समृद्धि और प्रगति का आधार बाहर नहीं भीतर

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सुविधा साधन प्राप्त करने के लिए, दूसरों को अनुकूल बनाने के लिए जो प्रयत्न होते हैं उनमें दबाव या अनुरोध ही प्रधान रखा जाता है इस आधार पर कुछ तो मिलता है, पर उतना नहीं जितना अपेक्षित है। दबाव की विवशता से किसी प्रकार पीछा छुड़ाने के लिए कोई कुछ देने भी लगे तो भी उसका स्तर गया बीता होता है। उपलब्धि क्या है और कितनी है यह देखना पर्याप्त नहीं। यह समझना भी आवश्यक है कि वह किस स्रोत से प्राप्त हुई और किस स्तर की है। निकृष्ट स्तर की उपलब्धि विस्तार से कितनी ही बड़ी क्यों न हो उसका परिणाम अन्ततः दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण ही होता है। इस प्रकार अनुरोध आग्रह से अपनी दीन दुर्बलता व्यक्त करते हुए जो मिलता है उसमें प्राप्त कर्त्ता को असमर्थ दुर्बल अभागी .... तिरस्कृतियों की मात्रा घुली रहती है। अनुग्रह से जो मिलता है उसके बदले आत्म-सम्मान और आत्मावलम्बन की गरिमा भी निश्चित रूप से घट जाती है।

सुविधा साधनों की वास्तविक आवश्यकता वस्तुतः बहुत स्वल्प है। सुखी निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है, सरलता और स्वल्प श्रम से सर्वत्र पाया जा सकता है यदि अधिक की आवश्यकता हो तो फिर उसका सही उपाय है अपने योग्यता का एवं पुरुषार्थ का अनुपात बढ़ाना। गुण, कर्म स्वभाव में शालीनता का संवर्धन करने से मनुष्य की प्रामाणिकता बढ़ती है और उस पूँजी के मूल्य पर अनायास ही दूसरों का सद्भावसिक्त समर्थन सहयोग मिलने लगता है। हर मनुष्य और हर पदार्थ के भीतर एक ऐसी श्रेष्ठ सत्ता विद्यमान है जो शालीनता को समुन्नत बनाने के लिए प्रकृति प्रेरणा एवं विधि विधान के अनुसार स्वतः ही काम करती और सहायता देती है।

अपने स्तर और पुरुषार्थ का बढ़ाना यही है वह सुनिश्चित मार्ग जिस पर चलते हुए भौतिक साधन सुविधाएँ ही नहीं आत्मिक विभूतियाँ भी प्रचुर परिमाण में उपलब्ध हो सकती हैं।

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उपासना से आत्मशोधन एवं आत्म परिष्कार

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नित्यकर्म में उपासना का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। नित्य कर्मों में ग्रहण और विसर्जन की दो प्रक्रियायें सम्मिलित हैं। अन्न, जल, वायु आदि शरीर ग्रहण करता है और मल, मूत्र, पसीना, साँस आदि विसर्जित करता है। इनके प्रबन्ध को नित्य कर्म कहते हैं। शरीर यात्रा के लिए यह सब अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आत्मा की भी आवश्यकतायें शरीर की तरह ही हैं। उनके लिए भी कुछ नित्य कर्म करने होते हैं। न करने पर अन्तरात्मा को भूख रहने से दुर्बल बनना पड़ता है। मल-विसर्जन न होने पर उस विकृत संजय की सड़न-से उत्पन्न विषाक्तता रुग्णता के रूप में परिणित होती है। नित्यकर्मों में व्यतिरेक उत्पन्न होने से शरीर का स्वास्थ्य संतुलन बिगड़ता है। इसी प्रकार आत्मा की आवश्यकतायें पूरी न होने पर मानसिक रुग्णता और आत्मिक मलीनता बढ़ने लगती है।

ईश्वर का अंश होने के कारण जीवात्मा अपने मूल उद्गम से ही अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकतायें पूरी करता है। जलाशय की सम्पदा बादल के अनुदान पर निर्भर रहती है। धरती पर जितनी भी जिस स्वरूप में भी गर्मी है वह सूर्य की सम्पदा है। इसी प्रकार व्यक्ति चेतना न केवल विश्व चेतना का एक घटक है वरन विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उसे परब्रह्म के भण्डार से कुछ प्राप्त करना पड़ता है। उपासना इसी आदान-प्रदान का द्वार खोलती है। रिजर्व बैंक में जारी की गई नोट मुद्रा ही सर्वत्र फैली पड़ी है। यों लोगों के पास अपना-अपना धन भी होता है पर यदि उसका सम्बन्ध रिजर्व बैंक से न रह जाय तो बड़े नोट भी कानी-कौड़ी मोल के रह जाते हैं। जाली नोटों की नहीं, उन्हें रखने वाले की भी दुर्गति होती है। ईश्वरीय सत्ता के साथ जीवसत्ता की सघनता जोड़ने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने के लिए उपासना को प्रमुख माध्यम माना गया है। उपासना न करने से ईश्वर का तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं पर मनुष्य को वैसे ही लाभ से वंचित रहना पड़ता है जैसा कि शुद्ध वायु प्राप्त न कराने पर शरीर को। पानी न पीने पर वरुण देवता की कोई क्षति नहीं। धूप सेवन न करने से सूर्य का कोई हर्ज नहीं। बिजली का उपयोग न करने से इन्द्र को कोई नाराजी नहीं। प्रयोक्ता को ही उनके लाभ अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है।

नित्य कर्म में स्नान, कपड़े धोना, दाँत माँजना, बुहारी लगाना आदि कृत्यों की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि भीतर से निकलने और बाहर से बरसने वाली गन्दगी का नियमित रूप से परिमार्जन होता रहे। मन पर भी आन्तरिक कुसंस्कारों और बाह्य अनाचरणों से मलीनता की छाप पड़ती और बढ़ती है। उपासना से उनका नित्य-नियमित परिमार्जन होता है और विघातक विकृतियों के कारण होने वाला पतन और पराभव रुक जाता है। उपासना का लाभ मिले बिना नहीं रहता। अग्नि, बर्फ, सुगन्ध आदि की समीपता का प्रभाव तत्काल देखा जा सकता है। कुसंग-सत्संग का प्रभाव सर्वविदित है। ईश्वर की समीपता प्राप्त करने के लिए की गई उपासना यदि सच्चे मन और सही उद्देश्य के लिए की गई है तो उसका प्रभाव लोह पारस के स्पर्श से स्वर्ण बनने जैसा सत्परिणाम सामने लाता है। उपासक को उपास्य की विशेषताओं और विभूतियों का लाभ मिलता है और वह क्रमशः अधिकाधिक समुन्नत होता चला जाता है। दो तालाबों को नाली खोद कर आपस में मिला दिया जाय तो कम पानी वाले तालाब की सतह उठने लगती है और उतनी बड़े तालाब के बराबर जा पहुँचती है। उपासक के अन्तराल का स्तर ऊँचा उठाने में असाधारण सहायता करती है। ऐसे-ऐसे अनेकानेक सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए उपासना को चेतना क्षेत्र का नित्य कर्म माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वालों की शास्त्रकारों द्वारा भर्त्सना की गई है।


क्या प्रमाण है कि ईश्वर नहीं है?

यों तो यह सारा संसार ही अपने आप में एक महान आश्चर्य है। पर संसार की कुछ इमारतें हैं जिनकी गणना सात महान आश्चर्यों में की जाती है। इनमें से एक है मिश्र के पिरामिड। वहाँ की राजधानी काहिरा से 9 मील पूर्व की ओर बने तीन पिरामिडों का समूह इस बात का द्योतक है कि अब से तीन चार हजार वर्ष पूर्व वहाँ के कला कौशल ने कितनी उन्नति की थी। इनका निर्माण ईसा से 3500 से 1100 वर्ष पूर्व की अवधि के बीच हुआ माना जाता है। बड़े बड़े पत्थरों को एक-पर एक चिन कर सीढ़ियों की तरह बनाई गई ये इमारतें आज की उन्नत भवन निर्माण कला को भी मात देती हैं।

पिरामिड वस्तुतः उस समय के राजा महाराजाओं या संपन्न प्रतिष्ठित व्यक्तियों की कब्रें हैं। इनमें सबसे बड़ा पिरामिड है जो राजा च्योप्स की कब्र पर बनाया गया है। इसका निचला भाग 13 एकड़ जमीन के घेरे में फैला हुआ है। लगभग 13 लाख पत्थर इसके बनाने में इस्तेमाल किये गये हैं। इनमें से कई पत्थरों का वजन ढाई टन तक है। आश्चर्य किया जाता है कि उस समय जब कोई क्रेनें नहीं थीं और न ही कोई मशीनें तो इन पत्थरों को वहाँ तक कैसे ले जाया गया और किस तरह इनको चिनकर 450 फीट ऊँचाई तक बनाया गया। इससे भी आश्चर्य की बात यह कि इन पिरामिडों के अन्दर की कब्रों में जो शव दफनाये गये, वे आज भी ज्यों के त्यों विद्यमान हैं। पिरामिडों के सामने ही 140 फुट लम्बा बहुत बड़ा पुतला है। जिसका मुँह औरत का सा है और धड़ सिंह जैसा इसे ‘स्फिक्स’ कहा जाता है। आँधी, वर्षा, तूफान इनका कुछ नहीं बिगाड़ सके।

पिरामिडों की तरह की दुनिया का दूसरा बड़ा आश्चर्य है बेबीलोन के झूलते बगीचे। ईसा से 600 वर्ष पूर्व बनवाये गये इन बागों की ऊँचाई 75 से 300 फुट जमीन के ऊपर तक है। इन बगीचों के निर्माण की गाथा भी उतनी ही विचित्र है। कहते हैं कि राजा नेबुचादनेजार ने ये बाग लगवाये थे। जिन दिनों ये बने उन दिनों अरब के पास बेबीलोन नामक एक बहुत ही सुन्दर नगर था। वहाँ के राजा नेबुचादनेजार ने फारस की राजकुमारी से विवाह किया। किन्तु वह इस नये नगर और राजमहल के परिवेश में उदास रहने लगी। राजा को एक बार उसने बातों ही बातों में बताया कि यहाँ कोई सुन्दर बगीचा नहीं है। बगीचे तो वहाँ बहुत थे और एक एक सुन्दर थे। राजा ने उन बगीचों के बारे में बताया तो राजकुमारी ने कहा ये बगीचे तो उसके देश के बगीचों से बहुत ही घटिया हैं। इस पर राजा ने आदेश दिया कि ऐसे बाग बनवाये जाएँ जो दुनिया में बेजोड़ और वे मिसाल हों।

राजा के आदेश का पालन किया गया और सैकड़ों मील दूर पहाड़ों से पत्थर लाए गये। जमीन के ऊपर छतें पाट कर जमीन बनाई गई और उस पर सुन्दर तथा सुगन्धित फूल लगाए गये। झील से पंप द्वारा पानी चढ़ाया गया। इस प्रकार इन झूलते बगीचों का निर्माण हुआ जिन्हें 40 हजार मजदूरों और कारीगरों ने तीन वर्ष तक रात दिन काम करके तैयार किया। ये बगीचे भी संसार के महान आश्चर्यों में गिन जाते हैं।

आगरा का ताज महल भी इसी प्रकार एक सम्राट द्वारा अपनी प्रिय रानी की याद को अमर करने के लिए बनवाई गई इमारत है। संसार के सर्व प्रसिद्ध सात आश्चर्यों में से एक इस ताजमहल का निर्माण साढ़े अठारह वर्षों में हुआ। इसे बनाने के लिए कोई 20 हजार मजदूर रोज काम करते थे। इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार उस समय जब वस्तुऐं और मजदूरी बहुत कम मूल्यों पर उपलब्ध थीं ताज महल के निर्माण में 6 करोड़ रुपये खर्च हुआ। इसके लिए राजस्थान से संगमरमर, तिब्बत से नीलम मणि, सिंहल से सिपास्त्मा जुलि मणि, पंजाब से हीरे और बगदाद से पुखराज रत्न मंगाए गये थे।

एशिया माइनर के तट पर ईसा से 350 वर्ष पूर्व बनाए गये डिआना देवी के मंदिर के निर्माण में भी करीब 100 वर्ष लग गये थे। इस मंदिर की मूर्ति 425 फुट लम्बी और 220 फीट चौड़ी थी। मन्दिर में लगभग 100 खम्भे थे और प्रत्येक की ऊँचाई 60 फीट थी। कोरिया का मेलोलियम भी संसार का एक आश्चर्य है, करीब 100 फीट लम्बी और उतनी ही चौड़ी चहार दीवार के मध्य 60-60 फीट ऊँचे 36 स्तम्भ जो नीचे मोटे और ऊपर क्रमशः पतले होते गए हैं, इनकी विशेषता है। सीढ़ियों पर नीचे से ऊपर तक संगमरमर की बहुमूल्य सजावट की गई है। यह एक मकबरा था जिसकी ऊँचाई 140 फीट थी, पाँच भागों में विभक्त इस मकबरे में तहखाना, खम्भों का घेरा, पिरामिड और मूर्तियों का आधार सभी कुछ आश्चर्यजनक है।

रोडस की प्रतिमा, ओलम्पिया में जुपीटर की विशाल मूर्ति, फारस के प्रकाश स्तम्भ, चीन की दीवार, पीसा का बुर्ज, सेंट सोफियों की मस्जिद, सेंट पीटर का गिरजाघर एम्पायर स्टेट (न्यूयार्क जिसकी ऊँचाई 1072 फीट है।) पाइटलट, ऊँचाई 1046 फीट) ईफिल टावर, कुतुब मीनार, गोल गुंबद, लीनिंग टावर, इंडिपेंडेस हाल, ऐलीजी पैलेस, क्रेमलीन आदि कितनी ही सर्वश्रेष्ठ इमारतें मनुष्यकृत रचनाएँ हैं जिनके निर्माण कर्ताओं को प्रखर बुद्धि और भाव सम्पन्न आत्माएँ कहा जा सकता है। संसार की इन आश्चर्य जनक इमारतों को देखकर सहज ही उनके निर्माताओं की कुशाग्र बुद्धि और पैनी प्रतिभा के सामने नतमस्तक हो जाना पड़ता है।

ये कृतियाँ तो जड़ हैं। एक बार बना दी गईं फिर अविचल खड़ी रहीं। इनमें से कुछ नष्ट भी हो गईं पर एक बात तय है कि इनमें से किसी का भी निर्माण स्वतः नहीं हुआ। फिर यह कहने का क्या आधार है कि इतना सुन्दर संसार जिसमें प्रतिदिन सूरज उगता, प्रकाश व गर्मी देता व अपने समय पर अस्त हो जाता है, दिन भर के हारे थके लोगों और प्राणियों को रात्रि अपने अंचल में विश्राम देती है, वन प्रान्तर में भूल भटक गए यात्रियों को तारे दिशा बताते हैं। ऋतुएँ समय पर आती और चली जाती हैं, हर प्राणी के लिए अनुकूल आहार, जलवायु की व्यवस्था और प्रतिकूलताओं से सुरक्षा का प्रबन्ध प्रकृति में उपलब्ध हैं। ये सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ सहज ही उपलब्ध हैं, इसलिए इन पर कोई आश्चर्य भले ही न होता हो, पर हैं तो विस्मय जनक ही। इस विस्मय के साथ ही प्रश्न खड़ा होता है कि इन आश्चर्यों की सर्जक सत्ता कौन है? जो भी कोई वह सत्ता हो, उसे ही भिन्न-भिन्न धर्मों, ऋषियों और मनीषियों ने ईश्वर कहा है।

जो लोग ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते और उसे संदिग्ध बताते हैं, उनके लिए प्रतिप्रश्न यह है कि जब संसार के इतने आश्चर्यों का कोई न कोई निर्माता है तो इतने बड़े संसार का निर्माण बिना सृजेता के कैसे हुआ यों तर्क के लिए तो कहा जा सकता है कि जब संसार का निर्माण ईश्वर ने किया तो ईश्वर का निर्माण किसने किया? इस प्रकार के तर्क वितर्कों का अन्त नहीं है और उन्हें कितना ही लम्बा खींचा जा सकता है, लेकिन तभी जबकि ईश्वर को कोई व्यक्ति मान कर चला जाय।

स्मरण रखा जाना चाहिए कि मनीषी विचारकों ने ईश्वरीय सत्ता का प्रतिपादन कहीं भी व्यक्तिक ईकाई के रूप में नहीं किया है। उसे एक नियामक शक्ति के रूप में ही जाना और समझा जाता है। उसके प्रभाव और शक्ति का परिचय प्रकृति के चारों ओर सन्तुलन के रूप में बिखरा पड़ा देखा जा सकता है। यदि कोई नियम व्यवस्था न रही होती तो करोड़ों की संख्या में तारागण किसी व्यवस्था के अभाव में अब तक न जाने कब के आपस में टकरा कर लड़ मरे होते। यदि इन सब में कोई नियम व्यवस्था काम न कर रही होती तो अमुक दिन, अमुक समय, अमुक सूर्य या चन्द्र ग्रहण, सूर्य संक्राँति आदि का ज्ञान किस प्रकार संभव होता।

सूर्य से पृथ्वी 9 करोड़ 30 लाख मील दूर है और पृथ्वी से चन्द्रमा 2 लाख 40 हजार मील दूर। यह दूरी पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के निरन्तर घूमते रहने के बाद भी न घटती है और न बढ़ती है। जैसे कोई कठपुतली नचाने वाला एक सुनिश्चित क्रम से अपनी अँगुलियों की डोरों को हिलाता हुआ कठपुतली का खेल दिखाता है और उसकी प्रवीणता के कारण कभी खेल नहीं बिगड़ता, उसी प्रकार सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा ही नहीं ब्रह्माँड के अन्यान्य ग्रह नक्षत्र भी उसी गति, उसी नियम व्यवस्था से चल रहे हैं।

चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा 17 दिन 7 घण्टे 43 मिनट और 12 सेकेंड में पूरी कर लेता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23 घण्टे 56 मिनट 4.9 सेकेंड में घूम जाती है। सूर्य की परिक्रमा करते समय वह एक सेकेंड में 18॥ मील दूरी तय करती और अपनी धुरी पर 1037 मील प्रति घण्टा की चाल से घूमती है। बृहस्पति अपनी धुरी पर 9 घण्टे 55 मिनट में घूम जाता है और 333 दिन में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है। सौर परिवार के इन सदस्यों ने निर्धारित समय में अपना यह क्रम पूरा करने में न कभी विलम्ब किया और न उतावली से काम लिया।

इनका नियमन करने वाली कोई व्यवस्था, सत्ता या शक्ति के अस्तित्व से किस प्रकार इन्कार किया जा सकता है जब कि बिना उठाने वाले के एक पत्थर भी उठ कर इधर से उधर नहीं जाता। कार्यालयों में कोई नियम व्यवस्था न हो, कोई नियन्त्रण कर्ता या प्रबन्धक न हो तो वहाँ का काम चल पाना कठिन हो जाता है। सब अपनी मनमानी करने लगे तो कैसी अव्यवस्था उत्पन्न हो जायेगी कहा नहीं जा सकता। यह मान लिया जाय कि किसी प्रकार थोड़ी देर के लिए यह व्यवस्था चल भी जाय तो वह स्थिर नहीं हो सकती। मुश्किल से पन्द्रह मिनट भी नहीं चल पाएगी। नियामक के बिना स्थिर और अनवरत नियम व्यवस्था और प्रशासक के बिना प्रशासन की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार के वयोवृद्ध व्यक्ति के हाथ में सारी गृहस्थी का नियंत्रण होता है गाँव का एक मुखिया होता है तो कई गाँवों के समूह की बनी तहसील का स्वामी(नियंत्रण कर्ता तहसीलदार, जिले का प्रशासक कलेक्टर राज्य का गवर्नर और देश की शासन व्यवस्था का सूत्र संचालक राष्ट्रपति होता है। मिलों तक में मैनेजर और कम्पनियों में डायरेक्टर न हों तो उनकी व्यवस्था ही ठप्प पड़ जाती है और अस्तित्व डाँवाडोल हो जाता है। फिर इतनी बड़ी सृष्टि का प्रशासक स्वामी और मुखिया न होता तो संसार न जाने कब का विनष्ट हो चुका होता।

यह एक मानी हुई बात है कि जड़ में शक्ति हो सकती है, व्यवस्था नहीं। राह में गड़े पत्थर से किसी को चोट लग जाये तो खून निकल सकता है लेकिन पत्थर खुद चलने वाले को देखकर चोट पहुँचाने के लिए उसके अँगूठों की नोंक तक नहीं पहुँचता। क्योंकि वह जड़ है। हालाँकि अब तो जड़ की परिभाषा भी बदल गई है और कहा जाता है कि इस दुनिया में जड़ कुछ नहीं है। पर वह विषय अलग है, उसका प्रस्तुत पंक्तियों से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। कहा इतना भर जा रहा है कि व्यवस्था, प्रशासन, संचालन, नियमन और नियंत्रण जिस तिस के बस की बात नहीं है। यह कार्य कोई समर्थ सत्ता ही कर सकती है और जब प्रश्न ब्रह्माण्ड का आता है, जिसके विस्तार का ही अनुमान नहीं लगाया जा सकता परन्तु यह अनुभव किया जाता है कि आकाशस्थ समस्त पिंड अंडाकार वृत्त में एक निश्चित गति क्रम से गतिवान हैं तो प्रश्न उठता है कि कोई नियामक सत्ता नहीं है इस बात का क्या प्रमाण है?


अभिमान गल गया (kahani)

राजा वृहदाश्व ने घोषणा कर दी-’मैं ही ईश्वर हूँ। सबका-भरण-पोषण करने वाला विष्णु मैं ही हूँ।’

चाटुकार राज-कर्मचारी राजा के अहं को फुलाने-सहलाने लगे। वे उसकी हाँ में हाँ मिलाते। उसे ही ईश्वर बतलाते। यदि कोई इसका विरोध करता तो वह दण्डित किया जाता।

ऋषि उतंक ने सुना तो एक दिन सभा में पहुँचे और पूछा राजन् कृपया बतायें कि आपके राज्य में कितने कौए, कितने कबूतर, कितने कोयल, कितने हंस व कितने बगुले हैं। राजा ने कहा ‘यह तो मुझे ज्ञात नहीं।’ ऋषि बोले-’तब सबके भरण-पोषण की व्यवस्था आप कैसे करते होंगे? उन सबकी रक्षा कैसे करेंगे?’

राजा समझ गया। उसका अभिमान गल गया। उसने ईश्वरत्व का दावा छोड़ दिया।


स्थूल से भी अधिक चिरंजीवी सूक्ष्म

भारतीय दर्शन में आत्मा और शरीर को देह तथा आवरण की संज्ञा देकर पृथक अस्तित्व माना गया है। विश्वास किया जाता है कि देहावसान होने के बाद जीवात्मा कुछ समय तक विश्राम करती है और फिर कर्मफल भोगने के लिए नया जीवन, जन्म ग्रहण करती है। इस विश्वास की पुष्टि में अनेकानेक प्रमाण आये दिन मिलते रहते हैं। पुनर्जन्म की स्मृतियाँ, प्रेतात्माओं का अस्तित्व तथा बहुत छोटी अवस्था में असाधारण प्रतिभा का परिचय देने वाली घटनाओं से मरणोत्तर जीवन की सहज ही पुष्टि होती रहती है। इस तथ्य को प्रमाणित करने वाला एक और पक्ष भी है, वह यह कि जीव सत्ता अपनी संकल्प शक्ति के द्वारा मरणोपरान्त ऐसी स्वतन्त्र इकाई खड़ी करती है मानो कोई दीर्घजीवी प्रेत ही बन कर खड़ा हो गया हो।

इन अति प्रचण्ड शक्ति संपन्न आत्माओं का समय समय पर परिचय मिलता रहता है। लोग इन्हें पितर नाम से देवस्तर की संज्ञा देकर पूजते पाये जाते हैं। यह आत्माएँ अपने अस्तित्व का प्रमाण इस ढंग से देती हैं कि उसे देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है।

ऐसे प्रसंग भी देखने में आए हैं जिनमें हजारों वर्ष पुरानी आत्माएँ अपनी सूक्ष्म देह द्वारा अशरीरी अस्तित्व बनाये रहती हैं। इन तथ्यों के प्रकाश में आने पर प्रेत विद्या में विश्वास रखने वाले उन लोगों को भी आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है जो प्रेत योनि को अल्पकालीन मानते हैं। उन्हें भी इस वर्ग के प्रेतों का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ रहा है तथा यह मानना पड़ रहा है कि आत्मा की शक्ति की कोई सीमा रेखा निर्धारित नहीं की जा सकती। वह अपनी प्रचण्ड शक्ति का परिचय बिना शरीर धारण किये भी अनिश्चित काल तक देती रह सकती है।

सन् 1932 में लन्दन की यूनिवर्सल न्यूज एजेन्सी ने लार्ड वेस्टवुरी का समाचार एक विस्तृत टिप्पणी के साथ प्रकाशित कराया। इस टिप्पणी में लिखा गया था कि अब यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो चुकी है कि कोई फीरोन बादशाहों की कब्र खोद कर ममी के अंग अथवा उसकी अन्य कोई चीज निकालने की चेष्टा करेगा उसकी भयावह दुर्गति होगी। उस क्षेत्र में बने हुए पिरामिडों में मिश्र के प्राचीन राजपुरुषों के मृत शरीर ऐसे मसालों से पोत कर रख गये हैं कि वे हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकें। प्राचीन काल में इन पिरामिडों में सुरक्षित रह सकें। प्राचीन काल में इन पिरामिडों में सुरक्षित दफनाये गये राजाओं अथवा श्रीमन्त सरदारों के शव के साथ उनके उपयोग की प्रिय वस्तुएँ भी गाढ़ दी जाती थीं। इन प्रिय वस्तुओं में न केवल बहुमूल्य बर्तन, वस्त्र, शस्त्र आदि चीजें होती थीं वरन् स्त्रियों को भी शव के साथ जीवित ही गाड़ दिया जाता था।

लार्ड वेस्टबुरी ने पिरामिडों के इन कौतूहल पूर्ण कृत्यों पर अधिक प्रकाश डालने के उद्देश्य से मिश्र जाकर पिरामिडों की खुदाई करने का निश्चय किया। इस खुदाई का एक उद्देश्य ऐतिहासिक सामग्री और उस समय की सभ्यता संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करना भी था। लार्ड वेस्टबुरी के साथ उनके अन्य कई सहयोगी भी इस खोज यात्रा उनके अन्य कई सहयोगी भी इस खोज यात्रा में शामिल हुए। ‘टुर अंख अमेन’ की एक कब्र खोदी गई तो उसमें से वाँछित सामग्री बड़ी मात्रा में निकली। इससे खोजियों का उत्साह बढ़ा और वे अन्य कब्रों की खुदाई के लिए भी प्रोत्साहित हुए। इंग्लैण्ड के एक विख्यात धनपति लार्ड कारनारवान ने इस अभियान का सारा खर्च स्वयं उठाने की पेशकश की। लार्ड रिचार्ड वेथल ने भी इस कार्य में गहन अभिरुचि दर्शाई ओर जितनी कब्रें खोदी गईं उनमें से प्रायः प्रत्येक में से बड़ी मात्रा में ऐसी वस्तुएँ प्राप्त हुईं, जिनके आधार पर पिरामिडों के निर्माण सम्बन्धी रहस्यों पर प्रकाश डालना संभव हो सका। ब्रिटेन के अधिकाँश समाचारों ने इस अभियान की प्रगति और उपलब्धियों के समाचार प्रकाशित किये तथा पत्र पत्रिकाओं ने शोध सामग्री के आधार पर पिरामिड कालीन मान्यताओं पर विस्तृत लेख छापे एवं इतिहास के उन अज्ञात पृष्ठों पर प्रकाश डालने वाले प्रयासों के लिए खुदाई करने वालों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

लेकिन इस अभियान का एक दुखद पहलू भी है। वह यह कि अभियान में भाग लेने वाले अधिकाँश व्यक्तियों को अपना शेष जीवन बड़ी कष्ट कर तथा भयंकर परिस्थितियों में व्यतीत करना पड़ा। उन्हें एक से एक भयंकर घटनाओं का इस तरह सामना करना पड़ा कि उन्हें किसी अदृश्य शक्ति की कोपलीला ही कहा जा सकता है। कुछ की रहस्यमय परिस्थितियों में बड़े विचित्र ढंग से मृत्यु हुई, कुछ ने आत्महत्याएँ कीं, कुछ लोग दुर्घटनाओं के शिकार होकर अकाल मृत्यु के ग्रास बने। लार्ड वेस्टपुरी, जो इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, एक दिन सैंट जेम्स पैलेस के सात तल्ले पर चढ़कर कूद गये और उन्होंने आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या की पृष्ठभूमि में ऐसा कोई कारण नहीं था जिससे मन मस्तिष्क पर कोई बहुत बड़ा आघात तो क्या हल्की सी ठेस भी पहुँचे।

खुदाई अभियान में लगे अन्य लोग भी इसी प्रकार मरे थे। जीवन भर दुखी रहे। कुछ यह अनुभव करते रहे कि उन्हें कोई प्रेतात्मा आ कर डराती तथा हैरान करती है। कइयों को प्राण घातक विपत्तियों का सामना करना पड़ा और मरते-मरते बचे। कुछ डर के मारे विक्षिप्त स्थिति तक जा पहुँचे, दुर्दशा ग्रस्त होकर मरे। लार्ड वेस्टपुरी ने जब सेंट जेम्स पैलेस के सातवें तल्ले से छलाँग लगाकर आत्म हत्या कर ली तो उनकी मृत्यु का समाचार जिस टिप्पणी के साथ छपा था, उसमें इन दुर्घटनाओं का संक्षिप्त किन्तु दिल दहला देने वाला वर्णन था। स्मरणीय है कि मिश्र के पिरामिडों का निर्माण ईसा से कई शताब्दियों पूर्व हुआ था। उस समय के प्रेत हजारों वर्ष तक कैसे जीवित हैं, यह अचम्भे की बात है।

प्रतिशोध के लिए एक हजार वर्ष तक प्रेतयोनि में रहकर अपने शत्रु की प्रतीक्षा करने वाले एक मुसलमान पीर सुलेमान का विवरण कल्याण के 1969 के वार्षिक अंक में छपा था। वह प्रेत ईरान के रहने वाले एक मुसलमान का था जो नादिरशाह अब्दाली के साथ लूट खसोट के लिए भारत आया था। नादिरशाह तो लूट कर अपने मुल्क वापस चला गया पर सुलेमान यहीं रह गया। सहारनपुर के पास मुगल खेड़ा गाँव में उसने शादी भी कर ली और इस शादी से उसके चार बच्चे हुए। इनमें से दो लड़के थे और दो लड़कियाँ जिस स्थान पर सुलेमान रहता था, उसके पास ही एक ढोंगी तपस्वी भी रहा करता था वह गंड़े, ताबीज, तन्त्र-मन्त्र, झाड़-फूँक आदि का काम किया करता था। उस तपस्वी ने सुलेमान की जवान लड़की से अवैध सम्बन्ध स्थापित कर लिया। इस का पता चलने पर सुलेमान ने तपस्वी को काफी समझाया बुझाया सरकारी अधिकारियों से भी हस्तक्षेप करने का आग्रह किया पर उसे कोई सफलता नहीं मिली। सुलेमान की लड़की और उस तपस्वी में अवैध यौनाचार यथावत जारी रहा। इससे सुलेमान को काफी ठेस पहुँची और वह इसी गम में घुल-घुल कर मर गया। दुखी रहने और मर जाने की बात सोचते-सोचते सुलेमान मन में यह भी विचार करता रहा कि चाहे जो हो वह इसका बदला जरूर लेगा।

मरने के बाद वह प्रेत बनकर उसी गाँव में उसी स्थान पर पेड़ के ऊपर रहने लगा जहाँ कि उसे दफनाया गया था। कालान्तर में लोगों ने उसकी कब्र को मजार का रूप दे दिया और पूजा करने तथा मनौती मानने के लिए आने लगे। पीर सुलेमान आने वाले सब लोगों को देखता था पर उनमें वह व्यक्ति सैकड़ों साल बीत जाने पर भी नहीं दिखाई दिया, जिससे उसको प्रतिशोध लेना था। करीब एक हजार वर्ष पूरे होने के बाद वह तपस्वी दिखाई दिया। जिसने पीर सुलेमान की लड़की से अनुचित सम्बन्ध स्थापित किया था। वह एक सिख परिवार में जन्मा था और युवक ही था। पीर सुलेमान ने उस की आत्मा को पहचान लिया और सात वर्षों तक उसे खूब सताया। बाद में एक सन्त ने उस युवक को पीर सुलेमान से छुटकारा दिलाया तथा पीर सुलेमान को भी प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाई।

इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ हैं जिनमें मनुष्य का अशरीरी अस्तित्व हजारों वर्षों तक बने रहने के प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार की सूक्ष्म सत्ताओं के प्रमाण जहाँ भी मिलते हैं, वहाँ इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य की संकल्प शक्ति और प्राणशक्ति में आत्मा नहीं बल्कि उसकी किरणें मात्र हैं। पर उनमें भी इतनी सामर्थ्य होती है कि वे अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व खड़ा कर के मूल आत्मा की प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती रहे।

लेकिन इसी क्रम में एक और आश्चर्य की बात है कि जड़ पदार्थों से बनी ऐसी वस्तुएँ जिनका जीवित मनुष्यों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा हो, वे भी अपना प्रेत अस्तित्व बना लेती हैं। और मूल पदार्थ के नष्ट हो जाने पर भी उसी प्रकार अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं, जिस प्रकार कि मरने के बाद मनुष्य अपना परिचय प्रेत के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समुद्री इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंगों के उल्लेख हैं, जिनमें सामने से आते हुए जहाज के साथ संभावित टक्कर से बचाने के ला मल्लाहों ने अपनी नाव या पाल वाले जहाज इतनी तेजी से मोड़े कि उस प्रयास में वह नाव अथवा जहाज उलट कर नष्ट हो गये। इस तरह की कई घटनाएँ घटीं और उनमें से जो थोड़े बहुत लोग बच सके उन्होंने बाद में बताया कि यह सब बहुत ही आश्चर्य जनक ढंग से होता था। सामने से आता हुआ दिखाई देने वाला जहाज जिसकी टक्कर से बचने के लिए मल्लाह आतुरतापूर्वक प्रयत्न कर रहे थे। वह कहाँ से आया, अचानक कैसे सामने प्रकट हो गया उसके चालक उसे बचा क्यों नहीं रहे थे आदि प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिल रहा था और न ही ऐसे जहाज का अस्तित्व सिद्ध हो रहा था। यह मान लिया गया कि संभवतः वह मल्लाहों की आँखों का भ्रम था, वस्तुतः दुर्घटनाओं के समय उस प्रकार का कोई जहाज नहीं हुआ करता था।

जब इस तरह की घटनाएँ बहुत होने लगीं तो जाँच कमेटियाँ बिठाई गईं। इन कमेटियों में डूबने वाले और न डूबने वाले जहाजों के यात्रियों तथा मल्लाहों की ऐसी अनेक गवाहियाँ हैं जिन्होंने समुद्र की सतह पर ऐसे जहाज देखे जिनका अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सका। रिपोर्टों में उसे भ्रम बताकर जाँच पर पर्दा डाल दिया गया पर उन मल्लाहों और यात्रियों का समाधान न हो सका जिनने अपनी आँखों से यह सब देखा था। भ्रम तो एक दो को हो सकता था, सारे मल्लाह और सारे यात्री एक ही तरह का दृश्य देखें यह कैसे सम्भव था। अन्त में इसी निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि डूबे हुए जहाजों में से कुछ के प्रेत अपने जीवन काल की आकृति में समुद्र तल पर भ्रमण करते रहते हैं। यह उनका सूक्ष्म शरीर होता है। जिसमें ठोस तत्व तो नहीं होते लेकिन उनकी छाया आकृति ठीक वैसी ही होती है जैसी कि उनके जीवित काल में थी।

डूबे हुए जहाजों के प्रेत होते हैं, इस मान्यता का पहले मजाक ही उड़ाया गया, पर पीछे उनके प्रमाण इतने ज्यादा मिलने लगे कि इस मान्यता को एक शोध का विषय बनाना पड़ा। अभी भी डूबे हुए जलयानों में से कई प्रेत के रूप में जीवित हैं। यह किसी प्रामाणिक कसौटी पर तो सिद्ध नहीं हो सका है लेकिन शोधकर्ताओं को विश्वास है कि उपलब्ध प्रमाण या साधन अपर्याप्त हैं और भविष्य में कई ऐसे उपकरण या सिद्धान्त निकल सकते हैं जो इन बहुचर्चित प्रेतों के बारे में कोई संतोष जनक तथ्य प्रस्तुत कर सकें।

जो भी हो इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अस्तित्व के रूप में प्रतिभासित होने वाली वस्तुओं का केवल उतना ही स्वरूप नहीं होता जितना कि वह दिखाई देता है बल्कि उसका सूक्ष्म और कारण अस्तित्व भी होता है। भारतीय मनीषियों ने प्रत्येक प्राणी तथा पदार्थ के तीन स्तर माने हैं, स्थूल, सूक्ष्म और कारण। स्थूल वह स्तर है जो दृश्यमान होता है, सूक्ष्म में उसकी शक्ति निहित रहती है जो उसे जीवित और सक्रिय बनाये रहती हैं तथा कारण स्तर जड़ या बीज के समान होता है। चेतना अविनाशी है, और इसी कारण जड़ वस्तुएँ भी नष्ट हो जाने के बाद कभी कभी अपने सूक्ष्म स्वरूप का परिचय देती हैं, तो इसे असम्भव नहीं मानना चाहिए। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी प्राणी या पदार्थ का सूक्ष्म अस्तित्व बना रहता है। यह तथ्य सिद्ध करता है कि जो दिखाई देता है वहीं सच नहीं है अपितु उससे भी बड़ी एक दुनिया अविज्ञात और रहस्यमय है। यदि विज्ञान के क्षेत्र में एक नई किन्तु अति महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ सकती है।


धर्म का मन्दिर आस्था की ज्योति

आधुनिक मनोविज्ञान ने परम्परागत अध्यात्म के इस अनुभव की पुष्टि कर दी है कि मानवी-चेतना विविध स्तरों पर एक साथ क्रियाशील रहती है। उन सभी स्तरों पर सक्रिय जीवन अपने आप में अखंड है। जीवन को विभाजित रूप में नहीं देखा समझा जा सकता। चेतना किस क्षेत्र में, किस रूप में सक्रिय होगी, यह इस पर निर्भर है कि उस क्षेत्र की किन प्रवृत्तियों के प्रति उसकी आस्था है। अतः स्पष्ट होता है कि चेतना की क्रियाशीलता का स्वरूप मुख्यतः आस्था से निर्धारित-निर्देशित होता है। यह बात जितनी अन्य क्षेत्रों के लिए लागू होती है, उतनी ही धर्मतन्त्र के लिए भी। धर्मतन्त्र भी उसी स्थिति में कल्याणकारी, उपयोगी और श्रेयप्रद होता है, जब उसके साथ प्रतिपादित जीवन मूल्यों में गहन आस्था हो। जब आस्था उन जीवनमूल्यों में न होकर स्वयं को धार्मिक कहलाने-दिखलाने और लोक-श्रद्धा को ठगने-फुसलाने में हो जाती है तो वही धर्मतन्त्र हानिकर, विकृत, पतनकारक भी बन सकता है।

आस्था ही पाषाण-प्रतिमा में परमेश्वर के दर्शन सम्भव बनाती है। आस्था के अभाव में धर्मतन्त्र के विशाल कर्मकाण्डों का अनुशीलन भी निष्फल ही रहता है।

भिन्न-भिन्न मानसिक संस्कार के लोगों में किसी विषय के प्रति आस्था का स्वरूप एवं स्तर भिन्न होता है। जिन व्यक्तियों को शरीरबल पर आस्था है, वे उसके दुरुपयोग को देखकर भी अपनी आस्था नहीं गंवाते क्यों कि उनकी दृष्टि में दुरुपयोग से भी शरीर बल का महत्व तो प्रकट होता ही है। यदि किसी व्यक्ति की कवित्व-शक्ति पर आस्था है तो किसी कवि की मद्यपी या अपव्ययी प्रवृत्ति से उसकी आस्था कवित्व शक्ति के प्रति नहीं घटेगी।

इस दृष्टि से विचार करें तो आज भी धर्मतन्त्र के प्रति जन साधारण में जो उल्लास, उत्साह, उमड़ता-दीखता है, उससे प्रबुद्ध जनों के विचलित होने का कोई कारण नहीं। धर्मतन्त्र के प्रति उमड़ती लोक श्रद्धा इस तथ्य का संकेत है कि उसके द्वारा मानवी अन्तःकरण के परिष्कार एवं समाज के कल्याण की सम्भावना के प्रति भारतीय जन में गहन आस्था है। यह अलग बात है कि इस आस्था के निरन्तर दोहन किये जाने एवं बदले में जन-मानस को समुचित मार्गदर्शन न दिये जाने से अब यह आस्था छीज चली है।

आस्था अकारण ही नहीं जमती और न अकारण ही उखड़ती। धर्मतन्त्र के प्रति जन-जन व्यापी आस्था का आधार मनीषी पूर्वजों द्वारा लम्बे समय तक किये जाते रहे, वे प्रयत्न-उपचार हैं, जिनके द्वारा यह धर्मतन्त्र देव-मानवों के भव्य उत्पादन में समर्थता और चारों ओर सुख-शान्ति भरे वातावरण की पृष्ठभूमि बनाता था। इसी प्रकार आज यदि वह आस्था कुछ घट रही है तो इसका कारण पिछली कुछ शताब्दियों से धर्मतन्त्र के प्रतिभाशालियों द्वारा उपेक्षा और उस पर प्रतिगामी तत्वों का एकाधिपत्य है। इसके कारण ही उसमें विकृतियों की भरमार हो चली। जहाँ-जहाँ धर्माध्यक्षों का रूप बनाकर अपने स्वार्थों को पूरा करने की तिकड़म चल पड़ी। समाज के श्रम, धन और सम्मान का शोषण होने लगा। प्रतिगामी लोगों ने धर्मतन्त्र के माध्यम से जन साधारण को दीं-कल्पनालोक की निरर्थक उड़ानें, मूढ़ मान्यताएँ, अन्धविश्वास, भाग्यवाद, देववाद, पलायनवाद की हानिकर धारणाएँ। जिस आदर्शवादी दृष्टिकोण का परिष्कार धर्मतन्त्र की स्थापना का उद्देश्य था, वह तो विस्मृत-विलुप्त ही होता चला गया। फैलता गया वह विकृत दृष्टिकोण जिसके अनुसार नदी स्नान, देवदर्शन जैसे छुट-पुट कर्मकाण्डों से पाप के दण्ड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है या अमुक पूजा-विधान से स्वर्ग-मुक्ति की, देव-अनुग्रह से मनोकामना पूर्ति की सिद्धि मिल सकती है। अनैतिकता एवं अकर्मण्यता को बढ़ावा देने वाली ये मान्यतायें धर्मतन्त्र पर लम्बे समय से छाई हैं और उस मृगमरीचिका में भटक रही जनता भ्रांत क्लान्त हो चली है। इसलिए अब विचारशील वर्ग में धर्मतन्त्र के प्रति आस्था वैसी अविचल नहीं रही। वे धर्मतन्त्र की उपयोगिता को संशय के दृष्टिकोण से देखने लगे हैं। किन्तु यह तो निषेधात्मक दृष्टि है।

विचारणीय यह है कि भारत के लोकमानस में मानवतावादी, सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियों की स्थापना किस पृष्ठभूमि पर हो सकती है। उपयोगी गतिविधियाँ अपनाने के लिए जन सामान्य को सहमत करने की सर्वाधिक सुगम प्रक्रिया क्या होगी?

अशिक्षित, देहाती भारत की कठिनाई यह है कि उसकी पूर्व जानकारी प्रधानतया धार्मिक स्रोतों से सम्बद्ध है। वे ही विचार, वे ही मान्यतायें उस तक सहजता से सम्प्रेषित हो सकती हैं, जो धर्म के कलेवर से जुड़ी हों। उसी सिलसिले को आगे बढ़ा कर बात ठीक से समझाई जा सकती है। धर्म भारतीय जनता का प्रिय विषय है। धार्मिक कलेवर को उपयोग विवेकपूर्ण विचारों के शिक्षण के लिए करने से वे गहराई तक सरलता से जम सकते हैं। धार्मिक आयोजनों में जो भावनात्मक वातावरण बनता है, उस ऊष्मा का उपयोग श्रेष्ठ मान्यताओं, उत्कृष्ट धारणाओं के प्रस्थापन के लिए किया जा सकता है। आज भी जनता के धन, समय और मनोयोग का बहुत बड़ा अंश धर्मतन्त्र के लिए स्वेच्छा से समर्पित होता रहता है। अतः उस शक्ति का सदुपयोग करना एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कर्त्तव्य-कर्म है। धर्म-कलेवर में नये प्राण फूँकना भारत में एक राष्ट्रीय कर्त्तव्य है।

धर्मतन्त्र द्वारा ही लोकमानस का परिष्कार-परिमार्जन सम्भव है। प्राणी भी पदार्थों की ही तरह प्रकृतितः अनगढ़ ही होते हैं। जिस प्रकार पदार्थों को पकाना, गलाना, ढालना, खरीदना आवश्यक होता है, तभी वे काँतिमान, सुन्दर, सुडौल और उपयोगी बन पाते हैं। उसी प्रकार प्राणियों को भी प्रशिक्षित, परिष्कृत करना होता है। जिस प्रकार पेड़-पौधों की कटाई, छटाई, गुड़ाई निराई, सिंचाई आदि करने पर ही सुन्दर, आकर्षक उद्यान तैयार होता है, उसी प्रकार प्राणियों की प्रवृत्तियों को भी परिष्कृत-विकसित कर उन्हें अधिक उपयोगी, अधिक सुन्दर बनाया जाता है। परिष्कृत, प्रशिक्षित मनुष्य ही सुसंस्कृत कहलाता है।

मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की प्रक्रिया द्विपक्षीय है। उसका दर्शन पक्ष अध्यात्म कहलाता है और व्यवहार पक्ष का नाम धर्म है। धर्मतन्त्र का कार्य कलेवर संस्कृति के व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए ही खड़ा किया गया है। एक लम्बी अवधि से इस धर्मतन्त्र का भीषण दुरुपयोग होता रहा है और वह मनुष्य के लिए हानिकारक विकृतियों का पोषण केन्द्र बनता रहा है। इस पर भी धर्मतन्त्र के प्रति लोक-आस्था शेष है। आस्था की इस ज्योति को स्वास्थ्यप्रद प्राणवायु से प्रखर प्रदीप्त बनाया जाना चाहिए। यह दायित्व उन लोगों का है, जो लोक-मानस के परिष्कार एवं प्रशिक्षण का महत्व समझते हैं और राष्ट्रीय संदर्भ में उसके उपयुक्त माध्यम के रूप में धर्मतन्त्र की उपदेयता भी समझते हैं। धर्मतन्त्र रूपी मन्दिर में जल रही जन आस्था की ज्योति को बुझा देने से मिलेगा कुछ नहीं, घाटा ही घाटा होगा। धर्म भावना का अभ्यासी मानस इससे विभ्रांत दिड़्मूढ़ हो जायेगा। अतः आवश्यकता इसी की है कि आस्था की उस ज्योति को प्राण वायु पर्याप्त रूप में पहुँचाई जाय। भावनाशील अन्तःकरण, उत्कृष्ट, चिन्तन एवं श्रेष्ठ आचरण वाले जीवन्त देव मानव एवं प्रबुद्ध जन इस क्षेत्र में आगे आयें और धर्मतन्त्र को परिमार्जित, परिशोधित, नवनिर्धारित कर आस्था की ज्योति को जागृत रखें। आस्था ही मानवीय अन्तःकरण को आनन्दित, पुलकित, प्रफुल्लित रख सकती है और प्रगति पथ पर बढ़ते रहने का पाथेय जुटाती रह सकती है।


Quotation

जो मनुष्य दूसरों की जीविका नष्ट करते हैं, दूसरों का घर उजाड़ते हैं, दूसरे की स्त्री का उसके पति से वियोग कराते हैं और मित्रों में भेदभाव उत्पन्न करते हैं वे अवश्य नरक में जाते हैं - वेदव्यास (महा.)


मानवी व्यक्तित्व में अन्तर्निहित समग्रता!

पदार्थवादी दृष्टिकोण वाले बौद्धिक मनुष्य को जैव रासायनिक संयोगों का एक आकस्मिक समुच्चय ही मानते रहे हैं। उस स्थिति में सम्पूर्ण व्यक्तित्व की किसी विशिष्ट एक सूत्रता का प्रश्न ही नहीं उठता। रंग, रक्त, शरीरस्थ रसों आदि की दृष्टि से निश्चित वर्गों का निर्धारण हो जाने पर तो यह और भी निश्चित माना जाने लगा कि जिस प्रकार कुछ तत्वों की निश्चित मात्रा एवं निर्दिष्ट प्रक्रिया में संयोग से अमुक यौगिक विशेष तैयार हो जाता है, उसी प्रकार कुछ निश्चित तत्वों के संयोग में सफल हो जाने पर वर्ग विशेष के मनुष्य भी तैयार हो सका करेंगे।

लेकिन विज्ञान प्रेमियों की इस बाल-कल्पना का आधार ध्वस्त किया खुद वैज्ञानिकों ने। जैसे-जैसे जीवन के रहस्यों की खोज का क्रम बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे तथ्य सामने आते गये, जिनसे स्पष्ट होता गया कि शरीर के ढाँचे वर्ण, कद, आकृति, रक्त हड्डियों आदि के हिसाब से तो वर्गीकरण ठीक है। किन्तु जीवन के इससे गहरे आधारों के क्षेत्र में वर्गीकरण से काम चलने का नहीं। चेतना की विद्यमानता प्रत्येक व्यक्तित्व को एक समग्र रूप देती है। जो दूसरे से बिल्कुल भिन्न है और इस लिये जिसे वर्गों में नहीं बाँधा जा सकता क्योंकि हर व्यक्ति अपने आप में एक पूर्ण इकाई है। अपना वर्ग वह स्वयं है।

व्यक्ति के संस्कार उसकी जन्म-जन्माँतर की संचित सम्पदाएँ और साधन हैं यह मान्यता भारतीय तत्व दर्शन की रही है। संस्कारों का यह सम्पुंजन बहुआयामी और अति विस्तृत होता है। संस्कार रूपी ये विशेषताएँ व्यक्ति की स्वयं उपार्जित क्षमताएँ होती हैं। इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उसकी अपनी विशिष्टता घनीभूत रहती है। दृश्यमान मानव-शरीर को स्थूल संरचना में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। तो भी कोई दो व्यक्ति शत प्रतिशत एक जैसे नहीं होते। फिर अंतरंग क्षेत्र तो और भी विस्तृत है। प्रत्येक व्यक्तित्व का अलग-अलग अनूठापन होता है। जो संस्कार समूहों की ही विशेषता होती है।

यह विशेषता ही मनुष्य की प्रवृत्तियाँ, रुचियों और सामर्थ्य के रूप में प्रकट होती रहती हैं। कोई प्रचण्ड शरीर बल का स्वामी है, तो किसी में उसकी अल्पता है। कोई विलक्षण मेधा और स्मरण शक्ति से सम्पन्न है तो किसी की बुद्धि में स्थूल बातों के अतिरिक्त और कुछ पैठता ही नहीं और स्मरण शक्ति भी मन्द होती है। किसी के हृदय में करुणा का अथाह समुद्र उमड़ता घुमड़ता रहता है, तो किसी को पर-पीड़न में ही पुरुषार्थ प्रतीत होता है। ये सभी भिन्नताएँ ईश्वरीय अनुदान में किसी प्रकार के पक्षपात या विषमता का परिणाम नहीं है, वरन् जन्म-जन्मान्तरों से अमुक व्यक्ति द्वारा बढ़ाई जा रही विशेषताओं या खोयी गँवाई जा रही क्षमताओं का ही जोड़ बाकी और गुणनफल हुआ करती है।

जिस प्रकार मिट्टी, पत्थर प्रतीत होने वाली वस्तुओं के तल में इलेक्ट्रान-प्रोटान-न्यूट्रान और उनकी आधारभूत विद्युत-तरंगें सक्रिय रहती हैं, उसी प्रकार स्थूल दृष्टि से जो काय कलेवर के अवयव हाड़-माँस के बने दीखते हैं उनमें चेतन कोशिकाएँ और उनकी भी तह में जीन्स क्रोमोसोम की निर्माणकारी चेतना प्रक्रियाएँ क्रियाशील रहती हैं।

प्रत्येक मनुष्य के अपने व्यक्तित्व की विशिष्ट छाप उन मूलभूत इकाइयों तक में विद्यमान होती हैं। इस विशेषता का पता चला आणविक जैविकी के विकास से, जिसकी भव्य परिणति के रूप में पिछले दिनों दुनिया की प्रथम परखनली शिशु का प्रादुर्भाव हो सका है और जिसने पूरे संसार को रोमाँचित कर दिया है।

आणविक जैविकीविदों की खोजों से यह तथ्य सामने आया कि जीवन की मूलभूत इकाई कोशिका। ये इकाइयाँ अति सूक्ष्म होती हैं। ये प्राणिमात्र की देह-इकाइयाँ हैं। एक कोशीय जीव अमीबा से लेकर विकसित मनुष्य तक। किसी स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट युवक के शरीर में लगभग साठ हजार अरब कोशिकाएँ होती हैं। इनमें से दस हजार अरब कोशिकाएँ होती हैं। इनमें से दस हजार अरब तो ऐसी इकाइयाँ ही हैं, जो स्वचालन-क्रिया को परिचालित करती हैं जितनी जगह में ‘मैं कोशिका है’ छपा है, उतनी जगह में औसत आकार की पचास हजार कोशिकाएँ रखी जा सकती हैं।

इनमें से प्रत्येक कोशिका एक शानदार कारखाना है। जो उत्पादन, कचरे के निष्कासन, सक्रियता, सुव्यवस्था एवं प्रशासन की सुनियोजित प्रणाली से क्रियाशील है। इस कारखाने के तीन मुख्य खण्ड होते हैं-पहला बाहरी खोल, जो एक पतली झिल्ली जैसा होता है, दूसरा साइटोप्लाज्म जैसे लसलसे पदार्थ से लबालब भाग और तीसरा केन्द्रक। यह केन्द्र ही प्रत्येक गतिविधि का नियन्त्रक होता है। केन्द्रक में ही डी.एन.ए. रहता है जो मनुष्य के गुणसूत्रों तथा अन्य सूचनाओं का भंडार होता है। सच पूछा जाय तो कोशिका एक बड़ी झील है, इसे जीव-द्रव्य या प्रोटोप्लाज्म की झील कह सकते हैं, जीव चेतना को क्षीर सागर भी कहा जा सकता है। इसी क्षीर सागर के केन्द्र में है केन्द्रक या न्यूक्लिस रूपी विष्णु जिनकी नाभिवत् केन्द्रिका या न्यूक्लिजोलस में रहते हैं- डी.एन.ए. रूपी ब्रह्मा। इन ब्रह्मा के चार मुँह हैं- डी॰एन॰ए॰ रूपी सीढ़ी की पौड़ियों के चार यौगिक एडिनिन, ग्वैनिन, साइटोसिन और थाइमिन। एडिनिन और थाइनिन का सदा जोड़ा रहता है तथा साइटोसिन और ग्वैनिन का। इन चारों का क्रम ही समस्त जीवों की समानता या भिन्नता का मूल है। डी॰एन॰ए॰का जो कुण्डलीनुमा फीता है उसके उपयुक्त चार यौगिक उसकी चार अक्षर की वर्णमाला है। इन्हीं अक्षरों के क्रम और डी॰एन॰ए॰ की संख्या के उलट फेर से भिन्न-भिन्न चेतना संदेश तैयार हो जाते हैं और उन चेतना सन्देशों से ही बनता है यह सारा चेतना संसार गुणसूत्र के डी॰एन॰ए॰ के एक क्रम से व्यक्ति का रंग काला बनता है तो अन्य भिन्न-भिन्न क्रम से गोरा, भूरा या पीला। देह के प्रत्येक अवयव और उनकी विशिष्टताओं का निर्माण इन्हीं डी॰एन॰ए॰ के हेर-फेर से हुआ करता है। कोशिकाओं के भीतर का डी॰एन॰ए॰ ही प्रोटीनों के संश्लेषण का निर्देशक है। इन प्रोटीनों से बनते हैं एन्जाइम। प्रत्येक जैव-रासायनिक क्रिया का प्रारम्भ, विकास या अन्त इन्हीं एन्जाइमों का खेल है।

दुनिया में प्राणियों की बोलियाँ भिन्न-भिन्न हैं। एक प्राणी दूसरे वर्ग के प्राणी की बोली कम समझ पाता है। मनुष्य ने तो भिन्न-भिन्न भाषाएँ विकसित कर ली हैं और जिस भाषा-बोली का उसे ज्ञान नहीं, उसका आशय अभिप्राय वह नहीं समझ पाता। कई बार तो मनोदशा और ज्ञान स्तर की भिन्नता से एक ही भाषा के बोलने वाले दो व्यक्ति एक दूसरे का अभिप्राय ठीक-ठीक नहीं समझ पाते। किन्तु सभी जीवों की रासायनिक भाषा एक है और प्रत्येक जीवकोशिका उससे भली−भांति अवगत है। उस भाषा का जो अर्थ जीवाणु कोशिका के लिए है वही अर्थ मानव-कोशिका के लिए।

इन सबसे यही स्पष्ट होता है कि सभी प्राणियों में क्रियाशील मूलभूत चेतना एक ही है और उनकी संरचना के आधारभूत सूत्र भी एक में हैं।

भारतीय तत्वदर्शी प्रखर साधनाओं द्वारा इसी एकमेव द्वितीय चेतन सत्ता और उसके लिए क्रियाकलापों की जानकारी में समर्थ होते रहे हैं। तभी वे सूक्ष्म जगत में उभरने वाली हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते थे। सृष्टि के रहस्यों को समझ सकने के लिए सर्व व्याप्त चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के अतिरिक्त और कोई उपाय भी नहीं।

एक ही आत्मा सब में समाया हुआ है। एक ही सूर्य असंख्य लहरों में प्रतिबिंबित हो रहा है। यह प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न रूपकारों में उसी रूप से ढला दिखाई पड़ता है।

आकार-प्रकार की यह भिन्नता कोशिकाओं तक में देखी जा सकती है। चमड़ी का बाहरी हिस्सा चपटी कोशिकाओं से बना रहता है तो पाचन प्रणाली की कोशिकाएँ सिलेण्डर के आकार की होती हैं। माँसपेशियों की कोशिकाएँ आकुँचन प्रसारण में सहायक होती हैं, तो गुर्दे की मूत्र निर्माण-निष्कासन में सहायक होती हैं। किन्तु कहीं की भी कोशिका हो उसमें वे विशिष्टताएँ विद्यमान होती हैं जो उस व्यक्तित्व का सार है। उनका पुनरुत्पादन भी सम्भव है। इसी आधार पर वैज्ञानिक दावा करते हैं कि यदि महात्मा गाँधी की त्वचा की ही कोशिकाएँ लेकर उनके ‘ऊतक संवर्ध’ बना लिये गये होते, तो अब तक कुछ दिनों बाद तकनीक विकसित होने पर उन्हीं ‘ऊतक संवर्धों’ से हजारों गाँधी बनाये जा सकते थे। या कि यदि आज जिम्मी कार्टर अथवा ब्रेजनेव की त्वचा की कोशिकाएँ इसी प्रकार रख ली जायें, तो कल उन्हीं से अनेक कार्टर और अनेक ब्रेजनेव बन सकते हैं।

चेतना विज्ञान और अणु जैविकी के अन्वेषण में कदम-कदम पर पैदा होने वाली नई-नई कठिनाइयाँ एवं प्रतिक्रियाएँ वैज्ञानिकों की इस सामर्थ्य सम्भावना को साकार कर सकें अथवा नहीं। किन्तु एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के अँगूठे की छाप दूसरे व्यक्ति से और एक के स्वरों का ध्वनि-चित्राँकन दूसरे के स्वरों के ध्वनि चित्राँकन से भिन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की कोशिका दूसरे से भिन्न होती है। साथ ही एक मनुष्य के शरीर में विद्यमान खरबों कोशिकाओं में से प्रत्येक में उसकी आधारभूत विशेषताएँ सुरक्षित होती हैं। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता में समग्रता है। वह किन्हीं चित्र-विचित्र प्रवृत्ति प्रवाहों का आकस्मिक मेल नहीं है। उसकी विशेषताएँ भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों के यों ही एकत्रीकरण भर से नहीं होतीं, अपितु उसके रोम-रोम में अंग-अंग में उन विशेषताओं का सारभूत अंश विद्यमान होता है।

इसी तथ्य से एक अन्य निष्कर्ष भी सामने आता है। मृत्यु के बाद मनुष्य के मस्तिष्क के प्रोटोप्लाज्म के बिखर जाने और उसके किसी अंश-विशेष के अन्य मनुष्य में प्रविष्ट हो जाने की बात कई वैज्ञानिकों द्वारा उन प्रमाणों के संदर्भ में की जाती रही है जहाँ कोई व्यक्ति अपने कथित पूर्व जन्म का कोई प्रामाणिक विवरण दे देता है। किन्तु कोशिका-सम्बन्धी ये खोजें उस तर्क को कमजोर बनाती हैं। जब शरीर के किसी भी हिस्से की कोशिका में व्यक्ति की सभी मूलभूत विशेषताएँ संरक्षित रहती हैं तो मस्तिष्क की कोशिका का प्रोटोप्लाज्म बिखर कर घूमघूम कर दूसरे में प्रविष्ट होने के स्थान पर चेतन कोशिका के ही नये रूप में पहुँचने की सम्भावना है। यों अभी तो इसके अनेक रहस्य अज्ञात के गर्भ में ही हैं। इतना ही स्पष्ट हुआ है कि हर नयी कोशिका अपनी जननी कोशिका से समस्त सूचनाएँ, साँचे संकेत और नक्शे लेकर अपना नया कारखाना खोलती है। आनुवाँशिकी कूट भाषा अभी तक पूर्णतः जानी नहीं जा सकी है। रहस्य खुलने पर वह जानकारी जीव-कोशिकाओं में निहित चेतना को अविच्छिन्नता पर भी प्रकाश डाल सकेगी।

आणविक जैविकी की इन खोजों ने ये दो बातें अब तक स्पष्ट की हैं-सभी जीव-कोशिकाओं की मूलभूत रचना-प्रक्रिया एक है। जिस व्यक्तित्व की वे इकाइयाँ होती हैं उसकी सभी आधारभूत विशेषताएँ इनमें सूत्र रूप में सन्निहित होती हैं। दोनों ही तथ्य भारतीय दर्शन के प्रतिपादन के अनुरूप हैं। वेदान्त दर्शन की मान्यता है कि एक ही चेतन-तत्व भिन्न-भिन्न दृश्यों के रूप में सर्वत्र दीखता है। साथ ही इन दृश्यों का बनना-बिगड़ना भी आकस्मिक नहीं है। वह एक सुनिश्चित सृष्टि प्रक्रिया का अंग है। विकास किसी अन्धेर गर्दी-भरी शैली से नहीं होता। अपितु उसी व्यवस्था के नियमों के अनुसार होता है।

हमारा चेतना-स्तर न तो आकस्मिक है और न अन्तिम या अपरिवर्तनीय। न तो इसका चाहे जैसे संयोग होता है न ही चाहे जैसा विघटन। इस सृष्टि में सभी कुछ सुव्यवस्थित और नियमबद्ध है और चेतना से परिपूर्ण है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है और वह परम पिता परमेश्वर का लाड़ला पुत्र है, इन दो तथ्यों को ध्यान में रखने पर उन्नति तथा आनन्द की वास्तविक दिशाएँ सदा स्पष्ट रहेंगी और उस ओर चलते हुए जीवन को सफल सार्थक बनाया जा सकेगा।


जो माँगेगा उसे दिया जायेगा

बाइबिल में ईसा अपने एक शिष्य से कहते हैं, “ईश्वर” के राज्य में जो माँगेगा उसे दिया जायेगा और जो खट खटायेगा उसके लिए द्वार खट खटाया जायेगा। यह नियम या सिद्धान्त बहुत ही सरल प्रतीत होता है। माँगने मात्र से मिल जाने का सिद्धान्त सच भी है अर्थात् जो भी आकाँक्षा की जाती है वह तत्काल पूरी होती है। लेकिन वास्तविक जीवन में इसका उल्टा ही प्रतीत होता है। लोगों की हजारों आकाँक्षायें रहती है, और उनमें से अधिकाँश अधूरी रह जाती है। यह देखते हुए सहज ही लगने लगता है कि यह सिद्धाँत और मनीषियों ने कहा है कि प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। वह अवश्य पूर्ण होती है।

प्रार्थना ईश्वर से की जाती है और उसका प्रयोजन कुछ प्राप्त करना ही है। ईश्वर सर्वव्यापी होने के साथ-साथ जगत् का पिता है। उसे हर किसी की आवश्यकता तथा इच्छा की जानकारी है। वह परम पिता परम दयालु और अनन्त वत्सल होने के नाते अपनी संतान के सभी मनोरथ पूरे करना चाहता है। कोई सामान्य स्तर का सामान्य दयालु पिता भी अपने बच्चों की इच्छा आवश्यकता पूरी करने के लिए उत्सुक एवं तत्पर रहता है। तो परम पिता, परमदयालु होने पर ईश्वर क्यों नहीं अपनी प्रिय सन्तान की इच्छा पूरी करना चाहेगा।

ईश्वर अपनी संतान की प्रत्येक इच्छा आकाँक्षा पूरी करता है। लेकिन मनुष्य आम तौर पर किसी आकाँक्षा को सही ढंग से नहीं जगाता है कभी किसी को देख कर इच्छा उत्पन्न होती है कि अपने पास भी बढ़िया कपड़े, सुन्दर बँगला, अच्छी कार और वैभव संपन्न सुविधा साधन होना चाहिए। किसी को देखकर मन में यह इच्छा उत्पन्न होती है परन्तु तभी किसी आत्माराम योगी, अपने, में ही आनन्द मग्न संन्यासी, सिद्ध पुरुष को देखा तो वैभव संपन्न होने की इच्छा न जाने कहाँ दब जाती है और योगी जैसी स्थिति प्राप्त करने का मन होने लगता है। उसके कुछ ही देर बाद किसी विद्वान का विद्वतापूर्ण भाषण सुना या कोई पुस्तक पढ़ी तो दोनों विचार पीछे छूट जाते हैं और विद्वान बनने का मन करने लगता है। नित निरन्तर बदलती रहने वाली इन स्फुरणाओं को आकाँक्षा नहीं कहा जा सकता। जो लहर की भाँति आती और तुरन्त उठ कर शाँत हो जाती है, फिर उसके स्थान पर नई लहर उठ जाती है वह लहर है प्रवाह नहीं। लहरों में कोई प्रवाह नहीं होता और प्रवाह में कोई लहर नहीं उठती। क्षण प्रतिक्षण बदलने वाली इच्छाओं को यदि लहर कहा जाय तो वे उठकर भी कहीं नहीं पहुँचती और निरन्तर एक दिशा में, एक लक्ष्य के प्रति एक निष्ठा से निरन्तर उमंग उठती रहे तो प्रवाह मान नदी की भाँति वह अपने गन्तव्य तक पहुँच कर ही रहती है।

गलती यहीं होती है कि लहर को इच्छा समझा जाने लगता है और उनकी पूर्ति न होने पर ईश्वर को दोषी ठहराया जाता है अथवा उपरोक्त सिद्धान्त को ही गलत ठहराया जाता है। इच्छा या आकाँक्षा किसी भूख की तरह जगती है। जब कड़ी भूख लगने लगती है तो रोम-रोम पुकारने लगता है कि रोटी चाहिए और जब तक क्षुधा पूर्ति नहीं हो जाती तब तक चैन नहीं मिलता न ही उस बीच कोई इच्छा जगती है। जब बहुत तेज प्यास लगती है तो पानी के अलावा कुछ नहीं सूझता। यह प्यास जगी ही रहे तो एक ऐसी दशा आ जाती है जब जीवन ही पानी का प्रतिरूप लगने लगता है और उस स्थिति में पानी पीये बिना चैन नहीं मिलता। इसी स्थिति में रेगिस्तान में दूर की रेत सरोवर की तरह लगने लगती है और उधर भागने का मन होता है। बहुत से भागते भी हैं, मनुष्य भले ही न भागे पर पशु पक्षी तो मृगतृष्णा के शिकार बनते हैं। एक कवि ने तो यहाँ तक गाया है कि मनुष्य समझदार है इसलिए रेगिस्तान में दीखने वाले सरोवरों की तरफ नहीं भागता लेकिन प्यास जब वे तरह बढ़ जाती है तो सारी समझ भूल जाती है। फिर यह विचार नहीं आता कि यह मृगतृष्णा है। उक्त कविता की अन्तिम पंक्तियों में तो यह भी कहा गया है कि जो मृग तृष्णा को समझ जाते हैं जानना चाहिए कि उनकी प्यास असली नहीं थी।

कहने का आशय यह कि आकाँक्षा अभीप्सा, ध्येय या लक्ष्य, कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा तब तक पूरी नहीं होती जब तक उसके प्रति सम्पूर्ण मन प्राण पुकार न करने लगे। उसी स्तर की माँग को ईसा ने सच्ची माँग कहा है कि जो माँगेगा उसे दिया जायेगा।

इस संदर्भ में स्मरणीय है कि मनुष्य की माँग सदैव आनन्द को लेकर ही उठती है। कभी लगता है धन पाकर सुख मिलेगा, परन्तु जब धन प्राप्त कर लिया जाता है तो लगता है कुछ नहीं मिला। कहीं कोई रिक्तता रह गई। कभी लगता है यश पा कर सुख मिलेगा। यश भी जब मिलने लगता है तो उससे भी अन्तःकरण की रिक्तता भरती नहीं। धन यश, प्रभाव, कीर्ति, सम्पदा आदि लौकिक उपलब्धियाँ प्राप्त होने के बाद भी असंतोष ज्यों का त्यों रिक्त ही बना रहता है। उस रिक्तता का कारण है। अन्तःकरण की मूल आकाँक्षा को न समझ पाना। मनुष्य को सच्ची और चिरस्थाई तृप्ति तभी मिलती है जबकि उसके अन्तःकरण की आनन्द पिपासा पूरी हो जाय। उस पिपासा को समझना चाहिए और जानना चाहिए कि जाने अनजाने सारी भागदौड़ उसी पिपासा को शान्त करने के लिए चल रही है।

पहाड़ों से निकल कर नदियाँ मैदानों में भागती दौड़ती हैं। उनका वेगवान प्रवाह तभी शान्त होता है जब वे सागर से मिल जाती हैं। सागर ही उनका अंतिम लक्ष्य है और वे सागर तक पहुँच कर ही विराम लेती है। मनुष्य भी विराट् चेतना का-परमात्मा का अलग थलग पड़ा हुआ एक घटक है। उससे मिलने की आतुरता ही आनन्द की पिपासा है। यह पिपासा न समझ पाने के कारण कई लोग धन में सुख खोजते हैं, कई यश में कई वैभव में और कई अधिकारों को प्राप्त करने में सुखी होना समझते हैं। लेकिन वैसा कुछ न होने पर अतृप्त ही भटकते हैं। अनेक प्रकार की आकाँक्षाओं इच्छाओं वासनाओं, और तृष्णाओं के जाल जंजाल में उलझे रहने के कारण अन्तःकरण की वह पिपासा कभी शान्त नहीं होने पाती और मनुष्य भटकता रह जाता है।

जबकि आनन्द प्राप्ति को एक ही दिशा है और वह कहीं बाह्य जगत में नहीं अपने ही भीतर की ओर है सारे संकेत उसी दिशा की ओर इंगित करते हैं। यह बात अलग है कि कोई उसे समझ लेता है और कोई नहीं समझ पाता है। जो समझ लेते हैं वे उसी दिशा में उन्मुख होते हैं, खटखटाते हैं, द्वारा खुल जाते हैं और अपने भीतर बैठे परमात्मा के सम्मुख आत्म समर्पण कर चिर स्थाई शान्ति तथा स्थिर आनन्द की अनुभूति करे लगते हैं।

भगवान को आत्म समर्पण करने की स्थिति में जीव कहता है- तस्यै वाहम् ‘मैं उसी का हूँ’ यह कहते कहते वह उसी में तन्मय हो जाता है और इतना तन्मय हो जाता है इतना घुल मिल जाता है कि अपने आपे का विसर्जन विस्मरण हो कर बैठता है और अपने को परमात्मा का ही स्वरूप समझने लगता है। तब वह करता है त्व्मेवाहम् (मैं तो तू ही है) शिवोऽहम् (मैं ही शिव हूँ) अहं ब्रह्मरिमा (मैं ब्रह्म ही हूँ)।

यह तो आनन्द प्राप्ति की, मनुष्य की मूल माँग की बात हुई। लौकिक जगत में भी मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति के बल पर वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जिसे पाने की वह कामना करता है। शर्त इतनी भर है कि इच्छा और संकल्प प्रखर हो प्रखर संकल्प के साथ पुरुषार्थ उसी तरह निहित है जिस प्रकार कि स्वस्थ बीज में एक परिपूर्ण वृक्ष। अतः यह कहना जरा भी अत्युक्ति पूर्ण नहीं है कि जो माँगेगा उसे दिया जायेगा और जो खट खटायेगा उसके लिए द्वारा खोला जायेगा। परमेश्वर की सृष्टि में यह शाश्वत नियम काम करता है। उसकी व्यवस्था में अपवाद की कहीं कोई गुंजाइश नहीं।


सच्ची बहादुरी

सन् 1922 में अमावस्या की काली रात और वामक नहीं का किनारा। गुजरात के प्रसिद्ध समाजसेवी रविशंकर महाराज नदी के किनारे पगडण्डी पर आगे बढ़ते चले जा रहे थे। तभी उनके कन्धे पर पीछे से हाथ रखते हुए किसी ने कहा महाराज! आप आगे कहाँ जा रहे हैं? चलिये वापस लौट चलिए।

महाराज ने स्वर पहचान लिया पूछा ‘कौन है? पुंजा’।

‘हाँ महाराज आगे मत जाइये। आगे खतरा है।’

‘कैसा खतरा!’

‘आगे रास्ते में ‘बहारवटिया’ छिपे हैं।’ कौन! नाम दरिया है।’

‘हाँ वही है। मेरी राय है कि आप आगे न जायें। व्यर्थ में ही इज्जत देने से क्या लाभ होगा?

महाराज हँसे। उन्होंने कहा ‘भाई मेरी इज्जत इतनी छोटी नहीं है जो थोड़ी सी बात में समाप्त हो जाय। मैं उन्हीं की तलाश में इधर आया था। चलो अब तुम्हीं मुझे वहाँ तक पहुँचा दो, क्योंकि तुम्हारा सारा रास्ता देखा है। और वह ठिकाने भी तुम्हें मालूम हैं जहाँ यह लाग छिपे रहते हैं।

‘नहीं, नहीं महाराज मेरी हिम्मत वहाँ जाने की नहीं है। अगर उन्होंने कोई हमला किया तो मैं आपको बचा भी न पाऊँगा और मेरे प्राण बेकार में चले जायेंगे। इतना कह पूजा ठिठक गया।

‘अच्छा तो तुम रुको। मैं आगे जाता हूँ।’ इतना कह महाराज आगे बढ़ गये।

वह चलते चलते एक खेत की मेंड़ पर खड़े हो गये। इतने में ही उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति साफा बाँधे बंदूक लिये उनकी ओर बढ़ता चला आ रहा है। जब दोनों के बीच की दूरी कम रह गई तो उसने सामने बंदूक तान दी।

महाराज खिलखिला कर हँस पड़े। उन्हें वारदोली सत्याग्रह का स्मरण हो आया और उनका साहस दुगुना हो गया। वे बोले ‘क्यों? क्या आज अकेले ही हो? तुम्हारे अन्य साथी कहाँ हैं?’

अब महाराज और बन्दूक धारी दोनों ही पास की झोंपड़ी के निकट आ गये जहाँ अन्य डाकू छिपे थे। एक ने गरज कर कहा खबरदार! जो एक कदम भी आगे बढ़ाया-’ और महाराज लापरवाही से उसी ओर बढ़ने लगे जिस ओर से यह ललकार आई थी। सामने एक घुड़सवार डकैत ने आकर पूछा “तुम कौन हो?”

‘मैं गाँधी की टोली का बहार बटिया हूँ। आओ हम लोग बैठ कर बात-चीत करें। मैं तुम सबको बुलाने ही तो आया हूँ। इतना कह कर महाराज ने घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा दिया।

सब लोग उसी झोंपड़ी के पास बैठ गये। महाराज ने समझाना शुरू किया ‘भाइयों! यदि तुमको जौहर ही दिखाना है तो उन अंग्रेजों को क्यों नहीं दिखाते, जिन्होंने सारा देश ही तबाह कर दिया है। इन गरीबों को लूट कर मर्दानगी दिखाना तो लज्जा की बात है। अब गाँधी जी के नेतृत्व में शीघ्र ही आन्दोलन शुरू होगा यदि तुममें सचमुच पौरुष है, तो गोली खाने चलो। गाँधी जी ने तुम सबको आमन्त्रित किया है। यह कहते-कहते महाराज के नेत्र सजल हो गये। गला रुँध सा गया। डाकू इस अन्तरंग स्नेह से आविर्भूत हो उठे।

अपने हथियार डालते हुए उनके सरदार ने कहा आप निश्चिन्त होकर जाइये। आज हम आपके गाँव में डाका डालने को थे पर अब नहीं डालेंगे। साथ में एक आदमी भेज देता हूँ।

महाराज ने कहा ‘आप मेरी चिन्ता न करिये, मैं अकेला ही आया था और अकेला ही चला जाऊँगा। साथ देना है, तो उस काम में साथ दो जिसे गाँधी जी ने और भगवान ने हमें सौंपा है।

डाकुओं में से कई ने कुकृत्य छोड़ दिये और कइयों ने सत्याग्रह आन्दोलन में भारी सहयोग किया।


वैज्ञानिक मान्यताएँ या तीर तुक्का?

अनेक दिशाओं में बिखरा-फैला, ज्ञान और अनुभवों का क्षेत्र बहुत व्यापक एवं विशाल है। हमारे प्राचीन पूर्वज मनीषियों ने इसी लिए इस बात पर सदा बल दिया था कि ज्ञान के प्रति हमें अपना मस्तिष्क सदा खुला रखना चाहिए ताकि हर क्षेत्र की नई से नई जानकारी होती रह सके। यह खुलापन, जागरूकता और परिश्रम ही प्रतिभा है। प्रतिभा का अर्थ है क्षमतावान् मनुष्य। प्रतिभाशालियों की संख्या जितनी अधिक होती है और उनमें आपसी सहयोग जितना प्रगाढ़ होता है, ज्ञान-विज्ञान का उतना ही बहुमुखी विकास होता है। जहाँ और जब संख्या और सहयोग कम होता है, तब वहाँ संकीर्णता बढ़ती-फैलती है।

आधुनिक वैज्ञानिक विकास-क्रम के प्राथमिक चरणों में ऐसी ही संकीर्णता का बोलबाला था। यद्यपि उसके पीछे प्रगति की सत्प्रेरणा और सदुत्साह ही था, किन्तु ज्ञानराशि से अपरिचय के कारण वह बाल-उत्साह अनेक काल्पनिक मान्यताओं को वास्तविक मान बैठा था। उस बाल-कल्पना की उड़ान कभी ठीक दिशा में हो जाती रही, तो तीर बनती रही, लक्ष्य-बेध में सफल होती रही। कभी वह यों ही तुक्का होकर रह जाती थी। गम्भीर उद्योगों प्रयासों के सत्परिणाम देखकर लोग प्रत्येक वैज्ञानिक परिकल्पना और मान्यता को ही सत्य मानने लगे। किन्तु प्रगति के साथ साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि उन परिकल्पनाओं-मान्यताओं में तथ्यों-नियमों के साथ ही पूर्वाग्रह-प्रेरित कल्पनाओं का अच्छा-खासा सम्मिश्रण है। नियम और तथ्य अपनी जगह पर हैं। उनसे सभी लाभान्वित होते और प्रगति करते हैं। मान्यताएँ भिन्न हैं। वे आपसी खींचतान का कारण बनती हैं समझदारी का तकाजा है कि मान्यताओं को कसौटी पर कसने के लिए सदा तैयार रहा जाय, उन्हें सदा सही सिद्ध करने के मोह से मुक्त रहा जाय।

विज्ञानवादियों की विकासवादी मान्यता भी ऐसी ही है, जिन्हें कई लोग विज्ञान द्वारा प्रमाणित और पुष्ट, निर्विवाद सत्य मान बैठे हैं।

यह माना जाने लगा है कि सृष्टि के विकास, प्रयोजन एवं कार्य-कारण की पूरी-पूरी जानकारी विज्ञान को हो चुकी है और वैज्ञानिक फार्मूलों द्वारा हर बात की सही-सही जाँच हो सकती है। दूध का दूध, पानी का पानी किया जा सकता है।

विकासवाद की मान्यता है-कि “सृष्टि एक निश्चित क्रम से क्रमशः विकसित हो रही है। पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता का भी निरन्तर विकास हो रहा है आज का मनुष्य जितना उन्नत है, सुसंस्कृत है, उतना पहले कभी नहीं था। आध्यात्मिकता, आत्मसत्ता पर विश्वास, ईश्वर भक्ति आदि पुराने पिछड़े युग की मान्यताएँ हैं जब मनुष्य को प्रकृति पर विजय प्राप्त नहीं थी और वह प्रकृति की विचित्रता से विमोहित, आतंकित, चकित और विचलित होकर इन रहस्यवादी भावनाओं की शरण में जाता था। आज के उन्नत मनुष्य को विश्व के सभी रहस्य ज्ञात होने का सूत्र प्राप्त है। उसे इन मान्यताओं से चिपटे रहने के पिछड़ेपन से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए।”

सर्वप्रथम तो डार्विन के विकासवादी जोड़-तोड़ की सैद्धाँतिक परीक्षा ही की जा सकती है। उनके अनुसार एक कोशीय जीव अमीबा प्रारम्भ में हुआ। फिर वह हाइड्रा में विकसित हुआ। उससे मछली, मेढ़क, सर्पणशील पक्षी स्तनधारी जीव आदि के श्रेणी-विकास पथ से बात बंदर तक पहुँची। वही बंदर प्रागैतिहासिक मानव के रूप में परिवर्तित हुआ। मनुष्य निरन्तर अपना विकास करता बढ़ रहा है। विकासवाद द्वारा यह नहीं बताया जा सकता कि अमीबा से ही नर-मादा दो श्रेणियाँ कैसे विकसित हुईं। उस एक कोशीय जीव से दो कोशीय हाइड्रा कैसे पैदा हुआ? क्या अन्य सब जीव भी इसी गुणोत्तर श्रेणी में रखे जा सकते हैं। सर्पणशील जीव श्रेणी-विकास के क्रम में पंख धारी बने। तब चींटे, पतिंगे मच्छर, जैसे कृमि किस प्रक्रिया में पनपे? माँसाहारी पक्षी, जल-जन्तु आदि विकसित हुए तो गाय, भैंस, बकरी हाथी जैसे शाकाहारी प्राणी कैसे बन गये? सहसा माँसाहार से शाकाहार की प्रवृत्ति-परिवर्तन किस इच्छा के कारण हुआ? फिर एक ही जीव के नर-मादा में अन्तर का कारण क्या है? हाथी के दाँत होते हैं हथिनियों के नहीं। मुर्गे में कलंगी होती है, मुर्गियों में नहीं। मोर जैसे रंग-बिरंगे पंखों वाले की मादा मोरनी बिना पंख के क्यों? पक्षियों की उम्र कुछ ही वर्ष होती है, सर्प और कछुओं की आयु सैकड़ों वर्ष होती है, ऐसा क्यों एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता जीव इच्छा के कारण विकसित हुआ, तब एक ही विकास श्रेणी में और एक दूसरी से जुड़ी विकास श्रेणी में इतनी भिन्नताएँ क्यों हैं?

सुविधा पूर्णजीवन की इच्छा ने शरीर संस्थानों में इच्छित परिवर्तन किये, तो मनुष्य की इच्छा-शक्ति तो अत्यधिक प्रबल और विकसित है। वह पक्षियों को आकाश में उड़ते देखकर खुद भी वैसा गगनचारी होने को लालायित है। मछलियों की तरह अगाध जल-प्रवाह में निर्द्वन्द्व विचरण करने को तरस रहा है और गोते मारने का अभ्यास कर रहा है। तब भी वह इन विशेषताओं से सम्पन्न क्यों नहीं बन पा रहा? हजार-हजार वर्षों से मनुष्य द्वारा की जा रही सामूहिक इच्छा कोई प्रभाव क्यों नहीं दिखा रही?

शायद विकासवादी कह दें कि वह ऐसी इच्छाओं में उतना समय और शक्ति नहीं लगाता। अपितु औद्योगिक-वैज्ञानिक विकास में प्रवृत्त है-और इन क्षेत्रों में निरन्तर अभूतपूर्व प्रगति कर रहा है। परन्तु नित नये ऐतिहासिक-पुरातात्त्विक तथ्य सामने आकर उनका यह दावा भी खंडित कर रहे हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि प्राचीन काल का मनुष्य पिछड़ होने के स्थान पर बौद्धिक सामर्थ्य, विज्ञान तकनीक, उद्योग, वाणिज्य, नभ संचरण, स्थापत्य, वास्तुकला और अध्यात्म सभी में इतना विकसित था कि वहाँ तक पहुँचने में आधुनिक विज्ञान को शताब्दियाँ लग सकती है।

अन्तरिक्ष-अभियान को विज्ञान की रोमाँचकारी प्रगति बताया जाता है। किन्तु ‘भारद्वाज संहिता’के वैज्ञानिक प्रकरण में विमान की विकसित तकनीक का वर्णन है, जो पुष्पक विमान समेत अतीत के विभिन्न विमानों की वास्तविकता पर प्रकाश डालता है।

दमिश्क की “टेरेस आफ बाल बैंक” कभी आधुनिक ‘एरोड्रोम’ से अधिक सुरक्षित अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा था, ऐसा विचार रूसी विद्वान अगरेस्ट ने व्यक्त किया है। यहाँ पहाड़ी छत पर एक सुन्दर ‘प्लेट फार्म’ बना है। इसमें 2 हजार टन तक के वजन वाले 65-65 फुट लम्बे पत्थर प्रयुक्त हुए हैं। टिहानको की 13 हजार फुट की ऊँचाई पर स्थित पहाड़ी छत भी पुराना अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा होने का अनुमान है। यह सुमेरियन सभ्यता का विकसित शहर था। 4784 वर्ग फुट क्षेत्र को समतल बनाकर विमान तल इस का निर्माण किया गया था। इस समतल में एक सूत भी ऊँचाई-निचाई का अंतर नहीं है। टिहान को नगर का पर्यावरणीय दबाव समुद्र तल से आधा है। वहाँ वायु में आक्सीजन बहुत कम रही होगी। तब शहर कैसे बना?

अंतरिक्ष-अभियान में नक्षत्रीय गणना और वेधशालाएँ आवश्यक हैं। चिली से छत्तीस सौ किलो मीटर दूर स्थित ईस्टर ड्रीप “ह्यूमन बर्ड आइसलैण्ड” (मानव पक्षी द्वीप) के नाम से प्रसिद्ध है। यह मय सभ्यता का केन्द्र था। टिहानको से यह द्वीप 5 हजार किलोमीटर दूर है। तो भी यहाँ उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि इन दोनों केन्द्रों में पारस्परिक संपर्क था इस द्वीप में उन दिनों एक अति विकसित वेधशाला थी। वहाँ ज्वालामुखी की चट्टानों को काट काट कर 33 से 66 फुट तक की ऊँचाइयों वाली और 40 से 50 टन तक भार वाली विशाल पाषाण-प्रतिमाएँ गोलाकार में खड़ी हैं। इनके खूबसूरती से तराशे अंग प्रत्यंग उनके सजीव होने का भ्रम पैदा कर देते हैं, मानो वे बस बोलने ही वाली हैं। यहाँ लकड़ी की पट्टियों में नक्षत्र गणना के विचित्र संकेत मिले हैं। अनुमान है-कि इन आकृतियों की छाया से गणितीय सूत्रों के हल और नक्षत्रमंडल की नाप जोख का काम होता रहा है। इस द्वीप के निवासी विद्या के उस स्रोत से विच्छिन्न हो जाने पर भी अभी तक यह बताने में समर्थ होते हैं कि प्रकृति का अमुक परिवर्तन भूकम्प, वर्षा, समुद्री तूफान आदि का परिचायक है। नक्षत्रों और चन्द्रमा आदि ग्रहों की भी उन्हें बहुत बारीकी से जानकारी है।

मय-सभ्यता के समय के कलैंडर प्राप्त हुए हैं, जो आगामी 4 हजार लाख वर्ष तक सूर्य-चन्द्र ग्रहण की प्रति वर्ष की घोषणाएँ करने में सक्षम हैं और इतने वर्षों तक पंचाँग का काम करते रहेंगे। इन कलैंडरों में पृथ्वी का वर्ष 365.2420 दिनों का बताया गया है। आधुनिक इलेक्ट्रानिक उपकरणों से निकाली गई अवधि 365.2422 दिन की है। अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि मय-कलैंडर में जो 0002 का अन्तर है वह गलत ही है। हो सकता है, आज के वैज्ञानिकों की गणना में ही अभी कुछ कमी हो। इन कलैंडरों द्वारा किसी स्थान पर पड़ने वाले विशेष नक्षत्रीय विकिरण तक जाने जा सकते थे। उसी आधार पर दुर्गों, प्रसादों, नगरों और नक्षत्र-वेध शालाओं का निर्माण होता था। ‘इनका’ सभ्यता में भी मय-कलैंडरों का ही आधार लिया जाता था।

बैवीलोनिया में कुछ पट्टियों में चन्द्र ग्रहणों की तिथियाँ अंकित हैं, जो आज भी सच निकलती हैं। चींचा की वेध शाला की सीढ़ियाँ, छत, गुम्बद सब इस प्रकार बनाये गये थे कि वे गणितीय समीकरणों और नक्षत्रीय गवेषणाओं में सहायक थे। ब्रोंसिया (इटली) की गुफाओं की भित्तियों में अन्तरिक्ष यात्रियों की वेशभूषा से सज्जित आकृतियाँ हैं।

विस्तृत भौगोलिक ज्ञान भी पूर्वजों को था। ईसा पूर्व 18 वीं शताब्दी यानी आज से 38 सौ वर्ष पहले का एक एटलस तुर्की के टापाकापी राजप्रासाद में मिला है। इसमें अमेरिका के पठार समेत विभिन्न महाद्वीपों के पर्वत-शिखर और पठार, नदियाँ, समुद्र, द्वीप भूमध्यरेखीय राज्य, दक्षिणी ध्रुव आदि को दिखाया गया है। आधुनिक सभ्यता के इतिहास में सन् 1952 में पहली बार दक्षिणी ध्रुव का सर्वेक्षण सम्भव हो सका उनके पूर्व तक इतनी वैज्ञानिक सामर्थ्य विकसित नहीं थी। “ईको साउण्ड” यन्त्रों द्वारा ही यह सर्वेक्षण सम्भव हो सका। क्योंकि जहाजों का वहाँ पहुँच सकना सम्भव नहीं था। तब इतने वर्षों पूर्व दक्षिणी ध्रुव का वैसा ही भौगोलिक स्वरूप कैसे दर्शाया जा सका, जो 1952 के सर्वेक्षण के ही अनुसार है?

आधुनिक इंजीनियरी अति विकसित मानी जाती है। किन्तु काहिरा और अलेक्जेन्ड्रिया के मध्य बने विशाल पिरामिड कुछ और ही तथ्य प्रकट करते हैं। “च्योप्स के पिरामिड” आधुनिक अभियाँत्रिकी एवं स्थापत्य को चुनौती देते हैं। ये पिरामिड उस स्थान पर बने हैं जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के मध्य में है। इसका अर्थ है कि उस समय के लोगों को चुम्बकीय बलों और नक्षत्रीय विकिरणों की जानकारी थी। यहाँ से महाद्वीपों और समुद्रों को बराबर के दो भागों में बाँटा जा सकता है। ऐसा पृथ्वी का मध्यवर्ती यह स्थान है। बिना अति विकसित यन्त्रों की यह गणना सम्भव नहीं थी।

पत्थर के 26 लाख आकर्षक डिजाइन पिरामिडों में पाये गये हैं। दो पत्थरों के बीच एक सेन्टीमीटर के पाँच सौवें भाग के करीब ही झिरी है। यानी लगभग बिल्कुल नहीं, अदृश्य सी एक एक पत्थर का ब्लाक 12 टन भार वाला है। गैलरी सुन्दर रंगों से रंगी पुती हैं। पिरामिडों की सुरंगें पचीसों मीटर लम्बी हैं। वे भी सुन्दर ढंग से रंगी पुती हैं। मशालें वहाँ ले जाई जा नहीं सकती थीं, अन्यथा श्रमिकों का दम कार्बनडाइ आक्साइड से घुट जाता। दीवारें काली हो जातीं। विकासवादी प्रतिपादन सत्य है तो उस समय टार्च और बिजली की जानकारी थी नहीं। भीतर प्रकाश की क्या कैसे व्यवस्था हुई? पत्थरों की ऐसी शानदार कटाई कैसे हुई?

विकासवाद के अनुसार सन् 1600 के आस-पास आदमी ने पहली बार बैलगाड़ी और घोड़ा गाड़ी का प्रयोग किया। डाइनामाइट का तो कहीं नामोनिशान था नहीं? ये 12-15 टन भार के पत्थर कैसे खदानों से निकाले गये, किस साधन से ढोये गये। इस विशाल मात्रा में कैसे ऊपर चढ़ाये गये। ये पिरामिड एक ही निर्माता “फराह खूफ” द्वारा बनाये गये यानी सौ-पचास वर्ष नहीं, कम ही समय लगा होगा। टनों वजनी 26 लाख पत्थर इतने कम समय में कैसे चढ़ाये और बिठाये गये? यदि रोलर्स से ढोये गये तो ये रोलर्स बने कैसे? उस रेगिस्तानी इलाके में तो बस ताड़ के पेड़ हैं। वही भोजन का आधार है। उन्हें इतनी तादाद में क्यों काटेंगे? क्या अपना पेट काटकर कोई इमारतें बनवाता है? यदि रोलर्स बाहर से मंगवाये गये तो क्या समुद्री मार्ग से जलयानों द्वारा बुलवाये गये?

मैक्सिको की राजधानी से 60 मील दक्षिण चोसला में भी ऐसे ही विशाल खंडहर मिले हैं। ग्वाटेमाला के जंगलों में तूतमखान के भव्य पिरामिड नक्षत्रों की गणना के आधार पर बनाये गए हैं।

लीमा के दक्षिण पिस्को की खाड़ी में 8.0 फुट ऊँची सीधी चट्टान की लाल दीवाल है, जो 20 किलो मीटर दूर से देखी जा सकती है। इस दीवाल पर मनोरम चित्रकारी की गई है।

पेरू की पल्पाघाटी में 37 मील लम्बा 1 मील चौड़ा विस्तृत क्षेत्र पत्थरों के सुडौल टुकड़ों से भरा पड़ा है। ये पत्थर जंग लगे लोहे जैसे लगते हैं।

मिश्र सभ्यता, मय-सभ्यता और इनका सभ्यता के खंडहर इस तथ्य के प्रमाण हैं कि उस समय अत्याधुनिक किस्म के नगर बसते थे। मन्दिर, मूर्तियाँ, सड़कें, जल मल निष्कासन की नालियाँ, स्टेडियम आदि परिष्कृत ढंग से बनाये जाते थे। भाषा, गणित, इतिहास, विज्ञान, दर्शन अध्यात्म, संगीत की शोध होती थी और ग्रन्थ रचे जाते थे। तिहानको नगर में भवनों हेतु 100-100 टन पत्थरों का प्रयोग किया गया दिखता है। 6 फिट लम्बे डेढ़ फुट चौड़े पत्थरों से बनी सुन्दर सुघड़ नालियाँ हैं, जो आज की कंक्रीट नालियों से भी अच्छी हैं। एक 4 मंजिला इमारत के बराबर ऊँचा भवन है, जो 20 हजार टन का एक ही स्टोन-ब्लाक है और उल्टा खड़ा किया लगता है। इस भवन से 800 मीटर दूरी पर पत्थरों को पिघलाकर एक प्रकोष्ठ बनाया गया है। पत्थर अत्युच्च ताप-ऊर्जा से ही पिघल सकते हैं? इसे पैदा करने की विधि उन्हें कैसे ज्ञात थी?

तात्पर्य यही कि विकासवाद की स्थापना के विरोध में इतने सारे प्रमाण मिलते हैं कि इसकी धज्जियाँ उड़ती हैं। यह स्पष्ट हो जाता है कि पूर्वज जीवन के सभी क्षेत्रों में हम से अधिक विकसित थे। हाँ, अनास्था में जरूर पिछड़े थे। सम्भवतः किसी भयंकर युद्ध में या जल प्रलय, हिमप्रलय, भूस्खलन आदि की चपेट में वे संस्कृतियाँ और उनका इतिहास नष्ट-भ्रष्ट अवश्य हो गया है, पर बचे अवशेष भी इस बात को प्रमाणित करते हैं कि वे अति समर्थ पूर्व पुरुष आध्यात्मिक सिद्धान्तों का दैनंदिन जीवन में परिपालन करते थे। उनकी आध्यात्मिक क्षमताएँ अति विकसित थीं। इस पर भी आत्म विज्ञान को रूढ़िवाद कहना और पदार्थ विज्ञान के वर्तमान विकास को मानवीय इतिहास में अभूतपूर्व बताना तथ्यों से आँखें चुराना और वैज्ञानिक प्रतिपादन के नाम पर यों ही तीर-तुक्का चलाना है। साक्ष्यों और अनुभवों का तकाजा है कि इस तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त हुआ जाय और अपने दृष्टिकोण में पूर्वजों द्वारा निर्दिष्ट आध्यात्मिकता का समावेश किया जाय, तभी जीवन में आनन्द उल्लास का नव-संचार हो सकेगा।


सुगन्धि-वितरण की उदारता (kahani)

किसी बगुले को निशाना साधकर मैं आहत करूं, इससे अधिक मुझे प्रिय है, मैं स्वयं उसकी एकाग्रता को देखूं उससे प्रेरणा प्राप्त करूं। किसी बुलबुल को मार कर उसके मांस का स्वाद लेते रहने के स्थान पर मैं चाहता हूं कि चुपचाप किसी शांत स्थान पर बैठा दूर से उसके गीत सुनूं। तितलियों को पकड़ने में नहीं, उनकी मुक्त उड़ान को निहारने में मुझे आनंद मिलता है। फूलों को तोड़कर उन्हें हाथ में लेकर मुझे सौन्दर्य-बोध दृष्टिगत नहीं होता अपितु उन्हें उनके प्राण-स्रोत से जुड़े रहने देकर उनकी प्रफुल्लता, उनकी समिति, उनकी सुगन्धि-वितरण की उदारता को आत्मसात करने में ही मेरा सौन्दर्य बोध तृप्ति पाता है।


स्वप्नों के माध्यम से अंतःस्थिति के दर्शन

स्वप्न जीवन का एक अनिवार्य अंग है। जिस प्रकार जागृत स्थिति में मनुष्य अपनी समझ मनःस्थिति और भावनाओं के अनुसार चित्र विचित्र कामनाएँ करता रहता है उसी प्रकार सुषुमावस्था में स्वप्न देखता रहता है। यों जागते हुए भी लोग अपनी कल्पनाओं के चित्र बनाते और उन्हें देख कर आनन्दित होते रहते हैं। मनो-विज्ञान की प्रचलित मान्यता के अनुसार सपने आने का मुख्य उद्देश्य मन में दमित वासनाओं और इच्छाओं की पूर्ति करना है। लेकिन अध्यात्म विज्ञान के अनुसार कई बार स्वप्नों के माध्यम से अंतर्जगत की झाँकी भी मिलती है और उस झाँकी से वह सब कुछ देखा, समझा जा सकता है जो गहन से गहन विश्लेषण और निदान परीक्षा द्वारा भी सम्भव नहीं देखा जाय।

मनोविज्ञान के अनुसार यथार्थ जगत में अप्राप्त सुखों और सफलताओं का आनन्द उठाने के लिए स्वप्न प्रकृति की वरदान तुल्य व्यवस्था है। सोते समय जब कोई स्वप्न देखता है और सो कर जागता है तो उससे जो ताजगी प्राप्त होती है वह स्वप्न रहित निद्रा में कदाचित ही प्राप्त होती है। क्योंकि स्वप्न देखकर मनुष्य कई अनचाहे दबावों और तनावों से अनायास ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। जीवन के कटु अनुभव, अवश परिस्थितियाँ तथा विक्षुब्ध कर देने वाली चिन्ताएँ स्वप्न के माध्यम से चेतन मन को पार कर अचेतन में जा डूबती है और मनुष्य पुनः सामान्य मनःस्थिति प्राप्त कर लेता है।

उदाहरण के लिए किसी ने किसी का अकारण ही अपमान कर दिया तो इसमें अपमानित होने वाले का क्या वश हो सकता है? अवश और निर्दोष होते हुए भी अपमान का दुःख तो होता ही है। जीवन में इस तरह के कई दुःख और दबाव अनचाहे ही एकत्रित होते रहते हैं। यदि ये सभी दुख और क्षोभ एकत्रित होते रहे तो मनुष्य के चित्त पर विषाद का इतना बोझ इकट्ठा हो सकता है कि उस बोझ के कारण मानसिक सन्तुलन ही लड़खड़ा जाय। स्वप्न ऐसी अप्रिय स्थितियों का समाधान उनकी स्मृति को विस्मृति की कूड़ेदानी में फेंक कर करता चलता है और मनुष्य के चित्त पर दुःख का कोई बड़ा बोझ नहीं बन पाता जिससे कि चरमरा कर उसके टूटने का भय उत्पन्न हो जाय।

इसके अतिरिक्त, मनुष्य बहुत कुछ चाहता है, पर जितना जो कुछ वह चाहता है वह सब प्राप्त नहीं होता। उसमें से अधिकाँश उसकी सामर्थ्य के बाहर की बात होती है। फिर भी इच्छा पूरी न होने पर असन्तोष तो होता ही है। यह असन्तोष बढ़ता ही रहे तो मनोविक्षिप्तता आ घेरती है। ऐसी अवस्था में सन्तुलन को टूटने से बचाने का उपाय स्वप्नों से मनचाही उपलब्धियाँ और सुख प्रस्तुत हो जाता है।

विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में स्वप्नों को लेकर कई खोज हुई है। उनसे प्राप्त निष्कर्षों से अभी तक तो स्वप्नों के विश्लेषण द्वारा व्यक्ति पर पड़ने वाले या उसे अनुभव होने वाले व्यक्त-अव्यक्त दबावों का ही पता लगाया जाता था। लेकिन अब स्वप्नों के माध्यम से रोग निदान भी किया जाने लगा है। ऐसे-ऐसे रोगों का निदान स्वप्न विश्लेषण द्वारा सम्भव हो सका है, जिनके लक्षण चिकित्सा उपकरणों की पकड़ में भी नहीं आते थे।

20 वर्षों के प्रयोग, निरीक्षण और विश्लेषणों के बाद रूस के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डा. कासातकिन ने प्रतिपादित किया है कि रोग के लक्षण प्रकट होने से पूर्व ही स्वप्नों के माध्यम से रोग अपने आगमन की सूचना दे देते हैं।

कुछ ही दिनों बाद यह स्थिति आने वाली है कि कोई स्वस्थ व्यक्ति स्वप्न विशेषज्ञ के पास जाकर अपने सपनों के बारे में बतायेगा और उस आधार पर विशेषज्ञ सतर्क कर देंगे कि अमुक रोग आपके शरीर दुर्ग में घुसपैठ कर रहा है।

इसी विषय पर शोध करने वाले एक-दूसरे रूसी मनःचिकित्सक ने अपनी पुस्तक “स्वप्नों का वैज्ञानिक अध्ययन” में लिखा है, व्यक्ति के भविष्य एवं उसके स्वास्थ्य सम्बन्धी भावी सम्भावनाओं पर स्वप्नों के द्वारा काफी प्रकाश पड़ता है। इतना ही नहीं शरीर और मन से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देने वाले व्यक्तियों के स्वप्न भी यह बता सकते हैं कि भविष्य में किन रोगों का आक्रमण होने वाला है।

सामान्य जीवन में अनागत घटनाओं पर स्वप्नों के माध्यम से पूर्वाभास होने के तो ढेरों प्रमाण बिखरे पड़े है। टीपू सुलतान के सपने, लिंकन द्वारा अपनी मृत्यु का स्वप्न में पूर्वज्ञान, कैनेडी की हत्या का पूर्वाभास आदि तो प्रख्यात उदाहरण हैं। स्वप्नों के माध्यम से सुदूर स्थित अति आत्मीयजनों के साथ घटी दुःखद घटनाओं की जानकारी के विवरण भी मिलते हैं। परन्तु लोग विवेचन के उदाहरण कुछ वर्ष पूर्व ही देखने में आये हैं।

फ्रायड के अनुसार, जब मनुष्य मूल प्रवृत्ति की दृष्टि से स्वाभाविक इच्छाओं को नैतिक या अन्य तरह के दबावों के कारण पूरी नहीं कर पाता और उनका दमन कर देता है तो चेतन मन उन इच्छाओं को अचेतन मन में धकेल देता है। ये इच्छायें अचेतन मन का अंश बन जाती है और अचेतन मन स्वप्नों के माध्यम से उनकी पूर्ति करता है। फ्रायड के इस सिद्धान्त के अनुसार अनेकानेक मनोरोगों का विश्लेषण स्वप्न के माध्यम से सम्भव हो सका।

रोगों की जड़ तन में नहीं मन में, यह सोचा जाने लगा तो इस दिशा में किये गये प्रयासों से यह भी निष्कर्ष सामने आये कि रोगों का एक कारण मनुष्य के मन में दबी इच्छायें, दूषित संस्कार भी हो सकते हैं, डा॰ ब्राउन, डा॰ पीले, मैगडूगल, हैंडफील्ड और डा॰ जुँग आदि प्रसिद्ध मनःशास्त्रियों ने तो यहाँ तक कहा कि फोड़े फुँसी से लेकर टी॰बी॰ और कैंसर जैसी बीमारियों तक में, प्रत्येक बीमारी का कारण कोई न कोई दमित इच्छा, अनैतिक कार्य या दूषित संस्कार है। मनुष्य बाहर से कैसा भी दिखाई दे या अपने को दिखाने का प्रयास करें, उसके बाहरी व्यक्तित्व और दमित इच्छाओं तथा दूषित संस्कारों में अनवरत एक द्वन्द्व चलता रहता है। यह अन्तर्द्वन्द्व ही रोग को जन्म देता है।

डा॰ स्टैकिल ने इस सिद्धान्त की पुष्टि में अपने कई रोगियों का उदाहरण प्रस्तुत किया है। कई चिकित्सकों के पास इलाज कराने और लाभ न होने पर निराश होकर अस्थमा का एक रोगी डा॰ स्टैकिल के पास आया। उसने अपने रोग का पूरा इतिहास डाक्टर को बता दिया। रोग और हुए उपचार का विवरण देखने के बाद रोगी से बातचीत करते हुए डा॰ स्टैकिल ने एक विचित्र बात देखी। रोगी के अनुसार उसे स्वप्न की एक विशेष स्थिति में, जब वह अपने आपको बकते हुए देखता था, तभी डरकर अचानक जाग उठता और उसकी साँस उखड़ने लगती।

डा॰ स्टैकिल ने सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार विश्वास जीत लिया और उस काँटे को उगलवा लिया, जो उस के मन में चुभ रहा था। विगत जीवन में एक बार बहक गये कदम से रोगी जो कुछ अनुचित कर बैठा था उसकी स्मृति ही निरन्तर रिसती रहती थी। डा. से अपने मन का पाप बता देने के बाद रोगी का चित्त कुछ हलका हुआ तो वह सपना भी आना बन्द हो गया और धीरे धीरे रोग भी जाता रहा।

कैलीफोर्निया के डा॰ मार्टिन रोशमान और इविगि ओयल का तो यह मानना ही है अधिकाँश रोग “साइको सोमेटिक” होते हैं, अर्थात् मानसिक अवसाद की प्रतिक्रिया शरीर पर भिन्न भिन्न रोगों के रूप में होती है, अमेरिका के एक चिकित्सक द्वय इस सिद्धान्त को चिकित्सा जगत में क्राँति के रूप में प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि शरीर का प्रत्येक रोग, भले वह छोटा से छोटा हो अथवा बड़े से बड़ा, मन की किसी न किसी गुत्थी से जन्मता है। इतना ही नहीं यदि उस गुत्थी को सुलझाया जा सके तो रोग ठीक भी हो सकता है।

स्वप्नों के माध्यम से रोग निदान की पद्धति का भी यही आधार है। फ्रायड के अनुसार भी तो मन की भली बुरी इच्छायें अतृप्त रह जाने के कारण अचेतन मन में जा छुपती हैं और जब चेतन मन सो जाता है तो उभर कर क्रीड़ा कल्लोल कर तृप्त होती हैं। इच्छाओं की भाँति ही स्मृतियाँ भी स्वप्नों में उभर आये तो इसमें भी आश्चर्य है।

मानसिक गुत्थियों को रोगों का कारण मानने की तरह स्वप्नों में उनकी प्रतिक्रियाओं का उभरना भी अस्वाभाविक नहीं है। यह बात और है कि स्वप्नों का पूरी तरह विश्लेषण किया जाना अभी सम्भव नहीं हुआ है क्योंकि प्रतिकरण, प्रतिस्थापन, अभिनयकरण और आकुँचन आदि उसे बहुत जटिल बना देते हैं। लेकिन जब स्वप्नों का पूरे तौर पर विश्लेषण कर पाना संभव हो जायेगा तो स्वस्थ व्यक्ति से भी उसके स्वप्न पूछकर रोगों का पूर्व संकेत प्राप्त किया जा सकेगा।

आँशिक रूप से इस दिशा में अब सफलतायें प्राप्त होने लगी हैं। डा॰ कासातकिन का कहना है कि -स्वप्नों द्वारा टान्सिल्स, अपेडिसाँइटीस और पाचान संस्थान के रोगों की जानकारी उनके प्रारम्भ होने से काफी समय पहले प्राप्त की जा सकती है। इतना ही नहीं ब्रेन ट्यूमर जैसे रोग का पूर्व परिचय भी एक वर्ष पहले ही स्वप्नों के माध्यम से मिल सकता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का ध्यान इस दिशा में अब गया है किन्तु आयुर्वेद में रोग निदान के लिए स्वप्नों को पहले ही काफी महत्व दिया गया था। कुछ आयुर्वेदिक ग्रन्थों में स्वप्नाध्याय के नाम से एक अलग ही खंड मिलता है। महान् ज्योतिष शास्त्री डा॰ कार्ल जुँग का कहना है कि जब कोई स्वप्न बार बार आता है तो निश्चित ही उसका सम्बन्ध मनुष्य के भावी जीवन से रहता है, ऐसे स्वप्नों की कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। वह पूर्वाभास भी हो सकती है और शरीर के स्वप्न द्वार पर रोग की दस्तक भी। और आयुर्वेदिक आचार्य वराहमिहिर ने “कला प्रकाशिका” में स्वप्नों के द्वारा त्रिदोष ज्ञान का सविस्तार विवेचन किया है। स्मरणीय है आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ ये त्रिदोष ही समस्त रोगों के मूल कारण हैं।

“कला प्रकाशिका” में उल्लेख आया है कि जो व्यक्ति स्वयं को स्वप्न में प्रायः घिरा हुआ या अग्नि और उस से संबंधित दृश्य देखता है उसके शरीर में वात और पित्त का प्रभाव बढ़ा हुआ होता है। कपाल पर उष्णता अनुभव होने या भयावह दृश्य दिखाई पड़ने पर पित्त विकार की संभावना रहती है। इसी प्रकार रक्त वर्ण की वस्तुएँ-रक्त विकार की, की ज्वाला और पुष्प पित्त दोष अथवा श्लेष्म के सूचक बताये गये हैं।

इसके साथ ही सतर्क भी किया है कि एक से स्वप्नों का सभी के लिए एक सा अर्थ नहीं होता। अपितु रोग निदान के लिए व्यक्ति की मानसिक स्थिति और उसकी प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में लिखा है ‘स्वप्न से केवल रोग निदान में ही सहायता नहीं मिलती वरन् रोगी मनुष्य के रोग की वृद्धि या सुधार का भी पता चलता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कुछ स्वप्नों के प्रकार भी दिये हैं जैसे प्रमेह तथा अतिसार के रोगी को यदि पानी पीने का स्वप्न दिखे तो निश्चय ही रोग बढ़ेगा। श्वास रोगी रास्ते में चलने या दौड़ने का स्वप्न देखें तो यह भी कष्ट वृद्धि का सूचक है।

ग्रामीण महिलाएँ भी इस विद्या को थोड़ी बहुत जानकार होती हैं। बच्चों को नींद में हँसते देख कर कई स्त्रियाँ निकट भविष्य में उसे रोग क्रान्त होने का अनुमान लगा लेती हैं। इसी तरह दूसरे स्वप्नों की भी रोग व्याख्या कर लेती है। भले ही अधिकाँश में ये अटकल बाजी से काम लेती हों परन्तु कई महिला स्वप्नों की अर्थ पूर्ण व्याख्या करने के आश्चर्यजनक रूप से सफल सिद्ध देखी गयी है।

स्वप्नों की व्याख्या को लेकर विदेशों में भी कई पुस्तकें लिखी गयी हैं। लेकिन इस विषय में अधिकाँशतः भविष्य सूचक स्वप्नों को व्याख्यायिक किया जाता रहा है स्वप्नों के द्वारा रोग निदान की विज्ञान सम्मत गवेषणाओं का अभी-श्रीगणेश ही हुआ है। इस क्षेत्र में किये जा रहे प्रयासों और प्राप्त निष्कर्षों से बीस पच्चीस वर्ष बाद रोगों के आगमन से पूर्व ही उनसे निबटने की सतर्कता बरतने के लिए आश्वस्त हुआ जा सकेगा। तब जानकार लोग उसे किसी साइकियाट्रिस्ट के पास जाने की सलाह दे सकेगा ठीक उसी तरह जैसे आज साँस उखड़ने और चक्कर आने पर डाक्टर के पास जाने की सलाह दी जाती है।

स्वप्नों के माध्यम से इस प्रकार अंतर्गत की शरीर और मन की यहाँ तक कि आत्मिक स्थिति की भी बहुत कुछ जानकारी मिल जाता है। सर्व विदित है कि मनुष्य के भीतर दैवी और आसुरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ बसती हैं मनुष्य के भीतर भगवान और शैतान दोनों ही विद्यमान हैं। किस का आधिपत्य है और कौन दुर्बल है यह स्वप्नों के विश्लेषण द्वारा बड़ी सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। कहने को भले ही कोई कहता रहे कि हम सपने नहीं देखते, स्वप्न रहित नींद लेते हैं। पर यह सत्य नहीं है। यह बात अलग है कि किसी को सपने याद नहीं रहते हों पर बिना स्वप्न की नींद कभी आती ही नहीं है।

स्वप्नों की भाषा बहुत बेतुकी, असंगत और आधारहीन है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक मानसिक संरचना भी भिन्न भिन्न होती हैं। इसलिए स्वप्नों की व्याख्या के लिए कोई सर्वमान्य सिद्धान्त स्थिर नहीं किया जा सकता। परन्तु जिस दिन स्वप्नों की सरीक और सही व्याख्या सम्भव हो सकेगी, उस दिन मनुष्य के कई रहस्यों का पता लगाया जा सकेगा और वह उपलब्धि मनुष्य के लिए वरदान तुल्य सिद्ध होगी।


झूठ बोलना एक छोटी किन्तु बहुत बुरी आदत

सत्य भाषण को अध्यात्म साधना का एक अंग कहा जाता है। एक अंग ही नहीं आत्म निर्माण का प्रथम और अनिवार्य चरण भी। साधारण से साधारण और अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति से भी धर्म का अर्थ पूछा जाय तो वह सर्व प्रथम सत्य बोलने की ही शिक्षा देते हैं। स्कूल के अध्यापक भी अपने छात्रों को ‘सत्यं वद’ का उपदेश देते हैं। कोई भी संत महात्मा अपने धार्मिक प्रवचनों में सत्य भाषण की महिमा सर्व प्रथम गाते हैं। विश्व के विचारवान व्यक्तियों, विद्वानों, महात्माओं और उपदेशकों से लेकर सामान्य व्यक्ति तक ने जितना महत्वपूर्ण बतलाया है, उतना शायद ही अन्य किसी सदाचरण को बताया है।

किन्तु इसका दूसरा पक्ष भी है और वह है कितने व्यक्ति सत्यव्रती होते हैं। झूठ बोलने की बुराई सभी करते हैं किन्तु उतने ही ज्यादा लोग अपनी जीभ पर इस कुटेव को बिठाये हुए हैं। यह विडंबना ही कही जायेगी कि झूठ बोलने को एक बुरी आदत कह कर उसे अवाँछनीय और अनैतिक बता कर ही कितने ही लोग सत्य भाषण का व्रत सध गया मान लेते हैं। सत्य भाषण की जितनी प्रशंसा की जाती है लगभग उतनी ही झूठ बोलने को आदत लोगों के स्वभाव का अंग बनी है। बेईमान, चोर, अवसरवादी, दुर्व्यसनी, नशेबाज, अनैतिक आचरण करने की दुष्प्रवृत्तियाँ जितनी हैं उन सबको मिलाकर भी झूठ बोलने की आदत वालों की संख्या से अधिक नहीं हैं।

और यह भी एक तथ्य है तो अधिकाँशतः झूठ बोलने की आदत ही व्यक्ति को अन्य दुष्प्रवृत्तियों की ओर ले जाती है। बच्चा सर्व प्रथम यदि कोई दुर्गुण सीखता है तो वह है झूठ बोलना। कई ऐसी बातें हैं जिन्हें स्पष्ट बताने में बच्चा डरता है। बाहर शैतानी करने की शिकायत आने पर पिटने के डर से बच्चा झूठ बोलेगा, या कोई नुकसान कर देने पर धमकाये जाने के भय से झूठ बोलेगा। जो भी कारण हो, बच्चे में अन्य दुर्गुण जब प्रवेश करते हैं तो उनका प्रवेश द्वार झूठ बोलना ही बनता है। इसमें वह अपनी सुरक्षा समझने लगता है कि झूठ बोल दिया तो पिताजी की नाराजगी से बच जायेगा। आरम्भ में तो माता पिता भी इस ओर कोई ध्यान नहीं देते, पर जब लड़का बड़ी गलतियाँ करता है और झूठ बोलकर अपना बचाव भी तो अन्य दुर्गुण बड़ी तेजी से बढ़ते हैं।

बड़े वयस्क व्यक्ति भी सुरक्षा की दृष्टि से झूठ बोलना सीखते हैं या उसे अपने स्वभाव का अंग बना लेते हैं। प्रारम्भिक रूप में झूठ बोलने की इतनी हानियाँ दिखाई भी नहीं देतीं। क्योंकि सामान्य व्यवहार में उसकी कोई तीव्र प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती। लेकिन जब इस आदत के परिणामस्वरूप बड़ी हानियाँ होती हैं तो निश्चित ही पश्चाताप होता है। देर से आफिस पहुँचने वाला कर्मचारी कभी बस न मिलने या कभी बच्चे की तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर अपना बचाव कर लेता है। लेकिन बार बार के बहाने सुनकर जब अधिकारियों का विश्वास उठ जाता है या सन्देह होने लगता है तो संयोग से कदाचित असली कारण होने पर भी विश्वास नहीं टूटता। साथियों सहयोगियों का विश्वास खोकर व्यक्ति की स्थिति उस ग्वाले की सी हो जाती है जो भेड़िया आया! भेड़िया आया!! चिल्लाकर गाँव वालों को इकट्ठा कर लिया करता था और झूठ मूँठ ही उन्हें हैरान कर देता। रोज की बात होने के कारण गाँव वालों ने जाना छोड़ दिया तो सचमुच भेड़िया आ जाने और सहायता के लिए चिल्लाने पर भी कोई नहीं आया और उसकी कितनी ही बकरियाँ मारी गयीं।

साथियों सहयोगियों के बीच झूठ बोलने का एक कारण असलियत को छुपा कर रखने की आवश्यकता अनुभव करना भी है। साधारण आमदनी वाले किसी व्यक्ति को कोई खर्चीला दुर्व्यसन लग जाये तो मित्रों से उधार लेकर गुजारा करने का ही रास्ता रह जाता है। अब उनसे तो बताया नहीं जा सकता कि पैसों की जरूरत क्यों आ पड़ी। परिचित व्यक्तियों के सामने झूठ बोलकर बहाना बना कर ही काम चलाना पड़ता है। इसी प्रकार के कोई सज्जन अपनी पत्नी की बीमारी का बहाना बना कर काफी दिनों तक उधार लेते और शराब पीते रहे। असलियत तब खुली जब कैसी बीमारी है यह समझ कर सहानुभूति जताने के लिए मित्रगण उनके घर आये पत्नी को स्वस्थ दशा में देखकर आश्चर्य हुआ और उन सज्जन की पोल भी खुली। आगे से न मित्रों ने उधार दिया और न ही उन्हें उधार माँगने की हिम्मत हुई। कुछ हफ्तों बाद श्रीमती जी सचमुच बीमार हो गयीं, उन्हें मोतीझरा हुआ। ऐसी परिस्थिति में मित्रों से उधार माँगना पड़ा। मित्रों ने उनकी सच्ची बात को भी बहाना मान कर कोई सहायता न की। परिणामस्वरूप समुचित चिकित्सा के अभाव में उनकी गृहिणी चल बसी।

इस प्रकार मित्रों का विश्वास खोकर हम अपनी हानि तो करते ही हैं जिसका देश कभी कभी बड़े बड़े दुष्परिणाम लाता है-हम स्वयं अपना विश्वास भी खो देते हैं। मनोविज्ञान का यह नियम है कि किसी व्यक्ति को बार बार कुछ कहा जाय उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा व्यक्त की जाय उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा व्यक्त की जाय तो बार बार सुनकर अपने सम्बन्ध में भी वह उसी धारणा को दोहराने लगता है। अनृत भाषण करने वाले व्यक्ति दूसरों का विश्वास खो बैठते हैं और उनकी दृष्टि में सदैव संदेहास्पद बने रहते हैं तो यह निश्चित है कि बोलने वाला स्वयं भी अपने प्रति उन्हीं धारणाओं को पुष्ट करने लगे। मित्र-परिचितों का कोई सहयोग न करने के कारण उसे अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक श्रम और अधिक संघर्ष करना पड़ता है। जिसकी तुलना में थोड़ी सफलता मिलती है। जब कि वह अन्य व्यक्तियों को थोड़े से श्रम और थोड़े से संघर्ष के कारण अधिक सफलतायें अर्जित करता हुआ देखता है। फलस्वरूप उसे अपने अयोग्य होने की आशंका सताने लगती है। इस प्रकार उसका स्वयं का भी आत्मविश्वास खत्म होने लगता है।

साथ ही यह बात और भी है कि झूठ बोलने वाला किसी और को धोखा देने में भले ही सफलता प्राप्त कर ले पर अपनी अन्तरात्मा के सामने तो वह उतना ही अपराधी रहता है। सत्य पर सदैव अटल रहने वाला अंतर्मन जब इस प्रवंचना की अनुभूति करता है तो वह निर्बल होगा ही। इस निर्बलता का अनुभव वह व्यक्ति आसानी से कर सकते हैं जो झूठ बोलना आरम्भ करते हैं। पहली बार झूठ बोलते समय अंतरात्मा का विरोध जितना सशक्त होगा उतना सशक्त दूसरी बार झूठ बोलते हुए नहीं रहता। यह क्षीणमना स्थिति बार बार पुनरावृत्ति करते समय बनती चली जाती है और अन्ततः व्यक्ति की अन्तश्चेतना में झूठ बोलने के विरुद्ध जो आवाज उठती है वह लुप्त हो जाती है। दूसरों का विश्वास तोड़ना, आत्मविश्वास खोने के साथ साथ आत्म बल भी क्षीण होने लगता है।

कहा जा चुका है कि सबसे पहला दुर्गुण झूठ बोलने वाला व्यक्ति अपने बचपन में ही सीखता है और नहीं सीखता है तो बड़ा होकर अभ्यास करता है। बचपन में पड़ी हुई झूठ बोलने की आदत थोड़ी सी कड़ाई और वाणी के संयम से छूट सकती है। पर वयस्क होने पर पकड़ी गयी यह आदम मुश्किल से छूटती है क्योंकि तब इसे कोई बड़ा अपराध भी नहीं माना जाता और न ही इतना बुरा क्योंकि तब इसमें कुछ लाभ होता दिखाई देता है।

तत्काल कुछ लाभ होता है। लेकिन इसका कारण यह नहीं मानना चाहिए कि वह झूठ बोलने से हुआ है। क्योंकि झूठ बोलने की बात तो हम जानते हैं, जिससे झूठ कहा गया है वह तो यही समझता है कि कहने वाला सच कह रहा है। अर्थात् झूठ से लाभ इसलिए होता है कि वह सच की आड़ में है। अन्यथा झूठ से लाभ होता तो विचारक मनीषी और ऋषि महर्षि सच को नहीं झूठ को ही सद्गुण मानते। सद्गुण का अर्थ सार्वभौम और सार्वकालिक वे विशेष प्रवृत्तियाँ हैं जो सफलता और लाभ प्रदान करती हैं।

कदाचित अनृतवादी यह घोषित कर दें कि मैं झूठ कह रहा हूँ और झूठी स्थिति यह है तो भी सच छुपता नहीं। सारी चालाकी और होशियारी इसी बात को छुपाने में बरती जाती है कि झूठ पकड़ में न आये। जब सारा ध्यान और मनोयोग झूठ को ही सच साबित करने में लग जाता है तो अन्य दिशाओं में श्रम की शक्ति कम लगती है। एक प्रकार से उधर लापरवाही आ जाती है। लापरवाही से किये गये कामों में असफलता ही मिलेगी। तो सच की ओट में बोले गये झूठ से ही असफलता की संभावना ही अधिक रहती है।

बच्चे बड़ों को देखकर झूठ बोलते हैं तो बड़े लाभकर और होशियारी मानकर झूठ बोलते हैं। यह प्रवृत्ति आदत बन कर जब स्वभाव का अंग बन जाती है तो व्यक्ति बात बात में झूठ बोलने का आदी हो जाता है उसके अन्तर और बाह्य जीवन में तो दो होते ही हैं। रहन सहन परिवार और व्यवहार में भी दोहरा जीवन बन जाता है। झूठे व्यक्ति सर्वप्रथम अपनी शान बढ़ाने और उच्चस्तरीय सिद्ध करने की ओर उन्मुख होते हैं। उन्हें परिश्रम और पुरुषार्थ द्वारा अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने की अपेक्षा झूठ बोलकर शेखी बहाना अधिक आसान लगता है। क्यों कि इसमें न तो कुछ लगता है और न ही माथे पर पसीना आता है। अतः वे घर की स्थिति को छुपाकर उसे बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं। और इस स्थिति को बनाये रखने के लिए इतनी तिकड़में लगाने में अपनी मानसिक शक्ति खर्च करते हैं कि वह यदि सही दिशा में लगायी जाती तो सचमुच जीवन स्तर कुछ तो ऊँचा उठ ही जाता।

झूठ बोलना, असत्य भाषण करना हर दृष्टि से हानिकारक है। साथ ही सत्य भाषण में भी कुछ सावधानियाँ बरती जानी चाहिए। सत्य बोलने का अर्थ यह नहीं है कि सिद्धान्तवादिता का अहंकार हममें आ जाय और अंधे को अंधा कह कर उसे खिजाने लगें अर्थात् ऐसी बातें भी कहने लगें जो सुनने वाले को खिजा कर दें, उसे उद्विग्न बना दें। उपनिषदों ने इस सम्बन्ध में सत्य भाषण की व्याख्या करते हुए कहा है- रुत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् प्रियं (सच बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो)।

मिथ्यावादी इस सतर्कता में भी अपनी आदत की पुष्टि कर सकते हैं। लेकिन अप्रिय सत्य न बोलने का अर्थ झूठ बोलना नहीं है। चुप या मौन रह कर भी काम चलाया जा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि यह बहाना जो प्रायः किया जाता है-झूठ बोले बिना काम नहीं चलता और आटे में नमक के बराबर तो जरूरी है झूठ। आटे में नमक की दलील तो तब दी जानी चाहिए कि जब उस से कुछ लाभ हो, या उसका कोई औचित्य हो। झूठ से जब सब प्रकार हानि ही हानि है तो आटे में नमक की दलील नहीं आटे में जहर की संगत बैठती है।

झूठ बोलने के व्यापक दोष से हमारा समूचा जीवन प्रभावित होता है और उसका विष सारे व्यक्तित्व को ही विषैला बना देता है। यहाँ तक कि विदेशों से आने वाले पर्यटक भी जब देखते हैं कि हरिश्चन्द्र बुद्ध और गाँधी के वंशज हम कदम कदम पर झूठ बोलते हैं तो वे हमारे बारे में क्या धारणा लेकर जाते हैं। इस दुर्व्यसन को राष्ट्रीय स्वाभिमान पर व्यक्तिगत आत्म गौरव पर धब्बा मान कर तत्काल छोड़ देना ही श्रेयस्कर है।


प्रकृति की अबूझ पहेली जीवन के विचित्र नियम

प्रकृति के अधिकाँश रहस्यों को समझने और सुलझा लेने का दावा करने वाला मनुष्य अभी कितना नासमझ और अल्प सामर्थ्य वाला है, यह आये दिन घटने वाली कई घटनाओं से सिद्ध होता रहता है। इन में से अधिकाँश घटनाएँ भ्रम, फ्राड या धोखा कहकर मनुष्य फिर भी अपने दम्भ को बचाने की कोशिश करता है। लेकिन कई मामले तो इतने प्रत्यक्ष होते हैं कि उन्हें किसी भी तरह भ्रम या फ्राड कह कर उनसे छुट्टी नहीं पाई जा सकती। प्रकृति प्रायः मनुष्य के सामने ऐसी पहेलियाँ प्रस्तुत करती रहती है, जो मनुष्य को अपनी वस्तु स्थिति का आभास कराती हैं और इस भ्रम को तोड़ती हैं कि मनुष्य सर्वज्ञानी और सब कुछ जान समझ लेने वाला बन गया है।

उदाहरण के लिए एक ही समय में जन्म लेने वाली जुड़वा सन्तानों को लें। सामान्यतः जुड़वा बच्चों से यह अर्थ लगाया जाता है कि एक ही गर्भ से, एक ही समय या कुछ क्षणों के अन्तर से पैदा होने वाले बच्चे। इस तरह के जुड़वा दो प्रकार के होते हैं। एक तो वे जो कुछ मिनटों या क्षणों के अन्तर से पैदा होते हैं। इन्हें सही दर्राय कहा जाता है। सामान्यतः इनके जन्म कुछ मिनटों के अन्तर से होते हैं। कभी-कभी इनके जन्म एक घन्टे या उससे अधिक का अन्तर से होते हैं। ये भिन्न लिंग के भी हो सकते हैं। सहोदर जुड़वा एक ही समय पर स्खलित दो शुक्राणुओं से विकसित होते हैं और अलग-अलग उर्वरित होते हैं। इस प्रकार के जुड़वा अपने गर्भाधान काल में माता के शरीर से विभिन्न प्रकार के जीवन तत्व ग्रहण करते हैं। इसलिए इनके गुण स्वभाव भिन्न भी हो सकते हैं उनकी रुचियाँ और विशेषताएँ अलग अलग भी हो सकती हैं।

दूसरे प्रकार के जुड़वा बच्चे एक साथ जन्म लेते हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये एक ही शुक्राणु से उर्वरित होते हैं और विकास की प्रारम्भिक अवस्था में ही दो पिंडों के रूप में विभाजित हो जाते हैं। जन्म लेने के बाद यह आधे सामान्य शिशु के रूप में पलते हैं। लेकिन ये गर्भाशय में एक ही प्रकार का आहार, जीवन तत्व प्राप्त करते हैं, इसलिए ये एक ही आकार-प्रकार और शक्त सूरत के होते हैं। इनकी आकृति तथा प्रकृति में सामान्यतः बहुत कम अन्तर देखा जाता है। जुड़वा सन्तानों के उपलब्ध रिकार्डों के अनुसार जन्म लेने वाले 80 बच्चों में से औसतन एक बच्चा जुड़वा होता है। इसलिए जुड़वा होना कोई असामान्य बात नहीं है। कई बार एक ही स्त्री के गर्भ से एक ही समय में तीन बच्चे भी पैदा होते हैं इस तरह के बच्चों के जन्म की सम्भावना प्रति छह हजार में से एक होती है। एक ही गर्भ में से एक ही समय में चार या पाँच बच्चे होना बहुत कम देखा जाता है।

यमज जुड़वा बच्चों के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे प्रायः बहुत कम जीवित रहते हैं। ऐसे बच्चे जिनके अंग आपस में जुड़े हुए हों वह तो जीवित नहीं ही बचते किन्तु थाईलैंड के मीकलाँग-गाँव में 11 मई सन् 1811 को दो ऐसे यमज बच्चों ने जन्म लिया जो अलग अलग अस्तित्व रखते हुए भी सीने के दायें-बायें हिस्से से जुड़े हुए थे। यह तो अपने आप में कोई खास अनोखी बात नहीं है। आश्चर्य की बात तो यह है कि वे दोनों 63 वर्ष की आयु तक जीवित रहे, उन्होंने विवाह किया, घर बसाया और इसी तरह जुड़े रह कर सामान्य जीवन व्यतीत किया।

प्रकृति द्वारा दी गई इन विचित्रताओं को साथ लिये जन्म लेते ही उनके माँ बाप सहित परिवार के अन्य लोग भी भयमिश्रित आश्चर्य में पड़ गये। मीकलाँग गाँव थाईलैंड (तब सियामी) की राजधानी बैंकाक से करीब 60 मील दूर उत्तर पश्चिम में है। सियामी माता और चीनी पिता से जन्म जन्म लेने वाले इन अद्भुत बालकों की खबर जंगल की आग के समान फैल गई और उन्हें दूर-दूर से लोग देखने के लिए आने लगे। यह बच्चे किस तरह अपनी जिन्दगी काटेंगे, कैसे रहेंगे आदि कई प्रश्न देखने वालों के हृदय में उठते थे, परन्तु माता पिता के लिए तो संतान सो संतान। प्रकृति की इस विचित्रता के कारण उत्पन्न हुई विवशता को देखकर माता पिता से उन पर अपना विशेष ममत्व उँडेला। यह घटना अब से लगभग पौने दो सौ वर्ष पुरानी है और उस मय तक शल्य चिकित्सा का इतना विकास नहीं हुआ था कि दोनों को अलग किया जा सके। उस समय थाईलैंड में ज्यादा डाक्टर भी नहीं थे, जो थे उनमें से भी अधिकाँश चीनी नस्ल के थे जो पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के स्थान पर पुरानी और पिछड़ी हुई चिकित्सा पद्धति ही प्रयोग में लाते थे।

उन बच्चों को जिनका नाम चाँग और इंग रखा गया था, देखने के लिए आने वालों में कई डाक्टर भी थे। उन डाक्टरों में से कइयों ने चाँग और इंग के माता पिता से एक दंपत्ति ने बच्चों को अलग करने के लिए आग्रह किया और वह कार्य स्वयं करने का प्रस्ताव भी निश्चित ही यह चिकित्सा का अपने आप में एक नया अनुभव था। पर चाँग और इंग की माँ नीफ ने ऐसे सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। क्योंकि प्रस्ताव करने वाले डाक्टरों ने शल्य क्रिया का जो स्वरूप प्रस्तावित किया था वह बेहद पीड़ाजनक था। उन में से किसी डाक्टर ने गर्म लोहे के तार से चाँग और इंग को अलग करने का सुझाव दिया था तो किसी ने रस्सी के दोनों और थैली की तरह लटका देने का उपाय सुझाया था। उन बच्चों की माँ इस तरह के उपायों को इस्तेमाल करने के लिए किसी भी तरह सहमत नहीं हुई।

चाँग और इंग बड़े होने लगे। समय बीतता गया। समय बीतने और बड़े होने के साथ साथ उनकी परेशानियाँ भी बढ़ने लगीं। पहली कठिनाई तो यही आई कि वे चलें कैसे क्योंकि दोनों के शरीर सीने पास धड़ से इस तरह जुड़े हुए थे जैसे वे गलबहियाँ डाले हुए हों। माँ ने दोनों बच्चों को गिरते पड़ते चलना सिखा ही दिया। साथ ही वह दोनों को इस तरह शिक्षित भी करती रही कि तुम दोनों की जिन्दगी परस्पर सहयोग और सद्भाव पर ही अवलंबित है। सहयोग और सद्भाव पर तो यह सारी दुनिया टिकी हुई है क्योंकि सभी मनुष्य और प्राणी जगत् एक दूसरे से किसी न किसी प्रकार आपस में सम्बद्ध हैं। लेकिन प्रकृति ने चाँग और इंग के साथ तो यह विवशता ही जोड़ दी थी इसलिए उनके लिए तो सहयोग सद्भाव से रहना और भी जरूरी, अनिवार्य था। सो उन्होंने अपनी माँ की सीख को गाँठ में बाँध लिया और उसी के सहारे 63 वर्ष की जिन्दगी पार कर ली।

आरम्भ में उन्हें चलना सीखने में बड़ी कठिनाई हुई थी पर धीरे धीरे उन्होंने न केवल अपनी इस कठिनाई पर काबू पा लिया बल्कि साथ साथ नदी में तैरना और नाव चलाना भी सीख लिया। सन् 1828 में एक अंग्रेज व्यापारी राबर्ट हंटर की निगाह इन दो अद्भुत जुड़वा किशोरों पर पड़ी जिस समय हंटर ने चाँग और इंग को देखा उस समय वे दोनों नदी में तैर रहे थे। पहले तो हंटर ने समझा कि यह जल का कोई विचित्र जीव है लेकिन जब दोनों भाई पानी से निकल कर एक नाव में सवार हो गये तो बड़े गौर से देखने पर वह समझ सका कि ये दोनों जुड़वा भाई हैं। आज तक उसने इस तरह के जुड़वा भाई न तो कहीं देखे थे और न ही ऐसे व्यक्तियों के बारे में सुना था।

हंटर के व्यापारी दिमाग में तुरंत एक योजना आई और वह चाँग तथा इंग के माता पिता से मिल कर प्रकृति के इस अजूबे का व्यावसायिक लाभ उठाने लगा। वह नोक दंपत्ति को कुछ दे दिला कर चाँग और इंग को अपने साथ अमेरिका ले गया। अमेरिका पहुँचते ही हंटर ने बोस्टन के हरवार्ड मेडिकल कॉलेज के प्रो॰ जान वारेन तथा अन्य डाक्टरों से दोनों भाइयों का मेडिकल परीक्षण कराया। डाक्टरों ने प्रमाणित कर दिया कि ये दोनों किशोर नैसर्गिक रूप से जुड़वा हैं। इस के बाद हंटर ने अमेरिका और ब्रिटेन में चाँग और इंग के कई एक प्रदर्शन किये तथा लाखों रुपये कमाये।

बाद में समझ आने पर चाँग और इंग ने हंटर से सम्बन्ध तोड़ कर स्वतन्त्र रूप से प्रदर्शन करना आरम्भ किया। जल्दी ही वे मालामाल हो गये। 1833 से सन् 1839 तक दोनों ने अमेरिका में सैकड़ों प्रदर्शन किये। इस बीच दोनों भाइयों की मुलाकात जार्जिया के एक समृद्ध किसान की लड़कियों एडलीड और लैसी से हुई। यह मुलाकात जल्दी ही प्रेम परिणय में बदल गई। विवाह के लिए कठिनाई यह थी कि दोनों भाई जुड़वा थे इसलिए दोनों ने आपरेशन करवा कर अलग अलग हो जाने की बात सोची। डाक्टरों ने यह आपरेशन बहुत पेचीदा और जान जोखिम का बताया। परन्तु चाँग और इंग के मन में विवाह की कामना इतनी प्रबल हो गई थी कि उन्होंने जोखिम उठाना स्वीकार कर लिया। एडलीड और लैसी, जो स्वयं भी चाँग तथा इंग से प्रेम करने लगी थीं उनसे आपरेशन के लिए मना किया और इसी स्थिति में विवाह करने के लिए तैयार हो गई।

उनके विवाह का समाचार अनेकों प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया। बड़े भव्य और शानदार समारोह में चाँग और इंग तथा एडलीस और लैसी का विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इस दंपत्ति युगल ने 21 बच्चों को जन्म दिया जिनमें से 18 जीवित रहे। विवाहित जीवन को सामान्य ढंग से व्यतीत करने के लिए दोनों भाइयों ने मर्यादाएँ और नियम बाँध लिये थे तथा आजीवन अपने बनाये नियमों का पालन करते रहे उन दोनों के जीवन में सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि चाँग और इंग आपस में बहुत ही कम बोलते थे फिर भी बिना बोले हीवे एक दूसरे के मन की बात समझ जाते थे। उन दोनों की मृत्यु सन् 1874 में सेटी-एयरी (उत्तरी कोरोलीना) में एक साथ हुई। 63 वर्ष तक प्रकृति की विलक्षण विशेषता को साथ लिये सामान्य ढंग से जीवन जीने वाले इन दोनों भाइयों का सचित्र विवरण एनी वालेस ने ‘द टू’ पुस्तक में लिखा है।

इसी प्रकार का एक उदाहरण भारत में भी इसी शताब्दी के आरम्भ में सामने आया। शायद लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता यदि मैसूर के आईफेरे गाँव में जन्मी गंगम्मा और गौरम्मा को यदि उनके माता पिता मैसूर रियासत के राजा के पास न लाते। 1915 में इन दोनों बहनों का जन्म एक साथ हुआ। उन के सभी अवयव अलग थे पर पीठ के नीचे वाला हिस्सा आपस में जुड़ा हुआ था। लोगों ने इन लड़कियों के जन्म को किसी राक्षसी का अवतार बताया जिसके चार हाथ, चार पैर, चार आँखें, चार कान, दो नाक, दो मुँह, दो सिर और दो धड़ थे। भयभीत होकर माता पिता उन्हें राजा के पास ले गये। महाराजा को भी ये लड़कियाँ बड़ी विचित्र लगीं। उन्होंने अपने विद्वान दरबारियों से परामर्श किया कि ये लड़कियाँ जुड़वा कैसे पैदा हुईं? उन के जन्म से परिवार पर क्या असर पड़ेगा आदि आदि प्रश्नों पर विचार करने के साथ यह भी सोचा कि हिन्दू परिवारों में एक तो वैसे ही लड़कियाँ भार रूप होती हैं उस पर जुड़वा लड़कियाँ और भी ज्यादा विपत्ति तथा परेशानी की जड़। इसलिए मैसूर नरेश ने उन लड़कियों को अपने पास रख लिया।

बड़ी होने पर माता पिता ने उन्हें वापस माँगा तो राजा ने गौरम्मा और गंगम्मा को उन्हें सौंप दिया। चाँग और इंग की तरह इन लड़कियों का भी प्रदर्शन किया गया। सन् 1925 से आरम्भ हुआ उनका प्रदर्शन गंगम्मा और गौरम्मा की जीवन पर्यन्त चला। उन्हें लाखों लोग देखते और प्रकृति के इस चमत्कार को देखकर दाँतों तले अँगुली दबा लेते। सन् 1937 में इन दोनों बहनों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में भी ले जाया गया, जो पेरिस में आयोजित की गई थी। ये दोनों बहिनें सन् 1952 तक जीवित रहीं। यद्यपि उनका जीवन क्रम चाँग और इंग की भाँति नहीं रहा फिर भी प्रकृति की विलक्षणताओं के इतिहास में उनका अपना स्थान तो है ही।

वैज्ञानिक आज तक इस गुत्थी को नहीं सुलझा सके हैं कि यमज बच्चे आम तौर पर बहुत कम जीते हैं और उन में भी एक दूसरे के साथ जुड़े हुए बच्चों के जीवित रहने की संभावना तो बिलकुल नहीं है। फिर सिद्धाँत और शरीर विज्ञान के सामान्य नियम के विपरीत चाँग तथा इंग और गंगम्मा तथा गोरिम्मा क्रमशः 63 तथा 37 वर्षों तक कैसे जीवित रहीं। इसे प्रकृति की एक अनबूझ पहेली ही कहना पड़ेगा और ऐसी अनेकानेक पहेलियाँ हैं, जिन्हें बूझ पाना सर्वज्ञ होने का दावा करने वाले मनुष्य के लिए अभी संभव नहीं है।


सहकारिता और आदान-प्रदान एक ब्रह्माण्ड व्यापी सत्य

सृष्टि चक्र में सर्वत्र अन्योन्याश्रय का सिद्धान्त काम कर रहा है। जड़ चेतन तत्वों से मिलकर बना यह समूचा ब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बन्धनों में बंधा हुआ है और हर किसी को दूसरों का सहयोगी तथा दूसरों पर आश्रित होकर रहना पड़ रहा है। यह पारस्परिक बन्ध नहीं सृष्टि की शोभा सुन्दरता का, उसकी विभिन्न हलचलों का तथा उत्पादन विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति पदार्थ सम्पदा एवं प्राणी सत्ता को शान्तिपूर्वक रहने और विकसित होने का अवसर दे रही है। अंतर्ग्रही आकर्षण शक्ति से खिंचे-बंधे रह कर ही ग्रह नक्षत्र अपनी-अपनी कक्षाओं और धुरियों पर परिभ्रमण करते हैं। यह तो मोटी जानकारी हुई, वास्तविकता यह है कि ग्रहों के बीच आदान-प्रदान का क्रम इतनी तीव्र गति से चल रहा है कि मानो विनिमय बाजार की धूम मची हुई हो।

उत्तरी ध्रुव में होकर अंतर्ग्रही शक्तियाँ धरती पर अवतरित होती हैं। जितनी आवश्यक होती हैं उतनी पृथ्वी द्वारा पचा ली जाती हैं और अनावश्यक को दक्षिणी ध्रुव द्वारा अन्तरिक्ष में फेंक दिया जाता है। उत्तरी ध्रुव को पृथ्वी का मुख कहा जाता है तो दक्षिणी ध्रुव को मल द्वार। यदि पृथ्वी को अन्तर्ग्रही अनुदानों का आहार न मिले तो उसे भूखे ही रहना पड़ेगा। इन ध्रुव क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी कितने ही ऐसे छिद्र हैं जिनके माध्यम से अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान का क्रम सुचारु रूप से चलता रहता है। इन्हें राम कूप अथवा स्वेद छिद्र भी कहा जा सकता है। शरीर इन छिद्रों द्वारा भी साँस लेते और साँस छोड़ते हैं। पृथ्वी पर कितने ही ऐसे छिद्र हैं जिनमें होकर सूक्ष्म ही नहीं स्थूल भी धँसता और निकलता देखा जा सकता है।

पृथ्वी का ऐसा ही एक रोम छिद्र अटलाँटिक महासागर में मियामी के हिस्से में है। यह क्षेत्र त्रिकोण जैसा सैकड़ों वर्ग मील आकार में फैला हुआ है। 5 दिसम्बर 1945 की घटना है। अमरीकी वायु सेना के पाँच टी॰बी॰एफ॰ अमरीकी बमवर्षक वायुयान प्रशिक्षण उड़ान पर रवाना हुए। ये सभी यान दिशासूचक यन्त्रों तथा संचार साधनों से सुसज्जित थे, उड़ाके भी काफी अनुभवी और योग्य थे। इस उड़ान का नेतृत्व कर रहे थे लेफ्टीनेन्ट चार्ल्स टेलर। यान ठीक समय पर उड़े और बमबारी का अभ्यास कर पूर्व निर्धारित मार्ग से वापस लौटने के लिए बढ़ने लगे। इस कार्य में उन्हें लगभग 70 मिनट लगे। 20 मिनट बाद पाँचों विमान फोर्टलाउरबेल के उड़ान केन्द्र पर उतरने थे। वहाँ के नियन्त्रण कक्ष पर आशा की जा रही थी कि दो-पाँच मिनट के भीतर ही उड़ान भर रहे विमानों से कोई संपर्क स्थापित होगा। नियन्त्रण कक्ष में अधिकारी इसी आशा से यन्त्रों के पास बैठे हुए थे तभी एक अप्रत्याशित सन्देश मिला जो लेफ्टीनेन्ट चार्ल्स टेलर ने प्रेषित किया था कि-हम खतरे में हैं............. फिर बीच में ही आवाज आना बन्द हो गयी। नियन्त्रण कक्ष से यह जानकारी चाही गयी कि वे लोग कहाँ और किस स्थिति में हैं लेकिन उसका कोई उत्तर नहीं मिला। उल्टे सन्देश आया-’हमें कुछ पता नहीं कि हम कहाँ हैं-शायद हम खो गये।’ प्रेषित सन्देश में अचरज और घबराहट का स्वर स्पष्ट झलक रहा था। ढाई हजार घण्टों की उड़ान आ अनुभव रखने वाले कुशल यान चालक चार्ल्स टेलर की यह घबराहट भरी आवाज कम चिन्ताजनक नहीं थी।

नियन्त्रण कक्ष से बमुश्किल संपर्क स्थापित हुआ और कुछ निर्देश दिये गये तो और भी निराशाजनक सूचनायें मिलीं कि-”हमारे कुतुबनुमा यन्त्र काम नहीं कर रहे हैं................. विमानों में कुछ ही मिनटों का ईंधन शेष है................... दिशा सूचक यन्त्र बेकार हो गये हैं।” इसके बाद रेडियो संपर्क पूरी तरह टूट गया और कुछ ही मिनटों बाद बमवर्षकों के खो जाने की घोषणा कर दी गयी।

इन खोये हुए बमवर्षकों को खोजने के लिए कई विमानों ने अविलम्ब उड़ानें भरीं। उनमें सबसे बड़ा विमान था। पी॰वी॰एम॰ मार्टिन मैरीनर बमवर्षक विमान। यह विमान नवीनतम आधुनिक यन्त्रों और उपकरणों से सुसज्जित था तथा तेरह अनुभवी एवं दक्ष विमान चालक सवार थे इस बीच उड़ान नम्बर 19 के लेफ्टीनेन्ट चार्ल्स टेलर तथा कैप्टन स्टीवर की आपसी बातचीत रेडियो पर कुछ देर के लिए सुनायी दी। जिससे कुछ अन्दाज लगाया गया कि वे पाँचों विमान किस क्षेत्र में है।

उसी के अनुसार मार्टिन मैरिनर को निर्देश दिये गये। निर्दिष्ट दिशा में उड़ान का रुख करने के कुछ ही मिनट बाद मार्टिन मैरिनर के एक चालक लेफ्टीनेन्ट कोम ने नियन्त्रण कक्ष को सूचित किया कि-छह हजार फुट के ऊपर हवा के प्रबल झोंके हैं। मार्टिन मैरिनर का यह सन्देश ही अन्तिम सन्देश सिद्ध हुआ और इसके बाद उसका कुछ भी पता नहीं चला।

इस प्रकार 5 दिसम्बर 45 को एक साथ छह बमवर्षक विमानों के खो जाने की सनसनीखेज घटना एक साथ दुनिया भर के समाचार पत्रों में छपी। आश्चर्य की बात यह है कि उस समय न तो कोई युद्ध चल रहा था कि शत्रु राष्ट्र उन विमानों का अपहरण कर ले तथा न ही मौसम खराब था कि विमान भटक जायें। छह विमानों के एक साथ खो जाने की यह घटना वायु सेना के इतिहास में अपने ढंग की अनोखी घटना थी। उन खोये हुए विमानों की खोजबीन के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किये गये, पर न कहीं विमानों का पता चला न ही उनके अवशेषों का कोई चिह्न मिला।

कई सूत्रों से इस बात की पुष्टि हुई कि यह छहों विमान ‘डेविन्स ....’ क्षेत्र में ही खोये हैं। इससे पूर्व उक्त क्षेत्र में प्रायः जलयानों के ही खोने की घटनायें घटी थीं। सर्वप्रथम 1840 में रोत्रेजी नामक फ्राँसीसी जलयान के खोने का विवरण मिलता है। इसके चालीस वर्ष बाद अंग्रेजी जहाज फ्रिगेट अटलाण्टा, 1902 में जर्मनी के बार्कक्रिया, 1918 में अमरीकी जहाज यू॰एस॰एस॰ साइक्लाँफ 1924 में रायफ्रूक नामक जापानी जलयान तथा इसी प्रकार छोटे-बड़े जलयानों के उस क्षेत्र में खो जाने की घटनाओं के विवरण मिले हैं। उनके सम्बन्ध में तो यह भी मान लिया जाता रहा कि ये जहाज किन्हीं समुद्री तूफानों में फँसकर नष्ट हो गये होंगे, पर जबसे विमानों के खो जाने और रहस्यमय ढंग से उनके अवशेषों का भी कोई पता न चलने के विवरण सामने आये तो सहज ही विश्वास करते नहीं बनता और न ही उन्हें अविश्वसनीय कहा जा सकता है।

खासतौर से इसी क्षेत्र में विमान या जलयान क्यों खोते हैं इसका कोई स्पष्ट कारण अभी तक खोजा नहीं जा सका है। इतना जरूर है कि अब तक 100 से अधिक विमानों तथा जलयानों के खो जाने के प्रामाणिक विवरण प्राप्त हुए हैं। किंवदन्तियों के अनुसार तो उनकी संख्या और भी अधिक हो जाती है।

इस समुद्री क्षेत्र में जो भी जलयान, विमान और व्यक्ति पहुँच जाते हैं उनमें से कोई प्रायः वापस नहीं आता। उनके कोई अवशेष चिह्न भी कहीं नहीं मिलते। फिर भी कुछ भाग्यशाली व्यक्ति हैं जो बड़ी मुश्किल से अपने यान को अथवा स्वयं को इस शैतानी पंजे से छुड़ा सके। इन व्यक्तियों द्वारा मिलने वाले विवरण विस्मय-विदग्ध कर देते हैं। सन् 1964 में मियामी की सनलाइन एबिएशन नामक कम्पनी के एक विमान चालक चक बेफली को विमान लेकर नासाऊ तक जाना था। चक बेफली अपने यान सहित इस त्रिकोण में फँस गये और सौभाग्य से बच कर अपनी यात्रा पूर्ण कर सके। चक बेफली ने उन संघर्षपूर्ण क्षणों का विवरण इस प्रकार बताया है-”मौसम बहुत बढ़िया और साफ था। रात्रि को 9:30 बजे के करीब एकाएक मुझे अजीब-सी अनुभूति हुई। मुझे लगा कि विमान के पंख एक अजीब-सी रोशनी के साथ चमकने लगे हैं। कुछ ही क्षणों में यह चमक इतनी तेज हो गयी कि यन्त्रों को पढ़ने में कठिनाई महसूस होने लगी।”

“यकायक यान के कुतुबनुमा की सुई तेजी से गोलाई में घूमने लगी। यान के इंजन में ईंधन की स्थिति बताने वाली सुई कभी तो शून्य पर आ जाती और कभी पूरा ईंधन भरा होने का संकेत देती। उस समय तो मैं अवश किंकर्तव्यविमूढ़ ही रह गया जब स्वचालित चालक (आटो पायलट) यन्त्र ने यान को दाहिनी ओर मोड़ दिया तथा इसके बाद वायुयान के सभी यन्त्र विचित्र सूचनायें देने लगे। किसी प्रकार मैंने स्वयं का इतना सन्तुलन बनाये रखा कि विमान को उड़ाये जा रहा था। चमक इतनी बढ़ गयी थी कि मुझे कुछ भी दिखाई देना बन्द हो गया। फिर भी मैंने अपना सन्तुलन नहीं खोया। थोड़ी देर बार चमक अपने आप कम होने लगी। जैसे-जैसे चमक कम होती गयी वैसे-वैसे यन्त्र ठीक तरह से काम करने लगे।”

“किसी तरह वायुयान को हवाई पट्टी पर उतारने में सफल हो सका तो मैं तुरन्त उसके निरीक्षण में जुट गया। उस समय मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब मैंने पाया कि वायुयान की हर चीज बिलकुल ठीक थी।”

इसी प्रकार जीवित लौटे जिम रिचर्डसन और दूसरे वायुयान चालकों ने भी अपने रोमाँचकारी अनुभव बताये हैं। उनके यानों में भी इसी प्रकार की गड़बड़ियाँ उत्पन्न हुईं-दिशासूचक यन्त्र बिगड़ गया-रास्ता भूल गये-नीचे ऊपर भयंकर धुँध छायी हुई थी और समुद्र में तूफानी लहरें उठ रही थीं। धुँध में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था। यह संयोग ही कहा जाना चाहिए कि दिशा ज्ञान न रहने पर भी वापस लौटना और बचना सम्भव हो सका।”

उक्त क्षेत्र में 1840 से जहाजों के लापता होने के विवरण प्राप्त हैं। परन्तु निरन्तर संपर्क और सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें किसी दुर्घटना का शिकार मान लिया जाता रहा। 1945 से जब विमानों ने इस क्षेत्र में उड़ना आरम्भ किया तो उन्हें वास्तविकता का कुछ आभास होने लगा। इसके बाद तथ्य का पता लगाने के लिए सम्बन्धित राष्ट्रों की सरकारों ने व्यापक स्तर पर प्रयास किये लेकिन कुछ भी नहीं पता लगाया जा सका। सन् 1955 में जापान के वैज्ञानिकों का एक दल उस क्षेत्र में गया। यह दल आधुनिकतम यन्त्रों, सुरक्षा उपकरणों तथा आपातकालीन व्यवस्थाओं से सुसज्जित “कातिमार फाइव यार” नामक जहाज पर सवार था। इसके बावजूद भी तथ्यों का पता लग पाना तो दूर रहा उल्टे ‘काँतिमार’ का यह जहाज भी गायब हो गया। वारमूडा क्षेत्र में जहाजों के गुम हो जाने का यह क्रम भी जारी है। कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि वारमूडा त्रिकोण पृथ्वी के उन 12 स्थानों में से एक है जो पूरी पृथ्वी पर निश्चित दूरियोंमान से स्थित है। भौगोलिक कारणों से इन स्थानों पर विशेष चुम्बकीय लहरें पैदा होती रहती हैं और इसी कारण इन यानों के दिशासूचक यन्त्र विद्युत उपकरण गड़बड़ा जाते हैं। परन्तु कुछ ऐसी भी घटनाएँ हुईं जिनसे यह व्याख्या अधूरी ही सिद्ध होती है? सम्भावना बताई जाती है कि उन क्षेत्रों में किसी ग्रह का प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण वायुयानों को खींचकर ले जाता है अथवा किसी अन्य ग्रह से प्रवाहित विद्युत धाराएँ विमानों को किसी अन्य ग्रह की ओर धकेल देती हैं।

वास्तविक कारण चाहे जो भी हो,पर अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान की व्यवस्था से इन्कार नहीं किया जा सकता है। विश्व ब्रह्माण्ड के कण-कण में संव्याप्त पारस्परिक निर्भरता या एक-दूसरे से प्रभावित होने के नियम को देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यहाँ अकेला कोई नहीं है। एकाकी कोई अस्तित्व नहीं है, जो कुछ है सब सामूहिक है। प्रकृति की इस व्यवस्था में वारमूडा के गुप्त जलयानों को दुर्घटना ही कहा जायेगा, परन्तु अंतर्ग्रही आदान-प्रदान से होने वाले लाभों की तुलना में वह क्षति एक पैसे बराबर भी नहीं है। सृष्टि के इस रहस्य और निर्देश को समझा जा सके तो प्रगति का वह चक्र अग्रगामी रह सकता है जिसके आधार सुव्यवस्था बनती और स्थायी रहती है।


Quotation

मैं चाहता हूँ सारे देश में उत्तम पुस्तकों वाली लाइब्रेरियों का जाल बिछा दिया जाये। आज जो ज्ञान के स्रोत सूखे पड़े हैं। वही राष्ट्रीय पतन का कारण हैं। अपनी जाति जब भी उठेगी ज्ञान की शक्ति से उठेगी। वह शक्ति जहाँ भी होगी वहीं स्वर्ग बनता चला जायेगा। - लोकमान्य तिलक


शान्ति के बीज अन्तःभूमि में उगते हैं

संसार के कोलाहल एवं अशान्त वातावरण में एक विशेषता यह दिखायी देती है कि प्रत्येक व्यक्ति शान्ति पाने के लिए व्याकुल है। सारे प्रयत्न पुरुषार्थ इसीलिए किये जा रहे हैं। इस बात का प्रमाण है कि शान्ति शाश्वत है, अशान्ति तो बाह्य हलचलों की प्रतिक्रिया मात्र है। शान्ति का भाव मानव के अन्तःकरण में बीज रूप से विद्यमान है। अनन्त कोलाहल के मर्मस्थल से भी एक मंत्र ध्वनित हो रहा है-’शान्तिः शान्तिः शान्तिः’। वह प्रेरक शक्ति शान्त स्वरूप में समस्त जड़-चेतन में विराजमान है मनुष्य की अन्तरात्मा में स्थित होकर वह अपनी सतत प्रेरणा देती रहती है।

उस शान्त स्वरूप परमात्मा का दर्शन अपने अन्तःकरण में किस प्रकार किया जाय? इसका एक ही उत्तर है-अनन्त शान्ति का अनुभव शान्त मनःस्थिति द्वारा ही किया जा सकता है। आन्तरिक चंचलता का कोलाहल हमें अपनी ही अन्तरात्मा से दूर रखता है। हमारी प्रवृत्तियाँ अनेकों दिशाओं में दौड़ती हुई शक्ति को छिन्न-भिन्न किये दे रही है। बाह्य भाग-दौड़ के असंयमित कारणों से मन सदा अशान्त बन ही नहीं पाती कि वृत्तियों को अन्तर्मुखी करके उस शान्त स्वरूप आत्मा का दर्शन कर सकें।

सामान्यतः लोग जीवन के ह्रास और शक्ति के अभाव को शान्ति समझ लेते हैं। किन्तु जीवन-विहीन शान्ति तो मृत्यु है। शक्ति हीन शान्ति जड़ता का परिचायक है। गति एवं क्रिया से रहित निश्चेष्ट होना शान्ति नहीं है। शान्ति तो एक सुसंतुलित मनःस्थिति है जिसे प्राप्त कर मनुष्य साँसारिक कोलाहल एवं विपन्नताओं में भी निर्लिप्त बना रहता है। जीवन की सम्पूर्ण शक्ति के स्वरूप में जो विद्यमान है वही शान्ति है। जो सृष्टि के सौंदर्य को प्रकाशित एवं प्राणिमात्र के कल्याण करने के लिए सचेष्ट है वह शान्ति है।

इसे एक सामान्य उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। विशालकाय रेल रंजन चलता है। उसके पहिये घूमते हैं, किन्तु इंजन का चलना ही चालक नहीं है वरन् चालक वह है जो इंजन का चलना ही चालक नहीं है वरन् चालक वह है जो इंजन में बैठा उसे गति दे रहा है। गतिशील संसार के मध्य अदृश्य रूप में विद्यमान चेतना शान्त स्वरूप है। रेल के डिब्बे में बैठे यात्री उसकी तीव्र गति से भयभीत नहीं होते। वे जानते हैं कि इंजन को चलाने एवं नियंत्रित करने वाला बुद्धिमान ड्राइवर बैठा है। यह अभय की भावना तभी बनती है जब यात्री इस बात से परिचित होते हैं कि रेल की भयंकर गति अनियंत्रित नहीं है।

विशाल कारखाने में यदि कोई अनभिज्ञ व्यक्ति पहुँचे तो यही समझेगा कि यहाँ कोई दानवीय काण्ड हो रहा है। चक्रों की तीव्र ध्वनि, मशीनों की गड़गड़ाहट उसके मन को विक्षुब्ध बना देगी। किन्तु जब उसे पता चलता है कि उनको नियंत्रित संचालित करने वाला कोई विज्ञ मनुष्य मौजूद है तो उसे वह भयरहित होकर शान्ति का अनुभव करेगा। कारखाने के कोलाहल एवं गति में परिणाम की सार्थकता में उसे शान्ति का दिग्दर्शन होगा।

जगत के प्रचण्ड शक्ति वेग एक विभीषिका के रूप में मानव मन को उद्वेलित कर रहे हैं। रेल की गड़गड़ाहट एवं कारखाने की भयंकर ध्वनि के समान सृष्टि के आवेग क्रिया प्रतिक्रियाओं से मनुष्य विक्षुब्ध बना रहता है। सामान्य प्राकृतिक आघातों से भयभीत हो जाता है। इसका मुख्य कारण है-अंतर्दृष्टि का अभाव। मन की उद्विग्नता उसे जगत के मध्य विद्यमान शान्त सत्ता के दिग्दर्शन से वंचित रखती है। फलस्वरूप जीवन पर्यन्त मनुष्य साँसारिक अभावों, आघातों, से भयभीत होकर विक्षुब्ध बना रहता है। अपने अज्ञान के कारण उस दिव्य सत्ता का अनुभव नहीं कर पाता जो निर्लिप्त भाव से बैठी संसार को गति प्रदान कर रही है।

वह प्रकृति को फल और फूल से प्राण और सौंदर्य से भरपूर बनाकर मंगलमय बना रही है। सृष्टि के शक्ति के वेग को भी एक मंगलमय लक्ष्य की ओर लिए जा रही है। धात्री के समान अनादि काल से जगत की रक्षा कर रही है। समस्त ग्रह नक्षत्रों को जड़ पदार्थों को आबद्ध किये सुव्यवस्थित ढंग से संचालित कर रही है। चेतन प्राणियों का पालन पोषण कर रही है। अनेकों स्वरूपों में वह पालन-शक्ति के रूप में जगत में विचरण कर रही है। जीवन उसका एक स्वरूप है मृत्यु दूसरा। सुख-दुख हानि लाभ उसके ही विभिन्न रूप हैं। जीवन व्यापार की समस्त गतिविधियों में कल्याणकारी भाव में शान्त रूप में विराजमान है। यदि ऐसा न होता तो आज संसार में जो सौंदर्य आकर्षण दिखाई दे रहा है। वह आघातों द्वारा लुप्त हो जाता। मानव मानव अन्यान्य प्राणियों के बीच जो सम्बन्ध बन्धन आकर्षित कर रहा है, वह समाप्त हो जाता। वह शान्त स्वरूप कल्याणकारी परमात्मा ही समस्त संसार की रक्षा कर रहा है।

मन की चंचलता ही उस शान्त स्वरूप को जो अन्तरात्मा में बैठा अपना भाव प्रेषित करता रहता है के सान्निध्य लाभ से वंचित रखती है। बाह्य संसार में मन शान्ति की तलाश में भटकता रहता है। कभी उसे वस्तुओं के आकर्षण में ढूंढ़ता है तो कभी व्यक्तियों में। आकर्षणों के ये बन्धन उसे और भी आबद्ध करके अशान्त बनाते हैं। वस्तुओं व्यक्तियों से बद्ध होकर मनुष्य अपने आन्तरिक स्रोत से दूर हटता चला जाता है। जीवन पर्यन्त मन की भाग दौड़ चलती रहती है तथा मनुष्य को व्यग्र बनाये रहती है। भाग दौड़ का परिणाम यह होता है कि मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है? शक्ति क्षीण होने से अशान्ति उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। शान्ति प्राप्त करने का यह अविवेकपूर्ण प्रयास अशान्ति के परिणाम के रूप में मिलता है। थकी इन्द्रियाँ निश्चेष्ट जीवन की बाह्य स्थिरता को शान्ति का स्वरूप मान बैठने की भूल करती है शक्ति के ह्रास होने पर भी मन की चंचलता उसी प्रकार बनी रहती है। फलस्वरूप मनुष्य अपने जीवन के अन्तिम दिनों में और भी अधिक व्यग्र बना रहता है तथा अन्तरात्मा के अमृत पान से सदा वंचित रहता है।

अन्तरात्मा के शान्त स्वरूप का दर्शन शान्त मनःस्थिति द्वारा कर सकना सम्भव है। इसके लिए मन को संयमित करना अति आवश्यक है। संयमित मन सदा चलायमान रहता है। शास्त्रकार इसी कारण मन को निग्रहित करने का निर्देश देते हुए कहते हैं-

“मनएव मनुष्याणाँ कारणं वन्ध मोक्ष्योः” (गीता)

मन बन्धन और मुक्ति का कारण है। बाह्य आकर्षणों में आबद्ध मन के कारण ही अशान्ति बनी रहती है। अशान्ति दूर करने एवं शान्ति प्राप्त करने का मन तो करता है किन्तु उसका प्रयास बहिर्मुखी होता है। जड़ वस्तुओं के क्षणिक आकर्षणों में शान्ति पा सकना सर्वथा असम्भव हैं। आन्तरिक भाव प्रेरणाओं को समझा जा सके तथा मन की घुड़ दौड़ को अंतर्मुखी बनाया जा सके तो स्पष्ट होगा कि न केवल अपनी अन्तरात्मा में वरन् समस्त सृष्टि में शान्ति स्वरूप परमात्मा विद्यमान है। बाह्य कोलाहल सुख-दुख तो परिवर्तनशील तरंगें हैं। उन तरंगों का प्रेरणा स्रोत तो इन हलचलों के प्रभाव से रहित कल्याणकारी परमात्मा है, जो निर्लिप्त भाव में सम्पूर्ण चराचर में शान्त रूप में स्थित है। मानवी काया में अंतरात्मा के रूप में वही विराजमान हो कर अपने दिव्य गुणों का आभास प्रेरणाओं के रूप में कराता रहता है। उन प्रेरणाओं को समझा जा सके तथा अपनी चेष्टाओं को अन्तर्मुखी बनाया जा सके तो जिस की प्राप्ति के लिए मन सदा व्यग्र बना रहता है, उस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

साँसारिक सुख-दुख, एवं अभाव उसे ऐसी स्थिति में पहुँचने पर प्रभावित नहीं कर पाते। सर्वत्र आनन्द की शान्ति की निर्झरिणी बहती दिखायी देती है। जगत के कोलाहलों में भी उसे कल्याणकारी भाव का दर्शन होता है। मन का भटकाव बन्द हो जाता है। अनन्त कोलाहल में भी उसे एक ही ध्वनि सुनायी पड़ती है-शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः।


कितने समझदार हैं यह नासमझ प्राणी

मनुष्य और पशुओं में तुलना करते समय सबसे स्पष्ट और प्रथम अन्तर समझ का ही सामने आता है। लगता है मनुष्य सबसे समझदार बुद्धिमान सामाजिक और नैतिक दायित्वों को अनुभव करने वाला प्राणी है। लेकिन नहीं, कई बातों में जानवर मनुष्यों से भी आगे हैं और वे अपना दायित्व कुशलतापूर्वक निभाते हैं, एक दूसरे का सहयोग करते हैं, आपस में काम आते हैं, वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार अपनी आदतें बदल लेते हैं, दोस्त बनाते हैं, पत्नी व्रत धर्म का पालन करते हैं तथा अपनी मर्यादाओं और सीमाओं में रहते हुए संतुलित जीवन जीते हैं।

कई स्तनपायी जीवों में पैतृक दायित्व का पर्याप्त विकास हो जाता है। यह भावना बन्दरों में बहुत अधिक पायी जाती है। माँ अपने बच्चों को तब तक छाती से चिपटाये रहती है जब तक कि वह स्वयं डालियों पर उछलने-कूदने नहीं लगता और अपनी आहार सामग्री जुटा नहीं लेता। यही नहीं वयस्क बन्दर अपने बच्चों को सम्भावित खतरों को दूर करने के लिए दुस्साहसिक कार्य भी कर बैठते हैं शेर पुच्छ जर्मत (लाइन टैल्डमैकाक) के बन्दरों का एक परिवार दिल्ली के चिड़िया घर में रखा गया है। उनके रहने के लिए एक छोटा सा टापू चुना गया जहाँ वे स्वतंत्रतापूर्वक रह सकें। एक बार एक साँप उस टापू पर पहुँच गया। साँप को देखते ही सब बड़े बन्दर पेड़ों पर चढ़ गये लेकिन दो तीन छोटे बच्चे साँप के पास चले गये और उसे चिढ़ाने के अन्दाज में चिल्लाने लगे।

उन बच्चों के माँ बाप पेड़ पर चढ़ गये थे। उनने देखा कि बच्चों को इस प्रकार का खतरा हो सकता है तो एक बन्दर पेड़ से उतरकर नीचे आया। संभवतः वह उन बच्चों का पिता रहा होगा। वह बन्दर बच्चों के पास पहुँचा ओर उन्हें धमका कर वहाँ से दूर ले गया। इतना ही नहीं उसने बड़ी सावधानी से साँप की पूँछ पकड़ कर उसे पानी में फेंक दिया। कहाँ तो वह साँप से डर कर पेड़ पर चढ़ गया था और कहाँ अपने बच्चों की जान खतरे में देख कर उन्हें धमकाने तथा खतरा दूर करने के लिए साँप के पास पहुँच गया।

परिवार बसाने और अबोध असमर्थ बच्चों का लालन पालन करने में ऊदबिलाव भी कमाल की तत्परता बरतता है। ऊदबिलाव के लिए पानी और जमीन में कोई अन्तर नहीं है। वह जितनी तेजी से जमीन पर दौड़ सकता है। उसके पंजों की अंगुलियाँ पतली चमड़ी से आपस में जुड़ी रहती है, इससे ऊदबिलाव को तैरने में आसानी रहती है परिवार बसाने से पहले वह नदी के किनारे जमीन खोद कर बिल बना लेता है। मादा ऊदबिलाव उस बिल में दो या तीन बच्चों को जन्म देती है। बिल खोदने का काम नर ऊदबिलाव ही करते हैं क्योंकि मादा तो बेचारी गर्भवती होने के कारण उस गहरे और लम्बे बिल को तैयार कैसे करें। प्रसव के बाद मादा ऊदबिलाव तीन महीने तक बिल में ही रहती है। उसके तथा बच्चों के लिए तब तक भोजन सामग्री लाने का काम नर ऊदबिलाव ही करता है। दस दिन में बच्चों की आँख खुलती हैं और तीन महीने बाद माता पिता उन्हें लेकर बिल से बाहर आते हैं। तब तक पूरे परिवार की निर्वाह व्यवस्था नर ऊदबिलाव ही जुटाता है। देखा गया है कि नर ऊदबिलाव नर ऊदबिलाव अपनी पत्नी और बच्चों को भरपेट भोजन करा चुकने के बाद ही स्वयं भोजन करता है।

दाम्पत्य जीवन में एक दूसरे के प्रति निष्ठा, सहयोग सद्भाव में सारस पक्षी की कोई तुलना ही नहीं है। वर्षा के मौसम में सारस पक्षी पानी के समीप जमीन पर घोंसला बना कर एक या दो अण्डे देते हैं। इन अण्डों से बच्चे निकलने में काफी समय लगता है, इसलिए नर और मादा दोनों युगल बारी-बारी से अण्डे सेते हैं। जब मादा काफी समय तक अण्डे पर बैठे रहने के कारण थक जाती है तो नर आकर बैठ जाता है और जब नर काफी देर तक बैठने के कारण थक जाता है तो मादा सारस आकर अण्डे सेने लगती है। यह जिम्मेदारी पारस्परिक रूप से निभाने के पहले दोनों पक्षी नर और मादा सारस आनन्दित होकर जोर-जोर से चिल्लाते हैं तथा एक विशेष प्रकार का नृत्य करते हैं।

मनुष्य अपने बच्चों को क्या करना है और क्या नहीं करना है यह शब्दों द्वारा सिखाता है। बहुधा ऐसे काम जो माता पिता स्वयं करते हैं अपने बच्चों को उन कामों से बचाने की सलाह देते हैं। बच्चों की असमर्थता और अभिभावों की अपेक्षा सीमित योग्यता के कारण यह एक सीमा तक उचित भी है परन्तु प्रायः माता-पिता अपने बच्चों में ऐसी आदतें डालना चाहते हैं जो उनमें नहीं होतीं। जैसे सुबह जल्दी उठने की बात को ही लिया जाय पिता देर तक सोने का आदी रहने के बाद भी बच्चों को जल्दी उठने के लिए कड़ाई करता है। स्वयं झूठ बोलते हुए भी बच्चों को सत्य भाषण करना सिखाता है। शिक्षण और आचरण की यह खाई बच्चों में कुण्ठा और विद्रोह की भावना को जन्म देती है।

बच्चों को किस प्रकार सिखाया जाय यह सीखना हो तो इन नासमझ कहे जाने वाले प्राणियों को ही अपना आदर्श बनाना पड़ेगा। लगभग सभी जानवर अपने बच्चों को निर्देश या आज्ञा द्वारा नहीं स्वयं आचरण करके सिखाते हैं कि किस समय कैसा व्यवहार करना है। आचरण में आगे रहने के कारण बच्चे भी अपने से बड़ों के आज्ञानुवर्ती करते हैं। किसी चूहे परिवार के मुखिया को बिल के आसपास रखे किसी खाद्य पदार्थ पर संदेह हो जाता है तो वह उसका स्पर्श तक नहीं करता है। परिवार के दूसरे सदस्य भी अपने संरक्षक को ऐसा करते देखकर उस पदार्थ की ओर मुँह तक नहीं उठाते।

हरिणों का झुण्ड-जिसके प्रायः सभी हरिण एक ही वंश परम्परा के सदस्य होते हैं अपने से बड़े कहना चाहिए वयोवृद्ध हरिण के पीछे-पीछे चलते हैं। जिस दिशा में वह चलता है, उसी दिशा में अन्य हरिण भी आगे बढ़ते हैं। रास्ते में कहीं भी कितनी ही बढ़िया घास या खाद्य पदार्थ दिखाई दे परन्तु कोई हरिण उसे छूना तो दूर रहा देखता तक नहीं। इस प्रकार के अनुशासित पारिवारिक जीवन में हरिण प्रायः खतरों से बचे रहते हैं।

यह तो हुआ कुछ वन्य प्राणियों का पारिवारिक जीवन वन जीवन का अपना एक अलग संसार है जहाँ विभिन्न जातियों के जीव जंतु रहते हैं। आपस में व्यवहार करते समय ये कितनी समझदारी का परिचय देते हैं, उतनी समझदारी यदि मनुष्य भी बरतने लगे तो दुनिया के सभी संघर्ष, लड़ाई और युद्ध दो तिहाई बन्द हो जायें। अक्सर यह पूछा जाता है कि अगर जंगल में शेर और हाथी की लड़ाई होती है तो कौन जीतता है! वर्षों तक वन्य पशुओं की आदतों और व्यवहारों का अध्ययन करने के बाद एक प्रसिद्ध जीव शास्त्री ने लिखा है-वास्तव में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं जब कि शेर और हाथी की भिड़न्त होती हो। प्रथम तो शेर और हाथी दोनों एक दूसरे के सामने आते ही नहीं, कभी संयोग वश दोनों का सामना हो भी जाय तो दोनों एक दूसरे की ताकत को समझते हुए अलग अलग रास्तों पर चले जाते हैं। न तो शेर हाथी से ही लड़ना पसन्द करता है, न हाथी शेर से ही लड़ता है। दोनों का द्वन्द्व अपवाद स्वरूप ही होता है और अपवाद कहाँ नहीं होते।

हाथी सम्भवतः जंगल का सर्वाधिक शाँति प्रिय ऐसा प्राणी है जो शक्तिशाली भी है। परन्तु वह अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने डराने के लिए नहीं करता। हाथी आपस में स्वयं भी बहुत कम उलझते हैं। खासतौर पर उन्हीं अवसरों पर हाथियों में आपसी लड़ाई होती है जब कोई हाथी उद्दण्ड हो जाता है और छोटे बड़े सभी के कान में तिनका करने लगता है। कानवर्ग प्राणी-संग्रहालय के डा॰ वुल्फ डार्टिच ने आठ वर्षों तक हाथी की आदतों प्रकृति और तौर तरीका का अध्ययन किया। एक पुस्तक में लिखा-”जब हाथी किसी के व्यवहार से परेशान हो जाता है तो पहले वह सूँड के अग्रभाग को मस्तक तक ले जाता है और फिर गंडास्थल का स्पर्श करता है। यही उसकी ज्ञानेंद्रिय है। इस प्रकार करने से क्या होता है यह कहना कठिन है परन्तु ऐसा लगता है कि ऐसा करने पर हाथी को मदसुख की गंध का अनुभव होता है तथा उसमें एक प्रकार का आत्म विश्वास जागृत होता है।

“जब उसे कोई दूसरा हाथी त्रास देना शुरू करता है तो वह सूँड से गंडास्थल का स्पर्श कर मस्तक से टक्कर मारकर बाहर निकाल देता है। एक दूसरी बात और ध्यान देने योग्य दिखाई दी। वह यह कि जब जब अधिक ताकत वाले हाथी की कम ताकत वाले हाथी से टक्कर होती देखी गयी तब-तब कमजोर हाथी की मदस्रावी ग्रन्थि तक बलवान हाथी अपनी सूँड से स्पर्श करता। इसके बाद कम ताकत वाला हाथी अधिक ताकत वाले हाथी के सामने अपनी पराजय स्वीकार कर लेता। लेकिन यदि उसे भरोसा हो जाता कि वह सामना कर सकेगा तो बलवान हाथी के मुँह में अपनी सूँड डालकर कायदे से उत्तर देता।”

यह ठीक उसी प्रकार है जैसे लड़ने से पहले दो पहलवान हाथ मिलाते हैं। हाथ मिलाते समय की गर्म जोशी को देखकर ही एक पहलवान दूसरे पहलवान की ताकत का अन्दाज लगाता है। इस यों भी समझा जा सकता है कि जब दो व्यक्ति लड़ते हैं तो कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का गला पकड़ता है। गले पर पड़ने वाले दबाव को अनुभव कर प्रतिपक्षी यह जाँचने की कोशिश करता है कि वह सामना कर सकेगा अथवा नहीं। सामना करने में अपने को समर्थ अनुभव करने पर ही वह प्रतिकार करता है अन्यथा गला छुड़ा कर चुप रह जाने में ही अपना भला समझता है। इस तरह की समझदारी मनुष्यों में तो कहीं कहीं ही दिखाई पड़ती है परन्तु बराबरी की टक्कर के सिद्धान्त का पालन हाथी पूरी निष्ठा से करते हैं। वह भी तभी जबकि लड़ाई अनिवार्य ही हो जाय।

आपसी समझ और सहचरत्व के आदर्श का पालन न केवल सजातीय प्राणियों में होता है वरन् वन्य पशु अपने से भिन्न वर्ग जाति के पशुओं से भी उसी प्रकार व्यवहार करते हैं। दो अलग अलग प्रकार के प्राणी एक दूसरे से सहयोग करके एक दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं और स्वयं भी लाभ उठाते हैं। सर्व विदित है कि पक्षी भैंस या बैल की पीठ पर आ बैठते हैं। बैल भैंस उन्हें न हटाते हैं न फटकारते। ये पक्षी भैंस, बैल, गेंडे और दूसरे प्राणियों की पीठ पर बैठकर उनके शरीर से चिपके हुए कीड़े खा लेते हैं। इन पक्षियों का पेट भरता है और जिनकी पीठ पर ये बैठते हैं उन्हें कीड़ों से छुटकारा मिलता है।

इसी प्रकार मगरमच्छ और दूसरे पक्षी भी एक दूसरे से लाभ उठाते हैं। मगरमच्छ माँसाहारी जीव है। खाने के बाद उसके दाँतों में थोड़ा बहुत माँस फंसा रहता है, सड़ने के बाद यह माँस पीड़ा कर सकता है, रोग उत्पन्न कर सकता है। इस तरह की परेशानी से बचने के लिए मगरमच्छ नदी के किनारे जाकर मुँह खोले बैठ जाता है नदी के आस पास पाये जाने वाले छोटे छोटे पक्षी मगरमच्छ के मुँह में घुसकर उसके दाँतों में फंसा हुआ माँस खा जाते हैं। मगरमच्छ उस समय तो क्या बाद में भी उन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचाता है।

वन्य प्राणियों की जीवनचर्या का अध्ययन करने से इस प्रकार के कई रोचक और रोमाँचक तथ्य सामने आते हैं। इनके व्यवहार को देखकर कहीं भी यह नहीं लगता कि ना समझ कहे जाने वाले प्राणी एक दम ना समझ या मूढ़ हैं। इनकी आदतों स्वभाव और प्रकृति का अध्ययन करने के बाद तो यही लगता है कि प्रकृति ने इन्हें केवल वाणी नहीं दी और मात्र गतिशील बौद्धिक क्षमता से ही वंचित रखा है। जिससे वे अपने उद्भव काल से एक ही ढर्रे का जीवन जी रहे हैं। अन्यथा अपनी सीमा मर्यादा में रह कर, एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए जीवनयापन की भरपूर प्रेरणा और सामर्थ्य इन्हें प्रकृति से मिली है। इन मर्यादाओं को ये मनुष्य से भी अधिक अच्छी तरह निभाते हैं।

फिर मनुष्य किस कारण से सृष्टि का उन्नत और सर्वश्रेष्ठ प्राणी है? केवल एक ही कारण है कि उसमें उन्नति और विकास की वे समस्त सम्भावनायें विद्यमान हैं जिनके आधार पर वह नर से नारायण और मनुष्य से देवता हो सकता है। इन्हीं सम्भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए प्रकृति ने संभवतः उसे कुछ भी बनने और कुछ भी करने की स्वतंत्रता प्रदान की। उस स्वतंत्रता सदुपयोग किया जाय सौभाग्य तो इसी में है।


Quotation

ज्ञान आत्मा का अमूल्य जीवन रस है ज्ञान व्यक्तियों को जागृत रखता है ज्ञान-हीन जीवन रक्तहीन देह की तरह निर्बल और निष्प्राण ही होना है इसलिये शरीर को अन्न से पुष्ट रखने की तरह जीवन को ज्ञान से परिपुष्ट बनाया जाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

(मिल्टन)


सुख के आधार

मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के लिए सुख पाने की लालसा स्वाभाविक है। सुख पाने की चेष्टा प्रत्येक प्राणी करता है। यह चेष्टा ही एक ऐसी चाबी है जिससे जीवन रूपी घड़ी निरन्तर क्रियाशील रहती है। घड़ी में चाबी नहीं देने पर वह बन्द हो जाती है उसी प्रकार यदि सुख पाने की चेष्टा समाप्त हो जाय तो वह जीवित रहते हुए भी मर जाता है।

सुख का आधार व्यक्ति की मनोभूमि पर आधारित होता है। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि अमुक वस्तु के उपभोग में सुख मिलता है। सुअर के लिए गंदगी, कीचड़, दुर्गन्ध सुखदायक है, क्योंकि उसकी मनःस्थिति इसी प्रकार की है किन्तु मनुष्य के लिए वही सब दुःखदायी होती है। यही नहीं भिन्न-भिन्न मनःस्थिति के मनुष्यों में भी सुख की सामग्रियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। शराब पीने वाले व्यक्ति के लिए शराब सुख प्रदान करती है किन्तु जो इस विभीषिका से परिचित है तो इसे छूना भी पाप समझता है।

ईश्वर ने जितनी सुख सुविधाएँ मनुष्य को प्रदान की हैं अन्य किसी जीव को प्रदान नहीं कीं। मनुष्य का अन्तःकरण विवेक से परिपूर्ण है। वह इन क्षमताओं तथा उपलब्धियों का प्रयोग उसकी सृष्टि को सुन्दर सुखी तथा सम्पन्न बनाने में करें इसी हेतु उसे यह सब प्राप्त हुआ है। इसी के आधार पर मनुष्य तथा पशुओं में सीमा रेखा निर्धारित की जानी चाहिए तभी मानव जीवन की उत्कृष्टता तथा सार्थकता सिद्ध हो सकती है।

मानवोचित सुख पशुओं के सुख से कुछ भिन्न अवश्य होना चाहिए। भोग से सुख मिलता है, वह इन्द्रियों को तृप्त करता है। भोग से सुख मिलता है, वह इन्द्रियों को तृप्त करता है। यह तृप्ति क्षणिक होती है। आग में घी डालने की तरह, मरुभूमि में प्यास बुझाने की लालसा से मृगतृष्णा के भुलावे में भटकाने वाली यह इन्द्रियजन्य वासना पाशविक सुख से भी निकृष्ट एक छलावा मात्र है। जो मनुष्य को अपनी गरिमा तथा कर्तव्य से भ्रष्ट करती है। मनुष्य विवेकशील प्राणी है वह अन्तरात्मा की आवाज को सुनता है। उसको सच्चा सुख सेवा साधना में ही मिलता है। इससे बढ़कर कोई ऐसा कर्म नहीं जो मानव को अपनी गरिमा का भान कराता हो।

मेरे पास चार रोटी हैं इनसे मैं अपनी क्षुधा पूर्ति कर लेता हूँ। मेरी इन्द्रियों को क्षणिक सुख मिल जाता है किन्तु इससे मेरी भूख सदा के लिए मिट नहीं जाती। मुझसे भी अधिक भूखा कोई है और उसे उनमें से दो रोटियाँ दे देता हूँ तो मेरी आत्मा में उस भूखे की तृप्ति देखकर जो आनन्द मिलेगा वही सच्चा सुख है।

भगवान ने इसी कारण मनुष्य को सामर्थ्य इतनी अधिक दी है कि वह इतना उपार्जित कर सकता है जिस के दसवें हिस्से में उसकी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। शेष जो भाग यदि वह उस समाज के हित में लोक मंगल के लिए प्रयुक्त करे जिसका कि वह चिर ऋणी है तभी वह सुख पा सकता है। समाज का ऋण उतारने का कुछ भी प्रयास करें तो हम सच्चे अर्थों से सुखी हो भी नहीं सकते।

किसी ने ठीक ही कहा कि ईश्वर ने उपार्जन के लिए हाथ दो दिये हैं तथा उदर पोषण के लिए मुँह एक ही दिया है। इसके पीछे जो एक सिद्धाँत छिपा है वह यह है कि हम जो कुछ उपार्जन करें उसका आधा भाग स्वयं के शरीर तथा परिवार के लिए तथा शेष आधा भाग लोक मंगल के लिये प्रयुक्त करें।

त्याग परोपकार-लोक मंगल के लिए अपने स्वार्थों को त्याग कर हम किसी पर अहसान नहीं करते वरन् उस ऋण से उऋण होते हैं जो समाज का हमारे ऊपर चढ़ा हुआ है। हमारे पूर्वजों ने अपनी सेवा साधना द्वारा इस विश्व उपवन को सुसज्जित सुरभित किया है। उसी के परिणामस्वरूप हम सामर्थ्य से अधिक उपार्जन कर पाते हैं। हम इस उपार्जन को अपने आप तथा अपने परिवार तक ही सीमित करें तो न हम स्वयं सुखी हो सकेंगे न दूसरों को सुखी बना सकेंगे तथा कृतघ्नता के दोषी बनेंगे।


परिस्थितियों का निर्माण अपने हाथ

नेपोलियन कहा करता था कि, ‘असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। मेरे शब्द कोश में इसका कोई स्थान नहीं। यह बात दर्प से भरी लग सकती है। नेपोलियन को स्वयं अपनी शक्ति सामर्थ्य का अतिशय अहंकार था वह चाहे जो भी रहा हो पर उसका उपरोक्त वचन अक्षरशः सही है। यही बात डेल कार्नेगी ने जीवन जीने की कला पर व्याख्यान देते हुए कहा तो एक श्रोता ने पूछा “श्रीमन् यह कैसे हो सकता है कि इस दुनिया में असंभव कुछ न हो। बताइये तो क्या एक चलनी को पानी से भरे बर्तन में डुबोया जाय और उसे बाहर निकाला जाय तो क्या उसमें पानी ठहर सकेगा।”

बेशक, कार्नेगी ने कहा-”चलनी में पानी ठहर सकता है। यदि बरतन के पानी को जमा कर बर्फ बना लिया जाय तो।” तर्क और विचार के द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। लेकिन इस युक्ति का तथ्य भी समर्थन करते हैं यदि व्यक्ति विश्वास विचार और योजनाबद्ध ढंग से कार्य करे तो असंभव को भी संभव में बदला जा सकता है। कहने का आशय यह है कि इस आधार पर अपने लिए मन चाही परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती हैं।

यदि अपने भीतर, अपनी शक्तियों के प्रति विश्वास कूट कूट कर भरा हो तो असफलताओं के मुँह कभी नहीं देखना पड़ता। असफलताओं का मुँह तभी देखना पड़ता है जब सामर्थ्य और साधनों का विचार न करते हुए ऐसे कदम बढ़ा लिये जायें जो विचारशीलता और विवेक की दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहे जा सकते। इसके अतिरिक्त आत्मविश्वास का अभाव भी असफलता का एक कारण है। आत्मविश्वास का अर्थ अनियन्त्रित भावुकता नहीं है, वरन् यह उस दूरदर्शिता का नाम है जिसके साथ यह संकल्प और साहस भी जुड़ा रहता है। ऐसे आत्म विश्वासी जो भी काम करते हैं उसमें न तो ढील पोल होती है न उपेक्षा और न ही अनुत्तरदायित्व। इस स्तर के आत्मविश्वास को लेकर जो भी कार्य किये जाते हैं उन में पूरा मनोयोग, तन्मयता, तत्परता तथा परिश्रम समाहित रखा जाता है।

सफलता प्राप्त करने की इस नीति को अपनाकर कई व्यक्ति प्रतिकूलताओं में भी आशातीत प्रगति कर चुके हैं। ईसाई प्रचारकों में पादरी इवाइटा मूड़ी का नाम अंग्रेजी प्रचारकों में लिया जाता है। उनकी पत्नी कम पढ़ी थी पर वह चाहती थी कि मेरा पति पादरी बने। मूडी एकदम अनपढ़ थे। सो कम पढ़ी लिखी श्रीमती मूडी ने अपने अनपढ़ पति को ही थोड़ा बहुत पढ़ना लिखना सिखाया और उनमें गिरजे के प्रति धर्म प्रचार के प्रति उत्साह उत्पन्न कर देने के बाद मूडी स्वयं अभीष्ट कार्य में प्रवृत्त हुए और रुचिपूर्वक अभ्यस्त दिशा में बढ़ने लगे। अंततः पत्नी की प्रेरणा प्रयत्न और प्रोत्साहन ने मूडी को धर्म प्रचारक बना कर ही छोड़ा। और पादरी भी ऐसा जिसने ईसाई जगत में असाधारण ख्याति तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की।

अमेरिका के प्रसिद्ध राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन पोषण उनकी सौतेली माँ ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच रहते हुए उसने अपने बेटे को ऐसी प्रेरणाएँ दीं और उसके अन्तःकरण में ऐसे बीज बोये जिनके अंकुर बच्चे की समझ और शिक्षा को ही नहीं वरन् उसकी आत्मा को भी ऊँची उठाते चले गये पढ़ने और ज्ञान प्राप्त करने का उनमें ऐसा चाव उत्पन्न हुआ कि वह एक एक पुस्तक माँग कर पढ़ने के लिए मीलों पैदल चल कर जाते और पढ़ने के बाद उस पुस्तक को वापस लौटाने के लिए उसी तरह पदयात्रा करते लक्ष्य के प्रति निष्ठा तन्मयता लगन और परिश्रम के बल पर लिंकन आत्मिक प्रगति करते हुए न केवल अमेरिका के राष्ट्रपति बने बल्कि उनकी गणना विश्व के महामानवों में की जाने लगी। इस बीच उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। पर क्या मजाल जो उन्होंने मन को जरा भी छोटा किया हो। एक बार लिंकन से किसी न उनकी उन्नति का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि जन्मदात्री न होते हुए भी जिसने मेरी निर्मात्री होने का कार्य पूरा किया मैं अपनी उसी माँ के हाथों से बनाया हुआ एक खिलौना अथवा मंत्र भर हूँ।”

टामस अल्वा एडीसन, जिन्होंने अब तक हुए तमाम वैज्ञानिकों से अधिक आविष्कार किये और विज्ञान को दिये अपने अवदातों से मनुष्यता को उपकृत किया, आरंभ में अति मन्द बुद्धि के बालक थे। पढ़ने लिखने में उनका दिमाग जरा भी नहीं चलता था। स्कूल में भर्ती कराये जाने पर कुछ दिनों बाद अध्यापक ने एडीसन के हाथ अभिभावकों के नाम एक पत्र भेजा। इस पत्र में कहा गया था कि मंद बुद्धि होने के कारण यह बच्चा कदापि पढ़ नहीं सकेगा इसलिए इसे स्कूल से हटा लिया जाना चाहिए।

माता पिता ने यह पत्र पढ़ा तो उनकी आँखें भर आईं लेकिन माँ ने अपने बच्चे को दुलराया और कहा-”कोई बात नहीं बेटे,मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊँगी।” उस पत्राचार के बाद बच्चे का स्कूल जाना बन्द कर दिया गया और माँ स्वयं अपने बेटे को पढ़ाने लगी। इस शिक्षण के साथ उन्होंने अपने बच्चे में ऐसे संस्कार भी बोये जिनके परिणामस्वरूप एडीसन इतना तन्मय होना सीख गये कि उससे उनकी प्रतिभा का अवरुद्ध श्रोत फूट निकला और परिणाम सभी के सामने है। एडीसन की गणना विश्व के सर्वाधिक मूर्धन्य वैज्ञानिकों में सब से पहले की जाती है।

अस्पताल की एक नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल जिसके पास न साधन थे और न सुविधाएँ पर मन में रोगियों और दुर्घटनाग्रस्त लोगों के प्रति अपार वेदना थी। इस वेदना की रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उसने रेडक्रास सोसायटी की योजना बनाई और इस संस्था के उद्देश्य तथा स्वरूप को लेकर बड़े-बड़े लोगों के पास गई। नाइटिंगेल की हैसियत और उसके कार्य की गरिमा में इतना भारी अन्तर देखते हुए लोगों ने उन्हें यही परामर्श दिया कि इस तरह हवाई कल्पनाएँ करना व्यर्थ है। अच्छा हो आप अपनी नौकरी ठीक ढंग से करें। और उसमें अपनी भावनाओं का सन्तोष खोजें। कइयों ने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से भी निरुत्साहित किया परन्तु नाइटिंगेल हताश नहीं हुई। कहीं से भी कोई सहायता न मिलने पर भी उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम आरम्भ किया। संस्था जब धीरे-धीरे अंकुरित होकर बढ़ने और फैलने लगी तो वहीं लोग जिन्होंने नाइटिंगेल को आरम्भ में निरुत्साहित किया था सहयोग की भावना से आगे आये लक्ष्य के प्रति निष्ठा और तन्मयता का ही परिणाम है कि फ्लोरेंस नाइटिंगेल द्वारा संस्थापित रेडक्रास सोसायटी तथा उनका मिशन देश काल की सीमाओं को लाँघ कर आज विश्व भर में फैले हुए संस्थानों में से सबसे बड़ी है। सफलता या असफलता परिस्थितियों पर नहीं स्वयं अपने ऊपर निर्भर करती है। एक विद्वान का कथन है कि संकल्पवान और कार्य करने के लिए तैयार रहने वाले व्यक्ति के एक नहीं अनेक हाथ होते हैं। अपने लिए उपयोगी हो सके ऐसी नजदीक की प्रत्येक वस्तु पर वह हाथ रखता है और अपने अनुकूल वस्तुओं तथा परिस्थितियों को वह आकर्षित कर लेता है। इस शक्ति का स्रोत आत्मविश्वास और केवल आत्मविश्वास ही है। आत्मविश्वास से बढ़कर सुनिश्चित परिणाम प्रस्तुत करने वाली दूसरी वस्तु या विशेषता नहीं है। अपने ऊपर अपनी सामर्थ्य के ऊपर यदि भरोसा किया जाय तो अगणित कठिनाइयों और अभावों के रहते हुए भी व्यक्ति अपनी अंतर्निहित सामर्थ्य के बल पर किसी भी दिशा में बढ़ सकता है और किसी भी संकट या विपत्ति से जूझ सकता है।

अपने आप पर विश्वास न करने के कारण ही लोग दुर्बल और असमर्थ सिद्ध होते हैं तथा असफलता के शिकार बनते हैं अपनी क्षमता पर अपनी प्रामाणिकता पर अपनी शक्ति पर अविश्वास करने से ही उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से वंचित रहना पड़ता है। क्योंकि उस स्थिति में न आत्म बल विकसित होगा और न आत्मबल बढ़ेगा।

इस संसार में कोई भी उपलब्धि या सफलता बिना उचित मूल्य चुकाये नहीं मिलती। संसार के पराक्रमी व्यक्तियों का इतिहास वस्तुतः उनके मनोबल और आत्मविश्वास की गरिमा का ही इतिहास है। यही वह गंगोत्री है जहाँ से तन्मयता और तत्परता की शीतल शाँत शक्ति धारा निकलती है जो आगे चल कर ऐसे शक्ति प्रवाह के रूप में बदल जाती है जिसकी अभिनव सामर्थ्य मनुष्य को वंदनीय और अभिनंदनीय बनाती है।


जीवन की सार्थकता समृद्धि में नहीं है!

प्रकृति ने अपने भंडार में वे सभी वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कर रखी हैं जिनकी जीवन निर्वाह के लिये आवश्यकता है। जो वस्तु जितनी अधिक आवश्यक है, वह उतनी ही सरलता से सुलभ है। उदाहरण के लिए मनुष्य और अन्य जीवधारियों को जीने के लिए साँस लेना सबसे अधिक आवश्यक है। साँस लेने के लिए प्रकृति द्वारा वायु का सबसे बड़ा भंडार उपलब्ध है। इसके बाद संभवतः पानी की आवश्यकता सबसे ज्यादा पड़ती है तो वायु के बाद पानी सर्वाधिक सरलतापूर्वक उपलब्ध है। उसे थोड़े बहुत प्रयत्नों द्वारा हर कहीं सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। वायु तथा जल के बाद अन्न सबसे अधिक आवश्यक है उसे भी मनुष्य परिश्रमपूर्वक आवश्यक ही नहीं पर्याप्त मात्रा में उगा सकता है। धरती माता में इतनी पोषक और उर्वरा शक्ति विद्यमान है कि वह एक दाने के हजार दाने बनाकर मनुष्य को वापस लौटा देती है। उसी प्रकार वह पहनने के लिए वस्त्र, भोजन बनाने के लिए ईंधन आदि भी प्रकृति से ही प्राप्त करता है। औषधियाँ, लोहा, इमारती लकड़ी, मकान के लिए मिट्टी और मिट्टी से बनी ईंटें, पत्थर, धातु, लोहा, ताँबा, सोना आदि वस्तुएँ भी धरती माता की कृपा से ही प्राप्त हो जाती हैं। इनमें जो वस्तुएँ जितनी कम मात्रा में आवश्यक होती हैं वे उतनी ही दुर्लभता से मिलती हैं।

जीवन की सामान्य आवश्यकताएँ साधारण प्रयत्नों से पूरी हो जाती हैं। प्रकृति ने ये सारी वस्तुएँ इतनी आसानी से इसलिये उपलब्ध करा रखी हैं कि उसकी संतानों को जीवन निर्वाह में कोई कष्ट या असुविधा न हो और वह सरलतापूर्वक अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए अपना विकास कर सके। वत्सल और ममत्व से परिपूर्ण हृदय वाले माता-पिता जिस प्रकार अपने बच्चों की निर्वाह सम्बन्धी आवश्यकताएँ जुटाते हैं उन्हें इस ओर से निश्चिंत रखते हुए पढ़ने लिखने योग्य बनने और क्षमताओं को विकसित होने देने की व्यवस्था बनाते हैं प्रकृति भी बहुत कुछ ऐसी ही व्यवस्था अपनी संतान के लिए करती है। यह बात और है कि मनुष्य और अन्य प्राणियों को निर्वाह के लिए परिश्रम करना पड़ता है। परिश्रम का स्वरूप भले ही दूसरा रहता हो पर माता पिता के सान्निध्य में रहते हुए भी बच्चों को खाने पीने तथा पहनने ओढ़ने के लिए थोड़ा बहुत प्रयास तो करना ही पड़ता है।

प्रकृति ने जिस उद्देश्य से मनुष्य के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध करने की व्यवस्था जुटाई है, वह है मनुष्य का नैतिक, बौद्धिक और आत्मिक स्तर का विकास, उन्नयन तथा उच्च स्थिति में आरोहण। लेकिन आज कल आमतौर पर यही समझा जाता है कि आत्यंतिक समृद्धि ही सर्वतोमुखी उन्नति और शाँति का मूल आधार है। उस आधार पर ही व्यक्ति और समाज की आँतरिक स्थिति तथा बाह्य व्यवस्था स्थिर प्रगतिशील और उन्नति बनाती है।

समृद्धि बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना कोई बुरी बात नहीं है। एक प्रकार से वह मनुष्य की श्रमशीलता का पुरस्कार है। लेकिन समृद्धि के प्रति आत्यंतिक आग्रह मनुष्य को अपने स्वभाव से ही विचलित कर देता है। इस दृष्टि से समृद्धि के प्रति एकाँगी आग्रह मनुष्य को व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से पतन की ओर धकेलता है इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए प्रसिद्ध विचारक ई॰एफ॰ शूमाकर ने लिखा है आत्यंतिक समृद्धि से सर्वतोमुखी की धारणा मनुष्य को दो प्रकार से क्षति पहुँचाती है। पहला तो यह कि इस धारणा ने शाँति को और प्रगति के लिए त्याग अथवा शाँति को अनावश्यक घोषित कर दिया है और दूसरा यह कि जिस विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हमने आज कर लिया है उस के कारण असमानता और शोषण की परंपरा बलवती होती जा रही है।

तथ्यों के संदर्भ में शूमाकर के इस प्रतिपादन को देखते हैं तो इसमें रत्ती भर भी अतिरंजना नहीं दिखाई देती है। एक बार किसी वस्तु विषय या लक्ष्य की उपयोगिता समझ ली जाय, भले ही वह अनुचित हो तो भी मनुष्य पूरी लगन और निष्ठा के साथ उसे प्राप्त करने में लग जाता है। समृद्धि को सबसे मूल्यवान समझ लेने पर भी यही होता है। उसके लिये ललक उत्पन्न होने पर नैतिक मूल्य समृद्धि के मार्ग में रुकावट लगने लगती है। उदाहरण के लिए ईमानदारी से मेहनत करने पर लग सकता है कि उसके सत्परिणाम विलम्ब से मिलेंगे। जल्दी लाभ उठाने या अधिक मुनाफा कमाने के लिए मनुष्य बेईमानी से लेकर अन्य तरह के अनैतिक उपाय अपनाता है।

उपार्जन में अनीति का उपयोग किया जाता है तो स्वाभाविक है कि अर्जित धन भी इसी तरह की अमंगलकारी दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ाता है। परिश्रम, ईमानदारी और नीतिपूर्वक कमाई गई संपत्ति को अनुचित ढंग से अपव्यय करने का साहस नहीं होता लेकिन जिस सम्पत्ति को कमाने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी, या जो मेहनत से अधिक प्राप्त हो गई हैं उसका दुरुपयोग हो सकेगा इस की कम ही संभावना रहती है। उससे दूसरे लोगों को अपने लाभ के लिए खरीदना या उनके नैतिक मूल्यों का सौदा करना व्यभिचार, नशेबाजी, महंगे शौक दुर्व्यसन, विलासिता आदि कई प्रकार की अनय प्रवृत्तियाँ अपनाई जाने लगती हैं। जिनके पास इस तरह के साधन होते हैं वे तो बड़े मजे से यह भले बुरे काम कर लेते हैं, लेकिन जिनके पास इस तरह की साधन सुविधाएँ नहीं होतीं वे भी सम्पन्न व्यक्तियों की देखा देखी उनकी तरह नकल करना चाहते हैं। इस योग्य स्थिति तो होती नहीं परन्तु अपने से ऊँची आर्थिक स्थिति के लोगों जैसे रहने की ललक उन्हें और भी जोर से अनीति के मार्ग पर धकेलती है। इस प्रकार समृद्धि को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य या जीवन दर्शन बना लेना व्यक्ति में गिरावट तथा समाज में अव्यवस्था ही पनपाता है।

इस तथ्य की ओर इंगित करते हुए शूमाकर ने अपनी पुस्तक ‘स्माल’ इजव्यूर्रा में लिखा है, आधुनिक व्यवस्था लोभ की प्रबल वासना से संचारित है तथा ईर्ष्या से ओत प्रोत है। स्वाभाविक ही समृद्धि और केवल समृद्धि को ही एकमात्र जीवन लक्ष्य मान लेना तो लोभ की प्रवृत्ति को ही पनपाता है। अब यह तो सम्भव नहीं है कि सभी लोग समान रूप से साधन सम्पन्न हो जायें या समृद्ध हों। विज्ञान की कृपा से अनेकानेक यंत्र निर्मित हुए हैं जो थोड़े समय में प्रचुर उत्पादन करते हैं। सौ आदमियों का काम संभालने वाली एक मशीन बाकी निन्यानवे व्यक्तियों को बेकार बनाती और उन निन्यानवे व्यक्तियों को बेकार बनाती और उन निन्यानवे व्यक्तियों द्वारा संभावित उपार्जन भी एक मालिक के पास चला जाता है।

मशीनों और यंत्रों से थोड़े समय में अधिक उत्पादन होता है यह ठीक है पर यह भी सही है कि अधिक व्यक्तियों द्वारा हो सकने वाला उपार्जन थोड़े व्यक्तियों के पास चला जाता है। परिणाम यह होता है कि कुछ लोग जा मालदार और धन सम्पन्न होते हैं, मशीनें लगा सकते हैं, उद्योग धन्धे और कल कारखाने खोल सकते हैं, दिनों दिन और अधिक सम्पन्न होते जाते हैं तथा जिनके पास थोड़े साधन होते हैं, वे और साधन हीन, निर्धन होते जाते हैं। यह व्यवस्था विषमता की खाई को ही बढ़ाती है।

यह भी स्वाभाविक ही होगा कि जो लोग निर्धन और साधनहीन होते जाते हैं, उन्हें धनवानों और साधन संपन्नों से ईर्ष्या होगी। परिणामस्वरूप समाज में कलह का वातावरण बनता है। समृद्धि को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मान लेना अन्ततः अनीति, अमंगल, अव्यवस्था और कलह को ही जन्म देना है। इसलिए आवश्यक है कि साधन वृद्धि की आवश्यकता को एक निश्चित स्तर तक ही सीमित रखा जाय। महात्मा गाँधी ने भी औद्योगीकरण और यंत्रीकरण को उतना ही आवश्यक माना था जितने से कि मनुष्य का जीवन और सरल बने। यंत्रीकरण बुरा भी नहीं है, बुरा उस स्थिति में है जब समृद्धि ही जीवन दर्शन बन जाय। साधन सुविधायें भले ही बढ़ाई जाय पर उन का उपयोग वैभव विलास, बड़प्पन की धाक जमाने और दूसरों को छोटा सिद्ध करने के लिए नहीं किया जाय। इस तथ्य और सत्य को पूरी तरह स्वीकार तथा अंगीकार किया जाना चाहिए कि जीवन साधनों के लिए नहीं है बल्कि साधन सुविधाएँ जीवन के लिए हैं। जीवन सर्वोच्च और सर्वाधिक मूल्यवान है तथा उसकी सार्थकता आत्मिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास एवं ऊपर उठाने में ही है। इसलिए आदर्शों और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ही किसी क्षेत्र विशेष में प्रवेश और प्रगति के प्रयास करने चाहिए।


तेज और तेज नहीं-थोड़ा धीरे भी

आधुनिक युग में बढ़ते हुए मानसिक तनावजन्य रोगों का एक कारण यह भी है कि आज का जीवन बहुत तीव्र गति से दौड़ना चाहता है। शहरों में लोग अपने को इस तरह व्यस्त पाते हैं कि उन्हें पड़ौसी तो दूर, परिवार के साथ मिलने बैठने, बोलने बतियाने और हँसने हँसाने का भी अवकाश नहीं मिलता। इसके साथ ही विडम्बना यह कि चलने फिरने से लेकर जीवन में आगे बढ़ने तक तेज और तेज की नीति अपनाई जा रही है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को विश्राम करने की भी नहीं सूझती। विश्राम के लिए बैठते या सोते भी हैं तो उसमें भी दिमाग दौड़ता रहता है।

व्यस्त रहना या तीव्र गति से विकास की आकाँक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं है। समय के एक एक क्षण की स्फूर्ति के साथ उपयोग करना एक सद्गुण है। लेकिन उसके साथ विश्राम और शान्तचित्तता भी एक अनिवार्य आवश्यकता है। इन दोनों को यदि संतुलित ढंग से जीवन में समाविष्ट नहीं किया गया तो स्थिति एक कमजोर या टूटे पंख वाले पक्षी की भाँति हो जायेगी। तेज और तेज भागो की नीति स्वास्थ्य के लिए हानि पहुँचाए बिना नहीं रहती। एक प्रसिद्ध मनःशास्त्री के अनुसार मनुष्य अपने स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाये बिना हमेशा भागते नहीं रह सकता। इसके कारण उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव से उच्च रक्तचाप, पेट के फोड़े (अल्सर) जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं यदि बराबर तेज रफ्तार से शरीर को चलायेंगे तो अधिक टूट फूट होगी-ठीक वैसे ही, जैसे मोटर कार का इंजिन कार को यदि तीव्र गति से हमेशा चलाया जाता रहे तो कभी एकाएक दुर्घटना घट सकती है। इसी प्रकार हड़बड़ी और हायतौबा से भरी हुई जिंदगी भी किसी भी समय दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है।

कारण कि जब शरीर में निहित क्षमता का निरन्तर व्यय किया जाता रहेगा, विश्राम या शाँति चित्तता द्वारा अर्जन और व्यय का संतुलन नहीं रखा जायेगा तो अंततः शक्ति चुकती जायेगी और एक स्थिति ऐसी आयेगी जब जीवन नीरस, अशक्त, क्षीण और दुर्बल हो जायेगा। अर्जन और व्यय में संतुलन न होना भी मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण है, यह कहा जा चुका है कि मानसिक तनाव सम्बन्धी समस्याओं पर वर्षों से अनुसन्धान कर रहे रूसी चिकित्सक इवान सेम्योनोविक खोसले ने आधुनिक सभ्य समाज के लोगों को एक नौका दौड़ प्रतियोगिता में भाग ले रहे नाविकों की संज्ञा दी है, जो पूरी ताकत से नाव खे रहे हैं, तेज और तेज। नाव निश्चित ही आगे बढ़ रही है, पर नाविकों की शक्ति निचुड़ती जा रही है और कइयों की निचुड़ चुकी है।

यही हाल मानसिक रूप से खींचे तने और शारीरिक रूप से थक जाने के बाद भी हड़बड़ा कर चलने वाले लोगों की है। थक जाने के कारण माँसपेशियों के अतिरिक्त खिंचवा में ऊर्जा खर्च होती है। यह ऊर्जा माँसपेशियों में रहने वाले ‘ग्लूकोनेट’ से मिलती है। यह तत्व माँसपेशियों की क्रियाशीलता के समय आक्सीजन के साथ संयोग करता है और लैफ्टिक एसिड तथा कार्बनडाइ आक्साइड गैसें बनाता है। इसलिए शारीरिक श्रम में अधिक आक्सीजन खर्च होती है, जिसके लिए तेज साँस लेना जरूरी हो जाता है। तेज गति से श्वास प्रश्वास लेने पर कार्बनडाइ आक्साइड तो साँस द्वारा बाहर चली जाती है, किन्तु लैफ्टिक एसिड को ग्लूकोनेट में बदलने के लिए आक्सीजन भी उतनी ही मात्रा में चाहिए जो नहीं मिल पाती, मिलती भी है तो परिवर्तन की प्रक्रिया उस गति से चल नहीं पाती। परिणामतः तनाव उत्पन्न होने लगता है।

इस प्रकार तनावों को एक तरह से हम स्वयं ही आमन्त्रित करते हैं। डा॰ खोराले ने आमंत्रित तनावों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है। पहला अनावश्यक आवेगमयता, व्यर्थ की हड़बड़ी और अत्यधिक भाग दौड़ दूसरा प्रकार है अपेक्षाओं और वास्तविक जीवन में अंतर होने के कारण उत्पन्न होने वाले क्षोभ का तनाव। तीसरे किस्म के तनाव उपभोगों की दौड़ में पिछड़े होने की चिन्ता।

पहले प्रकार के तनाव के सम्बन्ध में डा॰ खोरोल का कहना है कि आवेगमयता चाहे प्रसन्न मनःस्थिति में हो अथवा क्षुब्ध स्थिति में समान रूप से तनाव उत्पन्न करती है। उदाहरण देते डा॰ उस खोरोल ने कहा है कि डर कर भागने में हो या वासनात्मक आवेग से लिया चुँबन हो दोनों ही स्थिति में बराबर तनाव पैदा होता है। इस तनाव से बचने का वैज्ञानिकों की दृष्टि में कोई ठोस उपाय तो नहीं है, पर इतना तो स्पष्ट है कि आवेश और असंयम के स्थान पर विवेक तथा संयम का दैनिक जीवन में समावेश किया जाय तो इस प्रकार के तनावों से बड़ी सुरक्षा हो सकती है।

दूसरे प्रकार के तनाव जो कल्पनाओं, अपेक्षाओं और वास्तविक स्थिति में सामंजस्य न होने के कारण उत्पन्न होते हैं, को कम करने के लिए डा॰ हससेल्ये और खोरोल ने दो उपाय बताये हैं। पहला यह कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने के लिए संघर्ष किया जाय और वही कुछ प्रदर्शित किया जाय, उसे स्वीकार करने की मनःस्थिति बनाई जाय जो वास्तविक है। प्रायः हमारा जीवन कृत्रिमता, दंभ, छल शेखी जैसे बड़प्पन के प्रदर्शनों में लगता है। वास्तविक स्थिति को ढाँपने के लिए यथार्थ और कल्पना अथवा व्यक्तिगत आदर्शों में एक गहरा द्वन्द्व छिड़ता है। जिसकी न कोई सार्थकता है और न उपयोगिता। इस द्वन्द्व में अपनी शक्ति वैसे ही खर्च होती है जैसे अपने दोनों ही हाथों को आपस में लड़ाने अपने ही पंजे भिड़ाने में खर्च होती है। उचित यही है कि छद्म जीवन और कृत्रिमता के आडंबरों से मुक्त होकर ही सहज सरल जीवन क्रम अपनाया जाय।

डा॰ खोरोल का मत है कि मानव जीवन के अधिकाँश तनाव ईर्ष्याजन्य होते हैं। वह ईर्ष्या भले ही व्यक्तियों से हो अथवा परिस्थितियों से उदाहरण के लिए अभावग्रस्तता की कल्पना करके कितने ही लोग दुखी और उद्विग्न रहते हैं। अपने इस कथित अभावों से हर व्यक्ति आकुल और अशाँत रहता है। पड़ौसी के पास उपभोग के साधनों की अधिकता से पता नहीं कितनों का खाना, सोना हराम हो जाता है। ये तनाव जितने भयंकर और जटिल हैं उतना ही सहज और सरल इनका समाधान भी है। वह है मात्र दृष्टिकोण का परिवर्तन, विचार शैली को बदल देना। औरों की तुलना में अपने अभावों का स्मरण आते ही यदि अपने से भी अधिक अभावग्रस्तों की ओर ध्यान ले जाया जाये तो बदली स्थिति में अपने को प्राप्त वैभव बहुत अधिक तथा अभाव बहुत कम प्रतीत होंगे।

अपनी अभावग्रस्तता का रोना पीटते हुए प्रस्तुत समस्याओं और अभावों का निराकरण करने के लिए उचित प्रयास किये जायें यही एकमात्र उपाय है जिसे अपनाकर विपन्नता में बदला जा सकता है। ऐसी स्थिति में भी ऊर्जा का क्षय होता है परन्तु वह क्षय तनाव के कारण होने वाले क्षय से बहुत कम और पर्याप्त उपयोगी सिद्ध होता है। शरीर की दृष्टि से साधारण मनुष्यों के समान होते हुए भी संघर्षों के प्रबल थपेड़ों को सहकर, प्रतिकूलताओं के झंझावात में उलझते हुए कितने ही महामानव प्रसन्न और प्रफुल्ल चित्त रहे हैं। इसका कारण बताते हुए डा॰ इवान पावलोव ने कहा है, “लक्ष्य के प्रति निष्ठा किसी व्यक्ति की स्फूर्ति और प्रफुल्लता का सबसे बड़ा साधन है।”

कारण वही है कि वे अपने शक्ति भण्डार का पूरा पूरा उपयोग करते हुए भी हड़बड़ाहट या जल्दबाजी की आग में उसे अनावश्यक रूप से फूँकते जलाते नहीं हैं। स्मरण रखना चाहिए कि उतावली और हड़बड़ी में कोई काम जल्दी या ठीक प्रकार से सम्पन्न नहीं होता। तीव्र गति से भागने पर कहीं जल्दी तो पहुँचा जा सकता है पर उससे होने वाली थकान उतरने में उतना ही समय लग जाता है जितना कि स्वाभाविक चाल से चलने पर लगता। स्वाभाविक गति से चलने पर थकान से बचाव तो होता और अनेकों लाभ भी उठाये जा सकते हैं। अतः तनाव से बचने का सरल सा उपाय है सहज सरल और स्वाभाविक जीवन का लक्ष्य निस्संदेह उच्च रखा जाय पर उस ओर बढ़ने में अपनी सामर्थ्य क्षमता का भी ध्यान रखा जाय। उसके बाहर अतिवादिता की गई तो थकान तो निश्चित है ही, यह भी सम्भव है कि बीच में लड़खड़ाहट या दुर्घटना न घट जाय।


रोगों की जड़ शरीर में नहीं मन में

शरीर और मन का सम्बन्ध शासित और शासक का सा है। शरीर शासित है तो मन शासक। शरीर वही कुछ करता है जिसका निर्देश उसका शासक मन संस्थान देता है। ऐसा कोई शारीरिक क्रियाकलाप नहीं जो मन की इच्छा के विपरीत सम्पन्न होता हो। दीखने में भले ही लगे कि शरीर उस ढंग से स्वस्थ नहीं रह पाता जैसा कि हमारा मन चाहता है। पर मन के जिस भाग से हमारा परिचय होता है वह बुद्धि विचार तक ही सीमित है, जब कि मन का एक छोटा सा विभाग है। संपूर्ण मन संस्थान यदि चाहे तो शरीर को रोगी होने का कोई कारण नहीं है। वैसे मन से कोई नहीं चाहता कि बीमार हुआ जाय, पर उसकी अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था और अस्थिरता ऐसे कई कारण उत्पन्न कर देती हैं जिनसे शरीर को रोगाक्रांत होना पड़ता है। ढीली ढाली और लचर शासन व्यवस्था में जिस प्रकार अराजकता अव्यवस्था और अन्यान्य अस्त व्यस्तताएँ उत्पन्न होती हैं उसी प्रकार बिगड़ी हुई मनःस्थिति स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करती है।

मन का एक भाग जिसे विज्ञान की भाषा में मस्तिष्क भी कहा जाता है शरीर की स्वसंचालित प्रक्रियाओं को सम्पन्न करता है। रक्त संचार; श्वास प्रश्वास, आकुँचन, प्रकुँचन, निद्रा, स्पन्दन, मल विसर्जन आदि क्रियाकलापों पर मन के इसी भाग का नियंत्रण होता है। दूसरे सचेतन भाग द्वारा विभिन्न प्रकार के जीवन व्यवहार सम्पन्न होते हैं और वह दसों इन्द्रियों के अंग प्रत्यंगों के क्रिया व्यापार का नियमन करती है। इस प्रकार मन को शरीर राज्य का अधिपति कहा जा सकता है।

समाज व्यवस्था में उत्पन्न होने वाली गड़बड़ियों को भले ही पूरी तरह शासन सत्ता को उत्तरदायी न ठहराया जा सके। क्योंकि समाज में ऐसे तत्वों का अस्तित्व भी रहता है जो शासन सत्ता को चुनौती देते हैं और उसकी व्यवस्था में रुकावट डालते हैं। पर शरीर के सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं है। वह निर्विवाद रूप से मन की इच्छा कहना चाहिए यह ऐसा राज्य है जिस पर मन का एकछत्र और निर्द्वन्द्व शासन है। इस तथ्य को जानने के बाद यह मानने से इन्कार करने का कोई कारण नहीं है कि मन को असंतुलित करने का अर्थ न केवल शोक संतापों में डूबना और असंतोष उद्वेग की आग में जलना है वरन् अच्छे भले शरीर को भी रोगी बना डालना है। विज्ञान भी इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि रोगों का कारण शरीर में नहीं मन में है। वहीं से सारे रोग जन्म लेते हैं और शरीर को विभिन्न रूपों में खोखला बनाते हैं।

अमेरिका के मानसिक रोग विज्ञानी राबर्ट डी राय ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद यह प्रतिपादन किया कि असाध्य समझे जाने वाले अधिकाँश रोगों का कारण मनुष्य मन में विद्यमान रहने वाली दुश्चिंताएँ, कुँठाएँ, उलझनें, ग्रंथियाँ और चिंतन की विकृतियाँ हैं। अरब देश में कुछ शताब्दियों पूर्व एक विख्यात चिकित्सक हुआ है हकीम इब्नसीना। उसने अपनी पुस्तक कानून में ऐसे अनेक अनुभवों का उल्लेख किया है कि अमुक प्रकार के मानसिक उभारों के कारण शरीर में अमुक प्रकार की विकृतियाँ अथवा बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। चिकित्सा उपचार में इब्नसीना ने दवादारू के स्थान पर रोगी की मनःस्थिति बदलने के उपाय किये और उससे असाध्य लगने वाले रोग भी आसानी से अच्छे हो गये।

जटिल से जटिल रोग जो मानसिक कारणों से उत्पन्न होते ही हैं। साधारण रोगों की जड़ में भी यही मानसिक विकृतियाँ बैठी रहती हैं। कनाडा के एक शरीर शास्त्री और मनोविज्ञानी डा॰ डानियल कापोन के अनुसार तमाम उपचारों के बाद भी काबू में न आने वाला साधारण सा रोग जुकाम केवल मानसिक कारणों से ही उत्पन्न होता है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार जुकाम के भी विषाणु होते हैं,पर उनकी प्रकृति अन्य सजातियों से सर्वथा भिन्न होती हैं। चेचक, पोलियो आदि रोगों का आक्रमण एक बार होने पर शरीर में उस रोग से लड़ने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। फलतः इन रोगों के दुबारा आक्रमण का खतरा नहीं रहता लेकिन जुकाम के बारे में यह बात लागू नहीं होती वह कई बार आता है और लगातार बना रहता है। जिस दवा से एक बार अच्छा हो जाता है दुबारा उससे अच्छा नहीं होता। सही बात तो यह है कि दवाओं से वह ठीक ही नहीं होता। मन बहलाने के लिए चाहे जो दवायें ली जाती रहें लेकिन वास्तव में जुकाम की कोई दवा नहीं होती।

इसका कारण बताते हुए डा॰ डानियल कापोन का मत है कि जुकाम इतना शारीरिक रोग नहीं है। जितना कि मानसिक। जब मनुष्य थक हार कर निहाल हो जाता है उसे अपनी असफलताएँ निकट दिखाई देने लगती हैं तो मन उस लाँछन से बचने के लिए वह जुकाम बना लेता है ताकि दूसरे उसकी हार का दोष इस आपत्ति के सिर मढ़ते हुए उसे निर्दोष ठहरा सकें। डा॰ कापोन का मानना है कि यह रोग वस्तुतः ठहरा सके। डा॰ कापोन का मानना है कि यह रोग वस्तुतः अनार्मन का अनुदान है जो व्यक्ति को थोड़ा सा शारीरिक कष्ट देकर उसे असफलता के लाँछन से बचाता है। ऐसी स्थिति में रोगी बहुत हद तक पराजय की आत्म प्रताड़ना से बच जाता है। जुकाम की दैवी विपत्ति टूट पड़ने से वह हारा या असफल हुआ। इसकी योग्यता हिम्मत एवं चेष्टा में कहीं कोई कमी नहीं थी। यह मान लेने पर मनुष्य को साँत्वना की एक हलकी थपकी मिल जाती है। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए अंतःचेतना जुकाम का ताना बाना बुनती है।

इस प्रतिपादन की पुष्टि में कोपोन ने अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये। उदाहरण के लिए उन्होंने कहा खिलाड़ी लोग प्रतियोगिता के दिनों में, विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में, प्रत्याशी चुनाव तिथि पर अक्सर जुकाम से पीड़ित होते हैं इन में अधिकाँश ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी सफलता पर सन्देह होता है और हार की कल्पित विभीषिका उनकी मनश्चेतना को जुकाम निमंत्रित करने के लिए विवश करती है। हालाँकि जुकाम के विषाणु होते हैं। ऐसी बात नहीं है कि वे होते ही नहीं, उनका अस्तित्व होता है। पर शरीर में जिस प्रकार अन्य रोगों को लड़ भगाने की प्रतिरोधी क्षमता होती है उसी प्रकार जुकाम के रोगाणुओं को मार काट देने की क्षमता रहती है। दूसरे जुकाम के विषाणु इतने कमजोर होते हैं कि वे अन्य रोगों के समान मनुष्य के लिए कष्टकारक नहीं होते। चूहे, बन्दर आदि के शरीर में जुकाम के विषाणु प्रविष्ट कराये गये किन्तु उनके शरीर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

यह मानना भी गलत है कि सर्दी के कारण जुकाम होता है। ध्रुव प्रदेशों में कड़ाके की ठिठुरा और जमा देने वाली शीत पड़ती है। फिर भी वहाँ निवास करने वाले एस्किमो लोग अपनी सारी उमर उसी शीत में गुजार लेते हैं पर उन्हें कभी जुकाम नहीं होता। उस क्षेत्र में अन्वेषण के लिए जाने वाले खोजी दलों का भी यह कथन है कि जब तक वे ध्रुव प्रदेश में रहे तब तक उन्हें जुकाम नहीं हुआ। इस विषय में किये गये शोध अन्वेषणों का निष्कर्ष यह है कि जुकाम का प्रकोप शीत ऋतु की अपेक्षा गर्मी के दिनों में अधिक होता है। इस सामान्य से रोग का उपचार करने के लिए कितनी ही औषधियाँ, चिकित्सा फार्मूले खोजे गये पर वे सभी असफल रहे। इसका मात्र एक ही कारण है कि जुकाम दीखने भर में शारीरिक रोग लगता है पर वस्तुतः यह है मनोरोग।

यही बात अन्यान्य रोगों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। उनकी प्रतिक्रिया लक्षण शरीर पर भले ही दिखाई दें लेकिन उनकी जड़ मनुष्य के मन में होती है। वृक्ष की जड़ें जिस प्रकार जमीन के भीतर होती हैं और उसका तना, शाखायें, पत्ते, फूल, फल और शिखर आकाश में होते हैं।

इसी प्रकार रोगों का स्वरूप, उत्पात, प्रतिक्रिया शरीर के तल पर दिखाई देते हैं लेकिन उन का मूल मन में होता है। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए महर्षियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा है प्रज्ञापराधों रोगस्य मूल कारणम्, अर्थात् प्रज्ञापराध मानसिक अस्त-व्यस्त असन्तुलित मनःस्थिति, चिंता क्षोभ और अन्यान्य मानसिक विकृतियाँ समस्त रोगों का मूल कारण हैं। यदि अपनी मानसिक स्थिति को सम्हाला जाय उसे शाँत संतुलित बनाया जाय तो शरीर को पूर्ण स्वस्थ निरोग और पुष्ट रखा जा सकता है।


प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में परिजनों से अपेक्षाएँ

सूर्य और चन्द्रमा की तरह दसों दिशाओं में प्रकीर्ण होने व्यापक क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व करने की क्षमता हर व्यक्ति में नहीं विरले महापुरुषों में ही होती है। पू॰ गुरुदेव को जिसने जिस दृष्टि से देखा वैसा ही पाया उसमें सम्भव है किसी की श्रद्धा भी कार्य करती हो, पर तथ्य यह है कि उन्होंने मानवीय क्षेत्र के प्रत्येक मर्म का स्पर्श किया और उसकी पूर्णता तक पहुँचने की सिद्धि प्राप्त की।

यों वे साधना के क्षेत्र में सर्वाधिक समर्थ माने जाते हैं किन्तु जीवन प्रवाह सहस्र क्षेत्रों में प्रवाहित हुआ है। लोक सेवक, समाज सुधारक, पुरोहित साहित्यकार, सद्गृहस्थ, कथाकार, प्रभावशाली वक्ता, प्रखर विचारक दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिवेत्ता, व्यावहारिक अर्थशास्त्री आदि अनेक-अनेक विधाओं में उनका व्यक्तित्व गुँथा हुआ है। स्पष्ट है कि उनसे सम्बन्धित परिजनों ने उन्हें अपनी-अपनी तरह से देखा होगा।

जबलपुर राजकीय विज्ञान महाविद्यालय के प्रोफेसर डा॰ लोकेश इन दिनों शान्ति कुँज रहकर उन पर शोध कर रहे हैं उन्होंने भी उन सभी विधाओं का समावेश अपने शोध कार्य में रखा है। इन दिनों उन्हें बहुत ही अमूल्य सामग्री उपलब्ध हो रही है फिर भी अनेक परिजन यह पूछते रहते हैं कि वे पू॰ गुरुदेव के सम्बन्ध में क्या जानकारी दें। नीचे उनके शोध प्रबन्ध की वह सभी धारायें दी जा रही हैं जिन पर परिजन अपने विचार, संस्मरण घटनाएँ, साक्ष्य, पत्र व्यवहार प्रेरणायें और प्राप्त मार्ग दर्शन, अनुभूतियों, उपलब्धियों की जानकारी भेज सकते हैं

-: आचार्य श्रीराम शर्मा व्यक्तित्व एवं कृतित्व :-

-: प्रस्तावित शोध की आवश्यकता एवं उपादेयता :-

महर्षि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी मूलतः मनीषी हैं जिन्होंने अपने चिन्तन को अपने जीवन में उतारा और वृहत्तर समाज में विकीर्ण किया। उनके लिखे की लीक पीटने वाले आलोचक भले ही विशुद्ध साहित्य के अंतर्गत न रख सकें किन्तु उनके विचारों जीवन क्रम और कृतित्व ने समाज को इतना अधिक प्रभावित किया है कि विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त गम्भीर चिन्तन के रूप में उनके लघु वृहत् गद्य खण्ड साहित्यलोचकों की दृष्टि से अछूते नहीं रह सकेंगे। अभिव्यक्ति की शैली के रूप में महर्षि की निर्भीकता, स्वामी की तेजस्विता और महात्मा की सहज सरलता आलोचकों की खरी कसौटी पर अपनी स्वर्णिम आभा अंकित करती है

इसी परम्परा में आचार्य श्रीराम शर्मा का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने विगत पचास वर्षों में, उत्तर भारत की चिन्तन धारा, जीवन पद्धति और कर्मशीलता को आमूल प्रभावित किया है, धीरे धीरे उनका प्रभाव देश के शेष भागों एवं विदेशों में भी परिलक्षित होने लगा है, उनकी लेखनी ने भारतीय धार्मिक एवं साँस्कृतिक ग्रन्थों की सरल टीकायें प्रस्तुत की हैं, प्रचलित चिन्तन पद्धतियों का गम्भीर मनन कर के उनका समन्वित निचोड़, धर्म प्राण जनता एवं सुधि-बुद्धि जीवियों के लिए सुलभ किया है।

पाश्चात्य की विचारधाराओं का अध्ययन करके उनके जीवन पोषी तत्वों को स्वीकारा है तथा उनके ऐसे अंशों को जो अपनी साँस्कृतिक परम्परा से मेल नहीं खाते निर्ममतापूर्वक खण्डन किया है।

आज के जीवन की विभीषिकाओं से त्रस्त मानव समाज की आचार्य जी ने आत्मिक एवं आध्यात्मिक समाधान का अमृत प्रदान किया है। ऐसा जान पड़ता है कि आचार्य जी में कबीर का फक्कड़पन और तुलसी की समन्वय साधना समान मात्रा में विद्यमान है इसीलिए वे सड़ी-गली मान्यताओं को निर्मम भाव से तोड़ते चलते समय निर्माण का राम राज्यीय सपना भी देते चलते हैं। इस दृष्टि से महात्मा गाँधी का अधूरा काम आचार्य जी का युग साधना से पूर्ण होने जा रहा है।

दृष्टव्य है कि अपने पाश्चात्य शिष्यों को योग, हठ योग के चमत्कारिक प्रयोगों द्वारा आकृष्ट करने में लगे वैभव सम्पन्न योगियों, भगवानों से भिन्न आचार्य जी ने कबीर की वाणी में सहज समाधि का उपदेश दिया है। सामान्य जीवन क्रम का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए जीवन मुक्ति की साधना का मार्ग आचार्य जी के द्वारा प्रशस्त किया जा रहा है ‘साधों सहज समाधि भली।’

हरिद्वार के एकान्त भागीरथी के पावन अंचल में बैठकर आचार्य प्रवर प्राचीन ऋषियों की भाँति अपने आश्रम में नये युग के निर्माण के लिए भविष्य दृष्टा के रूप में कार्यरत हैं। उनकी वाणी का ओज देश देशान्तर में फैला हुआ है जो भव ताप तापितों को शान्ति प्रदान करता है। आवश्यकता इस बात की है कि आचार्य जी की मनीषा को जन सुलभ बनाने में सबका सम्यक योगदान हो। प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध इस दिशा में एक विनम्र प्रयास है।

आधुनिक साहित्य में प्रसूत विचार प्रधान साहित्य के निर्माताओं से आचार्य जी के साहित्य में वह और विशेषता है कि वे उसे जीवनानुभूति के रूप में व्यक्त करते हैं। उनकी लेखनी मात्र बुद्धि की तुष्ट नहीं करती वरन् हृदय से आत्मा तक यात्रा करती है।

आचार्य जी के इस योगदान का मूल्याँकन स्फुट रूप से ही तो होता रहा है। किन्तु शोध के स्तर पर उसका विवेचन अभी नहीं हुआ। पाँच सौ के लगभग छोटे-बड़े ग्रन्थों के लेखक, सम्पादक और भाष्यकार के रूप में उनकी सर्जना का व्यापक फलक विचारकों के विवेचन के लिए प्रभूत सामग्री प्रस्तुत करता है। प्रस्तावित शोध से राष्ट्रीय विचार आन्दोलन के इतिहास तथा हिन्दी में ललित साहित्येत्तर विचार प्रधान साहित्य के विकास पर गम्भीर प्रकाश पड़ सकेगा। इसी दृष्टि से प्रस्तुत विषय शोध हेतु चुना गया है।

आचार्य जी की लेखनी ने हिन्दी साहित्य के विविध आयामों को चिर प्रतीक्षित समृद्धि दी है। फलतः वे साहित्यकार तो हैं ही साथ ही वे अनन्य साधक एवं अखण्ड-ज्योति के लेखक हैं।

स्वतंत्रता संग्राम सैनानी, राष्ट्र पुरुष आचार्य जी ने गाँधीवादी दर्शन से अनुप्राणित होकर अपनी मौलिक एवं अनुदित रचनाओं तथा सम्पादकीय विचारों एवं टिप्पणियों के द्वारा एक नई सूझ बूझ एवं गम्भीर चिन्तन मनन का परिचय दिया है। उनकी कृतियाँ चाहे वे रामचरित मानस से प्रगतिशील प्रेरणा की हों या भारतीय संस्कृति का विश्व की “अजस्र अनुदान” वैचारिक क्रान्ति की दृष्टि से अपना अलग अलग महत्वपूर्ण एवं स्थान रखती हैं।

आचार्य श्रीराम शर्मा-व्यक्तित्व एवं कृतित्व।

प्रस्तावना :- प्रस्तावित शोध की आवश्यकता और उपादेयता।

अध्याय-1 आचार्य श्रीराम शर्मा : जीवन एवं व्यक्तित्व

(1) जन्म एवं परिवार (2) शिक्षा दीक्षा (3) आध्यात्मिक परिवेश (4) स्वातंत्र्य चेतना एवं स्वतंत्रता संग्राम में योगदान (5) समकालीन संत विचारकों से परिचय (6) युग निर्माण योजना और संगठन चेतना (7) साहित्यिक चेतना (8) दार्शनिक चेतना (9) सामाजिक और साहित्यिक अवदान (10) आचार्य शर्मा : एक संस्था एक मिशन।

अध्याय 2- आधुनिक विचार शोध और आचार्य श्रीराम शर्मा।

अध्याय 3- आचार्य शर्मा की सर्जना-प्रेरणा-

(1) महात्मा गाँधी (2) अरविन्द (3) महामना मालवीय (4) महर्षि रमण (5) संत विनोबा (6) जे कृष्णमूर्ति के चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में आचार्य श्रीराम शर्मा के चिन्तन का मूल्याँकन।

विदेशी विचारक और आचार्य जी-

(1) थियोसोफी मैडम वलडैक्सी (2) एनीबेसेन्ट दो अन्य विचारक कार्ल मार्क्स एवं रूसो।

अध्याय 4- आचार्य श्रीराम शर्मा की साहित्यिक कृतियाँ - (1) मौलिक (2) सम्पादित (3) अनूदित

अध्याय 5- हिन्दी पत्रकारिता और आचार्य श्रीराम शर्मा

(1) सनातन धर्म (2) कल्याण (3) विवेक-ज्योति (4) अन्य (5) परम्परा और मूल्याँकन-आचार्य श्रीराम शर्मा की

सम्पादन शैली-

(1) दैनिक सैनिक (2) अखण्ड ज्योति (मासिक) (3) युग निर्माण योजना (मासिक) (4) युग निर्माण योजना (पाक्षिक) (5) युग निर्माण पत्रिका (साप्ताहिक) (6) गायत्री परिवार पत्रिका (7) जीवन यज्ञ (8) युग शक्ति गायत्री (9) महिला जागृति अभियान

(6) उपलब्धियाँ और निष्कर्ष।

अध्याय 6- आर्ष ग्रन्थों के सम्पादन-टिप्पणी की परम्परा और आचार्य जी की कृतियाँ-

(एक) वैदिक साहित्य के हिन्दी टीकाकार

(1) महर्षि दयानन्द (2) श्रीमान् दामोदर सातवलेकर (3) महर्षि अरविन्द (4) विद्यानंद विदेह (5) स्वामी गंगेश्वरानन्द

(दो) आरण्यक और उपनिषदों की हिन्दी टीकाएँ

(तीन) उपलब्धि और सीमा (चार) निष्कर्ष।

अध्याय 7- (1) वैदिकेतर भारतीय वांगमय का सम्पादन और भाष्यकार

(1) पौराणिक साहित्य (2) धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ (3) तंत्र साहित्य (4) भारतीय दर्शन

(2) आधुनिक हिन्दी टीका साहित्य का आचार्य शर्मा जी की देन।

अध्याय 8- (1) आचार्य शर्मा की युग बोध सम्प्रक्त कृतियाँ और उनका प्रतिपाथ।

(1) हिन्दी काव्य कृतियों की टीका परक रचनायें (2) व्यक्ति निर्माण परक कृतियाँ (3) जीवन चरित्र प्रधान कृतियाँ (4) परिवार निर्माण परक कृतियाँ (5) राष्ट्र निर्माण परक कृतियाँ (6) साँस्कृतिक पुनर्शोधन परक कृतियाँ (7) लोक क्राँति परक रचनायें

(2) वर्गीकरण का औचित्य तथा वर्गीकृत कृतियों का मूल्याँकन

अध्याय 9- आचार्य शर्मा का साहित्य-भाषा शैली परक अध्ययन।

अध्याय 10- आचार्य शर्मा की कृतियों में प्रतिबिम्बित जीवन दर्शन-

(1) जीवन दर्शन की धारणा और भारतीय चिन्तन (2) जीवन दर्शन की धारणा और भारतीयेतर चिन्तन (3) जीवन दर्शन के मूल तत्व और उनका विवेचन (4) सामयिक चिन्तन-

(1) आचार्य श्रीराम शर्मा की विचारक दृष्टि-

(1) गाँधी वादी विचारधारा (2) मार्क्सवादी विधा (3) वर्ग संघर्ष की पुनर्व्याख्या (4) राजतंत्र और समाज व्यवस्था परक अध्ययनों का मूल्याँकन (5) वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की अवधारणा। (6) परम्परित धारणाओं का वैज्ञानिक आधार (7) आध्यात्मिक विज्ञानवाद के दृष्टा आचार्य श्रीराम शर्मा (8) विवेचन और निष्कर्ष (9) आचार्य जी के युग निर्माण का स्वरूप-

अध्याय 11- विश्व चेतना के दार्शनिकों में आचार्य श्रीराम शर्मा का योगदान।

अध्याय 12- विचार प्रधान हिन्दी साहित्य को आचार्य श्रीराम शर्मा की देन।

उपसंहार


Quotation

मन में जब सुख और शान्ति का समावेश हो जाता है, तब उसका प्रतिबिम्ब बाहर भी दिखाई देता है। इसलिए हर मनुष्य को यथासम्भव मानवता की सेवा करने में तत्पर रहना चाहिए। जिसे भी आवश्यकता है, उसके लिए कुछ न कुछ करना चाहिए। बिना मानवता की सेवा किये कोई भी सच्ची सुख शान्ति नहीं पा सकता। मनुष्य की सेवा करना अपनी सेवा करना है। फिर क्यों न अपने तक सीमित रहने के स्थान पर सामाजिक परिधि के माध्यम से अपनी सेवा की जाय। आत्मा का विकास परोपकार भावना और उसी के अनुसार कार्य करने से ही होता है। वैसे न उस विकास की सरल सम्भावना रहती है और न ही उसका कोई महत्व है।

-रवीन्द्र नाथ टैगोर

पू. गुरुदेव के जीवन दर्शन के प्रत्येक पक्ष की जानकारियाँ भेजें।


परिवार निर्माण पर नये सिरे से ध्यान दिया जाय

व्यक्ति को सुसंस्कृत होना चाहिए, ताकि वह मानवी काया में रहते हुए देवता की भूमिका निभा सके। समाज को समुन्नत होना चाहिए ताकि धरती पर ही स्वर्गीय सुख शान्ति का रसास्वादन संभव हो सके।व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के लिए हमें नये सिरे से नये प्रयास करने चाहिए ताकि छाया हुआ पतनोन्मुख अवसाद का समापन और अभिनव उल्लास से उज्ज्वल भविष्य का सृजन सम्भव हो सके। व्यक्ति को विज्ञ और सभ्य बनना चाहिए तथा समाज की संरचना में एकता, ममता, समता और शुचिता के तत्वों का समावेश होना चाहिए। जन जन में चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा जगे। समाज का अनुशासन और वातावरण ऐसा हो जिसमें न कोई पिछड़ा रह सके और न किसी को संग्रही विलासी और आततायी बनने की छूट रह सके। युग सृजन के लिए इसी रीति-नीति को अपनाया और इसी प्रक्रिया को अग्रगामी बनाया जाना आवश्यक है।

यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को सभ्य बनाया कैसे जाय? समाज का स्वतंत्र रूप से कहीं कोई अस्तित्व नहीं, उसका दृश्य स्वरूप पारिवारिक संगठन में ही देखा जा सकता है। और उन इकाइयों का समुच्चय ही समाज है। समाज को समुन्नत बनाने का अर्थ है उन परिवारों को समुन्नत बनाना; जिनकी संगठना ही समन्वित रूप से समाज बनता है। इसी प्रकार व्यक्ति निर्माण कैसे हो? इस प्रश्न की हद तक जाना हो तो यही उत्तर उभर कर आता है कि बहुज्ञता और कुशलता सिखाने के लिए प्रशिक्षण से काम चल सकता है किन्तु यदि उसे सुसंस्कृत बनाने की बात हो तो यह ढलाई परिवार के परिष्कृत वातावरण में ही संभव हो सकती है। क्योंकि नृतत्व विज्ञान के अनुसार मनुष्य गर्भ प्रवेश के दिन से लेकर दस वर्ष की अवधि तक अपने व्यक्तित्व की ढलाई पूरी कर चुकता है। गुण, कर्म, स्वभाव की जड़ें इसी अवधि में गहराई तक जा पहुँचती हैं। इसके बाद तो मात्र खाद पानी लगाने और रखवाली करने जैसा ऊपरी उपचार ही शेष रह जाता है अस्तु व्यक्ति निर्माण के लिए भी परिवारों को सराय की गई गुजरी स्थिति में नहीं रहने दिया जा सकता। उसे सदाशयता की पाठशाला के रूप में विकसित करना होगा।

व्यक्ति और समाज के दो पहिये हैं और परिवार उन दोनों को जोड़ने एवं गतिशील रखने वाली धुरी। व्यक्ति की महानता दीखती है और समाज के समृद्ध होने का भी परिचय मिलता है; किन्तु परिवार की उन भूमिगत खदानों की महत्ता ही समझ में नहीं आती, जिसे नर रत्नों की खदान कहा जा सकता है। मनुष्य प्रायः बारह घण्टे घर में रहता है, बारह घण्टे बाहर। बालक,वृद्ध और महिलाएँ तो प्रायः पूरा ही समय घर की सीमा में गुजारते हैं। कुल मिलाकर समस्त मनुष्य जाति को अपने समय का दो तिहाई भाग घर की परिधि में परिवार के साथ ही गुजारना पड़ता है। उसकी जैसी भी परिस्थितियाँ होती हैं उसी के अनुरूप उत्थान पतन की सम्भावनाएँ बनती हैं। परिवार को प्रत्यक्ष देखा जा सकने वाला स्वर्ग या नरक कहा जा सकता है।

समस्त संसार मिलकर जीवन को जितना प्रभावित करता है प्रायः उतना ही परिवार का वातावरण भी सुख दुख का निमित्त बनता है। आश्चर्य इस बात का है कि परिवार संस्था की गरिमा को समझा नहीं जाता। उसे परिष्कृत करने पर ध्यान नहीं दिया जाता है। चाहता तो हर कोई यही है कि उसके परिवारी अब एवं भविष्य में सुखी रहें, पर इसके लिए परिवार को उपयुक्त वातावरण बनाने की अनिवार्य आवश्यकता को पूरा किस प्रकार किया जाय, यह सोचा तक नहीं जाता। परिवार संगठन और न समाज ऊँचा उठेगा। भले ही ऊपरी उपचार कितने ही क्यों न किये जाते रहें। इस तथ्य को जितना जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।

युग निर्माण योजना के तीन सृजन प्रयोजनों में व्यक्ति और समाज की ही तरह परिवार निर्माण को भी समान महत्व प्राप्त है। इसके लिए अब तक महिला जाग्रति नाम दिया जाता रहा है। क्योंकि जागृत महिलाएँ ही प्रधान तथा परिवार गठन का उत्तरदायित्व सम्भाल सकती हैं। इस संदर्भ में उन्हें ही प्रधानता देनी होगी; उन्हीं को इतना समर्थ बनाना होगा कि इस छोटे शासन तन्त्र को कुशलतापूर्वक चलाने में गृहलक्ष्मी एवं साम्राज्ञी की भूमिका निभा सकें। नव सृजन के लिए महिला जाग्रति अभियान को अग्रगामी बनाने के लिए ही शान्ति कुँज की स्थापना की गई थी। उसमें प्रधानता भी उसी की रही है। कन्यासत्र, महिलासत्र, देव कन्याओं के दौरे, महिला पत्रिका, परिवार साहित्य आदि के रूप में कुछ न कुछ चलता ही रहा है। अड़चन इसी की रही है कि अन्य स्थान न होने एवं युग शिल्पियों के मोर्चे पर जौहर दिखाने का प्रशिक्षण देने के लिए अन्य कोई उपयुक्त स्थान था नहीं अतएव वह कार्य भी शाँति कुँज में ही चला। फलतः एक म्यान में दो तलवारें रहने की तरह गुजारा तो होता रहा पर अड़चन जरूर रही।

समय ने वह अड़चन दूर की है। गायत्री नगर बनने से स्थान की कमी दूर हुई है और एक साथ कई-कई शिविर चलाने का उपक्रम बना है। इसमें युग शिल्पियों के विभिन्न वर्ग एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे और नये-नये मोर्चे सम्भाल सकेंगे। इसके अतिरिक्त इस स्थान संबंधी सुविधा का दूसरा प्रयास यह बन पड़ा है कि परिवार निर्माण अभियान को नये सिरे से गठित किया जाय और उसे नये प्रवाह एवं नये विस्तार का लाभ दिया जाये। महिला जागरण शब्द इस नई योजना के अनुसार छोटा पड़ता है। क्योंकि महिला कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, समग्र परिवार नहीं हो सकती। परिवार निर्माण में महिला निर्माण आता है, महिला निर्माण में परिवार निर्माण नहीं। ‘महिला’ सुविज्ञ एवं प्रौढ़ होती है। जबकि परिवार में उनके अतिरिक्त भी पुरुषों एवं बाल वृद्धों की भर मार रहती है अस्तु प्रयास की पदोन्नति की गई है और महिला जागरण को परिवार निर्माण नाम दिया गया है पुराने परिचित नाम को धीरे-धीरे नये नाम में परिवर्तित किया जायेगा। इतने पर भी प्रधानता महिलाओं की ही रहेगी क्योंकि नेतृत्व हर हालत में उन्हीं को करना है। यह कर्म क्षेत्र प्रधानतया उन्हीं का है। पुरुष तो उनका समर्थन करने, सहयोग देने और साधन जुटाने की भूमिका निभा सकें तो भी बहुत है।

अखण्ड ज्योति परिवार के समस्त परिजनों को इन्हीं दिनों एक नया का सौंपा गया है। कि वे परिवार निर्माण की ओर पुराने अवसाद को छोड़ कर नये सिरे से नये दृष्टिकोण से ध्यान देना आरम्भ करें और इसके लिए विशेष रूप से प्रयास करें। यों साधारण तथा जीवन का अधिकाँश भाग, श्रम, समय एवं मनोयोग परिवार के निमित्त ही लगता है, पर वह सब कुछ बेतुका होने से मोह मात्र बनकर रह जाता है। आदर्शों का समावेश न रहने से वह प्रयास निरर्थक ही चला जाता है और कई बार तो उल्टा कष्ट कारक ही सिद्ध होता है। मोहजन्य दुलार पक्षपात से परिजनों में अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ उठ खड़ी होती हैं और उनका परिणाम संचालकों के सामने विषाक्त बन कर आता है। यह पुराना ढर्रा बदला जाना चाहिए और हर परिवार में नव सृजन की चेतना उत्पन्न होनी चाहिए। परिवार संस्था को अधिकाधिक समुन्नत बनाने का प्रयास किया जाय तो इससे स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही समान रूप से सधते हैं, स्वयं सुखी बनते परिजनों को समुन्नत बनाने और समाज के अभ्युदय में महत्वपूर्ण योगदान देने के तीनों ही प्रयोजन इस प्रयास से सधते हैं। परिणाम हाथों हाथ सामने आता है। परिवार निर्माण पर किये गये अभिनव प्रयासों का सत्परिणाम हर कोई हथेली पर सरसों जमने की तरह तत्काल देख सकेगा।

काम बड़ा है और व्यापक भी। एकाकी प्रयत्न से एक घर का सुधार होने पर भी कुछ बनता नहीं। क्योंकि अन्य परिवारों की विकृतियाँ सुधरे परिवार को चपेट में लेंगी और बनाने के लिये जो प्रयास किया गया था वह निरर्थक चला जायेगा। महिला जागरण में आधी जनसंख्या का और परिवार निर्माण में पूरे मानव समाज का भाग्य एवं भविष्य जुड़ा हुआ है। इन प्रयत्नों में कारगर सफलता तभी मिल सकती है जब अपने निजी परिवार का साज सम्भाल करने के साथ-साथ इस आँदोलन को व्यापक बनाया जाय। एक ही नकल दूसरे के द्वारा किये जाने की आदत के अनुसार परिवार निर्माण को भी एक प्रचलन का रूप देना होगा। इसके लिए सामूहिक रूप से प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी इससे कम में व्यापक लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव ही नहीं हो सकेगा।

इस संदर्भ में प्रथम चरण इन्हीं दिनों यह उठाया जाना चाहिए कि अखण्ड ज्योति, महिला जागृति, युग-निर्माण, युग शक्ति, पत्रिकाओं के सभी सदस्य मिल कर एक महिला शाखा गठित कर लें। परिवार निर्माण का नेतृत्व महिलाओं को ही करना है। इसके लिए श्रेय उन्हीं को देने की दृष्टि से शाखा को महिला शाखा ही कहा जाय और उसकी सदस्या तथा पदाधिकारी भी उन्हीं को बनाया जाय। पुरुषों की सारी भूमिका पृष्ठ पोषण की रहे। वे समर्थन करें, सहयोग दें; साधन जुटायें। किन्तु संगठन में भीतर घुसपैठ न करें; अन्यथा नये किस्म की विकृतियाँ खड़ी हो जायेंगी। इस संकेत को समझा जाय और परिवार निर्माण के लिए महिलाओं को ही आगे बढ़ाया जाय। पुरुषों के जिम्मे आत्म निर्माण और समाज निर्माण के पहले से ही ढेरों कार्यक्रम सौंपे गये हैं। प्रत्यक्षतः वे उन्हीं को सम्भालें और यह कार्य महिलाओं के ही तत्वावधान में चलने दें। नवगठित महिला शाखा की महिलाएँ सदस्या रहें। और पुरुष दूसरी श्रेणी के सदस्य अर्थात् सभ्य कहलायेंगे। अर्थ एक होते हुए भी इससे पृथकता और प्रमुखता का भेद स्पष्ट होता है।

महिला शाखाओं की सदस्याओं की सदस्यता फीस यह होगी कि वे साप्ताहिक सत्संगों में उपस्थित रहने का यथासंभव पूरा प्रयत्न किया करें। अनिवार्य कारण आने पर ही अनुपस्थित रहें। बड़ा नगर हो तो मुहल्लों के हिसाब से टोली बनाई जाय और टोली नायिका नियुक्त की जाय। छोटा गाँव हो तो उसकी एक ही शाखा पर्याप्त है। ऐसी दशा में संचालिका को कार्यवाहिका कहा जायेगा जहाँ सुविधा के अनुरूप कार्य क्षेत्र बढ़ेंगे और टोलियाँ बनेंगी वहाँ भी एक प्रबुद्ध कार्यवाहिका रहेगी, समस्त टोलियों का मार्ग दर्शन करने का उत्तरदायित्व सम्भालेगी।

आमतौर से महिलाओं में ऐसे सार्वजनिक प्रयासों में सम्मिलित होने का उत्साह नहीं होता। संकोची स्वभाव, घर से बाहर जाने में असुविधा, बड़े बूढ़ों की असहमति, बच्चों की देखभाल, घर का काम आदि कितने ही कारण ऐसे होते हैं जिनसे वे महिला शाखा जैसे कार्यों में सम्मिलित होने, साप्ताहिक सत्संगों में पहुँचने में आन-कानी करती हैं। इस प्रारम्भिक कठिनाई को दूर करना पुरुष परिजनों का काम है। वे इस प्रयोजन के लिए अपने-अपने घरों की महिलाओं को आगे धकेलें। उन्हें समझायें, उत्साह दें और अवसर प्रदान करें। साप्ताहिक सत्संग में ही उन्हें वह प्रेरणा तथा जानकारी मिलेगी; जिसके आधार पर घर में उत्कृष्टता का वातावरण बनाया जा सके। अस्तु संगठन बनाने के साथ साथ ही यह कार्य भी साथ साथ ही पूरा करना चाहिए। साप्ताहिक सत्संगों का ढर्रा अविलम्ब चल पड़े। रविवार की अपेक्षा गुरुवार या अन्य कोई दिन रखा जाय। क्योंकि उस दिन छुट्टी रहने से हर घर में काम बढ़ता है। समय मध्याह्नोत्तर दो से पाँच के बीच का ही उपयुक्त रहता है। सदस्याओं, सभ्यों, टोली नायिकाओं, कार्य वाहिकाओं के पूरे नाम पते शाँति कुँज भेजकर नई शाखा का नये सिरे से पंजीकरण करा लिया जाय। जहाँ पुरानी महिला शाखा चल रही थी। उन्हें रद्द करके नये सिरे से निर्धारण कर लिया जाय।

महिला शाखाएँ परिवार निर्माण के लिए किस प्रकार क्या करेंगी? उसका सुविस्तृत उल्लेख अखण्ड ज्योति के सीमित पृष्ठों पर सम्भव नहीं। इसके लिए 13 सितम्बर का साप्ताहिक युग निर्माण तथा सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर के महिला अभियान अंकों को देखा जाना चाहिए भविष्य में भी आन्दोलन को उपयुक्त दिशा देने का कार्य इन्हीं पत्रिकाओं में मिलता रहेगा। घरों में धार्मिक वातावरण बनाने एवं पंचशीलों का प्रचलन करने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से किन परिस्थितियों में कौन क्या कर सकता है इसकी विस्तृत विवेचना उपरोक्त पत्रिकाओं में नियमित रूप से पढ़ने को मिलती रहेगी। परिवार निर्माण का, महिला जागरण का सूत्र संचालन करने का कार्य नये सिरे से शान्ति कुँज के तत्वावधान में आरम्भ हुआ है। समस्त परिजनों को उस सच्चे अर्थों में युग बदलने वाले और हर व्यक्ति द्वारा क्रियान्वित हो सकने वाले कार्य में हाथ बंटाने के लिए कहा गया है। यदि उपेक्षा न की जाय तो इस सहयोग में स्वार्थ और परमार्थ की उभयपक्षीय सिद्धि हाथों हाथ होती दिखाई पड़ेगी।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजन ही अब तक शान्ति कुँज आते रहे हैं। सृजन शिक्षण के कार्य में जिन युग शिल्पियों की आवश्यकता थी, उन्हीं को सत्रों में बुलाया जाता रहा है। स्थान सम्बन्धी असुविधा रहने के कारण स्त्री, बच्चों को साथ लाने पर रोक रही है। अब स्थान संबंधी की भी छूट मिलने लगेगी। निश्चय ही इस आधार पर हर परिवार को नया प्रकाश मिलेगा और सुधार परिष्कार का नया वातावरण बनेगा। अप्रैल, मई, जून के तीन महीनों में एक एक सप्ताह के परिवार निर्माण सत्र लगा सकेंगे। इस में आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त ऋषिकेश, लक्ष्मणझूला, हरिद्वार, कनखल, मंसादेवी, चण्डीदेवी आदि दर्शनीय स्थानों को सुनियोजित ढंग से देखने का भी अवसर मिलेगा। इस अवधि में जिन्हें अपने बालकों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुँडन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराने होंगे। पितरों के श्राद्ध तर्पण कराने की इच्छा होगी तो वे सब धर्म कृत्य भी गायत्री नगर में ही करा दिये जाया करेंगे। यह सुविधा उत्साहवर्धक भी है, प्रेरणास्पद भी, सरल सस्ती भी। परिवार सत्र अप्रैल, मई, जून में 1 से 7 - 8 से 14 - 16 से 21 - 22 से 28 तक के रहेंगे। आगन्तुकों को स्थान तो इनमें भी सुरक्षित कराना होगा।

महिला शाखाओं का गठन होने पर नेतृत्व करने वाली महिलाएँ किस प्रकार अपने कार्य क्षेत्र में इन रचनात्मक प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनायें। इस संदर्भ में महिला जागृति पत्रिका के अक्टूबर, नवम्बर अंकों में ठोस सामग्री है। उन्हें सामयिक मार्ग दर्शन माना जा सकता है। इतने भर से भी काम तो चल पड़ेगा किन्तु एक आवश्यकता फिर भी बनी ही रहेगी कि प्रत्यक्ष प्रशिक्षण प्राप्त हों तो और भी उत्तम है। इसके लिए शान्ति कुँज में महिला सत्रों की विशेष व्यवस्था की गई है। नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फरवरी में एक-एक महीने के महिला सत्र उनके लिए लगाये जा रहे हैं, जिन्हें टोली नायिका का कार्यवाहिका का अथवा कर्मठ कार्य कर्त्री का उत्तरदायित्व निभाना है। इतने थोड़े समय में भी उन्हें वह काम चलाऊ शिक्षा मिल जायेगी जिसके आधार पर अपने घर में तथा कार्य क्षेत्र का परिवार निर्माण का रचनात्मक कार्यक्रम सरलता और सफलता के साथ क्रियान्वित कर सकना सम्भव हो सके।

इसी प्रयोजन के लिए बड़े महिला सत्र तीन-तीन महीने के लगा करेंगे। वे हर वर्ष तीन होंगे। (1) जुलाई, अगस्त, सितम्बर (2) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर (3) जनवरी, फरवरी, मार्च। इन में संगीत, प्रवचन, गृह उद्योग, संगठन संचालक को उन महत्वपूर्ण विषयों की शिक्षा दी जायेगी जिसके आधार पर अपने-अपने यहाँ की शाखाओं में महिला विद्यालय चलाना तथा अन्य रचनात्मक प्रवृत्तियों को गति देना संभव हो सकता है। परिवार निर्माण अभियान को जब व्यापक बनाना है और विश्व का नव निर्माण, पारिवारिकता के तत्व दर्शन को प्रधानता देते हुए करना है तो उसका नेतृत्व सम्भालने वाली प्रतिभाएँ भी चाहिए। अन्यथा वसुधैव कुटुम्बकम्, विश्व परिवार, विराट ब्रह्म के महान लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव ही न हो सकेगा।

समयदानी परिव्राजकों के एक-एक महीने का सामान्य एवं तीन महीने का .... शिक्षण क्रम बनाया गया है। ठीक इसी प्रकार महिला सत्र भी एक महीने और तीन महीने के चलते रहेंगे।

परिवार निर्माण की उपयोगिता, आवश्यकता समझी जाय और उस महान प्रयोजन के लिए यथासम्भव योगदान प्रस्तुत किया जाय। इन पंक्तियों के साथ यही आग्रह अनुरोध परिजनों तक भेजा जा रहा है।


आवश्यक साधन जुटाने ही होंगे

युग-निर्माण परिवार अब प्रशिक्षण की छोटी-बड़ी कक्षाओं में पढ़ने समझने का प्रयोजन बहुत अंशों में पूरा कर चुका। अब परिजनों को अध्यापकों की भूमिका निभानी पड़ेगी, प्रौढ़ता की, जिन्हें ही अपनी समर्थता एवं प्रतिभा के परिपक्व होने पर, उसकी उपलब्धि को अन्यान्यों के लिए वितरित करना है, बालक एक प्रकार से पराश्रित होते हैं। ज्ञान सम्वर्धन में भी वे दूसरों को सहायता चाहते हैं और अपने निर्वाह के लिए भी, अभिभावकों के अनुदान की अपेक्षा रहती है। परावलंबन बचपन और स्वावलम्बन यौवन। परिपक्वता, प्रौढ़ता और प्रवीणता का लक्षण एक ही है स्वावलम्बन। ऐसा स्वावलम्बन जो मात्र अपना ही नहीं, अपने समय, समाज की देश धर्म की भी आवश्यकता पूरी कर सके।

प्रसन्नता की बात है कि इस प्रगति क्रम का परिचय युग निर्माण परिवार के परिजनों में प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। जागृत आत्मायें, युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित हो रही है। उदीयमान सूर्य की किरणें पर्वतों की चोटियों पर अवतरित होती हैं। आलोक इसके बाद धरती पर क्रमशः नीचे उतरता है। जागृत और जीवन्त प्राणवानों की प्रखरता इन दिनों युग सृजन में नियोजित हो रही है। वे सृजन शिल्पी की भूमिका निभाने में आतुर और तत्पर देखे जा सकते हैं।

आवश्यकता पड़ने पर जब सेना में भर्ती बढ़ानी पड़ती है तो देशभक्त राष्ट्र रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए अपना नाम लिखाते हैं, मोर्चा संभालने और देश की इज्जत बचाने में उनकी श्रद्धा और साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है। भर्ती और प्रशंसा का उपक्रम थोड़ी देर में ही समाप्त हो जाता है। उसके उपरान्त दूसरी नई जिम्मेदारियाँ-भर्ती के लिए आह्वान, प्रोत्साहन आदि प्रबन्ध करने वालों के कंधों पर आती है। उन जिम्मेदारियों में प्रथम है-उन नई भर्ती के सैनिकों के ठहरने का प्रबन्ध करना। दूसरा है-उन्हें युद्ध कला में प्रशिक्षित करना। यदि यह दोनों जिम्मेदारियाँ न निभाई जायें तो देशभक्तों की बलिदान भावना के रहते हुए भी सीमा-सुरक्षा में असफल रहना पड़ेगा, तब उनकी निन्दा होगी जो सैनिकों की भर्ती करने का पूर्वार्ध पूरा करके ही सन्तुष्ट हो गये और भावनाओं को भड़काने की सस्ती सफलता के उपरान्त वह कार्य न किया जो कठिन होते हुए भी नितान्त आवश्यक था। जन्म कुशल प्रशिक्षकों द्वारा वह कौशल सिखाया जाता है। युग परिवर्तन अभियान के असुरता की सर्वनाशी विभीषिका से जूझने को महाभारत नहीं, विश्व युद्ध कहा जा सकता है। इसके लिए इन दिनों जागृत वर्ग के सृजन शिल्पी अग्रिम मोर्चे पर लड़ने की अपनी भावभरी साहसिकता का परिचय दे रहे हैं। इसे उज्ज्वल भविष्य का चिह्न माना जा सकता है। इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग है कि इनके लिए छावनी और शिक्षा का प्रबन्ध होना चाहिए। यह द्वितीय चरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना प्रथम चरण।

महाकाल की पुकार पर सृजन शिल्पियों का भाव भरा समुदाय आगे आ रहा है। थोड़ी नहीं बड़ी संख्या में अब उनकी प्रशिक्षण व्यवस्था बनाने में प्रथम प्रयास इन के लिए स्थान खड़ा करने के रूप में करना होगा। प्रशिक्षण का उत्तरदायित्व शाँतिकुँज ने संभाला है। इसके लिए सात स्तर के प्रशिक्षण सत्र एक साथ आरम्भ करने के अति महत्वपूर्ण कदम इन्हीं दिनों उठाये गये हैं। (1) शोध संस्थान के अनुसंधान सत्र (2) ब्रह्म वर्चस् के उच्चस्तरीय साधना सत्र (3) जन जागरण का उद्देश्य पूरा कराने में समर्थ बनाने वाले लोक नायकों के परिव्राजक सत्र (4) नारी जागरण एवं परिवार निर्माण की मुहीम संभालने वाली प्रतिभाओं को खरीदने वाले महिला सत्र (5) व्यक्तित्व में प्रखरता उत्पन्न करने वाले साधना सत्र (6) परिवार निर्माण सत्र (7) संगीत सत्र किस प्रकार चलेंगे और उनकी रूपरेखा क्या होगी, इसका विस्तृत विवरण छापा जा चुका है। उनमें शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या, अब तक के सभी सत्रों की तुलना में कई गुनी अधिक होगी। यह स्वाभाविक भी है, पिछले दो वर्षों में परिवार की सदस्य संख्या दूनी ढाई गुनी हो गई। पुरानों का उत्साह तो कुछ ठण्डा भी पड़ा है, पर नये रक्त का उभार तो तूफानी गति उभरता और मचलता है। इस प्रवेश पर हर्ष मनाने और संतोष व्यक्त करने के साथ ही यह पहाड़ जैसा उत्तरदायित्व सामने आ खड़ा होता है, कि इन भावनाशीलों को प्रवीण पारंगत बनाने के लिए तत्काल आवश्यक व्यवस्था बनाई जाय और साधन जुटाये जायें। गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण का कार्य तेजी से चल पड़ा है। इन सभी को इमारत बनाने की तरह ही अपने-अपने कार्य क्षेत्र को संभालने के लिए कुशल शिल्पियों की आवश्यकता पड़ेगी। उसकी पूर्ति इन्हीं दिनों अविलम्ब करनी आवश्यक हो गई है। सूत्र संचालकों के सामने इन दिनों प्रमुख कार्य यह है-युग शिल्पियों के प्रशिक्षण के लिए अध्यापकों का नहीं, खड़े होने के लिए छाया का प्रबन्ध करना है। कुशल अध्यापक अपने पास हैं। पर साधनों के लिए अन्यान्यों की ओर ही निहारना पड़ता है। इतना बड़ा पर्वत उठाना, एक का काम नहीं, इस गोवर्धन के उठाने में, समुद्र सेतु बाँधने में अनेकों का सहयोग चाहिए। आवश्यक नहीं, यह सहयोगी समर्थ ही हों। ग्वाल-बाल, रीछ बानर और गीध-गिलहरी तथा निषाद, केवट सरीखे व्यक्ति भी इस संदर्भ में अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी-अपनी भूमिका निभा सकते हैं। इन दिनों कुछ ऐसा ही धर्म संकट सामने आ खड़ा हुआ है। युग शिल्पियों की प्रशिक्षण व्यवस्था के लिए आच्छादन खड़ा करना, ऐसा कार्य है; जिसे न तो टाला जा सकता है और न उसकी उपेक्षा हो सकती है। उसे इन्हीं दिनों पूरा करना है।

मत्स्यावतार की कथा प्रसिद्ध है। ब्रह्माजी के कमण्डलु में प्रकट हुए, मत्स्य शावक ने क्रमशः अपना रूप बढ़ाया, और उसे क्रमशः घड़े में, गड्ढे में, सरोवर में और अन्ततः समुद्र में पहुँचाया गया था। लगभग वैसा ही युग सृजन के संचालक सूत्रों की आवश्यकताओं का विस्तार हो रहा है, एक आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती कि दूसरी नई उससे भी बड़ी और उससे भी आवश्यक लगने वाली, सामने आ खड़ी होती है।

ब्रह्मवर्चस् आरण्यक बन कर पूर्ण हो भी नहीं पाया कि गायत्री नगर का निर्माण एक अनिवार्य आवश्यकता की तरह सामने आ खड़ा हुआ। आरम्भ में उसे मिशन के कार्यकर्त्ताओं के निवास के लिए बनाने की बात सोची गई थी, पर अब नई आवश्यकता एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाने के रूप में सामने आ गई जिसमें प्रायः एक हजार प्रशिक्षणार्थी एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। प्रशिक्षण की सातों धारायें विश्वविद्यालयों में चलने वाली फैकल्टी कही जा सकती है। नालन्दा, तक्षशिला आदि के बौद्ध-विहारों और संधारामों का स्मरण इस अवसर पर अनायास ही आ जाता है। विस्तार वैभव भले ही उतना न हो पर उद्देश्य और स्वरूप सर्वथा उसी स्तर का है। निर्माणों की आवश्यकता उन दिनों, उन लोगों को भी पड़ी थी, इन दिनों अपने सामने भी बड़ी समस्या है, उन दिनों बड़े लोगों ने बड़े रूप में अपनी उदार साहसिकता का परिचय दिया था। अपने समय में अपनी आवश्यकतायें पूरी करने के लिए हमें अपने स्तर पर कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। विमुख रहने और कृपण कहलाने का दोष न उन दिनों के भावनाशीलों ने स्वीकार किया था और न अपने परिजन ही उसे ओढ़ने को तैयार हो सकते हैं।

गायत्री नगर का निर्माण पहले छोटे रूप में सोचा गया था, अब उसकी योजना कहीं अधिक बढ़ गई है। बढ़ी ही नहीं स्थिति ऐसी बन गई है कि उसे अविलम्ब पूरा करना पड़ेगा। युगशिल्पियों की भर्ती के बाद उनकी प्रशिक्षण व्यवस्था एक दिन के लिए टल नहीं सकती, इसलिए इस निर्माण कार्य को प्राथमिकता देनी पड़ रही है और उसे तेजी से सम्पन्न करने का उपक्रम चल पड़ा है।

अर्थ साधनों की आवश्यकता अत्यधिक बढ़ गई है। उसकी पूर्ति के लिए “स्मृति अनुदान” का एक आकर्षक तरीका ढूंढ़ निकाला गया है, प्रस्ताव रखा गया है कि अपनी एवं अपने पूर्व पुरुषों, प्रिय जनों की स्मृति के लिए जो हाथ बंटायेंगे, उनके स्मृति पत्थर लगा दिये जायेंगे। इन दिनों जो निर्माण गायत्री नगर में चल रहा है उसमें प्रायः दो-दो कमरों के फ्लैट हैं। इनमें दो कमरे, दो बरामदे, फ्लैस, बाथरूम, रसोई, स्टोर, आँगन, इतनी व्यवस्था है। इस पूरे को बनाने में गत वर्ष लागत ग्यारह हजार आँकी गई थी, इन दिनों प्रायः ड्यौढ़ी महंगाई बढ़ गई और लागत में असाधारण अन्तर आया है तो भी उदारमना लोगों पर अधिक भार न पड़ने देने की बात को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव यही है कि जो ग्यारह हजार देंगे; उनकी स्मृति पट्टिका पूरे फ्लैट पर लगा दी जायेगी। दूसरा प्रस्ताव इससे हल्का है। एक कमरा, एक बरामदा, एक रसोई इतना पूर्ण और टट्टी, स्नान घर, आँगन सम्मिलित रखने को आधे से कुछ अधिक कहा जा सकता है। इतने भाग के लिए सात हजार रखा गया है। यों असली लागत इन दिनों इससे भी अधिक बढ़ गई है। अपने मध्यवर्ती परिवार को अधिक बड़ी राशि देने में असुविधा पड़ेगी। इस दृष्टि से पत्थर लगाने की शर्त में जहाँ तक सम्भव हो सका है, यथासंभव कमी करने की बात ही ध्यान में रखी गई है।

स्मृति के लिए निर्माण कराने की परम्परा प्रचलित है। इस संदर्भ में यह भी देखा जाता है कि उस स्मृति से किस स्तर के और कितने लोग अवगत एवं प्रभावित होंगे। कहना न होगा कि इस दृष्टि से गायत्री नगर के कक्षों पर लगे ‘पटल’ हर दृष्टि से प्रथम श्रेणी के सिद्ध होंगे। किस स्तर के और कितने लोग इन गायत्री तीर्थ में आने वाले हैं, इसकी कल्पना भर से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह यश कितना उच्चस्तरीय, कितना स्थायी और कितना पुण्य प्रदायक होगा। पुण्य सदा उपयोगिता पर निर्भर रहता है न कि राशि पर। जिस कार्य में जितना बड़ा लोक हित होगा, उसी अनुपात में उसके संयोजक पुण्यफल के भागी होंगे। युगशिक्षण के लिए बनने वाले विश्वविद्यालय जैसे महान कार्य की उपयोगिता और गरिमा को हर विचारशील और दूरदर्शी व्यक्ति अनुभव कर सकता है। अतएव इस निर्माण में लगी राशि को श्रेष्ठतम सदुपयोग ही कहा जा सकता है। उसका पुण्य फल भी तद्नुरूप ही होगा।

परिजनों की इन दिनों की सर्वाधिक आवश्यकता को पूरा करने में अपनी समर्थता को टटोलना चाहिए। यदि वह न बन पड़े तो अपने प्रभाव क्षेत्र के उन लोगों को वस्तुस्थिति समझानी चाहिए, जो इस प्रकार का सहयोग दे सकते हैं। देना या दिलाना लगभग एक ही प्रकार का परिणाम उत्पन्न करता है। हर प्रतिभाशाली व्यक्ति के संपर्क में कुछ न कुछ लोग अवश्य ऐसे होते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो, साथ ही उदारता के, यश आकाँक्षा के तत्व भी मौजूद हों। उन्हें यदि गायत्री नगर के निर्माण कार्य की उपयोगिता और सहायता से असाधारण यश और पुण्य मिलने की बात समझाई जा सके तो निश्चय ही कइयों के संपर्क में कुछ को तो सहमत किया ही जा सकता है। हम इधर ध्यान देने लगें तो रुकती प्रतीत होने वाली गाड़ी, आगे बढ़ सकती है और देखते देखते समय की माँग को पूरा करना सम्भव हो सकता है।

एक कार्य तो हर कोई कर सकता है कि महीने में एक दिन की आमदनी एक वर्ष तक देते रहने जैसा निश्चय किया जा सकता है और उसे आसानी से निभाया भी जा सकता है। खर्चों में कई ऐसे होते हैं, जिनमें कुछ समय के लिए कमी-कटौती करने से भी गुजारा चलता रह सकता है, यदि प्रस्तुत निर्माण कार्य की उपयोगिता और उसके सहयोग करने की आवश्यकता समझी जा सके तो छोटे-बड़े अनुदान एक वर्ष तक नियमित रूप से देते रह सकना छोटे से लेकर बड़े तक के लिए सम्भव हो सकता है। इसके लिए सार्वजनिक चन्दा करने की कहीं भी आवश्यकता नहीं है। प्रस्तुत प्रयोजन की पूर्ति के लिए मात्र ऐसे स्वेच्छा-सहयोग स्वीकार किये जायेंगे जिनमें किसी का अनावश्यक एवं अनपेक्षित दबाव न पड़ा हो।

युग सृजन बड़ा काम है। उसमें अभिरुचि रखने एवं सहयोग देने की भावना का विकास ही इस बड़े काम के पूरे होने में आशा का केन्द्र है। इस केन्द्र को समर्थ बनाने में परिजनों का सामयिक सहकार मिलना ही चाहिए।


महत्वपूर्ण प्रकाशन

अध्यात्म का वैज्ञानिक प्रतिपादन साहित्य

प्रस्तुत बुद्धिवादी युग में तर्क, तथ्य, प्रत्यक्ष, प्रमाण एवं विज्ञान को प्रामाणिकता मिली है और शास्त्र, श्रद्धा एवं आप्त वचनों को अमान्य किया गया है। इस मनःस्थिति में पनपने वाले नास्तिकवाद एवं स्वेच्छाचार को निरस्त करने के लिए युग-दृष्टा गुरुदेव की लेखनी से अभिनव युग साहित्य सृजा गया है। प्रत्येक पुस्तक विचारशील वर्ग के लिए अत्यंत प्रेरणाप्रद है।

(1) विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व, (2) ईश्वर कौन है? कहां है? कैसा है? (3) दृश्य जगत के अदृश्य संचालन सूत्र, (4) असीम पर निर्भर ससीम जीवन, (5) चेतना की प्रचंड-क्षमता एक दर्शन, (6) मनुष्य चलता फिरता पेड़ नहीं है, (7) पांच प्राण-पांच देव, (8) दिव्य शक्तियों का उद्भव प्राण शक्ति से, (9) मानवीय क्षमता- असीम अप्रत्याशित, (10) अणु में विभु- गागर में सागर, (11) आत्मा न नर है, न नारी, (12) मानवीय मस्तिष्क विलक्षण कम्प्यूटर, (13) अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि, (14) जड़ के भीतर विवेकवान चेतन, (15) शरीर की अद्भुत क्षमताएं और विलक्षणताएं, (16) मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, (17) क्या धर्म अफीम की गोली है? (18) धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक, (19) विज्ञान को शैतान बनने से रोकें, (20) पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य, (21) स्वर्ग-नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया, (22) तात्विक दृष्टि से बंधन मुक्ति, (23) मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ, (24) भूत कैसे होते हैं? क्या करते हैं? (25) पितरों को श्रद्धा दें- वे शक्ति देंगे, (26) सपने झूठे भी, सच्चे भी, (27) शब्द ब्रह्मनाद ब्रह्म, (28) आध्यात्मिक काम विज्ञान, (29) जीव-जंतु बोलते भी हैं- सोचते भी हैं, (30) संसार चक्र की गति प्रगति, (31) असामान्य एवं विलक्षण, किंतु संभव और सुलभ, (32) मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु, (33) दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियां, (34) हम सब एक दूसरे पर निर्भर, (35) चेतना का सहज स्वभाव, स्नेह सहयोग, (36) सहृदयता आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य, (37) बच्चे बढ़ाकर अपने पैरों कुल्हाड़ी न मारें, (38) युग शक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण, (39) ब्रह्मवर्चस की ध्यान धारणा, (40) कुंडलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि, (41) सर्वोपयोगी गायत्री साधना, (42) गायत्री के पांच मुख-पांच दिव्य कोश।

प्रत्येक की छपाई-सफाई सुंदर। कवर आकर्षक पृष्ठ संख्या 112 मूल्य तीन रुपया। डाक व्यय अलग। पूरे सैट का मूल्य 110 रुपये डाक व्यय मुफ्त।

गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रंथ रत्न

हजारों ग्रंथों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रंथों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

(1) गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (प्रथम भाग) (2) गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (द्वितीय भाग) (3) गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (तृतीय भाग) (4) गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग) (5) सामूहिक यज्ञ विधान (द्वितीय भाग) (6) गायत्री चित्रावली (7) गायत्री मंत्रार्थ (8) गायत्री का स्वरूप और रहस्य (9) गायत्री की गुप्त शक्ति (10) सर्व सुलभ गायत्री साधना (11) गायत्री का शक्ति स्रोत- सविता देवता (12) गायत्री और उसकी प्राण-प्रक्रिया (13) गायत्री पंचमुखी और एक मुखी (14) गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना (15) गायत्री की विशेष साधनाएं (16) गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति (17) गायत्री की असंख्य शक्तियां (18) गायत्री की सिद्धियां (19) गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप (20) गायत्री स्त्रियों का अधिकार (21) गायत्री और यज्ञोपवीत (22) गायत्री और यज्ञ का संबंध (23) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि (24) गायत्री की दैनिक साधना (25) गायत्री चालीसा (26) युग-निर्माण सत्संकल्प

100 रुपये से अधिक पुस्तकें मंगाने पर 25/ कमीशन डाक व्यय अलग से लगेगा।

पुस्तकें मंगाने का पता- अखण्ड-ज्योति प्रकाशन मथुरा।


युगांतर चित्रण


युगांतर चित्रण (kavita)

आ रहे उभरकर नये चित्र, युग का आकाश निहारो तो। नूतन-युग के नव-चित्रण का, अनुपम-आभास उभारो तो॥1॥

युग की धरती पर फूट रहे, देखो तो आज नये-अंकुर। फूटी पड़तीं कोंपलें नई, नूतन-पल्लव हो रहे मुखर॥ आने वाली है नई-फसल, युग के खेतों, खलियानों में। नूतन-रस भरता जाता है, युग की फसलों के दानों में॥ युग-परिवर्तन के चित्र-तनिक, आंखों के बीच उतारो तो॥2॥

देखो! वह चित्र उभर आया, जिसमें श्रम का श्रृंगार हुआ। देखो! वह चित्र कि जिसमें, नव-सृजन सहज-साकार हुआ॥ वह चित्र निहारो तो जिसमें, युग-कलाकार की मनमानी। हैं जहां विशेषताएं, युग की समता का भरती हैं पानी॥ शोषण, उत्पीड़न, भेद-भाव, हैं शेष न तनिक विचारो तो॥3॥

यह चित्र गजब है, गिरतों को युग-पुरुष उठाते हाथ पकड़। देखो! कितनी करुणा छलकी, दीनों का दर्द न जाये बढ़॥ युग की ममता टूटी पड़ती, जन-जन को प्यार लुटाने को। रस की धारा फूटी पड़ती, प्यासे को प्यार पिलाने को॥ अपनी संवेदन-क्षमता को, पीड़ित के लिये पुकारो तो॥4॥

नव-युग के चित्र अनूठे हैं, अपने घर का श्रृंगार करो। जन-मानस में इन चित्रों को जड़कर स्वर्णिम-उल्लास भरो॥ ये चित्र मनुज की गरिमा को, देवत्व प्रदान करायेंगे। ये चित्र मनुज की धरती को, स्वाभाविक-स्वर्ग बनायेंगे॥ इन चित्रों से आचारों की दीवारें तनिक संवारो तो॥5॥

-मंगल विजय

*समाप्त*