*******
हर भावनाशील व्यक्ति के सम्मुख देव मानव बनने और समाज को समुन्नत बनाने की यशस्वी भूमिका निभाने का अवसर विद्यमान है। सृष्टा ने हर मनुष्य को ऐसे साधनों से सम्पन्न बना कर भेजा है कि वह जीवन लक्ष्य को पूरा करने में सहज ही सफल हो सके तथा सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धक की भूमिका निभाते हुए श्रेयाधिकारी बन सके।
अधिकाँश को इस सौभाग्य से वंचित रहना पड़ता है जो उसे मानव जीवन के साथ ही अजस्र उपहार के रूप में उपलब्ध है। व्यवधान के कारणों पर विचार करने से परिस्थिति की जटिलता नहीं मनःस्थिति में भरी हुई कुटिलता ही एक प्रधान अवरोध प्रतीत होती है। उपभोग और संग्रह का अनावश्यक लालच, सम्बन्धियों के प्रति अनुपयुक्त व्यामोह, अहंता का उद्धत परिपोषण इन तीनों का समुच्चय ही वह त्रिशूल है जो जीवन सम्पदा को अस्त-व्यस्त करता और सृष्टा के उपहार को दुर्भाग्य में बदलता है।
महान बनने और महान करने की आत्मिक आकाँक्षा पूरी करना जिन्हें वस्तुतः अभीष्ट हो उन्हें त्रिविध व्यवधानों से जूझने का साहस जुटाना चाहिए। निर्वाह के लिए औसत भारतीय स्तर साधन परिचारक का संक्षिप्तीकरण और स्वावलंबन-सद्गुणों की सम्पदा में गर्व गौरव यदि पर्याप्त प्रतीत होने लगे तो समझना चाहिए कि स्वर्ग के द्वार खुल गये और जीवन को आनन्द से भर देने वाले साधन बन गये। अमीरी नहीं महानता हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए क्या सोचना और क्या करना चाहिए इसका सही निर्णय निर्धारण तभी हो सकता है जब लोभ-मोह और अहंकार की मदिरा के आवेश से बुद्धि को सही और दूरदर्शी बनने का अवसर मिल सके।
----***----
*******
अणुबम का बाहरी आवरण इतनी मजबूत और ठोस धातु से किया जाता है कि उसके भीतर अणु विखण्डन की प्रक्रिया सम्पन्न करने वाले यन्त्रों पर बाहरी आघातों का कोई प्रभाव न पड़े। यदि इतनी कड़ी और मजबूत धातु क आवरण उस पर न चढ़ाया जाये तो उस बम के किसी भी क्षण विस्फोट हो जाने का खतरा बना रहेगा। शक्ति को धारण और संचय करने से पहले उसकी सुरक्षा और संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। उस शक्ति संचय से ही आत्मा की चैतन्य शक्ति बढ़ती है, अतः आत्मिक प्रगति के इच्छुक व्यक्तियों को शक्तियों पर नियन्त्रण करने की विद्या भी आनी चाहिए।
इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी ध्यान देने योग्य है कि एक ओर तो शक्ति को श्रम साधना और एकाग्रता पूर्वक संचित किया जाये तथा दूसरी ओर उसे इन्द्रिय छिद्रों से निर्बाध बहने दिया जाता रहे तो स्वप्न ही सिद्ध होगा। प्रयत्न और परिश्रम का, साधना और एकाग्रता का सत्परिणाम संयम से ही मिलता है। जो अपने आवेगों, भावों और इच्छाओं को वश में रखता है, आत्म-विजय की सफलता का श्रेय उसे ही मिलता है। आवेगों का निरन्तर नियन्त्रण में रखने की शक्ति का नाम ही संयम है।
इच्छायें और आकाँक्षायें मन में ही उपजती है। वहीं से शक्ति का क्षरण आरम्भ होता है। इसलिए संयम का बाँध जाना चाहिए और शक्तियों के अपक्षरण को रोक कर उसे आत्मिक प्रगति की दिशा में प्रयुक्त करना चाहिए। मानसिक संयम, शारीरिक संयम की आधार शिला है। मन इच्छावर्ती हो, अभीष्ट दिशा में उसे लगाने की स्थिति प्राप्त कर ली जाये तो शारीरिक शक्तियों का असाधारण विकास होने लगता है। शास्त्रकारों ने शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों के विकास के लिए संयम को जीवन का अनिवार्य अंग माना है तथा उसे आवश्यक धर्म-कर्तव्य बताया है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि जो मनुष्य जितना संयमी होगा उतना ही उसका व्यक्तित्व प्रखर, तेजस्वी और सामर्थ्यवान होगा तथा वह दूसरों को प्रभावित कर सकता है।
संयम साधना में तभी चूक हो जाती है जब मनुष्य विषय भोगों में रस लेता है। विषय भोग एक सीमा तक आवश्यक है, शरीर निर्वाह की दृष्टि से उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन जब मनुष्य उनमें रस लेने लगता है तो वहीं से दुख और शक्ति क्षय का सूत्रपात हो जाता है। मनुष्य जब सुख की खोज में इन्द्रियों और विषय को साधन बनाकर प्रयत्न आरम्भ करता है, मन बुद्धि को भी इसी ओर लगाता है तो इसी पर्यंत में अनेक दुखों का सूत्रपात हो जाता है। उदाहरण के लिए शरीर यात्रा के लिए भोजन करना नितान्त अनिवार्य है, लेकिन जब रसना के माध्यम से अनेक स्वादों का आनन्द प्राप्त करने के लिए भोजन किया जाने लगता है तो भोजन की मात्रा और उसके स्वरूप का निर्णय पेट न करके जिह्वा करने लगती है। जीभ की तृप्ति के लिए मनुष्य तरह-तरह के सुस्वादु भोजन करता है और परिणाम रोग, शारीरिक कष्टों के रूप में प्राप्त होते है, इस रूप में दुष्परिणाम न भोगना पड़े, शरीर की सामर्थ्य उन्हें पचा जाने की हो तब भी जो शक्ति आत्मिक विकास के लिए लगनी चाहिए थी, वह इन दुष्पाच्य पथ्यों को हजम कर जाने में लग जाती है।
मनुष्य शरीर एक ‘शक्ति उत्पादक डायनेमो की तरह है। इसमें नित्य निरन्तर शक्ति का उद्वेलन होता रहता है। आत्मिक विकास के लिए आवश्यकता इस बात की है उन्हें रोक कर, संयम द्वारा संचित किया जाय तथा उचित दिशा में में लगा दिया जाय। इसके विपरीत विषय भोगों के छिद्रों से नष्ट कर देने पर मनुष्य दीन-हीन असहाय और क्षीण ही हो जाता है। अस्तु संयम द्वारा शक्ति को संचित रखकर उसका सदुपयोग करने से ही मनुष्य का जीवन प्रभावशाली बनता है।’ बुद्धिमान पुरुषों की कसौटी बताते हुए भगवान ‘श्री कृष्ण ने कहा है, “नतेषु रमते बुधः” अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति संयम का महत्व समझ कर विषय भोगों में लिप नहीं होते।
शरीर तो माता-पिता के रजवीर्य से बना है। उन्हीं के संरक्षण में बालक का पालन-पोषण होता और उसे शिक्षा-दीक्षा मिलती है। दिखाई देने वाले इन उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए ही सुसंस्कारी व्यक्ति माता-पिता के प्रति श्रद्धासिक्त भाव से कृतज्ञ रहते है। असमर्थ और अशक्त स्थिति में पालन-पोषण करने और शिक्षा-दीक्षा दिलाकर योग्य बनाने जैसे मोटे कार्या के लिए ही कृतज्ञ हुआ जा सकता है तो उस परम पिता के प्रति कितना कृतज्ञ हुआ जाना चाहिए जिसका संरक्षण हर क्षण उपलब्ध रहता है और जिसके अनुदानों से मनुष्य का रोम-रोम उपकृत होता है।
मानवीय कलेवर भ्रूण जैसी अत्यधिक कोमल और सम्वेदनशील स्थिति में माता के गर्भ में जन्म लेता है। उसे यो ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह अपनी कोमलता और अत्यधिक सम्वेदनशीलता के कारण वैसे ही नष्ट हो गया होता है जैसे खुली वायु, और धूप में कई कीट-पतंगे नष्ट हो जाते हैं। उसे वायु, ताप और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही नष्ट कर डालती लेकिन परमात्मा ने उसके लिए गर्भाशय के रूप में एक ऐसा वातानुकूलित और सर्व-सुविधा सम्पन्न निवास तैयार किया जो भ्रूण के लिए सभी प्रकार से अनुकूल है।
भ्रूण अपनी कोमलता और सम्वेदनशीलता के कारण इस योग्य नहीं होता कि उसका विकास खुले में हो सके। इसलिए चारों तरफ से बन्द कोठरी-गर्भाशय में उसके विकास की समस्त सुविधाएँ उचित मात्रा में मिलती रहती हैं जन्म के पूर्व ही उसके लिए माँ के दूध जैसा सन्तुलित आहार उपलब्ध कराकर परमात्मा ने कितनी करुणा दर्शाई हैं जन्म लेने के बाद असहाय और असमर्थ शिशु के लिए न केवल भौतिक सहायताएँ भी जरूरी थीं। सो वे समस्त सुविधाएँ शिशु को कुटुम्ब में, समाज में, समुदाय में मिल जाती है। इस तरह जीवन सत्ता परिपक्व रूप में सामने आ जाती है।
जन्म से पूर्व ही संरक्षण, विकास और पोषण की इतनी सुन्दर सुव्यवस्था प्राप्त होने के बाद भी यह कितने आश्चर्य की बात है कि दूसरों के सहारे बढ़ा और विकसित हुआ मनुष्य न केवल सामाजिक कर्तव्यों के प्रति कृतघ्नता का परिचय देने लगता है अपितु अपने परम-पिता को, अपनी मूल सत्ता को ही भूला बैठता है। इस विस्मरण या कृतघ्नता से भी वह कारुणिक सत्ता अप्रसन्न नहीं होती वरन् अपने अनुदानों को क्रम जारी रखती है। वह दयालु पिता अपने शिशु के यौवन में प्रवेश करते ही उसकी बाल्यावस्था, ममता, स्नेह, सहयोग की आकाँक्षा और जीवन साथी की आवश्यकता पूरी करने के लिए उपयुक्त व्यवस्था करता है। कहना नहीं होगा कि ईश्वर की कृपा से ही नारी को नर में और नर को नारी में अपनी पूर्णता प्राप्त करने की सुविधा प्राप्त हुईं इतना ही नहीं विजातीय तत्वों के आक्रमण से उत्पन्न होने वाले, स्वास्थ्य संकट से जूझने वाली रोग निरोध की क्षमता और प्रतिकूलताओं अपने अस्तित्व की रक्षा की जन्मजात सुविधाएँ भी परमेश्वर की कृपा से ही प्राप्त हुई मनुष्य में रोग से लड़ने की शक्ति उसके रक्तकणों में, शारीरिक अवयवों की सुरक्षा उसकी त्वचा के द्वारा देखने के लिए आँखें, सुनने के लिए कान और विचार करने के लिए उन्नत मस्तिष्क जैसी सुन्दर मशीन उसी परमात्मा की अनुकम्पा है। आज तक इतनी सारी विशेषताओं से सम्पन्न कोई मशीन न तो कोई बना सका है और आगे भी कोई बना पाएगा इसमें सन्देह ही है जो हर परिस्थिति से जूझने, मुड़ने, लचकने या सम्भालने में सक्षम है।
आँख जैसी रेटिना, कान जैसा पर्दा, गुर्दे सरीखा सफाई उपकरण, हृदय जैसा पोषण, संस्थान और पाँव जैसा सुन्दर अर्थ बनाने वाली सत्ता कितनी बुद्धिमान होगी तुलना न तो किसी इंजीनियर से की जा सकती है और न ही किसी डाक्टर से। वह प्रत्येक कला कौशल का ज्ञाता, सर्व निष्णात, सर्व प्रभुता सम्पन्न और सर्वशक्तिमान केवल परमात्मा ही हो सकता हैं। इससे कम मानना न केवल उस परमात्मा की अवमानना होगी वरन् यह एक प्रकार से स्वयं का आत्माघात भी होगा।
यह तो शरीर के रूप में जीवात्मा को प्राप्त हुए एक दुर्ग भर की चर्चा हुई। यदि इस दुर्ग की रचना प्रक्रिया को देखा जाय तो और भी विस्मय विमुग्ध रह जाना पड़ता है। इस दुर्ग का निर्माण बहुत ही छोटे-छोटे घटकों से हुआ है। ठीक वैसे ही जैसे एक मकान का निर्माण ईंटों से होता है। कहा जा सकता है कि शरीर में तो हड्डी, रक्त, माँसपेशियाँ, हृदय मस्तिष्क आदि बहुत से अंग अवयव होते है। लेकिन मकान में भी तो फर्श, दीवार, अलमारियाँ, मेहराब आदि होते है। इन सबका निर्माण जिस प्रकार ईंटों से होता है। उसी प्रकार मनुष्य शरीर का निर्माण भी छोटे-छोटे कोष्ठों से मिलकर होता है, ये काष्ठ इतने सूक्ष्म और छोटे होते है कि उन्हें आँखों से नहीं देखा जा सकता। वे सिर्फ सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा ही देखे जा सकते है। अरबों, करोड़ों की संख्या में विद्यमान ये कोष्ठ शरीर दुर्ग के एक-एक कोने में तैरते घूमते रहते हैं और जहाँ कहीं भी थोड़ी बहुत टूट-फूट हुई वहीं मरम्मत में जुट जाते है। इस टूट-फूट या मरम्मत के काम में हजारों लाखों कोष्ठ अपने प्राण गँवा बैठते हैं। यानी विनष्ट हो जाते हैं। प्राण गँवा देते हैं, यह कहना भी अतिरंजित नहीं होगा क्योंकि प्रत्येक कोष्ठ एक जीवित इकाई होता है।
जब ये कोष्ठ मृत हो जाते हैं तो इनका स्थान लेने वाले नये कोष्ठ भी तुरन्त तैयार हो जाते है। एक क्षण की भी देरी नहीं लगती कि नए तैयार। यह कोष्ठ अपना उत्तरदायित्व सम्हाल लेते है। इस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था किस देश समाज में हो सकती है। यह परमात्मा की ही कृपा और उसी की अनुकम्पा है कि शरीर दुर्ग के रूप में जीवात्मा को रहने के लिए इतना सुन्दर, सुसज्जित और सुरक्षित आवास मिला।
फिर भी ईश्वर के अनुदान यहीं आकर समाप्त नहीं हो जाते उसने अग्नि में चिनगारी, पदार्थ में परमाणु और सूर्य में किरणों की तरह मनुष्य की अतर्गुहा में स्वयं बैठकर उसे प्रतिपल आत्मोत्कर्ष की प्रेरणा देने का दायित्व पूर्ण कार्य सम्हाला। गलत मार्ग पर चलने से पहले ही वह रुकने के लिए प्रेरित करता है, पर मनुष्य अन्तःकरण की उस पुकार को सुनकर भी अनसुनी करता और स्वेच्छा चारिता बरतता है तो उनका दण्ड रोग, शोक, क्लेश, कलह तथा मानसिक सन्ताप के रूप में भुगतता रहता है और माया से मूढ बना भ्रम जाल में पड़कर जीवन के बहुमूल्य क्षण मिट्टी के मोल नष्ट करता रहता है। इससे बड़ी मूढ़ता और क्या होगी।
ईश्वरीय सत्ता की अन्तरंग गुह्य में विद्यमान को प्रमाणित करते हुए हर्थटं स्पेसर ने कहा है, ईश्वर एक विराट् शक्ति है और प्राणीमात्र के प्रति वात्सल्य भाव से पूरित है क्योंकि वह समय-समय पर डरा, धमकाकर, पुण्यफल का प्रलोभन देकर मनुष्य को बुराईयों से बचाती तथा अच्छाइयों की ओर प्रोत्साहित करती है। राज्य के नियमों को हम इसलिए मानते है कि न मानने पर राजदण्ड का भय रहता है। नैतिक-नियमों का उल्लंघन करने पर भी भय उत्पन्न होता है, जबकि हम उनका पालन करने या न करने के लिए स्वतन्त्र रहते है। यह भय हृदय में विराजमान परमात्मा द्वारा ही बजाई गई खतरे की घण्टी होती है, जो इसे सुनकर सतर्क हो जाता है उसका कल्याण होता है, न सुनने वाले का तो अमंगल निश्चित है ही।
जन्म के पूर्व से लेकर जीवन सत्ता के अस्तित्व में आने, परिपक्व होने, क्रियाशील और समर्थ बनने तक परमात्मा जीव को गोदी में खिलाता, आपदाओं से उसकी सुरक्षा करता और समझदार हो जाने पर गलतियाँ न करने के लिए समझाता व डराता तक है। इतनी करुणावान-सत्ता का संरक्षण, अभिभावकत्व उपलब्ध होते हुए भी जो व्यक्ति पतन के गर्त में गिरते है, उनसे ज्यादा अभागा कौन होगा?
चिकित्सा शास्त्र पर नोबेल पुरस्कार विजेता फ्राँस के लियो विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा कैरले ने जटिल से जटिल रोगों का उपचार कर दिखाया है। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान को अपनी प्रतिभा द्वारा कई महत्वपूर्ण अनुदानों से भी सम्पन्न बनाया। जिन रोगों का उपचार तो दूर निदान करना भी बड़े-बड़े डॉक्टरों के वश में नहीं था, डा कैरल ने उनके अचूक इलाज और कारगर औषधियाँ खोज निकाली। उनसे जब इस सफलता का रहस्य पूछा गया तो वे बोले, ‘आम लोगों की तरी मैं भी एक साधारण मनुष्य हूँ और उनसे अधिक मेरी कोई सामर्थ्य भी नहीं है। मुझे जो सफलतायें प्राप्त करने का श्रेय मिला है, वे मेरे पुरुषार्थ का क्रम परमेश्वर के दिव्य सहयोग का प्रतिफल अधिक है।
प्रार्थना सभी करते है। उसमें ईश्वर से कुछ माँगते और याचना भी करते है। परन्तु देखा जाता है कि किन्हीं को सर्वथा निराश ही होना पड़ता है। डा कैरल जिस किसी भी रोगी का उपचार करते उससे कहते थे, प्रार्थना करो, सच्चे मन से प्रार्थना करो, अपनी भूलों के लिए पश्चात्ताप और भविष्य में निर्मल जीवन जीने की प्रतिज्ञा के साथ यदि प्रार्थना करोगे तो वह जरूर सुनी जायेगी। सच्चा इलाज तो प्रार्थना है और जो सच्चे हृदय से प्रार्थना करेगा वह शारीरिक ही नहीं आन्तरिक रोग-शोकों से भी छुटकारा पा जायगा।
वस्तुतः प्रार्थना फलित होती ही तब है जब वह सच्चे मन से की जाय। उसके लिए हृदय में सच्ची माँग उत्पन्न की जाय। क्योंकि प्रार्थना में अवलम्बन तो ईश्वर का ही लिया जाता है, पर वह ईश्वर सर्वव्यापी और परम कारुणिक सत्ता है। उसे हर किसी की इच्छा और आवश्यकता का ज्ञान है तथा वह उपयोगी और लाभदायक इच्छाओं की पूर्ति भी करना चाहता है। परन्तु इच्छा मात्र से कुछ नहीं होता। उसके लिए पुरुषार्थ भी करना पड़ता है। जन्म देने और पालन करने वाला पिता भी अपनी सन्तान के प्रति सभी जिम्मेदारियाँ तब तक निभाता है जब तक कि वह अपने पैरों पर खड़ा होने योग्य नहीं हो जाता। आत्म निर्भर होने के बाद वह उन्हीं कार्यों में योगदान देता है जो पुत्र के वश की बात नहीं है और पिता अपने अनुभवों के आधार पर उन्हें पूरा करा सकता है। लेकिन कोई जीवन भर ही अपने अभिभावकों पर आश्रित रहना चाहे, स्वयं कुछ न करने की बात सोचे तो न यह सम्भव है और न स्वाभाविक ही। परमात्मा भी अपनी ज्येष्ठ सन्तान मनुष्य को अपनी अनुकम्पा से तभी लाभान्वित करता है जब कि वह स्वयं भी पुरुषार्थ करने के लिए तत्पर हो।
पुरुषार्थ रहित प्रार्थना तो याचना ही कही जायगी और याचना अपने आप में हेय है क्योंकि दीनता, असमर्थता और परावलम्बन की प्रवृत्ति उसके साथ जुड़ी हुई है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाती नहीं घटाती हैं हाथ चाहे किसी व्यक्ति के सामने पसारा जाय अथवा भगवान के सामने झोली फैलाई जाय उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। बात एक ही है। चोरी चाहे किसी मनुष्य के घर में की जाय अथवा भगवान के मन्दिर में, चोरी तो चोरी है, बुराई है और बुराई हर स्थान पर बुराई ही रहेगी।
आत्म-गौरव को आघात पहुँचाने वाली प्रक्रिया, भले ही उसका नाम प्रार्थना ही क्यों न हो मनुष्य जैसी समर्थ सत्ता के लिए कदापि शोभा नहीं देती। जिस प्रार्थना को सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है उसका अर्थ अपनी आत्मा को परमात्मा का प्रतीक मानकर स्वयं को समझाना है कि वह अपने में ऐसी पात्रता विकसित करे जिससे आवश्यक विभूतियाँ उसकी योग्यता के अनुरूप सहस ही मिल सके। वर्षा होती है। पहाड़ों, मैदानों, नदियों और सरोवरों में बिना किसी भेदभाव के बादल पानी बरसाते है, पर पहाड़ की चोटियों पर पानी नहीं ठहरता, मैदानों में बह जाता है और मैदानों में भी सूख जाता है। लेकिन नदियाँ, सरोवर और गड्ढे, कुएँ पानी से भर जाते हैं क्योंकि उनमें वह रिक्तता, पात्रता विद्यमान रहती है जिनमें कि पानी ठहर सके।
यह एक तथ्य और भी ध्यान देने योग्य है कि सरोवर हो या गड्ढे, बाहर से उनमें पानी आता है तो वह उतना ताजा नहीं रहता जितना कि नदियों व कुँओं में ताजा और निर्मल रहता है। इसका कारण है नदियों तथा कुँओं के स्त्रोत अपने आप में होते है। अपने में निहित स्त्रोतों से कुँओं और नदियों में निरन्तर जल आता रहता है वह ताजा और शुद्ध तो रहता ही है, कभी सूखता भी नहीं। जबकि तालाब और गड्ढे पोखरों का पानी थोड़ी-सी धूप और जरा-सी गर्मी पड़ने पर सूख जाता है।
इसका कारण है नदी और कुँओं का संबंध स्त्रोतों के द्वारा जलोदधि से होता है। चूँकि सागर कभी सूखता नहीं इसलिए नदियाँ भी नहीं सूखती। कुँओं का संबंध भी यदि जमीन में बहने वाली गहरी जलधाराओं से होता है तो उनका पानी भी कभी खत्म नहीं होता। क्योंकि उनका संपर्क विराट् और अगाध जलराशि से सम्बद्ध हो जाता है। प्रार्थना भी मनुष्य का संपर्क विश्वव्यापी महानता के साथ घनिष्ठता बढ़ाती है। सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना का परिणाम आदर्शों के रूप में भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में होता है। उसके साथ जुड़ जाने पर प्रतीत होता है कि अपने दुःख क्लेशों, का हेतु कोई ओर नहीं अपनी ही तमसाछन्न मनोभूमि है, जिसमें अज्ञान और आलस्य ने जड़े जमाली है। प्रार्थना की कुदाली से अन्तःभूमि में व्याप्त कुत्सा और कुण्ठा का निराकरण कर अन्तःशक्ति के स्त्रोत को खोलने का प्रयास किया जाय तो मनुष्य की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती कोई भी आकाँक्षा बिना पूरी हुए नहीं रहती।
अन्तःशक्ति को जगाने वाली अन्तःज्योति की एक भी किरण उग सके तो उस अन्धकार से सहज ही छुटकारा मिल सकता है, जिसमें पग-पग पर ठोकरें लगती है और उनसे शोक सन्ताप उत्पन्न होता है। उस स्थिति में यह अन्तःप्रकाश उत्पन्न होता है, परमेश्वर यों साक्षी, दृष्टा, नियामक, उत्पादक, संचालक सब कुछ है, पर उसके जिस अंश की हम उपासना या प्रार्थना करते है वह सर्वात्मा है और पवित्रात्मा है।
यह प्रकाश उत्पन्न होने पर व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने तथा पेट और प्रजनन के लिए सीमाबद्ध रखने वाली वासना, तृष्णा की मूढ माया से छुटकारा पाने के लिए मन तड़पने लगता है। वासना, तृष्णा के इस भव बन्धन से छुटकारा पा लेना और अपने आत्मविस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना यही आत्मोद्धार है। इसी को आत्म साक्षात्कार भी कहते है। प्रार्थना में अपने उच्च आत्म स्तर से, परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करें और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करें जिससे सर्वत्र दिखाई पड़ने वाला अन्धकार दिव्य प्रकाश के रूप में परिणत हो सके।
प्रार्थना वही सच्ची है जो अपनी आत्मा की गौरव गरिमा के अनुरूप कही जायगी जिसमें यह कामना जुड़ी रहे कि परमात्मा हमें इस लायक बनाये, जिसमें हम उसके सच्चे भक्त अनुयाई एवं पुत्र कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकें। प्रार्थना में ईश्वर से वह शक्ति प्रदान करने की बिनती की जाती है जिसके आधार पर भय और प्रलोभन से मुक्त होकर विवेक सम्मत कर्तव्य पथ पर साहसपूर्वक चला जा सके और इस मार्ग में जो अवरोध आते हैं उनकी उपेक्षा करते हुए अटल रहा जा सके। कर्मों के फल अनिवार्य हैं, अपने प्रारम्भ भोग जब उपस्थित हों तो उन्हें धैर्यपूर्वक सह सकने और प्रगति के लिए परम पुरुषार्थ करते हुए कभी निराशा न होने वाली मनःस्थिति बनाते रहा जा सके।
मन को इतना निर्मल बना देने का अनुनय कि कुकर्मों की ओर प्रवृत्ति ही न हो और हो भी तो उन्हें करने का दुस्साहस न उठे। इस प्रकार मनुष्य जीवन को, अपनी आत्मा के स्तर को निरन्तर ऊँचा उठाने और गतिशील बनाये रहने की माँग ही सच्ची प्रार्थना कही जायगी। जिसमें धन, सम्मान, स्वास्थ्य, सफलता आदि की याचना की गई हो, वह प्रार्थना नहीं कही जा सकती। जिसमें अपने पुरुषार्थ, कर्त्तव्य के अभिवर्धन का स्मरण न हो ऐसी प्रार्थना को याचना मात्र कहा जायगा और ऐसी याचनाओं की सफलता प्रायः संदिग्ध ही रहती है।
डा. एमेली कोडी, जिन्होंने परामनोविज्ञान पर वर्षों तक खोज की है और कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रणयन किया है, लिखा है, “प्रार्थना मात्र ईश्वर को धन्यवाद देने या उससे कुछ याचना करने के प्रक्रिया नाम नहीं है। वरन् यह वह मनःस्थिति है, जिससे व्यक्ति शंका और सन्देहों के जंजाल में से निकल कर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है। अहंकार को खोकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और उद्धत मनोविकारों को ठुकरा कर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। जिसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार पवित्र और परमार्थी बन कर जिया जायगा। ऐसी गहन अन्तःस्थल से निकली हुई प्रार्थना जिसमें आत्म परिवर्तन की आस्था जुड़ी हुई हो भगवान का सिंहासन हिला देती है। ऐसी प्रार्थना के परिणाम भी इतने अद्भुत होते हैं कि उन्हें चमत्कार भी कहा जा सकता है।
जब मन दुर्बल हो रहा हो, मनोविकार बढ़ रहे हों और लगता हो कि पैर अब फिसला, तब फिसला, तो सच्चे मन से परमात्मा को पुकारना चाहिए। गज को ग्राह के चंगुल से छुड़ाने वाले भगवान, पतन से परित्राण पाने के लिए व्याकुल आर्त भक्त की पुकार अनसुनी नहीं करते है और उस मनोबल के रूप में अन्तःकरण में उतरते हैं जिसे गरुड कहा जा सकता है तथा जो पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों के सर्पों को उदरस्थ करने का अभ्यासी है भी। परमात्मा से यही माँग भी जाना चाहिए। समझदारी इसी में है। भिखारी बनकर राजा के पास पाँच दस पैसे माँगने पहुँचा जाय तो उसे मूर्ख ही कहा जायगा। फिर ईश्वर तो राजाओं का भी राजा, सम्राटों का भी सम्राट और अधिकों का भी महाधिपति है, उससे लौकिक याचनाएँ पुरी करने के लिए कहना भिखारी जैसी मूर्खता करने जैसा है। भगवान से वही माँगना चाहिए जिन्हें देने में वह भी सन्तुष्ट होता है और प्राप्त होने पर स्वयं को भी गौरव की अनुभूमि होती है। वह माँगने योग्य वस्तु आत्मबल, मनोबल, आत्मबोध, अन्तःप्रकाश अथवा समर्पण स्वीकार ही है।
भगवान को अपने में और अपने का भगवान में समाया होने की अनुभूमि जब इतनी प्रबलता के साथ अनुभूत होने लगे कि उसे कार्यरूप में परिणत किये बिना रहा ही न जा सके तो यही समर्पण भाव की परिपक्वता है। ऐसी शरणागति व्यक्ति को द्रुतगति से देवत्व की ओर अग्रसर करती है तथा यह गतिशीलता इतनी प्रभावकारी होती है कि भगवान को अपनी समस्त दिव्यता सहित भक्त के व्यक्तित्व में उतरना पड़ता है।
आरम्भ अपने पापों के पश्चात्ताप, निर्मल जीवन जीने के संकल्प और सफलताओं के लिए विनम्रतापूर्वक ईश्वर को धन्यवाद देने से करना चाहिए। निस्सन्देह सफलताएँ अपने ही परिश्रम पुरुषार्थ का प्रतिफल होती है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उस परिश्रम पुरुषार्थ की प्रेरणा देने वाला परमात्मा अपने अन्तःकरण में ही विद्यमान है। यदि इस तथ्य को नकारकर अपने क्षुद्र अस्तित्व का अभिमान किया जाता है तो मदोन्मत्त हाथी की तरह न केवल अपनी शक्तियों का विध्वंसकारी दुरुपयोगी होने की सम्भावना बनती है, वरन् उनके भी नष्ट होने का संकट खड़ा रहता है। अस्तु जो कुछ प्राप्त है उसके लिए परमात्मा के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद के बोध से भर कर परमात्मा से आत्मबल, मनोबल, आत्मबोध के ही दिव्य वरदान की माँग की जाय। सर्वतोभावेन परमात्मा के प्रति समर्पित भक्त का योगक्षेम वहन करने की प्रतिज्ञा भगवान ने स्वयं की है, पर उस शर्त को भी तो पूरा किया जाना चाहिए जो पात्रता विकसित करने, हृदय को वासनाओं और तृष्णाओं से रिक्त करने के रूप में जुड़ी हुई है।
कठोपनिषद् में एक उपाख्यान आता है। आत्मज्ञान की इच्छा से अभिप्रेरित होकर नचिकेता यमराज के पास पहुँचा! यमराज ने उसे सम्पत्ति, श्री ऐश्वर्य जैसे अनेकों प्रलोभन दिये तथा कहा कि वह चाहे तो इन सबका उपभोग कर सकता है। उसे वे सारी वस्तुएँ दी जायेंगी जिसे साँसारिक सुख कहते है। नचिकेता उन प्रलोभनों से अप्रभावित रहा। उसने यमराज से प्रश्न किया देव! क्या ये वस्तुएँ हमको शाश्वत आनन्द की अनुभूमि कराने में सहयोग देगीं। यमराज ने उत्तर दिया, नहीं।
तब नचिकेता ने कहा, ‘श्रेष्ठ फिर इन नश्वर वस्तुओं को लेकर मैं क्या करूंगा मुझे तो श्रेय मार्ग को बताइये जिसका अवलम्बन लेकर आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर सकूँ।’ यमराज ने नचिकेता के निर्लिप्त भाव को जानकर आत्म-ज्ञान का उपदेश दिया।
जीवन में दो प्रकार की परिस्थितियाँ प्रस्तुत होती हैं-एक श्रेय दूसरा प्रेय। प्रेय आकर्षणों का केन्द्र बिन्दु है। उस पर चलने वाला इन्द्रियजन्य सुखों में अपनी जीवन सम्पदा झोंकता रहता है। जबकि श्रेय मार्ग आन्तरिक सन्तोष शान्ति प्रदान करने वाला है। यहाँ बात दोनों के मतभेद की नहीं, बल्कि उनके स्तर की कही जा रही है। प्रेय, श्रेय साधन बनें यह तो बात समझ में आती है, किन्तु यदि आन्तरिक शान्ति, सन्तोष गँवाकर भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त की जा रही है तो वे अन्ततः दुःखदायी ही सिद्ध होंगी।
शास्त्रों में भौतिक प्रलोभनों, आकर्षणों से दूर रहने की बात कही गयी है। इन प्रतिपादनों का उद्देश्य भौतिक पदार्थों को बिल्कुल ही छोड़ देने से नहीं है बल्कि यह है कि उनके प्रति आसक्त न रहा जाय। भौतिक शरीर जब तक है तब तक भौतिक साधनों का परित्याग कर सकना सम्भव भी नहीं है। अन्न, जल, वायु, कपड़ा की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता है। ये सब श्रेय की प्राप्ति में सहयोगी हैं बाधक नहीं। किन्तु यदि भौतिक उपलब्धियों को ही लक्ष्य बना लिया गया तो भारी भूल होगी।
पाश्चात्य जगत का उदाहरण सामने है। भौतिक समृद्धियों में बढ़ा-चढ़ा तथा नवीन अनुसन्धानों का केन्द्र बिन्दु अमेरिका माना जाता है। सुख-साधनों की जितनी बहुलता वहाँ है, समस्याएँ भी वहाँ उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में जितनी अशान्ति वहाँ दिखायी देती है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं है। कारणों की तह में जाने पर पता लगता है कि ‘प्रेय’ को ही लक्ष्य माना गया। साधन जीवन के साध्य बन बैठे। भौतिक पदार्थ चेतना पर हावी हो गया। आन्तरिक शान्ति संतोष के मूल्य पर भौतिक समृद्धि खरीदी गई।
अमेरिका की स्थिति का वर्णन करते हुए समाज शास्त्र के विशेषज्ञ इंग्लैण्ड निवासी श्री विल्फ्रेड वेलाव अपनी पुस्तक में लिखते हैं-
“पिछले दशक में जितनी भौतिक प्रगति हुई है अशान्ति भी उसी अनुपात में बढ़ी है! भौतिक समृद्धि की दृष्टि से अमेरिका सभी राष्ट्रों से आगे है। किन्तु इतना अशांत जीवन भी अन्यत्र कहीं नहीं है जितना कि अमेरिका में। इस अशान्ति का सर्वाधिक कारण समृद्धि का मोह और उपभोग की आतुर लालसा है।”
शास्त्रकारों ने इस कारण से ही ‘प्रेय’ से बचने तथा श्रेय की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है। प्रेय का-साधन का-सदुपयोग किया जाय, किन्तु लक्ष्य हो शाश्वत आनन्द की -शान्ति-सन्तोष की प्राप्ति करना। जीवन लक्ष्य को यदि भुला दिया गया, भौतिक आकर्षण को लक्ष्य माना गया तो जीवन-सम्पदा का यह दुरुपयोग ही होगा।
जीवन सर्वाधिक प्रिय वस्तु है। मनुष्य अपने आपसे और अपने जीवन से जितना प्यार करता है उतना शायद ही किसी और से करता हो। इसी सर्वाधिक परम प्रिय जीवन को सुखी, सन्तुष्ट और तृप्त रखने के लिए वह तरह-तरह के साधन जुटाता है। उचित अनुचित सभी तरह के उपाय अपनाकर जीवन को खुशहाल बनाने की चेष्टा करता है और जीवन पर आ पड़ने वाले आकस्मिक खतरों से निपटने के लिए तो कभी-कभी इतना दुस्साहस भी कर बैठता है कि सामान्य स्थिति में रहते वह स्वयं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।
जिस समय जीवन पर संकट की सम्भावना बढ़ जाती है तो उस समय व्यक्ति में न जाने कहाँ से इतना बल आ जाता है कि वह अपनी स्थिति से भी अधिक सक्रियता बरतने लगता है। जंगल में शेर यदि पीछे भाग रहा हो और व्यक्ति उससे अपने प्राण बचाने के लिए दौड़ने लगा हो तो इतना तेज दौड़ने लगता है कि किसी बड़ी दौड़ प्रतियोगिता में भी कोई व्यक्ति क्या भागता होगा? अग्निकाण्ड, बाढ़ और प्राकृतिक प्रकोपों के समय दुर्बल रोगी और कमजोर व्यक्तियों का जीवन के लिए संघर्ष भी इतना प्रबल रहता है कि लाखों रुपये के पुरस्कार का आकर्षण भी उसे इतना साहसी नहीं बना सकता। यह जिजीविषा ही है कि व्यक्ति बुरी से बुरी परिस्थितियों और गम्भीर से गम्भीर खतरों में उलझ जाने के बाद भी उनमें से बच निकलने के लिए अन्त तक संघर्ष करता है।
इन सब बातों से सभी परिचित हैं और सभी कोई जानते है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन से बेहद लगाव रहता है। जीवन परम प्रिय है यह सच है लेकिन यह भी सच है कि कोई अवसर ऐसे आते है जब व्यक्ति अपने जीवन से ही घृणा करने लगता है और उसे समाप्त कर देने में क्षण भर की भी देर नहीं करता। आये दिनों होने वाली आत्म-हत्याओं की घटनाओं को देखते या उनके समाचारों को पढ़ते हुए हम इस बात का आसनी से अनुमान लगा सकते है कि जीवन को सबसे अधिक प्यार करने वाला मनुष्य क्या जीवन से इस प्रकार घृणा भी करने लगता है। दूसरे व्यक्तियों के द्वारा की गयी आत्म-हत्याओं के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तुरन्त उन्हें कायर बुज़दिल और अकर्मण्य कह दिया जाता है। परन्तु अपने संबंध में प्रायः कोई नहीं कहता कि वह जीवन से उन्हीं लोगों की तरह घृणा कर रहे है। यह बात और है कि आत्म-हत्या का साहस नहीं जुटा पाते। अन्यथा जिस प्रकार का जीवन हम जीते है उससे हमें जरा भी सन्तोष नहीं है और जीवन से बहुत प्रेम करते हुए भी उससे क्षुब्ध, असन्तुष्ट तथा खिन्न रहते है।
“अमेरिका के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डा अर्नाल्ड जॉन का कथन है कि-अधिकाँश व्यक्ति जाने-अनजाने प्रतिदिन आत्मविनाश की ओर बढ़ते रहते हैं और हममें से प्रत्येक व्यक्ति नित्यप्रति अपनी हत्या करता है। अधिकाँश मामलों में यह आत्महत्या अचेतन प्रक्रिया ही होती है और हमें इसका जरा भी पता नहीं चलता। उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति ऊपरी मंजिल की खिड़की से नीचे झाँकता है तो उसे हल्का-सा भय लगने लगता है। इस भय का कारण यह नहीं है कि वह अचानक आरक्षित हो उठता है अथवा कमरा डगमगाने लगता है। बल्कि इसका कारण यह अहसास है कि कोई उसे नीचे कूदने या गिर पड़ने के लिए प्रेरित करता है। कुछ लोग तो इस डर के कारण नीचे झाँकने तक की हिम्मत नहीं करते।”
“सोसायटी आफ साइकोलोजिकल रिसर्च” की अमेरिकी शाखा के अध्यक्ष डा थामस डब्ल्यू. साल्मन ने भी इस बात का समर्थन करते हुए लिखा है-”हममें से प्रत्येक व्यक्ति जीवन में एक बार आत्म-हत्या का विचार अवश्य करता है।”
कहा नहीं जा सकता कि उपरोक्त मनोवैज्ञानिकों की यह बात कहाँ तक सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य जीवन में एक बार आत्म-हत्या अवश्य करता है। क्योंकि यह प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने निजी अनुभव की बात है। लेकिन जिस प्रकार का जीवन लोग जीते है उससे एक बात तो अवश्य स्पष्ट होती है कि अधिकाँश व्यक्तियों को अपने जीवन से सन्तोष नहीं शिकायत ही ज्यादा रहती है। अधिकाँश व्यक्तियों को असफलताओं, अभावों और प्रतिकूलताओं के प्रति खीझ से भरा हुआ पाया जा सकता है। उन पर अपना कोई बस न चलता देखकर लोग जीवन से ही शिकायत करने लगते है। असफलताओं और प्रतिकूलताओं को अपनी मनमर्जी के अनुसार तुरन्त बदला नहीं जा सकता। फलतः उनके कारण उत्पन्न होने वाली खोज जीवन से ही शिकायत करने लगती है, जैसे कोई बाहर अपमानित हुआ व्यक्ति विवशता के कारण उस स्थान पर अपमान का प्रतिकार न कर पाने के कारण अपने स्त्री, बच्चों पर गुस्सा करने लगता है। वैसा ही कुछ व्यवहार अनबूझ समस्याओं के कारण उत्पन्न होने वाली खीझ के कारण जीवन के साथ किया जाने लगता है।
इस तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति जीवन की कठोरताओं और प्रतिकूलताओं, कठिनाइयों और अभावों का कहीं नाम भी नहीं होता वे भी आत्म-हत्या कर लेते है और अधिकांशतः तो ऐसे ही व्यक्ति आत्म-हत्या करते है। अभावग्रस्त जीवन जीने वाले व्यक्ति फिर भी अपनी जिन्दगी की गाड़ी जैसे-तैसे खींचते रहते हैं लेकिन सम्पन्न, प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्ति बहुत जल्दी अपने जीवन से स्नेह सम्बन्ध तोड़ देते है। इसका क्या कारण है?
अमेरिका की प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री मर्लिनमनरो की आत्महत्या अभी भी गुत्थी बनी हुई है। उसके पास रुपये, पैसों का भी अभाव नहीं था। किसी बड़े उद्योगपति से वह अधिक सम्पन्न थी। कहा जाता है कि उसके बराबर सम्पन्न व्यक्ति कम से कम भारत में तो कोई नहीं है। सम्पन्नता के अतिरिक्त यश की दृष्टि से भी उसे काफी सफलता मिली है। सम्पत्ति, यश, प्रतिष्ठा और प्रभाव में बहुत अधिक आगे बढ़ी हुई मर्लिन ने आत्महत्या कर ली तो आज तक कोई भी उसके कारणों पर प्रकाश डालने में सफल नहीं हो सका है।
कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के सुरक्षा सचिव जेम्स फोरेप्टाल ने खिड़की से कूदकर आत्म-हत्या कर ली। इस व्यक्ति के एक संकेत पर अमेरिका सेना और वहाँ के युद्धास्त्र, परमाणु-शस्त्र किसी भी राष्ट्र को धूरिसात् कर सकते थे। इसकी कल्पना ही की जा सकती है कि उस व्यक्ति का कितना प्रभाव, कितना महत्व और कितना सम्मान हो सकता है कि अमेरिका प्रशासन में राष्ट्रपति भी किसी देश से सन्धि करने या तोड़ने, संबंध बनाने बिगाड़ने के लिए उससे परामर्श लिये बिना कोई निर्णय नहीं लेता है तथा उसके परामर्श को महत्व देना ही होता है। इतने महत्वपूर्ण पद पर आसीन व्यक्ति को सुविधा, सम्पन्नता, प्रतिष्ठा, पद और सम्मान में किस बात की कमी हो सकती थी, परन्तु जेम्स फारेष्टाल को किन कारणों से विवश होकर आत्म-हत्या करनी पड़ी यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया।
कारण चाहे जो भी हो परन्तु इस तरह के उच्चपदों और उन्नति के उच्च शिखरों पर पहुँचे व्यक्तियों को अपनी सफलता से सन्तोष नहीं होता। यह असन्तोष ही जीवन को नष्ट करने का कारण बन जाता है। कई बार तो इस असन्तोष के बड़े विचित्र-विचित्र रूप सामने आते है। जैसे अभी कुछ समय पूर्व लन्दन के एक 82 वर्षीय व्यक्ति अल्फ्रेड ने केवल इसलिए आत्म-हत्या कर ली थी कि वह अपने आपको अपने एक मित्र से अधिक वृद्ध होता अनुभव करता था।
मेनचेस्टर के डा हेमिंग्वे से यह नहीं देखा गया कि उनके सिर के बाल उड़ रहे है। इस बात से चिन्तित होकर उन्होंने आत्म-हत्या कर ली।
मेक्सिको के निर्वाचित मेयर फेमिन सिवियर ने सन् 1970 में केवल इसलिए आत्महत्या कर ली कि उन्हें अपना पद पसन्द नहीं था। टर्की की एक महिला इअदिर ने इसलिए आत्महत्या कर ली-वह सोचती थी-मैं काफी जी चुकी हूँ। इअदिर की आयु मात्र चालीस वर्ष की थी। इस तरह की आत्म-हत्यायें कारणों की दृष्टि से विचित्र सनकीपना ही लगती है। वस्तुतः यह सनकें नहीं है, लम्बे समय से चले आ रहे जीवन यात्रा के प्रति ऊब असन्तोष है और वह असन्तोष गला काट देता है।
इसका अर्थ है कि जीवन अपने आपमें कोई प्रिय वस्तु नहीं है अथवा वह इस योग्य नहीं है कि उसे जिया जाय प्रेम किया जाय। जीवन की सार्थकता, उपयोगिता तभी सिद्ध होती है जब वह किन्हीं आदर्शों के लिए जिया जा रहा है। किन्हीं उद्देश्यों के लिए जीवन समर्पित हो। वैसी स्थिति में जीवन के प्रति ही नहीं मृत्यु का वरण जीवन का उत्सर्ग करने के प्रति भी एक उल्लास का भाव रहता है। जिन कारणों से जीवन के प्रति असन्तुष्ट होकर, खीझकर लोग आत्महत्या करते है वे जानते हैं कि मरने के पहले हमें बड़ी पीड़ा सहनी पड़ेगी। इसके बावजूद भी वे आत्महत्या का दुस्साहस करते हैं इसका अर्थ है कि वे जीवन से कितने ऊब चुके हैं, कितने परेशान है।
परन्तु इतिहास में ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें स्वेच्छया मृत्यु का वरण किया गया और वह भी बड़े हर्ष तथा गौरव के साथ। मुगल काल में राजस्थान की महिलाओं द्वारा किया जाता रहा, जौहर उसी स्तर की आत्महत्या रहा है जिससे देश व समाज का मान घटा नहीं उसका गौरव बढ़ा ही है। मेवाड़ की राना पद्यिमी, माण्डव की राना रुपमती और अन्यान्य महिलाओं ने अपने सतीत्वशील की रक्षा का कोई उपाय न देखकर कभी आग में कूदकर तो कभी विष खाकर जीवन का उत्सर्ग कर दिया। लेकिन इससे उन्हें कायर, अभिशप्त अथवा डरपोक नहीं वीर, बलिदान और गौरवान्वित होने का ही सौभाग्य मिला। इसलिए कि उन्होंने अपने किसी आदर्श को जीवन से भी मूल्यवान समझा। स्वतन्त्रता संग्राम के समय क्रान्तिकारी अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हँसते-हंसते फाँसी पर चढ़ गये- उन्हें भी आत्मसन्तोष हुआ तथा राष्ट्र को भी उन पर गर्व रहा।
जीने की आकाँक्षा सभी में रहती है, जीवित रहने के लिए प्रयत्न और संघर्ष भी सभी करते है। अतः कहा जा सकता है कि जीवन के प्रति प्रेम भी सभी को होना है। यहाँ तक तो कोई असहमत नहीं होता। उलझन तब पैदा होती है कि जब लोग जीवन से ऊबकर आत्महत्या कर लेते है। इसका अर्थ है जीवन का कोई उद्देश्य भी है, जिसे प्राप्त न करने अथवा उस दिशा में अभीष्ट प्रगति न हो पाने अथवा उस उद्देश्य से सर्वथा विमुख दिशा में चलने के कारण इतना पश्चात्ताप, खीझ और ऊब होती है, इतनी आत्म प्रताड़ना मिलती है कि उसके कारण का विश्लेषण न कर पाने के कारण लोग आत्महत्या कर बैठते है।
किसी आदर्श के लिए, सिद्धान्त की रक्षा के लिए लोग हँसते-हँसते जीवन का उत्सर्ग कर देते है। इसका अर्थ है कि कुछ मूल्य ऐसे भी है जिन्हें चुकाने के लिए जीवन का भी मोह छोड़ देना पड़ता है और उस बलिदान से ऐसा भी नहीं लगता कि कोई घाटे का सौदा नहीं हुआ। व्यक्ति उसमें भी सन्तोष गौरव और हर्ष की अनुभूति करता है।
महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कितना लम्बी जिन्दगी जीता है महत्वपूर्ण यह है कि उसका जीवन कितना सार्थक और सोद्देश्य है। साधन सुविधा सम्पन्न लम्बा जीवन भी एक दुर्वह भार बन जाता है यदि उसके साथ आदर्श और सिद्धान्त न जुड़े हों तो, और अब तो यह भी अनुभव किया जाने लगा है कि व्यक्ति अपने जीवन की व्यर्थता से इतना ऊब भी सकता है कि वह किसी भी क्षण आत्महत्या का निश्चय कर बैठे। गौरव और गरिमा तो इस बात में है कि व्यक्ति उच्च मानवीय आदर्शों, उत्कृष्ट आस्थाओं तथा आदर्शवादी मान्यताओं को अपनाते हुए आत्मा की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे। तभी जीवन का आनन्द है और जीने में सन्तोष है। अन्यथा उद्देश्य को भूलकर की गयी यात्रा का अन्त कहाँ होगा, यात्री उसमें अपने आपको कहाँ नष्ट कर लेगा अथवा कब अपनी यात्रा को व्यर्थ समझकर .... उठेगा कहना कठिन है। कोई व्यक्ति निरुद्देश्य जीवन यात्रा अथवा विपरीत दिशा में चलकर आत्महत्या करे अथवा न करे मनीषी विचारकों की दृष्टि में वह आत्महत्या तो है ही। क्योंकि वह अपना समय, श्रम, उपलब्धियाँ और साधन तो नष्ट कर ही रहा है।
पार्थिव शरीर पार्थिव सीमाओं से आबद्ध रहे यह स्वाभाविक ही है। किन्तु शरीर को ही जीव चेतना का आदि, अन्त मानने वालों को उस समय हतप्रभ और निरुत्तर रह जाना पड़ता है, जब जीवात्मा की अपार्थिव सत्ता और दिव्य क्षमताओं का प्रमाण प्रस्तुत करने वाली घटनायें सामने आती है। तब आत्मा को स्वतन्त्र सत्ता न मानने, उसे शरीर-चेतना भर समझने की उनकी मान्यता अधूरी और भ्रामक सिद्ध हो जाती है। प्रत्यक्ष को ही वास्तविक और प्रमाणभूत मानने वाले उस समय आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं, जब परोक्ष के रहस्यमय गह्वर से बाहर आये विचित्र और अलौकिक-असामान्य घटनाक्रम निर्विवाद रूप में प्रमाणित हो जाते है।
प्रथम महायुद्ध के समय डान और बाब नामक दो अमरीकी मित्र सैनिक युद्ध के एक मोर्चे में साथ-साथ घायल हो गये। डान का प्राणाँत हो गया। आहत बाब उपचार से ठीक हो गया। पर स्वस्थ होने के बाद वह डान जैसा व्यवहार करने लगा। वह स्वयं को डान ही कहता। युद्ध समाप्ति पर उसे छुट्टियाँ मिलीं। वह घर जाने को रवाना हुआ। किन्तु बाब के घन न पहुँचकर डान के ही घर जा पहुँचा। वहाँ उसके माँ-बाप को देखकर उतना ही प्रसन्न-पुलकित हुआ, जैसा डान होता था। आचरण और व्यवहार में डान से पूर्ण सादृश्य हो जाने पर भी बाब का रूपरंग पूर्ववत् ही था। डान की अपेक्षा वह कुछ ताँबई रंग का था। माँ अपने बेटे का चेहरा-मोहरा कैसे न पहचानती। उसने उसे बेटा मानने से इन्कार कर दिया। इस पर वह बाब रूपी नया डान भावुक हो उठा। भावातिरेक में स्वयं को अपमानित अनुभव करने वाले उसने अतीत की ऐसी-ऐसी नितान्त निजी और प्रामाणिक घटनाएँ बताई कि उन माँ-पिता को विश्वास हो गया कि यह हमारा बेटा डा नहीं है। फिर उसकी चेष्टाएँ, चाल-ढाल सभी कुछ तो डान जैसा ही था। उन्होंने समझा, अपने बेटे की मृत्यु की जो खबर फौजी केन्द्र से हमें मिली थी, वह शायद भ्रान्ति पर आधारित हो। बाद में, छानबीन करने वालों ने इस आश्चर्यजनक तथ्य का पता लगाया और यही निष्कर्ष निकाल सके कि मृत डान की आत्मा बाब के शरीर में प्रविष्ट हो गई।
विश्व विख्यात चित्रकार गोया की आत्मा अमेरिका की एक विधवा हैनरोट के भीतर प्रविष्ट होने की घटना भी सर्वविदित है। नये शरीर में गोया ने “ग्वालन” नामक एक अति विशिष्ट कलाकृति का निर्माण किया। हैनरोट ने जीवन में कभी रंग-कूँची छुई भी नहीं थी “ग्वालन” के निर्माण के बाद वह चित्र, उसकी सृजनकर्मी और स्वयं के भीतर गोया की आत्मा के प्रविष्ट होने का उसका दावा-ये सभी कई दिनों तक अमरीकी-अखबारों में सुर्खियाँ बनकर छाये रहे।
आद्य शंकराचार्य द्वारा शास्त्रार्थ में काम-कला की जानकारी की आवश्यकता आ पढ़ने पर परकाया-प्रवेशविद्या के अपने ज्ञान के आधार पर मृत सुधन्वा के शरीर में प्रवेश किया था और अपना प्रयोजन पूरा कर अपने शरीर में फिर वापस आ गये थे।
“पायोनियर” अन्तरिक्षयान को अमरीका ने बृहस्पति ग्रह की खोज के लिये जब छोड़ा, उसके कई महीनों पूर्व एक अमरीकी आत्मवादी ने अपने जीवित शरीर से ही, सूक्ष्म शरीर को पृथक् कर उस ग्रह की यात्रा की।इन सज्जन का नाम है-इन्गोस्वान। इन्होंने वहाँ के वातावरण, दृश्य आदि का वर्णन अपनी यात्रा के अनुभवों के बाद अमरीकी कान्सुलेट को लिख भेजा, जो उनके कार्यालय में सुरक्षित रहा। इसी बीच हेराल्ड शरमन नामक एक अन्य आत्मवादी ने भी उस एक हजार लाख किलोमीटर दूर ग्रह ‘बृहस्पति’ की यात्रा की। उन्होंने भी अपने विवरण दर्ज करा दिये। महीनों बाद जब ‘पायोनियर-10’ बृहस्पति-’अभियान से लौटा तो वह अपने साथ अतिविकसित वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा एकत्र सूचनाएँ लाया। ये सूचनाएँ, स्वान और शर्मन द्वारा प्रस्तुत सूचनाओं से मेल खा रहीं थी। तीनों के विवरण में सादृश्य था, जबकि तीनों द्वारा एकत्र सूचनाएँ, एक-दूसरे को ज्ञात नहीं थी और फिर अन्तरिक्षयान कोई मनुष्य नहीं था, वह तो वहाँ के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों के द्वारा संचालित योजना के अनुसार भेजा गया यान था, जिसकी सभी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ पूर्णतः गुप्त रहती है। महीनों पूर्व, बिना किसी उपकरण के दोनों आत्मवादियों ने एक भी पैसे खर्च किये बिना अपनी जीवात्मा की सामर्थ्य से जो जानकारियाँ संचित की थीं’ वे करोड़ों डालर और सैकड़ों मेधावी मस्तिष्कों के अहर्निश श्रम के खर्च से प्राप्त सूचनाओं जैसी ही थी।
जब यह बात अमरीकी पत्र-पत्रिकाओं में छपी।’ तो वहाँ की एक विज्ञान पत्रिका के सम्पादक ने उन आत्मवादियों को चुनौती दी कि वे जरा बुध ग्रह की यात्रा करें। चुनौती स्वीकार कर ली गई।
दोनों आत्मवादियों ने उस ग्रह की यात्रा सूक्ष्म शरीर द्वारा की। फिर पत्रिका को लिख भेजा कि ‘मरक्यूरी यानी बुध ग्रह का वातावरण पतला है और वहाँ विरल चुम्बकीय क्षेत्र भी है। तब तक बुध के बारे में मान्यता यही थी कि वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र नहीं है। उस विज्ञान पत्रिका ने उपहासास्पद टिप्पणियों के साथ उक्त विवरण छापे। बाद में “मेरीनर-10” अन्तरिक्षयान ने बुध ग्रह की परिक्रमा की और लौटकर वही निष्कर्ष साथ लाया। अब तो विज्ञानवादी चकित हो गये।
स्पष्टतः ये घटनाएँ भूतों की हलचलों की घटनाओं से भिन्न कोटि की है। मृत्यु के बाद प्रेतात्माओं द्वारा चाहे जहाँ आ-जा सकने, सताने, चौंकाने आदि की घटनाएँ तो प्रकाश में आती रही है। देव-पितरों द्वारा सत्कर्मों हेतु सहयोग और सद्भाव भरी प्रेरणाएँ देने के प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। मरने के बाद व्यक्ति की आत्मा स्थूल-शरीर की सीमाओं में नहीं बँधी रहती, इतना तो स्पष्ट होता रहा है। किन्तु प्रस्तुत घटनाएँ जीवित स्थिति में भी व्यक्ति में ऐसी समस्त क्षमताएँ सन्निहित होना सिद्ध करती है। वियना की मनःसंस्थान प्रयोगशाला और अमरीका के कैलीफोर्निया की मानसविज्ञान शोध-संस्थानों में जीवात्मा की इन क्षमताओं के द्योतक उदाहरणों की निरन्तर छानबीन चल रही है और उनकी प्रामाणिकता से वैज्ञानिक आश्चर्यजनक निष्कर्षों पर पहुँच रहे है। वे व्यक्ति-सत्ता की विलक्षण गहराइयों और जीवात्मा की अकूत शक्तियों को मानने को बाध्य है।
स्पेन में ऐसी ही एक आश्चर्यजनक घटना उस समय सामने आई, जब दो लड़कियाँ एक बस से लौट रही थीं। इनमें से एक का नाम था हाला। दूसरी का मितगोल। बस रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मितगोल इस दुर्घटना में पिस गई। हाला पूरी तरह सुरक्षित रही, किन्तु भय से संज्ञाशून्य हो गई। कुछ समय बाद उसे होश आया। इसी बीच दुर्घटना का समाचार सुनकर दोनों लड़कियों के अभिभावक निजी वाहनों से दुर्घटनास्थल पहुँचे। हाला के पिता उसकी ओर बढ़े और प्यार से पुचकारा-”मेरी प्यारी बच्ची!” पर, उन्हें वहीं ठिठक जाना पड़ा। वह लड़की बोल पड़ी-”मैं हाला नहीं, मितगोल हूँ।” वह मितगोल के पिता की ओर बढ़ी।
दोनों अभिभावक चकित थे। लड़की मितगोल के पिता के साथ जाने को उद्यत थी। उसे दर्पण दिखलाया गया ताकि वह अपना भ्रम दूर कर सके और पूर्वस्मृति लौटा सके। परन्तु दर्पण देखते ही वह चौंक उठी, मानो मितगोल का ही रूप बदल गया हो। उसने मितगोल के पिताजी की ओर देखा और बोली-”पिताजी! यह क्या हुआ? मैं बदल कैसे गयी?”
हाला के पिता किसान थे। वह अधिक पढ़ नहीं पाई थी। मितगोल के पिता प्राचार्य थे। वह कालेज में पढ़ रही थी और विभिन्न विषयों की जानकारी रखती थी।
लड़की को समझा-बुझाकर हाला के पिता के साथ भेजा गया। पर वहाँ उसका व्यवहार पूरी तरह बदला हुआ था। एक दिन वह उस विद्यालय में जा पहुँची, जहाँ मितगोल पड़ती थी। वहाँ छात्रों के समूह को सम्बोधित करने लगी और “स्पिनोला के तत्व-ज्ञान” पर भाषण दे डाला। ऐसे अनेक प्रमाणों के बाद प्राचार्य महोदय को मानना पड़ा कि वह मितगोल ही है। वे उसे अपने साथ रखने लगे और रूप-रंग के अतिरिक्त उसमें कुछ भी परिवर्तन कभी देखा भी नहीं। वह सचमुच मितगोल जैसा ही आचरण करती।
ये घटनाएँ जीवात्मा की असीम सामर्थ्य पर प्रकाश डालती है। परकाया-प्रवेश और अनन्त अन्तरिक्ष की इच्छानुसार यात्रा जैसी क्षमताएँ उसमें भरी पड़ी है। विज्ञान इस नये क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है और उसकी खोजों के निष्कर्ष भारतीय मनीषियों के प्राचीन प्रतिपादनों को पुष्ट कर रहे है। यदि इन प्रयोगों को सही रीति से कार्यान्वित किया गया, तो आत्महत्या के दिव्य आलोक का रहस्य स्पष्ट हो सकेगा और उससे व्यक्ति, समाज एवं विश्व के जीवन-प्रवाह में श्रेष्ठ, शुभ एवं ऊर्ध्वगामी परिवर्तन आ सकेगा।
धर्मगुरु रवी मेहर और दिनों की भाँति आज भी अपनी पाठशाला में बच्चों को पाठ सिखाते रहे। उस दिन उन्होंने भगवान की न्यायकारिता का उपदेश किया। अपनी धर्म पत्नी को भी वह प्रातःकाल यही समझा कर आये थे यह संसार ओर यहाँ का सब कुछ भगवान् का है उसे समर्पित किये बिना किसी वस्तु का उपभोग नहीं करना चाहिए।
उन दिनों नगर में महामारी फैली थी। दुर्भाग्य ने उस दिन उन्हीं के घर डेरा डाला और मेहर के दोनों फूल से सुन्दर बच्चों को मृत्यु की गोद में सुला दिया। मेहर की धर्म-पत्नी ने दोनों बच्चों के शव शयनागार में लिटा दिये और उन्हें सफेद चादर से ढक दिया। आप घर की सफाई ओर भोजन व्यवस्था में व्यस्त हो गई।
साँझ हुई और रवी मेहर घर लौटे। सबाथ का दिन था। मेहर ने आते ही पूछा-दोनों बच्चे कहाँ है? सन्तोष स्मित मुद्रा में पत्नी ने कहा यहाँ कहीं खेल रहे होंगे, जल लीजिये, हाथ-मुँह धोकर भोजन लीजिये। भोजन तैयार है। मेहर नेनिश्चिन्त होकर भगवान् का ध्यान किया और फिर पाकशाला में आये। उन्हें घर में आज कुछ उदासी दीख रही थी। बच्चे नहीं थे पूछा-बच्चे अभी खेलकर नहीं लौटे क्या? पत्नी ने कहा अभी बुलाये देती हूँ लीजिये दिन भर उपवास किया है भोजन कर लीजिये।
रवी ने भोग लगाया और फिर उस अन्न को प्रसाद मानकर प्रेम पूर्वक ग्रहण किया हाथ मुंह धोकर उठे तो फिर पूछा-बच्चे अभी तक नहीं आये-बाहर जाकर पता लगाऊँ क्या?
पत्नी ने कहा-’नहीं स्वामी बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है, पर हाँ यह तो बताइये-आप जो कह रहे थे कि संसार में जो कुछ है वह राव भगवान् का है यदि भगवान अपनी कोई वस्तु वापस ले ले तो क्या मनुष्य को उसके लिये दुःख करना चाहिए? इसमें दुःख की क्या बात भद्रे! रवी मेहर ने आत्म-सन्तोष की मुद्रा में कहा। पर आज तुम्हारी बातें कुछ रहस्यपूर्ण-सी लगती हैं प्रिये कहो न बात क्या है कुछ छुपाना चाहती हो क्या?
नहीं स्वामी! आप से क्या छुपाना मैं तो आपके ही आदर्श का पालन कर रही हूं। यह लीजिये यह रहे आपके दोनों बच्चों के शरीर प्राण भगवान के थे सो उन्होंने वापस ले लिये यह कह कर मेहर की पत्नी ने बच्चों के कफन मुंह से हटा दिये।
समुद्र की ऊपरी सतह पर ज्वार, सीपें और घोंघे ही मिलते हैं, धरातल में इतनी मूल्यवान सम्पदा छिपी पड़ी है कि उसे प्राप्त कर लिया जाय तो पाने वाला मालामाल हो सकता है। समुद्री गोताखोर सतह पर नहीं गहराई में गोता लगाकर तह से मोती बीन लाते है। धरती की ऊपरी परत कूड़े-कचरे, धूल-मिट्टी और कंकड़ पत्थरों से भरी हुई है, पर उसे गहरे खोदते जाते है तो पानी से लेकर अनेकानेक प्रकार की बहुमूल्य खनिज सम्पदाएँ मिलती चली जाती है। रेत के एक कण का स्थूल मूल्य नगण्य जैसा है। बाजार में उसकी कोमल कुछ भी नहीं है, पर जब उसकी भीतरी शक्ति की कुरेद बीन की जाती है तो सहज ही इस बात का पता चल जाता है कि पदार्थ का वह तुच्छाति तुच्छ घटक शक्ति का महान् और अजस्र शक्ति भाँडागार अपने में दबाये पड़ा है। परमाणु विस्फोट के समय उसकी शक्ति का लाखवाँ हिस्सा ही प्रयोग में आ पाता है, शेष भाग अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है। परन्तु परमाणु शक्ति के लाखवें हिस्से का भी जो प्रभाव और परिणाम देखने में आता है, उसी से पदार्थ की महान् शक्ति के बारे में पता चलता है। परमाणु में निहित यदि संपूर्ण शक्ति का प्रयोग किया जा सके और उसे ध्वंस में लगाया जाय ता उतने से हो सारे भूमण्डल का विनाश हो सकता है। इसी प्रकार यदि उस शक्ति का प्रयोग सृजन कार्य में किया जाय तो इतनी ऊर्जा प्राप्त हो सकती है जितनी कि सूर्य से पृथ्वी को मिली है।
परमात्मा की यह सृष्टि विचित्र रहस्यों और अनबूझ पहेलियों से भरी पड़ी है। उन्हीं में से एक रहस्य यह भी है कि गहराई में जाकर जो कुछ खोज बीन की जा सकती है, उससे इतना अधिक उपलब्ध किया जा सकता है, जितने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। स्थूल और बाह्य के प्रभाव तथा परिणाम स्वरूप है। स्थूल की गहराई में उतर कर जैसे-जैसे सूक्ष्म से संपर्क किया जाता है, उसी स्तर के अनुदान-वरदान मिलने लगते है।
मनुष्य यों दिखाई देने में अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत ही स्वल्प सामर्थ्य वाला दिखाई पड़ता है, पर उसके पास बुद्धि के रूप में एक ऐसी सूक्ष्म शक्ति विद्यमान है, जिसके बल पर ही वह अपने से बलवान, भीमकाय प्राणियों को पीछे छोड़ने, पछाड़ने में समर्थ हुआ और अन्य प्राणियों की तुलना में अपनी दुनिया को अधिक उन्नत और विकसित बना सका हैं। मनुष्य समाज में कितने ही लोग बुद्धिबल के द्वारा सामान्य तथा पिछड़ी हुई हालत में आगे बढ़े, ऊँचे उठे और समर्थ सम्पन्न व्यक्तियों की अग्रिम पंक्ति में जा बैठे। इसके विपरीत विरासत में प्राप्त हुई उच्च स्थिति में भी लोग बुद्धिबल के अभाव में पतन के गर्त में जा गिरे।
बुद्धिबल की सूक्ष्म सत्ता का यह आँशिक परिचय हुआ। मनुष्य में उससे भी चमत्कारी और रहस्यमयी क्षमताएँ विद्यमान है। यदि उन्हें उबारा और अर्जित किया जा सके तो सचमुच ही मनुष्य ईश्वर तुल्य बन सकता है। उस शक्ति को मनुष्य की अन्तःशक्ति कहा जा सकता है। यह शक्ति प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है, आवश्यकता उसे प्राप्त भर करने की है। योग साधनाओं का उद्देश्य मनुष्य की अन्तःशक्ति को अनगढ़ स्थिति से उबारकर उसे शुद्ध एवं प्रखर बनाना ही है। इस शक्ति को अर्जित और परिष्कृत कर कई प्रकार की अलौकिक क्षमताएँ उत्पन्न की जा सकती है और उसका उपयोग सत्प्रयोजनों में करके अपना व समाज का इतना बड़ा हित साधन किया जा सकता है, जितना सामान्य भौतिक क्षेत्र में सम्पन्न किये जाने वाले पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं है।
समय-समय पर कई उदाहरण देखने में आते है, जिनसे मनुष्य की अन्तर्निहित इस क्षमता के प्रमाण मिलते है। विश्व इतिहास में ऐसे अनेकों प्रसंग बिखरे पड़े है जिनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि मनुष्य सर्वसमर्थ और सर्वशक्तिमान् परमात्मा का पुत्र है तथा उसे अपने पिता द्वारा कई एक अमूल्य वरदान प्राप्त है। इनमें से कुछ प्रसंग तो इन दिनों काफी चर्चित रहे है। उदाहरण के लिए फ्राँस की एक लड़की ऐनेट फ्रेलन की पिछले दिनों प्रायः चर्चा होती रही। जब वह बारह वर्ष की आयु में थी उसकी चमड़ी पर सामने वाले व्यक्ति के मन की बातें उसके विगत और भावी के बारे में कई बातें इस तरह उभर आती थी, जैसे किसी ने कागज पर कलम से लिख दिया हो। यह अक्षर अपने आप ही उभरते थे और कुछ ही मिनट में गायब हो जाते थे।
दक्षिण अफ्रीका एक साधारण-सा युवक पीटरवाम डेनवर्ग योग विद्या के अपने चमत्कारों के लिए काफी दिनों तक प्रसिद्ध रहा। 28 जुलाई 1969 को उसने न्यूकेसिल नगर में एक बड़ी भीड़ के सामने अपने इन चमत्कारों का प्रदर्शन किया। इसके कुछ वर्ष पूर्व वह चाय का एक छोटा-सा होटल चलाता था। वहीं से उसके हाथ में योग विद्या की एक पुस्तक लग गई। जिसे पढ़कर उसने योग के बारे में जाना। उस पुस्तक ने डेनवर्ग की उत्सुकता बढ़ा दी और वह ऐसे ग्रन्थों को खोज-खोजकर पढ़ने लगा। अपने इसी स्वाध्याय क्रम में उसने भारत को योगियों के देश के नाम से जाना। उसकी उत्कण्ठा इतनी बढ़ गई कि अपनी सारी जमा पूँजी समेट कर वह भारत चल दिया और हिमालय क्षेत्र में भ्रमण करता हुआ चमत्कारी योग विद्याएँ सीखता रहा।
हिमालय के अनेक योगियों से संपर्क कर, उनके सान्निध्य में रहकर डेनवर्ग ने अनेक विद्याएँ सीखी। जब वह अपने देश लौटा तो वहाँ के लोगों ने उसे चमत्कार दिखाने के लिए कहा। पहले तो वह मना करता रहा, पर जब लोगों ने चुनौती, उलाहने दिये और व्यंग्यपरिहास किया तो एक तरह से विवश हो गया। न्यूकेसिल नगर में प्रदर्शन की व्यवस्था की गई। एक लम्बे-चौड़े चबूतरे पर पत्थर के दहकते कोयलों की लपटों में डेनवर्ग को देर तक चहल-कदमी करनी थी। प्रदर्शन के लिए जोरदार विज्ञापन किया गया, अस्तु उसे देखने के लिए दूर-दूर से हजारों लोग एकत्रित हुए। भारी संख्या में उपस्थित दर्शकों से प्रदर्शन का विस्तृत मैदान भर गया। नियत समय पर प्रदर्शन हुआ और डेनवर्ग ज्वालाओं के बीच नंगे पैर करीब 45 मिनट तक टहलता रहा। निकला तो उसके शरीर पर कहीं एक छाला भी नहीं था।
अन्तःशक्ति को जागृत करने में मन्त्र विद्या भी बड़ा महत्व रखती है। यों मन्त्र विद्या के नाम पर धूर्तता और ठगी भी कम नहीं है, उसकी आड़ में धूर्त लोग अपना स्वार्थ भी कम सिद्ध नहीं करते, पर इतने मात्र से ही यह नहीं मान बैठना चाहिए कि इस क्षेत्र में कुछ भी तथ्य नहीं है। एक अंग्रेज शिकारी डेविड लेजली ने अपनी अफ्रींकी शिकार यात्राओं के विवरणों की एक पुस्तक लिखी है। “जुलुओं के बीच” इस पुस्तक में एक ताँत्रिक से सम्बन्धित घटना भी है। लेजिली ने लिखा है कि एक बार उसके साथी हाथियों के शिकार में घेराबन्दी कर रहे थे। घेराबन्दी के बाद देखा गया कि उनके कुछ साथी गायब हो गये। बहुत ढूंढ़ खोज की गई, पर एक का भी कहीं पता नहीं चला। अन्त में किसी के परामर्श पर तलाश के लिए एक जुलु ताँत्रिक की सहायता ली गई। ताँत्रिक ने अपने मन्त्र बल से उन सभी साथियों की शक्लें, नाम, वस्तुएँ और उनसे सम्बन्धित अनेक बातों को बताया जो अक्षरशः सही थी। इसके बाद उसने यह भी बता दिया कि वे सभी अमुक स्थान पर है। बताये हुए स्थान पर जाकर उन्हें खोज लिया गया।
युगाँडा के एक आतंकवादी संगठन ‘दिनीबा मंसाबूबा’ जो छिपकर अपनी गतिविधियाँ चलाता था, का पता लगाने के लिए नियुक्त एक ब्रिटिश गुप्तचर अधिकारी ने भी अपनी संस्मरण पुस्तक में इसी तरह की विभिन्न घटनाओं का उल्लेख किया है। उक्त ब्रिटिश अधिकारी जान-क्राफ्ट अन्धविश्वासों से सर्वथा मुक्त, प्रगतिशील, विचार रखने वाले, कुशाग्र बुद्धि और साहसी व्यक्ति है। उन्हें जादू-टोनों पर भी रंचमात्र विश्वास नहीं था। जब वे आतंकवादी संगठन का पता लगाने के लिए सक्रिय हुए तो उन्हें चेतावनी दी गई कि वे इस कार्य में हाथ न डालें। गुप्तचरों को इस तरह की धमकियाँ तो प्रायः अपने प्रत्येक अभियान में उन्हें मिलती रहती है। जानक्राफ्ट पर उस धमकी का कोई प्रभाव नहीं होना था से नहीं हुआ। जब वे न माने तो उनके ऊपर आतंकवादियों ने अप्रत्याशित व अस्वाभाविक ढंग से महा विषैले सर्पों के आक्रमण की योजना बनाई।
जान क्राफ्ट एक बार कहीं से लौट रहे थे। जिस स्थान से वे लौट रहे थे, वहाँ से और भी कई व्यक्ति आ जा रहे थे, पर क्राफ्ट जैसे ही सीढ़ियाँ उतरने लगे न जाने कहाँ से सीढ़ियों पर एक विषधर साँप उन पर झपटा। संयोग ही कहना चाहिए कि क्राफ्ट तुरन्त उछलकर कई सीढ़ियां फलाँल गये। नहीं तो उस समय उनकी मृत्यु निश्चित थी। एक बार वे अकस्मात् एक सहयोगी के यहाँ पहुँचे तो वहाँ भी एक भयंकर फणिधर ने तीखी विषाण उनकी आँखों की ओर छोड़ी। सहकर्मी सतर्क व चुस्त था। उसने तुरन्त क्राफ्ट को नीचे गिरा दिया और जहरीली धार ऊपर से निकल गई। अन्यथा उनका वहीं प्राणाँत हो जाता या वे जन्म भर के लिए अन्धे हो जाते। फिर एक बार उन्हें अपनी कार में दरवाजे के पास, दूसरी बार बिस्तर पर ही भयंकर विषैले सर्प दिखे। एक बार साँप उनके दफ्तर में एक अँधेरे कोने से निकलकर क्राफ्ट पर झपटा।
इस तरह की घटनाएँ कई बार घटीं और क्राफ्ट संयोग अथवा सौभाग्यवश हर बार बच गय। इन घटनाओं का विश्लेषण करते हुए स्वयं जान क्राफ्ट ने लिखा है कि प्रत्येक बार घटी यह घटनाएँ संयोग मात्र नहीं हो सकती थीं। उनके अकस्मात् दूर कहीं पहुँचने की सूचना उनके शत्रुओं को तुरन्त नहीं मिल सकती थी, इसलिए इस बात की भी बहुत कम सम्भावना थी कि वे लोग चुपके से ये साँप छोड़ जाते थे। फिर जहाँ अनेक लोग आ जा रहें हों वहाँ केवल क्राफ्ट पर ही साँप क्यों झपटा? घटनाओं का विश्लेषण करते हुए जान क्राफ्ट ने युगाँडा में प्रचलित इस मान्यता की पुष्टि की है कि वहाँ के तान्त्रिक सर्पों को वश में करके उनका इस तरह मनचाहा प्रयोग कर सकते है।
हिन्दी के प्रसिद्ध समाचार पत्र नव भारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख के अनुसार ‘मध्य प्रदेश के सरगुजा नरेश के सामने सन् 1934-35 में एक ऐसी महिला की पेशी हुई, जिसके बार में आरोप लगाया गया था कि उसने मारण मन्त्र द्वारा कई लोगों की हत्यायें की हैं तथा समगुजा में एक वर्ष तक जलवृष्टि ने होने के कारण भी उक्त महिला द्वारा किया गया मन्त्र प्रयोग ही था। उस आदिवासी महिला ने भरे दरबार में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। आदिवासियों का यह स्वभाव होता है कि वे अपने द्वारा किये गये भले-बुरे कामों को निस्संकोच स्वीकार कर लेते है। जब सरगुजा नरेश ने उसके मारण मन्त्र की शक्ति का प्रदर्शन देखना चाहा तो एक स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट मुर्गा, एक राज कर्मचारी के हाथ में रखा गया। महिला ने एक निश्चित दूरी पर खड़े होकर घास का एक तिनका अपने हाथ में पकड़ा और मन्त्र बोलकर उस तिनके को बीच से तोड़ दिया। तिनका टूटने के साथ ही राजकर्मचारी की गोद में बैठा स्वस्थ मुर्गा सहसा ऐठा, छटपटाया और निष्प्राण हो गया।
मन्त्र साधनाओं या योग विद्या के चमत्कार और कुछ नहीं मनुष्य की अन्तःशक्ति के ही परिणाम है। यदि वह बढ़ाई या विकसित की जा सके तो मनुष्य शरीर चलते फिरते बिजलीघर के रूप में परिणत हो सकता है। इस शक्ति का प्रयोग योगीजन भले कार्या में ओर दुष्ट प्रकृति के लोग बुरे प्रयोजनों में करते है। आग से भोजन भी बनाया जा सकता है और घर भी जलाया जा सकता है। यही बात साधना द्वारा उत्पन्न अन्तःशक्ति के बारे में भी लागू होती है। इसलिए योग विद्या के आचार्यों ने यम-नियमों द्वारा अपने स्वभाव, प्रकृति और आदतों को परिमार्जित करने के बाद अगली सीढ़ियों पर कदम रखने का निर्देश दिया है।
अब तक शरीर विज्ञान सम्बन्धी जितनी खोजें हुई, उनमें अवयवों की प्रत्यक्ष हलचलों को ही मुख्य आधार माना जाता रहा है। जो भी सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से दृष्टिगोचर हो- उसे ही विज्ञान प्रामाणिक मानता गाया है। इतना सब होते हुए भी शरीरगत अनेकानेक संदर्भ ऐसे हैं जिन्हें मनुष्य अभी तक नहीं जान पाया है। इन पर रहस्य के पर्दे अभी भी पड़े है। वे तब ही हटैंग जब स्थूल की हलचलों पीछे झाँक रही सूक्ष्म सत्ता की लाला को समझने के प्रयास किये जायेंगे।
अन्तःस्रावी ग्रंथियों, वंशानुक्रम-प्रक्रिया, भ्रूणावधि में जीव का उग्र विकास क्रम, जीव कोष की अनंत संभावनाओं से भरी क्षमताएँ, अचेतन मन की रहस्यमय गतिविधियाँ, प्रभावशाली तेजोवलय जैसे संदर्भ ऐसे है, जिनका स्थूल शरीर की सामान्य हलचलों से कोई सम्बन्ध नहीं है। शरीर शास्त्रियों की विशद खोजबीन इसके कुछ ही रहस्य पता लगा पाई है। ऐसी अद्भुतताएं जिनका तालमेल जैव-रासायनिक हलचलों से नहीं बैठता, उन्हें सूक्ष्म शरीर की शरीर कह सकते है। यह क्षेत्र अत्यन्त सुविस्तृत है, जिसकी थाह पाने का प्रयास अध्यात्मवेत्ता युग-युगों से करते आये है एवं आधुनिक वैज्ञानिक अब इस दिशा में भी अग्रसर हुए है।
इस क्षेत्र का परिचय देने में अग्रणी है-शरीर की अन्तःशक्ति हारमोन ग्रन्थियाँ। इस दिशा में विशेष अनुसंधान करने वाले डा क्रुकशेंक ने इन स्रावों की आधार ग्रन्थियों को जादुई ग्रन्थियाँ कहा है। वे कहते है कि व्यक्ति का स्तर एवं व्यक्तित्व इन स्रावों के क्रियाकलापों का निरीक्षण कर ही जाना जा सकता है। शरीर की आकृति ही नहीं उसकी प्रकृति का निर्धारण भी इन हारमोन रसों द्वारा ही होता है।
वैसे तो अपने-अपने स्थान पर सभी ग्रंथों का महत्व है, पर इन सभी को नियामक सत्ता जहाँ विराजमान है उन्हें मास्टर गलैण्ड्स कहा गया है। इनमें मुख्य है- पीनियल एवं पीटुटरी। इनकी संरचना भी अपने आप में अनोखी है एवं दोनों का ही परस्पर गहन संबंध भी है।
जिस ग्रन्थि को शरीर विज्ञानी पीनियल कहते है- उसे पौराणिक वर्णन के अनुसार तृतीय नेत्र कहा गया है। जबकि तंत्र और योगशास्त्र उसे आज्ञाचक्र की संगति देते आये है। कुछ समय पहले तक वस्तुतः वैज्ञानिकों क यही मान्यता थी कि यह ग्रन्थि मनुष्य के लिए अनावश्यक है तथा यह मानवी सभ्यता के विकास के प्रारम्भिक चरणों का बचा हुआ अवशेष है। परन्तु अध्यात्मक चेतना का विज्ञान है। इसलिये अध्यात्मवेत्ताओं को दृष्टि स्थूल पर नहीं अपितु उसके अन्तराल में छिपी सूक्ष्म सत्ता पर जाती है। पीनियल की शरीर विज्ञान क्षेत्र में बढ़ती ख्याति एक इसी तथ्य से जानी जा सकती है कि कई राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन पिछले दस वर्षों में इसकी गुत्थियां सुलझाने हेतु ही आयोजित किये गये।
शारीरिक दृष्टि से पीनियल मानव शरीर का सबसे छोटा घटक है। यह एक चौथाई इंच लम्बा एवं सौ मिली ग्राम भारी होता है। इतना छोटा अंग शायद ही कभी इतनी उत्तेजना का कारण बना हों। गर्दन और सिर के मिलन बिन्दु पर प्रेरुदण्ड के ठीक ऊपर स्थित यह ग्रन्थि भू-मध्यभाग में तीसरे वेण्ट्रीकल की छत से जुड़ी है।
ऐसा नहीं कि पीनियल पर बाद-विवाद पहले न चला हो। ग्रीक वैज्ञानिक हीरोफीबस जो ईसा से चार शताब्दी पूर्व शरीर विज्ञान की अपनी व्याख्याओं के कारण काफी प्रसिद्ध हुए थे।-पीनियल सम्बन्धी अपने विचारों से विवादास्पद भी रहे। वे इस ग्रन्थि को विचार प्रवाह का नियामक (रेगुलेटर) मानते थे। उनके अनुसार यह ग्रन्थि शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र के मध्यस्थ के रूप में कार्य करती मानी जाती थी। प्रारम्भिक लेटिन एनाटाककिस्टों ने भी इसे स्वामी ग्रन्थि की संज्ञा दी थी। सोलहवीं शताब्दी के फ्रांसीसी दार्शनिक एवं स्नायु विज्ञानी रेने डेस्कार्ट्स ने इसे विवेकी आत्मा का निवास स्थान बताया था। सन् 1886 में दो माइक्रोएनाटाकिस्ट एचडब्ल्यू ग्राफ तथा ई बाल्डविन स्पेन्सर ने स्वतंत्र पीनियल पर शोध की। इनके शोध निष्कर्षों ने यह प्रमाणित किया कि यह ग्रन्थि वातावरण के प्रकाश से सीधे और बाह्यचक्षु के स्नायुमार्ग द्वारा दोनों ही तरह से प्रतिक्रिया करती है। यह निष्कर्ष अध्यात्मवेत्ताओं की इस घोषणा से साम्य रखता है कि पीनियल ग्लैण्ड से पृथक किये गये है। इन दोनों रसस्रावों के गुणों व कार्यों के संबंध में किया गया अनुसंधान स्थूल शरीर की रहस्यमय परतों के संबंध में कई नये तथ्य उजागर करता है।
येल मेडीकल स्कूल में कार्यरत मोटोन बी0 लर्नर ने सन् 1958 में पीनियल से मेलेटोनिन नामक हार्मोन को पृथक किया। यह पदार्थ मेंढक तथा मछलियों में वातावरण प्रकाश परिवर्तन की प्रतिक्रिया स्वरूप त्वचा में रंग परिवर्तन हेतु जिम्मेदार है और मनुष्य में यही भावनात्मक परिवर्तनों का तथा क्रोध एवं भय के आवेगों का नियंत्रण करता समझा जाता है। वयःसंधि के प्रारम्भ में तथा मनुष्य के यौन विकास में इसकी विशिष्ट भूमिका है। जैसे-जैसे बच्चे वयःसन्धि में प्रवेश करते है, इनकी पीनियल ग्रन्थि का आकार और कार्यक्षमता घटती चली जाती है। संभवतः यह ग्रन्थि यौनविकास के प्रारम्भ को अपने नियंत्रण में रखती है और जब इसका नियंत्रण हट जाता है। तो यही कार्य पीटुचरी को यौन हार्मोन्स स्रावित करने की प्रेरणा बन जाता है कामेन्द्रियों को पीटुचरी ग्लैण्ड के माध्यम से नियंत्रित करने में इस तरह का सक्रिय योगदान पीनियल की महत्वपूर्ण भूमिका प्रतिपादित करता है। वैज्ञानिक इसी रहस्यमय भूमिका को देख कर पीनियल को एक आवश्यक एवं मस्तिष्कीय कार्य क्षमता की वृद्धि तथा व्यक्तित्व के निर्माण हेतु उत्तरदायी अंग मानने लगे है। पीनियल की इसी कार्य विधि के कारण संभवतः उसका संगीत आज्ञा चक्र के साथ दी गई है।
विवेक का जागरण ही आज्ञाचक्र का जागरण कहलाता है। इसी विवेक का सहारा लेकर यदि मनुष्य अपनी समस्त क्षमताओं को विधेयात्मक प्रवृत्तियों की ओर नियोजित कर दे तो अचेतन की सुप्त सम्पदा के हीरे मोती उसे प्राप्त हो सकते है। यही प्रसुप्त का जागरण अथवा चित्त का परिशोधन है। यह मनोनिग्रह ही मनोमय कोश की साधना का आधार भूत अंग है। शिवजी द्वारा तीसरे नेत्र को खोल कर कामदेव का दहन मात्र पौराणिक आरष्यान नहीं अपितु इसी ग्रन्थि द्वारा पीटुचरी का संचालन एवं जननेन्द्रियों के स्रावों पर नियंत्रण है। मन के महादैत्य की साधना इसी संस्थान को सुविकसित करने से संभव होता है। इसी की साधना से मनुष्य देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करते चले जाते है। मनुष्यों के बीच निकृष्टता और वरिष्ठता का जो अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें इसी संस्थान का विकसित स्तर, चिंतन का क्रम एवं मनुष्य का दृष्टिकोण प्रमुख भूमिका प्रस्तुत करते है। यहीं से वस्तुतः प्रारम्भ होता है-समस्त अध्यात्म साधनों का आद्याक्षर।
प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डेनियल क्रीमेन ने मस्तिष्क के ऊतकों से एक दूसरा हारमोन पृथक किया है। जिसकी सघनता सर्वाधिक पीनियल ग्लैण्ड तथा मध्य मस्तिष्क के केन्द्रक के निकट की संधि कोषाओं में होती है। इसे सिरोटोनिन नाम दिया गया है। पीनियल मस्तिष्क हेतु सिरोटोनिन के संग्राहक का रोल अदा करता है जबकि संधि कोशाएं मस्तिष्क के अन्य भागों में इसे वितरित करती है। बाद में यह देखा गया कि सिरोटोनिन तो मेलेटोनिन की प्रारंभिक अवस्था है। एक और विचित्र संयोग यह पाया गया कि एल.एस.डी. 25 (लिसर्जिक एसिड डाय इथाइल अमाइड) नामक मादक औषधि जो राई नामक घास से पृथक की जाती है, की आणविक संरचना, सिरोयेनिन की संरचना से करीब-करीब मिलती जुलती है। एल.एस.डी. की अल्पमात्रा के प्रयोग से ही चेतना में गंभीर परिवर्तन होते देखे गये है। हिप्पी वर्ग इसका सेवन कर आध्यात्मिक अनुभूतियों का आनन्द लेने की बात कहते है तो दूसरी ओर चिकित्सक समुदाय इसके उपयोग के संबंध में चेतावनी देते है। वस्तुतः यह दवा सिरोटोनिन के कार्यों को निष्फल करने की क्षमता रखती है। इसी एक सामर्थ्य द्वारा यह चेतना के उच्चतम आयामों तक मनुष्य को पहुँचा देती है। पर यह विकास प्राकृतिक नहीं है। इसके पीछे निहित तथ्य यह है कि मस्तिष्क में सिरोटोनिन की सघनता का स्तर विवेकपूर्ण विचारों के लिए जिम्मेदार है तथा एल.एस.डी. 25 के सेवन से इसकी सघनता में परिवर्तन सामान्य सत्य को भी विकृत कर देता है।
इन सबसे यह प्रमाणित होता है कि पीनियल ग्लैण्ड चेतना की परिवर्तित अवस्था में रासायनिक चक्र को चलाने वाला स्थूल माध्यम है। संभवतः मानवी यौनपक्ष तथा चेतना की अवस्था आँतरिक रूप से परस्पर संबंधित है। जितना ही कड़ा नियंत्रण, पीनियल का पीटुटरी पर एवं दोनों का जननेन्द्रियों पर होता है उतना ही शरीर के सुप्त केन्द्रों के जागृत होने की संभावनाओं का एवं चेतना की उच्चतम स्थिति प्राप्त करने की साधक की पात्रता का विकास होता चला जाता है। इस तरह में बाँधा मात्र मस्तिष्क के ऊतकों में निहित सिरोटोनिन का स्तर ही है।
कुण्डलिनी योग और कुछ नहीं- पीनियल ग्लैण्ड को सक्रिय कर हठधर्मी अंतःस्रावी ग्रन्थि प्रणाली पर नियंत्रण बनाये रखने का विज्ञान है। यह अंतःस्रावी ग्रंथों के रस स्राव में गंभीर परिवर्तन करता है तथा मस्तिष्क ऊतकों में सेमटाँनिन के स्तर को कम करता है। वयःसंधि के प्रारम्भ तथा यौनपक्ष के आगमन से हमारा ध्यान तथा चेतना दीर्घ कार्यकारी पीनियल ग्लैण्ड से हट जाता है। इस प्रकार यह कार्य करना बन्द कर देता है। और प्रजनन प्रणाली हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक युवा में जो द्वार उच्च चेतना के गमन हेतु होता है, वह बंद हो जाता है पर उस दिशा में विकास की संभावनाएं छोड़ जाता है।
इस पूरे वैज्ञानिक विवेचन से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि हर मनुष्य अपने ही द्वारा गढ़ी गयी कारा में बंद है। इन बंधनों को तोड़ना संभव है यदि वह अपने अंदर छिपी सामर्थ्य को पहचान ले। आज्ञाचक्र की साधना और कुछ नहीं- ऋतंभरा प्रज्ञा, दूरदर्शिता, विवेकशीलता का ही जागरण है। महामानवों का इतिहास यही बताता है कि उन्होंने अपनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाकर उसे एक सुनियोजित ढंग से लक्ष्य की ओर अभिमुख कर दिया। परिणामतः उन्हें इसी जीवन में वे सभी भौतिक तथा आत्मिक वरदान मिले, जिनका शास्त्रकारों ने स्थान-स्थान पर वर्णन किया है।
हारमोन्स में हमारे शारीरिक मानसिक एवं आत्मिक विकास की अनन्त संभावनाऐं भरी पड़ी हैं। योग साधना द्वारा मनोमय कोश की साधना आज्ञाचक्र के जागरण की साधना किये जाने पर महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार करना तथा चिंतन को उच्चस्तरीय बनाना है। शारीरिक बलवृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर सृष्टा की अनुपम देन है। इसमें जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हारमोन्स तक सभी अनन्त क्षमताओं से संपन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए। उच्चचेतना के इन्हीं प्रवेश द्वारों को खोलने हेतु आज वैज्ञानिक प्रयत्नशील है।
मदिरा के व्यापारी मुल्कराज की दुकान पर धरना देने वालों की भीड़ के साथ उनकी पत्नी भी थी। पुलिस जिन दस बारह महिलाओं को गिरफ्तार कर के ले गई उसमें भी वे थीं।
माता के जेल चले जाने के बाद चौदह वर्षीय पुत्री शीला ने भोजन बना कर पिता के समक्ष परोसा। कौर गले के नीचे न उतरा। हृदय भर आया। जैसे-तैसे एक रोटी पानी के सहारे नीचे उतारी पुत्र से कहा “रोटी खालो बेटा” उसने कहा “मुझे भूख नहीं है।” पुत्री से कहा “खाना खाले बेटी” तो उसने कहा “पिताजी जब तक आप मदिरा का धन्धा नहीं छोड़ेंगे हम खाना नहीं खायेंगे। दुकान के सामने प्राण त्याग देंगे।” पिता की आँखों से अश्रु टपके और उसी समय वह खोटा धन्धा छोड़ दिया।
साधना उपासना प्रायः तीन प्रयोजनों के लिए की जाती है। पहली लौकिक सफलताओं के लिए, जिनमें कोई मनोकामना की पूर्ति, अवरोध हटने-मिटने और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने का उद्देश्य रहता है। पता नहीं साधना उपासना से किसी का यह उद्देश्य पूरा होता है अथवा नहीं, क्योंकि यह उद्देश्य विशुद्ध रूप से लौकिक और भौतिक है और साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
लौकिक कामनाओं की पूर्ति से हटकर कई लोग अतिमानवी क्षमतायें प्राप्त करने के लिए साधना का मार्ग अपनाते है। उसमें यदाकदा सफलता मिल भी जाती है और ठीक ढंग से यदि साधना की जाय तो निश्चित रूप से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। आत्मिक कल्याण के लिए किये जाने वाले योगाभ्यासों में भी अपने आप भी कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ जागृत होती है। महर्षि पतंजलि ने उन सिद्धियों का उल्लेख योगदर्शन के विभूतिपाद में सविस्तार किया है। अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्, ईश्वित्व, काय सम्पत्, मनोजवित्व, विकिरण, प्रधान-जय, भूत-जय, आकाशगमन, प्रतिभा, श्रावण वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता आदि अनेक सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, पर साधक को इनमें ही न उलझ जाने के लिए सतर्क भी किया है। क्योंकि ये सिद्धियाँ अन्तिम लक्ष्य ‘आत्म-कल्याण’ में बाधक ही बताई गई है।
यह ठीक है कि मनुष्य अनन्त शक्तियों और संभावनाओं से भरा हुआ ईश्वर का ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार है। पर उसकी अधिकांश शक्तियाँ सुषुप्त ही रहती है। इसका कारण परमात्मा की दुराव भरी इच्छा नहीं है। वरन् यह मनुष्य के हित में ही है। क्योंकि पात्रता से अधिक यदि उसे कुछ मिल गया तो उसमें लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक है। कम योग्यता वाले और कम विकसित व्यक्ति के हाथों में अधिक अधिकार और अधिक शक्तियाँ सौंप दी जायँ तो वह अपना और समाज का भला करने की अपेक्षा नुकसान ही ज्यादा करेगा। अनपढ़ और पागल व्यक्ति के हाथ में यदि बंदूक थमा दी जाय तो वह अपने अलावा और अन्य लोगों को भी उसका निशाना बना सकता है। बच्चों के हाथ में विस्फोटक पदार्थ सौंप दिये जाएँ तो वह स्वयं जल मरने साथ-साथ दूसरी अन्य हानियाँ भी पहुँचा सकते है। यही बात सिद्धियों और अतीन्द्रिय सामर्थ्यों के संबंध में भी लागू होती है। दक्षिण मार्गी साधना करते हुए यह सिद्धियाँ उन्हीं लोगों को हस्तगत होती है जो उनका सदुपयोग करना जानते है।
बहुत से लोग हठपूर्वक भी यह सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते है। सिद्धियाँ बुरी नहीं है, परन्तु उनके सदुपयोग की, सार-सँभाल की कला न आती हो तो उसमें परमाणु शक्ति के कारण होने वाली विनाश जैसी सम्भावनाएँ हर घड़ी बनी रहती है। परमाणु शक्ति के ध्वंसात्मक उपयोग की थोड़ी बहुत जानकारी तो प्रायः सभी को है। उसकी सृजनात्मक सम्भावनाओं के बारे में भी पिछले दिनों काफी प्रयोग किये गये हैं और उन प्रयोगों के माध्यम से सृजन की कितनी ही ऐसी सम्भावनाओं को स्वीकार किया गया है जो अगले दिनों साकार हो सकेंगी। सर्दी-गर्मी, वर्षा ऋतुओं में हेर-फेर करना तक इन प्रयोगों के द्वारा सम्भव हो सकेगा। समुद्र की अथाह जलराशि से उसके खारेपन को अलग कर मीठा पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध किया जा सकेगा। मरुस्थल तथा ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी और बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकेगा। समुद्र में वनस्पतियाँ उगाकर आहार की समस्या का समाधान सम्भव हो सकेगा। मानवीय श्रम का बोझ बिजली सम्हाल लेगी, व लोग केवल मनोरंजन के लिए श्रम किया करेंगे। संसार के एक कोने में रहने वाले मनुष्यों का संपर्क दूसरे छोर पर रहने वालों के साथ-क्षण भर में स्थापित हो सकेगा आदि आदि।
अणु के स्वरूप, शक्ति और बाहुल्य पर दृष्टिगत करें तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि अपने अति समीप ही अतिशय शक्ति का इतना बड़ा भण्डार प्रस्तुत है कि उससे लाभ उठाते नहीं बनता। उसकी शक्ति की संक्षिप्त जानकारी भी आश्चर्यचकित कर देती है। अणु का आकार एक इंच के बीस करोड़वें भाग के बराबर होता है। अब तक बने किसी भी सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों में से किसी के भी द्वारा अणु को अकेला नहीं देखा जा सका है और न ही उसे तोलने की कोई तराजू बनाई जा सकी है।
पदार्थ के सबसे छोटे इस कण के बारे में अभी पूरी तरह नहीं जाना जा सका है, पर उससे शक्ति प्राप्त करने में अवश्य सफलता प्राप्त कर ली गई है। परमाणु द्वारा शक्ति उत्पन्न करने की प्रक्रिया अणु-विखंडन कहलाती है। इसके लिए मूलतः यूरेनियम धातु का प्रयोग किया जाता है। उस पर न्यूट्रान्स का आघात करने से अणु विखंडन हो जाता है। उपलब्ध यूरेनियम पूरी तरह विखण्डन के योग्य नहीं। उसका एक प्रतिशत से भी कम अंश विखंडनीय होता है। शेष 99.29 प्रतिशत भाग बेकार चला जाता है। प्रयत्न यह हो रहा है कि इस भाग को विखंडन में सहायता देने योग्य बनाया जाय। विज्ञान की भाषा में शुद्ध अंश को यूरेनियम 235 तथा अशुद्ध अंश का यूरेनियम 238 कहा जाता है। अशुद्ध यूरेनियम पर न्यूटाणुओं का आद्यात करे उसे भी एक नये पदार्थ प्लूटीनियम 239 में परिणत’ कर लिया जाता है। इस प्रकार लगभग सारा मसाला ही घुमा-फिरा कर परमाणु शक्ति उत्पन्न करने में प्रयुक्त किया जा सकेगा।
एक घन फुट यूरेनियम में इतनी शक्ति उत्पन्न की जा सकती है, जितनी 17 लाख घन फुट कोयले में से अथवा 72 लाख गैलन तेल में होती है। इसे 320 खरब घनफुट प्राकृतिक गैस के बराबर भी समझा जा सकता है। यूरेनियम में अग्नि और रेडियम सक्रियता दोनों गुण है। इसलिए उसके निर्माण एवं उपयोग में पूरी-पूरी सावधानी बरतनी पड़ती है। तनिक-सी असावधानी के कारण महाविनाश उत्पन्न हो सकता है। पिछले दिनों अमेरिका में हैरिसबर्ग के पास एक नदी के द्वीप पर स्थित परमाणु बिजली घर में ऐसी ही दुर्घटना घटी। हालाँकि सावधानी के तौर पर तुरन्त ध्यान दिया गया। फिर भी जितनी रेडियोधर्मिता फैलने का अनुमान लगाया जा रहा है वहीं महाविनाशकारी है।
परमाणु बिजली घरों में ऐसी व्यवस्था होती है कि संयंत्रों में साधारण सी भी गड़बड़ी आ जाय तो खतरे की सूचना देने वाली बत्तियाँ जलने लगती है। पिछले दिनों इसी तरह बत्तियाँ जल उठीं। सोचा गया कहीं कोई साधारण सी गड़बड़ी होगी। लेकिन जब संकट बड़ा दिखाई दिया तो रेडियो धर्मिता से दूषित पानी बड़े पैमाने पर बाहर निकलने लगा। करीब ढाई लाख गैलन पानी बाहर आया। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो बिजली घर की भट्टी के पूरी तरह से गल जाने या फट जाने का भय था।
वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल के दौरान पता चला कि उस भट्टी के भीतर 880 घनफुट का विराट बुलबुला बन गया। अगर यह बुलबुला और बड़ा होता जाता है। तो इस बात की पूरी सम्भावना है कि भट्टी में आने-जाने वाला पानी रुक जाये ओर भट्टी का तापमान बढ़ जाए। इस जाँच-पड़ताल के समय भट्टी का तापमान 600 डिग्री फारेनहाइट था। यदि भट्टी में आने जाने वाला पानी रुका ही रहा तो वह 3000 डिग्री फारेनहाइट तक पहुँच जाएगा। उस स्थिति में भट्टी का सारा यूरेनियम पिघलकर जमीन में रिसने लगेगा। शुद्ध ‘यूरेनियम इतनी वेधक धातु है कि पृथ्वी को तोड़ती फोड़ती उसके दूसरे छोर तक पहुँच जाएगी। ऐसी दशा में पूरी पृथ्वी के ही विनष्ट हो जाने की सम्भावना व्यक्त की गई है। अमेरिका के परमाणु विदों का कहना है कि यदि यूरेनियम धातु पिघल कर जमीन में रिसने लगी तो वह रिसते-रिसते चील तक पहुँच जाएगी। ऐसी दशा में पृथ्वी पर कैसा विनाश कारी दृश्य उपस्थित हो जायगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इसके अलावा वैज्ञानिकों ने एक-दूसरे खतरे की ओर भी संकेत किया है। वह यह कि भट्टी को ठंडा रखने के यदि सारे प्रयास विफल रहे तो उसमें हाइड्रोजन गैस की मात्रा बढ़ती जायगी। अगर वह बहुत ज्यादा हो गई तो विस्फोट होने का खतरा है। विस्फोट इतना जबर्दस्त हो सकता है कि न केवल भट्टी बल्कि भट्टी के चारों ओर बनी कंक्रीट सीमेन्ट की दीवारें भी फट जायेंगी और रेडियो धर्मी विकिरण चारों ओर फैल जायगा तथा सारा वायुमंडल प्रदूषित हो जाएगा। ऐसी दशा में दूर-दूर तक के प्राणियों का जीवन अस्तित्व तो खतरे में पड़ ही जाएगा, समस्त पृथ्वी वासियों का स्वास्थ्य भी संकटग्रस्त हो उठेगा।
अणु में इतनी विनाशकारी शक्तियाँ भी छिपी है और शान्तिपूर्ण प्रयोगों के लिए किए जाने वाले प्रयोगों में भी तनिक-सी असावधानी बड़े भारी संकट और विनाश प्रस्तुत कर सकती है। फिलहाल विनाशकारी प्रयोजनों के लिए तो उसका खुलेआम उपयोग होने की सम्भावनाएँ क्षीण ही है। अभी अणु शक्ति से बिजली का उत्पादन, पनडुब्बियों का संचालन, अंतर्ग्रहीय ग्रहों की यात्रा करने वाले राकेटों के प्रक्षेपण जैसे ही काम लिए जा रहे है। परन्तु निरापद वह भी नहीं है।
निर्जीव और जड़ अणु इतना शक्तिमान है तो चेतना की सामर्थ्य को तो उससे असंख्यों गुना अधिक होना चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अणु विज्ञान से बढ़कर आत्मविज्ञान है। जड़ अणु में जब इतनी शक्ति विद्यमान है तो जड़ की तुलना में चेतन का जो अनुपात है उस हिसाब से आत्म शक्ति की महत्ता बहुत ज्यादा होनी चाहिए। अणु विज्ञानी अपनी उपलब्धियों पर गर्वान्वित है और उस सामर्थ्य को युद्ध अस्त्र से लेकर बिजली की कमी को पूरा करने जैसी योजनाओं में प्रयुक्त करने के लिए प्रयत्नशील है। आत्म विज्ञानियों का कर्त्तव्य है कि वे उसी लगन और तत्परता के साथ आत्मशक्ति की महत्ता व उपयोगिता को इस प्रकार प्रमाणित करें कि सर्वसाधारण के लिए उसकी गरिमा समझ सकना सम्भव हो सके।
इन बातों को स्पष्ट किया जा सके तभी यह समझा जा सकेगा कि सिद्धियाँ, दिव्य शक्ति के वरदान हैं, तो उपयोगी, पर उन्हें सम्हाल कर रखना अति दुष्कर है। थोड़ी भी कहीं चूक या असावधानी हुई तो अणु ऊर्जा के बिखर जाने की तरह ही उससे भी हानि होने का भय है। आत्मशक्ति का बिखराव रावण, कुम्भकरण, नायक बन कर ही छोड़ता है। अस्तु आत्मिक कल्याण के इच्छुकों को इनके लिए न लालायित रहना चाहिए और न ही इनके प्रलोभन में फँसना चाहिए। वैसे ही परमेश्वर के इतने अजस्र अनुदान प्रत्यक्ष रूप में मनुष्य को मिले है कि उन्हीं का ठीक तरह उपयोग किया जाय तो यह जीवन संतान से प्यार होता है और वह स्वयं कष्ट सहकर उनके भरण-पोषण का ही नहीं शिक्षा-दीक्षा, व्याह शादी, रोटी, रोजगार तक का प्रबन्ध करता है फिर भी उसके सुख-दुख में हर समय पूरी सहायता करने के लिए तत्पर रहता है।
मनुष्य भी परमेश्वर की सन्तान है। उसके प्रेम की विशिष्टता का परिचय इसी से मिलता है कि मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त अत्यधिक सुविधाएँ उपलब्ध है। ऐसा लगता है मानो यह सारा जगत ही मनुष्य की सेवा,, सुविधा और प्रसन्नता के लिए बना है। जिस ओर भी दृष्टि दौड़ाई जाए उसी ओर हर्षोल्लास प्रदान करने वाले साधनों का बाहुल्य दिखाई देता है। विवेकपूर्वक विचारपूर्ण दृष्टि से देखा जाय तो चारों ओर सुख-सुविधाएं की साधन-सुविधायें भरी पड़ी है। उनके रहते सिद्धियों की आकाँक्षा लोभ वृत्ति की ही परिचायक होंगी।
किसी भी मनुष्य के जीवन में क्या घटना है, यह सर्वथा अविज्ञान और संदिग्ध रहता है, पर एक तथ्य पूर्णतया निश्चित है कि प्रत्येक व्यक्ति को मरना पड़ेगा। मरने के बाद कोई जन्म लेगा या नहीं, नहीं कहा जा सकता, पर जन्म लेकर जो अपनी जीवन यात्रा पर निकल पड़ी है उसका मरना सर्वथा सुनिश्चित है। मृत्यु एक अनिवार्य घटना है जो प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक प्राणी के साथ घटता है। मृत्यु से अधिक निश्चित कुछ भी नहीं है। जो सर्वाधिक निश्चित, अनिवार्य और असंदिग्ध है, उसी से लोग इतने भयभीत रहते है। कि मरना, मौत, मृत्यु जैसे शब्दों को ही अशुभ मानते है। इस शब्द को सुनना ही पसन्द नहीं करते। इस भयग्रसतता और भीरु ग्रस्तता का क्या कारण है? यह जानता और समझना चाहिए।
मरने से भयभीत रहने का कारण केवल मनुष्य की वह मनःस्थिति है जो अपरिचित स्थिति में जाने और एकाकी रहने की आकाँक्षा से भय और भीरुता के रूप में उभरती है। सम्बन्धित व्यक्तियों और जाने-पहचाने लोगों से समझे हुए जगत से संपर्क छूट-टूट जायगा यह डर भी मनुष्य को मौत से डराता है, पर जिनने मरकर देखा है उनका कहना है कि मौतें में डरावनेपन की कोई बात ही नहीं हैं। मरने से पूर्व कैसा अनुभव होता है यह मनुष्य की अन्तःस्थिति पर निर्भर रहता है। वह आजीवन जैसा सोचता रहा है अन्तिम अनुभूतियाँ उसका सारतत्त्व क्षणभर के लिए प्रस्तुत हुआ कहा जा सकता है।
किन्हीं को प्रकाश दिखाई देता है तो किन्हीं को मधुर संगीत सुनाई पड़ता है, कुछ को नशा चढ़ने जैसी अनुभूति भी होती है और कइयों को दम घुटने तथा डूबने जैसी अकुलाहट अनुभव होती है। लेकिन जो जीवन को सही ढंग से जीते है सही ढंग से सोचते समझते है उन्हें मरण का सुखद अनुभव ही होता है। प्रसिद्ध प्राणि शास्त्री डा विलियम हन्टर ने मरते समय मन्द स्वर में कहा था कि, “यदि मुझमें लिखने की ताकत होती तो विस्तार से लिखता कि मृत्यु कितनी सरल और सुखदायी होती है।
डेट्रायर (अमरीका) के एक अखबार में कुछ समय पूर्व ‘उस पार’ शीर्षक से एक लेख माला छपी थी। उसमें उन लोगों के अनुभव संस्मरण शैली में प्रकाशित हुए थे, जो मरने के बाद पुनः जीवित हो गये थे। इन संस्मरणों में एक अनुभव मियानी निवासी लिनमेलविन का भी था, जिन्होंने बताया कि, “मृत्यु से पूर्व उन्हें तीव्र ज्वर के कारण मस्तिष्क में भारी जलन हो रही थी कि अचानक सब कुछ शान्त हो गया और मैं शक्ति, मैं शान्ति, स्वतन्त्रता तथा शीतलता का अनुभव करते हुए हवा में तैरने लगा। अपने चारों ओर का वातावरण मुझे बेहद रंगीन और सुहावना लगा। इस आश्चर्यपूर्ण स्थिति का पहले तो कोई कारा समझ में नहीं आया, पर पीछे लगा कि मैं मर गया हूँ और आत्मा के रूप में स्वच्छन्द विचरण कर रहा हूँ यह स्थिति भी देर तक नहीं बनी रही किसी ने मुझे पुनः शरीर में धकेल दिया और मैं जीवित हो उठा। देखा तो परिवार के लोग आवश्यक तैयारी करने में लगे हुए थे। मरने के बाद वापस जी उठने पर उन लोगों ने भी प्रसन्नता अनुभव की, खासतौर से मेरी छोटी लड़की ने।
बोस्टन निवासी डा मूर रसेल फ्लेचर ने लगातार 25 वर्षों तक इस तथ्य का अन्वेषण किया कि मरने के उपरान्त मनुष्य को किस प्रकार की अनुभूमि होती है। इतने वर्षों तक कई व्यक्तियों से भेंट कर, अध्ययन कर, उन्होंने “ड्रिटाइज आन सस्पेंडेंस इण्टीमेशन” नामक ग्रन्थ लिखा। वे आजीवन मैसाचूरौट्स मेडिकल सोसायटी के अग्रणी सदस्य भी रहे। अपने अनुसन्धान कार्य के दौरान उनका वास्ता ऐसे लोगों से भी पड़ा जो कुछ समय तक मृत रहने के बाद पुनः जीवित हो उठे थे। ऐसे लोग को खोज-खोजकर डाँ0 फ्लेचर ने उनके बयान लिए और इसके बाद उन्हें अपनी उक्त पुस्तक में प्रकाशित किया।
इन बयानों में एक संस्मरण गंनागिर नगर की निवासी श्रीमती जॉन डी0 ब्लेक का है। वे तीन दिन तक मृत स्थिति में पड़ी रही थी और डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था, पर कुछ लक्षण उनके शरीर में ऐसे भी विद्यमान थे जिनके कारण उनके घर वालों ने उन्हें नहीं दफनाया और पुनर्जीवन की प्रतीक्षा में शव को सम्हाले रहे। तीन दिन बाद मैडम ब्लेक जीवित हो उठीं। पूछने पर उनने बताया कि वह एक ऐसे लोक में गई थी, जिसे परियों का देश कहा जा सकता है। वहाँ बहुत-सी आत्माएँ विद्यमान थी, जिनमें उनकी मृत सहेलियाँ भी थी। मैडम ब्लेक ने बताया कि वे बिना परों आसमान में उड़ती थी और सभी प्रसन्न थी।
वरमान्य हडिगेट की एक अध्यापिका ने भी कुछ समय तक मृत रहने के बाद पुनर्जीवन प्राप्त किया था। उसने बताया कि मृत्यु देश के सभी निवासी प्रसन्न थे किसी के चेहरे पर विषाद नहीं था और सभी आमोद-प्रमोद में मग्न थे। वोस्टन से सेंट जान जाने वाला एक जलयान समुद्र में डूबा तो उसमें से केवल एक लड़की बची। पानी में एक घण्टे तक डूबी रहने के बाद वह बाद लहरों के साथ किनारे पर लगी। मृत समझी जाने के बाद भी वह बच गई। डाँ. फ्लेचर का उसने बताया कि मृत्यु और जीवन के बीच का समय उसने सुनहरे प्रकाश के बीच आनन्द पूर्वक बिताया।
साँस का रुक जाना और हृदय की धड़कन बन्द हो जाना आमतौर पर मृत्यु का चिह्न माना जाता है, पर अब यह तथ्य प्रकाश में आया है कि वस्तुतः साँस के रुकने और हृदयगति बन्द हो जाने से ही मृत्यु नहीं हो जाती। ये दोनों क्रियाएँ कृत्रिम रूप से भी जारी रखी जा सकती है। पानी में डूबे हुए व्यक्ति को कृत्रिम साँस देने की विधि साधारण स्काउट भी जानते है। आपरेशन करते समय किसी की हृदयगति बन्द हो जाने पर डाक्टर लोग कृत्रिम रूप से धड़कन पुनः चालू कर देते है। क्योंकि वास्तविक मृत्यु तो मस्तिष्कीय कोशों द्वारा अपना काम अन्तिम रूप से बन्द कर देने पर होती है।
रक्त और ऑक्सीजन द्वारा मस्तिष्क अपना काम चलाता है। वहाँ यदि यह दोनों चीजें न पहुँचें तो भी मस्तिष्क के लिए देर तक काम करते रहना सम्भव नहीं होता है। अधिक से अधिक वह बिना नये रक्त और ऑक्सीजन के छह मिनट तक अपना काम पुरानी संचित पूँजी द्वारा चलाता रह जाता है। इस बीच श्वाँस और रक्त पुनः प्राप्त होना आरम्भ हो जाय तो वह लगभग आधा घण्टे में वापस अपने पुराने ढर्रे पर आ सकता है, किन्तु यदि अधिक देर हो जाय तो जीवन को वापस लौटाने की कोई सम्भावना नहीं रहती।
मृत्यु निश्चित रूप से उतनी कष्टदायी नहीं जितनी कि समझी जाती है। बीमारी आदि के कारण मरने से पूर्व कितना ही कष्ट क्यों ने रहा हो, मरने का ठीक समय आने से पहले बेहोशी छाने लगती है और पीड़ा के समस्त लक्षण विदा हो जाते है मरने पर मनुष्य अनन्त शून्य में विलीन हो जाता है जहाँ उसके सुखद स्वागत की तैयारी पहले से की हुई लगती है। आमतौर पर वृद्ध लोग शान्ति और सन्तोषपूर्वक मरते है और युवावस्था में अधिक बेचैनी रहती है। यह उद्विग्नता महत्वाकाँक्षाओं के अतृप्त रह जाने के कारा ही होती है।
मृत्यु के समय सामान्यतः शरीर का तापमान 98.6 डिग्री फारेनहाइट होता है। इसके बाद वह प्रति घण्टे डेढ़ डिग्री कम होने लगता है। इस आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि मृत्यु हुए कितना समय बीत गया। मरणोपरान्त माँसपेशियाँ एक बार ढीली पड़ती है। इसके बाद वे कड़ी होती है और फिर ढीली पड़ जाती है। इसके बाद शव में सड़न आरम्भ होने लगती है तथा रक्त का लाल रंग बदलकर मटमैला और पतला होने लगता है।
मरने के बाद किसी व्यक्ति का चेहरा बहुत शाँत और तनाव रहित दिखाई देता है तो कईयों का चेहरा विकृत हो जाता है। इसका कारण यह समझा जाता है कि मृतक की आत्मा शाँत या उद्विग्न अवस्था में विदा हुई है, पर कतिपय शरीर विज्ञानियों की दृष्टि में ऐसा माँसपेशियों में आई शिथिलता के कारण दिखाई देना है। जीवित स्थिति में मस्तिष्क का, मनोभावों का दबाव चेहरे की माँसपेशियों पर रहता है और यह भाव-भंगिमा के रूप में प्रकट होता है। किन्तु जब यह दबाव हट जाता है तो माँसपेशियाँ शिथिल पड़ जाती है और चेहरे को शाँत या विकृत बनाती है। उनका कहना है कि गहरी निद्रा में सोये हुए व्यक्ति का चेहरा भी विकृत ही दिखाई पड़ता है, इसका कारण माँसपेशियों की शिथिलता है। मृतक की चेतना का अन्त ही माँसपेशियों की शिथिलता है। मृतक की चेतना का अन्त ही माँसपेशियों को उनकी बनावट के आधार पर शिथिल कर देता है और वे किधर भी लुढ़क पड़ती है। देखने वाले इस दृश्य को अपने-अपने ढंग से सोचते है और जीवित स्थिति में जो हर्ष-विषाद, सन्तोष, उद्वेग आदि के भाव चेहरे पर दिखाई पड़ते है उसी आधार पर मृतक की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।
जो भी हो इतना निश्चित हे कि मृत्यु के बाद शरीर के साथ जुड़े हुए सभी कष्टों और दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। अचानक पूरी मृत्यु किसी की नहीं हो जाती। वह तीन क्रम में धीरे-धीरे होती है। इन तीन क्रमों को स्लेनिकल, बायोलॉजिकल और सेलुलर कहा जाता है। प्रथम क्रम स्लेनिकल मृत्यु वह है जिसमें साँस, स्पंदन और मस्तिष्कीय विद्युत लहरों का प्रवाह रुक जाता है। इस स्तर पर मरे हुए व्यक्ति को हृदय मालिश जैसे उपचारों द्वारा पुनर्जीवित किया जाता है। मृत्यु के दूसरे चरण में शरीर के कुछ अंग विसंगठित होते हुए भी इस दशा में बने रहते है कि विद्युत प्रवाह के संचार से उनमें पुनः गतिशीलता उत्पन्न की जा सके तथा तीसरा और अन्तिम मरण रोका जा सके।
तीसरी सेलुलर मृत्यु वह है जिसमें शरीर के कोश विगलन की स्थिति में पहुँच जाते है और फिर किसी भी स्थिति में जीवन चेतना का वापस लौटना सम्भव नहीं होता। कई बार तो मृत्यु के यह तीनों चरण एक साथ, कुछ ही घण्टों में पूरे हो जाते है लेकिन कई बार पहली मृत्यु से तीसरी मृत्यु तक पहुँचने में दो-तीन दिन लग जाते है। जल्दबाजी में कितने ही मुर्दों को तुर्त-फुर्त दफना दिया जाता है जबकि वस्तुतः पूर्णतया मरे नहीं होते। ऐसे मुर्दे ही मरने के बाद पुनः जीवित हो उठते है। हिन्दू समाज में मृतक के समीप रोने-धोने, उसे स्नान आदि के क्रियाकृत्य कराने और श्मशान आदि में कुछ घण्टों तक रखे रहने का कारण सम्भवतः यही हो कि मृतक मृत्यु के तीनों चरण पूरी तरह सम्पन्न कर सके।
मस्तिष्कीय विद्युत तरंगों को मापने वाले यन्त्र ‘इलेक्ट्रो एन्सिफेलो ग्राफ’ का निष्कर्ष यह है कि मृत्यु के समय मस्तिष्क की विद्युत तरंगें धीरे-धीरे मन्द होती चली जाती है और गहरी मूर्छा आने लगती है। उस स्थिति में मृतक की स्मरण शक्ति और मस्तिष्कीय क्रियाशीलता धीरे-धीरे बन्द होने लगती है।
यदि आरम्भ से ही मृत्यु को जीवन का अनिवार्य अतिथि मानकर चला जाय, उसकी सुनिश्चितता को समझा जाय और अपनी गतिविधियाँ इस स्तर की बनाये रखा जाय जिससे मृत्यु के समय जीवन व्यर्थ जाने का पश्चाताप न रहे तो मृत्यु हर किसी के लिए सरल और सुखद हो सकती है। थकान मिटाने को जब निद्रा देवी की गोद में जाना नहीं अखरता तो इसका कोई कारण समझ में नहीं आता कि लम्बी थकान मिटाने के लिए, लम्बी निद्रा की गोद में जाने, जीवन की अनिवार्य निश्चित घटना मृत्यु से डरने या घबराने की स्थिति आये।
जो लोग इस तथ्य को समझ पाते है वे ही मृत्यु का हँसते हुए स्वागत करते और शान्तिपूर्वक मरते देखे जो सकते है। जार्ज वाशिंगटन मरने लगे तो उसने कहा, मौत आ गई, चलो अच्छा हुआ, विश्राम मिला। हेनरी थोरो ने शाँत और गम्भीर मुद्रा में मृत्यु का स्वागत करते कहा था मुझे संसार छोड़ने का कोई पश्चाताप नहीं है। कोहन्स ने और भी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा-लगता है मेरे बदन पर फूल ही फूल छा गये है। हेनरी ने अपनी मृत्यु के समय अलंकारिक भाषा में कहा, बत्तियाँ जला दो मैं अंधकार में नहीं जाऊँगा। विलियम ने भी मृत्यु को एक सुखद घटना कहा था। स्वामी दयानन्द ने तो ईश्वर तेरी इच्छापूर्ण हुई कहते विष की पीड़ा को भी जैसे गले से लगा लिया था और मृत्यु का स्वागत किया था।
यह मनःस्थिति हर कोई प्राप्त कर सकता है, पर इसके लिए मृत्यु के भय को मन से निकालना पड़ेगा तथा उसे जीवन की सबसे ज्यादा निश्चित घटना मानते हुए उसे सहज भाव से स्वीकार करना पड़ेगा, जिस सहजता से सूर्य का उदय और अस्त होना स्वीकार किया जाता है।
युग समस्याएँ बाहरी कारणों से उत्पन्न हुई लगती भर हैं वस्तुतः उनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। बड़े पेड़ों की जड़ें जमीन में गहराई तक धँसी होती हैं तभी उसके विशालकाय तने और पल्लव परिकर को आवश्यक खुराक मिलती है। लदे हुए फल-फूल बाहर टंगे होते हैं और मोटी बुद्धि से प्रतीत यह होता है कि यह कहीं बाहर से ही आये या ऊपर से उतरे हैं, पर सच्चाई यह है कि वृक्ष का अस्तित्व, विस्तार और वैभव बनाये रहने के लिए जड़ें ही प्रमुख भूमिका निभाती हैं। वे चर्म चक्षुओं को दीख न पड़ें यह बात दूसरी है।
गीता में इस जगत को “ऊर्ध्व मूल अधःशाखा” वाला ‘अश्वत्थ’ कहा गया है। जड़ें ऊपर और पेड़ नीचे होने की उक्ति पहेली जैसी लगती है, पर सूक्ष्मदर्शी पर्यवेक्षण से इस यथार्थता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं रह जाता। बादल ऊपर से बरसते हैं और धरातल में नमी और शीतलता बनाये रहते हैं। प्रतीत यह होता है कि जल धरती की सम्पदा है, पर वस्तुतः वह आकाश का अनुदान है। सृष्टि के आरम्भ में धरती गरम गोला थी। आच्छादित गैसें मिलकर पानी बनीं और बरसीं। उसी से समुद्र बने और भाप से बादल बनने का सिलसिला चला। धरती पर पाया जाने वाला जल ही प्रकारान्तर से प्राणियों का जीवनाधार है, वह मिलता तो धरती पर है ही है, फिर भी वस्तुस्थिति यह है कि वह सृष्टि के आरम्भ से लेकर अन्त तक आकाश का ही वैभव था और बना रहेगा।
धरती पर जीवन का विकास संतुलित तापमान से हुआ है। यह गर्मी ऊपर से सूरज से उतरती है। छूने से धरती ही गरम लगती है और उसी की सतह चमकती भी है। इसलिए सामान्य बुद्धि धरातल पर फैली हुई गर्मी और रोशनी को पृथ्वी की सम्पदा कह सकती है, पर वास्तविकता यह है कि ऊष्मा और ऊर्जा का स्रोत सूर्य है। जमीन से वनस्पति के रूप में, उगता और प्राणियों के रूप में चलता-फिरता जीवन वस्तुतः सूर्य का ही अनुदान है। उसकी किरणों असन्तुलित हो उठें तो यह धरती अग्नि पिण्ड या शीत पिण्ड बनकर सर्वथा निर्जीव स्थिति में जा पहुँचेगी।
पृथ्वी पर पाये जाने वाली अगणित सम्पदाएँ, क्षमताएं एवं विशेषताएँ उसकी अपनी श्री समृद्धि प्रतीत होती हैं, किन्तु विशेषज्ञों का प्रतिपादन है कि ह सारा वैभव अन्तर्ग्रही अनुदान है, जिसे ध्रुवों के चुम्बकत्व से कुशलतापूर्वक खींचा और संग्रह किया है। अंतर्ग्रही अनुदानों का विशेष सौभाग्य यदि धरती को न मिला होता तो वह अन्य निर्जीव ग्रहों की तरह इस सारे वैभव से रहित निस्तब्ध स्थिति में पड़ी होती है।
खाद्य पदार्थों का उत्पादन और उपयोग करने का अवसर धरती के सहारे उपलब्ध हुआ प्रतीत होता है, पर सच्चाई दूसरी ही है। प्राणियों का प्रमुख आहार अन्न, जल नहीं, वायु है। खाद्यों के अभाव में कुछ समय जीवित रहा जा सकता है, पर वायु के बिना एक क्षण का भी निर्वाह नहीं। पोषण जितना खुराक के सहारे मिलता है उनसे हजार गुणा हवा से ग्रहण करके प्राणिक जगत जीवित रहता है। आंखें भोजन को देखें और हवा की गरिमा को देखने, समझने में असमर्थ रहे तो भी स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी रहेगी।
ब्रह्माण्ड का छोटा रूप पिण्ड है। सौर मण्डल की छोटी झाँकी परमाणु के अन्तःक्षेत्र में काम करने वाले घटकों की गतिविधियाँ देखने से मिल जाती है। ब्रह्माण्ड में भरी चेतना ‘परब्रह्म’ है। उसी का छोटा घटक ‘जीव’ है। जीव और ब्रह्म का पारस्परिक आदान-प्रदान जितना निर्बाध रहता है उसी अनुपात से जीवधारी समर्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न पाया जाता है। उसका प्रगति क्रम इसी सम्बन्ध श्रृंखला पर अवलम्बित है। ईश्वर को आश्वस्त भूल और जीव को उसका पुण्य पल्लव कहा गया है। इसी स्थिति को ऊर्ध्व मूल अधःशाखा कहा गया है।
धरती पर ‘पदार्थ’ और ‘ऊर्जा’ यही दो घटक प्रधान हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष की दो सम्पदाएँ हैं-
(1) “वातावरण” और (2) “वायुमण्डल” दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। वातावरण चेतनात्मक है और वायुमण्डल प्रकृति परक। वातावरण से मनुष्य की आस्था, आकाँक्षा और विचारणा प्रभावित होती ही है। वायुमण्डल से वस्तुओं की मात्रा एवं स्तरीय स्थिति का सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य एक सीमा तक स्वतन्त्र भी है। उसकी अपनी पुरुषार्थ परायणता का भी महत्व है, किन्तु वातावरण का दबाव तो आँधी तूफान की तरह है जिसके आवेग में जन-मानस अमुक दिशा में उड़ता दौड़ता दिखाई पड़ता है। अन्धड़ के साथ-साथ तिनके और पत्ते दौड़ते हैं। पानी की प्रचण्ड धारा में न जाने क्या-क्या हलका-भारी बहता चला जाता है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष में संव्याप्त चेतनात्मक वातावरण जनमानस को किसी ‘दिशा विशेष’ में अनायास ही धकेलता घसीटता चला जाता है। अबोध-असमर्थ जनमानस का बहुत बड़ा क्षण स्वेच्छा से नहीं वातावरण के दबाव से अपने चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। “दैवेच्छा क्लीयसी” की उक्ति में इसी कटु सत्य की ओर संकेत किया गया है।
वायुमण्डल के उतार चढ़ाव का विश्व की सम्पत्ति और परिस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है उसे आये दिन देखा जा सकता है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि वायुमण्डल की असन्तुलित हलचलें हैं जिनसे समस्त प्राणि परिवार बुरी तरह प्रभावित होता है। मौसम प्रतिकूल हो जाने पर स्वास्थ्य को बुरी तरह क्षति पहुँचती है। दुर्बलता और रुग्णता का-महामारियों का-कभी-कभी ऐसा दौर आता है जो संभाले नहीं संभलता। मस्तिष्क ज्वर लू लगने और निमोनिया होने जैसी बीमारियों में मनुष्य का दोष कम और मौसम का अधिक होता है।
वायुमण्डल की अनुकूलता ही प्रकृति की सहायता है। सतयुग में प्रकृति अनुकूल रहती थी और मानवी आवश्यकता के अनुरूप वस्तुओं की कमी नहीं पड़ती थी। मौसम सन्तुलित रहने पर पदार्थ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते थे। खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों का परिणाम बढ़ा-चढ़ा रहता था। ऐसी-ऐसी अनेकानेक अनुकूलताएँ रहने के कारण प्राणि स्वस्थ, परिपुष्ट, प्रखर और दीर्घजीवी रहते थे। समर्थता, काय कलेवर तक ही सीमित नहीं रहती थी वरन् उसके अन्तराल में रहने वाले मनःतत्व को भी प्रभावित करती थी। स्वस्थ मनुष्य सन्तुलित एवं सुखी भी रहते हैं।
सतयुग में मनुष्यों तथा मनुष्येत्तर प्राणियों के शरीर विशालकाय भी थे और बलिष्ठ भी। पीछे उनमें गिरावट आती चली गई। इसका क्या कारण हुआ? परिवर्तन के दिनों में प्राणियों ने क्या अच्छाई अपनाई या क्या बुराई बढ़ाई। इसका ऊहापोह करने पर लगता है उनने भला-बुरा उगाया नहीं प्रकृतितः उन पर शाप, वरदान अनायास ही लदते रहे हैं।
पुरातन काल में मानवी चिंतन का स्तर उच्च स्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वाकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थीं। ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों। का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था। ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता, व्यवहार में उदारता का घुला रहना स्वाभाविक है। इसी स्तर के लोग धरती के देवता कहे जाते हैं।
उन दिनों समष्टिगत वातावरण ही कुछ ऐसा था जिसके प्रभाव में जनसमुदाय को ऊँचा सोचने ऊँचा करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था। प्रवाह चीर कर उलटा चलना कठिन होता है। आज निकृष्टता के प्रवाह में व्यक्ति विशेष को अपने निजी मनोबल के सहारे उत्कृष्टता अपनाना और उसे अन्त तक मजबूती के साथ पकड़े रहना अति कठिन पड़ता है। कोई अपवाद ही ऐसा पौरुष दिखा पाते हैं। ठीक इसी प्रकार प्राचीनयुग में भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं अतीव दुस्तर था। आज आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ मानवी आदर्शों से विपरीत दिशा में उद्दण्ड अंधड़ की तरह बह रही हैं उससे अनपढ़ ही नहीं सुशिक्षित और सभ्य कह जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
कार्य स्थूल है और चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है और वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियां दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव, घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट संकटों का-विरोध विग्रह का अभिवर्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिणाम है। वातावरण चेतन है। मान्यताओं, आस्थाओं और विचारणाओं के समन्वय से उत्पन्न चिन्तन प्रवाह में निष्कृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जन मानस में कुकल्पनाएँ, दुर्भावनाएँ और अनीति मूलक उच्छृंखलताएं ज्वार-भाटों की तरह उठती है॥ अचिन्त्य चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणित दुर्व्यवहार से होती है। फलतः मनोमालिन्य, विलगाव, सहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्दिताएँ खड़ी होती हैं और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती हैं। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते और दूसरों को अप्रसन्न करते हैं। गर्हित दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाले स्वयं दुख पाते और दूसरों को दुःख देते हैं। सहयोग के अभाव में प्रगति के द्वारा रुक जाते हैं। मनोविकार ही शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। अनुदारता और दुष्टता अपनाने वाले दूसरों की सद्भावना गँवा देते हैं।
वायुमण्डल दूषित होने के कारणों से वैज्ञानिक अनाचार से उत्पन्न कूड़े-कचरे की अभिवृद्धि भी है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कोलाहल विकिरण आदि बढ़ने से अन्तरिक्ष में बढ़ती विषाक्तता और उनसे उत्पन्न विभीषिका की चर्चा सर्वत्र होती रहती है। इसके अतिरिक्त मनुष्यों के अनाचरण भी प्रकृति संतुलन को विक्षुब्ध करते हैं फलतः मौसम बाढ़, वर्षा, भूकम्प, तूफान, युद्ध महामारी, टिड्डी, मूषक, कृमि कीटक, दुर्भिक्ष आदि की विपत्तियाँ आती हैं। वनस्पति हीन वीर्य होता है उसके पोषक तत्व घट जाते हैं और हवा में ऑक्सीजन और जीवन-तत्वों की कमी पड़ने से मनुष्य ही नहीं अन्य जीवधारियों की भी शारीरिक स्थिति इस प्रकार बिगड़ती है कि उनकी मनःस्थिति सामान्य और सुखद परम्परा अपनाये रहने योग्य नहीं रह जाती है। यह प्रकृति विपर्यय हर दृष्टि से हर किसी के लिए हानिकारक हो सिद्ध होती है। वातावरण की विषाक्तता लोक मानस में निकृष्टता की मात्रा बढ़ाती है फलतः स्नेह सहयोग के स्थान पर द्वेष, दुर्भाव और विग्रह, अनाचार की घटाएँ घुमड़ने लगती है।
भौतिक क्षेत्र में सुख-सुविधा और शान्त व्यवस्था के साधन बढ़ाने के लिए भरपूर प्रयत्न होने चाहिए। कठिनाइयों को हल करने के लिए जो भी पराक्रम संभव हो उसे तत्परतापूर्वक किया जाना चाहिए। किन्तु ध्यान यह भी रखा जाय कि इतना ही सब कुछ नहीं है। इसमें आगे भी बहुत कुछ करना शेष है। वायु मण्डल और वातावरण का परिशोधन उन अध्यात्म प्रयत्नों पर निर्भर है जिन्हें व्यक्तिगत धर्म धारणा एवं सामूहिक सह साधना के आधार पर संपन्न किया जाता है। वायु मण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई अधिक शक्तिशाली माध्यम अब तक नहीं ढूँढ़ा जा सका। थोड़े से पदार्थों को जलाने की हानि को ही देखा जाय और उसके द्वारा होने वाले लाभों को दृष्टि से ओझल कर दिया जाय तो यह बुद्धिमत्ता की बात न होगी। स्वर्ण भस्म, मोती भस्म आदि में उन पदार्थों को जला देने से मोटी दृष्टि से हानि और मूर्खता का ही निष्कर्ष निकलता है, पर जो उन रसायनों का महत्व समझते हैं उन्हें उसमें लाभ और समझदारी ही का परिचय मिलता है।
वातावरण के परिशोधन से सामूहिक साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं। गायत्री महापुरश्चरण की वर्तमान श्रृंखला में इन दिनों प्रायः दस लाख साधक एक समय, एक मन, एक विधान और एक उद्देश्य को लेकर जो धर्मानुष्ठान कर रहे हैं उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के संशोधन में अपना असाधारण योगदान देगा और इसे आज दूरदर्शिता के सहारे जाना जा सकता है। कल उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी सुखद परिस्थितियों के रूप में सामने होंगे।
देवनाम् प्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक के विशाल साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र और भागीरथी का उफनता हुआ कोप, बढ़ती हुई जल राशि का निरन्तर तीव्र होता जा रहा वेग सम्राट अपने मंत्रियों, सेनापतियों और पुरोहितों के साथ अवश भाव से खड़े गंगा की बाढ़ देख रहे थे। गंगा का जलस्तर निरन्तर बढ़ता जा रहा था, किसी भी क्षण कुपित नदी की विपुल जल राशि तट बंधों को तोड़कर राजधानी को अपने में समेटने के लिए बढ़ सकती थी। पर किया क्या जाय?
सम्राट ने बाढ़ के सनसनाते हुए जल की ओर एक दृष्टि दौड़ाई और फिर दूसरे ही क्षण महामंत्री और खड़ी भीड़ की ओर टुकुर टुकुर देखने लगे। फिर कहा, क्या अपने साम्राज्य में ऐसी कोई पुण्यात्मा नहीं जो इस भीषण बाढ़ पर काबू पा सके?
यह अनुरोध अकेले महामंत्री से ही नहीं किया गया था वरन् वहाँ उपस्थित लाखों नगर वासियों से भी था। सम्राट के दाँये बाँये सहस्रों लोगों का जमघट था। सभी इस समस्या के लिए अपने-अपने ढंग से सोच रहे थे, समाधान का उपाय खोज रहे थे।
पर किसी को कहाँ से कैसे क्या करना चाहिए कुछ सूझ नहीं रहा था। शशोपंज में पड़ी हुए इतनी भीड़ को चीरती हुई तभी एक महिला आगे बढ़ी। उसे देखकर कितनों के ही मुँह घृणा से दूसरी ओर घूम गये। बहुतों ने तो यहाँ तक कहा ‘रोको इसे नहीं तो विनाश नहीं होगा तो भी हो जायेगा। इस अधम नारी के जलस्पर्श से गंगा और कुपित हो उठेगी।’ यह सब कुछ स्वाभाविक भी था, इतने लोगों की भीड़ को चीर कर बने वाली वह महिला रूपजीवा वैश्या बिन्दुमती थीं।
अनेकों कंठों से किले तिरस्कार और अपमान भरे स्वरों को सहते हुए विधे कंठ से मग्न, हृदय से उसने अपना परिचय दिया। मैं हूँ बिन्दुमती! रूपजीवा!! अपना रूप और यौवन बेचकर जीविका चलाने वाली एक वेश्या। पर माँ भागीरथी से एक प्रार्थना करने का अवसर चाहती है सम्राट।”
अब वह अशोक की ओर देख रही थी। उन्होंने स्वीकृति दी और बिन्दुमती भयंकर गर्जना करती हुए गंगा के समीप पहुँची। उसने नदी की ओर हाथ उठाते हुए कहा, ‘माँ गंगे! यदि मेरे पाप कर्मों। के बीच पुण्यकर्मों के तनिक भी संस्कार रहे हों, यदि में सत्य निष्ठ रही हूँ तो उन पुण्यों का फल परलोक में देने के स्थान पर इसी लोक में दीजिये। आप अपना कोप समेटले माँ।
यह कह कर बिन्दुमती के नेत्रों से एक और गंगा दो धाराओं में बह उठी। उन आँसुओं का स्पर्श गंगा के गर्जन करते जल से होना था कि निरन्तर वेगवान होता जा रह जल प्रवाह घटने लगा। कुछ क्षणों में ही गंगा का उफान शनैः शनैः शान्त होने लगा।
सम्राट को आश्चर्य हुआ इस वेश्या में ऐसे कौन से पुण्य संस्कार है जिनके प्रत्ताप से उफनता हुआ गंगा का जल प्रवाह भी शान्त हो गया। सम्राट ही नहीं वहाँ खड़े सहस्रों नागरिक भी विस्मय विमुग्ध थे। अपने प्रश्न का उत्तर जाने के लिए सम्राट बिन्दुमती को अपने पास बुलाने के स्थान पर स्वयं उसके पास गये और बोले, भद्रे! तुम वेश्या हो। तुम्हारा कार्य घ्रणित है, लोगों को पथ भ्रष्ट करने वाला है। फिर तुम जैसी पापपंक में पली हुई नारी ने किस प्रकार इतना पुण्य अर्जित किया कि भागीरथी को तुम्हारी बात माननी पड़ी।’
‘राजन! आपकी प्रत्येक बात सत्य है, बिन्दुमती ने कहा, “पर मैं धन,जाति, शिक्षा, कुल और रूप के आधार पर किसी से पक्षपात नहीं करती। परिस्थितियों ने मुझे रूपजीवा बनाया पर सत्य, व्यवसाय के प्रति ईमानदारी और प्रत्येक व्यक्ति के सम्मुख निश्छलता के साथ उसे सन्तुष्ट करने का प्रयास ही वह पुण्य हो सकता है, जिसे गंगा ने स्वीकार किया।
सम्राट ने स्वीकार किया और राजकीय सम्मान से विभूषित करते हुए एक समारोह में यह शिलालेख भी खुदवाया, अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति पुण्यात्मा है। वह चाहे जो भी हो पर देश और समाज के लिए संकट के समय वही सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।
‘समय बहुत कीमती है’- यह वाक्य सम्भवतः आप हजारों बार सुन चुके होंगे और सैंकड़ों बार कह चुके होंगे। लेकिन क्या सचमुच ही आप अपना और दूसरों का समय कीमती समझते हैं? क्या आपने कभी स्वयं के क्रिया कलापों पर नजर डाली है और यह जानने की कोशिश की है कि जिस समय को बात-बात में आप भी कीमती कह जाते हैं, उसका कितना अंश आप या तो व्यर्थ ही गँवा देता हैं या उस समय पूँजी को घटिया कामों में लगाकर घाटा ही घाटा उठाते हैं। इस पूँजी को व्यर्थ न गँवाएँ न ही निकृष्ट कामों में खर्च होने दें, यह मानवीय आत्मा की स्वाभाविक माँग है। उसे पूरा करने पर ही आत्म-सन्तोष की अनुभूति सम्भव होती है।
प्रतिदिन एक घण्टा समय यदि मनुष्य लगाया करे, तो उतने समय से भी यह कुछ ही दिनों में बड़े महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर सकता है। एक घण्टे में चालीस पृष्ठ पढ़ने से महीने में बारह सौ पृष्ठ और साल में करीब पन्द्रह हजार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं यह क्रम दस वर्ष जारी रहे तो डेढ़ लाख पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। इतने पृष्ठों में कई सौ ग्रन्थ हो सकते हैं। यदि वे एक ही किसी विषय के हों तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन सकता है। एक घण्टा प्रतिदिन कोई व्यक्ति विदेशी भाषायें सीखने में लगाये तो वह मनुष्य निःसन्देह तीस वर्ष में इस संसार की सब भाषाओं का ज्ञाता बन सकता है। एक घन्टा प्रतिदिन व्यायाम में कोई व्यक्ति लगाया करे तो अपनी आयु को पन्द्रह वर्ष बढ़ा सकता है।’
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रतिदिन एक घण्टा नियम पर अन्त तक डटे रह कर इतनी प्रवीणता प्राप्त की।
माजार्ट ने हर घड़ी उपयोगी कार्य में लगे रहना अपने जीवन का आदर्श बना लिया था। वह मृत्यु-शय्या पर पड़ा-पड़ा भी कुछ करता रहा। रैक्यूयम नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ उसने मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया।
ब्रिटिश कॉमनवेल्थ और प्रोटेक्टरेट में अपने पदों का व्यस्ततापूर्ण उत्तरदायित्व वहन करते हुए मिल्टन ने पैरेडाईसलास्ट’ की रचना की। राज काज से कम समय मिल पाता था तो भी जितने कुछ मिनट वह बचा पाता उसी में उस काव्य की रचना कर लेता। ईस्ट इंडिया हाउस की क्लर्की करते हुए जानस्टुर्ट मिल ने अपने सर्वोत्तम ग्रन्थों की रचना की। गैलीलियो दवादारू बेचने का धन्धा करता था तो भी उसने थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर विज्ञान के महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।
हेनरी किरक व्हाइट को सबसे ज्यादा समय का अभाव रहता था, पर घर से दफ्तर तक पैदल आने और जाने के समय का सदुपयोग करके उसने ग्रीक भाषा सीखना फौजी डाक्टर बर्कले का अधिकतर समय घोड़े की पीठ पर बीतता था। उसने उस समय को भी व्यर्थ न जाने दिया और रास्ता पार करने के साथ-साथ उसने इटेलियन और फ्रेंच भाषायें भी पढ़ ली। यह याद रखने की बात है कि- परमात्मा एक समय में एक ही क्षण हमें देता है और दूसरा क्षण देने से पूर्व उस पहले वाले क्षण को छीन लेता है। यदि वर्तमानकाल में उपलब्ध क्षणों का हम सदुपयोग नहीं करते तो वे एक-एक करके छिनते चले जायेंगे और चाहे अन्त में खाली हाथ ही रहना पड़ेगा।
एडवर्ड बटलर लिटन ने अपने एक मित्र को कहा था - लोग आश्चर्य से कहते हैं कि मैं राजनीति तथा पार्लियामेंट के कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हुए भी इतना साहित्य कार्य कैसे कर लेता हूँ? साठ ग्रन्थों की रचना मैंने कैसे करली? पर इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह नियंत्रित दिनचर्या का चमत्कार है। मेरा प्रतिदिन तीन घण्टे का समय पढ़ने और लिखने के लिये नियत किया हुआ है। इतना समय मैं नित्य ही किसी न किसी प्रकार अपने साहित्यिक कार्यों के लिए निकाल लेता है। बस इस थोड़े नियमित समय ने ही मुझे हजारों पुस्तकें पढ़ डालने और साठ ग्रंथों के प्रणयन का अवसर ला दिया।
घर गृहस्थी के अनेकों झंझटों और बाल बच्चों की साज संभाल में दिन भर लगी रहने वाली महिला हेरेट स्टोव ने गुलाम प्रथा के विरुद्ध आग उगलने वाली वह पुस्तक ‘टाम काखा की कुटिया लिखकर तैयार करदी, जिसकी प्रशंसा आज भी बेजोड़ रचनाओं में की जाती है।
चाय बनाने के लिए पानी उबालने में जितना समय लगता है उसमें व्यर्थ बैठे रहने की बजाय लाँग फैलो ने ‘इनफरलो’ नाम ग्रन्थ का अनुवाद करना शुरू किया और नित्य इतने छोटे समय का उपयोग इस कार्य के लिए नित्य करते रहने से उनसे कुछ ही दिन में वह अनुवाद पूरा कर लिया।
इस प्रकार के अगणित उदाहरण हमें अपने चारों ओर बिखरे हुए मिल सकते हैं। हर उन्नतिशील और बुद्धिमान मनुष्य की मूल भूत विशेषताओं में एक विशेषता अवश्य मिलेगी- समय का सदुपयोग। जिसने इस तथ्य को समझा और कार्य रूप में उतारा उसने ही यहाँ आकर कुछ प्राप्त किया है। अन्यथा तुच्छ कार्यों में आलस्य और उपेक्षा के साथ दिन काटने वाले लोग किसी प्रकार सांसें तो पूरी कर लेते हैं पर उस लाभ से वंचित ही रह जाते हैं जो मानव जीवन जैसी बहुमूल्य वस्तुतः प्राप्त होने पर उपलब्ध होना चाहिए, या हो सकता था।
जीवन का महल समय की - घण्टे मिनटों की ईंटों से चिना गया है। यदि हमें जीवन से प्रेम है तो यही उचित है कि समय को व्यर्थ नष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ ही चल जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा- “मैंने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा हैं।”
कहीं आपको भी अन्त में ऐसा ही सोचने और स्वयं को धिक्कारने की, आत्म ग्लानि की स्थिति का सामना न करना पड़े।
खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया हुआ स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है पर खोया हुआ समय किसी प्रकार भी नहीं लौट सकता उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है।
जिस प्रकार धन के बदले में अभीष्ट वस्तुयें खरीदी जा सकता है, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, आरोग्य, सुख-शान्ति, मुक्ति आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है। ईश्वर ने समय रूपी प्रचुर धन देकर मनुष्य को पृथ्वी पर भेजा है और निर्देश किया है कि वह इसके बदले में संसार की जो भी वस्तु रुचिकर समझे खरीद लें।
किन्तु कितने व्यक्ति हैं जो समय का मूल्य समझते और उसका सदुपयोग करते हैं? अधिकाँश लोग आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद करते रहे हैं। एक-एक दिन करके सारी आयु व्यतीत हो जाती है और अंतिम समय में देखते हैं कि उन्होंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जिन्दगी के दिन यों ही बिता दिये। इसके विपरीत जो जानते हैं कि समय का नाम ही जीवन है वे एक-एक क्षण को कीमती मोती की तरह खर्च करते हैं और उसके बदले में बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं। हर बुद्धिमान व्यक्ति ने बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा परिचय यही दिया है कि उसने 5 जीवन के क्षणों को व्यर्थ बरबाद नहीं होने दिया। अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे से अच्छा उपयोग हो सकता था उसी में उसने समय को लगाया। उसका यही कार्यक्रम अन्ततः उसे इसी स्थिति तक पहुँचा सका जिस पर उसकी आत्मा सन्तोष का अनुभव करें।
यह सृष्टि जितनी आकर्षक है उतनी ही विलक्षण भी। पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पुष्प का आकर्षक सौंदर्य जहाँ मन को तृप्त करता है वहीं अथाह सागर, भीमकाय पर्वत एवं अनंत अन्तरिक्ष के दृश्य उस सृष्टा के विराट स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हैं। लघु से विराट संरचना उसकी अद्भुत कलाकृति, शक्ति एवं विलक्षण बुद्धि व्यवस्था का भान कराती है। जड़-प्रकृति के आकर्षक सौंदर्य से कम आश्चर्यजनक, चेतन जगत भी नहीं है।
चेतना के क्षेत्र में प्राणी-समूह की संरचना, उनके क्रिया कलाप एवं क्षमताओं की विलक्षणता को देखकर बुद्धि विस्मित रह जाती है तथा श्रद्धा से उस परम शक्ति के प्रति नतमस्तक होना पड़ता है। जिसने विचित्रताओं से युक्त प्राणियों का सृजन किया। सृष्टा ने मनुष्य को शक्ति-सामर्थ्य एवं बुद्धि प्रदान की किन्तु अन्य अपने छोटे जीव-जन्तुओं को भी आवश्यक क्षमताओं से वंचित नहीं रखा। उनकी आवश्यकता के अनुरूप न केवल जीवनयापन की क्षमता दी बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में सामंजस्य बिठाने एवं तदनुरूप अपने को ढालने की बौद्धिक क्षमता भी प्रदान की।
विभिन्न प्रकार के रंगों का उपयोग सामान्यतया मनुष्य कला, चित्रकारी आदि के लिये करता है। रंगों का यह सामान्य एवं सीमित उपयोग रहा। किन्तु इन्हीं रंगों के आवरण में लिपटे नन्हें वन्य प्राणी जीवन की भाग दौड़ में अपने को बचाये रखते हैं। इस सुरक्षा कवच की आड़ में ये प्राणी आसानी से अपना आहार भी ढूंढ़ लेते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में पाये जाने वाले पतंगों की एक जाति होती है ‘मेण्टीस’। ये पतंगे फूलों के रंग जैसे होते हैं। पुष्पों के डालियों पर बैठे अपना आहार प्राप्त कर लेते हैं। जब पुष्पों की पंखुड़ियों पर चिपके रहते हैं तो लगता है जैसे पुष्प की ही कोई पंखुड़ी हो। दक्षिणी अमेरिका में भी इसी प्रकार की पारदर्शी काँच जैसी पंख वाली एक तितली पायी जाती है जिसका रंग पेड़ की डालियों से बिल्कुल मिलता-जुलता है। उसे देखने से लगता है कि पेड़ की छाल हो। ‘डेड लीफ बटर फ्लाई’ तो सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती है। यह केवल रंग, रूप आकार में ही वैसी नहीं होती है वरन् उड़ती भी उसी प्रकार है जैसे हवा के झोंके से पत्तियाँ ‘स्टीक’ नामक कीड़ा पेड़ से इस प्रकार चिपका रहता है जैसे उसकी ही कोई छोटी शाखा हो। ‘ट्रापीकन’ कीड़े एक समूह में एकत्रित होकर पेड़ में उसके फूल जैसे लटके रहते हैं। अधिकाँश व्यक्तियों को उनके फूल होने का भ्रम हो जाता है।
तितलियों में कुछ जातियाँ ऐसी होती हैं जो पत्तियों का रंग धारण कर लेती हैं ‘गतिशील पर्ण’ नामक तितली तो पत्ते की शक्ल, रंग एवं आकर से मिलती जुलती है। पौधे पर जब यह रेंगती है तो लगता है कोई पत्ती चल रही हो। ‘वोलिविया सीनोफ्लेविया’ तितली जब फुदकती है तो पहचान में आती है।
ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी को प्राकृतिक प्रकोप एवं प्रतिकूलताओं में समायोजन कर सकने की शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता दी है। देखा यह जाता है कि बौद्धिक क्षेत्र का नेतृत्व करने वाला प्राणी मनुष्य ही सामान्य घटनाक्रमों, प्रतिकूलताओं से प्रभावित होकर अपना शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तुलन नष्ट करता रहता है जबकि अन्य प्राणी जीवन का एक सहज क्रम मानकर परिवर्तित परिस्थितियों एवं वातावरण के अनुरूप अपने को ढाल ले हैं। उत्तरी ध्रुव, पहाड़ों एवं बर्फीले प्रदेश की भीषण ठंड में भी रीछ, सर्प, उल्लू अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं।
बाह्य शत्रुओं, आक्रामकों से बचाव में जिस बुद्धिमता का परिचय ये छोटे नन्हें जीव देते हैं उसे देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। मनुष्य छोटी-मोटी कठिनाइयों, अवरोधी से विचलित होता रहता है जबकि उसकी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता इन क्षुद्र प्राणियों की तुलना में हर दृष्टि से अधिक समर्थ है। सामान्य घटनाक्रमों से प्रभावित होकर रोते-कलपते समर्थ मनुष्य को देखने पर उसकी बुद्धि पर सन्देह उत्पन्न होता है तथा यह कहना पड़ता है कि इनसे अच्छे तो ये जीव-जंतु हैं जो बाह्य परिस्थितियों को चैलेंज करते रहते हैं किन्तु घुटने नहीं टेकते। मनुष्य को इन जीवों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
मेंढकों का प्रिय आहार समझे जाने वाले ‘टोड’ मिट्टी के ढेले के आकार में बने बैठे रहते हैं। इनको पहचान पाना तो मेढ़क से ही सम्भव है। ‘टोड’ की चालाकी से परिचित मेढ़क स्वयं भी अपना रंग बदलता रहता है। पानी सतह पर तैरते हुए कोई का रंग धारण कर लेता है। मिट्टी में पहुँचकर उसी के अनुरूप बन जाता है। शत्रुओं को इस प्रकार झाँसा देता रहता है। दूसरी ओर रंग की आड़ में अपना शिकार भी करता रहता है। मछलियाँ, घोंघे तथा ‘स्क्वीड’ तो अपनी त्वचा का रंग बदलने में विशेषज्ञ है। कुछ घोंघे तो मिनटों में अपनी काया का रंग परिवर्तित करते देखे जाते है। समुद्री घास का हरा रंग तथा रंगीन काई का भूरा या ‘बैंगनी रंग ये शीघ्र ही धारण कर लेते हैं।
कुछ प्राणियों में परिवर्तन करने की प्राकृतिक क्षमता न हो हुए भी शत्रुओं से बचाव में अपनी विलक्षण सूझबूझ का परिचय देते हैं। अभिनय कला में वे इतने पारंगत होते हैं कि शत्रु धोखा खा जाते हैं। वर्षा ऋतु में पाये जाने वाले कीड़े’गिंजाई’ ‘काँतर’ कुंडलाकार रूप में इस प्रकार पड़े रहते हैं कि जैसे कोई मृतक हो। आक्रमणकारी जीव इन्हें मृत जानकर छोड़ देते हैं। अमेरिका में पाया जानेवाला जीव ‘आर्मेडिलो’ शत्रु की आहट मिलते ही अपनी गर्दन को मोड़कर फुटबाल जैसी शक्ल धारण कर लेता है तथा निश्चेष्ट पड़ा रहता है। ये पशु-पक्षी जीव न केवल अपनी सुरक्षा करते हैं। वरन् अपने बच्चों की देख-रेख एवं बाहरी आक्रमणों से बचाव की विधि-व्यवस्था, परिवार के मुखिया के समान करते हैं। ‘गौरैया और श्यामा’ अपने अण्डों को घास में इस प्रकार रखती है कि उनके ऊपर शत्रु की दृष्टि न पड़ सके। बच्चे भी आरम्भ से ही दिये गये माता-पिता के इस प्रशिक्षण का पालन पूरी मुस्तैदी के साथ करते हैं। अण्डे से निकलकर आते ही जब शत्रु को देखते हैं तो मृतक की भाँति लेट जाते हैं। शत्रु भी मृतक जानकर छोड़ देते हैं।
कुछ जीव जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ होते हैं वे इस प्रकार की शारीरिक चेष्टाएँ प्रदर्शित करते हैं जिन्हें देखकर अन्य प्राणी डर जाय तथा आक्रमण न करें। अमेरिका में पाया जाने वाला सर्प ‘लाँगलोण्ड’ इसी श्रेणी में आता है। इसमें विष नहीं पाया जाता है इसलिए सहज ही शिकार बनने की सम्भावना बनी रहती है। ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए यह अपना फन उठाकर फुफकारता हुआ ऐसे चलता है जैसे कोई विषधर सर्प आ रहा हो। शत्रु उसे देखकर डर जाते हैं तथा आक्रमण करने का साहस नहीं कर पाते। यदि अपने उस अभिनय में वह असफल रहा तथा कोई शत्रु आक्रमण कर दे तो वह चित्त होकर मृतक के समान लेट जाता है। आक्रमणकारी उसे प्रायः मृत जानकर आगे बढ़ जाते हैं। शत्रु के आगे बढ़ते ही वह एक ओर धरे से खिसक जाता है। ‘चीनी फीजेण्ट’ नामक रंगीन पंखों वाला पक्षी अपनी गर्दन के पास लाल थैलियों को फुलाकर अपना आक्रामक रुख प्रदर्शित करके शत्रुओं को डराता रहता है। छिपकलियाँ भी इस कला में निपुण होती हैं। आक्रमण की आशंका होते ही अपना मुंह खोलकर वायु द्वारा शरीर को फुलाती है तथा आँखों से रक्त की पिचकारी छोड़ती हैं। शत्रु भयभीत होकर भाग जाता है, ‘स्क्वीड’ हमला किये जाने पर रक्त की पिचकारी छोड़ती हैं। शत्रु भयभीत होकर भाग जाता है, ‘स्क्वीड’ हमला किये जाने पर अपने ही आकार का स्याही का बादल छोड़कर भाग जाता है।
परमात्मा ने प्रत्येक प्राणी को उसकी आवश्यकतानुसार शक्ति, सामर्थ्य एवं बुद्धि दी है जिससे वे स्वस्थ जीवनयापन करते हुए शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक सुरक्षा करे सकें। छोटे नगण्य समझे जाने वाले प्राणी ईश्वर द्वारा दी गई क्षमता का सदुपयोग करते है तथा अपने छोटे से क्षेत्र में उल्लासपूर्ण जीवन व्यतीत करते है। मनुष्य को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। मनुष्य जीवन की गरिमा एवं उद्देश्य को समझते हुए उसे प्राप्त करने के लिए सतत् प्रयास करना चाहिए।
आप नई-नई स्कूटर या साइकिल खरीदिए और फिर उस पर सवारी करना बन्द कर दीजिए, तो हर परिचित मित्र ओर स्वजन रोज-रोज पूछेंगे-टोकेंगे कि आखिर आपने वह वाहन खरीदा किस लिए है। खुद आपको भी झेंप लगेगी।
लेकिन एक वस्तु इन दिनों ऐसी भी फैशन में है कि जिसे अधिकाँश लोग खरीदते तो हैं, लेकिन फिर उसके उपयोग से पूरी तरह से बे खबर रहते हैं और इसके लिए न तो कोई परिचित मित्र टोकते, न खुद खरीदने वाला कभी झेंपता। शायद आप सोच रहे हैं कि भला ऐसी भी कोई वस्तु सम्भव है क्या? कौन ऐसा पागल होगा, जो किसी वस्तुतः को खरीदकर फिर उसका कोई भी उपयोग न करें?
लेकिन समाज का दुर्भाग्य है कि ऐसे ही लोगों की बहुतायत है और फिर न वह वस्तुतः भी कोई रुपये-दो रुपए की नहीं, उसकी कीमत सौ से तो ऊपर ही होती है। वह वस्तु है घड़ी।
घड़ी का एकमात्र प्रयोजन जो जग जाहिर है, वह है समय की जानकारी। लेकिन हमारे समाज की मानसिकता इन दिनों कैसी विचित्र और रुग्ण है कि घड़ी खरीदने की ललक तो हर एक को है, पर फिर उसके द्वारा समय की जानकारी रखने और समय के प्रति सजग रहने का भाव प्रायः किसी में उत्पन्न नहीं होता।
कई लोग तो घड़ी देखना नहीं जानते, फिर भी उन्हें घड़ी पहने देखा जा सकता है। घड़ी अब समय की जानकारी की आवश्यकता पूरी नहीं करती वरन् हाथ की शोभा ही बढ़ाती है। यहाँ तक कि घड़ी पहने हुए व्यक्तियों को भी दूसरों से समय पूछते हुए देखा गया है। घड़ी पहनने वाले सौ व्यक्तियों से यदि यह प्रश्न पूछा जाय कि आपने घड़ी क्यों बाँधी तो नब्बे लोग यही कहेंगे कि कलाई की शोभा के लिए। लेकिन यह स्वस्थ स्थिति नहीं है। यह इस तथ्य का परिचायक भर है कि जीवन की सर्वोपरि सम्पदा समय के प्रति हमारे लोगों के मन में कितनी अवज्ञा और उपेक्षा का भाव है। यहाँ तक कि समय का मूल्य महत्व बताने वाले यन्त्र-घड़ी को फैशन और आभूषण बना डाला। कथनी और करनी में कितना फर्क हो गया है, इस तथ्य की भी द्योतक यह प्रवृत्ति है। लोग समय-निष्ठ होना नहीं चाहते, दूसरों को यह बताना भर चाहते हैं हम समय-निष्ठ हैं। उसी प्रकार जैसे अधिकाँश लोग व्यक्तित्व और .चरित्र से धार्मिक होना नहीं चाहते, चन्दन लगाकर या रुद्राक्ष आदि पहनकर अपने को धार्मिक व्यक्ति जताना भर चाहते है॥ यह एक ह्रासशील समाज का लक्षण है।
कोई भी चीज जब फैशन बन जाती है तो उसका मूल्य महत्व कम और प्रदर्शन की चीज ज्यादा हो जाती है। घड़ी फैशन और आभूषण बन गयी है। आदमी के जीवन और व्यवहार में से घड़ी का वास्तविक महत्व या उपयोग लुप्त हो गया है। आज स्थिति यह है कि हाथ में घड़ी बँधी हो और वह कोई काम समय पर नहीं करता हो तो भी कोई नहीं पूछेगा कि आप दफ्तर देर से क्यों आते हैं या समय पर जाग क्यों नहीं पाते? उल्टे सभाओं और अन्य दूसरे कार्यक्रमों में जो लोग देर से पहुँचते हैं उनके हाथ में सुन्दर और कीमती घड़ियाँ बंधी होगी। आदमी अपनी पहली तनख्वाह से घड़ी खरीदेगा ताकि वह असल में बाबू कहला सके। माँ बाप अपने बच्चों को थोड़ा बड़ा होते ही घड़ी बँधवा देंगे ताकि औरों की दृष्टि में वे तथा उनके परिवार प्रतिष्ठित और सम्पन्न दिखाई दें। ब्याह शादियों के अवसर पर दूल्हे राजा अपने सास ससुर से घड़ी की ही फर्माइश सबसे पहले करेंगे। नव-वधू मुँह दिखाई में सर्वप्रथम घड़ी की ही माँग करेंगी। यह सच इसलिए नहीं कि घड़ी-समय बताने वाली मशीन है, बल्कि इसलिए कि घड़ी रौब दर्शाने वाली, फैशन और प्रदर्शन की चीज है।
यदि घड़ी को फैशन नहीं बनाया जाता तो उन्हीं हाथों में वह दिखाई देती जो समय के पाबन्द है या घड़ी पहनने वाला व्यक्ति समय को पकड़ने की कोशिश करता। घड़ी रखना तो आज तक एक व्यक्ति का सार्थक हुआ था। वे थे महात्मा गाँधी। उनकी कमर में लटकती घड़ी ने उन्हें एक-एक क्षण का बोध कराया। न तो उन्होंने कभी किसी क्षण को व्यर्थ गँवाया और न ही वे किसी सभा या कार्यक्रम में कभी देर से पहुँचे।
एक बार पण्डित नेहरू घड़ी बाँध कर उनके पास पहुँचे। महात्मा गाँधी ने देखते ही तुरन्त पूछा- ‘घड़ी’ तुम्हारे चलिए आवश्यक है या शौक।
नेहरूजी ने पूछा- ‘मैं आपकी बात समझा नहीं।’
मैं इधर कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि किसी भी कार्यक्रम या आयोजन में देर से पहुँचने लगे हो। घड़ी पहनकर भी अपने इस दोष को सुधार भी सकोगे या नहीं’ -बापू ने का।
‘पूरी कोशिश करूंगा’- नेहरू का उत्तर था। उनकी कोशिश पूर्ण हुई हो यान हुई हो परन्तु गाँधीजी से जब कभी मुलाकात के लिए मिलने जाते तो घड़ी का सर्वाधिक ध्यान रखते। आज जब कभी कोई घड़ी वाला व्यक्ति किसी स्थान पर देर से पहुँचता है तो वह घर से ही घड़ी को ठीक कर लेता है। यह बताने के लिए कि वह तो ठीक समय पर ही पहुँचा परन्तु घड़ी धोखा दे गयी। लेकिन मजे कि बात तो यह है कि आगे रखी गयी सुइयों के बावजूद भी, अपनी ही घड़ी के हिसाब से वह देर से पहुँचता है। जो लोग इसे आभूषण मानते हैं उनकी यह दशा है।
घड़ी का सही और उचित प्रयोग करना सीख लिया जाय तो आदमी की उम्र पच्चीस साल और बढ़ जायगी। साठ वर्ष का आदमी अपनी इसी उम्र में पच्चासी वर्ष का काम कर दिखायेगा। क्योंकि वह अपनी दिनचर्या को उतना ही नियमबद्ध रखेगा जितनी कि घड़ी।
समय की पाबन्दी-अच्छे व्यक्तित्व और उन्नत चरित्र का एक अनिवार्य गुण है। घड़ी की आवश्यकता को समझा जाय, तो घड़ी न भी हो तो काम चल जायगा और मनुष्य अपने व्यक्तित्व को विकास की उच्चतम सीढ़ियों तक ले जायगा।
घड़ी पास में होने पर भी, जो समय के प्रति लापरवाही करते हैं, समयबद्ध जीवनक्रम नहीं अपनाते, उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी नहीं कहा जा सकता, घड़ी कोई गहना नहीं है। उसे पहनकर फिर जीवन में उसका कोई भी प्रभाव नहीं परिलक्षित होने दिया जाता तो यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है, समय की अवज्ञा कैसे भी हेय है, फिर समय-निष्ठा का प्रतीक-चिन्ह धारण करने के बाद यह अवज्ञा तो एक अपराध ही है। यदि आपके पास घड़ी है, तो उसकी इज्जत की रक्षा कीजिए। अपनी गतिविधियों में उसका प्रभाव झलकने दीजिए।
मेरे पूर्वजों ने अपने पराक्रम और परिश्रम से जिस मातृ-भूमि का श्रृंगार किया, वह मातृभूमि आज मेरे पौरुष की अपेक्षा करती है। तो क्या मुझे उसके लिए क्षण भर की भी देरी करना चाहिये? मेरे पूर्वजों ने जिस भारतभूमि को अपन बलि की खाद से सदा वीर-प्रसूता बनाये रखा, वह मातृभूमि आज मेरे रक्त का अभिसिंचन चाहती है तो क्या मुझे उसके लिए क्षण भर की देरी करनी चाहिये?
मेरे बाद मेरी जाने वाली पीढ़ियां मेरी मातृभूमि के जिस रूप में दर्शन करना चाहती है, जिस श्रद्धा से उसे पूजना चाहती हैं, जिस पौरुष से उसके रक्षार्थ बलिदान होना चाहती हैं, यदि मैं। अपनी मातृभूमि का वैसा पूज्य वेष अपनी सर्वोपरि पूजा, सर्वस्व अर्पण और सर्वोच्च बलिदान से न बनाऊँ तो क्या मैं अकेला ही इतना बड़ा कलंक न बन जाऊँगा कि सारा मानव - समाज ही सदा के लिए उससे कलंकित और लज्जित न हो जाय?
प्रसिद्ध विचारक और चिन्तक डाक्टर वाल्टर टौपेल ने लिखा है कि “केवल मनुष्य ही रोना हुआ पैदा होता है, शिकायत करता हुआ जीता है और निराश मरता है।” यह उक्ति अधिकाँश लोगों के जीवन में अक्षरशः सही सिद्ध होती है। अन्य प्राणियों के जीवन में न तो कोई परेशानी होती है न समस्यायें। पर मनुष्य विचारशील और भाव-प्रवण होने के कारण छोटी-छोटी घटनाओं से भी प्रभावित होता है तथा उन पर अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त करता है। ये प्रतिक्रियायें अनुकूल कम होती हैं और प्रतिकूल अधिक।
समाज के प्रत्येक वर्ग में प्रत्येक स्थिति के व्यक्तियों का यदि विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि हर कोई कहीं न कहीं, किसी न किसी कष्ट या समस्या से पीड़ित है। निर्धन व्यक्ति अपनी गरीबी से पीड़ित है तो समृद्ध और किन्हीं कारणों से। कोई भौतिक सुख-सुविधाओं से परेशान है तो कोई मानसिक शांति न मिलने से। आज के समय में तो ये समस्यायें और भी अधिक जटिल हो गई है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ और भी नयी-नयी समस्यायें उत्पन्न होने लगी हैं। आज की मशीनी सभ्यता ने मनुष्य के लिए जो नई समस्याएँ उत्पन्न की है उनमें प्रमुख है मानसिक तनाव। यों चिन्तायें, विक्षोभ, मानसिक दबाव और असफलता का दुःख सदा से मनुष्य को परेशान करते हैं, पर विगत कुछ दशाब्दियों में मानसिक तनाव के कारण कई ऐसे रोग फैलने लगे हैं जिसका कारण शरीर में खोजें भी, नहीं मिल पाया है। ऐसे रोगों को अंग्रेजी में “साइकोसोमैटिक” रोग कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार अकेले अमेरिका में लगभग 65 प्रतिशत रोगी इसी प्रकार के होते हैं। भारत में भी ऐसे रोगियों की संख्या बड़े शहरों के कुल रोगियों की संख्या से करीब आधे इन्हीं रोगों से ग्रस्त होते हैं।
चिकित्सा-विज्ञान की नई-नई शोधों और उपचार पद्धतियों के बल पर कुछ दशकों में जहाँ कई पुरानी बीमारियों पर पूरी तरह नियंत्रण प्राप्त कर लिया गया था, वहीं अब कुछ ऐसे रोग बड़ी तेजी से फैल रहे हैं, जिनका पहले कभी नाम भी नहीं सुना गया था। विशेषज्ञों के अनुसार उन रोगों को सभ्यता के राजरोग कहा जाता है। उनका कहना है कि मन पर पड़ने वाले दबावों और मानसिक तनाव के कारण ही ये रोग उत्पन्न होते हैं।
विज्ञान की भाषा में मन शरीर का कोई अवयव नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार जिसे मन कहा जाता है। वह मस्तिष्क की शक्तियों का ही एक विशिष्ट प्रकार से होने वाला प्रक्षेपण है। मनुष्य शरीर के द्वारा सम्पन्न होने वाली सभी गतिविधियों, क्रिया-कलापों का संचालन मन द्वारा होता है- यह तो सर्वविदित है। शरीर के द्वारा कुछ कार्य तो मनुष्य अपनी इच्छानुसार करता है जैसे चलना, उठना, बैठना, लिखना, पढ़ना आदि। इनके अतिरिक्त शरीर में कई ऐसी प्रक्रियाएं भी चलती रहती है जिन पर मनुष्य अपनी इच्छानुसार नियमन नहीं कर सकता। जैसे पाचन क्रिया, रक्त परिभ्रमण, हृदय स्पंदन, नाड़ी चला आदि। इन प्रक्रियाओं का नियंत्रण मस्तिष्क के जिस भाग द्वारा होता है उसे हाईपोथेल्मस् कहते हैं। इस केंद्र से चलकर स्नायु पथ के द्वारा अनैच्छिक गतिविधियाँ चलती है। इसके भी दो भाग हैं एक को पैरासिंपेथैटिक कहा जाता है तथा दूसरे को सिंपेथैटिक। पहला पाचन, पोषण और शुद्धिकरण जैसे कार्य करता है तथा दूसरा भाग प्राणी को विशिष्ट परिस्थितियों से निपटने की क्षमता प्रदान करता है। तनाव या दबाव के समय मस्तिष्क का यह हिस्सा सक्रिय हो उठता हैं। जैसे खसरा प्रस्तुत होने पर इनके कारण रक्तचाप बढ़ जाता है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, हृदय से अधिक रक्त प्रवाहित होने लगता है, भीतरी अवयवों से हटकर रक्त माँसपेशियों की ओर आने लगता है। रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती हैं और शरीर .... नामक रसायन भी प्रवाहित होने लगता है। यह सब परिवर्तन आसन्न संकटों से जूझने के लिए होते है। किन्तु जब साधारण-सी बातों को लेकर भी चिंतित हुआ जाने लगता है तो भी यही परिवर्तन होते है।
भावनाओं की शरीर पर क्या प्रतिक्रिया होती है? इसका यह एक छोटा-सा उदाहरण है। प्रकृति ने भावनाओं का शरीर से यह संबंध विशिष्ट उद्देश्य से जोड़ा है। वह उद्देश्य यह है कि प्राणी का शरीर परिस्थिति के अनुरूप टल सके। कुछ और घटनाओं द्वारा भावनाओं की शरीर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को समझा जा सकता है। डर के कारण पेशाब छूट जाना, घबराहट से पसीना छूटना, चिन्ता के कारण भूख न लगना, गुस्से में होने पर चेहरा तमतमा उठना, परेशानी से नींद न आना और लज्जा के मरे लाल हो जाना, चेहरा झुका लेना आदि स्थितियाँ दर्शाती है कि भावनाओं का प्रभाव मनुष्य शरीर के रक्त प्रवाह और अंदरूनी हलचलों पर अनिवार्य रूप से पड़ता है।
पसीना छूटने से पता चलाता है कि भावनाएँ शरीर की उन ग्रन्थियों को प्रभावित करती है जो पसीना छोड़ने का काम करती है। बहुत बुरी खबर सुनने या मानसिक आघात पहुँचने पर घबड़ा उठने के साथ मूर्छित का क्रिया-कलाप भी भावनाओं से प्रभावित होता है। यह सब स्थितियाँ इस बात की द्योतक है कि परिस्थितियाँ भावना को जन्म देती है और भावनायें शारीरिक प्रक्रियाओं को। परिस्थिति विशेष से निपटने के लिए शरीर में होने वाले ये परिवर्तन प्रकृति की बहुत ही उपयोगी व्यवस्था होती है।
परन्तु कई बार अकारण ही व्यर्थ की चिन्ताएँ होती है और उन स्थितियों में भी यही परिवर्तन होने लगते है। लम्बे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो मनुष्य शरीर कई रोगों से आक्राँत हो जाता है। आधुनिक सभ्यता में जीवन-क्रम की तेज गतिशीलता और कदम-कदम पर प्रतिस्पर्धा की आपाधापी भी मस्तिष्क में मिथ्या आशंकाओं भय और गुत्थियां को जन्म देती हैं। वैसी दशा में मस्तिष्क के आदेश से शरीर में वैसी ही प्रक्रिया होने लगती है जैसी कि वास्तविक संकट के समय होती है। मनोवैज्ञानिक का कहना है कि इस तरह की प्रक्रियायें अपेक्षाकृत कम तीव्र होती हैं परन्तु वे लम्बे समय तक चलती है। जब वास्तविक संकट सामने आता है तब तो ये प्रतिक्रियायें जितनी तेजी से शुरू होती है। उतनी ही तेजी से संकट दूर हो जाने पर अपने आप समाप्त हो जाती है। लेकिन अवास्तविक और अभूर्त संकट से उत्पन्न प्रक्रिया भले ही तीव्र न हो पर धीमे-धीमे शरीर में चलती जाती है तथा उससे शरीर को नुकसान पहुँचता है। उदाहरण के लिए वास्तविक संकट उत्पन्न होने के कारण हृदय की गति बढ़ जाती है और संकट समाप्त होते ही पुनः स्वाभाविक स्थिति में आ जाती है। किन्तु मनोकल्पित आशंका से हृदय गति कुछ तेजी से ही धड़कती है। ऐसी आशंकाओं का कोई आधार तो होता नहीं, अतः ये आशंकाएँ भी लम्बे समय तक चलती रहती है और हृदयगति भी निरन्तर बढ़ी हुई रहने लगती है जो शारीरिक व्याधि का रूप धारण कर लेती है। उपरोक्त ढंग से बढ़ी हुई हृदय की गति के रोग को “टैकी कार्डिया” कहा जाता है।
इसी प्रकार संकट के समय मस्तिष्क रक्तप्रवाह को आमाशय से हटाकर ऊपरी माँसपेशियों की ओर मोड़ देता है। ऐसे क्षणों में मारे घबराहट के जी मिचलाने लगता है और ऊबकाई आने लगती है। यह प्रक्रिया मिथ्या भय के कारण भी यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। ऐसी स्थिति में खट्टी डकारें आने, जी मिचलाना जैसे लक्षण प्रकट होने लगते है।
यह सब लक्षण रोग के प्रतीत होते है और लगता है कि शरीर स्वास्थ्य में कोई खराबी आ गई है। परन्तु वास्तव में इनकी जड़ मन के भीतर होती है। व्यक्ति इस बात को नहीं समझता और मानसिक कारणों को यथावत् रखते हुए रोग की भी चिन्ता करने लगता है। जितना ही वह रोग के बारे में सोचता जाता है, उतना ही रोग बढ़ता नजर आने लगता हैं और दोहरा समस्या बन जाती है।
इस तरह के मानसजन्य रोगों की एक लंबी सूची है और विज्ञान भी लह मानने लगा है कि 65 प्रतिशत रोगों का कारण इस तरह की मानसिक अपरिपक्वता ही है। व्यक्तित्व में प्रौढ़ता का अभाव ही मानसजन्य शारीरिक रोगों का कारण बनती है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो निरन्तर किन्हीं बातों को लेकर चिंतित रहना, गलत सलत शंका, कुशंकाएँ करते रहना और व्यर्थ के बहम पालना मानवीय मस्तिष्क को आत्याँतिक तनावग्रस्त कर देते है। तनाव का बहुत अधिक बढ़ जाना ही इस तरह के रोगों का कारण बनता है।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि तनाव जीवन का एक अनिवार्य अंग है परन्तु वह सीमा से अधिक हो जाता है तो मस्तिष्क और शरीर पर बुरा प्रभाव डालने लगता है। सिएटल के वाशिंगटन विश्वविद्यालय में चिकित्सा विभाग के प्रधान डा. टामस होम्स ने हाल ही में लंबे समय तक शोध और अनुसन्धान के बाद यह प्रतिपादित किया है कि सक्रिय जीवन व्यतीत करते हुए कोई भी व्यक्ति तनाव से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता। उनका कहना है कि एक ही तरह की घटनाएँ अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अनुपात से तनाव का कारण बनती हैं। उन्होंने ऐसी विभिन्न घटनाओं तथा घटकों की एक लम्बी सूची बनाई जिनके कारण मानसिक तनाव उत्पन्न होता है तथा इन घटनाओं के लिए अंक निर्धारित किए और कहा कि एक वर्ष में 200 अंकों से अधिक तनाव-पूर्ण स्थितियों में स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।
डा. होम्स ने जीवन साथी की मृत्यु से लेकर रहन-सहन में परिवर्तन और यहाँ तक कि सोने की आदतों में बदलाव तक को तनाव का कारण बताया है। यह बात अलग है कि कौन व्यक्ति इन घटनाओं से कितना तनाव अनुभव करता ह। इस प्रकार तनाव से पूर्णतया छुटकारा तो नहीं पाया सकता ओर न ही इसके लिए चिन्ता करने की कोई आवश्यकता है। परमात्मा ने मनुष्य के शरीर और मन को इस योग्य बनाया है कि यह दैनन्दिन जीवन में आने वाले तनाव को झेल सके। समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जब मनुष्य साधारण घटनाओं को भी आवश्यकता से अधिक महत्व देने लगता है। इस स्थिति से बचने का एक ही उपाय है कि मनुष्य अपनी सीमाओं और सामर्थ्यों को सही ढंग से पहचाने तथा उनके अनुसार अपना जीवन-क्रम बनाये। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और डा. सोलिए के अनुसार अपनी सामर्थ्य के अनुसार तनाव झेलना स्वास्थ्य के लिए ही है।
लेकिन सामर्थ्य से अधिक तनाव बढ़ता प्रतीत हो तो डा. सोलिए ने उसके लिए श्रम को सबसे बड़ा उपचार बताया है। अपने आपको व्यक्त रखना अनेक प्रकार की समस्याओं के साथ-साथ मानसिक तनाव से मुक्त होने का भी अचूक उपाय है। महत्वाकांक्षाओं और क्षमताओं में सामंजस्य भी तनाव की सम्भावना को बहुत कम कर देता है। अपनी स्थिति में ऊँचा उठने और उन्नति के चरम शिखर को छूने की इच्छा हर किसी में रहती है। निश्चित ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए पर उसके लिए अधैर्य या व्यग्रता से काम नहीं लेना चाहिए। सीढ़ी दर सीढ़ी ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। डॉक्टर सोलिए का यह भी कहना है तनाव से उत्पन्न शारीरिक व्याधियों से बचने के लिए व्यक्ति का आस्थावान होना भी आवश्यक है। ईश्वर के अस्तित्व को मानने में किसी को आपत्ति भी हो सकती है, पर कम से कम अपने प्रति आस्था तो रखी जा सकती है।
अपने प्रति आस्थावान रहने के लिए आवश्यक है कि अपना सही-सही मूल्याँकन किया जाय। अपने को बहुत अधिक बढ़ाकर या बहुत अधिक घटाकर देखने वाले लोग तनाव तथा कुण्ठा के शिकार होते हे। अतएव अपना वास्तविक मूल्याँकन करते हुए सामान्य और सहज जीवन जीना मन और तन दोनों को सशक्त बनाता है।
अकुशल मजदूर 3-4 रुपए रोज पाता है और प्रशिक्षित श्रमिक 11 से 31 रुपए तक प्रतिदिन कमाते है। सामान्य मैट्रिक, स्नातक, बेकार घूमते रहते है। और मैट्रिक के बाद तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त लोग टर्नर, फिटर, मेकेनिक, टायपिस्ट, स्टेनों, आदि के पदों पर सरलता से काम पा जाते हैं और अच्छी कमाई कर लेते हैं। यह सब तकनीकी ज्ञान का कमाल है। तकनीकी जानकारी से व्यक्ति उस काम से सम्बन्धित ऐसी बारीकियों को जान लेता है, जिनमें श्रम तो अधिक नहीं लगता, किन्तु मनोयोग और दक्षता के परिणाम स्वरूप कार्य कुशलता बहुत अधिक बढ़ जाती है।
जानकार लोग ऐसी ही तकनीक पढ़ने में भी प्रयुक्त करते हैं और दूसरे लोगों से कई गुना अधिक पढ़ लेते हैं। जिन्हें छोटे से जीवन में बहुत अधिक काम करना होता है वे सब कामों से ऐसी ही तकनीक विकसित कर लेते हे। स्व. डा. राजेन्द्र प्रसाद के बारे में विख्यात है कि वे जिस पृष्ठ को तुरन्त पढ़कर पृष्ठ पलट देते थे मानों मात्र निगाह फेर रहे हों पर वे पृष्ठ को पूरा पढ़ लेते थे इतने अल्प समय में। यह कोई ईश्वरीय देन नहीं तकनीकी भर है। पिछले दिनों मास्को के कई नागरिकों ने ऐसी तकनीक सीखी है और वे सामान्य पाठक से 3-4 गुना अधिक पढ़ लेते है। चार घण्टे का वाचन एक घण्टे में कर लेते है। इस प्रशिक्षण को आरम्भ करने का श्रेय वहाँ के वैज्ञानिक एवं तकनीकी पुस्तकालय के कर्मचारी इंजीनियर ओलेवा कुन्जेत्सोव को है।
इनकी इस तकनीक का आधार यह है कि जिस समय मनुष्य पढ़ता है उस समय उसकी आंखें और उसका मस्तिष्क ही काम नहीं करता वरन् भीतर ही भीतर बोलने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। पढ़ने की इस गति का बोलने की प्रक्रिया के साथ अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। कहने का अर्थ है पढ़ते समय ज्ञान और सूचनाओं को मस्तिष्क में संग्रहित करने में दृष्टि, और श्रवण ये तीनों-शक्तियाँ एक साथ काम करती हैं। किसी भी लिखित सामग्री को शीघ्रतापूर्वक ग्रहण करना वाक् शक्ति को रोकने पर निर्भर करता है। क्योंकि बोलने की गति बहुत मन्द होती है। कोई भी व्यक्ति एक मिनट में 240 शब्दों से अधिक नहीं पढ़ सकता।
जिस गति से बोलने की तरह एक-एक शब्द को पढ़कर किसी गद्यांश का जितना भाग याद रखा व समझा जा सकता हैं, उसे उसमें लगे समय से बहुत कम समय में दृष्टि व मस्तिष्क के एकान्तिक सम्बन्ध को स्थापित करने पढ़ा व याद रखा जा सकता है। हम एक-एक शब्द को जिस मन्द गति से पढ़ते है। उसे ही तीव्र गति से भी पढ़ सकते हैं। इसके लिए बोलकर पड़ने या बोलने की तरह शब्दशः पढ़ने की आदत के स्थान पर इस नयी तकनीक को प्रतिष्ठित करना पड़ता है।
शार्ट हेन्ड का ज्ञाता जिस प्रकार अपने छोटे-छोटे संकेतों में बोलने वाले की बात समेट लेता है और पुनः टाइप राइटर पर बैठकर द्रुतगति से उसे ज्यों की ज्यों अंकित कर देता है। हमारे मस्तिष्क की जानकारियाँ ग्रहण करने की और उन्हें पुनः जुटा देने की वैसी ही प्रक्रिया है। भिन्नता यह रहती है। कि उनमें शब्दशः उतार देने का अभ्यास करना पड़ता है। ऐसा अभ्यास किया जाय तो पढ़ने की गति 3-4 गुनी बढ़ायी जा सकती है।
सोवियत संघ के मास्को नगर में दिये गये प्रशिक्षण जैसी सुविधा फिलहाल तो हमारे देश में उपलब्ध होना सम्भव नहीं है। फिर भी व्यक्ति अभ्यास के द्वारा अपने ढंग से उस तकनीक को विकसित करके अपने अध्ययन की क्षमता को कई गुना बढ़ाकर समय की बचत कर सकता है। आवश्यकता इस प्रक्रिया की तकनीक के अभ्यास की है।
देर तक मन्त्रणा और विचार-विमर्श के बाद सम्राट देवमित्र और महामन्त्री बोधायन ने यह निश्चित किया कि ज्येष्ठ, राजकुमार पुष्यमित्र को राजगद्दी पर आसीन किया जाय। इसमें मन्त्रणा और विचार-विमर्श की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ राजकुमार ही राज्य के उत्तराधिकारी थे। परन्तु सम्राट और महामन्त्री इस प्रश्न के कुछ दूसरे ही पक्षों को लेकर विचार-विमर्श कर रहे थे। अस्तु, राज्यारोहण के समय न कोई उत्सव मनाया गया और न ही विधिवत् अभिषेक किया गया।
प्रातःकाल राजसभा में ही घोषणा की गई कि सम्राट अब आयुष्य क उत्तरार्ध में वानप्रस्थ ग्रहण कर राज्य संचालन के बाद लोक सेवा के लिए अपने उत्तरदायित्व युवराज को सौंपना चाहते हैं। इस घोषणा के बाद देवमित्र सिंहासन से उठ आए और उस पर पुष्यमित्र को बिठा दिया गया। इस हस्तान्तरण के बाद देवमित्र राजभवन में चले गये और पुष्यमित्र राज्यसभा का संचालन करने लगे।
प्रातः सभा समाप्त होने के बाद अपराह्न जन सभा आरम्भ हुई। इसमें गण ने नागरिक सम्राट् को आकर अपनी कष्ट, कठिनाइयाँ और समस्याएँ सुनाते थे तथा तुरन्त न्याय हो जाता। न्याय प्रक्रिया चल रही थी कि बीच में एक वृद्ध पुरुष आया। पुष्यमित्र का अभिवादन करते हुए वृद्ध ग्रामीण ने कहा- “महाराज न्याय कीजिए। आज स्वयं राजमाता ने हम गरीबों के झोंपड़े जलवा दिये। हम गरीब बेघर हो गये। हमारे साथ न्याय करें महाराज।
ग्रामीण की यह शिकायत सुनते ही पुष्यमित्र का चेहरा तमतमा उठा। उसने ग्रामीण के लिए न्याय विमर्श करने के बजाय उल्टे डाँट पिलाई-दुष्ट! राजमाता के लिए फिर कुछ कहा तो तेरी खाल उधेड़ दी जायेगी। वे राजमाता हैं, इस राज्य की स्वामिनी। पूरा राज्य उनकी संपत्ति है और वे जो चाहे कर सकती हैं।
ग्रामीण सहम गया और चुपचाप अपने घर चला गया। किसी को इस बात पर आश्चर्य हुआ हो अथवा नहीं, पर दूसरे दिन इस घोषणा ने सचमुच सभी को आश्चर्य में डाल दिया। कि नीति निर्मात्री परिषद् ने कल ही सिंहासनारूढ़ पुष्यमित्र को राज्यकार्य के अयोग्य घोषित कर दिया है और उनके स्थान पर दूसरे कनिष्ठ राजकुमार विरथ को राज्यासीन किया है।
उस दिन भी जनसभा का आयोजन हुआ। लोग अपनी-अपनी फरियादें लेकर आते, उन्हें परिषद के सामने प्रस्तुत करते और विरथ उन पर विचार करता अपना फैसला सुनाते। इन फरियादियों में ही एक कलाकार भी था जिसने कहा- “महाराज! आज महा-मन्त्री ने मेरी बनाई हुई उन सभी कलाकृतियों को नष्ट करा दिया है जो मैंने बड़े परिश्रम से तैयार की थी। उनके भेजे अधिकारियों का कहना था कि अब महामन्त्री के आदेश से राज्य में केवल सम्राट् की ही मूर्तियां लग सकती हैं अनय देवी-देवताओं की नहीं। यह अन्याय हैं,कला का अपमान है महाराज। न्याय किया जाना चाहिए।
विरथ ने सोचा महामन्त्री ने सम्भवतः भूतपूर्व सम्राट को आदर देने के लिए ही यह निर्णय लिया होगा अतः उन्होंने मूर्तिकार को उनकी कलाकृतियों का यथेष्ट मूल्य दिये जाने का फैसला किया और राजकोष से इस आदेश की पूर्ति भी कर दी गई।
तीसरे दिन प्रातःकाल, राजसभा के सभी पार्षद एकत्रित हुए। इसमें भूतपूर्व सम्राट देवमित्र थे। पार्षदों को आशा थी कि आज राजकुमार विरथ के अभिषेक समारोह की घोषणा होगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, उल्टे विरथ को भी राजकाज चलाने के लिए अयोग्य करार दे दिया गा। नीति निर्मात्री परिषद् के अनुसार विरथ भी राज्य संचालन करने में अक्षम थे।
उस दिन तीसरे कनिष्ठ राजकुमार सुरथ को गद्दी पर बिठाया गया। लोगों को प्रतिदिन होने वाले इस परिवर्तन के कारण समझ में नहीं आ रहे थे। सभी आश्चर्य चकित थे कि प्रतिदिन एक नया सम्राट् आखिर कारण क्या है?
जो भी हो, उस दिन भी अपराह्न न्याय सभा की बैठक हुई। प्रधान के पद पर बैठे थे युवराज सुरथ। जिन्हें गद्दी तो मिल गई थी, पर विधिवत् सम्राट के रूप में अभिषिक्त नहीं किया गया था। न्याय सभा में एक पीड़ित ने पुकार लगाई, महाराज! मैं एक छोटा-सा किसान हूँ। इस वर्ष का राज्य कर समय पर भुगतान कर चुका हूँ, पर आज ही कर मन्त्री के आदेश से मुझे पकड़ बुलवाया गया और कोड़ों से मेरी पिटाई की गई।
‘मेरे पास कर चुकाने के प्रमाण भी है” यह कहते हुए उस व्यक्ति ने रसीदें युवराज के सम्मुख रख दीं। सुरथ ने उन्हें देखा और आदेश दिया, कर मन्त्री को पकड़ कर लाया जाए। तुरन्त दो सैनिक गए और कर मन्त्री को उनके निवास से पकड़ कर ले आये। उन्हें किसान की शिकायत से अवगत कराया गया और स्पष्टीकरण माँगा गया। कर मन्त्री ने कहा, “मैंने कर मन्त्री की हैसियत से जो किया है वह ठीक है। चूँकि आदेश दिया जा चुका है अतः भले ही इस व्यक्ति ने कर चुका दिया हो, उस आदेश का पालन करना पढ़ेगा। “
सुरथ कुछ देर तक विचार करते रहे और बोले, नागरिक तुम्हारे अभियोग पर कल निर्णय दिया जायगा। दूसरे दिन कर मंत्री को न्याय सभा में उपस्थित किया गया। उस दिन और दिनों की अपेक्षा काफी संख्या में लोग इकट्ठे हुए थे। राज्य के मंत्रीमण्डल में पहली बार किसी सदस्य पर अभियोग लगा था और उस पर निर्णय होने वाला था।
हजारों की भीड़ ने देखा- कर मन्त्री, बन्दी की वेशभूषा में लाये जा रहे है। उनके हाथ बँधे हुए है और गर्दन झुकी हुई है। किसान भी वही उपस्थित था। उसने अपना अभियोग दोहराया और सुरथ ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा-”मैंने इस विषय पर भली-भाँति विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि कर मन्त्री दोषी हैं। दोषी ही नहीं अपराधी और दुराग्रह भी हैं, अतः उन्हें पदच्युत करने के साथ -साथ यह दण्ड देना उचित होगा कि जितने कोड़े इस नागरिक को लगाये गए हैं उससे दुगुने कोड़े इन्हें लगाये जायें।
आदेश का पालन किया ही जाने वाला था कि पीछे भीड़ में कोलाहल सुनाई दिया। रथ से सम्राट देवमित्र उतर रहे थे और अपने अडिग रक्षकों से घिरे हुए जन-समूह के बीच से गुजरते हुए न्याय मंच की ओर बड़ रहे थे। मंत्र पर पहुँचते ही उन्होंने सुरथ को सम्बोधित करते हुए कहा आदेश का पालन रुकवा दिया जाए। इसके बाद उपस्थित नागरिकों की ओर उन्मुख होकर उन्होंने कहा, “आप पिछले तीन दिनों से नित नये परिवर्तन देख रहे थे उसका आज समापन हुआ। यह सब एक नाटक था। राजमाता पर आरोप ‘महामन्त्र’ को शिकायत और कर मन्त्री पर अभियोग सब नाटक थे, जो राज्य सिंहासन के घोषित उत्तराधिकारियों की परीक्षा के लिए रचे गये थे। परन्तु राजकुमार पुष्यमित्र और विरथ इस परीक्षा में असफल रहे और राजकुमार सुरथ सफल, क्योंकि उन्होंने प्रजा के लिए निष्पक्ष न्याय नीति के प्रति निष्ठा को प्रमाणित कर दिया है।
इन्हीं परीक्षाओं के लिए चार दिन पूर्व सम्राट देव-मित्र तथा महामन्त्री बोधायन में विचार विमर्श चल रहा था, जिसमें बोधायन को कहना था कि परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ राजकुमार को ह आप के बाद राज-गद्दा का उत्तराधिकारी होना चाहिए। जब कि देवमित्र कह रहे थे, हर परम्परा विवेक की कसौटी पर खरी उतरे यह आवश्यक नहीं है। देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार परम्पराओं को बदलते और बुद्ध संगत स्वरूप देते रहना चाहिए। तभी जनता का और समाज का हित सुरक्षित रहता है।
मानवीय मस्तिष्क प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया मणिमुकुट है, जो इस बात का द्योतक है कि वह इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी, परमात्मा का युवराज पुत्र है। अनादिकाल से अब तक मनुष्य ने जो प्रगति की है, जिस सभ्यता और संस्कृति का निर्माण तथा विकास किया है वह इस मस्तिष्क की ही कृपा है। शरीर स्वास्थ्य मानसिक सन्तुलन से लेकर सामाजिक सुव्यवस्था तक हर क्षेत्र में व्यवस्था और स्थिरता बनाये रहने में मस्तिष्क समर्थ और सक्षम है। लेकिन यह उसी स्थिति में सम्भव है जब मस्तिष्क को समुचित पोषण और सुव्यवस्थित संचालन मिलता रहे।
चिन्तन मस्तिष्क का प्रधान कार्य है। यदि वह सही और सन्तुलित हो तो सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी पग-पग पर सफलताएँ प्राप्त करता चलता है। संसार में। जितने भी महापुरुष और सफल व्यक्ति हुए हैं, उनमें से अधिकांश के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनकी मस्तिष्कीय क्षमता का अधिकतम छह प्रतिशत भाग ही सक्रिय रहा। लेकिन सही और सन्तुलित चिन्तन प्रक्रिया अपनाने के कारण उन्होंने इतनी सफलताएँ अर्जित कर दिखाई जो छह प्रतिशत या इससे भी अधिक सक्रिय मस्तिष्क वाले व्यक्ति भी प्राप्त नहीं कर सके। इसका एक ही कारण है कि अस्त-व्यस्त मनःस्थिति और मानसिक विकृतियाँ मस्तिष्क को चौपट करके रख देती हैं। बाहर वालों को न दीख पड़ने पर भी ऐसे व्यक्ति बेतरह जलते कुढ़ते रहते है और अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं को बर्बाद करते रहते हैं।
कहा जा चुका है कि मस्तिष्क प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदानों में सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ और मानवीय सत्ता की अमूल्य निधि है। इसी के आधार पर अगणित आविष्कार किये गये, जिनके द्वारा मनुष्य पाषाण युग से अणु युग तक अपनी सभ्यता की यात्रा पूरी कर सका। इसी के बल पर उसने आन्तरिक जगत की विलक्षणताओं को समझने तथा उनसे लाभ उठाने योग्य सामर्थ्य अर्जित की। इसी के बल पर सूक्ष्म जगत के क्रिया-कलापों और नियमों को जान पाना सम्भव हो सका। योग विज्ञान भी मस्तिष्क के कुशलतम अध्ययन और उसके निष्कर्षों का परिणाम है, जिसके द्वारा वह नर से नारायण नया पुरुष से पुरुषोत्तम बनने में समर्थ हो सका।
योग शास्त्रियों का कथन है कि अंतर्जगत में दिव्य उपलब्धियाँ अर्जित करने के लिए मस्तिष्कीय कुशलता अनिवार्य नहीं है। यह ठीक है, परन्तु यह भी सच है कि असन्तुलित मन और अव्यवस्थित चित्त द्वारा उस क्षेत्र में रंचमात्र भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। आत्मिक क्षेत्र में प्रगति के लिए यह अनिवार्य है कि मन की, मस्तिष्क की अव्यवस्थित दशा को सँवारा सुव्यवस्थित किया जाय, सन्तुलन साधा जाय और व्यर्थ के क्रिया-कलापों में नष्ट होती रहने वाली उसकी शक्ति को नष्ट होने से बचा कर आत्मिक प्रगति की दशा में लगाया जाय। योग-दर्शनकार ने इसी स्थिति को प्रत्याहार कहा है और बताया है।
“स्वविषय संप्रयोगे चित्त स्वरुपानुकार इवेद्रि-याणाँ प्रत्याहारः।”(2154)
अर्थात्- ‘‘अपने विषयों के संबंध से रहित होने पर चित्त का स्वरूप में तदाकार हो जाना प्रत्याहार है। जब साधनाकाल में साधक इन्द्रियों के विषयों से सम्बद्ध नहीं होता और चित्त को अपने विषय में लगाता है, उस समय इन्द्रियों का अपने विषयों की ओर न जाकर चित्त में विलीन सा हो जाना ही प्रत्याहार सिद्धि है।”
सामान्य स्थिति में होता यह है कि विषय मुखों, इन्द्रिय भोगों को भोगने के बाद भी मनुष्य की कल्पनायें उसी दिशा में भागती दौड़ती रहती हैं। उदाहरण के लिए भोजन करने में मुश्किल में पन्द्रह बीस मिनट लगते हैं, कोई व्यक्ति अहर्निश रतिक्रिया नहीं कर सकता, सुख सुविधाएँ शरीर से सम्बन्धित होती हैं और अपना परिणाम प्रस्तुत कर निष्प्रभावी हो जाती हैं। कहने का आशय यह है कि उपभोग के समस्त विषय एक निश्चित समय में सम्पन्न होते हैं। लेकिन मन उनमें चौबीसों घण्टे डूबता, उतराता रहता है। नित्य उन्हीं का ध्यान करता रहता है। प्रत्याहार साधना में सर्वप्रथम मन की इस निरर्थक भागदौड़ को रोका बाँधा जाता है।
योग विद्या इस विषय में दिशा निर्देश करती है कि मन की इस अनावश्यक और निरर्थक उछल-कूद को किस प्रकार रोका जाय। योग शास्त्रियों के अनुसार इन्द्रियों के माध्यम से ही मनुष्य की शक्तियों का क्षरण या अपव्यय होता है। मन में उठने वाली भावनायें, मस्तिष्क में उठने वाले विचार इन्द्रियों को उत्तेजित करते है और न चाहते हुए भी उनसे मनुष्य की शक्तियाँ बाहर फेंक जाती हैं जैसे दरवाजे से किसी को जोर का धक्का लगाकर धकेल दिया जाता हो। इन्द्रियों को इसीलिए द्वार कहा गया है कि उन से शक्तियों का विचार और भाव उत्तेजनाओं द्वारा बाहर फेंक दिया जाता है।
यदि मन में आने वाले विचार और भाव उत्तेजनाओं को किसी प्रकार रोका जा सके तो मनुष्य की बहुमूल्य शक्ति सम्पदा को अनावश्यक रूप से क्षरित और स्खलित होने से बचाया जा सकता है। यह अपक्षरण मन मस्तिष्क पर चेतन रूप से नियन्त्रण स्थापित कर ही रोका जा सकता है।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मन जिस वस्तु या विषय को महत्वपूर्ण अथवा मूल्यवान समझ लेता है फिर उसी में प्रवृत्त रहता है और यह समझ तब तक विकसित नहीं होती जब तक कि उस विषय के संपर्क में न रहा जाय। अनावश्यक बातों से अपना ध्यान हटा कर आध्यात्मिक उद्देश्य के लिए ही मन को निरत रखने का निर्देश देते हुए गीताकार ने कहा-
यतो यतो निश्चरति मनश्चं चलमास्थिरम्। ततस्त्तो नियम्यै तदात्मन्यैव वशं जग्रेत्॥ (अ. 6-26)
अर्थात्- जब-जब मन चंचल हो, इन्द्रियों के विषयों के कारण संसार में विचरे तो तब-तब वहाँ से इसका नियमन करके आत्मा में हो निरुद्ध करना चाहिए।
व्यर्थ के विचारों से मन को हटाकर उपयोगी आत्मा के विषय में लगाने के लिए यह एक अभ्यास है। शास्त्रकारों ने मनोनिग्रह के लिए दूसरा उपाय यौन सजगता बताया है। यौन सजगता का अर्थ यह बताया गया है कि मन जब भी किसी विषय के पीछे भागता है तो उस पर कोई लगाम लगाने की अपेक्षा यह स्मरण रखा जाय कि अपनी चेतन आत्मा मन के इस क्रीड़ा कौतुक को एक मूक दर्शक की भाँति देख रही है। वयस्क व्यक्ति छोटे बच्चों की उछल-कूद को जिस निर्लिप्त भाव से देखते हैं और यदा-कदा उससे अपना मनोरंजन भी कर लेते हैं। उसी प्रकार उछल कूद करने वाले मन को चेतन आत्मा निर्लिप्त भाव से देखते हुए साक्षी बना रहे। मन इस प्रकार अपने आप ही शाँत हो जायगा। देखना और केवल देखना तथा दर्शक के रूप में अपने अस्तित्व को चेतन आत्मा के रूप में अनुभव करना मन को शाँत करने तथा मानसिक शक्तियों का अपव्यय रोकने के लिए अचूक उपाय बताया गया है।
योग शास्त्र में मानसिक शक्तियों को एक दिशा में केन्द्रित करने तथा उसके द्वारा उच्च आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के और भी उपाय हैं। जिनका एक ही उद्देश्य है चिंतन को एक उपयोगी दिशा में नियोजित करना तथा उसके द्वारा अपनी मानसिक शक्तियों से उपयोगी परिणाम प्राप्त करना। आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए चिन्तन की यह एकाग्रता, मन को एक ही दिशा में केन्द्रित करना आवश्यक है ही लौकिक जगत में भी तब तक सफलता नहीं मिलती जब तक कि अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को पूर्णतया एक ही दिशा में नियोजित न किया जाय। अभीष्ट दिशा में अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को नियोजित कर ही संसार में कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में चमत्कारी सफलतायें प्राप्त कर सका हैं। इसके अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं रहा है तथा न ही सफलता प्राप्त करने का कोई उपाय।
जीवन में परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। एक परिस्थिति किसी व्यक्ति के लिए अनुकूल होती है तो वही परिस्थिति दूसरे किसी व्यक्ति के लिए प्रतिकूल भी हो सकती है। कौन-सी परिस्थिति किस व्यक्ति के अनुकूल है और किस व्यक्ति के लिए, प्रतिकूल यह तय कर पाना कठिन है, किन्तु इतना निश्चित है कि प्रत्येक व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों में प्रसन्न होता है और प्रतिकूल स्थितियों उद्विग्न हो उठता है। अनुकूलता में उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता विषण्णता को भावनात्मक संवेग कहा जाता है।
कई बार लोग इन परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाले भावनात्मक संवेगों को सभ्यता, शिष्टता या लोक-लाज के कारण दवा देते हैं। उदाहरण के लिए जब मुक्त कण्ठ से हँसने का मन होता है तो लोग जबरन अपनी हँसी को रोक लेते हैं या जब रुलाई फूटती है तो आँसुओं को जब्त करने की चेष्टा करते हैं। इन भावनात्मक संवेगों को रोकना कई बार अनेक रोगों और मानसिक उलझनों का कारण बन जाता है। यह भी होता है कि किन्हीं मानसिक कारणों अथवा बाहरी दबावों से व्यक्ति अपने भावनात्मक संवेगों को सहज रूप से व्यक्त नहीं कर पाता है। निखरे और सुलझे हुए मन में सभी अभिव्यक्तियाँ सहज और मुक्त रूप से होती हैं। बच्चा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्मुक्त हास्य और उन्मुक्त रुदन दोनों ही उसमें स्पष्टतया देखे जा सकते हैं। बड़े हो जाने पर भी भावनात्मक उद्वेलन उसी प्रकार उठते गिरते हैं जैसे सागर में लहरें चढ़ती-उतरती हैं। इन उद्वेलनों का उतार-चढ़ाव का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। जो परमहंस स्थिति में पहुँच गये हैं, उनकी बात भिन्न है अन्यथा। मनुष्य मात्र को इन भावनात्मक उद्वेलनों से गुजरना पड़ता है;
प्रसन्नता और हर्ष की अभिव्यक्ति प्रायः हँसी अथवा मुस्कान के रूप में होती है और उदासी तथा क्षोभ की प्रतिक्रिया रुलाई के रूप में फूटती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब हँसने का मन हो तो बिना कोई संकोच किये हँस लेना चाहिए और जब भीतर से रुलाई फूट रही हो तो जी भर कर रो लेना चाहिए। इसका कारण बताते हुए वैज्ञानिकों का कहना है कि हर्ष और शोक दोनों ही मनुष्य मन को अलग-अलग ढंग से उत्तेजित करते हैं। उत्तेजना की प्रतिक्रिया सहज स्वाभाविक नहीं होती, वह मन पर अतिरिक्त दबाव डालती है। उस दबाव से मुक्त होने के लिए ही हास उल्लास, उदासी, रुदन आदि प्रतिक्रियायें जन्मती हैं। यदि हर्ष, उल्लास या हास्य को जबरन रोककर दबा दिया जाय तो निश्चित रूप से भावनात्मक सन्तुलन गड़बड़ाता है। यही बात रोने, क्षोभ प्रकट करने और शोक करने के सम्बन्ध में है। मन ही मन घुटते रहने से उदासी अनेक प्रकार की ग्रन्थियों का कारण बनती है और कई अवसरों पर तो प्राण संकट भी उपस्थित हो जाता है।
घर में अकस्मात किसी प्रयोजन की मृत्यु हो जाती है तो उस आघात से कई व्यक्ति रोना भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में, जब रुलाई नहीं फूटता तो आसपास के लोग भरसक चेष्टा करते हैं कि वह रोने लगे। क्योंकि उस स्थिति में आघात का तीर इतना गहरा बैठता जाता है कि दूसरे विकास उत्पन्न करके या प्राण हर लेने के बाद ही रुकता है। इस आघात को सह लेने की क्षमता जी भरकर रो लेने से उत्पन्न होती है। एक तरह से रुलाई मरहम का काम करती है जो उस आघात की पीड़ा को हल्का करती है। सामान्य शोक या दुख के अवसरों पर भी देखा गया है कि रो लेने के बाद चित्त हल्का हो जाता है।
इसी प्रकार परदुःख कातरता मनुष्य स्वभाव का सहज गुण है। दूसरों को दुःखी देखकर भीतर की करुणा व सम्वेदना आन्दोलित होती है। यह हलचल भी आवश्यक है। यदि इस उद्वेलन को दबा दिया जाता है तो मन की कोमल भाव सम्वेदनाओं को क्षति पहुँचती है। इसी प्रकार प्रसन्नता और हर्षप्रद घटनाओं की प्रतिक्रियाओं को उल्लसित ढंग से व्यक्त कर देने का परिणाम स्वयं के लिए ही लाभप्रद नहीं होता बल्कि उनकी अभिव्यक्ति निकटवर्ती लोगों में भी सहचारी भाव उत्पन्न करती है। स्वयं का जो तो हल्का होता ही हैं, दूसरों को भी प्रसन्न होने का लाभ मिलता है।
कहा जा चुका है कि जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। असन्तोष, असफलता, क्षोभ, आघात और सफलता, सन्तोष, उल्लास आदि जीवन के उज्ज्वल और अन्धकार-मय पहलू दिन-रात की तरह, सभी के जीवन में आते-जाते रहते हैं। उनका आना-जाना यदि खिलाड़ी भावना से ग्रहण किया जाय तो चित्त के उद्वेलित, आन्दोलित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसी प्रशाँत मनः स्थिति परिष्कृत व्यक्तित्व का चिह्न है। अच्छा तो यही है कि सभी परिस्थितियों को खिलाड़ी भावना से स्वीकार किया जाय लेकिन ऐसा न किया जा सके तो उचित है कि हर्ष और शोक को सहज ढंग से व्यक्त कर दिया जाय। मनोभूमि में जब दुःखद घटनाओं की अनुगूँज उठ रही हो तो यही उपयुक्त है कि भीतर से उठ रही रुलाई को रोका न जाय, नकली बहादुरी के प्रदर्शन का प्रयत्न मन के भीतर की घुटन को तो हल्का करेगा नहीं, मस्तिष्क की क्रियाशीलता को अवश्य क्षति पहुँचायेगा। भारी सदमे के कारण उत्पन्न होने वाले घातक रोग इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। कई बार ही उनके कारण मृत्यु तक होती देखी गई है। यदि उस समय फूट-फूटकर रो लिया गया होता या कि अपना दुःख जो खोलकर किसी आत्मीयजन से विस्तारपूर्वक कह दिया होता तो ऐसी स्थित कदापि नहीं आती।
उच्च आदर्शों को अपनाने और उत्कृष्ट विचारों में रमण करने वाले व्यक्तियों के भीतर अपने चारों ओर पीड़ा और पतन की परिस्थितियां देखकर भी क्षोभ, रोष और करुणा का सम्मिश्रित वेग फूट पड़ता है। इन संवेगों को दबाया न जाय तो यही व्यक्त-होकर श्रेष्ठ कर्मों का आधार बनते है। प्रस्तुत परिस्थितियों से जूझने और उलट देने का संकल्प उसी भाव भूमि में उत्पन्न होता है। काव्य, कला, संगीत, साहित्य आदि में निहित मर्मस्पर्श करने वाली शक्ति इन्हीं अभिव्यक्तियों से अंकुरित होती है। समाज निर्माण और लोकमंगल का संकल्प ऐसी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के द्वारा और अधिक दृढ़ और प्रखर बनता चलता है। यदि उन प्रतिक्रियाओं को भाव सम्वेदनाओं को दबा दिया जाय तो उच्च आदर्शों को अपनाने वाले व्यक्ति भी व्यक्तिगत सन्तोष से अधिक कुछ नहीं पा सकते और न समाज को ही कुछ दे पाते हैं।
हास्य और रुदन जैसी प्रवृत्तियों का रासायनिक स्वरूप क्या होता है, यह महत्वहीन है। यद्यपि वे एक से नहीं होते। प्रो. स्टुगार्ट ने भिन्न-भिन्न भाव-भूमियों में निकल पड़ने वाले आंसुओं का विश्लेषण कर यह बताया है कि इनमें से प्रत्येक प्रकार के आँसुओं में प्रोटीन, शर्करा, लवण और कीटाणु नाशक आदि तत्वों का भिन्न-भिन्न अनुपात रहता है। साथ ही कुछ रासायनिक मिश्रण भी पाये जाते हैं। प्रो. स्टुगार्ट ने इस विश्लेषण के आधार पर, लम्बे समय तक प्रयोजनों और परीक्षणों द्वारा अपने शोध प्रयासों से इतने निष्कर्ष प्राप्त कर लिए कि अब अश्रु कणों के विश्लेषण द्वारा ही उनके बहने का कारण जाना जा सकता है। अर्थात् आँसू बहाने वाला व्यक्ति सामने न हो, केवल आँसुओं का ही विश्लेषण किया जाय और जिस व्यक्ति के वह आँसू हैं उससे रोने का कारण भी न पूछा जाय तो केवल आँसुओं के विश्लेषण द्वारा ही सब कुछ जाना जा सकता है।
स्मरणीय है कि आँसू शोक के समय ही नहीं निकलते, जोर से हँसने पर भी आँखों में आँसू चुहचुहाने लगते हैं। प्रो. स्टुगार्ट के अनुसार आँसुओं के विश्लेषण द्वारा यह भी जाना जा सकता है कि वे खुशी के आँसू है या दुःख के। अमेरिका के मनोवैज्ञानिक जेम्स इलियर के अनुसार हास्य और रुदन के भाव संवेगों को रोकने से जुकाम, सिरदर्द, आँखों में जलन, स्मरण शक्ति ह्रास, पेट के रोग जैसे कई शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते है।
प्रायः देखा गया है कि स्त्रियाँ आँसू बहाने में कंजूसी नहीं करतीं। यही कारण है कि वे पुरुषों की अपेक्षा घुटना का शिकार बनती है और अधिक स्वस्थ तथा दीर्घ जीवी होती हैं। जबकि पुरुष अपनी कठोर प्रकृति का दण्ड स्वास्थ्य के क्षरण के रूप में भोगते हैं। मनः चिकित्सक बेनार्ड होल्स ने तो कई विक्षिप्त रोगियों को कारुणिक दृश्य दिखा-दिखाकर नियमित रूप से रुलाया। केवल इसी उपचार के द्वारा वे विक्षिप्त रोगी ठीक हो गये।
हास्य और रुदन की तरह भय और क्रोध भी भावनात्मक संवर्ग हैं। यदि वे संवेग परिस्थितियों के कारण सहज रूप से उत्पन्न होते हैं तब तो उनकी अभिव्यक्ति हो जाती है, पर मनुष्य सबसे ज्यादा भयभीत अपने ही दुष्कर्मों से होता है। यदि उस भय का उपचार किया जाय तो न दुष्कर्म करते बन पड़ता है और न ही भयजन्य मनोविकारों का शिकार होना पड़ता है। लेकिन दुष्कर्मों में रत रहा जाय और भय की भावनाओं का दमन किया जाय तो व्यक्ति आत्मनाश और सर्वनाश के गर्त में ही गिरता है। अपराधी कितना ही वीर और साहसी क्यों न हो, अपने आप से भय, समाज से भय, राज्य का भय, दण्ड और न्याय व्यवस्था का भय उसे भीरु और कायर बनाता जाता है। अन्ततः भय की यह दमित भावना गहरे मानसिक सन्ताप और जटिल मानसिक रोगों का कारण बनती है। हिटलर युवावस्था में धीर वीर और साहसी था, पर जब अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के वह क्रूर कर्मों की और प्रवृत्त हुआ तो उसका अपना ही भूत, भयजन्य मानसिक सन्ताप उसे खाने लगा और खाता ही गया। इसी मनस्ताप के कारण अन्तिम दिनों में उसे एक प्रकार का लकवा मार गया और उसे अपने विश्वासों पर भी सन्देह होने लगा। यह मनस्ताप आखिर उसे आत्महत्या के कगार तक पहुँचाकर ही रहा। यदि अपनी आत्मा के साथ न्याय किया जाय, अन्तरात्मा की आवाज को सुना जाय और उसके अनुसार चलने का प्रयास किया जाय तो अपने भय से होने वाला मनस्ताप नहीं सताता और न ही विक्षोभ की आग में जलना चलना पड़ता है।
इतने पर भी अनजाने में यदि कोई दुष्कर्म बन जाय तो उसके कारण होने वाले मानसिक सन्ताप को पश्चाताप प्रक्रिया एवं आत्मस्वीकृति द्वारा दूर किया जा सकता है। भारतीय मनीषी आचार्यों ने इसी उद्देश्य से प्रायश्चित विधान किया था ताकि अनजाने हुए दुष्कर्मों के दुष्परिणामों से बचा जा सके। जान-बूझकर पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए भी सद्बुद्धि जागृत होने पर भी प्रायश्चित प्रक्रिया अपनाकर पापकर्मों का प्रक्षालन किया जा सकता है।
पाप कर्मों का दुष्परिणाम दण्ड भुगतना पड़ता है, यह निश्चित है, पर यह आवश्यक नहीं है कि सामान्य जीवनक्रम में आने वाले उतार-चढ़ावों का कारण भी पा ही हों। मन की स्वाभाविक क्रिया-प्रतिक्रियाओं को छिपाने की प्रवृत्ति, मानसिक भाव उद्वेलनों को सहजता से व्यक्त न करने की आदत, असह्य, नकली और कृत्रिम गम्भीरता आदि बातें मन में उन ग्रन्थियों को जन्म देती है, जो विकृतियों की ओर अग्रसर करती है। सहज सरल जीवन में इस प्रकार की ग्रन्थियाँ नहीं ही पड़ती हैं। बोझिल और उलझा हुआ मन ही अनैतिक जीवन की ओर प्रवृत्त करता है। मन में ऐसा बोझ न लदने देने के लिए भावनात्मक उद्वेलनों को दबाना नहीं चाहिए।
समुद्र में ज्वार-भाटे की तरह ही हमारे चित्त के तल पर भी परिस्थितियों के घात-प्रतिघात, हर्ष-विषाद, उल्लास और शोक के उतार-चढ़ावों को उठाते गिराते रहते हैं। इन भावों को सहज और मुक्त रूप से व्यक्त होने देना चाहिए तथा स्वयं बालकोचित सरलता बनाये रहना चाहिये। अधिक उत्कृष्ट स्थिति तो यही है कि हर्ष और शोक में से कोई भी प्रवृत्ति मन का सन्तुलन बिगाड़ ही न पाए। गीता में इसी मनःस्थिति के व्यक्तियों को स्थित प्रज्ञ, गुणातीत, ज्ञानी, योगी और अनासक्त पुरुष कहा है। वह स्थिति लम्बे अभ्यासों और आध्यात्मिक साधनाओं से प्राप्त होती है। उसके लिए प्रयास किया जाय यह अच्छा ही है, पर यह स्थिति एक दिन में नहीं बनती। जब भीतर वैसी उत्कृष्ट मनःस्थिति न हो तब ऊपर से भावोद्वेगों को दबाकर शान्ति बनाये रखना हानिकर ही सिद्ध होगा। इसीलिए कहा गया है कि मुक्त कण्ठ से हँसना और जी भरकर रोना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही है।
भौतिक-समृद्धि स्थूल साधनों से उपलब्ध होती है। आत्मिक-सिद्धि के लिए कुछ अन्य ही साधन अपेक्षित होते हैं। आत्म-साक्षात्कार- ईश्वर-साक्षात्कार के साधनों की विवेचना जहाँ भी हुई, उसमें श्रद्धा को प्रमुख माना गया है। श्रद्धा-तत्व के विकास द्वारा ही परमात्मा की अनुभूति कर पाना सम्भव होता है।
श्रद्धा का तात्पर्य उन भावनाओं अथवा आस्थाओं से है, जो अपने गुरुजनों या इष्ट के प्रति पूज्य-भाव एवं सघन आत्म भाव बनाये रखती हैं। महापुरुषों के वचनों पर विश्वास करके, उनके द्वारा उपदिष्ट मार्ग पर बढ़ सकना श्रद्धा द्वारा ही सम्भव हो पाता है। जिनके प्रति श्रद्धा के भाव नहीं होते, उनके कथन पर विश्वास कर पाना-उनके द्वारा बताये मार्ग पर चल पाना असम्भव ही रहता है। ‘श्रद्धा’ सत् तत्व के प्रति ही सघन होती है, असत् के प्रति नहीं। श्रेष्ठता का समावेश जहाँ भी होता है, श्रद्धा वहीं टिकती है, अन्यत्र नहीं। वस्तु स्थिति प्रकट होने पर श्रेष्ठता का पाखण्ड जैसे ही ध्वस्त होता है अपने साथ श्रद्धा को भी विनष्ट कर देता है। परमात्मा के प्रति श्रद्धा न डिगने का कारण उसके अस्तित्व एवं अनुग्रह के प्रति तनिक भी आशंका का न होना ही है। जिसके मन में संदेह या अविश्वास रहता है, उनकी श्रद्धा भी ईश्वर के प्रति गहन नहीं हो पाती प्रगाढ़ श्रद्धा तो मिट्टी में भी भगवान का दर्शन करा देती है। एकलव्य द्वारा मिट्टी के द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या में पारंगत हो पाना श्रद्धा का ही चमत्कार कहा जा सकता है।
श्रद्धा द्वारा कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है-
श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः। श्रद्धया भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि॥ ऋ10।1511
‘श्रद्धा’ से अग्नि का प्रदीप्त किया जाना सम्भव होता है अर्थात् आत्मज्ञान की अग्नि श्रद्धा द्वारा हविष्यान्न का हवन किया जाता है अर्थात् आत्मा सत्ता को परमात्मा-सत्त, में विलय कर पाना श्रद्धा द्वारा ही सम्भव हो पाता है। श्रद्धा भग (ऐश्वर्यादिकों) के सिर पर होती है, अर्थात् सभी ऐश्वर्यों की प्राप्ति श्रद्धा का सत्परिणाम है। ऐश्वर्यादिक भग छः होते हैं-
एश्यवर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियाः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णाँ भग इतीरिणा॥
ऐश्वर्य, धर्म, यश, क्षी (समृद्धि ) ज्ञान और वैराग्य-छहों को भग कहा जाता है श्रद्धा का इनमें मूर्धन्य होने का तात्पर्य है, श्रद्धा का इन पर नियन्त्रण होना। श्रेय साधक में सर्वप्रथम श्रद्धा ही प्रबल होती है, तत्पश्चात् क्रिया शीलता आती है और अन्ततः ऐश्वर्यादिकों की उपलब्धि होती है।
गीताकार श्रद्धा द्वारा आत्मज्ञान की प्राप्ति का तथ्य प्रकट करता है।-
श्रद्धा वाँल्लभते ज्ञानम्। गीता-4-38
श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।
योग-मार्ग के पथिकों की रक्षा’श्रद्धा’ के बलबूते ही सम्भव होती है, अन्यथा वे विघ्न-प्रलोभन उसे कभी का पथ भ्रष्ट कर देते, जो इस मार्ग में प्रायः आया करते है।
योग-दर्शन के व्यास-भाष्य में लिखा है-
सा (श्रद्धा) जननीव कल्याणं योगिन पाति।
ईश्वरानुभूति के अन्य साधन उतने सफल नहीं होते, जितना श्रद्धा की प्रगाढ़ता। याज्ञिक और योगी सर्वे प्रथम श्रद्धा की ही उपासना करते हैं क्योंकि वे इसके सत्परिणामों को जानते हैं। श्रद्धा अपनी चरम परिणिति ईश्वर साक्षात्कार के रूप में प्रकट करती है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के परिवेश में ही वह व्यक्तित्व का विकास करता और जीवन के आवश्यक सरंजाम जुटाता है। जिस समाज पर उसका जीवन अवलम्बित है, वह समाज की परस्पर स्नेह, सहयोग सद्भावना और सहकारिता जैसे सद्गुणों पर आधारित है। सुव्यवस्थित समाज के मूल में इसी गुण को कार्यरत देखा जा सकता है। जहाँ लोगों में न तो परस्पर-सहयोग है और न स्नेह, सद्भावना है और न सद्विचार, वहाँ नित्य प्रति कलह, ईर्ष्याद्वेष, मार-काट, अशान्ति से भरा वातावरण होता है। इस वातावरण में न तो जीवन की सुरक्षा हो पाती है और न विकास। उलटे व्यक्तित्व में अवाँछनीय तत्व प्रविष्ट होकर विकास की जड़ों को छिन्न-विच्छिन्न कर देते हैं। इसके विपरीत सहयोग और सहकारिता भरे वातावरण में भय आशंका, आतंक आदि के लिए स्थान ही नहीं बचता है। सभी प्रसन्नता से रहते और निश्चिन्तता से जीवन यापन करते हैं।
इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ सहयोगपूर्ण- विकास-क्रम के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। मानवीय-संस्कृति और सभ्यता को आदि कालीन पाषाण-युग से वर्तमान में उन्नति के उच्चशिखर पर पहुँचाने का श्रेय परस्पर सहकारिता और सौजन्यपूर्ण सद्व्यवहार को ही है। प्रस्तुत समाज-व्यवस्था, कल-कारखाने, शासन तन्त्र, कृषि,व्यवसाय वैज्ञानिक-आविष्कार इत्यादि सभी अद्यावधि उपलब्ध प्रगति-सम्पदा इसी के सुपरिणाम हैं।
परस्पर मिल-जुल कर रहने, खाने-खेलने ईर्ष्या-द्वेष न करने, किसी का भी बुरा न चाहने आदि विधि-निषेधों का पग-पग पर निर्देश देने वाले शास्त्रवचनों की दूर दर्शिता देखते ही बनती है-
संगच्छध्वं सं वदष्वं सं वो मनाँसि जानताम्। देवा भागं यथापूर्वे सज्जनाना उपासते॥ -ऋग्वेद 10/191/2
हे मनुष्यो! तुम मिल जुल कर रहो, मिल-जुल कर वार्तालाप करो, तुम सब के मन में एक जैसे संकल्प विकल्प हों। देवतागण इन्हीं गुणों के आधार पर पूजनीय और उपासनीय बने हुए हैं।
समानों मन्त्रः समिति समानी समानं मनःसहचित्तमेंषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वोह-विषाजुहोमि॥ -ऋ.10/191/3
तुम सबके विचार समान हों तुम्हारी सभा एक हो तुम्हारे अन्तःकरण एक हो, सभी के चित्त (हृदय) एक जैसे हों। मैं (परमेश्वर) तुम्हारे लिए एक से मन्त्र -वेद ज्ञान तथा एक समान आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करता हूँ।
‘सहजीविलाँ’ का सिद्धान्त-पारस्परिक स्नेह-सद्भावना पर ही आधारित है। ‘जियो और जीने दो’- उसका आदर्श है। श्रुतियाँ इसी का प्रतिपादन करती हैं-
सम्प्रच्यघ्वमुप सम्प्रयात्। (यजु.15/53)’
हे मनुष्यो! सभी लोग मिल-जुल कर (आत्मोत्कर्ष एवं सत्प्रयोजनों के लिए) प्रस्थान करो।
सं जीवास्थ। (अथर्व 19/69/3)
एक साथ अर्थात् मिल-जुल कर जियो।
‘पुमान पुनागूँग सं परिपातु विश्वतः।’ यजु.29/51
एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की सब प्रकार से रक्षा करें।’
आत्मिक-प्रगति और सामाजिक समृद्धि के मूल में कार्यरत इस सहयोग, स्नेह और सद्भावना को सर्वत्र देखा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास के इस मूल मन्त्र को समझकर जीवन की प्रत्येक गतिविधियों में इसे प्रमुखता दी जाय। जीवन में सुख सुविधा के साधनों से लेकर शान्ति और सुव्यवस्था का समावेश हो पाना इसी साधना द्वारा सम्भव हो सकेगा। सामाजिक उन्नति और प्रगति का लक्ष्य इन्हीं माध्यमों से प्राप्त हो सकेगा। इसी स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकेगा।
पिछले दिनों अपने परिवार का बहुत तेजी से और व्यापक विस्तार हुआ है। इस थोड़ी-सी अवधि में परिजनों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 28 लाख हो गई है। इतने परिजनों में आधे से अधिक परिजन ऐसे हैं जो पिछले दो वर्ष की अवधि में ही मिशन के संपर्क में आए हैं और इसी बीच उन्होंने परिवार की सदस्यता ग्रहण की है। जागृत आत्माओं को भी महाकाल के युग निमन्त्रण ने इन्हीं दिनों झकझोरा है। पिछले दिनों महापुरश्चरण योजना में लाखों व्यक्ति भागीदार हुए, प्रव्रज्या अभियान के अंतर्गत वरिष्ठ, कनिष्ठ और समयदानी वर्ग के सहस्रों सृजन शिल्पी वरिष्ठ, कनिष्ठ और समयदानी परिव्राजकों के रूप में कार्यक्षेत्र में उतरे हैं। शक्ति पीठों के स्थायी परिव्राजकों के साथ अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। महिला जागरण अभियान को भी इन्हीं दिनों नवजीवन दिया गया है और उसका स्वरूप परिवार निर्माण अभियान जैसा बना दिया गया है।
इसके विस्तार और व्यापक होने की प्रक्रिया को अभूतपूर्ण कहा जा सकता है। प्रज्ञावतार को प्रभात बेला में आलोक वितरण की प्रक्रिया द्रुतगति से चल पड़ी है और नव सुजन की दिशा में बहुमुखी प्रयास अभिनव उत्साह के साथ आरम्भ हुए है। इन परिस्थितियों में अपने परिवार को नये सिरे से, नई परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षित करने की व्यवस्था बनाना अनिवार्य हो गया है। पिछले सात वर्षा से शान्ति कुंज में विविध प्रयोजनों के लिए लोक सेवियों को प्रशिक्षित करने के लिए विभिन्न सत्र श्रृंखला चल रही हैं। इन शिविरों में लगभग 30 हजार कार्यकर्ता प्रशिक्षित हुए। जो भी इसमें सम्मिलित हुआ वह अपने जीवन क्रम में कुछ सुखद और शुभ संकल्प लेकर ही वापिस लौटा है।
इन शिविरों की सार्थकता और प्रभावोत्पादकता को सभी ने एक स्वर से सराहा है। अब सत्र श्रृंखलाओं का नये सिरे से निर्धारण किया गया है। पहले स्थान सम्बन्धी कमी की कठिनाई थी। अब वह कमी गायत्री नगर का एक बड़ा भाग बन जाने से लगभग पूरी हो गई हे। समय की माँग बढ़ी है। नई परिस्थितियाँ, नई चुनौतियों के समान सामने आई हैं। उनका सामना करने के लिए जागृत आत्माओं को नई आवश्यकताएँ पूरी कर सकने के लिए उपयुक्त बनाने वाला प्रशिक्षण भी नितान्त आवश्यक हो गया है। इस आवश्यकता को देखते हुए दीपावली बाद इसी नवम्बर माह से सात सत्रों की श्रृंखला आरम्भ की जा रही है।
इन प्रशिक्षणों में जागृत आत्माओं का सम्मिलित होना नितान्त आवश्यक है। जो पिछले सात वर्षा में किन्हीं सत्रों में सम्मिलित हो चुके हैं, उन्हें भी नये सिरे से, इन नये स्तर के सत्रों में सम्मिलित होना चाहिए। पहले की अपेक्षा अब की परिस्थितियों में काफी अन्तर आ गया है, इसलिए विकसित कार्यपद्धति बनानी पड़ी है और उसी आधार पर प्रशिक्षण में नये तत्वों का समावेश करके उनका अभिनव निर्धारित करना पड़ा है। इस दृष्टि से पुराने सत्रों में सम्मिलित होने की बात को अपर्याप्त समझना चाहिए तथा नये सिरे से सभी युग शिल्पियों को इनमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए।
इन सभी सत्रों के लिए आवेदन पत्र प्राप्त होने के उपरान्त ही स्वीकृतियाँ दी जायेंगी और शिविरार्थियों की योग्यता तथा आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही सम्मिलित होने के लिए कहा जायगा। साथ ही अनुशासन के पालन पर विशेष जोर दिया जायगा ताकि अस्त-व्यस्तता के कारण व्यवस्था सम्बन्धी गड़बड़ियां पैदा न हो सकें और प्रशिक्षण का स्तर ऊंचा ही बना रहे। स्मरणीय है कि प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य के लिए प्रशिक्षण लेना आवश्यक होता है। सुशिक्षित तथा कार्य कुशल व्यक्ति भी हर काम में हाथ डालने और उसमें सफलता प्राप्त करने में समर्थ या सक्षम नहीं होते।
इंजीनियर हो अथवा डाक्टर, कलाकार हो या शिल्पी, पहलवान हो या अध्यापक कहने का आशय यह कि अपने विषय में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए सभी प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। युग सृजन तो इन सभी कार्या से बड़ा व्यापक, जटिल और महत्वपूर्ण हे। इस उत्तरदायित्व को सम्हालने वाले व्यक्ति के लिए भी यह आवश्यक है कि वह अपने विषय में दक्ष हो। नये शिविरों की श्रृंखला इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाई गई है। इसे युगान्तरीय चेतना की प्राणवान प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए और सभी जीवन्त आत्माओं को अपनी परिस्थिति के अनुरूप किन्हीं सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए।
नये निर्धारित किये गये सात सत्रों की श्रृंखला इस प्रकार है -
(1) एक माह का परिव्राजक सत्र
क्षेत्रों में बने रहे शक्ति पीठों के लिए इन्हीं दिनों परिव्राजकों की नियुक्तियाँ की जानी हैं। उनमें अनुभवी कार्यकर्ता ही काम करेंगे, जो भी दायित्व इन कार्यकर्ताओं को सौंपा जायगा वह सर्वथा नये प्रकार का होगा। पूजा, अर्चा, नियमित रूप से होते रहने वाला हवन यज्ञ, जन-संपर्क, जन्म-दिन आयोजन, क्षेत्र में यज्ञों का आयोजन, भाषण और सम्भाषण में प्रवीणता, युग साहित्य को घर-घर पहुँचाने का अनुभव, स्लाइड प्रोजेक्टर के सहारे प्रवचन करना, कार्यक्षेत्र में रचनात्मक प्रवृत्तियों को गति देना, निर्माणाधीन शक्ति पीठों के भवन निर्माण की देखभाल करना, उनकी स्थानीय व्यवस्था बनाना, आगन्तुकों को सन्तुष्ट करने की क्षमता कार्यक्षेत्र की परिस्थितियां समझते हुए उसके अनुरूप गतिविधियाँ चलाना, अपना निज का दृष्टिकोण, व्यक्तित्व एवं व्यवहार प्रभावोत्पादक बनाना जैसी अनेकों योग्यताएं होनी चाहिए। इन योग्यताओं के अभाव में सुशिक्षित व्यक्ति भी शक्ति पीठों के वे उत्तरदायित्व पूरे नहीं कर सकते जो अप्रत्याशित रूप से उनके कन्धों पर आ रहा है।
शक्ति पीठें जहाँ बन रही हैं, या बनने वाली हैं, उनके निर्माण कर्ताओं से कहा है कि उन्हें अभी से अपने क्षेत्र को जागृत करने के लिए सचेष्ट रहना चाहिए। 24 लाख मन्त्र लेखन संग्रह जन जागरण के लिए छोटे बड़े यज्ञ आयोजन, भवन निर्माण आदि के कार्या में सहायता देने वाले कार्यकर्ता नियुक्त किये जाने चाहिए। इन दिनों तो ऐसे कार्यकर्त्ताओं की यों भी अधिक आवश्यकता है तो क्यों न उन्हें काम में लगाया जाय? ऐसे व्यक्तियों को अभी से तलाशना आरम्भ कर देना है, जो इस उत्तरदायित्व को सम्हालने के लिए हों। उन्हें खोज कर प्रशिक्षण के लिए हरिद्वार भेजना चाहिए।
एक महीने का प्रशिक्षण फिलहाल तो उन्हीं को दिया जायगा, जो शक्ति पीठों द्वारा भेजे जायेंगे। बाद में वरिष्ठ, और समयदानी परिव्राजकों को भी इन सत्रों में सम्मिलित होना होगा। टोली नायकों और कार्यवाहकों के लिए भी लोक नेतृत्व का यह प्रशिक्षण आवश्यक होगा। इसका सिलसिला अभी से आरम्भ कर दिया गया है। अंग्रेजी महीने की पहली तारीख से मई जून के दो माह छोड़कर शेष दसों महीनों यह प्रशिक्षण नियमित रूप से चलते रहेंगे। शक्ति पीठ किस महीने कितने कार्यकर्ता अपने यहाँ से भेजेंगे, इसके लिए अभी से आवेदन करके स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए।
(2) तीन माह के भजनोपदेशक सत्र
शक्ति पीठों का कार्य क्षेत्र प्रायः देहात है। वहाँ प्रवचनों की अपेक्षा भजनोपदेशक अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं। यह कार्यक्रम शिक्षित व्यक्ति भी जिनका कण्ठ मधुर हो हलके-फुलके संगीत द्वारा लोकशिक्षण का कार्य सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। लोकरंजन और लोकमंगल का यह समन्वय अपने देश की वर्तमान स्थिति में जन-जागरण का कार्य जितने अच्छे ढंग से सम्पन्न कर सकता है उतना सरल और प्रभावी तरीका कुछ भी नहीं है। भजनोपदेशकों के लिए भविष्य में तीन-तीन माह के सत्र 1 नवम्बर से शान्ति कुंज में चलेंगे। प्रथम सत्र नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी का - दूसरा फरवरी, मार्च, अप्रैल का चलेगा। मई, जून में एक-एक सप्ताह के जीवन साधना सत्र चलेंगे इसलिए उन दो महीनों तक संगीत सत्र बन्द रहेंगे। इसके उपरान्त तीसरा सत्र जुलाई, अगस्त, सितम्बर का और चौथा अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर का चलेगा। इन चारों में से जिन्हें जिसमें प्रवेश पाना हो, वे अपना स्थान सुरक्षित करा लें।
इस शिविर के लिए विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक व्यक्ति संगीत गायन के लिए फिट नहीं होता। गले की मिठास और स्वर पहचानने की क्षमता यह दो विशेषताएँ जिनमें हो, वहीं व्यक्ति इस शिक्षण के उपयुक्त बैठते और सफलता प्राप्त करते हैं। हर किसी को सफलता नहीं मिल सकती हैं इन सत्रों में प्रवेश पाने से पूर्व अपने घर पर ही जानकारों की सहायता से थोड़ा अभ्यास करना चाहिए। यदि गला ठीक लगे और बुद्धि में पकड़ की क्षमता दिखे तो उस विशेषता को निखारने के लिए हरिद्वार आना चाहिए प्रवेश प्राप्त करने से पूर्व प्रत्येक शिविरार्थी को यह बताना होगा कि उनका कण्ठ और स्वर ज्ञान इसके लिए उपयुक्त है अथवा नहीं। सर्वथा अनजानों को प्रवेश देना सम्भव नहीं हो सकेगा।
(3) ब्रह्मवर्चस साधना शिविर
सवा लक्ष गायत्री महापुरश्चरण, गंगा की गोद और हिमालय की छाया में चलने वाले ब्रह्मवर्चस सत्र नियमित रूप से चलते रहेंगे। साधक को स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप इन सत्रों में विशेष साधनाएँ भी बताई और चलाई जायेगी। पंचकोशों का अनावरण और कुण्डलिनी जागरण का उतना शिक्षण हर साधक को मिलेगा जितना उसकी स्थिति को देखते हुए पचने की सम्भावना प्रतीत होती है। जो कर सकेंगे उन्हें उनसे कायाकल्प जैसी तपश्चर्या चान्द्रायण साधना भी कराई जायगी पूर्ण चान्द्रायण करना है अथवा सौम्य यह निर्णय साधक की सहन शक्ति के अनुसार किया जायगा ये सभी साधनाएँ गंगा तट पर बने ब्रह्मवर्चस आरण्यक में सम्पन्न कराई जायेगी। साथ ही साधनात्मक मार्गदर्शन की कक्षाएं भी चलेंगी।
ब्रह्मवर्चस् साधना सत्र भारतीय महीनों के हिसाब से चलेंगे। चान्द्रायण व्रत का क्रम इसी प्रकार बनता है। प्रथम सत्र मार्गशीर्ष मास में 4 नवम्बर से 3 दिसम्बर तक का, दूसरा पोष का 3 दिसम्बर से 2 जनवरी तक का, तीसरा माघ शिविर 2 जनवरी से 1 फरवरी तक का चौथा फाल्गुन का 1 फरवरी से 3 मार्च तक का तथा पांचवां 3 मार्च से 2 अप्रैल तक का होगा। अभी इन पाँच शिविरों में ही स्थान सुरक्षित कराये जायेंगे।
(4) शोध संस्थान सत्र
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में दार्शनिक अनुसंधान एवं वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का क्रम आरम्भ हो गया है। इनमें सहायता करने तथा स्वयं उस संदर्भ में अपनी योग्यता निखारने के लिए दो-दो महीने के सत्र चलेंगे, फिलहाल अभी (1) नवम्बर-दिसम्बर, (2) जनवरी-फरवरी (3) मार्च-अप्रैल यह तीन सत्र ही घोषित किये गये हैं। कुछ व्यक्ति जो लम्बे समय तक हरिद्वार नहीं रह सकते, वे अपने-अपने स्थान पर रहकर इन शोधकार्यों में थोड़ा-बहुत हाथ बटा सकते है। इस विचार विमर्श के लिए दिसम्बर 79 में एक सत्र 23 से 30 दिसम्बर तक रखा गया है। जिन्हें इनमें रुचि हो वे पत्र व्यवहार कर लें। उपरोक्त सभी शिविरों में ग्रेजुएट रूप के व्यक्ति ही स्थान प्राप्त कर सकेंगे। यह सत्र लगते तो आगे भी रहेंगे, पर अभी दो माह वाले तीन शिविरों में ही स्थान सुरक्षित किये जा रहे है।
(5) एक और तीन माह के महिला सत्र
गत सात वर्षों से महिला जागृति अभियान चल रहा है। अब उसे और भी सुनिश्चित करके परिवार निर्माण अभियान स्तर का बना दिया गया है और उसमें कितनी ही नई गतिविधियाँ सम्मिलित की गई हैं। महिला जागृति पत्रिका में इसका सुविस्तृत विवेचन छप रहा है। अक्टूबर अंक में और भी विस्तृत जानकारी स्पष्ट रूप से प्रकाशित की जा रही है। प्रत्येक सृजन शिल्पी को चाहिए कि वह इस अभियान को अपने-अपने घरों में स्थान दें और यथा सम्भव समीपवर्ती पड़ौस और मुहल्लों में भी इस प्रक्रिया का प्रचलन करें।
परिवार निर्माण में नारी की ही भूमिका अग्रणी रहती है अतः इस अभियान का नेतृत्व जागृत नारी ही कर सकती है। कुशल महिलाएँ अपने परिवार का सुनियोजित निर्माण करने के लिए तथा निकटवर्ती क्षेत्र में इस चेतना को सुविस्तृत करने के लिए किस प्रकार क्या कर सकती है? इसकी व्यावहारिक शिक्षा एक-एक महीने के सत्रों में दी जाया करेगी।
तीन माह के सत्रों में एक माह वाले पाठ्यक्रम के अतिरिक्त संगीत-भजनोपदेश आदि का अभ्यास भी कराया जायगा। जो महिलाएँ तीन माह का समय निकाल सकती हैं वे इन सत्रों के लिए आवेदन भेज सकती हैं। यह तीन माह के सत्र एक माह वाले सत्रों से सर्वथा भिन्न चलेंगे। इन दोनों में स्थान केवल ऐसी महिलाओं को ही दिया जायगा जो सुशिक्षित होने के साथ-साथ प्रभावशाली भी हों। क्योंकि उनका उद्देश्य आत्म-निर्माण तक सीमित नहीं है, परिवार निर्माण का प्रयोजन पूरा हो सके इसके लिए प्रतिभाशाली महिलाओं को ही उनमें आमन्त्रित किया गया है। सामान्य महिलाएँ यह लाभ अप्रैल, मई-जून में होने वाले एक सप्ताह के शिविरों में प्राप्त कर सकेंगी। अभी नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी में प्राप्त कर सकेंगी। अभी नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फरवरी के चार माह इन सत्रों के लिए रखे जा रहे हैं। ये सत्र एक-एक महीने के होंगे। परिवार निर्माण में रुचि रखने वालों को अपने घरों की प्रतिभावान महिलाओं को इन सत्रों में भेजने के लिए विशेष रूप से कहा गया है। इनमें बच्चों सहित प्रवेश नहीं मिलेगा।
तीन-तीन माह के सत्र अगले वर्ष 80 में प्रारम्भ होंगे। (1) जुलाई, अगस्त, सितम्बर (2) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर तथा (3) सन् 81 जनवरी, फरवरी, मार्च में। इनमें कर्मकाण्ड स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से प्रवचन तथा जिनके गले मीठे होंगे उन्हें संगीत शिक्षण भी दिया जायेगा। यह स्थान भी अभी से सुरक्षित करा लेना चाहिये। अभी स्थान सीमित रखा गया है अतएव अपना स्थान अभी से सुरक्षित करा लेने में सुविधा होगी। बच्चे साथ न लाने का प्रतिबन्ध इनमें भी रहेगा।
(6) सप्ताह भर के तीर्थ सेवन सत्र
अप्रैल, मई एवं जून में तीर्थ यात्रा और सद्ज्ञान सम्पादन करने के इच्छुक परिजनों के लिए एक-एक सप्ताह के तीर्थ सेवन सत्र होंगे। तीनों महीनों में 1 से 7, 8 से 15, 16 से 21 और 22 से 28 तक यह सत्र चलेंगे। इनमें बच्चों सहित भी आया जा सकता है। उनके मुण्डन, अन्न प्राशन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार भी कराये जा सकेंगे। जीवन को साधना स्तर पर बिताने का प्रशिक्षण भी इन शिविरों में मिलेगा। साथ ही ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला, हरिद्वार, कनखल क्षेत्र तीर्थ स्थानों दर्शनीय स्थलों को दिखाने की भी सम्मिलित व्यवस्था बस द्वारा की जा रही है।
(7) अनुष्ठान साधना सत्र
नौ दिन में 24 हजार गायत्री अनुष्ठान श्रेष्ठ वातावरण में सम्पन्न करने के लिए विशेष पर्वों पर व्यवस्था की गई है। (1) आश्विन नवरात्रि (2) चैत्र नवरात्रि तथा (3) बसन्त पर्व इसके लिए उपयुक्त समझे गये है। यों गायत्री जयन्ती और गुरुपूर्णिमा भी इसके लिए उपयुक्त होती है, पर चूँकि शान्ति-कुंज में उन दिनों एक-एक सप्ताह के तीर्थ सत्र चलते है, इसलिए स्थान खाली नहीं रहता। अतएव उपरोक्त तीन सत्र ही इसके लिए उपयुक्त समझे गये है। वसन्त पर्व पर 15 जनवरी से 23 फरवरी, चैत्र नवरात्रि 15 से 23 मार्च तक नौ-नौ दिन के अनुष्ठान साधना सत्र शान्ति-कुंज में चलेंगे। इसके बाद छह महीने तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
स्थान की सुविधा हो जाने से शान्ति-कुंज में एक साथ कई-कई सत्र चलते रह सकेंगे और युग निर्माण और युग निर्माण परिवार के हजारों-लाखों साधकों को उपयुक्त प्रशिक्षण, सान्निध्य, परामर्श एवं अनुदान प्राप्त करने का अवसर मिलता रहेगा। इन सभी सत्रों में सम्मिलित होने वालों के लिए आवेदन-पत्र छपवाये गये हैं जिन्हें मँगाना चाहिए और भरकर भेजना चाहिए। इससे शिक्षार्थी के स्तर एवं उद्देश्य का पता रहेगा साथ ही उस आधार पर अनुकूल परामर्श की व्यवस्था बनाई जा सकेगी। आवेदन पत्रों के माध्यम से अनुपयुक्त और अनावश्यक भीड़ न बढ़ने देने की व्यवस्था हो सकेगी क्योंकि इन आवेदन पत्रों के आधार पर ही आवश्यक जानकारी प्राप्त करके स्वीकृति दी जाएगी।
इन आवेदन पत्रों में शिक्षार्थी के लिए आवश्यक निर्देश छपे रहते हैं, जो व्यवस्था अनुशासन सम्बन्धी भी होते हैं। इनका पालन करने की शर्त पर ही किसी को स्वीकृति मिलेगी, अव्यवस्था फैलाने पर यह स्वीकृति निरस्त की जा सकेगी और शिविर के बीच में से ही चले जाने के लिए कहा जा सकेगा। अगले प्रशिक्षण सत्रों में व्यवस्थित और उच्चस्तरीय आवेदन पत्र भर भेजने तथा सशर्त स्वीकृति देने का अनुबन्ध लगाया गया है। शिविरार्थियों को भोजन व्यय स्वयं ही वहन करना होता है। यह अस्सी रुपया मासिक पड़ता है। यह राशि आते ही जमा करनी होती है। सातों सत्रों में से जिन्हें जिस सत्र में सम्मिलित होने की इच्छा हो वे समय रहते शान्ति कुँज हरिद्वार पिन 249401 (उ.प्र.) से पत्र व्यवहार कर आवेदन पत्र मँगा लें तथा उन्हें भरकर भेजकर स्वीकृति प्राप्त कल लें।
क्रुद्ध प्रकृति के मदोन्मत्त हाथी की विनाश लीलाएँ रोकने, सूक्ष्म वातावरण की विषाक्तता को घटाने एवं नये युग के प्रज्ञा-प्रकाश को सुविस्तृत करने के तीनों प्रयत्न इन दिनों तेजी से चल पड़े हैं। जागृत आत्माओं ने नव सृजन की मुहीम नये उत्साह ओर नये साहस के साथ सँभाली है। युग परिवर्तन की इस पुण्य वेला में लोक मानस को दिशा देने और सृजन शिल्पियों को प्रशिक्षित करने का नया उत्तरदायित्व उनके कंधों पर आया है।
इस अभिनव प्रयोजन की पूर्ति के लिए नव प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से आवश्यक हो गया है। इसके लिए एक साथ आठ स्तर के प्रशिक्षण सत्रों का प्रबन्ध शान्ति कुँज में तत्काल करना पड़ा है। गायत्री नगर इस उ....श्य के लिए बनाया जा रहा है। आवश्यकताओं को देखते हुए इस निर्माण को छोटा रखने से काम नहीं बना, अब उसे अधिक बड़ा और विस्तृत किया जा रहा है। निर्माण में तेजी भी लाई जा रही है। नये शिविर गायत्री नगर में ही चलने हैं।
निर्माण कार्य में इन दिनों, आर्थिक अवरोध उत्पन्न हो गया है। इस निमित्त ‘स्मृति अनुदान’ के रूप में एक नया प्रस्ताव समर्थ परिजनों के सामने रखा गया है। एक कमरा, बरामदा, रसोई वाले कक्ष की लागत सात हजार रुपया देने वाले का, अथवा उसके किसी पूर्वज की स्मृति का पत्थर लगा दिया जायगा। पूरे फ्लैट में दो कमरे, दो बरामदे, रसोई, फ्लैश, बाथरूम, स्टोर हैं। इस पूरे फ्लैट पर पत्थर लगाने वालों को, ग्यारह हजार रुपये देने होंगे। स्मृति स्थिर रखने, युग सृजन में योगदान का पुण्य अर्जित करने का यह अलभ्य अवसर है। जिस स्तर के जितनी संख्या में विज्ञ-व्यक्ति गायत्री नगर में पहुँचेंगे और इस अनुदान को सराहेंगे उसे देखते हुए, इतनी उदारता दिखाना हर दृष्टि से श्रेयस्कर है।
जो यह प्रबन्ध कर सकें या दूसरों से करा सके वे इसके लिए इन्हीं दिनों प्रयत्न करलें बसन्त पर्व तक यह निर्माण कार्य पूरा करा देने का विचार बना है, उसी को ध्यान में रखते हुए यह प्रस्ताव रखा और नया अवसर दिया गया है।
इन दिनों जब कि हर व्यक्ति एड़ी से चोटी तक संकीर्ण स्वार्थपरता के पाप पंक और लोभ मोह की जंजीरों में जकड़ा और फँसा हुआ है, इस स्थिति में निजी लाभ लोभ पर अंकुश लगाकर मानवीय भाग्य और भविष्य को बदलने के लिए यत्नशील आदर्शवादी व्यक्तियों को सराहा जाना स्वाभाविक ही है। युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया में जो सृजन शिल्पी संलग्न हैं उनके साहस को अगले दिनों इसी कारण सराहा जायगा। उनका समुदाय इतिहासकारों के लिए अगले दिनों सर्वप्रिय और प्रमुखता के साथ उल्लेख करने का विषय होगा।
उन सृजन शिल्पियों की प्रतिभा को विकसित करने और भावनाओं को दिशा देने के लिए शान्ति कुँज में चलने वाले प्रशिक्षण शिविरों का असाधारण महत्व है। सैनिकों का साहस और पराक्रम कितना ही उ....म वेग लिए क्यों न हो? उनका प्रशिक्षण और मार्गदर्शन अत्यन्त आवश्यक है। इसके बिना वे अपने साहस और शौर्य का कोई उपयोग कर ही नहीं सकते। उनका कितना ही साहसिक, त्याग, बलिदान देश की सुरक्षा करने में तथा विजय श्री का वरण करने में समर्थ न हो सकेगा। तलवार पर धार न होता वह लोह खण्ड बनकर रह जायगी, उस पर धार चढ़ना आवश्यक ही होगा। शिक्षण सत्रों की व्यवस्था, युगान्तरीय चेतना को, दिशाधारा देने की दृष्टि को बहुत अधिक महत्वपूर्ण समझा जा सकता है। उसे नाभिक या मेरुदण्ड की उपमा भी दी जा सकती है।
1 नवम्बर (कार्तिक पूर्णिमा) से आरम्भ होने वाली सत्र श्रृंखला का महत्व भी बहुत है और विस्तार भी अधिक। सात प्रकार के सत्र एक साथ चल पड़ेंगे। दो तरह के सत्र पहले से ही चल रहे हैं। एक वर्षीय कन्या शिक्षण सत्र आठवाँ है, जो अपने क्रम से गत छह वर्षों से चलता रहा है। नौवाँ शिक्षण सत्र शान्ति कुँज में रहने वाले कार्यकर्त्ताओं और उनके परिवार का विशिष्ट शिक्षण तथा स्वावलम्बन की व्यवस्था बनाने के लिए एक अतिरिक्त सत्र के रूप में चलेगा। इसे पारिवारिक सम्भावना के एक अभिनव अभियान का एक जीवन्त प्रयोग समझा जाना चाहिए। यह प्रयोग देखकर अन्य स्थानों पर भी लार्जर फैमिली तैयार करने की प्रेरणा उत्पन्न होगी और वैसा उत्साह जगेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, विश्व परिवार की संरचना के लिए इस प्रकार के विकसित परिवारों की इकाइयाँ बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। इसका जीवन्त और जागृत प्रमाण नवें क्रम के सत्र में चलेगा। इस सत्र की तैयारी भी करीब-करीब पूरी हो चुकी है।
इन नौ प्रशिक्षण सत्रों को युगान्तर चेतना के प्रशिक्षण की नौ शिक्षा धाराओं का एक विशिष्ट समुच्चय कहा जा सकता है। विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों की शिक्षा के विभाग होते हैं, उन्हें फैकल्टी कहा जाता है। शान्ति कुँज का आकार छोटा है और साधन सीमित हैं, फिर भी इसे विश्व निर्माण विद्यालय कहा जा सकता है। सैनिकों की शिक्षा एक अलग बात है और सेना नायकों को तैयार करने की व्यवस्था अलग बात है। इन दोनों का कार्यक्षेत्र सर्वथा स्वतन्त्र या अलग-अलग नहीं होता फिर भी शिक्षण व्यवस्था तो अलग-अलग ही होती है। वर्तमान विषय परिस्थितियों में शान्ति कुँज को वर्तमान सन्दर्भों में अनुपम और अभूतपूर्व कही जाने योग्य भूमिका निभानी पड़ रही है। सत्र श्रृंखला अब तक भी चल रही है। कार्तिकी पूर्णिमा से जिस प्रकार सत्र श्रृंखला का जो काफी बड़ा क्रम बन पड़ा है उसे ऊँची उड़ान नहीं लम्बी छलाँग ही कहा जा सकता है। स्थान सम्बन्धी सुविधा होते ही नई प्रक्रिया चल पड़ी है और जैसे-जैसे स्थान सम्बन्धी एवं अन्य दूसरे साधन जुटते जाएँगे वैसे-वैसे इन सत्रों का स्वरूप एवं स्तर बढ़ता चला जायगा। कार्यक्षेत्र जितना बढ़ेगा, संकल्प और उत्तरदायित्व जितने फैलेंगे वैसे-वैसे उसी के अनुसार इन सत्रों की प्रखरता भी बढ़ती ही जायगी। सम्भव है अगले दिनों इन नौ प्रकार के सत्रों को नौ कालेजों के विकसित समुच्चय वाले अद्वितीय अनुपम विश्वविद्यालय के रूप में देखा जा सके। इस विस्तार और आवश्यकता की पूर्ति के लिए साधनों का आह्वान किया गया है। वे शीघ्रता से उपलब्ध नहीं हो सकते हैं। उनके प्राप्त होने की गति मन्द ही रहेगी। अस्तु जितने साधन मिल सके हैं, उसी अनुपात से विस्तार होता चल रहा है।
साधनों में धन का अपना स्थान है। कई लोगों से तो वह मिलता नहीं है अपने लोग ही थोड़ा-थोड़ा करके उसे संचित करेंगे और सृजन की माँग का घर भरेंगे। यह विस्तार क्रम एक दिन की आमदनी देने वाले उदार लोगों की सहायता से भी आगे बढ़ता रह सकता है। इस प्रक्रिया में थोड़ी तेजी आ सके तो युग की माँग पूरी करने में जो अड़चने उत्पन्न हो रही हैं, उन्हें दूर करने में सरलता हो सकती है।
जिनके पास शिक्षा और प्रतिभा है, वे इस संदर्भ में दूसरे प्रकार का सहयोग भी दे सकते हैं। कितने ही प्रतिभाशाली सुशिक्षित अपनी नौकरी पूरी करने के बाद पेन्शन लेते हैं और आजीविका के सम्बन्ध में निश्चित होते हैं। उन पर परिवार के निर्वाह का कोई आर्थिक उत्तरदायित्व भी नहीं होता। वे इस स्थिति में परिवार के बीच पड़े रहते और बेकार की देखभाल में समय काटते हैं। ऐसे व्यक्ति यदि चाहें तो अपने बचे हुए समय को युग सृजन महान परमार्थ के लिए दे सकते हैं। रिटायर होने वाले यह प्रतिभाशाली व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में वानप्रस्थ आश्रम के अधिकारी भी हैं। यह वर्ग अपने देश में कम नहीं, किन्तु कृपणता, व्यर्थ का मोह और अनेक बेकार के जाल जंजालों ने उन्हें जकड़ रखा है। इसीलिए गृहस्थ व्यक्तियों से थोड़ा-थोड़ा समय लेकर उस परम्परा का निर्वाह और आवश्यकता की पूर्ति करनी पड़ रही है।
जिनकी आध्यात्मिक जीवन पद्धति में रुचि है ऐसे योग्य परिजनों के अन्दर सत्रों में शिक्षण कर सकने योग्य क्षमता का विकास करने में अधिक कठिनाई नहीं होगी। संगीत-भजनोपदेशक सत्र के साथ यह बात नहीं है। उसके लिए ऐसे शिक्षक चाहिए जिनमें संगीत सिखा सकने की योग्यता पहले से ही हो। संगीत की योग्यता के साथ भजनोपदेशक की शैली आसानी से जोड़ी जा सकती है। अस्तु जो परिजन संगीत सिखा सकने की योग्यता रखते हों, वे विशेष रूप से पत्र व्यवहार कर लें। आवश्यक होने पर उन्हें आँशिक रूप से आर्थिक सहायता भी दी जा सकती है।
जिन पर कोई विशेष पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है वे घर से बाहर जाकर कुछ समय किसी उत्साहवर्धक वातावरण में रहने की इच्छा करते रहते है, आत्मा यद्यपि उस समय परमार्थ प्रक्रिया में निरत रहने की प्रेरणा देती है, किन्तु ऐसे व्यक्ति इधर-उधर आश्रम में रहकर जिस-तिस प्रकार अपने को सन्तुष्ट रखने की चेष्टा करते रहते हैं। वे किसी आश्रम में भी रहने चले जाते हैं। किन्तु वहाँ न उनके आत्म-कल्याण के लिए कोई उपयुक्त वातावरण रहता है और न ही लोक सेवा का कोई अवसर। ऐसे व्यक्तियों के लिए जो अपनी आत्मा की पुकार सुनते हैं और उसे पूरा करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, शान्ति कुँज एक उपयुक्त स्थान है। यहाँ रहकर परमार्थ भावना को भी परिपूर्ण पोषण मिल सकता है और आत्म-कल्याण तो होता ही है। अब स्थान सम्बन्धी असुविधा भी नहीं रही। पत्नी सहित भी यहाँ आकर रहा जा सकता है। अलग से ऐसा क्वार्टर मिल सकता है जिसमें शौचालय, स्नानघर, रसोई घर, बिजली, पंखा आदि की सुविधा है। कहने का अर्थ यह कि निवास में कोई असुविधा नहीं होगी। चारों ओर हरा-भरा उद्यान, गं....गा तट, हिमालय की छाया और मूर्धन्य बुद्धिजीवियों, सेवा परायणों का सान्निध्य, आत्म-साधना और योगाभ्यास आदि का समुचित अवसर आदि ऐसी सुविधाएँ हैं जो लाख प्रयत्न करने पर भी उचित ढंग से जुटाई नहीं जा सकतीं। सबसे बड़ा और अतिरिक्त लाभ यह है कि उपरोक्त नौ सत्रों में प्रशिक्षण की सेवा साधना में वह बहुमूल्य समय कट सकता है जो घर पड़े रहने पर ऐसे ही निरर्थक बीतता है। विद्या और अनुभव की सार्थकता इसी में है कि वह उच्च उद्देश्यों के काम में प्रयुक्त हो, ऐसे ही नष्ट न हो जाए।
सेवा साधना के उद्देश्य से आने वाले ऐसे रिटायर व्यक्तियों का शान्ति कुँज में विशेष स्वागत किया जायगा जो तकनीकों होने के स्थान पर बुद्धिजीवी स्तर के कार्य करते रहे हैं, उच्च कक्षाओं के अध्यापक, वकील, न्यायाधीश स्तर के लोग प्रशिक्षण में जितने फिट बैठते हैं उतने इंजीनियर आदि नहीं। यों उनमें भी कितने ही स्वाध्यायशील और विचारशील होते हैं तथा शान्ति कुँज में अध्यापक स्तर की योगदान दे सकते हैं। ऐसे व्यक्ति सदा सर्वदा के लिए आएँ यह आवश्यक नहीं है। कम से कम एकाध महीने के लिए तो आना ही चाहिए, इससे कम में कम नहीं चलेगा, पर आने के लिए कम से कम चार महीने की तैयारी की जा सके तो उस समय का कुछ कारगर उपयोग हो सकता है। महीने पन्द्रह दिन का समय तो समझने और समझाने में ही लग जाता है। इस सत्र श्रृंखला में संगीत शिक्षकों की भी आवश्यकता है। साथ ही ऐसी भोजन शाला चलाने वाले निपुण शक्ति की भी खोज-बीन की जा रही है जो निर्वाह भर का लाभ लेकर आश्रम की भोजन व्यवस्था का उत्तरदायित्व सम्भाल सके इस संदर्भ में उपयुक्त व्यक्ति ही लिखें।
इन नौ सत्रों की व्यवस्था का काम बहुत बड़ा है। शान्ति कुँज ने यह साहस किया है। उसे सफल बनाना साधन सम्पन्न और बुद्धिजीवियों के सहयोग की अपेक्षा है। इन पंक्तियों को इसी की आह्वान समझा जाना चाहिए।
पाण्डवों ने तीर्थाटन की तैयारी की तो श्री कृष्ण से भी साथ चलने को कहा। श्रीकृष्ण ने कहा-”मैं तो बहुत व्यस्त हूँ; पर कृपया मेरा यह कमण्डलु ले जायें व हर तीर्थ में इस भी स्नान कराएँ।’
पाँडवों ने ऐसा ही किया। लौटकर श्री कृष्ण को कमण्डलु दिया और बताया इसे हम लोगों ने सदा अपने साथ ही स्नान कराया, दर्शन-काल में भी इसे स्वयं धर्मराज हाथ में रखते थे। श्रीकृष्ण ने कहा-’तब तो यह अति पवित्र हो गई और इतना कहकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर प्रसाद रूप में सब को बाँट दिया। पर वह तो कड़वी तूम्बी थी। सब थू-थू करने लगे। कृष्णा ने कहा-’धर्मराज! इतने तीर्थाटन के बाद भी इसका कड़ुवापन मिटा नहीं।”
लोगों ने कहा- ‘महाराज! भला कमण्डलु की कड़ुवाहट तीर्थस्थान, देवदर्शन से मिट सकती है?
तब कृष्ण ने कहा-”यदि नदी जैसी निर्जीव वस्तु में स्नान से और पाषाण-प्रतिमा के दर्शन से उन्हीं के समान जड़ श्रेणी का कमण्डलु अपनी कड़ुवाहट नहीं मिटा पाया, तो चेतन मनुष्य पर इनका क्या असर होगा? उस पर तो चेतना का ही प्रभाव पड़ सकता है। चेतना-सम्बन्धी ज्ञान एवं साधना ही चेतना का स्तर उठाने में समर्थ है। विकसित चेतना नदी, प्रतिमा आदि से भी प्रेरणा पा सकती है और दैनंदिन जीवन क्रम से भी। अविकसित चेतना स्तर पर तीर्थाटन का भी प्रभाव नहीं होगा, जबकि विकसित चेतना के लिए घर में ही तीर्थ यात्रा के सुफल प्राप्त होना सम्भव हैं। अतः अपनी भूलों को स्वीकार कर उनका प्रायश्चित्त करते हुए निरन्तर आत्म परिष्कार के लिये प्रयासरत रहना ही सच्ची तीर्थ यात्रा है।
फूल का रूप मन को बड़ा भा गया। शूल पर क्रोध लेकिन बहुत आ गया॥
बाह्य सौंदर्य मन को लुभाता रहा। मन भ्रमर प्यार के गीत गाता रहा॥
किन्तु जिस दिन हटा आवरण चर्म हो। तब घृणा से बुरा हाल था मर्म का॥
असलियत देख इंसान थर्रा गया। शूल पर क्रोध लेकिन बहुत आ गया॥
जब तलक दूर थी स्वर्ण वाली चमक। हाथ में हो वही-बढ़ चली यह ललक॥
किन्तु जिस दिन चमक हाथ में आ गयी। प्यार के शुद्ध सम्बन्ध को खा गयी॥
इस दुखद अन्त पर व्यक्ति पछता गया। शूल पर क्रोध लेकिन बहुत आ गया॥
मार्ग सीधा सदा आदमी ने चुना। कब सुनीं भेरियाँ? स्वर मधुर ही सुना॥
कोसते सब रहे कष्ट और पीर को। प्राप्त संघर्ष को और तकदीर को॥
कष्ट से ही मगर ज्ञान भी आ गया। शूल पर क्रोध लेकिन बहुत आ गया॥
फूल है चीज अच्छी-प्रशंसा करो। किन्तु मत कण्टकों की चुभन से डरो॥
सत्य शिव का न हो न्यून वर्चस से कभी॥ बात सौंदर्य की चाह ही है तभी॥
शूल चुभकर यही बात समझा गया। शूल पर क्रोध लेकिन बहुत आ गया॥
-माया वर्मा
*समाप्त*