प्रार्थना जीवन अमृत

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“मुझे रोटी न मिल तो मैं व्याकुल नहीं होता, पर प्रार्थना के बिना मैं पागल हो जाऊँगा। प्रार्थना भोजन की अपेक्षा करोड़ गुनी ज्यादा उपयोगी चीज है। खाना भले ही छूट जाये लेकिन प्रार्थना कभी न छूटनी चाहिये। प्रार्थना तो आत्मा का भोजन है। यदि हम पूरे दिन ईश्वर का चिन्तन किया करें तो बहुत ही अच्छा, पर चूँकि यह सबके लिए सम्भव नहीं, इसीलिए हमें प्रतिदिन कम से कम कुछ घण्टों के लिये ईश्वर स्मरण करना ही चाहिए”।

“प्रार्थना करना याचना, करना नहीं है वह तो आत्मा की सच्ची पुकार है। हम जब अपनी असमर्थता खूब समझ लेते है और सब कुछ छोड़कर ईश्वर पर भरोसा करते हैं तब उसी भावना का फल प्रार्थना है। प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं हृदय से होता हैं। इसी से गूँगे, तुतले, मूढ़ सभी प्रार्थना कर सकते हैं, जीभ पर अमृत हो और हृदय में हलाहल हो तो जीभ का अमृत किस काम का? कागज के गुलाब से सुगन्ध कैसे निकल सकती है”।

“प्रार्थना करने का उद्देश्य ईश्वर से सम्भाषण करना एवं अन्तर आत्मा की शुद्धि के लिये प्रकाश प्राप्त करना है ताकि ईश्वर की सहायता से हम अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर सकें। प्रार्थना मन से न हो तो सब व्यर्थ है। प्रार्थना में जो कुछ बोला जाता है, उसका मनन कर अपने जीवन को वैसे ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। तभी उसका पूर्ण लाभ है”।

“परलोक की बात तो जाने दीजिये, इस लोक के लिये भी प्रार्थना सुख-शाँति देने वाला साधन है। अतएव यदि हमें मनुष्य बनना है तो हमें चाहिए कि हम जीवन को प्रार्थना द्वारा रसमय और सार्थक बना डालें। इसीलिए मैं आपको सलाह दूँगा कि आप प्रार्थना से भूत की तरह लिपटे रहें।”

“मेरे सामने आने वाले राष्ट्रीय, सामाजिक अथवा राजनैतिक विकट प्रश्नों की गुत्थी का सुलझाव मुझे अपनी बुद्धि की अपेक्षा अधिक स्पष्टता और शीघ्रता से प्रार्थना द्वारा विशुद्ध अन्तःकरण से मिल जाता है।”

-महात्मा गाँधी,

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सब काल के आधीन ....

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अधिकारी न होते हुए भी राज्याधिकारी भुज ने साम्राज्य सत्ता को हथिया लिया। इसके लिए भुज को युवराज भोज से ही निबटना था। महाराज सिन्धु को जब अकाल मृत्युपाश में आबद्ध होना पड़ा तो उन्होंने अपने परम विश्वसनीय सहयोगी भुज को पाँच वर्षीय युवराज का संरक्षक नियुक्त करते हुए कहा था कि-भोज के समर्थ होने तक वही राज्य व्यवस्था सम्हाले तथा युवराज को राजनीति की दीक्षा दे।

दीर्घावधि तक तो भुज अपने कर्तव्य मार्ग पर आरूढ़ रहे पर धीरे धीरे सत्ता लोलुपता और अधिकार लोभ के छिद्रों ने उनकी सारी निष्ठा कर्तव्य भक्ति बहा दी। लोभ लोलुपता की आसुरी प्रवृत्ति ने छल छद्म का सहारा लिया और युवराज भोज को मिथ्या आरोपों से निष्कासन दण्ड-भोगना पड़ा। राज्य सीमा से निर्वासित अज्ञात प्रदेश में रहने की राजकीय आज्ञा हुई और भोज चल पड़े, अवश निरुपाय होकर।

इतने पर भी भुज के मन का काँटा नहीं निकला। युवराज होने के कारण भोज जनश्रद्धा का सहज भाजन है। उसका लाभ उठा कर कहीं वह जन संगठन न करने लगे। संगठित जनशक्ति के आधार पर भोज मुझे कभी भी पदच्युत कर सकते हैं। इस आशा का को पूर्णतया निर्मूल करने के लिए राजा भूल ने गौडेश्वर वत्सराज को आदेश दिया कि वह भोज का शिरच्छेद कर उसका कटा हुआ सिर लाये ताकि अपने प्रतिद्वंद्वी को मूत देखकर निष्कंटक राज्य सुख भोगा जा सकें।

उसी मार्ग से, जिस मार्ग पर भोज ने प्रयाण किया था, वत्सराज ने अपना रथ दौड़ा दिया। लम्बी यात्रा पूरी करने के बाद भुवनेश्वरी वन के मध्य में भोज को पकड़ा जा सका। उस समय वत्सराज का मन राजा भुज के आदेश पालन तथा कर्तव्य निर्णय के झूले में झूल रहा था। इसी असमंजस की स्थिति में वत्सराज ने भोज को राजादेश सुनाया कि -भुज राजसिंहासन का पूरा अधिकार निश्शंक निश्चित हो कर भोगना चाहते हैं उन्होंने आपके वध की आज्ञा दी है।

;तो विलम्ब क्यों करते हो ‘गौडेश्वर,-भोज ने कहा जिस कार्य के लिए तुम्हें नियुक्त किया है उसे पूरा करो।

वन की नीरवता में कृष्ण पक्ष की अँधियारी रात काली चादर ओढ़े मृत्यु के समान लगती थी। वत्सराज के हाथों में चमकती तलवार उस समय भी ऐसी लगती थी जैसे मृत्यु भी निरपराध का वध करने में सहम रही हो। फिर न जाने क्या हुआ कि वत्सराज के हाथों से तलवार छूट गयी और वह कुमार से लिपटकर कहने लगा मैं भी मनुष्य हूँ कुमार! ममता, वात्सल्य से पूरित हृदय वाला मनुष्य। और उन्होंने कुमार को अंक में भर लिया।

दिये गये दायित्व को पूरा करने में सफल हुए? सम्मुख प्रस्तुत होते ही वत्सराज से राजा भुज ने पूछा। वत्सराज ने स्वीकार भाव से सिर हिलाया और रक्त लिखित एक वटपत्र भुज के हाथों में थमा दिया। वत्सराज ने पत्र पर लिखी पंक्तियाँ पढ़ी’ लिखीं भोज की ही थीं, लिखा था -समर्थ होते हुए भी भगवान श्री राम ने वनवास का क्लेश सहा, समस्त यादव कुल का नाश हुआ नल को राज्य से च्युत होना पड़ और कई चक्रवर्ती दिग्विजयी सम्राट हुए पर काल ने किसी को नहीं छोड़ा। सब काल के अधीन हुए।

श्लोक पढ़ कर भुज का न जाने कौन सा मर्मस्थल दग्ध हो गया और अपनी गलती का भान होते ही वह जोरों से विलाप करने लगा -मैंने क्या कर डाला। इतना बड़ा पाप, महाराज सिन्धु को मैंने क्या कर डाला। इतना बड़ा पाप, महाराज सिन्धु को मैं क्या उत्तर दूँगा? विधवा सावित्री के सामने मैं क्या मुंह लेकर जाऊँगा-?”

अंतरात्मा की प्रताड़ना और पश्चात्ताप की अग्नि ने भुज को विदग्ध कर डाला।

इसके बाद जैसे तैसे वस्तुस्थिति से आवरण हटाया गया कुमार भोज को सुरक्षित पा कर भुज व्यथा कुछ कम हुई, सब काल के अधीन है तो लोभ किस लिए, अनीति क्यों, दुराचरण किस हेतु। भुज ने विधिवत् भोज को राज्यासन सौंपा और स्वयं तप के लिए प्रस्थान कर दिया।


नास्तिकता सबसे बड़ा अन्ध विश्वास है!

दार्शनिकों के बीच आस्तिकता तथा नास्तिकता को लेकर शीत युद्ध लम्बे अरसे से चल रहा है। इसके दो मुख्य स्वरूप रहें है। पहला सत्य के अनुसंधान की उत्कट अभिलाषा दूसरा पाँडित्यपूर्ण वाग्वैदग्घ्य की प्रवृत्ति।

प्राचीन भारतीय मनीषी पूर्वजों में सत्य के शोध की लालसा सदैव जागृत-प्रखर रही है। जहाँ एक ओर वे योग्य साधना के पथ पर चलकर आत्मसाक्षात्कार द्वारा सत्य को जानते-देखते -समझते थे वहीं तर्क क्षेत्र में भी सत्य के प्रत्येक पहलू के परीक्षण-विश्लेषण में वे सदा सोत्साह अग्रसर रहें और उससे उन्होंने कभी मुँह नहीं चुराया।

साधना पथ पर चल कर ईश्वर-साक्षात्कार के साथ ही उसके अस्तित्व का तर्कों,-युक्तियों द्वारा विचार-विवेचन भी यहाँ सदा हो होता रहा हैं।

ईश्वरीय सत्ता को पूर्णतः अस्वीकार करने वाले भारतीय दार्शनिक-सम्प्रदायों में मुख्य था चार्वाक-सम्प्रदाय चार्वाक ने ईश्वरीय सत्ता की विद्यमानता का जो तार्किक विरोध किया उसका आस्तिक दार्शनिकों ने वैसी हो तार्किक प्रखरता से उत्तर दिया। उनके विरोध में सच्चे आस्तिक न तो क्रुद्ध हुए, न ही उदासीन अपितु गम्भीरता एवं संयत तार्किकता के साथ उस विरोध के आधार का खंडन किया। इन तार्किक खंडनकर्ताओं में दसवीं शताब्दी के दार्शनिक उद्यनाचार्य का अपना विशिष्ट स्थान है उनका लिखा ‘न्याय-कुसुमान्जलि’ नामक ग्रन्थ ईश्वर सिद्धि के विषय में तर्क प्रधान पुस्तकों में अद्वितीय माना जाता है। यहाँ तार्किकों के समाधान के लिए उसी ग्रन्थ के कुछ महत्वपूर्ण अंशों का सारा-रूप प्रस्तुत किया जा रहा है।

न्याय कुसुमांजलि में पाँच अध्याय या पाँच स्तवक हैं। ईश्वर के विषय पाँच मुख्य विप्रतिपत्तियाँ उस समय तक बौद्धिक जगत में स्थापित थीं अर्थात् ईश्वर के सम्बन्ध में पाँच महत्वपूर्ण स्थापनाएँ प्रस्तुत की जाती थीं उन्हीं पाँचों विप्रतिपत्तियों का निराकरण एक-एक स्तवक में किया गया है।

इसमें से पहली विप्रतिपत्ति है- “अलौकिकस्य पर लोक-साधनस्याभावत-अर्थात् अलौकिक परलोक साधन का अभाव है, इसलिए ईश्वर का भी अभाव है। यह सूत्र रूप कथन हुआ। आइए, इस कथन को विस्तार से समझें और फिर उसका तार्किक परीक्षण करें।

इस सूत्र में तीन तर्क छिपे हैं। पहला है अलौकिक का अभाव। दूसरा परलोक का अभाव। तीसरा साधन का अभाव। अर्थात्- (1) अलौकिक यानी जिसे देखा न जा सके, ऐसी अदृष्ट वस्तु सत्ता कीं कोई हो नहीं सकती। (2) इस लोक के अतिरिक्त और कोई लोक, जिसमें जीवन विद्यमान हो नहीं सकता। (3) संसार में कोई किसी का कारण नहीं है।

इनमें से अन्तिम ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसी लिए उद्यनाचार्य ने सबसे पहले ‘न्यायकुसुमांजलि’ में उसी का खंडन किया है। क्योंकि ईश्वर की सत्ता का जो सबसे पहला भाव -अनुमान होता है। वह इसी आधार पर कि इस सृष्टि का कोई न कोई कारण होना चाहिए। वह कारण मनुष्य है? यह नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो अरबों वर्ष के प्रयास के बाद भी आज तक सृष्टि के रहस्य को समझ नहीं सका। अतः मनुष्य या ऐसे ही किसी अन्य प्राणी ने सृष्टि की रचना की हो, यह सम्भव नहीं। इस लिए एक सर्वोच्च सत्ता ही इस समस्त सृष्टि का कारण हैं।

आस्तिक आचार्यों का तर्क है कि घड़ा कार्य है, उसका कर्ता कुम्हार है। इसी प्रकार पृथ्वी आदि का कोई चैतन्य कर्ता होना चाहिए। वही सर्वोपरि चैतन्य-सत्ता ईश्वर है। इस प्रकार उस चेतनसत्ता को दो रूपों में देखा जा सकता है। इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में संव्याप्त और उसकी क्रमबद्ध हलचलों का कारण ब्रह्माण्डीय चेतना है तथा प्रत्येक जीवपिंड में इसी ब्रह्माण्डीय चेतना का सक्रिय अंश है जीव-चेतना या जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। विराट, अनन्त चेतना- समुद्र में तैर रही मछलियों की तरह प्रत्येक जीवधारी की स्थिति है। उसके भीतर जो चेतन- सत्ता है वह उसी परमात्मा का अंश है पिंड से परे सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकृति में जो सुव्यवस्थित-सुनियोजित गतिशीलता है, घटना-प्रवाह है, उसका कारण और नियामक परमेश्वर या ब्रह्माँडीय चेतना है।

नास्तिकों ने परम सत्ता के इन दोनों रूपों का इस प्रकार खंडन किया।

(1) सृष्टि की गतिविधियों का संचालक, व्यवस्थापक कोई नहीं है। वह यो ही अकस्मात् होता है। इसे ही कहते है ....-व्यापार का अकस्मात्वाद।

(2) जीव चेतना वस्तुतः स्वतः उत्पन्न होती है। उसका शरीर से बाहर कोई अस्तित्व नहीं। शरीर के निर्माण की प्रक्रिया में चेतना स्वतः हो जीती है। दार्शनिक शब्दावली में इसे ही कहते है भूत-चैतन्य वाद।

इस प्रकार ये दोनों तर्क कारणवादी सिद्धाँत का और ईश्वरीय सत्ता के प्रकाश का खंडन करते है। इनका विस्तार क्यों किया गया है। नास्तिकों का कथन है।

अग्निरुग्णों जलं शीत शीतर्स्पशस्तथानिलः। केनेद चित्रितं तस्मात्-स्वभावात्तद् व्यवस्थितिः।

अर्थात्-अग्नि उष्ण होती है, और वायु का स्पर्श शीतल होता है, यह सब भला किसने बनाया है? अर्थात् किसी ने इन्हें बनाया थोड़े ही है, उनकी यह गुण-प्रकृति स्वभाव से ही है। यह विश्व किसी प्रकार-सत्ता का कार्य नहीं है। वह तो तत्वों के अकस्मात-संयोग का परिणाम है मानव बुद्धि सृष्टि के रहस्य का पता अभी तक लगा नहीं सकी है। इसलिए उसके विवेचक की चेष्टा व्यर्थ है और किसी कारण-सत्ता की मान्यता कल्पना-मात्र है। मोरों को रंगों से कौन सजाता है? कोयल से गाना कौन गंवाता है? यह तो उनकी प्रकृति ही है। इसलिए किसी भी कार्य का कोई अन्य कारण मानना व्यर्थ है। सृष्टि का कारण ईश्वर को मानना अनावश्यक है।

चार्वाकवादियों ने ईश्वरीय सत्ता की कारणता का निषेध तर्क शास्त्रीय पद्धति से यों किया-कारणता का निश्चय तर्क शास्त्रीय ढंग से अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर किया जाता है अर्थात् जब कोई कारण किसी कार्य के साथ सदा सम्बद्ध देखा जाय और उस कारण की अनुपस्थिति में कार्य कहीं भी न देखा जाय जब उस कार्य-विशेष का अमुक कारण-विशेष माना जा सकता है। चार्वाक के अनुसार क्योंकि सृष्टि में ऐसा कोई भी कार्य-कारण सम्बंध सिद्वांत्त नहीं हो पाता, इसलिए कारणता का सिद्धाँत ही गलत है।

अन्वय कहते हैं अनिवार्य विद्यमानता को “तत्तत् सत्वेंत्सत्ता अन्वयः” जहाँ-जहाँ कार्य है वहाँ-वहाँ अमुक्त कारण या गुण है यह हुआ अन्वय। जबकि “तदभावे तदभावों व्यतिरेकाः” जहाँ-जहाँ अमुक कार्य या वस्तु का भी अभाव है यह हुआ व्यतिरेक।

जैसे आग दाह का कारण है यह तो हुआ आग का स्वभाव किन्तु आग का कारण क्या है?

प्राचीन काल में अग्नि प्रायः दो प्रकार से उत्पन्न की जाती थी एक अरणि के मन्थन से दूसरे मणि अर्थात्-आतिशी शीशे के प्रयोग से यज्ञ आदि में अरणि नामक वृक्ष के दो टुकड़ों को एक विशेष ढंग से रगड़ कर आग पैदा की जाती थी। आतिशी शीशे यानी मणि को सूर्य के सम्मुख रखकर अग्नि उत्पन्न की जाती थी। उन दोनों साधनों से उत्पन्न अग्नि को तृणादि ग्रहण करते थे घास-फूस के द्वारा वह आग जोर पकड़ती थी, जब उसे जलाकर रखते थे काष्ठादि द्वारा।

अतः उस समय चार्वाक ने तर्क किया “अग्नि का क्या कारण है, कारणवादियो! तुम्हीं बताओ?” अग्नि के तुम तीन कारण गिना सकते हो (1) ‘तृणसत्वें वह्नि सेत्ता, (2) अरणासत्वे वह्नि-सत्ता और (3) मणासत्वे वह्नि सत्ता, यानी या तो तृणादि होने पर आग होती है या अरणि के रहने पर या मणि के रहने पर। अब न तो यह तर्क दिया जा सकता कि जहाँ-जहाँ तृण है वहाँ-वहाँ आग है अथवा जहाँ-जहाँ अरणि या मणि है वहाँ-वहाँ आग है। न ही यह तर्क सिद्ध होता है कि जहाँ-जहाँ तृण, अरिण या मणि नहीं है वहाँ-वहाँ आग नहीं है। यानी आग का इन तीनों कथित कारणों से न तो अन्वय सम्बन्ध सिद्ध होता न ही व्यतिरेक सम्बंध। इस प्रकार अग्नि का कोई एक कारण नहीं सिद्ध हो सकता। यदि कोई अन्य कारण प्रस्तुत किया जाता है अग्नि का, तब उसका भी इन्हीं तर्क आधार पर खंडन हो सकता है। चार्वाकवादियों का तर्क है पर इसी प्रकार सृष्टि के समस्त पदार्थों के कथित कारणों का खंडन हो सकता है। इसलिए संसार में कोई कारण नहीं है। अतः सृष्टि का प्रत्येक कार्य अकस्मात् हो जाता है। उसे किसी कारण की अपेक्षा नहीं रहती। सृष्टि भी अकस्मात और अकारण उत्पन्न हुई या कह सकते है कि इस प्रकार उत्पन्न होना उसकी प्रकृति ही है, उसकी स्थिति या गति का कोई ईश्वर जैसा अन्य कारण नहीं है।

इसी प्रकार आत्मा के बारे में चार्वाक का प्रतिपादन है कि वह किसी परमात्म-सत्ता का अंश नहीं। अपितु शरीर की उत्पत्ति के साथ स्वाभाविक रूप में चेतना अस्तित्व में आ गई। जैसे पान, खैर, चूना तथा सुपारी में अलग-अलग प्रयोग में लालिमा नहीं दीख पड़ती पड़ी किंतु एक विशिष्ट मात्रा में इनके संयोग होने से फिर इनके प्रयोग यानी चबाने से ललाई पैदा होती है, उसी प्रकार अचेतन तत्वों के एक निश्चित क्रम में संयोग से चेतना उत्पन्न होती है। अतः शरीर ही आत्मा है। शरीर के निर्माण की प्रक्रिया में स्वभावतः चेतना उत्पन्न होती है। जैसे जो या महुआ को खाने से नशा नहीं होता, पर इन पदार्थों को एक विशेष परकाया में ढालने पर मदिरा बन जाती है और मादकता नामक गुण-शक्ति उनमें स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार अचेतन तत्वों की एक विशिष्ट परिणाम और ढंग में संहति होने पर चैतन्य की स्वभावतः उत्पत्ति हो जाती है। वही आत्मा है। आत्मा का कारण कोई बाह्य सत्ता-परमात्मा आदि मानना बुद्धिहीनता है।

जब तक शरीर है, तभी तक चेतना है। शरीर के नाश हो जाने पर चेतना भिष्ट हो जाती है। पोषकतत्व शरीर को मिलते हैं तो प्रकृष्ट चेतना का उदय होता है। शरीर का पोषण न होने पर चेतना का ह्रास होने लगता है।चैतन्य के कार्य का आधार शरीर ही है। अतः शरीर ही चैतन्य है, वही आत्मा है। हमें सारा सम्वेदन ज्ञान शरीर-परक ही होता है ‘मैं मोटा हूँ’; ‘वह पतला है’, ‘मैं प्रसन्न हूँ’, ‘मैं उदास हूँ’, ‘मैं ज्ञान प्राप्त कर रहा हूँ आदि अनुभव शरीर से जुड़े हैं। अतः चैतन्य शरीर का ही अंग है।

शरीर में औषधि-विशेषों के प्रयोग से शारीरिक-मानसिक दक्षता बढ़ती है। इसे ही चेतना-स्तर में वृद्धि कहा जाता है। अतः शरीर ही चेतना का आधार है।

वर्षा काल में दही रखा हो, तो उसमें स्वतः छोटे-छोटे कीड़े कुछ समय बाद रेंगते देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार शरीर में स्वतः चेतना उत्पन्न होती है। अतः न तो सृष्टि संचालन का कारण कोई ब्रह्माँडीय चेतना है और न आत्मा किसी परमात्मा का अंश है। ये तो स्वाभाविक क्रियाएँ हैं। यह हुई ‘साधनस्थ अभागवात्’ की व्याख्या।

इनका खंडन एवं यथार्थ विवेचन इस प्रकार हैं- घड़े का कर्ता कुम्हार है, यह स्पष्ट है। क्योंकि घट का निर्माण प्राणिकृत क्रिया है। किंतु अग्नि, जल, वायु आदि की गतिविधियाँ अप्राणिकृत है। चार्वाक का यह प्रश्न कि उन्हें किसने बनाया अर्थात् किस व्यक्ति ने बनाया-गलत है। क्योंकि उन्हें किसी व्यक्ति ने बनाया, यह तो आस्तिक भी नहीं मानते। आस्तिक तो इन्हें ईश्वरीय व्यवस्था का ही अंग मानते हैं। अतः इन पदार्थों का मनुष्य ने निर्माण नहीं किया, इसलिए ईश्वर नामक सत्ता भी नहीं है, यह तो कोई तर्क नहीं हुआ। इन्हें किसी ने बनाया हो, यह देखने में न आने पर ईश्वर का न होना कैसे सिद्ध हुआ। उल्टे, इससे सिद्ध होता है कि कोई अदृश्य सत्ता इसका निर्माण करती है।

जहाँ तक कारणता के सिद्धाँत के खंडन का प्रश्न है, वह तो स्वतः ही गलत सिद्ध हो चुका है। वैज्ञानिक परीक्षणों-प्रयोगों और परिणामों को तो नास्तिक भी सत्य मानते है और समस्त वैज्ञानिक शोधें अपने मूल रूप में मात्र प्रकृति की अधूरी नकल हैं। प्रकृति की जिस हलचल की जितनी जानकारी ढूँढ़ने-खोजने पर मिल जाती है, उसी की नकल तैयार करली जाती है। इसे ही कहते हैं वैज्ञानिक अन्वेषण। गुरुत्वाकर्षण हो या सापेक्षता- सिद्धाँत, वे विद्यमान तो सहा से ही थे, उनकी जानकारी प्राप्त करली गई। ध्वनियों के कम्पन और प्रवाह, जीवकोशाओं का निर्माण और कार्य, विद्युत-संचार, चुम्बकीय सक्रियता, अंतरिक्षीय- संचार, आदि-आदि समस्त गतिविधियाँ सूक्ष्म रूप में प्रकृति में सदा से जारी हैं। उनके सूत्रों की जानकारी पाकर उसी की बांह पकड़कर चला गया तो रेडियो, टेलीविजन, वायुयान,उपग्रह, औषधि- शल्यक्रिया-उपचारक यंत्र एवं तंत्र, टेस्ट ट्यूब बेबी आदि का निर्माण सम्भव हो गया। वस्तुतः विज्ञान प्रकृति पर विजय नहीं करता, एक अनाड़ी बालक की तरह प्रकृति-माता का अनुकरण-अनुसरण करता है। जब यह अनुकरण सही होता है, तो प्रगति होती है, जिससे विज्ञान-शिशु हर्षोन्मत हो उठता है। जब अनुकरण त्रुटिपूर्ण होता है तो शिशु गिर पड़ता है।, उसे चोट लगती है, क्षतिग्रस्त हो जाता है।

प्रकृति के इस अनुसरण यानी सम्पूर्ण वैज्ञानिक शोध-प्रयोग के आधार है, कारणता का सिद्धान्त एवं प्रकृति की समरूपता के सिद्धाँत।

कारणता का सिद्धाँत का अर्थ है- प्रत्येक कार्य का एक निश्चित कारण होता है। प्रकृति की सफलता के सिद्धाँत का अर्थ है कि प्रकृति में एक स्थान पर यदि किसी कार्य का अमुक भूल कारण है, ता अन्यत्र सर्वत्र भी उस कार्य का मूल कारण वही और वैसा ही होगा। यदि वैसा कीं होता नहीं दीखता तो इसमें त्रुटि प्रकृति-की नहीं होती, हमारी जानकारी की कमी इसका कारण होती है।

इससे स्पष्ट हुआ कि प्रकृति की प्रत्येक हलचल सकारण है और उसका एक निश्चित क्रम है। ऐसी क्रमबद्ध सुनिश्चित सुव्यवस्थित हलचल बिना किसी किसी चेतन-सत्ता के नियंत्रण-निर्देशन के सम्भव नहीं है। अतः नास्तिकों का तर्क निरस्त हो जाता है। अग्नि वाला उदाहरण ही यदि लें तो अरणि, मणि या तूण स्वतः अग्नि के कारण नहीं, वे तो अग्नि-प्रज्वलन के अनुकूल पदार्थ मात्र हैं। अग्नि इनसे भिन्न शक्ति है। शक्ति की वह सूक्ष्म प्रक्रिया ही अग्नि की अभिव्यक्ति का कारण है। इसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ की गतिविधि के सुनिश्चित कारण हैं और इन सम्पूर्ण सृष्टि की क्रमबद्ध व्यवस्थित हलचल का भी सुनिश्चित कारण है।

चार्वाकवादियों का अंतिम तर्क या चेतना की स्तः उत्पत्ति का जो अब वैज्ञानिक दृष्टि से भी खंडित हो चुका है। चेतना स्वतः नहीं उत्पन्न होती, अपितु मूल रूप में विद्यमान रहती है। अब तो वैज्ञानिक भी वह मानने लगे हैं कि सृष्टि के मूल करण स्वयं ही अदृश्य चेतन तरंगें हैं, जो वेतन एवं जड़ दोनों में परिवर्तित हो सकने में सक्षम हैं। ‘शरीर के न रहने पर आत्मा की चेतना भी नहीं रहती’ नास्तिकों का यह तर्क तो स्पष्टतः भी विपरीत है। चार्वाक ने मदिरा और पान की ललाई का भ्रान्त उदाहरण दिया है। पान खत्म हो जाने पर भी लालिमा कुछ देर तक बनी रहती है। मादक-द्रव्य प्रत्यक्षतः पच जाने पर जाने पर भी नशे का प्रभाव मस्तिष्क में कुछ समय तक बना रहता है। यदि चेतना भी मदिरा या पान की लालिमा जैसी आनुषंगिक उत्पत्ति होती तो वह शरीर-नाश के कुछ समय बाद तिरोहित हुआ करती शरीर के रहते नहीं। पर होता विपरीत है, चेतना के तिरोभाव से शरीर पूर्ववत् रहते हुए भी निश्चेष्ट, व्यर्थ हो जाता है। अतः नास्तिकों द्वारा आत्म चेतना को उत्पत्ति-व्याख्या भी अनुपयुक्त एवं अप्रमाणिक है।

भूत-चैतन्यवाद एवं अकस्मात्वाद दोनों ही यर्थात एवं विवेक की कसौटी पर खरे नहीं उतरते और इसलिए नास्तिकता के बारे में आधुनिक दार्शनिक फिलिन्ट की यह उक्ति ही उचित सिद्ध होती है कि “प्रकृति के परमाणुओं ने परमात्मा की क्रिया के बिना स्वयं ही इस विचित्र सृष्टि की यह रचना की” यह बात मानना इस मान्यता से भी अधिक युक्ति शून्य है कि अंग्रेजी भाषा के अक्षरों ने बिना महाकवि शेक्सपियर के मस्तिष्क की सहायता के स्वयं ही शेक्सपियर के महान नाटकों की रचना कर डाली ‘इलियड’ महाकाव्य, में प्रयुक्त समस्त अक्षरों को यदि समस्त मनुष्य जाति संसार के आरम्भ से अब तक दिन-रात उछालती रहती तो भी ‘इलियड’ की पहली पंक्ति तक न बन पाती। वह बनी तभी, जब ‘इलियड’ के सृष्टा कवि होमर ने एकोलीज के क्रोध और ट्राय के युद्ध को काव्य में वर्णन करने की इच्छा की। फिर सृष्टि रूपी काव्य और ईश्वरीय नाटक की ‘इलियड’ काव्य कृति से या शेक्सपियर के नाटकों से क्या तुलना। बिना किसी विशेष चेतन-सत्ता की इच्छा और सहायता के क्या इतनी विशाल सृष्टि इस व्यवस्थित रूप में रची और चलायी जा सकती है? यह मानना कि प्रकृति के परमाणुओं ने स्वतः ही, बिना किसी चेतन-सत्ता के बिना उसकी बुद्धि की प्रेरणा के, स्वतः ही स विशाल, भव्य, जटिल सृष्टि की रचना करदी है, दुनिया का सबसे बड़ा अंधविश्वास है”


मनुष्य अपनी मौलिक विशेषताएं

डार्विन का विकासवाद जीवविज्ञान का बहुसमर्थित सिद्धान्त है। इस मान्यता को ही आजकल विद्यालयों में पढ़ाया और समझाया जाता है कि जीवन का आरम्भ अविकसित स्तर पर हुआ और वह क्रमशः आगे बढ़ता चला आया। इसके अनुसार मनुष्य का पूर्ण इतिहास गौरवास्पद नहीं है। आज का मनुष्य का पूर्व इतिहास गौरवास्पद नहीं है। आज का मनुष्य अपने पूर्वजों से अधिक अच्छी स्थिति में है-यह मान्यता हमें अहंकार ही नहीं बनाती वरन् अपने पूर्वजों के प्रति अश्रद्धा एवं उपहास की भावनायें भी पैदा करती है।

विकासवादी व्याख्या के अनुसार ‘प्रोटोजुआ’ से मनुष्य क्रमशः विकसित हुआ। सर्वप्रथम एक कोशीय जीव अमीबा, स्पंज, हाइड्रस और फिर विभिन्न सीढ़ियाँ पार करता हुआ मछली; मेढ़क, साँप, छिपकली, चिड़िया, घोड़े, हाथी, बन्दर आदि विकसित होते हुए मनुष्य बना। यह सिद्धान्त हमें यह सिखाता है कि जीव का मूल स्वरूप ही नहीं उसका स्तर, स्वभाव और आधार भी विकसित परिवर्तित होता आया है। एक कोशीय इंद्रिय चेतना से रहित जीवन क्रम उलट-पुलट करते 2 मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के रूप में आ गया है। लेकिन यह विकासवादी व्याख्या बुद्धि-संगत नहीं जान पड़ती। इसे मान भी लिया जाय तो प्रश्न उठता है कि वर्तमान प्राणी जिस स्थिति में है वह कब तक बनी रहेगी? विकास सिद्धान्त के अनुसार उनमें परिवर्तन होते-होते अन्ततः वे किस स्थिति में पहुँच जायेंगे और प्रगति की अनंत प्रक्रिया प्राणियों को कौनसा स्वरूप प्रदान करेगी?

सर्वप्रथम हमें विकासवादी सिद्धान्त की कुछ स्थापनाओं का अवलोकन करना पड़ेगा। इसके अनुसार लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व “आस्ट्रेलोपिथेकस”नामक वन मानुष विकसित हुआ। यह पहला ग्लेशियर दक्षिण की और बढ़ता हुआ यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरिका पहुँचा तथा वहाँ के एक बड़े हिस्से पर छा गया। उस समय अर्थात् अब से दस लाख वर्ष पूर्व यह वनमानुष दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में घूमता था और उसका सजातीय “अस्ट्रेलोपिथेकस” नामक वनमानुष उत्तरी अमरीका में। यह चिंपेंजी की तरह होता था और सीधा तन कर चलता था। वही नहीं “आस्ट्रेलोपिथेकस” विकसित होकर ‘पिथेकेन्थ्राइन” मनुष्य रूप में आया। इसके बाद बाद लगभग 60 हजार वर्ष पूर्व “निएण्डटथल” जिससे प्रारम्भिक मानव या आदिमानव विकसित हुआ। बताया जाता है कि इनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी थी। ये औजार बनाते थे, शिकार करते थे तथा अपने मृतकों का अन्तिम संस्कार समारोहपूर्वक मनाते थे।

डार्विक के बाद ‘हेमल’ और स्पेंसर आदि ने इसी सिद्धांत की पुष्टि की और इन्हीं आधारों पर नयी-नयी परिकल्पनायें प्रस्तुत कीं। लेकिन पिछले 50 वर्षों में डार्विन का यह प्रतिपादन खण्ड-बण्ड होकर निराधार सिद्ध हो गया है। इस धारणा ने आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म आदि की तमाम आस्थाओं को जड़-मूल से हिलाकर रख दिया था। क्योंकि विकासवाद के अनुप्रतिद्वन्द्विता प्रकृति का शाश्वत एवं सनातन सिद्धान्त है। इसमें जो योग्यतम होता है वही बचता है। ‘यूज एण्ड डिसयूज’ के अनुसार कारण विशेष से शारीरिक रचना में परिवर्तन, अंगों का लोप और विकास होता है। प्रकृति योग्यता का चुनाव कर उनकी ही रक्षा करती तथा औरों की उपेक्षा करती है, फलतः वे नष्ट हो जाते हैं। प्राणियों में बलवान निर्बलों को नष्ट करके अपने को सुरक्षित रखते हैं जिनमें अपने आपको परिस्थिति के अनुसार बना सकने की क्षमता होती है उन्हीं की सन्तान वृद्धि का क्रम चलता है। इस जीवन संघर्ष से विभिन्न गुणों-विभिन्न परिस्थितियाँ के अनुसार भेद उत्पन्न होता है और परंपरानुगत या आनुवांशिकता से पुष्ट होते हैं।

कुल मिलाकर यह कि विकासवाद के अनुसार मनुष्य पहले बन्दर था अर्थात् पृथ्वी पर जीवन का क्रमशः विकास हुआ। तथा जीवितों में जो योग्य शक्तिशाली और सबल थे वे बचे रहे एवं अन्य प्राणी नष्ट हो गये। डार्विन के बाद ही उनके इस सिद्धांत का खण्डन होने लगा था। उनके एक प्रमुख सहयोगी अल्फ्रेड रसेल वालेस ने, जो डार्विन की बाद भी विकास सिद्धान्त की गवेषणा करते रहे अन्त में कहा-”मैंने विकास के अन मौलिक नियमों को सरल और गम्भीर परीक्षा की है जिनको डार्विन ने अपने अधिकार के बाहर समझ कर जानबूझकर अपने ग्रन्थों में नहीं लिखा और उन नियमों की परीक्षा के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जीवन अभी भी अव्याख्येय है।”

आल्फ्रेडरसेल वालेस ने यह मन्तव्य अपनी पुस्तक “दि वर्ल्ड ऑफ लाइफ” में प्रकट किया था। चार्ल्स डार्विन के पुत्र जार्ज डार्विन ने स्वयं सन् 1905 में कहा था कि जीवन का रहस्य अभी भी उतना ही गूढ़ है जितना कि पहले था।

प्रो. पैट्रिक गेडीस ने कहा है कि-हम नहीं जानत कि मनुष्य कहाँ से आया और कैसे आया? यह मान लेना चाहिए कि मनुष्य विकास के प्रस्तुत किये गये सिद्धान्त पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में संदिग्ध है।

स्वयं डार्विन ने भी लिखा था कि ये सिद्धान्त कोई अन्तिम रूप से सत्य नहीं है। हो सकता है कि आगे चलकर उनमें कुछ और नये तथ्य जुड़ जायें।

प्रो. ओर्वेन का कहना था कि-”मनुष्य अपने प्रकार की एक मात्र जाति है और अपनी जाति का एक मात्र प्रतिनिधि”। बन्दर से मनुष्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सर जे. डबलू. डौसन ने कहा है- “बन्दर और मनुष्य के बीच की आकृति का कुछ भी पता नहीं है। मनुष्य की प्राचीनतम अस्थियाँ भी मनुष्यों की सी ही हैं। उनमें उस विकास का कुछ भी पता नहीं चलता जो मनुष्य शरीर के पहले हुआ।”

इन सब वैज्ञानिकों से अधिक विस्मयजनक और डार्विन के विकासवाद से एकदम विपरीत वैज्ञानिक अवधारणा प्रस्तुत की है प्रसिद्ध जीवशास्त्री जौन टी. रीड ने। उन्होंने कई तथ्यों, प्रमाणों और पुरातत्व अवशेषों के आधार पर कहा है कि- “मनुष्यों का विकास बन्दरों से नहीं हुआ प्रत्युत बन्दर ही मनुष्यों से जन्मे हैं।” इस सिद्धान्त को व्याख्या करते हुए जॉन टी. रीड ने कहा है कि-”प्राचीनकाल में मनुष्य ने ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नति की थी।उनमें से कईयों के सिर कमजोर हो गये। ऐसे कमजोर सिर वाले मनुष्यों में से कई तो बनमानुष हो गये।”

विकास सिद्धान्त के अनुसार जब एक ही जाति के प्राणी निर्बल और कमजोर होकर जीवन संघर्ष में हारने लगते हैं तथा उनसे शक्तिशाली उन्हें परास्तकर आगे बढ़ने लगते है तो यह असम्भव नहीं है कि मनुष्य जाति का ही एक भाग मस्तिष्क से कमजोर होने लगा तथा उसमें और दूसरे गुण उत्पन्न हो गये। फलतः आदमी बन्दर के रूप में उछल कर वृक्ष की डाल पर जा बैठा।

यह तो अब तक की नवीन शोधों से सिद्ध हो चुका है कि बन्दर से मनुष्यों की उत्पत्ति का सिद्धान्त किन्हीं ठोस आधारों पर प्रतिपादित नहीं है। डार्विन ने विकास का अध्ययन करने के लिए संसार के कई भागों की यात्रा की और जीव जन्तुओं की एक-एक जाति में अगणित भेद पायें। इन भेदों की मालथस सिद्धान्त के अनुसार संगतियाँ बिठाकर विकासवाद का सिद्धान्त स्थिर किया। मालथस के अनुसार कोई भी जीव,जाति की संख्या में अधिक बढ़ जाने के कारण जीवन संघर्ष में हार जाती हैं और उसी जाति के कुछ सदस्य नयी विशेषताओं के साथ जीवित रहने हैं।

डार्विन ने इन परिवर्तनों का आधार जीवन संघर्ष मानते हुए विभिन्न आकार प्रकार वाले जीव-जन्तुओं की कड़ियाँ मिलायी और कहा कि पृथ्वी पर जीवन सरल से जटिल की ओर सर्जित होता गया। कई स्थानों पर प्राप्त बहुत पुराने प्राणियों के अवशेषों को आधार बना कर उन्होंने यह सिद्ध करने की चेष्टा की कि सब प्राणी एक ही मौलिक शरीर यंत्र के परिशोधित एवं परिवर्धित रूप है। उदाहरण के लिए सर्वप्रथम बनी साइकिल बहुत ही भद्दे और भौंड़े ढँग की थी।साथ ही वह इतनी आसानी से चलायी भी नहीं जा सकती थी जितनी आसानी से कि हम चला लेते हैं। उसमें सुधार होते-होते ही साइकिल का वर्तमान स्वरूप बना।

इस तर्क का उत्तर देते हुए ‘साइन्स एण्ड रिलीजन’ के लेखक डॉ. जे. एम. फ्लोमिंग ने लिखा है- ‘भले ही साइकिल एक ही यन्त्र का विकल हो किन्तु मोटर, रेल, वायुयान तथा कारखानों के यन्त्र तो सब साइकिल के विकास नहीं है। इसी तरह साँपों के अवांतर भेद से साँपों का विकास भले ही हो परन्तु कनखजूरा जैसे सैकड़ों पैरवाला जीव, गिराया आदि साँपों के विकसित रूप नहीं हो सकते हैं। फिर भी मानल कि ये सांप की ही विकसित पीढ़ियाँ है तो फिर सांप को इस पृथ्वी से विलुप्त हो जाना चाहिए था, क्योंकि डार्विन के अनुसार जीवन संघर्ष में आत्मरक्षा के लिए प्रकृति ने ही उन्हें यह नया आकार प्रकार दिया।

कहा जाता है कि सूक्ष्म जन्तुओं का ही मछलियों कछुओं, पक्षियों, बंदरों तथा मनुष्यों के रूप में विकास हुआ। यदि यही विकास क्रम वास्तविक है तो फिर बन्दरों से बन्दरों की, मनुष्यों से मनुष्यों की, पक्षियों से पक्षियों की और मछलियों से मछलियों की ही उत्पत्ति क्यों होती है? आज भी बन्दरों की परम्परा से मनुष्यों का जन्म होना चाहिए। थोड़ी बहुत समानता से अन्यत्र अन्य रूप में परिणाम हो -यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कितने ही पौधे समान रूप आकार-प्रकार के होते हुए भी गुण और लक्षणों में भिन्न होते है। एक समान दिखाई देने वाले कितने ही पौधे औषध भी होते हैं- और विष के समान भी। एक समान घोड़ों में भी हय, अश्व और अर्वा घोड़ों की जातियों में अलग-अलग गुण, स्वभाव और आदतें पायी जाती हैं। यही क्यों एक ही आकृति के मनुष्यों में भी कोई दृष्ट दुर्जन होता है तो कोई सन्त सज्जन।

ईश्वर ने हर प्राणी को अपनी स्वतन्त्र सत्ता सृष्टि के आरम्भ में ही दी है। अमीबा अभी भी अमीबा ही है। मनु भी सन्तान मानव ने अपनी लम्बी यात्रा में कई उतार चढ़ाव तो देखें होंगे, परन्तु मनुष्य किसी और रूप में इस सृष्टि पर आया तथा आकृति में विकसित होता गया, चह असम्भव ही है। सन् 1923 में नेवादा की खुदाई करते समय 6 लाख वर्ष पुराना एक जूता मिला है है। उस जूते की सिलाई धागा को मरोड़ और मात्र इतना कौशलपूर्ण है कि वह आज के किसी भी जूते की तुलना में अधिक मजबूत सिद्ध होता। है। यही नहीं वहाँ ऐसे प्रमाण भी मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि तब वहाँ कोई बहुत विकसित सभ्यता रही होगी। स्मरणीय है वहाँ प्राप्त अवशेषों की आयु भूगर्भ विद्या शास्त्रियों ने निर्धारित की थी। ‘थियोसोफिकल पाथ’ पत्रिका के अगस्त 1923 अंक में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि नेवादा की सभ्यता आधुनिक सभ्यता की तुलना में कही भी उन्नीस नहीं ठहरती।

विकास सिद्धांत के अनुसार अब से साठ हजार वर्ष पूर्व ही इस धरती पर आदि मानव के चरण पड़े तो नेवादा की छह लाख वर्ष पुरानी सभ्यता कौन से जीवों ने विकसित की थी। विकासवादियों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है। यह ठीक है कि मानव सभ्यता उत्थान और पतन, प्रगति और अवनति के कई दौरों से गुजरी। साधनों ने उसके चिन्तन और कर्तृत्व तथा जीवनयापन के क्रम में परिवर्तन किया होगा। इतने पर भी मानव की मूल सत्ता-जिसे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति कहा जाता है आरम्भ से ही अपनी मौलिक विशेषताओं को साथ लेकर जन्मी है और उन्हें पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त करने तक अपने अन्तरंग में धारण किये ही रहेगी।


VigyapanSuchana

फार्म-4

1. प्रकाशन का स्थान- मथुरा

2. प्रकाशन का अवधि क्रम- मासिक

3. मुद्रक का नाम- मृत्युंजय शर्मा

राष्ट्रीयता- भारतीय

पता-जन-जागरण प्रेस, मथुरा।

4. प्रकाशक का नाम- मृत्युंजय शर्मा

राष्ट्रीयता- भारतीय

5. सम्पादक का नाम- भगवती देवी शर्मा

राष्ट्रीयता- भारतीय

पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।

6. स्वत्वाधिकारी- मृत्युंजय शर्मा

पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।

मैं मृत्युंजय शर्मा यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विचरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।

-हस्ताक्षर, मृत्युंजय शर्मा


असन्तोष का कारण अनुपयुक्त आकाँक्षाऐं

असन्तोष मानसिक दरिद्रता का चिन्ह है। यह एक ऐसा मासिक सन्ताप है जो मनुष्य को निरन्तर गीली लकड़ी की तरह कष्ट के साथ जलाया करता है। इसकी उत्पत्ति अभाव की भावना से होती है जिसके फलस्वरूप मनुष्य अपने को दीन-हीन अन्यों की तुलना में समझता रहता है। ईर्ष्या एवं हीनता के भाव इसी कारण पैदा होते हैं।

असन्तुष्ट व्यक्ति के प्रसन्नता दूर चली जाती है तथा खिन्न रहता उसका स्वभाव बन जाता है। वह हर क्षण अपने अन्दर रोष, क्षोभ तथा तनाव का अनुभव करता तथा हर प्रकार के शोक-सन्तापों को आमन्त्रित करता है। खिन्नता असन्तुष्ट मन की अभिव्यक्ति है। असन्तोष से सिवाय कुढ़न, कुण्ठा, विषाद के कुछ हाथ नहीं लगता है। आशा, उत्साह एवं काम करने की क्षमता उससे नष्ट होने लगती है। मन ही मन कुढ़ते रहने से, कोई काम करने को जी नहीं चाहता और यदि कोई काम जैसे-तैसे किया भी जाता है तो मनोयोग के अभाव में कार्य वे वह कुशलता नहीं आ पाती जिसको देखकर सन्तुष्ट हुआ जा सकें। जीवन को सरस एवं सफल बनाने के लिए असन्तोष रूपी मानसिक, व्याधि का परित्याग बहुत आवश्यक है।

आज के भौतिक संघर्षपूर्ण जीवन में असन्तोष रूपी व्याधि छूत के समान बढ़ती जा रही है। इस वृद्धि के अनेक कारण है। जिनमें प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्ति प्रमुख है। स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना मनुष्य को आगे बढ़ने में सहायक होती है, एवं निरन्तर प्रेरणा देती है। आगे बढ़ने की आकाँक्षा से प्रेरित होकर व्यक्ति जी-जान से जुट जाता है तथा किसी से पीछे न रहने का हर सम्भव प्रयास करता है।

किन्तु यह गुण तब दोष बन जाता है जब अनावश्यक प्रतियोगिता की स्पर्धा पाल ली जाती है। जिन वस्तुओं की न तो जीवन में आवश्यकता है न ही उपयोगिता, ऐसी आकाँक्षाओं से अशान्ति के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता। आज अधिकांश व्यक्ति इसी प्रकार के अनावश्यक फैशन, प्रदर्शन, विलास की वस्तुओं तथा खर्चीले जीवन की स्पर्धा में लगे हैं।

प्रतिस्पर्धा की इस भावना का सदुपयोग जीवन के क्षेत्र में मितव्ययिता, सादगी, सज्जनता, परोपकार जैसे सद्गुणों के समावेश करने में हो तो सुख, शान्ति का कहीं अभाव नहीं दिखायी देगा। महापुरुषों ने ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन इसी दृष्टि से किया है। इस प्रकार के जीवन दर्शन को अपनाने वाला कभी असन्तोष से दूषित नहीं होता।

आकाँक्षाओं के महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता है। प्रगति के लिए यह आवश्यक भी है किन्तु उनका औचित्यपूर्ण होना आवश्यक है। यदि मनुष्य के हृदय में आकाँक्षाओं का उदय होना समाप्त हो जाय तो विकासशीलता का भाव अस्त हो जायेगा। आज संसार का जो विकसित स्वरूप दिखायी पड़ रहा है। वह बहुत से व्यक्तियों की आकाँक्षाओं का ही प्रतिफल है। वैज्ञानिक, कवि, कलाकार, शिल्पी, साहित्यकार की आकाँक्षाओं के फलस्वरूप ही संसार में साहित्य, अनुसंधान, सृजन एवं सौंदर्य दिखलाई देता है।

विकासशीलता का वर्तमान स्वरूप जो विश्व में दृष्टिगोचर हो रहा है। उसमें मनुष्यों को स्वस्थ आकाँक्षाएँ ही फलीभूत हुई हैं चाहे वह विज्ञान, कला, अर्थ राजनीति के क्षेत्र में हो अथवा धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में। अस्तित्वमय जगत, सृजनेच्छा की ही अभिव्यक्ति है। आकाँक्षा के अभाव में सृजन एवं प्रकाश असंभव है।

श्रेष्ठ आकाँक्षाएं जहाँ मनुष्य को महान बनाकर उसके जीवन में सुख-सन्तोष का समावेश करती है वहीं निकृष्ट एवं विकृत आकाँक्षाएँ उसे दुख, दारिद्रय, अशांति के नरक में ढकेल देती है। एक सुख शान्ति का जीवन में समावेश करती हुई समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होती है तथा वहीं दूसरी अशांति; क्लेशादि जीवन के दिन पूरा करती है। शान-शौकत, व्यसन, विलास, बहुत प्रदर्शन अपव्यय आदि की दूषित आकाँक्षाएँ निकृष्ट एवं हेय मानी गयी हैं। जिनसे समाज एवं संसार का हित सम्पादित होता है उन्हें श्रेष्ठ कहा गया है।

श्रेष्ठ आकाँक्षाओं से प्रेरित व्यक्ति अपने जीवन में उन चीजों को स्थान नहीं देते जिससे समाज का अहित होता हो, उनका सारा समय, श्रम श्रेष्ठता के अभिवर्धन में लगा रहता है। वे अपनी क्षमता एवं शक्ति का दुरुपयोग इन्द्रियों की भोग लिप्सा की पूर्ति के लिए नहीं करते वे अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का उपयोग श्रेष्ठता की ओर बढ़ने में करते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि जीवन में उन्हीं आकाँक्षाओं को स्थान दिया जाय जिससे स्वयं के साथ ही समाज का उपकार हो। अनावश्यक आकाँक्षाओं से पीछा छुड़ाकर सादा जीवन की रीति-नीति अपनाई जाय। यदि महत्वाकाँक्षाओं को छोड़ा तो जा सकता है जो निरर्थक एवं अनुपयुक्त हैं।


स्थूल प्रकृति भी विलक्षण कौतुकमय

मनुष्य अपनी सीमित सामर्थ्य और थोड़ी-सी वैज्ञानिक प्रतिभा के बल पर सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने का दावा करा है। निस्संदेह मानवी सभ्यता ने पहले की अपेक्षा हजार गुनी प्रगति की है और कल्पना-सी समझनी जाने वाली उपलब्धियाँ अर्जित की हैं, परन्तु सृष्टि, रहस्य या प्रकृति की लीला सम्पूर्ण रूप से उसकी समझ के बाहर ही है। फिलहाल अभी तो उन्हें नहीं ही समझा जा सका है। आगे कभी समझ पायेगा कि नहीं यह कहना भी मुश्किल है।

जब यह दावा किया जाता है कि प्रकृति जिन नियमों के अधीन होकर काम करती है और उन नियमों को जान लिया गया है तो बरबस ही प्रकृति उन विचित्रताओं की ओर ध्यान जाता है जो उन नियमों से सर्वथा हट कर साकार होती है।लगता है प्रकृति इन विचित्रताओं को प्रस्तुत कर मनुष्य के दम्भपूर्ण दावे का उपहास करती हों। इस प्रकार की विचित्रताओं में से कुछ इस प्रकार है।

मैड्रिड (स्पेन) के एक गाँव केखरा डिव्यू ट्रेगों में हर सन्तान पाँच से अधिक अंगुलियों वाली होती है। यह तो सर्वविदित है और हर कही देखा जा सकता है कि मनुष्य के दोनों हाथों और दोनों पैरों में पाँच-पाँच अंगुलियां होती हैं। किसी-किसी के हाथ में अपवाद स्वरूप छः अंगुलियाँ भी होती है परन्तु इस गाँव के सभी व्यक्ति पाँच से अधिक अंगुलियों वाले है। किसी-किसी की सात सात आठ-आठ अंगुलियां भी होती है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस प्रकार की असामान्यता निकटतम सम्बन्धियों में विवाह करने पर आनुवांशिकता के कारण ही विकसित हुई है। किन्तु फ्रैंक फोर्ट (जर्मनी) की एक महिला ग्रीटले मेयर के मुँह में दो जीभ थीं। वह बोल नहीं सकती थी। आज तक कभी किसी की दो जीभ नहीं हुई, अतएव इसे किसी प्रकार की अनुवाँशिक घटना नहीं माना जा सकता। ई॰ सन् 1955 में शांशी के गवर्नर लिप चुंग की दोनों आँखों में दो-दो पुतलियाँ होने का उल्लेख इतिहास का कहीं कोई उदाहरण नहीं पाया जाता।

टोरकोईग (फ्रांस) में 1793 में एक बालिका पैदा हुई जिसका नाम क्लीमेंट। क्लीमेण्ट के केवल एक ही आँख थी वह भी वह भी मस्तिष्क के बीचों बीच उस स्थान चेहरे के दूसरे स्थान, गाल की तरह सपाट थे। वह पूरी आयु तक जीवित रहीं। आज्ञाचक्र के स्थान पर आँख होने से उसे कोई अतीन्द्रिय या दूरदर्शन की क्षमता तो नहीं मिली थी परन्तु वह एक ही आँख से सब कुछ देख लेती थी और उसका सारा जीवन भी सामान्य हो रहा।

हैप्पी टैक्सास (अमेरिका) में एक बच्चा ऐसा पैदा हुआ जिसके कान थे ही नहीं मता पिता को इस विचित्र बालक के जीवित रहने की आशा नहीं थी परन्तु वह पूरी उम्र तक जीवित रहा। कान न देकर प्रकृति ने उसके मुँह को ही श्रवणेन्द्रिय बना दिया। वह किसी की भी आवाज को मुँह से सुन सकता था। जब कोई बात कर रहा होता या कोई आहट लेनी होती तो वह मुँह खोल कर दूसरे लोगों की तरह सुन लेता। उस व्यक्ति का नाम था डिकएलेन। अपने समय का एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ भी रहा था।

अफ्रीका के काफीर मैजियर्स का फ्रैक्वायस डाविलो एक ऐसा व्यक्ति था जिसकी खोपड़ी में 13-13 इंच लंबे सींग थे। ल्हासा में आज भी ऐसे अनेकों लोग हैं।

यह विलक्षणता केवल मनुष्यों तक ही सीमित हो ऐसी बात भी नहीं हैं। जीव जगत में भी अपनी विशेषताओं के साथ-साथ ऐसी अनेक अगणित आश्चर्य-जनक बातें देखी गयी है जिसका कारण समझ में नहीं आता। सील मछली सम्भवतः अब तक देखी गयी मछलियों में सबसे बड़ी है। यह मछली कुल डेढ़ मिनट में अपनी नींद पूरी कर लेती है।

‘काडफिश मछली एक ही मुँह को होती है। लेकिन कैलीफोर्निया के भिड़वे सिटी में लारेंस प्रिसली नामक व्यक्ति ने एक ऐसी काडफिश पकड़ी जिसके दो मुँह थे। ग्लास स्नेक’ सर्प को जरा-सा छू लिया जाय तो वह टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। इंग्लैण्ड में एली नाम स्थान में एच. जी. बोडेन नामक एक व्यक्ति के पास एक मुर्गी के अण्डे से ऐसा चूजा निकाल जिसके चार पैर थे। वह चारों पैर से चलता था।

कटर पिलर नामक एक ऐसा कीड़ा भी इसी धरती पर पाया जाता हैं जो एक अवधि तक तो कीड़ा रहता है पर उस अवधि के बाद प्यूपा स्टेज में आते ही एक पौधे में बदल जाता है। वनस्पति जगत और मानवीय चेतना में जीवन चेतना की समानता का संभवतः यह सबसे बड़ा उदाहरण है।

ग्रीन्सवर्ग इण्डियाना में वाल्टर रेडेलमेन में पास एक ऐसी भेड़ थी जिसकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर कुछ भाग में नियमित रूप से घास उगा करती थी, शेष में ऊन। यह घास भेड़ को खिला दी जाती है। पैसिफिक सागर में रेड कायर फिश (मछली) के शरीर से आग की लाल लपटें निकलती हैं। इसी कारण इसका नाम रेडफायर (लाल अग्नि कहा) जाता है। यही मछली पानी की सतह से ऊपर उड़ भी सकती है और कौवे की तरह काँव-काँव भी बोलती है। जब यह बोलती है तो अनजान व्यक्तियों को कौवा बोलने का भ्रम होता हैं

व्रिस्टल निवासी राबर्ट व्हिटमोर ने एक बार ऐसी मछली पकड़ी जिसकी आँखों पर प्रकृति ने ही चश्मा लगा रहा था। यह चश्मा कोई दुकान पर बना हुआ नहीं था, बल्कि या बिल्कुल उसी तरह का। लेन्स के स्थान पर पारदर्शी झिल्ली लगी हुई थी और उसका फ्रेम जीवित रेशों से बना था, जैसे वह चश्मा उसकी के शरीर से उगा हो। उस जाति की अन्य मछलियाँ तो पूर्णतया सामान्य ही रहती है। परन्तु उसी मछली के आँखों पर चश्मा क्यों विकसित हुआ?

यह सभी जानते हैं कि सिर को धड़ से अलग कर देने पर कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता। कुछ जीव जन्तु ऐसे होते भी है जिन्हें काट दिया जाय तो वे एक के दो हो जाते हैं और अपनी-अपनी दिशाओं में चल पड़ते है। पर मुर्गी के बारे में तो ऐसा हर्गिज नहीं देखा गया है। 12 नवम्बर 1904 की बात है- साल्ट स्टेमेरी मिक (अमेरिका) में एक घटना घटी। बोल वेदर होटल के मालिक हर्बर्ट ह्यूज ने पकाने के उद्देश्य से एक मुर्गी का सिर काटा। अभी वह सिर एक ओर रख हो रखा था कि शेष धड़ वहाँ से भाग निकला। मुर्गी का वह सिर रहित धड़ न केवल चलता था वरन् पंख भी फड़फड़ाता और पंजे से कोई चीज पकड़ कर बैठ भी जाता। बोलने के लिए गर्दन ऊँची करने की ठीक वैसी ही हरकत करता जैसे कोई जीवित मुर्गी करती है।

इस दृश्य को देखने के लिए दो सप्ताह से भी अधिक समय तक हजारों लोग आते रहे। उसके फोटो उतारे गये, समाचार पत्रों ने यह समाचार छापा, मूवी चित्र लिये गये। होटल मालिक ने पहले तो इसे पकाने के उद्देश्य से मार डालना चाहा पर यह मुर्गी जब उसके लिए भी अनूपा हो गयी। सिरंज के माध्यम से उसके शरीर में खाना पहुँचाया जाता रहा। इस तरह वह 17 दिन तक जीवित रहीं। संभवतः वह अभी और जीवित रहती पर एक दिन एक लापरवाह नौकर के हाथ से छूट कर हवा पाइप उसकी गर्दन पर गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

मनुष्य अभी स्थूल प्रकृति के रहस्यों को ही नहीं समझ पाया है तो यह किस आधार पर कहा जा सकता है, सूक्ष्म चेतना नाम की कोई शक्ति सत्ता नहीं है। उन आश्चर्यों का आधार क्या है? विज्ञान यह अभी नहीं समझ पाया है तो सूक्ष्म चेतना की वास्तविकता समझने और नकारने का क्या आधार है?


आत्म चेतना का प्रबल आकर्षण बिल

जीव और ब्रह्म में, आत्मा और परमात्मा में संबंध स्थापित करने के लिए विभिन्न योग साधनाओं का सहारा लिया जाता है। उन सभी योग साधनाओं में, चाहे वह भक्तिपरक हों या ज्ञानपरक, कर्मपरक हों अथवा तन्त्र मार्गी-ध्यान का महत्व पूर्ण स्थान है। क्योंकि यही वह सेतु है जिससे चढ़ कर आत्मा परमात्मा तक पहुँचता है, यही वह डोर है जिससे जीव ब्रह्म से बँधता है।

ध्यान में अपनी बिखरी हुई चित्तवृत्तियों को सब और से समेट कर एक दिशा में, इष्ट में नियोजित किया जाता है। शास्त्रकारों का कथन है कि ईश्वर का अनन्य भाव से चिन्तन, साधक को भी ईश्वर बना देता है। अग्नि में पड़ कर ईधन जिस प्रकार अग्निमय हो जाता है, उसी प्रकार ध्यान द्वारा साधक अपनी चेतना को ईश्वर में आहुत कर स्वयं भी ईश्वर स्वरूप हो जाता है। यह ध्यान साधना का अलंकारिक प्रतिपादन नहीं है। ईश्वरीय सत्ता का तन्मयतापूर्वक भाव भरा चिन्तन व्यक्ति चेतना को क्रमशः विकसित करता चलता है और आत्मा से परमात्मा की मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। यह यात्रा किस प्रकार सम्पन्न होती है यह तो अनुभव गम्य ही है परन्तु इस साधना के पीछे छुपे तत्व दर्शन का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है। सर्वविदित है कि बिखरी हुई शक्तियाँ और वस्तुएँ बहुत दुर्बल होती हैं। बिखरी हुई बुहारी की सीकों से धूल का एक कण भी साफ नहीं किया जा सकता, परन्तु वे जुड़ कर सूत्र में बंध कर एक दिशा में कार्य करने लगती हैं तो सारी गन्दगी देखते ही देखते साफ हो जाती है बिखरी हुई सूर्य किरणों से साधारण गर्मी तथा प्रकाश ही मिलता है। परन्तु उन्हें केन्द्रित कर लिया जाय तो विराट् ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। आज-कल सौर ऊर्जा के माध्यम से कारखाने चलाने और बिजली पैदा करने की बात सोची जाती है, उसका उत्पादन भी सूर्य किरणों को केन्द्रित करके ही किया जाना सम्भव है।

ईश्वरीय सत्ता की उल्लेखित विशेषताओं की तुलना में जीव की सामर्थ्य निस्सन्देह तुच्छ है परन्तु उसमें विकास की भी उतनी ही सम्भावना है जितनी कि बीच के वृक्ष होने की। ध्यान के द्वारा उस संभावना को साकार करने के उपयुक्त पात्रता का विकास ही किया जाता है। यह सम्भावना किस प्रकार साकार होती है यह उदाहरण द्वारा भी भली भाँति समझा जा सकता है। प्रवाहमान नदी की धारा में कई बार भयंकर प्रवाह पड़ते देखे गये हैं इनकी सामर्थ्य इतनी अधिक होती है कि उधर से गुजरने वाली नावों और जहाजों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। यह भंवर इसलिए पड़ते है कि नदी का सम्पूर्ण प्रवाह सब दिशाओं से उसी स्थान पर केन्द्रित हो जाता है। विभिन्न दिशाओं में बहने वाली हवा जब किसी बिन्दु पर केन्द्रित होने लगती एक स्थान पर आकर मिलने लगती है तो चक्रवात उत्पन्न हो जाते हैं। चक्रवातों की क्षमता कितनी विघातक है? यह उदाहरण है किन्तु मानवीय चेतना में ध्यान के द्वारा जो शक्ति जागृत होती है वह व्यक्ति की समस्त क्षुद्रताओं, मलीनताओं, अवांछनियताओं को उखाड़ फेंकने और मनुष्य को उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर ले पहुँचने में समर्थ है।

पिण्ड ब्रह्माण्ड की ही एक छोटी अनुकृति है। एक परमाणु भी अब उतना रहस्यमय हो गया है जितना कि ब्रह्माण्ड। केन्द्रीभूत होकर सिकुड़ कर कई ग्रह−नक्षत्र और तारे भी इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि वे दिखाई पड़ने में तो 60 किलोमीटर व्यास के लगते हैं परन्तु हमारे सौरमण्डल के सूर्य जैसे दस सूर्यो के बराबर शक्ति रखते हैं और ऐसे एक दो या सौ दस बीस नहीं दो सौ तारों का पता लगाया जा चुका है जो आकर में दिल्ली जैसे शहर से भी छोटे होने के बावजूद पृथ्वी का अपनी कक्षा से खींच कर अलग हटा सकते है।

कैसे निर्माण होता है इन शक्तिशाली तेज पुर्जों का यह भी कम रोचक रोमाँचक नहीं है। अन्तरिक्ष में फैली हुई हाइड्रोजन गैस का बादल जिन्हें ‘नेव्यूल’ कहा जाता है, धीरे-धीरे साधन होता जाता है। जैसे-जैसे वह सघन होता है उसमें ऊर्जा उत्पन्न होने लगती है, इनकी मद्धिम चमक असंख्य मीलों दूर से देखी जा सकती है। इन तारों से निरन्तर शक्ति प्रवाह निकलता रहता है। इन तारों से निरन्तर शक्ति प्रवाह निकलता रहता है और उसके साथ ही वह सिकुड़ना शुरू हो जाता है। यह प्रक्रिया अरबों खरबों वर्ष में जा कर पूरी होती है। तारे जैसे-जैसे सिकुड़ने लगते हैं उनका घनत्व भी बढ़ता जाता है। यह तो सर्व सामान्य बात है कि वस्तु का घनत्व जितना अधिक होगा उसका आकर्षण बल और भार भी उतना ही बढ़ जाता है। निरन्तर सिकुड़ते रहने के बाद एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि तारे उसमें ज्यादा नहीं सिकुड़ सकते और एक ऐसे ऊर्जा स्त्रोत में बदल जाते हैं जो आकार में अपने से कई गुने बड़े ग्रह नक्षत्रों को भी उसकी कक्षा से खींच कर अपनी ओर आकर्षित करने लगते हैं। वैज्ञानिकों ने इन तारों को ब्लैक होल का नाम दिया है।

ऐसे ‘ब्लैक होल’ का अस्तित्व पहली बार आठ दिसम्बर 1972 में ही मालूम हुआ। कई वर्षा से इसके पूर्व खगोल शास्त्री कुछ तारों और उनमें सौरमण्डल के सदस्यों में एक विशेष बिन्दु पर असामान्य स्थिति लक्ष्य कर रहे थे। ये पिण्ड अपने निश्चित पथ से विचलित हो जाते थे और उस विशेष बिन्दु से हटने के वाद पुनः सामान्य पथ पर घूमने लगते थे। वर्षों तक अन्तरिक्षयान और उपग्रहों में लगाये गये यन्त्रों से लिये गये रेड फोटो तथा एक्सरे परीक्षणों से इस बात की पुष्टि हुई कि यह विचलन ‘ब्लैक होल’ नामक अज्ञातपिण्डों की प्रबल आकर्षण शक्ति के कारण होता है।

पृथ्वी के सबसे समीप वाले ब्लैक होल की पृथ्वी से दूरी 7500 प्रकाश वर्ष है। (एक प्रकाश वर्ष अर्थात् एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है। यह एक प्रकाश वर्ष दरी का मतलब है। दस-हजार अरब किलोमीटर। यानी कोई यान प्रकाश की गति से चले तो वह 7500 वर्षों में सबसे समीप वाले ब्लैक होल तक पहुँच सकेगा। सबसे नजदीक वाले ब्लैक होल को वैज्ञानिकों ने साइगनस एक्स नाम दिया है। ‘साइगनस एक्स-1’ नामक ब्लैक होल का अर्द्ध व्यास 60 किलोमीटर है जबकि उसका भार 10 सूर्यो के बराबर है। यह तारा जब चमकता रहा होगा तब हमारे सूर्य से दस गुना बड़ा रहा होगा। परन्तु जब इसमें इतनी आकर्षण शक्ति नहीं थी जितनी कि अब है।

‘साइगनस एक्स 1’-अथवा उस जैसे अन्य ब्लैक होलों में इतनी अधिक आकर्षण शक्ति है कि सूर्य से दस गुना बड़ा कोई भी आकाशीय पिण्ड उसके आस-पास से गुजर जाय तो वह उसे अपने पथ से विचलित कर सकता है और यदि वह विण्ड ब्लैक होल से आकार में छोटा हुआ तो ब्लैक होल उसे उदरस्थ कर लेता है। ब्लैक होल अपने आस-पास के ताराओं से पदार्थ खींच कर अरना सीमा क्षेत्र निरन्तर बढ़ाता रहता है। उस सीमा क्षेत्र में निरन्तर एक्स किरणों उत्सर्जित होती रहती हैं।

इन शक्ति किरणों के उत्सर्जन का एक मात्र कारण उस तारे का-जिसने ब्लैक होल का रूप धारण किया है-निरन्तर सिकुड़ते जाना है। कहना चाहिए एक बिन्दु की ओर केन्द्रित होते जाना हैं। यद्यपि ब्लैक होल से इसकी कोई संगति नहीं बैठती, फिर भी इतना तो समझा ही जा सकता है कि ध्यान साधना में व्यक्ति की मनः शक्ति का बिखराव एक स्थान पर सिमटता जाता है। शक्ति का वह केन्द्रियकरण ऐसा चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करता है कि व्यक्ति सिद्ध सन्तों और योगी पुरुषों की श्रेणी में जा बैठता है।

बिखराव इकाइयों की शक्ति को तो बिखेरता ही है, उसके वजन को हल्का कर देता है। कागज की बड़ी रील को, जिसका उपयोग अखबार छापने में किया जाता है, एक नदी पर फैलाया जाय तो वह पानी पर तैरने लगेगी परन्तु उसे लपेट कर पानी में डाला जाय तो वह अपने ही बराबर वजनदार दूसरी वस्तु को भी पानी में ले डूबेगी। कागज का वजह वही है। परन्तु उसका फैलाव सिकुड़ने के कारण शक्ति बढ़ जाती है। मनुष्य की बिखरी हुई चित्तवृत्तियाँ भी जब एक केंद्र पर एकत्रित होने लगती है तो वही शक्ति मिलकर कमाल कर दिखाती है।

‘ब्लैक होल’ में भी इसी तरह की शक्ति सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है। उसके सीमा क्षेत्र में कणों के प्रबल आकर्षण से घनत्व असामान्य रूप में बढ़ जाने के कारण एक पिन के आधार की वस्तु का वजन दस हाथियों के बराबर हो जाता है। इस बात को यों भी कहा जा सकता है कि यदि दस हाथियों को ब्लैकहोल के सीमा क्षेत्र में पहुँचाया जाय तो वहाँ उन सबका सम्मिलित आकार एक पिन से अधिक नहीं होगा। अर्थात् ब्लैकहोल का एक पिन यदि हाथी की पीठ पर रख दिया जाय तो उसके बोझ से दबकर हाथी जमीन पर बैठ जायेगा।

असामान्य घनत्व और प्रबल आकर्षण शक्ति के कारण ‘ब्लैक होल’ क्षेत्र में प्रवेश करने वाली वस्तुओं की गति भी प्रकाश वेग के बराबर हो जायेगी। इसे यों भी समझा जा सकता है कि यदि कोई मनुष्य ब्लैकहोल के क्षेत्र में प्रवेश कर जाय तो वह गुरुत्वबल के कारण अस्तित्वहीन हो जायेगा, किन्तु उसकी गति प्रकाश की गति के बराबर हो जायेगी। प्रकाश की गति से चलने पर समय का अस्तित्व भी नहीं रह जाता है। अर्थात् ब्लैक होल की यात्रा करने और दस हजार अरब कि.मी. घूम लेने के बाद पृथ्वी पर वापस आयेगा तो वह घड़ी के हिसाब से वहीं का वहीं होगा।

अणुओं की सघन स्थिति और प्रबल आकर्षण शक्ति वाले ‘ब्लैकहोल’ साइगन्स एक्स-1 सूर्य से भी अधिक शक्ति उत्सर्जित करता है। इस ब्लैक होल से एक सेकेंड में इतनी शक्ति उत्सर्जित होती है कि उससे पृथ्वी पर कारों को 100 कि.मी. प्रति घंटे की गति से निरन्तर दौड़ाया जाय तो उन्हें 10 अरब वर्षों तक चलाया जा सकता है।

यह तो फैले हुए स्थूल कणों के सिकुड़ने और सघन होने से उत्पन्न हुई प्रचण्ड शक्ति है। अभी तक इससे कोई लाभ उठाने की सम्भावना नहीं दिखाई पड़ी है। कुछ लोगों ने यह विचार जरूर किया है कि पृथ्वी पर जब प्राकृतिक ऊर्जा के स्त्रोत निरन्तर सूखते जा रहे हैं तो किसी प्रकार इन ‘ब्लैक होलों’ की शक्ति का उपयोग किया जाय। परन्तु यह विचार अभी कल्पना ही है।

लेकिन चेतना के विश्रृंखलित और अनियंत्रित फैले स्वरूप को, बिखरी हुई चित्तवृत्तियों को संगठित किया जाय तो इसी जीवन में प्रचंड शक्ति प्रवाह अपने भीतर ही पैदा किये जा सकते हैं। उस सम्भावना के बीच में जीव में विद्यमान हैं, आवश्यकता है ध्यान और साधना का खाद पानी भर देने की। फिर तो ब्रह्म के समान समर्थ बनने का अवसर मिल सकता है। तपस्वी; ज्ञानी, तत्वज्ञ इन्हीं शक्ति स्त्रोतों को प्रचंड बनाने और उनका आत्मकल्याण तथा लोक कल्याण के प्रयोजन में उपयोग करने का प्रयत्न करते रहते हैं।


निरंकुश भोगवाद अपराधी प्रवृत्तियों को बढ़ाता है।

अपराधों के बारे में जो सरकारी आंकड़े उपलब्ध है, वे इस तथ्य का प्रमाण हैं कि अपने देश में अपराधों लगातार बढ़ रहे है। पुलिस के प्रतिवेदनों के ही अनुसार बम्बई, दिल्ली, बैंगलौर कलकत्ता, मद्रास, कानपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद में 1976 की तुलना में 1977 में अपराध अधिक हुए। सर्वाधिक अपराध मुंबई में दर्ज किये गये-शेष शहरों में उपर्युक्त क्रम से ही अपराधों की संख्या कम दर्ज है। बम्बई में जनवरी, फरवरी और मार्च 1977 इन तीन महीनों में ही आठ हजार दो सौ साठ अपराध पुलिस के रोजनामचे में अंकित किये गये। इससे कहीं अधिक अपराध ऐसे भी होते हैं, तो नागरिकों की उदासीनता, पीड़ित पक्ष के मन में पुलिस के आतंक या आक्रामक पक्ष का पुलिस पर प्रभाव-दबाव अथवा किसी प्रलोभन के अभाव में पुलिस की अनिच्छा आदि कारणों से दर्ज नहीं किये जाते।

शासकीय आँकड़ों के ही अनुसार सन् 77 के आखिरी महीनों में देश में हत्याओं की संख्या बढ़ी, ग्रामीण क्षेत्रों में डाकुओं की संख्या बढ़ी। रेल -यात्रा और राजमार्गों पर बसों से यात्रा अधिक असुरक्षित हो गई। गुंडागर्दी और बाल अपराध भी बढ़े तथा शासन के विरुद्ध रोष-प्रदर्शन की आड़ में अराजक तत्वों की उपद्रवी गतिविधियाँ भी बढ़ी, जोकि वस्तुतः राजनैतिक कम, आपराधिक अधिक हैं।

दंगे को प्रायः साम्प्रदायिक रूप दिया जाता है। किन्तु उनकी तह में जाने पर भी यही स्पष्ट होता है कि प्रायः किसी शहर-कस्बे के कुछ गुँडे, उद्दंड किस्म के मनचले आवारा नौजवान सर्वथा निजी कारणों से अपनी उन्मत्त गतिविधियों के द्वारा दंगों की शुरुआत करते हैं।

राजस्थान को अब तक अन्य राज्यों की तुलना में शान्त राज्य माना जाता था, किन्तु 1977 के वर्ष में वहाँ भी अपराधों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हुई। 77 के वर्ष में वहाँ भी अपराधों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हुई। 77 के वर्ष में जयपुर में 57 हत्यायें तथा साढ़े आठ हजार से अधिक अन्य अपराध अंकित किये गये। उदयपुर में 5 हजार दो सौ अपराधों के अतिरिक्त 43 हत्या के मामले दर्ज हुए। कोटा में भी अपराधों की संख्या लगभग उदयपुर जैसी ही रही और हत्यायें 45 दर्ज की गई। जबकि गंगानगर में हत्याओं की संख्या जयपुर के बराबर अर्थात् 57 रही।

पाश्चात्य चिन्तन शैली के अभ्यस्त कई समाज शास्त्रियों के अनुसार हत्याओं और अपराधों में यह वृद्धि स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज आज संक्रमण काल से गुजर रहा है और औद्योगिक क्रान्ति के दबाव से नये सामाजिक तनाव पैदा हो रहे हैं। आर्थिक दबाव यानी गरीबी तथा शहरीकरण जनित गुमनामी यानी अपरिचय की सुविधा इसके मुख्य कारण बताये जाते हैं। सामाजिक जागरूकता की वृद्धि गरीबों में धनिकों के प्रति क्षोभ उत्पन्न करती है तथा शहर में एक दूसरे के कुलशील, ठौर-ठिकाने का अता-पता न होने से अपराध कर गुमनाम हो जाना आसान हो जाता है-ऐसा इन समाजशास्त्रियों द्वारा विश्लेषित किया जाता है।

यदि विपन्नता और सम्पन्नता की भीषण विषमता से उत्पन्न तनाव अपराधों का मुख्य कारण रहा होता तो अमरीका में, इस तनाव का अभाव है, तब वहाँ गम्भीर अपराध नहीं होने चाहिए। किन्तु वास्तविकता इससे विपरीत है। अमरीका में प्रति आधा घंटे में एक हत्या हो जाती है। दूसरी और यदि गुमनामी या अपरिचय की सुविधा स्वाभाविक रूप में अपराध वृति को उभारने वाली हुआ करती, तो तीर्थ-यात्री भी अपरिचित स्थानों पर जाकर भीड़-भक्कड़ में अपराध किया करते। जबकि वे लोग तो तीर्थयात्रा के दौरान सामान्य से अधिक ही उत्कृष्ट आचरण का प्रयास करते हैं।

स्पष्ट है कि अपराधों की जड़ साधनों की प्रचुरता या अभाव अथवा अवसरों की उपलब्धि से सम्बन्धित नहीं है। अपितु वह मानवीय चिन्तन से सम्बन्धित हैं। सामाजिक परिवेश अपराधों के लिए उत्तरदायी तो है, किन्तु सामाजिक परिवेश का अर्थ समाज का भौतिक ढ़ाँचा या समाज में साधनों- उपकरणों का औसत नहीं है। अपितु समाज में किन गुणों, मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा है, इससे सामाजिक परिवेश बनता है।

जब तक सामाजिक परिवेश मानसिक उद्वेगों को बढ़ाने वाला रहेगा, समाज में उद्धत आचरण और अपराध-कर्म बढ़ते रहेंगे। वातावरण में ही व्यक्तियों का अंतरंग और बहिरंग ढ़ाँचा ढालने की क्षमता होती है। यदि वर्तमान ढांचे अस्वस्थ, असुंदर और अशिव रूपों का निर्माण करने वाले प्रतीत होते हैं तो उनका स्वरूप परिवर्तित करने की ही आवश्यकता है।

छोटी श्रेणी के पशु मात्र शरीर- स्वार्थ की पूर्ति के लिए हत्यायें करते हैं। किन्तु मनुष्य तो ऐसी भी हत्यायें और अपराध करते देखें जाते हैं, जिनसे न तो उनके शरीर का कोई लाभ पहुँचता है नहीं मन को। यह चिन्तन और भावनाओं की विकृति नहीं तो और क्या है?

अपराधी प्रवृत्ति भय, आशंका, अविश्वास, घृणा और लोभ की अधिकता से बढ़ती है। इन पर रोक लगाने का काम अन्तःकरण की वे आस्थाएँ ही कर सकती हैं जिन्हें आस्तिकता, धार्मिकता, आध्यात्मिकता, सदाशयता, सद्भावशीलता, संस्कारसम्पन्नता के रूप में जाना जाता है। सरकारी रोकथाम से बात अधिक बनती नहीं।

सरकारी रोकथाम के आधार है कानून और औजार है पुलिस। विकृत वातावरण में ये दोनों ही उद्देश्य पूर्ति में विफल-अक्षम सिद्ध हो जाते हैं। यह शिकायत आये दिन की जाती है कि पुलिस-प्रशासन में ईमानदार, निष्ठावान लोगों की कमी है। परन्तु सोचने की बात यह है कि पुलिस आसमान से नहीं टपकती। पुलिस के लोग और जनता एक ही ढाँचे की उत्पत्ति हैं। पुलिसमैंन अपराधी तथा पीड़ित-तीनों ही साथ-साथ गाँव को धूलभरी पगडंडियों में, हरे भरे खेत खलिहानों के बीच, बाढ़ और सूखे की मार सहते हुए बढ़ते हैं या फिर कस्बों-शहरोँ के मुहल्लों में साथ-साथ खेलते-घूमते बड़े होते है। यदि उस वातावरण में ही करुणा, संवेदना कोमलता की भावनाएँ उभारने वाले तत्व पर्याप्त मात्रा में रहें, तो अपराध की प्रवृत्तियाँ कभी भी बढ़ नहीं सकती।

जहाँ तक कानूनों की बात है, हर बुरे काम के विरुद्ध कानून है। अपराधियों के लिये जेल, पुलिस न्यायालय की पूरी व्यवस्था है। जाँच पड़ताल के लिये गुप्तचरों का सरकारी तंत्र है। इन सब पर भारी खर्च भी होता है। किन्तु अपराध दिनदहाड़े जारी हैं और बढ़ रहे है। पचास प्रतिशत अपराध तो अंकित ही नहीं किये, कराये जाते। जो दर्ज होते है, उनमें भी दस प्रतिशत पकड़ में नहीं आते। जितने लोग पकड़े जाते हैं उनमें से तीन-चौथाई तिकड़म-तरकीब, धन-आतंक, प्रभाव दबाव से छूट जाते हैं। दंड-प्रक्रिया दुरूह है ही। एक साधनहीन को न्याय पाना कठिन हो जाता है। निस्सन्देह पुलिस, न्यायालय, कारागार सभी की अत्यधिक आवश्यकता है। किन्तु अपराधों की रोकथाम इतने भर से नहीं हो सकती। ये प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियाँ तो अनीति-अत्याचार की वृद्धि पर कुछ सीमा तक ही रोक लगा सकती है। मुख्य आवश्यकता उन दुष्प्रवृत्तियों की प्रेरणा के आधारों को ही समाप्त करने की हैं। जो इन अपराधों तथा न्यायव्यवस्था में होने वाली चालाकियों के लिये उत्तरदायी हैं। जब तक अधिसंख्य जनता का मन दुष्प्रवृत्तियों को पकड़े रहेगा, तब तक अपराधों की बाढ़ सामाजिक बंधनों-मर्यादाओं को इसी प्रकार तोड़ती रहेगी।

सर्वसाधारण अपराधियों और पुलिस को कोसकर अपने कर्त्तव्यमुक्त तथा सज्जन मान बैठते है। इस भयानक भ्रान्ति का करण भी चिंतन की विकृति ही है। अपराध, अन्याय और अनीति का मौनदर्शक बना रहकर वह उसमें सहभागी हो रहा है, यह बात उसे समझ में नहीं आती। इसका कारण भी चिन्तन की विकृति ही तो है। आये दिन सड़क से युवतियाँ-महिलाएं दो-चार गुँडे अपहरण कर ले जाते हैं और सैकड़ों लोग ‘तमाशा’ देखते रहते हैं। दिनदहाड़े मार-पीट, खून खराबा मचाया जाता है और हजारों की भीड़ सहमी-सिमटी सब ताकती रहती है। यह सब अन्तः क्षेत्र में घुसी कायरता के अतिरिक्त और क्या है?

कायरता और आक्रामकता जुड़वा बहिनें हैं। भीतर से कायर व्यक्ति ही कमजोरों के प्रति आक्रामक होता है। इसी प्रकार स्वार्थान्धता और निष्ठुरता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्वार्थान्ध सदैव निष्ठुर होता है। असंस्कृत व्यक्ति करुणाहीन होता है तथा जिसे नीति में आन्तरिक निष्ठा नहीं है, वह अपराधी होगा ही।

वस्तुतः अपराधों का क्रम न्यायसंहिता की परिधि की पहुँच से बहुत से बहुत पहले प्रारम्भ होता है। जिन कार्या के लिये दंड-संहिता में कोई व्यवस्थाएँ नहीं हैं वे ही अपराधों के उद्गम-केन्द्र हैं। आलस्य-प्रमाद, असंयम, अशिष्टता, उद्धत आचरण, द्वेष, दुर्भाव, कुदृष्टि-कुभाव, कटु भाषण, अस्त-व्यस्तता, नशा-पानी, अस्वच्छता, अनुशासनहीनता, जैसी अवांछनियताएं सरकारी अंकुश से भले मुक्त हैं, पर वस्तुतः अपराधों की कारण-भूत उत्तेजनाएँ इन्हीं से पनपती-फैलती हैं। यही अवांछनियताएं बढ़कर विध्वंसक अपराधों-विभीषिकाओं का रूप ले लेती हैं। नैतिक और नागरिक मर्यादाओं का निरन्तर उल्लंघन तथा मानवीय संवेदनशीलता का निताँत अभाव ही अपराधों का वास्तविक आधार और प्रेरणा केन्द्र है क्योंकि ये ही आदमी को धीरे-धीरे खोखला, हीन और संकीर्ण बनाती हैं जिसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति अपराध करने और सहने के रूप में सामने आती है। जिन्हें स्तरहीनता, परपीड़न और मर्यादाहीनता में कोई संकोच नहीं होता, वे अनास्थावादी लोग ही अपराधी बनते, गुंडागर्दी अपनाते, आतंक उत्पन्न करते तथा चोरी-ठगी पर उतारू रहते हैं। यही अभ्यास उन्हें हत्या, बलात्कार जैसे नृशंस क्रूरकर्म में भी निर्लज्ज बनाये रहता है।

अतः अपराधों की बाढ़ से बचने के लिये अनैतिकता के आरम्भिक विकास पर दृष्टि डालनी चाहिए और उसे ही रोकने की व्यवस्था करनी चाहिए। भोग की निरंकुश भूख और मन की मनमानी उछल कूद को ही जिस समाज में स्वाभाविक मान लिया गया, वहाँ हिंसा, क्रूरता तथा अपराध अवश्यंभावी हैं।

अतः आवश्यकता आस्थाओं के परिष्कार की, अन्तःकरण के उत्कर्ष की है। अन्तःकरण को सुसंस्कारित बनाने, अध्यात्म की प्राण-प्रतिष्ठा का महत्व समझाने की है। कहने वाले प्रायः कहते है कि अध्यात्म से क्या होगा? उससे धन तो मिल नहीं जायेगा। उन्हें स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि अध्यात्म से धन नहीं, मानसिक वर्चस आत्मशान्ति, आत्मसन्तोष, वास्तविक आनन्द मिलेगा, जो धन से भी अधिक महत्वपूर्ण तो है ही। साथ ही जो धन के संरक्षण-सदुपयोग के लिये भी आवश्यक है। अराजकता-असामाजिकता की चपेट से धन भी बचा नहीं रह पाता। सुख-शान्ति तो भला उस स्थिति में कभी मिलती ही नहीं।

मनुष्य मूलतः अपराधी, अविश्वासी, असहयोगी और असंवेदनशील नहीं होता। इसके विपरीत, मनुष्य-स्वभाव में संवेदन, सहकारिता, सदाशयता भी कूटकूटकर भरी हुई है। ऐसी स्थिति में अपराधों की वृद्धि का कारण विकृत चिन्तन और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और क्या है? स्पष्ट है कि मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की ओर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आज की दुःस्थिति बदलने की नहीं।

भोगवादी दृष्टिकोण वाले समाज में साँस्कृतिक गतिविधियों का अर्थ भी नाच-गाने, कामोत्तेजना और सस्ते मनोरंजन तक सिमट कर रह गया है। किन्तु वास्तविक साँस्कृतिक गतिविधि वह है तो व्यक्ति को साँस्कृतिक-चेतना से सम्पन्न, सुसंस्कारित बनाए। उसमें सिद्धान्तों, विचारों की समझ पैदा करे और सही दृष्टि दे। जब तक व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा, उसकी भौतिक वृत्तियों को ही प्रधानता देकर उभारा-उछाला जाता रहेगा, तब तक समाज में पशुप्रवृत्तियों का प्राधान्य भी बना ही रहेगा।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि अपराधियों को दंड देने और अपराधों की धड़-पकड़ पर जितना ध्यान दिया और खर्च किया जाये, साँस्कृतिक चेतना के प्रसार हेतु उससे अधिक ही हो। इसे ही आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण-प्रसार कहा जाता हैं जब तक उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श आचरण की महत्ता व्यक्ति के अन्तःकरण में अंकित नहीं होगी, अपराधों की वास्तविक रोकथाम और समाप्ति सम्भव नहीं होगी।


घटनाओं का स्वरूप घटने से पहले ही बन जाता है।

मौसम का पता लगाने वाले यन्त्र तो अभी कुछ दशाब्दियों पूर्व निर्मित हुए हैं जिनके द्वारा आगामी 24 घंटों अथवा उससे कुछ अधिक समय का मौसम ज्ञात किया जा सकता है परन्तु इससे पहले भी लोग मौसम का पूर्वानुमान लगा लेते थे। वह पूर्वानुमान इतना सटीक बैठता था कि लोग उसी आधार पर खेत जोतने की तैयारियाँ करने लगते थे। मौसम अनुसंधान शालाओं द्वारा प्रसारित सूचनायें आज भी सीमित क्षेत्रों में ही पहुँच पाती हैं। परन्तु दूर दराज गाँवों में बसे आधुनिक सभ्यता और साधनों से कोसों दूर लोग पशु-पक्षियों की हरकतों को देखकर मौसम का अनुमान लगाते हैं तथा उसी आधार पर जुताई बुआई की तैयारियाँ करने हैं।

पशु पक्षियों को बहुत-सी प्राकृतिक घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। कहा जाता है कि कोई मकान गिरने वाला होता है और उसमें कोई बिल्ली रह रही होती है तो बिल्ली अपने बच्चों को उसमें से पहले ही निकाल लेती है। देहाती मरघट में जहाँ कभी-कभार कोई मुर्दा जलता है यदि कोई सियार लौटता दिखाई देता है तो गाँव के लोग समझने लगते हैं कि निकट भविष्य में ही कोई मरने वाला होता है। जब कुत्ते एक साथ मिलकर ऊँचे स्वर में रोने लगते है तो बताया जाता है कि उस गाँव में चोरी, डकैती, बीमारी, कलह, अग्निकाण्ड जैसे उत्पात होने वाले हैं।

कहा नहीं जा सकता कि ये मान्यतायें कहाँ तक सत्य हैं। परन्तु इन मान्यताओं के आधार में निहित तथ्य अवश्य सत्य पाये जाते है। वह तथ्य यह है कि जो घटनायें हमें आज घटती हुई दिखाई देती हैं उनके बीच अतीत के गर्भ में बहुत पहले ही विकसित हो चुके होते हैं। मकान का गिरना उसी समय दिखाई पड़ता है जबकि उसके टुकड़े जमीन पर गिरते दिखाई देते हैं परन्तु वास्तव में उसके गिरने की सूक्ष्म प्रक्रिया बहुत पहले से ही आरम्भ हो चुकी होती है कोई मनुष्य कितना ही आकस्मिक मरता हुआ जान पड़े परन्तु उसके मरने की प्रक्रिया काफी समय पहले शुरू हो चुकी होती है। यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार आरम्भ होती है जिस प्रकार किसी बच्चे का जन्म आज होता हुआ दिखाई दे परन्तु उसका गर्भाधान नौ-सवा नौ महीने पहले हो चुका होता है।

हमारी दृष्टि की पकड़ में वह घटनाक्रम तभी आता है जब वह दिखाई देता है अन्यथा घटनाओं की सम्भावना के बीज बहुत पहले ही पड़ चुके होते है। कई जीव जन्तुओं में इन बीजों का अंकुरण पहचानने की सामर्थ्य होती है। मुर्गे को सूर्य की प्रथम किरण का आगमन होते ही जबकि पूर्व के आकाश पर लालिमा छाने ही लगती है सूर्योदय की सम्भावना का पता लग जाता है। कितने ही अंधेरे और बंद स्थानों पर रखे जाने पर भी मुर्गे को निश्चित समय पर बांग देते हुए देखा जा सकता है। समुद्र में जब बादल बनना आरम्भ ही होते है तभी उन स्थानों पर मोर एक विशेष स्वर के साथ कूकने लगते हैं जहाँ कि वर्षा होती है। जब मोर खूब कूकने लगता है तो किसान समझ लेता है अब वर्षा शीघ्र ही होने वाली है। रूस के दक्षिणी भाग में एक ऐसी चिड़िया पाई गयी है जो भूकम्प आने के हफ्तों पहले उस स्थान दिखाई देना बन्द हो जाती है। अर्थात् उसे भूकम्प आने का आभास हो जाता है, जबकि आधुनिकतम विकसित यन्त्र भी भूकम्प की चेतावनी दो-तीन दिन से अधिक समय पहले नहीं दे पाते।

कई बार मनुष्यों में भी इस प्रकार आने वाली घटनाओं का आभास होता है। इधर पिछले कुछ वर्षों से तो परावेत्ताओं ने पूर्वाभास की घटनाओं को लेकर ‘प्रीर्कोग्नीशन’ के नाम से परामनोविज्ञान का नया ही अध्याय खोला है। लेकिन इस बात का पता नहीं लगाया जा सकता कि पूर्वाभास का करण क्या है? डा. पुहरिच ने लिखा है कि- “एलन बैधन नामक एक अमरीकी को राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या का पूर्वाभास एक सप्ताह पूर्व ही हो गया था। बैधन ने कैनेडी की हत्या से एक सप्ताह पहले सपने में देखा था कि वे एक हॉल के रास्ते बहुत से युवकों के साथ एक पार्टी में जा रहे है तभी गोली चलती है और कैनेडी गिर पड़ते हैं। बैधन-जो एक उच्च शिक्षण संस्थान में प्राध्यापक था, इस स्वप्न को देख कर चिंतित हो गया। उसने अपना यह स्वप्न लिखकर स्वप्नों पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों के पास भेजा तथा’ लिखा कि यदि वे चाहें तो इस बात की सूचना राष्ट्रपति को दे दें। किन्तु प्राध्यापक की चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया गय और सप्ताह भर बाद ही जून 1968 को राष्ट्रपति कैनेडी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी।”

डा. पुहरिच अमेरिका के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक हैं तथा उन्होंने वर्षों तक अतींद्रिय ज्ञान की विभिन्न धाराओं का अध्ययन किया है। अब्राहम लिंकन द्वारा अपनी मृत्यु का पूर्वाभास स्वप्न में होने की घटना तो सर्वविदित ही है। कहा जाता है कि इस प्रकार पूर्वाभास देने वाले स्वप्न आकस्मिक संयोग अथवा भयभीत अचेतन मन की कल्पनायें ही होती हैं जो कभी-कभी सत्य भी हो जाती है। लेकिन ऐसी भी कई घटनायें हैं जिनके सम्बन्धित व्यक्तियों से पूछे जाने पर भावी घटनाओं का यथा तथ्य चित्रण कर दिया। ऐसे कई भविष्यवक्ता विश्वख्याति प्राप्त कर चुके हैं। जीन डिक्सन, पीटर, हरकैम्स, प्रो. हेटार जैक एंडरसन आदि भविष्यवक्ता इसी श्रेणी के है।

“टाइम्स ऑफ इण्डिया” के 23 मई 1967 के अंक में एक रेल दुर्घटना के विवरण के साथ-साथ राजस्थान विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग द्वारा किये गये अध्ययन का समाचार भी प्रकाशित हुआ था। जयपुर की एक सामान्य गृहस्थ महिला श्रीमती रत्नमणि जैन के बारे में “टाइम्स ऑफ इण्डिया” के संवाददाता को यह सूचना मिली कि उन्हें पूर्वाभास के अनेक अनुभव होते रहने है वह 16 मई 67 को उनके निवास स्थान पर पहुँचा। संवाददाता ने विभिन्न बातों पूछने के बाद यह पूछा कि वे किसी ऐसे पूर्वाभास की सूचना दें जो इस समय घटित नहीं हुआ है। यह पूछा जाने पर श्रीमती जैन ने अपने एक पूर्वाभास के अनुभव का वर्णन करते हुए कहा-एक रेल दुर्घटना होने वाली है। दुर्घटना काफी भयंकर होगी और उसमें 50 से भी अधिक व्यक्ति मारे जायेंगे। गाड़ी स्टेशन पर बहुत तेज स्पीड से आयेगी और किसी चीज से टकरा जाने के कारण इंजिन टेढ़ा हो जायेगा-लाइन में कोई गड़बड़ होने के कारण ही यह दुर्घटना होगी-दस दिन के अन्दर-अन्दर या इससे भी पहले यह दुर्घटना होगी-तथा दुर्घटना बम्बई-दिल्ली रेल मार्ग के बीच किसी स्टेशन पर घटेगी।”

संवाददाता ने श्रीमती जैन के पूर्वाभास को तत्काल अपनी डायरी में नोट कर लिया तथा इस विवरण को अन्तर्देशीय पत्र में लिखकर जोधपुर भेज दिया। अन्तर्देशीय पत्र पर इसीलिए कि उस पर लगी डाक की छाप से बाद में तिथि सम्बन्धी कोई शंका नहीं रह जाती। यही नहीं प्रतिनिधि ने अपने कई मिलने जुलने वाले व्यक्तियों को भी इस पूर्वाभास की सूचना देदी। छठवें दिन ही प्रातः रेडियो द्वारा प्रस्तावित तथा लगभग सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित बम्बई दिल्ली मार्ग पर घटी एक रेल दुर्घटना के समाचार शब्दशः पूर्वाभास के विवरण से मिलते-जुलते पाये गये। दुर्घटना में 62 व्यक्ति मारे गये थे। ट्रेन का इंजन लाइन की गड़बड़ी से गलत बन्द पटरी पर आ गया था और रेत के टीले से टकराकर टेढ़ा हो गया था। गाड़ी तेज स्पीड से आ रही थी और इस दुर्घटना के परिणामस्वरूप जान, माल की काफी क्षति हुई।

स्वप्नों के माध्यम से तो एक नहीं सैकड़ों पूर्वाभास की दुर्घटनाओं के विवरण मिलते हैं। इन पूर्वाभासों के कारण कई बार लोग लाभान्वित भी होते हैं। स्वप्न और परामनोविज्ञान के सम्बन्धों की कड़ियाँ मिलाने और इन क्षेत्रों के शोध करने हेतु गठित हालैण्ड की डच सोसायटी फार साइकिक रिसर्च ने इस दिशा में बहुत छानबीन की है। इस सोसायटी की फाइलों में एक ऐसे सामान्य व्यक्ति का प्रकरण भी मौजूद है जिसके पास किसी भी प्रकार की पराशक्ति या अलौकिक शक्ति होने की कोई सम्भावना नहीं थी।

नवम्बर 1947 में उक्त डंच नागरिक ने स्वप्न में कई बार 3....84 का अंक देखा। बार-बार उसकी आँख कुल जाती और बारबार उसे यह अंक दिखाई देता। परेशान होकर वह आधी रात को बिस्तर में ढूंढ़ बैठा और वह अंक याद करने के लिए उसने कई बार उसे रटा। सोकर जब उठा तो उसे अंक भली भाँति याद था।

पहले तो वह उस अंक को लेकर परेशान रहा। फिर एक बार स्वप्न ने ही उसकी समस्या का समाधान किया। वहीं अंक 3784 उसने उच राज्य लाटरी के मार्च 38 वाले ड्राफ्ट के टिकट पर अंकित देखा। अगले दिन ही वह अपने शहर के लाटरी सेण्टर पर गया और वहाँ से डल नम्बर वाला टिकट खरीद लिया। मार्च 48 में उसी टिकट पर प्रथम पुरस्कार मिला। स्वप्न यदि दामित वासनाओं की अभिव्यक्तियां ही है तो उसक्ति की चेतना पर यह पूर्वाभास कैसे पहुँचा और कैसे उसने इसका लाभ उठाया।

कोई आश्चर्य नहीं कि पूर्वाभास की घटनायें भविष्य में आने वाली विपत्तियों से सतर्क करते अथवा सामने प्रस्तुत अवसरों से लाभ उठाने के लिए हो घटती हो। यह तो तय है कि सूक्ष्म जगत में कोई भी परिवर्तन स्थल जगत में घटित होने से पहले ही घटने लगता है। यह बात और है कि उन परिवर्तनों को देखने समझने में हमारी चेतना असमर्थ हो। जब कभी चेतना में वह आभास कौंधता है तो घोर अंधियारी रात में यकायक चमक उठी बिजली के प्रकाश में दिखाई पड़ने वाली सोने की गठरी के समान सुखद सौभाग्य बन जाता है। संसार के प्रख्यात धनपति और सोने की खान के स्वामी विनफील्ड स्ट्राटन के साथ बिल्कुल इसी तरह की घटना घटी।

विनफील्ड स्ट्राटन अपने व्यवसाय में सब कुछ गंवा कर अपने साथी के साथ क्षति की खोज में कीलेरेडौ झरने के पराधाए पर सोया हुआ था। घटना 4 जुलाई 1891 की है। स्वप्न में उसने देखा कि वह जहाँ सोया है वही से बैटिल पहाड़ की ओर चल पड़ा है। उसने स्वप्न में ही पहाड़ों पर एक स्थान पर खोदना आरम्भ किया। थोड़ा आरम्भ किया। थोड़ा ही खोदने पर उसने सोने का एक बहुत बड़ा भण्डार प्राप्त कर लिया। स्वप्न इतना स्पष्ट था कि उसे यह सब कुछ जागृत स्थिति में ही घटित हुआ अनुभव होने लगा। स्वप्न में देखे गये रास्ते भर वह तत्काल चला बढ़ा तथा देखे! हुए स्थान पर उसने थोड़ा-सा खुरचा भर था कि सोना झलक आया। इस प्रकार स्ट्राटन के हाथ जो सोने की पत्रिका खदान मिली वह संसार में दूसरे नम्बर की खदान हैं।

कौन-सी घटनायें, भावनायें, संवेदनायें, अनुभूतियाँ पूर्वाभास होती हैं यह अलग विषय है। लेकिन इतना निश्चित है कि जो कुछ हम आज घटित होता देखते है वह सूक्ष्म जगत में काफी पहले ही घटित हो चुका होता है। कुछ लोग उसी समय उन घटनाओं को ट्रान्समीटर की तरह पकड़ लेते है। किन्हीं किन्हीं को यह खमता पूर्व जन्मों के संचित शुभ संस्कारों परिणामस्वरूप मिलती हैं और कोई कोई व्यक्ति उन्हें इसी जन्म में योग तप द्वारा आवे अपने कणय कस्मपों को माँज धोकर प्राप्त करते हैं। भारतीय धर्मशास्त्रों में इस प्रकार की सैकड़ों घटनाओं के उल्लेख मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण के सम्बन्ध में तो प्रख्यात है कि बाल्मीकि ने पूर्ण पहले ही लिखकर रख दी थी और लव−कुश उसे गाते हुए राम के अश्वमेध यज्ञ में पहुँचे थे।

यह सामर्थ्य प्राप्त करना दुरूह नहीं है। अपनी चेतना को इतना निर्मल, निष्कलुष बना दिया जाय कि उसमें रंचमात्र भी विकार न रह पाये तो बहुत ऊँचाई उड़ते हुए विमान की भाति मीलों दूर उखड़ी लई पटटिप को देख कर-तेज गति से दौड़ आ रही रेल गाड़ी के दुर्घटना ग्रस्त होने का अनुमान लगाया जा सकना ही आवश्यकता अपनी चेतना से स्तर को अभीष्ट ऊंचा उठाने की हैं।


उसे खोजा होता

“वह इधर ही गयी होगी! कुछ भी नहीं रहने दिया है उसने। सब अपने साथ समेट ले गयी है, किसी ने अत्यन्त उद्वेग भरे स्वर में चिन्ता प्रकट की।

“हम तो सर्वथा अकिंचन ही हो गये दूसरा स्वर उभरा। साथ ही आश्वस्त भाव भी-”पर वह इस बनखंड़ से भाग कर जायेगी कहाँ? कितने अमूल्य थे हमारे रत्नाभरण। हम उसके लिए उरुबल का कोना-कोना छान मारेंगे।

घटना उरुबल की हैं। कुछ लोग वन बिहार के लिए आये थे-साथ में रूपजीवा वेश्याओं को लेकर। रागरंग में आकंठ डूबे, अपनी सुध-बुद्ध धनाढ्य पुरुषों को विलास मग्न देखकर कोई वेश्या उनके सब रत्नाभूषण चुरा कर भाग निकली थी। सुध आने पर वे लोग उसी की खोज करने के लिए वन का पत्ता-पत्ता छानने के लिए निकल पड़े थे।

वन के उस भाग में प्रवेश करते ही उन्होंने विशेष शाँति का अनुभव किया। कुछ दूर जाने पर उन पुरुषों ने एक दिव्य पुरुष को घने वृक्ष की छांव में पद्मासन लगाये बैठे हुए देखा। यह दिव्यपुरुष और कोई नहीं भगवान बुद्ध ही थे।

रत्नाभूषण चले जाने के क्षोभ से विक्षुब्ध पुरुष चोर कर्म करने वाली रूपजीवा को खोजते हुए भगवान बुद्ध के समीप पहुँचे थे। भगवान बुद्ध के तेजोदीप्त दिव्य आभा पूरित परम शान्त मुख मण्डल को देखकर अनायास ही अभिभूत हो उठे और उन्होंने उस दिव्यमूर्ति की चरण धूली अपने मस्तक से लगा दी। भगवान के कृश शरीर की स्वर्णित प्रदीप्ति से विमुग्ध हो गये थे।

आपने उसको इधर से जाते देखा है- “भद्रवर्गीय पुरुषों ने भगवान बुद्ध से निवेदन किया।”

“मुझे अपने आपके सिवा दूसरा दीख ही नहीं रहा है मित्रों! इतना ही सत्य है”-कह कर भगवान मौन हो गये।

‘भत्ते हमारा आशय एक स्त्री से है। एक ने कहा।

‘कैसी स्त्री? भगवान बुद्ध की परमपवित्र दृष्टि भद्रगणों पर टिक गयी। उनके दृष्टिपात से ही भद्रगण आहत हो उठे। लगा, वे अनुचित कर्म के कारण पीड़ित है। वह कर्म और उसकी हानि भगवान बुद्ध की दृष्टि से छिपी नहीं रह गयी हैं एक ने कहा-वह वेश्या है भत्ते। हम लोग अपनी-अपनी पत्नियों के साथ वन बिहार के लिए आये थे। पत्नी के अभाव में एक मित्र के मनोरंजन के लिए वह वेश्या हमारे पास थी। विशेष राग-रंग में लिप्त देखकर वह हमारे रत्नालंकार लेकर इसी वन खण्ड में निकल कर छुप गयी है। हमें उसी की खोज है।

वन बिहार मनोरंजन किस लिए भद्र मंदस्थित मुस्कान के साथ भगवान बुद्ध ने कहा। मुस्कान ने उन लोगों के मर्मबेध दिये। प्रतीत हुआ अपराध पकड़ा गया। सकुचाते हुए वे कुछ न कह सके। फिर भगवान ने प्रथम ही कहा-आनन्द के लिए ही न!

तो भद्रो! जगत के विषय-भोग और सुख तो नश्वर और क्षणिक हैं। उनसे नश्वर और क्षणिक आनन्द ही मिलेगा। उनके पीछे उन्मत्त भाव से दौड़ने पर इसी प्रकार पश्चात्ताप, हानि तथा क्षोभ के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलने का।

‘शाश्वत आनन्द तो शाश्वत सत्य से ही प्राप्य हैं। शाश्वत सत्य केवल आत्मा ही है। तुमने उसे खोजा होता तो रत्नालंकार का दुःख नहीं झेलना पड़ता’-भगवान बुद्ध ने कहा।

भद्रवर्गीयों के धर्म चक्षु खुले। रत्नालंकार की चिन्ता छोड़कर उन्होंने कहा-”ठीक है भत्ते! हमें स्त्री की आवश्यकता नहीं है आत्मा की खोज करनी है।”

और उन्होंने भगवान से प्रव्रज्या उपसम्पदा की याचना की।


जो मौत से लड़े और अन्ततः विजयी हुए*******

जीने की अदम्य आकाँक्षा मानव की अमूल्य संपदा है। इसका महत्व एवं गरिमा को समझने वाले आस्थावान भयंकर परिस्थितियों में भी जीवन से निराश नहीं होते। आये हुए संकट को चीरते हुए अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने में सफल होते हैं परिस्थितियाँ ऐसे जीवट सम्पन्न व्यक्तियों के समक्ष नत-मस्तक होती हैं।

घटना ग्यारह वर्ष पूर्व की है। कनाडा का एक पायलट राबर्ट गाउची अपनी नियमित उड़ान उत्तर ध्रुव से फोर्ट स्मिथ को भर रहा था। अब तक वह अपने जीवन काल में 6000 घण्टे की उड़ान भर चुका था। उत्तरी ध्रुव के शून्य से 60 नीचे वाले तापमान क्षेत्र में उड़ान भरने का अभ्यस्त यह अनुभवी पायलट अन्य दिनों की तरह 2 फरवरी 1967 को कैंब्रीज नामक ग्राम में कुछ अधिकारियों को उतार कर अकेला वापसी यात्रा पर रवाना हुआ, कुछ ही दूर आगे बढ़ने पर उसे बर्फीले तूफान का सामना करना पड़ा। लाचार उसे विमान बर्फ की सतह पर ही उतारना पड़ा। प्रतिकूल मौसम के कारण एक मात्र सहायक कम्पास एवं, खो जाने पर ढूँढ़ने में मदद करने वाले यंत्र ने भी काम करना बन्द कर दिया। बर्फीले तूफान में किसी अन्य के सहयोग की आशा नहीं थी क्योंकि जिस मार्ग से वह उड़ रहा था, वह आम हवाई मार्ग नहीं था। उसके पास राशन की मात्रा मात्र इतनी थी कि किसी प्रकार 20 दिन जीवित रहा जा सके।

दो दिन स्लीपिंग बैग में सोते रहने के उपरान्त तीसरे दिन तूफान कम पड़ने पर उसने बर्फ में से सहायता के लिए 150 फीट ऊँचे अक्षर अंकित किए जिससे ऊपर उड़ने वाला कोई विमान उन्हें देख सके परन्तु तीव्र हवा के कारण बनाये गये निशान मिट गये। भीषण ठंड में मौत के बीच झूलते हुए भी ‘गाउची’ ने जीवन के प्रति आशा नहीं छोड़ी।

इसी बीच उसे ढूंढ़ने वायुसेना का खोजी दस्ता 3 फरवरी से 17 फरवरी तक लगातार पेट्रोलिंग करता फिरा किन्तु उसको ढूँढ़ नहीं पाया। अन्ततः निराश होकर वायु सेवा ने उम्मीद छोड़ दी तथा अपने शोक संदेश गाउची के पत्नी तक पहुँचा दिये।

राबर्ट 28 दिन तक थोड़ा-थोड़ा राशन खाकर मृत्यु से संघर्ष करता रहा। एक दिन उसने एक विमान के गुजरने की आवाज सुनी। रोमाँचित होकर वह बाहर आया तथा हवा में रायफल से एक फायर किया जिससे विमान चालक उसकी स्थिति जान सकें। दुर्भाग्य ने उसका साथ यहाँ भी नहीं छोड़ा, विमान सीधे निकल गया। ऐसा ही 40 वे व 45 में दिन भी हुआ।

बर्फीले पहाड़ में 55 दिन उसे रहते व्यतीत हो चुके थे फिर भी साहसी पायलट अपना मनोबल यथावत् बनाये रहा 56 वे दिन एक लाल विमान उसके 2000 फीट ऊपर से गुजरा यह सौभाग्य ही था कि डूबते सूरज की किरणों के प्रकाश से राबर्ट की चमक ऊपर जा रहे उसके दो साथियों को दिखाई दे गये। वे वापस लौटे तथा विमान से उतर कर ‘राबर्ट’ की ओर कदम बढ़ाये। राबर्ट ने अपने साथियों से हँसते हुए कहा, “क्या तुम्हारे विमान में एक यात्री की जगह है?”

किसी भी व्यक्ति के लिए उस बर्फीले पहाड़ पर मृत्यु को चुनौती देते हुए इतने दिन तक जीवित रहना तथा वापस लौट आना एक आश्चर्य ही है। किन्तु जीवन की गरिमा एवं सर्वोपरिता स्वीकार करने वाले के लिए कुछ भी असम्भव नहीं हैं।

जीने की उत्कृष्ट इच्छा मनुष्य को कठिनाइयों में भी शक्ति एवं प्रेरणा का संचार करती है ऐसे व्यक्ति संकटकाल में भी रास्ता ढूँढ़ निकालते हैं। चीनी नाविन ‘पुनलिम’ का भीषण समुद्री तूफान में 133 दिन जीवक जीवित रहना तथा सकुशल वापस चले आना जिजीविषा का ही परिचायक है। घटना इस प्रकार है- ‘पुनलिम’ एक छोटा जहाज तारपिंडों को लेकर जा रहा था। आकस्मिक समुद्री तूफान के कारण तारपिंडों का सन्तुलन कायम नहीं रह सका तथा उलट गया। नाविक लिम ने तारपिंडों से टूटे एक लकड़ी के तख्ते को पकड़ लिया। समुद्री लहरों के थपेड़ों के साथ वह तख्ते पर बहता रहा। मानवी संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि छोटे मोटे संकटों के सामने घुटने टेक दे। उनसे संघर्ष करने की पर्याप्त शक्ति उसमें भरी है। जिजीविषा को दुर्बल न पड़ने दिया जाय तो मौत सदृश दिखायी देने वाली विपत्तियों को पार कर सकना कुछ अधिक कठिन नहीं दिखता अन्दर की शक्ति ने ‘पुनलिम’ का पथ प्रशस्त किया।

जीवित रहने के लिए ‘लिम’ ने समुद्री मछलियों को लकड़ी के तख्ते पर से ही पकड़ना आरम्भ किया। वर्षा के पानी एवं मछलियों से पेट की ज्वाला शान्त रखकर वह मृत्यु से निरंतर संघर्ष करता रहा। इस प्रकार लहरों के बीच बहता हुआ वह ब्राजील पहुँचा। ब्राजील वासियों की ओर से इस साहसी नाविक का स्वागत करते हुए पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी ‘नोवेल वेकर’ ने इस एक आश्चर्यजनक घटना पर ‘पुनलिम’ को उसके प्रचण्ड साहस के लिए पारितोषिक प्रदान किया।

अपनी गरिमा का अनादर करने वाले भाग्य के भरोसे बैठे रहते तथा परिस्थितियों का रोना रोते रहते हैं। अपनी वर्तमान निकृष्ट परिस्थितियों का कारण समाज एवं ईश्वर को बताते हैं जबकि जीवन की सर्वोपरिता को स्वीकार करने वाले अपनी असामान्य क्षमता को पहचानते हैं तथा ईश्वर प्रदत्त जीवन उपहार का सदुपयोग करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते जाते हैं ऐसे व्यक्तियों के समक्ष परिस्थितियाँ बाधक नहीं होतीं। सामान्य घटना क्रमों एवं अभावों के कारण अपन मानसिक सन्तुलन नष्ट करते रहने वालों के लिए ‘वेल्जियम’ निवासी ‘चार्ल्स फेलू’ का जीवन वृतान्त अधिक प्रेरणास्पद होगा। ‘चार्ल्स फेलू’ का जीवन वृतांत अधिक प्रेरणास्पद होगा। ‘चार्ल्स फेलू’ सन् 1830 में बिना हाथों के पैदा हुआ तथा 70 वर्ष तक जीवित रहा। हाथों के अभाव में भी उसने पैर द्वारा पेंटिंग चित्रकारी कला सीखना आरम्भ किया तथा निरन्तर अभ्यास एवं लगने से प्रसिद्ध चित्रकार बना। सदा प्रसन्नचित्त, रहने वाले इस चित्रकार की प्रशंसा तत्कालीन राजा, महाराजा सभी करते थे। ‘फेलू के अन्दर से प्रवाहित उत्साह, प्रेरणा एवं प्राण शक्ति से निराश व्यक्ति प्रेरणा लेते। राजाओं द्वारा हाथ मिलाये जाने पर वह अपने पैरों को आगे बढ़ देता था।

शारीरिक अक्षमता मनुष्य के विकास में बाधक नहीं हो सकती। अन्तरात्मा की शक्ति का मूल्याँकन करने वाले शरीर से अपाहिज होते हुए भी ‘जानी’ के समान प्रेरणा के स्त्रोत बनते है। 23 अगस्त 1910 को ‘वाल्टीमोर’ सिटी में एक दम्पत्ति से जुड़वा बच्चे पैदा हुए। उनमें एक बच्चा सामान्य था किन्तु दूसरे के कमर के नीचे का हिस्सा नहीं था। जीवन के प्रति अदम्य उत्साह एवं प्रेम के कारण यह बच्चा न केवल जीवित रहा अपितु विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न बना। 14 वर्ष की आयु में उसने हाई-स्कूल पास किया। असामान्य विद्वता के कारण ‘जानी’ का नामाँकन सीधे ग्रेजुएट कक्षा में हो गया। कालेज का अध्ययन समाप्त करने के उपरान्त भी उसमें सीखने की प्रवृत्ति सदा बनी रही। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार को कलाओं में वह निपुण बन गया। जानी अब एक एक्सपर्ट ड्राइवर ड्राफ्टमैन, संगीत मास्टर, के रूप में पूरे वाल्टीमोर शहर में विख्यात है। असम्भव समझी जाने वाली कला जिसे पैरा द्वारा ही सीखा जा सकता है, मैं तैराकी, डांसिंग, रस्सी पर चलना, वेसवाल टैग खेल में विशेषता प्राप्त कर जन सामान्य को आश्चर्य चकित कर दिया। अपने जीवन काल में ‘जानी’ कभी भयंकर रोग से ग्रसित नहीं हुआ। सदा स्वस्थ, प्रसन्न एवं सन्तुष्ट रहने वाला यह विलक्षण व्यक्ति सदा दूसरों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसके संपर्क में आने वाले सहज ही प्रेरणा प्राप्त करते। प्रकृति एवं परिस्थितियों को चैलेंज करते हुए इस व्यक्ति ने विश्व के समक्ष अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया तथा यह सिद्ध कर दिया कि जीवन से असीम प्रेम करने वालों के समक्ष शारीरिक एवं परिस्थितिजन्य अवरोध बाधक नहीं हो सकते।

मनुष्य जीवन ईश्वर का दिया हुआ सर्वश्रेष्ठ उपहार है। इसकी गरिमा को समझने तथा उसका सदुपयोग करने वालों ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करते है और दूसरों को प्रेरणा के केन्द्र बनते है।


प्रकृति के आँगन में ब्रह्म विद्या के पाठ

ज्ञानप्राप्ति के लिए चिरकाल तक तप अनुष्ठान करने के बाद भी जब दत्तात्रेय को अपनी उपलब्धियों से सन्तोष न हुआ तो ब्रह्मा के पास पहुँचे। विधिवत् अर्चन वंदन करने बाद दत्तात्रेय ने कहा-”भगवन्! मैं उपयुक्त गुरु की खोज करने लिए अब तक कई स्थानों पर भटकता रहा, अनेक गुरुओं, संत-महात्माओं के पास पहुँचा परन्तु मुझे कीं भी ऐसा नहीं लगा कि जिसकी मुझे आवश्यकता थी वह मुझे प्राप्त हो गया है। कृपा कर ज्ञान प्राप्ति का मार्ग बताइये।”

“जिससे ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है वह सद्गुरु तो प्रत्येक व्यक्ति के अन्तः करण में ही विद्यमान है,” ब्रह्मा ने कहा-वत्स, आवश्यकता केवल उसी गुरु को खोजने की है-जिस व्यक्ति का अन्तःकरण कषाय कल्मषों से मुक्त हो गया है, तपश्चर्या और साधना द्वारा जिसने अपने मल विकारों को नष्ट कर लिया है तथा अन्तःकरण को पवित्र निष्कलुष बना दिया है वह व्यक्ति अपने चारों ओर विस्तीर्ण प्रकृति देखकर ही धर्म और अध्यात्म का तत्व ज्ञान सीख सकता है।”

प्रजापति ब्रह्मा से यह सूत्र प्राप्त कर दत्तात्रेय पृथ्वी पर लौट आये और उन्होंने प्रकृति में घटने वाली छोटी से छोटी घटनाओं को देखकर-उनका निरीक्षण कर ब्रह्मविद्या का अध्ययन किया और जीवन मुक्त हो गये। प्रकृति की खुली हुई पुस्तक पढ़कर अपने आस पास घटने वाली सामान्य घटनाओं का निरीक्षण करके दत्तात्रेय ने जब अध्यात्म ज्ञान की सिद्धि करली तो वे उन्मुक्त -विचरण करते हुये जन-जन को आध्यात्मिकता का संदेश सुनाने लगे। राजा से रंक तक और भोगी से योगी तक हर कोई उनकी अमृतवाणी श्रवण कर आत्मिक आह्लाद का अनुभव करने लगता।

एक बार राजा यदु ने दत्तात्रेय से पूछा महात्मन्! संसार के अधिकाँश लोक काम और लोभ के वश होकर कष्ट पा रहे हैं। आपने यह जीवन्मुक्त अवस्था कैसे प्राप्त की। कृपा कर आप मुझे यह बताइये कि आपको आत्मा में ही परमानंद का अनुभव कैसे होता है तथा आपने यह अपने किस गुरु के चरणों में बैठ कर प्राप्त की है।

ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेय जी ने उत्तर दिया-”मैंने अपने अन्तःकरण से अनेक गुरुओं द्वारा मूक उपदेश प्राप्त किया है।”

राजा यदु की जिज्ञासा और बढ़ी तथा उन्होंने पूछ ही लिया-अनेक गुरु? किस प्रकार? क्या नाम हैं उन गुरुओं के?

एक साथ किये गये इन अनेक प्रश्नों का उत्तर देते हुए दत्तात्रेय ने कहा-राजन्! प्राप्ति के लिए अकेले गुरु से ही काम नहीं चलता उसके लिए अन्तःकरण में स्थित सद् गुरु की शरण भी जाना पड़ता है तो कौन गुरु है और क्या शिक्षा दे रहा है इसका विवेचन करता व समझाता है। इस सद्गुरु ने मुझे 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करायी। उन गुरुओं में पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, भौंरा, हाथी, मधुमक्खी, हरिण, मछली, पिंगलावेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाग बनाने वाला, सर्प और भृंगी कीट है”

ब्रह्मन्! यह सब तो जड़ अथवा निर्बुद्धि हैं इन्होंने आपको क्या उपदेश दिया’-राजा यदु ने यह पूछा तो दत्तात्रेय ने बताया जड़ और निर्बुद्धि होते हुए भी प्रकृति तो उस लीलामय की चेतना लीला ही है। यदि हम अपने अन्तःकरण को निर्मल और परिष्कृत बना सके तो इस प्रकृति से ही बहुत कुछ सीख सकते हैं। जैसे पृथ्वी से मैंने धैर्य और क्षमा की शिक्षा ली। लोग पृथ्वी पर कितना आघात और उत्पात करते रहते हैं, पर वह न तो किसी से बदला लेती है तथा न रोती चिल्लाती है। प्राणी जाने-अनजाने एक दूसरे का अपकार कर ही डालते हैं। धीर पुरुष को चाहिए दूसरे की विवशता को समझकर वह न तो अपना धीरज खोये और न ही किसी पर क्रोध करे।

“वायु से मैंने यह शिक्षा ली है कि जैसे अनेक स्थानों में जाने पर भी वह कीं आसक्त नहीं होता और किसी का भी गुण दोष नहीं अपनाता वैसे ही साधक भी किसी का न तो दोष ग्रहण करे और न किसी से आसक्ति तथा द्वेष ही करे।”

जितने भी चल अचल पदार्थ हैं उनका आश्रय स्थान एक ही है आकाश! आकाश को देखकर मैंने यह जाना कि इस विश्व ब्रह्माण्ड में जितने भी चर अचर जीव है और थिर-अस्थिर पदार्थ हैं उनमें विद्यमान आत्मा ब्रह्मरूप से सर्वत्र व्याप्त है।

जल स्वभाव से ही स्वच्छ, मधुर और पवित्र हैं। जल को देखकर ही मैंने यह प्रेरणा प्राप्त की कि साधक को भी अपना स्वभाव स्वच्छ, शुद्ध, मधुर और पवित्र रखना चाहिए। अग्नि तेजस्वी और ‘ज्योतिर्मय होती है और उसके तेज को कोई दबा नहीं सकता’ उसके पास संग्रह परिग्रह के लिए कोई पात्र नहीं है और वह सब कुछ भस्म कर डालती है। भले बुरे सभी पदार्थों को भस्म कर डालने पर भी वह किसी वस्तु के दोषों से लिप्त नहीं होती इसी तरह साधक को भी तेजस्वी, इंद्रियों से अपराजित और विषयों से निर्लिप्त रहना चाहिए।

चंद्रमा की गति तो नहीं जानी जा सकती परन्तु काल के प्रभाव से उसकी गति घटती बढ़ती रहती है। वस्तुतः वह न तो घटता है और न बढ़ता है। वैसे ही जन्म से लेकर मृत्यु तक और मृत्यु और मृत्यु से लेकर पुनः जन्म तक जितनी भी अवस्थायें बदलती हैं वे सब शरीर की ही अवस्थायें हैं। आत्मा का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। सूर्य अपनी किरणों में से पृथ्वी का जल खींचता है और समय पर उसे बरसाता है वैसे ही योगी पुरुष भी समय और विषयों को ग्रहण और त्याग करते हैं किन्तु सूर्य की भाँति उनमें आसक्त नहीं होते।

अजगर से मैंने यह सीखा कि साधक को हर स्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए। समुद्र वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण न तो बढ़ता है और न ही ग्रीष्म ऋतु में जब नदियाँ सूखने लगती हैं तो घटता ही है। उस समुद्र से मैं ने यह सीखा कि साधक को सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति पर न तो प्रफुल्लित होना चाहिए तथा न ही उनके नष्ट हो जाने से भिन्न होना चाहिए।

पतंगा दीपक के रूप पर मोहित होकर उसकी शिखा में कूदता है और जल कर मर जाता है। वैसे ही अपनी इंद्रियों का वश में न रखने वाला पुरुष नाशवान पदार्थों में फँसा रहता है उसकी सारी चित्त वृत्तियाँ उनके उपभोग के लिए ही लालायित रहती है। वह अपनी विवेक बुद्धि खोकर पतंगे के समान ही नष्ट हो जाता है।

भौंरा छोटे बड़ अनेक पुष्पों से उनका सार मात्र ग्रहण करता है वैसे ही हे राजन् बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह छोटे बड़े सभी शास्त्रों से उनका सार मात्र ग्रहण करे। हाथी से मैंने यह सीखा कि साधक काठ की बनी पुतली से भी मोह न करे। हाथी काठ की हथिनी को देखकर ही शिकारियों क्षरा खोदे गये गढ्ढे में जा गिरता है तथा उस कारण मृत्यु को प्राप्त होता है। इसी प्रकार काष्ठ मूत में भी साधक की आसक्ति उसके पतन का कारण बन जाती है।

मधु निकालने वाली मक्खी से राजन्! मैंने यह शिक्षा ली कि जिस प्रकार वह प्रयत्नपूर्वक रस का संचय करती हैं इसी प्रकार लोभी व्यक्ति भी धन का संचय करते हैं। लोभी मधुमक्खी का संचित रस अन्य लोग ही ले उड़ते है। उसी प्रकार लोभी मनुष्य का संचित धन भी कोई दूसरा ही भोगता हैं। हरिण वाद्क यंत्रों के कारण श्रवणेंद्रिय के विषयों में आसक्त होकर अपने प्राण गंवाता है उसी प्रकार साधक को श्रवणेन्द्रिय के विषय को आसक्ति पतन की ओर धकेलती है। मछली काँटे में फंसे हुए मास के टुकड़े में अपने प्राण गँवा देती है वैसे ही स्वाद का लोभी मनुष्य भी अपनी जिह्वा के वश होकर मारा जाता है।

प्राचीन काल में विदेह नगरी में पिंगला नाम की एक वेश्या रहती थी। उसके मन में धन की बहुत कामना थी इसलिए वह सदा ही यह सोचा करती थी कि कोई धनी पुरुष आकर उसे अपना धन दे जायेगा एक दिन वह आधी रात तक इसी तरह प्रतीक्षा में खड़ी रही अत्यधिक देर हो जाने से उसका मुँह, सूख गया और चित्त व्याकुल हो गया, पर उस रात को उसे निराश ही रहना पड़ा इस निराशा के कारण उसे वैराग्य हो गया। इससे मैंने यह सीखा कि दूसरों से आशा कर उन पर निर्भर करना ही सबसे बड़ा दुख है। दूसरों से आशा न कर अपने प्रयत्नों पर ही निर्भर करना सबसे बड़ा सुख है। उस रात जब पिंगला ने दूसरों से आशा करना छोड़ दिया तो वह सुख की नींद सो सकी।

एक बार किसी कुमार कन्या के घर; उसे वरण करने के लिए कई वर और उनके परिजन पहुँचे। संयोग से उन दिन घर के लोग कहीं बाहर गये हुए थे। इस लिए कन्या ने स्वयं ही उनका आतिथ्य सत्कार किया और उन्हें भोजन कराने के लिए घर के भीतर एकाँत में धान कूटने लगी। धान कूटते समय उसकी कलाई की चूड़ियाँ बज रही थीं। इससे उसे बड़ी लज्जा हुई। उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं, केवल एक ही रखी। मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि साधक के चित्त में जब बहुत सी वृत्तियाँ हों तो वहाँ भी इसी प्रकार का कोलाहल उत्पन्न होता रहता हैं। इसलिए साधक को अपने चित्त में एक ही ध्येय का अवलम्बन करना चाहिए।

एक बाण बनाने वाला अपने कार्य में इतना तन्मय हो गया था कि उसके पास से ही राजा की सवारी दलबल, में साथ निकल गयी, पर उसे इस बात का पता ही नहीं चला, क्योंकि देह अपने काम में पूरी तरह तन्मय था। उससे मैंने यह शिक्षा ली कि साधक भी अपने ज्ञातव्य के चिंतन में तन्मय रहें तो उसे संसार में होने वाली उथल-पुथल अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती।

कोई पक्षी अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा लिए बैठा था। उसे छीनने के लिए दूसरे पक्षियों ने उसे अपनी चोंचों से मारना शुरू कर दिया। जब उस पक्षी ने चोंच में दबाये हुए टुकड़े को फेंक दिया तो वह कष्ट से मुक्त हो गया। अनावश्यक संग्रह ही दूसरों के मन में ईर्ष्या के कारण कष्ट पहुँचता है। उस पक्षी से मैंने यह शिक्षा ली कि अनावश्यक संग्रह नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार साँप से मैंने यह शिक्षा ली कि संन्यासी को मठ या मण्डली बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।

मकड़ी बिना किसी सहायक के अपने ही मुँह के तारों द्वारा जाला बना लेती है, उसी में विहार करती है और फिर उसे ही निगल जाती है। मकड़ी के इस कार्य से मैंने सर्वशक्तिमान भगवान की विश्व रचना के कार्य को समझने का प्रयत्न किया है। भगवान बिना किसी सहायक के अपनी ही माया से इस ब्रह्माण्ड को रचते हैं, उसमें जीवरूप से विहार करते हैं और अपने आप को ही लीन करके अंत में अकेले ही शेष रह जाते है।

भृंगी किसी कीट को पकड़ कर अपने रहने के स्थान में बंद कर देता है और कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते-करते तद्रूप हो जाता है, उसी प्रकार साधक को भी केवल परमात्मा का ही चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विवेक और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है। तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवन-मुक्त होने का मार्ग पाया।

भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं का सविस्तार वर्णन आया है और इस आख्यान का प्रतिपाद्य-मर्म-रहस्य यही है कि व्यक्ति यदि सीखना चाहे तो उसके लिए आवश्यकता केवल तीव्र लगन और आकुल जिज्ञासा भर की है। ये सभी साधन सुविधायें उपयोगी है और आवश्यक भी, परज्ञान प्राप्ति में आधार भूत दृष्टि से यह आवश्यक है कि व्यक्ति में ज्ञान प्राप्त करने के लिए कितनी उत्कंठा है, कितनी लगन है और कितनी साध है।

भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है-ज्ञान प्राप्त करने के लिए अकेले गुरु से ही काम नहीं चलता बल्कि उसके लिए स्वयं भी सोचने समझने और चतुर्दिक होती रहने वाली छोटी-छोटी घटनाओं से भी बहुत कुछ समझना आवश्यक है। साधक यदि अपनी दृष्टि को सूक्ष्म और ग्राह्म बनाये तो उसके चारों और ब्रह्मा विद्या का महाविद्यालय खुला पड़ा है, प्रकृति ने अपनी प्रिय संतान के लिए अपने ही आँगन में ब्रह्मविद्या का भाग्योदय मंदिर खोल रखा है। कोई उसमें नम्र याजक पूजक की तरह जाये तो सही।


जीव-जन्तु मनुष्य से कम सम्वेदनशील नहीं

विचारशीलता के क्षेत्र में मनुष्य चेतन जगत का नेतृत्व करता है, किन्तु उससे भी महत्वपूर्ण जो चीज है जिसके आधार पर मानवी गरिमा एवं श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है वह है भाव-संवेदनाएं। यह वह आचार है जो मनुष्य को सृष्टि का, प्राणि-जगत का मुकुट मणि बनाती है। संवेदनाओं से रहित व्यक्ति बौद्धिक क्षेत्र में चाहें जितना आगे बढ़ जाय किन्तु अपनी गरिमा बनाये रख पाने में असमर्थ ही सिद्ध होता है।

समझा यह जाता है भाव संवेदनाओँ की पूँजी परमात्मा ने मात्र मनुष्य को ही दी है किन्तु यह सोचना भूल है। उसने अपने अन्य जीवों को भी यह विशेषता प्रदान की है जिससे वे अपने छोटे से पारिवारिक जीवन को सरस एवं उपयोगी बनाये रख सके। न्यूनाधिक रूप में यह गुण प्रत्येक प्राणी में देखा जाता है। कभी-कभी खूँखार जीवों की संवेदना को देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। दो विरोधी प्रवृत्तियां एक चेतना में केन्द्रीभूत होते देखकर बुद्धि भ्रमित हो जाती है और श्रद्धा से उस सृजेता के समक्ष मस्तक झुक जाता है। जुलाई सन् 1951 लन्दन में एक प्रदर्शनी आयोजित हुई। विभिन्न प्रकार के जंगल जानवर लाये गये थे। उनमें अधिकाँश माँसाहारी जीव थे। एक दिन एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने सभी लोगोँ का ध्यान आकर्षित किया। एक युवा दम्पत्ति अपने नन्हे कुत्ते को लिए शेर के कटघरे के सामने खड़े होकर उसकी गतिविधियों का आनन्द ले रहे थे। इतने में उनका कुत्ता किसी प्रकार कटघरे के सीकचों के बीच से होकर भीतर पहुँच गया। शेर ने उसे देखकर दहाड़ लगायी तथा उसकी ओर बढ़ा। दहाड़ को सुनकर कुत्ता भयभीत हो गया तथा पिंजरे के एक कोने में जाकर चित्त होकर लेट गया। अपने पैरों को इस प्रकार ऊपर उठा लिया जैसे जीवन-दान की याचना कर रहा हो। उसकी आँखें से कातरता टपक रही थी। कौतूहल वर्धक एवं लोभ हर्षक दृश्य को देखने के लिए बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी। उसको यह विश्वास हो चला था कि कुछ ही क्षणों में शेर उसको खा जायेगा।

शेर कुत्ते की ओर बढ़ा, उसके पैर पकड़कर उलट दिये। उछलकर कुत्ता अपने छिले पैरों पर पूँछ दबाये बैठ गया। शेर उसको सूँघने लगा। कुछ देर पश्चात अपने सिर को इधर-उधर हिलाया। लगता था कुत्ते की कातर दृष्टि उसको चेतना को प्रभावित कर रही हो। सभी देखकर विस्मित रह गये शेर कुछ ही क्षणों बाद कुत्ते को उसी प्रकार चाटने लगा जैसे गाय अपने बछड़े को। शेर के मालिक ने उसे खाने के लिए माँस के टुकड़े फेंके तो उसने उन टुकड़ों को और भी छोटा करके कुत्ते के सामने डाल दिया। कुत्ते का भी भय जाता रहा तथा वह निर्भीक भाव से टुकड़ों को खाने लगा।

सायंकाल जब शेर लेट गया तो वह भी उसके पंजों पर अपना सिर रखकर सो गया। उस दिन बाद शेर ने कुत्ते के ऊपर कभी आक्रमण नहीं किया। दोनों साथ प्रेम से खाते तथा अपने हाव-भाव द्वारा परस्पर स्नेह का आदान-प्रदान करते। प्रदर्शनी में सर्वाधिक आकर्षण एवं मर्म स्पर्शी दृश्य यह बना रहा। कुत्ते के मालिक ने शेर के मालिक से अपने जानवर की माँग की तथा पिंजड़े से निकालने के लिए अनुरोध किया। किन्तु कुत्ते को बाहर निकालने के सारे प्रयास असफल सिद्ध हुए। जैसे ही कोई उसे निकालने के लिए आगे बढ़ता शेर गरजते हुए अपनी नाराजगी प्रदर्शित करता।

कहते हैं कि दोनों सालभर तक साथ-साथ घनिष्ठ मित्र के समान बने रहे। एक बार कुत्ता बीमार पड़ा तथा मर गया। शेर पर उसकी मृत्यु का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि खाना-पानी छोड़कर उसके शोक में सातवें दिन वह भी मर गया।


समस्त विग्रह और क्लेशों का मूल अहंकार

संसार में जितने भी द्वन्द्व, संघर्ष और युद्ध हुए हैं उनके कारणों का यदि अध्ययन किया जाय तो वह अनेक नहीं होंगे। दो व्यक्तियों की आपसी लड़ाई और दो राष्ट्रों के युद्ध दिखाई पड़ने में अलग-अलग होंगे परन्तु उनका कारण एक ही होगा और वह कारण है एक दूसरे पर आधिपत्य जमाना। दूसरे शब्दों में अपने आपको प्रतिद्वंद्वी से बड़ा शक्तिशाली सिद्ध करना। पिछले विश्व युद्ध में लाखों व्यक्ति मारे गये और उनसे भी अधिक हताहत हुए। इस भीषण नर संहार का कारण एक व्यक्ति का यह मानना था कि उसकी जाति सर्वश्रेष्ठ है और वह उस सर्वश्रेष्ठ जाति का सर्वोच्च नेता है। इसलिए वह संसार का सबसे बड़ा शक्तिशाली, सर्वश्रेष्ठ और सबसे महान व्यक्ति है।

दो व्यक्तियों की लड़ाई में भी यही कारण होता है। एक किसी कारण से अपने आपको दूसरे से बड़ा, शक्ति-शाली और श्रेष्ठ समझता है तथा उससे यह मनवाना चाहता है; जबकि दूसरा व्यक्ति उसकी इस बात को स्वीकार कर अपने आपको छोटा नहीं मानना चाहता। लड़ाई के प्रत्यक्ष कारण चाहे जो भी रहें पर मूलतः संघर्ष दो व्यक्तियों के अहंकार का टकराव ही होता है। इस अहंकार ने मनुष्य जाति का जितना अहित किया है उतना दूसरे किसी से हित नहीं हुआ है। न भूख से, न बीमारी से, न बाढ़ से, न सूखे से और न रोग से तथा न दुर्बलता से, किसी भी कारण इतने लोग नहीं मरे हैं। जितने कि आपसी संघर्षों, जातीय युद्धों और दो राष्ट्रों के या अनेक देशों के संग्राम से मरे है। इन संघर्षों, द्वन्द्वों और युद्धों का एक मात्र कारण अपनी श्रेष्ठता का दावा तथा दूसरों द्वारा उस दावे को दी गयी चुनौती हैं

अहंकार के कारण न केवल मनुष्य जाति हिंसा तथा विनाश की शिकार हुई है बल्कि उसके कारण मनुष्य का नैतिक पतन भी हुआ है। स्वार्थ, संकीर्णता, अनुदारता, लोभ, परस्वत्वापहरण जैसे दुर्गुणों का एकमात्र जनक भी अहंकार ही है। लोभ, मोह और अनीति अनाचार को अहंकार की ही संतान कहा जा सकता है। चूँकि यह दुर्गुण मनुष्य के अन्तःकरण में निवास करता है अतः इसकी प्रतिध्वनि समाज क्षेत्र में होना भी स्वाभाविक ही है और इसी कारण साम्प्रदायिक तनावों से लेकर दो राष्ट्रों के युद्ध तक मनुष्य का यह दुर्गुण ही कारण बनता है।

प्रसिद्ध विचारक क्लाइव लीविस ने लिखा है कि- “अहंकार की तुष्टि किसी चीज को पाने से नहीं बल्कि उस चीज को किसी दूसरे की अपेक्षा ज्यादा पाने से होती है।” वस्तुतः अहंकार का अर्थ ही अपने को दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध करने का दावा है। इसी कारण लोग लोभ करते हैं ताकि वे दूसरों से संपन्न दीखें, इसी कारण दूसरों को दबाने की चेष्टा करते हैं ताकि अपनी प्रभुता सिद्ध कर सकें, इसी कारण दूसरों को मूर्ख बनाना चाहते है ताकि स्वयं बुद्धिमान सिद्ध हो सकें। इसका अर्थ यह नहीं है कि संपन्नता, शक्ति और बुद्धिमत्ता को अर्जित विकसित नहीं करना चाहिए।

संपन्नता व्यक्ति की श्रमशीलता और पुरुषार्थ का पुरस्कार है इसलिए वह सम्माननीय है। परन्तु अहंकार उसे अपना लक्ष्य बना लेता है। संपन्न होना इसलिए भी आवश्यक है कि उसके बल पर जीवन यापन का क्रम सुख सुविधा पूर्वक चलाया जा सकें। यद्यपि आध्यात्मिक जीवन दर्शन की प्रेरणा तो यह है कि मनुष्य अपनी आवश्यकतायें अनिवार्य स्तर तक ही सीमित रखें और उन्हें पूरा करने के बाद बचा समय दे श्रम मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में लगाये। फिर भी सुख सुविधाओं के साधनों को एक सीमा तक छूट दी जा सकती है। लेकिन उनकी आकाँक्षा जब इस भावना से प्रेरित होकर बढ़ने लगती है कि हमें दूसरों की तुलना में सम्पन्न दिखाई देना है तो वह भावना लोभ के अंतर्गत आ जाती है।, जिसकी कोई सीमा नहीं है।

लोभ की सीमा इसलिए नहीं है कि दस व्यक्तियों की तुलना में सम्पन्न होने के बाद व्यक्ति को दिखाई देने लगता है कि दूसरे सौ व्यक्ति उससे भी ज्यादा संपन्न हैं। उसका अहंकार कसक उठता है और वह उन सौ व्यक्तियों से भी आगे निकल जाना चाहता है ‘इसके लिए वह जल्दी-जल्दी धन संपदा बटोरने की चेष्टा करने लगता है और इसमें उचित अनुचित का विवेक भूल जाता है। क्योंकि उचित साधनों से अनुचित साध्य की प्राप्ति तो की नहीं जा सकती। पूजा की माला से किसी को फाँसी तो लगायी नहीं जा सकती और माना कि किसी प्रकार लगा भी दी गयी तो फिर वह पूजा की माला कहाँ रही, वह तो फाँसी का फन्दा बन गयी। कोई व्यक्ति यदि चाहे कि ईमानदारी से दुनिया की सब धन संपदा अपने कब्जे में कर ले तो यह सम्भव कैसे होगा। इसके लिए तो अनैतिक उपायों का ही सहारा लेना पड़ेगा। वे उपाय चोरी डकैती भी हो सकते हैं और तस्करी मिलावट खोरों भी। इन व्यवसायों में भी किन्हीं सिद्धान्तों का पालन किया गया तो वे सिद्धान्त ईमानदारी की परिभाषा में कहाँ आये?

यद्यपि दुनिया की समस्त धन संपदा का मालिक स्वयं ही बन जाना असम्भव सा ही है परन्तु अपने को संसार का सम्पन्नतम व्यक्ति होने का अहंकार सिद्ध करने के लिए मन में आकर्षण इसी लक्ष्य की ओर रहता है। क्योंकि स्वयं को दूसरे सभी से संपन्न, श्रेष्ठ और शक्तिशाली सिद्ध करना है। यही बात शारीरिक दृष्टि से शक्तिशाली, प्रभुता संपन्न और अन्य सभी की तुलना में बुद्धिमान, सुन्दर सिद्ध करने के सम्बन्ध में लागू होती है।

अहंकार सदैव दूसरों को मापदण्ड बना कर चलता है। दूसरों से तुलना कर अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने की वृत्ति का नाम ही अहंकार है। भले ही फिर कोई सिद्ध कर पाये, न कर पाये या सिद्ध करने की चेष्टा में लगा रहे। अपनी जिन मौलिक विशेषताओं पर गर्व किया जा सकता है वह अहंकार से सर्वथा भिन्न है। क्योंकि अपने आप पर गर्व करना तथा उन विशेषताओं की दूसरों के साथ तुलना न करना व्यक्तियों में संतोष, शीतलता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करता है। जबकि लोग अपनी उपलब्धियों को दूसरों से बढ़-चढ़ कर बताते हैं तो उनमें अहंकार की भावना ही काम करती है। नैतिक और मानवीय मूल्यों से ऐसे व्यक्ति कभी भी गिर सकते है; क्योंकि उनमें ईर्ष्या, द्वेष और दूसरों से प्रतिस्पर्धा की भावना रहती है।

कहा गया है कि अहंकार ही प्रत्येक देश और घर में दुखों का मूल कारण है। देश व समाज में तो नागरिकों के भीतर काम करने वाला अहंकार का भाव किस प्रकार अनर्थ उत्पन्न करता है यह बताया ही जा चुका है। परिवार में भी अहंकार के कारण ही क्लेश, कलह और विग्रह का वातावरण बनता है। पति अपने को पत्नी से श्रेष्ठ समझता है इसलिए वह तरह-तरह से उस पर अपना प्रभुत्व जमाता है। पत्नी का स्वभाव यदि समझौता वादी हुआ तो वह पति के अहंकार को किसी प्रकार निबाह ले जायेगी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रति के अहंकारपूर्ण दावे को पचा लेगी। उसकी प्रतिक्रिया का विस्फोट कभी भी हो सकता है और पत्नी भी यदि अपने ‘अहं’ के प्रति उतनी ही सजग आग्रहशील रही तो नित्य का क्लेश परिवार के वातावरण को नरक ही बना डालेगा।

दूसरे कई दुर्गुण ऐसे हो सकते है जो लोगों को समीप ला सकते हैं। जैसे कोई शराबी-शराबी के साथ मेल जोल बढ़ा लेता है, चोर-चोर के साथ दोस्ती कर सकता है, दो आवारा व्यक्ति एक दूसरे के मित्र हो सकते है। प्रायः देखने में भी आता है कि दो समान स्वभाव के, दुर्गुणी व्यक्तियों में सभी सद्गुण हों किन्तु उनमें अहंकार का एक ही दुर्गुण हो तो वे कभी एक दूसरे के समीप नहीं आयेंगे। अधिकाँश सद्गुणी व्यक्तियों में, जिनमें कोई दुर्गुण होता है तो उनमें पहला नम्बर अहंकार का ही होता है। इसीलिए दृष्ट दुर्जनों की अपेक्षा सज्जन प्रकृति के व्यक्ति ज्यादा असंगठित होते है।

पुराणों में उल्लेख आता है कि देवता असुरों से जब-जब भी पराजित हुए तो उसका कारण उनका असंगठित होना ही पड़ा क्योंकि प्रत्येक देवता को अपनी शक्ति का अहंकार रहा और इसलिए वे आपस में तालमेल न बिठा सके। कहने का अर्थ यह कि सारे सद्गुण होते हुए भी व्यक्ति में यदि अहंकार विद्यमान है तो वह उसके सद्गुणों की शक्ति को उसकी प्रकार आवृत कर लेगा जिस प्रकार कि आँख में पड़ा हुआ तिनका सारे संसार को ढ़क लेता है। यों अहंकार का अस्तित्व तिनके से ज्यादा लगता भी नहीं है परन्तु वह मनुष्य को शेष संसार से अलग कर देता हैं। वह मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बना देता है।

यहाँ तक कि अहंकार के कारण ही मनुष्य अपनी मूल सत्ता। से अलग थलग कटा हुआ पड़ा है। वह सत्ता है ईश्वर की सत्ता। तत्वतः जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। जीवात्मा परमात्मा का ही एक अंश है परन्तु जिस प्रकार एक छोटा सा पात्र सागर के भीतर ही समुद्री जल के एक अंश को समुद्र से अलग कर देता है। उसी प्रकार मनुष्य का अपना अहंकार उसे ईश्वर से अलग और दूर कर देता है। इसीलिए सभी ऋषि महर्षियों और संत महात्माओं ने ‘अहं’ की कारा से मुक्त होने को ही सच्ची मुक्ति कहा है। यहाँ तक कि अच्छा होने या धार्मिक बनने के कारण दूसरों से श्रेष्ठ होने का भाव भी मनुष्य को ईश्वर से दूर रखता है। महाभारत में इस प्रकार के कई प्रसंग आते हैं जब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के अभिमान का मर्दन किया और उसे भगवत प्राप्ति में सबसे बड़ा अवरोध बताया। इसी प्रकार रामायण में भी नारद के अभिमान का प्रसंग आता है और वे अनुभव करते हैं कि इस कारण भगवान से कितने विमुख होते जा रहे है। तुलसीदास ने अहंकार नष्ट हो जाने को ही सबसे बड़ी भगवत कृपा कहते हुए रामचरित मानस में बताया है कि यही सब दुखों की जड़ है-

स्मृति मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ तेहिं ते करिहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति सूरी॥

ईसा मसीह ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा है- अगर तुम समझते हो कि तुम ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने की योग्यता रखते हो और इस कारण दूसरों से श्रेष्ठ हो तो यह भ्रम मन से निकाल दो कि तु ईश्वरीय राज्य में प्रवेश पा जाओगे। सुई के छेद में से ऊँट का निकल जाना सम्भव हो जायेगा, किन्तु तुम्हारा ईश्वरीय राज्य में प्रवेश सम्भव नहीं होगा।

अहंकार का आधार ही यह है कि हम अपने आपको महत्वपूर्ण मानते हैं और दूसरों से स्वयं को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए उनके अहंकार से टक्कर लेना चाहते हैं। महत्वपूर्ण होना एक अलग बात है और स्वयं को महत्वपूर्ण मानना तथा उसे सिद्ध करना सर्वथा दूसरी बात है। महत्वपूर्ण सिद्ध करने का प्रयास ही इस बात का घोतक है कि हम अपना मूल्याँकन वास्तविकता से बहुत अधिक करते हैं। विचार किया जाना चाहिए कि संसार में सबसे महत्वपूर्ण यदि कोई है तो वह ईश्वर है और ईश्वर की ऐसी कोई चेष्टा दिखाई नहीं देती जो वह अपने आपको महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए करता हो। संसार की सर्वोपरि महत्वपूर्ण सत्ता अपने आपको महत्वपूर्ण सिद्ध करने की और से उदासीन है तो क्या कारण है कि हम जैसे अरबों व्यक्तियों के होते हुए हम अपने आपको सबसे महत्वपूर्ण मानें और दूसरों से टक्कर लेते फिरें।

अपने अहंकार का पहचान लेने और उसे स्वीकार करने के साथ ही वस्तु स्थिति को समझ लेने मात्र से अहंकार, तिरोहित हो जाता है। केवल पहचानने और स्वीकार करने भर से ही बात नहीं बनेगी। प्रकाश है- और अंधकार नष्ट हो गया है यह जानने पर भी यदि आँखें बन्द रखी जाये तो स्थिति में कोई अंतर नहीं आता। आवश्यकता इस बात की हैं कि आँखें खोली जाये अहंकार को इसी तरह तात्विक दृष्टि से देखते ही उसका अभाव हो जायेगा और फिर चारों और सुख-शाँति सौहार्द्र और स्नेह के सत्य का आलोक उदय हो उठेगा।


सदाचरण में दीर्घ जीवन की प्राप्ति

स्वस्थ शरीर एवं दीर्घ जीवन की अपेक्षा सभी करते है पर इन विभूतियों को प्राप्त करने के लिए क्या करना होता है यह भूल जाते हैं। आहार बिहार का संयम इसके लिए नितान्त आवश्यक है। नियमित दिनचर्या और प्रकृति मर्यादा को ध्यान में रखकर चलने से आरोग्य की रक्षा होती है तथा दीर्घ-आया की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त एक और भी आत अधिक महत्वपूर्ण है वह यह है कि मस्तिष्कीय सन्तुलन और आत्म संतोष बनाये रखने के लिए सदाचारी जीवन जिया जाय। विवेक और औचित्य का ध्यान रखते हुए धर्म-मर्यादाओं का पालन किया जाय। मन का शरीर पर नियंत्रण होना आवश्यक है। उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व अपनाने पर ही मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है तथा दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। इस संदर्भ में शास्त्र कहते हैं -

य एवं शत वर्षाणि जीवति यो वा। भूयाँसि जीवन्ति सह एतद्मृतं प्राप्नोति।। (शतपथ ब्रा.)

सन्मार्ग गामी मनुष्य सौ वर्ष जीता है और अमृतत्व प्राप्त करता है।

ऋषि वशिष्ठ कहते हैं-

सर्वलक्षण हीनाऽपियः सदाचारवान् भवेत्। श्रद्धानोऽनसूयष्च षतं वर्षागि जीवति॥

अन्य विशेषताओं के न होने पर भी यदि मनुष्य आचरणवान है तो उस श्रद्धा के आधार पर भी सौ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेगा।

महाभारत में वर्णन है-

आचाराल्लभते ध्यायुराचारल्लभते श्रियम। आचारात् कीर्तिमाप्नोति पुरुषःप्रेत्य चेहच॥ (अनुशासन पर्व)

सदाचार से ही मनुष्य दीर्घायु होता है सदाचार से सम्पत्ति पाता। तथा सदाचार से ही उसे इह लोक एवं परलोक में कीर्ति प्राप्त होती है।

मार्दव सर्वभूतानाम् अनसूया क्षमा धृति। आयुष्याणि वुधाः प्राहुमियाणाँ चाविमानिनः॥ (महा. भा. उद्यी. प.)

सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति दया का भाव, किसी के गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य, मित्रों का अपमान न करना, ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं। विद्वानों का ऐसा मत है।

दुराचारी हि पुरुष की निन्दा करते हुए शास्त्र में वर्णन आता है-

दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निम्दितः। दुःख भागी च सततं व्याधितोऽज्पाय रंव च॥ (विष्णु पुराण)

आचार भ्रष्ट पुरुष जन समाज में निन्दा का पात्र होता है तथा सदा ही दुखी रहता है। रोग से जराजीर्ण हो अल्प आयु तक जीवित रहता है।

लक्षणैः परिहीनोऽपि सम्यगाचार तत्परः। श्रद्धालुरनसूयश्च नरो जीवेत् समाः शतम्॥

छुषचाररते लोके गर्हणीयः पुमान् भवेत्। व्याधि भिष्चाभिभूयेत् सदाल्पायुः सुदुः खभाक्॥

आचारः परमो धर्म आचारः परम तपः। आचारर्द्वधते ह्मायुराचारात् पाप संक्षयः॥ (स्केन्द्र)

देखने में सुन्दर न होने पर भी सदाचार युक्त होने से मनुष्य दीर्घजीवी हो सकता है तथा आचरणभ्रष्ट मानव सुलक्षण होने पर भी रोगाक्रांत, अल्पायु रहता और दुख भोगता है। सदाचार से आयु बढ़ती तथा पापों का नाश होता है।


पितरों के प्रति कृतज्ञ रहें।

प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक सुकरात का कहना था कि मुझे सदैव कोई एक ‘डेमन’ निकट भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास दे जाता है।

अमेरिका के एक ट्रेन ड्राइवर होरेस एल. सीवर ने अदृश्य सत्ता के ऐसे ही संकेतों को पाने की ख्याति अर्जित की थी और “किंग आफ द रोड़” कहलाने लगे थे। सन् 1890 में जब वे एक सैन्य दल लेकर इलिनास से शिकागो जा रहे थे, उन्हें इसी अज्ञात मार्गदर्शन ने बताया कि आगे खतरा है। होरेस ने गाड़ी रोक दी। पहले तो दल के कमाँडर बहुत क्रुद्ध हुए किन्तु थोड़ी खोज होने के बाद जब होरेस का पूर्वाभास सही निकला, तब सब लोग चकित भी हुए और कृतज्ञता का अनुभव भी किया। एक अन्य अवसर पर इन्हें सामने से आर रही एक गाड़ी का मीलों पहले पूर्वाभास हो गया। उन्होंने अपनी गाड़ी जो आगे बढ़ रही थी, रोक कर फिर पीछे चलाना शुरू कर दिया। वह गाड़ी आई टक्कर लगी। किन्तु एक ही दिशा होने और सतर्क रहने के कारण विशेष क्षति नहीं हुई।

अदृश्य सत्ता द्वारा मार्ग दर्शन की ऐसी घटनाओं के आये दिन प्रमाण मिलते रहते हैं। जिनमें सम्बद्ध व्यक्ति अनिष्ट से बचने और अभीष्ट को प्राप्त करने में समर्थ होते रहते हैं।

महारानी विक्टोरिया के पति प्रिंस अलबर्ट मृत्यु के उपरान्त भी अपनी प्रिय पत्नी से संपर्क बनाये रहें और समय-समय पर बहुमूल्य सुझाव देते रहे।

नेपोलियन जब सेंट हेलेना में निर्वासित जीवन बिता रहा था, तो उसकी मृत पत्नी जोसेफाइन की आत्मा ने उसे उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना दी थी। प्रख्यात उपन्यासकार राजा राधिकारमण सिंह रियासतों-रजवाड़ों की समाप्ति के बाद धनाभाव से पीड़ित थे। कन्या विवाह योग्य हो गई थी। आखिर उनकी दिवंगत माता ने उन्हें मीडियम के द्वारा जानकारी दी कि रत्न-आभूषण आदि महल की दक्षिणी दीवार में गोशाला के छप्पर के पास हैं। रजा साहब ने निर्दिष्ट स्थान में खोदकर धन पा लिया ओर अपनी चिन्ताओं से मुक्त हुए।

अमेरिका में कंसास सिटी के नागरिक आर्थक स्टिलवेल को उनकी पूर्वाभास क्षमता या अदृश्य के मार्गदर्शन ने दरिद्रावस्था से उबार कर लखपति बना दिया। वह पहले रेल ड्राइवरी, क्लर्की आदि करता रहा।

पन्द्रह वर्ष की आयु से ही उसे कुछ आवाजें सुनाई पड़ती। बार-बार सुनने पर वह उन्हें डायरी में नोट करने लगा। एक बार उसने नोट किया कि एक आवाज ने चार वर्ष के अन्दर जिनी नामक लड़की से उसके विवाह की घोषणा की है। जब वह इस नाम की लड़की को जानता भी न था। सहसा वह उसके जीवन में आई और भविष्य वाणी सही सिद्ध हो गई।

आगे चल कर वही एक आवाज उसे बार-बार सुझाव देने लगी कि तुम यह बाबूगिरी छोड़ो और रेल की पटरियाँ बनो का काम शुरू करो। लम्बी कशमकश के बाद पति-पत्नी दोनों ने सलाह की और पति ने नौकरी छोड़ दी। कसास सिटी की एक फर्म की दलाली शुरू की। आवाज उसका मार्ग दर्शन करती रही। उसने कर्ज दिया और उस मार्गदर्शन के अनुसार पटरी-निर्माण की योजना शुरू की। इस कार्य में उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली और सात वर्ष के भीतर वह लखपति बन गया।

स्नेही मृतात्माओं द्वारा अपने प्रियपात्र के मार्ग-दर्शन और सहायता-अनुदान की छोटी बड़ी घटनाएँ जाये और उनके विवरण एकत्र किये जायें तो यह स्पष्ट हो सकता है कि भूतों के आतंक- उपद्रवों की तुलना में सूक्ष्म शरीर धारियों के स्नेह सहयोग की घटनाएँ कम नहीं है।

आम तौर से यह धारणा लोगों में घर कर गयी है कि सूक्ष्म शरीर, धारी ये लोग मनुष्यों को हानि ही पहुँचाते हैं। किन्तु यह धारणा सही नहीं है। भली-बुरी दोनों प्रवृत्तियाँ सृष्टि में सब जगह क्रियाशील देखी जाती है। तब फिर सभी सूक्ष्म देहधारी बुरे पीड़ादायक या दुष्ट क्रूर ही हों यह कैसे सम्भव हैं।

जिस प्रकार संसार में सन्त दुर्जन ही नहीं। सज्जनों उदार अन्तःकरण बालों की भी संख्या यहाँ पर्याप्त है। दूसरों का उपकार करने की सदाशयता तो सामान्यतः अधिकाँश लोगों में होती है। ऐसे ब्राह्मण वृत्ति लोगों की भी कमी नहीं हैं जो सदा अपनी श्रेष्ठ शक्तियाँ दूसरों की मदद में ही लगाते रहते हैं। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर धारी जीवात्माएँ भी भिन्न-भिन्न प्रकृति की होती है। विक्षुब्ध अशांत उद्विग्न मनुष्य भरने के बाद भी क्रूरकर्मों और आततायी गतिविधियों में सर लेते रह सकते हैं। किन्तु अपने प्रियजनों के प्रति सद्भाव रखकर उन्हें सहायता पहुँचाने वाले पितर भी होते हैं और ऐसे उदात्त स्वभाव के पितर भी जो सूक्ष्म शरीर धारी ब्राह्मण ही कहे जा सकते हैं। ये देवतुल्य जीवात्माएँ सत्पात्रों को बिना किसी पूर्व सम्बन्ध के भी सहायता पहुँचाती और मार्गदर्शन करती है।

हर मृत व्यक्ति उपद्रवी भूत ही बने, यह कतई जरूरी नहीं। वह पितर रूप में दयालु, पथप्रदर्शक और उदार दानी भी हो सकता है और व्यक्तियों को कई प्रकार से लाभ पहुँचा सकता है। जिन्हें दैवी शक्तियाँ, देवात्माएँ देवता आदि कहते हैं वे उच्चकोटि की आत्माएँ ही हैं। हमारे पूर्वज ऋषियों की ये आत्माएँ हमारी श्रद्धा के अनुसार सहयोग देकर प्रगति पथ में बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। ये करुणार्द्र आत्माएँ अपनी सामर्थ्य और शक्तियाँ पीड़ितों के उद्धार के लिये खर्च करने को आतुर रहती हैं। पिछड़ों को आगे बढ़ाने और पतितों की ऊपर उठाने की उनमें ललक रहती है। सन्तप्त व्यक्तियों को शीतलता शान्ति पहुँचाने के लिये वे सदा तत्पर रहती हैं। बादलों की तरह वे हर प्यासी भूमि पर पानी बरसाने को सदा दौड़ती रहती हैं। परन्तु वे मदद कर सकें इसके लिये भावनात्मक अनुकूलता तो चाहिए ही। जो व्यक्ति भूतों से डरे नहीं प्रभावित न हो, उसका भूत कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जहाँ उनकी घुसपैठ की गुंजाइश हो वही वे उपद्रव दिखा पाते हैं। यह प्रत्येक सूक्ष्म शरीर धारी की सीमा है कि वह संवेदनात्मक अनुकूलता होने पर ही किसी व्यक्ति से सम्बन्ध बना सकता है। क्योंकि वे मुख्यतः संवेदनाओं, भावनाओं, विचारों के ही पुँज होते हैं। अतः जिस प्रकार भूतों के प्रति कोमलता, दुर्बलता न पालना ही उन्हें उत्पात का मौका देना ही है। उसी प्रकार श्रद्धा कृतज्ञता का भाव रखना ही पितरों को सहायता कर सकने का अवसर देना है। विरोध या उपेक्षा भाव रखने पर वे भी सहायता नहीं कर सकते।

अतः पितरों को जानना उनके प्रति श्रद्धा कृतज्ञता का भाव रखना उतना ही आवश्यक है और लाभ प्रद है, जितना भूतों को हस्तक्षेप का मौका न देना, उन्हें दूर ही रहने देना। भूत भगाने से अधिक ही महत्वपूर्ण है पितर बुलाना, पितरों से संपर्क रखना, सौहार्द्र स्थापित करना भूतों से डरा न जाये, तो वे कुछ न बिगाड़ सकेंगे। पितरों के प्रति सद्भाव न रहा, तो वे कुछ न सुधार सकेंगे।

जिनमें पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा की प्रवृत्तियाँ होती है उन्हें ही वे सहयोग प्रदान कर पाती है। यह सहयोग संकटों की पूर्व सूचना देने, उन्नति-अवनति का पूर्व ज्ञान कराने आसन्न खतरों से बचने का उपाय बनाने लाभकारी कदम सुझाने और स्पष्ट सहायता करने जैसे अनेक रूपों में सामने आता है।

सम्राट एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी एलेक्जेन्ड्रा पितरों से संपर्क में विश्वास करती थी। उन्हें एक ‘सेयान्स’ में एक पितर ने सूचना दी कि उनके पति अब कुछ ही दिनों जीवित रह सकेंगे और अपने जन्मस्थान कोबे में वे प्राणत्याग देंगे। उन दिनों सम्राट कोबे में ही थे। महारानी दूसरे ही दिन वहाँ के लिये चल पड़ी। तैयारी करते करते खबर मिली की सम्राट बीमार हैं। महारानी कोवे पहुँची तो रोग शय्या पर पड़े मूर्च्छित सम्राट ने मानों उन्हें देखने के लिये ही आँखें खोली। कुछ पल देखते रहे और फिर उनके प्राण पखेरू उड़ गये।

प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुँशी को भी सूक्ष्म शरीरधारियों प्रति कोमलता के भाव रखने से कई-बार बहुमूल्य जानकारियाँ प्राप्त हुई। भारतीय पत्रिका में वे भारतीय विद्याभवन के कुलपति के नाते नियमित एक स्तम्भ लिखते थे। इसमें उन्होंने पितरों से प्राप्त इन सहयोगों की चर्चा करते हुए बताया था कि बीजापुर जेल में उन्हें रहने के लिए उस कोठरी में भेज दिया गया, जहाँ पहले फाँसी लगा करती थी। यहाँ एक मृतात्मा ने जिसे वही फाँसी लगाई गयी थी। वहाँ एक मृतात्मा ने जिसे वही फाँसी लगाई गई थी, उन्हें सूचना दी कि आप शीघ्र जेल से मुक्त होने वाले हैं। परन्तु फिर जल्दी ही दुबारा जेल में भेजे जायेंगे। यही हुआ। वहाँ से वे छोड़े गये ओर छूटने पर डाँडी यात्रा में सम्मिलित हुए। अतः फिर बन्दी बनाये गये और कारावास का दण्ड दिया गया। श्री मुँशी ने यह भी लिखा है कि एक बार आवाहन करने पर लोकमान्य तिलक की आत्मा ने उनसे संपर्क किया था और यह संदेश दिया था कि मातृभूमि की स्वाधीनता के लिये संघर्ष करने वालों को मैं सहायता प्रदान करता रहूँगा।

इस प्रकार स्नेह पूर्ण उदार पितरों से बहूमूल्य सुझाव, सूचनाएँ, पथ निर्देश, जानकारियाँ और सहायता ही नहीं प्रण अनुदान तथा शक्ति तक प्राप्त होती है। वे सूक्ष्म शरीर धारी साधु ब्राह्मण भी होते हैं। उनको स्मरण और वन्दन उपयोगी व लाभकारी होता है उनकी मदद और मार्ग निर्देश, कृपा और करुणा जीवन में आगे बढ़ने, ऊँचा उठने में सहायता शक्ति बनकर प्राप्त हो सकती है। आवश्यकता उनके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव रखने की है।


दिमाग दूध से बना (kahani)

कांग्रेस कार्यकारिणी के प्रधान सदस्य परेशान थे। वह रिपोर्ट नहीं मिल रही थी जिसके आधार पर महत्व पूर्ण प्रस्ताव पारित करने के लिए कार्यकारिणी की विशेष बैठक बुलाई गयी थी। स्वतंत्रता आन्दोलन का समय था, जबकि हर कदम ठीक समय पर उठाना अत्यधिक आवश्यक था। बिना आधार के कार्य आगे कैसे बढ़े?

अचानक ध्यान आया कि वह रिपोर्ट महात्मा गाँधी तथा डा. राजेन्द्र प्रसाद पढ़ चुके हैं। राजेन्द्र बाबू वरिष्ठ नेताओं पं. नेहरू, आचार्य कृपलानी, मौलाना आजाद आदि के साथ चर्चा कर रहे थे। उनसे पूछा गया तो बोले ‘हाँ मैं पड़ चुका हूँ और आवश्यक हो तो उसे बोल कर पुनः नोट करा सकता हूँ।

लोगों को विश्वास न हुआ कि इतनी लम्बी रिपोर्ट एक बार पढ़ने के बाद ज्यों की त्यों लिखाई जा सकती है। किन्तु और कोई चारा न था। खोज के साथ-साथ पुनर्लेखन भी प्रारम्भ कर दिया गया।

राजेंद्र बाबू 100 ये अधिक पृष्ठ लिखा चुके तब वह रिपोर्ट भी मिल गयी। कौतूहल वश लोगों ने मिलान किया तो कहीं भी अंतर न मिला। लोग आश्चर्य चकित रह गये। पंडित नेहरू ने प्रशंसा भरे स्वर में पूछा ‘ऐसा आला दिमाग कहाँ से पाया राजेन्द्र बाबू? और देश रत्न की चिर परिचित सोम्य मुस्कान के साथ उत्तर मिला। “ यह दिमाग दूध से बना है अण्डे से नहीं।


कलि का प्रभाव क्षेत्र

पांडवों द्वारा महाप्रयाण करने के बाद महाराजा परीक्षित ने शासन सूत्र सम्हाला। उस समय द्वापर युग का अन्त हुआ ही था और कलिकाल की काली छाया भूमण्डल पर छाने लगी थी। महाराजा परीक्षित ने जब यह सुना कि मेरे साम्राज्य में कलियुग का प्रवेश हो गया है तो वे दुखी हुए लेकिन यह सोच कर प्रसन्न भी हुए कि युद्ध का अवसर प्राप्त हुआ है। युद्धवीर परीक्षित रथ पर सवार होकर कलयुग का उच्छेद करने के लिए निकल पड़।

साथ में न सेनायें न अंगरक्षक रथ पर अकेले परीक्षित रथ में जूते हुए अश्वों की रास भी स्वयं सम्हाले वे, राज्य के कौन कौने में कलि को ढूँढ़ने के लिए चल पड़े। एक स्थान पर वे कुछ समय के लिए रुक ही थे कि उन्होंने देखा-एक राज वेष धारी हाथ में लाठी लिये एक गाय और बैल को बुरी तरह पीटता जा रहा है गाय उसकी और बैल की बुरी तरह पीटता जा रहा है गाय उसकी निर्मम मार सहती हुई ठोकरें खाती हुई किसी प्रकार अपने को घसीटती हुई चल रही थी। बैल की भी यही दशा थी। राजा परीक्षित ने अपना धनुष चढ़ा कर उसे ललकारा- अरे तु कौन है? इस प्रकार गौमाता और गौसुत वृषभ को निर्ममता के साथ पीटने वाला तू अपराध कर रहा है, अतएव दण्डनीय ही है।

फिर उन्होंने वृषण सू पूछा-कमल नाल के समान आपका वर्ण श्वेत है लगता है इस नराधम के क्रूर अब शोक न कीजिए। मैं इस दृष्ट को अभी किये का दण्ड देता हूँ।

वृषभ ने अपना नाम धर्म बताया और गौ का परिचय पृथ्वी के रूप में देते हुए कहा कि-यह राज वेशधारी पुरुष कलि है और हम दोनों को नष्ट करने पर तुला हुआ है ताकि यह निःशंक होकर स्वैतचरण कर सकें।

परीक्षित ने धर्म और पृथ्वी को वृषभ तथा गौ के रूप में देखकर समझ लिया कि कलि सामना हो गया है। सतयुग में धर्म के चार चरण थे, तप, पवित्रता दया, और सत्य। इस समय तीन चरण नष्ट हो चुके हैं ओर कलि अपनी आसुरी शक्ति ने उस चौथे चरण को भी नष्ट कर देने के लिए तुला हुआ है ताकि धर्म पूरी तरह पंगु हो जाय। समस्त आपदा विपदाओं के कारण आसुरी प्रवृत्तियों के जनक और दृष्टता के प्रेरक कलि का वध करने के लिए उन्होंने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और उसे तान दिया।

अपने मरण को सामने प्रस्तुत जान कर कलियुग ने परीक्षित के चरणों में अपना सिर रख दिया और कहा आप यशस्वी, दीन वत्सल तथा शरणागत रक्षक हैं। मुझ पर दया कीजिए। आप जो आज्ञा देंगे उसी का पालन करूंगा पर कृपा कर मुझे प्राणों से मत मारिये।’

“तू हाथ जोड़कर शरण में आ गया, इसलिए तुझे मारना तो उचित नहीं है- महाराज परीक्षित ने कहा परन्तु तू अधर्म का सहायक है। इसलिए तुझे मेरे राज्य में नहीं रहना चाहिए।

कलि ने परीक्षित का आदेश स्वीकार कर लिया। इस समय समस्त भूमण्डल पर परीक्षित का राज्य फैला हुआ था। अतः कलि ने कहा-महाप्राज्ञ! आप मुझे ऐसा स्थान बता दीजिए जहाँ में स्थिरतापूर्वक रह सकूँ। महाराज परीक्षित ने कलि को चार स्थान बताये।

द्यूत, मद्यपान, परस्त्री संग और हिंसा। इन चार स्थानों पर मेरा निर्वाह नहीं होगा इसलिए कलि ने एक स्थान और माँगा। परीक्षित ने कहा सुवर्ण। सुवर्ण अर्थात् लोभ। कहते हैं तभी से कलि अपनी आसुरी माया के साथ इन पाँच प्रवृत्तियों को अपना आवास बनाये हुए है। इन पाँचों में से एक भी दुष्प्रवृत्ति जहाँ होती है, वहीं कलि का वश चलता हैं।


विलुप्त सभ्यता के पुनरोदय की सम्भावना

आज वैज्ञानिक इस बात को एकमत से स्वीकार करने लगे हैं कि वस्तुसत्य यानी जगत का यथार्थ स्वरूप विराट और जटिल है। उसके अनेक पहलू हैं। विज्ञान इनमें से एक है। इन विभिन्न पहलुओं में परस्पर विरोध नहीं, पूरकता हैं।

वैज्ञानिक चिन्तक हिंशलवुड आइन्स्टाइन के इस मत के पूर्ण समर्थक, थे कि अंतर्जगत में प्राणिमात्र में एकात्मता है। इस बार अपने एक मित्र द्वारा इस रहस्यवाद की खिल्ली उड़ाये जाने पर वे गम्भीर हो गये और बोले-”आन्तरिक जगत की वास्तविकता का खंडन वस्तुतः आसपास की सम्पूर्ण सत्ता को ही अस्वीकार करने के समान है। तर्काभास द्वारा उस वास्तविकता को झुठलाया नहीं जा सकता।”

वस्तुतः विश्वव्यापी चेतना’प्रवाह एक यथार्थ हैं और उसी का अंश हमसे से हर एक में विद्यमान होने से उस प्रवाह से मुक्त रूप में जुड़ सकना हर एक के लिये सम्भव है। यह सम्भावना प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर भी सामने आती ही रहती है। योग-साधना तो उसका सुनिश्चित मार्ग है ही। कई बार इसे जीवन में बिना किसी योग-साधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित देखी-पाई जाती है। जिससे जहाँ उनके पूर्व जन्म में सम्पन्न विकास का पता चलता हैं, वही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्यचेतना का भी प्रमाण मिलता है।

टी. लोवसांग रम्पा ने अपनी पुस्तक “थर्ड आई” में व्यक्ति की दिव्य-दर्शन को सामर्थ्य की प्रक्रिया विवेचित की है। डेनियल चार ने “स्वर्गीय खजाने की खोज” में अपनी निजी दिव्य अनुभूतियों का प्रामाणिक विवरण दिया है। गोविन मैक्सवेल ने तो अपनी शोधों द्वारा यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया हैं कि अतीत और भविष्य की अनुभूति की कुछ सामर्थ्य अनेक लोगों में होती है। किन्तु अधिक जानकारी और अभ्यास-मार्गदर्शन के अभाव में उनकी वह क्षमता अविकसित ही रही आती है। जिन लोगों में यह क्षमता अधिक विकसित होती है। उनके ही बारे में लोग जान पाते है। आश्चर्यजनक रूप से सही भविष्य-कथन करने वाले लोग ऐसे ही अधिक विकसित अतीन्द्रिय सामर्थ्य वाले होते रहे हैं।

ऐतिहासिक-राजनैतिक घटनाक्रमों की अचूक भविष्यवाणियों के लिये प्रो. कीरो, प्रो. हरार, जूल बर्न, जीन डिक्सन, जोरार्ड क्राइसे, एण्डरसन आदि प्रसिद्ध रहें हैं। दो प्रख्यात भविष्यवक्ता ऐसे भी हुए, जिन्होंने वैज्ञानिक खोजों से सम्बन्धित भविष्यवाणियाँ कीं और जो उस समय की वैज्ञानिक प्रगति के निष्कर्षों की दृष्टि से अविश्वसनीय मानी गई। किन्तु कालाँतर में वही सत्य सिद्ध हुई।

जोनाथन स्विफ्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “गुलीवर भ्रमण-कथा” में लिखा कि “मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा हैं। और वे उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इनमें से एक की चाल दूसरे से दुगनी है।” उस समय यह बात निरी कल्पना मानी गयी। उसके डेढ़ सौ वर्ष वाद सन् 1877 में वाशिंगटन की ‘नेशनल आब्जर्वेटरी’ की शक्तिशाली दूरबीन ने यह तथ्य नोट किया कि वास्तव में मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा और और एक की गति दूसरे से दूनी है। तब लोग चकित रह गये कि उस साधनहीन जानेथन ने इतने वर्षों पूर्व यह सही बात कैसे जान ली?

ऐसे ही एक चमत्कारी दिव्यदर्शी थे एडगर कायसी जो अब से 33 वर्ष पूर्व सन् 1945 में मरे। एडगर कायसी “निद्रालीन देवदूत” के रूप में प्रसिद्ध थे। क्योंकि वे गहरी निद्रा की स्थिति में ये भविष्यवाणियाँ करते थे। विशेष बात यह है कि नींद से जगने के बाद खुद कायसी को याद नहीं रहता था कि उन्होंने क्या कहा है? इसीलिये उनकी प्रसिद्धि बहुत विलम्ब से हुई। बचपन में वे यदा-कदा सोते समय विलक्षण बातें बड़बड़ा उठते थे। तब माँ-पिता अधिक ध्यान नहीं देते थे। बड़े होने पर उनकी इस क्षमता का पता चला। परा मनोविज्ञान में रुचि रखने वाले अध्येताओं ने उनकी इन भविष्यवाणियों को नोट किया। इन परामनोवैज्ञानिकों के अनुसार एडगर कायसी नींद में इस तरह बोलते जाते थे, मानों वे कुछ स्पष्ट लिखा देख रहे हैं और पढ़ते जा रहे हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे अपने ही अंतर्मन में संचित जन्म-जन्मान्तरों की स्मृतियों को दुहराते जाते थे। अस्तु वे भविष्य कथन एडगर कायसी की “रीडिंग” के रूप में नोट किये गये।

प्रारम्भ में एडगर कायसी ने आत्मसम्मोहन का कुछ अभ्यास किया। वे “आटो सजेशन’ द्वारा गहरी निद्रा में चले जाते और जानकारी देने लगते। अनेक रोगियों के रोग के जटिल कारण और सरल उपचार उन्होंने इस स्थिति में कई बार बताये। सैकड़ों रोगों और मनोरोगी कायसी की इस करामात से लाभान्वित होकर स्वस्थ हो गये। बाद में कायसी इस प्रकार की भविष्यवाणियाँ भी करने लगे। विज्ञान, पुरातत्व, राजनीति, समेत सामाजिक गतिविधियों के अनेक क्षेत्रों के बारे में उन्होंने अतीत और भविष्य सम्बन्धी अनेक बातें बतलाई।

अणुबम के निर्माण की सर्वप्रथम भविष्यवाणी एडगर कायसी ने ही की थे। यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं थे। इस प्रकार अमरीका में जातीय दंगे भड़क उठने की उनकी भविष्यवाणी भी अक्षरशः सत्य निकली, यद्यपि न वे इतिहास के अध्येता थे, न समाजशास्त्री। दो अमरीकी राष्ट्रपतियों की हत्याओं की उनकी भविष्यवाणी भी जोन डिक्सन और जूल बर्न की ही तरह की थी और सत्य सिद्ध हुई।

जापान और अमरीका में युद्ध होने जर्मनी की पराजय होने जैसी अनेक राजनैतिक भविष्यवाणियाँ तो अन्य प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं से मिलती-जुलती ही हैं। पर कायसी की इन सबसे पृथक भविष्यवाणियाँ की हैं, जो उनके अतीत-कथन से भी जुड़ी हैं। मय-सभ्यता के बारे में उन्होंने बताया था कि यह एक अति समृद्ध सभ्यता रह चुकी हैं। इनका-सभ्यता के विवरण भी उन्होंने सर्वप्रथम प्रस्तुत किये। बाद में, पुरातात्त्विक अनुसंधानों से ये विवरण प्रामाणिक सिद्ध हुए। सुनेरियन सभ्यता का कालपात्र गढ़े होने की बात भी कायसी ने कही थी। कई वर्षों बाद निपुर खंडहरों से 60 हजार मिट्टी की पट्टियाँ खुदाई के समय प्राप्त हुई; जिनमें सुमेरियन सभ्यता का ज्ञान-विज्ञान अंकित था।

इसी प्रकार कायसी ने अपनी निद्रावस्था के कथन में बताया कि आज से कई हजार वर्ष पूर्व धरती पर एक अति विकसित सभ्यता थी। उस समय विज्ञान आज से कई गुना विकसित था। ब्रह्मांड की यात्रा में समर्थ अन्तरिक्षयानों का प्रचुरता से प्रयोग होता था आणविक ऊर्जा के उपयोग से अनेकों लाभ लिये जाते थे, लेजर किरणों मेजर किरणों की उपयोगिता भी उन्हें ज्ञात थी। साथ ही दिव्यदर्शन, दूरानुभूति, दूसरों के मन की बात जान लेने, इच्छा-शक्ति से वस्तुओं और व्यक्तियों को प्रभावित कर सकने आदि तरह-तरह की अतीन्द्रिय क्षमताओं से लोग सम्पन्न होते थे।

एडगर का कथन था कि जल-प्रलय के समय वह सभ्यता समुद्र में समा गई। इसके बारे में एडगर ने भविष्य के जो कथन किये थे वे और भी विस्मयकर थे। उनका कहना था कि उस सभ्यता के ब्रह्माण्डीय संचार, केन्द्रों में से एक था पोसीडिया जो अतलांतिक महासागर के तट पर था। 1968 में अतलांतिक सभ्यता का पुनः उत्थान होगा। सर्वप्रथम ‘पोसीडियो केन्द्र का कुछ अंश प्रकट होगा। धीरे-धीरे उस सभ्यता के अनेक प्रमाण धरती पर मिलने लगेंगे। तीस वर्षों के भीतर ये प्रमाण अत्यधिक स्पष्ट रूप से और प्रचुर परिमाण में सामने आयेंगे। इसी बीच दुनियाँ के अनेक हिस्सों में व्यापक प्राकृतिक उथल−पुथल होगी। कई हिस्से जल में डूब जायेंगे। पुरानी सभ्यता नये रूप में उदित होगी। मनुष्य में देवत्व का उदय होगा और धरती पर फिर स्वर्गीय वातावरण पनपेगा। समृद्धि और विकास भौतिक भर न रहकर आध्यात्मिकता से भी जुड़ेगा। वर्तमान की विषमताएं तथा विकृतियाँ आधार से नष्ट हो जायेंगी।

जहाँ तक जल, प्रलय से किसी विकसित सभ्यता के अवसान की बात है; विश्व के तमाम प्राचीन साहित्य में धार्मिक पुट देकर इसका वर्णन यहाँ तक किया गया पढ़ने को मिलता है। भूगर्भ शास्त्रियों को भी यही मत हैं कि पृथ्वी के विशेष खंड टूट, टूट कर समय-समय पर जलमग्न होते रहे है। भूगर्भवेत्ता डा. ट्रिकलर ने हिमालय के आसपास के ध्वंसावशेषों का अध्ययन किया और पाया कि जलप्रलय की घटना सत्य है। यूनानी साहित्य, और बेबीलोनिया के साहित्य में भी जलप्लावान की चर्चा मिलती है। यूनानी पुराकथा के अनुसार डयूकालियन और उसकी पत्नी पैरहा का विनाश करने के लिये जीयस ने भीषण जलवृष्टि द्वारा नो दिन तक पृथ्वी को पानी में डुबाये रखा। अन्त में जब पति-पत्नी ने बलि दी; तब जीयस प्रसन्न हुआ और उन्हें संतान का वर दिया।

बाइबिल में भी जल-प्रलय होने का वर्णन है। उसके अनुसार जल देवता ‘नूह’ कुछ साथियों के साथ नौका में नौ महीने घूमते रहें। दसवें महीने के पहले दिन से जल कम होना शुरू हुआ। सुमेरियन और चीनी ग्रन्थों में भी जल-प्लावन की चर्चा है। प्राचीन भारतीय साहित्य में भी जल-प्रलय का स्थान-स्थान पर वर्णन मिलता है। अतः एडगर कायसी द्वारा वर्णित जल-प्रलय की बात तो विस्मयकारक नहीं है।

आश्चर्य की अधिकता एडगर की मृत्यु के 23 ‘वर्ष’ बाद उभरी। सन् 1968 में पोसीडिया के एक भाग के प्रकट होने की भविष्यवाणी उसने की थी। ठीक इसी वर्ष अतलांतिक समुद्र के बहामा-विमिनी वारमूडा क्षेत्र में कुछ विचित्र निर्माणों का पता चला। कायसी ने पोसीडिया का जो वर्णन किया है, वह इसी वारमूडा क्षेत्र का ही वर्णन है। उस वर्ष इस क्षेत्र में ऐसे अवशेष पाये गये, जिनसे स्पष्ट हुआ कि वे किसी विकसित प्राचीन सभ्यता के बन्दरगाह या प्लेटफार्म रहे होंगे। सैकड़ों टन भारी चट्टानें किस प्रकार किन साधनों से लायी गई होंगी और उनको विशिष्ट आकृतियों में ढालने वाली वास्तुकला कितनी समृद्ध रही होगी, इसकी कल्पना भी विस्मय से भर देती है।

एक विचित्र बात यह है कि एडगर कायसी द्वारा वर्णित इसी क्षेत्र में वह बहुचर्चित वारमूडा त्रिकोण हैं, जहाँ से अब तक पचासों जलयान और अन्तरिक्षयान गायब होकर अज्ञात लोक में खो चुके हैं। अब तक अनेक वैज्ञानिक इस तथ्य का रहस्य खोज निकालने का प्रयास कर चुके हैं कि जलयानों ओर वायुयानों के इस क्षेत्र में रहस्यमय लोप का कारण क्या है? परन्तु अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं प्राप्त हो सहा है। एक बात अब तक बराबर देखी गई है कि वारमूडा त्रिकोण से लुप्त समुद्री जहाजों और हवाई जहाजों का एक कण भी ढूंढ़े नहीं मिलता। जबकि हजारों व्यक्तियों और आधुनिकतम साधन-सम्पन्न यन्त्रों-विमानों के द्वारा हर घटना के तत्काल बाद चारों ओर चप्पा-चप्पा छान मारा गया है। आये दिन होने वाली ये घटनाएं कुछ लोगों के अनुसार समुद्र के गर्भ में दबी समृद्ध सभ्यता के कर्णाधारों का करिश्मा है। वे लोग समुद्र के गर्भ में रहकर भी अपने ज्ञान-विज्ञान के कारण जीवित और सक्रिय हैं तथा वही लोग हमारे जहाजों-विमानों का अपहरण करते रहते है। जबकि कुछ अन्य लोगों को धारण है कि किसी अन्य गुट के अतिविकसित लोग जो उड़न ‘तश्तरियों द्वारा इस पृथ्वी का निरीक्षण करने आते रहते हैं, वे ही अपने परीक्षण के लिये ये अपहरण करते हैं और उन्हें किन्हीं कारणों से वारमूडा-त्रिकोण ही अपने लिए उपयुक्त प्रतीत होता है।

तथ्य क्या है, यह शायद अगले दिनों सामने आ सकें। वहरलाल एडगर कायसी ने अपनी भविष्यवाणी में न तो कभी भी यह कहा कि समुद्र के नीच दबी सभ्यता के वाहक प्राणी अभी भी जीवित है और न ही कभी यह कहा कि विमानों के अपहरण का उनसे सम्बन्ध हो सकता है। कायसी ने तो सिर्फ यह बताया कि (1) कभी एक अतिविकसित सभ्यता धरती पर थी। (2) जल-प्रलय के समय यह सभ्यता अतलांतिकसागर के तल में समा गई। (3) 1968 से उसके कुछ साक्ष्य प्राप्त होने लगेंगे। ये तीन ही बातें अब तक के घटनाक्रमों और अनुसन्धानों से सही लगने लगी है। 1968 में उस विकसित सभ्यता के खंडहर मिलने शुरू हुए।

अब प्रतीक्षा है कायसी की भविष्यवाणी के अगले चरण चरितार्थ होने की। उसके अनुसार (1) अगले दिनों उस विकसित सभ्यता के विश्वभर में स्थान-स्थान पर प्रमाण सामने आयेंगे। (2) इसी बीच दुनियाँ भर में प्राकृतिक उत्पात होंगे, कई भाग जलमग्न हो जायेंगे और अनेक क्षेत्र क्षत−विक्षत हो जायेंगे। (3) उसी प्राचीन सभ्यता का पुनः उदय होगा। आध्यात्मिक मूल्यों क प्रतिष्ठा होगी। मानवीय प्रज्ञा के नये आयाम सामने आयेंगे। एक अभिनव युग-शक्ति का उदय होगा और अंततः धरती में चारों ओर सुख-शान्ति के स्वर्गीय वातावरण की अभिवृद्धि होगी। इसे ही अतल समुद्र में समा गयी उस समृद्ध संस्कृति का पुनरोदय कहा जा सकता है।

एडगर कायसी के अब तक सही सिद्ध हुए भविष्य-कथन जहाँ अगले समय से संबंधित कथनों के सत्य हो सकने की सम्भावना उपस्थित करते है, वहीं मानवीय चेतना की विलक्षण सामर्थ्य भी प्रस्तुत करते हैं। आखिर कायसी अतीत और भविष्य के इन घटना प्रवाहों को बिना आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों और प्रयासों के कैसे जान सका?

अन्तश्चेतना का क्षेत्र भौतिक-विज्ञान से भिन्न है, उसका विरोधी नहीं। तभी तो अन्तश्चेतना द्वारा जाने गये तथ्यों की पुष्टि अन्ततः विज्ञान से भी होती है। अतलांतिक सभ्यता का उदय विज्ञान और अध्यात्म के मिलन का परिणाम होगा यही सम्भावना व्यक्त की जा सकती है।


सन्तोषजनक जीवनयापन (kahani)

एक गाँव में एक सद्गृहस्थ परिवार रहता था, पति-पत्नी, दो बच्चे, माता-पिता उस तरह वे छः व्यक्ति थे। परिवार का मुखिया गाँव के स्कूल में अध्यापक था व गाँव के मन्दिर में पूजा भी करता था। आय कम थी परन्तु फिर भी पूरा परिवार सुखी था, सब लोग एक दूसरे का सम्मान करते रहते थे व सीमित आय में से ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दिया करते थे।

एक दिन उस पुजारी के मन में विचार आया वह कितना अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रहा है तथा उसके मन्दिर में ही नित्य दर्शनार्थी धनिक रईस कितने समृद्धिशाली व सुखी हैं। भगवान भी अजीब है जो उनकी दिन-रात सेवा करें वह अभावग्रस्त जीवन यापन कर दुःखी बना रहे व जो मात्र थोड़े समय के लिए दर्शनार्थ धाबे वह वैभवपूर्ण जीवन जिए। एक दिन वह पुजारी उन रईस के घर उनके सुख के बारे में पता लगाने लगा। रईस से उसने पूछा, “महाराज आपके इतने नौकर-चाकर हैं बड़ा महल है आपको किसी चीज की कमी नहीं। आपके सुख का क्या कहना” रईस बोला “पुजारी जी से सुखी कहाँ हूँ, मेरे कोई बालबच्चा नहीं है। इस महल में नौकरों के बीच रहकर भी मैं अन्दर से बहुत दुखी हूँ। “पुजारी ने पूछा फिर सुखी कौन होगा” “पास ही के गाँव में एक विद्वान रहता है उसे कई विद्याओं का अच्छा ज्ञान है मैं तो समझता हूँ वही सुखी है” ब्राह्मण पुजारी उस विद्वान से मिला तो मालूम हुआ वह विद्वान भी इसलिए दुखी है कि उसने विद्यार्जन में जितना समय लगाया इस अनुसार उसे आर्थिक लाभ नहीं होता वह जीवन निर्वाह भी कठिनाई से कर पा रहा है। पुजारी ने कहा “तो क्या दुनिया में कोई सुखी नहीं” “क्यों नहीं” “एक गाँ में एक ब्राह्मण पुजारी है उसकी आय तो सीमित है पर जो भी उसकी कमाई है वह सात्विक है। उसकी गृहस्थी बड़ है पर उसमें परस्पर स्नेह है। उसकी पूरी गृहस्थी एक तपोवन है अतः सर्वाधिक सुखी तो वह ब्राह्मण पुजारी ही है।”

यह सुन वह व्यक्ति लौट आया और सन्तोषजनक जीवनयापन करने लगा।


सर्व सुलभ बेहद सस्ता पौष्टिक भोजन

शरीर को भोजन की आवश्यकता मुख्यतः दो कारणों से पड़ती है। पहले शरीर की बुद्धि और मरम्मत के लिए तथा दूसरे शरीर में वाँछित गर्मी और शक्ति उत्पन्न करने के लिए। मनुष्य का शरीर निरन्तर निर्मित होती रहने वाली, अभिवृद्धि करने वाली प्रकृति की अद्भुत रचना है। किसी मकान का निर्माण करने के लिए जिस प्रकार ईंट, चूना, सीमेण्ट, लकड़ी और लोहे के सामान जरूरी होती हैं उसी प्रकार शरीर के लिए भी विभिन्न पोषक तत्व आवश्यक होते हैं जो खाद्य पदार्थों से मिलते हैं।

शरीर निरन्तर गतिशील, क्रियाशील भी रहता है। इसके लिए एक शक्ति की आवश्यकता होती है। रेल को चलाने के लिए वाष्प शक्ति या विद्युतशक्ति से चलते है। यदि उन्हें वह शक्ति मिलना बन्द हो जाय तो सम्बन्धित यंत्र बन्द हो जाते हैं। शरीर भी किसी मशीन से कम नहीं है। उसे चलाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता रहती है वह भोजन से ही प्राप्त होती है। हम जो आहार ग्रहण करते हैं जो कुछ भी खाते हैं उससे हमारा पाचन संस्थान पोषक तत्व चुन लेता है और उन्हें रक्त में मिलाकर रक्त परिवहन संस्थान को सुपुर्द कर देता है। यहाँ से जिन अंगों को जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है वहाँ रक्त वे तत्व पहुँच जाते हैं।

भोजन से प्राप्त होने वाले पोषक तत्व ही शरीर में शक्ति पैदा करते है। इसके अतिरिक्त शरीर की जीवित रखने के लिए गर्मी भी अपेक्षित होती है जिससे हमारा शरीर गर्म रहता है। इस गर्मी को हम जीवन की गर्मी भी कह सकते हैं। भोजन के पोषक तत्व जब शरीर में शक्ति पैदा करते है तो उनसे जीवन की यह वाँछित गर्मी स्वयं ही प्राप्त हो जाती हैं इसलिए आवश्यक है कि हम जो भोजन करें उस भोजन में पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में विद्यमान रहें ताकि शरीर को आवश्यक पोषक मिलता रहें।

स्वस्थ और शक्तिशाली शरीर के लिए वैज्ञानिकों ने जिन पोषक तत्वों को आवश्यक बताया है वे है- प्रोटीन्स, खनिज लवण, कार्बोहाइड्रेट्स, चर्बी और विटामिन्स, भोजन में यह तत्व पर्याप्त मात्रा में रहें तौ शरीर की अभिवृद्धि और उसकी अद्भुत मशीन में होने वाली टूट-फूट का कार्य भली प्रकार चलता रह सकता हैं।

समझा जाता है कि इन पोषक तत्वों के लिए उच्च कोटि का आहार चाहिए। जैसे प्रोटीन्स के लिए सोयाबीन, सूखे मेवे और सूखी फलियों वाले शाक, चर्बी के लिए बादाम, अखरोट, पिस्ता, काजू, घी, विटामिन्स के लिए फल दूध दही आदि। जिन खाद्य पदार्थों में ये तत्व पर्याप्त मात्रा में हैं उनकी एक लम्बी सूची है और कई बहुत महँगे होने के कारण सर्वसाधारण के लिये खाद्य पदार्थ सुलभ भी नहीं हो पाते। इसलिए सामान्य जनता के दुर्बल स्वास्थ्य में कुपोषण भी एक बड़ी समस्या है।

जब भी कमी पौष्टिक भोजन की बात चलती है। तो औसत स्तर के व्यक्ति इसे महंगा होने के कारण अपने लिए दुर्लभ ही बताते हैं। परन्तु बात ऐसी नहीं है। साधारण भोजन भी ठीक प्रकार से खाया पकाया जाये तो उसमें भी पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व मिल जाते है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि अनाज शकरकन्दी, आलू, अर्बी, मूली जैसे शाक! दूध, दही, नीबू गुड़ आदि में भी पर्याप्त विटामिन होते है। और वे उन महंगे खाद्य पदार्थों की तरह ही शरीर के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता पूरी करते है। वैज्ञानिक विश्लेषणों से पता चला है कि गन्ने शहर और खजूर में भी उतने ही विटामिन्स तथा लवण होते हैं जितने कि किशमिश और मुनक्का जैसे सूखे मेवों में।

अधिकाँशतः सामान्य खाद्यपदार्थों में भी पर्याप्त मात्रा में विटामिन्स और पोषक तत्व मिल जाते हैं जितने कि महंगे और सूखे मेवों फलों में। गेहूँ, ज्वार, बाजरा मक्का आदि अनाज तथा शक्ति, सब्जियाँ, भी पोषक तत्वों से भरपूर हैं। फिर क्या कारण है कि इन पोषक तत्वों से भरपूर हैं। फिर क्या कारण है कि इन पोषक तत्वों में पर्याप्त मात्रा में विटामिन्स होते हुए भी अधिकाँश व्यक्तियों का भोजन पोषण रहित या अपर्याप्त पोषक देने वाला होता है। किसी स्वास्थ्य वैज्ञानिक ने इसका कारण बताते हुए लिखा है-अधिकाँश लोग इसलिए बीमार बताते हुए लिखा है-अधिकाँश लोग इसलिए बीमार नहीं पड़ते कि उन्हें पोषक आहार जो महँगे बताये जाते है नहीं मिलते बल्कि इसलिए अस्वस्थ रहने लगते हैं उनके खानपान का तरीका अवैज्ञानिक होता है।

आमतौर पर लोगों को यह कहते सुनते पाया जाता है कि दूध नहीं मिलता, घी महँगा होने के कारण नहीं खरीद सकते, वनस्पति के दर्शन भी दुलर्भ हैं आदि। महंगाई के कारण कई वस्तुओं के सुलभ न होने की बात एक सीमा तक सही हैं क्योंकि इनकी आवश्यकता शरीर को पौष्टिकता प्रदान करने के लिए पड़ती है। जबकि दूध और घी के अलावा भी अन्य पौष्टिक खाद्य हैं जो सर्वसाधारण के नियमित व्यवहार में आते हैं। लेकिन उनका प्रयोग गलत ढंग से किये जाने के कारण उनसे उचित लाभ नहीं मिलता। फिर भी आहार में पोषक तत्वों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। इस सदी में आहार सम्बन्धी जो शोधें हुई तथा उनके परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष आये वे सर्व साधारण तक नहीं पहुँच पाते। यही कारण है कि अधिकाँश व्यक्ति घी दूध और सूखे मेवों, महंगे फलों को ही स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक खाद्य मानते है। प्रायः कहा जाता है कि आजकल महंगाई के जमाने में केवल अमीर लोग ही घी दूध खा पीकर स्वस्थ रह सकते हैं। गरीबों या मध्यवर्ग के व्यक्तियों के लिए तो पोषक आहार स्वप्न की ही बात है।

यह बात अधुनातन वैज्ञानिक निष्कर्षों और अनुसंधानों के आधार पर गलत सिद्ध हो रही है। यह सच है कि दूध घी पोषक तत्वों से परिपूरित आहार हैं किन्तु यह भी सच है कि यही एकमात्र पोषकपूर्ण खाद्य नहीं हैं। पूरा पोषण प्राप्त करने के लिए अन्य खाद्य पदार्थों को भी आवश्यकता रहती है। यदि बुद्धिमानों से भोजन का चुना किया जाय तो हम काफी सस्ते मूल्य में परिवार के लिए अच्छा और पोषकपूर्ण भोजन जुटा सकते है।

उदाहरण के लिए दूध को ही लें। अच्छी किस्म के दूध का मूल्य प्रायः तीन रुपये प्रति लीटर बैठता है। सर्व साधारण की इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि वह तीन चार रुपये रोज दूध पर खर्च कर सकें। फलतः दो ढाई सौ ग्राम दूध लेकर चाय के रूप में ही सुबह नाश्ता कर लिया जाता है। वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोगों से यह निष्कर्ष सामने आये है कि 50 ग्राम अंकुरित चने 250 ग्राम दूध में बराबर पौष्टिक होते हैं। अंकुरित चनों को खूब चबा चबा कर खाने से उसका रस मुंह में भरता रहता है। इस प्रकार अंकुरित चने खाने से दूध के समान ही पौष्टिक तत्व प्राप्त होते है।

आरम्भ में इस प्रकार अंकुरित चने खाने से उनमें स्वाद नहीं आता। फीके और अस्वाद होने के कारण चने खाने को मन नहीं करता, परन्तु उसका अपना एक अलग ही स्वाद होता है। यदि इनमें रुचि ली जाय तो अंकुरित चनों के खान और उनमें रस लेने की आदत डालीं जा सकती है। इसके लिए चनों में हलका सा नमक डाल कर और कागजी नीबू निचोड़ कर स्वाद पैदा किया जा सकता हैं। नीबू का रस और नमक डाल कर चने खाने से भरपूर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और खनिज लवण प्राप्त किये जा सकते हैं। मूल्य की दृष्टि से भी यह नाश्ता मँगा नहीं होता। मुश्किल से पाँच व्यक्तियों के परिवार के लिए पचास पैसे का नाश्ता पड़ता है। चाय में तो इससे ज्यादा ही खर्च पड़ता हैं।

पोषक तत्वों की पर्याप्त प्राप्ति के लिए जब फलों की बात चलती है तो लोगों का ध्यान अंगूर; अनार और सेब जैसे फलों की ओर जाता है तथा महंगाई की कठिनाई सामने आती है। लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि महंगे फल ही खाये जाँय। सभी क्षेत्रों में होने वाले मौसमी फल मिल जाते है जो काफी सस्ते भी रहते है जैसे खीरा, ककड़ी, अमरूद, जामुन, आम, चीकू, पपीता आदि। तीसरे पहर प्रायः सभी घरों में चाय बनती है। और नाश्ता के लिए कुछ न सही तो रोटी और चावल का प्रयोग तो किया ही जाता है। उसे रोककर यदि ताजे और मौसमी फल खाये जाँय तो अपराह्न कालीन नाश्ते में पर्याप्त पौष्टिक तत्व मिल सकते हैं। जाड़ों के दिनों में सन्तरे बहुतायत से मिलते है औसत साइज का एक सन्तरा 25 पैसे तक मिल जाता हैं। पूरे परिवार के लिए पाँच सन्तरे पर्याप्त होते है।

इतना खर्च भी अपनी शक्ति से बाहर लगे तो एक किलों गाजर भी काफी हैं। कच्ची गाजर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन ए तथा ‘खनिज लवण होते हैं। गाजर के अलावा इन दिनों शलजम, मूली, टमाटर आदि सब्जियाँ भी बेहद सस्ती मिलती हैं और पर्याप्त पोषक तत्वों से भी परिपूर्ण रहती हैं।

इसी प्रकार आँवला भी पर्याप्त पोषण पूर्ण खाद्य हैं। इनमें विटामिन भी बहुत अधिक मा. में होता है जो कि दाँतों और रक्त के लिए बहुत आवश्यक हैं। जिन दिनों ताजे आँवले मिलते हैं उन दिनों कच्चे आंवले खाने चाहिए। यदि अच्छे न लगें तो उनकी चटनी बनायी जा सकती है। जब आँवलों की फसल खतम हो जाय तो सूखा आँवला इस्तेमाल किया जा सकता है। रात को आँवला भिगोकर उसे सिल बट्टे पर पिसवाकर चटनी बनवाई जा सकती है। इस प्रकार कितने ही तरीकों से आँवलों का उपयोग किया जा सकता है। विटामिन सी और खनिज लवण के अतिरिक्त आँवलों में और भी कई पोषक तत्व होते है। आयुर्वेद में तो उसे वृद्ध व्यक्तियों को भी यौवन प्रदान करने वाला बताया गया है।

दूध की आवश्यकता भी सभी घरों में पड़ती है और प्रायः सभी लोग थोड़ी बहुत मात्रा में दूध खरीदते है। यह बात और है कि महँगा होने के कारण दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं खरीदा जा सकता। ऐसी दशा में दूध का विकल्प सपरेटा दूध खरीदा जा सकता है। सपरेटा दूध शुद्ध दूध की अपेक्षा सस्ता होता है। शुद्ध दूध से उसमें एक ही गुण कम है वह है घी अथवा मक्खन। शुद्ध दूध में से घी या मक्खन निकाल कर ही सपरेटा तैयार किया जाता है। उसमें घी भले ही नहीं रहता परन्तु उसके अलावा सभी पोषक तत्व (प्रोटीन्स, कैल्शियम, खनिज लवण और विटामिन्स) उतनी ही मात्रा में रहते हैं जितने कि शुद्ध रूप में।

ऊपर जिन खाद्य पदार्थों के सुझाव दिये गये हैं वे भी सस्ते है और सर्व साधारण की क्रयशक्ति की सीमा में आते हैं। इनका प्रयोग सभी कर सकते हैं। इनके अतिरिक्त खाना पकाने की विधि में भी थोड़ा सुधार कर लिया जाय तो पकाते समय जो बहुत से विटामिन पोषक तत्व नष्ट हो जाते है उन्हें बचाया जा सकता है। जैसे आमतौर पर गृहणियां आटे को छानकर चोकर फेंक देती है।चोकर के साथ बहुत से विटामिन फिक जाते है। जिन सब्जियों के छिलके कड़े नहीं होते उन्हें भी छील दिया जाता है जबकि ऐसा करने से कई विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

आहार के पोषक तत्वों की रक्षा के लिए सब्जियों को अधिक देर तक नहीं पकाया जाना चाहिए और न हीं उसमें बेहद मसाले वगैरह डाल कर उनकी पौष्टिकता को नष्ट करना चाहिए। इस प्रकार साधारण आमदनी वाले परिवार भी अपने लिए पर्याप्त पोषक पूर्ण आहार अपनी शक्ति सामर्थ्य के भीतर रह कर ही प्राप्त कर सकते है। आवश्यकता इन बात की है कि आहार को चुनने और पकाने में अपेक्षित सूझ-बूझ तथा सावधानी बरती जाय।


कण-कण में विद्यमान (kahani)

बच्चा दिये को बड़ी मोहक दृष्टि से देख रहा था, घर ठहरे मेहमान ने पूछा-मुन्ने, यह प्रकाश कहाँ से आया? बच्चे ने उत्तर दिया “भगवान के घर से”

अतिथि ने जिज्ञासा जतलाई-अच्छा तुम भगवान् को जानते हो। अच्छा बताओ वह कहाँ रहता है? बच्चे ने एक क्षण मस्तक पर कनिष्ठा रखी और दीपक को बुझाते हुए कहा-यह प्रकाश जहाँ चला गया वहाँ।

बच्चे की सरलता ने स्पष्ट किया-अदृश्य प्रकाश के रूप में वही तो कण-कण में विद्यमान है।


श्रम स्वेदों की गंगा

पाटिलीपुत्र साम्राज्य की जनता त्राहि त्राहि कर उठी। लगातार कई वर्षों से अकाल पड़ रहा था, अनावृष्टि की विभीषिका चारों ओर ताण्डव नर्तन कर रही थी। भीषण गरमी के कारण धरती तवे जैसी जल रही थी और क्षुधाग्नि के कारण लोगों के पेट। सम्राट चन्द्रगुप्त ने परिषद की बैठक बुलायी। बैठक में महामन्त्री कौटिल्य भी उपस्थित थे। उपस्थित प्रतिनिधि, अमात्य गणों को सम्बोधित करते हुए सम्राट ने कहा-जिस राज्य में प्रजा सुखी व सुरक्षित हो उसे ही अच्छा राज्य कहा जा सकता है। लेकिन हमारे राज्य में तो चारों और प्रकृति का प्रकोप छाया हुआ है। दुर्भिक्ष के कारण लोग भूखे मर रहे हैं। लगता है देश व्यापी क्षुधा की इस अग्नि में हम सब जल जायेंगे।

इसके बाद मन्त्री परिषद के सदस्यों और सम्राट में मंत्रणा चलती रही। इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि दुर्भिक्ष प्रकृति के नियमों की एक कड़ी है। सैकड़ों वर्षों के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। इस स्थिति से जूझने के लिए राज्यकोष के दरवाजे खोल दिये जायें। सभी अधिकारी प्रजाजन की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाँय। स्थान स्थान पर यज्ञों का आयोजन किया जाय ताकि वरुणदेव के मेघ उनसे पुष्ट होकर वृष्टि करने में सक्षम हों। एक विशाल यज्ञ राजधानी पाटिलपुत्र में भी किया जाय, जिसमें सम्राट प्रमुख यजमान के रूप में भाग लें।

सहायता कार्यों के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने तथा समुचित व्यवस्था बनाने के बाद पाटिलपुत्र में विशाल यज्ञ की तैयारियाँ की जाने लगीं। निश्चित किया गया था कि यज्ञ के बाद सम्राट स्वयं राजमहिषी साथ सूखी धरती पर जनक की भाँति हल चलायेंगे। इसके उपरान्त भगवती भागीरथी के तट से एक नहर निकालने के लिए स्वयं कुदाल चलायेंगे। इसके बाद ही यज्ञ की पूर्णाहुति होती।

यज्ञ की तैयारियां की नयी। दूर-दूर से मन्त्रविद् पुरोहित और यज्ञाचार्य आमंत्रित किये गये। व्यापक प्रबन्ध के साथ आरम्भ किये गये इस यज्ञ में लाखों नागरिकों ने भाग लिया। सम्राट चन्द्र गुप्त ने सात दिन तक चले इस यज्ञ में पूर्ण निराहार व्रत का पालन करते हुए प्रमुख यजमान की भूमिका निबाही। यज्ञ पूर्णाहुति के बाद सम्राट और राजमहिषी ने मिलकर बंजर पड़ी धरती पर हल चलाया। इस दृश्य को देखने के लिए हजारों लोग एकत्रित हुए थे। नियत समय तक हल चलाने के बाद उपस्थित जन समूह सहित सम्राट गंगा तट की और बढ़। नहर के लिए उन्होंने जैसे ही कुदाल चलायी हजार हाथ मि कर उनके साथ नहर खोदने लगे और गंगा का पानी देखते ही देखते उस जमीन तक पहुँचाया गया जो अभी अभी ही महाराज ने जोती थी।

इसके बाद महायज्ञ की पूर्णाहुति हुई। पूर्णात् पूर्णामिद के मन्त्रोच्चार सहित जैसे ही अन्तिम आहुति यज्ञ कुण्ड में छोड़ी गयी, यज्ञ की ज्वालाओं से एक दिव्य आकृति प्रकट हुई और उपस्थित यजमानों को सम्बोधित कर कहने लगी- “इस यज्ञ की प्रेरणाओं को घर-घर पहुँचाने के बाद ही यज्ञ कार्य सम्पन्न होगा। आसन्न विपत्तियों का कारण यह है कि लोग श्रम को भूल रहें हैं। उनके श्रमस्वेदों से सूखी धरती मेघों को कर्षित करने में अक्षम हुई जा रही है, इसी कारण यह दुर्भिक्ष प्रस्तुत हुआ है।”

सम्राट द्वारा हल चलाने और नहर खोदने की घटना तो लोगों ने प्रत्यक्ष ही देखी थी। उसके साथ ही यज्ञ पुरुष के संदेश को सुन कर प्रजाजनों में ऐसा उत्साह उमड़ा कि वे हाथ पर हाथ रखें बैठना छोड़ कर श्रमस्वेदों की गंगा बहाने लगे।


अद्भुत इमारतें और रहस्यमय सुरंग

इस विचार ने कि मनुष्य क्रमशः अपनी बुद्धि और सभ्यता का विकास करते हुए वर्तमान स्थिति तक पहुंचा है, आधुनिक विचारकों के मन में एक भ्रम और मिथ्या अहंकार पैदा कर दिया है। भ्रम यह है कि हम अपने पूर्वजों से कहीं अधिक उन्नत हैं, श्रेष्ठ हैं और अहंकार यह कि हमने जितनी प्रगति की है उतनी कभी भी किसी भी काल में किसी समाज ने नहीं की।

सामाजिक संदर्भ में प्रगति या विकास कोई वृक्ष नहीं है जो धीरे-धीरे अंकुरित हो, बढ़े और फूले फले। समाज की तुलना तो उस वन से की जानी चाहिए जिसमें हजारों वृक्ष होते हैं, लाखों अंकुर होते हैं और करोड़ों बीज होते हैं, सभी बीज, अंकुर या वृक्ष अपनी अलग-अलग ऊंचाइयां तय करते हैं और एक समुदाय का स्वरूप बनाते हैं। समाज में रहने वाले व्यक्तियों के बौद्धिक स्तर में अंतर हो सकता है, परन्तु औसत दृष्टि से कोई समाज कभी आज की तुलना में पिछड़ा या अविकसित नहीं रहा होगा, आधुनातन शोधों और पुरातत्व के मिले प्रमाणों के आधार पर इतिहासकारों को भी यह मानना पड़ रहा है। कइयों का तो कहना है कि हो सकता है मनुष्य समाज आज की तुलना में पहले कभी बहुत अधिक विकसित रहा हो। यह बात और है‍ कि उस युग की दिशायें तथा प्रवृत्तियां भिन्न रही हों।

दिशाओं और प्रवृत्तियों की भिन्नता का अंतर तो यों भी समझा जा सकता है। आधुनिक समाज की प्रगति दिशा तकनीकी कही जा सकती है। एक से एक विस्मयकारी और मनुष्य के श्रम को बचाने वाले यंत्र इन दिनों बन रहे हैं। किसी युग में मनुष्य ने आत्मिक दिशा पकड़ी हो और सुखशांति, आनंद, आह्लाद, प्रसन्नता की दृष्टि से वह आज की तुलना में कहीं अधिक विकसित रहा हो। किसी युग में मनुष्य अपने शरीर को बलिष्ठ पुष्ट बनाने में ही प्रवृत्त रहा हो।

इनका किले से करीब आधा मील दूर 11480 फीट की ऊंचाई पर विशालकाय पत्थरों का एक ब्लाक बना हुआ है। यह ब्लाक इतनी ऊंचाई पर स्थित है कि चढ़ते-चढ़ते सांस फूलने लगती है परंतु ब्लाक में 7 से 11 फीट की लंबाई चौड़ाई वाले समकोण पत्थर प्रयुक्त किये गये हैं। बताया जाता है कि यह इमारत 33 फीट ऊंची और 45 फीट चौड़ी चट्टान को काट कर बनाई गयी है। 39 फीट ऊंची यह इमारत इतनी भव्य और सुंदर है कि लगता है अभी ही इसका निर्माण हुआ है। संसार भर के वास्तुकलाविद् करीब दो हजार वर्ष पूर्व बने इनका किले और उसके पास स्थित इस इमारत को देखकर दंग रह जाते हैं।

आस्ट्रेलिया के दक्षिणपूर्व में कोई 1500 हजार द्वीप हैं। इन द्वीपों के मध्य में सबसे बड़ा द्वीप है पोनापे जिसका क्षेत्रफल 183 वर्गमील है। पोनापे की स्थिति इस प्रकार है कि वहां कोई भी वजनी चीज ले जाना आसान नहीं है और न ही वहां कोई इमारती सामान पैदा किया जाना सम्भव ही है परन्तु पोनापे में एक विशाल खण्डहर मिला है जो काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। आश्चर्य किया जाता है कि इतने बड़े भवन को उस युग में जब मानव सभ्यता को शैशवकाल की बताया जाता है किसने और कैसे इन भवनों का निर्माण कराया होगा। जो खण्डहर मिले हैं उनकी दीवारें अभी भी 125 फुट ऊँची हैं और इसमें लगे कई पत्थर दस टन वजन के हैं। 2580 फीट लम्बी इस इमारत में 12 से 17 कुछ तक के कई ब्लाक है। उस जमाने में जबकि न तो यातायात के इतने प्रचुर साधन थे और न ही इस वीरान उजाड़ टापू में लोग बसते थे किसने और किसलिए इन भवनों का निर्माण कराया होगा। इमारत जितने बड़े क्षेत्र में फैली हुई है उसे यदि आज के समय में बनवाया जाय तो बताया जाता है कि इतनी बड़ी इतनी मजबूत और इतनी सुन्दर इमारत, गरीब 300 वर्षों में ही बन सकती है।

एरिचव न डेनिकल ने अपनी पुस्तक-’दि गोल्ड आफ दि गाड्स’ में कुछ ऐसी सुरंगों का उल्लेख किया है जो साउथ अमेरिका में स्थित हैं और हजारों मील लम्बी है। ये सुरंगें कहाँ से कहाँ तक गई है इसका कोई पता नहीं लगाया जा सका है क्योंकि ये देखने में जितनी सुन्दर है अन्दर जाने पर उतनी ही भयावनी लगती हैं।

फिर भी पेरू और इप्रयोगा में सैकड़ों मील तक इन सुरंगों के भीतर खोजी दल जा चुके है। इसके बाद भी इनका अन्त नहीं आया और न ही यह पता चल सका है कि इनके बनाने का ध्येय क्या था। कुछ सौ मील तक, जहाँ कि खोजी दल ने यात्रा की बीच-बीच में कई बाहरी द्वार देखे। इतना ही नहीं सुरंगों के नीचे 250 और 500 फुट नीचे भी दोहरी तिहरी अंतरंग सुरंगें भी देखी गयीं।

सुरंगों की दीवारों पर विभिन्न रंगों में अलग-अलग चित्र बनाये गये थे। पत्थरों पर खोदे गये अथवा धातुओं की प्लेटों से विनिर्मित इन चित्रों का निर्माण किन्हीं उद्देश्यपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया गया लगता है। धातु प्लेटों पर इतने संकेत लिखे हुए है कि सुरंग की जितनी यात्रा की जा सकी, उस भाग के संकेतों को ही संकलित किया जाय तो एक विशाल लाइब्रेरी बन सकती है। एक खोजी दल जिससे एरिचवान डेनीकेन भी सम्मिलित थे उन सुरंगों में गये तो दल के सभी सदस्यों ने बड़े विचित्र अनुभव किये। डेनीवेन ने लिखा है कि-”हम लोग अपने हेलमेट पर जो बैट्री लगा कर गये थे वह सुरंग में घुसते ही बुझ जाती थी। एकाध व्यक्ति की बैट्री खराब भी हो सकती है। पर सभी यात्रियों की बैट्रियाँ खराब हो गयी हों ऐसा नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः ऐसा सुरंग के भीतर होने वाली रेडिएशन प्रक्रिया के कारण होता था।”

“सुरंग के जिस भाग की हमने यात्रा की उसकी दीवारें बेहद चिकनी थी-मानों संगमरमर की बनी हुई हो। कहीं-कहीं दीवारों में पालिश जैसी चमक भी थी। छतों पर ऐसी प्लेट्स लगी हुई थीं कि उन्हें उकेटने में सदियाँ लगी हों ऐसा आभास होता था। इन सुरंगों में एक बात बहुत ही विचित्र देखने में आयी वहाँ हमारे विद्युत यन्त्र काम कर रहे थे और न ही कोई चुम्बकीय यन्त्र। यहाँ तक कि दिशाओं का ज्ञान कराने वाला कुतुबनुमा भी बन्द हो गया था। दीवारों पर खुदे हुए चित्रों का हम फोटोग्राफ भी नहीं ले सके क्योंकि वहाँ हमारे कैमरे भी काम नहीं कर रहे थे।”

“सुरंग के बगल में कहीं कहीं कमरेनुमा गैलरियाँ भी थी। कहीं-कहीं बहुत बड़े कमरे थे जिन्हें हाल कहना ही ज्यादा उपयुक्त होगा। ऐसे एक हाल को हमने नापा तो उसकी लम्बाई 183 गज तथा चौड़ाई 164 गत थी। इन कमरों का क्या उपयोग होता होगा अनुमान लगाना कठिन है। इतने बड़े हाल में 12-13 हजार व्यक्ति आसानी से बैठ सकते है।”

“ऐसे ही एक छोटे हाल में हमने एक नरकंकाल पड़ा देखा। उस कमरे में प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी फिर भी कमरे में अंधकार नहीं था। लगता था प्रकाश दीवारों से आ रहा था। नरकंकाल इस ढंग से रखा हुआ था जैसे किसी मेडिकल कालेज की प्रयोगशाला में छोटों को पढ़ाने के लिए रखा जाता हो इन गैलरियों के निर्माण का भी कोई उद्देश्य या रहस्य मानवी समझ से परे था।”

“कुछ कमरों में हमने पत्थर से बनी मेज-कुर्सियाँ भी देखी। हालाँकि देखने में वे सनमाइका की तरह चिकनी और चमकदार लगती थी, पर छूने या उठाने पर पत्थर अथवा पत्थर जैसा ही किसी धातु की बनी प्रतीत होती है। इतनी वजनदार कुर्सियों को कहाँ बनाया गय होगा तथा यहाँ किस प्रकार लगाया गया होगा इस इस कभी कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं खोज सके। कुर्सियों के पीछे दीवारों पर कई तरह के चित्र बने हुए थे। इन चित्रों के समान सुन्दर चित्र मैंने तो अपनी जिन्दगी में कहीं नहीं देखें। गोह, हाथी, शेर, घड़ियाल, ऊँट, रीछ, बन्दर मुँह पर सींग वाला भैंसा, भेड़िया तथा घोंघा आदि जानवरों के सजीव चित्र वहाँ बने हुए थे।”

एक हॉल में हमने सोने,चाँदी, पीतल आदि धातुओं) के करीब 211-3 हजार पतरे देखे जिनकी मोटाई लगभग 1 मिलीमीटर रही होगी। इन पत्थरों का आकार 32 इंच लम्बा तथा 19 इंच चौड़ा था एक ही साइज में बने कटे इन पतरों पर किसी पुरानी भाषा में कुछ लिख हुआ था जिन्हें हम स्पष्ट देख तो सकते थे पर उन्हें पढ़ नहीं सकते थे क्योंकि उस तरह की लिपि हमने कही नहीं देखी। किन्हीं-किन्हीं पतरों पर चित्र भी बने हुए थे। ऐसे एक चित्र में हमने गोलाकार पृथ्वी पर घड़ी मानव आकृति का चित्र भी देखा।”

ऐरिचवान डिनीकेन ने अपनी पुस्तक में इन सुरंगों का विस्तृत विवरण लिखा है और प्रश्न उठाया है कि इनका निर्माण पिछले दो-चार सौ या पाँच सात सौ वर्षों के भीतर नहीं हुआ है-यह तो तय है यह किसी ऐसे युग में बनाई गई लगती है जबकि किन्हीं निर्माणों का इतिहास रखने की परम्परा न रही हो। अथवा जब तक का इतिहास हमारे पास उपलब्ध है उससे पहले इनके निर्माण हुआ हो और इसके बाद की वह कड़ी लुप्त हो गयी हो जिससे कि इन सुरंगों का उपयोग और उद्देश्य जाना समझा जा सकें।

दक्षिण अमेरिका के ही ग्वाटेमाला द्वीप समूह के यूकेटन जंगलों में प्राप्त खण्डहरों इजिप्ट की विशाल इमारतों के खण्डहर के समान है। इस क्षेत्र में पिरामिड भी पाये जाते है जो ठीक मिश्र के पिरामिडों की तरह है। इन पिरामिडों को बहुत भारी चट्टानों से बनाया गया। चट्टानों को जोड़ने के लिए किसी मसाले का उपयोग नहीं किया गया लगता है फिर भी एक चट्टान के ऊपर दूसरी चट्टान इस ढंग से जमी हुई है कि उनके बीच कहीं भी जोड़ नहीं दिखाई देता। बहुत ध्यानपूर्वक देखने पर एक हल्की सी बाल बराबर रेखा भर दिखाई देती है। किसने की होगी इन चट्टानों की इतनी बारीक और सूक्ष्म घिसाई तथा एक चट्टान के ऊपर दूसरी चट्टान को किस प्रकार जमाया होगा?

मैक्सिको के पास 8 वर्ग मील के क्षेत्र में ऐसी इमारतें मिली है जिनका निर्माण, लगता है अन्तरिक्ष वेधशाला के रूप में कराया गया हो। क्योंकि वहाँ उन सभी यंत्रों के चिह्न अवशेष प्राप्त प्राप्त होते है जो किसी वेधशाला में मिलते है। कुछ इमारतों का निर्माण ग्रह नक्षत्रों की गणना के आधार पर किया गया भी प्रमाणित होता है।

संसार में इतने बड़े-बड़े आश्चर्य भरे पड़े हैं और उनका निर्माण उस युग में हो चुका है जबकि हम समझते हैं लोग गुफाओं में रहते थे और एकदम पशुओं का सा जीवन जीते थे। पिछड़े और अविकसित लोग हर युग में हर समाज में रहते हैं, पर उनके आधार पर तत्कालीन समाज व सभ्यता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अब जब कि अति प्राचीनकाल में विनिर्मित इमारतों, सुरंगों और स्थापत्यों के ऐसे विस्मयकारी अवशेष प्राप्त हो रहे हैं जो अपने आपको अब तक की सृष्टि का सर्वाधिक विकसित, उन्नत और बुद्धिमान मनुष्य होने की घोषणा करना तथा स्वयं ही उसकी प्रसन्नता मना लेना, अपने आपको धोखा देने अथवा झूठा आडम्बर ओढ़ने के सिवा और कुछ नहीं है।


अजीब लोग और उनके विचित्र संकल्प

शारीरिक, बौद्धिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में सफलता अर्जित करने एवं उन्नति की ओर बढ़ने के प्रयास अनेकों व्यक्तियों द्वारा किये जाते हैं, तदनुरूप सफलता प्राप्त करते देखे भी जाते हैं। कभी-कभी यह प्रयास विभिन्न व्यक्तियों में विचित्र रुचियों के रूप में उभर कर आते हैं जिनकी पूर्ति के लिए वे दुस्साहस भरे कदम उठाने में भी नहीं हिचकते।

शीत ऋतु की भयंकर ठंड में गर्म कपड़ों एवं बिस्तरों में लोग दुबके रहते हैं तथा ठंड से बचाव करते हैं ‘म्यूनिख नगर” के एक एकाउन्टेन्ट श्री ‘पीटरशीत’ को अपने साहस एवं क्षमता के प्रदर्शन की सनक सवार हुई। उसने निरन्तर सात रात एवं सात दिन ठंडे फव्वारे के नीचे भीगते हुए व्यतीत किये तथा एक अनोखा कीर्तिमान प्रस्तुत किया।

इंग्लैंड के दो नवयुवक “फ्रैंकलिन जेम’ एवं जेमसन’ जिनकी आयु थी 20 एवं 19 वर्ष। ये दोनों नौकरी की खोज में भटक रहे थे। एक दिन फ्रैंकलिन को जाने क्या सूझा, वह ‘जेमसन’ से कहने लगा कि ‘क्यों नहीं हम अपने खाली समय का उपयोग कुछ नवीन अनोखे कार्यों के करने में करे?” अपने मन में आये विचार को मित्र के समक्ष प्रस्तुत करते हुए उसने कहा- “हम लोग ताली बजाने का नया रिकार्ड प्रस्तुत करेंगे।” सहमति मिलते ही दोनों ने 14 घंटे 6 मिनट तक निरंतर ताली बजायी। अमेरिका के दो किशोर छात्र जिनकी आयु 14 एवं 15 वर्ष थी तथा नाम था ‘केरोमिन’ एवं विलियम स्कार्ट ने उनको ताली बजाने में स्थापित कीर्तिमान को चुनौती दी। एक स्थान पर निरन्तर खड़े होकर 18 घंटा ताली बजाकर उन दोनों किशोरों ने “फ्रैंकलिन’ एवं उसके सहयोगी द्वारा स्थापित रिकार्ड को तोड़ दिया।

मनुष्य की संकल्प शक्ति एवं पुरुषार्थ में वे सारी विशेषताएँ जिनके सहारे असम्भव कार्य भी सम्भव किये जा सकते है। इस शक्ति का उपयोग चाहे रचनात्मक दिशा में किया जाय अथवा निरुद्देश्य कौतूहलजनक कार्यों में। यह मनुष्य में स्वयं के विवेक के ऊपर निर्भर करता है।

जापान के पतंगबाज गोरोकू कुडो को यह जानकारी मिली कि अमेरिका के एक व्यक्ति ने एक ही डोर में 178 पतंगे बांधकर उड़ायी हैं। पतंगबाजी कला में वह स्वयं भी निपुण था। इस अमेरिकी रिकार्ड को तोड़ने का अभ्यास ‘कुडो’ नित्य करने लगा। उसने 356 पतंगे अच्छी प्रकार तैयार करायी। आठ-आठ फुट की दूरी पर एक-एक पतंग को बांधकर वह उड़ाने लगा। अभी 250 पतंगे ही उड़ा सका था कि पतंग डोरी पर बोझ अधिक पड़ने एवं हवा के तेज दबाव के कारण डोरी टूट गई। 350 पतंगे तो नहीं उड़ा सका किन्तु अमेरिकी पतंगबाजी के कीर्तिमान को ‘गोरोकू’ ने तोड़ दिया।

कभी-कभी तो नवीन कीर्तिमान स्थापित करने की सनक में कुछ व्यक्ति जीवन के साथ दुस्साहसपूर्ण कार्य करते देखे जाते है। रोगी को नवजीवन देने एवं रक्त आपूर्ति करने के लिए रक्तदान एक महान त्याग एवं सेवा है। कितने ही व्यक्ति रक्तदान द्वारा पुण्य कार्य करते देखे जाते हैं। किन्तु मात्र नवीन एवं आश्चर्य जनक कीर्तिमान स्थापित करने के निमित्त रक्तदान करते कम ही व्यक्ति देखे गये है। ‘हैंम्वर्ग’ के 28 वर्षीय नवयुवक ‘रौकपीटर’ ने अपनी इस आयु तक 1770 वार रक्तदान कर अपने दुस्साहस का परिचय दिया है। रक्तदान में ‘पीटर’ के शरीर से अबतक 660 लीटर रक्त निकल चुका है। सारे विश्व में यह एक आश्चर्य जनक घटना है।

नार्वे निवासी “हैन्सलैंगसेथ’ को दाढ़ी बढ़ाने का भूत सवार हुआ। इस इच्छा से अभिप्रेरित होकर उसने अपनी दाढ़ी 50 मी. 330 बढ़ाकर लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया।

कहते हैं कि मनुष्य के सिर के बाल गिने नहीं जा सकते। यह असम्भव तो नहीं, पर इसे बेकार काम समझ कर कौन अपनी शक्ति एवं समय को नष्ट करेगा। किन्तु ‘हेलसिलासी यूनिवर्सिटी के एक कर्मचारी ‘वाकावाया’ को यह सनक सवार हुई और उसने अपने सिर का मुण्डन कराकर प्रतिदिन बाल गिनता आरम्भ किया। लगभग चार वर्षों में उसने अपने सिर के सारे बालों को गिन डाला जिनकी कुल संख्या 1 लाख 12 हजार 503 थी।

मनुष्य की संकल्प शक्ति अद्भुत है और पुरुषार्थ असीम। कितने लोग मात्र कौतूहल खड़ा करने एवं निरुद्देश्य उसका उपयोग करते देखे जाते हैं। श्रेष्ठ कार्यों के लिए इस शक्ति को नियोजित किया जा सके तो कठिन कार्य भी संभव बन जाते हैं। संकल्प शक्ति की महत्ता एवं उपयोगिता भी इसी में है। रचनात्मक दिशा में उसका सदुपयोग किया जाना चाहिए।


मनोबल गिराने वाले आक्रमणों से रक्षा

कहते हैं किसी विद्यालय के चतुर विद्यार्थियों उस दिन स्कूल की छुट्टी कराने के लिए एक चाल चली। वे एक-एक करके किसी बहाने अध्यापक के पास पहुँचते रहे और अन्य बातों के अतिरिक्त यह भी कहते रहे कि आपका चेहरा आज बुरी तरह उतरा हुआ है, आँखें लाल हैं ओर बुखार जैसे लक्षण प्रतीत हो रहे हैं। यही बात घुमा फिराकर मिलने वाले सभी लड़के अपने-अपने ढंग से कहते चले गये।

अध्यापक ने आरम्भ में तो अधिक ध्यान न दिया पर जब बार-बार वही बात सामने आई तो वह अपने बीमार होने की बात विश्वास करके, सचमुच ही चिन्ता ग्रस्त और बीमार हो गया। अन्ततः वह स्कूल से छुट्टी करके घर चला गया और विद्यार्थियों का मनोरथ मखौल-मखौल में ही पूरा हो गया।

बाल सफेद होने, चेहरे पर एक दो झुर्रियाँ दीखने से बुढ़ापे का आक्रमण हो जाने जैसी चिन्ता करने का बहुत बड़ा कारण नहीं है किन्तु मिलने वाले उसी बात को बार-बार दुहराते रहे और चिन्ता व्यक्त करते रहे है तो इन कहने वालों की चिन्ता उथली एवं बनावटी होते हुए भी उसका बुरा प्रभाव संबंधित व्यक्ति पर पड़कर रहेगा और वह इन शुभचिन्तकों के कथनानुसार उसी ढांचे में चलता चला जायेगा। और अपेक्षाकृत अधिक जल्दी वास्तविक बुढ़ापे का शिकार बनकर रहेगा। कमजोरी और बीमारी भी इसी प्रकार इन स्वजनों के द्वारा उपहार में मिल सकती है। उनका मंशा भले ही इस प्रकार की क्षति पहुँचाना न रहा हो, पर इससे क्या प्रहार तो अपना असर दिखायेगा ही, भले ही वह जान बूझ कर किया गया हो या अनजाने में।

अक्सर मातायें अपने बच्चों के बारे में पत्नियाँ अपने पतियों के बारे में कमजोरी-बीमारी आदि की बात कह कर चिन्ता व्यक्त करती रहती है और प्रकारान्तर से अपने प्रिय पात्रों के स्वास्थ्य को अनजाने ही हानि पहुँचाती रहती हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वस्तुतः बीमार या कमजोर होने पर उस बात की उपेक्षा करते रहा जाय। उपाय, उपचार करना-परामर्श मार्गदर्शन देना- एक बात है और ऐसा कुछ न करके मात्र अपनी अवास्तविक चिन्ता प्रकट करके किसी को वस्तुतः चिंतित कर देना दूसरी।

अभिभावक अपने बच्चों की मानसिक क्षमता-बुद्धिमत्ता के सम्बन्ध में चिंता व्यक्त करते रहते है। उसे घटाकर बताते हैं। अधिक तीव्र बुद्धि वालों से तुलना करते हैं और प्रकारान्तर वे अपने चालकों को मानसिक स्थिति में हेय सिद्ध करते रहते है यह भर्त्सना भले ही अपने बालक को अधिक बुद्धिमान होने की शुभ कामना से प्रेरित होकर की गई हो पर उसका तरीका ऐसा होता है जिससे बच्चों के कोमल मन पर निराशा का दबाव पड़ता है और वे वस्तुतः मूर्ख, प्रमादी बनते चले जाते हैं। आत्म स्वीकृति को मनःशास्त्र में अत्यधिक माना गया है। यह उत्पन्न तो अपने द्वारा ही होती हैं, पर इसमें योगदान समीपवर्ती स्वजनों या शुभ चिन्तकों का ही अधिक होता है। यह है जिसे स्वजनों का स्वजनों पर अत्याचार कर सकते है।

इस निषेधात्मक प्रभाव प्रक्षेपण की हानि को यदि समझा जा सका होता और उसके स्थान पर विधेयात्मक प्रक्रिया अपनाई जा सकी होती तो निश्चय ही खाई खोदने के स्थान पर दीवार चुनने जैसा अन्तर दिखाई पड़ता खाई खोदने से समतल भूमि नीचे धंसती जाती है। इसके विपरीत चुनने या जमा करने में वही स्थान ऊँचा उठता चला जाता है। उपयोगी भी बनता है और दूर से दिखाई पड़ता है। यदि शारीरिक स्वस्थता, मानसिक बुद्धिमत्ता; कामों की कुशलता, व्यक्तित्व की श्रेष्ठता को ढूँढ़ा जाय तो उसकी बड़ी मात्रा हर किसी में मिल सकती है। स्वजनों में भी। उसी पक्ष को यदि उत्साहवर्धक ढंग से कहते रहा जाय तो इसका प्रभाव बहुत ही उपयोगी होगा। इसमें न तो प्रवंचना मानना चाहिए और न मिथ्याचार। प्रशंसा के योग्य प्रोत्साहित करने योग्य तत्व हर किसी में पाये जाते हैं, भले ही वे मात्रा की दृष्ट में न्यून ही क्यों न हों। छोटी सी बीमारी को निरस्त करने के लिए जब इतने प्रबल प्रयास किये जा सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि थोड़ी सी अच्छाई को प्रोत्साहित करने तथा सराहने में कोताही की जाय।

यह दूसरों के साथ सहज सहयोग और उपकार है कि उन्हें उनकी अच्छाइयों के अवगत कराया जाय, सहज सम्भावनाओं के प्रति प्रोत्साहित किया जाय और उज्ज्वल भविष्य का सुनहरा सपना दिखाया जाय। यह भावनात्मक अनुदान किसी अच्छी खासी धन राशि के देने से भी अधिक श्रेयस्कर है। धन से केवल सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सुविधाओं की वृद्धि भर होती है किन्तु यदि व्यक्तित्व के मर्मस्थलों के गुदगुदी करना, उन्हें खिलाना और उछलना सम्भव हो सके तो उसकी तुलना अन्य किसी भी उपकार या उपहार से नहीं हो सकती।

इस सम्बन्ध में कहने और सुनने वाले दोनों ही पक्षों को सतर्कता बरतनी चाहिए। कहने वाले ध्यान रखे कि यदि किसी की कमजोरी या बुराई को सचमुच ही दूर करना है तो उसके लिए भर्त्सना एवं तिरस्कार का तरीका न अपनाया जाय। वरन् कमी को असाधारण और आसानी से दूर हो सकने वाली बताया जाय। अधिक चर्चा बुराई की न की जाय, उस संदर्भ में साथ थोड़ा लगाया जाय और अधिक समय इस प्रसंग को दिया जाय कि सुधार में किन उपायों से किस क्रम को अपनाने पर उस व्याधि से छुटकारा पाया जा सकता है। रचनात्मक सुझाव देना, उपाय बताना यदि अपनी सामर्थ्य के भीतर तो वैसा रहना चाहिए अन्यथा इस विषय के अनुभवी व्यक्तियों के पास जाने-उनसे सम्बन्ध मिला देने की सहायता करनी चाहिए। हर हालत में सुधार होने और उज्ज्वल भविष्य बन सकने की संभावना को ही प्रधान रूप से प्रतिपादित किया जाना चाहिए।

सुनने में सावधानी यह बरती जाय कि जो सज्जन निषेधात्मक निन्दा परक, चिन्ताजनक मत व्यक्त करते हैं उनके कथन की भावुकता अथवा शुभ कामना को विकृत ढंग से प्रस्तुत करने वाला भर माना जाय। यदि उसमें कुछ तथ्य हो तो समझ लिया जाय और उसके सुधार का ध्यान रखा जाय। अन्यथा अन कथनीय बातों को ऐसे ही बात के लिए बात जैसा वार्ता विनोद भर मान कर उपेक्षित कर दी जाय। दूसरों को कहने से रोकना कठिन है। बड़ों के प्रति तो ऐसी रोकथाम अनिष्टता में गिन ली जाती है। इसलिए जब वे कह रहे हो तो तब तो नहीं पर पीछे कभी अवसर पाकर इस प्रकार के कथन क्रम की हानियाँ समझा देनी चाहिए। अपने लिए सीधे समझा सकना कठिन हो तो दूसरे किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा रोकथाम करा देनी चाहिए जो उन्हीं के समकक्ष पड़ता हो। पिता को माता, माता को पिता सहज ही समझा सकते हैं क्योंकि उनका दर्जा लगभग समानता का होता है। इतने पर भी बात बनती दिखाई न पड़े तो ऐसे निषेधात्मक प्रहार करते रहने वालों से यथ सम्भव कतराते रहना उनके संपर्क में अनावश्यक रूप से न आना ही श्रेयस्कर है। आत्मरक्षा के लिए इस बचाव को करने में यह ध्यान रखना चाहिए कि वह बहुत ही नीतियुक्त और कुशलता युक्त हो। ऐसा न हो कि बात बढ़ जाय और रूठने, असहयोग करने, उपेक्षा करने जैसे नये आक्षेप उगाने लगें और वह बचाव का उपाय पहले से भी अधिक महंगा पड़े तथा विग्रह उत्पन्न कर दे।

कुछ व्यक्ति ऐसे भी पाये जाते हैं जिनका व्यवसाय ही दूसरों को डराकर उनकी भयभीत मनः स्थिति का लाभ उठाना होता है। इस धंधे में ज्योतिषी लोग सबसे अग्रणी होते हैं। उनकी बात भूत पलीतों की विद्या जानने का दावा करने वालों की भाँति है इन लोगों के हथकंडे समझदार तो जानते है और उनसे बचते भी हैं पर अपने देश की अशिक्षित और पिछड़ी जनता को बहुत बड़ा भाग ऐसा है जो उन लोगों पर अपनी धर्म भीरुता और मूढ़ मान्यता के कारण सहज ही विश्वास कर लेता है। यह लोग सामान्य सी बीमारियों एवं कठिनाइयों को ग्रह नक्षत्र एवं भूत प्रेतों द्वारा धकेली बताकर उस विपत्ति ग्रस्त को और अधिक डरा देते हैं। कठिनाई से दुःखी और भय से आतंकित व्यक्ति दुहरे प्रहार से घबरा जाता है और उन्हीं लोगों से बचाव का उपाय पूछता है। उनका नशा तुला उत्तर एक ही होता है। कुपित ग्रह नक्षत्र या भूत पलीत को शान्त करने के लिए जो तन्त्र मन्त्र करना पड़ेगा उसके लिए उन्हें पैसा दिया जाय। डरे घबराये हुए लीग इस कुचक्र से अपनी जेब कटाते और मानसिक प्रहार से अपने व्यक्तित्व की जड़े खोखली करते रहते हैं। आशंका और भय उनके स्वभाव का अंग बन जाता है जो आगे चलकर उन्हें किसी न किसी प्रकार त्रास ही देता रहता है। इस प्रकार के मूर्खताजन्य आक्रमणों से आत्मरक्षा करना और अकारण अपने को आतंकित न होना और न होने देना प्रत्येक विज्ञ व्यक्ति का कर्तव्य है।

ठीक इसी प्रकार चिकित्सकों में से भी एक ओक्षा वर्ग ऐसा पाया जाता है जो रोग की सामान्य सी व्यथा को बहुत बढ़ा चढ़ा-कर बताता और प्राण संकट उत्पन्न होने जैसा खतरा जताता है। इस प्रकार आतंकित रोगी से चिकित्सा क नाम मोटी रकम ऐंठते रहना सरल पड़ता है। इस कुचक्र को भी ओझाओं और ज्योतिषियों की तरह ही भयानक मानना चाहिए और जहाँ ऐसी आशंका हो वहाँ दूर से ही नमस्कार करना चाहिए। रोग तो समयानुसार अच्छे होते रहते हैं। दवादारू से ही बीमारियाँ अच्छी नहीं होती। प्रकृति भी अपना उपचार क्रम, बराबर जारी रखती है और बीमार अच्छे होते रहते है। रोगोपचार का जितना महत्व है उससे भी अधिक इस बात का है कि कहो बीमारी ने रोगी का मनोबल तो नहीं तोड़ दिया उसे आशंका ग्रस्त भयभीत तो नहीं बना दिया कष्ट निवृत्ति, रो चिकित्सा,संकट मुक्ति, विपत्ति से सुरक्षा दि के लिए प्रयत्न पुरुषार्थ किये ही जाने चाहिए परन्तु उन उपचारों में भयाक्रान्त एवं चिन्ता ग्रस्त बनाने वाली नई विपत्ति सिर पर न चढ़ बैठे, इसका और भी अधिक ध्यान रखना चाहिए। विपत्ति भी बीमारी की तरह हो समयानुसार टल जाती है किन्तु उपाय उपचार के सिलसिले में यदि मनोबल गिरा लिया गया तो वह हानि उपचार लाभ की तुलना में अधिक भारी ही पड़ेगा।

हानिकारक तत्वों से अपना समीपवर्ती वातावरण भरा रहता है। उससे आत्म रक्षा की सतर्कता सदा बरतनी पड़ती है। ठीक इसी प्रकार मनोबल गिराने वाली हरकतें भी कहीं न कहीं से किसी न किसी प्रकार चलती ही रहती हैं। मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू, जुँए, मीलर जैसे कृमि कीटक नुकसान पहुँचाने में लगे ही रहते है। चूहे, सांप, बिच्छू, कान खजूरे, मकड़ी, छिपकली भी हानि ही करती है। अनाज, कपड़े और फर्नीचर को बर्बाद करने वाले छोटे-छोटे कीड़ों की करतूतें कितनी चिन्ताजनक होती हैं। इन सबके आक्रमणों से होने वाली क्षति का लेखा-जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि आक्रान्ताओं से समीपवर्ती वातावरण भरा हुआ है। चोर उचक्के, ठग और गुण्डे अकारण ही आक्रमण करते और आघात पहुँचाते हैं। मित्र बन कर शत्रुता का परिचय देना सब्जबाग दिखा कर विश्वास घात करना आज का फैशन है। हवा और पानी में रहने वाले अदृश्य और नगण्य विषाणु अच्छी भली काया में किसी छिद्र से घुस पड़ते है और भीतर ही भीतर सर्वनाश का सरंजाम जुटाते हैं। इन सबसे बचने के लिए कृमि-कीटनाशक तरह-तरह के उपायों को निरन्तर बरतना पड़ता है। इसी श्रृंखला में मनोबल गिराने वाले उन आक्रमण आघातों को भी जोड़कर रखना चाहिए जो देखने सुनने में तो महत्वहीन लगते हैं किन्तु हानि अति अधिक पहुँचाते हैं। प्रगति को समुचित क्षमता रखने वाले व्यक्ति भी दीन-दुर्बलों और अपंग-असहायों की तरह अपने भविष्य को अंधकार से घिरा हुआ देखते ही नहीं, सचमुच उस विपत्ति के मुँह में धकेल भी दिये जाते हैं। जीवन को अनेक आवश्यकताओं में प्रोत्साहन भरा सत्परामर्श भी आवश्यक है। उसे अच्छे, अन्त, जल और हवा की तरह ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए और उसे जुटाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।


अपनों से अपनी बात - रजत जयन्ती वर्ष में 24 गायत्री तीर्थों की स्थापना

रजत जयन्ती वर्ष ने प्रज्ञावतार की प्रखरता सिद्ध कर दी हैं बीजारोपण समयानुसार अंकुरित होता और फलता-फूलता है। परिपूर्ण वृक्ष न बनने तक उसकी कीड़ों मकोड़ों, पक्षियों और पशुओं से रक्षा करनी पड़ती है। अन्यथा असमय ही पौध चन जाने का संकट बना रहता है। पीछे तो वह जीव-जन्तु और पशु-पक्षी तक उसके विशाल वृक्ष में घोंसले बनाते और आश्रय पाते हैं। प्रज्ञावतार जब तक शिशु था तब तक अनास्थावादी तत्वों से लेकर दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों तक हर कोई उसे उदरस्थ कर जाने की ताक में था किन्तु प्रयत्नपूर्वक सुरक्षा देने अभिसिंचन और खाद पानी देते रहने से आज यह स्थिति हो गई है कि बोधि-वृक्ष कल्प-वृक्ष की तरह दीनों का उद्धार और पतितों के मार्गदर्शन के साथ-साथ असुरता के महाराक्षस से निबटने में पूर्ण समर्थ है। यह प्रौढ़ता अब परिपक्व अवस्था तक विकसित होकर न केवल इस देश अपितु समूचे विश्व को शीलता प्रदान करने की स्थिति में है।

समय की विकृतियाँ निस्संदेह भयावह हैं। प्रत्यक्ष प्रवाह जिस दिशा में चल रहा है उसे देखते हुए सर्वनाश की सम्भावना स्पष्ट है। व्यक्ति और समाज को जिन विकृतियों ने ग्रस कर रखा है उन्हें गज-ग्राह की पौराणिक गाथा के समतुल्य ही समझा जा सकता है। इन परिस्थितियों में दैवी शक्ति की सहायता ही उद्धार कर सकती है। गजेन्द्र मोक्ष के पाठक जानते है कि महाविनाश के पूर्व ही-धर्म की संरक्षक सत्ता ने अपना उत्तरदायित्व पूरा कर दिया था। असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए नियन्ता अपने घोषित आश्वासन के अनुसार स्वयं वचनबद्ध है। उसने समय-समय पर उसे पूरा भी किया है। ‘यदा यदा हि धर्मस्य...........’ का वचन सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि समय पर पूरा भी होता रहा हैं। आज की विषय वेला में नियन्ता का हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया है। सो हो भी रहा है। समस्या आस्था संतुष्ट की है। सम्पदा की नहीं विचारणा की कमी पड़ रही है। साधनों की नहीं सद्भावों का अभाव है। अन्तरालों में घुसी हुई निकृष्टता ही सुरसा की तरह सर्वग्रासी बनती जा रही है। उसका निराकरण प्रज्ञा की उदीयमान प्रखरता ही कर सकती है। समाज शास्त्री इसे विचार क्रान्ति कहते है। धार्मिक क्षेत्र में इसका नाम ‘ज्ञान यज्ञ’ है। तत्वदर्शी इसी पुष्य प्रवाह को ‘प्रज्ञावतार’ कहते है। अपने समय में भगवान का अवतार इसी रूप में होना चाहिए था, सो ही हो भी रहा है।

प्रज्ञा शब्द ऋतम्भरा प्रज्ञा’ का ही संक्षिप्त नाम है? ऋतम्भरा प्रज्ञा को तत्वदर्शी ब्रह्म विद्या कहते और उसकी आराधना करते रहे हैं। साधकों के लिए यही गायत्री है। उसका अस्तित्व और सम्मान तो अनादिकाल से रहा है और अनन्त काल तक रहेगा, पर समय की आवश्यकता के अनुरूप उसे विश्व चेतना का अभिनव उभार बनकर अपनी भूमिका सम्पन्न करनी पड़ रही है। प्रस्तुत विकृतियों का अनेकानेक नाम रूप के मूल में आस्था संकट ही एक मात्र कारण है।उसका निवारण ऋतम्भरा के विवेक युक्त शालीनता के-उभार से ही सम्भव हो सकता है। इस उभार को सूक्ष्म जगत के अन्तराल में उभरते हुए कोई भी दिव्य चक्षु सम्पन्न व्यक्ति अत्यन्त सरलता पूर्वक देख सकता है। उसने जागृत आत्माओं को सर्वप्रथम झकझोरा है। अगले दिनों उसका आलोक जन−जन को अनुप्राणित करता दृष्टिगोचर होगा। युग परिवर्तन के लिए इससे अधिक और कुछ चाहिए भी नहीं साथ ही यह भी स्पष्ट है कि दुर्भति के कारण उत्पन्न हुई दुर्गति के निराकरण का उसके अतिरिक्त और कोई उपाय भी नहीं है।

पौराणिक प्रतिपादनों में अपने समय के अवतार का नामकरण निष्कलंक रखा गया है। निष्कलंक अर्थात् कलंक रहित। कलंक रहित व्यक्ति नहीं हो सकता। मानवी सत्ता जिस मिट्टी से गढ़ी गई है; उसमें कहीं न कहीं खोट रहता ही है। ‘निष्कलंक सत्ता एक ही है-’प्रज्ञा’। इसी कसौटी पर कसकर सत्य का निरूपण होता है। सत्य का स्थान कितना ही ऊँचा क्यों न हो उसे समझना और पकड़ना प्रज्ञा की सहायता के बिना सम्भव ही नहीं हो सकता। प्रज्ञा ही निष्कलंक है-ऋतम्भरा प्रज्ञा का ही दूसरा नाम ब्रह्मविद्या है चेतना जगत की यही आद्यशक्ति है इसी का सामयिक गतिविधियों के अनुरूप युग शक्ति नाम दिया गया है। प्रज्ञावतार को ही निष्कलंक कह सकते है। सामयिक सन्तुलन बनाने के लिए विकृतियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन आवश्यक है। यह कार्य यों जागृत आत्माओं के प्रबल पुरुषार्थ द्वारा ही सम्पन्न होता दिखाई देगा। किन्तु तथ्य और सत्य यही भी है कि अदृश्य जगत की भाव प्रेरणा ही उन्हें आन्दोलित करेगी और मनःस्थिति एवं परिस्थिति के बन्धनों से मुक्ति दिलाने में मानवी नहीं दैवी प्रयत्न ही सफल हो सकते है। मनुष्य अपने भौतिक पुरुषार्थ से सुसंपन्न बन सकता है, पर सुसंस्कृत बनने के लिए ऐसी प्रबल अंतःप्रेरणा चाहिए जो लोक प्रवाह को चीर कर उल्टी दिशा में बहने की साहसिकता से भरी पूरी हो। उच्चस्तरीय उमंगे निस्सन्देह दैवी प्रेरणा से प्रेरित होती है। ईश्वरीय अनुग्रह का एक ही चिन्ह है- उत्कृष्टता को अपनाने के लिए प्रचण्ड साहस। प्रज्ञावतार की अदृश्य भूमिका यही है। बाजीगर की तरह उसी के द्वारा जागृत आत्माओं को कठपुतली की तरह नचाया जायेगा और युग सृजन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए विवश किया जायेगा।

नवयुग में समस्त विश्व को एकता, समता और शुचिता की त्रिवेणी में स्नान करना होगा। व्यक्ति और समाज को सुसंस्कृत बनना होगा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की- ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की रीति-नीति अपनाकर चलना होगा। इसके लिए सैद्धान्तिक और व्यावहारिक सभी तथ्य बीज रूप से गायत्री महामन्त्र में मौजूद हैं। उसमें दार्शनिक प्रेरणात्मक और सामर्थ्य परक वे सभी क्षमताएँ विद्यमान हैं। जिनके आधार पर नवयुग का सृजन होने जा रहा है। गायत्री का तत्वज्ञान अगले दिनों पूजा, उपासना की परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। उसे सतयुग के आधारभूत आलोक की भूमिका निभाते हुए देखा जायेगा। इन्हीं तथ्यों के आधार पर आद्यशक्ति गायत्री की सामयिक भूमिका को ‘.... शक्ति’ कहा गया है। उसका संचरण ‘विश्व माता’ के रूप में होगा। जन-जन पर पड़ने वाली इसकी छाया को ‘देवमाता’ कहा जायेगा। वेद माता के यही रूप अगले दिनों दृष्टिगोचर होंगे। उसे किसी सम्प्रदाय विशेष की बपौती नहीं माना जायगा। जाति, लिंग और क्षेत्र की परिधि से आगे बढ़कर नवीन विश्व की संरचना संदर्भ में अपनी अनोखी भूमिका सम्पन्न करती हुई वह दृष्टिगोचर होगी।

रजत जयन्ती वर्ष के गायत्री महापुरश्चरण अभियान को प्रज्ञावतार का प्रभातकालीन वन्दन कहना चाहिए। उसने कोटि-कोटि जागृत आत्माओं में उच्चस्तरीय चेतना उत्पन्न की है और साहसिक प्रेरणा दी है। लक्ष लक्ष्य व्यक्तियों द्वारा कोटि-कोटि जप और भजन करने से अदृश्य वातावरण में सत्प्रवृत्तियों का प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न हुआ है। इस धर्मानुष्ठान में सम्मिलित होने वाले याजकों ने अपने संपर्क क्षेत्र में सदाशयता का नये सिरे से प्रवाह उत्पन्न किया है। यज्ञ आयोजनों से सृजनात्मक गतिविधियों ने सत्परम्पराओं का प्रचलन किया है। उनके कारण धर्म चेतना का उल्लास जन-जन के मन में उभरा हैं इन उपलब्धियों का प्रत्यक्ष मूल्याँकन करना तो कठिन है, पर दूरदर्शियों की दिव्य दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि जो हो रहा है। उसमें उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकने वाले तत्व प्रचुर परिमाण में विद्यमान है।

प्रव्रज्या अभियान रजत जयन्ती वर्ष की विशिष्ट देन है। पूरा समय देने वाले वरिष्ठ-सीमित थोड़ा समय देने वाले कनिष्ठ और दो घन्टा नित्य नव सृजन के लिए लगाने वाले समयदानी जिस तेजी से पंजीकृत हो रहे हैं, उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि भगवान बुद्ध द्वारा संचालित धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए जिस प्रकार श्रमण संस्कृति का आवेग आया था और लाखों चीवरधारी परिव्राजक विश्व भर में बिखरे, बरसे थे, प्रायः वैसा ही कुछ इन दिनों भी होने जा रहा है। जागृत आत्माओं का भावभरा समयदान अगले दिनों सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को किस प्रकार-किस कदर गगनचुम्बी बनाने जा रहा है; इस सम्भावना की कल्पना भर से हर्षातिरेक से रोमांच होने लगते है।

इस महापुरश्चरण में सम्मिलित हुए लाखों साधकों को टोली गठन के सूत्र में बाँधकर उन्हें आत्म-निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के रचनात्मक प्रयोजनों में लगाया गया है, इसे देव संगठन का नव-जीवन प्राण संचार कह सकते है। यह प्रज्ञावतार का देव माता स्वरूप है। तेतीस कोटि देवताओं का इसी भारत भूमि पर पुनः प्रकट होना और अपने महान कर्तृत्व से इस धरती को स्वर्गादपि गरीयसी बना देना, अभी भी तो एक सुखद स्वप्न है, पर उसकी पूरी और पक्की सम्भावना इस आधार पर दृष्टिगोचर होती है। कि देव परिवार की संख्या और उनकी उत्कृष्ट सक्रियता दिन और रात चौगुनी गति से बढ़ती और गगनचुम्बी बनती चली जा रही है।

रजत जयन्ती वर्ष में सर्वसाधारण के लिए नये सिरे से उसके सूत्र संचालक ने लिखा है- यह लेखन जन-जन को प्रज्ञावतार का स्वरूप प्रयोग और सन्देश से परिचित कराने की दृष्टि से लिखा गया है। तो अब तक भी गायत्री साहित्य लिखा गया हैं और अब उसके तत्व ज्ञान जानकारियाँ देने के लिए युग शक्ति गायत्री सात भाषाओं में प्रकाशित हो रही है, पर यह नूतन साहित्य विशिष्ट उद्देश्य के लिए लिखा गया हैं इस तत्वदर्शन से अपरिचित लोगों को भी विश्व के नवनिर्माण की आधारशिला का स्वरूप समझने का अवसर मिल सके यह इस नवीन लेखन का विशिष्ट उद्देश्य है। इसका अनुवाद भारत की प्रायः सभी भाषाओं में प्रकाशित होगा और अगले ही दिनों उसे गीता एवं बाइबिल की तरह संसार भर की 700 भाषाओं में अनूदित प्रकाशित, प्रसारित करने का योजनाबद्ध प्रयास किया जायगा। जो तत्वदर्शन विश्व के नव-निर्माण की प्रधान भूमिका सम्पन्न करने जा रहा है उसकी पूर्ण जानकारी भी मानव समाज को करायी जाना आवश्यक है। स्पष्ट है कि गायत्री को जाति, लिंग, क्षेत्र की बपौती नहीं रहने दिया जायेगा, वह विश्व संस्कृति का मेरुदण्ड ही थी और भविष्य में भी उसका वही स्वरूप प्रखर होगा।

रजत जयन्ती वर्ष विगत गायत्री जयन्ती से आरम्भ हुआ था। अब 5 जून को उसका एक वर्ष पूरा हो जायगा। इस अवधि में महापुरश्चरण योजना की व्यापकता-देव परिवार की अभिनव संगठना-प्रव्रज्या अभियान की प्रौढ़ता ऐसे काम हैं जो सर्वविदित है। ईसाई साहित्य की तरह अत्यन्त संस्था, अतीव सुन्दर और हर भाषा में उपलब्ध गायत्री साहित्य अगले ही दिनों भारत के कोने-कोने में-विश्व के हर क्षेत्र में जा पहुँचेगा। यह प्रयत्न गर्भ में पक रहा है। अब नौ-दस महीने पेट में रहने के उपरान्त यह भ्रूण पक गया अब उसका प्रसव होने ही वाला है। सम्भवतः अगले तीन महीने पार करके आने वाली गायत्री जयन्ती पर यह सर्वा सुन्दर गायत्री साहित्य भारत के-विश्व के कोने-कोने में जन-जन को उपलब्ध होने लगेगा।

गायत्री महापुरश्चरण के अंतर्गत अप्रैल, मई, जून में अगणित आयोजना हो रहे है। यह आगे अगले वर्ष भी चलते रहेंगे। रजत जयन्ती वर्ष मिशन का पच्चीसवाँ वर्ष है। इसमें 25 कुण्डी धर्मानुष्ठान की धूम रही है। निश्चय यह किया गय है कि यह प्रक्रिया 25 महीने चलने दी जाय। पुरश्चरण आयोजनों को अगले वर्ष भी जारी रखा जायगा और सन् 80 की गुरुपूर्णिमा को 25 महीने पूरे करने के बाद ही उसकी पूर्णाहुति होगी।

रजत जयन्ती वर्ष की केन्द्रीय उपलब्धियां यह है कि ब्रह्मवर्चस आरण्यक में (1) गायत्री शक्ति पीठ, (2) ब्रह्म विद्यालय एवं (3) शोध संस्थान की त्रिवेणी बहने लगेगी। पहले उसे मात्र साधनाश्रम के रूप में बनाया गया था। अब उस गंगा ने त्रिवेणी का रूप धारण कर लिया है। युग शक्ति की 24 धाराएँ 24 देवियों के रूप में प्रतिष्ठापित की गई है। कलेवर की दृष्टि से छोटा होते हुए भी इसे अन्तर्राष्ट्रीय गायत्री तीर्थ बनाया जा रहा है। यह दर्शनार्थियों की श्रद्धा का परिपोषण ही नहीं करेगा वरन् बुद्धिवाद एवं प्रत्यक्षवाद का उपयुक्त समाधान कर सकने के लिए आवश्यक अनुसंधान भी प्रस्तुत करेगा। यह शोधें इतने महत्व की होंगी।, जिनके लिए मानव जाति को अनन्तकाल तक उनका कृतज्ञ रहना पड़ेगा। यज्ञ पैथी ऐसा ही अनुसंधान होगा जिसके द्वारा विश्व मानव को शारीरिक व्याधियों, मानसिक आधियों से ही नहीं आन्तरिक निकृष्टताओं से छुटकारा प्राप्त करके समुन्नत एवं सुसंस्कृत जीवनयापन का अवसर मिल सके। प्रत्यक्षवादी बुद्धिवाद ने पिछली शताब्दियों से अध्यात्मवाद पर आक्रमण करना आरम्भ किया है और प्रतिरोध के अभाव में उसकी छवि धूमिल करने में बहुत हद तक सफलता भी पाई है। अब समय आ गया कि उलट कर हमला किया जाय। ब्रह्मवर्चस् में चलने वाली शोध आज तो आरम्भ ही हो रही है, पर अगले दिनों उसकी सफलता पर विश्वास रखा जा सकता है और यह माना जा सकता है कि जिस दिव्य संरक्षण में यह प्रयास आरम्भ हुआ है उसकी क्षमता को देखते हुए असफलता मिलने का कोई कारण नहीं है।

ब्रह्मवर्चस् के अंतर्गत चलने वाली साधन-शिक्षण प्रक्रिया युग सृजेताओं का एक विशिष्ट वर्ग पैदा करेगी और वे अपनी प्रखरता से अपना-अपने समाज का एवं समस्त विश्व का असाधारण हित साधन कर सकेंगे। ब्रह्म वर्चस का ही एक सहायक भाग- गायत्री नगर है। जहाँ सामान्य तीर्थ यात्रियों को-दस दिवसीय साधनाएँ करके वह आलोक प्राप्त करने का अवसर मिलता रहेगा, जो तीर्थ के नाम से जाने जाने वाले साँस्कृतिक मेरुदण्ड का मूलभूत उद्देश्य है। गायत्री नगर में रहकर इस दिन साधना करने वाले यह अनुभव कर सकेंगे कि तीर्थों का जो महात्म्य शास्त्रकारों ने बताया है वह अकारण एवं निरर्थक नहीं है।

यह विवरण रजत जयन्ती वर्ष के एक वर्ष का है जिसे पूर्वार्ध कहना चाहिए। उत्तरार्द्ध शेष है। जब इस हर्षोत्सव को -ऐतिहासिक धर्मानुष्ठान को-एक वर्ष से बढ़ा कर 25 महीने का किया जा रहा है तो समझना चाहिए कि इसके पीछे सामान्य भावुकता नहीं, वरन् कुछ विशिष्ट दैवी प्रयोजन ही छिपा हुआ है। पुरश्चरण आयोजन 25 महीने चलेंगे, यह बात अपने आप अति महत्वपूर्ण है। इससे वातावरण के परिशोधन में-देव परिवार के विस्तार में-प्रव्रज्या के अधिक प्रौढ़ परिपक्व बनाने में तो असाधारण सहायता मिलेगी ही, पर इससे भी बड़ी बात एक और होने जा रही है, जिसका प्रथम परिचय परिजनों को यह पंक्तियाँ पढ़ने के उपरान्त ही उपलब्ध होगा।

यह तथ्य सर्वविदित है कि वसन्त पर्व भगवती सरस्वती का ही नहीं प्रज्ञावतरण का भी पावन पर्व है। अनादि काल में गढ़ा और आद्यशक्ति गायत्री का जन्म जेष्ठ शुक्ला दशमी को हुआ था। उसी दिन दोनों की जन्म जयन्ती मनाई जाती हैं। इसी युग्म का दूसरा रूप है सरस्वती और युग शक्ति का अवतरण। बसन्त के सौभाग्य में यह दूनी अभिवृद्धि है कि उसे प्रज्ञावतार का जन्मदिन होने का भी श्रेय मिलता रहेगा। युग निर्माण मिशन का-उसके सू. संचालक का जन्मदिन बसन्त पंचमी को मनाया जाता है, यह प्रेरणापर्व भी है इस लिए कि मिशन के सू. संचालक पर उसी दिन आगामी वर्ष के कार्यक्रम के लिए दैवी आदेश, निर्देश उतरते और विधिवत् कार्यान्वित होते रहे है। मिशन के साथ जुड़ी हुई विशिष्ट आत्माओं को भी इसी प्रवाह में बहना पड़ा है। वे भी बसन्त पर्व पर महाकाल की प्रेरणाएँ प्राप्त करते रहे और श्रद्धापूर्वक उनका अनुसरण करके अपना क्रिया-कलाप निर्धारित करते रहे है। सामान्य परिजनों को भी हर वसन्त पर दिव्य लोक से कुछ संदेश, संकेत मिलते रहे हैं इन प्रेरणाओं का कौन कितना अनुसरण कर सका यह उसके पुण्य एवं सौभाग्य पर निर्भर रहा है। प्रज्ञावतार की प्रखरता का सामयिक परिचय इसी तथ्य के आधार की प्रखरता का सामयिक परिचय इसी तथ्य के आधार पर मिलता है कि युग सृजन के संदर्भ में उसके निर्देश क्रमशः बड़े और कड़े होते चले जा रहे हैं। इतना ही नहीं उस अनुशासन को शिरोधार्य करने के लिए देव मानवों के चरण बरबस आगे बढ़ने लगे हैं।

रजत जयन्ती वर्ष के बसन्त पर्व की विशिष्ट प्रेरणा यह है कि प्रज्ञावतार के आलोक को भारत भूमि के समस्त धर्म क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए गायत्री तीर्थों की स्थापना की जाय। आद्य शंकराचार्य को भी इसी प्रकार की प्रेरणा हुई थी। अनेकों दूरगामी परिणामों को देखते हुए उनने भारत के चारों कोनों पर चार धामों की स्थापना की थी। यह कार्य उन दिनों की उनकी स्थितियों में अति कठिन था, पर दैवी सहयोग साथ रहने के कारण वह कुछ ही वर्षों में जादुई सफलता की तरह पूरा हो गया था। इस स्थापना के सत्परिणामों पर जितनी गम्भीरता से चार किया जाय वह उतनी ही अधिक महत्वपूर्ण और श्रेयस्कर प्रतीत होती जाती है।

ठीक इसी स्तर की प्रेरणा प्रस्तुत बसन्त पर्व पर अवतरित हुई है। इसके अनुसार भारत में 2 गायत्री तीर्थ बनने हैं। यह स्थापना उन्हीं स्थानों पर होगी जहाँ परम्परागत विशिष्ट तीर्थ विद्यमान हैं। तीर्थों के रूप रेखा स्पष्ट है। वे कलेवर की दृष्टि से बहुत बड़े नहीं होंगे और न अनावश्यक रूप से खर्चीले। इनकी तीन मंजिल होंगी। ब्रह्मवर्चस की तरह इनमें भी युग त्रिवेणी जैसी गतिविधियों का दर्शन होगा।

पहली मंजिल में युग शक्ति की भव्य प्रतिमा दीवारों पर संगमरमर की गायत्री के अंतर्गत आने वाली 2 महाशक्तियों की प्रतिमाएँ। दर्शकों को इन सभी की जानकारी कराने के लिए ‘गाइडों की नियुक्ति। पैसा चढ़ाने का निषेध। कोई कुछ देना चाहे तो बदले में तत्काल उतने मूल्य का गायत्री साहित्य का प्रतिदान।

दूसरी मंजिल में सत्संग भवन, परामर्श कक्ष रहेगा। इसमें इच्छुकों का गायत्री ज्ञान देने तथा जिज्ञासाओं का समाधान करने का क्रम निरन्तर चलता रहेगा।

तीर्थ की सभी व्यवस्थाओं का संचालन करने, प्रचार प्रयोजनों में विरत रहने के लिए न्यूनतम पाँच परिव्राजक रहेंगे। अपनी निज की साधना, दैनिक-यज्ञ प्रक्रिया एवं शरीर यात्रा के लिए भोजन, शयन, शौच, स्नान आदि का प्रबन्ध रहेगा। अभी आरंभिक निर्माण के लिए इतनी ही व्यवस्था सोची गई है। अच्छा तो यह होता कि दूर-दूर से आने वाले आगंतुकों के लिए एक धर्म शाला भी साथ ही रहती, पर लागत की अधिकता और समय की जल्दी का ध्यान रखते हुए तुरन्त निर्माण के लिए उपरोक्त तीन मंजिलें तीर्थों का ही काम हाथ में लिया गया है। दूसरे चरण में जहाँ भी तीर्थ होंगे उसीसे सटी हुई या थोड़ी हटकर धर्मशालाएँ भी बनेंगी। जहाँ तीर्थयात्री और अनुष्ठानकर्ता शान्तिपूर्वक निवास करने एवं तीर्थों जैसा वातावरण प्राप्त करने का लाभ उठा सकें।

रजत जयन्ती वर्ष में यह गायत्री तीर्थ निर्माण का संकल्प 24 तक सीमित किया गया है। 24 अक्षरों में 24 शक्तियाँ और प्रेरणाएँ है। इसलिए 24 शक्ति पीठों की-गायत्री तीर्थों की संख्या 24 हो तो उपयुक्त ही रहेगा। वैसे भारतवर्ष के हजारों तीर्थों में से कम से कम 240 नहीं तो 108 तीर्थ तो ऐसे ही हो सकते हैं जिनमें गायत्री तीर्थों की स्थापना होनी चाहिए। इसे एक दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति की जन्मदात्री, ब्रह्मविद्या की गंगोत्री और साधना तपश्चर्या की शक्ति निर्झरणी गायत्री का कहीं एक भी समर्थ तीर्थ न दिखे और अन्यान्य चित्र विचित्र देवी-देवताओं के देवालयों की भरमार होती चले। इस लज्जाजनक स्थिति को हमें अविलम्ब धो डालना है। गायत्री तीर्थों की श्रृंखला का व्यापक विस्तार नवयुग के अवतरण का वातावरण बनाने के लिए भी आवश्यक है। यह सभी कार्य इन शक्ति पीठों से किस प्रकार सम्भव हो सकते हैं इसे समय से पूर्व कहना व्यर्थ है। यह तीर्थ मात्र देवालय नहीं रहेंगे, उनके द्वारा जो सृजनात्मक प्रवाह बहेंगे उन्हें हिमालय से निकलने वाली अनेकानेक सरिताओं के समतुल्य ही समझा जा सकता है।

रजत जयन्ती वर्ष के उत्तरार्ध में जिन गायत्री तीर्थों के स्थान चुने जाने हैं। उनका निर्धारण करने में विशेष खो-बीन, जाँच-पड़ताल की आवश्यकता होगी। पहले कहाँ से काम शुरू करना है यह भी इन्हीं दिनों निश्चित होना है। पर इतना निश्चित है कि सप्त पुरियों, द्वादश ज्योतिर्लिंगों, बीस शक्ति पीठों, चार कुम्भस्थलों में से एक भी ऐसा न बचेगा जहाँ गायत्री तीर्थों की स्थापना न हुई हो और जहाँ गायत्री तीर्थों की स्थापना न हुई हो और जहाँ से तीर्थ यात्रा के लिए पहुँचने वाले लोगों को युग शक्ति के स्वरूप, प्रयोग एवं प्रतिफल की जानकारी उपलब्ध न होती हो।

आद्य शंकराचार्य के चार धामों को निर्माण करने में एक मान्धाता ही समर्थ हो गये थे। समर्थ रामदास के महावीर मन्दिर छत्रपति शिवाजी ने बनवाये थे, बुद्ध के विहारों और विश्वविद्यालयों को बनाने में हर्षवर्धन, अशोक जैसे सम्पन्न लोगों का हाथ था। युग निर्माण परिवार में साधन सम्पन्न और उदार होने की दोनों विशेषताएँ जिनमें हो ऐसे लोगों को बहुत ढूंढ़-खोज करने पर ही पाया जा सकेगा। किन्तु आशा उन प्रतिभाओं पर केन्द्रित होती है जो प्रतिभाशाली और प्रामाणिक होने के कारण समर्थ लोगों को अपने प्रभाव से प्रभावित कर सकते है और एक-एक ईंट इकट्ठी करके देवालय बनाने का नया आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं यों यश या पुण्य के लिए भी कई लोग अपने स्थान में मन्दिर धम्र शाला आदि बनाने के इच्छुक रहते हैं। उन्हें यदि तीर्थ में देवालय बनाने से मिलने वाले असंख्य गुने पुश्य की जानकारी कराई जाय और इस माध्यम से व्यापक यश मिलने की स्पष्ट सम्भावना समझाई जाय तो ऐसे लोक भी मिल सकते है। जो अपने धन का श्रेष्ठतम उपयोग इसी में माने और युग देवता के चरणों पर अपने साधनों को समर्पित करने में छोटे भामाशाओं की-हरिश्चन्द्रों की-भूमिका सम्पन्न करें। जो हो, विश्वास यही किया जाना चाहिए कि जिस महाकाल की प्रेरणा से यह अनुपम संकल्प प्रकट हुआ है वही सत्ता इसे सम्पन्न करा सकने वाली प्रतिभाओं को सहयोग की प्रेरणा भी देगी। और यह निर्माण कार्य कष्ट साध्य-साधन साध्य होते हुए भी सम्पन्न होकर रहेंगे। परिजनों को कुछ ही समय में चौबीस गायत्री तीर्थों का दर्शन अपनी इन्हीं आँखों से कर सकने का सौभाग्य मिल जायेगा।

परिव्राजकों की भर्ती का क्रम पहले से ही चल रहा है। स्फूर्तिवान परिश्रमी एवं प्रभावशाली परिव्राजक इन 24 तीर्थों के लिए भी चाहिए। हर तीर्थ में न्यूनतम पाँच परिव्राजकों का एक जत्था रहेगा। उन जत्थों की हर साल एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ में बदली होती रहेगी। 24 तीर्थों के लिए 120 परिव्राजकों की 108 के लिए 540 तीर्थ संचालकों की आवश्यकता पड़ेगी। इन सब का प्रथम शिक्षण ब्रह्मवर्चस हरिद्वार में होगा। जो उत्तीर्ण होंगे उन्हें अन्य तीर्थों में भेजा जायेगा। इस प्रकार वे 24 वर्ष में 24 तीर्थों का सेवन कर सकेंगे। 24 वर्ष तक गायत्री की वैसी ही उपासना कर सकने में समर्थ होंगे जैसी कि युग निर्माण मिशन के संस्थापन ने की है।

जिन्हें यह कार्य प्रिय हो-जो अपने को इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उपयुक्त समझते हों वे पहले कुछ समय हरिद्वार शिक्षण प्राप्त करने की योजना बनाये। इन लोगों के निर्वाह का आवश्यक खर्च संस्था की ओर से ही बहन किया जायेगा।

रजत जयन्ती वर्ष युग निर्माण मिशन का एक पावन वर्ष है। इसमें परिवार को प्रायः समस्त जागृत आत्माओं ने अपने-अपने ढंग से योगदान दिया है। आगामी वर्ष उपरोक्त प्रयोजनों में और भी अधिक श्रद्धा के साथ प्रस्तुत कार्यों में हाथ बँटाने की आज्ञा की जा रही है। इन पंक्तियों को इसी का आह्वान आमन्त्रण समझा जाये।


अंशदान

हम पेट और प्रजनन में ही कोल्हू का बैल न बन जायें।पूरा जीवन ही खपजाये, क्षति का वह मार्ग न अपनायें॥

परिवार पालना यह माना पावन-कर्त्तव्य हमारा है।लेकिन परिवार पालने के ही लिये न जीवन सारा हैं॥संसार न इतना छोटा-सा, इस सीमा से बाहर आयें।हम पेट और प्रजनन में ही कोल्हू का बैल न बन जायें॥

हम पर समाज का ऋण भी है, इस ऋण का भी कुछ ध्यान रहे।सामाजिक कर्त्तव्यों का भी, हमको थोड़ा-सा ज्ञान रहे॥।फँस लोभ-मोह के चक्कर में अपना कर्त्तव्य न बिसरायें।पूरा जीवन ही खप जाये, क्षति का वह मार्ग न अपनायें॥

सांसों का, श्रम का, साधन का, सेवा में अंश लगायें हम।आश्रम विधान की परम्परा की गरिमा को अपनायें हम॥देकर समाज को समयदान, जन-सेवा को आगे आयें।हम पेट और प्रजनन में ही कोल्हू का बैल न बन जायें॥

परिव्राजक, देव, भ्रमण बनकर, घर-घर में अलख जगायें हम।खुद जाकर जन-जन के द्वारे, तम नाशक ज्योति जलायें हम॥फिर ज्ञान यज्ञ की ले मशाल, घर-घर प्रकाश हम पहुँचायें।पूरा जीवन ही खप जाये, क्षति का वह मार्ग न अपनायें।

-मंगल विजय

*समाप्त*