प्रगति और अवाति का स्वरुप समझने में भूल होते रहने के कारण ही मनुष्य भ्रम में पड़ते, पछताते और दुसह दुःख सहते है। प्रतिष्ठा की परिभाषा को बलिष्ठता, शिक्षा, सम्पदा और प्राप्त करने तक सीमित समझा जाता है। इस दिशा में जो जितना प्रयत्न करता है वह उतना पुरुषार्थी कहलाता है और जो जितना सफल होता है वह उतना भाग्यशाली माना जाता है।
वस्तुओं और सामर्थ्यों का अपना महत्व है, पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उन उपलब्धियों का सत्प्रयोजन में प्रयोग हो सकने पर भी उनके द्वारा वास्तविक प्रगति का लाभ मिलता है। प्रगति की वास्तविकता व्यक्तित्व की गरिमा के साथ जुड़ी हुई है मनुष्य का चिन्तन, चरित्र एवं लक्ष्य हो वह आधार है, जिस पर व्यक्तित्व की गरिमा टिकी हुई है। यदि इस केन्द्र बिन्दु पर निकृष्टता आधिपत्य करले तो समस्त उपलब्धियाँ हेय प्रयोजनों के लिए ही प्रयुक्त होती रहेंगी और फलतः पाल, पतन और त्रास विनाश का संकट ही उत्पन्न होता रहेगा। वह प्रगति कैसी जिसमें जलने और जलाने का- गिरने और गिराने का ही उपक्रम चलता रहे।
प्रगति का अर्थ है-ऊर्ध्वगमन, उर्त्कष, अभ्युदय। यह विभूतियाँ अन्तःक्षेत्र की है। दृष्टिकोण और लक्ष्य ऊँचा रहने पर इच्छा और आँकाक्षा का स्तर ऊँचा उठता है। आत्म गौरव का ध्यान रहता है। अपना मूल्य गिरने न पाये यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है वह उतना ही प्रगतिशील है।
सम्पन्नता और सफलता चमत्कृत तो कर सकती है। आकर्षक भी लगती है किन्तु यदि उसका उपयोग सदुद्देश्यों के लिए कर सकने की साहसिकता उत्पन्न न हो सकी तो समझना चाहिए गतिशीलता तो रही पर अवगति के गर्त तक ले पहुँची। प्रगति वह है जिसके सहारे आत्म सन्तोष मिल सके और अपनाई गई आदर्शवादिता के सम्मुख जन जन विवेक का मस्तक झुक सके।
प्रत्येक वस्तु के दो पक्ष होते है। एक उज्ज्वल तो दूसरा इसके विपरीत कालिमा से भरा। दिन भर में बारह घण्टे प्रकाश तो बारह घण्टे अन्धकार होता है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण के रुप में माह में दो बार अंधेरा और उजाला अपने प्रधान रुप मं रहता है। अन्धकार के साथ प्रकाश का एक अविच्छिन्न समन्वय सृष्टा ने अपनी हर मूकृति में किया है। अन्धकार से भटकाव होता है। इससे मनुष्य को उबारने के लिये कहीं न कहीं से प्रकाष किरणें आती है और सही मार्ग दिखाती है।
अन्धेरी रात में अपना मार्ग ढूँढता राही चन्द्रमा की किरणों में या झिलमिल तारों की रोशनी में अपना रास्ता बना लेता है। इसी तरह समाज में दुराचारों, पापों की अभिवृद्धि के रुप में जब उसका अन्धकार वाला पक्ष प्रबल होने लगता है तो महामानवों में प्रेरणाप्रद विचारों एवं उत्कृष्ट चिन्तन के रुप में प्रकाश किरणें आती है और अन्धकार के साम्राज्य को मिटा देती है।
मानवता का अब तक का इतिहास यही बताता है कि अँधियारा वाला पक्ष कभी भी उजले पक्ष पर हावी नहीं हो पाया। जब-जब भी ऐसे प्रयास हुए हैं-’दैवी चेतन शक्ति के प्रकाश पुन्ज उठ खड़े हुए और उन्होंने तम से मोर्चा लेकर अन्धकार को मिटाकर ही दम लिया’। अधर्म के विनाश और सर्त्धम की स्थापना के लिये, दुष्प्रवृत्तियों के निवारण और सत्प्रवृत्तियों की स्थापना के लिये ऐसे प्रकाश पुत्र जन्म लेते है और अपनी प्रचण्ड विचार शक्ति द्वारा चारों ओर प्रातः के उदीयमान सूर्य की तरह प्रकाश किरणें बिखेर देते है।
प्रकृति के अन्तराल में भी विश्वनियन्ता ने ऐसी ही कुछ विचित्रताओं का समावेष कर रखा है जो अपनी अद्भुतओं से मानव को हतप्रभ भी कर देती हैं एवं विकास के पथ पर चलते रहने की सतत् प्ररेणा देती रहती हैं। पृथ्वी के दोनों ध्रवों पर सूर्य छह-छह माह प्रकाशमान रहता है। जिस समय एक ध्रव पर प्रकाश होता है, दूसरे ध्रव पर अन्धकार का साम्राज्य छाया रहता है; लेकिन इसी अन्धकार के समय दोनों गोलार्धें में एक ऐसी आकर्षक प्रकाश ज्योति दिखाई देती है जो वास्तविक होते हुए भी लगती काल्पनिक ही है। जैसे-जैसे अन्धकार घना होता जाता है, यह प्रकाश ज्योति प्रकट होने लगती है और धीरे-धीरे उज्ज्वल प्रकाश की एक पट्टी के रुप में बदल जाती है। इस असाधारण प्रकाश पुन्ज को पृथ्वी से साठ से लेकर पाँच सौ किलो-मीटर की ऊँचाई तक देखा जा सका है। सौ मीटर से लेकर कई किलोमीटर लम्बी यह पट्टी निरन्तर प्रकाशमान रह कर अन्धकार को चुनौती देती रहती हैं।
प्रकृति जगत के अन्तराल में ऐसी अनेकानेक व्यवस्थाएँ है जो हमें सृष्टा की विराट्ता का मात्र परिचय ही नहीं देती, वरन् निरन्तर प्रेरणा देती रहती हैं। वस्तुतः प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। निराश, हीन भावनाग्रस्त व्यक्ति को उसका अन्धकार वाला पक्ष ही प्रबल दिखाई देता है तो आशावादी, महात्वाकाँक्षी व्यक्ति उस अन्धेरे में भी अपना मनोबल बनाये रख कर अपना पथ ढूँढ़ता चला जाता हैं। पतितों, पददलितो एवं पिछड़ों को अन्धकार से उबार कर प्रकाश की ओर ले जाने के लिये ही समाज सेवियों, महामानवों का आविर्भाव होता है। अपने चिन्तन, उपदेश एवं सत्परामश्द्वारा वे समाज को नयी दिशा देते है।
अन्धकार स्थायी नहीं है। उसे तो मिटना ही है। चिरपुरातन काल से ऋषि ‘तमसो माज्योतिर्गमय’ की प्रेरणा अपनी ऋचा में देते आ रहे हैं। आवश्यकता मात्र स्वयं को पहचानने की है, अज्ञान के-अन्धकार के अभाव के-पथ से हटाकर स्वयं को प्रकाश की ओर उन्मुख करने की है। तम से समझौता करने वाले प्रकाश पुत्रों को, अन्धकार स्वीकारने वाले प्राणियों को भी प्रकृति यही सतत प्रेरणा देती आ रही है कि वे स्वयं को उस दिव्य प्रकाश की ओर अग्रसर करें, जो मानव का अन्तिम लक्ष्य है।
ईश्वर क्या है ? उसकी सत्ता, इच्छा और क्रिया का उद्देश्य क्या है ? इस सर्न्दभ में विभिन्न धर्म और दर्शन अपने-अपने ढंग से व्याख्या, विवेचन करते रहते हैं। इनमें बहुत कुछ साम्य होते हुए भी काफी अन्तर और मतभेद विद्यमान है। इन मतभेदों का सही रुप से निरुपण न होने देने में हठवादिता ही प्रधान कारण रही है। यदि पूर्ण मान्यताओं को ही सब कुछ न मान लिया गया होता और विश्व व्यवस्था के अन्यान्य पक्षो की तरह इस सर्न्दभ में भी अधिक कचन्तन का द्वार खुल रखा गया हो तो उस सत्ता की महत्ता से सभी लाभाविन्त होते। जबकि आज ईश्वर का उपयोग अपने सही गलत पक्षों का समर्थन करने और सहयोग देने भर के लिए किया जाता है। इस विपन्नता के रहते, ईश्वर के सम्बन्ध में भ्रान्तियाँ भी बनी रहेंगी और उसकी सत्ता और पवित्रता को विशिष्ट स्वार्थों के पक्ष में किया जाता रहेगा। ऐसी दशा में विज्ञजनों के मन में यह असमंजस बना ही रहेगा कि आस्तिकता के क्षेत्र में ऐसी अराजकता के रहते उसकी उपयोगिता स्वीकार की जाय या न की जाय ?
ईश्वर विश्वास का अर्थ है उत्कृष्टता के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाला साहस। दूसरे शब्दों में इसे आत्मबल भी कह सकते हैं। सच्चे ईश्वर विश्वासी को आत्मबल सम्पन्न होना ही चाहिए। ऐसे व्यक्ति में ऐसा आत्मबल होगा वह न तो अनीति के साकने झुकता है और प्रलोभन से ग्रसित होकर कुछ ऐसा काम करता है जिससे आदर्शवादिता पर-मानवी गरिमा पर आँच आती है। ईश्वर विश्वास की गहराई इसी नीति निष्ठा की कसौटी पर सदा कसी जाती और खरी सिद्ध होती रही है।
दुनिया के इतिहास में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिलते है, जिनमें अकेला व्यक्ति किसी समय बालक जैसा छोटा व्यक्ति भी किसी की मदद के बिना जबरदस्त शक्तियों का निडरता और दृढता से मुकाबला करने के लिये खड़ा होता है। इन शक्तियों क सामने थोड़ा झुक जाने से जीवन बच सकता हो तथा लाभ भी हो सकता हो, तो भी वह झुकने की अपेक्षा टूटना या नष्ट हो जाना अधिक पसन्द करता है। ऐसे व्यक्ति के हृदय में ऐसी किस वस्तु का अनुभव होता है जो इसे इतना बल देती है ? प्रह्नाद ऐसी किस वस्तु का अपने हृदय में अनुभव करता था, जिसके बल पर वह अपने पिता की कठोर यातनाओं की अवलेहना कर सका। या सुधन्वा तेल में भुने जाने की, गुरुगोविन्दसिंह के छोटे-छोटे पुत्र दीवाल में जीवित चुने जाने की और रोम का तरुण जलती हुई मशाल में अपना हाथ रख देने की यातना किस बल पर सन्तोषपूर्वक सहन कर सके थे ?
प्राणों और जीवन के सुखों के विषय में ऐसी लापरवाही बताने का बल देने वाली तथा शारीरिक जीवन की अपेक्षा किसी अशरीरी वस्तु के साथ अधिक आत्मीयता का अनुभव कराने वाली आखिर कौन-सी वस्तु है ?
इस तरह बरतने के लिये किसी जबर्दस्त ‘भावना’ का अनुभव होना चाहिये, ऐसा अनीश्वरवादी को भी स्वीकार किये बिना चारा नहीं। यह भावना सामान्य इन्द्रियों के विषयों की या संकल्प-विकल्पों की नहीं हैं।
परन्तु यह एक ऐसा अनुभव है, जिसके कारण उस मनुष्य का यह विश्वास होता है कि उसमें कोई ऐसी शक्तिशाली प्रेरणा काम कर रही है, जो दुनिया की दूसरी सब शक्तियों से अधिक बलवान है, जो उसके शरीर और प्राणों की अपेक्षा उसके अधिक समीप है।
इस शक्ति को कोई ईश्वर निष्ठा का बल कहता है, कोई अध्यात्म बल (स्प्रिचुअल फोर्स) कोई आत्मबल (सोल फोर्स), तो कोई नैतिक बल (मोरल फोर्स) एवं कोई प्रतीत बल (स्ट्रेन्थ आफ कन्विक्शन) कहता है।
इस बल की परीक्षा क्या है ? हमारी भयवृति पर प्रभत्व रखने वाला वह अनुभव, जिसका बल हमें अपने नेक मार्ग और कार्य में दृढ रहने के लिये मजबूर करता हो। स्वयं आकाश भी टूट पड़े और मनुष्य के सब मनोरथ या साँसारिक ध्येय चूर-चूर हो जायें तो भी उसे अपने निश्चय पर अडिगता से चिपके रहने की शक्ति देने वाला जो मूल स्त्रोत है, वही अध्यात्म बल है।
ऐसा बल पैदा करने वाला विश्वास धर्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, बल, तप, नियम, शास्त्र, चिन्तन, विज्ञान वगैरा चाहे जिन निमितों से उत्पन्न हो, वही सत्याग्रही का ईश्वर या आत्मा है। यह बल उसे बाहर के साधनों या समाज में से नहीं मिलता। वह अपने भीतर ही इसका अनुभव करता है।
मार्क्स, एँजिल्स आदि यूरोपीय लेखकों ने इस विचार किया है कि ईश्वर और धर्ममत (ग्लीजन, चर्च) सब सत्ताधारियों द्वारा अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिये निर्मित कपोल कल्पित माया है। हमारे देश के अनेक व्यक्तियों ने भी उस विचार को जैस-तैसे अपना लिया है और भिन्न-भिन्न प्रकार से वे उसे हमारे साहित्य में फैला रहे है।
परन्तु वे द्त प्रकाशित अर्थात्- (रोवील्ड) एवं अनुभूत-(रीयलाइज्ड) धर्ममताअं में अन्तर स्थापित करने में असफल रहे है। यहूदी, ईसाई, मुस्लिम आदि किसी विशेष व्यक्ति द्वारा स्थापित अर्थात् पौरुषेय-रीवील्ड धर्म है, हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि किसी विशेष व्यक्ति द्वारा स्थापित न किये हुए अर्थात् अपौरुषेय धर्म रीयलाइज्ड हैं।
इन दोने में बड़ा अन्तर है। वह अन्तर यह है कि द्त प्रकाशित धर्ममतों में ईश्वर को आकाश के पार और निराकार होते हुए भी बुद्धि तथा भीवनायुक्त एक तत्व विशेष माना गया है। उसने जिसे जैसा चाहा वैसा बनाया है। उसमें उस वाणी की इच्छा-अनिच्छा का कोई सम्बन्ध नहीं है। बाद में मनुष्य को यह धर्म समझाया गया है कि वह ईश्वर सर्वत्र न्यायी और दयावान है। इसलिये उसने जो कुछ किया होगा, वह ठीक ही किया होगा। उनके द्वारा-पैगम्बरों द्वारा बाँधी गई सामाजिक रुढियाँ, प्रणालियाँ और नियम मिलकर एक-एक धर्ममत (निलीजन) हो गये हैं।
वास्तव में हमारे देश के किसी भी धर्ममत या उसके किसी भी पन्थ में ईश्वर स्वरुप, समाज धर्म तथा विधिधर्म की तात्विक नींव उपरोक्त नींव से बिल्कुल भिन्न प्रकार की है। अद्वेत-सेश्वर-जैन, द्वैत-निरीश्वर-बौद्ध, विशिष्टद्वैत-वैदिक। चाहे जिस मत का मनुष्य हो, हिन्दू धर्म विचार में ईश्वर को सृष्टि काक कुम्हार जैसा कर्त्ता नहीं समझा गया है।
हिन्दू धर्म में ईश्वर के साथ एक दूसरी शक्ति को भी महत्ता दी गयी ही। इसे हम ‘कर्म’ के नाम से पहचानते है। न तो ईश्वर एक स्वेच्छाचारी सर्वाधिकारी है, न कर्म ही सम्पूर्णतया स्वाधीन है। इसी कारण ईश्वर को केवल कर्मफल प्रदाता कहते है अथवा साक्षी मात्र और अकर्त्ता भी कहते है।
इसका अर्थ यह हुआ कि हिन्दुओं के विचार से हमारे सुख-दुखः की मुख्य जवाबदारी कर्म की मानी गई है, न कि ईश्वर की।
वह कर्म चाहे आज का हो, कल का हो या बहुत पहले का हो, वैयक्तित हो या पूर्वजों का या समग्र समाज का, इस जन्म का हो या पूर्वजन्म पर आरोपित किया गया हो, किसी न किसी प्रकार के कर्म के कारण ही हमारी वर्तमान स्थिति है और उसी के कारण उसमें परिवर्तन भी होगा।
हम आमतौर पर केवल वैयक्तिक कर्मों के ऊपर ही सुख-दुखः का उत्तदायित्व आरोपित करते हैं और उसमें भी बहुत ही जल्दी एकदम पूर्वजन्म के कर्मों का तर्क दौड़ाते है। यह गलत दृष्टिकोण है।
सृष्टि के सब प्राणी और पदार्थ शरीर के अवयवों की तरह एक दूसरे से सम्बन्धित है तथा अनादि भूतकाल से उनका सम्बन्ध है। हिन्दू जनता की भावना में ईश्वर या तो केवल साक्षी रुप, अकर्त्ता और कर्म फल प्रदाता है अथवा उसका कर्तृत्व किसी को पीड़ा पहुँचाने पीड़ीत रखने या पाप अथवा नरक में ढकेलने के लिए प्रवृत नहीं होता, परन्तु जो उसकी अनन्य शरण लेता है उसके कष्ट और पापों को हटाने और उसके ज्ञान, बल, बुद्धि अथवा उसकी सात्विक सम्पत्ति बढाने के लिये ही प्रवृत होता है। मनुष्य की शवुक वृत्तियों को जाग्रत और बलबती करने वाले उसके गूढ तत्व का ही नाम ईश्वर है।
भारतीय तथा विश्व के अन्य सभी धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता है। यह दूसरी बात है कि मरणोत्तर जीवन कितना लम्बा होता है और उस अवधि में किस प्रकार निर्वाह करना पड़ता है। मतभेद इन्हीं बातों पर ह। पुनर्जन्म को अस्वीकारा किसी ने भी नही-भले ही उसक लिए प्रलयकाल जितनी लम्बी प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया हो। धार्मिकों की तरह पुरातन दर्शनशास्त्र भी पुर्नजन्म के समर्थक रहे है। उन चार्वाक जैसों की संख्या नगण्य है, जिनमें आत्मा के अस्तित्व से इन्कार करने के साथ-साथ एक ही साँस में पुर्नजन्म की मान्यता का भी सफाया कर दिया।
कठिनाई आधुनिक वैज्ञानिकों ने उत्पन्न की है जिन पदार्थ को ही सब कुछ माना और आत्मा के अस्तित्व से इन्कार कर दिया । जब आत्मा ही नहीं तो पुनर्जन्म किसका ? आस्तिकता के सभी सिद्धान्त आत्मा की अमरता और ईश्वर की न्याय व्यवस्था के साथ जुड़ते हैं। यदि इन दो तथ्यों को अमान्य ठहरा दिया जाये तो फिर चेतना की स्वतन्त्र सता की समाप्ति हो जाती है। और संसार मात्र रासायनिक पदार्थों का ऐसा खिलौना भरा रहा जाता है। जो परमाणु कम्पनों की हलचलों से प्रभावित होकर एक निरुद्देश्य उछल कूद भर करता रहता है।
ये प्रसंग दार्शनिक विचार भर का रहा होता तो उसे बुद्धिमानी की मानसिक कसरत के लिए छोड़ा भी जा सकता था। किन्तु कठिनाई यह है कि आस्तिकता की अस्वीकृति के बाद नैतिक क्षैत्र में अराजकता फैल जाती है। शासकीय नियन्त्रण इतना समर्थ नहीं हो सकता कि वह अवाँछनीय गतिविधियों और दृष्परिणामों को रोक सके भी। उन्हें न अपनाने के लिए सर्वसाधारण को सहमत कर सके। ईश्वरीय सत्ता-मरणोत्तर जीवन-कर्म जैसी आस्थाएँ मनुष्य को पाप से डरने और पुण्य के प्रति श्रद्धालु होने की पृष्ठभूमि बनाती है। इस मान्यता के अभाव में मनुष्य नीति-अनीति का विचार क्यों करेगा ? उसमें दूरदर्शिता कहाँ है कि अनीति अपनाने से होने वाली हानियों की भावी कल्पनाओं को कर सके और उस भय से आत्म-नियन्त्रण करने की बात सोच सके। आमतौर से प्रत्यक्ष लाभ को ही सब कुछ समझा जाता है। अनीति अपनाने में तात्कालिक लाभ है-ये सभी जानते हैं। भविष्य के छडर से ही कुछ अंकुश रह पाता है। यदि इस सर्न्दभ में बची हुई आस्थाओं को समाप्त कर दिया जाये तो फिर नीति धर्म की चर्चा चलते रहने पर भी लोग उस अनुशासन को सच्चे मन से स्वीकार न करेंगे और मर्यादाओं का बाँदध टूटता चला जायेगा। उच्छृंखलता पनपेगी और उपयागी नीति नियमों को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देगी। ऐसी दशा में मनुष्य की समर्थता, सम्पन्नता एवं बुद्धिमता का उपयोग निकृष्ट स्वार्थों की पूर्ति के निमित ही होता चला जायेगा। भावना क्षेत्र की इस अराजकता का दुष्परिणाम इतना भयंकर होगा जिसकी आज तक कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब आस्तिकता की मान्यताएँ किसी रुप में बनी रहने पर भी इतना अत्याचार पनपता है तो उस अनुशासन के उठ जाने पर तो मनुष्य के मत्स्य न्याय का दर्शन ही चल पड़ेगा फिर संयम, सदाचार की-उपकार परमार्थ की न तो कोई आवश्यकता प्रतीत होगी न उपयोगिता। ऐसे समाज में प्रगति की आशाएँ समाप्त ही समझनी चाहिए। अनाचार का एक मात्र परिणाम दुर्गति ही हो सकती है। इस प्रकार नास्तिकता की अराजकता का दार्षनिक प्रतिपादन किसी प्रकार ओंधे-सीधे तर्कों द्वारा कर भी दिया जाये तो भी परिणिति को ध्यान में रखने पर सही उचित प्रतीत होता है कि इस भावनात्मक अनुशासन को स्थिर रहने देने में ही भलाई है।
यह तो गुण-अवगुण की परिणाम प्रतिक्रिया की बात हुई। अब तथ्यों की दुनिया में प्रवेश करने और उनक गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करने पर भी आस्तिकता के समर्थन में ऐसी सच्चाइयाँ समाने आ खड़ी होती हैं जिससे इन्कार करना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। परोक्ष को चदि प्रत्यक्ष के बिना मान्यता नहीं मि सकती तो ऐसे प्रमाण भी कम नहीं हैं जो बताते हैं कि आत्मा की मरण के साथ ही समाप्ति की जो बात वैज्ञानिक क्षेत्रों में कही जाती है, वह सच नहीं है।
पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाण इतने अधिक हैं कि उन्हें हर कसौटी पर कसा और सही पाया जा सकता हैं कितने ही बालक अपने पूर्व जन्म का विवरण बताते पाये गये है। जाँचने पर यह पाया गया है कि बच्चे को वैसी धूर्तता किसी ने सिखाई नहीं है, वरन् उसने सहज स्वभाव से ही अपनी पूर्व स्मृति का परिचय दिया है। यह कोई कल्पना तो नहीं है उसकी जाँच पड़ताल इन घटनाक्रमों में इस प्राकर की जाती रही है कि यदि कहीं कुछ छद्य हो तो उसका पर्दाफाश होने में देर न लगे। पुरानी ऐसी घटनाएँ जो मात्र सम्बद्ध व्यक्तियों की जानकारी से ही हो सकती थी। इन बालकों द्वारा बताया जाना, स्थानों, वस्तुओं तथा घटानाओं का वर्णन करना यह बताता है कि इसमें कल्पना या छद्य नहीं तथ्य ही प्रत्यक्ष है।
पुनर्जन्म के विवरण भारतवर्ष में आये दिन उपलब्ध होते रहेत है। यहाँ उन पर आर्श्चय भी नहीं हातो। पर ईसाई, मुस्लमान प्रधान देशों के लिए तो यह अतीव आर्श्चयजनक है, क्योंकि उनकी महाप्रलय के बाद ही जन्म होने की मान्यता है। यदि मध्य में कोई जन्म लेता है तो उससे उने पूर्वाग्रहों को आघात पहुँचता है। इस प्रकार के प्रमाण उन वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती हैं जो मनुष्य को एक चलता-फिरता पौधा मानते है और मरण के साथ ही उसकी सत्ता समाप्त हो जाने की बात कहते है। यदि आत्मा का-चेतना को-कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है और मरण के बाद ही उसका अन्त हो जाता है तो पुर्नजन्म कैसे सम्भव होगा ? यदि पुनर्जन्म सिद्ध होता है तो आत्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता और नास्तिकता की आधी जड़ कट जाती है। फिर मात्र कर्मफल मिलने न मिलने की बात शेष रह जाती है से उसके लिए उच्चस्तरीय मनाविज्ञान द्वारा वे तथ्य ही समर्थक बन जाते है जिनमें छद्य, दुराव, अन्दद्वन्द्व, दुहरे व्यक्तित्व, अनाचार, अपाध, दुश्चिन्तन आदि के जाल में फँसे रहने वालों को अनेकानेक शारीरिक, मानसिक अधिव्याधियों में फँस जाने और निकृष्ट स्वभाव आचरण के कारण व्यावहारिक जीवन में पग-पग पर ठोकरें खाने और कष्ट सहने की बात कही गई है। कर्म फल में कुछ तो शासकीय और सामान्य व्यवस्था भी सहायक सिद्ध होती है।
मरणोत्तर जीवन की पुष्टि आस्तिकता का आधा पक्ष समर्थन कर देती है। उसक बाद ईश्वर की सिद्धि एवं कर्म व्यवस्था की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती। कठिनाई तो तब पड़ती जब भौतिकवाद का वह प्रतिपादन सही सिद्ध होता जिसस पदार्थ को ही सब कुछ माना गया है। उसकी रासायपिनक हलचलों की प्राणियों की उत्पत्ति और समाप्ति का कारण कहा गया है। ऐसी नास्तिकता यदि सही है तो फिर पुनर्जन्म की घटनाओं का कोई अस्तित्व दृष्टिगोचर वनहीं होना चाहिए। यदि होता है तो उस प्रतिपादन को अमान्य ठहराना होगा जिससे चेतना का-आत्मा का-अस्तित्व अस्वीकारा गया है।
विश्व विख्यात वैज्ञानिक डा0 इयानस्टीवेंसन नपे जब अनुवंशिकता-विषयक प्राप्त समस्त जानकारियों में व्यक्तित्व को सर्वांग निर्माण में अपूर्ण पाया तो, पुनर्जन्म में उनकी रुचि बढी। अभी तक उन्होंने ‘दि साइकियाट्रिक इक्जामिनेशन’ 1969 में और ‘दि डायागोनिस्टिक इन्टरव्यू’ (1970) में नाम पुस्तकें प्रकाशित की हैं। डा0 स्टीवेंसनप की लगन व प्रमाणों की खोज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभावित होकर वर्जोंनिया विश्व विद्यालय में उन्हें अपने यहाँ मनोविज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त किया। इस बीच उन्होंने विश्व में विभिन्न राष्ट्रों से जानकारियाँ एकत्र कर अपने कार्य को इतना विस्तृत किया कि क्जीराँम्स के आविष्कारक प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्व0 डा0 चेस्टर कार्लसन उनके प्रमुख समर्थक बन गये थे। उनके निष्ठापूर्ण प्रयत्नों एवं एकत्रित प्रमाणों की सत्यता से प्रभावित होकर विश्व वैज्ञानिकों की संस्था- “द अमेरिकन एसोसिएशन फार द एडवाँस मेन्ट आफ साइन्स” ने अमेरिकन परामनोवैज्ञानिक संस्था को अपने साथ सम्बद्ध कर लिया।
जार्जवाशिंगटन विश्व-विद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के डा0 गार्डनर मर्फी की मान्यता है कि आज तक विश्व में डा0 स्टीवेंसन के समान पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कोई अन्प्य वैज्ञानिक नहीं है। डा0 स्टकर्ड, डा0 स्मीडलर, डा0 रिप्ले आदि है।
पुनर्जन्म की बढती मान्यताओं से प्रभावित होकर ब्रिटेन के दैनिक अखबार ‘डेली एक्सप्रेस’ ने कुछ वर्षों पूर्व अपने पाठकों से जिन्हें उनके पूर्व जन्म की स्मृतियाँ हों सप्रमाण भेजने का निवेदन किया था। इस निवेदन का परिणाम यह हुआ कि मात्र ब्रिटेन से ही एक हजार से अधिक घटनाओं का संकलन हो गया। उनमें कुछ प्रमुख घटनाएँ ये है।
डेरिक सेन्ट जूलियन-ब्राउन जिन्हें चित्रकारी का विशेष शोक था। इनकी अपनी कलाकृतियों में एक ऐसा लहरदार जीना विशेष प्रमुख है जिसके एक किनारे में एक युवती खड़ी दरवाजे को खटखटाती है तथा जीने के मध्य एक युवक की लाश पड़ी है। श्री ब्राउन का कहना है कि वह मृतक लाश मेरी ही है मेरा कभी एक नाम ‘यंग्स मैक्रकलाम’ थ और तब मैं स्कटट लैण्ड में 1472 में पैदा हुआ था। 1464 ई॰ में वह इटली युद्ध करने गया था।
ओलिवर बेलर ने अपने पूर्वजन्म के संस्मरणों के सम्बन्ध में ‘डेली एक्सप्रेस’ के सम्पादक को लिखा कि पूर्वजन्म में वह रेलवे विभाग में एक मजदूर के रुप में कार्य करते थे। उसका कार्य स्थल मिहर्स्ट था। 70 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हुई थी। ओलिवर वेलर ने तत्कालीन अपने विभागीय और गैर विभागीय लोगों के सम्बन्घ में भी बहुत-सी जानकारी दीं। ‘डेली एक्सप्रेस’ के सम्पादक ने उक्त कथन की निष्पक्ष जाँच हेतु मिडहर्स्ट नगर पालिका और रेलवे विभाग के कागजातों को देखने पर श्री ओलिवर वेलर द्वारा दी गई समस्त जानकारी सत्य पायीं।
एडवर्ड ने अपने पूर्वजन्म के संस्मरण में लिखा कि उसने 1685 ई॰ में सेजमूर की प्रसिद्ध प्रसिद्ध लड़ाई में एक सैनिक के रुप में भाग लिया था। उस समय उनकी उम्र 40 वर्ष की थी। इस लड़ाई में वह मारा गया था और अपने पीछे पत्नी क साथ दो लड़के छोड़ गया था। उस समय उनका नाम ‘जान फ्लेक्चर’ था। सकारी कागजात का मिलान करने पर उपरोक्त कथन बिलकुल सत्य पायास गया।
कर्नल लेकने जिनका पूर्वजन्म में कोई विश्वास न था। 1939 ई॰ में जब उन्हें रंगरुठ भर्ती करने के सिलसिल में बंगलौर भेजा गया। वहाँ पहुँचते ही उन्हें स्पष्ट स्मरण हो आया जैसे कल की बीती बात हो कि वह कभी एक अँग्रेज सैनिक थे और सुल्तान टीपू की सेनाओं से युद्ध किया था। युद्ध में वह बन्दी बना लिये गये थे। बाद में टीपू के सैनिकों ने उन्हें धक्का दे-देकर मार डाला था।
एक बार सम्मोहनावस्था में श्रीग्लेन फोर्ड 18वीं शदी की फ्रेंच भी नहीं जानते। इसी प्रकार उन्होनें सम्मोनावस्था में ही बहुत ही सुन्दर पियानो बजाया था। जबकि व्यक्तिगत जीवन में पियानो बजाना उन्हें नहीं आता। इस सम्बन्ध में श्री फोर्ड ने बतलाया कि 19वीं शदी में वह पियानो शिक्षक थे, जिसक संस्क्र उनके अचेतन मस्तिष्क पर पड़े हुए है और सम्मोहनावस्था में वह प्रकट होते है। पूर्व जीवन में वह जब पियानो शिक्षक थे तो क्ष्य रोग क कारण उनकी मृत्यु हुई थी। उन्होंने उस स्थान का नाम भी बताया जहाँ उन्हें दफनाया गया था। खोज करने पर वह स्थान और बातें सत्य पायी गई।
उनके व्यक्तियों ने विभिन्न क्षेत्रों में अल्प आयु में अपनी रुचि के अनुकूल दृढ विश्वास के साथ अपनी क्षमताओं को विकसित किया-16 वर्ष की आयु में जगत्गुरु शंकराचार्य सभी शास्त्रों के ज्ञाता हुए। 14 वर्ष की अवस्था में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शेक्सपीअर क नाटक मेकवेथ को बंगला भाषा में अनुदित कर दिखाया और बंगला नाटककार हरिश्चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘अबुल हसन’ 14 वर्ष की अवस्था में ही लिखा। अंग्रेजी साहित्य की एक और बंगला कवियत्री तारादत्त ने भी 18 साल में महान ख्याति अर्जित की। सन्त ज्ञानदेव ने 14 वर्ष की अवस्था में भगवत गीता पर मराठी छन्दों में ज्ञानेश्वरी टीका लिखा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी 7 वर्ष की आयु में गूढ एवं रहस्यमय दोहे लिखे और 13 वर्ष की आयु में ही श्रीमती सरोजनी नायडू ने 1300 पंक्तियाँ की एक अंग्रेजी कविता लिखकर सम्पूर्ण अग्रेंजी सभ्यता को एक विशाल चुनौती दी है।
एक घटना जर्मनी की है। छः वर्षीय बालिका ‘लोना वेड फोर्ड’ का विश्व की पाँच प्रसिद्ध भाषाओं जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, हिन्दी और जापनी की जानकारी है। वह धारा-प्रवाह से इन भाषाओं को बोल सकती है। इतनी कम आयु में इन भाषाओं को जानना स्वयं में एक आर्श्चय है। इसके लिए उक्त बालिका को किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं मिला था, फिर भी उसे उन भाषाओं के बोलने व लिखने पर अधिकार है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जन्म-जात प्राप्त यह प्रतिभा पूर्वजन्मों के संस्कारों का प्रतिफल है, जो इस जन्म में साकार हो उठी है।
वैचारिक हठवादिता का जोर घटने से जो चीजें धर्मास्था या अन्धविश्वास का ही विषय न रहकर वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में आती जा रही है, उनमें से एक हैं-पुनर्जन्म। छोटी-छोटी प्रयोगशालाओं को ही तथ्य की सत्यता का मापदण्ड मान लेने वाले वैज्ञानिक अब इस दिशा में सकारात्मक चिन्तन कर रहे ह।
अमेरीका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा0 इयन स्टिवेन्सन पिछले 30 वर्षों से इसी क्षेत्र में कार्य कर रहे है। विगत दिनों वे भारत आये थे और उन्होंने बताया कि विस्तृत सर्वेक्षण से संसार के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों का पता चला है, जहाँ पूर्वजन्म की स्मृतियों वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक संख्या में जन्म लेते है। ये क्षेत्र हैं- श्री लंका, उत्तर भारत, बर्मा, थायलैंड, तुर्की, इन्डोनेशिया, उत्तर-पश्चिम अमेरीका। ऐसा क्यों हैं ? यह बात पाना कठिन है।
शरीर में उत्पत्ति शरीर की ही हो सकती है। किन्तु जीवात्मा शरीर नहीं है। शरीर से अलग वह एक चेतन अभौतिक पदार्थ है। शरीर मात्र कर्त्तव्य, भेक्तृत्व और ज्ञाक्त्व लक्षणों के प्रकाश का उपकरण ह। माता या पिता के शरीर में पुत्र के जीवात्मा की उत्पति मानना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। क्याँकि एक तो सन्तान अपना स्वयं का व्यक्तित्व लेकर जन्मती है। उसमें बहुत से स्वभाव माता-पिता से मिलते-जुलते है, परन्तु सम्पूर्ण नहीं। अतः जीवात्मा का आरम्भ इस जीवन से नहीं होता अपितु इससे पूर्व की उसकी विद्यमानता सिद्ध हो जाती है। दूसे एक ही माता-पिता के दो बच्चों का मानसिक, वैज्ञानिक और शारीरिक विकास भिन्न होता है। वह सब विकास के एक ही तल पर नहीं होते।
इस प्रकार प्रत्येक बच्चा अपने व्यक्तित्व का आरम्भ से ही प्रकाशित कर देता है। एक ही परिस्थिति में पलते हुए भी उनके विकास भिन्न-भिन्न लाइनों पर होता है और आगे चलकर यह भिन्नता और स्पष्ट हो जाती है।
पीपल और बरगद क छोटे-छोटे बीज अलग-अलग तो है, पर उनमें बहुत बड़ा भेद नहीं है। खेत की भूमि एक-सी, जल-ऋतु एक सी होने पर भी एक पीपल का वृक्ष व एक बरगद का विशाल वृक्ष बन जाता है जिनमें बहुत अन्तर है। भिन्नता उन दोनों के मूल में थी। इस भिन्नता को जन्म के पश्चात् तलाश करना भूल है।
अतः शारीरिक जीवन का आरम्भ जीवात्मा का आरम्भ नहीं है।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी सशु़द्धकिल्विषः।अनेक जन्म संसिद्धस्ततो याति पराँ गतिम्॥-गीता
योगी लगातार प्रयत्न करता हुआ धीरे-धीरे सारे पापों को धोकर अनेक जन्मों की सिद्धि के अनन्त परमगति को पाया जाता है।
योगिराज अरविन्द कहते थे - “मनुष्य अभी तक मस्तिष्क के धर तिल पर है। जबकि अन्य प्राणी शरीर की क्षुध्रा पमरी कर सकने वाली इन्द्रय शक्ति के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं। मनुष्य ने अनियन्त्रत कल्पनाओं और सचित मान्यताओं, आदतो से ऊँचे उठकर बुद्धि के सहारे यथार्थता को एक सीमा तक समझ सकने की क्षमता प्राप्त कर ली है। प्राणियों की तुलना में मानवी प्रगति सराहनीय है। किन्तु यह विकास का अन्तिम सोपान नहीं है। उसे अभी काफी आगे चलना और ऊँचा उठना है। यह प्रगति क्षेत्र भाव सम्वेदनाओं का होगा। परिष्कृत अन्तःकरण अर्थात अति मानस स्तर तक पहुँचना यही मानव-जीवन का लक्ष्य है।”
इसाई धर्म ग्रन्थ “फ्लैगमेन्टस् आव ए कनफेंशन” में सेन्ट पाल के एक कथन का उल्लेख है जिसमें वे कहते है कि - ईश्वर का सबसे बड़ा अनुदान मानव है। प्राप्त करने वाले की बुद्धिमता है कि उसे विकास की चरम सीमा तक पहुँचाये। इसका उपाय है-प्रेम की व्यापकता और सेवा में आनन्द की अनुभूत विकसित आत्मा दिव्य का रसास्वादन करती है।
दार्शनिक प्लाटिनस कहते हैं- इन्द्रियों के माध्यम और तर्कों के आधार पर जिस ज्ञान की प्राप्ति होती है वह मनुष्य प्राणी के लिए का चलाऊ तो है, पर मानव के स्तर से बहुत नीचा है। देव मानव को विवेक तथ्यों को छानने की आवश्यकता तो पड़ेगी, पर निर्भर उस चेतना पर रहना होगा जो अन्तरात्मा की गहराई से उभरती अथवा ईश्वर की ऊँचाई से बरसती ह।
सन्त अगास्टिन ने जीवन स्मृति नाम अपने ग्रन्थ में सेण्ट मणिका का उल्लेख किया है। वह प्रार्थना के समय लगभग तीन फुट आकाश में अवस्थित हो जाती थी। ऐसा लगता था कि उसके शरीर पर गुरुत्वाकर्षण का कोई प्रभाव नहीं है। उसका शरार वायु में तैरता दिखायी पड़ता था।
सेण्ट फ्रान्सिस (पाओला) रात्रि के समय प्रार्थना करते हुए आकाश नेप्ल्स के नरेश ने उनको आमन्त्रित किया। जिस कक्ष में निवास की व्यवस्था थी उसके दरवाजे में एक छेद था। रात्रि को नगर राजा ने देखा कि सेण्ट फ्रान्सिस प्रार्थना कर रहे हैं तथा एक विशाल प्रकाश पुन्ज उनको घेरे हुए है। मेज से कई फुट ऊँचा उनका शरीर शून्य में बिना किसी सहारे के अवस्थित था। घटना पाँचवी शताब्दी की है। स्पेन की सेण्ट टेरेसा जिसकी तुलना भारतीय मीरा से की जाती ह उनके विषय में भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलता है। स्थानीय विशप डन आलपेरेस डे मोनडोसा एक बार सेण्ट टेरेसा से मिलने गये। यह देखकर आर्श्चयचकित रह गये कि टेरेसा का शरीर जंगले से ऊपर शून्य में स्थित है।
नव फ्लातनिक, दार्शनिक व्लिपास जाम प्रार्थना के समय पृथ्वी से 10 हाथ ऊपर उठ जाते थे। उस समय उनके शरीर एवं वस्त्राँ से सुनहरी चमकीली ज्योति निकलती दिखायी देवती थी। उनका शरीर वायु में विचरण करता रहता था।
विशप सेण्ट आर. के विषय में भी उल्लेख मिलता है कि गिरिजाघर बन्द हो जोने के बाद भी वे किसी अलौकिक शक्ति द्वारा पहरेदारों की उपस्थिति में भी भीतर पहुँच जाते तथा सारी रात जागकर प्रार्थना करते रहते। प्रार्थना की अवधि में सम्पूर्ण गिरजाघर एक दिव्य आलोक से आलौकित रहता था।
टियाना निवासी योगी एपोलोनियस में भी आकाशगमन की शक्ति थी।
भारतीय योगियों में तो इस प्रकार की आलौकिक घटनाओं के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। दयानन्द सरस्वती को कितनी बार नदी के ऊपर आसन लगाकर ध्यान करते हुँए देखा गया। स्वामी रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की घटनाएँ विख्यात है। काठियाबाबा, विशुद्धानन्द जैसे योगियों के जीवन वृत्तान्त में भी इस प्रकार की घटनाएँ देखने को मिलती है। शंकराचार्य, गोरखनाथ को भी आकाश गमन की सिद्धि प्राप्त थी।
दाराशिकोह ने औलियों के जीवन वृत्तान्त में मियाँमीर का उल्लेख किया है। इसके अध्ययन से पता चलता है कि उनमें अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त थी। वे आवश्यकतानुसार कभी-’कभी लाहौर से आकाश मार्ग द्वारा ‘हिजाद’ जाते थे। रात्रि व्यतीत करके पुनः सूर्योदय के पूर्व लाहौर वापिस लौट आते थे।
शेख अब्दुल कादिर एक व्याख्यान करते हुए भूमितल से ऊपर शून्य में उठ गये। उपस्थित हजारों व्यक्तियों ने इस घटना को देखा। शून्य में कुछ देर ठहरने के उपरान्त पुनः भूमि पर वापस लौट आये। इस आकस्मिक घटना का स्पष्टिकरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुझे अचानक दीखा सन्त ‘खिदिर’ मस्जिद के पास से जा रहे हैं। आकाश मर्का में जाकर मैंने अभिवादन किया तथा व्याख्यान सुनने के लिए आमन्त्रित किया।
पदार्थ सामान्यतया एक नियम व्यवस्था के अनुसार काम करते है। अणु-परमाणुओं से लेकर ब्रह्माण्ड के तारों, मण्डलों तक पर प्रकृति के कुछ नियम अनुशासन नियन्त्रण करते हैं, तदनुरुप ही सृष्टि का सारा क्रम चलता है। किन्तु चेतना का प्रकृति पर भी आधिपत्य है और वह अपने आकर्षण तथा दबाव से प्रकृति नियमों में भी हेर-फेर कर सकता है। कई बार देवताओं, सिद्धपुरुषों एवं प्रेतात्माओं के प्रभाव से वस्तुओं के सामान्य व्यवस्था क्रम में उलट-पुलट देखी गई है। साधारणतया प्रचलित व्यवस्था में इस प्रकार की गड़बड़ियों गुन्जायश नहीं होती। किन्तु देख गया है कि चेतना का दबाव बिना शरीर या उपकरणों का प्रयोग किये ही अपनी इच्छाशक्ति के सहारे ऐसा कुछ कर देता है जिन्हें रहस्य कहने के अतिरिक्त और कोई समाधान सूझ नहीं पड़ता।
24 अप्रैल 1944 के साप्ताहिक समाचार पत्र ‘टाइम’ में प्रकाशित घटना से पता चलता है कि वास्तविक जीवन में विलक्षणताओं को अन्धविश्वास कहकर नहीं ठहराया जा सकता है। श्रीमती पाँल्मिन रेवेल अमेरिका के उत्तरी भाग में डकोटा क्षेत्र के रिचर्डसन नामक नगर में बाइल्ड प्लम स्कूल की शिक्षका थी। जो आठ बच्चों को पढा रही थी अचानक घटना घटी।
कमरे के अन्दर रखी हुई अंगीठी में कोयले स्वयं प्रज्वलित होने लगे। थेड़ी देर में कोयले अंगीठी से निकलकर दीवारों से टकराये और फिर वापस अपने पूर्व स्थान पर ही आ गये। एक जलता हुआ कोयला एक विद्यार्थी के ऊपर जा गिरा जिससे उसका सिर झुलस गया। एक तेजी की अवाज के साथ अंगीठी विपरीत दशा में जा खड़ी हो गई वहाँ पर रखी हुई पुस्तकों का एक बन्डल स्वयं ही बड़ी तेजी के साथ लने लगा। उसी शेफ में रखा हुआ एक शब्दकोष अपने आप नीचे उतर आया और कमरे की खिड़कियाँ स्वयं ही जलने लगी।
उसी क्षण शिक्षिका द्वारा फाइरब्रिगेट को सूचित किया गाय। उनके आने पर भी अग्नि का प्रभाव बना ही रहा। विद्यार्थीयों को अपवने घर भेजकर कालेज को बन्द कर दिया गया। उन कोयलों का परीक्षण विज्ञान के शिक्षकों द्वारा किया गया और बाकी को अमेरिका की खुफिया पुलिस के वैज्ञानिकों द्वारा जाँच की गयी। इसके बारे में श्रीमती रेवेल ने स्कूल के बच्चों को पृथक रुप से पूछा तो उन्हाँने स्थिति की सच्ई को प्रकट किया।
इस घटना को लेकर वैज्ञानिक क्षेत्र में तहलका मच गया और बहुत समय तक उस सर्न्दभ में जाँच पड़ताल चलती रही। प्रो0 जार्ज गैमोन ने इस सर्न्दभ में लम्बी खोज की और कारणों तथा सम्भावनाओं पर कितनी ही अटकलें लगाते हुए प्रकाश डाला, एक दूसरे वैज्ञानिक मैक्सवेल ने भी इस घटना को लेकर कइर्द तरह की अटकलं लगाई। किन्तु समाधान किसी का भी नहीं हुआ। वे स्वयं अपने निष्कार्षों को अटकल बताते थे तो दूसरा कोई क्यों उन्हें सुनिश्चित माने ?
इस सम्भावना पर ही अधिक विश्वास किया गया कि कोई अदृश्य व्यक्तित्व के दबाव से इस प्रकार की उलट-पुलट हुई होगी। ऐसी अनेकों घटनाएँ यह बताती है कि चेतना की व्यक्ति विशेष में मात्रा भले ही न्यून हो, पर उसमें सम्भावनाएँ अपने उद्गम स्त्रोत जितनी ही विद्यमान रहती है।
मनुष्य की विलक्षणताएँ कई बार अनायास ही उभर कर ऊपर आती देखी गई है। कई बार उन्हें जगाकर ..... किया जाता है। दोनो ही परिस्थितियों से यह सिद्ध होता है कि मानवी सत्ता में अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। यदि उन्हें खोजने और जगाने का प्रयत्न किया जाये तो प्रकृति के वैज्ञानिक अनुसन्धानों से अब तक जितना मिल सका है उसकी तुलना में व्यक्तित्वव की खोजबीन से अपेक्षाकृत कहीं अधिक उपलब्धियाँ करतलगत की जा सकती है।
प्रकृति पदार्थमयी है इसलिए उसका अनुशासन पदार्थ पर तो पूर्णतया लागू होता है किन्तु मनुष्य चेतना का धनी है। उसकी अपनी मौलिक विशेषता है और ऐसी है जो प्रकृति को अपना अनुयायी बना सकती है। अनुसन्धान के लिए यदि आत्म-सता के क्षेत्र में प्रवेश किया जा सके तो मनुष्य सच्चे अर्थो में सिद्वियों और चमत्कारों का अध्सिपति हो सकता है।
एल्फ्र्रेड लाँगवेन नामक एक ऐसा व्यक्ति मिशिगन (अमेरिका) में था जो अपनी आँखों से फूँक मारकर जलते हूए दीपक को बुझा देता था। दस पर अनेक तरह के प्रयोग और परीक्षण हुए, पर कही कोई ऐसा कारण समझ में नहीं आया जिससे यह पता चला हो कि उसने ‘ट्रिक’ की है अथवा किसी तरह अभ्यास से सह सामर्थ्य विकसित हुई हो, अपितु दसमें यह क्षमता जन्मजात और ईश्वर प्रदत थी। एकबार तो उसके मुँह और नाक के नथुनों को पुरी तरह सील कर दिया गया तो भी उसके सामने जलती हुई मोमबती लाते ही उसने आँख से फूँक मारकर बुझा दी। यही नहीं इस अवधि में उसने साँस न मिलने से होने वाली कैसी भी घबराहट अनुभव नहीं की।
जार्जिया का टोकोआ पहलवान 364 पौण्ड भरी है अब बिना किसी की सहयता के 6370 पौण्ड वजन अकेला उठा लेता है और कुछ दूर तक उसे ठोकर से भी ले जाता है। ओलम्बक खेलों में उसने 1932 में 1956 में चेम्पियन का सम्मान प्राप्त किया था।
स्मरण शक्ति के इतिहास में इटली के जोसेफ कास्पर ने कीर्तिमान स्थापित किया था जो अभी तक तोडा नहीं जा सका। वह संसार की प्रायः समस्त भाषाओं का ज्ञाता था। इनमें 144 प्रमुख भाषाएँ हैं और अपनी लिपियाँ तथा व्याकरण की सुनिश्चित पद्वतियाँ है। इसके अतिरिक्त इसे 72 ऐसी श्रेत्रीय भाषओं में बोलने तथा समझने का अभ्यास था जो लोक-जीवन में प्रचलित तो है, पर उनका विधिवत् निर्धारण नहीं हुआ है। कास्पर को सबसे अधिक समय चीनी भाषा सीखने में लगा। इस अध्ययन में उसे चार महीने का समय नष्ट करना पडा।
डेनमार्क के एक नगर कोपेनहेगन में एक बैंक में आग लगई। सोने, चाँदी के सिक्के तो बच गए, किन्तु अन्य सारे रिकार्ड जल गये। अगले दिन बैंक के सामने लोगों की भीड जमा हो गई तथा सभी अपना हिसाब माँगने लगे। बैंक के अधिकारी रिकार्ड के अभाव में उलफत में पड गये। तभी बैंक का एक र्क्लक आगे आया। नाम था-वर्थोल्ड नोव्हर। उसने बताया कि उसे दो हजार ग्राहकों के हिसाब जवानी याद हैं। डाइरेक्टर ने उसकी बात पर विश्वास कर धन जमा करने वालों से पूछा तो पता चला कि र्क्लक का कहना ठीक है। इस विलक्षण स्मृति के आधार पर सबका पैसा ठीक प्रकार से चुका दिया गया।
इग्लैंड में एक ऐसा व्यक्ति था जो 1483 में जन्भा और 1635 में मरा। उसने डेढ़ शताब्दी का समय निरोग रहकर गुजरा। उसने अपने समय में दस राजाओं को सिहासन रुढ़ होते और पद छोड़ते देखा। असली नाम तो लोग भूल गये थे। “औल्ड पार” नाम से उसे पुकारा जाता था अतएव इसी नाम से उसका उल्लेख किया गया। वृद्वावस्था को सम्मान देने की द्वष्टि से सामान्य नागरिक होते हुए भी उसे ‘वेस्ट मिस्टर एवी’ के सम्मानित कब्रिस्तान में दफन किया गया।
नास्तिकतावादी नीत्से ने आत्मा और परमात्मा का अस्तिव तो नहीं स्वीकारा, पर वे भी मनुष्य का ‘अति-मानव’ बनने की प्रेरणा देते थे।
यही है नव-जागरण जिसके लिए उपनिषद्कार ने प्रत्येक विज्ञजन को उद्वोधन करते हुए कहा है- - “ ऊँचे उठो- - प्रसुप्त को जगाओ- जो महान है दसका अव-लम्बन करो और आगे बढ़ो” इस लक्ष्य की दिया में जितना प्रयास किया जायगा मनुष्य उतना ही समर्थ और समृद्ध बनता जायगा।
सौर्न्दय को बनावट या सज्जा के साथ जोडा जाता है और किसी को कुरुप या रुपवान ठहराने के लिए उसके द्वश्य स्वरुप को परीक्षा का आधार माना जाता है। पुष्प की शोभा हो या तरुणी की माँसलता, सौर्न्दय की परख के लिए उसकी आभा पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है।
यह बहुत ही उथली द्वष्टि से है। तात्विक सौर्न्दय बोध, व्यक्ति की अपनी भाव-सम्बेदना पर आधारित है। स्नेह सौजन्य को अनुभव करने पर कुरुप बालक या प्रियजन भी सौर्न्दयवान लगते हैं, जबकि उपेक्षा या शत्रुता का भाव रहने पर सुन्दर समझे जाने वाले पदार्थ या प्राणी कुरुप लगते है। सचना की द्वष्टि से सिंह , व्याघ्र, सर्प आदि की काया को कुरुप नहीं कहा जा सकता। फिर भी किसी को उनमें सौर्न्दय की अनुभूति नहीं होती।
आँखे केवल प्राकृतिक उभार के दिनों की स्थिति में सुन्दरता देखती हैं। इस दृष्टि से किशोर वय को अधिक मान्यता मिली है। इन दिनों हर अवयव माँसल स्निग्ध तथा आकर्षक होता है। इसके पूर्व या पश्चात् के दिनों में वही काया सामान्य दीखती और आकर्षण रहित लगती है।
पुरातन और स्वाभाविक परम्परा यही रही है। इसके बाद सभ्यता का युग आया। उसने सजधज की श्रृंगारिता के नये-नये आधार प्रस्तुत किये। देवताओं को मुकुट, पीताम्बर, आयुध और बाहनों से सुसज्जित करने की प्रथा इसी काल की देन है।नारी को नख-शिख के सजाने वाले अलंकार इन्हीं दिनों पहनाये गये। अब तक श्रृंगार ही सब कुछ है। उसे माँसलता से भी अधिक महत्व मिलने लगा है। श्रृंगार साधनों में कुरुपता को छिपा देने, कृत्रिम सुन्दरता चिपका देने की विशेषता तो है पर अब तो उसी ने प्रधानता पकड़ ली है।
इतने पर भी सौर्न्दय का मूल उद्गम अपने स्थान पर ही स्थिर है। वह भाव सम्वेदनाओं पर आधारित है। कवि हृदय को बादलों में लहरों में, निर्झर के कल कल में, प्रभात की ऊषा में जो सौर्न्दय बोध होता है वह उन पदार्थों से उद्भूत नहीं वरन् अनुभव कर्त्ता की सम्वेदना का प्रतिफल है।
सम्वेदना स्तर शुष्क होने पर सुन्दर से सुन्दर वस्तु मात्र पदार्थ जैसी नीरस प्रतीत होती है। फूलों का व्यवसाय करने वालों को वे विक्रय की एक घास-पास जैसी वस्तु अनुभव करते हैं, जबकि किसी भावुक के लिए उन्हीं के साथ सघन श्रद्धा की अनुभूति लिपटती और आराध्य के चरणों पर समर्पित होती है।
सौर्न्दय वस्तुतः चेतना की उत्कृष्ट स्थिति का अनुभव मात्र है। उसका पदार्थ या प्राणी से इतना सम्बन्ध नहीं जितना कि दृष्टा के दृष्टिकोण का। यह सौर्न्दय बोध बिना आँखों के भी हो सकता है। सूरदास ने अपनी अनुभूतियों को जिस प्रकार कृष्ण कलेवर में लपेटा और व्यक्त किया है, उससे स्पष्ट है कि दर्शक की दृष्टि एवं दृश्य की उपस्थिति न होने पर भी आन्तरिक सम्वेदनाओं के आधार पर सौर्न्दय की अनुभूति निर्वाध रुप से की जा सकती है। वस्तुतः वह भीतर से निकलती है और प्रिय वस्तु से टकरा कर प्रतिच्छाया के रुप में दीखती और प्रति ध्वनि की तरह गूँजती है। सौर्न्दय बोध और अध्यात्म तत्वदर्शन में राई रत्ती जितना ही अन्तर हो सकता है। ईश्वर भी सौर्न्दय की तरह भीतर प्रकट होकर बाहर परिलक्षित होता है।
मनुष्य को ईश्वर ने अन्य प्राणियों की तुलना में जे विशेषताएँ और विभूतियाँ दी हैं, उनका उद्देश्य एक प्राणी विशेष के साथ पक्षपात और दूसरों के साथ उपेक्षा बरतने का नहीं है। ऐसा होता है तो ईश्वर अन्यायी होता और उसे न्यायकारी, समदर्शी आदि न कहा जाता। सरकारी अफसरों के हाथ में शक्ति रहती है और साधन सामग्री भी। यह उन्हें मात्र शासन व्यवस्था एवं लोक-कल्याण में प्रयुक्त करने के लिए मिली होती है। वेतन तो निर्वाह भर के लिए सुविधाएँ मिली हैं। मनुष्य को इसके अतिरिक्त जो मिला है, वह ईश्वर की इस विश्व वाटिका को सुन्दर, समुन्नत, सुस्कृत बनाने में सहायता करने के लिए है। मनुष्य ईश्वर का युवराज है। युवराज के हाथ में शासन सत्ता का अधिक उपयोग करने की सामर्यि रहती है। पर वह उसका उपयोग अपने शौक मौज में समाप्त नहीं कर देता वरन् अपने कुटुम्बियों एवं प्रजाजनों की सुविधा, व्यवस्था में करता है। ठीक इसी प्रकार पमुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में जो भी विशेषताएँ, सुविधाएँ एवं सामर्थ्ये मिली हैं वे इसी प्रयोजन के लिए हैं कि ईश्वर के उत्तरदायित्वों में हाथ बंटाया जाय, उसकी शासन व्यवस्था को अधिक श्रेष्ठ और सुखउ बनाया जाय।
अधिकार के साथ कर्त्तव्य भी जुड़े होते है। अनुदान का प्रतिदान भी देना पड़ता है। ईश्वर ने मनुष्य को सृष्टि के शासन में हाथ बटाने का अधिकार दिया है और उसके अनुरुप बुद्धि, सुविधा एवं सम्पदा भी प्रदान की है। इस अधिकार को पाने के साथ ही कुछ कर्त्तव्य भी स्वभावतः कन्धे पर आते है। उपलब्ध विभूतियों में से उतना ही अपने लिए उपयोग करे जो हिस्से में आता है, शेष को सार्वजनिक सम्पदा समझे और उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में करके ईश्वर की इच्छा पूरी करे और अपनी ईमानदारी का परिचय दे।
अपने हिस्से का तार्त्पय है औसत नागरिक के हिस्से में न्यायोचित विभाजन से जितना आता है उतना ही उपभोग या संग्रह करें। शेष को विश्व परिवार की सम्पदा माने और जो उपलब्ध है उसे संरक्षक ट्रस्टी की तरह लोकमंगल के लिए प्रयुक्त करे। संसार में गरीब-अमीरों की मध्यवर्ती अनुपात सम्पदा थोड़ी ही होती है वह इन दिनों इतनी ही है कि हर व्यक्ति मितव्यतापूर्वक किसी प्रकार पेट भरने और तन ढ़कने का गुजारा प्राप्त कर सके। विश्व एक परिवार है। हर व्यक्ति विश्व नागरिक है। इसे विचार करना चाहिए कि परिवार के हर व्यक्ति को लगभग एक जैसे स्तर की ही व्यवस्था बनाये रहनी चाहिए। घर में कुछ व्यक्ति गुलछर्रे उड़ाये और शेष की निर्वाह की आवश्यक सुविधाओं से वंचित रहना पड़े तो यह अनीति है। समर्थ लोग ऐसा कर सकते हैं क्योंकि उनके हाथ में इतनी शक्ति होती है। कई कमाऊ लोग शराब पीते और दुर्व्यसनों में अपनी बहुत-सी कमाई फूँक देते हैं। फलतः अन्य बाल वृद्धों को अभाव और कष्ट सहने पड़ते हैं। जहाँ भी ऐसी अनीति चल रही होगी वहाँ समर्थ का अत्याचार ही निरुपित किया जायेगा। निरंकुशता बरती जाती रहे और कोई रोकथाम न बन पड़े तो भी अन्याय तो अन्याय ही रहेगा। उसके फलस्वरुप आत्मा की अवगति समाज में अव्यवथा एवं जन विवे की भर्त्सना, ईश्वरीय को प जैसे दुष्परिणाम तो भोगने ही होंगे।
ईश्वर ने मनुष्य को जो अन्य प्राणियों से अतिरिक्त दिया है उसे विशुद्ध अमानत मानकर चलना और उसका उपयोग उसकी विश्चव वाटिका को समुन्नत करने में करना ही सच्चा ईश्वर विश्वास है। अपने लिए औसत विश्व नागरिक जितना न्यूनतम निर्वाह प्राप्त करना ही ईश्वरीय व्यवस्था को सच्चे मन से स्वीकार करना है। उपलब्ध साधनों का उपयोग यदि अपने लिए अपनों के लिए ही किया जाता है तो उन सबका हक मारा जाता है जो युवराज के संरक्षण में सौंपे हुए है। युवराज का पद प्राप्त करने के साथ-साथ उसी गौरव गरिमा को बनाये रहना भी आवश्यक है।
मनुष्य और ईश्वर के मध्यवर्ती अधिकार एवं कर्त्तव्य की जागरुकतापूर्वक विवेचना करना और उसमें कहीं कुछ व्यतिक्रम चल रहा हो तो उसे ठीक करना ही आस्तिकता है। जो इस सर्न्दभ में मुँह मोड़े रहते है, मनमानी करते है, तथ्यों की उपेक्षा करते है वे नास्तिक हैं।
बैंक से ऋण मिलता है। वह पैसा हाथ आते समय कोई यह समझा बैंठे कि यह मुफ्त में मिला है और उसे चाहे जिस तरह उपयोग किया जा सकता है तो यह भूल है। बैंक सदा उत्पादक, उपयोगी कामों के लिए ही ऋण देती है और उसे नियत अवधि में ब्याज समेत वापिस करने की अपेक्षा रखती है। यदि ऋण प्राप्त करता बैंक के अनुदान को मुफ्त का माल समझे और वापिस करने की बात मन में से निकाल दे तो फिर समझना चाहिए कि बेंक व्यवस्था ही समाप्त हो जायेगी। ईश्वर ने मनुष्य को जो भसी अतिरिक्त दिया है वह विशुद्ध ऋण है। उसे प्रमाणिक और ईमानदार समझकर यह अनुदान दिया गया है। साथ ही यह अपेक्षा भी रखाी गई है कि इसे ब्याज समेत इसी जीवन की अवधि में वापिस भी कर दिया जायेगा।
निकृष्ट योनियों से ऊपर उठाकर मनुष्य जीवन का परम सौभाग्य प्रदान करना ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुग्रह है। इससे आगे की उपलब्धियाँ मनुष्य के अपने पुरुषार्थ पर निर्भर हैं। संचित कुसंस्कारों से जूझने और आत्मीयता विस्तृत करने का संयुक्त प्रयास ही साधना है। उपासना इसी प्रखरता को जागृत करने के लिए की जाती है। यदि वह तथ्य को समझते हुए की गई है और भजन-पूजन के साथ साथ ही अपनी दिशाधारा मोड़ने और रीति-नीति सुधारने का प्रयत्न भी जरी रखा गया है तो उसका प्रतिफल निश्चित रुप से होना चाहिए। ईश्वर के अतिरिक्त अनुदान सन्त, सुधारक एवं शहीद की गरिमा रुप में मिलते हैं। महामानव, ऋषि, देवतात्मा बनने के उपरान्त मनुष्य अन्ततः परमात्मा के पद तक जा पहुँचता है। यह आध्यात्मिक पदोन्नति जिस ईमानदारी एवं कर्त्तव्य परायणता के आधार पर सम्भव होती है उसे ही आत्मपरिष्कार एवं परमार्थ पुरुषथ्र के रुप में देखा जाता है।
ईश्वरीय अनुकम्पा की न्यूनाधिक मात्रा को प्राप्त करना पूर्णतया साधक के पुरुषार्थ पर निर्भर है। ईश्वर की इच्छा पर नहीं। ईश्वरच्छा विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न प्रकार की नहीं हो सकती। समदर्शी के लिए सभी बालक समान रुप से प्रिय हैं। उसकी सभी के लिए शुभेच्छा है। प्रतियोगिता में आगे निकलने वाले सर्वत्र विशेष अनुदानों के भागी बनते रहे है। विशेष उपहार राष्ट्रपति द्वारा हर साल विशेष व्यक्तियों को दिये जाते हैं। ईश्वर के दरबार में भी यही परम्परा है। न किसी के साथ पक्षपात न किसी के साथ अन्याय। पुरुषार्थ बढ़ते हैं और सिद्धियाँ पाते हैं, अकर्मण्य पिछड़ते हैं और प्रगति से वंचित रहते है।
ईश्वर शक्तियों, सिद्धियों, विभुतियों का भण्डार है। इस जड़ जगत में जो कुछ श्रेष्ठ, सुखद और सुन्दर दीखता है वह सच्चिदानन्द परमेश्वर का ही वैभव है। मनुष्य जीवन उसी की देन है। संसार के अनेकानेक सुख साधन उसी के वैभव का विस्तार है। उस परम सत्ता के साथ जो जितना सम्बद्ध है, जिसने आदान-प्रदान के सूत्रों को जितना सक्षम बनाया हुआ है वह उतना ही ऐर्श्वयवान् बनता है। ऐर्श्वय ईश्वर की ही देन है। ईश्वर के साथ-साथ मनुष्य का सम्बन्ध सूत्र तो पहले से ही जुड़ा हुआ है, पर कषय-कल्मषों के व्यवधान ने उसे अवरुद्ध कर रखा है। फलतः जो अतिरिक्त मिल सकता था उससे वंचित रहना पड़ रहा है। ऊँचा उठने आगे बढ़ने की आकाँक्षा स्वाीविक है। अपना पुरुषार्थ सीमित मात्रा में भौतिक लाभ ही उपार्जित कर सकता है। पर वैभव और चरम उर्त्कष के लिए ईश्वर का विशेष अनुग्रह चाहिए। यह सर्व सुलभ है। आत्म-निर्माण की ईमानदारी और लोक-निर्माण की जिम्मेदारी का हम जितना बढ़ा-चड़ा परिचय देते हैं उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुदान अनायास ही बरसने लगते हैं और मनुष्य तुच्छ से महान्, नर से नारायण बनता है। आस्तिकता का तत्वदर्श और उपासना का विधि-विधान इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है।
मरणोपरान्त जीवन के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष अनुभवों के उदाहरणों से परिपूर्ण ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ पुस्तक का प्रकाशन अभी हाल ही में हुआ है। इसके लेखक डा0 रेमाँड ए. मूडी है। जिन्होंने 50 ऐसे व्यक्तियों के अनुभवों को इस पुस्तक में संग्रहीत किया है। जिन्हें डाक्टरों ने मृतक घोषित कर दिया था किन्तु थोड़ी देर बाद वह पुनः जीवित हो उठे। स्वर्गीय अनुभवों से युक्त इस पुस्तक के कई बार संस्करण प्रकाशित हो चुके है।
रेमाण्ड ए. मूडी जब वर्जोनिया विश्व विद्यालय में छात्र थे तब उनके एक मनोविज्ञान के प्रोफेसन ने बताया कि अपनी बीमारियों के दौराव वह दो बार मर चुके है। उनके कथन को लेखक ने टेपरिकार्ड कर लिया था। उनके अनुसार मृत्यु के बाद महाशान्ति प्राप्त होती है।
लेखक जब कारोलिना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। तब उसके एक छात्र ने अपनी दादी की मृत्यु के बाद पुनः जीवित हो उठने की बात बताई। जिसमें मृत्यु के बाद अंधेरी गुफा, घण्टियों की आवाज, महाप्रकाश व पितरों की आत्मा से साक्षात्कार की बात उस महिला ने स्वीकार की थी।
एक व्यक्ति जिसकी चोट लगने से अचानक मृत्यु हो गई थी और थोड़ी देर बाद वह पुनः जीवित हो उठा। उसने अपना अनुभव बताया - “चोट की जगह एक क्षण के लिए दर्द महसूस हुआ और फिर सारा दर्द गायब हो गया। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं अन्धकार में उड़ता जा रहा हूँ। यद्यपि शीत ऋतु थी फिर भी अन्धकार में तैरता हुआ गर्मी और दिव्यतम सुख का अनुभव किया।”शारीरिक पीड़ा के असह्मय होते ही डाक्टरों द्वारा मृत घोषित एक व्यक्ति ने जीवित होने के बाद बताया कि उसे यह शरीर छोड़ते ही नये किस्म का शरीर मिल गया था। उसने घण्टियों की आवाज सुनी, अंधेरी सुरंग में जाने और बाद में अपने पूर्व मित्रों व पितरों से मिलने की बात कही। उस व्यक्ति ने यह भी बताया कि उसने अपने पूर्व मृत पितरों के साथ एक दिव्य प्रकाश युक्त आत्मा को देखा जिसमें प्यार और ममता का निर्झर बह रहा था। इस प्रकाश ने उसके पूर्व जीवन में घटित घटनाओं अर्थात् कार्यां का नक्शा दिखाया। उस दिव्य वातावरण से वह लौटना भी न चाहता था किन्तु अचानक उसे अपने इस जीवन का स्मरण हो आया और वह जीवित हो उठा। उसने बताया कि उस अलौकिक वातावरण का वर्णन वाणी से करने में असमर्थ है।
मृत घोषित होने के बाद पुनः जीवित होने वाली एक महिला ने बताया कि - “मैंने अखण्ड शान्ति, परम आनन्द और सुख के अलावा अपने मृत्यु काल में और कुछ भी नहीं महसूस किया।”
वियतनाम युद्ध में गोली लगने से मरा और बाद में जीवित होने वाले सैनिक ने बताया कि- “गोली लगते ही मैंने परमशान्ति और राहत की साँस ली। मुझे कुछ भी कष्ट नहीं हुआ। असके पूर्व इससे ज्यादा सुख मैंने कभी नहीं महसूस किया था।”
एक मृत व्यक्ति ने बताया कि मैंने मरते समय पाया कि एक ऐसी सीमा रेखा पर पहुँच गया हूँ जहाँ पर दिव्य प्रकाश पुँज के रुप में एक आत्मा मिली उसने बड़े ही प्रेम से, ममता व अपनत्व का परिचय दिया। साथही वहाँ पर व्याप्त दिव्य प्रकाश पुँज आत्मा ने उसके जीवन में किये कार्यों से सम्बन्धित नाना प्रकार के प्रश्न भी किये।
एक व्यक्ति का अनुभव है कि मरने के बाद उसने अपने को एक हरे रंग के प्रकाश युक्त मैदान में उड़ते देखा। उस मैदान के पार एक चहार दीवारी है उसके उस पार एक दिव्य ज्योति पुँज व्यक्ति उसे लेने आ रहा था।
एक व्यक्ति ने बताया कि उसने भूरे रंग के कुहरे में अपने को उड़ते देखा था। उसे पार धरती के निवासियों के समान इंसान थे। वहाँ पर बड़ी-बड़ी इमारतें व रोशनियाँ जगमगा रही थी। वहाँ पर उसने कई वर्ष पूर्व मरे चाचा कार्ल को भी देखा। उसे चाचा ने उसे पुनः धरती भेज दिया था।
इस प्रकार की सुखद अनुभूतियाँ उन्हे होती है जो शान्ति और सद्भावनाओं से भरा हुआ जीवन जीते है। जीवन भर छाई रही उत्कृष्टता ही मरण के उपरान्त अपने लिये एक सुखद संसार गढ़ लेती है और उन्हें इस हलकी फुलकी दुनिया में भी स्वर्गीय वातावरण छाया दृष्टिगोचर होता है।
इसके विपरीत जिनने निराशा, दुर्बुद्धि एवं दुष्टता से घिरी मनःस्थिति एवं परिस्थिति में जीवन गुजारा है उन पर इसी स्तर के स्वप्न मरणोत्तर जीवन में छाये रहते है। यह अपना रचा नरक है जो जीवित हरते भी दीखता है और शरीर छोड़ने के उपरानत भी। र्स्वग और नकर भी अपने इसी संस्कार की तरह अदृश्य प्रगति का कोई घटक हो सकता है पर इसमें किस द्वार से प्रवेश किया जाये यह पूर्णतया अपनी ही आदतों पर निर्भर रहता है।
उपरोक्त शोध में ऐसे उत्तर भी मिले है जिसे प्रतीत होता है कि मरने के बाद का समय डरावना भी होता है और नीरस तथा कष्टकारक भी। इसी स्थिति का विवेचन कोई चाहे तो नकर की विभीषिकाओं के साथ भी संगति बिठा सकता है।
एक व्यक्ति का अनुभव है कि जैसे ही वह मरा वह एक अंधकार युक्त सुरंग में पहुँच गया।
एक दूसरे का कहना है कि मर कर वह सर्वप्रथम एक अंधकार युक्त सिलिण्डर में पहुँच गया।
एक मृतक व्यक्ति ने जीवित होने पर बताया कि मेरे मस्तिष्क में एक प्रकार की बुरी भन-भनाहट सुनायी पड़ रही थी, मैं उससे बेचैन हो उठा। उस दृश्य को कभी नहीं भूल सकता।
मरने के बाद भी जीवात्मा अपने मृत शरीर के इर्द-गिर्द मंडलाती रहती है और उसका अस्तित्व बने रहने ते उसके समीप ही बना रहता है। इसलिए स्वजनों द्वारा मृत शरीर को जल्दी ही समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इस दृष्टि से शरीरों को बहुत समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास अनुपयुक्त प्रतीत होता है। सम्बन्धी लोग मोह वश उसकी स्मृति को बनाये रहने के लिए अवशेषों की रक्षा भी करते पाये जाते है पर मृतात्मा को शान्ति और सद्गति की दृष्टि से यही उचित है कि उसका मोह मृत शरीर से छूट सके ऐसा प्रयत्न किया जाये। उसी में उसके शोक की निवृत्ति और भावी प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
एक व्यक्ति ने बताया कि वह जल में डूब कर मर गया था। मरने के बाद उसकी आत्मा जलाशय से 4-5 फुट ऊँचाई पर रुक गई और वहीं से अपने शरीर को डूबते उतराते देखा था। इस समय वह अपने को अत्यन्त हल्का महसूस कर रहा था।
एक मृतक महिला ने बताया कि मरते ही मैं तैरते-तैरते धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी। कोडपिक, कोडपिंक की नर्सों की आवाज सुनी और देखा कि 10-12 नर्सें उसके शरीर को घेर कर खड़ी है। डाक्टर को बुलाया गया। मैंने डाक्टर को अपने कमरे में प्रवेश करते कौतुक देखती रही। मैं स्वयं को अत्यन्त हल्की-फुल्की महसूस कर रही थी। डाक्टर के आदेशानुसार जैसेही डिफिब्रिलेटर मशीन द्वारा मेरे शरीर को झटके दिये गये मैंने सारे शरीर को उछलते पाया, हड्डियों में दर्द हुआ। मैं पुनर्जीवित हो गई।
हर जन्म लेने वाले का मरण निश्चित है, मरण के उपरान्त जीवन का क्रम भी दिन और रात की तरह चलता रहता है। इसका मध्य काल कैसे बीतता है इसका कुछ आभाश उपरोक्त अनुभवों से मिलता है जो थोड़े समय तक मृत्यु की गोद में रहने के बाद वापिस लौटे और अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने में समर्थ रहे।
संसार में अनेकों आर्श्चयजनक वस्तुएँ पाई जाती हैं और घटनाएँ देखी जाती है। इस सबसे विलक्षण है मानवी संरचना और उसमें सन्निहित सम्भावना। लगता है सृष्टा ने अपनी विभूतियाँ और कुशलताओं को मनुष्य के छोटे से कलेवर में गागर में सागर की तरह भर दिया है। असमंजस इसी बात का है कि वे विशिष्टताएँ प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। सामान्यतया इस रहस्यमय भंडार में से उतना ही प्रकट और विकसित होता है जितनी कि आवश्यकता पड़ती और उभारने की चेष्टा की जाती है। शेष सब कुछ अविकसित एवं अविज्ञात स्थिति में ही पड़ा रहता है।
माना यह जाता है कि कठिन परिस्थितियों और साधनों के अभावों से ही मनुष्य गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहता है और दुःख सहता है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। स्वल्प साधनों से भी वर्चस्व बनाये रखा जा सकता है और वैभव बढाया जा सकता है। यही बात कठिनाइयों के सम्बन्ध में भी है। वे बाधक तो अवश्य होती है और प्रगति क्रम में विलम्ब भी लगाती है। इतने पर भी यह तत्परता और साहसिकता बनी रहे तो अभीष्ट की दिशा में अग्रसर होने में गतिरोध देर तक नहीं रह सकता है। इच्छा शक्ति की सामर्थ्य प्रचंड है। साहस भरे प्रयास ऐसी उपलब्धियाँ अर्जित कर लेते हैं जिन्हें देखने पर चमत्कार जैसा लगता है। देवताओं द्वारा मिलने वाले वरदानों की चर्चा समय-समय पर होती रहती है। देवताओं क अस्तित्व और उनके अनुग्रह के पक्ष विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर यह तथ्य निर्विवाद है कि मनुष्य का संकल्प, साहस और प्रयास यदि उच्चस्तरीय बना रहे तो उसका प्रतिफल दैवी वरदानों से किसी प्रकार कम नहीं होता। कठिन परिस्थितियाँ अपने स्थान पर बनी रहती हैं और मनुष्य अपनी प्रयत्नशीलता के आधार पर वहाँ जा पहुँचता है जिसके लिए सर्व समर्थ भी तरसते पाये जाते है।
इतिहास में ऐसी घटनाओं की कमी नहीं जिसमें अभावों के ऊपर साहस ने विजय पाई है। विकट परिस्थितियों में जन्मे, पले ओर घिरे व्यक्ति आमतौर से पिछड़ेपन से ग्रसित रह कर ही दिन बिताते हैं, पर यह अभिशाप हर किसी पर नहीं लदता। असंख्यों ऐसे भी होते है जो परिस्थितियों को चुनौती देते कठिनाइयों से अठखेलियाँ करते अभीष्ट की दिशा में दन दनाते और सन सनाते चले जाते है। चेतना के अन्तराल में सन्निहित विशेषताएँ उभारने का प्रयत्न करने वालें को किसी के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ता है। प्रतिभा जब उभरती है तो बाहरी सहयोग को अपनी आकर्षण शक्ति के सहारे आस-पास ही खींच लेती है। महामानवों की जीवन गाथा के साथ जुड़े घटनाक्रमों का विश्लेषण करने पर उनकी सफलताओं में इसी तथ्य का पग-पग पर प्रमाण परिचय मिलता है। ऐसे उदाहरणों से इतिहास के पन्ने तो भरे हुए है। दृष्टि पसारने पर इस स्तर के प्रमाण अपने इर्द गिर्द ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकते है।
सन् 1883 में अमेरिका के कोलोरेडो खान में एक 17 वर्षीय मेकफर्सन नाम युवक काम करता था। एक दिन चट्टान दुर्घटना में वह अपनी दोनों आँखें तथा हाथ गवाँ बैठा। सामान्य व्यक्ति अपना धीरज खे बैठता तथा जीवन से निराश हो जाता। किन्तु इस भयंकर दुर्घटना के बाद भी मेफसर्सन का लगाव जीवन से बना रहा। उसने अपनी जीभ की नोक को धातु के टाइप अक्षरों पर फिरा कर पढ़ने का अभ्यास आरम्भ किया। सामान्यतः अंधे व्यक्ति ब्रेल पुस्तकों के उभरे अक्षरों को अंगुलियों से टटोल कर पढते है किन्तु जीभ द्वारा पढने का प्रयास करना एक आर्श्चयजनक घटना है। सतत् प्रयास तथा अटूट मनोयोग का अनुकूल परिणाम निकला। कुछ ही दिनों में मेकफर्सन पढने लगा।
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) के युवक श्री सुरेशानन्द, जिन्होंने पैर से रेडियो बजाना, माचिस जलाने से लेकर लिखने पढने में कुशलता प्राप्त की है। अभी तक दो विषयों में एम.ए. करके स्वस्थ व सबल कहे जाने वाले प्रतिभाशाली छात्रों के लिए एक आदर्श बन गये है।
श्री सुरेशानन्द जिनके दोनों हाथ व दोनों पाँव जन्मजात लुँज है, बचपन में जब अपने बड़े भाई को पढते लिखते देखते तो उनके भी दिल में पढने का उत्साह उमड़ता, किन्तु हाथ से असमर्थ कलम पकड़ने तक की भी सुविधा जिसे ईश्वर ने न दी हो वह रोने के सिवा और का ही क्या सकता है। माता पिता सुरेशानन्द की उत्कण्ठा को समझते किन्तु वह भी तो असमर्थ थे। विवश सुरेशानन्द नित्य अपने भाई का पढना लिखना देख कर अपनी तृप्ति करते। एक दिन अपने भाई की कलम पैर के अंगूठे और उंगली की सहायता से पकड़ कर एक कागज में सुरेशानन्द ने अ, आ लिख दिया। सुरेशानन्द के यह प्रथम बार लिखे अक्षर इतने सुन्दर थे कि कोई भी सामान्य बुद्धि का बालक वैसे अक्षर न बना पाता। सुरेशानन्द के भाईने उनके इन सुन्दर अक्षरों को माता पिता को दिखाया। माता-पिता को सुरेशानन्द की प्रतिभा व अच्छर लिखने की कुशलता का पता चला तो उन्होंने उसके लिए लिखने पढने की सभी साधन सामग्री छोड़ दी।
शिक्षा जारी रही। न उत्साह घटा न प्रयत्न फीका पड़ा। फलतः अच्छे डिवीजन में एक के बाद दूसरी परीक्षा उत्तीर्ण करते हुऐ अंग्रेजी और राजनीति से एम.ए. पास कर ली यह युवक कवि भी है और लेखक भी। रचनाएँ कई पत्रिकाओं में छपती रही है। प्रतिभा के धनी इस लगनशील को राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने सम्मानित भी किया था।
अपनी इसी पृथ्वी पर एक ऐसा भी क्षेत्र है जहाँ के सभी प्राणधारी अन्धे ही होते है। यह स्थान मैक्सिको के समुद्री क्षेत्र में स्थिति टुलप्पिक नाम स्थान है। यहाँ पर जन्म लेते समय बच्चा तो आँख वाला पैदा होता है किन्तु कुछ ही दिनों में वह अन्धा हो जाता है यहाँ पर रहने वाले पशु पक्षी, कीड़े-मकोड़े सभी अन्धे ही होते है।
टुलप्टिक में मात्र एक ही सड़क है जिसके दोनों किनारों पर यहाँ के अन्धे निवासियों की बना दरवाजों और खिड़की वाली झौपड़ियाँ बनी हैं। यहाँ के लोग पक्षियों के कलकल को सुन कर प्रातः काल का अनुमान करते और उसी के साथ उठ कर परुष अपने-अपने खेतों में तथा स्त्रायाँ घर के काम में लग जाती हैं। प्रकृति की यह विलक्षण लीला है कि काई भी अन्धा न तो एक दूसरे के खेत में धोखे से पहुँचता है और न ही दूसरों की झौपड़ी में प्रवेश करता है। अन्धा होते हुए भी प्रकृति ने यहाँ के प्रत्येक प्राणी को इतनी प्रज्ञाचक्षु प्रदान की है कि वह अपना जीवन निर्वाह का क्रम बनाये रह सकता है।
अनेकों ऐसे होते हैं जिन्हें सुविधा साधनों की कोई कमी नहीं होती। सहायक भी बहुत होते है। अभि भावकों का लाड़ प्यार और वैभव भी कम नहीं होता। इतने पर भी वे कोई कहने लायक प्रगति नहीं कर पाते। समय की कमी, साधनों का अभाव बता कर कई व्यक्ति अपने पिछड़ेपन का दोष हलका करते भी हैं। उनकी बात एक सीमा तक स्वीकार भी की जाती है किन्तु जिनके पास किसी प्रकार की कमी नहीं है, उन सम्पन्न परिवारों में जन्मे लोगों को क्या कहा जाय जो पर्याप्त अवसर होते हुए भी किसी दिशा में प्रगति नहीं कर पाते। बैठे-ठाले समय गुजारने वाले और दुर्व्यसनों से ग्रसित होकर उपलब्धियों को नष्ट-भष्ट करते कहने वालों का प्रधान दोष एक ही होता है अपनी विशेषता को न समझ पाना और उन्हें उभारने के लिए उत्साह न जुटा पाना।
सफलताओं में अवरोध उत्पन्न करने वाले अन्य करण भी हो सकते हैं, पर सबसे बड़ा कारण अपनी सामर्थ्य से अनजान रहना योग्यता को न बढ़ाना और प्रगति के लिए पुरुषार्थ न करना। यदि इन दोषों को हटाया जा सके तो हर व्यक्ति उज्जवल भविष्य की संरचना अपने ही हाथों कर सकता है। भले ही उसके इर्द-गिर्द कठिनाइयाँ घिरी पड़ी हो।
प्रत्येक व्यक्ति की धारणा और मान्ता रहती है कि वह संसार का सर्वश्रेष्ठ, सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा व्यक्ति है। कोई अपनी इस मान्यता को व्यक्त करे, या न करे पर आचार में व्यवहार में उसका जो अहं झलकता है उससे क्षण क्षण में चही भाव टपकता है। विचार किया जाना चाहिए कि व्यक्ति जैसा जो कुछ है, उस रुप में उसकी हस्ती क्या है ? पुराणों में कथा आती है कि चक्रवर्ती सम्राट भरत ने जब समस्त भूमण्डल को जीत लिया और वे इन्द्र के पास पहुँचे तो उन्होंने दावा किया कि, मैं ही संभवतः एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने पूरे भूमण्डल को जय कर लिया है। मुझे अपनी कीर्ति को अक्षय और अमर बनाना चाहिए और इसके लिए मुझे वृषमाचल पर अपना नाम अंकित करना चाहिए। भरत की धारणा थी कि यहाँ उनका यह पहला नाम होगा।
इन्द्र ने सम्राट भरत के कथन से सहमति व्यक्त की और कहा कि आप जाइये तथा वृषमाचल पर अपना नाम अंकित कर आइये। वहाँ हम ऐसे ही व्यक्ति को अपना नाम अंकित करने की छूट देते है जिसने पूरी पृथ्वी पर तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली हो। सम्राट भरत बड़े इठलाते हुए वृषमाचल की ओर बढे, पर यह क्या ? वहाँ पहुँच कर तो उनके पैर यकायक ठिठक गये, उन्होने ऊपर से नीचे ते पर्वत शिखर नाप डाला। जहाँ तक वे ज सकते थे ऊपर से नीचे तक शिखर की अन्य दिखाओं में भी गये। समस्या यह थी कि वह अपना नाम कहाँ लिखें ? शिखर परही नहीं पूरे पर्वत पर नाम ही नाम लिखे हुए थे। पूरे पर्वत पर इतने अधिक नाम लिखे थें कि कहीं कोई स्थान इतना खाली नहीं था, जहाँ कि एक नाम और लिखा जा सके। इन लिखे हुए नामों में से एक भी ऐसा नहीं था, जो चकक्रवर्ती का नाम न हो।
भरत खिन्न हो गये। वे पर्वत शिखर से उतर कर इन्द्र के पास गये और कहा- शिखर पर तो कहीं कोई स्थान खाली नहीं है। पूरे पर्वत पर चक्रवर्ती सम्राटों के नाम अंकित है। मैं अपना नाम कहाँ लिखूँ ?
इन्द्र ने कहा - ‘किसी का नाम मिटा दीजिये और स्थान पर अपना नाम लिख दीजिए। मुझे जहाँ तक ज्ञात है पिछले सहस्त्रों वर्षों से यही क्रम चलता आ रहा है। मेरे पिता भी बताते थे कि न मालूम कब से यह परम्परा चली आ रही है, उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम।”
“तो फिर कभी मेरा नाम भी मिटा कर भविष्य में कोई चक्रवर्ती सम्राट वहाँ अपना नाम लिख जायेगा ?” सम्राट भरत ने पूछा।
‘अवश्य ही इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता। अतीत में अनादि काल से असंख्य चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं और भविष्य मं भी अनन्त काल तक होते रहेंगे। किसी के सम्बन्ध में आश्वासन पूर्वक यह नहीं कहा जा सकता कि उनका नाम अनन्त काल तक इस पर्वत शिखर पर अंकित रहेगा।”
तो फिर क्या लाभ ? सम्राट भरत का अहं विगलित होकर पानी-पानी हो गया। वे अनुभव करने लगे कितना विराट् और अनादि अनन्त काल से चला आ रहा है यह जगत ? इस विराट् और विषम जगत में अपना अस्तित्व अपना स्थान है ही कितना ? यह सोचना गलत होगा कि हम से पहले किसी ने वह काम न किया है जो मैंने कर लिया है। अति समथ शक्तिशली,, अजेय कुबेर के समान वैभव सम्पन्न और सूर्य के समान अपनी कीर्ति को चतुर्दिश बिखेरने वाले मानव न जाने कितने हुए है ? भविष्य में भी वे और होते रहेंगे, इस स्थिति में अपना महत्व है ही कितना ?
यह सोचकर सम्राट भरत इन्द्रलोक से वापिस चले आये। उनका अभिमान जाता रहा था, अहं जल कर क्षार-क्षार हो गया था और उस ‘अहं’ का विसर्जन होते ही इतनी शान्ति अनुभव होने लगी, जितनी कि समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त भी नहीं हुई थी। तब भी महत्वाकाँक्षाओं की अद्विग्नता अशान्त किए दे रही थी और जब अपने अहं का सत्य महत्व का भान खुलकर सामने आ गया तो लगा सब कुछ शान्त हो गया है।
समस्त विग्रह, क्लेश, कलह, युद्ध केवल अहं का पोषण और महत्व का तोषण करने के लिए ही तो है। काल के प्रवाह को दृष्टिगत देखते हुए, उस परिप्रेक्ष्य में आत्मविश्लेषण किया जाये तो शान्ति इसी क्षण, अभी और यहीं उपलब्ध है।
भूत-प्रेतों के अस्तित्व पर कई लोग विश्वास करते है और कई नहीं भी करते है। यह सच है कि अनेक बार सामान्य घटनाओं को भी भूत-प्रेत की लीला समझा जाता है और उनके सम्बन्घ में अतिरंजति कल्पनाएँ की जाती है। भूत-प्रेतों से सम्बन्धित अधिकाँश मामलों में मूल में अन्धविश्वास, धोखाधड़ी और अज्ञान ही कारण होते है, पर यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भूत-प्रेतों का अस्तित्व है और वे कई तरह से अपने अस्तित्व का पचिय देते है। कौन सी घटना से भूत-प्रेतों का अस्तित्व सिद्ध होता है और कौन-सी बातें मात्र अन्धविश्वास है, यह भेद करना कठिन है। किन्तु परामनोविज्ञान की शाधों के अनुसार अब यह शास्त्रीय मान्यता पुष्ट हो चुकी है कि मरने के बाद और जन्म लेने के पूर्व जीव कुछ समय तक अशरीरी अवस्था में रहता है।
कुछ शान्त आत्माएँ इस अवस्था में चुपचाप रहती है और उपयुक्त गर्भ का चुनाव करने के लिए प्रतीक्षा करती रहती है। किन्तु कई विक्षुब्ध आत्माएँ अशरीरी अवस्था में भी अपने जीवन काल की मनःस्थिति का परिचय देती रहती है। भूत-प्रेतों के अस्तित्व सम्बन्धी प्रचलित कथा-गाथाओं के सम्बन्ध में यह तथ्य सदा ही सामने आया है कि जो व्यक्ति मरते समय अत्यधिक आवेश में रहे है, उन्होंने प्रेत कलेवर में उसी मनःस्थिति का परिचय दिया है। जैसे धन या मकान से अत्यधिक लगाव रखने वाला व्यक्ति मरते समय उन वस्तुओं से अत्यधिक मोह प्रकट करते हुए विलग हुए है तो उनका प्रेत उन्हीं स्थानों के इर्द-गिर्द भटकता रहता है। जमीन में गढ़े हुए धन की उन्होने चौकीदारी की है और यदि किसी ने उसे निकाला, भोगा या निकालने का प्रयास किया है तो उसको तरह-तरह के त्रास दिये है।
घृणा और रोष की स्थिति में मरने वाले अक्सर अपने प्रतिपक्षी को कष्ट देते रहे है। इस तरह की एक घटना का विवरण नाइजीरिया के एक अंग्रेज अफसर फ्रेंक हाइब्स ने प्रकाशित किया था। अफ्रीका का यह देश किसी समय अंग्रेजों का उपनिवेश था। अब यों वहाँ आजादी है, पर प्रभुत्व वहाँ स्थाई रुप से बसे हुए गोरों का ही है, फ्रेंक हाइब्स भी वहाँ बसे हुए अंग्रेजों में से ही है। एकबार वह किसी काम से ‘इसुइंगु’ नामक देहाती क्षेत्र में गया। वहाँ एक पुराना और टुटा-फुटा डाक बंगला था। फ्रेंक हाइब्स ने उसी डाकबंगले में ठहरने का निश्चय किया।
उस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों ने फे्रंक हाइब्स को बताया कि इस बंगले में प्रेत रहते है इसलिए वहाँ न ठहरें। अफसर उनकी बातों पर हंसता रहा। उस बंगले में काफी दिनों से शायद कोई नहीं ठहरा था। फें्रक ने मजदूरों से उसे साफ करवाया। मजदूरों ने बंगले की सफाई कर दी, ठहरने और खाने-पीने के साधन जुटा दिये, पर जब उनसे वहाँ रात को रुकने के लिए कहा गया तो कोई भी इसके लिए तैयार नहीं हुआ। निदान फें्रक को अकेले ही वहाँ ठहरना पड़ा।
आधी रात गए तक तो कोई विशेष बात नहीं हुई। पर रात के बारह बजे बाद फें्रक को लगा कि कोई उसाक बिस्तर खींच रहा है। उठकर देखा तो कोठ नजर नहीं आया किन्तु फें्रक ने अनुभव किया कि वहाँ बहुत तेज बदबू फैली हुई है। इतने में हवा का एक तेज झोंका आया और बंगले की खिड़कियाँ जोरों से खड़खड़ाने लगीं, मेज पर रखी चा की प्लेटें जमीन पर गि पड़ी। फ्र ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। किन्तु थोड़ी देर बाद ही फें्रक को बाहर किसी ने भारी पैरों से चलने की आवाज सुनाई दी। उन्होनें बाहर निकलकर देखा तो प्रतीत हुआ कि कोई छाया जैसी आकृति बरामदे में टहल रही है। फें्रक ने आवाज दी, पर कोई उत्तर नहीं मिला। इस पर उन्होने दो गोलियाँ उस आकृति पर दाग दी, लेकिन उस आकृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह छाया पास में बढ़ती आई और आकृति स्पष्ट दिखाई देने लगी। भयावह डरावना चेहरा, बैठी हुई नाक, खुले हुए होठ, गन्जा सिर, स्थिर और एक ही तरफ अपलक ताकती हुई आँखे, गड्ढों और झुर्रियों से भरे हुए गाल। वह सोच न सका कि यह कौन है और क्या कर रहा है ? धीरे-धीरे वह आकृति वह पीछे हटने लगी और एक खम्भे के पास पहुँचकर उसके ऊपर चढने लगी। फ्रेंक ने निशाना बाँधकर फिर दो गोलियाँ चलाई, पर वे लगी किसी को भी नहीं। यह सब देखकर फ्रेंक हाइब्स बुरी तरह डर गया और बंगले से निकलकर बेतहाशा भागने लगा। कुछ दूर भागने पर वह एक चीख के साथ बेहोश होकर गिर पड़ा।
जब होश आया तो देखा कि कुछ आदिवासी उसकी झाड़फूँक कर रहे है। स्वस्थ होने के बाद फ्रेंक हाइब्स ने आदिवासियों से डाक बंगले के प्रेत की बावत पूछताछ की तो इसुइंगई लोगों ने बताया कि जिस जगह यह डाक बंगला बना है, इस स्थान पर पहले एक टीला था। इस टीले पर आदिवासियों के जू-जू देवता की पूजा होती थी और जानवरों तथा मनुष्यों की बलि दी जाती थी। जब अंग्रेज आये तो उन्होने इस स्थान की मूर्तियों को उठाकर फिकवाँ दिया, नर बलि बन्द करा दी और वहाँ एक डाक बंगला बनवा दिया।
इस कृत्य से उस क्षेत्र का देव पुरोहित बहुत बिगड़ा और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उसने गाँव वालों को इकट्ठा करक कहा कि डाक बंगल को जला दो और वहाँ फिर से देवताओं की पूजा शुरु करो। अगें्रजों से भयभीत आदिवासी इसके लिए तैयार नहीं थे। निराश पुरोहित गुस्से में आकर उन्मत पागलों की तरह बड़-बड़ाता हुआ डाक बंगले के चारों ओर चक्कर लगाता रहा। फिर एक रस्सी से वहीं बरामदे में फाँसी लगा कर मर गया। तब से अब तक पुरोहित का प्रेत डाक बंगले में रहता है। कोई उधर जाने की हिम्मत नहीं करता, इससे पहले भी जब कोई अगं्रेज अफसर वहाँ आया और उसमं ठहरा तो पुरोहित के प्रेत ने उसे नहीं ठहरने दिया। फ्रेंक हाइब्स ने डाक बंगले के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी एकत्रित की और जब उसके भुतहे होने पर विश्वास हो गया तो भविष्य में किसी अफसर पर संकट न आये, यह ध्यान में रखते हुए फ्रेंक ने बंगले में अपने सामने आग लगवा दी।
कानपुर की सर्वाधिक धनी बस्ती काहू कोठी में एक ऐसी तिमंजली हवेली है जो पिछले लगभग 40 वर्षों से खाली पड़ी ह। बताया जाता है कि सन् 1642 में एक लोहा व्यवसायी ने इस हवेली को खरीदा जो इसके पहले काफी जीर्ण-शीर्ण हालत मं था इस मकान को नये ढंग से बनवाने के लिए उक्त लोहा व्यवसायी ने मकान की नींव खुदवाई। नींव खोदते समय एक कब्र निकली। लोगों ने कहा कि या तो मकान का निर्माण रोक दिया जाये अथवा उस कब्र को सम्मान के साथ उचित स्थान दिया जाये, मगर इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और खुदाई जारी रखते हुए भवन का निर्माण यथावत् चालू रखा। इस भवन के निर्माण कार्य के दौरान ही उक्त व्यवसायी और उनका एक पुत्र अकस्मात् चल बसे। कुछ दिनों बाद मृत मौतों के कारण भयभीत होकर सेठ की विधवा ने भवन बनवाने का विचार त्याग दिया।
इस अध-बने मकान में जो कोई भी आकर ठहरता है, वह बुरी तरह संतप्त होता है। प्रतीत होता है कि कोई प्रेतात्मा मकान में उसका ठहरना सहन नहीं कर पाती। अब तक जिस किसी ने भी इस मकान में रहने की कोशिश की है वह बुरी तरह पेरशान होकर मकान छोड़ने के लिए बाध्य हो गया है। सन् 1960 में कोई फक्कल और अलमस्त फकीर इस मकान में आकर रहा वह बताया करता कि रात में यहाँ भंयकर आकृतियाँ और काले भुजंग साँप घूमते दिखाई देते है। रात में ऐसे भयकंर दृश्यों को देखकर वह फकीर बुरी तरह डर जाता था। लोगों ने उसे मकान छोड़कर अन्यत्र कहीं रहने की सलाह दी, पर वह इतना गरीब था कि अन्यत्र कहीं अपना ठिकाना नहीं बना सका। आखिर वह इसी मकान में टिका रहा और एक दिन सुबह वह मकान की देहरी में मृत पाया गया।
कलकत्ता में जैसोर रोड़ पर स्थित क्लाइव हाउस भी इसी प्रकार के अभिशिप्त भवनों में से एक है। ब्रिटिश राज्य के दिनों यह इमारत लार्ड क्लाइव का निवास स्थान था। वास्तव में लार्ड क्लाइव का निवास तो फोर्ट विलियम क्षेत्र में था, वहीं से वह राजकाज निबटाया करता था। लेकिन ऐशो-आराम और रास विलास के लिए वह जैसोर रोड़ पर गोराँ बाजार में स्थित इस इमारत में आया करता था। इतिहास प्रसिद्ध प्लासी की लड़ाई लार्ड क्लाइव के शासन काल में ही हुई। इस लड़ाई में सिराजुद्दौला के बाद मीरजाफर को नवाब बनाया गया। मुर्शिदाबाद के खजाने में बेशुमार हीरे, सोने के आभूषण और अशर्फियाँ थी, जिन्हें लार्ड क्लाइव ने ले लिया। क्लाइव ने यह खजाना उक्त इमारत में ही कहीं गाढ़ दिया, बताया जाता है।
इस खजाने के बारे में क्लाइव ने ईस्ट इन्डिया कम्पनी को कुछ भी नहीं बताया और जब वह इंग्लैण्ड गया तो खजाने को इस आशा में यहीं छोड़ गया कि फिर कभी वह इसे यहाँ से ले जायेगा। पर वह ‘फिर कभी’ काला समय कभी आया ही नहीं, आया तो क्लाइव का अन्त काल। क्लाइव का वह खजाना इस इमारत में कहाँ गढ़ा है, यह किसी को कुछ नहीं मालूम। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद इस इमारत के कमरों में कई लोग आकर रहने लगे। इमारत में रहने वाले लोगों को कई बार रात में घोड़ों के टापों की आवाज सुनाई देती है और उसके साथही कुछ ऐसी आवाजें भी जिससे लगता है कि घुड़सवार अपने साथ हथियार आदि भी रखे हुए है। कई बार खाली पड़े मकरों में किसी महफिल के जमने, युवतियों के खिलखिलाने और हँसी-ठिठौली करती अंग्रेजी आवाजें भी सुनाई देती है।
क्लाइव हाउस में कई बार औरतों के साथ मार-पीट करने और उनके चीखने-चिल्लाने की आवाजें भी सुनाई देती है। रात के सन्नाटे में कभी-कभी कत्थई रंग के घोड़े पर सवार फौजी वर्दी पहने कोई अंगे्रज अफसर भी दिखाई देता है, जिसके सिर के बाल उड़े हुए और खोपड़ी चमकती हुई दीखती है। छोटी-छोटी मूँछों और हलकी दाढी वाले, कमर में तलवार लटकाये यह आकृति लार्ड क्लाइव की प्रेतात्मा बताई जाती है।
इस प्रकार की घटनाएँ विक्षुब्ध आत्माओं द्वारा किये गए उत्पात ही प्रतीत होते है। ऊपर की घटना वाला पुरोहित प्रेत, टीला हटाने के कारण रुष्ट हुआ और उस आक्रोश की स्थिति में ही आत्महत्या कर बैठा। मरने के बाद भी उसका रोष शान्त नहीं हुआ और उद्विग्न आत्मा उस टीले की जगह बने हुए डाकबंगले को अपनी प्रतिहिंसा का केन्द्र बनाये रही। मिश्र के पिरामिडों में बलि दिये गये मनुष्यों के चीत्कार जो प्रायः सुनाई पड़ते है, इतने उद्विग्न रहते हैं कि उन स्थानाअं को छेड़छाड़ करने वालों पर ही बरस पड़ते हैं और घातक हमले कर बैठते हैं। कब्रिस्तानों और मरघटों में भी इसी प्रकार के उपद्रव घटित होते रहते हैं।
उपद्रव भूत-प्रेत प्रायः इसी स्तर की विक्षुब्ध और उद्विग्न आत्माएँ हुआ करती है। मरते समय तथा उसके उपरान्त मृत्यु स्थान पर धार्मिक वातावरण बनाने की उपयोगिता, महत्व धर्मशास्त्रों में इसीलिए बताई गई है कि उससे दिवंगत आत्मा को यदि कोई विक्षोभ रहा हो तो उसका समाधान होने से सद्गति प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। अन्यथा विक्षोभ मरने के बाद भी चैन से नहीं बैठने देता।
मनुष्य प्रकृति की मर्यादा से बंधा तो है, पर वे सीमा बन्धन ऐसे नहीं हैं जो चेतना की प्रखरता को किसी भी दिशा में बढ़ चलने से अवरुद्ध कर सें। चेतना प्रकृति से बड़ी है। वह चाहे तो उसक नियम प्रतिबन्धों को व्यतिक्रम भी कर सकती है। सामान्य स्थिति और सामान्य मनोबल के व्यक्ति सामान्य पुरुषार्थ ही कर पाते हैं, इसलिए उनकी गतिविधियों को भी नियति क्रम के सामान्य नियम प्रतिबन्ध पालन करने पड़ते है। इससे अगली स्थिति वह है जिसमें चेतना अपनी विशिष्टताओं को जागृत करती है और उस प्रखरता को उपलब्ध कर लेती है, जिसमें स्तर के अनुरुप वैसा कुछ कर दिखाना सम्भव हो जाता है, जिसे चमत्कार कहा जा सके। चमत्कारों के पीछे भी सृष्टि का वह विशेष नियम लागू होता है, जिसमें चेतना की सत्ता को सर्वोपरि कहा गया है। प्रकृति उसकी सुविधा के लिए है। साथ ही इतनी लचकदार भी है कि चेतना की प्रखरता का वर्चस्व स्वीकार करके उसका अनुगमन करने लगे। भले ही इसमें उसके सामान्य नियम-क्रम का उल्लंघन ही क्यों न होता हो। सिद्धियों और चमत्कारों के पीछे एक ही तथ्य काम करता है कि सृष्टि का व्यवस्था क्रम उपयुक्त होते हुए भी अनिवार्य नहीं है। मनुष्य उससे एक सीमा तक ही बंधा है। अन्धनों से मुक्त होने की स्थिति की प्रतिक्रिया में जहाँ लोभ, मोह, के भव बन्धनों से छुटकारा पाने की बात है। वहाँ एक तथ्य यह भी है कि इस स्थिति में पहुचा हुआ मनुष्य प्रकृति का अनुयायी न रहकर उसे अपनी अनुगामिनी बना लेता है।
‘सर बाइबल आफ बाडीली डैप’ पुस्तक के लेखक ने जर्मनी की एक ऐसी घटना का उल्लेख किया जिससे भविष्य में घटने वाली घटना का पूर्वाभास मिलता है। कैप्टेन ‘कोल्ट’ नामक सेना के कैप्टन का छोटा भाई सेवसटोपल स्थान पर कमाण्डर था। उस समय युद्ध चल रहा था। रात्रि के समय कैप्टन कोल्ट ने जागृतावस्था में अपने भाई की छाया देखी। उसके चारों ओर पीला कोहरा था। वह छाया कैप्टन के सिर के चारों ओर घूमी तथा पलंग क पास उसने घुटने टेक दिये। उसके दाहिनी करपटी पर एक बड़ा घाव था, जिससे रक्त स्त्राव हो रहा था। दूसेर दिउन कैप्टन को सूचना मिली कि उसके भाई की मृत्यु हो गई है। पहुँच कर देखने पर पाया कि भाई का शव घुटने टेकती अवस्था में है तथा दाहिनी कनपटी पर गोली का घाव था।
कलकत्ता प्रेसीडेंसी कालेज में योग प्रदर्शन की व्यवस्था बनाई गई। व्यवस्था का भार विश्वविद्यालय ने उठाया। प्रदर्शन स्थल पर वैज्ञानिकों, डाक्टरों एवं बुद्ध-जीवीयाँ की बड़ी भीड़ जमा हो गई। इनमें भारत के भूतपूर्व नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर सी. बी. रमन भी उपस्थित थे। योगी नरसिंह स्थायी प्रदर्शन कक्ष के मध्य में खड़े थे। भयंकर विष पहले से ही प्रयोशाला से मंगाकर रख लिया गया था। योगी ने सर्वप्रथम गंधक का तेजाब (सल्फ्यूरिक एसिड) जिसकी परख वैज्ञानिकों ने पहले कर ली थी, हाथ में लिया तथा जीभ से चाट गये। इसके उपरान्त कारवोलिक एसिड को भी पी गये। वैज्ञानिक तथा अन्य उपस्थित व्यक्ति यह देखकर हैरत में पड़ गये। अब बारी थी विज्ञान जगत के सबसे भयंकर विष पोटेशियम सायनाइड के परीक्षण की। पोटेशियम विष की भयंकरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मात्र इसके स्वाद चखने के प्रयास में तीन व्यक्तियों की मृत्यु कुछ मिनट में हो गई। सभी व्यक्ति कौतुहल से योगी नरंिसंह की ओर देख रहे थे। सभी के मन में एक ही प्रश्न उत्पन्न हो रहा था कि इस विष को खाकर भी बचना क्या सम्भव है ? यह देखकर दंग रह गये कि स्वामी नरसिंह विष को सामान्य चीज जैसे फाँकने के बाद भी मुस्का रहे है। सी. पी. रमन क मुँह से यह निकल पड़ा कि “यह अद्भुत प्रदर्शन विज्ञान को चुनौती दे रहा है।” पोटेशियम सायनाइड को खाने क अतिरिक्त भी योगी ने एक अन्य प्रदर्शन किया। मोटी काँच की बोतल चूर्ण बनाकर उनको दिया गया। वे चूर्ण को प्रसाद के समान खा गये। वैज्ञानिक हतप्रभ रह गये कि इन भयंकर विषों के सेवन का योगी के ऊपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। एक डाक्टर ने यंत्र की सहायता से बाद में पेट से सारे विष बाहर निकाले जो बिना पचे, ज्यों के त्यों इस तरह रखे मानों उन्हें बाहर से भीतर हस्तान्तरित भर किया गया हो।
24 फरवरी 1978 को उदयपुर (राजस्थान) में भारतीय लोक कला मण्डल का समारोह था। उसमं एक हठयोगी ने जलती आग में प्रवेश करके नृत्य किया। पैट्रोल छिड़क-छिड़क कर कई बार आग भड़काई जाती रही और योगी का नृत्य चलता रहा इस प्रदर्शन से पूर्व योगी के शरीर पर कोई विशेष लेप आदि न होने की आशंका का भली प्रकार निराकारण कर लिया गया था। उपस्थितों और परीक्षकों में दूर-दूर के ऐसे भूर्धन्य लोग बुलाये गये थे। जो यदि बाजीगरी चल रही हो तो तुरन्त जाँच और पकड़ सकें।
‘ए सर्च इन सिक्रेट इजिप्ट’ के लेखक ने अपनी इस पुस्तक में विभिन्न योगियों के चमत्कारों का वर्णन किया है। इसमें टर्की के कुस्तु-तुनिया के प्रसिद्ध फकीर डा. ताहा का उल्लेख किया गया। विद्यालय से विधिवत् डाक्टरी परीक्षा पास कराने के उपरान्त इनकी अभिरुचि योगिक क्रियाओं में उत्पन्न हुई। हठयोग की क्रियाओं में लम्बे साधना से दक्षता प्राप्त कर ली और अन्वेषक परीक्षकों की उपस्थिति में ऐसी क्रियाएँ कर दिखाई जो सामान्य शरीर धारी के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकती।
डेनमार्क क एक व्यक्ति के शरीर से नोकदार काँटे उभरते थे और उन्हें बार-बार आपरेशन करके निकालना पड़ता था। यह क्रम जीवन भर चलता रहा। 248 बार कई-कई स्थानों के आपरेशन हुए और कुल मिलाकर 32131 काँटे निकाले। यह काँटे क्यों उगते थे इसका रहस्य टाी भी उतना ही बना हुआ है जितना कि आज से दस वर्ष पूर्व रोगी के जीवित रहने तक बना रहा।
मानवी काया में न जाने क्या-क्या चित्र-विचित्र भरा हुआ है। साधारणतया उतने भर की जानकारी सर्व साधारण को रहती है जितनी कि अधिकाँश लोगों में दृष्टिगोचर होती है। किन्तु यह मानकर नहीं चला जा सकता कि जो है वह उतना ही है जितना जाना गया।
जीवन भर नर, नर ही रहता है और नारी, नारी ही। सामान्य नियम यही है, पर इन दिनों लिंग परिवर्तन के जो तथ्य अस्पतालों से छनकर बाहर हा रहे है उनसे प्रतीत होता है कि संसार भर में सैंकड़ों व्यक्ति हर साल लिंग परिवर्तन करते है। नर को नारी का और नारी को नर का पूर्ण जीवन बिताने का अवसर मिलता है। आपरेशन के अभाव में जो पूर्ण परिवर्तन नहीं हो पाते उनकी संख्या तो उससे भी कहीं अधिक होनी चाहिए।
मानवी संरचना के अनुरुप नारी के शरीर में ही गर्भ धारण की क्षमता होती है। किन्तु ऐसी घटनाएँ कम घटित नहीं होती जबकि नर के पेट में गर्भ पाये गये और वे आपरेशन करके हटाये गये। अभी-अभी उत्तर प्रदेश के बादाँ जिले के गधेश्वर गाँव में एक पुरुष के पेट से पाँच मास का गर्भ हटाया गयाहै। इसी जिले के बडौसा थाने के गधेश्वर गाँव में एक अन्य पुरुष के पेट में गर्भ पाया गया था और शल्य क्रिया द्वारा हटाया गया था।
यह घटनाएँ बताती है कि मनुष्य सामान्य भर दीखता अवश्य है वस्तुतः वह वैसा है नहीं। उसके अन्तराल में एक से एक बढ कर विचित्रताएँ, विभूतियाँ और सम्भावनाएँ भरी पड़ी है, जो उन्हें जगाते और क्रियान्वित होते है वे सिद्ध पुरुष अथवा प्रखरता सम्पन्न कहलाते है। प्रकृति उनके कार्य में बाधक नहीं बनती, वरन् अपनी नियम क्रमों को भी चेतना के अनुरुप ढालने, बदलने में भी संकोच नहीं करती।
कर्म-विपाक त्रिविधि परिणाम उत्पन्न करते है - जाति, आयु तथा भोग। जाति से आशय योनि से है। क्योंकि शास्त्रों के अनुसार “समाज प्रसवः जातिः”-एक ही योनि-वर्ग से जिसका जन्म होता है, उन्हें एक जाति के कहते है। अतः जाति से तार्त्पय हुआ-मनुष्य जाति, गो-जाति, अश्व-जाति, हस्ति-जाति, सिंह-जाति, शेर-जाति, चीता-जाति, बन्दर-जाति ऐसी योनियाँ या देह-जातियाँ। जिस देह में जन्म लिया, वह जाति हुई।
आयु का अर्थ हुआ उस देह का स्थितिकाल और भोग का अर्थ हुआ इस जन्म में भोगी जाने वाली क्रियाए, अनुभूतियाँ और परिणाम-सुख-दुःख, लाभ-हानि, भोग-रोग आदि।
जाति, आयु और भोग; इन तीनों के अब तक कुल तीन हेतु मनुष्यों ने खोजे या विचारे है। प्रथमतः ईश्वर को ही इनका कर्त्तृत्व, हेतु माना जात है। दूसरा यह माना जाता है कि इनका कारण अज्ञेय है और तीसरा निर्ष्कष यह है कि कर्म ही इनके कारण है। ईश्वर को कर्त्ता मानना उसे विषमता को जन्म देने वाला अन्यायी मानना है। अज्ञेयवादी यह तो कह सकते है कि इनके कारण हमारी दृष्टि में अज्ञात है। किन्तु इसी आधार पर यह कहना कि इनके कारण “ मनुष्य मात्र द्वारा अज्ञेय है” दुराग्रह या दर्प है। इलेक्ट्र, प्रोटोन आदि कण सामान्य मनुष्यों के लिए अदृश्य अज्ञेय है, किन्तु प्रयोगशील वैज्ञानिकों के लिए वह ज्ञेय एवं दृश्य है। आध्यात्मिक उपकरणों, बौद्धिक विवेचनों तथा अन्तःप्रज्ञात्मक अनुभूतियों द्वारा इस विषय की छान-बीन करने वालों ने कर्मों को ही इन तीनों का कारण माना है। महर्षि पातँजली ने कहा है-
“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः।”(योगसूत्र 2/13)
अर्थात् क्लेशूल कर्माशयों के त्रिविधि बिपाक होते है-जाति, आयु एवं भोग।
मनुष्य जो भी कर्म करता है, वह कर्म संस्कारों की प्रेरणा से। प्रज्ञा के उन्मेष के लिए, आत्म-साक्षात्कार के लिए किये गये कर्मों के संस्कार प्रज्ञा-संस्कार कहे जाते है। इसके अतिरिक्त शेष सभी कर्मों के संस्कार क्लिष्ट संस्कार है। इन्हीं संस्कारों के समूह को कर्माशय कहते है। उत्कृष्ट निकृष्ट एवं मिश्रित ऐसे तीन प्रकार के कर्म होते है। इन तीनों के संस्कार जब पककर फलप्रद हो जाने की स्थिति में पहुँच जाते है, तो उन्हें त्रिविपाक कहते है। जब यह संस्कार जागृत होता है तो उसे वासना कहते है। वासना ही कर्म की प्रेरणा बनती है।
जिन कर्मों का फल इसी जन्म में प्राप्त होता है, उन्हें दृष्टजन्म-वेदनीय कर्माशय का परिणाम माना जाता है और जिनका परिणाम देर से प्राप्त होता है, उन्हें अदृष्टजन्म वेदनीय कर्माशय कहा जाता है। कर्माशय का अर्थ है-कर्म संस्कार।
इन कर्माशयों के स्वरुप पर ही यह निर्भर करता है कि जीव की जाति या योनि अथवा देह क्या कैसी होगी, आयु क्या होगी एवं भोग क्या होंगे। इनमें से दृष्टजन्म-वेदनीय कर्माशय तो साधारणतः लोगों की समझ में आ जाते है। क्योंकि वे इसी जीवन के कर्मों का फल होते है। किन्तु उसी जन्म के सचित कर्मों का फल आयु तथा भोग के रुप में ही सामने आ सकता है, किन्तु जाति या योनि क्या होगी, यह विगत जन्म के कर्म पर ही निर्भर होता है।
आयु को बढाने वाले कर्म करने तथा स्वास्थ्य संरक्षण के नियमों का पालन, सात्विक जीवन, श्रेष्ठ विचार, समुचित पोषण, सन्तुलित जीवनचर्या आदि के द्वारा इसी जीवन में आयुष्काल बढा हुआ देख्रर जाता है। इसी प्रकार अभक्ष्य भक्षण, मदिरा-पान या अन्य नशों का सेवन, विष-भक्षण, आत्मघात, अस्त-व्यस्त,जीवनचर्या, जीवनी शक्ति का मनमाना अपव्यय आदि के द्वारा आयुष्काल को स्वयं इसी जीवन में लोग घटा लेते है। मनुष्यत्व को स्वयं ही पशुत्व में परिवर्तित करते अथवा देवत्व क रुप में ऊपर उठते भी इसी जन्म में लोगों को देखा जाता है। उन्नति-अवनति, विद्वत्ता-विमूछता, सक्रियता-निष्क्रियता आदि की सितियाँ मनुष्य स्वयं ही अपनाता या छोड़ता है। इस प्रकार अपनी आयु एवं भोग का एक अच्छा खासा अंश मनुष्य इसी जन्म के कर्मों के द्वारा बनाता है। यही दृष्टजन्म वेदनीय कर्माशय है। इससे भी यह तार्किक निर्ष्कष स्वतः निकलता है कि जो जाति, आयु तथा भोग इस जन्म के कर्मों के फल नहीं हैं, उनका कारण प्राग्भावीय अदृष्ट-जन्म वेदनीय कर्म होगा। फिर, सूक्ष्मतत्व विशारदों, जीवन तत्व के ज्ञाताओं ने तो स्पष्ट अनुभूतियों एवं निरीक्षणें द्वारा यह निर्ष्कष प्रतिपादित किया है कि समस्त भोग कर्मफल ही होते है तथा अप्रत्याशित प्रतीत होने वाले परिणामों के पीछे विगत जन्म के कर्म होते है। जन्मजात प्रतिभा या मूढता, विशेष प्रवृति-दिशा तथा विशेष रोग या अस्वाभाविक हानि-लाभ अदृष्ट-जन्म वेदनीय कर्मों के परिणाम होते है। इस सम्बन्ध में भारतीय मनीषियों ने ये कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रतिपादित किये है, जिन्हें जान लेना उपयोगी होगा।
महर्षि व्यास ने पातँजल योग सूत्रों का भाष्य करते हुए लिखा हैः- दृष्टजन्म वेदनीय कर्माशय कभी मात्र भोग का एवं कभी आयु और भोग दोनों का हेतु होता है। अनादि काल से वासना द्वारा अपरिपुष्ट यह चित्त चित्राँकित पट जैसा या अनोनेक गाँठों वाले (मछली पकड़ने के काम आने वाले) जाल जैसा होता है। इस प्रकार वासना तो अनेक-जन्मपूर्विका होती है, किन्तु कर्माशय पूर्व के एक ही जन्म से सम्बन्धित होता है।
यह कर्माशय नियम विपाक एवं नियत-विपाक होता है। जो कर्म अपने फल को पूरी तरह उत्पन्न करता है, उसे नियत विपाक कहते है। जो कर्माशय अन्य कारणों से नियमित-निर्देशित होकर पूर्ण फलवान नहीं हो पाता, उसे अनियत विपाक कहते है।
जो कर्माशय मुख्यतः एवं स्वतन्त्रता से फलदायक हो, उसे प्रधान कर्माशय कहते है और जो कर्माश्य गौधष्स सहकारी भाव से स्थित हो, उन्हें अप्रधान कर्माशय कहते है।
जो कर्म तीव्र काम, क्रोध, क्षमा, दया आदि आवेगों से आचरित होता है या बार-बार आचरण से जो गहराई तक संस्कार अंकित करता रहता है, वही प्रधान कर्माशय होता है। इसके विपरीत जो कर्माशय होते है, वे अप्रधान होते है, उनके सम्यक् परिणाम नहीं प्राप्त होते।
जब कोई अति प्रबल कर्माशय या कर्म-संकार विपाक को प्राप्त होता है, तो अन्य अप्रधान व कर्माशय उससे अभिभूत हो जाता है। वह दब जाता है तथा काल क्रम से अवसर पाकर अभिव्यक्त होता है।
उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति बाल्यावस्था में धार्मिक आचरण करता है। इसके उपरान्त विषय वासनाओंके आवेग से अनेक पाशविक कर्म करता है। अब मृत्यु के समय वही पाणविक भाव प्रधान रहने से उसका अगला जन्म पाशविकता प्रधान होगा या फिर पशु योनि में होगा। यदि पशु योनि में जन तो वहाँ वह पशुवत् आचरण एवं भोग ही कर सकेगा। अप्रधान (बाल्यावस्था) धर्माचारण का फल उस जन्म में प्रकाशित नहीं होगा। आग्र जब वह मानव-जन्म लेगा, तभी उसका सचित धर्माचरण-अंश प्रकाशित होगा।
इस प्रकार अदृष्टजन्म-वेदनीय कर्माशय अनियतविपाक ही होता है। अर्थात् उसका कितना फल पूरी तरह मिलेगा, कितना नहीं, यह पूर्णतः निश्चित नहीं होता। इसके कर्मों की तीन गतियाँ सम्भव हैं-
अपिक्त कर्म का नाश। जैसे क्रोधपूर्ण आचरण का कर्माशय नये जन्म में अक्रोश के अभ्यास से नष्ट हो जाता है। अतः पिछले जन्म के कर्मों का कुछ अंश विरुद्ध कर्म से अथवा ज्ञान से नये जन्म में नष्ट हो जाता है। अथवा वह प्रधानता से फल दे सकता है
अथवा वह संचित रहकर किसी अन्य जन्म में लाभप्रद हो सकता है।
अनेक कर्माशयों के फल एक ही जन्म में मिल जाते है। इस प्रकार एक ही जन्म के अनेक कारण होते है और वे उन सबके सम्मिलित प्रभाव से उनजन्म में जाति, आयु एवं सुख दुःख प्राप्त होता है। जो कर्माशय उन जन्म में अभुक्त रह जाते है, वे जन्म के अन्य कर्माशयों के साथ अगले जन्म में अभिव्यक्ति हो सकते है। यही क्रम चलता रहता है। सामान्यतः एक जन्म के सभ्ी कर्माशय अगले जन्म में फल उत्पन्न कर देते है। किन्तु अगले जन्म में किन्हीं कर्माशयों की प्रचण्डता से कुछ कर्माशय अनभिव्यक्त भी रह सकते है। इसी प्रकार एक जन्म के सभी कर्मों का फल संचित रहकर अगले जन्म में मिले यह कदापि आवश्यक नहीं। अनेक कर्मों के फल उसी जन्म में मिल सकते है और उनके कर्माशय इस प्रकार विनष्ट हो सकते है।
इस प्रकार कर्माशयों के कुल त्रिविपाक या तीन फल होते हैं- जाति, आयु एवं भोग। पुण्य एवं अपुण्य कर्मों के कारण ये त्रिविपाक सुखपूर्ण और दुःखपूर्ण होते है। यों प्रज्ञा-सम्पन्न् योगियों के लिए सम्पूर्ण भोग दुःख मय ही होते है। अविद्या, अस्मिता, रोग, द्वेष एवं अभिनिवेश को क्षीण करने वाल, उनके विरोधी कर्म पुण्यकर्म कहलाते है और इस क्लेशप्रद वृत्तियों के पोषक कर्म अपुण्य या पापकर्म कहलाते है। आचार्य गौड़पाद के अनुसार यम, नियम, दया और दान ये धर्म-कर्म या पुण्य कर्म है। जबकि मनु के अनुसार धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध-ये दस कर्म, धर्म-कर्म है। विवेकी पुरुष को विषय सुख भी दुःखकर ही जान पड़ते है क्योंकि वे परिणाम, ताप एवं संस्कार उत्पन्न करते है और इस प्रकार क्लेश को बढाते है। इसीलिए प्रज्ञामूलक-संस्कारों को उत्पन्न करने वाले कर्म ही विवेकी व्यक्तियों का लक्ष्य होते है। क्योंकि प्रज्ञा ही परम लक्ष्य तक पहुचाने में समर्थ होती है। अन्यथा जाति, आयु और भोग का अन्तहीन क्रम चलता ही रहता है।
तत्वमागें यथा दीपो दृश्यते पुरुषोत्तमः।यः स्तनः पूर्वपीतस्त निष्पीडय मुदमश्नुते॥
यस्माज्जातो भगात्पूर्वं तस्मिन्ने व भगे रमन्।या माता सा पुनर्भाया या भार्यां मातरेव हि॥
यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः से पुनः पिता।एव संसार चक्रेण कूपचक्रे घटा इस॥
भ्रमन्तो चोनिजन्मानि श्रुत्वा लोकान् समश्नुते।त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्तिस्त्रः संध्यास्त्रयः त्वराः॥
त्रयो5ग्नयश्य त्रिगुणाः स्थिताः सर्वे त्रयाक्षरे।त्रयाणामक्षराणाँ च चो5धीते5र्प्यधमक्षरम्॥
तत्वदर्शी व्यक्ति को अपने पूर्वजन्म प्रकाश की तरह दीखते है। प्राणी एक जन्म मं जिस स्तन को पीता है, दूसरे से उसी का काम भाव से र्स्पश करता है। कभी जिस योनि से जन्म लेता है तो कभी उसी में रमण करता है। एक जन्म में जो माता होती है, वहीं कभी पत्नी हो जाती है। जो पिता होता है से पुत्र बन जाता है और पुत्र पिता हो जाता है। इस तरह सम्बन्ध बनते ही रहते है। यह संसार चक्र कुए की रहट की तरह है जिससे प्राणी एक के बाद दूसरे घड़ों की तरह आते और जाते रहते है।
परिस्थितियों से समायोजन एक कला है और साधना भी। इस कला का विकास कर लेने वाला व्यक्ति हर तरह की परिस्थिति में एक कलाकार की भाँति हंसता-हंसाता जीवन व्यतीत करता है। अपने दायित्वों को ठीक प्रकार पूरा करने में ही प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभवन करता है। नाटक के दृश्योंके समान जीवन को रंगमंच मानकर चलने पर व्यक्ति प्रतिकूलताओं अथवा अनुकूलताओं में अपना सन्तुलन बनाये रखते, उनसे अप्रभावित रहते है। ऐसे ही व्यक्ति सफल होते प्रगति करते देखे जाते है।
स्वभावगत अनुकूलताएँ ही उसे अभीष्ट होती है। प्रतिकूलताएँ अनभस्त होने से डरावनी लगती है। उन्हें जीवन का एक अनिवार्य पक्ष न मानकर मनुष्य भारी संकट के रुप में मान लेता है। सन्तुलन बनाने से मानसिक सन्तुष्टि का जो आधार बन सकता था वह पूरी नहीं हो पाता। परिस्थितियों की गुलामी चेतना को भी कमजोर बनाती है।
मन को बाह्य साधनों से अप्रभावित रखने वाला जीवन साधना का साधक ही प्रसन्न रहता और प्रगति करता है। एक खिलाड़ी की भाँति “हार-जीत” की परवाह न करते हुए निर्लिप्त बना रहता है। उसकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता, सुख-साधनों पर, सफलता-असफलता पर नहीं टिकी होती। इस कला से अपरिचित बने रहने वाला व्यक्ति पग पग पर आवेशग्रस्त होता रहता है। अनगढ एवं असन्तुलित मन छोटी-मोटी प्रतिकूलताओं को सहन कर पाने में भी अपने को असमर्थ पाता है।
प्रतिकूलताएँ मानवी क्षमता के विकास की सशक्त माध्यम है। जबकि इस तथ्य से अनभिज्ञ व्यक्ति उन्हें शाप एवं अनुकूलताओं का वरदान मान लेने की भूल करते है। तथ्य तो यह है कि ‘मनुष्य की क्षता का’ समग्र विकास विषमताओं में ही होता है। पुरुषार्थ निखरता एवं अधिक सबल बनता है। अभ्यस्त ढर्रें की अनुकूलता प्रगति की नहीं अवगति का कारण बनती है। मनचाही स्थिति बने रहने से न तो पुरुषार्थ बन पड़ता न ही क्षमताओं का विकास हो पाता है। कई बार तो अवरोध व्यतिक्रम मनुष्य के पुरुषार्थ की परीक्षा के लिए ही आते है। उनके पीछे सफलताएँ छिपी रहती है, पर अवरोधों से घबरा जाने-प्रयत्न छोड़ बैठने से उनसे वंचित रह जाते है।
शास्त्रकारों ने मनोनिग्रह पर बहुत जोर दिया है। और उसे आत्मिक प्रगति एवं सुख-शान्ति का प्रधान उपाय माना है। भ्रमवश लोग एकाग्रता को मनोनिग्रह मान लेते है जबकि उसका वास्तविक अभप्रायः चिन्तन को अर्न्तमुखी बनाना है। बहिर्मुखी मनःपरिस्थितियों की अनुकूलता में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी रहता है। विश्व व्यवस्थ में इस प्रकार के परिवर्तन आते रहना नितान्त स्वाभाविक है। सदा दिन ही रहे रात न आवे ऐसी अपेक्षा करना र्व्यथ है। सफलता एवं अनुकूलता की सदा हस्तगत रहे यह भी सम्भव नहीं। ऐसी दशा में प्रतिकूलता में तो दुःख होता ही है। अनुकूलता में भी चैन नहीं पड़ता। अधिक पाने की आतुरता जब तृष्णा यालिप्सा बन जाती है तो उसका आवेश भी चित्त को विक्षुब्ध करता है और शान्ति को छिन्न भिन्न करके रख देता है।
बुद्धिमत्ता इसमें है कि अपने चिन्तन और लक्ष्य को ऊँचा रखा जाये और उत्साहपूर्वक उसके लिए निरन्तर कर्त्तव्यरता रहा जाये। कर्मनिष्ठा पर प्रसन्नता-अप्रसन्नता को आधारित कर लेना सदा प्रसन्न रहने का रहस्यमयी आधार है। दूरदर्शिता, पूर्ण योजना बनाना और परिस्थितियों को देख्रते हुए उनमें हेर-फेर करना उचित है। इतने पर भी आवश्यक नहीं है कि पुरुषार्थ का प्रतिफल अनुकूल ही हो। ऐसी दशा में मनुष्य के हाथ में इतना ही है कि वह स्थिति के साथ ताल-मेल बिठाये और कर्त्तव्य पालन पर अपने को गौरवान्वित अनुभव करने और प्रसन्न रहने का प्रयत्न करे।
मुक्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ कहा गया है। आत्म स्वातन्त्रय मनुष्य को सर्वाधिक प्रिय है। वह उसके लिए सभी कुछ न्यौछावर कर देने को बड़े से बड़े कष्ट उठाने को तत्पर रहता है। शास्त्रकार ने भी आत्म-स्वान्त्रय के लिए शेष सब उर्त्सग कर देने की प्रेरणा दी है- “आत्मार्थें पृथिवीम् त्वजेत” कहा है। आत्म स्वातन्त्रय को भारतीय मनीषी सदा ही सर्वाधिक महत्व देते रहे है। मनुष्य मात्र के भीतर मुक्ति का, स्वतन्त्रता का प्रचण्ड वेग सदा जागृत रहता है, भले ही अपनी किन्हीं दुर्बलताओं के कारण उसे विविध बन्धनों में बंधे रहना पड़े।
मुक्ति की इस प्रबल कामना के बाद भी मनुष्य इतना अधिक बंधा हुआ क्यों रहता है ? लगता है जैसे वह जकड़ कर बाँध रखा गया है और इच्छानुसार एक काम भी नहीं कर सकता, एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। परिस्थितियाँ और मन की प्रवृतियाँ उसे विवश करती रहती है कि जहाँ है, वहीं रहे, आगे बढ़े नही।
तब मुक्ति के परम पुरुषाथ को कैसे प्राप्त किया जाये। अनेक लोग सोचते है कि कर्म में प्रवृत होना ही बंधन में बंधना है। इसलिए कर्म मत करो, कर्म से दूर रहो, तो बन्धन से दूर रहोगे और मुक्ति के निकट पहुँचोगे। कुछ लोग सोचते है कि मुक्ति तो मरने के बाद ही होती है और उसका अर्थ यह है कि इस लोक से भिन्न किसी अन्य लोक विशेष में रहने की खास सुविधा मिलेगी, अवसर मिलेगा। मुक्ति की ऐसी मान्यताएँ बुद्धि विकार या भ्रान्ति मात्र है। जहाँ जक कर्म से भागने की बात है। मनुष्य बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। जैसा कि गीता में कहा है-
न हि कश्यित्क्षणामपि जातु तिष्ठत्पकर्मकृत।कार्यते ह्मवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणै॥
अर्थात् कोई भी प्राणी कर्म किये बिना क्षण भी भी नहीं रहता। सभी प्राणी प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणों द्वारा परवश रहते हुए कर्म में प्रवृत्त रहते है। (क्याँकि सोना बैठना, चुप रहना, निश्चल बैठना या लेटना आदि भी कर्म ही है। व्यक्ति या प्राणी जो भी क्रिया कर रहा होता है, वह सब कार्य या कर्म ही है।)
प्रत्येक कर्म अपना संस्कार व्यक्ति चित्त पर अंकित करता रहता है। संचित संस्कारों के ही अनुपार वासनाएँ उदित होती रहती है। प्रारब्ध का स्वरुप भी संस्कारों एवं वासनाओं के ही अनुसार बनता है। फिर उसी प्रारब्ध से पुनः कर्म प्रेरणा मिलती रहती है। इसी चक्र में प्रत्येक जीव घूमता रहता है। सभी जीवों के मन में जीव भाव आते प्रबल रहता है। आत्मभाद की तो वे यदा-कदा चर्चा या स्मरण मात्र ही करते है। जब तक वासना के आधार इस दृश्य जगत का तथा स्वयं वाना का उसके अधिष्ठान अन्तःकरण का और इन सबकी साक्ष्ीभूत चैतन्य आत्मसत्ता का तात्विक स्वरुप आँशिक रुप में जान नहीं लिया जाता, तब तक मुक्ति का सच्चा संल्प तक नहीं उदित हो सकता उस ओर प्रयास करने की वृति होने का प्रश्न ही नहीं। जब दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों के बंधनों का स्वरुप समझ में आ जायेगा, उनकी भीषणता स्पष्ट हो जायेगी तभी मुक्ति की तीव्र छटपटाहट जन्म लेगी।
मुक्ति की लालसा मात्र से मुक्ति नहीं मिल जाती। लालसा मन में उत्पन्न होने वाली एक तरंग है, जो बदलती रहती है।
मुक्ति कोई चमत्कार या रहस्य नहीं है। वह तो जगत और आत्मा दोनो का वास्तविक तत्व जानने तथा इस बोध को व्यक्ति चेतना की सहज स्थिति बना डालने की साधना है।
मुक्ति का बाह्य प्रकटीकरण भौतिक जगत में स्वतन्त्रता का आभ्युदय है। राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक साँस्कृतिक दासताओं को उखाड़ फेंकना, उनके स्थूल सूक्ष्म बंधनों को काट डालना सरलता से सम्भव नहीं हो पाता। उसके लिए अनथकश्रम, अंडिग साहस, अगाध शौर्य अविचलित बुद्धि तथा अविराम प्रयत्नों की आवश्यकता होती है। आँतरिक मुक्ति के लिए भी वैसे ही प्रयास उससे कहीं अधिक गहराई तक किये जाने होते है। वस्तुतः बाह्य स्वतन्त्रताएँ आन्तरिक मुक्ति से गुँथी रहती है। जिस सीमा तक आन्तरिक मुक्ति होगी, उसी सीमा तक बाह्य स्वतन्त्रता भी विकसित होगी। जो व्यक्ति समाज या संस्थाएँ आन्तरिक मुक्ति एवं विकास की अवहेलना कर बाहरी स्वतन्त्रता तक ही ध्यान देते रहते है। उनकी वह स्वतन्त्रता विकार-ग्रस्त होकर विषाक्त होने लगती है और विनाश के खतरे उत्पन्न हो जाते है। बाह्य स्वतन्त्रता की पूर्णता अन्तरिक मुक्ति पर निर्भर है।
मुक्ति का वास्तविक सम्बन्ध अन्तश्चेतना से ही है। आत्मचेतना में ही आत्म स्वातन्त्रय सन्निहित है। बिना आत्मचेतना के बाहरी स्वतन्त्रताएँ बहुधा परतन्त्रताओं का ही छद्य रुप आ करती है। किसी बाहरी स्वतन्त्रताओं में जो कारणभूत आवेग है, स्वातन्त्रय भाव का स्फुरण है, मात्र वह अन्तश्चेतना का भाव एवं आवेग होता है। किन्तु उसके साथ-साथ मनुष्य आन्तरिक अज्ञानता क कारण अपनी कामनाओं, वासनाओं की आँधी में उड़ते फिरने को ही स्वतन्त्रता समझे रहता है, और मूर्खतापूर्ण गर्व पाले रहता है। यह वैसा ही है, जैसे नशे में डूबा शराबी गन्दी नाली में पड़े पड़े र्स्वग की काल्पनिक अनुभूति करता रहे। अपनी दयनीय दुदर्शा, अपनी कातर परतन्त्रता तो उसे तब विदित होती है जब नशा उतरता है, होश आता है।
मोह, माया, तृष्णा-अहता, वासना-कामना की आकर्षक, मादक मदिरा अन्तश्चेतना को सदा लुभाती रहती है। कहते है, बीन की मधुर धुन से मृग समूह विमुहित होकर वहीं पहुँच जाते है, जहाँ वह धूर्त वादक उन्हें पकड़ने को जाल बिछाये तान छेड़ता रहता है। वासनाओं की बीन अन्तःकरण का मृग भी ऐसे ही सुख-बुध खो बैठता है। शरीर और मन को रुचिकर इन मदिराओं-मादकताअं का त्याग ही मुक्ति है। इन्द्रियों की रसानुभूति में रमना सबसे जटिल, सबसे सूक्ष्म बंधन में बंधना है। उन बन्धनों को तोड़ना निश्चय ही परम पुरुषार्थ है।
सुनते तो सभी रहते है कि जीवन आत्मा कल्याण के लिए मिला है। वही लक्ष्यहै। शरीर और मन के वाहनों पर आरुढ जीवन-रथ पर उसी दिशा में विवेक के मार्गदर्शन, संयम के नियन्त्रण के साथ हाँका जाना चाहिए। पर हजार बार भी इसे सुनकर भी भतर तक इस सचाई को कोई स्वीकार नहीं करता। अन्तःकरण को यह प्रतिपादन अपनी यथार्थता से पूर्णतः अभिभूत नहीं कर पाता। वासना के आवेग उसे अधिक गहराई से अभिभूत आच्छादित किये रहते है। उनके प्रभाव से लोग स्वयं को ही छलने लगते है। कोई यह भ्रम पालते है कि बार-बार बंधनाँ की निन्दा और मुक्ति की प्रंशसा सुनने से ही मुक्ति के लक्ष्य की दिशा में प्रगति होने लगेगी। कुछ इससे भी आगे बढते है। वे उत्साह और आवेग के साथ, मुक्ति की महत्ता का प्रतिपादन करने लगते है। माने इस प्रवयन से ही उन्हें जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। कुछ अधिक चालाक लोग इससे भी आगे बढते है। वे मुक्ति और बन्धन के बौद्धिक विश्लेषण बड़ी बारीकी से करने लगते है। बौद्धिक दाँव पेंचों के सहारे वे अपनी आसक्ति को अनासक्ति दुर्बलताओं को उदारता, असुरता से समझौता और गठ बन्धनको सन्तुलन तथा स्वार्थ पूर्ण जोड़-तोड़ को लोकसंग्रह जनसेवा आदि बताते अधाते नहीं। किन्तु इससे उन्हें वस्तुतः न तो आन्तरिक मुक्ति मिल पाती और नहीं बाह्य।
अतः मुक्ति का एक मात्र उपाय यही है कि हम आत्मासत्ता को सत्यतः स्वीकारं, उसे यथार्थतः जानें, उसके प्रति अज्ञान भाव न पालें रहें। जीवन के प्रत्येक क्रिया कलाप उसी केन्द्रीय सत्ता के प्रकाश से निर्देशित, नियन्त्रित हों, वासनाओं के अंधड़ आवेग से नहीं। तभी हम सर्वोच्च पुरुषार्थ मुक्ति के अधिकारी होंगे।
बुद्धि के क्षेत्र में मनुष्य समस्त प्राणि जगत का नेतृत्व करता है। किन्तु मात्र इस विशेषता के आधार पर वह अपने को सर्वोपरी होने का दावा नहीं कर सकता। जिन गुणों के आधार पर उसकी महिमा का गुणगान किया गया वह है उसकी भाव सम्वेदनाए। इन्हीं विशेषाएँ। इन्हीं विशेषताओं के कारण उसे सर्वश्रेष्ठ होने एवं सृष्टि के मुकुटमणि कहे जाने का गौरव प्राप्त हुआ। इनके अभाव में तो बुद्धि सम्पन्न होते हुए भी उसकी गतविधियाँ निकृष्ट बनी रहती। संकीर्णताओं एवं स्वार्थां को अपनाने से तो वह मानवेत्तर योनियों से भी गया गुजरा सिद्ध होता। उसकी महत्ता तो मानवोचित गुणों से सम्पन्न होने पर ही प्रतिपादित की गई है।
परमात्मा ने मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धि तो दी। किन्तु अन्य प्राणियों को भी उन विशेषताओं से वंचित नहीं रखा जो उनके जीवन-यापन के लिए आवश्यक है। भोजन जुटाने से लेकर सुरक्षा का सरंजाम करने में ये प्राणी कितने दक्ष होते है, यह उनके कृत्यों का अवलोकन करने पर जता चलता है। जो जीव अधिक कोमल एवं शक्ति की दृष्टि से कमजोर हैं उनके साथ कुछ ऐसी विशेषताएँ जोड़ दी, जिनसे वे खूँखार जीवों से अपनी सुरक्षा कर सकें। न केवल जीव जन्तुओं वरन् प्रकृति के प्रकोपों से बचने के लिए उन्हें अतिन्द्रिय शक्तियाँ प्रदान की। जिससे वे आने वाले संकटों का पूर्वाभास कर अपनी सुरक्षा कर सें। उनकी इन क्षमताओं को देखकर मानवी बुद्धि को भी आर्श्चयचकित होना तथा सोचना पड़ता है कि उसका सर्वोपरि होने का दम्भ मिथ्या है।
होने वो प्रकृति प्रकोपों की जानकारी प्राप्त करने के लिए विज्ञान अभ ऐसी तकनीक का विकास नहीं कर सका है जिससे वह सम्भावित विक्षेभों को जानकर अपनी सुरक्षा कर सके। इस कारण प्रतिवर्ष कितनी क्षति उठानी पड़ती है, इससे हर कोई अवगत है। किन्तु जो नवीन तथ्य सामने आये है उनसे पता चला है कि कुछ जीवों को इस प्रकार की अतीन्द्रिय क्षमताएँ प्राप्त है। उनको होने वाले प्रकृति प्रकोपों का पूर्वाभास हो जाता है। फलस्वरुप वे संकट सिर पर खड़ा देखकर अपनी सुरक्षा का प्रयत्न करते है।
जुलाई 28 सन् 76 को उत्तर चीन में भूकम्प का तीव्र झटका महसूस किया गया। सर्वेक्षण में गये सरकारी कर्मचारियों को एक गाँव के व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण बातें बताई। एक कृषक नित्य की भाँति अस्तवल में बंधे अपने घोड़ों को चारा-पानी देने के लिए गया। अस्तवल में बंधे घोड़े एवं खच्चर चार खाने के स्थान पर उछलने -कूदने लगे। पशु पालक के अथक प्रयत्न क बावजूद भी जानवर रस्सियाँ तुड़ाकर भाग चले। उसी क्षण आसमान में बिजली की तीव्र गड़गड़ाहट गूँज उठी। तीव्र प्रकाश की चमक दिखाई पड़ी। कुछ समय बाद पता चला कि वहाँ से 40 किमी दूर ताँगशान में 78 की शक्ति का भूकम्प का झटका अनुभव किया गया।
इस आधार पर चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी खोज आगे बढायी। सर्वेक्षण में जीव भोतिकविद्, प्राणिशास्त्री, भू-भौतिकविद् रसायन शास्त्री और मौसम विशेषज्ञ सम्मिलित थे। उन्होने भूकम्प आने के पूर्व पशुओं के व्यवहार में अकस्मात् असाधारण परिवर्तन होने की 2793 घटनाएँ रिकार्ड की। इस छान-बीन से लिकने तथ्यों में 80 प्रतिशत घोड़ों, गधों, खच्चरों, गायों, मुर्गियों, बिल्लियों, चूहों, कुत्तों, नेवलों, मछलियाँ एवं बकरियों से सम्बन्धित थे।
देखा यह गया कि भूकम्प आने के कुछ समय पूर्व उस क्षेत्र के नेवले अपने अपने बिलों से निकलकर भागने लगे। कुछ ने अपने बच्चों को पीठ पर तथा कुछ ने मुँह में दबा रखा था। ऐसी मान्यता है कि नेवले सामान्यतया रात्रि को ही अपने बिलों से शिकार करने के लिए निकलते है। टैंको, छोटे तालाबों में पाली गई मछलियाँ भूकम्प से पूर्व अपने टैकों, तालाबों में उछल कूद मचाने तथा बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगी। कुछ तो तालाब के किनारे आकर छटपटाने ताि इधर-उधर भागने लगी। देखने वालों ने बताया कि उनकी छटपटाहट यह बताती थी कि जैसे उनको किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने की तेजी हो। किन्तु ऐसा कर पाने में वे असहायिी। जिसकी वेदना छटपटाहट के रुप में व्यक्त कर रही थी। कुछ को तो पानी से उठकर हवा में छलाँग लगाते हुए भी देखा गया। बकरियों के मिमयाने का ढंग उस समय विचित्र एवं करुण था। बिल्लियाँ घरों से निकलकर भागने लगी। अपने साथ नन्हे बच्चों को भी उन्होनें मुँह में दबा रखा था।
कुत्ते कितने वफादार होते है इससे सभी परिचित है। किन्तु उस दिन कुत्तों ने अपने मालिकों के ऊपर ही गुर्राना, भोंकना आरम्भ कर दिया। उन्हें बाँधकर रखने के प्रयास में कुछ ने तो अपनी मालिकों को ही काट खाया। चूहों के स्वभाव में अजीब परिवर्तन देखा गया। अपने-अपने बिलों से निकलकर वे जमीन पर लोटने पोटने लगे। चुस्त एवं चौकन्ने रहने वाले जीवों को अपने शत्रुओं का भी भय नहीं रहा। कितने तो तेजी से दौड़ते हुए पेड़ों पर जा चढे।
इस सर्वेक्षण में यह पता लगा कि जानवरों के व्यवहार में असामान्यता भूकम्प क पूर्व 24 घण्टे तक चरम सीमा पर थी। जहाँ-जहाँ भी भूकम्प के झटके अनुभव किए गये वहाँ-वहाँ इस प्रकार के परिवर्तन जानवरों में नोट किए गये।
ये घटनाएँ इस बात की प्रमाण है कि प्रकृति में होने वाले परिवर्तन तथा प्रकोपों की जानकारी जीव जन्तुओं को मिल जाती हैं इस आधार पर यह सम्भावना बन चली है कि जानवरों के असामान्य व्यवहारों के आधार पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। न केवल जानकारी वरन् इस आधार पर सुरक्षा की व्यवस्था भी बनायी जा सकती है। इस दिशा में चीन के वैज्ञानिकों का प्रयास भी चल पड़ा है। चीन के एक नगर ‘सिंगताई’ को अधिकतर भूकम्प के झटके से गुजरना पड़ता है। फलस्वरुप अधिक जन एवं धन शक्ति नष्ट होती है। इसके लिए ‘सिंगताई में एक केन्द्र खोला गया है। दूसरा ‘अक्सू’ नाम स्थान पर खुला है। इन केन्द्रों पर विभिन्न प्रकार के जीव जन्तु पाले गये है। उनके व्यवहारों एवं उनमें होने वाले परिवर्तनों का गहन अध्ययन किया जाता है। उन वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकम्प के पूर्व पृथ्वी के परतों, जल एवं वायु के आयनों से भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन होता है। परिवर्तनों में, भू-विद्युतीय, भू-चुम्बकीय प्रभाव में अन्तर आना, तापक्रम का कम, अधिक होना भी सम्मिलित है। इन परिवर्तनों को ये जीव ग्रहण करने में समर्थ होते है। मनुष्य की इन्द्रीयाँ एवं यन्त्र इन परिवर्तनों को देख एवं जान सकने में असमर्थ है। जबकि ये तुच्छ जीव होने वो सूक्ष्म परिवर्तनों को भी जान लेते है।
इन प्रयोगों के आधार पर पिछले दिनाँक आक्सू (सिंकयाँग) एवं ‘पोहाई’ नाम स्थान पर आये 74 शक्ति के भूकम्प की पूर्व घोषणा की गई। पूर्व घोषणा से होने वाली क्षति को बचाया जा सका।
जन्तुओं की इन अतीन्द्रिय क्षमताओं ने वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। अब यह सम्भावना बन चली है कि नगण्य समझे जाने वाले जीव भी मनुष्य के लिए उपयोगी हो सकते है। उनसे वे सूचनसं प्राप्त की जा सकती है जो यन्त्रों एवं बुद्धि द्वारा सम्भव नहीं है। धर्म दर्शन प्राणिमात्र पर दया करने की प्रेरणा देता है। सभी के एक सूत्र में गुँथे होने की घोष्णा करता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की उदात्त भावना में मानवेत्तर जीवन सम्मिलित है। सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी कहे जाने के कारण यह दायित्व मनुष्य के ऊपर आता है कि वह इन नन्हें जीवों का पोषण एवं रक्षा करें। उनसे भौतिक जानाकरियाँ मिलने की सम्भावना बन ली है। करुणा, दया, सेवा जैसे आध्यात्मिक तत्वों का विस्तार प्राणिमात्र पर दया करने, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने से ही सम्भव हो सकेगा। इस उदात्त भावना के अपनाने से ही मानवी गरिमा अक्षुण्ण रह सकती है।
ज्ञान की सार्थकता कर्म में है। सत्साहित्य का स्वाध्याय और सन्त सज्जनों का सत्संग असाधारण पुण्य फलदायक माना गया है। ऐसा क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि पठन और श्रवण के माध्यम से उपब्ध प्रेरणा जब सत्प्रवृतियों में परिणित होती है तो उसमें व्यक्तित्व का स्तर बदल जाता है। मनःस्थिति बदलने पर परिस्थितियाँ बदलती है। अन्तरंग सुधारने से बहिरंग में सुखद परिवर्तन होते है। यही मनुष्य को अभीष्ट भी है। सभी सुख और सन्तोष चाहते है। उसी के लिए अपने अपने ढंग से प्रयत्नरत भी रहते है, किन्तु सफलता बिरलों को ही मिलती है। दिशा विहीन श्रम से अभीष्ट की उपलब्धि तो दूर मात्र थकान ही हाथ लगती है। उपयोगी दिशा धारा प्रदान करना स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य है। यदि इन दोनों प्रयासों से सन्मार्ग पर चल पड़ने का साहस मिल सके तो समझना चाहिए कि उनका जो माहात्म्य बखाना गया है, उसमें कोई अत्युक्ति नहीं। किन्तु यह स्वाध्याय पढने तथा सत्संग सुनने तक सीमित रहे और उनका प्रभाव जीवन व्यवहार में समन्वित न हो सके तो समझना चाहिए, पढने और सुनने की व्यसन भर की पूर्ति हुई। समय क्षेप का अपेक्षाकृत कुछ उपयोगी बहाना मिल गया। ऐसी दशा में न स्वाध्याय को कोई पुण्य है और न सत्संग का कोई लाभ।
अखण्ड-ज्योति पिछले तैतालीस वर्षों से इस प्रयास में संलग्न है कि स्वाध्याय के लिए श्रेयतम पाठ्यसामग्री परिजनों को उपलब्ध कराने में कुछ कसर बाकी न रहने दी जाये। कमल पुष्पों का मधु सर्वोत्तम माना जाता है। प्रयत्न यही हुआ है कि घटिया फूलों का नहीं प्रफुल्लित पारजातों का ही पराग ढूँढा जाये और उससे परिजनों की परिपोषण के सभी उपयोगी तत्वों से भर पूर खाद्य आवश्यकता पूरी कराई जाये। मधु मक्खी के श्रम को सराहा जाता है। अखण्ड-ज्योति के अध्यवसाय और प्रस्तुतीकरण का यदि मूल्याँकन हो सके तो यही कहा जायेगा कि मानवी तत्परता के अर्न्तगत जो सम्भव था उसमें कुछ उठा नहीं रखा गया है।
सत्संग इन दिनों असम्भव नहीं तो कष्ट साध्य आवश्यक है। जो इस योग्य है, उन्हें महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न हरने के कारण फुरसत नहीं। जिन्हे फुरसत है वे इस योग्य नहीं कि उनकी बात सुनी जाये। सत् परामर्श देने की क्षमता वाले व्यक्ति दूसरों से कुछ कहने से पूर्व उसे आरण में उतारते है और ज्ञान को कर्म में उतारने के लिए बिना एक क्षण गंवाये तत्पर रहते है। वे हर जगह, हर समय उपलब्ध भी नहीं रहते। ऐसी दशा में इन दिनों सत्संग का प्रयोजन भी स्वाध्याय से ही पूरा करना पड़ता है।
परिस्थितियाँ बदलती रहती है। समस्योओं का स्वरुप सदा एक सा नहीं रहता। इसलिए सामयिक समस्याओं के समाधान एवं प्रस्तुत उलझनों के हल प्रस्तुत करने के लिए ऐसे मार्ग-दर्शन की आवश्यकता पड़ती है जो जन साधारण की मनःस्थिति और सामयिक परिस्थितियों के साथ ताल-मेल खता हो। इस दृष्टि से सृजा गया साहित्य ही युग साहित्य कहलाता है। उपयोगिता उसी की होती है। हर युग में ऋषि उत्पन्न होते है और वे सामयिक चिन्तन एवं मार्ग दर्शन की आवश्यकता पूरी करते है। यह प्रस्तुतीकरण ही युग बोध कहलाता है। इसी स्तर के प्रतिपादन का स्वाध्याय सार्थक होता है।
अखण्ड-ज्योति के जीवन काल की प्रायः आधी शताब्दी होने को आई है। उसने युगऋष्टि की भूमिका निभाई और स्वाध्याय की दृष्टि से उपयासेगी पाठ्यसामग्री प्रस्तुत करने में यथासम्भव कहीं कोई चूक नहीं रहने दी है। यह आहार लोगों ने अपनाया भी है और सराहा भी। यही कारण है कि उसके पाठकों की संख्या इतनी है, जिसे हिन्दी धार्मिक पत्रिकाओं में अद्वितीय ही कह सकते है। यह उसकी लोकप्रियता का चिन्ह है।
देखना यह होगा कि यह प्रतिपादन मात्र रुची ही या पढा भी। पाचन के अभाव में बहुमूल्य खाद्यसामग्री भी अपच का कारण बनती है। उससे शरीर को पोषण तो मिलता नहीं उलटा पेट पर भार ही बढता है। धन, बुद्धि, पद, प्रभाव आदि का सही लाभ उन्हीं को मिलता है जो उन्हें पचा पाते है।अन्यथा अपच से वमन विरोचन जैसी विकृतियाँ उठ खड़ी होती है। सम्पदाएँ विग्रह उत्पन्न करती है। उपलब्धियों का महत्व तभी है जब वे पच सके।
ज्ञान की सार्थकता कर्म से मानी गई है। स्वाध्याय तभी सराहा जायेगा जब वह व्यक्तित्व में चमके और आचरण में उतरे। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन, और पाठकों के अध्यवसाय अध्ययन की सार्थकता इसी कसौटी पर आँकी जायेगी कि परिजनों के जीवन क्रम में उसका क्या प्रभाव पडा ? क्या परिवर्तन हुआ ? यदि ऐसा छ भी न हुआ हो तो समझना चाहिए कि मनोरंजन बेचने खरीदने वालों में एक संख्या अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन को भी सम्मिलित हो गई। यदि ऐसा हुआ हो तो समझना चाहिए कि एक महान प्रयास चट्टान से टकराने वाली नाव की तरह दुर्घटना ग्रसित हो गया। ऐसी दशा में इस असफलता को अपने समय का एक दुःखदायी दुर्भाग्य ही माना जायेगा।
अनुमान है कि ऐसा हुआ नहीं है। कहीं कुछ अधुरापन रह गया है जिसके कारण प्रेरणा चिन्तन क्षेत्र तक घुमड़ कर रह गई, उसे कर्म के रुप में परिणित होने का अवसर नहीं मिला। पूर्ण असफलता इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती है कि अखण्ड-ज्योति परिजनों की आस्था, अभिरुचि एवं आकाँक्षा जन साधारण की तुलना में कहीं अधिक उत्कृष्ट पाई जाती है। यदि कोई प्रभाव न पड़ा होता तो मनःस्थिति में इतना असाधारण अन्तर कैसे आया ?
परिणिति को सफलता भी नहीं कह सकते। क्योंकि इस विशाल समुदाय में से ऐसी व्यक्तित्व सम्पन्न प्रतिभाएँ क्यों नहीं उभरी जिनकी माँग विश्व के कोने-कोने में है। सर्वविदित है कि प्रतिभाएँ ही जन मानस को प्रशिक्षित एवं परिवर्तित करती है। अवाँछनीय प्रवाहों को मोड़ने-मरोड़ने और उसे उपयेगी बना देने का कार्य व्यक्तित्वान प्रतिभाएँ ही करती रही है। आज इसी की माँग और आवश्यकता है किन्तु उसकी पूर्ति हो नहीं रही। यदि अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन प्रखर रहे होते तो उस समुदाय में से युग की माँग पूरी कर सकने वाली प्रतिभाएँ उभर कर आगे आई होती। यदि इस समुदाय में जीवन रहा होता, तो वे मात्र सज्जन भर बन कर न रह जाते। समय का मार्ग-दर्शन करते भी दिखते।
सज्जन होना अच्छा तो है, पर पर्याप्त नहीं। प्रखर व्यक्तित्व दूसरों पर अपनी छाप छोड़ते है और पग-पग पर अनुयायी उत्पन्न करते है। निराशा को आशा में बदलना उन्हीं काकाम है। वे पतन को रोकते ही नहीं वरन् उसे गलाते, ढालते और उत्थान में परिवर्तित करते है। हेय स्तर की प्रतिभाओं ने अपनी दुरभिसन्धियों से हर क्षेत्र में अवाँछनीयता बोई और उगाई। यदि श्रेष्ठता के क्षेत्र में भी प्रखरता विद्यमान रहती तो कोई कारण नहीं कि लोक प्रचलन में सत्परम्पराओं के उद्यान लहलहाते दृष्टिगोचर न होते।
यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कया उत्कृष्ट चिन्तन उपलब्ध होने से जीवन क्रम बदलेगे और प्रतिभा उभरने का लाभ नहीं मिलता ? इसके उत्तर में बीज, फसल और खाद पानी का उदाहरण देना होगा। उत्कृष्ट चिन्तन बीज है। उसकी आवश्यकता अपरिहार्य है। वह न हो तो अंकुर उगने से लेकर फल लगने तक का आधार ही नहीं बनता। इस अभाव में तो पूर्ण अवरोध ही बना रहेगा। इतने पर भी यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि इस प्रसंग में बोया हुआ बीज, अंकुर भर बन सकता है। परिपुष्ट पौधे की स्थिति में नहीं पहुँच सकता। व्यक्तित्व के विकास का जहाँ तक सम्बन्ध है वहाँ उसके लिए प्रेरणाप्रद वातावरण की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। इसका प्रबन्ध हो सके तो दोष चाहे बोने वाले को दियाजाये या काटने वाले को। आवश्यक फसल काटने का अवसर तो नहीं ही मिलेगा। विचारणा चाहे भली हो या बुरी अनुकूल वातावरण में ही पलती और फलती है। इसके अभाव में हर प्रयत्न मुरझाता और सूखता दृष्टिगोचर होगा, भले ही वह अच्छा हो या बुरा। सत्संग और कुसंग की जा महिमा बताई जाती है उसे मात्र व्यक्ति विशेष के सर्म्पक तक सीमित न माना जाये। वातावरण में ही प्रभावित करने की वास्तविक क्षमता रहती है।
अखण्ड-ज्योति परिजनों को चदि उपयोगी प्रतिपादन की तरह ही प्रेरणाप्रद वातावरण मिला होता तो निश्चय ही उसका चमत्कारी रहा होता। सम्पन्न लोग अपने छोटे बच्चों को पाँच सौ रुपया मासिक खर्च वाले पब्लिक स्कूलों में पढने भेजते है, जबकि वहाँ भी ग्रामीण स्कूलों की तरह ही प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम रहता है। पूछने पर वे अभिभावक एक ही बात कहेंगे कि उन मंहगे स्कूलों का वातावरण ऐसा होता है जिसमें बालकों में सभ्य व्यवहार की आदत पड़ सके। वातावरण की प्रभावी शक्ति को असंदिग्ध रुप से स्वीकार करना पड़ता है।
देवता र्स्वग में रहते है, इसलिए उनकी गरिमा अक्षुण्ण बनी रहती है। यदि उन्हें नारकीय वातावरण में रहना पड़े तो निश्चय ही उनमें से अनेकों की आदतें बदल जायेगी और साधारण लोगों जैसी बुरी आदतों से वे भी भर जावेगें। प्राचीनकाल में बालकों को शिक्षण ऋषियों के गुरुकुलों में होता था और वे नर-रत्न बनकर निकलते थे। वयस्कों को तीर्थवास में, अधेड़ों को आरण्यकों में चिरकाल तक निवास करना पड़ता था ताकि वे परिवार के अनपढ वातावरण से प्रथक होकर कुछ समय प्रेरणाप्रद परिस्थितियों में रह सकें। वानप्रस्थों की शिक्षा साधना आरण्यकों में चलती थी। यों गुरुकुलों और आरण्यकों के कोर्स को प्राइवेट पढकर गैस पैपरों के सहारे अथवा पत्राचार विद्यालय में भर्ती होकर भी पूरा किया जा सकता है। ट्यूटर निर्धारित पाठ्यक्रम का अभ्यास करा सकते है। और सरलतापूर्वक उत्तीर्ण होने का अवसर मिल सकता है। इतने पर भी छात्रों को वह लाभ नहीं मिल सकता जो उन शिक्षण संस्थओं के साथ जुड़े हुए विशिष्ट वातावरण में सन्निहित रहता था।
अखण्ड-ज्योति परिजनों को एकाँगी सौभाग्य मिल सका। उससे उपयोगी प्रेरणाएँ तो सत्साहित्य के माध्यम से मिली, किन्तु जो पढा उसे व्यवहार में उतारने के लिए सहयोगी वातावरण न मिल सका। फलतः उस अध्ययन का लाभ चिन्तन का स्तर उठाने तक सीमित बनकर रह गया। घर, गाँव और मुहल्ले का - सम्बन्धियों और कुटुम्बियों का समुदाय भी ऐसा नहीं रहा जिसमें सुसंस्कारिता गहराई तक भरी होती । ऐसी दशा में उपयोगी अध्ययन अपने जीवन्त होने का प्रमाण चिन्तन को ऊँचाई देकर समाप्त हो गया।
कभी-कभी मनस्वी ऐसे भी होते है जो बिना दूसरों का सहारा लिये निज के बलबूते ही अपने को उठाने और उछालते है। स्वनिर्मित व्याक्तित्वों को भी संसार में कमी नहीं, किन्तु यह अपवाद है। आमतौर से मनुष्य वातावरण में ढलते है। यों कोई तेजस्वी वातावरण में भी ढलते देखे गये है, पर वे जन्मजात प्रतिभावान संचित संस्कारों के धनी ही होते है। उन्हें आदर्श तो कहा जा सकता है। उदाहरण नहीं। नदी के प्रवाह यों बहते ही अधिक है। उसे रोककर बाँध बनाने और नहरों में मोड़ने में सफलता प्राप्त करने वाले तो कोई कोई ही होते है।
अखण्ड ज्योति परिजनों को प्रतिपादन, परामर्श की तरह ही यदि तदनुरुप वातावरण भी मिल सका होता तो निश्चित रुप से वे वहाँ नहीं होते जहाँ गतिरोध उन्हें रोके खड़ा है। चिन्तन में उत्कृष्टता का महत्व कम नहीं पर तथ्य यह भी है कि यदि किसी को असामान्य बनना या बनाना हो तो त्दनुरुप वातावरण उपलब्ध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसी अभाव की यह दुखद परिणित है कि परिजन सामान्य स्तर के बने और सामान्य स्थिति में पडे हुए हैं। यदि स्थिति ऐसी न होती, अवसर मिलता तो यह पूछने बताने की आवश्यकता प पड़ती कि परिजनों के इतने बडे सूदाय में मात्र सज्जन ही क्यों दिखाई पड़ते हैं। इनमें प्रभावित करने वाले नेतृत्व की क्षमता क्यों नहीं है ? यों सृजन शिल्पियों का एक बड़ा समुदाय भी इसी परिवार में से निकला है तो भी परिजनों की संख्या और उसमें से उभरी हुई उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की संगति मिलाई जाती है जो स्थिति निराशाजनक ही दीखती है।
होना यह चाहिए था कि प्रेरणाप्रद वातावरण का प्रबन्ध होता और उसमें परिजनों को रुकने, बसने का अवसर मिलता। यदि यह प्रबन्ध किया जा सका होता तो अखण्ड-ज्योति की खदान से इतने नर-रत्न निकले होते जिनकी जगमगाहट से अगणित चहरे दमकते और उनके प्रभाव से असंख्यों व्यक्तित्व उभारते, उछलते द्वष्टि गोचर होते।
भूतकाल में गुरुकुलों और आरण्यकों ने विश्वमानव को, नर-रत्नों को अजत्र उपहार दिया है। इतिहास भारतीय गरिमा का ऋणी है। जिससे संसार के कोने-कोने में अभ्युदय और उर्त्कष के लिए भागीरथ जैसे प्रयास और आदर्श क्रिया-कलाप अपनाने वाले नर-नारायणों की यह पृष्ठभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती थी। इस गरिमा का विशाल रुप जनसाधारण ने जिस भी रुप में देखा हो और परखने वालों ने जो भी निर्ष्कष निकाला हो, पर वास्तविकता इतनी ही है कि धरती पर बिखरे पड़े और मानवी काया में परिलक्षित होने वाले देवत्व कर उपार्जन उत्पादन गृरुकुलों और आरण्यकों में ही होता था। वे नर्सरी, खदान और फैक्टरी की भूमिका निभाती थीं। यह विधालय नहीं थे। उनमें पढ़ाई भर नहीं होती थी, ढलाई उनका प्रमुख प्रयोजन था। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए पाठ्यक्रमों को गौण और वातावरण को प्रमुखता दी जाती थी। अध्ययन से मनुष्य सीखता है। वातावरण से ढलता है। पढ़ाई से जानकारी मिलती है और वातावरण से प्रतिमा उभरती है। व्यक्तित्व ढालने के जितने भी उपाय है वे सभी एकाँगी और संदिग्ध है। सुनिश्चित उपचार एक ही है कि सुसंस्कृत वातावरण में रहने का ऐसा अवसर मिले जिससे जो बनना है उसके अतिरिक्त प्रयत्तन करना पडे़। अनुकरण करने, ढरें में लुढकने और अनुशासन पालने भर से चिन्तन और चरित्र में परिवतन होता चला जाय।
प्राचीन काल में यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। बालकों को गुरुकुलों में प्रौढ़ों को आरण्यकों में अधिक समय रहने और सीखने तथा ढलने का अवसर मिलता था। तीर्थ कल्प के माघ्यम से व्यस्त लोग कुछ समय के लिए वातावरण बदलने और देव जीवन को प्रेरणा लेने जाते थे। स्वारथ्य गडबड़ाने पर जलवायु बदलने के लिए लोग किसी उपयुक्त स्थान पर चले जाते है और कुछ दिन वहाँ निवास करने का लाभ लेकर लौटते है। प्राचीनकाल में तीर्थ सेवन द्वारा मानसिक स्वास्थ्य सुधारने, द्वष्टिकोण एवं जीवन क्रम में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया पूर्ण करते थे।
समय की माँग है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के देव परिजनों को मात्र उत्कृष्ट स्वाध्याय का ही अवसर न मिले-वरद् उस वातावरण में रहने को भी सुविधा हो जो व्यक्तित्व को आदर्शवादी-अध्यात्मवादी ढाँचे में ढालने के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक है। समय को माँग-नव सृजन के लिए अपने आदर्श उपस्थित करने वाले और जन समुदाय को नेतृत्व कर सकने योग्य प्रतिभाओं का उत्पादन प्रचुर परिमाण में करने की है। उसकी पूर्ति के लिए गायत्री नगर का ढाँचा खडा किया गया है, इसमें गुरुकुल, आरण्यक और तीर्थ कल्प की तीनों ही दिव्यधारीओं का समन्वय किया गया है। इस त्रिवेणी में अवगाहन करने के लिए जागरुक प्राणवानों को अखण्ड-ज्योति के प्रखर परिजनों को- आग्रहपूर्वक आमन्त्रण किया गया है।
उपयोगी सम्पदाओं की संख्या अगणित है। संसार के बाजार में जिस ग्राहक को जो रुचता है वह मूल्य देकर खरीदता है। इसमें कुछ खरी होती है कुछ खोटी कुछ चमकीली होती हैं कुछ उपयोगी। कुछ नशीली होती ह। कुछ विषैली। साथ ही कुछ ऐसी भी होती है जिन्हें प्राप्त करने पर इस मण्डी में आना सच्चे आर्थो में सार्थक होता है।
मनुष्य जन्म का सर्वोपरि लाभ है- व्यक्तित्व का निर्माण। सफलताओं में उसी को सर्वोच्च स्तर कहा जा सकता है। अलंकारिक रुप से इसी को कल्प वृक्ष कहा गया है। जिसने यह कमा लिया उसकी तुलना में सभी वैभववान छोटे पड़ते है। इतिहास में पृष्ठ साधन सम्पत्रों की भी जिस-तिस प्रसंग में चर्चा करते है, पर जिनका भाव भरा गुणगान और अभिनन्दन होता है वे महामानव वर्ग के ही होते है। यों चर्चा तो उनके द्धारा प्रस्तुत कार्या की ही होती है। उल्लेख तो घटनाओं का ही हो सकता है, पर वस्तुस्थिति यह है कि उनका व्यक्तित्व ही पारस पत्थर होता है वह जिस भी लौह खण्ड को छूता है उसे ही स्वर्णिम बनाकर रख देता है।
अध्यात्म-दर्शन में अनेको सिद्धियों और उपलब्धियों का वर्णन है। वे बडी आकर्षक और आनन्ददायक प्रतीत होती है। उन्हें जिसने पाया वे स्वयं गौरवान्वित हूए और अनेको को लाभान्वित करने में समर्थ रहे। समझा यह जाता है कि यह सिद्धियाँ किसी देवी-देवता के द्वारा दी गई है। मन्त्रोपचार के सहारे उपलब्ध हुई है, पर वास्तविकता दूसरी ही होती है। मनुष्य जान या अनजान में व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश करता है और उसी अनुपात में अपना मूल्य बढ़ाता है। यही है वह आधार जिससे मानवी गरिमा आँकी जाती है। यही है वह हुण्डी जिसे किसी भी दुकान पर भुनाया जा सकता है। व्यक्तित्व पुरुषार्थ से मिला-सिद्धि पुरुषों ने दिया अथ्वा प्रारब्ध वश हाथ आया- यह बात दूसरी है, किन्तु इतना निश्चित है कि महान सफलताओं के अधिकारी मात्र महामान ही रहे है। महामानव का अर्थ शक्ति और सम्पत्रता का धनी नहीं वरत् व्यक्तित्व का वैभव है। जिसके होने पर जन सहयोग और अभीष्ट साधनों की कमी नहीं रहती।
लगता ऐसा है मानो साधनों के सहारे मनुष्य ऊँचे उठते और आगे बढ़ते है। यह भ्रम इसलिए होता है कि साधन और सफलता यही दो प्रकट रुप से सामने दीखते है। कर्ता की प्रतिभा और प्रखरता तो बुद्धिगम्य होती है, वह आँखों से नहीं दीखती। इयलिए स्थूल द्वष्टि से सफलताओं का आधार साधन सुविधाओं तथा परिस्थितियों को समझा जाने लगता है, किन्तु थोडी गहराई तक उतरने पर दूसरे ही तथ्य सामने आते है। प्रमुखता व्यक्तित्व की विदित होती है। उसे एक जीवन्त चुम्बक कह सकते है जो दूसरो को सहयोग से संचित करने में अनायास ही सफल होता चलता है। परिस्थितियों के अनुकूल में कोई जादू काम नहीं करता। दूरदर्शी चिन्तन तथा व्यवस्थित पुरुषार्थ के सहारे अपनाई गई गतिविधियाँ ही प्रतिकूलताओं को मोडती-मरोडती तथा उन्हें अनुकूलता में बदलती देखी जाती है। परोक्ष को न समझ पाने वाले ही परिस्थितियों के गुण गाते है। जो तथ्यों तक पहुँचते है उन्हे यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होती कि प्रगति का आधार प्रतिभावान वयक्तित्व ही होता है।
व्यक्तित्व अर्थात-गुण, कर्म, स्वभाव, का समुच्चय, द्वष्टिकोण का स्तर, सुसंस्कारी व्यवहार,आकाँक्षाओं का प्रवाह, साहस और उत्साह अनुशासन का अभ्यास। इन्ही विशेषताओं के समन्वय को उत्कृष्ट व्यक्तित्व कहते हैं। जिसने अपने को इन विभूतियों से सुसज्जित कर लिया, समझना चाहिए कि उसे आत्मिक सृद्धियों और भौतिक सिद्धयों के रहस्मय सूत्र हाथ लग गये। उपासना, तपश्चर्या, योगासाधना आदि के नाम से जानी जाने वाली क्रिया-प्रक्रियाओं का उद्वेश्य एक ही है-साध्क के अन्तरंग और वहिरंग की उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालना। जो उपासना इस प्रयोजन को जिस सीमा तक पूरा कर रही होगी, उसके चमत्कार भी उसी अनुपात से उपलब्ध हो रहे होगे। इस लोक मान्यता को उपहासारुपद भ्रान्ति ही मानना चहिए कि मनुहार और उपहार के भूखे देवताओं की छुट-पुट, टन्ट-घन्ट से फुसलाया और उन्हें हर कामनामनाओं को पूरी करने के लिए मनाया जा सकता है।
उपासना के फलस्वरुप साधक को सिद्ध बन जाने की प्रक्रियायों जाद जैसी अटपटी लगती है, पर उसके पीछे नारतत्व इतना ही है कि उपासना से अन्तराल में जन्में कुसस्कारी कपाय-कल्मप कटते है। पशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरत लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्ध पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उव प्रखरता का लाभ नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित विभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
जिनने इतिहास को धन्य और अपने को कुत-कृत्य बनाया उनकी गतिविधियों और सफलताओं का उतना महत्व नहीं है जितना कि व्यक्तित्व का-उत्कृष्टता एवं प्रखरता का। यदि वे इन विशिष्टताओं से रहित रहे होते और ज्यों-त्यों सफलताएँ पाने का ताना-बाना बुनते रहते तो उनके पुरुषार्थ भर को सराहा जाता। उस श्रद्धा और सम्मान से वंचित ही बने रहते जो महामानवों का वास्तविक बल एवं धन होता है। दैवी अनुग्रह लोक सम्मान एवं आत्मसन्तोष की तीन विभूतियाँ ही मनुष्य जीवन की सफलता सिद्ध करने वाले प्रतीत चिन्ह हैं। इन तीनों को प्राप्त करना मात्र सुसस्कारी प्रतिभाओं के लिए ही सम्भव होता हैं। शेष तो मकड़ी का जाला बुनते और उसी में उलझते, सुलझते, रोते, कलपते रहते हैं।
साँसारिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले भी उस स्तर की विशेषताएँ अपने अभ्यास में समाविष्ट किये रहते हैं, जो उन प्रयोजनों के लिए आवश्यक हैं। ठगी, चोरी करने वाले अपराधी, आतंकवादी तक अपने ढंग की चतुरता में प्रवीण होते है। डाकू, हत्यारा बनने के लिए दुर्दास्त साहस चाहिए। व्यवसाय में लाभ कमाने वाले उतने ही होते है, जो उस प्रयोजन में काम आने वाले श्रम, मनोयोग संजोये रहते हैं। इसके अभाव में घाटा होने और दिवालिया बनने की शिकायत आयेदिन देखने को मिलती है।
व्यवस्था बुद्धि और दूरदर्शिता रहने पर ही नेतृत्व करने का अवसर मिल सकता है। परीक्षा में अच्छे नम्बरों से वे ही उतीर्ण होते हैं जो अध्ययन में तन्मयता नियोजित किये होते हैं। स्वस्यता और बलिष्ठता संयमी लोगो के ही भग्य में बदी होती है। अपव्यय से बचने वाले ही धनी हो सकते हैं। हर क्षेत्र से सफलताऐ प्राप्त करने वालों के सौभग्य का कारण ढूँढा जाय तो एक ही निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ेगा कि उनने अपने स्तर की विशेषताए मनोयोगपूर्वक अर्जित की, फलतः सहयोगियों की सहायता से वे क्रमशः आगे बढ़े और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचे।
बात चाहे सामान्य जीवन की सुख-शान्ति की हो चाहे विशिष्ट सफलताओं की, हर हालत में उन स्तरों की विशेषताओं की आवश्यकता पड़ेगी। असफल, पिछड़े तिरस्कृत और संकटग्रस्त लोगो में कई तो देवी दुर्विपाक के सताये हुए भी हो सकते हैं, पर आधिकाँश के स्वभाव में छछोरापन भरा पाया जायेगा। दुर्गुणी ही विपत्ति में फंसते हैं। आलसी ही पराजित होते हैं। साहस हीनों को पराभव का मुँह देखना पड़ता हैं।
यों कहते को तो सर्वत्र बेरोजगारी का ही दौर दीखता है। अनेकों नोकरी के लिए भटकते और रोजगार के लिए तरसते दखे जाते है। किन्तु यथार्थता यह है कि हर क्षेत्र में अभी भी असंख्यों के खप जाने की गुत्रजायश और माँग है। कुशलता और पुरुषार्थ परायणता रहने पर कोई भी निठल्ला नहीं रह सकता। एक नहीं तो दूसरा काम मिल सकता है। हर क्षेत्र में सुयोग्यों और सज्जनों की भारी माँग हैं। ऐसो के लिए सर्वत्र भारी माँग हैं। बेरोजगारी-आलम, प्रसाद और अहन्कार के समन्वय का ही नाम है। अन्यथा हर पराक्रमी हर स्थिति में अपनी और अपने आश्रितों की पेट भरने से लेकर अन्यान्य जिम्मेदारियाँ निभाने में भली प्रकार सफल हो सकता हैं।
प्रगति और अवगति का चक्र व्यक्तित्व की धुरी पर भ्रमण करता है। आन्तरिक पिछडापन की बाहा जीवन में दरिद्रता और अवमानना का त्रास सहता है। जिन्हे अभ्युदय और उर्त्कष से अभिरुचि हो-जो श्रेय, सम्मान और सन्तोष चाहते हो- उनके लिए सुनिश्चित राजमार्ग एक ही है कि वे व्यक्तित्व को पारष्कृत करने पर अपना पूरा ध्यान एकत्रित करें। स्वभाव और व्यवहार में घुसी हुई अवाँछनीयताओं को ध्यानपूर्वक खोजें और उन्हे उखाड़कर मान्यताओं और आदतों की नये सिरे से स्थापना करने का प्रयास करें। यह एक दिन का काम नहीं है। जोश दिखाने, प्रतिज्ञा करने भर से यह प्रयोजन पूरा नहीं होता। आदतें ऐसी ढीठ होती है कि प्रतिरोध का दबाब जरा सा ढीला होने पर उभर कर फिर ऊपर आ जाती है और सुधार मनोरथ को आँधी-तूफान कीी तरह हावी होकर उखाड फेकती है। बार-बार ऐसी असफलता मिलने पर तो हिम्मत ही टूट जाती है और सुधार प्रयत्नों से निराश होकर पुरानें ढरें पर ही विवशतापूर्वक घिसटना पडता है।
इस कठिनाई से कैसे बचा जाय ? व्यक्तित्व निर्माण का प्रयोजन कैसे पूरा किया जाय ? इसका उत्तर एक ही है-” उपयुक्त वातावरण की तलाश और उसमें लम्बे समय तक रहने का प्रयास।” यह अभीष्ट सफलता का सरलतम मार्ग है। डर्रे पर लुढकना किसी के लिए भी सरल पड़ना है, प्रवाह में भी वह सकता है। नदी की भार में उखडे़ हुए विशालकाय वृक्ष बिना किसी सहारे तैराक की तरह द्रुतगति से बहते चले जाते है। हवा के रुख में तिनके और पत्ते अनायास ही उडते है। नमी वाली जमीनो में अपने आप घास उगी रहती है। प्रवाह की सामर्थ्य असीम है। वातावरण के प्रभाव को अत्यन्त प्रचण्ड माना जाना चाहिए। इतना प्रचण्ड कि उसके माध्यम से एक प्रकृति के मनुष्य को दूसरी प्रकृति का बनाया जा सके।
गुरुकुल, आरण्यकों, तीर्थ कल्पों में निवास करने वाले जो पढ़ते-सुनते थे उसका उतना महत्व नहीं या जितना कि आँख-कान और मन-बुद्धि के सहारे उपलब्ध होने वाले आदर्शवादी व्यवहार प्रचलन का। चिन्तन को प्रभावित और चरित्र को परिष्कृत करने में भी उस वातावरण का प्रयोग हो सकता है जो अवाँछनीय स्तर का होने पर र्म्पक में आने वालों को पतन और पराभव के गर्त में धकेल सकता ह।
इन दिनो और सब कुछ सुलभ है, पर उच्चस्तरीय वातावरण का एक प्रकार से सर्वत्र अभाव ही दीखता है। साधन और चातुर्थ बढ़ जाने से ढकोसला किसी भी स्तर का खड़ा किया जा सकता है, पर प्ररण तो वास्तविकता में होता है। उसके अभाव में वह क्षमता उत्पत्र ही नहीं हो सकती जो अन्तराल को प्रभावित करने और व्यक्तित्व को बदलने के लिए आवश्यक है। बाजार में अनेकों स्टाल, बडी सजधज के साथ लगे हैं। इनमें धर्म आ।र अध्यात्म के चमकरले बोर्डो वालेभी कम नहीं हैं। योगाक्षमों की धूम हैं। धर्म स्थान पुराने भी कम नहीं अब हर साल और नये-नये बनते जा रहे हैं। मन्दिरों की भव्यता में प्रतिस्पर्धा लगी हुई है। इन गहना विषयों पर अनपढ़ लोग भी प्रवचन करते और लम्बी-चौड़ी डीगे हाँकते देखे जाते है। कलेवर की द्वष्टि से धर्माडम्बर किसी अन्य से पीछे नहीं। इतने पर भी प्रभार्वी बातावरण का अभाव अभी भी जहाँ का तहाँ है। सुविधा सम्पत्र धर्म स्थान, होटलों के काम करो देखे जाते हैं, पर उच्चस्तरीय आत्माओं का निवास न होने के कारण वहाँ भी ऐसा कुछ नहीं दीखता, जिसमें अनपढ़ों को भी ढ़लने बदलने का अवसर मिले। इस अभाव के रहते उस ऊर्जा की कमी खटकती ही रहेगी जिससे धान पकते और अण्डों से चूजे निकलते है।
अपने समय की महती आवश्यकता प्रखरता सम्पत्र तक पूरा कर रही होगी, उसके चमत्कार भी उसी अनुपात से उपलब्ध हो रहे होगे। इस लोक मान्यता को उपहासास्पद भ्रान्ति ही मानना चाहिए कि मनुहार और उपहार के भूखे देवताओ को छुट-पुट, टन्ट-घन्ट से फुसलाया और उन्हें हर कामनामनाओं को पूरी करने के लिए मानाया जा सकता है।
उपासना के फलस्वरुप साधक को सिद्ध बन जाने की प्रक्रियाओं जाद जैसी अटपटी लगती है, पर उसके पीछे सारतत्व इतना ही है कि उपासना से अन्तराल में जन्मे कुसस्कारी कषाय-कल्मप कटते हैं। पुशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरम लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्व पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उस प्रखरता का लाभा नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित निभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
जिनने इतिहास को धन्य और अपने को कृत-कृत्य बनाया उनकी गतिविधियों और सफलताओं का उतना महत्व नहीं है जितना कि व्यक्तित्व का उत्कृष्टता एवं प्रखरता का। यदि वे इन विशिष्टताओं से रहीत रहे होते और ज्यों-त्यों सफलताएँ पाने का ताना-बाना बुनते रहते तो उनके पुरुषार्थ भर को सराहा जाता। उस श्रद्धा और सम्मान से वंचित ही बने रहते जो महामानवों का वास्तविक बल एवं धन होता है। दैवी अनुग्रह लोक सम्मान एव आत्मसन्तोष की तीन विभूतियाँ ही मनुष्य जीवन की सफलता सिद्ध करने वाले प्रतीक चिन्ह हैं। इन तीनों को प्राप्त करना मात्र सुसस्कारी प्रतिभाओं के लिए ही सम्भव होता हे। शेष तो मकड़ी का जाला बुनते और उसी में उलझाते, सुलझते, रोते, कलपते रहते हैं।
साँसारिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले भी उस स्तर की विशेषताएँ अपने अभ्यास में समाविष्ट किये रहते है, जो उन प्रयोजनों के लिए आवश्यक हैं। ठगी, चोरी करने वाले अपराधी, आतंकवादी तक अपने ढंग की चतुरता में प्रवीण होते हैं। डाकू, हत्यारा बनने के लिए दुर्दान्त साहस चाहिए। व्यवसाय में लाभ कमाने वाले उतने ही होते है, जो उस प्रयोजन में काम आने वाले श्रम, मनोयोग संजोये रहते हैं। दसके अभाव में घाटा होने और दिवालिया बनने की शिकायत आयेदिन देखने को मिलती रहती है।
व्यवरुथा बुद्धि और दूरदर्शिता रहने पर ही नेतृत्व करने का अवसर मिल सकता है। परीक्षा में अच्छे नम्बरों से वे ही उतीर्ण होते है जो अध्ययन में तन्मयता नियोजित किये होते है। स्वस्यता और बलिष्ठता संयमी लोगो के ही भाग्य में बदी होती है। अपव्यय से बचने वाले ही धनी हो सकते हैं। हर क्षेत्र से सफलताएँ प्राप्त करने वालों के सौभाग्य का कारण ढूँढा जाय तो एक ही निर्ष्कष पर पहुँचना पडे़गा कि उनने अपने स्तर की विशेषताएँ मनोयोगपूर्वक अर्जित की, फलतः सहयोगियों की सहायता से वे क्रमशः आगे बढ़े और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचे।
बात चाहे सामान्य जीवन की सुख-शान्ति की हो चाहे विशिष्ट यफलताओं की हर हालत में उन स्तरों की विशेषताओं की आवश्यकता पड़ेगी। असफल , पिछडे़, तिरस्कृत और संकटग्रस्त लोगो में कई तो दैवी दुर्विपाक के सताये हुए भी हो सकते हैं, पर अधिकाँश के स्वभाव में छछोरापन भरा पाया जायगा। दुर्गणी ही विपति में फँसते है। आलसी ही पराजित होते हैं। साहस हीनों को पराभव का मुँह देखना पड़ता है।
यों कहने को तों सर्वत्र बेरोजगारी का ही दौर दीखता है। अनेको नौकरी के लिए भटकते और रोजगार के लिए जरसते देखे जाते है। किन्तु यथार्थता यह है कि हर क्षेत्र में अभी असंख्यों के खप जाने की गुत्रजायश और माँग है। कुशलता और पुरुषार्थ परायणता रहने पर कोई भी निठल्ला नहीं रह सकता। एक नहीं तो दूसरा काम मिल सकता है। हर क्षेत्र में सुयोग्यों और सज्जनों की भारी माँग है। ऐसो के लिए सर्वत्र भारी माँग है। बेरोजगारी-आलस, प्रसाद और अहन्कार के समन्वय का ही नाम हे। अन्यथा हर पराक्रमी हर स्थिति व्यक्तियों की है। स्वार्थ सिद्धि की द्वष्टि से भी यह नितान्त आवश्यक है। परमार्थ तो इसके बिना हो ही नहीं सकता। वैयक्तिक प्रगति के लिए प्रतिभा चाहिए। आर्थिक, समाजिक, बौकि, परिवारिक, राष्ट्रीय प्रगति के लिए कुछ कहने लायक योगदान दे सकने योग्य वे ही हो सके हैं निलकी निजी क्षमता में गुण, र्म, स्वभाव की वरिष्ठता विधमान हो। इसके अभाव में तो भीड बढ़ाने वाने नर-पशुओं की संख्या वृद्वि ही होती चली जाती है। धरती का भार बढ़ाने वाले-अपने और दूसरों के लिए समस्याएँ उत्पत्र करने वालों की कहीं भी कमी नहीं है। आवश्यकता ऐसों की है जो अपने पैरों पर स्वय ही मजबूती से खड़े न हो, वरन् दूसरों को भी सहारा देने, ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने और पार लगाने में समर्थ हो सके।
नीत्से ने ‘अतिमानव’ की आवश्यकता बताई थी और कहा था संसार को सुव्यवस्थित बनाने में इस उत्पादन की महतर आवश्यकता है। हिटलर ने उसका फहड प्रयोग किया था। द्वष्टि लडखडा जाने और उद्देश्य में निकृष्टता घुस पड़ने से वह देव के स्थान पर दैत्य उत्पन्न करने लगा और विघातक बना तथा बदनाम हुआ। योगी अरविन्द की कल्पना का अतिमानस देव स्तर का है। प्राचीनकाल के देवमानव काया की द्वष्टि से मनुष्य और भावना की द्वष्टि से देव थें। उनकी सहज स्वाभाविक गतिविधियों ने जन्म-भूमि स्वर्गोपत बनाई थी। इन चन्दन वृक्षों ने समस्त विश्व उधान को सुगन्ध और सौर्न्दय से भर दिसा था। नव युग में जिस उपार्जन उत्पादन की निर्माण उत्थान की चर्चा है उसमें सदाशयता सम्पन्न प्रखर और कुशल व्यक्तित्वों का निर्माण ही प्रथम है। उन्ही के सहारे प्रगति के अनेकानेक प्रयोजनों को सही रीति से सही दशा में अग्रगामी बनाया जाना सम्भव हो सकेगा।
अखण्ड-ज्योति परिजनों क आधा निर्माण हो चुका आधा शेष है। आधी मजिल चल चुके पर आधी दूरी ही करनी है। परिष्कृत द्वष्टिकोण से समस्याओं पर विचार करने की पद्वति का जहाँ तक सम्बन्ध था उसे परिजन उपलब्ध कर चुके हैं। पत्रिका के पृष्ठों पर चित्रविचित्र लेखों का संग्रह सम्पादन करने और गुलदस्ता सजाने का पयत्न नहीं हुआ है, वरन युगान्तरीय चेतना के रुप में जिस आलोक की आवश्यकता थी उसे ही सँजोने का प्रयत्न किया गया है। उसके सारगर्मित और मार्मिक होने की बात सभी ने एक स्वर से स्वीकार की है। जिनने उन्हें मनोयोग पूर्वक पढ़ा है उनने पाया है कि उसमें अपनाये जाने योग्य बहुत कुछ है। जो प्रस्तुत प्रतिपादन को क्रियान्वित नहीं कर सके उनने भी कथन को अनुपयुक्त नहीं ठहराया बरन् उसे व्यवहार में न उतार सकने की अपनी दुर्बलता भर स्वीकार की है।
विगत चालीस वर्षो से चल रहा प्रशिक्षण, प्रतिपादन परिजनों के बौद्धिक और भावना तन्त्र को प्रभावित करता रहा है। इसे आधी मत्रिजल पार कर लेना कह सकते हैं। शेष इतना ही ह गया है कि उपयुक्त वातावरण में संचित कुसंस्कारों का परिशोधन और शालीनता की सत्यवृतियों का अभ्यास अभिवर्धन सम्भव बनाया जाय। इसके लिए इतना ही करना शेष था कि देव परिवार बनाने के लिए सुनियोजित आधार खड़ा किया जाय। उसको चलाने वाली गतिविधियों का स्वरुप उसा हो जिसे अपनाने पर बिना प्रयत्न के हा स्वभाव आर अभ्यास का परिवर्तन क्रम बिना किसी दबाब एवं प्रयत्न के सहन गति से स्वयंमेव चलने लगे। गायत्री नगर इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया है। इमारत की प्रथम आवश्यकता कलेवर खड़ा होने की बात बन गई। अब प्रवृतियों और गतिविधियों का चल पड़ना दूसरा चरण है। इसे अगले ही दिन उठाया जाना है। इस आरण्यक में ऐसों को रहने के लिए बुलाया गया है जो अपनी संचित सुसस्कारिता को कार्य रुप में परिणित करने की साधना करते हुए आत्मोर्त्कष के चरम लक्ष्य तक पहुँचे। साथ ही दस प्रयोजन की पूर्ति भी करें जो जागृत आत्माओं को सृजन शिल्पियों के रुप में अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर करनी है।
त्याग के समान संसार में कोई दूसरी शक्ति नहीं। -स्वामी रामतीर्थ
गायत्री नगर बनाने का संकल्प इसी द्वष्टि से उठा कि धरती पर र्स्वग के अवतरण का स्वप्न छोटे रुप में साकार करके दिखया जाय। भावी सम्भावनाओं का अनुमा लगाने के लिए वर्तमान में भी कुछ प्रतीक चिन्ह तो खड़े करने ही पड़ते हैं। इमारते बनने से पूर्व उनके नक्शें बनते है। मूर्तियाँ गढ़ी जाने से पूर्व उनके माँडल खड़े होते हैं। देवताओं का र्स्वग पहले इसी अपनी भारत भूमि पर बिखरी हुई स्वर्णिम परिसिथतियों में प्रतिभाषित होता था। दसे देखकर लोग उससे भी ऊँची परिस्थितियों का अनुमान लगाते थे और मरणोतर जीवन आने पर वही पहुँचने का स्वप्न देखते थे।
घर परिवारों को र्स्वग का छोटा प्रतीत प्रतिनिधि माना जाता था। उसमें भाववात्मक षट्रस व्यंजन मिलते है। छोटे-बड़े, नर-नारी समर्थ, अविकसित मिल-जुलकर एक गुलदस्ता बनते थे और संयुक्त अस्तित्व आनन्द के निझेरे झरते थे। दीवार, छप्पर तो इन्ही दिनों जैसे होते थे। चूल्हा-चक्की, बुहारी-चारपाई तो इन दिनों जैसे ही होते थे, पर उनमें व्यवस्था और सुसज्जा की ऐसी कलाकारिता समाई होती थी कि दस आश्रम में पलने वाले र्स्वग का पूर्णभास पाते और मोद मनाते थे। जहाँ श्रमशाीलता और व्यवस्था रहेगी वहाँ दरिद्रता क्यों प्रवेश करेंगी ? जहाँ आपाधपी नहीं, वहाँ मनोमालिन्य किस बात का ? जहाँ दुद्वटता नहीं वहाँ विग्रह क्यों ? जिन कारणों से नरक पनपता है उनकी जड़ ही ना जमने पासे तो असन्तोष और सन्तोष कैसा ? भारतीय पकरवारों में आतिथ्य पाने वाले, विदेशी तक अपने भाग्य को सराहते थे। वहाँ क्या खाया-पीया तो छोटी बात थी, क्या देखा और क्या अनुभव किया, इसी की स्मृति उनके मानस पटल पर आजीवन छाई रहती थी। ऐसे थे भारतीय परिवार। उन्ही का संयुक्त रुप अपने देश की धरती पर बिखरा पड़ा था। फलतः उसे जन-जन द्वारा ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ की मान्यता और प्रतिष्ठा मिली थी।
नव-निर्माण मिशन ने अपने लक्ष्य को दो स्वरुप में चरितार्थ होने की सम्भावना घोषित की है। एक घरती पर र्स्वग का अवतरण दूसरा मनुष्य के देवत्व का उदय। यह दो आधार दो पृथक इकाइयाँ नहीं वरन् एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ लोगो की मनःसिथति के देवत्व की उत्कृष्टता भरी होगी, वहाँ व्यवहार में स्नेह, सहयोग, सृजन, सौर्न्दय की हलचले द्वष्टिगोचर होगी। दूसरे शब्दों में इसी प्रकार कहा जा सकता है कि जहाँ स्वर्गीय वातावरण होगा वहाँ दस प्रभाव से प्र्रभावित व्यक्ति देवत्व का आचरण करते, देवों जैसा द्वष्टिकोण अपनाते पाये जायेगे। देवताओं की निवास भूमि को र्स्वग कहते है। जितना यह कथन सत्य है उतना ही यह भी तथ्य है कि स्वर्गीय वातावरण में रहने वाले देवत्व से ही भरते चले जयेगे।
यह प्रतिपादन किस हद तक सही है ? सामान्यता इसे हर व्यक्ति जानना चाहेगा ? जो वयवहार में द्वष्टिगोचर होता है , कौतूहल उसी का होता है। जादू उस प्रस्तुतीकरण को कहते है जो सामान्यतः देखा नहीं जाता। सिद्वियाँ उन विशेषताओं को कहते है, जो हर किसी में द्वष्टिगोचर नहीं होतीं। देवेता अलौकिक होते है। र्स्वग धरती से बहुत ऊपर है। इन समस्त प्रति पादनों से एक ही ध्वनि निकलती है कि जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए युग निर्माण मिशन के प्रयास चल रहा है, वे सामान्य जन-जीवन से ऊँची स्थिति है।
धरातल पर सहगमन एक जैसा होता है। मनुष्य दो पैरो से और पशु चार पैरों से चलते है, पर पक्षी आकाश में उड़ते हैं। चलने और उडाने का अन्तर मात्र है। इसर प्रकार लोक व्यवहार और आर्दशवादी अनुशासन में भी भिन्नता रहेगी। आस्थाओं और चेष्टओं में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ जाने को ही अध्यात्म की भाषा में उर्त्कष या अभ्युदय कहते है।
सम्पदाओ को वैभव कहते है। वैभव कोई भी रख सकता है, चोर- लुच्चा भी। वह उत्राधिकार, लाटरी में या भाग्यवश अनायास भी मिल सकता है। किन्तु अभ्युदय तो हर व्यक्ति का निजी उपार्जन है। रोटी स्वयं खाई, स्वयं पचाई जाती है, काया को जीवन शक्ति उसी से प्राप्त होती है। दूसरों के खाने-पचाने से अपने शरीर में रक्त माँस नहीं बढ़ता। इसी प्रकार देवत्व और अभ्युदय के लिए वैयक्तिक प्रयास से परिशोधन और भिवर्धन का क्रम चलता है। इसी राजमार्ग पर एक-एक कदम चलते हुए जीवन लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव होता है। यही है देवत्व की उपलब्धि का स्वरुप। उसे प्राप्त करने में यों आवश्यक तो मार्गदर्शन भी होता है, वस्तुतः काम वातावरण से बनता है।
अनुभाग को प्रेरणा प्रभावी प्रतिपादन से नहीं प्रस्तुत उदाहरण से मिलती है। उत्कृष्टता के उदाहरण वहाँ देखे जा सकें उसी को वातावरण कहते हैं। इसकी व्यवस्था जहाँ बनी, समझाना चहिए कि सम्भानाओं के प्रत्यक्ष होने का साधन बन गया।
नव युग में चिन्तन किस स्तर का होगा, उसकी झाँकी करने और उसे लोकमानस में जमाने के लिए अखण्ड-ज्योति ने लम्बे समय से प्रयास किया है। प्रतिपादनों के पीछे जुड़े हुए तथ्य और सत्य ने हर विचारवान् को प्रभावित और प्रेरित किया है। चिन्तन का प्रवाह मोड़ने में उस प्रयास को उत्साहवर्धक ही नहीं आशातीत कही जाने वाली सफलता भी मिली है। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रतिफल दृष्टिगोचर नहीं हो सका। चिन्तन चरित्र में नहीं उतरा और देव चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इस कमी का एक ही करण है। बीजोरोपण के उपरान्त उपयुक्त खाद पानी का न मिलना।
आर्दशवादी प्रतिपादनों को बीजारोपण से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। वह तो है पर समग्र नहीं। स्वाध्याय और सत्संग का महत्व एकपक्षीय है। बात आचरण से बनती है और उसके लिए अनिवार्य रुप से वातावरण चाहिए। उद्यान लगाने वालक सिंचाई, रखवाली, माली आदि की समस्त व्यवस्थाए बनाते है अन्यथा आपने आप तो जंगलों में झाड़-झंखाड़ ही उगते बढ़ते है। अनगढ़ता सर्वत्र है। सुसंस्कारिता के लिए तो नियोजन और अनुशासन को निरन्तर आपनाये रहना पड़ता है। उद्यान लगाना और परिवार बसाना एक ही प्रक्रिया के दो प्रयोग हैं।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष बनाये रहने से काम नहीं चलेगा। इस मधुर कल्पना को कब तक रखे रहा जायगा ? स्वप्नों के कल्पना चित्र भी छाप छोड़ते और सम्वेदना उभारते देखे जाते हैं, पर वे प्रत्यक्ष में न उतरने के कारण अविश्वस्त और निरर्थक समझे जाते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् के महान् आदर्श में ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भानाऐ सन्निहित हैं। एकता और ममता के ईंट-गारे से ही नव युग का भवन चुना जायगा। अस्तु उस प्रतिपादन को प्रत्यक्ष करना होगा। योजनाएँ भी दिवा स्वप्न ही होती हैं। उनमें उन्तर इतना ही रहता है कि उपलब्धि के लिए साधन जुटाने की सम्भावनाओं को जुड़ा रखते हैं जबकि स्वपनों में वैसा कुछ नहीं होता। वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वपन चिरकाल से देखे जाते रहे हैं और उनकी पूर्ति में उज्ज्वल भविष्य का रगींन चित्र दर्शाया जाता रहा हैं। अब एक कदम आगे बढ़ने की आवश्यकता है। रात्रि स्वप्नों और दिवा स्वप्नों में जो अन्तर होता है वेसे समझा जाना चाहिए। रात्रि स्वप्न कल्पना क्षेत्र में अविज्ञात से आते और अनन्त की ओर उड़ते चले जाते है। उनके सिर पैर नहीं होते। किन्तु दिवा स्वप्नों के पीछे कार्य करण की संगति होती है। उनके पीछे क्रमबद्ध योजना बनती और साधन जुटाने की तत्परता रहती है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की आदर्शवादिता को अब स्वप्न लोक से नीचे लगने और व्यवहार में उतरने का समय आ गया।
गुरुकुलों, आरण्यकों और तीर्थ कल्पों की गरिमा गाथा का बखान यदि सच्चे मन से होता है तो उसमें एक कड़ी और जुड़नी चाहिए-उस त्रिवेगी के पुनर्जागरण की, पुनर्जीवन की। गंगा का आस्तित्व तो पहले भी था। पर वह र्स्वग लोक में। उसे प्रयत्नपूर्वक भागीरथ ने धरती पर उतारा। मनुष्यों को देवत्व के वरदान उपहार से लदे रहने वाली वह त्रिवेणी रुठकर दमयन्ती को लादे अपने पितृगह चली गई है। अथवा यों कहना चाहिए कि सीता की तरह अपहतं कर ली गई जो हो उसे वापिस लाया जाना चाहिए। मावनी काया में शैतान भा रहता है और भगवान भी। परिस्थितियाँ उसे हैवान बनाये रहती है किन्तु अनुकुलता मिलने पर उसका इन्सान भी प्रकट एवं प्रबल हो सकता है। इस युग सृगन में इसी प्रयास की आवश्यकता है।
इसी दूरदर्शी चिन्तन ने- समय के इसी दबाव ने गायत्री नगर बनाने को प्रेरणा दी और इस इमारत का काम चलाऊ अशं बनकर तैयार भी हो गया हैं। अब उसमें इतनी जगह हो गई है कि मन मसोस कर न बैठा जाय। जो करना है उसके लिए कुछ कर सकने के लिए कदम बढ़या जाय। देवालय, धर्मशाला बनाने की बात न कभी सोची गई और न सोची जा रही है। धनी मानी यश लिप्सा या पुण्य लूटने की दृष्टि से उस उस प्रकार के भवन बनाते रहते हैं। जितनी तेजी से, जितनी संख्या और जैसी विशालता के साथ वे बन रहे हैं, उन्हे देखते हुए कई बार तो यहाँ तक सोचना पड़ता हैं कि वस्तुतः इनकी आवश्यकता है भी या नहीं ? कहीं निर्माण सामग्री और भूमि का अपव्यय तो नहीं हो रहा है ? गायत्री नगर बनाते समय इस प्रकार का अन्धानुकरण कभी कल्पना में भी नहीं आया। उसके पीछे एक सुनिश्चित योजना रही हैं। इसी प्रेरणा से इसके साधन जुटाने में ऐड़ी-चोटी श्रम किया गया है।
भव सम्पन्नों को दिशाधारा दे सकने योग्य वातावरण बनाने की दृष्टि से ही इस निर्माण को हाथ में लिया गया। उसका ढाँचा खड़ा होने पर अब दूसरा कदम उठाना है-देव परिवार बसाने का । युग मन्च से एक गीत आरम्भ से ही गाया जाता रहा है-
नया संसार बनायेंगे, नया इन्सान बनायेंगे।नया भगवान बनायेंगे, नया परिवार बसायेंगे॥
युग सृजन के पीछे इसी तत्वदर्शन को क्रियान्वित करने की आकाक्षएँ उफनती और छोटी-बड़ी योजनाएँ बनती आई हैं। अब वह समय आ गया कि साकार और गतिशील बनाया जाय।
गायत्री नगर में क्या किया जाना है। इसकी योजना और, घोषण पिछले दिनो संक्षिप्त रुप से बताई जाती रही है। उसे युग शिल्पियों का प्रशिक्षण संस्थान बनाना है। बौद्ध बिहारों और संधारामों जैसा। बुद्ध के ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ अभियान में प्रशिक्षण के लिए बिहार और नियोजन के लिए संधाराम बने थे। उतने विशाल निर्माणों का अवसर तो नहींमिला, पर गायत्री तपो-भूमि को संधाराम एवं गायत्री नगर को बुद्ध बिहार के अनुकरण कर सकने योग्य बनाया गया है।
युग शिल्पी बारी-बारी से यहाँ आते रहें और आत्म निर्माण तथा लोकनिर्माण की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का क्रियान्वित करने का अभ्यास करते रहे। एसी पाठ्य विधि बनाई गई है। एक-एक महीने के साधना एवं शिक्षण के बहुमुखी प्रशिक्षण सत्र यहाँ चलते। जो अधिक समय ठहरना चाहेंगे उनके लिए वैसी सुविध भी रहेगी। युग सृजन बड़ा काम है। उसकी जटिलताओं को देखते हुऐ तदनुरुप प्रशिक्षण नित्तन्त आवश्यक हैं। डाक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, कलाकार आदि को अपने विषय में परागत होने के लिए कई-कई वर्ष का प्रशिक्षण एव अनुभव प्राप्त करना पड़ता है तो कोई करण नहीं कि युग सृजन के समुद्र मन्थन जैसे महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक अनुभव एवं अभ्यास की आवश्यकता न पड़े। गायत्री शक्ति पीठों का चलाना रेलगाड़ी चलाने से भी अधिक पेचीदा है। संचालकों में स्तरीय प्रवीणता न हो तो वह बहुमूल्य प्रयास निरर्थक बनकर रह जायगा। तथ्य को ध्यान में रखते हुए-आवश्यकता को समझते हुए-सृजन शिल्पियों की बहुमुखी शिक्षा व्यवस्था का कार्यक्रम बना है। यह प्रत्यक्ष क्रिया-प्रक्रिया हुई। अब इससे भी पहले की बात यह सोचनी है कि छात्रों को पढ़येगा कोन ? यह प्रश्न सरल भी है और कठिन भी। सरल इस अर्थ में कि अन्य विद्यालयों की तरह निर्धारित पाठ्यक्रम को पुरा करा देने वाले अध्यापक आसानी से मिल सकते हैं। पेचीदी मशीनों को चलाने, बनाने, सुधारने की कला अब कुछ ही समय में दिखाई जा सकती हैं तो युग सृजन जैसी सीधी-सादी पाठ्यविधि को पूरा कराने में क्या कठिनाई हो सकती है। किसी भी अध्यापक स्तर के व्यक्ति को निर्धारित विषयों का अभ्यास कराने और पढ़ने में प्रवीण किया जा सकता है। इस दृष्टि से यह कार्य नितान्त सरल है।
कठिन इस अर्थ में कि इस शिक्षण प्रक्रिया में छात्रों के व्यक्तित्व को ढालना भी सम्मिलित है। उनके निजी चिन्तन, स्वभाव एवं क्रिया-कलाप में ऐसा परिवर्तन आना है कि वे सर्म्पक क्षेत्रों में अन्यान्यों का ढाल सकने काले साँचे की भुमिका निभा सकें। ‘डाई’ से पुर्जे पेन्ट्रल बनते चले जाते हैं। उसे कुशल कारीगरों के अभ्यस्त हाथ तथा अनुभवी मस्तिष्क ही सही रुप में बना पातें है। जो शिक्षार्थी गायत्री नगर में आयेगे उन्हें प्रवक्ता अध्यापक बनाना होता तो चिश्चय ही यह बहुत सरल था। कला सीखना सिखाना कठिन नहीं है, पर व्यक्तित्वों को ढालना, बदलना, हीरा तराशने और खरादने जैसा कठिन है। शिक्षार्थी ‘साँचा’ और ‘डाई’ बन सके तो ही उनके शिक्षण की सार्थकता है अन्यथा आवश्यक जानकारी तो पत्रिकाओं में छपते रहने वाले लेख ही करा देते हैं। उतने भर के लिए किसी को समय और धन खर्च की आवश्यकता क्यों पड़े ?
मनुष्य को उत्कृष्टा के ढाँचे में ढालने की कोई मशीन नहीं बनी है। वह कार्य तो प्ररेणाप्रद वातावरण और सुसंस्कारी व्यक्तित्वों के निजी प्रभाव सर्म्पक से ही सम्भव हो सकता है। नव सृजन के प्रशिक्षण में इसी अप्य की प्रमुखता रहेगी। अतएव अध्यापक ऐसे होने चाहिए जो शिक्षार्थियों को जानकारी ही नहीं दे वरन् उन्हें विकसित परिष्कृत कराने में-प्रखर प्रतिभाशाली बनाने भी योगदान दे सकें।
विद्यार्थी भर्ती करने से पूर्व अध्यपकों की नियुक्ति करनी पड़ती है। अन्यथा बिना पढ़ाने वालों का स्कूल खो अनाथालय बनकर रह जायेगा। गायत्री नगर के विद्यालय के अध्यपकों को ‘छात्राध्यापक’-की दुहरी भूमिका निभानी पड़ेगी। वे स्वयं भी पढ़ेगे साथ ही दूसरो का भी पढ़वागें। गायत्री नगर में बसने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार ने उन प्रबुद्ध परिजानों को आमन्त्रित किया गया है जो आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण की दूहरी शिक्षा साधना साथ-साथ करने में रुचि रखतें हों, जिन्हें सच्चा स्वार्थ साधने और सच्चा परमार्थ करने में उत्साह हो। बड़ी कक्षाओं के छात्रों में से कितने ही ऐसे भी हाते हैं जो छोटी-कक्षाओं के छात्रो के छात्रो का पढ़ाने की व्यवस्था बनाकर अपना काम चलाते हैं। गायत्री नगर में बसने वाले अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठने के लिए-अपने स्तर की प्रगति करगें। साधना, स्वाध्याय, समय और सेवा की चतुविधि आत्मोर्त्कष प्रक्रिया हर श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक हैं। मात्र भजन अधूरा है। किसान को भूमि, बीज, सिचाई और रखवाली की चारों व्यवस्थाओं पर समान रुप से ध्यान देना और प्रबन्ध करना पड़ता है। इसी प्रकार श्रवार्थी साधना, स्वाध्याय, संयन, सेवा के चारों विद्यान अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करते हैं। यही रीति-नीति उन्हें अपनानी होगी जो गायत्री नगर में निवास करते हुऐ उसका वातावरण बनाने तथा उससे स्वयं लाभन्वित होने के महत्व को समझे होगें।
गायत्री नगर को धरती पर र्स्वग के अवतरण का एक छोटा नमूना बनाया जा रहा है। उसके निवासी इस प्रयत्न में निरस्त रहेंगे कि मनुष्य में देवत्व के उदय की सम्भावना को अपने निजी व्यक्तित्व में प्रकट कर सके। वसुधैव कुटुम्बकम् की आदर्शवादिता को चरितार्थ करने के लिए किन गतिविधियों को अपनाना होगा। शिक्षार्थियों और निवासियों को लाभान्वित कर सकने वाला प्रेरणाप्रद वातावरण किस प्रकार बन सकता है। इन्ही तथ्यों को उजागर करने के लिए गायत्री नगर को युग चेतना उभारने की एक सशक्त प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। उसे सफल बनानें में छात्रों से भी अधिक योग-दान उनका होगा जो इसमें तथा उपरोक्त प्रयोजनों की पूर्ति में सत्त संलग्न रहेंगे।
“ कालो न यातो वयमेव याता-स्तृष्णा न जीर्ण वयमेव जीर्णः । -वेराग्य शतक
काल समाप्त न हुआ, जीवन समाप्त हो चला वृद्धावस्था आ गई, किन्तु हा हेत ! तृष्णा अभी भी न छूटी। “‘
“‘ तप का फल है- प्रकाश और ज्ञानै। - वेदव्यास
जन मानस के परिष्कार की प्रक्रियाजब प्रोढ़ स्थिति तक पहँचेगी तो प्रशिक्षण औ परिवर्तन का तन्त्र भी मानवी संख्या तथ परिस्थिति का ध्यान में रखते हुए समर्थ एवं विशाल बनाना पड़ेगा। आरम्भ तो छोटे से ही होता है। अग्नि प्रज्वलत के लिए माचिस या चिनगारी ही अग्रणी होती है। उद्यान खाद में दृष्टिगोचर होते हैं नर्सरी पहले बनती है। भव्य भवन खड़े होने से उनके नक्से या माँडल ही सामने आते हैं। गायत्री नगर की गतिविधियों को नव युग का शुभारम्भ श्रीगणेश ही कहना चाहिए।
धरती पर र्स्वग का अवतरण सम्भव है या नहीं ? मनुष्य में देवत्व का उदय कोरी कल्पना है या शक्य भी ? इन प्रश्नों का उत्तर वाणी से देने पर किसी का समाधान नहीं होगा। जन-जन को विश्वास दिलाने और उत्साह बढ़ाने के लिए प्रयोगशाला का आश्रम लेना पड़ेगा। परीक्षण और प्रतिफल ही इन दिनों समाधान कारक हो सकते हैं। प्रश्नों के इस कोलाहल में इतना कुछ कहा, दिखाया गया है कि लोगो को कानों पर विश्वास नहीं रहा। अब प्रमाणिकता की मान्यता आँखो के निर्धारण पर आ टिकी है। ऐसी दशा में विज्ञान को हि प्रयोगशालाओं का आश्रय नहीं लेना पड़ रहा है वरन् व्यवहार और निर्धारण की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए भी प्रयोगशालाओं की शरण में ही जाना पड़ेगा।
विश्व परिवार को किस प्रकार का प्रशिक्षण, परिर्वन, प्रचलन एवं निर्धारण किये जायं, उनका परीक्षण भी कसौटी पर कसा हुआ होना चाहिए। इसी प्रयोजन के लिए गायत्री नगर बना है, अब उसमें देव परिवार के लिए गायत्री नगर बना रहें हैं, अब उसमें देव परिवार बसाया जाना है। देवालयों में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। इमारत बनती है। प्रतिमा गढ़ी जाती है। पूजन वेदी तक पहुँचाई जाती है। इतना सब अध चुकने के उपरान्त ही पड़ितों को प्राण-प्रतिष्ठा की उपाचार सामग्री लेकर वहाँ पहुँचना होता है प्राण-प्रतिष्ठा का कृत्य को चुकने के उपरान्त ही प्रतिमा की आर्चा, अराधना आरम्भ होती है। गायत्री नगर का देवालय माना जाय तो देव परिवार को उसकी प्राण प्रतिष्ठा कह सकतें है।
होटल धर्मशाला भरनी होती हो तो तीर्थस्थानों में जहाँ यात्रियों के लिए सिर छिपाना कठिन पड़ता है। वहाँ गायत्री नगर में भीड़ भरना तनिक भी कठिन नहीं था। इशारा करते ही 24 लाख की विरादरी अपने लोगों के लिए बने विश्राम स्थल में पर्यटन के नितित्त, विश्राम की सुविधा के निमित्त दस बिना खर्च के सुरम्य आश्रम में भरी ही रहती। कभी कहीं तिल रखने की भी जगह न मिलती। प वैसा किया जाना नहीं है। धर्मशाला और प्रयोगशाला, पाटशाला में क्या अन्तर होता है, यह जानने वाले ही यह समझा सकते हैं कि गायत्री नगर न मुसाफिर खाना है और न सराय। उसका ढाँचा नवयुग के अनुरुप नागरिक ढालने की फैक्ट्ररी का स्वप्न लेकर ही खड़ा किया गया है अब उत्पादन आरम्भ होने से पहले कुशल कारीगरों की तलाश हो रही है।
अगले दिनो सामान्य नागरिकों को भी मानसिक आरोग्य लाभ करने के लिए बुलाया जायगा। पर इससे पहेले डाक्टर, कम्पाउण्डर, ड्रेसर, हैल्पर, नर्स, चौकिदार, सफाईदारों की व्यवस्था होनी आवयश्क है। मरीज धस पड़े, न चिकित्सक हों, न व्यवस्थापक, तब तो सुधार क्या होगा। पूरा नरक बन जायगा। प्रीति भोज के लिए अतिथियों को बुलाने में इतनी कठिनाई नहीं होती, जितनी कि हलवाई तथा खाद्य सामग्री की व्यवस्था बनाने में। गायत्री नगर की प्रशिक्षण प्रक्रिया से लाभ उठाने के लिए आने वालों की कमी नहीं रहेगी। सुसंस्कारिता की आवश्यकता अब समझी जा रही है। इसके बिना हर व्यक्ति भूत और हर धर शमशान बना हुआ है। सुधार का विश्वास दिलाया जा सके तो भले मनुष्य लाखों करोड़ो की संख्या में शान्ति के आश्रम स्थल में प्रवेश पाना चाहेगें।
जहाँ का कथन अविश्वस्त माना और विज्ञापन समझा जाता हो वहाँ की बात दूसरी है, पर जिन पत्रक्ताओं के वचन ऋचाओं की तरह श्रद्धास्पद माने जाते हों-जहाँ की कथनी करनी में एकता विगत चालीस वर्षो से निरन्तर परखी जाती रही हो, उनका आमन्त्रण न तो अविश्वस्त की न कभी शान्ति कुन्ज में कमी रही है। और न रहेगी। स्थान जैसे-जैसे बढ़ा है शिक्षार्थी उससे अधिक अनुपात से बढ़ते रहें है कि यहाँ स्थान की सदा कमी पड़ती है। गायत्री नगर बनने के बाद भी वह प्रतिबन्ध जारी रहेगा। इसके पीछे एक ही तथ्य है, आमन्त्रण के पीछे आगन्तुकों का सुनिश्चित हित साणन। इस तथ्य को जब भुक्तभोगी एक दूसरे को अपने अनुभव सुनाते हुए बताते है तो प्रामाणिकता और भी अधिक बढ़ जामी है। फलतः आगन्तुकों की शिक्षार्थियों की कमी नहीं रहती। अब जबकि प्रशिक्षण में उत्कृष्टता और उपयोगिता का अनुपात और भी अधिक बढ़ा संख्या में आना चाहेंगे। इसमें सन्देह की तनिक भी गुँजाइश नहीं है।
निमार्ण का प्रथम चरण पूरा होते ही उन कारीगरों की आवश्यकता पड़ रही है जो ढिलाई का कारखाना चालाने की बहुमुखी आवश्यकातएँ पूर्ण कर सके। यह द्वितीय चरण पूरा होते ही फिर निर्धारित तथ्य को पूरा कर सकने वाली गतिविधियों का चल पड़ना सरल हो जायगा। यह विद्यालय ऐसा नहीं है जिसमे मात्र क्लास चलाने वाले प्रवक्ताओं से काम चल सके। नोट लेने वाले और रटने में लगे रहने वाले छात्र भी तो इस पाठशाला में पढ़ने नहीं आने वाले हैं। ऐसी दशा में प्रवक्तताओं से काम चलने वाला नहीं है यदि वैसा हो सका होता तो तलाश की दोड़ धूम करने, की तनिक भी आवश्यकता न पड़ती। वे थोड़ा पैसा खर्च करके भी नियुक्त किये जा सकते थे। हर स्तर की प्रतिभएँ बाजार में मौजुद हैं। मर्जी का माल मिलने में कहीं किसी को कोई कठिनाई नहीं होती। फिर गायत्री नगर के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त अध्यापक ढूँढना और उन्हे अपनी ड्यूटी पूरी करने योग्य बना दिना कुछ भी कठिन न होता, किन्तु बात ऐसी है नहीं। काय व्यक्तित्वों को ढालने एवं परिष्कृत करने का है। उसके लिए अध्यापक एवं कारीगर भी ऐसे होने पर फिर इस फैक्ट्र्ररी के चल पड़ने और उत्पादन का ढेर लगने में कोई कठिनाई शेष नहीं रह जायगी।
गायत्री नगर में देव परिवार बसने की बात क्यो कही गई ? इस आमन्त्रण आहवान की आवयश्कता सि लिए पड़ गई ? इसका उत्तर ऊपर की पंक्तियों से मिल जाना चाहिए। इस आहवान की पूर्ति में साधक और साध्य दोनों का समान हित साधन है। साधक वे जो इस सृजन सेवा में संलग्न होगें। साध्य वह जिसे नव सृजन का पुण्य प्रयोजन कह सकते हैं। देव परिवार की तरह गायत्री नगर में बसने वालो से इन दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति भली प्रकार हो सकेगी। जो बसेंगे वे अध्ययन अध्यापक का स्वार्थ और परमार्थ के समन्वय का-ढलने और ढालने का दुहरा लाभ प्राप्त कर सकेंगे। ऐसा लाभ जो आज की परिस्थिति में अन्यत्र कदाचित ही कही, किसी को मिल सके। आत्मोर्त्कष की ऐसी व्यावहारिक और उच्चस्तरीय व्यवस्था ढुँढ सकना सम्भ्रव न हो सकेंगे। विवेकवानों को ऐसी सर्वागीण उपयुक्तता कदाचित ही कहीं मिल सके। भावुक भक्तों की बात दूसरा है वे कहीं भी रम सकते है।
साध्य का हित-साधन भी इसी में है कि भावनात्मक दृष्टि पे ऊँचे स्तर के लिए अध्यापन का काम करें। स्पष्ट है कि यह अध्यापन वाणी से कम और व्यवहार से अधिक होगा। वातावरण किसी स्थान के निवासियों की गतिविधियों से ही बनता है। इस प्रयास में उच्च-शिक्षतों को नहीं चरित्रवानों की व्यवहार में उत्कृष्टाता बनाये रहने वालों की आवश्यकता पड़ेगी। इस स्तर के व्यक्ति बाजार में नहीं मिल सकतें। अखण्ड-ज्योति की प्रेरणाओं को जो लम्बे समय से हृदयंगम करते रहे है, जिनने उसके प्रतिपादनों का गम्भीरता पूर्वक अवगाहन किया है-वे ऐसा अवसर प्राप्त करनें के भी इच्छुक होंगे जिससे मान्यताओं को गतिविधियों में, आदतो में सम्मिलित कर सकना सम्भव हो सके। वस्तुतः इस स्तर के लोग ही प्रस्तुत आहवान को स्वीकार कर सकेंगे और वे ही उपयोगी भी सिद्ध होंगे।
बताया जा चुका है कि गायत्री नगर में बसने वालों को अपनी दिनचर्या में साधना, स्वाध्याय संयम और सेवा के चारों तत्व समन्वित रखने होंगे। आत्मोर्त्कष की सच्ची साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समु़त्रत करने का, उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है। जिन्हें उसके एि उचित श्रम साधना करने में आपत्ति न होवें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर निवास में समुचित सन्तोष प सकेंगे। यो पूर्ण तो एक भगवान है। अपूर्णता के कुछ अंश तो हर व्यक्ति और हर स्थान में कुछ न कुछ पाये ही जायेंगे।
जिस प्रशिक्षण के लिए गायत्री नगर बनाया गया उसमें सबसे अधिक प्रभावी तत्व एक ही होग-प्रेरणाप्रद वातावरण। यह जलवायु पर नहीं, वहाँ के निवासियों की मान्यताओं, भवनाओं और गतिविधियों पर निर्भर है। वातावरण प्राकृतिक द्रश्यों को सुविधा साधनों को एवं आकर्षक कार्यक्रमों को नहीं कहते। वह द्रश्य नहीं अद्रश्य होता है। कहीं के निवासियों क चिन्तनएवं व्यवहार में जितनी उतकृष्टा घूली रहेगी उसी अनुपात में वहाँ का वातावरण उच्चस्तरीय बनेगा। प्रेरणाएँ उसी से मिलती है। उतकृष्टता की दिशा में चलना, धकेलना एवं उछलना उसी आधार पर सम्भव होता है।
गाँधी जी के आश्रम में शिक्षार्थी-प्रायः निर्वाह की सामान्य दिनचर्या में ही अपने समय का अधिकाँश भाग पूरा करते थे। गुरुकुलों, आरण्यकों में पढाई कम और बढ़ाई अधिक होती थी। गढ़ाई को काम व्यक्ति विशेष इस प्रकार सम्पन्न करते हैं कि उनकी चेष्टा अपनी तथा साथियों की गतिविधियाँ उच्चस्तरीय बनाने में निरन्तर नियोजत रहती है। अवाँछनीयताओं के परिशोधन का नाम ही उत्कृष्टाता है। वह कहीं भंडार की तरह जमा नहीं होती वरन् अस्वच्छता से अव्यवस्थता से अहर्निश जूझने के फलस्वरुप पुण्य फल की तरह उपलब्ध होती है। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व यही रीति-नीति अपनाते और वातावरण बनातें हैं। कहना न होगा कि इसी ऊर्जा के सहारे अविकसितों को विकसित होने का अवसर मिलता हैं। प्ररेणा इसी प्रवाह से मिलती है। प्रमुखता परोक्ष की रहती है। प्रत्यक्ष प्रशिक्षण तो दिनचर्या को सही रखने और आवश्यक जानकारी देने भर का प्रयोजन पूरा करता है।
गायत्री नगर में बसने वाले उपरोक्त दोनों प्रयोजन पूरे करेंगे। उनकी साधना आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों पहियों के प्रगति पथ पर सवार होगी और द्रुत गति से आगे बढ़ेगी। वे अध्ययन और अध्यापन के अनेक प्रकार है। लेखन, पत्र व्यवहार, प्रचार, जनसर्म्पक प्रवचन आदि क्रिया-कलापों को इस अध्यापन कार्य के अर्न्तगत ही गिना गया है। शारीरिक श्रम के रुप में की गई अन्यों को प्ररेणा देने वाली गतिविधियाँ भी इस समग्र अध्यापन के अर्न्तगत ही आती है। इन बहुमुखी प्रयोजनों को गायत्री नगर में बसने वाले अपनी सुनियोजित दिनचर्या के आधार पर सतुलित रुप से सम्पन्न करते रहेंगे। फलतः आश्रम वासी तथा शिक्षार्थी दोनों हीं एक दूसरे से समुचित लाभ उठाते रहेंगे। आश्रम वासी शिक्षार्थियों के सहारे अपने कौशल परिपक्व कि शालीनता व्यवहार में किस प्रकार समन्वित रखी जा सकती है।
गायत्री नगर में बसने के लिए उन्हें बुलाया जा रहा है। जो मात्र सीखने की स्थिति तक सीमित न हो जो सिखा भी सकें। जो पाने के ही इच्छुक न हो कुछ दे भी सके। जिनमें नव सृजन की पात्रता बढ़ाने और योगदान देने की उत्कृष्टा भी जीवन्त हो। असफल जीवन से छुटकारे का आश्रय स्थल नहीं चरम पराक्रम के लिए गायत्री नगर को आधुनिक कुरुक्षैत्र बनाया गया है। उसमें अर्जुन भी चाहिए, और अभिमन्यु भी। अपने को टंटोल कर देख जिनमें जीवन हो वे ही उधर आने की बात सोचे। मृतकों का बोझा यहाँ कोन ढोयेगा ?
आहवान के आरम्भिक दिनों में उन्हें प्राथमिकता दी जायेगी जिनके पास निर्वाह की अपनी आर्थिक सुविधा विद्यमान है। संचित पूँजी से पेन्शन से जो अपना गुजारा कर सकें। इसमें मिशन की दुर्लब स्थिति पर बोझ भी नहीं बढ़या और साथ ही साधकों की निस्वार्थ परमार्थ परायणता का प्रभाव भी बढ़ता है। इसके बाद उनका नम्बर आता है, जिनके पास अपनी व्यवस्था में थोड़ी बहुत ही कमी पड़ती है। उसकी पूर्ति मिशन द्वारा भी हो सकता है। इसके बाद उनका नम्बर है जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जिन्हें अपना ब्राह्मणोचित निर्वाह ही उपलब्ध करना है। प्राचीन काल में ब्रह्मचारी और वानप्रस्य ही प्रधान तथा अध्यात्म क्षेत्र में उतरते और जन कल्याण में मार्ग पर चलते थे। गृहस्थ परिवार पालते और उसी में से पथासम्भव लोक मंगल के लिए समय तथा साधनों का अशं दान सेवी आर्थिक दृष्टि से जितने हलके होंगे उतना ही उनके लिए तैरना और दौड़ना सरल पड़ेगा।
अपवाद के रुप में ऐसे दाम्पति भी मिशन के व्यय से निर्वाह चला सकतें है जिनकी पत्नियाँ भी कधें से कधाँ मिला कर अपनी योग्यतानुसार श्रम करने में तत्पर हैं। गुड़िया बन कर बैठी रहने वाली पत्नियों का भार स्वभवत- अखरने लगेगा। ऐसे गृहस्थ अभी इस प्रयोजन के लिए नहीं बुलाये जा रहे हैं जिनके ऊपर कितने बच्चों का उत्तदायित्व है, और जिनकी प्रजनन प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसी प्रकार जो शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से जरा-जीर्ण अस्त-व्यस्त हो चुके हैं। वे सृजन सैनिकों की घुड़दौड़ में सम्मिलित होने और साथ दौड़ने में असमर्थ सिद्ध होगें।
जिन्हें प्रशिक्षण का जन सर्म्पक का व्यवस्था का अभ्यास है। जो अनुशासन के अभ्यस्त रहें हैं, जिन्हें चिन्तन और स्वाध्याय में रस आते है। जिनके स्वभाव में कटुता नहीं, जो निन्दा करने के स्थान पर सुझाव या सुधार के आधार प्रस्तुत कर सकतें हैं, ऐसीरचनात्मक प्रवृति ही यहाँ उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हे छिद्रन्वेषण आक्षेप निन्दा भर्त्सना में ही रस आता है, ऐसे निषधात्मक प्रकुति के व्यक्ति यहाँ खप नहीं सकेंगे। अपना लक्ष्य सृजन है- विग्रह एवं विगठन नहीं। निषेधात्मक प्रवृति को तोड़ना भष्ट आता है बनाना नहीं, ऐसे यदि सुणर सकेंगे तो ही उनके पैर यहाँ जम सकेगें।
गायत्री नगर में बसने के लिए आरम्भ में प्रयोगात्मक रुप से ही आना चाहिए। न्यूनतम ती तहीने की बात सोच कर आया जाय। इतनी अवधि गुजर जाने के बाद ही यह निश्चय किया जाय कि स्थायी रुप से रहना है या नहीं। अनुकुलता और उपयुक्ता के आधार पर ही स्थायी नियर्ण लेना ठीक होगा।
जिन्हे देव परिवार में सम्मिलित होने और गायत्री नगर में बसने का उत्साह है उनके विस्तृत परिचय समेत आवेदन पत्र माँगे गये है। उन सभी को गायत्री जयन्ती सत्र में प्रत्यक्ष विचार विनिमय के लिए बुलाया गया है। जुलाई से देव परिवार में प्रवेश पाने वाले परिजनों की व्यवस्थित कार्य पद्धति आरम्भ हो जायगी।
अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए।
समस्याएं जानी पहचानी हैं। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित हैं। फिर से उस सर्न्दभ में अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है कि तथ्यों पर जिस हलके ढंग से विचार किया जाता रहा है वह अपर्याप्त है। ढर्रे आवरण उठाकर हमें वास्तविक को देखना चाहिए। इसी को तत्वदर्शन या ईश्वर दर्शन कहतें हैं। इसी का नाम आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म निर्वाण है। ढर्रे का अभ्यास ही भव बन्धन है। माया अर्थात् आवास्तविकता की खुमारी। इसे हटाया और तथ्य को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।
मनुष्य जीवन ईश्वर का बहुमूल्य अनुदान है। इसे इनाम नहीं अमानत माना जाय। भव-बन्धनों के कुचक्र से निवृति, पर्णता की प्राप्ति-र्स्वग और मुक्ति की उपलब्धि-सिद्धियों की विभूति आत्मा और परमात्मा की एकता है कि यर्थर्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं ?
कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रुप में मान्यता देते और नदनुरुप दिशा धारा का निर्धारण करते हैं।
युग-सन्धि की ब्रह्म वेला में जागृत आत्माओं का आत्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।
थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरुप ही बदल सकता है जो लक्ष्य पथ पर चल सकने की असमर्थता विवशता बनकर सामने आती रहती है।मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फंसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष है। किन्तु जब अपना चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागो को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
सामान्यता मनुष्य जीवन की गरिमा का समुचित उपयोग विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में योग दान देकर इस सुअवसर को सार्थक बनाने में ही है। पेट प्रजनन तक अन्यान्य प्राणियों को सीमित रहना शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। अन्य प्रणियों को साधन समिति मिले हैं। उनकी शरीर संरचना और बौद्धिक क्षमता इतनी ही है कि अपना निर्वाह भर चला सकें । किन्तु मनुष्य तो सृष्टा का युवराज है उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे उसे तनिक-सा श्रम मनोयोग लगाकर चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्म-कल्याण और लाक-कल्याण जैसे उच्च उद्दयश्यों की पूर्ति कर सकता है।
इस सुअवसर को ठुकरा कर जो तृष्णा, वासना का लोभ-मोह का अनावश्यक भार संजोते और ढोते है, उनकी समझदारी को किस तरह सराहा जाये ? दल-दल में घुमते जाना और उसकी सड़न से खीझते ओर जक्ड़न से चीखते जाना, किसी का लादा हुआ नहीं, स्वयं ही अपनाया हुआ दुर्भाग्य है। यह अनिवार्य नहीं, अपना ही चयन है। कोई चाहे तो स्िति को किसी भी समय बदल भी सकता है। इसके लिए बहुत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र दृष्टिकोण उलटना और कार्यक्रम बदलना पड़ता है। इस परिवर्तन से व्यवस्था बिगड़ती नहीं, वरन् और भी अच्छी बन जाती है। किन्तु उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाये जो अभ्यस्त ढर्रें के रुप में सिर से पैर तक लद गई है। कोई चाहे तो उसे सहज ही उतार भी सकता है।
माया छाया की तरह है वह आगे-आगे चलती और नेतृत्व करती है। किन्तु जब प्रकाश की ओर पीठ किये रहने की प्रक्रिया बदली जाती है, दिशा को उलट दिया जाता है तो सूर्य के सम्मुख होते ही छाया पीछे दौडने लगती है। परिस्थितियों की विवशता के सम्बन्ध में ऐसा ही सोचा जाता है कि वही बाधक हो रहा है। किन्तु ऐसा है नहीं। चिन्तन प्रतिगामी ढर्रा ही बसधक है। यदि आदर्शवादी आधार अपनाकर नये ढंग से सोचना और गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण कर सकना सम्भव हो सके तो प्रती होगा कि समस्त गुत्थ्याँ सुलझ गई। ऐसा मार्ग निकल आया जिस पर चलते हुए लोक और परलोक का सुव्यवस्थित रीति से सध सकना सम्भव ही नहीं सरल भी है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए गतिविधियों के अमिट निर्धारण के लिए जो साहस जुटा लेते है वे देखते हैं प्रगति पथ पर बढ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा था जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित उदारता पूर्वक प्रदान की है।
सामान्य परिस्थितियों में जन्में और कठिनाईयों से घिरे व्यक्ति भी चरम उर्त्कष के लक्ष्य तक पंहुचे और महामानव बने है। दूसरे लोग जिन परिस्थितियों को विवशता मानते रहे उनने उन्हें इस रुप में देखा ही नहीं। नये ढंग से सोचा और नया मार्ग निकाला। फलतः परिस्थितियाँ अपनी जगह पर बनी रहीं और अग्रगमन के लिए दूसरा रास्ता निकल आया। महामानवों में से प्रत्येक का जीवन क्रम इसका साक्षी है कि उनने परिस्थितियों को अपरिहार्य नहीं माना और उनके न बदलने पर अपना ढर्रा बदलने का साहस जुटाया। पिछड़ेपन और प्रगतिशीलता का मध्ववर्ती अन्तर इतना ही है। जो इस रहस्य को समझते हैं उन्हें दैत्यों के जादू तिलस्म से बाहर निकलना और देवों के उन्मुक्त आँकाश में विचरण करना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता। तिलस्म अवास्तविक है। स्व सम्मोहन और आत्मसमर्पण ही उसका आधार है। अन्तरंग बदलते ही बहिरंग के उलटने में देन नहीं लगती। जो भीतर की गुत्थी सुलझा सके उनके लिए बाहर समस्याओं का हल निकालते देन नहीं लगती। प्रपंच का जंजाल तो भीतर ही भरा पड़ा है। अपच होने से ही स्वादिष्ट व्यजंन कडुए लगते है।
यदि विलासी लिप्सा और संग्रह की तृष्णा को हलका किया जा सके तो औसत भारतीय जेसा नैतिक निर्वाह आसानी से उपार्जित हो सकता है। यदि परिवार को बढाने की मूर्खता न की जाय, जो अब तक का है उसे स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाना भर कर्त्तव्य माना जाय तो उस परिपोषण के लिए सामान्य प्रयास से ही काम चल सकता है। बोझिल जीवन तो उनका होता है जो अमीरी के स्वप्न देखते ओर उत्तराधिकारियों को वैभव से लादने की ललक संजोये रहते है। बोझ इस दुश्चिन्तन भ का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता है और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है जो लिप्सा तृष्णा के रुप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गढाये रहती है। आवश्यकता हर किसी की पूरी हो सकती है पर तृष्णा की आग को बुझा सकना कितने ही प्रचुर वैभव से नहीं हो सकता। ईंधन पड़ने पर वह शान्त कहाँ होती, दूनीं-चौगुनी भड़कती है।
प्रसुप्ति ग्रस्तों का चिन्तन और आचरण जैसा होता है उसकी तुलना में जागृतों के सोने और करने में भारी अन्तर रहता है। जागृतों का मोह ग्रस्तों की तरह नहीं सोचना चाहिए, उन्हें सुख में ही लिप्त नहीं रहना चाहिए। सन्तोष भी उपार्जित करना चाहिए। बड़प्पन ही पर्याप्त नहीं महानता भी अभीष्ट है। वावाही लूटने के लिए उद्धत प्रदर्शन का सरंजाम जुटाने में सार नहीं, महत्व उस लोक श्रद्धा का है जो उत्कृष्टता और उदारता अपनाने पर प्रयुर परिमाण में उपलब्ध होती और अन्तरात्मा को आनन्द भीर पुलकन से परितृप्त करती है।
हर जागरुक को इन दिनों इसी स्तर का प्रगतिशील चिन्तन अपनाना चाहिए और ढर्रें में ऐसा परिवर्तन करना चाहिए जिससे इस विषम वेला में आपतित धर्म का निर्वाह कर सकना सम्भव हो सके। ढूँढने से हर कसी को राह मिलती है। यदि आकाँक्षा सच्ची हो तो एक न सही दूसरे ढंग से सही कोई हलनिश्चित रुप से ऐसा निकल सकता है जिसमें निर्वाह भी कठिन न पड़े और जीवन लक्ष्य पाने तथा युग धर्म निभाने का अवसर भी मिलता रहे।
रोज कुआ खोदने और रोज पानी पीने वाले भी यदि आदश्रवादिता को अपना सके तो आठ घण्टा कमाने के -सात घण्टा सोने के-पाँच घण्टा गृह कार्यों के लिए लगाकर बीस घण्टे में संसार यात्रा भली प्रकार चला सकते है और शेष चार घण्टे बिनाकिसी कठिनाई के युग धर्म के निर्वाह में नियमित रुप से लगा सकते है। बहानेबाजों की बात दूसरी हैं उन्हें बसी बहाने पहले से ही याद है। चाहं तो चालीस और भी गढ सकते है। इन भावना रहित लोगों की आत्मा प्रवचना ही मूल भूत कठिनाई है। यथार्थ चिन्तन की कसौटी पर उनकी वह मनगढन्त नितान्त बनावटी लगती है जिसका आश्रय लेकर वे अपनी जागरुकता को कर्त्तव्य पाि पर चलने से रोके रहते है।
पूरा समय आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण में लगा सकने की परिस्थितियाँ प्रायः आधे लोगों में होती है। सचित सम्पदा को समेटकर यदि स्थाई निधि के रुप में जमा कर दिया जाये तसे दस प्रतिशत ब्याज भर से इतना पैसा सहज ही मिलता रह सकता है जिसमें निर्वाह भी होता रहे और देव जीवन भी जिया जा सके। परिजनों को स्वावलम्बी भर बनाने का लक्ष्य हो तो उनमें से अन्य समर्थों को बैठकर न खाने कुछ कमाने के लिए उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है। बैठकर खाने में इज्जत और कमान में अपमान की मान्यता यदि बदली जा सकें तो प्रतीत होगा कि बचे हुए समय में घ के समर्थ लोग कुछ न कुछ कमा सकते है और एक व्यक्ति पर लदे हुए भार को बहुत कुछ हलका कर सकते है। बेटों को वैरिस्टर बनाने ओर लड़की को कुबेर घर भेजने का नशा हलका किया जा सके ओर उन्हें औसत नागरिकों की तरह निर्वाह करने और सुसंस्कारी गतिविधियाँ अपनाने के मार्ग पर चलाया जा सके तो प्रतीत होगा कि पहाड़ जैसा बोझ उतरकर हलका हो गया। सन्ताने स्वावलम्बी हो जाने पर छोटे परिवार से बिदाई लेनी चाहिए और बड़े परिवार की विश्व परिवार की बात सोचनी चाहिए। समर्थ सन्तानो को समझाया जाना चाहिए कि माता पिता का ऋण छोटे भाई-बहिनों की जिम्मेदारियाँ सम्भालने के रुप में चुकाया जाना चाहिए। यह ऋण मुक्ति ओर अनुदान के प्रतिदान का सिद्धान्त हर समर्थ सन्तान को सीखना चाहिए। इस कर्त्तव्य भावना को हर परिवार में जगाया जाना चाहिए। बाप की कमाई बेटों को ही बंटे, यह देव परम्परा नहीं है। परिवार के भरण पोषण उत्तरदायित्व से जो निवृत हो चुके उनके लिए पोतों के टटी धोते रहने और पुत्रवधू की गालियाँ खाते रहना ही एकमात्र मार्ग नहीं। वे चाहं तो वानप्रस्थ परम्परा को अपनाकर भारतीय संस्कृति के सच्चे उत्तराधिकारी भी बन सकते है।
परिस्थितियाँ असंख्यों की ऐसी है जिनको युग धर्म के निर्वाह की समुचित सुविधाएँ प्राप्त है। हथकडियाँ मोह की और बेडियाँ लोभ की है जो एक कदम आगे बढने और एक परमार्थ करने देने में अवरोध अटकाती है। इन्हें तोड़ा न जा सके तो ऐंठ मरोड़कर ढीला तो किया ही जा सकता है। इतने भर से दौड़ना न सही घिसटना तो निश्चित रुप से सम्भव हो सकता है।
युग सन्धि की इस पुनित वेला में आपत्ति धर्म के निर्वाह से मुँह मोड़ना ऐसा प्रमाद है जिसके लिए समय निकल जाने पर हाथ मलना और पश्चापात करना ही शेष रह जायेगा।
देवताओं से सहायता माँगने की बात तो सदा ही चलती है। पर कुछ विशेष समय ऐसे भी आते है जब देवता मनुष्य से याचना करते है। ऐसे अवसर किन्ही सौभाग्यवालों को ही मिलते है जब वे देवताओं की मनोकामनाएँ पूरी करने में समर्थ हो सके। दशरथ को देवताओं की सहायता के लिए जाना पड़ा था। अर्जुन भी गये थे। दधीचि ने उदरतापर्वूक उन्हे दान दिया था। कृष्ण साधु के वेश में घायल कर्ण के पास पहुँचे थे। वामन ने बलि के सामने हाथ पसारा था। राम ने शबरी से बेर की याचना की थी। सुदामा से तन्दुल माँगे गये थे। अंगद और हनुमान ने देवताओं से अपनी कामनापूर्ण नहीं कराई थी वरन् उनकी पूरी की थी। इस प्रसंग में ऋषियों की परम्परा याद आ जाती है। विश्वामित्र ने हरश्चन्द्र से, उद्यालक ने आरुणि से, चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से, समर्थ ने शिवाजी से, परमहन्स ने विवेकानन्द से, विरजानन्द ने दयानन्द से कुछ माँगा था और सत्पात्र शिष्यों ने जी खोल कर दिया भी था। बुद्ध और गाँधी की झालियाँ आदि से अन्त तक फैली ही रही। देने वाले घाटे में नहीं रहे। लेने वाले जितने धन्य हुए उससे अधिक श्रेय देने वाले को मिला। सान्धाना ने शंकराचार्य को जो दिया था उससे अधिक पाया। अंगुलि माल और अम्बपाली हर्षवर्धन और अशोक, बुद्ध को देते समय उदारता की चरम सीमा पर पहुँयचे थे। गाँधी के सत्याग्रहियों ने अनुदानों की अपने दाव पर झड़ी लगा दी। देखते है कि जो दिया गया था वह निरर्थक नहीं गया वरन असंख्य गुना होकर उन उदार मनाओं के ऊपर दैवी वरदान की तरह इस प्रकार बरसा कि वे कृत-कृत्य हो गये। धनी अकेले भामाशाह ही नहीं हुए है। मरण अकेले भगतसिंह के हिस्से में ही नहीं आया हक्। जेल अकेले नेहरु पटेल ही नहीं गये है। मुसीबतें बहुतों को आती है। त्यागने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। किसी से चोर छीनता है। किसी से बेटा। पेट भरने और तन ढकने के अतिरिक्त और किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। जब विरानों के लिए ही सब कुछ छोड़ना है तो इन विरानों का स्तर कुछ ऊँचा क्यों न उठा लिया जाये। जब अपना उपार्जन श्रम, सहयोग किसी को देना ही है तो उन्हें देवताओं ऋषियों एवं सदुद्देश्यों के लिए ही क्यों न दिया जाये ? इस उदार नीति को अपनाने वाले बैंक में जमा की गई पूँजी की तरह ब्याज समेत लम्बा लाभ पाते है जबकि मोह के गर्म में धकेली हुई उपलब्धियाँ निरर्थक ही नहीं जाती, विघातक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करती है।
दूसरों से बात करने में समय और चातुर्य का कचुमर निकल जाता है। यदि अपने से भी एकान्त में जी खोलकर समझदारी की बात की जा सके और अभिन्नों के सहयोग से बनाने वाली सृजनात्मक योजना बनाने जैसा कुछ किया जा सके तो अन्तःलोक में प्रसुप्त पड़े देवता ही जागृत होकर ऐसा परामर्श एवं सहयोग देने लगेगें जिन्हें पाकर समस्त अभाव की पूर्ति और समस्त वैभव की उपलब्धि हो सकती है।
गायत्री नगर में देव परिवार बस रहा है। उसमें रहने वाले अकर्मण्यता अपनाकर मौत के दिन पूरे नहीं करेगें वरन् आत्मोर्त्कष एवं लोकमंगल का अवसर प्राप्त करेंगें जिसे पारस को छूकर लोहे के सोने में बदल जाने की उपमा दी जा सकती है। कल्पवृक्ष के नीचे बैठने वालों की कामनाएँ पूर्ण होती और दरिद्रता मिटती बताई जाती है। गायत्री नगर के निवास को उसी अलंकारिक मान्यता के समतुल्य माना जा सकता है। कामनाएँ सुरसा के मुख की तरह है। उन्हें पूर्ण करने के लिए हनुमान जैसा आप्तकाम दृष्टिकोण चाहिए। कामनाओं के भावनाओं में बदल जाने पर वह परितृप्ति मिलती है जो कल्पवृक्ष के सान्निध्य में रहने वाले देवताओं को मिलती है। गायत्री नगर का वातावरण अपने आश्रम में रहने वालों को आप्तकाम बनाने और देव सम्भव परितृप्ति दिलाने में समर्थ हो सकेगा ऐसी आशा करने को अतिवाद नहीं कह सकते।
मनःस्थिति को परिष्कृत किया जा सके तो अखण्ड-ज्योति परिजनों में से अगणित अपनी परिस्थिति गायत्री नगर में बस सकने योग्य पावेंगें। जो इस अवसर का लाभ उठा सकंगे उन्हें सच्चे अर्थों में सौभाग्यशाली माना जायेगा।
गायत्री नगर में निवास करने वाले तथा कथित निवृत वैरागी कहे जाने वाले अकर्मण्यों जैसा जीवन नहीं जियेंगे वरन् माहेचस्त लालचियों से भी अधिक पुरुषार्थ करते दृष्टिगोचर होंगे। सामान्य परिश्रमियों और व्यस्त लोंगों में गायत्री नगर निवासियों की भिन्नता मात्र इतनी ही होगी कि उनकी गतिविधियाँ उच्चस्तरीय उद्देश्यों के साथ जुड़ी हुई होंगी। जबकि मूढ, मति स्वार्थान्ध होकर पिसते और पिघले रहते है।
शान्ति का अर्थ यदि निष्क्रियता और निराशा होता है तो समझना चाहिए कि शान्ति कुँज में वैसा कुछ भी नहीं है। वैसी परिस्थितियाँ किन्हीं सदावर्त समेत चलने वाले विरक्त निवासों में ही ढूँढनी चाहिए। एकाध घंटा उलटा पुलटा जप ध्यान करने के उपरान्त सारे दिन आलस में पड़े रहने या मटर गश्ती में इधर उधर घूमते रहने का अवसर ढूँढने वालों को, कोई अन्य आश्रम ढूँढना चाहिए। शान्ति कुँज में अशान्ति से जूझ कर शान्ति की विजय श्री धरण के निमित प्रबल पुरुषार्थ करने की ही योजना बनी है। यहाँ हर किसी को आने की तैयारी करनी चाहिए।
कहा जा चुका है कि आत्मोर्त्कष के लिए एक प्रयत्न से काम नहीं चलता, उसके लिए चार उपाय अपनाने पड़ते है। 1. साधना, 2. स्वाध्याय, 3. संयम और 4. सेवा। इन चारों को एक चार पाई के चार पाये एक कमरे के चार कौने एक धरातल की चार दिशाएँ एक धर्म के चार आश्रम, एक संस्कृति के चार वर्ण कहना चाहिए, इन्हीं चार पुरुषार्थों के परिणाम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के रुप में फलित होते है। इन्हीं चारों को मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय में बोया उगाया जाता है।
जीवित रहने के लिए अन्न, जल, साँस एवं निद्रा की आवश्यकता पड़ती है कृषि में भूमि, बीज, सिंचाई रखवाली अभीष्ट है। इमारत खड़ी करने में ईंट, चूना, लकड़ी, लोहा चाहिए। व्यवसाय में सफलता के लिए पूँजी, श्रम, अनुभव एवं खपत के चार साधन जुटाने पड़ते है। आत्म कल्याण मात्र भजन से नहीं हो सकता। बीज की तरह वह प्रमुख तो है पर पर्याप्त नहीं। जीवन को परिष्कृत करने की साधना पर जिनने ध्यान नहीं दिया और मात्र भजन करते रहे उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा है। साधना समग्र होनी चाहिए। एकाँगी अवलम्बन से उसकी सफलता सम्भवन न हो सकेगी।
गायत्री नगर के निवासियों को यह तथ्य भली प्रकार समझना होगा। और यह मान कर आने का निर्णय करना होगा कि यहाँ उन्हें अपनी शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरुप प्रत्यक्ष एवं परोक्ष पुरुषार्थ में निरन्तर निरत रहना होगा।
अन्तराल में उच्चस्तरीय आस्थाओं का उत्पादन उपासना से ही सम्भव होता है। वस्तु साधना को प्राथमिक महत्व दिया और अनिवार्य माना या है। गायत्री उपासना गौ-दुग्ध की तरह परिपूर्ण आहार है। किसे, किस स्तर की-किस प्रकार गायत्री उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी अनुगन भेद से दी जाती है। उसकी मात्रा तथा सेवन विधि में अन्तर रहता हे। सामान्य क्रम तो सभी के लिए एक है पर अगली सीढियों पर चढते ही आवश्यकतानुसार अन्तर होने लगता है। प्राथमिक पाठशालाओं में सर्वत्र एक ही स्तर की पढाई होती है। पर जैसे-जैसे विद्यार्थी ऊँची कक्षाओं में पढता है उसे उन्हीं विषयों की गहराई में प्रवेश करने के लिये अधिक विस्तृत जानना और अभ्यास करना पड़ता है। काँलेज कक्षा में विषय थोड़े रह जाते है। किन्तु उनकी विशेष प्रवीणता प्राप्त करनी होती है। स्नातकोत्तर कक्षाओं में तो एक ही विषय रह जाता है। एम. ए. में जो भी विषय लिया जाता है। उनमें पारंगत होना पड़ता है। यही बात साधना के सम्बन्ध में भी है। आरम्भ में जप, ध्यान की सामान्य उपचार प्रक्रिया की बाल कक्षा की तरह सभी कर सकते है। पर इसके बाद छात्रों की रुचि एवं स्थिति के अनुरुप अध्ययन क्रम बदला जाता है।
गायत्री नगर में उपासना पद्धति सामान्य भी होगी और विशिष्ट भी। आश्रम की सामान्य साधना पद्धति एक होते हुए भी हर साधक को अपने स्तर का विशिष्ट साधना क्रम अलग से बताया और कराया जायेगा। अल्पकाल में सामान्य दिनचर्या, नियम मर्यादा, विधि-व्यवस्था एक रहते हुए भी हर रोगी का उपचार एवं निर्धारण अलग-अलग रहता है। यही नीति उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्म दर्शी मार्ग दर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त पड़ेगा। कहते है कि सही निदान हो जाने से चिकित्सा का उद्देश्य पूरा हो जाता है। अन्यथा सभी साधकों को एक लाठी से हाँका जाता है। सभी धान वाईस पंसेरी के भाव तोले जाते है। सभी के लिए एक साधना बलती है। किन्तु गायत्री नगर में बसने वाले साधकों को अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरुप साधना का मार्ग दर्शन ही नहीं अवसर भी मिलेगा।
उपासना और साधना के अन्तर को और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उपासना पूजा पद्धति को कहते है और साधना जीवन चर्या को। जीवन चर्या अर्थात् चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है। कुसंस्कार मनुष्य को जहाँ तहाँ घसटते फिरते है। पशु प्रवृत्तियों हावी रहती है। और आदते जो चाहें से कराती रहती है। यहीं है अनगढ जीवन की परिभाषा जो आम आदमी पर पूरी तरह चरितार्थ होती देखी जा सकती है। सर्व समर्थ होते हुए कुछ बन नहीं पड़ता। सम्भावना और क्षमताओं की कमी न होते हुए भी उपलब्धियों की दृष्टि से शून्य ही रहना पड़ता है। उसका कारण एक ही है- जीवनचर्या का दिशाबद्ध, क्रमबद्ध, अनुशासित और निर्धारित न होना। इसी स्थिति को असफलता की जननी और दुर्भाग्यों की दादी कहते है। साधक को अपने मानसिक भटकाव और शारीरिक बिखराव पर नियन्त्रण करना होता है। यही साधना है। व्यवहार में सभ्यता का स्वभाव में सुसंस्कारिता का अधिकाधिक समादेश करते जाना ही आत्म साधना है। इसमें आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास की चतुर्विधि प्रक्रिया साथ लेकर चलना पड़ता है। इसी साधना पद्धति के सहारे साधकों को सिद्ध पुरुष, महामानव बनने का सौभाग्य उपलब्ध होता है। गायत्री नगर में बसने वालों की जीवनचर्या में उस साधना पद्धति के समावेश का नियमित अवसर मिलेगा जिन्हे वे अब तक सिद्धान्त रुप से ही समझते रहे है पर व्यवहार में ने उतार सके।
गायत्री नगर का दूसरा पाठ्य क्रम है स्वाध्याय। स्वाध्याय के चार चरण है। 1. अपने सम्मुख समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त साहित्य का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन। 2. ऋषियों से विचार विनिमय, परामर्श, मार्गदर्शन। इसी को प्रवचन सत्संग कहते है। 3. मनन-भूतकाल से लेकर अध्यावधि चलते आ रहे जीवन क्रम कर पर्यवेक्षण। उसमें से परिवर्तन योग्य प्रसंगों को ढूँढ निकालना। 4. चिन्तन-भविष्य के लिए नीति निर्धारण और उस अपनाने के लिए अभीष्ट उपायों का सुनियोजन। इन चारा आधारों के समन्वय से ही जीवन आत्मोर्त्कष के लक्ष्य तक पहुँचते और महती सफलता का आनन्द लाभ करते है। गायत्री नगर में बसने वालों को इसी स्तर की साधना पद्धति अपनानी पड़ती है। यही है मनोनिग्रह-आत्मविजय- स्वनिर्माण। इसी के साथ ऋद्धियों और सिद्धियों का भौतिक और आत्मिक सफलताओं का श्रेय साधन जुड़ा हुआ है।
सयम, इसी साधना पद्धति के मार्ग में आने वाली अड़चनों के साथ लोहा लेने के शौर्य साहस को कहते है। भीतर और बाहर से अनेकानेक प्रतिकूलताएँ और असफलताएँ ही परिलक्षित होती है। इन हलके भारी प्रहारों के साथ ताल-मेल बिठाने बचने और परास्त करने की रीति-नीति को सयम कहते है।
साधना, स्वाध्याय, सयम के अतिरिक्त चौथा चरण सेवा है। यह चारों ही ऐसे है जिन्हें एक साथ लेकर चलना पड़ता है। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिस अकेले के सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ने पर आत्मिक प्रगति का रथ एक इंच भी आगे बढ सके। यह चारों ही अपरिहार्य है। अस्तु गायत्री नगर में बसने वाले हर व्यक्ति को लोक सेवा की विशुद्ध साधना की तरह अपनाने के लिए तत्पर किया जाता है। यह दूसरे आश्रमों की पद्धति है जहाँ रोटी तोड़ने और माला घुमाने से काम चल जाता है। गायत्री नगर के निवासियों का उद्देश्य देव जीवन की प्राप्ति है। देवता उन्हें कहते हैं जो निरन्तर देने की ही बात सोचते और उसी पुण्य प्रयोजन में निरत रखते है। दे-सो देवता। इसी कायाकल्प के लिए गायत्री नगर में बसावट होगी अस्तु हर निवासी को स्वयं ही यह ललक रहेगी कि उसे लोक सेवा का कितना अवसर मिला इसे वह अपना सौभाग्य मानेगा।
सद् विचार तब तक मधुर कल्पना पर बने रहते है जब तक उन्हें कार्य रुप में परिणित नहीं किया जाता। विचारों और कार्यों का समन्वय ही संस्कार बनता है। सामर्थ्य-संस्कारों में ही होती है। उन्हीं के सहारे व्यक्तित्व बनता है और वे ही भविष्य निर्धारण की प्रमुख भूमिका निभाते है। संस्कार अर्थात् चिन्तन और चरित्र का अभ्यस्त .... जहाँ तक सुसंस्कारिता की उपलब्धि का सम्बन्ध है वह सत्प्रवृतियों के सम्बन्घ में निस्वार्थ भाव से निरत हुए बिना और किसी प्रकार सम्भव ही नहीं हो सकती। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री नगर के निवासियों में से प्रत्येक के लिए उसकी योग्यता एवं स्थिति के अनुरुप सेवा कार्य करने में नियोजित किया जाता है। इसके लिए न्यूनतम चार घन्टे निर्धारित है। जिन्हें परमार्थ परायणता की देव साधना में सेवा संलग्नता में अधिक रस आने लगे उनके लिए अधिक अवसर भी उपलब्ध हो सकता है किन्तु चार घन्टे तो इसके लिए अनिवार्य ही रखे गये है। इससे छूट्टी रुग्णता जैसे अरिहार्य कारणों से मिल सकती है। स्वार्थ वर्ग में साध, स्वाध्याय, संयम ये तीन प्रयोजन आते है। परमार्थ में एक ही निर्धारण है, सेवा। एक होते हुए भी वह इतना महत्वपूर्ण है कि अन्य तीनों की आवश्यकता पूरी कर सके। संसार में कितने ही ऐसे महा मानव हुए है जिन्होने आत्म निर्माण की उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ सेवा साधना में संलग्न रह कर ही उपार्जित करली। गायत्राी नगर में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाता है कि कोई ऐसा न रहे जो अपने ही निजी गोरख धन्धो में उलझा दिन काटता रहे और परमार्थ प्रयोजनों में अरुचि दिखाये।
गायत्री नगर, ब्रह्म्, शान्ति कुँज के तीन आश्रम यों सिर, धड़, पैर की-रक्त, माँस अस्थि की तरह तीन दीखते हैं पर वे वस्तुएं परस्पर पूर्णतया गूँथे हुए हैं। तीनों को मिला कर एक पूर्ण इकाई बनती है। इनकी गतिविधियाँ बहुमुखी हैं और उनमें हर स्तर का व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त सेवा मार्ग प्राप्त कर सकता है।
ब्रह्म वर्चस् में शोध के अनुसन्धान का कार्य चलता है, साहित्य सृजन की गतिविधियाँ वहाँ चलती हैं। आगन्तुकों को आश्रम के प्रतीकों का परिचय कराते हुए अध्यात्म तत्व ज्ञान का परिचय कराने वाला लोक शिक्षण चलता रहता है।
शान्ति कुन्ज में देश-विदेश के लाखों परिजनों की जिज्ञासाओं का समाधान, व्यक्तिगत उलझनों का निराकरण, युग सृजन के लिए अभीष्ट मार्ग-दर्शन जैसे अगणित प्रसंगों पर विचार विनिमय और आदान-प्रदान चलता रहता है। यह कार्य प्रत्यक्ष परामर्श से कम और पत्राचार के रुप में विस्तारपूर्वक चलता रहता है। हजारों पत्रों का प्रतिदिन आदान-प्रदान होता है।
गायत्री नगर में प्रशिक्षण प्रक्रिया है। इसे नव सृजन की बहुमुखी शिक्षा का आकार छोटा किन्तु प्रखरता सम्पन्न विश्व विद्यालय कह सकते हैं। यहाँ की समस्त गतिविधियाँ प्रशिक्षण के आधार पर बनती हैं। छोटे बालकों की बाल-कक्षाओं से लेकर मैट्रिक तक की पढ़ाई गुरुकुल पद्धति से चलेगी। महिलाओं को परिवार निर्माण .... का सम्भव एवं प्रत्यक्ष कर दिखाने का निश्चय किया गया है।
स्मरण रहे स्थ्ज्ञान, व्यक्ति और परिस्थितियों के साथ मनुष्य बुरी तरह जकड़ा रहता है। व्यक्तित्व में क्रान्तिकारी कायाकल्प स्तर का परिवर्तन लाना हो तो उसके लिए स्थान परिवर्तन अनिवार्य रुप से आवश्य कहै। ब्रह्मचारियों को घर छोड़ कर गुरुकुल जाना पड़ता है। यद्यपि घर पर मास्टर बुला कर लड़कों को पढ़ाने में अमीरों को कोई असुविधा नहीं होती। वानप्रस्थों को घर छोडढ़ कर आरण्यकों में बसना पड़ता है। यद्यपि भजन और सेवा कार्य घर गृहस्थी के साथ-साथ भी होते रह सकते हैं। लड़की को ससुराल जाना पड़ता है, यद्यपि कोई सम्पन्न लड़की पितृ गृह में भी पति को नौकर रख सकती है। स्वयं सेवी और परिव्राजक जन-जन से सर्म्पक साधते और परिभ्रमण करते हैं यद्यपि वे दफ्तर खोलर जरुरत मन्दों को अपने घर भी बुलाते रह सकते हैं। संस्कार बदलने के लिए घर और वातावरण बदलना आवश्यक है। प्रायः सभी महामानों ने अपना कार्यक्षेत्र जन्म भूमि से हट कर अन्यत्र बनाया है। यह व्यवहारतः असुविधा जनक लगता है पर तत्यतः यह इतना आवश्यक है जिसे अनिवार्य भी कहा जा सकता है। व्यक्तित्व बदलने की आवश्यकता जो समझते हों उन्हें स्थान परिवर्तन की बात भी सोचनी होगी। जो इस प्रकार सोचे उनके लिए गायत्री नगर से बढ़ कर उपयुक्त स्थान दूसरा हो नहीं सकता।
गायत्री नगर की इमारत का काम चलाऊ भाग बनते ही उस शिक्षण प्रक्रिया का अब आरम्भ होना है, जो नव-निर्माण के लिए नितान्त आवश्यक होते हुए भी अब तक स्थान न होने के कारण रुकी पड़ी थी। गायत्री नगर का उद्देश्य और स्वरुप अध्यात्म विश्वविद्यालय स्तर का होगा। यों साधन सीमित रहने के कारण उसका विस्तार और कलेवर तो छोटा रहेगा ही। दुर्बल काया में भी उच्चस्तरीय आत्मा का निवास हो सकता है। छोटी इमारत में भी नव सृजन की गंगोत्री किस प्रकार प्रादुर्भूत होती है इसका अीिनव दृश्य अगले दिनों इन्हीं आँखों से देखा जा सकेगा।
जुलाई से गायत्री नगर में सभ प्रशिक्षण चल पड़ेगें। चुग शिल्पियों के पूर्व घोषित सत्रों की क्रम व्यवस्था सुनियोजित ढंग से इसी नई देव नगरी में प्रारम्भ होगी। इस वर्ष नव निर्मित गायत्री शक्ति पीठों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं को उन महान् उत्तरदायित्वों के निर्वाह की पात्रता उत्पन्न करने वाले प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जायेगी। उसके लिए न्यूनतम अवधि एक महीना है। अधिक तीन महीना या जतना अधिक सम्भव हो सके उतना उत्तम है।
गायत्री नगर में बसने के लिए अभी उन परिजनों को आमन्त्रित किया है जो मिशन की विचारधारा के साथ लम्बे समय से जुड़े रहे हैं और उसकी दिशाधारा भली प्रकार हृदयगंम कर चुके हैं। अजनबी लोगों को प्रवेश न मिलेगा। उनके लिए यहाँ की गतिविधियाँ अवपेक्षित होंगी। फलतः वे स्वयं हैरान होंगे और यहाँ के व्यवस्था तंत्र को हैरान करेंगे। जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ है उन्हीं को बुलाया गया है। रुग्ण, जराजीर्ण एवं विकृत स्वभाव के लोगों की सेवा, सहायता करने का जब समय आयेगा तब उन्हें भी बुलाया जायेगा अभी तो उन्हीं के लिए आमन्त्राण है जो यहाँ का वातावरण बनाने में योगदान दे सकने की जिनमें क्षमता एवं तत्परता विद्यमान है। अभी हाथ बंटाने वाले बुलाये गये हैं जिन्हें कन्धे पर लेकर चलना है उनकी बारी बाद में आयेगी।
आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी लोगों को इस प्रथम चरण में प्रमुखता दी जायेगी। अपने निर्वाह के आर्थिक साधन जिनके पास हैं वे आवें तो मिशन पर आर्थिक भार न पड़ेगा। जो पारिवारिक चिन्ताओं से छुटकारा पा सकें उन्हीं को स्थिरतापूर्वक कुछ करते बन पड़ेगा। अन्यथा देह कहीं मन कहीं रहने की उथल-पुथल में ऐसे ही कुछ आधा-अधूरा सध पाना है। बाल-बच्चों समेत किसी को आने के लिए इस बार नहीं कहा गया है। एकाकी न सही पत्नी समेत सही, इतना ही छोटा कुटुम्ब होना चाहिए। पत्नी भी गुड़िया या संकीर्ण प्रकृति की नहीं होनी चाहिए अन्यथा पति के किये धरे पर पानी फेरती रहेगी।
जिनके निजी आर्थिक साधन नहीं हैं ऐसे भी कुछ व्यक्तियों के निर्वाह की व्यवस्थ्ज्ञा की जायेगी, किन्तु उनके ऊपर अन्यान्यों की जिम्मेदारियाँ नहीं होनी चाहिए। जो अपने को गायत्री नगर में देव परिवार में बसने की मनःस्थिति परिस्थिति में पतो हों वे अपने भूतकाल के अनुभव अभ्यास का तथा वर्तमान परिस्थितियों का विवरण लिख भेजे। तदनुरुप ही उन्हें आने के लिए कहा जायेगा।
जिन्हें स्वीकृति मिले वे गायत्री जयन्ती 23 जून 80 को शान्तिकुन्ज आ जायें। न्यूनतम श्रावणी पूर्णिमा तक यहाँ रहने का कार्यक्रम बनाकर आवे। इस एक मात्र महीने में वे यह अनुमान लगा सकेंगे कि अनुकूलता एवं उपयुक्तता बनी या नहीं। तालमेल बैठा या नहीं। उस अवधिको प्रयोग परीक्ष्ज्ञण का समय माना जाये। इसके उपरान्त ही अन्तिम निश्चय किया जाये कि स्थायी रुप से आना है या नहीं।
भोजनालय के दोनो प्रबन्ध हैं। आश्रम के भोजनालय में भी सम्मिलित रहा जा सकता है और अपने हाथों अथवा मिल-जुलकर भी बनाया जा सकता है। आश्रम भोजनालय में 80/- मासिक का खर्च आता है।
जिन्हें गायत्री नगर में देव परिवार का सदस्य बन कर रहने में रुचि हो वे यथा म्भव जल्दी ही आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लें।
*समाप्त*