शक्ति पीठों के कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग-
जहां गायत्री शक्ति पीठें बन रही हैं, वहां निर्माण कार्य के साथ-साथ स्थायी कार्यकर्ताओं का प्रबंध करना भी आवश्यक होगा। इनकी खोज, नियुक्ति और ट्रेनिंग इन्हीं दिनों करने की आवश्यकता है। यह कार्य भी निर्माण कार्य का आवश्यक अंग समझा जाय।
शक्ति पीठों के इर्द-गिर्द की तीस-तीस मील परिधि तक उनका कार्यक्षेत्र होगा। इसका नक्शा इन्हीं दिनों बनाया जाय और उनके गांव तथा रास्ते अंकित किये जांय। इसकी एक प्रति शक्ति पीठ के दफ्तर में रहे। दूसरी हरिद्वार, तीसरी मथुरा भेजी जाय। इस कार्यक्षेत्र के विचारवान एवं भावनाशील लोगों से संपर्क स्थापित करने का प्रयास भी निर्माण कार्य के साथ-साथ ही चल पड़ना चाहिए।
कार्यक्षेत्र में शक्ति पीठ की स्थापना का उद्देश्य तथा प्रयास का परिचय जन-जन का बताया जाना चाहिए। इसके लिए महापुरश्चरण योजना के अंतर्गत वहां छोटे-छोटे यज्ञ आयोजन करने की श्रृंखला बनानी पड़ेगी। इन आयोजनों द्वारा ही शक्ति पीठों के लिए 24 लाख गायत्री मंत्र लेखन संग्रह हो सकेगा। प्राण प्रतिष्ठा के समय 25 कुंडी यज्ञ होंगे। उनमें नैष्ठिक उपासक ही आहुति देंगे। इन्हें भी इन यज्ञ आयोजनों के द्वारा ही उत्पन्न तथा उत्साहित किया जा सकेगा। संपर्क बढ़ाने तथा उत्साह उभरने से शक्तिपीठों को अपने कार्यक्षेत्र में अधिक सहयोग, समर्थन भी मिलेगा। इन कार्यों के लिए कुशल कार्यकर्ताओं की आरंभ से ही आवश्यकता पड़ेगी।
हर शक्ति पीठ में पांच परिव्राजकों की आवश्यकता पड़ेगी। वे उसी कार्य क्षेत्र के होंगे। इसके लिए उपयुक्त व्यक्ति अभी से खोजे जाने चाहिए। निर्माण कार्य की देखभाल तथा कार्यक्षेत्र में दौड़-धूप के दुहरे कार्य में इन्हें अभी से लगाया जाना चाहिए। यह कार्यकर्ता नव-निर्मित शक्ति पीठ के कार्यक्षेत्र के हों तो अधिक उत्तम है। निश्चिंत मन से जो स्थायी रूप से कार्य करने की स्थिति में हों यह स्थान दिया जाय। उनकी निर्वाह व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
इस प्रयोजन के लिए निश्चित किये गये कार्यकर्ताओं की एक-एक महीने के ट्रेनिंग का सिलसिला 1 नवंबर से शांतिकुंज में आरंभ हो रहा है। इनमें शक्ति पीठों द्वारा चुने गये और भेजे गये कार्यकर्ताओं को ही स्थान दिया जायेगा। शिक्षण एक समय में सीमित लोगों का ही हो सकता है अस्तु जिन्हें जिस महीने सम्मिलित होना ही वे अभी से स्थान सुरक्षित करालें।
ब्रह्मवर्चस् साधना-सत्र
ब्रह्मवर्चस् सत्र भारतीय महीनों में चलेंगे और एक महीने के होंगे। गायत्री पुरश्चरण अनिवार्य होगा। जो चाहेंगे पूर्ण चांद्रायण एवं सौम्य चान्द्रायण व्रत भी करेंगे। हर साधक की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप उसे विशेष साधनाएं भी बताई जायेंगी। पंचकोशों के अनावरण एवं कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया इसी साधना में सम्मिलित है। विशिष्ट साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है।
मार्गशीर्ष में सत्र 4 नवंबर से 3 दिसंबर तक- पौष 3 दिसंबर से 2 जनवरी तक का, माघ का 2 जनवरी से 1 फरवरी तक का- 1 फरवरी से 2 मार्च तक का होगा। यह सत्र नियमित रूप से चलते रहेंगे, पर अभी स्थान सुरक्षित इन्हीं चार सत्रों के लिए ही किये जा रहे हैं। जिन्हें जिस मास सम्मिलित होना हो आवेदन-पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लें।
वर्ष 42 सितम्बर 1979 वार्षिक चन्दा 12 अंक 9 दस वर्ष का चन्दा 100
अणु का विभु के प्रति समर्पण इसी को विस्फोट कहते है। रज घटक जब तक अपने सीमित कलेवर में आबद्ध रहता है तब तक उसकी स्थिति पददलित धूलि जितनी नगण्य और उपहासास्पद बनी रहती है, किन्तु जब हव विराट् से मिलने के लिए आतुर हो उठता है और अपने परम्परागत आवरण को तोड़ने का साहस जुटाता है तो प्रयास को विस्फोट के रूप में आश्चर्यचकित होकर देखा जाता है। उससे निकलने वाले विकिरण का प्रभाव कितना गहरा, कितना व्यापक और कितना चिरस्थायी होता है। इसे सभी जानते है।
उत्तंग शिखर पर जमी हुई हिम कलेवर जब असीमता से असन्तुष्ट होकर लोक-साधना की बात सोचता है तो उसे अपनी काया गलानी पड़ती है। उसकी यह करुण सम्वेदना गंगोत्री से फूटती है। उसका प्रयाण प्यासी भूमि को सींचने और प्राणियों की प्यास बुझाने का होता है। इसी का गंगावतरण कहते है। उसके सभी सहायकों को श्रेय प्राप्त होता है। द्रवित हिम खण्ड धन्य बनते हैं और देवता की तरह अभ्यर्थना प्राप्त करते है। अपने वैभव को सार्थक बनाने के अतिरिक्त चरमविकास के लक्ष्य तक पहुँचकर महान समुद्र बनते है। धरती की हरितमा समुद्र पर ही निर्भर है। हिम खण्ड की उदार साहसिकता पर कृपणों को कुड़कुड़ाने और बहुत कुछ कहने की (गुंजाइश) है, पर बुद्धिमत्ता बताती है कि समीपता छोड़कर असीमता के साथ जुड़ जाने में हानि कम और लाभ अधिक है।
आत्मा सीमित है। संकीर्ण स्वार्थपरता की बेड़ियां ही भव बन्धन उठती है उसी का नाम भक्ति है। भक्ति को भाव से कर्म में उतारने का नाम ही साधना है। साधना कृत्य नहीं दुस्साहस है। उसमें बन्धनों को तोड़ने और महान से मिलने की ललक ही महान भूमिका सम्पादित करती है, सिद्धि के लक्ष्य, तक पहुँचाती है।
भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को मोह-कलिल से उबारने के लिए-उन्हें युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए-उनकी शोकाकुल मनःस्थिति दूर करने के लिए-ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कहा था-
‘न हि ज्ञानेन (सद्वश) पवित्रमिह विद्यते।’
ज्ञान के समान पवित्र तथा पवित्र करने वाला इस संसार में कोई दूसरा नहीं है।
इस प्रसंग से जहाँ ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन होता है, वहीं इसे प्राप्त करने के लिए प्रेरणा भी प्राप्त लेकर मनुष्य-पाषाण काल से क्रमशः समुन्नत होता हुआ, आज विकास की चरम सीमा पर पहुँचा है।
भौतिक जगत् के अनेक विध वैज्ञानिक आविष्कार और अध्यात्म जगत् की अनेकानेक उपलब्धियाँ ज्ञान ही प्राप्तव्य होती हैं। इसके अभाव में कुछ कहने लायक अर्जित करने को कौन कहे, सामान्य जीवन-क्रम भी स्थिर कर पाना कठिन होता है।
शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाना ज्ञान के द्वारा ही सम्भव हो पाता है-
आधयो व्याधयश्चव द्वय दुःखस्य कारणम्। तत्रिवृत्तिः सुख विद्यात् तत्क्षयो मोक्ष उच्यते॥ -योगवाशिष्ठ
आधियाँ (मानसिक रोग) और व्याधियाँ (शारीरिक रोग)-यह दो ही व्यक्ति के लिए दुःख के कारण बनते हैं। इनकी निवृत्ति ज्ञान द्वारा होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है। संसार में व्यक्ति केवल अपनी अज्ञानता से ही कष्ट पाता है और कुमार्गगामी बन जाता है। महाभारतकार ने इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है-
एकः शत्रुर्न द्वितीयोस्ति शत्ररज्ञान तुल्यः पुरुषस्य राजन्। येनावृतः कुरुते सम्प्रयुक्तो, घोराणि कर्माणि सुदारुणानि॥ -महा. शांतिपर्व
इस संसार में पुरुष का एक ही शत्रु है-अज्ञान इसके अतिरिक्त उसका अन्य कोई शत्रु नहीं है। इस अज्ञान से विमोहित होकर व्यक्ति अनेकानेक कुकर्मों प्रवृत्त होता रहता है।
ज्ञानी पुरुष को किसी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता-
प्राज्ञं विज्ञान विज्ञेयं सम्यग् दर्शनमाधयः। न दहन्ति वनं वर्षासिक्तमग्नि शिखा इव॥ -योग वरिष्ठ
जिसने जानने योग्य को जान लिया और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली, उस ज्ञानी व्यक्ति को कष्ट (शरीर और मन के ) उसी प्रकार नहीं दुःखी कर पाते, जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि नहीं जला पाती सद्ज्ञान प्राप्त कर पाना सर्वोपरि उपलब्धि होती है क्योंकि यही सुख-शान्ति का कारण होता है-
पाताले भूतले स्वर्गे सुखऐर्श्वयमेव वा। न तत्पश्यामि यत्राम पाण्डिन्यदतिरिच्यते॥ -स्कन्द पुराण
पृथ्वी लोक, पाताल लोक और स्वर्ग लोक में पांडित्य (ज्ञान) से बढ़कर कोई भी सुख या ऐश्वर्य नहीं दिखाई पड़ता है। ज्ञान ही सुख ऐश्वर्य आदि का कारण होता है। ज्ञानी-मनुष्य को, अन्य साँसारिकता के बन्धनों से जकड़े, दुःख-तकलीफ सहते, रोते-कलपते मनुष्य, अत्यधिक छोटे-तुच्छ यो क्षुद्र परिलक्षित होते हैं-
प्रज्ञा प्रासादमारुळयाशोच्यः शोचती जनान्। तमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति।
प्रज्ञा प्राप्त विवेकवान् योगी, संसार में शोकाकुल मनुष्यों को उसी प्रकार देखता है, जैसे पहाड़ की चोटी पर खड़ा मनुष्य पृथ्वी पर नीचे खड़े हुए मनुष्यों को देखता है। उस ज्ञानी व्यक्ति की स्थिति की वर्णन उप-निषद्कार के शब्दों में-
‘विशोक आनन्दमायो विपश्चित्- स्वयं कुतश्चिन्न विभेति काश्चित्।
विज्ञ (ज्ञानी) व्यक्ति शोक रहित होकर आनन्दपूर्वक रहते है, वे किसी से भी नहीं डरते।
‘ज्ञान’ का गुणगान जितना भी किया जाय वही कम ही होगा इसके विपरीत अज्ञान की अधिकाधिक भर्त्सना भी कम ही होगी। ‘ज्ञान’ में वहीं पतन की पराकाष्ठा भी है। इस तथ्य को समझकर ‘ज्ञान’ प्राप्ति के मार्ग पर ही नित्य-निरन्तर गतिशील होना ही श्रेयष्कर होगा। यही मानव-जीवन के सच्चे लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग का प्रदर्शक कहा जा सकता है।
आनंद आत्मा का शाश्वत गुण है। मनुष्य जब प्रसन्नचित्त होता है तो उसकी आत्मा प्रफुल्लित हो उठती हैं। शरीर में जीवनी शक्ति का प्रवाह तीव्र हो जाता है। समस्त आत्मिक शक्तियां विकसित होती हैं। आत्मिक शक्ति की स्फुरणा से शरीर की आकृति एवं मन की प्रवृत्ति में परिवर्तन होता है। मुख से चेतनता एवं सजीवता टपकने लगती है। शरीर रोमांचित हो उठता है। कभी-कभी इस प्रकार का आभास प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में होता है।
आनंद प्राप्त करने का भाव मनुष्य की अंतरात्मा में निहित है। भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में वह भिन्न-भिन्न प्रकार से उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है। उसके सुख का केंद्र कभी एक वस्तु बनती है कभी दूसरी। शैशव काल में शिशु माता की गोदी में लेटा रहता है। मां का स्तन पान करता हुआ आनंद में मग्न रहता है। शिशु अवस्था में उसके आनंद का केंद्र मां की गोद से हटकर खिलौनों में जा पहुंचता है। उसमें आमोद-प्रमोद करता रहता है। विद्यार्थी जीवन में पैर रखते हुए भविष्य के निर्माण में केन्द्रित होता है। सुनहरे भविष्य का ताना-बाना बुनता रहता तथा उस स्थिति तक पहुंचने के लिए प्रयास करता है। इसमें ही वह आनंदित रहता है। शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी करना अथवा व्यवसाय की सफलता उसके आनंद का क्षेत्र बन जाता है। धनोपार्जन से वह प्रसन्न होता है।
गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरांत आनंद का केंद्र-बिंदु पत्नी बन जाती है। पत्नी के साहचर्य, स्नेह-अभिसिंचन से प्रसन्न रहता है। कुछ समय पश्चात् पत्नी की गोद में बच्चा आ जाता है तथा वह पत्नी का स्थान ले लेता है। बाल-सुलभ चेष्टाओं में मनुष्य अपने दुखों को भूल जाता है तथा उसकी किलकारियों में रस में डूबा रहता है।
यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं बनी रहती। गृह, स्त्री, पुत्र, धन अब उसे उतना आनंद नहीं आता। आनंद प्राप्ति का कोई नया क्षेत्र ढूंढ़ने लगता है। सामाजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठता है। सामाजिक कार्यों द्वारा प्रतिष्ठा प्राप्त करता तथा प्रसन्न होता है।
उपरोक्त अवस्थाओं पर विचार करने पर प्रतीत होता है कि व्यक्ति से सुख का केंद्र सदा बदलता रहता है। शैशव काल मां की गोद में, बाल्यावस्था खिलौनों में, छात्र जीवन में पुस्तकों में, यौवन पत्नि तथा धन संचय में, गृहस्थाश्रम पुत्र में, यश की प्राप्ति में रहता है। गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि जिन चीजों में आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है वस्तुतः वे भौतिक पदार्थ आनंद से रहित हैं। यदि उनमें आनंद होता तो मन सदा उनमें लीन रहता किंतु आनंद प्राप्ति का केंद्र सतत परिवर्तित होते रहना इस बात का प्रमाण है कि यह विशेषता भौतिक वस्तुओं में नहीं है।
सुख एवं आनंद की भावना तो मनुष्य की अंतरात्मा में विद्यमान है यह भाव ही विभिन्न वस्तुओं में आरोपित होकर हमें आनंद देता प्रतीत होता है, इसी कारण भ्रम वश लोग वस्तुओं को ही आनंद का हेतु समझ लेने की भूल कर बैठते हैं। विभिन्न वस्तुओं में उसे ढूंढ़ने एवं प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। फलस्वरूप असफलता ही हाथ लगती है। यह स्थिति उस हिरन के समान है जो अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी की गंध से प्रभावित होकर उसे पाने की तलाश में जंगलों में भटकता रहता है जबकि कस्तूरी उसके अंदर ही विद्यमान होती है।
सुख, आनंद का केंद्र बिंदु आत्मा है जो मनुष्य के अंदर विराजमान है। वही आनंद प्राप्ति का भाव प्रेषित करती तथा अपनी आनंदमय स्थिति का भान कराती है। किंतु मनुष्य अंतर्मुखी होकर उसे प्राप्त करने के स्थान पर बहिर्मुखी होकर भौतिक पदार्थों में ढूंढ़ता रहता है। वस्तुओं को सुख का आधार मान लेता है।
वाह्य वस्तुओं में जो आकर्षण दिखायी पड़ता है वह भी आन्तरिक भावों की प्रतिक्रिया मात्र है। जड़-वस्तुओं में अपना कोई आकर्षण नहीं है न ही आनन्द। अन्तरात्मा के सौंदर्य प्रवाह की किरणें ही वस्तुओं पर पड़कर सुन्दरता का आभास कराती हैं। दर्पण में दिखायी पड़ने वाली मुखाकृति की प्रतिच्छाया को देखकर दर्पण की सराहना की जाय तथा सुन्दर मुखाकृति का कारण दर्पण को पाना जाय तो यह मान्यता अविवेकपूर्ण ही होगी। प्रतिच्छाया से आनन्द प्राप्त करने का भ्रमपूर्ण प्रयास असफल ही सिद्ध होगा।
अन्तरात्मा की प्रकाश किरणें वस्तुओं में आरोपित होकर सौंदर्य पैदा करती हैं। जिसके फलस्वरूप उनको प्राप्त करने तथा उनके उपभोग से आनन्द प्राप्त करने का लोग असफल प्रयास करते हैं। कुछ समय तक तो वे आनंददायक लगती है, किन्तु वह थोड़े समय उपरांत ही समाप्त हो जाती है। वे निस्सार तथा आकर्षण रहित प्रतीत होने लगती हैं। वस्तुतः अन्तरात्मा की प्रकाश किरणें वस्तुओं से हट जाती है जिसके फलस्वरूप जो कभी सुन्दर आनंददायक प्रतीत हो रही थी वे ही असुख-कर लगने लगती हैं।
चेतना की यह विशेषता होती है कि वह जड़ वस्तुओं में अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जब तक उसका अन्तरात्मा में निकली भाव तरंगें संसार में विविध वस्तुओं में अपने उद्गम स्थल को ढूंढ़ती रहती हैं। उसकी स्थिति प्यास से छटपटाते हुए प्राणी के समान होती है। विविध साँसारिक चीजों में वही अपनी प्यास बुझाने का प्रयत्न करती है। तृप्ति तो होती नहीं उल्टे उसकी स्थिति वही होती है जो पानी की तलाश में निकले प्यासे व्यक्ति की मदिरालय पहुँचकर मद्य पीने पर होती है। शराबी के समान जीव-चेतना एक वस्तु के उपभोग से अतृप्त बनी विभिन्न वस्तुओं से टकराती रहती तथा सदा अतृप्त बनी रहती है।
यह कैसी विडम्बना है कि जीव का उपहासास्पद प्रयास जीवन पर्यन्त चलता रहता है। जीव पृथ्वी पर अवतरित होते ही आनन्द प्राप्ति का प्रयास विभिन्न रूपों में आरंभ कर देता है। स्वयं आनन्द स्त्रोत होते हुए जीवनपर्यन्त उस अमृतत्व से वंचित रह जाता है। बचपन के खेल खिलौने, किशोरावस्था के अध्ययन एवं युवावस्था के भोग-विलास से गुजरते हुए थके हुए खिलाड़ी की भाँति अपनी वृद्धावस्था पूरी करता और काल के गर्भ में चला जाता है। आनन्द प्राप्ति का भ्रम-पूर्ण, पदार्थवादी प्रयास उसे अपने ही आनन्द स्त्रोत अन्तरात्मा से दूर रखते हैं। फलस्वरूप मनुष्य विक्षुब्ध बना रहता है।
आन्तरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि आनन्द का अजस्र स्त्रोत अन्दर बैठा अपना प्रवाह संप्रेषित कर रहा है। इस प्रकार के भावों के उत्पन्न होते ही कुप्रवृत्तियाँ नष्ट होने लगती है। चेष्टाएँ अन्तर्मुखी बन जाती हैं तो भौतिक लालसाएँ नष्ट हो जाती हैं। उनका स्थान दया, करुणा, प्रेम जैसी सत्प्रवृत्तियाँ ले लेती हैं। प्राणिमात्र के दुःखों को दूर करने में मनुष्य को आनन्द आने लगता है। प्रेम का सतत प्रवाह चारों ओर बहता दिखायी देता हे। इस स्थिति को प्राप्त करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रह जाती है।
मृग के कस्तूरी के लिए जंगल में भटकते रहते के समान बाह्य-वस्तुओं में आनन्द ढूंढ़ने का अविवेकपूर्ण प्रयास करने की अपेक्षा, आवश्यकता इस बात की हे कि अपनी चेष्टाओं को अन्तर्मुखी किया जाय। अन्दर बैठे अन्तरात्मा के दर्शन एवं उससे मिलने वाले अजस्र आनन्द के अनुदान को प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक साधनाओं का ही अवलम्बन लेना होगा। चेतना अपने उद्गम स्थल पर पहुँचकर ही शान्ति एवं आनन्द की शाश्वत अनुभूति कर सकती है। जीवनपर्यन्त मनुष्य जिसकी प्राप्ति के लिए साँसारिक आकर्षणों में भटकता रहता है, आत्म-दर्शन से ही सम्भव है।
महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थी, मैत्रेयी और कात्यायनी। जब महर्षि ने संन्यास लेना चाहा, तब अपनी दोनों पत्नियों को बुलाकर कर कहा-हम अब संन्यास लेने वाले है तुम दोनों घर की सम्पूर्ण संपत्ति को आधा-आधा बाँट लो। यह सुनते ही मैत्रेयी बोल उठी देव! क्या इन धन सम्पदाओं को प्राप्त कर मैं अमर हो जाऊँगी? नहीं-याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया। जिस प्रकार धन-सम्पत्ति वालों का लोभ-मोह से भरा जीवन होता है देवि! उसी प्रकार का तुम्हारा भी जीवन हो सकेगा। तब तो ऐसे धन की हमें आवश्यकता नहीं- मैत्रेयी ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा। पुनः निवेदन किया कि-देव हमें तो अमरत्व का साधन बाताइये। हमें धन-संपदा नहीं चाहिए।
मैत्रेयी के बार-बार आग्रह करने पर महर्षि को विवशतः अमरत्व का साधन-आत्म-कल्याण का साधन बताना ही पड़ा। उनने सूत्र रूप में कहा-
आत्मा वाऽऽदे मैत्रेयि! द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निविध्यासितव्यश्च। आत्मानः खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति। (वृहदारण्यकोनिषद)
है मैत्रेयी! आत्मा ही देखने योग्यताएं सुनने योग्य, मनन करने योग्य और अनुभव करने योग्य है। अपने आपको-आत्मा को-जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यही अमरत्व का साधन है-यह आत्म- कल्याण का मार्ग है।
अपने को जान लेना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। गीताकार ने आत्मोत्कर्ष की गरिमा समझाते हुए कहा है-
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ळयात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अपनी आत्मा द्वारा अपना उद्धार करो, आत्मा को पतित न करो। आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु है।
व्यक्ति को दुनिया की, विश्व ब्रह्माण्ड की यत्किंचित् जानकारी कितना सन्तोष प्रदान करती है। जान पहचान के लोगों से मिलने पर कितनी प्रसन्नता होगी है, कदा-चित् अपने को पहचाना जा सके-आत्मा को जाना जा सके-तो कितने महान् आनन्द की प्राप्ति हो। उपनिषद्- कार के शब्दों में अपने आपको जान लेने वाले को ही सर्वोपरि सुख की प्राप्ति होती है-
तमात्मस्थं येनुपश्यन्ति धीराः तेषा सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ कठोपनिषद् 2।2।12
उस अपने में स्थित आत्मा को जो विवेकी पुरुष देख लेते हैं -जान लेते है-उन्हीं को नित्य सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं।
अपनी आत्मा को जान लेने पर भवबन्धनों से मुक्ति हो जाती है-
न मुक्तिर्जपनाद्धोमादुपवास शतैरपित। ब्रळमैवाहमिति ज्ञात्वा मुक्तो भवति जीवभृत॥
जप, हवन, तथा सैकड़ों उपवास से भी मुक्ति नहीं मिल पाती, आत्मज्ञान, हो जाने पर जीव और ब्रह्म की एकता, की अनुभूति होने पर आत्मा मुक्त हो जाती है।
अनाद्यनन्त महतः परं ध्रुवं, निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते। कठो.1।3।15
उस अनादि अनन्त, महत्तत्व (बुद्धि) से परे तथा ध्रुव (निश्चल) आत्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से छुट जाता है।
महान्त विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति। कठो.2।1।4
उस महान और विभु (सर्वसमर्थ) आत्मा को जान कर बुद्धिमान पुरुष शोकाकुल नहीं होता।
इस प्रकार अनेकानेक श्रुतिवचनों द्वारा आत्मज्ञान की गरिमा को प्रतिपादित कर उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है। व्यक्ति को जिसमें अपना लाभ दिखाई पड़ता है, उस कार्य को बड़े परिश्रम, मनोयोग व प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न करता है। यदि आत्मज्ञान के लाभों को जाना जा सके तथा इसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा सके तो व्यक्ति धन्य हो जायेगा।
आत्म ज्ञान का तात्पर्य अपने को जानने से है। मैं कौन हूँ? किस लिए हूँ कहाँ से आया हूँ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तरज्ञान कहा जायेगा। इसी प्रकार की प्रबल जिज्ञासा एक बार देवराज इन्द्र और दैत्यराज विरोचन को हुई। दोनों एक साथ प्रजा-पति के पास गये ओर विनम्रतापूर्वक अपना प्रश्न उनके सामने रखा। प्रजापति ने एक बड़े पात्र में पानी मँगवा कर उसमें अपना-अपना शरीर, मुख देखने का कहाँ और बताया-यही तुम हो-यही तुम्हारा स्वरूप है। वस्तुतः प्रजापति ने दोनों की विवेकबुद्धि का अन्दाज लगाने के लिए ऐसा किया था। क्या इनमें आत्मा को जानने की उत्कट अभिलाषा है? आत्मा को पहचान सकने की क्षमता है? इसका पता लगाने के लिए ऐसा किया था। विरोचन तो जल में अपनी आकृति देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला मैंने तो अपने को जान लिया ऐसा कहता हुआ, अपने घर चला गया, वहाँ सभी को इसी प्रकार दर्पण में खूब सज-धज कर अपने स्वरूप को देखने और प्रसन्न होने का कहा।
लेकिन इन्द्र को इतने भर से सन्तोष न हो सका, वे पुनः प्रजापति के पास जाकर बोले-
‘‘..........................-नाहपात्र भोग्यं पश्यामि।’’
मैं तो इसमें कोई भलाई, लाभ, नहीं देखता। जब शरीर ही आत्मा को भी यह सब दुःख, कष्ट, प्रसन्नता के साथ आत्मा को भी यह सब अनुभव होता होगा और शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा भी नष्ट हो जाती होगी।
इन्द्र की यह शंका सही थी। जिज्ञासा से प्रसन्न होकर प्रजापति ने आगे की बात बताते हुए कहा-आत्मा परमात्मा का ही अंश है-उसी का लघु रूप है। परमात्मा की समस्त विशेषताएँ इसमें विद्यमान है। शरीर के नष्ट होने पर भी इसका विनाश नहीं होता। तुम वही तो-तत् त्वम् असि।
व्यक्ति जब अपने को ईश्वर का परम पवित्र अविनाशी अंश समझता है, आत्मा के रूप में अनुभव करता है और शरीर को एक उपकरण भी स्वीकारता है, तब वही दीन-दीन स्थिति से ऊपर उठकर, उन कार्यों को ही करता है, जो उसके गौरव के अनुरूप होते हैं-आत्म-संतोष प्रदान करते हैं।
आत्मा के इस स्वरूप को जानने की एक लम्बी प्रक्रिया है। आत्म-बोध, आत्म परिष्कार, आत्म -निर्माण और आत्म-विकास की लम्बी मंजिल पार करके ही आत्मा के सही स्वरूप का अनुभव किया जा सकता है।
सर्वप्रथम अपने को शरीर से भिन्न होने की धारणा को पुष्ट करना पड़ता है। हम दूसरे हैं और हमारा साध्य नहीं। हम अपनी सारी शक्ति शरीर को ही सुख पहुँचाने में न झोंक दें। शरीर से भिन्न भी कुछ है- वही मैं है। इस प्रकार का बोध हो जाने पर अपने द्वारा किये जाने वाले ओछे कार्यों को छोड़ना पड़ता है। यहीं से आत्म-परिष्कार आरम्भ होता है।
दोष-दुर्गुणों के दूर हो जाने पर उनके स्थान पर सद्गुणों-श्रेष्ठताओं का समावेश करना आवश्यक होता है। कषाय-कल्मषों से रहित होने पर शुद्ध अन्त-करण में श्रेष्ठ-सद्गुणों की अभिवृद्धि होने लगती है। सही आत्म-निर्माण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट स्तर के चिन्तन एवं कर्तृत्व को स्थान देना आत्मज्ञान का तृतीय चरण है।
इसके उपरान्त आत्मविकास आता है। अपने ही समान सभी प्राणियों को, जीव, जन्तुओं को, समझाना ही आत्म-विकास है। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ का सही आदर्श है।
किन्तु ‘आत्मज्ञान’ की लक्ष्य प्राप्ति इतनी सुगम नहीं होती अनेकानेक विघ्न बाधाएँ चुनौती बनकर साधक के समक्ष आ खड़ी होती है। बिना परीक्षा के तो सामान्य कार्य की दक्षता भी प्रमाणित नहीं हो पाती, तो इतने महान लक्ष्य की कौन कहे? काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य-यह छः दोष, छः बाधक तत्व, आत्मिक प्रगति के मार्ग में अवरोधक बन कर आड़े आ जाते हैं-
तप्प्रत्यूहाः षडाख्याता योगविघ्न करानघ। काम क्रोधौ, लोभमोहौ, मदमार्त्सय संज्ञकौ॥ -देवी भागवत
‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, पद और मात्सर्य-यह छः योग मार्ग के -आत्मिक उन्नति के शत्रु है, जो इस कार्य में विघ्न डाला करते हैं।
आत्म-साधना के अधिकाँशतः साधक इन बाधकों द्वारा विचलित कर दिये जाते हैं। काम-क्रोध की लिप्सा में फंसकर अपनी साधन-सम्पत्ति को गवाँ बैठते हैं। इस स्थिति को संभालना बहुत आवश्यक होता है। आत्म-लाभ की फसल की रखवाली, काम क्रोधादि पक्षियों से इन्हीं दिनों करनी पड़ती है। इन बाधक तत्वों से बच निकलता बड़े पुरुषार्थ की बात होती है। इसी स्थिति को ‘साधना-समर’ कहा गया है।
आत्मज्ञान की प्राप्ति सर्वोपरि उपलब्धि है। ‘अपने आपको जान लेने वाला पुनः कुपथगामी नहीं होता है, फलतः दुष्कर्म अन्य दुष्परिणामों को, उसे नहीं भुगतना पड़ता। वह परमात्मा की ही तरह निर्विकार और शुद्ध हो जाता है-
‘यदा तु शुद्ध निजरुपि सर्व कामक्षये ज्ञान-मपस्तदोषाम्।’-विष्णु पुराण
‘आत्मज्ञान प्राप्त होने पर मानव निर्दोष हो जाता है, तथा सभी कर्मों के क्षय हो जाने से अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान लेता है।’ इस समय व्यक्ति अपने पराये में कोई भेद नहीं देखता है, क्योंकि अपने और पराये का भेद तो संकीर्णता की स्थिति में ही रहता है। संकीर्णता से ऊपर उठने वाले को ही आत्म-लाभ हो पाता है। उस समय सम्पूर्ण संसार को ही वह अपना परिवार मानने लगता है-
‘अयं निजः परोषेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचारितानाँ तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
‘यह हमारा है यह दूसरे का है-ऐसा विचार क्षुद्र हृदय वाले-संकीर्ण-विचारों वाले करते हैं, उदार चेता-आत्मज्ञानी-तो सम्पूर्ण विश्व को ही अपना परिवार समझते हैं।
इसके अतिरिक्त आत्मज्ञान हो जाने पर-अपने सच्चे स्वरूप को पहचान लेने पर-व्यक्ति परमात्म-शक्तियों से ओत-प्रोत हो जाता है। ‘आत्मज्ञान’ हो जाने पर ‘ब्रह्माण्ड ज्ञान’ भी हो जाता है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड में तात्विक अन्तर कुछ भी नहीं है’ अन्तर है तो केवल स्वरूप का। इसलिए पिण्ड (आत्मा) को जानने वाला ‘ब्रह्माण्ड को भी जान लेता है-
ब्रहमाप्डे ये गुणाः सन्ति पिण्डमध्ये च ते स्थिताः।
ब्रह्माण्ड में जो गुण है, वे पिण्ड में भी विद्यमान हैं। ‘आत्मज्ञान’ के महान् लाभ से लाभान्वित होना ही सर्वोपरि बुद्धिमत्ता है। उसी में जीवन की सार्थकता है।
प्रकृति ने मानवी शरीर की संरचना ऐसी कला-कारिता के सहारे की है कि उसे चिरकाल तक निरोग और दीर्घजीवी बनाये रखा जा सके। बीमार पड़ना शरीर का स्वभाव नहीं है। जब सृष्टि के अन्य प्राणी मात्र प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण करके निरोग जीवन जी लेते है तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य को ही रुग्णता और दुर्बलता घेरे रहे। यदि संयम बरता जाय और सुरक्षा के सामान्य नियमों का पालन किया जाय तो शारीरिक और मानसिक आधि−व्याधियों से सहज ही बचा जा सकता है। स्वास्थ्य संवर्धन और रोग निवारण पर जितना ध्यान दिया जाता है उससे कम यदि संयम बरतने, अपव्यय को रोकने, अनावश्यक बर्बादी बचाने और निरर्थक दबावों को कम करने की सावधानी बरती जाये तो आरोग्य का चिरस्थायी आनन्द सहज ही प्राप्त किया जा सकता है।
शरीर पर व्यर्थ का दबाव न आने दिया जाय और उसकी समुचित साज-सम्हाल की जाती रहे, तो यह स्थूल-शरीर अनेक अमूल्य अनुदानों से हमें आजीवन समृद्ध-सुखी बनाये रख सकता हैं इस तथ्य से अनभिज्ञ रहने पर, स्थूल शरीर रूपी सेवक की न्यूनतम आवश्यकताओं की भी उपेक्षा करने का अर्थ है-जीवन को भार बना लेना, इस सेवक की अथवा और विद्रोह से सन्तप्त और सुविधाओं से वंचित बने रहना तथा लगभग आधी जिन्दगी बीमारी को भेंट कर अकाल मृत्यु के लिए विवश होना। इस तथ्य को जितनी जल्दी ही समझ लिया जाए, उतना ही अधिक शरीर में छलक रहे जीवन-रस का लाभ लिया जा सकता है।
मनुष्य-शरीर जिन छोटे-छोटे जीवकोषों से बना है, वे प्रतिक्षण टूटते रहते है और नए।स्वस्थ कोषों का निर्माण भी उसी क्रम से निरंतर चलता रहता है। मनुष्य की त्वचा के कोष 4 दिन में नए बदल जाते है। 80 दिन में सम्पूर्ण शरीर की प्रोटीन बिल्कुल नई हो जाती है। पुरानी का पता भी नहीं चलता कि सड़-गल कर कहाँ चली गई?
डा. केनिथ रोंसले ने अनेक सूक्ष्म प्रयोगों के बाद यह प्रतिपादित किया कि यदि मनुष्य शरीर के कोषों में कोई गड़बड़ी न आये, तो गुर्दे 200 वर्ष और हृदय 300 वर्ष त जीवित रखे जा सकते है। इसके बाद उन्हें बदला भी जा सकता है। हृदय प्रत्यारोपण के प्रयोग तो बहुत ही अधिक सफल हुए है। इसके अतिरिक्त चमड़ी, फेफड़े और हड्डियों को तो क्रमशः 1000 वर्ष, 1500 वर्ष और 4000 वर्षों तक भी जीवित रखा जा सकता है।
जीव-कोषों को विकृत होने से रोककर उन्हें पुनः पोषण देकर मनुष्य को दीर्घजीवी बनाया जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में जिसे कायाकल्प कहते है, वह पुराने शरीर में ही इन जीवकोषों की नई जिन्दगी आरम्भ करा देने का ही नाम है, जो रोग और आयुर्वेद की सम्मिलित प्रक्रिया से पूरा हो सकता है। च्यवन ऋषि का वृद्ध शरीर अश्विनीकुमार की चिकित्सा से इसी प्रक्रिया से नवयौवन सम्पन्न हुआ था। राजा ययाति को भी पुनः यौवन इसी तरह प्राप्त हुआ था।
शक्ति की कमी, कलपुर्जों की घिसाई, संचित पूँजी का खर्च, नये उत्पादन में शिथिलता, कचरे-दूषण में निरन्तर वृद्धि, इनका परिणाम ही शरीर का मरण होता है। जीवकोषों में चलती रहने वाली रासायनिक प्रक्रिया में विषाक्त पदार्थों का अनुपात बढ़ जाता है और प्रोटीन का चालीस प्रतिशत भोग कोलाजेन में बदल जाता है। त्वचा के नीचे का कोलाजेन कठोर हो जाने से चमड़ी पर झुर्रियां पड़ने लगती है। इस जराजीर्णता से बचने के लिए शारीरिक-मानसिक शक्तियों को अपव्यय रोक कर सीधा, सरल, सौम्य जीवनक्रम अपनाना ही सर्वोत्तम औषधि है। अपव्यय रोका जा सके तो ढलती आयु में भी शिथिलता से बचे रहा जा सकता है।
भारतीय मनीषियों द्वारा प्रतिपादित यह तथ्य अब आधुनिक शरीर-शास्त्रियों द्वारा भी स्वीकृत हो चला है कि शरीर को नियमित-सन्तुलित रखे रहना ही शक्ति का सही स्त्रोत एवं विधि है। विश्व विख्यात शरीर क्रिया-विद् क्लाड बर्नार्ड ने “नियमन” को ही चिकित्सा का एकमात्र उद्देश्य निरूपित किया है। उनका कहना है कि समस्त जीवन क्रियाएँ एक निषेचित सीमा में ही गतिशील रहती है। सामान्य अवस्था में तो देह की जीवन क्रियाएँ इस सीमा में ‘नियमित’ रहती ही है, विकारग्रस्त अवस्था में भी इसी ‘नियमित’ सीमा के भीतर ही जीवन क्रियाएँ कार्यशील रहती है अर्थात्! विकारग्रस्त अवस्था बहुत दिनों तक नहीं टिक सकती। विकारों की सफाई के बाद स्वतः ही सामान्य अवस्था आ जाएगी। यही “नियमन” की धारण है। इस प्रकार शरीर अपना नियमन स्वतः ही करते रहने में पूर्ण समर्थ है। वातावरण के दूषण और आहार-बिहार की अव्यवस्था-असन्तुलन को दूर करना तथा इनके कारण उत्पन्न शारीरिक असन्तुलन के स्वतः ही क्रमशः नियमित हो जाने तक प्रतीक्षा करना ही वास्तविक चिकित्सा हैं।
प्रख्यात शरीर क्रिया विज्ञानी वाल्टर कैनन ने “विजडम आफ द बाड़ी” नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य का स्पष्ट विवेचन किया है कि डाक्टर के मुख्य कर्त्तव्य दो है-(1) इस तथ्य को भली-भाँति स्मरण रखना कि रोगी की देह-क्रिया, जो इस समय अस्वाभाविक और विकृत रूप में कार्यशील है, नियमन-प्रणाली के अनुरूप स्वतः ही सामान्य हो जाएगी तथा इस बात की जानकारी रखना कि अनुमानतः कितने समय में रोगी की देह-क्रिया स्वाभाविक हो जाएगी। (2) रोगी में ‘आशा और उल्लास’ का संचार करना, ताकि अपेक्षित समय तक रोगी बेचैनी से मुक्त रहे अथवा बेचैनी अधिक बढ़े नहीं। इसके लिए ही आवश्यकतानुसार दवाएँ आदि दी जा सकती है।
डाक्टर वाल्टर कैनन के अनुसार जब ऐसा लगे कि रोग स्वाभाविक नियमन-प्रणाली के परे है, तो उपचार द्वारा उसे नियमन की सीमा में ले आना चाहिए। इसके आगे का काम रोगी का शहरी स्वतः ही कर लेगा। हाँ, विघातक वातावरण से मुक्ति आवश्यक है। क्योंकि मनुष्य का पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पर्यावरण-प्रदूषण, रेडियो-सक्रियता ओर घातक शोरगुल के दुष्परिणाम आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बने हुए है। दूषित, विकृत वातावरण में रहते हुए शरीर की अव्यवस्थित जीवन क्रियाओं को नियमित कर पाना अति दुष्कर हो जाता है।
आहार-बिहार के नियमन-सन्तुलन द्वारा स्थूल शरीर की शक्तियों को जागृत, गतिशील रखे रहा जा सकता है और उससे बहुविधि महत्कार्य सम्पादित कराए जा सकते है। योगवाशिष्ठ में इसीलिए इस देहनगरी को अतिरम्या और सर्वगुणन्विता कहा गया है। महर्षि वशिष्ठ भगवान राम से तत्व-दर्शन का उपदेश करते हुए कहते है-
“रम्येयं देहनगरी राम सर्व गुणान्विता। अज्ञस्येयमनन्तानाँ दुःखाना कोषमालिका। ज्ञस्यत्वियमनन्तानाँ सुखानाँ कोषमालिका।” -योगवाशिष्ठ 4/23/4 और 18
अर्थात् हे राम यह देह नगरी बड़ी सुरम्य और गुण-सम्पन्न है। यह ज्ञानियों के लिए सुख और अज्ञानियों के लिए दुःख देने वाली है।
शरीर की स्वाभाविक शक्तियों को विकसित करते रहने पर जहाँ इसकी विलक्षण सामर्थ्य प्रकट होती है, वहीं आहार-बिहार के असंयम-असन्तुलन से उसकी सामान्य क्रियाशीलता का भी ....स होता है।
शरीर की स्वाभाविक सामर्थ्य का वर्णन करते हुए विख्यात लेखक व चिकित्साविद् डाक्टर विलियम ली हावर्ड ने कहा है कि मानव-शरीर में एक भी ऐसा अंग-उपाँग नहीं है, जो स्वयं ही अपना हित किसी बड़े से बड़े डाक्टर या चिकित्सा-विशेषज्ञ से अधिक न कर सकता हो। दवाएँ और नशीली वस्तुएँ शरीर के अनुपम अवयवों बेतार के स्टेशनों को तोड़-फोड़ डालती है। इस तोड़-फोड़ के अधिक हो जाने पर उनकी मरम्मत असम्भव हो जाती है।
आस्टियोपैथी नामक चिकित्सा-विधि का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रसिद्ध अमरीकी डाक्टर एंड्रूज टेलर स्टिल ने किया। इस चिकित्सा पद्धति का पहला विद्यालय सन् 1894 में अमरीका के कर्कस-मिले मंसूर में खुला था। आज अमरीका में इसके बड़े-बड़े अस्पताल है।
आस्टियोपैथी के आधारभूत सिद्धान्त ही यह है कि शरीर में आत्मरक्षा की शक्ति पर्याप्त है। शारीरिक यन्त्र रचना अपने आप में परिपूर्ण है। इस यन्त्र रचना की अव्यवस्था ही शरीर में रोग पैदा करती है। शरीर के एक अंग की यन्त्ररचना में गड़बड़ी और कार्यक्षमता में क्षति आने से शरीर के नाड़ी-संस्थान में अव्यवस्था फैलती है और रक्त-संचालन की क्रिया प्रभावित होती है। आस्टियोपैथी में शारीरिक यन्त्ररचना की ही देखभाल की जाती है और उन्हें क्षति पहुँचाने वाली गलतियाँ सुधारी जाती है।
प्राकृतिक चिकित्सा का भी आधार यही सिद्धान्त है कि शरीर अपने आपमें एक अद्वितीय तथा सर्वांगपूर्ण यन्त्र है। रोगों का कारण जान में या अनजाने प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है। यह उल्लंघन विचार, श्वसन-क्रिया, भोजन, पेय, वस्त्र, सेक्स, श्रम किसी से भी सम्बन्धित हो सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त के अनुसार रोगमुक्ति शरीर के अन्दर से होने वाली एक क्रिया है। मानव-देह में ही वह शक्ति निहित है, जो शरीर के भीतर जमा कचड़े या विजातीय द्रव्य को शरीर से बाहर निकाल फेंकती हैं।
शरीर की समुचित देखभाल की जाए, तो सुदीर्घ स्वस्थ जीवन सहज ही जिया जा सकता है और प्रकृति द्वारा प्रदत्त असंख्य अनुदानों से न केवल स्वयं ही धन्यता की अनुभूमि की जा सकती है, अपितु औरों को भी उनसे लाभान्वित करने का पुण्य प्रयोजन पूरा होता रह सकता है।
अमेरिकन मेडिकल एसोसियेशन तथा जेरियाट्रिक्स सोसाइटी के भूतपूर्व अध्यक्ष डा. एडवर्ड बोर्ड के अनुसार मनुष्य इन सात भूलों से बचकर विश्वासपूर्वक शतायु हो सकता है-
(1) आहार सम्बन्धी मर्यादाओं का उल्लंघन। (2) अत्यधिक या अत्यल्प परिश्रम। (3) अस्त-व्यस्त दिन-चर्या। (4) नशेबाजी (5) कामवासना संबंधी असंयम। (6) अधिक मानसिक तनाव। (7) स्वच्छता-शुचिता की उपेक्षा।
जोन्स हापकिन्स विश्वविद्यालय के विद्वान डा. रेमण्ड पर्ल की शोधों का निष्कर्ष यह है कि आहार-बिहार संबंध त्रुटियों के परिणामस्वरूप शरीर की कोषाओं में धीरे-धीरे दुर्बलता आती है और टाक्सिन नामक विष वृद्धावस्था तक पहुँचते-पहुँचते शरीर में उत्पन्न होने लगता है। यह टाक्सिन कोषों को धीरे-धीरे विनष्ट करता है। यदि इस विष की रोकथाम की जा सके तो बुढ़ापे से छुटकारा मिल सकता है। इस विश्वविद्यालय के चिकित्सा-शौधार्थियों ने मेंढकों को चिरयुवा बनाए रखने का सफल परीक्षण भी किया है।
पिछले दिनों सोवियत रूस के सर्वाधिक आयु वाले व्यक्ति 162 वर्षीय श्री शेराली और उनकी 94 वर्षीया पत्नी के स्वास्थ्य, सक्रियता और शक्ति का रहस्य पूछे जाने पर उन्होंने सादे रहन-सहन और सरल निश्चिंत मनः स्थिति को ही इसका कारण बताया।
शरीर के इन रहस्यों से प्राचीन भारतीय मनीषी परिचित थे। इसीलिए यहाँ सदा आहार-बिहार के संयम पर बल दिया गया और सुव्यवस्थित आश्रम-व्यवस्था द्वारा सामाजिक जीवन में भी इन नियमों को भली-भाँति लागू किया जाता रहा। सात्विक आहार-बिहार से ही रक्त शुद्ध रहता है।
तामसिक भोजन से स्थूल शरीर में फैला यह स्वच्छ रक्त-सरोवर भी अशुद्ध हो, अनेक रोगों का केन्द्र बनता है। आहार के साथ ही विहार का दूषण भी रक्त को दूषित करता है। असन्तुलन, विक्षोभ, क्रोध, भय, शोक हताशा जैसी मनः स्थिति का प्रभाव धीरे-धीरे रक्त को विषाक्त बनाता चलता है और तब वह विजातीय द्रव्यों-रोगाणुओं के अनुकूल हो उठता है, यह मौका पाकर बीमारियाँ चढ़ाई करने से भला क्यों चूकेंगी? आवेशों-विक्षोभों से मात्र रक्त ही दूषित नहीं होता, अपितु इन अनभीष्ट मनोवेगों का प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव ‘स्नायु-कोषों और नाड़ी-तन्तुओं पर पड़ता है। वे दुर्बल, असक्त तथा शिथिल होते जाते है।
आहार-बिहार की सतर्कता मानसिक सन्तुलन और सज्जनता भरे आचार व्यवहार की रीति-नीति ऐसी है जो शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की गारंटी सिद्ध हो सकती है।
यजुर्वेद में एक मन्त्र आता है-
सहस्त्रषीर्षा पुरुषः सहस्त्रत्राक्षः सहस्त्रपात्। स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठिदृषाड्. गुलम्॥
ईश्वर अनन्त मस्तिष्कों, वाला, अनन्त आँखों और अनन्त पैरों वाला है। सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त होते हुए भी उससे ऊपर है। अर्थात् वह परमात्मा सृष्टि के भीतर और बाहर सभी जगह व्याप्त है।
जिस वस्तु को हम अनुभव नहीं कर सकते अथवा तर्क द्वारा सिद्ध नहीं कर सकते, वह अनन्त है। ईश्वर अनन्त है। काल, समय एवं क्षेत्र की परिधि में बँधी होने के कारण साँसारिक वस्तुओं की अपनी सीमायें है, उनका अन्त है। पहाड़ों की चोटियों पर दृष्टि दौड़ाने पर उनका अन्त स्पष्टतः दीखता है। न भी दिखायी दे तो भी यह अनुभव होता है कि उसका कभी न कभी निर्माण हुआ है और एक न एक दिन उसका अन्त होगा। इस बात की पुष्टि तर्क भी करता है। समुद्र की भी अपनी सीमाएँ है। अपार दिखायी पड़ते हुए भी वह पार रहित नहीं है।
अनन्तता का भाव मनुष्य के हृदय में जन्म के साथ ही मिला है, जिसको वह अनुभव तो करता है किन्तु उसको भली प्रकार जान सकना असम्भव हैं जो बात समझ में आ गई वह अनन्त नहीं रही।
परमात्मा की कृति यह सृष्टि इतनी विराट एवं अनन्त रहस्यों से युक्त है जिसका एक अंश भी अब तक जाना नहीं जा सका। जिन पदार्थों, रचनाओं को हम देखते हैं, उनका ही स्वरूप अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। सृष्टि की प्रत्येक घटना तथा वस्तु अपने अन्दर अनन्त नियमों को छिपाये है। विज्ञान द्वारा जितना ज्ञात होता है अविज्ञात का क्षेत्र उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि विज्ञान अब तक पदार्थ सत्ता का स्पष्ट स्वरूप तक निर्धारित नहीं कर सका है। कभी यह मान्यता थी कि पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है। नयी शोधों ने इस मान्यता को निरस्त कर दिया। प्रोट्रान, इलेक्ट्रान, न्यूट्रान, पॉजीट्रान जैसे सूक्ष्म कणों का अस्तित्व उभर कर सामने आया। कालान्तर में कणों की मान्यता को ऊर्जा का स्वरूप विज्ञान ने प्रदान किया। स्थिति अब यहाँ तक जा पहुँची है कि जड़-चेतन की मध्यवर्ती ‘क्वान्टा’-जो विचारशील शक्ति प्रवाह है की बात परमाणु के संदर्भ-विवेचन में स्वीकार की जाने लगी हैं कौन जाने आगे चलकर नये तथ्यों का रहस्योद्घाटन हो और यह मान्यता भी धराशायी हो जाय।
एक सामान्य परमाणु अपने अन्दर असंख्यों रहस्य छिपाये है। इस विराट् सृष्टि की कल्पना मात्र से बुद्धि हतप्रभ रह जाती हैं ग्रह नक्षत्रों से युक्त अनेकों सौर-मण्डल, आकाश गंगाएँ जिनका वर्णन शास्त्रों में आता है, के रहस्यों को जान सकना तो अभी बहुत दूर की बात है। उनकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। इनकी स्थिति एवं दूरी की सही जानकारी प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं हो सका है, उनके स्वरूप को समझ सकना बहुत आगे की बात है।
लगता है परमात्मा ही नहीं उसकी सृष्टि भी अचिन्त्य और अनन्त है। सृष्टि का स्वरूप यदि स्पष्ट हो जाय तो भी उसके प्रवाह की अनन्तता से इन्कार नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह कि सृष्टि के पहले भी सृष्टि थी और बाद में भी होगी। इससे पहले भी एक सृष्टि तथा इसके पश्चात् भी सृष्टि की कल्पना करते जाय तो यह क्रम कभी समाप्त नहीं होता। सृष्टि का प्रवाह काल इस प्रकार अनादि और अनन्त दोनों है। अनादि से चली आ रही सृष्टि अनन्त की ओर प्रवाहित हो रही है। जिस प्रकार रात के बाद दिन और फिर रात का क्रम चलता रहता है। जन्म, मरण, प्रलय सबका प्रवाह कभी अवरुद्ध नहीं होता। इसी कारण संसार को जीवन चक्र कहा गया है। जिस प्रकार चक्र के आदि और अन्त का पता लगाना मुश्किल है उसी प्रकार सृष्टि के अनन्त प्रवाह को काल की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है।
सीमा की दृष्टि से देखा जाये तो भी सृष्टि का अन्त नहीं है। सृष्टि रूपी श्रृंखला की कड़ियों का आदि अन्त नहीं दिखायी पड़ता, इस बात पर विचार किया जाये कि मनुष्य सृष्टि के कितने अंशों को जान सकता है तो उसकी अल्पज्ञता को देखते हुए निराशा ही हाथ लगती है। संसार के समस्त ज्ञान का योग किया जाय तो भी वह सृष्टि के विराट् अविज्ञात ज्ञान के समक्ष उतना ही है जितना कि पहाड़ के समक्ष कंकड़ों का एक छोटा ढेर।
विराट् सृष्टि के अनन्त रहस्यों को देखते हुए ‘सर ऑलिवर लाज’ ने अपनी पुस्तक ‘मनुष्य तथा सृष्टि’ में लिखा है। “अनन्त नियम, अनन्त स्थान और अनन्त काल का सृजन करने वाली कोई अनन्त सत्ता ही हो सकती है। इस सृष्टि का निर्माण किसी सीमित शक्ति सम्पन्न सत्ता द्वारा सम्भव नहीं हो।,’
प्रसिद्ध दार्शनिक ‘डब्लू. आर. ईज.’ अपनी पुस्तक फिलासफी एण्ड रिलीजन में लिखते है, “सृष्टि को बनाने एवं उसका नियमन करने वाली सत्ता अनन्त ही हो सकती है। सृष्टि पर ईश्वर की प्रतिच्छाया परिलक्षित होती है। सृष्टि सदा रहती है क्योंकि इसका रचयिता नित्य है। यह अनन्त है क्योंकि इसको बनाने वाला अनन्त है। सृष्टि नियमित है क्योंकि इसका बनाने वाला ‘एक रस’ है। सृष्टि की सुव्यवस्था को देखकर विचार शीलता का पता लगता है क्योंकि उसका कर्त्ता बुद्धिमान है।”
उपरोक्त कथन वेद की उस मान्यता की पुष्टि करते है। जिसमें अथर्ववेद का ऋषि कहता है-
“यों भूतं च भव्यं च सर्व यष्चाधितिष्ठति।’
“वह ईश्वर भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे है।”
ईश्वर की अनन्त सत्ता का यह तो स्थूल स्वरूप रहा जिसका एक अंश भी अब तक जान सकना मनुष्य के लिए सम्भव नहीं हो सका है। सृष्टि के स्थल स्वरूप की तुलना में अदृश्य चेतन जगत कही अधिक अद्भुत एवं रहस्यों से युक्त है। शास्त्रों में वर्णन है-
‘एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँष्च पुरुषः। पादोऽस्य विष्वाभूतानि त्रिपादस्यामृत दिवि॥’
“परमात्मा के वर्णित की अपेक्षा अवर्णित स्वरूप असंख्य गुना अधिक है। समस्त सृष्टि उसका एक स्वल्प भाग है। बड़ा भाग तो अमृत है।” अमृत का अभिप्राय यहां चेतना की उन परतों से है जो स्थूल सृष्टि से अलग सूक्ष्म जगत में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है तथा जीवन मरण से रहित है। वस्तुतः यह अमृतत्व ही अनन्तता है। उसे समझ सकना तो और भी कठिन है। मानव शरीर में कार्य कर रही चेतन परतों को ही अब तक न ही जाना जा सका है। उस परम चेतना को समझ पाना कठिन ही नहीं असम्भव ही है। ऋषियों ने इसी कारण उस परमात्मा को कहा था ‘नेति-नेति।
जीव अल्प है उसकी सामर्थ्य की अपनी सीमाएँ है। परमात्मा अनन्त है। उसकी शक्ति भी अपरिमित है। उसकी कल्पना मात्र से हृदय आन्दोलित एवं मस्तिष्क चकित हो जाता है। उसका सान्निध्य प्राप्त किया जा सके, अनन्तता से सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो जिस प्रकार पानी की बूँद गंगा में मिलकर गंगाजल बन जाती है, उसी प्रकार जीव को सामर्थ्य भी अनन्त हो सकती है। उस मिलन की स्थिति में कितना आनन्द एवं सन्तोष मिलता है इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अल्प जीव का अनन्त ब्रह्म के साथ सम्बन्ध जोड़ना ही आत्म-विकास है। क्रमिक विकास की श्रेणियों में होते हुए जीव उस अनन्तता का अनुभव करता है। उस अनन्तता की पूर्ण अनुभूमि को ही मुक्ति कहा गया है।
उस अनन्त सत्ता के साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय। उसके संपर्क सान्निध्य को लाभ उठाया जा सके तो मनुष्य वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जिसके लिए उसे जीवन का अनुपम आहार मिला है।
सोचा यह जाता है कि धन का जितना अधिक संग्रह होता जायेगा, परिणामस्वरूप उतनी ही अधिक सुख-शान्ति मिलेगी? यह तथ्य कहाँ तक यथार्थ है-कहा नहीं जा सकता है? वैसे तो जीवन व घर-परिवार को सुविधापूर्वक व सुखमय बनाने में ‘धन’ की महत्वपूर्ण भूमिका है। उसकी इस उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। साधनों की पूर्ति का माध्यम धन ही हुआ करता है, फिर भी इसका अत्यधिक संग्रह अपने साथ अनेकों समस्यायें, विपदायें लिए हुए रहता है। अतः धन के अधिक संग्रह पर नहीं प्रत्युत उसके सदुपयोग पर ध्यान देना चाहिए। धन का उपार्जन तो अधिकाधिक किया भी जा सकता है, परन्तु उसका अच्छे से अच्छा उपयोग ही उसकी सार्थकता होगी। इस विषय में शास्त्रों में पर्याप्त वर्णन आते है-
ऐर्ष्वयमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः। ऐर्ष्वयमदमत्तो हि नाषयित्वा विबुध्यते॥ -महाभारत
यों तो (मादक वस्तुओं के) पीने का नशा आदि भी नशा ही है, किन्तु ऐश्वर्य का नशा तो बहुत ही बुरा है, क्योंकि इसके मद से मतवाला पुरुष भ्रष्ट हुए बिना होश में नहीं आता।’ इसका मारण है कि व्यक्ति उस समय विमोहित (अज्ञानयुक्त) हो जाता है, फलतः उसे उस सुख को भी प्राप्ति नहीं हो पाती जिसे लिए अनेक कष्ट सहनकर उसने धन का उपार्जन किया है-
विमोहयन्ति संपत्सु ताप्रयन्ति विपत्तिषु। खेदयन्त्यर्जन काले कदा ह्यर्थाः सुखावहाः॥ -भविष्य-पुराण
‘जब संपत्ति की खूब वृद्धि होती है, तब उस दशा में सम्पत्तियाँ प्राणी को विमोहित कर देती है। विपत्ति की दशा में ये दुःखी किया करती है तथा अर्जन करने के समय में खेद (दुःख) पहुँचाती है। संग्रही व्यक्ति कब सुख पाते है, अर्थात् उन्हें किसी भी समय सुख की प्राप्ति नहीं होती है।
मनुस्मृतिकार ने ‘दूसरों’ को बिना कष्ट पहुँचाये अपनी आवश्यकतानुसार ही धनोपार्जन करने को कहा है-
अद्रोहेणैव भूतानामल्प द्रोहेण वा पुनः। यावृतिस्ताँ समास्थाय विप्रोजीवेदनायदि॥
यात्रामात्रपसिद्धर्य्थ स्वैर्कर्म भिरगहिर्तः। अवलेषन शरीरस्य कुर्वीत धन मंचयः॥
जिस वृत्ति में जीवों को बिल्कुल ही पीड़ा न हो अथवा थोड़ी ही पीड़ा हो, उस वृति से व्यक्ति को अपनी जीविका चलानी चाहिए। शरीर को बिना अधिक कष्ट दिये हुए, अनिन्दित कर्मों से केवल निर्वाह मात्र के लिए अर्थ (धन) का संग्रह करना चाहिए।
श्रेष्ठ कार्यों में विघ्न-बाधा उपस्थित करने वाले धन को छोड़ देना ही औचित्यपूर्ण होता है-
सर्वान् परित्येजद्रर्थात् स्वाघ्यायस्य विरोधिनः। -मनु.
उन समस्त अर्थों को छोड़ दे, जो स्वाध्यायादि श्रेष्ठ कार्यों में विघ्न डालता है।
निष्ठुर-व्यक्ति ही धन का संचय कर सकता है, उदारचेता तो अपना सर्वस्व लोक कल्याण हेतु समर्पित कर देता है।
‘ये वित्तमभिपद्यन्ते सम्यकत्वं तेषु दुर्लभम्। दुह्यनः प्रैतितत् प्राहुः प्रतिकूलं यथातथम्॥ -महाभारत-शान्तिपर्व
जो धन के पीछे पागल है, न तो उनमें विवेक रहता है और न सज्जनता। जिस-तिस को पीड़ा पहुँचाने की निष्ठुरता के बिना कौन धनी बनता है?
धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्ट चेतनः। तिर्यगीक्षेः शुष्कमुखः पाप को भृकुटीमुखः॥ -महाभारत
जो धनवान् हैं, वह क्रोध और लोभ के आवेश में आकर अपनी विचार-शक्ति को खो बैठता है, टेढ़ी आँखों से देखता है, मुख सूखा रहता हैं, भौहें टेढ़ी रहती है और वह पाप से युक्त रहता है।’ व्यक्ति चाहे तो वह अपना कार्य थोड़ी सी धन-सम्पत्ति से चला सकता है-
तरुण सर्षपषाकं नवोदनं पिच्छलानि च दधीनि। अल्पव्ययेन सुन्दरी ग्राम्यजनोमिष्ट मष्नाति॥
सरसों, वास्तुक, पालक आदि के शाक इच्छानुसार पैदा किये जा सकते है। थोड़े ही खेत तथा थोड़ी ही सम्पत्ति में अपने कुटुम्ब के उपयोग की सब वस्तुएँ तैयार कर ली जा सकती है।
‘ऊर्ध्व बाहुविषेष्येण नहिकष्चित् श्रृणोतिमाम्। धर्मादर्थष्च काम च सः धर्मः कि न सेव्यते॥
‘मैं हाथ उठाकर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा हूँ कि अर्थ और काम को धर्मपूर्वक ही ग्रहण करने में कल्याण है, पर इसे कोई नहीं सुनता है?
इस प्रकार हम देखते है कि धन के अनावश्यक संग्रह की वृत्ति, मनुष्य को कितनी निकृष्टता की स्थिति तक पहुँचा देती है। हमें इस स्थिति से ऊपर उठकर धन के सदुपयोग पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आवश्यकतानुसार जीवन-निर्वाह व आश्रितों के पोषण के साथ-साथ उसका एक अंश लोक-कल्याण के लिए लगाते रहना ही सर्वाधिक अच्छा उपयोग कहा जा सकता है। धन को ‘साध’ नहीं ‘साधन’ मानना चाहिए। साधन के रूप में इसका केवल सहयोग लेना ही श्रेयस्कर होगा न कि ‘साध्य’ के रूप में जिस-किसी भी प्रकार से उसका अनावश्यक संग्रह।
परमात्मा का अनुग्रह वरदान जिन लोगों पर बरसता है उनका ऐहिक और आत्मिक जीवन कृतकृत्य हो उठता है। प्रत्येक पिता अपने पुत्र को सम्पूर्ण हृदय से प्यार करता है और उसकी सुख-सुविधा के लिए हर सम्भव प्रयास करता है। सीमित और संकीर्ण होने के कारण उस स्नेह को मोह की संज्ञा भी दी जाती है। लाड़-प्यार भी कहा जा सकता है। इस तरह की मोह-ममता में सन्तान का अहित होने की सम्भावना भी रहती है। परन्तु परमात्मा अपने पुत्रों को शुद्ध स्नेह, प्रगाढ़ प्रेम करता है। जिसमें सभी का हित सधता है।
ईश्वर को चूँकि अपने सभी पुत्र समान रूप से प्रिय है। न कोई विशेष प्रिय है और न ही उसका किसी पर कम स्नेह है। जहाँ सबके प्रति समदृष्टि हो वहाँ कुछ नियम मर्यादायें भी बनानी पड़ती है। परमात्मा का अनुग्रह सबके लिए उपलब्ध है परन्तु उसके साथ कुछ शर्तें भी जुड़ी हुई है। हर जरूरतमंद को हथियार मिल सकते है, परन्तु यदि उनका दुरुपयोग होता हो तो प्रशासन उन्हें जब्त भी कर लेता है।
परमात्मा का अनुग्रह उसके अनुदान, वरदान नितान्त सम्भव सहज उपलब्ध है, किन्तु यह सब किसी को बिना शर्त नहीं मिल सकते। बैंक की पूँजी से अनेकों उद्योग चलते है। अनेकों को ऋण मिलते है, पर वह उधारी प्राप्त करने के लिए बैंक का अंकुश भी स्वीकार करना होता है। प्राप्त धन उन्हीं कार्यों में लगाया जा सकता है जिस लिए बैंक ने सहमति दी है। उस ऋण को मनमर्जी के हर काम में खर्च नहीं किया जा सकता। दूसरी शर्त यह रहती है कि ऋण का मूलधन ही नहीं उसका ब्याज भी लौटाने की तैयारी रखी जाय। इन शर्तों को तोड़ने पर बैंक के सहयोग का सिलसिला बन्द हो जाता है और मिली हुई पूँजी वापिस करने को विवश होना पड़ता है, भले ही उस दबाव से कारोबार ही क्यों न बन्द हो जाय। बैंक का ऋण लूट का माल नहीं है जिसे अपनी मर्जी से चाहे जिस प्रकार खर्च किया जाय और वापिस करने के नाम पर अँगूठा दिखने का इरादा रखा जाय।
शर्त है-सम्पूर्ण आत्म-समर्पण अर्थात् अपनी खुदी को मिटा देना।
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तवा चाहे कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है।
आत्म समर्पण में जितनी गहराई होती है उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुग्रह बरसता है। आदान-प्रदान का सिद्धांत सर्वत्र काम करता है। भक्त और भगवान के बीच भी घनिष्ठता स्थापित होने में भी यही सिद्धान्त काम करता है। इस आधार पर भक्त जन ईश्वर की समीपता पाते और अनुकम्पा खरीदते है। इस तथ्य को यदि पूरी तरह हृदयंगम किया जा सके तो परिजनों में से प्रत्येक के जीवन में काया-कल्प प्रस्तुत हो सकता है और एक ऐसे सहयोगी की सच्ची घनिष्ठता प्राप्त कर सकने का अवसर मिल सकता है जो सर्व समर्थ है और जिसका अनुग्रह इतना बहुमूल्य है जितना समस्त संसार का समन्वित वैभव। इस क्षेत्र की सफलता को जीवन लक्ष्य की प्राप्ति कहते है। इसे प्राप्त करने वाले स्वर्ग में रहते-मुक्ति फल पाते और इसी कार्यों में रहते हुए देवताओं जैसा आंतरिक सन्तोष और ब्रह्म सम्मान सहयोग प्राप्त करते हुए सत्-चित् आनंद की स्थिति प्राप्त करते है। इसके लिए किये गये प्रयासों को परम पुरुषार्थ कहा गया है। ईश्वर के सान्निध्य से परिष्कृत व्यक्तित्व के कण-कण से सिद्धियों का वैभव झरता रहता है।
उपासना गहरी, जीवन्त, सरस, और सफल हो सके इसकी एक ही शर्त है कि उसे प्राणवान् बनाया जाय। उसके साथ सघन संपर्क मिलाने पर ही आशाजनक अनुदानों की अपेक्षा की जा सकती है। यह सघन संपर्क कैसे हो इसका ‘तत्व-दर्शन’ पूजा उपासना के क्रिया-कृत्यों से-भजन-पूजन के निर्धारित कर्मकाण्डों से सीखा जा सकता है। अर्चा आराधना के विधि-विधान, हमें उन तथ्यों से परिचित कराते है, जिनके सहारे ईश्वर तक पहुँचना-उसके साथ घनिष्ठता स्थापित करना और अनुग्रह का लाभ ले सकना सम्भव होता है। धन का स्पर्श करके दूध दुहा जाता है, यह बात सही है, पर इसमें इतना और जोड़ना चाहिए कि स्पर्श मात्र से ही, दूध की धार नहीं छूटती। थनों को हाथों से सुहलाने की एक ऐसी विशेष क्रिया भी, करनी होती है जो बछड़े द्वारा मुँह से थन चूसने के समतुल्य हो। ईश्वर भक्ति की सफलता इस बात पर निर्भर है कि भक्त ने भगवान से कितनी वास्तविक सघनता स्थापित की। बछड़े जैसा स्तर अपना बनाया जाय ताकि माता हमें अपना बालक मानने लगे और भावभरा पयपान कराने के लिए-आतुर रह सके। पाने के लिए, देने के लिए नहीं, जब अपने मन में उमंग उठने लगे तो समझना चाहिए कि जीवन व्यवसाय में ईश्वर की साझेदारी की पृष्ठभूमि बन गई। यह आधार खड़ा करने के लिए इन्हीं दिनों हमें अपने को-अपने दृष्टिकोण को उलटने का प्रबल प्रयास करना चाहिए। इस परिवर्तन के लिए ही साधना, उपासना का विशालकाय कलेवर खड़ा है। हम इस तथ्य को समझें। अपने को ईश्वर का बनावें ताकि यह हमारा बन सके। प्रगति का-सुख-शांति का-सच्चा मार्ग यही है।
ईश्वर के सान्निध्य से किसने क्या पाया ऐसे अगणित उदाहरण प्राचीन और अर्वाचीन प्रचुर परिमाण में उपलब्ध है। हनुमान, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानरों की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति तुच्छ थी। उनने भक्ति का मार्ग अपनाया और भगवान का अनुग्रह खरीदा। इस उपार्जन से चमत्कारी कार्य कर सके और हर दृष्टि से धन्य बन सके। कृष्ण के भक्तों में अर्जुन और सुदामा के नामों की गणना अग्रणी है। वे आत्मिक और साँसारिक क्षेत्रों में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सके। मनुष्य होते हुए भी ईश्वर का व्यक्तित्व विकसित करने वाले अनेकों महामानव अपनी कृतियों के कारण धरती के देवता कहलाते रहे हैं। बुद्ध, महावीर, मूसा, ईसा, जरथुश्त्र, मुहम्मद जैसे देवात्माओं का एक मात्र बल दैवी अनुग्रह ही था। सन्तों में भागीरथ, हरिश्चंद्र, ध्रुव, प्रहलाद, शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, नानक, कबीर, रामदास, रामकृष्ण, रामतीर्थ, विवेकानन्द, चैतन्य दयानन्द, गाँधी आदि की गणना की जा सकती है। वे स्वयं पार उतरे और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठा कर पार करने में समर्थ हुए। न उन्हें सन्तोष की कमी रही-न सम्मान की- न सहयोग की-न साधनों की। ईश्वर भक्ति के सत्परिणाम असीम है। उसके लिए प्रयत्न करना सर्वोपरि बुद्धिमता का चिन्ह है। इस स्तर के प्रयासों को ही परम पुरुषार्थ नाम दिया है जो अक्षरशः सही है।
“पूजा करना-मंशा पूरी कराना” यह बात प्रलोभन भर है। तथ्यपूर्ण नहीं। ईश्वर को हमें अपनी मर्जी पर चलाने में तभी सफलता मिल सकती है जब हम पहले उसकी मर्जी पर चलना सीखें। प्रलोभन और प्रशंसा की कीमत पर भगवान जैसी दिव्य चेतना को फुसलाकर अपना उल्लू सीधा करने में न आज तक किसी को सफलता मिलती है और न भविष्य में किसी को मिलेगी। यदि इतनी छोटी प्रक्रिया में ईश्वरीय अनुग्रह, प्राप्त करना सम्भव रहा होता तो मन्दिरों के पुजारी, तन्त्र-मन्त्र में उलझने-उलझाने वाले देव व्यवसायी अब तक करोड़पति बन गये होते उनमें दरिद्र और विपन्न एक भी दिखाई न पड़ता।
ईश्वर प्राप्ति के लिए ऐसा दृष्टिकोण एवं क्रियाकलाप अपनाना पड़ता है जिसे प्रभु समर्पित जीवन कहा जा सके। जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आत्मिक प्रगति का मार्ग अपनाना पड़ता है और वह यह है कि हम प्रभु से प्रेरणा की याचना करें और उसके संकेतों पर चलने का साहस करें। उपासना का मर्म और उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने लक्ष्य को-इष्ट को समझे और उसे प्राप्त करने के लिए प्रबल प्रयास करे। उपासना कोई क्रिया-कृत्य नहीं है। उसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए। आत्म-परिष्कार और आत्म-विकास का तत्व-दर्शन ही अध्यात्म है। उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित और अनुभव प्रतिपादित पद्धति है। इतना समझने पर प्रकाश की ओर चल सकना बन पड़ता है। जो ऐसा साहस जुटाते है, उन्हें निश्चित रूप से ईश्वर मिलता है। अपने को ईश्वर के हाथ बेच देने वाला व्यक्ति ही ईश्वर को खरीद सकने में समर्थ होता है। ईश्वर के संकेतों पर चलने वाले में ही इतनी सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि ईश्वर को अपने संकेतों पर चला सके। लालच की पूर्ति के लिए ईश्वर को फुसलाने वाली विडंबनायें लोग रचते तो है, पर उनमें किसी का भी सफल होना असम्भव है। ज्ञान का देवता-अज्ञानियों की लिप्सा पूरी करने के लिए निमित्त बनना स्वीकार कर लेगा ऐसा आशा करना दुराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
यहाँ वास्तविक और अवास्तविक घनिष्ठता का अन्तर भी अच्छी तरह समझ लिया जाना चाहिए। वास्तविक घनिष्ठता को आत्मीयता भरी मैत्री कहते है। मित्रता प्रेम के आधार पर जुड़ती, दृढ़ होती और बढ़ती है। प्रेम का ही दूसरा नाम भक्ति है। “रसो वैस” उक्ति में प्रेम को ही परमेश्वर माना गया है। प्रेम किसी भावुकता का नाम नहीं है। उसके लिए आँसू टपकाने या ऐसी ही कुछ अन्य भाव क्षेत्र की उछल-कूद करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। प्रेम एक स्थित सिद्धान्त है जिसे दूसरे शब्दों में सघन आत्मीयता कहते है। इस स्तर का उदय होते ही प्रेमी की हित कामना प्रधान हो जाती है। उससे लेने का नहीं देने का ही जी करता है। यह देना जितना अधिक उच्च स्तर का-जितना सर्वांग-पूर्ण होता है उतना ही मैत्री का आनन्द आता है। उसी अनुपात से मित्रता सुदृढ़ बनती और फलप्रद होती है। पारस्परिक सहयोग मित्रता का मूल प्रयोजन है। इसमें जो अग्रणी होता है उसे प्रेमी कहते है। भक्त की मनः- स्थिति भी यही है कि वह भगवान से प्रेम करता है। प्रेमी होने के नाते उससे कुछ माँगता नहीं वरन् अपने पास जो कुछ है उसे देने के लिए व्याकुल रहता है। अवसर ढूंढ़ता है कि किस समय, किस प्रकार उसे क्या दिया जा सकता है। इन प्रयत्नों को करते-करते एक दिन ऐसी स्थिति आ जाती है कि अपनी चेतना और सम्पदा का समग्र प्रभु चरणों पर हो जाता है। अपनी महत्वाकाँक्षायें समाप्त हो जाती है उनके स्थान पर ईश्वर की आकाँक्षा का वर्चस्व छाया रहता है। जीवन की दिशाधारा अपनी इच्छानुकूल नहीं वहर्त वरन् उधर चलती है जिधर परमेश्वर की प्रेरणा होती है। चेतना के उपरान्त मानवी अस्तित्व का दूसरा पक्ष है-सम्पदा। इसमें शरीर, कौशल और धन तीनों का समन्वय रहता है। इनका उपयोग लिप्साओं की पूर्ति के लिए नहीं वरन् उन प्रयोजनों के लिए लगने लगता है जिनके लिए सृष्टा ने इस बहुमूल्य अमानत को जीवात्मा का स्तर परखने के लिए सौंपा है।
पुजारियों और भक्तों के अन्तर को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए। पुजारी के क्रिया-कलाप पूजा-परक कर्म-काण्डों तक सीमित रहते है। इतने भर से देवता प्रसन्न हो जाते है और मनोकामना पूरी करने वाले वरदान बरसाने लगते है-यही पुजारी मनोवृत्ति आज सर्वत्र छाई हुई है। जबकि पूजा-अर्चा उपचार कलेवर है और आस्था उसका प्राण है। प्राण और कलेवर का सम्मिश्रण ही पूर्णता उत्पन्न करता है। पुजारी की गतिविधियों कर्मकाण्डों तक सीमित रहती है जबकि सच्चा भक्त उपासना के क्रिया-कृत्यों से प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करके अपनी चेतना को दिशा और सम्पदा को धारा देने का प्रयत्न करता है। भगवान और भक्त की अन्तः स्थिति और गतिविधियों में जितनी समस्वरता जितनी एकता दिखाई पड़े उसी आधार पर यह जाना जा सकता है कि भक्ति कितनी प्राणवान् है। प्राणवान् भक्ति के सत्परिणाम सुनिश्चित है।
ईश्वर की सजीव साझेदारी में उस ओर से पर्याप्त साधन जुटा दिये गये अब अपनी बारी है कि अपना पक्ष भी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करें। मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य इस विश्व उद्यान को सुविकसित और सुसंस्कृत बनाने में ईश्वर का हाथ बँटाना है। इस धरोहर को इसी प्रयोजन के लिए दिया गया है। सेवा धर्म अपना कर हम अपने को परिष्कृत समाज को उपकृत और ईश्वर को प्रसन्न करने का तिहरा लाभ उठाते है। इसकी उपेक्षा करके उपासना कृत्य का स्वरूप फुसलाने के लिए रची गई विडम्बना बनकर रह जाता है। भक्त प्रेमी होता है। प्रेम का परिचय-उदार सहयोग के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। हमें ईश्वर से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं है। पात्रता बढ़ने के साथ-साथ पिता सहज ही अपने साधन और अधिकार स्वयं ही हस्तांतरित करता जाता है। जितना गहरा गड्ढा होगा वर्षा का जल उसमें उतना भी भरता चला जायेगा। उथले पात्र में मेघ माला द्वारा बरसाये गये अजस्र अनुदान में से भी मात्र उतना ही मिल पाता है जितनी कि उस बर्तन की परिधि होती है। हमें अपनी पात्रता और परिधि बढ़ानी चाहिए और उसके लिए ईश्वरीय प्रयोजनों के निमित्त और अनुदानों की मात्रा बढ़ानी चाहिए।
इसके लिए अब तक जीवन क्रम का जैसा कुछ प्रवाह चल रहा है उसे जबर्दस्ती संकल्पपूर्वक और दृढ़ निश्चय के साथ मोड़ना पड़ेगा, जीवन साधना के पथ पर बढ़ने की हिम्मत जग पड़े तो फिर दूसरा चरण जीवन को सुव्यवस्थित बनाने का होना चाहिये उसके लिये सतर्क सिपाही की तरह प्रतिदिन मन को भक्त बनाने का, संकल्प शील बनाने का अभ्यास प्रारम्भ करना पड़ेगा।
प्रातः उठते ही सोचा जाय, ईश्वर के प्रतिनिधि की तरह आज का दिन-एक जीवन-सत्प्रयोजनों की पूर्ति के लिए घर और बाहर के क्षेत्र में व्यतीत करना है। दिन भर अपने चिन्तन और कर्तृत्व पर कड़ी दृष्टि रखी जाय और परखते रहा जाय कि उनमें निकृष्टता का समावेश तो नहीं हो रहा है। सजगता रहने से अनैतिक तत्वों का आक्रमण प्रायः नहीं हो पाता। रात्रि को सोते समय मरण की गहरी अनुभूमि की जाय। सृष्टा के घर जाने और सौंपे गये उत्तरदायित्वों को लेखा-जोखा देने की बात स्मरण रखी जाय तो रात की शयन बेला और प्रातःकाल की संध्या एक अच्छे धर्मोपदेशक जैसी प्रेरणाएँ देती रह सकती है। ईश्वर की साझेदारी इन्हीं आधारों के अपनाने में सम्भव हो सकती है जब वह जीवन साधना के रूप में परिणित हो। कल्पना जल्पना के मन मोदक खाते रहने से न तो साँसारिक सफलताएँ मिलती है और न आध्यात्मिक प्रगति सम्भव होती है।
ईश्वर की सामर्थ्य अनन्त है उसकी अनुकम्पा से मिल सकने वाली सम्पदायें भी असीम है। ऐसी समर्थ शक्ति के साथ यदि किसी के लिए घनिष्ठता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके तो समझना चाहिए कि उसने पारस को छूकर लोहे के सोने में परिणित हो जाने जैसी स्थिति प्राप्त कर ली।
जीवन का जो स्वरूप वर्तमान में दिखायी पड़ रहा है, वह इतने ही तक सीमित नहीं है वरन् उसका सम्बन्ध अनन्त भूतकाल तथा अनन्त भविष्य के साथ जुड़ा हुआ है। वर्तमान जीवन तो उस अनन्त श्रृंखला की एक कड़ी मात्र है। भारतीय दर्शन पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। कर्मफल की व्याख्या पुनर्जन्म के सिद्धान्त द्वारा ही की जाती है।
पुनर्जन्म के विरुद्ध कुछ लोग तर्क यह देते है कि यदि जीवन का अस्तित्व भूतकाल में था तो उस समय की स्मृति क्यों नहीं रहती? ध्यान देने योग्य यह है कि घटनाओं की विस्मृति मात्र से पुनर्जन्म का खण्डन नहीं हो जाता। इस जीवन की प्रत्येक दिन की घटनाओं को ही हम कहाँ याद रख पाते है। अधिकांश घटनाएँ विस्मृत हो जाती है। स्मृति का न होना मात्र, घटना को अप्रमाणित नहीं कर देता। स्मृति तो अपने जनम की भी नहीं रहती। इस आधार पर यदि कहा जाय कि जन्म की घटना असत्य है क्योंकि उसकी हमें स्मृति नहीं है तो इसे अविवेकपूर्ण ही कहा जायेगा।
किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में जन्मजात ऐसी विशेषताएं दिखायी पड़ती हैं जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। बड़े-बड़े विचारक भी उन विशेषताओं का कारण स्पष्ट नहीं कर पाते। पुनर्जन्म के सिद्धान्त की मानने से यह गुत्थी सहज ही सुलझ जाती हैं। यह मानना पड़ता है कि उसका कारण पूर्व जन्मों के संचित कर्म है।
विकासवाद के समर्थकों ने मानवी गुण एवं प्रवृत्तियों का आधार पैतृक माना है तथा कहा है कि बच्चा अपने माता-पिता से विशेष प्रकार के गुण प्राप्त करता है। यह बात एक सीमा तक ही सत्य है। देखा यह जाता है कि अनेकों बच्चों में जन्मजात ऐसी विशेषताएं होती है जो उनके माता-पिता में नहीं थी। इन विशेषताओं के कारण की खोज में वैज्ञानिक पिता-पितामह से लेकर अनेक पीढ़ियों तक जाने का प्रयत्न करते है। उनके अनुसार इन पीढ़ियों में से कोई एक ऐसी होनी चाहिए जिसमें वे विशेषताएं विद्यमान थीं। किन्तु इस प्रकार की व्याख्या से निराशा ही हाथ लगती है। वस्तुतः बच्चे के ये गुण मौलिक होते हैं जो वह संस्कारों के रूप में साथ लाता है। कुछ व्यक्ति गायक, संगीतज्ञ, कलाकार, साहसी, कवि, साहित्यकार होते है। पैतृक गुणों के आधार पर व्याख्या की जाय तो असफलता ही हाथ लगती हैं यह पता चलता है कि उसके पैतृक पीढ़ियों में कोई भी इन गुणों से युक्त नहीं था। तथ्य यह है कि प्रत्येक जीव अपनी मौलिक क्षमता लेकर आता है। उन क्षमताओं को वह माता-पिता के माध्यम से विकसित करता है।
यदि पैतृक गुण ही मानवी गुण के आधार होते तो एक परिस्थितियों में पैदा होने वाले समान सुविधाओं को प्राप्त करते हुए भी इतने भिन्न क्यों दिखायी पड़ते, एक ही पिता के पुत्र असमान पाये जाते हैं। यह असमानता उनकी मौलिक क्षमताओं की भिन्नता के कारण है। एक उन्हीं परिस्थितियों में विद्वान, योग्य, प्रतिभा सम्पन्न बन जाता है, जबकि दूसरा दयनीय अवस्था में पड़ा रहता है। यह पूर्व जन्मों की संग्रहित सूक्ष्म क्षमता एवं संस्कारों की ही विशेषता है जो एके को महान तथा दूसरे को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देती है। विकास की यह परस्पर भिन्नता उस बात की प्रमाण है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ कुछ पूर्वजन्मों की मौलिक विशेषताएं बीच रूप में लेकर अवतरित होता है।
विकासवाद की व्याख्या करते समय डार्विन जैसे वैज्ञानिक ने मानवी विशेषताओं की विवेचना पैतृक गुणों के आधार पर करने का प्रयत्न किया। जीवात्मा माता-पिता के शरीर में प्रविष्ट होकर कुछ गुणों को अपनी मूल विशेषताओं के अनुरूप प्राप्त करता है। इस सीमा तक तो बात सही है, किन्तु सम्पूर्ण विशेषताओं का आधार पैतृक मानना सही नहीं है। पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार किये बिना इन गुत्थियों को सुलझा सकना संभव नहीं है।
पाश्चात्य दार्शनिक भी पुनर्जन्म में विश्वास करते है। ‘प्लेटौ’ ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि “जीवात्माओं की संख्या निश्चित है। जन्म के समय जीवात्मा का सृजन नहीं होता, वरन् एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रत्यावर्तन होता है। ‘लिवनीज’ ने अपनी पुस्तक दी आयडियल फिलासफी आफ लिग्टोज” में लिखा है कि “मेरा विश्वास है कि मनुष्य इस जीवन के पहले भी रहा है।”
प्रसिद्ध विचारक ‘लेस्सिग’ की पुस्तक “दी डिवाइन एजुकेशन आफ दि. ह्यूमन रेस” प्रख्यात है। वे अपनी इस पुस्तक में लिखते है-”विकास का उच्चतम लक्ष्य एक जीवन में ही पूरा नहीं हो जाता वरन् कई जन्मों के क्रम में पूर्ण होता है। मनुष्य ने कई बार इस पृथ्वी पर जन्म लिया है तथा अनेकों बार लेगा।”
दार्शनिक ‘ह्यूम’ का कहना है कि “आत्मा अजर अमर है। जो अक्षय, अजर या अविनाशी है वह अजन्मा भी है। आत्मा की अमरता के विषय में पुनर्जन्म ही एक सिद्धान्त है जिसका समर्थन प्रायः सभी दर्शन शास्त्री करते है।” ‘गेटे’ ने अपनी एक मित्र श्रीमती ‘वी.स्टेन’ की एक पत्र में लिखा था कि “इस संसार से चले जाने की मुझे प्रबल इच्छा है। प्राचीन समय की भावनाएँ मुझे यहाँ एक घड़ी सुखमय बिताने नहीं देती। यह कितनी अच्छी बात है कि मनुष्य मर जाता है और जीवन में अंकित घटनाओं के चिह्न मिट जाते है। वह पुनः परिष्कृत संस्कारों के साथ वापस आता है।”
पत्र लिखने का लक्ष्य चाहे जो भी रहा हो किन्तु ‘गेटे’ के उपरोक्त कथन में पुनर्जन्म में विश्वास होने का दृढ़ प्रमाण मिलता है। तत्व ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ ‘गीता’ भी पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा-देव! योगभ्रष्ट व्यक्ति की स्थिति क्या होती है? भगवान कृष्ण कहते है-
शुचीनाँ श्रीमताँ गेहे योगभ्रष्टो इभिजायते। अथवा योगिनामेव कुले भवति धीथताम॥
वह योगभ्रष्ट साधक पवित्र और साधन सम्पन्न मनुष्य के घर जन्म लेगा अथवा बुद्धिमान योगी के घर पैदा होगा।
पिछले जन्म की विशेषताओं एवं संस्कारों की प्राप्ति दूसरे जन्म में होती है। जन्म के साथ दिखायी पड़ने वाली आकस्मिक विशेषताओं का कारण पूर्वजन्म के कर्म होते है। उसका प्रमाण गीता के अगले श्लोक में मिलता है-
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनम्दन॥
वह अपने पूर्व जन्म के संस्कार को प्राप्त करके पुनः मोक्ष सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है।
दुष्कर्मों के फलस्वरूप जन्म निम्न योनियों में होता है। भगवान कृष्ण कहते हैं-
तानहं द्विषतः क्रूरान संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यज स्त्रभषुभानासुरीव्वेव योनिषु॥
निकृष्ट कर्म करने वाले क्रूर, दीन नराधमों को मैं आसुरी योनियों में फेंक देता हूँ।
पुनर्जन्म एक सुनिश्चित सिद्धान्त है जिसको अधिकांश विचारशील स्वीकार करते है। कुछ लोग जीवन की इति श्री भौतिक शरीर की मृत्यु के साथ समझ लेते है। उनकी मान्यता है कि जब जीवन वर्तमान तक ही सीमित है तो उसका उपभोग जैसे भी बन पड़े करना चाहिए। नीति-अनीति में भेद किये बिना ऋण कृत्वा घृतं पिवेत” का चारवाकी-सिद्धान्त अपनाना चाहिए। निस्सन्देह वे भयंकर भूल करते है। सामाजिक दण्ड के भागी तो बनते ही हैं, अपना अगला जीवन भी अन्धकारमय बनाते है। अच्छे का फल अच्छा, बुरे का बुरा मिलना निश्चिंत है। फल ही नहीं कर्मों के संस्कार भी सूक्ष्म रूप से अगले जीवन में साथ जाते तथा नये जीवन की पृष्ठभूमि तैयार करते है। विशिष्ट प्रतिभा, योग्यता, जन्मजात इसी कारण दिखायी पड़ती है। इस तथ्य को जानते हुए अपने गुण-कर्म-स्वभाव में सतत परिष्कार करते रहना चाहिए? जीवन की अगली कड़ी की पृष्ठभूमि अभी से तैयार की जानी चाहिए।
न्यूयार्क (अमेरिका) की ए बालिका डेजी ड्राइडन की मृत्यु इस वर्ष की अल्पायु में ही हो गयी, उसकी मृत्यु का कारण पेट की खराबी और टाइफाइड की बीमारी थी। जीवन के अन्तिम दिनों में, जब वह बहुत कमजोर तो थी, लेकिन उसे कोई शारीरिक कमजोरी नहीं थी वह अपने चारों ओर के भौतिक जगत के अतिरिक्त एक अन्य अलौकिक जगत की बातें भी करने लगी।
पश्चिमी दुनिया के लिए इस तरह की घटनाएँ भले ही आश्चर्यजनक हों, परन्तु भारतीय समाज में इस तरह की घटनाएँ आम देखने को मिलती हैं। गाँव, कस्बों में रोग शैया पर मरणासन्न स्थिति में पड़े व्यक्ति प्रायः देवदूत, यमदूत या किन्हीं डरावनी अथवा सौम्य आकृतियाँ दिखाई देने की बातें करने लगते है। सम्भवतः यह प्रायः व्यक्ति के मन में, पारलौकिक जगत के प्रति बनी हुई पूर्व धारणाओं और धार्मिक संस्कारों के फलस्वरूप होता हो। परन्तु डेजी ड्राइडन की घटना इस तरह की सभी घटनाओं से भिन्न थी।
बीमारी की शुरुआत के समय ही जब किसी को डेजी के मरने की आशंका नहीं थी तभी वह जान गयी थी कि अब और अधिक दिन जीवित नहीं रहा जा सकेगा। फिर भी उसने अपने माता-पिता पर यह विश्वास बहुत आहिस्ता-आहिस्ता व्यक्त किया। माता-पिता का मन यह स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था। हो भी कैसे सकता है? कौन माता-पिता अपनी लाड़ली सन्तान को सदा के बिछुड़ जाने की बात सहज ढंग से स्वीकार कर सकेगा। इस बात को उन्होंने डेजी का व्यर्थ भय बताया और कहा कि हम सब लोग शीघ्र ही अपने पुराने स्थान कैलीफोर्निया जायेंगे। इस पर डेजी ने धीरे से कहा-’मम्मी, तुम लोग ही जाओगे, मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकूँगी।’
किन्हीं-किन्हीं लोगों के लिए ही यह बता पाना सम्भव होता है कि वे शीघ्र ही मरने वाले है। मृत्यु का भय और जीवन का मोह मनुष्य को चेतना पर एक ऐसा आवरण डाल देता है, जिससे वह अपनी मृत्यु को प्रथम तो स्वीकार ही, नहीं करता कि और करता भी है तो इसी जिजीविषा के साथ कि मुझे अभी बहुत दिनों तक जीता है। फिर भी इतना तो सभी जानते हैं कि सबकी मृत्यु निश्चित है। प्रत्येक व्यक्ति या जीवधारी को एक न एक दिन सुनिश्चित ही मरना है। जीवन में जो घटना इतनी सुनिश्चित हो उसके बारे में समय से पहले जान लेना कोई कठिन बात नहीं है। कठिन लगती जरूर है क्योंकि सामान्य व्यक्ति मृत्यु से इतने भयभीत हो जाते हैं कि वे जीवन से भी आँख मूँद लेते है।
बस या ट्रेन में सवार सोये हुए यात्री को इस बात का कोई पता नहीं रहता कि गन्तव्य स्टेशन तक गाड़ी पहुँचने में कितनी देर है। जागा हुआ व्यक्ति इस बात का पूरा ध्यान रखता है और वह कभी भी बता सकता है कि इतनी देर बाद हम गन्तव्य स्थान तक पहुँच जायेंगे। मृत्यु को सहज स्वाभाविक मानते हुए सहज ढंग से जीवन जिया जाय तो उसके बारे में भी जाना जा सकता है। डेजी ड्राइडन कहा करती थीं कि कोई अदृश्य आत्मा उसे मृत्यु की स्वाभाविकता के सम्बन्ध में बताया करती थी और उसे आश्वस्त करती रहती थीं कि मृत्यु के सभी भय काल्पनिक और अवास्तविक हैं।
जिस दिन डेजी की मृत्यु हुई उस दिन उसने दर्पण माँगा। माँ, ने यह सोचकर कि अपना रक्तहीन चेहरा देखकर उस आघात लगेगा, हिचकिचाई। लेकिन डेजी के पास ही बैठे उसके पिता ने कहा-अगर वह चाहती ही है तो उसे अपना चेहरा देख लेने दो।
माँ ने डेजी को दर्पण दे दिया। कुछ देर तक अपना चेहरा देखने के बाद वह बोली-”मेरी यह देह जर्जर हो गयी है। यह उस खूँटी पर टँगी पुरानी पोशाक की तरह है जिसे मम्मी तुमने पहनना छोड़ दिया है। मैं भी इस देह को उतार दूँगी और फिर एली की भाँति दिव्य देह धारण करूंगी।”
‘एली कौन है?’-यह पूछने पर डेजी ने बताया कि- ‘‘यही वह व्यक्ति है जो हवा में तैरता हुआ-सा आता है और उसे मृत्यु के बारे में बताया है। आज रात तक मैं भी चली जाऊंगी।’’
क्या पागलपन की बात करती हो डेजी- मां ने डांटते हुए कहा, परंतु डेजी ने मुस्कराकर अपनी मां की ओर देखा जैसे वह कह रही हो कि यही सत्य है। उसी दिन शाम को साढ़े आठ बजे के समय डेजी ने स्वयं ही समय देखा और बोली- ‘अभी साढ़े आठ बजे हैं साढ़े ग्यारह बजे एली मुझे लेने आयेगा।’
फिर उसने अपने पिता के सीने से लगकर उनके कंधे पर सिर रख दिया और विश्राम करने लगी। इस तरह बैठना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। करीब सवा ग्यारह बजे वह बिस्तर पर लेट गयी और उसने एक भजन गाने को कहा। जैसे ही घड़ी के कांटों ने साढ़े ग्यारह बजाये, उसने दोनों बांहें फैलायीं और बोली- ‘आओ एली। मैं तैयार हूं।’ इतना कहते ही डेजी ने अंतिम श्वांस ली और कमरे में गंभीर शांति छा गयी।
मृत्यु के समय मनुष्य को किन-किन अनुभवों से गुजरना पड़ता है- यह जानने के लिए लंदन के जोन एफ. हैस्लोप ने वर्षों तक सैकड़ों व्यक्तियों से संपर्क किया। संपर्क के लिए उन्होंने ऐसे व्यक्तियों को चुना जिनके यहां हाल ही में किसी की मृत्यु हुई थी तथा मरने वाला अपने संबंधियों को कोई ऐसी असामान्य बातें बता रहा था। इस शोध, संपर्क और अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों को उन्होंने ‘लाइफ वर्थ लिविंग’ के नाम से लंदन की प्रसिद्ध प्रकाशन संस्था मैसर्स चार्ल्स बुक हाउस द्वारा प्रकाशित कराया।
मृत्यु के समय कोई अशरीरी आत्मा मनुष्य को समझाने बुझाने या आश्वस्त करने के लिए आती है अथवा नहीं यह अलग विषय है। परंतु अन्य पराविदों ने भी अपने शोध-अनुसंधानों के आधार पर यही प्रतिपादित किया है कि मृत्यु कोई असामान्य अथवा पीड़ादायी घटना नहीं है। भारत तथा विदेशों की परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थाओं में अनेक ऐसे व्यक्तियों के भी अनुभव संकलित किये गये हैं, जो एक बार मृतक घोषित किये जाने के बाद पुनः जी उठे। इन विवरणों में कई भिन्नतायें होने के बावजूद अनेक समानतायें भी हैं। एक तो यह कि मृत्यु के समय, मरने से पहले या मरने के बाद ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि हो जाती है।
प्रकृति ने यह व्यवस्था इसलिए की हो कि मनुष्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक निश्चित घटना को जागरूक होकर देखे तथा अनुभव करे। अपने जीवन के तमाम क्रिया-कलापों और उपलब्धियों को छूटते हुए अनुभव कर ले जिन्हें प्राप्त करने के लिए उसने उचित अनुचित सभी उपाय किये थे। यह जाना जा सके कि वे सारी उपलब्धियां व्यर्थ रही हैं जिनके लिए वह जीवन भर भाग-दौड़ करता रहा और सही गलत सभी तरीके अपनाता रहा।
लेकिन मनुष्य के मन में मृत्यु का भय इस प्रकार समाया रहता है कि वह आसन्न मृत्यु को देखकर मृत्यु से पहले ही अचेत हो जाता है। इसे जीव के प्रति अज्ञानजनित आसक्ति ही कहना चाहिए कि मृत्यु जीवन की एक अनुपम घटना होते हुए भी दुखद बन जाती है और मनुष्य उसकी पीड़ा को, जो वस्तुतः है नहीं, झेल नहीं पाता। यथा वासांसिजीर्णानि........ की सैद्धांतिक चर्चा तो बहुत देखने सुनने को मिलती है, परन्तु व्यवहार क्षेत्र में इससे उल्टी ही बात देखने को मिलती है। प्रतीत होता है कि मनुष्य अपने अचेतन में मृत्यु को जीवन का अंत ही माने बैठा है। इसी कारण वह मृत्यु के नाम से भी सिहर उठता है।
अब तक भौतिक विज्ञान भी मृत्यु को जीवन का अंत मानता आ रहा था। परंतु पिछले दशकों में हुई शोधों ने विज्ञान को यह मान्यता बदलने के लिए विवश कर दिया है। उपरोक्त कुछ उदाहरणों और परामनोवैज्ञानिकों के शोध निष्कर्षों से स्पष्ट हो जाता है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, एक उत्सव है। इस बात को यों भी समझा जा सकता है, पर्व-उत्सवों के दिन लोग नये वस्त्र पहनते हैं, घरों को नये ढंग से सजाते संवारते हैं और इस नवीनत्व का सृजन करने में गहन रुचि लेते हैं। मृत्यु को भी जीवन चेतना द्वारा, आत्मिक सत्ता द्वारा मनाया जाने वाला एक उत्सव माना जा सकता है जिससे पुराने शरीर से लेकर अपनी ही बनाई हुई पुरानी दुनिया का परित्याग किया जाता है तथा एक नये वातावरण की सृष्टि होती है।
मृत्यु के प्रति यह समझ और सहज स्वीकृति का भाव विकसित किया जा सके तो इसी जीवन में एक अद्भुत परिवर्तन आने लगता है। वर्षों तक इस विषय का अध्ययन कर ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ पुस्तक लिखने वाले डा. रेमण्ड ए. मूडी ने अपनी पुस्तक में लिखा है- जो व्यक्ति मर चुके थे और मरने के कुछ ही समय बाद पुनः जीवित हो उठे, उनसे संपर्क कर प्राप्त किये गये विवरणों तथा इसके बाद के उनके जीवन क्रम को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मृत्यु का अनुभव प्राप्त कर चुके उन व्यक्तियों में बहुत परिवर्तन आ गया है। इस संसार के प्रति, अन्य व्यक्तियों के प्रति, ईश्वर के प्रति और जीवन-मृत्यु के प्रति सभी के दृष्टिकोण को मैंने एकदम बदला हुआ पाया। प्रायः उन व्यक्तियों ने कहा कि अपने जीवन में दूसरों को जितना ज्यादा प्रेम कर सकें उतना कम है। अपनी सारी उम्र घृणा एवं तिरस्कार के साथ गुजारने वाले एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि वह जब तक जीवित है लोगों को अधिकतम प्यार करेगा। क्योंकि यही एक वह तत्व है जो दूसरों को दिया जा सकता है तथा बाँटने से और बढ़ता है।”
जीवन में अ.ये इन अद्भुत परिवर्तनों का कारण यह बताया गया है कि व्यक्ति अपने को शरीर मानकर उसकी सुख-सुविधा के लिए छीना-झपटी से लेकर बेईमानी और चोरी ठगी जैसे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अपराध करता है। अपनी सत्ता को शरीर तक ही सीमित मानने के कारण उस सन्तुष्ट और सुविधा सम्पन्न बनाना ही उसका लक्ष्य रह जाता है। लेकिन मृत्यु इस भ्रान्ति को तोड़कर जीवन की शाश्वतता से साक्षात्कार करा देती है उसे अनुभव करा देती है कि जीवन जन्म और मृत्यु के बीच की ही घटना नहीं है बल्कि उससे पहले भी है और बाद में भी है। फलतः शरीर के प्रति, भौतिक जीवन के प्रति उसका मोह कम हो जाता है और शाश्वत जीवन के प्रति आस्था सुदृढ़ होती है।
यात्रा कर रहे दो सहपाठियों में बिना किसी पूर्व परिचय के जिस प्रकार सहज ही मैत्री बन जाती है, जीवन को यात्रा मानकर चलने पर भी सबके प्रति उसी स्तर की सद्भावना बढ़ने लगती है। एक अर्थ में सहपाठियों के प्रेम, सद्भाव से जीवन यात्रा के प्रेम सद्भाव की तुलना की भी नहीं जा सकती है। क्योंकि यात्रा तो कुछ ही समय की है जबकि जीवन तो शाश्वत और अनन्त है तथा स्थूल बातों पर आश्रित भी नहीं है। बल्कि स्थूल ही उस चेतना पर निर्भर है।
स्थूल भौतिक की तुलना में सूक्ष्म और चेतन की महत्ता आभास होने पर स्पष्ट ही जीवन में उत्क्राँति घटित होगी। इसीलिए शास्त्रकारों ने कहा है कि मृत्यु जीवन यात्रा का एक पड़ाव भर है, जीवन का अन्त नहीं। किसी धर्मशाला में कुछ समय के लिए ठहरना हो तो यात्री को वहाँ विश्राम करने भर से मतलब होता है। उसे न किसी से राग करने की आवश्यकता प्रतीत होगी होगी और न ही द्वेष करने की। जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि को, भी आत्म-चेतना का विश्राँति स्थल या यात्रा का एक पड़ाव भर मान लिया जाय तो किसी से राग-द्वेष रखना मूढ़तापूर्ण ही लगेगा।
इससे पूर्व की मृत्यु की वास्तविकता को समझा जाय, यह आवश्यक होगा कि उसके प्रति मन में समाया हुआ भय दूर हटाया जाय। यह भय दूर कर लिया गया तो मृत्यु का तत्वदर्शन समझना सहज हो जायगा और फिर मृत्यु कोई दुःखद घटना न होकर एक उत्सव बन जायेगी, अध्यात्म विज्ञान का मूल सिद्धान्त ही शाश्वत जीवन की खोज हैं। जीवन तो शाश्वत ही है, परन्तु अज्ञानवश ही वह जन्म-मृत्यु के साथ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। मृत्यु के प्रति सहज स्वीकार शाश्वत जीवन के प्रवेश द्वारा पर पहुँचने की सिद्धि है। इसलिए आवश्यक है कि मृत्यु को त्यौहार की भाँति उल्लास और आनन्द के साथ वरण करने की तैयारी की जाती रहे। यह तैयारी जीवन को अनुपम सन्तोष और अद्भुत शान्ति से परिपूरित कर देती है।
सन् 1898 में एक अमेरिकी लेखक रावर्टसन का उपन्यास ‘द रैंक आफ टाइरन’ प्रकाशित हुआ था। उपन्यास की कथावस्तु टाइरन नाम विशाल जलयान से सम्बन्धित थी। यह जहाज 75 हजार टन का विशाल यात्री जलयान था। टाइरन की लम्बाई 882 फीट की थी और इसमें तीन प्रोपेलर थे। जहाज में सवार यात्रियों की संख्या लगभग तीन हजार यात्री थे और लेखक ने पूरे उपन्यास में काल्पनिक टाइरैन को कभी न डूबने वाला जहाज बताया लेकिन एक वर्ष अप्रैल के महीने में जहाज की पेंदी में बर्फ की चट्टान से टकराने के कारण एक छेद हो जाता है और जहाज में पानी भर जाता है। फलतः जहाज पानी में डूब जाता है। लेखक ने काल्पनिक जहाज और उसमें सवार यात्रियों में से सबके डूब जाने का कारण नावों का अभाव बताया था।
प्रकाशित होते ही उपन्यास की हजारों प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक गयीं। रोमाँचकारी उपन्यासों की लोकप्रियता प्रायः वर्ष दो वर्ष तक ही रहती है, परन्तु 14 वर्ष बाद उस उपन्यास की माँग एकदम अब तक के सभी उपन्यासों की लोकप्रियता का रिकार्ड तोड़ने लगी। कारण था कि उपन्यास में वर्णित काल्पनिक जहाज, काल्पनिक जहाज, काल्पनिक दुर्घटना और काल्पनिक यात्रियों की काल्पनिक जल समाधि शब्दशः सत्य सिद्ध हो उठी थी।
लोगों ने सन् 1912 की अप्रैल 15-16 के समाचार पत्रों में पढ़ा 14 अप्रैल की रात्रि को 11 बजकर 40 मिनट पर एक यात्री जहाज एस. एस. टाइरैनकि इंग्लैण्ड से अमेरिका जाते हुए उत्तर अटलाँटिक में बर्फ की चट्टान से टकराकर पेंदी में सूराख होने से डूब गया है। यह उस प्रसिद्ध यात्री प्रसिद्ध यात्री जहाज की प्रथम यात्रा थी। कितना आश्चर्यजनक संयोग था कि 14 वर्ष पूर्व मारगट रावर्टसन के उपन्यास ‘द रैंक आफ टाइरन’ का काल्पनिक जहाज भी टाइरन था। वह भी अपनी प्रथम यात्रा में ही डूब जाता है। उसमें वर्णित दुर्घटना टाइरैनिक दुर्घटना के विवरण से सटीक मेल खाती थी।
टाइरैनिक जहाज का भार भी लगभग 75000 टन था उसकी ऊँचाई 882 फीट थी, उस जहाज में तीन प्रौपैलर लगे हुए थे और उसमें लगभग ढाई हजार यात्री सवार थे। काल्पनिक टाइरन जहाज से यह विवरण कितना संगति खाता है यह प्रस्तुत लेख की प्रारम्भिक पंक्तियों में देखा जा सकता है। आश्चर्य की बात तो यह कि काल्पनिक टाइरन के बारे में भी उन्हीं विशेषताओं का उल्लेख किया गया था। जिनके दावे टाइरैनिक जहाज का निर्माण करने वाली जहाज कम्पनी ने किये थे। जैसे उक्त जहाज कम्पनी का दावा था कि यह जहाज कभी न डूबने वाला अद्वितीय जहाज था। 14 वर्ष पूर्व प्रकाशित उपन्यास टाइरन के बारे में भी उपन्यास लेखक ने इसी प्रकार का कथानक विकसित किया।
इसी तरह के और भी वर्णन उपन्यास में थे, जिन्हें टाइटैनिक दुर्घटना का पूर्वाभास कहा गया है। स्वाभाविक ही यह प्रश्न उठता है कि यह मात्र एक संयोग था अथवा लेखक मार्गन राबर्टसन ने किसी अन्तःप्रेरणा या पूर्वाभास से प्रेरित होकर आने वाले कल का चित्र अपने उपन्यास में खींच दिया था।
किसी युग में भले ही यह कहा जा सकता था कि इस प्रकार की घटनायें मात्र संयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। परन्तु अब वैज्ञानिक और डॉक्टर भी यह मानते हैं कि शरीर में इन्द्रियों की चेतना का भी अस्थायी महत्व है। स्थायी रूप से दर्शन, श्रवण, घ्राण उत्प्रेरण और सम्वेदन की सभी क्षमतायें मस्तिष्क में विद्यमान हैं। थैलामस नामक पिण्डली (गैलियन) भीतरी मस्तिष्क में होती है, जो सिर के केन्द्र में अवस्थित हैं। यही केन्द्र सभी तन्मात्राओं के ठहरने का स्थान (स्टेशन) है। यही सी पीनियल ग्रन्थि (ग्लैण्डस् ) निकलती है जो देखने का काम करती है। “पीनियल ग्लैण्ड” को तीसरा नेत्र भी कहते हैं। पिट्यूटरी ग्लैण्डस् और सुषुम्ना शीर्ष (मेडुला आफ लाँगलेटा) जो शरीर के सम्पूर्ण अवयवों का नियंत्रण करती हैं, वे सब भी मन से संबंधित हैं। मस्तिष्क का यदि वह केन्द्र काट दिया जाए तो शरीर के अन्य सब संस्थान बेकार हो जायेंगे।
विज्ञान और शरीर रचना शास्त्र (एनाटॉमी) की इन आधुनिक जानकारियों का भण्डार यद्यपि बहुत समृद्ध हो चुका है किन्तु योग और भारतीय तत्व-दर्शन की तुलना में यह जानकारियाँ समुद्र में एक बूँद की तरह हैं। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने मन को सर्वशक्ति मय इन्द्रियातीत ज्ञान का आधार माना है। उसकी शक्तियों को ही ब्रह्मा में लीन कर देने से हाड़ माँस का मनुष्य सर्वजयी और कालदर्शी हो जाता है। महर्षि पातंजली ने इस तत्वदर्शन का साधन स्वरूप बताते हुए कहा है-
परिणाम त्रय संयमाद तीतानागत ज्ञानस्। ( योगदर्शन, विभूतिपरिषद )
तीनों में परिणामों में ( चित का ) संयम करने से भूत और भविष्य का ज्ञान होता है।
योग वशिष्ठ में बताया गया है-
मनो हि जगताँ कतृ मनो हि पुरुषः स्मृतः। 3। 9114
अर्थात्- संसार को रचने वाला पुरुष भी स्वयं मन ही है, मन में सब प्रकार की शक्तियाँ हैं। हमारे मन में चूँकि ईश्वरीय शक्ति का बढ़ा-चढ़ा रूप है, इसलिए इन बातों पर यकायक विश्वास नहीं होता। मन की शक्तियों से सम्बन्ध न होने के कारण यह बातें भ्रम लगती हैं कि प्रत्येक मनुष्य के मन में सब कुछ जान लेने, दूसरों के अन्तरंग को पढ़ लेने और जो अभी अनागत है, उसे किस प्रकार जाना जा सकता है स्वाभाविक भी है। यह शंका उठना कि जो अभी घटा ही नहीं है उसे किस प्रकार जाना जा सकता है?
उपरोक्त घटना के संदर्भ में, उपन्यास और जहाज दुर्घटना की सभी बातें समान रूप से घटित होने के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले कुछ और विवरणों को जान लेना उचित होगा। उपन्यास में वर्णित घटनाक्रम तो 14 वर्ष पूर्व का था, परन्तु उसी समय जब “टाइटैनिक जहाज” का जलवितरण होने वाला था कुछ और लोगों को भी इसी प्रकार का आभास हुआ। एक अंग्रेज व्यापारी जे. कैनन मिडिलटन ने 23 मार्च 1912 को टाइटैनिक से यात्रा करने के लिए टिकट खरीदा। लेकिन यात्रा से दस दिन पूर्व ही कैनन ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न में उसे एक बड़ा जहाज समुद्र में उल्टा तैरता दिखाई दिया। उसकी तली टूटी हुई दिखाई दे रही थी और बहुत से यात्री चीखते चिल्लाते पानी में हाथ-पैर मार रहे थे।
स्वप्न इतना भयावह था कि घबराकर कैनन की आँख खुली गयी। उसने सोचा ऐसे ही कोई स्वप्न होगा और वह उस बात को भूल गया। अगली रात जब वह फिर सोने लगा तो सोते ही फिर वही स्वप्न देखने लगा। इस बार उसने अपने आपको जहाज के ऊपर हवा में तैरते हुए देखा। दो दिन तक लगातार यही स्वप्न देखने के कारण कैनन इतना सन्देहग्रस्त हो गया कि उसने अपनी यात्रा ही स्थगित कर दी। दुर्घटना के बाद उसने लन्दन की ‘सोसायटी फार साइकोलॉजिकल रिसर्च’ को पत्र लिखकर अपने स्वप्न की जानकारी दी। यह विवरण सोसायटी की पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ था।
बैरी ग्राण्ट ने एक-दूसरे ही प्रकार का विवरण “फार मेमोरी” नामक पुस्तक में लिख है जो सन् 1956 में न्यूयार्क से प्रकाशित हुई थी। बैरी ग्राण्ट ने लिखा है कि जिस दिन टाइटैनिक जहाज अपनी पहली यात्रा का आरम्भ कर रहा था। जहाज का भौंपू बज चुका था और इंजिन भी स्टार्ट हो चुका था, तब उसके पिता जेक मार्शल और उसकी माँ आइल आफ ह्वाइट दूसरी ओर मकान की छत पर जहाज को रवाना होते देख रहे थे। एकाएक न जाने क्या हुआ कि श्रीमती मार्शल अपने पति की बाँह पकड़ कर जोर से चीखी “अरे.......रे! वह जहाज तो अमेरिका पहुँचने से पहले ही डूब जायगा। कुछ करो, रोकी उसे।’
जैक मार्शल ने अपनी पत्नी को सहलाया और कहा- ‘चिन्ता मत करो टाइटैनिक कभी भी डूब नहीं सकता।’ लेकिन श्रीमती मार्शल अपने पति को इस प्रकार कहते देख कर गुस्सा हो गयी और कहने लगी-तुम कैसी बातें कर रहे हो। मैं सैंकड़ों लोगों को अपनी आँखों से पानी में डूबते हुए देख रही हूँ। क्या तुम उन्हें मरने दोगे।’
इस प्रकार के अनुभव और भी कितने ही व्यक्तियों को हुए तो क्या उन सबके आभासों और टाइटैनिक जहाज की जल समाधि को मात्र संयोग ही कहा जाय। कहना कठिन है। सामान्य मस्तिष्क की शक्ति इन्द्रिय गम्य जानकारियों तक ही सीमित है-शरीर विज्ञानियों द्वारा अब तक कहा जाता है। किन्तु अब न्यूरोलॉजी-पैरासाइकोलॉजी-मैटाफिजिक्स आदि विज्ञान के जानकार यह स्वीकार करने लगे हैं कि मानवी मन-विराट विश्व मन का ही एक अंश हैं और जो कुछ निकट भविष्य में होने जा रहा है उसकी सम्वेदनायें मानवी मन को भी मिल सकती हैं।
स्थूल जानकारियाँ संग्रहित करने वाले चेतन मस्तिष्क और स्वसंचालित नाड़ी संस्थान को प्रभावित करने वाले अचेतन मस्तिष्क का ही ज्ञान अभी विज्ञान क्षेत्र की परिधि में आया है, पर अब अतीन्द्रिय मस्तिष्क के अस्तित्व को भी स्वीकारा जा रहा है, क्योंकि ऐसी अनेकानेक घटनायें घटित होती रहती हैं जिनसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलने और उनके अक्षरशः सही उतरने के प्रमाण मिलते हैं।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार गेटे ने लिखा है कि एक बार वह अपने निवास स्थान वाइक्नर में था तो अचानक उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा कि वहाँ से हजारों मील दूर सिसली में एक भयंकर भूकम्प आया है। यह बात उसने अपने मित्रों को बतायी पर किसी को विश्वास न हुआ कि बिना किसी आधार के इतनी दूर की बात कैसे मालूम हो सकती है, पर कुछ ही महीनों बाद सिसली में भयंकर भूकम्प आया। जैसा कि गेटे ने अपने मित्र को बताया था।
प्रसिद्ध लेखक जानेथन स्विफ्ट ने अपनी पुस्तक ‘गुलिवर की यात्रायें’ में लिखा था कि- मंगल ग्रह के चारों ओर दो चन्द्रमा परिक्रमा करते हैं। इसमें एक की चाल दूसरे से दुगुनी है।’ उस समय यह बात निरी कल्पना के सिवा कुछ नहीं लगती थी। क्योंकि तब इस बात का किसी को तनिक भी आभास नहीं था कि मंगल के इर्द-गिर्द चन्द्रमा भी हो सकता है। पीछे डेढ़ सौ वर्ष बाद सन् 1877 में वाशिंगटन की नेबल आबजरवेटरी में एक शक्ति शाली दुर्बीन के सहारे यह देख लिया गया कि वास्तव में मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा हैं और एक की चाल दूसरे से दूनी है तो लोग आश्चर्यचकित रह गये कि उस साधन हीन जमाने में जब इस तरह की कल्पना कर सकना भी सम्भव नहीं था, तब किस प्रकार स्विफ्ट ने मंगल ग्रह की स्थिति बतायी।
विज्ञान कथा लेखिका मेरिनिवेन ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास “ए होल इन द स्पेस” में एक ऐसे तारे की कल्पना की थी जो सूर्य से आकार में दस गुना था और अरबों वर्ष बाद एक काला पिण्ड भर रह गया। यही नहीं वह सिकुड़ कर साठ किलोमीटर अर्द्धव्यास का रह गया किन्तु उसका भार अभी भी सूर्य से दस गुना अधिक है।
उस समय जब यह उपन्यास लिखा गया तब वैज्ञानिकों का इस ओर ध्यान भी नहीं गया था। सन् 1672 में ‘साइगनस-एक्स वन’ नामक एक ब्लैक होल के अस्तित्व का पता चला जिसका अर्द्धव्यास साठ किलोमीटर है और वजन सूर्य से दस गुना अधिक। पृथ्वी से उसकी दूरी, घनत्व, गुरुत्वाकर्षण वहाँ की गतीय सम्भावना, आकर्षण शक्ति आदि सब कुछ उपन्यास में वर्णित विशेषताओं से मेल खाती थी।
क्या इन सब घटनाओं से मात्र संयोग कह कर छुटकारा पा लिया जाय। विज्ञान के लिए इतने प्रबल प्रमाण होने के बाद उनकी उपेक्षा कर पाना सम्भव नहीं है। भारतीय तत्वदर्शन तो पहले ही मानता है-अतीन्द्रिय चेतना मानवी सत्ता के अस्तित्व में विद्यमान है। योगी सिद्ध पुरुष जिस शक्ति को अपनी तप, साधना के माध्यम से विकसित करते है वह कई बार बिजली की चमक के समान अनायास ही सामने आ प्रस्तुत होती है। इस सत्ता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बन्धन काट कर असीम के साथ अपने सम्बन्ध मिला सकता है और अपनी ज्ञान परिधि को उतना ही विस्तृत कर सकता है।
हमें दूसरों से क्या नहीं मिला इस पक्ष पर यदि विचार करें तो प्रतीत होगा कि कंजूसी कर ली गई और जितना वे दे सकते थे उतना नहीं दिया, ऐसी दृष्टि से हमें दूसरों की उदारता पर उँगली उठाने और उन्हें कृपण कहने के पर्याप्त प्रमाण मिल जायेंगे। ऐसी दशा में अपना क्षोभ, रोष और असन्तोष ही बढ़ेगा।
विचार करने का एक दूसरा पहलू भी है और वह यह कि जो मिला वह कितना अधिक है। यदि इतना भी न मिलता तो हम क्या कर सकते थे? जबरदस्ती तो किसी को भी कुछ देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। हमारा कुछ ऋण या दबाव तो था नहीं, जो दिया गया वह प्रेम-उदारता और सौजन्य से ही दिया गया है। ऐसी दशा में यदि स्वल्प मिला तो भी उससे असन्तुष्ट क्यों होना चाहिए। जिन्होंने दिया उन्हें दोष क्यों देना चाहिए। इस धरती पर असंख्य ऐसे हैं जिनसे हमारा कोई परिचय सम्बन्ध नहीं, उनसे किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिलता। जब हम कुछ भी द देने वालों पर रोष नहीं करते तो थोड़ी सहायता करने वालों से ही रुष्ट क्यों हों?
स्वजन, सम्बंधियों, मित्र, हितैषियों के और स्त्री-पुत्रों और अभिभावकों के द्वारा प्रदत्त अनुदानों का लेखा-जोखा संग्रह करें-उनकी निरन्तर जो सहायता, सद्भावना मिलती रही है उसका मूल्याँकन करें तो बूँद-बूँद करके भी वे घड़े भर कर हो जाती हैं। वे इससे भी अधिक क्या कर सकते थे, और उन्होंने क्या नहीं किया, यह सोचना निरर्थक है। हम उनकी कठिनाइयों को नहीं जानते-सम्भव है उन्होंने अपनी स्थिति में उतना भी बहुत कष्ट सहकर और आत्म-निग्रह पूर्वक किया हो। हमारी एकाकी सहायता ही तो एक मात्र उनके सामने नहीं थी। अन्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ा होगा, और उन कार्यों में भी अपना चित्त समय तथा धन लगाना पड़ा होगा। सम्भव है जो उन्होंने अपनी स्थिति में किया वही उस समय सर्वोपरि रहा हो। ऐसी दशा में बिना परिस्थितियों का सही मूल्याँकन किये उन्हें दोष देना उनके साथ अन्याय करना है।
माता-पिता की सहायता पर्वत के समान है। उन्होंने कितना निस्वार्थ स्नेह और सहयोग प्रदान किया। वस्तुओं का मूल्य आँका जाता है पर प्रेम और ममता तो अमूल्य है। जिनके रक्त-माँस से अपना शरीर बना और पोषित हुआ, उनका उपकार कैसे भुलाया जा सकता है। भाई, बहिन कितना विश्वास और सौजन्य प्रदान करते रहे। परिवार के भरे-पूरे उद्यान में से हर एक ने अपने-अपने ढंग से जो दिया वह थोड़ा-थोड़ा करके भी बहुत हो जाता है। पत्नी की सेवा, सहायता और सद्भावना में जो आत्मीयता और समर्पण बुद्धि घुली चली आ रही है उसे शब्दों में नहीं सराहा जा सकता। उसके लिए जन्म- जन्मान्तरों तक हमें कृतज्ञ ही रहना चाहिए। बच्चों ने सूनेपन को कैसे विनोद उल्लास से भर दिया उनका अहसान भी कम नहीं हैं।
अध्यापक जिनने शिक्षा प्रदान की, चिकित्सक जिन्होंने रोगों से छुड़ाया, मित्र जिन्होंने अनेक प्रकार का प्रयोजन पूरा किया, क्या धन्यवाद के पात्र नहीं हैं।’ अनादि काल से हमारे पूर्वज जो ज्ञान संचित करते चले आ रहे हैं। उसी का लाभ लेकर तो हम साधन सम्पन्न रह रहे हैं। एकाकी व्यक्ति को लिखने, पढ़ने, बोलने और सोचने से भी वंचित रह जाएगा। आहार-विहार की, आजीविका, मनोरंजन की, यश-वैभव की जो सुविधाएँ हमें प्राप्त है उनमें असंख्यों का श्रम और योगदान है।
कितना मिला, कितनों से मिला, इसका लेखा-जोखा लेते रहें तो प्रतीत होगा यह संसार उदार-देवमना सज्जनों से भरा पड़ा है। उनके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए, ऋण चुकाने के लिए तत्पर होना चाहिए। यह दृष्टि हमारी उन समस्त शिकायतों को निरस्तकर देती हैं जिनमें हर व्यक्ति को कृपण ठहराया गया था।
मनुष्य प्रकृति के सभी रहस्यों को जान लेने का दावा करने लगा है। पिछले सौ दो सौ वर्षों में निस्सन्देह वैज्ञानिक उन्नति हुई है। विज्ञान के कारण प्रकृति के कई रहस्य सुलझे हैं और उनके नियमों को जान पाना सम्भव हो गया है। उन नियमों का अनुकरण कर अनेकानेक यन्त्र बनाये गये, थोड़े समय में अधिक का निबटा लेने, रोग बीमारियों से लड़ने और मनुष्य की आयु तथा स्वास्थ्य के रक्षण अभिवर्धन में सफलता प्राप्त की गयी।
होना तो यह चाहिए था कि प्रकृति के इन रहस्यों को जानने के बाद मनुष्य और अधिक विनीत, उदार तथा विशाल हृदय बनता। कहा भी है ‘विद्या ददाति विनयं। विद्या से विनय प्राप्त होती है। परन्तु प्रकृति के रहस्यों और नियमों को जानने तथा उनका अनुकरण कर अपनी भौतिक स्थिति उन्नत बनाने के साथ-साथ मनुष्य का दर्प भी बढ़ता चला गया है। निस्सन्देह मनुष्य सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ है। परमात्मा ने उसे विद्या, बुद्धि, सोचने समझने की क्षमता और कर्म की स्वतन्त्रता के अधिकारों से सम्पन्न कर इस धरती पर भेजा है। इन विशेषताओं द्वारा अर्जित थोड़े से लाभों को देखकर ही वह दर्प से चूर हो उठे तो यह शुभ नहीं कहा जा सकता। प्रकृति का एक छत्र अधिपति और उसके सभी रहस्यों को जान लेने के दर्प ने उसे मानवीय सन्तोष, हृदय की शान्ति तथा आन्तरिक आनन्द-उल्लास से रिक्त ही किया है। परिणामतः वह दिनोंदिन श्रेष्ठता के अहंकार से प्रेरित होकर न करने और न अपनाने योग्य आचरण व रीति-नीति बरत रहा है।
मनुष्य अपने श्रेष्ठता के आधारहीन दर्प से मुक्त हो सके इसके लिए प्रकृति अनेकों बार ऐसे रहस्य प्रस्तुत करती रहती है जिसे समझना अभी तो मनुष्य के बस में नहीं है। ऐसे कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं।
हाल ही में जबलपुर का एक समाचार समाचारपत्रों में छपा है। आम का पेड़ पन्द्रह-बीस फूट ऊँचा बढ़ने के बाद ही बौराता और फल देता है। लेकिन जबलपुर में किसी व्यक्ति ने कुछ माह पूर्व आम का एक पौधा लगाया। यह पौधा दो फुट ऊँचा बढ़कर ही आम क फल देने लगा। कुछ महीनों की आयु वाले इस पौधे में 80 आम लगे। इस आम के पौधे को देखने के लिए दूर-दूर से हजारों लोग आये। कोई भी यह नहीं समझ सका कि इतने छोटे पौधे में कैसे फल-फूल लग आये। जिसने भी देखा उसने प्रकृति की लीला को अगम रहस्यमय पाया।
बंगाल में एक नारियल का पेड़ भी इसी प्रकार की विचित्रता के कारण पिछले कई दिनों से चर्चा और आकर्षण का विषय रहा है। नारियल के पेड़ आमतौर पर विधिवत् लगाये जाते हैं, पर नदिया जिले के भाम जोआन गाँव में एक शिक्षक के घर नारियल का एक ऐसा पेड़ लगा हुआ हैं जिसकी शाखाओं से ही उसकी सन्तानें जन्मने लगती हैं। पिछले पाँच वर्षों में इस पेड़ ने करीब 100 पौधों को जन्म दिया और सभी पौधे उस पेड़ के पत्तों में मूल स्थान से लगे हैं। जिस शिक्षक के घर पर यह पेड़ लगा है, उसने बताया कि “पहली बार जब मैंने पेड़ के एक पत्ते में छोटा-सा अंकुर फूटते देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। शुरू में तो मैंने उस अंकुर के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की, पर कुछ दिनों बाद जब वह अंकुर बड़ा हुआ तो मैंने उसे निकाल कर दूसरे स्थान पर रोप दिया। कुछ दिनों बाद उसी पेड़ पर पुनः वैसा ही अंकुर फूटा। पेड़ में नारियल तो लगते ही थे यह अंकुर भी फूटने लगे इस प्रकार पिछले पाँच वर्षों में कोई 100 नारियल के पौधों ने उस पेड़ से जन्म लिया है।
मजे की बात यह है कि उन अंकुरों को यदि पेड़ से अलग नहीं किया जाता तो वे नष्ट हो जाते हैं। जबकि अंकुर निकाल कर दूसरे स्थान पर लगाने से वह पेड़ बन जाता है। नारियल के उक्त पेड़ द्वारा नये पौधों को जन्म देने का यह क्रम अभी भी जारी है।
यह प्रकृति की विचित्र लीलाएँ ही है जिनका रहस्य समझ पाना अभी तक सम्भव नहीं हुआ है। प्रकृति इस प्रकार को पहेलियाँ जीव-जन्तुओं के माध्यम से भी प्रस्तुत करती है। यौन परिवर्तन की घटनायें आयेदिन सामने आती रही हैं। इन परिवर्तनों के लिए हारमोन के क्रिया-कलाप उत्तरदायी ठहराये गये हैं, पर पिछले दिनों बालाघाट जिले में स्थित एक पशु-चिकित्सालय के डाक्टरों ने एक ऐसे मुरगे के बारे में बताया जो अंडा देने लगा था। डेढ़ वर्ष के इस मुरगे को अंडा देते हुए कई लोगों ने देखा। यह मुरगा एक मूर्गीपालक के पास था। उस मुरगे को रोज दड़बे में बन्द कर देता था। जिस दड़बे में उसे बन्द किया जाता था उसमें दूसरे कोई मुरगे या मुरगी नहीं होते थे एक दिन मालिक ने उक्त मुरगे के दड़बे में अण्डा देखा। शुरू में तो उसने कोई ध्यान नहीं दिया, सोचा कोई मुरगी दिन में आकर अण्डा दे गयी होगी, पर जब रोज ऐसा ही होने लगा तब तो वह निगरानी करने लगा और यह देखकर विस्मित रह गया कि मुर्गी नहीं मुरगा ही अण्डा देने लगा था।
6 अप्रैल 76 के समाचार पत्रों में कई लोगों ने पढ़ा होगा कि उन्नाव में गंगा घाट थाने के पास रहने वाली एक महिला ने बच्चों के स्थान पर कुत्ते के दो पिल्लों को जन्म दिया। अब तक जुड़वा बच्चे होने की घटना तो आम सुनने, पढ़ने में आती थी, पर यह पहली घटना है जब किसी महिला ने कुत्ते के पिल्लों को जन्म दिया और वह भी जुड़वा। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार ये पिल्ले एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, उनके मुँह तो दो थे, परन्तु पैर चार ही थे। कान और पूँछ सब कुत्ते जैसे ही थे। यद्यपि जन्म के तीन घण्टे बाद ही ये पिल्ले मर गये, परन्तु एक अजूबा तो बने ही।
ये तो हुई ऐसी घटनायें जिनमें प्रकृति का अदृश्य परोक्ष हाथ दिखाई देता है लेकिन उसकी प्रेरणा से जानवरों के स्वभाव में भी कई बार ऐसे परिवर्तन आ जाते है कि देख जानवर दांतों तले अँगुली दबा लेनी पड़ती है। यह परिवर्तन कई बार इस तरह का होता है कि लगता है कही सम्बन्धित जानवर पिछले जन्म में मनुष्य ही तो नहीं रहा था और पूर्वजन्म के संस्कारों की प्रेरणा से वह से वह अनायास मनुष्यों जैसा आवरण करने लगा हो। कानपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘आज’ में पिछले दिनों बम्बई के उपनगरीय क्षेत्र चेब्बर के एक विद्यालय का बड़ा ही मनोरंजन समाचार छपा। विद्यालय की एक कक्षा में जब पढ़ाई चल रही थी तो एक बन्दर न जाने कहाँ से कक्षा में घुस आया और छात्रों के बीच बैठ गया। बन्दर को देखकर छात्र चुहलबाजी करने लगे, पर अपने साथ होती चुहल के बीच भी वह बन्दर चुपचाप शान्तिपूर्वक बैठा रहा।
यही नहीं उसे जब भगाने की कोशिश की गयी तो भी बन्दर वहाँ से नहीं भागा। कक्षा जब समाप्त हुई तभी बन्दर वहाँ से उठकर गया। दूसरे-तीसरे दिन भी यही क्रम चलता रहा। कई दिनों तक बन्दर विद्यालय में आता रहा और बैठता रहा। जब तक विद्यालय के अधिकारियों ने दमकल वालों को बुलाया नहीं और उसे पकड़ कर चिड़ियाघर नहीं भिजवा दिया तब तक वह बन्दर नियमित रूप से, समय पर विद्यालय आता रहा और चुपचाप पढ़ाई का आनन्द लेता रहा।
यह घटनायें क्या सिद्ध करती है? क्या मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को जान लिया हैं। कदापि नहीं। प्रकृति इतनी बड़ी और विराट् है कि उसे जान पाना तो दूर, देख लेना भी सम्भव नहीं है। कोई भी समझदार विनम्र वैज्ञानिक यह दावा भी नहीं करता कि वह प्रकृति को जान चुका है। बल्कि जैसे-जैसे उसके ज्ञान का क्षेत्र बढ़ता जाता है वह न्यूटन की तरह कहने लगता है कि हम तो सागर के किनारे बैठकर कुछ घोंघे और सीपियाँ ही बीन पाये हैं। लेकिन ज्ञान का, श्रेष्ठता का, प्रकृति के सिरमोर होने का दर्प रखने और अपने अहंकार के कारण विश्व की शान्ति सुव्यवस्था को भंग करने वाले लोगों को क्षुद्र नहीं तो और क्या कहा जाए? सच तो यह है कि क्षुद्रता ही इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप है और प्रकृति की इन पहेलियों को देखकर अपनी क्षुद्रता को तिलाँजलि देनी चाहिए।
विश्व के रूप और उसकी क्रियाओं का गणितीय आधार पर विश्लेषण करते हुए जब आइन्स्टाइन ने सापेक्षवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया, तभी से अतीत की घटनाओं को असली रूप में देख सकने की सम्भावनाओं की चर्चा वैज्ञानिकों के बीच चल पड़ी है। अब प्रति-पदार्थ और प्रति-कणों की खोज के साथ ही भविष्य से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की ओर काल-यात्रा करने वाले कणों तथा तरंगों की खोज से भविष्य की झाँकी करने की प्रक्रिया पर भी विचार चल रहा है।
सापेक्षतावाद द्वारा आइन्स्टाइन ने सिद्ध कर दिया था कि अतीत की जो घटनाएँ हमारे लिए घटित एवं समाप्त हो चुकी हैं, उनकी तरंगें विश्व-ब्रह्माण्ड में अब भी विद्यमान हैं तथा किसी अन्य लोक के निवासी यदि उनके सामने समुचित साधन हों, तो हो सकता है कि वे उन घटनाओं को ऐसे देख रहे हों, जैसे कि वे इसी समय उनके सामने घट रही हों। इसी सिद्धान्त के आधार पर आर्कियोविडियोफोन जैसे यन्त्र की रचना हुई और वैज्ञानिक यह विश्वास कर रहे हैं कि शीघ्र ही वे अतीत की घटनाओं को चाहने पर प्रत्यक्ष देख सका करेंगे, ऐसा एक अनूठा टेलीविजन जैसा यन्त्र बनाया जा सकेगा। इसका अर्थ है कि ईसामसीह को प्रवचन करते, पैगम्बर मुहम्मद को जनता का संगठन-मार्गदर्शन करते तथा भगवान कृष्ण को गीता का उपदेश करते या राम-रावण युद्ध अथवा महाभारत युद्ध होते देखा-सुना जा सकता है।
पिछले दिनों अँग्रेजी पत्रिकाओं में ऐसी कितनी ही घटनाएँ छपी हैं जिनमें यह तथ्य उभर कर आता है कि भूतकाल के घटनाक्रम भी दिवास्वप्न की तरह कई बार वर्तमान में भी प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं और वे यथार्थता की कसौटी पर सही उतरते हैं।
आक्सफोर्ड के सेन्टह्यूम कॉलेज की प्राध्यापक कुमार एलेनोर एफ॰ जार्डन ने अपनी वार्साई (फ्राँस) यात्रा के समय प्राचीन खण्डहरों में ऐसे दृश्य देखे थे जो शताब्दियों पूर्व हुए, राजाओं के रहन-सहन पर प्रकाश डालते थे। उन दृश्यों की ऐतिहासिक तथ्यों के साथ संगति बिठाई गई तो वे सच निकले। एलेनोर का कथन है कि इससे पूर्व उन विवरणों का उन्हें आभास मात्र भी नहीं था।
इंग्लैण्ड के गैयार्सी टावर नामक कस्बे के रहने वाले कर्नल डेविड स्मिथ ने सौ वर्ष पूर्व का एक घटनाक्रम इस प्रकार देखा, मानो वह अभी-अभी घटित हो रहा है। आश्चर्यपूर्वक उन्होंने तलाश किया कि क्या कभी ऐसी कोई घटना उधर घटित हुई थी। पता लगाने पर पाया गया कि जैसा उसने दिवा स्वप्न देखा ठीक वैसा ही भूतकाल में प्रत्यक्ष हो चुका है।
अतीत की ही तरह अनागत भविष्य की सम्भाव्य घटनाएँ भी कई बार दिवास्वप्न के रूप में प्रत्यक्ष देखी जानी जाती हैं और कालान्तर में वे ज्यों की त्यों सत्य सिद्ध होती हैं। बाल्टीमोर के एक इंजीनियर की लड़की लिंडा एन ब्युरिट्स को अपने भविष्य की ऐसी ही पूर्व झाँकी दिखाई पड़ गई थी। यह भावुक, सम्वेदनशील कल्पना-प्रवण किशोरी जीवन के प्रति प्रगाढ़ आसक्ति रखती थी। काव्य, संगीत और चित्रकला में उसे रुचि थी। जब वह हाईस्कूल में थी, तभी एक दिन अचानक एक पोर्ट्रेट बनाने बैठी। यह उसके द्वारा बनाया गया प्रथम व्यक्ति-चित्र था। उसने अपनी ही आयु के एक अनजान लड़के का चेहरा बना डाला। वह चेहरा न तो उसने अपने जीवन में कभी भी देखा था, न उसके माता पिता ने। जब माँ ने पूछा कि यह लड़का कौर है जिसकी तुमने तस्वीर बनाई है, तो लिन्डा ने बताया कि “यह मेरी कल्पना का राजकुमार है। मैंने इसे कभी भी देखा नहीं। बस मुझे एक चित्र बनाने की प्रेरणा हुई, मैं बैठ गई और यह पोर्ट्रेट बन गया। वह पोर्ट्रेट बड़े चाव से उस किशोरी ने अपने अध्ययन-कक्ष में लगा लिया।
आगे चलकर महाविद्यालयी शिक्षा प्राप्त कर वह एक अध्यापिका बन गई। इसी बीच उसे ‘ब्रेन ट्यूमर’ हो गया। उसकी मृत्यु के समय डाक्टरों ने उसके माँ-बाप से अनुरोध किया कि बच्ची की आंखें नेत्र बैंक को दान कर दी जाएँ। उन्होंने अनुमति दे दी। मृत्यु के तत्काल बाद डाक्टरों ने उसकी आंखें सुरक्षित रख लीं।
ये आंखें लगाई गई वहाँ से 400 मील दूर स्थित चार्लस्टन शहर के उसी लड़की के हम उम्र 22 वर्षीय युवक बूड़ी को। इस लड़के की आंखें बचपन से ही कमजोर थीं। बीस साल की आयु में उसे गम्भीर नेत्ररोग हो गया तथा ऐसे आपरेशन के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं शेष बचा, जिसमें नेत्रदाता के शरीर से अलग किये जाने के 72 घण्टों के भीतर रोगग्रस्त आँख की जगह दूसरी आँख प्रतिरोपित कर दी जाये।
युवती लिंडा की आंखें नेत्र-बैंक को दे दी गई। बूड़ी के डाक्टर का क्रम नेत्र-आकाँक्षियों में प्रथम था, अतः उसे ही वे आँख मिलीं। ताजी नयी आंखें पाकर बूड़ी कृतज्ञता से भर उठा। उसने नेत्रदानी परिवार के प्रति कृतज्ञता दिखलाने हेतु बैंक से उनका पता पूछकर पत्र लिखा। कुछ दिन बाद वह उनसे मिलने गया। वहाँ अपने मधुर व्यवहार से बहुत घुल-मिल गया। उसकी हंसी लिंडा जैसी ही थी। अतः माँ-बाप को अपनी बेटी की स्मृति ताजी हो आई। विदा के समय वूडी अपना एक चित्र उन्हें दे आया। लिंडा की माँ को वैसे भी यह चेहरा परिचित लग रहा था।
इस घटना के छः माह बाद, एक दिन लिंडा के माता-पिता अपनी स्वर्गीय पुत्री की वस्तुएँ उलट-पुलट रहे थे। तभी उन्हें वह पोर्ट्रेट मिला, जिसे उनकी लाड़ली ने हाईस्कूल जीवन में बनाया था तथा अपनी कल्पना का राजकुमार कहा था। इंजीनियर-दंपत्ति विस्मय से उछल पड़े-’हे भगवान्! यह तो वूडी का ही चित्र है।” सचमुच वह पोर्ट्रेट वूडी के ही उस चित्र जैसा था, जो उस लड़के ने अपने आगमन के समय छः माह पहले उन दोनों को दिया था। इस प्रकार लिंडा की भविष्यकल्पना पूर्ण सत्य निकली।
समष्टि-मन अपने आप में एक इकाई है। हमारे साधारण विचार समय और पदार्थ में ढले-सिमटे रहते हैं। काल और देश के ढाँचों में होकर ही विचार स्पष्ट रूप ले पाते हैं और वही जानकारी जो दिक्−काल के खाकों में ढली हो, हमारे चेतन-मन को ग्राह्य होती है। किन्तु वस्तुतः समय और स्थान हमारे मस्तिष्क की हो कल्पना एवं रचना है। उनकी कोई निरपेक्ष स्थिति नहीं है। घटनाओं की सापेक्षता में ही दिक् और समय का महत्व उभरता है।
3 अगस्त को सुबह 5 से 6 तक हमने दर्शन-शास्त्र की कान्ट की पुस्तक पढ़ी। 16 जुलाई को संसद में दोपहर 2 बजे अमुक-अमुक ने बहस की। मई 78 में राजेन्द्र ने हाईस्कूल की परीक्षा दी। 11 नवम्बर 77 विनय के घर में सुबह तीन बजकर 55 मिनट पर बच्ची पैदा हुई-आदि-आदि प्रत्येक कथन किसी घटना से जुड़ा है। घटनाओं से परे समय को समझ पाना सचेतन मस्तिष्क के लिए दुष्कर है। जब व्यक्ति अपने आपको समय से ऊपर उठाकर देखता है, तो उसे मस्तिष्कीय चेतना ही दिखाई पड़ती है। यही बात मांडूक्य-कारिका में कही गई है-
“चित्तकाला हि येऽन्तस्तु, द्वय कालाश्च ये बहिः। कल्पिता एवं ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः॥” (2914)
अर्थात्-यह विश्व वास्तव में चित्त की अनुभूति-सम्वेदना और घटनाओं की सापेक्षता मात्र है। दृश्य जगत में इसके अतिरिक्त अन्य कोई विशेषता नहीं है।
अतः समष्टि मन से अपने को जोड़ देने पर चित्त की अनुभूति-क्षमता का क्षेत्र अनन्त तक विस्तृत हो जाता है और उस समय भूत-भविष्य की किसी भी घटना को प्रत्यक्ष जानना सहज सम्भव है।
सायास-सचेत रूप में अपने मन को समष्टि-मन से जोड़ने के लिए साधना करनी होती है। जो जिस स्तर तक उस समष्टि चित्त से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उसकी भूत-भविष्य की दर्शन-क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। इसी तथ्य को महर्षि पातंजलि ने योगदर्शन में इस प्रकार प्रतिपादित किया है-
“क्षण तत्क्रमयोः संयमाद् विवेकजं ज्ञानम्।” (3152)
अर्थात्-समय के अत्यंत छोटे टुकड़े क्षण के क्रम में चित्त-संयम करने से संसार की सही स्थिति का निरीक्षण किया जा सकता हैं।
कई बार व्यक्ति के अवचेतन मन का तार कुछ पलों के लिए समष्टि के प्रवाह से अनायास भी जुड़ जाता है। सामान्य लोगों में ऐसा किसी अनजान क्षण में ही घटित हो उठता है। उस क्षण में ही उन्हें भूत या भविष्य की प्रत्यक्ष झाँकी दिखाई पड़ जाती है, जिसे लोग चमत्कार मान बैठते हैं।
वस्तुतः इसमें चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। मनुष्य के भीतर ऐसी विशिष्ट क्षमताएँ स्वाभाविक रूप में विद्यमान है, जिनका समुचित विकास कर वह काल की मानव-निर्मित सीमाओं को भेदकर अतीत-अनागत की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त कर सकता है। योग-साधनाओं द्वारा यह विकास सहज रूप में हो जाता है और तब व्यक्ति को अपनी उस अनन्त विस्तृत आत्म-चेतना का बोध होता है, जिसे वह विस्मृत किये रहता है।
बात गुजरात के छोटे से गाँव की है उस दिन सुबह ही सुबह वहाँ के एक संभ्रांत सज्जन की, राह चलते अहमदाबाद की सड़क पर एक ग्रामीण से भेंट हुई। वह ग्रामीण अपने कन्धे पर लोहू लुहान कुत्ते को बिठाये धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। उन सज्जन पर न रहा गया। आखिर सहज भाव से पूछ ही बैठे-’क्यों पटेल! इस कुत्ते को कहाँ ले जा रहे हो।’
‘मेरे गाँव का यह आवारा कुत्ता है। किसी के घर में घुसकर कुछ नुकसान कर दिया होगा सो इसकी इतनी पिटाई हुई कि रीढ़ की एक हड्डी टूट गई और घाव हुआ सो अलग। आप देख ही रहे हैं कि घावों से खून छलक रहा है। गाँव में दो-चार लोगों ने बताया कि यदि शहर के मवेशी अस्पताल में इसका इलाज कराया जाये तो अच्छा हो सकता है।
दो-तीन मोटर वालों से भी मिन्नतें करता रहा, पर उन्होंने भी मोटर में जगह न दी। अतः पैदल ही कन्धे पर बिठाये, इसे यहाँ तक ले आया। यदि अच्छा हो गया तब तो ठीक हैं, अन्यथा भगवान की मर्जी।’ इस प्रकार पटेल ने सारी बात कह सुनाई।
वह सज्जन इलाज के लिए उस पटेल को दो-तीन रुपये भी देते रहे, पर उसने एक भी पैसा न लिया। वह घर से दो रुपये लेकर चला था। उसे बात करते काफी देर हो गई थी। कुत्ता भी कन्धे पर ही बैठा था। अतः नमस्कार किया और मवेशी अस्पताल की राह पूछकर चल दिया।
वे सज्जन उस पटेल को जाते हुए देखते रहे और तब तक खड़े रहे जब तक कि वह उनकी आँखों से ओझल न हो गया। कभी उन्हें उस ग्रामीण में भगवान बुद्ध की करुणा दिखाई देती और उस समय का दृश्य सामने घूमने लगता जब यज्ञ मण्डप में बलिदान के लिए आये मेमने की रक्षा उनके द्वारा की गई थी। थोड़ी ही देर में अब्राहमलिंकन का वह दृश्य दिखाई देने लगा जब उन्होंने दल-दल में फँसे एक सुअर को निकाला था और उन्हीं कपड़ों से धारा सभा के अधिवेशन में चले गये थे।
कहाँ बौद्ध धर्म के प्रचारक भगवान तथागत और कहाँ अमेरिका जैसे महान राष्ट्र के राष्ट्रपति पर, इनकी तुलना उस अशिक्षित ग्रामीण से की भी कैसे जा सकती थी। उन सज्जन को तो उस समय ऐसा अनुभव हो रहा था मानो करुणा ने ही मोतियों को एक सूत्र में पिरोदिया है।
डा. हिलवर्ट सिग्लर एक प्रख्यात जीव विज्ञानी के रूप में जाते हैं। जीव-जन्तुओं के अध्ययन के लिए एक बार जंगल गये। पेड़-पौधों के प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करते हुए वे वन में घूम रहे थे कि एकाएक उनकी दृष्टि एकाएक उनकी दृष्टि एक मार्मिक दृश्य पर पड़ी। ‘जे’ नामक एक पक्षी एक दूसरे पक्षी की चोंच में दाना अपनी चोंच से दे रहा था। ध्यान से देखने पर उन्होंने पाया कि दूसरे पक्षी का जबड़ा टूटा हुआ था तथा उसके हाव-भाव से स्पष्ट था कि उसके जबड़े में तकलीफ है। वह दाने को अपनी चोंच से उठा पाने में असमर्थ लग रहा था। इस मार्मिक दृश्य से उनका हृदय उद्वेलित हो उठा।
वैज्ञानिकों की एक गोष्ठी में डा. सिग्लर ने उक्त घटना का उल्लेख करते हुए कहा, “मानवोचित गुणों दया, करुणा, सेवा, सहयोग के आधार पर ही मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। किन्तु अन्य प्राणी भी इन प्रवृत्तियों से रहित नहीं हैं। परमात्मा ने उन्हें भी सहयोग, सहानुभूति, सम्वेदना से युक्त कर रखा है। आज मनुष्य अपनी मूल प्रवृत्तियों से अलग भले ही हट गया हो किन्तु ये नगण्य प्राणी अपनी संवेदनशीलता से मनुष्य को चुनौती देते हैं।”
परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में अतिरिक्त क्षमताएँ, विशेषताएँ दीं। सोचने-विचारने के लिए बुद्धि दी कि वह अपने छोटे से परिवार ही के भरण-पोषण तक उलझ कर न रह जाए, मानव समूह से भी आगे बढ़कर प्राणि मात्र की समस्याओं को हल करे, उनकी देख-रेख एवं सहयोग करे। किन्तु देखा यह जा रहा है कि अन्य जीव-जन्तुओं को सहयोग करना तो दूर रहा वह अपने सजातीय मनुष्य तक अपनेपन का विस्तार न कर सका। व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति में लगी बुद्धि सम्वेदनाओं को रौंदती चली गई और मनुष्य अपनी गरिमा को खो बैठा।
सृष्टि के अन्य प्राणियों ने परमात्मा द्वारा प्रदान की गई क्षमता का भरपूर उपयोग किया। कभी-कभी तो इनकी करुणा, सहयोग एवं मैत्री की प्रवृत्ति को देखकर हैरत में पड़ जाना पड़ता है।
आस्ट्रेलिया के जंगलों में पाये जाने वाली चिंपेंजी को एक अमेरिकी पर्यटक ने एक मिठाई का डिब्बा दिया। डिब्बा को खोल कर खाने की बजाय वह लेकर जंगल की ओर चला। कौतूहल वश उक्त पर्यटक ने चिंपेंजी का पीछा किया। आगे बढ़ने पर देखा कि चिंपेंजी एक स्थान पर जाकर रुक गया तथा मुँह से विचित्र प्रकार की आवाज निकाली। फलस्वरूप सात आठ चिंपेंजी दौड़ते हुए चले आये। वे अलग-बगल की झाड़ियों में छिपे थे। सभी ने एकत्रित होकर मिठाई के डिब्बे को खोला तथा डिब्बे को जमीन पर उलट दिया। एक घेरे में बैठ कर सभी मिठाई को खाने लगे। किसी प्रकार का झगड़ा आदि उन्होंने नहीं किया। बिना किसी ईर्ष्या भाव के सबने मिठाई खायी।
जानवरों में इतनी एकता, सामूहिकता एवं सहयोग, करुणा, दया की भावना देखी जा सकती है तो मनुष्य को क्षमता, योग्यता तो और भी बड़ी-चढ़ी है। शक्ति, सामर्थ्य एवं बुद्धि जैसी विभूतियाँ मनुष्य के पास ऐसी हैं कि इनका सदुपयोग मानवीय गुणों के पोषण, अभिवर्धन एवं प्रसार के लिए कर सके तो मनुष्य ही नहीं अन्य प्राणियों के दुःख-दर्द निवारण का ठोस आधार बन सकता है।
मनुष्य की महत्ता का प्रतिपादन उसकी शक्ति, बुद्धि बल के आधार पर नहीं किया गया है वरन् उसकी भाव-संवेदनाओं करुणा, दया, सेवा, सहयोग जैसे श्रेष्ठ गुणों के आधार पर किया गया है। आवश्यकता इसकी है कि मनुष्य अपनी गरिमा समझे तथा उसके अनुरूप आचरण करे। सामान्य जीवों से भी इसकी प्रेरणा ली जा सकती है।
अच्छे काम करने की प्रेरणा प्रायः सभी के मन में उठती है पर वे इसलिए टलते रहते हैं कि तुरन्त लाभ देने वाले कार्य ज्यादा आवश्यक लगते हैं। सत्कर्मों का परिणाम देर में मिलता हैं, उनमें तुरन्त कोई लाभ होता भी नहीं दिखाई देता इसलिए उन्हें पीछे के लिए छोड़ दिया जाता है। यह सोचना गलत होगा कि सत्कर्मों की पुण्य प्रेरणा किसी के मन में उठती ही नहीं है आखिर तो सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि अच्छे कामों का फल अन्ततः अच्छा ही मिलता है पुण्य परमार्थ से आनन्द उल्लास की प्राप्ति होती है, इस तथ्य से कौन अनभिज्ञ होगा।
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि सत्कर्मों के पुण्यफल से अवगत होते हुए भी अधिकाँश व्यक्ति उनसे विरत क्यों होते हैं या क्यों टालते रहते हैं? इसका एक ही उत्तर है कि मृत्यु को या तो भुला दिया गया है अथवा भूलने की चेष्टा की जाती रहती है। रोज अनेकों व्यक्ति अपनी आँखों के सामने मरते रहें, चलते फिरते कितनों को ही अकस्मात् मृत्यु के मुख में गिरते देखा जाता रहे, फिर भी यह विचार अपने भीतर बना रहता है कि अपने साथ ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। क्षण भर को यदि इस तरह का विचार आ भी जाए तो तत्क्षण दूसरा विचार लहर की भाँति उठता है और उस विचार को नष्ट करता हुआ चला जाता है।
यदि इस तथ्य को स्मरण रखा जाय कि मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है अगले ही क्षण आ सकती है तो उस स्थिति में सुर-दुर्लभ इस शरीर और उसके साथ मिली विभूतियों के सदुपयोग की प्रेरणा मन में उठती, उमगती रह सकती है। यदि मृत्यु को स्मरण रखा जाता तो निश्चित ही यह प्रश्न भी मन में उठता रहता कि प्राप्त विभूतियों के साथ जो जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं उन्हें पूरा करने के लिए कुछ किया जा रहा है या नहीं।
मृत्यु एक ऐसा अनागत अतिथि है जो किसी भी क्षण सामने आकर खड़ा हो सकता है और उस स्थिति में यह नग्न यथार्थता प्रस्तुत होती है कि पेट और प्रजनन के लिए अब तक जो कुछ किया जाता रहा उसकी कोई अर्थवत्ता नहीं सिद्ध हुई। अस्तु अपनी दिनचर्या में उपासना की तरह एक ऐसा समय भी निश्चित रखना चाहिए जिसमें मृत्यु का स्मरण किया जाए और इस बात का विश्लेषण किया जाय कि जो क्रम चल रहा है वह अर्थपूर्ण है या निरुद्देश्य पेट प्रजनन के लिए ही चलाया जा रहा है।
इस चिंतन स्मरण के साथ ही वह दृष्टि भी विकसित होगी जिसके आधार पर प्रस्तुत जीवन का सदुपयोग हो सके। सृष्टि के अन्य जीवों की आँख से देखा जाय तो मनुष्य असीम सुविधा साधनों से सम्पन्न अवतारी सत्ता ही है। उसी अंश अवतार जैसी सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की भूमिका में मनुष्य को भी संलग्न रहना चाहिए, पर यह इसलिए विस्मृत हो जाता है कि हम मृत्यु को भुला बैठते हैं और यह सोचते तक नहीं कि मरण निकट है। इसी कारण यह भी भुला दिया जाता है कि उपलब्ध अवसर को नष्ट किये बिना पूरी सजगता के साथ उस ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में लगना चाहिए जिसके लिए कि यह जीवन मिला है।
जिन्हें मरण के उपरान्त आने वाली समस्याओं का ज्ञान है, जो उन्हें सुलझाने में निरत हैं। उनके लिए मृत्यु का स्वरूप अगली कक्षा की तैयारी जैसी है विद्यार्थी अगली कक्षा में पहुँचने के लिए जिस प्रकार दिन रात श्रम करते हैं, व्यस्त रहते हैं उसी प्रकार उन व्यक्तियों को भी व्यस्त देखा जा सकता है जो मृत्यु को स्मरण रखे रहते हैं। भगवान शंकर को इसी से मृत्युँजय कहा जाता है कि वे मरघट में निवास करते है, श्मशान भस्म शरीर में लगाते हैं और गले में मुंडमाला पहनते हैं। इन प्रतीकों को अर्थ मृत्यु की प्रतिमा को सामने रख कर चलने की प्रेरणा ही है। निश्चित ही वे व्यक्ति मृत्युँजयी, होते हैं जो मरण को सामने रखकर चलते हैं और अपना जीवन क्रम इस तरह का श्रेयष्कर बनाते हैं जिससे अपने जीवन में भी शान्ति रहे और समाज तथा भावी पीढ़ी को भी प्रकाश मिले।
धरती और समुद्र के चप्पे-चप्पे पर कब्जा कर लेने के बाद अब मनुष्य की लिप्सा आकाश पर आधिपत्य जमाने की है। उपार्जन तो इस खोखले बेपेंदी के लोटे से क्या होना है, पर जासूसी करने तथा लड़ाई का मोर्चा खड़ा करने के लिए यह क्षेत्र अधिक सुविधाजनक समझा जा रहा है। अस्तु लोभ संवरण भी नहीं होता। अन्तरिक्षयानों में जितनी धन राशि व्यय होती है उसे सुनने पर कानों को यह विश्वास नहीं होता कि इतना वैभव धरती पर लगाने से तो उसकी समृद्धि में चार चाँद लग सकते थे फिर असीम को मापने की विडम्बना में इतना अपव्यय आखिर किया ही क्यों जा रहा है?
आकाश की स्थिति जाँचना बुरी बात नहीं है, पर उससे पहले धरती की उपलब्धियों को अधिक बढ़ाने और उनका सही विवरण करके वर्तमान जन समुदाय को दरिद्रता, रुग्णता और अशिक्षा जैसी विपत्तियों से बचाना भी तो एक काम है। धरती को श्मशान बनाने वाले अन्तरिक्ष का दोहन करने से पूर्व यदि इस प्रकार सोच सकने में समर्थ होते तो यह परिस्थितियाँ ही सामने न आने पाती जिनके लिए आज जन-जन को चिन्तित होना पड़ रहा हैं।
इन दिनों प्रायः चार हजार छोटे-बड़े अन्तरिक्ष यान आकाश में परिभ्रमण कर रहे हैं। अगले दिनों इनका विस्तार जिस क्रम से किया जाना है योजना के अनुसार सन् 2000 तक इसमें से अत्यधिक वृद्धि होने से एक नई कठिनाई यह उत्पन्न हो जायगी कि पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमने के लिए कोई उपयुक्त परिक्रमा पथ तक शेष नहीं रह जायगा। इन उपग्रहों की औसत आयु 10 वर्ष मानी गई है। यन्त्र का कार्य काल असीम नहीं होता उनके पुर्जे घिसते हैं फलतः उनकी कार्य शक्ति भी समाप्त हो जाती है। उपग्रह प्रेषण का सिलसिला सन् 71 से आरम्भ हुआ है। अब उनका मरणकाल आरम्भ होने ही वाला है इन लाशों की विधिवत् अन्त्येष्टि न होने से उनके अंजर-पंजर अन्तरिक्ष को महामारी के दिनों वीभत्स बने हुए श्मशान से भी बुरे हो जायेंगे। अन्तरिक्ष शाटल बनने और मलवा धरती पर लाने की योजना पूरी होने में तो अभी बहुत देर है।
स्काईलैब अब तक छोड़े गये अन्तरिक्ष यानों में सबसे बड़ा था। यह प्रति 63 मिनट पर पृथ्वी की एक परिक्रमा करता था? पृथ्वी से 836 कि.मी. ऊँचाई पर उसका परिक्रमा पथ था। अनुसन्धान कार्य के लिए सन् 1673 में तीन वैज्ञानिकों के दल ने इसमें बैठकर यात्रा की। प्रथम दल 28 दिन, दूसरा 56 तथा तीसरा 84 दिन तक यान में अन्तरिक्ष के संदर्भ में शोध कार्य करता रहा। तीनों दलों ने सूर्य का 740 घण्टों में टैलिस्कोप द्वारा अवलोकन करके 17500 से भी अधिक चित्र खींचे। स्काईलैब द्वारा कुल मिलाकर 46 हजार से अधिक चित्र लिए गये। इन चित्रों की 64 किलोमीटर लम्बी जानकारी एवं आँकड़ा पट्टी तैयार हुई है। सूर्य की इलेक्ट्रानिक आकृतियाँ टेलीस्कोपिक चित्र एक्सरे अल्ट्रावायलेट और दृष्टिगोचर प्रकाश में बनाए गये।
स्काईलैब में अनुसन्धान कर्ता अपने साथ दो मकड़ियाँ एवं हजार ‘जिप्सी’ पतंगे ले गये थे। उद्देश्य यह था कि मकड़ियाँ क्या अन्तरिक्ष में भी जाला बना सकती हैं। आरम्भ में तो वे असफल रही, किन्तु कुछ समय बाद जाला बनाने में सफल हो गई। पतंगों ने अन्तरिक्ष में भी उसी प्रकार अण्डा दिया जैसे पृथ्वी पर?
बताया गया है कि सूर्य की लपटें अत्यधिक बढ़ जाने से उस यान पर प्रभाव पड़ा और उसके यन्त्र गड़बड़ा गये। ईंधन की भी कमी पड़ी। फलतः वह नीचे की ओर खिसकने लगा और जैसे-जैसे नीचे उतरता आया वैसे ही वैसे अनियन्त्रित होता गया।
गिरते-मरते समय तक उसने अपनी विचित्र गतिविधियों से नियन्त्रण कर्ताओं को बुरी तरह छकाया वे कम्प्यूटर, उसकी गतिविधियों के सम्बन्ध में जो आशा करते थे उससे विपरीत ही घटित होता रहा। अन्तिम क्षणों उसने सीधी चाल छोड़ दी और लहराता, उछलता और थरथराता हुआ चलने लगा। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते समय न जाने उसे किसी बिच्छू ने काटा कि अचानक साठ मील ऊँचा उछल गया और फिर औंधे मुँह उसी दहलीज पर आ गिरा। घुसने को छेद तो बना लिया, पर वायु के घर्षण से जिस तरह अन्य उल्काएँ जल जाती हैं वैसा उसे सहन नहीं करना पड़ा। अनुमान था कि बहुत ऊपर ही वह जलने लगेगा और उसके छोटे-छोटे टुकड़े बड़े क्षेत्र में छितराते दिखाई देंगे, पर वैसा तो नहीं हुआ। पृथ्वी से टकराने में कुछ ही क्षण शेष रह गये तब कहीं उसके दो टुकड़े हुए और वे टुकड़े धरती के अति निकट आने पर ही छोटे टुकड़ों में विभाजित हुए। ‘नासा’ के सूचना केन्द्र यही कहते रहे, स्काईलैब के सम्बन्ध में लगाये गये अनुमानों में से अधिकाँश गलत साबित हो रहे हैं। वह कब गिरेगा, कहाँ गिरेगा, इसकी पूर्व सूचना दे सकना सम्भव नहीं रहा। कुछ मिनट पहले ही वस्तुस्थिति बताई जा सकेगी।
स्काईलैब के अन्तिम क्षण बड़े रोमाँचकारी रहे। धरती से जब वह 63 मील ऊपर रह गया तो अफ्रीका के ऊपर से गुजरते समय 11 जुलाई की रात को 3 बजकर कुछ मिनट पर उसके ‘सोलर पैनल’ उखड़े। फिर भी गिरे नहीं, उसी में अटके रहे। उसका कुछ भाग आस्ट्रेलिया के दक्षिण, पच्छिम और कुछ हिन्द महासागर कुछ अटलाँटिक में जा गिरा। जब वह धरती से कुल 22 मील दूर था तो वैज्ञानिकों ने फिर उस पर एक घूँसा मारा। उसका इतना ही प्रभाव हुआ कि अमरीका के असोसियन द्वीप पर गिरने की उसकी सम्भावना टल गई और उपरोक्त स्थानों पर उसके टुकड़े 10 जुलाई की रात्रि को प्रायः दस बजे जा गिरे। यह यान छः वर्ष के लगभग जिया इस अवधि में उसने पृथ्वी की 35000 परिक्रमाएँ करने का पुण्य अर्जित करने के लिए 416 किलोमीटर की गति से अनवरत परिभ्रमण किया।
यूनाइटेडस्टेट्स, की सूचना के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में पहुँचते ही स्काईलैब विखण्डित हो गया। बीस से लेकर तीस टन तक के टुकड़े पृथ्वी पर गिरने के पूर्व अग्नि गोलों के रूप में घूमते देखे गये। ‘रे स्मिथ’ नामक एक आस्ट्रेलियन अधिकारी का कहना है कि स्काईलैब के टुकड़ों के गिरत समय वर्षा एवं आँधी से मिश्रित ध्वनि के समान आवाज सुनायी पड़ी रेंकर रे सेलर’ नामक वैलोडोनिया के एक व्यक्ति का कहना है कि यह एक अविश्वसनीय दृश्य था। वैलोडोनिया के दस मील दूर स्थित छुट-पुट बस्तियों के चारों ओर ऐसा लगा कि एक साथ सैंकड़ों तीव्र प्रकाश से युक्त टुकड़े एक साथ नीचे आ रहे हों। पहले तो प्रकाश का रंग सफेद था किन्तु पृथ्वी के निकट आने पर मन्द लाल में परिवर्तित हो गया। लगभग एक मिनट तक शब्द तरंगी भयंकर गर्जन सुनायी पड़ा। इस तीव्र ध्वनि को सुनकर अस्तबल में बँधे घोड़े बन्धन तोड़कर पागलों की भाँति भागने लगे। कुत्ते भौंकने लगे देखने वालों का कहना है कि जानवरों के स्वभाव में इस प्रकार का परिवर्तन पहले कभी नहीं देखा गया। पृथ्वी से टकराने के उपरान्त समीपवर्ती क्षेत्रों से लगभग आधे घण्टे तक विचित्र प्रकार की दुर्गन्ध आती रही। ‘सेलर’ की पत्नी एलिजावेथ ने पत्रकारों को बताया कि प्रचण्ड गर्जन के कारण हृदय काँप उठा। उन्होंने कहा कि मेघ गर्जन से तीन गुनी तीव्र आवाज गिरते हुए टुकड़ों की थी। एक पत्रकार का कहना है कि मात्र 18 मिनट के विलम्ब के कारण स्काईलैब आस्ट्रेलिया में गिरा अन्यथा वह अमेरिका में ही गिरता। कैप्टन विल एंडरसन ने जो ‘पर्थ’ नामक स्थान से 130 मील दूर मरीजों की देखभाल में लगे थे, कमरे की खिड़की से दूर तीव्र नीले प्रकाश से युक्त टुकड़ों को गिरते देखा। जो नीचे आते ही गुलाबी-लाल में परिवर्तित हो गया।
पर्थ के आपत्तिकालीन सुरक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मात्र 8 मिनट पूर्व उन्हें यह सूचना दी गई कि स्काईलैब वहाँ पृथ्वी से टकराने जा रहा है। उक्त अधिकारियों ने कहा कि इस आकस्मिक सूचना से ऐसा लगा जैसे कि हृदय की धड़कन रुक गई हो। निरीक्षण करने वाले “व्राडिया स्मिथ” नामक एक ‘पर्थ’ अधिकारी का कहना है कि आग से भरी ट्रेन के समान चारों ओर टुकड़े गिरने लगे जो सुनहरे पीले एवं गहरे लाल रंग के थे।
77 टन भारी महादानव 1.8 कि.मी. प्रतिदिन की गति से पृथ्वी की कक्षा में प्रविष्ट कर रहा था। नासा के उद्घोषकों ने यह सम्भावना व्यक्त की है कि 12 मंजिली इमारत जैसी ऊँची यह आकृति जो लगभग 822 फीट ऊँची तथा 30 मिलिट्री ट्रक के वजन के बराबर है, भयंकर क्षति पहुँचा सकती है। 82.2 फीट लम्बी एवं 22 फीट व्यास वाली स्काईलैब पृथ्वी कक्षा में पहुँचकर लगभग 500 टुकड़ों में बँट जायेगी इनमें कुछ टुकड़ों का भार एक टन से भी अधिक होगा। जो 6400 कि.मी. लम्बे और 160 कि.मी. चौड़े भाग को प्रभावित करेगा। एल्युमीनियम के बने 5000 पौण्ड भारी तथा 22 फीट व्यास वाले अनेकों टुकड़े पृथ्वी से टकरायेंगे। पर वे सभी घोषणाएँ आँशिक रूप से ही सत्य सिद्ध हुई।
स्काईलैब में 4000 पौण्ड भारी फिल्म वाल्ट लगी थी। 2600 पौण्ड के छः टाइटेनियम के आक्सीजन टैंक जुड़े थे। जिन्हें पृथ्वी की कक्षा में आते ही टूट कर अलग होना था। पर “नासा” के वैज्ञानिक सारे प्रयत्न करने के बावजूद उसके गिरने का समय और स्थान सुनिश्चित रूप से नहीं बता सके। वे इतना ही कह सके- अन्तिम 48 घण्टे अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। उस अवधि में भारत के घनी बस्ती के किसी क्षेत्र को तत्काल खाली कराना पड़ सकता हैं। एयर इंडिया की उड़ानें 2 दिन बन्द रखनी होगी। ऐसी सम्भावना व्यक्त की गई है कि स्काईलैब का 60 प्रतिशत मलवा पृथ्वी की कक्षा में पहुँचते ही जल जायेगा। 40 प्रतिशत लाल धातु के गोले जिनका वजन 2 से 200 कि.ग्रा. होंगे, पृथ्वी से टकरायेंगे। इनका तापक्रम 4000 से.ग्रे. होगा।
नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक 150 व्यक्तियों में से 1 को चोट लगने की सम्भावना है। इन्दौर के होल्कर विश्वविद्यालय के अन्तरिक्ष विज्ञान के प्रो.डा. आर.यस. श्रीवास्तव का कहना है कि महाराष्ट्र गुजरात, मध्यप्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, दक्षिण बिहार, उड़ीसा प॰ बंगाल में गिरने की अधिक सम्भावना है। उनका कथन था कि उसे गिरता हुआ देखने में अन्धता होने का भय है। उससे उत्पन्न विषैले पदार्थों से कैन्सर रक्त स्राव, रक्ताल्पता, आँखों में जलन, सिर दर्द जैसी बीमारियों के होने का खतरा है। आनुवांशिकता पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिकन सरकार ने संसार की प्रमुख सरकारों को खतरे की सम्भावना से अवगत रखा और सुरक्षा उपाय क्या हो सकते हैं उसकी जानकारी दी। क्षतिग्रस्तों की सहायता करने का आश्वासन भी दिया गया। सम्भावना भारत पर भी गिरने की थी इसलिए अपने देश की सरकार ने अग्निशामक दलों को तैयार रहने का प्रबन्ध किया। हवाई उड़ाने रोकी तथा दूसरे सुरक्षा प्रबन्ध किये।
उल्काओं के इतिहास में यह मनुष्य कृत खगोल पिण्ड धरती पर गिरने का प्रथम अवसर था इसलिए उसके टुकड़े संग्रह करने की होड़ बढ़ी और उसके लिए कई प्रकार के इनाम घोषित किये गये।
स्काईलैब के टुकड़े खोज निकालने वाली के लिए कई संस्थानों ने लम्बे चौड़े इनामों की घोषणा की। ओहियो रेडियो स्टेशन ने घोषणा की कि स्थानीय क्षेत्र में गिरा स्काईलैब खण्ड जो सर्वप्रथम लायेगा उसे 98 हजार डालर इनाम मिलेगा। सान फ्रांसिस्को के ‘इक्जामिनर’ पत्र ने ऐसा टुकड़ा लाने वाले को 10 हजार डालर का पुरस्कार घोषित किया। अमेरिका के ‘क्रानिकल’ अखबार ने स्काईलैब के क्षतिग्रस्तों को दो लाख डालर देने घोषणा की। डीक एण्ड कम्पनी ने स्काईलैब के टुकड़े सोने के बराबर मोल में खरीदने का विज्ञापन छपाया।
स्थिर जलाशय में भारी पत्थर जोर से फेंका जाय तो पानी उछलेगा और असाधारण स्तर की लहरें उत्पन्न होंगी और समूचे जलाशय में फैलती दिखाई पड़ेगी। उल्काओं के उपद्रव इसी प्रकार के होते है। पृथ्वी के चारों ओर वायु मंडल तथा अन्याय पदार्थों के कई आवरण चढ़े हैं। सूर्य की प्रचण्ड किरणों तथा अन्तरिक्ष में विद्यमान भयंकर शक्ति प्रवाहों से यह कवच ही सुरक्षा व्यवस्था बनाता है। उल्काएँ इस छत्र को तोड़ती हुई जब भीतर घुसती हैं तो पानी में पत्थर पटकने की तरह यहाँ के सुव्यवस्थित क्रम में भारी व्यतिरेक उत्पन्न करती है। इतना ही नहीं अपने साथ ऐसी छूत भी समेटें होती है। जो धरती निवासियों के लिए इस या उस प्रकार की विपत्ति उत्पन्न करें। कवच में प्रवेश करते समय जो छिद्र होता है। उसमें होकर कई प्रकार की ब्रह्माण्डीय किरणें तथा वस्तुएँ भी प्रवेश कर सकती हैं और उस विजातीय द्रव का आगमन पृथ्वी वासियों के लिए कई प्रकार का संकट उत्पन्न कर सकता है। स्काईलैब जिस समुद्री इलाके में गिरा है उसे जल पीने के लिए कुछ समय तक निशिद्ध कर दिया गया है ताकि वहाँ कोई विपत्ति उतरी हो तो उसकी जाँच पड़ताल की जा सकें।
भारतीय खगोल विद्या के अनुसार ‘उल्कापातों को अशुभ माना गया है और उसके होने का प्रतिफल पृथ्वी के वातावरण और प्राणि समुदाय के लिए हानिकारक कहाँ गया है। जिस वर्ष अधिक उल्कापात हों उस वर्ष प्रकृति सन्तुलन गड़बड़ाने और कई प्रकार के संकट आने की फल श्रुति बताई जाती है। कारण स्पष्ट है उल्काएँ असंतुलन और संकट ही उत्पन्न कर सकती हैं।
स्काईलैब को जन संकुल क्षेत्र से दूर गिराने और उसके द्वारा होने वाली क्षति को हलका करने के लिए वैज्ञानिकों के अपने ढंग से प्रयत्न किये हैं। प्रसन्नता की बात है कि इस क्षेत्र में आध्यात्म उपचार भी हुए यह इस बात का चिन्ह है कि स्थूल को प्रभावित करने वाले विज्ञान की तरह सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने वाले ‘अध्यात्म’ भी सामयिक समस्याओं के सम्बन्ध में जागरूक है। यह उज्ज्वल भविष्य का शुभ चिन्ह है। गायत्री परिवार के लाखों परिजनों ने जुलाई मास में जो निर्धारित साधना की उसे सूक्ष्म संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण ही माना जायगा। इसी से मिलता-जुलता एक साधनाक्रम अमेरिका में भी उन दिनों पाया गया था। बुलियन नगर के मनःशक्ति संस्थान के अधिष्ठाता सी. क्रिल्हन ने अपने प्रायः एक लाख अनुयायियों सहित ऐसी ही सुरक्षा साधना सम्पन्न की थी।
विघातक शक्तियों और परिस्थितियों के दुष्परिणाम सर्वविदित हैं। विघातक शक्तियाँ यदि जागरूक हो सकें और सुरक्षा एवं सृजन प्रयत्नों में जुट सकें तो प्रवाह ही उलट सकता है और आतंक का स्थान उल्लास ले सकता है। स्काईलैब पतन ने विज्ञान को झकझोरा और नये सिरे से विचार करने के लिए विवश किया है। उसने अध्यात्म क्षेत्र में भी संरक्षण एवं सृजन के लिए बड़े पग उठाने का उत्साह उत्पन्न किया है। इसे बुराई के पीछे विद्यमान भलाई की शक्ति का दर्शन कह सकते हैं।
सत्यदेव परिव्राजक ने अमरीका में एक सम्पन्न घर के लड़के को अखबार बेचते देखकर पूछा-बेटा तुम्हें इसकी क्या जरूरत? बच्चे ने उत्तर दिया- श्रीमानजी अपनी उन्नति चाहने वाले के लिए कठिनाई का यह प्रारम्भिक अभ्यास ही आवश्यक है।
आज मनुष्य जितनी प्रगति कर सका है, उसके महत्वपूर्ण आधारों में से एक बौद्धिक सम्पदा का पीढ़ी-दर पीढ़ी संरक्षण सम्वर्धन भी है। ज्ञान ही प्रगति की आधार शिला है। ज्ञात रहित मनुष्य अन्य पशुओं की तरह ही आदिम, अनगढ़, अपरिष्कृत, प्रवृत्तियों, आवेगों से परिचालित जीवन जीता है और मानवीय गरिमा का अर्थ तक नहीं समझ पाता।
अज्ञानी व्यक्ति की सारी शक्तियाँ उसके भीतर निरुपयोगी बनी बन्द रहती है और शीघ्र ही कुँठित होकर नष्ट हो जाती है। जिन शक्तियों के बल पर मनुष्य संसार में एक-से-एक ऊँचा कार्य कर सकता है, बड़े-से-बड़ा पुण्य-परमार्थ सम्पादित करके अपनी आत्मा को भव-बन्धे से मुक्त करके मुक्ति, मोक्ष जैसा परम पद प्राप्त कर सकता है, उन शक्तियों का इस प्रकार नष्ट हो जाना मानव-जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। इस क्षति का दुर्भाग्य केवल इसलिए सहन करना पड़ता है कि वह ज्ञानार्जन करने में प्रमाद करता है अथवा अज्ञान के कारण धूर्तों के बहकावे में आकर सत्य-धर्म के मार्ग से भटक जाता है। मानव-जीवन को सार्थक बनाने, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाने और आध्यात्मिक स्थिति पाने के लिये सद्ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना ही चाहिए और विधिपूर्वक जिस प्रकार भी हो सके उसकी प्राप्ति करनी चाहिए। जड़तापूर्वक जीवन जीना मृत्यु से भी बुरा है।
ज्ञान की जन्मदात्री, मनुष्य की विवेक बुद्धि को ही माना गया है और उसे ही सारी शक्तियों का स्त्रोत कहा गया है। जो मनुष्य अपनी बुद्धि का विकास अथवा परिष्कार नहीं करता अथवा अविवेक के अभिभूत होकर बुद्धि के विपरीत आचरण करता है, वह आध्यात्मिकता के उच्च स्तर को पाना तो दूर साधारण मनुष्यता से भी गिर जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ अधोगामी एवं प्रतिगामिनी हो जाती हैं। वह एक जन्तु-जीवन जीता हुआ उन महान सुखों से वंचित रह जाता है जो मानवीय मूल्यों को समझने और आदर करने से मिला करते हैं। निकृष्ट एवं अधो-जीवन से उठकर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक जीवन की ओर गतिमान होने के लिये मनुष्य को अपनी विवेक बुद्धि का विकास, पालन तथा संवर्धन करना चाहिए। अन्य का विकास, पालन तथा संवर्धन करना चाहिए। अन्य जीव-जन्तुओं की तरह प्रकृति प्रेरणाओं से परिचालित होकर सारहीन जीवन बिताते रहना मानवता का अनादर है, उस परमपिता परमात्मा का विरोध है जिसने मनुष्य का ऊर्ध्वगामी बनने के लिए आवश्यक क्षमता का अनुग्रह किया है।
आध्यात्मिक ज्ञान सिद्ध करने में बुद्धि ही आवश्यक तत्व है। इसके संशोधन, संवर्धन एवं परिमार्जन के लिए विचारों को ठीक दिशा में प्रचलित करना होगा। विचार प्रक्रिया से ही बुद्धि का प्रबोधन एवं शोभन होता है। जिसके विचार अधोगामी अथवा निम्न स्तरीय होते है उसका बौद्धिक पतन निश्चित ही है। विचारों का पतन होते ही मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन दूषित हो जाता है। फिर वह न तो किसी माँगलिक दिशा में सोच पाता है और न उस ओर उन्मुख ही हो पाता है। अनायास ही वह गर्हित गर्त में गिरता हुआ अपने जीवन को अधिकाधिक नारकीय बनाता चला जाता है। पतित विचारों वाला व्यक्ति इतना अशक्त एवं असमर्थ हो जाता है कि अपने फिसलते पैरों को स्थिर कर सकना उसके वश की बात नहीं रहती है।
ज्ञानमूल आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का यथार्थ अर्थ विचारों को उपयुक्त दिशा में विकसित करना ही है। विचारों के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन निर्मित होता है। यदि विचार उदात्त एवं ऊर्ध्वगामी हैं तो निश्चय ही मनुष्य निम्न परिधियों को पार करता हुआ ऊँचा उठता जायेगा और उस सुख-शान्ति का अनुभावक बनेगा जो उस आत्मिक ऊँचाई पर स्वतः ही अभिसार किया करती है। स्वर्ग-नरक किसी अज्ञात क्षितिज पर बसी बस्तियाँ नहीं है। उनका निवास मनुष्य के विचारों में ही होता हैं। सद्विचार स्वर्ग और असद्विचार नरक का रूप धारण कर लिया करते हैं।
विचारों का विकास एवं उनकी निर्विकारता दो बातों पर निर्भर है- सत्संग एवं स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, सम्वेदनशील तथा प्रभावकारी होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग में रहा जाता हैं मनुष्य के विचार भी उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते है। उसी प्रकार के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।
किन्तु आज के युग में सन्त पुरुषों का समागम दुर्लभ हैं न जाने कितने धूर्त तथा मक्कार व्यक्ति वाणी एवं वेश से महात्मा बनकर ज्ञान के जिज्ञासु भोले और भले लोगों को प्रताड़ित करते घूमते हैं। किसी को आज वाणी अथवा वेश के आधार पर विद्वान अथवा विचारवान मान लेना निरापद नहीं है। आज मन-वचन-कर्म से सच्चे और असंदिग्ध ज्ञान वाले महात्माओं का मिलना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। सत्संग के लिए तो ऐसे पूर्ण विद्वानों की आवश्यकता है जो हमारे विचारों को ठीक दिशा दे सकें और आत्मा में आध्यात्मिक प्रकाश एवं प्रेरणा भर सकें। वक्तृता के बल पर मन चाही दिशा में भ्रमित कर देने वाले वाक् वीरों से सत्संग का प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा।
ऐसे प्रामाणिक प्रेरणा-पुंज व्यक्तित्व आज के युग में विरल हैं। जो हैं भी उनकी खोज तथा परख करने के लिये आज के व्यस्त समय में किसी के पास पर्याप्त समय नहीं। इन सब कठिनाइयों को देखते हुए स्वाध्याय ही सर्वोत्कृष्ट सत्संग का माध्यम सिद्ध होता है। पुस्तकें विद्वानों का बौद्धिक शरीर हैं। उनमें उनका व्यक्तित्व बोलता है। वह भी बहुत ही व्यवस्थित ढंग से।
प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को स्वाध्याय रूपी सत्संग के द्वारा ही ज्ञान का प्रकाश सरलता से मिल सकता है। इसलिए हर एक जागरूक नागरिक को जहाँ स्वयं स्वाध्याय में सदा प्रवृत्त रहना चाहिए। यह एक बड़ी लोकसेवा होगी। स्वयं भी ज्ञान-यज्ञ करना और दूसरों से भी उसे कराना एक बड़ा पुण्य-कर्त्तव्य है।
सृष्टि का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, देव, दानव सभी ने अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझा और अपने-अपने क्षेत्र में काम करने के लिए चल दिये।
अन्त के लिए शैतान बच गया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे भी कोई काम और दीजिए। भगवान चिन्ता में पड़ गये। यदि शैतान को शरीर मिल गया तो फिर इसके द्वारा उत्पन्न हुए उपद्रवों का पारावार न रहेगा। इसलिए इसे शरीर ता नहीं दिया जा सकता, पर कुछ न कुछ काम तो बताना ही पड़ेगा।
बहुत सोच कर भगवान ने शैतान से कहा-तुम्हें क्रोध का रूप दिया गया है। इस संसार में जिन्हें तुम नष्ट होने वाला समझो, उनके शिर पर चढ़ जाया करना।
तब से लेकर अब तक शैतान मारा-मारा फिरता है। उसे कोई निश्चित स्थान और काम तो नहीं मिला। पर जिसकी दुर्गति होने वाली भवितव्यता उसे दीखती है उसी के सिर पर क्रोध बनकर चढ़ जाता है।
यह तथ्य सर्व विदित है कि जिसे क्रोध आता है उसका सर्वनाश होकर रहता है। शैतान के कानून को कोई तो जानते हैं और कोई नहीं भी जानते।
संगीत विद्या संगीत विद्या का मुख्य उपयोग आजकल गाजे-बजाने और मनोरंजन करने में ही किया जाता है। लेकिन इसका उपयोग इतना मात्र ही नहीं है संगीत को नादब्रह्म कहा गया है, उसकी साधना कर मनीषियों ने ब्रह्मा प्राप्ति ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग भी सुझाया है। योगविद्या के ग्रन्थों में उल्लेख आता है। कि जिन मन्त्रों का प्रयोग कर साधक साधना की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ लक्ष्य तक पहुँचता हैं उनमें मन्त्रों का उच्चारण तो गौण है। मुख्य तो इस उच्चारण में लय को साधना है। मन्त्रों के प्रत्येक अक्षर का एक लक्ष्य नियत किया गया है। उसका सफल अभ्यास करने के बाद ही मन्त्र सिद्धि की कक्षा उत्तीर्ण की जाती है।
गुरुमुख होकर मन्त्र साधना करने का विधान भी इसी उद्देश्य से किया गया है। गुरुमुख से मन्त्र लेने का अर्थ है उसकी लय को अधिकारी सिद्ध पुरुष से सुनना व समझना ताकि उसे लक्ष्य बना कर अपना साधन अभ्यास आरम्भ किया जाय। बेद मन्त्रों का प्रभाव तभी दृष्टिगोचर होता है; जब उन्हें निर्धारित क्रम से-लयबद्ध रूप में गाया जाय। वस्तुतः मन्त्र साधनाओं में संगीत की सूक्ष्म शक्ति का महत् प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इस तथ्य को अन्यान्य रहस्यों की भाँति भले ही हम लोगों ने भुला दिया हो परन्तु विज्ञान पुनः इस दिशा में बढ़ रहा है। अब यह तो सिद्ध हो ही गया है कि संगीत का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। यह भी सिद्ध हो गय है कि न केवल मन मस्तिष्क पर वरन् मनुष्य के स्वास्थ्य पर संगी का अद्भुत प्रभाव पड़ता है।
ऐलोपैथी, नैचरोपैथी, होम्योपैथी, बायोकेमिकल चिकित्सा पद्धति आदि चिकित्सा प्रणालियों की तरह पश्चिमी देखो में संगीत से भी रोगों के उपचार विधि खोज ली गयी है और इसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जाने लगा है। पश्चिम जर्मनी के कुछ अस्पतालों में इस चिकित्सा पद्धति का सफलतापूर्वक उपयोग किया जाने लगा है। वहाँ के एक मानसिक चिकित्सालय में जो बर्लिन में स्थित है दो असाध्य मानसिक रोगी लड़कियों का संगीत से पहली बार 1962 में इलाज किया गया। ये दोनों लड़कियाँ जुड़वा बहनें थी और दोनों ही जटिल रोगों से ग्रस्त थीं।
डॉक्टर उन सभी चिकित्सा प्रयोग आजमा चुके थे। दोनों ही शारीरिक रोगों के अतिरिक्त मानसिक रोगों से भी ग्रस्त थी। कहना चाहिए उनके रोग शारीरिक कम मानसिक अधिक थे। किसी भी प्रकार के रोग में जब कोई फायदा नहीं हुआ तो एक लड़की पर डा. कुर्त्त ने सर्वथा नय प्रयोग किया। उस लड़की को एक ऐसे ग्रुप में शामिल किया गया जिसमें रहने वाले सभी रोगी असाध्य मान लिये गये थे और काफी शोरगुल करते थे। वह लड़की भी इस ग्रुप में शामिल हो गयी। ग्रुप के सभी मरीज काफी शोरगुल करते थे। इस लड़की को शोरगुल पसन्द नहीं आया और वह अस्पताल में पड़ा हुआ ड्रम बजाने लगी। जब भी रोगी चीखते, चिल्लाते, शोरगुल मचाते तभी वह लड़की ड्रम बजाने लगती।
डा. कुर्त्त का लड़की की इस हरकत पर ध्यान गया उन्होंने रोगिणी लड़की को कुछ ठप्पे दिये। अब उसने ड्रम बजाना छोड़ दिया और और उन लड़की के ठप्पों की ही धीरे-धीरे किसी वाद्य यन्त्र की तरह बजाता इससे डॉक्टर को संगीत द्वारा उसका उपचार करने की सूझी तथा कुछ ही समय बाद उसे वाद्ययन्त्र खेलने के लिए दिये जाने लगे। धीरे-धीरे वह वाद्ययन्त्रों को बजाने लगी। उसका आत्मविश्वास लौटने लगा था। शीघ्र ही उसमें इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया कि वह उप ध्वनियों का संगीत के माध्यम से उत्तर देने लगी।
इस प्रगति से डा. कुर्त्त को सन्तोष हुआ और उनका उत्साह भी बढ़ा उन्होंने निश्चय किया कि संगीत द्वारा ही उसे रोग मुक्त करने का प्रयास किया जाय। यह प्रयास प्रयोग के तौर पर ही किये गये थे, पर उनमें आश्चर्यजनक सफलता मिली। धीरे-धीरे लड़की की बीमारी दूर होती गयी और वह अपनी परिधि से निकलकर स्वस्थ लोगों के संपर्क में आती गयी। संगीत द्वारा मनोरोगों के उपचार का बर्लिन में यह पहला प्रयोग था। अन्य देखो में तो इससे पूर्व भी संगीत द्वारा मनोरोगों को चिकित्सा के सुफल प्रयोग किये जा चुके थे। लेकिन ये प्रयोग सामान्य रोगियों पर ही किये गये थे। जटिल तथा असाध्य समझे जाने वाले मानसिक रोगों के उपचार का यह पहला प्रयोग था।
अब तो संगीत को मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली अचूक औषध समझा जाने लगा है। पश्चिमी देखो में संगी त चिकित्सा दिनोंदिन लोकप्रिय होती जा रही हैं। इस चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत रोगियों को एक-दूसरे के साजों से निकलने वाली ध्वनियों का उत्तर धुनों के माध्यम से ही देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। पागल और विक्षिप्त समझे जाने वाले व्यक्तियों की मस्तिष्कीय क्षमता पहले ही प्रयास में इस योग्य तो नहीं बन पाती कि वे बतायी गयी विधि का अक्षरशः पालन कर लें। लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के साजों ने निकलने वाली धुनों को पहचानने लगते हैं तथा उन धुनों द्वारा ही उत्तर देने लगते हैं। धुनों के माध्यम से उत्तर देने का यह क्रम धीरे-धीरे शब्दों तक भी पहुँच जाता है और परिणामतः रोगी के रोगमुक्त होने में दिनोंदिन सफलता प्राप्त होने लगती है।
गत वर्ष बर्लिन में ही सम्पन्न हुई ‘अन्तर्राष्ट्रीय संगीत चिकित्सा परिषद् में कहा गया कि-जिन व्यक्तियों को विक्षिप्त मान लिया जाता है और पागल समझ कर समाज से अलग कर दिया जाता है ऐसे व्यक्ति का दिमाग वास्तव में बेकार नहीं हो जाता है। वस्तुतः लोग भावनाओं पर अत्यधिक ठेस लगने के कारण मस्तिष्कीय सन्तुलन खो बैठते है। कभी-कभी यह असर इतना गहरा हो जाता है कि वह व्यक्ति समाज की धारा से पूरी तरह कट-पिट कर अपने आप में सिमट जाता है।
संगीत में भावनाओं को जागृत करने और सम्बल देने की ही नहीं उनके परिष्कृत बनाने तथा उनका सन्तुलन साधने की भी प्रभावशाली क्षमता है। शरीर शास्त्रियों की मान्यता है कि मस्तिष्क के कुछ भाग भावनाओं को उत्तेजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संगीत का उन अंगों पर बहुत अच्छा और अनुकूल प्रभाव पड़ता है। संगीत द्वारा मस्तिष्क की उन सिकुड़ी हुई माँस-पेशियों को शक्ति मिलती है फलतः व्यक्ति को भावनात्मक बल और आनन्द मिलता है। वे पेशियाँ जो कारणवश निष्क्रिय हो जाती है पुनः सक्रिय हो उठती है। संगीत की स्वर लहरियों से तनाव हल्का होने की बात तो आम है। लोग संगीत का यह प्रयोग तो आमतौर पर करते हैं इसी नियम को एक विधि व्यवस्था के साथ रोग चिकित्सा के लिए अपनाया जाता है और अब तो जटिल से जटिल रोगों का उपचार भी संगीत द्वारा किये जाने की विधियाँ खोज ली गयी है।
वाद्ययंत्रों के माध्यम से रोगोपचार की यह पद्धति तो कुछ वर्षों पूर्व ही आविष्कृत की गयी है। अब चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान इस दिशा में भी गया है कि वाद्ययन्त्रों के अलावा गायन का शरीर व स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। बाहरी उपकरण इतना प्रभाव उत्पन्न कर सकते है तो स्वयं अपनी ही वाणी, शब्द और स्वर तो और अधिक प्रभाव उत्पन्न करते होंगे। इस विषय पर चिकित्सा शास्त्रियों का ध्यान भले ही अभी गया हो परन्तु यह तो पिछले काफी समय से जान समझ लिया है कि प्रेरक गीतों का स्वर उच्चारण मनुष्य को न केवल हल्का-फुल्का व प्रफुल्लित कर देता है वरन् उसकी कई चिन्ताओं, दबाव और तनावों तथा समस्याओं के बोझ को भी बड़ी सीमा तक समाप्त कर देता है।
भारतीय मनीषियों ने संगीत की इस शक्ति को हजारों वर्ष पूर्व पहचान कर उसका उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयोग करना आरम्भ कर दिया था। मंत्र साधना का अपना एक स्वतन्त्र विज्ञान तो है ही पर उसमें लय और गति का तालमेल बहुत कुछ संगीत की इस जीवन दात्री क्षमता के प्रयोग का उदाहरण है। कोई आश्चर्य नहीं कि संगीत का स्वास्थ्य प्रयोजन के लिए उपयोग करते-करते विज्ञान इस तथ्य को भी बहुत जल्दी स्वीकार करने की स्थिति में आ जाय।
प्रतिभाएँ ईश्वरीय अनुदान हैं वे लोक-मंगल के लिए सौंपी गई ईश्वरीय अमानत हैं। प्रतिभाशाली उस प्रतिभा का ट्रस्टा होता है। उसे चाहे जैसे खर्च करने का उसे अधिकार नहीं। वस्तुतः इस ईश्वरीय सृष्टि में मनमानी का अधिकार किसी को भी नहीं। जब स्वयं ईश्वर ने अपने को नियम-व्यवस्था में बाँध रखा है, तब और किसी के द्वारा नियमोल्लंघन क्यों कर सह्य होगा? इसलिए प्रतिभाशाली को अपनी विशिष्टता का बोध होने के साथ ही उससे जुड़े विशेष कर्त्तव्यों का भी बोध होना ही चाहिए। प्रतिभा के विशेष उपहार को अपनी वासना, तृष्णा, अहंता की पूर्ति के लिए, नहीं लोक-मंगल की पुण्य प्रवृत्ति के लिए उपयोग में लाना चाहिए। दूसरे शब्दों में प्रत्येक प्रतिभाशाली को स्वधर्म का स्मरण रहना चाहिए और धर्मनिष्ठ बनना चाहिए।
प्रतिभाशाली का पाप समाज का बहुत बड़ा अहित करता है।
ऋग्वेद के अनुसार मानव की समष्टि आत्मा अभी भी एक हो स्वर पुकारती है-”हमें देवों के पाप से बचाता जाय।” कुमार्गगामी प्रतिभाएँ जितना अहित कर सकती है, उतना कोई नहीं कर सकता हैं हम अपने पापों से भी अधिक देवों के प्रतिभाओं के पापों का दण्ड भोग रहे है और दुर्गति के गहन गर्त में पड़े कराह रहे है। इस स्थिति तक पहुँचने में हमारे प्रमाद ही नहीं देवों का पाप भी बहुत हद तक जिम्मेदार है।
प्रतिभाओं के अनेक क्षेत्र है-दर्शन, अध्यात्मक, साहित्य, राजनीति, सिनेमा, रंगमंच, नृत्य, गीत संगीत, समेत समस्त ललित कलाएँ आदि। इन सभी मानवीय विभूतियों को सत्यपथगामी होना चाहिए, अन्यथा वे समाज में अनर्थ फैलाती ह।
एक प्रतिभा और है उसने उपरोक्त सभी अन्य विभूतियों से अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान बना लिया है। उसका नाम है-धन। इन दिनों धन का वर्चस्व अत्यधिक है। सारी कलाएँ उससे हेठी पड़ गई है और लगभग सभी ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। धन का प्रलोभन देकर गायक, वादक, चित्रकार, अभिनेता, कवि, साहित्यकार, पत्रकार, धर्मगुरु, राजनेता सभी अपने वश में किये जा सकते हैं और उन्हें कठपुतली की तरह नचाया जा सकता है। अथवा यों कहना चाहिए कि सभी कलाएँ धन का कृपा कटाक्ष प्राप्त करने के लिए अपना शील सतीत्व बेचने के लिए लालायित फिर रही हैं। प्रतिभाएँ धन के द्वारा खरीदी जा रही हैं और वे खुशी-खुशी अपना आत्म-समर्पण करके उसकी इच्छानुसार नाचने के लिए बाजारू वेश्या की तरह अपना साज-श्रृंगार सजाये बैठी है। इस प्रकार आज धन, प्रतिभा शेष प्रतिभाओं की निर्देशक बन बैठी है।
धन की प्रतिभा को लोभ, परिग्रह और कृपणता के बन्धनों से छुड़ाना होगा। धनी भी एक कलाकार हैं भले ही वह कलाकारिता उचित हो या अनुचित, पर पर उसे स्वीकार तो करना ही पड़ेगा। जिन दिनों 90 प्रतिशत लोग जीवन निर्वाह की मूलभूत आवश्यकता जुटाने के लिए दैनिक आवश्यकताएँ भर पूरी नहीं कर पाते, उन दिनों किसी का धनी, अमीर, मालदार बन पाते, उन दिनों किसी का धनी, अमीर, मालदार बन जाना सचमुच किसी विलक्षण व्यक्ति का ही काम है। अधिक उपार्जन की क्षमता समझ और अशक्ति की पीड़ा से बुरी तरह कराह रही हो उन दिनों लोक-मंगल की आवश्यकताओं के आँखें मींचकर जो अर्थ संग्रह कर सकता है, अमीरी और अय्याशी जुटा सकता है,उसे पत्थर के कलेजे वाला आदमी ही कहा जायगा।धीरे अनुदार परम कृपण और स्वार्थान्ध के लिये ही यह स्थिति प्राप्त कर सकता सम्भव हैं सो इन विशेषताओं से सम्पन्न धनी व्यक्ति को महापुरुष तो नहीं, विलक्षण जरूर कहा जायगा। यह विलक्षणता ‘कला’ नहीं तो और क्या है। धनी भी कलाकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा है, उसे पीछे कौन धकेले?
इस अग्रिम पंक्ति में खड़ी प्रतिभा को कुमार्गगामी नहीं होने दिया जाना चाहिए। उसे अति नम्रतापूर्वक समझाया जाना चाहिये कि अन्य कलाओं की तरह संपन्नता भी एक परम पवित्र विभूति हैं और इसका उपयोग लोक-मंगल के लिये होना चाहिये। कमाये कोई कितना ही, पर अपने और अपने परिवार के लिये खर्च भारतीय जनता के औसत स्तर ध्यान में रखकर ही करे। बचत को उदारतापूर्वक उन कार्यों के लिए देता रहे, जिनके अभाव में मानवीय प्रगति रुकी पड़ी है। समय-समय पर सर्वमेध करके अपना सारा कोष लोक-मंगल के लिए दे डालने वाले प्राचीन काल के श्रीमंतों का उदाहरण उन्हें बताया जाना चाहिए और भामाशाह का आदर्श अपनाकर अपनी कला को सार्थक सिद्ध करने का अनुरोध करना चाहिए।
अमीरी और विलासिता का ठाठ-बाठ वाला जीवन अब अगले दिनों प्रशंसा या प्रतिष्ठा का आधार नहीं रहेगा वरन् जनता का रोष ही उभरेगा। बिना बेईमानी कमाया हुआ ही सही- पर जो पीड़ित मानवता की कराह को अनसुनी कर निष्ठुरता और कृपणता के साथ जो जमा कर रखा है वह अवांछनीय ही कहा जायेगा। अगले दिनों ऐसे संग्रही जनता की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किये जाने वाले हैं, आध्यात्मिकता और धार्मिकता तो अनादि काल से परिग्रह को- संग्रह को- पांच प्रधान पातकों में गिनती रही है। अब समाज की भावनायें भी उस संबंध में अधिक उग्र हो चली हैं। उसने धनी को संपन्न बनाने की अपेक्षा अधिक दुष्ट दुराचारी मानना आरंभ किया है और अगले ही दिनों समाजवाद, साम्यवाद की उंगलियां गले तक डालकर जो खाया उसे उगलवा लेने की तैयारी हो रही है। इस वस्तुस्थिति को समझना चाहिए और उस प्रतिक्रिया से डरना चाहिए। रूस, चीन एवं अन्य समाजवादी देशों में धनियों का बड़ा उत्पीड़न और तिरस्कार हुआ है। देर सवेरे सारे संसार में वही होने वाला है। शंकरजी को बेल-पत्र, गंगाजी को दूध और हनुमानजी को प्रसाद, महंतजी को मालपुए खिलाकर अब किसी को ईश्वरीय सहायता की आशा नहीं करनी चाहिए और लंबी माला सटकाने वाले और रोज गंगाजल पीने वाले को अपनी धार्मिकता की दुहाई अब नहीं देनी चाहिए क्योंकि इसे घड़ियाल के आंसू भर माना जायेगा। अधिक उपार्जन कर सकने वाले कलाकार की सदाशयता केवल इस कसौटी पर कसी जायेगी कि उसने व्यक्तिगत उपयोग के लिए न्यूनतम अंश लेकर शेष को लोक-मंगल के लिये उदारतापूर्वक दिया या नहीं। राजाओं के राज, जमींदारों की जमींदारी जा चुकीं अब अमीरों की अमीरी जाने को तैयार बैठी है। सरकारी टैक्सों की दर दिन-दिन बढ़ रही है। इनकम टैक्स, सुपर टैक्स, संपत्ति टैक्स, मृत्यु टैक्स आदि की कैंची तेजी से चल रही है। कुछ दिनों बाद इन झंझटों में व्यर्थ सिर फोड़ी से बचने के लिए समाज सीधे, व्यक्ति को निजी संपदा पर कब्जा कर लेगा। यह एक कड़ुई किंतु सुनिश्चित सच्चाई है। इसलिए हर धनवन्त कलाकार को पूर्व चेतावनी, नेक सलाह दी जानी चाहिये कि वह बेटे पातों के लिए दौलत जमा न करे। अमीरी का ठाठ-बाठ न जुटाये। सोने-चांदी की सलाखें जमीन में न गाढ़ें और तिजोरियां भरने के फेर में न रहें। इस व्यर्थ प्रयास में उसे सुख नहीं दुख ही मिलेगा। इस फेर में वह प्रशंसा का नहीं भर्त्सना का पात्र ही रहेगा।
बेटे पोतों के लिए- सात पीढ़ी को बैठे-बैठे खाने के लिए दौलत जमा करते जाना उनके साथ अत्यंत दुष्टता बरतना है। हराम की कमाई किसी को दुर्गुणी और पतनोन्मुख ही बना सकती है। अपनी संतान को हराम खाऊ के घृणित स्तर पर पटकने की कुचेष्टा किसी को नहीं करनी चाहिए। उन्हें पढ़ा-लिखाकर स्वावलंबी बना देन भर की बात तो समझ में आती है पर इस प्रक्रिया का औचित्य समझ में नहीं आता कि कमाऊ संतान के लिये बाप अपनी कमाई मुफ्त के माल पर गुलछर्रे उड़ाने के लिए छोड़ जाय। पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे करने के बाद बचा हुआ हर पैसा विशुद्ध रूप से इस अभाव ग्रस्त समाज को मिलना चाहिए और ईमानदारी के साथ वही असली हकदार है। बेटे को बाप की कमाई मिलनी ही चाहिए, यह सामन्तवादी अर्थ भ्रष्टता संसार में से जितनी जल्दी मिट जाय उतना ही अच्छा है।
यों, वर्तमान धनवानों ने जिस ढंग से कमाया है और जिस मनोवृत्ति से संग्रह किया, है उसे देखते हुए यही सोचा जा सकता है कि वे वह पैसा (1) बेटे, पोतों को विलासी हरामखोर बनाने के लिये छोड़ेंगे। (2) चारों, डाक्टरों, शराब घरों एवं वेश्याओं के यहाँ फेकेंगे। (3) राजनैतिक दाँव-पेचों में खर्च करेंगे। (4) विवाह शादियों में होली फूँकने। (5) अमीरी का ठाठ-बाट और शान-शौकत का ढोंग खड़ा करेंगे। (6) मरने के बाद मुकदमेबाजी और सरकारी टैक्सों में उसे बह जाने देंगे। (7) सस्ती स्वर्ग की टिकट खरीदने के लिए छुट-पुट कर्मकाण्डों के बहाने धर्म वंचकों से जेब कटायेंगे। (8) कोई तुरन्त नामवरी का या प्रतिष्ठा का लालच दिखा दे तो उसमें थोड़ा बहुत लगा देंगे। धर्मशाला सदावर्त का विज्ञापन बोर्ड भी उन्हें रुचिकर लग सकता है। (9) कोई ठग उन्हें लम्बे-चौड़े सब्जबाग दिखाकर ठग ले जा सकता है। से ही किसी औंधे-सीधे मार्ग में उनकी कमाई जा सकती है, पर मानवीय उत्कर्ष के सच्चे आधार-लोक-मानस के परिवर्तन में शायद ही इस वर्ग में से किसी की रुचि पैदा की जा सके।
दीखती निराशा ही है, पर कोशिश करनी चाहिए कि कोई विवेकशील धनी प्रतिभा दूर-दर्शिता का परिचय दे और मनुष्य को भावनात्मक परतन्त्रता के कारागार से छुड़ाने में अपनी कमाई का कुछ अंश लगा सकें। असंभव कुछ भी नहीं। एक भामाशाह उस युग में भी निकला था, जिससे राणाप्रताप की नसों में नया रक्त भरा था और पर्दे के पीछे भारतीय स्वतन्त्रता का एक गौरवपूर्ण अध्याय खोला था। हो सकता है उसकी परम्परा का कोई बीज कहीं पड़ा अंकुरित हो रहा हो और प्रोत्साहन का अभिसिंचन पाकर हरे-भरे पत्र-पल्लवों से लदकर फलने-फूलने तक बढ़ चलें। प्रयत्न इसके लिये भी करना चाहिए। धनियों को कहना चाहिये-भावनात्मक नव-निर्माण के पुण्य प्रयोजन में सहयोग देने से बढ़कर और कोई दान-पुण्य हो नहीं सकता। समझ और सदाशयता जीवित है, तो वे वस्तुस्थिति पर विचार करें और उदारता की एक बूँद उस प्रयोजन के लिये भी खर्च कर दे, जिस पर मानव जाति एवं समस्त संसार के भाग्य भविष्य बनने बिगड़ने की सम्भावना बहुत कुछ निर्भर है।
राणा प्रताप को धन के बिना भारतीय स्वाधीनता की रक्षा करता असम्भव देखा तो भामाशाह आगे बढ़कर आये। आज मानव जाति की बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक स्वतन्त्रता की रक्षा और प्रतिष्ठा करने के लिए फिर पैसे की जरूरत है। विचार क्रान्ति का रथ साधनों के अभाव में रुका खड़ा हैं। ज्ञान-यज्ञ की ज्वाला समिधाओं के अभाव में प्रज्वलित होने का अवसर प्राप्त नहीं कर रही हैं। सामाजिक कुरीतियों को फाँसी घर के कैदी को तरह समाज जकड़े पड़ा है। इन कुत्साओं और कुण्ठाओं के विरुद्ध धर्म युद्ध की भेरी तो बन गई पर कारतूस खरीदने को पैसा नहीं। सौ हर जिन्दा दिल धनी का हर फालतू पैसा इसी प्रयोजन के लिए लगना चाहिए, युग ने -भगवान् ने धनवन्त कलाकारों को इसके लिए पुकार है। ये अनसुनी कर भी रहें है और करेंगे भी, पर गाँठ यह भी बाँध रखा, जाय कि इस प्रकार ‘बचाये रखने’ की चतुरता उन्हें आज की उदारता की तुलना में अत्यधिक महंगी और अत्यधिक कष्टकारक सिद्ध होगी। कैसे? इस प्रश्न का उत्तर निकटवर्ती समय ऐसी अच्छी तरह देगा जिसका कभी विस्मरण न किया जा सकें।
संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘शिक्षण एवं साँस्कृतिक संगठन-यूनेस्को-ने शिक्षण प्रक्रिया को आजीवन चालू रखने आवश्यकता पर बल दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के शिक्षा-सम्बन्धी प्रस्ताव में भी इसी आशय की बात कही गई है तथा ऐसी विश्व-व्यवस्था बनाने का आग्रह किया गया है। कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति ज्ञान की एक शाखा से दूसरी शाखा में सरलता से आ जा सके और ज्ञान के फल को अधिकाधिक चख सके तथा जीवन का आनन्द प्राप्त करता रह सके। अमरीका, फ्राँस, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी जैसे उन्नत देशों में ऐसी व्यवस्था भी है।
अमेरिका में शिक्षा की इस प्रक्रिया को निरन्तर चालू रहने वाली शिक्षा’ कहकर पुकारा जाता है। सरकारी योजनाओं में उसका उल्लेख इसी नाम से रहता है। शिक्षा विभाग का यह बहुत बड़ा कार्य है। कम से कम 300 कालेजों और विश्वविद्यालयों में इस शिक्षा की व्यवस्था है। इसके अंतर्गत छोटे-बड़े अनेक पाठ्यक्रम निर्धारित है। सेन्ट लुई विश्वविद्यालय द्वारा 80 पाठ्यक्रम चलाये जाते है, जिनमें एक ‘आज की दुनिया में मनुष्य और ईश्वर का तालमेल जैसा विषय भी सम्मिलित हैं वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सेन्ट ‘लई-मिसूरी में उन लोगों की शिक्षा व्यवस्था भी है। जो अनिश्चित आजीविका वाले श्रमिक हैं। ऐसे लोग वहाँ शिक्षा भी प्राप्त करते है और अपनी मजदूरी भी करते हैं।
फ्लोरिडा विश्वविद्यालय ने ऐसे पाठ्यक्रम अधिक अपनाये हैं जिनके सहारे मनुष्य अधिक विनोदी बन सके और हँसता-हँसता रह सकें। इनमें एक जादूगरी, संगीत, नृत्य, अभिनय एवं विदूषक के पाठ्यक्रम भी सम्मिलित हैं।
केलोग, मिशिगन, जौर्जिया, ओक्ला, हीमा, नेंब्रास्का, न्हूहैम्पशर, इलिनोये, इण्डियाना विश्वविद्यालयों ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के लिये, दूर-दूर से आने वालों के लिये छात्रावास भी बनाये हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत जनता की बढ़ती हुई माँग पूरा करने के प्रति प्रायः प्रति वर्ष नये कम्यूनिटी कॉलेजों की स्थापना होते चलने का सिलसिला बँध गया है। संभवतः यह संख्या अगले दिनों और भी तेज करनी पड़ेगी।
वाल्टीमोर, मैरीलेण्ड के कम्यूनिटी कॉलेज ने अधिक आयु के लोगों को अधिक प्रोत्साहन देने की दृष्टि से यह नियम बनाया है कि 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को प्राथमिकता दी जायेगी और उन्हें शिक्षा शुल्क न देना पड़ेगा। कुछ ऐसे भी स्कूल हैं जो केवल छुट्टियों के दिनों में ही खुलते हैं ताकि अधिक व्यस्त रहने वाले लोग उन्हीं सुविधा के दिनों में कुछ न कुछ सिख सकें। सरकार और व्यापारिक संस्थाओं द्वारा यह परामर्श दिया जाता रहा है कि किस उद्योग में मन्दी आने से श्रमिकों की छटनी करनी पड़ेगी और किस धन्धे का विकास होने से उनमें नई भर्ती की जरूरत पड़ेगी। शिक्षित उद्योगों के श्रमिक समय से पूर्व शिक्षा प्राप्त करके नये उद्योगों के लिए उपयुक्त बन सकें और उनका स्थानान्तरण करके ही सुविधाजनक पग उठा लिये जाय इसके लिये उन क्षेत्रों में नये-नये पाठ्यक्रम चालू कर दिये जाते है। इससे छटनी और भर्ती का सहज सन्तुलन बन जाता है और किसी प्रकार की उखाड़ पछाड़ नहीं करनी पड़ती।
महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोगों का नवीनतम ज्ञान से लाभान्वित करने के लिए कई पाठ्यक्रम चलाये जाते है। जैसे अमेरिकन ला इन्स्टीट्यूट जो वकीलों को कानूनी दावपेचों सम्बन्धी उच्च न्यायालयों द्वारा दी गई टिप्पणियों और राज्य सरकारों द्वारा किये गये परिवर्तनों का सम्पूर्ण विवरण जल्दी से जल्दी पहुँचा देता है और किसी वकील को उसकी तलाश के लिए अलग से माथा पच्ची नहीं करनी पड़ती। इसी प्रकार उस देश की मेडीकल एसोसियेशन ने अपने 140,000 सदस्यों को नवीन तथ्य शोध निष्कर्षों से अवगत करते रहने के लिए 67 क्षेत्रीय केन्द्र संस्थानों की स्थापना की है। कुछ विद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों की फिल्में बना ली है और वे शिक्षार्थियों की बस्तियों में ले जाकर उन्हें दिखाते है ताकि छात्रों को विद्यालयों तक आने-जाने के समय और पैसा खर्च न करना पड़े।
सरकारी शिक्षा तन्त्र, लोक सेवी संस्थायें तथा व्यापारिक आधार पर चलाये गये प्रतिष्ठान, इन तीनों क सम्मिलित प्रयासों में ऐसा तालमेल रहता है कि हर क्षेत्र और हर वर्ग की आवश्यकता पूरी होती रहे और उनमें अनावश्यक प्रतिद्वन्दिता पैदा न होने पाये। 70 वर्षीय ब्रण्डेज ने प्रौढ़ शिक्षा को अर्थ उपार्जन का माध्यम बनाया है और वे उसमें पूरी सफल हुए है, इनके पाँच दर्ज पाठ्यक्रमों में वक्तृत्व कला से लेकर यौन शिक्षा तक की लोक रुचि की जानकारियाँ सम्मिलित है।
सतत शिक्षण की यह प्रक्रिया अत्यन्त आवश्यक है। किसी आयु-’वर्ग या समय-सीमा में शिक्षा का बाँध देना तो शिक्षा की आवश्यकता और महत्व का अवमूल्यन है। सतत शिक्षण-प्रक्रिया विज्ञान के क्षेत्र में तो इसलिए भी आवश्यक है कि नये अनुसन्धानों के कारण पुराने तथ्य पिछड़ जाते है और नवीन शोधों से लाभ उठाने के लिए नये निष्कर्ष आवश्यक होते हैं। खेल, नृत्य, पर्यटन,संगीत व सामान्य ज्ञान के सम्बन्ध में भी सर्वसाधारण को गहरी रुचि है। स्त्रियाँ दाम्पत्य-जीवन के हास-विलास, पेश-विन्यास, शिशुपालन आदि विषयों के ऊँचे, अधिक ऊँचे कोर्स पूरे करती रहती है।
अमरीका में न्यू आर्लियन्स (लुईजियैना) के अवकाश प्राप्त नाविक 81 वर्षीय लोकस टकरे ने दर्शन शास्त्र की आरम्भिक कक्षा में अपना नाम लिखवाया। इस प्रकार के कदम उठाना भारत में आश्चर्यजनक माना जाता है क्योंकि यहाँ बड़ी उम्र में स्कूली शिक्षा प्राप्त करने का प्रचलन नहीं है, पर अमेरिका में ऐसी बात नहीं है। वहाँ यह एक बिलकुल सामान्य बात है। छोटी उम्र के लड़के भी खेल-कूद पसन्द करते है और बड़ी उम्र वालों को भी इसमें रुचि रखने पर कोई रोक नहीं है। ठीक उसी प्रकार क्या बड़ी उम्र क्या छोटी उम्र इसमें नियमित रूप से विद्या पढ़ने में कोई अन्तर नहीं आता।
पौष्टिक भोजन हर आयु के लिए आवश्यक है। स्वच्छ हवा बच्चों से लेकर बड़ों तक का स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए जरूरी है। स्वस्थ मनोरंजन और निश्चिन्तता प्रफुल्लता सभी आयु वर्ग वालों के लिए आवश्यक और उपयोगी है। उसी प्रकार शिक्षा या ज्ञान भी व्यक्ति मात्र की आवश्यकता है उसके लिए आयु, स्थिति और वय का कोई बन्धक-प्रतिबन्धक नहीं है। रहा प्रश्न उसे प्राप्त करने की आयु का तो वह भी निरा संकोच है, अन्यथा ऐसा कोई कारण नहीं है कि उसे केवल बच्चों की बात ही समझा जाय और बड़ों के लिए उसकी कोई आवश्यकता वही रहे या बचपन गुर्जर जाने के बाद जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकें।
वयस्क और प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षा का महत्व समझाया जाना चाहिए और उन्हें ऐसे शिक्षण-पाठ्यक्रम सुलभ कराए जाने चाहिए, जिनमें उनके जीवन में तात्कालिक लाभ स्पष्ट दिखाई पड़े।
प्रौढ़ व्यक्तियों के शिक्षा के प्रति अनुत्साह इसलिए भी देखा जाता है कि उन्हें समय न मिलने साधन उपलब्ध न होने की शिकायतें रहती हैं। वस्तुतः तो ये कोई बड़े कारण नहीं है। जब हम ढेरों समय गपबाजी के लिए निकाल लेते हैं, अपना बहुत-सा समय और बहुत-सा पैसा अनावश्यक कार्यों में खर्च कर देते हैं तो कोई कारण नहीं है कि शिक्षा के लिए समय तथा साधनों का अभाव हो। अत्यन्त आवश्यक कार्य दूसरे जरूरी कामों को छोड़कर भी किये जाते हैं। अपना कोई प्रिय स्वजन किसी दुर्घटना का शिकार हो गय हो तो सारे काम एक ओर छोड़कर उसे देखने के लिए जाया जाता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो तो उसके लिए सभी काम एक ओर रख दिये जाते हैं। आशय यह है कि आवश्यक और उपयोगी समझे जाने वाले कार्यों के लिए समय तथा साधनों की कमी कभी बाधक नहीं बनती। यह कठिनाई उत्पन्न तब होती है जब लगता हो कि कोई व्यर्थ का कार्य करने के लिए कहा जा रहा है। सीधे शब्दों में कहा जाय तो शिक्षा का महत्व न समझने के कारण ही प्रौढ़ व्यक्ति समय न मिलने तथा साधन उपलब्ध न होने का बहाना करते है।
शिक्षा कोई खिलौना नहीं। बचपन से ही याद शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रयत्न किया जाय तो अच्छा ही रहता। परन्तु वह अवसर निकल गया तो शिक्षा इतने कम महत्व की वस्तु नहीं है कि उसे प्राप्त करने के लिए बाद में कोई प्रयत्न न किये जाय। बचपन में खिलौनों से नहीं खेला जा सका तो भी बड़ी उमर में उनकी कोई आवश्यकता नहीं रहती है। परन्तु बचपन में यदि अच्छा स्वास्थ्य नहीं बनाया जा सका तो सारी उमर ही बीमार रहकर सन्तुष्ट नहीं हुआ जा सकता। यह बहाना कोई नहीं करता कि क्या करें साहब अब तो स्वास्थ्य बनाने की उमर ही जाती रही। अब जैसा है वैसा ही स्वास्थ्य रहने दिया जाय। पहलवान बनने के लिए अच्छा होता यदि बचपन से ही दण्ड बैठक लगाई जाती। परन्तु ऐसा नहीं हो सका और बाद में किसी को पहलवानी का चस्का लगा तो वह उसी आयु में दण्ड बैठक और व्यायाम शुरू कर देता है। प्रश्न आयु या स्थिति का नहीं है। प्रश्न इस बात का है कि शिक्षा के प्रति आम आदमी का क्या दृष्टिकोण है और उसमें कौन से ऐसे परिवर्तन किये जाने चाहिए जिससे कि वह शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रवृत्त हो उठे।
सर्वसाधारण में-जिनमें अशिक्षितों की संख्या ही अधिक है शिक्षा के प्रति यही धारणा बनी हुई है कि वह बच्चों के लिए एक ऐसा काम है जिनमें बच्चों इधर उधर मारे-मारे फिरने की अपेक्षा एक स्थान पर बैठे और बँधे रह सके। इसका मूल कारण शिक्षा का मौजूदा सड़ा स्वरूप है।
शिक्षा के प्रयोजन को अभी हमारे यहाँ ठीक से समझा ही नहीं गया है। शासक वर्ग और प्रबुद्ध व्यक्ति भी उसे पर्याप्त महत्व नहीं देते। जो भी समस्यायें हमारी दिमागी जड़ता और मानसिक पिछड़ेपन से सम्बद्ध हैं, उनका उन्मूलन शिक्षा के व्यापक कार्यक्रम द्वारा ही किया जा सकता है। जाति प्रथा, मद्यपान, छुआछूत, साम्प्रदायिकता वगैरह बुराइयाँ हमारी दिमागी, गुलामी और रूढ़िवादिता के बड़े गवाह हैं, बल्कि उन्हीं की उपज हैं। इनको सिर्फ कानून बनाकर नहीं खत्म किया जा सकता। कानून एक सीमा तक मदद जरूर कर सकता है। इसमें ज्यादातर काम मानसिक प्रशिक्षण द्वारा करना है। यह काम प्रौढ़ शिक्षा द्वारा ही सम्पन्न किया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि हमारे देशवासियों का दिमागी पुनरुत्थान किया जाए, उन्हें बताया जाए कि उनके देश की तरक्की किन कारणों से रुकी हुई है, परिस्थितियों में वाँछित सुधार कैसे लाया जा सकता है। तभी हम इन सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जोरदार अभियान शुरू कर सकते है।
शिक्षा को बच्चों तक तथा उसकी उपयोगिता को आजीविका तक सीमित करने से ही इस देश में व्यापक जागृति की सम्भावनाएँ बहुत कुछ सिमट गई है। शिक्षा के विस्तार के बिना प्रबल जन-जागृति असम्भव है।
भारत में विश्व की जनसंख्या का छठवाँ भाग बसता है। शिक्षण-प्रशिक्षण के ओर समुचित नियोजन के अभाव में इतनी विपुल जनशक्ति निताँत सामान्य आवश्यकताएँ तक नहीं जुटा पा रही, विकास और प्रगति के नये क्षितिजों को छूना तो भिन्न बात है। अज्ञान और अशिक्षा के इस भयानक घातक अन्धकार को दूर करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा और सतत शिक्षा का व्यापक क्रम चलाना जाना चाहिए। सतत शिक्षा और वयस्क अथवा प्रौढ़ शिक्षा के सिद्धाँत को अमल में लाने का यह वृहत् कार्यक्रम अकेले सरकार के भरोसे छोड़ देना अपने कर्त्तव्य से मुँह मोड़ना है। सामाजिक उत्कर्ष की आकाँक्षा रखने वाले सभी प्रबुद्ध लोगों को अपने-अपने स्तर पर इस हेतु प्रयास करना चाहिए।
बेलग्रेड के एक अध्यापक श्री विस्टन डुलेस का 7 वर्षीय पुत्र लिंडन अपनी पाठशाला से वापिस लौट रहा था। रास्ते में उसे एक हार मिला। किसी यात्री का था, टूटकर गिर गया था। बालक उसे लेकर घर पहुँचा। माँ ने हार देखकर पूछा यह कहाँ से मिला है तो उसने सब बातें सच-सच कह दीं। माँ और बेटे दोनों उस हार को लेकर पुलिस थाने में जमा कर आये। बाद में पता चला कि वह 50 हजार रुपये मूल्य का हार वहाँ के एक रईस का था जो उसे पहुँचा दिया गया।
हम शताब्दियों से अपने खाने में नमक का प्रयोग करते आ रहे हैं, पर यह सोचने की कभी आवश्यकता अनुभव नहीं की कि भोजन में इसकी क्या उपयोगिता है? वायो केमिस्ट वंगे ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बताया है कि पूर्व काल में भूमि में पोटेशियम और सोडियम की मात्रा में ठीक-ठीक सन्तुलन था, पर सहस्त्रों वर्षों की वर्षा ने अधिक घुलनशील सोडियम लवणों को धो बहाया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि भूमि से उत्पन्न खाद्य पदार्थों में पोटेशियम की वृद्धि तथा सोडियम की कमी हो गई है।
मानव और मानवेत्तर प्राणी इस अभाव को पूर्ण करने हेतु आतुर है। उठे आखिर उन्हें एक चीज मिली-सोडियम क्लोराइड अथवा नमक। यह जितनी सस्ती थी उतनी ही स्वास्थ्य के लिये खतरनाक पर व्यक्ति अपने स्वाद के अखाद्य वस्तुओं को भी खाने को तैयार हो जाता है। जैसे शरीर में कैल्शियम के अभाव को कैल्शियम क्लोराइड से पूर्ण नहीं कर सकते वैसे ही प्राकृतिक सोडियम की कमी नमक खाकर पूरी नहीं की जा सकती।
शरीर पाचन यंत्रों के लिए इस प्रकार के रासायनिक पदार्थ हानिकारक है क्योंकि इन्हें कोषाणु खपा नहीं पाते। जब नमकीन भोजन किया जाता है तो थोड़ी देर बाद काफी प्यास लगती है। पाचन यन्त्र गुर्दे के मार्ग से उसे बाहर निकालने के लिए तत्पर हो जाता है। इससे आमाशय यन्त्र की श्लेष्मिक झिल्ली पर चोट पहुँचती है। शरीर के सब अंगों में गुर्दों को ही नमक से अधिक हानि होती है। नमक खाने से गुर्दे के अनेक रोगों को जन्म तो मिलता ही है। गुर्दे में सबसे पहले नमक ही बन्द किया जाता है।
यदि नमक की मात्रा इतनी अधिक है जिसे गुर्दे बहाकर बाहर निकाल पाते तो वह पैर के निचले भाग में जमा हो जाता है। और पानी एकत्र होने लगता है उनमें सूजन और दर्द शुरू हो जाता है। नमक रासायनिक प्रणाली में गड़बड़ी पैदा करता है हृदय की गति तथा रक्तचाप में वृद्धि हो जाती है। कितने ही हृदय रोग ऐसे हैं जिनमें नमक की अल्प मात्रा भी बहुत हानिकारक होती है। शरीर इसका कोई उपयोग नहीं करता क्योंकि इसमें किसी प्रकार का पोषक तत्व नहीं होता। इससे मिरगी तथा पक्षाघात की प्रवृत्ति में वृद्धि होती है। नमक स्नायविक प्रणाली को अधिक उत्तेजित करने वाला है।
आहार विशेषज्ञ चिकित्सक रेमाण्ड बर्नाड नमक को भोजन नहीं मानते। जिस तरह किसी औषधि विक्रेता की दुकान में रखे पोटेशियम क्लोराइड का प्रयोग तर्क संगत नहीं कहा जा सकता वही स्थिति भोजन के लिए नमक की भी है। इससे शरीर में कैल्शियम की मात्रा घट जाती है। प्यास शान्त करने के लिए जो द्रव्य लिए जाते है वह कैल्शियम लवण को अपने साथ बहा कर बाहर ले जाते हैं और अनेक अम्ल सम्बन्धी रोगों को पैदा कर देते हैं। शरीर अपनी आँतों में हानिकारक पदार्थों की बाहर निकालने के लिए ही पानी जमा कर लेता है।
पक्षियों के लिए नमक एक प्रकार का विष है। नमक की अधिक मात्रा खाने से सुअर की मृत्यु हो जाती है। नमक न खाने वाले व्यक्ति के लिए यह वस्तु उतनी ही आपत्ति जनक है जितनी सिगरेट न पीने वाले व्यक्ति के लिए उसका धुंआ या तम्बाकू न खाने वाले लिए तम्बाकू।
नमक का प्रयोग बिल्कुल बन्द करने की बात-भले ही अस्वाभाविक लगे पर इतना ध्यान अवश्य रखना चाहियें कि शरीर को जितने सोडियम क्लोराइड की आवश्यकता हो उतनी प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के रूप में ही मिलनी चाहिए तभी शरीर के ‘सेल’ उसे जज्ब कर सकते हैं। कभी-कभी कुछ समय अस्वाद व्रत रहा जाये तो यह अतिरिक्त विष निष्कासित करने का लाभ भी मिलता है।
नव युग का दृश्यमान अवतरण प्रभातकाल के अरुणोदय के समतुल्य माना जाय तो उसकी किरणें गायत्री शक्ति पीठों के रूप में व्यापक आलोक वितरण करती हुई प्रतीत होगी। सूक्ष्म कितना ही प्रचण्ड क्यों न हो उसका दृश्य स्वरूप स्थूल कलेवर के रूप में ही दृष्टिगोचर होता है। मानवी सत्ता चेतना होने के कारण सूक्ष्म है। जीव का स्वरूप आँखों में नहीं देखा जा सकता। तो भी उसका परिचय काय कलेवर के रूप में मिलता है। आम तौर से शरीर को ही व्यक्ति माना जाता है। व्यक्ति को ही जीव समझा जाता है। यों वस्तुतः दोनों पृथक् हैं। शरीर पंचभौतिक है और आत्मा सर्वथा अभौतिक। तो भी दोनों इस प्रकार गुथे होते हैं कि सामान्य बुद्धि उनका पृथककरण कर नहीं पाती। लोक मान्यता में जीव और शरीर का संयुक्त स्वरूप ही प्रकाश परिचय में आता और प्रभावी प्रतीत होता है। ठीक इसी प्रकार नव युग की हलचलों को अगले दिनों गायत्री शक्ति पीठों के माध्यम से परिवर्तन और सृजन की सामयिक आवश्यकताओं को पूरा होते हुए देखा जायगा।
विगलित का अभिनव के रूप में प्रत्यावर्तन ही युग परिवर्तन है। व्यष्टि में दुष्टता और समष्टि में भ्रष्टता के तत्व बढ़ गये है। औचित्य का स्थान औद्धत्य हथियाता चला जा रहा है। समूह गत सहकारिता कुंठित हो गई है और संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला है। प्रवृत्तियाँ सृजन का बहाना भर करती हैं। व्यवहार में ध्वंस ही उनकी दिशा धारा है। ऐसी दशा में बड़े परिवर्तन और बड़े परिवर्तन से कम में कम नहीं चल सकता। प्रवाह को उलटना बड़ा काम है। विशेषता निकृष्टता की सड़क पर जब आतुर घुड़दौड़ चल रही हो तो पवमानों की लगाम पकड़ना और उन्हें ....कने ही नहीं, उलटने के लिए विवश करना, एक बहुत बड़ा काम है। साथ ही अतिकठिन भी। श्रम साध्य और साधन साध्य भी। क्रान्तियों की बात करना सरल है, योजनाएँ बनने में भी देर नहीं लगती। किन्तु उन्हें कर दिखाना और सफल बनाना दुरुस्त होता है। श्रेय हलचलों को नहीं सफल प्रतिफल को मिलता है। इस दृष्टि से क्षेत्रीय और सामयिक क्रान्तियाँ भी आँशिक रूप से ही सफल हो पाती है। फिर चार सौ करोड़ मनुष्यों की मनःस्थिति और 25 हजार मील परिधि के भूमण्डल की परिस्थितियों को बदल देना कितना कठिन कार्य है, इसकी कल्पना करने भर से सामान्य बुद्धि उतनी ही हतप्रभ हो जाती है जितनी कि विशिष्ट प्रज्ञा, ब्रह्माण्ड के विस्तार और उसके अन्तराल में चलती हुई हलचलों को देखकर। फिर भी काम तो काम ही है। जो होना है वह तो होगा ही। दूसरा विकल्प नहीं। यह जीवन और मरण का चौराहा है। जहाँ आज की दुनियाँ आ खड़ी हुई है वहाँ से आगे बढ़ने के लिए दो ही मार्ग हैं एक सर्वनाश, दूसरा नव सृजन। चुनाव इन्हीं दोनों में से एक का होना है। नियति को इन्हीं दोनों में से एक का चयन करना है।
प्रस्तुत परिस्थितियों में निर्माण भूमिका सृष्टि के सूत्र संचालक को ही निभानी है। निश्चय ही उसे अपनी इस अनुपम कलाकृति का विनाश अमान्य है। छूट तो बच्चों को भी मिलती है और अभिभावक उसकी स्वतन्त्रता एवं सक्रियता को एक सीमा तक चलने भी देते हैं, पर जब बचपन विनाश से खेलने को मचलता हो तो अभिभावकों का उत्तरादयित्व आगे आता है और सहमत या असहमत होने की परवा किये बिना बालक के उद्धतता छोड़ने और औचित्य अपनाने के लिए विवश करता है। इन दिनों भी यही होने जा रहा है। सृष्टा ने समय-समय पर असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने की भूमिका निभाई है। महाविनाश की घड़ी आने तक यह क्रम चलता ही रहेगा। नियति के अन्याय निर्धारणों की तरह सन्तुलन में सक्षम विधान है, उसे सक्रिय ऐसे ही अवसरों पर होना पड़ता है, जैसा कि आज है। अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन की आवश्यकता जब भी अनिवार्य हुई है तभी वदाऽऽत्मनं सृजाम्यहं का आश्वासन मूर्तिमान होते और आश्वासन की पूर्ति करते देखा गया है। अवतार की सुदीर्घ श्रृंखला का यही इतिहास है। इसी में एक नया अध्याय, प्रज्ञावतरण का और जुड़ रहा है। आस्था संकट की सघन तमिस्रा का निराकरण ऋतंभरा प्रज्ञा की प्रभात वेला ही कर सकती है। गायत्री यही है। जनमानस का परिवार और देव युग का निर्धारण उसी तत्व ज्ञान के आलोक से सम्भव होगा। गायत्री को एक वर्ग की पूजा प्रयोजन समझा भर गया है। वस्तुतः वह इतनी स्वल्प और सीमित है नहीं। उनमें मानवी चिन्तन और चरित्र को देवत्व की दिशा में घसीटा ले जाने वाले सभी तत्व विद्यमान है। उस अवलम्बन से देव युग में स्वर्गीय परिस्थितियों का लाभ चिरकाल इस धरती के निवासी उठाते रहे है। पुनर्जीवित किया जा रहा है। इसे पुनरावर्तन मात्र समझा जा सकता है। अभिनव दीखने पर भी वस्तुतः चिर पुरातत्व है। देवयुग की वापसी आश्चर्यजनक लग तो सकती है, पर उसमें ऊषा के हर प्रभात में हर बार उदय होने के गति चक्र का परिभ्रमण मात्र ही तथ्य है।
सूक्ष्म की प्रेरणा स्थूल में हलचलें वन प्रकट होती है। ऋतुओं के बदलते ही परिस्थितियां किस प्रकार उलट जाती है इस चमत्कार से हर कोई परिचित है। शीत और ग्रीष्म की प्रतिक्रियाएँ और व्यवस्थाएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न होती हैं? वर्षा के महीने और गर्मी के दिन एक-दूसरे से कितने भिन्न होते है यह सर्वविदित है। यह सूक्ष्म परिवर्तन का स्थूल प्रभाव है। अदृश्य का दृश्य में परिणित है। मनुष्य की आस्था आकाँक्षा बदलने पर उसकी गतिविधियों और सम्भावनाओं में कितनी बड़ी उलट-पुलट होती है इसके प्रमाण आये दिन पग-पग पर देखे जाते है। बड़े और व्यापक परिवर्तन इसी प्रकार होते है। साधनों की सहायता से भी कई बार कुछ बड़े हेर-फेर देखे गये हैं। बुद्धि, कौशल और व्यवस्था विधान से भी कई बार चमत्कार दीखता है, किन्तु लोक प्रवाह बदलने जैसे व्यापक और जटिल प्रयोजन की पूर्ति चेतना जगत में उठने वाले प्रचण्ड प्रवाह ही सम्पन्न करते है।
देखने वाले देखते है और जानते वाले जानते है कि जब कभी सृजनात्मक परिवर्तन हुए है तो अंतर्जगत में आदर्शवादिता अपनाने वाली उमंगे आँधी तूफान की तरह उमँगी है और उनके प्रचण्ड प्रवाह में पत्ते तिनके तक आकाश चूमने का असंभाव्य सम्भव करके दिखाते रहे है। यही है युग परिवर्तन की सन्धि वेलाओं में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने वाली समर्थता। जो उत्पन्न तो अंतर्जगत में होती है, पर उलटकर सारे वातावरण को रख देती है। अपने समय में युग परिवर्तन की यही पुण्य वेला है। इसके अन्तराल में महाकाल का प्रचण्ड प्रयास चल रहा है उसी के फलस्वरूप अनेकानेक सृजनात्मक प्रवृत्तियां मानवी प्रयत्नों में सम्मिलित हो रही है। विवाद यह हो सकता है कि स्थूल प्रयत्नों से लोक चेतना उत्पन्न हुई या सूक्ष्म प्रवाह ने प्रयत्नों को उभारा? इस प्रश्न का निपटारा अभी नहीं हो सकता। इसे समय बीतने पर पूरी तस्वीर सामने आने के उपरान्त भावी विश्लेषण कर्ताओं के लिए शोध का विषय बने रहने के लिए छोड़ देना चाहिए। आज तो इतना ही मान लेना पर्याप्त है कि दोनों अविच्छिन्न रूप से जीव और शरीर की तरह गुथे और परिवर्तन एवं सृजन के उभय पक्षीय प्रयोजन में एक जुट होकर परिपूर्ण तत्परता के साथ तन्मय हो रहे है। सूक्ष्म जगत की प्रेरणाएँ और स्थूल जगत की प्रवृत्तियां संयुक्त रूप से नव सृजन का ढाँचा खड़ा कर रही है। प्रमुखता हलचलों की नहीं प्रेरणाओं की है।
महान जागरण और महान परिवर्तन का सूत्र-संचालन दिव्य लोक से उभरी हुई सक्रियता का उपयुक्त नाम ‘युगान्तरीय चेतना’ है। देव संस्कृति का उदय और स्वर्गीय परिस्थिति का नव निर्माण उसी का काम है। इसी ने जागृत आत्माओं को अनुप्राणित किया है। उदीप्त सूर्य की प्रथम किरणें भी तो सर्वप्रथम गिरि शिखरों पर ही चमकती है। द्वितीयचरण में दिनकर का आलोक समस्त भू-मण्डल को ही आच्छादित कर देता यों गुफाओं में अन्धेरा तो मध्याह्न काल में भी बना रहता है। युगान्तरीय चेतना को ही कितने ही दृष्टिकोण से कई रूप में समझा अपनाया जा रहा है। सामाजिक क्षेत्रों में उसे विचार क्रान्ति कहा जा रहा है। सृजन शिल्पी उसे जनमानस का परिष्कार कहते है। दार्शनिक क्षेत्र में उसे ‘ज्ञानयज्ञ’ की संज्ञा दी गई है। अध्यात्म वादियों ने उसे ‘प्रज्ञावतार’ की संज्ञा दी है। चूँकि यह प्रयोजन धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण की प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होना है इसलिए उसे गायत्री से तात्पर्य धर्मानुष्ठान के लिए प्रयुक्त होने वाले एक शब्द गुच्छक तक सीमित नहीं है वरन् उसे महाप्रज्ञा के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। उसका कार्यक्षेत्र सार्वभौम और लक्ष्य सर्वजनीन है। गायत्री शक्ति पीठों की स्थापना इसी देव चेतना को जन-जन के मन में प्रतिष्ठापित करने के लिए की जा रही है। उनका स्वरूप हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुरूप बने हुए देवालयों जैसा है। इतने पर भी उसका कार्यक्षेत्र किसी देश, जाति या धर्म की परिधि में सीमित नहीं है। उसका विस्तार विश्वव्यापी है।
कहा जा सकता है कि शक्ति पीठें हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुरूप देव प्रतिमा को आधार मानकर क्यों की गई? उनका स्वरूप सार्वभौम मान्यता के अनुरूप क्यों नहीं बनाया गया? इसका उत्तर यही है कि सार्वभौम धर्म और दर्शन भी बन नहीं सका है। उसके बन जाने पर वैसा प्रयास ही उचित होगा, पर जब तक विश्व भाषा बनी नहीं है तब तक क्षेत्रीय भाषाओं का अवलम्बन छोड़ा कैसे जाय? लक्ष्य विश्व भाषा बनने का बहुत उत्तम है। पर उसके लिए आधार खड़ा करने, वातावरण बनाने एवं सहमति पाने के लिए वर्तमान भाषाओं के माध्यम से ही प्रतिपादन और प्रचार करना होगा। लक्ष्य की मान्यता एक बात है उसे पाने की प्रक्रिया दूसरी। लोक प्रवाह को मोड़ने के लिए जनजागरण की प्रक्रिया धर्म तन्त्र से लोक-शिक्षण से ही सम्पन्न होनी है। चूँकि आज विश्व धर्म का कोई स्वरूप विद्यमान नहीं है इसलिए उसके लिए वर्तमान धर्मों के माध्यम से ही विश्व धर्म की-विश्व दर्शन की-पृष्ठ भूमि खड़ी करनी होगी। प्रभात का शुभारम्भ पूर्व से होता है। अग्रणी होने का श्रेय सौभाग्य उसी को प्राप्त है। भारत पूर्व भी है और अग्रणी भी। अध्यात्म उसकी अपनी प्रकृति और परम्परा है। अतएव शुभारम्भ का उत्तरादयित्व भी उसी के कन्धे पर आना है। ‘प्रज्ञावतार’ सार्वभौम है। ऋतम्भरा प्रज्ञा भी सर्वजनीन है। गायत्री शक्ति पीठों की योजना, रीति-नीति एवं कार्य पद्धति भी व्यापक है। प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना एवं उपचार पद्धति भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही रखी गई है। जिस देश से अरुणोदय हो रहा उसके लिए वर्तमान परिस्थितियों में वही सर्वोत्तम है। अन्य देशों में अगले दिनों इसी प्रतिष्ठापना का विस्तार होगा। तब उन क्षेत्रों की संस्कृति के अनुरूप प्रतीकों और परम्पराओं को अपनाया जायगा और वहाँ के जन मानस को सार्वदेशिकता की दिशा में क्रमशः अग्रसर किया जायगा। मुस्लिम देशों में सम्भवतः मसजिदों और ईसाई देशों में गिरजे बनाकर उसी महान उद्देश्य की पूर्ति की जायगी जिसके लिए भारतीय लोक मानस को माध्यम में रखते हुए गायत्री शक्ति पीठों की योजना बनाई गई है। उस दिन की सम्भावना सुनिश्चित है जब सभी धर्म, सभी दर्शन मिलकर एक सार्वभौम उपासना पद्धति और संस्कृति आचार संहिता निर्धारित करेंगे। उन्हीं परिस्थितियों में गायत्री शक्ति पीठों का स्वरूप सार्वभौम होगा। आज तो सार्वभौम दर्शन अपना कर चलना ही सम्भव है। गायत्री शक्ति पीठें भारतीय संस्कृति के अनुरूप बन रही है। इतने पर भी उसमें विश्व संस्कृति के समस्त बीजांकुर और प्रगति प्रयास विद्यमान देखे जा सकते है और उस सुदिन की सम्भावना झाँकती मिल सकती है, जिसमें सब कुछ सार्वभौम ही होगा। गायत्री शक्ति पीठें भी तब उसी स्तर की बन सकेगी। सब कुछ बदलेगा तो शक्ति पीठों का स्वरूप बदलने में ही क्या कठिनाई रहेगी। आज तो शुभारम्भ जिस रूप में किया जा रहा है वही सर्वोत्तम है।
प्रज्ञावतार ही पौराणिक मान्यता के अनुरूप ‘निष्कलंक’ है। यह प्रमाण पत्र हैं जिसके लिए कलंकों का आरोपण और अग्नि परीक्षा से उसका निराकरण आवश्यक है। शक्ति पीठों के निर्माण में अनेकानेक विग्रहों का खड़ा होना प्रायः वैसा ही है जैसा राम, कृष्ण बुद्ध आदि को निरस्त करने के लिए आसुरी तत्वों ने विविध छड़ रूप से आक्रमणों का सिलसिला चलाया था। इसमें बिगड़ा कम बना अधिक। प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को भी इसी प्रकार के अवरोधों में होकर गुजरना होगा। इतने पर भी सफलता की आत्मिक परिणित सुनिश्चित है। ‘निष्कलंक’ प्रज्ञावतार द्वारा युग परिवर्तन की प्रक्रिया को सम्पन्न होने में आस्थावानों को तनिक भी सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है।
जिन्हें सूक्ष्म दर्शन का आभास देने वाली दिव्य दृष्टि प्राप्त है उन्हें यह अनुभव करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि युग परिवर्तन की सुखद सम्भावनाओं को मूर्तिमान करने के लिए गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण की कितनी आवश्यकता है। स्थान न होने पर बैठा कहाँ जाय? बैठने को जगह तक न हो तो किया क्या जाय? उथले और अस्थिर कार्य तो चलते-फिरते भी हो सकते है किन्तु अनेकानेक गतिविधियों का सूत्र संचालन तो किन्हीं केन्द्रों से ही हो सकता है। गायत्री तपोभूमि, शान्ति कुंज, ब्रह्म वर्चस-गायत्री नगर आश्रमों का अस्तित्व न होता, सब कुछ चलते-फिरते ही किया जाता रहता तो जो बन पड़ा है उसका शताँश भी सम्भव नहीं था। अब मथुरा और हरिद्वार के दो आश्रम पर्याप्त नहीं रहे। प्रवृत्तियों की तीव्रता और व्यापकता ने तकाजा किया है कि आलोक वितरण के लिए अनेकानेक केन्द्रों के लिए व्यवस्था बनाई जाय। बिजली उत्पादन के लिए एक बड़ा केन्द्र हो सकता है। किन्तु हर नगर का हर मुहल्ले का सब स्टेशन थी बनता है। ट्रांस फारमर अनेक लगने पड़ते है। सत्ता भले ही दिल्ली में केन्द्रित रहे पर शासन तन्त्र को चलाने के लिए क्षेत्रीय कार्यालयों की आवश्यकता रहेगी ही। समय आगया कि युग सृजन की चेतना का एक मात्र केन्द्र या एक व्यक्ति के द्वारा सूत्र संचालन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उसके लिए सब डिवीजन चाहिए। गायत्री शक्ति पीठों को महान सूत्र संचालन तन्त्र का विकेन्द्रीकरण कहा जा सकता है। उनकी उपयोगिता आवश्यकता के प्रतिपादन में जितना कुछ कहा जा सके उतना ही कम है। उन्हें वर्तमान पीढ़ी के लिए गौरव गरिमा का और भावी पीढ़ी के लिए समय से पूर्व बड़ी बात कहने से तो कुछ लाभ नहीं। चुनाव घोषणा पत्रों की तरह इस कथन को भी अतिश्योक्तिपूर्ण और अविश्वस्त माना जा सकता है, किन्तु जन इन कल्पवृक्षों को फलित होने का अवसर आवेगा तो एक स्वर से यही माना जायगा कि उनकी आवश्यकता उपयोगिता, प्रतिक्रिया एवं सम्भावना के सम्बन्ध में जो कहा गया था, वह स्वल्प नम्र एवं संकोच युक्त था। जो होने जा रहा है उसके सम्बन्ध में इन दिनों उसको कही अधिक उत्साह वर्धक एवं आशाजनक कहा जा सकता है जो संक्षेप में और शील संकोच को ध्यान में रखते हुए कहा जा रहा है।
गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण क्रम युग शक्तियों द्वारा इन दिनों उत्साहपूर्वक अपनाया गया है। उनका ढाँचा गढ़ने में तत्परता पूर्वक प्रयत्न चल रहे है। फलतः प्रगति की दिशा में उससे कहीं अधिक हो रहा है जैसा कि योजना को घोषित करने समय कहा गया था। आरम्भ में 24 तीर्थों में 24 निर्माण की बात कही गई थी। वह संकल्प अब योजनों पीछे रह गया। इस समय तक 108 के निर्धारण का दूसरा चरण भी पूरा हो गया और 240 निर्माणों के तीसरे चरण को पूरा करने की योजना चल रही है। एक वर्ष पूरा होते-होते आगामी वसन्त पर्व तक यह तृतीय चरण पूरा हो जाने और चौथे की तैयारी चल पड़ने की सम्भावना है। चौथे चरण की संख्या क्या होगी यह अभी से बताना असामयिक होगा। यह सफलता वस्तुतः महाकाल द्वारा प्रेरित युगान्तरीय चेतना की है जिससे जागृत आत्माओं को युग की माँग पूरी करने के लिए अनुप्राणित करके रख दिया है।
निर्माण कार्य में जुटे हुए नल-नीलों का इतिहास दिखने और छापने की भी योजना है। तथ्य जब सामने आयेंगे तो प्रतीत होगा कि सामान्य स्तर के व्यक्तित्व भी आज की परिस्थितियों में भी रीछ-बानरों का-ग्वाल-वालों का-गिद्ध-गिलहरियों का-केवट और जामवन्तों का अनुकरण करने में किसी से पीछे नहीं रहे। गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण में जो सामान लगा उसका हिसाब नहीं छपेगा वरन् यह अंकित किया जायगा कि परिस्थितियाँ प्रतिकूलता रहते हुए भी अन्तःक्षेत्र में उफनती हुई दिव्य चेतना असमर्थों से भी समर्थों की तुलना में कहीं बड़ी भूमिका निभा सकना सम्भव कर सकती है। यह रहस्योद्घाटन प्रस्तुत इतिहास प्रकाशन द्वारा जब जनसाधारण के सामने आयेगा तो प्रतीत होगा कि उत्कृष्टा और आदर्शवादिता इस गये गुजरे समय में भी अपना अस्तित्व किस प्रकार बनाये और कहाँ छिपाये बैठी थी।
गायत्री शक्ति पीठें अधिक संख्या में बननी, अपेक्षित है और उस निर्माण को बिना समय गंवाये ही सम्पन्न होना चाहिए ताकि युग समस्याओं के समाधान के लिए कारगर उपाय अविलम्ब अपनाये जा सके। इन संस्थानों के माध्यम से सृजन शिल्पियों की जो चतुरंगिणी कार्यक्षेत्र से उतरने को आतुर हो रही है उसे भी निर्माण के लिए लम्बी प्रतीक्षा सहन नहीं। समय से अधिक संख्या में और अधिक जल्दी इन निर्माणों को पूर्ण करने के लिए दबाव डाला है। इस संदर्भ में अन्यमनस्कता एवं निष्क्रियता अपनाना प्रत्येक जागृत आत्मा के लिए इन दिनों प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। चुनौती को अस्वीकार करना हर दृष्टि से खेदजनक ही होगा।
दबाव को ध्यान में रखते हुए पूर्व निर्धारण को काफी उदार और लचीला बना दिया गया है। प्राचीन तीर्थों तक ही यह निर्माण सीमित रहे अब ऐसी कोई बात नहीं हैं। जागृत क्षेत्रों में सर्वत्र यह नये तीर्थ बन सकते है। भव्य भवन बनाने की जो प्रतिस्पर्धा चली थी और उसमें अधिक धनराशि लगाने के लिए दौड़-धूप चल रही थी। यों विशालता से सुविधा भी है और प्रभावोत्पादक आकर्षण शक्ति भी। फिर भी उतनी बड़ी राशि जमा करना हर किसी का काम नहीं है। उसे उंगली पर गिनने जितने व्यक्ति ही संग्रह कर सकते है। एक समय था जब धर्म संस्थान बनाने में गौरव पुण्य और यश की प्राप्ति समझी जाती थी। अब रुझान बदल गया है इसलिए धनिकों को भी उसके लिए उदार सहयोग देने के लिए सहमत कर लेना सहज नहीं है। थोड़े से भव्य भवनों पर ध्यान केन्द्रित करने की अपेक्षा यही सर्व सुलभ पाया गया कि निर्माण की राशि कम करने की बात सोची जाय। भले ही इससे भव्यता घटती हो। आवश्यक काम चलाऊ सुविधाएँ तो हर शक्ति पीठ में अनिवार्य रूप से रखी ही जानी थी। (1) देवालय (2) लेख स्थापना कक्ष (3) यज्ञशाला (4) अतिथि गृह (5) दफ्तर (6) परामर्श कक्ष (7) पाँच परिव्राजकों के रहने के लिए क्वार्टर। यह सात सुविधाएँ न्यूनतम हैं जो हर हालत में छोटी या बड़ी शक्ति पीठ में रखी ही जानी चाहिए।
आरम्भ में जो नक्शे बने थे उनमें प्रथम श्रेणी डेढ़-दो लाख की और द्वितीय श्रेणी एक-डेढ़ लाख की कूती गई थी। यह राशियाँ कठिन दिखी तो भवन निर्माण विद्या के विशेषज्ञों को बुलाकर एक नया नक्शा बनवाया गया जिसमें उपरोक्त सातों सुविधाएँ तो उपलब्ध रहें किन्तु लागत न्यूनतम आये। इस प्रयोजन के लिए नया स्पेशल डिजाइन ढूंढ़ निकाला गया है जिसकी भवन निर्माण लागत साठ हजार आती है। किन्तु जमीन में 60 ग 80 फुट से कमी नहीं होती। जहाँ मौके की जमीन मिलना दुस्तर एवं असम्भव नहीं है वहाँ छोटे शहरों में, कस्बों के लिए यही उपयुक्त है। कहीं मौके की जमीन न मिलती हो वहाँ पुराना टूटा-फूटा मकान लेकर भी उसे बनाया जा सकता है। दस हजार जमीन म का रखा जाय तो हरिद्वार की लागत के माप दण्ड से प्रायः सत्तर हजार में स्पेशल डिजाइन की दो मंजिली शक्ति पीठें बनती है। इनका नक्शा तथा विस्तृत विवरण 28 जुलाई के साप्ताहिक युग निर्माण में छाप दिया गया है।
बड़े शहरों में शक्ति पीठ बनाने की समस्या अभी भी जटिल है वहाँ मौके की जमीनें पहले से ही घिरी हुई है। जो बची थी वे होटल निर्माताओं ने सोने-चाँदी के मोल पर खरीदने की प्रतिस्पर्धा लगा रखी है। ऐसी दशा में एक तो मिलन ही कठिन है फिर कहीं कुछ गुंजाइश भी हो तो 60×80 की जमीन के लिए डेढ़ दो लाख देने की बात है। इतना यदि जमीन में ही लगाया जाय तो इमारत में कितना लगे? और फिर वह कहां से आये? शहरों को छोड़ा भी नहीं जा सकता क्योंकि शिक्षित और कुशल वर्ग देहातों से सिमटकर उन्हीं में जमा हो गया है। देहात अपना प्रधान लक्ष्य है फिर भी शहरों की ओर से आंखें मूंद भी तो नहीं रहा जा सकता। शक्ति पीठें वहां भी बननी ही चाहिए।
समाधान यह सोचा गया है कि तीर्थ स्तर की न सही प्रज्ञाभवन स्तर की इमारतें वहां बनाई जायें। मुख्य सड़क और सघन मुहल्ले से हटकर किसी खुले गली मुहल्ले में भी यह निर्माण हो सकता है। जमीन न मिले तो पुराना मकान तोड़कर भी उसे बनाया जा सकता है। बड़ी जमीनें तो ऐसी जगहों में भी नहीं मिलेंगी। इसलिए महंगे शहरों के लिए थोड़ी जमीन में बन सकने वाली एक ऐसी डिजाइन बनाई गई है जिसे तीन मंजिली बना देने से वे सातों उद्देश्य पूरे हो जाते हैं जिनकी सभी शक्ति पीठों में अनिवार्य आवश्यकता है। इस स्तर के शहरी डिजाइन में मात्र 40×40 जगह लगेगी। इसका विस्तृत विवरण 7 अगस्त के साप्ताहिक युग निर्माण में छाप दिया गया है। इमारत की लागत इसमें भी साठ हजार ही आती है। जमीन की लागत अधिक से अधिक पच्चीस हजार और सम्मिलित करनी पड़ सकती है।
सत्तर से पच्चासी हजार की राशि में प्रायः शहरी और देहाती दोनों ही स्तर की शक्ति पीठ बन सकते हैं। मजदूरी या निर्माण सामग्री कहीं हरिद्वार की तुलना में सस्ती पड़ती हो तो लागत और भी घट सकती है। यह राशि इतनी बड़ी नहीं है कि उत्साही और प्रतिभाशाली कुछ व्यक्ति कहीं भी उठ खड़े हों तो उसे संकलित न किया जा सके। शक्ति पीठों के लिए चंदा देने वालों के लिए इनकम टैक्स फ्री होने की छूट मिल गई है। अतएव जो इस दृष्टि से दान देने में कई लाभ सोचते हैं उनके लिए भी अब अधिक सुविधा रह सकती है और जो इनकम टैक्स देते हैं उन्हें अधिक प्रभावी दलील देकर इस पुण्य-प्रयोजन में अधिक सहायता देने के लिए कहा जा सकता है।
कुछ दिनों पहले समझा गया था कि शक्ति पीठों के निर्माण में, संपन्नों एवं समर्थों का कारगर सहयोग प्राप्त करना होगा। इसके बिना गाड़ी रुक जायेगी। अब वह अवरोध दूर हो गया। भव्यता में कटौती कर देने से आकर्षण तो जरूर घटेगा पर जिस प्रयोजन के लिए इन्हें बनाया जा रहा है। उसमें अंतर पड़ने की आशंका नहीं है। नवयुग का आलोक वितरण के लिए शक्ति पीठों के साथ जुड़े हुए परिव्राजकों के जत्थे उतनी ही तत्परता से इन छोटे निर्माणों में भी काम करते रहेंगे जितना कि भवन बनने की स्थिति में कर पाते।
परिजनों में से जिनने युग परिवर्तन, प्रज्ञावतार और गायत्री शक्ति पीठों की परस्पर गुथी हुई श्रृंखला का स्वरूप समझा हो, वे उसकी सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए साहसिक कदम उठावें। गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण में ऐसा भावभरा सहयोग दें जिसे चिर स्मरणीय रखा और अनुकरणीय कहा जा सके।
दिन का अधिकांश समय, एक बच्चा एकांत में बिताता। न खाने में कोई तर्क, न बाहर निकलने की इच्छा। कहीं जाना होता तो अपनी राह जाता और अपनी राह वापस लौट आता।
पिता को चिंता हुई। एक दिन पूछ ही लिया- ‘‘बेटा! आजकल काम-धंधा कुछ नहीं करते। कुछ कष्ट रहता है क्या?’’
बेटे ने विनीत भाव से उत्तर दिया- ‘‘पिताजी! आप ही तो कहते थे- मनुष्य को शांति का जीवन बिताना चाहिये।’’ पिता ने हंस कर कहा- ‘‘बेटे! चुप-चाप पड़े रहने का नाम शांति नहीं। कैसी भी स्थिति हो धैर्य रखकर, अनिवार्य दुखों को स्वयं वीरतापूर्वक झेलता हुआ भी उद्विग्न न हो उसे शांति कहते हैं।’’
नित्य सहते लहर का टकराव-ऐसे कूल हैं। लोकहित की वेदिका के हम समर्पित फूल हैं॥ हम समर्पित फूल हैं॥
फूल जैसी जिंदगी सब लोग जीना चाहते हैं। जहर तो शिव के लिये-सब अमृत पीना चाहते हैं॥
किन्तु जग हित के लिये व्यक्तित्व वह भी है जरूरी। जो करें सबकी भलाई की जरूरत आज पूरी॥
बाड़ बन-हर फूल की रक्षा करे-वह शूल हैं। लोकहित की वेदिका के हम समर्पित फूल हैं॥
हर भटकती बेसहारा जिंदगी की हर नमी को। धूप, पानी से बचाने के लिये हर आदमी का॥
चाहिए ऐसे भवन, जिसमें छिपा ले आदमी सिर! तुम बनो शोभा की- किन्तु हम क्या हैं कहें फिर॥
जोड़ने हर ईंट को-गारा बनी-वह धूल हैं। लोकहित की वेदिका के हम समर्पित फूल हैं॥
कामना है हर कली को प्राणपूर्ण विकास दे हम। हर सुमन को स्नेह-सौरभ, भावपूर्ण सुवास दे हम॥
मुस्कराये पात नव, हर डाल झूमे मस्त होकर। विश्व-उपवन लहलहाये, हम हँसे निज सत्व खोकर॥
जो हरा रखती चमन को, भूमिगत वह मूल हैं। लोक हित की वेदिका के हम समर्पित फूल हैं॥
हम समर्पित फूल हैं॥
-माया वर्मा
*समाप्त*