मनुष्य जीवन सुनिश्चित कल्पवृक्ष

कल्पवृक्ष का अस्तित्व स्वर्गलोक में माना जाता है और कहा जाता है कि उसकी अमुक विधि से पूजा प्रार्थना करने पर अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस अदृश्य एवं रहस्य मय प्रतिपादन में संदेह करने की गुंजाइश है।

किन्तु भूलोक के उस कल्पवृक्ष के अस्तित्व का अनुभव हर कोई कर सकता है जो उसे ‘जीवन’ के रूप में ईश्वर की महान अनुकम्पा का प्रत्यक्ष प्रमाण बन कर मानव प्राणी को उपलब्ध हुआ है। यह अद्भुत है। अनुपम और असाधारण। यह दिव्य भी है और महान भी। इसके अन्तराल में जो सम्भावनाएँ एवं सिद्धियां भरी पड़ी हैं उन्हें देखते हुए रत्नाकर कहने में संकोच- नहीं होना चाहिए। जीवन सबसे प्रत्यक्ष, सबसे निकट और सबसे अधिक वरदायी देवता है। उसका सदुपयोग भर किया जा सके तो वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है जो कल्पवृक्ष से अभीप्सित है। प्रगति का सुविस्तृत इतिहास साक्षी है कि जिनने भी जीवन सम्पदा का सुनियोजित उपयोग किया वे न तो पिछड़ेपन से ग्रहित रहे और न सामान्य समझे गये। उनने तत्परता और सजगता अपना कर अभिष्ट दिशा में साहसिक प्रगति की और पुरुषार्थ के बल-बूते ऐतिहासिक महामानवों की पंक्ति में जा खड़े हुए।

कहा जाता है कि कल्पवृक्ष से भी कुछ प्राप्त करने का एक निश्चित विधि-विधान है। जीवन देवता भी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। शर्त एक ही है कि अभीष्ट की प्राप्ति के लिए उसका श्रेष्ठ तम सदुपयोग करने की विधि व्यवस्था बनाई और अपनाई जाय।


साधनों का प्रथम चरण

सिद्धार्थ के राज भवन में किसी महान सन्त का आगमन हुआ। बालक वर्द्धमान स्वभावतः ही सन्त महात्माओं के संपर्क सान्निध्य में बड़े आनन्दित होते थे। जब उन्हें यह पता चला कि भोजन और विश्राम के उपरान्त ही राज भवन के प्रवचन कक्ष में धर्मोपदेश की व्यवस्था की जा रही है तो पहले से ही वे वहाँ जा पहुँचे। प्रवचन कक्ष की सफाई और व्यवस्था आदि का कार्य चल रहा था। वर्द्धमान भी पीछे क्यों रहे? उन्होंने भी झाडू उठाई और लगे सफाई करने। साथ में साथी गण भी आ जुटे और यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक कि कार्यक्रम आरम्भ होने न लगा।

प्रवचन आरम्भ हुआ, वर्द्धमान भी एकाग्र चित्त हो आदि से अन्त तक सन्त के उपदेश श्रवण करते रहे। प्रवचन समाप्त होने के बाद सम्राट सिद्धार्थ ने राज परिवार के सभी सदस्यों का सन्त से परिचय कराया। जब वर्द्धमान का क्रम आया तो सन्त उन्हें अपनी गोदी में बिठाया और प्यार से सिर पर हाथ फेर कर उनकी आँखों में झाँका। अपने तपोबल से वर्द्धमान का भविष्य जानकर सन्त ने कहा -’राजन्! तुम्हारा यह लड़का भोगी नहीं, योगी ही बनेगा। और योगी भी कोई सामान्य नहीं, धर्म तीर्थ का स्थापक और तीर्थंकर। लेकिन दुःख है, मुझे इस बात का कि उस रूप में इस विभूति का दर्शन करने के लिए हम तुम जीवित न रहेंगे।’

फिर बाद में अन्यान्य चर्चायें चलने लगीं और कुछ घण्टों बाद सन्त विदा हो गये और तो सब ठीक परन्तु सन्त के भविष्य कथन से माता और पिता को बड़ा धक्का लगा। माँ को तो इतनी ठेस पहुँची कि वे सीधी अपने शयनागार में चली गयीं और शय्या पर जा गिरीं। वहाँ जोर-जोर से सिसकने लगीं। संयोग से वर्द्धमान भी उधर ही जा निकले और माँ त्रिशला को रोते हुए देखकर पूछा -’माँ तुम्हें अचानक क्या हो गया। अभी तो तुम अच्छी खासी भली थीं और अब अचानक यह रुदन क्यों?’

‘बेटा तुम अब भी पूछते हो कि मैं क्यों रो रही हूँ।’ मुझसे जीते जी यह ने देखा जायगा।’

‘क्या न देखा जायगा?’

‘क्या तुमने नहीं सुना कि अभी विदा हुए सन्तवर क्या कह रहे थे?’

‘मैंने सुना तो सब कुछ परन्तु यह नहीं जान पा रहा हूँ कि कहे हुए वचनों में से तुम्हारे रोने का क्या कारण है,?’

‘मैंने अपने मन में तेरे लिए कितनी आशायें संजों रखी हैं, पर आज उन सब आशाओं का आधार ढह गया है, जब मैंने यह सुना कि तू घर बार’ छोड़कर संन्यास ले लेगा।’

‘संन्यास’-मगर मैंने तो तुमसे ऐसा नहीं कहा।

‘आदमी को पलटने में कितना समय लगता है। आगत अतिथि सन्त ने तुम्हारी आँखों में देखकर जो भविष्यवाणी की है वह कभी झूठ नहीं हो सकती’ -त्रिशला ने अपने सन्देह को पुष्ट किया।

‘वह तो ठीक है परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं है कि मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा।

‘और नहीं तो क्या? योगी कौन से घर में रहते है’-त्रिशला का अश्रु प्रवाह अविरल बह रहा था।

‘योगी घर में रहते हों या नहीं रहते हों यह तो मैं कुछ कह नहीं सकता परन्तु जब तक तुम हो और पिता श्री हैं तब तक तुम्हारी सेवा ही मेरे लिए योगाभ्यास है। जब तक आप लोग विद्यमान हैं तब तक यह त्याग मेरे लिए अभीष्ट नहीं है, यह मेरा निश्चित मत है। आपकी सेवा ही मेरा प्रथम व्रत, प्रथम धम्र और साधना का प्रारम्भिक सोपान है’ - वर्द्धमान के इन वचनों को सुनकर मातृ हृदय के सशंक सन्देह तिरोहित हो गये और वर्द्धमान ने जब तक माता-पिता रहे घर छोड़कर बन जाने एकान्त तप त्याग का अनुष्ठान करने की बात भी नहीं सोची।


परमात्म-सत्ता के अकाट्य प्रमाण

इन्द्रियों की पकड़ स्थूल जगत तक ही सीमित है। स्थूल वस्तुओं को देख सकने एवं जान सकने की सामर्थ्य इन्द्रियों में होती है। किन्तु बहुत-सी बातें इन्द्रियातीत हैं। किन्तु उनके अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। वायु न तो दिखाई देती है न ही उसका स्वरूप निर्धारण किया जा सकता है किन्तु उसको अनुभव किया जा सकता है। दिखाई न पड़ने के आधार पर यह कहा जाय कि उसका अस्तित्व ही नहीं है तो यह कहना अविवेक पूर्ण होगा। वह दिखाई नहीं पड़ती, किन्तु उसकी प्रतिक्रिया शरीर अनुभव करता है। विद्युत को प्रत्यक्ष देखा नहीं जा सकता। प्रकाश के रूप में बल्ब में, चलते हुए पंखे में, जलते हुए हीटर में उसकी शक्ति का आभास मिलता है। परमात्मा के संदर्भ में भी यही मान्यता बनायी गई। यंत्रों अथवा इन्द्रियों की पकड़ में न आने के कारण उसके अस्तित्व से ही इन्कार करने का दुस्साहस किया गया।

महत्व स्थूल स्वरूप का नहीं; बल्कि उसके अन्दर कार्य कर रही शक्ति का है, जिसका प्रमाण विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं के रूप में परिलक्षित होता है। मूलभूत सिद्धान्तों एवं विशेषताओं के आधार पर उसके अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ता है। पदार्थ सत्ता का सूक्ष्मतम कण परमाणु माना जाता रहा। नये शोधों ने पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त किया। इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान, वाजीट्रान, जैसे कणों के अस्तित्व का प्रमाण सामने आया। आधुनिक खोज से परमाणु स्वरूप की सारी मान्यताएँ बदल गयीं। वर्तमान स्थिति यह है कि पदार्थ सत्ता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। सम्भव है स्थूल जगत के अस्तित्व को ही अगले दिनों भ्रमपूर्ण बताया जाय और अदृश्य शक्ति की सत्ता से इन्कार करने का जो उत्साह चल रहा है, वह ही सत्य का कारण बने।

परमाणु के स्वरूप की मान्यताएँ तो समय-समय पर बदलती रहीं किन्तु उसकी प्रचण्ड शक्ति की धारणा से कोई इन्कार नहीं कर सकता, न ही इस मूलभूत तथ्य में कोई परिवर्तन हुआ। स्वरूप में चाहे कुछ भी परिवर्तन क्यों न हो वह शक्ति को केन्द्र तो सदा बना रहेगा। इस आधार पर ही परमाणु शक्ति के अस्तित्व को स्वीकार किया गया।

परमात्मा के अस्तित्व के विषय में भी विभिन्न मान्यताएँ बनायी गई। विभिन्न स्वरूप निर्धारण किया गया, उनमें उलट-फेर होता रहा तथा आगे भी हो सकता है किन्तु कुछ मूलभूत सिद्धान्त सृष्टि में ऐसे हैं जो कभी नहीं बदलते तथा अदृश्य समर्थ सत्ता का अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। (1) नियम व्यवस्था (2) सहयोग (3) विशालता (4) उद्देश्य, चार विशेषताएँ सृष्टि क्रम में ऐसी हैं जो पदार्थ से लेकर चेतन प्राणियों में दृष्टिगोचर होती हैं। विवेक दृष्टि से इसका अध्ययन किया जाय तो कोई कारण नहीं कि परमात्म सत्ता के अस्तित्व से इन्कार किया जा सके।

पिण्ड से लेकर ब्रह्मांड तथा चेतन जगत में एक नियम, व्यवस्था कार्य कर रही है। प्राणि पैदा होते, क्रमशः युवा होते तथा वयोवृद्ध होकर विनष्ट हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में एक निश्चित उपक्रम दिखाई पड़ता है। ऐसा कभी नहीं होता कि कोई वृद्ध रूप में पैदा हो और युवा होकर बच्चे की स्थिति में पहुँचे। प्रत्येक जीव चाहे मनुष्य हो अथवा छोटे प्राणी सभी इस व्यवस्था के अंतर्गत ही गतिशील हैं। वृक्ष, वनस्पतियों का भी यही क्रम है। अंकुरित बीज बढ़ते तथा पेड़ पौधों में विकसित होकर पुष्प फल देते दिखायी देते और जराजीर्ण होकर मर जाते हैं। प्राणियों एवं वनस्पतियों के उत्पन्न होने, विकसित होकर जराजीर्ण स्थिति में जा पहुँचने और अन्ततः विनष्ट हो जाने के क्रम में शायद ही कभी कोई व्यतिक्रम देखा जाता हो।

इस नियम के अंतर्गत दूसरी विशेषता यह जुड़ी है कि एक विशेष प्रकार के बीज से विशेष प्रकार का वृक्ष ही तैयार होगा। गेहूँ के बीज से गेहूँ तथा धान से धान ही उत्पन्न होगा। गेहूँ के बीज से धान, अथवा आम के बीज से अमरूद पैदा होने की बात नहीं सुनी जाती है। यहीं बात प्राणियों में देखी जाती है। पुरुष-स्त्री के संयोग से मानवाकृति ही उत्पन्न होगी। अपवादों को छोड़कर एक निश्चित जातियाँ अपने समान ही जातियों को जन्म देती हैं। यह निश्चित नियम प्रत्येक जीव-जन्तु तथा वनस्पतियों में देखा जाता है।

न केवल जीव जगत वरन् अणु से लेकर ब्रह्मांड तक सुव्यवस्थित क्रम में गतिशील हैं। प्रत्येक ग्रह नक्षत्र एक निश्चित गति एवं निर्धारित कक्षा में परिक्रमा करते देखे जाते हैं। भौतिक विज्ञान के ज्ञाता इस तथ्य से परिचित हैं कि इनकी गति में थोड़ा भी अन्तर आ जाय अथवा अपनी कक्षाओं से थोड़ा हटकर घूमने लगें तो सारी ब्रह्माण्ड व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो सकती है। एक ग्रह दूसरे से टकराकर चूर-चूर हो जायगा तथा देखते-देखते महाविनाश का दृश्य उपस्थित हो जायेगा। समय की पाबन्दी, गति की सुनिश्चितता तो प्रकृति में देखते ही बनती है। सूर्य प्रातःकाल निकलता तथा सायं को डूब जाता है। ऋतुएं अपने समय पर ही आती है, बसन्त ऋतु अपनी छटा नियत समय पर बिखेरती है। इनमें थोड़ा भी हेर-फेर सारे प्राकृतिक सन्तुलन को नष्ट कर सकता है। विराट ब्रह्मांड ही नहीं बल्कि पदार्थ सत्ता का सबसे छोटा कण परमाणु भी एक सुदृढ़ व्यवस्था का परिचय देता है। नाभिक में रहने वाले प्रोटान तथा बाहर कक्षों में घूमने वाले इलेक्ट्रान का सन्तुलन कक्षाओं में घूमने की प्रक्रिया भी पूर्णरूपेण व्यवस्थित है,

गहराई तक दृष्टि दौड़ाई जाय तो ज्ञात होता है कि व्यवस्था, नियम, व्यवस्थापक, नियामक के अभाव में सम्भव नहीं। अपने आप तो खेतों में जंगलों में झाड-झंखाड़ ही उगते हैं। बगीचा लगाने, पौधे उगाने तथा अन्न फल प्राप्त करने के लिए श्रम एवं विचार शक्ति दोनों का उपयोग करना पड़ता है। सुन्दर मकान, यंत्र, कला आदि भी कुशल कर्ता का भान कराती हैं तथा यह अनुमान लगाया जाता है - उन कलाकृतियों के पीछे सुनियोजित, श्रम शक्ति लगी है। ऐसा कभी सम्भव नहीं कि जड़ पदार्थ अपने आप गतिशील होकर सुन्दर रचनाकृति में परिवर्तन हो जाये। अभिप्राय यह है कि मानवाकृति रचनाएँ भी कुशल मस्तिष्क सम्पन्न कर्ता का प्रमाण देती है तो फिर विराट सृष्टि जिसकी कल्पना कर सकने में भी मस्तिष्क असमर्थ है, का सुनियोजित एवं व्यवस्थित स्वरूप अपने आप कैसे विनिर्मित हो सकता है। दृष्टि दौड़ाई जाय तो सम्पूर्ण सृष्टि में नियम बद्धता देखी जा सकती है। यह हुई नियम की बात जिसे सृष्टि के कण-कण में सन्निहित देखा जा सकता है और किसी सुयोग्य नियामक के अस्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता है।

दूसरा भिन्न आधार जिसके द्वारा परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है वह है सहयोग। इसी पर ही सृष्टि की व्यवस्था टिकी है। सहयोग की परम्परा जड़ चेतन सबमें देखी जा सकती है। जड़-चेतन में विभेद दीखता तो है किन्तु दोनों के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। एक के ऊपर दूसरे का अस्तित्व टिका है जीवन चक्र चल रहा है सूर्य उगता है, प्रकाश बखेरता है। सभी जीव जन्तु पेड़-पौधे उससे जीवन प्राप्त करते हैं। अपनी प्रकाश सम्पदा को सूर्य समेट ले, बखेरना बन्द कर दे तो पृथ्वी पर से जीवन लुप्त हो जायेगा। समुद्र सूर्य देव के तप का अनुकरण करता तथा प्रकृति के सन्तुलन में अपना योगदान देता है। अपनी जल सम्पदा को सतत वाष्पित कर आकाश में बखेरता रहता है। नदियाँ समुद्र के जल की आपूर्ति करती हैं। बादल समुद्र से प्राप्त अनुदान का संग्रह नहीं करता वरन पृथ्वी को अपनी जल सम्पदा से सिक्त करता रहता है। इस प्रकार सहयोग का यह विस्तर चक्र चलता रहता तथा चेतना समूह का पोषण अभिवर्द्धन होता रहता है। यदि नदियाँ, बादल सूर्य, संकीर्ण हो जायँ, एक दूसरे को सहयोग करना बन्द करदे तो सारा प्राकृतिक सन्तुलन डगमगा जाय तथा प्राणि जगत का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा।

सहयोग का यह सिद्धान्त प्राणियों वनस्पतियों के बीच भी देखा जाता है जीव जन्तु वृक्ष वनस्पतियों से स्वच्छ आक्सीजन प्राप्त करते हैं जबकि पेड़ पौधे प्राणियों द्वारा निष्कासित गन्दी वायु को ग्रहण करते तथा उसी से अपना विकास करते हैं। आपसी सहयोग का यह क्रम थोड़े समय के लिए भी टूट जाय तो कुछ ही क्षणों में पृथ्वी में जीवन लुप्त हो जाय। सहयोग की यह प्राकृतिक व्यवस्था ही प्राणियों एवं वनस्पतियों के जीवन क्रम को सुचारु रूप से चलाती रहती है।

सहयोग की प्रवृत्ति सृष्टि के कण कण में देखी जा सकती है। पदार्थ का स्थूल स्वरूप अणुओं के परस्पर सम्बद्ध रहने से ही दिखायी पड़ता है यदि अणु वागी हो जाय तो उसका स्वरूप बिखर जायेगा। शरीर तन्त्र को लिया जाय तथा देखा जाय तो स्पष्ट होगा कि सुगठित स्वास्थ शरीर अंग प्रत्यंगों के परस्पर सहयोग पर ही गतिशील है। यहाँ तक कि शरीर की इकाई कोशिकाएँ भी पूरी मुस्तैदी के साथ इस प्रवृत्ति को अपनाये हुए हैं। परस्पर आबद्ध रह कर शरीर के दृढ़ बनाये रखती हैं। भोजन ग्रहण करने पाचन तथा रक्त में परिवर्तन से लेकर नस - नाडियों में रक्त के संचार की प्रक्रिया में शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों की सहयोग भरी भूमिका देखी जा सकती है। इसमें थोड़ा भी व्यतिक्रम पूरे शरीर तन्त्र को अस्त-व्यस्त कर दे सकता है। हाथ कार्य करना बन्द कर दें तो पेट को भोजन नहीं प्राप्त हो सकेगा। पाचन तन्त्र अपनी प्रक्रिया से विमुख होने लगे तो पेट में पहुँचा आहार सड़ने लगेगा तथा विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते जायेंगे हृदय रक्त संचार की प्रक्रिया, गुर्दे सफाई की क्रिया बन्द कर दें तो कुछ ही घन्टों में मृत्यु हो जायेगी। तात्पर्य यह है कि अंग; प्रत्यंगों के सहयोग पर ही शरीर की गतिविधियाँ संचालित हैं।

विशाल ब्रह्मांड तथा पिण्ड सभी के अस्तित्व को अव्यस्थित बनाये रखने में सहयोगिता का सिद्धान्त ही कार्य करता है। परमाणु के प्रोटान, इलेक्ट्रान एक दूसरे के बीच आकर्षण बनाये रखते हैं। उनका परस्पर असहयोग परमाणु विस्फोट के रूप में दिखायी पड़ता है। उनके परमाणुओं के सहयोग से ही पदार्थ सत्ता स्थिर बनी रहती है। अर्थात् सहयोगिता पर ही सृष्टि की सुव्यवस्था टिकी है।

सृष्टि की रचना की तीसरी विशेषता है विशालता। इसकी विशालता के कारण ही ब्रह्माण्ड नाम से कहा गया। ब्रह्म अर्थात् बड़ा अण्ड अर्थात् मण्डल विराट मण्डल। भीम काय पर्वत, अथाह समुद्र, रहस्यों से भरा अनन्त अन्तरिक्ष असंख्यों ग्रह-नक्षत्र, तारा, पिण्ड को देखकर बुद्धि आश्चर्यचकित रह जाती है। अपने सौर मण्डल के ग्रह नक्षत्रों की अब तक जितनी जानकारी मिल सही है उसकी तुलना में कई गुना जानना अभी शेष है। एक सूर्य का भी अब तक रहस्योद्घाटन कर सकना सम्भव नहीं हो सका है। इस प्रकार के असंख्य सौर मण्डल आकाश गंगाएँ ब्रह्माण्ड में होने का वर्णन शास्त्रों में आता है। अनन्त विस्तारण वा अनेकों सूर्यो, ग्रह नक्षत्रों से युक्त ब्रह्माण्ड की कल्पना मात्र से बुद्धि चकित हो जाती है। अविज्ञात के रहस्यमय क्षेत्र तक तो कल्पना शक्ति भी नहीं पहुँच पाती है। उनको जान सकना तो और भी कठिन है। परमात्मा के इस विस्तार के कारण ही भारतीय धर्म-शास्त्रों में ऋषियों ने नेति-नेति कह कर अपनी असमर्थता व्यक्त की।

विराट से कम रहस्यमय एवं विलक्षण सूक्ष्म जगत भी नहीं है सूक्ष्मता की ओर जैसे-जैसे बढ़ते हैं शक्ति का अनन्त सागर लहलहाता हुआ दिखाई पड़ता है। बर्फ की अपेक्षा पानी और पानी से वाष्प कहीं अधिक सामर्थ्यवान हैं। प्रसिद्ध जीव शास्त्री डा. फ्रीटुज ने पदार्थ के सूक्ष्म कण अणु के व्यास एक से.मी. का करोड़वां भाग बताया है। परमाणु तो इससे भी अधिक सूक्ष्मतम होता है किन्तु पदार्थ की शक्ति उसके नाभिक में केन्द्रित होती है। परमाणु की प्रचण्ड शक्ति से हर कोई परिचित है स्थूल से सूक्ष्म की शक्ति कई गुना अधिक होती है होम्योपैथी की उपचार प्रक्रिया इसी सिद्धान्त पर आधारित है। नगण्य से दिखाई देने वाले बीज में वृक्ष के आकार प्रकार तथा उसकी विशेषताएँ छिपी पड़ी है। नन्हें से शुक्राणु अपने में मनुष्य की आकृति ही नहीं व्यक्तित्व की सारी विशेषताएँ छिपाये बैठा है। सेम्स क्रोमोसोम के जीन्स माता पिता के गुणों को अपने में समेटे बैठे हैं।

यह तो जड़ की बात हुई। अदृश्य सूक्ष्म की चेतन परतें तौ और भी अद्भुत हैं। स्थूल तो मात्र कलेवर है जो कठपुतली के धागे के समान चेतन परतों द्वारा संचालित है। स्थूल कलेवर की हलचल सूक्ष्म चेतना द्वारा ही नियन्त्रित की जाती हैं। सामान्य जीवन क्रम में उसका एक नगण्य सा भाग व्यक्त होता है उतना मात्र ही चमत्कारी परिणाम प्रदर्शित करता है। अव्यक्त की अनन्त परतें तो और भी विलक्षण हैं। उसकी सम्भावनाएँ असीम है। उसकी विशेषताओं को देखकर ऋषि कह उठते है।

विराट् का असीम क्षेत्र मानवी मस्तिष्क को आश्चर्य चकित र रहा है, वहीं सूक्ष्मता की ओर बढ़ने पर शक्ति का लहलहाता हुआ सागर दिखायी पड़ता है। शास्त्रकारों ने परमात्मा के विराट् एवं सूक्ष्म स्वरूप को देखकर कहा- अणोरणीयान् महतोमहीयान्

सृष्टि रचना में सबसे प्रमुख और अन्तिम बात रह जाती है जिसके बिना उपरोक्त तीनों प्रतिपादन अधूरे रह जाते है। वह है सृष्टि रचना का उद्देश्य। संसार की प्रत्येक संरचना एवं घटनाओं से किसी विशिष्ट प्रयोजन की जानकारी मिलती है। पृथ्वी, आकाश, ग्रह, नक्षत्र,नदियाँ ; पर्वत, जीव-जन्तु सभी एक निश्चित लक्ष्य को लेकर चलते एवं पूर्ण करते हैं। जीव - जन्तुओं को जीवन धारण किये रहने के लिए पृथ्वी साधन जुटाती, अन्न फल-फूल प्रदान कर उनका पोषण करती है। सूर्य प्राण संचार करता, पेड़, पौधों; प्राणियों, में शक्ति प्रदान करता है। उसके इस अनुदान से ही पृथ्वी का जीवन व्यापार चलता है। नदियाँ फसलों को सींचती तथा जीवों की प्यास बुझाती है। पृथ्वी पर जल की कमी न हो इसके लिए समुद्र अपने खारे जल को सतत वाष्पित करके बादलों में परिवर्तित करता रहता है। बादल समुद्र से प्राप्त सम्पदा को पृथ्वी पर बखेरना ही अपना परम लक्ष्य समझता है तथा इसकी पूर्ति के लिए सत्त प्रयत्नशील रहता है। विशालकाय पर्वत, जंगल आदि प्राकृतिक सन्तुलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते है। सृष्टि चक्र को सन्तुलित बनाये रखने में ग्रह नक्षत्र निरन्तर चक्कर लगाते रहते है। अन्यान्य प्राकृतिक संरचनाएँ भी निश्चित प्रयोजनों की पूर्ति में लगी है। सबका सम्मिलित उद्देश्य है प्रकृति को व्यवस्थित एवं संतुलित बनाये रखना। इस महती प्रयोजन में जड़ संरचनाओं की चेष्टाएँ लगी है।

न केवल जड़ प्रकृति बल्कि चेतन प्राणियों के निर्माण में भी सृष्टी का एक सुनिश्चित प्रयोजन है। अन्यान्य जीव-जन्तु इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनी क्षमता के अनुरूप संलग्न है। सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ विचारशील प्राणी मनुष्य का निर्माण भी एक महान उद्देश्य के लिए हुआ है, वह है अपने छोटे प्राणियों को सहयोग करना तथा विश्ववसुन्धरा को श्रेष्ठ समुन्नत बनाना। अतिरिक्त विशेष क्षमताएँ एवं प्रतिभाएँ उसे परमात्मा द्वारा इस महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए दी गई हैं। यह देखा जाता हैं कि अन्य नन्हें जीव जंतु तथा जड़ पदार्थ अपने सुनिश्चित लक्ष्य की पूर्ति के लिए सतत् प्रयत्नशील हैं जबकि मनुष्य ही अपने महान लक्ष्य को भूल गया है।

नियम व्यवस्था, सहयोग, विशालता उद्देश्य इन चार सिद्धांतों के पीछे अदृश्य सत्ता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है जिसे सृष्टा, नियामक परिवर्तनकर्त्ता एवं सर्वव्यापी परमात्मा कहा जाता है। यह चार सिद्धान्त ऐसे है जिसे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त देखा जा सकता है। दुराग्रह छोड़ा जाय तथा दूरदृष्टि अपनायी जाये तो सृष्टि के इन चारों सिद्धान्तों में परमात्मा सत्ता का इतना अधिक प्रमाण बिखरा पड़ा है जिसे देखकर कोई भी विचारशील व्यक्ति परमात्मा के अस्तित्व से इन्कार करने का दुस्साहस न कर सके। आवश्यकता इस बात की है कि उस परम शक्ति का दर्शन अपने दिव्य नेत्रों से किया जाय उसके सान्निध्य का लाभ उठाया जाय तथा जीवन लक्ष्य को प्राप्त किया जाय। मनुष्य जीवन की गरिमा इसी में निहित है।


Quotation

न जलाप्वुत देहस्य स्नानमित्यभिधीयते स स्नातो यो....मस्नातः शुचिः शुद्धमनोमलः

अर्थात्- जल में शरीर को डूबो लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिसने दम रूपी तीर्थ में स्नान किया है, मन इंद्रियों को वश में कर रखा है, उसी ने वास्तव में स्नान किया है। जिसने अपने मल को धो डोला वही शुद्ध है। वही स्नान है।


तथ्यों और मान्यताओं का अन्तर समझा जाय

वैज्ञानिक विषयों और मानवी (ह्यूमेनिटीज) विद्या के विषयों, दोनों के उच्चतर शिक्षण-क्रम में एक हिस्सा सैद्धाँतिक और मान्यताओं सम्बन्धी रहता है, दूसरा प्रायोगिक। सिद्धान्तों और प्रयोगों के व्यवहार सिद्ध रूप को व्यावहारिक या ‘एप्लायड’ कहा जाता है। ‘एप्लायड फिजिक्स’ ‘एप्लायड इकॉनोमिक्स’, आदि के नाम से इनका शिक्षण होता है। प्रत्येक विद्या के इन रूपों को समझना चाहिए।’एप्लायड’ रूप वह होता है, जो तथ्यों, प्रयोगों और व्यवहार की कसौटी पर खरा उतरे। दूसरा मान्यताओं वाला क्षेत्र इससे भिन्न होता है। वह मनुष्य के अनुभवों भर से निःसृत नहीं होता। अपितु उसमें उसकी स्वयं की कल्पनाएँ, रुचियाँ दिमागी उड़ाने, निजी आस्थाएँ घुलीमिली होती है। इस प्रकार वैज्ञानिक प्रयोग एक बात है, वैज्ञानिक परिकल्पनाएँ और मान्यताएँ भिन्न बात है। मान्यताएँ बदल जाने पर भी प्रयोगों की प्रक्रिया यदि शुद्ध हो, तो वही परिणाम प्राप्त होते रहते हैं। परमाणुओं का स्वरूप अब भी वही है, पारमाण्विक संयोग-वियोग की प्रक्रियाएँ और परिणाम अब भी वही है, किन्तु अब परमाणुओं को पदार्थ की प्राथमिक इकाई मानने की मान्यता समाप्त हो चुकी है।

पिछली शताब्दी के अन्त में भौतिकी में यह मान्यता थी कि पदार्थ अविनाशी है। इस पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है। वे ही पदार्थ के मूल कण हैं। पदार्थ का उससे आगे विभाजन सम्भव नहीं है। यों, उससे भी पहले अणु को ही ‘एटम कहा गया था। लूक्रेटस ने यह दर्शन प्रतिपादित किया था कि सभी पदार्थ अविनाशी और अपरिवर्तनीय अणुओं से बने है। बाद में पता चला कि अणु टूट सकते हैं। कई पदार्थों के अणु तो सरलता से टूट सकते हैं। जैसे लोहे पर जंग लगने से उसके अणु टूट कर नया रूप धारण कर लेते हैं। किसी धातु पर अम्ल डालने से या उसे जलाने, गरम करने अथवा प्रकाश के आपात से भी अणुओं को तोड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए हाइड्रोजन पराक्साइड की बोतल यदि किसी प्रकाशमय स्थान पर रखी जाय, तो उस तरल पदार्थ के अन्दर से प्रकाश गुजरने भर से उसका हर एक अणु टूट कर एक जल अणु और एक आक्सीजन अणु में बदल जायेगा। उस बोतल को प्रकाश में कुछ देर रहने देने के बाद यदि उसकी कार्क हटाई जाय, तो तत्काल एक आवाज होगी। यह उसमें बन गयी आक्सीजन की आवाज होगी। इसके बाद हाइड्रोजन पराक्साइड के स्थान पर उस बोतल में मिलेगा सिर्फ पानी। अणुओं की टूटन की यह जानकारी मिलने पर परमाणुओं को ‘एटम’ कहा जाने लगा। परमाणु का अर्थ था वे छोटे कण जो अणु के टूटने पर प्राप्त होते थे।

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में लार्ड रदरफोर्ड इस कथित अखण्डनीय परमाणु को भी तोड़ने में सफल हो गये। तब पता चला कि परमाणु ऋण आवेशित ‘इलेक्ट्रान’ कणों और धन आविष्ट प्रोटान कणों से मिलकर बना है। इस प्रकार परमाणु मूल कण नहीं रहे। अब हर पदार्थ को विद्युत-आवेशित कणों का समूह मात्र माना जाने लगा। देखा गया कि परमाणु से विकिरण निकलते हैं। अब परमाणु मूल रूप में विकिरणशील विद्युदणु माने जाने लगे। परन्तु हाइड्रोजन के दो और आक्सीजन के एक अणुओं के संयोग से पानी बनने का जो प्रयोग उन्नीसवीं शती में सही था, वह अब भी सही है। ठोस द्रव और गैसीय पदार्थों के अणुओं के संयोगों का परिणाम अब भी वही होता है जो उस समय होता, जब अणु को अविभाज्य माना जाता था। इसी प्रकार परमाणु के सम्बन्ध की नवीनतम जानकारियों के कारण परमाणु बम के निर्माण की विधि गलत नहीं हुई है। सिर्फ परमाणु के सम्बन्ध में मान्यता सुधरी है।

यही बात न्यूटन के गति और गुरुत्वाकर्षण सम्बन्धी सिद्धान्त के बारे में है। गति और गुरुत्वाकर्षण के जो सिद्धान्त न्यूटन ने प्रतिपादित किये थे, वे आइन्स्टाइन के सापेक्षता-सिद्धान्त से अधूरे सिद्ध हो गये। न्यूटन ने माना था कि हर वस्तु या पदार्थ से एक नियत राशि सम्बद्ध रहती है, जो उसका द्रव्यमान है। उस समय माना जाता था कि द्रव्यमान स्थिर और अपरिवर्तनीय है। यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान 1 किलोग्राम है, तो वह सदा उतना ही रहेगा। वहाँ, उसका भार पृथ्वी तल पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने पर तथा ऊपर या नीचे जाने पर बदल जाता है। किन्तु जे.जे. टामसन ने सिद्ध किया कि द्रव्यमान भी बदलता है। विद्युत आवेशित कण वाला पदार्थ जितने अधिक वेग से चलेगा, उतना ही उसका द्रव्यमान अधिक हो जायेगा। न्यूटन के समय पदार्थ और ऊर्जा भिन्न-भिन्न समझे जाते थे। आइन्स्टाइन ने स्पष्ट किया कि गति बदलने पर पदार्थ का जो द्रव्यमान का परिणाम होता है। अर्थात् यदि कोई जहाज 25 मील के वेग से चल रहा है, तो उसका द्रव्यमान उस समय से तनिक सा अधिक होगा, जब वह जहाज स्थिर था। यह बढ़ा हुआ द्रव्यमान उस जहाज की गति से पैदा ऊर्जा का द्रव्यमान है। यह सब कहने का तात्पर्य सिर्फ यही कि गति द्रव्यमान आदि के बारे में न्यूटन के द्वारा स्थापित धारणाएँ आइन्स्टाइन के सापेक्षतावाद के प्रतिपादन से बदल गईं, परन्तु इस सैद्धाँतिक प्रतिपादन के बदलने से जहाज की गति, वायुयानों की उड़ान आदि में कोई अन्तर नहीं आया। उनमें कुछ सुधार अवश्य हुए, पर पूर्वस्थापित नियम और समीकरण पूरी तरह गलत नहीं हुए। राइट बन्धुओं को सापेक्षवाद ज्ञात नहीं था, तो भी उन्होंने वायुयान उड़ाने का सूत्र गढ़ डाला था और व्यावहारिक प्रयोग में सफल रहे थे।

ढ़ाई हजार साल पहले यूनानी दार्शनिक थेल्स ने घर्षण द्वारा विद्युत-आवेश पैदा होते देखकर बिजली के बारे में यह धारणा गढ़ी कि यह रबड़ से पैदा होने वाला आवेश है। बाद में विद्युत को धन और ऋण आवेश के बीच दौड़ने वाली धारा के रूप में जाना गया। बिजली के बल्ब, पंखे, बैटरी आदि की खोज इतने ही सिद्धान्त से हो गई। जबकि अब पता यह लगा है कि विद्युतधारा के किसी भी संवाहक में वस्तुतः झुण्ड के झुण्ड इलेक्ट्रान समूह ऋण सिरे से धन सिरे तक बहते रहते हैं। यह मान्यता-भेद सामने आने पर भी बिजली के प्रकाश की व्यवस्था में कोई फेरबदल नहीं करना पड़ा।

अविज्ञात प्रकृति का जितना अंश समझ में आ जाता है, उसे अपनी कल्पना के अनुसार नाम दे दिया जाता है। उस समझ में आ गये अंश के भी सभी गुण ज्ञात नहीं होते। पहले वाले कारण को यों समझा जा सकता है कि रसायनशास्त्रियों को जब इतनी बात समझ में आ गई कि विभिन्न तत्वों का संयोग निश्चित मात्रा मूलक अनुपातों में होता है और तब नये-नये यौगिक बनते हैं, रासायनिक प्रक्रियाएँ होती हैं, तब उन्होंने परमाणुओं की सत्ता मान ली। यानी छोटी से छोटी पदार्थ-मात्रा को परमाणु नाम दिया ताकि उनका आनुपातिक सम्मिश्रण सरल हो, उन्हें मापा जा सके और मिलाया जा सके। यह परमाणु नाम कल्पित था। आगे एक-एक परमाणु के भीतर नाच रहे प्रोट्रान और इलेक्ट्रान दिखे, उनसे उत्सर्जित होने वाले विकिरण का पता चला तो परमाणु की जगह विद्युदणु की कल्पना की गई। इस प्रकार वस्तुओं का नाम और स्वरूप जैसा समझ में आता गया कल्पना के सम्मिश्रण से उसके बारे में मान्यता बनाई जाती रही है।

दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन प्रकल्पित पदार्थों में भी भौतिकशास्त्री मात्र गणितात्मक गुणों का आरोप करते हैं। इसी प्रकार रसायनशास्त्री कुछ रासायनिक गुणों का आरोप करते हैं। इस प्रकार विज्ञान यथार्थ के स्वरूप का सम्पूर्ण विवरण नहीं दे पाता। क्योंकि आइन्स्टाइन के शब्दों में “विज्ञान में जिन्हें ‘आधारभूत सैद्धान्तिक नियम’ (वेसिक थ्योरिटिकल लाँज) कहा जाता है। वे वस्तुतः वैज्ञानिक कल्पना की स्वच्छन्द सृष्टियाँ होते है।”

भौतिक विज्ञानी ने पदार्थों के परमाणु या विद्युदणु का माप देखा-समझा। वे किस मात्रा में संयोग-वियोग से क्या बनते हैं, यह परखा। परन्तु इससे परे की विशेषताएँ वह नहीं जान सकता। अमुक वस्तु के परमाणुओं या विद्युदणुओं की ये-ये विशेषताएँ हैं, इतना ही वह बता सकता है। इससे भिन्न और कोई विशेषता नहीं है; यह वह कभी भी दावा नहीं करता। अमुक वस्तु में ये-ये रासायनिक गुण हैं, इतना एक रसायनशास्त्री बता सकता है। उनके अतिरिक्त और किसी प्रकार के गुण नहीं हैं, यह वह नहीं कहता। चेतन वस्तुओं में सिर्फ भौतिक, रासायनिक या अन्य विज्ञान द्वारा सेप विशेषताएँ ही रहें, यह अनिवार्य नहीं। इसलिये विज्ञान के सूत्रों को सही मानते हुए भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे अधूरे हैं। और उनसे विश्व या चेतना सम्बन्धी कोई अन्तिम सिद्धान्त नहीं जाना जा सकता। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, पहले जो सैद्धान्तिक -निष्कर्ष सही माने जाते थे, आज उनमें से अनेक गलत माने जाते हैं।

वैज्ञानिकों की कल्पना के क्षेत्र की भी अपनी सीमाएँ हैं, इसीलिए उनके द्वारा प्रतिपादित मान्यताओं का सही होना आवश्यक नहीं। विशेषकर सृष्टि-सम्बन्धी व्याख्याएँ, विश्व-व्यवस्था के नियम और प्राचीन सभ्यताओं के बारे में धारणाएँ आधुनिक वैज्ञानिक सूत्रों से नहीं समझी जा सकतीं। कोई रसायन-शास्त्री या भौतिकविद् यदि किसी व्यक्ति के शव का रासायनिक - भौतिक विश्लेषण परीक्षण करे, तो उससे प्राप्त नतीजों द्वारा वह उस व्यक्ति के जीवित अवस्था के स्वभाव-व्यवहार को ठीक-ठीक नहीं जान सकता।

यहाँ मनुष्य के शव का उदाहरण समझाने के लिए ही दिया गया है। अमुक व्यक्ति के शव में कार्बन, लोहा, शीशा, ताँबा या विभिन्न अम्ल आदि के अवशेष किस मात्रा में हैं या शरीर, संरचना कैसी है, अंतःस्रावी ग्रन्थियों की आकृति कैसी है, खोपड़ी कैसी है; देह के अवयव सुगठित हैं या नहीं, आँतें और पाचन प्रणाली स्वस्थ है या नहीं, आदि जानने के बाद भी उस व्यक्ति की चेतना का स्तर क्या था, संस्कार क्या थे, यह जानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य समाज का अतीत में स्वरूप क्या था, विकास की किन स्थितियों से वह गुजर चुका है, इसके बारे में निश्चित रूप से जानना तभी सम्भव है, जब परीक्षण-विश्लेषण करने वालों को मानव-जीवन और सृष्टि-विकास के सभी रूपों की निश्चित जानकारी हो। जिसकी परिकल्पना ही सम्भव नहीं, उसका परीक्षण प्रयोगशाला में ठीक से नहीं हो पाता। यों तीर-तुक्का भिड़ाते-भिड़ाते कभी कोई आकस्मिक जानकारी मिल भी सकती है - किन्तु उतने भर से सुनिश्चित सिद्धाँत नहीं गढ़े जा सकते।

जो लोग आध्यात्मिक प्रतिपादनों की पुष्टि या ईश्वरीय सत्ता की उपस्थिति की जाँच के लिए वर्तमान वैज्ञानिक आधारों और नियम-सूत्रों का सहारा ढूंढ़ते हैं, या वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में ही ईश्वरीय सत्ता को पकड़कर दिखाने का आग्रह करते हैं, उन्हें ये तथ्य भली−भांति समझ लेने चाहिए। अभी तक विज्ञान द्वारा पदार्थ की सत्ता ही नहीं पकड़ी जा सकी है। उसके बारे में ही मान्यताएँ आये दिन बदल रही हैं। इसलिए आत्मा को पकड़ कर दिखाने की माँग एक ऐसी माँग है, जो विज्ञान से उसकी शक्ति सीमा के बाहर का कार्य करने की माँग कही जा सकती है। उदाहरण देना हो, तो यह कह सकते है कि ऐसी माँग किसी पहलवान से दर्शन-शास्त्रीय गुत्थियाँ सुलझाने या किसी सहजता से परमाणु-भट्टी का संचालन करने की माँग जैसा है। यों, प्रयास-परिश्रम से पहलवान दार्शनिक भी हो सकता है और संगीतज्ञ परमाणुविद् बन सकता है। परन्तु उसके लिए कार्य-क्षेत्र, अभ्यास-विधि और जीवन-क्रम की दिशा बदलनी होगी। एक वैज्ञानिक अध्यात्मवेत्ता भी हो सकता है, आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिकों ने आध्यात्मिक अनुभूतियाँ की भी हैं। किन्तु वे वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की परिधि के बाहर ही सम्भव हो सकी है।

आध्यात्मिक तथ्यों का निरूपण-विश्लेषण अध्यात्म की प्रयोगशालाओं में ही हो सकता है। आत्मसत्ता का अनुभव-क्षेत्र भौतिक-सत्ता के अनुभव-क्षेत्र से परे हैं। जो ऋषि-मनीषी, प्रज्ञा-पुरुष अध्यात्म के प्रयोग करते रहे हैं, वे ही उसके निष्कर्ष जान सकते हैं। और बता सकते हैं। यों, मान्यता बनाने के जिए सभी स्वतन्त्र हैं। अभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो यह मान्यता बनाये बैठे हैं कि चन्द्रलोक की यात्रा एक गल्प है। बताते हैं कि चीन की जनता को बहुत दिनों तक यही बताया जाता रहा कि अमेरिका के अन्तरिक्ष-अभियान के दावे गपबाजी हैं। अमरीका तो ‘कागजीशेर’ है और वहाँ की पूँजीवादी सभ्यता अपने ही बोझ से चरमराकर टूट रही है। अपनी जनता का ध्यान अपनी विफलताओं से हटाने के लिए ही अमरीकी शासक अन्तरिक्षीय उड़ानों के किस्से गढ़ते रहे हैं। इस प्रचार को ही चीनी जनता सत्य मानती रही और उसे वास्तविक तथ्य बहुत बाद में ज्ञात हुए।

आत्मा और परमात्मा के प्रति मनचाही मान्यता भी बनाये रखी जा सकती हैं। धर्म के नाम पर भ्राँत मान्यताएँ फली-फूली भी हैं। उनकी अवास्तविकता स्पष्ट है। किन्तु इतने से ही आध्यात्मिक तथ्य भी असत्य-अवास्तविक नहीं हो जाते। न ही उनके वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुरूप होने की बाध्यता हो सकती है। आत्म-सत्ता की अनुभूति के उपकरण, शोध की विधियाँ और प्राप्त परिणाम -से सभी वैज्ञानिक उपकरणों विधियों तथा परिणामों से भिन्न हैं। उसके रहस्यों को समझने के लिए ज्ञान-चक्षु, विवेक-दृष्टि, विकसित अन्तःकरण और आध्यात्मिक तत्व वेत्ताओं द्वारा निर्दिष्ट पथ का अनुसरण आवश्यक है। तभी चेतना के क्षेत्र में सत्य की शोध और लक्ष्य की उपलब्धि सम्भव है। यों, मानने को आस्तिकता के नाम पर भी भ्रान्तियाँ सही मानी जा सकती हैं, नास्तिकता के नाम पर भी।

मात्र पदार्थ, के स्वरूप और उपयोग की विधि−व्यवस्था को जान लेने से चेतना के स्वरूप और उससे सम्बन्धित सभी तथ्यों को जान लिया, ऐसा नहीं माना जाना चाहिए। शीर्षस्थ विज्ञान मनीषी आज एक स्वर से यह कह भी रहे हैं। “फ्राम द फिजिकल टू द सोशलः साइन्सेज” के लेखक जाक रुएफ ने स्पष्ट लिखा है -”हमारे पास यह जानने का कोई आधार नहीं हैं कि भौतिक शास्त्र के सिद्धान्त जिन कारणों का उद्घाटन करते हैं, वे वस्तुओं की असली प्रकृति हैं या नहीं।” आइजेन वर्ग ने इसीलिये कहा है कि “जैसे ही हम वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा प्रकृति का रहस्य जानने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही प्राकृतिक स्वरूप में व्यवधान उपस्थित करते हैं। हम जो जानते हैं, वह प्रकृति के साथ हमारी क्रियाओं-प्रयोगों की प्रतिक्रिया है। उसे प्रकृति का वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता।”

जब प्रकृति के बारे में ही यह बात है तब पुरुष या चेतन तत्व का स्वरूप तो वैज्ञानिक प्रयोगों से कथयपि नहीं जाना जा सकता। जो कुछ जाना जाता है, वह पदार्थ के अमुक-अमुक स्वरूप के संपर्क एवं ज्ञान से चेतना में उत्पन्न हलचल-विशेष है। स्वयं समग्र चेतना का स्वरूप इससे नहीं ज्ञात हो पाता।

चेतन-सत्ता का वास्तविक स्वरूप ऋतम्भरा प्रज्ञा, अन्तरात्मा या अंतर्मन द्वारा ही जाना जा सकता है। योग भूमिका में प्रवेश के बिना चेतन-तत्व को जानने के प्रयास कुछ और नयी अटकलें- मान्यताएँ ही सामने ला सकते हैं, तथ्य नहीं।


यही गुण ब्राह्मण के (kahani)

तथागत अपने शिष्य अनाथपिंडक के जैतवन में धर्मोपदेश कर रहे थे। तभी सामने से आते दिखे-महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चन्द, देवदत्त आदि।

बुद्ध ने अनाथपिंडक से कहा- ‘‘वत्स! ब्राह्मण-मण्डली आ रही है। उचित आसन की व्यवस्था करों।”

“कहाँ भगवान!” सामने देखता अनाथपिंडक विस्मित था- “इनमें तो कोई क्षत्रिय है, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य .............”

तथागत खिलखिला उठे, बोले-”वत्स!जाति का निर्णय गुण-कर्म स्वभाव से होता है, जन्म से नहीं। जन्म से नहीं। जन्म से तो सभी शूद्र है। जो रागरहित, धर्मपरायण, सेवाभावी संयमी और श्रेष्ठ विचारों से संचालित है, वहीं ब्राह्मण है। ये ऐसे ही लोग है। इसी से मैंने इन्हें ब्राह्मण कहा है।”


वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय

मृत्यु जीवन की एक अनिवार्य घटना है। किसी भी मनुष्य के जीवन में और कुछ निश्चित हो अथवा नहीं हो परन्तु इतना तो निश्चित ही है कि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य और अनिवार्य रूप से होगी ही। इतनी निश्चित और अनिवार्य घटना कोई भी नहीं है जितना कि मरना। यह जानते हुए भी अधिकाँश व्यक्ति मृत्यु से भयभीत रहते हैं और मरने के नाम से भी डरते हैं। मरना जितना निश्चित है उतना ही यह भी सत्य है कि मरने अधिकाँश लोग डरते है। जीवन की इतनी निश्चित और स्वाभाविक घटना से भयभीत होना व्यर्थ है फिर भी लोग मृत्यु से भयभीत क्यों रहते है? विचार करने पर एक ही कारण समझ में आता है कि अधिकाँश लोगों को मृत्यु के संबंध में अज्ञान ही रहता है।

यह स्वाभाविक ही है कि प्रत्येक व्यक्ति को सबसे अधिक अपना अस्तित्व प्रिय होता है और सब कुछ नष्ट हो जाय पर कोई भी व्यक्ति अपने अस्तित्व को नष्ट नहीं होने देना चाहता। किसी भी मूल्य पर उसे बनाये रखने में हरे किसी की रुचि और लगाव रहता है। जिन प्राणियों को अपने अस्तित्व का भान नहीं होता या जिनमें समझ बूझ नहीं होती, वह मृत्यु से नहीं घबराते हैं। बकरा कसाई की छुरी के नीचे जाने से पहले तक खूब खाता पीता है और हरी पत्तियाँ देख कर ललचाता है। बिल्ली के पंजों में दबने से पहले चूहा भी मौज-मस्ती से उछल कूद मचाता है। कारण कि उन्हें मृत्यु की संभावना का जरा भी पता नहीं रहता। मरणासन्न स्थिति में उनके शरीर पर छुरे की पैनी धार अथवा पंजों के नुकीले नाखून चुभते हैं तभी उसके कारण होने वाले दर्द से वे मिमियाते, चिचियाते हैं। लेकिन कोई रोगी व्यक्ति भी मृत्यु, की सम्भावना बता दिये जाने पर खाने पीने से विरक्त, उदास और म्लान मुख हो जाता है। कारण कि उस समय लगता है अब अपने जीवन का अन्त हुआ और अब अपना अस्तित्व समाप्त हुआ।

यह अपने अस्तित्व के प्रति आसक्ति ही है, जो किसी व्यक्ति को मौत के नाम से भी कँपकँपा देती है। वही यह भी तथ्य है कि मृत्यु के वास्तविक स्वरूप का पता लगा लिया जाय, किसी प्रकार मृत्यु के बारे में जान लिया जाय तो मौत के प्रति वह भय कम हो सकता है और मृत्यु को उल्लासपूर्वक गले लगाया जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय मनीषियों ने मृत्यु के विषय में गम्भीरता पूर्वक विचार किया है और उसका विस्तार से विश्लेषण विवेचन करते हुए कहा है कि मृत्यु का अर्थ जीवन का अस्तित्व का अंत नहीं है। जीवन तो एक शाश्वत सत्य है और अस्तित्व का न आदि है न अंत। गीताकार ने कहा है - न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि हम सब लोग इससे आगे नहीं रहेंगे। (2/12)

जन्म वस्तुतः न तो जीवन का आदि है और नहीं मृत्यु उसका अन्तः भारतीय मनीषियों ने अपनी अंतर्दृष्टि से हजारों वर्ष पूर्व इस तथ्य को जान लिया था और उपनिषदों, पुराणों स्मृति और शास्त्रों में प्रतिपादित कर दिया था। आधुनिक युग में जब बुद्धिवाद का प्रभाव बढ़ने लगा और हर बात व सिद्धान्त को तथ्य, तर्क व प्रमाणों की कसौटी पर कसा जाने लगा तो एक बारगी यह प्रतीत हुआ कि शाश्वत जीवन का यह सिद्धान्त हवा में उड़ जायेगा। कुछ लोगों ने तो यह कहना भी आरम्भ कर दिया कि जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि से परे जीवन का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है। मरणोत्तर जीवन और जन्म से पूर्व प्राण चेतना की सत्ता काल्पनिक उड़ानें हैं। लेकिन बुद्धिवाद को भी अपनी मान्यता उन ढेरों ढेर घटनाओं को देखकर बदलनी पड़ी जो जीवन की शाश्वतता को सिद्ध करती थी।

अब तो इस विषय विज्ञान की भी रुचि हुई है। और उस शाखा के वैज्ञानिक मरणासन्न व्यक्तियों का अध्ययन कर यह जानने की चेष्टा करते हैं कि मृत्यु से पूर्व उन्हें कैसा अनुभव होता है। विज्ञान की इस शाखा को थेनार्टालाँजी, कहते हैं। पश्चिमी जर्मनी की एक वैज्ञानिक डॉक्टर लोथर विद्जल ने ऐसे कई व्यक्तियों से बातचीत की जो मृत्युशैया पर पढ़े थे और उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे मृत्यु निकट आती जाती है मरणासन्न व्यक्ति का मृत्यु भय मिटता जा रहा है। बीमारी की वृद्धि के साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों की धार्मिक आस्था भी दृढ़ होती पायी गयी और यह भी देखा गया कि उनकी चिंतायें कम होती जा रही हैं।

डा. लोथर विद्जल ने अपनी पुस्तक में एक मरणासन्न मरीज का विवरण देते हुए लिखा है, मैं शायद उसका हाथ कुछ अधिक मजबूती के साथ पकड़े हुए था क्योंकि उस मरीज ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा मुझे वापस मत खींचो। वहाँ आगे बहुत ही सुन्दर दृश्य है। इसी प्रकार एक चिकित्सक का विवरण लिखते हुए डॉक्टर विद्जल ने कहा है, “ यदि मुझमें कलम उठाने की शक्ति होती तो मैं लिखता कि मृत्यु भी कितनी सरल और सुखद है।

इन विवरणों को संकलित और सम्पादित करते हुए डॉ विद्जल ने कहा है कि मरने से पूर्व मनुष्य की अंतश्चेतना इतनी संवेदनशील हो जाती है कि वह तरह तरह के चित्र विचित्र दृश्य देखने लगती है। यह दृश्य उसकी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप ही होते हैं। उदाहरण के लिए हिन्दू को यमदूत अथवा देवदूत दिखाई देते हैं मुसलमानों को अपने धर्मशास्त्रों में उल्लेखित प्रकार की झांकियां दीख पड़ती हैं और ईसाइयों को भी उसी प्रकार पवित्र आत्माओं, ईसा अथवा बाइबिल में वर्णित पवित्र आत्माओं और दिव्यलोकों के दर्शन या अनुभव होते हैं।

विज्ञान की थेनेटालाँजी शाखा के अंतर्गत मृत्यु का विश्लेषण करने के लिए अमेरिका के डॉ. रेमंड ए. मूडी ने भी गहन शोध की है। डा. विद्जल ने तो केवल मरणासन्न व्यक्तियों का ही अध्ययन किया पर डा.मूडी ने अपनी शोध म तीन प्रकार के व्यक्तियों का सम्मिलित किया। इनमें एक तो वह थे जो किसी रोग या दुर्घटना के कारण मृत्यु के एकदम समीप पहुँच गये और फिर बच गये। उनके लिए कहा जा सकता है कि उन्हें नयी जिन्दगी मिली। दूसरे वे व्यक्ति थे जो मरणासन्न स्थिति में थे और अपने अनुभव बता सकते थे तीस प्रकार के व्यक्ति डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित कर दिये जाने के बाद पुनः जी उठे थे।

इस तरह के सैकड़ों व्यक्तियों से बातचीत करके उनके द्वारा दिये गये विवरणों का अध्ययन कर और अन्य व्यक्तियों के अनुभवों से संगति बिठाते हुए डा. रेमंड ए मूडी लाइफ आफ्टर लाइफ’ पुस्तक लिखी इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि मृत्यु के समय भले ही यह लगता रहा हो कि सब कुछ समाप्त हो जायगा अथवा हम कुछ भी देखने, सुनने या समझने में असमर्थ हो जायेंगे अथवा अब हम समाप्त ही हो जायेंगे परन्तु ऐसा कुछ नहीं होता। परिवर्तन इतना भरा होता है कि अपने अस्तित्व का अनुभव शरीर से पृथक अस्तित्व के रूप में होने लगता है।

अमेरिका की ही एक महिला मिसेज मार्टिन, जिसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था और वह पुनः जी उठी थीं, उन ने अपने अनुभव सुनाते हुए डा. मूडी को बताया में अस्पताल में थी, पर डॉक्टरों को मेरे रोग के बारे में कुछ पता ही नहीं चल रहा था। मरे चिकित्सक डा. जेम्स ने मेरी जाँच के लिए नीचे की मंजिल पर रेडियोलाजिस्ट के पा भेजा। उसने मुझे एक खास दवा दी परन्तु मैंने अनुभव किया कि मेरी साँस रुक गयी है इसके बावजूद भी मैं सब कुछ देख सुन और समझ रही थी डॉ. मुझे कृत्रिम उपायों से श्वांस दिलाने की कोशिश कर रहे थे यह मैं स्पष्ट देख रही थी। मेरे लिए कोई खास दवा लाने का आदेश दिया गया। यह सब मैं देख जान, और समझ रही थी पर वे लोग मुझे छू रहे थे मेरी बाँहों में इंजेक्शन लगा रहे थे यह सब देखते हुए भी मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।

कार दुर्घटना का शिकार हुए और मृत घोषित कर दिये गये एक युवक ने, जो पुनः जी उठा अपना अनुभव सुनाते हुए बताया- पास ही खड़ी कोई महिला पूछ रही थी कि क्या इसका दम निकल गया। इस पर दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया कि हाँ यह मर गया है। उस युवक ने बताया कि ऐसा सुनते समय वह उन बातचीत करने वाले और आस-पास खड़े दूसरे व्यक्तियों को ही नहीं देख रहा था बल्कि अपने शरीर, चेहरे, सिर, में लगे घाव, उनमें से रिसा हुआ खून और टूटी हुई हड्डियों के बारीक-बारीक टुकड़े भी देख रहा था जैसे किसी दूसरे व्यक्ति का शव देख रहा हो।

एक अन्य महिला ने अपनी अनुभूति इस प्रकार व्यक्त की है, “ दिल की बीमारी के कारण मुझे अस्पताल में भरती किया गया और अगले दिन फिर मेरी छाती में असह्य दर्द उठा। मैंने पेट के बल लेटने की कोशिश की तो मेरी साँस बन्द हो गयी और दिल भी थम गया। तभी मैंने नर्स को चिल्लाते सुना कोड पिंक कोड पिंक। ठीक तभी मैं अपने शरीर से बाहर निकल गयी और इसी समय लगभग एक दर्जन नर्सें दौड़ती हुई मेरे कमरे में आई। मेरा डॉक्टर उस समय अस्पताल का दौरा कर रहा था, उसे भी बुला लिया गया डॉक्टर और नर्स नीचे पड़े मेरे शरीर को फिर से जीवित करने की कोशिश कर रहे थे और मेरा शरीर आँखों के सामने पलंग पर पसरा हुआ था दूसरी नर्स मेरे शरीर के मुँह से मुँह लगा कर मुझे कृत्रिम साँस देने की कोशिश कर रही थी। पीछे से मैं उसका सिर देख रही थी, उसके बाल छोटे कटे हुए थे। तभी कुछ लोक एक मशीन कमरे में लाये और उन्होंने मेरे शरीर की छाती पर बिजली के झटके लगाये।”

डा. लिट्जर और डा. मूडी के अतिरिक्त डा. श्मिट ने भी ऐसे व्यक्तियों से संपर्क किया जिन्हें मृत घोषित कर दिया था। उन्होंने भी लगभग इसी प्रकार के अनुभव बताये। निष्कर्षतः सब का सार यह था कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है और इस घटना से केवल आत्म चेतना ही शरीर से पृथक् होती है। इसके अलावा कोई रोमाँचकारी अथवा हृदय विदारक घटना नहीं घटती।

इसका अर्थ है कि मृत्यु जीवन अन्त नहीं है। मनुष्य या जीवन का अस्तित्व शरीर से सर्वथा भिन्न बात है। शास्त्रकारों ने इसी अस्तित्व को जीव कहा है। जीवन को शरीर से संबद्ध मान लेने को देहभ्रान्ति कहते हुए योगवाशिष्ठ के निर्वाण प्रकरण में कहाँ है- यह जीव अस्थि, माँस और रक्त से बने स्थूल हाथ पैर वाले शरीर को अपना अस्तित्व मान लेता है जो कर्म कर्म और कामना का केंद्र तथा परिणाम रूप से मरणशील है और देहभ्रान्ति में पड़ जाता है। तब वह बाल्य, युवा वृद्धावस्था, जरा रोग मरण भ्रमण व्यवहार आदि का ज्ञान भी कल्पित करता है। इसी कारण दुःख सुख, पीड़ा, व्यथा और कष्ट वेदना का अनुभव होता है।

दुर्घटना में मृत घोषित कर दिये गये परन्तु बाद में जीवित हो उठे व्यक्तियों से संपर्क कर उनके अनुभवों का अध्ययन करने के बाद डा. एम. बेनफोर्ड ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है। उन्होंने लिखा है कि दुर्घटनाओं के कारण घटित होने वाली मृत्यु की घटना बड़ी गति से घटती है और जीव को शरीर से विलग हो जने का अनुभव भी नहीं होता। ये आकस्मिक दुर्घटनायें बड़ी भीषण और, दर्द नाक होती है परन्तु जो मर जाते है, उनके लिए मृत्यु बड़ी विस्मय पूर्ण घटना होती है। दुर्घटना, के तत्क्षण बाद मर जाने वाले व्यक्तियों को किसी पीड़ा का आभास इसलिए नहीं होता कि, जीवात्मा बहुत, आगे की संभावनाओं को जान लेती है। दुर्घटना ग्रस्त होने से पहले ही उसे पता चल जाता है कि इस दुर्घटना के कारण यह शरीर अपने रहने योग्य नहीं रहा जायगा इसलिए वह दुर्घटना से पहले ही शरीर छोड़ देता है।

इस प्रकार की जितनी भी घटनाओं के विवरण देश विदेश के थेनेटालाजिस्टों ने संकलित किये हैं उनसे भारतीय दर्शन की यही मान्यता पुष्ट होती है कि मृत्यु कोई अस्वाभाविक, दुःखद और पीड़ादायी घटना नहीं है। उन विवरणों से शरीर और चेतना की भिन्नता तो सिद्ध होती ही है यह सिद्ध होता है कि शरीर इस चेतनशक्ति के कारण ही स्पर्श, ग्रहण, संवेदन, स्पंदन और क्रियाशीलता अपनाता है। अर्थात् शरीर अपनी सार्थकता के लिए आत्म तत्व पर निर्भर है जब कि आत्मचेतना शरीर की शक्ति−सामर्थ्य या स्थिति पर रत्ती भर भी निर्भर नहीं है। फटे हुए वस्त्र को व्यर्थ और निरुपयोगी जान कर जिस प्रकार उतार रख दिया जाता है उसी प्रकार जीवात्मा भी जीर्ण अशक्त शरीर को अपने रहने योग्य न समझ कर उसका परित्याग कर देता है।


श्रेयात् सिद्धिः

“जननी भिक्षामि देहि”- नगर सेठ प्रसेनजित के द्वार पर अभिराम कपिल ने गुहार लगाई। जीवन का बहुत ही मार्मिक क्षण था जब कि नगरसेठ की अद्वितीय सुन्दरी परिचारिका गौरवर्ण मधूलिका भिक्षा लेकर द्वार पर उपस्थित हुई। आचार्य इन्द्रदत्त के स्नातकों में कपिल भी मनोज के समान सुंदर थे। सुदीर्घ वक्ष, प्रलम्ब बाहु, उन्नत, ललाट, गौरवर्ण। भिक्षा देर तक अंचल में ही पड़ी रही मधूलिका और कपिल देर तक एक दूसरे को निर्निमेष देखते रहे। सौंदर्य के इस आकर्षण में कपिल मुग्ध हो गये। कितने क्षण इस तरह बीत गये कुछ पता ही नहीं चला।

इसके बाद-कपिल को जब भी अवसर मिलता वही द्वार -वही भिक्षा सब कुछ वही-और तब प्रारम्भ हुई पतन की करुण कथा। कपिल ने रमणी के सौंदर्य में न केवल विद्या खोई वरन् अपना ओजस, आरोग्य और वर्चस्व सब कुछ खो दिया फिर भी वासना की आग शान्त न हुई। ऐसा होता तो वासना और तृष्णा ने सैकड़ों बार इतिहास के मस्तक को कलंकित नहीं किया होता। इस शाश्वत सत्य से कपिल कहाँ बचने वाले थे। अभी तो अधोगति का आरम्भ था- अन्त नहीं।

बसन्त पर्व समीप था। सुकुमारियाँ ऋतुराज का स्वागत करने के लिए नाना परिधान; अंगराग, कुँचकि केसर, वेणि; किन्तु धन उसके पास कहाँ? निदान युवक प्रेमी कपिल को ही उसने अपनी आकाँक्षाओं का आखेट बनाया। उसने कपिल से ही एक शत स्वर्ण मुद्राओं की याचना की, वह जानती थी कपिल भिक्षु हैं, स्नातक हैं, दूरवर्ती कौशांबी का रहने वाला है यहाँ उसके पास स्वर्ण मुद्रायें कहाँ - सो उसी, ने युक्ति भी बताई, आप श्रावस्ती नरेश के पास चले जाये। वे अप्रतिम दानी हैं एक सौ मुद्रायें उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं।

कामार्त्त कपिल द्वार पर पहुँचे। वे विवेक खो चुके थे। रात्रि में ही राजप्रासाद में प्रवेश करना चाहा फलतः न केवल प्रहरी की प्रताड़ना मिली अपितु दस्यु की आशंका से उन्हें रात बन्दीगृह में बितानी पड़ी। विद्यमान वर्चस्व खोने के बाद उन्हें आत्म सम्मान से भी विच्युत होना पड़ा। वासना जो न कराये सो थोड़ा।

प्रातःकाल वे बन्दी वेष में नृपति के सम्मुख प्रस्तुत हुए। कपिल ने शील खोया था, पर उन्हें उबारने वाला सत्य अभी तक उनके पास था। उन्होंने महाराज को सब कुछ स्पष्ट बता दिया परिचारिका मधूलिका के सम्मोहन से यहाँ तक की सारी गाथा कपिल ने कह सुनाई।

सम्राट कपिल की निश्छलता पर बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने पूछा-युवक। बोलो अब तुम क्या चाहते हो- जो माँगोगे मिलेगा। एक शत स्वर्ण मुद्रा। कपिल ने मन ही मन कहा-फिर विचार आया जब कुबेर का भण्डार ही खुला है तो एक शत क्यों-एक सहस्र-नहीं नहीं एक लक्ष-जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई”-क्यों न ऐसा कुछ माँगा जाये जिससे मधूलिका के साथ आजीवन सुखोपभोग का जीवन जिया जाये।

“आपका सम्पूर्ण राज्य चाहिए राजन्-याचक के मुँह से यह निकलते ही समस्त सभासद-परिचारक, अंगरक्षक अवाक् स्तब्ध रह गये किन्तु श्रावस्ती नरेश किंचित मात्र विचलित नहीं हुए।

तथावस्तु कपिल! वे बोले-मैं निःसन्तान हूँ। राज्यभोग ने मेरी आत्मिक शक्तियों को जर्जर कर दिया है चाहता ही था कोई सुयोग्य पात्र मिले तो इस जंजाल से मुक्त होकर आत्म-कल्याण का मार्ग खोजूं - तुमने आज मेरा भार उतार दिया आज से श्रावस्ती तुम्हारी हुई।

नृप के इस औदार्य पर कपिल आश्चर्यचकित रह गये। आत्म-कल्याण-आत्म- शान्ति क्या इतनी महान है जिस पर राज्य यों न्यौछावर किया जा सकता है। तब तो मैंने महा अनर्थ किया। कपिल सम्भले और बोले नहीं-नहीं-क्षमा करें राजन। मैं अपने उसी श्रेय की ओर प्रस्थान करूंगा। जिसका निर्देश मेरे गुरुदेव ने किया था-क्षणभर में कपिल राज प्रासाद से बाहर हो गये, लोगों ने देखा वे जा रहे हैं दूर-बहुत दूर-बहुत दूर बहुत दूर।


यह जीवन भी कोई जीवन है

जन्म लेना एक अलग बात है और जीवन जीना उससे बहुत ही भिन्न तथा विशिष्ट बात है। मनुष्य या पशु-किसी भी प्राणी का बच्चा जन्म लेता है तो जन्म से ही उसे अपना ध्यान आता है। भूख लगती है तो रोता चिचियाता है, बीमार पड़ता है तो उदास हो जाता है और सोने की इच्छा होती है तो उचित स्थान के लिए ठनकने भटकने लगता है। अबोध स्थिति में ये सारी आवश्यकतायें अभिभावक पूरी करते हैं। थोड़ी समय बढ़ती है, मनुष्य बड़ा होता है तो स्वयं अपनी आवश्यकतायें पूरा करने लगता है।

इस स्थिति तक ही सीमित रहने का नाम जीव नहीं है। कहना ही हो तो यों कहा जा सकता है कि वह जन्म के बाद थोड़ा समझदार हो गया है तथा अपनी आवश्यकताएं किसी सीमा तक पूरी करने में स्वयं समर्थ हो सका है। किसी सीमा तक इसलिए कि कोई भी मनुष्य अपने उपयोग की समस्त वस्तुओं को अकेले जुटाने, बनाने में सफल नहीं हो सकता है। उनका मूल्य रुपयों में चुकाने की बात कही जाय तो यह भी कहा जा सकता है कि रुपये अथवा सिक्के का अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। वह सहयोग के आदान-प्रदान की एक व्यावहारिक व्यवस्था भर है। अन्यथा दूसरे व्यक्ति श्रम न करें, जीवनोपयोगी वस्तुओं का निर्माण बन्द हो जाय, आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाय तो सिक्का बस सिक्का ही रह जायगा।

इस आदान-प्रदान के-क्रय-विक्रय के अतिरिक्त भी मनुष्य पर समाज के अन्य और कितने ही उपकार हैं।उनसे उऋण होना जीवन और मानवता का तकाजा है। लेकिन मनुष्य की चिन्तायें और उसकी गतिविधियाँ स्वार्थ की उस परिधि से किंचित भी बाहर नहीं जाती जिनमें कि वह जन्म के समय व्यस्त रहता है। इसीलिए संकीर्ण स्वार्थ को घृणित, असामाजिक, अमानवीयता कहा जाता है। जीवन का अर्थ खोजते हुए फ्रेंच के प्रसिद्ध, कवि राडल फेलेरो ने वर्तमान समस्याओं के कारण को उद्घाटित करते हुए कहा है -गड़बड़ क्या है सबसे पहले मैं खुद ही गड़-बड़ हूँ। क्योंकि मैं स्वार्थ हूँ, मनुष्य में मेरा विश्वास नहीं और समाज के प्रति मेरी आस्थायें दरिद्र हैं।

स्वार्थ की परिधि से थोड़ा भी बाहर निकल कर झाँका जाय तो प्रतीत होगा कि वह समय और वह सामर्थ्य जो हमें अपने लिए ही अपर्याप्त लगती है, दूसरे के लिए कितनी सहायक सिद्ध हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को एक बड़ा-सा बँगला भी अपर्याप्त लगता है, क्योंकि उसके चारों ओर फूल-पौधे लगाने के लिए खाली जमीन नहीं है। परन्तु कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें सर छुपाने के लिए टूटी झोपड़ी तक नहीं मिलती। कोई व्यक्ति इसीलिए व्यथित है कि उसके बच्चे को सुबह नाश्ते में मक्खन और स्लाइड नहीं मिल सका क्योंकि बाजार बन्द था। इसी कारण पूरी समाज व्यवस्था भ्रष्ट और काहिल लगती है; किन्तु दुनिया में 40 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो भूख के कारण अपना जीवन मौत की झोली में डालने के लिए अब तब करा रहे हैं उनकी व्यथा किसी को नहीं सालती, न उधर ध्यान देना ही उचित और आवश्यक प्रतीत होता है-

इस तरह की तमाम प्रवृत्तियाँ मनुष्य की आत्म केन्द्रित स्वार्थ परायणता का परिचय देती है और यह मानने के लिए माध्य करती है कि कितना ही जीवित दिखाई देने के बाद भी मनुष्य जन्म भर ले सका है, जीवन को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका है कवि फोलेरो ने अपनी एक कविता में लिखा है- जिसके भाव कुछ इस प्रकार हैं-”दुनिया में चालीस करोड़ बच्चे भूखे हैं। आपका बच्चा क्यों नहीं? आपके बच्चे को क्या खाना, कपड़ा और मकान प्राप्त है? आपके बच्चे को ही क्यों? दूसरे के बच्चे को क्यों नहीं? श्रीमती जी, कभी आपने सोचा है इस पर? एक तिहाई मनुष्यों को भरपेट भोजन नहीं मिलता। दुनिया में अस्सी करोड़ आदमियों ने डाक्टर की शक्ल तक नहीं देखी। दुनिया में एक अरब से अधिक आदमी पढ़ नहीं पाते।’

सचमुच इन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता और जाता भी है तो केवल चर्चा करने, क्लब या होटलों में बैठ कर बात-चीत शुरू करने का कोई सूत्र ढूंढ़ने अथवा अपने सामान्य ज्ञान की छाप दूसरों पर छोड़ने के लिए ही। इन मानवीय समस्याओं को भी लोग अपने अहं की तुष्टि अथवा तात्कालिक लाभ के लिए प्रयुक्त करते हैं, समय काटे नहीं कट रहा है, मित्र से बातचीत के सारे विषय समाप्त हो चुके हैं तब बातचीत जारी रखने के लिए क्या किया जाये? खाली बैठना भी अच्छा नहीं लगता तो आदमी इन समस्याओं पर बातचीत शुरू कर देता है। इससे बढ़कर स्वार्थपरता और क्या होगी? जन्म के बाद मनुष्य जीवन नहीं जीता बल्कि उसका स्वार्थ और गहरा हो जाता है तथा वह उसे और अधिक चतुराई व निर्भयता से पूरा करना सीख जाता है।

माननीय समस्यायें है, उनके समाधान के लिए कुछ करना चाहिए, यहाँ तक तो सभी कोई स्वीकार करते हैं। परन्तु क्या करना चाहिए और क्यों नहीं करते हैं का प्रश्न आता है तो उत्तर में सब मौन हो जाते हैं। अधिक ही कोई नैतिक या सामूहिक दायित्वों का दबाव पड़ा तो लोक यह कहते हुए पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं कि - हम कर ही क्या सकते हैं? भूख; अशिक्षा, रोग, अभाव, दैत्य और ऐसी ही समस्यायें इतनी व्यापक हैं कि हमारे अकेले के प्रयास जलते हुए तवे पर पानी की बूँद के समान होंगे।

यह उत्तर भी मानवी समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ करने से कन्नी काट जाने के लिए दिया जाता है। प्रश्न किया जाना चाहिए अपने आप से कि आपके प्रयास जलते तवे पर पानी की बूँद छिड़कने जैसे हो सकते हैं, हो सकता है उनके बड़े परिणाम भी हों, किन्तु उन प्रयासों की दिशा में अभी तक आपने थोड़ा बहुत कुछ किया है। जलते हुए मकान को बुझाने के लिए लोग बाल्टियाँ लेकर दौड़ पड़ते हैं। एक बाल्टी पानी से कोई मकान की आग नहीं बुझ जाती। फिर भी प्रयत्न तो किया ही जाता है और दूर देहातों में जहाँ आधुनिकतम अग्निशामक यन्त्र उपलब्ध नहीं है लोग बाल्टियों से ही आग पर काबू पा लेते है। दीपक इन्कार कर दे कि सारी पृथ्वी में अन्धेरा है मैं अन्धकार को हटाने में अकेला दीप उसके लिए क्या कर सकता हूँ। दीपक ने आज तक तो यह बहाना नहीं बनाया और वह अकेला ही अन्धकार से जूझने के लिए सन्नद्ध खड़ा है। वस्तुतः “हम क्या कर सकते है?” का प्रश्न ही इस बात का प्रतीत है कि कुछ करने की उमंग नहीं है और कायरता की वह निर्लज्ज स्वीकृति इस प्रश्न के रूप में उभर कर सामने आयी है।

इस आत्यन्तिक स्वार्थपरायणता के अलावा मनुष्य के जीवन से वंचित रहने का एक दूसरे का कारण यह है मनुष्य के प्रति विश्वास और सद्भावों का अभाव मनुष्य अपने ही समान पड़ौसी को मनुष्य के रूप में देखने से पहले उसे कुल, बिरादरी और संप्रदाय के हिस्सों में देखता है तब इसके बाद कहीं मनुष्य के रूप में स्वीकार कर सका, तो करेगा। इस प्रवृत्ति को संकीर्णता नहीं तो और क्या कहा जायगा। धर्म, जाति, कुल और संप्रदाय के कारण ही मनुष्य दूसरे मनुष्य से घृणा करने लगता है। अपने परिवार में अपना कोई बन्धु-बान्धव रोगी या बीमार पड़ता है तो उसके स्वास्थ्य की थोड़ी चिन्ता होती है और उसकी चिकित्सा-परिचर्या की व्यवस्था की जाती है। उस समय मन में रहने वाली चिन्ता और रुग्ण स्वजन की स्वास्थ्य कामना की तुलना स्वयं अपने स्वास्थ्य की कामना से की जाय तो विदित होगा कि वहाँ भी अपनी ही चिन्ता ज्यादा होती है। स्वयं बीमार हो जाने पर व्यक्ति स्वस्थ होने के लिए जितना आतुर होता है उतना किसी बन्धु-बान्धव के बीमार होने पर नहीं होता। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डा. जानबोरहम का तो यहाँ तक कहना है कि -स्वजनों के अस्वस्थ होने से दुःखी नहीं होता व्यक्ति उनके रोग के कारण व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में होने वाला अशान्ति से स्वयं प्रभावित होने के कारण उसके उपचार का व्यग्रता से प्रबन्ध करता है।”

डा. जान बोरहम का यह भी कहना है कि - “मातायें रात में अपने बच्चों को गीले से उठा कर सूखे में सुलाने का प्रयत्न ममता की अपेक्षा अपनी सुविधा के लिए ज्यादा करती हैं। क्योंकि उन्हें लगता है बच्चा यदि गीले में सोता रहा तो रो-रो कर उसकी भी नींद हराम कर देगा।” कहा नहीं जा सकता कि इन दोनों मनोवैज्ञानिकों के कथन कहाँ तक सत्य है; परन्तु व्यक्ति के सम्बन्धों पर निर्भर व्यवहार को देखते हुए इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता कि वह दूसरों के लिए हितकामना से कम स्वार्थ की भावना से अधिक चिन्तित रहता है। पड़ोसी के बीमार पड़ने पर कितनी चिन्ता होती है, दूर स्थित रिश्तेदार के बीमार पड़ने पर कितना दुख होता है और किसी अपरिचित व्यक्ति को दुर्घटना का शिकार होते देख कर कोई कितना परेशान होता है। आदि स्थितियों में मानवीय करुणा, सहृदयता तथा सद्भावना की अच्छी परख हो जाती है।

एक ही स्थान पर मित्र की भाँति रहने वाले लोग सम्प्रदाय और मजहब के नाम पर कितने भयंकर शत्रु हो जाते हैं - इसके प्रसंग, आये दिनों होने वाले साँप्रदायिक दंगों में देखे जा सकते है। स्वतंत्रता मिलने के तुरन्त बाद जब देख विभाजन हुआ भारत दो टुकड़ों में बँटा तो व्यापार में भागीदार लोग भी एक दूसरे खून के प्यासे हो गये। यह किसी धर्म संप्रदाय में नहीं है कि अपने विधर्मी की हत्या करो, मतभेद रखने वाले को किसी कीमत पर सहन मत करो। परन्तु मनुष्य हृदय में बसने वाली क्षुद्रता और संकीर्णता अपने धर्म सम्प्रदाय के सिद्धान्तों की भी सुविधानुसार व्याख्या कर लेती है।

इसीलिए तो कहा गया है कि जन्म लेने के बाद भी मनुष्य, जीवन को प्राप्त नहीं कर पाता। वह जन्मते ही स्वार्थ सीखता है और ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है त्यों-त्यों स्वार्थ की भाषा में अधिक पारंगत होता जाता है संकीर्णता की परिधि में और अधिक और अधिक सिकुड़ता जाता है। जन्म लेने के बाद मनुष्य किस प्रकार जीवन को प्राप्त करे यह जानने से पहले आवश्यक होगा कि जीवन का अर्थ समझ लिया जाय।

सृष्टि जगत में व्याप्त अन्तःचेतना का एक विश्राम जीवन है। यह ये जीवन है एक पड़ाव जो जन्म से मृत्यु के बीच इस काय कलेवर में डाला जाता है। किसी भी स्थान पर नियत अवधि के लिए ठहरते समय व्यक्ति अपने सारे सम्बन्धों को उस तंग कोठरी तक ही सीमित नहीं कर लेता बल्कि उसके लिए सारे सम्बन्ध जीवित रहते हैं और दूर रहते हुए भी वह उन्हें निभाने की चेष्टा करता है। जीवन चूँकि आत्मचेतना का शरीर वास है और और आत्म चेतना उसी विराट् चेतना का एक अंश है जो समूची सृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। अतः उसे शरीर की तंग कोठरी तक ही सीमित कर देना जीवन को खो देने, उसकी हत्या कर देने जैसा होगा।

जीवन की व्याख्या एक ही शब्द में करना चाहें तो वह शब्द होगा ‘प्रेम’। प्रेम के चाहे जितने अर्थ किये जाये परन्तु भारतीय मनीषियों ने विश्वव्यापी विराट् चेतना को अंगीकार करने के भाव को ही प्रेम कहकर सम्बोधित किया है। सद्यः प्रसूत शिशु अबोध और असमर्थ होने के कारण केवल अपनी ही क्षुधा पहचान सके, अपना ही कष्ट अनुभव कर सके तो यह अस्वाभाविक नहीं है। परन्तु जैसे-जैसे वय विकसित होती जाती है उसका अपना आपा भी विस्तृत होता चलना चाहिए और धीरे-धीरे उसे अपना कुटुम्ब, समाज, देश और विश्व के साथ अपने सम्बन्ध विकसित व प्रगाढ़ करना चाहिए। यह ठीक है कि मनुष्य की सामर्थ्य बहुत कम है और उसका अस्तित्व बहुत क्षुद्र। सर्व व्यापी अन्धकार की तुलना में दीपक भी बहुत असमर्थ और क्षुद्र है। परन्तु वह शक्ति भर अन्धकार से जूझने का प्रयास करता है और ऐसे हजारों दीपक व्यापक क्षेत्र में फैले हुए अन्धकार को हटाने में समर्थ हो जाते है। यह सोच कर निराश न हों और न ही अपने माननीय दायित्वों से पलायन करें कि - हम क्या कर सकते हैं। बल्कि अपनी पूरी सामर्थ्य को दाव पर लगा कर आसन्न चुनौतियों का प्रस्तुत संकटों का उत्पन्न मानवीय समस्याओं का समाधान करने के लिए उठ खड़े हों तो जीवन अभी और यहीं उपलब्ध है।


महामानव अर्थात् चरित्र-निष्ठा

मेसीडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र सिकन्दर को एक महान् पुरुष के रूप में देखना चाहते थे। उसकी प्रतिभा, शक्ति, सामर्थ्य, क्रियाशीलता, धैर्य, साहस और सूझ-बूझ से वे अच्छी तरह परिचित हो गये थे। अब इस बात की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे कि किस व्यक्ति के पास अपने बच्चे को शिक्षा हेतु भेजूँ जो इसकी इन शक्तियों को कुमार्गगामी बनने से रोके ओर महामानव बनने की प्रबल प्रेरणा उत्पन्न कर सके। सोचते-सोचते उनकी नजर तत्कालीन महान्-दार्शनिक अरस्तू पर पड़ी जो इस कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर सकते थे। सिकन्दर उनकी पाठशाला में भेज दिया गया।

आचार्य अरस्तू सिकन्दर की विलक्षण प्रतिभा देखकर फूले न समाये। उनकी यह प्रबल इच्छा हुई कि इस बच्चे की शक्तियों का सद्मार्ग में विकास करना चाहिए। यदि ऐसा हो सका तो निश्चय ही यह संसार के महान् व्यक्तियों में से एक होगा।

शिक्षा के साथ-साथ गुरु का ध्यान गुण, स्वभाव और चरित्रबल की तरफ विशेष था। दार्शनिक अरस्तू यह जानते थे कि जीवन के महान् विकास के लिए इन गुणों के विकास की नितान्त आवश्यकता है। जिन दुर्गुणों से मनुष्य की शक्तियों का क्षरण होता रहता है यदि उनका उन्मूलन न हो सका तो फिर शक्ति का स्रोत किसी अन्य मार्ग से निकलकर व्यर्थ हो जायेगा। फिर जीवन विकास के सारे प्रयास निर्बल, निस्तेज और निष्प्राण हो जायेंगे।

इन्हीं बातों को सोच-सोचकर अरस्तू अन्य विद्यार्थियों के साथ-साथ सिकन्दर के हर क्रिया-कलाप पर विशेष ध्यान रखते थे। उन्हें सिकन्दर का उतना ही ध्यान रहता था जितना किसी पिता को अपने एक होनहार पुत्र का रहता है।

एकबार सिकन्दर का किसी स्त्री से अनुचित सम्बन्ध हो गया। अरस्तू को इस बात का पता चल गया। उन्होंने सिकन्दर को समझाया और डाँटा तथा इस को छोड़ने का आग्रह किया। उस स्त्री को यह सब पता चला तो सोचने लगी की यह अरस्तू ही मेरे प्रेम सम्बन्ध में रोड़े अटका रहा है। अतः ऐसा करना चाहिए जिससे गुरु शिष्य में शत्रुता हो जाय। फिर मेरा काम आसानी से चलता रहेगा।

वह कुटिल नारी एक दिन अरस्तू के पास पहुँची और एकान्त में मिलने का प्रस्ताव रखा। अरस्तू ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और जिस उद्यान में उन्हें मिलने के लिए बुलाया गया था उसमें ठीक समय पर पहुँच गये।

मनोवैज्ञानिक अरस्तू यह जानते थे कि कोरी शिक्षा की अपेक्षा प्रमाण का मनोभूमि पर अधिक प्रभाव पड़ता है। वे इस कुटिल चाल से लाभ उठाना चाहते थे। अरस्तू ने अपने अन्य शिष्यों द्वारा इस घटना की सूचना सिकन्दर तक भी पहुँचवा दी। साथ ही सूचना-अरस्तू ने भिजवाई है यह भेज न खुलने की कड़ी मनाई कर दी। सिकन्दर आकर एक छिपे स्थान में टोह में बैठ गया।

कुछ समय बाद वह तरुणी आई। उसने अरस्तू के गले में बाहुपाश डाले और कहा-’क्या हो अच्छा होता-थोड़ी देर तक हम लोग क्रीड़ा विनोद का आनन्द लेते।, अरस्तू की स्वीकृति मिल गई। युवती ने दार्शनिक अरस्तू को घोड़ा बनाया उनकी पीठ पर सवार होकर उन्हें चलाने लगी। बूढ़ा घोड़ा युवती को अपनी पीठ पर बिठाकर घुटनों के बल चल रहा था। स्वाभिमानी सिकन्दर जो जीवन में कभी झुकना नहीं जानता था अपने गुरुदेव की यह स्थिति अधिक देर तक सहन न कर सका और तुरन्त सामने आकर कहा, “क्यों गुरुदेव! यह सब क्या हो रहा है?”

अरस्तू ने कहा- देखते नहीं। मुझे यह माया किस तरह घुटनों के बल चलने को विवश कर रही है, फिर तुमको तो पेट के बल रेंगने को विवश कर देगी। सिकन्दर को वस्तुस्थिति समझ में आ गई। उसने अपना मुँह मोड़कर चरित्र गठन में अपना सारा ध्यान लगा दिया जिससे वह संसार का एक महान् पुरुष - ‘सिकन्दर महान’ कहलाया।


प्रकृति के बन्धनों से मुक्त मानवी चेतना

सामान्य दृष्टि से मनुष्य एक सोचने, बोलने वाला पशु भर है जो अपना जीवन अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधापूर्वक चला सकता है - भविष्य के लिए सुख साधन जमा कर सकता है तथा परिस्थितियों से अधिक सक्षमता के साथ जूझ सकता है। यह सामर्थ्य अन्य प्राणियों को भी किसी न किसी रूप में प्राप्त है और वे उसके अनुसार अपना जीवन क्रम चलाते भी हैं, मनुष्य इस क्षेत्र में अन्य प्राणियों से थोड़ा कुछ आगे बढ़ा हुआ है। बुद्धि की दृष्टि से वह अन्य प्राणियों से और भी ज्यादा आगे है परन्तु फिर भी मनुष्य की क्षमतायें सीमित हैं और प्रकृति पर उनका कुछ वश नहीं है। भौतिक दृष्टि से तो मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में कईयों से बहुत पिछड़ा हुआ भी है। लेकिन चेतना के क्षेत्र में मनुष्य की बराबरी अन्य कोई दूसरा प्राणी कर ही नहीं सकता।

उदाहरण के लिए अन्य प्राणी प्रकृति के नियमों में रहते हुए ही अपना जीवन क्रम चलाते हैं। लेकिन मनुष्य प्रकृति के अनुशासन में रहने के लिए विवश नहीं है। वह प्रकृति के अनुशासन में रहे तो उससे लाभ भी उठा सकता है और उल्लंघन करता है तो उसे हानि भी उठानी पड़ती है। वह लाभ उठाये अथवा दण्ड सहे, यह उसकी अपनी इच्छा की बात है। यह छूट उसे अपनी चेतना का स्वतन्त्र विकास करने के लिए मिली है। यदि मनुष्य इस दिशा में कुछ सफल कदम बढ़ता है तो वह अपने प्रभाव से प्रकृति को अपने नियम बदलने के लिए भी बाध्य कर सकता है।

इस सम्भावना को मनुष्य के लिए वरदान कहा जा सकता है कि वह अपनी चेतना की शक्ति को किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त करने के लिए स्वतंत्र है। मनः शास्त्री विक्टर ई. क्रोमर का कथन है कि - यदि व्यक्ति अपनी मनःशक्ति को केन्द्रित या घनीभूत करने की कला में प्रवीण हो जाय, उसे किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त किया जा सके तो न केवल मानवी व्यक्तित्व का कोई भी पक्ष उस प्रयोग में प्रबल और प्रमुख बनाया जा सकता है वरन् प्रकृति के नियमों को भी बदला जा सकता है।

इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए विक्टर ई.क्रोमर ने दक्षिण जापान के बौद्धमंदिरों में किये जाने वाले एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान का उदाहरण दिया है। जापानी में बौद्ध धर्म की एक शाखा है, जिसके अनुयायी ध्यान योग पर बहुत आस्था रखते हैं और उनकी आस्था इस हद तक दृढ़ रहती कि उन्हें कठिन तितीक्षाओं से होने वाले कष्टों का भी अनुभव नहीं होता। इतना ही नहीं उनके शरीर पर इन कष्टों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

यह तो हो सकता है कि मनुष्य ध्यान किसी और दिशा में केन्द्रित हो तो उसे अपने शरीर पर होने वाले आघातों का पता नहीं चलता लेकिन शरीर पर उनका प्रभाव तो पड़ता है। जैसे कोई खिलाड़ी बड़े उत्साह के साथ कोई खेल खेल रहा है। खेलते-खेलते उसे पैर में चोट आ गयी यह तो आम तौर पर होता है कि खेलते समय उत्साह और खेल की तन्मयता के कारण उसे चोट की पीड़ा का पता न चले। लेकिन चोट लगने पर खून तो बहता ही है, जख्म तो होता ही है। रात को सोते समय जब हारे थके आदमी का मस्तिष्क भी सो जाता है तो कई व्यक्तियों को मच्छर, खटमल काटने का पता ही नहीं चलता लेकिन उनके काटने से फुन्सियाँ, सूजन तो हो ही जाती है। अर्थात् ध्यान कहीं और रहने पर भी शरीर के अपने नियम काम करते रहते है।

परन्तु दक्षिण जापान के बौद्ध मन्दिरों में होने वाले जिस धर्मानुष्ठान की चर्चा यहाँ की जा रही है। उसमें ऐसी कोई बात नहीं होती और प्रकृति के नियम अपवाद बन जाते हैं। उन मन्दिरों में जब साधक छह फुट लम्बी दहकते हुए कोयलों से सजायी गये, बेदी पर नंगे पैरों नाचते रहते हैं तथा नाचते हुए ही उस वेदी को पार करते हैं। पुरोहित आगे चलता है और अनुयायी पीछे-पीछे। इस अग्नि नृत्य में भाग लेने वाले जैन साधकों को आग से जलने का अनुभव तो दूर रहा उनके पैरों में झुलसन तक नहीं लगती। दहकता हुआ अग्निकुण्ड जिसकी आँच आस पास खड़े लोगों को भी लगती है, उन जैन साधकों के लिए ठण्डी राख के समान हो जाती है और उसी पर चलने के समान किसी के भी पैरों में उसका कोई असर नहीं होता।

मलेशिया के कई क्षेत्रों में भी इस प्रकार के धर्मानुष्ठान प्रचलित हैं। आग का स्वभाव है जलना और जलाना- फिर क्या कारण है कि वह इन धर्मानुष्ठानों में अपना नियम बदल देती है। और वह भी केवल उन व्यक्तियों के लिए जो चेतना के क्षेत्र में अन्य मनुष्यो से उन्नत समझे जाते हैं।

भारतीय तत्वदर्शियों का कथन है कि जड़ प्रकृति ही गुणमयी है और इस कारण नियम विशेष के अंतर्गत अपना काम करती है। चेतना का जो अंश जहाँ जितना विकसित होगा वह इन जड़ नियमों के अपवाद देखे जा सकते हैं। पत्थर जड़ है- अपने स्थान से बिना हटाये नहीं हटेगा परन्तु प्राणी स्वेच्छा से कहीं भी आ जा सकते हैं। बर्फ शीतल है और तप्त बालू गर्मी से अपनी इच्छा से गर्म या ठण्डी नहीं हो सकती पर मनुष्य के संपर्क में आते ही मनुष्य उन्हें इच्छानुसार पिघला सकता है या ठण्डा कर सकता है।

मनुष्येत्तर जीव जन्तु भी अपनी सीमा में रहते हुए स्थान परिवर्तन, परिस्थितियों के अनुरूप अपना परिवर्तन आदि सम्पन्न कर लेते हैं। परन्तु उनकी चेतना मनुष्य की अपेक्षा कम विकसित है इसलिए उन्हें भी कुछ मर्यादाओं का पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। यह छूट केवल मनुष्य को ही मिली है कि वह इच्छित दिशा में विकास करने के लिए इन नियमों का चाहे तो अतिक्रमण कर दे।

इसे प्रकृति की अव्यवस्था नहीं कहा जाना चाहिए। वरन् यह तो और अधिक उन्नत तथा अच्छी संभावनाओं के लिए मनुष्य को दिये गये विशेष अधिकार हैं। सामान्यतः किसी मुर्दे की चीर फाड़ करना भी कानून की दृष्टि में अपराध है। श्मशान घाट अथवा कब्रिस्तान से कोई शव चुरा लाता है तो उसे दण्ड मिलता है। परन्तु डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों को मृत व्यक्तियों का शव अध्ययन के लिए मिल जाता है तथा वे उसकी चीर फाड़ कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में और अधिक प्रगति होने की सम्भावना बनती है। प्रकृति द्वारा मनुष्य को दी गयी विशेष छूट भी इसी तरह की सम्भावना को दृष्टिगत रखते हुए मिला विशेष अधिकार समझना चाहिए।

इस अधिकार का उपयोग कर मनुष्य अपनी चेतना को निरन्तर विकसित, परिष्कृत करता हुआ प्राप्त क्षमताओं का मनुष्य समाज के हित में अधिकाधिक सदुपयोग कर सकता है। उन्नत और परिष्कृत व्यक्तित्व न केवल अपने आस-पास की प्रतिकूलताओं को निरस्त कर देते हैं। वरन् ऐसे-ऐसे कार्य भी कर दिखाते हैं जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है। वस्तुतः चमत्कार जैसे कोई करतब होते नहीं वरन् व्यक्ति अपनी आस्था, संकल्प और निष्ठा के बल पर प्रकृति को अपने नियंत्रण में करने की ही सफलता प्राप्त करता है।

सर्वविदित है कि सर्प महाक्रोधी और स्नेह शून्य प्राणी है। वह जरा भी छेड़ने वाले को डसने और उसका प्राण हरण करने में जरा भी विलम्ब नहीं करता परन्तु आस्था व संकल्प के बल पर सर्प जैसे विषैले प्राणी को भी अपना परम सहयोगी और विश्वस्त बनाया जा सकता है। अंग्रेज साहित्यकार डी.एच.लारेन्स ने अपनी मैक्सि को सचित्र यात्रा का विवरण प्रकाशित करते हुए उस देश के रेड इंडियनों के सर्प प्रेम की चर्चा की है और बताया है कि वहाँ के लोग किस प्रकार वर्ष में एक बार मिल कर सर्प पूजा का अनुष्ठान करते है।

यह सर्प अनुष्ठान नवाजों प्रान्त के कारिजोना से 70 मील दूर स्थित वार्स्य गाँव में होता है। निर्धारित तिथि पर एकत्रित होने के लिए होपी कबीले के पुरोहित साँपों को निमन्त्रण देने उनके बिलों पर जाते हैं और उनसे मन्त्रोच्चार पूर्व अनुरोध करते हैं। यह काम साल भर तक चलता है और आश्चर्य यह कि जिन साँपों को निमन्त्रण दिया जाता है वे निमन्त्रण स्वीकार कर उत्सव में भी आते हैं। इस कबीले के लोग साँप को सूर्य देवता का विशेष प्रतिनिधि मानते हैं और उन्हें इस पूजा समारोह में आमन्त्रित कर उनकी प्रसन्नता प्राप्ति की आशा करते हैं। लारेन्स के अनुसार सर्प पूजा का यह समारोह नियत स्थान पर नियत तिथि को आयोजित होता है।

इस समारोह में प्रधान भूमिका निभाने वाले याजक नौ दिन पहले से ही उपवास करना आरम्भ कर देते हैं। निर्धारित समय पर वे अपनी विचित्र वेशभूषा में सर्पनृत्य आरम्भ करते हैं। दर्शकों से कह दिया जाता है कि वे मौन रहें अन्यथा आगन्तुक सर्प अप्रसन्न होकर दर्शकों का अनिष्ट भी कर सकते हैं। पत्तों से ढके एक गड्ढे में न जाने कितने सर्प कब से छिपे हुए बैठे रहते हैं। अनुष्ठानकर्ता मन्त्रोच्चार करते हुए उनमें से थोड़े-थोड़े सर्प पकड़ कर लाते हैं, उन्हें अपने गले में पहनते हैं और शरीर से लपेटते हैं। उनका मुँह अपने मुँह में दबाते हैं और विभिन्न मुद्राओं में सर्पनृत्य करते हैं। इस नृत्य में नर्त्तकों के शरीर से लिपटे सर्प भी भाग लेते हैं और अपने अंगों को हिलाते-झुलाते हुए आयोजनों में भाग लेने वाले याजकों की तरह रुचि तथा प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।

अनुष्ठान जब पूरा हो जाता है तो याजक आमन्त्रित साँपों को स्वागत सत्कार के साथ विदा कर देते है तथा अगले आयोजन में फिर आने को निमन्त्रण देते हैं। लारेन्स ने लिखा हैं- मैंने इस तरह के कई अनुष्ठान देखे। विचित्र और अविश्वसनीय होने के कारण मैं उन्हें संदिग्ध दृष्टि से भी देखता रहा तथा यह जानने का पूरा प्रयास किया कि इसका रहस्य क्या है? लेकिन कहीं कोई चालाकी या फ्राड जैसी कोई बात देखने में नहीं आयी।

इस प्रश्न का उत्तर अध्यात्मक विज्ञान के पास है कि मनुष्य चाहे तो अपनी संकल्प शक्ति, आत्मबल को इतना विकसित कर सकता है कि वह किसी भी भयंकर से भयंकर और विषैले से विषैले प्राणी के साथ सौहार्द पूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। आखिर उन प्राणियों में अपने सजातीय प्राणियों से भी तो प्रेम सद्भाव होता है। प्रेम सद्भाव न सही वे उनके साथ सहजीवन तो व्यतीत करते हैं कि नहीं।

रूप, गुण, आकृति और प्रकृति में भिन्न होते हुए भी सभी प्राणियों में एक ही चेतना विद्यमान है। इस तथ्य को समझ लिया जाय तो सुनिश्चित आध्यात्मिक अभ्यासों, साधनाओं द्वारा उस चेतना से सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते हैं अध्यात्म विज्ञान में जड़ को गौण और चेतना को प्रमुख स्थान इसीलिए मिला है कि वह स्थूल प्रकृति की मर्यादाओं से बंधी हुई नहीं है और अपना स्वतन्त्र विकास करने में सक्षम है।

मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं के अतिरिक्त जिन शक्तियों को पदार्थ विज्ञान द्वारा अभी तक जाना अथवा अनुभव किया जा सका है वे मस्तिष्कीय शक्तियोँ हैं जिनमें इच्छा, ज्ञान, अनुभव और बुद्धि आती है। परन्तु अध्यात्म दर्शन इन शक्तियों से भी अधिक समर्थ, संकल्प आस्था और विश्वास की शक्ति को मानता है। तत्व-दर्शियों की मान्यता है कि इन शक्तियों को अर्जित विकसित करने में किन्हीं बाहरी योग्यताओं की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनके विकास का अपना अलग ही विज्ञान है और उसके अलग ही नियम हैं जिनके अनुसार क्रमबद्ध विकास होता है। श्रद्धा और विश्वास के आधार पर परिपक्व हुआ अन्तःकरण मनुष्य में इस तरह की विशेषतायें उत्पन्न कर सकता है जिनके आधार पर वह जड़ प्रकृति को भी अपने अनुकूल ढाल लेता है। तथा विपरीत स्वभाव के प्राणियों से भी मित्रता स्थापित कर लेता है।

मनुष्य की शारीरिक मानसिक क्षमताओं की एक सीमा है। मानसिक क्षमतायें शारीरिक क्षमताओं से अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मिक क्षमता का तो अभी अनुमान ही लगाया जा सकता है। यंत्र-तंत्र उसके दिखाई देने वाले में उदाहरण इस दिशा में संकेत कर सकते हैं।


निर्भयता- श्रेयस् की जननी

वाराणसी के जंगलों में एक खरगोश रहता था। जितना छोटा था उसका शरीर अन्य जीव जन्तुओं की तुलना में, उससे भी छोटी थी उसकी बुद्धि। एक दिन मध्याह्न समय वेल पादप की छाया में वह विश्राम कर रहा था। भोजन से पेट भरा था और इसलिए उसे नींद भी आ गयी और निद्रावस्था में उसने एक भयंकर स्वप्न देखा। स्वप्न में शायद वह किसी भवन के नीचे सोया था और वह देख रहा था कि भवन की छत फट पड़ी है और उसके मलबे तले वह दबता जा रहा है।

यह स्वप्न देख कर भयभीत हो जाग उठा। उसका मुँह आकाश की ओर तो था ही सीधी दृष्टि आकाश पर गयी और उसने सोचा कभी यह आकाश फट पड़े। तो स्वप्न की तन्द्रा में तो वह था ही और हृदय भी भय ग्रस्त, सो सचमुच ही लगने लगा कि आकाश फट पड़ा है तभी भयानक तेज हवा चली और बेल के वृक्ष से एक फल टूट कर जमीन पर गिरा। उसकी जो आवाज हुई उसने खरगोश की इस आशंका की पुष्टि कर दी कि आकाश फट पड़ा है। वस्तुस्थिति को जानने के लिए न तो उसने अपनी आजू बाजू देखा और न कुछ विचार ही किया। एकदम से भाग खड़ा हुआ। आत्मरक्षा के लिए वह किसी ऐसे स्थान पर जा छुपने की कोशिश में था कि जहाँ उसके प्राण बच जाँय और वह सुरक्षित भी रह जाय वह इस प्रकार डरकर भाग रहा था कि पीछे तो क्या अगल-बगल में अपन सुरक्षित स्थान देखने की भी हिम्मत नहीं जुट पा रही थी।

इस प्रकार बेतहाशा भागते हुए देख कर उसके कुछ साथियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। कुछ ने रोक कर पूछना चाहा कि क्या बात है परन्तु खरगोश के पास रुकने का समय कहाँ था। भागते-भागते ही उसने कहा-’अरे मूर्खों! रुकने की बात कह रहे हो अभी पता चल जायगा कि क्या हुआ। पीछे आसमान फट पड़ा है अभी सब दब कर मर जाओगे मैं तो किसी सुरक्षित स्थान की तलाश कर रहा हूँ ताकि अपने प्राण बचा सकूँ।’

इतना सुनना था कि उसके साथियों ने भी बिना कोई सोच विचार किये उस खरगोश के पीछे भागना शुरू किया। थोड़ी दूर बाद मिला हरिणों का झुण्ड हरिणों ने पूछा- भाइयों आप सब लोग इस तरह घबराकर क्यों भाग रहे हो।

घबरा कर नहीं मित्रों, अपनी जाति और अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग रहे हैं - भागते हुए खरगोश में से एक ने कहा- पीछे आसमान फट पड़ा है और सारी पृथ्वी के प्राणियों पर विपत्ति आ पड़ी है।

हरिण भी भागने लगे नदी के किनारे पहुँचे तो हाथियों ने भी उसी प्रकार पूछा जिस प्रकार अन्य खरगोशों तथा हरिणों ने पूछा था और वे भी वस्तु स्थिति पर कोई विचार किये बिना ही भागने वालों के उस झुण्ड में जा मिले। इसी प्रकार धीरे-धीरे बारहसिंगा, लोमड़ी, गैंडे, नीलगायें, चीते और भेड़ियों भी इन भागने वालों के काफिले में शरीक हो गये।

भागते-भागते जब यह मण्डली एक पहाड़ की घाटी पहुँची तो उस घाटी की एक गुफा में विश्राम कर रहे वनराज सिंह की आँखें खुल गयीं। सिंह ने भागते हुए प्राणियों को रोका और पूछा तो कारण का पता चलने पर वनराज की हँसी छूट पड़ी। आकाश की ओर देखते हुए कहा- देखो आकाश तो अपनी जगह पर खड़ा हुआ है।

घटना के मूल कारण का पता चला तो सभी जीव को बड़ी आत्म ग्लानि हुई। यह कथा सुना कर भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा-भिक्षुओ अब तुम समझ गये होंगे कि भय से मनुष्य के सोचने विचारने की शक्ति भी समाप्त हो जाती है। इससे पूर्व कि जब भय के कारण उपस्थित हों तभी विचारपूर्वक उन्हें जान लिया जाय तो तनिक भी अनिष्ट ने होगा। लौकिक जगत में ही नहीं आत्मिक जगत में प्रवेश और सफलता के लिए भी निर्भयता एक द्वार है और जो उस द्वार से प्रवेश करते हैं वे ही श्रेयस् को प्राप्त कर सकते हैं।


अवाँछनीय अभिवृद्धि के दुष्परिणाम

अभिवृद्धि की कामना सभी करते हैं और विस्तार को प्रगति एवं सफलता का चिह्न माना जाता है। इतने पर भी यह ध्यान रखने योग्य है कि अभिवर्धन स्वस्थ और सन्तुलित होना चाहिए। अन्यथा अनावश्यक फैलाव कई बार उलटी समस्या बन जाता है।

शरीर में चर्बी बढ़ जाने से जो स्थूलता आती है। वह आंखों को भले ही यह सम्पन्नता का चिह्न लगे और मोटा व्यक्ति भले ही अपनी समृद्धि की शेखी बघारे पर वस्तुतः यह बढ़ा हुआ भार हर दृष्टि से असुविधा ही उत्पन्न करता है। सूजन आने से किसी अंग की स्थूलता बढ़ सकती है, पर उससे किसी को कोई सुविधा या प्रसन्नता नहीं हो सकती।

सुविधा साधनों की बढ़ोतरी के लिए मची हुई आतुर भगदड़ के फलस्वरूप सम्पन्नता बढ़ी है, पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि इससे स्वस्थ विकास का कोई उपयोग आधार खड़ा हो रहा है। प्रगति एवं समृद्धि की प्रशंसा तभी की जा सकती है, जब वह सही साधनों से उपलब्ध हुई हो और उसका उपयोग किन्हीं श्रेष्ठ प्रयोजनों के लिए किया जाता हो। इसके विपरीत यदि अवांछनीय तरीकों से वृद्धि हुई है और बढ़ोतरी का उपयोग अनुपयुक्त प्रयोजनों के लिए किया जाता है तो निश्चय ही इस उन्नति की तुलना में यह सामान्य स्थिति ही अच्छी थी जिसमें असन्तुलन उत्पन्न होने की आशंका तो नहीं थी।

उदाहरणार्थ अपने समय में औसत मनुष्य के बढ़ते हुए मस्तिष्कीय भार को लिया जा सकता है। मस्तिष्क पर चिन्ताओं का भार बढ़ने की बात यहाँ नहीं कही जा रही है वरन् उस तथ्य का उल्लेख किया जा रहा है जिसके अनुसार खोपड़ी के भीतर भरे हुए पदार्थ के भार और विस्तार दोनों में ही बढ़ोतरी हो रही है और उस अभिवृद्धि के कारण लाभ नहीं हो रहा वरन् उल्टा घाटा सहना पड़ रहा है। यह वृद्धि वैसी ही है जैसी कुसंस्कारों की, उसकी बढ़ी हुई सम्पदा दुष्ट दुर्गुणों को बढ़ाने का निमित्त बनती है। हाल ही में ब्रिटिश चिकित्सकों ने परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि मानव मस्तिष्क का भार निरन्तर बढ़ रहा है। लन्दन इन्स्टीट्यूट ऑफ सायकिल्ट्री के प्रोफेसर कोर्सेलिस एवं डा. एच.मिलर ने अपनी प्रामाणित शोध द्वारा यह सिद्ध किया है कि मानवी मस्तिष्क की क्षमता का निरन्तर ह्रास हो रहा है व उसी अनुपात में उसका वजन भी बढ़ता जा रहा है।

लन्दन के अस्पतालों में मरने वाले 20 वर्ष से 60 वर्ष तक की आयु के 397 स्त्री पुरुषों के शवों की परीक्षा करके उनने पाया कि सन् 1940 से 60 के मध्य एक पुरुष के मस्तिष्क का औसत भार 1372 ग्राम से बढ़कर 1424 ग्राम हो गया। इसी अवधि में एक महिला के मस्तिष्क का भार 1242 ग्राम से बढ़कर 1264 ग्राम हो गया। इसी अनुपात में स्नायु रोगों की संख्या एवं आत्महत्या करने वालों की तादाद भी बढ़ी है। अमेरिका में प्रति वर्ष 50000 व्यक्ति आत्महत्या कर लेते हैं। भारत में भी आत्महत्या हेतु प्रेरित लोगों की संख्या कम नहीं है।

इन वैज्ञानिकों के अनुसार भार एवं आयतन का सीधा सम्बन्ध है। मस्तिष्क के भार के अनुपात में आयतन भी बढ़ा है, एवं इसी वजह से स्नायुरोगों का आधिक्य हुआ है।

ऐसा लगता है, भौतिक सुखों की तलाश में मनुष्य के मस्तिष्क पर अधिक बोझ आ गया है। बीसवीं शताब्दी के इस अभिशाप को हम मानसिक अशान्ति एवं रोगियों की बढ़ती संख्या के रूप में प्रत्यक्ष देखते हैं।

यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि अमेरिका जो विश्व का सर्वाधिक उन्नत, आधुनिक व सुखसम्पन्न राष्ट्र है, में इतनी अधिक आत्म-हत्याओं का कारण क्या है? आज से सौ वर्ष पूर्व का मानव अपनी सीमाओं में सुरक्षित था, शान्तिपूर्ण जीवन जीता था व उनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता नहीं थी। आज का मानव प्रतिद्वन्द्वी है व मनोविकारग्रस्त है। संप्रेक्षण की वर्तमान प्रगति मानव मस्तिष्क के लिए बोझ बन गई है। विज्ञान की अतुलनीय उन्नति ने पिछली अनेक शताब्दियों के ज्ञान को समेटकर मानव मस्तिष्क पर लाद दिया है।

शरीर के कार्य करने की अपनी प्रक्रिया है। विभिन्न क्रियायें अपनी निर्धारित गति से कार्य करती हैं। इस निर्धारित गति, लय तथा ताल में आया अन्तर सम्पूर्ण क्रियाओं को गड़बड़ा देता है और क्रियाओं की यह असामान्य अवस्था उसे रोगी बना देती है।

प्रतिद्वन्द्विता, उत्तेजना तथा उलझावों के कारण मानव मस्तिष्क भावनात्मक धरातल पर कमजोर पड़ गया है। कमजोर मस्तिष्क उसकी निर्णय शक्ति का साथ नहीं दे पाता तो वह मानसिक सुप्तता के लिए दवाओं का सहारा लेता है और ये ही दवायें उसे मृत्यु के नजदीक पहुँचा देती है। विक्षिप्त व्यक्ति समाज के लिए घातक एवं बोझ तथा मृत व्यक्ति के समान होता है।

मस्तिष्क की उत्कृष्टता पर मानवी प्रगति का सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। उससे अनेकानेक उपयोगी प्रयोजन सध सकते हैं, पर यह सम्भव तभी है जब उसका मूलभूत ढाँचा अपनी स्वाभाविक एवं सन्तुलित स्थिति में बना रहे। इस सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि मनुष्य से बहुत वजन डालने वाला काम अत्यधिक मात्रा में न लिया जाय। दिनचर्या में यह गुंजाइश रहनी चाहिए कि हँसने-खेलने, विनोद-उपार्जन एवं शारीरिक श्रम के लिए समुचित समय सुरक्षित रखा जाय। अत्यधिक श्रम लेने से मस्तिष्क की वैसी ही दुर्गति होती है जैसी एक सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के सारे अंडे एक साथ निकाल लेने के लोभी मालिक की हुई थी इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखा ही जाना चाहिए कि मनोविकारों की उत्तेजना मनःसंस्थान को बुरी तरह जलाती झुलसाती और विषाक्त बनाती है। चिन्त, भय, निराशा, द्वेष, लिप्सा, लालसा जैसे मनोविकारों का जो अनावश्यक दबाव इन दिनों पड़ रहा है वही इस मस्तिष्कीय भार वृद्धि का प्रधान कारण है। मोटे तौर पर बढ़ोतरी सौभाग्य का चिह्न मानी जाती है, पर मस्तिष्क भार का बढ़ना प्रत्यक्षतः अतीव हानिकारक दुष्परिणाम उत्पन्न कर रहा है। ठीक यही बात इस समृद्धि एवं प्रगति के सम्बन्ध में कहीं जा सकती है जो सुविधा साधनों के रूप में बढ़ती रही है पर उसके उपार्जन एवं उपयोग में नीतिमत्ता का समावेश नहीं हो रहा है। विस्तार का उपयोग तभी है जब उसके स्तर में न्यूनता न आने पाये।


जड़ का मजबूत होना आवश्यक (kahani)

जोर का अन्धड़ आया। उसने उस सघन प्रदेश के अगणित पेड़ उखाड़ कर पटक दिये। फिर भी असंख्य ज्यों के त्यों अपना शिर उठाये खड़े थे।

उस प्रदेश से बाप बेटे किसी लम्बी यात्रा पर जा रहे थे। बेटे ने पूछा- भला कुछ ही पेड़ अन्धड़ ने क्यों उखाड़े और कुछ ज्यों के त्यों क्यों कर खड़े रह गये?

बाप ने गिरे हुए पेड़ों के पास लेजाकर बेटे को दिखाया कि गिरने वाले पेड़ों की जड़ें पहले से ही काफी कमजोर हो गई थी। अन्धड़ तो गिराने का निमित्त मात्र था। तूफानों का सामना वे पेड़ देर तक करते रहेंगे जिनकी जड़ें मजबूत है।


अपनी इच्छा ही नहीं, दूसरों का हित भी देखें!

मनुष्य और पशुओं में यह अन्तर है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को उठता, उमगता अनुभव करता है। तथा पशु नहीं। यों मनुष्य और पशु में बुद्धि का अन्तर भी है। पर वह गौण है। कई प्राणी मनुष्य से भी अधिक बुद्धिमान होते हैं और अपना हित और अहित मनुष्य से भी ज्यादा अच्छी तरह समझते है। मनुष्य की बुद्धिमता श्रेष्ठ और सर्वोपरि लगती है तो इसलिए कि इसके अन्त में इच्छा आकाँक्षाओं के ज्वार निरन्तर उठते हैं और उनकी प्रेरणाओं से ही वह नयी उपलब्धियां प्राप्त करता है। नयी शोधें करता है। जब कि पशुओं में सीमित इच्छायें होती है -या कि वे अपनी नैसर्गिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही बुद्धि का प्रयोग करते है।

कहने का आशय यह कि आकांक्षायें ही मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को गति देती हैं उन्हें सक्रिय करती हैं। मनुष्य अपने आस पास कुछ ऐसी, स्थितियाँ ऐसी क्षमतायें और ऐसे साधन देखता है जो उसे पास नहीं है। बुद्धि उन्हें पास कर देती है और उसी का सूक्ष्म रूप अन्तः करण उन्हें पाने के लिए मचल उठता है, तथा जिसे हम बुद्धि के नाम से जानते हैं वह चेतना उसे प्राप्त करने के उपाय सोचती है। उन्हें प्रयोग में लाने की चिन्ता और व्यवस्था करती है।

अतः बुद्धि कहें या इच्छायें -यही वह तत्व या चेतना है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करती है। अन्य प्राणी न स्वास्थ्य की कामना करते है - न धन चाहते हैं, न ही उन्हें इस बात की चिन्ता है कि उनका प्रभाव क्षेत्र कितना व्यापक है तथा न ही वे यश की कामना करते हैं। यह मनुष्य ही है जिसके मन में कामना आकांक्षायें उठा करती हैं और वह उन आकांक्षाओं की पूर्ति में व्यस्त हो जाता है। सामान्य मनुष्य स्वास्थ्य, धन यश और प्रभाव की कामना करता है। उसके मन में इन्हीं के कल्पना चित्र बनते बिगड़ते रहते हैं। जैसे ही कल्पना चित्र स्थिर हुआ कि वह इनकी पूर्ति में लग जाता है। उसकी मानसिक शक्तियाँ उस चित्र को साकार करने में जुट जाती हैं। उसके शारीरिक क्रिया कलाप अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सक्रिय होने लगते हैं।

इच्छाओं और आकांक्षाओं को इसी कारण मनुष्य की प्रगति का मूल कहा जाता है। क्योंकि दिखाई देने वाली प्रवृत्तियां तो बाद में उभरती हैं, वे प्रवृत्तियां आकांक्षाओं के रूप में ही जन्म लेती हैं। यों हमारे मन में कितनी ही इच्छायें उठती रहती हैं पर पूरी शायद उसकी एक प्रतिशत भी नहीं हो पातीं। बाजार जा रहे हैं और दुकानों पर कई सुन्दर-सुन्दर चीजें दिखाई देती है। मन चुपचाप उन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता चलता है। उन्हें अच्छा या बुरा बताता जाता है। इसका यही अर्थ हैं कि मन उन्हें प्राप्त करने और छोड़ देने के निर्णय करता जा रहा है। ये प्रतिक्रियायें इस बात का संकेत हैं कि मन उन चीजों की प्राप्ति की कल्पना करता चल रहा है, और उस कल्पना से आनन्दित होता जा रहा है। क्योंकि मत का स्वभाव है कि जिस चीज को वह पसन्द करता है उसे प्राप्त भी करना चाहता है।

लेकिन कई इच्छायें तो उठ कर ही बैठ जाती हैं। कुछ होती है जिन्हें साकार करने का विचार भर आता है। और कुछ ऐसी होती हैं जिन्हें प्राप्त करने की व्यक्ति चेष्टा भी करता है। इन सब के बाद कुछ एक ही ऐसी होती है जो पूरी हो पाती हैं। पर यह सत्य है कि मनुष्य इच्छाओं का पुतला है और उसकी इच्छायें किस स्तर की हैं यह उसकी कार्यपद्धति, विचारों और क्रियाकलापों से पता चल जाता है। यह बात कई लोग कहते हैं कि मनुष्य कैसा है- यह उसके चेहरे पर लिखा होता है और उसके चेहरे को देख कर पता लगाया जा सकता है कि वह क्या चाहता है। यह ठीक भी हो सकता है। शाँत झील में जिस प्रकार एक पत्थर फेंकने से लहरें उठने लगती हैं। और किनारे पर आकार ही दम लेती हैं। ठीक इसी प्रकार हमारी इच्छायें क्या हैं या क्या हो सकती हैं यह चेहरे पर आने वाले हाव भावों से मालूम पड़ जाता है। कुछ ऐसी मोटी कसौटियाँ हैं भी जिनके आधार पर मनुष्य का निर्णय किया जा सता है। जैसे व्यभिचारी और कामुक व्यक्ति की आँखों से निर्लज्जता टपकती रहती है। चौर, डाकू और बदमाशों के चेहरे पर एक नृशंस डरावनापन छाया रहता है। बधिक की दुर्गन्ध से ही बकरी मिमियाने लगती है। इसी प्रकार सदाचारी, सौम्य सज्जन स्वभाव के व्यक्तियों की मुखाकृति बता देती है कि यह व्यक्ति सात्विक स्वभाव का है। विचार युक्त और गम्भीर मुँह कह देता है कि यह व्यक्ति विद्वान् और विचारशील है। प्रेम व आत्मीयता के भाव से जीव-जन्तुओं की ओर देखें तो वे हमारी ओर खिंचे चले आते हैं। उसी क्षण यदि हम अपने चेहरे का भाव बदलते और उन्हें क्रूर दृष्टि से देखने लगें तो पास खड़े जान कर दूर खिसक जायेंगे।

यह सब सिद्ध करता है कि मनुष्य इच्छाओं का पुतला है और आकांक्षायें उसका जीवन हैं। इच्छाओं और आकांक्षाओं के चक्कों पर ही मनुष्य जीवन की गाड़ी दौड़ती है अन्यथा उसकी सामान्य आवश्यकतायें तो इतनी थोड़ी सी है जिन्हें आधारभूत कहा जा सके कि वे थोड़े से समय और थोड़े श्रम द्वारा ही पूरी हो सकती हैं। आवश्यकताओं के आधार पर ही यदि मनुष्य का मूल्याँकन और महत्व विश्लेषित किया जाय तो लगेगा कि पेट भर खाना मिल जाय तन ढकने का कपड़ा मिला और हवादार आरामदेह मकान हो-तो इसके बाद उसकी कोई जरूरत नहीं है। इससे आगे शिक्षा और मनोरंजन भी जोड़े जा सकते हैं, पर वे भी बौद्धिक विकास के आधार पर है बौद्धिक आवश्यकता न हो तो इनकी कोई जरूरत नहीं है। शिक्षा जहाँ मनुष्य के बौद्धिक विकास और मानसिक शिक्षण से सम्बन्ध रखती है, वहीं मनोरंजन इन विशिष्ट चेतनाओं को विश्राम देने तथा सुख प्राप्त कराने के लिए होता है। पशु भी अपने बच्चों के साथ अठखेलियाँ करते हैं और किलकारियां भरते हैं। पर उन क्रियाओं को मनोरंजन नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पशुओं में बुद्धि और उसकी स्फुरणा इच्छा जैसी कोई हलचल नहीं दिखाई देती। अगर कुछ होती भी है तो नहीं के बराबर।

इसलिए मनुष्य के समग्र विकास और उसकी सभ्यता के उच्चस्तर का दारोमदार बुद्धि आकाँक्षा पर जाता है। सामान्य इच्छाओं से ऊँचा उठ कर और समाज को दृष्टि गत रख कर अपनी क्रियाओं को नियोजित करने वाले व्यक्ति मनुष्य के विकास में योगदान दे पाते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति महामानव स्तर के होते हैं और इसका सबसे निचला छोर है उन लोगों की मनोभूमि जो अपने ही सुख को केंद्र मानकर चलते हैं। एक को श्रेय सम्मान मिलता है तो दूसरे की आत्यन्तिक लिप्तता उसे अपमान तथा निन्दा का पात्र बनाती है। क्योंकि दूसरों का सहयोग, अनुदान और उपकारों से हम आगे बढ़ते हैं तो देवत्व की इस मर्यादा के अनुरूप हमें भी तो चलना होगा।

देवत्व की यह विशेषता है जिसके कारण मनुष्य जीवन और समाज आगे बढ़ता है, गतिवान होता है। उस स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती जब कि कोई वैज्ञानिक दुनिया के रागरंगों को छोड़ कर मशीनों का आविष्कार नहीं करता और मनुष्य के श्रम की कठोरता को कम नहीं करता तो क्या होता। कोई चिकित्सा विज्ञान का साधक होता है और अपनी सारी जिन्दगी बीमारियों से लड़ने तथा उनका इलाज खोजने में बिता देता है। कोई एक साहित्यकार होता है जो मनुष्य के चिन्तन को आगे बढ़ाता है और पुस्तकों के रूप में अपनी विरासत अगली पीढ़ी के लिए छोड़ जाता है। सम्भव है कि इन कार्यों के मूल में व्यक्ति की अपनी महत्वाकाँक्षा भी जुड़ी हो, पर वह महत्वाकाँक्षा इतने ऊँचे स्तर की होती है कि उसमें मनुष्य जाति के कल्याण का उद्देश्य भी जुड़ा होता है और उन आकाँक्षाओं को पूरा करने में जो कठोर श्रम करना पड़ता है तथा जिन कठिनाइयों से सामना होता है वे स्थितियाँ व्यक्ति की साधना को तपसाधना बना देती है।

उत्कृष्ट और मध्यम स्तर की इच्छाओं के साथ ऐसी इच्छायें रखने वाले व्यक्ति भी मिलते हैं जिन्हें न समाज की चिन्ता रहती है, और नहीं इस बात से कोई सरोकार कि हमारे प्रयत्नों में से थोड़े बहुत देवत्व की सीमा में भी आते हैं या नहीं। अपना सुख ही उनके लिए सर्वोपरि लक्ष्य होता है। और उसकी प्राप्ति के लिए हर तरह के प्रयास औचित्य में आते हैं। उन्हें इस बात की चिन्ता भी नहीं रहती कि हमारे प्रयत्नों से किसी का भला हो रहा है अथवा बुरा? जैसे कोई व्यक्ति धन को ही सर्वोपरि मानता है और उसे प्राप्त करने के लिए हर उचित अनुचित प्रयास करता है। अगर व्यापारी हो तो मुनाफाखोरी से लेकर मिलावट और अपने उत्पादन का गुणानुवाद कर अपने माल को खपाने की कोशिश करेगा। नौकरपेशा हुआ तो किसी काम के लिए आने वाले व्यक्ति से अनाप शनाप रिश्वत ऐंठने का प्रयत्न करेगा। मजदूर हुआ तो कम काम कर अधिक पैसा प्राप्त करना चाहेगा। यह सब इच्छायें निकृष्ट स्तर की - पशुता से भी गिरी हुई कही जायगी।

यद्यपि उचित तो यह है कि व्यक्ति जितना समाज से ग्रहण करता है। उसके बराबर समाज को दे भी। माना कि पैसे से हर चीज खरीदी जा सकती है। पास में पैसा हो और इच्छित चीज न मिले तो पैसे की क्या उपयोगिता? पैसे की व्यवस्था और उससे क्रय विक्रय की परम्परा तो इसलिए बनी है कि उसके माध्यम से समाज के सभी सदस्यों की आवश्यकतायें पूरी होती रहें। अन्यथा पैसा देकर खरीदने से उस वस्तु का पूरा मूल्य नहीं चुकाया जा सकता। और हम अपने समग्र जीवन में जिन वस्तुओं का उपयोग करते है- ज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा आदि व्यवस्थाओं का लाभ उठाता है और इन व्यवस्थाओं के निर्माण में जिन एकान्त साधकों का हाथ है, उनके नैतिक रूप से ऋणी हो जाते हैं। उस ऋण से उऋण होने का तकाजा है कि हम अपने प्रयत्नों द्वारा आँशिक रूप से ही सही उन परम्पराओं को कायम रखें जो कि उनके आविष्कर्ताओं ने आरम्भ की है। अब यह हो नहीं सकता कि रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा रची गयी कृतियों से अथवा पुरातन काल से चली आ रही ज्ञान-विज्ञान की धाराओं के प्रणेताओं को अपनी कृताँजलि अर्पित करें। जिन मनीषियों और साधकों का इन उपलब्धियों के मूल में सारे जीवन का पुरुषार्थ और सम्पूर्ण जीवन की साधना कारण रूप से उपस्थित है उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यही व्यावहारिक उपाय रह जाता हैं कि उसी अनुपात में थोड़ा समाज के लिए भी करते रहें।

और जो इस नैतिक दायित्व से पलायन करते हैं उन्हें मानवीय गुणों से सम्पन्न तो नहीं कहा जा सकता। इतना भी न बन पड़े तो कम से कम यह नहीं होना चाहिए कि हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को हानि पहुँचा कर अनैतिक अनुचित उपाय अपनाकर अपना लाभ कमाने की बात सोचें। इस रीति नीति को अपना कर कोई व्यक्ति थोड़े समय के लिए सुखी बन कर अपने अहं को भले ही तुष्ट करे पर परिणामतः वह बुरा ही है। समाज के पक्ष में तो यह स्थिति बुरी कही जायगी जिससे कि सामाजिक सुव्यवस्था में कोई सहयोग मिलने के स्थान पर उल्टा विघ्न पड़ता है। स्वयं व्यक्ति के लिए भी कोई स्थायी लाभ का आधार नहीं बनाती।

हम इच्छायें तो करें। स्वास्थ्य, समृद्धि, सुख और यशकीर्ति की कामना भी करें। पर उपलब्ध के साथ जुड़े हुए सामाजिक अनुदान के प्रति भी कृतज्ञता अनुभव करें। न केवल कृतज्ञता अनुभव करें।, वरन उसका प्रतिपादन करने के लिए भी तत्पर रहें। आत्मतुष्टि को महत्व दें परन्तु यह भूल कर नहीं कि उससे कहीं किसी का अहित तो नहीं हो रहा है। दूसरों के हित की कामना और परमार्थपूर्ण प्रयास स्पृहणीय है, किये जाने चाहिए, पर उनके करने में असमर्थता अनुभव हो रही हो तो सामाजिकता को ही नहीं भुला देना चाहिए। स्मरण रखा जाय कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस पर अपने परिवार, पड़ोस, गाँव एवं राष्ट्र की अनेकानेक जिम्मेदारियाँ हैं और अपनी सुख सुविधाओं के लिए न उन्हें अनदेखा किया जाय तथा न ही उपेक्षा। वरन् कर्त्तव्य भावना से स्वयं की सुख समुन्नति के साथ दूसरों के हितों का भी ध्यान रखा जाय।


पूर्वाग्रह छोड़ प्रगतिशीलता अपनायें

विचारशीलता तथा बुद्धिमत्ता अब इसी बात में है कि प्राचीन परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा रूढ़ियों को विवेक की कसौटी पर कसने के उपरान्त ही अपनाया जाय। पुरातन होना मात्र किसी रीति-रिवाज अथवा परम्परा की महत्ता और उपयोगिता को सिद्ध नहीं करता है। पुरातन के नाम पर ही रूढ़ियों को पोषण दिया जाता रहेगा तो सामाजिक विकास न हो पायेगा। रूढ़िगत समाज आर्थिक एवं मानसिक रूप में अपने आप ही उन बन्धनों में बँधा रहता है तथा अपने प्रगति पथ प बढ़ने वाले चरणों को कम देता है। आज सम कहता है और पुकार रहा है। प्राचीनता का व्यामोह छोड़ो इसका निर्देशन तो हमारे शास्त्र भी देते है।

जनोऽयमन्यस्यमृतः पुरातनः, पुरातनैरेव समोभविष्यति। पुरातने पिवत्यन्त स्थितेषु, कः पुरातनों कन्तान्य परीक्ष्यरोचयेत्। (सिद्धसेन)

-जो पुरातन काल था वह मार चुका। वह दूसरों का था, आज का जन यदि उसको पकड़कर बैठेगा तो वह भी पुरातन की तरह ही मृत हो जायेगा। पुराने समय के जो विचार हैं वे तो अनेक प्रकार क हैं। कौन ऐसा है जो भली प्रकार उनकी परीक्षा किये बिना अपने मन को उधर जाने देगा।

प्राचीन रूढ़ियों पर अन्धश्रद्धा के साथ चलने वालों को बौद्धिक रूप से परावलम्बी ही कहा जाना चाहिए। ऐसे लोगों की प्रगति हो सकना सम्भव नहीं इसी बात को स्पष्ट करते हुए विद्वान् ने लिखा है -

विनिश्चंधनैति यथा-यथा लसस्तथा तथा,

निश्चितवान् प्रसीदति। अपन्धवाक्या गरवोऽहमल्पधीरिति, व्यवस्यन स्ववधाय धावतिं (पूर्व नूतन द्वात्रिशिका-6)

अर्थात् - जो स्वयं विचार करने में आलसी है, वह किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाता। जिसके मन में सही निश्चय करने की बुद्धि है उसी के विचार प्रसन्न और साफ सुथरे रहते हैं। जो यह सोचता है कि पहिले आचार्य और धर्मगुरु जो कह गये हैं, वह सब सच्चा है। उनकी सब बात सफल हैं और मेरी बुद्धि या विचार शक्ति टटपूंजिया है। ऐसा “बाबा वाक्य प्रमाण” के ढंग पर सोचने वाला मनुष्य केवल आत्म-हनन का मार्ग अपनाता है।

किन्तु खेद की बात है कि जहाँ हमारे वेद और शास्त्र हमेशा चलते रहने की, विवेक, बुद्धि की और ज्ञान की प्रेरणा देते हैं अपने हाथ-पैरों को ही नहीं अपनी अकल को भी जकड़े हुए है। वे रूढ़ियों के जाल में फँसे हुए हैं। इनमें केवल अशिक्षित, अज्ञानी, असभ्य लोग ही बाँधे होते तो कुछ कहने की बात थी लेकिन इसमें तो पण्डित, शास्त्री, पढ़े-लिखे, शिक्षित कहाने वाले लोग भी फँसे है। यह बात और भी अधिक खेदजनक है।

अपनी प्रगति की इच्छा रखने वालों के लिए मनुस्मृति में स्पष्ट निर्देश है कि -

प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्। त्रयं सुविदित कार्य धर्मशुद्धिमभीप्सता॥ (मनु. 12/105)

अर्थात्- धर्म शुद्धि चाहने वाले को उचित है कि वह प्रत्यक्ष, अनुमान एवं विविध आगमन शास्त्र इन्हें भली−भांति हृदयंगम करें तथा वाद में उन पर आचरण करें।

पवित्रता की रक्षा, देवत्व की प्रतिष्ठा, निष्ठा- भावना सब अच्छा बातें हैं पर यदि उन्हें विवेक की परिधि से परे और पूर्वाग्रह की स्थिति में पहुँचा दिया जाय तो उससे अनेक विकृतियाँ सामने आ सकती हैं।


अदृश्य शक्तियों का परोक्ष सहयोग

संत, महापुरुष अपने जीवन काल में त्याग, बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करते हुए समाज को अनुग्रहीत करते है। उनकी यह परम्परा जीवित रहने तक ही नहीं रहती वरन् मृत्यु के उपरान्त भी बनी रहती है। ऐसी ही आत्माओं के पितर, देवता अदृश्य सहायक कहा गया है।

देखा यह जाता है कि सूक्ष्म रूप में विचरण करती आत्माएँ अदृश्य रूप में सहयोग देती हैं। उन परिस्थितियों में जब मनुष्य का प्रयत्न, पुरुषार्थ एवं शक्ति अपना बचाव कर सकने में भी असमर्थ सिद्ध होती है, अन्तःकरण में दिव्य प्रेरणा के रूप में उनकी अनुकम्पा बरसती दिखाई देती है। ये दिव्य शक्तियों की परोक्ष प्रेरणा अन्तःकरण की स्फुरणा के रूप में परिलक्षित होती है। कभी-कभी तो प्रत्यक्ष माध्यम से भी उनका सहयोग दिखायी पड़ता है।

राजस्थान प्रान्त के जैसलमेर के पश्चिमी रेगिस्तानी इलाके में अनेकों प्रकार के खतरनाक सर्प पाये जाते हैं। इनमें सबसे भयंकर तथा विषधर सर्प है ‘पीना’। कहते है कि यह सर्प रात को निकलता है तथा सोये हुए आदमी के सीने पर सवार हो जाता है। नाक के समीप सटकर मनुष्य द्वारा छोड़ी गई साँस को पीता है और अपनी जहरीली साँस छोड़ता है। उसकी साँस इतनी विषैली होती है कि साँप के चले जाने के बाद उस आदमी के गले में जहरीला फोड़ा हो जाता है। कुछ दिनों में फोड़े के फटते ही आदमी की भी मृत्यु हो जाती है।

इस सर्प की चमड़ी रबड़ जैसी होती है तथा लाठियों के प्रहार से भी नहीं मरता। सूर्य के प्रकाश में यह अन्धा हो जाता है। अमरीकी संग्रहालयों में भी पीना सर्प रखा गया है।

6 नवम्बर 1978 को जैसलमेर के भैरवा ग्राम में एक ऐसी ही घटना हुई जो अदृश्य सत्ता के प्रत्यक्ष सहयोग का प्रमाण देती है। उक्त गाँव के एक सहायक कृषि अधिकारी सरकारी फार्म में कार्यरत थे। हनुमान जी के वे परम भक्त थे। ईश्वर के प्रति उनकी अटूट आस्था थी। एक दिन अपने फार्म का निरीक्षण करते घूम रहे थे। पेड़ पर उन्होंने देखा कुछ बन्दर उछल-कुछ मचा रहे थे। यकायक बन्दरों के पास से निकलते हुए एक आवाज सुनाई दी “साँप से बचना।” चौंक कर उन्होंने ऊपर देखा किन्तु कुछ नहीं दिखायी दिया। एक बन्दर अवश्य पेड़ पर बैठा था। अधिकारी ने मन का भ्रम समझकर भुलाने की चेष्टा की किन्तु उस चेतावनी का डर तो बना ही रहा।

रात्रि को जब अधिकारी महोदय सोने का प्रयास कर रहे थे। इसी बीच उन्हें अपने सीने पर कुछ रेंगती हुए चीज मालूम पड़ी। तेजी से बिस्तर से उठ खड़े हुए रेंगती हुई चीज नीचे गिर पड़ी। बगल में रखी टार्च जलाकर देखा तो सर्प था। बचाव के लिए चिल्लाने पर फार्म में सोये अन्य कर्मचारी पहुँच गये। लाठियों से सर्प पर बारम्बार प्रहार किया गया किन्तु आश्चर्य कि सर्प नहीं मरा। कुछ लोग इस विचित्र सर्प से पूर्व से ही परिचित थे। उन्होंने बताया यह पीना सर्प है जो लाठियों से नहीं मरता। तत्पश्चात् भाले-बल्लम के प्रहार से सर्प मर गया। सर्प की मोटाई साढ़े तीन इंच तथा लम्बाई सवा पाँच फुट थी। वजन इसका 1.3 किलो पाया गया।

ईश्वर की विशिष्ट कृपा का वर्णन करते उक्त अधिकारी महोदय ने सारी घटना एवं अदृश्य चेतावनी की बात सभी को बतायी। उन्होंने कहा कि दी गई चेतावनी के कारण ही हमें नींद नहीं आ रही थी। यदि सो जाता तो सर्प के जहर से बचना असम्भव था।

कहा जाता है मानवी चेतना प्रत्येक परिस्थितियों एवं घटनाओं से जूझने में समर्थ है। किन्तु यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देने वाली घटनाओं के संदर्भ में ही लागू होती है। कुछ घटनायें ऐसी होती है जिनके विषय में कुछ भी जानकारी नहीं होती है अथवा कुछ परिस्थितियाँ ही ऐसी आ खड़ी होती हैं जिनमें जीवन-सुरक्षा असम्भव जान पड़ती है। ऐसे विशिष्ट अवसरों पर जब मनुष्य असहाय एवं असमर्थ होता है एकमात्र आसरा उप परमात्मा का ही रहता है। देखा यह जाता है कि इन असहाय परिस्थितियों में अदृश्य शक्ति किसी न किसी रूप में सहयोग करती तथा संकटग्रस्त को उबारती है।

प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के जेठवारा थाना के पाती ग्राम में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसमें देवी अनुकम्पा प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हुई। कहा जाता है कि गाँव की एक महिला का पति मर गया। उसका दो वर्ष का बच्चा था। विधवा ने पुनर्विवाह के लिए एक युवक को राजी कर लिया विवाह में एक अड़ंगा आ खड़ा हुआ। युवक का कहना था कि बच्चे के रहते वह विवाह करने के लिए तैयार नहीं होगा। फलस्वरूप लड़की के माता-पिता बच्चे को लेकर हत्या करने के उद्देश्य से एक खेत में ले गये। इसके पूर्व कि गड़ासे का प्रहार बच्चे के ऊपर करें, एक भयंकर सर्प फुफकारता हुआ उनको काटने के लिए आगे बढ़ा। सर्प देखकर वे भयभीत होकर भाग गये। पुलिस ने बाद में उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार बच्चे की जान बच गई।

दैवी शक्तियाँ समय-समय पर अपने प्रिय पात्रों का सहयोग, अनुग्रह करती रहती है। साथ ही दुष्ट, आतताइयों को उनके कुकृत्यों के लिए भयंकर दण्ड-व्यवस्था भी करती हैं सूक्ष्म जगत में विचरण करती दिव्य आत्माओं का सहयोग अनायास इस रूप में मिलते देखा गया है।

इंग्लैण्ड के न्यायिक इतिहास में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में एक ऐसी घटना घटी, जिसने कानून व्यवस्था को भी चुनौती दे दी। इंग्लैण्ड के एक्सटर जेल में एक ‘जान ली’ नाम अपराधी बन्द था। हत्या के आरोप में न्यायालय द्वारा उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया। उस समय विद्युत द्वारा फाँसी दी जाने की व्यवस्था आज की तरह नहीं थी। मोटी रस्सी के फंदे द्वारा फाँसी दी जाती थी।

निर्धारित तिथि एवं समय पर डाक्टर ने उसके स्वास्थ्य की परीक्षा की। पादरी ने ‘जान ली’ के किये गये अपराधों के लिए परमात्मा से क्षमा-प्रार्थना की। फाँसी का फंदा उसके गले में डालने के पूर्व जल्लाद जेम्स वेरी ने फाँसीघर के सारे उपकरणों की भली-भाँति जाँच करली। फाँसी का फंदा बनाकर खींचे जाने वाले रस्से को ठीक किया। मजिस्ट्रेट की देख-रेख में अपराधी के गले में फंदा डाला गया। जल्लाद ने पीछे हटकर नीचे के तख्ते को खींचा किन्तु तख्ता बिल्कुल नहीं हिला। पुनः तख्ते का निरीक्षण किया कि सम्भवतः कहीं जाम हो गया हो, किन्तु पाया वह बिल्कुल ठीक था। दुबारा जोर लगाकर तख्ता खींचा किन्तु आश्चर्य कि वह टस से मस न हुआ। जल्लाद ने तीसरी बार तख्ते की जाँच करने के बाद खींचने का प्रयास किया किन्तु असफलता ही हाथ लगी।

तीसरी बार फाँसी पर चढ़ाये जाने की मानसिक पीढ़ा से ‘जान ली’ भीषण ठण्ड में भी पसीने से डूब गया। मजिस्ट्रेट सामने खड़ा सारी कार्यवाही देख रहा था। उसके जीवन की यह अभूतपूर्व घटना थी। वह विस्मित था कि फाँसी के सारे उपकरण ठीक होते भी तख्ता खिसक क्यों नहीं रहा है। निरन्तर सात मिनट तक अथक प्रयास तथा तीन बार फाँसी के तख्ते पर चढ़ाये जाने पर भी उसे मृत्यु दण्ड नहीं दिया जा सका। उस समय के लिए फाँसी को मजिस्ट्रेट ने स्थगित करने का आदेश किया। फाँसी का निर्धारित समय बीत चुका।

सर विलियम कोर्ट में इस मामले को प्रस्तुत करते हुए निवेदन किया गया “कि न्यायालय द्वारा निर्धारित समय पर पूरी सतर्कता एवं सावधानी रखने के बाद भी मृत्यु न दी जा सकी। अतः न्याय की रक्षा के लिए फाँसी के लिए अगला समय निर्धारित किया जाय। उच्च न्यायालय ने अपील को निरस्त करते हुए कहा कि “अपराधिक दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार न्यायालय द्वारा मृत्यु दण्ड की सारी कार्यवाही पूरी हो चुकी है। इस समय को आगे बढ़ाना न्यायालय के क्षेत्राधिकार के बाहर है। विश्व के न्यायिक इतिहास में यह आश्चर्य जनक घटना थी जबकि एक व्यक्ति को निरन्तर 7 मिनट तक फाँसी दी जाती रही हो और वह बच गया हो।

पत्रकारों ने ‘जान ली’ से पूछा कि “वह कैसे बच गया”। उत्तर में उसने कहा कि “वह निर्दोष था, हत्या में उसे किसी प्रकार फँसा दिया गया था। अपनी सफाई एवं समुचित साक्ष्य वह न्यायालय में प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे उसको मृत्यु दण्ड मिला। फाँसी के तख्ते पर ईश्वरीय न्याय एवं सहयोग की प्रार्थना वह निरन्तर करता रहा। फलस्वरूप किसी अदृश्य शक्ति को प्रत्यक्ष सहयोग करते उसने अनुभव किया।

कभी-कभी यह देवी प्रेरणा, सहयोग व्यक्तियों के अन्तःकरण में अवतरित होकर, उन्हें अनायास इस प्रकार के निर्णय लेने को बाध्य करता है, जिसका कारण तुरन्त जान सकने में वे असमर्थ होते हैं। घटना के घटित होने पर उक्त प्रेरणा का रहस्योद्घाटन होता है। नवम्बर 1950 अमेरिका के वाशिंगटन शहर में प्रसिद्ध लेखक ‘हेराल्ड ग्लक’ चिन्तित होकर अपने कमरे में घूम रहे थे। पत्नी के पूछने पर उन्होंने बताया कि “उनके मन में मछली पकड़ने जाने के लिए बारम्बार प्रेरणा उठ रही है।” मौसम उस समय प्रतिकूल था। तूफानी ठण्डी हवायें चल रही थी। हल्की बूँदा-बाँदी भी हो रही थी। पत्नी के रोकने पर भी हेराल्ड नहीं रुके। अपने निकटवर्ती मित्र के घर पर पहुँचकर मन की बात बतायी। मित्र यह सुनकर अवाक् रह गया। उसने बताया कि -’उसके अन्दर भी उसी प्रकार की प्रेरणा उठ रही है।’ मौसम की प्रतिकूलता भी उन दोनों के निर्णय को बदल न सकी। समुद्र के किनारे पहुँचकर नाव को समुद्री उठती लहरों के बीच खोल दिया। ऊँची लहरों में नाव का सन्तुलन रख पाना कठिन हो रहा था। जैक ने डरकर हेराल्ड से वापस लौट चलने को कहा किन्तु उसने इन्कार कर दिया। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि दो व्यक्ति समुद्री धारा में डूब रहे हैं। वे अचेतन अवस्था में डूबते-उतराते बहे जा रह हैं। दोनों ने जाल फेंककर बहते व्यक्तियों को नाव में खींच लिया। नाव किनारे ले आकर दोनों बेहोश व्यक्तियों का प्राथमिक उपचार किया। उनकी चेतना वापस लौट आयी।

इन घटनाओं को मात्र एक आकस्मिक संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता। भयंकर तूफान में एक साथ ही दो व्यक्तियों के मन में समुद्र में नाव लेकर पहुँचने की प्रेरणा उठना, तूफानी लहरों में भी नाव चलाते हुए साहस बनाये रखना तथा बहते हुए व्यक्तियों को बचाना अकस्मात सम्भव नहीं है। देवी शक्ति ने सुनियोजित ढंग से एक साथ ही दोनों मित्रों को समान विचारों से प्रेरित किया। उद्देश्य था डूबते हुए व्यक्तियों को मृत्यु से बचाना।

अदृश्य शक्तियाँ इस प्रकार अपने प्रिय-पत्रों की न केवल प्रतिकूलताओं में सुरक्षा करती सहयोग देती है वरन् किन्हीं-किन्हीं की भौतिक उन्नति में भी योगदान देती देखी गयी है। जर्मनी के जान ग्रीक की घटना प्रसिद्ध हैं। एक सामान्य सा सरकारी कर्मचारी अदृश्य सहायता से पूँजीपति बना। अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह अक्सर चिन्तित रहता था। इसी चिन्ता में एक दिन अपने कमरे में बैठा था कि अचानक उसे आवाज सुनाई दी कि, “तुम नौकरी छोड़ दो तथा सड़क का ठेका लेने का कार्य आरम्भ करो।” कमरे में चारों और उसने दृष्टि दौड़ाई किन्तु कोई दिखायी न पड़ा। मन का भ्रम जानकर उसने आवाज की उपेक्षा कर दी किन्तु दूसरे दिन पुनः इसी प्रकार की निर्देशित आवाज सुनाई दी। कई दिनों तक इस प्रकार की आवाज उसे सुनायी देती रही। देवी शक्ती का निर्देशन मानकर उसने नौकरी छोड़ दी तथा सड़क बनवाने के ठेके का काम आरम्भ किया।

इस कार्य में उसे अप्रत्याशित लाभ होने लगा। ग्रीक का कहना है कि ठेके के कार्य में समय-समय पर एक दिव्यात्मा द्वारा सुझाव, एवं निर्देशन मिलता रहता है। आज जर्मनी के अच्छे पूँजीपतियों में उसकी गणना है। अनेक संकटपूर्ण स्थिति में रक्षा किये जाने की बात को भी ग्रीक ने स्वीकार किया।

अदृश्य देवी सत्ताएँ मनुष्यों की सुरक्षा करती, सहयोग करतीं तथा उन्नति में अपना योगदान देवी हैं।

ऐसी आत्माओं के साथ अध्यात्म साधनाओं के माध्यम से संपर्क साधा जा सकता हैं, उन्हें अधिक सहयोग देने के लिए सहमत किया जा सकता है।


Quotation

कामं क्रोध च लोभ च यो जित्वा तीर्थ भाविशेत्। न तेन किंचिद प्राप्त तीर्थ्राभिगमानद् भवेन्॥

अर्थात् जो काम क्रोध और लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है उसे तीर्थ यात्रा से कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती।


उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः

सामान्यतया सोचा यह जाता है कि कार्या की सिद्धि या सफलता दैवी अनुकम्पा या अन्यों के सहयोग पर पूर्णतया आधारित होती है और इसके लिए दैवी अनुग्रह या जन सहयोग की याचना ही पर्याप्त है, जिसके प्राप्त हो जाने पर अभीष्ट कार्य स्वतः पूर्ण हे जायेंगे। परन्तु वास्तविकता इससे कुछ भिन्न ही है। दैवी सहयोग या अन्यों की सहायता- कार्यों की सिद्धि में यत्किंचित सहायक तो हो सकती है लेकिन उनके ही द्वारा कार्य सिद्ध नहीं होते। इसमें व्यक्ति का प्रबल-पुरुषार्थ या स्वयं की कार्यक्षमता ही सफलता की हेतु बनती है। अपनी सामर्थ्य के अभाव में प्राप्त अनुदानों का भी सदुपयोग नहीं हो पाता, जबकि पुरुषार्थ - परिश्रमशीलता के बल पर अन्यों को सहयोग देने के लिए विवश किया जा सकता है। तात्पर्य यह कि मनुष्य के समस्त कार्य उसके ही प्रयास के सत्परिणाम स्वरूप ही सिद्ध और सफल हुआ करते हैं। इस के प्रमाण सर्वत्र उपलब्ध होते है-

प्रयाति वाँछितं वान्यद्दृढं ये व्यवसायिनः। नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवचेह वा॥ -मार्कण्डेय पुराण

‘दृढ़ संकल्प वाले कर्मनिष्ठ व्यक्ति ही सफलताएँ प्राप्त करते हैं। मनस्वी व्यक्ति के लिए इस संसार में कोई वस्तु अप्राप्य नहीं और कोई भी स्थान अगम्य नहीं है।’

क्वभूतलं क्व च ध्रौव्य-स्थानं यत्प्राप्तबन्ध्रुवः। उत्तानपाद नृपतेः पुत्रः सद् भूमि गोचरः॥ -मार्कण्डेय पुराण

“उत्तानपाद राजा के पुत्र ‘ध्रुव’थे, उन्होंने अपने पुरुषार्थ से ही अद्भुत स्थान प्राप्त कर लिया। कहाँ पृथ्वी और कहाँ ध्रुवस्थान।”

मनुष्य के लिए पुरुषार्थ द्वारा कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं होती, इसके द्वारा वह अपने भाग्य का निर्माण स्वतः कर लेता है -

न तदस्ति जगत्कोशे शुभकर्मानु पातिना। यत्पौरुषेण शुद्धेन न समासाधते जनैः॥ -धोगवशिष्ठ

“कोई दूसरा हमारे भाग्य का निर्माण नहीं करता है। संसार की कोई वस्तु ऐसी नहीं जो समर्थ और सही पुरुषार्थ से प्राप्त न हो सके।”

‘अप्राप्य नाम नेहास्ति धीरस्य व्यवसायिनः। -कथासरित्सागर

“धैर्यशाली और व्यवसायी (उद्यमी) व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। अपने पुरुषार्थ के बल पर वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है।”

यो यदर्थ प्रार्थयते यवर्थ घटतेऽपि च। अवश्यं तदवाप्नोति न चेच्छ्रान्तोनिवर्तते॥

“जो जिस वस्तु की चाह करता है और उसके लिए प्रयास करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है, यदि निराश होकर प्रयास न छोड़ दे।”

उद्योगिनो मनुष्यस्य ननुमत्यकिं दुर्घटम्। आकाशमषि पानम्लमेकी कुर्यात्कदाचम्॥

“उद्योगी (पुरुषार्थी) मनुष्य के लिए कौन सा कार्य अकरणीय होता है, वह चाहे तो आकाश और पाताल को एक कर दे।”

वास्तव में प्रत्येक कार्य की सफलता का मूल कारण उसके लिए किया गया प्रयास है, न कि केवल उसी सफलता की कामना कर लेना। इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति दोनों मिल कर ही व्यक्ति को सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाती है। प्रत्येक महापुरुष के जीवन में दिखाई पड़ने वाले चमत्कार का यही कारण है, वे कार्य की सिद्धि को अपने प्रबल-पुरुषार्थ से सहज ही करतलगत कर लेते हैं। किसी के सामने हाथ नहीं पसारते, उन्हें इस सिद्धान्त पर पूर्णतया विश्वास होता है -

कार्यों की सिद्धि या सफलता उद्यम (परिश्रम) से होती है, केवल कामना करने से नहीं। यही सिद्धान्त सभी व्यक्तियों के लिए भी है। काश इसे हम समझ सके और इसके अनुसार क्रिया पद्धति को निर्धारण कर सकें। सफलता तो हमारे स्वागत को पहले से ही तैयार बैठी है। आवश्यकता केवल उसे स्वीकार करने की है।


सृजन की ओर बढ़ें ध्वंस को रोकें

शक्ति की अपनी महत्ता एवं उपयोगिता है। किन्तु उसकी महत्ता तभी है जब उसका सदुपयोग किया जाय। सृजनात्मक प्रयोजनों में वह लग सके। ध्वंस के लिए नियोजित शक्ति तो विग्रह ही खड़ी करती है। अनेकानेक समस्याओं एवं बाधाओं को जन्म देती है।

शक्ति प्राप्त कर लेना ही बड़ी बात नहीं है बल्कि प्राप्त क्षमता का उपयोग किस दिशा में हो रहा है, महत्ता इस बात की है। जहाँ इसका सदुपयोग मानवी सुखशान्ति के अभिवर्धन में अपना योगदान दे सकता है वहीं इसका दुरुपयोग अनेकों समस्याएँ खड़ी कर सकता है।

इतिहास के पन्ने पलने पर पता लगता है कि अपने प्रयत्न, पुरुषार्थ से अनेकों ने शक्ति अर्जित की किन्तु समाज एवं राष्ट्र अथवा मानव मात्र को कुछ दे सकने में वे समर्थ हो सके जिन्होंने इसका सदुपयोग किया, सृजन के कार्या में लगाया, सदुपयोग के लिए नियोजित शक्ति की पूजा अर्चन की। भारतीय संस्कृति ने राम की, कृष्ण, बुद्ध, दुर्गा की उपासना पर बल दिया। शक्ति तो रावण, कंस, हिरण्यकश्यप को भी प्राप्त थी किन्तु अत्याचार, हिंसा, अनैतिकता को बढ़ावा देने में प्रयुक्त उनकी सामर्थ्य का तिरस्कार किया गया। उनके पुतले जलाये गये। हिटलर, नेपोलियन, सिकन्दर, मुसोलिनी, की सामर्थ्य कितनी बढ़ी-चढ़ी था, उसे हर कोई जानता है। किन्तु उन्होंने विश्व में कितना कहर ढाया, इसे भी सभी जानते हैं। उनके कुकृत्यों की गवाही इतिहास के पन्ने सदा देते रहेंगे। जहाँ इनके कुकृत्यों ने समाज के पतन की ओर घसीटा वहीं महापुरुषों के योगदान से समाज पुष्पित, पल्लवित हुआ। सुख-शान्ति की वृद्धि हुई। मानव समाज का मस्तक उनके श्रेष्ठता के प्रति झुक जाता है। प्रकाश स्रोत के समान उनके त्याग बलिदान सदा प्रेरणा देते रहेंगे।

शरीर बल, बुद्धि बल से कम महत्व धन का भी नहीं हैं सृजनात्मक दिशा में इसका प्रयोग सुख-शान्ति की अभिवृद्धि में अपना योगदान दे सकता है। पिछले दिनों मनुष्य ने सम्पत्ति का जितना सदुपयोग किया उससे कहीं अधिक दुरुपयोग किया। सृजन की अपेक्षा ध्वंस कार्यों में अधिक लगाया गया। फलस्वरूप साधनों का उपयोग सुख-शान्ति के विकास में किया जा सकता था, उसका एक बड़ा भाग ध्वंस में प्रयुक्त किया जा रहा है। कुछ दिनों पूर्व ‘रूमानिया’ के विशेषज्ञों की खोज का विवरण दिया गया कि विध्वंसक यन्त्रों में सम्पत्ति का कितना बड़ा भाग नियोजित हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार “विश्व में औसतन एक मिनट में दस लाख डालर (80 लाख रुपये) हथियारों के निर्माण में खर्च किये जाते हैं। इस धन से पाँच हजार टन गेहूँ या चार हजार टन दूध प्राप्त किया जा सकता है। इससे लाखों व्यक्तियों को रोटी तथा करोड़ों बच्चे जो दूध के अभाव में कुपोषण के शिकार हो रहे हैं, उन को पोषक मिल सकता है।”

इस प्रकार मात्र एक मिनट, शस्त्रास्त्रों का निमार्ण रोक दिया जाय तो उसकी बचत से एक सौ परिवारों की आजीविका की व्यवस्था की जा सकती है। छोटे-छोटे तीन सौ मकान बनाये जा सकते हैं जिनमें गरीबों के लिए निवास की व्यवस्था हो सकती है। एक सामान्य रायफल बनाने में 2500 रुपये खर्च होते है, इससे एक आधुनिक हल तैयार हो सकता है। एवं मशीनगन पर 12000 रुपये की लागत आती है जिससे एक ट्रैक्टर बनाया जा सकता है। हजारों एकड़ भूमि को उपजाऊ बनाने में 72 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इस धन से आधुनिक चिकित्सा यन्त्रों से सुसज्जित 16 अस्पताल खोले जा सकते हैं। रोग निवारण एवं स्वास्थ्य सम्वर्धन का लाखों व्यक्ति लाभ इससे प्राप्त कर सकते हैं। बारह अरब रुपये में एक पनडुब्बी बनती है। इससे शिक्षा प्रदान करने के लिए 10 हजार विद्यालय चल सकते है।

एक मिनट में 80 लाख रुपये पूरे विश्व में संहारक यन्त्रों के लिए नष्ट किए जाते हैं। एक दिन में 115200 लाख रुपये, तथा एक माह में 3456000 लाख रुपये का अपव्यय विनाशकारी यन्त्रों के लिए किया जाता है। एक वर्ष का हिसाब जोड़ा जाय तो यह संख्या 4147-2000 लाख रुपये तक जा पहुँचती है। यह संख्या चौंकाने के लिए पर्याप्त है। इस पूँजी से कितनी योजनाएं बन सकती है। लाखों छोटे-छोटे उद्योग खड़े किये जा सकते हैं। अरबों व्यक्तियों का रोजी-रोटी मिल सकती है। अभाव, दुःख क्लेश का साम्राज्य सारे विश्व में छाया हुआ है, उसके निवारण में इस पूँजी को लगाया जा सकें तो कुछ ही वर्षों में सारे संसार से अभाव को समाप्त किया जा सकता है।

यह खर्चा तो अभी उन संहारक यंत्रों पर किया जाता है जो युद्ध के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रयुक्त होते हैं परोक्ष मारक यंत्रों में मादक द्रव्य, शराब, सिगरेट भी कम घातक नहीं। इनके उत्पादन में बहुत बड़ी पूँजी लगी हुई है। भारत में तम्बाकू उद्योग में लगभग 41 अरब 6 करोड़ 40 लाख की पूँजी लगी है। अनुमान किया गया है कि भारत में लगभग 10 करोड़ व्यक्ति सिगरेट बीड़ी पीते हैं। इस प्रकार प्रति वर्ष करीब 720 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय क्षति उठानी पड़ती है। शराब उद्योग में तो और अधिक पूँजी लगी है। यदि प्रति वर्ष होने वाली शराब की “क्षति को बीड़ी सिगरेट से होने वाले क्षति के बराबर ही माना जाय तो यह पूँजी 1440 करोड़ तक जा पहुँचती है।”

प्रगतिशील कहे जाने वाले राष्ट्रों की स्थिति तो और भी भयंकर है। अमेरिका में करोड़ों डालर तो मात्र मादक द्रव्यों के प्रचार के लिए विज्ञापन में खर्च किये जाते हैं। खरबों डालर नशीली वस्तुओं के उद्योग में लगे है। अन्यान्य देशों में भी मारक नशीली वस्तुओं के उत्पादन में राष्ट्रीय संपत्ति का एक बड़ा भाग लगा है। इतनी बड़ी धन शक्ति एवं जन शक्ति का दुरुपयोग मनुष्य अपने ही विनाश के लिए कर रहा है उसे देखते हुए मनुष्य की विचारशीलता पर शक उत्पन्न होता है।

प्रत्यक्ष एवं परोक्ष ध्वंस के प्रति मानवी उत्साह उसे विनाश के कगार पर घसीटता ले जा रहा है। बढ़ते हुए यह कदम बताते हैं कि सृजन से मनुष्य कितना विमुख होता जा रहा है। धनशक्ति के इस बड़े भाग का यदि दुरुपयोग रोका जा सके तथा इसका उपयोग संसार में फैले दुःख क्लेश के निवारण में किया जा सके तो अच्छा होता।

संसार में 150 करोड़ से भी अधिक मनुष्य ऐसे हैं जिनकी आय 500 रु. वार्षिक से भी कम है। मात्र 40 रुपये मासिक पर निर्वाह करने वाली जनता में आधी ऐसी है जिसका औसत और भी गया गुजरा है। उन्हें भरपेट रोटी और तन ढकने को कपड़ा जीवन में कभी-कभी ही मिल पाता है। अधिकतर तो आधा पेट खा कर ही किसी प्रकार सोते है और फटे-चिथड़ों में अपनी लाज ढकते है।

दरिद्रता निवारण के लिए क्या कुछ नहीं किया जा सकता? क्या इस दिशा में सहयोग देने में सचमुच ही लोक असमर्थ हैं। उक्त विशेषज्ञों का कहना है कि प्रगति और वर्चस्व का दावा करने वाले दो बड़े राष्ट्र रूस और अमेरिका मिल-जुलकर ही यदि कुछ काम करें तो बहुत कुछ हो सकता है। इन दोनों राष्ट्रों में जितनी धन शक्ति एवं जन शक्ति युद्ध कार्या में लगी है उसे यदि पीड़ित मानवता को ऊंचा उठाने में लगा दिया जाय तो उन पौने दो करोड़ व्यक्तियों की आमदनी कुछ माह के अन्दर ही ठीक दूनी हो सकती है। 500 रुपये वार्षिक के स्थान पर 1000 रु. वार्षिक प्राप्त करने लगेंगे। दरिद्र स्थिति से ऊपर उठकर सामान्य जीवनयापन की आवश्यक सुविधाओं को प्राप्त कर सकते हैं -

इस धन का सदुपयोग यदि दूसरे वर्ष मकान निमार्ण में किया जाय तो लगभग 20 करोड़ मनुष्यों के रहने के लिए नये मकान प्राप्त हे सकता हैं जो आज वन्य पशुओं के समान जीवनयापन कर रहे है। प्रथम वर्ष मकान द्वितीय वर्ष गृह-उद्योग तृतीय में शिक्षा, चौथे में स्वास्थ्य, पाँचवें में बिजली, बाँध यातायात संचार की योजनाएँ बनायी जाय तो पहले पंचवर्षीय योजना में ही पौने दो अरब अर्थात् लगभग आधी दुनिया के व्यक्तियों का भाग्य पलट सकता है इतना तो रूप और अमेरिका जैसे राष्ट्र अकेले कर सकते हैं। फिर यदि संसार के अन्य देश इस दिशा में कदम बढ़ाने लगे तो फिर समझना चाहिए कि पिछड़ी हुई दुनिया का अन्त ही हो जायेगा। पीड़ा पतन का दृश्य कहीं नहीं दिखाई देगा।

ध्वंस की प्रतिक्रिया एवं परिणामों से हर कोई परिचित है। यह जानते हुए भी सृष्टि का मुकुटमणि कहलाने वाला मनुष्य ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों की ओर निरंतर बढ़ता जा रहा है। प्रत्येक राष्ट्र में घातक शस्त्रों के निर्माण की होड़ सी चल पड़ी है। प्रगति का माप-दण्ड तथा कथित विचारशील व्यक्तियों द्वारा इस आधार पर लगाया जा रहा है कि कौन राष्ट्र कितना विनाशक यन्त्र क निर्माण कर सकता है अथवा कर चुका है। बुद्धि का दम्भ बनने वाला मनुष्य प्रगतिशील होने का दावा यदि इस आधार पर करता है कि हमने अधिक विनाशक यन्त्रों का निर्माण कर लिया अथवा कर रहे है तो यह कहना होगा कि आज विकसित कहे जाने वाले मनुष्य की अपेक्षा पाषाण युग की आदिम जातियाँ अधिक प्रगतिशील थी। जीव-जन्तु जो अधिक हिंसक हैं वे भी अधिक प्रगतिशील कह जायेंगे।

माप दण्ड का आधार यदि यही रहा तो सारी परिभाषाएँ उलट जायेंगी। संस्कृति-सभ्यता का मानवी आधार विश्रृंखलित हो जायेगा। सोचने का क्रम यदि यही रहा तो फिर पुरानी मान्यतायें भी बदल जायेंगी। राम के स्थान पर रावण की पूजा होगी। कृष्ण की जगह कंस की आराधना होगी। हिटलर नैपोलियन ही मानव के आदर्श होंगे। इस विभीषिका की कल्पना मात्र से हृदय काँप उठता है।

आवश्यकता इस बात की है कि सृजन का महत्व समझा जाय। ध्वंस के लिए प्रयुक्त हो रही विपुल संपत्ति को रोका जाय। संसार में फैली हुई दरिद्रता, रोग-क्लेश के लिए उसका प्रयोग किया जाय। मनुष्य की विचारशीलता एवं श्रेष्ठता इसमें ही निहित है।


Quotation

गंगादि तीर्थेषु वसन्ति मत्स्या देवालये पक्षिगणाश्च सन्ति। तीर्थाच्च देवायतनाच्च मुख्यात् भावं ततो हृत्कमले निधाय तीर्थानि सेवेत् समाहितात्मा (नारद पुराण)

अर्थात् गंगा आदि तीर्थों में मछलियाँ निवास करती हैं, देव मन्दिरों में पक्षीगण रहते है; किन्तु उनके चित्त भक्ति भाव से रहित होने के कारण उन्हें तीर्थ सेवन और देव मन्दिर में निवास करने से कोई फल नहीं मिलता है। अतः हृदय कमल में भाव का संग्रह, करके एकाग्र चित्त होकर तीर्थ सेवन करना चाहिये।

नृणाँ पापकृताँ तीर्थे पापस्य शमनं भवेत्। यथोकृफलदं तीर्थ भवेच्छुद्धात्मनाँ नृणाम्॥

अर्थात्- पापी मनुष्यों के तीर्थ में जाने से उनके पाप की शान्ति होती है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्यों के लिए तीर्थ यथोक्त फल देने वाला है।


संकल्प शक्ति का सदुपयोग किया जाय!

संकल्प शक्ति की महत्ता अन्य सभी प्रकार की शक्तियों से अधिक है। विश्व में जितने भी महान कार्य हुए है उनमें इस शक्ति का योगदान निश्चित रूप से जुड़ा रहा है। उथले विचार कौतूहल भले ही खड़ा कर ले, इनसे कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। उसके लिए तो दृढ़ संकल्प बल की ही आवश्यकता होती है। अनेकों व्यक्ति इस शक्ति का सदुपयोग कर स्वयं के विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास में भी योगदान दे सकने में समर्थ हो सके हैं। जबकि कुछ व्यक्ति इस महान शक्ति का दुरुपयोग कौतूहल खड़ा करने में करते देखे जाते हैं। कुछ तो उसके प्रभाव से अपरिचित रहने के कारण गई गुजरी स्थिति में पड़े हुए पिछड़ा जीवन ही बिताते रहते हैं।

उत्तरी रोडेशिया में 27 वर्षीय युवक ‘हैवलाक व्रिग्डर’ कपड़ा सिलाई का कार्य करता था। न जाने किन प्रेरणाओं से जगने में विश्व रिकार्ड स्थापित करने की बात उसके मन में आयी। वह इसके लिए 168 घण्टे 33 मिनट लगातार जागता रहा। नवस्थापित रिकार्ड को रोडेशिया के ही 25 वर्षीय ‘डेवहेटर ‘ ने अपने लिए चुनौती माना तथा एक अनोखा संकल्प लिया। उसने निश्चय किया कि वह निरन्तर नौ दिन नौ घण्टे, नौ मिनट, नौ सेकेंड तक नहीं सोयेगा! सात दिनों तक इस संकल्प को पूरा करने में उसकी स्थिति सामान्य बनी रही किन्तु आठवें दिन उसने बोलना बन्द कर दिया। शराबियों की भाँति वह झूमने लगा किन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी। उत्तरी कोरिया की एक महिला श्रीमती ‘वैर्थावान’ जो 55 वर्ष की हैं उन्होंने सन् 1968 में यह दिखा दिखा कि महिलाएँ इस प्रतियोगिता में पुरुष से विशेष आगे हैं। 2 दिसम्बर 1968 को उसने जगना आरम्भ किया तथा 15 दिसम्बर तक निरन्तर जगती रहीं। इस प्रकार 282 घण्टे 55 मिनट जगकर पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिये।

10 सितम्बर 1970 को लास एजेल्स के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति की विचित्र हरकतों ने बड़ी समस्या खड़ी कर दी। 24 वर्षीय ‘जान जीगर’ने प्रातः 6 बजे से ही लोगों से हाथ मिलाना आरम्भ किया। हवाई अड्डे पर आने जाने वालों में शायद ही कोई उसकी दृष्टि से बच पाया हो जिससे उसने हाथ न मिलाया हो। पन्द्रह घण्टे में उसने 22500 व्यक्तियों से हाथ मिलाया। यह पूछे जाने पर कि उसके मन में इस प्रकार के विचार क्यों उठे। उसने उत्तर दिया कि वह एक नया रिकार्ड स्थापित करना चाहता था जिसमें वह पूर्णतया सफल रहा।

कई व्यक्ति कीर्तिमान स्थापित करने की सनक में इस प्रकार के दुस्साहस करते देखे जाते हैं जिससे जीवन के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। सन् 1965 में अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री स्काट कारपेंटर ने 30 दिनों तक पानी के भीतर रहकर लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। अमेरिका के वोस्टन शहर के चार गोताखोरों में पानी में अधिक दिनों तक रहने की होड़ लगी। उनमें 34 वर्षीय ‘जान वाल्कर’ तथा 31 वर्षीय कोनराडमेंकन क्रमशः 41 तथा 49 दिनों बाद एक गोलाकार मकान के पानी तल से बाहर निकल आये। किन्तु 30 वर्षीय जानकिंग तथा 38 वर्षीय एडवर्ड क्लिफटन क्रमशः 49 तथा 60 दिन तक पानी के भीतर बने रहे।

संकल्प शक्ति की अपनी महत्ता एवं उपयोगिता है। उसका दुरुपयोग इस प्रकार के मात्र कौतूहल खड़ा करने के लिए किया जाना बचकानापन है। इस महान शक्ति को सोद्देश्य नियोजित किया जा सके तो व्यक्तिगत और सामाजिक उत्थान में योगदान मिल सकता है। संकल्पशक्ति की महत्ता समझी जा सके और उसका सदुपयोग किया जा सकें तो निश्चय ही उसके बल पर ऐसे महान् कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं जो व्यक्ति की गरिमा बढ़ा सके और समाज के लिए ऐतिहासिक अनुदान प्रस्तुत कर सकें।


मंत्र विद्या ध्वनिशक्ति का उच्चस्तरीय उपयोग

ध्वनि को सामान्यतया कानों को अमुक प्रकार की जानकारी देने का माध्यम माना जाता है। किसी शब्द को सुनकर उसमें सन्निहित अर्थ का बोध प्राप्त किया जाना है। अथवा किसी हलचल का - घटना क्रम का अनुमान लगाया जाता है। यह सर्वविदित ध्वनि परिचय हुआ। किन्तु गहराई में उतरने पर ध्वनि की सामर्थ्य उसकी अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती है जैसा कि साधारणतया अनुमान लगाया जाता है।

विज्ञान ने ध्वनि को भी ऊर्जा वर्ग में गिना है। यह ऊर्जा आमतौर से कानों के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचती है और अपने लिए उपयुक्त संस्थानों को तरंगित करके अपने प्रभाव से प्रभावित करती है। इस ज्ञान के सहारे ही जीवन का अधिकाँश काम चलता है। ध्वनि के माध्यम से बालकों को अभिभावकों की भाषा सीखने का अवसर मिलता है उसके बाद ज्ञान क्षेत्र की अन्याय उपलब्धियों का अधिकाँश उपार्जन कान से माध्यम से ही होता है। बधिर व्यक्ति गूँगा भी होता है और उसकी ज्ञान परिधि अन्धे की अपेक्षा भी कम रह जाती है। ग्रहण की तरह प्रेषण भी एक काम है। अभिव्यक्तियों, आवश्यकताओं, प्रेरणाओं का आदान-प्रदान प्रायः ध्वनि की सहायता से ही सम्भव होता है। लेखनी से भी प्रभाव ग्रहण तो किया जाता है, पर उस ग्रहण की अधिकाँश पृष्ठभूमि उसके पहले वाणी की सहायता से बन चुकी होती है। लेखनी उस वाणी संचित मनोभूमि से आगे का ही कुछ काम कर सकने में समर्थ होती है।

विज्ञान की शोधों ने इससे आगे की जानकारियाँ प्राप्त की हैं और पता चलाया है कि ध्वनि का कार्य क्षेत्र ज्ञान का संवहन करने तक ही सीमित नहीं है वरन् वे ऐसी प्रचण्ड ऊर्जा भरी रहती हैं जो मनुष्य के लिए संसार के लिए हानि और लाभ दोनों ही प्रचण्ड परिमाण में कर सकती हैं। कोलाहल के फलस्वरूप वातावरण इतना विक्षुब्ध हो जाता है कि उस ओजित क्षेत्र में रहने वालों को शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है। मशीनों वाहनों, एवं हलचलों से उत्पन्न अनगढ़ शोर की हानि का दिन-दिन अधिक परिचय मिल रहा है। फलतः उससे बचने के उपायों को गंभीरता पूर्वक सोचा जा रहा है, अन्यथा बढ़ता हुआ कोलाहल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भयंकर संकट बन सकता है।

दूसरी ओर उपयोगी एवं सुनियोजित ध्वनियों का उपयोग प्रभाव भी देखा जाता है। सुमधुर संगीत की सृजनात्मक सामर्थ्य की जानकारी क्रमशः बढ़ती जा रही है और सोचा जा रहा है कि इस ध्वनि सम्पदा का लाभ किसी प्रकार अधिक मात्रा में, किस क्षेत्र में - किस प्रकार उठाया जाय।

कर्णेन्द्रिय के माध्यम से समझी जाने वाली ध्वनियाँ समस्त ध्वनि प्रवाह का एक बहुत छोटा अंश होती हैं। कान अपनी बनावट के अनुरूप मध्यम स्तर की ध्वनियों को ग्रहण कर पाते हैं। उनकी पकड़ से धीमी या तीव्र ध्वनियाँ भी अनन्त आकाश में परिभ्रमण करती रहती हैं। इनमें से कुछ तो ऐसी होती हैं कि उनका उपयोग प्रचण्ड शक्ति की तरह किया जा सकता है। उनसे ऐसा लाभ उठाया जा सकता है जो एक प्रकार से अद्भुत या अनुपम ही कहा जा सके।

कनाडा के दो खदान नगरों के पास की खानों में कई दिन तक श्रमिक बहुत बड़ी संख्या में स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से काम पर हाजिर नहीं हुए। जो कुछ व्यक्ति आये, वे शारीरिक स्वास्थ्य और मनोदशा ठीक न होने के कारण सही ढंग से काम नहीं कर सके। इन लोगों की आम शिकायतें थी सिर दर्द, अनिद्रा, थकावट काम में मन एकाग्र न होना चेहरे का संज्ञा रहित हो जाना, मन बेचैन हो जाना, बहुतों की शिकायतें थी कि उन्हें अपने आस-पास रिक्त स्थान में से तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती है।

कनाडा के ध्वनि वैज्ञानिकों के एक दल ने वैज्ञानिक जाँच के बाद इन परिस्थितियों के लिए रूस पर आरोप लगाया कि उसने कनाडा के इन नगरों पर रेडियो तरंगें जैसी एक खास तरह की शक्तिशाली तरंगों का प्रहार किया है, जिनके प्रभाव से वहाँ के निवासियों का शरीर व मन दोनों ही अस्वस्थ हो गये हैं।

वास्तव में यह अब कपोल कल्पना नहीं रही कि अस्थायी मनोविकारों से ग्रस्त शत्रु सेना आत्म-समर्पण करने को विवश हो जाये व इन मनोविकारों का कारण ‘ध्वनि-युद्ध’ यानी “साउण्डवार” हो। यह अब उस शीतयुद्ध की विभिन्न शृंखलाओं में सम्मिलित हो चुकी है, जो पूँजीवादी एवं साम्यवादी देशों के मध्य चल रहा है। इस युद्ध में रूस ने अग्रणी रहकर ऐसा अस्त्र बना लिया है जिसके प्रयोग से नियंत्रित रेडियो तरंगें फेंककर शत्रु सैनिकों के मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव पैदा किया जाता है जिससे वे युद्ध विमुख होकर शस्त्र त्याग करने की मनोदशा से आक्रान्त हो जायें एवं आत्म-समर्पण कर दें। ऐसा होने से शत्रुओं पर भयंकर बम या अन्य संहारक अस्त्रों के चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। धन-जन की हानि से बचाव इस नये युद्धास्त्र की एक उपलब्धि होगी।

आखिर ये रेडियो तरंगें क्या हैं? क्या वस्तुतः ध्वनि तरंगों में इतनी शक्ति होती है। ध्वनि विज्ञान हमारे ऋषि-मनीषियों द्वारा प्रतिपादित पुरातन विद्या है जिसके ऊपर मंत्रशक्ति आधारित है। हमारे पूर्वजों ने इसी का आश्रय लेकर ऐसी ऋचाओं का आविष्कार किया जिनके माध्यम से वे तरंगें फेंककर सूक्ष्म वातावरण को भी प्रभावित करते थे एवं स्थूल रूप से विश्व के मानव- मस्तिष्क को भी। मनोयोग से लक्ष्य पर फेंकी गई ध्वनि तरंगें प्रभावोत्पादक होती हैं। इसी पुरातन ज्ञान के आधार पर इन्फ्रारेडियो तरंगों का आविष्कार किया गया है।

इन तरंगों को ट्राँसमिशन टावर द्वारा दूरदेश पर रेडियो तरंगों की ही तरह सीधे फेंका जा सकता है। ये तरंगें सूक्ष्म तरंग पट्टी की आवर्तिता में नहीं है बल्कि उन तरंगों से लम्बाई (वेव लेंग्थ) में कहीं ज्यादा लम्बी और प्रतिसेकेंड आवर्तिता (फ्रीक्वेंसी) में कहीं कम आवर्ती है। इनकी लम्बाई और आवर्तिता मानव मस्तिष्क की विविध तरंगों के आसपास है और इसीलिए ये मस्तिष्क तरंगों को जगह-जगह छूती है, उन्हें काटती हैं, प्रभावित करती हैं और परिणामस्वरूप मन और दिमाग में व्यवधान पैदा करती हैं जिससे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य विकृत हो जाता है। इन तरंगों को ‘रेडियो से इस ओर’ की तरंगें या इन्फ्रारेड वेण्स कहा जाता है।

हमारे रेडियो सेटों को किसी खास स्टेशन को पकड़ने के लिए उसके लिए ट्यून होना पड़ता है, परन्तु उपर्युक्त मामले में रूस से प्रसारित तरंगों की फ्रीक्वेंसी मानव मस्तिष्क रूपी रेडियो सेटों की फ्रीक्वेंसी के आसपास होने से वे स्वाभाविकतः ‘इनट्यून’ हो गये एवं बजने लगे यानी प्रभावित होने लगे। यह प्रभाव अस्थायी होता है। इसमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य इतना ही विकृत किया जाता है कि शत्रु युद्ध से विमुख हो जायें एवं आत्म-समर्पण की मनोदशा में आ जायें। जबकि माइक्रो तरंगों पैदा होने वाली शिकायतें न केवल ज्यादा खतरनाक बल्कि स्थायी प्रकार की होती हैं। माइक्रो तरंग के शिकार रैडार पर काम करने वाले होते हैं। रैडार पीड़ितों का एक संगठन अमेरिका में है जिसके सदस्य द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ ही वर्षों की रैडार साजी के शिकार हो गये हैं। कुछ पर बार-2 हृदय रोग के आक्रमण हुए हैं। कुछ को पक्षाघात, कुछ को मोतियाबिन्द एवं कुछ की प्रजनन शक्ति चली गयी है। इनके बालों का रंग भूरे से लाल हो गया है। इस संगठन के अध्यक्ष जोसेफ टाडने सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि माइक्रो तरंगों के बढ़ते खतरों से रक्षा के लिए वह ठोस कार्यवाही करें। ये तरंगें न केवल रक्तरोग पैदा करती हैं अपितु इनसे कैंसर तक हो जाता है।

इन तरंगों के बारे में जो वैज्ञानिक जानकारी हमें उपलब्ध हुई है उससे भय की एक लहर दौड़ जाती है। ये तरंगें मनुष्य को उत्तेजित एवं तुरन्त बाद हताश कर उसे अक्षम बना देती हैं। रूस अकेला ही ‘इन्फ्रारेडियो’ तरंगों के मामले में आगे नहीं है। अमेरिका भी ऐसा आविष्कार कर चुका है।

इस बात की कल्पना करने की आवश्यकता है कि मानव-मस्तिष्क को नियंत्रित करने वाले ये प्रयोग आखिर मनुष्य को किस श्रेणी में ला देंगे? इन तरंगों का सदुपयोग विज्ञान ने संचार साधनों के विस्तार हेतु किया, तब तक तो उचित था, पर जब इनका विनाशकारी उपयोग हो रहा है तो इसकी निंदा की जानी चाहिए। दूसरी ओर कुछ वैज्ञानिक ध्वनि तरंगों का उपयोग कर अल्ट्रासोनिक थेरेपी द्वारा मनुष्य की विभिन्न व्याधियों का उपचार करने का दावा करते हैं। ध्वनि का यही सृजनात्मक उपयोग मंत्रों की विद्या में प्रयुक्त हुआ है। विज्ञान विनाश की ओर न बढ़कर सृजन की ओर बढ़े तो लाखों पीड़ितों की सहायता हो, उन्हें अपने कष्ट से मुक्ति मिले।

मंत्र शक्ति की विधेयात्मक और निषेधात्मक शक्ति की प्रायः चर्चा होती रहती है। शाप और वरदान की बात असंगत नहीं युक्ति युक्त है। समर्थ व्यक्तित्व अपनी विशिष्ट सूक्ष्म प्राण शक्ति में घोलकर ऐसा शब्द प्रवाह उत्पन्न सूक्ष्म प्राण शक्ति में घोलकर ऐसा शब्द प्रवाह उत्पन्न कर सकते हैं जो अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंच कर अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न कर सके। शब्द बेधी बाण की चर्चा होती रहती है। कहा जाता है कि यह बाण तरकस से निकलकर उस स्थान पर अचूक निशाना लगाता हैं जहाँ से अमुक शब्द निसृत हुआ था। इस संदर्भ में प्रमाण के अभाव में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, पर शाप और वरदान की अमोघ शक्ति के बारे में अनेकानेक प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रमाण उपलब्ध हो सकते हैं।

मन्त्र साधना से साधक अपनी सामर्थ्य बढ़ाते हैं, दैवी शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं तथा अन्यान्य व्यक्तियों एवं वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। यह न तो कपोल कल्पना है और न अंध विश्वास। इसे शब्द शक्ति का विज्ञान सम्मत प्रयोग कह सकते हैं। मन्त्र की शब्द संरचना उसकी उच्चारण प्रक्रिया, निर्धारित साधना पद्धति- साधक का मनोबल एवं व्यक्तित्व आदि के सम्मिलित स्वरूप से वह शक्ति निखरती है जिसके आधार पर वे चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनकी मन्त्र योग की साधना से अपेक्षा की जाती हैं।

ध्वनि शक्ति का परिष्कृत उपयोग ही मन्त्र साधना है। उससे परोक्ष अध्यात्म उद्देश्य ही नहीं- प्रत्यक्षतः शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के उपयोगी लाभ भी मिल सकते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्रों में ऐसे प्रयोगों को चिकित्सा उपचार का महत्वपूर्ण अंग माना जाने लगा है।

ध्वनि विज्ञान का सृजनात्मक उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में भी हो सकता है, इसका उदाहरण पश्चिमी जर्मनी के डाक्टरों की वह अनूठी खोज है, जिसमें मूत्राशय या वृक्क की पथरी पर छोड़ी गई ध्वनि तरंगें कुछ ही क्षणों में पथरी को सूक्ष्म-सूक्ष्म कणों में बाँटकर उसे मूत्रमार्ग से बाहर निकाल देती हैं। नियंत्रित ध्वनि तरंगें निश्चित आवृत्तियों में जब छोड़ी जाती हैं, तब वे आसपास के ऊतकों को घायल किये बिना पथरी को पीस डालती हैं। बिना आपरेशन के मुक्ति पाने का यह अद्भुत उपाय है।

उपकरण के उपयोग की विधि यह है कि रोगी को नहाने के एक टब में बैठाया जायेगा और डेढ़ मीटर की दूरी से ध्वनि तरंगें उसके गुर्दे की पथरी को लक्ष्य बनाकर छोड़ी जावेगी जो पथरी को चाहे उसका आकार कितना भी बड़ा हो, भस्म कर देती है।

इससे पूर्व आल्ट्रासोनिक थेरेपी के द्वारा शरीर के विभिन्न जोड़ों में दर्द आदि की चिकित्सा की जाती रही है। चिकित्सा के अलावा रोगों के निदान में भी ध्वनि व प्रतिध्वनि के सिद्धान्त का आश्रय लिया जाता है। हृदय की विभिन्न व्याधियों में उसके कपाटों द्वारा आने वाली प्रतिध्वनि को ग्राफ बनाकर पढ़ा जाता है व तदनुसार बीमारी जानी जाती है। मस्तिष्क में चोट, रक्तस्राव आदि में भी इसी सिद्धान्त के द्वारा रोग का निदान किया जाता हैं।

विज्ञान जिस तत्परता के साथ ध्वनि शक्ति को खोजने और उसका सदुपयोग करने का मार्ग निकालने में दत्तचित्त है उसी प्रकार मन्त्र शक्ति के अनुसंधान में संलग्न होने पर और भी उच्चस्तर के लाभ मिल सकने की सम्भावना है।


स्वस्थ जीवन की कुँजी

अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करने एवं निरोग बने रहने की आकाँक्षा सभी करते हैं। किन्तु स्वस्थ बने रहना एवं दीर्घ जीवन की प्राप्ति जिन बातों पर आधारित है, उन सामान्य नियमों की उपेक्षा अधिकाँशतः व्यक्ति करते देखे जाते हैं। फलस्वरूप अनेकानेक आधि व्याधियों से घिरे एवं ग्रस्त दिखाई देते हैं।

समझा यह जाता है कि पोषक आहार पर ही अच्छा स्वास्थ्य अवलम्बित है तथा इसके द्वारा आरोग्य की प्राप्ति हो सकती है। यह मान्यता एक सीमा तक ही सही है। पोषक तत्वों का अपना महत्व है तथा स्वस्थ बने रहने में इनका योगदान भी है। इसकी महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण जो चीज है, जिस पर स्वास्थ्य की नींव आधारित है वह है- संयम एवं सदाचार युक्त जीवन। सच पूछा जाये तो सदाचार युक्त जीवन ही आरोग्य की कुँजी है। शास्त्र भी इसका समर्थन करते हुए कहते हैं -

इत्याचार समासेन भाषितं यः समाचरेत्। स विंदत्यायुरारोग्यं प्रीतिं धर्म धन यशः॥ (भाय प्रकाश)

जो व्यक्ति सदाचरण का पालन करेंगे वे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, यश, प्रीति तथा धर्म प्राप्त करेंगे।

न केवल आरोग्य अपितु आत्मलक्ष्य क गति भी सदाचार युक्त जीवन से ही सम्भव है;

महाभारत में वर्णन है -

तस्मात् कुर्यादिद्वाचारं यदिच्छेद् भूति आत्मन;। अभिपाप शरीरस्य आचारो हन्त्य लक्षणम्॥

आत्म-कल्याण चाहने वाला सदाचार बरते। शरीर की व्याधियाँ भी सदाचरण से नष्ट होती है।

चरक ऋषि कहते हैं -

तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्व सर्वदा स्मृतिमास्थाय सद्वृन्तमनुष्ठेयम्। तदनुष्ठानंयुग पत् सम्पादय र्त्यथद्धय मारोग्यमिंद्रिय विजय चरेत।

आत्म कल्याण के अभिलाषी सर्वदा अंतःकरण से सदाचार का आचरण करें। सदाचार के आचरण से आरोग्य की प्राप्ति होती है इन्द्रियों पर विजय भी प्राप्त होती है। इस प्रकार दोहरा प्रयोजन सिद्ध होता है।

बीमार पड़ने पर अन्धाधुन्ध दवाओं का सेवन करते लोग देखे जाते हैं। इसका परिणाम क्षणिक लाभ के रूप में भले ही दिखायी दे किन्तु स्थायी लाभ तो नहीं ही मिल सकता। दवाओं के सेवन करने की अपेक्षा आत्म संयम किया जाय तो स्थायी स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है शास्त्रों में भी वर्णन है -

प्रयोगः शमयेद् व्याधियों नैवान्य मुदीरयेत्। तासौ विशुद्ध शुद्धस्तु शमयेद् योन कोपयेत्॥

रोग उत्पन्न होने पर चिकित्सा करने की अपेक्षा यह उत्तम है कि आत्म नियन्त्रण करके रोग उत्पन्न ही न होने दिया जाय।

आचाराल्लभते ह्ययायुरा चारा दीप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धन क्षय्यमाचारों हन्त्यलक्षणम्॥

सदाचारवान् मनुष्य दीर्घ जीवी होता है सुयोग्य सन्तान का लाभ प्राप्त करता है। सदाचार से सम्पत्ति सुरक्षित रहती, शरीर में यदि जन्मजात रोग हो तो वह भी नष्ट हो जाता है।

संयमित जीवन एवं आचरण की श्रेष्ठता और पवित्रता का महत्व समझा जा सके तथा जीवन क्रम में इसका समावेश किया जाय तो आरोग्य और दीर्घ जीवन की प्राप्ति सम्भव है।


मस्तिष्क की प्रसुप्त क्षमताएं और उनकी जागृति

मानव मस्तिष्क एक जादुई पिटारा है। उसमें संग्रहित स्मृतियों की यदि लिपिबद्ध किया जाय और छाया जाय तो साधारण से साधारण मनुष्य के मन में इतनी स्मृतियाँ भरी पड़ी हैं कि उनसे अखण्ड-ज्योति के आकार की 32 अरब पृष्ठों मोटी के बराबर छपी हुई सामग्री निकल सकती है। यह तो तब है जबकि कहा जाता है साधारण व्यक्तियों में मस्तिष्कीय क्षमता का चार प्रतिशत से भी कम अंश काम में लाया जाता है।

यों मस्तिष्क देखने में एक छोटा-सा माँसपिण्ड लगता है जिसे हड्डियों के आवरण में बाँध कर प्रकृति ने मनुष्य के सिर पर रख दिया है। इसमें करीब एक अरब स्नायु कोष है, जिनकी प्रत्येक की अपनी दुनिया अपनी विशेषता और अपनी सम्भावनायें है। लेकिन इन स्नायु कोषों से थोड़े ही कोष सक्रिय रहते हैं, शेष का कोई उपयोग नहीं होता। इस प्रकार मनुष्य की अधिकाँश मस्तिष्कीय क्षमता प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ी रहती है। दैनिक जीवन की आवश्यकतायें पूरी करने में जितनी आवश्यकता पड़ती है, मस्तिष्क का उतना ही भाग सक्रिय रहता है। यदि शेष भाग को भी सक्रिय किया जाय- प्रशिक्षित कर उभारा जाय तो अब की तुलना में लाखों गुनी क्षमता विकसित की जा सकती है।

न्यूरोलॉजी (मस्तिष्क विज्ञान) के अनुसार सामान्य व्यक्ति अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं का केवल 4 प्रतिशत भाग ही प्रयुक्त करते हैं। जो व्यक्ति इसका जितना अधिक भाग प्रयुक्त करते हैं वे उतने ही बुद्धिमान बन जाते हैं। अर्थात् साधारणतया मनुष्यों में मस्तिष्क का 96 प्रतिशत भाग प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहता है। उस प्रसुप्त मस्तिष्क में से जो जितना जागृत कर लेता है, वह उतना ही प्रतिभाशाली बन जाता है। यह भी एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि अब तक संसार के बड़े से बड़े विचारक, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक अपने मस्तिष्क के प्रसुप्त अंश का अधिकतम दस प्रतिशत भाग ही जागृत कर सके हैं। शेष 90 सर 86 प्रतिशत भाग उनका भी प्रसुप्त ही पड़ा रहा। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि मस्तिष्क कितना विलक्षण और अद्भुत यंत्र है-जो प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान किया है।

कितने ही बढ़िया कम्प्यूटर क्यों न बन चुके हों, परन्तु मनुष्य अभी तक ऐसा कम्प्यूटर बनाने में असमर्थ ही रहा है जैसा कि प्रकृति ने तैयार कर उसे उपहार रूप में दिया है। सामान्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक काम करने, दक्षता बरतने वाले कम्प्यूटर भी तो आखिर मानवीय मस्तिष्क का ही कमाल है। अर्थात् मनुष्य प्रकृतिदत्त कम्प्यूटर द्वारा उसी की प्रतिकृति कम्प्यूटर बनाने में सफल हुआ परन्तु कम्प्यूटर स्वयं कम्प्यूटर बना लेगा ऐसा अभी तक सोचा भी नहीं गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि साधारण से साधारण व्यक्ति का मस्तिष्क भी संसार के सभी कम्प्यूटरों की तुलना में बेजोड़ हुआ। क्या हुआ वह अधिक सक्रिय, जागृत और सामर्थ्यवान न बन सका तो, लेकिन उसमें वह सम्भावना तो, विद्यमान है ही।

वैज्ञानिकों की दृष्टि में मस्तिष्क का निर्माण कुछ रासायनिक पदार्थों द्वारा हुआ है। न्यूरोलॉजी के अनुसार मस्तिष्क के बाहरी धूसर पदार्थ (ग्रे मैटर) में तंत्रिका कोशिकाओं की संख्या करीब 17 अरब है। अनुमस्तिष्क (सेरिबेलम) में 120 अरब और मेरुदण्ड में 1 करोड़ 35 लाख तंत्रिकायें अतिरिक्त हैं। इनके साथ ही ग्लाया स्तर की 1 खरब लघु कोशिकायें और है। इन सबका मिलन तंत्रिका बंध (न्यूरोग्लाया) कहलाता है। परन्तु इन रासायनिक पदार्थों के कारण ही मस्तिष्कीय चेतना उत्पन्न नहीं होतीं, यदि ऐसा होता तो स्वाभाविक है कि जिन प्राणियों का शरीर मनुष्य शरीर के अनुपात में बड़ा है और इस कारण उनका मस्तिष्क भी बड़ा है तो उनमें यह रासायनिक पदार्थ भी अधिक मात्रा में होने चाहिए।

मस्तिष्क यदि रासायनिक पदार्थों से निर्मित हुआ माँसपिण्ड ही है तो उसके भार और विस्तार के साथ मस्तिष्क की क्षमता भी घटती बढ़नी चाहिए थी। हाथी और व्हेल का मस्तिष्क विस्तार की दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा बहुत बड़ा है। फिर भी वे मस्तिष्कीय क्षमता के क्षेत्र में मनुष्य से बहुत पिछड़े रहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उन प्राणियों के मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचना भी माननीय मस्तिष्क से बहुत पिछड़ी और अविकसित है।

न्यूरोसर्जरी के विशेषज्ञ डा. विल्डरपेन ने मस्तिष्क के भीतरी भाग में चारों ओर लिपटी हुई काले रंग की पट्टियों में मुद्दतों पुरानी स्मृतियाँ छिपी रहती हैं। इन पट्टियों का क्षेत्रफल 25 वर्ग इंच तथा मोटाई एक इंच का दसवाँ भाग है। कनपटियों के ठीक नीचे स्थित टेम्पोरल कारेटेक्स में स्मृति का संचार और नियमन होता है।

नित्यप्रति ढेरों घटनायें हमारी आँखों के सामने घटती हैं। उनमें से कुछ पर तो ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं, जिन पर ध्यान जाता है उनमें से भी अधिकाँश विस्मृति के गर्त में खो जाती हैं। जो याद रहती है। लेकिन डा. विल्डरपेन के अनुसार ध्यान में आने वाली तथा न आने वाली, कुछ समय तक याद रहने वाली और थोड़ी देर बाद ही भूल जाने वाली सभी प्रकार की घटनायें टेम्पोरल कारटेक्स में अंकित रहती हैं। डा. विल्डर ने कितने ही व्यक्तियों के मस्तिष्क के धर्मस्थलों का विद्युत धारा से स्पर्श करके निरर्थक घटनाओं का स्मरण कराने में सफलता प्राप्त की है।

जिन व्यक्तियों में स्मरण-शक्ति विलक्षण रूप से जायी जाती है उनमें भी यही पट्टियाँ चमत्कारी भूमिका निभाती हैं। कितने ही व्यक्तियों में यह स्मरण-शक्ति इतनी अधिक मात्रा में विकसित पायी जाती है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। लिथुयानिया का रैवी एलिजा दो हजार पुस्तकें कंठाग्र रखने के लिए प्रसिद्ध था। कितनी ही बार उसकी हर तरह से परीक्षा ली गयी, पर वह सदा खरा उतरा। फ्राँस के राजनेता-लिआन गैम्वाटा को विक्टर ह्यूगो की रचनायें बहुत पसन्द थीं और उनमें से वह हजारों पृष्ठों के संदर्भ याद रखता था तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें दोहरा देता था। इनमें से एक शब्द भी आगे पीछे नहीं होता, यहाँ तक कि वह पृष्ठ संख्या तक सही-सही बता देता था।

प्राचीन भारतीय वांग्मय के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि हजारों वर्षों तक उसे लिपिबद्ध नहीं किया गया। चारों वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, निरुक्त, निधण्टु और उपनिषद् आदि सब गुरु शिष्य परम्परा के अनुसार सीखे,सिखाये जाते रहे। शिष्य गुरुमुख से उन्हें सुनता और याद कर लेता। सुन कर याद करने के कारण ही वेद-उपनिषदों का नाम ‘श्रुति’ पड़ा। चारों वेद और उपनिषद् कोई छोटी पुस्तकें नहीं हैं। वेद के सब मंत्र ही करीब 5 हजार पृष्ठों में आते हैं। फिर उनकी व्याख्या व्याकरण ब्राह्मण आरण्यक सब सुन कर ही कंठस्थ किये जाते थे। यह स्मरण शक्ति का ही कमाल कहा जायगा।

स्मरण-शक्ति की विलक्षणता के उदाहरण आज भी यंत्र-तंत्र देखे जा सकते हैं। ग्रीक विद्वान रिचार्ड पोरसन को एक बार पढ़ी हुई कोई भी पुस्तक महीनों याद रहती थी। जो उनने आज पढ़ा हो उसे महीने भर तक कभी भी पूछा जा सकता था। शतरंज का जादूगर कहा जाने वाला अमेरिकी नागरिक हैरी नेलसन पिल्सवरी एक साथ बीस चालों को याद रख कर खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करता था। यह सब काम वह पूरी मुस्तैदी और फुर्ती के साथ करता था।

मोली क्यूलर बायोलॉजी (अणुजैविकी) के आधार पर मस्तिष्क की अनोखी हलचलों का विश्लेषण करते हुए मस्तिष्क की अनोखी हलचलों का विश्लेषण करते हुए स्वीडन की गोटन वर्ग यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञान डा.होल्गर हाइडेन ने कहा है कि मस्तिष्क को दक्ष बनाने वाला शिक्षण और चिंतन कोशिकाओं में महत्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देता है तथा वे कोशिकाएँ अधिक संवेदनशील बन कर बुद्धिमत्ता का क्षेत्र विस्तृत कर देती हैं।

डा. होल्गर हाइडेन के अनुसार मस्तिष्क का विकास मात्र उस शिक्षण पर निर्भर नहीं जो स्कूलों में या समीपवर्ती लोगों से मिलता है। वह विकास तो मात्र जानकारी बढ़ाने जैसा है। उनके अनुसार मस्तिष्कीय पोषण के लिए सुविकसित चेतना सम्पन्न व्यक्तियों, मनस्वी लोगों के सान्निध्य में रहना अत्यंत उपयोगी है। उनकी बढ़ी−चढ़ी प्राणशक्ति दुर्बल मस्तिष्क के अभाव की पूर्ति कर सकती है। बुद्धिमान और प्रतिभाशाली व्यक्तियों के सान्निध्य में रहकर जड़मति भी कुछ समय में सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान हो जाते हैं। इसका कारण यही है कि प्रतिभाशाली मनस्वी व्यक्तियों की मस्तिष्कीय विद्युत उन व्यक्तियों को भी उसी प्रकार विद्युत्मय कर देती है जैसे बिजली के तार से छू जाने पर कोई धातु अपने में विद्युत धारा प्रवाहित करने लगती है।

येल निवासी मस्तिष्क विज्ञानी डा. जोज डेलगाड़ो ने अपने प्रयोगों और परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि मस्तिष्क में बाहर से विद्युत पहुँच कर उसके अभीष्ट केन्द्रों को सक्रिय अथवा निष्क्रिय किया जा सकता है। कम्युनिस्ट देशों में विरोधी विचार रखने वाले व्यक्तियों को इसी पद्धति से ‘ब्रेनवाश’ द्वारा अपनी विचारधारा के अनुकूल बनाया जाता है। सम्मोहन क्रिया में मस्तिष्क की विद्युत द्वारा ही मस्तिष्क को प्रभावित करने तथा दूसरे व्यक्ति को अपनी वशवर्ती बनाने की प्रक्रिया अपनायी जाती है। लेकिन अब यह काम, विशेष प्रकार के इलेक्ट्रानिक यंत्रों द्वारा भी किया जाने लगा है तथा इन प्रयोगों द्वारा मनुष्य की इच्छा शक्ति, ज्ञान-शक्ति एवं क्रिया-शक्ति पर नियंत्रण करके उसे अमुक प्रकार से सोचने या कार्य करने के लिए विवश करने में सफलता पायी जा चुकी है।

यह प्रयोग इसी सीमा तक सफल हुए हैं कि सब तक प्रयोग चलता रहे तब तक व्यक्ति वशवर्ती रहे, पीड़ा अनुभव न करे अथवा उससे अपना आदेश, निर्देश पालन करवाया जा सके। प्रयोग बन्द होते ही अथवा प्रयोग की पकड़ ढीली पड़ती ही वह पुनः अपनी पिछली स्थिति में आ जाता है और अभ्यस्त शैली का आचरण करने लगता है।

इन नियमों का विवेचन करते हुए डा. जोज ने कहा है कि यदि मनुष्य अपने सम्पूर्ण मनोयोग से किसी एक ही दिशा में अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं को नियोजित कर दे तो प्रसुप्त मस्तिष्कीय क्षमता जागृत हो सकती है। किसी को अपना इच्छानुवर्ती बनाना, सम्मोहन या इलेक्ट्रानिक यंत्रों द्वारा किसी को प्रभावित, वशीकृत कर लेना अलग बात है। उससे न मस्तिष्कीय क्षमता जागृत होती है और न उसमें अभिवृद्धि। वह तो ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी निर्बल, दुर्बल को शारीरिक बल या शस्त्रास्त्रों द्वारा अपने अधीन कर लेना। लेकिन मस्तिष्कीय क्षमता की दृष्टि से सशक्त, सबल व्यक्ति किसी के आगे यों ही हार नहीं मान जायगा और न उसे पराजित करना आसान होगा।

रुके हुए पानी को बाँध पाना आसान है; परन्तु बहते पानी को रोकना सरल सम्भव नहीं है। जागृत मस्तिष्कीय क्षमतायें वेगवती धारा से भी अधिक प्रचण्ड होती है। उन्हें जागृत करने का एक ही उपाय है कि उपलब्ध मस्तिष्कीय क्षमता को सुनिश्चित दिशा में नियोजित कर दिया जाय। कुँए में फूट पड़ने वाले सोते एक सीमा तक पानी निकाल कर रुक से जाते हैं परन्तु झरनों के रूप में फूटने वाले सोते निरन्तर बहते रहते हैं। क्योंकि वहाँ निरन्तर प्रवाह बना रहता है। प्रकृति का यह नियम है कि जो वस्तु उपयोग में आती रहती है वह चमकती है। उपलब्ध सारा भण्डार दाँव पर लगा दिया जाता है तो अक्षय स्रोत खुल जाता है। यदि वर्तमान मस्तिष्कीय क्षमता को पूरे दाँव पर लगा दिया जाय उसे सुनिश्चित दिशा में लगा दिया जाय-उसके बिखराव को रोक दिया जाय-उसे निष्क्रिय अवस्था में से निकाल कर सक्रिय कर दिया जाय तो मस्तिष्क भी अपनी विलक्षण विशेषताओं के साथ जागृत हो उठाता है।


सर्वचिन्ता परित्यागो निश्चिन्तो योग उच्यते।

योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है। उसमें संग्रहित कुसंस्कारों का शमन करना पड़ता है। स्वभाव का अंग बनी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में जुटना होता है। भौतिक लिप्साओं की ललक शान्त करनी पड़ती है। चिन्तन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाना है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। यह सारे कार्य अन्तःपरिशोधन और आत्म परिष्कार से संबन्धित है। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है। उसमें अपनी अन्त भूमिका से ही जूझना पड़ता है। इसे गीता का आन्तरिक महाभारत कह सकते हैं। हर साधक को अर्जुन की तरह अपना मनोबल-गाण्डीव संभालना पड़ता है। जो इस महा-समर में तत्पर होते है; भगवान उनका रथ हाँकते हैं और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। योग की प्रवृत्ति आत्म परिष्कार की पृष्ठभूमि बनाती है-

यदा पंचावतिष्ठानों ज्ञानानि मनसा सहः। बुद्धिश्च न विचेष्ठति तामाहुः परमाँ गतिम्॥ ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रि धारणम्॥

चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में ही समावेश करना अध्यात्म योग है। चक्षुरादि पंचेन्द्रिय, मन और बुद्धि आत्मा में अविचलित होकर समाविष्ट हो, यही योग है।

सर्वचिन्ता परित्यागो निश्चिन्तों योगउच्यते। (योग शास्त्र)

“जिस समय मनुष्य सब उद्विग्नताओं को त्याग देता है, उस समय उसके मनकी लयोवस्था को योग कहते हैं।”

असंयतात्मा योगों दुष्प्राय इति में मति। वश्यात्मना तुयतता शक्योंऽवप्त मुपायत॥ (गीता)

“जिनका मन वश में नहीं है उनके लिये योग का प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, यह मेरा मत है। परन्तु मन को वश में किये हुये प्रयत्नशील पुरुष साधन द्वारा योग प्राप्त कर सकते हैं।”

धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिर गेहिनी। सत्यं सूनुरयं दया च भगिनी भ्राता मन संयमः।

शय्या भूमितल दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजन- येते यस्य कुटुम्बिनों वद सखे कस्माद्भयं योगिनः।

धैर्य जिसका पिता है, क्षमा माता है, नित्य शान्ति स्त्री है, सत्य पुत्र है, दया भगिनी है, तथा मनः संयम भ्राता है, भूमितल ही जिसकी सुकोमल शय्या है, दिशायें ही वस्त्र हैं और ज्ञानामृत ही जिसका भोजन है, जिसके ये सब कुटुम्बी हैं, कहो मित्र, उस योगी को किससे भय हो सकता है।

गृहारण्य समालोके गतव्रीड़ा दिगम्बराः। चरन्ति गर्दभाद्याश्च विरक्तारन्ते भवन्तिकिम्॥

यदि घर छोड़कर जंगल में रहने और नंगे बदन रहने से योगी बना जा सकता होता तो वैसा ही आचरण करने वाले गधे क्यों विरक्त न कहलाते।

आजन्म मरणात्त गंगादि तटिनी स्थिताः। मराडूकमत्स्य प्रमुखों योगिनस्ते भवन्तिकिम्॥

जन्म से लेकर मरण पर्यन्त गंगा के किनारे और उसी के जल में रहने वाले मेंढक क्यों योगी नहीं कहलाते? जबकि वैसे निवास मात्र से लोग योगी होने का अहंकार करते हैं।

तस्मान्तित्यादिकं कर्म लौकरंजन कारकम्। मोक्षस्य कारणं साक्षात्तत्वज्ञानं श्वमेंश्वर॥

बाह्य आवरण तो लोक व्यवहार एवं सुविधा की दृष्टि से हैं। उनका विशेष महत्व नहीं है। हे गरुड़ बंधन मुक्ति का कारण तो तत्व ज्ञान हैं उसी को उपलब्ध करने से योग का उद्देश्य पूरा होता है।


क्रोध-के सर्वनाशी आवेग से बचे!

क्रोध का कारण बताते हुए गीता में कहाँ गया है- “कामात् क्रोधोऽभिजायते।” कामनाओं में विक्षेप उपस्थिति होने पर उस विक्षेप के कारण के प्रति क्रोध उत्पन्न होता है। तीन-चार महीने के बच्चे को यदि कोई थप्पड़ मार दे तो उस थप्पड़ की पीड़ा से वह रो तो उठेगा, किन्तु उठे हुए हाथ और स्वयं को पीड़ा का अन्तर सम्बन्ध उसे ज्ञात नहीं रहता, इस हाथ से थप्पड़ मारे जाने के कारण मुझे पीड़ा हो रही है यह जानकारी उसे नहीं रहती, इसलिए उसके रुदन में क्रोध का आवेग नहीं रहता। इस प्रकार क्रोध दुःख-कष्ट के कारण के बोध से उत्पन्न होने पर क्रोध का आवेग पैदा हो जाता हैं। अपने मनोरथों का विफल कर सकने वाले, अभीष्ट-प्राप्ति के मार्ग में बाधक का स्पष्ट परिचय पाकर क्रोध उदित होता है। यह क्रोध का सामान्य स्वरूप हुआ है।

किन्तु मनुष्य की कोई भी प्रतिक्रिया सरल यन्त्रवत् नहीं होता। इसीलिए क्रोध के स्वरूप और उसकी अभिव्यक्ति के ढंग, दोनों में बहुतेरी भिन्नताएँ होता है।

क्रोध मस्तिष्क में उभर पड़ने वाला एक आवेग विशेष है। मस्तिष्कीय संरचना कुछ ऐसी है कि जिस भी आवेग का उसमें बार-बार उदय हो, उसके संस्कार गहरे होते जाते हैं और फिर वह आवेग स्वभाव का अंग बनता जाता है। एक ही बाधक विषय-वस्तु के प्रति दो लोगों की प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न होती है- एक क्रोध से लाल-पीला होकर मरने-मारने पर उतारू हो जायगा दूसरा उस बाधा के निवारण का गम्भीर प्रयास प्रारम्भ कर देगा। यह भिन्नता मस्तिष्क में पड़ गये संस्कारों की ही है। असफलता प्राप्त होने पर जब क्रुद्ध होने की ही प्रवृत्ति दृढ़ हो जाती है, तो फिर यह क्रोध उस बाधकतत्व के प्रति ही सीमाबद्ध नहीं रहता, अपितु संपर्क में आने वाले लोगों से अकारण क्रुद्ध व्यवहार का प्रेरक बन बैठता है।

मन की जटिलताएँ भी मनुष्य के क्रोधी स्वभाव का कारण होती है। मनुष्य अपनी मानसिक जटिलताओं में उलझा उद्विग्न रहा आता है। और यह जटिलताओं में उलझा उद्विग्न रहा आता है और यह उद्वेग जिस तिस पर क्रोध बनकर बरस पड़ता है।

इस प्रकार मोटे तौर पर क्रोध के तीन वर्ग गिनाए जा सकते है (1) कामना पूर्ति में अवरोधक-बाधक विषय के प्रति क्रोध, जो बाधक को हानि पहुँचाने की भावना से जुड़ा रहता है।

(2) असफलता से क्रुद्ध मनःस्थिति में संपर्क में आए अन्य व्यक्तियों पर कारणवश या अकारण ही व्यक्त होने वाला क्रोध।

(3) लम्बे अभ्यास से व्यसन सा बन चुका क्रोध, जो स्वभाव का स्थायी अंग बन जाता है।

पहले प्रकार का क्रोध लोक-व्यवहार में सर्वाधिक स्वाभाविक माना जाता है। किन्तु क्रोध एक विचार मात्र नहीं है; वह एक भावावेग है। उसका सम्पूर्ण शरीर संस्थान और मनः संस्थान पर प्रभाव पड़ता है। प्रथम तो बाधक को हानि पहुँचाने की जो भावना है वह भी परिणाम में अपने पक्ष में कभी-कभार ही & पाती है। सम्भव है, जिसे हानि पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं कल भिन्न अवसर पर अपने लिए उपयोगी सिद्ध हो। हमारी कामना पूर्ति में वह बाधक बनता दीख रहा है, किन्तु कल को वही कामना हमें महत्वहीन लग सकती है और किसी अधिक महत्वपूर्ण कामना में आज का बाधक सहायक के रूप में सामने आ सकता है।

इससे भी बड़ी बात यह है कि क्रोध में दुःख या हानि के कारण को नष्ट कर देने की या क्षतिग्रस्त कर देने की भावना इतनी तेजी से उमड़ती है कि अपनी भूमि या दोष की ओर तो ध्यान नहीं ही जाता, जो करने जा रहे है, उसके परिणाम का भी विचार नहीं आ पाता। ऐसी स्थिति में कई बार पूर्व में हो गई हानि के साथ ही क्रोध में किए गये कामों से और बड़ी हानि हो जाती है। जैसे कोई व्यक्ति सुने कि उसका शत्रु 10-12 लठैतों के साथ उसे मारने आ रहा है और वह चट क्रुद्ध होकर उस शत्रु को मारने अकेला दौड़ पड़े, बिना शत्रु की शक्ति का विचार एवं अपनी सुरक्षा की व्यवस्था किए; तो परिणाम में उसे ही प्राणा गंवाने पड़ सकते है। बाधक को हानि पहुँचाने की इस भावना में जब अपनी मर्यादाओं को भुलाकर व्यक्ति कुछ कर गुजरने को तैयार हो जाता है, तो प्रायः अपनी हानि ही उसे सहनी-उठानी पड़ती है।

क्रोध मन को उत्तेजित और खिंची हुई अवस्था में रख देता है; इससे शरीर में भी तनाव आ जाता है। रक्त-संचालन तीव्र हो उठता है और अनावश्यक गर्मी शरीर में आ जाती है। विचार-शक्ति शिथिल हो जाती है। तीव्र रक्त-शक्ति शिथिल हो जाती है। तीव्र रक्त-संचालन से चेहरा तमतमा उठता है, ओठ फड़कने लगते हैं, आंखें लाल हो उठती हैं। भीतरी अवयवों पर भी ऐसा ही अनिष्ट और दूषित प्रभाव पड़ता है। हृदय-स्पन्दन तेज हो जाता है, आँतों का पानी गर्मी से सूखने लगता है। पाचन-क्रिया शिथिल पड़ जाती है; रक्त में एक प्रकार का विष उत्पन्न होता है जो जीवनी शक्ति को क्षीण कर देता है। एड्रीनल ग्रन्थियों से क्रोध की स्थिति में जो हारमोन्स स्रवित होते हैं; वे रक्त के साथ मिलकर जिगर में पहुँचते है और वहाँ जमे ग्लाइकोजन को शर्करा में बदल देते हैं। यह अतिरिक्त शक्कर शरीर पर विघातक प्रभाव डालती है। इस प्रकार क्रोध से बाधक-तत्व की हानि हो या नहीं अपनी हानि अवश्य होती है। क्रोध के कारण की तो कोई क्षति कभी-कभार ही होती है, क्रोधी व्यक्ति की स्वयं की क्षति हर बार होती है।

फिर कामनाएँ भी बहुरंगी होती हैं। किसी की प्रत्येक कामना की पूर्ति असम्भव तो है ही, अनुचित भी है, क्योंकि उनमें से कई दूसरों की कामनाओं के विरुद्ध होती हैं। किसी एक की सब कामनाएँ पूरी हो जाने का वरदान यदि मिल जाए, तो उसमें अनेकों की अनेक कामनाएँ विफल होने का शाप भी सम्मिलित समझना चाहिए। इसलिए अपनी प्रत्येक कामना की पूर्ति को आवश्यक मानने और उस में बाधा उत्पन्न होते ही क्रोध से भड़क उठने की मनःस्थिति को अपरिपक्व और क्षुद्र ही कहा जाएगा। फिर उस क्रोध की प्रतिक्रिया में औरों का भी क्रोध भड़क उठने की सम्भावना और उस सम्भावना के परिणामों का सामना करने को भी तैयार रहना चाहिए।

क्रोध अधिकाँश कारण तो अत्यन्त सामान्य व छोटे होते है। कई बार तो वे सर्वथा आधारहीन ही दिखाई पड़ते हैं। ऐसे भी समाचार सुनने में आते रहते हैं कि किसी छोटे फल वाले से उधार फल माँगे या रिक्शे वाले से मुफ्त में बैठाकर घुमाने को कहा और पहले के पैसे बाकी होने से फल वाले ने अथवा आजीविका में व्यस्त रिक्शे वाले ने नाहीं करदी तो क्रोध में उनकी ऐसी पिटाई की गई कि वे मर ही गये। यह अविवेकी क्रोध और उन्मत्त अहंकार के स्वाभाविक किन्तु भयंकर परिणाम हैं। अपने इस क्षुद्र अहं और क्षणिक क्रोधोन्माद पर फाँसी या आजीवन कारावास की सजा भुगतते हुए पछताने-रोने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

घरों में स्त्रियों को मारने-धमकाने, बच्चों को पीट देने की अधिकाँश घटनाएँ बहुधा नगण्य से कारणों की अशोभनीय प्रतिक्रियाएँ हुआ करती हैं। क्रोधावेग बढ़ जाने पर -ऐसी मार-पीट से पत्नी-बच्चों के बुरी तरह आहत हो जाने और मर जाने तक की स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है। इससे आन्तरिक पीड़ा और तीव्र मनस्ताप के साथ ही कानूनन दण्ड भी भोगना पड़ता है और हर तरह से अपयश ही अपयश-घाटा ही घाटा उठाना पड़ता है। छोटी-छोटी भूलों से उत्तेजित होकर थाली फेंकने, कपड़े फाड़ने आदि की गतिविधियाँ भी नित्य ही घरों में देखने को मिलती हैं, जिससे स्वयं की हृी क्षति होती है, त्रुटि का परिमार्जन तो इससे कभी होता ही नहीं।

ऐसे घातक परिणामों को लक्ष्य कर ही यह कहा गया है कि क्रोधी ‘अन्धा’ होता है। वह केवल उस ओर देखता है, जिसे वह दुःख का कारण या अपनी कामनाओं को बाधक समझता है। उसका नाश हो, उसे हानि, दुःख, कष्ट पहुँचे, यही क्रोधी का लक्ष्य होता है। वह लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाता, क्योंकि क्रोध एक अति वेगवान मनोविकार है। सोचने-विचारने का समय वह मस्तिष्क को देता ही कब है। वह तो आँधी-तूफान की तरह पूरे मनोजगत पर सहसा छा जाता है और अनर्थकारी कार्य सम्पन्न कराने के बाद ही हटता है। इसीलिए तो ऋषि ने कहा है -

“संचितस्यापि महतो स क्लेशेन मानवै।” यशसस्तपसश्चैव क्रोधी नाशकरः परः॥

अर्थात्- मनुष्य द्वारा बहुत प्रयत्नों से अर्जित यश और तप को भी क्रोध नष्ट कर डालता है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में कहा-

“क्रोध प्राणहरः शत्रु क्रोधोऽपकर्षति॥ तपते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति। क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोध विवर्जयेत्॥” (उत्तरकाण्ढ 71)

अर्थात्- ‘‘क्रोध प्राणहारी शत्रु है, अमित्र-मुखधारी बैरी है, एक तीक्ष्ण तलवार है, यह क्रोध सब प्रकार से गिराता ही है। मनुष्य जो, तप, संयम, दान आदि करता है, उस सबका क्रोध हरण कर लेता है, इसलिए क्रोध का परित्याग कर देना चाहिए।”

यह तो बाधक तत्व को हानि पहुँचाने की उत्तेजना उत्पन्न करने वाले क्रोध के दुष्परिणाम हैं। जब क्रुद्ध मनःस्थिति में संपर्क में आए अन्य व्यक्तियों के प्रति रोषपूर्ण व्यवहार किया जाता है, तब वह तो सर्वथा अनुचित एवं अन्यायपूर्ण होता है। उसका परिणाम भी अधिक हानिकारक होता है। जिसे यों अकारण अपमानित किया गया है, उसके मन में अपमान का यह शूल निरन्तर चुभता रहता है और उसका परिणाम हर प्रकार से अशुभ ही होता है। दफ्तर से बिगड़कर आया बाबू पत्नी को पीटकर दाम्पत्य-सुख में आग लगाता है; बाहर का क्रोध घर के नौकर पर उतारने वाले क्षुब्ध नौकर द्वारा छिपकर की जाने वाले चोरी, लापरवाही व क्षति को भोगते हैं। क्रुद्ध मनःस्थिति में मित्रों-परिचितों से दुर्व्यवहार करने वालों को मैत्री-सुख और परिचितों की सहानुभूति से वंचित रहना पड़ता है। साथ ही निन्दा व तिरस्कार भी सहना पड़ता है।

क्रोधी मनुष्य दूसरे के समर्थ-शक्तिशाली होने पर जब अपने मन्तव्य में सफल नहीं हो पाता, तो वह स्वयं अपने ऊपर वैसी ही क्रिया करने लगता है, जो वह दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करने की सोच रहा था। अपना सिर फोड़ने लगना, बाल नोंचने लगना, अंग-भंग और आत्महत्या तक कर बैठना ऐसी ही मनःस्थिति के परिणाम होते है।

इस प्रकार क्रोध सदैव हानिकारक ही सिद्ध होता है। यदि क्रोध आवेग रूप में न हो, तब तो उससे कुछ प्रयोजन भी सिद्ध हो सकता है; किन्तु प्रचण्ड भावावेग के रूप में वह सर्वनाशी ही सिद्ध होता है।

अनौचित्य को देखकर उत्पन्न होने वाले विवेक नियन्त्रित क्रोध की बात भिन्न है। भारतीय मनीषियों ने उसे “मन्यु” की संज्ञा दी है तथा दिव्यता का अंश बताया है। सामाजिक जीवन में वैसे क्रोध की जरूरत बराबर पड़ती है। दुष्टता जिनमें गहराई तक पैठ गई है, उनमें दया, विवेक आदि उत्पन्न करने में बहुत समय लगता है और तब तक वे अत्यधिक अनर्थ कर चुकते हैं। एक व्यक्ति के इस हृदय-परिवर्तन की चिरप्रतीक्षा में अनेकों के हृदय को पीड़ा पहुँचाने का क्रम सहा नहीं जा सकता। अतः उस पर क्रोध आवश्यक हो जाता है। वैसे लोक-कल्याणकारी क्रोध की-मन्यु की -बात भिन्न हे। उस क्रोध का जन्म उद्वेग-उत्तेजना से नहीं, विवेक-विचार से होता है। जन-सामान्य के क्रोध में प्रतिकार और परपीड़न की ही उग्रता होती है। यह क्रोध उत्तेजना और आवेश के रूप में ही उत्पन्न होता है। इससे सत्य-असत्य की विवेक-शक्ति दब जाती है और लड़ाई-झगड़ा कुटता, मार-पीट के रूप में ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। क्रोध का मन के दूसरे विकारों से घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। अस्थिरता, क्षणिकता, कुँठा, उद्वेग, अहंकार, असहिष्णुता आदि उसके सहचर हैं। चिड़चिड़ापन कमजोर व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाला क्रोध-आवेश ही है।

क्रोध के कारणों पर विचार किया जाय तो गलत जीवन दृष्टि मन का विकृत अभ्यास तथा असात्विक आहार। मुख्य कारण सिद्ध होते हैं। अतः क्रोधी प्रवृत्ति से मुक्ति के इच्छुक व्यक्तियों को आहार की सात्विकता पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। साथ ही मन को यदि ऐसा अभ्यास पड़ गया है, तो उसके दुष्परिणामों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और सही जीवन दृष्टि अपनाने का यत्न एवं उद्योग करना चाहिए।

जब कभी क्रोध उमड़े तो एक प्रयोग कर देखना चाहिए। क्रोध का उभार होते ही चुपचाप कमरे में चले जाएँ और दर्पण में अपना चेहरा देखें। आप स्वयं देखेंगे कि चेहरे पर आयी तमतमाहट ने सौंदर्य को तनिक भी बढ़ाया नहीं कम ही किया है। मुँह फीका पड़ गया है, जैसे तेज ज्वर चढ़ा हो। थोड़ी देर टहलने के बाद या तत्काल ही पानी से मुँह धोएं और तौलिए से उसे पोंछ कर फिर शीशे के सामने खड़े हो। पहले के चेहरे और अबके चेहरे में अन्तर स्पष्ट दिख जाएगा। क्रोध की तमतमाहट से व्यर्थ ही तन गए चेहरे का स्मरण करें और प्रसन्नता से मुस्कराएँ। आगे जब भी क्रोध उभरे, इस घटना को याद करें और अपने चेहरे में व्यर्थ तनाव लाने से बचने की उपयोगिता समझें। क्रोध को दूर से ही नमस्कार कर लें।

क्रोध की बाह्य अभिव्यक्ति दबाकर मन ही मन लम्बे समय तक सुलगते रहना ही ‘बैर’ है। यह बैर क्रोध से भी भयंकर हानियाँ उत्पन्न करता है।

क्रोध सदैव जल्दबाजी का परिणाम होता है। जब कोई गलत कार्य होता दिखे या कोई हानि हो जाए, तो उसके कारण का निश्चय करने में जल्दबाजी न करें। स्मरण करे कि पहले विचार-क्रम में बहुधा कारण खोजने में चूक हो जाती है। अतः अनुचित या हानिप्रद कार्य के घटना-स्थल से इधर-उधर हट जाएँ, किसी सुरम्य उद्यान में टहलें या किसी प्रियजन के पास पहुँच जाएँ। उससे स्नेहपूर्ण बात करें। कुछ न हो सके, तो एक गिलास ठण्डा पानी पीएँ और क्रोध को शान्त करें। इस आवेग को भड़कने देने में घाटा ही घाटा है। शमित करने में लाभ ही लाभ है। इसीलिए विश्व के समस्त धर्मशास्त्रों और नीतिग्रन्थों में क्रोध को विनाशकारी अतः त्याज्य ही ठहराया गया है।


अधिक श्रेष्ठता सादगी और सज्जनता की (kahani)

पं. दीनदयाल उपाध्याय अपनी विदेश यात्रा के दौरान इंग्लैंड गये। उन्हें इंग्लैंड के पार्लियामेंट हाउस दिखाने का भार वहाँ के हाउस आफ कामन्स के तात्कालिक सदस्य श्री सोरेनसन को सौंपा गया था। सोरेनसन उस समय 30 वर्ष की आयु पार चुके थे फिर भी, चुश्ती में वे किसी नौजवान से कम न थे। अपनी व्यंग-पटुता के लिए तो वे हाउस आफ कामन्स में प्रसिद्ध थे। दीनदयाल जी को जब उन्होंने देखा तो वे बड़े आश्चर्यचकित हुए। लन्दन की इस कड़कड़ाती ठण्ड में भी वे धोती और बन्द गले का कोट भर पहने हुए थे। इनकी दुर्बल काया और कद-काठी को देखते हुए तो यह और भी आवश्यक था कि वे विलायती ढंग के कपड़े पहन कर सर्दी से बचाव करने का प्रयास करते।

प.उपाध्याय जी की ऊँची धोती को देखकर श्री सोरेनसन ने मीठी चुटकी ली”आप महात्मा गाँधी बनने की कोशिश कर रहे है।” वे समझ गये कि मेरी धोती का मजाक उड़ाया जा रहा है। वे बोले ‘कोशिश तो कर रहा हूँ पर उनसा बनना मुश्किल लग रहा है।’ “अब तक कितनी सफलता मिली?” सोरेनसन ने पूछा। उपाध्याय जी बोले “केवल आधी।” सोरेनसन का अगला प्रश्न था। “आँधी क्यों?” उपाध्याय जी ने उनकी पहली चुटकी का उत्तर देते हुए कहा-”आप देख ही रहे है, नीचे से ही तो गाँधी जी का अनुकरण कर पाया हूँ ऊपर तो नहीं चाहत हुए भी लन्दन के मौसम ने कोट पहनने पर विवश कर दिया है।” श्री सोरेनसन समझ गए कि सादगी और सज्जनता ही श्रेष्ठता की द्योतक है। ऊपरी पहनावा नहीं।


शक्ति के दुरुपयोग की विभीषिका

शक्ति की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता, उसी के बल पर मनुष्य समर्थ और समृद्ध बनता है। तथ्य को समझते हुए अपने काम की सामर्थ्य उपार्जित करने के लिए यथा संभव प्रयत्न करता है। यह उचित भी है और आवश्यक भी। पर ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि जिस सामर्थ्य का उपार्जन किया जा रहा है उसका उपयोग सत्प्रयोजनों के लिए सम्भव भी है या नहीं, यदि नहीं तो, तब तक सीमित शक्ति से ही सन्तोष करना उचित है जब तक कि विशिष्ट शक्ति के सदुपयोग का मार्ग न मिल जाय।

वर्तमान शताब्दी में भौतिक सामर्थ्य के क्षेत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि अणुशक्ति है। उसने मानवी समर्थता में एक नया अध्याय सम्मिलित किया है। अणु भट्टियों में एक नया अध्याय सम्मिलित किया है। अणु भट्टियों द्वारा विपुल मात्रा में विद्युत उत्पादन करने और आधार पर आर्थिक प्रगति को चरम सीमा तक पहुँचा देने की योजना बनती और क्रियान्वित होती रहती हैं। इस प्रकार शत्रु देश को तहस-नहस करके रख देने के लिए अणु-आयुधों का उत्पादन द्रुत-गति से हो रहा है। समर्थता को विपुल मात्रा में अर्जित करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने की लिप्सा से अणु शक्ति के उत्पादन में सर्वत्र घुड़दौड़ सी लगी दिखाई पड़ती है। प्रगति भी कम नहीं हुई है। पिछले तीस वर्षों में इस संदर्भ में इतना काम हुआ है कि उसे देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। प्रयासों की सराहना करते हुए भी यह असमंजस बढ़ता ही जा रहा है कि उस उत्पादन के संरक्षण और सदुपयोग का सुनिश्चित मार्ग न मिल सका तो इन उपलब्धियों से महाविनाश की विभीषिका ही उत्पन्न होकर रहेगी।

वह समय बहुत पीछे रह गया जब अकेले अमेरिका के हाथ में ही अणु शक्ति का एकाधिकार था और उसने जापान के दो नगरों पर अणु-बम गिरा कर उस देश के लाखों निर्दोष नागरिकों के लिए महा प्रलय उपस्थित कर दी थी।

आज कम से कम 7 ऐसे देश है जो न्यूक्लियर क्लब की सदस्यता के अधिकारी हैं। आज कच्चे कच्चे प्रकार के ऐटमी विस्फोटक के बजाय एक भारी भरकम महाविनाशकारी बम बनाना कहीं अधिक आसान है। बम की साज-सज्जा के लिये कुछ विशेष तकनीकी ज्ञान चाहिये, पर उसका अधिकाँश एटामिक एनर्जी कमीशन से कोई भी खरीद सकता है। ‘एटम फार पीस’ कार्य क्रम के अंतर्गत 1955 के आस-पास अधिकाँश जानकारी अमरीकी राष्ट्रीय गुप्त सूची से अलग कर दी गई थी। आज कोई भी इन आंकड़ों को अमेरिका में सुगमता से प्राप्त कर सकता है। इतनी जानकारी तो उनके पास भी नहीं थी, जिन्होंने पहला एटम बम बनाया था।

अमेरिकी अनुशासन-उदासीनता ने एक अलभ्य खतरनाक वस्तु को भी अब सुलभ बना दिया है। यह है प्लूटोनियम 239 या संबंधित यूरेनियम (यूरेनियम-233) इनमें से प्लूटोनियम का चुराया जाना सबसे आसान है। यह तत्व आज कल अमेरिका के रिएक्टरों में स्वयमेव बन जाता है एवं आधुनिक रिएक्टर यह ईधन इस्तेमाल करते नहीं जो एटम बम के निर्माण में काम आता ह। 1980 तक अमेरिका में लगभग 150 ऐसे ऐटमी कारखाने हो जायेंगे जो प्लूटोनियम का ही उपयोग करेंगे और ढेरों प्लूटोनियम जब आयेगा, जिसकी प्रति किलोग्राम कीमत दस हजार डालर के आस-पास होती है, वह चोरों के लिये आकर्षक सौदे की वस्तु होगी। बम बनाने के लिए इस तत्व की छोटी मात्रा भी काफी होती है।

आज सामान्य लोगों में तो है ही वैज्ञानिकों में भी यह मिथ्या विश्वास है कि ऐटमबम बनाना अत्यन्त असाध्य है; जबकि वस्तुस्थिति यह है कि भीमकाय तो नहीं-2-4 हजार प्राणों की क्षमता वाला एक बम आप आसानी से बना सकते हैं। एक छोटे यंत्र में 100 टी.एन.टी. की विस्फोटक शक्ति भर कर उसे बम का रूप दे देना मुश्किल कार्य नहीं है।

अमेरिका में जब पत्रकारों ने यह रहस्योद्घाटन किया कि अनेक ऐटमी संस्थानों में लेखा जोखा लेने पर कहीं भी पूरा माल बरामद नहीं हुआ तो जनता में भय समाप्त हो गया। यह चोरी गया माल तस्करी द्वारा विभिन्न देशों में भी जा रहा है व विध्वंसक मनोवृत्ति वाले लोगों या संस्थाओं तक पहुँचकर पूरे समाज में आतंक पहुँचा रहा है।

अणु शक्ति का यह विस्तार उत्पादन के उपयोगी कार्या के लिए हुआ होता, अथवा उसे विश्व के मूर्धन्य लोक नायकों के हाथ में सुरक्षित रखा गया होता तो भी एक बात थी पर अब तो उसका विस्तार इतना अधिक हो गया है और इतनी तेजी से हो रहा है कि अगले दिनों कोई सिरफिरा आदमी कुछ लाख रुपये की लागत से विश्व विनाश का पागलपन प्रस्तुत कर सकता है। यह विभीषिका कम चिन्ताजनक नहीं है।

तथाकथित प्रगति का एक कदम और आगे बढ़ा है और अणु आयुधों ने हाइड्रोजन बमों के रूप में अपनी समर्थता का और भी अधिक विस्तार किया है। अणु बमों की तुलना में हाइड्रोजन बमों की शक्ति को अनेक गुना भयानक आँका जा सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के शासनकाल में जापान पर अणु बम गिराये गये थे। उसके बाद इस सामर्थ्य के बनाने के लिए प्रयत्नों में और भी अधिक तेजी आई। सन् 1950 में अमेरिका ने 1000 अरब डालर की एक योजना हाइड्रोजन बम बनाने की तैयार की। योजना को रूस ने अपने अस्तित्व के लिए चुनौती माना। स्पष्ट था कि यह तैयारी समतुल्य सामर्थ्यवान समझे जाने वाले रूस के विरुद्ध ही की जा रही थी। वही सैद्धान्तिक एवं भौतिक क्षेत्र में उन दिनों एक मात्र चुनौती देने वाला देश था। रूस के कान खड़े हुए और उसने भी अपने साधनों का एक बहुत बड़ा भाग इसी निमित्त झोंक दिया। प्रतिस्पर्धा का चक्र द्रुतगति से परिभ्रमण करने लगा। अणु बम व उद्जन बम का तुलनात्मक अध्ययन किया जय तो उद्जन बम की विस्फोटक शक्ति का भीषण स्वरूप सामने आता है।

अणु बम का ज्वाला 3 सेकेंड तक जलती है, एवं इसका प्रभाव केवल 1 सेकेंड तक रहता है, जबकि उद्जन बम का प्रभाव पूरे 10 सेकेंड तक बना रहता है, ज्वाला 20 सेकेंड तक प्रज्वलित रहती है एवं इसके विस्फोट से 80 वर्गमील के क्षेत्र क सभी इमारतें नष्ट हो ईंट तथा पत्थर पिघल जाते है। 1000 वर्ग मील की इमारतों को आँशिक क्षति पहुँचती है एवं आसपास के 100 वर्गमील क्षेत्र में कोई भी प्राणी जीवित नहीं रहता।

आशय यह कि अकेला एक उद्जन बम लन्दन या न्यूयार्क सरीखे विशाल नगर को नेस्तनाबूद कर सकता है।

हाइड्रोजन बम के दाहक प्रभाव से 800 वर्गमील के क्षेत्र में व्यक्तियों की खुली त्वचा पर जलन के घाव (रेडियेशन बर्न्स) उत्पन्न हो सकते हैं जो उनकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं।उत्सर्जित किरणें मानव सभ्यता के लिये अभिशाप है। इनसे आयु घट जाती है, वंशानुगत रोग उत्पन्न हो सकते है एवं अंततः जिंदा लाश के रूप में ही मनुष्य बच पाता है।

प्रथम उद्जन बम का परीक्षण 1 नवम्बर 1952 को पैसिफिक महासागर के एक द्विप पर किया गया। सफल परीक्षण के बाद एक क्रम आरम्भ हो गया-इस शक्ति से युद्धोपयोगी शस्त्र बनाने का।

पर उधर सोवियत रूस भी चुप नहीं बैठा था। रूस ने साइबेरिया के निर्जन प्रान्तों में हाइड्रोजन बम के परीक्षण कर उसे अमेरिका के समकक्ष ला दिया।

एक अनुमान हमें इन हाइड्रोजन बमों की शक्ति के विषय में लगाना हो तो 1950 मार्च के बम परीक्षण का वर्णन पढ़कर जान सकते हैं। बिकनी द्वीप समूह के चारों ओर 100 मील दायरे का क्षेत्र खतरनाक घोषित कर दिया गया था। विस्फोट के समय करोड़ों डिग्री के ऊँचे ताप के कारण द्वीप की भूमि के मूँगे, पत्थर आदि तप्त होकर पहले तो वाष्प बन गये फिर ठण्डे होने पर नन्हें-नन्हें जर्रे के रूप में ये हवा में उतराते रहे। आकाश में वाष्पी भूत हुए 20 लाख टन पदार्थ के जर्रे (कण) कई समाप्त तक भयंकर रेडियो सक्रिय रश्मियाँ उत्सर्जित करते रहे। इस बम की क्षमता हिरोशिमा वाले बम से 1000 गुणा अधिक थी। इस अस्त्र के विस्फोट से लगभग 1 लाख वर्ग मील के क्षेत्र की वायु दूषित हो गयी। यह शक्ति लगभग उतनी ही शक्ति के बराबर है जितनी समस्त भारत में सूर्य किरणों से दो मिनट में प्राप्त होती है।

शक्ति का यह विस्मयकारी भंडार मनुष्य के हाथ में आने पर कुछ देश उस पर गर्व अनुभव कर सकते हैं पर यथार्थता यह है कि उससे आतंक और अविश्वास की ही अभिवृद्धि हुई है। भय एवं आशंका का वातावरण बढ़ा है। महाविनाश का संकट सघन हुआ है कि जनमानस को असुरक्षा की उद्विग्नता ने भयभीत किया है। इन प्रयत्नों में अब तक जितना धन लगा है उसे देखने से गणितज्ञ कहते है कि इस राशि का उपयोग यदि गरीबी बीमारी एवं अशिक्षा के निराकरण में किया गया होता तो स्थिति आज की तुलना में कहीं अधिक अच्छी होती और व्यक्ति तथा समाज को अधिक सुख शाँति से रहने का अवसर मिला होता।

सामर्थ्य, उपार्जन और उसका विनाश के लिए उपयोग ऐसा कुचक्र है जिससे संलग्न प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय नहीं देती। भस्मासुर, हिरण्यकश्यप रावण, सहस्रबाहु, वृत्तासुर, महिषासुर आदि की समर्थता प्राचीन काल में भी चरम सीमा तक पहुँची थी पर उसका दुरुपयोग होने से उपार्जनकर्त्ता भी घाटे में रहे और तत्कालीन जन समाज को भी असीम कष्ट सहने पड़े। शक्ति का असीम संचय और उसका दुरुपयोग भूतकाल में भी दुखद परिणाम ही उत्पन्न कर सका। आज भी विश्व के मूर्धन्य उसी नीति को अपना रहे हैं हम इतिहास को जानकर रह जाते हैं, उससे शिक्षा ग्रहण नहीं करते यदि वैसा किया जा सका होता तो अणु शक्ति के दुरुपयोग की ऐसी योजना न बनती जैसी कि आज बन रही है।


Quotation

राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री सावित्री को अपने से भी अधिक विवेकशील समझ कर उसे स्वयं वर ढूंढ़ने की आज्ञा दे दी। राजकुमारी ने उपयुक्त वर की तलाश में देश-विदेश की यात्रा आरम्भ कर दी।

बहुत भ्रमण के बाद उसे वनवासी सत्यवान उपयुक्त जंचा। बेचारा लकड़ी काटता और अन्धे माता-पिता की सेवा करता था वहाँ। सावित्री वापिस लौट आई और पिता को अपने चुनाव की सूचना दे दी।

ज्योतिषी और चिकित्सकों ने सत्यवान के सम्बन्ध की परख की तो उसे केवल एक वर्ष जीवित रह सकने योग्य घोषित किया। ऐसे व्यक्ति के साथ जो एक वर्ष जीवित रहे विवाह करने से क्या लाभ? अश्वपति ने पुत्री को समझाया।

सावित्री ने कहा- ‘‘पिताजी! चिरकाल तक धुँआ करने वाली अग्नि की अपेक्षा थोड़ी ही देर प्रकाशवान रहने वाली लपटें अधिक प्रशंसनीय होती है। श्रेष्ठ आत्माओं के साथ स्वल्प काल का सुहाग भी बुरा नहीं।” शरीर को नहीं आत्मा को मैंने परखा है। मेरे चुनाव में देह का नहीं आत्मा का सुख ही प्रधान है।”

आजीवन वैधव्य की तुलना में अल्पकालीन श्रेष्ठ संगति को महत्व देने वाली सावित्री अश्वपति को विवेकशील ही दिखाई पड़ी, उसने उसे आज्ञा दे दी।

सावित्री ने सत्यवान को वरण किया। वनवास करती हुई राजकुमारी भी लकड़ी काटती हुई आदर्श जीवन बिताने लगी। समय आने पर उसने यम को भी परास्त किया और निकटवर्ती वैधव्य चिरस्थायी सुहाग में बदल गया।


वैज्ञानिक दृष्टि से अध्यात्म का प्रतिपादन साहित्य

अपने विषय की अनोखी, तथ्य, तर्क और प्रमाणों से परिपूर्ण पुस्तकें।

अध्यात्म तत्वज्ञान को विज्ञान, तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर प्रतिपादित करने की युग-पुकार को पूरा करने के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के माध्यम से युगान्तरकारी प्रयास किये जा रहे है। उसी प्रयत्न श्रृंखला के अंतर्गत इस प्रयोजन की पूर्ति कर सकने योग्य साहित्य भी प्रकाशित किया जा रहा है। इस सीरीज में प्रथम बार निम्नलिखित 42 पुस्तकें प्रकाशित की जा रही हैं। सभी के लेखक परम पूज्य गुरुदेव है। उनकी प्रतिपादन शैली से परिचित लोग भली भाँति जानते हैं कि वे प्रस्तुत विषयों पर कितनी गहराई से प्रकाश डालते हैं और तथ्यों को प्रमाणित करने वाले कितने अकाट्य प्रमाणों और तर्कों का संग्रह करते हैं। उनके अगाध ज्ञान एवं अध्यावसाय का चमत्कार एकबार फिर इस नव प्रकाशन के पृष्ठों पर उछलता देखा जा सकता है।

पुस्तकों की सफाई, छपाई मुखपृष्ठ की सुन्दरता देखने ही योग्य है। प्रकाशन सामग्री की घोर महंगाई के दिनों में भी इन पुस्तकों का मूल्य तीन-तीन रुपया मात्र रखा गया है। कलेवर की दृष्टि से इसे अन्य प्रकाशनों की तुलना में अत्यधिक सस्ता ही कहा जा सकता है।

ईश्वर कोन है? कहाँ है? कैसे है?

ईश्वर को चर्म चक्षुओं से तो नहीं देखा जा सकता है पर उसकी कृतियों को देख कर, उसके अस्तित्व का परिपूर्ण परिचय और प्रमाण मिल जाता है। किस वृत्ति को किस विशेषता और विलक्षणता का देखकर ईश्वरीय सत्ता का आभास, किस प्रकार प्रत्यक्ष होता है इसकी क्रमबद्ध प्रतिपादन श्रृंखला इस पुस्तक में है। प्रस्तुत प्रतिपादनों को पढ़कर नास्तिक भी आस्तिक बन सकते है।

विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व

ईश्वर का अस्तित्व इन्द्रिय गम्य भले ही न हो पर बुद्धि गम्य निश्चित रूप से है। जो इन्द्रियानुभूति को ही सब कुछ मानते हो उनकी बात दूसरी है पर जिसमें बुद्धि को भी प्रमाण और परख का आधार स्वीकार किया हो, उन्हें ईश्वर की सत्ता और महत्ता स्वीकार करने में तनिक भी कठिनाई नहीं हो सकती है। ईश्वर के होने न होने के संदर्भ में जो विवाद चलता रहता है उसका बुद्धिवादी स्तर पर आत्यन्तिक समाधान इस पुस्तक में मौजूद है।

क्या धर्म अफीम की गोली है?

साम्प्रदायिक विकृतियों और वर्ग विशेष में प्रचलित परम्पराओं को धर्म मानकर उसकी उपयोगिता को अमान्य ठहराया जाता रहता है और उस पर अनेकानेक आक्षेप होता है। किन्तु धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने और उसके प्रतिफल पर दृष्टिपात किया जा सके तो प्रतीत होगा कि ‘धर्म’ व्यक्ति की गरिमा और समाज की व्यवस्था बनाये रहने के लिए कितना उपयोगी और आवश्यक है। अपने विषय की अनूठी पुस्तक।

मनुष्य चलता फिरता पेड़ नहीं

पिछले दिनों अधकचरे विज्ञान के मुरीद ‘आत्मा’ के अस्तित्व से इनकार करते है और मनुष्य को चलते-फिरते पेड़ की उपमा देते हैं। जो जन्म के साथ प्रकट और मरण के साथ समाप्त होता रहता है। इस संदर्भ में नास्तिक मंच से जो कहा जाता रहा है उसके उत्तर में इस पुस्तक के ऐसे तर्क और तथ्य प्रस्तुत किये गये है कि अनास्था में पैर टिक नहीं सकते।

मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु?

मनुष्य क्या है? उसकी मूल प्रवृत्तियां क्या है? उसके स्तर का मूल्याँकन किस कसौटी पर किया जाय? इस संदर्भ में नृतत्व विज्ञान के मंच से पिछले दिनों सिद्ध किया जाता रहा है कि मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह स्वार्थ सिद्धि के लिए जीवन यापन करने वाला जीवधारी है। नीति, सदाचार, परमार्थ आदि उसके गुण स्वभाव नहीं थे। ये आधार हैं। इस प्रकार की भ्राँतियों का निराकरण करते हुए मानवी सत्ता को देव वर्ग की सिद्ध करने वाली अनूठी पुस्तक है।

आत्मा न नारी है न नर

शरीर भेद से जीव नर मादा बनते, बदलते रहते हैं पर उनमें निवास करने वाली मूल सत्ता लिंग भेद से परे है। इच्छानुसार वह किसी लिंग को अपनाये रहती है और अरुचि होने पर उसे बदल भी लेती है। हर शरीर में नर मादा के दोनों तत्व विद्यमान रहते हैं और उनके समन्वय से जीवन प्रवाह में सन्तुलन बनता है। इस तथ्य को अकाट्य प्रमाणों द्वारा प्रस्तुत करके नर-नारी के बीच चल रही प्रचलित भेद बुद्धि को समाप्त किया गया है।

जड़ के भीतर विवेकवान चेतन

जड़ पदार्थ न तो निष्क्रिय है और न निर्जीव। उनके भीतर भी एक विशेष स्तर की क्रियाशीलता एवं चेतना विद्यमान है। इस तथ्य से अवगत होने पर जड़ें चेतन में समान रूप से विद्यमान ब्रह्मचेतना की सर्वव्यापकता का दर्शन होता है। अर्जुन, यशोदा, कौशल्या, काक भुशुंडी को हुए विराट् दर्शन की झाँकी इस पुस्तक के आधार पर कोई भी कर सकता है।

दृश्य जगत के अदृश्य संचालन सूत्र

कहा जाता है कि यह संसार अपनी धुरी पर आप घूम रहा है। प्रकृति क्रम अपने आप बह रहा है उससे किसी संचालक सत्ता की झाँकी नहीं मिलती। प्रत्येक बाद के इस प्रतिपादन को इस पुस्तक में उखाड़ कर रख दिया गया है और तथ्यों को सामने रख कर सिद्ध किया गया है कि कठपुतली के नाच के पीछे किस बाजीगर की उँगलियाँ किस प्रकार सृष्टि संचालन के समस्त सूत्र बाँधे हुए हैं।

चेतना की प्रचण्ड क्षमता -एक दर्शन

प्रकृति की शक्तियों का स्वरूप और महत्व समझा जाता रहा है। विज्ञान ने इन्हीं का उपयोग करके भौतिक समृद्धि एवं सुविधा साधनों की अभिवृद्धि में आश्चर्य जनक सफलता पाई है। इतने पर भी चेतना की प्रचण्ड क्षमता को जानने और उसका उपयोग करने की दिशा में उदासीनता ही बरती जाती है। यह उपेक्षा छोड़ी जा सके, चेतना की क्षमता को समझा और उसकी प्रचण्डता को जीवन क्रम में जोड़ जा सके तो उससे व्यक्ति और विश्व के वैभव में कितनी अभिवृद्धि हो सकती है; इसकी सारगर्भित जानकारी।

पाँच प्राण-पाँच देव

मानवी काया में काम करने वाले पाँच प्राण कितने रहस्यमय, कितने शक्तिशाली एवं कितनी महान संभावनाओं से भरे पूरे है। इस तथ्य पर इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। पढ़ने पर आत्मसत्ता के साथ घुले हुए इन पाँच देवताओं की विद्यमानता को अनुभव करके अपने को सौभाग्य शाली होने की अनुभूति होती है। इन पाँच देवताओं को सिद्ध करके सच्चे अर्थों में सिद्ध पुरुष बनने का उत्साह उठता है।

अणु में विभु-गागर में सागर

‘अणोरणीयान् में महतो महीयान्’ कैसे समाया हुआ है। पिण्ड में ब्रह्माण्ड की, बिन्दु में सिन्धु की, परमाणु में सूर्य की, जीव में ब्रह्मा की, सत्ता किस प्रकार अपने समग्र रूप में विद्यमान है। किस प्रकार उस चिनगारी को दावानल बनाया जा सकता है, इसका रहस्योद्घाटन इस पुस्तक में शोधपूर्ण शैली के साथ किया गया है।

तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति

भव बन्धनों से जीव के बंधे होने और मुक्ति को परम पद मानने के संदर्भ में दार्शनिक दृष्टि से बहुत कुछ कहा जाता रहा है। इस संदर्भ में प्रस्तुत किये गये प्रतिपादनों में परस्पर विरोधी तथ्यों की भी कमी नहीं। प्रस्तुत पुस्तक में इस प्रसंग को तात्विक दृष्टि से परखा है और जन जिज्ञासा के समाधान का उपयोगी आधार प्रस्तुत किया है।

मानवी क्षमता-असीम, अप्रत्याशित

तुच्छ समझे जाने वाले मानव प्राणी में बीज रूप में कितनी अद्भुत सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं। उनके जागरण और सदुपयोग से कितने उच्चस्तरीय लाभ उठाये जा सकते हैं, इस रहस्य पर इस पुस्तक में आँखें खोल देने वाला प्रकाश डाला गया है। आत्मबोध और आत्म विकास की दृष्टि से इसमें महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख है।

असीम पर निर्भर-ससीम जीवन

जीवन सम्पदा अपने आप में पूर्ण और समर्थ प्रतीत होता है पर उसकी विशेषताएँ किस प्रकार किसी अन्य पर निर्भर है इसकी चौंका देने वाली जानकारी इस पुस्तक में प्रस्तुत की गई है। पढ़ने पर जी करता है कि उस ‘अन्य’ से असीम से -सम्बन्ध सूत्र और सघन किया जाये ताकि उपलब्ध विभूतियों को असंख्य गुना बढ़ाया और असीम आनन्द पाया जा सके।

संसार चक्र की गति-प्रगति

संसार चक्र किस प्रकार चलता है। उसके साथ किस प्रकार ताल-मेल बिठाया और अनंत ऐश्वर्य कमाया जा सकता है इस तथ्य पर सारगर्भित प्रकाश इस पुस्तक में डाला गया है। यों इस विराट् विश्व में मनुष्य का स्थान नगण्य जितना लगता है पर यदि वह अपने स्वरूप को विस्तृत कर सके तो प्रगति का -अनन्त सम्भावनाओं का द्वारा सामने ही खुला दीखेगा। यही है इसका प्रतिपादन।

पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य

आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार न करने वालों के सामने तो पुनर्जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता। कई आस्तिकतावादी प्रतिपादनों में भी पुनर्जन्म से इनकार किया गया है। जीवन दूसरी बार न मिलने की मान्यता अपनाकर मनुष्य में खिन्नता, निराशा, लिप्सा एवं आतुरता जैसी कितनी ही हेय मान्यताएँ पनपती है और मरण अतीव कष्टकारक प्रतीत होता है। प्रस्तुत पुस्तक में उन भ्रान्तियों को हटाकर पुनर्जन्म होने के अगणित प्रमाण प्रस्तुत किये गये हैं। इससे अनवरत जीवन का उत्साह भरा और रचनात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है।

स्वर्ग और नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया

स्वर्ग नरक किसी विशेष लोक में अवस्थित माने जाते हैं और उनमें मृत्यु के उपरान्त ही पहुँचने की मान्यता है। प्रस्तुत प्रस्तुत में बताया गया है कि यह दोनों ही मनुष्य के उत्कृष्ट एवं निकृष्ट दृष्टिकोण के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली प्रतिक्रिया भर है। जो आये दिन सामने खड़ी रहती हैं। इन्हें बनाना बिगाड़ना और बदलना किस प्रकार सम्भव हो सकता है इसका उल्लेख इस पुस्तक में है।

मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ

मरना सभी को पड़ता है। पर लोग मूर्खता पूर्वक जीते और रोते कलपते मरते हैं। जब मरण अनिवार्य ही है तो उसकी ऐसी पूर्व तैयारी क्यों न की जाय जिससे कार्य परिवर्तन की घड़ी उत्साहवर्धक प्रवास जैसी प्रतीत हो। इसी तैयारी का अति महत्वपूर्ण परामर्श इस पुस्तक में है।

भूत कैसे होते हैं-क्या करते हैं?

भूतों की करतूतों के सम्बन्ध में अनेकानेक घटनाएँ और किम्वदंतियां देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। उनके होने न होने के सम्बन्ध में विवाद चलते रहते हैं। इस प्रसंग में अधिक गम्भीर और महत्वपूर्ण जानकारी देने वाली सामग्री इस पुस्तक में प्रस्तुत की गई है। जीवन की स्थिति की तरह ही मरणोत्तर स्थिति जानने की जो इच्छा रहती है उसका उपयुक्त समाधान इस पुस्तक में मिलेगा।

पितरों को श्रद्धा दें-वे शक्ति देंगे

भूतों को निकृष्ट और पितरों को उत्कृष्ट स्तर का माना जाता है। भूत हानि पहुँचाते और पितर सहायता करते हैं इन मान्यताओं पर प्रस्तुत पुस्तक में तथ्यपूर्ण प्रकाश डाला गया है, भूतों का डर निकालने और पितरों के साथ आदान-प्रदान करके लाभान्वित होने का उपयोगी मार्गदर्शन इस पुस्तक में है।

शरीर की अद्भुत क्षमताएँ एवं विशेषताएँ

सामान्य से दीखने वाले शरीर में कितनी विशेषताएं और विलक्षणताएँ भरी पड़ी हैं इसकी अविज्ञात जानकारियों का इस पुस्तक में संग्रह है और बताया गया है कि इनका उभरता तथा उपयोग में लाना, किस प्रकार संभव हो सकता है। निरोग, दीर्घजीवी, बलिष्ठ एवं प्रफुल्ल रहो’ के सूत्र का व्यवहार विस्तार इसके पृष्ठों पर अंकित है।

अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि

मनुष्य के अन्तराल में ऐसी अद्भुत क्षमताएँ भरी पड़ी हैं जिनके जागृत होने पर वह चमत्कारी, सिद्ध पुरुष, देवात्मा स्तर की भूमिका निभाता है। सर्वसाधारण में इनके न पाये जाने के कारण उन्हें अतीन्द्रिय अथवा अतिमानवी कहा जाता है यह विचित्र सिद्धियाँ चमत्कारी तो लगती हैं; पर उनके स्रोत या सूत्र का पता नहीं चलता। इस पुस्तक में अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि और उनके विकसित करने का मार्ग दर्शन किया गया है।

दिव्य शक्तियों का उद्भव प्राणशक्ति से

प्राणतत्व मानवी चेतना के अन्तराल में सन्निहित दिव्य सामर्थ्यों का उद्गम है। प्राणमय कोश में ऐसी रत्न राशि के भाण्डागार भरे-पड़े हैं, जिनके आधार पर मनुष्य को प्रगति पथ पर द्रुत गति से बढ़ते हुए उच्चतम स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिल सकता है। इस प्राणशक्ति को उभारने और उपयोग में लाने का मार्गदर्शन इस पुस्तक में है।

शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म

सामान्य जीवन में बोलचाल के लिए शब्द शक्ति का प्रयोग होता रहता है। वाद्य एवं घोष में नाद का प्रयोग होता है। ध्वनि तरंगें स्वर लहरियाँ विचारों और भावनाओं को उत्तेजित करके विकास क्रम में असाधारण सहयोग प्रदान करती हैं। अध्यात्म की उच्चस्तरीय भूमि में भी शब्द, ब्रह्म का प्रतिनिधि बनता और मन्त्र रूप में प्रकट होता है। नाद के सहारे ब्रह्म के साथ भावनात्मक आदान-प्रदान चल पड़ते हैं और ब्राह्मीस्थिति की भूमिका तक पहुँचना सम्भव होता है। शब्द और नाद के उच्चस्तरीय रहस्यों का उद्घाटन इस पुस्तक में है।

सपने झूठे भी - सच्चे भी

सपनों का एक अनोखा संसार है जिसके साथ अधिकाँश मनुष्यों को रात्रि का अधिकाँश समय गुजारना पड़ता हैं। वे सार्थक होते हैं या निरर्थक। उनके पीछे कोई रहस्य संकेत छिपा रहता है क्या? कईबार सपने भूत और भविष्य की पूर्णतया सही सिद्ध होने वाली घटनाओं की महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी देते हैं। इस सपने की दुनिया का स्वरूप, रहस्य और प्रतिफल इस पुस्तक में समझाया गया है।

जीव जन्तु बोलते भी हैं- सोचते भी हैं,

मनुष्येत्तर प्राणियों को मूक अथवा निरर्थक बोलने वाला माना जाता है। उनमें विचारशीलता नहीं होती ऐसा भी समझा जाता है। इस पुस्तक में बताया गया है कि प्राणियों की अपनी-अपनी भाषा है, जिसके आधार पर सजातियों के साथ आदान-प्रदान करते है। इसी प्रकार उनमें अपने जीवन में काम आने वाली विचार शक्ति एवं बुद्धिमत्ता भी है। इस तथ्य को जानने पर मनुष्य का सर्वोच्च बनने का अहंकार गलता है। पुस्तक में अपने विषय या प्रतिपादन खोजपूर्ण तथ्यों के साथ किया गया है। उपन्यास की तरह मनोरंजक है।

हम सब एक दूसरे पर निर्भर

सृष्टि की सभी जड़े चेतन इकाइयों का स्वतन्त्र अस्तित्व होते हुए भी वे एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध ही नहीं, निर्भर भी हैं। परस्पर सहयोग और आदान-प्रदान के सहारे ही सृष्टि क्रम चल रहा है। एकता के बीच अनेकता की यह स्थिति ही सर्वात्मा का -परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध करती है। वसुधैव कुटुम्बकम् की-आत्मवत् सर्व भूतेषु की-सर्व खिल्विदं की मान्यताओं का परिपोषण ‘सह जीवन’ धारा के आधार पर किस प्रकार हो रहा है इस तथ्य की गम्भीर विवेचना।

दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ

प्रत्यक्ष जगत यो सीधा सादा-सा लगता है, पर बारीकी से देखने पर उसके साथ अगणित अनबूझ पहेलियाँ जुड़ी दीखती हैं। इन्हें सुलझाये बिना मनुष्य भूल-भुलैयों में भटकता रहता है और शान्ति एवं प्रगति की अतृप्ति ही बनी रहती है। जिन पहेलियों का समझना और उनका सुलझाना नितान्त आवश्यक है उनका स्वरूप और समाधान इस पुस्तक में दिया गया है।

असामान्य एवं विलक्षण - किन्तु सम्भव और सुलभ

आये दिन ऐसे तथ्य सामने आते तथा घटनाक्रम घटित होते रहते हैं जिनका कारण ढूँढ़ने में बुद्धि हतप्रभ होकर रह जाती है। इन आश्चर्यजनक रोमाँचकारी रहस्यों के पीछे जो तथ्य छिपे रहते हैं, उसे इस पुस्तक में सर्वसाधारण को अवगत कराया गया है। चमत्कारों को देवताओं के कौतूहल मानने वालों का इस प्रतिपादन से सन्तोषजनक समाधान हो सकता है।

धर्म और विज्ञान-विरोधी नहीं पूरक

धर्म मंच से विज्ञान को नास्तिक और विज्ञान मंच से धर्म को अन्धविश्वास ठहराया जाता रहा है। इस विरोध ने दोनों को अपूर्ण और अनगढ़ रखा। तत्व-दर्शन और पदार्थ विज्ञान का समन्वय ही अन्तरंग उत्कृष्टता और बहिरंग सम्पन्नता का लाभ दे सकता है। धर्म और विज्ञान को एक-दूसरे का पूरक एवं सहयोगी बनाने से किस प्रकार समग्र प्रगति का द्वार खुल सकता है इसी की विवेचना प्रस्तुत पुस्तक में है।

विज्ञान को शैतान बनने से रोकें

नीति और मर्यादा की उपेक्षा करके चल रही वैज्ञानिक प्रगति, एक हाथ से सुविधा संवर्धन करती है और दूसरे हाथ से व्यक्ति की गरिमा तथा समाज की सुव्यवस्था पर भारी आघात पहुँचाती है। इस स्थिति को कैसे सुधारा जाय विज्ञान की उपयोगी प्रक्रिया का विनाशकारी प्रयोजनों में होने वाला प्रयोग कैसे रोका जाय, इसी की विवेचना प्रस्तुत पुस्तक में है।

मस्तिष्क-प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष

मस्तिष्क के खोखले में भरी अद्भुत शक्ति सामर्थ्यों को यदि समझा और जगाया जा सके तो परिष्कृत मनः स्तर ही प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष बनता है और ऋद्धि-सिद्धियों से सुसम्पन्न बना देता है। मानसिक सन्तुलन, दिशा निर्धारण, परिमार्जन एवं प्रखरता संवर्धन के ऐसे उपाय इस पुस्तक में बताये गये हैं, जिन्हें अपनाने पर ओजस्वी तेजस्वी और मनस्वी स्तर का महामानव इसी जीवन में बना जा सकता है।

मानवीय मस्तिष्क-विलक्षण कम्प्यूटर

कपाल के अस्थि गह्वर में भरा हुआ तनिक-सा लिवलिवा पदार्थ कितनी विलक्षणताओं और अद्भुत सामर्थ्यों का केन्द्र है इस तथ्य को जितनी गहराई से समझा जाता है; उतना ही चकित रह जाना पड़ता है। मस्तिष्क संसार के सबसे बहुमूल्य कम्प्यूटरों की तुलना में असंख्य गुना शक्तिशाली है। इसमें सन्निहित क्षमताओं के सदुपयोग-दुरुपयोग से मनुष्य किस प्रकार प्रगति अवगति की ओर बढ़ सकता है यही विवेचना इस पुस्तक में है।

चेतना का सहज स्वभाव स्नेह और सहयोग

आधुनिक मनोविज्ञान चेतना का स्वभाव स्वार्थ, संरक्षण एवं आक्रमण अपहरण तक के पुरुषार्थ करके उपभोग के साधन जुटाना बताया है। इस प्रतिपादन से मत्स्य न्याय का औचित्य समझा, समझाया गया है। इस अवाँछनीय प्रतिपादन को निरस्त करके प्रस्तुत पुस्तक में यह सिद्ध किया गया है कि चेतना का स्वभाव उत्कृष्टता को दिशा में अग्रसर होना तथा स्नेह सहयोग भरा आचरण करना है। वस्तुस्थिति समझी जाने पर मनुष्य को अपने स्तर को सुधारने की प्रेरणा मिलती है।

सहृदयता-आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य

पशु, पक्षियों, प्राणियों तथा दुर्बलों के प्रति बरती जाने वाली निर्भयता से, दुर्बलों से भी अधिक हानि सताने वालों की होती है- यह प्रतिपादन प्रस्तुत पुस्तक का है। माँसाहार की हर दृष्टि से अनुपयुक्तता सिद्ध की गई है। आत्मिक प्रगति के लिए उदार सहृदयता अपनाया जाना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस तथ्य को इन पृष्ठों पर उजागर किया गया है।

आध्यात्मिक-काम विज्ञान

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में ‘काम’ को भी पुरुषार्थ एवं सौभाग्य माना गया है। पर वह काम आधुनिक एवं सौभाग्य माना गया है। पर वह काम आधुनिक कामुकता से सर्वथा भिन्न है। कामाचार का निष्कृष्ट स्तर कितना हानिकारक और उत्कृष्ट स्तर कितना प्रेरणाप्रद होता है। इसकी विवेचना मनःशास्त्र तथा अध्यात्म विज्ञान दोनों के ही सहारे की गई हैं। बढ़ते हुए यौनाचार को उपयोगी दिशा देने वाले महत्वपूर्ण तथ्य इस पुस्तक में प्रस्तुत किये गये हैं।

बच्चे बढ़ कर अपने पैरों कुल्हाड़ी न मारें

आज की परिस्थितियों में सन्तान की संख्या बढ़ाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है इस तथ्य को हर दृष्टिकोण से परखा और उजागर किया गया है। सन्तान संख्या बढ़ाने से परिवार की आर्थिक स्थिति, जननी की स्वस्थता, अभावग्रस्त बच्चों की दुर्दशा तथा भार वहन करने में असमर्थ समाज पर इस स्वेच्छाचार का कितना बुरा प्रभाव पड़ता है इस संदर्भ के महत्वपूर्ण तथ्यों का संकलन है। साथ ही सीमित परिवार की बुद्धिमत्ता अपनाने के लिए प्रेरणा भी।

युगशक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण

अपने युग की समस्याओं के समाधान तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में आद्य शक्ति गायत्री की भूमिका वैसी ही होगी जैसी कि भूतकाल में अवतारों की रही है। गायत्री मन्त्र में सन्निहित प्रेरणाओं में वे सभी तथ्य मौजूद है जो प्रस्तुत विभीषिकाओं को, विडम्बनाओं को निरस्त करके स्वर्णिम नवयुग का सृजन कर सके। गायत्री का तत्व दर्शन और साधना विधान विश्व के नव-निर्माण में किस प्रकार अपने प्रभाव से विश्वमानव को प्रभावित परिष्कृत करने जा रहे हैं, इसकी तथ्यपूर्ण झाँकी प्रस्तुत पुस्तक में है।

सर्वोपयोगी गायत्री साधना

उपासना के अनेक उपचार, विधान एवं प्रयोग है। इनमें गायत्री महाशक्ति की सामर्थ्य तथा परिणिति असाधारण है। उसे ऋषियों ने सर्वोच्च स्थान दिया है। महान साधकों में से अधिकाँश ने उसी का अवलम्बन लिया है और आत्मिक प्रगति के उच्चस्तर तक पहुँचे हैं। अनजानों से लेकर साधना विधान के निष्णातों तक के लिए यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी है। गायत्री की ब्रह्मविद्या का स्वरूप एवं तत्वज्ञान इसमें सुबोध ढंग से समझाया गया है।

गायत्री के पाँच मुख-पाँच दिव्य कोश

गायत्री महाशक्ति के 24 स्वरूपों में एक प्रतिमा पाँच मुख वाली है। इसे सावित्री कहा गया है। पिछले दिनों इस चित्र का प्रचलन भी बहुत रहा है। यह पाँच मुख मानवी सत्ता के अन्तराल में विद्यमान पाँच कोशों के प्रतीक हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों की साधना एवं उपलब्धि की पंचमुखी गायत्री का क्षेत्र माना जाता है। पाँच कोशों का जागरण ही प्रख्यात पाँच देवताओं का प्रत्यक्ष अनुग्रह-अनुदान प्राप्त करना है। यह सब कैसे सम्भव है इसका सुविस्तृत विवेचन इस पुस्तक में देखें।

कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि

कुण्डलिनी महाशक्ति प्राण विद्युत, जीवनीशक्ति, प्राणऊर्जा, योगाग्नि, आत्म-ज्योति के रूप में मानवी काया में संव्याप्त है। यह प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। और यौनाचार जैसे विलास प्रमोद में अधोमुखी भी हुई सर्पिणी की भूमिका निभाती है। किन्तु जब उसे जागृत किया जाता है तो षट्चक्रों के विभूति भण्डारों का द्वार खुलता है और मनुष्य दिव्य क्षमताओं से भरा पूरा सिद्ध पुरुषों जैसा जीवन जीता है। इस कुण्डलिनी महाशक्ति का स्वरूप, जागरण विधान एवं उपलब्ध सामर्थ्य के प्रयोग की सुविस्तृत जानकारी इस पुस्तक में है।

ब्रह्मवर्चस की ध्यान धारणा

ब्रह्मवर्चस साधना में पंच कोशों का अनावरण कुण्डलिनी जागरण षट्चक्र वेधन एवं सुसंकल्पों की ध्यान धारणा का समावेश है। इस समग्र साधना पद्धति को ब्रह्मविद्या तपश्चर्या का समन्वय समझा जा सकता है। भौतिक वर्चस और आत्मिक तेजस् की प्राप्ति के लिए क्या धारणा अपनानी और क्या योग साधना करनी होती है इसका क्रमबद्ध शिक्षण इस पुस्तक में है।

उपरोक्त सभी पुस्तकों का मूल्य तीन-तीन रुपया मात्र है। पोस्टेज अलग। दस पुस्तकों से कम की वी.पी. नहीं भेजी जाती। दस पुस्तकों पर वी.पी. खर्च पाँच रुपया निर्धारित मूल्य से अलग लगेगा। किन्तु पूरा 42 पुस्तकों का सैट लेने पर डाकखर्च मँगाने वाले को नहीं देना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त 126 के स्थान पर अग्रिम मूल्य 110 का ड्राफ्ट मनीआर्डर ही स्वीकार कर लिया जायगा। इस प्रकार पूरा सैट लेने पर 16 मूल्य की और लगभग 10 पोस्टेज कुल 26 की बचत हो जायगी।

विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की सीरीज की यह प्रथम किस्त सभी सभी विज्ञजनों को अपने घरों में रखनी चाहिए और इसे समीपवर्ती विचारशील वर्ग को पढ़ा कर युग प्रवाह को पलटने की सामयिक माँग पूरी करनी चाहिए।


“फसल उगाना है”


फसल उगाना है (kavita)

युग की मनोभूमि में ऐसी फसल उगाना है। जिनमें जन जीवन में स्वर्गिक-वैभव आना है॥1॥

युग सृष्टा ने डाल दिये है सद्विचार के बीज। उन्हें अंकुरित करने की करनी है हर तजबीज॥ जन-मानस में फिर सुषुप्त-देवत्व जगाना है। जिससे जन-जीवन में स्वर्गिक-वैभव आना है॥2॥

दुर्भावों के घास-पात को आओ! दूर करें। सद्भावों के विरवों से जन-भू भरपूर करें। सद्विचार को सदाचार का सलिल पिलाना है। युग की मनोभूमि में ऐसी फसल उगाना है॥3॥

अपनी-अपनी क्षमताओं का खाद बिखेरें हम। जन-मंगल के लिये आज जन-जन को प्रेरें हम॥ अपने-अपने अंशदान की रोप लगाना है। युग मनोभूमि में ऐसी फसल उगाना है॥4॥

अपने युग में क्यों अभाव से कोई ग्रसित रहे। जन मानस की उर्वर-भू क्यों भूखी त्रसित रहे॥ समता, स्नेह और सम्वेदन से लहराना है। जिससे जन-जीवन में स्वर्गिक-वैभव आना है॥5॥

सुख, सन्तोष, शान्ति की फसलें भू पर खूब फलें। अनुदानों से, उपहारों से शिव संकल्प पलें॥ श्रम, सहयोग, त्याग, तप से भू स्वर्ग बनाना है। युग की मनोभूमि में ऐसी फसल उगाना है॥6॥

-मंगल विजय

*समाप्त*