आनन्द प्राप्ति की दिशा

रेशम का कीड़ा अपना खोल आप बुनता है और उसी में बंध कर रह जाता है। मकड़ी के बंधन में बाँधने वाला जाला उसका अपना ही तना हुआ होता है। इसे उनकी प्रवृत्त की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। जब रेशम का कीड़ा खोल में से निकलने की बात सोचता है तो बुनने की तरह उसे कुतर डालने में भी कुछ कठिनाई नहीं होती। मकड़ी अपने फैलाये जाल को जब चाहे तब समेट भी सकती है इन्द्रिय लिप्साओं और ममता अहंता को प्रधानता देकर मनुष्य शोक सन्ताप की विपन्नता में ग्रस्त होता है। यदि वह अपनी दिशा पलट ले तो जीवन मुक्त स्थिति का आनन्द प्राप्त करने में भी उसे कोई अड़चन प्रतीत न होगी।

मनुष्य को सोचने और करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। उसका उपयोग भली या बुरी सही या गलत किसी भी दिशा में वह स्वेच्छा पूर्वक पूरा कर सकता है। अब बंधन में बंधना भी उसका स्वतंत्र कर्तृत्व ही है। इसमें माया, प्रारब्ध, शैतान, ग्रह−नक्षत्र आदि किसी अन्य का कोई दोष या हस्तक्षेप नहीं है। जीवन के स्वरूप और उद्देश्य से अपरिचित व्यक्ति ही भौतिक लालसाओं और लिप्साओं में स्वतः आबद्ध होता है।

समस्त विभूतियों से संपन्न मानव जीवन का अनुदान और सर्वतंत्र स्वतंत्रता का उपहार देकर भगवान ने अपने अनुग्रह का अंत कर दिया। अब वह मनुष्य पर निर्भर है कि वह उसका सदुपयोग करे और जीवनमुक्त स्थिति प्राप्त करे अथवा दुरुपयोग कर मोहपाश, लिप्सा जाल में आबद्ध हो जाय, उलझ कर आत्मविनाश करले। क्लेशों और दुःख दैवित्यताओं से मुक्ति उसके अपने ही हाथ में है। -श्री रामकृष्ण परमहंस


मंगला मंगलम्

भवन अमंगल-मकड़ियों ने जहाँ तहाँ जाले बुन रखे हैं, शिशुओं का शौच दुर्गन्ध फैला रहा है-पशुओं ने सर्वत्र गोबर फैला रखी है, सर्वत्र अस्वच्छता, अमंगल ऐसे घर में रहना तो नर्क में रहना है। दिन भर यही विचार उठता रहता, श्रुतिधर बेचैन हो उठे, यह भवन अमंगल है कह कर एक दिन उनने गृह-परित्याग किया और समीप के एक गाँव में जाकर रहने लगे। ग्राम वासी निर्धन हैं, अशिक्षित, हैं मैले कुचैले वस्त्र पहन कर सत्संग में सम्मिलित होते हैं गाँव की गन्दगी ने पुनः श्रुतिधर के मन में पीड़ा भर दी। ग्राम भी अमंगल है-इस अमंगल में कैसे जिया जाये? श्रुतिधर ने उसका भी परित्याग किया और निर्जन वन में एक वृक्ष के नीचे एकाकी कुटी बना कर रहने लगे।

रात आनंद और शान्ति के साथ व्यतीत हो गई किन्तु प्रातःकाल होते ही पक्षियों का कलख, कुछ जंगली जीव उधर से गुजरे थे कुटी के बाहर उनने आखेट किये जीवों की हड्डियाँ छोड़ दी थी, आशंका से ओत-प्रोत श्रुतिधर के अन्तःकरण को आकुलित करने के लिए इतना ही पर्याप्त था, उन्हें वन में भी अमंगल के ही दर्शन हुये। अब क्या किया जाए वे इसी चिन्ता में थे तभी उन्हें सामने बहती हुई श्वेत सलिला सरिता दिखाई दी, उन्हें आनंद हुआ, विचार करने लगे यह नदी ही सर्व मंगल सम्पन्न है सो कानन-कुटी का परित्याग कर वे उस शीतल पयस्विनी के आश्रय में चल पड़े।

शीतल जल के सामीप्य से उन्हें सुखद अनुभूति हुई अंजुलि बाँध कर उन्होंने जल ग्रहण किया तो अन्तःकरण प्रफुल्लित हुआ, पर इस तृप्ति के क्षण अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हो पाये थे कि उनने देखा एक बड़ी मछली ने आक्रमण किया और छोटी मछली को निगल लिया, इस उथल पुथल से सरिता के तट तक हिलोरें पहुँची-जिससे वहाँ रखे मेंढकों-मच्छरों के अंडे बच्चे पानी में उतरने लगे अभी यह स्थिति स्थिर भी न हो पाई थी कि ऊपर से बहते-बहते किसी श्वान का शव उन के समीप आ पहुँचा। यह दृश्य देखते ही श्रुतिधर का हृदय घृणा से भर गया। उन्हें उस नदी के जल में भी अमंगल के ही दर्शन हुये।

अब कहाँ जाया जाए? इस प्रश्न ने श्रुतिधर को झकझोरा वन, पर्वत, आकाश सभी तो अमंगल से परिपूर्ण हैं उनका हृदय उद्वेलित हो उठा। इससे अच्छा तो यही है कि जीवन ही समाप्त कर दिया जाए अमंगल से बचने का एक ही उपाय उनकी दृष्टि में शेष रहा था।

श्रुतिधर ने लकड़ियाँ चुनी, चिता बनाई प्रदक्षिणा की और उस पर आग लगाने लगे तभी उधर कहीं से वासुकी आ पहुँचे। यह सब कौतुक देख कर उनने पूछा-’तात! यह तुम क्या कर रहे हो। दुःख भरे स्वर में श्रुतिधर ने अपनी अब तक की सारी कथा सुनाई और कहा जिस सृष्टि में सर्वत्र अमंगल ही अमंगल हो उसमें रहने से तो मर जाना अच्छा।

वासुकी मुस्कराये, एक क्षण चुप रहे फिर मौन भंग करते हुए बोले-वत्स! तुम चिता में बैठोगे, तुम्हारा शरीर जलेगा, शरीर में भरे मल भी जलेंगे उससे भी अमंगल ही तो उपजेगा, उस अमंगल में क्या तुम्हें शान्ति मिल पायेगी?

तात! सृष्टि में अमंगल से मंगल कहीं अधिक है घर में रहकर सुयोग्य नागरिकों का निर्माण, गाँव में शिक्षा संस्कृति का विस्तार, वन में उपासना की शान्ति और जल में दूषण का प्रच्छालन प्रकृति की प्रेरणा यही तो है कि सृष्टि में जो मंगल है उसका अभिसिंचन परिवर्धन और विस्तार हो जो अमंगल है उसका शुचि-संस्कार, यदि तुम इसमें जुट पड़ो तो अशान्ति का प्रश्न ही शेष न रहे, श्रुतिधर को यथार्थ का बोध हुआ वे घर लौट आये और मंगल की साधना में जीवन बिताने लगे।


ईश्वर हमें दीखता क्यों नहीं

ईश्वर यदि है तो प्रत्यक्ष क्यों नहीं दीखता? यह तर्क लोग करते रहें हैं। विकसित बुद्धि के व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व के विषय में यदि शंकालु हुए भी, तो उनकी वह शंका इतनी स्थूल नहीं होती है कि पर्याप्त खोज-बीन कि बिना निष्कर्ष निकाल लिए जाये। विज्ञान की अधुनातन खोजों ने तो विकसित-मस्तिष्क और अद्यतन जानकारी वाले लोगों को अद्वैत सत्ता के प्रति नये सिरे से आस्थावान बना डाला है। यह स्वाभाविक भी है।

वस्तुतः नास्तिकता एक प्रकार की मानसिक अक्षमता मात्र है। जो अपनी हीनता ढ़कने के लिए मानसिक प्रखरता का अभिनय रचती है। ऊपरी तौर पर नास्तिक बड़ा तर्कयुक्त दीखता है, लगता है कि वह अपने पैने विचारों से सत्य को छानना और पहचानना चाहता है। परन्तु इस पैनेपन की पीछे प्रायः दुर्बलताजन्य पूर्वाग्रह छिपा रहता है।

पैनी बुद्धि से विचार करें तो ईश्वर के न दिखाई पड़ने से उसके अस्तित्व पर ही शंका करने का कोई भी कारण सही नहीं सिद्ध हो पाता। ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति न हो पाना, व्यक्ति की सीमाएँ ही स्पष्ट करता है न कि ईश्वर का अनस्तित्व।

अनेक वस्तुएं हम से दूर होती हैं वे हमें तब तक दिखाई नहीं पड़ती, जब तक हम उनके इतने पास न पहुँच जाएँ कि हमारी दृष्टि-सामर्थ्य के क्षेत्र के भीतर हो जाये। दूरी के कारण वस्तुओं का न दिखाई पड़ना ही उनका न दिखाई पड़ना ही उनका न होना नहीं सूचित करता। वे हैं तो, किन्तु हम उनसे दूर हैं, बस इतना ही पता चलता है। हमारे संवेदन और ज्ञान का स्त्रोत मस्तिष्क है। वह मस्तिष्क ईश्वरीय सत्ता से विलग, विपरीत और दूर-दूर ही भटकता रहे, सामान्य साँसारिक विषयों तथा प्रयासों में ही उलझा रहे, तो ईश्वरानुभूति किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।

ईश्वर से यह दूरी मनुष्य स्वयं बढ़ा लेता हैं अपनी हलचलों का क्षेत्र वह ऐसी ही वस्तुओं एवं इच्छाओं को पाने, पूरा करने वाला बनाये रहता हैं जो ईश्वरीय चेतना की अनुभूति से उसे दूर ठेले रहती है। यद्यपि वह परम सत्ता है हमारे अति निकट। तथापि यह अति समीपता भी ईश्वरानुभूति में सहायक नहीं, बाधक ही बन बैठती है। आँखों में देखने की शक्ति है लेकिन आँखों में लगा सुरमा वे स्वयं तभी देख पाती हैं, जब दर्पण में प्रतिबिंब देखा जाय। ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति भी सामान्य व्यक्तियों को प्रायः तभी हो पाती है, जब वे कहीं उसका प्रतिबिंब देखते है। अंतःस्थल सत्ता का बहिर्मुखी मन को सामान्यतः अनुभव नहीं हो पाता। यद्यपि वह न केवल है, अपितु अत्यंत समीप है।

अति सामीप्य ही नहीं सादृश्य की अनुभूति में बाधक बनता है। समुद्र में वर्षा का पानी नद-नदियों का जल मिलता है, वहाँ उनका पृथक अस्तित्व नहीं दिखाई पड़ता। बाहर भिन्न गुण धर्मी वस्तुओं के बीच तो उनका अस्तित्व देख जा सकता है बादलों से वायुमंडल से होकर आता पानी और पहाड़ों-मैदानों के बीच दौड़ते नदी-नद तो अलग ही दिखाई पड़ते हैं, पर समुद्र के भीतर उन्हें अलग से ढूँढ़ बता पाना सम्भव नहीं रह जाता। चेतना समुद्र की बूंदें समुद्र की अलग से अनुभूति सरलता से कैसे कर पाये? यह अति दुष्कर कार्य है। मनुष्य की अनुभूतियाँ इसी परमचेतना के प्रकाश की उपस्थिति में संभव होती है। वह चेतना-अंश प्रकृति के विभिन्न रूपों की, उनकी हलचलों को समझने की क्षमता देता है। किन्तु चेतना के अनन्त समुद्र को देख-समझ पाना उसके लिए कठिन हो जाता है। गंगा के प्रवाह में एक बोतल दबा, मदिरा या एक लोटा दूध, डाल देने के बाद फिर उसे अलग नहीं देखा पहचाना जा सकता। चेतन मन का परम चैतन्य सत्ता को देख पाना इसी प्रकार कठिन है। मन-मस्तिष्क की संरचनात्मक भिन्नता के बावजूद चेतन-तत्व उनका सामान्य गुण है। प्रकृति की बारीकियों को समझने के लिए भी असाधारण प्रयास-पुरुषार्थ अपेक्षित होते हैं। किन्तु वहाँ मन मस्तिष्क चेतना के उपकरण के रूप में काम कर रहे होते हैं। स्वयं चेतना के स्वरूप को समझना स्वजाति-सादृश्य के कारण अधिक कठिन होता है

अनेक रोगों के कीटाणु या विविध शब्द तरंगें ध्वनि कम्पन आदि हमारे इर्द गिर्द मौजूद रहते हैं। माइक्रोस्कोप से आस पास जो कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है साधारणतः हमें उसका भान ही नहीं होता। रेडियो सेट पर निश्चित स्टेशन पर सुनाई पड़ने अथवा टेलीविजन के पर्दे पर दिखाई पड़ने वाली शब्द-तरंगें दृश्य-तरंगें, ध्वनि-तरंगें इसके पूर्व भी हमारे ही पास से होकर गुजर रही थी, किन्तु उनकी सूक्ष्मता एवं हमारी दृष्टि-सामर्थ्य की सीमा के कारण उन्हें देख जान पाना सम्भव नहीं था। विभिन्न ग्रह नक्षत्रों से क्वासर-पल्सर जैसे विकिरण प्रतिपल हम पर बरसते रहते हैं, परन्तु हमें उनकी प्रतीत नहीं हो पाती। क्योंकि वे हमारी इन्द्रिय क्षमता के अनुपात में अति सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चेतना तत्व ही लोगों की अनुभूति में अनायास कैसे आ जाये? उस हेतु पहले बसी सामर्थ्य विकसित करनी होगी। नेत्रहीन को सामने का रूप नहीं दिखाई पड़ता जबकि वहीं पास खड़ा कोई नेत्रयुक्त व्यक्ति उसे सरलता से देख सकता है। ईश्वरानुभूति के लिए भी भीतरी नेत्र चाहिए, शक्ति का विकास चाहिए। मन को वैसा ढालना पड़ता है उसे ईश्वराभिमुख बनाना होता है और उसकी अन्तर्मुखी सामर्थ्य बढ़ानी होती है।

मन-मस्तिष्क जैसी गतिविधियों में डूबे रहते हैं उन्हीं विषयों में गहराई तक उनकी पैठ हो पाती है। ऐसे अनेक लोग होते है, जिनकी समझ में साहित्य या कलात्मक विषय जल्दी आ जाते हैं, पर गणित का प्रश्न पूछ लेने से ही उनका दिमाग साँय-साँय करने लगता है। उन्हें वह अति जटिल दुरूह विषय-वस्तु लगती है। कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता। जबकि गणित में रुचि रखने वाले को वे ही प्रश्न अति सरल लग सकते हैं। वह सोत्साह उनको हल करने में जुट सकता है। मन की तत्परता और अभ्यास से ही अनुभूति एवं बोध के गहरे आधार बनते हैं। जिस दिशा में क्षमता प्रयास पूर्वक बढ़ा ली जाती है, उसी ओर तीव्र गति सम्भव होती है। अनजाने विषय क्षेत्रों में दिमाग नहीं चल पाता। ईश्वरानुभूति पर भी यही तर्क स्वाभाविक रूप में लागू होता है। यदि उस ओर प्रवृत्ति ही नहीं हुई आध्यात्मिक चिन्तन-मनन अंतर्दर्शन, अन्तःअवलोकन कर अभ्यास नहीं रहा, तो ईश्वरानुभूति कठिन होगी ही।

जब मन किसी विषय में तल्लीन होता है तो समीप की ही दूसरी हलचलें कई बार ध्यान में नहीं आती। कोई अध्येता अध्ययन में, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में या दक्षशिल्पी अपने कारखाने में जब मनोयोग में जुटा हो, तो पास से निकल जाने वाले लोगों की उन्हें कुछ भी जानकारी नहीं हो पाती। इसका कारण मन की विषय-लीन हो जाने की क्षमता एवं प्रवृत्ति ही है। साँसारिक विषय कामनाओं, हलचलों और रंग रूपों में डूबे दिल-दिमाग में जो तर्क तथा जो विश्वास रूढ़ हो जाते हैं उससे भिन्न तर्क तथा अनुभूतियाँ समझ में ही नहीं आती। उस ओर ध्यान ही नहीं जा पाता। अतः ईश्वरानुभूति से सम्बन्धित बातों की ओर कुछ यदि लोगों का मन ही न जाए, तो इसी से उनकी निस्सारता या आधारहीनता नहीं सिद्ध होती।

दिन के समय तारे दिखाई नहीं पड़ते। यद्यपि वे होते उस समय भी आकाश में ही हैं। अपने सामान्य क्रम में ही वहाँ विद्यमान होने पर भी वे लोगों के लिए अप्रकट होते है। यह उन तारों का वास्तविक तिरोभाव न होकर भी मनुष्य के लिए तो उनका तिरोभाव ही है। दिन के प्रकाश की चकाचौंध को भेदकर ऊँचे आकाश की ओर दूर तक ताक सकने की क्षमता मनुष्य की आँखों में नहीं है। जागतिक चकाचौंध इससे कम नहीं, अधिक ही प्रखर होती है। उनमें डूबे लोग ईश्वरीय आलोक को देख समझ न पायें, इसमें आश्चर्य की कोई अधिक बात नहीं। जब इस आपाधापी में ही मन नहीं डूबने-उतरने दिया जाता वरन् साथ ही साधना-उपासक द्वारा अपनी आन्तरिक क्षमताएँ विकसित-परिष्कृत करली जाती है, तो ईश्वरीय सत्ता की प्रतिपल अनुभूति स्वाभाविक हो जाती है। जैसे दूरदर्शन यंत्र से दिन में तारे देखे जा सकते हैं उसी प्रकार तब साँसारिक भागदौड़ के बीच भी आत्म सत्ता का दर्शन-स्मरण होता रह सकता है।

हमारे ही मनोभावों की परतें हमारी अन्तःचेतना पर जमती चली जाती है। दूषित अनगढ़ भावनाएँ कामनाएँ चित्त को बरसाती बाढ़ से उफन रही नदी जैसा बना देती है, आँखों पर मोह-लाभ एवं अज्ञान के पर्दे डालती रहती है। पर्दे की पीछे बैठा आदमी, जमीन में गड़ा हुआ धन सन्दूक में बन्द रखी वस्तुएँ दिखाई नहीं पड़ती। बरसात के गंदले पानी के प्रवाह में नीचे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। पर्दा उठा देने पर; जमीन की मिट्टी पत्थर खोद कर हटा देने पर या संदूक का ऊपरी पल्ला उठाने पर क्रमशः व्यक्ति, धन एवं वस्तुएं स्पष्ट दिखाई दे सकती है। शाँत-स्वच्छ जल में नीचे तल तक साफ देखा जा सकता है। ईश्वरीय अनुभूति के मार्ग में अपनी ही संकीर्णताओं के कारण मनुष्य जो व्यवधान खड़े कर लेता है, उन्हें हटाने पर वह अनुभूति प्रत्यक्ष हो जाती है क्योंकि ईश्वर की महान शक्ति का अनुग्रह हम पर अनवरत बना रहता है, उसकी अनुकंपा सभी पर प्रतिपल बरसती रहती है। ईश्वरीय प्रकाश निरन्तर हमारे चारों ओर छाया रहता है भीतर भी और बाहर भी। आवश्यकता अपनी मलीनताओं-संकीर्णताओं को हटाने-अपनी सीमाओं को समझने और विवेक-ज्योति को प्रज्वलित रखने की है।

भौतिक विज्ञानी आज स्वयं भी उस मोड़ पर पहुँच गये हैं, जहाँ वे पदार्थ के मूल स्वरूप तक के बारे में कोई निर्णय नहीं कर पा रहे हैं, जहाँ उनको ज्ञात हुआ कि यह सम्पूर्ण सृष्टि चेतन-तरंगों का सुव्यवस्थित क्रिया-व्यापार है। आज वैज्ञानिक इस तथ्य पर एकमत हैं कि चेतन-सत्ता की खोज जड़ उपकरणों द्वारा सम्भव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में नास्तिकता के रूढ़ तर्क अल्पज्ञता एवं दुराग्रह का ही परिणाम हो सकते हैं। ईश्वर के न दिखाई पड़ने, अतः न होने की बात अब पूरी तरह बेजान हो गई है। वैज्ञानिक बुद्धि इस तर्क को भ्राँत और अपर्याप्त मानती है उस महासूक्ष्म सर्वव्यापी तत्व को विनम्रता, विवेक, साधना एवं सद्ज्ञान द्वारा ही देखा-समझा जा सकता है।


यशस्वी ख्याति से विभूषित (kahani)

आगे बढ़ने की प्रबल कामना, ऊँचा उठने की अदम्य अभिलाषा जाग पड़ी एक किशोर के मन में। पैसे का अभाव और विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करने का लम्बा खर्च। जैसे तैसे किराया मात्र जुटा सका। वहाँ पहुँच कर क्या होगा कुछ पता नहीं। एक मात्र मनोबल के सहारे अमेरिका पढ़ने चल दिया। वहाँ जाकर वैभव तथा विलास साम्राज्य देखा। वहाँ का औसत नागरिक यहाँ के किसी धनाढ्य से कम न था। पैसा कदम कदम पर बिखरा सा लगता, चाँदी सोने की कोई कीमत नहीं। हर चीज इतनी महंगी कि मूल्य सुन कर प्राण काँप जाते।

ऐसे शहर रहना तथा पढ़ना कितना मुश्किल था। पर इस साहसी युवक ने न हिम्मत हारी न साहस छोड़ा। पैसा तो आखिर चाहिए ही था। तब उसने खेतों पर जाकर काम करना प्रारम्भ किया। बगीचे में जाकर काम किया। और एक बार तो होटल में झूठी प्लेटें साफ करने का काम भी करना पड़ा। जो भी परिस्थिति उसके सामने आई अपने संकल्प बल से जीता और जीवन संग्राम में अपने साहस को हारने नहीं दिया। ऐसी अटूट निष्ठा तथा असाधारण लगन के धनी थे श्री जयप्रकाश नारायण। जो न विपत्ति से हारे न कभी निराश हुए और अपनी असाधारण मनस्विता के बल पर आगे बढ़ते चले आये और आज लोक नायक यशस्वी ख्याति से विभूषित हैं


ब्रह्म सत्यं-जगत मिथ्या का व्यावहारिक स्वरूप

जिस जाति की विचार-प्रणाली ब्रह्म सत्यं-जगत मिथ्या” पर आधारित है, उसमें वैराग्य, संन्यास प्रियता एवं ज्ञान-पिपासा का होना स्वाभाविक है। किन्तु यह सिद्धांत जीवन सत्य के महत्वपूर्ण व्यावहारिक पक्ष के प्रति उदासीन है। ज्ञान की प्रबल इच्छा के साथ ही साथ अन्य भी बहुत सी वृत्तियाँ मानव के अन्दर क्रीड़ा करती रहती है, उनकी उपेक्षा करके कोई भी समाज अधिक दिनों तक अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता। ब्रह्म सत्य है तथा जगत मिथ्या यह सिद्धांत सत्य है, पर इस सिद्धांत को समझने में प्रायः भ्रम हो जाता है। विषय वासनाओं के प्रति साधक के हृदय में वैराग्य उत्पन्न करने के लिए प्रतिपादन हुआ था कि न कि उस जगत के प्रति-जिसके द्वारा हमें जीवन साधनों की प्राप्ति होती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि साधनों के बिना मानव अपने लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकता और न जीवित ही रह सकता है। इस दृष्टि से साधनों की अपनी महत्ता एवं उपयोगिता है।

जब तक मनुष्य वासनाओं, तृष्णाओं को सत्य मानकर चलता है तथा उसमें लिप्त रहता है, वह ‘ब्रह्म सत्य है’ इस सिद्धांत की कल्पना भी नहीं कर सकता। अभ्यास के लिए यह सत्य है किन्तु अभ्यास कि उपरान्त व्यावहारिक दृष्टि से ‘सर्व खल्विदं-ब्रह्म’ को ही उपयोगी मानना पड़ता है। जगत को मिथ्या मानने वाले अपने प्रति भले ही अत्याचार न करते हो किन्तु यह भावना बनाकर समाज का घोर अहित करते है। अन्य व्यक्ति भी उनके इस आचरण का अनुकरण करके सामाजिक उत्तरदायित्वों से विमुख होने लगते हैं।

‘जगत मिथ्या’ की मान्यता से कर्म से विरत होकर उस परम् सत्य की खोज ही सम्भव नहीं है। जीवन का अस्तित्व कर्म पर ही टिका है। कर्म के बिना तो एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता है। जीवनमुक्त भी लोक कल्याण के लिए कार्य करते हैं। संसार को माया मानकर कर्म को त्यागकर बैठना, एक प्रकार का पलायनवाद है। इसे अपनाकर कोई भी पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। ‘ईशावास्योपनिषद्’ कर्मवाद का समर्थन करते हुए कहता है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥

अर्थात्- श्रेष्ठ कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करते रहने से मनुष्य कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।

गीता में भी कर्मों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं-

तस्मादसक्तः सतत कार्य कर्म समाचार। असक्तो ह्माचरर्न्कम परमाप्नीति पूरुषः॥ (गीता 3119)

हे अर्जुन। तू अनासक्त हुआ निरन्तर श्रेष्ठ कर्म का आचरण कर, क्योंकि अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। जब ईश्वर तक विश्व के संरक्षण एवं पालन-पोषण के लिए कार्य करना स्वीकार किए हुए हैं तो मनुष्य का कर्म से विरत होना अनुचित एवं अविवेकपूर्ण है। मिथ्या जगत के पोषण अभिवर्धन में फिर भला ईश्वर ही क्यों इतना श्रम एवं अपनी शक्ति का उपयोग करता। ईश्वर को अपनी बनायी सृष्टि के प्रति असीम प्यार है। अतः ईश्वर के प्रति हमारा प्यार उसकी सृष्टि के प्रति हमारे प्यार के रूप में परिलक्षित होना चाहिए। जिसकी अभिव्यक्ति का आधार है श्रेष्ठ कर्म - सृष्टि को अधिकाधिक सौंदर्ययुक्त बनाने की उदात्त भावना से कर्म में निरन्तर जुटे रहना।

प्रश्न यह नहीं है कि मैं क्या करूं कि मेरा उद्धार हो जाय वरन् यह है कि मैं किस भावना से कार्य करूं जिससे अपनी आत्मा को निर्लिप्त एवं निसर्ग रखने के साथ ही साथ संसार का परित्याग भी नहीं करना पड़े। ‘बृहदारण्यक’ उपनिषद् में वर्णन आता है कि बह्मविद् लोग संसार का पुनः निर्माण करते हैं। फलतः निष्काम भाव से किया हुआ कार्य न तो आत्मा को बाँधता है न ही उसे मलिन करता है। जब तक उस ब्रह्माण्डीय प्रक्रिया की समाप्ति नहीं हो जाती तब तक जीवन-मुक्त पुरुष भी विश्वात्मा के लिए कार्य करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में जब कर्म का क्षेत्र भी यह दृश्यमान जगत है, तो उसको मिथ्या मानकर चलना अविवेकपूर्ण है। ब्रह्म सत्य तो है किन्तु उस सत्य तक पहुँचने के लिए जगत को भी सत्य मानकर चलना होगा। निष्काम भाव से कर्म करते हुए तभी परम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।


आर्श्चवत्पश्यति कश्चिदेनं

मनुष्य - शरीर की संरचना अपने आप में इतनी विस्मयकारक है कि उसका जितना ही अधिक विचार-विश्लेषण किया जाय, उतना ही अधिक यह तथ्य स्पष्ट होता है कि ईश्वर न इस अद्भुत यंत्र का उपहार हल्के-फुल्के प्रयोजनों के लिये कदापि नहीं दिया होगा जिस आश्चर्यजनक वैज्ञानिक सामर्थ्य, गणितीय बुद्धि तथा व्यवस्था एवं संचालन की अनुशासित योजना से इस शरीर का निर्माण किया गया है, वह इतनी प्रचंड एवं समर्थ चेतन सत्ता का ही कार्य हो सकता है, कि उसके इस निर्माण को कुतूहल या क्रीड़ा मान सकना असम्भव है। किसी खेल भर के लिये, विनोद-मनोरंजन के लिये भला कभी ऐसा अनुपम और विराट यंत्र समूहों से सज्जित विशाल कारखाना रचा जाता है?

वैज्ञानिक अन्वेषणों ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया है कि मानव-शरीर अपनी मिसाल आप है। यह सच है कि कुछ प्राणी मनुष्य से अधिक तेज दौड़ते हैं, कुछ लम्बी कूद लगा सकते हैं, कोई उड़ सकते हैं, तो कोई स्पर्श, श्रवण या घ्राण-संवेदना की दृष्टि से मनुष्य हजार गुना विकसित होते है। लेकिन बौद्धिक-सामर्थ्य ही नहीं, देह की संरचना की दृष्टि से भी मनुष्य अनुपम है। ऐसा कोई भी जानवर नहीं है, जो दौड़ने कूदने, उछलने और फेंकने सब में समान रूप से दक्ष व निपुण हो।

206 हड्डियों और 600 से कुछ ऊपर माँसपेशियों के ऊपर चमड़ी का चोला तना है। हड्डियाँ, माँसपेशियाँ और चमड़ी तीनों की ही संरचना का कौशल अनूठा है।

हड्डियों जैसी मजबूत किन्तु हल्की वस्तु की कल्पना करना भी कठिन है। पूरे शरीर का जितना वजन होता है, हड्डियाँ उसके पंचमांश से भी कम वजन की होती है। अपनी देह का ही भार इन पर कुछ कम नहीं होता। जब हम खाली हाथ डुलाते चल रहे होते हैं, उस समय हमारी जाँघ की हड्डी के एक-एक वर्ग इंच क्षेत्र पर पाँच-पाँच सौ किलो का दबाव पड़ रहा होता है। शरीर का भार, धरती का गुरुत्वाकर्षण और हवा की तेज मार ये तीन दबाव हड्डियाँ झेल रही होती है। इस दबाव को जो उस समय मानव-शरीर की हल्की हड्डियाँ झेल रही होती है, इस्पात की छड़ ही बर्दाश्त कर सकती है। जब कुली भारी बोरों का बोझ ढोते हैं, जब वेट-लिफ्टर चैम्पियन प्रतियोगिता प्रदर्शनों में सैकड़ों किलो वजन उठाते हैं, तब हाथ और पैर की हड्डियों पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है। सीमेन्ट और इस्पात को भी मात करने वाली ये हड्डियाँ कितनी मजबूत और फिर भी कितनी हल्की होती है।

फिर इन हड्डियों की बनावट का कौशल और सूझबूझ भी गजब की हैं आधुनिक इमारतों में गोलाईदार पतली छत बनाई जाती है। क्योंकि अंडाकार खोल पतला होने पर भी मजबूत रहता है। मानव-मस्तिष्क की रक्षक खोपड़ी की हड्डियाँ ऐसी ही गोलाईदार मजबूत प्लेटों की शक्ल में होती है। जहाँ जैसी आवश्यकता हो वहाँ वैसा आकार। जाँघ की हड्डियों पर ज्यादा जोर पड़ता है, तो उन्हें भी एक खोखले बेलन की आकृति दी गई है। जाँघ और कूल्हे की हड्डियों या बाँह और कंधे की हड्डियों का जोड़ ऐसा है, जैसे किसी गोल छल्ले में गेंद फंसादी जाये, ताकि आसानी से घूम भी सके और फंसी भी रहे। खोपड़ी, कूल्हे जैसे स्थानों में हड्डी का हिलना-डुलना घातक-हानिकारक हो सकता है, अतः वहाँ के जोड़ अति सुदृढ़ बने हैं। नारी की कूल्हे की हड्डियाँ पुरुषों से भिन्न होती है। उनमें यह व्यवस्था रहती है कि प्रसव-काल समीप आते ही जोड़ कुछ खुल जाये, ताकि शिशु बाहर सुगमता से आ सके। पसलियों का जोड़ सामने सीने की हड्डी पर मजबूत होता है किन्तु पीछे रीढ़ की हड्डी के साथ उनके जोड़ घूम और फिसल सकने वाले होते हैं, ताकि फेफड़ों की धौंकनी के फैलने-सिकुड़ने में आसानी हो।

हड्डियों की इन जोड़ों की सुव्यवस्था का ही परिणाम है कि हम शरीर को तरह-तरह से घुमा सकते हैं। हाथों को पूरे 360 अंश के कोण में से किसी भी कोण पर, किसी भी दिशा में घुमाया जा सकना अपने आप में एक चमत्कार ही है। कोई भी एक अकेली क्रेन इस प्रकार सभी दिशाओं में नहीं घूम सकती। फिर इन हड्डियों में ऐसी विशिष्टता है कि प्रबल आघात-प्रहार से यदि वे टूट जायें, तो स्वतः ही जुड़ सकती है। हाँ अपने आप जुड़ने की क्रिया धीमी अवश्य होती है। जब तक मनुष्य अपने ही शरीर पर अत्याचार की अधिकता न करदे, हड्डियों की कोई बीमारी नहीं लगती।

वस्तुतः मनुष्य का शरीर ही नहीं, मन, बुद्धि, अन्तः-करण सभी इतने समर्थ होते हैं कि छोटी-मोटी भूलों को सुधार लेना या हल्के-फुल्के आघातों को झेल लेना उनके लिये सरल बात होती है। अनाचार और अपव्यय की अति ही उन्हें जर्जर और रुग्ण बनाती है।

इसी प्रकार दुराग्रह ही मनुष्य को रुक्ष और संकीर्ण बनाते है। अन्यथा उसमें स्वाभाविक रूप से सरसता भरी लोच रहती है। जिससे वह हर परिस्थिति में तालमेल बिठा सकता है और प्रतिकूलताओं के बीच प्रसन्न रहते हुए उन्हें क्रमशः अनुकूलता में बदल सकता है।

शरीर की माँसपेशियों तक में यह लोच और शक्ति पाई जाती है। इसीसे सिकुड़ती-फैलती रहकर वे देहव्यापार साधे रहती है। ये अपने से हजार गुना वजन सम्हालती रहती है। इनकी क्षमताएँ विस्मयकारक हैं। पेट की माँसपेशी भोजन ग्रहण करने के लिये स्वतः फैलती चली जाती है। हृदय की माँसपेशी गर्भस्थ शिशु में तीसवें दिन से काम करना शुरू कर देती है और ‘अहर्निश सेवामहे’ का साकार उदाहरण बनी आजीवन निरन्तर क्रियाशील रही आती है। साधारण काम करते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपनी माँसपेशियों पर इतना जोर डालता है जितना कि जोर टनों माल उठाते समय किसी क्रेन को लगाना पड़ता है। अपनी हड्डी और माँसपेशी तो आदमी साधारणतः देख नहीं पाता। पर चमड़ी पर उसकी नजर नित्य ही पड़ती है। इस चमड़ी को रंगने पोतने में लोग हजारों रुपये खर्च करते हैं। पर चमड़ी के वास्तविक चमत्कार को कम ही लोग जान पाते हैं और जानने पर भी स्मरण तो और भी कम लोग रख पाते हैं।

(1) बाहरी ताप-शीत को झेलने (2) शरीर के भीतरी ताप को सामान्य बनाये रखने, (3) स्पर्श बोध के द्वारा आसपास की जानकारी निरन्तर देते रहने और (4) भीतरी अंगों-अवयवों को चोट-चपेट, कीटाणु-विषाणु से बचाये रखने की चतुर्विध सेवा चमड़ी निरन्तर करती रहती है। जबकि शरीर के किसी भी हिस्से में यह एक इंच के पंचमांश से भी अधिक ही पतली होती है। इतनी नाजुक पतली इस चमड़ी के भी हिस्से होते हैं

चमड़ी का बाहरी हिस्सा जो एपीडर्मिस कहलाता है, एक चतुर चौकीदार है। अपनी चौकीदारी के कर्त्तव्य की पूर्ति के लिये जहाँ जैसी व्यवस्था आवश्यक होती है वैसी ही व्यूहरचना उसने कर रखी है। आँख जैसे कोमल स्थान की रक्षा के लिये वह इतनी पतली व मृदु हो गई है कि एक इंच के दो हजारवें भाग के बराबर ही उसकी तह है। अंगुलियों के नाजुक पोरों की रक्षा के लिये तो उसने नाखून का ही निर्माण कर डाला है। तलुओं में वह मोटे-तगड़े चौकीदार के रूप में बैठी है। हड्डियों के उन जोड़ो पर जहाँ मोड़ने की जरूरत पड़ती है, यह चमड़ी ढीली-ढाली होती है।

बाहरी चमड़ी के नीचे की तह किसी विशाल एवं व्यवस्थित दल के निष्ठावान स्वयं सेवकों की तरह चुपचाप काम करती रहती है। वह नित नये कोश रूपी कार्यकर्ता तैयार कर उन्हें व्यवस्थित रीति से आगे बढ़ाती है, ताकि समय आने पर वे बाहर मंच की व्यवस्था सम्हाल सकें। दुनिया को गोर-काले, भूरे-पीले के भेदों में फँसाने वाला “मेलेनिन” नामक पदार्थ इसी तरह तरह में होता है।”मेलेनिन” की अधिकता से रंग काला हो जाता है। तेज धूप और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिये अधिक “मेलेनिन” की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए गर्म देशों के लोग श्यामवर्णी होते हैं। गोरे भी अधिक समय यहाँ रहें, तो ताम्बई-भूरे होने लगते हैं।

भीतरी चमड़ी का कारोबार और भी जटिल है। उनमें लाखों बारीक तार यानी स्नायु-तंतु फैले रहते हैं, जो प्रत्येक स्पर्श की संवेदना मस्तिष्क तक ले जाते और वहाँ से आवश्यक सूचना-निर्देश लाते हैं। सर्दी-गर्मी, पीड़ा-रोमाँच आदि की अनुभूतियों के सन्देश- वाहक ये बारीक तार कुल मिलाकर अपने आप में किसी विशाल दूरभाष-केन्द्र की छवि पैदा करते हैं। मस्तिष्क के ‘हाइपोथेलमस’ केन्द्र से जैसे ही दूरभाष पर खबर मिली कि शरीर का तापमान बढ़ गया है वैसे ही रक्तवाहिनियों में रक्त प्रवाह की और चमड़ी में स्थिर स्वेदग्रंथियों की गति तेज हो जाती है और खून की बढ़ी हुई गर्मी बाहरी चमड़ी के रास्ते, पसीने के रूप में निकलने लगती है। तापमान गिरने की इस टेलीफोन से खबर मिलने पर रक्तप्रवाह कम हो जाता है, स्वेदग्रंथियां भी धीमी चाल से काम करने लगती हैं और चमड़ी तथा चर्बी की तहें शरीर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देतीं। इस प्रकार, किसी वायरलेस-सज्जित, अनुशासित एवं ईमानदार पुलिस-दल की तरह चौकस और सक्रिय, समर्पित स्वयं सेवकों की तरह निष्काम भाव से सेवारत तथा परिपक्व बुद्धि संचालकों-निर्देशकों की तरह सूझबूझ से काम लेने वाली यह शरीर की व्यवस्था जितनी विशाल है, उतनी ही जटिल भी।

इसकी क्रियाशीलता, सन्तुलन-क्षमता, लचीलापन, दृढ़ता सभी कुछ आश्चर्यजनक है। योग-व्यायाम, जिम्नास्टिक, सर्कस और ओलम्पिक खेलों में शरीर के इसी सन्तुलन के करतब देखकर लोग मुग्ध होते है। हाथ की अंगुलियों से उसी हाथ की कुहनी को छू सकना याकि गर्दन को मोड़कर चेहरा पीठ की तरफ ले जाना जैसे मोड़ ही असम्भव हैं। अन्यथा मानव-शरीर में इतनी अधिक मुड़ सकने, लचक-झुक सकने की सन्तुलन-सामर्थ्य है कि जो बेमिसाल है। क्रियाशीलता भी ऐसी ही अथाह है। बहुत अधिक श्रम करने पर माँसपेशियों में जो थकान होती है वह भी आराम के बाद पूरी तरह दूर हो जाती है, यदि मनुष्य स्वयं ही व्यर्थ की चिन्ताओं से मानसिक तनाव न लाद ले।

सामान्यतः मनुष्य अपने शरीर को इन आश्चर्यजनक क्षमताओं के प्रति जागरूक नहीं रहते। दूसरों की असमानताएं ही उन्हें आकर्षित करती हैं, पर वे असामान्य करतब वस्तुतः प्रत्येक के शरीर में अन्तर्निहित सामर्थ्य के किसी अंश-विशेष का नहीं प्रयत्नपूर्वक किया गया विकास होते हैं।

बिना कभी सोये दिन−रात लगातार वर्षों काम करने वाले अपवाद व्यक्ति की क्रियाशीलता का स्मरण कराते हैं। चलती रेल, मोटर रोक देने वाले राममूर्ति जैसे व्यायाम-विशारदों के कतरब हमें शक्ति का भान कराते हैं। कीलें, पिन और रेत खा-पचा लेने वालों को देखकर पाचन-शक्ति का ध्यान आता हैं। पिछले दिनों जब बंगला देश का स्वातंत्र्य-संघर्ष चला था, तो उसकी सहायता हेतु बीकानेर में श्री आशुगिरि ने लम्बे समय तक एक समय बालू-रेत खायी थी और बचा अन्न बंगला देश के लिये अर्पित किया था।

किन्तु यदि अपने ही प्रति जागरूकता हो तो ऐसी असामान्य घटनाओं को बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं पड़े। प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्रति क्षण चल रहा भव्य क्रिया-व्यापार स्वयं में ही इतना विस्मयविभोर कर देने वाला है कि आश्चर्यों की खोज के लिए बाहर दौड़ने के मेहनत जरूरी नहीं। अपने भीतर ही एक जादूगर मौजूद है। आवश्यकता अपनी इन विलक्षणताओं को समझने तथा उनका मूल्य आँकने और उनसे मार्गदर्शन पाने की है। परमेश्वर ने इतनी क्षमताएँ जिसे दी हैं वह मनुष्य खाने-पीने और रोने-कलपने में ही जीवन गुजार दे, तो उससे अधिक अयोग्य और अपात्र कौन होगा? हर परिस्थिति में मार्ग ढूंढ़ सकने और हजार तरह की गतिविधियों में दक्ष हो सकने की क्षमता उसमें विद्यमान है। आवश्यकता अपनी कीमत आप आँकने की है।

माँ के स्तन से जो दूध प्राप्त होता है, वह किसी भी “रेफ्रिजरेटर” में संरक्षित दूध को ताजगी में मात करता है। कान जैसा “साउण्ड फिल्टर” यन्त्र मनुष्य द्वारा बना पाना अभी स्वप्न ही है। आँख जैसे कैमरों का बन पाना भी अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। फिल्में बनाते समय भी फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन साधते हुए ‘फोकस’ मिलाना पड़ता है। ‘फोकल लेन्थ’ को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। पर पास से पास और दूर से दूर का दृश्य देखने के विभिन्न क्रम हम अपनी आँखों को आगे-पीछे हटाये बिना मजे में देखते रह सकते हैं। फिर वे एक ही बार में सही फोटो उतार लेती है, जबकि कैमरे के उल्टे फोटो दुबारा प्रिन्ट कर सीधे किये जाते हैं। सुरक्षा और सफाई के स्वतः प्रबन्ध और रंगों के वर्गीकरण की अतिरिक्त विशेषताओं का तो कैमरे में हो सकने का प्रश्न ही नहीं।

यही बात चारों तरफ की और भिन्न-भिन्न ‘फ्रीक्वेंसी” की ध्वनियाँ स्पष्ट सुन सकने की क्षमता वाले कानों के बारे में है।

हृदय, फेफड़े, गुर्दे सभी की सामर्थ्य गतिविधियाँ विस्मयकारी हैं। इनकी निरन्तर श्रमशीलता और कर्तव्यपरायणता इनके अद्वितीय समर्पण के प्रतिपादक तथ्य हैं। भोजन पचाने की आमाशय की क्रिया का तो कहना? अन्न को रक्त में बदल देने वाली इस रसायनशाला में अत्यंत जटिल और विलक्षण रासायनिक प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती रहती है।

इतने अधिक जटिल, बारीक शक्तिशाली और समर्थ यन्त्रों का संचालन-निर्देशन प्रधानतः शरीर में मस्तिष्क के नियन्त्रण से स्वतः होता रहता है। उसके लिये सचेत प्रयास कम ही किये जाते हैं। इस विराट और भव्य कारखाने को जितना ही देखा-परखा, समझा-सोचा जाय, उतना ही विस्मय भाव बढ़ता जाता है और गीता की ये पंक्तियाँ (2129) बार-बार याद आती है-

“आश्चर्य वत्पश्यति कश्चिदेनं, आश्चर्य व द्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्य वच्चैनमन्य श्रृणोति, श्रृत्वाप्येनं वेद न चैक्कश्चित्॥”

अर्थात्- कुछ लोग इस मानव पिंड को आश्चर्य से भरकर देखते हैं, कुछ लोग आश्चर्यवत्-इसका वर्णन करते हैं, जिसे कुछ अन्य आश्चर्य से भरकर सुनते हैं। इस पर भी कई लोग इसे जान नहीं पाते।

आवश्यकता इस आश्चर्योत्पादक अनुपम कृति के स्वरूप एवं प्रयोजन को समझने की है। इतनी श्रेष्ठ कृति को क्रीड़ा-विनोद के लिए सृजित मानने से बड़ी मूढ़ता और क्या होगी? फिर भी अपने को बुद्धिमान कहने-मानने वाले मनुष्यों में ऐसे मूढ़ों की संख्या कम नहीं अधिक ही है। यह भी अपने आप में एक आश्चर्य ही है। अन्यथा इतनी समर्थता के स्वामी में मूढ़ता-हीनता तो दुलर्भ ही होनी चाहिए।

आवश्यकता इन सर्वश्रेष्ठ अनुदानों के सदुपयोग द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने की है। तभी उस कर्ता की कारीगरी का सही सम्मान समझा जायेगा।


‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’’

प्रख्यात जर्मन विद्वान हेनरिख जीमर ने “मिथ्या एण्ड सिम्बल्स इन इण्डियन आर्ट एण्ड सिविलाइजेशन” नामक अपने ग्रन्थ में लिखा है कि “विष्णु, रुद्र, शक्ति, शिव, ब्रह्म आदि विविध पौराणिक प्रतीक युगों-युगों के अनुभूत जीवन-तथ्यों और सत्य की अभिव्यक्ति हैं।” वस्तुतः देव-सत्ताओं की आराधना और प्रसन्नता का लाभ उठाना तभी सम्भव है, जब हम उनके स्वरूप को ठीक-ठीक समझ सकें तथा उनके वर्णन-विश्लेषण के निहितार्थ को, उनमें अन्तर्निहित तत्वज्ञान को भली-भाँति हृदयंगम कर सकें।

भगवान शंकर और भगवती पार्वती का तात्विक स्वरूप क्या है? यह समझने के लिए शैव-शक्ति दर्शनों का गम्भीर अध्ययन-मनन तो उपयोगी है ही, “रामचरित मानस” जैसा लोकोपयोगी ग्रन्थ उस तत्वज्ञान को समझने का एक सर्वसुलभ उपकरण है। तुलसीदास जी ने ‘मानस’ के प्रारम्भ में ही, मंगलाचरण के द्वितीय श्लोक में इसकी स्पष्ट व्याख्या की है-

“भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ। याभ्या बिना न पश्यन्ति सिद्धा; स्वान्तः स्थमीश्वरम्॥”

अर्थात्- मैं उन श्रद्धा एवं विश्वास रूपी भवानी और शंकर की वन्दना करता हूं, जिनके बिना अन्तःकरण में अवस्थित परमात्म-सत्ता को सिद्धजन देख नहीं सकते।

यह श्लोक संक्षेप में अध्यात्म के तत्वज्ञान के आधारों का निरूपण है। आत्म-शक्ति की अनुभूति के लिये ये दो ही सम्बल हैं-श्रद्धा एवं विश्वास।

श्रद्धा और विश्वास अन्तःकरण की शक्तियाँ है। स्थूल शरीर की शक्ति क्रिया है। सक्रियता के बिना न तो जीवित रहा जा सकता, न ही प्रगति-उपलब्धि सम्भव है। इस सक्रियता का प्रेरक है-चिन्तन। यह सूक्ष्म शरीर की शक्ति है।

चिन्तन बुद्धि का व्यापार है। समझ, सूझ-बूझ, विचार, कल्पना, निर्णय सब इसी के अंग हैं। किन्तु चिन्तन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अन्तः-करण में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अन्तःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अन्तःकरण में उठी उमंगें, आकाँक्षायें, प्रेरणायें ही होती है। अन्तःकरण की प्रेरणा ही जीवन-दिशा का निर्धारण करती है। इस अन्तःकरण में घनीभूत भाव-संवेदना का नाम ही श्रद्धा है।

कोई भी व्यक्ति वही होता है, वैसा ही बनता चला जाता है, जैसी उसकी श्रद्धा होती है। बुद्धि और सक्रियता श्रद्धा के ही अनुगामी होते हैं। एक जैसी बुद्धि और एक जैसी क्रियाशीलता भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्रयुक्त होने पर आकाश-पाताल जैसे अन्तर उपस्थित करा देती है। यह अन्तर भिन्न-भिन्न श्रद्धा के ही परिणामों का होता है। अम्बपाली की श्रद्धा जब तक रूप-सौंदर्य की अधिकाधिक प्रशंसा प्राप्त करने में ही जीवन की सार्थकता देखती-समझती थी, तब तक वह नगर वधू थी। वही सौंदर्य, वही गतिशीलता, वही बुद्धि किन्तु श्रद्धा बुद्ध से, विवेक से, अध्यात्म से, आत्म-विकास एवं लोकमंगल के अभ्यास से जुड़ गई तो जीवन की दिशाधारा ही बदल गई, वह प्रख्यात बौद्ध भिक्षुणी बन गई। लोगों में काम जन्य आकर्षण को पैदा करने वाली, अब उनमें विवेक−बुद्धि को उभारने लगी। धन-वैभव लूटने और लुटाने वाली अब उस वैभव को हेय एवं आत्म-वैभव की ही वास्तविक उपादेय मानने लगी। रत्नाकर डाकू की श्रद्धा बदल गई तो वह महाकवि वाल्मीकि हो गया। महाविद्वान आचार्य रावण की श्रद्धा ने उसे क्रूर कर्मी राक्षस बना डाला। दुराचरण और निरंकुश भोग की श्रद्धा ने दुर्योधन को तब तक चैन से नहीं बैठने दिया, जब तक अपने सभी स्वजनों-सम्बन्धियों- सहयोगियों का और स्वयं अपना भी विनाश उसने नहीं करा डाला। यदि उसकी श्रद्धा भ्रातृत्व, मैत्री और सहयोग में रही होती, तो महाभारत न हुआ होता और आज भारतवर्ष का इतिहास ही भिन्न होता। उस महाविध्वंस में इतनी विकसित सभ्यता न नष्ट हुई होती तो सम्भवतः आज भी यह देश ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी ही रहा आता।

क्रिया और विचारधारा भी चेतना की ही शक्तियाँ है। किन्तु उनका स्वरूप एवं उनकी दिशा श्रद्धा के ही अनुरूप होती है। इसलिए श्रद्धा को मानवीय चेतना की मूल शक्ति कहा जा सकता है। गीता में भी कहा है-

“श्रद्धामयोऽयं पुरुषो, यो यच्छृद्वः सः एवसः।”

अर्थात्- व्यक्ति श्रद्धामय ही है। जिसकी जो श्रद्धा है, वह वही है। तात्पर्य यही कि किसी का व्यक्तित्व क्या है, कैसा है? इसे जानने-समझने का एक ही अर्थ और एक ही उपाय है कि उस व्यक्ति की श्रद्धा का स्वरूप क्या है? जीव की स्थिति श्रद्धा से लिपटी हुई है। जैसी श्रद्धा, वैसी स्थिति, वही स्वरूप।

भगवती पार्वती को जगज्जननी कहा गया है। यह स्वाभाविक ही है। श्रद्धा ही आन्तरिक व्यक्तित्व को जन्म देने वाली, उसके स्वरूप को निर्धारित-विकसित करने वाली दिव्य जननी है। यह श्रद्धा विश्वास से जुड़कर संकल्प और सक्रियता की प्रेरक बनती है। संकल्प तभी उत्पन्न होता है जब विश्वास दृढ़ होता है। जिस कार्य, लक्ष्य या बात पर विश्वास ही नहीं, उसके प्रति संकल्प उदय भी नहीं हो सकता। विश्वास की प्रतिक्रिया ही संकल्प है और संकल्प ही सक्रियता का जनक है। इस लिये विश्वास को श्रद्धा का सहचर कहा गया है। श्रद्धा रूपी पार्वती के अनन्य सहचर हैं विश्वास रूपी शंकर।

श्रद्धा व्यक्तित्व की आदि-शक्ति है और विश्वास महादेव हैं, परम शिव हैं। विश्वास ही परम कल्याणकारी दिव्य सत्त है। ‘श्रित्र्’ धातु में ‘उत्’ प्रत्यय जोड़कर “श्रत्” शब्द बनता है। ‘श्रित्र् सेवायाम् के अनुसार इसका धात्वर्थ है-सेवा करना। यह “श्रत्” भाव धारण किया जाना श्रद्धा है। जिसके प्रति सेवा की भावना रखी जाय, जिसे पुष्ट-प्रबल बनने में योग दिया जाय उसके प्रति व्यक्ति की श्रद्धा है, यह मानना चाहिए। सेवा और उपासना बिना आत्मीयता के सम्भव नहीं। शास्त्र में कहा है- “शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’। अर्थात्-स्वयं शिव रूप बनकर ही शिव की उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कट इच्छा एवं प्रयास हो।

श्रद्धा और विश्वास इन दो बीजों का विकसित रूप ही व्यक्तित्व वृक्ष है। जैसी श्रद्धा ओर जैसा विश्वास होता है, वैसी ही आकाँक्षा-प्रेरणा तथा वैसा ही संकल्प प्रबल होता है। उसी दिशा में सक्रियता बढ़ती है और तदनुरूप साधन सहयोग जुटाये जाते है। गन्तव्य का निर्धारण विश्वास ही करते हैं। उस दिशा में निरन्तर बढ़ते जाने की प्रेरणा और शक्ति उन्हीं से मिलती है। व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों का सरंजाम उसी स्तर का जुटाया जाता है और जो कुछ अनायास जुटता चला जाता है, वह भी उसी स्तर के अनुरूप ही। अतः व्यक्तित्व की पहचान, उसके भीतर गतिशील श्रद्धा एवं विश्वास से ही हो सकती है।

विश्वास शब्द को ‘विश्’ और ‘वास’ इन दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है। ‘विश्’ का अर्थ है ‘प्रविष्ट होना’ तथा ‘वास’ का अर्थ निवास करना है। जो भाव-संवेदना अन्तःकरण में गहराई से प्रविष्ट हो, वहीं निवास करे, गहराई तक जमी हो, उसे विश्वास कहते है। अन्तःकरण में कुछ समय उमड़-घुमड़ कर तिरोहित हो जाने वाली भाव तरंगें संकल्प, उपलब्धि और कल्याण का आधार नहीं बन सकती। स्थायी और सुदृढ़ विश्वासभाव ही ‘शंकर’ अर्थात् कल्याण करने में समर्थ है।

उत्कृष्ट श्रद्धा-विश्वास ही शिव-पार्वती का युग्म है। अस्थायी भावोन्माद न तो श्रद्धा है, न विश्वास। उससे न तो शक्ति प्राप्त होती, न ही कल्याण। अन्तःकरण में सुदृढ़ता से गहराई तक जमी हुई भावनायें और आकाँक्षायें ही श्रद्धा-विश्वास हैं। वे ही प्रगति एवं पुरुषार्थ का आधार हैं। कृतित्व तथा कल्याण का साधन-सम्बल वे ही है।

उल्लसित वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य सत् श्रद्धा एवं सत्विश्वास के द्वारा ही निर्मित होते हैं जो आचरण में न अभिव्यक्त हो, संकल्प के रूप में न उदित हो और प्रखर भावनाओं का जनक न बने, वह विश्वास नहीं। जो क्रियाशक्ति से न जुड़ सके, जो अन्तःकरण में प्रगाढ़ भाव-संवेदनाओं के रूप में न स्थित हो और चिंतन तथा क्रिया का आधार न बन सके वह श्रद्धा नहीं।

रामचरित-मानस में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से आत्म साधना की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है कि ‘‘सात्विक श्रद्धा धेनु सहाई।’’ सात्विक श्रद्धा ही सुंदर गाय है। यह गाय ‘जप, तप, व्रत जम नियम अपारा’ यानी यम-नियम, जप-तप आदि चारा ही खाती है। यह चारा हरा हो, उसमें जीवन हो, प्राण हो, जीवंत संवेदनायें उन्हें प्राणवान बने रहे हैं।

‘‘तेन तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।’’

अर्थात्- ऊपर कहे हरे चारा को जब श्रद्धा रूपी धेनु चरती है और उनसे पोषण प्राप्त करती है, तब भावरूपी बछड़े को देखकर वह पिंहाती है, उसको थनों में दूध उतर आता है। इस दूध को निर्मल मन रूपी अहीर विश्वास रूपी पात्र में दुहता है। श्रद्धा का दूध भावरूपी बछड़े को पाकर निर्मल मन द्वारा विश्वास के बर्तन में दुहा जाता है।

इससे श्रद्धा का तात्विक स्वरूप, उनके पोषण-आहार या आधार और विश्वास से उसका संबंध स्पष्ट होता है। भाव-विहीन, जप-तप विहीन, नियमों का उल्लंघन करने वालों की श्रद्धा से धर्मरूपी दूध नहीं दुहा जा सकता। उस स्थिति में विश्वास का बर्तन रीता ही रह जाता है। उस बर्तन को दूध से भरने के लिये साधना आवश्यक है। बिना साधना के श्रद्धा बांझ ही रही आती है।

श्रद्धा शक्ति है और विश्वास शिव। बिना शक्ति के शिव शव है। बिना शक्ति और शिव के जीवन, जीवन नहीं है, वह निष्फल है। सार्थक जीवन के लिये श्रद्धा एवं विश्वास रूपी भवानी तथा शंकर की नित्य आराधना आवश्यक है। तभी अंतरात्मा की चेतन-शक्ति को देखा समझा जा सकता है।


पर्वतराज ने कहा (kahani)

सृष्टि कर्ता ने एक दिन सोचा कि धरती पर जाकर कम से कम अपनी सृष्टि को तो देखा जाये। धरती पर पहुंचते ही उनकी दृष्टि एक किसान की ओर गई। वह कुदाल लिये पहाड़ खोदने में लगा था। सृष्टि कर्ता प्रयत्न करने पर भी अपनी हंसी न रोक पाये। उस इतने बड़े कार्य में केवल एक व्यक्ति को लगा देख और भी आश्चर्य हुआ।

वह किसान के पास गये और कारण जानना चाहा तो उसका सीधा उत्तर था- ‘महाराज! मेरे साथ कैसा अन्याय है? इस पर्वत को अन्यत्र स्थान ही नहीं मिला। बादल आते हैं, इससे टकराकर उस ओर वर्षा कर देते हैं। और पर्वत से इस ओर जो मेरे खेत हैं, वह सूखे ही रहते हैं।’

‘‘क्या तुम, इस विशाल पर्वत को हटा सकोगे?’’

‘क्यों नहीं! मैं इसे हटाकर ही मानूंगा यह मेरा दृढ़ संकल्प है।’

सृष्टि कर्ता आगे बढ़ गये, उन्होंने अपने सामने पर्वत राज को याचना करते देखा वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था- ‘विधाता! इस संसार में सिवाय आपके मेरी रक्षा कोई नहीं कर सकता।’

‘क्या तुम इतने कायर हो, जो एक किसान के परिश्रम से डर गये।’

‘मेरे भयभीत होने के पीछे कोई कारण है। क्या आपने अभी-अभी नहीं देखा था कि किसान में कितना आत्म-विश्वास है’ यहां से वह मुझे हटाकर ही मानेगा। अगर इसकी इच्छा इस जीवन में पूरी नहीं हुई तो उसके छोड़े हुए काम को उसके पुत्र तथा पौत्र पूरा करेंगे और मुझे भूमिसात करके ही चैन लेंगे। ‘‘आत्म-विश्वास असंभव लगने वाले कार्यों को भी संभव बना देता है।’’ पर्वतराज ने कहा।


भावना से सिद्धि

महाराज अंबरीष के संबंध में प्रजा में प्रख्यात थी कि वे बड़े ही धर्म परायण व्यक्ति है। प्रतिदिन राजमहल के प्रांगण में ही बनवाये गये भगवान विष्णु के मंदिर में प्रातःकाल उषा बेला में पहुंचने, भगवान के विग्रह की पूजा अर्चना करने, संध्या, उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती। इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभावग्रस्तों को प्रतिदिन एक स्वर्णमुद्रा बांटते थे, जिनकी भीड़ रोज प्रातः से ही लग जाया करती थी।

पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरांत अंबरीष अपनी समस्याओं को उनके पास लेकर सुलझाने के लिए आये नागरिकों से भेंट करते, उनके कष्ट सुनते, और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे। इन सभी कार्यों से निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिये ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुंच जाते थे। महाराज अंबरीष को यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्टसाध्य जीवन जीते हुए ईश्वर भक्ति और प्रजावत्सलता के पुण्य कार्यों में लगे रहने के कारण अंबरीष को एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति से अपनी कष्टसाध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गये थे।

महाराज अंबरीष की ख्याति से प्रभावित होकर अवंती राज्य के नरेश उदयभानु ने अपनी कन्या उदयानी के विवाह का प्रस्ताव किया। अंबरीष ने स्पष्ट कह दिया कि वह कठोर दिनचर्या का अभ्यस्त है और उसके साथ विवाह कर उदयानी को कष्ट तथा असुविधायें ही मिलेंगी।

परंतु उदयभानु ने कहा कि- ‘उदयानी स्वयं भक्ति, सेवा तथा तप तितिक्षा में विशेष रुचि रखती थी। यह प्रस्ताव भी उसी का है।’

अंबरीष ने प्रसन्न होकर विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात् प्रथम रात्रि को उषाकाल में, अंबरीष के उठने से पहले ही उदयानी जाग गयी और उसने विष्णु मंदिर में जाकर पूजा-अर्चा कर ली। अंबरीष जब जागकर मंदिर में गये तो यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि उनसे पहले ही उदयानी पूजा-पाठ से निवृत्त हो चुकी है और वह भी उन्हीं के मंदिर में। प्रथम पूजा का श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए यह सोचकर अंबरीष ने उदयानी को निर्देश दे दिया कि वह बाद में ही पूजा के लिए जाया करे। उदयानी ने सहर्ष इस निर्देश को अंगीकार कर लिया।

कुछ समय बाद अंबरीष अनुभव करने लगे कि उदयानी उनकी अपेक्षा साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमंडल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य-शांति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उदयानी भाव समाधि की स्थिति में जा पहुंची हैं।

मैं इतने समय से पूजा, भक्ति और सेवा साधना में लगा हुआ हूं। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। उदयानी किस प्रकार इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार अंबरीष को और भी खिन्न और उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि भी कम होने लगी। इन्हीं दिनों अंबरीष के गुरु, उस समय के प्रख्यात सिद्धयोगी राज-प्रासाद में आये। दिव्य दृष्टि से योगी ने महाराज अंबरीष के मनोद्वेगों को ताड़ लिया और पूछा ‘राजन्! आजकल आप निराश और खिन्न से क्यों दिखाई देते हैं?’

अंबरीष ने अपनी मनोव्यथा खोल दी तो योगी ने समाधान किया- ‘‘राजन्! सिद्धि पूजा या दीर्घ अवधि का नहीं भावना का परिणाम है। तुम जो पूजा साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है, जबकि राजमहिषी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया उसके पास अहं कहां बचा? और जहां अहं मिट जाता है वहां ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।’’

इन वचनों ने अंबरीष की साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।


प्रकृति का दुलार, उपहार- विलक्षण क्षमताओं का भंडार

अमेरिका पश्चिमी द्वीप समूह में स्थित पांच हजार फुट ऊंचा पर्वत माउण्टपीरो के आस-पास जब से लगभग 80 वर्ष पूर्व कितनी ही बस्तियां थीं। उनमें हजारों लोग रहते थे। सन् 1904 की बात है वहां के ग्रामीणों ने अपने साथ रहने वाले पालतू जानवरों तथा अन्य स्वच्छंद पशु-पक्षियों के व्यवहार में असामान्य परिवर्तन देखा। वे प्रायः घबराये से रहने लगे। पशु पक्षी मनुष्यों के अधीन थे, वे तो कुछ नहीं कर सके, पर सांप, कुत्ते और सियार धीरे-धीरे माउण्टपीरो के आस-पास वाले क्षेत्रों से हटने लगे। लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ये प्राणी क्यों इस क्षेत्र से भाग रहे हैं।

उसी वर्ष एक दिन माउण्टपीरो पर्वत से एक भयानक विस्फोट हुआ और पहाड़ के टुकड़े-टुकड़े हो गये। विस्फोट का कारण वहां अकस्मात् फूट पड़ा ज्वालामुखी था। इस ज्वालामुखी के विस्फोट से कोई तीस हजार व्यक्ति जो पर्वत पर और उसके आस-पास रहने वाले थे मारे गये तथा करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गयी।

तो क्या उन पशु पक्षियों को इस विस्फोट का पहले से ही आभास हो गया था। प्रसिद्ध जीवशास्त्री डा. विलियम जे. लाग ने अपनी ‘हाई एनिमल्स टाक’ में प्राणियों की ऐसी अद्भुत क्षमताओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि मनुष्य की तुलना में पशु-पक्षी भले ही पिछड़े हुए हों, परंतु उनकी चेतना मनुष्यों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है और उसी के आधार पर वे अपनी जीवनचर्या को सुविधापूर्वक संपन्न करते हैं।

किन्हीं मनुष्यों में भी इस तरह की शारीरिक या मानसिक क्षमतायें पायी जाती हैं जो सर्वसाधारण में नहीं होती हैं। उन क्षमताओं को देखकर ही उन्हें अतीन्द्रिय शक्ति संपन्न, विलक्षण और चमत्कारी ठहराया जाता है। इन क्षमताओं के आधार पर लोग ऐसी बातें जान लेते या बता देते हैं जिनका कोई बुद्धि सम्मत आधार नहीं होता किंतु बाद में ये बातें पुष्ट हो जाती हैं। ज्ञानेन्द्रियों की सीमा से परे की बातें जान लेने वाले सिद्ध योगी भी कहे जाते हैं और जन-साधारण के लिए आश्चर्य व आकर्षण का विषय बन जाते हैं।

इस प्रकार की शक्तियां किन्हीं-किन्हीं मनुष्यों को हजारों लाखों में एकाध को ही मिलती हैं, परंतु कितने ही प्राणियों में यह जन्मजात होती हैं। वे ऐसा बहुत कुछ जान व समझ लेते हैं जो मनुष्य जानने-समझने लगें तो उसे अलौकिक व्यक्ति कहा जाय। जैसे कुत्ते और भेड़ियों की नाक मीलों दूर की गंध, सूंघ लेती है। आकाश में मीलों ऊंचाई पर उड़ते हुए चील और गिद्ध धरती पर पड़ा हुआ मांस का एक छोटा-सा टुकड़ा भी देख लेते हैं। देखने, सूंघने और सुनने की यह क्षमता प्रकृति ने इन प्राणियों को इस लिए दी है कि उनके द्वारा वे आत्म-रक्षा करने के साथ-साथ सुविधा सामग्री प्राप्त करने में सरलतापूर्वक सफल हो सकें।

यही नहीं प्रकृति ने इन प्राणियों को ऐसी शक्तियां भी दी हैं जिनके आधार पर वे निकट भविष्य में होने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास कर लेते हैं। परमात्मा ने यदि उन्हें वाणी और भाषा दी होती तो संभवतः वे भविष्यवाणी भी कर सकते थे। डा. लाग ने अपनी पुस्तक में ऐसे ढेरों प्रसंग लिखे हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि इन प्राणियों में ऐसी शक्तियां विद्यमान हैं, जिन्हें मानवीय भाषा में अतीन्द्रिय क्षमता ही कहा जा सकता है।

उपर्युक्त पुस्तक में एक प्रसंग इस प्रकार है- एक मैदान में हिरनों का झुंड बड़ी तेजी से घास चर रहा था। झुंड कुछ ऐसी तेजी से चर रहा था जैसे उन्हें कहीं जाने की जल्दी हो। उस समय तो इसका कोई कारण समझ में नहीं आया पर कुछ ही घंटे बाद बर्फानी तूफान आया और कई दिनों तक घास मिलने की सम्भावना नहीं रही। स्थिति का पूर्वाभास प्राप्त करके हिरन इतनी जल्दी-जल्दी इसीलिए घास चर रहे थे कि उससे कई दिन तक गुजर हो सके।

उत्तरी कनाडा की झीलों में प्रायः बर्फ जम जाया करती है। झीलों में रहने वाली मछलियाँ बर्फ जमने से काफी पहले ही गर्म स्थानों पर चली जाया करती है, जहँ अपनी सुरक्षा कर लेती है। इसी प्रकार बर्फीले प्रदेशों में रहने वाले भालू जब बर्फ गिरने को होती है तो काफी समय पहले से ही अपना आहार इकठ्ठा करने लगते है और अपनी गुफा में जमा कर लेते हैं। बर्फ गिरने के कारण गुफा का मुँह बन्द हो जाने के बाद भालू उसी संचित आहार से अपना काम चलाते है।

प्रकृति जगत् में एक से एक विलक्षण और अद्भुत क्षमताओं वाले प्राणी भरे पड़े हैं। उन्हें बुद्धि भले ही न मिली हो पर वे अन्य क्षेत्रों में मनुष्य से इतने आगे है कि मात्र बुद्धि बल के कारण अपने आपको सर्वश्रेष्ठ कहने वाले मानव का यह दावा खोखला मात्र ही सिद्ध होता है और यह भी कि बुद्धि-बल का अहंकार रखना व्यर्थ है। क्योंकि अन्य प्राणियों के पास इतनी विलक्षण शक्तियाँ है कि मनुष्य उनकी तुलना में अक्षम और असमर्थ ही ठहरता है।

वायुयान बनाकर मनुष्य ने उड़ना तो अब सीखा है परन्तु मनुष्य से पहले तमाम पक्षी आकाश में उड़ते रहते हैं। वे अपने भार के अनुसार ही तीव्र या मन्द गति से उड़ते हैं लेकिन गरुड़ एक ऐसा पक्षी है जो आकार में बड़ा होते हुए भी 200 मील प्रति घण्टे की गति से उड़ता है। तीव्र गति से हवा में उड़ने, उसी गति से गोता लगाने और फिर उसी गति से कितनी ही कलाबाजियाँ बताकर वापस सीधे उड़ने लगने में गोशाल्क जाति के बाज की बराबरी आज तक कोई भी नहीं कर सका है।

पृथ्वी पर ही-थलचर प्राणियों में चीता सबसे तेज दौड़ता है। वह एक मिनट में एक मील अर्थात् 60 मील प्रति घण्टे की गति से बड़ी सरलता पूर्वक दौड़ लेता है। किन्हीं-किन्हीं अवसरों पर वह 90 से 100 मील प्रति घण्टे के हिसाब से भी दौड़ लेता है। आस्ट्रेलिया का कंगारू 40 फुट ऊँची छलाँग लेता है। जबकि वह मनुष्य की तुलना में बहुत छोटा होता है।

साँप की मांसपेशियां इतनी मजबूत और लचीली होती है कि आठ-दस फुट का साँप किसी पतली डाल पर पूँछ से एक लपेट मारकर पूरा नीचे लटक जाने के बाद भी मुँह की ओर से वापस उसी डाल पर पहुँच जाता है। हाथी की सूँड में 40 हजार माँसपेशियाँ होती है। उन्हीं में इतनी लचक होती है कि वह सूँड से पृथ्वी पर पड़ी हुई सुई तक उठा लेता है।

शेर का पंजा और व्हेल की दुम इतने सशक्त होते है कि अन्य जीव जन्तुओं में से किसी का भी कोई अंग इन प्राणियों के इन अंगों की तुलना में अधिक या बराबर भी मजबूत नहीं होता। गहरे समुद्रों में पाया जाना वाला ‘अष्टपद जलचर’ जरा-सा प्राणी होता है जिसका धड़ और सिर आठ भुजाओं के बीच में होता है। इस प्राणी की ये भुजायें इतनी मजबूत होती हैं कि उनकी पकड़ में आ जाने वाला कोई भी प्राणी जीवित नहीं बचता।

देखने की क्षमता में मनुष्य उल्लू, बाज, खरगोश और कितने ही जलचर प्राणियों से पिछड़ा हुआ है। उल्लू रात को भी आसानी से देख सकता है। मनुष्य को जितनी रोशनी में दिखाई देता है उससे दस गुना कम रोशनी में भी वह देख सकता है। उल्लू के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसे दिन में भी दिखाई देता है। वस्तुतः ऐसा है नहीं, दिन के प्रकाश में उसकी आँखें चौंधिया जाती है अन्यथा अन्धेरे स्थानों में तो वह दिन के समय भी भली-भाँति देख सकता है। अच्छे से अच्छे दूरबीन द्वारा भी जितनी दूर की चीजों को स्पष्टतः देखा नहीं जा सकता उतनी स्पष्टता से बाज हजारों फुट की ऊँचाई पर उड़ते हुए देख लेता है। एक हजार फुट ऊँचे उड़ते हुए भी वह घास में छिपे साँप, मेढ़क और चूहों को देख लेता है जबकि हम पाँच फुट दूर से नहीं देख पाते।

मनुष्य को पीछे का दृश्य देखने के लिए सिर भी पीछे घुमाना पड़ता है। परन्तु खरगोश की आँखों की बनावट ऐसी है जिससे कि वह सामने की तरह ही पीछे भी साथ-साथ ही देख सकता है। यह विलक्षणता मछलियों में पायी जाती है। वे पानी के भीतर तैरते हुए ऊपर और नीचे दोनों ओर देख लेती है।

स्मरण शक्ति की दृष्टि से कुत्ता अन्य सब प्राणियों की तुलना में बहुत आगे है। उसे आँख बाँधकर सैकड़ों मील दूर ले जाकर भी छोड़ दिया जाय तो वह वापस अपने स्थान पर पहुँच जाता है।

यह तो हुई प्राणियों की सामान्य विशेषतायें, जो किसी मनुष्य को प्राप्त हो जाये तो वह सिद्धयोगी या अतिमानव ही कहलाने लगे। प्रकृति ने अपनी इन अबोध सन्तानों को देखने, सूँघने, उड़ने, पकड़ने, दौड़ने भागने की ये क्षमतायें इसलिए दी कि उनके पास बुद्धि का अभाव है और उस कारण व अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा आसन्न संकटों से बचने का कोई प्रबन्ध करने में असमर्थ होती है।

इन्हीं कारणों से आकस्मिक संकट से बचने के लिए प्रकृति ने माउण्टपीरो के जीव-जन्तुओं तथा अन्य पशु-पक्षियों को पूर्वाभास की क्षमता भी दे दी है। कहते है कि मातायें अपने कमजोर, मन्द-बुद्धि और अक्षम बच्चों का विशेष ध्यान रखती हैं तथा उनके लिए सुरक्षा प्रबन्ध भी करती है जिससे कि वह आकस्मिक संकटों से बचाव कर सके। यह पक्षपात या अन्याय नहीं है, बल्कि सहज ममता के अंतर्गत ही आता है। प्रकृति माता भी अपने अबोध लाड़लों को इन विलक्षण क्षमताओं और अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा उनके लिए सुरक्षा का प्रबन्ध ही करती है।

इन विलक्षण क्षमताओं के अतिरिक्त अतीन्द्रिय शक्तियों के भी ढेरों उदाहरण हैं। प्राणधारियों की अतीन्द्रिय क्षमताओं पर शोध कर रहे डा. विद्लाग ने एक घटना का विवरण “न्यूयार्क टाइम्स” में प्रकाशित कराया था। उन्होंने लिखा था कि वियना में एक कुत्ता माल उठाने उतारने की क्रेन के समीप ही पड़ा सुस्ता रहा था। अचानक वह चौंका, उछला और बहुत दूर जा बैठा। इसके कुछ देर बाद ही क्रेन की जंजीर टूटी और एक भारी लोह खण्ड उस स्थान पर आ गिरा जिस स्थान पर कि वह कुत्ता बैठा था। सम्भवतः कुत्ते को इस घटना का पूर्वाभास हो गया था और इसी कारण वह उस स्थान से उठकर दूसरे स्थान पर जा बैठा था।

मनुष्यों को भी यदाकदा कभी इस प्रकार के पूर्वाभास होते है। इस तरह के पूर्वाभास की घटनाओं का विश्लेषण करते हुए अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डा. नेलसन वाल्ट का कथन है कि -प्राणधारियों के भीतर रहने वाली प्राण चेतना, जिसे जिजीविषा एवं प्राणशक्ति भी कहते हैं- विद्यमान रहती है। यह न केवल रोग निरोध अथवा अन्य आत्म-रक्षा जैसे अस्तित्व संरक्षण के अविज्ञात साधन जुटाती हैं, वरन् वह सूक्ष्म जगत् में चल रही उन हलचलों का भी पता लगा लेती है जो अपने आगे विपत्ति के रूप में आने वाली होती है।

यह आभास बहुधा अपने ऊपर तथा अपने सम्बन्धियों के ऊपर आने वाले संकटों के ही होते हैं। सिद्ध पुरुष जिसके सम्बन्ध में भी चाहें भविष्यत् का आभास कर लेते हैं। कई जीव जन्तुओं में यह शक्तियाँ जन्मजात और स्वाभाविक रूप से होती है। उनके बीज मनुष्यों में भी रहते हैं। बल्कि प्रकृति ने उनमें इन शक्तियों के विकास की विशिष्ट सम्भावनायें भी प्रस्तुत कर दी है। यही कारण है कि सीधे, सरल और निष्कपट व्यक्ति अपनी इस शक्ति का अनुभव न करते हुए भी कितने ही खतरों से बच जाते हैं जैसे उन्हें कोई दैवी सहायता प्राप्त हो गयी हो।

यह शक्ति हर मनुष्य में विद्यमान होते हुए भी अस्वाभाविक जीवन जीने तथा मनोविकारग्रस्त मनः-स्थिति के कारण वे शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती है। वनवासी लोग प्रकृति के अधिक समीप रहते हैं, प्राकृतिक जीवन जीते हैं और सीधा सरल जीवन जीने के कारण उस शक्ति से अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न होते है। सिद्धयोगी जिन अद्भुत या अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास कर लेते है उन्हें अर्जित करने में उनका प्रयास, परिश्रम या अभ्यास तो सहायक होता ही है, उनका प्राकृतिक सरल जीवन भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। प्रकृति ये दिव्य उपहार ऐसे ही व्यक्तियों को प्रदान करती है जो उसके नियमों मर्यादाओं के अधीन रहते हुए सीधी सरल सपाट जिन्दगी जीते हों। माँ का लाड़ दुलार भी तो आज्ञाकारी और शिष्ट शालीन बच्चों को अधिक मिलता है।


वनस्पति जगत मनुष्य से कहीं अधिक संवेदनशील है

निष्कलुष हृदय में दूसरों के दुर्भाव दुर्विचार उसी प्रकार अनुभव होने लगते हैं जैसे सामने वाला व्यक्ति स्वयं अपने मुंह से उन्हें व्यक्त कर रहा हो। पवित्र अंतःकरण वाला व्यक्ति दूसरों के हृदय की भावनाओं की परख स्वतः ही कर लेता है। पेड़-पौधे जिन्हें न किसी से लगाव होता है न दुराव, निष्कलुष और पवित्र अंतःकरण व्यक्ति की तरह ही यह ताड़ लेते हैं कि पास आने वाला व्यक्ति या प्राणी शत्रु या मित्र है। अमेरिका के प्रोफेसर मर्किल वोगल ने इस तरह के कई प्रयोग किये और उन्होंने जो जानकारियां एकत्रित कीं वे बेहद ही चौंकाने वाली और आश्चर्यजनक थीं।

पेड़-पौधे न केवल अपने पास आने वाले व्यक्तियों के भले बुरे भावों को पहचान लेते हैं बल्कि उन भावनाओं से प्रभावित भी होते हैं। प्रो. वोगल ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि पौधे उन्हें उखाड़ने या नष्ट करने के विचार मात्र से पूरी तरह आतंकित हो जाते हैं। यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने एक मित्र विवियन विले के सहयोग से एक प्रयोग की योजना बनायीं। इसके लिए उन्होंने गमले में लगे हुए दो पौधों को चुना। इन दोनों पौधों को उन्होंने अपने शयनकक्ष में रखा। वोगल ने जो पौधा अपने शयन कक्ष में रखा था जब भी वे वहां जाते तो पौधे के प्रति अच्छे भाव और शुभ विचार अपने मन में लाते। इधर विले अपने शयन कक्ष में रखे पौधे के पास जब भी जाते तो पौधे को उखाड़ने नष्ट करने या तोड़ने का विचार करता। दोनों मित्र प्रातःकाल जब उठते तो इसी प्रकार के विचार करते।

एक माह बाद देखा गया तो वोगल वाला पौधा पहले की अपेक्षा अधिक हरा-भरा था और विले वाला पौधा पहले की अपेक्षा सूख कर पीला पड़ने लगा था। दोनों को खाद पानी दिया गया था वह एक ही तरह का था। फिर भी यह परिवर्तन नोट किया गया। संभव है यह मात्र संयोग रहा हो। यह सोचकर वोगल तथा विले पहले के भावों से विपरीत भावनायें जगाने लगे। अर्थात् वोगल अपने पौधे से शत्रुवत् भाव करते और विले मित्रवत्। महीने भर बाद ही दोनों पौधों पर यह परिणाम नोट किया गया कि वोगल वाला पौधा सूखने लगा तथा विले का पौधा हरा-भरा रहने लगा।

इन लंबे प्रयोगों के बाद प्रो. वोगल ने कुछ और प्रयोग भी किये उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में एक पौधे को ऐसे यंत्र से जोड़ा जो जो पौधे की आंतरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों को कंपन के रूप में अंकित करता था। पौधे को इस यंत्र से जोड़ने के बाद वोगल ने अपनी हथेलियों को पौधे के चारों ओर पास किया तथा साथ ही अपने मन में पौधे के प्रति मित्रता के भाव भी जगाने लगे। प्रो. वोगल ने देखा कि पौधे के साथ लगे हुए यंत्र ने कागज पर एक ग्राफ खींच दिया है।

दूसरी बार प्रो. वोगल ने दूसरी तरह की भावनाएं अपने हृदय में लाये तो यंत्र ने दूसरी तरह का ग्राफ बनाया। फिर उन्होंने पहले वाली कोमल भावनाओं को ही जगाया तो पहले वाले ग्राफ जैसा ही ग्राफ बना। इन प्रयोगों को वोगल ने कई बार दोहराया और हर बार एक जैसे ही निष्कर्षों पर पहुंचे।

प्रो. वोगल ने इन प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को वनस्पति विज्ञानियों के एक सम्मेलन में कहा तो कई वैज्ञानिकों ने उनके प्रयोगों में रुचि दर्शायी। एक वनस्पति विज्ञानी डा. सिलम जोंश ने स्वयं इस प्रयोग को अपने हाथों से किया और संतोषजनक परिणाम प्राप्त किये। यही नहीं उनके कुछ भावों पर पौधों ने विपरीत प्रतिक्रियायें भी दर्शायी। एक बार जब डा. जोंश ने प्रो. वोगल की प्रयोगशाला में प्रवेश किया तो पौधे ने कंपन देना एकदम बंद कर दिया। प्रो. वोगल ने प्रश्न किया कि आप इस समय क्या विचार कर रहे थे? तो डा. जोंश ने उत्तर दिया कि वे इस पौधे की तुलना अपने घर में लगे एक पौधे से कर रहे थे। उनके घर के बगीचे में उसी पौधे की जाति का एक दूसरा पौधा लगा हुआ था। डा. जोंश उस पौधे से इस पौधे की तुलना करते हुए सोच रहे थे कि मेरे उपवन में लगा हुआ पौधा कितना हरा-भरा और तरोताजा है जबकि यह पौधा सूखा-सूखा-सा लगता है। शायद यह गमले में लगा हुआ है इसलिए ऐसा हुआ हो।

प्रो. वोगल के उस पौधे ने इस घटना के दो हफ्ते बाद तक कोई कंपन अंकित नहीं किया। मशीन ठीक-ठाक काम कर रही थी फिर भी कंपन क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर देते हुए प्रो. वोगल ने कहा है कि आगंतुक वैज्ञानिक अपने मन में पौधे के प्रति जो भाव लाये थे और उसके प्रति जो हीनता की भावना व्यक्त की थी उससे उस की भावनाओं को बड़ी ठेस पहुंची थी और इसी कारण उसने अबोल लेते हुए कोई बात करने- प्रतिक्रिया व्यक्त करने से इंकार कर दिया था।

पेड़ पौधे भी अनुभव करते हैं और उनमें भी संवेदनायें होती हैं, इस तथ्य को न्यूयार्क के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी क्ली बैकस्टर ने सिद्ध कर दिखाया है। क्ली बैकस्टर ने पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया को मापने के लिए एक विशिष्ट यंत्र गेल्वेनोमीटर का उपयोग किया। आम तौर पर गेल्वेनोमीटर में सुई का उपयोग होता है परंतु इस मीटर में सुई के स्थान पर पेन का इस्तेमाल किया गया था ताकि कंपनों को अंकित किया जा सके।

क्ली बैकस्टर ने इसके बाद पेड़ की एक पत्ती को उबलती हुई काफी की प्याली में डाल दिया। पत्ती पेड़ से जुड़ी हुई हालत में ही प्याली में डाली गयी थी। परंतु इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। क्ली बैकस्टर ने एक दूसरा प्रयोग किया। उसने विचार किया कि वह पत्ती को जलाकर राख कर देगा। इस‍ विचार के आते ही बैकस्टर ने माचिस की तीली जलाने के लिए आगे हाथ बढ़ाया। लेकिन वह अभी माचिस हाथ में उठा भी नहीं पाया कि गेल्वेनोमीटर ने पेड़ में कंपनों को तेजी से अंकित करना आरंभ कर दिया। पेड़ की नोक बहुत तेजी से कागज पर चलने लगी थी।

यद्यपि बैकस्टर पेड़ से दूर खड़ा था और वह अपने स्थान से हिला तक नहीं था तो क्या पेड़ ने बैकस्टर के विचारों को जान लिया था और इस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया दर्शायी थी। बैकस्टर के मन में यह प्रश्न बिजली की तरह कौंधने लगा। प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उन्होंने माचिस की एक तीली जलायी और पत्ती के पास ले गये। यह करते हुए बैकस्टर के मन में पत्ती को जलाने का कोई विचार नहीं था। वह पत्ती को जलाने का नाटक कर रहे थे। शायद पौधे ने बैकस्टर के आंतरिक भावों को पहचान लिया हो और वह समझ गया हो कि युवा वैज्ञानिक केवल नाटक कर रहा है। इसलिए पौधें में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

इसके बाद बैकस्टर ने सचमुच पत्ते को जलाने का निश्चय कर लिया और इस इरादे से लौ को आगे-आगे बढ़ाया। बैकस्टर ने जैसे ही तीली को आगे बढ़ाया पौधे ने गेल्वेनोमीटर के माध्यम से एक झटके के साथ अपना भय व्यक्त किया। यंत्र की नोक कागज पर चलने लगी।

इन ग्राफों को सुरक्षित रख लिया गया और यही प्रयोग अन्य किस्म के पौधों पर भी दोहराने की योजना बनाई गयी। बैकस्टर ने इसके लिए कुछ युवा वैज्ञानिकों का एक दल बनाया और पच्चीस तरह के अलग-अलग किस्म के पेड़-पौधे लिये। ये पौधे देश के विभिन्न कोनों से मंगाये गये थे। सभी पौधों पर विचारों के होने वाले प्रभाव को अलग-अलग गेल्वेनोमीटर से आंका गया तो वही परिणाम सामने आये जो पहले आये थे। प्रयोगशाला में कोई कुत्ता, बिल्ली या बंदर लाया जाता तो पौधे भय से अलग-अलग कंपन करते। जैसे बिल्ली के प्रवेश पर वे सबसे कम भयभीत हुए, कुत्ते के समय उससे ज्यादा और बंदर के समय सबसे ज्यादा। यहां तक कि कोई व्यक्ति प्रयोगशाला में किसी पौधे के प्रति दुर्भावना लेकर आता तो पौधा उसे भी अंकित कर देता।

गैलवेनी मीटर द्वारा अंकित किये गये कंपनों को किसी प्रकार ध्वनि तरंगों को रूपांतरित किया गया। तरंग के सूक्ष्म कंपन को भी ध्वनि में बदल देने वाले यन्त्र से जब उन ध्वनियों को सुना गया तो उनमें कहीं भय, कहीं प्रसन्नता, कहीं हर्ष तो कहीं उल्लास की ध्वनियाँ निकलती थी।

बैकस्टर ने पेड़ पौधों पर होने वाले इस प्रभाव को जाँचने के लिए एक विस्तृत प्रयोगशाला बनायी और उसमें अपने छः साथियों को भी अनुसंधान कार्य में लगाया और एक फुट दूर स्थित दो पौधों को लिया गया। इन पौधों को गमले में लगाकर एक ही कमरे में रखा गया। प्रयोग की रूप रेखा यह बनायी गयी कि उसका कोई एक साथी उन दोनों पौधों में से एक पौधे के पत्तों को नोंच नोंचकर फेंकेगा। लेकिन उसकी खबर उस साथी के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं दी जायेगी। इस घटना का साक्षी एकमात्र वह दूसरा पौधा ही होगा जिसके सामने उसके साथी पौधे को नोचा खसोटा जायेगा। प्रयोग पूरा हुआ तो नोंचने वाले वैज्ञानिक के अतिरिक्त शेष पाँचों वैज्ञानिकों को उस साक्षी पौधे के पास लाया गया। पाँचों वैज्ञानिकों के पास खड़े रहने पर पौधे में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हुई और जब वह छठा वैज्ञानिक पौधे के पास लाया गया, जिसने कि दूसरे पौधे की पत्तियों को नोंचा खसोटा था तो पौधे ने तुरन्त अपनी प्रतिक्रिया दर्शायी॥ इसके निष्कर्ष में बैकस्टर ने यह कहा कि- “पौधा अपने साथी को नुकसान पहुँचाने वालों को भूला न था और उनको बिल्कुल ठीक पहचान गया था।”

भयभीत होने, प्रसन्नता व्यक्त करने तथा शत्रु को पहचानने में समर्थ होने के अतिरिक्त पेड़ पौधे गर्मी और सर्दी भी महसूस करते हैं, उन्हें प्यास भी लगती है तथा उन्हें भी एक निश्चित मात्रा में खनिज लवणों और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। यह खोज रूस के प्रसिद्ध, वनस्पति शास्त्री’ लियोनिड ए. पनिशकिन तथा कैरोमोनेव ने की है। कैरामोनेव ने एक दिलचस्प प्रयोग किया। उन्होंने एक विशेष यन्त्र को एक सेम के पौधे के साथ जोड़ा और यन्त्र को चालू कर दिया। जब पौधे को पानी की जरूरत पड़ती तो वह यन्त्र पर एक विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा संकेत देता। यह संकेत देखकर पौधे को एक विशेष विधि से पानी दिया जाता। यह देखा गया कि पहले दो मिनट तक पौधे ने पानी लिया किन्तु फिर उसने पानी कि प्रति अनिच्छा व्यक्त की। इसके घण्टे भर बाद पौधे ने पुनः पानी का संकेत किया इस बार भी उसने केवल दो मिनट तक ही पानी लिया और फिर पानी लेने में अरुचि दर्शायी।

इन अनुसंधानों ने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किया है। काई आश्चर्य नहीं कि पेड़ पौधों के इस तरह के व्यवहार को देखते हुए उन्हें जानवरों, प्राणियों से अलग न माना जाय। भाव संवेदनाओं की दृष्टि से वृक्ष वनस्पति को यन्त्र की श्रेणी का ही कहा जा सकता है। अभी तो यही पता चला है कि दुर्भावनाओं, धमकियों, सद्भावों और दूसरों पर होने वाले अत्याचारों पर पेड़ पौधे भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियायें करते हैं। कौन जाने उनकी प्रतिक्रियाओं में उपेक्षा, परामर्श, तिरस्कार या मित्रता की भावनायें व्यक्त होती हों और कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी बुद्धि, नैतिक चेतना तथा आध्यात्मिकता मनुष्य से अधिक उन्नत स्तर की हो। मनुष्य और वनस्पति में अन्तर है तो इतना भर ही कि वनस्पति मनुष्य की भाषा में बात नहीं कर सकता है? तो मनुष्य ही वनस्पति जगत की भाषा में बात करने में कहाँ समर्थ है?


Quotation

धरती उन्हें भी आश्रय देती है जो उसे खोदते हैं। जहाँ आत्मीयता है वहाँ सताने और अपमानित करने वाले के प्रति भी प्रतिशोध नहीं जागृत होता। -तिरुवल्लुवर


उपासना सफल तो जीवन भी सफल

अच्छे और बुरे कार्यों का स्पष्ट प्रभाव आत्मविश्वास आत्मगौरव, आत्मबल बढ़ाने अथवा गिराने के रूप में होता है। अच्छे कार्य करने के बाद व्यक्ति अपने मन में एक आत्मसन्तोष की अनुभूति करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति या सत्ता उसे धन्य करते हुए उसकी पीठ थपथपा रहीं है इसी के परिणाम स्वरूप वह अपनी दृष्टि में ऊँचा उठ जाता है। उसे अपना मूल्य और वर्चस बढ़ गया प्रतीत होता है। इसके विपरीत बुरे कार्य व्यक्ति में भय, क्षुद्रता, पतन तथा प्रताड़ना की भावनाओं को जन्म देते हैं। ये भावनायें व्यक्ति में किन्हीं बाहरी कारणों से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि उसकी अपनी चेतना ही उसे डराती है, क्षुद्र बनाती है, पतित सिद्ध करती है और प्रताड़ना देती है।

इसी आधार पर कहा जाता है कि अच्छे कार्य व्यक्ति में धनात्मक शक्ति पैदा करते हैं, जैसे इसके व्यक्तित्व में कोई शक्ति आकर जुड़ गयी है। इसीलिए सभी सत्कर्मों, सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं को प्रार्थना उपासना के स्तर का कहा गया है, प्रार्थना या उपासना का अर्थ केवल ईश्वर के समीप बैठने की अनुभूति करते हुए कुछ क्षणों तक नाम विशेष का जप या स्तवन पाठ ही नहीं है। वे सभी अच्छे कार्य जो आत्मसन्तोष, धन्यता का बोध और आत्मगौरव बढ़ाते हैं, इसी वर्ग में आ जाते है। उपासना या प्रार्थना को इन कार्यों को बीज कहा जा सकता है।

महर्षि अरविंद ने कहा है-सारा जीवन ही योग है। उस योग का शुभारम्भ-बीच वपन प्रार्थना या ध्यान से होता है। कोई पुस्तक पढ़ने से पहले उसके पृष्ठ उलटना पड़ते है। ध्यान या उपासना पृष्ठ उलटने की क्रिया कहीं जा सकती है, जिससे पढ़ने का शुभारम्भ होता है। उन क्षणों में जब व्यक्ति उपासना करता है तो नये अध्याय का पहला पृष्ठ उलटता है और उसे पढ़ता जाता है।

व्यापारी बैंक में जाकर रुपया निकालते है। न पास में रुपया हो तो बैंक उधार भी देता है। उपासना बैंक से धन बैंक से धन निकालने की प्रक्रिया के समान है। उस समय प्राप्त राशि का उपयोग जीवन व्यवसाय चलाने के लिए किया जाता है। लेकिन बहुत से व्यक्ति ठीक से उपासना करना ही नहीं जानते, अधिकाँश लोगों को प्रार्थना का रहस्य ही मालूम नहीं होता। परिणाम स्वरूप वे उपासना के बाद भी कोई संवेदना या शक्ति का उठान अनुभव नहीं करते।

उपासना को ईश्वर और जीव के, परमात्मा और आत्मा के सम्बन्ध जोड़ने वाली प्रक्रिया कहा गया है। वह ठीक से सम्पन्न हो इसके लिए आवश्यक है कि चित्त स्थिर रहे। भगवान कृष्ण ने भी कहा है-

मनः संयम्य भाच्चित्तो युक्तः आसीत मत्परः।

अर्थात्-मन को वंश में करके मेरे में चित्त को लगाना और मत्परायण होना चाहिए। उपासना या ध्यान की इसी स्थिति में आत्मा परमात्मा की सिद्धि प्राप्त करता है। अगले ही श्लोक में कहा गया है-

यञजन्नेव सदात्मान योगी नियत मानसः। शान्ति निर्वाण परमाँ मत्संस्था मधि गच्द्धति॥

“इस प्रकार आत्मा का निरन्तर परमेश्वर के स्वरूप में लगा हुआ स्वाधीन मन वाला योगी मेरे में स्थिति रूप परमानन्द पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है।

जीव और ब्रह्म अंश तथा अंशी होने के कारण स्वभावतः तो एक ही है परन्तु अज्ञान कहें अथवा माया दोनों के बीच एक ऐसी दीवार पड़ी हुई है जो दोनों को सम्बन्धित रखते हुए असम्बद्ध करती है। ध्यान योग की साधना अथवा उपासना उस विभेद को दूर करने के लिए ही की जाती है। चित्त की एकाग्रता के महत्व को समझाते हुए आचार्य बिनोवा भावे ने लिखा है कि-”उपासना ही क्यों जीवन व्यवहार के किसी भी क्षेत्र में चित्त की एकाग्रता अत्यन्त आवश्यक है। व्यवहार ही .... परमार्थ चित्त की एकाग्रता के बिना उसमें सफलता मिलना कठिन ही है।

यह ठीक भी है व्यापार, अध्ययन, राजनीति, समाज सेवा किसी भी क्षेत्र में सफलता का वरण तभी होता है जबकि मनुष्य अपनी संपूर्ण शक्ति से उसे दिशा में प्रयास करे। लेकिन चित्त को स्वभावतः ही चंचल प्रकृत का कहा गया है। उसे किसी एक बिन्दु पर एकाग्र करना बड़ा कठिन कार्य है। शास्त्रकारों ने इसके लिए अभ्यास और वैराग्य दो उपाय बताते है। अभ्यास का अर्थ है स्थिति के लिए बार-बार प्रयत्न और वैराग्य का अर्थ उन व्यवधानों का निवारण जो चित्त और वैराग्य का अर्थ उन व्यवधानों का निवारण जो चित्त की एकाग्रता में बाधक बनते हैं। उन उपायों को व्यवहार में लाने से पूर्व यह समझ लेना और विचार कर लेना चाहिए कि चित्त की एकाग्रता क्यों आवश्यक है? सामान्यतः किसी भी कार्य का महत्व समझ लेने, उपयोगिता अनुभव कर लेने के बाद उसे कर पाना अधिक पुष्कर नहीं रह जाता।

मनोविज्ञान की अधुनातम शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि सद्विचारों, सद्भावनाओं और सत्कर्मों में लगे, व्यक्ति दुष्कर्मों तथा बुरे विचारों में प्रवृत्त व्यक्ति की अपेक्षा शान्त और स्थिर रहते हैं। भारतीय दर्शन की तो यह मान्यता है कि ध्यान के साथ विवेक शुद्धि के प्रयास भी अनिवार्य रूप से जुड़े होने चाहिए। जिस व्यक्ति का विवेक निर्मल, विचारणायें उत्कृष्ट हों वह अपनी चित्तवृत्तियों को आसानी से नियन्त्रित कर सकता है। अच्छे कार्य, सदुद्देश्य और सदाशयता से प्रेरित होकर किये गये कार्य साधारण जीवन क्रम में भी एकादता की साधना संपन्न करते रहते है। व्यवहार शोधन और सद्विचारों के बाद अभ्यास से जब चित्त स्थिर हो जाता है तो व्यक्ति सभी प्रकार की मानसिक दुश्चिंताओं पीड़ाओं आदि पर नियंत्रण रखने में सफल हो जाता है।

प्रार्थना एकाग्रता पूर्वक की जानी चाहिए यह कहने की अपेक्षा यह कहना कहीं अधिक संगतिपूर्ण होगा कि एकाग्रता का नाम ही प्रार्थना है। फिर तो चित्त को जिस दिशा में भी लगा दिया जाये सफलता ही सफलता है एकाग्र चित्त होकर की गयी प्रार्थना उपासना के निकला लाभ बताये गये है। प्रत्यक्षतः लाभ दृष्टिगोचर होते हैं उसमें प्रमुख है बुद्धि की तीक्ष्णता और उसका परिष्कार तथा हर कार्य को सही ढंग से करने की शक्ति। यही नहीं उसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति जिन आध्यात्मिक गुणों का विकास करता है उससे एक अनिवर्चनीय आनंद प्राप्त होता है।

आचरण की पवित्रता और विचारों पर नियंत्रण पूर्वक एकाग्रता की सिद्धि के लिए मनोवैज्ञानिकों ने तीन उपाय बताये हैं-आकाँक्षाओं का परिष्कार, क्रिया कलापों की पवित्रता तथा शक्ति का संचय अथवा जीवन की परिमितता। सर्वप्रथम आकाँक्षाओं के परिष्कार को ही लें,

विचार आकाँक्षाओं की ही तरंगें हैं। मन मस्तिष्क में जिस प्रकार की इच्छायें उठती हैं विचारों का अधड़ भी उसी ओर दौड़ने लगता है। विचारों का इच्छाओं से वही सम्बन्ध हो जो इलेक्ट्रानों का परमाणुओं से। इलेक्ट्रान परमाणु नाभिकेन्द्र के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं उसी प्रकार विचार इच्छाओं के इर्द−गिर्द चक्कर काटते रहते हैं। उदाहरण के लिए मन में इच्छा उठी कि कोई वस्तु खरीदी जाये। वह वस्तु क्रय करने की सामर्थ्य अपने पास नहीं है। अब मस्तिष्क के विचार उस वस्तु को प्राप्त करने के उपायों को सोचने में ही व्यस्त हो जायेगा और दिन−रात उसे प्राप्त करने के तरीके खोजने लगेगा।

विचारों की इस दौड़ को नियंत्रित करने के लिए शास्त्रकारों ने उपलब्ध में ही मोद मनाने का निर्देश दिया है। सन्तोष के लिए अपने से निम्नस्थिति वालों को देखने एक व्यावहारिक कदम है। उदाहरण के लिए पाँच सौ रुपये कमाने वाला व्यक्ति यदि एक हजार रुपये कमाने वाले से अपनी तुलना करता है तो उसे अपनी स्थिति से असन्तोष तज्जनित क्षोभ और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए जोड़-तोड़ बिठाने में ही सारी मस्तिष्कीय क्षमता खपाना पड़ेगी। इसके विपरीत यदि 500 रुपये कमाने वाला अपनी तुलना 200 रुपये कमाने वाले से करे तो वह अपेक्षाकृत अधिक सन्तोष, शान्ति और परिणाम स्वरूप स्थिरता के प्राप्त कर सकेगा।

पहली तुलना इच्छाओं के बीच लिये होती है और उन्हें पैदा करने में उत्प्रेरक का कार्य भी करती है जबकि दूसरी तुलना इच्छाओं पर नियन्त्रण करने में सहायक होती है। विचारों पर नियंत्रण और चित्त की एकाग्रता साधने वाला व्यक्ति संतोष की भावना को अपना लक्ष्य बनाले तो यह लक्ष्य विचारों पर नियन्त्रण करने में पर्याप्त सहायक सिद्ध हो सकता है। स्मरण रखना चाहिए कि सन्तोष की यह भावना भौतिक क्षेत्र की अपेक्षा चित्त में आना चाहिए भौतिक क्षेत्र में सन्तोष का ढोंग किया जाये और चित्त में असन्तोष ही भरा रहे तो कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि प्रगति के तमाम अवसरों क उपयोग करते हुए व्यक्ति के चित्त में वस्तुओं के प्रति आकर्षण कम हो जाये। गीताकार ने इसी स्थिति को इस शब्दों में व्यक्त किया है-”सुख दुःख में कृत्वा लाभालाभौ जया-ज्यों”-सुख दुःख हानि लाभ और जय पराजय से चित्त के अप्रभावित रखा जाये तो उनके कारण उत्पन्न होने वाले विचारों की विश्रृंखलता तथा चंचल, आशक्ति और तरंगित मनःस्थिति से बचा जा सकता है।

संतुलित मनःस्थिति के लिए सन्तोष के भाव का वरण चित्त के प्रत्यक्ष रूप से एकाग्र करने में सहायक होता है। उसी प्रकार छोटे-बड़े प्रत्येक कार्य को सही-सही ढंग से करने का अभ्यास मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार से चित्त की एकाग्रता सिद्ध करता है। एक त्व चिंतक ने जीवन की परिमितता और नियमन की चित्त की एकाग्रता में सहायक बताते हुए लिखा है-औषध जैसे नाप तौल कर ली जाती है, वैसे ही आहार निद्रा भी नपी-तुली होनी चाहिए। सब जगह, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समय नियमन रहे तो एकाग्रता का दूसरा पहलू सध जाता है। चित्त के प्रत्येक कार्य मन और शरीर क्षेत्र में उपजते तथा फूलते-फलते हैं। सन्तोष की भावना द्वारा विचारों की असत व्यस्तता के निवारण और जीवन व्यापार के संयम द्वारा शरीर का संयम संतुलन सही हैं दो उपाय जिनके द्वारा चिन्तन और विचार को एक दिशा में नियोजित किया जा सकता है।

मन में असन्तोष, शरीर के क्रिया कलापों में अमर्यादा का निवारण करने के बाद भावना क्षेत्र में सन्तुलन साधकर प्रार्थना या ध्यान को संपूर्ण रूप से प्रभावशाली बनाया जा सकता है। भावनाओं में विकृति का मुख्य कारण है-भय। वह भय दूसरों से नुकसान पहुंचाने का भी हो सकता है और परिस्थितियों का भी।

यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि समस्त दुर्भावनायें भय के कारण ही होती है। किसी से द्वेष भी होता है तो केवल इसलिए कि अचेतन मन में उस व्यक्ति से हानि पहुँचने का भय रहता है। दूसरों से ईर्ष्या द्वेष होता है तो इसलिए कि उसे अपने अहं पर चोट पहुँचाने का डर रहता है। इसलिए सब प्रकार के भयो से मुक्त होने का उपाय शुभ दृष्टि बताते हुए कवि ब्राउनंग ने लिखा है-ईश्वर आकाश में विराजमान है इसलिए सारा विश्व ठीक ही चल रहा है।

यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि संसार की ओर देखने की जैसी हमारी दृष्टि होगी संसार भी हमें वैसा ही दिखाई देगा। यदि हमारे मन में इस बात का निश्चय हो जाये कि यह सृष्टि शुभ है, सर्वत्र मंगल ही मंगल दिखाई देने लगे तो चित्त में अपने आप शान्ति आ जायेगी।

इच्छाओं के तल पर सन्तोष का भाव, कार्यों के तल पर उन्हें सन्तुलित और संपूर्ण रूप में करने की रीति नीति तथा भावनाओं के तल पर सभी स्थितियों में मंगल्य का दशन-यही है वह सूत्र जिनके आधार पर चित्त एकाग्र किया जा सकता है। यह एकाग्रता प्रार्थना, ध्यान और उपासना को चमत्कारी बनाने के साथ जीवन व्यापार के समग्र क्षेत्रों में भी सफलता प्रदान करती है।

एकाग्रता की शक्ति का विवेचन यहाँ अभिष्ट नहीं है फिर भी इतना तो मानना ही चाहिए कि अनन्य और सर्वभाव से किया गया ईश चिन्तन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है तथा एकाग्रता और तन्मयता से किये गये कार्य ही सफलता तक पहुँचाते है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति की बढ़ा यह है आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है जीवन के सभी क्षेत्रों में साधी गई एकाग्रता ईश्वर प्राप्ति की साधना को भी प्रखरतम बनाती है तथा व्यक्ति का स्तर दिनों-दिन उच्च से उच्चतर और उच्चतम की और बढ़ता है।


जीवन का सत्य और सार्थकता

युवराज भद्रबाहु अपने समय के सभी युवकों में सर्व श्रेष्ठ, सुन्दर और सुगठित काया का स्वामी था। उसे अपनी सुन्दर कार्या और अतुल रूप यौवन का गर्व भी था। इस गर्व के कारण वह अन्य राजकुमारों के सामने दर्प भरे वचन भी बोलता रहता था। एक दिन युवराज महामंत्री के पुत्र सुकेशी के साथ बजरा से बाहर सरिता के तट पर भ्रमण कर रहा था। भ्रमण करते हुये युवराज और मंत्री पुत्र नगर से कुछ दूर चले गये।

एक स्थान पर-जहाँ सरिता के दूसरे तट पर श्मशान था, कुछ लोग शवदाह कर रहे थे। युवराज ने मंत्री पुत्र से पूछा-‘वहाँ क्या हो रहा है?’

वहाँ खड़े लोगों का कोई स्नेही जन मर गया है-सुकेशी ने कहा-’वे लोग उसके मृत शरीर का दाह संस्कार कर रहे है।’

“अवश्य ही वह कोई कुरूप व्यक्ति होगा’-भद्रबाहु यहां भी दर्पभरी टिप्पणी किये बिना नहीं रह सका-”वह सुन्दर होता तो कोई क्यों जलाना चाहता। अपने पास नहीं रखता।”

“नहीं। ऐसी बात नहीं है, शरीर सुन्दर हो या असुन्दर मर जाने पर सभी शरीर सड़ने-गलने लगते है। अतः उन शरीरों को जला देना पड़ता है”-सुकेशी ने कहा।

यह बात युवराज के जाने किस धर्मस्थल को स्पष्ट कर गई कि उसे अपने रूप, सौंदर्य और यौवन का दर्प टूटे हुये काँच के टुकड़ों की तरह बिखर गया प्रतीत होने लगा और वह उदास रहने लगा। उदासी ने उसे इस बुरी तरह आ घेरा कि उसका सुन्दर चहरा म्लान दिखाई पड़ने लगा। राजा ने अनेक प्रकार युवराज की उदासी और मलीनता का कारण जानना तथा उसे दूर करना चाहा पर कोई परिणाम नहीं निकला।

युवराज की इस प्रकार चिन्तित और उदास देख कर मंत्री पुत्र सुकेशी भी व्यथित हुआ। वह भद्रबाहु को हर तरह से बहलाने का प्रयत्न करता पर युवराज के मुख छायी रहने वाली मलीनता मिटती ही नहीं थी। राजगुरु कालाचार्य को एक विधि सूझी और वह भद्रबाहु को अपने गुरु महाचार्य के पास ले गया।

सिद्धयोगी महाचार्य ने अपनी अंतर्दृष्टि से भद्रबाहु की मनोव्यथा, खिन्नता का कारण जान लिया और कहा-’भद्र तुम इस शरीर के अन्तिम परिणाम की चिंता करते हो।’

लगा किसी ने दुःखती रग को पहचान लिया हो और भद्रबाहु ने अपनी सारी उड़ेल दी। महाचार्य ने कहा-’अच्छा बताओ! आज तुम भवन के स्वामी हो। उस भवन में निवास करते हो। कल को वह भवन रहने योग्य नहीं रह जाता तो उस भवन को छोड़कर अन्य भवन में जाओगे अथवा नहीं।’

‘सो तो जाना ही पड़ेगा महात्मन्-भद्रबाहु ने कहा। कालाचार्य बोले- इसके बाद वह भवन गिर जाता है कि उसमें आग लग जाती है तो इससे तुम्हारा क्या बिगड़ा?’

‘कुछ नहीं गुरुदेव।’

‘वहीं नियम शरीर के लिए भी लागू होता है। इसमें निवास करने वाली आत्मा के लिए जब तक यह रहने योग्य है तभी तक यह सुन्दर है। जराजीर्ण हो जाने पर आत्मा द्वारा इसका त्याग और इसका नाश स्वाभाविक ही है। शरीर नहीं, सुन्दर तो वह आत्म तत्व है जिसके कारण इसकी प्रतिष्ठा है। इसलिये आत्मा के प्रीत्यर्थ, उसके हित व विकास के लिए शरीर को एक उपकरण मात्र समझा। उसके लिए चिंतित मत होओ।

इन वचनों ने भद्रबाहु के ज्ञान चक्षु खोल दिये और उसने निश्चय किया कि वह शरीर के गर्व की अपेक्षा आत्मा की महिमा को समझ कर जीवन सार्थकता की सिद्धि के लिए ही प्रयत्नशील रहेगा।


शरीर सोता है तो सपने कौन देखता है?

स्वप्नों का अपना एक विचित्र संसार है जिसमें विचरण करते हुए हम अनेकों चित्र -विचित्र दृश्य देखते है। इनमें से कई सार्थक होते है और कई विचित्र। स्वप्न में देखी हुई बहुत सी बातें तो याद रह जाती है और अनेकों विस्मृति के गर्त में खो जाती है। प्रश्न उठता है उस समय व्यक्ति का शरीर तो सोता रहता, इन्द्रियाँ भी निष्क्रिय ही रहती है। गहरी नींद सोये व्यक्ति को अपने आस - पास क्या हो रहा है - इसका कुछ पता ही नहीं चलता। एक तरह से वह सोते हुए भी दूसरी दुनिया में चला जाता है। फिर प्रश्न उठता है कि शरीर का कौन-सा बाहरी या भीतरी अंग होता है जो स्वप्न देखता है?

प्रश्नोपनिषद् में गार्ग्य मुनि पिप्पलाद ऋषि से यही प्रश्न करते है- “कान्य स्मिंज्जागृति कतर एव देव स्वप्नान्पश्यन्ति (4/1)” अर्थात् - “कौन - कौन जागते रहते है और स्वप्न अवस्था में कौन - कौन स्वप्न की घटनाओं को देखते रहते है। “

चतुर्थ प्रश्न में गार्ग्य मुनि पिप्पलाद ऋषि से निद्रा के समय मनुष्य शरीर की स्थिति के सम्बन्ध में प्रश्न करते है जिसके उत्तर में पिप्पलाद ऋषि कहते है कि - निद्रा एक यज्ञ हैं। उस शरीर रूप नगर में पंच प्राण रूप अग्नियाँ जागती रहती है। श्वास प्रश्वास दोनों इस यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियाँ है। इनको जो समभाव से पहुँचाता है वही ‘होता’ है। यह मन ही यजमान है और उससे मिलने वाला अभीष्ट फल ही उदान है वह उदान ही इस मन रूप यजमान को प्रति दिन ( निद्रा के समय ) ब्रह्म लोक में भेजता है अर्थात् हृदय गुहा में ले जाता है ( प्रश्न4/3-4 )

ऋषि के अनुसार निद्रा एक यज्ञ है और उसमें शरीर में जाने वाले श्वास प्रश्वास आहुतियाँ है। इस अलंकारिक उत्तर में ऋषि ने यह बताया है कि स्वप्न के माध्यम से मन जीवात्मा के पास पहुँचने का प्रयास करता है। यद्यपि नींद में पड़ने वाले विक्षेपों के कारण भी कई स्वप्न आते जाते है। सोते-सोते यौन उत्तेजना में काम क्रीड़ा को दृश्य दिखाई देते है। उस समय की कष्ट कारक अनुभूतियाँ और मानसिक परेशानियाँ भी अपने-अपने स्तर के पीड़ा दायक डरावने स्वप्न खड़े कर देती है। अतृप्त आकांक्षायें भी अपना रंग महल बनाने बिगाड़ने का खेल खेलती है और कई प्रकार के स्वप्नों की सृष्टि होती है। इस तरह के स्वप्न महत्व हीन होते है। यो उनका विश्लेषण किया जाय तो उनके सहारे मनः स्थिति का परीक्षण निदान भी उसी प्रकार किया जा सकता है जिस प्रकार कि मल, मूत्र, रक्त, आदि की जाँच एक्सरे द्वारा शारीरिक रोगों का निदान किया जाता है। परन्तु पिप्पलाद का प्रतिपादन निद्रा यज्ञ से सम्बन्धित है।

यों अग्नियाँ और भी है जिनमें कूड़ा करकट के जलाने से लेकर खाना पकाने और मकान जलने जैसी प्रिय अप्रिय घटनायें घटनी है। परन्तु यज्ञाग्नि उन अग्नियो से भिन्न है। इसी प्रकार निद्रा को भी एक अग्नि की संज्ञा देते हुए उसके यज्ञ स्तर के स्वरूप वाली निद्रा मन को ऐसे उच्च-लोको की यात्रा करा देती है जिन्हें वरदान और अलौकिक अनुभूतियाँ कहा जा सकता है। ऋषि ने इसी स्तर के स्वप्नों को ब्रह्मलोक की यात्रा - हृदय गुहा में स्थित आत्मचेतना के सामीप्य की प्राप्ति और उसके माध्यम से विराट् चेतना के साथ सम्बद्ध होने का द्वार कहा है।

अब तक तो विज्ञान भी स्वप्नों को अतृप्त आकांक्षाओं और दबी हुई कामनाओं का ही प्रतीक मानता था ; परन्तु अब हाल ही में हुई शोधों के अनुसार स्वप्नों के बारे में मनःशास्त्री भी कहने लगे है कि कुछ स्वप्न ऐसे होते है जिनकी आधुनिक मनोविज्ञान के आधार पर व्याख्या नहीं की जा सकती है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय तथा शिकागो विश्वविद्यालय ने इस तरह के अव्याख्येय स्वप्नों का रहस्य सुलझाने के लिए अलग से ‘स्वप्न परीक्षण विभाग’ खोले है। जहाँ लोगों को बुलाया जाता है, उन्हें पैसे देकर सुलाया जाता है। वे गाढ़ी नींद लेकर सो सके इसके लिए आवश्यक प्रबन्ध भी किये जाते है। और सोते समय उनके मस्तिष्क में चलने वाली विद्युत तरंगों को रिकार्ड करने के साथ - साथ जागने के बाद उन्हें याद रहे स्वप्नों का विश्लेषण भी किया जाता है।

इन विश्वविद्यालयों द्वारा की गयी शोधों से प्राप्त निष्कर्ष फ्रायड के एकाँगी स्वप्न सिद्धाँत की यह मान्यता लगभग ध्वस्त हो चुकी है। दैनिक जीवन की अतृप्त आकांक्षायें, इच्छायें और संवेदनायें ही निद्रा के समय स्वप्न के रूप में परिलक्षित होती है। मनः शास्त्र के विश्व विख्यात आचार्य डा. कार्ल जुँग ने अपनी पुस्तक ‘मेमोरिज ड्ऱीक्स रिफलैक्शन्स’ में लिखा है चेतन मस्तिष्क को ज्ञान प्राप्ति के जितने साधन प्राप्त है उससे कही अधिक और समर्थ, ठोस साधन उपचेतना ( सब काशंस ) मन को उपलब्ध है। चेतन मस्तिष्क दृश्य ; श्रव्य तथा अन्य इन्द्रियानुभूतियों द्वारा ज्ञानार्जित करता है परन्तु - उपचेतना के पास तो ज्ञान प्राप्ति के असीम साधन है। वह अंतरिक्ष में प्रवाहित होते रहने वाले संकेत कंपनों को भी पकड़ लेता है जिनमें असीम जानकारियाँ होती है और वह भी विभिन्न स्तरों की।

यह उपचेतना तभी सक्रिय होता है जब चेतन मन सो जाता है। सामान्यतः हमारा शरीर ही सोता है, चेतन मन नहीं, जिसे मस्तिष्क भी कह सकते है। सोते समय मन में चलते रहने वाले विचारों और कल्पनाओं की दृश्यावली साधारण स्वप्नों के रूप में उभर कर आती है। लेकिन जब मस्तिष्क भी थका होता है - चेतन मन भी सो जाता हे तो गाढ़ी नींद के समय उपचेतन मन सक्रिय होता है।

फलोरन्स ( इटली ) के मनः शास्त्री गेस्टन उग्दियानी का कहना है कि सक्रिय मस्तिष्क शिथिल होने अथवा सुषुप्ति की अवस्था में चले जाने के बाद दिखाई पड़ने वाले स्वप्नों में कई ऐसे संकेत ढूंढ़े जा सकते है जो महत्वपूर्ण कहे जा सकते है। इसी स्थिति में बहुतों को ऐसे आधार हाथ लगते है जिन्हें बहुत माथा - पच्ची करने के बाद भी नहीं समझा जा सका है। अपने स्वयं के एक स्वप्न का विश्लेषण करते हुए उन्होंने यह बात कही थी।

घटना एस समय की है जब गेस्टन सात वर्ष की आयु के बालक थे। तब वे प्रायः सपना देखा करते थे कि वे किसी बहुत बड़े मन्दिर में पुजारी का काम करते है, सपना इतना अधिक स्पष्ट था कि इमारत का नक्शा उनके मस्तिष्क पर जमा रहा और उस स्वप्न की गहरी छाप भी उनके मस्तिष्क में जमी रही। एक बार जब वे भारत आये तो उन्होंने फिर वैसा स्वप्न देखा। भारत मंदिरों का देश है यह तो उन्हें मालूम ही था अतः वे अपनी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए सभी प्रख्यात मंदिरों में गये। खोजते - खोजते वे महाबली पुरम् नगर के एक मन्दिर में गये तो उसे देख कर वे सन्न रह गये। यह मन्दिर हू बहू स्वप्न में देखे गये मन्दिर के समान था। इस स्वप्न का विश्लेषण उन्होंने पूर्व जन्म की स्मृति बताते हुए किया है।

स्वप्नों के साथ जुड़ी हुई दूर दर्शन, अविज्ञात का ज्ञान और भविष्य के पूर्वाभास की घटनायें भी यही सिद्ध करती है कि मनुष्य की चेतना स्वप्नों के माध्यम से सूक्ष्म जगत् की हलचलों के साथ अपना संपर्क स्थापित कर लेती है। मस्तिष्क या चेतन मन के शिथिल होते ही मनुष्य को सूक्ष्म चेतना पर छाया रहने वाला उनका आवरण हट जाता है और उसका संपर्क दिव्य चेतना से जुड़ जाता है। ध्यान धारणा, समाधि और योग निद्रा के समय भी चेतन मन तथा बुद्धि की दौड़ - धूप कम हो जाती है और उस समय भी अन्तः चेतना विराट् चेतना के साथ संपर्क कर लेती है। पूर्ण समाधि अथवा अर्ध समाधि की स्थिति में साधको को जो दिव्य अनुभूतियाँ होती है उन्हें जागृत एवं अधिक यथार्थ स्वप्न कहा जाया तो उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी हैफनर मारस का तो कहना है कि अपनी अन्तश्चेतना को इस प्रकार प्रशिक्षित भी किया जा सकता है कि वह स्वप्नों का संकेत समझ सके। सिडनी के टामफीचर नामक व्यक्ति ने तो यह कर भी दिखाया है। इतना ही नहीं उन्होंने ऐसी क्षमता भी अर्जित कर ली है कि जागृत स्थिति में न सुलझायी जा सकने वाली समस्याओं और गुत्थियों को वे स्वप्नों के माध्यम से सुलझा सके। इस क्षमता को प्राप्त करने के लिए उन्होंने वर्षों तक कई अभ्यास किये थे और उनमें सफलता भी पायी। टामफीयर की स्वप्न सिद्धि के कई प्रमाण सिडनी के समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे है।

एक प्रमाण तो सिडनी नगर के पुलिस दफ्तर में भी दर्ज है। इसमें फीयर ने एक चुराये गये बालक को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराने में पुलिस की सहायता की थी। बालक इस समय कहाँ है, उसे किन व्यक्तियों ने चुराया है और उनका क्या पता ठिकाना है, वे बालक को क्या - क्या यातनायें दे रहे है आदि बातों का विवरण टातफीयर ने स्वप्न में देखकर बताया था और इसके लिए सिडनी पुलिस ने टामफीचर को दो हजार डौलर पुरस्कार स्वरूप भी दिये थे।

योग साधना, ध्यान- अभ्यास और आत्मिक व्यायामों द्वारा हो अथवा पूर्व जन्मों के संस्कारों के परिणाम स्वरूप जब व्यक्ति का आत्मिक स्तर इतना ऊंचा उठ जाता हे कि उसका मन आत्मा की सन्निधि में पहुँच जाय तो वह इस स्तर की अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से प्राप्त करता है। उपचेतन मन ऐसे स्वप्न संकेत ही पकड़ता है जिनसे किसी का भला होता हो अथवा अपना पवित्र साध्य भी पवित्र साधनों से सधता हो। स्वप्नों के माध्यम से आज तक न तो किसी को अनीति अपनाने अथवा अवाँछनीय लाभ उठाने के संकेत मिले है अथवा न किसी को पहुँचाने की ही प्रेरणा मिली है। ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते है जिनमें व्यक्ति के अपने सौभाग्य उदय में आर हे अवरोधों को हटाने की प्रेरणा मिली हो।

स्वप्नों के माध्यम से विराट् चेतना व्यक्ति को दिशा बोध भी प्रदान करती है जैसे -सुदूर चौकियों पर लड़ रहे सैनिकों को उनके अफसर वायरलैस अथवा ट्रांसमीटर संकेत देता है कि अमुक दिशा में बढ़ो। अमुक मोर्चे पर आक्रमण करों। उसी प्रकार विराट् चेतना भी व्यक्ति चेतना का मार्ग दर्शन करती है। अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर को प्राप्त स्वप्न संकेत इसी सिद्धाँत को प्रमाणित करता है।

चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक प्रकृति के व्यक्ति थे। वे स्वयं ध्यान साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे - पीछे आने का संकेत कर रहा है। वे उसके पीछे -पीछे चल पड़े और कसाँस नगर पहुँच गये। फिर वह व्यक्ति उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया जो उनके लिए अपरिचित था। वहाँ उसने चार्ल्स के हाथ में एक समाचार पत्र दिया जिसका पहला अक्षर ‘यू’ ही वे पढ़ पाये थे कि एक के बाद एक अनेक समाचार पत्र उनके हाथों में आते गये। साथ ही उन्होंने देखा कि सामने बैठे बहुत से व्यक्ति ध्यान कर रहे है।

स्पष्ट ही इस स्वप्न का अर्थ उन्होंने लगाया कि वे ध्यान साधना का प्रचार करे, संयोग की बात कि एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आ कर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कसाँस शहर चले गये। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर कार्यालय खोलने की बात कही वह स्थान यो तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था यह वही स्थान है उसी स्थान पर सोसायटी ऑफ सायलेण्ट यूनिटि नामक संस्था की स्थापना की। संस्था की ओर से जो समाचार पत्र निकाला गया उसका प्रथम अक्षर ‘यू’ ही था और अखबार का नाम ‘यूनिटि’ रखा गया। बाद में और भी पत्र पत्रिकायें वहाँ से छपी। और स्वप्न का तथ्य सत्य हो गया।

कई बार स्वप्न इतने प्रेरक होते है कि उनके कारण मनुष्य की जीवन दिशा ही बदल जाती है। सभी जानते है कि भगवान बुद्ध राजकुमार थे। उनके बीत राम संन्यासी हो जाने की भविष्य वाणी ज्योतिषियों से सुन कर शुद्धोधन ने इस बात का हर सम्भव प्रयास किया था कि उनके एक वृद्ध और शव यात्रा को देख कर जीव प्रवाह के मोड़ देखे। इन घटनाओं ने उनके चित्त व विचलित किया। एक दिन उन्होंने स्वप्न देखा कि श्वेत वस्त्रधारी एक वयोवृद्ध दिव्य पुरुष आया और उनके हाथ पकड़ कर श्मशान ले गया। उंगली का इशारा करते हुए उस दिव्य पुरुष ने बताया - देखा यह तेरी लाश है। इसे देख और प्राप्त हुए जीवन का सदुपयोग कर। आँख खुलते ही बुद्ध ने निश्चय कर डाला कि इस बहुमूल्य सौभाग्य का उन्हें किस प्रकार सदुपयोग करना है - जीवन का क्या प्रयोजन है और वे इसी क्षण रात में ही अपने राजपाट को छोड़ कर श्रेय की खोज में निकल पड़े तथा उसे प्राप्त कर ही लिया।

फ्राँस की राज्यक्रांति की सफल संचालिका ‘जान ऑफ आर्क’ एक मामूली से किसान के घर में जन्मी थी। अपने पिता के घर ही उसने स्वप्न देखा कि आसमान से कोई फरिश्ता उतर कर आया है तथा उससे कह रहा है कि - अपने को पहचान! समय की पुकार सुन और स्वतन्त्रता की मशाल जला। “ उस फरिश्ते ने जोन के हाथों में एक जलती हुई मशाल भी दी। नींद खुलने पर जोन ने इन बातों को गाँठ में बाँध लिया और उसी समय से फ्राँस को स्वतंत्र कराने के लिए उत्साह के साथ काम करने लगी। इतिहास साक्षी है कि जोन ने कितनी वीरता के साथ स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा और अपने प्राणो की बाजी लगा कर सफलता प्राप्त कर सकी तथा अपने आपको अमर कर गयी।

इस तरह के दिव्य आभारू और दिव्य प्रेरणायें देने वाले स्वप्न उन्हीं व्यक्तियों को आते है जिनकी मनोभूमि अधिक विकसित होती है। पूर्व संचित संस्कारों के कारण भी किन्हीं में ऐसी विशेषतायें पाई जाती है। कई लोग साधना - उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियां का शोधन करके भी इस प्रकार की आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करते है और स्वप्नों के माध्यम से, ऐसे संकेत प्राप्त करते है जो आत्मतत्व की खोज में सहायक होते है अथवा आत्मसत्ता के अस्तित्व की पुष्टि करते है।

ऋषि पिप्पलाद ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि इस अवस्था में भी व्यक्तिक चेतना परम चेतना के साथ आसानी से एकाकार हो जाती है। पाण्डूक्योपनिषद् में बताया गया है -

स्वप्न स्थानों हुन्तः प्रज्ञः सहाँग एकोनविंशति मुखः प्रविविक्त भुक तैज सो द्वितीय पादः(4) स्वप्न स्थान सौजस् उकारो द्वितीया मात्रोतकर्ष दुभयत्वा द्वोर्त्कषति हवैज्ञान संतति समानश्च भवति(10)

अर्थात्- स्वप्न अवस्था में जब मन सो जाता है तब उसकी प्रज्ञाबुद्धि अन्दर ही काम करने लगती है। इस समय उसके सातों अंग (पाँच तन्मात्रायें, अहंकार और महतत्व) उन्नीस मुख (दस इंद्रियां, पाँच प्राण और चार अतः करण) भी उसी में लीन हो जाते है जिनसे आत्मा शरीर के समान ही संसार का भोग करता है। यह आत्मा का तेजस् द्वितीय पाद है अर्थात् यह जागृति और सुषुप्ति के बीच की अवस्था आत्मतत्व की खोज में सहायक हो सकती है।

स्वप्न मन को आत्मा से जोड़ने वाली अवस्था के रूप में भी बदले जा सकते है। शास्त्रकारों ने इसके लिए साधना उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार, मलीनताओं का निवारण तथा आत्मशोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है जिस समय चेतना पूर्णतः निर्मल, शुद्ध हो जाती है उस समय आत्मसत्ता-परमात्मसत्ता का उसी प्रकार अनुभव किया जा सकता है, जिस प्रकार कि सामने बैठे हुए व्यक्ति या रखी हुई वस्तु का।

साधना क्षेत्र में आत्मिक प्रगति की कितनी मंजिल पार कर ली गयी है इसका पता भी स्वप्नों से लगाया जा सकता है पुराणों और आर्ष-ग्रन्थों में इस प्रकार के कई स्वप्नों का उल्लेख आता है जिनसे यह पता चलता है कि साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना भी रहती है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।


मरण और उसके साथ जुड़ी हुई समस्याएँ

भागवत में एक अत्यन्त मासिक आख्यायिका आती है। देवर्षि नारद ने मरते हुए व्यक्ति को देखा, उनका अन्तःकरण जीव के मायावी बंधन देखकर द्रवित हो उठा। आत्मा ने तब शरीर छोड़ दिया था, उसके शव के समीप खड़े कुटुम्बी जन रुदन कर रहे थे। पुत्र भी विलाप कर रहा था, कह रहा था-हाय!पिताजी ने मुझे असहाय छोड़ दिया, नारद ने जीव को समझाया वत्स! इस मायावी बन्धन को तोड़ मेरे साथ चल, विराट विश्व में कैसे-कैसे स्वर्गीय स्थल हैं, चल और जीवन मुक्ति का आनन्द ले।

किन्तु मृतक पिता की आसक्ति उन विलाप कर रहे कुटुम्बियों से जुड़ी थी, नारद की ओर उसने ध्यान ही नहीं दिया अपने वासना मय सूक्ष्म शरीर से वहीं घूमता रहा। परिवारी जन शोक मनाकर धीरे-धीरे अपनी सामान्य जिन्दगी बिताने लगे, किन्तु मृतात्मा के विश्रृंखलित चित्त मेँ बेटे का विलाप ही गूँजता रहा, उसने पशु योनि में प्रवेश किया, बैल हो गया और बैल बनकर अपने किसान बैठे की सेवा करने लगा।

कुछ दिन पश्चात नारद पुनः बैल के पिंजरे में बन्द उस जीव से मिले और पूछा-तेरा मन हो तो चल उच्च लोगों की उपलब्धियों का आनन्द प्राप्त कर। बैल ने कहा-भगवन अभी तो जैसे तैसे बेटे की आर्थिक स्थित कुछ नियंत्रित हो पाई है, अभी कहाँ चलूं? नारद चले गए। जीव डण्डे खाकर भी बेटे की आसक्ति का शिकार बना रहा। मृत्यु के समय भी बेटे की आसक्ति कम न हुई सो वह कुत्ता हो गया, हर बार बेटे को देखने की मोह भावना उसे क्रमशः अल्पायु योनि में प्रविष्ट कराती रहीं। कुत्ता बनकर वह बेटे की सम्पत्ति की रक्षा में तल्लीन हो गया। पूर्व जन्मों के संस्कार और मोह भावना उसे जब उमड़ती वह भोजन के लिये चौक की ओर बढ़ता पर तभी मिलती दुत्कार और डंडे, कुत्ता ड्योढ़ी की ओर भागता। पर बेटे की रक्षा की बात, उससे खून से जोंक की तरह चिपकी हुई थी सो उसने मालिक बने पुत्र का दरवाजा नहीं छोड़ा।

देवर्षि नारद फिर आये और चलने को कहा तो कुत्ते ने कहा-भगवन आप देखते नहीं। मेरे बेटे की सम्पत्ति को चोर बदमाश ताकते रहते हैं ऐसे में उसे छोड़कर कहाँ जाऊं? देवर्षि इस बात को समझते थे कि इस मोहासक्ति में उसकी अपनी वासनायें और तृष्णायें भी जुड़ी है। वह समझाते वत्स! तू जिन इन्द्रियों को सुख का साधन समझता है वे तुझे बार-बार छोड़ देती है फिर तू उनके पीछे बावला क्यों बना है, किन्तु कुत्ते को समझ कहाँ से आती, मानवीय सत्ता तक तो सत्य को आँक नहीं पाती।

जीव को गुस्सा आया-मेरे द्वारा कमाये अन्न का एक अंश भी यह मेरा तथा कथित बेटा देता नहीं-इस बार ऐसा करूंगा कि मेरी कमाई तो मुझे खाने को मिले-इस तरह वह चूहा बना उस स्थिति में नारद ने पुनः दया की किन्तु तब भी उसे ज्ञान न हुआ, चूहों से तंग किसान ने विष मिले आटे की गोलियाँ रखीं। चूहा मर गया। मृतक चूहे ने देखा कि विष देकर मेरा प्राणांत किया गया है उसका मन क्रोध और प्रतिशोध की भावना से जल उठा। फलतः उसे सर्प योनि मिली। जीवन के बदले जीवन लेने की क्रोधाग्नि के भड़कते ही सर्प ज्यों ही बिल से बाहर निकला, उन्हीं घर वालों ने, जिनकी आसक्ति उसे निम्नतर योनियों में भ्रमण करा रही थी, लाठियों, पत्थरों से उसे कुचल कुचल कर मार डाला। बेचारे नारद ने अब उधर जाना व्यर्थ समझा क्योंकि वे समझ चुके थे कि अभी वह इस प्रतिशोध की धुन में चींटी, मच्छर मक्खी न जाने क्या-क्या बनेगा?

कहानी के शास्त्रीय प्रतिपादन संभवतः आज के बुद्धि जीवी लोगों को प्रभावित न करें। वे इसे मात्र अन्धविश्वास और पौराणिक वाक्य कहकर उसकी उपेक्षा कर दें किन्तु सत्यान्वेषी पश्चिमी जगत के मूर्धन्य वैज्ञानिकों, प्रबुद्ध व्यक्तियों, डॉक्टरों और पत्रकारों को जीवन और मृत्यु की संध्या के जो अनुभव हुये है वह इस आख्यायिका और हिन्दुओं की मरणोत्तर संस्कार परम्परा का पूरी तरह समर्थन करते हैं। यहाँ कुछ ऐसी ही घटनायें दी जा रहीं है जिनमें, मरणासन्न व्यक्तियों को हुए अनुभव आये हैं।

कई बार यों हुआ किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय सुप्रसिद्ध डाक्टर भी विद्यमान थे। लोग अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे तभी एकाएक मृतक की चेतना उसी शरीर में पुनः लौट आई और वह जीवित उठ बैठा। कुछ व्यक्तियों का मस्तिष्क प्रखर और हृदय संवेदन शील रहा है उन्होंने अपनी चेतना को जीवन और मृत्यु की देहली पर संधि पर स्थिर कर उस पार जो कुछ देखा उसका वर्णन मरते मरते कर दिया। किन्हीं माध्यमों के द्वारा मृतात्माओं से संपर्क का सम्मोहन विज्ञान भारत वर्ष ही नहीं पश्चिमी देशों में भी प्रचलित है। उन अनुभवों की सत्यता की परख उनके द्वारा बताई गई उन अतिरिक्त बातों और घटनाओं से होती है जो मृतक के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था पीछे माध्यम के बताये गये तथ्यों के आधार पर खोज की गई तो वह घटनाऐं सत्य पाई गईं।

इस तरह की घटनाओं के सैकड़ों उदाहरण डा. रावर्ट कूकल बी.एस.सी. (साइकोलॉजी डी.एस.सी., पी.एच.डी) पूर्व निर्देशक वनस्पति विज्ञान एडरबीन विश्वविद्यालय की पुस्तक “टेकनीक्स आफ एस्ट्रल प्रोजेक्शन, एन्थोनी बोर्गिया लन्दन की पुस्तक “मोर एबाउट लाइफ इन दी वर्ल्ड अनसीन”, डब्ल्यू एच. ऐलन लन्दन द्वारा प्रकाशित डा. जेम्स पाइक की पुस्तक “दि होराइजन” “पोस्टमार्टम जनरल,” “लाइफ वर्थ लिविंग” तथा “सुप्रीम एडवेयर” जिन्हें क्रमशः ग्रेस रोशर (प्रकाशन जूम्स क्लार्क एण्ड कं.) मिसेज जैन शेरवुड (प्रकाशन मेसर्स नेबिल्ले स्पेयर मैन 112 ह्वाइट फील्ड स्ट्रीट लन्दन) मिसेज हैस कोप (प्रकाशक मेसर्स चार्ल्स टेलर, बुक हाउस लन्दन) तथा जियो लाजिकल सर्वे लन्दन के तत्कालीन प्रधानाचार्य और भूगर्भ विज्ञान वेत्ता हैं। इस तरह के विख्यात व्यक्तियों की अनुभूतियों को यों ही ठुकराया जाना मानवीय आस्था के लिये घातक नहीं तो अशोभनीय अवश्य कहा जायेगा। इन पुस्तकों के कुछ उद्धरण-

लारेंस आफ अरेबिया- जिन्हें लोग स्काट कहकर बुलाया करते थे, ने अपने अनुभव इन शब्दों में व्यक्त किये है-यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ न प्रकाश है और न अन्धकार है धूमिल वातावरण जान पड़ता है, ऐसा लग रहा है कि दीपक बुझ रहा है और मुझे निद्रा घेरती चली आ रही है, इस समय मेरी इच्छायें-नींद में न जाने के लिये झगड़ती और मचलती सी लगती हैं किन्तु ..............!

“वियान्ड दि होराइजन” में गोर्डन का अनुभव-मेरी चेतना शरीर से बाहर आ गई, मैंने इतना हल्कापन अनुभव किया मानो सारे शरीर की थकावट विश्राम में बदल गई हो, पर मेरे मन में बार-बार पत्नी रोशर का स्नेह उमड़ता था अतएव वहाँ से हटने का मन नहीं कर रहा था। पत्नी की आँखों में आँसू थे, उनकी रोने की आवाज और वह जो भी कहती थी उन्हें मैंने स्पष्ट सुना। उन्होंने यह शब्द कहे मैंने उनको समझाने, उनके आँसू पोंछने का प्रयास भी किया पर न तो मुझ से आँसू धुले न किसी ने मेरी आवाज सुनी, तब मैंने अनुभव किया कि यह शरीर छूट जाने की अवस्था है। उस समय बहुत दुख हुआ। मैंने सारी शक्ति लगाकर अपने शरीर में घुसने का प्रयास किया, पीछे क्या हुआ? कैसे हुआ? याद नहीं आता।

आफ्टर डेथ में प्रकाशित जुलिया का संस्करण और मासिक है। यह पुस्तक 1897 प्रकाशित हुई और अब तक उसके लगभग बीस संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। जर्मन,स्विस फ्रेंच, डेनिस, रशियन तथा इटैलियन भाषा में उसके अनुवाद भी छप चुके है। जुलिया एक बहुत रंगीन स्वभाव की लड़की थी। सुन्दर होने के कारण उसके अनेक मित्र थे। अपने मित्रो से वह प्रायः कहा करती थी कि यदि मेरी मृत्यु हुई तो भी मिलती अवश्य रहूँगी। संयोग वश 12 दिसम्बर 1891 में उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उसके कई मित्रो ने तो उसके प्रेत को मंडराते हुए देखा ही कुछ अजनबी आत्माओं को उसके संदेश भी मिले जिनमें उन लोगों को न केवल वह सन्देश प्राप्त हुए जिन्हें जूलिया के अत्यधिक निकट सम्बन्धी ही जानते थे। ऐसे लोगों में कुछ वह भी थे जिन्होंने उसे कभी देखा न हीं था पर जब सैकड़ों फोटो उनके सामने रखे गये तो उन्होंने जुलिया का फोटो ग्राफ पहचान कर बता दिया-उन लोगों ने बताया-जुलिया की आत्मा अपने मित्रों के लिये भटकती रहती है, वह उन्हें देखती है पर स्वयं न देखे जाने या स्पर्श जन्य अनुभूति का आनन्द न प्राप्त कर सकने के कारण वह आतंकित और पीड़ित रहती है।

डा. रावर्ट कूकल ने स्वीकार किया है मृत्यु के बाद मनुष्य अपने सूक्ष्म अणुओं के शरीर से बना रहता है उसके मन की चंचलता, इच्छाएं और वासनायें बनी रहती हैं यदि वे अतृप्त रहें या जहाँ आसक्ति होती है जीव वहीं मंडराता रहता है।

इन उदाहरणों में अभिव्यक्त सत्य पढ़ समझकर देवर्षि नारद की वह व्यथा निरर्थक नहीं लगती जिसमें मनुष्य जैसे विचार शील प्राणी को नितान्त पार्थिव होने का भ्रम हो जाता है। अपने यहाँ किसी की मृत्यु के समय दुख न करने, धार्मिक वातावरण बनाने के पीछे ऐसा ही अकाट्य दर्शन सन्निहित है कि यदि मृत्यु के समय जीव अशान्त आसक्त रहा हो तो देह त्याग के बाद भी यह अशान्ति बनी न रहे अपितु उसे परामर्श बोध हो जिससे वह जीवात्मा की विकास यात्रा पर चल पड़े।

किन्तु भ्रम में पड़ी माननीय बुद्धि को क्या कहा जावे? जो इतना भी नहीं सोच पाता कि मृत्यु के समय विचारणायें, इच्छायें, स्वभाव सब वहीं तो रहेंगे जैसा जीवन भर का अभ्यास होगा जिसने जीवन भर परमात्मा की याद न की, अपना लक्ष्य न पहचाना, शारीरिक सुखों और इन्द्रिय जन्य अनुराग को निरर्थक नहीं समझा, उन्हीं में आसक्त रहा उसकी अन्तिम समय भावनायें एकाएक कैसे बदल पायेंगी।

मृत्यु जीवन का यथार्थ है, उसे कोई टाल नहीं सकता, फिर उपेक्षा क्या हितकर हो सकती है। समझदार वह है जो एक महान यात्रा की तैयारी के इस श्री गणेश पर्व की अच्छी तरह जान लेता है और परिपूर्ण तैयारियां करके चलता है जिससे महान् यात्रा के आनंद मिल सकें। मानवेत्तर योनियों में भटकना पड़े तो महर्षि नारद के जीव की कथा अपनी ही समझनी चाहिए किसी और की नहीं।


Quotation

मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सम्पदा से नहीं, समाज के लिये उसकी उपयोगिता तथा क्रिया शीलता से किया जाना चाहिये। -विवेकानन्द


आज का कार्य आज ही (kahani)

धर्मराज युधिष्ठिर के पास ब्राह्मण याचक बन कर आया और कहने लगा-’भिक्षा देहि!

युधिष्ठिर उस समय बैठ न जाने क्या सोच रहे थे। उन्होंने नम्रता पूर्वक ब्राह्मण से कहा-भगवन्! आप कल पधारें, आपको अभीष्ट वस्तु मिल जायगी।

ब्राह्मण तो चला गया किन्तु-भीमसेन उठे और लगे सैन्य साथियों को ले कर दुन्दुभि बजाने तथा मंगल गीत गाने। असमय में मंगलवाद्य बजने का शब्द सुन कर धर्मराज ने पूछा-आज इस समय मंगलवाद्य क्यों बज रहे है।

सेवक ने पता लगा कर बताया-भीमसेन ने ऐसा करने की आज्ञा दी है और वे स्वयं भी दुन्दुभि बजा रहे है।

भीमसेन बुलाये गये तो बोले-आपने काल को जीत लिया है, इससे बढ़ कर मंगल का समय और क्या होगा।

‘मैंने काल को जीत लिया?’-युधिष्ठिर आश्चर्य चकित हो कर बोले तो भीमसेन ने बात स्पष्ट की-महाराज विश्व जानता है कि आपके मुख से हँसी में भी झूठी बात नहीं निकलती। आपने याचक ब्राह्मण को अभीष्ट ‘दान’ कल देने के लिए कहा है, इसलिए कम से कम कल तक तो अवश्य काल पर आपका अधिकार होगा ही।’

अब युधिष्ठिर, को अपनी भूल का बोध हुआ। वे बोले-’तुमने मुझे आज उचित ही सावधान कर दिया। कोई भी कार्य जो करना है उसे कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।


धर्म जानि कुसुमानि

रंग-बिरंगे पुष्पों की सुशोभित छटा एवं अनुपम सौंदर्य सहज ही उस रास्ते जाने वाले के मन को आकर्षित कर लेता था। पुष्पों की सुरभित गंध मन को मदमस्त बना देती थी। अपने पावन चरणों से अपनी परम भक्त शबरी की कुटिया को कृतार्थ करने भगवान स्वयं आज जा रहे थे। ये पुष्प मानो उनका अभिनन्दन कर रहे थे।

कुटिया पर अपने इष्ट देव को देखकर शबरी भाव विह्वल हो उठी। आँखों से आनन्द एवं प्रसन्नता के अश्रु टपकने लगे। पद रज को मस्तक पर धारण कर उनके चरणों को पवित्र जल से धोया, उन्हें आसन पर बैठाकर भोजन आदि की तैयारी करने लगी। पुष्पों की लुभावनी सुगन्ध अब भी भगवान राम के मानस पटल पर छायी थी। शबरी के आते ही वह पूछ पड़े ‘कि इन सुन्दरतम पुष्पों को किसने लगाया है?

शबरी ने कहा, “भगवान! एक ऋषि कुछ दिनों पूर्व यहाँ रहते थे जिनका नाम मातंग था। लोक कल्याण के लिए उन्होंने यहाँ आश्रम की व्यवस्था बनायी थी। मातंग ऋषि के आश्रम में दूर-दूर से बहुत से विद्यार्थी विद्याध्ययन एवं जन सेवा का प्रशिक्षण लेने आते थे। लोक-कल्याण में निरत रहने वाले ऋषि-मुनियों को ठहरने की भी यहाँ समुचित व्यवस्था रहती थी। यहाँ विश्ववसुन्धरा को सुन्दर बनाने एवं प्राणि मात्र के कल्याण के लिए शोध कार्य, प्रशिक्षण एवं तपश्चर्या के क्रिया-कलाप चलाये जाते थे।

एक बार आश्रम में भोजन आदि बनाने की लकड़ी का अभाव हो गया। वर्षा ऋतु भी आने ही वाली थी। आश्रम में रहने वाले विद्यार्थी इस तथ्य से अवगत थे कि बरसात आने वाली है तथा लकड़ी की व्यवस्था करली जानी चाहिए जिससे चार मास बरसात में ईंधन का काम चल सके। यह जानते हुए भी विद्यार्थी उपेक्षा कर रहे थे तथा श्रम से बचना चाहते थे। विद्यार्थियों में छाये हुए अवसाद एवं उपेक्षा की प्रवृत्ति को देखकर मातंग ऋषि चिन्तित हो उठे, ‘श्रम देवता का अपमान और वह भी ऋषि आश्रम में, भला यह कैसे हो सकता था। विद्यार्थियों ने जब ‘आचार्य श्री’ को लकड़ी लाने के लिए जंगल की ओर जाते देखा तो ग्लानि से भर उठे तथा उनके पीछे कुल्हाड़ी लेकर दौड़े।

सभी जंगल में पहुँचकर लकड़ी काटने लगे। तीसरे पहर विद्यार्थी गण अपने-अपने सिर पर भारी लकड़ी के गट्ठर लादे आश्रम की ओर लौट पड़े। शरीर से पसीना निकल कर गिरता जा रहा था किन्तु सब प्रसन्न थे तथा एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति कर रहे थे। उस दिन विद्यार्थियों की छुट्टी कर दी गई। कठोर श्रम एवं मन प्रफुल्लित होने के कारण सब जल्दी ही सो गये। प्रातःकाल ब्रह्म वेला में ऋषि उठे। विद्यार्थियों को साथ ले स्नानादि के लिए चल पड़े। एकाएक मन्द-मन्द उषाकालीन वायु के झोंके के साथ मन को प्रसन्न करने वाली सुगन्ध आने लगी। सभी विद्यार्थी आश्चर्य से युक्त स्वर में ऋषि से पूछने लगे-पूज्य वर! यह सुगन्ध आज कहाँ से आ रहीं है? मातंग ऋषि मुस्कराते हुए बोले, ‘जाओ, स्वयं पता लगाओ। हिरण के समान छलाँग लगाते हुए बच्चे निकले। उन्होंने देखा कि जंगल से सिर पर लकड़ी लाते हुए जिन-जिन स्थानों पर आश्रम वासियों का पसीना गिरा था, उन स्थानों पर एक-एक पुष्प सुन्दर डालियों में खिला हुआ दिखायी दिया। “हे राम! ये सुगन्ध युक्त रंग-बिरंगे पुष्प पसीने से उत्पन्न हुए है” शबरी ने कहा।

वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग में श्रम देवता के महत्व का प्रतिपादन किया है। इस देव की उपासना से ही विश्व उद्यान को सौंदर्य युक्त बनाया जा सका है। भौतिक समृद्धि का जो आज बढ़ा-चढ़ा स्वरूप दिखायी दे रहा है उसका मूल आधार है, श्रम की साधना। जन मानस में श्रम रूपी देवता के प्रति निष्ठा की प्रतिष्ठा से ही सामाजिक उन्नति एवं भौतिक समृद्धि सम्भव है।


पुनर्जन्म सिद्धान्त को भली भाँति समझा जाय

किसी भी सिद्धान्त को यदि भली भाँति नहीं समझा जाय तो उसे मानने का दम भरने पर भी आचरण उससे विपरीत ही बना रहता है। पुनर्जन्म-सिद्धान्त के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया को न समझने वालों ने जहाँ इस जीवन के भौतिक सुविधा-साधनों को ही पूरी तरह पिछले जन्म का पुण्यफल मान लिया, वहीं इस पुण्य कर्म का अर्थ पूजा-पत्री, कर्मकाँड तक ही सीमित माना जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि न तो व्यक्ति की आदर्श परायणता के प्रति कोई वास्तविक सम्मान बचा न ही पुरुषार्थ को प्रगति का आधार समझा गया। इसके स्थान पर भौतिक सुख-सुविधाएं अपने पुरुषार्थ की तुलना में कहीं अधिक जुटा पाना या पा जाना ही चारित्रिक सौभाग्य या श्रेष्ठता का प्रमाण माना जाने लगा और वह श्रेष्ठता पाने का आसान तरीका ग्रह नक्षत्रों, देवताओं को टंट-घंट से प्रसन्न करना समझा गया।

यह एक विचित्र विडम्बना ही है कि पुनर्जन्म का जो सिद्धान्त पुरुषार्थ और कर्म की महत्ता का प्रतिपादक था, कठिन से कठिन अप्रत्याशित विपत्ति को भी प्रारब्ध भोग मानकर धैर्यपूर्वक सहने और आगे उत्कर्ष हेतु पूर्ण विश्वास के साथ प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता था, वहीं निष्क्रियता और अंधनियतिवाद का भ्रान्त मतवाद बन कर रह गया है।

मनुष्य द्वारा अपने भाग्य का निर्माण आप किये जाने का तथ्य भुलाकर यह माना जाने लगा कि देवता अपनी मर्जी और मौज के मुताबिक किसी का भाग्य खराब किसी का अच्छा लिखते या बनाते रहते है। भला, यदि ऐसा होने लगे, तो इन देवताओं को शक्ति सम्पन्न पागलों के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा? पूजा पत्री के रूप में मिथ्या, या अतिरंजित प्रशंसा तथा अत्यन्त सस्ती उपहार सामग्री पाकर ही अपनी नीति व्यवस्था को उलट पुलट देने वाले देवता तो अस्त व्यस्त अफसरों और बाबुओं से भी अधिक भोंदू सिद्ध होते।

प्रायः किसी को धन-सुविधा सम्पन्न देखकर इसे उसके पिछले जन्मों का पुण्य मान लिया जाता है। पर, धन मनुष्य की अनेक विभूतियों में से एक विभूति है, एक मात्र नहीं। कोई व्यक्ति धनी है, यह यदि उसके किसी विगत पुण्य का फल है। तो साथ ही यदि वह दुराचारी है, क्षुद्र है, क्रूर है व्यसनी है, तो यह सब उसके किसी विगत पाप का फल मानना होगा। यही स्वाभाविक और तर्क संगत प्रतिपादन कहलायेगा। सामान्यतः लोग जीवन में कुछ सत्कर्म करते है, कुछ अनैतिकताऐं भी। सत्कर्म का सुफल किसी सद्गुण या समृद्धि के रूप में सामने आयेगा तो दुष्कर्म का प्रभाव दुष्प्रवृत्ति दुर्गुणों के रूप में दिखेगा धनिकों में से कोई भी मतिमंद देखे जाते हैं, तो कोई ओछे भी। कोई दुर्व्यसनी दुराचारी होते हैं तो कोई धूर्त प्रवंचक भी। सबके सब धनिक सर्वगुण सम्पन्न होते हों, ऐसा देखने में नहीं आता। लेकिन उनके दुर्गुणों को पिछले जन्म में उनके पापी होने का प्रमाण तो खुले आम नहीं कहा जाता जबकि उनकी धन-सम्पन्नता को उनके पुण्यात्मा होने का चिन्ह बताते प्रायः बहुत से रूढ़ि पूजकों को देखा जाता है। यह पुनर्जन्म की अधूरी और भ्रान्त धारणा हुई।

साधन-सुविधाओं की प्रचुरता उपलब्ध होना न तो किसी के पिछले जन्म में पुण्यात्मा होने का प्रमाण है, न ही किसी के व्यक्तित्व की श्रेष्ठता का परिचायक है। प्रवृत्तियाँ दूषित या पतनशील हुई तो परिस्थितियों की यह अनुकूलता और साधनों की प्रचुरता बौद्धिक-नैतिक एवं चारित्रिक पतन में भी सहायक सिद्ध होती है। साधन सम्पन्नता से भी बढ़ चढ़कर उत्कृष्ट संवेदना, आदर्शवादी आस्था, सात्विकता, प्रसन्नता, धैर्य, साहस, शौर्य, सूझबूझ, स्वाध्याय-परायणता-कला कौशल व्यवहार-कुशलता भावनात्मक श्रेष्ठता, करुणा, निरहंकारिता, अंतर्दृष्टि, कुशाग्रबुद्धित्व, प्रखर धारणा-शक्ति-सहयोग वृत्ति, आदि सैकड़ों, हजारों मानवीय विशेषताएं है। इनमें से प्रत्येक का अपना महत्व है और उपयोगिता है। प्रत्येक से अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ संभव हैं।

इस पर भी इन दिनों किसी भी व्यक्ति की अन्य कोई विशेषता न देखकर मात्र उसकी आर्थिक-समृद्धि के आधार पर भाग्यवान और पुण्यात्मा मान लिया जाता है। अथवा आर्थिक विपन्नता देखकर अभागा और पिछले जन्म के पाप का फल भोगने वाला मान बैठा जाता है। इस प्रवृत्ति को पुनर्जन्म पर आस्था का द्योतक नहीं, चिंतन-शक्ति एवं विवेक की दरिद्रता और व्यक्तित्व के उथलेपन का परिचायक मानना ही सही है। इस उथलेपन और बौनेपन के कारण ही भाग्य को बदलने के लिये चमत्कारों का आश्रय खोजने में ही समय, श्रम एवं पुरुषार्थ गंवाया जाता रहा है।

पुनर्जन्म की वास्तविक दार्शनिक मान्यता तो इससे भिन्न ही तथ्य एवं निष्कर्ष प्रस्तुत करती है। सफलताएं विफलताएं व्यक्ति के निजी व्यक्तित्व भर से संबंधित नहीं होतीं। सामाजिक परिस्थितियां और सामाजिक प्रचलित मान्यताएं भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाती निभाती हैं। आदर्शवादी समाज में चरित्रवान का सम्मान होता है, तो भ्रष्ट समाज उसे पिछड़ा मूर्ख समझता है। कभी भारतवर्ष में तपस्वी विद्वानों का लोकमानस पर गहरा प्रभाव होता था। आज आर्थिक संपन्नता अन्य सभी सामर्थ्यों पर हावी है। पैसे वालों को बुद्धिजीवियों-कलाकारों तक का सहयोग सरलता से मिल जाता है। कभी यही कला और विवेक धर्म के लिये समर्पित होता था।

अतः किसी व्यक्ति के पिछले जन्मों की प्रवृत्तियों, संस्कारों का लेखा-जोखा यदि करना ही हो तो ऐसा उसकी वर्तमान प्रवृत्तियों गतिविधियों के आधार पर किया जाना ही उचित है, न कि सफलता के आधार पर। सफलता की परिभाषाएं और पैमाने भिन्न-भिन्न होते हैं, किंतु आदर्शवादिता और अवसरवादिता का मापदंड प्रायः सर्वमान्य होता है। स्वार्थ को छलपूर्वक परमार्थ तो प्रचारित किया जा सकता है परंतु वास्तविकता विदित होने पर सभी एक स्वर से उसे हेय स्वार्थ ही कहेंगे। जबकि सफलता के बारे में ऐसा एकमत नहीं हो सकता। भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद को कुछ लोग क्रांति-चेतना के प्रसार में सफल व्यक्ति मानेंगे तो कुछ अन्य उस दशा में उन्हें, विफल निरूपित करेंगे। किंतु उसका जो भी आदर्श था उसके प्रति वे निष्ठावान थे यह सभी मानेंगे। इस प्रकार प्रवृत्तियों के मापदंडों में भिन्नता है। अतः पिछले जन्म के पुण्य-पाप को उपलब्धियों से नहीं, प्रवृत्तियों से आंका जाना चाहिए।

यह मन, बुद्धि, अंतःकरण की प्रवृत्तियों और चेतना-स्तर ही है, जो अगले जन्म में भी काम आता है। साधन-सामग्रियां तो यहीं छूट जाती हैं।

दक्षिणी अफ्रीका में जोहान्सवर्ग शहर स्थित विट्टाटर स्ट्रैण्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर्थर ब्लेकस्ले ने ‘साइकिक रिसर्च’ के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये हैं। पिता एडवर्ड माइकेल बर्वे और मां कैरोलिन फ्रांसिस एलिजाबेथ की संतान जोय बर्वे की जांच पड़ताल इन्होंने उस समय शुरू की, जब वह 13 वर्ष की थी और उसकी विचित्रताओं की बात श्री ब्लेकस्ले को विदित हुई।

यह लड़की जोय ढ़ाई वर्ष की आयु से ही अति प्राचीन ऐतिहासिक दृश्यों और वस्तुओं के चित्र बनाने लगी थी। उसकी इस शक्ति का प्रचार तब से अधिक हुआ, जब 12 वर्ष की आयु में वह ‘क्रुगर’ हाउस नामक भवन देखने गयी, जहां 15 वीं शताब्दी में वहां के गणतंत्र का प्रधान ओम पाल रहा करता था। जोय का कहना था कि मैं पाल को जानती थी। उसने पाल के बारे में अनेक बातें बताई। जोय के इतिहास-प्राध्यापक ने जांच के बाद उसके द्वारा बताये गये विवरण इतिहास-प्रमाणित बताये और कहा कि इसके पूर्व मैं स्वयं यह सब नहीं जानता था। जोय के बताने पर मैंने पुस्तकों और रिकार्ड्स की छानबीन की, तो पाया कि जाये की जानकारी आश्चर्यजनक रूप से सही थी। जोय ने बताया कि ओम पाल की पहल पत्नी मेरिया डूप्लेसिस 16 वर्ष की उम्र में एक बच्चे को जन्म देते ही मर गई थी। फिर मेरिया की भतीजी से पाल का दूसरा विवाह हुआ और उसके 16 बच्चे हुए। जोय ने यह भी बताया कि पाल को एक विद्रोह के बाद देश से निर्वासित कर दिया गया था और वह स्विट्जरलैंड चला गया था, जहां 1940 में उसकी मृत्यु हुई। ये सभी बातें छानबीन से सही निकलीं।

इस विचित्र बालिका जोय का दावा है कि उसे अपने पिछले 9 जन्मों की स्मृति है। इस बालिका के विवरणों में भी एक ही तथ्य अंतर्निहित है कि मनुष्य के विकास क्रम में एक सातत्य है और वह पिछले संस्कारों के साथ नया जीवन प्रारंभ करता है। यह बालिका आज परामनोवैज्ञानिकों के अध्ययन का एक आकर्षण-केंद्र बनी हुई है। अपने इन नवों जीवन के बारे में 12-13 वर्ष की आयु में जोय ने ऐसे विस्तृत विवरण पेश किये, जो मात्र अध्ययन के आधार पर शीर्षस्थ इतिहास-पुरातत्ववेत्ता ही बता सकते हैं। यह चमत्कार दूरानुभूति का परिणाम भी नहीं माना जा सकता। क्योंकि दूरानुभूति की सामर्थ्य से व्यक्ति उन्हीं बातों को जान सकता है, जो प्रश्नकर्ता के मन-मस्तिष्क में हैं। किंतु जोय तो बिना किसी प्रश्नकर्ता के अनेकों ब्यौरे सुनती बताती है, जिसकी जानकारी खुद श्रोताओं को नहीं होती।

जोय के अनुसार बहुत पहले के एक जन्म की उसे इतनी ही याद है कि डिनासार यानी प्राचीन भीमकाय पशु ने उसका एक बार पीछा किया था। यह पाषाण-काल की घटना है। दूसरे जन्म में जोय दासी थी। उसके स्वामी ने अप्रसन्न होकर उसका सिर काट दिया था। तीसरे जन्म में भी वह दासी के रूप में ही रही। चौथे जन्म में वह तत्कालीन रोम में एक जगह रहती थी और रेशमी कंबल एवं वस्त्र बनाती थी। पांचवें जन्म में वह एक धर्मांध महिला थी और एक धर्मोपदेशक को उसने पत्थर दे मारा।

जोय का छठवां जन्म इटली में नवजागरण के कालखंड में हुआ। उस समय वहां कला और साहित्य की नयी जागृति उभार पर थी। जोय के घर में दीवारों और छतों पर बड़े-बड़े चित्र थे। सातवां जन्म गुडहोप के अंतरीप में 17 वीं शताब्दी में हुआ। जहां पर वह ठिंगने पीले रंग के लोगों में से थी। राज्याश्रम में पलने वाले व्यवसाय से उसका सदा सम्बंध रहा।

आठवें जन्म में वह अधिक विकसित रूप में पैदा हुई। 19 वीं शताब्दी की यह बात है। सन् 1883 से सन् 1900 तक वह ट्रांसवाल गणतंत्र के राष्ट्रपति ओम परल के निवास भवन आती-जाती थी कला और कारीगरों में उसकी गहरी रुचि थी।

नवें वर्तमान जीवन में वह प्रिटोरिया नगर की एक छात्रा है। वह पिछले जन्मों के बारे में विस्तृत ब्यौरे बताती है। उसकी कला-रुचि प्रत्येक जन्म में अक्षुण्ण रही है। दासी के रूप में वह नाचती थीं। रोम में रेशमी कंबल बुनती थी धर्म क्षेत्र से भी वह सदा संबंधित रही। उसके संस्कारों में निरंतर एक धारावाहिकता देखी जा सकती है।

संस्कारों का यह प्रवाह ही पुनर्जन्म-सिद्धांत का आधार है। भाव-संवेदनाएं, आस्थाएं, चिंतन की दिशाएं और स्वभाव ही अगले जन्म में संस्कार रूप में साथ रहते हैं। साधन-सामग्रियां नहीं। साधनों की उपयोगिता भी प्रवृत्ति के अनुरूप घटती-बढ़ती रहती हैं। बुद्ध के विकास में उनका राजसी ऐश्वर्य कोई सहायता नहीं कर सका। अयोध्या की साधन-सुविधाएं राम को रावण-विजय में रंचमात्र सहयोग न दे सकीं। जिसके कारण राम या बुद्ध की गरिमा है, जो उन के व्यक्तित्व की वास्तविक विशेषताएं कही समझी जाती हैं, उनका निर्माण उन सुविधाओं के द्वारा नहीं हुआ था, जो उन्हें जन्म से प्राप्त थीं। अपितु उन सत्प्रवृत्तियों के द्वारा हुआ था, जो उनके समग्र व्यक्तित्व के मूल में क्रियाशील रहीं। ये प्रवृत्तियां ही अपने अनुरूप साधन जुटाने का समर्थ आधार बन जाती हैं। व्यक्तित्व में ये विशेषताएं न हुईं, तो साधनों सुविधाओं का विशाल भंडार खाली होते देर नहीं लगती।

यह सही है कि पुनर्जन्म-सिद्धांत के प्रारब्ध कर्म का अपना विशेष महत्व है। पर प्रारब्ध भी किसी चमत्कार का परिणाम नहीं होता और न उसमें हेर-फेर सर्वथा असंभव होता है। लेकिन आज पुनर्जन्म को मानने वालों में बड़ी तादाद उन लोगों की है, जो प्रारब्ध या दैवी-विधान को अकारण या व्यवस्थाविहीन, चमत्कारिक मानते हैं। और इनमें परिवर्तन भी चमत्कार के सहारे ही संभव मानते हैं। ये दोनों की बातें पुनर्जन्म-सिद्धांत के वास्तविक आधारों के विरुद्ध हैं।

निस्संदेह ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनमें जन्म से ही अनेक विलक्षणताएं होती हैं या जो प्रचलित लोक-प्रवाह से अप्रभावित, अपनी ही विशिष्टता से विभूषित देखे जा सकते हैं। इसका कारण भी दैवी चमत्कार नहीं, पिछले जन्म में वैसे विकास हेतु किया गया उनका स्वतः का प्रयास- पुरुषार्थ है।

महर्षि अरविंद की प्रधान सहयोगिनी श्री मां जब मीरा रिचर्ड के रूप में फांस में बाल्यावस्था व्यतीत कर रही थीं, उसी समय उन्हें दिव्य दर्शन होते थे, जो उनके पिछले जन्म के ही संस्कारों के परिणाम थे। आचार्य विनोबा भावे ने अपने बारे में कहा है कि मुझे यह आभास होता है कि पूर्व जन्म में मैं बंगाली था। साथ ही जिन वस्तुओं के प्रति जन-सामान्य में प्रचंड आकर्षण होता है उनके प्रति विनोबा में कभी आकर्षण ही नहीं हुआ यह भी वे अपने पिछले जन्म की कमाई मानते हैं। इस जन्म की कमाई तो वह तब होती, जब उस ओर आकर्षण होता और वे उस पर नियन्त्रण करते। श्री अरविन्द के एक प्रमुख शिष्य थी अनिलवरण राय ने शैशवावस्था में ही श्री कृष्ण के विराट-स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शन की बात की हैं उस समय तक उन्होंने कैसी भी साधना नहीं की थी, अतः यह अनुभूति पूर्वजन्म की साधना का ही फल थी यह बात उन्होंने स्वयं कहीं है।

पुनर्जन्म के प्रति विवेकविरुद्ध मान्यतायें पालकर हर दुःखग्रस्त या आर्थिक दृष्टि से कुछ खोने वाले व्यक्ति को पिछले जन्म का पापी और सुविधा-सज्जित लोगों, धन कुबेरों, सत्तासीनों को विगत जन्म का पुण्यात्मा मान बैठने की मूढ़ता से बचना चाहिए। इन मापदंडों से तो राम, कृष्ण, विवेकानन्द, मार्क्स, महात्मा गाँधी, समेत सभी महा मानवों को अभागा और महापापी बताना तथा अत्याचारी विलासी सामन्तों धनपतियों को महान पुण्यात्मा करार देना आसान होगा।

आवश्यकता जन्म-जन्मान्तर तक चलने वाले कर्मफल के अटूट क्रम को समझने की है। उसे समझने पर ही उसकी दिशाधारा निर्धारित करने और मोड़ने में सफलता मिल सकती है। अपने भीतर की दुर्बलताओं और विकृतियों को अपनी ही भूल से चुभे काँटे समझकर धैर्यपूर्वक निकालना और घाव को पूरना चाहिए। अपनी सत्प्रवृत्तियों, श्रेष्ठ उमंगों को अपनी अमूल्य थाती समझकर उसे संरक्षित ही नहीं रखना चाहिए, अपितु चढ़ाने का भी प्रयास करना चाहिए। इस हेतु न तो किसी ग्रह-नक्षत्र की मनुहार की जरूरत है न चमत्कारों की खोज की। अपने भीतर की देव-प्रतिष्ठा और अपने भीतर जगमगा रहे आस्था के प्रकाशपूर्ण ग्रहों नक्षत्रों की अनुकूलता ही अपने विकास का आधार बन सकती है। यही पुनर्जन्म सिद्धान्त की दार्शनिक पृष्ठभूमि और नैतिक प्रेरणा है।


कहना ही क्या (kahani)

हिरण्याक्ष का वध करने के उपरान्त भी जब भगवान वाराह अपने लोक को वापिस नहीं लौटे तो वहाँ चिन्ता होने लगी। देवता व्याकुल हुए और शंकर जी को तलाश करने भेजा गया।

शंकरजी ने भू लोक में उन्हें सर्वत्र खोज डाला। देखा तो वे अपना परिवार बनाये बैठे है। स्त्री बच्चों के समक्ष क्रीड़ा संलग्न हो रहे है। शूकरी और उसके शिशु शावक उन्हें अपना विनोद साधन बनाये हुए है।

वापिस ब्रह्मलोक चलने की प्रार्थना जब बाराह जी ने अस्वीकार करदी और अपना क्रीड़ा विनोद छोड़ने का तैयार न हुए तो क्रुद्ध शंकरजी ने त्रिशूल से उनका पेट फाड़ डाला। शरीर क्षत−विक्षत हो गया तो विवश होकर बाराह भगवान अपने लोक जा पहुँचे।

प्रतीक्षा में चिन्तित बैठे हुए देवताओं ने जब विलम्ब का कारण पूछा तो उनने कहा--”शरीर और उसकी ममता बड़ी प्रबल है। जीवधारी उसी में लिप्त होकर धारियों की तरह मेरी भी दुर्गति हुई। शंकरजी ने उस माया को विदीर्ण न किया होता तो मेरे लिए भी वापिस लौटना कठिन था।

शिवजी हँस पड़े, उनने कहा-देवताओं! अब तुम समझे होंगे कि मेरे विरक्त विचरण का रहस्य क्या है। आसक्ति के बंधनों में बंधे हुए जीव, त्याग का आधार न लें तो उनका छुटकारा भी संभव नहीं। आसक्ति ग्रस्त बाराहजी की जब यह दुर्गति हुई तो दूसरों के बारे में कहना ही क्या है?


अपराध न समाज से छिपता है न अपने आपसे

अपराध विज्ञान का एक सामान्य और सर्वमान्य सिद्धांत है कि अपराधी कितना ही चतुर और कितना ही चालाक क्यों न हो, जब वह अपराध करता है तो अपराध स्थल पर कोई न कोई ऐसा चिन्ह आवश्यक छोड़ जाता है जिससे कि वह पकड़ में आ जाता ह। इस सिद्धान्त के मूल में अंतरात्मा के विरुद्ध किये जाने वाले कार्य में आत्मा की प्रताड़ना के कारण अंतःकरण में होने वाली हड़बड़ाहट ही है। अपराधी को उस समय दोहरे मानसिक द्वन्द्व से गुजरना पड़ता ह। एक तो अपराध करते हुए कोई देख न ले, कोई ऐसा सूत्र न छूट जाये जिससे उसकी पहचान हो सके। दूसरा संघर्ष अपनी आत्मा से ही करना पड़ता है जो उसे किये जा रहे अनुचित कार्य के लिए अनवरत लताड़ती फटकारती ही रहती है। इन दोहरे द्वन्द्वों के कारण वह इतना घबरा उठता है कि अपराध स्थल पर कोई न कोई चूक अवश्य कर जाता हैं।

अब तो अपराधी की खोज के लिए अंगुल मुद्रायें (फिंगर प्रिन्ट्स) भी काफी सहायक होते हैं। यह मुद्रायें अपराध स्थान पर अपराधी द्वारा कहीं न कहीं जरूर छूट जाती हैं। यद्यपि अपराधी अपनी ओर से पूरी सावधानी बरतते हैं कि उनका कोई चिन्ह घटना स्थल पर छूटे नहीं परन्तु अंगुलियों की छाप कहीं न कहीं अवश्य छूट जाती है, जिससे वे पकड़ में आ जाते हैं।

ऐसे कितने ही अपराध हुए हैं जिनमें अपराधी ने अपना कोई सूत्र घटना स्थल पर नहीं छोड़ा किंतु अंगुल मुद्रा के कारण पकड़ में आ गये 2 जून 1648 को बर्कशायर (इंग्लैंड) में 4 वर्षीय श्रीमती फ्रीमैन की हत्या हुई। अपराधियों ने हत्या करने के बाद अपनी पहचान के सूत्र बड़ी सफाई से मिटा दिये थे। अपराधियों को खोजने के लिए चैपमैन तथा हिश-लैम्प नामक पुलिस अधिकारियों को नियुक्त किया गया। पुलिस अधिकारी जब घटना स्थल पर पहुँचे तो उन्हें ऐसा कोई सूत्र नहीं मिला जिसे लेकर जाँच को आगे बढ़ाया जा सके। बहुत बारीकी से पड़ताल करने के बाद फिंगर प्रिण्ट ब्यूरो के प्रधान एफ.आर. चैरिल न सब और से निराशा व्यक्त की 16 कमरे वाले इस आलीशान मकान में दुबारा खोज की गयी तो मृत महिला के बिस्तर पर एक छोटा सा कार्ड बोर्ड का टुकड़ा मिला। इस कार्ड बोर्ड पर बहुत हलके निशान दिखाई दिये बड़ी सावधानी से उन निशानों को रसायन द्वारा उभार कर फोटो लिया गया यह कार्ड बोर्ड का टुकड़ा एक ऐसे कागज के डिब्बे का था जिसे पचासों बार खोला और बन्द किया गया था। पता नहीं वे निशान किसके थे। फिर भी जो निशान मिले वे किसी व्यक्ति के दाँये अंगूठे तथा मध्यमा के निशान थे।

इन निशानों को स्काटलैण्ड यार्ड के फिंगर प्रिन्ट रिकार्ड से मिलाया गया तो पता चला कि ये निशान कुख्यात सेंधमार जार्ज रसेल कीट की अंगुलियों के थे। वह वर्षों से अपराधी जीवन व्यतीत कर रहा था। इस हत्याकाण्ड में जार्ज रसेल के फिंगर प्रिन्ट के अलावा अन्य कोई व्यक्ति न तो प्रत्यक्षदर्शी था और न ही अन्य कोई दूसरे प्रमाण थे जो उसे अपराधी सिद्ध करा सकते थे। परन्तु गुप्तचर अधिकारियों ने सारे काण्ड को इस प्रकार सूत्र दर सूत्र मिलाया कि जार्ज रसैल को अपराधी घोषित किया गया और उसे सजा दी गयी।

कई बार तो अंगुल-मुद्रायें प्रत्यक्षदर्शियों से भी अधिक प्रमाणित सिद्ध होती हैं। अंगुल-मुद्राओं का वैज्ञानिक आधार यह है कि मनुष्य शरीर के सभी अंग सारे चिन्ह समयानुसार बदलते, बनते मिटते रहते हैं हथेली अथवा अंगुलियों पर पड़ी रहने वाली हस्तरेखाऐं भी बदलती रहती है किन्तु इनके अतिरिक्त जो बारीक असंख्य रेखायें होती हैं वे कभी नहीं बदलती इनके साथ ही किसी एक व्यक्ति की रेखायें दूसरे व्यक्ति से मेल भी नहीं खातीं यहाँ तक कि एक ही समय पर एक साथ जन्मे दो हमशक्ल जुड़वा भाइयों की रेखायें भी एक सी नहीं रहतीं पिछले दिनों लन्दन में ही एक सेवा काण्ड हुआ जिसमें अपराधी का पता चल गया था। उसे देखने वाले, प्रत्यक्षदर्शी भी थे परन्तु समस्या यह थी कि अपराधी का एक दूसरा भाई भी था, जो स्वयं अपने भाई का अनुगमन करता था। यह निश्चित नहीं किया जा रहा था कि वास्तविक अपराधी कौन है? उस स्थिति में अंगुल मुद्रायें सहायक सिद्ध हुईं और वास्तविक अपराधी को दण्ड दिया जा सका।

घटना स्थल पर अपराधी की अंगुल-मुद्रायें कैसे अंकित हो जाती हैं। इस संदर्भ में अपराध विज्ञानियों का कहना है कि मनुष्य के हाथ में से एक अदृश्य द्रव निरन्तर द्रवित होता रहता है। व्यक्ति जब अपराध करता है तो इस द्रव की मात्रा बढ़ जाती है। मात्रा बढ़ जाने का कारण अपराधी में चलते रहने वाला मानसिक द्वन्द्व, पकड़े जाने का डर तथा आत्मा की फटकार के कारण उत्पन्न हुई घबराहट ही बताया जाता है। इसलिए अपराधी की अंगुलमुद्रायें उस स्राव के कारण अधिक स्पष्टता से अंकित हो जाती है। इसी आधार पर सैकड़ों व्यक्तियों की अंगुल मुद्राओं के बीच भी अपराधी की अंगुल मुद्रायें पहचानी जा सकती हैं।

भारत की राजधानी दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में 24 अगस्त 1969 को हुई चोरी इतनी सफाई से की गई थी कि अपराधी का कोई चिन्ह ही पता नहीं चल रहा था। वहाँ काँच के एक टूटे हुए टुकड़े पर पड़े अदृश्य अंगुल मुद्राओं के द्वारा ही अपराधी को पहचाना और पकड़ा जा सका अन्य सूत्रों के आधार पर अपराधी की कद काठी का ही अनुमान लगाया जा सकता था। अपराधी ने खिड़की में लगी लोहे की सलाखों को मोड़कर एक वर्ग फीट जगह बनायी थी और उसी में से वह अन्दर घुसा था राष्ट्रीय संग्रहालय में हुई इस चोरी में 1 लाख 74 हजार रुपये मूल्य के गुप्त एवं मुगलकालीन रत्नजड़ित आभूषण तथा स्वर्ण मुद्रायें चोर ले गये थे।

अपराध विज्ञान के विशेषज्ञ इतना ही अनुमान लगा सके कि अपराधी अकेला था, नाटे कद का तथा शक्तिशाली और पुष्टदेह का स्वामी था। खोज इससे आगे न बढ़ने पर सेण्ट्रल फिंगर प्रिन्ट ब्यूरो कलकत्ता से फिंगर प्रिण्ट एक्सपर्ट बुलाये गये जिन्होंने काँच के एक टूटे हुए टुकड़े पर तीन अदृश्य अंगुल मुद्रायें देखी। उन्हें ग्रेपाउडर से उभारा गया और चित्रित कर दिया गया।

इसी आधार पर उक्त घटना के 60 दिन बाद आँध्रप्रदेश के सिकन्दराबाद जिले के पिकेट ग्राम में छुपे हुए अपराधी यादगिरि को 5 नवम्बर को गिरफ्तार किया गया तथा उसके पास से चोरी किया गया माल बरामद हुआ। अपराध विज्ञानी अंगुल-मुद्राओं के अंकित होने का कारण जिस अदृश्य और सूक्ष्म द्रव को मानते हैं बताया जाता है कि वह द्रव किसी संगीन अपराध के समय अपराधी के हाथों से अनजाने ही बड़ी तेजी से बहने लगता है।

किसी भी दुष्कर्म में प्रवृत्त होते समय पहले व्यक्ति की अन्तरात्मा धिक्कारती है, परन्तु जब उस आवाज को कुचल कर बार-बार दुष्कर्म किये जाते हैं तो अन्तरात्मा की वह ध्वनि, चेतावनी क्षीण पड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में अपराधी को न घबराहट होती है और न भय। माना जाये कि उस द्रव के निसरण का कारण घबराहट या भय ही है तो वैसी स्थिति में जब कि ऐसा कोई द्वन्द्व नहीं चलता, अतः करण की आवाज मर सी जाती है तो कोई द्रव नहीं बहना चाहिए परन्तु इस दशा में भी अंगुल मुद्राओं के अंकन में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया है। बड़े से बड़े पुराने और कुशल अपराधियों की अंगुलियाँ उसी प्रकार अपनी छाप छोड़ देती हैं जैसे नये अपराधी की। कहीं यह प्रक्रिया अन्तरात्मा द्वारा अपनी बात न मानने अनीति का पथ न छोड़ने के कारण समाज द्वारा दण्डित कराये जाने के लिए छुड़वायी गयी सूक्ष्म पहचान हो।

उपरोक्त अपराध घटनाओं में तो उन्हीं अपराधों को उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। जिसमें हाथ के निशान अंकित होने की सम्भावना कहीं न कहीं रहती ही है लेकिन अपराधी जब दूर रहकर वार करता है जैसे गोली चलाता है या विष देकर किसी की हत्या करता है तो भी बच नहीं पाता। हालाँकि इन तरीकों में अंगुल-मुद्राओं का कोई भय नहीं रहता फिर भी अपराधी को पकड़ ही लिया जाता है 1950 में पंजाब की रियासत के राजा रणजीतसिंह की हत्या उनकी रानी पलविंदर कौर ने ही कर दी थी। कोई प्रमाण नहीं था कि यह हत्या रानी ने ही की है और न ही किसी को संदेह हो सकता है क्योंकि किसी ने कभी भी राजा रानी में मनमुटाव या मतभेद जैसी कोई बात देखी ही नहीं थी।

घटना इस प्रकार है- रंजीतसिंह और पलविंदर कौर उस दिन शिकार पर गये थे, शाम को वापस कैंप पर केवल महारानी ही लौटी। उन्होंने अपने अन्य साथियों को बताया कि मैं और महाराजा अपने शिकार के पीछे अलग-अलग रास्तों पर निकल गये थे। महाराज के वापस न आने पर महारानी भी बहुत चिंतित दिखाई दे रहीं थी। देर रात तक उन लोगों ने कैंप पर महाराजा का इंतजार किया जब महाराजा का एक प्यादा यह सूचना लेकर आया कि महाराज एक कुएं में गिर गये हैं सभी लोग दौड़े गये और रस्सी डाल कर महाराज को कुएं में से निकाला गया परन्तु तब तक महाराजा की मृत्यु हो चुकी थी।

लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मृत्यु का दूसरा ही कारण बता रहीं थी। डाक्टरों के अनुसार महाराजा की मृत्यु कुएं में गिरने के कारण नहीं वरन् एक नुकीले तीर के कारण हुई थी। पुलिस का विचार था कि उन दिनों कुछ आदिवासी कबीलों की महाराजा से रंजिश चल रहीं थी और यह तीर आदिवासियों द्वारा ही इस्तेमाल किया जाता है। सूत्र दर सूत्र घटना की कड़ियां इस प्रकार मिलाई गयीं कि लगता था किसी आदिवासी ने महाराजा पर उस समय तीन चलाया जब वह पानी पीने के लिए कुएं पर चुके थे। प्रहार के कारण महाराजा कुएं में गिर गये और उनकी मृत्यु हो गयी।

उस तीर को, जिसका अगला सिरा महाराजा की पीठ में घुसा हुआ था, अपराध विज्ञान की लैबोरेटरी में भेजा गया। अपराध विज्ञानी डा. दत्त ने निरीक्षण किया तो पाया कि तीर का अगला हिस्सा अत्यन्त नुकीला, ठोस और ताँबे का बना हुआ था और वह एक पेचदार खोखली ट्यूब से बना है। आगे जाँच की गयी तो पता चला कि वह तीर नहीं बल्कि एक विशेष प्रकार की रायफल की गोली है जो ताम्बे से बनती है क्योंकि उस रायफल से निकली गोली की गति व मारक शक्ति इतनी तेज तथा गर्म होती है कि सीसे की गोली पिघल जाती है। इसी लिए रायफल में ताँबे की गोली प्रयुक्त की जाती है।

यह रायफल उक्त क्षेत्र में केवल रियासत के राज घराने में ही थी। केस ने नया मोड़ लिया तो उसके आधार पर पलविंदर ‘कौर’ को गिरफ्तार किया गया और उसे सेशन से सात साल की सजा दी गयी। यद्यपि यह केस आगे हाईकोर्ट में भी ले जाया गया। पता नहीं वहाँ क्या निर्णय हुआ परन्तु इन सभी घटनाओं से यह सिद्ध है कि अपराधी अपराध करने के लिए कितनी भी योजनायें बनायें, कैसी भी सावधानी बरतें परन्तु प्रायः वे कहीं न कहीं ऐसी चूक जरूर कर जाते हैं जिससे कि उसका राज खुल जाता है।

कदाचित कोई व्यक्ति इतनी सावधानी बरते कि वह पुलिस और कानून की निगाहों से बच निकले तो भी उसे अपराध का दण्ड तो मिला ही हैं। समाज न भी दे, परन्तु जिनके प्रति अपराध किया गया है उनकी आत्मा, स्वयं अपनी आत्मा और ईश्वरीय नियम अपराधी को उसके किये का दण्ड देते हैं। अभी कुछ वर्ष पूर्व की घटना है। अर्जेण्टाइना के एक ग्रामीण क्षेत्र में किसी व्यक्ति ने एक ग्रामीण को गोली मार कर हत्या कर दी। गोपी इतनी नजदीक से मारी गयी थी कि मृत व्यक्ति की खोपड़ी को छेदते हुए पीछे खड़े वृक्ष के तने में जा घुसी।

हत्यारा पकड़ लिया गया। प्रत्यक्ष दर्शी गवाह, साक्ष्य और प्रमाणों के बावजूद भी वकीलों ने कुछ ऐसे कानूनी पेच निकाल लिये कि अपराधी को संदेह का लाभ मिल गया और वह बरी हो गया। इस घटना के तीन वर्ष बाद वहीं व्यक्ति अपने खेत पर खड़ा होकर मेंड़ पर लगा वृक्ष कटवा रहा था। वह वहीं वृक्ष था जिसके नीचे उस मजदूर की गोली मार कर हत्या की गयी थी।

जब वृक्ष को काटा जा रहा था तो वृक्ष कट कर कुछ इस प्रकार गिरा कि उसमें तीन वर्ष पूर्व फंसी गोली बंदूक से छूटी गोली की तरह ‘उसी खेत मालिक की कनपटी पर लगी’ जिसने कि मजदूर की गोली मार कर हत्या की थी। पेड़ से छूटी हुई गोली के कारण वह व्यक्ति घटना स्थल पर ही मर गया। इस विचित्र घटना को जिस किसी ने भी सुना सृष्टि नियंता की न्याय प्रक्रिया का यह अद्भुत ढंग देख कर दांतों तले अंगुली दबा कर रह गया।

अनीति अनाचार के शिकार होकर अपने प्राण खो बैठने वाले व्यक्ति की आत्मा भी कई बार अपराधी को पकड़वा देती है। एडिनबरा में 1905 एक अद्भुत हत्या काण्ड हुआ वहाँ की एक मकान मालकिन मिस जूरी की हत्या उसी मकान में रह रहे किरायेदार चार्ली ने कर दी। चार्ली एक पुलिस अधिकारी था और उसी थाने का इंचार्ज था जिसमें कि जूरी की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करायी गयी थी। अतः चार्ली ने इस रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की और कैसे फाइल हो गया। यह सारा घटनाक्रम मार्च 1905 का हैं।

इसके बाद उस मकान में जो भी किरायेदार आता जूरी की आत्मा उस केस को पुनः चालू कराने तथा अपराधी को दण्ड दिलवाने के लिए कहती। लेकिन लोग जूरी की आकाँक्षा को पूरा करने के स्थान पर डर के मारे वह मकान छोड़कर चले जाते, सन् 1920 में उसी बंगले में मि. डिक्सन नामक एक पुलिस अधिकारी आया, जूरी की आत्मा ने उससे भी वहीं सब कहा जो अन्य किरायेदारों से कहती रहती थी। मि. डिक्सन ने उन बातों को सहजता और गम्भीरता से लिया। उन्होंने एडिनबरा के उस थाने में दबा दी गयी 15 वर्ष पुरानी वह फाइल फिर निकलवायी। उसमें जूरी के नौकर द्वारा यह शिकायत दर्ज करायी गई थी कि किसी ने उसकी मालकिन को गला घोंट कर मार डाला है। इस रिपोर्ट पर तत्कालीन थाना अध्यक्ष ने यह टिप्पणी लिखवायी थी कि-जिस समय जूरी की हत्या हुई उस समय चार्ली गश्त पर गया हुआ था और अनुमान किया जाता है कि मिस जूरी ने अपने अकेले पान से ऊब कर स्वयं आत्महत्या कर ली है।

जूरी की आत्महत्या द्वारा दिये गये निर्देशों के आधार पर मि. डिक्सन ने सारे मामले की फिर से जाँच करायी और सारे प्रमाण एकत्रित किये गये। सभी प्रमाण चार्ली के विरुद्ध जाते थे। इस आधार पर चार्ली को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार करने के बाद चार्ली ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने जूरी की हत्या की थी क्योंकि जूरी से उसके अवैध सम्बन्ध थे। प्रेम का ढोंग रचकर चार्ली जूरी से जल्द ही विवाह करने का वादा करते हुए यह सब करता रहा था। इन सम्बन्धों के कारण जूरी गर्भवती हो गयी थी और शादी के लिए दबाव डालने लगी थी। उससे छुटकारा पाने के लिए ही चार्ली ने जूरी की हत्या कर दी और अपने पुलिस अधिकारी होने का लाभ भी उठाया।

व्यक्ति अपने अपकर्म ही भूत बन कर उसका पीछा करते रहते हैं और जब तक वह व्यक्ति उन दुष्कर्मों का फल नहीं भोग लेता तब तक वह उससे पीछा नहीं छूटता। 28 जनवरी 76 की घटना है मझगवाँ बिहार के सोनपुर गाँव में एक बनिये के यहाँ नौकरी कर रहे 23 वर्षीय युवक भवानी ने 13 वर्षीया दुलारी के साथ मौका देख कर अपनी वासना पाशविक ढंग से पूरी की और उसके बाद दुलारी की हत्या करके नहर में फेंक दी। इस घटना का किसी को पता नहीं चला और न पुलिस को ही हत्या का कोई सुराग ही मिल सका कि किसने हत्या की थी?

लेकिन भवानी के कानों में उस निर्दोष युवती की चीत्कार, हमेशा गूँजती रहती, मूक याचना भरी निगाहें, चेहरे पर विवशता के भाव, आतंक की काली छाया-आदि कुल मिलाकर वह सारा दृश्य भवानी की आंखों के आगे कौंध जाता। अंतरात्मा की प्रताड़ना और पश्चाताप की व्यथा वेदना भवानी अधिक नहीं झेल सका और मार्च तक मझगावाँ वासियों ने भवानी को सड़कों पर पागलों की तरह चिल्लाते चीखते देखा। यहीं नहीं कुछ दिनों बाद भवानी ने विक्षिप्तावस्था में अपने गले में फाँसी लगा ली।

इस जन्म में कोई व्यक्ति पापकर्मों के दण्ड से बच जाने में सफल भी हो जाता है तो भी उसका दण्ड अगले-जन्म में सुनिश्चित रूप से मिलता है। आप्त वाक्य कि’-पूर्व जन्म के पाप हो इस जन्म में असाध्य और कष्टकर रोगों के रूप में पीड़ित करते हैं। “अगले जन्म में यह दण्ड तो भोगना ही पड़ते हैं इसी जन्म में जो मानसिक बोझ, व्यथा पश्चाताप की आग दहकती रहती है वही कम नहीं होती। अखण्ड ज्योति के पाठक उस विमान चालक का विवरण पिछले अंकों में पढ़ चुके हैं। जिसने नागाशाकी और हिरोशिमा पर अणु बम गिराये थे।

क्षणिक प्रलोभन या आवेश में आकर कोई अपराध कर बैठना सौ में से निन्यानवे बार समाज के सामने अपराधी की तरह खड़ा कर देता है। उससे बच भी गये तो अंतरात्मा की मार पीड़ित आत्मा के प्रतिशोध और सृष्टि संतुलन बनाये रखने वाले नियमों की पकड़ से बचकर कहाँ जायेगा।


खीजते रहने की आदत से पिण्ड छुड़ायें

प्रसन्न रहना, न रहना उसी तरह अपनी इच्छा पर निर्भर है जैसे चलना न चलना। हम चाहें तो किसी एक जगह पर भी अपंगों की तरह बने रह सकते हैं और चाहें तो पैरों में थोड़ी अड़चन रहने पर भी प्रयत्नपूर्वक कुछ न कुछ चलते फिरते रह सकते हैं। विवशता की बात दूसरी है अन्यथा सामान्य स्थिति में चलना न चलना अपने हाथ की बात है। ठीक इसी प्रकार मन को प्रसन्नता की दिशा में चलाना या न चलाना अपनी मर्जी पर है। हम चाहें तो वर्तमान परिस्थितियों के रहते हुए भी प्रसन्न रह सकते हैं, चाहे उसमें थोड़ी सी प्रतिकूलता ही क्यों न हो। यदि चाहना इसके विपरीत हो, अप्रसन्न रहने की आदत ने गहराई से उत्तर कर जड़ जमा ली हो तो फिर विद्या और अनुकूलता का प्रचुर परमाणु उपलब्ध करते हुए भी ऐसे कारण ढूंढ़ निकाले जा सकते हैं जो खीज चिन्ता परेशानी और असन्तोष उत्पन्न करके चेहरे पर अप्रसन्नता बनाते रहें।

अप्रसन्नता एक आदत है, जैसी कि नशा पीने वालों की होती है। अभ्यास का जीवन में बहुत बड़ा स्थान है। बहुत समय तक एक ढर्रा चलता रहे तो वह धीरे-धीरे आदत बन जाता है और उसी में स्वाभाविकता लगने लगता है। इतना ही नहीं आदत पुरानी हो जाने पर तो उसे चरितार्थ किये बिना चैन नहीं पड़ता है। नशेबाजी की बुराईयों को समझते हुए भी आदमी उसे अपनाए रहता है। दूसरे दिन चैन नहीं पड़ता। यह आदत का ही चमत्कार है। इसी प्रकार बात बात में आवेश लाने कटु वचन बोलने कामों में अनावश्यक देर लगाने छिद्रान्वेषण करते रहने जैसी अनेकों आदतें स्वभाव का अंग बन जाती हैं और अनचाहे ही अपना काम करती रहती हैं। अप्रसन्न रहना भी एक आदत है जिसमें परिस्थितियाँ उतना करण नहीं जितना कि स्वभाव और अभ्यास। लगता भर ऐसा है कि परिस्थितियों के दबाव और व्यक्तियों के दुर्व्यवहार से खिन्न रहना पड़ता है। इसमें बहुत थोड़ी ही सचाई होती है। वास्तविकता यह है कि चिड़चिड़े बच्चों की तरह कुछ बड़े भी खीजते रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं और उस अभ्यास को व्यवहार में लाने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ़ते रहते हैं। खोजने वाले जब ईश्वर तक को खोज निकालते हैं तो कोई कारण नहीं कि असन्तुष्ट रहने का सच्चा झूठा बहाना न खोजा जा सके।

यदि अप्रसन्नता से सचमुच ही पीछा छुड़ाना हो और यह लगता हो कि इसके कारण मानसिक स्वास्थ्य मानसिक सन्तुलन और लोक व्यवहार की सफलताओं का सिर्फ सन्तुलन और लोग व्यवहार की सफलताओं का स्त्रोत-व्यक्तित्व इस दुर्भाग्य के कारण नष्ट हुआ जा रहा है तो अप्रसन्नता के कारणों को गिनने और उन्हें निरस्त करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि हमारे इर्द गिर्द प्रसन्नता दायक परिस्थितियाँ कितनी हैं। सर्व प्रथम उन्हीं की गणना करनी चाहिए। उसका महत्व समझना चाहिए। और देखना चाहिए कि उन सुविधाओं से भी संसार में कितने लोग वंचित है इतने पर भी वे खीजते नहीं, किसी तरह परिस्थितियों से ताल मेल बिठाते हैं और अपना सन्तुलन बनाए रहते हैं। फाँसी की सजा पाये हुए कैदी भी मौत की कोठरी गहरी नींद सोते देखे गये हैं फिर अपने ऊपर ही ऐसी क्या गाज गिर रहीं है जो नींद गंवा बैठे चिन्ता में डूबे रहें और खिन्न बने। खीजें, और मुखाकृति पर अप्रसन्नता की कालिख पोते फिरें।

अपनी मन मर्जी की परिस्थितियाँ मिलती रहना नितान्त कठिन हैं। कामनाओं पर कोई अंकुश नहीं। वे कुछ भी चाहे सकती हैं और कुछ भी माँग सकती हैं। परन्तु दुनिया अपनी बनाई हुई तो नहीं है। इसमें चल रहे घटना क्रम अपने ढंग से चलते है। वे हमारी मर्जी से चलने लगे-जैसा चाहते हैं वैसा ही होता रहे, यह कठिन है। ऐसा तो तभी हो सकता था जब हमीं ईश्वर होते और बिना अन्य किसी की सुविधा असुविधा का आवश्यकता अनुकूलता का ध्यान रेख, वैसा ही ही बनाते रहते जैसा कि अपना मन है। वैसा तो ईश्वर के लिए भी नहीं बन पड़ा फिर हमारे लिए ही कैसे सम्भव हो सकता है। ईश्वर को गालियाँ देने वाले, अवज्ञा करने वाले और उसकी सुंदर सृष्टि तक को मन चाही परिस्थितियाँ मिल नहीं सकी हैं, अथवा उसने किसी कारण वंश उन्हें चाहा नहीं है। हो सकता है कि विभिन्न अनुकूलता के खतरे को उसने समझा हो और प्रतिकूलता से जूझने में जो सतर्कता, समर्थता की प्रसन्नता उत्पन्न होती है उसे ध्यान में रखा हो। फलतः खट्टा मीठा स्वाद लेने के लिए प्रिय और अप्रिय के ताने बाने से इस दुनिया की चादर बुनी हो। हमें भी इसी तरह विचार करना चाहिए और सर्वत्र अनुकूलता बनी रहने की, आकाश कुसुम जैसी कल्पना को छोड़ ही देना चाहिए। वह सोचने में सुखद लगती तो है पर जिस ढंग से यह संसार बना है उसमें संभव है नहीं।

अप्रसन्नता को अपनी कुकल्पनाओं का अभिशाप कह सकते हैं। उससे छूट सकना उतना ही सरल है जितना कि अपनी सुखेच्छा अत्यधिक ऊंचे स्तर की बढ़ा ली जाये और फिर देखा जाये कि उसमें क्या-क्या कमी रहीं हैं। इन कमियों को दुर्भाग्य मानकर कोसते रहा जा सकता है। दूसरों से बड़ी-बड़ी आशा अपेक्षाएं कीजिए फिर देखिये उनमें कितनी कमी रह गई। कम जरूर मिल जायेगी। बस, क्रुद्ध और खिन्न रहने के साधन मिल गये। इस उपाय को अपनाने वाला इस राह पर चलने वाला जीवन भर अप्रसन्न बना रह सकता है।

किन्तु यदि लगता हो कि अप्रसन्न रहने के कारण अपनी प्रतिभा जलती और गरिमा गलती जाती है और उसमें मात्र घाटा है तो फिर परिस्थितियों में परिवर्तन के लिए साहसिक कदम उठाने की आवश्यकता है। यह कदम एक ही हो सकता है कि अपने सोचने का ढर्रा बदला जाय और खीजते रहने की आदत को बदला जाय। परिस्थितियाँ इसमें बहुत बड़ा कारण नहीं होती। क्योंकि इससे भी गई गुजरी परिस्थितियों में रहने वाले असंख्यों व्यक्ति जब हंसते-हंसाते दिन गुजारते रहते हैं तो अपने लिए ही वैसा कर सकना क्यों सम्भव नहीं हो सकता? संपर्क के सभी व्यक्ति अनुकूलता वर्ते यह सम्भव नहीं। क्योंकि उनका अपना स्तर और व्यक्तित्व है, जो अनेक कारणों से बना है। उसमें हेर फेर होना होगा तो हमारी मर्जी से नहीं उनकी अपनी ही चेष्टा से संभव होगा। ऐसी दशा में तालमेल बिठा कर चलना ही एक मात्र उपाय है। यह दुनिया साझे को दुकान है। मिल जुल कर रहने से तालमेल बिठाकर ही चलना होता है। यह तथ्य समझ में आ सके तो फिर समन्वय को नीति अपनाना होगी। चिन्तन में इतना लोच आ सके तो समझना चाहिए कि खीजने को सारा संकट अनायास ही टल गया।

प्रतिकूलताओं को बदला नहीं जाना चाहिए या व्यक्तियों को सुधारा न जाये। यह यथा सम्भव करते ही रहना ही चाहिए। प्रयत्न से अब अनेक कार्यों में कहने लायक सफलता मिलती रहती है तो इस दिशा में भी सुधार हो सकता है। अभीष्ट परिवर्तन की आशा और चेष्टा करना उचित भी है और आवश्यक भी, पर वह सब धैर्यपूर्वक संतुलित ढंग से ही, योजनाबद्ध रीति से होना चाहिए। आवेश आने और तत्काल बदल जाने की बात सोचने से काम बनता नहीं बिगड़ता है। उत्तेजित मस्तिष्क को उपाय सोचने की क्षमता से हाथ धोना पड़ता है। उसके लिए सही मार्ग खोजना और दूरदर्शितापूर्ण रीति अपना सकना भी संभव नहीं रहता। अप्रसन्नताग्रस्त व्यक्ति तत्वतः अर्ध-विक्षिप्तता की स्थिति में रहता है और सुधार के लिए उसके द्वारा सोचे गए उपाय भी अटपटे होते हैं। फलतः प्रयत्न भी प्रायः उलटे ही पड़ते है और गुत्थियाँ सुलझने की अपेक्षा उलटी उलझती ही चली जाती हैं।

सम्बद्ध व्यक्तियों की आदतें अपने प्रतिकूल पड़ती है तो उन्हें समझाने बुझाने, सुधारने से लेकर सम्बन्ध तोड़ने या प्रतिरोध करने तक के तरीके अपनाये जा सकते हैं पर इसके लिए आवेश ग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं हैं। ऐसा करने से सुधार की बात तो पीछे पड़ जायगी और क्रोध के कारण नया प्रश्न उठ खड़ा होगा, मान अपमान का। जिसे सुधारना था वह यदि आवेश का शिकार बना है तो अपने अपमान का बदला लेने की बात सोचने लगेगा, सुधारने के प्रश्न पर तो वह और भी अड़ियलपन अपना लेगा ऐसी दशा में आवेश का प्रतिकूल उलटे रूप में ही सामने आवेगा। व्यक्तियों से निपटने में भी अपना सन्तुलन तो ठीक ही बना रहना चाहिए। अप्रसन्नता का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह अपने चिन्तन तंत्र को ही गड़बड़ा देती है। फलतः न तो यही उपाय सूझता है और न सही उपाय अपनाये बनता है। ऐसी दशा में परिस्थितियों को बदलने और व्यक्तियों को सुधारने का उद्देश्य तनिक भी पूरा नहीं होता और असफलता जनम निराशा मस्तिष्क पर नई विपत्ति की तरह और भी अधिक बोझिल बनकर लद पड़ती है।

यह उन उपायों की चर्चा हुई जो परिस्थिति की प्रतिकूलता एवं व्यक्तियों की अभद्रता एवं अस्तव्यस्तता के कारण उत्पन्न होती है। यदि वे तथ्यपूर्ण हों और उन्हें वस्तुतः बदलना ही आवश्यक हो तब भी अप्रसन्नता की मनःस्थिति को ही सर्व प्रथम बदलना होगा, क्योंकि अभीष्ट परिवर्तन के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपकरण अपना मस्तिष्क ही होता है। यही उपाय सोचने और यही गति अपनाने की जिम्मेदारी उसी पर आती है। यदि वह अस्तव्यस्त, खिन्न उत्तेजित स्थिति में रह रहा होगा तो उसके कार्य ही उपहासास्पद होंगे, ऐसी दशा में सारे प्रयास ही निष्फल होते चले जायेंगे।

अधिकतर होता यह है कि प्रतिकूलता उतनी बाधक नहीं होती जितनी कि अप्रसन्न रहने की आदत। यह जब अभ्यास में सम्मिलित हो जाती है तो तुनक-मिजाजी का रूप धारण कर लेत हे। बात बात पर रूठना असन्तोष व्यक्त करना-दोष निकालना, आक्रोश व्यक्त करना जैसे लक्षण चेहरे पर छाये रहते हैं। मन भारी रहता है और दूसरों को दंड न बन बड़े तो भूखा रहने आदि के उपक्रमों द्वारा अपने को ही संतानें का मन होता रहता है। यदि कोई सच्चे मन से अप्रसन्नता के अभिशाप से छूटना चाहता हो तो उसे अपना इस अभागी आदत से मनोवैज्ञानिक स्तर पर छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए।


भगवान् की शक्ति अधिक (kahani)

“भगवान की शक्ति अधिक है या शैतान की”

“भगवान की”

“ यदि भगवान अधिक शक्तिशाली है तो फिर उसकी सृष्टि में अनाचार अत्याचार का आधिक्य क्यों?”

किसी को बनाने में अधिक समय व परिश्रम लगता है बिगाड़ने में नहीं! एक अच्छी मूर्ति गढ़ने में मूर्तिकार इतना समय लगता है व परिश्रम करता है परन्तु उसे तोड़ने में न कोई समय लगता है न विशेष परिश्रम ही! एक सन्त किसी व्यक्ति को दस वर्षों में यदि सुधार पाता है तो दुरात्मा उसे दस दिनों में ही भ्रष्ट भी करने की शक्ति रखता है।

किसी की भी शक्ति वा योग्यता का मापदण्ड बनाने में है बिगाड़ने में नहीं।

-सत्यभक्त

एक दिन कुआँ फरियाद लेकर समुद्र के पास पहुँचा, बोला “नदियों को ही प्यार करते हो हमें भी तो कभी पूछते भी नहीं! पिता के घर में ऐसा पक्षपात क्यों? समुद्र ने कहा “चारों तरफ से दीवार खींचकर बैठने वाले को जो मिलता है वही तुम्हें मिल रहा है। प्यार चाहते हो, तो अपनी दीवारें तोड़कर बाहर आ जाओ और हर दिल के किनारे बहो।”

-महमूद तैमूर


भ्रमण और स्वास्थ्य

बगदाद का एक सरदार सिरदर्द के कारण बड़ी बुरी तरह परेशान था। उसे हमेशा सिर दर्द बना रहता था और इस कारण वह अपना सामान्य काम-काज भी ठीक तरह नहीं कर पाता था। सिर दर्द के कारण उसे अपना सारा दिन बिस्तर पर छटपटाते हुए बिताना पड़ता था। ऐसी बात भी नहीं थी कि रोग का कोई इलाज न कराया हो। कई वैद्य हकीमों से इलाज कराया पर कोई दवा कारगर नहीं हो सकी। कोई दवा अपना थोड़ा बहुत प्रभाव बताती, कुछ समय के लिए सिरदर्द कम भी होता परन्तु फिर रोग जहाँ का तहाँ।

किसी ने सरदार को अरब के प्रख्यात फकीर अल्लामा इशा के बारे में बताया कि वे कठिन से कठिन रोगों का इलाज बड़ी आसानी से कर देते हैं और आज तक जिन रोगियों का भी उन्होंने इलाज किया उनमें से कोई भी दुबारा उस रोग से आक्रान्त नहीं हुआ। सरदार ने अपने कुछ गुमाश्तों को बढ़िया सवारी लेकर फकीर के पास भेजा कि व फकीर को यहीं लाया जायें। साथ ही यह भी कहला दिया कि आप की दवा से सरदार स्वस्थ हो गये तो आपको भारी इनाम दिया जायेगा। यहीं नहीं प्रारम्भिक भेंट के रूप में थोड़ा धन अग्रिम भी भेज दिया।

बताते गये पते पर पहुँच कर गुमाश्तों ने देखा कि वहाँ एक फकीर ऊँट चरा रहा था। उस फकीर से गुमाश्तों ने संत अल्लामा का पता पूछा तो फकीर ने कहा मैं ही अल्लामा हूँ।

इतना बड़ा सन्त और चिकित्सक ऊँट चराता होगा यह बात गुमाश्तों की समझ में नहीं आयी। उन्होंने और लोगों से भी पूछा तो उनका संशय दूर हुआ कि यही संत अल्लामा है। अल्लामा इशा से उन्होंने अपने सरदार का संदेश और उनके रोग विवरण बताया तो संत ने कहा-”मैं किसी मरीज के घर नहीं जाता। उन्हें ही यहाँ लाना पड़ता है और जहाँ तक तुम्हारे सरदार का प्रश्न है उनसे कहना कि वह पैदल ही चलकर यहाँ आयें।

दूत निराश होकर लौट गये। सरदार से उन्होंने शब्दशः सन्त की बात कह दी। पहले तो सरदार भी हताश हुआ पर कोई चारा न देख कर पैदल चलकर फकीर के पास पहुँचने का निश्चय किया। कई हफ्तों तक चलते रह कर सरदार ने इतनी दूर की मंजिल तय की तथा अल्लामा के पास पहुँचा।

अल्लामा ने मरीज को भली प्रकार देखा परखा और उसे कुछ पुड़ियायें देते हुए कहा कि इसकी सौ खुराक दवा है। इनका प्रयोग करने पर मर्ज अच्छा हो जायेगा। दवा के प्रयोग की विधि यह बताई गयी कि जब माथे पर पसीना आवे तब एक पुड़िया खोल कर सिर पर मल लिया जाये और जिस प्रकार पैदल चल कर आये है उसी प्रकार पैदल चलते हुए ही वापस लौटे।

निर्देश के अनुसार सरदार को पैदल ही वापस लौटना पड़ा। सिर पर पसीना निकले इसका एक ही उपाय था कि तेज चाल से यात्रा की जाये। उसने वहीं किया और करीब तीन सप्ताह में वापस बगदाद पहुँच गया। वह तब तक तेज कदमों से चलता ही रहता जब तक कि सिर पर पसीना निकल न जाये और जब पसीना निकल आता तो वह दवा की पुड़िया खोल कर उसे अपने माथे पर मल लेता।

घर लौटने तक सरदार का सिर दर्द पूरी तरह अच्छा हो गया। बची हुई दवा का क्या किया जाये? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए सरदार ने अपने गुमाश्ते को वह दवा लेकर अल्लामा के पास पहुँचाया।

गुमाश्ता अल्लामा के पास पहुंचा और बोला हमारे सरदार अब पूर्ण तरह ठीक हो गये हैं। आपने कहा था कि इस दवा का प्रयोग रास्ते में तभी करना है जब सिर पर पसीना आये। सरदार पहुँच गये हैं और ठीक भी हो गये है। अब इस दवा का क्या किया जाये।

अल्लामा ने हंसते हुए कहा “यह दवा तो मामूली मिट्टी भर थी। इसे भले ही फेंक दो। असली इलाज तो लम्बा सफर करना और उसी तरह वापस लौटना था।” फिर कुछ देर रुकने के बाद फकीर ने कहा-पैदल चलने की आदत छोड़ देने से ही लोग मरीज बनते और बीमार पड़ते है। यदि अपने शरीर और मन को निरोग रखना है तो मेरी ही तरह पैदल चलने की आदत डालना चाहिए और मुझे देखा मैं पैदल घूमता हुआ धर्म, ईमान का प्रचार भी करता हूँ और स्वस्थ भी रहता हूँ।


बुढ़ापा मिटाया तो नहीं घटाया जा सकता है

उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन यह सृष्टि का सुनिश्चित नियम है। नियति के गतिचक्र पर परिभ्रमण करते हुए पदार्थों और प्राणियों में से कोई भी इस व्यवस्था में व्यतिरेक उत्पन्न नहीं कर सकता। जो जन्मा है वह मरेगा। जो बढ़ेगा वह परिपक्व होगा। प्रगति की एक सीमा है उसके बाद ढलान आती है। सूरज दोपहर तक चढ़ता है और इसके बाद ढलना प्रारम्भ कर देता है। परिपक्वता जीर्णता में बदलती है, और क्रमशः ऐसी अवस्था आती है जिसे अनुपयोगी या अशक्त कहा जा सके। इस स्थिति में पहुँचे पदार्थ या प्राणी को नये सिरे से फैक्टरी में गलने और ढलने जाना पड़ता है। इस परिवर्तन को मरण कहा जाता है। एक वस्तु का मरण ही दूसरी का जन्म है। एक का समापन दूसरी का श्रीगणेश कहलाता है।

इस गतिचक्र के अनुसार जन्म ने वाले को प्रौढ़-प्रौढ़ को जीर्ण-होना स्वाभाविक है। समयानुसार शारीरिक जीर्णता का आता और विदाई समारोह की व्यवस्था बनना ऐसा नियति क्रम है जिस पर न तो आश्चर्य की आवश्यकता है और न उसे पलटने का प्रयास करने की।

चर्चा का विषय व्यतिरेक है। जीर्णता समय से पूर्व आ जाती है और अपेक्षाकृत अधिक अशक्त बनाती, अधिक कष्ट देती और अधिक निराशाजनक दिखती है। यहीं चिन्ता का विषय है। अन्यथा हर आयु का अपना महत्व और अपना आनन्द है। बचपन अल्हड़पन के लिए नवयौवन, जोश खरोश के लिए-प्रौढ़ता सृजन कृत्यों के लिए और वृद्धावस्था परिपक्वता के लिए प्रख्यात है। मानवी जीवन क्रम और समाज के सुसंचालन में इन सभी विशेषताओं का समन्वय ही नवीनता का आकर्षण बनाये रहता है। आशा और उमंगों का सफलताओं और प्रतीक्षाओं का सिलसिला इस परिवर्तन क्रम के अनुरूप ही चलता है। स्थिरता एवं एकरूपता बनी रहने पर तो यहाँ सब कुछ नीरस लगने लगेगा और जड़ता जैसी स्थिति बन जायेगी।

आयुष्य के वर्गीकरण में वृद्धावस्था को अधिक कुरूप और कष्टदायक माना जाता है और यौवन को अधिक सुखद तथा सुन्दर। किन्तु बात ऐसी है नहीं। कुछ बातों में यौवन और कुछ में बुढ़ापे का महत्व है। ज्ञान और अनुभव की परिपक्वता, व्यक्तित्व की प्रखरता जीवन इतिहास के साथ जुड़ी हुई प्रामाणिकता का लाभ वृद्धावस्था में ही मिल पाता है। उनका परामर्श और नेतृत्व जन साधारण के गले उतरता है। यह लाभ प्रायः युवावस्था में नहीं ही मिल पाते शारीरिक समर्थता-संघर्ष की सक्षमता, इन्द्रिय शक्ति की प्रौढ़ता, कायिक सुन्दरता, जैसी विशेषतायें जवानी में ही पाई जाती हैं। पुरुषार्थ और प्रतिस्पर्धा में वे ही बाजी मरते है। गंभीरता पूर्व विचार करने से प्रतीत होता है कि दोनों की परिस्थितियों में कुछ सुविधायें हैं और कुछ कठिनाइयाँ। दोनों में से न कोई पूर्णतया बुरी है और न भली। दो की ही क्यों चर्चा की जाये। तीसरे बचपन का अल्हड़पन अपने आप में एक अनोखा आनन्द है। एक बार उसके चले जाने के बाद तरसते ही रहना पड़ता है। दूसरे बच्चों को देखकर, बचपन की सुन्दरता, मस्ती, स्फूर्ति और निश्चिन्तता की झलक देख-देखकर मन बहलाना पड़ता है। चौथे मरण की बात सोची जाये तो उसमें नया वस्त्र पहनने, नये मकान में बसने जाने, नई यात्रा पर निकलने जैसी उत्साहवर्धक स्थिति का आभास मिलता है। रात्रि का अवसान और प्रभात का अरुणोदय किसी को अखरता नहीं, फिर जराजीर्ण अंधियारी से निकलकर नव जीवन का आनन्द देने वाला परिवर्तन मरण ही किसी को क्यों अखरना खटकना चाहिए?

शारीरिक दृष्टि से बुढ़ापे का कारण यह है कि अवयवों की शक्ति काम करते-करते पुरानी मशीनों की प्रकृति क्रम के अनुसार घटती चली जाती है। काम का दबाव उस अनुपात से नहीं घटता। पाचन के लिए उपयुक्त रसों का स्राव उतना नहीं होता जितना कि प्रस्तुत भोजन पचाने के लिए आवश्यक है। फलतः अपच रहने लगता है और उस कचरे को निकालने में ही पाचन तंत्र की अधिकाँश शक्ति चुक जाती है। दैनिक कार्यों के लिए जितनी शक्ति चाहिए उतना न तो रक्त बनता है और न उसमें पोषण का उतना अनुपात रहता है। आमदनी कम और खर्च अधिक होने पर व्यवसाय में घाटा ही पड़ता जाता है शरीर भी क्रमशः इसी क्रम से दिवालिया बनता है और बुढ़ापा चढ़ता जाता है।

इस क्रम में बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक सुधार परिवर्तन कर दिया जाये तो बुढ़ापा मिट तो नहीं सकता, पर उसे काफी दूर तक हटाया जा सकता है। तेजी से बढ़ती हुई अशक्तता और कुरूपता से भी बहुत हद तक बचा जा सकता है।

दबाव डालने वाले श्रम को बदल कर हलके परिश्रम वाले काम चुने जा सकते हैं। आवश्यक नहीं कि कठोर श्रम ही उपयोगी होता हो। कितने ही काम ऐसे हैं जो हल्के होते भी उपयोगिता की दृष्टि से उच्चस्तरीय होते हैं। पाचन तंत्र की शिथिलता को देखते हुए भोजन की मात्रा और गरिष्ठता में कमी की जा सकती है। अधिक पौष्टिक और अधिक मात्रा में भोजन में लाभ सोचने की आदत और मान्यता दोनों ही गलत हैं। यही यह है कि जितना ठीक तरह पचेगा वहीं सामर्थ्य देगा। अधिक खाकर उनकी अपेक्षा कहीं अधिक घाटे में रहता है जो भूख से कम खाते और पेट खाली रखते है। पेट को भूख से कम खाते और पेट खाली रखते हैं। पेट की लदान ढोने और कचरा बुहारने के भारी काम से छुटकारा मिल सके तो वह स्वल्प मात्रा में लिये गये हलके भोजन को पचाकर इतनी सामर्थ्य देता रह सकता है जिसके सहारे बुढ़ापे में भी लम्बे समय तक जीवन रथ को लम्बी यात्रा तक चले जाने में समर्थ रखा जा सके। दिनचर्या का व्यतिक्रम बहुत भारी पड़ता है। शरीर को ढर्रे को जिन्दगी अनुकूल पड़ती है। जवानी के जोश में तो उछल कूद और अनिश्चित छलाँग लगाना अखरता नहीं, किन्तु बुढ़ापा एक नियत और निर्धारित क्रम अपनाने में सुविधा अनुभव करता है। ढलती हुई आयु में अनियमितता जितना बचा जा सके उतना ही उत्तम है। इन्द्रिय शक्तियों का अपव्यय जितना कम हो उतना ही अच्छा है। यह भण्डार आवेशों की आकुलता में गंवाया तो जा सकता है पर युवावस्था बीत जाने के उपरान्त फिर नये सिरे से उसे संचित नहीं किया जा सकता।

समय रहते चेतने की नीति यदि स्वीकार हो तो वृद्धावस्था के आगमन की गति धीमी करने वाले आवश्यक उपाय सहज की अपनाये जा सकते हैं। काम तो पूरे समय किया जाता रहे, पर उसे हलका बनाया जाये। बीच-बीच में सुस्ता-सुस्ता कर किया जाये। आलसी बनने की आवश्यकता नहीं है। काम को मनोरंजन बनाया जा सकता है और उसे खेल की तरह खेलते हुए स्वास्थ्य रक्षा-उत्पादन लोक-हित और आत्म-सन्तोष का बहुमुखी लाभ उठाया जा सकता है।

भूख घट जाये तो भोजन की मात्र तुरन्त कम कर देनी चाहिए पेट की थैली तो युवावस्था जितनी ही फैली रहती है और उसे ठूँसते रहने की पुरानी आदत भी बनी रहती है किन्तु पाचन शक्ति की न्यूनता से उतना पच नहीं पाता। अपच से विष उत्पन्न होता है और उससे शरीर को वृद्धावस्था के साथ-साथ रुग्णता का भी कष्ट सहना पड़ता है। यह सोचना गलत है कि कम खाने से कम शक्ति मिलेगी। भोजन का उतना ही अंश लाभदायक होता है जो पच सके। बुढ़ापे में थोड़ा भोजन ही पच सकता है। अस्तु उसकी मात्र पेट की सामर्थ्य गिरते ही तुरन्त घटानी आरम्भ कर देनी चाहिए। युवावस्था की तुलना में वृद्धावस्था का भोजन आधा तो कर ही देना चाहिए। आवश्यकतानुसार उसे और भी अधिक अनुपात में कम किया जा सकता है। एक समय भोजन दूसरे समय दूध, फल आदि हल्की चीजें लेकर काम चलाया जाये। भोजन में गरिष्ठता हटा दी जाये। सात्विक भोज बच्चे और बूढ़ों के लिए भी उपयुक्त है। इन्द्रिय निग्रह यों होता तो सभी के लिए उत्तम है, पर वृद्धावस्था में तो उस पर अधिकाधिक अंकुश ही लगाते चलना चाहिए। प्रातःकाल कई मील नियमित रूप से टहलने जाना-गहरी और लम्बी साँस लेने की आदत डालना बुढ़ापे पर नियन्त्रण करने का अच्छा उपचार है। भोजन के समय तो उतना नहीं पर बाद में कई गिलास पानी-पीने की आदत डालनी चाहिए। व्यस्तता में लोग पानी-पीने की उपेक्षा करने लगते है। फलतः शरीर में जलीय अंश घट जाने से नस-नाड़ियों में माँस-पेशियों में कठोरता उत्पन्न होती है और मलों के निष्कासन में रुकावट पड़ती है।

वृद्धावस्था में मस्तिष्कीय मज्जा और जीवाणु संरचना में कठोरता की मात्रा बढ़ जाती है। उनमें आवेशों से उत्पन्न आग को सहने और सन्तुलन बनाये रहने की क्षमता में काफी कमी पड़ जाती है फलतः चिन्ता, भय, क्रोध, शोक, निराशा आदि के आवेश जड़ जमाकर बैठन लगते हैं। उनकी घुसपैठ को रोकना कठिन पड़ता है। यह उत्तेजनायें देर तक जिस मस्तिष्क पर छाई रहती है उसकी कुशलता पर भारी आघात पहुँचाती हैं और चिन्तन की समस्वरता ही बिगाड़ कर रख देती है। बुढ़ापे में प्रायः मनुष्य चिड़चिड़ा जिंदगी उसकी बन जाती है। उसका कारण स्वाभाविक अवसाद उतना नहीं होता जितना कि आवेशों के दबाव से मानसिक समस्वरता का अस्त-व्यस्त हो जाना।

परिवारों में कई व्यक्ति होते हैं और उनसे सम्बन्धित कई प्रकार की समस्याओं बनी रहती है। उनमें से कुछ कष्टसाध्य भी होती है। उनके समाधान की आवश्यकता वयोवृद्धों को अपेक्षाकृत और भी अधिक प्रतीत होती है। फलतः वे चिन्तित रहने लगते हैं। समाधान ढूंढ़ना एक बात है और चिन्तित रहना दूसरी। हल खोजने और उपाय अपनाने के लिए मस्तिष्क का सन्तुलित होना आवश्यक है। चिन्तित व्यक्ति का मन संस्थान विक्षुब्ध रहता है फलतः सारा चार तंत्र ही लड़खड़ा जाता है और निराकार का मार्ग निकालने के स्थान पर ऐसा कुछ सोचने लगता है जिनमें गुत्थी सुलझने के स्थान पर उलटी और उलझती चली जाये। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बुढ़ापे में मस्तिष्क को विशेष तौर से हल्का रखने की आवश्यकता है। वानप्रस्थ की परम्परा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण लाभ यह है कि उपासना स्वाध्याय, लोक-साधना जैसे उच्चस्तरीय कार्यों में मस्तिष्क के रहने से उन चिन्ताओं का दबाव सहज ही घट जाता है जो बुढ़ापे को आवश्यकता से अधिक कष्टकारण बना देती हैं।

परिवार के परामर्शदाता के रूप में वयोवृद्धों की भूमिका पर्याप्त है। बच्चो की शिक्षा और सुसंस्कारिता बढ़ाने में उनकी विशेष रुचि होनी चाहिए। तरुणों की डाँट-डपट करने की अपेक्षा अपना कार्य क्षेत्र बच्चो में बना लेना और हंसते-हंसाते समय गुजारना अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण है। प्रशासक का पद स्वेच्छापूर्वक तरुण पीढ़ी हो हस्तान्तरित कर लेना चाहिए। उन्हें प्रेम पूर्वक परामर्श देते रहने का कर्त्तव्य पालन ही पर्याप्त मानना चाहिए। अनुभव से आदमी बहुत कुछ सीखता है। नई पीढ़ी यदि कुछ खोकर भी अनुभव खरीदती है तो उतनी छूट उस मिलनी ही चाहिए जिसमें किसी भयंकर संकट का खतरा न हो।

मानसिक तनाव बुढ़ापे को जल्दी लाने, कष्टकर बनाने का बहुत बड़ा कारण है। इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो अतीत की मर्मबेधी स्मृतियाँ, मरण की सम्भावनायें, सीमा से बाहर चली जाने से रोकी जा सकती है। परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर चलने की नीति अपनाने वाले वयोवृद्ध, बुढ़ापे की उतनी ही हानि सहते हैं जितनी अनिवार्य है। आमतौर से अपनी ही शारीरिक, मानसिक अस्त-व्यस्ततायें बुढ़ापे के साथ मिलकर इन संकटों को उत्पन्न, करती है जिनके कारण ढलती आयु वाली बुरी तरह संत्रस्त देखे जाते हैं।


Quotation

उपदेश की सफलता इस बात में नहीं कि सुनने वाले उसकी प्रशंसा करते चले जांय। जिसे सुनने के बाद वे लोग चिंतनशील, गंभीर और परिवर्तन निरत दिखाई पड़ें तो उसे सफल उपदेश समझना चाहिए। -गिलवर्ट वरनेट


रोग का कारण कीटाणु नहीं शरीर गत विषाक्तता

रोग बीमारियों के सम्बन्ध में आम धारणा यह है कि वे शरीर में विजातीय तत्वों के प्रविष्ट हो जाने से उत्पन्न होती हैं। परन्तु विज्ञान की अधुनातम शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बीमारियों का कारण विजातीय द्रव्य अथवा कीटाणु नहीं अपितु जीवनी शक्ति का अभाव है। पिछले दिनों एक स्वास्थ्य पत्रिका में अमेरिका के एक प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा शास्त्री एम. डी. पसीने का मत है-”कीटाणु रोग का कारण नहीं है। वे रोग का परिणाम है। एक स्वस्थ शरीर कीटाणुओं के लिए अच्छा अड्डा नहीं है किन्तु एक गंदा शरीर जिस में विजातीय पदार्थ और नाना प्रकार के विष भरे है, कीटाणुओं के लिए एक क्यारी की तरह होता है। अतः रोग को दूर करने का उपाय कीटाणुओं को नष्ट करना नहीं बल्कि उन कारणों को दूर करना है जो कि कीटाणुओं की वृद्धि में सहायक है। बच्चे का मुख प्रायः सभी संक्रामक कीटाणुओं का निवास होता है। किन्तु दस में से नौ बच्चे नहीं पड़ते। केवल इसलिए कि उन का शरीर कीटाणुओं को पनपने और फलने के लिए कोई वातावरण प्रस्तुत नहीं करता। वह दसवां अभागा बच्चा जो बेचारा बीमार पड़ता है अपने शरीर में इस लिए कीटाणुओं को पलने और पनपने का अवसर देता है कि उसका शरीर जीवनी शक्ति को खो बैठा है तथा मलों से लदा पड़ा है।

डाक्टर जे. डब्ल्यू. विल्सन अपनी पुस्तक ‘दि न्यू हाइजिन’ में लिखते है- “एक बार’ अमेरिका के डॉक्टरों ने मूलाधार में संचित मल की अवस्था की जाँच की। इसके लिए उन्होंने पर्याप्त समय लगाकर 284 रोगियों के थे। डाक्टरों ने देखा कि इनमें से 156 शवों की बड़ी आंतें सड़े हुए मल से भरी थीं। उनमें से कई का मलाधार मल से भरकर फुल जाने के कारण दूना हो गया था। कई शवों में यह मल इतना सूख गया था कि मूलाधार से चिपक कर स्लेट के समान कठोर हो गया था। इससे किसी भी रोगी का मल त्याग स्थगित नहीं हुआ था। यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस सूखे हुए मल में था। यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस सूखे हुए मल में छोटे बड़े कई प्रकार के रोगों के कीड़े पाये गये। कहीं कहीं इन कीटाणुओं के अण्डे भी मिले। कई जगह ऐसा हुआ था कि ये कीटाणु माँस में भी घुस गये थे और उससे वहाँ घाव पड़ गये थे।

डाक्टर टर्नर का कथन है कि-आठ व्यक्तियों ने केवल एक व्यक्ति की ही बड़ी आँत साफ रहती होगी। शेष लोगों को साधारण रीति से नित्य शौच हो जाता है और बे समझ लेते है कि हमारा पेट साफ है पर वास्तविक बात यह होती है कि मलाशय में पूरा मल भर जाने से उसके नीचे का मल थोड़ा सा निकल जाता है और उसकी जगह ऊपर का मल नीचे खिसक आता है। मलाशय सदा ही भरा रहता है। इस प्रकार का मनुष्य वर्षों तक पाँच फीट लम्बे मल से भरे थैलों को पेट में रख कर चलता फिरता और सोता है। इस मल का परिणाम अनेक मनुष्यों में पाँच से आठ दस किलोग्राम तक होता है वे इसी मल को साथ लेकर चलते फिरते हैं, मिलते जुलते हैं, खाते पीते हैं और अन्त में दुनिया से कूच कर जाते हैं।

शरीर में मल के जमा होने से पैदा होने वाले रोग दवा, नश्तर या ऐसे किसी उपचार से दूर नहीं हो सकते जो शरीर को इस मल से मुक्त नहीं करता। आँत में अधिक दिनों तक रुका हुआ मल बहुत खतरनाक हो जाता है क्योंकि उसके उसके सड़ने से विष पैदा होता है जो सारे शरीर में फैल कर उसे विषाक्त कर देता है। आंतों की असाधारण अवस्था ही सिरदर्द, निरोध शक्ति के ह्रास आदि का कारण होती है और इनके जरिये सर्दी और कठिन रोग उत्पन्न किया करती हैं।

शरीर की आँतरिक शुचिता और पवित्रता शरीर में वह सामर्थ्य उत्पन्न करती है कि वह रोग बीमारी के कारणों को अपने आप दूर करता रहता है, उसमें यह सामर्थ्य स्वतः ही स्फूर्ति होती रहती है कि वह शरीर में घूस पड़ने वाली विकृतियों का सफाया करती रहे।


एक बहुत बुरी खबर

“जो बात मैं पूरे आत्मविश्वास से कहूं समझना चाहिये वह अवश्य होकर रहेंगी। इस वक्त मेरा अन्तरात्मा उत्प्रेरित है और मैं यह अशुभ समाचार देने को बाध्य हूँ कि सन् 1982 की जुलाई विश्व के महाविनाश के दृश्य लिये दौड़ी चली आ रहीं है। उस समय दो महाशक्तियों के मध्य कुल 12 मिनट का ऐसा वीभत्स परमाणु युद्ध होगा जिसमें छहों महाद्वीपों में कुल 70 हजार व्यक्ति जीवित बचेंगे। उस महाप्रलय की विभीषिका को देखने के लिए मैं जो जीवित नहीं रहूँगा किन्तु संसार उसके लिए अभी से तैयार रहे।”

यह उपोद्धात मैक्सिको के महान ज्योतिर्विद् आर्नाल्ड क्रूम हेलर के हैं जिनके बारे में यह कहा जाता है कि आज तक उसकी भविष्य वाणियों में 99 प्रतिशत भविष्य वाणियाँ पूरी तरह सही उतरी हैं। यह निष्कर्ष न केवल मेक्सिको अपितु यूरोप के उन अनेक पत्रकारों के है जिन्होंने समय-समय पर उनका साक्षत्कार किया और भविष्य कथन प्रकाशित किये।

श्री क्रूम हेलर अपने आप को ज्योतिषी कहलाने की अपेक्षा- कास्मोबायोलाजिस्ट (ब्रह्माण्ड जीवशास्त्री) कहलाना अधिक पसंद करते हैं। ब्रह्माण्ड जीव शास्त्र की प्रतिष्ठापना भी उन्होंने ही की है। उनकी मान्यता भारतीय दर्शन के इस सिद्धान्त से पूरी तरह मेल खाती है कि जीवन तत्व मात्र पार्थिक नहीं अपितु समूचा ब्रह्माण्ड ही जैव-द्रव्य से ओत-प्रोत है। शरीर के किसी भी अंग में पिन चुभे उसकी जानकारी अविलम्ब मस्तिष्क को होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि मस्तिष्कीय चेतना का शरीर से अविच्छिन्न सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। ठीक इसी तरह समूचे ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म संचार सूत्र फुटबाल में भरी हवा की तरह आत्मविश्वास रहते हैं। मनुष्य के न केवल तात्कालिक क्रिया कलाप अपितु दूरगामी योजनाऐं जिस तरह मस्तिष्क के गर्भ में ताने बाने बुनती और पकती रहती है ठीक उसी तरह भविष्य में घटने वाली सारी घटनायें ब्रह्माण्ड के उस अविभक्त जैव द्रव्य में तरंगायित होती रहती है। हम कल जो भी कुछ होंगे उसकी पूर्व भूमिका इसी को कहते है कि “कास्मोबायोलाजी”। मेरे अंतरंग की कास्मोलॉजी उन दृश्यों को फिल्म की तरह मानस पटल पर उतार देती है और मैं भविष्य बता देता हूँ।

इस कथन को चुनौती न भी दी जाए तो भी इस समय आणविक शस्त्रास्त्रों की चल रहीं भयानक घुड़दौड़ को देख कर, और महाशक्तियों के मध्य बिछी कूटनीतिक शतरंज को देखकर कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि कहीं से भी एक विशाल है कि उसमें 790 हजार मनुष्यों के बच जाने की बात तो दूर एक भी व्यक्ति जीवित न बचे तो उसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह बात तो गणित की तरह निर्विवाद और स्पष्ट समझी जानी चाहिए।

इस कथन के ज्योतिष पक्ष को भी गम्भीर दृष्टि से देखने के कुछ स्पष्ट आधार है (1) हिटलर की सेनाऐं हालैण्ड, फ्राँस और डेनमार्क को उदरस्थ कर चुकी थी उस समय कोई कल्पना भी नहीं करता था कि फ्युहरर को कोई पराजित कर सकेगा। तभी 23 नवम्बर 1945 के अखबारों में छपा अब हिटलर की पराजय के ही नहीं उसकी मृत्यु के भी दिन एक दो माह में अधिक नहीं। और सचमुच सारे संसार ने देखा कि उनकी भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। उनकी कुछ भविष्यवाणियाँ सितम्बर 1972 की कादम्बिनी में भी छपी थी।

(2) सन् 1958 में मैक्सिको में भयंकर भूचाल आने वाला है तीन वर्ष पूर्व ही जब उसने इस बात की भविष्यवाणी की तो लोगों उन्हें डराने वाला दैत्य तक कहा पर सचमुच उस वर्ष मैक्सिको में ऐसा विभत्स भूचाल आया कि मैक्सिको वासी त्राहि त्राहि कर उठे।

(3) स्टालिन की मृत्यु, मार्टिन लूथर किंग की हत्या तथा तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के लिए उन्होंने जो परिस्थितियाँ बताई थी उनकी मृत्यु ठीक वैसी ही हुई। इससे डा. क्रूम हेलर ख्याति के उच्च शिखर पर जा पहुँचे।

(4) एक बार वे लास ऐंजिल्स की यात्रा कर रहे थे। उनसे इंटरव्यू के लिए अनेक पत्रकार उनके पास पहुँचे। उस समय उन्होंने ठंडी आह भरते हुए कहा मित्रो! मुझे न जाने क्यों परमात्मा ने अशुभ समाचार ही देने को भेजा है। जिस प्रान्त में मैं इस समय बैठा हू कुछ ही महीनों बाद यहाँ के ध्वस्त और लाशों के ढेर मुझे अभी से दिखाई पड़ रहे हैं। उस समय तक उसका भविष्य वक्ता स्वरूप बहुत प्रसिद्ध हो उठा था अतएव समाचार पत्रों में छपी उनकी भविष्य वाणियों पर जहाँ कुछ ने मखौल उड़ाया वहाँ अनेकों नागरिकों और सरकारी अधिकारियों ने उस तथ्य को गम्भीरता से लिया-उनके इस भविष्य कथन के कुछ ही दिन बाद लास ऐंजिल्स में सचमुच इतिहास का सर्वाधिक रोमांचक भूकम्प आया। जिसमें बस्तियों पर बस्तियाँ उजड़ गई। लाखों लोगों की जाने गई पर उनके पूर्वाभास ने लाखों लोगों को बचा भी दिया अन्यथा स्थिति इतनी दयनीय होती कि अमेरिका के सम्भाले न सम्भलती।

(5) रूप और चीन के मध्य युद्ध और तनाव की भविष्यवाणी करने के बाद उनका सर्वाधिक उपहास हुआ था, पर दो साम्यवादी देशों के मध्य युद्ध और बुरे सम्बन्ध आज सारी दुनिया देख रहीं हैं।

(6) सन् 1961 को अमेरिकी राष्ट्रपति यात्रा पर थे। सुरक्षा के लिए सैकड़ों पुलिस अधिकारी जुटे थे। पुलिस का घेरा तोड़कर क्रूम हेलर उनके पास पहुँच गये और उनके हाथों में एक परचा थमा दिया। कैनेडी ने पर्ची पढ़ी, उनकी ओर देखकर अविश्वास की मुद्रा में मुस्कराये और पर्ची फेंक दी-घटना का विवरण अखबारों में छपा लिखा था दो वर्ष बाद 22 नवंबर को आपकी हत्या कर दी जायेगी। पीछे लोगों ने इस भविष्य कथन को सत्य पाया तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

आज से कई वर्ष सृष्टि के महाविनाश के पूर्वाभास भी ऐसे ही हैं जिन पर लोगों को हंसी आ सकती है। मनुष्य सर्व शक्तिमान नहीं है उससे भी ऊपर समर्थ सत्ता परमात्मा की है वह स्वयं नियामक सत्ता है विधान बदल भी सकता है किन्तु उनके लिए मानवीय प्रकृति का बदलना भी आवश्यक है। अंधाधुँध अपराध करने वाला सजा से बचेगा। यह मात्र दुराशा है यदि वह प्रायश्चित के लिए तैयार हो तब यह सम्भव है कि उसकी दंड प्रक्रिया सह्य और सरल बना दी जाये। महाविनाश से बचने के लिए मानवीय आस्थाओं का परिवर्तन आवश्यक है। इन दिनों ही रहीं स्वार्थ और भोगवादी घुड़दौड़ रोकी जाए मनुष्य की उच्छृंखलता पर रोक लगे विलासिता का स्थान प्रकृतिस्थ जीवन ग्रहण करे। मर्यादाओं का उल्लंघन रुके तो संभव है इस ईश्वरीय दंड से कुछ विमुक्ति मिले अन्यथा सृष्टि के विनाश की सम्भावना तो चर्मचक्षुओं से ही देखी जा सकती है।

आर्नाल्ड क्रूम हेलर की इस समीक्षा का भविष्य क्या है लोगों ने उनसे प्रश्न किया तो उन्होंने उत्तर दिया-महाविनाश अवश्यम्भावी है किन्तु मानव जाति का लोप हो जायेगा ऐसा नहीं। उन्होंने कहा हमारे पुरखों की आद्य संस्कृति को नया जन्म मिलने वाला है यह स्मरणीय है कि मैक्सिको किसी समय मय संस्कृति का घर रहा है। यह सभ्यता वहाँ भारतवर्ष से गई है। महायुद्ध की विभीषिकायें ही विकसित नहीं हो रहीं पवित्रता समता करुणा उदारता न्याय नीति मैत्री और विश्व बन्धुत्व वाली शक्ति भी अवतरित हो चुकी है विश्व की तुलना में वह यद्यपि अभी शिशु जैसी और गहन अन्तराल में हैं-वहाँ श्रद्धा और विश्व की शक्ति कार्य कर रहीं है तथापि वह परमाणु से भी अति समर्थ है और अनत में इसी महाशक्ति की साँस्कृतिक पौध सारी दुनिया में तिरित होगी, रोपी जायेगी पुष्पित पल्लवित होगी और इस तरह शान्ति प्रगति और प्रसन्नता की एक नई फुलवारी दुनिया में लहलहायेगी।

सन् 1972 में उन्होंने कुछ भविष्य वाणियाँ इस प्रकार की थी :-

(1) अफगानिस्तान में दो बड़ी समस्याएं- अंतर्क्रान्ति और सैनिक शासन।

(2) पाकिस्तान में प्रजातन्त्र का सदा के लिए अन्त।

(3) भारतवर्ष सत्ता परिवर्तन भयंकर प्राकृतिक प्रकोप जो सन् 1982 तक प्रतिवर्ष और अधिक उग्र होते चले जायेंगे-यही वह देश जिसके प्रताप से महायुद्ध की उग्रता शान्त होगी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत वर्ष विश्व का शिरोमणि राष्ट्र बनेगा।

(4) कैलीफोर्निया में भयंकर भूचाल और उसका बहुत भाग पृथ्वी में समा जायेगा।

(5) भारतवर्ष और रूस की अटूट मंत्री और साम्यवादी रूस का धार्मिक देश के रूप में परिवर्तन।

(6) इंग्लैंड में भयंकर मुद्रा संकट।

(7) चीन में भयंकर गृहयुद्ध-जिससे बचने के लिए चीन द्वारा विश्व युद्ध प्रारम्भ करने का पतीला।

इनमें से अनेक भविष्यवाणियों को लोग सत्य हुआ देख भी चुके है। श्री क्रूम हेलर एक ऐसे ज्योतिर्विद् है जिनकी भविष्य वाणियों को कतरने पश्चिमी देशों में अनेक पत्रकार अपनी सम्पत्ति की तरह फाइलों में सुरक्षित रखते हैं। “हैरिएट” के संवाददाता-जान मिलर-जो कई बार भारतवर्ष की यात्राऐं कर चुके है का कथन है कि उनके पास क्रूम हेलर की एक ऐसी भविष्य वाणी है जिसको उन्होंने अपनी अन्तिम भविष्यवाणी बताया है-यह भारतवर्ष से सम्बन्धित है और इसीलिए मैंने भारतवर्ष विशेषकर उत्तराखंड हिमालय की कई बार यात्रायें की हैं। बहुत पूछने पर वे इतना ही बताते है कि इनका संबंध उस महाशक्ति से है जिसे क्रूम हेलर इस युग की एक बहुत बड़े चमत्कार की संज्ञा दिया करते थे और कहा करते थे धार्मिक आस्थाओं के कारण लोग राजकीय वैभव तक का परित्याग कर देते है यह बात बुद्ध के इतिहास में तो मिलती है, पर उसकी पुनरावृत्ति इस युग के लोग अपनी आंखों से देखेंगे। यही वह आदर्श है जो इस महाविनाश का शमन करेंगे अन्यथा आगामी विश्वयुद्ध में पूर्ण प्रलय तक आशंका है।

भविष्य क्या होगा इसकी सत्यता तो समय बताएगा पर वस्तुतः अब जो परिस्थितियाँ हैं वे अपने आप में एक बहुत बुरी खबर है मानवीय जीवन में व्याप्त आस्था संकट, नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन राजनैतिक दर्प, जनसंख्या की बाढ़ खाद्य संकट मुद्रा स्फीति, और परमाणविक आयुधों का अंधा धुँध निर्माण ही इस बुरी खबर को सत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है-उन्होंने वाला तो इससे भी अधिक भयंकर है, तब जब कि मनुष्य अपनी जीवन दृष्टि बदलने को तैयार नहीं होगा।


Quotation

नाश्नति दादुराः शीते, फणिसः पवनाशनाः। कूर्माश्चैबाँगगो प्रारोदृष्टान्ता योगिना यताः॥

शीतकाल में मेंढक कुछ भी नहीं खाते, साँप वायु सेवन करके रह जाते है, कछुए अंग छिपाये पड़े रहते हैं। योगी भी ऐसा कर सकते है।


अपनों से अपनी बात- - जाग्रत आत्माओं को रजत जयंती वर्ष का आह्वान उद्बोधन

दूध गरम करने पर मलाई तैर कर ऊपर आ जाती है। वृक्ष जब अपने पूर्ण यौवन पर होता है तो फूलने फलने लगता है। बादलों की जल सम्पदा जब परिपूर्ण हो जाती है तो वे आकाश में ऊंचे उड़ना छोड़कर नीचे उत्तर आते है और धरती पर बरसने लगते हैं। चन्द्रमा जब पृथ्वी के समीप होता है तो समुद्र से ज्वार भाटे उठते है और धरती पर कितनी ही अदृश्य हलचलें उठ पड़ती है। शरीरों का विकास परिपूर्ण होते ही प्रजनन की उमंगे उठने लगती है।

विचारणा और भावना के क्षेत्र में प्रविष्ट हुई सदाशयता का एक ही चिन्ह है कि वह लोक हित के पुण्य परमार्थ प्रयोजनों के लिए सहज उन्मुख होती है। आदर्शों की प्रतिष्ठापना ही श्रद्धा की प्रौढ़ता प्रमाण है। चिन्तन के भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता के रूप में परिलक्षित होने वाला निकृष्टता के प्रति उच्चस्तरीय अन्त करणों में प्रचण्ड आक्रोश उभरता है। असुरता से लड़ पड़ने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा ही नहीं रहता। ईश्वर अवतरण के दो ही लक्ष्य हैं, धर्म का संस्थापन और अधर्म का निराकरण। जिसकी अन्तरात्मा में ईश्वरत्व की मात्रा जितनी बढ़ेगी उसे उसी अनुपात से इन दोनों प्रयोजनों के लिए अपनी तत्परता नियोजित करनी पड़ेगी।

आस्थावान निष्क्रिय रह नहीं सकते। निष्ठा की परिणित प्रबल पुरुषार्थ में ही होकर रहती है। श्रद्धा का परिचय प्रत्यक्ष कारुणिकता के रूप में मिलता है। करुणाई की अन्त संवेदनाऐं पीड़ा और पतन की आग बुझाने के लिए अपने सामर्थ्य और सम्पदा को प्रस्तुत किये बिना रह ही नहीं सकती। यहीं चिन्ह है जिसकी कसौटी पर व्यक्ति को आन्तरिक गरिमा का यथार्थ परिचय प्राप्त होता है। आध्यात्मिकता, आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना करने वाले तो संकीर्ण स्वार्थपरता के दल-दल में फंसे भी बैठे रह सकते है, पर जिनकी अन्तरात्मा में दैवी आलोक का वस्तुतः अवतरण होगा वे राजहंस की तरह विराट के उन्मुक्त आकाश में विचरण करेंगे। विश्व कल्याण में ही उन्हें आत्म कल्याण की प्रतीति होगी। उन्हें आदर्शों के लिए समर्पित जीवन जीते ही देखा जा सकेगी।

ईश्वर भक्ति और संकीर्ण स्वार्थपरता में किसी प्रकार संगति नहीं बैठती। महानात्मा का अर्थ ही यह है कि वह महान प्रयोजनों के लिए जिये। पेट और प्रजनन की पशु प्रवृत्तियों तक सीमित रहने वाले, लोभ-मोह की सड़ी कीचड़ में कृमि कीटकों की तरह बुल बुलाते रहने वाले तत्व ज्ञान का वांग् विलास भर कर सकते है। ब्रह्मविद्या और भक्ति साधना का आनन्द तो मात्र उन्हें ही मिलता है जो साधु ब्राह्मण की पुण्य परम्परा के अनुरूप अपना जीवन क्रम उदार परमार्थ परायणता के रंग में रंगे रहते हैं।

अखंड-ज्योति और उस के परिजनों के मध्य लम्बे समय से इन्हीं तथ्यों को समझने समझाने का उपक्रम चलता रहा है। स्वाध्याय सत्संग की आरम्भिक शिक्षा का प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो चुका। अब परीक्षा की घड़िया हैं। जो पढ़ा या पढ़ाया गया उसकी पहुँच कितनी गहराई तक हो सकी है यह जानना परीक्षा का उद्देश्य होता है। जो उत्तीर्ण होते है उन्हीं का परिश्रम और मनोयोग सराहा जाता है। अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं। अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के मध्य लम्बे समय से चले आने वाले आदान-प्रदान की परिपक्वता की घड़ियां सामने हैं। इन्हें परीक्षा काल भी कह सकते हैं। दंगल में पहलवान की-घुड़दौड़ में घोड़े की-युद्ध मोर्चे पर सैनिक की गहराई आँकी जाती हैं।

नव-निर्माण के लिए चल रही देवी हलचलों की प्रौढ़ता इन दिनों देखी जा सकती। यह युग बसन्त है। पौधे लहलहाऐंगे ही। पल्लव हुलसेंगे ही। फूल खिलेंगे ही। फल लगेंगे ही। भौंरे इन दिनों गूँजे बिना रह नहीं सकते। कोकिल की वाणी मुखर बिना रुकने वाली नहीं हैं। तितलियों की उमंगे उनके हिलते हुए पंखों से सहज ही परिलक्षित होगी। जहाँ चेतना में जागृति का अंश होगा वहाँ युग परिवर्तन की पुण्य बेला में युग धर्म के अनुरूप अपनी क्रिया पद्धति को मोड़ने का साहस भी उभरेगा। अरुणोदय से पूर्ण कुकुट्ठों को अन्तःप्रेरणा वांग लगाने और सोतों को जगाने के लिए अनायास ही उमंगती है। ऊषा का आलोक पक्षियों तक को कलरव की प्रेरणा देता है। प्रभात का दर्शन होते ही प्रत्येक सचेतना को पूछता छोड़ने और कर्म संलग्न होने की प्रेरणा मिलती है। जिन पर परिवर्तनों का कोई प्रभाव न पड़े उन्हें जड़ ही कहा लायेगा। जीवितों में भी मृतक देखे जा सकते हैं। जिनके अन्तःकरण में उच्चस्तर की संवेदनाओं का अता-पता न लगे और जो नर पशुओं की रीति नीति छोड़ने और मानवों आदर्शों के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्व अपनाने के लिए सहमत न हो सकें, उन्हें जीवितों में गिने जाने वाले मृतक ही कहा जायेगा।

रजत जयन्ती वर्ष में अखण्ड ज्योति परिवार के प्राणवान परिजनों में से प्रत्येक के अंतःकरण में एक उमंग उठ रही है कि परिवर्तन की इस पुण्य बेला में नव सृजन की युग पुकार को पूरा करने के लिए उसका भी कुछ योगदान होना चाहिए। कृपणता कभी सह्य भी हो सकती है पर कभी तो वह नितान्त असह्य हो जाती है। आपत्ति काल में हर समर्थ से साहसिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है। उससे मुँह मोड़ने वालों में बाल, वृद्ध, रुग्ण अपंग क्षम्य समस्या जा सकते हैं। पर समर्थों की आना कानी हर किसी को बुरी लगती है। यहाँ तक कि उसका अपनी आत्मा भी धिक्कारे बिना नहीं रह सकती। बाहर से तो इस प्रकार की निष्ठुरता पर घृणा ही बरसती है। युग संख्या की यह विशिष्ट घड़ियां कुछ ऐसी ही है। जिनमें नव सृजन में योगदान करने की युग पुकार की अनसुनी नहीं ही किया जाना चाहिए। जागृत आत्माओं को नव सृजन का आमंत्रण अन्तरिक्ष से उतरा है। इसे अस्वीकार करने में हर दृष्टि से घाटा ही घाटा है इस तथ्य को जो जितनी जल्दी समझ लेगा वह उतनी ही बुद्धिमत्ता का परिचय देगा।

नव-सृजन के लिए समय दान यही हैं कि महाकाल की माँग को पूरा करने के लिए जागृत आत्माओं की साहसिकता को उमंगना ही चाहिए। सुदामा को बगल में दबी चावलों की पोटली देनी पड़ी थी-कर्ण ने मुँह में लगे हुए दाँत उखाड़े थे-बलि और हरिश्चंद्र को राज सिंहासन खाली करने पड़े थे-शबरी को बेरों से और गोपियों को दही और माखन से हाथ धोना पड़ा था। दरिद्र विदुर बथुए का शक परोसने की ही स्थिति थे पर जो दे सकते थे देने में कृष्ण न बने। साधन न सही श्रम और मनोयोग तो हर किसी के पास हो सकता है इसे तो गीध, गिलहरी और रीछ, वानर सरीखे साधन ही भी प्रस्तुत कर सकते है। समय दान की माँग ऐसी है जिसे हर भावनाशील सहज ही प्रस्तुत कर सकता है। व्यस्तता, दरिद्रता, चिन्ता समस्या आदि के बहाने गढ़ने हो तो बुद्धिकौशल को इशारा करने भर की देर है। गढ़ने और ढालने में दिमाग की फैक्टरी इतनी तेज है कि पुण्य प्रयोजन में सहयोग न दे सकने के पक्ष में दलीलों और कारणों का एक से एक विचित्र बहाने गढ़कर खड़े कर देगी। इन जादूगरी से किसको कितना संतोष होगा यह तो नहीं कहा जा सकता पर इतना अवश्य माना जायेगा कि अनिच्छा के पक्ष में हजार तर्क उपस्थित कर देने में किसी का भी मस्तिष्क किसी दूसरे से पीछे रहने हार मानने को तैयार नहीं हो सकता।

तथ्य दूसरे ही हैं। जिन्हें कुछ करना होता है वे घोर व्यस्तता के बीच भी अपने प्रिय प्रसंग के लिए कुछ कर गुजरने के लिए सहज ही अवसर प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि दरिद्रता, रुग्णता, व्यस्तता से लेकर समस्याओं के जाल जंजाल तक के कुछ न कुछ करते रहने में बाधक नहीं बन सकते। ऐसे भावनाशीलों की कमी नहीं जो उलझनों और कठिनाइयों से निपटने की तरह ही अन्तरात्मा की, महाकाल की युग पुकार की-गरिमा स्वीकार करते हैं और उसे सर्वोपरि समस्या आवश्यकता मानते हैं। प्रयासों में प्रमुखता सदा उन्हें मिलती है जिन्हें अंतःकरण द्वारा महत्वपूर्ण माना जाता है। युग प्रकार यदि महत्वहीन समझी गई है तो सहज ही उसके लिए आजीवन फुरसत न मिलने की मनःस्थिति और परिस्थिति बनी रहेगी। श्रद्धा उमंगी भी तो हजार उपाय ऐसे निकल जावेंगे जिनके आधार पर निर्वाह की समस्याओं को हल करते रहने के साथ-साथ ही प्रस्तुत युग धर्म के आहृ के लिए भी इतना कुछ किया जा सकता है जिससे आत्म संतोष और लोक श्रद्धा को अभीष्ट मात्रा उपलब्धि होती रहे।

युग विकृतियों का एक ही कारण है जन मानस में आदर्शों के प्रति अनास्था का बढ़ जाना। इस सड़ी कीचड़ से ही असंख्यों कृमि कीटक उपजते हैं और समस्याओं तथा विभीषिकाओं के रूप में जन जन को संत्रस्त करते हैं। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक ही उपाय है-जन मानस का परिष्कार। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को स्थान मिल सके तो लोक प्रवाह में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य दीखेगा। ऐसी दशा में युग संकट के कुहासे को दूर होते देर न लगेगी। समस्या दार्शनिक है। आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक नहीं। जन मानस को परिष्कृत किया जा सके तो प्रस्तुत विभीषिकाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। उनसे लड़ने की लम्बी चौड़ी तैयारी करने की आवश्यकता ही न रहेगी। मनुष्य को ध्वंस के विरत करने के-सुजन में से लागू होने के लिए सहन किया जा सके तो बड़े पैमाने पर जो खर्चीली योजनाएं बन रहीं है। उनमें से एक भी आवश्यकता न पड़ेगी। जन के बूँद बूँद प्रयासों से इतना कुछ अनायास ही होने लगेगा जिस पर सैकड़ों पंच वर्षीय सृजन योजनाओं को निछावर किया जा सकेगा। इसके विपरीत जन सहयोग के अभाव में बड़ी से बड़ी खर्चीली योजनाएं अपंग बनकर रह जाती है। हमें पत्तों पर भटकने के स्थान पर जड़ सींचने का प्रयत्न करना चाहिए। जन मानस का परिष्कार ही सामयिक समस्याओं का एक मात्र हल है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का लक्ष्य इस एक ही राज मार्ग पर चलते हुए निश्चित रूप से पूर्ण हो सकता है। ज्ञान यज्ञ का युग अनुष्ठान इसी निमित्त चल रहा हैं। विचार क्रान्ति की लाल मशाल का प्रज्वलन इसी विश्वास के साथ हुआ है कि जन-जन के मन-मन में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आलोक उत्पन्न किया जा सके।

युग-सृजन का संकल्प एक ही कार्य पद्धति को उपजाने से संभव हो सकता है वह नव जागरण के लिए अनवरत जन संपर्क। इस प्रक्रिया के अंतर्गत सभी कार्यक्रम आ जाते हैं जिन्हें प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक कार्यों में गिना जाता है। बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्तियाँ ही अपने युग की समस्त समस्याओं द्वारा जन जागरण का आलोक वितरण करने के लिए जन संपर्क कर निकलना ही एक मात्र उपाय है। लेखनी और वाणी की सामर्थ्य जितनी ही क्यों न हो पर उसका वास्तविक लाभ तो प्राणवानों का जन संपर्क ही उत्पन्न कर सकता है।

बादलों की तरह खेत-खेत पर बरसने से ही व्यापक हरितिमा उत्पन्न की जा सकेगी। पवन की तरह जन-जन तक अनुदान पहुँचाने का प्रयास ही प्राणियों में जीव चेतना का अस्तित्व बनायें रह सकता है। सूर्य की तरह गर्मी रोशनी और चन्द्रमा की तरह शीतलता बाँटने के लिए ठीक वैसे ही परिभ्रमण की योजना बनानी पड़ेगी जैसी कि प्राचीन काल के ब्राह्मण, साधु और वानप्रस्थ अपनाते थे। अतीत की गौरव गरिमा का मेरुदंड धर्म चेतना उत्पन्न करने के लिए परिभ्रमण करने की धर्म निष्ठा को ही समझा जा सकता है। तीर्थ यात्रा का प्रधान उद्देश्य यही है।

भगवान बुद्ध ने युग क्रांति के लिए इस पुण्य परंपरा को अपने ढंग से सामयिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन किया था। छोटे बड़े रूपों में प्रायः सभी संतों ने अपनी कार्य पद्धति में उसी धर्म धारणा का समावेश किया है। युगांतरीय चेतना को व्यापक बनाने के लिए प्रव्रज्या अभियान को प्रमुखता देना ही प्रधान उपाय है। रजत जयंती वर्ष में जागृत आत्माओं में से अधिकांश को अपनी-अपनी मनःस्थिति और स्थिति के अनुरूप प्रव्रज्या अभियान में भाग लेने के लिए कहा गया है।

यह प्रक्रिया ऐसी है जिसे हर व्यक्ति हर स्थिति में किसी न किसी प्रकार- किसी न किसी सीमा तक अवश्य ही पूरा हो सकता है। संपर्क हर व्यक्ति का दूसरों के साथ होता ही है। कुछ लोग अपने पास आते हैं कुछ के पास अपने को जाना पड़ता है। इस संपर्क से वैयक्तिक करणों के अतिरिक्त एक उद्देश्य आस्थाओं के परिष्कार की चर्चा को भी रखा जा सके तो उतने भर से हर व्यक्ति युगांतरीय चेतना उत्पन्न करने में सहयोग दे सकता है। प्रियजनों, परिचितों में पत्र-व्यवहार के माध्यम से ऐसा कुछ करते रहा जा सकता है। घर परिवार की सीमा में भी यह प्रयास चलते रह सकते हैं। जो घर से बाहर जाने की स्थिति में नहीं हैं वे अपने प्रतिनिधि के रूप में दूसरों को परिभ्रमण सुविधा साधन देकर उनके लिए अधिक कर सकने का पथ-प्रशस्त कर सकते हैं। व्यक्ति विशेष के लिए एक स्थान पर रह कर भी लेखन, शोधन, शिक्षण आदि कार्यों के सहारे युग आलोक का वितरण कर सकना संभव हो सकता है।

कौन किस प्रकार प्रव्रज्या अभियान में सम्मिलित हो इस क्रिया-पद्धति का निर्धारण व्यक्ति विशेष की स्थिति योग्यता को ध्यान में रखकर अलग-अलग प्रकार से किया जा सकता है। यह आगे की बात है। प्रथम प्रश्न यह है कि जाग्रत आत्माओं में से प्रत्येक को किसी न किसी प्रकार लोक मानस को परिष्कृत करने के लिए जन संपर्क के लिए समय दान करने की नीति बनानी चाहिए। सिद्धांत इतना निश्चय हो जाने के उपरांत यह सरल पड़ेगा कि व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उसे समयदान का उपयोग किस कार्य के लिए किस प्रकार किया जाय?

अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में प्रव्रज्या अभियान के संदर्भ में प्रकाश डाला और उसका स्वरूप तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता रहा है। व्यक्ति की समस्त जागृत सफलताओं में से प्रत्येक को समयदान के लिए अनुरोध किया गया है और उसके उपयोग का प्रधान उपाय जन-संपर्क के लिए परिभ्रमण सुझाया गया है। यों व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार ऐसा भी हो सकता है कि अन्य उपायों से बाहर न जा सकने की स्थिति में भी, प्रव्रज्या का उद्देश्य पूरा कर सकने में योगदान दे सकें।

परिव्राजकों की तीन श्रेणियां हैं (1) वरिष्ठ (2) कनिष्ठ (3) समयदानी। 1. वरिष्ठ वे जो परिवार के उत्तरदायित्वों से प्रायः निवृत्त हो चुके, जो अपना अधिकांश समय घर से बाहर रहकर दे सकते हैं। 2. कनिष्ठ वे जो साल में दो महीने बाहर जाने के लिए दे सकते हैं। और शेष समय में अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जन-जागरण के लिए प्रायः दो घंटे रोज लगाते रह सकते हैं। 3. समयदानी वे जो बाहर तो नहीं जा सकते पर अपने स्थान पर दो घंटे नित्य का एवं छुट्टी के दिनों का उपयोग इसी पुण्य प्रयोजन में लगाते रह सकते हैं। तीनों प्रकार के समयदानियों से आवेदन-पत्र मांगे गये हैं और अपना परिचय देने के लिए निम्न जानकारियां अपने ही हाथ से विस्तारपूर्वक लिख भेजने के लिए कहा गया है। परिचय-

(1) पूरा नाम (2) पूरा पता (3) प्रव्रज्या का वर्ग वरिष्ठ, कनिष्ठ या समयदानी, (4) संकल्प तिथि (5) शिक्षा योग्यता (6) व्यवसाय (7) जन्मतिथि (8) जाति-गोत्र।

विवरण- (1) शारीरिक स्वास्थ्य (2) मनःस्थिति (3) परिवार के सदस्यों का विवरण (4) अर्थ व्यवस्था (5) दुर्गुणों, सद्गुणों की जानकारी (6) समस्याऐं तथा उलझनें (7) जीवन की उल्लेखनीय घटनाऐं (8) मिशन से संपर्क का विवरण-

अनुरोध के अनुरूप जागृत आत्माओं की भावभरी श्रद्धाँजलियाँ समयदान के संकल्पों के रूप में मिल रहीं है। आशा के अनुरूप अभी उनकी संख्या नहीं है। जो लोग चिरकाल से मिशन की भावभरी सेवा करते रहे हैं उनमें से भी बहुतों के नियमित आवेदन पत्र अभी फाइल में नत्थी नहीं हो सके हैं। इस कमी से यह कठिनाई पड़ेगी कि इन दिनों प्रव्रज्या किनकी किस रूप में चल रहीं है और उसमें क्या मोड़ परिवर्तन लाया जाना आवश्यक है इसका समुचित निर्धारण न हो सकेगा। शान्ति कुँज की संचालक सत्ता इन दिनों इस संदर्भ में बहुत उत्सुक एवं इच्छुक है कि समयदानियों की सूची उनके सामने रहे और उनकी गतिविधियों की तस्वीर निरन्तर आँखों के आगे से गुजरती रहे। सहायकों, सदस्यों की कमी नहीं। वे लाखों की संख्या को पार कर करोड़ों बनने जा रहे हैं। आशाओं के केन्द्र बिन्दु व है जो प्राण वितरण में हाथ बटा सकते हैं। जो नियमित श्रमदान की प्रतिज्ञा के सहारे अपनी विशिष्ट निष्ठा का प्रमाण दे सकते है। प्रव्रज्या अभियान के अंतर्गत इन दिनों इसी की जाँच पड़ताल, खोज बीन हो रही है और जो आगे आ रहे है। उनकी हाथ में लगी उंगलियाँ के सदृश्य अभीष्ट प्रयोजन के लिए घनिष्ठ सहयोगियों के रूप में गणना हो रहीं हैं। अस्तु जहाँ भी युग सृजन के लिए समयदान का आमंत्रण पहुँचा हो-जहाँ भी उस अनुरोध ने हलचल उत्पन्न की हो वहाँ यह आवश्यक माना जाये कि प्रतिज्ञाबद्ध सक्रियता का पंजीकरण भी आवश्यक है। उसके बिना न अनुशासन चलेगा न मार्गदर्शन रहेगा। और न योजनाबद्ध रूप से अगले दिनों कुछ करने का निर्धारण बन पड़ेगा। जब योजनाबद्ध-संघबद्ध कार्य होना है तो प्राथमिक आवश्यकता पंजीकरण के रूप में भी पूरी होनी चाहिए। इसमें उपेक्षा करना संकोचशीलता नम्रता, नाम न चाहना जैसी आदर्शवादिताओं की सीमा में नहीं आता वरन उससे सुनियोजित क्रिया प्रक्रिया में भारी अव्यवस्था और विश्रृंखलता उत्पन्न होती हैं। जिन्हें भी समयदान की चुनौती स्वीकार करनी ही युग देवता के अंचल में अपनी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करनी हो, उन्हें निर्धारित आठ जानकारियाँ भेज कर शान्ति कुँज हरिद्वार से अपना पंजीकरण करा लेना चाहिए। इसके लिए अनावश्यक विलम्ब न करना ही श्रेयस्कर है।

वरिष्ठ कनिष्ठ और समयदानी परिव्राजकों को अपनी भावी कार्य पद्धति एवं रीति नीति के सम्बन्ध में आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए अगले दिनों शान्ति कुँज की परिव्राजक सत्रश्रृंखला में उपस्थित होना चाहिए। यह श्रृंखला 1 मई से चलेगी और जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर इन पाँच महीनों में लगातार जारी रहेगा। इन सत्रों में जहाँ परिव्राजकों का दृष्टिकोण चिन्तन उद्देश्य, व्यवहार समझा जायगा। वहाँ उनके व्यक्तित्व को उभारने वाले ऐसे परामर्श भी दिये जायेंगे, जिन्हें अपना कर अपनी प्रतिभा और प्रभावशीलता को अधिक प्रखर बनाया जा सके। जन संपर्क का आनन्द तभी है जब उससे दूसरों को आवश्यक प्रकाश एवं उत्साह मिल सकें। यह किसे लिए किस प्रकार का संभव हो सकता है इसका विधिवत प्रशिक्षित व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उन पाँच महीने के परिव्राजक सत्रों में चलता रहेगा।

विचार विनिमय, परामर्श मार्गदर्शन की दृष्टि से 10 दिन की अवधि भी पर्याप्त है। इस दृष्टि से उपरोक्त पाँच महीनों में 1 से 10-11 से 20-21 से 31 तारीखों के सत्र चलते रहेंगे। इसके अतिरिक्त कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जिन्हें सीखने के लिए अधिक समय लगाने की आवश्यकता पड़ेगी। (1) भाषण कला एवं संभाषण की प्रभावोत्पादक क्षमता का अभ्यास (2) काम चलाऊ संगीत शिक्षा (3) यज्ञ आदि कर्मकांडों को प्रेरणाप्रद पद्धति से सम्पादित कर सकने का कौशल। यह तीनों कार्य ऐसे हैं जिनके लिए दस दिन पर्याप्त नहीं हो डडडड इनका अभ्यास करने के लिए अधिक समय डडडड इन तीनों का साथ-साथ अभ्यास करने के लिए डडडड तीन महीना चाहिए किन्तु जिन्हें थोड़ा डडडड उनके लिए जल्दी भी हो सकता है संगीत डडडड साध्य है। उसे छोड़ दिया जायें तो भाषण डडडड कर्मकांड का अभ्यास एक महीने में भी पूरा हो सकता है।

यहां एक बड़ी कठिनाई यह आती है कि हर व्यक्ति की योग्यता अलग होती है। अतएव शिक्षण की आवश्यकता भी अलग-अलग प्रकार की रहती है। सामूहिक प्रशिक्षण के अध्यापन की सुविधा तो रहती है पर शिक्षार्थियों का स्तर ऊंचा-नीचा रहने के कारण मध्यवर्ती लाभ उठा पाते हैं, कम दर्जे वाले ऊंचा शिक्षण पकड़ नहीं पाते और बड़े दर्जे वाले को छोटा प्रशिक्षण व्यर्थ लगता है। इस कठिनाई का हल एक ही निकाला है कि हर शिक्षार्थी को एक स्वतंत्र इकाई मानकर उसे उसकी स्थिति के अनुरूप एक अलग कक्षा माना जाय और आवश्यकता के अनुरूप भाषण- संगीत एवं कर्मकांड का अभ्यास कराया जाय। अध्ययन की दृष्टि से यह अत्यंत जटिल एवं कष्ट साध्य है। फिर भी वैसा ही करने का साहस किया गया है। यह शिक्षण शैली एक प्रकार से अनुपम ही समझी जा सकती है। आशा की गई है कि अभिनव प्रयोग भी असफल नहीं होगा। संगीत प्रवचन एवं कर्मकांड कक्षाओं में कौन छात्र कितने समय तक रुक सकेगा यह नहीं कहा जा सकता है। अपनी ओर से यही कहा गया है कि जितना अधिक ठहर सकना संभव हो उतना ठहरना चाहिए। अधिक गुड़ डालने से अधिक मीठा होने की कहावत यहां भी चरितार्थ होगी। पर जो अधिक समय नहीं ठहर सकते उन्हें भी बीस दिन तो ठहरना ही चाहिए। परामर्श के लिए दस दिन भी पर्याप्त हैं किंतु प्रशिक्षण के लिए बीस दिन भी न्यूनतम ही समझे जायेंगे।

परिव्राजकों का पंजीकरण आवश्यक है। समयदानी अपने आवेदन परिचय इन्हीं दिनों भेज कर प्रव्रज्या श्रृंखला में अपने आपको सूत्र संबद्ध करलें। इसके उपरांत अगला चरण उन्हें यह उठाना चाहिए कि मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर के पांच महीनों में से परामर्श डडडड दिन वाले में और प्रशिक्षण के लिए न्यूनतम डडडड आने के लिए अपनी सुविधा की तारीख निश्चित कर लेनी चाहिए और स्थान सुरक्षित करा लेना चाहिए। अधिक समय रुकने वाली बात का महत्व भी समझा ही जाना चाहिए। संगीत अभ्यास के लिए तो हर हालत में अधिक समय ही चाहिए।

रजत जयंती वर्ष से पुरश्चरण श्रृंखला का विस्तार तेजी से हो रहा है। नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी चार महीनों में 250 आयोजन पूरे होने जा रहे हैं। अप्रैल, मई, जून में भी प्रायः इससे भी अधिक गायत्री यज्ञ एवं युग निर्माण सम्मेलन पूरे होंगे। पुरश्चरण श्रृंखला नवीन निश्चय के अनुसार 25 महीने चलेगी अर्थात् आयोजनों का वर्तमान क्रम एक वर्ष और आगे तक चलेगा। उनमें पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए परिव्राजक भेजे जाने हैं। कुशल वक्ताओं और गायकों की भी आवश्यकता पड़ेगी। इसकी पूर्ति इन पांच महीने के परिव्राजक सत्रों में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले समयदानी ही पूरा करेंगे। इस दृष्टि से समयदानियों को- पंजीकरण कराने वालों को- उपरोक्त पांच महीने में शांतिकुंज पहुंचकर अधिक समय रुकने और अपने कार्य को अधिक शानदार ढंग से पूरा कर सकने की योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिये। युग-चेतना के उभार की इस भाव-भरी बेला में सृजन शिल्पियों की सर्वोपरि आवश्यकता है। अखण्ड-ज्योति परिवार की जागृत-आत्माओं को इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए आगे आने का युग निमंत्रण इन पंक्तियों के द्वारा रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष में एक बार फिर से भेजा जा रहा है।


Quotation

अच्छी शिक्षाप्रद व ज्ञानवर्द्धक पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने अच्छे सच्चे मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। हम जितना अधिक स्वाध्याय करते जायेंगे, उतनी ही अधिक उपयोगिता उसकी हमें होती जायेगी व हमारे चिंतन व कृतित्व का स्तर उतना ही ऊंचा उठता जायेगा। -मो. क. गांधी


बुझा सकेगी इसे न झंझा


बुझा सकेगी इसे न झंझा (kavita)

युग-ऋषि ने युग का तम हरने क्रांति-मशाल जलाई। दृढ़ता की परिचायक, उसको, थामे सुदृढ़ कलाई॥

एकबार भर दिया हृदय-रस इसमें ऋषि ने अपना। और सदा प्रज्ज्वलित रहे, देखा है ऐसा सपना॥ यह युग- व्यापी अंधकार तब ही तो मिट पायेगा। और रोशनी का वर्चस्व प्रतिष्ठित हो जायेगा॥

तुम्हीं इसे प्रज्ज्वलित रखोगे, ऐसी आस लगाई। दृढ़ता की परिचायक, उसको, थामे सुदृढ़ कलाई॥

अतः याद रखना है- इसका स्नेह न चुकने पाये। भले हमारे रक्त-कोष की बूंद-बूंद चुक जाये॥ हृदय न हो संकीर्ण कोष अपना खाली करने में। प्राण न सकुचाएं जग में अपना प्रकाश भरने में॥

हृदय-राग से हो सिंचित तो अरुण लालिमा छाई। दृढ़ता की परिचायक, उसको, थामे सुदृढ़ कलाई॥

संकल्पों की दृढ़ता इसको थामे सदा रहेगी। तम का अंतिम संस्कार कर जय की कथा कहेगी॥ ऊंचा सदा रहेगा हाथ न नीचे कभी झुकेगा। लक्ष्य प्राप्ति से पूर्व न सृजन-कारवां कभी रुकेगा॥

बुझा सकेगी इसे न झंझा, पछुआ या पुरवाई। दृढ़ता की परिचायक, उसको, थामे सुदृढ़ कलाई॥

-माया वर्मा

*समाप्त*