अन्तरिक्षीय हलचलों में प्रकृति प्रेरणा अनेक ज्ञात एवं अविज्ञात घटनाओं के लिए उत्तरदायी होती है पर उन पर सर्वोपरि प्रभाव मानवी स्तर का ही होता है। मनुष्य समुदाय जब अचिंत्य चिन्तन और अभद्र आचरण पर उतारू होता है तो उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत समस्याओं, समाजगत कठिनाइयों के रूप में ही नहीं प्रकृति संतुलन बिगड़ने के रूप में भी सामने आती है। सतयुग की श्रेष्ठ परिस्थितियों में उस समय की सामूहिक मनःस्थिति की उत्कृष्टता ही प्रधान कारण थी। इन दिनों जन समुदाय की अभिरुचि, विचारणा एवं कार्य पद्धति निकृष्टता की दिशा में बढ़ रही है फलतः समस्याओं, विपत्तियों के अतिरिक्त दैवी प्रकोपों की विभीषिका का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है। अति वृष्टि, अनावृष्टि और समुद्री तूफानों के कारण हुई दुर्घटनाओं के समाचार अक्सर सुनने को मिलते रहते है।
यदि मनुष्य अपनी चाल नहीं बदलता तो दैवी प्रकोप और बढ़ेंगे। फरवरी 79 की अखंड ज्योति में पृष्ठ 49 पर एक बुरी खबर शीर्षक से संसार के मूर्धन्य ब्रह्माण्ड जीव विज्ञानी एवं भविष्य वक्ता श्री क्रूम हेलर का वह कथन छपा है जिसमें उन्होंने अगले दिनों मनुष्य जाति के सामने आने वाले संकटों का संकेत किया है। यह सकारण है। मनुष्य ने जो रवैया अपनाया है उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत संकट, समाज विग्रह के रूप में ही नहीं दैवी संकटों के रूप में भी प्रस्तुत होती है तो उसे विधि व्यवस्था के अनुरूप ही कहा जायेगा।
इन दिनों “स्काई लैब” यान का मलवा धरती पर गिरने और भीषण विनाश का संकट आ खड़ा होने की चर्चा जन-जन के मुख पर है। पिछले दिनों अन्तरिक्ष में संव्याप्त शक्तियों और उनकी गति विधियों का पता लगाने के लिये अमेरिका व रूस आदि समृद्ध देशों द्वारा लगभग 1000 उपग्रह भेजे और पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किये गये “स्काई लैब” अमेरिका द्वारा संचालित उन्हीं में से एक है। 85 टन भारी यह यान 1973 छोड़ा गया था। यह पृथ्वी के चारों ओर विषुवत रेखा के 50 अंश उत्तर दक्षिण चक्कर काटता रहा। आशा की गई थी कि वह सन् 83 तक अपना काम करता रहेगा। पर वैसा हो नहीं सका। अन्तरिक्षीय शक्तियाँ उसके मार्ग में आड़े आई। इसमें एक कारण सूर्य धब्बों की गति विधियों में असाधारण वृद्धि हो जाना भी बताया जाता है। स्मरण रहे सूर्य धब्बों का 11 वर्षीय गति चक्र चलता है और लाखों मील क्षेत्र अपनी भीषण अग्नि ज्वाला में लपेट लेता है। सौर विकिरण की इस लपेट में स्काई लैब भी आ गया और अपनी क्षमता गँवा बैठा, यान की यंत्र-प्रणाली में गड़बड़ भी कारण हो सकती है, बात जो भी हो संकट अति गहरा हो गया है करोड़ों व्यक्तियों के विनाश की विभीषिका उठ खड़ी हुई है।
प्रारम्भ में यह स्काईलैब 276 मील की ऊँचाई पर कक्षा में स्थापित किया गया था किन्तु यान्त्रिक गड़बड़ी और अपना भार न सम्भाल पाने के कारण वह गिरते हुये अब 180 मील से भी कम ऊँचाई पर निष्प्राण प्रेत की तरह परिभ्रमण कर रहा और अपनी अन्त्येष्टि के दिन गिन रहा है। उसके कुछ टुकड़े तो 3 अप्रैल 1975 शेष बचे भाग का गिरना निश्चित है तब घोषणा की गई कि उसका मलबा 6 जुलाई से 28 जुलाई के बीच कभी भी पृथ्वी पर गिर सकता है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण वह उन दिनों धरातल से कराने के लिये तेजी से टकराने के लिये दौड़ेगी और वायु मंडल की रगड़ से असंख्य छोटे बड़े टुकड़ों में बँट जायेगी। इनमें से कुछ तो मार्ग में ही जल जायेंगे। अनुमान है कि 400-500 भारी धातु खंड वायुमंडल को पार करके धरती तक आ पहुँचेंगे और 4000 मील लम्बे तथा 100 मील चौड़े भू-क्षेत्र को प्रभावित करेंगे। यह टुकड़े भयानक तेजी से भीषण तापमान सहित पृथ्वी पर आवेंगे। उनके वेग से उत्पन्न ऊर्जा पृथ्वी-वासियों के लिये हर दृष्टि से घातक होगी। जिसे क्षेत्र में यह गिरेंगे वहाँ जन-धन की क्षति का अनुमान लगाना कठिन है पर वह होगी रोमाँचकारी। तापमान विकिरण बढ़ने के कारण सारे वातावरण का संतुलन बिगड़ जायेगा, परोक्ष रूप से समूचे मानवीय अस्तित्व को संकट ग्रस्त होना पड़ेगा।
यान को गिने से रोकने के सभी वैज्ञानिक प्रयास असफल रहे अतएव अब उसका विस्फोट सुनिश्चित है यान की परिभ्रमण कक्षा अधिकाँश समुद्र के ऊपर से गुजरती है तो भी वह भू-खण्ड भी कम नहीं जहाँ उसका मलवा गिरेगा। ऐसे क्षेत्रों में लाओस, मनीला, पनामा, अटलांटिक देश तथा नाइजीरिया आते हैं। भारत का बड़ा क्षेत्र जिसमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, आन्ध्र तथा प. बंगाल प्रमुख हैं उससे प्रभावित होंगे। होल्कर साइन्स कालेज के प्रोफेसर डा. श्री वास्तव ने खतरे के क्षेत्रों में बम्बई, पूना, नासिक, कोल्हापुर, शोलापुर, औरंगाबाद, नागपुर, भुवनेश्वर, भवानी पाटन, फूलबनी, कटक, कलकत्ता, खड़गपुर, भिलाई, रायपुर, सारंगढ़, जगदलपुर, सूरत तथा निजामाबाद को प्रभावी क्षेत्र घोषित किया है।
तेज चमक वाले इस मलबे को बिना काला चश्मा पहने खुली आँखों से न देखने की चेतावनी दी गई है। इसमें अन्धा होने का खतरा है। आवासीय क्षेत्रों से ज्वलन शील पदार्थ दूर रखने को कहा जा रहा है उसके विषैले धुयें ने भी बचना अनिवार्य होगा। संभावित संकट की सूचना उन क्षेत्रों में भी अधिकाधिक पहुँचाई जानी चाहिये जहाँ संचार और यातायात के साधनों का अभाव है। ग्रामीण जनों को आतंकित तो न होने दिया जाय पर सतर्कता बरतने को हर एक से कहा जाये?
इस संकट को टालने के लिये वैज्ञानिक अपने ढंग से प्रयत्न कर हार चुके। उसे ऊँचा उठाने ‘अन्तरिक्ष में हो विस्फोट कर नष्ट कर देने’ समुद्र में धकेल देने जैसे उपाय अभी भी खोजे जा रहे हैं पर यह हाथ-पाँव फूल जाने पर किये गये प्रयत्नों जैसा लगता है। खतरा तो स्पष्ट है पर पूर्ण निश्चित समय की सही जानकारी नहीं है पहले यह विस्फोट जून में संभावित था, अब 6 जुलाई से 28 के मध्य ही हो सकता है या आगे और खिसक जाये?
संकट प्रत्यक्ष हो या परोक्ष निवारण के उपाय तो किये हो जाने चाहिये प्रत्यक्ष उपाय उपचारों के समतुल्य की अध्यात्म क्षेत्रों के प्रयास पुरुषार्थ भी है वैयक्तिक संकटों के निवारण में निजी तपश्चर्या और सामूहिक विपत्तियों को निरस्त करने के लिये सामूहिक साधना का महत्व है। बँगला देश के उपद्रवों, आपात्काल स्थिति के निवारण और रजत जयंती वर्ष के महापुरश्चरण इसी श्रेणी में आते हैं जो अप्रत्याशित रूप से सफल रहे। स्काई लैब का संकट सामयिक स्थानीय और छोटा मालूम पड़ता है पर गम्भीरतापूर्वक विचारने पर इसे उस श्रृंखला का सूत्र पात समझा जा सकता है जिसकी ओर भविष्य वक्ता क्रूम हेलर ने संकेत किया था। घटना बड़ी भी है दूरगामी भी। इसलिये उपाय उपचारों की दृष्टि ले अध्यात्म वादियों को भी अपने कर्तव्य पालन करने सुरक्षात्मक प्रयास करने में पीछे नहीं रहना चाहिये।
गायत्री परिवार के प्रत्येक परिजन को 1 जुलाई से 31 जुलाई तक चलने वाले “सुरक्षा अनुष्ठान में उसी उत्साह के साथ सम्मिलित होना चाहिये जैसा कि गत वर्ष महा पुरश्चरण के लिये अपनाया गया था। ब्रह्मवर्चस शान्ति कुँज में यह साधना 1 जुलाई से ही आरम्भ की जा रही है इन दिनों मथुरा प्रेस हड़ताल चल रही है अतएव पत्रिकाओं द्वारा समय पर सूचना भेजनी कठिन जान पड़ी अतएव इस अनुष्ठान की सूचना आकस्मिक रूप से दी जा रही है। जहाँ जहाँ यह संदेश पहुँचे उसके बाद यथा संभव जल्दी ही यह, सामूहिक साधना प्रारम्भ कर दी जाये। आशा की गई है कि पहली जुलाई से न सही 6 जुलाई से अधिकांश परिजन इस साधना की सामूहिक व्यवस्था बना लेंगे। इसके बाद बन सके तो भी हर्ज नहीं। पूरा महीना न बन पड़े तो कम से भी कम चल सकता है पर साधना में सम्मिलित सभी साधकों और शाखाओं को होना चाहिये। साधना विधि इस प्रकार है-
(1) सुरक्षा अनुष्ठान के लिये कोई शान्त, स्वच्छ स्थान चयन किया जाये सभी साधक नौ बजे से पौने दस बजे तक सामूहिक साधना में सम्मिलित हों।
(2) चौबीस बार सामूहिक गायत्री जप एक स्वर से एक साथ किया जावे-आगे पीछे ऊँचे नीचे स्वर से न बोला जाये। इसका अभ्यास पहले करलें ताकि भूल करने वालों को पहले से ही सुधार लिया जा सके।
(3)गायत्री गान के बाद सभी लोग ध्यान मुद्रा में बैठें। शांत चित्त स्थिर-शरीर, कमर सीधी, हाथ गोद में-आँखें बंद इन पाँच प्रक्रियाओं का समन्वय कही ध्यान मुद्रा है।
(4)ध्यान करें गायत्री परिवार के लाखों सदस्यों की सामूहिक संकल्प शक्ति अन्तरिक्ष में सुरक्षा-ढाल की तरह प्रखर परिपक्व हो रही है। उस ढाल के नीचे बैठी मनुष्य जाति अधिकाधिक सुरक्षा प्राप्त कर रही है।
(5)ध्यान किया जाय कि इस सामूहिक संकल्प शक्ति का प्रहार अन्तरिक्ष में उतरते संकट को निरस्त करने के लिये हो रहा है। विपत्ति को ऊपर धकेला और अन्यत्र खदेड़ा जा रहा है। यह प्रहार और प्रयोग पूरी तरह सफल हो रहा है। विपत्ति का प्रभाव न्यूनतम की शेष रह रहा है।
(6)यह ध्यान ठीक नौ बजे प्रारम्भ किया जाय, पन्द्रह मिनट सामूहिक जप के लिये और तीस मिनट ध्यान के लिये रखे जायें। ठीक नौ बजकर पैंतालीस मिनट पर प्रयोग को समाप्त कर दिया जाये। नियत समय पर ..... अ सकने वाले साधकों को भी सम्मिलित तो कर लिया जाये पर उन्हें दूसरी पंक्ति में बिठाया जाय। सामूहिक संकल्प बल के उपार्जन में एक जैसी विचारणा होना और नियत समय का पालन आवश्यक है।
(7) इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति सर्वत्र 31 जुलाई को होगी। जो साधक इस अनुष्ठान में भाग लेते रहे हों वे ही यज्ञ में सम्मिलित हो। पूर्णाहुति की एक आहुति अन्य लोग भी दे सकते हैं। अनुष्ठान सम्पन्न होने के समाचार पूर्णाहुति के तुरन्त बाद भेजे जाँय?
विलम्ब के कारण रहने वाली कमी की पूर्ति का एक ही उपाय है कि जिन्हें यह संदेश मिले वे अपने समीप वर्ती शाखाओं तक साधक समुदाय तक स्वयं सूचना पहुँचा दें। जहाँ यह संदेश पहुँचे रात्रि के समय पौन घंटे के उपरोक्त सुरक्षा अनुष्ठान को तुरन्त आरम्भ करने का प्रयत्न किया जाये।
तुच्छ का महान् के साथ मिलन ऐसा सुयोग है जिसकी सराहना ही की जा सकती है, उसका लाभ भी असीम है। पारस के साथ लोहे का-स्वाँति वर्षा के साथ सीप का मिलन स्वर्ण और मुक्तक क सृजन करता है। मिलन धन्य होता है। और उस सुयोग से लाभान्वित होने का अवसर असंख्यों को मिलता है।
हनुमान ने राम के साथ-सुदामा ने कृष्ण के साथ मिलकर कुछ गंवाया नहीं कमाया ही। आरम्भ अवश्य ही अड़चन उपस्थित करता रहा होगा। सुदामा को बगल में दबी चावल की पोटली गँवानी पड़ी और हनुमान को समुद्र लाँघने का खतरा उठाना पड़ा। इन असमंजस की घड़ियों में क्षुद्रता को डरने घबराने के लिये कारण मौजूद हैं। फिर भी महानता जब अकुलाती है तो उसे दुस्साहसी ही बनना पड़ता है। यह पराक्रम और कुछ नहीं कुसंस्कारी लिप्सा लालसा से झगड़ पड़ना और क्षुद्रता को अस्वीकार करने के लिये तनकर खड़ा हो जाना भर है। यही योग साधना और यही तपश्चर्या है।
साधना याचना नहीं है। क्रिया-कृत्यों की विलक्षणता एवं काय कष्टों में उसकी पूर्णता समझना व्यर्थ है। शरीरगत हलचलें और मनोगत मनुहारें साधना के आवरण को तो पूरा करती है पर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं। भक्ति का उद्गम अन्तःकरण है। उस मर्मस्थली से जब महानता के प्रति अगाध आस्था और पाने की आतुरता उत्पन्न होती है तो दिशा में कदम बढ़ते हैं जो क्षुद्रों द्वारा मूर्खतापूर्ण कहे जाते हैं। तुच्छता और महानता की दिशा, परिभाषा और उपलब्धि भिन्न-भिन्न है। परमात्मा का स्वरूप महानता है। उसी पथ पर बढ़ते हुए लोग जीवन लक्ष्य की प्राप्ति और पूर्णता के चरम बिन्दु तक जा पहुँचते हैं।
शास्त्रों में एक मन्त्र आता है- “नमोः शम्भवाय च मयोभवाय च”। जिसका अर्थ है सुखकर को नमस्कार और कल्याणकर को भी नमस्कार। मन्त्र से स्पष्ट है कि सुखकर एवं कल्याणकारक का अन्योन्याश्रित संबंध है। दूसरे रूप में इस प्रकार कहा जा सकता है कि वे सुख जो कल्याणकारी हैं उनको नमस्कार किया जाय, अपनाया जाय। सुख का अभिप्राय यहाँ भौतिक सुख से नहीं बल्कि - उन विशेषताओं से है जो मनुष्य को कल्याणकारी मार्ग की ओर अग्रसर करें। यह वह स्थिति है जो अन्तरात्मा को प्रफुल्लित करती है।
सामान्यता देखा यह जाता है कि लोग भौतिक सुखों को ही वास्तविक सुख समझते, उसे प्राप्त करने के लिए पूजा-अर्चना करते तथा कल्याण कारी मार्ग की उपेक्षा कर जाते हैं। धनी तथा विलासी प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने ऐसे-आराम में प्रवृत्त रहते हैं। उनके जीवन का लक्ष्य अधिकाधिक सुख-साधनों का उपभोग करना है। फलतः वे अपने को पंगु बना डालते हैं। अपनी इन्द्रियों पर ही अधिकार नहीं रहता। सुखोपभोग की प्रवृत्ति व्यक्ति की विशिष्ट क्षमताओं को नष्ट करती है तथा उन सारी सम्भावनाओं से वंचित कर देती है; जिनके लिए मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपहार मिला। वे कल्याण का मार्ग इसलिए नहीं अपनाते कि वह दुःखों, कष्टों से भरा प्रतीत होता है।
कल्याणकारी मार्ग में भौतिक सुखों का मोह छोड़ना पड़ता है, तप-तितीक्षा का मार्ग स्वेच्छा से अपनाया जाता है। यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि भौतिक सुखों से मुख मोड़े बिना उस मार्ग पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता है, किन्तु उन छोटे-मोटे अभावों से घबड़ा कर श्रेष्ठ मार्ग से कदम खींच लिया जाय, यह कितना अविवेकपूर्ण है। यह बात तो उसी प्रकार है जैसे एक विद्यार्थी परिश्रम के भय से परीक्षा की तैयारी करना ही छोड़ दे। परिश्रम न करने वाले विद्यार्थी को अन्ततः कितना घाटा उठाना पड़ता तथा पछतावा हाथ लगता है, उससे हर कोई परिचित है।
देखा यह जाता है कि अधिकाँश व्यक्ति आत्मोत्कर्ष के कल्याणकारी मार्ग से इस कारण डरकर विमुख होते हैं कि वह दुखोंकष्टों एवं अभावों से भरा हैं इस प्रकार की आशंका से आशंकित होकर वे कृत्रिम सुख-साधनों के मौज मजा करने में संलग्न हो जाते हैं। उनकी क्षमताएं, विशेषताएँ भौतिक-साधनों की प्राप्ति के ताना-बाना बुनने तक ही सीमित बनती तथा नष्ट होती रहती हैं।
अभावों के दुःख एवं पीड़ा के भय में कल्याणकारी जीवन लक्ष्य से ही विमुख हो जाया जाय, यह मानवी विवेक के लिए उचित नहीं है। इस प्रकार की भीरुता से मात्र विलासिता, तथा दुर्बलता की उत्पत्ति होती है। फल स्वरूप जीवन सम्पदा को इन्द्रियों के सुख में झौंक कर मनुष्य अन्ततः पश्चाताप की आग में जलता है। मलीनता के आवरण में जकड़ी उसकी आत्मा सदा कोसती तथा स्वतन्त्रता के लिए छटपटाती रहती है। मनुष्य जीवन की इसे सबसे बड़ी पराजय कहा जा सकता है।
आवश्यकता इस बात की है कि भौतिक सुखों की अपेक्षा कल्याण को वरण किया जाय। उन शाश्वत सुखों के लिए अपनी चेष्टाएँ हों, जो आत्मा को ऊँचा उठाने, जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग दे सकें शाँति, आनन्द, संतोष की उपलब्धियाँ यों किसी भी बाहरी सुख से कम नहीं वरन् अधिक ही हैं।
सुख प्राप्त तो किया जाय किन्तु वह शान्ति देने वाला हो-आत्मा को आनन्द प्रदान करने वाला हो कल्याणकारी हो। कल्याण की उपेक्षा कर इसकी बलि देकर यदि सुख को प्राप्त किया जाता है तो कभी भी स्थायी शान्ति नहीं मिल सकती न ही वह उद्देश्य पूरा होता है जिसके लिए शास्त्र का ऋषि कहता है। ‘नम्रोः शम्भवाय च मयोभवाय च’।
शास्त्रकार संसार को माया एवं ब्रह्म को सत्य मानते हुए कहते हैं ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या।’ इस प्रतिपादन में जगत के मिथ्या होने की अवधारणा उसके अस्तित्व के संदर्भ में नहीं, वरन् स्वरूप के विषय में है। संसार स्वप्न है, माया है, एक प्रपंच है। इस प्रकार की मान्यता के पीछे एक ही तथ्य है कि संसार का जो स्वरूप हमारी इन्द्रियों को भासित होता है वह अवास्तविक है। इन्द्रियाँ, वस्तुओं एवं संसार का वास्तविक स्वरूप बता सकने में असमर्थ हैं। समुद्र में उठने वाली तरंगों की भाँति चेतना की लहरें स्थूल जगत का सृजन करती है। इन लहरों की उलट-फेर से ही जगत का सृजन परिवर्तन एवं विनाश की प्रक्रिया सम्पन्न होती रहती है। इसी कारण चेतन को सत्य तथा संसार को मिथ्या कहा गया है।
संसार स्वप्न, मिथ्या इस अर्थ में नहीं है कि जीवन का जो प्रवार चल रहा है वह मात्र एवं भ्रम है। श्वाँस लेना, खाना, पीना, सोना, श्रम करना जैसी क्रियाओं को भ्रम कहा जाय तो भूल होगी। कहना यह चाहिए कि-”वस्तुओं का जो स्वरूप दिखायी पड़ता एवं अनुभव में आता है वह भ्रामक है?”
इन्द्रियों को मिलने वाली जानकारियाँ कितनी अवास्तविक हैं इसका अनुमान तथ्यों के अवलोकन से लगता है। वस्तुओं का जो स्वरूप हमें दिखायी पड़ता है वह हमारी पूर्व बनायी गई मान्यताओं पर अवलम्बित है। वस्तु का स्वरूप किसी के सापेक्ष से निर्धारित किया जाता है। गुणों की दी जाने वाली परिभाषाएँ सापेक्ष सिद्धान्त पर आधारित है। अपनी बनायी गई मान्यताओं के सापेक्ष से ही वस्तुओं के विविध गुणों की विवेचना की जाती है। इन मान्यताओं द्वारा निरपेक्ष सत्य तक पहुँच सकना सम्भव नहीं। ईश्वर निरपेक्ष है। हमारी मान्यताएँ स्थूल जगत का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट कर सकने में असमर्थ हैं, फिर उस परम सत्ता को जिसके लिए शास्त्रकार नेति-नेति कहता है, अपनी स्थूल मान्यताओं द्वारा कैसे जाना जा सकता है।
आँख द्वारा विविध दृश्य देखे जाते हैं। विभिन्न प्रकार के रंगों का दिग्दर्शन होता है। विज्ञान के छात्र आँख की देखने की प्रक्रिया से परिचित हैं। प्रकाश किरणें वस्तु पर पड़कर आँखों की ओर लौटती है। उनका चित्र आँख की रेटिना पर बन जाता है। फलस्वरूप वस्तुओं क विविध रूप एवं रंग दिखायी पड़ता है। वस्तुओं के विभिन्न रंगों का कारण वस्तुतः प्रकाश किरणें हैं। उदाहरणार्थ बाग में गुलाब के पुष्प पर प्रकाश किरणें पड़ती हैं। विविध रंग की किरणें पुष्प पर पड़कर अवशोषित हो जाती है मात्र गुलाबी रंग की किरणें परावर्तित होकर हमारी आँखों तक पहुँचती तथा गुलाबी रंग का अनुभव कराती है। वस्तुतः यह प्रकाश किरणों की विशेषता है जिससे वस्तुओं में आकर्षक रंग दिखायी पड़ता है। अँधेरी रात में तो सभी वस्तुएँ काली ही दिखायी पड़ती हैं। प्रकाश का संयोग तथा वस्तु द्वारा अवशोषण, परावर्तन की प्रक्रिया जुट जाने से विभिन्न प्रकार के रंगों का आभास होता है।
स्पष्ट है कि किसी वस्तु का अपना कोई मौलिक रंग नहीं है। रंगों का निर्धारण प्रकाश के सापेक्ष है। इस प्रकार देखा जाय तो प्रतीत होगा कि रंगों के विषय में मिलने वाली आँखों की जानकारियाँ कितनी भ्रामक हैं।
त्वचा के स्पर्श द्वारा वस्तुओं के ठण्डा, गरम अथवा कड़ा, नरम होने की जानकारी मिलती है। त्वचा वस्तुओं के संपर्क में आती है, उनके स्फुरणा लेकर नाड़ी जाल द्वारा बुद्धि संस्थान तक पहुँचाती है। शरीर का निश्चित तापक्रम होता है उससे हर कोई परिचित है। बुद्धि उस तापक्रम को आधार मानकर ही गर्मी अथवा ठण्ड का अनुमान लगाती है। यह कायिक तापक्रम विभिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न होता है। वह वस्तु जो हमें गरम प्रतीत हो रही हैं आवश्यक नहीं कि मनुष्येत्तर प्राणियों को भी गरम लगे। यही बात ठण्ड के लिए भी है। गर्मी ठण्ड का निर्धारण शारीरिक ताप के सापेक्ष किया जाता है। बाह्य वस्तुओं का तारतम्य हमारे शरीर के साथ कैसा है इतने मात्र की जानकारी त्वचा द्वारा होती है। वस्तुओं के कड़े अथवा नरम होने में भी यही बात लागू होती है। त्वचा एक सीमा तक कड़ाई तथा नरमी का बोध करा सकती है। उस स्थिति की कल्पना की जाय- यदि त्वचा इतनी संवेदनशील बन जाय कि वह आकाश जैसे सूक्ष्म तत्व को स्पर्श कर सके। उस स्थिति में पानी जैसा तरल पदार्थ भी हीरे जैसा कड़ा एवं कठोर मालूम पड़ेगा। जो कभी इतना नरम लग रहा था वही सापेक्ष आधार को बदल देने से कठोरता का परिचय देगा। सम्भव है मनुष्य की त्वचा को जिस रूप में वस्तुओं का अनुभव होता है अन्य जीव जन्तुओं को उसके विपरीत ही होता है।
न केवल आँख; त्वचा द्वारा वरन् अन्य शारीरिक इन्द्रियों द्वारा वस्तुओं के स्वरूप एवं गुणों का बोध जिस रूप में होता है उनमें सत्य की खोज की जाय तो स्पष्ट होगा कि इन्द्रियों की पकड़ एवं अनुभव में आने वाला स्वरूप कितना अवास्तविक है।
शब्दों के सुनने के साधन हमारे कान हैं। बाह्य जगत में उत्पन्न होने वाले ध्वनि कम्पन विभिन्न प्रकार के होते हैं। उनकी गतियाँ भी एक समान नहीं हैं। मनुष्य के कान की बनावट ऐसी है कि वह एक सेकेंड में तेतीस स्फुरणा से लेकर चालीस हजार स्फुरणा तक की ध्वनि को सुन सकती है। इससे कम अथवा अधिक स्फुरण वाले शब्दों को सुन सकना सम्भव नहीं है। अनेकों प्रकार की ध्वनि का विभेद करना कानों का नहीं बुद्धि का कार्य है। कौन स्वर किसका है इसका निश्चय बुद्धि करती है। बुद्धि का योगदान न हो तो कान पर ध्वनि पड़ते हुए भी इस बात का निर्धारण नहीं किया जा सकता कि कौन सी ध्वनि कहाँ से आ रही है तथा किसकी है।
कर्णेन्द्रिय अन्तरिक्ष में प्रवाहित ध्वनि कम्पनों में तेतीस स्फुरणा प्रति सेकेंड से लेकर चालीस हजार प्रति सेकेंड की स्फुरणा वाली ध्वनि तक को ही सुन सकने में समर्थ है। उसकी शक्ति सीमित है। कम अथवा अधिक स्फुरणा वाली ध्वनियों को हमारी कर्णेन्द्रिय सुन ही नहीं पाती जबकि अन्तरिक्ष में कम अथवा अधिक स्फुरणा वाली ध्वनियाँ भी निरन्तर प्रवाहित हो रही हैं। सुनने की यह सीमा जीव-जन्तुओं में भिन्न स्तर की होती है। जो ध्वनि हमें रुचिकर मालूम होती है यह आवश्यक नहीं कि उन प्राणियों को भी अच्छी लगे। कर्णेन्द्रिय ध्वनि का सही बोध कराने में अक्षम है।
जिह्वा के विषय रस हैं। रस के विषय में लोगों की मान्यता यह है कि यह वस्तुओं का गुण है जबकि तथ्य कुछ और ही है। जब कोई पदार्थ खाते अथवा पीते हैं तो हमारी जिह्वा से वस्तु की प्रतिक्रिया स्वरूप विशेष प्रकार के रसायनों का स्राव होता है। रसायनों का यह स्राव विभिन्न पदार्थों के साथ भिन्न प्रकार का होता है। रासायनिक स्राव के वस्तु के साथ मिलने से मीठा, खट्टा, नमकीन, कसैला, स्वाद का आभास होता है। यही कारण है कि एक ही पदार्थ सभी प्राणियों को एक जैसा नहीं लगता है। रसों का स्राव विभिन्न जीवों में एक प्रकार का नहीं होता है। नीम की पत्ती मनुष्य को कड़वी लगती है। जबकि ऊँट उन पत्तियों को बड़े चाव से खाता है। ऊँट की जिव्हा में स्थित ग्रंथियों से सम्भव है कि इस प्रकार के पदार्थ का स्राव होता हो जो नीम की पत्ती से मिलकर रुचिकर स्वाद, खट्टा अथवा मीठा का निर्माण करता हो। स्वाद की विभिन्नता अंतःस्रावी ग्रन्थियों पर निर्भर करती है। इस प्रकार वस्तुओं के गुणों के हिसाब से रसना द्वारा मिली जानकारी असत्य है।
गन्ध की स्थिति भी रस जैसी ही है। अणोन्द्रिय द्वारा अनुभव किये जाने वाले गन्ध सभी प्राणियों को एक प्रकार के नहीं लगते। एक गन्ध जो मनुष्य को प्रिय लगता है वही मनुष्येत्तर जीवों को अप्रिय लगता है।
देखने, सुनने, अनुभव करने जैसी आदि क्रियाएँ भी तभी सम्पन्न होती है जब उनके साथ ध्यान की प्रक्रिया जुड़ी हो। मस्तिष्क का चिन्तन कहीं अन्यत्र है तो वस्तु सामने रहते भी दिखायी नहीं पड़ती। ध्वनि कम्पन कर्णेन्द्रिय पर बराबर पड़ती रहती है किन्तु सुनायी नहीं पड़ती है। किसी कार्य में तल्लीन रहने पर कोई बुलाता है तो सुनायी नहीं पड़ता। त्वचा द्वारा अनुभव करना,
हालीवुड की अभिनेत्री ‘किमनोवाक’ ‘द अमोरम एडवंचर्स माल फ्लेडंर्स’ फिल्म की शूटिंग के लिए इंग्लैण्ड गयी थी। ‘आउट डोर’ सूटिंग के लिए ‘केंटरावरी’ में स्थित ‘चिंलहम कैसल’ नाम प्राचीन किले के आस-पास का स्थान चुना गया। इस किले क अधिकाँश भाग बारहवीं सदी का बना है तथा शेष 300 वर्ष पूर्व बनाया गया है। किले के जिस भाग में अभिनेत्री ‘किम नोवाक’ को ठहराया गया वह बारहवीं सदी का था। बिजली आदि की सुविधाएँ बाद में की गई थीं। ‘किम नोवाक’ शूटिंग के उपरान्त थककर वापस लौटती, भोजन करने के बाद थोड़ी देर टेलीविजन देखती तदुपरांत सो जाती। यह क्रम नित्य का था।
एक रात्रि टेलीविजन में संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। संगीत के जादुई प्रभाव से ‘किम’ के पाँव संगीत की लहरों के साथ थिरकने लगे वह नृत्य करने में तन्मय हो गई। अचानक उसे ऐसा लगा कि किन्हीं बलिष्ठ हाथों ने उसे घेर लिया है तथा जबरन नृत्य करवा रहा हैं। आरम्भ में उसने इसे मन का भ्रम समझा किन्तु जब उसने अपने थिरकते हुए पैरों को नृत्य से रोकना चाहा तो पाया कि किसी व्यक्ति के दो हाथ उसे जबरन घुमाते जा रहे हैं। न चाहते हुए भी वह नृत्य करने लिए बाध्य थी। देखने पर सामने कोई स्पष्ट नहीं दिखायी दे रहा था। भय से शरीर से पसीना निकलने लगा। टेलीविजन पर संगीत की ध्वनि धीमी हो गई किन्तु उस अदृश्य व्यक्ति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपने साथ अभिनेत्री किम को तेजी से नचाये जा रहा था। काफी समय के बाद अदृश्य हाथों की पकड़ समाप्त हुई। ‘किम’ बेहोश होकर एक किनारे गिर पड़ी। चैतन्य स्थिति में आने पर उसने कमरे में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई किन्तु कोई भी दिखाई नहीं पड़ा।
इस घटना को उल्लेख अभिनेत्री ‘किम’ ने तत्काल अपने किसी अन्य साथी से नहीं किया तथा उत्सुकतावश आगे क्या होता है, यह देखने के लिए अपने अन्दर साहस बाँधने लगी। उस रात के बाद उसने टेलीविजन देखना तो छोड़ दिया किन्तु अदृश्य प्रेतात्मा अपनी उपस्थिति का प्रमाण अन्य रूप में देने लगी। ‘किम’ कमरे की बत्ती जलाती तो वह गुल कर देता। बत्ती बुझाकर वह सोने जाती तो कोई हाथ आगे बढ़कर बिजली का स्विच आन कर देता। कितनी बार कमरे की रखी व्यवस्थित वस्तुएँ अस्त-व्यस्त फैली हुई मिलतीं कभी-कभी खिड़की के दरवाजे बन्द होने पर भी उन पर लगे परदे जोरों से हिलने लगते। कई बार ‘किम’ ने अनुभव किया कि ‘कोई’ उसके हाथों से पहनने वाले कपड़े छीनने का प्रयास कर रहा है। शूटिंग के समाप्ति दिन में प्रत्येक रात्रि इन घटनाओं के क्रम चलता रहा। फिल्म की शूटिंग की समाप्ति पर सारी घटनाओं का उल्लेख ‘किम’ ने अपने साथी अभिनेता ‘रिचर्ड जानसन’ से किया।
‘रिचर्ड-जानसन’ को उक्त महल में रहने वाली प्रेतात्मा की जानकारी पहले से थी। उसने कहा कि “वह प्रेतात्मा तेरहवीं सदी के प्रसिद्ध राजा ‘किंगजान’ की है। 11 अक्टूबर 1216 को राजा ‘जान’ अपने दुश्मनों के चंगुल से भागकर शरण प्राप्त करने के लिए उसी किले में रुका था। दूसरे दिन ‘किंग जान’ एक खाई को पार करने का प्रयास कर रहा था तो नौका दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी आत्मा की आसक्ति इस किले के साथ अब भी बनी है जानसन ने कहा कि मृतात्मा ‘जान’ की उपस्थिति पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से इस किले में बनी हुई है। इसका आभास समय-समय पर उस कमरे में रुकने वालों को होता रहता है।
यह घटना जहाँ प्रेतात्मा के अस्तित्व का प्रमाण देती है वहीं उसकी अतृप्त मनोवृत्तियों पर भी प्रकाश डालती हैं। मृत्यु के बाद जीवात्मा की अतृप्त आकाँक्षाएँ एवं वासनाएँ स्थूल शरीर के साथ समाप्त नहीं हो जाती वरन सूक्ष्म शरीर के साथ उनके संस्कार बने रहते हैं। यह अतृप्त वासनाएँ एवं इच्छाएं मृत्यु के उपरान्त भी जीवात्मा को उद्विग्न बनायें रहती हैं, जिसकी पूर्ति के लिए जीवात्मा को प्रेत-योनि धारण करनी पड़ती है।
प्रत्येक धर्मशास्त्र, वस्तु एवं व्यक्ति से मोह एवं आसक्ति के परित्याग की बात कहता है। द्रष्टा ऋषियों एवं मनीषियों द्वारा शास्त्रों धार्मिक ग्रन्थों में प्रतिपाद्य यह सिद्धान्त कभी अवैज्ञानिक नहीं हो सकता। उनके कथन के पीछे ठोस मनोवैज्ञानिक आधार हैं। वे इस तथ्य से अवगत थे व्यक्ति अपने साथ जीवन काल के संस्कार को सूक्ष्म शरीर के साथ लेकर मरता है। यदि वे संस्कार निम्नस्तर के अतृप्त वासनाओं एवं इच्छाओं के होते हैं तो मृत्यु के उपरान्त भी जीवात्मा को उद्विग्न बनाए रहते हैं। जीवात्मा को इनके रहते हुए कभी शान्ति नहीं मिल पाती। इन अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही जीवात्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है तथा जिस भी व्यक्ति, अथवा वस्तु से आसक्ति अथवा विद्वेष रहता है उसके इर्द-गिर्द मंडराती रहती है।
यह आसक्ति प्रेम मूलक ही नहीं द्वेष मूलक भी होती है। विक्षुब्ध आत्माएँ अपने जीवनकाल के उन व्यक्तियों को क्षति पहुँचाती है जिनसे उन्हें द्वेष रहता है, वहीं कुछ प्रेतात्माएँ अपने ‘प्रिय’ एवं निकटवर्ती व्यक्तियों को सहयोग करती हैं। कभी-कभी यह आसक्ति इतनी गहरी देखी जाती है कि प्रेतात्मा अपने प्रेमपात्र को स्पष्ट निर्देशन देती है।
स्ट्रामवर्ग जून 1961 को ‘जेमी केलघन’ शराब के नशे में दुत्त अन्धेरे को चीरता हुआ अपने फ्लैट की ओर वापस लौट रहा था। एक तो अँधेरी रात ऊपर से ठण्डी हवा के झोंकों से शरीर रोमाँचित हो उठता था। अचानक पीछे से आवाज आयी ‘रुको’! केलघन से पीछे मुड़कर देखने का प्रयास किया किन्तु कोई भी दिखायी न पड़ा। आवाज की ध्वनि नीरव वातावरण में अब भी गुँजित हो रही थी। ‘शराब’ का नशा इस अप्रत्याशित आवाज को सुनकर गायब हो गया। वह सोचने लगा कहीं यह मन का भ्रम तो नहीं, तभी उसे आवाज पुनः सुनाई पड़ी ‘बेटा’। यह आवाज उसे परिचित सी लगी। उसे अपनी माँ का ध्यान आया जो 27 वर्ष पूर्व मर चुकी थी। वह सोचने लगा, तो फिर क्या यह उसकी माँ की प्रेतात्मा है। अदृश्य आवाज ने पुनः उसका ध्यान तोड़ते हुए कहा, “बेटा तुम्हें इन कुकृत्यों को छोड़ देना चाहिए। तुम नहीं जानते कि मुझे कितना कष्ट उठाना पड़ रहा है। जब तक तुम अपने दुष्कृत्यों को छोड़ नहीं देते, मुझे शान्ति मिलना असम्भव है”। माँ की इन वेदना पूर्ण बातों को सुनकर केलघन का हृदय झंकृत हो उठा। वह सोचने लगा “कि क्या उसके कारण ही माँ को प्रेतयोनि में भटकना पड़ा है। उसकी उद्विग्नता एवं अशान्ति का कारण क्या स्वयं वह है।” केलघन ने तत्काल मन में यह संकल्प लिया कि “आज से कभी मैं शराब नहीं पीऊँगा।” तथा अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाऊँगा। इस बात की परख के लिए कि वह आवाज उसकी माँ की है या किसी अन्य की। उस अदृश्य प्रेतात्मा से ‘केलघन’ ने कहा “कि यदि तु मेरी माँ हो और मुझे देख रही हो तो, अपने हाथों से हमें छूकर आभास कराओ”। यह कहना था कि ‘माँ’ ने अपना ममता भरा हाथ केलघन की बाँह पर रख दिया। माँ के हाथ का निशान उसके कमीज की बाँह पर उभर आया। यह हाथ का चिन्ह कमीज के साथ आज भी लन्दन के ‘पर- गेटरी म्यूजियम’ जिसे ‘हाउस आफ शैडोज’ प्रेतात्माओं का घर कहा जाता है में सुरक्षित रखा है।
प्रस्तुत घटना इस बात का प्रमाण है कि जीवन काल में अत्याधिक व्यक्ति विशेष से आसक्ति मरणोत्तर जीवन को भी उद्विग्न बनाए रहती है। कभी-कभी तो जीवित व्यक्ति की गहरी संवेदनाएँ भी प्रेतात्मा’ को उपस्थित होकर अपना परिचय देने को बाध्य करती हैं। ऐसी ही एक घटना अमेरिका की विधवा महिला “श्रीमती एलिस वैल” के साथ घटित हुई जिसका प्रकाशन अमेरिका ने अधिकाँश प्रमुख पत्रों में हुआ था।
श्रीमती एलिस वैल शाम को थकी-माँदी बाजार से लौटी। सामान को एक ओर पटक, बेलचा उठाकर अँगीठी में कोयला डालने का प्रयास करने लगी। बेलचा उठाते ही वे काँपने लगी। बेलचा उन्होंने एक दिन पूर्व ही खरीदा था तथा बिल्कुल स्वच्छ एवं चमकदार था। यह देखकर आश्चर्य चकित रह गई कि उस पर ‘राबर्ट कैनेडी’ का बिंब उभर आया था यह चेहरा उनकी हत्या के समय का था। ठीक वैसा ही था जैसा हत्या के उपरान्त 1968 में देखा गया। सिर पीछे की ओर झुका था, आँखें बन्द थीं तथा चेहरे पर खून के धब्बे स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। बिंब को देख श्रीमती ‘बेल’ द्रवित हो उठीं। सहसा उन्हें यह अहसास हुआ कि “कहीं यह भ्रम तो नहीं है।” उन्होंने बेलचे के ऊपर बने बिंब को हाथ से छूकर देखा, यह जानकर और भी भय मिश्रित आश्चर्य हुआ कि भयानक शीत में रखा हुआ बेलचे का वह भाग जहाँ बिंब दृष्टि गोचर हो रहा था; गरम था और मुलायम भी।
बेलचे का उलटकर दूसरी ओर देखा तो पाया कि वह वैसा ही ठण्डा एवं कठोर था जैसा कि उस मौसम में होना चाहिए।
श्रीमती ‘वेल’ अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर सकीं। कहीं यह दृष्टि भ्रम तो नहीं, ऐसा समझकर कि ‘मैं’ ‘राबर्ट’ की प्रशंसक रही हूँ तथा उनकी मृत्यु से हमें गहरा सदमा पहुँचा है, किसी ने मनोरंजन की दृष्टि से यह चित्र तो नहीं बना दिया है, उन्होंने बेलचे पर उभरे चित्र को हाथों से रगड़ा; किन्तु यह सोचना असत्य था। बेलचे पर रग-रोशन के प्रयोग का कहीं चिन्ह नहीं था तथा उसमें ‘ताप’ अब भी उसी प्रकार बना था। श्रीमती ‘वेल’ ने सोचा यदि यह मेरी चेतना का भ्रम है तो यह सब दृश्य किसी अन्य को दिखायी नहीं देना चाहिए। तथ्य की परीक्षा के लिए बेलचे को मुलायम कपड़े में लपेटकर साथ लिए हुए अपने पड़ोसी ‘वोलोन’ दम्पत्ति के यहाँ पहुँची। उनके सामने ‘बेलचे’ को रखते हुए श्रीमती वेल ने पूछा “कि क्या उन्हें कुछ दिखायी दे रहा है। श्रीमती ‘वोलोन’ ने तेज स्वर में कहा ‘यह तो राबर्ट कैनेडी हैं, जिनकी हत्या अमेरिका में कर दी गई थी। देखा! उनके चेहरे से अब भी रक्त टपकता मालूम हो रहा है।” बेलचे की गर्मी का आभास उनको भी ठीक वैसा ही हुआ जैसा कि श्रीमती वेल को। सन्देह की अब बिल्कुल ही गुँजाइश नहीं थी।
बेलचे पर उभरा हुआ चित्र किसी व्यक्ति द्वारा बनाया गया है अथवा अन्य कोई रहस्य मय कारण से बना है इस बात के परीक्षण के लिए चित्रकला विशेषज्ञ को बुलाया गया। ‘बेलचे’ पर बने रंगीन चित्र पर तेजाब आदि डालकर परीक्षण किया गया। ‘बेलचे’ की धातु में छेद तो हो गया किन्तु बिंब ठीक वैसा ही बना रहा। विशेषज्ञ ने परीक्षण के उपरान्त घोषणा की कि “यह चित्र मानव निर्मित नहीं है। इसके पीछे किसी दैवीय शक्ति का हाथ है। इसका प्रमाण है बेलचे का गरम होना”।
अगले दिन लोगों की भीड़ यह देखने के लिए उमड़ पड़ी। अनेकों व्यक्तियों ने बेलचे पर उभरे चित्र का फोटोग्राफ लेने का प्रयत्न किया। किन्तु यह देखकर निराशा हुई कि फिल्म पर कोई चित्र नहीं आया साथ ही बेलचे पर उभरा चित्र भी लुप्त हो गया। इस घटना का विस्तृत विवरण उत्तरी इंग्लैंड के (साउथ शोल्डस) से निकलने वाले पत्र “सण्डे- मिरर” में प्रकाशित हुआ।
प्रख्यात परा-मनोविज्ञानी डा. “टिमोंरी वेलजोन्स” ने ‘बेलचे’ में कैनेडी भी प्रेतात्मा की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए कहा कि “केनेडी की मृत्यु से ‘श्रीमती वेल’ को मानसिक आघात लगा। उनकी सम्वेदनाओं ने सूक्ष्म आध्यात्मिक वातावरण में केन्द्रीभूत होकर इस बिंब की स्टष्टि की, जो किसी भी वास्तविक चित्र से अधिक यथार्थ है ‘बेलचे’ का गरम होना इस, बार का प्रमाण है कि ‘केनेडी’ की प्रेतात्मा द्रवित होकर उक्त चित्र में उपस्थित है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की उष्णता एवं कोमलता से बना ‘बिंब’ मानस पटल पर ही प्रतिबिंबित होते हैं। ‘कैमरे’ का फिल्म इतना सम्वेदन शील नहीं होता कि उस पर इस प्रकार के बिंब आ सकें।
मरणोत्तर जीवन की सच्चाई एवं प्रेतात्माओं के अस्तित्व के तथ्य से अब इन्कार नहीं किया जा सकता। परामनोविज्ञान भी इसका समर्थन कर रहा है। इस क्षेत्र में गहन शोध की आवश्यकता है। इस दिशा में यदि प्रयास चल पड़े तो मरणोत्तर जीवन की गुत्थियों, मनुष्य के क्रिया कलाप से मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध, कर्मफल जीवात्मा के स्वरूप एवं अमरता के सिद्धान्त को समझ सकने में विशेष योगदान मिलेगा।
बुद्धिवादियों ने कुछ दिनों पूर्व तक यह घोषित किया था कि-’विचार अपने साम्राज्य का स्वयं शासक है, उसे किसी भी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं।’ इस तथ्य को वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया तथा उसमें एक कड़ी और जोड़ते हुए कहा कि ‘प्रकृति ही हमारी सच्ची अध्यापिका है।’ परिणाम यह निकला कि प्रकृति गत प्रेरणाओं को ही मार्गदर्शक माना गया विचार शक्ति भी उसी के इर्द-गिर्द घूमती रही। प्रकृति को ही शिक्षक मान लिया गया तथा विचारों का ताना-बाना उस शिक्षक के आदेशों के पालन करने में नियोजित हो गया। परिणाम यह हुआ मन को खुली छूट मिली। बुद्धि शरीर की आवश्यकता एवं स्वार्थों को ही सिद्ध करने में लग गयी। अन्तःकरण में उठने वाली प्रेरणाओं, भावनाओं को बुद्धि दबाती हुई निरंकुश होती चली गई।
उस समय से लेकर अब तक संसार के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई है। मनोविज्ञान के नये-नये क्षेत्र ढूँढ़ निकाले गये, चेतना की रहस्यमय परतों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या हुई। अब नवीन युग के विज्ञान वेत्ता बुद्धिबल की अपेक्षा उन तत्वों को ढूँढ़ने में अधिक प्रयत्नशील हैं जो मनुष्य के मानवोचित गुणों को उभारते, बढ़ाते हों। एक मनुष्य को दूसरे के नजदीक लाने तथा परस्पर मिलाने का प्रयत्न करते हों। बुद्धिवाद अब अपने सीमित दायरे से निकलकर उन क्षेत्रों में बढ़ रहा है जो मनुष्य की चेतना का विकास करते हैं।
अब यह बात स्वीकार की जाने लगी है कि शरीर एक चलता-फिरता यन्त्र नहीं वरन् एक ऐसी चेतना का अंश है जिसका सम्बन्ध विश्व चेतना के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि मनोवृत्तियों का विरोध न होने से ही मनुष्य शरीर का गुलाम बन जाता है और कुसंस्कारों के वशीभूत हुआ इधर-उधर मारा-फिरता है। किन्तु यदि वृत्तियों का परिमार्जन किया जाय तो उसे अपने स्वरूप का वास्तविक ज्ञान हो जाता है। अलग-अलग दीखते हुए भी आत्मा मन, इन्द्रियों का आपस में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। यदि मन इन्द्रियों की आवश्यकता की पूर्ति में लिप्त है तो आत्मा इन्द्रियों का दास बन जाता है। किन्तु यदि मन को आत्मा की ओर मोड़ दिया जाय तो इन्द्रियाँ बाह्य जगत से छूटकर चेतन शक्ति की सहायता करने लगती हैं। मनःशक्ति पर ही शरीर का सारा कारोबार अवलम्बित है। न केवल शरीर संचालन वरन् जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी इसके योगदान पर निर्भर है।
मन की शक्ति असीम है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्रश्न यह है कि मन को निकृष्ट कार्यों से हटाने तथा सद्मार्ग पर लाने के लिए क्या कोई शरीर में ऐसा साधन है जो अन्तःज्योति को देखने में सहयोग कर सके? उत्तर में कहा जा सकता है कि पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ ही मनुष्य शरीर में एक छठी इन्द्रिय भी कार्य करती है। जो अच्छे, बुरे का परिचय परिष्कृत अन्तःप्रेरणा के रूप में सदा देती रहती है। उसकी प्रेरणाओं का अनुमान प्रत्येक श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट कार्य करते समय लगाया जा सकता है। जिसका आभास अच्छे कार्यों में प्रसन्नता सन्तोष आदि के रूप में, तथा बुरे कार्यों में घृणा, आत्म प्रताड़ना, क्षोभ के रूप में, अनुभव होता है। आध्यात्मिक भाषा में विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में उस छठी इन्द्रिय को आत्मा, सोल, जमीर, आदि नामों से पुकारते है। कुछ लोग उसे ईश्वरीय आवाज तथा कुछ अन्तःज्ञान कहते हैं। प्रत्येक कार्य में हमें-इस अन्दर बैठे परमात्मा द्वारा सामयिक चेतावनी मितली रहती है।
जैसे-जैसे अन्तर से उठने वाली प्रेरणाओं को ग्रहण करके भौतिक इन्द्रियों एवं मनोवृत्तियों को परिष्कृत करते हैं तथा जीवन को पवित्र बनाते जाते हैं, वैसे-वैसे अन्तरात्मा की आवाज स्पष्ट होने लगती है और जब डस आवाज की प्रेरणाओं के अनुरूप आचरण करने लगते हैं तो उसकी ध्वनि और भी प्रखर हो जाती है। तब यह ध्वनि इस प्रकार सुनायी देने लगती है जैसे कोई शिक्षक सामने बैठे स्पष्ट निर्देश विद्यार्थी को दे रहा हो। एक समय ऐसी स्थिति भी आती है जब उसकी आवाज बिल्कुल निर्दोष सुनायी पड़ती है।
कहते हैं कि भगवान बुद्ध का ‘भद्रक’ नाम का शिष्य उनके पास आत्म ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से पहुँचा। भगवान बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा कि प्रकाश का पुंज उसके अंदर है। बाह्य मलीनताओं के कारण उसका प्रकाश बदली के सूर्य के समान दृष्टिगोचर नहीं होता है। उनका अभिप्राय इसी अन्तरात्मा से ही था जो पग-पग पर अन्तःप्रेरणाओं के प्रकाश में अच्छे-बुरे का आभास कराती रहती है। ‘भद्रक’ इस रहस्य को जानकर आत्म-परिष्कार की साधना में निरत हो गया।
घर की खिड़की के शीशे गन्दे तथा धुँधले हों तो बाहर की वस्तुएँ साफ नहीं दिखायी पड़तीं। इस तथ्य से हर कोई अवगत है। उसी प्रकार आन्तरिक पवित्रता के अभाव में अन्तःप्रकाश को देख पाना सम्भव नहीं है। सत्यज्ञान की प्राप्ति की इच्छा रखने वालों को आभ्यन्तर की पवित्रता अति आवश्यक है। धर्म-शास्त्र, आप्त वचन मार्ग-दर्शन कर तो सकते हैं किन्तु ज्ञान के स्रोत अपने अन्दर हैं। जो जीवन को पवित्र बनाये बिना मिल सकना असम्भव है।
जीवन की अविच्छिन्नता एक सचाई हैं नवीनतम वैज्ञानिक अन्वेषणों का भी निष्कर्ष यही है कि जीवन में निरन्तरता तो है ही; किन्तु वे यह मानते हैं कि जीवन-ऊर्जा का रूपांतरण होता रहता है। उनकी मान्यता है कि जीवन-कोशिकाएँ और मस्तिष्क के विभिन्न चेतन-प्रकोष्ठ प्राणी की मृत्यु के उपरान्त इधर-उधर बिखर जाते हैं, वे भूमि, जल, वनस्पतियों आदि में समाहित हो जाते हैं और बाद में आहर रूप में प्राणियों के भीतर रक्त-रस-मज्जा में घुल-मिलकर उनकी सन्तति में ‘सेल्स’, ‘जीन्स’, ‘प्रोटोप्लाज्म आदि के रूप में सक्रिय रहते हैं।
अनेक व्यक्तियों द्वारा पूर्वजन्म की स्मृतियों के प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किये जाने का विश्लेषण वैज्ञानिक इसी रूप में करते हैं कि इन व्यक्तियों में पूर्ववर्ती उस व्यक्ति के, चेतन-प्रकोष्ठ अभाव प्रोटोप्लाज्म का कोई अंश गर्भस्थिति में इनके निर्माण-काल में घुल-मिल जाता है, जिस व्यक्ति से सम्बद्ध प्रामाणिक विवरण, के बाद में बताते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले जन्म की कुछ खास घटनाओं का विवरण जो मस्तिष्क के किसी चेतन-प्रकोष्ठ में अंकित-सुरक्षित था, वही चेतन-प्रकोष्ठ भर नये प्राणी के भीतर आ गया है। पूर्ववर्ती व्यक्ति का सम्पूर्ण मनोजगत या आत्मा से जुड़े समूचे संस्कार-समूह नये शरीर में उसी पुरानी आत्मा के साथ स्वाभाविक रूप में आ गये हैं, ऐसा वैज्ञानिक अभी नहीं मानते। पूर्वजन्म की किन्हीं स्मृतियों की प्रामाणिक पुनः प्रस्तुति मात्र उनकी दृष्टि में उसी आत्मा द्वारा नया शरीर धारण करने का यथेष्ट प्रमाण नहीं है। वे यह मानते हैं कि घास-पात, पेड़-पौधे में मृत प्राणी के प्रोटोप्लाज्म के अंश घुल-मिल गये, वही अंश आहार द्वारा मनुष्य शरीर में पहुँचे और सन्तान में अभिव्यक्त हुए।
इन वैज्ञानिकों की इस परिकल्पना को यदि सही माना जाये तब यह प्रकट होता है किसी भी नयी सन्तान के व्यक्तित्व के निर्माण में आनुवंशिक विशेषताएँ ही सर्वप्रधान कारण होती हैं, हाँ, छुटपुट नयी विशेषताएँ अवश्य प्रोटोप्लाज्म आदि के रूप में सन्तान में प्रविष्ट हो सकती हैं। किन्तु उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व आनुवंशिक विशेषताओं को वाहक ‘जीन्स’ से ही गठित होता है। गुण-धर्म, स्वभाव आदि का निर्माण ये वंशानुगत ‘जीन्स’ ही करते हैं।
आनुवंशिक की ये स्थापनाएँ शारीरिक संरचना के क्षेत्र में तो अब तक पूरी तरह खरी उतरती रही हैं। सन्तान की नाक, कान, आँख, दाँत, मुँह, देह, व्यष्टि, अंग-उपांग एवं विभिन्न अवयवों की बनावट तो वंशानुगत विशिष्टताओं के ही किसी न किसी अनुपात में सम्मिश्रण का परिणाम होती है। किन्तु बुद्धि और भावना के क्षेत्र में ऐसी विलक्षणताएँ सन्ततियों में उभरती देखी-पाई गई हैं कि उनका आनुवंशिक से दूर का भी सम्बन्ध नहीं सिद्ध हो पाता और बड़ी दिमागी जोड़-तोड़ के बाद भी यह नहीं स्पष्ट हो पाता कि आखिर अमुक व्यक्तियों की अमुक सन्तान में ये बौद्धिक भावनात्मक विशेषताएँ आई कहाँ से जो, न तो उसके माता-पिता के वंश में थी, न ही वातावरण में। उन विशेषताओं को प्रोटोप्लाज्म आदि के अंश की अभिव्यक्ति भी नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसे लोगों में ये विलक्षणताएँ आँशिक रूप में नहीं होतीं, अपितु उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ही वैसा गठन होता है। ऐसी स्थिति में यही मानने को बाध्य होना पड़ता है कि व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ आनुवंशिक, पर्यावरण अभाव परिव्राजक प्रोटोप्लाज्म की कृपा नहीं, बल्कि उसी व्यक्ति द्वारा पिछले जन्म में अर्जित-वर्धित, संचित-सुरक्षित विशेषताएँ हैं, जो जन्मना ही उसमें उभर आई है।
अशिक्षा, अज्ञान और अभाव के वातावरण में अप्रतिम मेधावी, विद्वान, संगीतज्ञ, गणितज्ञ आदि का पैदा होना, श्रेष्ठ परम्पराओं और उत्कृष्ट वातावरण वाले परिवारों में दुर्गुणी-दुराचारी सन्तति का जन्म जैसी घटनाएँ आये दिन देखने को मिलती हैं। जिस देश, समाज और परिवार में चारों और माँसाहार एक सामान्य आहार अभ्यास के रूप में स्वीकृत हो वहाँ किसी अबोध बालक द्वारा माँस को छूने से भी अस्वीकार कर देना और पूर्ण सात्विक शाकाहारी भोजन पसन्द करना, क्रूरता के वातावरण में जन्मतः अथाह करुणा की प्रवृत्ति का पाया जाना आदि अनेक विचित्रताएँ देखने में आती रहती हैं, जो आनुवंशिक सम्बन्धी अथवा जीवात्मा के मरणोपरान्त बिखर जाने सम्बन्धी स्थापनाओं को खण्डित करती है तथा उसी आत्मा द्वारा नया शरीर धारण करने की पुष्टि करती प्रतीत होती है।
महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने ऐसी ही एक विलक्षण प्रतिभा की सामर्थ्य को देखकर उसे भावावेश में अपनी बाँहों में उठा लिया था और आनन्दातिरेक से बोल उठे थे-’किशोर! तुमने आज फिर एक बार इस विश्व में, ईश्वर के संचालक होने का विश्वास दिलाया है।”
उस प्रतिभाशाली किशोर का नाम था मेनुहिन। तब वह मात्र आठ वर्ष का था। पिछले दिनों उसे भारत में भी नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज वह दुनियाँ का सर्वोत्कृष्ट वायलिन वादक है।
यहूदी मेनुहिन के माता-पिता में से कोई भी संगीतकार नहीं थे। वे स्कूल में साधारण शिक्षक थे। किन्तु मेनुहिन में बचपन से ही संगीत की विलक्षण सामर्थ्य थी। आठ वर्ष की ही आयु में उसने बीथोवेन, ब्राह्मस, बारव जैसे महानतम संगीतकारों की कठिन संगीत-रचनाओं को कुशलता से प्रस्तुत कर लोगों को चकित कर दिया था। सामान्य श्रोताओं की तो बात ही क्या श्रेष्ठ सगीतज्ञों और संगीत-समीक्षकों तक ने उसका वायलिन-वादन सुना तो विस्मय विमुग्ध हो गये।
तीन वर्ष के नन्हे मेनुहिन की वायलिन-वादन की सामर्थ्य विलक्षण ढंग से प्रकट हुई। उसके माता-पिता उसके लिये नकली वायलिन खेलने के लिये लाये। मेनुहिन ने उसे बजाया तो उसका संगीत उसे रुचिकर नहीं लगा। उसने वह खिलौना फेंक दिया और मचल गया। माना तब, जब माता-पिता ने असली वायलिन लाकर दिया। उसे पाते ही वह बालक उसी में लीन रहने लगा। उसकी दक्षता उभर आई। तब जाकर चार वर्ष की आयु में माता-पिता ने उसे संगीत-शिक्षा दिलानी शुरू की। उसकी विलक्षण गति एवं लगन से संगीत शिक्षक भी विस्मित हो उठता। छः वर्ष के मेनुहिन ने सेन्फ्राँसिस्को में हजारों श्रोताओं के सामने एक श्रेष्ठ संगीत-रचना प्रस्तुत की। अगले दिन अमरीकी अखबार उसकी प्रशंसा से भरे थे।
यद्यपि बाद में मेनुहिन ने श्रेष्ठ संगीत-शिक्षकों से संगीत की शिक्षा ग्रहण की, तथापि उसके प्रत्येक शिक्षक ने यह कहा कि हमने इसे सिर्फ सिखाया ही नहीं, इससे बहुत कुछ सीखा भी है।
टोस्कानिनी जैसे विश्वविख्यात संगीत- संचालकों ने उसे अलौकिक वायलिन वादक कहा। विश्व के अनेक शीर्षस्थ कलाकारों, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, लेखकों संगीतज्ञों ने उसकी एक स्वर से प्रशंसा की है और उसकी जन्मजात विलक्षण सामर्थ्य को ईश्वरीय वरदान कहा है। स्पष्ट है कि मेनुहिन की यह क्षमता आनुवंशिक विशेषता नहीं है। यह उसके पूर्व-संचित संस्कारों का, पिछले जन्म की प्रगति का ही प्रतिफल हो सकता है।
महान गणितज्ञ जानकार्ल फ्रेडरिक गाँस भी ऐसा ही अनुपम प्रतिभाशाली था। 30 अप्रैल 1977 को जर्मनी के ब्रन्सविक शहर में उत्पन्न गाँस के पिता किसान थे और गरीब थे। छोटी-मोटी ठेकेदारी भी करते थे तीन साल की ही आयु में उसने एक दिन मजदूरों का हिसाब कर रहे पिता की गलती पकड़ ली थी और उसे सुधार दिया था। नौ वर्ष की आयु में उसने कक्षा में अध्यापक को उस समय चमत्कृत कर दिया, जब गणित का लम्बा प्रश्न बोर्ड पर लिखकर जैसे ही अध्यापक रुके, गाँस ने उस कठिन प्रश्न का सही उत्तर प्रस्तुत कर दिया।
14 वर्ष की आयु में उसकी चारों ओर प्रसिद्धि फैली। ब्रन्सविक के राजा ने उसे अपने दरबार में बुलाया, जहाँ उसने अपनी गणित विद्या की धाक जमाई। 19 वर्ष की आयु में उसने यूक्लीडियन सूत्रों में एक मूलभूत संशोधन प्रस्तुत किया कि सत्रह समान भुजाओं की आकृति को परकार तथा सीधी रेखाओं द्वारा भी बनाया जा सकता है 22 वर्ष की आयु में उसने अपनी ‘थीसिस’ में “फन्डामेन्टल थ्योरम आफ अलजब्रा” नामक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। 25 वर्ष की उम्र में उसने “आँकिक सिद्धान्त” ग्रन्थ रचा, जिसने गणितीय विश्व में तहलका मचा दिया।
चलते-फिरते ज्ञान-कोश, अद्भुत स्मरण शक्ति के धनी अनेक विलक्षण व्यक्ति आये दिन देखने को मिलते हैं। इनके माता-पिता के वंश में अथवा वातावरण में इनमें से कोई भी विशेषताएँ विद्यमान नहीं पाई जातीं। ऐसी स्थिति में यही मानना पड़ता है कि उनकी यह विभूति स्वयं उनके द्वारा पूर्वजन्म में अर्जित क्षमताओं का सत्परिणाम है।
बौद्धिक-सामर्थ्यों की विलक्षणता की ही तरह स्वभाव एवं संस्कारों की, भावनात्मक विलक्षणताएँ भी देखी जाती हैं जार्ज बर्नार्डशा के कुल में सभी माँसाहारी थे। समाज में भी माँसाहार का ही प्रचलन था। किन्तु वे बचपन से ही शाकाहारी थे। देशभक्त परिवारों में देशद्रोही तथा दुराचार-रत परिवारों में सज्जन-साधु व्यक्तियों का जन्म लेना भी संस्कारों की दृष्टि से वंशानुक्रम एवं वातावरण से विलक्षणता ही है।
बुद्धि, भावना और गुण-स्वभाव की ये विलक्षणताएँ जो आनुवांशिकता तथा पर्यावरण के प्रभावों से सर्वथा भिन्न होती हैं, सम्बद्ध व्यक्ति के स्वतः अर्जित संस्कार एवं सामर्थ्य का ही परिणाम मानी जा सकती है। इन प्रत्यक्ष उदाहरणों से यही तथ्य उभरता है कि शरीरनाश के साथ ही मानव-जीवन का अन्त नहीं हो जाता न ही यह बिखर कर टुकड़े-टुकड़े होकर नदी, पर्वत, मैदान, वृक्ष, वनस्पति आदि में समाहित हो जाता, अपितु आत्मा का अस्तित्व शरीर-त्याग के बाद भी बना रहता है और उससे जुड़े संस्कार-समूह जन्म-जन्माँतर तक धारावाहिकता के साथ गतिशील रहते हैं। प्रगति पथ पर बढ़ते रहा जाय, तो उसके सत्परिणाम इस जीवन में ही नहीं अगले जीवन में भी मिलते हैं। इस तथ्य को समझ लिया जाय तो आत्मिक विकास में कभी भी आलस्य-प्रमाद की मनोवृत्ति नहीं उभर-पनप पायेगी। ‘जब जागे तभी सबेरा’ की तरह, कितने ही विलम्ब से श्रेष्ठता की दिशा में कदम बढ़ाया जाय, तो भी उसमें निराशा की कोई बात नहीं। साथ ही, एक क्षण भी अनौचित्य-अनाचार में लगाया गया, तो उसका भी परिणाम अवश्य होगा। अतः उस दृष्टि से रत्ती-भर भी लापरवाही हानिकर सिद्ध होगी और प्रत्येक गलती को सुधारने की आवश्यकता बनी रहेगी। इतना तो सत्कर्म कर लिया, अब जीवन का जो अंश बचा है, उसमें जरा मनमानी कर लें, मौज-मजे ले लें यह भावना भी पुनर्जन्म के मानने वाले में कभी नहीं आ सकती। यौवन के उभार में आदर्शोन्मुखता और प्रौढ़ावस्था में भोग-परायणता के जो दृश्य सामाजिक-राजनैतिक जीवन में देखे जाते हैं, वे जीवन की संकीर्ण धारणा का ही परिणाम है। पुनर्जन्म की वास्तविकता को समझने वाला तो अन्तिम क्षण तक श्रेयस् पथ पर ही चलता रहेगा। बुढ़ापे में पढ़कर साधना-स्वाध्याय कर या संयम-उपासना-सेवा क पथ अपनाकर भी क्या होगा, अब तो थोड़े दिनों का खेल है, चाहे जैसे दिन काटने हैं, यह भावना पुनर्जन्म पर सच्ची आस्था रखने वाले में नहीं आ सकती। उसके लिये तो जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक कार्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि उसका परिणाम अवश्यम्भावी है।
सभी धर्म पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते रहे हैं। हिन्दू धर्म में तो उसे सुस्पष्ट-सुनिश्चित मान्यता प्राप्त है ही। इस्लाम और ईसाई भी प्रलय-उपरान्त जीवों के पुनः जागृत एवं सक्रिय होने की बात कहते हैं। जो पुनर्जन्म का ही एक विचित्र एवं विलम्बित रूप है। ईसा मसीह तो तीन दिन बाद ही पुनः जीवित हो उठे थे, ऐसा कहा जाता है।
परामनोविज्ञान के अनेक अनुसंधानों ने पुनर्जन्म की वास्तविकता को प्रमाणित किया है। अगले दिनों सघन वैज्ञानिक प्रयास इस दिशा में और अधिक प्रगति कर सकेंगे, ऐसा विश्वास किया जाता है।
धर्मं की शक्ति महान् है। इससे भी अधिक महान् वे लोग हैं, जो वास्तविक धर्म को सम कर तदनुसार व्यवहार करते हैं। धर्मं का वास्तविक अर्थी होता है ‘कर्त्तव्यपरायणता’। व्यक्ति का स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, देश व समाज के प्रति यहाँ तक कि मानवमात्र या प्राणिमात्र के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं? उन्हें पूरा करना क्यों आवश्यक है- इसकी व्याख्या विवेचना करने वाले को एक शब्द में धर्म के नाम से कहा जाता है। शास्त्रों में इसी धर्म की महता यंत्र-तंत्र-सर्वत्र प्रतिपादित की गयी है-
एक एवं सुहृद्धर्मों निधेनऽप्यनुयाति यः। शरीरेण समं नाश सर्वम-यद्धि गच्छति॥-मनु
धर्म ही एक मात्र मित्र है, जो मरने पर भी साथ जाता है, और सब तो शरीर के साथ ही नष्ट हो जाता है।
धर्म कामदुधाः धेनूः सन्तोषो नन्दनं वनम्। विद्या मोक्षकरी प्रोक्ता तृष्णा वैतरणी नदी॥
धर्म ही कामधेनु के समान सम्पूर्ण अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है, सन्तोष ही स्वर्ग का नन्दन वन है, विद्या (ज्ञान) ही मोक्ष की जाननी है और तृष्णा वैतरणी नदी के समान नरक में ले जाने वाली है।
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्म सारमिद जगत्।
धर्म से अर्थ उत्पन्न (प्राप्त) होता है, धर्म से सुख प्राप्त होता है धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है, ‘धर्म’ ही इस संसार का सारतत्त्व है।
रामायण में प्रसंग आता है कि नर लीला करते हुए जब भगवानराम को अपनी सुरक्षा के विषय में सन्देह होता है तब उन्हें धर्म द्वारा ही रक्षा होने की बात बताई जाती है-
यं पालयिस धर्मं त्वं धृत्या च नियमने च। स बै राघव शार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥ -बाल्मीकीय रामायण-अयोध्या
हे राघव! (राम) तुम्हारी सुरक्षा के लिए मैं क्या करूं? निश्चित रूप से केवल धर्म ही तुम्हारी रक्षा करेगा। तुम जिस धर्म का धैर्य और नियम के साथ पालन करते आये हो, वही धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।
वास्तव में इस समस्त विश्व की प्रतिष्ठा स्थिति) धर्म से ही है-
धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति। धर्मेण पापमपनुदन्ति धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ तस्माद धर्म परमं वदन्तिः -नारायणोपनिषद्
धर्म ही सम्पूर्ण विश्व को प्रतिष्ठिता एवं स्थिर करने वाला है। धर्मिष्ठ (धार्मिक) के पास ही प्रजाजन जाते हैं धर्म से ही पाप दूर होता है, धर्म में सब की प्रतिष्ठा (स्थिरता या सत्ता) है, इसी कारण धर्म को सबसे बड़ा (श्रेष्ठ) कहा गया है।
मृतं शरीरमुत्सुज्य काष्ठलोष्ठ समक्षितौ। विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति॥ तस्मार्द्धमं सहायार्थं संचिनुयाच्छनैः। धर्मेण हि सहायेन तमसतरति दुस्तरम्।
‘मनुष्य के मर जाने पर, घर परिवार के लोग लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समान फेंक कर चले आते हैं धर्म ही केवल उसके साथ जाता है धर्मं की सहायता से निश्चित रूप से मनुष्य अपने दुस्तर अन्धकार (अज्ञानांधकार) को पार कर लेता है, अतः अपने सहायतार्थ मनुष्य को धीरे-धीरे धर्म संचय करना अत्यावश्यक है।
धर्म की इस महिमा को देखते हुए, जीवन में इसकी अनिवार्यता स्वतः सिद्ध हो जाता है। हमें धर्म के वास्तविक रूप को समझने का प्रयास करना चाहिये और तदनुसार अपने आचार- व्यवहार में उसका समावेश करना चाहिये। कर्म को पूजा समझकर, उसे पूरा करने वाले व्यक्ति का प्रत्येक क्रिया-कलाप धर्म सम्मत ही माना जायेगा। इस प्रकार की ‘कर्तव्यपरायणता’ से युक्त व्यक्ति ही समाज में सम्माननीय और अभिनन्दनीय बनते हैं। उन्हीं की यश गाथा संसार में प्रसिद्ध होती है।
काया के विभिन्न अवयवों को सुन्दर, सुडौल, सुसज्जित बनाने के लिए हम पूरा ध्यान रखते हैं और उस कायिक सौंदर्य संवर्धन के लिए वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार प्रसाधन, पुष्प, आदि जो कुछ सूझता है उसे जुटाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इससे विदित होता है कि काया और उसके विभिन्न अवयवों को अच्छी स्थिति में रखने के सम्बन्ध में हमारी सतर्कता और सुरुचि कितनी बढ़ी-चढ़ी है, पर जब यह देखते हैं कि यह ध्यान, मात्र देखने दिखाने तक सीमित है। जो दृष्टि से ओझल है उसकी उपेक्षा ही होती रहती है। फिर चाहें वे अवयव कितने ही महत्वपूर्ण क्यों न हों। पेट, आँतें, जिगर, गुर्दे, फेफड़े, हृदय जैसे अवयव होंठ, गाल, भौं, नाक आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उनकी सुसज्जा तो पीछे की बात है सुरक्षा तक पर ध्यान नहीं जाता और वे अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़े रहने के कारण रुग्ण बने रहते हैं। फलतः जीवन का आनन्द ही चला जाता हैं एक प्रकार से जिन्दगी की लाश की किसी प्रकार ढोनी पड़ती है।
मस्तिष्क की-उसके चेतना प्रवाह मन की गरिमा पर जब विचार किया जाता है तो प्रतीत होता है कि जीवन का अस्तित्व, स्वरूप, स्तर और भविष्य भी उसी केन्द्र बिन्दु के साथ जुड़ा हुआ है। देखने में तो जो कुछ किया, कमाया और भोगा जाता है उसमें शरीर की ही भूमिका दृष्टिगोचर होती है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। म नहीं पूरी तरह शरीर पर छाया हुआ है, उसके भीतर भी वही रमा है। विपन्नता और सम्पन्नता और सम्पन्नता का सम्बन्ध परिस्थितियों और व्यक्तियों के साथ जोड़ा तो जाता है, पर थोड़ी गहराई में उतरने पर स्पष्ट हो जाता है कि काया की कठपुतली जो तरह-तरह की हरकतें करती और सम्वेदनाएँ प्रकट करती है उसमें पर्दे के पीछे बैठे बाजीगर मन की उँगलियाँ ही अपनी करामात दिखा रही होती हैं।
स्वास्थ्य-अर्थ, व्यवस्था, परिवार-प्रबन्ध, सुरक्षा-सुविधा, श्रेय सम्मान के लिए प्रयत्न करने में ही हमारी गतिविधियाँ संलग्न रहती हैं। उन्हीं प्रयासों में एक कड़ी मनःसंस्थान को सुव्यवस्थित रखने की भी जोड़ी जानी चाहिए। बालों को सुसज्जित रखने का जितना ध्यान रखा जाता है यदि उतना ही मानसिक सन्तुलन बनाये रहने का ध्यान रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि सर्वोपरि बुद्धि मत्ता और सर्वोच्च सफलताएँ प्राप्त करने का द्वारा खुल गया। शरीर की जो भी स्थिति है उसके लिए वस्तुतः मन ही उत्तरदायी है। ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत वाली उक्ति की यथार्थता में रत्ती भर भी सन्देह करने की ‘गुंजाइश’ नहीं है।
मस्तिष्क की तुलना एक अच्छे-खासे बिजली घर से की जा सकती है। उसकी उत्पादित शक्ति का वितरण तन्त्रिका तन्त्र-नर्वस सिस्टम-द्वारा समस्त शरीर में होता है और उसी की शक्ति से समस्त अवयव अपना-अपना काम ठीक प्रकार कर पाते हैं। मस्तिष्कीय विद्युत उत्पादन का जितना भाग समस्त शरीर को गतिशील रखने में खर्च होता है उससे कुछ ही कम अपनी निज की मशीनरी को चलाने और खुराक जुटाने एवं टूट-फूट ठीक करने में खप जाता है। चिन्तन अथवा हलचलों के लिए हम जान-बूझ कर कुछ नहीं भी करें तो भी मस्तिष्क तन्त्र स्वयमेव चालू रहेगा। उसे सोते जागते विश्राम कभी नहीं। सोचने विचारने वाला भाग कुछ समय तक नींद में विश्राम भी पा लेता है, पर अवयवों को गतिशील एवं जीवित रखने वाला अचेतन भाग तो जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से कार्य संलग्न ही रहता है।
सोचने या काम करने में मस्तिष्कीय शक्ति का सीमित, सन्तुलित एवं व्यवस्थित व्यय होता है किन्तु मानसिक उत्तेजनाओं की स्थिति में शक्ति व्यय का अनुपात अत्यधिक बढ़ जाता है। चूल्हे में ईंधन सीमित जलता है, पर ईंधन के ढेर में आग लग जाने पर तो ऊँची लपटें उठने लगती हैं और देखते- देखते उतना ईन्धन जलकर खाक हो जाता है जिससे महीनों चूल्हा जलता रहता। घबराहट, चिन्ता, भय, शोक, उदासी जैसी मनःस्थिति होने पर गिरावट स्तर की खिन्नता होती है और क्रोध, आवेश, कामुकता, आतुरता जैसे प्रसंगों में उत्तेजित प्रतिक्रिया उभरती है। दोनों की परिस्थितियों में मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है ज्वार हो या भाटा दोनों ही परिस्थितियों में समुद्र में समान उथल-पुथल होती है। खिन्नता एवं प्रसन्नता की अति से जो आवेश मनःक्षेत्र में उत्पन्न होता है उसके कारण सही चिन्तन कर सकना और सही निष्कर्ष निकाल सकना सम्भव नहीं रहता। थका हुआ आदमी असफलताओं की निराशाजनक बातें सोचता है और नशे में धुत्त व्यक्ति दूनकी हाँकता है। जिसे कुछ विशेष उपलब्धियाँ मिल गई हैं वह फूला नहीं समाता और धरती जोतने जैसे मंसूबे बाँधता है। लो ब्लड प्रेसर और हाई ब्लड प्रेसर के लक्षण भिन्न-भिन्न है, पर कष्ट दोनों ही व्याधियों के रोगी समान रूप से भुगतते हैं।
शरीर और मन का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर में सक्रियता रहेगी और यदि खिन्नता छाई हो तो क्रियाशीलता में कमी ही नहीं आयेगी वरन् उसके साथ अस्तव्यस्तता जुड़ जाने से जो थोड़ा-बहुत काम किया गया था वह भी गलत-सलत हो जायेगा और उसका नुकसान, न करने से भी अधिक महंगा पड़ेगा।
मनःस्थिति का ही एक नाम ‘मूड’ है। मूड अनुकूल हो तो आदमी काम पर सवार रहेगा और यदि वह प्रतिकूल हो तो काम आदमी पर सवार रहेगा। दोनों परिस्थितियों में कितना अन्तर है इसका परिचय प्राप्त करना हो तो एक उस आदमी को देखा जाय जो घोड़े पर सवार होकर तेजी से सफर कर रहा है। दूसरा वह आदमी देखा जाय जिसके जिम्मे मरा घोड़ा ठोकर या घसीट कर ले जाने का काम सौंपा गया है। दोनों अपनी प्रसन्नता-खिन्नता के अनुरूप ही वे सौभाग्य दुर्भाग्य का अनुमान लगा रहे हों। उसी अनुपात से उनके उत्साह एवं बल में भी घट बढ़ का अन्तर पड़ रहा होगा।
मन कुछ काम तो अपने आप ही कर लेता, कुछ उसे इन्द्रियों की सहायता से कराने पड़ते हैं। चिन्तन, मनन, ध्यान, कल्पना, योजना, निष्कर्ष, निश्चय आदि क्रियाएँ वह अपने आप अकेला ही कर लेता है। चलना-फिरना, खाना-पीना, देखना, सुनना, बोलना जैसे कार्य उसे इन्द्रियों की सहायता से कराने पड़ते है।
इन्द्रियाँ देखने भर में स्वतन्त्र हैं उनका स्थान मस्तिष्क से दूर है तथा बनावट भी भिन्न है इसमें उनकी भिन्नता अनुभव की जाती है, पर तथ्य यह है वे सभी मन के बाजीगर द्वारा उँगली के इशारों पर चलाई जाने वाली कठपुतलियां भर हैं। अधिक से अधिक इतना कह सकते हैं कि वे मन महाराज की रखैल नर्तकी हैं जिन्हें अपने स्वामी को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के खेल-खेलने और स्वांग रचने पड़ते हैं। इन्द्रियों की बुरी आदतों में कई प्रकार की हानियाँ होती है। चटोरापन, कामुकता, आलस दुर्व्यसन जैसे कृत्यों के लिए इन्द्रियों को दोष दिया जाता है और उनका नियन्त्रण निग्रह करने की बात सोची जाती है। यह जड़ का ध्यान रखकर पत्ते सींचने के समान है। इन्द्रिय विग्रह के स्थानीय अभ्यास प्रायः असफल रहते हैं। कामुकता की प्रवृत्ति को लंगोट बाँधने के प्रतिबन्ध से नहीं रोका जा सकता है। प्रतिबन्ध से प्रत्यक्ष कृत्य रुक सकते है, पर भीतर से उनकी लिप्सा लपकती रहे तो अन्तः शक्तियों का क्षरण इन्द्रिय भोग जितना ही होता रहेगा। पानी का सोता रोका जाना चाहिए मेंड़ बाँधने पर वह एक जगह रुकते ही दूसरी जगह फूट पड़ेगा। इन्द्रिय निग्रह की आवश्यकता अनुभव हो तो स्थानीय रोक थाम की बात सोचने के साथ-साथ लिप्साओं के उद्गम मन पर नियन्त्रण करना चाहिए। इन्द्रिय निग्रह की सफलता मनोनिग्रह पर निर्भर है।
कुसंस्कारी मन कच्चे पारे की तरह है। वही सुसंस्कारी बना लिये जाने पर मकरध्वज जैसे पारद रसायनों के रूप में विकसित होता है, तो गुणकारी रसायन का काम करता है। कच्चा पारा तो भयंकर शरीर विस्फोट एवं मरण का निमित्त ही बन सकता है। मन की गुलामी सबसे बुरे किस्म की पराधीनता है। गुलाम सोने खाने जैसे समय तो अवकाश प्राप्त कर लेते हैं, पर मन के गुलाम को दिन-रात में कभी भी चैन नहीं। स्वतन्त्रतापूर्वक वह कुछ भी कर सकना तो दूर; सोच तक नहीं सकता।
बन्ध मोक्ष का-पतन उत्थान का आधार भूत कारण मन है। परिस्थितियों को बहुधा श्रेय या दोष दिया जाता है; पर वह लाँछना मात्र है। यदि परिस्थितियाँ ही कारण रही होतीं तो उन परिस्थितियों में रहने वाले सभी न सही अधिकाँश को तो एक जैसा मार्ग अपनाना चाहिए था। पर वैसा होता कहाँ है। अच्छी से अच्छी परिस्थितियों के लोग समस्त सुविधा साधन होते हुए भी बुरे से बुरे कर्म करते हैं। इसके विपरीत भारी विपत्ति में फँसे हुए और घोर अभावग्रस्त स्थिति में रहते हुए भी कितने ही लोग अपनी नैतिकता और सदाशयता बनाये रहते हैं। वास्तविक कारण मन का स्तर है वह अपनी निकृष्टता एवं उत्कृष्टता के अनुरूप मनुष्य की गतिविधियों को इच्छित दिशा में घसीटता चला जाता है।
प्रश्न मन की शक्ति का नहीं, उसके नियन्त्रण प्रयास का है। घोड़ा बड़ा है या सवार। इस प्रश्न का उत्तर इस जानकारी के आधार पर दिया जा सकता है कि घोड़े के मुँह में लगाम है या नहीं और यदि है तो सवार ने उसे अपने हाथ में थाम रखा है या नहीं यदि सवार के हाथ में लगाम है तो सवार बड़ा है और यदि घोड़ा छुट्टल है तो फिर उसी को सवार से बड़ा मानना पड़ेगा। एक बुढ़िया कौतूहल वश बैठे हुए ऊँट पर सवार हो गई। ऊँट बिना नकेल का था। बुढ़िया के पीठ पर बैठते ही वह उठकर खड़ा हो गया और मन-मर्जी की दिशा में चल दिया। बुढ़िया घबराने लगी पर बहु कुछ कर नहीं सकती थी। कूदने का साहस भी उसमें नहीं था। रास्ते में एक यात्री ने बुढ़िया से पूछा-माताजी इस घने जंगल की ओर अकेली क्यों जा रहीं हो। बुढ़िया ने उत्तर दिया बेटा, मैं कहीं नहीं जा रही यह ऊँट ही जहाँ इसकी मर्जी होगी ले जा रहा है।
मन की मस्तिष्क की बनावट ऐसी है कि ईमानदारी, सज्जनता, संयमशीलता, नियमितता, सुव्यवस्था का हलका-फुलका जीवन जिया जाय तो मनःसंस्थान अपना काम ठीक से करता रहता है। मानवी आदर्शों के अनुरूप गतिविधियाँ और उसी स्तर की उत्कृष्ट विचारणाएँ अपनाई जायँ तो मानसिक सन्तुलन बना रहता है और सामान्य परिस्थितियों में भी आनन्द उल्लास से भरा-पूरा जीवन जिया जा सकता है। विकृतियाँ तो अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने और स्वार्थांध अनैतिक विचार पद्धति अपनाने से उत्पन्न होती हैं। यदि कुमार्ग पर चलने और अचिन्त्य चिन्तन से मस्तिष्क को भरे रहने की हानि को समझा जा सके तो इतने भर से अनायास ही ईश्वर प्रदत्त उस आनन्द और उत्कर्ष का लाभ मिल सकता है जिसके लिए जीवन और उसका महान संरक्षक यह मन हमें प्राप्त हुआ है।
क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। असंयम बरतने पर रुग्णता घेरती है। कटुवचन बोलने से शत्रुता बढ़ती है। अपव्यय से दारिद्र आता है। नशा पीने से खुमारी आती है। विष खाने से मृत्यु होती है। पुरुषार्थी प्रगति करते हैं। आलसी असफल रहते हैं। दर्पण में अपनी ही छवि दीखती है। कुएँ में अपनी ही आवाज प्रतिध्वनित होती है।
अनाचार बरतने की प्रतिक्रिया विपत्ति के रूप में सामने आती है। लोग इस मोटी बात कोन जाने क्यों भूल जाते हैं। अनाचार करते हुए सुख की आशा की जाती है। यह लघुदृष्टि है। तुरन्त के लाभ को देखकर उस पर टूट पड़ना और पीछे के परिणाम को न देखना, अदूर दर्शिता ही है। अदूरदर्शी तात्कालिक प्रसन्नता को देखते हैं, और आटे की गोली के लोभ में प्राण गँवाने वाली मछली की तरह अपनी दुर्गति कराते हैं ऐसी अनाचार परक भूल न करने के लिए शास्त्रकार ने सर्वसाधारण को सचेत किया है।
ब्रजत्यधः प्रयात्युच्चैर्नर स्वैरेव चेष्टितैः। अधःकूपस्य खनक ऊर्ध्वं प्रासादकारकः॥
मनुष्य अपने ही कामों से नीचे चला जाता है और ऊपर चढ़ जाता है। कुएँ को खोदने वाला नीचे की ओर उतरता जाता है। और प्रासाद का बनाने वाला ऊपर की ओर चढ़ता जाता है।
दुराचाररती लोके गर्हणीयः पुमान्भवेत्।
दुराचारी व्यक्ति व्याधियों से अभिभूत हो जाया करता है अर्थात् उसे बहुत-से रोग घेर लिया करते हैं- वह सदा ही अल्प आयु वाला होता है। और हमेशा दुःखों के भोगने वाला रहा करता है।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैमाप्नुयात्॥ कठ 1।2।24
दुराचारी, अशांतचित्त और असंयमी मनुष्य तत्वज्ञान की बातें करते रहने पर भी उस परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते।
आचारः परमो धर्मः सर्वषामिति निश्चयः। हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह विनश्यति॥
नैनं तपाँसि न ब्रह्म नाग्निहोत्र न दक्षिणाः। हीनाचारमितो भ्रष्टं तारयन्ति कथंचनः॥
दुराचारी हि पुरुषो लोक भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥
आचारात्फलते धर्ममाचारात्फलते धनम्। आचाराच्छिमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम्॥ वशिष्ठ स्मृति 166 से 172
श्रेष्ठ आचरण ही धर्म का प्रथम आधार है। यह सब प्रकार निश्चित है। पाप आचरण करने वाला परलोक में दुर्गतिग्रस्त होता है॥66॥
दुराचारी को तप, वेद, अग्निहोत्र, दक्षिणा आदि कोई भी तार नहीं सकता॥167॥
दुराचारी की सर्वत्र निंदा होती है वह दुखों का भागी, अल्पायु और रोगी होता है॥171॥
सदाचारी का ही धर्म फलता है। उसी का धन फलता है। उसी को श्रेय प्राप्त होता है और आचरण यदि भ्रष्ट हो जाय तो मनुष्य को मार डालता है॥172॥
दरिद्रौ यस्त्वसंतुष्टः कृपणौ योऽजितेन्द्रियः। गुणेष्वसक्तधीरीशों गुणसंगों विपर्ययः॥ -महायोग विज्ञान
जो असंतुष्ट है वही दरिद्र है। जो अजितेंद्रिय है वह दीन कृपा है। जो वासनाओं में आसक्त है वही असमर्थ पराधीन है।
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः। न स तत्पदमाप्नोति स ऽ चारं चाधिगच्छति॥ कठ॰ वल्ली 3 मं 7।
जो अविवेकी, अव्यवस्थित और कुकर्मों में निरत रहता है, वह परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता, भव बन्धनों में ही पड़ा रहता है।
सृष्टि का कण-कण सृजन और ध्वंस के संगुम्फित नृत्य-उत्सव में निरन्तर नाच रहा है। मनुष्य-शरीर के भीतर भी रचना और संहार की अन्योन्याश्रित गति-विधियाँ लगातार चलती रहती हैं।
फेफड़े प्रतिपल श्वाँस-वायु का पोषक अंश ग्रहण करते और दूषित अंश बाहर फेंकते हैं। एक करोड़ लाल रक्त-कोशिकाएँ प्रति सेकेंड मरती है और निर्जीव कोशिकाओं को प्लीहा उसी समय तोड़ डालती है। यकृत उनके लौहांश जैसे जीवन्त भागों का इस ध्वंस से संरक्षण करता है और नयी रक्त-कोशिकाओं के निर्माण के आधार प्रस्तुत करता रहता है। अशुद्ध रक्त को शुद्ध करने का काम यकृत निरन्तर करता रहता है।
सृजन और ध्वंस का यह क्रम जीवन की मूल इकाई कोशिका में भी निरंतर गतिशील रहता है। वे निरंतर मरती रहती हैं और वैसी ही नई कोशिकाएं लगातार पैदा होती रहती हैं।
सृजन और संहार की इस प्रक्रिया के स्वरूप पर दृष्टिपात करें तो यही स्पष्ट होता है कि विधेयात्मकता नवसृजन का और निषेधात्मकता विनाश का कारण बनती है। ऊपरी त्वचा को ही लें जब उन्हें स्वच्छ रखा जाता है और समुचित श्रम से उनकी क्रियाशीलता का पोषण किया जाता है, तो वे संरक्षक का कार्य करती हैं। शरीर का कारखाना गरम होते ही तेजी से पसीना बाहर निकालने का काम स्वेद-ग्रन्थियों के द्वारा करने लगती हैं और बदन ठंडा कर देती हैं। सर्दियों में शरीर की संचित ऊष्मा सुरक्षित रखने की जरूरत पड़ती है, तो उनके छेद सिकुड़ जाते हैं। भीतर की गर्मी रुकी रहती है और ठण्ड से बचाव हो जाता है। इस प्रकार ये “एयर कंडीशनर” का काम अंजाम देती हैं।
इसी त्वचा पर जब रंग-पोतकर उसकी स्वाभाविकता नष्ट की जाती है, तो वह अपनी यह “एयर-कंडीशनिंग” की क्षमता खोने लगती है। उनके छिद्र भरे रहने लगते हैं और वे कई बीमारियों का कारण बन जाती हैं। त्वचा के रंग-रोगन का अभ्यास चर्मरोगों को बढ़ाता है। स्नान की उपयोगिता न समझकर उसे मात्र चिन्ह-पूजा बनाकर करने वाले भी ऐसी ही पीड़ाएँ-परेशानियाँ झेलने को बाध्य होते हैं। एक बार होली के अवसर पर एक लड़के के शरीर पर ‘सीरा’ पोत कर रुई चिपकाई गई और लंगूर का स्वाँग रचा गया। थोड़ी देर बाद लड़का बेहोश हो गया। अस्पताल ले जाने तक उसने दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम-रिपोर्ट से पता चला त्वचा के छिद्रों का पूरी तरह बंद हो जाना ही इस मृत्यु का कारण था। पुराने जमाने में अपराधी को मृत्यु-दण्ड देने की एक विधि यह भी थी कि उसके हाथ पैर बाँध दिये जायें और पूरे शरीर र मोम पोत दिया जाय। त्वचा के रामे-छिद्र बन्द होने से, वह घुट-घुटकर मार जाता था।
विधेयात्मकता और निषेधात्मकता दोनों के दो-दो पक्ष स्पष्ट होते हैं। त्वचा की सृजनात्मकता के दो रूप हैं-वह स्वयं अपना परिपोषण करती है और शरीर के लिये आवश्यक प्राणवायु भी जुटाती रहती है। उसकी संवेदना के बारे में भी यही बात है। वह अपने संपर्क में आने वाले वातावरण का संवेदनात्मक अनुभव स्वयं करती और सम्पूर्ण शरीर तक पहुँचाती है। धूप, बर्फ, तीखी हवा, तेज बारिश की बौछार काँटा कील, सुई की चुभन आदि का स्पर्श त्वचा में होने पर भी पूरा शरीर उस सम्वेदना को अनुभव करता है। प्रीतिकर स्पर्श-सम्वेदनों के बारे में भी यही बात है। बदले में शरीर के अन्य अवयव भी उसके साथ वैसा ही सहयोग करते हैं। मस्तिष्क उसे आवश्यक निर्देश देता है। उसमें चोट पहुँचने पर रक्त कण आक्रमण के प्रतिकार हेतु दौड़ पड़ते हैं।
निषेधात्मकता के भी दो पक्ष हैं। पहला लापरवाही और भूलें। जैसे रगड़ कर न नहाना-धोना। इससे मैल की परतें बच रहती और फोड़े-फुन्सियों जैसी विकृतियों का कारण बनता हैं। दूसरा असामाजिकता अर्थात् शरीर के लिये वाँछित प्राणवायु की पूर्ति न करना, जैसा, ऊपर के उदाहरणों में बताया है इसका परिणाम त्वचा और शरीर दोनों के विनाश के रूप में सामने आता है। इस प्रकार भूलों से विकृति तथा असामाजिकता के विनाश की स्थितियाँ पैदा होती हैं। विकृतियाँ विनाश की मन्दगति का ही रूप हैं। कुछ लम्बी बीमारियों के बाद कई बार चमड़ी की ऊपरी परतें तौलिये से रगड़ने के उखड़ने लगती हैं। चोट ठीक होने पर भी यही बात होती है। ऐसी निकल-झड़ जाने वाली चमड़ी मरी चमड़ी कही जाती है। शिर से भी भूसी निकलती रहती है। इस प्रकार यह विनाश की मन्द प्रक्रिया चलती रहती है और उसी के समानान्तर गतिशील शरीर की चमड़ी में नवसृजन का क्रम भी चलता रहता है।
अपनी ही चिन्ता करते रहने और दूसरों के प्रति अपने आवश्यक कर्त्तव्यों को भुला देने से अन्ततः स्वयं की भी संकट-ग्रस्त, असहाय और असमर्थ हो जाना पड़ता है। सुख और प्रगति के आधार औरों के सहकार के बिना जूट ही नहीं सकते। दूसरों से सहयोग के आदान-प्रदान हेतु, वाँछित उदारता और अपने काम को भली-भाँति सम्पादित करने हेतु जागरूकता की निरन्तर आवश्यकता रहती है। उदारता और जागरूकता के बिना सफलता और सहयोग नहीं प्राप्त किये जा सकते। असामाजिकता और लापरवाही, प्रमाद सदा हानि ही उत्पन्न करते हैं।
सफलताएँ अनायास ही नहीं मिलतीं और सहयोग यों हीं नहीं जुटता। उस हेतु अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को जगाये रखने और निखारते रहने तथा निषेधात्मक प्रवृत्तियों को नियंत्रित-निरस्त करते रहने की जरूरत सदैव ही पड़ती है।
माँसपेशी की विधेयात्मकता के भी दो पक्ष होते हैं। वह जितना ही काम करती हैं, उतनी ही सशक्त होती हैं। व्यायाम और परिश्रम से माँसपेशियों का स्वास्थ्य भी अच्छा होता है और ताकत भी बढ़ती है जिन लोगों की माँसपेशियों का श्रम का अभ्यास होता है; उनकी माँसपेशियाँ बुढ़ापे में भी बखूबी काम करती रहती हैं। यह हुआ उनकी रचनात्मकता का निजी पक्ष। सामाजिक पक्ष यह है कि माँसपेशियाँ हाथ, पैर फेफड़े, सीने, आँत आदि के कार्यों में सहयोग देती हैं, बदले में इनमें निरन्तर खून दौड़ता रहता है, जिससे इन्हें बीमारियाँ थक जाती हैं। लापरवाही या अन्य किसी कारण से उनमें मोच भी आ सकती है। विश्राम से थकान और सेंक आदि उपचार के मोच ठीक होती है। किन्तु यदि माँसपेशियाँ सहयोग भरी सक्रियता न अपनाएँ, असामाजिकता अपना लें तो वे निस्तेज और दुर्बल होती जाती हैं। यदि कोई स्वस्थ युवक एक हफ्ते तक व्यर्थ ही आराम करे तो उसकी माँसपेशियाँ अत्यधिक ढीली हो जायेंगी और उसे हिलने-डुलने में ही जराजीर्ण रोगियों जैसी थकान आने लगेगी।
यही बात हड्डियों के बारे में है। अनावश्यक विश्राम से हड्डियाँ कैल्शियम- रहित हो जाती और अत्यन्त कमजोर पड़ जाती हैं। एक 30 वर्षीय अमीर युवक एक बार चार सीढ़ियों पर से गिरा और उसको दाहिने पैर की हड्डी टूट गई तथा कुहनी सरक गई। बाद में पता चला कि इसका कारण यह था कि अति विश्राम से उसकी हड्डियाँ इसी आयु में कैल्शियम की कमी से जर्जर हो चली थीं। जबकि निरंतर पर्याप्त श्रम करने वालों को हड्डियों की बीमारी सामान्यतः कभी भी नहीं होती।
यह हुआ परिश्रम का एक पक्ष। इसके दूसरे पक्ष उचित विश्राम का महत्व भी भूलना न चाहिए। नवीन स्फूर्ति के संचय के लिये विश्राम की आवश्यकता पड़ती हैं विश्राम का समय नवीन, उत्साह और नई ताजगी के अर्जन का समय होता है।
अपनी शरीर-रचना में भी निरन्तर क्रियाशीलता के बीच विश्रान्ति के क्रम भी आते रहने की व्यवस्था है। हर अवयव बीच में स्वल्प-विश्राम लेता है। इसी अवधि में वह नई सक्रियता अर्जित कर लेता है और उसकी निरन्तर चलती प्रतीत होने वाली गतिशीलता अक्षुण्ण बनी रहती है, हृदय रक्त फेंकने की अविराम गतिशीलता के मध्य ही टुकड़ों- टुकड़ों में उससे अधिक विश्राम कर लेता है, जितना दूसरे विश्वयुद्ध के समय निरन्तर काम करने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री विंस्टन चर्चिल अपनी बीच-बीच में थोड़े समय का विश्राम लेने की पद्धति से करुते थे। चर्चिल तो उन दिनों कुल 16 घन्टे काम करते और खंड-खंड में कुल मिलाकर 8 घन्टे विश्राम कर लेते थे। जबकि हृदय चौबीस घन्टे में कुल 9 घन्टे ही काम करता, 15 घंटे विश्राम करता है। तभी तो वह आजीवन इस क्रम को बनाये रख पाता है।
जिन महापुरुषों को अपनी ध्येयनिष्ठा और परिस्थितियों के दबाव से, प्रकृति के इन नियमों को जानते हुए भी, अत्यधिक श्रम करना पड़ता है, वे संयमी-सात्विक जीवन बिताने पर भी अधिक अवधि तक इस क्रम को निभा नहीं पाते और देह-परिवर्तन के लिये विवश हो जाते हैं, स्वामी विवेकानन्द का 40 वर्ष की आयु में ही निधन हो जाने के पीछे उनकी कठोर और अत्यधिक परिश्रम भी एक कारण था। कोशिकाएँ जल्दी ही मरती हैं। इसका कारण उनका कद की तुलना में अनेक गुण अधिक, घोर परिश्रम करना ही है। नन्हीं सी कोशिकाएँ सृजन, नियन्त्रण, व्यवस्था, संचार, संपर्क, विकास, प्रशासन आदि के गुरुतर दायित्व सम्हालती हैं। इससे उन्हें मरना तो 27 दिन में ही पड़ता है। किन्तु अपने गौरवपूर्ण उत्सर्ग का प्रतिदान भी उन्हें मिलता है और उनका नाम तथा वंश चलता ही रहता है। वे ‘मुहूर्त ज्वलितं श्रेयः, न च धूमायितं चिरं’ के आदर्श को साकार करती हुई 27 दिनों का अपना अतिव्यस्त जीवन-क्रम पूरा करती है। उनकी जीवन-अवधि कम ही सही, पर वह जीवन होता सार्थक और महिमान्वित है। शरीर को दिये जाने वाले कोशिका के प्राण-अनुदान व्यर्थ नहीं जाते। बदले में शरीर की प्राणशक्ति उन्हें सर्वथा नया जीवन देती है। नये शरीर में उसी पुरानी कोशिका की ही आत्मा निवास कर रही होती है। वही चेतना, वही संरचना और वही संस्कार उस नई कोशिका के भी होते हैं, जो पुरानी की मृत्यु के तत्क्षण बाद प्रकट होती है।
इस प्रकार जो दिया जाता है, वही अनुदान रूप में प्राप्त होता है। यही सृष्टि-व्यवस्था का सनातन क्रम है। जब मैत्रीपूर्ण सहयोग दिया जाता है, तो वैसा ही भाव भरा सहयोग-अनुदान प्राप्त होता है। सब सर्वस्व न्यौछावर कर दिया जाता है, तब नये सिरे से सब कुछ मिला जाता है, सो भी नई ताजगी, नये जीवन-रस के साथ। दाहिनी ओर की पसलियों के नीचे स्थित तीन पौंड वजन वाली यकृत नाम ग्रन्थि सृष्टि की इस व्यवस्था का एक अन्य उत्तम उदाहरण है। यकृत से शरीर को चौबीसों घंटे ग्लाइकोजन नाम स्टार्च मिलता रहता है। ऊँचाई चढ़ते समय माँसपेशियों को अधिक ईंधन की जरूरत पड़ती है। वह माँग भी यकृत ग्लाइकोजन का एक अंश ग्लूकोज में बदलकर उसे रक्त प्रवाह में घोलकर माँसपेशियों के हवाले करते हुए पूरी करता है। शरीर में कहीं भी चोट लगे, तो वह उठने वाले खून को जमा देने का काम यकृत फिब्रिनोजन तथा प्रोथ्राम्बिन नाम रासायनिक पदार्थ उत्पन्न कर सम्पादित करता है। साथ ही वह विषाणु-निरोधक तत्व भी पैदा करता है। अन्यथा छोटी सी चोट या फुड़िया भी प्राणों पर संकट पैदा कर सकती है।
माँसपेशियाँ ग्लूकोज से ऊर्जा पैदा करती हैं। इस प्रक्रिया में शरीर में लैक्टिक एसिड पैदा होता है। इस जहरीले तेजाब को बढ़ने से यकृत ही रोकता है। वह इसे पुनः ग्लाइकोजन में परिणत कर देता है। रक्तशोधन का गुरुतर दायित्व भी यकृत ही सतत सम्हालता है। यदि अंतड़ियों से होकर आने वाला खून अधिक है और उसके हृदय में पहुँचने पर हृदय पर अधिक दबाव पड़ने की आशंका है, तो उसकी अतिरिक्त मात्रा को यकृत अस्थायी तौर पर अपने कोष में संचित कर लेता है, जो आपात्काल में या कमी के समय काम आता है।
दवाओं या मादक द्रव्यों के नशीलेपन-विषैलेपन को घटाने का काम भी यकृत करता है। शरीर के हारमोन स्रावों को संतुलित करने का काम भी वही पूरा कर सकता है। इतने सहयोगियों की सहायता के महान सामाजिक दायित्वों में व्यस्त यकृत की निजी स्थिति को उसके सहयोगी भूल कैसे सकते हैं? उसे सुदृढ़ रखने का काम वे सम्हालते हैं। हृदय अपने इस आदर्शवादी त्यागी मित्र को रक्त पहुँचाने का विशेष ध्यान रखता है वह अपनी कुल शक्ति का एक चौथाई हिस्सा यकृत को रक्त की पूर्ति में खर्च करता है। शेष तीन चौथाई शक्ति से शरीर के हजारों अवयवों का ध्यान रखता है। किन्हीं प्रचंड आघातों, श्रम की अति या पोषण की कमी से यदि यकृत कैंसर-ग्रस्त हो गया, और उसका आपरेशन कर सड़ा अंश अलग कर दिया, तो शरीर के सभी भीतरी अवयव अपनी-अपनी शक्ति का अंश सर्वप्रथम यकृत के स्वास्थ्य-लाभ और शक्ति-वृद्धि के लिये देने को उमड़ पड़ते हैं। जिससे वह शल्य क्रिया से अंगभंग यकृत पुनः पहले जितना बड़ा हो जाता है। रचनात्मकता, उदारता, उत्सर्ग और सेवा परायणता के फलस्वरूप ऐसे ही चमत्कार-भरे, अनुदानों से व्यक्तित्व समृद्ध बनता चला जाया करता है।
इस यकृत की जब कभी उपेक्षा की जाती है, उस पर निरन्तर अनुचित आहार दबाव विहार से डालकर उसे व्यथाग्रस्त, तनाव-ग्रस्त रखा जाता है तो पेट में रक्तस्राव होने, यकृत-शोथ, सिरोसिस, साण्डुरोग आदि होने लगते हैं। इस प्रकार जहाँ सृजन और ध्वंस की अनवरत प्रक्रिया मानव-शरीर में चलती रहती है, वहीं विधेयात्मक प्रवृत्तियों से सत्परिणाम और निषेधात्मकता के दुष्परिणाम भी सामने आते रहते हैं। हमारा विवेक जागृत हो, तो यह अपना शरीर भी अपना गुरु व मार्गदर्शक मित्र बन सकता है।
नौशेरवाँ को, जो भी मिले उसी से कुछ न कुछ सीखने का स्वभाव हो गया था। अपने इस गुण के कारण ही उन्होंने अपने जीवन के स्वल्प काल में महत्त्वपूर्ण अनुभव अर्जित कर लिये थे।
राजा नौशेरवाँ एक दिन वेष बदलकर कहीं जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध किसान मिला। किसान के बाल पक गये थे पर शरीर में जवानों जैसी चेतनता विद्यमान थी। उसका रहस्य जानने की इच्छा से नौशेरवां ने पूछा-महानुभाव! आपकी आयु कितनी होगी?
वृद्ध ने मुस्कान भरी दृष्टि नौशेरवाँ पर डाली और हँसते हुये उत्तर दिया-”कुल 4 वर्ष।”
नौशेरवाँ ने सोचा बूढ़ा दिल्लगी कर रहा है पर सच-सच पूछने पर भी जब उसने 4 वर्ष ही आयु बताई तो उन्हें कुछ क्रोध आ गया। एक बार तो मन में आया कि उसे बता दूँ-”मैं साधारण व्यक्ति नहीं नौशेरवाँ हूँ। पर उन्होंने अपने विवेक को सँभाला और विचार किया कि उत्तेजित हो उठने वाले व्यक्ति सच्चे जिज्ञासु नहीं हो सकते, किसी के ज्ञान का लाभ नहीं ले सकते, इसलिये उठे हुये क्रोध का उफान शान्त हो गया।
अब नौशेरवाँ ने नये सिरे से पूछा-पितामह! आपके बाल पक गये, शरीर में झुर्रियाँ पड़ गईं, लाठी लेकर चलते हैं मेरा अनुमान है आप 80 से कम के न होंगे फिर आप अपने को 4 वर्ष का कैसे बताते हैं?
वृद्ध ने इस बार गम्भीर होकर कहा-आप ठीक कहते हैं मेरी आयु 80 वर्ष की है किन्तु मैंने 76 वर्ष धन कमाने, ब्याह शादी और बच्चे पैदा करने में बिताये, ऐसा जीवन तो कोई पशु भी जी सकता है, इसलिये उसे मैं मनुष्य की-अपनी जिन्दगी नहीं किसी पशु की जिन्दगी मानता हूँ।
इधर 4 वर्ष से समझ आई। अब मेरा मन ईश्वर उपासना, जप, तप, सेवा, सदाचार, दया, करुणा उदारता में लग रहा है। इसलिये मैं अपने को 4 वर्ष का ही मानता हूँ। नौशेरवाँ वृद्ध का उत्तर सुन-कर अति सन्तुष्ट हुये और प्रसन्नतापूर्वक अपने राजमहल लौटकर सादगी सेवा और सज्जनता का जीवन जीने लगे।
किसी वस्तु की इच्छा करना एक बात है और इच्छा के साथ शक्ति का संयोजन करना इससे सर्वथा भिन्न बात है। इच्छा तो प्रायः सभी व्यक्ति किया करते हैं कि हम धनवान हो जायें, विश्व भर में हमारी कीर्ति फैल जाये और जो भी हम चाहें वह तुरन्त प्राप्त हो जाय। लेकिन कितने व्यक्तियों की इच्छायें पूरी होती हैं। वस्तुतः इच्छा के साथ शक्ति का संयोग ही उनकी पूर्ति के आधार खड़ा करता है। इस शक्ति के कारण ही संकल्प मात्र से परमात्मा ने सृष्टि कर डाली। माण्डूक्यकारिका में कहा गया है- इच्छामाँत्र प्रभौः सृष्टिः (यह सृष्टि प्रभु की इच्छा मात्र है) क्योंकि प्रभु की इच्छा शक्ति सम्पन्न और समर्थ है।
इस तथ्य को सोदाहरण समझाते हुए काशी के प्रसिद्ध सन्त और सिद्धयोगी स्वामी विशुद्धानन्द ने अपने एक शिष्य से कहा, शिष्य के साथ दो अन्य व्यक्ति भी थे, उन्होंने तीनों शिष्यों की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा-देखा इच्छाशक्ति के विषय में, मैं तुम्हें एक प्रयोग बताता हूँ। तुम तीनों अपने हाथ की मुट्ठी बाँध लो और उसमें रखने लायक किसी भी वस्तु की इच्छा करो।” तीनों शिष्य मुट्ठी बाँधकर स्वामीजी के निर्देशानुसार मनचाही वस्तु की इच्छा करने लगे। कुछ देर बाद स्वामी जी ने कहा-’मुट्ठी खोल कर देखो तुम्हारी वस्तु मुट्ठी में आ गयी है या नहीं।’ तीनों शिष्यों ने मुट्ठी खोल कर देखा तो वह पहले जैसी ही खाली मिली।’ बाबा ने फिर कहा-एक बार और मुट्ठी बाँधो तथा पुनः अपनी इच्छित वस्तु का चिन्तन करो। तुम लोगों ने यह तो देख लिया कि मात्र इच्छा से कुछ नहीं होता। अब मैं तुम्हारी इच्छा में शक्ति का संचार करता हूँ। तीनों शिष्यों ने फिर मुट्ठियाँ बन्द कर लीं। बाबा के कहने पर जब उन्होंने पाया तो तीनों की मुट्ठियों में इच्छित वस्तुएँ।
इस घटना की व्याख्या में सिद्ध योगी ने अपने शिष्यों को बताया-तुम्हारी इच्छा और मेरी शक्ति दोनों मिलकर हो इच्छा शक्ति के रूप में परिणत हो गयीं। जब तुम स्वयं अपनी शक्ति का विकास कर लोगे तो तुम्हें इस शक्ति संचार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
जहाँ कहीं भी कभी चमत्कारी घटनाओं के विवरण मिलते हैं, इच्छा शक्ति हो उनके मूल में विद्यमान रहती है। अमेरिका के ‘मिशिगन पैरासाइकिक रिसर्च सेण्टर’ ने इस प्रकार की कितनी ही घटनाओं के विवरण संकलित किये और उनकी वास्तविकता की जाँच की। रिसर्च सेण्टर द्वारा खोज के लिए चुनी गई घटनाओं में से कई निराधार और झूठ थी परन्तु ऐसी भी कितनी ही घटनायें निकली जिनसे इच्छा शक्ति के चमत्कारों तथा उसके विकास सम्बन्धी नियमों के बारे में नयी जानकारियाँ मिलीं।
न केवल अमेरिका वरन् रूस में भी जहाँ स्थूल से परे किसी वस्तु या शक्ति का अस्तित्व पहली ही प्रतिक्रिया में ऽठ, मिथ्या और फ्राड समझा जाता है, ऐसे कई व्यक्ति है जो अपनी इच्छाशक्ति की अद्भुत सामर्थ्य का वैज्ञानिक परीक्षण करवाने में भी निस्संकोच आगे आये। रूस की महिला श्रीमती मिखाइलोवा अपनी अतीन्द्रिय सामर्थ्य के लिए विख्यात है। एक रात्रि भोज में, जिसमें प्रसिद्ध रूसी पत्रकार वादिम मारिम भी उपस्थित थे लोगों के आग्रह पर मिखाइलोवा ने कुछ चमत्कार प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को हैरत में डाल दिया। वादिम मारिन ने अपने पत्र को ताजे अहं में उस प्रदर्शन के बारे में लिखा- ‘वहाँ भेज पर कुछ दूर एक डबल रोटी रखी थी। उन्होंने उसकी ओर निर्निमेष दृष्टि से देखना आरम्भ किया। कुछ ही क्षणों के पश्चात् डबल रोटी उनके ओर सरकने लगी जैसे ही डबलरोटी उनके निकट आयी वैसे ही श्रीमती मिखाइलोवा ने झुककर थोड़ा मुँह खोला और वह डबल रोटी उनके खुले मुँह में पहुँच गयी।
रूस के ही एक-दूसरे मनोचिकित्सक डा. वैन्शनोई अपनी अलौकिक शक्ति के लिए विख्यात है। वे किसी भी वस्तु को केवल दृष्टि केन्द्रित कर उसे अपने स्थान से हटा सकते हैं और किसी खाली पात्र को दूध या किसी अन्य वस्तु से परिपूर्णतः कर सकते हैं। इन बातों पर रूस में अभी तक बहुत कम विश्वास किया जाता है। इसलिए कुछ वैज्ञानिकों ने वैन्शनोई की परीक्षा लेने का कार्यक्रम बनाया, वैज्ञानिकों ने हर तरह से डा. बैन्शनोई के प्रत्येक कार्यक्रम की परीक्षा ली और उनको बारीकी से जाँचा परन्तु कहीं कोई धोखा धड़ी या हाथ की सफाई नहीं दिखाई दी।
डा. नन्डोर फीडोर ने एक पुस्तक लिखी है ‘विश्वीन टू वर्ल्डस्’ इस पुस्तक में उन्होंने कितनी ही ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया है जिनके मूल में स्थूल मानवीय सामर्थ्य से परे कोई शक्ति काम करती थी। एक प्रसिद्ध मनोविज्ञानवेत्ता सिगमण्ड फ्रायड को परामानसिक शक्तियों पर विश्वास नहीं था। डा. फीडोर ने लिखा है कि एक बार उनके पास जुँग नामक व्यक्ति आया जुँग को फ्रायड ने चुनौती दी तो उसने अपनी अलौकिक-शक्ति का प्रदर्शन किया। जुँग अपने ही स्थान पर खड़ा रहा पर कमरे की वस्तुएं इस तरह काँपने लगीं जैसे कमरे में भारी भूकम्प आ गया हो। कमरे की सारी पुस्तकें उड़ उड़ कर फर्श पर इस तरह जमा हो गयीं जैसे किसी ने समझदार व्यक्ति ने उन्हें उठा कर कराने से रखा हो।
अमेरिका के यूरी गैलरतो ने इच्छाशक्ति के माध्यम से लोहे के सरियों को मोड़ने, छुरी और चम्मचों को तोड़ने के कई सफल प्रयोग किये हैं। और उनके परीक्षणों को कई चोटी के पत्रकारों, वैज्ञानिकों तथा बुद्धि जीवियों ने देखा है। अन्य प्रदर्शनकर्त्ताओं की भाँति दूरी गैलर को भी संदेह की दृष्टि से देखा गया परन्तु ऐसा कोई छिद्र अब तक दिखाई नहीं दिया है जिसके आधार पर दूरी गैलर को फ्राड या धोखा कहा जा सके।
भारतीय महर्षियों ने इन शक्तियों को इच्छा-शक्ति के साधारण चमत्कार कहा है। महर्षि पतंजलि ने मन को शुद्ध और अन्तःकरण को पवित्र बनाकर चित्त की एकाग्रता साधने मात्र से अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने की बात कही है। अध्यात्म को विज्ञान की दृष्टि से देखने समझने और विश्लेषण करने वाले व्यक्तियों ने ही इन चमत्कारों को साधारण इच्छा शक्ति की सफलता बताया है। वस्तुतः मनुष्य की प्रवृत्ति उसी ओर होती है जिसकी उसे इच्छा आकाँक्षा रहती है। परन्तु इच्छाओं में बल तथा शक्ति इसलिए नहीं आ पाता कि वे बिखरी हुई रहती हैं। सूर्य की बिखरी हुई रश्मियों को एक स्थान पर केन्द्रित कर दिया जाय तो उससे बड़े बड़े कार्य किये जा सकते हैं। धूप देखने में सामान्य लगती है परंतु उसे केन्द्रित कर, और ऊर्जा के माध्यम से फैक्ट्रियाँ चलाने की बात सोची जा रही है। और ऊर्जा के उत्पादन का कार्य सूर्य की किरणों के केंद्रीकरण द्वारा ही सम्भव बनाया जायेगा।
बिखरी हुई इच्छाओं को यदि केंद्रित किया जाये और दृढ़ संकल्प शक्ति को जगाया जा सके तो शारीरिक असमर्थता या अंगहीनता भी मनुष्य के कार्य व्यापार में कोई बाँधा नहीं पहुँचा सकती है। रूस की एक नेत्रहीन युवती जो अंधी हैं, केवल इच्छाशक्ति के बल पर ही कागज पर लिखे अक्षरों को पड़ने में समर्थ हो सकी है। वह पुस्तक पर छापे हुए अक्षरों को छूती हुई जाती है और बताती चलती है कि यहाँ यह लिखा है। ठीक आँख वाले व्यक्तियों की तरह रोजा कुलेशोवा अंधी होते हुए भी पन्ने पलट कर पुस्तक पढ़ देती है। आरम्भ में लोगों ने समझा कि रोजा अंधी नहीं है वरन् उन्हें बेवकूफ बना रही है। पर ऐसी कोई बात नहीं थी। उसकी इस शक्ति का परीक्षण करने के लिए सितम्बर 1962 में मनोविशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई गयी उनके सामने रोजा की आँखों पर पट्टी बाँध कर उससे एक छपा हुआ कागज पढ़ने को कहा गया। रोजा ने कागज हाथ में लिया और शब्दशः इस प्रकार पढ़ कर सुना दिया जैसे वह आंखें खोल कर पढ़ रही हो। वैज्ञानिकों ने समझा शायद काली स्याही से छपे अक्षरों और सफेद कागज के बीच ऊष्मा का जो अन्तर है उसके आधार पर अंगुलियां भेद कर लेती हो। परन्तु जब ऊष्मा वहन करने वाला तत्व निकाल दिया गया तो भी रोजा को पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
रोजा ने यह क्षमता अकस्मात अर्जित नहीं कर ली। उसने बताया कि बचपन में जब वह स्कूल जाने योग्य हुई थी तभी उसी दृष्टि जाती रही थी। अपनी हम-उम्र बालिकाओं को स्कूल की बातें करते हुए सुन कर उसे बड़ा दुःख होता और वह सोचती काश मैं भी स्कूल जा सकी होती। वह जब अपनी सहेलियों को पढ़ते हुए सुनती तो उसे लगता कि नेत्रों के अभाव में वह संसार के अमूल्य ज्ञान भण्डार से वंचित रह गयी है, क्योंकि वह उस राशी के संचित कोष से तो कोई लाभ उठा नहीं पा रही है।
यह आकाँक्षा उसके अन्तःकरण में इसने प्रबल रूप में उठने लगी कि वह छपी हुई पुस्तकों के पन्नों को पलट कर, उन पर हाथ फेर कर ही मन को समझाने का प्रयत्न करती। परन्तु इससे असंतोष ओर बढ़ता ही जाता था। एक दिन यकायक ही बैठे बैठे जब वह एक पुस्तक के पन्ने उलट रही थी तो उसे लगने लगा कि वह अक्षरों को देखने लगी और उसकी दृष्टि अंगुलियों में आ कर केंद्रित हो गयी है।
इसके बाद वह जब भी पन्ने पलटने लगती तो उसे एक एक अक्षर अपनी अंगुलियों से दिखाई देने लगता। कल्पनाओं और विचारों के चित्र खींचने में सफलता प्राप्त करने वाले टैड सीरियरस ने भी इस सिद्धि को प्राप्त करने में इच्छा शक्ति का ही उपयोग किया अमेरिका के टैड सीटियस को कल्पनाओं के फोटोग्राफ उतरवाने में मिली सफलता के कारण विश्वास की जो ख्याति मिली है वह संसार में शायद ही किसी व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के कारण प्राप्त हुई हो। टैड सीरियस ने इस प्रकार के अनेक प्रदर्शन किये। वह प्रायः किसी व्यक्ति को किसी वस्तु या दृश्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए कहता है और उस व्यक्ति की ओर ध्यान से देख कर कैमरे का बटन दबा देता है।
टैड सीरियस ने एक बार दौड़ती हुई कार की कल्पना का चित्र खींचा। हू बहू चित्र वैसा ही आया। चित्र में दौड़ती हुई दो कारें दिखाई दे रही थीं। एक कार सामने थी और दूसरी उसके पीछे। पिछली कार का पहिया तथा विण्ड स्क्रीन सहित अगला हिस्सा दिखाई दे रहा था। आगे वाली कार के चित्र में एक विशेषता यह थी कि उस पर वह आँख भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी जिसमें से होकर कार का चित्र फोटो प्लेट पर पहुँचा था।
डेनवर के मनोवैज्ञानिक डा. जूले आइसेन वैड ने ‘दि वर्ल्ड ऑफ टैड सीरियस’ नामक एक पुस्तक लिखी है जो टैड सीरियस पर कई परीक्षण करने के बाद डा. जूले ने यह पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में उन्होंने एक स्थान पर लिखा है-मैंने सब प्रकार की चालाकी या धूर्तता को विफल करने के लिए टैड को एक दम निर्वस्त्र करके उसके विचार चित्र से कैमरे द्वारा फोटो लिए। उसे धातु के बंद कमरे में खड़ा करके फोटो खींचे, परन्तु फोटो सदा साफ आये। यह सिद्ध हो गया कि टैड किसी प्रकार की कोई चालाकी नहीं करती है।
इस सिद्ध का रहस्य पूछने पर टैड ने बताया कि वे अपनी कल्पनाओं का चित्र उतारने से लिए कैमरे के सामने जा बैठते और संकल्प करते कि वे अपनी कल्पना को जा बैठते और संकल्प करते कि वे अपनी कल्पना को कैमरे पर प्रक्षिप्त कर रहे हो महीनों तक इसमें असफलता मिली सैकड़ों रीलें बिगड़ी पर जब भी हताश हुए बिना वे अपनी साधना में लगे रहे और अन्ततः अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए।
उपनिषदों ने कहा है- ‘संकल्पयचोडयं पुरुषः’ यह पुरुष संकल्पमय है। मनुष्य अपनी इच्छानुसार जन्म चुनता हैं, इच्छानुकूल मृत्यु को प्राप्त करता है और इच्छा हो तो परब्रह्म को भी प्राप्त कर लेता है। फिर क्या कारण है कि साधारण सी इच्छाओं को भी पूरा न किया जा सके। इच्छाओं के साथ शक्ति का संयोजन कर मन चाही वस्तुयें, सफलतायें प्राप्त करने का विज्ञान अलग है। लेकिन इस सिद्धि को तत्वदर्शियों ने आत्मकल्याण के मार्ग में बाधक ही माना है। उनकी दृष्टि में यह बहिर्मुखी साधना है जब कि आत्मकल्याण के इच्छुकों को अपनी ही ओर अवर्मुखी होना चाहिए तथा समस्त इच्छाओं वासनाओं को परम चेतना में विलीन कर परमप्राप्तव्य को प्राप्त करना चाहिए।
बौद्ध धर्म की विचार धारा देश की सीमाओं को लाँघती हुई अन्य राष्ट्रों को भी प्रभावित कर रही थी। उन विचारों को ठीक प्रकार समझ पाना तथा उसके उपरान्त अपना सकना तभी सम्भव हो सकता था जबकि अन्य देशों के निवासियों के लिए उन्हीं के भाषा में बौद्ध धर्म के विचारों का प्रकाशन हो। इस महान कार्य के लिए बौद्ध भिक्षुक सतत प्रयत्नशील थे। जापान के एक भिक्षुक ने जापानी भाषा में बौद्ध ग्रन्थों के प्रकाशन का कार्य हाथ में लिया। कार्य कठिन था तथा साधन साध्य भी।
सम्पूर्ण ग्रन्थों के अनुवाद कराने में लगभग दस हजार रुपये का खर्च आता था। उक्त भिक्षुक ने जन सहयोग प्राप्त करने के लिए भिक्षा माँगना आरम्भ किया। सतत् प्रयत्न एवं मनोयोग का सत्परिणाम जन सहयोग के रूप में मिला। अभीष्ट धनराशि एकत्रित हो गई। अनुवाद कार्य प्रारम्भ होने वाला ही था कि एक आकस्मिक घटना हुई। उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। पीड़ितों की वेदना ने भिक्षुक के हृदय को झकझोर कर रख दिया। आन्तरिक करुणा, सेवा, सहयोग एवं त्याग के रूप में परिलक्षित हुई। यह सोचकर कि ग्रन्थों का अनुवाद प्रकाशन तो बाद में भी हो सकता है तथा जिस दया, करुणा का पाठ पढ़ाने एवं इस भावना को उभारने के लिए यह कार्य किया जा रहा है उसकी ही रक्षा न हो तो फिर उसका उद्देश्य कहाँ रहा। बौद्ध भिक्षुक ने तत्काल निर्णय लिया तथा एकत्रित धनराशि को अकाल से त्रस्त लोगों की क्षुधा तृप्ति के लिए समर्पित कर दिया। उसके सहयोगियों ने कहा कि जिस कार्य के लिए तुमने धन एकत्रित किया है वह अपूर्ण रह जायेगा भिक्षुक ने उत्तर दिया, ‘उस महान कार्य की नींव यही है।
अकाल का प्रकोप दूर होते ही पुनः उसने गाँव-गाँव जाकर भिक्षा माँगना आरम्भ किया। दस वर्षों तक निरन्तर प्रयास करने पर इतना धन संग्रह हो गया कि उस से ग्रन्थों का अनुवाद प्रकाशन कार्य पूरा हो जाय। किन्तु लगता था कि प्रकृति को अभी यह स्वीकार नहीं था। बाढ़ के भयंकर विप्लव ने जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जनता के करुण क्रन्दन ने पुनः सहयोग की अपेक्षा की। भिक्षुक ने प्राप्त धनराशि को फिर बाढ़ पीढ़ियों में बाँट दिया। इस अवधि तक उसकी आयु सत्तर वर्ष पार कर चुकी थी। साथियों ने उनके इस कार्य को पागलपन की संज्ञा दी। उन सबकी बातों को भिक्षु ने हँसते हुए टाल दिया।
निर्लिप्त भाव से वह पुनः भिक्षा के प्रयोजन से निकला नब्बे वर्ष की आयु तक वह भिक्षा माँगता रहा। धनराशि एकत्रित होते ही उसने फिर उस अधूरे कार्य को पूरा करने की बात सोची। उसे ईश्वरीय कृपा ही कहना चाहिए कि उस समय कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं हुआ। ग्रन्थ का अनुवाद हुआ तथा छपा। पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा गया कि “यह तीसरा संस्करण है। दो इसके पूर्व निकल चुके हैं जो पीड़ा पतन के निवारण में अपनी आहुति दे चुके हैं इसलिए वे अदृश्य हो गये। वे दोनों संस्करण इस तीसरे दृश्य की तुलना में कहीं अधिक सुन्दर एवं प्रेरणास्पद थे।”
ज्ञान का उद्देश्य है अज्ञान की तमिस्रा में डूबें लोगों को आलोक प्रदान करना। पीड़ा-पतन का निवारण करना। इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही अनेकानेक धर्मग्रंथों की रचना की गई। उस श्रेष्ठ पथ पर बढ़ने में ये मार्ग दर्शन करते हैं। यदि उस लक्ष्य को भुला दिया गया तथा ग्रन्थों की रचाना को ही मात्र लक्ष्य मान लिया जाय तो यह भूल होगी। धर्म-अध्यात्म का विशाल कलेवर खड़ा करने का एक मात्र उद्देश्य है मानवी संवेदनाओं का विकास तथा समष्टिगत चेतना के साथ उसे जोड़ देना। दूसरों के दुख-दर्द में अपनी भाव-संवेदनाएँ यदि न जुट सकी तो शास्त्रों के ज्ञान की उपयोगिता कहाँ रही। उनका प्रयोजन क्या रहा?
दुर्बल मनःस्थिति के लोग प्रायः अशुभ भविष्य की कल्पनायें करते रहते हैं। विपत्ति की, असफलता की आशंकाएँ ही उनके मन पर छाई रहती हैं। वे ऐसे कारणों को ढूँढ़ते और तर्कों को गढ़ते हैं जो भविष्य में किसी संकट के आगमन की पुष्टि कर सकें। असफलता का निराशाजनक चित्र खींच सकें। इन गढ़ी हुई तस्वीरों में मित्रों को आकृति शत्रु जैसी गढ़ दी जाती हैं। दूसरों की सामान्य गति विधियों में भी षड्यन्त्रों का जाल छिपा होता दिखाई देता है। यह अशुभ कल्पना चित्र किसी भयंकर दैत्य दानव से कम नहीं होते। कल्पित भूतों को आमन्त्रित करके कितने ही व्यक्ति स्व संकेतों के आधार पर बीमार पड़ते, डरते, घबराते, और जान गँवाते देखे जाते हैं। डरावनी आशंकाओं के दैत्य डरपोक मनुष्य पर दिन−रात छाये रहते हैं। विपत्ति की सम्भावना उन्हें दिन रात डराती रहती है। ऐसे मनुष्य भय से काँपते खिन्न रहते और सदा निराशा में डूबे ही दिखाई पड़ते हैं। ऐसी मनःस्थिति अपने आप में एक विपत्ति है वास्तविक विपत्ति के आने पर जितनी क्षति हो सकती थी, उससे भी कई गुनी हानि इस अशुभ चिन्तन की आदत से होती है। ऐसा व्यक्ति अपनी बहुमूल्य चिन्तन क्षमता का बहुत बड़ा भाग इसी भट्टी में झोंकता जलाता रहता है और कुछ महत्वपूर्ण सोच सकने की क्षमता गँवा बैठता है। जब देखो तब चिन्ताओं की काली घटाएँ ही उसके सिर पर छाई रहती हैं।
इस स्थिति को बदल सकना पूर्णतया अपने हाथ की बात है। कल्पनाएँ अपनी ही गढ़ी हुई तो होती हैं। उन्हें अपने ही चिन्तन तर्क और अनुमान के सहारे ही तो खड़ा किया जाता है। जो आशंका की गई थी जिस संभावना की कल्पना की गई थी, वह निश्चित रूप से होकर ही रहेगी यह नहीं कहा जा सकता। ऐसी दशा में यदि यह गठन विधेयात्मक स्तर का किया जाय तो क्या हर्ज है। भविष्य के उज्ज्वल होने, सफलताएँ मिलने की आशा भी बँध सकती है। उसके पक्ष में भी तर्क और तथ्य ढूँढ़े जा सकते हैं, जिनमें शत्रुता का भय सोचा गया था, उनके उदासीन रहने अथवा समयानुसार मित्र बन जाने की बात भी सर्वथा अशक्य ही नहीं होती। परिस्थितियाँ उलटती ओर तथ्य बदलते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि अपना आज का भय कल उसी रूप में बना रहे। सम्भव है अपने सुधार प्रयत्न पूरी तरह सफल होकर रहें और सम्भव है समय के प्रवाह में अपने चिन्तन के प्रतिकूल अनायास ही सुखद सम्भावनाएँ विनिर्मित होने लगें। जब परिवर्तन एक तथ्य है तो निराशा के आशा में बदल जाने की सम्भावना को ही क्यों अस्वीकार किया जाय?
मस्तिष्क को चिन्तन की विधेयात्मक धारा अपनाने के लिए यदि प्रशिक्षित किया जा सके तो उतने भर से समृद्धि, सफलता, प्रसन्नता एवं उज्ज्वल भविष्य की उत्साह भरी आशा का आनन्द लिया जा सकता है। आँखों में चमकने वाली आशा, साहस बढ़ाती है और उपयोगी पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरणा देती है। निराशा में नष्ट होने वाली शक्ति को यदि आशा भरी सृजनात्मक स्थिति में प्रयुक्त किया जा सके तो इतने भर से मनोबल बढ़ने लगेगा और उस अभिवृद्धि से सहज ही ऐसी क्षमता विकसित हो सकेगी जिसके सहारे सचमुच ही उज्ज्वल भविष्य का सृजन हो सके।’
सूक्ष्म शरीर की मन-मस्तिष्क की सृजनात्मक शक्ति की विकसित करने की चेष्टा को एक महत्वपूर्ण साधना कहा जा सकता है। उसके अनगढ़ होने का प्रतिफल ही हमें इस अत्यन्त उपयोगी उपकरण के अनुदानों से वंचित किये रहता है। इस दिशा में थोड़ा ध्यान दिया जाय मस्तिष्क को अशुभ चिन्तन से विरत करके विधेयात्मक दिशा अपनाने के लिए सहमत अभ्यस्त किया जा सके तो यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि ही कही जायेगी। संसार के सफलता सम्पन्न महामानवों को सबसे प्रथम अपने चिन्तन को परिष्कृत किया है। इसी आधार पर उनकी गतिविधियाँ सुधरी। चिन्तन और कर्तृत्व इन्हीं दो पैरों के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता। यदि वे विकृत स्तर के हों तो प्रगति पतन की दिशा में होगी और स्थिति दुखद एवं निराशाजनक बनती चली जायेगी।
वर्तमान उपलब्धियों का आनन्द लेने और जो हाथ में है उसका श्रेष्ठतम उपयोग करने की बात सोचते रहना बुद्धिमत्तापूर्ण है। मूर्खता इसमें है कि अपने से अधिक समृद्धों के साथ तुलना करते रह कर अकारण अपने ऊपर अभाव ग्रस्तता और दरिद्रता का अभिशाप लादा जाय। इस तरह सोचने पर तो बड़े से बड़ा सम्पन्न भी अपने को गरीब ही अनुभव करेगा। क्योंकि उससे भी बड़ा समृद्ध तो कोई न कोई अवश्य होगा। रावण, हिरण्यकश्यप सिकन्दर जैसे सम्पन्न व्यक्ति भी अपनी समृद्धि से कहाँ सन्तुष्ट हुए थे। दरिद्रता, धन की नहीं मन की होती है। अपने से अधिक अभावग्रस्तों के साथ तुलना करके हर मनुष्य अपने वर्तमान साधनों पर भी हर्ष, सन्तोष और गर्व अनुभव कर सकता है। इस प्रकार भूतकाल की सफलताओं का लेखा-जोखा एकत्रित कर लिया जाय तो प्रतीत होगा कि सौभाग्य ने कम साथ नहीं दिया है। असफलताओं और विपत्तियों की लिस्ट बनाने और उसी का बार-बार पाठ करने से दुर्भाग्य का देवता प्रसन्न होता है और सामने प्रकट होकर विश्वास दिलाता है कि मैं सदा से आपके साथ रहा हूँ और भविष्य में भी कभी साथ छोड़ने वाला नहीं हूँ। निषेधात्मक रीति से सोचने वाले ही दुर्भाग्य का रोना रोते पाये जाते हैं। इन अभावों को यदि विधेयात्मक चिन्तन की चमत्कारी शक्ति का ज्ञान होता तो आज की स्थिति में भी उन्हें हँसता-हँसाता पाया जाता, वे स्वयं प्रसन्न रहते और साथियों को प्रसन्नता का लाभ देते दृष्टिगोचर होते।
अधिक प्राप्त करने, आगे बढ़ने और ऊँचा उठने का उत्साह पूर्वक प्रयत्न करना प्रशंसनीय है। अग्रगमन सराहनीय है यह प्राणी का स्वाभाविक धर्म है। किन्तु जो उपलब्ध है उसे अपर्याप्त ही मानते रहा जाय तो वर्तमान को सर्वथा अभावपूर्ण ही मानते हुए दुःखित रहा जाय यह अनुचित है। इन राह पर चलने वाले को तो बड़ी से बड़ी उपलब्धियाँ भी सन्तुष्ट न कर सकेंगी। जो प्रस्तुत उपलब्धियों का आनन्द नहीं ले सके तो भविष्य में अधिक मिलने पर प्रसन्न या सन्तुष्ट हो सकेंगे इसकी आशा नहीं की जा सकती। उनके चिन्तन की विकृति सदा ही मानसिक दरिद्रता के शोक संताप में डुबाये रहेगी। संसार में सुखद बहुत कुछ है। सज्जनों की भी कमी नहीं। अपने साथ सदा अपकार ही अपकार होते रहे हों ऐसी बात नहीं। अनेकों के सहयोग और उपकार भी समय-समय पर मिलते रहे हैं। जिन्हें अपकारी या शत्रु समझते हैं उनने भी पिछले दिनों कई सहयोग किये होंगे। यदि उन बातों का स्मरण किया जा सके तो प्रतीत होगा इस संसार में मात्र दुष्टता ही नहीं भरी है। सज्जनता, सहयोग और उदारता के तत्व भी कम नहीं है। यदि उनको ढूँढ़ा जा सके तो सन्तोष की साँस ली सकती है। अपनी सज्जनता बढ़ाकर कृतज्ञता और सहकारिता को स्वभाव का अंग बनाकर हम संपर्क क्षेत्र के अधिकाँश व्यक्तियों की सज्जनता उभार सकते हैं और उस प्रयास के फलस्वरूप प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलते हुए देख सकते हैं।
आलस्य और प्रमाद के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति अपनी तीन चौथाई शक्ति नष्ट कर डालता है यदि समय और श्रम का अपव्यय रोका जा सके तो प्रतीत होगा कि क्रिया शक्ति कई गुनी बढ़ गई। प्रमादवश आधे अधूरे मन से अन्यमनस्क रह कर उपेक्षा पूर्वक बेगार भुगतने की तरह काम किये जाते हैं। फलतः वे सभी काने, कुबड़े, त्रुटिपूर्ण एवं अस्त-व्यस्त रहते हैं। अधूरे शारीरिक और मानसिक श्रम से किये गये काम अपनी त्रुटिपूर्ण स्थिति के कारण ऐसे निराशाजनक रहते हैं कि उनकी अपेक्षा न करना अधिक उत्तम रहता। उन्हीं कार्यों की प्रशंसा होती है, वे ही लाभदायक होते हैं जिनमें तत्परता पूर्वक शारीरिक श्रम और तन्मयता पूर्वक मनोयोग लगाया जाता है इसी रीति से किये गये काम, कर्ता को गौरव बढ़ाते हैं और उसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य हथियाने का अवसर देते हैं। प्रगतिशील मनुष्यों के समुन्नत बनने का यह क्रम रहा है, उन्होंने अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को अस्तव्यस्त होने से बचाया है। आलस्य प्रमाद की अर्धमृतक स्थिति में अपने को नहीं फँसने दिया है। समझा जाता है कि शरीरगत दोष या रोग है पर वस्तुतः वह मन की ही तन्द्रित स्थिति है। शरीर पर मन का अधिकार है। मन के संकेतों पर ही उसकी समस्त गतिविधियाँ संचालित होती है। मन में उत्साह हो तो कोई कारण नहीं कि शरीर पर निष्क्रियता छाई रहे। आलस्य और प्रमाद की जोड़ी साथ-साथ चलती है। मन पर अवसाद छाया है तो शरीर में ही स्फूर्ति कैसे दृष्टिगोचर हो सकती है। कई बार रुग्ण और दुर्बल मनुष्य भी इतना काम कर गुजरते हैं कि आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। यह शरीर का नहीं मन की उभरी हुई स्थिति का ही चमत्कार होता है। आद्य शंकराचार्य रहते हुए भी 32 वर्ष जैसी स्वल्प आयु के मिलने पर भी इतना काम कर सके जितना दीर्घजीवी मनुष्य कई जन्मों में भी नहीं कर सकते। यह उनके शरीर का ही नहीं मन का ही कर्तृत्व था।
ईर्ष्या, द्वेष शोक-सन्ताप, क्रोध, आवेश, रोष की मानसिक उत्तेजना में उस मानसिक शक्ति का बुरी तरह विनाश होता है जो सृजनात्मक कार्यों में लगा दिये जाने पर असाधारण उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकती थी। कहते हैं कि एक घंटे का क्रोध एक दिन के बुखार से अधिक शक्ति नष्ट करता है। कामुकता जैसी वासनायें मस्तिष्क को ऐसे चिन्तन में उलझायें रहती है जिसमें मिलता कुछ नहीं, गँवाना ही गँवाना हाथ लगता है। चिन्ता, निराशा भय, क्रोध, प्रतिशोध, द्वेष जैसे आवेश दोनों ही ज्वार-भाटों की तरह अवाँछनीय उद्वेग उत्पन्न करते है। इस जंजाल में मनुष्य को अपनी उस क्षमता को व्यर्थ नष्ट करना पड़ता है जो यदि सृजनात्मक दिशा में लगी होती तो चमत्कार उत्पन्न किया होता। प्रतिकूल परिस्थितियों में अवसाद और आवेश आता है यह ठीक है, पर यह तो अनगढ़ स्थिति हुई। परिष्कृत मनः स्थिति में इन आवेशों पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है। उत्तेजना पर नियन्त्रण करके उसे अर्ध उन्माद बनने से रोका जा सकता है। इस वचन को उस उपाय से लगाया जा सकता हैं जिससे प्रतिकूलताओं से जूझने के उपाय सोचने और उन्हें निरस्त करने के साधन जुटाना सम्भव हो सके। उद्विग्न रहने से प्रतिकूलतायें घटती नहीं बढ़ती हैं। उत्तेजित मस्तिष्क निवारण का मार्ग नहीं खोज सकता वरन् हड़बड़ी में ऐसे कदम उठा लेता है जो नई विपत्ति खड़ी करते हैं और प्रतिकूलता की हानि कई गुनी बढ़ जाती है। परिस्थिति जन्य प्रतिकूलता जितनी हानि पहुँचाती हैं उससे अधिक स्व निर्मित उद्विग्नता के कारण उत्पन्न होती है। इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि मनो निग्रह की जीवन में कितनी बड़ी आवश्यकता है अनगढ़ मस्तिष्क इतनी अधिक विपत्ति उत्पन्न करता है जिसकी तुलना में परिस्थिति जन्य कठिनाइयों को स्वल्प ही कहा जा सकता है। मन की सूक्ष्म शरीर की साधना करके उन स्व निर्मित असन्तुलनों से बचा जा सकता है जो जीवन की संकटग्रस्त बनाने के बहुत बड़े कारण बने रहते हैं।
गुण, कर्म, स्वभाव का आधार शरीर में नहीं मन में जमा होता है। शरीर की बनावट से नहीं किसी का वास्तविक स्वरूप उसकी मनः स्थिति को देखकर ही जाना जा सकता है। शरीर की हरकतें हलचलें ही सर्व साधारण की जानकारी में आती है और कर्म के आधार पर ही किसी का मूल्याँकन किया जाता है पर गम्भीरता से विचार करने पर प्रतीत होगा कि बाह्य सफलतायें और सम्पदायें वस्तुतः आन्तरिक विभूतियों की प्रतिक्रिया पर है। मनः स्थिति ही परिस्थितियों का निर्माण करती है जो इस सारगर्भित तथ्य को जानते हैं वे भाग्य और भविष्य का निर्माण अपने हाथों करने के लिये तत्पर होते है। ऐसा शुभारम्भ मनः संस्थान का परिष्कृत नव-निर्माण करने का साधन संजोने के रूप में ही सम्पन्न होता है। सूक्ष्म शरीर की साधना नकद धर्म है। उसका प्रत्यक्ष परिणाम है हथेली पर सरसों जमाने की तरह तत्काल सत्परिणाम प्रस्तुत करते हुए देखा जा सकता है।
शत्रु सेना का मुकाबला करने और उसे राज्य की सीमा से दूर तक खदेड़ देने के लिए युद्ध अभियान पर गये सेनानी भामलेकर को प्रतीक्षा कर रहे थे, छत्रपति शिवाजी को चिंता थी कि कहीं आशा के विपरीत भामलेकर शत्रु सेना के बंदी तो न हो गये हों।
प्रतीक्षा करते हुए काफी देर हो गयी थी, शिवाजी महल का अट्टालिका पर ही बैठे थे। उन्होंने एक सेनानी को देखा। निकट आने पर जाना यह भामलेकर ही थे। चाल देख कर ही अनुमान लगा लिया कि वह विजयी श्री का वरण कर लौटे है, पर उनके पीछे दो सैनिक जो डोला लेकर आ रहे थे उसके बारे में छत्रपति को कुछ समझ में नहीं आया।
दौड़कर वे नीचे आये और भामलेकर को गले लगा लिया। भामलेकर ने कहा -’छत्रपते! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी। बेचारा बहलोल जान लेकर भागा। अब ताकत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके।’
‘वह तो मैं तुम्हें देख कर ही समझ गया था भामले - छत्रपति ने कहा और डोले की ओर इशारा करते हुए कहा
-’यह क्या है?’
अट्टहास करते हुए भामले ने कहा- ‘इसमें मुसलिम रमणियों में सुँदरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल की बेगम है महाराज! मुगल सरदारों ने हजारों हिन्द नारियों का सतीत्व लूटा है। उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी आपको भेंट है।,
‘छिः छिः’ - शिवाजी के मुंह में जैसे किसी ने कड़वा पेय उड़ेल दिया हो। इसके बाद वे डोले के पास गये, पर्दा हटाया ओर बहलोल की बेगम को बाहर आने के लिए कहा। छुई मुई सी अपने आपमें सिमटती सिकुड़ती वह बाहर आयी शिवाजी ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा- सचमुच तू बड़ी ही सुँदर है। अफसोस है कि मैं तेरे पेट से पैदा नहीं हुआ, नहीं तो मैं भी तेरे जैसा ही सुंदर होता।’
भविष्य के लिए ऐसा न करने को सतर्क करते हुए शिवाजी ने अपने एक अन्य अधिकारी को निर्देश दिया कि वह बेगम को बहलोल खाँ के पास ले जाकर ससम्मान सौंप आये। इसके बाद वे भामलेकर से बोले- ‘भामले! तुम मेरे साथ इतने दिन रहे, पर मुझे नहीं पहचान सके। वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे और धर्म - ग्रन्थों की होली जलाये। कोई पाप और पतन के गर्त में गिरता हो तो उसके प्रतिकार का यह अर्थ नहीं हैं कि हम भी उसी तरह की नीचता पर उतर आयें।’
इधर बेगम को ससम्मान लौटाया देख कर बहलोल खाँ विस्मित हुए बिना नहीं रहा। वह तो सोच रहा था कि अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के हरम का शोभा बन चूकी होगी, पर बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जान कर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़ कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति पिघल उठा। पत्र में शिवाजी ने अपने सेनानायक की गलती के लिए क्षमा माँगी थी। इस पत्र को देख कर स्वयं को बहुत महान, वीर और पराक्रमी समझने वाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में शिवाजी के सामने बहुत छोटा दिखाई देने लगा। उसने निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देख कर ही दिल्ली लौटूँगा।
इसके लिए आग्रह भेजा गया। बहलोल खाँ और शिवाजी के मिलने का समय व स्थान निश्चित हुआ नियत तिथि, समय व स्थान पर शिवाजी बहलोल खाँ के पहले ही पहुंच गये। बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चात्ताप आत्मग्लानि के साथ साथ शिवाजी के महान व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही परों में झुक गया - “माफ कर दो मुझे मेरे धरिश्ते। बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला जाऊँगा। उस समय तेरी सूरत की याद मुझे थोड़ी सी ठंडक पहुँचायेगी।”
‘ जो हुआ सो हुआ, अब आगे का होश करो’ - एक पराजित और श्रद्धानत सेनापति को छत्रपति ने गले से लगाते हुए कहा।
पिछले दशक में संसार को प्राकृतिक प्रकोपों के बीच से अधिक गुजरना पड़ा है। सूखा, बाढ़, भूकम्प कि घटनाओं में तीन - चार वर्षों से जितनी वृद्धि हुई है उतना पहले कभी नहीं देखा गया। मौसम में इतना अप्रत्याशित परिवर्तन शायद ही कभी हुआ हो। वातावरण इतना असन्तुलित हो गया है कि यह ठीक पता नहीं कि मौसम में कब क्या परिवर्तन हो जाय। कहीं ठंड बढ़ी है तो कहीं गर्मी, अभी हाल में प्रकाशित समाचार के अनुसार सहारा के रेगिस्तान में ओले पड़े तथा भयंकर बारिश हुई है। उस रेगिस्तानी इलाके में ओले पड़ना एक आश्चर्य जनक, अद्भुत एवं अप्रत्याशित घटना है। प्रकृति को इतना क्रुद्ध पहले कभी नहीं देखा गया है। मौसम की विचित्रता, प्राकृतिक असन्तुलन को देखने से लगता है कि कहीं हम प्रलय काल के निकट तो नहीं है जिसकी कल्पना प्रस्तुत करते हुए ऋषि कहता है-
यत्र मत्र भूस्खलनं च कदाचित् भूकम्पनम्। क्वचित् बृष्टिरनाबृष्टिः जायते तस्मिनं क्षने॥ (मत्स्य पंराण)
उस समय सर्वत्र भूस्खलन और भूकम्प आते हैं। कहीं अतिवृष्टि और कहीं अनावृष्टि होती है।
तथ्य चाहे जो भी हो प्रकृति के असन्तुलन की बात से इन्कार नहीं किया जा सकता। अप्रत्याशित प्रकृति प्रकोप यह सोचने को बाध्य करते है कि इस असन्तुलन का कारण क्या है? दैवीय प्रकोप या मनुष्य की स्वयं विनिर्मित परिस्थितियाँ। आध्यात्म तत्व दर्शन के अनुसार इस प्रकार के प्रकृति प्रकोप को दैवी आक्रोश समझा जा सकता है और उसका कारण मनुष्य की उस संकीर्ण स्वार्थपरता को माना जा सकता हैं जिसके कारण देवता रुष्ट होते है। ऐसे प्रसंग न आने पायें उसके लिये मनुष्यों और देवों के बीच परस्पर सद्भाव सम्पन्न आदान-प्रदान बना रहना चाहिए। यह कार्य यज्ञ परम्परा का प्रखर बनाये रहने से ही सम्पन्न हो सकता हैं। गीता का कथन है-
देवान्यावयत नेन ते देवा भावयन्तु वः।
तुम सब यज्ञीय कर्मों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो। देवता प्रसन्न होकर अपने अनुग्रह की वर्षा करेंगे।
देवताओं को प्रसन्न रखने से अभिप्राय यहाँ प्रकृति को संतुलित एवं व्यवस्थित रखने से भी है। प्रकृति दैवीय शक्तियों की क्रीड़ा भूमि है। उसके अनुदानों से ही विश्व वसुंधरा पुष्पित - पल्लवित होती तथा समुन्नत बनती है। विभिन्न दैवीय शक्तियाँ ही अपना स्थूल परिचय प्रकृति की हलचल बन कर देती है। जिनका अलंकारिक वर्णन पौराणिक उपाख्यानों में आता है। इनमें वर्णन है कि देवता मनुष्य के सत्कर्मों से प्रसन्न होकर अनुदान बखेरते हैं। इन देवताओं के अनुग्रह को प्राप्त करने के लिये इन्हें प्रसन्न रखना होता है। प्रसन्न रखने का अभिप्राय यहाँ उन्हें प्रसाद, उपहार देने से नहीं है न उनकी आवश्यकता ही देवी देवताओं को है। वे शक्तियाँ मात्र अनुनय - विनय पर प्रसन्न नहीं होतीं। मानवी मर्यादा के नियमों पर चलकर तथा आदर्शवादी परम्परा अपनाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
बिजली प्राप्त करने के लिये धनऋण तारों की व्यवस्थिति तार - लाइन बनानी पड़ती है? विद्युत संचार की प्रक्रिया तब कहीं जाकर आरम्भ होती है और बल्ब में चमकती, पंखे में चलती तथा हीटर को गर्म करती देखी जाती है। इसे चाहे दैवीय अनुग्रह माना जाय अथवा नियम मर्यादाओं के पालन का प्रतिफल।
प्रकृति के अनुग्रह को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है। यह अनुदान उच्चस्तरीय नियम - व्यवस्था के अधीन चलते रहने से ही मिलता रहता है। जिस प्रकार बिजली के नंगे तारों को छूने वाले उसके प्रकोप के भाजन बनते, दुर्घटना ग्रस्त होकर मरते देखे जाते हैं उसी प्रकार प्राकृतिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करने वाले, उसके कोप का भाजन बनते है। चाहे उसे प्राकृतिक प्रकोप कहा जाय चाहे मानवी कृत्य अथवा दैवी आक्रोश।
प्रकृति के प्रकोपों में यह बढ़ोत्तरी कुछ वर्षों से ही आयी हैं। यह बढ़ोत्तरी विघातक अनुसंधानों, परमाणु परीक्षणों के साथ बढ़ी है। औद्योगीकरण से प्रदूषण के संकट का अभी हल नहीं निकल पाया था कि परमाणु - परीक्षण की विभीषिका भी आकर जुट गई। इस दोहरे प्रहार ने सारी प्राकृतिक व्यवस्था को ही चरमरा दिया।
‘न्यूटन का प्रतिपादन है-”प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इस विपरीत प्रक्रिया के वेग एवं मात्रा में ही समानता नहीं होती बल्कि उसके स्वरूप एवं प्रतिफल में भी एक रूपता होती है।”
अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का बुरा सर्वविदित है। कहने को तो यह सिद्धान्त पुराना पड़ गया किन्तु इसके पीछे तथ्य सनातन है। यह सिद्धान्त सृष्टि के कण-कण में कार्य कर रहा है। गेहूँ का बीज पृथ्वी में पड़कर असंख्यों बीज के रूप में फलित होता है। अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ अपने अनुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती है।
शास्त्रों में वर्णन है कि मनुष्य जितनी गंदगी फैलाता है उसकी स्वच्छता के लिये तथा वातावरण को परिशोधित करने के लिये यज्ञ कृत्य करने चाहिये। यज्ञ देवता वातावरण को परिशोधित करते तथा सन्तुलित रखते हैं। उसके प्रभाव से ऋतुएँ समय पर आती है। सन्तुलित वातावरण मानवी सुख-समृद्धि का आधार बनता है। पौष्टिक अन्न, वनस्पतियाँ उपजाती है। मनुष्य स्वस्थ एवं निरोग बनता है। यज्ञ प्रयोगों के सत्परिणामों से सभी परिचित है। अतीत में जब तक यज्ञ प्रक्रिया चलती रही प्रकृति का सन्तुलन बना रहा। कहते हैं कि भारत में कभी दूध-दही की नदियाँ बहती थी। आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक अनुदानों से भी भारत ने विश्व-मानव को तृप्त किया था। कालान्तर में यही प्रक्रिया बन्द हो गई। मनुष्य का भ्रष्ट चिन्तन तथा दुष्ट कर्तृत्व वातावरण में ऐसे प्रदूषण भरने लगा जो वायुमण्डल में बढ़ती जाने वाली विषाक्तता से भी अधिक भयंकर है।
निस्सन्देह प्राकृतिक असन्तुलन का दोषी मनुष्य स्वयं है। दोषारोपण चाहे भगवान पर किया जाय अथवा देवी देवताओ पर, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। परिणामों को तो भुगतना ही होगा। इन प्राकृतिक प्रकोपों ने अपार सम्पत्ति को तो नष्ट किया ही, नर संहार भी कम नहीं हुआ। समस्त प्राणियों को उसका श्राप सहना पड़ा। इस क्षति का लेखा-जोखा तैयार किया जाय तो प्रतीत होगा कि प्रकृति एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से लौटाने पर उतारू हो गई है।
भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन जैसे प्राकृतिक प्रकोपों के कारणों पर भी विचार किया जाय तो इस संदर्भ में आँखें खोल देने वाले तथ्य सामने उपस्थित होते हैं। भूकम्प के बारे में ‘इलास्टिक रिवाउण्ड सिद्धान्त” सर्व विदित है। इसके अनुसार अनेक स्थानों पर पृथ्वी काँपती है जिससे टूट-फूट होती है। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ पलभर में धराशायी हो जाती हैं। विपुल धन-शक्ति एवं जनशक्ति होती है। नष्ट होती है। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी एक गर्म पिघलता हुआ गोला है जिसकी ऊपरी परत पर मिट्टी की एक हल्की एवं ठण्डी परत जमी है। कई स्थानों पर यह पपड़ी कमजोर है। बनावट में असमानता होने तथा असमान फैलाव -सिकुड़न के कारण पृथ्वी के भीतर स्थित चट्टानें कहीं-कहीं बनी हुई रहती है। जब तनाव किसी प्रकार बढ़ जाता है अथवा किसी बाहरी दबाव से झटका लगता है तब वे टूट जाती है। यही प्रक्रिया भूकम्प का कारण बनती है। पृथ्वी की यह पपड़ी जहाँ-जहाँ कमजोर हैं प्रायः भूकम्प का झटका वही महसूस किया जाता है।
परमाणु विस्फोट के समय उस स्थान की पृथ्वी में कम्पन होता है। यह कम्पन कमजोर एवं तनाव पूर्ण चट्टानों को झटका देकर तोड़ देती है। यह आवश्यक नहीं कि जिस स्थान पर परमाणु परीक्षण हो रहा है वहीं की चट्टानें टूटे बल्कि दूरवर्ती पृथ्वी की कमजोर चट्टानों को भी तोड़ सकती है। भूकम्प का झटका इन स्थानों पर महसूस किया जाता है।
अनेक स्थानों पर भूकम्प का झटका अनुभव होने का कारण है भूकम्प से उठी कम्पन तरंगों का पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलना। ये तरंगें दो प्रकार की होती है। एक तरंग तो पृथ्वी के ऊपरी पृष्ठ से होकर चलती है जिसे पृष्ठीय तरंग कहते है। दूसरी तरंग पृथ्वी के भीतर जाकर दो भागों बट जाती है। एक को एस॰ तथा दूसरी को पी. तरंगें कहते हैं। विभिन्न गति से चलती हुई ये तरंगें पृथ्वी के अधिक घने केन्द्रीय भाग से टकराकर लौटती है। जहाँ दोनों तरंगें एक दूसरे को प्रचलित करती हैं, वहाँ भूकम्प का झटका तीव्र महसूस किया जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि बहुत समय पूर्व उत्तरकाशी के पास हुए भू-स्खलन जिसके फलस्वरूप हिमालय की विशाल चट्टानें टूटकर गिर पड़ी थी, के पीछे उपरोक्त प्रक्रिया ही कारण थी।
परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न होने वाली भूगर्भीय तरंगों से भूकम्पों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। अनुवाद प्रक्रिया द्वारा ये तरंगें पृथ्वी की मजबूत चट्टानों को भी तोड़ने में समर्थ हैं। इनकी गति यदि पृथ्वी में चट्टानों की प्राकृतिक कम्पन के समान है तो चट्टानों के टूटने की सम्भावना और भी बढ़ जाती है। रिजोनेन्स की शक्ति से हर कोई परिचित है। पुल पार करते हुए सिपाहियों के कदम मार्च को तोड़ दिया जाता है। एक साथ, एक गति एक ताल के क्रम से ध्वनि के रिजोनेन्स से पुल टूटने की सम्भावना रहती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक स्थान के परमाणु परीक्षणों से किसी अन्य स्थान पर कभी भी, बहुत समय बाद भी भूकम्प आ सकता है।
समुद्री तूफानों के आने में भी इस प्रकार के परीक्षणों की बात वैज्ञानिक स्वीकार करने लगे है। सामान्य लहरों की अपेक्षा कभी-कभी तो इन तूफानों में लहरों की ऊँचाई अप्रत्याशित रूप से डेढ़ सौ फीट तक पहुँच जाती है। इनका वेग दो सौ मील प्रति घण्टा तक देखा गया है। पिछले दिनों आंध्रप्रदेश में आये भयंकर तूफान में उन लहरों की विनाशकारी शक्ति देखने में आयी। विश्वास किया जाता है समुद्री तूफानी लहरों का सम्बन्ध ज्वार लहरों से है। किन्तु वैज्ञानिकों का कहना है कि इन तूफानी लहरों का कारण पृथ्वी की सतह अथवा समुद्र के भीतर आये भूकम्प भी होते है।
बाढ़ की घटनाओं में असामान्य वृद्धि कुछ वर्षों से देखी जा रही है। अभी पिछले वर्ष की भयंकर बाढ़ ने करोड़ों व्यक्तियों को बेघर कर दिया। असंख्यों लोग मरे न केवल भारत बल्कि अन्य देशों को भी भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ा है। बाढ़ के कारणों का पता लगाने पर जो तथ्य सामने आये है वे बताते है कि यह स्वयं मनुष्य की क्रियाएँ है। जो प्रतिक्रिया स्वरूप इस प्रकार की विभीषिकाएँ खड़ी करती है। सामान्यतया वर्षा की प्रक्रिया में समुद्र का पानी सूर्य की गर्मी में भाप बनकर उड़ता रहता है। वही ठण्डा होकर जल की बूंदों में बदल जाता है। इन्हीं बूंद समूहों को बादल कहते हैं। ये बूँदें हल्की होने के कारण हवा में तैरती रहती तथा नीचे नहीं गिरती। इन बूँदों का आकार अतिरिक्त भाप के ठण्डा होते रहने से बढ़ जाता है। बड़ी बूंदें भार बढ़ने के कारण पृथ्वी पर गिरने लगती है।यह वर्षा की सामान्य प्रक्रिया सन्तुलित रूप से चलती रहती है। असन्तुलन की स्थिति तब बनती है जब वायुमंडल में स्थित आक्सीजन नाइट्रोजन तथा कार्बन डाई आक्साइड आवेश युक्त हो जाती है। विस्फोट से उत्पन्न रेडियो धर्मी पदार्थ ऊपर वायुमण्डल में जाकर आक्सीजन नाइट्रोजन और कार्बन डाई आक्साइड को आवेशित करते है। ‘आयन’ की स्थिति में आने पर इन पर पानी की बूंदें अधिक जना होने लगती हैं। बूँदों का अतिरिक्त जमाव अधिक वर्षा का कारण बनता है।
नदियों में आई बाढ़ का एक कारण परमाणु-पुरी-क्षणों से उत्पन्न अधिक ताप से पहाड़ों पर जमी बर्फ का पिघलना भी है। इसके साथ वर्षा का संयोग जुट जाने से स्थिति और भी संकट पूर्ण हो जाती है।
प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। परिणाम सामने है- विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक विक्षोभ। निस्सन्देह वर्तमान संकट पूर्ण परिस्थितियों के लिये उत्तरदायी मनुष्य स्वयं है। इस विषाक्तता के परिशोधन की व्यवस्था तो बनाई ही जानी चाहिए नये परमाणु परीक्षणों पर सख्ती से रोक लगनी चाहिये। साथ ही अधिक उत्पादन के लिये विशालकाय उद्योगों की स्थापना की होड़ सभी देशों में चल रही है इस अविवेकपूर्ण उत्साह को बन्द किया जाय। बड़े उद्योगों से उत्पादन तो बढ़ेगा किन्तु उनसे उत्पन्न होने वाली विषाक्तता का यदि लेखा जोखा लिया जाय तो उत्पादन की अपेक्षा कहीं अधिक महंगा पड़ेगा। प्रदूषण की वृद्धि रोकने के लिए बड़े उद्योगों का कुटीर उद्योगों में परिवर्तन किया जाय। उससे उत्पादन में कमी जो सकती है। किन्तु दूरगामी परिणामों की दृष्टि से देखा जाय तो बड़े उद्योगों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण जितनी क्षति पहुँचाते हैं। उसकी तुलना में यह हानि अल्प होगी। वस्तुओं का उत्पादन कम हो तो भी गुजारा किया जा सकता है। आवश्यकताओं में कटौती करके काम चलाया जा सकता है, किन्तु उद्योगों के प्रदूषण की प्रतिक्रिया -स्वरूप होने वाले प्राकृतिक विक्षोभों को सहन करना असह्य है।
वातावरण की विषाक्तता के परिशोधन में यह उपचार की सनातन परम्परा ही सफल हो सकती है। यज्ञीय - दर्शन को जन-सामान्य के चिन्तन में उतारा जा सके तो सत्प्रवृत्तियों के विकास में असामान्य योगदान मिलेगा। चिन्तन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार सम्भव है। इस बात से कोई भी विचारशील इन्कार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिन्तन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को उसी प्रकार दूषित कर रहे है जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
यज्ञे देवमा की प्रतिष्ठापना इस युग की माँग हैं। सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन यज्ञीय प्रवृत्तियों के प्रसार से ही सम्भव है। वातावरण की सन्तुलन परिशोधन तथा प्राकृतिक प्रकोपों के रोकथाम के लिए यज्ञानुष्ठान का प्रचलन व्यापक स्तर पर करना होगा।
राजा उदावर्त बहुमूल्य रत्न-राशि लेकर महर्षि कणादि के आश्रम में पहुँचे, और वह भेंट करते हुए ब्रह्मविद्या का उपदेश करने की प्रार्थना की।
महर्षि ने धन को अनावश्यक कर कह लौटा दिया और एक वर्ष ब्रह्मचर्य पालन करने के उपरान्त पुनः आने पर उपदेश की सम्भावना व्यक्त की।
राजा निराश लौट रहे थे। उन्हें बुरा भी लगा और क्षोभ भी आया।
मन्त्री द्युतिकीर्ति ने उनकी खिन्नता दूर करते हुए कहा-राजन्! भूखे को ही अन्न पचता है। जिज्ञासु को ही ज्ञान का लाभ मिलता है। ऋषि ने एक वर्ष ब्रह्मचर्य रहने की शर्त लगाकर आपकी जिज्ञासा को परखा है। यदि आप उनकी कसौटी पर खरे उतरे तो आपको ब्रह्म-विद्या का लाभ अवश्य प्राप्त होगा, अनधिकारी में ज्ञान को पचाने की सामर्थ्य नहीं होती। मनोरंजन के लिये कुछ कहने में समय की बर्बादी समझकर ऋषि ने लौटाया है। उसमें बुरा न मानें।
ऋषि का अभिप्राय उदावर्त की समझ में आ गया, वे एक वर्ष से रह और आध्यात्मिक ज्ञान के अधिकारी बन कर जब पुनः आश्रम में समित्पाणि होकर पहुंचे तो कणाद ने उन्हें छाती से लगा लिया और कहा, निरहंकारी, धैर्यवान और श्रद्धावान जिज्ञासु ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं। अब मैं कुछ कहूंगा और आप ब्रह्म-विद्या का सच्चा लाभ उठावेंगे।
उदावर्त ने ब्रह्म-ज्ञान पाया और अपने को धन्य बनाया।
बुद्ध ने कहा था- अच्छे जीवन का सार है- “सुन्दर का मनन”। स्पष्ट है कि यह सुन्दरता बाहरी नहीं हो सकती। सत्य और शिव ही सुन्दर है इसीलिये सुन्दरता के मनन का अर्थ है-सत्यं और शिव का मनन। यही बात गाँधी जी अपने ढंग से इस प्रकार कहते थे- “तपस्या जीवन में सरल सौंदर्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।” इस प्रकार गाँधी जी की दृष्टि में तपस्वी होना ही सचमुच सुन्दर होना है।
वस्तुतः सुन्दरता का अर्थ ही है पवित्रता और सुव्यवस्था। देह वही सुन्दर कही जाती हैं जो स्वस्थ-सुडौल और स्वच्छ हो। कपड़े वही सुन्दर कहे जाते है, जो स्वच्छ हों और दूसरों को भी भाएँ। यह सही है कि सुन्दरता कई बार शृंगारिकता का पर्याय मान ली जाती है। किन्तु उसका कारण दृष्टि का सिर्फ ऊपर ही ऊपर अटकी रहना है। बाहरी सुन्दरता को सराहने वाले में दृष्टि के पैनेपन का अभाव होता है। पर जो कुछ वह देख रहा होता है वह स्वच्छता और सुव्यवस्था ही होती है। ऐसी कभी भी नहीं होता कि गंदगी और अस्त-व्यस्तता, शिथिलता या विकृति समझ में आ रही हो, तब भी उसे सुन्दर मान लिया जाये। जो लोग शरीर की सुन्दरता पर ही मुग्ध होते है, वे उस समय भीतरी प्रवृत्तियां देख नहीं रहे होते। अतः उसे उनकी दृष्टि का उथलापन या विवेक की दुर्बलता तो कहा जायेगा। पर जिसे वे गंदा देख रहे है, उसे वे भी नापसंद करेंगे।
जो लोग जीवन का सार शरीर और उसके लिये आवश्यक उपकरणों को ही मानते है, उनके लिये उसी में जुटना उचित ही है। मन, बुद्धि, अन्तः करण का भी अस्तित्व और महत्व मानने वालों को उनकी सुन्दरता के संरक्षण-अभिवर्धन की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अन्यथा वे असौंदर्य, गंदगी और अपवित्रता के उपासक कहे जायेंगे।
अन्तःकरण की सुन्दरता की रक्षा और वृद्धि के प्रयासों को ही साधना कहा जाता हैं। अन्तःकरण ही मानवी सत्ता का केन्द्र बिन्दु है। उसकी स्थिति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर प्रभाव नहीं पड़ता। जा आज सिर्फ धोती- कुर्ता पसन्द करने लगे, तो इससे उसकी स्वयं की स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन न होगा। न ही उसके आस-पास इस परिवर्तन से कोई उल्लेखनीय उथल पुथल होगी। बहुत हुआ, तो हल्की -सी चर्चा, उत्सुकता या विनोद तक बात पहुँचेगी।
किन्तु अन्तःकरण की रुचियों में परिवर्तन होते ही पूरे जीवन का स्वरूप असाधारण तौर पर बदलने लगता है। वाल्मीकि का शरीर और मस्तिष्क नहीं था। पर उनके अन्तःकरण में एक नयी आस्था पैठ गयी, डाकू का जीवन उन्हें अनुचित और साधु-जीवन उचित लगने लगा, तो काया कल्प ही हो गया। खुद उनका स्वयं का व्यक्तित्व बदल गया, उनके परिजनों का भी जीवन - क्रम बदल गया। एक डाकू आदि कवि बन गया। जंगल का अल्पज्ञता तिरस्कृत दस्यु विश्ववंदित मनीषी, साहित्यकार बन गया। अजामिल, अंबपाली, अंगुलिमाल, विल्वमंगल आदि के जीवन- क्रम में ऐसा ही उलट-पुलट हुआ। कारण रहा अन्तःकरण की स्थिति में थोड़ा सा परिवर्तन। उचित और अनुचित की एक नयी मान्यता - आस्था का उदय।
इसी अन्तःकरण के क्षेत्र को प्रभावित करने का प्रयास साधना कहलाता है। शरीर की सुन्दरता की रक्षा के लिये उसे व्याधियों से मुक्त रखना होता है और पोषक तत्व जुटाना होता है। अन्तःकरण को कुसंस्कारों - कषाय कल्मषों की भयानक व्याधियों से साधना की औषधि ही मुक्त करती है। अन्तःकरण की गहराई तक उत्कृष्टताओं को पहुँचाने वाले भाव-संवेदनों के इन्जेक्शनों का नाम ही साधना है।
असत् से सत् की ओर अंधकार से आलोक की ओर और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम साधना है। चेतना के समुद्र में अनन्त ऐश्वर्य-दायक रत्न-भंडार भरे पड़े है। उन्हें पाने के पुरुषार्थ को ही साधना कहते है। वह भीतर की स्वच्छता और श्रृंगार-सज्जा है।
शरीर के विकास-पोषण के लिये स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी और उनको जीवन में अपनाना आवश्यक होता है। मन-बुद्धि को विकसित करने के लिये शिक्षा, साहित्य, संपर्क-जन्य अनुभव आदि आवश्यक है। उसी प्रकार चित्त के विकास परिष्कार का मार्ग साधना है।
स्वर्ण की आभा पकने पर फौलाद बनता है। खारा और भारी जन तपाने के बाद हलका और मीठा हो जाता है। ये सब उन वस्तुओं की साधना कही जा सकती है। व्यक्तित्व की साधना इसी प्रकार आभा निखारती, परिपक्वता-सुदृढ़ता बढ़ाती और सात्विकता मधुरता पैदा करती है। मनुष्य के भीतर जो दिव्य, अलौकिक और अद्भुत है, उसे साधना द्वारा ही उभारा-निखारा जा सकता है।
साधना से ही व्यक्तित्व विकसित - परिवर्तित होता और महिमा-मंडित, गरिमापूर्ण बनता है। मानवीय चेतना साधना द्वारा ही अपनी स्वाभाविक सुन्दरता-उज्ज्वलता से समृद्ध बनती है।
साधना का अर्थ है चिन्तन और मनन। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी समीक्षा आप ही करनी चाहिए। जैसे प्रयोगशाला में पदार्थों का वर्गीकरण कर उनकी संरचना के तत्वों को देखा-परखा जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की प्रयोगशाला में चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
आत्म-समीक्षा से प्राप्त निष्कर्षों का मनन करना, उस हेतु निर्धारित उपायों को अपनाना और अभीष्ट दिशा में जीवन-क्रम को ढालते जाना साधना का अगला चरण है। यह कठिन कार्य यों ही नहीं हो जाता। एक तो आत्म- समीक्षा ही कठिन है। अपने दोष देखने की सामान्यतः व्यक्ति में प्रवृत्ति नहीं होती। वैसी प्रवृत्ति अपनाना सरल नहीं है। फिर, दोष समझ में आ जाने भर से दूर नहीं होते। उसके लिये अपने ही अब तक के अभ्यास के विरुद्ध चलना होता है। धारा के प्रतिकूल तैरने का श्रम सर्वविदित है। अपने आप से संघर्ष करना, दुर्बुद्धि-दुष्प्रवृत्ति से लड़ना कठिन नहीं। बाहरी गंदगी तो स्पष्ट दिख जाती है; पर भीतर की गंदगी अभ्यासवश प्रिय और आकर्षक लगने लगती है। उसे समझना भी कठिन है। हटाना तो और भी दुष्कर है। क्योंकि इस सफाई में जिन उपकरणों का प्रयोग होता है, वे बाहरी नहीं है। वे गंदे होते हुए भी अपने स्वच्छ होने का भ्रम पैदा कर सकते है। इसीलिये एक बार आत्म-समीक्षा करने भर से काम नहीं चलता। उस आत्मशोध के निष्कर्षों का निरन्तर मनन करना आवश्यक है। मनन से कर्त्तव्यों का स्मरण रहेगा। आत्म-निर्माण की दिशा याद आती रहेगी और अपना संकल्प भी प्रबल बना रहेगा। तभी आत्मविकास सम्भव होगा।
इस कठिन काम को ही साधना कहते है। प्रचंड मनोबल और जागृत संकल्प शक्ति द्वारा ही यह सम्भव होता है, इस प्रक्रिया में एक प्रकार से अन्तःयुद्ध जैसी ही स्थिति उत्पन्न होती है। इसीलिये साधना को समर कहा गया है। कचरे के विशाल ढेर को हटाने के लिये सफाई-कर्मचारियों को उससे जूझना ही पड़ता है। बाढ़ या तूफान के समय जब प्रकृति के उत्पात से मलबों और लाशों का अम्बार लग जाता है, तब उसे हटाने के लिये सेना की मदद लेनी पड़ती है। फौज जैसी चुस्ती और तत्परता के बिना अपेक्षित सफाई सम्भव नहीं होती।
आन्तरिक क्षेत्र में अपनी अन्तःप्रकृति के उत्पात इसी तरह का मलबा-कचड़ा जमा कर देते है। उन्हें हटाने के लिये सैनिक जैसी तत्परता और श्रमशीलता आवश्यक होती है। साधना-समर में विजय तभी प्राप्त होती है। बुरे विचारों को अच्छे विचारों से काटना पड़ता है। गलत आदतों को दूर कर नई आदतों का अभ्यास करना होता है। निकृष्टता की ओर आकर्षित करने वाले वातावरण के स्थान पर चारों ओर उत्कृष्ट वातावरण बनाना होता है।
कचरा हटा देने भर से कोई स्थान सुन्दर नहीं हो जाता। वहाँ वातावरण को पवित्र बनाना होता है। फिर पुष्प वाटिका मनोहर उद्यान, मंदिर या अन्य कोई सुन्दर भवन बनाना होता है। नव-निर्माण और श्रृंगार-सज्जा के द्वार ही वह स्थान होता है। दुर्बुद्धि दुष्प्रवृत्तियों की समाप्ति और सद्बुद्धि सत्प्रवृत्तियों का विकास करने पर ही अन्तःकरण सुन्दर बनता है। इसके लिये विचार-संघर्ष और कर्म-संघर्ष की समन्वित प्रक्रिया अपनानी पड़ती हैं।
शरीर की स्वच्छता और श्रृंगार-सज्जा भी सुखकर है। पर अंतःकरण की मलिनता उस सुख की अनुभूति में भी बाधक बनती हैं। उपेक्षित अंतःकरण किसी भी प्रकार के सुख की सहज अनुभूति के योग्य सशक्त नहीं होता। अतः उसे स्वच्छ, स्वस्थ, सुन्दर बनाना शारीरिक सौन्दर्य के प्रयासों से भी पहले और बढ़-चढ़कर जरूरी है। इस प्रयास पुरुषार्थ को ही साधना कहते हैं।
अश्वपति ने राज्य विस्तार तो नहीं किया पर समर्थ नागरिक तैयार करने के लिये जो भी उपाय सम्भव थे, उसने किये। यही कारण था कि उसके राज्य में सब स्वस्थ, वीर, और बहादुर नागरिक थे। काना, कुबड़ा, दीन-हीन और आलसी उनमें से एक भी न था। अश्वपति के राज्य में जन्म लेते ही बच्चे राज्याधिकारियों के नियन्त्रण में सौंप दिये जाते थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध अश्वपति स्वयं करता था। उसका हर नवयुवक चरित्र बल, दृढ़ता, शौर्य और संयम की प्रतिमूर्ति था। यही कारण था कि उस छोटे-से राज्य से भी कोई टक्कर नहीं ले पाता था।
प्रतापी सम्राट पोरस से युद्ध करने के बाद सिकन्दर की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया, उस समय सिकन्दर ने सोचा आस-पास के छोटे राज्य ही हस्तगत क्यों न कर लिये जायें? उसको एक वक्र दृष्टि अमृतसर के समीप रावी नदी के तट पर बसे अश्वपति के राज्य पर पड़ी। सिकन्दर ने अश्वपति की वीरता की गाथाएँ पहले ही सुन रखीं थीं, उसके सिपाही भी हिम्मत हार चुके थे, इसलिये उसने मुकाबले की अपेक्षा छल से रात में अश्वपति पर आक्रमण कर दिया। युद्ध के लिये अनिश्चित अश्वपति के सैनिकों को सिकन्दर के सिपाहियों ने छल पूर्वक काटा और इस तरह यह युद्ध भी यूनानियों के हाथ रहा। महाराज अश्वपति बन्दी बना लिये गये। सिकन्दर ने अश्वपति के शौर्य की परीक्षा लेने के इरादे से उसे बन्धन मुक्त कर दिया और सन्धि कर ली। इस खुशी में दोनों नरेशों का एक सम्मिलित दरबार आयोजित किया गया। अश्वपति अपने खूँखार लड़ाका कुत्तों के लिये विश्व-विख्यात था, चार कुत्ते हमेशा अश्वपति के साथ रहते थे। जब वह दरबार में पहुँचे तब वह कुत्ते भी उनके साथ थे। सिकन्दर ने उनके पहुंचने ही व्यंग किया- महाराज यह “भारतीय कुत्ते” है? अश्वपति ने तुरन्त दिया- हाँ यह छिपकर आक्रमण नहीं करते, शेरों से भी मैदान में लड़ते हैं। लड़ाई का आयोजन किया गया।
उधर शेर इधर दो कुत्ते- लड़ाई छिड़ गई। शेर ने कुत्तों को लहू लुहान कर दिया पर कुत्तों ने भी शेर के छक्के छुड़ा दिए। शेष दो कुत्ते भी छोड़ दिये गये और तब शेर को भागते ही बना। पर कुत्तों ने उसके शरीर में ऐसे दाँत चुभाये कि शेर आहत! होकर वही गिर पड़ा। अश्वपति ने ललकार कर कहा-महाराज! आपकी सेना में कोई वीर है जो कुत्ते के दाँत शेर के माँस से अलग कर दे? बारी- बारी से कई योद्धा उठे और कुत्तों की टाँगे पकड़ कर खींचने लगे, कुत्तों की टाँगे टूट गई पर वे उनके दाँत छुड़ा न सके। सात फुट लम्बे अश्वपति ने अपने अंग रक्षक को संकेत किया। वह उठकर शेर के पास पहुँचा और कुत्ते को पकड़ कर एक ही झटका लगाया कि शेर की हड्डी और माँस सहित कुत्ता भी खिंच गया।
सिकन्दर ने युद्ध जीत लिया था पर इस यथार्थ के आगे वह अपना सिर झुकाये बैठा था।
किसे कौन वस्तुएं कितनी मात्रा में मिलीं, इस आधार पर किसी के सौभाग्य की नाप तोल नहीं की जानी चाहिए। सौभाग्यशाली वह है जिसने वस्तु का महत्व समझा और उसके सदुपयोग का रास्ता बनाया।
कितनों के ही पास धन दौलत होती है, पर वे उसे विलासिता-अह’कार की पूर्ति और स्त्री-बच्चों की शौक मौज के लिए खर्च करते है, कई तो उससे व्यसन व्यभिचार और शोषण- उत्पादन के कुकृत्य करते है, अपना पतन करते है, दूसरों को दुःख देते है, ईर्ष्या भड़काते हैं और बहुतों को उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। धन मिला, पर उसका उपयोग न आया तो उसका मिलना सौभाग्य का चिन्ह कहाँ हुआ?
अच्छा स्वास्थ्य मिलने की सार्थकता तभी है जब उस शरीर से आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण की रीति- नीति अपनाई जाय। ऐसे कर्म किये जाँय जिनसे सत्य परम्पराओं को प्रोत्साहन मिलता हो। अनाचार न करना और न करने देना, स्वयं उन्नति के पथ पर बढ़ना, यही अच्छे स्वास्थ्य का सदुपयोग हैं। यदि ऐसा न किया जा सके, उलटी गतिविधियाँ अपनाई जाँय। शारीरिक बलिष्ठता का उपयोग शोषण, उत्पीड़न, आक्रमण आतंक, अनाचार के लिए किया जाय तो उससे स्वयं भी पछताना पड़ेगा और समाज में शोक संताप बढ़ेगा। दुरुपयोग में प्रयुक्त होने वाले स्वास्थ्य को सौभाग्य कैसे कहा जाय। इससे तो वह रुग्णता, दुर्बलता अच्छी जो उद्धत कर्म करने में असमर्थ तो बनाये रहती है।
बुद्धिमान, विद्वान, चतुर होना सौभाग्य का चिन्ह कैसे माना जा सकता है? यदि विद्या पाकर विनयशीलता और सज्जनता नहीं बढ़ी, अहंकार और स्वार्थ ही बढ़ा तो साँप को दूध मिलने जैसी बात हुई। साँप अधिक अत्याचार करने में समर्थ हुआ और दूध जो रोगी या बच्चे के लिए आवश्यक था, वहाँ न जा सका। दूध और सर्प दोनों का संयोग दुर्भाग्य ही कहा जायगा। विद्या की प्रशंसा और गरिमा तभी है जब वह सज्जनता के साथ शोभायमान हो। दुष्ट की बुद्धिमत्ता तो प्रत्यक्ष अभिशाप है। उससे न जाने कितनों को किस-किस प्रकार दुःखित, पतित और भ्रमित किया जायेगा। दुर्बुद्धि की अपेक्षा मंद बुद्धि होना श्रेयस्कर है। अनाचारी को विद्या और बुद्धि का अनुदान मिलने में प्रसन्न होने को कोई बात नहीं। यह तो शोक संताप का ही प्रसंग है।
सत्ता किसी को मिले, ऊँचा पद मिले सो ठीक है। पर प्रश्न तब भी यही बना रहेगा कि सत्ता किस स्तर के व्यक्तित्व को मिली। श्रेष्ठता और सत्ता का समन्वय हो सके तो ही उसकी सार्थकता है, अन्यथा वह एक विपत्ति ही सिद्ध होगी। रावण, कंस, जरासंध, हिरण्यकश्यप- भस्मासुर, सहस्रबाहु आदि के हाथ में सत्ता आई, दुष्टता और सत्ता का मिलन सर्वत्र हाहाकारी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करता रहा सत्ताधारियों की दुर्गति हुई और असंख्य लोगों को त्रास सहना पड़ा। सत्ता को सराहा तभी जायगा जब वह रामराज्य, धर्मराज्य की सुव्यवस्था बनाने के लिए प्रयुक्त हो।
किसे क्या मिला? किसके पास क्या है? इस आधार पर किसी को सौभाग्यशाली नहीं माना जाना चाहिए महत्ता ‘पात्र’ की नहीं वरन सदुपयोग कर सकने की क्षमता की है। संसार में कितने ही लोग साधनहीन अथवा स्वल्प साधन सम्पन्न हुए किन्तु उनने जो कुछ मिला था, उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात सोची और वैसी ही रीति-नीति अपनाई यही बुद्धिमता और सौभाग्यशाली होने का चिन्ह है। जो ऐसी सदुपयोग की दूरदर्शिता दिखा सके वे स्वल्प साधन रहते हुए भी सौभाग्यशाली कहलाये - सुखी हुए, सराहे गये। जबकि विपुल वैभववान होते हुए भी उसका मूल्य महत्व और उपयोग न समझने वाले स्वयं दुख पाते और दूसरों को दुख देते हुए इस संसार से विदा हुए।
बौद्ध साहित्य में एक बहुत ही सुन्दर कथा आती है। उस समय भगवान बुद्ध जीवति थे और जगह पर घूम कर लोगों को धर्म, नीति तथा सदाचार का उपदेश दे रहे थे। जिस राज्य में वे प्रव्रज्या कर रहे थे उसी राज्य के नरेश ने एक रत्न जटिल स्वर्ण कमण्डल ऊंचे बाँस पर टाँग दिया और कहा जो कोई व्यक्ति इस कमण्डल को उतार लेगा उसे मैं सिद्ध योगी मान लूँगा और उसका अनुयायी बन जाऊँगा। कमण्डल बहुत ऊँचे बाँस पर टंगा था, किसी व्यक्ति का सीधे खड़े होकर उसे उतार पाना सम्भव नहीं था। भगवान बुद्ध का एक शिष्य जिसका नाम कश्यप था, कुछ ही दिनों पूर्व धर्म संघ में दीक्षित हुआ था। उसने अपने सिद्धि ‘बल’ से कमण्डल को उतार लिया। यह सूचना ले कर लोग बुद्ध के पास गये और यह सारा विवरण उन्हें कह सुनाया।
लोगों को आशा तो यह थी कि वह कश्यप की प्रशंसा करेंगे क्योंकि उसने एक राज परिवार को धर्म दीक्षित कर लिया था। परंतु हुआ इसके विपरीत ही। बुद्ध ने यह विवरण सुना ही था कि वे उठे और उस विहार की ओर चल पड़े। उन्होंने कश्यप पर अपनी व्यथा उड़ेलते हुए कहा- मैं बार-बार तुम लोगों को इन चमत्कारों का प्रदर्शन करने तथा अभ्यास करने के लिए रोकता हूँ। यदि तुम्हें इन मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि की सिद्धियों और प्रदर्शनों में ही आकर्षण हैं तो अद्यावधि तुम लोगों को धर्म की कोई जानकारी नहीं है। यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो सदाचार का अभ्यास करो। क्योंकि चमत्कार ही यदि अध्यात्म की कसौटी बनने लगे तो फिर बाजीगरी की बन आवेगी और तपस्वी, ज्ञानवान तथा लोक सेवियों की बात कोई नहीं सुनेगा।
वस्तुतः अध्यात्म का चमत्कारों से कोई संबंध नहीं है। अधिकांश चमत्कार तो, जो जनसाधारण को प्रभावित करने के लिए किये जाते हैं, केवल हाथ की सफाई और बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं होते। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि सिद्धियों-अतीन्द्रिय शक्तियों के पीछे भी यही कारण है। अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए, सिद्धियाँ और अतीन्द्रिय शक्तियाँ अनायास ही मिल जाती है। अध्यात्म मार्ग के लिए उन्हें अलग से कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता और नहीं वह इनमें रमता है। पातंजलि मुनि ने यम नियमों के पालन से ही पूर्वाभास, दूरबोध, परोक्ष दर्शन, दिव्यस्पर्श, आकाशगमन, अणिमा, महिमा आदि सिद्धियों की प्राप्ति बतायी है और साथ ही साधको को सतर्क भी किया है- ‘ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः’
अर्थात् वे (सिद्धियाँ) समाधि में विघ्न हैं तथा अभ्युत्थान में सिद्धियाँ है। विघ्न इसलिए है कि इन सिद्धियों के कारण मिलने वाली प्रशंसा, उनसे उत्पन्न होने वाला अहंकार साधक को श्रेय पथ से विचलित कर देता हैं। लेकिन कोई व्यक्ति यदि इन सिद्धियों को ही श्रेय की प्राप्ति समझता है तो पातंजलि मुनि ने उसे विक्षुब्ध या भ्रमित मनः स्थिति वाला व्यक्ति कहा है।
आये दिनों सामान्य व्यक्तियों में भी इस प्रकार की विलक्षण क्षमतायें कुछ समय के लिए अथवा सदा के लिए जागृत हो जाने की घटनायें देखने सुनने में आती है। इस तरह की ढेरों घटनायें अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में छपती रहती है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि चेतना, अध्यात्म, आत्म और परमात्मा को जानने मानने का भी यही प्रयोजन है। इन घटनाओं के माध्यम से यह तो सिद्ध होता है कि अध्यात्म एक सर्व समर्थ विद्यमान हैं, आत्मा विलक्षण विभूतियों का भण्डार है लेकिन उसका उपयोग इस तरह बाल क्रीड़ाओं के लिए करना न आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है और न समाज के लिए ही उनकी उपयोगिता है। इन साक्ष्यों से आत्मा की सामर्थ्य को एक अंश तो प्रमाणित किया जा सकता है पर आत्म सत्ता की शक्ति सामर्थ्य इतने तक ही सीमित नहीं है।
जिन किन्हीं व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित होती है वे न इसका ढिंढोरा पीटते हैं न इनका प्रचार ही करते है। क्योंकि इससे जन साधारण का ध्यान श्रेय की दिशा से हट कर उन क्रीड़ा कौतुकों पर ही चला जायेगा। इस लिए सच्चे आत्मवेत्ता न तो किसी को चमत्कार दिखाते है और न ही किसी को इस बात की शिक्षा देते है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति ही अध्यात्म की सच्ची साधना है और उसी का अभ्यास कर सामान्य, स्थिति में रहते हुए भी देवोपम जीवन व्यतीत किया जा सकता है। उसके आलोक से असंख्य व्यक्तियों का भला किया जा सकता है। सही अर्थों में यही अध्यात्म का चमत्कार है। और जिन व्यक्तियों ने भी अध्यात्म के मर्म को समझा है उन्होंने सिद्धियों और चमत्कारों को व्यर्थ बताया है।
सर्वसाधारण के लिए इनकी कोई उपयोगिता नहीं है इसलिये ईश्वरीय विधान के अनुसार इन्हीं अविज्ञात एवं रहस्य के पर्दों में छिपा हुआ ही रहने दिया है। परमात्मा ने मनुष्य और प्राणियों को वे सारी विशेषतायें साधन क्षमतायें पहले ही इतनी मात्रा में प्रदान कर दी हैं जितनी कि उन्हें आवश्यक है। हवा, पानी, अन्न, आदि आवश्यकताओं के लिए जिनके बिना जीवन चल नहीं सकता परमात्मा ने प्रकृति में प्रचुर व्यवस्था कर दी है इसके बाद जीवन की ग्रन्थियों और समस्याओं को समझने हल करने के लिए सामान्य बुद्धि भी मनुष्य में विद्यमान हैं। विशेष प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमताओं का विकास करते हैं और उससे स्वयं लाभ उठाते हुए अन्य मनुष्यों को भी लाभान्वित करते है।
इसके बाद आती है वे सिद्धियाँ और क्षमतायें जिन्हें मनुष्य वरदान तुल्य समझता है और सोचता है कि यदि ये सिद्धियाँ उसके पास होती तो वह ‘और’ भी बड़ा बन सकता था। स्मरणीय है इन सिद्धियों की ललक दूसरों का भला करने के लिए अपना अहंकार पुष्ट करने के लिए ही ज्यादा उठती है। यदि दूसरों का भला करना ही अभीष्ट रहता है तो मनुष्य अपनी उपलब्ध क्षमता और वर्तमान स्थिति में रह कर ही बहुत कुछ कर सकता है। परन्तु सिद्धियों के पीछे यह भावना नहीं रहती। उसमें अधिकांशतः अहंकार की भावना ही काम करती है और अहंकारी व्यक्ति के पास यदि से सिद्धियाँ आ जायँ तो न वह अपना भला कर पाता है न दूसरों का ही कुछ हित साधन कर सकता है।
प्रथम तो परमात्मा ने मनुष्य के हित की दृष्टि से ही उन सिद्धियों को सबके लिए सुलभ नहीं बनाया है। इनका उपयोग और महत्व न जानने के कारण इनसे लाभ उठाने की अपेक्षा अहित होने का ही ज्यादा भय रहता है, उदाहरण के लिए यदि किसी के पास पूर्वाभास की क्षमता हो तो स्वाभाविक ही है कि उसे अपनी मृत्यु का समय पहले ही विदित हो जायगा। यदि पूर्वाभास के कारण सभी लोगों को अपनी मृत्यु का समय मुद्दतों पहले विदित रहने लगे तो लम्बा जीवन प्रेम रहने पर भी वह भयभीत उदास और खिन्न रहने लगेगा। सामान्य जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण में उदासीनता आ जायगी और मानसिक असंतुलन के कारण उससे कुछ करते धरते न बनेगा। जब अमुक समय से आगे पीछे नहीं ही मरना है तो चह किसी से भी प्रतिशोध लेने के लिए आक्रमणकारी बन सकता है, निडर होकर भी कुछ भी कर सकता है। मृत्यु का समय पहले ही मालूम हो जाने से व्यक्ति या तो निरन्तर खिन्न, उदास और बेबस रहने वाला निरीह प्राणी भर बन कर रह जायगा अथवा आगा पीछा न सोच कर कुछ भी कर डालने वाला दुर्दान्त नर पशु बन जायगा।
जीवित रहने का आनन्द तभी है जबकि मृत्यु का ठीक समय का ज्ञान न हो। इसके अतिरिक्त दूसरों के भविष्य को जान लेने पर यदि उसके दुर्दिन हुए तो कोई भी उससे संबंध नहीं बनाना चाहेगा और अच्छे दिन हुए तो हर कोई उसके आगे पीछे घूमने और चाटुकारिता करने लगेंगे। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का मनुष्य के प्रति स्नेह-सौहार्द्र सहयोग सद्भाव, पुरुषार्थ परिश्रम प्रभावित होंगे। इसलिए अनागत को न जान पान का प्रतिबंध लगा कर परमात्मा ने मनुष्य का भला ही किया है। अदृश्य हो जाने की सिद्धि भी परमात्मा ने, मनुष्य का हित देख कर ही उसे प्रदान नहीं की। यदि कोई अदृश्य होने की विद्या सीख ले तो वह बड़े से बड़ा अपराध करते रहने पर भी नहीं पकड़ा जा सकेगा। इस प्रकार मनुष्य का निजी व्यक्तिगत जीवन कुछ रह ही न जायगा। ‘चोर बड़ी आसानी’ से किसी भी व्यक्ति के घर में घुस कर उसका माल, सामान समेट लेंगे। पति-पत्नी के सम्बन्धों में लज्जा जैसी कोई बात रह ही न जायगी।
भविष्य को जानने और अदृश्य होने की सुविधा न देने के साथ परमात्मा ने मनुष्य की इन्द्रियों को भी उतनी ही क्षमता प्रदान की है जितनी से कि उसका काम भर चलता रहे। आंखें प्रकाश का एक नियत स्तर ही देख पाती हैं जबकि आँखों से न दिखाई पड़ने वाले, आँखों की दर्शन क्षमता से कम व अधिक स्तर के दृश्य भी इस संसार में मौजूद हैं। वे दिखाई नहीं देते और इसी कारण केवल काम की तथा उपयोगी वस्तुओं का देख पाना सम्भव है। कल्पना कीजिये यदि पानी, हवा, मिट्टी आदि में रहने वाले जीवाणु उतने ही स्पष्ट दिखाई देने लगे जितने कि माइक्रोस्कोप से दिखाई देता है तो फिर आँखों के समाने इन्हीं की भीड़ भरी रहेगी। तब काम के और बेकाम के दृश्यों का इतना अंधड़ सामने खड़ा होगा कि उन्हें देख का क्या हो रहा है यह निष्कर्ष निकाल पाना ही कठिन हो जायगा।
इसी प्रकार हमारे कान एक सीमित स्तर की ध्वनियाँ ही सुन पाते हैं। उनसे ऊँचे और नीचे कंपनों की असंख्य ध्वनियाँ अपने चारों ओर मंडराती रहती है। अंतरिक्ष में घूमते रहने वाले ग्रहों, उनमें होने वाले विस्फोटों के कारण होने वाली भीषण ध्वनियों को यदि सुना जा सके तो हमारा दुनिया में रहना ही दूभर हो जायगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे चारों ओर इतनी भीषण भयावह विस्फोट की ध्वनियाँ चौबीसों घण्टे गूंजती रहती हैं। कि जैसे हजारों बम एक साथ फटते हों। परन्तु हमारे कान उन ध्वनियों के लिए पहले से ही बहरे है। इसलिए जीवनक्रम सामान्य गति से चलता रहता है। कल्पना कीजिए कि यदि उन ध्वनियों को सुन पाना सम्भव रहा होता तो क्या शाँति पूर्ण ढंग से जिया जा सकता था, इसी प्रकार कितने हीं सूक्ष्म ध्वनि कम्पन भी हमारे इर्द-गिर्द घूमते रहते है। उन सभी ध्वनियों को सुना जा सकता तो लगभग उसी तरह की दशा होती जैसे कि एक ट्राँजिस्टर पर संसार भर के सभी स्टेशन बोलने लगें और विचित्र प्रकार की न समझ आने वाली मिश्रित ध्वनियाँ होने लगे।
ईश्वर की ओर से मनुष्य की आंखें, कान, नाक आदि इन्द्रियों को उतनी ही शक्ति मिली है जितनी से कि उनका कार्य सरलता पूर्वक चल सके। इसी प्रकार जिन सिद्धियों की,जिन उद्देश्यों से आवश्यकता है वे सामान्य प्रयास करने पर ही मिल जाती है। मनुष्य के लिए संभाषण, वार्तालाप, गायन और इसी प्रकार की दूसरी अन्य विशेषतायें अन्य प्राणियों की दृष्टि में देवोपम ही है। यह सब बातें मनुष्य के लिए निताँत सहज और ‘स्वाभाविक हैं। जहाँ भी असहज या असामान्य की आकाँक्षा उठी अथवा आरोपण किया गया वहीं अहं का उदय और भय की सृष्टि होने लगती है। पहली बार जिनने रेलगाड़ी देखी थी उन्होंने उसे कोई भयंकर दैत्य समझा था और भयभीत होकर भागे थे, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन आदि भी लोगों के लिए कम आश्चर्य जनक नहीं रहे हैं परन्तु इनकी वास्तविकता समझने के बाद लोग न तो इनसे डरते हैं और न दूसरों को डराते हैं क्योंकि यह सब निताँत सरल सामान्य ही है।
परमात्मा जिन व्यक्तियों को उपयुक्त समझता है उन्हें इस तरह की विशेष शक्तियाँ देता भी है, ताकि साधक उनके द्वारा दूसरों का भला कर सकें। लेकिन सिद्धियों का रहस्य जानने वाले समझते है। कि यह उनका लक्ष्य नहीं है। ये सिद्धियाँ तो ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी मंजिल पर चलते हुए मार्ग में एक से एक सुन्दर सुगन्धित फूल लगे मिल जाँय। उन फूलों की महक में ही कोई रम गया तो लक्ष्य से विचलित हो गया। इसलिए योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पातंजलि ने इन सिद्धियों को साधना मार्ग में विघ्न कहा है तथा उनसे अप्रभावित अनाकर्षित रहते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए कहा है। वह प्रगति सदाचार, नीति, सद्भाव और सत्कर्मों द्वारा ही होती है न कि चमत्कारी सिद्धियों द्वारा।
यज्जाग्रतो दूर मुदैति दैवं, तदु सुप्तस्थ तथैवैति। दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरंकं, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥
यजुर्वेद संहिता में इस तरह के अनेक मंत्र हैं, जिनका चौथा पाद है- ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ अर्थात् मेरे मन का संकल्प शिव हो, शुभ हो, कल्याणकारी हो। उसमें किसी व्यक्ति के प्रति पाप की भावना न हो।
मन के शुभ विचारों से सब प्रकार के घाव भर जाते हैं। जैसे वर्षा के जल से अकालग्रस्त क्षेत्र नंदन वन की तरह लहराते हैं, वैसे ही मन की शक्ति से एकाग्रता, प्रसन्नता और शांति प्राप्त होती है। अमेरिकी लेखक स्वेट मार्डेन ने कहा है- ‘यदि आप अस्वस्थ विचारों को मन में स्थान देंगे तो शरीर पर उनका बुरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। जैसा बिंब होगा वैसा ही प्रतिबिंब होगा।’
स्वास्थ्य नदी के प्रवाह की तरह है। जब तक सब अंग ठीक से काम करते हैं, तब तक शरीर में शक्ति और ताजगी रहती है। नदी के स्रोत की भांति स्वस्थ शरीर का भी स्रोत है, और वह है आपका मन।
चिकित्सा-विशेषज्ञों के अनुसार स्वार्थ-भावना, काम वासना और ईर्ष्या का प्रभाव यकृत तथा प्लीहा पर पड़ता है। घृणा और क्रोध का प्रभाव गुर्दों तथा हृदय पर पड़ता है। योग सूत्र में कहा गया है- ‘‘नाम उभयता बहति, पापायच बहति पुण्याय च बहति।’’ अर्थात् चित्त रूपी नदी दोनों तरफ बहती हैं- पाप की ओर भी और पुण्य की ओर भी।
लोग प्रायः रोगों के विषय में पुस्तकें पढ़कर यह सोचने लगते हैं कि उनमें किन्हीं रोगों के लक्षण मौजूद हैं। वे चिंतातुर हो जाते हैं। मन में किसी रोग के बारे में विश्वास जम जाने से शरीर अस्वस्थ होने लगता है, और उससे फिर चिकित्सा में भी अनावश्यक झंझट और बाधा उपस्थित हो जाती है। संकल्प का अर्थ है अच्छा इरादा। संकल्प महान रक्षक का काम करता है। शुभ संकल्प से व्यक्ति शिखर पर चढ़ सकता है, केवल कोरी कल्पना से नहीं। कुछ वर्ष एक विचित्र समाचार छपा कि एक पादरी बहुत बीमार हो गया। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। वह इतना कमजोर हो गया था कि सिर भी न उठा सकता था। उसने बतलाया कि मैंने भूल से अपने नकली दांत निगल लिए हैं और वे उसके आमाशय को चीरे डार रहे हैं। डॉक्टर ने एक्सरे द्वारा उसके पेट की जांच की और कहा कि आपका पेट ठीक है, आप अपने मन से यह विचार निकाल दें, परंतु इस बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ। कुछ दिनों बात पादरी के घर से तार आया कि आपके नकली दांत बिस्तर पर पड़े मिले हैं। बस पादरी का सारा दर्द हवा हो गया। अस्पताल के सभी लोग हंसने लगे।
छूत की बीमारी भी मानसिक दुर्बलता है। अगर व्यक्ति अपने खाने-पीने और सफाई का पूरा ध्यान दे, तो उस पर छूत का कोई असर नहीं हो सकता। यदि छूत की धारणा सत्य हो तो डॉक्टर उसकी पकड़ में क्यों नहीं आते? हमें सदैव रोग का विचार छोड़कर आरोग्य का चिंतन करना चाहिए। घृणा और पाप के विचार त्याग कर प्रेम और स्नेह के विचार पैदा करने चाहिए।
सारे कामों का आरंभ मन से होता है। मन श्रेष्ठ है। सारे कार्य मन की स्थिति पर निर्भर हैं। मनुष्य यदि दुष्ट मन से बोलता या काम करता है, तो दुख उसका वैसा ही पीछा करता है, जैसे गाड़ी में बैल के पीछे-पीछे चाक भागता है। यदि मनुष्य प्रसन्न और शुद्ध अंतःकरण से बोलता या काम करता है, तो सुख मनुष्य के पीछे-पीछे भागने वाली छाया की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ता।
ईमानदारी से भी रोग दूर हो जाते हैं। यदि स्वास्थ्य खराब होने का बहाना करके हम अपने दैनिक कर्तव्यों को पूरा नहीं करते तो मन पर उसका उल्टा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य आप ही अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु। सच्चरित्रता में विश्वास रखने वालों का आधार यही है। वेद-व्यास से लेकर आधुनिक विचारक इमरसन तक सभी महापुरुषों ने नैतिकता पर ही बल दिया है।
मौत को सदा के लिए टाला तो नहीं जा सकता पर उसे बहुत समय के लिए आगे खिसकाया अवश्य जा सकता है। जिंदगी को यदि सचमुच प्यार किया जा सके तो मौत का दिन समय से पूर्व न आने देने की सावधानी बरतनी चाहिए। यदि इस दिशा में सतर्क रहा जा सके। तो इतनी जल्दी मरने की आवश्यकता न पड़े जितनी कि आम लोगों को समय से बहुत पहले ही विदाई लेनी पड़ती है।
जीवन एक संप्रदाय है, जिसे प्राप्त करने वाले को उसकी सुरक्षा तथा सदुपयोग की बात भी सोचनी चाहिए। इसके लिए बहुत बड़ी योजना बनाने की आवश्यकता नहीं है; अपव्यय का बचाव करते रहने से भी काम चल सकता है। सभी जानते हैं कि आमदनी अधिक और खर्च कम होने से सम्पदा बढ़ती है। इसके विपरीत खर्च बढ़ता रहे और आमदनी घट जाए तो दरिद्र बनने एवं दिवालिया, होने में देर न लगेगी। जीवनी शक्ति का उत्पादन उपयुक्त आहार-विश्राम की व्यवस्था बनाये रहने से बढ़ता है। इसके विपरीत शक्तियों को उत्पादन से अधिक खर्च किया जाता रहे तो पूँजी के समाप्त होने पर टाट उलट जाने की परिस्थितियाँ ही बनेंगी। शक्ति का अपव्यय साँसारिक प्रयोजनों में दौड़-धूप तथा अधिक परिश्रम करने से नहीं होता जितना कि पाचन तंत्र के अनावश्यक भार वहन करने से होता है। आमतौर से लोग आवश्यकता से अधिक भोजन करने के आदी होते है। भूख से अधिक खाना एक ऐसा अपराध है जिसके बदले में अकाल मृत्यु का दंड भुगतान पड़ता है और दुर्बलता, रुग्णता से ग्रसित रहकर रोते-खीजते समय बिताना पड़ता है उसे मौत से पहले हथकड़ी, बेड़ी, काल कोठरी जैसी प्रताड़नाओं के समतुल्य समझा जा सकता है। औसत आदमी जितना खाता है उससे आधे में शरीर की आवश्यकता सहज ही पूरी होती रह सकती है। शेष आधार तो पाचन तंत्र की क्षमता को बर्बाद करने तथा उसे विषाक्त विकृत बनाने में ही लगा रहता है। सभी जानने हैं कि सामर्थ्य से अधिक वजन लादने पर भारवाही जानवर किस प्रकार दुर्बल होने और वे मौत मरते है।
पेट की थैली इसलिए नहीं बनी है कि उसका कोना-कोना ठसाठस भर दिया जाय। वस्तुतः वह गोदाम नहीं वर्कशाप है जिसमें जीवन रसों के उत्पादन से संबंधित अनेकों क्रिया -कलाप चलते रहते है। यह सारी जगह यदि सामान से ही भर दी जाय तो अन्य कार्य किस प्रकार सम्पन्न होते रह सकेंगे। पाचन रस प्रायः इतनी ही मात्रा में स्रावित होते है जो सीमित और स्वल्प मात्रा के आहार का ठीक तरह पाचन कर सकें। मंद आग के छोटे चूल्हे, पर यदि बड़े भगौने भरकर खिचड़ी पकाई जाय तो वह बहुत समय लगने पर भी कच्ची ही बनी रहेगी। यही बात हमारे अति मात्रा में खाये हुए आहार से होती है। वह पचकर शुद्ध रक्त के रूप में परिणित नहीं हो पाता- वरन् निरर्थक पड़े-पड़े सड़न उत्पन्न करता है और उस सडाँद की विषाक्तता जिस अंग में जितनी मात्रा में जा पहुँचती है वहाँ चित्र-विचित्र रोगों की उत्पत्ति होने लगती है।
अपच से दुहरी हानि है। एक तो शरीर निर्वाह के आवश्यक रसों का उत्पादन न होने से दुर्बलता छाई रहती है, दूसरे उस भार को ढोने और हटाने में इतनी शक्ति खर्च हो जाती है जो दिन भर के परिश्रम से किसी भी प्रकार कम नहीं होती। आजीविका आदि के लिए किया गया श्रम कुछ घण्टे का ही होता है और उसकी पूर्ति शुद्ध रक्त से होती रहती है। पर यदि चौबीसों घंटे निरन्तर पाचन तंत्र से अनावश्यक भार ढोते रहना पड़े और क्षति पूर्ति के लिए उपयुक्त रक्त आहार न मिले तो फिर क्षति पूर्ति कैसे होगी संचित पूँजी की इस प्रकार निरन्तर घटोत्तरी होती रहती है और दुर्बलता तथा जीर्णता के रूप में उस आन्तरिक दिवालियापन का परिचय मिलने लगता है।
यह सब हानियाँ अधिक भोजन करने के फलस्वरूप उठानी पड़ती है। समझा यह जाता है कि अधिक कमाने की तरह अधिक मात्रा में खाना भी लाभदायक होता है। अधिक खायेंगे तो अधिक पोषण मिलेगा। यह मान्यता इतनी अधिक भ्रम पूर्ण और अनावश्यक है कि फैली हुई अन्ध परम्पराओं में उसे अत्यधिक हानिकारक माना जा सकता है। इसी प्रकार शकर, मसाले और चिकनाई के सहारे भूरे तले गये खाद्य पदार्थ स्वाद के नाम पर सर्वत्र प्रतिष्ठा पाते, महंगे बिकते और स्वाद पूर्वक अधिक मात्रा में खाये जाते है। नशे बाजी की तरह, अधिक खाना भी एक आदत बन जाती है और पेट पर भारी वजन डाले बिना उस घुटन का समाधान ही नहीं होता है। मस्तिष्क पर दबाव डालने वाले नशे मनः क्षेत्र को भयंकर क्षति पहुँचाते हैं फिर भी अभ्यस्त लोगों को उस बर्बादी के बिना चैन ही नहीं पड़ता। ठीक इसी प्रकार स्वादिष्ट व्यंजनों को अधिक मात्रा में खाते रहने की आदत ऐसी बुरी है जिस प्रकारान्तर से छोटी आत्म-हत्या के समतुल्य ही ठहराया जा सकता है। यह तलवार की तरह एक झटके में काम तमाम नहीं करती और न विष खाने जैसे भयंकर दुष्परिणाम ही तत्काल सामने आते है। इतनी भर है इस कुटेव की हानि, कि दीमक की तरह जीवन वृक्ष की जड़ों को खोखली करने में लगी रहती है और उसे असमय में ही धराशायी बना देती है।
दूर-दर्शिता का तकाजा यह है कि तथ्यों पर विचार करने और बुद्धिमत्ता पूर्ण रीति-नीति अपनाने का रवैया अपनाया जाय। भूलो को सुधारा जाय और औचित्य को कसौटी मानकर जीवन चर्या को सुव्यवस्थित बनाया जाय। ऐसी में सर्वतोमुखी हित साधन है और उसी में प्रगतिशील, सुसम्पन्न, उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना सन्निहित है। बुद्धिमत्ता अपनाने और औचित्य को जीवन व्यवहार में स्थान देने का साहस जुट सके तो उसका सर्वप्रथम उपयोग, आहार संबन्धी अवांछनीयता के निराकरण में किया जाना चाहिए। क्योंकि जीवन की स्थिरता और समर्थता का इसी से सीधा सम्बन्ध है। पूँजी पल्ले हो तभी ही उससे लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा, यदि संचय ही बर्बादी ही अन्धी दौड़ की तरह चल रही है तो प्रगति दौर प्रसन्नता की बात बनेगी ही कैसे?
अनुशासन की सर्वत्र प्रशंसा और महिमा है। इस प्रवृत्ति का अभ्यास आत्मानुशासन से किया जाना चाहिए और इस संदर्भ में प्रथम चरण-आहार की मात्रा को नियन्त्रित किया जाना चाहिए। विशेष अपवादों की बात दूसरी है; पर आम नीति के संबंध में इतना कहा जा सकता है कि अभ्यस्त मात्रा में आधी नहीं तो एक तिहाई कमी कर देने की गुँजाइश निश्चित रूप से है ही। यदि यह अभीष्ट हो तो खाने से पूर्व ही भोजन की मात्रा निर्धारित कर लेनी चाहिए। उतना ही नपा तुला आहार एक बार लेकर दूसरी बार लेने के शिष्टाचार को समाप्त कर देना चाहिए।
भोजन परोसने में अधिक आग्रह इन दिनों शिष्टाचार और प्रेम प्रदर्शन का अंग बना हुआ हैं। खाने - खिलाने में यह शिष्टाचार एक आवश्यकता बना हुआ है। पर वस्तुतः यह प्रकारान्तर से शत्रुता जैसी अहितकर है। परोसे हुए सामान की या तो जूठन बचती है या पेट पर अवाँछनीय भार लदता है। आर्थिक हानि तो स्पष्ट ही है। यदि कम मात्रा में खाया जाय तो पैसे की बचत होगी और अन्न संकट की जो विभीषिका देश पर छाई रहती है उससे सहज ही छुटकारा मिलेगा। भोजन के समय यदि पास बैठना ही आवश्यक हो तो अन्य मनोरंजक चर्चाएं की जा सकती है। आवश्यक नहीं कि अधिक खाने और अधिक परोसने का आग्रह ही प्रेम प्रदर्शन का अंग माना जाय।
दावतों का यह नया ढंग किसी कदर अधिक उपयुक्त है जिसमें अपने हाथ से आवश्यक वस्तु स्वयं परोस लेने का क्रम चल तो गया है। इसमें आग्रह के व्यक्तिगत दबाव से छुटकारा पाने का मार्ग मिल जाता है। यह एक आँशिक अच्छाई है जो दैनिक आहार ग्रहण करते हुए भी अपनाई जा सकती है। किन्तु यह उपचार भी आधा अधूरा ही है। उचित यह है कि एक बार ही विवेक को कसौटी पर कस कर खाद्य पदार्थों की मात्रा थाली में रखी जाय। पहले से ही अपने पेट की थाह रखनी चाहिए कि उसमें कितना डाला जाना हैं। उस नाप-तोल का ध्यान रखते हुए आधा या दो तिहाई पेट पूरा कर सकने जितनी मात्रा रख लेनी चाहिए। इसके बाद और न लेने की नीति ही अपनानी चाहिए।
यहां एक बात और भी ध्यान में रखने योग्य है कि अभ्यस्त चटोरेपन की आदत को भी लगे हाथों निरस्त किया जाय और कुशल चिकित्सक की तरह क्षुधा निवृत्ति ही नहीं उपयुक्त पोषण दे सकने योग्य खाद्य सामग्री को ग्रहण करने के उपरांत मात्र चटोरापन पूरा करने वाली सामग्री को साहसपूर्वक पहली बार ही लौटा दिया जाय, देखकर बहुधा अपनी ललक लिप्सा जागृत हो उठती है और ऐसी वस्तुएं लेली जाती हैं जो स्वाद की दृष्टि से भले ही रुचिकर हों स्वास्थ्य की दृष्टि से नितांत हानिकारक होती हैं। बुद्धिमत्ता का अनेक प्रयोजनों में जिस तरह उपयोग किया जाता है उसी तरह यह भी विवेकशीलता की कसौटी रहनी चाहिए कि, स्वाद के नाम पर भारभूत एवं हानिकारक पदार्थों का चुनाव तो नहीं कर लिया है। सीमित मात्रा की तरह खाद्य पदार्थों के सुपाच्य होने की बात को भी प्रमुखता दी जानी चाहिए और इस संदर्भ में कठोर आत्मानुशासन बरतना चाहिए।
बाहर खाने जाना हो तब के लिए परोसने और चुनने की सतर्कता बरतने और स्वीकार अस्वीकार करने का प्रश्न उठता है। घर में तो पहले से ही सुनिश्चित नीति निर्धारित कर ली जानी चाहिए। खाद्य पदार्थों में क्या ग्रहण किया जायेगा और किन्हें वर्जित रखा जायेगा यह सूची पहले से ही निर्णित रहनी चाहिए। पकाने के ढंग में हलकी मंद आग का उपयोग होना चाहिए। भाप में पकाने की पद्धति अपनाई जा सके तो वह सर्वोत्तम है। शकर, मसाले चिकनाई लिए बिना काम न चले तो उनकी मात्रा स्वल्प ही रखी जाय। भूनने तलने की अपेक्षा उबालने को पर्याप्त समझा जाय। मात्रा नपी-तुली रहे। ध्यान बढ़ाने की ओर नहीं चलना चाहिए वरन् कमी और कटौती की बात सोची जाय। स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि पदार्थों की मात्रा से नहीं उनके ठीक तरह पच जाने से ही शक्ति मिलती है। मात्रा को नहीं स्तर को वरिष्ठता दी जानी चाहिए। ठीक तरह बना हुआ सुपाच्य भोजन स्वल्प मात्रा में होते हुए भी इतनी शक्ति प्रदान कर देता है जितना कि भारभूत आहार दस गुनी मात्रा में लेने पर भी प्रयोजन पूरा नहीं कर सकता।
यह छोटे-छोटे अनुशासन हैं जो खाद्य पदार्थों की मात्रा स्तर पर लगाये जा सकते हैं। बार-बार खाने और पूरी तरह चबाकर उदरस्थ करने की नीति भी ऐसी है जो आहार अनुशासन श्रृंखला का आवश्यक अंग समझी जानी चाहिए। ठूंस कर खाने और चटोरेपन के गले में बांधे रहने की कुटेव से यदि छुटकारा पाया जा सके तो समझना चाहिए मौत के दिन बहुत आगे धकेल दिए। जिंदगी की अवधि लंबी कर ली और समर्थ स्वस्थता का आनंद मिलते रहने की संभावना सुनिश्चित हो गई। थोड़े से आत्मानुशासन को अपनाकर यदि मौत को धकेलना और जिंदगी का अधिक लंबा अधिक रसास्वादन करते रहना संभव होता है तो निश्चय ही यह किसी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है।
अब्राहम लिंकन के एक मित्र ने समाचार-पत्र की एक कटिंग उनके सामने रखते हुए कहा, ‘देखिये न! लोग किस तरह से आपकी आलोचना करने में लगे हैं और आप चुप्पी ही साधे बैठे हैं क्यों इनका प्रतिवाद आप भी समाचार-पत्र को भिजवा दीजिए।’
अमेरिका के महान् राष्ट्रपति लिंकन का साधारण-सा उत्तर था, ‘‘मेरे प्यारे दोस्त यदि मैं आलोचकों की हर आलोचना को देखूं और उनके उत्तर छपाने का प्रयास करूं तो राष्ट्र के महत्वपूर्ण कार्य करने का भी समय न रहेगा। यह तो आप सब जानते हैं कि अच्छे ढंग से राष्ट्र की सेवा शक्ति भर में करता हूं, यदि मेरे कार्यों के परिणाम देश की जनता के हित में निकलते हैं तो आलोचकों की बातें स्वतः ही निरर्थक सिद्ध हो जायेंगी और यदि लोक-कल्याण की भावनायें नहीं होती, देशवासियों को सुख-सुविधाएं नहीं मिल पातीं, तो मैं क्या देवता भी आकर मेरे कार्यों का पक्ष लें तो भी कोई उस बात को सुनने के लिए तैयार न होगा।’’
शरीर यात्रा और परिवार पोषण के लिए धन उपार्जन आवश्यक है। इसके लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए। पर साथ ही वह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मानव जीवन की सार्थकता के लिए व्यक्तित्व को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत बनाने के लिए प्रयत्न किये जा रहे है या नहीं। समाज की ऋण मुक्ति और ईश्वरीय प्रयोजन पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर अनुदान प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। इन दोनों कार्यों के लिए श्रम,समय,चिन्तन, मनोयोग, प्रभाव, प्रतिभा और शक्ति को लगाया जाना चाहिए। यदि धन की लिप्सा ने अभीष्ट तृष्णा का रूप धारण कर लिया तो चिन्तन और थम पूरी तरह उसी दिशा में लगा रहेगा। फिर उच्चस्तरीय अध्यात्म प्रयोजन मात्र एक कल्पना की वस्तु बनकर रह जायेगा। फलतः व सारे कार्य अपूर्ण ही पड़े रहेंगे जिनके लिए मनुष्य जीवन का अनुपम उपहार मिला है। दूरदर्शिता इसी में है कि शरीर और परिवार के लिए धन उपार्जन में उतना श्रम किया जाय और मनोयोग लगाया जाय जिससे सामान्य निर्वाह की गाड़ी किसी प्रकार लुढ़कती रहे।
अनावश्यक धन उपार्जन कानूनी दृष्टि से अपराध नहीं है, उस पर मात्र शासकीय कर-व्यवस्था जैसे प्रतिबन्ध ही है। किन्तु सामाजिक दृष्टि से अति संग्रह और अपव्यय निश्चित रूप से अपराधों की श्रेणी में गिने जाने योग्य है। शास्त्र परम्परा में सीमित मात्रा में न्याय पूर्ण श्रमयुक्त आजीविका उपार्जन तक ही अपनी गतिविधियाँ सीमित रखने के लिए कहा गया है। देश वासियों की औसत स्थिति में निर्वाह करते हुए शेष को परमार्थ प्रयोजनों में लगा देने का निर्देश है। अनावश्यक संग्रह के दुष्परिणामों की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित किया गया है।
वेद में साधक भगवान से प्रार्थना करता है-
शिवा अर्स्मभ जातवदों नियच्छ। रमंता पुष्पा लक्ष्मीर्याः पापिस्ता अनीनशम्। प्रपतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रानुतःपत।
हे सर्वज्ञ परमेश्वर! हमें कल्याणकारी और पवित्र सम्पत्ति (लक्ष्मी) देना। पवित्र वन ही हमारे घर को
सुखी बनाये और अनीति, पाप से आये धन का नाश हो। हे पाप मय धन की देवी लक्ष्मी तू चली जा, अदृश्य हो जो और अति दूर चली जा।
धन की पवित्रता के लिए शास्त्र कहता है-
सर्वेषामेव शौचनामर्थशौच परं स्मृतम्। यार्न्थे शुचिहि स शचिर्न मृद् वारि शुचिः शुचिः॥
जिसका अर्थ पवित्र है उसी का जीवन पवित्र है। मिट्टी, पानी के उपयोग से अपने को पवित्र मानने वाला पवित्र नहीं क्योंकि समस्त प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता ही सर्वोपरि कही गयी है।
नेहेतार्थान प्रस..... न विरुद्धेन कर्मणा। न विद्य ( कल्प ) मानेण्त्रर्थेषुँ नात्यामपियतस्ततः॥ ( मनु )
पैसा धर्म विरुद्ध निन्दित कर्म करके न कमायें। जिसके पास गुजारे के लिए पैसा है वह भी जमा करने के लिए न कमायें।
अधिक धन संग्रह मनुष्य को चिन्ता ग्रस्त बनाये रहता है
राजतः संलिलादग्नेश्रोरतः स्वजनादपि। भयमर्थवताँ नित्यंमृतयोः प्राणभृतामिव॥ ( महाभारत )
धनवान् व्यक्ति शासक, राजा, कर्मचारी अग्नि, जल, चोर और अपने सम्बन्धियों से भी भयभीत रहते है। उन्हें सम्पत्ति उसी प्रकार चिन्तित किये रहती है जैसे प्राणी को मृत्यु।
अतः वनं उपार्जन को नीतियुक्त मार्ग अपनाया जाना चाहिए। शरीर निर्वाह एवं परिवार पोषण में कम से कम धन का प्रयोग करते हुए समाज के लिए, मानव मात्र के लिए बचे भाग को समर्पित करना ही धन की महत्ता एवं सदुपयोग है। अनावश्यक संग्रह तो विग्रह ही पैदा करेगा।
देश में आर्थिक क्रांति की आवश्यकता है इससे इनकार नहीं किया जा सकता। पिछली पंचवर्षीय योजनाएं इस प्रयोजन के लिए बनती रही हैं, पर उनसे कोई विशेष-प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ। कृषि, उद्योग आदि के जो साधन बढ़ते हुए थे वे जनसंख्या वृद्धि के कारण उत्पन्न होती रहने वाली नई आवश्यकताओं की तुलना नहीं कर पाते वरन् कुछ पीछे ही हट जाते हैं। मुद्रास्फीति के कारण रुपये के गिरे हुए मूल्य को देखते हुए प्रति व्यक्ति आय वृद्धि का थोड़ा-सा अनुमान लगाया भी जा सकता है पर वह काल्पनिक है क्योंकि बढ़ती जा रही महंगाई को देखते हुए उस तनिक-सी आय वृद्धि का कोई महत्व नहीं रह जाता। शिक्षितों और अशिक्षितों की बेकारी घटती नहीं वरन् लगातार बढ़ती ही जाती है। आजीविका ढूंढ़ने की प्रतीक्षा में बैठे हुए समर्थ लोगों की संख्या दो करोड़ से ऊपर है। स्त्री, बच्चे, वृद्ध, रुग्ण, अपंग इनके अतिरिक्त हैं। यदि काम मिले तो वे भी कुछ उपार्जन कर सकते हैं, पर काम है कहां? विदेशों का कर्ज बढ़ रहा है और अब तक जो लिया गया है उसकी ब्याज ही हर साल इतनी हो जाती है जिसे चुका सकना वर्तमान स्थिति को देखते हुए नितांत कठिन है।
स्पष्ट है कि आर्थिक कठिनाई के कारण प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, निवास जैसी प्राथमिक आवश्यकताएं अर्थ साधन मांगती हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि किसी विकासोन्मुख देश के नागरिकों की निर्वाह आवश्यकता भली प्रकार होते रहने के साधन उपलब्ध हों। कमी पड़ने पर कई तरह की विकृतियां उत्पन्न होती हैं। व्यक्ति स्वयं अविकसित रह जाता है और समाज की सुरक्षा एवं सुव्यवस्था खतरे में पड़ जाती है।
कहना न होगा कि पूंजी विनियोग, भूमि वितरण, संपत्ति का सीमाकरण, लघु उद्योगों का विकास आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो थोड़ी-सी प्रशासनिक प्रखरता जुटा लिये जाने पर ही संभव हो सकते है और कुछ ऐसे हैं जिनके लिए नई पूंजी की आवश्यकता पड़ेगी। विचारणीय है कि क्या ऐसा वर्तमान स्थिति में नहीं हो सकता? भूमि वितरण और संपत्ति सीमा निर्धारण में थोड़े से कानूनी हेर-फेर करने और उन पर ईमानदारी से अमल करने भर से बहुत बड़ा काम हो सकता है। पूंजी जुटाने के लिए नये स्रोत ढूंढ़ने की अपेक्षा जो उपलब्ध है उसे ही हथियाने में क्यों कठिनाई होनी चाहिए? बांचु समिति का अनुमान है कि देश में 7000 करोड़ रुपये का काला धन है। इसमें थोड़ी-सी चतुरता का परिचय देकर इसमें से आधा धन तत्काल नये उद्योगों के लिए प्राप्त किया जा सकता है। साधन संपन्न लोगों पर 850 करोड़ रुपये की कर वसूली पड़ी हुई है। इसमें से समझौते की नीति अपनाकर भी आधी रकम प्राप्त की जा सकती है। सहकारी समितियों के माध्यम से दिया गया 300 करोड़ रुपये का ऋण ऐसे ही कागजी बन गया है। यह जिस समझ के साथ लिया और दिया गया है उसने यह रकम एक प्रकार से दलदल में फंसा दी है। तो भी प्रयत्न करने पर आधा पैसा लौट ही सकता है। सरकारी उद्योगों में 5000 करोड़ रुपये का धन लगा हुआ है। यदि इनका संचालन नीतिपूर्वक हो तो 10 प्रतिशत शुद्ध लाभ मिल सकता है और 500 करोड़ रुपया वार्षिक की नई आय हो सकती है। इसके अतिरिक्त खाली जमीनों का राष्ट्रीयकरण जैसे अन्य उपाय भी हैं जिनसे राष्ट्रीय पूंजी बढ़ाकर उसे देश की आर्थिक प्रगति के साधन जुटाने में लगाया जा सकता है।
काले धन को ही लें। वह पूंजीपतियों के पास जितना है उससे कहीं अधिक राजनेताओं और बड़े अफसरों के पास है। नेताओं को चुनावों में अनाप-शनाप खर्च करने के लिए तथा अपनी मजबूती के लिए पैसा चाहिए। अफसर बहती गंगा में हाथ धोने से क्यों चूूूूूूूूकें? उन्हें कमाना तो उन्हीं से है जिनके पास काले धन के स्त्रोत है। यदि वे बन्द हो जायेंगे तो उन्हें कहाँ से मिलेगा। ऐसी दशा में बाहर से रोकथाम का ढोल पीटने पर भी ये कालेधन की उत्पत्ति साधनों का प्रश्रय दिये रहती है। इस स्थिति में काला धन उन्हीं छोटे लोगों में बटोरा जा सकता है जो इन बड़े आदमियों के संपर्क से दूर हैं। इस स्थिति के रहते टैक्सों से होने वाली आय का उचित अंश सरकार को मिल सकेगा ऐसी संभावना कम ही है।
उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का लाभ जनता को-सरकार को मिलना चाहिये। उद्योगों के लिए दिये गये ऋण के फल स्वरूप बेकारी दूर होनी चाहिये। पर पर्यवेक्षण करने पर निराशाजनक तथ्य ही सामने आते है। जिनके हाथ में इन सूत्रों के संचालन का उत्तरदायित्व है वे उसे निबाहने में प्रयोग अथवा असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं।
श्रम संगठनों का उद्देश्य न केवल श्रमिक स्वार्थों का अधिकाधिक पोषण होना चाहिए वरन् यह भी होना चाहिए कि श्रम शक्ति का समुचित लाभ समाज को मिले। काम के घंटे बर्बाद करने, आलस्य और उपेक्षा बरतने, टकराव, तोड़−फोड़ और हड़तालों का माहौल बनाये रहने भर के लिए यदि श्रम, संगठन बनते और चलते हैं तो उनसे देश की आर्थिक समृद्धि में क्या योगदान मिलेगा?
भूमि सीमा सुधार कानून बने हुए मुँढृतें बीत गई। देश की 34 करोड़ एकड़ जमीन में से लगभग 3 करोड़ एकड़ जमीन वितरण योग्य थी। उसमें से केवल घटिया दर्जे की 20 लाख एकड़ जमीन प्राप्त की जा सकी है। बाकी मिली भगत के पेट में चली गई। यदि ईमानदारी से वह कार्य हुआ होता तो अन्न उत्पादन बढ़ता और देहात के बेरोजगारों को काम मिल सकता था।
शहरी बड़े उद्योगों और कारखानों की ओर ताकते रहने की अपेक्षा-असली भारत की ओर ध्यान देना पड़ेगा जो छोटे देहातों में बिखरा पड़ा है। इसके लिए सिंचाई, भूमि विकास, वन विकास, विद्युतीकरण, गृह-निर्माण, सड़क निर्माण, पशु व्यवसाय, पेय जल पूर्ति, लघु उद्योग विकास जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है पर कार्य नौसिखिये बाबू लोगों की कागजी घुड़दौड़ और ठेकेदारी के नये स्त्रोत खोल देने भर से पूरे नहीं हो सकते। इन कार्यों पर अब तक करोड़ों रुपया खर्च हो चुका है पर उसका परिणाम देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि इस प्रयोजन में लगे हुए श्रम, बुद्धि धन तथा साधनों का ठीक उपयोग हो गया।
सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में आर्थिक प्रगति के लिए अपने-अपने ढंग से जो प्रयत्न हो रहे हैं उनके बाहरी स्वरूप में नुकता चीनी करने की गुंजाइश नहीं है पर एक बहुत बड़ी कमी रही जाती हैं सचाई और तत्परता की कमी, यह तत्व जब तक पैदा न किया जायगा प्रचुर प्रयास और असीम साधन होते हुए भी कोई कहने लायक सफलता हाथ न लगेगी और चिरकाल तक समृद्धि के दिवा स्वप्न देखते हुए प्रतीक्षा में बैठा रहना पड़ेगा।
साधन स्वल्प होने से भी काम चल सकता हैं। आवश्यकता चरित्र निष्ठा की है। इस दिशा में मार्गदर्शन उन्हें करना चाहिए जिन्हें नेतृत्व का अवसर प्राप्त है। उचित और सरल यही है कि अर्थ व्यवस्था से लेकर शिक्षा सुरक्षा तक के सभी क्षेत्रों में लोक नायकों की असंदिग्ध ईमानदारी और कर्तव्य परायणता काम करे। तब नौकरशाही की वे चालें भी निरस्त हो जायेंगी जो सरकारी धन और जनता की सुविधा से खिलवाड़ करती रहती है और प्रगति के रथ को आगे बढ़ने देने की अपेक्षा पीछे ही घसीटती हैं।
असावधान नेतृत्व जनता में नव चेतना उत्पन्न नहीं कर सकता और असावधान जनता पर से असावधान नेतृत्व का लदा भार हल्का नहीं हो सकता। हमें सर्वतोमुखी सतर्कता और प्रखरता उत्पन्न करनी होगी जिसका सबसे पहला कदम होगा चरित्रनिष्ठा की पुनः प्रायः प्रतिष्ठा। यह सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से आवश्यक है। इस आवश्यकता को पूरा किये बिना हम न तो आर्थिक प्रगति का स्वप्न, पूरा कर सकेंगे और न अन्य क्षेत्रों में समृद्ध सशक्त बन सकेंगे।
एकाकी और सामूहिक प्रयत्नों की सफलता के स्तर में भारी अन्तर रहता है। अलग-अलग रहकर दस आदमी अलग प्रयत्नों से जितना काम कर सकते हैं उनकी तुलना में उन दसों का संयुक्त प्रयत्न कहीं अधिक परिणाम उत्पन्न करेगा। अलग-अलग रहकर सींकें उतनी सफाई नहीं कर सकतीं जितनी कि उन्हें मिलाकर बनने वाली बुहारी द्वारा संभव होती है। ठीक इसी प्रकार अलग-अलग की जाने वाली उपासना व्यक्ति एवं वातावरण को परिष्कृत करने में जितनी उपयोगी सिद्ध होती है उसकी तुलना में एक संकल्प सूत्र में आबद्ध होकर एक तत्त्वावधान की गई साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास, सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना की तुलना में कहीं अधिक होती है।
शब्द शक्ति का संयुक्त समावेश कितना प्रभावी होता है इसका एक प्रमाण तब मिलता है जब किसी भारी वजन को ऊपर उठाने या आगे धकेलने के लिए मजूर लोग एक नारा लगाकर, एक साथ अपनी सामर्थ्य को केन्द्रित करते हैं। प्रातः सायं मंदिरों में होने वाली आरती, विद्यार्थियों की सामूहिक प्रार्थना में भी यही विशेषता रहती है कि संयुक्त मन, संयुक्त भाव प्रवाह से उत्पन्न शब्द शक्ति उच्चारण कर्ताओं से लेकर अन्य असंख्यों के समग्र वातावरण को प्रभावित करने में विशेष रूप से फलप्रद होती है।
ध्वनि शक्ति के संदर्भ में जो शोध कार्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में चल रहा है उससे सामूहिक उच्चारण की प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में नये तथ्य सामने आये है। एक निष्कर्ष यह निकला है कि संसार के 50 प्रतिशत व्यक्ति भी यदि सक्रिय हों तो वे शब्दों तथा ध्वनियों द्वारा 3 घंटे में छः हजार खरब वाट विद्युत शक्ति पैदा करते है, जो भारत में पैदा की जाने वाली कुल ऊर्जा से 8 गुना ज्यादा है। सम्पूर्ण विश्व में इस ऊर्जा से घण्टों प्रकाश किया जा सकता है।
साधारणतया वाणी का उपयोग बातचीत के एवं जानकारियों के आदान-प्रदान हेतु ही होता है। यह उसका अति स्थूल प्रयोग हैं शब्द की सूक्ष्म शक्ति और उसके उपयोग की विधि को जाना जा सके तो उससे जितने गुना लाभ आमतौर से उठाया जाता है, उससे असंख्य गुना उठाया जाना सम्भव हो कसता है।
शब्द के साथ जुड़ा विद्युत प्रवाह कितना प्रचंड है इसे पदार्थ विज्ञानवेत्ता जानते है और उसी ज्ञान के आधार पर रेडियो, टेलीविजन, रैडार आदि यंत्रों का निर्माण करते है। आज इसी शब्द शक्ति के आधार पर शरीर की विभिन्न गहरे पर्तों में छुपी व्याधियों का निदान भी सम्भव है। इकोएनसेफेलोग्राफ द्वारा प्रतिध्वनि प्राप्त कर मस्तिष्क को बीमारियों का पता लगाया जा सकता है तो उसी तरह इकोकार्डियोग्राफ द्वारा हृदय की व्याधियों का। आवाज मुँह से निकलने वाली ‘हवा’ मात्र ही नहीं है। वह एक शक्तिशाली ऊर्जा (एनर्जी) की तरह है।
उच्चारित शब्द कान व त्वचा पर सीधा प्रभाव डालते हैं। कान एक प्रकार का माइक्रोफोन है जिसमें 02 से 20,000 आवृत्तियों का प्रवेश होते ही एक धारा प्रवाहित होने लगती है। सीधे मस्तिष्क तक पहुंचकर यह शरीर के सभी भागों एवं ग्रंथियों को क्रियाशील बना देती है। मनुष्य के शरीर, विचारणा एवं भाव स्थिति की विविध क्षमताओं का समन्वय करने से विद्युत प्रवाह प्रस्तुत होता है; उसकी क्षमता को अध्यात्म तत्त्ववेत्ताओं ने समझा है और उसी आधार पर मंत्रविद्या का आविष्कार किया है।
उच्चारित शब्दों का श्रोता के मस्तिष्क पर दो तरह से प्रभाव पड़ता है। पहला मुख से शब्द निकलने के पूर्व वक्ता के मस्तिष्क से कुछ उसी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय लहरें निकलती है जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने का प्रयत्न करता है। दूसरा-उच्चारित शब्द वायुकंपनों के माध्यम से विद्युत संचार के रूप में कर्णरंध्रों से होते हुए मस्तिष्क तक पहुंचकर विभिन्न आवेग उत्पन्न करते हैं। अपमान सूचक शब्द कहने से दूसरों को किस तरह क्रोध आता है एवं फलस्वरूप अनर्थ होता है- इसका उदाहरण द्रौपदी के थोड़े शब्दों से महाभारत का हो जाना है। दुखद शोकसंताप की घटना सुनकर कैसा बुरा हाल हो जाता है। शब्दों की भावोत्तेजक क्षमता स्पष्ट है। भावनाओं को उभारने तथा तरंगित करने का काम संगीत कितनी अच्छी तरह करता है, यह सर्वविदित है।
मंत्रविज्ञान द्वारा समस्त सूक्ष्म जगत को प्रभावित करना संभव है। सितार के तारों पर क्रमबद्ध उंगलियां रखने से जिस तरह विभिन्न प्रकार की स्वर लहरियां निकलती हैं उसी प्रकार शब्दों के एक उच्चारण का एक लयबद्ध क्रम रहने से उसमें भी विशेष प्रकार के, विशेष शक्तिशाली कंपन उत्पन्न होते हैं। मंत्रों के अक्षरों के क्रम तथा उनके उच्चारण की विशेष विधि-व्यवस्था का ही अधिक महत्व है। कंठ, तालु, दांत, होठ, मूर्धा आदि जिन स्थानों से शब्दोच्चारण होता है उनका सीधा संबंध मानव शरीर के सूक्ष्म संस्थानों से है। षट्चक्र, उपात्मक एवं दिव्य नाड़ियों, ग्रंथियों का सूक्ष्म संस्थान है, जिनसे हमारे मुखयंत्र के तार जुड़े हुए हैं। जब मंत्र गुंफनों का प्रभाव उक्त संस्थानों पर पड़ता है तब एक अतिरिक्त शक्ति तरंगों का प्रवाह चल पड़ता है। जो मंत्रविज्ञानी को लाभान्वित करता है, उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाता है। जब वे कंपन बाहर निकलते हैं तो वातावरण को प्रभावित करते हैं। ये कंपन सूक्ष्म जगत में अभीष्ट परिस्थितियों का सृजन करते हैं और व्यक्ति विशेष को प्रभावित करना हो तो उस पर भी असर डालते हैं।
भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में शब्दों की इन्हीं प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी ‘‘सायकोलॉजीकल वार’’ या (स्नायविक युद्ध) के अंतर्गत आता है।
इसी शब्द शक्ति का उपयोग करके पिछले दिनों कनाडा के उत्तरी भाग में हजारों वर्गमील के क्षेत्र में सोवियत रूस द्वारा रोगवर्धक तरंगें फैलायी गयी थीं। जिनसे वहां के निवासियों में चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव, डिप्रेशन आत्महत्या की प्रवृत्ति देखने में आयीं। विश्लेषण करने पर मालूम हुआ कि किसी स्थान विशेष से तरंगें छोड़ी जा रही हैं जो कहीं निश्चित आवृत्तियों में होने से मानसिक क्षमताओं पर ऐसा प्रभाव छोड़ रही हैं। इस तरह शब्द शक्ति का दुरुपयोग कर ‘साउण्ड वार’ भी आरंभ हो गया है। दूसरी ओर चिकित्सकों ने ध्वनिविज्ञान का सहारा लेकर ‘साउण्ड थेरेपी’ नामक एक नयी ही चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है जिससे शरीर के विभिन्न भागों में दर्द आदि कष्टों का इलाज किया जाता है। ध्वनि के कंपनों द्वारा परमाणु को सूक्ष्मतम भागों में विभाजित करना अब संभव है। इन सबके मूल में हमारे ऋषि मनीषियों द्वारा प्रतिपादित मंत्रशक्ति है जिसमें ध्वनि विज्ञान का आश्रय लेकर सूक्ष्म संस्थानों व वातावरण को प्रभावित किया जाता है।
पाश्चात्य देशों में शब्द-शक्ति के रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी मनोवैज्ञानिक आई.पी. पावलोव ने शब्दों को अत्यंत शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवर्त्त (उत्तेजक) ‘कण्डीशन्ड रिफ्लेक्स’ की संज्ञा दी है। शब्द-शक्ति पर पावलोव ने विशद कार्य किया है, जो विश्व प्रसिद्ध है। शब्द-शक्ति का महत्व वैज्ञानिक जानते हैं व उसे अब उपयोग में भी लाने लगे हैं। यदि यह सब संभव है तो मंत्र-विद्या की सामर्थ्य को समझकर हम उसका समुचित उपयोग कर भौतिक उन्नति से कम नहीं बल्कि कई गुनी अधिक लाभदायक आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं।
यह शब्द-शक्ति तब और भी अधिक प्रखर हो उठती है जब उसका भावनात्मक तारतम्य एवं उच्चारण का प्रवाह सामूहिकता को अपनाले। वेद-मंत्रों को सामगान के स्वर क्रम में गाने वाले उद्गात अपने उपक्रम से चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करते हैं। यज्ञानुष्ठानों में भी यही शब्द सहकार एक महत्वपूर्ण तथ्य होता है और उसका प्रभाव भी असाधारण ही होता है।
स्थूल रूप से मनुष्य का जो स्वरूप दिखाई देता है वह उसकी काया, बुद्धि, व्यवहार और श्रमशीलता ‘लगन’ पुरुषार्थ का ही सम्मिश्रण है। इस बहिरंग स्वरूप के बल पर कितनी ही लौकिक सफलतायें प्राप्त की जा सकती है। साधारण सामान्य दीन स्थिति से ऊपर उठ कर असाधारण असामान्य संपन्न स्थिति तक पहुँचने वाले व्यक्ति अपने श्रम, लगन, सूझ-बूझ और व्यावसायिक कौशल का ही प्रयोग करते हैं। अचर्चित और असाधारण वर्ग के लोग अपनी सेवा, लोक साधना, प्रचार, जनसंपर्क और व्यवहार कुशलता के बल पर ख्याति अर्जित कर लेते हैं। दुर्बल से ‘बलवान, अख्यात से विख्यात, मंदबुद्धि से बुद्धिमान, निर्धन से धनवान आदि सफलतायें बहिरंग सत्ता की ही उपलब्धियाँ कही जा सकती हैं।
मनुष्य की बहिरंग उपलब्धियाँ और सफलताएँ भी उल्लेखनीय प्रशंसनीय हैं। परन्तु उन उपलब्धियों को जिस आसानी से प्राप्त किया जा सकता हैं उतनी ही जल्दी व्यक्ति उन्हें गँवा भी देता है। अपने प्रयत्नों में जरा कहीं चूक हुई नहीं कि व्यक्ति उस स्तर से गिर पड़ता है। सरकस में तार पर चलने का खेल दिखाने वाले कलाकार बड़े अभ्यास पूर्वक यह सिद्धि प्राप्त करते है फिर भी जरा सी चूक उन्हें गिराने के लिए काफी होती है। इन उपलब्धियों में कहीं टिकाऊपन नहीं है।
आँतरिक दृष्टि से सफल ओर सशक्त व्यक्ति हर परिस्थिति में स्थिर दिखाई देते हैं और अपने उच्च प्रयोजनों में अनवरत संलग्न रहते है। मनुष्य की अन्तरंग सामर्थ्य को जगाने और उसके सदुपयोग करने के विज्ञान का नाम ब्रह्मविद्या है। ब्रह्मविद्या के बल पर ही व्यक्ति आन्तरिक दृष्टि से वह ऊर्जा प्राप्त करता है, जिससे बड़े-बड़े कार्य संपन्न किए जाते हैं। उस ऊर्जा के बल पर किये गये कार्य टिकाऊ परिणाम भी उपलब्ध करते हैं और उनसे असंख्य आत्माओं, सभी समुदायों और सभी वर्गों को लाभ भी पहुँचता है। वर्षा के दिनों में जब हर कहीं पानी उपलब्ध होता है तो पोखर तालाबों का उतना महत्व नहीं रहता। लेकिन गर्मी और सूखे के दिनों में जब पानी दुर्लभ हो जाता है तो वे पोखर, तालाब भी लगभग रीत जाते है। इसके विपरीत गंगा, यमुना जैसी नदियाँ जो अक्षय जल-संपदा के भंडार हिमालय से जुड़ी रहती हैं, ऐसे समय में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है।
युग परिवर्तन जैसा महत् कार्य उन अन्तरंग सामर्थ्यवान व्यक्तियों के बल पर ही सम्भव है जिन्होंने ब्रह्मविद्या को अपने जीवन का आधार बनाया है तथा जिन्होंने अपना सम्बन्ध उस महाशक्ति से जोड़ा है जिसके बल पर इतने बड़े कार्य संपन्न हो सकते हैं। इस तरह के कार्यों को संपादित करने के लिए सीखी और सिद्ध की जाने वाली ब्रह्म विद्या के बीज सूत्र का नाम गायत्री है। गायत्री के एक-एक अक्षर में वह तत्वज्ञान सन्निहित है जिसकी व्याख्या में ब्रह्म विद्या का इतना व्यापक विस्तार हुआ है।
लौकिक पूँजी और भौतिक सामर्थ्य की अपने स्थान पर उपयोगिता है पर उसे आधार मान कर नहीं चला जा सकता है। व्यापक परिवर्तन के महान उद्देश्य इन साधनों के बल पर सम्भव नहीं है। कई देशों में भौतिक साधनों और शक्तियों के द्वारा परिवर्तन के प्रयास हुये भी है। परन्तु उन्हें आँशिक ही सफलता मिल पाई। आँशिक सफलता भी बाहरी दबाव और दण्ड के भय से मिली। अन्यथा जहाँ भी जब भी जिसे अवसर मिला वहीं हर किसी ने अपने उन स्वार्थों को पूरा करने में जरा भी चूक नहीं आने दी, जिन्हें सामाजिक या राष्ट्रीय अपराध घोषित किया गया। इसका एक मात्र कारण है व्यक्ति को प्रभावित करने, निर्देशन देने और किसी दिशा में नियोजित करने के प्रयासों का अभाव।
यह प्रयास केवल आत्मशक्ति संपन्न व्यक्ति ही कुशलता पूर्वक कर सकते है। व्यक्ति वही कुछ नहीं है जो बाहर से दिखाई देता है; बल्कि उसकी मूल सत्ता तो उसकी चेतना है जहाँ आस्थाओं की जड़ें विद्यमान रहती हैं, निष्ठाओं के बीज जड़ें पोषण और अंकुरण को प्राप्त करते है। आस्थाओं का शोधन और निष्ठाओं का परिष्कार किए बिना सुधार के सभी प्रयास व्यर्थ जाते हैं।
आस्थाओं का परिष्कार ही सर्व निर्माण का मूल आधार है और यह कार्य आत्मशक्ति सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना संभव है। शरीरबल, बुद्धिबल, धनबल, मनोबल का अपना महत्व है परन्तु उनके उपयोग की दिशा भी व्यक्ति की चेतना पर निर्भर करती है। व्यक्ति की चेतना यदि निकृष्ट स्तर की है तो वह इन बलों का प्रयोग कर अपना व समाज का भारी अहित ही करेगा बाहर से लाख प्रतिबन्ध लगायें जाने पर भी उसके प्रयासों को रोक पाना आसान नहीं होगा। यदि रोक भी दिया गया तो वह बल बिना उपयोग में आई संपत्ति की तरह व्यर्थ पड़ा रहेगा। इसके विपरीत यदि परिष्कृत चेतना द्वारा इन साधनों का उपयोग किया जाय तो उसके सभी पक्षों में सत्परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं।
आत्मशक्ति के द्वारा मनुष्य की व्यष्टिगत और समष्टिगत चेतना को परिष्कृत करके जिस नये युग के अवतरण की चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है, उसे यदि एक सूत्र में व्याख्यायित किया जाना हो तो वह सूत्र होगा- ‘मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण।’ इस लक्ष्य को प्राप्त करने -स्वप्न को साकार करने का मार्ग-दर्शन गायत्री के प्रत्येक अक्षर में निहित है।
गायत्री को गुरुमन्त्र कहा जाता है। गुरुतत्त्व द्वारा मिलने वाली श्रद्धा, प्रेरणा, भाव संवेदना एवं अनुशासन का प्रकाश गायत्री मन्त्र में सन्निहित है। इसीलिए गायत्री को गुरुमन्त्र कहा जाता है। कितने ही मंत्र हैं, वैदिक, पौराणिक, ताँत्रिक। मन्त्रों की संख्या का ठीक-ठीक अनुमान भी लगा पाना सम्भव नहीं है। ऐसी स्थिति में गायत्री को ही गुरुमन्त्र क्यों कहा गया? यह विचारणीय हो सकता है। भारतीय संस्कृति में गुरु की व्याख्या करते हुए उसके दो महत्वपूर्ण कार्य बताये गए हैं एक- ज्ञान वर्धन और दूसरा-अशुभ निवारण। गायत्री की शक्ति के दो पक्ष है पहला सृजनात्मक और विध्वंसात्मक गायत्री की सृजनात्मक शक्ति को ब्रह्मविद्या कहा जाता है। और ध्वंसात्मक शक्ति को ब्रह्मास्त्र। साधक की तुलना राजहंस से की जाती है जिस पर आरूढ़ गायत्री साधक का कल्याण करती है और दुखदायी विघ्नों का निवारण करती है।
इसी शक्ति की चर्चा जब युगशक्ति के अवतरण संदर्भ में की जाती है तो (1) परित्राणाय साधूनाँ और (2) विनाशाय दुष्कृताम् की अवतार प्रतिज्ञा पूरी होती हैं। सृजन और ध्वंस एक सम्मिलित पूरक प्रक्रिया है। नया कुछ निर्माण करना हो तो पहले जमीन पर उगी हुई खर-पतवार उखाड़नी पड़ती है, कपड़े को रँगने के लिए पहले धुलाई कर उस पर जमा मैल साफ करना पड़ता है। किसी भी क्षेत्र में निर्माण कार्य तभी पूरा होता है। जब वहाँ उपस्थित कूड़ा-कबाड़ा, गन्दगी, मलीनता और कषाय कल्मष हटाए जाँय।
भारतीय शास्त्रों में जिन 24 अवतारों का उल्लेख आता है उनकी यही क्रिया पद्धति रही। अधर्म का अनीति; आतंक का निवारण और धर्म, नीति सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन अभिवर्धन। इस संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है- अवतारों की संख्या 24 ही क्यों गिनी जाती है? जब कि समय-समय पर कितनी ही विभूतियाँ अवतरित होती रहीं और अपनी निर्माण प्रक्रिया को पूर्ण करती रहीं। इस संख्या में नाम या क्षेत्र विशेष का महत्व नहीं है। वस्तुतः संकेत युगशक्ति के रूप में अवतरित होती रहने वाली गायत्री महाशक्ति की ओर है। उसे नाम और रूप भले ही चाहे जो दिया जाता रहा हो।
गायत्री के 24 अक्षरों में वे सभी सिद्धाँत सूत्र रूप में सन्निहित है जिनके आधार पर युगाँतरकारी परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। ईश्वरीय शक्ति का अवतरण प्राकट्य हर ऐसे संधिकाल में होता है जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रियाकलाप में हेर फेर अवश्य होता रहता है। हिरण्याक्ष राक्षस जब धरती को समुद्र में ले जाकर छुप गया तो भगवान् को बाराह का रूप धारण करना पड़ा। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह न मनुष्य से मारा जा सकेगा, न मल्ल युद्ध में मारा जा सकेगा न शस्त्र युद्ध में। इसलिए भगवान को मनुष्य और सिंह का सम्मिलित रूप धारण कर दोहरी में नखों को शस्त्र की तरह उपयोग कर हिरण्यकश्यप का संहार करना पड़ा। इसी प्रकार आततायियों का संहार करने के लिए परशुराम मर्यादा की स्थापना के लिए राम, योग का कर्म प्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्राँति के लिए बुद्ध से अवतरित होना पड़ा। इस अवतरण प्रक्रिया में कहीं भी जड़ता नहीं है, अधर्मं का विनाश और धर्म की स्थापना ही प्रधान लक्ष्य रहा है।
आज की परिस्थितियाँ भिन्न है। पहले असुरता सीधे आक्रमण करती थी और समाज व्यवस्था को अस्त-व्यवसिता तहस-नहस करती थी। आज असुरता ने छद्म आक्रमण को नीति अपनाई है और वह जन मानस में विकृतियाँ उत्पन्न कर रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा इस व्यापक स्तर पर होने लगी है कि उनके लिए कटिबद्ध व्यक्ति अपवाद बनते चले जा रहे हैं। ईश्वर के आस्तित्व को मानने और देवस्थानों पर प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वालों का अभाव नहीं है, अभाव है उन व्यक्तियों का जिन्हें सच्चे अर्थों में आस्तिक कहा जा सके। ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने वाला उतना नास्तिक नहीं है जितना कि उसे मानते हुए भी आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा करने वाला। फलतः इन दिनों चारों ओर जितने भी संकट जितनी भी समस्यायें दिखाई देती है, उनके मूल को खोजें तो विदित होगा कि आज का संकट आस्थाओं का संकट है।
इस बार नवयुग की, युग गायत्री की अवतरण प्रक्रिया भी असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से पूर्ण होगी। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों का स्वरूप भी भिन्न होगा। अवाँछनीयता, असुरता को निरस्त करने का यह धर्मयुद्ध धर्मक्षेत्र में-अन्तःकरण की गहराई में उतर कर लड़ा जाना है और जन मानस के परिष्कार द्वारा आस्थाओं के परिशोधन द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल वालों की- रीछ वानरों की भूमिका निभाने, कि लिए हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना है।
गायत्री तत्वज्ञान की जानकारी जन-जन तक पहुँचाना युगशक्ति के विस्तार का प्रथम चरण है। अब तक यह प्रयास लेखनी और वाणी द्वारा किया जाता रहा। व्यक्तिगत रूप से लाखों साधकों ने इस तत्वज्ञान को अपनाने में तत्परता दर्शायी और उसके अभीष्ट परिणाम भी उत्पन्न हुए। पिछले दिनों इन प्रयासों में सामूहिकता का समावेश किया गया जिसे इस युग की नवीनता और विशेषता कहा जा सकता है। व्यक्तिगत सफलतायें तो असंख्य हैं और उत्साहजनक भी; परन्तु महत्वपूर्ण उल्लेखनीय सामूहिक प्रयासों को ही समझा जाना चाहिए। पिछले दिनों साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में एक लाख साधकों ने मिल कर प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जाप का अभियान चलाया। यह इस युग का अद्वितीय और अपने आप में अकेला प्रयास था। इस अभियान का वातावरण पर, जन मानस पर जो सूक्ष्म प्रभाव पड़ा तो वह स्पष्टतः दिखाई पड़ सकता है। गायत्री यज्ञों के रूप में सामूहिक आयोजनों की जो अभियान श्रृंखला चल पड़ी है वातावरण के निर्माण और सूक्ष्म जगत के परिवर्तन में उनका भी अपना विशिष्ट स्थान है।
यह सूक्ष्म परिवर्तन स्थूल आंखों से होते हुए नहीं दिखाई दे सकते। परिवर्तन प्रक्रिया जब संपन्न हो जायेंगी तथा दैवी शक्तियाँ और दैवी प्रवृत्तियाँ चारों ओर गतिमान दिखेगी- तब इन प्रयासों की उपलब्धियाँ आकुलित की जा सकेंगी। जिस प्रकार असुरता का प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं दिखाई पड़ा उसी प्रकार उसका उन्मूलन भी स्थूल दृष्टि से नहीं देखा जा सकेगा। लेकिन जो व्यक्ति युगशक्ति के अवतरण को पहचान रहे हैं और उसके प्रसार विस्तार में लगे हुए है वे अपने आप को कृतकृत्य और धन्य अनुभव करेंगे।
मनुष्य के विकास में उसके चारों तरफ के वातावरण का प्रमुख सहयोग हुआ करता है। मनुष्य में जो कुछ श्रेष्ठता था निकृष्टता परिलक्षित होती है, वह प्रायः उसके वातावरण, तथा संगी-साथियों को देन होती है। सद्गुण सम्पन्न व्यक्तियों का साथ सद्गुणों की वृद्धि करता है, इसके विपरीत दुष्ट-दुर्जन के साथ रहने से दुर्ग गुणों की वृद्धि होती है। इसी को संगति का प्रभाव कहा जाता है। जैसी संगति होती है, व्यक्ति में उसी प्रकार के गुण-दोष स्वतः आने लगते हैं। फलतः व्यक्ति, अच्छे लोगों के संसर्ग से अच्छा और घटिया लोगों के संसर्ग से घटिया बन जाता है। शास्त्रों में भी वर्णन आता है-
यादृशो यस्य संसर्गो भवेत्तद्गुणदोष भाक्। अयस्कान्तमणेर्योगादयोप्याकर्ष को भवेत्॥
जिस प्रकार का जिसका संसर्ग (साथ) होता है, उसी प्रकार के गुण-दोषों से वह सम्पन्न हो जाता है पारस-मणि के संसर्ग से लोहा भी सोना बन जाता है।
शास्त्रों में इसीलिए श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ-साथ रहने, मित्रता करने आदि की बात कही गई है, दुर्जनों के साथ किसी भी प्रकार व्यवहार करना निषिद्ध बताया गया है-
सद्भिरेव सहासीत् सद्भिः कुर्वीत संगतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रींच नासद्भिः किंचिदाचरेत्॥
सज्जनों के साथ ही रहना चाहिए, उन्हीं की संगति करनी चाहिए, उनके साथ ही बातचीत व मित्रता करनी चाहिए दुर्जनों के साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार नहीं करना चाहिए।
वाल्मीकि, अंगुलिमाल जैसे कुमार्ग गामी भी सत्संगति के प्रभाव से महान् सन्त बन गये। मूर्ख व्यक्ति भी विद्वानों की संगति से विद्वान बन जाया करता है, मामूली मूल्य का काँच भी कंचन के संयोग से बहुमूल्य बन जाता है-
काचः कांचनसंसगद्धित्ते मारकतीं द्यतिम्। तथा सतसन्निधानेन मूर्खो याति प्रवीणतान्।
सामान्य-सा काँच, सुवर्ण के संयोग से मरकत मणि जैसी कान्ति को प्राप्त कर लेता है तथा सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति के संग स मूर्ख में भी प्रवीणता आ जाती है’ इसके विपरीत असज्जनों का संग पतन के गर्त में धकेल देने वाला होता है-
‘असताँ संगदोषेण कोन याति रसातलम्।’
असज्जनों ( दुष्टों ) के संगदोष से कौन व्यक्ति रसातल में नहीं चला जाता अर्थात् पतन के गर्त में नहीं गिर जाता, प्रायः सभी गिर जाते है। नीच व्यक्ति के साथ रहने से नीचता, मध्यम प्रकृति वाले व्यक्ति के साथ रहने से मध्यम प्रकृति तथा विशिष्ट व्यक्तियों के साथ रहने से व्यक्ति में विशिष्ट गुणों की वृद्धि हो जाती है-
हीयते हि मतिस्नात हीनैः सह समागमात्। समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम्॥
वास्तव में सभी प्रकार के गुण-दोष संसर्ग से ही विकसित होता रहते है-
सर्गजाः दोष गुणाः भवन्ति।
इसीलिए दुष्टजनों के संपर्क का सर्वत्र निषेध किया जाता रहा है-
वरं गहनदुर्गेषु भ्रान्त्रं वनचरैः सह। न दुष्टजन सर्म्पकः सुरेन्द्र भवनेष्वपि॥
भयंकर जंगली पशुओं के बीच रहना ठीक है, लेकिन दुष्ट-दुर्जनों के साथ इन्द्र के वैभव सम्पन्न भवन में भी निवास करना उपयुक्त नहीं है।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है, कि श्रेष्ठ-सद्गुणों का विकास श्रेष्ठ लोगों की संगति से हुआ करता है। अतएव श्रेष्ठता अभिवर्धन हेतु सदैव श्रेष्ठ व्यक्तियों का संसर्ग आवश्यक है।
इन दिनों युगनिर्माण परिवार के समर्थ संगठनों में गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण का कार्य सघन भाव श्रद्धा एवं परिपूर्ण तत्परता के साथ चल रहा है। बसन्त पर्व पर इन निर्माणों की संख्या चौबीस घोषित की गई थी। वह प्रथम चरण कब का पूरा हो गया। इन दिनों पचास का अंक पार हो चुका और 108 की परिधि में प्रायः निर्माण प्रयासों की श्रृंखला चल रही हैं। भारत में प्रायः 400 जिले है। किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि अगले दिनों इतनी ही संख्या में इन धर्म संस्थानों को भी कार्यरत देखा जा सके।
धर्म तंत्र की उपयोगिता शासन तंत्र से कम नहीं। भौतिक प्रगति अपेक्षित है। किन्तु आन्तरिक उत्कृष्टता के बिना तो बढ़ी हुई सम्पन्नता भी विपत्ति और विनाश के विग्रह ही खड़े करती है। बहिरंग संपन्नता है, पर अंतरंग की भी सुसंस्कारिता कम महत्व की नहीं है शासन व्यवस्था बनाने और सम्पन्नता बढ़ाने का कार्य हाथ में लेना है तो धर्म की उत्कृष्टता के अभिवर्द्धन का उत्तरदायित्व संभालना चाहिए। दोनों का कार्यक्षेत्र तो अलग है पर दोनों परस्पर मिलजुल कर मानवी गरिमा के उभय पक्षीय प्रयोजनों को पूरा कर सकते हैं। शासन की तरह ही धर्म को भी समर्थ होना चाहिए। दोनों अपनी-अपनी मर्यादाओं में रहकर एक दूसरे के सहायक और पूरक बन सकते हैं। युग सृजन से जन मानस का परिष्कार ही प्रधान कार्यक्रम हैं। यह समृद्धि संवर्धन की तरह महत्वपूर्ण है। सुगठित धर्म संस्थानों के रूप में गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण हो रहा है। आवश्यकता को देखते हुए उनकी संख्या का विस्तार होना उज्ज्वल भविष्य का शुभ लक्षण है।
असमंजस का एक ही कारण हो सकता है कि धर्म संस्थानों की देवालयों की वर्तमान दुर्गति और सडांद को देखते हुए विचारशील वर्ग चौंके और यह आशंका करे कि प्रतिगामिता की नई यह नई हवेलियाँ तो नई बन रही हैं। ऐसा सोचना उचित भी है। देश में हजारों बड़े और लाखों छोटे मन्दिर बने हुए हैं। इनकी गतिविधि भी और उपलब्धियों का पर्यवेक्षण करने पर निराशा ही हाथ लगती है। प्रतिमा पूजन में इतनी जनशक्ति और धनशक्ति लगना किन्तु उत्कृष्टता के संवर्धन में उनसे कुछ भी योग दान न मिलना-रचनात्मक प्रवृत्तियों के लिए इन समर्थ साधनों का कुछ भी उपयोग न होना निश्चय ही निराशाजनक है। बहुत बार तो निहित स्वार्थों द्वारा इन देवालयों की आड़ में जो विकृतियाँ उगाई जाती है उनसे अश्रद्धा ही नहीं बढ़ती उत्तेजना भी उत्पन्न होती है। विचार शील वर्ग की देवालयों के प्रति अवज्ञा से हर कोई परिचित है ऐसी दशा में गायत्री शक्ति पीठों को सरसरी दृष्टि से देखने वालों को अप्रसन्नता ही हो सकती है।
तथ्य को निकट से देखने पर यह आशंका सहज ही तिरोहित हो जाती हैं। शक्तिपीठों के निर्माण की योजना का सूत्र संचालन जिस केन्द्र से होता है वहाँ दूरदर्शिता और उपयोगिता को पूरी तरह ध्यान में रखा जाता है। धर्म संस्थान किस रूप में अपने महान् उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं इसके प्रयोग परीक्षण का अवसर प्रस्तुत करना इस निर्माण का उद्देश्य है। इस प्रयोग की सफलता से लोक मत का दबाव बढ़ेगा कि देवस्थानों में लगे हुए साधनों का उपयोग इसी स्तर पर किया जाय। इससे चिन्तन को दिशा मिलेगी। धर्म संस्थानों को अपनी गतिविधियों पर नये सिरे से विचार करना होगा और उनके पुनर्निर्धारण के लिए विवश होना होगा। तुलनात्मक अध्ययन के लिए जो अवसर चाहिये उसे यह शक्ति पीठें प्रस्तुत कर सकेगी ऐसा विश्वास किया जा सकता है। यदि हो सके तो यह एक बड़ी क्रान्ति होगी। धर्म के निमित्त लगने वाली धनशक्ति, धर्मशक्ति, बुद्धिशक्ति और भावशक्ति को यदि सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन की ओर मोड़ा जा सके तो यह ऐसा हो चमत्कार होगा जैसा कि बाढ़ से भूमि और फसल को नष्ट करने वाली नदियों पर बाँध बना कर नहरें निकालना और बिजली घर बनाना। धर्म तन्त्र की अस्तव्यस्तता की व्यवस्था में प्रतिगामिता को प्रगति शीलता में बदलने का यह अभिनव प्रयास है जिनसे धर्म संस्थान बनाने की मूल भावना का प्रत्यक्ष स्वरूप देखा जा सकता हैं।
धर्म तत्व को यदि इस बुद्धिवादी युग में अपना अस्तित्व बनाये रहने और सम्मान पाने की इच्छा हो तो उसे अपनी सृजनात्मक शक्ति का परिचय देना होगा। अन्यथा समय की दौड़ में पिछड़ने वाले प्राणी जिस प्रकार अपना अस्तित्व गँवा बैठे ठीक उसी तरह धर्म के प्रति बढ़ती हुई उपेक्षा अन्ततः उसे अवाँछनीय घोषित करके ही रहेगी शक्तिपीठों का सृजन, धर्म प्रचार की विडम्बना से एक कदम आगे बढ़कर धर्म तन्त्र का व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत करने वाले पुनीत संस्थानों के रूप में हो रहा है। देखने में वे वर्तमान देवालयों से ही मिलते जुलते प्रतीत होंगे। प्रतिमाओं की पूजा आरती का सनातन उपक्रम देखकर अनुमान यही लगाया जायगा कि मन्दिरों में बिरादरियों में यह और एक नये सम्प्रदाय का जन्म है। किन्तु यह असमंजस आक्षेप देर तक टिक नहीं सकेगा। वस्तु स्थिति समझने का अवसर मिलते ही प्रतीत होगा कि आकृति मिलती जुलती होने पर भी प्रकृति में जमीन आसमान जैसा अन्तर है। अपनी उत्कृष्टता और उपयोगिता सिद्ध करके शक्तिपीठ धर्म तन्त्र के प्रति बढ़ती हुई अश्रद्धा को रोकने और श्रद्धा सम्वर्धन का प्रयोजन पूरा करने में भली प्रकार समर्थ हो सके। यह सच्चाई कुछ ही दिनों में सामने आ खड़ी होगी।
प्रत्येक शक्तिपीठ में गायत्री के नौ शब्दों की प्रतीक नौ प्रतिमाओं की - नौ देवियों की प्रतिष्ठापना होगी।’ इन्हें व्यक्तिगत जीवन में नौ सत्प्रवृत्तियां और सामाजिक जीवन में नीति मर्यादाएँ कहा जा कसता है। हर दर्शनार्थी को एक प्रशिक्षित ‘गाइड’ इनका परिचय देते हुए वैयक्तिक उत्कर्ष के लिये आवश्यक नौ सद्गुणों की और समाज विकास के लिये अभीष्ट नौ रीति-नीतियों का महत्व एवं उपयोग समझाता रहेगा। हर देव दर्शन को आने वाले हर व्यक्ति को कुछ न कुछ नई प्रेरणा लेकर ही वापिस जाते देखा जा सकेगा। जिनके पास समय होगा वे देवालयों में बैठकर साधन का- साथ ही स्वाध्याय का लाभ लेते रह सकेंगे। पुस्तकालय ज्ञान मन्दिर के रूप में हर शक्तिपीठ का अविच्छिन्न अंग रहेगा। दर्शनार्थी घर ले जाकर पढ़ने और वापिस करने की शर्त पर बहुमूल्य युग साहित्य यहाँ से ले जाया करेंगे और इस सूत्र के सहारे जन मानस के परिष्कार का-विचार क्रांति का एक सीमा तक उद्देश्य पूरा किया करेंगे।
शक्तिपीठों में देवता के सम्मुख पैसा चढ़ाने का निषेध रहेगा। यह परम्परा प्राचीन काल में जिस भी उद्देश्य से चलाई गई हो आज वह अनेकानेक विकृतियों के निहित स्वार्थों के परिपोषण का केन्द्र बिन्दु बन गई है। देवता के सामने पैसा चढ़ाना आवश्यक नहीं। प्रतीक रूप में पुष्प अक्षत चढ़ाये जा सकते है। यह न होने पर एक चमची जल, पाद्य, अर्घ के निमित्त चढ़ा देने से काम चल सकता है। देव स्थानों में धनी निर्धन का जो भेद-भाव बरता जाता है। देवता का अनुग्रह पाने को पैसे को निमित्त बनाने के प्रचलन का उसी प्रकार अन्त होगा। शक्तिपीठों में कहीं भी देव प्रतिमा के संमुख पैसा न चढ़ेगा। कोई कुछ देना ही चाहेगा तो उसे तुरन्त उतने ही मूल्य का सस्ता युग साहित्य दे दिया जायगा जिससे वे स्वयं लाभ उठाने और दूसरों तक उसका आलोक पहुँचाने में समर्थ हो सकें।
हर शक्तिपीठ में पाँच परिव्राजकों की एक टीम रहेगी। एक देवालय की व्यवस्था सम्भालेगा। दो-दो की दो टोलियों में शेष चार परिव्राजक समीपवर्ती क्षेत्रों में संपर्क स्थापित करने जाया करेंगे। एक दिन में एक गाँव हो सके इस दृष्टि से एक महीने में तीस गाँवों का शक्तिपीठ मण्डल बनाने का विचार किया गया है, एक टोली हो तो महीने में एक दिन दो टोलियाँ हों तो महीने में दो बार उन गाँवों में जाने का अवसर मिलेगा। दिन में जन संपर्क रात्रि में प्रवचन का क्रम चलेगा। प्रयत्न यह होगा कि गाँव के उपयोगी वर्ग से इस अवसर पर संपर्क साधा, और सघन बनाया जाए। अनेकों रचनात्मक प्रवृत्तियों का बीजारोपण एवं परिपोषण ही इस संपर्क का एकमात्र उद्देश्य होगा। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रांति के लिये जिन स्थापनाओं की जिन उन्मूलनों की आवश्यकता है उन सबको संपर्क योजना में सम्मिलित रखा गया है। जहाँ जिसके लिये जिस प्रकार अवसर होगा वहाँ उसी प्रकार प्रगतिक्रम आगे बढ़ाया जायगा संक्षेप में भौतिक एवं आत्मिक सत्प्रवृत्तियों की दृष्टि से आवश्यक सभी रचनात्मक योजनाओं को इसमें सम्मिलित रखा गया है।
नव-निर्माण के लिये स्थान सम्बन्धी व्यवस्था का प्रयोजन शक्तिपीठों की इमारत से सम्पन्न होगा। उस छाया में बैठकर सम्बद्ध मण्डल क्षेत्र को सुविकसित करने का उपयोगी निर्धारण और कार्यान्वयन उसी केन्द्र से होता रहेगा। इस सक्रियता का उभार न तो उभारते बन सकता है-न प्रतिमा से और न साधन सुविधा से। यदि इतने से ही काम चल गया होता तो वर्तमान हजारों लाखों मन्दिरों से न जाने सर्वतोमुखी प्रगति से कितनी बड़ी सहायता मिली होती। समर्थ गुरु के महावीर मन्दिर-सिख धर्म के गुरुद्वारे-बौद्धों के विहार-जनों के चैत्य, साधुओं के मठ, वानप्रस्थों के आरण्यक, जिस उद्देश्य से बने थे यदि वही परम्परा प्रस्तुत देवालयों में भी प्रवेश कर सकी होती तो सचमुच वे धर्म और अध्यात्म की भारी सेवा कर सकने में समर्थ हो गये होते। किन्तु वैसा कुछ भी न हो सका इसका एक ही कारण है कि इन देवालयों में राम कृष्ण परमहंस परम्परा के पुजारियों का प्रबन्ध न हो सका। शक्तिपीठों में पाँच प्रशिक्षित एवं परखे हुए परिव्राजकों की नियुक्ति के पीछे एक ही उद्देश्य है कि वे इन धर्म संस्थानों को अपने व्यक्तित्व एवं श्रम से कल्पवृक्ष की तरह चन्दन वृक्ष की तरह हर दृष्टि से सार्थक सिद्ध कर सके।
रजत जयन्ती वर्ष से प्रव्रज्या अभियान को सुनियोजित गति दी गई है। वानप्रस्थ- तीर्थ यात्रा-लोक शिक्षण, समय दान, धर्म प्रचार, पर्यटन जैसे अनेक उपयोगी तत्वों को मिला कर ‘प्रव्रज्या’ अभियान का सुव्यवस्थित रूप दिया गया है। जागृत आत्माओं को युग सृजन के लिए समय दान करने के लिये प्रेरणा दी गई है। वह बहुत हद तक सफल भी रही है। परिव्राजकों का एक बड़े वर्ग का पंजीकरण हुआ है। उन्हें थोड़े-थोड़े समय के लिये प्रशिक्षण देकर गत वर्ष महापुरश्चरण योजना के अंतर्गत सम्पन्न हुए युगनिर्माण सम्मेलनों में योगदान करने के लिए पन्द्रह-पन्द्रह दिन के लिए हजारों स्थानों पर भेजा गया है। जन संपर्क और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का रचनात्मक सामने हैं। बुरे संपर्क की- कुसंग की दुष्परिणामों की हानियाँ सर्व विदित हैं। सत्संपर्क एवं सत्संग का सत्परिणाम भी कम प्रभावी नहीं होता है।
पाप से पुण्य की-दैत्य से देव की-ध्वंस से सृजन की-शक्ति निश्चित रूप से अत्याधिक है। प्राचीनकाल में सन्त परम्परा ने जन संपर्क के अनेकानेक उपाय अपनाकर लोक मानस में धर्म धारणा की फसल उगाई और गरिमा भरी रत्न राशि उगाई थी। आज भी भावनात्मक सृजन के लिए उन्हीं प्रयत्नों का पुनर्निर्धारण आवश्यक है। मात्र राजनैतिक और आर्थिक सुधार ही पर्याप्त नहीं। भौतिक समृद्धि ही सब कुछ नहीं है। व्यक्तित्वों में उत्कृष्टता की मात्रा का संवर्धन भी आवश्यक है। हर क्षेत्र में घुसे हुए अनाचार को चुनौती देना आवश्यक हैं श्रेष्ठता का समर्थक-दुष्टता विरोधी जनमानस तैयार किया ही जाना चाहिये। नई सृजन के लिए जनजागरण और मार्ग निर्धारण आवश्यक है। यही कार्य इन परिव्राजकों को करना होगा। वे अपने भागीरथी प्रयासों से अपने संपर्क क्षेत्रों को पुष्पोद्यान की तरह सुविकसित कर सकेंगे ऐसी आशा और अपेक्षा सहज ही की जा सकती है।
कहाँ क्या करना है? किस क्षेत्र की परिस्थिति और आवश्यकता क्या है? यह देखते हुए स्थूल गतिविधियाँ निर्धारित की जायेंगी। किन्तु मूल तथ्य जहाँ का तहाँ रहेगा जन-जन में चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा उत्पन्न करना और सृजन प्रयोजनों के लिये अपनी स्थिति के अनुरूप योगदान देना। यही जन-जन को सिखाया जाय। जिस आस्तिकता-आध्यात्मिकता और धार्मिकता की आस्थायें जगानी है वे उनकी प्रतिक्रिया मनुष्य में चारित्रिक पवित्रता और व्यावहारिक प्रखरता उत्पन्न करने के रूप में ही सामने आनी है। शक्तिपीठों का-उनके साथ जुड़े हुए परिव्राजकों का-प्रवाह प्रयास-उसी स्तर का होगा कि वे वातावरण में युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करें और ध्वंस को सृजन में बदलने का चमत्कार कर दिखायें।
लक्ष्य महान् है साथ ही व्यापक भी। ज्ञान यज्ञ से वातावरण में नव जीवन का संचार करना-विचार क्रान्ति से अवांछनियताओं को उलट देना-अपने समय की-विश्व मानव की आज की महती आवश्यकता है। यह किसी देश जाति की नहीं 400 करोड़ मनुष्यों के विनाश या विकास की समस्या के समाधान का प्रश्न है। इसलिए उसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। साथ ही जटिल और गहन भी। इस सृजन के लिए शिल्पी भी उच्च स्तर के ही चाहिए और बड़ी संख्या में भी। यही वह अदृश्य प्रश्न है जिसके समाधान पर शक्तिपीठों का हर प्रयास सार्थक सिद्ध हो सकता है। अन्यथा निष्प्राण निर्माणों से धर्म का कलेवर भले ही बढ़ जाय उससे प्राण संचार संभव हो सकेगा शक्तिपीठें मन्दिरों की भावुकता के उभारने के लिए नहीं-दूरगामी सृजन प्रयोजन को ध्यान में रखकर बनाई गई है! उनके पीछे परिव्राजकों का स्तर और प्रयास ही लक्ष्य को पूरा कर सकने में सफल होगा।
एक ओर शक्तिपीठों के निर्माण कार्य में उत्साह उत्पन्न हुआ है। दूसरी ओर परिव्राजकों को ढालने का प्रयास चल पड़ा है। दोनों दिशा में चल रही तत्परता इन दिनों देखते ही बनती है। प्रथम श्रेणी की शक्तिपीठें पिछले नक्शे के अनुसार प्रायः डेढ़ दो लाख लागत की बनती थीं। वे तीन मंजिली थीं। अधिक स्थानों पर यह निर्माण जल्दी और अधिक संख्या में सम्भव हो सकें इसके लिए एक नया नक्शा बनाया है जो दो मंजिला है और एक लाख के करीब में बन जाता है। पहले इन्हें द्वितीय श्रेणी का माना गया था अब उनमें थोड़े संशोधन के साथ प्रथम श्रेणी में ही गिन लिया गया है। कस्बों और देहातों में शायद इतनी व्यवस्था भी न हो सके इसलिए वहाँ के लिए चालीस हजार लागत के द्वितीय श्रेणी के डेढ़ मंजिलें शक्ति पीठों का निर्धारण हुआ है। भूमि प्रायः सभी में साठ फुट चौड़ी-अस्सी फुट लम्बी आवश्यक होगी। भव्यता की शोभा सुविधा, बढ़ी-चढ़ी होने के लाभ आकर्षण से इन्कार नहीं किया जा सकता। जहाँ अधिक पूँजी जुटा सकने का प्रबन्ध होगा वहाँ वैसा ही किया जाना प्रशंसनीय है किन्तु जहाँ तंगी है वहाँ हलकी व्यवस्था से काम चलाने की नीति भी अपनानी पड़ेगी। अन्यथा प्रगति क्रम कुछ ही स्थानों तक सीमाबद्ध होकर रह जायगा।
नव निर्धारण के अनुसार दो मंजिलें-डेढ़ मंजिलें-एक लाख एवं चालीस हजार वाले बड़े-छोटे शक्तिपीठ स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तेजी से बनते जा रहे है। समर्थ शाखाओं में सर्वत्र इस दिशा में भाव-भरे प्रयत्न चल रहे हैं और प्रतिस्पर्धा उभर रही है। यह उज्ज्वल विषय के शुभ चिन्ह है। साथ ही जागृत आत्माओं में यह उमंगें भी उठ रही हैं कि वे युग आह्वान में समयदान की आहुति देने के लिए रास्ता खोज निकालें। यह चिन्तन सही भी है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के लिए श्रम, समय देने का इससे अच्छा और इससे सुव्यवस्थित सुअवसर कदाचित ही फिर किसी को मिल सकेगा। प्रव्रज्या में सम्मिलित होने का अदृश्य उत्साह भी उसमें कम नहीं उभर रहा है। जैसा कि भवन निर्माण का दृश्य प्रयास सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है। शक्ति पीठों के साथ जुड़कर काम करने के लिए सृजन शिल्पियों के अंतःकरणों में इन दिनों उठ रही उमंगे देखते ही बनती हैं। प्रव्रज्या पंजीकरण की सूची बताती है कि पारमार्थिक तत्परता की युगांतरीय चेतना जागृत आत्माओं को किस प्रकार झकझोरने और तन कर खड़ा होने के लिए विवश बेचैन कर रही है।
प्रव्रज्या को गौरवास्पद बनाने के लिए हीरों को खरीदने की तरह प्रशिक्षण का प्रबन्ध आवश्यक था। सो शान्ति कुँज में बना लिया गया है। वहाँ पहले से भी इस स्तर का प्रबन्ध था, अब उसमें आवश्यक अभिवर्धन और भी कर दिया गया है। 15 जुलाई से यह प्रशिक्षण प्रक्रिया चल पड़ेगी। न्यूनतम एक महीना और अधिकतम जितना आवश्यक है, यह प्रशिक्षण हर युग-शिल्पी को नये सिरे से लेना होगा। पिछले दिनों जिनने अपना नाम वानप्रस्थों में वरिष्ठ-कनिष्ठ समय दानियों में नोट कराया था उन्हें नई आवश्यकता के अनुरूप योग्यता सम्वर्धन के लिए नये सिरे से इस अभिनव प्रशिक्षण में सम्मिलित होने के लिए कहा गया है। टोली नायक, कार्यवाहक, समयदानी वर्ग के क्रमयोगी भी इस पाठ्यक्रम में सम्मिलित हो सकते हैं। कौन कब आये इसका निर्धारण भी स्थान और सुविधा का संतुलन मिलाकर ही किया जायगा। एक बार में 100 से अधिक के लिए प्रबन्ध नहीं हो सकता, इसमें से न्यूनतम एक महीना और अधिकतम बहुत समय ठहरने की प्रक्रिया भी चलेगी। ऐसी दशा में शिक्षार्थियों में से किसको कब आना है यह निर्धारण पत्र व्यवहार से ही सम्भव हो सकेगा।
भाषण, कला, संगीत, पर्व संस्कार यज्ञ आदि के कर्मकांड, कार्यक्षेत्र के अनुरूप रचनात्मक कार्यों का निर्धारण, प्रतिकूलताओं से निपटना, व्यक्तित्व का परिष्कार प्रभावी जन संपर्क सामयिक समस्याओं का समाधान जैसे अनेकों विषय पाठ्यक्रम में सम्मिलित रखे गये हैं। समझने से लेकर अभ्यास करने तक की प्रक्रिया साथ-साथ चलेगी। शिक्षार्थी की रगड़ाई, मँजाई इस स्तर की हो जायेगी कि पेनी और चमकीली तलवार से उसकी तुलना की जा सके।
शक्तिपीठों के कार्यक्षेत्र की लपेट में प्रायः सारा देश, सारा विश्व आ जाने की आशा है। ऐसी दशा में हर गाँव में स्थानीय कार्यकर्ता की भूमिका हर कोई अपने सामान्य उपार्जन कार्यों में संलग्न रहते हुए भी भली प्रकार निभा सकता हैं। प्रशिक्षित व्यक्ति अपने स्थान पर भी बहुत कुछ कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त वे लोग हैं जो पूरा समय इस योजना में देना चाहते हैं। इनमें से हर एक को तो स्वीकृत नहीं किया जा सकता, फिर भी जो कसौटी पर खरे उतरेंगे उन्हें निश्चिंतता पूर्वक काम करने की व्यवस्था बनाई गई है। शक्तिपीठों के साधन उनके रहेंगे जिनके सहारे ब्राह्मणोचित निर्वाह का प्रबन्ध हो सके।
शक्तिपीठों से जुड़े परिव्राजकों की निर्वाह व्यवस्था के कई स्तर है। परिवार के लिए जिन्हें कुछ भेजना नहीं पड़ेगा प्रायः वैसे ही लोगों को प्राथमिकता दी जा सकती है। सामान्यतया यह प्रबन्ध किया जा रहा है कि स्थायी कार्यकर्त्ताओं के निर्वाह का प्रबन्ध शक्तिपीठ करें। इनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते है जो घर में अपना निर्वाह मँगाते रह सके। हर शक्तिपीठ में एक वानप्रस्थ पत्नी समेत रहेगा। बच्चे उनके साथ नहीं होंगे। यह पति-पत्नी मिलकर पूजा आरती से लेकर अतिथि सत्कार तक की स्थानीय व्यवस्था संभालेंगे आगन्तुकों के साथ सत्संग, परामर्श का क्रम भी यह लोग चलायेंगे और साहित्य केन्द्र का उत्तरदायित्व भी इन्हीं के कंधों पर होगा। इसके अतिरिक्त चार अन्य परिव्राजक रहेंगे। चारों के पास साइकिलें होंगी। दो-दो की जोड़ियों में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपर्क क्षेत्र में जायेंगे और एक-एक दिन एक-एक गाँव में रुकेंगे। इनका निवास निर्वाह का प्रबन्ध शक्तिपीठ में रहेगा। इनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनकी जन्म-भूमि समीप ही है और जो रात्रि को घर पहुँचने, दिन में ड्यूटी सँभालने का क्रम चला सकते है। ऐसी दशा में घर और शक्तिपीठ दोनों को संभालना भी सम्भव हो सकता हैं और परिवार के लोगों का विरोध भी हल्का हो कसता है। ऐसे लोगों का निर्वाह व्यय इस प्रकार भी किया जा सकता है जिससे मिल-जुलकर उनके परिवार को भी थोड़ी सहायता मिल सके।
निर्वाह व्यय के सम्बन्ध में सबको एक लाठी से नहीं निर्वाह किया जा सकता। परिस्थिति का भिन्नता को ध्यान में रखना होगा। किन्तु इतना अवश्य है कि उपयुक्त युग शिल्पियों में से अब किसी को भी यह असमंजस नहीं रहेगा कि वे निर्वाह की व्यवस्था न कर पाने के कारण समय की पुकार में योगदान दे सकने से वंचित रह गये।
शक्तिपीठों का निर्माण और प्रव्रज्या अभिवर्धन की दिशा में साथ-साथ उठ रहे हादसों को देखकर उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना हर विचारशील को अति निकट और सुनिश्चित ही दृष्टिगोचर होगी।
कर सकेगी वृद्धि इस वातावरण की। धर्म से प्रेरित व्यवस्था आचरण की। हट गया है आज मानव धर्म-पथ से। कृष्ण का सम्बन्ध टूटा कर्म-रथ से॥
अब निरकुँश और दुर्योधन हुआ है। नित्य घर-घर में यहाँ होता जुआ है॥
बढ़ रही सम्भावनाएँ नित्य रण की। कर सकेगी शुद्धि इस वातावरण की। धर्म से प्रेरित व्यवस्था आचरण की॥
है जरूरत-आचरण में धर्म आए। और अर्जुन कृष्ण को जाकर मनाए॥
द्रौपदी ताना न मारे परिजनों को। प्रेम से जीते परस्पर सब मनों को॥
बात हो संवेदना के संचरण की। कर सकेगी शुद्धि इस वातावरण की। धर्म से प्रेरित व्यवस्था आचरण की॥
प्रभु समर्पित कर्म हों सारे हमारे। स्वार्थ के आगे कभी कोई न हारे॥
दूसरे का हित हमेशा ध्यान में हो। गहन आस्था मनुज की, भगवान में हो॥
ललक जागे सद्गुणों के शुभवरण की। कर सकेगी शुद्धि इस वातावरण की। धर्म से प्रेरित व्यवस्था आचरण की॥
- माया वर्मा
*समाप्त*