अग्निश्ष्टोमादिमियैज्ञैरिश्ष्ट्वा विपुल दक्षिणः। न तत्फल मवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत्।
अश्रद्धानः पापात्मा नास्तिकोऽच्छिन्नसंष्शयः। हेतु मिश्ष्ठष्श्च प´चैत न तीर्थफल भागिनः।
येश्षु सम्यक् नरः स्नात्वा प्रयाति परमाँ गतिम्। तस्मात् तीर्थोश्षु गन्तव्यं नरैः संसारिकभीरुभिः।।
महाभारत। वन पर्व
हे महाभाग! जो पुष्प अग्निष्टोम जैसे विशाल यज्ञों से उपलब्ध नहीं हो सकता वह तीर्थ यात्रा से तीर्थ सेवन से सहज सुलभ होता है, अश्रद्धा युत मात्र, पर्यटन और मनोरंजन के लिये इधर-उधर परिभ्रमण करने वाले संशयात्मक व्यक्ति इस पुण्य फल को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। तीर्थ यात्रा का उद्देश्य है-अन्तःकरण की शुद्धि और इस प्रकार शुद्ध हुए हृदय-अन्तःकरण से मानवीय जीवन की यथार्थता का बोध और प्राप्ति। इस आत्म-कल्याण के इच्छुक और अशांत मनःस्थिति के गोलों को तीर्थ यात्रा का पुष्प लाभ प्राप्त करना चाहिये।
पानी का स्वभाव नीचे की ओर बहना है। मनुष्य का मन भी पानी की तरह है, जो पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को सहज ही अपना लेता है। इसमें जन्म-जन्मान्तरों की संचित पशु प्रवृत्तियों का अभ्यास उसे मानवी गरिमा को अपनाने की दिशा में बढ़ने से प्रायः रोकता ही रहता है। ऊँचा उठने के लिए-विशेष प्रयत्न करने पड़ते है। पानी को कुँए से ऊपर खींचना हो तो कई साधन जुटाने पड़ते है और बल लगाना पड़ता है। इसी प्रकार मनुष्य को ऊँचा-चढ़ना हो तो सीढ़ी आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। नीचे गिरना हो तो पानी, मनुष्य या कुछ भी, क्षण भर में गहरे गर्त तक पहुँच सकता है। ऊँचा उठना बड़ा काम है। उसके लिए आवश्यक व्यवस्था बनानी पड़ती है। क्रेनें इसी काम में लगी रहती है। पम्पों को यही करना पड़ता है। लिफ्टों का यही कार्य है। आगे बढ़ाना भी लगभग इसी प्रकार का काम है। पैदल चलना हो तो भी शक्ति चाहिए। दौड़ने वाले वाहनों में भाप, तेल, बिजली आदि की शक्ति नियोजित करनी पड़ती है। इसके लिए अतिरिक्त साधन न जुटाये जायँ तो प्रगति की कल्पना स्वप्न ही बनी रहेगी।
मनुष्य जीवन की विशेषता और सार्थकता उसके उत्थान-अग्रगमन में है। गतिशीलता पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने ऊँचे उठने में है। मनुष्य शरीर पालने से कोई बड़ा लाभ नहीं। सुविधा की दृष्टि से तो अन्य प्राणी भी अपनी आवश्यकतानुसार ईश्वर प्रदत्त सुविधाओं को भोगते और सुखी रहते है। मानवी गरिमा इतने तक ही सीमित नहीं है। उसके कुछ विशेष कर्त्तव्य हैं और विशेष उत्तरदायित्व। चरित्र और चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश ही मनुष्यता है। मर्यादाओं के पालन और आदर्शों का अवलम्बन अन्य प्राणियों से नहीं बन पड़ता। उसे मात्र मनुष्य ही निवाहता है, इसी में उसका गौरव है। मनुष्य शरीर के साथ जुड़ी हुई उपलब्धियों का रसास्वादन एक सौभाग्य है, उसे सुअवसर की सार्थकता इस पर निर्भर है कि मानव गौरव के अनुरूप आदर्शवादिता अपनाई गई या नहीं। सच्चे अर्थों में मनुष्य उसी को कहा जा सकता है, जो मानवी उत्कृष्टा का अवधारणा करके शालीनता, कर्मठता और परमार्थ परायणता का परिचय दे।
एक सीढ़ी इससे भी आगे की है-मानवी काया से देवत्व का उत्पादन, अभिवर्धन। व्यक्तित्व के उच्चस्तरीय उत्कर्ष इसी स्थिति में सन्निहित है। महामानव, सन्त, ऋषि, देवात्मा, अवतार इसी प्रगति यात्रा के क्रमिक सोपान है। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पशुता से ऊँचे उठकर-मनुष्यता के उत्तरदायित्व सम्भालने पड़ते है-मनुष्य से देवता बनने के लिए गतिविधियों को लोकमंगल में नियोजित करना पड़ता है।
गुण, कर्म स्वभाव में देवत्व की मात्रा बढ़ते चलने से ही आत्म संतोष, लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह की प्राप्ति होती है जिसकी उपलब्धि को पूर्णता की प्राप्ति कहते है। शास्त्रकारों ने इसी स्थिति का उल्लेख स्वर्ग, मुक्ति के ऋद्धि-सिद्धि के ईश्वर दर्शन आत्म-साक्षात्कार के-रूप में सुविस्तृत वर्णन किये है। आत्मिक प्रगति का स्वरूप एवं क्रम यही है। इसी का विवेचन एवं मार्गदर्शन करने के लिए अध्यात्म तत्वज्ञान की रचना हुई है। ब्रह्म विद्या को इसी निमित्त सृजा गया है। दूरदर्शी ऋषि मनीषियों ने धर्म धारण एवं अध्यात्म साधना का विशालकाय ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है कि उसके आलोक में मनुष्य प्रगति पथ पर अग्रसर हो सके। अपनी चेतना को-व्यक्तित्व की सत्ता को उच्चस्तरीय बना सके। कहना न होगा कि वैयक्तिक सुख−शांति और सामाजिक सुविधा सुरक्षा के समस्त आधार इसी केन्द्र बिन्दु पर निर्भर है।
मनःस्थिति ही परिस्थिति के रूप में परिणत होती है। बाह्य वैभव आन्तरिक वर्चस् का ही प्रतिफल है। हेय मनःस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति परिस्थिति की दृष्टि से दरिद्रता, अवमानना, दुर्बलता, रुग्णता, हीनता, दीनता जैसी पिछड़ेपन की स्थिति से कभी उभर न सकेंगे। बढ़ी हुई सम्पदा भी दुष्प्रवृत्तियों को उभारने के अतिरिक्त और किसी काम में न आ सकेगी। ऐसे लोगों को किसी अनुपयुक्त मार्ग से वैभव हस्तगत हो जाने पर भी कोई विशेष लाभ नहीं होते। आग में ईधन पड़ने से भड़की हुई दुष्प्रवृत्तियां उस बढ़े हुए अनुपयुक्त वैभव के कारण मनुष्य की रही बची शालीनता और शांति को भी नष्ट करके रख देती हैं। वे दरिद्रों की तुलना में भी घाटे में रहते है। व्यक्ति और समाज की समग्र सुख-शांति के लिए सम्पदा से भी अधिक आवश्यकता उच्चस्तरीय आस्थाओं की है। इसके बिना किसी का मनुष्य जीवन सार्थक हो ही नहीं सकता।
तत्वदर्शी मनीषियों ने धर्म और अध्यात्म का तत्वदर्शन सृजा। साथ ही यह प्रयत्न भी किया कि इसे जीवन क्रम में उतारने की विधि व्यवस्था भी बनाई जाय। धर्मधारणा इसी का नाम है। विभिन्न प्रकार के धर्मानुष्ठान इसी के अंतर्गत आते है। इन्हीं आदर्शों के परिपालन के लिए प्रथा परम्पराओं का निर्धारण एवं प्रचलन किया गया। संक्षेप में यही है, विशालकाय धर्म कलेवर जिसके अंतर्गत धारणाओं और कुकृत्यों का द्विधा समावेश है। आचार-व्यवहार क रीति-रिवाजों, नियम-मर्यादाओं के निर्धारण में ध्यान रखा गया है कि मनुष्य को आचारवान बनने की दिशा में अग्रसर करें पीछे भले ही मनुष्य ने अपनी भ्रष्टता और दुष्टता का समावेश करके उन्हें कुरीतियों, अन्ध-विश्वासों एवं अनाचरणों में बदल लिया हो पर मूलतः धर्म की आचार संहिता का सृजन मानवी गरिमा के अनुरूप व्यक्तित्वों को ढालने के लिए ही किया गया था। विकृत होने पर तो अमृत भी विष हो सकता है। धर्म परम्परा भी यदि अंधविश्वासों में परिणत होकर अनुपयुक्त बन चले तो उसमें आश्चर्य ही क्या है। आज हम धर्म विकृति के ऐसे युग में रह रहे हैं जिसमें धर्म तत्व का दर्शन भी कठिन हो रहा हैं। धूर्तों और मूर्खों का समन्वित आधिपत्य ही उस पर छाया दीखता है।
धर्मानुष्ठानों के असंख्य स्वरूप है। सामान्य पूजा उपासना से लेकर उच्चस्तरीय योगाभ्यासों और तप साधनों तक अनेकानेक क्रिया-प्रक्रिया मनुष्य को एक ही लक्ष्य पर ले जाती है कि वह भावनात्मक दृष्टि से अधिकाधिक परिष्कृत होता चल जाय और ऐसी आचार पद्धति अपनाये जो अपने स्वयं के लिए तथा समूचे संसार के लिए श्रेयस्कर सिद्ध हो। धर्मानुष्ठानों के स्वरूप कितने ही प्रकार के क्यों ने हो उनका लक्ष्य एक ही है जीवन क्रम में अधिकाधिक उदात्त उत्कृष्टता का समावेश करते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाना और उस स्थिति का व्यक्ति तथा समाज को परिपूर्ण लाभ प्रदान करना। आज धर्मानुष्ठान भले ही देवता को फुसलाकर मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए किये जाते हों पर इस उद्देश्य से उन्हें बनाया नहीं गया था। परिष्कृत अन्तःकरण अपने आप में एक परिपूर्ण देवता है, उसके अन्तराल से जो कुछ उद्भूत होता है उसे ऋद्धि-सिद्धियों की रत्न-राशि समझा जा सकता है। प्रगति और शांति स्वर्ग और मुक्ति उसी के प्रतिफल है।
मनुष्य को धर्म धारणा के राज मार्ग पर चलकर सर्वतोमुखी प्रगति से लाभान्वित होने के लिए जिन क्रिया कुकृत्यों और विधि-विधानों का निर्धारण किया गया है उनकी संख्या एवं विधि-विधानों का निर्धारण किया गया है उनकी संख्या एवं विधि व्यवस्था का विस्तृत वर्णन करना इन पंक्तियों में अभीष्ट नहीं। यहाँ तो इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि दैनिक उपासना, देव प्रतिमाओं का नमन-वंदन-षोड्श-संस्कार, पर्व-त्यौहार, व्रत-उपवास, कथा-कीर्तन, स्वाध्याय, सत्संग, अग्निहोत्र, बलिवैश्व, जप-ध्यान, श्राद्ध-तर्पण, दान-पुण्य, योगाभ्यास, तप-साधन, ब्रह्मभोज, सन्त-सत्कार, सदावर्त, जलाशय, धर्मशाला, स्मारक आदि के अनेकानेक धर्मकृत्यों का वाह्य स्वरूप भिन्न भले ही हो पर उनका मूल प्रयोजन व्यक्ति को अधिक पवित्रता एवं अधिक उदारता अपनाने की प्रेरणा प्रदान करना ही है। इन क्रिया-कुकृत्यों की सार्थकता उतनी ही आँकी जा सकती है; जितने से कि मूल उद्देश्य के पूर्ण होने में सहायता मिलती है। आत्मा की, परमात्मा की प्रसन्नता इसी तथ्य पर निर्भर है कि अपनाये गये धर्म-कुकृत्यों के सहारे आत्म-परिष्कार का लक्ष्य पूरा कर सकना किस परिणाम में सम्भव हुआ। देवता के वरदान इसी एक कसौटी पर कसकर सत्पात्रों को दिये जाते हैं कि उनने धर्म-कुकृत्यों को अपना कर अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का कितना विकास किया। देव अनुग्रह की मात्रा और प्रतिक्रिया इसी आधार पर उपलब्ध होती है। आज भले ही प्रशंसा करने और उपहार देने के मूल्य पर दैवी अनुकम्पा पाने की बात सोची जाने लगी हो पर यथार्थता कुछ और ही है। धार्मिकता की सार्थकता और उस मार्ग पर चलने वाले को मिलने वाली सर्वतोमुखी सुसम्पन्नता का आधार केवल एक ही है कि इन उपचारों के सहारे किसने आत्मपरिष्कार में कितनी सफलता प्राप्त की।
धर्म-कुकृत्यों में सबसे अधिक व्यापकता, विशालता और लोक-मान्यता-तीर्थयात्रा को मिली है। ध्यान पूर्वक देखने से विदित होता है कि अन्याय धर्म-कुकृत्यों के लिए धर्म प्रेमी जन-समुदाय का जितना श्रम, समय, मनोयोग एवं धन खर्च होता है उस सब का समन्वय करने से भी अधिक प्रयत्न तीर्थ यात्रा के लिए नियोजित करते है। भारत में हजारों बड़े और लाखों छोटे तीर्थ है। अपने-अपने क्षेत्रों में इन सभी की महिमा और मान्यता है। लोग श्रद्धा पूर्वक तीर्थ सेवन के लिए समय, श्रम, मनोयोग एवं धन का प्रचुर परिणाम में खर्च करते हैं। समय-समय पर तीर्थयात्रा के विशेष पर्व करते है। उन पर पवित्र जलाशयों में स्थान करने एवं देव प्रतिमाओं का दर्शन करने अगणित लोग भाव श्रद्धा लेकर पहुँचते है। विशेष पर्वों पर भीड़ इतनी हो जाती है कि उसकी व्यवस्था बनाने में सरकार तक को भरी दौड़-धूप करने एवं जिम्मेदारी उठाने की आवश्यकता पड़ती ह। सामान्य अवसरों पर भी लोग तीर्थ यात्रा की धर्म भावना से वहाँ पहुँचते ही रहते हैं।
प्रसिद्ध तीर्थों में अनेक पर्व होते है। इन विशिष्ट अवसरों से लेकर सामान्य दर्शन तक को पहुँचने वाले यात्रियों की गणना की जाय तो वह संख्या लाखों को पारकर जाती है। बड़े तीर्थ हजारों है। उन सब में पहुँचने वाले हर साल करोड़ों होते है। छोटे तीर्थ इनके अतिरिक्त है। उनमें भी कुछ सिलसिला तो चलता ही रहता है। कुम्भ-मेले बड़े आयोजनों की विशालता तो आश्चर्यजनक होती है। इन सबमें सम्मिलित होने वाले जन-समुदाय का लेखा-जोखा लिया जा सके तो प्रतीत होगा कि करोड़ों व्यक्ति वहाँ पहुँचते हैं। यह ठीक है कि हर प्रकृति के लोग उनमें नहीं जाते, पर ऐसा भी होता है कि एक ही व्यक्ति बार-बार कई-कई तीर्थों में पहुँचे। हर हालत में उपस्थित का अनुपात इतना अधिक रहता है कि उसे असाधारण ही कहा जा सकता है। अभ्यास में आने वाले प्रचलन में सम्मिलित रहने के कारण वह स्वाभाविक-सामान्य भले ही लगने लगे पर वस्तुतः वैसा है नहीं। इतनी बड़ी जन-शक्ति का एक विशिष्ट प्रयोजन के साथ सम्बद्ध रहना-उसके निमित्त इतना समय, श्रम, मनोयोग और धन खर्च करना कुछ अर्थ रखता है। तीर्थ प्रयोजन में संलग्न जन शक्ति और धन शक्ति का विस्तार इतना बड़ा है कि उतने भर से अधिक प्रगति के नाम पर खड़ी की जाने वाली कई-कई पंचवर्षीय योजनाएँ सफलता पूर्वक चलाई जा सकती है। इतना श्रम और धन शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग आदि किसी भी केन्द्र पर नियोजित किया जा सके तो उतने अनुदान से उस क्षेत्र में काया-कल्प जैसी प्रगति हो सकती है। जन साधारण द्वारा एक पवित्र प्रयोजन के लिए इतने भावभरे अनुदान प्रस्तुत करते हुए देखकर प्रतीत होता है कि जन मान्यता में तीर्थ के लिए कितनी आस्था विद्यमान है। इस श्रद्धा और चेष्टा के समन्वय का प्रतिफल ऐसा उत्पन्न होना चाहिए कि निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति और अभीष्ट की पूर्ति हो सके। तीर्थों की स्थापना उनकी यात्रा का इतना सुविस्तृत प्रावधान इसलिए बना कि उस पुण्यप्रक्रिया के संपर्क में आने वाली अपनी गरिमा निखार सके और सामाजिक प्रगति में उत्साहवर्धक योगदान दे सके। आज तीर्थ भी हैं और तीर्थयात्रा का प्रचलन भी। किन्तु सब कुछ खोखला और निर्जीव बन गया। ढकोसला खड़ा रहा और उसमें से प्राण निकल गया है तो उसे निरर्थक विडम्बना के बने रहने या सड़े पदार्थों के फूलते रहने की तरह क्या कुछ बनेगा? इस ज्वलन्त प्रश्न पर आज गम्भीर चिन्तन की आवश्यकता है। साथ ही यह भी अभीष्ट है कि भ्रान्ति या विकृति की इस क्षेत्र में जहाँ घुस पैठ हुई है उसका परिमार्जन, परिशोधन और नवनिर्धारण किया जाय।
प्राणी या पदार्थ स्वभावतः अनगढ़ होते है। उन्हें सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए विशेष प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ती है। पदार्थों को पकाया, गलाया, ढाला व खरादा जाता है। तब कहीं वे अपनी अनगढ़ स्थिति से आगे बढ़कर उपयोगी बनते है। प्राणियों के संदर्भ में भी यही बात है। पशुओं को पालतू बनाने के लिए उनकी वन्य प्रकृति को बदलना पड़ता है। सरकस जैसे महत्व पूर्ण कार्यों में उनकी भूमिका अधिक उपयुक्त हो सके इसके लिए प्रशिक्षण में और प्रशिक्षित पशु-पक्षी स्वयं कितना श्रेय सम्मान पाते है और पालने वाले के लिए कितने उपयोगी सिद्ध होते है। यह किसी से छिपा नहीं है। अनगढ़ को सुगढ़ बनाने का नाम ही सभ्यता एवं संस्कृति है। बगीचे के पौधों की कटाई, छटाई, गुड़ाई, निराई, सिंचाई जैसे उपचारों से कुशल माली उन्हें कितना सुविकसित बना देता है। कलम लगाने पर पेड़ों के फल फूलों में कितना अन्तर आ जाता है उसे देखते हुए सुसंस्कारिता को एक प्रकार से जादुई उपचार ही कह सकते है।
मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने का विज्ञान और विधान संस्कृति कहलाता है। इसके दर्शन को अध्यात्म और व्यवहार को धर्म कहते है। धर्म और अध्यात्म का समन्वय ही साधना विज्ञान है। ब्रह्म विद्या इसी को कहते है। इस प्रयोजन के लिए बनाये गये अनेकानेक उपाय-उपचारों को धर्म कुकृत्यों के रूप में विनिर्मित किया गया है।
इन धर्म कुकृत्यों में तीर्थ महत्ता अत्यधिक है। इसका पता उसकी प्रथा परम्परा के प्रति धर्मप्रिय जनता के उत्पात के देखने से सहज ही लग जाता है। स्थिति इस स्तर तक कैसे पहुँची-इस पर अधिक गम्भीर चिन्तन करने से प्रतीत होता है कि इस पुण्य प्रयोजन को इतनी लोक मान्यता मिलने के पीछे कई कारण है।
ऋषियों ने तीर्थों का माहात्म्य वर्णन करने में धर्म पुराणों के जितने पृष्ठ लिखे है उतने कदाचित अन्य किसी प्रसंग पर नहीं। शंकर पुराण का बहुत बड़ा भाग तीर्थ माहात्म्य से ही भरा पड़ा है अन्यान्य पुराणों उपपुराणों में इस संदर्भ में इतना अधिक पुण्य-फल बताया गया है कि उसे प्राप्त करने के लिए धर्म प्रेमियों की सहज श्रद्धा को परिपूर्ण प्रोत्साहन मिले। पापों से निवृत्ति-प्रायश्चित विधा-पुण्य संचय, स्वर्ग-मुक्ति की प्राप्ति, दैवी अनुकम्पा, आत्म-शांति, मनोकामना की पूर्ति जैसे कितने ही लाभ गिनाये गये है। उनके साथ क्या इतिहास जुड़ा हुआ है। किन कारणों से वे तीर्थ बने, उसका सेवन करने से किसे क्या पुण्य फल प्राप्त हुआ? जैसे अनेकों वृत्तान्त इस तीर्थ चर्चा के प्रसंग में आते है। इन कथनोपकथनों का प्रयोजन यह है कि जन साधारण में वहाँ पहुँचने की प्रवृत्ति बढ़े।
दूसरा प्रयास तीर्थ यात्रा को प्रोत्साहित करने में उन लोगों का है जिनने उन स्थानों पर दर्शनीय देवालय, घाट, सरोवर, राज-मार्ग, धर्मशाला आदि बनाये। वहाँ पहुँचने के रास्ते में ठहरने के सुविधा-साधन उत्पन्न किये।
जन साधारण को वहाँ पहुँचने के लिए प्रोत्साहन इसलिए दिया गया कि वे वहाँ पहुँचे और इन कल्पवृक्षों के संपर्क में आकर आन्तरिक अभावों और संकटों से निवृत्ति प्राप्त करें। तीर्थ के पारस का स्पर्श करके अपने कलुष कालिमा की लौह जैसी कठोरता को बहुमूल्य स्वर्ण सदृश बनाने का श्रेय प्राप्त करें।
अपने आरम्भ काल में तीर्थ एक प्रकार से शांति समाधान के केन्द्र थे जहाँ पहुँच कर कुछ समय तीर्थ यात्री को वहाँ निवास करना पड़ता था, इस निवास अवधि को तीर्थ सेवन नाम दिया गया था। अभी भी त्रिवेणी तट पर माघ महीने में पर्ण कुटी बना कर कितने ही व्यक्ति एक महीने का साधना व्रत लेते हैं और उस तपश्चर्या को ‘कल्प वास’ कहते है। प्राचीन काल में तीर्थ ऐसे आध्यात्मिक सेनेटोरियम थे जहाँ आत्मिक विश्रान्ति पाने एवं उद्विग्नताओं का समाधान करने में सहायता मिलती थी। वहाँ ऋषियों के आरण्यक रहते थे तीर्थ सेवन के लिए आने वाले वहाँ कुछ समय ठहर कर जीवन क्रम पर नये सिरे से विचार करते और आरण्यक संचालक ऋषियों से अपनी समस्याओं के समाधान तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में आवश्यक परामर्श-प्रकाश प्राप्त करते थे। दूर हटकर देखने पर विस्तृत क्षेत्र दीखता है। जीवन की उलझनों की समीक्षा करने के लिए भी कुछ दूर पहुँचने पर निष्पक्ष समीक्षा कर सकना अधिक सरल पड़ता है। आत्म-चिन्तन, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चारों ही चरण पूरा करने में यह तीर्थ वास का वातावरण हर दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होता था। पापों का प्रायश्चित करने के लिए कई तपश्चर्याएं आवश्यक होती है। वे भी यहाँ रहकर करने से वह प्रयोजन पूरा होता था; जिसमें तीर्थों के महात्म्य से पाप निवृत्ति को जोड़ा गया है। यह निश्चित रूप से प्रायश्चित विधान की ओर संकेत है। आत्मोत्कर्ष के लिए कई प्रकार के साधन करने पड़ते है। धर्मानुष्ठान इन्हीं को कहते है। योग और तप के विधिविधान, आत्म शोधन एवं आत्म-परिष्कार के उद्देश्य से ही विनिर्मित हुए हैं। यह सभी प्रयोजन तीर्थ वास की अवधि में तपःपूत मनीषियों के संरक्षण में तत्वावधान में सम्पन्न होते थे। तीर्थ यात्री जब लौटता था तो किसी सेनेटोरियम में रहकर व्याधियों का उपचार एवं स्वास्थ्य संवर्धन का दुहरा लाभ उठाने वालों की तरह ही आत्मिक पवित्रता और प्रखरता साथ लेकर घर आता था।
इस उपलब्धि की सुखद प्रतिक्रिया को देखते हुए तीर्थ का जो माहात्म्य बताया गया है वह बहुत अंशों में सही सिद्ध होता था। प्रकृति के सान्निध्य में उत्तम जलवायु का लाभ लेने सात्विक आहार विहार पर निर्भर रहने प्रेरणा-प्रद वातावरण की ऊर्जा ग्रहण करने से छोटे-मोटे शारीरिक और मानसिक रोगों से भी निवृत्ति मिल जाती थी। रात्रि को गहरी नींद लेने पर जिस प्रकार प्रातः उठने पर स्फूर्ति एवं प्रसन्नता अनुभव होती है वैसे ही तीर्थ से लौटने वाला अपनी इस आध्यात्मिक विश्रान्ति के उपरान्त फिर से सामान्य जीवन में प्रवेश करता था। और नई क्षमता, नई दृष्टि एवं नई स्फुरणा के कारण उसे हर क्षेत्र में उत्साह वर्धक सफलताओं का लाभ मिलता चला जाता था। इसे तीर्थ यात्रा का प्रत्यक्ष पुण्य फल माना जाता था। शारीरिक और मानसिक चिकित्सा की दृष्टि से इसे पक्षीय उपचार अनुभव किया जाता था और जितना समय, श्रम, धन उस कार्य में लगा उसे सार्थक माना जाता था।
तीर्थ यात्रा पद यात्रा के रूप में होती थी, सवारी का उपयोग उसमें नहीं होता था। उसके कई लाभ है। प्रथम है आरोग्य संवर्धन, पैदल यात्रा को रोगोपचार का असाधारण प्रयोग माना जा सकता है। बैठे रहने हाथ पैर विंध जाते हैं और नस-नाड़ियों का माँस पेशियों का उचित संचालन न होने से श्रम रहित व्यक्ति अपच एवं जकड़न के कारण उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों के शिकार बनते है। प्रातः टहलने की महत्ता सर्व विदित है। यदि शारीरिक, मानसिक रोगों की निवृत्ति के लिए एक क्रम बनाकर लम्बे समय तक पद यात्रा की जाये तो उसे एक उपयोगी चिकित्सा कोर्स कहा जा सकता है। यदि यात्रा अवधि में खानपान रहन आदि के भी कुछ ‘व्रत’ जुड़े रहते तो इसके कारण उस विधान की उपयोगिता किसी उच्चस्तरीय चिकित्सा पद्धति के कम नहीं रहती।
मानसिक स्वास्थ्य सुधार की दृष्टि से भी तीर्थों की उपयोगिता असाधारण थी। परिस्थिति में लिप्त व्यक्ति अपनी कठिनाइयों का वास्तविक स्वरूप समझ नहीं पाता। वास्तविक समीक्षा के लिए ऐसी मनःस्थिति चाहिए जो पक्ष-पात रहित हो-जो दूसरों की तरह अपनी समीक्षा भी कर सके जिसे अपने-पराये में से किसी के प्रति राग द्वेष न हो। न्यायाधीश इसी मन स्थिति में होते है तथा उनके लिए वस्तुस्थिति को ठीक तरह समझना और न्याय करना सम्भव होता है। पहाड़ की ऊँची चोटी पर चढ़ा हुआ व्यक्ति ही दूर-दूर तक की स्थिति को ठीक तरह से देख सकता है। जो नीची घाटी में खड़ा है उसके लिए तो समीपवर्ती घेरा ही सब कुछ है। तीर्थ में पहुँच कर सम्बद्ध लोग टूट हट जाते है। फलतः उनके प्रति राग द्वेष भी झीना हो जाता है। ऐसा मनोदशा अपने-पराये गुण-दोष समझने में समर्थ होती है समस्याओं का सही रूप समझा जा सके तो उनका आधा हल निकल आया समझा जा सकता है। सही निदान हो जाना आधी चिकित्सा है। इस प्रकार तीर्थ निवास के दिन प्रस्तुत समस्याओं का हल ढूंढ़ने में ही नहीं उज्ज्वल भविष्य के संदर्भ में उपयोगी रीति-नीति अपनाने में भी कार्य पद्धति निर्धारित करने में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।
वातावरण के प्रभाव से सभी परिचित है। कुछ प्रतिभाएँ तो ऐसी भी होती है, जो वातावरण को बनाती है। किन्तु जन साधारण की स्थिति यही होती है, कि वे वातावरण के प्रभाव में ढलते है। घर का, समाज का वातावरण सम्बद्ध व्यक्तियों को घसीट कर उसी ढर्रे पर ले आता है, जिसका प्रवाह वह रहा होता है। डिब्बे पटरी पर ही लुढ़कते है। आँधी अपने साथ अपनी दिशा में बहुत सा कूड़ा करकट उड़ा ले जाती है। वातावरण को भी सरिता प्रवाह एवं आँधी-तूफान के समतुल्य माना जा सकता है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह गाय के एक घाट पानी पीने जैसे उदाहरण आये दिन मिलते रहते है। सामान्य मनुष्य दर्पण की तरह होते है। उन पर समीपवर्ती प्रखरता जिस रंग की होती है वैसी ही दर्पण की छवि बन जाती है। सत्संग की महिमा से इतिहास पुराण भरे पड़े है। इससे यही सिद्ध होता है कि प्राणवान व्यक्तित्वों का अथवा प्रचलित ढर्रे का प्रभाव अत्यधिक प्रचण्ड होता है। उसकी समीपता से प्रभावित हुए बिना कोई विरला ही बच सकता है। आग की समीपता से गर्मी, बर्फ की समीपता से ठंडक मिलती है। दुर्गन्धित और सुगन्धित स्थान की अनुभूमि से सभी प्रभावित होते है। तीर्थों को प्रमुख विशेषता यह रहती थी कि प्राणवान प्रतिभाएँ अपने प्रभाव से आरण्यकों का वातावरण ऐसा बनाये रहती थी जिसमें कुछ समय रहने मात्र से किसी नये व्यक्ति को भी प्रभावित होना पड़ता था। जहाँ जिस प्रकार की प्रवृत्तियाँ प्रवाहित होती है वहाँ के निवासी उस रीति-नीति से प्रथा परम्परा से प्रभावित ही नहीं होते अनुकरण भी करने लगते है और क्रमशः अभ्यस्त भी हो जाते है। उच्चस्तरीय जीवन यापन के लिए जिस रीति-नीति को अपनाया जाना आवश्यक है उसे पढ़ने सुनने से भी अधिक प्रभावी ढंग से जीवन में उतारने के लिए उस प्रकार के वातावरण में रहना आवश्यक होता है। तीर्थ सेवन से जीवन संतुलन की दृष्टि से इस प्रकार के वातावरण की सहज उपलब्धि होती थी।
पाप बन पड़ने पर उनके प्रायश्चित के लिए अमुक तीर्थ तक पद यात्रा करते हुए जाना वहाँ अमुक अवधि तक निवास करना प्रायश्चित विधान पूरे करना भविष्य के लिए पवित्र रहने का व्रत लेकर लौटना आवश्यक समझा जाता था। पाप प्रायश्चित के लिए तीर्थ यात्रा के विधान का यही तात्पर्य था। घर में किसी प्रिय जन की मृत्यु हो जाने पर भी उसकी अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए पवित्र जलाशयों में तीर्थों में जाया जाता था। इस बहाने कुछ समय वे लोग वहाँ रहते थे। श्राद्ध तर्पण आदि करते थे। गरुड़-पुराण आदि की कथा सुनते थे। फलतः शोक संकुलन मन को शांति मिलती थी और चित्त पर पड़े हुए दबाव एवं छाये हुए असंतुलन से निवृत्ति पाकर हलके मन से लोग अपने घरों को वापिस लौटते थे। मृत्यु शोक की तरह अन्यान्य हानियाँ भी ऐसी होती है-जिनसे आघात लगता है। संतुलन गड़बड़ा जाता है। ऐसी स्थिति में आवेश ग्रस्त लोग कुछ भी भला बुरा कर गुजरते है। असंतुलनों का उपचार तीर्थ निवास से बढ़कर उन दिनों और कुछ था ही नहीं। उसमें न केवल परिस्थितियों बदलती थीं वरन प्रभावी वातावरण के कारण मनःस्थिति में भी परिवर्तन आ जाता था। अनर्थ से बचने के लिए इसे एक सुयोग ही समझा जाता था और खिन्न उद्विग्न मनुष्य शांति दायक वातावरण में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए तीर्थों के लिए दौड़े जाते थे।
न केवल विग्रहों की निवृत्ति के लिए वरन् भविष्य निर्धारण के लिए अनुभव दूरदर्शी लोगों से प्रकाश परामर्श प्राप्त करने के लिए भी तीर्थ यात्रा की जाती थी। सभी जानते है कि घर पड़ौस के आत्मीय चिकित्सकों के द्वारा रोगों का उपचार कराने की तुलना में बड़े चिकित्सक अस्पतालों में नियुक्त विशेषज्ञों की सलाह लेना उनके संरक्षण में रहकर चिकित्सा कराना अधिक लाभदायक होता है। यों सत्परामर्श कहीं भी प्राप्त किये जा सकते है। सर्वत्र संव्याप्त दुर्बुद्धि से भी तथा कथित मूर्धन्य लोग भी कम ग्रसित नहीं है। फिर भी ढूंढ़ने पर सत्परामर्श दाता भी मिल जाते है उनकी सलाह से भी समस्याओं के समाधान एवं भविष्य निर्धारण में कुछ तो कम चल ही जाता है किन्तु यदि दूर दर्शी-दिव्य दर्शी महामनीषियों का अधिक महत्व पूर्ण मार्ग दर्शन प्राप्त करना होता था तो लोग तीर्थ यात्रा की तैयारी करने थे और वहाँ आरण्यकों में निवास करने वाले तत्व दर्शी मनीषियों से ऐसे परामर्श प्राप्त करते थे जो हित साधन की दृष्टि से आरोग्य कहे जा सकें।
कई बार ऐसी विषम परिस्थितियाँ सामने होती है जिनके लिए मात्र परामर्श से भी कम नहीं चलता। निपटने के लिए समर्थों की सहायता आवश्यक होती है। कई बार आगे बढ़ने के लिए ऐसे आत्मबल की जरूरत पड़ती है जो गाड़ी में पैट्रोल पड़ने जैसा उदाहरण प्रस्तुत कर सके। व्यवसाय में पूँजी और अनुभव दोनों की जरूरत होती है। जिनके पास यह नहीं होते कहीं से उपलब्ध करके अपना काम चलाते है। तपस्वी मनीषी आत्मबल के निर्झर होते थे। उनसे अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उच्चस्तरीय सहायता बिना कठिनाई के मिल जाती थी। आशीर्वाद-वरदान- ऐसा ही अनुदानों का नाम है, तपस्वी-मनीषियों द्वारा अपनी तप सम्पदा निचोड़ कर दी जाय तो वे कारगर ही सिद्ध होती है। इस प्रकार के अनुदान प्राप्त करने के लिए भी इन दिनों तीर्थों में अवस्थित प्राणवान प्रतिभाओं का आश्रय तका जाता था और जो इन कल्प वृक्षों के पास पहुँचते थे खाली हाथ वापिस सही लौटते थे।
तीर्थों की स्थापना और वहाँ पहुँचने की प्रेरणा देने वाले शास्त्रकारों के मस्तिष्क में इन्हें इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न रखने की योजना थी। ऐसे उच्चस्तरीय अध्यात्म अस्पताल बनाने की दृष्टि से यह सरंजाम जुटाया गया था कि वहाँ पहुँचकर सर्वसाधारण को न केवल शारीरिक, मानसिक अधि-व्याधियों से आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा मिले वरन् उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में भी उपयोगी प्रकाश परामर्श एवं अनुदान उपलब्ध हो सके। तीर्थों के निर्माण में ऋषियों ने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया, साधन-सम्पन्नों को उनके निर्माण में धन लगाने की प्रेरणा दी जन-साधारण को पुण्य प्रलोभन देकर वहाँ पहुँचने के लिए उकसाया। यह सब न तो निरर्थक था और न किसी षड्यंत्र अंग इस स्थापना के पीछे विशुद्ध जन-कल्याण को लोक निर्माण की भावना थी जो तब तक पूर्ण तया सफल ही होती रही जब तक कि तीर्थों का स्वरूप अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त बना रहा।
आज प्राण निकल गया। उद्देश्य पिछड़ मात्र लकीर पिटती है। निष्प्राण कलेवर पर पुष्प हार चढ़ते है। प्रज्ञावानों का मृत शरीर भी कोई प्रयोजन पूरा कर सकने में समर्थ नहीं रहता, महा मनीषियों ने जिस लक्ष्य को सामने रख कर तीर्थ परम्परा की स्थापना की थी, उस लक्ष्य की पूर्ति के प्रायः सभी साधन समाप्त हुए दीखते है। उसके स्थान पर धर्म श्रद्धा के दोहन का प्रपंच चल पड़ा है। वस्तुतः स्थिति के अनुरूप विचारशील वर्ग में जो अश्रद्धा उत्पन्न हो रही है उसे देखते हुए लगता है पेड़ की जड़ खोखली हो जाने से उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है उसी प्रकार तीर्थ की महान परम्परा भी अपनी गरिमा समाप्त करने जा रही है। जो चल रही है उसी को चलने देकर इस पुण्य प्रचलन को अपनी मौत मरने दिया जाय या उसमें पुनः नव-जीवन के संचार का प्रयत्न किया जाय आज हर धर्म प्रेमी के सामने यह उज्ज्वल प्रश्न समुचित उत्तर पाने के लिए सामने खड़ा है।
तीर्थ यात्रा किस प्रकार की जाय, इसका अशास्त्रीय प्रतिपादन यह है कि उसे पद यात्रा के रूप में सम्पन्न किया जाना चाहिए। वाहनों का उपयोग निषिद्ध है। अभी तो तीर्थ यात्रा की इस प्राचीन परम्परा का स्वरूप अनेक स्थानों पर अनेक प्रसंगों पर देखने को मिलता है। गोवर्धन गिरनार पर अनेक प्रसंगों पर देखने को मिलता है। गोवर्धन गिरनार आदि पर्वतों की-ब्रजधाम, प्रयाग पंचकोशी आदि क्षेत्रों की-नर्मदा आदि नदियों की परिक्रमा होती है। इन्हें पैदल ही किया जाता है। शिवरात्रि के अवसर पर शिव प्रतिमाओं पर गंगा जल चढ़ाने के लिए अभी भी कन्धे पर ‘काँवर’ रखकर तीर्थ यात्रा की जाती है। श्रवण कुमार ने गंगाजल के स्थान पर अपने अन्धे माता-पिता को काँवर में बिठा कर तीर्थ यात्रा की थी। जो लोग दूर नहीं जा सकते, समीप ही तीर्थ यात्रा का पुण्य लेना चाहते है वे विशिष्ट पर्वों पर पीपल, बरगद, आँवला, तुलसी आदि की अमुक संख्या में परिक्रमा कर लेते है। देवालयों की प्रदक्षिणा की जाती है। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय चार परिक्रमाएँ करने का विधान है। इन प्रचलनों के पीछे उस आदि परम्परा की झाँकी की जा सकती है जिसमें तीर्थों की स्थापना के साथ दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए पदयात्रा जैसी कुछ नियम मर्यादाओं का समावेश किया गया था।
योग साधनाओं में, तपश्चर्याओं में, धर्मानुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान तीर्थयात्रा का भी है। यह इसलिए कि विचाराधीन धर्मज्ञ जन-जन धर्म धारणा जागृत रखने के लिए गाँव-गाँव पहुँचते घर-घर जाते और अलख जगाते वर्ग के लोग अपनी निर्वाह समस्याओं में ही उलझें रहते है उन्हें धर्म, दर्शन अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय अनुभूतियों के साथ संपर्क मिलाने की इच्छा ही नहीं होती। इच्छा हो तो अवसर नहीं मिलता। नगरों से दूर छोटे देहातों में प्रायः हर तरह के साधनों का अभाव रहता है। ऐसी दशा में उनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति इस योग्य नहीं रहती कि वे जीवन लक्ष्य को समझने और उसे उपलब्ध करने के लिए उपयुक्त प्रकाश प्राप्त कर सकें। बड़े नगरों में सम्पन्न लोगों के पास ज्ञानवान और विद्वान भी आसानी से पहुँचते रहते हैं, सुविधा साधन हर किसी का अपने निकट खींच बुलाते है। कथा प्रवचनों और सत्संगों की वहाँ कमी नहीं रहती। लाभ उठाना न उठाना इच्छा पर निर्भर है, पर वहाँ ज्ञान का आलोक पहुँचने में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं है। देहातों की स्थिति ऐसी नहीं है। वहाँ छाया हुआ आर्थिक एवं बौद्धिक पिछड़ापन न तो धर्म जिज्ञासा के प्रति उत्साह उत्पन्न होने देता है और न साधनों के अभाव में परिस्थितियों के दबाव से कहीं दूर स्थान पर जाकर धर्म प्रवीणों के साथ संपर्क साधने का अवसर ही मिल पाता है। वे अन्यत्र जा नहीं सकते; उनके पास कोई पहुँचता नहीं। ऐसी दशा में पिछड़े क्षेत्र धर्म चेतना से लाभान्वित होने का सौभाग्य प्रायः प्राप्त ही नहीं कर पाते।
धर्म प्रचारकों को भी ऐसे क्षेत्रों में पहुँचने में उत्साह नहीं होता। दक्षिणा, सुविधा, सम्मान का अभाव यातायात साधनों की असुविधा उन्हें उन क्षेत्रों जाने से निरुत्साहित करती है। जब साधन सम्पन्न क्षेत्रों में ही उनकी बहुत माँग है और उन्हीं से फुरसत नहीं मिलती तो फिर पिछड़े क्षेत्रों में अनेकानेक असुविधाओं का सामना करने के लिए क्यों जाया जाय? यही व्यवधान है जो पिछड़ेपन को प्रगतिशीलता में परिवर्तित करने वाले प्राणवान सत्संग संपर्क का सुयोग नहीं बनने देते और एक बहुत बड़े वर्ग के पिछड़ेपन की समस्या जहाँ की तहाँ उलझी रह जाती है। बड़ा वर्ग पिछड़े लोगों का है-जनसंख्या की दृष्टि से भारत में तीन चौथाई के लगभग है। उन तक प्रकाश कैसे पहुँचे? उनमें उत्कृष्टा का आलोक कौन जगाये? बिना उत्थान प्रयासों के कुसंस्कारों निष्कृष्टता कैसे घटे? उत्थान का सम्बल कहाँ से मिले? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही निकाला गया-तीर्थ यात्रा का प्रचलन।
व्यक्तिगत स्तर की साधनाओं में ही रुचि सनकों को भी रहती है। व्यक्तिगत संपर्क की ललक ही कुछ ऊँचे क्षेत्र में चलकर निजी सिद्धियों के रूप में अपना मुखौटा बदल लेती है। स्वर्ग और मुक्ति को स्वार्थपरता का थोड़ा ऊँचा स्तर कह सकते है। सेठ और सन्त की प्रवृत्ति प्रायः एक ही दिशा में बहती देखी जा सकती है। आत्म साधन का यह स्वरूप न तो वास्तविक है और न उच्चस्तरीय। जिसमें परमार्थ सम्मिलित न हो उसमें अन्तःकरण के विकास विस्तार की सम्भावना भी नहीं है। करुणा के बिना कोई सन्त नहीं हो सकता। उदारता अपनाये बिना आत्म विस्तार का आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इन तथ्यों को ध्यान में रख कर ऋषियों ने तीर्थ यात्रा को ऐसी आत्मा साधना के रूप में विकसित किया जिसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों का समान समन्वय है।
धर्म परायण व्यक्ति छोटी बड़ी मण्डलियाँ बनाकर तीर्थ यात्रा के लिए निकलते थे। कहाँ से चल कर, किस मार्ग से, किन-किन स्थानों पर ठहरते हुए कब तक वापस लौटेंगे; इसकी रूप रेखा प्रत्येक मण्डली अपनी-अपनी पृथक-पृथक बनाती थी। मार्ग में जो गाँव झोंपड़े नगले पुरबे मिलते थे उनमें रुकते, ठहरते किसी उपयुक्त स्थान पर रात्रि विश्राम करते थे। यही क्रम निरन्तर चलता था। दिन में जहाँ रुकना वहाँ धर्म चर्चा करना-लोगों को कथा सुनाना और उन्हें उपयुक्त मार्ग-दर्शन देना यह क्रम प्रातः से सायंकाल तक चलता था। रात्रि में जहाँ रुकते वहाँ कथा कीर्तन का-शंका समाधान का सत्संग क्रम बनता था। यही क्रम पद्धति पूरी यात्रा अवधि में बनी रहती थी। काय चिकित्सा, मानसिक समाधान, उपयोगी परामर्श, समर्थ शुभ कामना जैसे अनेकों लाभ इस सन्त मण्डली के संपर्क से जन साधारण की मिलते थे। इन मण्डलियों के स्तर एवं क्रिया कलाप से जन-जन के मन-मन में अपार श्रद्धा उमड़ती थी। अस्तु वे उनके प्रति न केवल भावभरा सम्मान व्यक्त करते थे वरन् उनके लिए आवश्यकता सुविधा जुटाने में पूरा-पूरा सहयोग भी करते थे।
अतिथि को भारतीय संस्कृति में देव की संज्ञा दी गई है और उसका सत्कार करने की बात गृहस्थ धर्म में अविछिन्न रूप से सम्मिलित की गई है। मातृ देवो भव-पितृ देवोभव-आचार्य देवोभव की ही तरह ‘अतिथि देवोभव’ को भी मान्यता दी गई है। माता-पिता गुरु की तरह ही अतिथि को भी देव मानने और उसका सम्मान सत्कार करने का अनुशासन है।
अतिथि दो माने गये हैं- (1) तीर्थयात्री (2) अपंग अपंगों पर करुणा की जाती है और उदार सहृदयता की अभिव्यक्ति के लिए उनके निर्वाह की व्यवस्था की जाती है। तीर्थ यात्री का सत्कार उनकी गरिमा के प्रति नत मस्तक होकर श्रद्धा सहित अर्पण किया जाता है। तीर्थ यात्री जहाँ से गुजरते थे, जहाँ भी ठहरते थे वहाँ व्यक्ति अतिथि सत्कार के रूप में अपनी शालीनता का परिचय देते थे। विदेशी भारत यात्रियों ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि “भारत में दूध की नदियाँ बहती है।” इसका तात्पर्य यह था कि वे जहाँ भी गये वहाँ उन्हें दूध आदि से परिपूर्ण सत्कार मिला। उन दिनों अपंग तो थोड़े से ही थे जिनकी व्यवस्था परिवार पड़ोस में ही हो जाती थी। कदाचित ही उनमें से किसी को दूसरों के दरवाजे पर जाना पड़ता था। वास्तविक अतिथि तो तीर्थ यात्री ही होते थे। उनका सहयोग करना ही अतिथि सत्कार का वास्तविक स्वरूप था। इन दिनों तो निठल्ले लोग, अपने स्वार्थ प्रयोजनों के लिए कहीं जाते हैं और किसी परिचित सम्बन्धी से कई तरह की सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए जा धमकते है। ऐसे लोगों को अतिथि नहीं कहा जा सकता। दोस्त, मेहमान आदि की उन्हें माना जा सकता है और उनका सहयोग लोकाचार कहाँ जा सकता है। पुण्य-प्रयोजनों में जहाँ अतिथि सत्कार की चर्चा होती है वहाँ तीर्थ यात्री समुदाय की सुव्यवस्था बनाने और उनकी गतिविधियों में अड़चन न आने देने के नागरिक कर्तव्य का ही संकेत है।
तीर्थयात्री के लिए उसका धर्म प्रचार, पदयात्रा एक उच्चस्तरीय तप साधना प्रक्रिया थी जहाँ वे रुकते थे उनके लिए सौभाग्य सुअवसर जैसी दैवी अनुकम्पा। इसी भावनात्मक तालमेल के कारण तीर्थयात्रा प्रक्रिया का धर्म प्रवाह सर्वत्र बहता था और उससे नदी सरोवरों से भी अधिक मात्रा में जन-जन को लाभान्वित होने क अवसर मिलता था।
तीर्थ यात्रियों को अतिथि मानने और उनके सत्कार का प्रबन्ध करने की व्यवस्था को भारतीय जन-जीवन का अंग माना गया था। इसके लिए हर व्यक्ति अपना कुछ अंशदान नित्य नियमित रूप से निकालता था। एक परम्परा यह भी थी कि अपने भोजन से पूर्व अतिथि को भोजन कराया जाय। यदि वे उस दिन उपलब्ध न होते थे तो उसे निमित्त निकाला हुआ अन्न सुरक्षित रख लिया जाता था और आवश्यकतानुसार उसे उसी प्रयोजन में लगा दिया जाता था, दैनिक बलिवैश्व-यज्ञ में एक आहुति अतिथि देव की भी है, कुछ अन्न नित्य उस प्रयोजन के लिए हर परिवार में निकाला जाता था। इससे पता चलता है कि उन दिनों अतिथि-तीर्थ यात्री कितने अधिक गौरवान्वित होते थे और उनकी उपयोगिता, आवश्यकता किस कदर समझी जाती थी। यह महत्व अकारण नहीं मिला था। तीर्थयात्री कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाकर धर्म चेतना उत्पन्न करने के लिए जो उदारता बरतते और तितीक्षा सहते थे उसी के फलस्वरूप वे अपने देव प्रयोजन में संलग्न रहने के बदले देव स्तर का आत्मसंतोष एवं लोक सम्मान प्राप्त करते थे।
प्राचीन काल में अनेकानेक मन्दिर मठ, एवं धर्मशाला बनाने को बहुत बड़ा पुण्य फल माना जाता था। उनका खर्च चलाने के लिए स्थायी सम्पत्ति की व्यवस्था की जाती थी। भेंट-पूजा, चढ़ोतरी आदि के माध्यम से जनसाधारण द्वारा उनकी समृद्धि बढ़ाने में योगदान दिया जाता था। यह धन प्रायः तीर्थयात्रा को निकले धर्म प्रचार जत्थों की व्यवस्था पर ही खर्च किया जाता था। धर्मशाला बनाने का उद्देश्य था, धर्म प्रचार जत्थों के ठहरने के लिए उपयुक्त डाक-बंगले। कुछ समय विश्राम करने-अगली यात्रा के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध करने की सुविधा तीर्थ यात्रियों को इन्हीं मठों से धर्मशालाओं से मिल जाती थी। वस्त्र, जूते, पात्र, साबुन, औषधि आदि दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ अगली यात्रा के लिए वहीं से उपलब्ध कर लेते थं। धर्मचर्चा के लिए अनेक व्यक्ति इन चलते-फिरते ज्ञान भांडागारों से भेंट करने के लिए जिन स्थानों पर पहुँचते थे उन्हें धर्मशाला कहा जाता था। धर्म प्रयोजनों के लिए बनी हुई इन शालाओं के बनाने वाले इसलिए पुण्य के भागीय बनते थे कि उनके धन से बनी हुई शाला-इमारत’?-सच्चे अर्थों में धर्म प्रयोजन की पूर्ति कर रही है। मठों में लगी हुई मन्दिरों में देव प्रतिमाओं पर चढ़ी हुई सम्पत्ति का एक ही उपयोग था। तीर्थयात्रा के नाम से उत्पन्न की जाने वाली धर्म चेतना के लिए सरलता उत्पन्न करना। निरन्तर तीर्थ यात्रा के लिए परिभ्रमण वाले धर्म प्रचारक परिव्राजक कहलाते थे। उनमें वानप्रस्थ वर्ग का बाहुल्य रहता था।
जिन दिनों यह पुण्य परम्परा अपने असली रूप में क्रियान्वित होती होगी, उन दिनों कितना सुखद सुअवसर मिलता होगा जन-जन का इसी कल्पना मात्र से हृदय हुलसने लगता है। निरन्तर धर्म चेतना उत्पन्न करने के पवित्र प्रयोजन में संलग्न परिव्राजक एक प्रकार से चलते-फिरते जीवन्त तीर्थ ही रहे होंगे। उनकी तपः पूत ज्ञान सरिता में स्थान करके न जोन कितने पवित्र होते है- कितनों को भाव-सागर से पार होने का नित्य ही अवसर मिलता होगा। ऐसी दशा में यदि यह देश किसी समय धर्म प्राण कहलाता रहा हो, यहाँ के नागरिक देवोपम जीवन जीते रहे हो-अपने संपर्क क्षेत्र को सुख-शांति की प्रगति और समृद्धि की स्वर्गीय परिस्थितियों से भरापूरा रखे रहे हों तो आश्चर्य ही क्या है। तेतीस कोटि देव नागरिकों की-स्वर्गादपि गरीयसी यह भारत भूमि स्वयं गौरवान्वित रही और समस्त भूमण्डल को अपने अनुदानों से कृत-कृत्य बनाया, इसका परिचय उन विश्लेषणों से सहज ही लग जाता है जो संसार भर में इस वेश के लिए प्रयुक्त होते थे। जगद् गुरु चक्रवर्ती, नर-रत्नों के भाण्डागार इस देश को धरती का स्वर्ग कहा जाता था। इस स्थिति तक अपने देश को पहुँचाने में तीर्थ यात्रा का, उसमें संलग्न परिव्राजक मण्डलियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है यह निश्चित है।
पानी की आवश्यकता खेतों को रहती है, वे बादलों तक याचना के लिए जा नहीं सकते। ऐसा साधना भी नहीं है कि मेघमाला को आमंत्रित करने एवं बुला सकने में सफल हो सके। बादल ही अपनी सहज करुणा से अपने पैरों चलकर-अपने कन्धों पर जल राशि लाद कर खेतों तक पहुँचते है और आवश्यकता से अधिक जल देकर उन्हें तृप्त करते है। संसार में छाये हुए शीत को निवारण करने के लिए धरती सूर्य के समीप नहीं पहुँच सकती। सूर्य ही उसकी आवश्यकता समझकर स्वयं उस पर अपना तेजस बखेरते है। रात्रि के अन्धकार की व्यापकता कैसे मिटे? चन्द्रमा के निकट चाँदनी माँगने निशा कैसे पहुँचे। चन्द्रमा स्वयं ही परिभ्रमण करते हुए रात्रि की तमिस्रा को घटाते हैं। उनके पास अपना प्रकाश नहीं तो भी वे सूर्य से माँग कर लाते हैं और रात्रि की कुरूपता मिटाते हैं। प्राणियों का जीवन प्राणवायु पर निर्भर है। उस बहुमूल्य पदार्थ को कौन, कहाँ से, कैसे खरीदे। पवन स्वयं ही प्राण वायु अपने ऊपर लाद कर-हर जीवधारी के पास पहुँचता है और उसे जीवन सम्पदा प्रदान करता है। यदि कह उदारता संसार में न रहे। हर कोई बदला ही चाहे, बिना स्वार्थ के कोई किसी के काम न आये तो समझना चाहिए कि यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ न होगा। यहाँ जो कुछ सौंदर्य-सुषमा का दर्शन होता है उसके पीछे शालीनता ही काम करती है। इसी शालीनता का जब धर्म क्षेत्र में प्रयोग होता है उसे तीर्थ यात्रा जैसी पुण्य-प्रक्रिया में प्रयुक्त होते देखा जाता है।
भूकम्प, बाढ़, दुर्भिक्ष, अग्नि काण्ड, तूफान आदि दुर्घटनाओं से पीड़ित व्यक्ति तात्कालिक सहायता के लिए साधना सम्पन्नों का दरवाजा खटखटाते हुए पहुँचने की स्थिति में नहीं होते। उदार, व्यक्तियों को ही अपनी सहज करुणा से प्रेरित होकर उन पीड़ितों की सहायता करने पहुँचना पड़ता है और अपने श्रम, सौहार्द्र एवं साधनों की सहायता से उन्हें ही आगे बढ़कर पीड़ितों का कष्ट हलका करना पड़ता है। तीर्थ यात्रा को ठीक इसी स्तर की परम्परा कहा जा सकता है जिसमें जन-जन तक घर-घर तक पहुँचने का प्रयत्न सद्भावना सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा जब तब नहीं वरन् सुनियोजित रीति से किया जाता है।
तीर्थ स्थानों का महत्व इसलिए है कि वे तीर्थ यात्रा परम्परा को गतिशील रखने में उपयोगी आधार हैं। तीर्थ न हो तो तीर्थयात्रियों को सुनियोजित कार्यक्रम बनाने में भारी असुविधा हो धर्म प्रचारकों का प्रकाश अनुदान प्राप्त करना होता है। उन महत्वपूर्ण अनुदानों को वे तीर्थ संचालक ऋषियों से प्राप्त करते है। उन ऋषियों के आरण्यक तीर्थों में चलते हैं। आरण्यकों को एक प्रकार के अध्यात्म विद्यालय ही समझा जा सकता है। वहाँ स्थायी साधकों और समय-समय पर आने वाले आगंतुकों के लिए उभय पक्षीय शिक्षण व्यवस्था का सुयोग रहता था। तीर्थों में सामान्य यात्री-नागरिक तो पहुँचते ही थे। धर्म प्रचारक मण्डलियों को भी वहाँ से बहुत कुछ मिलता था। तीर्थ आरण्यकों में आवश्यक शिक्षण परामर्श, विश्राम एवं साधनों का लाभ उन्हें मिलता था। इस प्रकार व अपनी थकान मिटाने नवीन स्फूर्ति पाने और आत्म-कल्याण लोक कल्याण की उस समन्वित साधना में निरत रहते थे।
बड़े तीर्थ बड़े केन्द्र थे-उन्हें राजधानियाँ कह सकते है। छोटे तीर्थ जिले तहसील आदि की भूमिका निभाते थे। उनके कार्यक्षेत्र बँटे हुए थे। इन क्षेत्रों को मण्डल कहते थे और मण्डलों में धर्म चेतना बनाये रहने बढ़ाते चलने का उत्तरादयित्व सम्भालने वाले मंडलेश्वर या मंडलाधीश। इनके केन्द्र संस्थान तीर्थों के नाम से जाने जाते थे। इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से देश भर में विश्व भर में धर्म चेतना सुव्यवस्थित रखने का महान कार्य सम्पादित होता था। इस सूझ-बूझ और सुव्यवस्था को देखते हुए तीर्थ स्थापना करने वाले महान तत्वज्ञानियों की दूरदर्शिता के सम्मुख ही श्रद्धा से प्रत्येक विचार शील का मस्तक झुक जाता है।
प्रतीत यह होता है कि पदार्थों का महत्व सर्वोपरि है। जिसके पास जितने साधन हैं वह उतना ही सुखी और समर्थ है। इस प्रकार यह भी समझा जाता है कि परिस्थितियाँ जिसके अनुकूल हैं वह प्रसन्न रहता है और प्रगति करता है। जन मान्यता यही है; पर गइराई में उतरने पर कुछ और ही तथ्य सामने आते हैं। मूल वस्तु, साधन और परिस्थितियों का समन्वय-वैभव नहीं मनुष्य का व्यक्तित्व है। व्यक्तित्व, चिन्तन और चरित्र से मिल कर बनता है। आस्थाओं में आदर्शवादी मान्यताओं का जितना गहरा समावेश होगा इच्छाएँ, विचारणाएँ, क्रियाएँ उसी स्तर की बन पड़ेगी। बहुत समय तक जिस दिशा धारा में बहते रहा जाय वही आदत बन जाती है और स्वभाव के रूप में प्रकट होती है। व्यक्तित्व इसी परिकर का नाम है। व्यक्तित्व में चुम्बकत्व होता है। वह अपने अनुरूप मनुष्यों, साधनों एवं परिस्थितियों को खींचता और जमा करता जाता है। यह संचय वैभव-वर्चस्व आदि के रूप में दृष्टि गोचर होता है।
व्यक्तित्व ही मनुष्य के सुख-दुख का, उत्थान-पतन का, सहयोग-विरोध का आधार भूत कारण है। बाहर से थोपा हुआ वैभव या तो ठहरता ही नहीं, ठहरता है तो दुर्बुद्धि उसका दुरुपयोग करके उलटे विपत्ति ही उत्पन्न करती है। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व अपनी विशेषताओं के कारण गई गुजरी परिस्थितियों में रहते हुए भी आन्तरिक क्षमता के बल-बूते चट्टानों की दरारों में उगने वाले वृक्षों की तरह ऊँचे उठते है। निर्झरों की तरह मार्ग के अवरोधों को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं।
व्यक्तित्व का समूह ही समाज है। समाज का ही बड़ा रूप राष्ट्र एवं विश्व है। व्यक्तियों के घटक मिल कर ही समाज या राष्ट्र की रचना करते है। यह घटक जिस स्तर के होंगे उनका समूह भी उसी स्तर का बन जायगा। समाज में फैली हुई अवांछनियताएं एवं अव्यवस्थाएं वस्तुतः उन घटनाओं की ही क्षुद्रता की-निष्कृष्टता की परिणिति होती है। समाज में असंख्यों अव्यवस्थाओं से, राष्ट्र और निर्गुण होते हुए भी सब ओर से हाथ पैर वाला तथा सब ओर से नेत्र, सिर और मुख वाला है। वस्तुतः ब्रह्म का या चेतना का, कोई स्थूल स्वरूप आँखों से नहीं देखा जा सकता फिर भी ऐसी कोई घटना नहीं होती जिससे चेतना को अनभिज्ञ रखा जा सके अथवा किसी घटना क्रम में उसके अस्तित्व को, कारण को अस्वीकारा जा सके।जो विभु में है वही अणु में भी है, जो ब्रह्मांड को अगणित समस्याओं से, व्यक्ति को अनेकों विपत्तियों से घिरा हुआ देखकर यों उनके अलग अलग कारण खोजे और उपाय सोचे जा सकते है; पर यह सब होता उथला ही है। मूलतः व्यक्तित्वों में घुसी हुई निकृष्टता ही इन सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति की दुखद प्रतिक्रिया प्रकट कर रही होती है। समाधान और सुधार के अनेकों उपाय सोचे और प्रयास किये जा सकते है। आर्थिक अभावों को दोष दिया जा सकता है। समाज, धर्म, शासन, दैव आदि में से किसी को अथवा इन सबको विपत्तियों का कारण ठहराया जा सकता है। यह उथली समीक्षायें है। वास्तविक एक ही है कि व्यक्तित्व में घटियापन का घुसा होना ही समस्त विपत्तियों का एक मात्र कारण है। सुधार की परिवर्तन की, इच्छा हो तो हेर-फेर के लिए इसी केन्द्र पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
इन तथ्यों को गंभीरतापूर्वक समझने वाले तत्व दर्शियों ने मानवी प्रगति और समृद्धि की समस्या को ध्यान में रखते हुए आधार भूत उपाय यह सोचा कि जनमानस को परिष्कृत करने की दूर गामी योजना एवं सुव्यवस्थित अवधारणा विनिर्मित विकसित की जाय। धर्म-धारण के विशाल काय कलेवर के मूल में यही तथ्य, अभिप्रेत हैं। पशु प्रवृत्तियों को मानवी संस्कृति में परिणित करने के लिए ही व्यक्ति के स्तर से ताल-मेल रखने वाले धर्मोपचारों का निर्धारण किया गया है। ऋषियों की शास्त्रकारों की सारी सूझ-बूझ उसी प्रयोजन में संलग्न रही है उनने जिन प्रथा प्रचलनों का, धर्मानुष्ठानों का, दार्शनिक निर्धारणों का निर्माण, प्रचलन किया उनमें इसी मूल उद्देश्य को समाहित रखा कि व्यक्ति का अन्तरंग उच्चस्तरीय बने, उसकी आस्थाओं का स्तर ऊँचा उठे। संक्षेप में इसी प्रयास को धर्म प्रतिपादनों के विभिन्न रूपों में समाविष्ट देखा जा सकता है।
कहना न होगा कि धर्म धारणा को विकसित करने में शास्त्र-संरचना और दार्शनिक-स्थापनाओं का बड़ा महत्व है; पर उस महत्व की सार्थकता तब बनती है, जब जन-जन को उससे अवगत एवं प्रभावित किया जाय। इतना ही नहीं स्थिति यहाँ तक पहुँचाई जाय कि आदर्शवादी आस्थाओं को अपनाने और व्यवहार में उतारने के लिए भी मनुष्य को सहमत-समुद्यत किया जा सके। इसके निमित्त किये जाने वाले उपायों को धर्मों-प्रचार कहा जाता है। धर्म धारण की स्थापना और धर्मोपचार को उसका क्रिया पक्ष कह सकते है। दोनों के समन्वय को ही परिपूर्ण धर्म पक्ष कह सकते है। दोनों के समन्वय को ही पूर्ण धर्म प्रक्रिया समझा जा सकता है।
धर्म को मानव जीवन का अंग बनाने के लिए उसकी आस्थाओं और आदतों को समुन्नत-सुसंस्कृत बनाने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए एक सीमा तक तो शास्त्र के, साहित्य के माध्यम से भी कार्य हो सकता है; पर अधिक प्रभावी और पूरक उपाय यही है कि उत्कृष्टता सम्पन्न महा मानवों का प्रभाव में जड़ी हुई महानता जन-जन को प्रभावित करे। उठे हुए ही उठाने में समर्थ होते है। इसलिए तपःपूत प्रतिभाओं को जन संपर्क का अधिकाधिक अवसर मिले इसके लिए धर्म-चेतना के निर्धारण कर्ताओं ने पूरा-पूरा ध्यान रखा और स्थान दिया है। कथा प्रवचनों की सत्संग, सान्निध्य की प्रक्रिया इसी निमित्त चलती है। सामूहिक धर्मानुष्ठान में धर्मोपदेशों को अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रखा जाता है। द्रव्य-यज्ञ का ज्ञान-यज्ञ अविच्छिन्न अंग है। पर्व संस्कारों के अवसर पर ज्ञान गोष्ठियां होती है और पुरोहित उस अवसर पर किये जाने वाले कुकृत्यों की व्याख्या विवेचना करके उपस्थित लोगों में स्थिति के साथ संगति मिलाते हुए शालीनता अपनाने की प्रेरणा भरते है। धर्म कुकृत्यों को शरीर और धर्म-प्रेरणा को प्राण माना गया है। दोनों के समन्वय से ही धर्मोपचारों का उद्देश्य पूरा होता है। इस तथ्य को आरम्भ से ही समझा जाता रहा है और मनुष्य को आस्थावान बनाने के लिए मनीषियों द्वारा प्रबल प्रयत्न किया जाता रहा है।
इन प्रयत्नों में अत्यधिक महत्व पूर्ण धर्मचर्यातीर्थ है। तीर्थ स्थापना के दोनों ही प्रयोजन सर्वविदित है एक यह कि समय-समय पर अपनी सुविधानुसार व्यक्ति आये और उसे उपयुक्त वातावरण में आरण्यकों के तत्वावधान में तीर्थ वास करके सीमित काया-कल्प का लाभ उठायें। इस कार्य में तीर्थ संचालक-ऋषि इन आगंतुकों की भाव भरी सेवा सहायता करते थे। अपने स्नेह सौजन्य, अतिथि सत्कार एवं भाव भरे परामर्शों से तीर्थ यात्री को निहाल कर देने वाले व्यक्तित्व ही जीवन्त तीर्थ कहलाते थे। प्राकृतिक सौंदर्य के नदी-सरोवर, उत्साह भरने वाले देवालय भी तीर्थ-बास के लाभ में चार चाँद लगाते और सोने में सुगन्ध उत्पन्न करते थे। इतने पर भी मूल केन्द्र तीर्थों के ऋषि आश्रम आरण्यक ही होते थे। उनमें प्राप्त होने वाली प्रेरणा तथा वहाँ रह कर की जाने वाली साधना ही आगंतुकों को पुण्य फल प्रदान करती थी जिसकी संगति तीर्थ माहात्म्य के साथ पूरी तरह बैठ जाती है।
तीर्थ तंत्र के संचालकों की गति विधियाँ तीन भागों में विभक्त थीं।
(1) तीर्थ बास के लिए आने वाले धर्म प्रेमियों के लिए साधना एवं शिक्षण की समुचित व्यवस्था। इस क्रमबद्ध साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते है।
(2) तीर्थ के समीप वर्ती क्षेत्र को एक मण्डल बना कर उसमें पुरोहितों का परिभ्रमण करना और उस परिधि में नियंत्रित रूप से धर्म चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तर दायित्व संभालना। इन धर्म मंडलों की सुव्यवस्था बनाये रहने वाले मंडलाधीश या मंडलेश्वर कहलाते थे। इन मंडलों के केन्द्रीय स्थानों को मठ कहा जाता था।
(3) उस समय पर उन तीर्थों में स्वल्प काल के लिए दूर-दूर से जन समुदाय को आसीन होने की प्रेरणा देना। यह कार्य पर्व स्नान के रूप में होता था। यह एक प्रकार से धर्म सम्मेलन थे। अभी भी संस्थाएँ अपने वार्षिकोत्सव मनाती और सामयिक आयोजन करती है। इनका उद्देश्य बड़ी संख्या में जनता को एकत्रित करके उनमें अभीष्ट प्रेरणाएँ भरना होता है। पर्वों पर तीर्थ स्थान का विशेष महत्व इसी दृष्टि से बताया गया था कि धर्म प्रेमियों का बड़ा समुदाय एक ही समय एकत्रित होकर ऋषियों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली सामयिक प्रेरणाओं को ग्रहण करें और अपने-अपने स्थानों पर जाकर उस चेतना का विस्तार करें।
तीर्थों, दर्शनों के लिए यों तो धर्म प्रेमी सदा ही जाते रहते हैं; पर विशेष पुण्य फल पर्व स्थान का माना जाता है। इसका कारण ऊपर की पंक्तियों में स्पष्ट है। पर्व, अनायास ही धर्म सम्मेलनों का प्रयोजन, पूरा करते थे। जन चेतना का उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर होने का इन आयोजनों से विशेष उद्देश्य पूरा होता था।
कभी-कभी धर्म-सेवियों का, ऋषि-तपस्वियों का भी मिलन सम्मेलन होता था; ताकि वे मिल जुल कर सामयिक समस्याओं पर विचार कर सकें, पारस्परिक सुख दुःख की पूछ ताछ कर सकें, एक दूसरे के अनुभव से लाभ उठा सके; अधिक संगठित हो सके; समय की माँग का पूरा करने के लिए मिल जुल कर उपाय निर्धारित कर सके। ऐसे-ऐसे अनेक उद्देश्य उन विशिष्ट आयोजनों के साथ जुड़े रहते थे जिनमें मुख्यतया धर्म सेवियों की-सन्त परिव्राजकों की उपस्थिति ही आवश्यक होती थी। कुम्भ पर्व जैसे आयोजन इसी उद्देश्य से निर्धारित किये गये थे। यह चलते फिरते तीर्थ थे। अपना स्थान और क्रम बदलते रहते थे। कुँभ पर्वों की योजना दृष्टव्य हैं। हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक इन चारों स्थानों पर तीन-तीन वर्ष बाद प्रायः एक-एक महीने के कुँभ पर्व होते है। बारह वर्ष में यह चक्र पूरा होता है। धर्म प्रचारकों की सन्त मंडलियाँ इन आयोजनों में पहुँचती थी। इस प्रकार उस समय की व्यवस्था के अनुरूप बने एक बड़े धर्म क्षेत्र का भ्रमण चक्र पूरा हो जाता था। सभी धर्म प्रचारक, सभी क्षेत्रों में पहुँचने, वहाँ की स्थिति समझने और पारस्परिक संपर्क को सघन बनाने का आनन्द उपलब्ध करते थे।
जहाँ देश भर के धर्म सेवी एकत्रित हों वहाँ जनता की सहज रुचि होना स्वाभाविक है। तीर्थ स्नान से भी बड़ा पुण्य समझा जाता था-सन्त समागम। इसके लिए साधन सम्पन्न लोग सदावर्त-जल प्रबन्ध, निवास व्यवस्था आदि की सुविधा बनाने के लिए दान पुण्य करते थे।
विभिन्न वर्गों में मूर्धन्य मनीषी अभी भी राजनैतिक एवं सामाजिक स्तर पर मिलते जुलते रहते है। पारस्परिक सहयोग आदान-प्रदान का इन सम्मेलनों से मार्ग खुलता है और उत्साह वर्धक परिणाम निकलता है। सरकारी तत्वावधान में में समय-समय पर ऐसे सेमिनारों की व्यवस्था बनती रहती है जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, न्याय, व्यवस्था आदि उपयोगी विषयों पर मिल जुल कर अधिक सोचने एवं प्रगति के उपाय खोजने में सुविधा उत्पन्न हो। काँग्रेस आदि बड़ी संस्थाओं के वार्षिकोत्सवों के अवसर पर उन्हीं पंडालों में अन्याय संस्था संगठनों के भी आयोजन चलते रहते है। कुँभ जैसे पर्वों का प्राचीन काल में ठीक यही रूप था। विभिन्न संतों की विभिन्न प्रेरणाओं एवं निर्धारणों से अवगत होते और किसी उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुँचने की दृष्टि से यह कुँभ पर्व जैसे विशाल आयोजन अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमा सम्पन्न करते थे।
स्मरण रहे यह समस्त गतिचक्र तीर्थों की धुरी पर परिभ्रमण करते थे। बार-बार स्थान बदलने से नये प्रकार की नई व्यवस्था जुटानी पड़ती है और नई समस्याओं का सामना करना पड़ता है समय की अलग से सूचना भेजनी पड़ती और स्थानीय परिस्थितियों से तालमेल बिठा कर उनका प्रबन्ध करने में विशेष सूझ बूझ एवं विशेष तत्परता का परिचय देना पड़ता है। किन्तु अमुक तीर्थ में अमुक पर्व पर पहुँचने की बात निश्चित रहने पर नये आमन्त्रण भेजने से लेकर नई व्यवस्था बनाने तक के सारे झंझट मिट जाते थे। न विद्वानों को बुलाना पड़ता था न जनता को आमन्त्रित, आकर्षित करने को दौड़ धूप करनी पड़ती थी। सब कार्य सहज स्वाभाविक रूप से सम्पन्न होते रहते थे और विशाल कार्य धर्म सम्मेलनों की व्यवस्था अपने गति चक्र पर सरलता पूर्वक परिभ्रमण करती रहती थी।
जब तीर्थ उपरोक्त तीनों भूमिका निभाते रहे होंगे तब उसके सुखद परिणाम किस प्रकार किस परिणाम में प्रस्तुत होते होंगे, इसका परिचय अभी भी पुरातन इतिहास की झाँकी करने पर मिल जाता है। अतीत की स्वर्णिम परिस्थितियाँ दैवी वरदान थीं जिनने इस महान देश के नागरिकों को-उनके देश को सच्चे अर्थों में गौरवान्वित किया। यह दैवी वरदान संभवतः स्वर्ग से उतरता होगा और उसे देवता अपने पुष्पक विमानों पर चढ़ कर बरसाते होंगे। जो इस मान्यता को संदिग्ध मानते हों उन्हें तीर्थों को, उनके संचालक ऋषियों को वह केन्द्र मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए जहाँ से भारत भूमि को स्वर्गोपम परिस्थितियों से भरा पूरा बनाने वाले वरदान बरसा करते थे।
यह अतीत की चर्चा हैं। तथ्य भी है और इतिहास भी। इसकी साक्षी प्रस्तुत तीर्थों में जाकर लकीर पिटने के रूप में चलने वाली प्रथा परम्पराओं को देखने से उपलब्ध हो सकती है। जिन दिनों तीर्थ जीवन्त रहे होंगे अपने उद्देश्य की पूर्ति में प्राण पण से निरत रहे होंगे तब कितना सौभाग्य सुअवसर जन-जन को मिलता होगा। उसको स्मृति मात्र से अन्तःकरण पुलकित हो आता है और उस तीर्थ परम्परा को उसके निर्धारण कर्ताओं को शत-शत नमन करने को जी करता है, जिनने अपने समय में जन आस्था को उत्कृष्ट बनाने में अपने ढंग से महान भूमिका निभाई।
आज तीर्थों की काया तो विद्यमान है, पर उनकी आत्मा सुषुप्ति में चली गई। प्रसुप्ति मृत्यु तो नहीं है पर उस स्थिति में आचरण मृतकवत ही होते हैं। तीर्थ अभी भी विद्यमान है। पहुँचने वालों की भीड़ स्नान दर्शन, दान पुण्य आदि के कृत्य वैसे ही होते हैं। अन्तर एक ही है जागृति, सुषुप्ति के गर्त में जा गिरी। प्रथा रह गई, प्रेरणा बुझ गई।
समय की पुकार है कि मूर्छना को जागृति में बदला जाय। नव जागरण के इस पुण्य प्रभाव में तीर्थों के धर्म बिन्दु को उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता, मैले कपड़े धोये जा सकते हैं-टूटी वस्तुओं की मरम्मत हो सकती है, रोगी को स्वास्थ बनाया जाता है, अपराधी सुधरते हैं। तो कोई कारण नहीं कि तीर्थों को निहित स्वार्थों एवं अन्ध विश्वासों से छुड़ा कर उनके पर्व रूप में न पहुँचाया जा सके।
व्यक्ति और समाज को समुन्नत बनाने के लिए उच्च स्तरीय आस्था का निर्माण एवं अभिवर्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस पुण्य प्रयोजन के लिए अतीत की तरह वर्तमान में भी तीर्थ संस्थान अपनी महती भूमिका निभा सकते है और उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
ओस्लो के समीप एक गाँव में दो मजदूर रहते थे। एक का नाम था आरडिन और दूसरे का क्रिस्टल। उनके कनाडा स्थित अमीर सम्बन्धी ने मरते समय अपनी सम्पत्ति में से एक लाख डालर इन मजदूरों को मिलने की वसीयत कर दी ताकि उनकी गरीबी दूर हो सके।
जब वह धन उनके पास आया तो वह श्रमिकों ने गिरजे की पाठशाला में पहुँचा दिया और कहा-”हमारे लिए उतना ही पर्याप्त है, जितना पसीना बहा कर कमा लेते है। बिना मेहनत के मिलने वाली अमीरी से यह श्रम निष्ठ गरीबी हमें अधिक सुखद है।”
प्राचीनकाल में गुरुकुल शिक्षा पद्धति छात्रों की शिक्षण व्यवस्था थी। ऋषियों के सान्निध्य में शिक्षार्थी अध्ययन करते थे और दिव्य सान्निध्य एवं प्रशिक्षण द्वारा समग्र रूप से विकसित व्यक्तित्व लेकर वापिस लौटते थे। यह गुरुकुल कहाँ थे, इसका पता लगाने पर, उनके भव्य भवनों का कहीं पता नहीं चलता। शिक्षा का इतना विस्तार और उनके निमित्त बनाये गये स्थानों का कही अता-पता तक नहीं! इस आश्चर्य के कारण की खोज करने पर विदित होता है कि गुरुकुल चलते फिरते थे। ऋषि अपने छात्रों तथा गौओं सहित परिभ्रमण करते थे। सुविधाजनक स्थानों पर पड़ाव डालते थे। कुछ समय रुकते थे और फिर आगे बढ़ने की तैयारी करते थे। इस प्रकार विद्यालयों के माध्यम से अध्ययन-अध्यापन का क्रम चलता रहता था। उससे समीपवर्ती क्षेत्रों की जनता भी लाभ उठाती थी। ऋषि संपर्क का सौभाग्य अपने समीप ही आया देखकर जन-साधारण को बड़ा बल मिलता था। छात्रों का अध्ययन और जन साधारण का लोक शिक्षण साथ-साथ चलता रहता था।
बड़े तीर्थों की स्थापना के बड़े उद्देश्य थे। छोटे-छोटे तीर्थ, देव स्थान, धर्म स्थान जगह-जगह बने दिखाई पड़ते है। इनके पीछे ऋषियों का निवास एवं प्रशिक्षण प्रक्रिया का स्मारक समझा जा सकता है। स्थान छोड़ने से पूर्व ही या पीछे उस सत्प्रवृत्ति के चलते रहने की व्यवस्था बन जाती थी, अथवा उनके बिदा होने के बाद प्रभावित व्यक्ति यह प्रयत्न करते थे कि स्थापित परम्परा नष्ट होने न पाये, धर्म धारणा की यह प्रवृत्ति किसी प्रकार भविष्य में भी चलती ही रहे। इस विचार में देवालय बनाये जाते थे। इन्हें धर्म-चेतना के केन्द्र स्थान ही कहना चाहिए। जहाँ देव प्रतिष्ठा से लेकर धर्म धारणा को सुस्थिर एवं प्रगतिशील बनाने की अनेकानेक रचनात्मक गतिविधियाँ वहाँ चलती रहती थीं। अधिकांश देव मन्दिरों के साथ अतिथि निवास को धर्मशाला एवं अध्ययन को पाठशाला की व्यवस्था जुड़ी रहती थी। कथा-प्रवचनों का सिलसिला वहाँ नियमित रूप से चलता रहता था। घरों पर संस्कारों की और सामूहिक रूप से पर्व त्यौहारों को मनाने की विधि व्यवस्था का उत्तरादयित्व इन देवालयों के संरक्षक की चलाते थे। पुरोहित, पुजारी एवं धर्म प्रचारक की भूमिका निभाने के लिए न्यूनतम एक और अधिक जितने सम्भव हो सके उतनों की निवास व्यवस्था वहाँ रहती थी। यही था देवालयों का वह स्वरूप जो गुरुकुलों के संचालक मनीषियों की प्रेरणा से बनता बढ़ता चला गया। स्थान-स्थान पर छोटे-बड़े प्राचीन देवालयों का निर्माण इसी प्रकार इसी उद्देश्य के लिए हुआ है। छोटे तीर्थों का, देव संस्थानों का इतना अधिक विस्तार अपने देश में प्राय इसी आधार पर होता गया है।
धर्म क्षेत्र के महामानवों ने स्वयं-अथवा उनके अनुयायियों ने बाद में तीर्थ स्थापना को आवश्यक समझा और उनके भाव-भरे निर्माण की व्यवस्था बनी। समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र में ऐसे अनेकों देवालयों की स्थापना की थी जिनमें स्थानीय धर्म चेतना जीवन्त रखने के अतिरिक्त शिवाजी की सहायता के लिए सैनिक, शास्त्र तथा साधन भी इकट्ठे किये और भेजे जाते थे। भगवान बुद्ध की महत्वपूर्ण गतिविधियाँ जहाँ कहीं चलती रही-वहाँ उनके सामने ही अथवा बाद भी तीर्थ स्थान बन गये। सन्तों की जीवनचर्या उनके उपरान्त भी तीर्थों के रूप में प्रेरणा केन्द्र बन कर गतिशील रही है और वह आलोक अद्यावधि किसी किसी रूप में अपनी रश्मियां वितरित कर रहा है।
भगवान के विभिन्न अवतारों के क्रिया कलाप जहाँ अधिक महत्वपूर्ण प्रेरणा प्रस्तुत करते रहे हैं; वहाँ भक्तों ने तीर्थों की स्थापना की है। भगवान राम और कृष्ण की लीला भूमियों में अभी भी विद्यमान है। इस निर्माणों का एक ही उद्देश्य था कि जन साधारण को उन उद्देश्यों का परिचय, प्रकाश तथा उत्साह वहाँ पहुँचने पर मिल सके। भगवान का शरीर न रहने पर भी उनके उद्देश्य की प्रेरणा इन प्रेरणा केन्द्रों से मिलती रहती है। इसलिए उनके निर्माता इन तीर्थों का अवतारों का भावना शरीर मानते हैं और इसी श्रद्धा के साथ उनका सान्निध्य शिरोधार्य करते है।
विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में यही प्रथा प्रचलित है कि उनके संस्थापकों की शिक्षा प्रेरणा के लिए ऐसे केन्द्र बने रहें जहाँ से उस मिशन का सुसंचालन व्यवस्थित रूप से भविष्य में भी होता रहे। ईसाई धर्म के लिए क्रिश्चियन मिशन के तत्वावधान में अनेकों छोटे-बड़े धर्म संस्थान समस्त संसार में काम करते है। धर्म प्रचारकों के निवास निर्वाह से लेकर-रचनात्मक प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन समीपवर्ती क्षेत्र में इन्हीं केन्द्रों से होता है। उस सम्प्रदाय वालों की दृष्टि से इस प्रकार के धर्म केन्द्रों को इसी भावना से देखा जाता है; जिससे कि भारत में तीर्थों का सम्मान होता है। सिक्खों के गुरुद्वारे मात्र पूजा स्थल ही नहीं होते वहाँ वे प्रवृत्तियाँ भी चलती है जिनके सहारे सिख धर्म की प्रेरणाएँ वहाँ पहुँचने वालों को मिलती रहें।
तीर्थों का स्थापना में कई सन्तों का विशेष प्रयत्न रहा है। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना हुई। उनके शिष्य मान्धता ने अपने गुरु की इच्छा योजना पूरी करने के लिए अपना सर्वत्र दाव पर लगा दिया और वह महान प्रयोजन पूरा कर दिखाया। ब्रज धाम के अधिकांश तीर्थ महाप्रभु चैतन्य के संकेत पर कृष्ण भक्तों ने बनाये और उन क्षेत्रों में विनिर्मित देवालयों का वर्तमान स्वरूप सामने आया। पुष्टि मार्गीय सम्प्रदाय के धर्मगुरु जहाँ-जहाँ रहे जहाँ करते रहे प्रायः उन सभी प्रमुख स्थानों में उनकी बैठक बनी हुई हैं। स्वामी नारायण सम्प्रदाय में भी ऐसा ही हुआ है। उनके धर्म गुरु जहाँ भी कुछ महत्वपूर्ण कृत्य करते रहें है, प्राय; उन सभी स्थानों पर देवालय बने हुए है।
तीर्थों का प्रयोजन प्रेरणाओं के देवालयों के साथ जोड़कर जन-संपर्क साधना और उस आलोक से लोक श्रद्धा को प्रभावित करना रहा है। यह प्रयोजन जहाँ से, जिस प्रकार, जिस सीमा तक पूरा होता है, उसी अनुपात से उसे जीवन्त कह सकते है। अन्यथा मात्र देव प्रतिमाओं को अलग-अलग स्थापित करते फिरने और वहाँ पूजा पत्री भर की चिन्ह पूजा होते रहने से उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती, जिसके लिए इस महान स्थापना के लिए ऋषियों ने अपनी दूरदर्शिता एवं प्रखर प्रयत्नशीलता का प्रयोग किया था।
देवता का पूजन तभी उपयोगी हो सकता है जब उस अर्चना के फलस्वरूप आदर्शवादी प्रेरणाओं को उकसाने का समर्थ आधार भी उसके साथ ही जुड़ा हुआ हो। ऐसा न बने पड़े तो घर में चौकी पर रखी छोटी प्रतिमा भी पूजा प्रयोजन के लिए पर्याप्त है; फिर उसके लिए इतने धन और श्रम का विनियोग किस लिये किया जाय?
प्रेरणाओं से रहित मात्र पूजा प्रयोजन तक सीमित देवालयों के प्रति बुद्धिवादी वर्ग के तीखे आक्षेप होते हैं। वे इसे स्थान, पूँजी एवं श्रम का अपव्यय मानते हैं तथा धर्म व्यवसायियों द्वारा महालोभी पूँजी पतियों के द्वारा रचा हुआ षड्यंत्र बताते है। इन आक्षेपों का समाधान कारक उत्तर इसी रूप में दिया जा सकता है कि उनके द्वारा उच्चस्तरीय आस्था की निर्माण कर सकने वाली रचनात्मक प्रवृत्तियों का संचालन होता रहे। आज के तीर्थों को इसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि वे अपने मूल प्रयोजन-उत्कृष्टा परक आस्था संवर्धन में कहाँ तक सहायक होते है। यदि ऐसा न हो सका तो वे अपनी उपयोगिता खोते चले जायेंगे और परम्परागत श्रद्धा की पूँजी समाप्त होते-होते उपहास के ही नहीं; तिरस्कार के भी भाजन बनेंगे।
संसार भर में पर्यटन को एक स्वस्थ मनोरंजन माना जाता है और उसे सुविधाजनक बनाने के लिए सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर प्रयत्न किया जाता है। मनोरंजन के अनेकानेक माध्यमों में कुछ तो केवल विनोद तक सीमित रहते और खर्च की दृष्टि से महंगे पड़ते हैं। कई मनोरंजन दुर्व्यसन सिद्ध होते हैं और उपभोक्ता के लिए कालान्तर में विपत्ति खड़ी करते हैं किंतु पर्यटन ऐसा मनोरंजन है जिससे उदासी तो मिटती ही है, साथ ही कई प्रकार के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ भी मिलते हैं। तीर्थाटन को विशुद्ध विनोद प्रक्रिया से भी रखा गया होता तो भी उसके प्रति विज्ञजनों में जो अश्रद्धा बढ़ रही है वह न बढ़ती और उनका भविष्य अन्धकार मय न दीखता। स्पष्ट है कि समाज को मेरुदंड मध्यम वर्ग है। विचारशील लोगों के समर्थन से ही प्रवृत्तियाँ बलवती और चिरंजीवी होती है। बुद्धिवादी जन समुदाय जिस तथ्य पर अविश्वास करने, अप्रामाणिक मानने लगता है उसकी जड़े खोखली होती जाती है और अपनी मौत मरने की स्थिति आ जाती है। अन्ध श्रद्धा का शोधन करने वाली प्रवृत्तियाँ उपेक्षित होती, उपहासास्पद बनतीं ओर विरोध के आघात न सह सकने कारण धराशायी होती चली जाती हैं।
किले ढह गये। जागीर छिन गई। फिर अपनी प्रामाणिकता एकं उपयोगिता गँवा बैठने पर बेचारे तीर्थ ही कितने दिन जीवित रह सकेंगे। यदि उन्हें अकाल, मृत्यु के मुख में जाना पड़ा तो ऋषि प्रणीत इस महान परम्परा के टूट जाने से जो अपार क्षति होगी उसे अपने युवक की भयानक दुर्घटना ही माना जायगा।
पर्यटन का आनंद उपलब्ध होता रहे और इस प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ वर्तमान तीर्थों को यदि स्वस्थ मनोरंजन का केन्द्र भर रहने दिया जाय तो भी वे अपनी उपयोगिता बनाये रहेंगे। यदि उनके साथ तीर्थों की आत्मा भी जुड़ी रहने का प्रबन्ध किया जाय तब तो उनका स्वरूप और भी अधिक आकर्षक बन जायगा। तीर्थ निवासियों और तीर्थ प्रेमियों को मिलकर ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए कि निहित स्वार्थों की धर्म शोषण प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाय। सम्भव हो तो उनकी धर्म गरिमा को भी उच्च स्तरीय बनाने का प्रयत्न किया जाय, अन्यथा उन्हें पर्यटन केन्द्र से तो नीचे गिरने ही न दिया जाय। ऐसा तभी हो सकता है जब कि तीर्थों में पनपने वाले छद्म- भिक्षा व्यवसाय को निरुत्साहित किया जाय और आगन्तुकों को भारी मन से लौटने का अवसर न आने दिया जाय।
एक स्थान पर रहते-रहते एक तरह का काम करते-करते मनुष्य को ऊब आती है। ऊब से मन उचटता है और हाथ के कामों में रस नहीं रहता। हठात् काम करते रहने से कार्य की मात्रा और उत्कृष्टा में भारी कमी आती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए साप्ताहिक अवकाश की व्यवस्था बनाई गई है। इसी लिए बना घण्टे का अवकाश रहने का नियम भी इसी लिए बना है कि सुस्ताने पर ऊब उतर सके और नये सिरे से उत्साह पूर्वक काम कर सकना संभव हो सके। पर्यटन अधिक समय का एवं दूर ले जाने वाला अवकाश है जिससे भिन्न प्रकार की परिस्थिति से जाने और कुछ उत्साह वर्धक देखने जानने का अवसर मिलता है। ऐसे अवकाशों में पैसा और समय तो खर्च होता है, इसके उपरान्त जो स्फूर्ति एवं विश्रान्ति मिलती है वह व्यक्ति का मनोयोग एवं क्रिया कौशल बढ़ाकर पर्यटन में हुई क्षति की पूर्ति कर देती है।
पर्यटन यदि तीर्थ यात्रा स्तर का पैदल मार्ग के रूप में साइकिल यात्रा के रूप में हो सके, तब तो उसका आनन्द और लाभ निश्चित रूप से कई गुना बढ़ जायगा। पर यदि वैसा न हो सके तो सवारियों की सहायता से प्रकृति सौंदर्य देखने, ऐतिहासिक स्थानों से प्रेरणा लेने, दर्शनीय स्थानों में जाकर नवीनता देखने, नये व्यक्तियों के नई परिस्थितियों के संपर्क में आने से नये प्रकार के अनुभव बढ़ाये जा सकते हैं। और उस ज्ञान वृद्धि से प्रकारान्तर से अनेकों परोक्ष लाभ मिल सकते हैं।
अनुभव सम्पादन बड़ी बात है। सीमित दायरे में ही जीवन बिताने वाले यदि पुस्तकीय ज्ञान इकट्ठा करते भी रहें तो भी इतने से काम नहीं चलता। चेतना पर प्रत्यक्ष अनुभव का जितना प्रभाव पड़ता है उतना अन्य किसी प्रकार नहीं। अनुभव जन संपर्क से बढ़ता है। जिन्हें ऐसे अवसर नहीं मिलते वे व्यवहार में अकुशल एवं आत्म हीनता की ग्रंथि से ग्रसित रह जाते हैं। ऐसे लोगों की समीक्षा बुद्धि, निर्णय शक्ति एवं दूर दर्शिता में भारी कमी बनी रहती है। यही कारण है कि घरों में कैद रहने वाली महिलाएँ मस्तिष्क की दृष्टि से तीक्ष्ण रहने पर भी अनुभव हीनता के कारण कई तरह के खतरे उठाती रहती है। जन संपर्क में रहने वाले व्यक्ति सामयिक लाभ तो उठाते ही अपने अनुभव एवं कौशल को भी बढ़ा लेते हैं ओर उसके दूर गामी सत्परिणाम उपलब्ध करते हैं।
सरकार का पर्यटन विभाग यात्रा को प्रोत्साहित करने तथा यात्राओं को सुविधा देने के लिए तरह-तरह के उपाय करता रहता है। इससे सरकार को कई प्रकार से टैक्स मिलने का नया स्त्रोत खुलता है। पर्यटन केन्द्रों के व्यवसायी तथा श्रमिक आगन्तुकों से आजीविका उपार्जित करते है। धन का विवरण होता है। समृद्धि फैलती है और नये उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है। इस लाभ का एक अंश जिस-तिस रूप में सरकार के पास भी जा पहुँचता है। विदेशी पर्यटकों से विदेशी आगन्तुकों को अपने यहाँ बुलाने और सुविधा देने को उत्सुक रहता है।
भारत में पर्यटन की भौतिक उपयोगिता समझने के साथ-साथ भावनात्मक एकता, संस्कृति का क्षेत्र-विस्तार, धर्मधारणा के अभिवर्धन आदि अनेक उच्चस्तरीय लाभों को भी समन्वित रखा गया है। अस्तु धर्म पर्यटन के लिए तीर्थों को विराम स्थल मानते हुए परिभ्रमण के लिए प्रोत्साहित किया गया है। तीर्थ यात्रा इसी का नाम है।
पर्यटन का लौकिक मनोरंजन और सद्ज्ञान संवर्धन का आध्यात्मिक आनन्द दोनों की सम्मिलित प्रक्रिया तीर्थ यात्रा है। इससे व्यक्ति उत्थान और समाज कल्याण के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। भारत में पर्यटन केंद्रों की दृष्टि से भी तीर्थों का महत्व है। तीर्थों के साथ जुड़ी हुई प्राचीन परम्परा को शुद्ध स्वरूप में यदि उनके साथ सम्मिलित रखा जा सके तो उसमें फलस्वरूप वैयक्तिक एवं सामाजिक उत्थान के नये द्वार खुलेंगे ओर उनके फलस्वरूप उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में असाधारण सहायता मिलेगी।
पर्यटन को आर्थिक दृष्टि से प्रोत्साहित करने वाला वर्ग यात्रियों के सुविधा संवर्धक का, स्थानीय आकर्षण का जितना विस्तार कर सकें उतना उत्तम है। समाज को स्वच्छ और शालीन दीखने वाला वर्ग यह प्रयत्न करे कि आगंतुकों की भाव श्रद्धा का अवाँछनीय तत्वों द्वारा अनुपयुक्त शोषण न होने पाये। भीड़ से गंदगी न फैलने देने को स्थानीय निकायों की सतर्कता और तत्परता बढ़नी चाहिए व्यवसायी यात्रियों के निवास, भोजन एवं उचित मूल्य पर आवश्यक वस्तुएँ मिलने का प्रबन्ध करें। धर्म क्षेत्र की प्रभावी प्रतिभाओं को तीर्थ परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए ऐसे साधना सूत्रों का प्रबन्ध करना चाहिए जिससे आगंतुकों को एक साथ उपरोक्त सभी लाभ मिल सकें। संयुक्त प्रयत्नों से ही तीर्थों का महत्व बढ़ सकता है। इस अभिवृद्धि को हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही माना जायगा।
तीर्थ यात्रा का ऋषि निर्मित काय-कलेवर अभी भी यथावत् स्थिर है। उसके वाह्य ही हुई है। रेल-मोटर की सुविधा हो जाने से यात्रा सरल भी हो गई है और सस्ती भी। दूरवर्ती स्थानों में जाने में जो समय और श्रम लगता था, मार्गों के अण्ड-खण्ड होने से जो कष्ट सहना पड़ता था, उतने समय तक जो खर्च करना होता था-निवास और भोजन के साधनों को तलाश करने में भटकना पड़ता था, उसमें न केवल पग-पग पर कठिनाइयाँ ही रहती थीं वरन् लम्बी अवधि में खर्च भी बहुत हो जाता था। आज द्रुतगति वाहनों ने लम्बी यात्राएँ सरलतापूर्वक स्वल्प समय में पूरी कर लेने की जो सुविधा बनाई है उससे समय और श्रम की ही नहीं पैसे की भी बचत हुई है। फलतः तीर्थयात्रियों की संख्या पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गई है।
तीर्थों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने में उन लोगों ने अधिक उत्साह दिखाया है पुण्यफल, देव अनुग्रह एवं यश कामना के लिए तीर्थ में देवालय स्थापित करने धर्मशाला बनाने की अधिक उपयोगिता दीखती है। यों मन्दिर आदि बन तो कहीं भी सकते हैं, पर उनकी जानकारी स्थानीय लोगों को ही रहती है। और वे थोड़ी ही संख्या में होते हैं। तीर्थों में असंख्य लोग-दूर-दूर से आते रहते हैं उन्हें देव-दर्शन के अतिरिक्त, निर्माता की जानकारी भी मिलती है। धर्मशालाओं में ठहरने वाले भी निर्माताओं की स्मृति रखते हैं। उन्हें धर्म परायण मानते हैं। इस प्रकार यश लाभ का सिलसिला चिरकाल तक चलता रहता है। साधन सम्पन्न लोगों के लिए पुण्य और यश का समन्वय यह सहज आकर्षण उत्पन्न करता है कि वे अपनी स्मृति के लिए तीर्थ स्थानों को अपनी वृति प्रस्तुत करने के लिए चुनें। इस आधार पर तीर्थों में संख्या और भव्यता की दृष्टि से पहले की अपेक्षा अब अधिक दर्शनीय स्थान बन गये हैं। सरकार मन्दिर तो नहीं बनाती; पर पर्यटकों को आकर्षित करने वाले निर्माण की वह भी कुछ न कुछ व्यवस्था करती ही रहती है। यात्री टैक्स वसूल करके स्थानीय निकाय भी इन स्थानों की स्वच्छता शोभा बढ़ाने के लिए यथा सम्भव कुछ सोचती-’करती ही रहती है। व्यवसायी वर्ग अपने लाभ के लिए कुछ ऐसे प्रयत्न करता है जिससे दर्शकों का आकर्षण बढ़ और खरीद के लिए उत्साह बढ़े। मनोरंजन के साधन बढ़ने से पर्यटन में रुचि रखने वाली प्रवृत्ति को तीर्थ यात्रा में दुहरा लाभ दीखा है। ऊब मिटाने मन हलका करने, नवीनता का आनन्द लेने के लिए श्रम जीवियों से लेकर नव दम्पत्तियों तक को परिभ्रमण को उत्सुकता होती है और उसके लिए अपने देश में तीर्थ स्थान ही उपयुक्त पर्यटन केंद्रों की भी आवश्यकता पूरी करते हैं। गर्मी की छुट्टियों में बच्चों का कहीं बाहर चलने का आग्रह रहता है। अभिभावकों को भी अपेक्षाकृत उन दिनों सुविधा रहती है। फलतः तीर्थ प्रवास और भी अधिक बढ़ जाता है।
ऐसे-ऐसे अनेक कारणों के मिल जाने से तीर्थ यात्रा के लिए पहुँचने वाली जन संख्या में दिन-दिन बढ़ोत्तरी ही होती जाती हैं भव्यता और सुविधा की दृष्टि से भी पहले की अपेक्षा उनका आकर्षण और विस्तार क्रमशः बढ़ता ही चला गया है। इसे बाह्य कलेवर का विस्तार कह सकते हैं। तीर्थ यात्रा को निकलने वाली ट्रेन और बसे भी अधिक उत्साह बढ़ता है। उनमें चलने के लिए महिलाओं, वृद्धों और बालकों का आग्रह और भी अधिक बढ़ते जाता हैं इसमें पड़ने वाले खर्चे को भी अच्छी या कमजोर आर्थिक स्थिति के लोग किसी प्रकार वहन कर ही लेते हैं। पर्यटन का आकर्षण और पुण्य का प्रलोभन मिलकर तीर्थ यात्रा का उभय पक्षीय परिपोषण करते है। फलतः धर्म श्रद्धा का अनुपात बढ़ते हुए बुधवार ने जिस तेजी से घटाया है, उस घटोत्तरी का तीर्थ प्रवास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
विचारणीय यह है कि तीर्थों में पहुँचने वाली जनता क्या उनसे कुछ वैसा प्रतिफल प्राप्त करती है जैसा कि अपेक्षा की जानी चाहिए? पर्यवेक्षण करने पर उत्तर निराशाजनक ही मिलता है। भिक्षा व्यवसायी वर्ग के लोग जिस प्रकार यात्रियों के पीछे लगते हैं और विनोद के लिए कहीं चलने बैठने की स्थिति पा सकना दूभर कर देते है, उसे देखते हुए विनोद का आकर्षण प्रायः चला ही जाता है। सज्जन प्रकृति भी अनुपयुक्त दबाव और थोड़े से विनोद के क्षणों को बुरी तरह नष्ट होने पर खीजने लगते हैं, फलतः लोग झल्लाते हुए ही लौटते है और भविष्य में तीर्थों में न जाकर कहीं अन्यत्र जाया करने की बात सोचते हैं।
बुद्धिवाद की कसौटी पर धर्म तत्व का प्रचलित स्वरूप लोकोपयोगी नहीं दीखता। घटती हुई श्रद्धा पर धर्म व्यवसायी कोढ़ में खाज की तरह अपने कुचक्रों से वहाँ पहुँचने वालों को विक्षुब्ध करते रहते हैं। इस परिस्थिति में देखना यह है कि तीर्थ स्थापना के जिस महान उद्देश्य को लेकर ऋषि मनीषियों ने प्रबल प्रतिपादन और सफल प्रचलन के रूप में जो महान प्रयास किया था; उसकी पूर्ति हो रही है या नहीं? पर्यवेक्षण करने पर निराशाजनक उत्तर ही सामने आता हैं। यह दुःख का विषय है। होना यह चाहिए था कि तीर्थों का आकर्षण और आवागमन का विस्तार होने का समुचित लाभ वहाँ पहुँचने वालों को मिलता। लोग धर्म श्रद्धा को सुविकसित करते। उसे व्यवहार में उतारते और व्यक्तित्व की दृष्टि से अधिक प्रखर परिष्कृत बनते। उस उत्कर्ष का लाभ सामाजिक सुव्यवस्था समृद्धि एवं प्रगति शीलता के रूप में सामने आता है। पर प्रतीत होता है कि तीर्थ यात्रा की प्रतिक्रिया में उपरोक्त दोनों लाभों में से एक ही उपलब्ध हो रहा हैं। इन स्थानों में पर्यटन केन्द्रों जैसा आकर्षण तो क्रमशः बढ़ता जाता है, पर चिन्ता की बात यह है कि धर्म धारणा को जीवन्त रखने के लिए तत्वदर्शियों ने इस महान परम्परा को जन्म दिया था और प्रबल प्रयत्नों से उसे अपनाने के लिए जन-जन को सहमत किया था; उस लक्षण का क्या हुआ? यदि उसकी पूर्ति नहीं होती है तो इस बढ़े हुए कलेवर को निष्प्राण ही कहा जायगा। निष्प्राण विस्तार को ढकोसला कहते हैं। निरुद्देश्य परिभ्रमण को आवारागर्दी कहा जाता हैं। श्रद्धा मानवी अन्तरात्मा का परिपोषण करने वाली कामधेनु है। धर्म-कुकृत्यों द्वारा उसका परिपोषण और अभिवर्धन होना चाहिए। तीर्थों से यही अपेक्षा की गई थी। बहुत समय तक उसकी उत्साहवर्धक पूर्ति भी हुई पर अब यदि उस प्रकार का वातावरण समाप्त होता जा रहा है तो उसकी प्रतिक्रिया खेद जनक ही होगी। पर्यटन केन्द्रों के रूप में यदि तीर्थों का अस्तित्व बन भी गय तो विनोद के अन्यान्य साधनों में ही उनकी गणना भी होने लगेगी। संस्कृति के परिपोषण के लिए जो प्रकाश स्तम्भ खड़े किये गये थे यदि उनका प्रकाश बुझ गया तो फिर उपयोगिता ही क्या रह जायेगी। समुद्रों में खड़े प्रकाश स्तम्भों की ज्योति बुझ जाय तो वे उधर से निकलने वाले जहाजों को बचाने की अपेक्षा उलटे टकराने और डुबाने वाले संकट बन सकते है।
तीर्थ सज्जा पर सरकारी गैर सरकारी तत्वों का ध्यान है किन्तु उनके प्राण तत्व को बुझने न देने, मरने ने देने पर किसी का भी ध्यान नहीं है। धर्म के नाम पर जो स्टाल इन पुनीत स्थानों में लगे हुए हैं उन पर बिकने वाला माल आत्मिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में नहीं गिराने में ही सहायक हो रहा है। भावुक जनों की धर्म श्रद्धा का शोषण जिन अंधविश्वासों के सहारे होता देखा जाता है उससे विचारशीलता को पीड़ा ही होती है। सड़ा हुआ अमृत भी विष हो जाता हैं। मृत शरीर फूलता तो तेजी से है, पर उस विस्तार पर किसी को प्रसन्नता नहीं होती। तीर्थों की आत्मा निकल गई और काया फूलने लगी तो उसमें प्रसन्नता की नहीं व्यथा अनुभव करने जैसी ही बात हैं।
तीर्थ यात्रा को पुण्य लाभ का ही प्रमुख प्रयोजन माना जाता है। प्रत्यक्षतः इसी प्रयोजन के लिए यात्रा उपक्रम के लिए घर से निकला जाता है। वह स्वार्थ अपूर्ण ही बना रहे तो समझना चाहिए कि उस श्रम और व्यय की सार्थकता नहीं हुई जिसकी आशा अपेक्षा की गई थी। उपलब्धि रहित विनियोग से निराशा भी बढ़ती है और खिन्नता भी। प्रयोजन के परिपोषण के लिए लोक अनुदानों में कमी नहीं हुई हैं। तीर्थ यात्रा के माध्यम से धर्म प्रयोजन के लिए जन साधारण को बहुत कुछ करते हुए देखा जाता है। इससे आशा बँधती है कि धर्म जीवित है। पर दूसरे ही क्षण हुए उस अनुदान का प्रतिफल तलाश किया जाता है तो प्रतीत होता है। ऊसर भूमि में बाज बीज बोने जैसा विनियोग ही बन पड़ा और उससे निराशाजनक परिणाम ही निकला।
देखा जा सकता है कि तीर्थों के निर्माण में कितनी प्रचुर सम्पदा लगी हुई है। उनका संचालन व्यय वहन करने में कितनी अधिक धन शक्ति और जन शक्ति लगती हैं। वह जन अनुदान असाधारण है। इसका प्रतिफल व्यक्ति और समाज को सुखद सत्परिणामों के रूप में ही मिलना चाहिए। यदि नहीं मिल रहा है तो उन छिद्रों को बन्द करना चाहिए कि जिनमें होकर लोक श्रद्धा की कामधेनु का अमृतोपम दूध ऐसे ही पड़ता, बिखरता, नष्ट होता और गन्दगी फैलाता रहता है।
इस संदर्भ में कुछ अधिक गहराई तक उतरने पर आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। उदाहरण के लिए सोमवती पर्व पर गंगा-स्नान जैसी छोटी बात का ही पर्यवेक्षण करके देखा जाय। उत्तर काशी से लेकर गंगा सागर तक प्रत्येक सोमवती अमावस्या को प्रायः पचास लाख व्यक्ति स्नान करते हैं इनमें से कुछ स्थानीय एवं समीपवर्ती होते है कुछ दूरवर्ती। सभी का समय लगता है। सभी को पैसा खर्च करना पड़ता है। श्रम, समय और धन की औसत लगाई जाय तो हर व्यक्ति पीछे वह राशि न्यूनतम दस रुपया प्रति के हिसाब से 5 करोड़ हुआ। वर्ष में 4-5 सोमवती अमावस्या होती हैं। यह राशि प्रायः 25 करोड़ जा पहुँचती है। गंगा की ही तरह अन्य प्रान्तों में अनेक पवित्र नदियाँ हैं। नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, सरयू, यमुना आदि प्रमुख दस नदियों का महत्व और महात्म्य प्रायः गंगा के समतुल्य ही समझा जाता है। सोमवती पर वहाँ भी उसी श्रद्धा से उन क्षेत्रों के लोग स्नान करने जाते हैं। इन सब पर पहुँचने वाली जनता का व्यय 75 करोड़ माना जा सकता है। इस प्रकार सोमवती संदर्भ, में लगने वाली राशि 100 करोड़ के लगभग जा पहुँचती है।
यह एक प्रसंग हुआ। सोमवती पर्व का स्नान। इसके अतिरिक्त तीर्थ यात्रा वर्ष भर चलती ही रहती है। ऋतु प्रतिकूलता के कुछ ही महीने ऐसे जाते हैं जिनमें कुछ शिथिलता आती है। वर्ष भर में हिन्दू तीर्थों पर पहुँचने वाले यात्रियों का समय और धन 1000 करोड़ से कम नहीं अधिक ही मूल्य का होता है। यह जन सम्पदा यदि रचनात्मक प्रयोजनों में लग सकी होती तो उससे देश की प्रौढ़ शिक्षा जैसी कई समस्याएँ सहज ही हल हो सकती थीं। इस राशि से कुटीर उद्योग पनप सकते थे। पवित्र नदियों में गिरने वाले तटवर्ती नगरों के गन्दे पानी को खेतों तक पहुँचाने के लिए यह राशि प्रयुक्त हो सकी होती तो उसका चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होता। नदियों का जल अस्वच्छ न होने पाता। दूसरी ओर उस खाद मिले पानी से जो सिंचाई होती, उससे खाद्य उत्पादन का परिमाण कहीं अधिक बढ़ जाता। यदि एक वर्ष की तीर्थ यात्रा राशि ऐसे रचनात्मक प्रयोजनों में लग सकें तो नदियों की पवित्रता घाटों का नये सिरे से निर्माण, मन्दिरों का जीर्णोद्धार-पानी और सड़कों का प्रबन्ध जैसे कितने ही उपयोगी इमारतें बनी हैं। उनके संचालन के लिए जो स्थायी निधियाँ जमा हैं उन सब का यदि रचनात्मक कामों में न सही-धर्म प्रयोजनों में ही दूरदर्शिता पूर्वक विनियोग होने लगे तो उसके सत्परिणामों को देखते हुए धर्मश्रद्धा की उपयोगिता स्वीकार करने और गौरव स्वीकार करने का नया आधार बन सकता है।
धर्म व्यवसायी-तीर्थ यात्रियों को फुसलाने और उनका धन हरण करने के कुचक्र में जितना समय और मनोयोग लगाते हैं उसे उलट कर आगन्तुकों के अन्तःकरणों में धर्म चेतना उत्पन्न करने वाली सदाशयता व्यक्त करने लगे तो उनका गौरव तो बढ़ेगा ही सम्मान पूर्वक जीविका चलाने में भी कोई कमी न रहेगी, पर प्रवाह जिस दिशा में वह रहा है उसे देखते हुए इस प्रकार के हृदय परिवर्तन की सम्भावना कम दीखती हैं।
विचार शील वर्ग के मूर्धन्य व्यक्ति यदि गंभीरतापूर्वक विचार करें तो उन्हें प्रतीत होगा कि धर्म श्रद्धा मनुष्य जीवन की बहुमूल्य थाती है। उसी ने अनेक रूप आदर्शवादी प्रयोजनों में उभरते और महान प्रयोजनों की पूर्ति करते दिखाई देते हैं। देश भक्ति, परमार्थ परायणता, उदार सहृदयता, सेवा साधना, आत्म-संयम, चरित्र-निष्ठा; आदर्शवादिता, तप-तितीक्षा जैसे व्यक्ति का गौरव बढ़ाने वाले और समाज को समुन्नत बनाने वाले समस्त प्रयोजन वस्तुतः धर्म श्रद्धा के ही रूपांतरण हैं। यह चेतना जिस भी क्षेत्र में प्रयुक्त होती है वहीं मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले महान कार्य रच कर खड़ा कर देती है। यह तत्व जहाँ भी है उसे रत्न राशि से स्वर्ण खदान से बढ़कर बहूमूल्य माना जय। उसे अन्ध श्रद्धा से टकराकर चूर-च्र होने और उसके टुकड़े से बचाया ही जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब उसे दूसरी उपयोगी दिशा मिले। कोसने और गाली देने से कुछ काम नहीं बनता। अनुपयुक्तता की तुलना में उपयुक्तता प्रस्तुत की जानी चाहिए। ताकि जन-विवेक को दो में से एक चुनाव करने का अवसर मिल सकें। समतुल्य प्रस्तुतीकरण ही वह कारगर उपाय हैं जिसमें उपयुक्त और अनुपयुक्त के अन्तर को समझना और उनमें से किसी एक को चुनने का अवसर जन विवेक को मिल सकता हैं।
भारतीय धर्म और दर्शन की अन्तरात्मा को प्रकट करने वाली तीर्थ प्रक्रिया का पतनोन्मुख प्रवाह इसी रूप में चलने दिया जाय उसे उलटा बदला जाय यह एक ज्वलन्त प्रश्न है। समस्या यह नहीं किसी धर्म स्थापना का उन्मूलन, अवसाद होने या उसके उन्नयन उत्कर्ष की नहीं, वरन् विचारणीय यह है कि मानवी गरिमा के परिपोषण तीर्थ तन्त्र को जीवन्त रखा जाय अथवा उपेक्षा अवमानना के आघात सह-सहकर अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाय? यदि तीर्थ तत्व की उपयोगिता समझी जा सके तो उसे रुग्ण, विकृत एवं अर्ध-मूर्छित स्थिति में उबारना भी आवश्यक है। उस परिवर्तन के लिए रचनात्मक प्रयासों की आवश्यकता होगी। श्रद्धा को सजीव और प्रगतिशील देखने के इच्छुक विवेकशीलता के लिए ठीक यही समय है जिसमें तीर्थों की ऋषि परंपरा को पुनर्जीवित किया जाय और उसके लिए कुछ साहसिक कदम उठाया जाय।
किसी फकीर का एक पुराना कम्बल चोरी चला गया। उसने थाने में चोरी की गई चीजों की लिस्ट दर्ज कराई तकिया, गद्दा, छाता पजामा कोट आदि।
चोर भी संयोग वश वहीं खड़ा था। इतनी लम्बी लिस्ट देख कर वह आग बबूला हो गया और गुस्से में कम्बल दरोगा के सामने फेंकते हुए कहा-”यही वह सड़ा कम्बल, जिसके साथ यह झूठा फकीर झूठी लिस्ट लिख रहा है।
फकीर ने अपना कम्बल उठा लिया और लेकर चलने लगा तो दरोगा ने झूठी रिपोर्ट लिखाने के लिए उसे डाँटा।
गम्भीरता पूर्वक फकीर ने कहा यही कम्बल मेरे लिए सब कुछ है। इसी से तकिया गद्दा, कोट, पजामा छाता आदि का काम लेता हूँ।
जिनके लिए ईश्वर ही सब कुछ है उन्हें उस एक में ही समस्त आकाँक्षाओं की पूर्ति दिखाई पड़ती है।
-स्वामी रामतीर्थ
तीर्थ प्रक्रिया की महान स्थापना का प्रतिपादन, प्रचलन जब हुआ होगा तो निस्संदेह उसकी प्रतिक्रिया से न केवल भारत भूमि को धन्य बनने का अवसर मिला होगा। वरन् उसके आलोक का लाभ समस्त संसार को मिला होगा। इन पुण्य तीर्थों का दर्शन एवं सेवन करने के लिए संसार भर से भाव सम्पन्न व्यक्ति यहाँ आते, देखते, ठहरते और लाभान्वित होकर वापिस चले जाते थे। इसका विवरण प्रामाणिक इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। ईसा इसी तीर्थयात्रा के लिए आये थे और कुछ समय उन ऊर्जा केन्द्रों में निवास करने के उपरान्त ईश्वर के पुत्र बनकर वापिस लौट गये थे। भारत भूमि उन दिनों अब जितनी छोटी नहीं थी। बृहत्तर भारत लगभग समूचे एशिया भूखण्ड में फैला हुआ था। उसका आलोक सूर्य की तरह अपनी आभा और ऊर्जा धरती के प्रत्येक भाग में बखेरता होगा। उस सतयुग स्वर्णयुग की स्थापना में बहुत बड़ा भाग निश्चित रूप से तीर्थ प्रक्रिया का रहा होगा।
यहाँ यह तथ्य भी पूरी तरह ध्यान में रखे जाने योग्य है कि तीर्थ तत्व किसी देवालय नहीं, सरोवर, या पूजा कृत्य तक सीमित नहीं है। यह उसके वाह्य कलेवर मात्र हैं प्राण तो वह विधि व्यवस्था है जिसके अंतर्गत प्राणवान ब्रह्मवेत्ता इन स्थानों में रहकर व्यापक जन संपर्क की योजना लोक चेतना में गहराई तक धर्म धारणा की प्रतिष्ठापना के लिए सर्वतोमुखी प्रयत्न करते थे। इन प्रयत्नों को आत्मिक स्वास्थ्य संवर्धक के सेनेटोरियमों के व्यापक क्षेत्र में भाव हरीतिमा उत्पन्न करने वाले मेघ मण्डलों के ऊर्जा उत्पादन और विवरण के लिए बने बिजली घरों के रूप गतिशील देखा जा सकता था। यदि उस प्रयत्नशीलता को हटा दिया जाय तो निष्प्राण कलेवर सड़ते-गलते ठीक इसी स्थिति में पहुँच सकता हैं जिसमें कि आज वह पहुँच चुका हुआ दृष्टिगोचर होता है।
कलेवर का अपना महत्व है आवरण की भी आवश्यकता है। उपकरणों के बिना भी काम नहीं चलता पर इस तथ्य को भली भाँति जान लेना चाहिए कि आवरण, उपकरण, साधन तभी कारगर होते हैं जब उनका उपयोग कोई क्रिया कुशल प्राणवान कर रहा हो ऐसा सुयोग न बने तो समझना चाहिए कि साधन उपकरणों की उपयोगिता दर्शनीय वस्तु से अधिक और कुछ न रहेगी। तीर्थों की गरिमा इसलिए नहीं थी कि वहाँ देवालय बने हुए थे-प्रकृति सान्निध्य था, जलाशयों की शोभा सुषमा थी। ऐसा प्रकृति सौंदर्य एवं दर्शनीय आकर्षण तो कहीं भी हो सकता है या उत्पन्न किया जा सकता है। इतने मात्र से उसे तीर्थ कोन कहेगा?
तीर्थ तो श्रद्धा के प्रतीक हैं श्रद्धा वस्तुओं से नहीं उत्कृष्ट व्यक्तित्वों द्वारा संचालित आस्थाओं का संवर्धन करने वाले किये गये क्रिया-कलापों द्वारा ही उत्पन्न होती है। तीर्थों के वाह्य कलेवर जितने बड़े थे और उसमें भी असंख्य गुनी महानता उनमें भरी रहती थी। महत्व डिब्बी का नहीं उसमें रखी हुई अँगूठी का होता है। बिकता छिलका नहीं धान-चावल है। धान तो उसके ऊपर लिपटा भर होता है। मूल्यांकन मनुष्य का किया जाता है। पोशाक तो उसकी शोभा सज्जा के लिए होती है। पोशाक के आधार पर किसी को महत्व नहीं मिल सकता। सच तो यह है कि बना पोशाक के भी महानता अपने गौरव को अक्षुण्ण रख सकती है। अच्छा व्यक्तित्व-अच्छा स्वास्थ्य-अच्छा आच्छादन का सुयोग मिल सके तब तो कहना ही क्या है। इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग है कि गरिमा उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्तित्व की है। उसी की शोभा क्षमता बढ़ाने में आवरण का उपयोग होता है।
तीर्थों में देवालयों को भव्यता-जलाशयों की शोभा-दर्शकों का आकर्षित करने वाली विचित्रता, किन्हीं स्थानों को दर्शनीय बनाये रह सकती हैं कौतूहलवश पर्यटकों का आवागमन वहाँ रह सकता है। इसमें विनोद के बदले अर्थतन्त्र का परिभ्रमण का लाभ सम्बद्ध लोगों को मिलता रह सकता है। पर्यटक विनोद खरीदें और उस आवागमन से कुछ लोग-व्यावसायिक लोक लाभ उठायें इतना उपक्रम ही यदि तीर्थों के द्वारा पूरा हो सके तो समझना चाहिए कि किसी कलात्मक प्रतिभा का उपयोग तराजू में रखे बटखरे जैसा हो रहा है। ऐसा कुछ चलता रहे और प्रतिमा का उपयोग तोल नाम में होता रहें तो इसमें प्रतिमा निर्माता को किसी प्रकार का सन्तोष नहीं हो सकता। उसे गढ़ने में जिस प्रतिभा, तन्मयता, श्रमशीलता, कलाकारिता का उपयोग हुआ था उसकी सार्थकता तो तब थी जब उसे दर्शकों की कला बुद्धि को आनन्द मिला होता। तीर्थों पर ऋषियों की दूरदर्शी योजना एवं उनके निर्माताओं पर उदार योगदान तभी सफल समझा जा सकता है जब उन केंद्रों के द्वारा धर्म चेतना उत्पन्न करने वाले, प्राणवान प्रयत्नों से ओत-प्रोत हों।
तथ्य को समझा जा सके तो तीर्थों के विद्यमान विशालकाय कलेवर में प्राण फूँकने की आवश्यकता अनुभव होगी। असाध्य रुग्णता की स्थिति दुःखद है। मरना हो तो मौत आये। जीना हो तो शक्ति रहें। चार पाई पर सड़ना किसी के लिए प्रसन्नतादायक नहीं। महान प्रयोजन सिद्ध कर सकने के उद्देश्य से बनाये गये और अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध कर सकने में पूर्णतया सुविधा सम्पन्न तीर्थों का उपयोग यदि सही रूप से न हो सके तो उसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायगा और समझा जायगा कि विचारशीलता, जागरूकता और सुव्यवस्था बनाये रहने की प्रतिभा का मूर्धन्य वर्ग में से पलायन हो गया। प्रचुर साधनों के रहते हुए उनका सदुपयोग न बन सकता यही सिद्ध करता है कि विवेक और पौरुष के हाथों से लोक नेतृत्व कर सकने वाली क्षमता छिन गई। इसे अपने युग की दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ही कहा जायगा।
प्रस्तुत आस्था संकट ही मनुष्य के आन्तरिक पिछड़ेपन का प्रधान कारण है। उसी के कारण व्यक्ति में दुष्टता और समाज में भ्रष्टता का अनुपात बढ़ता चला जा रहा है। आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, शासकीय, अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अगणित समस्याएँ बढ़ती और उलझती जाती हैं। समाधान ढूंढ़ने वाले एक छेद को बन्द नहीं कर पाते कि इस नये छेद और फूट पड़ते हैं। यह क्रम तब तक चलता ही रहेगा जब तक समस्त विकृतियों के आधार भूत कारण आस्था संकट के निराकरण के लिए कारगर उपाय न किये जाँय।
अर्थ-व्यवस्था सुधारने, उपयोगी कानून बनाने, सुविचार फैलाने जैसे प्रयत्नों की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी, पर ध्यान रखा जाय व्यक्तित्व का उद्गम मनुष्य के अन्तःकरण की गहराई में सन्निहित है। वहाँ तक न अर्थ साधन पहुँचते हैं, न कानून न शिक्षण। उस गह्वर मात्र श्रद्धा का प्रवेश हो सकता है। दूसरी वस्तु का प्रवेश है ही नहीं। उच्चस्तरीय श्रद्धा का उत्पादन, धर्म चेतना के माध्यम से ही अन्तःकरण के मर्मस्थल में संभव हो सकता है। इस विशेष काम को प्रखर धर्मनिष्ठा के अतिरिक्त और कोई कर नहीं सकता। धम्र अर्थात् आदर्श। आदर्शों का समझना समझाना तो वाणी और लेखनी के माध्यम से भी हो सकता है किन्तु उन्हें अन्तराल की गहराई में सुस्थिर रूप से प्रतिष्ठापित कर सकना मात्र धर्म धारणा के लिए ही सम्भव है। आदर्शवादी आस्थाओं को दृढ़ता पूर्वक अपनाये रहने वालों को निश्चित रूप से धर्मात्मा ही कहा जायगा।
उच्चस्तरीय आदर्शों को व्यवहार में उतारने की विधि व्यवस्था ओर पुण्य परम्परा को धर्म कहते हैं। उसे स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन आदि के द्वारा अपनाया जाता है। धर्मानुष्ठानों के सहारे उसे अभ्यास में उतारा जाता है। यह वैयक्तिक प्रयत्न हुए। सामूहिक एवं सुसंगठित रूप से उसे जनमानस में जगाने और जमाने के लिए जो कारगर उपाय ढूंढ़े गये हैं उनमें तीर्थ प्रक्रिया का असाधारण स्थान है उनमें चलने वाली गतिविधियों की प्रतिक्रिया बनाने के लिए अतीत के गौरव भरे इतिहास में प्रामाणिक साक्षी के रूप में पढ़ा जा सकता है।
युग सृजन अभियान में जन चेतना में उत्कृष्ट आदर्श वादिता का समावेश आधार भूत लक्ष्य है। उसी धूरी पर अनेकों रचनात्मक गतिविधियों को धर्मचक्र चल रहा है इन प्रयासों में एक महान कार्य तीर्थ तत्व को पुनर्जीवित करने का भी है। विडम्बनाओं से उन्हें मुक्ति मिल सके और धर्म चेतना जागृत कर सकने वाली तत्परता उसमें धुल सके तो समझना चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक महत्वपूर्ण द्वारा खुल गया।
युग की इस महती आवश्यकता की पूरा कैसे किया जाय? इसका सरल उत्तर तो यह है कि वर्तमान तीर्थ संचालकों से अनुरोध किया जाय कि वे अपनी व्यवस्था ऐसी बदलें कि उनमें तपःपूत मनीषियों की परम निस्वार्थ भाव से धर्मधारणा उत्पन्न करने वाली गतिविधियाँ चलने लगें। आशा की जा सकती है। कि वस्तुतः देवालयों का, धर्म संस्थाओं का उद्देश्य समझते होंगे तो सहज ही इस अनुरोध की स्वीकार कर लेंगे। और चुटकी बताते सब कुछ ठीक हो जायगा। तीर्थों की प्रक्रिया बदल जायगी और उनमें प्राचीनकाल जैसे दृश्य उपस्थित होने लगेंगे।
इस आशा को उचित भी कहा जा सकता है और सराहनीय भी। किन्तु व्यवहार में यह नितान्त कठिन जिसे लगभग असम्भव कह सकते है। धर्म संस्थानों से होने वाली आय का-उनके अधिपत्य से तुष्ट होने वाली अहंता का दबाव इतना अधिक है कि आज की स्थिति में उस प्रकार के परिवर्तन की तनिक भी संभावना नहीं है। स्वामित्व का मोह एक प्रकार का लाभ ही है और वह इतना प्रबल है कि मनुष्य अपनी निरुपयोगी वस्तुओं को भी किसी सत्प्रयोजन में देने के लिए तैयार नहीं हो सकता। जहाँ लोभ और मोह दोनों का समन्वय हो वहाँ तो फिर इस प्रकार का परिवर्तन और भी दुष्कर है बहुत से धर्मस्थानों में अच्छी खाती आजीविका भी है और उसे गँवाने के लिए कोई क्यों तैयार हो? धर्म का शब्दाडम्बर गढ़ना एक बात है और स्वार्थों में कमी पड़ने देना बिलकुल दूसरी। भजन पूजन करने वाले अगणित लोगों में से ऐसे व्यक्ति उँगलियों पर ही गिनने जितने मिलेंगे जो अपने स्वार्थों में कमी पड़ना सहन कर सकें। यों चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा बढ़ाने के लिए धर्मधारणा का सृजन हुआ था पर उसकी आत्मा तो न जाने कहाँ चली गई। उथले कर्मकांडों तक ही सारी विडम्बना सीमित होकर रह गई है। वस्तुस्थिति को समझा जा सकें तो उन प्रयत्न कर्ताओं की असफलता का कारण समझा जा सकेगा जो वर्तमान तीर्थों को साधन सम्पन्न धर्म स्थानों को संकीर्ण स्वार्थ परता के बन्धन में से छुड़ाने और उन्हें धर्मचेतना उत्पन्न करने के लिए हस्तान्तरित करने का अनुरोध करते रहे हैं। ऐसे प्रयत्नों में नितान्त असफलता के साक्षी युगनिर्माण मिशन के सूत्र संचालक को माना जा सकता हैं उसने मंदिरों को धम्र चेतना के प्रसार केन्द्र बनाने की दृष्टि से हर सम्भव उपाय किया है पर जिनके हाथ में उनका स्वामित्व है वे उसमें शिथिलता करने के लिए टस से मस न हुए।
अच्छा होता तीर्थ कलेवर में लगे वर्तमान साधनों का ही उपयोग धर्मधारणा की पुनर्जीवन प्रक्रिया के लिए हो सका होता। पर उसमें असफलता मिलने की संभावना-दीखने पर अब यही कदम उठाया गया है कि युग तीर्थों का नव निर्माण किया जाय जिनकी गतिविधियों को ऐसा बनाया जाय जिससे जन साधारण को तीर्थों की गरिमा स्वीकार करने और उनसे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अवसर मिल सके। गायत्री तीर्थ निर्माण योजना गायत्री शक्ति पीठों की स्थापना के पीछे एक मात्र उद्देश्य यही है कि तीर्थ तत्व अपने असली रूप में पुनः जनसाधारण के सामने उपस्थित हो सकें, और प्राचीनकाल की उस पुण्य परम्परा को क्रियान्वित कर सकें जिससे भारत भूमि को उसके महान पुत्रों की गरिमा को गगन चुम्बी बनाया था।
तीर्थ प्रक्रिया का निर्धारण जब हुआ और देवालयों के निर्माण एवं देव प्रतिमाओं की स्थापना का उपक्रम चला तो साकार ब्रह्म की प्रतिमा गोलाकार बनाई गई। शिव लिंग और शालिग्राम के गोलाकार प्रतिमा पिण्ड इस विश्व ब्रह्माण्ड को साकार ब्रह्मा का स्वरूप प्रतिपादित किया गया। पिण्ड भी गोल है- ब्रह्माण्ड भी। विश्व को विराट्-ब्रह्म की प्रत्यक्ष-प्रतिमा मानने और उसके साथ एकात्मता की अवधारणा का अभ्यास पूजा उपचार के रूप में प्रस्तुत किया गया। देवता को जल, पुष्प, अक्षत आदि को अपने श्रद्धा समर्पण के रूप में अर्पण करने का तात्पर्य है इस विश्व वसुधा को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने भाव- भरे अनुदान-अंशदान प्रस्तुत करना। अग्नि की समीपता से गर्मी मिलती है और देव की समीपता से देवत्व की भाव-सम्वेदना उपलब्ध करना। यही देवाराधन का प्रत्यक्ष प्रतिफल। इस वरदान को जो जितनी मात्रा में उपलब्ध करता है वह उसी अनुपात से भौतिक सम्पन्नताओं और आत्मिक विभूतियों से-ऋद्धि-सिद्धियों से लदता चला जाता है।
साकार देव उपासना में संध्या वन्दन के समय गायत्री की ध्यान धारणा का विधान है। त्रिकाल संध्या में प्रातः ब्राह्मी, मध्याह्न वैष्णवी और सायंकाल शाँभवी गायत्री की अभ्यर्थना करने का अनुशासन है। प्रत्यक्षतः शिवलिंग या शालिग्राम के गोलाकार प्रतीकों की अर्चना और परोक्ष प्रक्रिया में गायत्री के तीन रूपों की ध्यान धारणा है। यह क्रम चिरकाल तक चलता रहा। इतिहास पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि महत्वाकाँक्षी धर्माध्यक्षों ने अपनी-अपनी विशिष्टता सिद्ध करने और अपने अनुयायियों का संगठन बनाने की दृष्टि से सम्प्रदायों की स्थापना की और उनके समर्थक देवता तथा ग्रंथि बनाये। प्रतिस्पर्धा ने एक-दूसरे की इस घुड़ दौड़ में पीछे रहने के लिए उकसाया। फलतः अनेकानेक देवी-देवता बनते चले गये। मूल निर्धारण का व्यतिरेक करने से ही यह सिलसिला आगे चल सकता था। सौ अनेकानेक देवताओं का प्रकटीकरण होता चला गया। सामान्य देवालयों से लेकर विशिष्ट तीर्थों तक उन्हीं की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठापित होती चली गई। यह भुला दिया गया कि भारतीय तत्व ज्ञान का प्रधान उपास्य ब्रह्म विद्या ऋतम्भरा प्रज्ञा है। यदि बहु देववाद का प्रचलन ही होना है, आद्य शक्ति को क्यों विस्मृत किया जाय? यह प्रश्न न तो प्रमुख रूप से उभरा और न उसे प्रश्रय मिला। फलतः औचित्य की दृष्टि से सर्वप्रथम गायत्री प्रतिमाओं की बात आगे रहनी चाहिए थी, सो न रहकर साम्प्रदायिक उत्साह की आपाधापी में उसे एक प्रकार से भुला ही दिया गया। छोटे रूप में गायत्री की प्रतिमाएँ तो बनी रहीं, छोटे देवालय भी बनते रहे पर निजी प्रतिपादन के अत्युत्साह ने अन्यान्य देवताओं-अवतारों को ही महत्व प्रदान किया। गायत्री प्रधान तीर्थों देवालयों के लिए कोई कहने लायक प्रयास न बन सका। पुष्कर जैसे कुछ ही तीर्थ ऐसे हैं जिन्हें गायत्री प्रधान कह सकते है।
इस भूल का परिमार्जन करने का समय आ गया। जब निराकार देव शक्तियों की साकार प्रतिष्ठापना की उपयोगिता स्वीकार ही कर ली गई तो प्रधानता, आद्यशक्ति गायत्री को क्यों न मिले? गायत्री तीर्थों के आधुनिक निर्माण की पुण्य परम्परा गायत्री तपोभूमि मथुरा से आरम्भ हुई और इन्हीं पिछले बीस वर्षों में छोटे-बड़े सैकड़ों गायत्री मन्दिरों की स्थापना हो चुकी है। गायत्री परिवार की प्रायः छः हजार शाखाओं में बड़े साइज के गायत्री चित्र, देव प्रतिमा की तरह स्थापित हैं और वहाँ उनकी नित्य पूजा आरती होती हैं शान्ति कुंज एवं ब्रह्मवर्चस के गायत्री मन्दिर प्रसिद्ध हैं। इस वर्ष से ब्रह्म वर्चस की एक मंजिल गायत्री के 24 अक्षरों की 24 प्रतिमाओं के 24 देवालयों के रूप में गायत्री शक्ति पीठ की अभिनव प्रतिष्ठापना हुई है। इसे अंतर्राष्ट्रीय गायत्री तीर्थ की संज्ञा दी गई है। शुभारंभ के दृष्टि से यह श्री गणेश भी कम उत्साह वर्धक नहीं है, पर इतने भर से कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। महत्व को देखते हुए इस प्रतिष्ठापना का प्रसार विस्तार व्यापक होना चाहिए।
इस संदर्भ में बड़े प्रयास की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि युग अवतार का सीधा सम्बन्ध प्रज्ञावतार से है। “यदा यदा हि धर्मस्य.........’’ का आश्वासन देने वाली सत्ता को जब भी असंतुलन उग्र हुआ तो उसे सम्भालने के लिए स्वयं ही दौड़ कर आना पड़ा है। सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप ही अवतारों के स्वरूप तथा क्रिया कलाप रहे है। वर्तमान युग की सामयिक कठिनाइयों का एक मात्र कारण आस्था संकट हैं इसका निराकरण प्रज्ञा ही कर सकती हैं प्रज्ञा-अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा। ऋतम्भरा अर्थात् गायत्री। संक्षेप में गायत्री। संक्षेप में गायत्री में सन्निहित तत्वज्ञान का जन-मानस में प्रवेश करना-ज्ञानयज्ञ का युग अनुष्ठान करना-विचारक्रान्ति के रूप में अपना लीला संलाप प्रस्तुत करना यही होंगी अनाचारी असुर को निरस्त करने के लिए प्रज्ञा ही समर्थ हो सकती है। वही होगी भी। विश्व के नये निर्धारण में जिन आस्थाओं, विचारणाओं एवं परम्पराओं का उपयोग होना है वे सभी गायत्री महामन्त्र में सन्निहित प्रेरणाओं से ही अनुप्राणित होंगी। यह विश्व माता के रूप में आद्यशक्ति का युग अवतार है। चौबीसवें अवतार को निष्कलंक कहा गया है। पूर्णतः निर्दोष, निष्कलंक कोई मनुष्य नहीं हो सकता। कोई शरीर धारी कितना ही शुद्ध क्यों न हो कलंक कालिमा को कुछ चिन्ह बने ही रहेंगे। निष्कलंक तो विवेक ही है। विवेक ही सत्य को सही रूप में प्रस्तुत करता है। सत्यनारायण कहा जाय अथवा विवेक नारायण। इस नामों में भगवान के उसी रूप को मान्यता मिली है; जिसे प्रज्ञावतार कहा जा रहा है। प्रज्ञावतार कहा जा रहा है। प्रज्ञा के सम्मुख समस्त संसार श्रद्धावनत होने जा रहा है। इसके सूत्र संकेतों को प्रधानता देते हैं। नवयुग की मान्यताओं एवं परम्पराओं का निर्धारण एवं प्रचलन होने की सुनिश्चित सम्भावना है। गायत्री मन्त्र किसी देश, जाति, धर्म के सीमा बन्धनों में जकड़ा न जा सकेगा, उसे विश्व का भाग्य निर्माण करने वाली दिव्य प्रेरणा के रूप में लोक मान्यता मिलेगी। ऐसी दशा में यह उचित ही होगा कि युग शक्ति को प्रतीक प्रतिष्ठापना को भावभरा प्रश्रय दिया जाय तीर्थ परम्परा को पुनर्जीवित करने में उसी को प्राथमिकता मिले। यह इसलिए भी आवश्यक है कि जिन आदर्शों के अनुरूप व्यक्ति और समाज को ढलना है उनके प्रशिक्षण को समर्थ माध्यम गायत्री के विग्रह को ही उपयोग क्यों न किया जाय? आद्यशक्ति को युग शक्ति के रूप में प्रकट होने एवं विश्व माता की भूमिका निभाने की प्रक्रिया का उपयुक्त अवसर गायत्री तीर्थों की स्थापना से जैसी अच्छी तरह सम्भव हो सकता है। उतना अन्य किसी प्रकार नहीं।
बसन्त पर्व पर युग सृजन की महाशक्ति के हर वर्ष नये निर्देश उतरते हैं। युग निर्माण मिशन की गतिविधियों का अद्यावधि सूत्र संचालन इसी क्रम से होता चला आया है। इस बसन्त पर्व पर गायत्री शक्ति पीठों का विश्व व्यापी प्रतिष्ठापना की प्रेरणा उभरी है। महाकाल के संकल्प कभी अधूरे नहीं रहे। इस सन्देश के अपूर्ण रहने की कोई आशंका नहीं मनुष्य तुच्छ है, उसके साधन भी स्वल्प हैं, प्रतिभा एवं पराक्रम भी सीमित हैं। इसलिए उसके निजी प्रयासों में परिस्थिति के अनुरूप कुछ सफल कुछ असफल होते रहते हैं। किन्तु देवी संकल्प के बारे में ऐसी कोई बात नहीं है। सर्व समर्थ सत्ता अपने प्रयोजन पूरे तो उसी मनुष्य शरीर द्वारा ही कराती है, पर वस्तुतः उसको सम्भालने, साधन जुटाने और सफल बनाने का उत्तरदायित्व वह स्वयं ही सम्भालती है। श्रेय उन सौभाग्यशालियों को अनायास ही मिल जाता है जो ऐसे महान प्रसंगों में प्रभु कृपा से निमित्त बन जाने को बनाये जाते हैं। प्रज्ञावतार का आलोक विश्व व्यापी बनाने के लिए गायत्री तीर्थों की स्थापना का अभियान भी ऐसा ही है जिसे पूरा तो कुछ मनुष्य ही करेंगे पर सूक्ष्मदर्शी उसकी सफलता में अदृश्य शक्ति द्वारा सूत्र संचालन होने तथा साधन व्यवस्था का एकत्रीकरण किये जाते प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे।
गायत्री शक्ति पीठ का प्रथम शिलान्यास ब्रह्मवर्चस हरिद्वार में हुआ है। चौबीस अक्षरों की चौबीस प्रतिमाओं का परिचायक यह धर्म संस्थान अन्तर्राष्ट्रीय गायत्री तीर्थ माना जायगा। इसी का विस्तार दूसरे चरण में 24 गायत्री तीर्थों की स्थापना के रूप में किये जाने का निर्धारण है। यह 24 स्थापनाएँ भी एक क्रम व्यवस्था मात्र है। इसे विराम निर्धारण समझा जाय। वस्तुतः उसका विस्तार होगा और वह प्रगति 108 की संख्या को पार करती हुए 240 प्रतिष्ठापनाओं में गिनी जा सकेगी। यह विस्तार क्रम है। यह आरम्भ चर्चा है अन्तिम सिरे तक पहुँचते-पहुँचते भारत भूमि को पार करके इन निर्माणों को देख-देशान्तरों में होते हुए देखा जा सकेगा।
सर्वप्रथम परम्परागत तीर्थों वाले स्थानों का चयन किया गया है। क्योंकि धर्म प्रेमी जन-समुदाय कभी न कभी, किसी न किसी तीर्थ में जाही पहुँचेगा वहाँ पहुँचने पर उसे इस विस्तार में छोटी किन्तु ऊर्जा भरी-पूरी गायत्री शक्ति पीठ में पहुँचने का अवसर निश्चित रूप से मिलेगा। किसी तीर्थ यात्री के लिए सम्भव ही न होगा कि बिना इन नव निर्मित तीर्थों का आलोक ग्रहण किये वापिस लौट सके। धर्म श्रद्धा युक्त आत्माएँ आसानी से युग शक्ति के अवतरण का तथ्य समझने और हृदयंगम करने के सौभाग्य से लाभान्वित हो सकेंगी। प्रस्तुत गायत्री तीर्थों की स्थापना से यह पुण्य प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकेगा।
गायत्री शक्ति पीठों की स्थापना के प्रथम चरण में 24 पुरातन तीर्थों को प्राथमिकता दी गई है। प्रस्तुत योजना के अंतर्गत यह स्थान इस प्रकार है-
उत्तर प्रदेश- (1) प्रयाग (2) काशी (3) अयोध्या (4) बद्रीनाथ (5) चित्रकूट।
गुजरात- (6) अम्बाजी (7) डाकेरजी (8) जूनागढ़ (9) द्वारिका (10) सोमनाथ
मध्य प्रदेश- (11) उज्जैन (12) ओंकारेश्वर (13) अमर कंटक।
बिहार- (14) गया (15) बैजनाथ धाम।
उड़ीसा- (16) जगन्नाथ पुरी।
राजस्थान- (17) नाथद्वारा (18) पुष्कर।
हरियाणा- (19) कुरुक्षेत्र।
जम्मू-काश्मीर- (20) वैष्णव देवी।
महाराष्ट्र- (21) नासिक (22) पंढरपुर।
दक्षिण भारत- (23) रामेश्वरम् (24) तिरुपति बाला जी।
नामों का यह प्रथम निर्धारण है। जहाँ अधिक उत्साह दिखाया गया है। उन तीर्थों के लिए अतिरिक्त निर्णय किया गया है। ऐसे निर्णयों में गुजरात के दो स्थान बढ़ाये गये है। (1) चाडोद (2) वीर पुर। इन्हें पच्चीसवाँ और छब्बीसवाँ माना जा सकता है। उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी के अतिरिक्त (1) राउर केला और (2) काँटा भाँजी का भी ऐसा ही आग्रह हैं और उसे लगभग स्वीकार ही किया जा रहा है। इस प्रकार उड़ीसा में भू पूर्ण निर्णय के अतिरिक्त दो तीर्थ और बढ़ चले इन्हें सत्ताईसवाँ और अट्ठाईसवाँ कहा जा सकता हैं।
जहाँ पुराने तीर्थ नहीं है वहाँ के स्थानीय लोगों के आग्रह उत्साह को देखते हुए नई स्थापनाओं के संदर्भ में उदार विचार किया जा रहा है। पूर्व घोषित चौबीस में कुछ स्थान ऐसे है जहाँ इस वर्ष व्यवस्था बनती नहीं। दीखती। इसलिए इनके स्थान पर दूसरे निर्धारित करने जैसे परिवर्तनों को भी सम्भावना है।
यथागवाँ सर्वशरीरजंपवः पयोधरत्रि सहतीकेवलम् तथा परामखिएगोपि शाश्वतों विकासमाप्नोति से दिव्यदेशकः
जिस प्रकार दूध गौ के सब शरीर में व्याप्त लेने पर भी केवल स्तन द्वारा क्षरित होता है, उसी प्रकार परमात्मा के व्यापक होने पर भी विकास दिव्य देशों में होता है।
गायत्री तीर्थों की स्थापना का कार्य लगता तो ऐसा है मानों कोई नया प्रयास है, पर वास्तविकता यह है कि यह ऋषि प्रणीत तीर्थ परंपरा का जीर्णोद्धार मात्र है। इसे चिर पुरातन का चिर नवीन के साथ नये सिरे से किया गया गठबन्धन मात्र कह सकते है। इस अभिनव प्रयत्न में वे सभी तत्व कूट-कूट कर भरे है। जिनसे उन मूल प्रयोजनों की पूर्ति हो सके जिसे ध्यान में रख कर तत्व दर्शी महामनीषियों ने यह अत्यंत दूर दर्शिता पूर्ण योजना-धर्म धारणा को जीवन्त एवं ज्वलन्त रखने के लिए बनाई थी।
प्रस्तुत योजना के तीन अंग है (1) स्थानों का चयन एवं भवनों का निर्माण (2) उनके द्वारा उनमें संचालित रहने वाली गतिविधियों का निर्धारण (3) संचालन कर्ता परिव्राजकों का प्रशिक्षण एवं निर्वाह। इन तीनों ही दिशा धाराओं को गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलन का संगम कह सकते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना के मिलने से जागृत होने वाली -युगान्तर चेतना के रूप में उभरने वाली कुण्डलिनी का विश्व जागरण भी इसे माना जा सकता है। सत् भावना में सत्य, विचारणा में शिवम् और क्रिया में सुन्दरम् का प्राण संचार करने वाली इसे गतिशील गायत्री कह सकते हैं। देखने सुनने में यह कोई भवन निर्माण जैसा कार्यक्रम लगता है किन्तु वस्तुतः इसे धर्मचेतना का रक्त संचार करने वाली महाधमनी में अड़े हुए अवरोध को हटाने वाला एक अद्भुत शल्य प्रयोग ही समझा जाना चाहिए और विश्वास किया जाना चाहिए कि इसके दूर गामी परिणाम होंगे। युगनिर्माण अभियान को उछाल देने की इसे ऐसी तैयारी कहा जा सकता है जैसी कि अन्तरिक्षीय राकेट भेजने के लिए उस यान को उछाल देने वाली प्रचण्ड ऊर्जा जुटाते समय की जाती है।
प्रथम प्रयोजन है स्थानों का चुनाव। इसके लिए उन सभी बातों को ध्यान में रखना होगा जिन्हें प्राचीन काल के ऋषियों को ध्यान में रखना होगा जिन्हें प्राचीन काल के ऋषियों ने ध्यान में रखकर उपयुक्त क्षेत्रों का चयन किया था। इस निर्वाचन में उन्होंने कई बातों का ध्यान रखा है यथा-
(1) ऐतिहासिक प्रेरणाएं-जिनकी स्मृति दिलाने पर आगन्तुकों की भावनाएँ उछलने लगें और महान पूर्वजों के चरित्रों-प्रेरणाओं, एवं निर्देशों को अपनाने के लिए उत्साह उमँगे। महानता को अपनाने वाले महामानवों के प्रति श्रद्धा उमंगे। उनके प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के लिए श्रद्धाँजलि चढ़े। अनुसरण एवं अनुगमन का भाव उठे।
(2) जलवायु की दृष्टि से -उन स्थानों की विशेषता हो। वहाँ कुछ समय निवास करने वालों को प्रकृति विशेषता एवं वातावरण की उपयुक्तता का लाभ मिले।
(3) धर्म प्रचारकों को जनजागरण प्रक्रिया में सहायता देने वाले साधन जहाँ स्थानीय एवं क्षेत्रीय सहयोग से सरलता पूर्वक उपलब्ध हो सकें।
(4) धर्म चेतना उत्पन्न करने के लिए विभाजित क्षेत्रों का जहाँ एक मण्डल केन्द्र बन सके।
(5) जहाँ अधिक जन संपर्क बन सके जहाँ आवागमन की यातायात सम्बन्धी हो।
प्राचीनकाल में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तीर्थों का निर्धारण किया गया था गायत्री तीर्थों के लिए स्थानों का चयन करते समय भी इन्हीं तथ्यों के ध्यान में रखा गया हैं परंपरागत तीर्थों वाले स्थान इस दृष्टि से अधिक उपयुक्त माने गये है। ऋषियों के चयन इस दृष्टि से बहुत ही उपयुक्त थे। उन्होंने महामानवों के व्यक्तित्वों की एवं प्रेरणाप्रद महान घटनाओं की ऊर्जा का बाहुल्य जिस भूमि में अपनी सूक्ष्म दृष्टि देखा वहाँ उन्होंने तीर्थ निर्माण की योजना बनाई और समर्थ लोगों को प्रेरणा देकर उसकी पूर्ति कराई। साथ ही यह भी ध्यान में रखा कि इसके अतिरिक्त अन्य चार प्रयोजन भी वहाँ पूरे हो सकते हैं या नहीं। जहाँ उपयुक्तता देखी वहाँ ध्वजा गाढ़ी और व्यवस्था बनाई।
गायत्री तीर्थों के नव-निर्माण में उस पूर्व परम्परा का अनुसरण करना अधिक सरल है। इन स्थानों में धर्म कृत्य श्रद्धा अश्रद्धा से किसी प्रकार होते ही रहते हैं और उनका प्रभाव भूमि को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। हर तीर्थ के पीछे ऐतिहासिक सत्प्रयत्नों को भूमिका है। वहाँ धर्म प्रयोजनों के लिए अनेकों व्यक्ति सहज ही आते रहते हैं। इनमें संपर्क साधनों में प्रचलित प्रवाह के कारण सरलता रहेगी। नव सृजन के लिए धर्म चेतना सम्पन्न व्यक्तियों को अग्रिम पंक्ति में आना होगा। धर्म तन्त्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए ऐसे व्यक्तियों का सहयोग अपेक्षित है जिनमें इस प्रकार के संचित संस्कार विद्यमान हों। इन्हें कहाँ से ढूँढ़ा जाय। अन्य प्राणियों को तलाशना हो तो जलाशयों के निकट जाना चाहिए जहाँ वे प्रायः ही जाते है। भिन्न-भिन्न स्थानों पर उन्हें तलाश करने की अपेक्षा एक ही स्थान पर ढूँढ़ खोज जारी रखी जाय और संपर्क बनाकर सुसंस्कारित का पता लगाया जाय तो निश्चित रूप से वर्तमान तीर्थों वाले स्थान अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति अधिक आसानी से कर सकते हैं।
तीर्थ यात्रियों को गायत्री माता का छोटा चित्र वितरण करते रहने तथा स्थानीय गायत्री तीर्थ में पधारने का आमन्त्रण देते रहने से वहाँ भी सहज ही यात्रीगण पहुंचेंगे उन्हें इस देवालय में स्थापित गायत्री की नौ प्रतिभाओं का दर्शन कराते हुए धर्म चेतना की नो दिशा धाराओं का परिचय कराने के लिए नियुक्त मार्ग दर्शक प्रसंग की जानकारी कराते रहें तो आगन्तुकों को प्रज्ञावतार की दैवीभूमिका तथा उसके लोकव्यवहार में उतरने की सुखद प्रतिक्रिया की जानकारी कराई जाय तो निश्चित रूप से हर दर्शक को एक ऐसी जानकारी मिलेगी जिसे प्राप्त करने से तीर्थ यात्रा की सार्थकता होती है।
इन स्थापित तीर्थों में हर यात्री की गायत्री संदर्भ की जिज्ञासाओं के समाधान की नियमित व्यवस्था रहेगी। जो कुछ अधिक जानना चाहेंगे उन्हें सत्कार पूर्वक बिठाया जायगा और पूरे मनोयोग से इस तत्वज्ञान का परिचय कराया जायगा। इस प्रकार दर्शनार्थी देवालय की झाँकी करने में भगदड़ मचाने एवं रेल-पेल करने की अपेक्षा शान्त चित्त से कुछ समय बैठने, शीतल जल आदि का सत्कार पाने एवं आत्मीयता पूर्वक विस्तृत जानकारी प्राप्त करने पर ऐसा अनुभव करेंगे कि उन्हें तीर्थ परम्परा के प्राचीन स्वरूप की झाँकी हो रही है। गायत्री तीर्थों में नियुक्त मार्गदर्शकों द्वारा नौ प्रतिमाओं का परिचय कराने-समाधान कक्ष में नियुक्त समाधानी द्वारा सत्कार पूर्वक जिज्ञासाओं के समाधान के साथ-साथ वह सब कुछ बताया जा सकता है जो जन मानस के परिष्कार एवं उत्कृष्टता की परम्परा प्रचलित करने के लिए आवश्यक है।
परम्परागत तीर्थों में धर्म रुचि के लोगों के अनायास ही पहुँचने रहने के कारण उनसे संपर्क साधना और युग चेतना से अवगत कराना अपेक्षाकृत अधिक सरल रहेगा। नये स्थानों पर इस रुचि के व्यक्तियों को खोजने में नये स्थानों पर इस रुचि के व्यक्तियों को खोजने में नये सिरे से प्रयत्न करने पड़ेंगे।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री तीर्थों के निर्माण का प्रथम चरण यही है कि प्रख्यात तीर्थों को प्राथमिकता दी जाय। भारत में हजारों तीर्थ हैं। उनमें से चुना उन्हें जाय जहाँ धर्मप्रचार का एक क्षेत्र बन सकें। स्थापना के स्थान एक दूसरे से अतिनिकट नहीं घोषित 24 स्थानों में उपरोक्त सभी आवश्यकताएँ बहुत हद तक पूरी होती हैं
तीर्थों के प्रति जन साधारण के मन में अवज्ञा का भाव भरता और बढ़ता जा रहा है यह खुली सचाई है। दर्शकों में तीर्थ बुद्धि कम और पर्यटन प्रवृत्ति की ही अधिकता रहती है। इसका एक बड़ा प्रमाण यह है कि मन्दिरों में चढ़ने वाले पैसों का परिमाण दिन-दिन घटता जाता है, यद्यपि भीड़ में निरन्तर बढ़ोतरी ही हो रही है। इसका कारण है तीर्थ संचालकों द्वारा दर्शकों की बेतरह जेब काटने की प्रवृत्ति और इन संस्थानों की अनुपयोगिता ईसाई धर्म संस्थानों में कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलती है। फलतः उनके प्रति विचारशील अनुयायियों की श्रद्धा घटती नहीं बढ़ती ही जाती है। अपने तीर्थों में छान के धन पर कुछ लोगों को गुलछर्रे उड़ाते भर ही देखा जा सकता है। इसी दशा में जन-विवेक को झुठलाया नहीं जा सकता। अन्धश्रद्धा को फुसला लेना एक बात है और विचारशील वर्ग के सम्मुख उपयोगिता प्रमाणित करके उनकी आन्तरिक श्रद्धा अर्जित करना दूसरी। कहना न होगा कि आज के तीर्थ इस कसौटी पर खरे सिद्ध नहीं हो रहे है। फलतः उन्हें देखने के लिए बहुतों के पहुँचते रहने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनके आगमन का श्रम भावश्रद्धा में बदलने में अभिवृद्धि करके वापिस लोटा। यदि ऐसा नहीं हो सका तो तीर्थ यात्रा का प्रयोजन कहाँ पूर्ण हुआ?
अनुपयुक्तता के कारण बढ़ती अश्रद्धा को कलियुग का प्रभाव या नास्तिकता का दौर कह कर आत्मप्रवंचना तो की जा सकती है, पर उससे उस दुःखद संभावना की रोकथाम नहीं हो सकती, जिसमें तीर्थ तत्व की अनुपयुक्तता के कारण तिरस्कार एवं आक्रोश के तत्व निरन्तर बढ़ते हुए दृष्टिगोचर होते हैं यह क्रम चलता ही रहा तो कुछ दिन पश्चात् तीर्थ परम्परा का रहा बचा प्राण भी निकल जायगा और उन्हें मात्र कौतूहल की दृष्टि से ही देखने जाने की विडम्बना भर बच जायेगी।
सही उपाय यही है कि वर्तमान तीर्थ वस्तुस्थिति को समझते और समय से पूर्व ही जग कर अपना रवैया बदलते। ईसाई मिशनों का अनुकरण करते और उपलब्ध साधनों का धर्मचेतना उत्पन्न करने वाली लोकोपयोगी प्रवृत्तियों में उपयोग करते। वर्तमान स्थिति में ऐसा सम्भव नहीं दीखता। निहित स्वार्थों की उन पर काली छाया बहुत गहरी छाई हुई है। लोभ और मोह की जंजीरों ने उनके संचालकों को इस तरह जकड़ लिया है कि उन्हें सुधार परिवर्तन के लिए हम करना असंभव जितना ही कठिन है। प्रयत्न कर्ताओं ने अपनी पूरी शक्ति इस संदर्भ में पिछले चालीस साल से लगाई है ओर संकोच छोड़ कर अपनी पूर्ण पराजय स्वीकार की है।
ऐसी दशा में दूसरा उपाय यही बच जाता है कि नये तीर्थ ऐसे विनिर्मित किया जाँय; जिन्हें देख कर तीर्थों को “धर्म व्यवसायियों का षड्यंत्र “ कहने वालों को नये सिरे से विचार का अवसर मिले और वे यह अनुमान लगा सकें कि प्राचीनकाल में इस महान स्थापना का क्या प्रयोजन रहा होगा और वे जिन दिनों जीवन्त रहे होंगे उन दिनों उनके द्वारा कितने उच्चस्तर की लोक सेवा होती रही होगी।
तुलना का अवसर मिलने पर ही जन विवेक को स्वस्थ समीक्षा करने और उपयुक्तता, अनुपयुक्तता के मध्य अन्तर करने की सुविधा होती है। अनुपयुक्त को कोसते रहना निषेधात्मक कृत्य है। काम उतने भर से नहीं चलेगा। इसका रचनात्मक पक्ष भी प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। अभी बढ़ती हुई अश्रद्धा की रोकथाम हो सकती है। अवांछनियताओं का विरोध ही एक मात्र उपाय नहीं है उसकी तुलना में वाँछनीय क्या हो सकता है उसका भी प्रस्तुतीकरण होना चाहिए। वरन् निषेध की प्रबलता किसी तथ्य का पूर्णतया उन्मूलन भी कर सकती है। तीर्थों के प्रति बढ़ती हुई अनास्था किसी दिन उस प्रक्रिया की जड़ें की उखाड़ कर फेंक सकती है। भले ही उसे नास्तिकता या कुछ और कहते रहा जाय। दूर दर्शिता इसी में है कि जिस तथ्य को जीवित रखना हो उसकी उपयोगिता समझने का अवसर भी जनसाधारण को मिलता रहें। इसी सामयिक आवश्यकता को पूरा करने में गायत्री तीर्थों के प्रति सनातन श्रद्धा को नष्ट होने से बचाने वाले जागरूक प्रहरी कहला सकेंगे। भले ही उन पर निहित स्वार्थों के द्वारा आक्षेप और आक्रमण होते रहें।
गायत्री तीर्थों की स्थापना के प्रथम चरण में जिन चौबीस स्थानों की घोषणा की गई है; उनका निर्धारण पत्थर की लकीर नहीं है। यह संख्या भी बढ़ सकती है और नये स्थानों का निर्धारण भी हो सकता है तभी यात्रा की योजना बनाते समय रास्ते बनाते समय रास्ते के विराम स्थानों की भी रूपरेखा बना ली जाती है। 24 तीर्थों का संकल्प एक विराम हैं आरंभ है अन्त नहीं। यह यात्रा तो बहुत लम्बी है। लक्ष्य की चरम पूर्ति तक ऐसे-ऐसे अनेकों संकल्प बनते और पूरे होते रहेंगे। उन्हें पूरा करने के लिए वर्तमान सू. संचालक तो जीवित न रहेंगे पर इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। महाकाल का आवेश जिन्हें भी इस प्रयोजन का आगे बढ़ाने के लिए वरण करेगा वे साधन रहित दीखते हुए भी हनुमान अंगद और नल-नील जैसी ऐतिहासिक भूमिकाएँ सम्पन्न करते देखे जायेंगे।
संख्या की दृष्टि से चौबीस इसलिए चुने गये हैं कि प्रज्ञावतार गायत्री मन्त्र के 24 अक्षर है। ब्रह्मवर्चस् में बनी गायत्री शक्ति पीठ में चौबीस प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। साथ ही चौबीस तीर्थ स्थानों पर गायत्री शक्ति पीठें बनाने का संकल्प भी। यह एक विराम है। पंचवर्षीय योजनाएँ तो कितनी ही बन चुकीं। चौबीस महीने से चौबीस तीर्थ बनाने की योजना में से वर्तमान संकल्प को प्रथम कह सकते हैं इसके उपरान्त भी यह सिलसिला जारी रहेगा। 108 और 240 के अंकों को उपासना क्षेत्र में 24 की तरह ही महत्वपूर्ण माना जाता है। तीर्थ स्थापना की संख्या भी क्रमशः बढ़ती ही जायगी।
परम्परागत तीर्थों के अतिरिक्त जहाँ धर्मचेतना को अग्रगामी बनाने जैसा उत्साह पाया जायगा- जहाँ के क्षेत्रीय लोग अपने यहाँ इसका महत्व समझेंगे और उसके लिए श्रम सहयोग प्रस्तुत करेंगे, वहाँ भी इसी श्रृंखला में नये निर्माण में सम्मिलित होते चलेंगे। यह पंक्तियां लिखे जाते समय तक ऐसे नये स्थानों में उड़ीसा के राउर केला और काटाभाजी दो स्थान बढ़ा दिये गये है और सम्मिलित कर लिए गये है। इस प्रकार 24 के स्थान पर 28 तो इस प्रथम संकल्प में ही बढ़ गये। जहाँ तीर्थ नहीं है-वहाँ भी नये तीर्थ स्थापित करने की गुंजाइश रहने के कारण सम्भव है। 24 महीने में 24 तीर्थ बनाने का संकल्प पूरा होने के साथ-साथ संख्या की दृष्टि से इतना बढ़ जाय जिसको आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित कहा जा सकें। व्यक्ति के संकल्प अधूरे रहते है। महाकाल के संकल्प तो महा पुरश्चरण अभियान के घोषित लक्ष्य की तुलना में बीस गुना अधिक हो जाने की तरह तीर्थ स्थापना का विस्तार भी कई गुना हो सकता है।
शरीर पाँच तत्वों से बना है और चेतना का संचार पाँच प्राणों द्वारा होता है। काया की संरचना जल, पवन, पृथ्वी, अग्नि और आकाश से हुई है और जीवन चेतना का संचार प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान इन पाँच प्राणों के द्वारा हो रहा है। पंच, गव्य, पंचामृत, पंचाँग, पंच रत्न, जैसे वर्गीकरण में इस पंचधा संरचना का बोध होता हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ-पाँच कर्मेंद्रियां-पाँच नियम और पाँच उप नियम प्रसिद्ध है। यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या सिखाई थी। यह कुण्डलिनी जागरण के लिए प्रयुक्त होने वाली पाँच प्राण साधनाएँ है। बृहस्पति ने देव समुदाय के पाँच कोशों का अनावरण कराया था। यह वैदिक पक्ष है। इन साधनाओं की सफलता से जो पाँच विभूतियाँ उपलब्ध होती है, उन्हीं को देव संज्ञा दी गई है। पाँच देवता प्रसिद्ध हैं। उन्हीं की शक्तियों को देवियाँ कहते है। देव और देवियों में पाँच-पाँच ही प्रधान हैं। इन्हें सावित्री के पाँच मुख कह सकते हैं।
गायत्री तीर्थों को पंच सूत्री कार्यक्रमों को बौद्धमर्यादाओं में प्रधानता प्राप्त पंचशील कह सकते हैं। शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में से प्रत्येक की पाँच-पाँच मर्यादाएँ हैं। उनमें प्रत्येक के उत्कर्ष की पाँच-पाँच योजनाएँ है। इन्हीं को पंचशील कहा गय है। गायत्री साधना के अविच्छिन्न अंग बलिवैश्व में की पाँच आहुतियाँ नित्य देने की विधि परम्परा में इन्हीं पंचशीलों को धारण करने और उन्हें निष्ठापूर्वक अपनाये रहने का संकल्प दुहराया जाता है।
गायत्री तीर्थों की निर्धारित कार्य पद्धति को सुसंचालित रखने के लिए पाँच-पाँच व्रतशील परिव्राजकों के जत्थे नियुक्त रहेंगे। रजत जयन्ती वर्ष में प्रव्रज्या अभियान को गतिशील किया गया है। समयदानी, कनिष्ठ और वरिष्ठ वर्ग के आस्थावान परिव्राजकों ने अपने श्रम समय का जो अनुदान, अंशदान किया है, उसका उपयोग करने के लिए उनकी नियुक्तियाँ इन्हीं गायत्री तीर्थों में होती रहेंगी और वे उस धर्म केन्द्र के स्थानीय गतिविधियों को सुसंचालित रखने के अतिरिक्त समीपवर्ती क्षेत्रों में नव जागरण की चेतना उत्पन्न करने के उद्देश्य से परिभ्रमण करते रहेंगे। साधारणतया तीन तीर्थ में रहकर वहाँ के उत्तरदायित्वों का निर्वाह करेंगे और दो अपने नियत निर्धारित मंडल पैदल एवं साइकिलों से धम्र चेतना उत्पन्न करने के निमित्त नियमित रूप से लाया करेंगे। हर गायत्री तीर्थ में पाँच परिव्राजकों की नियुक्ति होगी। और वे ही तीर्थ की सीमा में तथा उसके साथ जुड़े हुए क्षेत्र में आलोक वितरण करने जाया करेंगे।
प्रव्रज्या अभियान और गायत्री तीर्थ स्थापना को एक-दूसरे का पूरक कहा जाता हैं दोनों के मध्य अन्योन्याश्रय सम्बन्ध रहेगा। तीर्थ की इमारत को पाँच तत्वों से बना हुआ शरीर और उसमें गतिविधियों का जीवन संचार करने वाले पाँच प्राणों के प्रतीक पाँच परिव्राजकों के रूप में देखा जा सकेगा। रजत जयंती वर्ष के आरम्भ में प्रचार केन्द्र बनाये जाने का संकेत किया गया था और प्रव्रज्या अभियान हाथ में लिया गया था। प्रव्रज्या अब प्रौढ़ हो गई है। उसने महापुरश्चरण अभियान में सफल योगदान दिया है। तीर्थ यात्रा पद यात्रा, प्रव्रज्या उस रूप में तो जारी रहेगी ही, अब उसी अभियान को गायत्री तीर्थों के संचालन का कार्य भार भी सौंपा जायगा।
आमतौर से मन्दिरों में पुजारी ऐसे रखे जाते हैं जिन्हें स्वल्प वेतन में उपलब्ध किया जा सके। थोड़ा वेतन पाने और आवश्यकता एवं इच्छा अधिक रहने के कारण उन्हें एक ही उपाय सूझता है कि चढ़ोत्तरी का पैसा मन्दिर समिति को न देकर अपने पास रखा जाय। आगन्तुकों को जप कराने, जन्म पत्री बनवाने, कथा, कराने, भोजन दिलाने जैसे आग्रह करके कुछ न कुछ वसूल करते रहा जाय। इस याचना वृत्ति का परिणाम अश्रद्धा ही हो सकता है, वैसा ही होता भी है। देवालय के पुजारी वहाँ पहुँचने वालों की दृष्टि से उथले स्तर के ही होते है। उनका कोई नैतिक प्रभाव नहीं होता। ज्ञान एवं तप का अभाव रहने से वे इन आगन्तुकों को कोई उच्चस्तरीय प्रेरणा भी नहीं दे पाते। प्रमाण तो कितने ही करते हैं, पर आशीर्वाद फलित हो सके ऐसे बल प्रभाव की पूँजी न होने से उनका कथन निष्फल ही चला जाता है। पुजारी होने के लिए ब्राह्मण वंश के लोग ही उपयुक्त समझे जाते हैं, पर यह नहीं देखा जाता है कि उनमें ब्राह्मणत्व कितनी मात्र. में है। कहीं निर्धन कहीं प्रचुरधनवान पुजारियों में उनका पिछड़ापन या चातुर्य ही कारण होता है। दोनों ही परिस्थितियों में उस विशिष्टता का अभाव ही दीखता है जो तीर्थ संचालकों में होनी चाहिए। देवपूजा के निरन्तर संलग्न रहने वाले व्यक्ति भी यदि देवोपम न बन सकें तो फिर इस तथ्य को कौन स्वीकार करेगा कि देवालयों में प्रतिष्ठित प्रतिमाओं के दर्शन से किसी को कुछ संतोषजनक सत्परिणाम उपलब्ध हो सकेंगे।
गायत्री तीर्थों का निर्माण उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है। आवश्यक है कि उनकी गतिविधियों का संचालन करने वाले भी व्यक्तित्व की दृष्टि से ऐसे हों, जो संपर्क में आने वालों में धर्म श्रद्धा का संचार कर सकें। यह स्तर ही वह आधार है जिसके सहारे इन धर्म संस्थानों के सफल सिद्ध होने की आशा की जा सकती है।
गायत्री तीर्थों में नियुक्त पाँच परिव्राजक स्थानीय कर्मचारी नहीं होंगे। वे ब्रह्मवर्चस शान्ति कुँज में प्रशिक्षण प्राप्त होंगे। उन्हें गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से ऐसा बनाने का प्रयत्न किया जायगा जो सौंपे गये उत्तरदायित्व को सँभाल सकने के उपयुक्त कहा जा सके। तीर्थ पुरोहित को उपासना पद्धति एवं धर्म-कृत्य करा सकने की शास्त्रीय जानकारी होनी चाहिए। वे अपने विषय में प्रवीण एवं अनुभवी सिद्ध हो सकेंगे तभी उन्हें इन तीर्थों में भेजा जायगा। कोई सीधी नियुक्ति कहीं भी नहीं होगी और न उपयुक्त शिक्षण में प्रवीणता प्राप्त किये बिना किसी को तीर्थ संचालन का काम सौंपा जायगा।
प्रत्येक तीर्थ में परिव्राजकों की संख्या न्यूनतम पाँच होगी। क्षेत्रीय आवश्यकता के अनुसार उन्हें दस तक किया जा सकेगा। मन्दिर का कार्यक्रम पूरा करने के अतिरिक्त शेष जितने भी बनेंगे। दो-दो की टोलियाँ बनाकर समीपवर्ती क्षेत्रों में नियमित रूप से नव जागरण का वातावरण बनाने के लिए जाया करेंगे। प्रातः जाकर शाम को लौट आना। अथवा आवश्यकतानुसार राशि को कहीं रहा जाना यह सब वे लोग अपने विवेक के अनुसार किया करेंगे।
परिव्राजक एक वर्ष से अधिक कहीं नहीं रहेंगे। उनका स्थानान्तरण हर वर्ष होता रहेगा। पाँचों एक साथ ही रहें यह आवश्यक नहीं। पुरानी मण्डलियाँ बिखरती नई-नई बनती रहेगी। यह इसलिए कि व्यक्तियों में मोह बन्धक न जुड़ने पाये। पुरानी से हटने-बिछुड़ने और नयों के साथ तालमेल बिठाने में कठिनाई तो हर बार होती है, पर मोह बन्धक नहीं बाँध पाते और रागद्वेष के वे अंकुर नहीं पनपने पाते जो लोक सेवा में निरत परमार्थ संलग्न व्यक्तियों के लिए अन्ततः हानि कारक ही सिद्ध होते हैं।
एक वर्ष से अधिक ठहरने की बात कभी-कभी कहीं-कहीं अपवाद के रूप में ही बनेगी अन्यथा साधारणतया स्थानान्तरण ही होते रहेंगे। इससे बहुत बड़ा लाभ यह है कि कहीं कोई घनिष्ठता का वैयक्तिक लाभ भी नहीं उठा सकेगा और मोह बंधनों से बँधकर उस उद्देश्य से च्युत होते लगेगा जो प्रव्रज्या ग्रहण करते समय परिभ्रमण करने को उत्तरदायित्व निभाने के लिए शपथ पूर्वक शिरोधार्य किया था। सरकारी अफसरों के अनिवार्यतः तबादले होते रहते हैं। इसमें सरकारी खर्च भी बढ़ता है और अफसर भी नाक भौं सकोड़ते है, कठिनाई अनुभव करते है। इतने पर भी प्रवाह मान जल स्वच्छता बनी रहती है। अवरुद्ध जलाशय सड़ते हैं। बँधकर स्थान विशेष पर बैठे जाने सन्त भी आपत्ति ग्रस्त होकर कईबार तो सामान्य गृहस्थों जैसे परिग्रही एवं प्रपंची हो जाते हैं। गायत्री तीर्थों के संचालक लोग लोभ मोह के बँधनों में न बँधने पायें-किसी संस्थान पर आधिपत्य जमाने की दुरभि सन्धि न रचने पायें, इसलिए आरम्भ से ही स्थानान्तरण की मर्यादा बना दी गई है। इसमें पुराना चोला छोड़ने नय ग्रहण करने जैसी अड़चन तो अवश्य अनुभव होती है, पर उद्देश्य की दृष्टि से लाभ ही लाभ है। अनेक परिस्थितियों में रहने, अनेक समस्याओं का सामना करने- अनेक अनुभव सम्पादित करने का लाभ कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसी प्रकार इन तीर्थ क्षेत्रों के लोगों को भी नये परिव्राजकों की नई विशेषताओं का अनुभव हर वर्ष होते रहने की नवीनता भी बनी रहेगी। इसमें हानि इतनी ही है कि मोह का दबाव पड़ता है। लाभ असीम है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए परिव्राजकों की मण्डलियाँ बिछुड़ते रहने स्थान बदलते रहने की परम्परा आरम्भ से ही बना दी गई है।
परिव्राजकों को अपने निर्वाह के लिए स्वयं प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा। याचना करने की, किसी से इस निमित्त घनिष्ठता बढ़ाने और चापलूसी करने की भी उन्हें आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उनका निर्वाह व्यय वहन करना शान्ति-कुंज का उत्तरदायित्व होगा।
गायत्री तीर्थों की यह परम्परा रहेगी। कि वहाँ प्रतिमा के सम्मुख पैसा चढ़ाने की परम्परा नहीं होगी कोई पैसा चढ़ाना चाहेगा तो उसके बदल में प्रायः उतने ही मूल्य का ‘प्रसाद साहित्य’ उसे हाथों हाथ दे दिया जायगा। इस प्रयोजन के लिए गायत्री चालीसा, गायत्री चित्र, युग निर्माण संकल्प के अत्यधिक सस्ते संस्करण छापे गये हैं। पैसा चढ़ने इस प्रसाद साहित्य को ले जाकर स्वयं पढ़े-पूजा प्रयोजन में प्रयुक्त करें और अन्य प्रिय जनों को उसे देकर उनमें भी धर्म चेतना उत्पन्न करें, तो इतनी ही देव-दक्षिणा पर्याप्त मानी जायगी। कोई विशेष दक्षिणा देना चाहेंगे तो अपने किसी दोष-दुर्गुण को छोड़ने घटाने की किन्हीं सत्प्रवृत्तियों को अपनाने बढ़ाने की प्रतिज्ञा निर्धारित घटाने की-किन्हीं सत्प्रवृत्तियों को अपनाने बढ़ाने की प्रतिज्ञा निर्धारित संकल्प-पत्र पर लिखकर देवता के चरणों में प्रस्तुत करेंगे।
प्रव्रज्या अभियान एवं तीर्थ स्थापना की प्रक्रिया आरम्भ करते ही यह व्यवस्था बनाई गई है कि युग निर्माण योजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाले सभी साहित्य का लाभाँश विशुद्ध रूप से इसी पुण्य प्रयोजन के लिए सुरक्षित कर दिया है। भवन निर्माण का कार्य तो धर्म प्रेमी उदार लोगों की सहायता से सम्पन्न होगा, पर परिव्राजकों के निर्वाह का अधिकाँश खर्च युग साहित्य में जो थोड़ा सा लाभांश रहता है उसी से पूरा करने का प्रयत्न किया जायगा। जो कमी पड़ेगी उसकी पूर्ति उन लोगों के अंशदान से की जायगी जो प्रव्रज्या का महत्व तो समझते है, पर कारण वश स्वयं नहीं जा सकते। ऐसे लोग समय के स्थान पर कुछ पैसा दिया करेंगे तो उसका उपयोग कार्यक्षेत्र में गये हुए परिव्राजकों के निर्वाह व्यय के निमित्त कर दिया जाया करेगा। हर हालत में परिव्राजक स्वयं अपने निर्वाह की चिन्ता से मुक्त रहेंगे। और निजी रूप से इसके लिए कुछ भी प्रयत्न नहीं करेंगे। परिस्थिति वश कहीं भोजन करना पड़े तो बात अलग है अन्यथा वस्त्र आदि के रूप में किसी का कोई दान उपहार निजी प्रयोजन के लिए स्वीकार न करेंगे। उन्हें आरम्भ से ही सिखाया गया हैं कि व्यक्तिगत रूप से दान ग्रहण करना प्रतिग्रह है। पूर्वजों की बात दूसरी थी। अपने समय में निजी रूप से याचना करना एवं उसे ग्रहण करना उपयुक्त नहीं। प्राचीन समय में भी प्रतिग्रह का निषेध था। वर्तमान स्थिति में युग निर्माण योजना के परिव्राजकों पर भी ऐसे ग्रहण पर प्रतिबन्ध लगाते हुए नियुक्त व्यक्तियों का व्यय भार मिशन द्वारा उठाये जाने और परिव्राजकों के स्वाभिमान को उच्चस्तरीय बनाये रहने का निश्चय किया गया है।
गायत्री तीर्थों के लिए भवन निर्माण के लिए अर्थ साधन जुटाने के लिए जिस प्रकार प्रयत्न किये जा रहे हैं उसी जागरूकता के साथ परिव्राजकों की भर्ती उनकी शिक्षा के लिए भी प्रयास किया जा रहा है। शान्ति-कुंज ब्रह्मविद्यालय का पाठ्य क्रम लोक सेवी परिव्राजकों के लिए ही बनाया गया है। उसमें भाषण कला- संगीत उपासना विज्ञान, यज्ञ-प्रक्रिया, पर्व एवं त्यौहार एवं षोड्श संस्कार करने, देव पूजा की शास्त्रीय पद्धति समीपवर्ती क्षेत्रों में धर्म चेतना बढ़ाने की विधि व्यवस्था युग समस्याओं के समाधानों की जानकारी-रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन -अवांछनियताओं के विरुद्ध संघर्ष परिव्राजकों के लिए निर्धारित पंचशील का परिपालन जैसे अनेक विषयों का परिव्राजकों को नियमित अध्ययन कराया जायगा और समय-समय पर उन्हें सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप परामर्श निर्देश के लिए शांतिकुंज बुलाया भी जाता रहेगा।
जिस प्रकार तीर्थों के भवन छोटे होते हुए भी तिमंजिले भव्य, आकर्षण एवं धर्म परम्परा का गौरव बढ़ा सकने योग्य बनाये जा रहे है। उसी प्रकार यह प्रयत्न भी समानान्तरण चल रहा है कि इन तीर्थों की संचालन कर्त्री पाँच देव कुमारों की मंडली भी अपने व्यक्तित्व आचरण एवं पुरुषार्थ से इस स्थापना को गौरवान्वित करने में सफल सिद्ध होती रहे। गायत्री तीर्थों पर निहित स्वार्थों की काली छाया मंडराने न पाये, उसमें दुरभि संधियों को किसी छिद्र में होकर प्रवेश करके ध्वंस रचने का अवसर न मिलने पाये इसके लिए पैनी सतर्कता को आर्मी से ही जुड़ा रखा गया है।
गायत्री तीर्थों के उद्देश्य महान हैं। उनके द्वारा जिन रचनात्मक प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन होने वाला है, उन्हें धर्म चेतना के पुनर्जीवन का देव प्रयास का जा सकता है। इनकी सफलता का विश्वास जिस आधार पर किया गा है वह है तीर्थ निर्माण के साथ प्रव्रज्या अभियान का उस पुण्य प्रयोजन में सक्रिय योगदान। इन दोनों के मिलन को कृष्ण, अर्जुन की राम हनुमान की जोड़ी कह सकते है। युग सृजन की महाभारत योजना में हर तीर्थ में रहने वाले पाँच परिव्राजक पाँच पाण्डवों की भूमिका निभा सकेंगे, हमें ऐसी ही आशा करनी चाहिए।
गायत्री शक्तिपीठ दो चरणों में बनेंगे। एक होगा जन-संपर्क और दूसरा होगा-साधना सत्र। प्रथम चरण में जन-संपर्क वाले देवालय बन रहे हैं। इन्हें ऐसे जन-संकुल वाले संकुल वाले साधन स्थानों में बनाया जा रहा है। जहाँ यात्रियों का सहज स्वभाव आवागमन होता हो। इमारतें विस्तार में छोटी होते हुए भी तीन मंजिली बनाई जा रही हैं उनके मुख कलेवर-ऐलीवेशन-ऐसे रखे जा रहे हैं, जो उधर से निकलने वाले को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर सकें और उसकी भव्यता को देख कर हर किसी का उसे देखने-भीतर प्रवेश करने का मन हो। प्राचीन काल में मन्दिरों के तोरण द्वार-शिखर आदि सज्जा पक्षों को इसीलिए अधिक आकर्षक बनाया जाता था, कि दर्शकों की सहज रुचि को उधर मुड़ने और पहुँचने का आकर्षण बना रहें। इन पीठों में उस तथ्य का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। सर्वत्र तीन मंजिली इमारतें इसीलिए है कि उनकी ऊँचाई दूर से दीख पड़े। मुख कलेवर को अधिक आकर्षक बनाने का इसलिए ध्यान दिया गा है कि दर्शनार्थी की सहज इच्छा उसके संबन्ध में अधिक जानने की हो। सज्जा आवरण का यही सिद्धान्त भी है। मन्दिरों में इस तथ्य का अधिकाधिक समावेश करने की उनके निर्माताओं में सदा प्रतिस्पर्धा रही है।
ऐसे स्थान घने ही हो सकते हैं। घनी सड़क बाजारों में ऐसी खाली जगहें मिलना अति कठिन है। वे पहले से ही घिरी होंगी बहुत कठिनाई से ही मिलेंगी। कहीं-कहीं तो ऐसा भी हो सकता हैं कि पुराने मकान खरीदकर उन्हें तोड़ा जाय और उनकी जगह पर यह निर्माण किया जाय। जो हो अभीष्ट स्थानों में जगह कठिनाई से मिलेगी और महंगी भी होगी। इस दृष्टि से उन्हें तीन मंजिला ही बनाया जा रहा है। जमीन कम और काम बहुत हो वहाँ तो कई मंजिली इमारतें ही बनाई जाती हैं। यही निर्णय इन निर्णय इन निर्माणों के सम्बन्ध में है। वे सघन सड़क मुहल्लों पर ही बनेंगे ताकि जन संपर्क का उद्देश्य ठीक प्रकार सधता रहें।
दूसरे चरण में साधना सत्रों के लिए जो आश्रम बनेंगे, वे कोलाहल से दूर एकान्त शान्त प्रकृति सान्निध्य वाले स्थानों में होंगे। वहाँ उसी प्रकार के साधना सत्र चला करेंगे जैसे कि ब्रह्म-वर्चस शांतिकुंज में चलते हैं। उस क्षेत्र के साधकों, जिज्ञासुओं-सृजन शिल्पियों के लिए उपयुक्त वातावरण में रह कर साधना करने और जीवन निर्माण तथा लोक-कल्याण की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता रहे। जहाँ सम्भव होगा इनमें तो यात्रियों के ठहरने की सुविधा भी रखी जायगी। यह आश्रम कहे जायेंगे और एक मंजिलें ही होंगे। उनमें भव्यता आवश्यक नहीं। कुटिया बनाने में भी काम चल सकता है।यह योजना ध्यान में तो है, पर आर्मी कहीं भी नहीं की जा रही है। एक पक्ष को पूरा करने के बाद ही दूसरा हाथ में लेने का निश्चय है। यह उचित भी है और यही सम्भव भी। धन, साधन, संचालक, व्यवस्था आदि की इतनी समस्याएँ हैं जिन्हें ध्यान में रख कर उठाये गये कदम ही पार पड़ते हैं। आतुरता में बहुत काम हाथ में ले लेने पर काम एक भी पूरा नहीं होता ओर अव्यवस्था फैलती हैं। इसलिए आश्रम को बाद के लिए रखा गया है और प्राथमिकता जनसंपर्क वाले देवालयों को दी गई है।
इन दिनों जो तीन मंजिलें निर्माण हो रहे है; उनमें पहला कक्ष विशुद्ध देवालय है दोनों और बरामदे। बीच में प्राँगण। इसमें इतना स्थान रहेगा कि प्रायः दो सौ व्यक्तियों का एक साथ आवागमन आसानी से हो सके। और नवरात्रि आदि की सामूहिक साधना करनी हो तो भी उसमें दो सौ साधक एक साथ बैठ सकें। इतनी जनता का छोटी ज्ञान-गोष्ठियों का-कथा प्रवचनों का उद्देश्य इस देवालय भाग से पूरा हो सकेगा।
इस मंजिल में नौ मूर्तियां पृथक-पृथक कक्षों में स्थापित होंगी और इन सभी से नित्य पूजा आरती होती रहेगी। एक ही कमरे में एक साथ अनेकों मूर्तियां बिठा देने से स्थान तो कम घिरता है थोड़े बहुत करने का कौतूहल भी पूरा हो जाता है, पर ध्यान धारणा में बाधा पड़ती है। इस दृष्टि से नौ स्थापनाएँ एक दूसरी से पृथक्-पृथक थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रहेगी।
सामने मध्य में आद्यशक्ति गायत्री की बड़ी प्रतिमा रहेगी। वही इस शक्ति पीठ की प्रमुख अधिष्ठात्री है। इसके उपरान्त आठ उसकी अन्य शक्ति धाराओं की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठापित होंगी। आद्यशक्ति के एक पार्श्व में पंचमुखी सावित्री-दूसरे पक्ष में प्राणऊर्जा कुण्डलिनी। तीनों का परस्पर सघन सम्बन्ध भी है। पंचमुखी सावित्री की पंच कोसी-दक्षिण मार्गी साधना का विज्ञान हैं। कुंडलिनी को ताँत्रिकी वाममार्गी-भौतिकी कहा जाता है। एक ज्ञान की देवी हैं दूसरी विज्ञान की आद्यशक्ति गायत्री इन दोनों की अधिष्ठात्री है।
सामने तीन प्रतिमाएँ। तीन-तीन दोनों बरामदों में रहेंगी। एक कक्ष में ब्राह्मी-वैष्णवी, शाम्भवी। दूसरे में वेदमाता-देवमाता-विश्वमाता। ब्राह्मी, वैष्णवी शाम्भवी को ही सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा कहा जाता है। मध्यवर्ती आद्यशक्ति की प्रतिमा तीन फुट ऊँची और अन्य आठ दो-दो फुट ऊँची होंगी। आद्यशक्ति का मध्यवर्ती सिंहासन परिपूर्ण होंगी। शेष आठ दीवारों में बने सिंहासनों पर प्रतिष्ठापित की जायेंगी। नीचे कमल का सिंहासन पर प्रतिष्ठापित की जायेंगी नीचे कमल का सिंहासन-ऊपर छत्रकलश यह सीमेन्ट के बने होंगे और आधे कटे हुए जैसे दिखाई पड़ेंगे। दीवार में प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना इसी प्रकार होती हैं।
देव प्रतिमा पर पैसा चढ़ाने की रोक रहेगी। दर्शनार्थी नमन वन्दन करेंगे। पुष्प चढ़ा सकेंगे। जो पैसा देना चाहेंगे उन्हें तत्काल उसके बदलें में गायत्री प्रसाद साहित्य दे दिया जायगा। इसके लिए प्रवेश द्वार की बगल में एक छोटा स्टाल भी रहेगा।
दर्शनार्थियों को प्रतिष्ठापित नौ प्रतिमाओं का तत्व ज्ञान, स्वरूप एवं प्रयोग समझाने के लिए एक गाइड नियुक्त रहेगा। दर्शनार्थी मात्र प्रतिमाओं को देख कर ही वापिस नहीं चले जायेंगे वरन् उन के विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से गायत्री विद्या का सुनिश्चित परिचय भी इतने थोड़े समय में सार-रूप में प्राप्त कर लिया करेंगे। दर्शन और शिक्षण के दोनों उद्देश्य ठीक तरह परे होते रहें, यह योजना पहले से ही बनाकर रखी गई है।
ऊपर की दूसरी मंजिल में जाने के लिए प्रवेश द्वार की बगल से ही जीना रहेगा। जो दर्शनार्थी गायत्री विद्या के सम्बन्ध में अधिक जानना चाहेंगे। उन्हें ऊपर बने सत्संगभवन में पहुँचा दिया जायेगा। यहाँ एक समाधानी परिव्राजक इसके लिए सदा प्रस्तुत रहेंगे। जिज्ञासुओं की हर जिज्ञासा का सुविस्तृत समाधान यहाँ हर किसी को उपलब्ध रहेगा। यह सत्संग कक्ष बीच की मंजिल के दो तिहाई भाग में बना होगा। एक तिहाई में पाँच परिव्राजकों के निवास, नित्यकर्म, भोजनालय आदि की सुविधा रहेगी। दोनों विभाजित होंगे। मंजिल एक होते हुए भी सत्संग वालों को परिव्राजक निवास की जानकारी मिलेगी और उनके निवास क्रम में भीड़ के कारण कोई व्यतिक्रम न पड़ेगा।
तीसरी मंजिल को अतिथिगृह समझा जाना चाहिए। इसमें तीन ओर तीन बड़े बरामदे होंगे, जिन्हें आवश्यकतानुसार अलग-अलग काट देने पर आठ कमरों के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता हैं। शक्तिपीठ में आगन्तुक अतिथि भी पहुँचते ही रहेंगे। इनके निवास, भोजन, शौच, स्नान आदि की सुविधा इस तीसरी मंजिल पर रहेगी। दैनिक हवन भी इसी मंजिल की खुली छत पर होता रहेगा।
इस प्रकार तीनों ही मंजिल मिलकर शक्तिपीठ के विभिन्न, त्रिविधि उद्देश्यों को पूरा करती रहेगी। देवालय-सत्संग भवन-परिव्राजक निवास-अतिथि गृह के चारों ही उद्देश्य जिस कुशलता से छोटी-सी इमारतों में पूरे किये जायेंगे; उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इस निर्माण की एक-एक इंच भूमि का परिपूर्ण सदुपयोग होगा। फालतू समझा जाने योग्य स्थान इसमें कही भी दृष्टिगोचर न होगा।
सामने प्रवेश द्वार के आगे बारह फुट जगह खाली छोड़ी गई है ताकि उसमें कुछ फूल फुलवारी लोन आदि लग सकें ओर आवश्यकतानुसार कोई वाहन भी उस में खड़ा हो सके। अन्य तीनों और न्यूनतम छः-छः फुट खाली जगह छोड़ी गई है। ताकि प्रकाश एवं हवा भीतर पहुँचने में बाधा न पड़े। इस खाली जगह में नीचे फूलों के गमले रहेंगे। और ऊपर की मंजिल में बालकनी छजली-बाहर निकली रहेगी। उनसे शोभा भी होगी और सुविधा भी।
साधारणतया इन शक्तिपीठों के लिए 60 फुट चौड़ी और 80 फुट लम्बी जमीन से काम चल जायेगा। पाँच हजार वर्ग फुट पर्याप्त है। जहाँ न्यूनाधिक मिलेगी वहाँ उसके अनुरूप घट-बढ़ को जायगी पर मोटी रूप रेखा यही रहेगी जो ऊपर बताई गई है। अभीष्ट प्रयोजन इतने स्थान के बिना पूरे होते नहीं है।
लागत डेढ़ लाख रुपये की कूती गई है। इसी में भूमि खरीदना तथा नौ प्रतिमाओं की लागत भी सम्मिलित है। अलग-अलग जगहों पर वस्तुओं के-मजूरी के दाम अलग अलग होते है इसलिए इसमें न्यूनाधिकता भी हो सकती है। यह लागत हरिद्वार और मथुरा का औसत निकाल कर कूती गई है।
जहां साधन कम होंगे वहाँ दो मंजिली इमारत भी बन सकती है। तीसरी मंजिल पर बनने वाले अतिथि कक्ष को छोड़ा जा सकता है, देवालय का बीच का आंगन बिना पटा-खुली छत का रखा जा सकता है। ऐसी दशा में इनकी लागत घट कर एक लाख भी हो सकती है। प्रतिमाएँ तथा जमीन तो तीन मंजिली दो मंजिली इमारतों में समान ही रहेगी। इसलिए लागत में पचास हजार से अधिक की कटौती नहीं हो सकती है।
कोई उदार मन डेढ़ लाख रुपये की लागत स्वयं अपने परिवार से वहन कर सकेंगे तो निर्माण के रूप में उनके नाम का पत्थर लगेगा और रंगीन फोटो भी लगा रहेगा। जहाँ संग्रह कना पड़े वहाँ पाँच हजार से ऊपर देने वालों के भी स्मृति पटल-पत्थर लगाये जायेंगे। यों मुट्ठी-मुट्ठी सहयोग तो इनमें अनेकों धर्म प्रतियों का रहेगा। जिनसे सहयोग का अनुरोध किया जायगा। उनसे ईंट-सीमेन्ट लोहा-लकड़ी-आदि सामग्री देने की बात कही जायगी। एक-एक दो-दो रूपों से तो कहा तक इतनी बड़ी राशि संग्रह कर सकना सम्भव होगा।
आत्मा नदी संयम पुण्य तीर्थ सत्योदका शीलतटा दयोमिः तत्रावगाहं कुरु पाण्डु पुत्र न वारिणा शुद्धयति चान्तरात्मा।। (वेदव्यास)
अर्थात्- आत्मा नदी है। जिसमें संयम का पुण्य घाट है। सत्य ही जल है, शील किनारा है तथा दया की लहरें उठती रहती है। युधिष्ठिर तुम उसी में गोता लगाओ, भौतिक जल से शरीर धुल जाता है परन्तु अन्तःकरण नहीं धुलता।
न तोयपूत देहस्य स्नानमित्यमिधीयते। स स्नातो यस्य वै पुँसः सुविष्शुद्धं मनामतम्।। -स्कन्ध. पु.
अर्थात्- जल से देह के ऊपरी भाग को धो लेना ही स्नान नहीं है। स्नान तो उसका नाम है, जिससे बाहरी शुद्धि के साथ-साथ हम अपनी अन्तःशुद्धि भी करलें।
शरीर को पाँच तत्वों का चमत्कार और चेतना का, पाँच प्राणों का सघन सहकार कहा जा सकता है। गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण जिस भाव-भरी आशा उमंगों के साथ किया जा रहा है उसका आधार उन पाँच परिव्राजकों को कहा जा सकता है जो उन देव संस्थाओं का संचालन अपने देव-प्रयासों के माध्यम से करते रहेंगे। देवालयों के प्रति गिरती हुई श्रद्धा की रोकथाम करने तथा मन्दिरों को अनुपयोगी बनाने वालों को पुनर्विचार के लिए विवश करने में गायत्री शक्ति पीठों की असाधारण भूमिका होगी। यह कार्य अनायास ही नहीं हो जायगा। इमारतें उतना सब नहीं कर लेंगी। यह कार्य प्राणवान परिव्राजकों का है। निर्माण में लगा हुआ धन एवं उदार श्रम सहयोग अपना कार्य करके कुछ ही समय में निवृत्त हो जायगा, पर इन्हें इन धर्म संस्थानों को जीवन्त रखने, उनके प्रति जन-साधारण की श्रद्धा अर्जित करने, प्रबुद्ध वर्ग को इन निर्माणों की उपयोगिता स्वीकार करने के लिए जिस प्रकार के उत्कृष्ट क्रिया-कलाप अपनाने होंगे उनका सूत्र संचालन यह परिव्राजक ही करेंगे।
गायत्री के पाँच मुख हैं-पांच देवता प्रसिद्ध हैं पंचामृत को उपयोगी माना जाता है-पाँच तत्व और पाँच प्राण अपनी समर्थता का परिचय देते रहते है। उन्हीं पंचकों में इन पाँच परिव्राजकों की भी गणना की जा सकती है जो इन गायत्री शक्ति पीठों की विशिष्टता सिद्ध करने में अनवरत श्रम एवं भाव-भरे मनोयोग के साथ युग तपस्वियों की तरह निरन्तर जुटे रहेंगे। पाँच देव-कन्याओं के जत्थे-महिला जागृति अभियान के अंतर्गत पिछले दिनों देश भर में भेजे गये थे और उनने अपनी प्रखरता से वातावरण गरम किया। जिस प्रयोजन के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया गया था वह एक शब्द में पूरी तरह सफल हुआ ही कहा जा सकता है। पाँच परिव्राजकों के जत्थे भी लगभग उसी स्तर के समझे जा सकते है।
रजत जयन्ती वर्ष में प्रव्रज्या अभियान आरम्भ किया गया है। उसके लिए अग्रसर होने वाले युग शिल्पियों का एक अच्छा समुदाय उभर कर आगे आया है। जागृत आत्माओं के नाम भेजा गया महाकाल का युग निमन्त्रण निरर्थक नहीं गया। भावनाशील उत्कृष्टता ने उसे ध्यानपूर्वक सुना और युग धर्म की आवश्यकता स्वीकार करते हुए अपना आत्मदान प्रस्तुत किया है। इन्हें इस वर्ष में विशेष सत्र लगाकर प्रशिक्षित किया गया है। महापुरश्चरण योजना के अंतर्गत होने वाले आयोजनों में दो-दो परिव्राजकों के जत्थे भेजे गये है। उनने प्रस्तुत कार्यक्रमों में जिस शालीनता एवं तत्परता के साथ आयोजन कर्ताओं का हाथ बटाया है उसकी सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है। महापुरश्चरण आयोजनों को एक वर्ष में समाप्त न करके 25 महीने चलने देने का निश्चय किया गया है। उसकी पूर्ण आहुति एक वर्ष बाद गायत्री जयन्ती सन् 81 में होगी। तब तक प्रस्तुत परिव्राजकों को फिर दो-दो के जत्थों में आगामी कार्यक्रमों के लिए भेजा जाता रहेगा।
आशा की गई है कि रजत जयन्ती वर्ष का दूसरा वर्ष पूरा होते-होते जन 81 तक एक वर्ष के भीतर चौबीस गायत्री शक्ति पीठ बन चुके होंगे। इनमें पाँच पाँच परिव्राजक नियुक्त कर दिये जायेंगे। तब तक महापुरश्चरण योजना के लिए उन्हें भेजने की आवश्यकता भी पूरी हो चुकेगी। इस प्रकार चौबीस तीर्थों में 120 परिव्राजक नियुक्त कर दिये जायेंगे। जहाँ अधिक की आवश्यकता समझी जायेगी वहाँ पाँच से अधिक भी भेजे जा सकेंगे।
कहा जा चुका है कि यह जत्थे एक-एक वर्ष बाद बदल जाया करेंगे। उन्हें नये-नये स्थानों पर जाकर नये अनुभव सम्पादित करने का अवसर मिलेगा। शक्ति पीठों के संपर्क क्षेत्रों को भी नई विशेषताओं से युक्त नये लोक सेवाओं के संपर्क का नया आनन्द लेते रहने की नवीनता का लाभ मिलता रहेगा। बड़ी बात है कि परिव्राजकों की गरिमा लोभ और मोह के चंगुल में फँसकर नष्ट-भ्रष्ट होने से बची रहेगी। सरकारी कर्मचारियों की तरह शक्ति पीठों के संरक्षकों का भी स्थानान्तरण उपयोगी समझा गया हैं यों स्थान बदलने और संपर्क छोड़ने में भावनात्मक एवं व्यवस्था परक कठिनाई तो होती ही है। पर क्या किया जाय-जल धारा के प्रवाह मान रहने पर ही उसकी स्वच्छता बने रहने का प्रयोजन पूरा होता है।
परिव्राजकों की भर्ती तथा उनके शिक्षण का क्रम शान्ति-कुंज में विगत आठ महीने से चल रहा है। समय की आवश्यकता को देखते हुए थोड़े-थोड़े दिनों के शिक्षण सत्रों में उन्हें रखा गया और काम चलाऊ निर्देश देकर बाहर भेज दिया गया। पर आगे से उनके भावी उत्तरदायित्वों को देखते हुए अधिक कारगर शिक्षण की-व्यवस्था की जायगी और वह व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप समय साध्य भी होगी। जुलाई 80 से प्रव्रज्या प्रशिक्षण की सुव्यवस्थित पाठ्य प्रक्रिया आरम्भ हो जायगी। अक्टूबर से फिर देश-व्यापी महापुरश्चरण आयोजन प्रारम्भ होंगे उनके लिए परिव्राजकों के जत्थे अधिक कुशलतापूर्वक काम कर सकें इसके लिए जुलाई-अगस्त-सितम्बर के तीन महीने विशुद्ध रूप से परिव्राजक प्रशिक्षण के लिए रखे गये है। भाषण कला, सम्भाषण कुशलता, स....त, कथा प्रवचन, यज्ञ कृत्य, पर्व संस्कार जनम दिन आदि कर्मकाण्ड एवं जन-संपर्क के उतार-चढ़ाव, धर्मतन्त्र से लोक-शिक्षण की रूप-रेख एवं कार्य पद्धति का इस प्रशिक्षण में समुचित समावेश रहेगा। तीन महीने की इस शिक्षा को भी अगले वर्षों के आयोजनों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तदनुरूप ही बनाया जा रहा है। इसके उपरान्त इसे शिक्षण पद्धति की सामयिक आवश्यकता की पूर्ति से आगे बढ़ा कर स्थायी कर दिया जायगा और उसमें गायत्री शक्ति पीठों के लिए स्थायी रूप से भेजे जा सकने योग्य युग शिल्पियों की भर्ती होगी।
गायत्री शक्ति पीठ प्रायः भारत के हर प्रान्त में बनने जा रहे हैं। उनको भाषा सम्बन्धी कठिनाई पड़ेगी। परिव्राजकों के स्थानान्तरण होते रहेंगे। उन्हें एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में भेजा जाता रहेगा। ऐसी दशा में आवश्यक है कि उन्हें कई भाषाएँ आती हों। भारत में 14 भाषाएँ संविधान में मान्यता प्राप्त है। इसके अतिरिक्त ऐसी क्षेत्रीय भाषाएँ एक सौ से अधिक हैं जिनकी लिपि तो पृथक नहीं है, पर शब्द कोश-व्याकरण आदि से पूरी-पूरी भिन्नता है। जो जिस क्षेत्र में जन-संपर्क के लिए उतरेगा उसे उस समुदाय की भाषा आनी ही चाहिए इस दृष्टि से प्रव्रज्या विद्यालय में भाषायी प्रशिक्षण की अतिरिक्त कक्षाएँ चलेंगी और प्रयत्न किया जायगा कि परिव्राजकों को कई-कई भाषाएँ आये। न केवल भाषा का-वरन् क्षेत्रीय संस्कृति एवं प्रथा परम्पराओं की भी उन्हें समुचित जानकारी हो। इसके बिना वे किसी एक क्षेत्र में भले ही जमे रहें-विभिन्न क्षेत्रों में काम करने योग्य न बन सकेंगे। ईसाई मिशनरी योरोप आदि देशों से आते हैं तो उन्हें जहाँ काम करना है वहीं की भाषा तथा संस्कृति का अध्ययन क्रिश्चियन कालेजों में प्राप्त करना पड़ता है। इसके उपरान्त ही वहाँ उन्हें भेजा जाता है। बौद्ध प्रचारकों के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था थी। नालन्दा-तक्षशिला आदि संधारामों में एशिया तथा योरोप की प्रमुख भाषाएँ पढ़ाने तथा जहाँ उन्हें भेजा जाना है वहाँ की प्रथा परम्परा सम्बन्धी जानकारियाँ भी प्रशिक्षण का अ.... रहती थी। अपने प्रव्रज्या प्रशिक्षण के लिए शान्ति-कुँज में भी वैसी ही व्यवस्था बनाई जायेगी। कार्य क्षेत्र तो अपना भी प्राचीन बौद्धों और अर्वाचीन इसाइयों की तरह ही व्यापक बनना है। प्रवासी भारतीयों को भी युग सृजन में अपनी भूमि निभाने की प्रेरणा दी जानी है और प्रायः 74 देशों में बसे इन प्रवासी भारतीयों के उद्बोधन के लिए भी जत्थे भेजे जाते है। गायत्री शक्ति पीठें वहाँ भी बननी है। ऐसी दशा में भाषायी ज्ञान उन क्षेत्रों का भी कराने के लिए प्रस्तुत प्रशिक्षण की उपयुक्त व्यवस्था सम्मिलित की जा रही है।
गायत्री शक्ति पीठों प्रकारान्तर से-धर्म मंच से लोक शिक्षण को पुण्य प्रक्रिया के प्रसार केन्द्र कहा जा सकता है। चलते-फिरते पुस्तकालयों की तरह उन्हें चलते-फिरते ब्रह्म विद्यालय कहा जा सकता है। नियुक्त पाँच परिव्राजकों को इनमें प्रशिक्षण क्रम चलाने वाले पाँच उपाध्याय, अध्यापक कहा जा सकता है। स्कूली पढ़ाई और धर्म शिक्षा शिक्षा की प्रक्रिया में अन्तर होता है। इसी प्रकार छात्रों को एक जगह बिठा कर पढ़ाने के तथा घर-घर जाकर जन-जन से मिलकर सिखाने की रीति-नीति अलग प्रकार की होती है। इतने पर भी उद्देश्य एक ही है। परिव्राजकों की अध्यापन पद्धति जन-संपर्क होने के कारण चलते-फिरते स्तर की है तो भी उनसे आवश्यकता वहीं पूरी होती है जिसे प्राचीन काल के गुरुकुल एवं आरण्यक पूरी करते थे। प्रव्रज्या पर्यटन नहीं है। परिव्राजक मायावरों की तरह भटकते नहीं है, उन्हें जन-जन में धर्म-चेतना उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है और उसी युग साधना में तपस्वी योगी की तरह एक निष्ठा भाव से लगे रहने के लिए कहा गया है। वह उसी उत्तरदायित्व को शपथपूर्वक निभायेंगे भी।
शक्ति पीठों में भेजे गये परिव्राजकों की प्रशिक्षण प्रक्रिया इस प्रकार चलेगी (1) दर्शकों को नौ प्रतिमाओं के दर्शन कराते हुए-नौ सत्प्रवृत्तियों का महत्व समझाना और उन्हें अपनाकर देवोपम जीवन जीने की प्रेरणा करना (2) जिनमें जिज्ञासा के कुछ भी बीजाँकुर मिलें उन्हें सत्संग कक्ष में बिठाकर आत्मीयतापूर्वक भारतीय संस्कृति के तत्व बीज गायत्री और उसके अवलम्बन का स्वरूप समझाना। इस अवलंबन की दूरगामी प्रतिक्रिया समझाना (3) संपर्क में जिनके साथ घनिष्ठता बढ़े उन्हें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के द्वारा सर्वतोमुखी आत्म-विकास के लिए प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन देना। (4) दो परिव्राजकों के एक जत्थे का प्रतिदिन दो गाँवों में जाना। विचारशील लोगों से संपर्क बनाना। नवयुग के संदेशों से अवगत करना और तदनुरूप ढलने की प्रेरणा देना। (5) जन्म-दिन मनाने का उत्साह उत्पन्न करके व्यक्ति निर्माण की-संस्कार प्रचलन से परिवार निर्माण की-पर्व त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाकर समाज निर्माण की चेतना उत्पन्न करना। इन धर्म-कुकृत्यों के सहारे अधिकाधिक संपर्क साधना (6) रात्रि को किसी गाँव में रुक कर वहीं रामायण, गीता आदि की कथा कहना और धर्म चेतना उत्पन्न करना (7) पन्द्रह दिन का गति चक्र बना कर हर दिन दो गाँवों में जाने के क्रम से तीस गाँवों का एक मण्डल बनाना और उसे अपनी मण्डलीय कार्य क्षेत्र मानकर विचार-क्रान्ति के लिए पथ प्रशस्त करना (8) अपने क्षेत्र में चलपुस्तकालयों की व्यवस्था बढ़ाना (9) प्रौढ़ शिक्षा, नशा निवारण, वृक्षारोपण, श्रमदान, व्यायामशाला, स्वच्छता सहकारिता, कुप्रथाओं, अन्धमान्यताओं का और अनैतिकताओं का उन्मूलन, जैसे रचनात्मक प्रयत्नों में स्वयं लगना दूसरों को लगाना। (10) कर्मक्षेत्र में चल रही सरकारी गैर सरकारी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने के लिए जन सहयोग जुटाना।
परिव्राजकों का संपर्क प्रयोजन, व्यक्तिगत दोस्ती बढ़ाना या आवारागर्दी में भटकना नहीं वरन् रचनात्मक कार्यों के लिए भावभरा जन-सहयोग उत्पन्न करना है। इन प्रयोजनों में निरंतर दत्त चित्र रहने वाले परिव्राजक अपने उज्ज्वल चरित्र और शालीनता भरे सौम्य व्यवहार से असंख्यों को स्नेह-बन्धनों में जकड़ेंगे और उन्हें मानवी गरिमा को बढ़ाने वाला दृष्टिकोण अपनाने के लिए सहमत करेंगे, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। युग निर्माण योजना विशुद्ध रूप, से व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के कार्यक्रमों में संलग्न है। उसका विश्वास है कि राष्ट्र और विश्व का वास्तविक निर्माण इसी प्रकार हो सकता है। राजनैतिक विरोध समर्थन दूसरे लोगों का काम है; परिव्राजक तो सरकारी गैर सरकारी सभी क्षेत्रों का-सभी व्यक्तियों का सहयोग समर्थन, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए उपलब्ध करने और उन्हें उचित सहयोग देने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
सितासिते सरिते संगते तन्नप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति। ( ऋक् परिधि )
तीर्थों के आश्रय से मनुष्य भारी से भारी विपत्तियों से मुक्ति पाता है।
अतीत के पुनरागमन-वर्तमान के निर्धारण और भविष्य के संयोजन के त्रिविधि उद्देश्य पूरे कर सकने में सर्वथा समर्थ गायत्री शक्तिपीठ योजना अपने समय का अनुपम प्रयास है। इसे भागीरथी तप साधना के साथ जुड़ा हुआ गंगावतरण कह सकते है। अभी वह कल्पना के गर्भ में है। इन दिनों उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली सम्भावना और प्रतिक्रिया का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर जब भी वह मूर्ति रूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो सोचा-कहा और किया जा रहा था वह अनर्गल नहीं था।
प्राणवान संकल्प-साधना हीन परिस्थितियों में भी किस प्रकार उगते-बढ़ते और फलते-फूलते है, इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। उस श्रृंखला में नवयुग के अवतरण के लक्ष्य रख कर किये गये प्रयास को अपने समय का दुस्साहस ही कहा जायगा। इसकी उपमा खोजनी हो तो समुद्र पाटने के लिए प्राणपण से सन्निद्ध टिटहरी से अथवा सागर को पाटने में प्रवृत्त गिलहरी से ही दी जा सकती है। सेतुबन्ध बाँध जाने जैसे सहज बुद्धि द्वारा असंभव घोषित किये जाने वाले कार्य को संभव बनाने के लिए रीछ बानरों ने प्राणों की बाजी लगाई थी। साधन हीन क्या कर सकते है इसके लिए उनके लिए इतना ही संभव था कि लकड़ी पत्थर जमा करने में श्रम लगायें। इतिहास साक्षी है कि काम उतने भर से भी चल गया था। पहाड़ मनुष्यों का भार वहन करते है, यह एक तथ्य है, पर मनुष्य पहाड़ का भार वहन कर सकते है यह विश्वसनीय नहीं है। इतने पर भी प्रचण्ड संकल्पों की सामर्थ्य जिन्हें विदित है वे जानते है कि मनुष्य-मनुष्य है। उसे भगवान की निकटतम प्रतिकृति ही कहा जा सकता है। जब वह उच्च उद्देश्य को लेकर अपनी समस्त आस्था को नियोजित करके कर्मक्षेत्र में उतरता है तो सचमुच ही असंभव जैसी कोई वस्तु रह नहीं जाती।
ग्वाल−बालों की कमजोर कलाइयाँ और पोले बाँस की लाठियाँ गोवर्धन उठा सकती है इस पर कौन, किस आधार पर विश्वास करे? इतने पर भी अनहोनी, होकर रही गोवर्धन उठ ही गया। युग परिवर्तन का संकल्प महाकाल का हैं उसी के प्राण उस अभिमान में संलग्न है। जब मनुष्यों के प्राणवान संकल्प पूरे हो सकते है तो सृष्टि संतुलन का उत्तरदायित्व सम्भालने वाली शक्ति की इच्छा क्यों पूरी न होगी?
अगले दिन सुखद सम्भावनाओं से भरे पड़े है। कुक्कुट बहुत समय से प्रभात के आगमन की सूचना दे रहा था। अब ब्रह्म मुहूर्त की उदीयमान ऊषा ने सुनिश्चित आश्वासन दिया है कि अरुणोदय सन्निकट है उसके लिए अब अधिक समय प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इन दिनों उभरते उग्र विग्रहों को सूक्ष्मदर्शी प्रसव पीड़ा मानते है और कहते है अधीर होने की आवश्यकता नहीं महान उद्भव के दर्शन अब होने ही वाले है।
इस प्रभात बेला में प्रत्येक जागृत आत्माओं को युग सृजन के लिए अपना भाव भरा योगदान प्रस्तुत करना ही चाहिए। सृजन प्रयोजनों में गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण इमारत की दृष्टि से कम और लक्ष्य पूर्ति की दृष्टि से अधिक महत्व का है। इमारत बनाना भी एक काम है। पर उसमें भी बड़ी आवश्यकता उन आत्माओं के योगदान की है जो स्वयं जग चुके और दूसरों को जगा सकने की स्थिति तक जा पहुँचे है। प्रव्रज्या आमन्त्रण उन्हीं के लिए। रजत जयन्ती वर्ष के इस महान् अभियान ने अनेकों को आत्माहुतियाँ देने के लिए झकझोरो और वे अपना बिस्तर समेट कर शान्तिकुँज में आविराजे है। इनकी संख्या बड़ी है। गायत्री नगर इन्हीं की निवास व्यवस्था के लिए बन रहा है। इतने पर भी समय की माँग को देखते हुए जितने आत्मदानी आगे आये है; वे जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें पड़ने के समान है। वरिष्ठ और कनिष्ठ वानप्रस्थों का समय दान इस वर्ष महापुरश्चरण योजना में गति देने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। इतने पर भी माँग को देखते हुए इस संख्या को भी कम ही कहना चाहिए। प्रव्रज्या का युग निमन्त्रण स्वीकार करने के लिए असंख्यों के मन में हलचल मची हुई है। स्थानीय क्षेत्रों में दो-दो घन्टा समय नित्य देने वाले समयदानी यह अनुभव कर रहे हैं कि कुछ साहस और जुटाया जाय। रचनात्मक प्रवृत्तियों में दो घंटे नित्य देना सराहनीय तो है पर संतोषजनक नहीं। वर्ष में दो महीने किसी प्रकार लगातार काम करने और बाहर जाने के लिए निकलने चाहिए। यह आन्तरिक हलचल युगनिर्माण परिवार के प्रत्येक जीवन्त घटक में चल रही है। समयदानियों, परिव्राजकों की संख्या बढ़ रही है और उनका दर्जा क्रमशः बढ़ रहा है। समयदानी-कनिष्ठ-और कनिष्ठ वरिष्ठ के रूप में अपनी पदोन्नति होते देख रहे है। इस प्रकार की प्रगति को परमेश्वर की वास्तविक अनुकम्पा एवं प्रत्यक्ष प्रेरणा ही मानना चाहिए।
गायत्री शक्ति पीठों के लिए नये किस्म के परिव्राजक चाहिए। वे ऐसे होने चाहिए जो कुछ-कुछ समय बाद ही घर दौड़ने की आतुरता व्यक्त न करें। इसमें उन्हीं से काम चलेगा जो पैर जमा कर स्थिर चित्त से अपने प्रस्तुत प्रयोजन को ही सब कुछ मानें और उसी में रमे जुटे रहें। जल्दी-जल्दी घर लौटने की जिन्हें आतुरता न हो। प्रत्यक्ष है कि इस प्रकार की भाग-दौड़ में जो किराया भाड़ा खर्च होता है, वह उतना जा पहुँचता है कि वेतन देकर काम करने जितना हिसाब जा पहुँचें। इन दिनों चल रहे महापुरश्चरण आयोजनों में उन्हें थोड़े-थोड़े दिन के लिए भेजने का कुछ तुक भी है, पर गायत्री शक्ति पीठों में थोड़े दिन रहने और भाग खड़े होने से क्या काम चलेगा। वहाँ तो स्थायी रह सकने की मनःस्थिति एवं परिस्थिति वाले लोगों से ही काम चलेगा। निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति वे ही हो सकते है जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जो उनसे निवृत्त हो चुके अथवा जिनने अभी उस प्रकार का भार शिर पर उठाया नहीं है, एवं जल्दी ही उठाने का मन भी नहीं है।
तीर्थ सेवन एक प्रकार का तप है। फिर तीर्थों के संचालक तो ब्रह्मर्षि कहलाते है। जिन्हें यह गौरव अनुकूल पड़ता हो। जिन्हें यह आत्मकल्याण का उत्कृष्ट तम माध्यम प्रतीत होता हो उनके लिए तीर्थ संचालकों की विशिष्ट श्रेणी के परिव्राजक होने का साहस जुटाना चाहिए। युग-निर्माण मिशन के सूत्र संचालक ने 24 वर्ष तक 24 गायत्री महापुरश्चरण पूरे करने में अपना सारा समय और मन लगाया है। इसी तपश्चर्या की उपलब्धि है जिससे उस काया में से ब्रह्मवर्चस् की प्रचण्ड ऊर्जा निस्सृत होती और युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करती दृष्टिगोचर होती है। लगभग इसी स्तर की साधना उन्हें भी करनी होगी जो तीर्थ संचालक की साधना करें। इसे महन्त मैनेजर जैसा पद न समझा जाय। यश, मान, वैभव, सुविधा एवं अहंता की तृप्ति का इसे सरल माध्यम समझ कर कोई इस स्थान को न अपनाये। तीर्थ सेवन एक विशुद्ध तप है। इसी तप साधना का आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण से भरा पूरा यह अति महत्वपूर्ण स्वरूप है। इसमें आत्मसंतोष और ईश्वरीय आग्रह के दोनों तत्व समान मात्रा में भरे पड़े है। अपने युग की इसे सर्वोत्तम साधना कह सकते है। लोभ और मोह से जिन्हें निवृत्ति मिल चुकी हो-परिवार के उत्तरदायित्वों से जो निश्चिंत हो चुके हो उनके लिए इस परमार्थ द्वार में प्रवेश करने का खुला अवसर है।
बौद्ध कालीन प्रव्रज्या का यही स्वरूप था। उसमें गृह निवृत्त एवं पूर्णतया आत्मसमर्पित लोग ही दीक्षा ग्रहण करते थे। अपने समय में उस स्तर का आत्मबल लोगों में दिखाई नदी देता इसलिए सामयिक प्रव्रज्या के रूप में ही उस महान परम्परा को किसी प्रकार लिया जा रहा है। दो-दो चार-चार महीने समय दे सकना भी आज की घोर स्वार्थपरता के वातावरण में कम महत्वपूर्ण नहीं है। उतने से भी बहुत काम बन रहा है। इतने पर भी यह पर्याप्त नहीं है। महान प्रयोजनों के लिए-महान व्यक्तित्वों की-साहसिक अनुदानों की आवश्यकता पड़ती है। गायत्री तीर्थ संचालन के लिए जन परिव्राजकों को नियुक्ति होनी है उनकी स्थिति इतनी सुदृढ़ होनी चाहिए जो कुछ दिन खेल-खिलवाड़ करके फिर घर दौड़ जाने जैसी अस्थिरता न हो।
एक वर्ष में एक तीर्थ में रहना होता है। चौबीस वर्ष में चौबीस तीर्थ पूरे हो जाते है इसे एक प्रकार से पूर्ण योगाभ्यास कहना चाहिए। जो इस प्रकार का साहस करेंगे वे अपने मार्गदर्शन का सच्चा अनुगमन करने वाले कहे जायेंगे। एक स्थान पर बैठ कर चौबीस महापुरश्चरण करने की तुलना में तीर्थ संचालन की तपश्चर्या किसी भी दृष्टि से कम महत्व की नहीं है। तीर्थ मृत्यु को सौभाग्य माना जाता है। कितने ही लोग मरने से पूर्व ‘काशी करवट’ लेने पहुँचते है। जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता वे मरने के बाद अपनी अस्थियां किसी तीर्थ में विसर्जित करने की आकाँक्षा करते है। यहीं प्रकारांतर से तीर्थ सेवन की ही महिमा है जिसमें जीवित स्थिति में उसे पुण्य से वंचित रहने पर मरने से पूर्ण भी पश्चात् वहाँ पहुँचने की आकाँक्षा करते है। यह सुयोग उन व्यक्तियों को मिल सकता है जो निवृत्त हो चुके है और तीर्थ सेवन ही नहीं तीर्थ संचालन का भी सौभाग्य प्राप्त कर सकते है।
आमतौर से तीर्थ वास में निर्वाह खर्च स्वयं ही वहन करना पड़ता है। गायत्री शक्ति पीठों में यह सुविधा भी है कि निवास एवं निर्वाह जैसे सुविधा साधन वहाँ उपलब्ध मिलेंगे। आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण की सर्वांगपूर्ण साधना का तो सर्वोत्तम सुअवसर है ही; गृह निवृत्त लोगों के लिए यह उपयुक्त अवसर है अभी एकाकी व्यक्ति ही लिए जायेंगे पर जिनकी गृहणी शारीरिक दृष्टि से समर्थ होंगी और तीर्थ प्रयोजन में कुछ हाथ बटा सकेंगी उन्हें पत्नी समेत भी रहने की स्वीकृति मिल जायगी। बच्चे किसी भी स्थिति में साथ नहीं रह सकेंगे।
जिनके ऊपर गृहस्थ के उत्तरदायित्व नहीं आये है और जल्दी ही उसे लादने का मन भी नहीं है वे इस तीर्थ सेवन योजना में सम्मिलित हो सकते है। न्यूनतम एक वर्ष की भी यह अवधि हो सकती है अपेक्षा तो अधिक समय रहने की ही की गई है। क्योंकि प्रतिभा और कुशलता का निखार किसी भी कार्य में समय साध्य है अनुभव और अभ्यास से ही प्रवीणता प्राप्त होती है और कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकना संभव होता है। इसलिए न्यूनतम एक वर्ष की अवधि ही तीर्थ संचालन के परिव्राजक प्रयोजन के लिए रखी गई है। अपेक्षा यह की जाय कि यह अवधि जितनी लम्बी हो उतनी ही निश्चिंतता रहेगी और सुव्यवस्था बन पड़ेगी।
तीर्थ संचालन से पूर्ण न्यूनतम तीन मास की ट्रेनिंग प्राप्त करना आवश्यक है। ब्रह्मवर्चस शांतिकुंज में इसकी समुचित व्यवस्था है। यह ट्रेनिंग अवधि तीर्थ वास में सम्मिलित नहीं है उसके अतिरिक्त है। इस प्रकार एक वर्ष का समय देने वालों को भी पन्द्रह महीने लग जायेंगे। दीर्घ कालीन और स्वल्प कालीन-सदा सर्वदा वाले और एक वर्ष बीते सभी परिव्राजकों की ट्रेनिंग एक जैसी-तीन महीने की ही है। इनके बाद ही किसी को तीर्थ संचालक के लिए परिव्राजक जत्थे में भेजा जा सकेगा। यों सभी परिव्राजक अवैतनिक होंगे। जिनके पास अपनी आजीविका है वे निजी खर्च अपने पास से भी चलायेंगे। जिनके पास वैसी सुविधा नहीं है वे तीर्थ में भोजन वस्त्र आदि का निर्वाह प्राप्त कर सकेंगे। अपवाद के रूप में कुछ लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था भी रखा गई है कि यदि अनिवार्य हो तो वह अधिकतम एक सौ रुपया मासिक तक उन पर अवलंबितों के लिए भी भेज सकें। इस वर्ग की प्रथम ट्रेनिंग आगामी जुलाई, अगस्त, सितम्बर में होंगी। इसके बाद यह विद्यालय निरन्तर चलता रहेगा।
गायत्री शक्ति पीठें, बनने जा रही है। उनकी इमारतें कलेवर की दृष्टि से निस्सन्देह छोटी है। इस घोर महंगाई के जमाने में मात्र डेढ़ लाख रुपया कितना होता है, और उतने भर से विशालता कहाँ उत्पन्न हो सकती है इसका अनुमान लगाने में किसी को भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। इतने पर भी उनकी गरिमा इसलिए है कि वे अन्य देवालयों के समतुल्य दीखने पर भी सम्भावना की दृष्टि से नितान्त भिन्न है। बुद्ध के संधाराम और समर्थ गुरु के ग्राम्य मठ आरम्भ में कितने बड़े थे इसका कोई महत्व नहीं, गरिमा इस बात की है कि उनके द्वारा कितने महान कार्यों का सम्पादन हुआ। गायत्री शक्ति पीठों का कलेवर देवालय-सत्संग भवन, अतिथि ग्रह का एक छोटा समन्वय ही होगा। विशालकाय धर्म संस्थानों के निमित्त बनी इमारतों की तुलना में इन्हें; खिलौने भर ठहराया जा सकता है। इतने पर भी यह विश्वास किया जा सकता है कि वे अपने महान प्रयत्नों के कारण अद्भुत एवं अनुपम ही कहे जायेंगे। इनके पीछे परिव्राजक योजना और धर्म चेतना उत्पन्न करने के निर्धारण को युग शक्ति कहा जा सकता है। युगान्तरीय चेतना उत्पन्न कर सकने की समर्थता ही इन निर्माणों के सम्मुख लोक विवेक को नतमस्तक होने के लिए विवश करेगी। धर्म का-धर्म संस्थानों का स्वरूप क्या होना चाहिए-भूतकाल में क्या था। इसका समाधान इन छोटे निर्माण की कुरेद बीन करने वाले किन्हीं महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंच सकेंगे, ऐसी आशा की जा सकती है।
गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण-युग की आवश्यकता का एक अविछिन्न अंग है। इसलिए समय की शक्तियाँ इस सृजन को पूरा कराने में परोक्ष सहयोग देंगी और निकट भविष्य में उन्हें देश के कौने-कौने में गर्वोन्नत मस्तक से खड़ा हुआ देखा जा सकेगा। यह शुभारम्भ जिस सत्ता और जिस संकल्प को साथ लेकर हुआ है उसकी पूर्णता को असंदिग्ध ही माना जाना चाहिए। 24 शक्ति पीठों का निर्माण आरम्भिक घोषणा का प्रथम चरण है। उसे ‘इति’ नहीं अथ कहना चाहिए। इस संख्या को कई गुनी विस्तृत होते हुए अगले ही दिनों देखा जा सकेगा।
इस निर्माण में हाथ बँटाने, कंधे से कन्धा-पैर से पैर मिला कर चलने के लिए जागृत आत्माओं को खुला आमन्त्रण प्रस्तुत है। सहयोग के अनेकों आधार हैं और उनमें से हर स्थिति का, हर स्तर का व्यक्ति अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुरूप कुछ करने के लिए साहस जुटा सकता है। प्रश्न साधनों का नहीं साहस का है। साधन तो प्रचुर परिमाण में उनके पास भी लतियाते रहते है; जो निरन्तर अभाव की रट लगाये रहते और तृष्णा की आग में अध जले मुर्दे की तरह झुलसते रहते है। बिना पढ़ा-निर्धन हजारी किसान, मात्र अपने श्रम का सहारा लेकर अजर-अमर हो सकता है और हमारी बाम जिले में हजार बाग लगा सकता है तो कोई कारण नहीं कि युग सृजन की दृष्टि से उठाये गये ऐतिहासिक कदम में किसी भी स्थिति का व्यक्ति किसी न किसी प्रकार उसमें योगदान न दे सके।
भवन निर्माण में पैसे की जरूरत पड़ेगी। युग निर्माण परिवार में हजारों व्यक्ति ऐसे होंगे जो डेढ़ लाख रुपया अपनी प्रस्तुत सम्पत्ति में से निकाल दे तो उतने भर से उन्हें आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़े, ऐसी सम्भावना नहीं है। प्रश्न साधन का नहीं साहस का है। भगवान साधन तो असंख्यों को देते हैं, पर न जाने सत्साहस देने में क्यों कृपणता बरतते है। लगता है वही कृपणता उन लोगों पर छाई रहती है जिनके पास पैसा तो है, पर हृदय नहीं। उत्तराधिकारियों की अमीरी बढ़ाने के स्थान पर ऐसे लोग यदि अपने साधनों से युग की माँग पूरी करने में उदारता का परिचय दे सकें तो यही कहा जायेगा कि भगवान ने उन्हें साधन और साहस देकर अच्छे अर्थों में अपना कृपा पात्र बनाया।
कुछ लोग इतने प्रतिभावान और प्रतापी होते है कि अपने प्रभाव का उपयोग करके एक तीर्थ के निर्माण को लक्ष्य बना सकते है। प्रभाव भी एक प्रकार का वैभव ही है। जिनके पास वह है उन्हें भी अमीरों की ही श्रेणी में गिना जायगा। कुछ अपने पास से कुछ मित्र परिचितों से समेट लिया जाय तो उतनी सी रकम इकट्ठी होने में कोई कठिनाई नहीं रह जाती। विशेषतया तब-जबकि उसकी पूर्ति में महाकाल का संकल्प जुड़ा होने से सफलता में कोई बड़ी अड़चन आने वाली नहीं है।
प्रस्तुत संकल्प 24 महीने में पूरा हो जाने की आशा है। बसन्त 79 में संदेश उतरा है। 24 महीने में बसन्त सन् 81 तक यह संख्या पूरी ही नहीं हो जायगी वरन् इस परिधि को पार करके कहीं अधिक आगे बढ़ गई-कई गुनी पहुँच गई होगी। घोषित स्थानों में परिस्थितिवश परिवर्तन हो सकता है, पर स्थापनाओं में कमी नहीं पड़ेगी। इन 24 महीनों में निजी अनुदान के रूप में संचित पूँजी का एक अंश एवं मासिक आय का एक भाग नियमित रूप से देते रहने की बात सोची जा सकती है। गिलहरी जब अपने बालों में बालू भरकर अपना श्रमदान सहयोग प्रस्तुत कर सकती है, केवट का नाव चलाने का श्रम सहयोग अविस्मरणीय बन सकता है तो भावनाशील लोगों का श्रम एवं श्रम का प्रतीक अंशदान भी इतना उपयोगी हो सकता है कि उससे आत्म-संतोष का एवं दूसरों के लिए अनुकरणीय उदाहरण का आधार बन सकें। इस प्रकार के कण-कण भी एकत्रित होकर एक संयुक्त शक्ति के रूप में ऋषियों द्वारा संग्रहित रक्त घट की उपमा बन सकते है। ऐसा संग्रह सीता के जन्म का कारण बना था। युग शक्ति के अवतरण में ऐसी भूमिका भी बहुत उपयोगी हो सकती है-भले ही वह कितनी ही छोटी क्यों न हो। 24 महीने लगातार कुछ-कुछ अंशदान देते रहने की बात धनी निर्धनों में से हर कोई सोच सकता है।
तीर्थयात्रा का पुण्य माना जाता है। तीर्थ में दानपुण्य करने का महात्म्य बहुत है। फिर तीर्थ निर्माण का महत्व कितना बड़ा हो सकता है। जप-तप करने वाले ब्राह्मण साधुओं को भोजन इस दृष्टि से कराया जाता है कि उनकी साधना का एक अंश इन अन्नदाताओं को भी मिलेगा। इन प्रचलित मान्यताओं में यदि कुछ सत्य और तथ्य हो तो तीर्थ निर्माण का पुण्य इस सबसे अधिक ही माना जायगा। इन धर्म संस्थानों से जो धर्म चेतना उत्पन्न होगी उस उत्पादन में इन पुण्यात्माओं का एक बड़ा भाग होगा जिनने इस सृजन में सहयोग दिया है।
तीर्थ यात्रा पाप निवृत्ति एवं प्रायश्चित के लिए भी की जाती है। यह प्रायश्चित प्रयोजन तीर्थ स्नान से भी बढ़कर तीर्थ निर्माण में किये गये अंशदान के रूप में भी पूरा हो सकता है।
यश कामना से जहाँ-तहाँ स्मारक बनाये जाते है। यह प्रयोजन भी वहीं अच्छी तरह पूरा हो सकता है जहाँ अधिक लोग पहुँचें। अधिक लोगों द्वारा अधिक सराहना मिलने के लिए स्थान चुनना हो तो अपने पास-पड़ोस की बात सोचने के स्थान पर ऐसे स्थान चुने जाने चाहिएँ जहाँ से व्यापक और चिरस्थायी ख्याति मिलने की सम्भावना हो। प्रस्तुत तीर्थों में पाँच हजार से अधिक देने वालों के नाम के पत्थर लगा देने का भी निश्चय किया गया है। यों अच्छा तो यही है कि यश कामना करके पुण्य का मूल्य न घटाया जाय। स्वर्गीय पूर्वजों के निमित्त कई व्यक्ति कुछ दान-पुण्य करते है उनके लिए भी इस राशि को गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण में लगा देना अधिक श्रेयस्कर है।
अन्नदान, वस्त्र दान, गौ दान, औषधि दान, धनदान आदि का पुण्य फल समझा जाता है। इस संदर्भ में यह भी स्मरण रखा जाने योग्य है कि तीर्थ दान की गरिमा इस सबसे बड़ी है। गायत्री तीर्थ जीवन्त तीर्थ है-उनमें धर्म चेतना के व्यापक विस्तार का जो कार्यक्रम जुड़ा हुआ है उसे देखते हुए इसे ब्रह्मदान के रूप में मूर्धन्य माना जा सकता है।
युग चेतना उत्पन्न करने वाले धर्म धारण के केन्द्र संस्थान बनने वाले इन गायत्री तीर्थों के निर्माण में जागृत आत्माएँ अपना ध्यान चौबीस महीने केन्द्रित रखें तो वे इस संदर्भ में बहुत बड़ी भूमिका प्रस्तुत कर सकती है। साधनों की दृष्टि से भले ही वे कितनी ही सामान्य क्यों न हों।
चौबीस गायत्री शक्ति पीठें 24 तीर्थों में बनने जा रही है। इसके अतिरिक्त जागृति केन्द्रों के रूप में यही प्रतिष्ठापना कुछ अन्य स्थानों में भी होगी। सम्भवतः वे भी इतने ही हों, या इनसे भी अधिक। आगामी चौबीस महीनों के भीतर बन कर खड़े हो जायेंगे। सभी की इमारतें प्रायः एक जैसी होंगी। सभी में लागत प्रायः डेढ़ लाख के लगभग आवेगी। सभी में 9 प्रतिमाएँ स्थापित होगी और सभी में पाँच परिव्राजक रहेंगे। संख्या की दृष्टि से इस अवधि में एक सौ तक पहुँच सकती है। यह सौभाग्य जिन स्थानों को मिलेगा वे प्रचलित तीर्थों की तरह ही विख्यात होंगे। तीर्थ यात्रियों की मण्डलियाँ देशभर से वहाँ पहुंचा करेगी। इन धर्म केन्द्रों के स्थापनकर्ता भी यशस्वी बनेंगे और अपने सत्साहस का पुण्य परिणाम देखकर गर्व गौरव अनुभव करेंगे।
इतने पर भी यह निश्चित है कि मुट्ठी भर स्थानों और व्यक्तियों को ही इस प्रकार का श्रेय सौभाग्य प्राप्त होगा; जबकि आकाँक्षा सभी की यह रहेगी कि ऐसा सुयोग उन्हें स्वयं को भी मिला होता, अथवा उनका स्थान भी इस गणना में आ सका होता तो कितना अच्छा रहता।
प्रस्तुत गायत्री शक्ति पीठ योजना का एक छोटा-सरल, सर्वसुलभ रूप यह हो सकता है कि ज्ञान रथ के रूप में स्थानीय देव मन्दिर बनाया जाय। इसकी लागत अधिकतम एक हजार और युग साहित्य की पूँजी अधिकतम एक हजार होगी। कुल लागत दो हजार से अधिक नहीं कम ही बैठेगी। थोड़ी किफायत करने पर यह डेढ़ हजार और बहुत अधिक किफायत करने पर एक हजार तक की हो सकती है। उसे चलते-फिरते प्रज्ञा-मन्दिर के रूप में समझा जा सकता है। तीर्थ संचालक परिव्राजक के रूप में अपना निज का समय दो चार घण्टा नित्य दे सकते है।
ज्ञान रथ अभियान की जिन्हें जानकारी है वे जानते है कि उन्हें आत्मिक दृष्टि से ऋतम्भरा प्रज्ञा का विशुद्ध देव मन्दिर ही समझा जा सकता है। घर-घर युग साहित्य पहुँचाना और वापिस लाना प्राचीन काल के सन्तों द्वारा घर-घर अलख जगाने की तरह ही परमार्थ प्रयोजन है। जो लोग मन्दिर में नहीं पहुँच पाते उन्हें घर पर मन्दिर को ले पहुँचना ऐसा ही है जैसा दुर्घटना ग्रस्त अपंगों के पास स्वयं दौड़कर जाने वाले सेवा भावियों का होता है। गायत्री शक्ति पीठ का लाभ वे ही उठायेंगे जो वहाँ तक अपने पैरों चल कर पहुँचेंगे। किन्तु जो वहाँ तक किसी कारण वश नहीं जा पाते उनके घर तक मन्दिर को स्वयं घसीट कर ले पहुँचना कम नहीं वरन् अधिक महत्व का ही सेवा कार्य है।
ऋतम्भरा प्रज्ञा ही गायत्री है। युग साहित्य में उसकी आत्मा का दर्शन और भी अधिक अच्छी तरह हो सकता है। यों प्रतिमा के सान्निध्य से भी भक्ति भावना जगती है उन्हें सत्साहित्य के स्वाध्याय से भी कम लाभ नहीं मिलता, इसे भली प्रकार समझ लेना चाहिए। भगवती सरस्वती की मयूर वाहिनी प्रतिमा भी पूजनीय है, पर विद्या विस्तार के रूप में जो प्रयास चल रहे है; उनमें भी माता शारदा को ही वीणा बजाते हुए देखना चाहिए। गायत्री माता की प्रतिमाएँ शक्ति पीठों में भी स्थापित होंगी पर प्रज्ञा का आलोक वितरण करने वाले साहित्य में भी उसी तथ्य की प्रत्यक्ष झाँकी होने की बात भी झुठलाई नहीं जा सकती।
ज्ञान रथों के रूप में चलने वाले-चलते-फिरते प्रज्ञा मन्दिर भी गायत्री माता के छोटे किन्तु प्रकाश भरे देवालय ही है। प्रकारान्तर से वे सभी उद्देश्य उनके द्वारा पूरे होते है जो शक्ति पीठों के साथ जुड़े हुए है। इन्हें परमार्थ बुद्धि से चलाने में जितना समय लगता है उसे तीर्थ परिव्राजकों की श्रद्धा के समतुल्य ही समझा जा सकता है। जो कार्य बड़े रूप में शक्ति पीठ करेंगे उसी को इन प्रज्ञा रथों के माध्यम से भी छोटे रूप में पूरा किया जा सकेगा। अन्तर परिमाण का तो है परिणाम का नहीं। छोटे और बड़े शालिग्राम आकार में ही न्यूनाधिक होते हैं उनकी पूजा करने वाले समान रूप से अपनी श्रद्धा साधना का प्रतिफल प्राप्त करते है।
जो अपने यहाँ शक्ति पीठ स्थापित न कर सकें, वे छोटे आकार का प्रज्ञा-मन्दिर चलते-फिरते ज्ञान रथ के रूप में बना लें और अपना निज का समय उसे दो घन्टा नित्य चलाने में लगाना आरम्भ कर दें। जो इतना कर सकें उन्हें प्रशंसा न सही सन्तोष करने का पूरा अवसर है। ऐसा बन पड़े तो छोटे रूप में शक्ति पीठ के निर्माण एवं संचालन जैसा युग सृजन में एक छोटा योगदान माना जा सकता है।
जो स्वयं नहीं बना सकते, वे मिल जुलकर ज्ञानरथ बनालें। जो स्वयं उसके लिए समय नहीं दे सकें तो स्थानीय समय दानी परिव्राजकों से उसे बारी-बारी चलाने का अनुरोध कर सकते है।
एक उपाय यह भी हो सकता है-कि किसी कुशल व्यक्ति को उतने घन्टे के लिए नियुक्त कर लिया जाय और उतने पैसे का प्रबन्ध कर दिया जाय। इस संदर्भ में मथुरा केन्द्र ने यह निश्चय किया है कि साहित्य का लाभांश विशुद्ध रूप से परिव्राजक प्रयोजनों में ही लगेगा। और लाभांश ‘कमीशन’ के आधार पर वितरित किया जाता है। श्रम और मनोयोग नापने और उसका पुरस्कार देने का एक काम चलाऊ माप दण्ड और भी है कि श्रम कर्ता को कमीशन दिया जाय। तीर्थ संचालकों के खर्च की व्यवस्था का एक बड़ा आधार भी यह लाभांश ही है। ज्ञानरथों को भी इस सुविधा का लाभ मिलेगा और जो लोग उन्हें चलायेंगे वे अपने निर्वाह के कुछ साधन उसी प्रकार उपलब्ध कर सकेंगे; जिस प्रकार शक्ति पीठों में काम करने वाले परिव्राजकों को मिलते है।
इन सचल प्रज्ञा-मन्दिरों की स्थापना हर तीर्थ में तत्काल की जा सकती हैं शक्ति पीठ 24 की संख्या में या उससे कुछ अधिक बनने जा रहे हैं, पर प्रसिद्ध तीर्थों की ही संख्या 2400 से ऊपर है। इन सबमें शक्ति पीठ तो नहीं बन सकते पर प्रज्ञा मन्दिर हर जगह चल सकते है। कार्यकर्ता का पारिश्रमिक और वेतन के बीच डडडड इनके संचालकों एवं साथियों को मिल-जुलकर उठानी चाहिए। इस व्यवस्था के आधार पर 2400 तीर्थों में कुछ ही समय में प्रज्ञावतार आलोक वितरित होने का सुयोग बन सकता है। उससे भी निश्चित रूप से वही सत्परिणाम छोटे रूप में मिल सकता है जो बड़े रूप में प्रस्तुत शक्ति पीठों के द्वारा मिलने जा रहा है।
यह प्रयोग बिना जोखिम का है। कोई निजी रूप से भी इसे आरंभ करें तो किसी बड़े असमंजस की आवश्यकता नहीं है। असफलता मिले तो विनिर्मित ज्ञान रथ को कोई भी फेरी वाला प्रसन्नतापूर्वक खरीद सकता है। मुश्किल से ही सौ-दो सौ का घाटा पड़ेगा। बची हुई पुस्तकें किसी भी पुस्तक विक्रेता को उसी मूल्य पर दी जा सकती हैं जिस पर वह प्राप्त हुई हैं। यह खुला रहस्य है बड़े पुस्तक विक्रेताओं को भी थोक माल लेने पर 25 प्रतिशत से अधिक कमीशन देने का नियम नहीं है। जबकि नियमित और व्यवस्थित ज्ञान रथों को 33 प्रतिशत तक की छूट दे दी जाती है। बची हुई पुस्तकें मिले हुए कमीशन को काट कर किसी पुस्तक विक्रेता को ज्ञान रथ वाले दे दें तो उन्हें उस कार्य में लगाई गई पूँजी में कोई कमी न पड़ेगी। ज्ञान रथों के बनाने में आरम्भिक पूँजी तो लगती है, पर पूँजी डूबने की आशंका नहीं है।
हर तीर्थ में-हर बड़े नगर में ज्ञानरथों के रूप में छोटे गायत्री शक्ति पीठ बनाये और चलाये जा सकते है। इसलिए उन सभी को प्रयत्नशील होना चाहिए जो अपने स्थान या व्यक्तित्व को इस पुण्य स्थापना के साथ सम्बद्ध करने के इच्छुक हों।
अन्य क्षेत्रे कृतं पापं पुण्य क्षेत्रे विनश्ष्यति। पुण्य क्षेत्रे कृतं पापं बज्रलेपो भविष्यति।।
अर्थात्- तीर्थों में रहते हुए भूलकर भी पाप नहीं करना चाहिए। क्योंकि दूसरे स्थल के पाप तो तीर्थ में स्नान करने से कट जाते है किन्तु तीर्थ स्थल में किया गया पाप बज्र लेप हो जाता है। वह फिर किसी प्रकार नष्ट नहीं होता।
प्रज्ञावतार की इस उदीयमान बेला में युगान्तरीय चेतना का विस्तार प्रभात किरणों की तरह द्रुतगति से होता चला जा रहा है। गायत्री शक्तिपीठें इस परिवर्तन प्रयास में अपनी असाधारण भूमि प्रस्तुत करने जा रही है। समय ही बतायेगा कि सामान्य उपासना गृहों की तरह प्रतीत होने वाले इन देवालयों ने मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की भूमिका किस शानदार ढंग से निभाई। यह निर्माण ऐतिहासिक स्मृतियों में सम्मिलित रहेंगे और उनके निर्माताओं को वैसा ही श्रेय मिलेगा जैसा चार धामों के बनाने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले मान्धाता को मिला था। इतने साधन वे अकेले नहीं जुटा सके थे, पर उन्होंने अपने निजी साधनों के उपरान्त जो कमी पड़ती थी उसे अपने स्नेही, सम्बन्धियों, मित्र, पड़ौसियों को प्रोत्साहित करके पूरा कर दिया था। देने वाले की तरह ही दिलाने वाले भी यशस्वी होते है।
बसन्त पर्व पर महाकाल का संदेश शक्तिपीठों के निर्माण के लिए उतरा। फरवरी में उसकी रूप-रेखा तैयार हुई और संपर्क क्षेत्र में जानकारी पहुँची। मार्च से उस महान निर्माण के लिए प्राणवान परिजनों के संकल्प आरम्भ हो गये। इतने जल्दी-इतने बड़े कार्य को कन्धे पर उठाने के लिए लोग दुस्साहस जैसा कदम उठा सकेंगे ऐसी आशा थी नहीं, पर महाकाल की इच्छा जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में जिस प्रकार हिलोरें लेने लगी, उसे रोकता भी कौन? अनुरोध तो बहाना मात्र है। वस्तुतः इस दिशा में जो कुछ हो रहा है उसे विशुद्ध अन्तःप्रेरणा का उभार कह सकते है। इसके उभार का सूत्र संचालन उद्देश्य सत्ता द्वारा हो रहा है। दैवी आवेश ही रीछ बानरों को-गिद्ध, गिलहरियों को-ग्वाल−बालों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित कर रहा है जिसकी आशा सामान्य रूप से नहीं ही की जा सकती।
मार्च के एक महीने में 24 स्थानों पर निर्माण संकल्प पूरे हो गये। हरिद्वार आकर इन निर्माता मण्डलों ने अपने संकल्प लिये है। उन्हें निर्माण का शुभारम्भ करने के लिए मंगल प्रतीकों के रूप में शान्ति कुंज से एक-एक हजार रुपये अनुदान मिला है। शेष व्यवस्था यह निर्माण मण्डल स्वयं करने में तत्काल जुट गये है।
जो संकल्प कार्यान्वित हो चले उनमें से 14 घोषित तीर्थों के है और 10 अघोषितों के। अघोषित शक्तिपीठ वहाँ बनाने की नई व्यवस्था बनाई गई है जहाँ पुराने प्रख्यात तीर्थ तो नहीं है, पर उन स्थानों की उपयोगिता को देखते हुए आग्रहकर्त्ताओं का यह तर्क स्वीकार करना पड़ा कि पुराने तीर्थ भी जब बने होंगे तब वे सर्वथा नये ही रहे होंगे। सत्प्रवृत्तियां सामान्य स्थानों को तीर्थ बना देती है। जहाँ अघोषित नये शक्तिपीठ बनेंगे, वहाँ कुछ ही समय में प्रख्यात तीर्थ हो जायगा। यह तर्क वजनदार हैं। अस्तु उसे स्वीकार भी किया गया और क्रियान्वित होने का सिल-सिला भी चल पड़ा। घोषित 24 में से क्रमशः बनते चले जा रहे है। साथ ही अघोषित स्थानों में भी निर्माण का क्रम आरम्भ हो गया। इस दुहरी प्रगति से ही उस लक्ष्य की पूर्ति हो सकेगी। जिसमें 24-24 के विराम लेते हुए 240 निर्माणों तक पहुँचना है।
किन स्थानों में मार्च मास में संकल्प हुए और निर्माण आरम्भ हुए? किनने उनका उत्तरदायित्व संभाला और साधनों की व्यवस्था किस प्रकार हुई? इसका विवरण समग्र हो जाने पर अगले अंक में छापा जायेगा। अधूरापन रहने के कारण अभी उसकी सुविस्तृत जानकारी देना बन नहीं पड़ा किन्तु उसका सार इतना ही है कि इन स्थापनाओं के पीछे काम करने वाली जागृत आत्माओं की भाव संवेदनाएँ पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ जुट गई है। और सफलता का स्तर चमत्कार जैसा होगा। दैवी प्रयोजन-देव मानवों द्वारा किस प्रकार पूरे होते है इसके उदाहरण यों इतिहास के पन्ने-पन्ने पर भरे पड़े है, पर अपनी पीढ़ी को आँखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से यह दृश्य देखने का अवसर मिलेगा कि इतना कठिन और जटिल कार्य कितनी सरलता और कितनी सफलता के साथ कितने शानदार ढंग से सम्पन्न हो सका।
शक्तिपीठों की उपयोगिता स्पष्ट है। उनमें स्थापित नौ प्रतिमाओं के माध्यम से आत्म-विकास के आधारभूत सिद्धान्तों और साधनों से जन-जन को परिचित कराया जायेगा। देवालयों की दुनिया को यह परिचित कराया जाय कि लोक श्रद्धा के आधार पर समर्पित किये गये इन साधनों का सदुपयोग किस प्रकार होना चाहिए शक्तिपीठें उन सब को झकझोर कर रखेगी और एक नया मार्गदर्शन देगी कि इन इमारतों और उनके साथ जुड़ी हुई जन शक्ति एवं धन शक्ति का धर्म-धारणा के अभिवर्धन में किस प्रकार सही नियोजन किया जा सकता है। उपासना क्षेत्र में फैली हुई अराजकता का यह एक प्रकार से सार्वभौम अनुबंध होगा कि मनुष्य मात्र को आत्मिक प्रगति के लिए आस्थापरक एवं साधनात्मक अवलम्बन, ग्रहण करने के लिए उपयुक्त मार्ग क्या हो सकता है। बिखराव का केंद्रीकरण करने की दिशा में यह एक अति महत्वपूर्ण शुभारम्भ है। उपासना से आगे चलकर जीवन क्षेत्र की अन्यान्य मान्यताओं एवं गतिविधियों का भी सार्वभौम स्वरूप बन सकेगा, इस पर विश्वास करने के लिए पर्याप्त कारण एवं तथ्य मौजूद है।
प्रव्रज्या अभियान इन शक्तिपीठों का अविच्छिन्न अंग है। हर शक्तिपीठ में पाँच प्रशिक्षित परिव्राजक रहेंगे और वे निकटवर्ती क्षेत्र की प्रायः तीस मील जितनी परिधि अपनी सेवा साधना के लिए नियत करेंगे। दो परिव्राजक इस क्षेत्र में नव-जागरण की सचेतनता उत्पन्न करने के लिए परिभ्रमण करते रहेंगे। तीन स्थानीय गतिविधियों को सुनियोजित रखते में संलग्न रहेंगे। कहना न होगा कि प्रशिक्षित परिव्राजकों की सेवा साधना से उससे समूचे क्षेत्र में धर्म चेतना की कृषि कुछ ही दिनों में लहलहाती हुई दिखाई देगी।
घोषित शक्तिपीठों की योजना तीन मंजिली इमारतों की है। सभी का स्वरूप लगभग एक जैसा होगा। भूमि 60×80 फुट चौड़ी हैं। और लागत डेढ़ लाख से कम नहीं बैठेगी। जहाँ इतना प्रबन्ध हो सका है अभी उन्हीं स्थानों पर संकल्प हुए है और कार्य आरम्भ किये गये है। प्रस्तुत गतिविधियों के लिए जितने स्थान की आवश्यकता थी उसे ध्यान में रखते हुए पूरी-पूरी किफायत के साथ यह नक्शा बना है। फिर भी घोर महंगाई को देखते हुए इतनी लागत का आ जाना स्वाभाविक है। नौ मूर्तियां उनके लिए नौ छोटे बड़े देवालय-यज्ञ दैनिक यज्ञ के लिए यज्ञशाला-सत्संग भवन-दो सौ साधकों के एक साथ बैठकर साधना करने का स्थान-अतिथि कक्ष-पाँच परिव्राजकों के रहने की निवास व्यवस्था-साहित्य स्टाल, पुस्तकालय जैसी प्रवृत्तियों को देखते हुए इससे कम में काम चलना कठिन था। सो न्यूनतम आवश्यकता और सस्तेपन की हरमद को पूरी तरह ध्यान में रखने हुए योजना बनाई गई है।
स्पष्ट है कि युग निर्माण परिवार के सदस्यों का वर्ग आर्थिक दृष्टि से गुजारा कर सकने जैसी स्थिति का ही है। उनमें सुसम्पन्न तो उँगलियों पर गिनते जितने ही होंगे। निर्माण की उपरोक्त राशि उन्हें अपने ही लोगों से एकत्रित करना कठिन पड़ रहा है। सम्पन्न लोगों की भी कमी नहीं है, पर उन पर प्रभाव डालने वाली प्रतिभाएँ परिजनों में बहुत ही कम दीख पड़ती है। ऐसी दशा में जहाँ संभव है वहाँ तो बन ही रहे है और बनेंगे भी, किन्तु लगता है यह विस्तार एक छोटी सीमा तक ही हो सकेगा। जब कि समय की माँग को देखते हुए उनका विस्तार अत्यधिक संख्या में होना चाहिए। 24 निर्माणों का एक विराम ही तो पूरा हुआ है। ऐसे-ऐसे विराम पड़ाव तो अभी कितने ही पार करने होंगे। 108-240-1008- 2400 के विस्तार की आशा की जाय तो इसमें कुछ भी असमंजस या आश्चर्य की बात नहीं है।
भावनाओं का उभार और अर्थ संकोच की इन दिनों भारी रस्साकसी चल रही है। भावनाशील परिजनों के आग्रह भरे ढेरों पत्र हर दिन आते है कि कोई ऐसा डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
*समाप्त*