घी की मूल सत्ता दूध के प्रत्येक कण में ओत-प्रोत है। प्रयत्न पूर्वक उसे मथ कर बाहर निकाला जाता है। आत्मिक विभूतियाँ और विशिष्टताएं जीवन चर्या की प्रत्येक मिनट और प्रत्येक क्रिया-कृत्य के साथ जुड़ी रहती है। विचारों की प्रत्येक तरंगों और आकाँक्षाओं की प्रत्येक उमड़ में वह घुली रहती है। फूल की गन्ध, सुषमा और सुन्दरता किसी विशेष स्थान पर रखी नहीं रहती वरन् उसके समस्त कलेवर में गुथी रहती है। मनुष्य का समग्र व्यक्तित्व ही उसकी आन्तरिक स्थिति का परिचायक है। किसी अंग विशेष को आत्मिक क्षमताओं का अतिरिक्त केन्द्र मानना भूल है।
साधना परख योगाभ्यासों में किन्हीं अवयवों को प्रमुखता देकर कई प्रकार की हलचलों से उन्हें प्रभावित किया जाता है। यह प्रयोगात्मक पद्धति है। व्यायामशालाओं में भी ऐसा ही होता रहता है। कई प्रकार के व्यायामों में ऐसा लगता है कि उनका प्रभाव अमुख अवयवों पर ही पड़ रहा है। फलतः समस्त शरीर को बलिष्ठ बनाने की कुँजी वही है। देखने में भले ही ऐसा लगता हो, पर वास्तविकता वैसी है नहीं। व्यायाम कोई भी क्यों न हो उसकी सफलता इसी तथ्य पर निर्भर रहेगी कि समस्त शरीर को बलिष्ठ बनाने की क्षमता उसमें है या नहीं।
आत्मबल का अनुपात जीवन के स्तर के साथ अविछिन्न रूप से जुड़ा है। सज्जनता और उदारता से भरापूरा जीवन क्रम ही वो मूल सम्पदा है जिसे मथने पर सिद्धियों और विभूतियों के नाम से जानी जाने वाली विशिष्टतायें उभर कर ऊपर आती है। कोई साधना ऐसी हो नहीं सकती दृष्टिकोण और आचरण में संकीर्णता एवं निकृष्टता भरे रहने पर भी वैसा कुछ परिणाम उत्पन्न कर सके जैसा कि अध्यात्म प्रयोगों के फलस्वरूप अपेक्षा की जाती है।
“सज्जन का तिरस्कार करने वाले पापी मनुष्य का कार्य वैसा ही जैसे कोई ऊपर देखकर आकाश पर थूके, उसका थूक आकाश को तो नहीं छूता, वरन् लौट कर उसी को मलीन करता है। पुनः उसका कार्य वैसा ही, जैसे कोई वायु के विपरीत प्रवाह में दूसरे पर धूलि उड़ाये। उस समय वह धूलि उड़ाने वाले पर ही आकर गिरेगी। सज्जन व्यक्ति आहत नहीं होता, उसे दुःख देने वाला स्वयं ही दुःख में ग्रस्त हो जाता है।”
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“मनुष्य को चाहिए कि क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से, लोभ को उदारता से और मिथ्या को सत्य से जीते।”
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पाप कर्म दूध की तरह तुरन्त नहीं जम जाता, वह तो भस्म से ढकी हुई आग की तरह थोड़ा-थोड़ा जलकर मूढ़ मनुष्य का पीछा करता है।
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जैसे महान् पर्वत हवा के झरोखों से विकम्पित नहीं होता; वैसे ही बुद्धिमान लोग निंदा और स्तुति से विचलित नहीं होते।
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दूसरों को दोष देखना आसान है, किन्तु अपना दोष देखना कठिन है। लोग दूसरे के दोषों को भुस के समान फटकते फिरते हैं, किन्तु अपने दोषों को इस तरह छिपाते हैं, जैसे चतुर जुआरी हारने वाले पासे को छिपा लेता है।
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अज्ञानी और मूढ़ मनुष्य केवल मौन से मुनि नहीं हो जाता। वही मनुष्य मुनि है, जो तराजू की तरह ठीक ठीक जाँच करके सुव्रतों का ग्रहण और पापों का त्याग करता है। जो दोनों लोकों का मनन करता है वही सच्चा मुनि है--धम्मपद (धम्मदृवग्गो)
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मुनि को गाँव में इस प्रकार विचरण करना चाहिए, जिस प्रकार भौंरा फूल के रंग और सुगन्ध को न बिगाड़ता हुआ उसके रस को लेकर चल देता है।
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कोई भी सुगन्ध, चाहे वह चन्दन की हो, चाहे तगर की या चमेली की, वायु से उलटी ओर नहीं जाती है। किन्तु सत्पुरुषों की सुगन्ध वायु से उलटी ओर भी जाती है। सत्पुरुषों की सुगन्ध सभी दिशाओं को सुवासित करती है।
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अपने आप को उठा, अपनी परीक्षा कर! इस प्रकार तू अपनी आप रक्षा करता हुआ विचारशील हो सुख पूर्वक इस लोक में बिहार करेगा।
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“अशुभ कर्मों को न करो, शुभ कर्मों का अभ्यास करो, चित्त पर पूर्ण निग्रह रखो, यही बुद्ध की शिक्षा है। (उदान वग्ग)
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जाति मत पूछ, तू तो बस एक आचरण पूछ। देख! आग चाहे वैसे काष्ठ से पैदा होती है। इसी प्रकार ‘नीचे-कुल’ का मनुष्य भी धृतिमान, सुविज्ञ, और निष्पाप मुनि होता है। (अत्तदीप सुत्त)
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उलीचो, उलीचो, इस नाव की उलीचो। उलीचने से तुम्हारी यह नाव हल्की हो जायगी और तभी जल्दी-जल्दी चलेगी। राग और द्वेष का छेदन करके ही तुम निर्वाण-पद पा सकोगे। (धम्मपद से)
एक स्त्री थी, उसने सुन्दर रूमाल निकाला, उसमें उसने एक बूँद इत्र डाला। इत्र सूख गया। रूमाल को तौला गया तो इत्र डालने से पूर्व उसका जितना वजन था उससे अब .0000001 (दशमलव शून्य शून्य शून्य शून्य शून्य एक) ग्राम अधिक निकला। वह इस रूमाल को लेकर यात्रा पर निकल पड़ी। प्रतिदिन 10 मील चली। तीन दिन तक चली। 30 मील की दूरी तक गई। उसका पति उसे ढूंढ़ने निकला। प्रति एक गज की दूरी पर उसने एक क्यूविक सेंटीमीटर हवा की गन्ध ली। उसमें उसे इत्र (सेंट) की खुशबू मिलती चली गई। इस तरह गन्ध के सहारे उसने अपनी रूठी हुई प्रियतमा का ठिकाना पा लिया। उसे मना कर अपने घर ले आया।
इस एक घटना में तीन चमत्कार जुड़े हैं। दो कोई भी जाना सकता है, तीसरे को गोपनीय रखा गया है, जो उसे जान लेगा वही चतुर, सुजान, ज्ञानी और पंडित कहा जायेगा।
पहला चमत्कार तो उसे आविष्कार का है जिसमें वस्तु को इतना सूक्ष्म कर देना है जिसमें सारा दृव्य गुण इस तरह समा जाये कि वह लघुता विराट बन जाये। .0000001 ग्राम भार की वस्तु को न्यूनतम 1760 X 3 X 2 (पथ के 1+1 गज दोनों ओर ) अर्थात् 10560 वर्ग गज दूरी में व्यापक बना देना सचमुच चमत्कार ही है। और यह भी चमत्कार ही है कि 1 एक वर्ग इंच की नाक मनुष्य को उसका भान करती हुई चली जाती है। मानवीय बुद्धि की इस क्षमता को वंदनीय कहा जाये तो इस में कुछ बुरा नहीं है।
किन्तु सच पूछा जाये तो इसमें मनुष्य का कोई कमाल नहीं है। उसने आविष्कार स्वयं नहीं किया, नकल की, नकलची विद्यार्थी बुद्धू कहलाते है। योग्यता तो उनकी सराही जाती है, जिनके हल सही होते है। मनुष्य ने यह योग्यता प्रकृति के उन कलाकारों से चुराई है जिन्हें वह निर्बल असहाय व तुच्छ श्रेणी का जीव मानता है। पतिंगा नितान्त उपेक्षणीय जीव है किन्तु यदि मनुष्य का असाधारण इंद्रिय बोध ही उसकी श्रेष्ठता का मापदण्ड हो तो पतिंगे को उससे निम्न स्तर का नहीं उच्च ही माना जायेगा, जिसके पास यह क्षमता है कि अपनी दो मील दूर बैठी हुई मादा को मात्र उसकी गन्ध से ही पहचान लेता है। यह नहीं कि यह गन्ध उसी जाति की मादा की हो वरन् उसमें केवल मात्र अपनी दुल्हन की गन्ध पहचान लेने की क्षमता है, जबकि उसी तरह की सैकड़ों लाखों पतिंगिनियाँ दो मील के घेरे में चक्कर काट रही होगी। मनुष्य में तो वैसी क्षमता किसी -किसी में होती है।
अनेक लोग दूषित स्थानों में, गन्दी नालियों के किनारे रहते-रहते उस गंध के अभ्यस्त हो जाते है। उन्हें उससे अरुचि तक नहीं होती वह यह तक विचार नहीं कर पाते कि यह गन्दगी उनके लिए कितनी हानि कारक है। उनकी बौद्धिक क्षमताएँ इतनी स्वच्छ और निर्मल नहीं होतीं। आहार, बिहार की अनियमितता और अप्राकृतिकता के कारण घ्राण ही क्यों दूसरी इन्द्रियों की सूक्ष्म संवेदनशीलता तक को बैठते हैं पर मनुष्येत्तर जीव अपनी यह क्षमतायें आजीवन बनाये रखते है। इसलिए गन्ध (सेंट) का आविष्कार करके भी मनुष्य अपूर्ण रहा। इन जीवों ने तो ही इतना तो उपकार कि मनुष्य को गंध की इस असाधारण शक्ति की जानकारी दे दी। पुलिस का बहुत बड़ा कार्य गंध की असाधारण क्षमता का उपयोग कर प्रशिक्षित कुत्ते ही निबटाते है। इनके तो भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास तक हो जाता है। बिल्लियाँ, दीमक, चींटियों में यह क्षमता पाई जाती है। मनुष्य तो अपनी साधारण देखने, चबाने, सुनने और विचार करने तक की क्षमतायें खो और देता है फिर उसकी समझदारी कहाँ रही?
बात केवल गंध तक सीमित नहीं दुनियाँ के हर आविष्कार के लिए मनुष्य ने प्रकृति का ही अनुसरण किया है। हवाई जहाज की कल्पना उसे उड़ते हुए नभचरों से मिली है तो पनडुब्बियों की जलचरों से। बिजली आज जीवनोपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में आ गई है। उसके लिए आविष्कर्ताओं को इलैक्ट्रिक ईल (विद्युत मछली) का ऋणी होना चाहिये। आज के सामान्य विद्युत सरकिटों की अपेक्षा चार से छः गुना अधिक तक बिजली उत्पादन कर सकने वाली यह मछली एक हजार बोल्ट विद्युत शक्ति बिजली पैदा कर लेती है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह अपनी जिन्दगी भर सामान्यतः पचास बोल्ट क्षमता के बीस बल्ब जलाये रख कर प्रकाश देती रह सकती है। मनुष्य के लिए तो यह भी नहीं बन पड़ता कि वह अपनी बुद्धि से ही न कुछ तो अपने परिवार वालों को ही नीति, सदाचार, ईमानदारी, धर्म और अध्याय का प्रकाश देता रहे।
मनुष्य ने बड़ी बड़ी शक्ति वाली दूरबीनें बनाई है। 27 व्यास के लेन्स की पालोमोर वेधशाला की दूरबीन से चन्द्रमा की दूरी लाखों मील से सिमट कर हजारों में आ जाती है पर क्या इसका श्रेय अकेले मनुष्य को ही है। दूरबीन की प्रेरणा देने वाले गिद्धों ने मनुष्य को इस आविष्कार के लिए प्रेरित किया जो सैकड़ों मील दूर से ही यह देख लेते हैं कि किस स्थान पर जानवर की खाल उतार ली गई है। वे न केवल अपनी इस क्षमता का उपयोग अपने उदर पोषण के लिए करते हैं अपितु माननीय अस्तित्व के लिए संकट बनने की सम्भावना वाले प्रदूषण को भी मिटा डालते हैं।
द्विनाभिक ताल (बाईफोकल) चश्मों का आविष्कार पहले प्रकृति ने किया, पीछे मनुष्य ने। “मेरी-”आप्थेलमस नाम की मछली की दोनों आँखों में एक के ऊपर दो-दो पुतलियाँ उभरी रहती है। जब तक वह पानी में रहती है नीचे वाली पुतली से देखती है। इसके बाद वह हवा में आ जाती है तब वह नीचे वाली पुतली से देखना बंद कर देती है और ऊपर की पुतली से देखने लगती है। इस तरह वह जलचर जीवन जितना आनंद और सुविधा पूर्वक जीती है उतना ही थलचर जीवन। चाहे तो मनुष्य भी यह “उभय दृष्टि” रख कर लोक और परलोक दोनों को संवार ले। विचार इस दृश्य संसार को देखने और समीक्षा करने के लिए है तो भावनायें दृश्य जीवन से परे की अनुभूति के लिए। अपनी इस दूसरी पुतलों का उपयोग न करने के कारण ही वह मृत्यु जैसी आनंद दायक, उल्लास वर्धक घटना से हे भयभीत रहता है, लोक जीवन में तो चतुर बना रहता है पर लोकोत्तर के प्रति आस्थायें ही स्थिर नहीं रख पाता। उसने बाईफोकल तो बना लिया पर अन्त चक्षुओं की इतना सक्षम नहीं बनाया कि इस लेख के प्रारम्भ में चर्चित तीसरे चमत्कार को भी समझ लेता।
इन पंक्तियों में जो कुछ लिखा और कहा जा रहा है, उसका उद्देश्य मनुष्य को घटिया और जीव जन्तुओं की विशेषतायें, उपयोगितायें प्रतिपादित करना नहीं है अपितु इस तथ्य का बोध कराना है कि मनुष्य अपने में अनेक दुरूह आविष्कार कर लेने का अहंकार न करें, वरना उसे यह देखना चाहिये कि वह स्वयं ही कितना बड़ा आविष्कारक है-यह कि जिस तरह उसके अपने आविष्कारक मानव जाति के कल्याण, प्रसन्नता और ऐश्वर्य वृद्धि के लिये हैं, उसी तरह यदि उसका जीवन भी उद्देश्य पूर्ण है तो उसे भी सृष्टि में देवत्व एवं मंगल कामनायें विकसित करने, प्राणियों के आनन्द की वृद्धि करने और नियंता के ऐश्वर्य वृद्धि के उत्तरदायित्वों को भी सम्पूर्ण ईमानदारी से पालन करना आवश्यकीय है।
उद्देश्यों के प्रति ईमानदार न होने के कारण ही लगता है उसकी बुद्धि का विधेय पक्ष नष्ट हो गये है और वह प्रकृति से मात्र विध्वंसक प्रेरणायें ग्रहण करने में लग गया। आजकल किसी भी देश की सेनायें विध्वंसकों के अभाव में अपूर्ण मानी जाती हैं ऐसे बाम्वर विमान बने हैं चालक जिन्हें “डाइव” (जहाज के एक दम नीचे कूदने को डाइव कहते हैं ) करके जहाज को पृथ्वी स्पर्श जैसी समीपता तक ले जाते हैं, और बस फेंक कर सीधे 90 डिग्री पर ऊपर उड़ जाते हैं, अहं प्रदर्शन के लिए मनुष्य ने उसे गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर आश्रित कला बताया पर सच पूछा जाय तो यह “मनेर” पक्षी की कला का अनुकरण मात्र है यह अपने शिकार पर बहुत तेजी से झपटता है और उसे पकड़ कर सीधे ऊपर उड़ जाता है। जर्मनी ने रैडार नामक यन्त्र बनाया जो पदार्थ की विद्युत चुम्बकीय तरंगों को पकड़ कर ह बता देता है कि किसी स्थान पर शत्रु की क्या गति विधियाँ चल रही हैं। अब यह यन्त्र प्रत्येक देश की सैन्य सज्जा में सम्मिलित है ईमानदारी की बात यह है कि चमगादड़ को इस सत्य का पता अनादि काल से है, कहते है कि चमगादड़ को दिन में दिखाई नहीं देता पर चूँ चूँ की विशेष प्रकार की नियंत्रित ध्वनि निकालता है और परावर्तित विद्युत चुम्बकीय तरंगों के माध्यम से सूक्ष्म से सूक्ष्म धागे तक का स्थान ज्ञात कर लेता है। किसी भी जाल में उसे चौबीस घन्टे उड़ाया जाये तो वह किसी पदार्थ से टकराता नहीं। मनुष्य ने उसकी इसी क्षमता का अनुकरण कर रैडार यंत्र बनाया है।
सेना को यह ज्ञात हो कि किसी स्थान विशेष में शत्रु है उसे पास से गुजर कर अन्यत्र जाना हो तो एक विशेष प्रकार के गोली की फायरिंग करके वह धुयें की ऐसी लम्बी और ऊँची दीवार खड़ी कर देती है जिससे दूसरी तरफ के लोगों को इस ओर की हलचल का पता ही नहीं चल पाता है सेनायें इस तरह अपने खेमे बदलती रहती हैं “ आक्टोपस” नामक जीव न होता तो सम्भवतः मनुष्य को इस “स्मोक स्क्रीन” (धुयें की दीवार) की कल्पना ही न होती। यह आक्टोपस अपने शरीर के थैले में काली स्याही की तरह का एक पदार्थ छिपाये रहता है जब कभी उसे शत्रु से बच कर निकलना होता है वह थैले में बंद इस स्याही को उड़ा कर धुयें की दीवार खड़ी कर देता है और चैन से निकल भागता है। जेट-प्रापल्शन की क्रिया में भी आक्टोपस दक्ष होता है इस स्थिति में वह दूसरी थैली में भरे पानी का उपयोग करता है। आज कल जहाजों को मार गिराने वाली “एण्टी एयरगन क्राफ्ट” का भी युद्ध कला में विशेष स्थान है। इस तोप की विशेषता यह होती है वह किसी भी कोण में यहाँ तक कि 60 डिग्री में भी खड़ी होकर ट्रेसर गोलियों (जलती हुई गोलियों) की ऐसी बौछार करती है कि जहाज को किसी न किसी गोली का शिकार अवश्य हो जाना पड़ता है। आरचर मछली न होती तो शायद मनुष्य को इस आविष्कार की सूझती भी नहीं। यह हवा में उड़ते कीड़ों को पानी की ऐसी धार मारती है कि कीड़े उसी धार के शिकार होकर मछली के मुँह में चले जाते है।
मनुष्य की अपेक्षा हजारों वर्ष पूर्व से ही कबूतरों को पृथ्वी की चुम्बकीय धाराओं का ज्ञान रहा है। जिसके सहारे किसी भी पाठशाला से अ, ब, स, भी न पढ़ने वाला यह साधारण पक्षी दुर्गम स्थानों से होता हुआ भी अपने परिचितों के पास जा पहुँचता है। छिपना (कैमोफ्लेज) आज युद्ध में विध्वंसक आयुधों से भी अधिक महत्व रखता है यह कला मनुष्य ने गिरगिर जन्तु (वाकिंग स्टिक) से सीखी है जो हरी घास के बीच शत्रु से बचने के लिए इस तरह निश्चेष्ट हो जाता है मनों वह स्वयं ही किसी पौधे का नन्हा तना या पत्ती हो। इन दिनों ‘इन्फ्रारेड”किरणों का महत्व बहुत अधिक समझा जा रहा है। इन किरणों से शरीर या पृथ्वी के अन्तराल की वह वस्तुयें तक देख ली जाती है जहाँ तक दृश्य प्रकाश की पहुँच ही नहीं होती, रैटिल स्नेक (एक विशेष जाति के सर्प) से ही इन किरणों का पता लगाया गया है उसकी आँखें बंद कर देते पर भी वह प्रकाश की दिशा का बिना भूल किये पहचान लेता है। ऐसी ऐसी सैकड़ों विलक्षण शक्तियाँ जिन्हें सिद्धियाँ कहते हैं, मनुष्य शरीर में बड़ी चतुराई से सँजोई गई हैं, किन्तु मनुष्य उनका लाभ प्राप्त करना तो दूर उन पर विश्वास ही नहीं कर पाता इसी कारण साधा विज्ञान का विशाल काय कलेवर अब तक विज्ञान की दृष्टि से ओझल पड़ा हुआ है। कितने आश्चर्य की बात है कि अमेरिका के राष्ट्रपति कार्टर की बातचीत और रुय के प्रेसीडेन्ट ब्रेजनेव के भाषणों की प्रतिध्वनि जहाँ भी वायु मंडल है वहाँ तक जाती है। हम जहाँ रहते हैं वहीं सारी पृथ्वी की प्रतिध्वनियाँ आती हैं, चाहें तो वायरलैस से भी उच्च श्रेणी यंत्र की तरह घर बैठे सृष्टि के किसी भी कौने में बैठे व्यक्ति की वार्ता सुनलें पर अभी तक मनुष्य के लिए यह सुलभ नहीं हुआ जबकि कंगारू रैट (एक विशेष चूहा) पृथ्वी में कई तरह की प्रतिध्वनि खोलियाँ बना कर उनमें से बदल-बदल अपनी आधी खोपड़ी जमा कर चारों तरफ की प्रतिध्वनियाँ सुनता और भूमि कम्पनों के माध्यम से सम्भावित संकटों की पूर्व जानकारी लेता और अपने जीवन का बचाव करता रहता है। आविष्कारीय सम्भावनाओं का क्षेत्र जितना जाना जा सका, अभी उससे असंख्य गुना व्यापक क्षेत्र प्रकृति के गर्भ में छुपा हुआ है उन्हें जानने और उन सुविधाओं का लाभ प्राप्त करने में मनुष्य को करोड़ों वर्ष लग जायेंगे तो भी वह इति न पा सकेगा।
फ्रैंकलिन इन्स्टीट्यूट के वारटोल रिसर्च फाउण्डेशन के डायरेक्टर सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डब्लू. जे. स्वान के इन तथ्यों को स्वीकारते हुए लिखा है-कि सृष्टि में अन्तर्निहित इस ज्ञान विज्ञान के अपार भाण्डागार को गणितीय सिद्धाँतों से समझा जाना और प्रकृति की इन क्षमताओं में बौद्धिक संस्कारों का जुड़ा होना इस बात का प्रमाण है कि संसार को किसी अति समर्थ इंजीनियरिंग सत्ता ने बनाया है, वैज्ञानिक तो उनमें से कुछ को समुद्र की रेत में पड़े स्वर्ण कणों की भांति अनायास ही पा भर लेते है। उनमें उनकी इतनी ही प्रशंसा है कि उनने शोधकार्य में अपना मनोयोग लगाया और परिश्रम का प्रतिफल प्राप्त किया। ऐसा नया कुछ न बनाया, न बन सकेगा जो उस अभियंता ने पहले से बनाकर न रखा हो। तरह-तरह के जीव जन्तु, पेड़, पौधे, फूल, पत्तियाँ, पदार्थ अन्य और अपदार्थोय शक्तियाँ बनाने के प्रयोग वह चुपचाप अपनी प्रयोग शाला में बैठा किया करता है। और हम उसे जानकर भी जानने का प्रयास नहीं करते। उसकी बनाई हुई वस्तुओं का उपभोग करके आनन्द प्राप्त करने, सुविधायें जुटाने, ऐश्वर्य वृद्धि करने में लगे रहने के अतिरिक्त उस इंजीनियर को कुछ वेतन भी दिया जाना है, उसे भूख प्यास भी लगती होगी, उसे दर्द भी होता होगा, उसकी कुछ जिम्मेदारियाँ भी होंगी, उनमें हाथ बटाना तो दूर उनकी ओर ध्यान तक नहीं देते, आज के अपराधों की बाढ़, अनाचार, आँधी और मानव जाति के संकट उसी का प्रतिफल है।
ऐसा कोई आविष्कार नहीं जो प्रकृति में न हो, मनुष्य ने जिसे आज प्रकट किया वह कल से ही विद्यमान था। अर्थात् महान आविष्कार का जनक मनुष्य नहीं कोई सुपर इंजीनियर है जिसने जीवन सत्ता को प्रकट किया, उसके पालन पोषण, विकास, सुख-सुविधा, सौंदर्य आदि के इतने वैज्ञानिक और सटीक साधन प्रस्तुत किये है; जितने आज का कोई बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी प्रस्तुत नहीं कर सका। प्रकृति ने लोहे जैसा कठोर और पानी जैसा कोमल दोनों तरह के तत्व दिये है। लोहा कठोर से कठोर वस्तु को काट सकता है और पानी कठोर से कठोर वस्तु को भी घुला सकता है। जीवन के लिये यह दोनों ही तरह के कार्य आवश्यक है। मनुष्य आटा-दाल, चावल सैकड़ों वस्तुओं से, सैकड़ों प्रकार के व्यंजन बना सकता है किन्तु प्रकृति अपनी “फोटी सिन्थेसिस” (पत्तियाँ सूर्य की ऊर्जा में क्लोरोफिल मिलाकर शर्करा पैदा करती है, उसी से तरह-तरह के फल पैदा होते है। इस क्रिया को फोटी सिन्थेसिस कहते है।) की रसोई में एक ही पदार्थ पेड़ों के क्लोरोफिल को सूर्य ऊर्जा में पका कर सभी तरह के व्यंजन बना देता है। ऐसी रसोई मनुष्य के लिए संभवतः करोड़ों वर्षों में भी उपलब्ध न हो।
परस्पर वार्तालाप और विकिरण से सुरक्षा के लिए मंडल का कवच प्रकृति के वात्सल्य का अनोखा उदाहरण है, फलों में सौंदर्य और सुगन्ध उसकी विलक्षण कलाकारिता का परिचय देता है। सांसारिक इंजीनियर तो अपने स्वार्थों के लिये आत्म प्रतारणा के शिकार और कर्तव्य च्युत होते हुये भी पग-पग पर मिल जाते है। पर उस चीफ इंजीनियर में सर्वज्ञता ही नहीं, सर्व समर्थता ही नहीं, माँ का सा वात्सल्य और पिता का सा संरक्षण है। प्रकृति की संरचना और नियम इस बात के स्पष्ट प्रमाण है। यह देखते हुये भी लोग उसे जानने और पाने का प्रयास नहीं करते। जिसने भी उसे श्रद्धा वंदना किया जो भी उसका हो गया उसे वह अपनी ही अनंत विभूतियों का स्वामी बना देता है।
प्रकृति की अनेक रहस्य मय क्रियाओं के अनुरूप यदि कोई इंजीनियर योजनायें बना सकता तो उसे निश्चित रूप से सर्वोच्च प्रतिभा का व्यक्ति मानते। यह प्रतिभा अनादि काल से अभिव्यक्त है। वही सर्वोपरि चमत्कार है। उसे अनुभव करने वाला, जानने वाला ही सच्चे अर्थों में अपना जीवन सार्थक कर पाता है।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में किसी ने एकाकी, अपने ही बलबूते पर सफलता अर्जित कर ली हो ऐसा बहुत कम ही देखने में आता है। आहार मनुष्य जीवन की नितान्त सामान्य बात है, पर उसे जुटाने में ही कितने लोगों का सहयोग और साझेदारी अभीष्ट है इसे सभी जानते है।
कोई भी व्यक्ति अकेले गृहस्थ नहीं बसा सकता, पति-पत्नी मिलकर ही उस अभाव की पूर्ति करते है। एक पहिये की गाड़ी नहीं चल सकती, अकेले धन या ऋण आवेश से विद्युत धारा प्रवाहित नहीं हो सकती। जीवन के लिए जल ही आवश्यकता सभी समझते है। किन्तु काम आग के बिना भी नहीं चल सकता, एक डॉड से नाव एक किनारे खड़ी की जा सकती है, पर नदी पार नहीं कर सकती। जीवन हर व्यापार साझेदारी की नीति पर बना हुआ है, जिसमें पग-पग पर औरों के सहयोग की हर किसी को आवश्यकता पड़ती है।
बड़े कार्य और महान उपलब्धियों में तो सहयोग की अपेक्षायें और भी सघन होती है। धर्मचक्र प्रवर्तन का महान कार्य पूर्ण गौतम बुद्ध ने किया; किन्तु वह कार्य अधूरा पड़ा रहता यदि हर्षवर्धन ने आगे बढ़कर साझेदारी न निभाई होती। मान्धाता और शंकराचार्य, महाराणा प्रताप और भामाशाह, समर्थ रामदास और शिवाजी, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द की साझेदारी के पावन स्मारक और कृतियाँ अभी हजारों वर्षों तक भुलाये न भूलेंगी। अवतारों तक को भी यह नीति अपनानी पड़ी, राम के साथ लक्ष्मण, श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन, का योगदान सभी जानते हैं। अन्धे और पंगे के पूरक सिद्धान्त की तरह साझेदारी का नियम उन सभी अपूर्णताओं को दूर करता है जिसका सामना प्रायः संसार में हर किसी को करना पड़ता है।
जीवन की छोटी-छोटी बातों में ही जब सहयोग और साझेदारी का इतना महत्व है तो मनुष्य जीवन जैसे अलभ्य अवसर को सार्थक बनाने, उसे दीन-हीन तथा दरिद्र स्थिति में पड़ा न रहने देने के लिए, चौरासी लाख योनियों के पश्चात् मिले सुरदुर्लभ जीवन को सफल बनाने में उसका कितना महत्व हो सकता है यह सहज ही समझा जा सकता है।
यह साझेदारी किसकी हो? मनुष्य को मिली विभूतियाँ, और ईश्वर प्रदत्त क्षमताएँ इतनी गरिमामय है जिन्हें देखकर उसे सृष्टि का राजकुमार ही कह सकते है। शिक्षा, दीक्षा, वाणी और विचारों के आदान-प्रदान, संस्कृति और सामाजिकता के सुन्दर उपहार किसी अन्य प्राणी को वैसे ही नहीं मिले जैसे कि मनुष्य को। इतने उच्चकोटि की प्रतिभा और क्षमताओं से सम्पन्न मनुष्य की साझेदारी किसी पशु-पक्षी, जीव-जन्तु से नहीं, अपने से श्रेष्ठ से ही हो सकती है। जीवन की गहराई और उस तात्विक दृष्टि के कारण भी यह यह साझेदारी परमात्मा की ही हो सकती है। आज का मनुष्य दीन हीन स्थिति में यदि है तो उसका एकमात्र कारण ईश्वरिय साझेदारी से वंचित रहना है। यदि परमात्मा हमारे जीवन व्यापार में घुल जाय तो लोहे का सा काला कुरूप जीवन पारस स्पर्श से बने स्वर्ण की तरह और साकार कल्प वृक्ष हो सकता है। मनुष्य जीवन की अपूर्णताएँ केवल मात्र परमात्मा के संस्पर्श और साझेदारी से ही पूर्ण हो सकती है।
साझेदारी का अर्थ है मिल-जुलकर काम करना और साधनों को एकत्रित करके पारस्परिक सहमति से गति विधियों का निर्धारण करना। रीति-नीति को अपनाना। जीवन एक व्यवसाय है। एक समूचा उद्योग है। इसमें ईश्वर के साथ साझेदारी को जीवन्त कर लिया जाय तो फिर घाटे की असफलता कीविपन्नता आने की कोई सम्भावना नहीं है। आज का हमारा ईश्वर विमुख जीवन ही दुःख से घिरा और दारिद्रय से भरा रहता है। यदि उसमें ईश्वर की साझेदारी जुड़ सके तो फिर अज्ञान, अशक्ति और अभाव के तीनों ही संकटों से सदा सर्वदा के लिए निवृत्ति मिल सकती है।
यह बात सृष्टि का हर प्राणी जानता है कि जिसने जीवन लिया वह मरेगा अवश्य, किन्तु कितने लोग है जो जानते हुए भी उसके लिए तैयारी कर पाते है। महासागर की ओर प्रस्थान सभी कर रहे हैं, पर उस पार क्या है यह कोई नहीं जानता। फलतः काले पानी की सजा पाये हुए अपराधी के समान जीवन यात्रा घिसट-घिसट कर चलती है। लोग भय, अवसाद और अभाव की स्थिति में पड़े रहते है; किन्तु जिस दिन हमारे जीवन व्यापार में परमात्मा की साझेदारी जुड़ जाती है उस दिन से मनुष्य शरीर की सीमा से उठकर आत्मा के समीप चल पड़ता है। शरीर की नश्वरता के साथ ही आत्मा के अस्तित्व का बोध होता है। यह अनुभूति क्षणिक भी हो तो भी इतनी समर्थ है कि एक न एक दिन वह आत्मा साक्षात्कार की स्थिति में आवश्यक पहुँचा देती है। यही अमृतत्व की स्थिति है।
अमर आत्मा का विश्वास सचमुच भूलोक का अमृत है। इसे पान करने के उपरान्त मनुष्य की दिव्य दृष्टि खुलती है। वह कल्पना करता है कि मैं अतीत काल से सृष्टि के आरम्भ से एक अविचल जीवन जीता चला आया हूँ। अब तक लाखों करोड़ों शरीर बदल चुका हूँ। पशु-पक्षी, कीड़े, मकोड़े, जलचर, नभचरों के लाखों मृत शरीरों की कल्पना करता है और अंतर्दृष्टि से देखता है कि यह इतने शरीर समूह मेरे द्वारा पिछले जन्मों में काम में लाये एवं त्यागे जा चुके है। उसकी कल्पना भविष्य की ओर भी दौड़ती है, अनेक नवीन सुन्दर ताजे शक्ति सम्पन्न शरीर सुसज्जित रूप से सुरक्षित रखे हुए उसे दिखाई पड़ते है। जो निकट भविष्य में उसे पहनने है। यह कल्पना-यह धारणा-ब्रह्म विद्या के विद्यार्थी के मानस लोक में सदैव उठती, फैलती और पुष्ट होती रहती है। यह विचार धारा धीरे धीरे निष्ठा और श्रद्धा का रूप धारण करती जाती है जब पूर्ण रूप से, समस्त श्रद्धा के साथ साधक यह विश्वास करता है कि यह वर्तमान जीव-मेरे महान अनन्त जीवन का एक छोटा-सा परमाणु मात्र है तो उसके समस्त मृत्यु जन्य शोकों की समाप्ति हो जाती है। उसे बिलकुल ठीक वही आनन्द उपलब्ध होता है जो किसी अमृत का घट पीने वाले को होना चाहिए।
“मैं पवित्र अविनाशी और निर्लिप्त आत्मा हूँ” इस महान सत्य को स्वीकार करते ही मनुष्य अमरत्व के समीप पहुँच जाता है। उसका दृष्टि कोण अमर, सिद्ध महात्मा और देवताओं जैसा हो जाता है। इस परिस्थिति के भव-बन्धन में बँधा हुआ इधर-उधर नाचता नहीं फिरता, वरन् अपने लिए वैसे ही संसार का जान-बूझकर निर्माण करता है, जैसा आत्म-विश्वास और आत्मपरायणता का मार्ग है। यदि आप अपना सम्मान करते हैं अपने को आदरणीय मानते हैं, अपनी श्रेष्ठता और पवित्रता पर विश्वास करते हैं तो सचमुच वैसी ही बन जाते हैं। जीवन की अन्तः चेतना उसी ढाँचे में ढल जाती है और रक्त के साथ दौड़ने वाली विद्युत शक्ति में ऐसा प्रवाह उत्पन्न हो जाता है, जिसके द्वारा हमारे सारे काम काज ऐसे होने लगते हैं, जिनमें उपरोक्त भावना का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देने लगता है आत्म तिरस्कार करने वालों के कामों को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह नीच वृत्ति का अकर्मण्य, आलसी, दास, दीन और अपाहिज है। अपने आपे का तिरस्कार करने वाले आत्म हत्यारे अपना लोक भी बिगाड़ते है और परलोक भी! उनकी उन्नति के स्रोत रुक जाते है और दीनता की सड़ी हुई कीचड़ में कीड़ों की तरह बुज-बुजाते रहते है उनका उद्धार दूसरे किसी से भी न हो सकेगा क्योंकि कृपा करके उन्हें कीचड़ से बाहर कोई निकाल भी दे तो वे फिर अपने पूर्व संस्कारों से नाली मे फिसल पड़ेंगे।
आत्मा की अमरता पर विश्वास करना ही अमृत है। “मैं अविनाशी हूँ पग पग पर दिखाई देने वाले भय को मार भगाकर निर्भयता प्रदान करने वाला यह मृत्युंजय बीज मन्त्र है अपने अन्दर पवित्रता अनुभव करने में आत्म-सम्मान है और अपने को अविनाशी समझने से आत्म-विश्वास का प्रादुर्भाव होता है। निराशा और भय के झूले में झूलने वाले लोगों को में “अविनाशी हूँ” यह मन्त्र जीवन सन्देश देता है वह कहता है-उठो। कर्तव्य पर प्रवृत्त होओ तुम्हारा जीवन अखण्ड है, कपड़े बदल जायेंगे, पर तुम नहीं बदलोगे शरीर बदल जायेंगे, पर जीवन नहीं बदलेगा। अपने ऊपर विश्वास करो। आत्मा और परमात्मा पर विश्वास करो तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता। इस विश्वास के सहारे उसका जीवन तेजस्विता से परिपूर्ण श्रद्धामय आनन्दमय हो जाता है।
परमात्मा को साझेदार बनाने का अर्थ है वह प्रतिक्षण हमारे जीवन के हर क्रिया कलाप में घुला हुआ आच्छादित रहे हम कभी उससे रिक्त न रहें। यह वह अमृत है जो समस्त चिन्ता और तृष्णाओं को समाप्त कर देता है। मृत्यु और जीवन को वह एक ही जुए में जोत देता है, दोनों का यह जोड़ा कितना भला मालूम देता है। जो मृत्यु और जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखता है वह धन्य है। शोक, मोह, चिन्ता, क्लेश, पश्चाताप, तृष्णा, पाप आदि की छाया भी ऐसे मनुष्यों तक नहीं पहुँच पाती।
जीवन में अभय की प्राप्ति, आत्मा के दर्शन, मुक्ति निर्वाण को सर्वोपरि पुरुषार्थ कहा जाता है। उसे पाकर मनुष्य समर्थ हो जाता है, पर यह, सम्भव तभी है जब परमात्मा हमारे साथ घुला रहे। जिसके अन्तः करण में यह परमार्थ जाग गया उसका जीवन धन्य हुआ ही माना जाता है।
संसार के एक व्यक्ति की इच्छायें प्रायः (1) आरोग्य और दीर्घ जीवन (2) आर्थिक सम्पन्नता (3) तथा सफलता और सम्मान की प्राप्ति के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। हर व्यक्ति किसी ऐसे पारस पत्थर की तलाश में रहता है जो लोहे जैसी उसकी मनोकामनाओं का स्पर्श करके ही उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर दे। ऐसा कोई पत्थर संसार में किसी को मिल गया हो-ऐसा अभी तक सुनने में नहीं आया; किन्तु परमात्मा की साझेदारी एक ऐसा पारस प्रदान करती है जो जीवन को सोने जैसा सुन्दर बना देती है उस समय यह सांसारिक इच्छाऐं भी तुच्छ प्रतीत होने लगती है।
यह पारस क्या है? यह है प्रेम। एक काला-कलूटा आदमी जिसे आए पूर्णतया कुरूप, गँवार या असभ्य कह सकते है, अपनी स्त्री के लिए कामदेव-सा रूपवान और इन्द्र के समान सामर्थ्यवान लगता है। जैसे शची अपने इन्द्र को पाकर प्रसन्न है, उसकी सेवा करती है और अपने को सौभाग्यशालिनी मानती है, वैसे ही एक भीलनी अपने अर्धनग्न और धनहीन भील को पाकर प्रसन्न है। विचार कीजिए की इसका कारण क्या है? जो आदमी सबके कुरूप और गन्दा लगता है वह एक स्त्री को इतना प्रिय क्यों लगता है? इसका कारण है-प्रेम। प्रेम एक प्रकार का प्रकाश है, अँधियारी रात में आप अपनी बैटरी की बत्ती से किसी वस्तु पर रोशनी फेंके तो वह वस्तु स्पष्ट रूप से चमकने लगेगी; जब कि पास में पड़ी दूसरी अच्छी-अच्छी चीजें अँधियारी के कारण काली-कलूटी और श्री हीन-सी मालूम पड़ेगी, तब वह वस्तु जो चाहे सस्ती या भद्दी क्यों न हो बैटरी का प्रकाश पड़ने के कारण स्पष्टतया चमक रही होगी अपने रंग रूप का भला प्रदर्शन कर रही होगी, आँखों में जँच रही होगी। प्रेम में ऐसा ही प्रकाश है। जिस किसी से भी प्रेम किया जाता है वही सुन्दर, गुणकारी, लाभदायक, भला, बहुमूल्य, मनभावन मालूम पड़ने लगता है। माता का दिल जानता है कि उसका बालक कितना सुन्दर है। अमीर अपने हीरे-जवाहरात और महल की जैसी कीमत अनुभव करते है गरीबों को अपनी टूटी-फूटी झोंपड़ी फटे-पुराने कपड़े और मैले-कुचैले सामान से भी वैसी ही ममता होती है।
प्रेम एक सजीव बिजली है; वह जिसके ऊपर पड़ती है उसे गतिशील बना देती है। निराश, उदास, रूखे, गिरे हुए और झुँझलाये- झल्लाये हुए लोगों को एक दम परिवर्तित कर देती है। वे आशा, उत्साह, उमंग, प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भर जाते है देखा गया है कि उपेक्षा और तिरस्कार ने जिन लोगों को दुर्जन बना दिया था वे ही प्रेम की डली चखकर बड़े उदार, सद्गुणी और सज्जन बन गये। दीपक स्नेह की चिकनाई को पीकर जलता है, मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। जिसे स्नेह से खींचा गया है, उसका दिल हरा और फला फुला रहेगा। जो स्नेह से वंचित है वह सूखा, झुंझलाया दुखी, निराश और अनुदार बन जायगा। इसलिए दूसरों को यदि अपना इच्छानुवर्ती, मधुर-भाषी, प्रिय-व्यवहारी बनाना है तो इस निर्माण कार्य के लिए प्रेम चाहिए। अन्धकार को प्रकाश में, निर्जीवता को जीवन में, मरकट को उद्यान में बदल देने की शक्ति का नाम प्रेम है। इतनी चमत्कार पूर्ण, सजीव परिवर्तन कर सकने वाली शक्ति को यदि पारस कहा जाता है तो कुछ अत्युक्ति की बात नहीं है।
ऐसा पारस वास्तव में बनाया गया होता तो सृष्टि क्रम असंतुलित और बाधित होने में कोई आशंका न थी, पर इस पारस में जो परमात्मा के रूप में मिलता, जीवन के हर क्षण, हर स्वाँस को स्वर्णमय बना देता है। प्रेम का अन्त वहीं होता है जहाँ स्वार्थ और मोह भरा हो। जिसे ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास होगा, जो संसार के वास्तविक स्वरूप को पहचानता होगा वह आत्मा से प्यार करेगा, शरीर से नहीं। ऐसे व्यक्ति के लिए न तो कोई अपना न पराया वरन् सभी में एक ही प्रेमास्पद सत्ता उसे ओत-प्रोत दिखाई देगी। यह दिव्य दृष्टि, यह निर्मलता जीवन को आनन्द से परिपूर्ण बना देती है। जिसने उसका रसास्वादन किया, मीरा, कबीर, सूर, तुलसी, नानक बन गया है।
परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त होने वाली तीसरी निधि कल्पवृक्ष की है। कल्पवृक्ष तपस्वी जीवन के रूप में फलित होता है। तप का अर्थ है (1) सच्ची लगन और निरन्तर प्रयत्न-यही दो महान साधनायें है; जिनसे परमात्मा प्रसन्न होता है और इच्छित वरदान प्रदान करता है।
जो भी अपना कार्यक्रम बनाया हो, जो भी जीवनोद्देश्य बनाया हो उसे पूरा करने में जी-जान से जुट जाना चाहिए। सोते-जागते उसी के सम्बन्ध में सोच-विचार करते रहें और आगे का रास्ता तलाश करते रहें। परिश्रम! परिश्रम!! घोर परिश्रम!!! आपकी आदत में शामिल होना चाहिए। मत सोचिये कि अधिक काम करने से आप थक जायेंगे, वास्तव में परिश्रम एक स्वयं-चालक-शक्ति है, जो अपनी बढ़ती हुई गति के अनुसार कार्यक्षमता उत्पन्न कर लेती है। उदासीन, आलसी और निकम्मा व्यक्ति दो घण्टा काम करके, एक पर्वत पार कर लेने की थकान अनुभव करता है, किन्तु उत्साही, उद्यमी और अपने काम में दिलचस्पी लेने वाले व्यक्ति सोने के समय को छोड़ कर अन्य सारे समय लगे रहते हैं और जरा-भी नहीं थकते। सच्ची लगन, दिलचस्पी, रुचि और झुकाव एक प्रकार का डायनुमा है, जो काम करने के लिए क्षमता की विद्युत शक्ति हर घड़ी उत्पन्न करता रहता है।
उत्साह, स्फूर्ति, लगन, धुन, परिश्रम-प्रियता, साहस धैर्य, दृढ़ता और कठिनाई को देखकर विचलित न होता यह तप के लक्षण है। जिसने तप द्वारा इन गुणों को पैदा किया, अपने मनोवाँछित तत्व को पाने के लिए खून-पसीना बहाना सीखा, वह एक प्रकार का सिद्ध है। कल्पवृक्ष की सिद्धि उसके आगे हाथ बाँधे खड़ी रहती है। ऐसे आदमी जो चाहते है; कर गुजरते हैं। जो चाहते है प्राप्त कर लेते है। नेतृत्व, लोक-सेवा, धन उपार्जन, प्रतिष्ठा ज्ञान, भोग आदि सम्पदाएँ पाने को जिनके मन में लालसाएँ उठती हों उन्हें सबसे पहले अपने को तपस्वी बनाना चाहिए। आलस्य, प्रमाद, समय आ अपव्यय, बकवाद, ठलुआपन्थी, निराशा, निरुत्साह, अस्थिरता आदि दुर्गुणों को हटाकर तपश्चर्या के सद्गुणों को अपने अन्दर धारण करना चाहिए। तप ही कल्पवृक्ष है। जिस किसी ने इस दुनिया में कुछ पाया है, परिश्रम से पाया है। आप भी कुछ पाना चाहते है तो अदम्य उत्साह के साथ घोर परिश्रम करना अपना स्वभाव बनाइये। इस साधना के फलस्वरूप आपको कल्पवृक्ष जैसी प्रतिभा मिलेगी और उसके द्वारा आपकी सब प्रकार की इच्छा, आकाँक्षाएँ आसानी से पूरी हो जाया करेगी।
परमात्मा को अपने जीवन व्यवसाय में साझेदार बनाकर उपरोक्त तीनों अनुदान- वरदान प्राप्त किये जा सकते है। साझे में चलने वाली कई कम्पनियाँ दूसरों से पूँजी प्राप्त कर अपना काम चलाती है। इसी प्रकार कई मालिकों को अपने पिता से ही उतराधिकार मे सम्पत्ति मिल जाती है और वह उसको चतुराई से उपयोग करता हुआ अपनी सम्पन्नता श्री समृद्धि, को बढ़ाता रहता है। परमात्मा भी आपके जीवन में यह पूँजी लगाने के लिए तैयार है। आपको भी उत्तराधिकारी में यह सम्पदा प्राप्त हो रही है। आप इसका उपयुक्त नियोजन और सदुपयोग करने में जरा चतुराई बरतिये तो सही।
ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना को ब्रह्म के नाम से सम्बोधित कर भारतीय ऋषियों ने कहा है कि वह निराकार और निर्गुण होते हुए भी सब ओर से हाथ पैर वाला तथा सब ओर से नेत्र, सिर और मुख वाला है। वस्तुतः ब्रह्म का या चेतना का, कोई स्थूल स्वरूप आँखों से नहीं देखा जा सकता फिर भी ऐसी कोई घटना नहीं होती जिससे चेतना को अनभिज्ञ रखा जा सके अथवा किसी घटना क्रम में उसके अस्तित्व को, कारण को अस्वीकारा जा सके।
जो विभु में है वही अणु में भी है, जो ब्रह्माण्ड में है वह कण में भी है तथा जो ब्रह्म में है; वही चेतन में भी है-भारतीय दर्शन के अध्येताओं से यह सिद्धान्त अनावगत नहीं है। सामान्य जगत में भी यह देखा जा सकता है। एक बीज में वृक्ष की तमाम विशेषतायें और सम्भावनायें सन्निहित होती है। समुचित खाद-पानी और पोषण प्राप्त कर बीज ही वृक्ष बनता है। मामा-पिता के रजवीर्य में अपने ही समान एक नया प्राणी जन्म देने की क्षमता अंतर्हित होती है। आत्मा, जिसे शरीर तक सीमित रहने वाली चेतना का एक कण समझा जाता है विकसित होकर परमात्मा के समान विभूतियों और विशेषताओं की भण्डार बन जाती है।
विज्ञान पहले इन तथ्यों को नकारता आ रहा था; पर नकारने से तो कोई तथ्य असत्य नहीं हो जाता। जो घटनायें अनादि काल से घटती आ रही है, यदाकदा घटने के कारण वे विचित्र और चमत्कारी भी लगती है, परन्तु उनके पीछे चेतना विज्ञान के सुनिश्चित नियम काम करते है, आज भी घटती है। पहले लम्बे समय तक उन्हें गप्प, भ्रम या मनगढ़न्त कहा जाता रहा; परन्तु विज्ञान उनकी ओर से और अधिक आँखें मूँदे नहीं रह सका।
अब इन घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन भी किये जाने लगे हैं, उनके निष्कर्षों को पुष्ट करने के लिए प्रयोगशालाओं में परीक्षण भी होते हैं, तथा जो तथ्य विदित होते है। उदाहरण के लिए बिना किसी बाहरी संसाधनों के मीलों दूर घटी घटनाओं का आभास ही लिया जाय। अध्यात्म की भाषा में इसे दूरबोध कहते है। आत्मा की यह सामर्थ्य लम्बी योग साधनाओं के अनवरत अभ्यास से प्राप्त होती है किन्तु यदा कदा सामान्य स्थिति में भी इसकी अनुभूति हो जाती है।
घटना सन् 1918 की है। लन्दन में चार वर्ष का बालक टैड अपने हम उम्र अन्य बच्चों के साथ खेल रहा था। अचानक उसे खेलते-खेलते न जाने क्या हुआ कि चिल्लाता हुआ घर के भीतर दौड़ा आया-मेरे पिता का दम घुटा जा रहा है। उन्हें बचाओ। वे एक कोठरी में बन्द हो गये हैं ओर उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। टैड इतना कहकर बेहोश हो गया और जब उसे होश आया तो उसके मुँह से जो पहले शब्द निकले वह थे-अब वे ठीक हो जायेंगे।
उस समय टैड के पिता दूसरे महायुद्ध में फ्राँस के मोर्चे पर लड़ रहे थे। युद्ध समाप्त होने पर जब वे घर वापस आये तो उन्होंने बताया कि 7 नवम्बर को वे एक गैस चैम्बर में फँस गये थे और वहाँ से किसी अदृश्य शक्ति के सहयोग से ही वे निकल पाये। घर के लोगों को तब याद आया कि जिस दिन टैड खेलते-खेलते बेहोश हो गया था उस दिन भी 7 नवम्बर थी।
इस प्रकार की एक नहीं असंख्य घटनायें है। कई व्यक्तियों को रहस्यमय अनुभव होते है और कभी पता चलता है कि उन्होंने जो अनुभव किया है वह अमुक स्थान पर ठीक से उसी प्रकार घटा है। वैज्ञानिकों ने जब इन रहस्यों को उद्घाटित करने का बीड़ा उठाया तो एक से एक चौंका देने वाले तथ्य सामने आये और सिद्ध हुआ कि साढ़े पाँच फुट ऊँची सौ पौण्ड वजनी काया में ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना संयुक्त और ओतप्रोत है।
प्रसिद्ध जीवशास्त्री प्रो. फ्रैंक ब्राउन कई प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि सृष्टि में जो असंख्य प्राणी है वे ऐसे संग्राहक रिसीवर हैं जो ब्रह्माण्ड के स्पन्दन तथा सम्वेदन ग्रहण करते रहते .... संग्राहक का काम करने वाले बहुत सूक्ष्म परमाणु बताये गये है जिनमें घनत्व, मार, विस्फुटन, चुम्बकत्व आदि कोई भौतिक लक्षण नहीं होते है।
अन्य वैज्ञानिकों ने इस दिशा में खोज की ओर पाया कि प्रो. फ्रेंक ब्राउन का मत एकदम सही है। संग्राहक का काम करने वाले इन चेतन परमाणुओं को ‘न्यूगिनी’ नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अणु अरबों की संख्या में प्रकाश की गति से बहते रहते है। यहाँ तक की यह अणु के भीतर से भी पार हो जाते है--इतने सूक्ष्म होते है। यदा कथा इनमें कुछ विशेष क्रियाशीलता आती है। इसी से इन्हें देख पाना सम्भव होता है।
एण्ड्रिया ड्राब्स नाम वैज्ञानिक ने न्यूर्टिन के आधार पर ही साइत्रोन अणु का पता लगाया और कहा कि साइत्रोन ही मस्तिष्क के न्यूरोन कणों से जुड़कर पराचेतना को जागृत करता है। एक्सेल फरसॉफ नामक अंतरिक्ष वैज्ञानिक ने तो तथ्यों और प्रयोगों के आधार पर यह प्रमाणित कर दिखाया कि मनुष्यों को कभी अनायास ही विचित्र अनुभूतियाँ होती है। उनमें से कुछ खास तरह की अनुभूतियाँ माइण्डोन नामक कणों के हलचल में आने से होती है। जब यह कण सक्रिय होते है तो हमारा अवचेतन मन (सब काशंस) ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जुड़ जाता है। यदि उन अनुभूतियों को पहचाना, जगाया अथवा समझा जा सके तो व्यक्ति बैठे ठाले ही किसी भी ग्रह नक्षत्र की बातें जान सकता है।
योग साधना भी एक विज्ञान है और उसके अपने सुनिश्चित सिद्धाँत है। विज्ञान का यह सिद्धाँत जिस प्रकार अपने आप में अकाट्य है कि हाइड्रोजन के दो अणु और ऑक्सीजन का एक अणु मिलकर पानी बनता है उसी प्रकार योगविज्ञान के भी अकाट्य, अनुभूत और परीक्षित सिद्धाँत है, जिन्हें अपना कर अभीष्ट दिशा में असाधारण सामर्थ्य अर्जित कर लेता है।
वैज्ञानिक परीक्षणों से जिस प्रकार यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य के भीतर कई केंद्रों में ऐसा गुप्त सामर्थ्य छिपी पड़ी है जो अनुकूल परिस्थितियों में ही प्रकट होती है। योगाभ्यास द्वारा उन परिस्थितियों का निर्माण ही किया जाता है। रूस--जहाँ के स्कूलों में यह सिखाया जाता है कि धर्म अफीम है और ईश्वर फ्राड है--में ही अब इस दिशा में बहुत कार्य होना लगा है। पिछले दिनों इन घटनाओं की वास्तविकता जाँचने के लिए कई परीक्षण किये गये।
गत 29 अप्रैल 1976 कार्ल निकोलायेव नामक युवा वैज्ञानिक को मास्को से साइबेरिया भेजा गया उद्देश्य था-दूरानुभूति के कुछ सिद्धाँत प्रायोगिक परीक्षण। साइबेरिया के नियत स्थान गोल्डन वैली होटल में कुछ सोवियत वैज्ञानिकों के साथ बैठा हुआ था उसी समय से सैकड़ों मील दूर मास्को स्थित एक ‘इन्सुलेटेड’ कक्ष वैज्ञानिक यूरी कामेस्की अपने कुछ साथियों के साथ बैठा था। यूरी को नहीं बताया गया था कि उसे किस प्रकार का सन्देश भेजना है। ठीक आठ बजे, एक वैज्ञानिक ने कामेस्की के हाथ में एक सील बन्द पैकेट पकड़ा दिया। उस पैकेट में धातु की बनी एक स्प्रिंग थी जिसमें सात क्वाइल लगे थे।
कमेस्की ने उस स्प्रिंग को उठा लिया और क्वाइलों पर अंगुलियां फेरने लगा। उस समय कमेस्की ने कार्ल निकोलायेव का ध्यान किया और पूरी एकाग्रता के साथ यह कल्पना की कि व उसके सामने बैठा है तथा उस स्प्रिंग को देख रहा है-फिर वो कार्ल की आंखों से वो स्प्रिंग और क्वाइल देख रहा है।
उसी समय, मास्को से 1860 मील दूर अपने वैज्ञानिक साथियों के बीच बैठे कार्ल ने कुछ अजीब सा अनुभव किया। जैसे उसे अपने हाथों में कोई वस्तु दिखाई दे रही है। कुछ ही क्षणों बाद वो बोला गोल, चमकती हुई चीज; धातु से बनी हुई है............... क्वाइल है।
इसके बाद कमेस्की ने मास्को से एक पेचकश का चित्र देखा तो कार्ल ने उसका विवरण भी शब्दशः बता दिया। कार्ल निकोलायेव ने टेलीपैथी को सिद्ध करने में बड़ी मेहनत की है। एक प्रेस सम्मेलन में कार्ल ने इन प्रयोगों के संदर्भ में कहा है-टेलीपैथी के क्षेत्र में मैंने जो सफलता प्राप्त की है वो हर कोई प्राप्त कर सकता है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में अन्तः शक्ति विद्यमान होती है। इसलिए मैं अपनी योग्यता को विज्ञान की कसौटी पर कसा जाना मानता हूँ। यदि मैं ऐसी योग्यता प्राप्त कर सकता हूँ तो कोई कारण नहीं कि आप ऐसी योग्यता प्राप्त न कर सकें।
‘यह विद्या आपने कहा से सीखी?’-इस प्रश्न के उत्तर में कार्ल निकोलायेव ने बताया कि-”बचपन में उन्हें योग पर किसी भारतीय महात्मा द्वारा लिखी हुई एक पुस्तक प्राप्त हो गई थी। उसी प्रेरणा प्राप्त कर मैं अपने मित्रों से कहना लगा कि वे मुझे कोई मानसिक आदेश दे। आगे चलकर मैंने योगदर्शन, राजयोग, प्राणायाम आदि साधनाओं का 11 वर्ष तक अभ्यास किया। इस का परिणाम वर्तमान सफलता के रूप में प्रस्तुत है।
इस क्षेत्र का और अधिक गहरा अध्ययन करने के लिए रूस ने भारत सरकार से कुछ योगियों को जिन्होंने योग साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की थी-रूस भेजने के लिए भी आग्रह किया था। न केवल वरन् अन्य पश्चिमी देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग सफलतापूर्वक किये गये है। तथा इस देश में बहुत आगे पहुँच गये व्यक्तियों से कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग लिया गया है।
चेकोस्लोवाकिया के व्रेतिस्लाव काफ्का ने पराशक्ति के सम्बन्ध में अनेकों अद्भुत प्रयोग किये है। उन्होंने एक प्रयोगशाला भी स्थापित कर रखी है। कहते है कि द्वितीय महायुद्ध में जब मित्र राष्ट्रों के अधिकारियों को युद्ध की स्थिति के बारे में कुछ पता नहीं चलता था तो ब्रेतिस्लाव काफ्का का ही सहायता लेते थे। काफ्का अपनी प्रयोगशाला में कार्यरत दूसरे मनोवैज्ञानिक को समाधिस्थ कर देते तथा उससे वही प्रश्न करते। प्रायः यह जानकारी सही निकलती थी।
प्रश्न उठता है कि परमात्मा ने यह सामर्थ्य क्या केवल मनुष्य को ही प्रदान की है? उत्तर एक ही है-उसे अपनी सभी संतानें समान रूप से प्रिय है और उसने सभी प्राणियों में विभिन्न सम्भावनाओं के बीज बो रखे है। क्योंकि शरीर भेद होने पर भी आत्मा तो सब में समान रूप से विद्यमान है। अन्य प्राणियों की अलौकिक क्षमता का अध्ययन करने के लिए पिछले दिनों रूस में ही खरगोश पर एक प्रयोग किया गया।
सर्वविदित है कि पानी के भीतर पनडुब्बी से जमीन पर बैठे व्यक्ति का किसी भी प्रकार कोई संपर्क सम्भव नहीं है। यहाँ तक की रेडियो और बेतार के तार भी काम नहीं कर सकते। पराशक्ति की अनुभूति का प्रयोग करने के लिए रूस के वैज्ञानिकों ने एक पनडुब्बी में खरगोश के बच्चों को बन्द कर दिया और उनकी माँ को बाहर जमीन पर एक प्रयोगशाला में रखा गया। खरगोश के बच्चों को पानी में उतारने से पूर्व उनके मस्तिष्क में ‘इलेक्ट्रोड’ लगा दिये गये थे। जबकि पनडुब्बी समुद्र में बहुत नीचे चली गयी तो उसमें मौजूद व्यक्तियों ने एक-एक करके खरगोश के बच्चों की हत्या कर दी। मादा खरगोश को इस हत्या के विषय में कोई जानकारी नहीं थी, पर ठीक उसी समय जबकि समुद्र तल में उसके बच्चों की हत्या की जा रही थी, मादा खरगोश के मस्तिष्क में वैसी ही प्रतिक्रियायें नोट की गयीं जैसे उसके सामने ही बच्चों को मारा गया हो।
यह चेतना हर प्राणी में विद्यमान देखी गयी है। कारण स्पष्ट है कि आत्मा केवल मनुष्य में ही नहीं है, जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों में भी है। कई बार आत्मा की सामर्थ्य मनुष्य की अपेक्षा दूसरे प्राणियों में ज्यादा देखी जाती है, जिन्हें अबोध, बुद्धिहीन और मनुष्य की तुलना में सृष्टि का तुच्छ घटक समझा जाता है। इस संदर्भ में तत्वदर्शियों का कहना है कि मनुष्य ने अपने जीवन में कृत्रिमता, रागद्वेष, ईर्ष्या, डाह आदि विकारों के कारण उस शक्ति स्त्रोत को कमजोर बना लिया है अथवा उस पर पर्दा डाल दिया है।
महर्षि पातंजलि ने यम नियमों के दृढ़तापूर्वक पालन करने और व्यक्तित्व, चरित्र को निष्कलुष, निर्विकार बना लेने मात्र से उन सभी सिद्धियों के करतल गत होने की बात कही है जिन्हें लोग लम्बी तप साधनाओं से प्राप्त होने की बात करते है। मैले दर्पण को साफ कर लेने पर जिस प्रकार उसमें स्पष्ट छवि देखी जा सकती है उसी प्रकार अपनी अन्तरंग चेतना पर चढ़े मलीनता आवरणों को हटाकर उसमें संसार की दृष्ट-अदृष्ट सभी वस्तुओं, घटनाओं को देखा जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने एक परीक्षण के लिए किसी व्यक्ति को आपरेशन टेबल पर लिटाया और उसे कुछ मिनटों के लिए सम्मोहित कर सुला दिया जब वह सम्मोहन अवस्था में सो रहा था। तो उसके गले पर एक छुरी चुभाई गयी। उससे खून की एक बूँद छलक पड़ी। इसके बाद ही वैज्ञानिकों ने उसकी सम्मोहन निद्रा तोड़ दी और जगा दिया। यह सारा प्रयोग कुछ ही मिनटों में हो गया था और जितने समय तक वह व्यक्ति सोया वह तो कुछ ही सेकेंड थे। उन कुछ ही सेकेंड में उस व्यक्ति ने एक लम्बा सपना देख लिया था।
डा. रोशे ने उस स्वप्न का उल्लेख करते हुए लिखा है कि इन कुछ ही सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक आदमी की हत्या कर दी थी। वह महीनों तक लुकता छुपता रहा था। अंततः पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया उस पर हत्या का मुकदमा चला-मुकदमे का फैसला होने में दो ढाई साल लगे- जज ने उसे मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई और उसे जब फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया गया तभी उसी क्षण नींद खुल गयी।
वैज्ञानिकों का कहना था कि इस प्रयोग में वह व्यक्ति पाँच सात सेकेंड ही सोया था और इस अवधि में उसके लिए वर्षों का घटना क्रम गुजर गया। यह प्रयोग आइन्स्टीन के समय सिद्धाँत की सत्यता जाँचने के लिए किया जा रहा था। जिसके अनुसार समय का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। वह दो घटनाओं के बीच की दूरी मात्र है- जो कुछ भी हो सकती है, परन्तु मनुष्य को अपने ज्ञान व अनुभूति के आधार पर ही लम्बी अथवा छोटी लगती है।
तो क्या सचमुच समय कुछ भी नहीं है? सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक 24 घण्टे होते है। इन चौबीस घण्टों में हम कितने ही काम करते है। घड़ी अपनी चाल से चलती है, सूर्य अपनी गति से क्षितिज के इस पार से उस पर तक पहुँचता है। सब कुछ तो स्पष्टतः प्रतीत होती है परन्तु आइन्स्टीन के अनुसार यह सब एक भ्रम मात्र है। फिर तो सारा संसार ही भ्रम मात्र हो जायगा।
वस्तुतः सारा संसार ही एक भ्रम है। वेदान्त दर्शन के अनुसार सारा जगत ही मायामय है। माया अर्थात् जो नहीं होने पर भी होता दिखाई दे। जिसका अस्तित्व नहीं है परन्तु भासित होता है। शंकराचार्य ने इस माया की परिभाषा करते हुए कहा है-”माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयतो” अर्थात्--वही माया है जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है।
आइन्स्टीन से पहले इन्द्रिय बुद्धि, द्वारा होने वाले अनुभवों और प्रत्यक्ष जगत् को ही सत्य समझा जाता था। इससे पूर्व के वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि आप दौड़ रहे हो अथवा बैठे हो, जाग रहे हो या सोये हुए हो, समय अपनी सीधी बँधी रफ्तार से बराबर आगे बढ़ता है। परन्तु आइन्स्टीन के सापेक्षता सिद्धाँत ने इस मान्यता को छिन्न भिन्न कर दिया है और यह सिद्ध हो गया है कि समय कुछ घटनाओं का जोड़ भर है। यदि घटनायें न हों तो समय का कोई अस्तित्व नहीं होता और घटनायें भी दृष्टा की अनुपस्थिति में अस्तित्व हीन होती है।
इस बात को कतिपय उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। समय को मापने का सबसे बड़ा माप दण्ड घड़ी है। घड़ी मैं सेकेंड का काँटा 12 से चल कर 12 तक पहुँचने पर, एक मिनट होता है, मिनट का काँटा इतनी दूरी तय कर लेता है तो मान लिया जाता है कि एक घण्टा हो गया और घंटे का काँटा इतनी दूरी तय कर लेने पर आधा दिन तथा तथा आधी रात बता देता है। अर्थात् 12 से 12 तक दूसरी बार पहुँचने पर 24 घण्टे या एक दिन पूरा हुआ मान लिया जाता है। आइन्स्टीन का कहना था कि घड़ी के काँटे की गति बढ़ा दी जाये तो यही 24 घण्टे 36 घण्टे में भी बदल सकते हैं और कम कर दी जाये ता तो 20 या उससे भी कम, चाहे जितने हो सकते है। अर्थात् यह बात बेमानी है कि दिन 24 घण्टे का होता है अथवा उससे कम ज्यादा है।
इस अनुसार घड़ी का यह विभाजन पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेने वाली घटना को आँकने के लिये किया गया। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि पृथ्वी एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है तो 24 घण्टे हो जाते है। लेकिन चन्द्रमा सूर्य की परिक्रमा करने में इससे भी अधिक समय लगाता है, मंगल उससे भी अधिक और शुक्र उससे भी अधिक। तो पृथ्वी के 24 घण्टों में चन्द्रमा, मंगल या शुक्र का एक दिन नहीं होता है। वहाँ इससे अधिक समय में दिन रात होता है। अर्थात् वहाँ के लिए दूसरे समय-मापदण्ड निर्धारित करने पड़ेंगे।
आइन्स्टीन के अनुसार समय इसी प्रकार घटनाओं पर निर्भर करता है। सोये हुए व्यक्ति के लिए बाहरी जगत् में भले ही पाँच मिनट का समय व्यतीत हुआ हो परन्तु वह जो स्वप्न देख रहा होता है; उसमें उन पाँच मिनटों के भीतर वर्षों की घटनायें घटित हो जाती है। तो उसके लिए पाँच मिनट बीत गये यह कहना सही होगा अथवा यह कहना सही होगा कि वर्षों बीत गये।
यह व्यक्ति के अपने बोध (परएकशन) पर निर्भर करता है कि समय कितनी तेजी से अथवा धीमी गति से बीत रहा है। घटनाओं के अतिरिक्त समय का अस्तित्व दृष्टा के बोध पर भी आधारित है। कई बार लगता है कि समय बिताये नहीं बीतता। दूर स्थान से अपने किसी अति आत्मीय स्वजन का दुखद समाचार आया हो और वहाँ पहुँचता हो तो गाड़ी आने में दस मिनट की देरी भी घण्टों सी लगती है। क्योंकि व्यक्ति उस समय तनाव ग्रस्त उद्विग्न मनःस्थिति में रहता है लेकिन किसी सुखद समारोह में भाग लेते समय, विवाह शादी के अक्सर पर यह पता भी नहीं चलता कि समय कब बीत गया। उस समय व्यक्ति की बोध शक्ति, चेतना पूरी तरह तन्मय हो जाती और समय भागता सा प्रतीत होता है।
इसके अनुसार एक मच्छर का कुछ घण्टों का जीवन भी उसके अपने लिए मनुष्य की पूरी आयु 70-80 वर्षों के बराबर होता है। इतनी अवधि में ही वह बच्चा, जवान, बूढ़ा सब कुछ हो जाता है और हमारे अनुसार थोड़े से घण्टों तथा उसके अपने अनुसार सत्तर-अस्सी वर्ष की आयु पूरी कर मर भी जाता है। इसका कारण प्रत्येक जीव जन्तु की अलग अलग बोध शक्ति है और उसी के अनुसार समय सिमटता या फैलता है।
घटनाओं और बोधशक्ति के अतिरिक्त सापेक्षतावाद के अनुसार समय की चाल गति पर भी निर्भर करती है। आइन्स्टीन ने सन् 1904-5 में सापेक्षता का यह सिद्धाँत प्रतिपादित किया कि गति का न केवल समय पर वरन् जगह पर भी प्रभाव पड़ता है। उसके अनुसार गति जितनी बढ़ेगी समय की चाल भी उतनी ही घटती जायेगी। उदाहरण के लिए एक अन्तरिक्ष यान प्रकाश की गति से अर्थात् एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड की गति से चलता हो तो उसमें बैठे कर कोई व्यक्ति नौ प्रकाश वर्ष (नौ वर्ष में प्रकाश एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड के हिसाब से जितनी दूरी तय कर सकता है) उतनी, दूर स्थित किसी तारे पर जायें और वहाँ से तुरन्त लौट पड़े तो इस यात्रा में अठारह वर्ष लगेंगे। लेकिन उस यान में बैठे व्यक्ति के लिए यह समय अठारह वर्ष का सत्तर हजारवाँ भाग अर्थात् सवा दो घण्टे ही होगा।
ऐसा भी नहीं है कि पृथ्वी पर भी सवा दो घण्टे ही बीतेंगे। पृथ्वी पर ता वही अठारह वर्ष ही व्यतीत होंगे। उस व्यक्ति के सगे सम्बन्धी भी अठारह वर्ष बूढ़े हो चुकेंगे। जिन बच्चों को वह 12, 13 वर्ष का छोड़ गया होगा वे 30, 31 वर्ष के हो चुकेंगे। उसकी पत्नी जो उससे 2 वर्ष छोटी 34 वर्ष की रही होगी वह बूढ़ी हो चुकेगी। किंतु वह व्यक्ति जिस .... जिस स्थिति में गया होगा उसी आयु तथा उसी स्वास्थ्य का रहेगा। यानी उसकी आयु सवा दो घण्टे ही बीती होगी। यह भी कहा जा सकता है कि वह अपनी पत्नी से आयु में सोलह वर्ष छोटा हो जायेगा।
यह बात पढ़ने सुनने में अनहोनी लगती हे कि कोई व्यक्ति 18 वर्ष बाहर रहकर आये और जब लौटे तो ऐसे मानो कुछ घण्टे ही बाहर रहा हो। उसके चेहरे और शकल में भी कोई परिवर्तन नहीं आया। उसे देख कर कोई यह भी न कह पाये कि इस बीच वह 18 वर्ष और बड़ा हो चुका है। लेकिन आइन्स्टीन ने प्रमाणों और प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर दिखाया है। सापेक्षता के इस सिद्धाँत को ‘क्लाक पैराडाक्स’ (समय का विरोधाभास) कहा गया है।
यद्यपि अभी कोई ऐसा यान बन नहीं सका है जिसके द्वारा की गयी यात्रा से इस सिद्धाँत की सचाई को अनुभूत किया जा सके। परन्तु समय विरोधाभास के जो समीकरण आइन्स्टीन ने दिये उसके अनुसार अमेरिका के भौतिक शास्त्री जोजफ हागले और खगोल शास्त्री रिचर्ड किटिंग ने 1971 में दो बार प्रयोग किये। उन्होंने अपने साथ चार परमाणु घड़ियाँ ली। स्मरणीय है परमाणु घड़ी सेकेंड के खरब वे हिस्से तक समय सही सही बता देती है। इन घड़ियों को लेकर उन्होंने उन्होंने सर्वाधिक तीव्र गति से उड़ने वाले यान द्वारा पृथ्वी की दो बार परिक्रमा लगायी। हाफले और कीटिंग ने भूल चूक से बचने के लिए हर तरह की सावधानी बरती थी। प्रयोग पूरा करने के बाद उन्होंने पाया कि तीव्र गति के कारण परमाणु घड़ियों ने अन्तर बता दिया। वैज्ञानिकों ने घोषित किया कि आइन्स्टीन का क्लॉक पैराडॉक्स सिद्धाँत सही था।
इस सिद्धाँत के अलावा घटनाओं और बोध पर निर्भर समय गति का सिद्धाँत तो पहले ही सिद्ध हो चुका है। सापेक्षता के ये समस्त सिद्धाँत वेदान्त के अनुसार यह विश्व और कुछ नहीं घटनाओं का जोड़ मात्र है तथा घटनायें व्यक्ति की बोध शक्ति, संकल्प चेतना का ही प्रतिफल है। विराट् ब्रह्म के संकल्प से, उसकी उपस्थिति मात्र से यह माया मय संसार उत्पन्न हुआ। मनुष्य यदि चाहे तो वह इस माया से मुक्त हो सकता है और सत्य का दर्शन कर सकता है; बशर्ते कि हम पहले से बनी बनायी घटनाओं को वस्तु जगत पर थोपना बन्द कर दें। तत्व दर्शियों ने इसी को ‘साक्षी भाव की सिद्धि कहा है।
अन्तिम सिद्धाँत समय ‘विरोधाभास’ के अनुसार मायावाद की और पुष्टि हो जाती है जिसमें व्यक्ति को असंग भाव से कर्म करने की प्रेरणा दी गयी है। उस स्थिति को प्राप्त हुए बिना अन्तिम सत्य का पता लगाया ही नहीं जा सकता क्योंकि समय का बोध (आब्जेक्टिव टाइम) निरन्तर भ्रमित स्थिति बनाये रखता है। जैसे पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है परन्तु दिखाई यह देता है कि सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जा रहा ह। चलती हुई रेलगाड़ी में से दूर तक देखने पर पेड़, वृक्ष, टीले और पृथ्वी ही दौड़ती दिखाई देती है। उसी प्रकार सीमाबद्ध, अस्तित्व में ये सारी भ्रान्तियाँ उत्पन्न होती है।
इन सब घटनाओं का साक्षी रहने वाले मायायुक्त अस्तित्व पहचाना जा सके तो वस्तु स्थिति का ज्ञान सहज ही हो सकता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि मायामुक्त हो जाने से व्यक्ति अकर्मण्य, निष्क्रिय हो कर बैठ जायगा। सत्य की प्राप्ति कभी किसी क्षेत्र में अनर्थ नहीं करती। सत्य का ढोंग ही अनर्थ करता है। जब यह अनुभव हो पायेगा कि वस्तुतः तो यह सभी संसार एक क्रीड़ांगन है जहाँ एक ही चेतन सत्ता खेल रही है। यह जगत् अभिनय मय है जहाँ प्रत्येक जीवात्मा को अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए भेजा गया है तो अधिक प्रखरता से कर्म साधना हो सकेगी। प्राचीन काल में ऋषियों ने अपनी अंतर्दृष्टि से, साधना उपासना से इस भ्रम जाल, माया मय संसार के सत्य को पहचाना था। विज्ञान भी अब उसी बिन्दु की ओर प्राप्त करने के लिए सच्ची लगन और जिज्ञासा से किसी भी क्षेत्र में प्रयास किया जाय अन्ततः पहुँचना एक ही बिन्दु पर होता है।
6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा नगर पर अणुबम गिराया गया था। इसके बाद दूसरा अणुबम नागाशाकी पर गिराया गया। इसमें 60 हजार व्यक्ति तत्काल मर गये और उसके साथ ही एक विशाल भू-भाग जल भुनकर खाक हो गया। तब से लेकर अब तक लगभग 40 वर्षों में अणु अस्त्रों की भारी वृद्धि हुई है और उनकी संहारक शक्ति भी पहले की अपेक्षा कई गुणा बढ़ गयी हे। जापान पर गिराये गये बम 2 हजार टन टी.एन.टी. शक्ति के थे, लेकिन अब जो हाइड्रोजन बम बन रहे हैं उनकी शक्ति 6 करोड़ टन टी.एन.टी. शक्ति की है। अर्थात् इन बमों की शक्ति जापान पर गिराये गये बमों की से तीन हजार गुनी है। अर्थात् यदि एक उद्जन बम कहीं गिरा दिया जाये तो 18 करोड़ व्यक्ति तत्काल मर जायेंगे। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे देशों को एक या दो बमों से ही पूरी तरह तत्काल नष्ट किया जा सकता है।
यह तो उद्जन बम के कारण तत्काल होने वाला नर संहार है। बम के विस्फोट से जो विकिरण फैलने लगता है और रेडियो धर्मी धूल उत्पन्न होती है; वह महाविनाश का ही दृश्य उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है। अब तक इस तरक के बमों का युद्ध में कहीं प्रयोग तो नहीं किया गया और न ही इनके प्रयोग की सम्भावना दिखाई देती है। क्योंकि जो राष्ट्र इनका प्रयोग करेंगे, वे भी उनसे होने वाले कुप्रभावों से बच नहीं सकेंगे। लेकिन परीक्षण के तौर पर जहाँ परमाणु अस्त्रों का विस्फोट दिया गया वहाँ की हजारों वर्ग मील भूमि बेकार हो गयी है।
भूमि ही बेकार हुई हो, ऐसा भी नहीं है। उन विस्फोटों का प्रभाव अन्तरिक्ष ने अभी भी विद्यमान है। अब तक अणु विस्फोट के लिए जितने परीक्षण किये गये उतनों का क्या दुष्परिणाम होगा? संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा यह जानने के लिए जिस वैज्ञानिक समिति का गठन किया गया उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा है-जो परीक्षण किये जा चुके है; उनका ही इतना विषाक्त प्रभाव हवा में मौजूद है कि उसके परिणाम स्वरूप वर्तमान तथा अगली पीढ़ी में कम से कम डेढ़ करोड़ बच्चों शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से विकृत होंगे। उनकी सन्तानें भी इन प्रभावों से मुक्त न रह सकेंगी और यह क्रम वंश परम्परा के अनुसार निरन्तर चलता है। इसके अतिरिक्त पिछले प्रभाव के कारण 20 लाख व्यक्तियों को कैंसर, ल्यूकोभिय, हृदयरोग, टी.बी. तथा गलित कुष्ठ के कारण मरना पड़ेगा। इससे अधिक व्यक्तियों की इन रोगों की दारुण व्यथा सहनी पड़ेगी। करोड़ों व्यक्तियों को अकाल मृत्यु से मरना पड़ेगा।
“साइन्स डाइजेस्ट” पत्रिका में डा. जूल वैरमोन ने अपने एक लेख “क्रिएटर और किलर” में लिखा है कि-विज्ञान से मनुष्य जाति ने आशा की थी कि वह उसके लिए जीवन सुविधायें जुटायेगा परन्तु उसने मनुष्य को मारने के सरंजाम ही जुटाये हैं। विज्ञान से वर्तमान सभ्यता और संस्कृति के विकास की आशा की गयी थी परन्तु उसने विकास की अपेक्षा मनुष्य को विनाश की ओर ही अधिक धकेला है।”
इस समय अमेरिका के पास छोटे-बड़े करीब 35 हजार अणुबम है। इनमें से सैकड़ों प्रक्षेपास्त्रों पर कस कर तैयार रखे हुए हैं। बटन भर दबाने की देर है कि एटलस, टिटन, पोलाटिस किस्म के सुसज्जित प्रक्षेपास्त्र उन्हें दो हजार मील दूर तक पलक झपकते ही फेंक आयेंगे और उसे देश को भूमिसात कर देंगे। इन अणु अस्त्रों की मार से उत्पन्न हुई विभीषिका का वर्णन शब्दों में ही नहीं किया जा सकता और न कल्पना ही की जा सकती है।
सन् 1945 में जिन बमों का विस्फोट नागाशाकी और हिरोशिमा पर किया गया तत्काल ही उससे दो तरह से विनाशलीला की। जिन वैज्ञानिकों ने उस विस्फोट का विवरण प्रस्तुत किया था-उनके अनुसार “बम एक अन्धा कर देने वाली चमक के साथ फटा। उससे भयंकर ज्वलनशील गैस आकाश की ओर लपकी। जैसे सैकड़ों सूर्य एक साथ चमक उठे हों और उनकी लपटें अपने आसपास ऊपर नीचे की वस्तुओं को भस्म कर डालने के लिए लपक रही हों। विस्फोट इतना जोरदार था कि उससे 12 मील तक के भवन बुरी तरह ध्वस्त हो गये। तीन मूल दूर तक की मोटी-मोटी दीवारें चकनाचूर हो गयी। 14 मील के घेरे में इतना ताप उत्पन्न हुआ कि वहाँ की सारी चीजें धू-धू कर जल उठी। इतनी तेजी से जली कि उनका धुँआ तक नहीं दिखाई दिया और न ही ज्वालायें ही दीख पड़ी। जलने की क्रिया केवल विभिन्न गैसों के रूप में दिखाई दी; जो स्वयं बहुत उच्च तापमान वाली थी और उनके कारा इतने बड़े घेरे में एक आग्नेय तूफान उठ खड़ा हुआ था।
विनाश के ताण्डव का यह तो प्रत्यक्ष दृश्य था। विस्फोट के तुरन्त बाद ही वैज्ञानिकों के अनुसार उसका विकिरण फैलने लगता है और न्यूट्रोनों, बीमा तथा गामा किरणों का प्रवाह बहने लगता है। यह किरणें अभेद्य समझे जाने वाले अवरोधों को भी पार करती हुई दूर-दूर तक पहुँच जाती है तथा अपना विनाशकारी ताण्डव नाच नाचने लगती है।
विस्फोट के तुरन्त बाद होने वाली इस विनाश के उपरान्त रेडियो धर्मी धूल आती है। यह विस्फोट के साथ आकाश में उड़ने वाले धूलिकणों के साथ विषाक्त विकिरण लेकर अन्तरिक्ष में उड़ने लगती है। इस धूल का एक छोटा-सा अंश ही जमीन पर उतरता है। शेष अन्तरिक्ष में हवा के साथ उड़ता रहता है और वर्षा के साथ यत्र-तत्र भू तल पर गिरता है। फलतः उस जमीन की उर्वरा शक्ति ही नष्ट हो जाती है। विकिनी स्टोल में सन् 1954 में किये गये अणु परीक्षण से रेडियो धर्मी धूल के कारण 700 वर्गमील क्षेत्र तुरन्त दूषित हो गया था। इसी प्रकार 1955 में अमेरिका द्वारा किये गये परीक्षण से 63 हजार वर्गमील जमीन खराब हुई थी।
यह तो परीक्षणों के कारण उत्पन्न हुआ कुप्रभाव ही है, जो बहुत सुरक्षात्मक ढंग से किये जाते है; ताकि उनके कारण कम से कम हानि हो। खुल कर यदि इन अणु अस्त्रों का उपयोग किया जाय तो इससे भयंकर विनाश लीला उत्पन्न हो सकती है। एक बारगी तो सारी पृथ्वी का ही जीवन नष्ट हो सकता है। थोड़ा बहुत जीवन बच भी जायेगा तो वह इतना विकृत होगा कि मृत्यु से भी भयंकर यन्त्रणादायी होगा।
अणु युद्ध की सम्भावना से इन्कार करते और अणु अस्त्रों के प्रसार को रोकने के लिए प्रयास करते हुए भी संसार में इस महाविनाशकारी दैत्य का परिवार दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। अकेले अमेरिका में आणविक प्रहार कर सकने वाले केन्द्रों की संख्या करीब 4600 है। रूस में ऐसे 2000 केन्द्र बताये जाते है। वस्तुतः ऐसे केन्द्र कहाँ कितने होंगे तथा किस देश के पास कितने हथियार है इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। जो कुछ कहा जाता है वह दूसरे देशों द्वारा एकत्र की गयी, गुप्तचर जानकारियों के आधार पर ही कहा जाता है। और प्रत्येक महाशक्ति सम्पन्न देश दूसरे देश की प्रतिद्वन्द्विता में आगे रहने के लिए निरन्तर आणविक अस्त्रों का प्रसार करता ही जा रहा है।
जूलियस सीजर के समय में कहते है एक व्यक्ति को मारने में पाँच रुपये खर्च होते थे। नैपोलियन के जमाने में खर्च की वह राशि बढ़ कर एक हजार रुपये हो गयी। प्रथम विश्वयुद्ध के समय वह लागत 15 हजार तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में 1 लाख रुपये तक बढ़ गयी। अब तीसरा युद्ध यदि हो तो कहा जाता है कि एक आदमी को मारने के लिए औसतन 13 लाख रुपये खर्च करना पड़ेंगे।
विज्ञान को विनाश का साधन जुटाने में लगी हुई मानवीय बुद्धि यदि विकास को लक्ष्य मान कर चल रही होती तो यह संसार ही स्वर्ग जैसा बन जाता। इसमें दोषी विज्ञान नहीं है। वह तो शक्ति है जिसका उपयोग सृजन में भी किया जा सकता है और विनाश में भी। दोषी तो मनुष्य की दुर्बुद्धि है जिसने विज्ञान को अपना अहं बढ़ाने तथा सिद्ध करने का शस्त्र बनाया और उस शक्ति को अभिशाप बना बैठा है। काश विज्ञान का उपयोग सद्भावनायें बढ़ाने और उपलब्धियों का श्रेष्ठ उपयोग करने की दिशा में किया जा सके तो वह उतना ही बड़ा वरदान भी है, जितना बड़ा कि अभिशाप दिखाई देता है।
“ऐसा कोई स्वप्न जो नींद खुलने के बाद भी याद रहे, दबी हुई आकाँक्षाओं की छद्म पूर्ति की जाती है” इन पंक्तियों में सुप्रसिद्ध यौन विज्ञानी सिगमण्ड फ्रायड ने अपने स्वप्न सिद्धाँतों को सूत्र रूप से कह दिया है। इस सिद्धाँत का विवेचन और विश्लेषण करते हुए फ्रायड ने “द अमर्रजन एण्ड डेवलपमेण्ट ऑफ साहको- एनालिसस” पुस्तक में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि मनुष्य रात में सोते समय जो स्वप्न देखता है उनसे वह अपनी दबी हुई कामनाओं विशेषतः राग और यौन आकाँक्षाओं की पूर्ति ही करता है।
यह ठीक है कि अचेतन मन में दबी हुई इच्छायें आकाँक्षायें प्रायः स्वप्न के रूप में भी सामने आती है। परन्तु यह पूर्णतः सत्य नहीं है। हमारा मन शरीर के माध्यम से अपनी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है। कई इच्छायें ऐसी भी होती हैं जिन्हें वह अपने आसपास के वातावरण, सामाजिक दबाव और अक्षमता या असमर्थता के कारण पूर्ण नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में वह इच्छा पूर्ति की कल्पनायें भर करता रह सकता है। यह पूरी न होने वाली इच्छायें मन की मन में ही दबी रहती हैं और रात को जब व्यक्ति सो जाता है, तब उन कल्पनाओं को दृश्यों के रूप में देख कर इच्छा पूर्ति का आनन्द लेने लगता है। रात में जब व्यक्ति सो जाता है तो उसका शरीर तो शिथिल हो जाता है पर मन तब भी जागृत रहता है और वही अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं के स्वप्न की इतनी ही व्याख्या की गयी है और मान लिया गया है कि स्वप्न मनुष्य की दमित अपूर्ण इच्छाओं की प्रतीकात्मक पूर्ति मात्र है, इससे अधिक कुछ भी नहीं।
लेकिन भारतीय दर्शन ने स्वप्नों के सम्बन्ध में इससे भी आगे बढ़ कर उनका सर्वांगपूर्ण विश्लेषण किया है। आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत ने लिखा है कि मनुष्य का बात पित्त और कफ कुपित रहता है, तब भी स्वप्न आते है। सोते समय शरीर की विभिन्न अवस्थाओं का भी स्वप्न पर प्रभाव पड़ता है। कहा जाता है कि सीधे चित्त हो कर लेटने और छाती पर हाथ रख कर सोने से डरावने सपने आने लगते है।
फ्रायड और शरीर विज्ञान ने स्वप्न के जो कारण बताये वह भारतीय मनीषियों ने पहले ही अथर्ववेद, दैवज्ञ, कल्पद्रुम, सुश्रुतसंहिता, अग्निपुराण आदि ग्रन्थों में लिखे दिये हैं। परन्तु स्वप्नों के इतने भर ही कारण नहीं है। भारतीय मनीषियों के अनुसार मन की गति बहुत तीव्र है। ऋग्वेद के अनुसार-मन संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक क्षण भर में पहुँच जाता है-
यत् ते विश्वमिंद जगन्मनो जगाम दूरकम् यत् ते पराः पाँरवतो मनो जगाम दूरकम्। 10।58।11
कठोपनिषद् में कहा है-‘‘यन्मन सहाइन्द्र,-अर्थात् मन विदुद शक्ति के समान हैं। मन सामान्य स्थिति में अपने शरीर अपने विषयों तक ही सीमित रहता है इसलिए स्वप्न की सामान्य अवस्था में ऐसे ही ऊलजलूल और ऊटपटाँग स्वप्न आते है; जिनमें से कई तो याद भी नहीं रहते। शास्त्रकारों ने इस प्रकार के स्वप्नों को तामसिक स्वप्न बताया है।
जब शरीर में या स्वप्न अवस्था में रजोगुण प्रधान रहता है तो उस समय में जागृत दशा में देखे हुए पदार्थ ही कुछ रूपांतर से दिखाई देते हैं ऐसे स्वप्न जागने के बाद भी याद रहते है। शास्त्रकारों ने इन स्वप्नों से भिन्न प्रकार के स्वप्नों का भी उल्लेख किया है जिन्हें सात्विक स्वप्न कहा है। इस स्थिति को उत्तम कहा गया है और बताया गया है कि ऐसे स्वप्न मन के आत्म भूत होने पर देखे जाते हैं।
स्वप्नावस्था में मन का आत्मा से सम्बन्ध किस प्रकार होता है इस तथ्य को एक छोटे से उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। रेडियो की सुई 340 किलो साईकिल्स पर लगते ही हमारा रेडियो दिल्ली के रेडियो स्टेशन से प्रसारित शब्द तरंगों को पकड़ने लगता है और बोलने लगता है। ऐसा इसलिए होता है कि छोटे से रेडियो का विद्युत सम्बन्ध रेडियो स्टेशन की विद्युत से जुड़ गया है। उपरोक्त प्रकार के स्वप्नों में जो सूक्ष्म, नियंत्रित और निर्मल मन द्वारा ही देखे जाते हैं, मन किसी भी क्षण आत्मा से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है और भूत, भविष्य, वर्तमान की काल सीमा और देश, स्थान की मर्यादा से बाहर की घटनायें, वस्तुएँ भी देखने लगता है।
स्वप्नों में भविष्य की घटनायें दिखाई देना इसका एक प्रमाण है। “सखाइवल ऑफ मैन पुस्तक के लेखक सर ओ. लोज ने भी अपनी पुस्तक में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि मन के माध्यम से हम स्वप्न अवस्था में अलौकिक जगत् और भविष्य में होने वाली घटनाओं को देख जान लेते है। इसकी पुष्टि में “सखाइवल ऑफ मैन” पुस्तक में एक ही घटना दी गई है, जो इस प्रकार है- ‘‘पादरी इ. के. इलियट समुद्री यात्रा पर थे और उस समय उन्होंने स्वप्न देखा कि 14 जनवरी 1887 को उनके पास उनके चाचा का एक पत्र आया है जिसमें छोटे भाई की मृत्यु की सूचना है। उस दिन जब फादर इलियट ने यह स्वप्न देखा 14 दिसम्बर 1886 की तारीख थी। फादर इलियट ने यह स्वप्न अपनी डायरी में नोट कर लिया और अपने सारे कार्यक्रमों को रद्द कर अगले पोर्ट से ही वापस रवाना हो गये। जिस समय वे वापस घर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि उनका भाई जिसे वह टाइफ़ाइड में छोड़ गये थे अब ठीक हो गया है। कुछ दिनों तक तो वे सोचते रहे कि उन्होंने बेकार ही अपनी यात्रा रद्द की और व्यर्थ ही स्वप्न के कारण भ्रम के शिकार हुए। परन्तु कुछ ही दिनों बाद उनका भाई फिर बीमार पड़ गया। उसे दुबारा टाइफ़ाइड हो गया था और उसी तारीख को जिसे इलियट ने समुद्री यात्रा के समय स्वप्न में देखा था उनके भाई का देहान्त हो गया।”
यह घटना स्वप्नों में पूर्वाभास के अलावा और क्या हो सकती है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में इस प्रकार के स्वप्नों को “तेजस स्वप्न” कहा गया है। जिनके सम्बन्ध में महर्षि ने बताया है कि इनमें भविष्य के संकेत छिपे रहते हैं। लन्दन के इण्डिया हाउस की लाइब्रेरी में टीपू सुल्तान की डायरी है। टीपू अपने विचार, कल्पनाओं और योजनाओं का इस डायरी में लिखता रहता था, इस डायरी में दो ऐसा स्वप्नों का उल्लेख है। जिससे उसने देखा कि उसके बाग की तीन ताजी खजूरे एक चाँदी की तश्तरी में उसके सामने रखी है। जो लोग खजूरे लेकर आये थे। उनमें से एक तो निजाम अली था और, दो अन्य दूसरे सरदार थे। यह स्वप्न उसे कई दिनों तक दिखाई देता रहा। उसके कुछ महीनों बाद ही टीपू के राज्य में निजाम अली तथा दो अन्य सरदारों ने अपने राज्य विलय कर दिये।
एक और स्वप्न में टीपू ने देखा कि चीन के बादशाह का दूत उसके पास एक सफेद हाथी लेकर आया है और कह रहा है ऐसी भेंट चीनियों ने केवल सिकन्दर भर को दी है। यह स्वप्न भी टीपू ने कई बार देखा और अर्थ लगाया कि वह भी सिकन्दर जैसा महान विजेता है। इसके बाद ही उसने अंग्रेजी रियासतों पर हमला करना आरम्भ किया और अपने साम्राज्य को काफी बड़ा कर लिया।
स्वप्न केवल मन की अतृप्त इच्छाओं, वासनाओं की पूर्ति ही नहीं है। फ्रायड और अन्य फ्रायडवादी मनोवैज्ञानिकों की यह व्याख्या एकाँगी तथा अपूर्ण है। क्योंकि स्वप्नों में ऐसी कई बातें दिखाई देती है। जिनका इच्छाओं और वासनाओं से कोई सम्बंध नहीं होता। फ्रायड द्वारा प्रतिपादित स्वप्न सिद्धाँत का एक अंश ही मान्य हो सकता है। इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विज्ञान सम्मत जानकारियाँ हमारे भारतीय आचार्यों, योगियों तथा तत्वदर्शियों ने दी है। “परमहंस परिव्राजकोपनिषद्” के महर्षि ने एक चौथे प्रकार के स्वप्नों का उल्लेख भी किया है। जिसमें जो दृश्य दिखाई देते हैं वे हूबहू वैसे ही घटते हैं।
इस स्वप्नों को “तुरीय स्वप्न” कहा गया है जिनमें मन चेतना आत्म चेतना के साथ घुलमिल जाती है और अनागत भविष्य को भी देख लेती है। पौराणिक साहित्य में तो ऐसी असंख्यों घटनायें बिखरी पड़ी है परन्तु इस प्रकार की घटनायें पश्चिम में भी कम नहीं घटी है क्योंकि आत्म चेतना के लिए तो पूर्व पश्चिम का कोई भेद है ही नहीं। सीजर की पत्नी कैलपूर्निया ने अपने पति की हत्या से काफी पहले एक स्वप्न देखा था, जिसमें उसके पति की हत्या की जा रही थी। कैलपूर्निया ने अपने पति तथा अन्य लोगों को इस बारे में बताया भी परन्तु किसी ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अन्ततः जब सीजर की हत्या हो गयी तो लोगों को कैलपूर्निया के कथन की सत्यता का अनुभव हुआ।
नेपोलियन के सेनापति जनरल बैकमैन, अब्राहमलिंकन, हेनरी तृतीय और कैनेडी को अपनी हत्या स्वप्न में पहले ही देख जाने के उदाहरण भी इसी बात को सिद्ध करते हैं। ब्रिटेन के दो बार प्रधान मन्त्री बने सर विंस्टन चर्चिल ने अपनी जीवनी में स्वीकार किया है कि उन्हें स्वप्न में दो बार चेतावनी मिली और इन स्वप्नों के कारण वे बच गये।
स्ट्रेटन नामक व्यापारी ने एक स्वप्न देखा कि एक स्थान पर सोना निकल रहा है। जागने पर उन्होंने जाँच किया तो उस स्थान पर पथरीले टीले के अलावा कुछ नहीं था। लेकिन स्ट्रेटन ने वह स्वप्न बड़ी स्पष्टता से देखा था और न जाने क्यों उसे यह विश्वास हो गया था कि उसका सपना सही है। वह स्वप्न में देखे गये स्थान पर गया और वहाँ खुदाई आरम्भ करवा दी। सचमुच ही वहाँ सोना मिला और आज अमेरिका के कोलेटैडा राज्य में राकफील्ड स्थित स्ट्रेटन की खदानें संसार की दूसरी सबसे बड़ी खाने है।
लार्डकिल ब्रेकन का तो दावा था कि उन्हें एक दिन पहले ही स्वप्न में दिखाई दे जाता है कि रेस में कौन सा घोड़ा जीतेगा और वे उसी घोड़े पर रकम लगा कर जीत जाते हैं। लन्दन के प्रसिद्ध अखबार “डेली मिरर” ने उनकी परीक्षा करने के लिए रेस से पहले ही उनसे घोड़े के बारे में पूछलिया। रेस में वही घोड़ा जीता जो किल ब्रेकन ने बताया था।
फ्रायड के अनुसार यदि स्वप्न केवल रागात्मक जीवन से ही सम्बंधित है और उनमें मनुष्य की अपनी दबी अधूरी इच्छायें ही पूरी होती है तो उपरोक्त स्वप्नों का क्या कारण है। वस्तुतः स्वप्न मन के क्रीड़ा कलोल भी है और उसकी अनुभूतियाँ भी। यही कारण है कि स्वप्न सार्थक भी होते हैं और निरर्थक भी। सिगमण्ड फ्रायड के स्वप्न सिद्धांत का खण्डन अब आधुनिक मनः शास्त्री भी करने लगे हैं। प्रख्यात मनोविज्ञान वेत्ता काल गुस्ताख़ जुँग ने कहा है कि- “दैनिक जीवन की घटनाओं और संवेदनाओं का प्रभाव स्वप्नों में रहता तो है, पर स्वप्न इतने ही सीमित नहीं है। ब्रह्माँड में प्रवाहित होते रहने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के कारण पराचेतना में अनेक प्रतिबिम्ब तैरते रहते हैं। मनुष्य की अनुभूतियाँ उनसे प्रभावित होती हैं और वह प्रभाव व्यक्ति की निज की स्थिति के साथ सम्मिलित होकर स्वप्न जैसी विचित्र प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करता है।
अर्थात्-व्यक्ति की सीमित चेतना विराट् चेतना के साथ मिल कर जिस स्तर का अनुभव करती है उसका आड़ाटेड़ा और सीधा-सीधा परिचय स्वप्न संकेतों के रूप में मिल जाता है। कोई स्टेशन ठीक से न पकड़ पाने के कारण रेडियो जिस तरह की गड्डमड्ड ध्वनियाँ निकालता है उसी प्रकार मन का आत्मचेतना से मेल संयोग यदि सीधा सही हो तो स्वप्नों में स्पष्ट संकेत भी मिल जाते हैं। मन के इधर-उधर भटकते रहने पर ऊलजलूल निरर्थक स्वप्न भी आते है।
कौन से स्वप्न सार्थक हैं और कौन से निरर्थक इसका कोई स्पष्ट विश्लेषण नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के मन की संरचना भिन्न-भिन्न प्रकार की है। परन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि शुद्ध, सात्विक, निर्मल और परिष्कृत मन ही सूक्ष्म जगत् के स्पन्दनों को पकड़ने में समर्थ होता है। अशुद्ध, निकृष्ट और मलीन मन खराब रेडियो की तरह व्यर्थ और निरर्थक शोरशराबा ही उत्पन्न करेगा, जिसकी न कोई उपयोगिता है और न आवश्यकता ही।
जिस प्रकार चेतना प्राणियों के शरीर के रूप में व्यस्त होती है और जीवधारियों का विकास करती है उसी प्रकार वृक्ष लताओं के रस में चेतनाओं के रस में चेतना होती है और वह अपना आनन्द फूलों तथा फलों के रूप में व्यक्त करती है। जड़ या चेतना दोनों में ही चेतना बीज रूप से विद्यमान रहती है। एक अपनी जड़ता के कारण जड़ रूप में आ जाती है दूसरी सक्रियता के कारण चेतन रूप में।
इस सिद्धांत के आधार पर ही भारतीय तत्वदर्शियों ने “सर्वखल्विदं ब्रह्म”, ‘ईशावास्यामिदं सर्वम्” के रूप में सर्वव्यापी चेतन सत्ता का अनुभव कर सब कुछ चेतन है, जड़ कुछ भी नहीं का वेदान्त दर्शन विकसित किया और कहा कि मनुष्य को अपनी चेतना का परिष्कार इस हद तक करना चाहिए कि वह शरीर के तुच्छ भोगों तक ही सीमित न रहकर विश्व व्यापी विराट चेतना तक पहुँच जाये। यदि वह ऐसा नहीं करता इन्द्रिय भोगों की ओर आकृष्ट होकर अपनी चेतना को शिथिल और निष्क्रिय बनाये रहता है तो उसे जड़ योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
जीवन जड़ योनियों में भी है परन्तु वहाँ इतनी स्वतन्त्रता नहीं है जितनी की मनुष्य योनि में। अभी कुछ दशक पूर्व तक यह माना जाता रहा था कि वृक्ष वनस्पतियाँ निर्जीव, निष्प्राण हैं। यह मान्यता भारतीय तत्व दर्शन का खण्डन करती थी। विज्ञान के अन्धभक्त वृक्ष वनस्पतियों में जीवन चेतना प्रमाणित न होने तक इस सिद्धांत की खिल्ली भी उड़ाते रहते और भारतीय दर्शन को वायवीय कह कर उसकी उपेक्षा करते रहते थे। लेकिन जब वृक्ष वनस्पतियों की जीवन चेतना भी विज्ञान सिद्ध हो गयी तो ऋषि महर्षियों के तत्व चिन्तन और अध्यात्म के माध्यम से सृष्टि रहस्यों को सुलझाने की उनकी क्षमता पर दंग रह जाना पड़ा। शास्त्रों में कितने ही ऐसे पेड़ पौधों का उल्लेख है जो वनस्पतियों के सामान्य स्वभाव से अलग विशिष्ट हलचलें करते हैं। ऐसे पेड़ पौधे आज भी दुनिया में यत्र तत्र पाये जाते है।
इन पेड़ पौधों में से कईयों के व्यवहार और क्रियायें तो अद्भुत वैचित्र्य लिये होती है। डेसिगोडियम ट्राइक्वेट्रम नामक एक पौधे में लगातार ऐसी हलचल, होती रहती है, जैसे तार करने वाली मशीन में होती है। 3 से 8 फुट तक की ऊँचाई वाले इस पौधे के पत्ते संयुक्त पत्तों के आकार के होते हैं। प्रत्येक संयुक्त पत्ते में तीन छोटी पत्तियाँ निकलती हैं- एक बड़ी पत्ती और बाजू में दो छोटी छोटी पत्तियाँ। बड़ी पत्ती में तो कोई प्रतिक्रिया नहीं होती पर बाजू में रहने वाली छोटी पत्तियों में प्रायः हलचल होती रहती है। जब दिन का तापमान 72 डिग्री का हो जाता है तो पत्तियाँ तार करते समय होने वाले संकेतों के समान हलचल करने लगती है। इस समय पौधे इस प्रकार लगने लगते हैं जैसे सभी संयुक्त पत्तियाँ तार करने वाली मशीन में रूपांतरित हो गयी हों।
इस प्रक्रिया में एक और विशेषता दिखाई देती है कि ये पत्तियाँ अक्सर वृत्ताकार घूमती हैं और साथ ही अपनी धूरी पर, भी घूमती हैं। हवा चलने या बन्द रहने पर भी इन पत्तियों के घूमने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और सुबह तक ये पत्तियाँ इसी प्रकार घूमती रहती हैं।
दक्षिण अफ्रीका के एक क्षेत्र में ऐसा पौधा पाया जाता है जो कि किसी मनुष्य की उपस्थिति से उल्लास प्रकट करता है और किसी की उपस्थिति से घबड़ाने या अपने आपको दबने या छुपाने लगता है। इस पौधे का नाम “ऐसिटिव प्लाँट” है। इसी तरह का व्यवहार वह अन्य प्राणियों से भी करता है। जिस किसी की उपस्थिति से वह प्रसन्न होता है तब उसकी पत्तियाँ गहरे गुलाबी रंग की हो जाती हैं, तथा फूलकी पंखुड़ियाँ फैलकर चौड़ी हो जाती हैं जैसे वह खिलकर, प्रसन्नता व्यक्त कर रहा हो। जिस किसी की उपस्थिति से वह रुष्ट या असंतुष्ट होता है तो उसका गुलाबी पन हल्का पड़ जाता है तथा फूल की पत्तियाँ अपेक्षा कृत सिकुड़ जाती हैं।
इसे ऐसिटिव प्लाण्ट का शर्मीलापन भी कह सकते हैं। परन्तु कई पौधे ऐसे होते है जो वास्तव में शर्मीले होते हैं। नये और अजनबी व्यक्ति के साथ कोई व्यक्ति जिस प्रकार संकोच पूर्वक व्यवहार करता है ठीक उसी तरह ये भी व्यवहार करते हैं। यहाँ तक कि पौधे तो परम्परा निष्ठ परिवार की कुलवधू के समान दूसरों को देख कर अपने व्यवहार को तुरन्त बदल देते हैं और उसी तरह शर्माने लजाने लगते हैं। भारत में पाये जाने वाले एक विशेष प्रकार के पौधे का नाम तो इसी कारण लाजवन्ती पड़ गया है। यह पौधा और दूसरे प्राणियों से तो नहीं शर्माता परन्तु मनुष्य के पास पहुँचते ही अपनी पत्तियों को इस प्रकार सिकोड़ने लगता है जैसे कोई नव वधू अपनी ससुराल वालों को या बड़े व्यक्तियों को देखकर अपने कपड़े सम्हालने लगती है कि कहीं कोई अंग उघड़ा हुआ तो नहीं है।
छुईमुई के पौधे में इमली की पत्तियों के समान बारीक बारीक पत्तियाँ होती है। इस पौधे के पास कोई पहुँचता है और हाथ से छूता है तो पत्तियाँ तुरन्त सिकुड़ कर इकट्ठी हो जाती है। जिन क्षेत्रों में यह पौधा पाया जाता है, वहाँ इसकी कितनी ही विचित्रताओं के चर्चे सुनने को मिलते हैं।
अफ्रीकन वायलेट भायक पौधा छुईमुई के पौधे की तरह ही शर्मीला है परन्तु कुछ भिन्न ढंग का। छुई मुई की पत्तियाँ जहाँ छूने से सिकुड़ जाती हैं वहीं इस पौधे की पत्तियों पर पानी की एक बूँद भी पड़ जाती है तो तत्क्षण उस स्थान पर एक दाग पड़ जाता हैं। यह दाग पत्ती के सूखने तक नहीं मिटता।
सूर्यमुखी का फूल उधर ही झुका रहता है जिधर कि सूर्य स्थित रहता है। रात के समय भी यह उसी क्रम में घूमता रहता है। पृथ्वी तो अपनी कीली पर घूमती रहती हैं। पृथ्वी के उसी क्षेत्र में रात होती है, जो क्षेत्र दूसरे गोलार्द्ध में आ जाता है लेकिन सूर्य के सामने तो पृथ्वी का घूमना जारी ही रहता है। लाख बादल हों और कितने ही व्यवधान पर सूर्यमुखी का पौधा सूर्य की ओर उन्मुख रहने का व्रत नियम पूर्वक निभाता है।
बहुत से पौधे ऐसे भी होते हैं जिनके फूल दिन या रात में समय विशेष पर ही खिलते हैं। इस प्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न पुष्पपादपों में एक पुष्प पादप जो भारत में पाया जाता है- रात की रानी के पौधे से तो प्रायः सभी परिचित हैं जिसके फूल रात के समय ही महकते हैं। परन्तु ‘सरियस ग्रेण्टी फ्लोर’ नामक पौधे के फूल, तो खिलते भी रात के समय ही है। रात में प्रायः नौ बजे के बाद पौधे के फूल खिलना आरम्भ होते हैं और इसके साथ ही फैलने लगती है, उनकी महक। आधी रात तक फूल पूरी तरह खिल जाते हैं और उनकी महक चारों ओर फैल जाती है। फिर इसके बाद रात ढलने के साथ साथ फूल मुरझाने लगता है और सुबह होने तक पौधा पुनः सामान्य अवस्था में आ जाता हैं।
इन विशेषताओं को देखते हुए यह मानने का कोई कारण नहीं है कि पेड़ पौधों का व्यवहार भी स्वभाव गत विशेषताओं से संचालित होता है। जीव विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि कई पौधे ऐसे हैं जिनके सम्बन्ध में अभी तक यह निश्चित नहीं किया जा सका है कि उन्हें वनस्पति माना जाये अथवा जीव जन्तु। इस तरह के पौधे या जन्तु में ‘डायटम’ को प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके सम्बन्ध में वैज्ञानिक अभी तक यह तय नहीं कर पाये हैं कि उसे पौधा माना जाय अथवा जन्तु क्योंकि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के अनुसार तो वह पौधे के गुण रखता है जबकि उसके दूसरे गुण एक कोशीय जीवाणुओं के समान है।
डायटम से भी स्पष्ट उदाहरण कैटर पिलर का है जो प्रत्यक्ष रूप से एक योनि से दूसरी योनि में परिवर्तित होता है। कैटट पिलट प्रारम्भ में किसी कीड़े की तरह इधर उधर घूमता रहता है। न उसमें प्रकाश संश्लेषण होता है और न ही वह कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करता है। पौधे का विकास निषेचित (फर्टिलाइज्ड) और परिपक्व बीजाण्ड से होता है। मूलांकुर जड़ की ओर चल पड़ता है और प्राँकुर तने की ओर। धीरे धीरे यही बीजाण्ड पूरा वृक्ष बन जाता है किन्तु कैटर पिलट नामक कीड़े में नर-मादा के संयोग का कोई चक्कर नहीं, उसकी देह के किसी भी हिस्से से एक नन्हीं सी टहनी फूट पड़ती है और बस तभी उसमें कीड़े वाले गुण समाप्त हो जाते हैं।
वह टहनी प्रकाश संश्लेषण द्वारा बढ़ने लगती हैं प्रकाश संश्लेषण एक ऐसी क्रिया है जिसमें क्लोरोफिल नामक तत्व की उपस्थिति में पौधे सूर्य के प्रकाश से अपना आहार ग्रहण करते हैं। प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना आहार ग्रहण और पोषण प्राप्त करते हुए यही कीड़ा एक दिन बड़ा सा वृक्ष बन जाता है। अर्थात् टहनी न फूटने तक तो वह एक कीड़ा रहता है और टहनी फूटते ही पौधा बनकर वृक्ष बनने लगता है।
वनस्पति जगत में वृक्ष संसार पादप-परिवार के कितने ही सदस्य ऐसे हैं। जो कितनी ही विशेषतायें लिए रहते हैं और इस बात का प्रमाण भी है कि उनमें तथा जीव तन्तुओं में कोई अन्तर नहीं हैं। भारतीय महर्षियों ने जीवन चेतना और उसके स्थूल स्वरूपों का विवेचन करते हुए 84 लाख योनियाँ बतायी हैं। जिनमें मनुष्य भी एक है। मनुष्य के अतिरिक्त जलचर, नभ चर देव, पितर, गंधर्व, यक्ष, प्रेत योनियों के अलावा स्थावर योनियाँ भी है। स्थावर अर्थात् जो स्थिर रहें, चल फिर न सकें, वृक्ष वनस्पति इन स्थावर योनियों में ही आते है। विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करने लगा है कि जीवन चेतना केवल चलाय मान ही नहीं है वरन् वह स्थिर रहने वाली वस्तुओं में भी विद्यमान रहती है। जीवन के इसी स्वरूप को वैज्ञानिकों “इम्मूवेवल लाइफ” कहा है।
इससे आगे भारतीय तत्वविदों का कहना है कि परिष्कृत व्यक्तित्व जहाँ अपने रो ऊँची योनियों में जाते हैं वहीं विकृत और अपरिष्कृत व्यक्ति पतित होकर निम्न योनियों में जा पड़ते हैं यह ठीक है कि मनुष्य को अन्य योनियों की अपेक्षा ईश्वरीय अनुदान अधिक मिले हैं। किन्तु उनका उपयोग केवल वासना, लालसा और इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही किया जाय तो यह अवसर हाथ से निकल कर पुनः निम्न योनियों में भेज दिया जाना निश्चित है। यह योनि पशु पक्षियों की योनि होंगी अथवा वृक्ष वनस्पतियों की स्थावर योनि-यह अपने कर्मों पर निर्भर है। परन्तु ईश्वर की ओर से मनुष्य जीवन में एक चुनाव का अवसर है वह या तो उन्नत स्थिति में जाये अथवा पीछे वापस लौटे। बीच में ठहरने की कोई छूट नहीं है। अतः यही श्रेयस्कर है कि अपनी चेतना को परिष्कृत कर ऊर्ध्वगामी बनाया जाय इसे यथावत् अथवा पतित कर जड़ नहीं बनने दिया जाय।
महा बिहार में भिक्षुओं की स्थिति का निरीक्षण करते हुए भगवान बुद्ध एक कुटिया में पहुँचे तो उसमें रहने वाला साधक रुग्ण अवस्था में मल मूत्र से सना पड़ा मिला।
पूछने पर मालूम हुआ कि उसे अतिसार है। कोई दूसरा उसकी सहायता करने नहीं आता।
तथागत ने आनन्द से जल माँग कर उसे स्वच्छ किया, उठाकर बिस्तर पर सुलाया और चिकित्सा की व्यवस्था की। साथ ही निकटवर्ती कुटियाओं में रहने वाले भिक्षुकों को भुलाकर पूछा-कोई उस रोगी की सहायता क्यों नहीं करता।
उत्तर में सभी ने एक ही बात कही- वह किसी के काम नहीं आता, सदा अकेला रहता और उपेक्षा भाव बरतता है। फिर कोई क्यों उसकी सहायता करे?
तथागत ने कहा-अज्ञान का बदला ज्ञान से और संकुचित वृत्तिका सुधार उदारता से होता है क्या तुम इतना भी नहीं जानते। क्या तुमने नहीं सुना कि परमार्थ बदले के लिए नहीं अपनी ही करुणा को विकसित करने के लिए किया जाता है।
ब्रह्मवादिनी पत्नी का सान्निध्य प्राप्त कर राजा शिखिध्वज की प्राप्ति और आत्म साक्षात्कार करने की प्रेरणा हुई। शिखिध्वज को लम्बा समय हो गया था, राज्यसुख और ऐश्वर्य का उपभोग करते हुए परन्तु इससे उन्हें किसी भी प्रकार तृप्ति नहीं मिली थी। जबकि उनकी पत्नी सामान्य स्तर की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भी विलक्षण शान्ति और अद्भुत तृप्ति का आस्वादन करती थी। ब्रह्मवादिनी राजमहिषी के मुखमण्डल पर इस शान्ति और अक्षय तृप्ति के कारण अलौकिक तेज छाया रहता था। नेत्रों में अद्भुत आभा चमकती थी और शरीर अनुपम काँति से दमकता था।
इसका कारण पूछा तो रानी ने बताया कि त्याग से ही यह शक्ति प्राप्त हुई है। इस उत्तर को प्राप्त कर और ब्रह्मविद्या की प्राप्ति का उपाय जानकर शिखिध्वज ने भी उसे प्राप्त करने का निश्चय किया। उन्होंने देखा कि साँसारिक सुखों के भोग से वासनायें तृप्त होने के स्थान पर और बढ़ती ही जाती है कोई प्रतिकूलता न होने पर भी चित्त अशाँत ही रहता है। यह सब विचार कर वे राज्यभोग से खिन्न हो गये। उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान दिया, अनेकानेक तप-अनुष्ठान किये, चित्त को फिर भी शान्ति नहीं मिली।
विचार उठा कि राजपाट छोड़कर अरण्य में जा बैठा जाय और वहीं जप-ध्यान-तप उपवास द्वारा आत्मोपलब्धि की जाय। शिखिध्वज ने अपना यह विचार राजमहिषी को बताया और कहा-”भद्र’! तुम प्रजा का पालन करो और मुझे तपश्चर्या के मार्ग पर जाने दो।
रानी ने समझाया-’प्रत्येक कार्य का समय होता है। यदि आत्मोपलब्धि ही ध्येय है तो उसे कही भी रहते हुए सिद्ध किया जा सकता है। अभी आप अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए यहीं रहें। यथासमय हम दोनों ही वानप्रस्थ लेंगे और अरण्यवास कर लोक मंगल के लिए तप करेंगे।
शिखिध्वज को यह परामर्श गले नहीं उतर। वे वन को चले गये। किन्तु वर्षों तक कठोर साधनायें करने के बाद भी जब चित्त को सच्ची शान्ति नहीं मिली तो शिखिध्वज निराश से रहने लगे। परन्तु जिस मार्ग का उन्होंने अपनाया था उससे वे वापस लौट भी नहीं सकते थे। लौटने का कोई अर्थ भी नहीं था, क्योंकि जिस जीवन को छोड़कर उन्होंने यह मार्ग अपनाया था, वह जीवन भी तो क्लान्ति, अतृप्ति और अशान्ति के सन्ताप से भरा हुआ था।
महाराज शिखिध्वज की व्यथा आकुलता बढ़ती ही जा रही थी। वे यह निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें? तभी उन्होंने एक ऋषि कुमार को सरिता तट से अपनी कुटिया की ओर आते हुए देखा। उन्होंने ऋषिकुमार का दौड़कर स्वागत किया। प्रणाम कर अर्घ्य आदि दिया तथा परिचय आदि के लिए वार्तालाप आरम्भ करते हुए ऋषिकुमार ने पूछा-”आप कौन है?”
‘संसार’ रूपी भय से भीत होकर मैं इस वन में रहता हूँ’-राजा ने अपना परिचय देकर कहा-’जन्म मरण के बन्धन से मैं डर गया हूँ। कठोर तप करते हुए भी मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। मेरा प्रयत्न कुण्ठित हो गया है। मैं असहाय हूँ आप मुझ पर कृपा करें,”
‘जन्म-मरण से मुक्ति और कर्मों से निवृत्ति तो एकमात्र ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त होता है’- ऋषिकुमार ने कहा- ज्ञानी कर्म करते हुए भी अकर्ता ही रहता है। कर्मबन्धन उसे लिप्त नहीं करते क्योंकि वह कर्म और कर्मफल के प्रति अनासक्त रहता है। यह आसक्ति ही है जो मनुष्य को इस मायामय संसार बन्धनों से बाँधती है। आप ज्ञान को शस्त्र बना कर कर्म बन्धनों को काटिये।’
‘उस ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही तो मैं यह तप अनुष्ठान कर रहा हूँ। उसी के लिए मैंने दण्ड और कमण्डलु धारण किये हैं। फिर भी अभी तक कोई सफलता नहीं मिली’ शिखिध्वज ने कहा।
‘अपने अन्तःकरण पर चढ़े मल, विक्षेप और आवरणों को हटाने के लिए तप, अनुष्ठान आवश्यक है पर इतने मात्र से ही ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती। ज्ञान प्राप्ति के लिये आत्मतत्व का श्रवण, मनन, निदिध्यासन भी चाहिए।’
शिखिध्वज ने उन ऋषिकुमार को ही तत्वोपदेश का आग्रह किया और कहा-”मैं आपका शिष्य हूँ, आपका अनुगत हूँ; अब आप कृपा करके मुझे ज्ञान का प्रकाश दें।’
“ज्ञान को ग्रहण करने के लिए आवश्यक हैं कि साधक अपने चित्त को सब ओर से खाली कर दे। सब आश्रय और अवलम्बनों का परित्याग कर दे।
‘यह वन ही मेरा आश्रय है, मैं इसे छोड़े देता हूँ। अब मैं इस कुटिया को छोड़ कर कही नहीं जाऊँगा - शिखिध्वज ने व्रत लिया।
परन्तु यह कुटिया भी तो वन में -ऋषिकुमार ने कहा। शिखिध्वज कुटिया की सब सामग्री समेट कर उस कुटिया को भी छोड़ देने की तैयारी करने लगे। इस पर ऋषिकुमार ने कहा-”राजन् यह तो सर्वत्याग नहीं हुआ। आप इस वन और कुटिया को छोड़ रहे हैं तो अन्यत्र कहीं जाकर रहने लगेंगे। क्योंकि आपने सारी सामग्री तो अपने साथ ले जाने के लिए समेट ली।”
इस पर शिखिध्वज ने कुटिया में से एकत्र की गयी सब वस्तुओं को अग्नि में समर्पित कर दिया। उन्होंने आसन, कमण्डलु, दण्ड आदि सभी कुछ एक-एक करके अग्नि में डाल दिया। वे सोचने लगे कि अब तो ऋषिकुमार उन्हें सर्वस्व त्यागी और आकिंचन मान लेंगे। परन्तु ऋषिकुमार के इन वचनों ने उनकी आशा जैसे निर्ममता से चूर-चूर कर दी। उन्होंने कहा-राजन्! आपने अभी तो कुछ भी नहीं छोड़ा है। जो कुछ छोड़ा है वह तो सर्वत्याग का अभिनय मात्र था। आपने जो कुछ जलाया है, उसमें आपका अपना था ही क्या? वे तो सब प्रकृति विनिर्मित वस्तुएँ थीं।”
शिखिध्वज ने विचार किया कि यह शरीर तो अपना है। इसका परित्याग कर दिया जाय तो सम्भवतः सर्वस्व त्याग हो जाय। यह सोचकर शिखिध्वज बोले-आप ठीक कहते हैं महात्मन्। अभी मैंने कुछ नहीं छोड़ा है; क्योंकि इनमें मेरा कुछ नहीं था किन्तु मैं अब सर्वत्याग कर रहा हूँ।’
यह कह कर शिखिध्वज अपने शरीर की आहुति देने को उद्यत हुए ही थे कि ऋषिकुमार ने कहा-तनिक ठहरिये आप फिर गलती कर रहे है। आप क्या समझते हैं कि यह शरीर आपका है। शरीर भी आपका नहीं है। शरीर को तो प्रकृति ने बनाया है। उसे नष्ट करने से क्या होगा?
“तब मेरा क्या है?”-अब नरेश थक से गये थे और उन्हें अब ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखाई दे रही थी जो मेरी कही जा सके।
“यह जो पूछ रहा है कि मेरा क्या है केवल वही आपका है और आपका कुछ नहीं है’-ऋषिकुमार ने कहा आप उसी का परित्याग कीजिये।’
शिखिध्वज कुछ न समझे से अवाक् देखते रह गये। ऋषिकुमार ने उनकी कठिनाई को समझा और कहा - “यह जो विचार करता है कि यह मेरा है। यही परित्याग करने योग्य है। इसी का नाम अहंकार है। इस अहंकार को कि यह मेरा है, छोड़ दीजिये क्योंकि वास्तव में आपका कुछ भी नहीं है। न वस्तुएँ अपनी हैं न सम्बन्ध अपने हैं वस्तुतः अपनी सत्ता को मैं की सीमा में बाँध लेना ही अहंकार है। अपनी सत्ता को उस विराट् चेतना का ही एक अड़ उसी का एक अंश बल्कि मूलतः वही है-इस सत्य का बोध तभी होता है जब व्यक्ति अपनी ही बनायी हुई अहं ही कारा को तोड़ देता है।”
ऋषिकुमार के इन शब्दों ने शिखिध्वज के सम्मुख ब्रह्मविद्या के समस्त रहस्यों को अनावरित कर दिया। उन्हें अपना अस्तित्व ही तिरोहित, शून्य सा होता जा रहा प्रतीत होने लगा। इसके बाद लगा कि अभूतपूर्व शान्ति उनके मन-मस्तिष्क और चेतना में छा गयी है। तभी ऋषिकुमार ने कहा-व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग कर कर्तव्य कर्मों का भली−भांति आचरण करते हुए इसी संसार में सक्रिय जीवन व्यतीत करते हुए निर्लिप्त, अनासक्त और मुक्त रह सकता है।
इसके बाद शिखिध्वज पुनः नगर में लौट आये। उनकी ब्रह्मवादिनी और अलौकिक शान्ति की आभा चमकती हुई देखी।
शरीर के एक भाग में चोट पहुंचती है तो पूरे शरीर को इसकी तत्काल सूचना पहुंच जाती है और प्रत्येक अंग अपनी सामर्थ्य के अनुसार संकटग्रस्त अंग की सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं। पैर के अँगूठे में घाव हो जाने पैर आँख में आँसू, चेहरे पर घबड़ाहट, हाथ में कंपकंपी और मस्तिष्क में विचार, समस्याओं से उबरने के उपाय उत्पन्न होने लगते हैं। इसका कारण यह है कि पूरा शरीर एक ही चेतना से ओतप्रोत है। परन्तु यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि वह चेतन सत्ता केवल शरीर तक ही सीमित है। शरीर के बाहर भी वह चेतना अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में व्यास है और अपने शरीर में विद्यमान चेतना को परिष्कृत, निर्मल तथा विशुद्ध बनाया जा सके तो संसार के किसी भी कोने में घटने वाली घटना का तत्काल पता लगाया जा सकता है जैसे वह अभी ही आँखों के सामने घट रही हो।
सैकड़ों मील दूर टेलीविजन स्टेशन पर कोई फिल्म का दृश्य दर्शाया जाता है और वह दूर पड़े टी.वी. सैट पर ज्यों का त्यों देखा जा सकता है। रेडियो से हजारों मील दूर स्थित रेडियो स्टेशन पर प्रसारित समाचारों, सूचनाओं और विवरणों को शब्दशः सुना जा सकता है। आधुनिक विज्ञान ने जड़ साधनों द्वारा भी हजारों मील दूर संपर्क सूत्र तत्काल स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है फिर चेतना तो उससे हजार गुना समर्थ और लाख गुना शक्तिशाली है।
महाभारत का युद्ध कहीं लड़ा जा रहा है और अन्धे धृतराष्ट्र के पास राजमहल में बैठा संजय युद्ध का आँखों देखा विवरण बता रहा होता है। दूरबोध-परोक्ष दर्शन की सैकड़ों घटनायें शास्त्रों में भरी पड़ी हैं। प्रत्येक धर्म के इतिहास में इसके प्रमाण बिखरे पड़े है परन्तु आधुनिक विज्ञान का ध्यान करीब 100 वर्ष पूर्व ही इस ओर गया था। दूरबोध (क्लेअरवायेन्स) की ही तरह चेतना के माध्यम से दो विभिन्न दूरियों के बीच सम्बन्ध सूत्र जोड़ने का एक और प्रकार है विचार सम्प्रेषण (टैलीपैथी)। ने लगभग 100 वर्ष पूर्व इंग्लैंड के वैज्ञानिक ए. ए. क्रीरी ने विचार संप्रेषण के सफल प्रयोग किये। इसके लिये उन्होंने कुछ छोटे-छोटे प्रयोग किये। इस प्रयोगों में उन्होंने अपनी पुत्रियों अथवा नौकरानियों को कमरे से बहार भेजकर कमरे के भीतर की किसी वस्तु पर अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा। इन प्रयोगों के उत्साहजनक परिणाम सामने आये। बाहर गयी हुई युवतियों द्वारा दिये गये सही उत्तरों की संख्या इतनी अधिक पायी गयी कि उनके निष्कर्षों की ओर अनेक शोधकर्ताओं का ध्यान गया। डबलिन विश्वविद्यालय के प्रो. मर विलियम बैरट इंग्लैंड की सोसायटी फौर साइकिकल रिसर्च के अध्यक्ष प्रो. सिजविग व सोसायटी के सदस्यों ने भी क्रीरी के इन प्रयोगों की जाँच की और सामान्य अवस्था में भी विचार सम्प्रेषण को थोड़े से अभ्यास द्वारा सम्भव साध्य बताया।
रेडियो और टी. वी. कार्यक्रमों के प्रसारण में ध्वनि तथा दृश्य को तरंगों में रूपांतरित भर कर दिया जाता है। उन तरंगों को रेडियो या टी. वी. सैट पकड़ते हैं तथा वापस ध्वनि या दृश्य में बदल देते है। विचारों की तरंगें ध्वनि और प्रकाश की तरंगों से बहुत अधिक सूक्ष्म होती हैं। ध्वनि और दृश्य तो कान और आँखों से भी सुने, देखे जा सकते है। इस तरह उनका एक प्रकट स्वरूप भी है परन्तु विचार तो जब तक स्थूल माध्यमों द्वारा व्यक्त नहीं किये जाते तब किसी को उनका पता ही नहीं चलता। अर्थात् स्वरूपतः ही वे सूक्ष्म है और चेतना के निकट भी। पश्चिमी देशों में आजकल इस क्षेत्र में काफी शोध की जा रही है और इसमें काफी सफलता भी प्राप्त हो रही है। यह अनुभव किया जाने लगा है कि टेलीपैथी एकाग्रचित्त, ध्यान के केन्द्रित कारण तथा मानसिक शक्तियों की साधना से सिद्ध की जा सकती है। परन्तु परोक्ष (क्लेयरवायन्स) के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अभी भी मौन है।
डा. एंडरीना पुहरिच ने, जो अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक है, टेलीपैथी पर वर्षों तक कार्य किया तथा उनके आधार पर कुछ सिद्धान्त निष्पादित किये। उनके अध्ययन में आयी दो प्रमुख घटनायें इस प्रकार हैं। सॉलिनॉस (कैलीफोर्निया) निवासी श्रीमती हायेस ने सुबह होते होते एक सपना देखा। उनका पुत्र जॉन हायेस कार में घूमने जा रहा है। रास्ते में कार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। जॉन का शरीर बहुत अधिक रक्त निकल जाने के कारण पीला पड़ गया है। जॉन लेटा हुआ है और उसका शरीर कपड़े से ढका है।” यह सपना देखकर श्रीमती हायेस की नींद टूट गयी और नीचे आकर उन्होंने सेंट जोंस स्टेट कॉलेज में फोन किया जहाँ जॉन पड़ता था। उस समय तक कॉलेज अधिकारियों को ऐसी किसी भी दुर्घटना की जानकारी नहीं थी। उन लोगों को यह भी मालूम नहीं था कि इस समय जॉन कहाँ है?
इस घटना का उल्लेख डा. एण्डरीना पुहरिच ने अपनी पुस्तक “वियाँण्ड टैलीपैथी” में किया है तथा लिखा है कि कॉलेज फोन करने के बाद भी श्रीमती हायेस का चित्त बेहद अशान्त रहा। बारह घण्टे बाद हायेस के फोन की घंटी बजी। हायेस ने फोन उठाया। फोन उसी कॉलेज से आया था और बताया जा रहा था कि कार दुर्घटना में जॉन को चोटें आयीं है। उस समय लगभग साढ़े पाँच बजे का समय था।
श्रीमती हायेस ने भी इस समय स्वप्न में दुर्घटना का आभास प्राप्त किया था। इस घटना और श्रीमती हायेस को हुए परोक्ष आभास की संगति के कारणों का अध्ययन करने के लिए डा. पुहरिच ने जॉन से पूछा कि क्या वह दुर्घटना के समय अपनी माँ के बारे में सोच रहा था तो जॉन का कहना था कि दुर्घटना इतने कम समय में हो गयी कि उसे पास अपनी माँ या किसी और बात के बारे में सोचने के लिए समय ही नहीं था।
इसी पुस्तक में एक और प्रामाणिक घटना का उल्लेख किया गया है। अमेरिका के ही बोस्टन शहर में जैक सुल्लीवान का एक मजदूर खाइयों में लगे पानी के पाइप ठीक करने का काम किया करता था एक दिन वह वाशिंगटन स्ट्रीट में अकेला खाई में पाइप की बैल्डिंग कर रहा था। काम का समय समाप्त हो गया था। तभी खाइयों को बन्द करने वाला एक दस्ता वहाँ आया और उन्होंने यह समझकर कि खाई में कोई नहीं है, खाई को बन्द कर दिया। सुल्लीवान उसी खाई में दब गया।
उस स्थान के पाँच मील दूर काम कर रहे सुल्लीवान के मित्र वेल्डर टामी विटकर को अचानक इस प्रकार की कल्पना आयी कि उसके मित्र को खाई में बन्द कर दिया गया है। टामी का कहना था कि पता नहीं किस प्रकार यह विचार मेरे दिमाग में आया और काम करते-करते ही मैं सोचने लगा कि वाशिंगटन स्ट्रीट जाऊँ और अपने मित्र के बारे में मालूम करूं। मैं वाशिंगटन स्ट्रीट पहुँचा तो मैंने देखा कि वास्तव में गलती से सुल्लीवान खाई में दब गया है और इस बात का किसी को पता नहीं चल सका है। टामी ठीक समय पहुँचा था, उस समय सुल्लीवान अपने जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन रहा था। सुल्लीवानं को खाई खोद कर बचा लिया गया।
“बियाण्ड टैलीपैथी” में डा. पुहरिच ने बताया है कि शरीर की दो अवस्थाएँ दूरवर्ती घटनाओं का आभास करा देती है। पहली दशा को “कोलिनर्जिया” कहा गया है जिसमें शरीर पूर्णतः शिथिल होता है तथा व्यक्ति आराम कर रहा होता है। दूसरी दशा को “एडरेनजिया” बताया गया है, उस स्थिति में शरीर पूरी तरह तनावग्रस्त रहता है। ऐसी स्थिति में शरीर या चेतना सन्देशों का संप्रेषण करती है।
योग साधनाओं द्वारा मनुष्य वह सामर्थ्य भी विकसित कर लेता है जिसमें एक स्थान पर बैठे-बैठे ही दूरवर्ती स्थानों पर क्या हो रहा है? यह जान लेता है। उस स्थिति में व्यक्ति की चेतना शरीर तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि विराट चेतना से एकाकार हो जाती है। जिस प्रकार अँगूठे में आयी चोट की सूचना मस्तिष्क को और वहाँ से रोम-रोम तक पहुँच जाती है, उसी प्रकार विश्व ब्रह्माण्ड के किसी भी क्षेत्र में घटने वाली घटना का प्रभाव वहीं तक सीमित नहीं रह जाता। पानी में फेंके गये ढेले के कारण उठने वाली लहरों की तरह उसकी तरंगें सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं। योग साधनाओं द्वारा परिष्कृत अन्तःकरण और निर्मल चित्त हुए व्यक्ति उन तरंगों को पकड़ने में समर्थ हो जाते हैं। अनायास होने वाली परोक्ष अनुभूतियाँ चेतना की इसी सामर्थ्य का परिचय देती है और व्यक्ति को जड़ में ही उलझे न रहकर उससे भी सामर्थ्यवान चेतन को विकसित करने की प्रेरणायें देती हैं।
भारतीय तत्ववेत्ताओं ने मन सर्वशक्तिमय इन्द्रियातीत ज्ञान का आधार और परमब्रह्म का ही लघुरूप माना है। सामान्यतः हमारे जो भी देखने सुनने में आता है उसके सम्बन्ध में यह प्रतीत होता है कि हमने आँखों से देखा अथवा कानों से सुना। इसी प्रकार सुगन्ध, स्पर्श, रसास्वादन आदि अनुभूतियाँ भी इन्द्रियों के माध्यम से होती हुई दिखाई देती है परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। इन्द्रियों के माध्यम से मन ही अनुभूतियाँ ग्रहण करता है और संवेदनायें व्यक्त करता है। किसी भी दिशा में दृष्टि लगी रहे तो भी मन यदि किसी और विषय में लगा हुआ हो तो वह आँखों से दिखाई देने पर भी नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि मन कही और लगा रहता है।
सोते समय आँखें बन्द रहती हैं फिर भी स्वप्न में चित्र विचित्र दृश्य दिखाई देते है। और उन्हें देखने के लिए नेत्रों का खुला या बन्द रहना कोई महत्व नहीं रखता। कान आस-पास होने वाली ध्वनि को ही सुन पाते है, पर नींद में कानों से भी प्रायः कुछ नहीं सुनायी देता और स्वप्न में ऐसी ध्वनियाँ सुनाई देती हैं जो अपने आस-पास तो नहीं ही होती हैं। यह सब इसलिए कि इन्द्रियों का स्वामी, नियन्त्रण कर्ता, नियोक्ता और उनके माध्यम से ज्ञान तथा अनुभव करने वाला मन ही होता है।
दैनंदिन जीवन में मन की सामान्य शक्तियों का ही अनुभव आभास होता है। परन्तु मन की शक्तियों को किसी सीमा या परिधि में नहीं बाँधा जा सकता है। भारतीय मनीषियों का कथन है कि मन की शक्तियों को ब्रह्मा में तादात्म्य कर हाड़ माँस का मनुष्य भी भगवान के समान हो जाता है। उसकी शक्तियों का आश्चर्यजनक और चमत्कारिक विकास इसी अवस्था में होता है। इसी कारण आत्म विकास के लिए की जाने वाली समस्त साधनाओं में जप ध्यान और एकाग्रता द्वारा मन को ही नियंत्रित संयमित किया जाता है। महर्षि वशिष्ठ ने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘योगवाशिष्ठ में कहा है--’मन सब प्रकार की शक्तियाँ हैं। वह अपने भीतर जैसी भाव करता है क्षण भर में वैसा ही हो जाता है।
योग साधनाओं द्वारा मन की इस शक्ति को विकसित किया जा सकता है तथा विलक्षण शक्तियों का स्वामी बना जा सकता है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान लुई जकालियान ने जो बहुत दिनों तक भारत में रहकर योगविद्या का अध्ययन अन्वेषण करते रहे इस तरह कई उदाहरणों का उल्लेख किया है जिनमें उन्होंने योग के द्वारा मानसिक शक्तियों के अद्भुत विकास की घटना प्रत्यक्ष देखी। लुई जकालियान ने गोविन्द स्वामी नाम दक्षिण के एक योगी के सम्बन्ध में लिख है पानी भरे हुए घड़े को वह दूर बैठकर अपनी मानसिक या शक्ति से आगे पीछे कर देता था और हवा में उड़ा सकता था। उसके आदेश पर जल से भरा हुआ घड़ा भी अधेर में लटक जाता हुआ मैंने देखा हैं। भारती योगियों के इन करतबों को कई लोग मनोरंजन व दृष्टि से देखते है, पर मुझे उस कौतूहल के पीछे किसी व रहस्य की अनुभूति होती है। ऐसा लगता है कि मनुष्य के मन में वह शक्तियाँ हैं जिनका विकास यदि किया जा सके तो मनुष्य जीवन की अनेक गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है।
मास्को (रूस) की एक महिला नेल्या भिखाई लोक सिर्फ घड़ी की ओर देखकर उसका चलना रोक सकते है। वह मेज पर रखे बरतनों और भोज्य पदार्थों को भी खिसका सकती है। दिशासूचक यन्त्र (कम्पास) की सूल जो केवल चुम्बकीय शक्ति [मैगनेटिक फील्ड] से ही प्रभावित होती है। उसे भी अपनी शक्ति से किसी भी दिशा में घुमा देती है। रूस के प्रसिद्ध समाचार पत्रों ‘मास्कोवास्काया’ ने उक्त महिला की इस विलक्षण शक्ति पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- मनुष्य के मन में वस्तुतः विज्ञान से परे विलक्षण शक्तियाँ भी विद्यमान है। उनका विकास कर लिया जाय तो आधुनिक विज्ञान उनके सामने एक छोटा सा बच्चा ही सिद्ध होगा।”
स्थूल शरीर से होने वाली इंद्रिय शक्तियों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक और जीवशास्त्री भी यह मानते हैं कि शरीर में इन्द्रियों की चेतना और उनकी शक्ति का अस्थायी महत्व है। उनकी शक्तियों का असली स्त्रोत तो मस्तिष्क में विद्यमान है। थैलामस नामक एक पिण्डली (गैंगलियन) भीतरी मस्तिष्क में होती है जो मस्तिष्क के केन्द्र में अवस्थित होती हैं। यह स्थान सभी तन्मात्राओं (शब्द, रूप, रस, ग्रन्थि के सूक्ष्म रूप) के ठहरने का स्थान है। यहीं से पीनियल ग्रन्थि निकलती है जो तीसरे नेत्र का काम करती है, “पिट्यूटरी ग्लैण्डस्” और मंडुला ऑफ लोंगलेटा’ शरीर के संपूर्ण अवयवों का नियन्त्रण करती है। ये सब मन से ही सम्बन्धित हैं। मन की सत्ता यद्यपि मस्तिष्क से सूक्ष्म है। फिर भी मस्तिष्क का शरीर में महत्वपूर्ण स्थान है। मस्तिष्क के वह केन्द्र जो ऊपर बताये जा चुके हैं यदि काट दिये जाँय तो शरीर के अन्य सब संस्थान बेकार हो जायेंगे।
भारतीय तत्त्वदर्शन के अनुसार मस्तिष्क मन का स्थूल स्वरूप मात्र है। इससे भी सूक्ष्म और सामर्थ्यवान बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण है जो मस्तिष्क से कई गुना शक्तिशाली है। भौतिक जानकारियाँ संग्रह करने वाले चेतन मस्तिष्क और स्वसंचालित नाड़ी संस्थान को प्रभावित करने वाला अचेतन मस्तिष्क ही अभी तक विज्ञान की परिधि में आया है। मन की सूक्ष्म सत्ता और विलक्षण शक्ति ‘सामर्थ्य का विश्लेषण कर पाने में अभी सफलता नहीं मिल सकी है; फिर भी विज्ञान इतना तो स्वीकार करने ही लगा है कि विज्ञान की परिधि में आने वाली मस्तिष्कीय क्षमता के अतिरिक्त मनुष्य में एक ऐसी क्षमता भी विद्यमान है। जिसे अतीन्द्रिय और अभौतिक कहा जा सकता है। क्योंकि बहुत−सी घटनायें आये दिनों प्रकाश में आती रहती है जिससे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास, परोक्ष दर्शन और अनदेखे भूत, भविष्य वर्तमान का आभास होने तथा उनके अक्षरशः सही उतरने के प्रमाण मिलते रहते हैं।
यह प्रमाण इतने प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किये गये होते है कि उनमें किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश ही नहीं रहती है। गेटे द्वारा अपने निवास स्थान से हजारों मील दूर सिसली में एक भयंकर भूकम्प ही तीव्र अनुभूति-जानेथन स्विफ्ट द्वारा उस समय मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा होने की बात कहता जब वैज्ञानिक मंगल के चन्द्रमा की कल्पना भी नहीं करते थे आदि ऐसी ही घटनायें है। प्रसिद्ध लेखक जे. डब्ल्यू. उने ने अपनी पुस्तक ‘एन एक्स पोर्ट मेण्ट’ विद द टाइम में लिखा है कि क्रेस्टोआ द्वीप में हुए ज्वालामुखी के भयंकर स्फोट की जानकारी उन्हें काफी समय पहले ही हो गयी थी और इस बात को उन्होंने अपने मित्रों को भी बता दिया था।
विकसित मनःचेतना में भविष्य के आभास और परोक्ष दर्शन की ही क्षमतायें विद्यमान हों ऐसा नहीं है। बल्कि मन के द्वारा दूसरों के मनोभाव पढ़ लेने, जो कुछ संसार में हैं उसे प्राप्त कर लेने तथा और भी कितनी ही विलक्षण जानकारियाँ, उपलब्धियों के अतिरिक्त जिन्हें सिद्धियाँ भी कहा जा सकता है और भी कई विलक्षणतायें हैं जो न तो पूरी तरह उल्लेखित की जा सकती हैं और नहीं उनके बारे में कुछ बताया जा सकता है।
अभी तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कम्प्यूटर को इसीलिए आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता है कि वह घण्टों में हल किया जाने वाला कोई प्रश्न सेकेंडों में हल करके रख देता है, परन्तु कुछ वर्षों पूर्व दक्षिण भारत को एक साधारण महिला ने कम्प्यूटर को भी पछाड़ दिया। बैंगलौर की रहने वाली शकुन्तला देवी बिना एक क्षण का विलम्ब किये गणित का जटिल से जटिल प्रश्न भी सामने रखते ही उसका उत्तर बता देती है। लन्दन में उनके इस कार्यक्रम का टेलीविजन पर प्रदर्शन किया गया और ब्रिटेन के बड़े बड़े वैज्ञानिकों ने उन्हें गणित का जादूगर कहा।
कुछ महीनों पूर्व ही एक जैन मुनि अमेरिका गय। तो उनके अवधान प्रयोग वहां चर्चा का विषय रहे वे भी गणित की सात आठ संख्याओं का इतनी ही संख्याओं से गुणनफल कुछ सेकेंड में बता देते थे जब कि कागज पेंसिल लेकर बैठे लोग घंटों तक उन सवालों को करने बैठे और जो हल उन्होंने निकाले वे अक्षरशः सही निकले। जैन मुनियों द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले अवधान प्रयोग कही भी देखे जा सकते हैं और इसके पीछे कोई रहस्यमय सिद्धियाँ नहीं होतीं बल्कि मुनि स्वयं घोषित करते हैं कि यह मनकी शक्तियों को साधने का कमाल है।
इन उदाहरणों और घटनाओं द्वारा मन की शक्तियों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। अध्यात्मविदों ने मन की इन शक्तियों को आत्मसाधना की उपलब्धि, आत्मा का वरदान ही कहा है। इन्हीं बातों को देख कर वैज्ञानिक शरीर में आत्मा जैसी किसी सर्व व्यापक शक्ति के अस्तित्व की बात स्वीकार करने लगे हैं। भले ही अभी उसका विस्तृत अध्ययन कर पाना सम्भव न हो पाया था। अमेरिका के प्रसिद्ध जीव शास्त्री और चिकित्सा विज्ञान के माने हुए पण्डित डाक्टर एम. डी. कुले ने वर्जीनिया के मेडिकल कॉलेज में व्याख्यान देते हुए बताया था कि - मनुष्य के जीवन का आधार केन्द्र हृदय नहीं वरन् मस्तिष्क है। यद्यपि मस्तिष्क का सम्पूर्ण विश्लेषण अभी नहीं किया जा सका है, पर यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि मनुष्य की जीवन चेतना विज्ञान के स्थूल उपकरणों से नहीं समझी जा सकती।
इस तथ्य को भारतीय ऋषियों और योगियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही जान लिया था। आज भी समाधि अवस्था में आत्म चेतना को ब्रह्माण्ड (मस्तिष्क) में चढ़ा कर विना साँस लिए कहीं भी दवे पड़े रहने के सैकड़ों प्रयोग सफलता पूर्वक किये जाते हैं। इन प्रयोगों के आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य के शरीर में प्रत्येक सेल के भीतर उस सामूहिक प्रक्रिया का नाम ही जीवन या मन है और उसमें सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता के लक्षण विद्यमान है।
योगवाशिष्ठ में भगवान राम ने महर्षि वशिष्ठ को बताया है- “जैसे बीज के भीतर पुष्प, शाखा और पत्तों की तथा मृत्तिका में घट की सम्भावना छिपी रहती है, जड़ पदार्थ के भीतर भी वासना विद्यमान रहती है। जड़ पदार्थों में विद्यमान वासना की तरह ही संसार की सब वस्तुओं के भीतर भी चित्त (मन) विद्यमान है। यह शक्ति सम्पूर्ण जड़ चेतन में वासना के रूप में सोई हुई उसके रस के रूप में सदैव वर्तमान रहती है। (3140120)”
उपरोक्त पंक्तियों में शास्त्रकार ने जहाँ एक महान दार्शनिक सत्य को उद्घाटित किया है वहीं उसका विश्लेषण भी कर दिया है। अर्थात् संसार में जितनी भी धातुयें या पदार्थ हैं चेतना (मन) उन सबसे सूक्ष्मतम है। वह मनुष्यों में वासना के रूप में सोयी रहती हैं किंतु यदि उसे संयमित कर लिया जाय तो मनुष्य अपने में उन सभी शक्तियों को विकसित देख सकता है; जिनकी कल्पना हम परमात्मा में करते हैं। अर्थात् वासनाओं से उन्मुक्तमन ही ईश्वर हैं।
मन में इस तरह की असंख्य सामर्थ्यों का भण्डार छुपा हुआ है। मन ही जीवन है, मन ही सब सिद्धियों का साधन है, मन ही देवता और भगवान् है। मन का पूर्ण विकास ही एक दिन मनुष्य को अनन्त सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी बना देता है पर इस दिशा में कठोर आत्म संयम, साधना तपश्चर्या के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
राबिया कई सन्तों के संग बैठकर बातें कर रही थी तभी हसन बसरी [सूफी संत] वहाँ आ पहुँचे और राबिया से बोले-चलिये झील के पानी पर बैठकर हम दोनों बातें करें।
हसन के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त थी। राबिया तो सब सिद्धियों को करतलगत कर ही चुकी थी फिर भी वह गम्भीर होकर बोली-भैया! जो तुम कर सकते हो वह तो एक मछली भी कर सकती है और मैं हवा में उड़ सकती हूँ तो वह तो एक मक्खी भी कर सकती है। सत्य चमत्कारों से बहुत ऊपर है। उसे सिद्धियों के अहंकार से नहीं, समर्पित विनम्रता से ही खोजना चाहिए।
शूरसेन राज्य की सीमाएँ विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी। उस राज्य के अधिपति ये सम्राट चित्रकेतु संत और साधु प्रकृति के साथ प्रतापी, पराक्रमी भी थे। उन्हें किसी बात का अभाव नहीं था। चिन्ता थी तो इस बात की कि उनके बाद इस साम्राज्य का क्या होगा? क्योंकि उनके कोई सन्तान नहीं थी। एक दिन महर्षि अंगिरा चित्रकेतु के पास राजभवन में आये। राजा की चिंता और व्यथा को देख कर अंगिरा ने चित्रकेतु को पुत्रेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया।
पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ और यज्ञशेष हविष्यान्न राजमहिषी कृत द्युति को दे दिया। जाते जाते महर्षि कहते गये- राजन! आपके एक पुत्र तो होगा किंतु वह आपके हर्ष तथा शोक दोनों का कारण बनेगा।’
राजमहिषी कृत द्युति गर्भवती हुई। उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। उत्तराधिकारी की चिंता मिटी और इस उपलक्ष्य में पूरे राज्य भर में उत्सव हर्षोल्लास मनाया गया। वर्षों तक राज्य करते रहने और अब प्रौढ़ता की ओर अग्रसर होते जा रहे चित्रकेतु के यहाँ सन्तान का जन्म हुआ था सो उनके हर्ष का पारावार न रहा और उल्लास उमड़ पड़ा। पुत्र के स्नेह वश वे प्रायः कृतद्युति के आवास में ही अधिकाँश समय व्यतीत करते थे। पुत्रवती बड़ी रानी पर उनका एकाँत अनुराग हो गया था। फलतः दूसरी रानियाँ कुढ़ने लगी।
पति की उपेक्षा से उत्पन्न हुए, क्षोभ ने द्वेष का रूप धारण कर लिया। उन्होंने सोचा कि राजा कृत द्युति पर विक्षेप स्नेह इसलिए रखते हैं कि उसने संतान को जन्म दिया है। यह नवजात शिशु ही उनकी उपेक्षा का कारण है। अन्त में सबने मिलकर उस अबोध शिशु को विष दे दिया-और वह बालक मृत्यु का ग्रास वन गया।
महारानी कृतद्युति और सम्राट चित्रकेतु के लिए तो यह अनभ्र बज्रपात था। वे बालक के शव के पास ही कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़े। पूरे राजसदन में क्रंदन होने लगा। रुदन क्रंदन से भरे उस राजभवन में शोक छाया रहा। चित्रकेतु ने अपने पुत्र का अन्तिम संस्कार भी नहीं कराया था। उसी समय महर्षि अंगिरा और महर्षि नारद आये। अंगिरा ने समझाया कि-इस मृतदेह से अब क्या आसक्ति रखना इसकी अंत्येष्टि करवा दो। राजन्! जो भाग्य में नहीं होता है उसे बचाया नहीं जा सकता।
चित्रकेतु ने कहा-”नहीं महात्मन्! ऐसा मत कहिये मैं अपने प्रिय पुत्र को प्राण दे कर भी पुनः प्राप्त करना चाहता हूँ। आप इसे पुनर्जीवित कर दीजिये।
बहुत समझाने पर भी चित्रकेतु नहीं माने तो महर्षि अंगिरा ने अपने तपोबल से उस शिशु का आत्मा को आमंत्रित किया और बालक जी उठा। देवर्षि नारद ने कहा-लो राजन् तुम्हारा पुत्र जी उठा।
अपने पुत्र को जीवित देख कर राजा चित्रकेतु तथा महारानी कृतद्युति ‘हा पुत्र’ कह कर उसे अपनी छाती से लगाने दौड़े।
‘कौन पुत्र? -उस बालक ने कहा- देवर्षि ये लोग कौन हैं?’ बालक ने नारद से कहा।
“यह तुम्हारे माता पिता है’’ नारद बोले।
तब बालक ने कहा- “नहीं मैं जीवात्मा हूँ। शरीर ही पुत्र हो सकता है। सारे सम्बन्ध शरीर के ही है जहाँ शरीर से सम्बन्ध छूटा वहीं सब सम्बन्ध छूट जाते हैं। यह कर कर शरीर फिर निष्प्राण हो गया। चित्रकेतु का जैसा सारा मोहावरण नष्ट हो गया। वे पुत्र के शव का अन्तिम संस्कार संपन्न करके लौटे तो देवर्षि नारद ने कहा- अनात्म वस्तु में सम्बन्ध करना ही शोक का कारण है अतः किसी के लिये आसक्ति न करते हुए अपने कर्त्तव्य कर्मों को भली−भांति पूरा करते चलना ही संसार में सुखी रहने का सर्वोत्तम साधन है।
जीवन में प्रायः रोज ही इस तरह की घटनायें घटित होती है। जिनमें से कुछ के कारण प्रफुल्लता और आह्लाद फूट पड़ने लगता है तथा कुछ को देखकर क्षोभ होने लगता है जो घटनायें स्वयं स सम्बन्ध रखती है, उनमें से कई घटनाओं के कारण खेद, क्षोभ, क्रोध, उत्तेजना, दुःख, विषाद और रोष जैसे भाव उत्पन्न होने लगते है। इन भावनाओं को-जिनके कारण शरीर तन्त्र उत्तेजित हो उठता है-संवेग कहते हैं और इनकी प्रतिक्रिया का केन्द्र, मस्तिष्क होता है।
मस्तिष्क चूँकि सारे शरीर का नियन्त्रणकर्ता और संचालक है अतः वहाँ होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव भी निश्चित रूप शरीर पर पड़ता है। इन मानसिक संवेगों का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? मनोवैज्ञानिकों के लिए यह सदा से ही अनुसंधान का विषय रहा है और इस दिशा में जो खोजें की गयी उनसे विभिन्न शारीरिक समस्याओं को सुलझाने में भी सहायता मिली।
सम्वेदना और भावनाओं में आने वाली उत्तेजना के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले तनाव में पिट्यूटरी तथा ऐड्रनेल ग्रन्थियों द्वारा सोमोटोट्राफिक हार्मोन तथा डेसोक्साइकोटि कोस्टेरोन नामक हार्मोन उत्साहित होते है। फलतः तनाव के कारण सरदर्द, उच्च रक्तचाप, रूमेटिक अर्थराइट्स, गैस्ट्रिअल्सर, हृदयरोग तथा अन्य कितने ही विकार रोग उत्पन्न होते हैं।
क्रोध, घृणा, कुण्ठा अथवा निराशा के रूप में मानसिक तनाव या दबाव के कारण न केवल भोजन देर में पचता है, वरन् उससे पेट की अन्य गड़बड़ियाँ भी उत्पन्न हो सकती है यहाँ तक कि अल्सर भी और आदमी में वृद्धावस्था के लक्षण प्रकट होने लगते है।
शरीर संस्थान पर मनोविकारों के ऐसे कितने ही दुष्प्रभाव पड़ते है और उन सभी मनोविकारों के क्रोध सर्वाधिक विषैला तथा तुरन्त प्रभाव डालने वाला मनोविकार है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डा. केनन ने संवेगों के मनुष्य शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने के लिए अनेकों प्रयोग किये और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पाचन रस और अंत्रस्राव पर संवेगों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। जब संवेग तीव्र होता है तो अन्तः स्राव कम होने लगता है और पाचन क्रिया में गड़बड़ी होने लगती है। जब संवेग ठीक रहते है तो पाचन क्रिया भी ठीक−ठाक चलने लगती है। अन्तः स्राव किस परिमाण में होता है यह संवेगों के स्वभाव पर ही निर्भर करता है। भय का संवेग तीव्र होने पर इसका प्रवाह कम परिमाण में होता है और क्रोध का संवेग तीव्र होने पर अधिक।
क्रोध चूँकि एक उत्तेजनात्मक आवेग है अतः इसका कुछ प्रभाव तो तुरन्त ही देखा जा सकता है, जैसे आँखों में लाल डोरे तन जाते है, शरीर काँपने लगता है, हृदय की धड़कनें बढ़ जाती है आदि। क्रोध के कारण होने वाली शारीरिक शक्ति ह्रास को जानने के लिए डॉक्टर अरोल और डा. केनन ने अनेक परीक्षण किये और इस परिणाम पर पहुँचे कि क्रोध के कारण उत्पन्न होने वाली विषाक्त शर्करा पाचन शक्ति के लिए सबसे खतरनाक है। यह रक्त को विकृत कर शरीर में पीलापन, नसों में तनाव, कटिशूल आदि पैदा कर देती है। क्रोधाभिभूत माँ का दूध पिलाने पर बच्चे के पेट में मरोड़ होने लगती है और हमेशा चिड़चिड़ी रहने वाली माँ का दूध कभी-कभी तो इतना विषाक्त हो जाता है कि बच्चे को जीर्णरोग तक हो जाते है।
न्यूयार्क के कुछ वैज्ञानिकों ने चूहे के शरीर में क्रोध से उत्पन्न विषाक्तता का “परीक्षण किया था। उन्होंने देखा कि ‘बाईस मिनट बाद चूहा मनुष्य को काटने दौड़ा, पैंतीसवें मिनट पर उसने अपने को ही काटना शुरू कर दिया और एक घण्ट के भीतर पैर पटक-पटक कर मर गया।
क्रोध से शारीरिक शक्ति का ह्रास होता है तो मानसिक शक्ति भी क्षरित होती है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनःचिकित्सक डा. जे. एस्टर नामक वैज्ञानिक ने क्रोध के कारण होने वाली मानसिक शक्ति के ह्रास के संबंध में कहा है- “ पन्द्रह मिनट क्रोध के रहने से मनुष्य की जितनी शक्ति नष्ट होती है उससे वह साधारण अवस्था में नौ घन्टे कड़ी मेहनत कर सकता है। शक्ति का नाश करने के साथ क्रोध शरीर और चेहरे पर अपना प्रभाव छोड़कर उसके स्वास्थ्य व सौंदर्य को भी नष्ट कर देता है। शरीर में जहाँ-तहाँ नीली नसें उभर आती है, जवानी में ही बुढ़ापे के चिन्ह प्रकट हो जाते है, आँख की कटोरी के नीचे काली धारी और गोलक में लाल डोरे पैदा हो जाते है।
कईबार लगता है कि क्रोध उत्पन्न होने के लिए हम उतने जिम्मेदार नहीं है जितनी कि परिस्थितियाँ। वैसी स्थिति में क्रोध पर नियन्त्रण करने और उसके कारण उत्पन्न होने वाले तनाव से अपने आपको बचाये रखने के लिए क्या करना चाहिए? इस तरह की समस्याओं के मनोवैज्ञानिक समाधान सुझाते हुए अमेरिका के प्रसिद्ध मानस चिकित्सक डा. जार्ज स्टीवन्सन और डा. विन्सेण्ट पील ने स्नायविक तनाव दूर करने के उपायों पर एक पुस्तक लिखी है ‘लाइफ, टेन्शन एण्ड रिलेक्स।’ इस पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर सिद्धान्त रूप में तीन वाक्य लिखे है- “क्रोध आये तो किसी भी प्रकार के शारीरिक श्रम में लग जाओ। किसी काम का विपरीत परिणाम निकले तो स्वाध्याय या मनोरंजन में लग जाओ तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम को अनिवार्य समझो।”
क्रोध के समान ही चिन्ता, दुःख व्यथा और अन्यान्य संवेगों को नियन्त्रित करना भी सीखना चाहिए। जीवन के प्रति सन्तुलित दृष्टिकोण अपनाने वाले व्यक्ति ही मानसिक संवेगों को तटस्थ या सन्तुलित भाव से ग्रहण कर सकते है। फिर भी किन्हीं अवसरों पर जब अनियन्त्रित संवेग उत्पन्न होने लगें तो वैसी स्थिति में शरीर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को जबरदस्ती दबाना नहीं चाहिए। इन प्रभावों को भी संवेगों के भार से मुक्त करने का एक अचूक उपाय बताया गया है। न्यूयार्क के एक विश्वविख्यात मनोरोग चिकित्सक डा. विलियम ब्रियान ने यह मत व्यक्त किया है कि- ‘आँसू, दुःख, चिन्ता, क्लेश व मानसिक आघातों से मुक्ति दिलाने तथा मन को हल्का-फुल्का बनाकर आकस्मिक हुई मनःव्यथाओं को सहने में सहायता पहुँचाते हैं।’ अमेरिकी औरतों का उदाहरण देते हुए डा. ब्रियान ने कहा है कि- मर्दों की अपेक्षा औरतों की लम्बी आयु का रहस्य यह है कि वे खूब रोती है। वे ऐसी फिल्में देखने की शौकीन है कि जिनमें बार-बार रोना आता है। इस तरह आँसू लाने से जीवन लम्बा हो जाता है। क्योंकि रोने के कारण व्यक्ति की दबी हुई भावनाओं को बड़ी राहत मिलती है। रोने के कारण दमित भावनाओं के निष्कासन से ब्रण तथा हृदय के रोगों में भी लाभ पहुँचता है।
भारतीय धर्मदर्शन ने जीवन जीने की ऐसी पद्धति को विकसित किया है कि उसमें भावनाओं के अनियन्त्रित उभार, असन्तुलन तथा मानसिक तनाव जैसी परिस्थितियों का शिकार होने से अपने आप बचाव हो जाता है। जैसे कहा गया है कि जीवन और जगत् की प्रत्येक घटना को प्रभु की लीला, अनुकम्पा मानकर चलना चाहिए। सुख-दुःख में सन्तुलित, मान अपमान में लाभ हानि में सन्तुलित व्यक्ति सुखी रहता है। गीता में कहा भी गया है ---
सुख दुखे समेकृत्वा लाभा लाभौ जया जयौ। निरार्शीयत चित्तात्मा ज्ञेयः स नित्य सुखी॥
तथा दूसरा वह व्यक्ति इन घटनाओं के प्रति सन्तुलित रह सकता हैं जो किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता। जिस ढंग से भी हो जीवन में संतुलन को साधना चाहिए। सुख और शान्ति और आशाप्रद भविष्य की सम्भावनायें इसी सन्तुलन में निहित है।
सुख का एक द्वार बंद होता है तो दूसरा खुल जाता है। परन्तु बहुधा हम बंद दरवाजे को ही ताकते पछताते रहते हैं। नये खुले द्वार की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। -हेलन फेलर
विश्व के परदे पर प्रकाशित होने वाले महापुरुषों की सफलता एवं उनकी महानता का आधार उनका श्रेष्ठ आदर्श चरित्र रहा है। इस अक्षुण्ण सम्पदा के आधार पर ही मानव-महात्मा, युगपुरुष, देवदूत अथवा अवतार स्तर तक ऊँचा उठने में समर्थ होता है। ऐसी ही चरित्रनिष्ठ व्यक्तित्वों ने विश्व वसुन्धरा को अभिसिंचित कर इस विश्व उद्यान की श्री-वृद्धि की है। उसने मानव की गरिमा को बढ़ाकर महान कार्य सम्पादित किया हैं ‘ऐसे ही व्यक्ति प्रकाश स्तम्भ की भाँति स्वयं प्रकाशित रहते हुए अन्यों को प्रकाश एवं प्रेरणा देने में सक्षम होते हैं। उनके पार्थिव शरीर भले ही जीवित न हों, उन उनका अमर यश सर्व-साधारण के लिए हमेशा प्रकाश दीप वन कर युग-युग तक मार्गदर्शन करता रहेगा, वे जन श्रद्धा के अधिकारी बने रहेंगे।
ऐसे ही चरित्रवान पुरुषों को भगवान की संज्ञा दी गई है। शास्त्रों में भी इसका समर्थन है।
पुन्योपदेशी सदयः केतवैश्व विर्वार्जतः। पापमार्ग विरोधी च चत्वारः केशवोपमाः॥ (पद्म पु. सं. 7 वा. अ. 1)
-धर्मोपदेशक, दयावान्, छल−कपट से शून्य, पापमार्ग के विरोधी ये चारों भगवान के समान है।
अन्य दुखे नयो दुखियोऽन्य हर्षेण हर्षितः। स एवं जगतामीशे नर रूप धरों हरि॥ (नारद पु. पूर्वखण्ड अ. 7)
-अन्यों के दुःख से दुःखी, दूसरों के हर्ष में जो हर्षित होता है, वह व्यक्ति नर के रूप में जगत का ईश्वर भगवान है।
मानवीय गरिमा की वृद्धि करने वाली सम्पत्ति में चरित्र की सम्पदा का ही नाम अग्रगणी हैं। अन्य सम्पत्ति इससे कम महत्व की है। इस सम्पत्ति का धनी अन्य प्रकार की भौतिक सम्पत्तिवानों के हृदय पर अपना प्रभुत्व जमा सकता है। चरित्रवान व्यक्ति अपनी मौन भाषा से ही समाज को उपदेश देता है। ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में आने वाले व्यक्ति सन्तोष का अनुभव करते हैं। जिन व्यक्तियों के संपर्क में अन्यों को सन्तोष मिलता है, वे व्यक्ति जनश्रद्धा के पात्र होते हैं। वे ईश्वर स्वरूप कहे गये है।
ज्ञान रत्नैश्च रत्नैश्च पर सन्तोष कृन्तरः। सज्ञेयं ‘सुमतिर्नूनं नररुप धरो हरिः॥ (पद्म पुराण)
-ज्ञान जैसे रत्नों से और द्रव्यादि से जो दूसरों को सन्तुष्ट करता है ऐसे मनुष्य को तनधारी भगवान समझना चाहिए।
आत्मोत्कर्ष के मार्ग में चरित्र निष्ठ का सम्बल पाकर ही बढ़ा जा सकता है। इसमें बाधक बनने वाले रोड़ों तथा कंटकों में इन्द्रिय लिप्सा तथा वासनाएँ प्रमुख है इनके ऊपर अंकुश न रखा गया तो चरित्र भ्रष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है। वासना के थोड़े से झोंके में आचरण की नींव न हिल जाय इसके लिए इन्द्रियों पर अंकुश रखा जाय। इन्द्रियों पर अंकुश रखा जाना ही चरित्र उत्कृष्टता का आधार हैं जिसका कारण श्रेष्ठतम स्तर का बन सकता हैं। शास्त्रों में इसकी महत्ता स्वीकार की गई है।
द्वय यस्य वशे भूपात् स एव स्याज् जनार्दनः। (वैशाख महात्म्य 22)
-कामेन्द्रिय और जिह्वा ये दोनों जिसके वश में में वह भगवान है।
अलोल जिहृ समुपरिस्थतो धुति निधान चक्षुर्घगमायमेवतन्। मनवचान। च निगृहय चंचलं, भयंनिवृन्तोमम भक्त उच्चते।
(महाभारत)
जिसकी वाणी चंचल नहीं है अर्थात् जो व्यर्थ बकवाद से रहित है, जो भोजन में आसक्त नहीं है तथा धीरज धारण करने वाला (सुख दुःख में समान) है, जिसकी बुद्धि चंचल नहीं है, दूर दृष्टि रखने वाला है, मन वाणी जिसकी संयमित है, जो कर्त्तव्य पालन में सदा निर्भय रहता है वह मेरा भक्त मेरा ही स्वरूप है।
आचरण के अंतर्गत आने वाले गुणों से सम्पन्न व्यक्ति उन सभी धनी लोगों से अधिक श्रेष्ठ होता है जिसके पास भौतिक सम्पत्ति का भण्डार भरा है। आध्यात्मिक सद्गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को ब्रह्म स्वरूप कहा गया हैं।
अनाढ़यामानुषेविन्ते आढ़या-वेदेषु चे द्विजाः ते दुर्द्धषी दुष्प्रकम्प्या विधात् तान-ब्रह्माणस्तनुय॥
महा. भा. उ. अ.4139
-जो द्विज भौतिक सम्पत्ति के धनी (सुवर्णपुत्र सिद्धि) नहीं है और आध्यात्मिक सम्पत्ति (अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, शम, दम आदि) के धनी हैं वे विवेकवान व्यक्तियों के मत से ब्रह्मा के शरीर हैं। वे बड़े तेजस्वी तथा दुष्प्राप्य हैं।
चरित्र-विकास जीवन का परम उद्देश्य है। इसी के आधार जीवन लक्ष्य प्राप्त होता है। इस सम्पदा के प्राप्त हो जाने पर ही जीवन का आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। यही सम्पत्ति वास्तविक, सुदृढ़ और चिरस्थायी होती है।
चिकित्सा-विज्ञान की आधुनिक खोजें मानव-शरीर की छान-बीन करती हुई मन और अन्तःकरण के छोर तक जा पहुंचा है। आज मनोविज्ञान भी चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों का एक अध्ययन विषय होता है। आज वैज्ञानिक- चिकित्सक एक स्वर से यह मान रहें है कि शारीरिक रोगों में अच्छा-खासा हिस्सा मानसजन्य रोगों का होता है। इसीलिए आज कई असाध्य रोगों में डॉक्टर किसी रोगी के साथियों- शुभचिन्तकों को आस्था चिकित्सा यानी “फेथ-हीलिंग” की अनुमति सहर्ष दे देते है। जबकि कुछ वर्षों पूर्व तक इसे घोर अन्ध विश्वास मानकर इसके नाम पर ही शिक्षित वर्ग में उपहास और तिरस्कार का भाव तैर जाता था। इसका कारण मात्र यही है कि मनुष्य की आस्था को उसे प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति अब पुनः माना जाने लगा है। रोगी की आस्था यदि किसी स्थान या व्यक्ति अथवा क्रिया-विशेष के प्रति गहरी हुई तो उस पर उसका लाभ-दायक प्रभाव अवश्यंभावी है।
आस्था-चिकित्सा (फेथ-हीलिंग) और चमत्कार से उपचार (मिरेकिल-हीलिंग) की पद्धतियाँ विश्व के हर समाज तथा काल-खण्ड में किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है। प्रत्येक धर्म और सम्प्रदाय में पूजा व आस्था के कुछ प्रतीक होते हैं। प्रतीक-पूजा और आस्था-पूजा के तत्व भारत समेत सम्पूर्ण एशिया, यूरोप, अफ्रीका, अमरीका, आस्ट्रेलिया हर कही पाये जाते है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की आज की सर्वाधिक विकसित स्थिति वाले देश अमरीका में इन दिनों पुनः ‘फेथ-हीलिंग’ अधिकाधिक लोक प्रिय हो गई है। मनोविज्ञान द्वारा व्यक्ति के अवचेतन मन के शक्ति को प्रतिपादन और वहाँ जमी आस्थाओं के आश्चर्यजनक परिणामों के विश्लेषण ने इस प्रक्रिया को तेज किया है।
दक्षिणी पश्चिमी फ्राँस में एक शहर है लुर्द। यह रोमन कैथालिकों का एक प्रमुख तीर्थस्थान है। यहाँ एक गरीब किसान परिवार में एक कन्या जन्मी। नाम रखा गया-बनोंदे सुविरोस। 14 वर्ष की आयु से इस लड़की को भावनात्मक अनुभूतियाँ होने लगीं।
ईसा मसीह की माँ जो कुमारी थीं और “वर्जिन मेरी” के रूप में जानी जाती हैं, उनके सुविरोस को दर्शन होने लगे। वे इस लड़की को सन्देश देतीं। यह बात चारों तरफ फैली। ईसाई पुरोहितों ने इसका उग्र में विरोध किया। 16 अप्रैल 1879 को 36 वर्ष की उम्र में यह लड़की मर गई। पर मरकर भी वह अमर हो गई। उसकी स्मृति में वहाँ जो समाधिस्थान बनाया गया, वह तीर्थ बन गया। लाखों लोग वहाँ आने तथा रुकने से असाध्य रोग अच्छे हो जाते हैं।
अनेक लोगों ने इसे अन्ध-विश्वास का विस्तार बताते हुए तीखी आलोचना की और सरकार से इसमें हस्तक्षेप का अनुरोध किया। आलोचकों का कहना था कि यहाँ इतनी बड़ी संख्या में लोग आते हैं तो व्यापारियों को मनमाने दाम में सौदे बेचकर लाभ लूटने का एक जरिया निकल आया है।
फ्राँस-सरकार ने इस बात की जाँच के लिए एक जाँच-आयोग गठित कर दिया जो यह पता लगाये कि वहाँ आने वाले रोगियों को वास्तविक लाभ होता है या नहीं। आयोग में चिकित्सक मनोवैज्ञानिक व समाजशास्त्री भी थे। अनेक मामलों की विस्तृत छान बीन के बाद आयोग ने पाया कि यह बात पूर्णतः सत्य थी कि कई असाध्य रोगी लुर्द पहुंचने पर ठीक हो जाते थे। 19 वीं 20 वीं शताब्दी में सरकारी तौर पर इस प्रकार की जाँच का यह एकमात्र मामला है, जिसमें आस्था के चमत्कारी परिणामों की ही पुष्टि हुई। यों सामान्यतः सरकारें जीवित व्यक्तियों की प्रसिद्धि की असलियत की तो छान बीन करता हैं; किन्तु तीर्थ स्थानों या विशेष स्थलों को लेकर कोई खोज-पड़ताल नहीं करती।
रोगों के दो वर्ग है। शारीरिक और मानसिक। पहले को ‘व्याधि’ और दूसरे को ‘आधि’ कहते हैं। खाँसी, सर्दी दमा, कब्ज, मधुमेह जैसे रोग स्पष्टतः शारीरिक होते है। जबकि सनक, विस्मृति, विसंगतियाँ, उलझनें, कुँठाएँ, मूढ़ता, उन्माद आदि मानसिक रोग हैं। शारीरिक योग भी प्रायः मानसिक अस्त--व्यस्तता के ही परिणाम होते हैं। यदि ऐसा न भी हुआ, बाहरी कारण से रोग हो गया तो भी उसकी पीड़ा-व्यथा सहनी मन को ही पड़ती है। चिकित्सा क्रम में यदि मन ही हार मान बैठे, हिम्मत टूट जाये, तो शारीरिक शक्ति ढीली पड़ जाती है और प्रकृति भीतर ही भीतर रोग को दूर करने का काम कर रही होती हैं, उसको प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। आस्था-चिकित्सा से व्यक्ति-मन में नयी आस्था, नये विश्वास का संचार हो जाता है। तब उपचार से शीघ्र आराम मिलता है। यदि रोग मानसिक ही हुआ, तब तो आस्था का संचार उसकी रामबाण औषधि सिद्ध होने वाला ही है।
इस तथ्य को समझने पर स्पष्ट हो जाएगा कि आस्था चिकित्सा वस्तुतः कोई बाहरी चमत्कार है। जन-सामान्य अधिक अंतर्मुखी नहीं होता। अतः वह अपनी ही आस्था के इन चमत्कारों को बाहर आरोपित कर देता है।
आस्था मस्तिष्क की ऊपरी परत से नहीं, चेतना की मूल प्रवृत्ति के मर्मस्थल अन्तःकरण से सम्बन्धित होती है। इसीलिए बौद्धिक रूप में बाहरी आस्था-केन्द्रों में विश्वास न करने वाले तथा इन्हें अन्ध विश्वास मानने वाले प्रबुद्ध लोग भी किन्हीं विशेष संकट के अवसरों पर इन आस्था-केन्द्रों से लाभ उठाते देखे जाते हैं। उनके अंतर्मन में जमी आस्था की गहरी परतें ऐसे मौकों पर प्रभावी सिद्ध होती हैं
प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का मूल स्त्रोत आस्थाओं में सन्निहित रहता हैं इसी आस्था केन्द्र से उमंगों और इच्छाओं का उद्भव होता है। ये इच्छाएँ उमंगे ही विचारणा और क्रिया को जन्म देती हैं। इस प्रकार मनुष्य के कार्यों का ही नहीं, विचारों और इच्छाओं तक का उद्गम आस्था-मान्यता के चेतन-केन्द्र से होता है। इस केन्द्र से जैसी लहरें स्फुरणाएँ उठेंगी, वैसा ही चिन्तन और कर्म होगा। उसी के अनुसार व्यक्तित्व समुन्नत अथवा पतित बनता चला जायेगा।
उन्माद, विस्मृति जैसे असामान्य लक्षणों की ओर तत्काल ध्यान चला जाता है। किन्तु अनैतिकता, छल, प्रपंच, बेईमानी, अश्लीलता, अनाचार की प्रेरणाएँ भी मानसिक विकृतियों का ही परिणाम हैं। ये विकृतियाँ आस्था-केन्द्र में घुसी विकृति का ही परिणाम होती हैं। इसीलिए आस्था-केन्द्रों, प्रतीकों, पूजा स्थलों से मिलने वाला वह लाभ बहुचर्चित रोगों के उपचारों से कई गुना अधिक है। जो मनुष्य के भीतर सद्विचारों, सद्भावनाओं को जागृत करता और बढ़ाता है। अच्छे पवित्र विचारों तथा उत्कृष्ट भाव-संवेदनाओं की प्रवाहित करने की आस्था-केन्द्रों की सामर्थ्य ही उनकी वास्तविक विशेषता है।
आस्थाओं के भले ओर बुरे, दोनों ही रूप होते है। वे विधेयात्मक भी होती है, निषेधात्मक भी। विधेयात्मक आस्था व्यक्ति में उत्कृष्ट विचारों, पुण्य-प्रवृत्तियों और श्रेष्ठ उदात्त भावनाओं को जगाती-बढ़ाती है। निषेधात्मक आस्थाएँ आदमी में निष्क्रियता, निरुत्साह परावलम्बन, मिथ्याभय, अविवेक और संकीर्णता को बढ़ाती पोसती हैं तथा क्रूरता एक को प्रोत्साहन देती है। क्योंकि संकीर्णता का अनिवार्य परिणाम क्रूरता होता है। विधेयात्मक श्रद्धा उत्कर्ष के नित नये आधार प्रस्तुत करती है, निषेधात्मक श्रद्धा पतन की ओर तेजी से धकेलती है।
शकुन विचार, प्रेत-चर्चा, ग्रहदशा-विचार पहले उत्साह और प्रेरणा प्रदान करने के लिए फैलाये गये थे। यह उनकी उस समय की चर्चाओं के ढंग से पता चलता है। अब इन्हीं का उपयोग मूढ़ता, निकम्मापन अन्धकार, आलस्य और पर निर्भरता फैलाने के लिए किया जाता है। अनेक ज्योतिषी और तान्त्रिक इन दिनों मनुष्य की इसी श्रद्धा का दोहन कर उसमें निषेधात्मकता बढ़ाते है। यह आस्था की प्रभाव-क्षमता का दुरुपयोग है। जबकि संत-महात्मा, साधु, ब्राह्मण महामानव, व्यक्ति की विधेयात्मक आस्था को, उसके प्रसुप्त देवत्व को जगाकर उस शक्ति का सदुपयोग करते है और डाकू को महाकवि, वैश्या को विदुषी धर्मनेता तथा युद्धलोलुप सम्राट को शान्ति सद्भावना का अग्रदूत बना देते हैं। वाल्मीकि, अम्बपाली अशोक जैसा के जीवन की घटनाएँ विधेयात्मक आस्था के चमत्कार का परिणाम हैं। जबकि जाति उपजाति के भेदों में पिसते रहने, अपने और समाज के वास्तविक उत्कर्ष के लिए कुछ करने के स्थान पर ठगों-चालबाजों के पीछे दौड़ते फिरने तथा पशुबलि, पर पीड़न आदि से भाग्योदय की आशा निठल्ले बैठे रहने वाले बैठे रहने वाले लाखों करोड़ों लोग निषेधात्मक श्रद्धा के भयंकर चमत्कारों की जीती मिसाल हैं।
कभी वह सन्त भी विधेयात्मक दृष्टिकोण जगाने के लिए ही शुरू किया गया हो सकता है, जो आज निषेधात्मकता का पोषक बन गया हैं। पहले कहा जाता था कि दाहिना अंग फड़कने से विशेष लाभ होगा। यह व्यक्ति के भीतर उत्साह जगाने का तरीका था। बाद में इस पर चल दिया जाने लगा कि बांया अंग फड़कने से हानि निश्चित हैं। कभी दुर्दिनों को धैर्यपूर्वक गुजारने, और अच्छे दिनों की आशा में प्रगति-पथ पर उत्साह पूर्वक बढ़ने के लिए ग्रह-दशा का विचार चला होगा। पर अब तो अधिकांश लोग बुरे ग्रहों के प्रकोप की आशंका से ग्रस्त त्रस्त रहते ही देखे जाते है। कभी पितरों के स्नेह-आशीर्वाद के अदृश्य शक्ति से उत्साहित रहने और दुष्कर्मों से बचकर रहने की प्रेरणा देने का काम भूत-चर्चाओं से होता था। आज वही भूत-चर्चा भीतर भय जगाने और अन्ध-विश्वास बढ़ाने का उपाय बन गई हैं।
यह सब विचार करने पर यही तथ्य स्पष्ट होता है कि आस्था, जो अन्तःकरण की मूल प्रवृत्ति है, तभी लाभकारी होती है, जब वह विधेयात्मक हो। किसी न किसी प्रकार की आस्था तो हर व्यक्ति में होती ही है। वह निषेधात्मक हुई तो विघटन और विनाश का कारण बनेगी। उत्कर्ष-प्रगति की प्रेरक वही आस्था बन सकती है जो विधेयात्मक हो। वे ही आस्था केन्द्र मानवता की वास्तविक सेवा कर सकते हैं, जो मनुष्य में विधेयात्मक श्रद्धा जगायें।
एक महाशय भयंकर रोग से ग्रहित हो मृत्यु शैया पर शाँत व प्रसन्नचित्त ही पड़े थे। वे रोग से ग्रसित तो थे परन्तु मृत्यु के भय से नहीं।
उनका एक निकट का सम्बन्धी उनकी शैया पर बैठा-बैठा रात भर रोता रहा, उसे उन महाशय के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी तथा वह उनके संसार से चले जाने की आशंका से ग्रसित था
प्रातःकाल हुआ यह कि वे रिश्तेदार तो मृत पाए गए व वे रोगी महाशय स्वस्थ।
सृष्टि के प्रत्येक घटक में न केवल नियम-व्यवस्था और क्रमबद्धता है; वरन् उसकी प्रत्येक इकाई कितनी दूरदर्शिता से काम करती है इसका उदाहरण हम पेड़-पौधों में देख सकते हैं। पेड़-पौधे जितनी दूरदर्शिता और सामाजिकता का परिचय देते हैं उतना शायद मनुष्य भी नहीं दे पाते हों। जैसे मनुष्य समाज में पीढ़ियों का संघर्ष एक सामान्य बात है। पुरानी पीढ़ी के लोग नयी पीढ़ी को उच्छृंखल और गैर जिम्मेदार समझते हैं तथा उन्हें कोई दायित्व सौंपने से कतराते हैं। नयी पीढ़ी के लोक पुरानी पीढ़ी को ज्यादती करने वाला वर्ग समझते हैं और इस कारण दोनों में अपेक्षित सामंजस्य नहीं बन पाता। परिणाम यह होता हैं कि पुरानी पीढ़ी के अनुभवों का लाभ नयी पीढ़ी को नहीं मिल पाता और नयी पीढ़ी की शक्ति का कोई सन्तोषजनक सदुपयोग नहीं हो पाता।
किन्तु पेड़ पौधों में नये ओर पुरानों में अद्भुत सामंजस्य देखा गया है। वृक्ष की टहनियों में जिन आँखों से नयी पत्तियाँ निकलती हैं उनका अकस्मात् निर्माण नहीं होता बल्कि वे टहनियों की आँखों के खोल में ढकी रहती हैं बसन्त ऋतु में जब पुरानी पत्तियाँ गिरती हैं तो उसके बाद ही नयी पत्तियों की कोपलें फूटने लगती हैं। इससे पूर्व सूख जाने के बाद भी पुरानी पत्तियाँ टहनियों से इसलिए जुड़ी रहती है कि नयी पत्तियाँ उनका स्थान लेने योग्य बन जाये। यह नहीं वे पुरानी पत्तियाँ नयी पत्तियों के लिए भरपूर पोषण भी एकत्रित करती रहती है; जिन्हें वे अपनी कलियों के माध्यम से नयी पत्तियों तक पहुँचाती रहती हैं।
मनुष्य समाज में माता-पिता प्रायः अपनी सन्तान के लिए भी धन सम्पत्ति कमाने, जमाकर छोड़ जाने की बात सोचते हैं जबकि सन्तान को स्वावलम्बी भर बना देना पर्याप्त होता है। अभिभावक अपनी सन्तान के प्रति कहाँ तक जिम्मेदार हैं, इसका एक सुंदर उदाहरण है- नारियल का पौधा। नारियल का पौधा अंकुरित होने और जड़ पकड़ लेने तक नारियल की गिरि से ही पोषण प्राप्त करता रहता है। जब तक नारियल का पौधा खोपरे की तीन आँखों में से किसी एक को फोड़कर जड़ नहीं पकड़ लेता तब तक गिरी का सफेद, नरम और पौष्टिक गूदा प्रस्तुत रहता है। परन्तु जैसे ही पौधा जड़ पकड़ लेता है उसे गिरी से पोषण मिलना बन्द हो जाता है। गिरी खिर कर जमीन में मिल जाती है। जैसे अपने अपनी सन्तान को स्वावलम्बी बनाकर शेष सारी सम्पत्ति समाज को सौंप दी हो। सेम, मटर, बादाम, अखरोट आदि के पौधों को भी इतना ही पैतृक सहयोग मिलता है, जबकि उनके बीजों में काफी पोषण शक्ति-सम्पत्ति विद्यमान रहती है।
अपनी पोषण शक्ति को जमीन में मिलाकर ये पौधे ऐसे पौधों के लिए आहार उपलब्ध कराते हैं जो कमजोर वर्ग के होते हैं, जैसे राई, पोस्त, पीपल आदि। इस तरह के कितने ही पौधे होते है, जिनके पास नारियल के बीज जैसी सुविधा नहीं होती हैं। इन पौधों को अतिरिक्त शक्ति वाले पौधों द्वारा समर्पित सम्पत्ति से धरती पोषण प्रदान करती रहती है। परन्तु ऐसी भी बात नहीं है कि गरीब घरानों में पैदा हुए ये पौधे अपनी गरीबी का ढिंढोरा पीटने हुए निराश, हताश दूसरों का ही मुँह, ताकते रहते हों। जिन पौधों को अपने अभिभावकों (बीजों) से इस प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिलता, वे आँख खुलते ही अपने पैरों आप खड़ा होना सीख लेने है। अर्थात् इन पौधों की पत्तियाँ अंकुरित होते ही हरितवर्ण की हो जाती हैं और वातावरण से अपना भोजन आप उपार्जित करने लगती हैं। यदि इन पौधों की पत्तियाँ हरितवर्णी न हों, और प्रौढ़ विकसित पत्तियों की भाँति श्रम न करने लगें तो इनकी पौधे ही मर जाय और इन पौधों की जाति ही विलुप्त हो जाये।
इन पौधों की जीवनीशक्ति अनुकरणीय कहीं जानी चाहिए कि ये पैदा होते ही अपना भोजन स्वयं अर्जित करने के लिए जीवन संघर्ष करने लगते हैं।
मनुष्यों में आमतौर पर यह प्रवृत्ति होती है कि यदि उसकी आमदनी बढ़ जाती है तो वे व्यसनी, अपव्ययी और विलासी जीवन जीने लगते हैं। जबकि पेड़-पौधों में ऐसी कोई प्रवृत्ति नहीं होती। उनके पास अतिरिक्त पूँजी जमा हो जाती है तो वे उसे भविष्य के लिए सुरक्षित रख लेते हैं तथा अपनी जाति के विकास में लगाने लगते है इस तरह के पौधों में आलू, शकरकन्द, शलजम, गाजर, मूली आदि आदि प्रमुख है।
प्रकृति ने सभी प्राणियों के लिए प्रचुर आहार सामग्री अपने भण्डार में रख छोड़ी है। और उस भण्डार को हर किसी के लिए खुला छोड़ रखा है परन्तु मनुष्य को छोड़ कर और कोई दूसरा प्राणी नहीं है जो अपनी आवश्यकता से अधिक सामग्री संचित करते हों अथवा यह आकाँक्षा भी रखते हों। प्याज का पौधा जमीन पर ही उगता हैं, परन्तु वह अपना जीवन केवल पानी से ही चलाता हैं। यह एक साधारण से प्रयोग द्वारा भी देखा जा सकता हैं। प्याज की एक पत्ती को पानी से भरी हुई एक बड़े मुँह की बोतल में इस प्रकार रखा जाय कि पत्ती की जड़ तर रहे। यह आवश्यक है कि बोतल को प्रकाश में रखा जाया करें। कुछ दिनों बाद ही उस प्याज की पत्ती से धीरे-धीरे हरी पत्तियाँ और फूल भी निकल आयेंगे।
प्रयोग और परीक्षणों इस तथ्य पर पहुँच गया है। कि प्रकृति में सब प्रकार के साधन उपलब्ध रहने के बावजूद भी पौधे अपने पोषण के लिए, मिट्टी का बहुत थोड़ा-सा अंश ही उपयोग में लाते हैं। अधिकाँशतः पानी और कार्बन डाइआक्साइड से ही पौधों के भोजन की आवश्यकता पूरी हो जाती है। इस आधार पर जब बिना भूमि के ही-पानी में पौधे उगाये जाने की तकनीक विकसित की जा रही है। पानी में की जाने वाली खेती को इस विधि को “हाइड्रोयोनिक्स” कहते हैं।
नदी, तालाब और स्त्रोतों के पानी में उगने वाली एक वनस्पति शैवाल की प्रायः कोई उपयोगिता नहीं समझी जाती, उपयोगिता हो भी क्या सकती हे क्योंकि उसमें न फल है, न फूल, न जड़ और न ही पत्तियाँ। पानी में इसके केवल बहुशाखी तन्तु ही पाये जाते हैं और यह इतनी गन्दी चिकनी तथा चिपचिपी होती है कि छूते ही इस तरह हाथ से छोड़ दी जाती हैं जैसे कोई गन्दा कीड़ा परन्तु वैज्ञानिकों ने इसमें कितने ही उपयोगी तत्व खोज निकाले हैं तथा उसके द्वारा खाद्य संकट को हल्का करने की सम्भावनायें भी व्यक्त की हैं।
यूरोप के कई देशों और जापान में शैवाल के तैलीय भाग से भोजन तैयार किया जाने लगा है। जापान और चीन में शैवाल से तैयार किये गये एक विशेष खाद्य ‘कोम्बू’ का उत्पादन तो एक प्रमुख उद्योग रूप लेता जा रहा है। पाचन क्रिया को ठीक रखने तथा पाचन संस्थान सम्बन्धी रोगों को सुधारने के लिए शैवाल को औषधियों के रूप में भी प्रयुक्त किया जाने लगा हैं। शैवाल में ऐसे अनेक तैल तत्व और खाद्य पदार्थ खोज निकाले गये हैं, जो ब्लडप्रेशर और हृदय विकार के रोगों में अचूक दवा तथा पौष्टिक भोजन का काम करते हैं। चिकनाई युक्त पदार्थ खाने के खून में गांठें पड़ जाती हैं। इसी कारण हृदय विकार उत्पन्न होते हैं परन्तु सिवार की ही एक ऐसी वनस्पति है जिसका तैलीय तत्व (चिकनाई) इस रोग का कारण बनने के स्थान पर उसके कारण को दूर करता हैं।
इसके अतिरिक्त समुद्री शैवाल से पोटाश, आयोडीन, आल्जिनिक आदि रासायनिक दृव्य बनाये जाते हैं। अगर-अगर नामक द्रव्य जिसका उपयोग आइस्क्रीम मुरब्बा आदि बनाने में किया जाता हैं-यह शैवाल से ही तैयार किया जाता हैं। नार्वे, ब्रिटेन, चीन, जापान में शैवाल के उत्पादन तैयार करने वाली कई फैक्ट्रियाँ धड़ल्ले से चल रहीं है।
प्रकृति के अबोध से अबोध शिशु तक भौतिक नियमों का इतनी दृढ़ता से पालन करते हैं। उसी का परिणाम है कि मनुष्य को छोड़कर प्रकृति की अन्य किसी सन्तान को दुःखी, क्लान्त और खिन्न होते नहीं देखा गया। इसका एकमात्र कारण प्रकृति के आदेशों का पालना हैं। प्रकृति का दण्ड भी उन्हीं के लिए प्रस्तुत है जो उसके नियमों को तोड़ते और मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं।
आत्मा शान्ति और ‘ईश्वर’ प्राप्ति के लिए की जाने वाली समस्त साधनाओं में ध्यान का प्रमुख स्थान है। प्रायः सभी धर्मो ने अपनी उपासना पद्धतियों में ध्यान को किसी न किसी रूप में अपनाया है। भारतीय धर्म में ‘ध्यान’ ईसाई धर्म में ‘होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कब्बालह’ इस्लाम मत में ‘तसब्बुफ’ जापान के जैन धर्म में, जो भारतीय धर्म की ही एक प्रशाखा है ‘जानने’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। ध्यान की परिभाषा करते हुए गीताकार ने कहा है -’योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान पर बैठकर, सब इच्छाओं, आकाँक्षाओं को त्याग कर किसी भी परिग्रह की कामना न करते हुए अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करें।’
इस तरह किये जाने वाले योगाभ्यास के परिणाम बताते हुए कहा गया है -’जिसने अपने मन को इस प्रकार वश में कर लेने वाला आत्म तत्व को प्राप्त कर परमशान्ति और जीवन में समस्वरता को प्राप्त करता है। सर्वविदित है कि याँत्रिक सभ्यता के आधुनिक युग में मनुष्य का जीवन इतना तनावपूर्ण हो गया है कि दिन में मनोयोग से कार्य करना और रात्रि में पूर्ण विश्राम में जाना दूभर हो गया है। जिन देशों में यान्त्रिक सभ्यता अपने शिखर पर है वहाँ के निवासियों का सामान्य जीवन असामान्य रूप से अशान्त और तनाव पूर्ण ही पश्चिम के एक मनःचिकित्सक डा. बेनसन ने आधुनिक समाज में मनुष्य मन पर पड़ने वाले दवाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- ‘आश्चर्य यह नहीं है कि लोग इतनी अधिक संख्या में मनःरोगों से ग्रस्त क्यों है? बल्कि आश्चर्य तो इस बात का है कि सामान्य आदमी अपने आस-पास के दबावों और तनावों को झेल किस प्रकार रहा है। इन दबावों के रहते तो मानसिक विक्षिप्तता स्वाभाविक ही है।’
आगे चल कर डा. बेनसन का कहना है कि मनुष्य अपना संतुलन बनाये रखने के लिए प्रकृति से आवश्यक ऊर्जा प्राप्त करता रहना है। अन्यथा उसका टूट जाना नितान्त सहज है। फिर भी यह सन्तुलन कब तक बना रहेगा, मनुष्य अपनी उदार माता से कब तक अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त करता रहेगा-कहना कठिन है?
डा. बेनसन अपने सहयोगियों के साथ सामान्य जीवन पर ध्यान के प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। इस विषय पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है “रिलैर्क्सरान रिस्पोंस’ (विश्राम के परिणाम) डा. हर्बर्ट-बेनसन एक मनःचिकित्सक होने के साथ हृदय रोगों पर शोध कार्य भी कर रहे हैं। वे हार्वर्ड फेकल्टी में हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। हृदय तन्त्र की कार्यविधि और संवेगों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करते हुए वे ध्यान की ओर आकर्षित हुए। शरीर पर ध्यान के पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करते हुए उन्होंने जो निष्कर्ष प्राप्त किये उन्हीं का विवेचन उपरोक्त पुस्तक में किया गया है।
इस पुस्तक के अनुसार नियमित रूप से बीस मिनट ध्यान करने के परिणाम व्यक्ति को पूरे दिन तरोताजा हल्का-फुल्का और शान्त चित्त बनाये रखने के लिए पर्याप्त है। यह परिणाम तो गाड़ी नींद में भी प्राप्त किये जा सकते है? परन्तु ध्यान के प्रभाव निद्रा से मिलने जुलते होने के उपरान्त भी इतने भिन्न हैं कि उसकी तुलना नींद से नहीं की जा सकती है। डा. बेनसन और डा. बैलेस ने 1962 व्यक्तियों का परीक्षण कर, जो नियमित रूप से ध्यान करने का अभ्यास करते थे यह प्रतिपादित किया कि- ‘ध्यान लगाने के कुछ मिनट बाद ही सारे शरीर की जैविक प्रक्रिया मन्द पड़ जाती है और वह भी इस सीमा तक जो कई घण्टों की गहरी नींद के बाद प्राप्त होती है। ध्यान में तीन मिनट के भीतर ही ऑक्सीजन की खपत दर में 16 प्रतिशत कमी आ जाती है, जब कि पाँच घण्टे की नींद में केवल 9 प्रतिशत ही कमी आती है।
डा. बेनसन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ध्यान के कारण व्यक्ति की त्वचा में अवरोध क्षमता की अभिवृद्धि भी होती है। यद्यपि यह अभिवृद्धि सोते समय भी बढ़ती है किन्तु -ध्यान में यह जिस गति और मात्रा में बढ़ती है उतनी गाढ़ी से गाढ़ी नींद में कभी नहीं बढ़ती। अब रोग क्षमता का अर्थ है शरीर को बाहरी विद्युत प्रभावों से मुक्त रखने की सामर्थ्य। जिन व्यक्तियों में यह सामर्थ्य जितनी कम होती है वे उतनी ही जल्दी उन्माद और इसी प्रकार के अन्य मानसिक रोगों से आक्रान्त होते हैं। व्यक्ति जब जितना अधिक चिन्तित, व्यथित और व्यग्र होता है तब उतना ही ज्यादा पसीना आता है। इसके साथ ही शरीर से कुछ ऐसे तत्व भी निकलने लगते हैं जो अवरोध क्षमता बनाये रखने में सहायक होते है। ऐसी स्थिति में त्वचा द्वारा शरीर के भीतर विद्युत तरंगें प्रविष्ट हो जाती हैं। फलतः मनुष्य कई मनोरोगों का शिकार हो जाता है।
ध्यान के द्वारा शरीर को जो ताजगी और विश्राँति मिलती है, उससे वह बाहरी चिंताओं, भयों तथा परेशानियों को सहने योग्य पर्याप्त सामर्थ्य जुटा लेता है। फलतः वह इन प्रभावों से मुक्त रहता है और विद्युत तरंगें त्वचा के माध्यम से शरीर के अन्दर नहीं घुस पातीं।
लन्दन के माडस्लो अस्पताल तथा ‘इंस्टीट्यूट ऑफ साइकिएट्री’ से सम्बन्धित डा. पीटर फेन्विक ने अपनी पुस्तक ‘मेडीटेशन एण्ड साइन्स’ में लिखा है- “मैंने और मेरे सहयोगियों ने सन् 1869 में लन्दन के अस्पताल में कुछ व्यक्तियों के मस्तिष्क की विद्युत क्रिया की जाँच की। ये लोग एक वर्ष से भी ज्यादा समय से ध्यान कर रहे थे। मस्तिष्क तरंगों की रिकाडिंग में ध्यान के समय स्पष्ट परिवर्तन नोट किए गये। वे ‘पैटर्न’ केवल उसी समय रिकार्ड होते जबकि वह व्यक्ति ध्यान में बैठा हो।
“सहज विश्राम की स्थिति में जब परीक्षणाधीन व्यक्ति नेत्र मूंदे शान्त बैठा हो तो उसके मस्तिष्क के पिछले भाग में एक स्पष्ट लय पायी जाती हैं जिसे ‘अल्फालय’ कहते हैं। यह लय सूचित करती है कि व्यक्ति जागा हुआ और सतर्क है। उनींदापन शुरू होते ही “अल्फालय”गायब होने लगती है और ‘थेटा लय’ प्रकट होने लगती है। पूर्ण प्रगाढ़ निद्रा में ही यह लय प्रकट होती है। ध्यानावस्था में दिलचस्प और असामान्य बात यह है कि उसमें ये दोनों पैटर्न साथ-साथ पाये गये। अर्थात् व्यक्ति चेतना के स्तर पर सजग और सतर्क है तथा शरीर के स्तर पर पूर्ण विश्राँति की अवस्था में है।”
डा. फेन्विक के प्रयोग और अनुसन्धानों से ध्यान तथा निद्रा में अन्तर स्पष्ट होता है। ध्यान एकदम अलग स्थिति है जबकि निद्रा एकदम विपरीत। निद्रा में व्यक्ति का शरीर, और चेतना दोनों ही सुप्त हो जाते हैं जबकि ध्यान में चेतना तो वही रहती है परन्तु शरीर, अपने तल पर पूर्ण विश्राम कर रहा होता है। कुछ लोग जो कहते हैं कि आध्यात्मिक प्रतीकों पर ध्यान केन्द्रित करने से व्यक्ति आत्म सम्मोहित-सा हो जाता है जिसे बाहरी घटनाओं का कोई बोध नहीं रहता। डा. फेन्विक के उपरोक्त निष्कर्ष, इस मान्यता को थोथी सिद्ध करते हैं। नींद का प्रभाव सोये रहने तक ही दिखाई पड़ता है। जागते ही वह प्रभाव क्षीण होने लगता है परन्तु ध्यान का प्रभाव ध्यान के बाद भी एक निश्चित अवधि तक यथावत् बना रहता है।
टेक्सास विश्वविद्यालय (अमरीका) के डा. डेविड ओर्म जौन्सन ने साइको गैल्वेनिक जाँच करके यह दिखाया कि ध्यान करने वालों में त्वचा की विद्युत रोधकता दूसरों की अपेक्षा ज्यादा विद्यमान रहती है। यही नहीं उनकी तरंगों की आकृतियाँ भी दूसरे लोगों की अपेक्षा बहुत सरल रहती है। निष्कर्षतः ध्यान से स्वायत्त स्नायु तन्त्र में स्थिरता आती है।
कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के डा. राबर्ट कीथ बैलेस ने ध्यान साधना के शरीर पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले- ‘‘जब कोई व्यक्ति ध्यान करता है तो उसकी हृदयगति, रक्तचाप, नाड़ी की चाल और श्वसन गति में एक स्वस्थ संतुलन बनता है। जैसे हृदयगति सामान्य हो जाती है, रक्त चाप भी सन्तुलन बिन्दु पर आ जाता है। श्वाँस धीमी और गहरी चलने लगती है।” उन्होंने ध्यान के कारण शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों की भी जाँच की ओर एक पूरा शोध निबंध तैयार किया। यह निबन्ध ‘साइण्टिफिक अमेरिकन’ जैसी विख्यात विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इस पत्रिका में प्रकाशित कोई भी निबन्ध की प्रामाणिकता असंदिग्ध कही जाती हैं क्योंकि पत्रिका के पास अपनी प्रयोगशाला है और पत्रिका में कोई भी सामग्री तभी प्रकाशित हो जाती है जब कि सम्पादकीय विभाग तत्सम्बन्धी प्रयोगों को अपनी प्रयोगशाला में दुहरा कर पुष्ट कर लेता है।
“इन्स्टीट्यूट ऑफ लिविंग, हार्ट फोर्ड” के डाइटैक्टर डा. बर्नार्ड सी.ग्लू एक ने भी ध्यान के प्रभावों का वैज्ञानिक परीक्षण किया। उन्होंने शरीर और मन में उत्पन्न होने वाले सभी तरह के तनावों को शान्त करने वाले सारे उपायों का परीक्षण कर देखा और दूसरे रोगियों के ध्यान का अभ्यास कराया। इन दोनों प्रकार के प्रयोगों में उन्होंने तनाव मुक्ति और निरापद शान्ति के लिए ध्यान का ही सबसे अधिक कारगर तरीका पाया।
अमेरिका की एक दूसरी विज्ञान पत्रिका ‘साइन्स’ के 18 जून 1876 के अंक में तीन वैज्ञानिकों का तैयार किया हुआ एक ध्यान सम्बन्धी लेख प्रकाशित हुआ है। ये तीनों वैज्ञानिक डा. माइकेल्स, डा. ह्यूवर और डा. मैक्नान मिशिगन यूनीवर्सिटी से सम्बन्धित हैं। इन्होंने डेट्रियर की ‘स्टूडेण्टस् इन्टर नेशनल मेडीटेशन सोसायटी’ के छह पुरुष और ‘छह’ स्त्री सदस्यों की जाँच की, जो नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करते थे। इस जाँच की कसौटी यह थी कि तनावग्रस्त व्यक्ति के रक्त में कैटई कोलेमीन नामक यौगिक की मात्रा बढ़ जाती है। प्रयोग के लिए चुने गये व्यक्तियों के रक्त की ध्यान से पहले जाँच की गयी। इसके बाद प्रत्येक व्यक्ति को अलग अलग एकान्त कक्ष में रखा गया। वहीं उनके लिए अलग-अलग जाँच उपकरण भी लगाये गये। इसके बाद सभी व्यक्तियों से ध्यान करने के लिए कहा गया। ध्यान का समय 3 मिनट रखा गया था। इसके साथ बारह सामान्य व्यक्ति भी चुने गये जिन्हें उतनी ही देर आँख मूंद कर बैठने को कहा गया। उनके रक्त की जाँच की भी गयी। तीनों वैज्ञानिक चौबीसों व्यक्तियों के रक्त की जाँच करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि खून में तनाव व्यक्त करने वाले ‘केटई कोलोमिन’ नामक यौगिक की मात्रा ध्यान के बाद कम हो गयी है।
वैज्ञानिक उपकरणों और प्रयोगों द्वारा ध्यान के प्रभावों का अभी इतना ही अध्ययन किया जा सका है, जबकि स्वयं इन्हीं वैज्ञानिकों का कहना है कि ध्यान के प्रभावों को विज्ञान के माध्यम से भली भाँति नहीं समझा जा सकता। इन प्रयोगों में प्रयुक्त पात्रों ने सुखासन पर बैठ कर की जाने वाली उसी ध्यान साधना का अभ्यास किया था जिसमें उन विशिष्ट शब्दों पर, जिन पर उनकी आस्था थी ध्यान को केन्द्रित किया जाता है। इन शब्दों को भारतीय दर्शन की भाषा में मंत्र भी कहा जा सकता है। अपने चित्त को पूर्णतया एकाग्र कर, चिन्तन को एक दिशा में मोड़कर की जाने वाली ध्यान साधना के चमत्कारी परिणाम सामने आ रहे है।
डा. बेन्सन और डा. बैलेस ने ध्यान आरम्भ करने के बाद व्यक्तिगत जीवन में आये परिवर्तनों को जाँचने के लिए एक प्रश्नावली तैयार की। लगभग दो हजार व्यक्तियों से उन प्रश्नों के उत्तर पूछे और पाया कि ध्यान साधना आरम्भ करने के बाद कई व्यक्ति मादक द्रव्यों, मद्यपान और धूम्रपान के दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने में से मिलने वाली सफलता की तुलना में अधिक थी। कई व्यक्ति जो चिन्ता और तनाव के कारण बिना ‘ट्रैक्वलाइजर’ सोने के अभ्यस्त नहीं थे, नींद की गोली लिए बिना चैन की गाड़ी नींद सोने लगे। डा. पीटर फेन्विक का कहना है कि -’अभी तक ध्यान के प्रभावों के जो विपुल प्रमाण मिले हैं उनसे सिद्ध होता है। कि मनः चिकित्सा में ध्यान साधना बहुत सहायक और कारगर सिद्ध होती है।
यह तो वैज्ञानिकों के अनुभव हैं जो अपने निष्कर्षों को अभी सम्पूर्ण नहीं जानते। ध्यान के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन की यह मान्यता अपने स्थान पर पूर्ण सटीक है कि ध्यानयोग के अभ्यास द्वारा व्यक्ति जीव से ब्रह्म, आत्मा से परमात्मा और क्षुद्र से महान बन जाता है?
मनुष्य के शरीर में 70 प्रतिशत पानी है। यदि किसी का वजन 67 किलोग्राम है, तो उसके शरीर में 45 किलोग्राम से भी ज्यादा पानी होगा। दाँत के बाहरी आवरण जो सख्त लगते हैं तक में 2.1 प्रतिशत पानी होता है। लार में तो 1/10 प्रतिशत ही दूसरे पदार्थ होते हैं। शेष सब पानी ही रहता है। रक्त में 80 प्रतिशत और माँस पेशियों में 74 प्रतिशत पानी होता है।
शरीर में इतना पानी रहना आवश्यक है। पानी की सहायता से ही शरीर भोजन को पचाता तथा भोजन से प्राप्त प्रोटीन और लवणों को आगे बढ़ाता है। शरीर की क्रियाशीलता के परिणाम स्वरूप जो टूट फूट होती है वह पसीने और पेशाब के रूप में पानी द्वारा ही निकलती है। इस प्रकार मनुष्य शरीर के निर्माण में पानी का महत्वपूर्ण भाग रहता है। यही नहीं उसके पोषण, सुरक्षा और व्यय हुई शक्ति के पुनरार्जन में भी पानी की मुख्य भूमिका रहती है।
सामान्य समझा जाता है कि शरीर का पोषण और रक्षण भोजन, वायु और विश्राम द्वारा ही होता है। इन तत्वों और क्रियाओं द्वारा थके शरीर को शक्ति संपादन करने तथा टूट फूट की मरम्मत करने में सहायता मिलती है। एक सीमा तक इन्हें ग्रहण करने की क्रिया शरीर को बनाये रखने और शक्ति अर्जित करते रहने में मुख्य महत्व भी रखती है। परन्तु पानी की आवश्यकता उन सब वस्तुओं से अधिक महत्वपूर्ण है। कहा जाय कि सारा शरीर ही जलमय है, जल से बना हुआ है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस तथ्य को प्रतिदिन पीये जाने वाले पानी की मात्रा से भी समझा जा सकता है। भोजन के रूप में जितना ठोस आहार नहीं खाया जाता उससे अधिक पानी पीना पड़ता है। हालाँकि भोजन का अधिकाँश भाग भी पानी में ही बना होता है तो भी पीये जाने वाले पानी की मात्रा उससे अधिक होती है। हम जो भोजन करते है उसके पचाने की प्रक्रिया का अध्ययन करने पर भी पानी का महत्व समझा जा सकता है। प्रमुखतः आहार का पाचन उदर एवं छोटी आँत में होता है। उदर में पहुँचने पर आहार कई रासायनिक प्रतिक्रियाओं से गुजरता है, यह प्रतिक्रिया उन रसों से होती है जो आँत और आमाशय की ग्रन्थियों से निसृत होते हैं। इस प्रतिक्रिया का रूप यह होता है कि खस तत्व ऐसे तत्व में बदल जाते हैं जो छोटे-छोटे व्यूहाणुओं से निर्मित होते हैं।
आहार को इस प्रकार कई पाचक सोपानों से होकर गुजरना पड़ता है। माँस एमोनो एसिड में बदलते हैं तोल स्नेहिल एसिड में बदलते हैं। व्यूहाणु इतने छोटे होते हैं कि वे छोटी आँत के 50 लाख स्पीतियों में से तैरकर निकल जाते है। रक्त का 60 प्रतिशत भाग जलीय होता है और प्लाज्मा में मिल जाता है तथा शेष बची हुई सामग्री के छोटे छोटे व्यूहाणु के शवल सूक्ष्म शिराओं के ‘जाल से होते हुए प्रतिहारिणी शिरा तक पहुँचते हैं जहाँ से रक्त प्रवाह उन्हें यकृत तक ले जाते हैं।
यकृत प्रत्येक प्रकार के भोजन को आवश्यकतानुसार हीं रक्त प्रणाली में पहुँचने देता है। शेष या तो यकृत में संचित हो जाता है अथवा नष्ट हो जाता है जब कभी किसी प्रकार के भोजन की न्यूनता होती है तो यकृत उसकी पूर्ति अपने इसी संचित कोष में से करता है।
प्लाज्मा को यकृत से पानी को छोड़कर अन्य सभी तत्व मिलते हैं क्योंकि प्लाज्मा स्वयं ही अपने मूलरूप में पानी होता है, जो आहार ग्रहण किया जाता है। उसमें केवल पानी ही ऐसा होता है जो बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के पाचन संस्थान द्वारा सोख लिया जाता है। और प्लाज्मा का अंग बन जाता है यदि पानी की मात्रा बढ़ जाती है तो वह गुर्दा द्वारा छन जाता है। गुर्दे पानी का उपयोग रक्त स्वच्छ करने में करते हैं।
शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाये रखने के लिए आहारविदों ने इसीलिए पानी का उपयोग प्रचुरता से करने का परामर्श दिया है। बहुत से व्यक्ति पानी का कम से कम उपयोग करने की सिफारिश करते हैं। कई लोग प्यास लगते रहने पर भी पानी नहीं पीते और प्यास को मारते रहते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह हानि-कारक ही है। क्योंकि पानी के अभाव में शरीर पेशाब, पसीने तथा अन्य विसर्जन क्रियाओं द्वारा शरीर में उत्पन्न हुए विकारों को हटाने में अक्षम हो जाता है। इसलिए जाड़ा या गर्मी बीमारी हो अथवा स्वस्थ स्थिति, पानी का यथेष्ट उपयोग करना चाहिए।
मानवीय आस्थाओं में प्रविष्ट अवाँछनीयता की जड़ों को काटने, निकाल बाहर करने तथा उनके स्थान पर प्रकाश पूर्ण धारणाओं, सद्विचार सद्कर्म और मानवीय सम्वेदनाओं की स्थापना के लिये जिस महाशक्ति के अवतरण की आवश्यकता पड़ा करती है, उसका अवतरण इस युग में गायत्री के रूप में हुआ? पिछले दिनों जो भी अवतार हुये उन्हें व्यक्त से लड़ना पड़ा, वह कार्य अपेक्षाकृत सुगम था। किन्तु इस युग में जबकि असुरता ने मनों में, मानवीय, आस्थाओं में आधिपत्य जमा लिया हो वैसी ही प्रकाशपूर्ण और प्रखर सत्ता की आवश्यकता थी जो भावनाओं की गहराई में उतर कर कार्य कर सके। उसके लिये गायत्री ही समर्थ थी सो ब्राह्मी चेतना के रूप में उसका प्रादुर्भाव युग की एक अलौकिक घटना मानी जानी चाहिये।
शक्तियों का प्रकट होना एक बात है उनकी सक्रियता और युग को प्रभावित करना सर्वथा दूसरी बात। इस प्रयोजन को चिरकाल से देव-आत्मायें पूरा करती आई हैं। गायत्री महाशक्ति को व्यापक बनाने के लिये युग सैनिकों की कुमुक पूरी तरह सन्नद्ध, हर मोर्चे पर लड़ने को तैयार खड़ी है। यह अलग बात है कि मायावी असुर से कैसे लड़ा जाये, यह समझ में नहीं आता। उसके लिये बार-बार मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है, बार-बार मोह भंग की और सैनिकों में शौर्य भर कर उन्हें अग्रिम मोर्चों में भेजने की आवश्यकता पड़ती है। वही इन दिनों किया जा रहा है। गायत्री उपासना के व्यापक विस्तार की जैसी सम्भावनाएँ इन दिनों विकसित हुई हैं उन पर कोई भी संतोष ही अनुभव कर सकता है।
किन्तु इतने मात्र से बात बनती नहीं। सृष्टि बहुत बड़ी है। 65 करोड़ आबादी का तो अपना ही देश है इसमें लाख दो लाख व्यक्तियों तक यह सन्देश पहुँच भी जाये तो उससे युग परिवर्तन की तो आशा और अपेक्षा नहीं की जा सकती? अभी तक देश के ही सम्पूर्ण प्रान्तों में यह प्रकाश नहीं पहुँचाया जा सका। जबकि कल्पना सारे विश्व को गायत्रीमय बनाने की करते हैं। ऐसी स्थिति में एक बार सारे वातावरण को इस तरह मय डालने की आवश्यकता पड़ेगी जिस तरह श्रीराम ने रावण से युद्ध, श्रीकृष्ण ने महाभारत और धर्मचक्र प्रवर्तन के समय भगवान बुद्ध ने सारे वातावरण को ही आन्दोलित करके रख दिया था। उस तरह से एक सी विचारधारा और आदर्श निष्ठा के संस्कारों से ओत-प्रोत वातावरण से ही वह शक्ति व प्रेरणाएँ प्रकीर्ण हो सकेंगी, जो चिरकाल तक मानवीय आस्थाओं में शान्ति और प्रसन्नता के, सहयोग और सहकारिता के, धर्म-नीति और सदाचार के रंग भरती रहेंगी।
वातावरण की महत्ता हर कोई जानता है। सेव कुल्लू मनाली घाटियों में ही उम्दा किस्म के होते हैं यों उनकी पैदावार अन्यत्र भी होती है, पर वैसा शानदार फल दूसरी जगह नहीं बन पड़ता। भुसावल के केले की ही पौध किसी अन्य स्थान पर लगाकर भी वैसा ही केले का फल बहुत प्रयत्न करने पर भी नहीं लिया जा सका। बरार की कपास के से रेशे दूसरी जगह उपलब्ध नहीं हो पाते। लखनऊ के खरबूजों की सी सुन्दरता और मिठास सब कहीं नहीं मिलती। यह वातावरण की अनुकूलता का परिणाम है। प्रस्तुत युग को विवेकपूर्ण, सद्गुणी और सदाचारी बनाने के लिये वातावरण में उस तरह की गरिमा भरनी आवश्यक होगी जो न केवल इस देश अपितु समूचे विश्व को मानवीय आस्थाओं के प्रति निष्ठावान बनाये रखें।
वातावरण का प्रभाव पेड़ पौधों और वृक्ष वनस्पतियों तक ही सीमित रहता हो तो बात नहीं। किसी को बताया न जाये और अज्ञात श्मशान घाट में खड़ा कर दिया जाये तो अनायास भय लगने लगता है। पशुओं को दिनभर उनके मालिक एक स्थान से दूसरे स्थान लाते ले जाते रहते हैं, पर यदि कोई कसाई उन्हें वध गृह की ओर ले चलने लगता है तो पशुओं को उनके रोंगटे खड़े हो जाने जैसी स्थिति में भयभीत पाया गया है। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि जब श्रवणकुमार अपने माता-पिता को लेकर मय देश में पहुँचे तो उनकी सारी पितृभक्ति तिरोहित हो गई उसने न केवल माता-पिता को काँवर से उतार दिया अपितु उन्हें भला-बुरा भी सुनाया। सूक्ष्मदर्शी ऋषि श्रवण कुमार के माता-पिता ने कहा हम पैदल चलते हैं, पर तुम रहो साथ ही। मय देश की सीमा पार होते ही श्रवण विलख उठा। उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसी भूल क्यों हो गई। पिता ने बताया - वत्स! यहाँ के अधिपति मय ने अपने माता-पिता को बन्दी गृह में डालकर कठोर यातनायें दीं, इस प्रदेश में माता-पिता को सम्मान और सत्कार देने की परम्परा नहीं है वह संस्कार यहाँ के वातावरण में छाये रहते हैं, यह उसी का दुष्परिणाम था तुम्हारा दोष नहीं।
हिमालय क्षेत्र चिरकाल से ही इस देश का तपोस्थल रहा है ऋषियों, महर्षियों से लेकर भगवान राम तक ने उत्तराखण्ड में रहकर तप साधनायें सम्पन्न की। उन संस्कारों का ही प्रतिफल है कि आज भी इस प्रदेश में पहुँचने वालों में श्रद्धा और भक्ति भावनायें उमड़ पड़ती हैं। इस प्रान्त के निवासी मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा अब भी बड़े ईमानदार पाये जाते हैं। वातावरण का प्रभाव न केवल शरीर, स्वास्थ्य, खानपान और वेशभूषा को प्रभावित करता है अपितु उसके सूक्ष्म संस्कारों में मनुष्यों के विचार और भावनायें बदल डालने की भी जबर्दस्त शक्ति है। डा. आस्कर ब्रोलर ने 1948 में प्रकाशित अपने एक लेख “ब्रेन रेडिएशन” में इस तथ्य पर विस्तृत प्रकाश डालते हुये लिखा है कि किसी क्षेत्र के लोगों में एक ही तरह के विचारों में अटूट निष्ठा हो तो उनके मस्तिष्कों से होने वाले “मस्तिष्कीय विकिरण” की सघन तरंगें वहाँ छा जाती हैं और चिरकाल तक बनी रहती हैं। रूसी वैज्ञानिकों ने एक ऐसा “हीट कैमरा” बनाया है जो किसी स्थान पर अपराध करके भाग गये अपराधी द्वारा उस समय अपने शरीर से छोड़ी हुई ऊर्जा के आधार पर उसका वास्तविक फोटो तैयार कर देता है। वैज्ञानिक उस समय उसकी मनःस्थिति को अध्ययन करने के लिये भी यन्त्र विकसित करने में लगे हैं उससे अपराधों की योजनाओं के चिन्तन का भी सही स्वरूप सामने लाना सम्भव हो जायेगा जिससे अपराधी कहाँ गया है यह सब तुरन्त पता चल जायेगा। यह अनुसंधान भी उसी तथ्य को प्रकट करते और बताते हैं कि एकबार किसी वातावरण को शक्तिशाली आत्म शक्ति - भावनाओं से मथ दिया जाये तो वहाँ चिरकाल तक लोगों को प्रभावित करती रहने वाली परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। इन दिनों सारे समाज सारे वातावरण में अनीति, बेईमानी चरित्रहीनता, तृष्णा, लिप्सा और क्षुद्र अहंकार का जो विष समा गया है उसे धोने के लिये यज्ञ और गायत्री के व्यापक विस्तार की क्रान्ति खड़ी करनी पड़ेगी। युग शक्ति गायत्री के अवतरण का यही मूलभूत उद्देश्य है जिसे इस युग की जागृत आत्माओं को अपना कर्त्तव्य समझ कर पूरा करना है।
सामूहिक कीर्तन, सामूहिक भजन और सामूहिक अनुष्ठानों के पीछे यही सिद्धान्त कार्य करता है। एकाकी उपासना से व्यक्ति का अपना वाह्याभ्यंतर प्रभावित हो सकता है, अधिक से अधिक परिवार वालों, पड़ौसियों तक भी प्रेरणायें प्रवाहित की जा सकती हैं, पर व्यापक रूप से जनशक्ति को दिशा और प्रकाश देना होता है तो उन्हें सामूहिक रूप देना पड़ता है। गायत्री मंत्र में “योनः” शब्द आता है उसका अर्थ होता है हम अकेले नहीं हम सब। इसकी संगति भी सामूहिक अनुष्ठान से ही बैठती है। सामूहिक रूप से आधे और सम्पन्न किये गये गायत्री अनुष्ठानों में सारे वातावरण को आन्दोलित कर देने और एक इच्छित दिशा में बदल डालने की शक्ति होती है। यह एक तथ्य है कि वातावरण में मनुष्य ढलता और बनता है, पर झूठ यह भी नहीं हैं कि मनुष्य द्वारा भी वातावरण ढाले और बनाये जाते है। जिनसे चिरकाल तक प्रवाहित होते रहने वाले संस्कारों की विचारों की विलक्षण फौज न जाने ब्रह्मांड के किस कोने से दौड़ती हुई आती और बादलों की तरह आच्छादित हो जाती है। गायत्री उपासना द्वारा असत् से सत् अन्धकार में प्रकाश और अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की विलक्षण शक्ति है। एकाकी साधना द्वारा वह साधक को लाभान्वित करती है तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र और युग प्रभावित होता है इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता।
सामूहिक प्रार्थनायें सारे वातावरण को हिला देने की सामर्थ्य रखती हैं। युद्ध और संकट के समय प्रायः प्रत्येक देश में सामूहिक प्रार्थनायें आयोजित होती हैं। मुसलमानों में नियत दिन नियत समय पर सामूहिक समाज के पीछे भी यही सिद्धान्त कार्य करता है। 13 वें अपोलो (चन्द्र यात्रा) अभियान के समय अन्तरिक्षयानों में आई गड़बड़ी से जब तीनों यात्रियों का जीवन संकट में पड़ा तब पृथ्वी वासियों की सामूहिक प्रार्थना ही उनके लिए ढाल बनी और वे सकुशल धरती पर लौटे।
युग परिवर्तन के लिए दुष्टता, असुरता, अधर्म और आडम्बरों से लड़ने के लिये जिस महान् शक्ति की आवश्यकता हो सकती हैं, वह दुर्गा से कम नहीं हो सकती, दुर्गा सामूहिकता का प्रतीक है। इस दृष्टि से भी गायत्री का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होना आवश्यक था। इसीलिए इस योजना के आधार के रूप में गायत्री तत्व ज्ञान पर इतना जोर दिया गया। क्रमशः कदम उठाते हुए उस स्थिति तक पहुँचना संभव हो सका है जहाँ से सारे राष्ट्र को एक उपासना समुदाय में ढाला जा सके। इससे जो वातावरण विनिर्मित होगा, जो अन्तर्क्रान्ति उठ खड़ी होगी वह अन्तःकरणों में छाये हुये अज्ञान, अन्धकार, अशक्ति और दरिद्रता को नष्ट भ्रष्ट कर डालेगी। जब तक यह मूढ़तायें रहती हैं, मानवीय संवेदना का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पायेगा अतएव सृजन प्रक्रिया के पूर्व की यह विचार मंथन प्रक्रिया आवश्यक मानी गयी है।
गायत्री मंत्र सामान्य दृष्टि से देखने में यो पूजा उपासना में प्रचलित एक प्रार्थना जैसा लगता है जिसमें परमात्मा से सद् बुद्धि की प्रार्थना की गई है किन्तु शब्द शक्ति के ज्ञाता जानते हैं कि इस महामंत्र के 24 अक्षर 24 महान शक्तियों के ऐसे मर्म स्थल बीज और शक्ति कोष हैं जो सारे ब्रह्माण्ड में हलचल मचा देने की शक्ति से ओत-प्रोत है। गायत्री उपासना के प्रति जन आस्था का भी अभाव नहीं है। पिछले दिनों कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस महाविद्या को अपनी जन्मजात विरासत और अपने वंशधरों की सम्पत्ति समझ कर इस तरह की भ्रान्तियाँ गढ़ी जिनसे लोगों में आस्था तो बनी रहे पर उसकी व्यक्तिगत स्तर पर कोई न तो शोध कर सके न उससे लाभान्वित हो सके। इससे उनने स्वयं तो गंवाया ही राष्ट्र का बड़ा भारी अहित किया। प्राण चेतना से परिपूर्ण राष्ट्र अपनी गरिमा अपना ओज अपनी तेजस्विता खोता चला गया। बात-बात में दूसरों का परावलम्बन देख कर विश्वास नहीं होता क्या यह वही पराक्रमी देश है जिसने साधनों के अभाव में भी हिमालय की छाती फाड़ करके गंगाजी को निकाल लाने का महान् तप सम्पन्न कर दिखाया था। गायत्री उपासना चिरकाल से इस देश को शक्ति सामर्थ्य प्रदान करती रही है, इस युग के लिए तो वह संजीवनी बूटी की तरह है। इसलिए उसके अवतरण का जोरदार स्वागत किया जाना चाहिए एक बार यदि वातावरण को संस्कारित कर लिया गया तो उससे राष्ट्र और विश्व को संयत स्वस्थ, समर्थ देवभावनाओं से ओत-प्रोत रखने का गति चक्र अप ही चल पड़ेगा। यह जिम्मेदारी उन जागृत आत्माओं पर आती है, जिनकी विवेक बुद्धि वस्तु स्थिति को पहचान सकने में समर्थ है, जिनमें अन्ध विश्वास रूढ़िवादी मान्यताओं और परम्पराओं से लड़ पड़ने का साहस है। एक बार उस कारागृह से मुक्ति मिल गई तो फिर सर्वशक्तिमान माता के अनुग्रह अनुदानों से लाभान्वित होते रहने की परम्परा चिरकाल तक चलती रहेगी। राष्ट्र को हराभरा सुखी समुन्नत बनाने वाले सभी तत्व गायत्री में विद्यमान है। आवश्यकता मात्र उसे घर घर जन-जन तक पहुँचाने और लोगों के हठात् इस महाशक्ति के संपर्क में आने के लिए प्रेरित करने की है। वही इन दिनों किया जाना है।
यह आवश्यकता नहीं कि जो इस पुण्य प्रयोजन में जुटें वे उतने उच्च स्तर के साधक और निष्णात हों ही युग सत्ता ने वह परिस्थितियाँ स्वयं विनिर्मित कर दी हैं। प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, संरक्षण सभी कुछ उपलब्ध है, गायत्री उपासना, दर्शन, कर्मकाण्ड, नियमोपनियमों, विज्ञान आदि सभी पक्षों पर विभिन्न प्रकार की पुस्तकों पत्रिकाओं द्वारा प्रचुर मात्रा में प्रकाश डाला गया, डाला जा रहा है। लोगों को उसके संपर्क में लाने भर को बात है। यह कार्य कोई भी थोड़ा-सा समय लगा कर भी पूरा कर सकता है।
व्यक्ति मूलतः दो भागों में विभक्त है। एक उसका बहिरंग, कवच ढाँचा, खोखला, जिसे शरीर कहते हैं। दूसरा उसकी चेतना प्राण गति, तत्परता, इच्छायें, आकाँक्षायें, भावनायें। यह सभी जानते हैं कि इनमें महत्व दूसरे अन्तरंग कलेवर का ही है नो तो भी 60 प्रतिशत लोग जीवन के बहिरंग क्षेत्र को ही सजाने सँवारने में लगे रहते हैं। अन्तरंग की उपेक्षा होती रहती है। व्यक्ति के स्वार्थों कुटिल, अनाचारी होने और विश्व में सर्वत्र अव्यवस्था, अशान्ति फैलने के पीछे वही शारीरिक सुखों के प्रति आसक्ति तृष्णा, और भोगवादी वृति है। भावनायें बुरी तरह मसली कुचली जाती रहती है। न्याय का सचाई का नैतिकता का, मनुष्यता का गला घुटता रहता है। अपराधों में वृद्धि उसी का परिणाम है। आलस्य, प्रमोद, परावलम्बन भी उसी अन्तरंग के परिष्कार का अभाव ही है और कुछ नहीं। गायत्री को “प्राणों के उत्कर्ष” की भी साधना कहते हैं। इस उपासना से अन्तरंग गतिवान होता है, उसमें छायी मलीनता, अन्धकार, अविवेक दूर भागते है। सृष्टि का यथार्थ अभिव्यक्त होने से मनुष्य करने योग्य करता है और सोचने योग्य सोचता है। भावनाओं में देवत्व का विकास और कर्तृत्व में शुचिता व पवित्रता का, दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। जहाँ लोगों की भावनायें शुद्ध और पवित्र होगी वहाँ के समाज में सर्वत्र शान्ति, सुव्यवस्था, प्रसन्नता और सन्तोष भरे जीवन की निर्झरिणी प्रवाहित हो रही होगी। गायत्री को देवताओं की माता, वेद माता इसलिये कहते हैं। उससे ज्ञान की समृद्धि, पवित्रता का विस्तार और सक्रियता की अभिवृद्धि होती है। साँसारिक सुख-शान्ति और प्रगति के यही तीन आधार है; जो गायत्री से पूरे होते है। इस विज्ञान का एक पक्ष लूले-लंगड़े रूप में विद्यमान है, उसका विज्ञान पक्ष बहुत अधिक शक्तिशाली और समर्थ है। वह इन दिनों अभिव्यक्त हो रहा है। इस प्रकाश को सम्पूर्ण शक्ति लगा कर घर-घर पहुँचाया जाय और इस युग के वातावरण को चिन्तन, उपासना और यज्ञों के विस्तार द्वारा गायत्री मय बनाया जा सके तो युग शक्ति का यह अवतरण सफल और सार्थक हो कर रहेगा। उससे इस देश और विश्व को चिरकाल तक स्वस्थ, स्वच्छ और समर्थ बनाये रखने वाली ऊष्मा का प्रस्फुटन सम्भव होगा। इसे अपना पुनीत कर्त्तव्य मानकर प्रत्येक उस व्यक्ति को, जिसे युग शक्ति गायत्री का संपर्क सान्निध्य मिला है, दूसरों तक पहुँचने के लिए हृदय अन्तःकरण से कटिबद्ध होना पड़ेगा। इतना किया जा सका तो इस महान् सत्ता का अवतरण सफल और सार्थक होकर ही रहेगा।
मनुष्य शरीर को स्वस्थ और समर्थ बनाये रखने के लिए आहार का बड़ा महत्व है। यद्यपि उसे प्रतिदिन का काम चलाने योग्य शक्ति अन्य स्रोतों से भी प्राप्त होती रहती है, परन्तु उन स्रोतों से प्राप्त साधनों का उपयोग तभी हो पाता है जबकि शरीर में उन साधनों का उपयोग करने योग्य शक्ति हो। वह शक्ति भोजन द्वारा ही आती है।
आग भी हो और पानी भी हो किंतु ईंधन न हो तो आग थोड़ी देर जल कर ही बुझ जायगी और पानी भाप न बन सकेगा। भाप-जो बड़ी-बड़ी मशीनों को चलाती है, नहीं बनेगी तो मशीनें बन्द पड़ी रहेगी और उनकी कोई उपयोगिता भी नहीं रह जायेगी। स्वच्छ वायु और खुला प्रकाश हो किन्तु भोजन न किया जाय तो शरीर में शक्ति का उत्पादन भी बन्द हो जायगा। इसलिए भोजन की तुलना मशीनों में प्रयुक्त किये जाने वाले ईंधन, उन्हें चलाने के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के उत्पादन हेतु इस्तेमाल किये जाने वाले साधनों से की गयी है।
निर्बाध और पर्याप्त भाप तैयार करने के लिए स्वच्छ तथा मजबूत ईंधन जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार स्वस्थ और सबल शरीर के लिए भोजन का पौष्टिक तथा निर्दोष होना आवश्यक है। यह कैसे जाना जाय कि कौन-सा भोजन पौष्टिक है और किस तरह का भोजन जीवन तत्वों से भरपूर है। यह जानने से पूर्व हमें अपने भोजन का विश्लेषण करना चाहिए।
किसी भी क्रिया का प्रयोजन उसके प्रभावों और परिणामों को स्पष्ट कर देता है। जो भोजन हम करते हैं, उसके सम्बन्ध में बहुत कम लोग यह सोचते हैं, कि जो खाया जाय वह जीवन तत्वों से भरपूर होना चाहिए। बल्कि अधिकांश व्यक्तियों की तो यही धारणा रहती है, कि जो कुछ खाता जाय वह स्वादिष्ट और जायकेदार होना चाहिए। और स्वाद का परीक्षण करने -- भोजन में रस लेने का कार्य जीभ द्वारा होता है।
खाद्य क्रिया जीभ का एक महत्वपूर्ण कार्य है। इस इस प्रक्रिया में दोनों ओर से गाल, सुदृढ़ दीवार का काम देते हैं। उन्हीं के सहारे यह मुँह के ग्राम को आगे पीछे ऊपर नीचे और दाँतों व दाढ़ों के बीच लाती ले जाती है। ग्रास की लुगदी बन जाने पर गोली बनाकर उसे कण्ठ में आहारनाल के द्वार पर इस तरह पहुँचा देती है कि वह सरलता से नाल में उतरता चला जाय। इस क्रिया में इसकी लार उत्पादक ग्रन्थियाँ (सेलिंवरी ग्लैण्डस) विशेष सहायक होती है। यदि लार उत्पन्न न हो तो सूखा ग्रास आहार नाल को क्षति पहुँचाता हुआ जाएगा। लार की सहायता से ही ग्राम नर्म होकर सरलता से सरकता चला जाता है।
इस प्रकार भोजन का स्वाद परखने तथा उसे आगे बढ़ाने में जीभ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन जीभ का एकमात्र कार्य भोजन का स्वाद चखना, रसग्रहण करना या आगे बढ़ाना ही नहीं है। जीभ बोलने का दूसरों से वाणी द्वारा संपर्क करने का भी काम करती है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से जीभ असंख्य स्नायविक तन्तुओं का एक समूह है; जिसमें रक्त लाने ले जाने के लिए शिराओं तथा वाहिनियों का जाल बिछा रहता है। समझा जाता है कि जीभ केवल स्वाद की ही जानकारी देती है, अथवा बोलने का ही काम करती है परन्तु इसके अलावा भी जीभ अनेक कार्य करती है, जैसे वह मनुष्य के स्वास्थ्य का परिचय भी देती है। स्वास्थ्य का परिचय देने के लिए तो जीभ वस्तुतः एक मीटर का काम देती है। और कुशल चिकित्सक उसे देख कर कितने ही रोगों को पढ़ लेते है।
रस ग्रहण, भोजन को आगे बढ़ाने और बोल चाल द्वारा दूसरों से संपर्क स्थापित करने में जीभ पर दोहरा दायित्व आ जाता है। अध्यात्म ने इसलिए जीभ को दोहरी इंद्रिय माना हैं। इसे ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों का कार्य सम्पन्न करना पड़ता है। न केवल यह विचारों और भावों को व्यक्त करती है, बल्कि शरीर की आन्तरिक स्थिति को भी अपनी छाती पर ला कर बात पर लिख कर बता देती है। लेकिन आमतौर पर इससे दो ही कार्य लिए जा सकते हैं - भोजन और भाषण। उनमें भी भोजन का स्वाद चखने तथा आहार को आगे बढ़ाने का कार्य जीभ को अकेले पूरा करना पड़ता है, जबकि बोलने में तो स्वर, कण्ठ, तालु आदि भी सहयोग देते हैं।
जीभ का जो भाग स्वाद की सूचना मस्तिष्क को देता हैं; वह एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। जिन्हें स्वाद कलिकायें कहा जाता है। जीभ की ऊपरी सतह पर स्वाद कलिकाओं की क्रमबद्ध रचना होती है। सूक्ष्म रोयों के रूप में, छोटे, बड़े, ऊँचे-नीचे; आगे-पीछे तथा अगल-बगल छाये हुए उन रोयों को अंकुरक (पेपिली) कहते हैं। जीभ की नोक पर इतने से कुछ संकरे कुछ कुछ उभरे भी रहते हैं। वहाँ इन्हें सूत्री अंकुरक (फिली फार्म पेपिली) कहते हैं। अन्य स्वाद कलिकाओं में से कुछ टोपीदार और कुछ कुकुरमुत्ते जैसी उठी रहती हैं। उन्हें कंवकी अंकुरण या फजाई फार्म पेपिली कहते हैं। असंख्य कोशिकाओं युक्त एपोथेलियम जीभ की ऊपरी सतह को ढके रहता है। उसी में ये भिन्न-भिन्न स्वाद कलिकायें रहती हैं। कली का सामान्य रूप हमारे गले की ओर एक खुले हुए फ्लास्क की भाँति रहता है। हमारे ग्रास का घुलनशील भाग ज्यों ही इन कलिकाओं को स्पर्श करता है, इनकी रसवेदी कोशिकाओं (गैस्टेटरी सेल्स) में उतर जाता है। ये कोशिकायें कलिकाओं की जड़ में स्थिति ज्ञान तन्तुओं को प्रभावित करती हैं। जो तुरन्त ही स्वाद का संवाद मस्तिष्क तक पहुँचा देती हैं।
प्रकृति ने जीभ में यह व्यवस्था केवल इसलिए कर रखी है, कि मनुष्य को आहार की उपयोगिता अनुभव रहे। तथा वह रुचि पूर्वक भोजन ग्रहण करता रहे। होती अभिरुचि और तन्मयता पूर्वक किये गये कार्य अपना संपूर्ण परिणाम प्रस्तुत करते हैं। सम्भवतः इसलिए प्रकृति ने जीभ में स्वाद कलिकायें बनायी हो और उनमें रसना का आकर्षण उत्पन्न किया हो। लेकिन मनुष्य उन प्रयोजन को भूल कर केवल स्वाद के लिए ही भोजन करते है। यह विपर्यय हानिकारक परिणाम ही उत्पन्न करता है, जिसे किसी भी दृष्टि से समझदारी नहीं कहा जा सकता है। लोग उपार्जन के लिए यहाँ वहाँ घूमते रहते हैं। अपनी बुद्धिमता, परिश्रम और लगन से घूम फिर कर आवश्यक उपार्जन कर भी लेते हैं परन्तु कोई व्यक्ति दिन रात कमाता रहे और जो कुछ कमायें उसे आवश्यक कार्यों में खर्च करने के स्थान पर केवल घूमने फिरने में ही खर्च करने लगे तो यह नासमझी से बढ़कर पागलपन ही कहा जायगा। कुछ इसी तरह की ना समझी जीभ में रहने वाली स्वाद कलिकाओं के उपयोग के सम्बन्ध में भी हो गयी है। स्वाद का प्रयोजन भूल कर केवल उसे ही प्रधानता देने की गलती अन्ततः हानि ही पहुँचाती है।
यद्यपि प्रकृति समय-समय पर रसना के माध्यम से ही इस गलती की ओर ध्यान दिलाती रहती है।
जीभ में स्थित स्वाद कलिकाओं की क्षमता घ्राणेन्द्रिय के सहयोग द्वारा ही बनी रहती है। जुकाम के कारण जब नाक बन्द हो जाती है और हमें कोई भी सुगंध प्रभावित नहीं कर पाती तब इसी लिए खाना पीना स्वादहीन लगता है। इसी प्रकार कहीं दूर बनते हुए स्वादिष्ट व्यंजन की सुगन्ध हमें अनदेखे ही आह्लादित कर देती है। वह व्यंजन जब तक हमारी जीभ पर नहीं आ जाता तब तक तृप्ति नहीं होती। इस स्थिति को लिप्सा ही कहना चाहिए।
जिस प्रकार जुकाम के कारण किसी व्यंजन की सुगन्ध नहीं आती उसी प्रकार पेट की खराबी और दूसरे कई रोगों में जीभ की स्वाद कलिकायें निष्क्रिय हो जाती हैं। स्पष्ट अर्थ है कि प्रकृति भोजन की ओर से निरुत्साहित कर रही है।
स्वाद कलिकाओं की संख्या मनुष्य की आयु के साथ परिवर्तन होता रहता है। बाल्यावस्था में यह संख्या सैकड़ों तक की होती है, जबकि प्रौढ़ावस्था में केवल 70-80 तक रह जाती है। इनकी रचना भी उद्देश्य पूर्ण है। बच्चों के बढ़ते शरीर को अच्छा भोजन चाहिए जबकि वृद्धावस्था के साथ भोजन की विविधता या प्रचुरता अनावश्यक हो जाती है, इसलिए स्वाद कलिकायें कम होकर अथवा अशक्त बनकर भोजन की ओर से निरुत्साहित भी करती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से स्वाद के मूलतः चार भेद हैं - मीठा, खट्टा, कड़वा और खारा। शेष सभी स्वाद दूसरे का मिश्रण मात्र होते हैं। भिन्न- भिन्न रूप से व्यवस्थित स्वाद कलिकायें भिन्न-भिन्न स्वादों की अनुभूति कराती हैं। जीभ के अग्रभाग की कलिकायें केवल मीठा, पिछले भाग की कड़वा और दोनों पार्श्व की खट्टे तथा खाकी तीव्र संवेदक है।
प्रकृति ने प्रत्येक खाद्य पदार्थ में ये चारों स्वाद समुचित रूप से भर देय हैं। किसी स्वाद की अधिकता या न्यूनता से भिन्न-भिन्न स्वाद बनते हैं। और इन चारों में से दो या दो से अधिक स्वादों के सम्मिश्रण अलग-स्वाद निर्मित करते हैं। उनमें मुख्य रूप से मीठा और चरपरा। मीठे के लिए आमतौर पर शंकर, गुड़, खाँड़ आदि का प्रयोग किया जाता है। इन खाद्यों की प्रचुरता शरीर पर क्या प्रभाव डालती है- यह वैज्ञानिकों के लिए लम्बे समय से अनुसंधान और परीक्षण का विषय रहा है।
मीठे खाद्य पदार्थ शरीर में शर्करा को बढ़ाते है। शर्करा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, परन्तु सीमा से बाहर तक अनावश्यक हैं। वह प्राकृतिक खाद्यों में स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। अतिरिक्त रूप से मीठे का उपयोग शरीर पर अपना दुष्प्रभाव डालता है।
“रोडेल्स सस्टम फार मेण्टल पावर एण्ड नैचुरल हैल्थ” में डा. जे. आई. रोडेल ते लिखा है-रक्त में शर्करा की मात्रा अत्यधिक बढ़ने से रोकने के लिए पैन-क्रियाज नामक ग्रन्थि अत्यधिक मात्रा में इन्सुलीन का का स्रवर्ण करती है, मीठी चीजें खाने से पैन क्रियाज हो जाता है। इस प्रकार पैन क्रियाज पर अधिक दबाव पड़ता है। फलतः उसकी दक्षता में कमी आ जाती है। इससे वह अपेक्षा से अधिक इन्सुलीन का निर्माण करने लगता है। चीनी की मात्रा कम होने लगती है।
चूँकि मस्तिष्क का पोषण रक्त द्वारा पहुँचायी गयी शर्करा से होता है। अतः रक्त में शर्करा की कमी से आयी मस्तिष्क सम्बन्धी गड़बड़ी को लोग मानसिक रोग समझ लेते हैं।
न्यूयार्क के डॉक्टर जॉन डब्लू. टिनटेरा का कथन है कि-अमेरिकी पागल खानों में 80 प्रतिशत रोगियों को मस्तिष्क दोष नहीं होता अपितु हाइपोग्लाइसेमिया (रक्त में शर्करा की अल्पता) है हाइपोग्लाइसेमिया का कारण वस्तुतः गलत खान पान होता है।
यद्यपि यह सही है कि पैनक्रिया, ऐड्रँनल तथा यिटुइटरी ग्रन्थियों की गड़बड़ी से भी ये कष्ट हो सकते है; तथापि अनेक स्थितियों में इसका कारण भोजन की ही गड़बड़ी होता है। पर यह तथ्य है कि रक्त में शर्करा की कमी का स्थिति अत्यधिक चीनी खाने से आती है।
“बॉडी, माइण्ड एण्ड शुगर” नामक पुस्तक के लेखन डा. ई. एम. अब्राह्मसन का कहना है कि डॉक्टर प्राय हाइपोग्लाइसेमिया (रक्त में शर्करा की अल्पता) का परीक्षण न करने की भूल कर बैठते हैं। फलस्वरूप इस रोग के रोगियों को केनोनरी थ्रान्बासिस, ब्रेनट्यूमर, मिरगी, जालब्लैडर, एपेडिसाइटिस, हिस्टीरिया जैसे अनेक जटिल रोगों का कष्ट भोगना पड़ता है।
इस प्रकार मीठे खाद्यान्नों का प्रभाव शरीर में कितने ही रोगों को जन्म देता है और मानसिक गड़बड़ियां पैदा कराते है। मीठे पदार्थों की तरह कई व्यक्तियों को चरपरे पदार्थ प्रिय होते हैं। यह स्वाद कड़वे और खारे स्वाद के सम्मिश्रण से बने है। मिर्च का स्वाद कुछ फीकी कड़ुवाहट लिए रहता है। इसी कारण उसमें स्पष्टतः कड़वाहट का आभास नहीं होता, बल्कि तीखापन लगता है। इसके साथ नमक का प्रयोग खाद्य पदार्थ में चरपरापन पैदा कर देता है।
शरीर चरपरराहट को एक सीमा तक ही सह सकता है; हालाँकि उसे स्वीकार नहीं करता यह स्वाद रक्त में उष्णता और शरीर में उत्तेजना लाता है। बहुत तेज स्वाद की वस्तु जीभ पर रखते ही पसीना छूट आता है।, प्यास लगने लगती है, मुँह में जलन होने लगती है, नाक और आँख से पानी बहने लगता है। स्पष्ट है शरीर इस तत्व को बड़ों कड़ाई के साथ अस्वीकार कर रहा है। पर लोग पानी पी-पी कर भी इस स्वाद की वस्तुओं को उदरस्थ करते रहते है।
मिर्च के साथ प्रयुक्त किया जाने वाला नमक भी शरीर और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होने के स्थान पर हानिकारक ही है। केवल नमक ही स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है। हाल ही में कुछ समय पूर्व वैज्ञानिकों ने नमक के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए चूहों पर प्रयोग किये। और पाया कि इससे चूहों का रक्त चाप बढ़ जाता है सामान्यतः एक व्यक्ति आधे से एक औंस नमक रोज खा लेता है। इसी अनुपात में जब चूहों को नमक खिलाया गा तो उनको रक्तचाप बढ़ गया और जीवन अवधि घट गयी।
इन स्वादों के अलावा दूसरे स्वादों का अधिक उपयोग भी शरीर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यहाँ मुख्यतः प्रयुक्त किये जाने वाले स्वादों का ही विश्लेषण करने लायक स्थान है। इतने मात्र से समय लेना चाहिए कि किसी भी स्वाद के प्रति शरीर की क्या प्रतिक्रिया है।
कहा जा चुका है कि प्रकृति ने जीभ में स्वाद कलिकाओं की रचना मात्र इस उद्देश्य से की है कि मनुष्य का भोजन के प्रति आकर्षण रुचि बनी रहे। यदि स्वाद ही प्रकृति का मुख्य उद्देश्य रहा होता तो शरीर इन स्वादों के प्रति इतनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता मीठा खाने के बाद जीभ पर आने वाला फीकापन, कड़ुवाहट से अरुचि, खट्टे से ऊबकाई’ खारे से मितली जैसा प्रभाव जीभ पर नहीं होता। जीभ इन स्वादों को चखते ही सूचित कर देती है कि गलत चीज आ रहीं है। अब उसे बार-बार दबा कर, उसकी सूचना को अनसुना कर अपने ही मन की चलायी जाती है, तो रोग के रूप में प्रकृति पुनः सतर्क करती है। उसके बावजूद भी न सुने न माने तो दूसरा कोई कुछ क्या करें?
विधाता सृष्टि की रचना में लगा था जब मनुष्य का नम्बर आया तो उसे बनाने में अधिक श्रम, समय और अपनी सूझ बूझ का परिचय देना पड़ा। ईश्वर का लाड़ला पुत्र कहलाने में मनुष्य को गौरव का अनुभव होता था। उसके कृत्य अपने पिता की तरह ही नेक और भलमनसाहत पूर्ण थे। उसके नेत्र अच्छी वस्तुएँ देखते थे, कान हरिर्कीतन तथा गुणानुवाद को बड़े चाव से सुनते थे जिह्वा से निकलने वाला प्रत्येक शब्द सत्य, मधुर और सार्थक होता था। हाथ दान देने और पिछड़े हुए व्यक्तियों को उठाने में लगे थे। पैर अपने स्वभावनुसार सुमार्ग पर चलने के अभ्यस्त ही गये थे।
शैतान तंग आ गया, उसे अपनी कारगुजारी दिखाने का अवसर ही नहीं मिल रहा था वह तो कितने ही दिनों से बेकार पड़ा था, वह वेष बदल कर मनुष्य के पास पहुँचा और बोला “इसमें कौन सी बुद्धि मानी है जो कार्य एक आँख तक, कान, एक हाथ और एक पैर से हो सकता है उसके लिए तुम अपनी दोहरी शक्ति लगा रहे हो यह तो उसका दुरुपयोग है।,,
सीधा साधा मनुष्य शैतान की बातों में आ गया उस दिन से वह एक आँख से अच्छा देखने लगा, एक काने अच्छी बातें सुनने लगा, एक हाथ से दान देने तथा अन्य भलाई के काम करने शुरू किये और एक पैर को भलाई के मार्ग पर चढ़ाया। अधिक समय तक कोई हथियार काम न आये तो उस पर जंग लग जाती है यह ठहरा मानव शरीर, हाड़ माँस का पुतला जिन अंगों से कुछ काम नहीं लिया गया वह निष्क्रिय हो गये। शैतान तो ऐसे अवसर की ताक में था ही उसने इन खाली पड़े अंग पर अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया। इसलिए तो यह कहा जाता है कि तभी से मनुष्य अच्छाई के साथ बुराई देखने लगा, प्रशंसा के साथ परनिंदा सुनने लगा। अच्छे कार्यों के साथ बुरे कार्य करने लगा और सत् मार्ग के साथ कुमार्ग पर चलने लगा। आलस में पड़ी निकम्मी वस्तु का विकृत हो जाना स्वाभाविक ही था।
अखण्ड-ज्योति परिवार की नर्सरी में उगने बौर बढ़ने वाले पौधे अगले दिनों विश्व परिवार के नंदनवन विकसित कर सकें और अपने कल्प वृक्ष जैसे अस्तित्व व्यक्ति की विशिष्टता को देवोपम सिद्ध कर सके, प्रयत्न इसी का चल रहा है। अपनी पारिवारिकता का यही उद्देश्य और यही स्वरूप है। सफलता कहाँ तक मिलती है यह दूसरी बात है। प्राणवान सहयोगी और समर्थ साधन मिलने पर छोटे काम बड़े हो जाते हैं और इनके अभाव में विशाल संभावना वाले वट वृक्ष भी सूखते नष्ट होते देखे गये हैं। परिस्थिति क्या परिणाम उत्पन्न करेंगी। यह आगे की बात है। मनःस्थिति यही है कि हम लोग मिल जुलकर एक ऐसी सद्भाव सम्पन्न आत्मीयता विकसित करें जिसे नव युग की भूमा के रूप में क्रियान्वित होते देखा जा सकें।
प्रशिक्षण और सान्निध्य की उभय पक्षीय प्रक्रिया ही व्यक्तित्वों को ढालने का काम करती है। बौद्धिक समाधान और समर्थन एक पक्ष है। दूसरा वह है जिसमें वातावरण का अप्रत्यक्ष प्रभाव अन्तराल की गहराई में उतरता चला जाता है और ऊँचे आदर्शों की समीपता अपनी ऊर्जा से प्रभावित करके निकटवर्ती के अनुगमन की प्रेरणा देती है। भावनात्मक उत्कर्ष के लिए सदा से इन दोनों ही पक्षों का समन्वित प्रयोग होता रहा है। अब या भविष्य में जब भी व्यक्तित्वों का उच्चस्तरीय निर्माण अभीष्ट होगा तब इन्हीं उपाय उपचारों को कार्यान्वित करना होगा।
चिंतन तथ्य के अनुरूप अखंड ज्योति परिजनों का स्तर ऊँचा उठाने के लिए बौद्धिक प्रशिक्षण, युग साहित्य के माध्यम से किया जाता रहा है। दूसरा सान्निध्य वाला पक्ष किसी रूप में क्रियान्वित तो पहले से भी होता रहा है पर पिछले सात वर्ष से हरिद्वार का शान्ति कुँज आश्रम बनने के उपरान्त तो उसी को प्रमुखता दी जाने लगी है। यहाँ जीवन साधना सत्रों का कई स्वरूप में प्रयोग चलता रहा है। बड़ी संख्या में परिजन उसमें समय-समय पर सम्मिलित होते रहे हैं। इसका प्रभाव परिणाम क्या हुआ इसका संक्षेप में एक ही उत्तर है कि प्रयत्न का सत्यपरिणाम आशातीत निकला है। “पिछले दिनों इस प्रयास की सफलता ने जो उत्साह एवं साहस प्रदान किया है कि उसके आधार पर इस प्रक्रिया को और भी अधिक व्यवस्थित एवं तीव्र कर देने का निश्चय किया गया है। इस निश्चय को कार्यान्वित भी जल्दी ही किया जा रहा है। गायत्री नगर के निर्माण कम में थोड़ी और तेजी आ सकी अवरोध हट सकें तो आशा की जा सकती हैं कि अगली छमाई में वह उपक्रम चल पड़ेगा जिसकी रूप रेखा बनाने में उपलब्ध दूर दृष्टि का पूरा-पूरा उपयोग किया गया है तथा उपलब्ध साधनों को पूरी तरह झोंक दिया गया है।
स्थान और समय का ध्यान रखते हुए कई शिविरों को थोड़े थोड़े समय के लिए करते रहने का चार किया गा। अभी मात्र दिवाली तक के आठ महीनों की ही योजना बनाई गई है। अनुभव, आवश्यकता एवं साधनों का ध्यान रखते हुए अगले कदम परिस्थितियों के अनुरूप उठाये जाते रहेंगे। अभी तो सामयिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही सान्निध्य के साथ उपयुक्त आदान प्रदान के लिए उतना ही प्रबन्ध किया गया है जितना इन दिनों नितान्त आवश्यक एवं साधनों को देखते हुए सम्भव था।
जनवरी से सितम्बर तक के लिए निर्धारित सत्रों का क्रम इस प्रकार बना है-
(1) ता. 25 जनवरी से 3 फरवरी 79 तक बसन्त पर्व पर दस दिवसीय साधना सत्र सर्व साधारण के लिए।
(2) ता. 4 फरवरी से 13 फरवरी 79 तक दस दिवसीय सत्र उन परिव्राजकों के लिए जो अप्रैल मई जून में होने वाले महायज्ञ आयोजनों के लिए दो-दो महीने के लिए कार्य क्षेत्र में भेजे जायेंगे।
(3) ता. 29 मार्च से 6 अप्रैल तक चैत्र नवरात्रि का साधना सत्र। गायत्री लघु अनुष्ठान, उपयुक्त वातावरण एवं मार्ग दर्शन में करने वालों के लिए।
(4) मई जून में दस दस दिन के छः साधना सत्र (1) 1 से 10 मई तक (2) 11 से 20 मई तक (3) 21 से 30 मई तक। (4) 1 जून से 10 जून तक (5) 11 से 20 जून तक (6) 21 से 30 जून तक।
(5) कन्या सत्र 1 जुलाई से आरम्भ होकर दस महीने- 30 अप्रैल तक चलेगा भविष्य में एक वर्षीय शिक्षण दस महीने में ही पूरा कर दिया जाया करेगा।
(6) परिव्राजकों एवं टोली नायकों का प्रशिक्षण। जुलाई-अगस्त-सितम्बर के पूरे तीन महीने में। इस अवधि में न्यूनतम एक महीने के लिए और अधिकतम तीन महीने के लिए शिक्षण में सम्मिलित हुआ जा सकता है।
(7) आश्विन नवरात्रि एक दिवाली दशहरा की छुट्टियों में दस दस दिन के दो साधना सत्र। नवरात्रि सत्र 22 सितम्बर से 30 सितम्बर 79 तक और दशहरा दिवाली की छुट्टियों का सत्र ता 2 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक का रहेगा।
इन छः हों सत्रों का प्रयोजन और स्वरूप फिर एक वार अच्छी तरह समझ लेने की आवश्यकता है।
बसन्त सत्र (क्र.1) बसन्त पर्व मिशन का जन्म दिन है, उस अवसर पर सर्वत्र युग चेतना की वर्षा होती है। नई प्रेरणाओं का अदृश्य लोक से अभिवर्धन इस अवसर पर विशेष रूप से होता हैं। पिछले दिनों घनिष्ठ स्वजनों की इस अवसर पर साथ रहने की इच्छा रहती है। साथ साथ साधना भर चलती है। इस बार महापुरश्चरण योजना के अंतर्गत सर्वत्र गायत्री यज्ञों की धूम है। बसन्त पर्व पर हर शाखा को अपने यहाँ तथा अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में पाँच कुण्डी आयोजन करने के लिए कहा गया है। उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने को प्राथमिकता दी गई है। इसलिए इस क्रम से ही लोगों को आ सकने का अवसर मिलेगा। फिर भी परम्परा के अनुरूप सत्र तो होगा ही।
दस दिवसीय प्रव्रज्या सत्र (क्र.2) बसंत पंचमी के बाद वाला दस दिवसीय सत्र परिव्राजकों के प्रशिक्षण के लिए तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए रखा गया है। परिव्राजक पंजीयन के आवेदन भर कर भेजने वालों में एक या दो माह का समय देने में सक्षम तथा परिव्राजक पंजीयन के आवेदक भर कर भेजने वालों में एक दो माह का समय देने में समक्ष तथा परिव्राजक उत्तरदायित्व संभालने योग्य परिजन बड़ी संख्या में है। उनमें से जो 1 सितम्बर से 15 सितम्बर 78 के प्रशिक्षण में नहीं पहुँच सके थे, उन्हें प्रशिक्षण देकर होली के बाद सम्पन्न होने वाले आयोजनों को संभालने के लिए तैयार किया जायगा।
साधना सत्र (क्र. 3, 4 एवं 7) इस वर्ष गायत्री महा पुरश्चरण शृंखला के अंतर्गत लाखों नये साधक मिशन में सम्मिलित हुए है। स्वभावतः उनकी आकांक्षा शान्ति कुँज के वातावरण और उपयोगी सान्निध्य में कुछ दिन रहने ओर साधना करने की होगी। इन्हें दस दिवसीय सत्रों में सम्मिलित होने का अवसर मिल सके इसके लिए अगली दिवाली तक 9 सत्र रखे गये हैं। एक अभी चैत्र की नवरात्रि (क्र. 3) में तीन मई और तीन जून (क्र. 4) में और दो आश्विन (क्र. 7) में इस प्रकार कुल 9 सत्रों में ही साधकों को स्थान मिल सकेगा जो इस वर्ष नये साधकों के रूप में मिशन में सम्मिलित हुए।
ग्रीष्म के साधना सत्र 1 एक गर्मी के दो महीनों में न केवल पढ़ने पढ़ाने वालों को वरन् अन्याय वर्ग के लोगों को भी घर से बाहर जाने की सुविधा रहती है। अस्तु इनमें दस दस दिन के छः सत्रों की व्यवस्था की गई है। इनमें सभी को 24 हजार जप का अनुष्ठान इस पुनीत वातावरण में रह कर करना होगा। अध्यात्म को व्यवहार में उतारने और चमत्कारी प्रतिफल प्राप्त करने का सामान्य मार्ग दर्शन को सभी को मिलेगा साथ ही व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उसके अवरोधों से जूझने तथा प्रगति पथ पर चलने का विशिष्ट परामर्श एवं सहयोग भी उपलब्ध होगा। इन सत्रों में से कोई अपनी सुविधानुसार चुना जा सकता है।
कन्या सत्र क्र.5:- कन्या सत्र। इसमें 24 वर्ष से अधिक आयु की तथा आठवीं कक्षा से अधिक पढ़ी शारीरिक और मानसिक दृष्टि से निरोग कन्याओं की ही भर्ती की जानी है। अगले दिनों परिवार निर्माण अभियान को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया जाना है। उसका नेतृत्व सुविकसित नारी हो कर कर सकेगी। नव योग में नारी का वर्चस्व प्रधान रहेगा। समय की इस आवश्यकता को पूरा कर सकने में समर्थ प्रतिभाओं को निर्माण जिस प्रशिक्षण के माध्यम से हो सकता है, यह सत्र उसी की भूमिका है। यों यह शिक्षा कई वर्ष की होनी चाहिए पर अखण्ड ज्योति परिवार की अधिक कन्याएँ सीमित स्थान एवं सीमित समय में लाभ उठा सकेगा इसलिए थोड़े समय की ही यह शिक्षा संभव हो सकी। व्यक्तित्व का विकास पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह-महिला जागरण अभियान में योगदान इन तीनों ही विषयों का इस संक्षिप्त प्रशिक्षण में समुचित समावेश है। स्वावलम्बन के लिए अनेक उद्योगों की शिक्षा दी जाती है। होम नर्सिंग की शिक्षा अब विशेष रूप से बढ़ा दी गई जिसके आधार पर लड़कियाँ अपने परिवार की स्वास्थ्य संरक्षिका बन सकेंगे। संगीत एवं भाषण का अभ्यास अनिवार्य रूप से कराया जाता है। प्रयत्न यह किया जाता है कि कन्या इस थोड़ी सी ही अवधि में इतनी सुसंस्कारिता प्राप्त कर सके जिसके आधार पर वह अपने निज के लिए-अपने परिवार के लिए, समाज के लिए सच्चे अर्थों में गृह लक्ष्मी युवा नेत्री सिद्ध हो सके।
प्रव्रज्या सत्र (क्र.6):- प्रव्रज्या अभियान इन दिनों प्रौढ़ावस्था में है। जागृत आत्माओं ने युग देवताओं ने इस सान्ध्य वेला में समय दान की माँग की है। प्राणवानों ने उदारतापूर्वक यह अनुदान प्रस्तुत भी किये हैं। वरिष्ठ कनिष्ठ और समय दानी वर्ग के प्रव्रज्या अभियान में सम्मिलित होने वालों तथा टोली नायकों, कार्यवाहकों को अपना उत्तर दायित्व ठीक कर निर्वाह कर सकने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण मिलने की आवश्यकता है। अपनी वर्तमान परिस्थितियों के के साथ मेल बिठा कर कौन, कहाँ, किस प्रकार क्या कर सकता है। इसके लिए हर व्यक्ति को परिस्थिति के अनुरूप मार्गदर्शन मिलेगा कुछ योग्यताएं ऐसी है जो इन समस्त युग शिल्पियों में होनी चाहिए। भाषण कला, सामान्य संगीत ज्ञान गायत्री यज्ञ तथा पर्व संस्कारों में निपुणता, स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर एवं लाउडस्पीकर का उपयोग, यह कर्म ऐसे है जो हर युगशिल्पों को आने चाहिए। जुलाई, अगस्त, सितम्बर की अवधि इन्हीं तीन योग्यताओं के संवर्धन के लिए रखी गई है। जिन्हें भविष्य में धर्म तन्त्र से लोकशिक्षण का महान प्रयोजन पूरा करना है युग शिल्पियों की भूमिका निभानी है जन जागरण का शंख बजाना है उनमें यह सभी योग्यताएँ होनी चाहिए जो इन तीन महीनों के सत्रों में दी जाने वाली है।
जुलाई, अगस्त, सितम्बर में से किसी में भी युग शिल्पियों को एक महीने के लिए आने की छूट है। किस में आया जायगा इसका निश्चय निर्धारण समय से पूर्व ही कर लेना चाहिए स्थान और शिक्षण की दृष्टि से तीनों में शिक्षार्थी समान संख्या में रखने पड़ेंगे इसलिए शिक्षार्थियों की सुविधा के साथ साथ शाँति कुँज के सीमित स्थान का भी ध्यान रखना होता है। इस दृष्टि से समय का निर्धारण पहले से ही कर लेना चाहिए। एक का स्थान भर जाने पर दूसरे में ही अवसर मिल सकेगा। संगीत प्रशिक्षण तीन महीने से कम में पूरा नहीं हो सकता। इसलिए गायन वादन का काम चलाऊ शिक्षण होने के लिए तीन महीने से में काम नहीं चल सकता। जिन्हें पहले का अभ्यास है वे कुछ कम समय में भी आवश्यक योग्यता प्राप्त कर सकते है। जितने समय अधिक रहा जायगा उतनी ही योग्यता बढ़ेगी। निश्चय ही एक महीने की अपेक्षा दो महीने-दो के स्थान पर तीन महीने ठहर सकने वाले अधिक योग्यता प्राप्त कर सकेंगे। कौन कितना समय निकाल पाता है यह अपनी स्थिति पर निर्भर है।
उपरोक्त तीन महीने के परिव्राजक सत्र इस दृष्टि से और भी आर्थिक महत्वपूर्ण है कि गायत्री महा पुरश्चरण शृंखला अब एक वर्ष तक सीमित नहीं है। उसकी अवधि 24 महीने कर दी गई है। रजत जयन्ती वर्ष 25 वें वर्ष में बनाया जा रहा है। उच्च स्तरीय सूत्रों का नया संदेश आया है कि सूक्ष्म वातावरण में अभीष्ट ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए 24 महीने तक इस पुण्य प्रक्रिया को चलने देना चाहिए तद्नुसार अब जितने आयोजन इस वर्ष हुए है उनमें भी अधिक अगले वर्ष होंगे। उनमें परिव्राजक वक्ता एवं गायकों की बड़ी संख्या में जरूरत पड़ेगी। यह बाहर के किराये के लेने से काम नहीं चलेगा। जिनके मन में मिशन रमा हुआ है वे ही ठीक तरह आलोक वितरण की-जन् जागरण की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। अस्त, तीन महीने के उपरोक्त प्रशिक्षण को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इसी अवा में इतने बर्तन पक जायेंगे, जिससे अगले वर्ष के लिए लोक नायकों की आवश्यकता पूरी हो सके। इसके लिए जितने शिक्षार्थी बुलाये जा रहे है, उसके अनु रूप ही उपयुक्त अध्यापकों का भी प्रबन्ध किया जा रहा है।
वर्ष के प्रारम्भ में ही अगले आठ महीनों की सत्र योजना का प्रकाशन इसलिए किया गया है कि जिन्हें इनमें से किसी में सम्मिलित होना हो वे अपना स्थान समय से पहले ही सुरक्षित करा लें। सर्व विदित है कि अपना देव परिवार आँधी तूफान की तरह बढ़ रहा है। इस वर्ष महा पुरश्चरण योजना के अंतर्गत नये साधकों की संख्या प्रायः दूनी हो गई है। शान्ति कुँज के प्रभावी प्रशिक्षण, दिव्य वातावरण और प्राणवान सान्निध्य में कुछ समय रहने, साधना करने परामर्श पाने की इच्छा अनेकों को रहती है। सीमित स्थान और सीमित समय में सभी को स्थान नहीं मिल पाता। ठीक समय पर आवेदन पत्र भेजने वाले को स्थान पर जाने के कारण प्रायः निराश हो रहना पड़ता है। इसलिए इस सूचना के साथ आमंत्रण भेजा जा रहा है कि अगले आठ महीनों के उपरोक्त सत्रों में से किसी में जिन्हें सम्मिलित होना हो वह समय से पहले ही अपने विस्तृत परिचय सहित आवेदन पत्र भेज कर स्वीकृति प्राप्त करलें।
श्रम जीवी कार्यकर्ताओं की आवश्यकता
जागृत आत्माओं से युग देवता ने समय दान की माँग की है। तदनुसार भाव भरे उत्तर मिले है। जीवन दानियों की आत्माहुतियाँ बड़ी संख्या में मिल रही है। वे ऐसे ऊँचे स्तर की तथा इतनी अधिक है कि उनसे परिवार का हर सदस्य अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर सकता है।
इन जीवन दानियों में से अधिकाँश ऐसे है जो अपनी निर्वाह आजीविका का पूरा अथवा अधिकाँश अपने संचित साधनों से ही बना कर आये है। कुछ ही ऐसे है जिनके निर्वाह की पूरी व्यवस्था का उत्तरादयित्व मिशन को सम्भालना पड़ रहा है। थोड़े से ही जीवनदानी ऐसे भी है जिनके निर्वाह में कमी पड़ने वाला भाग मिशन को पूरा करना पड़ता है।
इनके अतिरिक्त ऐसे कितने ही भाव भरे परिजन पत्र लिखते रहते है कि उन्हें शान्ति कुँज के वातावरण में रहकर अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्ज्वल बनाने की उत्कृष्ट आकांक्षा है। निर्वाह के लिए वे कुछ भी परिश्रम कर सकते है-अपनी आजीविका स्वयं चलाना चाहते है। उनके ‘पास संचित सम्पदा नहीं है।
ऐसे लोगों में से कुछ को इस वर्ष यहाँ काम मिल सकता है। गायत्री नगर एवं ब्रह्मवर्चस के नये निर्माण में कुछेक ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होगी, जो यहाँ रह कर परिश्रम पूर्वक आजीविका प्राप्त कर सकते है। और यहाँ के स्वर्गीय वातावरण में परिवार सहित या एकाकी जीवन यापन कर सकते है। ऐसे कुछ श्रम जीवी अगले दिनों इस प्रकार चाहिए।
(1) रसोइया फुर्ती से अधिक मात्रा में भोजन पका सकने के अनुभवी।
(2) माली जो पेड़, पौधे, घास आदि लगाने के पहले से अभ्यस्त रहे हों।
(3) धोबी जो कपड़े धोने का धंधा करते रहे हैं।
(4) मोटर ड्राइवर-डीजल तथा पेट्रोल की गाड़ियां चलाने के अभ्यस्त।
(5) लकड़ी का काम जानने वाले बढ़ई। इमारत चुनने, पुताई, रंगाई आदि करने का कौशल जानने वाले।
(6) झाड़ू बुहारी लगाने वाले, सफाई कर्मचारी, मुस्तैद चौकीदार।
बाजारू पारिश्रमिक की दर पर नहीं अपेक्षा कृत कुछ सस्ते पड़े, ऐसे ही स्वयं सेवी स्तर के लोगों की आवश्यकता है। इच्छुक लोग अपना परिचय तथा अनुभव और वेतन लिखते हुए शांतिकुंज हरिद्वार के पते पर पत्र व्यवहार कर लें।
अनुसंधान कार्य के लिए सहयोग उपेक्षित
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का विवरण पिछले अंक में छप चुका है। इसके लिए आवश्यक साधन तत्परता के साथ जुटाये जा रहे हैं। प्रयोगशाला के लिए बहुमूल्य यंत्र उपकरण मंगाये गये हैं जो यज्ञ चिकित्सा तथा अन्यान्य साधनाओं की प्रतिक्रिया का प्रमाण निष्कर्ष प्रस्तुत कर सके। इन प्रयोगों के कार्य संचालन के लिए उपयुक्त शिक्षा संपन्न सुयोग्य प्रतिभाएं आ चुकी हैं और आ रही हैं आशा की जानी चाहिए विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का अद्भुत आविष्कार अगले दिनों संपन्न हो सकेगा। यदि अभीष्ट प्रयोजन में सफलता मिलती है तो इसे अपने समय की अनुपम एवं युगांतकारी उपलब्धियां कहा जा सकेगा।
प्रयोगशाला के माध्यम से वैज्ञानिक अन्वेषण के अतिरिक्त अनुसंधान का दूसरा पक्ष है दार्शनिक पर्यवेक्षण। विचारणाओं, भावनाओं, आस्थाओं, मान्यताओं का उत्कृष्ट निकृष्टता का स्वरूप तथा उसका प्रतिफल जिस आधार पर प्रस्तुत किया जाता है उसे अध्यात्म या तत्व दर्शन कहते हैं। ब्रह्म विद्या का यही क्षेत्र है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिंतन की सारी प्रक्रिया इसी पर घूमती है। योग साधना एवं तपश्चर्या के विभिन्न उपचार इसी क्षेत्र में विभूतियां उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का चमत्कारी और विभूतियों का स्वर्ग एवं मुक्ति का- आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का यही क्षेत्र है।
समस्त संसार में अध्यात्म विद्या पर विभिन्न प्रकार के प्रयोग तथा प्रतिपादन हुए हैं। संकीर्णता एवं हठ वादिता ने उन्हें एक प्रकार से संप्रदाय बना दिया है आवश्यकता इस बात की है कि इस समस्त विस्तर को सामने रखकर नये सिरे से पर्यवेक्षण किया जाय और उसमें से क्या कितना, वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पूर्व साधारण के व्यवहार में आने योग्य रह गया है उसका विचार मंथन एवं प्रयोग परीक्षण के आधार पर पता लगाया जाय। इसके लिए ग्रंथों का अध्ययन, विचार मंथन, परामर्श आदि अनेकों कदम उठाने होंगे। इसके अध्ययन का क्षेत्र अधिक व्यापक, विस्तृत एवं प्रमुख है। शोध संस्थान में यह कार्य सुशिक्षित विचारशील व्यक्तियों की सहायता से चलेंगे।
वेतन देकर इन कार्यों के लिए प्रतिभाएं खरीद सकना ब्रह्मवर्चस आरण्यक की वर्तमान स्थिति में सर्वथा बाहर की बात है। इसके लिए जो सहयोग होगा वह ऋषि स्तर का होगा। उच्च शिक्षा प्राप्त गृह कार्यों में निर्वाह आजीविका की दृष्टि से आत्म निर्भर व्यक्ति ही इस कार्य में सहयोगी सिद्ध हो सकेंगे। ऐसी प्रतिभाएं अखण्ड-ज्योति परिवार में हों और वे अपना समय दान उदारता पूर्वक परमार्थ बुद्धि से दे सकें तो अपना विस्तृत परिचय देते हुए पत्र व्यवहार कर लें। यह समयदान उन्हें हरिद्वार रहकर ही देना होगा प्रस्तुत शोध कार्य ऐसा नहीं है जो अपने घरों पर रहकर भी संपन्न किया जा सके।
इस शोध संदर्भ में एक काम ऐसा है जो उन स्थानों के सुशिक्षित सहयोगी अपना थोड़ा-थोड़ा समय देकर भी कर सकते हैं- जहां सुसंपन्न विशालकाय पुस्तकालय हैं, विश्व विद्यालय हैं वहां जाकर आवश्यक विषयों की पुस्तकों का पता लगायें और उनमें से अभीष्ट संदर्भों को पढ़ते रहने तथा नोट करे भेजते रहने का कार्य संभालें। ऐसा मात्र उन्हीं स्थानों पर किया जा सकता है जहां अच्छा साहित्य केन्द्र है। छोटे नग कस्बों में न तो ऐसी उच्चस्तरीय साहित्य सामग्री मिलती है और न वहां ऐसी खोज के लिए क्षेत्र ही होता है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, आगरा, कानपुर, मेरठ जैसे थोड़े से नगर ही ऐसे शोध प्रयोजन के क्षेत्र हो सकते हैं। अन्य प्रांतों के संबंध में भी यही बात है। जो उस प्रकार की सहायता कर सकें उन्हें अपनी योग्यता तथा स्थानीय स्थिति की जानकारी देते हुए आवश्यक पत्र व्यवहार शांतिकुंज हरिद्वार के पते पर कर लेना चाहिए।
(लाखन सिंह भदौरिया)
(लाखन सिंह भदौरिया)
रोज खोया गंवाया है दिन आपने, ध्यान आया नहीं! ध्यान आया नहीं॥
ठीक हैं प्राण ये पेट भर कर जिये! एक क्षण क्या जिये, दूसरों के लिये? नित्य खोया वृथा प्राणधन, आपने, ध्यान आया नहीं ध्यान आया नहीं॥
जिंदगी क्या सुमन-गंध बन कर रही? श्वास-गति क्या कभी द्वन्द बन कर रही? नाद से क्या जगाया है क्षण आपने, ध्यान आया नहीं। ध्यान आया नहीं॥
पांखुरी-पांखुरी से मिली क्या कभी, बन सकी आंख, गंगाजली क्या कभी, एक भी क्या खिलाया सुमन आपने, ध्यान आया नहीं। ध्यान आया नहीं॥
प्राण अनुदान कितना मिला है तुम्हें, देव वरदान, कितना मिला है तुम्हें, एक कण भी चुकाया है, ऋण आपने, ध्यान आया नहीं। ध्यान आया नहीं॥ रोज खोया गंवाया है, दिन आपने, ध्यान आया नहीं॥
*समाप्त*