देवत्व पर विजय

एक बहुत भला आदमी था। उसकी भलमनसाहत से उस पर देवदू प्रसनन होय गये। उन्होने उससे कोई सिद्धि या वरदार माँगने को कहा।

तब उस भेद आदमी ने कहा -"आप मुझ पर वास्तव में ही कृपा करना चाहते हैं तो यह वरदान दीजिए कि मुससे सदा किसी न किसी की भलाई होती रहे, परन्तु मुझे उसका पता न लगे।"

'देवता हैरान थे अन्ततः उनको एक उपाय सूझा और उसको 'तथास्तु' ऐसा ही हो, कहकर वरदान दे दिया। देवताओं ने यह वरदान दे दिया कि वह जहाँ कहीं भी जाय उसके पीछे की छाया में दूसरों का हित करने वाली अद्भुत शक्ति रहे।'

अब तो वह व्यक्ति जिधर भी जाता तो उसकी छाया जली घास पर पड़ जाती तो वह हरी हो जाती, किसी रोगी पर पड़ जाती तो वह रोग मुक्त हो जाता, किसी मन्दमति पर पड़ जाती तो वह बुद्धिवान हो जाता, किसी दरिद्र पर पड़ जाती तो वह ऐर्श्वयवान हो जाता। परन्तु उस व्यक्ति को कभी इसका पता न चला। देवता खुश थे और वह आदमी भी प्रसन्न।

यदि उस व्यक्ति को इस बात का पता चल जाता तो उसमें अहंकार का अंकुर फूटकर उसकी भलमनसाहत का निवाश कर डालता। दूसरों को भी उसकी इस अलौकिक सामर्थ्य का ज्ञान न था। यदि दूसरे लोगों को भी इसका पता चल जाता तो उसकी ख्याति हो जाती। उसके चारों ओर ईर्ष्यालु लोग इकट्टे होकर उसे परेशान करते।

उस आदमी के मुनष्यत्व ने देवत्व पर विजय प्राप्त कर ली थी।


यात्रा शून्यनगर से भविष्यनगर की

महर्षि जातवेद ने पाठ प्रारम्भ किया और बोले आज तुम्हें योगवाशिष्ठ का एक उपाख्यान सुनाता हूँ। एक शून्य नाम का नगर था। उसमें तीन राज पुत्र रहते थे? एक गर्भ में नहीं आया था। अपने भावी जीवन को लेकर तीनों चिन्तित रहते थे। सबने मिलकर निश्चय किया कि बाहर कहीं जाकर धनोपार्जन करना चाहिए। यह सोचकर तीनों चल पड़े। भूख-प्यास से थककर तीनों तीन वृक्षों की छाया में बैठ गये। इन तीनों वृक्षों में दो तो उगे ही नहीं थे और एक का बीजारोपण भी नहीं हुआ था। वृक्षों के नीचे बैइ कर तीनों ने विश्राम किया और मीठे फल खाये। तत्पश्चात आगे बढ़े। कुछ दूरी पर उन्हं तीन नदियाँ दिखायी पड़ी। नदियों में दो तो जल से रहित थीं और एक सूखी गई थी। तीनों ने ठण्डे जल से स्नान किया तथा प्यास बुझाई। आगे बढ़ने पर सायंकाल हो गया। सामने एक भविष्य नगर दिखाई पड़ा। नगर में प्रविष्ट करने पर तीन मकान मिले। जिनमें दो बने ही नहीं थे। तीसरे में ईंट भी नहीं रखी गई थी। तीनों ने मिलकर तीन ब्राहमणों को निमन्त्रण दिया। बा्रहमणों में दो अशरीरी थे। तीसरे का मुँह नहीं था। तीनों ने तीन थालियों में भोजन किया। दो थालियाँ तली रहित थीं। तीसरे का स्थूल रुप ही नहीं था। इस भविष्य नगर में तीनों बालक सुखपूर्वक जीवनयापन करने लगे।

महर्षि ने उपाख्यान समाप्त किया तो स्नातक उनके मुख की ओर ताक रहे थे। इस विलक्षण उपाख्यान ने उनकी जिज्ञासा तो जगा दी किन्तु समाधान किसी के लिए भी सम्भव न था, सो उन्होनें समवेत प्रश्न किया गुरुदेव तीन राजकुमार, तीन वृक्ष, तीन नदियाँ, तीन मकान, तीन ब्राहमण और तीन थालियों का रहस्य हमें भी बताये ताकि हम भी अपने भविष्य नगर में सुखपूर्वक रह सके।

महर्षि गम्भीर हो उठे बोले, 'तात! तीन राजकुमार जीव, आत्मा और ब्रहा! प्रथम दो यद्यपि अविनाशी है किन्तु शरीर के साथ गर्भ में आना पड़ता है, परब्रम्हा जिसके अंश से ही उपरोक्त दो की सत्य है गर्भ में न आते हुए भी अस्तित्व में बना रहता है। उनका वृक्ष की छाया में पहुँचना अर्थात् साँसारिक फल-बासना, तृष्णा, अहंता में सुख्या मानने की प्रवृत्ति है इनमें वासना और तृष्णा का तो कोई स्वरुप है भी किन्तु अहंकार का तो कोई अस्तित्व ही नहीं फिर भी वही सारे उपद्रवों की जड़ है।

तीन नदियाँ जीवन के तीन प्रवाह बाल्यावस्था, यौवन और वृद्धावस्था, प्रारम्भिक दो में जल ही नहीं अर्थात् होश ही नहीं आता किन्तु जीवन के तीसरे प्रहर में जब तक होश आये सारी शक्ति समापत हो चुकी होती है।

तब कही स्मरण आता है भविष्य अर्थात् लोकोत्तर जीवन और तीन भवन, तीन आश्रय-सत्य, सन्तोष और श्रद्धा की शरण होना पड़ता है। सत्य और सन्तोष अभिव्यक्त है किन्तु श्रद्धा अभ्यान्तर, ज्ञान, कर्म और भक्ति के तीन ब्राहमणों से भेंट होना मनुष्य के कल्याण की भूमिका प्रस्तुत होना है ज्ञान और कर्मयोगी साधनाएँ तो साधनजन्य होती है, पर भक्ति उससे सर्वथा मुक्त। उनको भोजन कराना अर्थात् आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण की प्रवृत्ति का विकास ही वह अवलम्बन है जिससे आत्म साक्षात्कार या ब्रम्हा प्राप्ति की साधना सिद्ध हो पाती है अर्थात् इस विनाशशील जगत के प्रपंचों से छूट कर मनुष्य सत्य को प्राप्त और धारण करता हैं। स्नातक सन्तुष्ट हुए और अपने पर्णकुटीरों को चल पडे़।


यह अलभ्य अवसर यों हीन चला जाय

मनुष्य का बचपन खेलने, कूदने, शिक्षा अर्जित करने तथा उज्जवल भविष्य के सपने सजोते में नियोजित रहता है। निर्माण की इस अवधि में आत्म-कल्याण एवं समाज अथवा विश्व-कल्याण की विशेष बात सोचते नहीं बनती। आयु के आरिम्भक बीस वर्ष भावी जीवन की तैयारी में चले जाते है। वृद्धावस्था पचास वर्ष के बाद शुरु होती है। अनुभवों एवं ज्ञान की दृष्टि से इस आयु वाले व्यक्ति अधिक परिपक्व होते है। पर शरीर कमजोर पड़ जाने के कारण न तो उमँग रहती है न ही सत्कार्यों के प्रति विशेष अभिरुचि। आत्म-विकास, लोक-कल्याण की महत्ता समझ में तो आती है, पर शारीरिक असमर्थता, उमंग एवं उत्साह के अभाव में सत्कार्य की इच्छा मात्र कपो कल्पना बनकर रह जाती है और अनुभव अपने स्थान पर रखे रह जाते है। अपवादों को छोड़कर अधिकाँश व्यक्तियों की आयु का उत्तरार्ध पक्ष यो ही बेकार चला जाता है।

जीवन का पूर्व भाग अर्थात् शक्ति तो थी दिशा नहीं थी, सूझ-बूझ नहीं थी, अनुभव नहीं था इसलिए इधर-उधर भटकते रह गये, कोई उल्लेखनीय सफलता किसी ने वाल्यावस्था में प्राप्त की तो ऐसे उदाहरण इतिहास में बहुत ढूँढने से मिलते है, इसी तरह जीवन का उत्तरार्द्ध अर्थात् दिशा थी सूझ-बूझ भी थी, अनुभव भी था किन्तु शक्ति नहीं थी, कल्पनाएँ। असंख्य करते रहे बात एक भी नहीं बनी। साठ सत्तर वर्ष की आयु में किसी ने कोई कार्य प्रारम्भ किया हो और सफलतापूर्वक उसे अपने सामने पूर्ण कर लिया हो ऐसे उदाहरण भी यदा-कदा ढूँढ़ने पर मिल पाये।

आयु का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष होता है-युवावस्थ का। यही वह अवसर होता है जब कि कोई विशिष्ट काय्र किया जात सकता हैं। इस अवधि में जीवनी शक्ति की बहुलता होती है। प्राण तत्व हिलोरें लेता है। भावनाएँ उमँड़ती, घुमड़ती रहती है। उमँगें पर्वत को ठोकर मारने और समुद्र को भी लाँघ जाने का साहस रखती है। सौर्न्दय का प्रस्फुटन होता है। शारीरिक बलिष्ठता एवं मानसिक प्रखरता अपने चरमसीमा पर होती है। शक्ति सामर्थ्य से ओत-प्रोत इस अवधि में ही लोक-मंडल जैसे वे विशिष्ट कार्य किये जा सकते है, जिसके लिए बाल्यावस्था और वृद्धावस्था अक्षम सिद्ध होते है।

पर जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भी अधिकाँशतः व्यक्तियों का र्व्यथ चला जाता है। युवास्था की सम्पूर्ण शक्ति भौतिक प्रयोजनों की सिद्धि एवं विषय वासनाओं के उपभोग में चली जाती है। अर्थोपार्जन, साधन संचय शरीर एवं शरीर से जुड़ें परिवार के निर्वाह की सीमा तक तो उचित है, पर समस्त क्षमताएँ मात्र इतने के लिए नहीं झोंक देनी चाहिए। युवावस्था का उमंग, उत्साह, शारीरिक वलिष्ठता एवं मानसिक प्रखरता का उपयोग सत्प्रयोजनों, परमार्थ कार्यो के लिए भी अभिष्ट है। सच पूछा जाय तो युवावस्था में ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण आत्म-विकास एवं लोक-कल्याण का कार्य किया जा सकता है। जवानी के जोश को सार्थक करने की बात सोचने वाले युवक उन महापुरुषों से प्रेरणा ले सकते है जिन्होंने अपनी युवावस्था की समस्त सम्पदा को समाज के लिए विश्व-कल्याण के निमित झोंक दिया।

विश्व इतिहास के परदे पर श्रेष्ठतम रोल युवकों का ही रहा है। सामाजिक, राजनैतिक एवं अध्यात्मिक क्रान्तियों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों में अधिकाँश की आयु 25 और 50 के बीच ही रही है। भौतिक आकर्षणों से विरत रहने वाले समाज के लिए मानव मात्र के लिए अपना सब कुछ होम देने वाले इन युवकों को कौन भुला सकता? घटना बारह सौ वर्ष पूर्व की है। बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार ने जिस विचारधारा को जन्म दिया उसके प्रभाव से वैदिक संस्कृति का अवसान होने लगा। इस दुःख से पीड़ित कुमारिल भट्ट गंगा तट पर चिता जलाकर आत्माहुति देने की तैयारी कर रहे थे। इतने में एक युवा सन्यासी ने उन्हें इस दारुण कार्य से रोका। वृद्ध का चरण रज मस्तक पर रखकर वेदान्त के पुनर्जागरण का संकल्प लिया। साधन-सुविधाओं के अभाव में भी उसने 32 वर्ष की अल्पायु में ही सम्पूर्ण भारत में वैदिक विचारधारा की धूम मचा दी। 32 वे वर्ष में दिबंगत होने वाले जगतगुरु शंकराचार्य के नाम से विश्व विख्यात उस युवा सन्यासी को कौन नहीं जानता? आज भी भारत के चारों कोनों पर स्थापित चारों धाम उस ऋषि के अनूठे त्याग, बलिदान का बोध कराते है।

40 वर्ष की आयु तक पहुँचते गौतम एक सामान्य राजकुमार से भगवान बुद्धे बन गये थे, स्वा. महावीर द्वारा समाज को महान उपलब्धियाँ पच्चीस और चालीस वर्ष के मध्य ही प्राप्त हो सकीं। तीर्थकर के रुप में विश्व विख्यात होने की आयु युवावस्था ही थी। स्वा. विवेकानन्द मात्र 40 वर्षों तक जीवित रहे। इस अल्पायु में ही भारतीय संस्कृति को उन्होंने विश्व-व्यापी बनायाँ इसके पूर्व तो पाश्चात्य देशों में भारतीय तत्वज्ञान की गौरव गरिमा का बोध भी नहीं था। उनके सहयोगियों में जिन्होंने साँस्कृति पुनरोत्थान में भाग लिया अधिकाँश युवक थे। सिस्टर निवेदिता की महत्वपूर्ण भूमिका भी इसी आयु में आरम्भ हुई थी।

ऋषि दयानन्द के वैदिक अनुदानों को कभी नहीं भुलाया जा सकता। एक समाज सुधारक के रुप में साँस्कृति पुनरोत्थान के रुप में उन्होंने भारतीय समाज को जो दिया उसके समक्ष श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है। सभी जानते है कि 55 वर्षों की अल्पायु में दिवंगत हो गये। पर समाज को इतना दे गये जितना कई व्यक्ति जीवन पर्यन्त भी नहीं दे सकते। आर्य समजा आज भी उस ऋषि की ऋचाओं को प्रसारित करने में संलग्न है। अन्ध विश्वासों से जकड़े, धार्मिक भ्रान्तियों में अकड़ें भारतीय समाज के उवारने एवं धर्म के वास्तविक स्वरुप से बोध कराने में ऋषि दयानन्द की असामान्य भूमिका रही है।

महर्षि रमण और योगीराज अरविन्द की कठोर तप अवधि युवाकाल ही रही हैं उनकी उग्र साधनाएँ सूक्ष्ये वातावरण को परिष्कृत करने में असाधारण प्रभावकारी सिद्ध हुई। स्वामी रामतीर्थ युवावस्था में ही अध्यात्म पथ पर उन्मुख हुए। वैदिक धर्म का प्रचार न केवल भारत में वरण अन्य देशों में भी करके अपनी युवा शक्ति को सार्थक किया। भारत ही नहीं विदेशी अध्यात्मवेत्ताओं के महत्वपूर्ण कार्य की अवधि यौवन काल ही रही है। सेन्टपाल, आगस्टाइल, कन्फ्यूशियस, अरस्तू, सुकातल ने धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य आयु के मध्य काल में किए। शरीर, मन की बलिष्ठता एवं प्रखरता अन्तःउमंग एवं उल्लास सतत् समाज सेवा के कार्यों में निरत रहाँ फलतः उनकी श्रद्धामय स्मृति आज भी जन-मानस के पटल पर बनी हुईं

आध्यात्मिक ही नहीं राजनैतिक क्षेत्र में भी सराहनीय और स्मरणीय भूमिका युवकों ने ही निभाई है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम युवकों के बलबूते ही लड़ा गयाँ क्रान्तिकारियों में भगतसिंह आजाद, बिस्मिल, सुभाष ने अपनी क्षमता को स्वतंत्रता आन्दोंलन में झोंक कर जो उदाहरण प्रस्तुत किया उन्हें स्मरण कर अब भी रोमाँच हो आता है। उनक त्याग, बलिदान के समक्ष नत-मस्तक हो जाना पड़ता है। अहिंसक क्रान्ति में आस्था रखने वाले महात्मा गाँधी समर्थक पटेल, तिलक, नेहरु, मालवीय स्वतन्त्रता सेनानी युवक थे। यह युवा उफान ही था जिससे अंग्रेजों को भारत छोड़कर भागना पड़ा। यदि वे मोहग्रस्त, भौतिक आकर्षणों में लिप्त रहते तो पराधीनता की बेंड़ियाँ टूटनी सम्मव नहीं थी। बाजुओं में फड़कता, सीने में उभरता, चेहरे से प्रस्फुटित होता यौवन व्यक्तिगत स्वार्थों में जकड़ा न रह सका। वह उछल कर बाहर आया और तनकर पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए खड़ा हो गया। फलतः अभीष्ट सफलता मिली न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम वरन् विश्व की हुई महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्रान्तियाँ युवा शक्ति की दास्तानें हैं जिसके इतिहास में युवा शक्ति ही उछलती, कूदती एवं अभीष्ट परिवर्तन की भूमिका निभाती दृष्टिगोचर होती हैं।

विश्व के प्रखर वैचारिक अनुदान देने वाले विचारकों, मनीषियों एवं वैाज्ञनिक उपलब्धियों से लाभान्वित कराने वाले वैज्ञानिकों ने युवाकाल में उल्लेखनीय कार्य किये है। प्रजातन्त्र की नींव रखने वाले रुसों एवं साम्यवाद को जन्म देने वाले कार्लमार्क्स की सफलता का रहस्य बीस और पचास वर्ष के मध्य की -वैचारिक साधना ही रही है जो कालान्तर में सशक्त विचारों के रुप में विश्व के सामने प्रस्तुत हुईं भौतिक विज्ञान के मूर्धन्य वैज्ञानिक हक्सले हाइजन वर्ग, वटरवर्थ, परमाणु उर्जा के विशेषज्ञ भाभा ने महत्वपूर्ण शोधें पचास वर्ष की आयु के पूर्व ही पूरी की है। नये जीन का निर्माण करने वाले जीवविज्ञानी डाँ. हरगोविन्द खुराना, इन्सुलिन के आविष्कार बेन्टिग एण्ड बेस्ट, कैंसर पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले के. यामा गीवा, फर्स्ट एड के जन्मदाता जे. स्मार्ट की उपलब्धियों की अवधि आयु का यह मध्य काल ही रहा है। ‘हयूमन एनाटामी’ के आविष्कारक हेनरी गे्र ने तो मात्र 25 वर्ष से 31 वर्ष के मध्य में वह कार्य किया जिस पर समस्त एलोपैकिक चिकित्सा विज्ञान आधारित हैं

समाज को अपने महत्वपूर्ण योगदान से लाभान्वित करने वाले अध्यात्मवेत्ताओं, मनीषियों, विचारको एवं मूर्धन्य वैज्ञानिकों का कर्यकाल अविधि युवावस्था ही रही है। शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक शक्ति का सही दिशा में नियोजित करने की यही उपयुक्त आयु होती है। सत्कार्य में लगाया जाय-आत्म-कल्याण, लोक-कल्याण साधा जाय अथवा विषय-भोगों में यो ही गँवा दिया जाय, यह मनुष्य के विवेक उपर निर्भर करता हैं स्वभावतः मानवी प्रवृत्त्यों पतनोन्मुख होती हैं युवावस्था की उमंगों में भावनाओं का व्यतिरेक रहने के कारण सरल मार्ग ही सूझता हैं। कष्टसाध्य परमार्थ का लोक सेवा का मार्ग दुरुह एवं अरुचिकर जान पड़ता हैं लम्बे समय तक आत्म-साधना का मार्ग कष्टसाध्य मालूम पड़ता हैं। इस चिन्तन के फलस्वरुप कोई बड़ा कदम उठाते नहीं बनता। त्याग, बलिदान से भरे लोकसेवा के कार्य में प्रत्यक्ष और तुरन्त का लाभ मिलते देखकर अधिकाँश व्यक्तियों का युवाकाल यों ही पेट और प्रजनन जैसे सामान्य प्रयोजनों को पूरा करने में चला जाता हैं जबकि अधिक महत्वपूर्ण कार्यो के लिए साहस भरे कदम उठाने की यही आयु होती है। यो तो श्रेष्ठ लोक-कल्याण के कार्यों के लिए आयु का कोई बन्धन, नहीं है। न ही यहाँ इसका प्रतिपादन किया जा रहा है, वरन् जीवन का वास्तविक सत्यों का उद्घाटन किया जा रहा है जो सैद्धान्तिक कम व्याहारिक अधिक हैं

पारिवारिक जीवन में रहते हुए दायित्वों का निर्वाह करते हुए इस ओर कदम बढ़ाया जा सकता। परिवार सद्मार्ग का रोड़ा नहीं है। वृद्धावस्था आये-सभी उत्तरदायित्वों में मुक्त हो जाने पर परमार्थ की ओर उन्मुख होगे यह सोचते रहने की अपेक्षा सभी से अपनी क्षमता, प्रतिभा, श्रम एवं समय का एक अंश लोकसेवा के कार्यों में आसानी से नियोजित किया जा सकता है इससे स्वार्थ भी सधेगा और परमार्थ भी। लोक बनेगा। और परलोक भी। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण का दुहरा प्रयोजन पूरा होगा। शक्ति सामर्थ्य से ओत-प्रोत जीवन की मध्यायु का सदुपयोग इस श्रेष्ठतम प्रयोजनों में होन चाहिए। जिन पर पारिवारिक दायित्व न हो अथवा आरम्भ से ही जिन्होंने नहीं ओढ़ा हो वे तो शरीर निर्वाह के लिए सीमित उपार्जन के अतिरिक्त अपने सम्पूर्ण समय, श्रम एवं प्रतिभा को सत्कार्यों में नियोजित कर सकते है। जीवन का यह अलभ्य अवसर कही यो ही न चला जाय। वृद्धावस्था में असमर्थता का रोना रोना पडे़- आत्म-प्रताड़ना सहनी पडे़ इससे अच्छा यह कि शक्ति से भरपूर अमूल्य अवसर का सदुपयोग हों युवावस्था की सार्थकता भी इसी सत्प्रयोजन को पूरा करने में सन्निहित है।


Quotation

जो समय चिन्ता करते कटा व समझो कुड़ेदान में डाल दिया, जो चिन्तन में लगा समझों कि वह ब्याज सहित लौटाने वाली बैंक में जमा हो गया।


कृतज्ञ नहीं, वह मनुष्य नहीं

समाज से मनुष्य अनेकानेक अनुदान प्राप्त करता है। जन्म से ही समाज के घटक माता-पिता के बच्चे पालन-पोषण में इतना सहयोग देते है जिसका यदि लेखा-जोखा और मूल्याँकन किया जाय तो एक जन्म क्या अनेक जन्मों तक उनके उपकार का प्रतिदान किया जा सकना कठिन हों। पूर्वजों के संचित ज्ञान कोष से, अभिभावकों एवं शिक्षकों के अमूल्य योगदान से ही मानव आज इतनी ज्ञान-सम्पदा अर्जित कर सका हैं। भोजन, वस्त्र, मकान से लेकर दैनिक उपयोग की वस्तुओं में लाखों-करोड़ों व्यक्तियों का श्रम एवं मनोयोग जुड़ा है।

दूसरों के सहयोग का मूल्य-उदारता, सेवा, दया, करुणा और सद्भावनाओं के रुप में ही चुकाया जा सकता हैं मनुष्येत्तर प्राणी जो प्रायः तुच्छ एवं हेय समझे जाते है वे भी प्रत्युपकार, कृतज्ञता, सहदयता और सहानुभूमि से रक्त नहीं। अपने प्रति किये गये उपकार सहयोग का मूल्य वे समझते है और उसे चुकाने में आत्म गौरव एवं सन्तोष की अनुभूति करते हुए कृतज्ञता प्रकट करते है। बुद्धि की दृष्टि से वे भेल ही न्यन हो, परन्तु सम्वेदना शून्य नहीं।

मध्य प्रदेश के सरगुजा जिले की घटना हैं 1960 के गर्मियों के दिन थें लटोरी ग्राम के निवासी ‘मोहर-साय’ महाशय अपने एक मित्र के साथ जंगल में धुमने गये थे। सुरक्षा की दृष्टि से वे लोग कुल्हाड़ी भी लेते गये।

जंगल में कुछ दूर प्रवेश करने के बाद उन्होंने देखा कि एक काले मुँह वाले बन्द की पूँछ और से आधी चिरी लकड़ी के बीच बुरी तरह फँसी हुई हैं उसके फँस जाने का कारण ज्ञात होने पर पता चला कि पिछले दिन कुछ लोग रात अधिक हो जाने से लकड़ी को अधचिरा ही छोड़ गये थे। बन्दर की स्वाभाविक उछल-कूद की चंचल वृत्ति के कारण लकड़ी के बीच लगा गुटका निकल गया और उसकी लम्बी पूँछ उसी में दब गई। दबाव अधिक होने से वह अपनी पूँछ निकालने में समर्थ न हो सका। जोर लगाने पर उल्टे कष्ट होता अतः बन्दर रात भर उसी स्थिति में चिल्लाता रहा।

मोहरसाय और उसके साथी को देखकर बन्दर सहायता क याचना भरी आवाज में चीखने लगा। उन दोनों व्यक्तियों की रुण उस असहाय के लिए फूट पड़ी। उन्होनें कुल्हाड़ी से लकड़ी के चिरे भाग को फैला दिया जिससे बन्दर की पूँछ निकल गयी।

अपनी पीड़ा से मुक्त होते ही बन्दर ‘मोहर साय’ का अँगोछा लेकर बड़ी तेजी से वहाँ से भाग लियाँ दोनों व्यक्ति उसे खोजते हुए हैरान थे और बन्दर की चपल उच्छखलता के बारे में सोच ही रहे थे कि तब तक बीस मिनट के भीतर ही वह बन्दर उनके अँगोछे में दो-तीन किलो पके मीठे तेन्दू के फल लिए दौड़ता आया और उनके सामने रखकर कुछ दूर हटकर बैइ गया। बन्दर उनकी ओर कृतज्ञता भरी दृष्टि से निहार रहा था और तब तक देखता रहा जब तक कि उन लोगों ने उसके सामने ही कुछ फल खा न लिये। फिर वह उन्हें धन्यवादपूर्ण नेत्रों से देखता, सन्तोष अनुभव करता जंगल में ओझल हो गयाँ

उन लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में इतने मीठे एवं स्वादिष्ट तेंदू के फल कभी नहीं खाये थें बन्दर की कृतज्ञता की भावना की याद आते ही उनकी आँखें आँसुओं से भर आतीं

बन्दर जैसा तुच्छ, साधनहीन प्राणी अपनी अल्प क्षमताओं में भी प्रत्युपकार, कृतज्ञता, सहृदयता, सम्वेदनाओं से सम्पन्न पाया जाता है। मनुष्य को तो सामाजिक अनुदान एव सहयोग से विशेष साधन, बौद्धिक, क्षमताएँ आदि उपलब्ध हुए हैं यदि वह उनका उपयोग मात्र संकीर्ण स्वार्थपरता तक ही सीमित रखे, अपने पेट-प्रजनन तक ही नियोजित करता रहे तब तो समाज के प्रति उसकी कृतघ्नता ही कही जायेगी। मानव-जीवन की सार्थकता तभी है जब सामाजिक सहयोग एवं अनुदानों को कृतज्ञता और उदारतापूर्वक समाज को श्रेष्ठ, शालीन, सभ्य एवं समुन्नत बनाने के रुप में लौटा दिया जाय।


आत्मिक प्रगति का मूल आधार-श्रद्धा

एक ही मन्त्र, एक ही साधना पद्धति और एक ही गुरु के-मार्गदर्शन का अवलम्बन लेने पर भी विभिन्न साधकों की आत्मिक प्रगति अलग-अलग गति से होती हैं कोई तेजी से आत्मिक विकास की सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है तो कोई मंथरगति से आगे बढ़ता हैं इसका क्या कारण है? मनीषियों ने इसका उत्तर एक ही वाक्य में दते हुए कहा है कि ‘अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। जिस प्रकार शक्ति के आधार पर भौतिक हलचलें और गतिविधियाँ सम्पन्न होती तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ हस्तगत होती है, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा ही अपनी सघनता या विरलता के आधार पर चमत्कार प्रस्तुत करती हैं श्रद्धा विहीन उपचार सर्वथा निष्प्राण रहते है और उनमें किया गया श्रम भी प्रायः निरर्थक चला जाता हैं

सामान्य जीवन में भी सफलता, श्रद्धा, विश्वास के आधार पर ही प्राप्त होती है। कृषि, उद्योग, शिल्प, खेल आदि सभी क्षेत्रों में तत्काल तो परिणाम प्राप्त नहीं हो जाते उनके, लिए अनवरत श्रम करना पड़ता है और यह श्रम सफलता का विश्वास रखते हुए करते चलना पड़ता हैं आत्म-विश्वास के बल पर ही कोई बड़े कदम उठा पाना सम्भव होता है। शौर्य और साहस आत्म विश्वास के ही नाम है। परिवार में एक-दूसरे को स्वजन, घनिष्ठ एवं आत्मीय होने की मान्यता ही उन्हें पारस्परिक स्नेह-सहयोग के सुदृढ़ सूत्र में बाँधें रहती है। यह मात्र श्रद्धा ही है, जिसके आधार पर परिवारों में स्नेह दुलार का अमृत बरसता है और एक-दूसरे के लिए बढ़े-चढ़े त्याग करने को तत्पर रहता है। श्रद्धा की, विश्वास की कड़ी टूट जाए तो फिर परिवारों का विघटन सुनिश्चित हैं तनिक सी बातों पर वे अन्तः कलह के अखाड़े बनेगे और देखते-देखते बार कर अस्त-व्यस्त हो जाएँगे।

इस प्रकार श्रद्धा, विश्वास के बिना भौतिक जीवन में ही गति नहीं तो फिर अध्यात्म क्षेत्र में, जिसका तो वह प्राण ही है, गति कहाँ से हो सकती है? इसलिए श्रद्धा का महत्व बताते हुए गीताकार ने कहा है- श्रद्धामयों अयं पुरुषों यो यच्छ्द्ध स एव सः। (गीता 17। 3)

अर्थात्-यह पुरुष श्रद्धामय है। जो जिस श्रद्धा वाला है अर्थात् जिसकी जैसी श्रद्धा है वह स्वयं भी वही अर्थात् उस श्रद्धा के अनुरुप ही है।

यो यो याँ याँ भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तथ्या चलाँ श्रद्धाँ तासे व विदधाम्यहम्।

(गीता 7। 21)

अर्थात्ः-जो-जो सकाय भक्त जिस-जिस देवता के स्वरुप का श्रद्धापूर्वक अर्चन पूजन करता है उस भक्त की तद्विपयक श्रद्धा को स्थिर करता है।

सतया श्रद्धया युक्तिस्तरयाराधनमीहतो। तभते चे्ततः काम। न्यैव विहिताहितान्। (गीता 7। 22)

वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा करता है और उसदेवता से मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त करता हैं

यह श्रद्धा ही है जो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओं में भी प्राण भर देती है और उन्हें अलौकिक चमत्कारी क्षमता से सम्पन्न बना देती हैं। मीरा ने कृष्ण प्रतिमा को अपनी श्रद्धा के बल पर ही इतना सजीव बना लिया था कि वह प्रत्यक्ष कृष्ण से भी अधिक प्राणवान प्रतीत होने लगी थी। श्रद्धा विश्वास के सम्बन्ध में रामायण में एक सुन्दर प्रसंग आता है। सेतुबन्ध के अवसर पर रीछ, बानरों ने राम के प्रति अपने विश्वास का आधार लेकर ही समुद्र में पत्थर तैरा दिए थे, किन्तु स्वयं राजा ने अपने हाथों से जो पत्थर फंके वे नहीं तैर सके। इसी प्रसंग को लेकर शास्त्रकारों ने कहा है, ‘राम से बड़ा राम का नाम’ पर नाम में कोई शक्ति नहीं है। शक्ति है उस श्रद्धा में जो अलौकिक सामर्थ्य उत्पन्न करती है, साधारण स्तर के व्यक्तियों को भी असंप्रज्ञात समाधि की सिद्धि श्रद्धा के आधार पर उपलब्ध होने का प्रतिपादन करते हुए महर्षि पातंजलि ने कहा है-

श्रद्धावीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञापूर्वक इतरेषाम। (योगदर्शन 1। 20)

अर्थात्-श्रद्धा वीर्य समृति समाधि और प्रज्ञापूर्वक सामान्य योगियों की जो विदेह और प्रकृतिलय नहीं है, असंप्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है।

इस सूत्र की व्याख्या करते हुए स्वामी औमानन्द तीर्थ ने कहा है कि जो विदेह और प्रकृतिलयों से भिन्न है, उन्हें जन्म-जन्मान्तरों से योग में नैसर्गिक रुचि नहीं होती है किन्तु उनको पहले शास़्त्र और आचार्य के उपदेश सुनकर योग में विश्वास उत्पन्न होता है। योग की प्राप्ति के लिए अभिरुचि अथवा उत्कट इच्छा को उत्पन्न करने वाले इस विश्वास का नाम ही श्रद्धा है। यह कल्याणकारी श्रद्धा योगी की रुचि को बढ़ती है, उसके मन को प्रसन्न रखती है और माता के समान कुमार्ग से बचाती हुई उसकी रक्षा करती है। श्रद्धा के वीर्य उत्पन्न होता है। योग साधन में तत्परता उत्पन्न करने वाले उत्साह का नाम वीर्य है। श्रद्धा के अनुसार उत्साह और उत्साह के अनुसार साधन में तत्परता होती है। परिपूर्ण उत्साह के साथ साधन में तत्पर होने पर पिछली अनुीव की हुई स्थितियों की स्मृति होती है। उन्हें पूर्व संचित-संस्कार भी कहा जा सकता है। श्रद्धा से वीर्य उत्साह और साधना में उत्साह से इन पूर्व सचित संस्कारों का जागरण होता है-शास्त्रीय भाषा में इसे पिछले जन्म के अक्लिष्ट कर्मो और ज्ञान के संस्कारों का जागृत होना कहते है। पूर्व के अक्लिष्ट कर्मों और संस्कारों का जागरण होने से साधन में चित्त एकाग्र चित्त में ही ऋतम्भरा प्रज्ञा का अवतरण होता है, जिसके प्रसाद स्वरुप निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है।

श्रद्धा से वीर्य-उत्साह, उत्साह से स्मृति, स्मृति से समाधि और समाधि से प्रज्ञा का क्रम पूरा होते हुए अन्तिम स्थिति निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। अर्थात् जीवन का परमलक्ष्य आत्मज्ञान की आधारशिला श्रद्धा ही है। मनीषियों की दृष्टि में श्रद्धा जितनी ही तीव्र होगी उतनी ही शीघ्र लक्ष्य की प्राप्ति होती है, योग-दर्शन-कार ने इसे सम्वेगों की मात्रा के आधार पर नौ रुपों में बाँटा है और उन्हें नौ उपाय प्रत्यय कहा है। मौटे तौर पर इन्हें दो रुपों में बाँटा जा सकता है तीव्र सम्वेग और मृदु संवें इनके भी तीन-तीन भेद किये गए है। मृदु-मध्य और अधिभाग। इनका विवेचन गहन चर्चा का विषय है उसे सरलतापूर्वक नहीं समझा जा सकता। संक्षेप में इतना ही समझा जा सकता है कि श्रद्धा जितनी प्रगाढ़ और सघन होगी, इष्ट की प्राप्ति भी उतनी ही शीघ्र होगी उपनिषद्कार ने भी परम लक्ष्य को प्राप्त करने वालों की पात्रता और गति का उल्लेख करते हुए कहा है-

तपः श्रद्धे ये हयुप सन्त्यरण्ये शाँता विद्वासो पक्ष्यचर्या परतः सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यज्ञामृत स पुरुषो हयव्ययात्मा॥ (मुण्डकोपनिषद् 1।2।12)

"वन में रहने वाले शान्त स्वभव के विद्वान अपरिग्रह, अल्पाहारी भिक्षाचारी तप और श्रद्धा का सेवन करते हे तथा रजोगुण रहित सूर्य के मार्ग से वहाँ पहुँच जाते है जहाँ पर जन्म मृत्यु से रहित अविनाशी परमपुरुष रहता है।

प्रश्न उठता है कि आत्मिक प्रगति का सर्वापरि आधार श्रद्धा प्रगाढ़ और परिपुष्ट कैसे हो? इस सम्बन्ध में यह तथ्य भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए कि साधकों की सफलता-असफलता या सफलता में विलम्ब केवल श्रद्धा पर ही निर्भर करता है। कष्ट साध्य तपश्चर्याएँ, व्रत उपवास, तितिक्षा आदि का साधन अभ्यास इसलिए कराया जाता है और इनका इतना माहात्म्य इसिलए बताया जाता है कि साधक की श्रद्धा अधिकाधिक परिपुष्ट हो सके और वह अभीष्ट सत्परिणाम अर्जित करने का अधिकारी बन सके। मंत्र, देवता, गुरु, उपासना, साधन-सिद्धि का आधार श्रद्धा की ही आधारशिला पर खड़ा है। देवताओं का जन्म श्रद्धा से ही होता है, वे श्रद्धा से ही जन्मते, बढ़ते, परिपुष्ट होते और वरदान दे सकने में समर्थ सक्षम बनते है। उनका उदय एवं अस्त भी इसी श्रद्धा के अनन्त अन्तरिक्ष में होता रहता है। सच तो यह है क साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि श्रद्धा-विश्वास की महाशक्ति का उपयोग आत्मिक प्रगति की उद्देश्य पूर्ति में किया जा सके क्योंकि श्रद्धा से ही व्यक्तित्व का निर्माण और निर्धारण होता है। उसी आधार पर अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन होता तथा सफलता के उच्च स्तर पर पहुँच पाना सम्भव होता है। श्रद्धा ही आत्मा का सब से विश्वस्त और घनिष्ठ सचिव है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।

इस की स्थापना और श्रद्धा को परिपुष्ट चिरस्थायी बनाने का आधार यही है कि जिस तथ्य पर विश्वास जमाना आवश्यक है उसकी यथार्थता और वैज्ञानिकता को सघन तथ्यों और तर्कों के आधार पर समझ सकने का अवसर दिया जाय। बुद्धि का सर्वतोमुखी समाधन हो सके तो श्रद्धा की स्थिरता सुनिश्चित समझी जा सकती है और उससे अभीष्ट परिणामों की अधिकाधिक अपेक्षा रखी जा सकती है। जिस तिस से सुनकर जल्दी पल्दी कुछमान समझकर यदि कोई श्रद्धा बनेगी तो उसकी जड़े उथली रहने के कारण तनिक से आघात से उखड़ जाने की आशंका बनी रहेगी। प्रायः होता भी ऐसा ही है। अमुक व्यक्ति के कहने से भावावेश उमड़ा और तत्काल वह साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही देर बाद किसी दुसरे ने उस विधान में दोष बता दिया और किसी नेय प्रयोग के माहात्म्य सुना दिये तो इतने भर से मन सशंकित हो गया और पिछला मार्ग छोड़ कर नया मार्ग अपना लिया। इस परिवर्तन के बीच यह नई आशंका बनी रहती है कि पिछली साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पडे़ और इसमें भी वैसा कोई दोष न हो जैसा कि पहले वाली साधना में थाँ कभी कोई चर्चा बदल कर अपनाई गई नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने और न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है। संदिग्ध, शंकाशंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित रहता है। यदि यह आधार ही न रहा, मूल तथ्य का अभाव बना रहा तो फिर कर्मकाण्डों की कितनी ही लकीर पीटी जाती रहे उससे कुछ बात बनने वाली नहीं है।

उस स्थिति में मिलने वाली असफलताओं का कारण विधि-विधानों की हेरा-फेरी में ढूँढ़ा जाने लगेगा और यह खोज की जाने लगेगी कि किसी क्रिया-कृत्य में कोई अन्तर तो नहीं रह गया, जिससे असफलता मिली या उलटा परिणाम निकला। वस्तुतः विधि-विधानों का महत्व साधना विज्ञान में उतना नहीं है जितना श्रद्धा, विश्वास का। सघन श्रद्धा के रहते अटपटे विधि-विधान भी चमत्कारी परिणाम उपस्थित कर सकते है जबकि अविश्वासी संदिग्ध मनःस्थिति में परिपूर्ण सावधानी बरतते हुए किए गए कर्मकाण्ड भी निष्प्राण होकर रह जाते है तथा उनका परिणाम निराशाजनक ही रहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक को श्रद्धातत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझना चाहिए।

श्रद्धा तत्व का परिपक्व परिपुष्ट आधार किस प्रकार खड़ा किया जाए? इसके दो ही उपाय है, एक तो यह कि शास्त्र वचन, गुरु वचन, परम्परा, अनुशासन को सब कुछ मानकार चला जाए और उसे ही वेदवाक्य मानकर, पत्थर की लकीर समझकर पूर्ण सत्य होने का विश्वास कर लिया जाए और दूसरा यह कि उसतयि का गहन अध्ययन किया जाए, वास्तविकता को समझ कर किसी सुनिश्चित निर्ष्कष पर पहुँचा जाए। इन दो उपयों से श्रद्धा की परिपक्वता के उस स्तर को प्राप्त कर पाना सम्भव है, जिसमें किये गए प्र्रयोग सफल होकर ही रहते है। साधना क्षेत्र में प्रवेश करके आत्मिक प्रगति और उसके आधार पर मिलने वाली उपलब्धियों को श्रद्धा तत्व की गरिमा समझनी चाहिए तथा आप्त वचनों के सहारे, तक्र और तथ्यों का आश्रय लेकर अपने आदर्शों तथा साधनों पर विश्वास भरी निष्ठा परिपक्व करनी चाहिए।


सारी पृथ्वी साबुन न बन जाये

अमेरिका में कुछ ऐसी झीले है जिनका पानी पूरी तरह साबुन बन गया है। इनमें से अधिकाँश झीलें 40-40 फुट गहरी हैं एक झील तो 80 वर्ग एकड़ भूमि में फैली हुई हैं

वैज्ञानिकों ने इन झीलों का अध्ययन कर बताया कि उनमें जमा झार का भूमिगत तेल से सम्पक्र होने के कारण पानी साबुन बन गया। यह क्षेत्र तेल वाले रहे होगे और कभी भमि विस्फोट क कारण तेल उपर आकर झार से मिल गया होगाँ इसी से सारी झीलें साबुन बन गई है।

कल कारखानों की विराट् जनसंख्या और उनसे निस्रत होने वाले दूषित रसायनों की ऐसी ही प्रतिक्रिया के फलस्वरुप एक दिन वह भी आ सकता है कि कोई नदी विष नदी बन जाये, तालाब रासायनिक खाद और समुद्र समूचा का समूचा "सर्फ" बन सकता है। पानी राशन से मिलने लगेगा वह भी आधा लिटर या एक लिटर प्रति सप्ताह। विज्ञान और आधुनिक सभ्यता के समर्थन के इस मूल्य को चुकाने के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। जल प्रदूषण इसी शताब्दी में इस स्थिति तक पहुँचने वाला है।

टोरंटों कनाडा के चोरों ने सोने, चाँदी में हाथ लगा कर अपना समय नष्ट करने की अपेक्षा अब कीड़ों की चोरी का लाभदायक धन्धा अपनाया हैं टोरटो की एक दुकान मछली पकड़ने कासामान बेचती है, गत माह उस दुकान से 42 हजार डालर अर्थात् पौने तीन लाख मूल्य के कीडे़ चोरी चले गये। दूसरे नगरों से भी लगभग 1 लाख डालर मूल्य के कीड़ों की चोरी हुई।

यह पंक्तियाँ पढ़ने तक पाठक इसे हास्यास्पद समाचार समझ रहे होगे, पर यह उस दुःखद स्थिति की ओर संकेत है जिसका निर्माण आज का सभ्य मनुष्य प्रकृति को नष्ट करके कर रहा है। वायु प्रदूष्धण, विकिरण तथा भारी संया में जंगलों के काटने आदि के कारण ऐसे कीड़े जो कृषि और उद्यानिकी के प्राण है, मिट्टी को उनसे पोषण भी मिलता है और विजातीय कीड़ों को जो नष्ट भी करते रहते है, या तो पूरी तरह समाप्त हो गये है या अपनी सुरक्षा के लिए जमीन के अन्दर चले गये है। अब ऐसे कीड़े दुकानों में बिकने लगे है, समर्थ किसान भारी मुद्राअदा कर उन्हे खरीदते है और अपनी उपज बढ़ाने या फसल के शत्रुओं को नष्ट करने में सहायता लेते है। इनकी वर्तमान उपयोगिता का पता इसी से चलता है कि अब उनकी विधिवत् चोरी तक हो रही है।

प्रश्न चोरी रुकने या नहीं रुकने का नही, वरन् यह है कि आद्योगिकी का, अस्त्र-शस्त्र के विस्तार का, विज्ञान की प्रगति का व्यामोह बना रहा तो इस शस्य-श्यामला वसुन्धरा का क्या होगा? स्पष्ट है उसे बाँझ बनाने का पाप पूरी तरह तथाकथित सम्यता को लगेगा जिसके पीछे आज का युग पागल हुआ पड़ा है।


VigyapanSuchana

त्यौहारों से सावधान

बेनेजुएला के कराकास नगर का समाचार हैं फरवरी में सम्पन्न कार्निवल त्यौहार के समय एक दिन में 325 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। पुलिस सूत्रों ने बताया कि यह दुर्घटना नगर में कारों का काफिला धमक पड़ने के कारण हुआँ कारें लड़ जाने से 188 पुरुष तथा 120 स्त्रियाँ घुटन से मर गयें 17 व्यक्ति परस्पर झगड़ें में गोली या छुरेबाजी से मरे। इस स्थिति से चिन्तित प्रशासन भविष्य में त्यौहार मनाने पर रोक लगा रहा हैं।


संकटों के निराकरण में आस्तिकता का योगदान

जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों का प्रभाव अभ्यास मनुष्य जीवन में भी बना रहता है, निम्न योनियों का स्वभाव जड़ जमाये बैठा रहता है और मानवी प्रवृत्तियों को अभ्यास में सम्मिलित करने के मार्ग में अनेकानेक बाधाएँ। उपस्थित करता हैं पानी का स्वभाव नीचे की ओर बहना हैं गुरुत्वाकर्षण शक्ति किसी भी वस्तु को अवसर मिलते ही नीचे खींच लेती हैं ठोस पदार्थों को नीचे की ओर गिरने और प्रवाहों की ओर बहने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती। पर जब उन्हें उपर उठाना या बहाना होता है तो साधन जुटाने और प्रयत्न करने पड़ते है। मन की प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। उसकी मर्जी चलने दी जाए तो फिर नर-पशुओं और नर-कीटकों से अधिक उपयुक्त चिन्तन और आचरण बन पड़ना सम्भव नहीं हो सकता। क्रोध सहज है, स्नेह कठिन। क्रोध बिना किसी प्रशिक्षण के आरम्भ से ही प्रकट होने लगता है; पर प्रेम को स्वभाव का अंग बनाने के लिए सुसंस्कारी वातावरण और तद्नुरुप अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। ईर्ष्या और अपहरण, अहंता और आक्रमण, वासना और आधिपत्य का आचरण करते हुए सभी प्राणी पाये जाते है, मनुष्य भी। किन्तु संयम और सद्भाव को जीवनक्रम में सम्मिलित करने के लिये सभ्यता और संस्कृति को, धर्म और अध्यात्म को गले उतारना कितना कठिन पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। यौनाचार की पूर्ति हर प्राणी बिना किसी प्रशिक्षण के संचित अभ्यास के आधार पर स्वयंमेव करने लगता है किन्तु ब्रहाचर्य पालन के तत्वज्ञान को हृदयंगम कराने से लेकर तप साधन करने तक के उपाय अभ्यास अपनाने होते है। वस्तुस्थिति देखते हुए इस निर्ष्कष पर पहुँचने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि पतन सरल और उत्थान कठिन है। इस कठिनाई को पार करना ही परम पुरुषार्थ कहलाता हैं। अनेकानेक साधन विधानों का आविर्भाव इसी दृष्टि से हुआ है।

उत्कृष्टता की धुरी आस्तिकता है। यों विकृतियों के घुस पड़ने से मध्य काल के अंधकार युग में इस क्षेत्र की दुर्गति भी कम नहीं हुई हैं। इतने पर भी तथ्य और स्त्य अपने स्थान पर अर्डिंग हैं आस्तिकता को आस्था में सम्मिलित किये बिना आत्मिक प्रगति का आधार बनता नहीं। दार्शनिक पर्यवेक्षण करने पर आदर्शवादिता और आस्तिकता एक ही तथ्य के दो पक्ष है। उच्चस्तरीय आदर्शों का समुच्चय ही ईश्वर का वह स्वरुप है जिसकी उपासना की जाती है। परब्रहमातो नियामक सत्ता भी है, सृष्टि प्रवाह को सुव्यवस्थित रीति से चलाने के अतिरिक्त मानवी चेतना को वह उच्चस्तरीय चिन्तन और चरित्र अपनाने के लिए बाधित करती हैं इसी को अन्तः प्रेरणा या ईश्वर की वाणी कहते है। कर्मफल के दण्ड पुरस्कार की विधि व्यवस्था परब्रहमा के द्वारा संचालित होती है किनतु मानवी गरिमा विशुद्ध रुप से आस्तिकता के तत्वज्ञान से जुड़ी हुई है। आस्तिकता के अनेक स्वरुप है। उनमे से एक ईश्वर उपासना का अवलम्बन लेकर चेतना के दिव्य परतों को सुविकसित और सशक्त बनाना भी है।

आस्तिकता एक आस्था दर्शन है और उपासना उसे परिपक्व करने का प्रयोग अभ्यास। दोनों का परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। दर्शन एक कल्पना है उसका परिणाम तभी निकलता है तब वह अभ्यास में उतरे। आस्तिकता में मात्र ईश्वर का आस्तित्व स्वीकार कर लेने और उपासना में मनुहार द्वारा उसकी कृपा प्राप्त कर लेने, जितना छोटा उद्देश्य सन्निहित नहीं है, वरन् तथ्य यह है कि ईश्वर को उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समुच्चय मानना होता है और उसे चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाकर तादात्म्य स्थापित करना ही होता है।

भक्ति का अर्थ है- प्यारी भरी सेवा। संक्षेप में इसे जात्मीयता एवं उदारता का समन्वय कह सकते है। ईश्वर भक्ति का अर्थ होता है-आदर्शों के प्रति असीम प्यार। असीम का तार्त्पय है इतना प्रबल कि उसे क्रियान्वित किये बिना रहा न जा सकें। ईश्वर भक्ति को समर्पण योग भी कहते हैं शरणागति, लय आदि कइ्र नामों से इस स्थिति का उल्लेख किया जाता है। इसका व्यावहारिक स्वरुप है-अहंता को, स्वार्थपरता को भूल जाना। वैयक्तिक महत्वाकाँक्षाओं को विसर्जित करके आदर्शवादी, सामूहिक महत्वाकाँक्षाओं में रस लेना। इसी तत्व-दर्शन को आस्था क्षेत्र में गहराई तक प्रतिस्थापित करने के लिए उपासना परक अभ्यास किये जा सकते है यह आत्मोर्त्कष के, भाव-विज्ञान के अनुरुप अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोग हैं।

आत्मा की उत्कृष्टतम स्थिति को को ही परमात्मा कहते है। पुरुष से पुरुषोत्तम-नर से नारायण बनने का एकान्त अभ्यास ही उपासना है। इसमें ईश्वर को व्यक्ति बनाने का नहीं, व्यक्ति को ईश्वर-अति मानव बनाने और अति मानस को प्रखर करने का प्रयोग है। सच्ची उपसना लघु को विभु, क्षुद्र को महान् बनाती एवं कामना को भावना में विकसित करती है। मनोकामना पूर्ति के लिए ईश्वर का मनुहार कना बाल-कक्षा के विद्यार्थियों तक ही सीमित रहता हैं आत्मिक प्रौढ़ता की स्थित आते ही ईश्वर का स्वरुप उत्कृष्ट आस्थाओं और आदर्शवादी भाव-सम्वेदनाओं का समुच्चय बन जाता है।

ईश्वर भक्ति और आदर्शों के लिए समर्पित व्यक्तित्व परस्पर पर्यायवाचक बन जाते है। इसी स्थित को प्राप्त करने के लिए भावनात्मक अभ्यासों की चिरपरिचित प्रणाली को उपसना कहते है। इसी अवलम्बन का आश्रय लेकर प्राचीन काल में साधकों को ऋषिकल्प, देवमानव एवं सिद्ध पुरुष बनने का अवसर मिला है। ऐसे व्यक्तित्वों में भगवान का स्वरुप प्रत्यक्ष झाँकता हैं अतएवं भक्त और भगवान की एकता का प्रतिपादन शास्त्रकार सदा से करते रहे हैं

युग परिवर्तन का श्री गणेश आस्था क्षेत्र में उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना के साथ होना है, व्यक्तित्व प्रस्तुत आस्था समुच्चय का ही दूसरा नाम हैं उसी स्तर के अनुरुप आकाँक्षाएँ उभरती है। आकाँक्षाएँ विचारणा को दिशा देती है, विचारणा के दबाव से शरीर की गतिविधियाँ चलती है। गतिविधियों के अनुरुप परिस्थियाँ बनती है। यह भली-बुरी परिस्थितियाँ ही र्स्वग-नरक, उत्थान पतन, विकास, विनाश आदि नामों से निरुपति होती रहती है।

पतन को उत्थान में बदलना हो, नरक को र्स्वग बनाना हो तो तद्नुरुप परिस्थतियाँ बननी चाहिये। परिस्थतियाँ गतिविधियों की परिणिति हैं गतिविधियाँ शरीर की कार्य पद्धति को कहते है। शरीर पर मन का परिपूर्ण नियन्त्रण हैं मनः क्षेत्र का सूत्र संचालन इच्छाएँ करती है। इच्छाएँ अन्तराल में आस्था परक स्तर के अनुरुप उठती हैं यही तत्व-दर्शन का खुला रहस्य है। जो इसे जानते है वे पत्ते धोने की अपेक्षा जड़ को सींचते हें फुँसियों पर दवा लगाने की अपेक्षा रक्त शोधन पर अधिक ध्यान देते है, मच्छर मारते फिरने का श्रम करने की अपेक्षा गन्दी नाली साफ कर डालने की आवश्यकता अनुभव करते है।

सामयिक परिस्थितियों का विवेचन और निराकरण आवश्यक है, उत्थान के साधन भी जुटाये जाने चाहिए किन्तु स्थायी समाधान के लिए लोकमानस को परिष्कृत करना होगा। इस प्रयोजन के लिए आस्तिकता का दर्शन और उपासना का अभ्यास परस्पर मिलकर ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते है जिससे अन्तराल में जमे कुसंस्कारों का निष्कासन और उत्कृष्टता का अभिवर्धन सम्भव हो सके। अस्तु नवयुग का बीजारोपण उपासना की प्रक्रिया को जीवनक्रम में नित्य कर्म की तरह सम्मिलित करने की आवश्यकता पड़ेगी। प्राचीन काल के देवयुग में भी इस अवलम्बन को प्रमुखतः प्राप्त थी और अब उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए उपासना के लिए गम्भीर लोक-रुचि उत्पन्न करनी पडे़गी।

सामयिक परिस्थतियों दृष्टिपात करने से उनमें भरी हुई विकृतियों और विभीषिकाओं के अनेकानेक रुप दिखाई पड़ते है, वे एक-दूसरे से भिन्न भी दिखाई पड़ते है उनके समाधान भी स्थिति के स्वरुप को देखते हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के सोचे जाते है। प्रत्यक्षवाद के आधार पर समाधान इसी प्रकार सम्भव दिखाई पड़ता है। शारीरिक दुर्बलता का निवारण पौष्टिक आहार और रुग्णता का निराकरण चिकित्सा उपचार से ही सम्भव प्रतीत होता है, किन्तु परोक्ष तक पहुँचने वालों को इस निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है कि यह सारा अखेड़ा असंयम की दृष्प्रवृत्ति ने उत्पन्न किया हैं असंयम के रहते भी पुष्टाई और दवाई की खिलवाड़ तो चलती रह सकती है, पर उनमें दुर्बलता एवं रुग्णता का स्थायी निवारण कदापि सम्भव न हो सकेगा। तात्कालिक उपचार से जादुई लाभ तो मिल भी सकता है किन्तु स्थिर स्वास्थ्य की अपेक्षा रखने वालों को संयम साधना की जीवन नीति बनाकर चलना होगा। अनैतिकवाद और अध्यात्मवाद के दृष्टिकोण का यह अन्तर हर क्षेत्र में समझा जा सकता है। प्रत्यक्ष कितना ही प्रभावी क्यों न हो, आत्यन्तिक समाधान परोक्ष के आधार पर ही निकलता है।

मानसिक विक्षोभों से जन-जन को तनावग्रस्त, खिन्न उद्विग्न, निराशा एवं नीरस भारभूत जीवन जीते पाया जाता है। मनोविकारों की प्रबलता से अनुकुलताएँ, प्रतिकूलताएँ बनती है। सामान्य परिस्थितियाँ भी विकृत चिन्तन के कारण तिल जैसी होते हुए भी ताड जितनी भयानक प्रतीत होती है। लोग परिस्थितियाँ बदलना चाहते है, पर जिस अनुपयुक्त दृष्टिकोण के कारण व उत्पन्न होती है उसने बदलने की बात तक नहीं सोचते। झरना झरता रहे और बहाव को मेंड बाँधकर रोकने में श्रम किया जाता रहे तो थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ने वाला नहीं है। स्वस्थता की तरह प्रसन्नता भी आवश्यक है, पर उस परिष्कृत दृष्टिकोण के मूल्य पर ही खरीदा जा सकता है। शरीर सुख संयम पर निर्भर है और मानसिक सन्तोष चिन्तन के सन्तुलन पर। यह तथ्य भले ही आज न सही हजार वर्ष बाद समझा जाए किन्तु समाधान सही निर्ष्कष पर पहुँचने और सही उपाय अपनाने पर ही सम्भव हो सकेगा।

आज व्यक्ति और समाज के सामने अगणित समस्याएँ और विभिषिकाएँ मुँह बाँधे खड़ी है। उनका निराकरण बुद्धिमानों द्वारा प्रत्यक्ष उपचारों सामयिक उपायों के आधार पार सोचा जाता है, मस्तिष्क की दौड़ इतनी ही है। विग्रहों को साम, दाम, दण्ड-भेद जैसे कूट नितिक उपयों से हल करने का बरताव ही उसने देखा समझा है। सो उन्हें क्रियान्वित करने में भी कोई केसर नहीं रखी जाती। आर्थिक सुधार के लिए गरीबी हटाओं अभियान के अर्न्तगत गृह उद्योगों से लेकर विशालकाय कारखाने लगाने तक का प्राविधान पंचवर्षीय योजना में है। निजी क्षेत्र भी इस सर्न्दभ में कुछ उठा नहीं रख रहा है, पर कठोर श्रम और मितव्ययता की तपश्चर्या का सिद्धान्त जन-जीवन में उतर न पाने के कारण बढ़ा हुआ उपार्जन, दुर्व्यसनों की बढ़ोतरी तक को पूरा नहीं कर पाता और दरिद्रता जहाँ की तहाँ बनी रहती है। इस कुचक्र में से निकल सकना अर्थोपार्जन और व्यय-व्यवस्था में आदर्शवादी सिद्धान्तों का समावेश किए बिना अत्यन्तिक समाधान सम्भव ही न ही हो सकता। प्राचीनकाल में उपार्जन बहुत सीमित था और आज की तुलना में सुविधा साधन कहीं कम थे। फिर भी यह देश र्स्वग सम्पदाओं का स्वामी और विदेशियों की दृष्टि में सोने की चीड़ियाँ बना हुआ था। गरीबी चाहे आज मिटे, चाहे सौ साल बाद अर्थ क्षेत्र में आदर्शवादिता का समावेश किये बिना और काई स्थायी हल नहीं, अमेरिका सबसे जादा समृद्ध होते हुए भी आर्थिक उद्विग्न का जितना शिकार है उतना आदिवासी क्षेत्र भी असन्तुष्ट दिखाई न पडे़गा।

परिवारों की स्थिति का यदि सही मूल्याकंन किया जाए तो स्थिति सराय से अधिक उपयुक्त न मिलेगी। भेडें़ बाड़ों में भी रहती है और कैदी जेलों में भी। सद्भाव और सहकार के अभाव में होटलों में यदि जाने वाली चटक-मटक भी कितनी कृत्रिम कितनी नीरस और कितनी कुरुप, कक्रश लगती है उसे सभी जानते हैं आर्थिक अभाव रहते हुए भी परिवारों में स्नेह सौजन्य के सहारे स्वर्गीय आनन्द का रसास्वादन किया जा सकता है, इसके लिये साधनों की जितनी आवश्यकता है उससे कहीं अधिक सुसंस्कारिता कीं यह उपलब्धि बाहम व्यवस्थाओं के सहारे नहीं आन्तरिक सदाशयता है सहारे हो सम्भव हो सकती हैं

समाज में अनेकानेक मुढ़ मान्यताओं, कुरीतियों, अवाँछनीयताओं, अनैतिकताओं की भरमार है। अपराध बेहिसाब बढ़ हरे है। प्रामाणिकता दिन-दिन घट रही है। सज्जनता का प्रतिपादन तो हे, पर प्रचलन नहीं हैं। सहकारिता का समर्थन जोरों से होता है और आर्थिक क्षेत्र में उसका लगड़ा-लूला कलेवर भी बना है। किन्तु पारस्परिक व्यवहार में सहकारिता एवं उदारता को खोज निकालना अति कठिन है। आपाधापी की शतरंज का नशा बुरी तरह चढ़ा है हर कोई एक दूसरे को मात देने और अपनी गोटी लाल करने में सारी अक्कलमन्दी निचोडे़ दे रहा है। ऐसी दशा में समाज सच्चे अर्थो में समाज कैसे बने और किसी जन संकुल क्षेत्र को सच्चा राष्ट्र कैसे कहा जाए?

कलह और विग्रहों के असंख्य क्षेत्र है, सबके अपने-अपने कारण है। भाषा, प्रान्त, धर्म, वर्ग, वर्ण आदि के निहित स्वार्थों को लेकर परस्पर टकराव की इतनी अधिक घटनाएँ होती है कि उनका निराकरण कानून और पुलिस के द्वारा अत्यन्त स्वल्प मात्रा में ही निकल पाता है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले दाव-पेचों और कुटिल कुचक्रों से शीतयुद्धों की भरमार बढ़ती जा रही है और गरम युद्ध की, अणु-अणुओं से लड़ें जाने वाले तृतीय एवं अन्तिम युद्ध की सम्भावनाएँ तेजी से समीप आ रही है। घटनाचक्र पर दृष्टिपात करने से महाप्रलय का दिन दूर दिखाई नहीं पड़ता। इस विग्रह से निपटने में तो कानून और पुलिस जैसे अनुबन्ध भी कुछ काम करते नहीं दीखते।

धर्म और अध्यात्म का उपयोगी कलेवर तो प्राचीन काल से भी अधिक विस्तृत और आकर्षण बन गया है, पर उसमें प्राण का दर्शन भर दुर्लभ हो रहा है। कर्मकाण्डों के घटा टोप छाये हुए है पर आस्थआों में उत्कृष्टता भरने वाली प्रक्रिया तो एक प्रकार से विकृत ही होती चली जाती हैं धर्म ने मूढ़ता और कट्टरता के कवच कुण्डल पहन लिये है और अध्यात्म के कल्पना लोक में बिना पंखों की उड़ानें उड़ने जैसे उपक्रम चल रहे है। इन क्षेत्रों में धूर्तों और मूर्खों के बीच ऐसी पटरी बैठी है कि विज्ञजनों को इस कुछ का कुछ हो जाने को देखकर किंकर्तव्य विमूढ़ बना देने वाले असमंजस का अनुभव हो रहा है।

समस्याओं की यह मोटी झाँकी है, इस स्तर के अगणित कारण है जो व्यक्ति और समाज को सुखी समुन्नत बनाने वाले सभी प्रयत्नों को र्व्यथ करते चले जा रहे है। इन विग्रहों के रहते आर्थिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक उपलब्धियाँ कोई समाधानकारक हल खोजने में अपनी असमर्थता प्रकट कर रही है, इन परिस्थितियों को पीछे मुड़कर देखना होगा और वस्तुस्थिति समझने को गहराई में उतरना होगा। परिस्थतियों का उत्तरदायित्व मनःस्थिति पर लदा हुआ है। मनः स्थिति का भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वे आस्थाओं एवं आकाँक्षाओं पर निर्धारित है, अन्तःकरण ही वह क्षेत्र है जो व्यक्तित्व के स्तर को उठाता गिराता है। मनुष्य ने स्वयं ही अपना इतिहास सृजा है, वर्तमान की परिस्थतियों के लिए भी वही पूरी तरह उत्तरदायी हैं भविष्य को उज्जवल या अन्धकारमय बना लेना पूरी तरह उसी के हाथ में हैं इस तथ्य को स्वीकार करने में असमंजस उन्हीं को हो सकता है जो व्यक्तित्व के उद्गम स्त्रोत अन्तःकरण की सामर्थ्य से अपरिचित है। मनुष्य को सर्व समर्थ माना गया है। यह तथ्य पूर्णतया उसके आस्था क्षेत्र के आधार पर सर्वथा सत्य पाया जा सकता है।

नवयुग में मनुष्य आस्था प्रधान होगें। वे उत्कृष्टता आदर्शवादिता और उदात्त भाव सम्वेदनाओं से भरे-पूरे होगें। प्रश्न एक ही है कि वर्तमान अनास्था को उदात्त भाव श्रद्धा में परिणत कैसे किया जाये? इस सर्न्दभ में उत्तर तो कई दिये जा सकते है, पर सब प्रामाणिक प्रतिपादन आस्तिकता को भाव श्रद्धा का उन्नयन ही है। यह कार्य उपासना के आधार पर सम्भव हो सकता है। व्यक्ति निर्माण का आधार-भूत क्षेत्र यही है। यह प्रक्रिया ऐसी है जिसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता। उसे प्रमुखता ही देना होगा। जन-जन को आस्तिक और उपासना प्रिय बनाने के प्रयत्नों में नवयुग की उज्जवल सम्भावनाएँ पूर्णतया समाविष्ट है, अस्तु युग शिल्पियों को अपने समस्त क्रिया-कलापों में इस केन्द्र बिन्दु को प्रदान मानकर चलना होगा। महाकाल वैसी ही प्रेरणा देने और व्यवस्था बनाने में संलग्न भी है।


अविज्ञात सृष्टि के अविज्ञात रहस्य

सृष्टि का विस्तार असीम है। इसके ज्ञात की अपेक्षा अविज्ञात का क्षेत्र अधिक व्यापक है। रहस्य के परदे अभी इतने अधिक है कि उनके समक्ष अब तक की जानकारियाँ नगझय लगती है। सूक्ष्म जगत तो अभी पूर्णतया अनजान बना हुआ है। प्रकृति रहस्य के स्थूल पक्ष ़कितने ही ऐसे है जो अब भी मानवी बुद्धि, वैज्ञानिकों के समक्ष रहस्यमय बने हुए है। प्रकृति को समक्ष लेने का दावा करने वाली वैज्ञानिक बुद्धि भी जब उन रहस्यात्मक पक्षों का पर्यवेक्षण करती है तो उसे देखकर हतप्रभ रह जाती है। ढूँढ़ने में कोई ऐसा कारण नहीं दिखाई पड़ता जो भौतिक विज्ञान की विश्लेषणात्मक पद्धति अथवा नियमों के अर्न्तगत आता हो। बौद्धिक असमर्थता व्यक्त करते हुए हार कर उन्हें अविज्ञात रहस्य घोषित किया जाता है।

इतने पर भी तयि एवं सत्य अपने स्थान पर यथावत् है। सृष्टि का कोई घटना-क्रम ऐसा नहीं जो कारणों से रहित अथवा अवैज्ञानिक हो। यह बात दूसरी है कि भौतिक विज्ञान उन रहस्यमय क्षेत्रों में पहुँच कर अविज्ञात सूत्रों को ढूँढ निकालने में असमर्थ सिद्ध हो रहा हो जो वैज्ञानिक हाते हुए भी उसक पकड़ के बाहर हो।

घटना अठारहवीं शदी के आरम्भ की है। उन दिनों स्पेन और फ्रान्स के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। 5000 हजार स्पेनी सैनिकों का नेतृत्व कर रहे थे कमाण्डर ली.जोर्नवाव। सैनिक दो-तीन टुकड़ियों में बटकर चल रहे थे। एकाएक लगभग 1500 सैनिक की टुकड़ी देखते-ही-देखते लुप्त हो गई। इस घटना के घटने में कुछ सैकिन्ड लगे होंगें। ‘कमाण्डर ली जोर्नवाव’ का इसकी सूचना मिलीं उक्त स्थान को खतरनाक घोषित करते हुए जोर्नवाव ने शीघ्रता-शीघ्र पार करने का सैनिकों को आदेश दिया। सैनिकों को ढँढ़ने के लिए विशेषज्ञों की एक टोली भेजी गई जो समीपवर्ती स्थानों से पूर्णतया परिचित थी। ढूँढ़-खोज का कार्य कई दिनों तक चलता रहा, पर उनका कोई सुराग न किल सका। घटना का विवरण पुस्तक ‘हिस्ट्री आँफ वन्डरफुल इवेन्टसा’ में मिलता है।

इसी से मिलती एक घटना सन् 1856 में घटीं 650 फ्राँसीसी सैनिकों का एक ग्रुप निकटवर्ती जर्मन चौकी पर हमला करने के लिए बढ़ रहा था। सीी सैनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे। अचानक हवा का हल्का बवण्डर आया और देखते-ही-देखते 645 सैनिक हवा में विलुप्त हो गये। बच्ो हुए पाँच सैनिकों के लिए यह घटना अचम्भित कर देने वाली थी। अब शेष सैनिको ने उस स्थान की एक-एक इन्च भूमि देख डाली, पर उनका कोई पता न लग सका। सेना की दूसरी टुकड़ी को जाकर इन पाँचों ने घटना की सूचना दी। महीनों खोज-बीन चलती रही, पर उन सैनिकों को कोई चिन्ह तक नहीं मिल सका।

अमेरिका का टेनेसी निवासी एक किसन ‘डेविड लाग’ अपने दो मित्रों के साथ 23 सितम्बर 1808 को सायंकाल घूमने निकला। तीनों मित्र साथ-साथ चल रहे थे। एकाएक डेविड लाग हवा में गायब हो गया। उस स्थान पर मित्रों ने ध्यान से देखा, पर वहाँ। न तो कोई गड्ढा था न ही झाड़-झंखाड़ और खाई। सड़क प्लेन और साफ थी। ‘लाग’ के दो मित्रों में से एक प्रतिष्ठित न्यायाधीश थे। उन्होंने ‘लाग’ को ढूँढ़ निकालने के अनेकों सरकारी प्रयास किये, पर असफलता ही हाथ लगी। अपने वक्तव्य में न्यायाधीश महोदय ने कहा कि "यह एक अविश्वनीय किन्तु सत्य घटना है जिसका कोई समाधान खोजने पर नहीं मिलता।"

सन् 1920 में लन्दन के एक युवा साँसद पिक्टर ग्रेसर लन्दर की दुकान से जैसे बाहर निकले ऐसे लुप्त हो गये जैसे हवा के झोंके के साथ तिनका। इसी तरह की एक घटना 13 जुलाई 1950 को घटी। पौलेण्ड निवासी पादरी केनरी वोर्निस्की अपने मित्र के पास जा रहे थे। अपने मकान से अभी 100 गज ही दूर गये होंगे कि गायब हो गयें। आस-पास के स्थानों में खोज-बीन की गई, पर उनका कोई ीी सुराग नहीं मिल सका।

सन् 1936 में चीन और जापान के बीच युद्ध चल रहा था। चीनी सेना की एक टुकड़ी जिसमें 3000 सैनिक थे, का पड़ाव नानकिंग नामक स्थान पर पड़ा था। टुकड़ी का सम्पक्र सूत्र केन्द्र से निरन्तर बना हुआ था। एक दिन प्रातः अचानक केन्द्र से संचार सम्पक्र टूट गया। केन्द्रिय सैनिक कमाण्ड ने अविलम्ब उक्त टुकड़ी के सैनिकों की खोज आरम्भ कर दी। पड़ाव के स्थान पर सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र एवं खाद्य सामग्री तो विद्यमान थी, पर वहाँ न तो किसी प्रकार के युद्ध का चिन्ह मिला न ही सैनिकों का अवशेष। खोजी कुत्ते उक्त स्थान पर जाकर भौंकते रहे। वे वहाँ से आगे बढ़ने का नाम नहीं लेते थे। दो फर्लाग दूरी पर दो सैनिक सुरक्षा पहरे पर नियुक्त थे, मात्र वे ही बच सके। इन दोनों सैनिकों ने किसी प्रकार के बाहरी आक्रमण होने अथवा सैनिकों के वहाँ से भाग जाने की सम्भावना से इन्कार कर दियाँ

हाल ही एक रोचक घटना ने वैज्ञानिकों को इन कारणों पर सोचने को बाध्य किया है, जिससे कितने ही व्यक्ति लुप्त हो गये। जुन 1979 में लन्दन की श्रीमति क्रिस्टीन जान्सटन नामक महिला ने वहाँ के न्यायालय में सम्बन्ध-विच्छेद का एक मुकदमा दायर किया। उक्त मुकदमें का आधार रोचक किन्तु आर्श्चयजनक था। त्याग पत्र में उल्लेख था कि उसके पति ‘श्री एलन’ हवा में गायब हो गये, उस कारण वैवाहिक सम्बन्ध-विच्छेद की अनुमति दी जाय। घटना इस प्रकार बताई जाती है। श्रीमति किस्टीन जान्सटन एवं उनके पति श्री एलन सन् 1975 के गर्मियों के अवकाश में उत्तरी धु्रव की यात्रा पर गये। दोनों पति-पत्नि रुसी सीमा से लगे लैपलैण्ड में स्थित एक गिरजाघर के निकट से होकर गुजर रहे थे। शीतल वायु के झोंकों का आनन्द उठाते हुए दोनों आगे बढ़ रहे थे। पत्नि कुछ कदम ही आगे बढ़ गई। पीछे मुड़ कर देखा तो मि. एलन का कहीं पता न था। इस घटना को घटित होने में मात्र कुछ सैकिण्ड लगे होगें। श्रीमति क्रिस्टीन ने ढूँढ़ने के असफल प्रयासों के बाद स्थानीय लोगों से मदद माँगी। ‘फिनिश’ जाति के लोगों ने खोजी कुत्तों की सहायता से एलन के खोजने का अथक प्रयास किया, पर कुत्ते उस मोड़ पर जाकर रुक जाते थे जहाँ से ‘एलन’ गायब हुए थे। रुसी सेना का कैम्प निकट होने से सेना विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया। पर अब तक इस रहस्य का उद्घाटन न हो सका कि एलन का क्या हुआ? इस तथ्यों पर अवलोकन करने के बाद लन्दन की अदालत ने मि. एलन को मृतक घोषित करते हए श्रीमति क्रिस्टीन के पक्ष में फैसला दिया।

उपरोक्त घटनाओं का अब तक रहस्योद्घाटन न हो सका। वारमूडा त्रिकोण भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य का केन्द्र बना हुआ है। कितने ही हवाई जहाज, जलयान, उक्त स्थान से गायब हो चुके हैं वैज्ञानिकों ने वायु में चलने वाले खतरनाक चक्रवातों का एक कारण बताया है। पर इससे समाधान नहीं होता। चक्रवातों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान को वस्तुएँ फेक दी जाती है। उनका चिन्ह तो मिल जाता है। पर उपरोक्त घटनाओं के उपरान्त कोई भी चिन्ह अब तक नहीं प्राप्त हो सके है। ये घटनाएँ मानवी मस्तिष्क को सृष्टि के अविज्ञात रहस्यों पर सोचने को बाध्य करती है। शास्त्रों में भू-लोक के अतिरिक्त अन्य छै सूक्ष्म लोकों का वर्णन आता है। सम्भव है कोई अदृश्य शक्ति उन सूक्ष्म लोकों में मुनष्य को ढकेल देती हो जहाँ से वापस पृथ्वी लोक पर आ सकना सम्भव न हो। तथ्य चाहे जो भी हो ये घटनाएँ सृष्टि की उन रहस्यमय बातों का बोध कराती है जो अब भी मानवी बुद्धि के लिए अछूती एवं अनजान बनी हुई है। विज्ञान भी अपनी असमर्थता व्यक्त कर रहा हैं उन अविज्ञात तथ्यों एवं रहस्यों को जानने के लिए आत्म-विज्ञान का ही अवलम्बन लेना होगा जिसके लिए शास्त्रकार घोषित करते है कि आत्म-विज्ञान का अवलम्बन लेने वाले के समक्ष कुछ भी अविज्ञात नहीं रहता।


प्रकृति का गला न घोट दिया जाय

असन्तुलन प्रत्येक क्षेत्र में घातक सिद्ध होता हैं प्रकृति की सुव्यवस्था भी सन्तुलन पर ही टिकी हुई है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकृति के प्रत्येक घटक जीव-जन्तु, वनस्पति, वायु एवं जल का एक दूसरे से अन्योयाश्रित सम्बन्ध है। एक ही विकृति जुडे़ हुए अन्य घटकों को प्रभावित करती हैं। इसमें आपसी सन्तुलन से ही प्रकृति का गतिचक्र ठीक प्रकार चलता तथा उसके अनुदानों का लाभ समुचित मात्रा में मिल पाता हैं।

इन दिनों पर्यावरण में भारी असन्तुलन पैदा हुआ है। फलस्वरुप प्रकृति प्रकोपों की बहुलता देखी जा रही है। इसे समझा तो दैविय अभिशाप के रुप में जा रहा है, पर है वस्तुतः मानव द्वारा रचित। क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। प्रकृति विपदाएँ मनुष्य की स्वयं के क्रिया कृत्य की परिणिति हैं उत्पादन के नाम पर औद्योगीकरण के प्रति जो उत्साह चल रहा है उससे तात्कालिक लाभ तो दिखाई पड़ रहा है, पर जब दूरगामी परिणामों पर ध्यान देते है तो पता चलता है कि अति उत्साह का क्रम अन्ततः हानिकारक ही सिद्ध हुआ।

पर्यावरण के सन्तुलन में वृक्षों का भारी योगदान हैं पौधे प्राणी जगत के जीवन का स्त्रोत है। एक ओर जहाँ प्राणियों के लिये आहार जुटाते, जीवन प्रदान करते है। वही दूसरी ओर वायु मण्डल की विषाक्त गैस कार्बन डाई आँक्साइड को वायु मण्डल से खींच लेते है। प्राणी समुदाय के लिए वे सच्चे हित चिन्तक है। इसमें पाया जाने वाला क्लोरोफिल जीवन का स्त्रोत है। माँसाहारी अथवा शाकाहारी सभी मूलतः आहार हरे पौधों, वनस्पतियों से प्राप्त करते है। इन दिनों औद्योगिक विकास एवं अन्य कार्यों के लिए तेजी से वन सम्पदा को नष्ट किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण सन्तुलन को बनाये रखने के लिए किसी देश का एक तिहाई भाग पेड़ पौधों से भरा-पूरा होना चाहिए। प्राप्त आँकड़ों के अनुसार भारत में 257 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है जो पर्यावरण सन्तुलन सीमा रेखा से दस प्रतिशत कम हैं अन्य देशों की स्थिति और भी बुरी है। प्राकृतिक वन सम्पदा में कमी होने से जो विभीषिकाएँ उत्पन्न हुई है उनकी रोकथाम के लिए पिछले दिनों दिल्ली में विश्व के प्रमुख 700 वैज्ञानिकों की गोष्ठी हुई। जिसमें उपस्थित विशेषज्ञों ने प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के लिए एक विश्व नीति तैयार की है। सम्मेलन में उपस्थित प्रकृति तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय संघ के महानिर्देशक डाँ. देविडमनरी ने कहा कि- "आने वाली हजारों पीढ़ियों के कल्याण के लिए प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

एक ओर वन सम्पदा में भारी कमी आई है। दूसरी ओर औद्योगीकरण बढ़ता जा रहा हैं इससे उत्पादन तो बढ़ रहा है, किन्तु पर्यावरण सन्तुलन के आवश्यक घटक वायु एवं जल में विषाक्तता भरती जा रही है। परिवर्धन के प्रति उत्साह एवं परिशोधन की उपेक्षा से प्रदूषण एक विभीषिका के रुप में प्रस्तुत हुआ है। एक आँकड़ें के अनुसार अमेरिका में मोटरें हर दिन ढाई लाख टन विषैला धुँआ उगती है। फ्रान्स के पावर स्टेशनों से प्रति वर्ष 200,000 टन सल्फर डाई आक्साइड वायु में मिल रही है। न्यूयाक्र में हर साल 15 लाख टन सल्फर डाई आक्साइड हवा को विषाक्त बना रही है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन 14,000 लीटर शुद्ध हवा चाहिए। जो इन स्थानों पर अप्राप्त है।

प्राप्त आँकड़ें के अनुसार संसार में लगभग 20 करोड़ मोटर वाहन सड़कों पर है। 1000 किलो मीटर चलने के लिये एक कार को जितनी आँक्सीजन चाहिए उतनी एक मनुष्य को एक वर्ष तक साँस लेने के लिए पर्याप्त है। प्रकृति का स्त्रोत सीमित है। मोटर वाहनों द्वारा आँक्सीजन के इतने बड़े भाग के खपत से वायु में इसकी मात्रा की कमी हो जाना स्वाभाविक है। प्राणियों एवं वनस्पतियों के लिए उपलब्ध प्रकृति गत आँक्सीजन का एक बड़ा भाग यों ही बेकार चला जा रहा है। उल्टे इन वाहनों से विषाक्तता और बढ़ रही हैं। जिसके परिशोधन के लिए कोई प्रयास नहीं चल रहा हैं। करोड़ों टन विष गैस के रुप में प्रति वर्ष वायु मण्डल में मिल रही है। जल की भी यही स्थिति हैं उद्योगों, कल-कारखानों से निकलने वाला कचरा नदी के जल स्त्रोतों को इस योग्य नहीं छोड़ रहे है कि उनका उपयोग कर स्वस्थ रहा जा सके।

तीसरा असन्तुलन जनसंख्या का है। अब तक विश्व की जनसंख्या 450 करोड़ के निकट जा पहुँची है। सन् 1965 में विश्व की जनसंख्या 350 करोड़ थी। प्रत्येक 14 वर्षों में 100 करोड़ की वृद्धि हो रही है। इस प्रकार 50 वर्षों में यह संख्या दुगुनी हो जायेगी। प्रकृति साधन सीमित है और उपभोगकर्ताओं की संख्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही हैं। अधिक उत्पादन के लिए अदूरदर्शी रीति-नीति अपनाई जा रही है अन्न प्राप्त करने के लिए कृत्रिम रासायनिक खादों से लेकर अन्य भौतिक साधन बढ़ाने के लिए बड़े उद्योंगों के निर्माण से तात्कालिक लक्ष्य की आपूर्ति तो सम्भव है, पर अन्ततः इसका प्रभाव प्रकृति सन्तुलन पर पड़ रहा है। एक ओर वन सम्पदा को काटा जा रहा है। दूसरी ओर उद्योगों से निकलने वाली विषाक्तता से स्वच्छ वायु एवं जल अप्राप्त हो गया है।

छेड़छाड़ का यह उपक्रम प्रकृति के स्थूल पक्षों तक ही सीमित नहीं है, वरन् सूक्ष्य परतों में भी घुस कर किया जा रहा है। परयाव्विक परीक्षण से निकलने वाला विकिरण मानव जाति के लिए संकट सिद्ध हुआ है। दूसरा संकट नवीन प्रयोगों से उभर रहा हैं। जीवन का स्त्रोत है कोशिकाओं के केन्द्रक में मौजूद डी.एन.ए.। डी.एन.ए. के हेर-फेर से ही प्राणियों की एवं वनस्पतियों की आकृति एवं प्रकृति नियन्त्रित होती है। इनके गुण धार्मों में भिन्नता का कारण डी.एन.ए. है। जीव विज्ञान की नई शोधों द्वारा यह सम्भव हो गया है कि दो सूक्ष्य जीवों के डी.एन.ए. को मिलकर एक तीसरे किस्म का जीव तैयार करना। नवीन प्रयोगों के प्रति उत्साह होना स्वाभाविक हैं पर अशंका यह है कि कहीं प्रयोग से कोई ऐसा जीव न पैदा हो जाय जो भयानक रोगाणु हो। इस सम्भावना से पूर्णतया इन्कार नहीं किया जा सकता। इन दिनों जेनेटिक इन्जीनियरिंग द्वारा महामानवों, अतिमानवों की नई सन्तति तैयार करने की कल्पना भी चल रही है। इस प्रकार के प्रयोग प्रकृति व्यवस्था के प्रतिकूल है। जीव प्रकृति पर इसका बुरा प्रभाव पडे़गा।

इन सबका सम्मिलित प्रभाव पर्यावरण पर पड़ा है। प्रकृति का इकोलाजिकल ‘वैलेन्स’ डगमगा गया है। फलतः इसकी प्रतिक्रिया प्रकृति विक्षोभों, प्रकोपों के रुप में परिलक्षित हो रहा है। स्वीडिशसेस मोलाजिस्ट प्रो. मारकस भट्ट के अनुसार पर्यावरण के असन्तुलन से बाढ़ एवं भूकम्प की घटनाओं में वृद्धि हुई है। प्राप्त आँकड़ों के अनुसार भू-स्खलन से पिछली दशाब्दी में 4 लाख व्यक्तियों की मृत्यु हुईं सन् 1976 में चाइना के तागसेन में हुए भू-स्खलन में दो लाख 42 हजार व्यक्तियों की जाने गईं 31 मई 1970 को पेरु में हुए भू-स्खलन से 70 हजार व्यक्ति मृत्यु की गोद में समा गये। टर्की में सन् 1970 में 11 हजार व्यक्ति मरे। 12 अगस्त 1979 को मोरवी में आयी बाढ़ से 25 हजार व्यक्ति मात्र 75 मिनट में काल के गर्भ में समा गये। यह प्रकृति विक्षोभ पर्यावरण असन्तुलन का ही अभिशाप है। सन्तुलन बनाये रखने के लिए मनुष्य को प्रकृति से छेड़छाड़ बन्द करनी होगीं वातावरण में भरी विषाक्तता को परिशोधन के लिये हर सम्भव प्रयास करना होगा। वन सम्पदा के कटाव को रोकना होगा। अन्यथा कु्रद्ध प्रकृति का आक्रोश अगले दिनाँ और भी भयकर रुप से बरसेगा। समय रहते-भूतकाल की भूल से प्रेरणा लेकर मनुष्य जाति को अपनी गतिविधियों में हेर-फेर करना अभीष्ट हो गया है।


शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही

भौतिक विज्ञान के सिद्धान्तानुसार पदार्थ का कभी नाश नहीं होता। विभिन्न रुपों में वह परिवर्तित होता रहता है उसे उर्जा में और उर्जा को पुनः दृश्य पदार्थ में रुपान्तरित किया जा सकता है। प्रकटीकरण को पदार्थों का पुनर्जन्म और अदृश्य होने को मुत्यु के नाम से सम्बोधित किया जा सकता है। वस्तु ही नहीं जीवों में भी यह रुपान्तरण की प्रक्रिया चलती रहती है। जराजीर्ण काया को छोड़कर चेतना नये कलेवर में अपने कर्मों के अनुसार प्रकट करती है। पुनर्जन्म के सनातन सिद्धान्त को वैज्ञानिक विकास के आरम्भिक चरण में कुछ अपरिपक्व मस्तिष्क वाले व्यक्ति ने इन्कार करने का प्रयत्न किया। पर वर्तमान के नये वैज्ञानिक एवं परामनोवैज्ञानिक शोध तक्र एवं तथ्यों के आधार पर पुनर्जन्म को एक स्वर से स्वीकार करने लगे है। समय-समय पर मिलने वाले घटनाओं के प्रमाण भी इस तथ्य की पुष्टि करते है।

कुछ वर्ष पूर्व नागपुर के एक स्थानीय अस्पताल में श्रीमति उत्तरा हुद्दार को चर्म रोग की चिकित्सा के लिये भरती किया गया, लेकिन वही से उन्हें विचित्र दौरे आने शुरु हुए। पहले तो वे दस-पन्द्रह मिनट तक ही उस अवस्था में रहती थीं लेकिन वाद में वही स्थिति दस-पन्द्रह दिनों तक के लिए रहने लगी। अँगे्रजी और मराठी के अलावा कोई अन्य भाषा न तो वे और न उनके परिवार में ही कोई जानता था। लेकिन उक्त अवधि में वे धारा प्रवाह बंगला बोलते हुए अपने को ‘सप्तग्राम की निवासी ‘शारदा’ नामक महिला बताती थी। यों तो ये दौरे उन्हें आकस्मिक रुप से ही आते थे लेकिन एकबार जब उनके भाई कैमरे से उनकी तस्वीर लेने जा रहे थे, वह अचानक चीखते-चिल्लाते हुए भागने लगी। पूछने पर उनने बताया मेरा भाई गले में काला साँप लटकाये मुझे मारने आ रहा हैं। बड़ी मुश्किल से उन्हें पकड़ा जा सका।

श्रीमति उत्तरा हृद्दार 37 वर्ष की आकर्षक सौम्य और सुशिक्षित गृहिणी थीं तथा नागपुर की एक स्थानीय युनिवर्सिटी में मराठी की व्याख्याता थीं

परिवार वाले किकर्तव्यविमूढ़ थे। आखिर इस लाइलाज मर्ज से परेशान होकर उन्होंने ‘मनश्चिकित्सकों’ की शरण लीं। स्थानीय अस्पताल के डाँक्टरों ने इस केस का अध्ययन वर्जीनिया के परामनोवैज्ञानिक डाँ. स्टीवेन्सन को सौंपा दिया। इस कार्य में डाँ. स्टीवेसन के साथ कलकत्ते के दो अन्य परामनोवैज्ञानिक डाँ. आर. के. सिन्हा तथा प्रो. विपिन्द्र पाल भी कार्यरत थे। इन तीनों ने मिलकर उत्तरा हुद्दार की केस हिस्ट्री तैयार कीं जब-जब दौरा पड़ता और उत्तरा अपनी पिछली कहानी दुहराती, डाँक्टर उसे टेपरिकार्ड कर लेते। उत्तरा के व्यवहार का मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी किया गयाँ

अनेक प्रयोगों के बाद उत्तरा के पिछले जन्म अर्थात् शारदा के जीवन की कहानी का ‘ले आउट-सा’ तैयार हुँआ।

शारदा का जन्म सप्तग्राम (बंगाल) में लगभग 150 वर्ष पूर्व हुआ था। उसकी माँ शारदा बहुत पहले ही मर चुकी थी। इसलिए शारदा का पालन-पोषण उसकी मौसी ने किया था। उसके पिता बृजनाथ चट्टोपाध्याय एक प्रसिद्ध कंकाली मन्दिर के प्रधान पुजारी थे। सोमनाथ और यतीन्द्रनाथ उनके दो छोटे भाई थे। शारदा के पति विश्वनाथ एक वनस्पति विशेषज्ञ थे।

शारदा माँ। बनने के दो अवसर खो चुकी थी। तीसरी बार प्रसवकाल से लगभग 3 माह पूर्व वह एक दिन आँगन में बैठी धान साफ कर रही थी। पास की झाड़ियों से निकल कर एक नाग ने उसे दंश लिया। शोर सुनकर काफी लोग इकट्ठे हो गये। शारदा के पति को भी सूचना दी गयी जो खुद भी किसी सर्प-दशित व्यक्ति के इलाज के लिए पड़ौस के गाँव में गये हुए थे। समाचार सुनते ही वे घोड़े पर दौडे़ चले आये। शारदा अपने प्रलापों में भी कहा करती थी देखो मेरे पति घोड़े पर चढ़े चले आ रहे है। लेकिन तब तक जहर काफी फैल चुका था, अतः शारदा बचायी नहीं जा सकी।

शारदा द्वारा बताये गए तथ्यों की खोज करने पर सारी बातें सही पाई पायी। आत्मा की खोज विषय पर शोध कार्य करने वाले डाँ. स्टीवेन्सन ने अपनी शोध यात्रा में विश्वभर से इस प्रकार के 600 प्रामाणिक घटनाएँ एकत्रित की है। इनमें 170 प्रमाण अकेले भारत से प्राप्त हुए है। डाँ. स्टीवेन्सन के अनुसार जिनकी मृत्यृ किसी उत्तेजनात्मक, आवेशग्रस्त मनः स्थिति में हुई हो, उनमें पिछले जन्म की स्मृति, अधिक स्पष्ट रहती है। दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, प्रतिशोध, कातरता, मोहग्रस्तता, अतृप्ति का विक्षुब्ध घटनाक्रम प्राणी की चेतना पर गहरा प्रभाव डालता है और वे उद्वेग अगले जन्म में भी स्मृति पटल पर उभरते रहते है। जिस व्यक्ति से अधिक प्यार या द्वेष रहा हो, उसका विशेष रुप से स्मरण बना रहता हैं

डाँ. स्टीवेन्सन के शोध रिकार्ड में एक पाँच वर्षीय लड़की की घटना है जो हिन्दी भाषी परिवार में जन्म लेकर भी बंगला गीत गाती और उसी शैली में नृत्य करती थी। जबकि कोई बंगाली उसके घर परिवार के समीप नहीं था। उसने अपना पूर्वजीवन सिलहट से संबंधित बताया। इस जन्म में वह जबलपुर में पैदा हुई, लेकिन उसकी पूर्व जन्म की स्मृतियाँ 95 प्रतिशत सही साबित हुई।

इग्लैण्ड के नार्थम्बर लैंड के श्री पोलक की दो लड़कियाँ सड़क पर मोटर की चपेट में आकर मर गयी। बड़ी लड़की ‘जोआना’ 11 वर्ष की थी तथा छोटी जैक्लन 6 वर्ष की।

दुर्घटना के कुछ समय बाद श्रीमति पोलक गर्भवती हुई तो उन्हें न जाने क्यों हमेशा यह महसूस होता थाकि उनके गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं डाँक्टरी जाँच कराने पर उनकी धारणा बहम साबित हुईं लेकिन दाद में जन्म दो लड़कियों का ही हुआ तथा उनमें एक का नाम गिलियन और दूसरी का जेनिफर रखा गया। ये अपने पूर्वजन्म के सभी चिन्हों को अपने शरीर पर धारण करके ही जन्मी थी। इन दोनों को अपनी मृत बहनों के बारें में कुछ भी नहीं बताया गया था लेकिन वे अपने पूर्वजन्म के घटनाओं की आपस में चर्चा करती हुई पाई गई। समयानुसार उन्होने अपने पूर्वजन्म के इतने प्रमाण प्रस्तुत किये कि लोगो को यह मानने का बाध्य होना पड़ा कि दुर्घटना में मरी बहनों ने ही इस बार एक साथ ही पुनर्जन्म लिया है।

रोपेन हेगन (डेनमाक्र) की एक सात वर्षीय लड़की लीना मार्कोनी ने अपने पूर्वजन्म के बारे में बताया कि वह फिलीपीन निवासी किसी होटल मालिक की मारिया एस्पिना नामक पुत्री थी जो 11 वर्ष की उम्र में मरकर रोपेन हेगन में पैदा हुई थी। ईसाई परिवार के लिए यह एक चुनौती देने वाली घटना थी उक्त देश तथा स्थान पर जाँच पड़ताल करने पर वह विवरण सत्य पाया गया।

8 अगस्त 1980 दैनिक पत्र हिन्दुस्तान के रविवार अंक में पुनर्जन्म की एक घटना का उल्लेख इस प्रकार था-’सिम्मी’ नामक एक बालिका का जन्म ग्रा. बस्सी पढाणाँ जि. पटियाला (पंजाब ) के निवासी ईश्वरीदास पाठक के घर 2 फरवरी 1976 को हुआ। एक दिन अपने माता-पिता से बोली कि अपने पति मोहिन्दर सिंह को देखना चाहती हूँ। बालिका ने उक्त व्यक्ति का पता भोजपुर बाजार, सलापड़ मण्डी के निकट बताया। बारम्बार आग्रह करने पर वास्तविकता का पता लगाने के लिए उसके पिता उक्त ग्राम में पहुँचे। पूछताँछ द्वारा मालूम हुआ कि मोहिन्दर सिंह नामक एक ड्राईवर है। उसकी पत्नि कुछ वर्ष हुए मर गई। उसने मोहिन्दर सिंह को देखते ही पहचान लिया तथा बताया कि पूर्व जन्म के उसके पति हैं। बालिका ने अनेकों ऐसे प्रामाणिक घटनाओं का भी उल्लेख किया जिसकी मात्र जानकारी मोहिन्दर सिंह एवं उसकी पत्नि को थी।

हालीवुड के प्रसिद्ध सिनेमा-अभिनेता ग्लेन फोर्ड ने भी अपने पूर्व जन्मों का वृतान्त बताकर वैज्ञानिकों, परा-मनोवैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। एक दिन अचानक अंग्रेजी में बात करते हुए उन्होने अपना परिचय उन्नीसवीं सदी के एक संगीत शिक्षक के रुप में दिया। पियानों पर उन्होंने उन्नीसवी सदी की एक प्रचलित धुन भी सुनायी जबकि इस जीवन में उन्हें पियानों का कोई अभ्यास न था। खोजबीन करने पर मालूम हुआ कि उक्त संगीतज्ञ की मृत्यु 1891 में क्षय रोग के कारण हुई थी तथा वह एक प्रख्यात संगीतज्ञ था। ग्लेन फोर्ड द्वारा बताये गये सारे विवरण सही पाये गये।

समय-समय घटनाओं के मिलने वाले प्रमाण इस तथ्य का समर्थन करते है कि पुनर्जन्म एक सच्चाई-एक तथ्य है। साथ ही यह भी सिद्ध हो चुका है कि पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार ही मनुष्य को भली-बुरी परिस्थितियाँ योग्यता, प्रतिभा जन्म के साथ मिलती है। कोई कारण नहीं है कि इस सत्य से इन्कार किया जाय। जीवन का अन्त इस शरीरत्व के साथ नहीं हो जाता, यह प्रामाणित हो जाने तथा कर्मों के भले-बुरे फल मिलने की पुष्टि हो जाने से सत्कर्मों की महत्ता एवं दुष्कर्मों की हानियाँ स्वयं सिद्ध हो जाती है।


तेज आँधी और पानी (kahani)

तेज आँधी और पानी ने एक-दूसरे से मानो होड़-सी कर ली थी। रह रहकर बिजली कड़क रही थी। ठण्डी हवा वदन को सूत्र सा किये दे रही थी। तभी होटल के अन्दर थर-थर काँपते किसी दम्पत्ति ने प्रवेश किया और कमरे की माँग कीं

‘पर यहाँ तो पूरा होटल भरा हुआ है, क्षमा कीजियेगा।’ बैरे ने विनम्रतापूर्व कहा।

निराशा दम्पत्ति कहने लगे, ‘हमें पता होता कि फिलडिल्फिया के सभी होटल इतने भरे रहते है तो पहले से ही स्थान रिजर्व करा लेते। हर होटल में यही उत्तर हमें मिला है। अब हम जायें भी तो जायें कहाँ?

युवक बोला-’इस तूफान और सर्दी में बाहर आप कहाँ भटकेगें? यदि आप बुरा न माने तो मेरे कमरे में ठहर सकते है।’

‘और तुम कहाँ रहोगे? दम्पती ने पूछा।

‘मेरी कोई बात नहीं। मैं तो होटल का बैरा हूँ। रात में मुझे जगने की आदत है। कहीं भी रात बिता दूँगा।’ युवक ने कहा और दम्पत्ति को अपने कमरे में ले जाकर ठहरा दिया। उनकी सुख-सुविधा की सारी सामग्री इकट्ठी करके कड़ाके की उस सर्दी में स्वयं कष्ट सहते वह बाहर निकल गया। बरामदे में पड़ी एक मेज पर उसने अपना बिस्तर लगाया और तूफान के झोंकों में रात भर सोने का प्रयास करता रहा।

सुबह जब तूफान और वर्षा कुछ कम हुई तो दम्पत्ति ने उस युवक को काफी धनराशि देनी चाही। पर गरीब बैरे ने धन लेने से स्पष्ट इन्कार कर दिया और बोला-’आप उस समय आपत्ति में पड़े थे और क हीं आपको स्थान न मिलता इसलिये मैंने आपकी सहायता की थी। यह मेरा धर्म था। धन प्राप्ति की इच्छा से मैंने आपकी सहायता नहीं की। इसलिये मैं पैसे नहीं ले सकता।’ दम्पत्ति लाचार होकर होटल से चले गये।

लगभग दो वर्ष बाद उस कर्मचारी को न्यूर्याक का एक टिकिट और एक पत्र मिला, बुलाने वाले व्यक्ति न्यूयाक्र के सुप्रसिद्ध धनाड्य विलियम थे। युवक जब न्यूयाक्र पहुँचा तो विलियम वाल्डोफ ने उसका जोरदार स्वागत किया। एक शानदार होटल में उसे ले जाकर वे बोले-’यह होटल विशेष रुप से मैंनेआपके लिये बनवाया है। आज से आप इसके मैंनेजर है।’

‘पर मुझ में तो इतनी योग्यता नहीं।’ युवक ने आर्श्चयचकित होते हुए कहा।’

‘आप में सज्जनता और परोपकार की भावना तो है। इस तरह के कार्यां के लिये वही सबसे बड़ी योग्यता है।’ धनिक ने युवक को गले से लगाते हुए कहा।


तात्कालिक नहीं दूरवर्ती हितों को प्रश्रय मिले।

अनीति का तुरन्त लाभ मिलते देखकर प्रत्यक्षवादियों का कहना है कि ईमानदारी क्यों अपनायी जाय-उत्कृष्टता का समर्थन क्यों किया जाय? इससे तत्काल तो घाटा ही दीखता है फिर क्यों न उस रास्ते पर चला जाय जिससे कम समय एवं श्रम में अधिक लाभ पहुँचता हो। यह मान्यता एकाँगी, अधूरी एवं अविवेकपूर्ण है। दूरगामी एवं स्थायी परिणामों पर ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट होगा कि उत्कृष्टता के पक्षधर हर क्षेत्र में प्रत्यक्षवादियों-अनीति के मार्ग पर चलकर तात्कालिक लाभ सोचने वालों की तुलना में कहीं अधिक सफल रहे है। भौतिक अथवा आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर जा पहुँचने वाले व्यक्ति उत्कृष्टता के न केवल समर्थक रहे है वरन् अपने प्रत्येक क्रिया-कलाप में व्यवहार में उसका समावेश किया।

नीति के मार्ग पर चलने वालों को अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ, मनोयोग एवं धैर्य तीनों की आवश्यकता पड़ती है। असफलताएँ नीति के अवलम्बन के कारण नहीं प्रस्तुत होती है बल्कि उनके मूल में इन तीनों का अभाव ही प्रधान कारण होता है। जिन्हें भौतिक सम्पन्नता ही अभीष्ट हो वे भी नीति पर चलते हुए श्रमशीलता, मनोयोग एवं धैर्य का आश्रय लेकर अपने उद्देश्य में सफल हो सकते है। भौतिक सम्पन्नता में ईमानदारी बाधक सिद्ध होती है, यह मान्यता उन लोगों की है जो पुरुषार्थ से जी चुराते है। ऐन-केन प्रकारेण कम समय एवं कम श्रम में अधिक से अधिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से ही अनीति को प्रोत्साहन मिलता तथा लम्बे समय तक सफलता के लिए इन्तजार करते नहीं बनता है। फलतः थोड़ा तात्कालिक लाभ भले ही उठा लें-महत्वपूर्ण उपलब्धियों से सदा वंछित ही बने रहते है। देखा जाय तो भौतिक सम्पन्नता के क्षेत्र में शिखर पर वही पहूँचे है जो नीति के-ईमानदारी के समर्थक रहे है-पुरुषार्थी रहे है। विश्व के मूर्धन्य भौतिक सम्पन्न व्यक्तियों के जीवन क्रम पर दृष्टिपात करने पर यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है। ईमानदारी, पुरुषार्थ के मनोयोग एवं असीम धैर्य के सहारे ही वे सामन्य स्तर से असामान्य स्थिति तक जा पहुँचे।

अमेरिका के प्रसिद्ध पूँजीपति राकफेलर ने एक छोटे से व्यापारी के रुप में अपना जीवन आरम्भ किया। घर की स्थिति ऐसी नहीं थी कि व्यापार में पूँजी का योगदान मिल सके। पर अपनी प्रामाणिकता, गहन अभिरुचि एवं नम्रता के कारण एक मित्र से इतना सहयोग प्राप्त करने में सफल हो गये कि किसी प्रकार छोटा-मोटा व्यवसाय आरम्भ हो सके। लगन, पुरुषार्थ के कारण वे आगे बढ़त गयें प्रामाणिकता क कारण उन्हें कर्ज के रुप में अन्य बड़े व्यापारियों का भी योगदान मिलने लगा। निर्धारित समय पर उधार का पैसा मिल जाने के कारण राकफेलर की प्रामाणिकता व्यवसाय क्षेत्र में बढ़ती गई। अपनी श्रमशीलता, असाधारण मनोयोग एवं चरित्रनिष्ठा के कारण राकफेलर का लाभ इन दिनों यूरोप के मूर्धन्य सम्पन्नों में गिना जाता हैं। राकफेलर की ‘एक्सन’ एवं स्टेर्न्डड तेल कम्पनियाँ आज संसार के सबसे बड़े 500 निगमों में से एक गिना जता है। एक प्रेस इन्टरव्यू में अपनी सफलता का रहस्योद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि ‘विषम परिस्थितियों, असफलताओं में भी हमने अपना धैर्य कभी नहीं खोया। अपनी प्रामाणिकता पर कभी आँच नहीं आने दिया। अपने उपर आत्म-विश्वास बना रहा। यही हमारी सफलता का रहस्य है।

कितने ही व्यक्ति सम्पन्न बनना चाहते है। अभीष्ट लक्ष्य के प्रति आरम्भिक उत्साह भी रहता है, पर छोटी-मोटी असफलताओं के कारण प्रयास छोड़ बैठते है। इतना धैर्य नहीं रहता कि असफलता से प्रेरणा ले-कारणों की ढूँढ़ खोज करें तथा नये सिरे से प्रयत्न आरभ्भ कर दें। अप्रामाणिकता भी असफलता का कारण बनती है। झूँठ फरेव के बलबूते थोड़ा लाभ आरम्भ में उठाया तो जा सकता है, पर जन-सामान्य को मालूम पड़ जाने पर विश्वास समाप्त हो जाता है तथा वह व्यक्ति सहयोग से वंचित रह जाता है। अनीति पूर्वक सफलताएँ प्राप्त करने के इच्छुक अन्ततः घाटे मं ही रहते है। महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ तो ईमानदार, श्रमशील व्यक्ति के ही हिस्से में आती है।

एक युवक ने जब हैनरी फोर्ड से कहा कि “मैं भी हैनरी फोर्ड के समान सम्पन्न बनना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्ग दर्शन कीजिये। हैनरीफोर्ड ने जो उत्तर दिया वह हर भौतिक महत्वाकाँक्ष्ज्ञी को प्रेरणा दे सकता है। फोर्ड ने उत्तर दिया “किसी भी कीमत पर अपना प्रामाणिकता बनाये रखो, मनोयोग एवं सतत् श्रम का अवलम्बन लेकर व्यवसाय के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हो।” एक सामान्य से आँटोबाईल मैंकेनिक के रुप में फोर्ड ने अपना जीवन क्रम आरम्भ किया तथा पुरुषार्थ के सहारे सफलता की चोटी पर जा पहुँचे। फोर्ड को आँटोमोबाईल उद्योग का संस्थापक माना जात है। मोटर कारखाना की स्थापना के समय उसकी इच्छा थी कि इतनी सस्ती कारों का निर्माण करे कि प्रत्येक कर्मचारी को उपलब्ध हो सके। सन् 1930 में फोर्ड कम्पनी से निकलने वाली कार की कीमत मात्र 300 डाँलर थी। फोर्ड कम्पनी के सामने हर समय 70,000 कारें खड़ी रहती है जो मात्र कम्पनी में कार्य करने वाले कर्मचारियोँ की है। सन् 1930 में फोर्ड कम्पनी में लगी पूँजी आठ अरब रुपयें आँकी गई थी। 1937 में मृत्यु के समय ‘हैनरी’ विश्व के सबसे सम्पन्न व्यक्ति माने गये। फोर्ड शान्ति के पक्षपाती थे। उन्होंने फोर्ड फाउन्डेशन की स्थापना द्वारा अपने करुण हृदय का परिचय दिया। खरबों डालर की राशि से स्थापित यह संस्था मानवतावादी कार्यों में लगी है।

अमेरिका के ही जान जेकोव एस्टर को कितनी ही असफलताओं का सामना करना पड़ा, पर कभी भी उन्होंने अपना सन्तुलन नहीं खोया। परिश्रम एवं ईमानदारी के प्रति अटूट निष्ठा ने उन्हें अमेरिका के मूर्धन्य पुँजीपतियो की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। लम्बी चौड़ी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा उन्होंने व्यवसाय के क्षेत्र में एक सामन्य से व्यापारी के रुप में चाय एवं चन्दन खरीदने बचने का कार्य छोटे पैमाने पर आरम्भ किया व्यापारिक क्षेत्र में अपनी ईमानदारी के कारण वे सदा विख्यात रहे। फलतः जन-सहयोग भी मिला। इस छोटे व्यापारी से व्यापार से एस्टर ने क्रासिक विकास करते हुए अमेरिका में बहुत बड़ा व्यापारिक साम्राज्य स्थापित कर लिया। व्यापार के विस्तार होते देखकर उन्होंने न्ययाक्र का एक बड़ा भाग भाग खरीद लिया तथा नियन्त्रण के लिए स्थायी केन्द्र की स्थापना की। इन दिनों अनेकों देशों में उनका व्यवसाय फैला है।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध कार निर्माता न्यूफील्ड एक सामान्य मैंकेनिक था। अपनी श्रमशीलता, लगन एवं प्रामाणिकताके कारण वह ब्रिटेन का सबसे बड़ा कार निर्माता बना। न्यूफील्ड का कहना है कि अपने भाग्य का निर्माण हमने पुरुषार्थ एवं चरित्रनिष्ठा के आधार पर किया है। असफलताओं से भी प्रेरणा लेकर मैं अपने लक्ष्य की ओर सतत् तत्पर रहा। फलतः वर्तमान स्थितिं तक पहुँच सका हूँ”

लम्बी-चौड़ी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा अपने पास मौजूद साधनों को लेकर ही छोटे-मोटे कार्यो में जुट जाया जाय तो भी प्रगति का सशक्त आधार बन सकता है। परिस्थितियाँ अनुकूल होगी- साधनों का बाहुल्य होगा, तब व्यवसाय आरम्भ करेगे, यह सोचते रहने की तुलना में अपने अल्प साधनों को लेकर काम में जुट जाना कही अधिक श्रेयस्कर हैं। काम छोटा हो अथवा बड़ा उसमें सफलता के कारण साधना नहीं अथक पुरुषार्थ, लगन एवं प्रामाणिकता बनते है। देखा जाय तो विश्व के सभी मूर्धन्य सम्पन्न सामान्य स्थिति से उठ कर असामान्य तक जा पहुँचे। साधन एवं परिस्थितियाँ तो प्रतिकूल ही थी, पर अपनी श्रमनिष्ठा एवं मनोयोग के सहारे सफलता के शिखर पर जा चढ़ें। वे यदि परिस्थितियों का रोना रोते रहते तो अन्य व्यक्तियों के समान ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते और सम्पन्न बनने की कल्पना में मन बहलाते रहते।

बाटा एक सामान्य मोची थाँ पैतृक सम्पत्ति के रुप में उसे जूते बनाने की कला प्राप्त हुई। जिस तल्लीनता के साथ वह जूते की मरम्मत करता था, वह देखते बनती थी। अपने काम एवं मजदूरी के प्रति इतना ईमानदार था कि ग्राहकों का ताँता लगा रहता था। उचित मजदूरी एवं निश्चित समय पर ग्राहकों को जूते मरम्मत करके देना उसकी विशेषता थी। इस लगन एवं प्रामाणिकता के कारण ही उसकी ख्याति हुँई। व्यवसाय बढ़ने लगा। कार्य के विस्तार को देखते हुए उसे अन्य सहयोगी रखने पड़े और अन्ततः कम्पनी का रुप देना पड़ा। “बाटा शू कम्पनी’ आज अपनी प्रामाणिकता के कारण विश्व विख्यात है। गई-गुजरी स्थिति से उठ कर अश्वपति की श्रेणी में जा पहुँचने वाले विश्व विख्यात ‘बाटा शू कम्पनी’ के निर्माता का जीवन वृत्तान्त भौतिक सम्पन्नता प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों को प्रेरणा दे सकता है।

गली-गली में जाकर दैनिक उपयोगी छोटे-छोटे सामान बेचने वाले ‘बिरला’ किस प्रकार भारत के मूर्धन्य व्यवसायी बने, इस रहस्य को जानने के इच्छुक व्यक्तियों को उनके खर्च, व्यवसाय, विस्तार को नहीं उन विशेषताओं का अध्ययन करना होगा जिनके बलबूते वैभव के स्वामी बने। उनकी श्रमनिष्ठा एवं प्रमाणिकता उल्लेखनीय थी। असफलताओं में भी उन्होनें निराशा को पास नहीं फटकने दिया। चरित्रनिष्ठा पर आँच नहीं आने दी। फलस्वरुप व्यवसाय फूलता फैलता गया। सम्पूर्ण भारत में इन दिनों विरला का व्यवसाय छाया हुआ है।

उत्कृष्टता के अनेकानेक पक्ष है। नीति का अवलम्बन उसका एक पक्ष है। इसका अवलम्बन लेकर प्रामाणिकता श्रमशीलता एवं मनोयोग के सहारे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ा जा सकता है। जिन्हें भौतिक सफलताएँ ही अभीष्ट हो, वे भी इन विशेषताओं का अवलम्बन लेकर अपने लक्ष्य में सफल हो सकते है। उपरोक्त उदाहरण इस तथ्य के प्रमाण है जो इस दिशा में सफलता के इच्छुक व्यक्तियों का मार्ग-दर्शन करने में समर्थ है।


उड़ीसा के दीवान कृष्णच्न्द्र सिंह (kahani)

उड़ीसा के दीवान कृष्णच्न्द्र सिंह बंडे़ विलासी थे। उनके जीवन का लक्ष्य मात्र इन्द्रिय सुख में लिप्त रहना था। जब उनकी भौतिकता की अति हो गई तो पत्नी ने कहा भी ‘आप आपना सारा पुण्य इस जन्म में ही समाप्त कर देगें या अगले जन्म के लिए भी कुछ एकत्रित करेगे। अगले जन्म में आप कुछ पा सके इसके लिये अभी से परमार्थ-परायण बनिये, आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखिये।’

पत्नी की बात को कृष्णचन्द्र सिंह ऐसे ही हँसकर टाल दिया करते थे। परन्तु एक घटना ने उनका जीवन ही बदल दिया। एक बार कृष्णचन्द्र जंगल के रास्ते से आ रहे थे। रास्तें में किसी गरीब की कुटिया थी । लड़की अपने चारपाई में पडे़ हुए रोगी पिता से कह रही थी-’बाबूजी, रात घिर आयी, आपने अभी तक दीपक नहीं जलाया।”

वृद्ध ने उत्तर दिया-’बेटी! जीवन की रात्रि भी निकट है। यदि मैंने सत्कर्मों का दीपक जलाया होता, समय रहते अपने जीवन का सदुपयोग किया होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। मैंने अपने जीवन को भोग-विलास में र्व्यथ गँबाया। उसी के परिणामस्वरुप मैं आज व्याधियों से घिरा हुआ मरणासन्न दयनीय स्थिति में पड़ा हूँ। लगता है कि मेरा अगले जन्म का खाता भी शून्य ही होगा।’

यह कहकर वह वृद्ध विलाप करने लगा। कृष्णचन्द्र ने वृद्ध में अपना भविष्य प्रतिविम्बित पाया। वे सोचने लगे कि यदि मैं भी समय रहते नहीं चेतता तो मेरी स्थिति भी इस वृद्ध जैसी ही दयनीय होगी।

इस विचार धारा ने कृष्णचन्द्र का जीवन ही बदल दिया। उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति दीन-दुखियों और असहायों को दान दे दी और स्वयं तपोवन में जाकर साधना करने लगे।


दोष मत दीजिये “कैच” ठीक करिये

सन् 1940 की बात है। अमेरिका की मिनीसोटा यूनिवर्सिटी में दो छात्र अध्ययन के लिए प्रविष्ट हुए। छात्र थे श्री केलर और छात्रा का नाम था कुमारी मेरियन। मनोविज्ञान सम्भवतः सृष्टि का सर्वोपरि जटिल विषय है। फायड की तरह पूर्वाग्रह ग्रस्त हो तब तो प्रतिभा सम्पन्न विद्वान भी लोगों को दिक्भ्रान्त करके छोड़गा, पर तथ्यान्वेषण का गुण किसी में सच्चाई से जागृत हुआ हो, भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पक्ष-पहलू को प्रत्येक कसौटी पर सत्य-सिद्ध देखा जा सकता है।

विद्यार्थी जीवन में श्री केलर और कुमारी मेरियन में सिद्धान्त निष्ठ घनिष्ठता बढ़ने लगी। दोनों अनेक गूढ़ मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर परामर्श किया करते दोनों ने कोई बड़ा कार्य करने का निश्चिय किया। इन्द्रियजन्य दुर्बलता ने कई बार उन्हें भी घेरे में लेने का प्रयत्न किया किन्तु उन्होंने मुनष्य जाति को इस शाश्वत दर्शन-मनुष्य न तो भला है न बुरा, वह जैसा भी कुछ है वातावरण की-प्रशिक्षण की देन है, परिचित कराने का संकल्प ले लिया था अतएवं उन्होनें उस पाश से अपने को मुक्त रखा। संकल्प जपी और इन्द्रिय निग्रही व्यक्ति ही कुछ असाधारण करने का श्रेय प्राप्त करते है इस निश्चिय के साथ उन्होंने अमेरिका के अक्रन्सास में 260 एकड़ की एक विलक्षण पाठशाला बनाई। लोकमर्यादा की दृष्टि से उन्होंने परस्पर विवाह भी कर लिया सन्तान भी उत्पन्न की किन्तु इतनी नहीं कि एक बच्चे को माता-पिता के प्यार के लिए दूसरे के प्रति ईर्ष्या का शिकार होना पड़ा हो। उसकी अपेक्षा उन्होने इस फार्म में परीलोक जैसा स्वरुप प्रदान किया। विभिन्न श्रेणी के लगभग 5000 जीव-जन्तुओं की उन्होने पाठशाला स्थापित की और प्रारम्भ से ही उनके शिक्षण का कार्य प्रारम्भ कर यह दिखाया कि मनुष्य और पशु-पक्षियों में जन्म-जात अन्तर कुछ भी नहीं है- दोनों में एक सी चेतना विद्यमान है उसे चाहे जिस वातावरण में गलाया और ढाला जा सकता है। अपने बच्चों पर ही नहीं समूची मनुष्य जाति पर दुर्गणी होने का दोष लगाने वाले से यह पूछा जाना चाहिए कि उसने संस्कारवान् जीवन की संरचना के लिए कुछ प्रयत्न किया क्य? यदि नहीं तो उसे छिद्रान्वेषण का कतई अधिकार नहीं। प्रयत्न और प्रशिक्षण विहीन वातावरण में ढले व्यक्ति भी पशु-प्रवृत्ति में जकड़े रहे तो इसके लिए वही दोषी नहीं अपराधी वह है जिन्होंने उन्हे जन्म दिया, वातावरण दिया।

ब्रेलैझड दम्पति के इस फार्म में लोमड़ी, गिलहरी, बिल्ली, चूहे, चूजे, नेबले, सुअर, बन्दर आदि विभिन्न स्वभाव, आहार बिहार और अभिरुचि वाले जीव-जन्तुओं की भरती प्रारम्भ की। उनकी नियमित कक्षाये चलने लगी। इन दिनों इसने विश्व विद्यालय का सा रुप ले लिया है और उसमें रह गये जीवों की संख्या दस हजार से उपर हो गई है। प्रशिक्षण के विषयों में जहाँ उनकी बौद्धिक प्रतिभा का विकास सम्मिलित है वही उनके प्रकृतिजन्य स्वभाव के ठीक विपरीत उन गुणों का सम्बन्ध भी सम्मिलित है जो जीव विशेष की प्रकृति से बिलकुल भिन्न और विलक्षण हो।

उनके कार्य में आप देखगे कि घरेलू नौकर के सभी कार्य उनके प्रर्शििक्षण पशु करते है जिसकी आप को कल्पना तक न हो। उदाहरणार्थ प्रशिक्षित सुअरिया उनके गन्दे कपड़े इकट्टे करके लान्ड्री के धुलने के लिए डाल आती है। उनकी चौकीदार का काम जो सामन्यतः कुत्ते करते है, वह काम एक भेड़ करती है, उसको ऐसा प्रशिक्षित किया मानो वह कुत्ता ही हो। जैसे कुत्ता मनुष्य के साथ-साथ खाता है, वैसे ही भेड ब्रेलैण्ड दम्पत्ति के साथ खाती है। उन्होंने लोमड़ी को ट्रेन्ड किया जो अंगूरों के लिए उछला करती है। (पीरपोयज) मछलियों को ‘कैच’ करना सिखाया, नेवले को गेंद फेंकना सिखया और खरगोश को बच्चों वाली बैक में पैसे डालना सिखाया। रुस के प्रसिद्ध मनोविज्ञानी ‘पैवलाव’ के ‘कन्डीशन्ड रेंफजैंस’ सिद्धान्त का उपयोग प्राणियों को प्रशिक्षित करने में किया जाता है।

ब्रेलैण्ड ने एक स्वसंचालित ‘फीडर’ बनाया। बटन दबाने से घण्टी बजती है और उसके साथ-साथ कुछ खाने की चीज निकलती है। घण्टी बजते ही खाने की वस्तु मिलना-इन दो चीजों की चूजों के दिमाग में ताल बैठाना पहला काम है। चूजों को बोतल के पास जाकर टक-टक करना सिखाने के लिए उन्होंने पहले घण्टी बजाई खाना निकाला और ‘चिकेन’ भाग कर खाना खाने गया उसके कुछ और चाहिए था इसलिए वह ठहर गया, जैसे ही वापस होने के लिए मुड़ा, बटन दबा दिया और वह दुबारा खाने के लिए दौड़ पड़ा। दूसरी चीज उसने यह सीखी जब तक पीछे नहीं मुडे़गा, तब तक खाना नहीं मिलेगा। फिर उसने धीरे-धीरे चूजे को बोतल की ओर जाना सिखाया पहले बोतल की दिशा में एक पग बढ़ाया तभी बटन दबा दिया, दुबारा कुछ अधिक पग चला तो बटन दबाया और क्रमशः इसी प्रकार बोतल की ओर चलने की बात उसके दिमाग में बैठाई गई। इस प्रयोग से ‘चकेन’ के मस्तिष्क में यह बात जमाई गईं कि खाना अचानक नहीं मिलता, विशेष प्रकार का काम करने से मिलता है। आखिर में वह बोतल तक पहुँचने के बाद जैसा कि उसका स्वभाव होता है बोतल पर एक बार टक करने पर खाना दिया गया, फिर दो बार टक करने पर खाना दिया गया। 15 मिनट तक प्रयास करने के बाद खाली बोतल को देखते ही उसको खाना मिलेगा। यह बात उसके दिमाग में बैठ गई और जब तक बोतल के पास जाकर इच्छित संख्या में टक-टक न कर लेता तब तक उसे चैन नहीं मिलता था।

प्राणियों को प्रशिक्षित करने में सफलता प्राप्त करने का यह मूल सिद्धान्त है। फिर तो चिड़ियाघरों में, मेलों में, प्रदर्शनियों में एवं टेलीविजन पर कार्यक्रम देने के लिए ब्रेलैण्ड दम्पत्ति को बुलाया जाने लगा और अन्ततः उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।

बे्रलेण्ड दम्पत्ति ने विभिन्न प्राणियों के साथ किये गये विभिन्न परीक्षणों से यह पता लगाया है कि मनुष्य की अपेक्षा अन्य प्राणी बुद्धि तत्व का विकास न होने पर भी चतुरता में पीछे नहीं है। अगर पशुओं के प्रशिक्षित करने से उनकी प्रसुप्त क्षमता उभर सकती है तो मनुष्य की प्रसुप्त शक्तियों की जागरण की कितनी अकल्प्य सम्भावना हो सकती है।

रीडर्स डाइर्जस्ट के नवम्बर 1957 अंक में इस विलक्षण पाठशाला के प्रत्यक्षदर्शी जर्मन विद्वान इरा-बुलफर्ट ने अपनी साक्षी-प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि धरती का हर व्यक्ति न्यूटन, आइन्स्टीन, हम्फ्रीडैबी यूक्लिड मडाम क्यूरी, नील्सवोहर और कूले और वैज्ञानिक, नैपोलियन बोना पार्ट, नेल्सन, राणा प्रताप, शिवाजी और जानआँफ आक्र की तरह का देशभक्त, वीर योदा, सुकरात, नीत्से, सन्त फ्रान्सिस अरस्तू, जरथुस्त्र, कन्फ्युसस इमर्सन स्वाईत्जर, बुद्ध, ईसा और महात्मा गाँधी जैसा विचारक, कालिदास, शेक्सपियर और बैंजामिन फ्रैंकलिन जैसा साहित्कार बन सकता है तथ्य एक ही है कि उसे प्रशिक्षण मिले-वातावरण मिले-इस सत्य को यह अजायबघर देख कर कोई भी स्वीकार से इन्कार न करेगा।

“मैंने एक सफेद, स्वस्थ एवं सुन्दर चूजे से पूछा, ‘21 को 7 से’ भाग देने पर क्या मिला है?’ उसने अपनी चोंच से तीन बार टक-टक करके उत्तर दिया ‘3’।

दूसरा प्रश्न पूछा गया कि 16 का वर्गमूल कितना होता है, टक-टक से जवाब मिला ‘चार’। आप सोचेगे कि क्या यह र्बुिद्धमान चूजा थाद्य नहीं यह तो एक ‘टिक’ है। आर्श्चय की बात तो यह है कि चूजे को यह बात सिखाने के लिए मूझे केवल 15 मिनट लगे ऐसा केलर मेरियन ब्रेलैण्ड दम्पत्ति पशु-शिक्षक ने कहा है। पिछले 10 वर्षों में उन्होने 28 विभिन्न जातियों के 5000 पशुओं को प्रशिक्षित किया है। ऐसे करते हुए जिन्होंने पशु-मनोविज्ञान के अनेकों तथ्य खोजे है जिनका उपयोग करके कोई भी अपने पालतू पुशओं को ही नहीं मनुष्य को भी प्रशिक्षित कर सकता है।

इस तथ्य का ठीक विरोधी पक्ष यह है कि यदि मनुष्य को वातावरण ही पुशओं का-सा मिले तब तो वह वैसा बनेगा ही। सन् 1857 में उत्तर प्रदेश के बुलन्द शहर जिले के जंगलों में एक शिकारी दल ने लगभग 8 वर्षीय बालक ‘दीना शनीचर’ पकड़ा था। शनिवार के दिन पकड़े जाने के कारण उसको ‘दीना शनीचर’ के नाम से सम्बोधित किया गया। उसे आगरा के समीप सिकन्दरा के ईसाई मिशन अनाथालय में ले जाया गया। 1873 में भारतीय भू-सर्वेक्षण के वैज्ञानिक बी. बाल ने उसका पूरी तरह निरीक्षण किया तथा उसके क्रिया-कलाप भेडियें जैसे पाये। बहुत प्रयास करने पर भी वह लिखना, पढ़ना, बोलना नहीं सीख सका। 29 अक्टूबर 1865 को टी. बी. रोग से उसकी मृत्यु हो गई।

मथुरा के जंगलों में एक अँगेंज अधिकारी ‘टामस स्मिथ’ ने 1905 ई. ‘मानसिंह’ नामक एक अद्भुत भेड़िया बालक को भेड़ियों के चुगल से निकाला था। वह बहुत कठिनाई से सामान्य जीवन जीना सीख पाया, कुछ शब्द भी वह बोलने लगा था। बहुत प्रयत्न करने पर वह कुछ गीत भी गाने लगा था किन्तु अन्ततः वह पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाया, जीवन की काफी अवधि तक रहने पर 1960 में 65 वर्षों की आयु में अलीगढ़ के समीप बन्ना देवी मुहल्ले में रेवरेंड नोबलडेविड के यहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

इसी प्रकार आगरा जिले के नगला नामक गाँव के बाबूलाल जाधव 1॥ वर्ष के ‘परशुराम’ नाम के बच्चे को मई 1950 में भेडियें उठा ले गये थे। अप्रैल 1957 में उत्तर प्रदेश के खंडौली के जंगलों में सैनिकों ने उसे पकड़कर फीरोजाबाद अस्पताल में भरती करा दिया था। शिकागों विश्वविद्यालय के प्रो. विलियम एफ. ओगवर्न ने ‘परशुराम’ की जाँच करके बताया कि मादा-भेड़िया अपने बच्चों के खो जाने या मर जाने के कारण वात्सल्य भावना की तृप्ति के लिए उसका पोषण करने लगी। उसकी चिकित्सा के लिए उन्होंने सुझाव दिया परन्तु परशुराम के माता-पिता ने अस्वीकार कर दिया नया 1930 में ही उसकी भी चेचक से मृत्यु हो गई।

सन् 1954 में लखनऊ के सरकारी अस्पताल के ‘राम’ नामक भेड़िया बालक को विश्व भर के लोगों का आकर्षण केन्द्र बन गया। लन्दन स्कूल आँफ ट्राँपिकल मेडीशिन के सर फिलिप मेन्सन-बार ने ‘राम’ की अच्छी तरह जाँच करके बताया कि उसमें भेड़िये के गुण और लक्षण थे तथा उसे मानवी संस्कार दिया जाना सम्ीव न हो सका। मिरगी के दौरों से अप्रैल 1968 में वह मृत्यु का ग्रास बन गया।

अभी कुछ दिन पहले लखनऊ के मदर टेरेसा के ‘होम फार डाईगं डेस्टीट्यूट्स’ में ‘भालू नामक एक जंगली बालक सुल्तानपुर के जंगलों से पकड़ कर लाया गया। मदर टेरेसा के ‘प्रेम-निवास’ में उस भालू बालक का नाम ‘पास्कल’ रख लिया गया हैं प्रारम्भ में वह भालू जैसे विचित्र ढ़गं से चला था और गुर्राता था, परन्तु अब वह नौ वर्षीय ‘पास्कल’ दाल-भात खाने लगा है तथा कपडे़ भी पहनना पसन्द करने लगा है। कहा जाता है कि इस अनाथ बालक को वात्सल्य भावनामयी मादा भालू ने अपना स्तन-पान कराके पाला। यही बालक आज नोबुल पुरस्कार प्राप्त मदरटेरेसा के आश्रम के प्राँगण में उछलता, कूदता, खेलता है।

कुछ भी हो भेड़िये, भालू भी वात्सल्य स्नेह-दुलार से रहित नहीं है वर्तमान में मनुष्य ही इन दिव्य भावनाओं से रिक्त होता जा रहा है तथा अपनी मानवीय गरिमा को खोता जा रहा है।

दक्षिण और बाम-जीवन के दोनों ही पक्ष है दोनों की जिम्मेदारी आज के मनुष्य समाज पर है, वह चाहें तो दैवी प्रकृति के मनुष्य विकसित करने वाला संस्कार सम्पन्न वातावरण भी बना सकता है और अपराधी आसुरी परिस्थितियाँ भी। यह अलग बात है कि उसके अच्छे बुरे परिणाम भी उसे और आने वाली पीढ़ी को भुगतना ही पडे़गा। अच्छा हो ब्रेलैण्ड दम्पत्ति की तरह हम भी आने वाली पीढ़ी को सुयोग्य नागरिक बनाने का महान कार्य सम्पन्न कर आज की नारकीय परिस्थितियों को स्वर्गीय वातावरण में बदलने का पुण्य प्राप्त करे।


ग्रहों के प्रभाव का लाभ उठायें

अपने पुरुषार्थ के बलबूते मनुष्य परिस्थितियों का सृजन कर सकता है। यह मान्यता एक सीमा तक ही सच है। सृष्टि के प्रत्येक घटक एक-दूसरे से अभिन्न रुप में जुडे़ हुए है। उनकी अलग-अलग परिस्थितियाँ है। पर अविच्छिन्न अंग होने के कारण एक की स्थिति का दूसरे के ऊपर प्रभाव प्रड़ता है। मनुष्य का भौतिक प्रयास अपने समीपवर्ती वातावरण को अनुकुल बनाने में समर्थ हो सकता है। यह सच तो है किन्तु अन्य ग्रहों के प्रभावों से भी वह नहीं बच सकता। भौतिक प्रयत्नों द्वारा अन्तः ग्रही प्रभावों का रोका जा सके, यह सम्भव नहीं है। इन अर्थो में उसका भाग्य समष्टि के साथ जुड़ा हुआ है। ग्रह-नक्षत्रों के कुप्रभावों को रोकने के लिए व्यक्तिगत भौतिक प्रयासों की तुलना में सामूहिक अध्यात्मिक पुरुषार्थ ही अधिक सफल एवं समर्थ होते है।

अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग की अलवुक्र के स्थित साँड़िया प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए कि सौर-मण्डल की गतिविधियों का पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है, विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने अपराधों एवं दुर्घटनाओं सम्बन्धित बीस वर्षों के आँकड़ें एकत्रित किये। 88 पृष्ठों की एक लम्बी रिपोर्ट तैयार हुई। इस रिपोर्ट से निर्ष्कष निकाला गया कि सौर-क्रियाओं एवं चन्द्रमा की कलाओं का मानव व्यवहार एवं दुर्घटनाओं पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इन वैज्ञानिकों ने सूर्य के घूमने के कारण पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाली 27 दिन के चक्र की गड़बड़ी से भी दुर्घटनाओं का सम्बन्ध जोड़ा है। गहन पर्यवेक्षण के उपरान्त यह मालूम हुआ कि इस चक्र के प्रथम 7 दिन, 13 वे, 14 वे, 20 वे तथा 25 वे दिन अधिक दुर्घटनाएँ हुई।

मियामी यूनिवर्सिटी के दो मनोवैज्ञानिकों आर्नोल्ड लीवर और कैकोलिन शेरिन ने अमेरिकन जर्नल आँफ साइकियाट्री विभाग में चन्द्रमा की कलाओं का मनुष्य के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है की ढूँढ़ खोज की। प्राप्त तथ्यों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि चन्द्रमा का प्रभाव न केवल ज्वारभाटों के रुप में-समुद्र में दिखाई पड़ता है वरन् मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर भी पड़ता है। पूर्णिमा के तीन दिन पूर्व से हत्याओं की दर बढ़ने लगती है। पूर्णिमा के दिन सर्वाधिक हत्याओं एवं आत्म-हत्याओं की घटनाएँ घटित होती है। पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगियों की व्यग्रता और भी बढ़ जाती है। कुछ तो हिंसा आदि पर उतारु हो जाते है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मान्यता है कि पूर्णिमा क दिन बैलों का बधिया नहीं करानी चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र के सर्जरी विशेषज्ञों का भी अनेकों प्रयोगों के उपरान्त यह निर्ष्कष है कि पूर्णिमा के दिन आपरेशन आदि करने पर शरीर से रक्त का स्त्राव अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक होता है। इसका कारण पूर्ण रुप से स्पष्ट तो नहीं हो सका है, पर ऐसा विश्वास किया जाता है कि पूर्णिमा के दिन विशेष प्रकार की किरणें अधिक मात्रा में आती है जिससे रक्त स्त्राव को रोकने वाले रक्त में विद्यमान प्लैटलेट कार्य बन्द हो जाता है। फलस्वरुप रक्त अधिक निकलता है। उपरोक्त अध्ययन में यह पाया गया कि हर चौदहवे महीने जब सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी पर सबसे अधिक गुरुत्वाकर्षण डालते है, अपराधों की संया बढ़ जाती है। इन दिनों मस्तिकष्क के न्यरान्स की सक्रियता अधिक हो जाती है। “चन्द्रमा मनसोजायत्” इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है।

‘द केस फार एस्ट्रालेजी’ नामक पुस्तक में अनेकों उद्वरण पृथ्वी के वातावरण जीवों, वृक्ष, वनस्पतियों, ग्रह-नक्षत्रों के पड़ने वाले प्रभावों के दिये हुए है। वैज्ञानिक फ्रेंक ए. ब्राउन ने सिद्ध किया है कि मटर के दाने, आलू, चूहे, केकड़े एवं सीपियाँ सभी सूर्य एवं चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होते है। इन प्रभावों का सूर्य प्रकाश से कोई सम्बन्ध नहीं है। जीवों को अँधेरी कोठरी में भी बन्द कर दिया तो भी उनकी क्रियाएँ। उसी प्रकार चलती रहती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि सूर्य एवं चन्द्रमा की गति का प्रभाव जीवों पर पड़ता है न कि उनके प्रकाश का। इस तथ्य को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के लिए ब्राउन ने एक प्रयोग किया। समुद्र से हजारों मील दूर सीपियों को अँधेरी कोठरी में रखा। पर उनके खुलने एवं बन्द होने के क्रम एवं समय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया।

भौतिकविद् जान एलसन ने एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उल्लेख किया कि रेडियों प्रसारण में बाधा डालने वाले आयन मण्डल से आने वाले तूफानों का सूर्य के सर्न्दभ में ग्रहों की स्थिति से सीधा सम्बन्ध है। जब भी दो या दो से अधिक ग्रह सूर्य की राशि में होते है तो उनमें 180 अंश और 90 अंश दूर राशि में ऐसे ही तूफान आते ळै और जब कई ग्रह सर्य की राशि से 60 अंश या 120 अंश की दूरी पर होते है तो आयन मण्डल शान्त रहता है। पाश्चात्य ज्योतिष शास्त्र की भी मान्यता है कि 90 अंश और 180 अंश का सम्बन्ध कठोर से और 60 अंश या 120 अंश का कोमल से होता है।

ग्रहों का भला, बुरा प्रभाव भी सर्वत्र एक जैसा नहीं दिखाई पड़ता है। यदि ऐसा होता तो सभी स्थानों पर समुद्री ज्वार-भाटे एक समय ही आते। तूफान, भूकम्प की घटनाएँ भी एक साथ सर्वत्र घटित होती। इसका कारण पृथ्वी के विभिन्न भागों का सूर्य एवं चन्द्र के विभिन्न अक्षाँसो पर पड़ता है। इटली के रसायनविद् पिच्चादी ने सन् 1958 में सिद्ध किया कि रासायनिक क्रियाएँ भी सूर्य एवं चन्द्र की गति से प्रभावित होती है। फसलों, फलों के अन्दर विद्यामान जीवन तत्वों पर भी इस गति की प्रतिक्रिया होती है। मौसम के अनुरुप पैदा होने वाले फलों, खाद्यान्नों को इसलिए स्वास्थ्यवर्धक माना गया है कि सूर्य राशि का कोमल प्रभाव उन पर पड़ता है।

इस तथ्य की पुष्टि के लिए रासायनिक क्रियाएँ सदा एक जैसी होती है अथवा भिन्न, अनेकों प्रयोग किये गये। पानी में घुले विस्मथ आक्सी क्लोराइड के तले में बैठने का समय नापने के लिए एक सामान्य प्रयोग 7 वर्षों के भीतर दो लाख बार विभिन्न प्रयोगशालाओं में सम्पन्न किया गया। प्रयोगों द्वारा सिद्ध हुआ कि विस्मथ आक्सी क्लोराइड के तली में बैठने का समय ग्रहों की स्थिति एंव सूर्य राशि के परिर्वतन के अनुसार बदलता रहता है। मार्च माह में यह गति सबसे धीमी होती है। रसायनविद् ‘पिच्चादी’ ने यह निर्ष्कष निकाला कि अर्न्तग्रही चुम्बकीय तरगों की प्रतिक्रिया पानी में विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती हैं। इसी कारण रासायनिक क्रियाओं की गति में भी भिन्नता पायी जाती है।

अन्य ग्रहों की चुम्बकीय शक्ति के थोड़े हेर-फेर से पृथ्वी पर भारी विप्लव उत्पन्न हो जाता है। 1960 के बाद बंगाल की खाड़ी में आठ बार समुद्री लहरें उठी। जिसके फलस्वरुप चार लाख व्यक्ति मारे गये। सन् 1967 में महाराष्ट्रक का कोयना नगर भूकम्प से नष्ट हो गया। यह दुर्घटना दक्षिण के उस पठार में हुई जिसे भू-विज्ञानी भूकम्पों से मुक्त बताते है। 19 जनवरी 1975 को काँगड़ा की घाटी किन्नौर में भीषण भूकम्प आया। चीन में आये भूकम्प से लाखों व्यक्ति मारे गये। सन् 78 में आन्ध्र में आये साइक्लोन ने हजारों व्यक्तियों की जाने ली। इन सभी दुर्घटनाओं के पर्यवेक्षण के उपरान्त वैज्ञानिकों ने पाया कि उक्त स्थानों पर अन्तरिक्ष से आने वाले रेडियों विकिरण की बहुलता थी। इन स्थानों पर सूर्य 90 अंश और 180 अंश की राशि पर अवस्थित था। भौतिकविद् जान एलसन के अनुसार सूर्य जब इन राशियों पर होता है तो उसके सीध में पड़ने वाले भू-भाग पर तूफान, भूकम्प की घटनाएँ घटित होती है।

यह तक्र किया जा सकता है कि यह प्रभाव सर्वत्र सभी प्राणियों पर या भू-भाग पर एक जैसा क्यों नहीं पड़ता? उत्तर स्पष्ट है-आग फेकी जाये तो स्वाभाविक है सूखी लकड़ियों वाले स्थान में लग जायेगी, पानी में वही बूझ जायेगी और चट्टान में तब तक सुलगेगी जब तक वह स्वतः मन्द न पड़ जाये। पानी बरसता है। तो मिट्टी देर तक गीली रहती है, पर चिकने संगमरमर को वर्षा के तुरन्त बाद ही सूखा देखा जा सकता है। व जन-समुदाय की शारीरिक बनावट, मानसिक स्थिति और अनेक परिस्थितियाँ अलग-अलग प्रभाव के लिए जिम्मेदार होती है। वर्षा से पूर्व किसान अपने खतों को पूरी तरह साफ छोड़ देते है ताकि समूची जमीन जी भर कर पानी पी ले सामूहिक रुप से ग्रह-नक्षत्रों से भाग यह उदाहरण है जिसका लाभ यह देश सदैव लेता रहा।

अर्न्तग्रही कुप्रभावों को सामूहिक आध्यात्मिक उपचारों द्धारा रोका जा सकता है। ग्रहण आदि के समय में उपासना, साधना की भारतीय परम्परा रही है जो इसी तथ्य की पुष्टि करती है कि उस अवसर सूर्य एवं चन्द्रमा से निस्सृत होने वाले हानिकारक विकिरणों से सुरक्षा की जा सके। कब किस ग्रह की क्या स्थिति है? उनके आपसी गठबन्धन की स्थिति का पृथ्वी पर-मुनष्य जाति पर क्या प्रभाव पडे़गा इसे जानने के लिए आधुनिक वेधशाला का योगदान आवश्यक है। हर क्षण उनकी चाल में होने वाले परिवर्तनों का सही अध्ययन तभी किया जा सकता हैं।

गायत्री नगर में आधुनिक यन्त्रों से सुसज्जित वेधशाला का निर्माण इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है। ताकि सौर मण्डल की गतिविधियों एवं उनके पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों का सही अध्ययन किया जा सके। उसी आधार पर कुप्रभावों से बचने के लिए आध्यात्मिक उपचारों की भी व्यवस्था बनाई जा रही है। प्रकृति विप्लवों को रोकने में यह सामूहिक साधना, उपचार प्रणाली समर्थ सिद्ध होगी।


वहाँ मूँगफली के छिलके पडे़ हुए हैं (kahani)

अध्यापक जब कक्षा में आये तो उन्होंने पाया कि वहाँ मूँगफली के छिलके पडे़ हुए हैं। उन्होंने गुस्से में भर कर पूछा-’किसने की है यह गन्दगी?’

किसी भी छात्र की बोलने की हिम्मत न हुई। सभी को पता था कि क्रोधित होने पर वे बेंत से मारते है। कुछ पल की चुप्पी के बाद अध्यापक बोले।

‘ठीक है, कोई नहीं बोलता तो मैं सभी की बेंत से पिटाई करता हूँ।’ और उन्होंने सबसे आगे वाले छात्र को हथेली फैलाने का इशारा किया। जैसे ही उन्होंने मारने के लिए बेंत उठाया, कक्षा का एक छात्र बोल पड़ा, ‘गुरुजी रुकिये।’ उठा हुआ बेंत सहसा रुक गया। सभी की निगाहें उस छात्र पर जम गयी।

छात्र कह रहा था-’गुरुजी! दोषी मैं हूँ। मैंने मूँगफली के छिलके डाले है। दण्ड मुझे दीजिये।’

‘पर तुम तो ऐसा अपराध करते नहीं’ आर्श्चयचकित होकर कक्षा के उस मेधावी छात्र से गुरु ने पूछा।

‘जैसे ही मैं इन छिलकों को फेंक रहा था कि घण्टी बज गयी और आप गये।’ छात्र ने अपराध का कारण स्पष्ट किया।

‘तो जाओं अब इन छिलकों को बाहर फेंक आओ।’ अध्यापक ने कहा।

कक्षा के सभी छात्रों ने मन-ही-मन इस सत्यवादिता के लिए धन्यवाद दिया क्योंकि इसी कारण वे सभी बेंत खाने से बच गये थे।

गुरुजी भी कह रहे थे-’तुमने मार का भी भय छोड़कर सत्य बोला है। इसलिये अब तुम्हें किसी प्रकार का दण्ड नहीं मिलेगा।’

यह बाल गंगाधर तिलक थे जिनकी यह सत्यनिष्ठा उन्हें आज भी जन श्रद्धा का पात्र बनाये हुए है।


यंत्र मानवों की गुलामी के लिए तैयार रहें

विज्ञान ने मनुष्य को अगणित सुविधा-साधनों से सम्पन्न बनाया है। पूर्वकाल में जीवन जितना जटिल था, उतनी जटिलताएँ अब नहीं रही और वर्षों में सम्पन्न होन वाले काम अब मिनटों, सैकिण्डों में होने लगे हैं। यात्रा, यातायात, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्पक्र और ऐसे ही अन्यान्य क्षेत्रों में विज्ञान ने मनुष्य को ऐसे-ऐसे अवदान दिए है कि उसकी दुनिया सिमट कर न केवल एक मुहल्ले जैसी बन गई है, बल्कि जिन सुविधाओं की पहले कल्पना भर की जाती थी, वे अब सत्य -साकार होने लगी है।

यान्त्रिक प्रगति ने मनुष्य जीवन की जटिलता को हल किया है और उसके श्रम को सरल बनाया है। प्रगति का यह एक पहलू है। इसका एक दूसरा पहलू भी हैं पहला पक्ष जितना उज्जवल है, दूसरा पक्ष उतना ही अन्धकारपूर्ण है। दूसरा पहलू यह है कि मशीने निरन्तर मनुष्य का श्रम छीनती जा रही है और एक तरह से मनुष्य को बेकार बनाती चली जा रही है। इसका एक छोटा-सा उदाहरण तो यही है कि अब पच्चीस-तीस साल पहले लोग दो-चार मील की यात्रा यों ही पैदल चलते हुए ही पूरी कर लेते थें वाहनों की सुविधा जब सरलता से उपलब्ध होने लगी तो मनुष्य चलने के मामले में इतना आलसी होता गया कि अब एकाध किलोमीटर दूर जाना हो तो भी रिक्शा, ताँगा या बस, स्कूटर का इन्तजार किया जाता हैं।

पिछले दिनों सुविधा साधनों की श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ी है वह है यन्त्र मानव की। अब तक कम्प्यूटर से हिसाब-किताब का काम लिया जाता था, लिखने-पढ़ने के लिए भी विविध उपकरण तैयार किये जा चुके है, परन्तु जब से यन्त्र मानव का निर्माण हुआ है तब से मनुष्य सभ्यता के भविष्य को लेकर अनेक प्रश्न चिन्ह उठाए जाने लगे है। प्रसिद्ध अँग्रेज समाज शास्त्री पी. क्लिएटर ने तो इन यन्त्र मानवों के विकास को परमाणु संकट से भी अधिक गम्भीर बताया है। नोर्बट वाइनेर ने लिखा है परमाणु बमों और आणविक अस्त्रों के खतरों के प्रति लोगों के जागरुक होने से भी ज्यादा हमें इस बात के लिए सतक्र हो जाना चाहिए कि मनुष्य को बुरी तरह प्रभावित करने वाली एक और शक्ति गम्भीर चुनौती के रुप में सामने प्रस्तुत हो रही है।

क्या है यन्त्र माव? उनसे मनुष्य को किस प्रकार के खतरे है? यह विचारणीय है। पिछलें तीस वर्षों में कम्प्यूटरों का तेजी से विकास हुआ है। इन्हें दिमागी यन्त्र या बौद्धिक मशीने कहा जा सकता है। इस तकनीक का विकास मुख्य रुप से दूसरे महायुद्ध के बाद से हुआ है और विज्ञान की एक नई ही शाखा अस्तित्व में आई है। विज्ञान की इस शाखा को ‘साइबरनेटिक्स’ कहते है। इसी शाखा के वैज्ञानिकों ने यन्त्र मानवों का निर्माण किया हैं। दूसरे महायुद्ध के समय से ही इस प्रकार के यन्त्र मानवों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए हार्वर्ड के प्रोफेसर होवोर्ड ऐकेन ने ‘माक्रवन’ नामक कम्प्यूटर का निर्माण किया था। इस कम्प्यूटर का भार लगभग साढे़ चार मैट्रिक टन था और इसमें करीब 80 यन्त्रों को 800 किलोमीटर लम्बे तारों से जोड़ा गया था। यह कम्प्यूटर एक चौथाई सैकिण्ड में जोड़ देता था और इतनी बड़ी संख्या का गुणा छह सैकिण्ड में कर देता था।

आरम्भ में इसी तरह के भारी भरकम कम्प्यूटर बनाये गए। परन्तु पाँचवें और छठवें दशक में न केवल छोटे कम्प्यूटर बना पाना सम्भव हो गया वरन् उनकी कार्य क्षमता भी कई गुना बढ़ गई। पहली बार जो कम्प्यूटर बने वे आकर में बहुत बडे़ और संरचना की दृष्टि से अब की अपेक्षा बहुत जटिल थे। अब जबकि उनको निर्माण विधि में काफी सुधार हुआ है तो पहले की अपेक्षा वे सुविधाजनक और सरल हो गये है। अब तो ऐसे कम्प्यूटर बनाये जाने लगे है जो एक सैकिण्ड में कई अरब संख्याओं का हिसाब-किताब लगा सकते है। किन्तु अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि कम्प्यूटरों का विकास चरम स्थिति में पहुँच गया है, इन दिनों इलेक्ट्राँनिक पद्धति से कम्प्यूटर बनाये जाते है। आगे चलकर लेसर किरणों का उपयोग कम्प्यूटरों के निर्माण में किये जाने की बात सोची जा रही है। अब तो ऐसे कम्प्यूटर बनने लगे है, जिन्हें रेडियों और ट्रान्जिस्टर सेट की तरह आसानी से कहीं भी लाया ले जाया जा सकता है। उनकी कार्य क्षमता में भविष्य में और भी अधिक प्रगति होने की सम्भावना है।

जिन यन्त्र मानवों की चर्चा ऊपर की पंक्तियों में की गई है व और कुछ नहीं कम्प्यूटर चालित मशीन ही है वे सारे काम कर सकेगे जिन्हे मनुष्य करता है। कम्प्यूटरों का विकास मानव मस्तिष्क के अनुकरण करने की दिशा में होगा। इनमें स्मृति कोशों में अधिक जानकारी संचित रखने में और अधिक तेजी से सोचने में, जटिलतम गणनाएँ करने में समर्थ होगें। इनमें अब तक विकसित समाज, ज्ञान-विज्ञान का समावेश करना भी सम्भव हो जायेगा। अब तक ऐसे कम्प्यूटर भी अस्तित्व में आ चुके है जो एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद कर लेते है। पिछले दिनों डेनमाक्र में विश्वभर के कम्प्यूटर विशेषज्ञों का एक सम्मेलन हुआ, जिसमें इन बौद्धिक यन्त्रों की भावी सम्वेदनाओं के बारे में पूर्वानुमान प्रस्तुत किये गये। विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत पूर्वानुमानों के अनुसार सन् 2000 तक सभी प्रमुख उद्योग कम्प्यूटर की नियन्त्रण प्रक्रिया द्वारा संचालित होगे। बैंकों और दफ्तरों का सारा काम-काज कम्प्यूटरों द्वारा ही सम्पन्न किया जायगा। तब अधिकाँश चिकित्सक रोग निदान के लिए भी कम्प्यूटरों की मदद लेगे। फिर मनुष्य को उतना श्रम करने की आवश्यकता नहीं रहेगी, जितना कि वह आज करता हैं।

यन्त्र मानव जिन्हें ‘रोबोट’ कहा जता है, इन्हीं कम्प्यूटरों की अगली कड़ी है। कुछ समय पहले अमेरिका के एक कम्प्यूटर वैज्ञानिक बेनस्कोर ने ऐसा रोबोट बनाया है जो मनुष्यों की तरह काम करता हैं बेन स्कोर ने इन यन्त्र मानवों का नाम अराँक रखा है। अराँक क्या-क्या काम कर सकते है इसकी संक्षिप्त जनकारी इस प्रकार है कि वे एक बटन दबाने पर रसोईघर में जाते है और वहाँ से खाना उठा-उठाकर एक टे्र में रखते है और उस टे्र को लेकर धीरे-धीरे खाने की मेज तक जाते है। खाने की मेज पर ये रोबोट फिर तरकीब से मेहमानों के लिए खाना सजा देते है। यही नहीं आदेश देने पर वह कूड़ेदान तक जाता है, उसे उठाता है और बाहर जाकर कूड़ा ले जाने वाली गाड़ी में फेंक आता है। यही न ही अराँक कुत्तो को घुमाने, पालतू जानवरों को खिलाने का काम भी करते है।

उल्लेखनीय है कि चन्द्रतल पर पहलीबार जो चन्द्रयान उतरा था, मनुष्य के वहाँ पहुँचने से पहले उसका संचालन रोबोट ने ही किया था और मनुष्य के स्थान पर उन्हें ही चन्द्रतल पर उतारा गया है। अब रोबोटों के निर्माण में जिस तेजी से विकास हो रहा है और वे जो-जो काम सम्पन्न कर सकते है, उन्हें लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठाये जा रहे है। कुछ समय पहले चेक लेखक कारेल चापेक ने एक पुस्तक लिखी थी ‘रोस्सुम के रोबोट’ उस समय तक रोबोटो का निर्माण न हुआ था और न वैसी कल्पना ही की जा रही थी। परन्तु पुस्तक में जो तथ्य दिये गए है, रोबोटों की जो विशेषताएँ बताई गई है वे अब तैयार किये जा रहे रोबोटों से अक्षरशः मेल खाती है।

पुस्तक कहानी शैली में लिखी गई है। उसके कथानक का नायक है रोस्सुम नामक वैज्ञानिक जो अपने इन्जीनियर पुत्र की सहायता से यन्त्र मानवों के निर्माण की एक फैक्टी खेलता हैं। ये रोबोट मनुष्यों के समान बुद्धि सम्पन्न, बलशाली और स्मरण शक्ति सम्पन्न होते है। दस वर्षों के भीतर रोस्सुम के सार्वभौमिक रोबोट इतना अनाज पैदा कर लेते है, इतने कपडें़ तैयार कर लेते है, सब कुछ इतना अधिक उत्पन्न करते है कि चीजें लगभग मुफ्त मिलने लगती है। सारा काम यन्त्र मानव करते है और प्रत्येक व्यक्ति चिन्ता मुक्त होकर बेफिक्र जीवन व्यतीत करेगा, किसी को अधिक श्रम नहीं करना पडे़गा। इन रोबोटो का उत्पादन इतने व्यापक पैमाने पर होने लगेगा कि चारों ओर उन्हीं का साम्राज्य व्याप्त दिखाई देगा। कारेल चापेक ने कल्पना की है कि कुछ ऐसे यन्त्र मानव भी उत्पन्न हो सकते है जिनमें अतिरिक्त मानव विशेषताएँ होगी, जैसे पीड़ा को अनुभव करने की सोचने समझने की। इन विशेषताओं से सम्पन्न यन्त्र मानव सभी रोबोटो को मनुष्य के विरुद्ध संगठित करेगें और यह घोषणा करेगे कि हम मनुष्य से अधिक विकसित है, अधिक बलशाली है और मनुष्य हम पर निर्भर है।

रोबोटों में जब यह धारणा उत्पन्न होगी कि वे मनुष्य से अधिक उन्नत है और वास्तव में ऐसा होगा भी सही तो मनुष्य उनका गुलाम हो जायगा। मनुष्य की श्रम करने की आदत तो रहेगी नहीं, वह आलसी हो जायेगा। इसलिए स्वाभाविक होगा कि वह रोबोटो को नियन्त्रण में नहीं रख सकेगा और अन्ततः रोबोट विद्रोह कर देगे। वे धरती पर मनुष्य के अस्तित्व को आवश्यक नहीं समझेगे और अपने निर्माताओं को या तो नष्ट कर डालेगे या उसे अपना गुलाम बना लेगे।

प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक बियान आलिस ने कभी इसी प्रकार की कल्पना की है। उनकी कहानी में सभी आवश्यक काम रोबोटो द्वारा सम्पन्न होते है। खेती बाड़ी का काम भी इन्हीं यन्त्र मानवों के जिम्मे है। रोबोटों द्वारा मनुष्य के विरुद्ध किये गए विद्रोह के परिणाम स्वरुप जमीन उपजाउ बन गई है। उन्हे खाने-पीने की आवश्यकता तो है नहीं इसलिए वे अनाज पैदा न कर मनुष्य को निराश और बलहीन कर देते है।

यन्त्र मानवों के सम्बन्ध में ये कल्पनाए भले ही अतिरंजित हो किन्तु आज जो अतिरंजना लगती है, वह कल सम्भव हो जाए तो कोई आर्श्चय नहीं है। यहाँ तक तो सोचा जाने ही लगा है कि युद्ध में सैनिकों के स्थान पर रोबोटो का ही प्रयोग किया जाये। इन यन्त्रों मानवों में ऐसी काई विशेषता तो पैदा की जी जायेगी जिसेस वे साममियक मोर्चां पर परिस्थतियों के अनुसार निर्णय ले सके और उन्हें क्रियान्वित कर सके।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यन्त्र मानव कितने ही विकसित हो जाएँ, अन्ततः वे रहेगे मनुष्य पर ही निर्भर आइजक एसिमोव नामक एक अमेरिकी, विज्ञान कथा लेखक के अनुसार यह सम्भव नहीं है कि कोई रोबोट किसी आदमी को क्षति पहुँचाये या बिगड़ कर कोई नुकसान करे ऐसी सम्भावना लगभग नहीं के बराबर है। वे किसी भी स्थिति में अपने स्वामियों की आज्ञा का पालन करेगे। इतना अवश्य हो सकता है कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करने लगे।

यदि ऐसा भी सम्भाव हो जाए तो भी उससे मनुष्य जाति पर संकट की सम्भावनाएँ कम नहीं होती। यह बात और हे कि संकट का स्वरुप बदल जाये। वह संकट किस प्रकार का हो सकता है? इस सम्बन्ध में निश्चित और स्पष्ट कल्पना कुछ नहीं की जा सकती। अणु बम का आविष्कार करते समय किसने यह सोचा होगा कि यह निर्माण मनुष्य जाति के लिए अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर देगा? यन्त्र मानवों अथवा रोबोटो का निर्माण भले ही सुविधा साधनों के विकास की दृष्टिगत रखते हुए किया जा रहा है, परन्तु इस बात की क्या गारन्टी हे कि इनका दुरुपयोग नहीं होग? उदाहरण के लिए यन्त्र मानवों का सैनिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग युद्ध की विभीषिका को बढ़ाने वाला ही सिद्ध होगा। अभी तो युद्ध में लड़ने वाले सैनिक अपने बचाव को ध्यान में रखते हुए आक्रमण और प्रत्याक्रमण करते है। यन्त्र मानव तो अपने मालिक की इच्छाओं, आदेशों का पालन करेगे। उन्हें न अपने बचाव की चिन्ता होगी और न अपनी सुरक्षा की।

सैनिक प्रयोजनों के लिए, बलहीनों पर नियन्त्रण रखने के लिए यन्त्र मानवों का उपयोग अन्ततः थोड़े से लोगों के हाथों में समूची मानव जाति का भविष्य सौंप देगें। यह तो निश्चित है। जैसी कि कई वैज्ञानिक कल्पना करते है। यन्त्रों मानवों में सोचने समझने की क्षमता विकसित हो सकती है और वे आजाद होकर मनुष्य को अपना दास बना सकते है, यह कल्पना यहद साकार हो गई तब तो मनुष्य जाति स्वयं ही अपनी सामूहिक दासता को नियमन्त्रित कर रही है, यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।


शिक्षा का आदर्श क्या होना चाहिए?

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अनेक समस्याओं से ग्रस्त है। छात्रों में अनुशासनहीनता, अध्यापकों में अपने उत्तरदायित्वों के प्रति गैर गम्भीरता। आगे चल कर बेरोजगारी और ऐसी ही अनेक समस्याएँ भारतीय शिक्षा जगत में व्याप्त होगी, इनके कारणों की गहराई में जाया जाये तो प्रतीत होगा कि इन समस्याओं के मूल में प्रारम्भिक शिक्षा की उपेक्षा, नींव की कमजोरी, अयोग्य अध्यापकों की नियुक्ति, ध्येयहीनता तथा विद्यार्थियों में नित्य प्रति के अध्ययन कार्य की अवहेलना आदि कई कारण प्रतीत होगें। परन्तु मूल कारण है ध्येयहीनता, विद्यार्थी के सामने स्पष्ट नहीं रहता है कि उन्हं पढ़ कर क्या करना है? जो शिक्षा वे प्राप्त कर रहे है उसका उनके जीवन में क्या योगदान होगा? जीवन जीने में प्राप्त की जा रही शिक्षा की क्या भूमिका होगी?

शिक्षा से तार्त्पय मूलतः व्यक्तित्व के समग्र विकास से है। विद्वानों और मनीषियों ने शिक्षा की जो परिभाषाएँ की हे उन सबका समन्वित अर्थ व्यक्तित्व का समग्र विकास है। स्वामी वेवेकानन्द ने कहा है कि मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली प्रक्रिया का नाम ही शिक्षा है। इन परिभाषाओं को माप दण्ड मान कर वर्तमान शिक्षा पद्धति की कसौटी पर कसा जाये तो स्वाभाविक ही प्रश्न उठेगा कि-क्या यह वास्तव में शिक्षा है? और यदि नहीं तो क्यों?

यह बात सैकड़ों बार लिखी और हजारों बार दोहराई जा चुकी है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें अँगे्रजों से विरासत में मिली थी और अँग्रेजों ने इस शिक्षण प्रणाली का ढाँचा यह उद्देश्य सामने रखकर खड़ा किया था कि उन्हें अपना राज-काज चलाने के लिए सस्ते मूल्य पर देशी क्लक्र और बाबू मिल जाएँ। साथ ही भारतीय मानस में राजभक्ति के बीज बोना भी एक उद्देश्य था। अँगे्रज तो चले गये परन्तु वह शिक्षा पद्धति ज्यों की त्यों कायम है। कही कोई फेर बदल हुआ है तो वह भी नाम मात्र को ही और उसका परिणाम भी नगण्य-सा ही दिखाई देता है। यही कारण है कि पढ़ लिखकर, डिग्रियाँ प्राप्त करते ही छात्र नौकरियों की तलाश में दर-दर भटकते फिरते है। सरकारी कार्यालयों और निजी संस्थाओं में नाम मात्र को ही स्थान खाली होते है। जगहें कम और उम्मीदवार कई गुना अधिक स्वाभाविक ही बेकारी बढ़ती है और शिक्ष्खा प्राप्ति के बदले छात्रों का जो कुछ हाथ लगता है-वह बेकारी है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली की तुलना प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल पद्धति से करते है तो उसमें जमीन, आसमान का अन्तर दिखाई देता है। प्राचीनकाल में छात्र गुरुकुल से जहाँ सम्पूर्ण विकसित और प्रखरता सम्पन्न व्यक्तित्व लेकर निकलते थे, वहीं आज के शिक्षण स्ंस्थानों से संस्कारों के नाम पर उनकी स्थिति शून्यवत् ही रहती है। शिक्षा के सम्बन्ध में पद्धति ही नहीं दृष्टिकोण भी बदला जाने का ही परिणाम यह है कि प्राचीनकाल में गुरु जहाँ शिष्य के यक्तित्व विकास में पूरी-पूरी रुचि लेते थे, वहाँ आज अध्यापक विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से छात्रों को पढ़ाते है। उनके अध्यापन एक जीविकोपार्जन का साधन मात्र रहता है, उसका कोई आदर्श नहीं है। यही कारण हैकि आजकल कदम-कदम पर अध्यापकों को अपने छात्रों की उपेक्षा और अवहेलना का शिकार होना प्रड़ता है। प्राचीनकाल में शिष्य को माता-पिता के समान ही गुरु का सम्मान करना सिखाया जाता था, आज वह स्थिति कहाँ है? तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘मातृ देवों भाव’ ‘पितृ देवो भव’ के साथ ‘आचार्य देवों भव’ कहकर गुरु का महत्व माता-पिता के समान बताया हैं इतना ही नहीं अनेक स्थानों पर तो ‘गरु साक्षात् परब्रहमा’ कह कर उसकी सर्वोपरिता को भी स्वीकार किया गया है। वस्तुस्थिति भी ऐसी ही है। बालक के पालन-पोषण का कार्य माता-पिता करते है किन्तु उसे संस्कारवान बनाने, सुसभ्य नागरिक बनाना आचार्य की जिम्मेदारी हैं इस महान् उत्तरदायित्वों के कारण ही गुरु मनुष्य समाज का देवता माना गया और उसकी महत्ता सिद्ध करने में जितना जो कुछ लिखा गया, उसे कम समझा गया।

आज की स्थिति में गुरु का न वह महत्व है और न ही गुरु अपनी वह जिम्मेदारी अनुभव करते है। प्राचीन पद्धति के अनुसार बालक की बुद्धि का विकास आरम्भ हाते ही उसे योग्य गुरु को सौंप देने का विधान है। गुरुकुल पद्धति में विद्यार्थी पूर्ण शिक्षित होने तक अपने गुरु के समीप रहकर जहाँ अक्षर ज्ञान से लेकर साहित्य, भाषा, कला, भूगोल, दर्शन आदि का अध्ययन करते थे वहीं उन्हें चरित्र, सदाचार, निर्मलता, पवित्रता आदि की शिक्षा भी दी जाती थी। मानसिक शक्ति, विचार प्रोढ़ता, उत्तम स्वास्थ्य और शुद्ध जीवन लेकर स्नातक जिस क्षेत्र में भी प्रवेश करते थे उसी में एक कीर्तिमान स्थापित कर योग्य नागरिक कहलाने की स्थिति प्राप्त कर लेते थे।

आज की तरह उस समय अध्यापन या शिक्षण में कोई वृति नहीं थी। वह एक आदर्श थी और उस कार्य में उपयुक्त व्यक्तियों को ही लगाया जाता था। आज की तरह जिस-तिस को वाँछित शिक्षा या डिग्री प्राप्त कर लेने के बाद ही इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त नहीं किया जाता था, बल्कि यह गुरुतर भार उन्हीं व्यक्तियों को सौंपा जाता था जो अपने चरित्र और विद्वता को कसौटी पर कस कर पूर्णता प्राप्त कर लेते थे। इनका कुल प्रयोजन इतना ही था कि विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान, शास्त्रीय ज्ञान देने के साथ-साथ छात्रों को सद्गणों की क्रियात्मक शिक्षा भी दे सके। इसके पहले वे अपने उदात्त चरित्र का प्रमाण देते थे। जिनमें विद्यार्थियों के चरित्र और ज्ञान को परिपक्व बनाने की, उनके मन और जीवन को सत्प्रेणाएँ देकर उत्कृष्टता बनाने की क्षमता होती थी उन्हें ही आचार्यत्व का पद प्राप्त होता था।

ऐसे गुरु के सानिध्य में रहकर शिष्य साधनों का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोनिष्ठ होने से उनका शरीर, कुन्दन जैसा दैदीप्यमान होता था। साँसारिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें क्षमता होती थी। शिष्ट व्यवहार, परिस्थितियों का विवेचन और विश्लेषण कर ठोस समाधान के लिए उचित निर्णय लेने की क्षमता उनमें जगृत रहती थी। साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुणवान या ज्ञानवान होकर ही नहीं निकलत थे वरन् वे शक्ति पुत्र बनकर भी गुरु फल से साँसारिक जीवन में प्रवेश करते थे। फलस्वरुप उन्हे भौतिक सुखों की न तो इतनी स्पर्धा रहती थी और न ही वे अधिकार प्राप्त करने के लिए लालायित रहते थे। तब के स्नातक गुरुकुल से स्नातक होकर विदा के समय प्रतिज्ञा करते थे “मैं पृथ्वी पुत्र हूँ। भूमि मेरी माता है। मेरा जीवन मातृभूमि की सेवा में अर्पित रहेगा।” मैं लोक-कल्याण की सेवा के लिए समर्पित रहूँगा। सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान और शक्ति से उदीप्त रखने की मेरी चेष्टा रहेगीं गुरुदेव द्वारा मैंने जो ज्ञान और बल अर्जित किया है उससे अपने राष्ट्र को जीवन्त और जागृत रखूँगा।”

इस प्रतिज्ञा के एक-एक वाक्य से छात्र की बौद्धिक प्रतिभा, उदात्त भावना और उच्चतम अध्यात्मिक संस्कारों की सुगन्धि टपकती है। यह विशेषता छात्रों की अपनी विशेषता नहीं होती थी, बल्कि उनका व्यक्तित्व गुरुकुल के विद्यालयों में इस प्रकार का ढाला जाता था। श्रेय उन प्राचीन गुरुकुलों को ही दिया जाना चाहिए और उनके आचार्यों को ही मिलना चाहिए कि जहाँ जिनके सान्निध्य में रहकर मनुष्य न केवल आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के दार्शनिक और तात्विक ज्ञन से ओत-प्रोत बनता था, वरन् उनमें ऐसी शक्ति और प्रतिभा भी विकसित होती थी जो सारे समाज को उर्ध्वगामी बनाये रखने का आधार खड़ा करती थी।

आज की ठूटी-फूटी लकीर में, केवल शिक्षण की चिन्ह पूजा करने वाले विद्यालयों में छात्रों के स्तर चारित्रय और उनकी लक्ष्य हीनता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह निरी विडम्बना मात्र है। गुरुकुल के छात्रों में वह गम्भीर शक्ति होती थी जिसे आज का निर्बल और अशक्त छात्र वहन करने में भी शायद ही समर्थ हो सके। जिन्हें इस प्रकार शिक्षण की एक किरण का भी अनुमान है वे उसकी तेजस्विता और प्रखरता से अनभिज्ञ नहीं हो सकते। पाणिनी की तरह व्याकरण, पाँतजलि की तरह योग, चरक और सुश्रुत्त की तरह औषधि शास्त्र, मनु और याज्ञवल्क्य के मानव आचार शास्त्रों में आत्यन्तिक सूक्ष्म तत्वज्ञान और बौद्धिक शक्तियों का अवतरण गुरुकुल पद्धति से प्राप्त विशेषताओं की ही परिणिति है। गुरुकुलों मं ही आरण्यक और उपनिषदों की रचना हुई। पुराण और उपपुराण लिखे गये। प्राचीनकाल में भारतीय ज्ञान-विज्ञान कितना विलक्षण और परिपूर्ण रहा है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बिन्दु में सिन्धु, राई में पर्वत, अणु में विभु, गागर में सागर का साक्षात्कार यदि किसी की समझ में न चढ़े, इसकी सत्यता में यदि किसी को सन्देह हो तो भी विवेकानन्द के शब्दों में अतीत के गौरव को इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है कि इतनी उच्च कल्पना भी संसार में काई नहीं कर सका, हमने परमानन्द को र्स्वग से उतार कर अपनी जन्म भूमि में रख दिया। बड़े गर्व के साथ हम कह सकते है कि ईश्वर हमारा है, और हमारे भारतवर्ष का है और यह कहना कोई अतिरजना नहीं है, वरन् तादात्म्य की सही रुपरेखा है। इस देश के संकल्प बल के आगे देवता तो क्या परमात्मा को भी नत-मस्तक होना पड़ा हैं।”

गुरु के समीप रह कर जहाँ शिष्य इस तरह की ओजस्विता तथा तेजस्विता धारण करते थे , वहाँ गुरुविहीन पुरुषों की भर्त्सना भी होती थी। ‘निगुरा’ शब्द एक प्रकार की गाली समझी जाती थी। इसे एक प्रकार का सामाजिक अपराध समझा जाता था। इस अपराध से बचने के लिए माता-पिता पहले ही यह व्यवस्था बना लेते थे कि बालक को किसी आचारवान्, गुणवान और विद्वान गुरु के समीप, उसके संरक्षण में भेजा जाये ताकि बालक गुरु विहीन होने के अपराध से बच सके।

उस समय दी जाने वाली शिक्षा का जीवन से पूर्ण सम्बन्ध था। व्यक्ति के अज्ञान, किवा, अविद्या के नाश के अतिरिक्त उसके गुँण, कर्म, स्वभाव, आचार, विचार, दृष्टिकोण, बल, विवेक, चातुर्य में तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का विकास अर्थात् मनुष्य के व्यक्तिगत का सर्वागीण विकास ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए तप की समुचित व्यवस्था की जाती थी।

इस व्यवस्था द्वारा ज्ञानवान और बुद्धिमान आचार्यों के सम्पक्र में रह कर प्राचीनकाल में यहाँ के नागरिकों ने जो सर्वागपूर्ण शिक्षा प्राप्त की थी, इसी से वे अपने ज्ञान और संस्कृति को प्रकाशित रख सके, उसे गौरवास्पद बना सके। गुरुकुलों के रुप में पुनः वही प्रचलन आज के समय में भले ही स्म्भव और व्यवहार्य न हो, परन्तु उन विशेषताओं का समावेश तो किया ही जा सकता है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि आज भी जहाँ यह पद्धति किसी न किसी रुप में विद्यमान है, चरित्रवान और ज्ञानवान आचार्य तथा जिज्ञासु और समर्पित शिष्य जहाँ अध्यापन अध्ययन करते है, भले ही उनकी संख्या सीमित हो परन्तु वे लोक जीवन में अपने ढंग से प्रकाश उत्पन्न कर रहे हैं।

वर्तमान शिक्षा पद्धति के परिणामों की विवेचना करने पर यह सोचने के लिए बाध्य-सा हो जाना पड़ता है कि आज शिक्षा संस्थाएँ जिस रुप में चल रही है उससे क्या मानवीय जीवन की आवश्यकताएँ पूरी होली है? यदि नहीं तो क्या इसका परिवर्तन और सुधार नहीं किया जाना चाहिए? और यदि किया जाना चाहिए तो उसका स्वरुप क्या हो सकता है? उसका एक ही उत्तर है कि विद्यार्थी जीवन में तपश्चर्या, तत्परता और संयम भावना जागृत जाए। गुरु शिष्यों के सम्बन्ध में स्नेह, अपनत्व और आदर अनुशासन के मूल्यों की प्रतिष्ठा की जाए। इसके लिए सर्वप्रथम योग्य, विचारवान, दृढ़ चरित्र तथा प्राज्ञ अध्यापकों को ढूढ़ निकालना पडे़गा। शिक्षा की नींव जब तक चरित्रवान व्यक्तियों के हाथों में नहीं पडे़गी तब तक राष्ट्रीय जीवन के विकास की समस्या हल न हो सकेगी। राष्ट्र को ज्ञानवान, प्राणवान, शक्तिवान, समुत्रत और सुविकसित बनाने के लिए वर्तमान शिक्षा पद्धति में परिवर्तन नितान्त और अनिवार्य आवश्यक है।


परम्पराएँ नहीं उनकी प्रासंगिकता महत्वपूर्ण है

समय विशेष की आवश्यकता को देखकर किन्हीं प्रचलनों का सूत्रपात किया जाता है। कालान्तर में जब वे परिस्थितियाँ नहीं रह जाती तो परम्पराओं का महत्व भी समाप्त हो जाता है और वे रुढ़ियाँ बन जाती है। इन रुढ़ियों के निर्वाह से न व्यक्ति का भला होता है और न समाज का। इसके विपरीत रुढ़ियाँ लोगों का मूल्यवान समय, धन और श्रम तो बर्वाद करती ही है, कई प्रकार की जटिल समस्याएँ भी उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए विवाह संस्कार के समय सम्पन्न किये जाने वाले रीति-रिवाजो को ही लिया जायें। प्रासंगिकता के आधार पर उन्हें कसा जाए तो, वे रिवाज न केवल हानिकारक सिद्ध होते है, वरन् मूढ़ता का भी परिचय देते है।

दहेज, नेग-जोग अलन-चलन और ऐसी ही अनेक रस्मों का प्रचलन किसी समय की आवश्यकता रही होगी। किन्तु आज जब परिस्थितियाँ बदल चुकी है, लोंगों की स्थिति और आवश्यकता बदल चुकी है तो विवेक की कसौटी पर इन परम्पराओं की उपयोगिता सिद्ध होने के स्थन पर निरुपयोगिता ही सिद्ध होती है। इनके अतिरिक्त समाज में विवाह के समय जिन प्रथा- परम्पराओं का पालन किया जाता है, उनको विकसित समाजों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो अपना समाज बेहद पिछड़ा और आदिम ही प्रतीत होगा।

संसार के सभी देशों में विवाह का प्रचलन है, उनके रीति-रिवाजों में कई विभिन्नताएँ पाई जाती है। कुछ रिवाजों का स्वरुप तो इतना विचित्र है कि उन्हें जान पढ़कर हँसी ही छूटती है। इन रिवाजों के अलावा वर-वधु को अपने रहन सहन में जो परिवर्तन करने पड़ते है अर्थात् विवाहित होने का परिचय चिन्ह धारण करना पड़ता है वह भी कम विचित्र नहीं है। उदाहरण के लिए ब्राजील के आदिवासी कबीलों में शादी के वाद पुरुषों को होंठ और कान में छल्ले पहनने पड़ते है। वहाँ किसी भी पुरुष के शादी-शुदा होने की पहचान ही यही है। विवाह न होने तक तो युवक को ऐसे कोई छल्ले, चक्के धारण नहीं करने पड़ते, पर शादी की रस्म पूरी होते ही उन्हें अपने होंठ और कान छिदाने पड़ते है। यह रस्म पूरी होने के बाद ही वधु-पति के घर जाती हैं भारतीय सर्न्दभ में इस परम्परा को क्या स्त्रियों के नाक-कान छिदाने से नहीं जोड़ा जा सकता है कि उन्हें कान में इयररिंग और नाक में लौंग या नथ पहननी पड़ती हैं। यह बात अलग है कि अपने यहाँ यह रस्म विवाह के पूर्व ही सम्पन्न कर ली जाती है।

पूर्वी नाइजीरिया के आदिवासी क्षेत्रो में शादी के बाद तो नहीं पर शादी के पहले अच्छी खासी मुशीबत झेलनी पड़ती है। मुशीबत इसलिए कि दुलहन अपनी सहेलियों के साथ वर की परीक्षा लेती है कि वह पुरुष है या नहीं। इस परख का अपना अनौखा ही अन्दाज है। जिस लड़के की यानी वर की परीक्षा ली जाती है वह अपने सिर पर जानवर का सींग रखकर खड़ा हो जाता है। फिर उसे वधु और उसकी सहेलियाँ चारों ओर से घेर लेती है। वर महाशय कमर पर एक छोटा-सा कपड़ा लपेटे खडे़ रहते है और इसके बाद वधु पक्ष की बालाये उसके नंगे बदन पर कोडे़ बरसाना शुरु कर देती है।

यह पिटाई उस समय तक चलती रहती है जब तक कि सिर पर रखा सींग जमीन पर नहीं गिर जाताँ ऐसा भी नहीं कि कोई जानबूझकर सिर से सींग गिरा दे। वर को दोनों हाथों में उसे थामे रहना पड़ता है। कोड़ों की मार से लड़का जब तक बेदम होकर गिर नहीं पड़ता तब तक यह परीक्षा चलती रहती है। साथ्ज्ञ ही जब तक दुल्हे राजा होशोहवास में रहते है, उन्हें मुस्कराते रहना पड़ता है। माथे पर शिकन आयी कि हो गये परीक्षा में फेल।

विवाह करना कोई हँसी-माजक तो है नहीं उसके साथ पत्नि के निर्वाह का उत्तरदायित्व भी जुड़ा रहता हैं इसलिए फीजीद्वीप के आदिवासी युवकों को कोई भी अपनी लड़की देने के लिए तब तक तैयार नहीं होता जब तक कि वअ अपना खुद का मकान न बना ले। मकान बना लेने के बाद युवक का सम्बन्ध तय होता है और विवाह की तिथि निश्चित होती है।

विवाह की तिथि से तीन दिन पहले वर को अपने शरीर में नारियल का तेल और वधु को हल्दी लगानी पड़ती है। चौथे दिन वर कोई दुर्लभ वस्तु लेकर वधु को उपहार देने जाता है। उपहार पाकर कन्या जोरों से रोना शुरु कर देती है। घर के लोग उसे समझा बुझा कर चुप कराते है और महिलाएँ पास के किसी तालाब में स्नान कराने ले जाती है। स्नान के बाद वर-वधु के परिवार वाले उसी तालाब में मछलियाँ पकड़ते है जिन्हें विवाह के भोज में परोसा जाता है। भोज के समय वर-वधु एक ही पात्र में भोजन करते है और भोजन के बाद समाज उन्हें पति-पत्नी के रुप में मान लेता है।

तिब्बत के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में शादी के लिए आये वर की घर के सभी व्यक्तियों द्वारा परीक्षा ली जाती है। वर जब शादी के लिए कन्या के घर जाता है तो कन्या पक्ष के लोग इधर-उधर छुपकर बैठ जाते है। जैसे ही वर घर में प्रवेश करता है वैसे ही लोग उस पर पिल पड़ते है और घूँसे थप्पड़ों से मारते-पीटते है। किसी प्रकार बचता-बचाता वर आगे बढ़ता है तो स्त्रियों का झुण्ड घेर लेता है। उनसे बचने पर छोटी लड़कियाँ पीछे पड़ जाती है। किसी प्रकार इस चक्र-व्यूह को बेध कर कन्या तक पहुँच जाने के बाद ही मारपीट रुकती है और फिर शाम के समय दोनों को एक साथ एक थाली में भोजन कराकर विदा कर दिया जाता है।

विवाह की इन विचित्र परम्पराओं में वर को ही कड़ी परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता हो ऐसा नहीं है। लड़कियों को भी अपने ढंग से परीक्षा देकर योग्य गृहिणी सिद्ध होने का आश्वसन देना पड़ता है। जैसे मेलेनेशिया द्वीप समूह की जन-जातियों में आठ वर्ष की आयु से ही लड़कियों को पिंजरे में बन्द कर दिया जाता है। यह पिंजरे पेड़ की पत्तियों और लकड़ियों से बनाये जाते है। न इनमें पर्याप्त हवा जा सकती है और न रोशनी। स्थान भी इतना ही रखा जाता है कि लड़की आराम से बैठ सके या सिकुड़ कर लेट भर सके। पिंजरे में बन्द करने की प्रक्रिया को विवाह की तैयारी कहा जाता है।

पोलेनेशियन द्वीप समूह में एक द्वीप है ‘ताहिती’। बहाँ की कबायली जातियों में विवाह के लिए ईश्वर और पूर्वजों की स्वीकृति लेनी पड़ती है। इसके लिए वधु परिवार के घर आँगन में एक वेदी बनायी जाती है। वेदी पर वधु के पूर्वजों की हड्डियाँ तथा खोपड़ियाँ टाँग कर वर-वधु दोनों कुछ दूर खडे़ हो जाते है। पुजारी उनकी ओर से ईश्वर की स्तुति करता है और पूर्वजों की आत्माओं का आहवान करता है। कुछ देर बाद किन्ही संकेतों के आधार पर पुजारी कह देता है कि ईश्वर और पूर्वज सहमत है। पुजारी की इस सूचना के साथ ही विवाह कृत्य सम्पन्न मान लिया जाता है।

सभी परिवारों में कन्याओं के विवाह होते है। इसलिए कबाइली लोग अपने पूर्वजों की हड्डियाँ और खोपड़ियाँ सम्हाल कर रखते है। इस क्षेत्र में विवाह के बाद उपहार की भी विचित्र परम्परा है। जो व्यक्ति नवदम्पत्ति को उपहार देना चाहते हे वे शाक्र मछली के दाँतों से अपने चेहरे को खुरचते है और उससे निकलने वाले खून को एक कपड़े पर इकट्ठा करते है। यह कपड़ा वर-वधु के पैरों पर रख दिया जाता है। जो सबसे ज्यादा खून निकालता है उसी का उपहार सबसे मूल्यवान समझा जाता है।

सामान्यतः छरहरी और सुगठित बदन की लड़कियाँ सुन्दर समझी जाती है, पर इबों जाति में सुन्दरता का मापदण्ड इससे भिन्न है। वहाँ मोटी स्त्रियाँ सुन्दर समझी जाती है और जो लड़की जितनी मोटी होती है उसे उतनी जल्दी युवक पसन्द कर लेते है। विवाह सम्बन्ध निश्चित हो जाने के बाद कन्या को खूब खिलाया पिलाया और आराम कराया जाता है ताकि उसके शरीर की चरबी बढ़ जाय।’

न्यूगिनी के आदिवासी नव-दम्पति विवाह के तुरन्त बाद घर जाने के स्थान पर जंगल में चले जाते है। होता यह है कि युवक जिस कन्या से विवाह करना चाहता है उसके सम्बन्ध में वह अपने पिता से कहता है। युवक के पिता को यदि अपने बेटे की पसन्द अच्छी लगी तो वह अपने कुटुम्बी के साथ कन्या के पिता के पास जाता है और लेन-देन ठहराने के साथ विवाह सम्बन्ध तय किया जाता है। विवाह के एक दिन पहले वर उपहार सामग्रियों के साथ कन्या के यहाँ जाने की बजाय जंगल मं चला जाता हैं। अगले दिन कन्या अपने घर से ससुराल पहुँचती है और वहाँ एक दिन ठहर कर पति की तलाश करने के लिए अकेली ही जंगल में चल देती है। प्रायः नव-वधु अपने पति को जंगल में खोज लेती है। वे दोनों तब तक जंगल में ही रहते है जब तक कि वधु गर्भवती न हो जाय।

सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि इसके पहले दोनों में से कोई भी किसी परिचत व्यक्ति को दिखाई नहीं देना चाहिए। वधु के गर्भवती होने से पहले ही दोनों में से कोई किसाी गाँव वाले को दिखाई दे गया तो विवाह टूट गया मान लिया जाता है। नियत मर्यादाओं को पूरा करते हुए, वधु के गर्भवती हो जाने के बाद दोनों वापस गाँव में आ जाते है और विवाहोत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव में वधु को वर पक्ष वालों के सामने अपने सीखें हुए तमाम गुणों का नाच-नाच की कुशल गृहिणी होने का सबूत देना पड़ता है।

सूडान में विवाह की रस्म वर और वधु एक साथ नाच कर पूरी करते है। इस नाच में यद्यपि गाँव के अन्य स्त्री-पुरुष भी भाग लेते है, पर उसमें वर-वधु ही मुख्यतः नायक नायिका होते है। वधु के घर जब वर और उसके साथ आये अतिथि पहुँच जाते है तो नगाड़े की धुन पर खले बाल, अर्धनग्न युवतियाँ नृत्य करती है। नृत्य आरम्भ होने के साथ ही वधु का श्रृंगार किया जाने लगता है। श्रृंगार पूरा हो जाने के बाद वधु के नाचने के स्थान पर पर एक लाल चटाई बिछायी जाती है जहाँ वर को अपनी पोशाक बदलनी पड़ती है। पोशाक बदलने के बाद उस स्थान पर लाल रंग के कपडे़ पहने वधु लबादा ओढे़ आती है। वर उस लबादे को हटाया है।

लबादा हटाने के साथ ही वर-वधु नृत्य करती टोलियों में जा मिलते है और स्वयं भी नाचते लगते है। टोलियाँ बदलती हरती है, पर वर-वधु को तब तक नाचते रहना पड़ता है जब तक कि दोनाँ में से कोई एक थक कर गिर नहीं पड़ता। नाचते-नाचते वधु का गिर पड़ना शुभ समझा जाता है और इसे वधु की वर प र विजय माना जाता है। यह नृत्य समाप्त होने के बाद वधु-वर के साथ अपनी ससुराल चली जाती है।

विवाह की इन विचित्र परम्पराओं के सम्बन्ध में जान पढ़ कर आर्श्चय होना स्वाभाविक है। किन्तु यदि इस विषय पर किसी अन्य देश में कही कुछ लिखा जा रहा होगा तो भारतीय समाज की विवाह परम्पराओं को भी कम विचित्र नहीं कहा जाता होगा। चर्चा कुछ इस प्रकार होती होगी कि भारत में आमतौर पर वर माथे पर जानवर के पंखों, काँच के टुकड़ो या मोतियों और फूलों से बना मुकुट पहनकर घोड़ी पर चढ़ कर वघु के घर जाता है। उसके साथ बहुसे लोग नाचते गाते बैड-बाजा बजाते चलते है। वर-वधु के पिता से उपहार माँगता है उपहार न दिये जाने पर ससुराल में भोजन करने से इन्कार कर देता है। इस प उसकी खूब मनुहार की जाती है। यह वर की इच्छा पर निर्भर है कि वह अपनी माँग वापस ले लेता है अथवा मनवा कर ही रहता है।

उपरोक्त समाजों और कबीलों में इन परम्पराओं का प्रचलन किस उद्देश्य को सामने रखकर क्यों किया गया होगा? यह शोध का विषय है। भारत में विचित्र और निरर्थक परम्पराएँ क्यों प्रचलित हुई तथा किस समय उनकी क्या प्रासंगिकता रही? यह अलग विवेचन का विषय हैं। परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि आज उनमें से अधिकाँश अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है और उन्हें चलते रहने देना न केवल उन्नत समाजों के सामने अपनी स्थिति विदूषकों जैसी बनाना है, अपितु आत्म-प्रवचना भी है कि एक ओर तो इस अपनी साँस्कृतिक महानता क गीत गाते रहे तथा दूसरी ओर उन प्रथा-परम्पराओं को बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपटायें रहे।


भोजन ही नहीं शोधन भी

शरीर को जीवित रखने के लिए हवा और पानी के समान भोजन भी आवश्यक है , पर वह स्वास्थ्यवर्धक एवं अरोग्य रक्षक तभी हो सकता है, जब स्वास्थ्य से जुडे़ अन्य नियमों का भी पालन ठीक प्रकार किया जाय। मोटी, कल-कारखानों को सतत् चलते रहने के उपरान्त कुछ समय का बीच में विश्राम देना पड़ता हैं पाचन तन्त्र भी एक मोटर के तुल्य हैं। भोजन को पचाने के लिए उसे सतत् श्रम करना होता है जिसमें शरीर की अत्यधिक उर्जा खर्च होती हे। उसे भी समय-समय विश्राम देना उतना ही आवश्यक है। मोटर, इन्जिन, कारखानों का विश्राम देने का एक अभिप्रायः उनकी सफाई का भी होता है। पाचन तन्त्र में भी अनेको प्रकार के अनुपयोगी तत्व संग्रहित हो जाते है। अपच भोजन जमा हो जाता है। उसके परिशोधन का सर्वश्रेष्ठ, सुलभ एवं सरल प्राकृतिक उपाय उपवास को माना गया है। उपवास को एक समग्र उपचार-परिशोधन पद्धति माना गया है।

उपवास के लाभों को देखते हुए विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों, और विचारशील व्यक्तियों ने एक स्वर से सराहना की है तथा इसे आरोग्य की कुँजी माना है। सोवियत संघ के जीवन-विज्ञानवेत्ता ‘ब्लाड दिमीर निकिलन ने अपने अनेकों शोधों के उपरान्त के बाद घोषण की कि उपवास द्वारा यौवन को चिरकाल तक अक्षुण्ण बनाये रख जा सकता है। उन्होने शीघ्र मरने वाले अधिकाँश व्यक्तियों में पाचन तन्त्र को असमर्थ होना ही बताया है। उनका कहना है कि अधिक खाने कोकरण ही पाचन तन्त्र खराब होता तथा अनेकों रोग उत्पन्न होते है।

अमेरिका के डाँ. अटन सिक्लेयर कहते है कि इस आयु में मेरा पूर्ण स्वस्थ, युवा उमगों से भरपूर होने का कारण है उपवास के प्रति मेरी अटूट निष्ठा। सप्ताह में एक दिन का नियमित रुप से में व्रत रखता हूँ। शुद्ध शाकाहार भोजन कम मात्रा में ग्रहण करता हूँ उनका कहना है कि उपवास प्रकृति की स्वास्थ्य संरक्षक विधिक है जिसके द्वारा प्रकृति हमे शारीरिक एवं मानसिक रोगों से सुरक्षित रखती हैं। मुझे प्रसन्नता है ऐसे तीव्र एवं जीर्ण रोग हमसे दूर चले गये, जिससे अधिकाँशतः व्यक्ति पीड़ित रहते है।

चिकित्सा वाज्ञन के विशेषज्ञ ‘फ्यूरिगटन’ महोदय लिखते है कि यदि आप मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, यौवन और जीवन का आनन्द एवं शक्ति चाहते है तो सप्ताह में कम से कम एक दिन नियमित रुप से उपवास कीजिए इससे शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति का आधार भी बनता है।” प्राकृतिक चिकित्सा के सुप्रसिद्ध अमेरिकी डाँ. एरनाल्ड इहरिट अपनी पुस्तक “रैशनल फास्टिंग” में उपवास की अनेको विधियों का वर्णन किया है तथा कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को निरोग रहने के लिए छोटे-मोटे उपवास सप्ताह में एक बार अवश्य करना चाहिए।” अमेरिका के प्रख्यात डाँ. डैवी ने तो उपवास की महत्ता से प्रभावित होकर “नो बे्रक फास्ट प्लान” अर्थात् “सुबह का नाश्ता छोड़ों” नामक योजना चलाई है।

डाँ. हैनरी हिडल्डार ने तो ‘उपवास को रोगों के समूल नाश करने की अचूक विधि कहा है।’ उनके अनुसार शरीर को स्वस्थ रखने के लिऐ बहुत थोडे़ भोजन की आवश्यकता हे। उपवास की अवधि में नीबू एवं जल के सेवन पर उन्होंने जोर दिया है।

प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक वेंजामिन फै्रकलिन ने रोग निवारण का सर्वोत्तम उपाय उपवास को माना है।

भोजन के साथ उपवास को भी उतनी ही महत्ता है। स्वास्थ्य सर्म्बधन से लेकर आरोग्य संरक्षण जैसे अनेकानेक लाभ है। विश्व के मूर्धन्य चिकित्सा शास्त्रीयों एवं विचारकों ने अपने अनुभवों के आधार पर इस तथ्य को स्वीकार किया है। आध्यात्मिक लाभों की चर्चा न की जाय तो भी स्थूल लाभ ही इतने अधिक है, जिन्हें देखकर प्रत्येक विचारशील को अपने जीवन क्रम में उपवास को अनिवार्य स्थान देना चाहिए।


तीसरे विश्व युद्ध की सर्वनाशी विभीषिका

इन दिनों भविष्य ज्ञान की एक नई ही शाखा विकसित हुई हैं सामान्यतः ग्रह नक्षत्रों की गणना के आधार पर ज्योतिषी भविष्य में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी करते है। ऐसे ज्योतिषी भविष्यवक्ता और अन्तदृष्टि सम्पन्न दिव्य-दृष्टा आगामी दिनों की विभीषिकाओं के चित्र खींचते रहते है। उनमें से कइयों की भविष्यवाणियाँ अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में प्रकाशित हुई है। इन पंक्तियों में भविष्य ज्ञन की जिस शाखा की चर्चा की जा रही है, वह इस तरह की भविष्यवाणियों से सर्वथा भिन्न है। इन शाखा को (फ्यूचरोलाँजी) अर्थात् भविष्य शास्त्र कहा जाता है। इस विज्ञान में पृथ्वी की दशा, विभिन्न देशों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, युद्ध सम्बन्धी तैयारियाँ, वैज्ञानिक प्रगति और मानव जीवन पर पड़ने वाले उसके प्रभावों से सम्बन्धित विभिन्न पक्ष पहलुओं के आँकड़े और तथ्य एकत्रित किये जाते है तथा उकसे आधार पर भविष्य का प्रतिपादन किया जाता है।

पश्चिमी देशों में इस विषय पर अनेकों पुस्तकें लिखी गई है और वे सबकी सब धड़ाधड़ बिकी है। हाल ही में ब्रिटेन के एक उच्च पदस्थ सैनिक अधिकारी जनरल सरजान हैकेट और उनके अन्य सहयोगियों द्वारा लिखी गई ‘द थर्ड वर्ल्ड वार इन नाइंटीन एट्टी फाइव’ पुस्तक प्रकाशित हुई हैं यह पुस्तक इतिहास की शैली में लिखी गई और चँकि सरजान हैकेट ब्रिटिश सेना के उच्च पद पर रहे है, इसलिए उन्हें संसार के विभिन्न देशों के आन्तरिक सम्बन्धों का भी गहन ज्ञान है। इस पुस्तक के सम्बन्ध में एक प्रख्यात भारतीय पत्रकार ने लिखा है, ‘प्रो. हर्मन काव, डैनियल वैल जैसे अनेक विद्वान पिछले वर्षों में संगठनों की मदद से भविष्यवाणियों को विज्ञान का दर्जा दिलाने की कोशिश करते रहे है। ये प्रयत्न प्रवृत्तियों को रेखाँकित करने तक ही सीमित रहें है, पर जनरल हैकेट की यह पुस्तक प्रवृत्तियों के अस्थि पंचर पर रक्तमज्जा ही नहीं बल्कि चर्म तक आरोपित कर चुकी है।

सरजान हैकेट किसी समय नारो सैनिक संगठन के सर्वोच्च अधिकारी रहे है। अतः उनके विश्व के विभिन्न देशों की सामरिक शक्ति के सम्बन्ध में उनकी प्रामाणिकता पर सन्देह नहीं किया जा सकता हैं। पुस्तक चूँकि ऐतिहासिक उपन्यास की शैली में लिखी गई है, इसलिए उसमें घटनाओं को कल्पना का रंग तो दिया गया है। सम्भव है, घटना क्रम ज्यों का त्यों न घटे, पर उससे उन्नत और विकसित देशों की शक्ति का जो अन्दाजा लगता है और यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इस समय दुनिया एक बारुद के ढेर पर बैठी है, जिसमें कभी भी कोई भी चिनगारी विस्फोट कर सकती है।

‘द थर्ड वर्ल्ड वार’ के अनुसार युद्ध की शुरुआत अन्तरिक्ष में होती है और विस्फोटक पदार्थों तथा विभिन्न रसायनों द्वारा हवाई अड्डों को नष्ट किया जाता है। युद्ध के प्रथम चरण में ही ऐसे विषैले तत्वों का उपयोग किया जाता है, जिनके कारण बड़ी संख्या में लोग घातक रोगों के शिकार होने लगते है। एच.सी.एन. जैसे विषैले तत्वों के सम्पक्र में आते ही लोग मिनटों में मरने लगते हैं।

आणविक शस़्त्रास्त्रों के उपयोग की सम्भावना से कई लोग इसलिए इन्कार करते है कि उनके खतरों से प्रयोग करने वाले राष्ट्र भी बचे नहीं रहेंगे। परन्तु ‘द थर्ड वार 1895 में लेखकों ने बताया है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो इनका उपयोग किया जाना निश्चित है। परमाणु अस्त्रों के अलावा भविष्य में होने वाले युद्ध में ऐसे अस्त्रों का प्रयोग भी सम्भव है जो परमाणु अस्त्रों से घातक है। इन अस्त्रों में लेसर किरणों का उपयोग प्रमुख्य है। सन् 1958 में हम्जेस एयर-क्राफ्ट कम्पनी के वैज्ञानिक थियोडोर एच. मेनान ने लेसर किरणों की खोज की। पिछले 22 वर्षों में इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर खोज हुई है और अब अमेरिका तथा रुस दोनों इस स्थिति में आ गये कि इस किरण का उपयोग शस्त्र के रुप में कर सके। दोनों ही देश प्रति वर्ष खरबों डाँलर लेसर किरणों के प्रयोग की तकनीक को विकसित करने में लगे है। इन देशों में ऐसे य़न भी बना लिये गये है, जिन्हे लेसर गन कहा जाता है, जिनकी सहायता से कितनी भी दूर, किसी भी पदार्थ पर लेकर किरणें फ्रेंक कर उसे नष्ट किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि ये किरणें प्रकाश के वेग से चलती है। यह है तो प्रकाश ही। कोई भी प्रक्षेपास्त्र या प्रतिप्रक्षेपास्त्र इनकी गति प्राप्त नहीं कर सकता थाँ इनकों छोड़ने और शिकार तक पहुँचने के बीच नगण्य-सा समय लगता है। साथ ही इन्हें न तो किसी प्रकार रास्ते में रोका जा सकता है और न ही इनका मार्ग बदला जा सकता है।

प्रकाश की एक विशेषता होती है कि उसकी किरणें फैलती हुई चलती है किन्तु लेसर किरणें सामान्य प्रकाश की तरह नहीं फैलती बल्कि एक ही घनत्व में चलती है और एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की गति से अपने लक्ष्य या शिकार की ओर बढ़ती है। सन् 1975 में रुस ने अन्तरिक्ष में लेसर किरणों का प्रयोग किया। प्रथम पहले प्रयोग में साइबेरिया से छोड़े जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों की जासूसी करने वाले दो अमरीकी उपग्रहों पर इन्फ्रारेड किरणें फेंकी गईं। इन किरणों के प्रभाव से उपग्रह ने काम करना बन्द कर दिया।

खैर, यह तो शन्तिकाल का प्रयोग हुआ। ‘जैन्सवैपन्स सिस्टम’ की 1977-78 की वार्षिक में लेसर उपकरणों का जो विवरण है वह न केवल चौका देने वाला है, वरन् इतना आतंककारी है कि सामान्य व्यक्ति उसे पढ़कर ही थरथरा उठते है। लेसर किरणों का प्रक्षेपण करने वाले यन्त्र का भार मात्र 6॥ किलोग्राम है यानी एक साधारण बन्दूक से भी कम वजनदार और इसका आकार छोटी नाल वाली रायफल के बराबर होता है। अपने लक्ष्य की दूरी का पता लगाने वाले लेसर उपकरण एक सैकिण्ड से भी कम समय में हिसाब लगा लेते है और इस जानकारी को दूरस्थ वायुयान या गतिशील प्रक्षेपास्त्र तक अचूक मार के लिए भेज सकते है।

लेसर किरणों की भयावहता को इसी बात से जाना जा सकता है कि इन्हें ‘मृत्यु किरण’ नाम दिया गया है। संसार के सभी सागरों में ब्रिटेन, अमेरीका और रुस की पनडुब्बियाँ इन दिनों प्रेक्षपास्त्र और लेसर गन लिए घूम रही है। अमेरिका और रुस ऐसे उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज चुके है, जिनमें रासायनिक तत्वों से सज्जित उपकरण है और वे एक सैकिण्ड बीस खरबें भाग में 200 खरब वाट बिजली के बराबर प्रकाश किरण पैदा करते है जो किसी भी धातु को पिघला कर भाप बनाने में सक्षम है। यह प्रक्रिया इतनी तेजी से सम्पन्न होती है कि जिस वस्तु को लेसर का लक्ष्य बनाया जाता है वह तत्क्षण अन्तर्ध्यान हो जाती है, पता ही नहीं चलता कि वह थी भी अथवा नहीं।

दूसरे महायुद्ध में नागासाकी और हिरोशिया पर जो अणुबम छोड़ गये वे तो अब के अणु और परमाणु बमों की तुलना में हथगोले ही सिद्ध होते है। 6 अगस्त 1945 का जापान में हिरोशिया और तीन बार 9 अगस्त को नागासाकी 42,500 गज उपर से डाले गये इन बमों को पृथ्वी तक पहुँचने में कुल 52 सैकिण्ड का समय लगा था, इन बमों ने आकाश में ही आग-सा विशाल गेंद का रुप ग्रहण कर लिया जिसका तापमान दस करोड़ डिग्री सेन्टीग्रेड था और एक मील दूर से वे सूर्य की अपेक्षा सौ गुना दिखाई दे रहे थे। इस घटना को 35 वर्ष हो गये हैं यों 35 वर्ष कोई बहुत बड़ी अवधि नहीं होती, परन्तु परमाणु विज्ञान ने इस बीच जो तरक्की की है वह हजारों साल के बराबर है।

कई देश परमाणु बम से भी आगे निकल गये है और उन्होने हाईड्रेजन बम का निर्माण कर लिया है। परमाणु बम इसकी तुलना में बच्चा ही सिद्ध होता है। परमाणु बम विस्फोट के नियम के आधार पर काम करता हैं। उसमें परमाणु का विस्फोट होता है, मगर हाईड्रोजन बम का निर्माण संयुजन (फ्येजन) अर्थात् मिलन के नियम के आधार पर होता है, जिससे अपार उर्जा और गरमी उत्पन्न होती है। इन बमों की भयंकरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बम का विस्फोट हो, इसके लिए यह आवश्यक है कि पहले उसके खोल के भीतर ही एक परमाणु बम विस्फोट हो, जिसकी गरमी से हाईड्रोजन बम का विस्फोट हो सके। अब तो यह भी सम्भव हो गया है कि एक ही परमाणु बम समूची पृथ्वी पर प्रलय मचा सकता हैं।

अणु और परमाणु अस्त्रों, लेसर किरणों, मिसाइलों, कीटाणु बमों के सम्बन्ध में विश्व के मूर्धन्य विचारक चिन्तित है और जो तथ्य सामने आ रहे है, उन्हें लेकर तीसरा विश्व युद्ध यदि हुआ तो पृथ्वी पर प्रलय मच जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध पत्रकार रोविन क्लाक्र ने अपनी पुस्तक ‘द साय-लेन्स वेपन्स’ में लिखा है कि अब सर्वनाश का अनुष्ठान, प्रलय का आयोजन बिना किसी धूमधड़ाके के सम्पन्न हो सकता है। इन दिनाँक ‘वोटुलिनम टाक्सिन’ नामक ऐसा महा विष ढूँढ़ निकाला गया है जिसकी 500 ग्राम मात्र पूरी पृथ्वी के जीवधारियों को नष्ट कर सकती है।

‘स्क्रिप्स इन्टट्यूशन आँ ओशनोग्राफी’ के निर्देशक विलियम ए. नाइटेन वर्ग ने अपने लेख ‘मिलिट’ राइड ओशंस’ लेख में लिखा है कि अगले दिनों भूमि हथियाने की तरह समुद्र हथियाने की प्रतिद्वन्द्विता बड़े राष्ट्रों में चल पडे़गी और जल के भीतर रहने वाले ऐसे वाहनो का विकास होगा जो घातक आक्रमणकारी अस्त्रों से सुसज्जित रहेंगे और स्थल की तरह ही जल को रणाँगण बनायेगे।

भावी परमाणु युद्ध या तीसरे विश्व युद्ध के महाविनाश के उपरान्त मनुष्य जाति का अस्तित्व बचेगा या नहीं? इसका उत्तर नहीं में ही दिया जाता है। इसमे बाद वाला प्रश्न यह है कि इस महाविनाश के उपरान्त क्या फिर कभी मनुष्य का अस्तित्व प्रकाश में आ सकेगा? वैज्ञानिक इसका उत्तर जरुर हाँ में देते है उनका उत्तर है कि तब थलचर तो प्रायः सभी समाप्त हो जायेगें, पर जलचरो में जीवन का अस्तित्व बना रहेगा। समुद्र इतना बड़ा है कि तीन हजार अणु विस्फोटों को वह हजम कर सकता है। निस्सन्देह इसमे उपरी सतह के प्रायः सभी प्राणी मर जाएँगें। इस गहराई तक हवा का प्रभाव पहुँचता है और नदियों द्वारा पानी आता तथा बादलों द्वारा जाता रहता है। पर इसके नीचे में की गहराई बिना रीढ़ वाले ऐसे कीडे़ रहते ळै जो कभी भी उपर नहीं आते। कहा जाता है कि रेडियों विकिरण का प्रभाव समुद्र जल में प्रवेश तो करेगा, पर छह मील गहराई तक पहुँचते-पहुँचते खारे जल में घुल जायेगा।

लाखों वर्ष बाद जब धरती और समुद्र की तह रेडियों सक्रियता से युक्त होगी तो तली में रहेन वाले वे कीड़े उभर आयेगें और जिस प्रकार अब से करोड़ों वर्ष पूर्व एक कोशीय जीव से बहुकोशीय जीवों का विकास क्रम आरम्भ हुआ था और क्रमशः अधिक समर्थ तथा बुद्धिमान प्राणी बनते बढ़ते चले आये थे, उसी प्रकार करोड़ों, अरबों वर्ष बाद मनुष्य जाति फिर से अस्तित्व में आ सकेगी। यह आशा करना आकाश कुसुम तोड़ना ही है। सवाल तो यह है कि एक बार तो पृथ्वी मनुष्य जाति से रहित हो ही जाएगी। उसके बाद किस क्रम से उसका अस्तित्व प्रकाश में आता है अथवा नहीं आता है? यह प्रश्न गौण है।


रावण दर्बचन बोल रहा था (kahani)

रावण दर्बचन बोल रहा था, तब तक भगवान राम चुपचाप खडे़ रहे। विभीषण ने कहा-भगवन! शस्त्र प्रहार क्यों नहीं करते? भगवान राम बोले- क्षत्रिय मृतकों पर शस्त्र प्रहार नहीं करते।

“लेकिन रावण तो जीवित है भगवन!” विभीषण बोले!

इस पर राम ने हँसकर उत्तर दिया-”आवेश ग्रस्त मनुष्य और मृतक में कोई अन्तर नहीं होता क्योंकि उस समय भी मनुष्य मृत्यु के समान ही ज्ञान शून्य हो जाता है।”


मृत्यु पर्यन्त चिरयुवा कैसे रहे?

खरगोश की औसत आयु 7 वर्ष होती है। बिल्लियाँ और बकरियाँ 12 वर्ष जीवित रहती है। कबूतर 8 वर्ष और घोडे़ 50 वर्ष तक जीवित रहते है। कछुए एवं सर्प की औसतन आयु 150 वर्ष और 120 वर्ष होती है। मनुष्य की आयु 100 वर्ष आँकी गई है। मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों के जीवनक्रम पर दृष्टि डालते है तो पता चलता है कि उनमें सदा यौवन का उत्साह बना रहता है। आयु की दृष्टि से उनकी सम्पूर्ण आयु में बचपन, यौवन एवं वृद्धावस्था की कोई स्पष्ट सीमा रेखा दृष्टिगोचर नहीं होती है। अपवादों एवं दुर्घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो पर्यवेक्षक करने पर शायद ही कोई जीव ऐसा दिखाई पड़ें जो रोगग्रस्त पड़ा हो अथवा वृद्धावस्था के कारण शक्ति रहित बना असमर्थता के चंगुल में जकड़ा हों अधिकाँशतः पशु-पक्षी जीवनपर्यन्त युवा बने रहते है। उनकी मृत्यु वृद्धावस्था की असमर्थता में नही, यौवन जैसे उत्साह एवं उमंगों के बीच होती है। उछलते, कूदते, फुदकते, मचलते, इकलाते, जीवों को कभी भी मृत्यु का, वृद्धावस्था का आभास नहीं होता। पैदा होते है चिरयौवन की उमंगों के साथ और मरते है यौवन की उमंगों के बीच। जरावस्था की थकान क्या होती है इससे वे सदा अनभिज्ञ बने रहते है। साधनों की दृष्टि से पिछड़े-शक्ति, सामर्थ्य, एवं बुद्धि में अविकसित इन मुनष्येत्तर जीवों के चिर यौवन के कारणों की खोज करते है तो एक ही तथ्य हाथ लगता है, प्राकृतिक दिनचर्या, चिन्ताओं, आशंकाओं से रहित उमंग एवं उत्साह से भरा जीवन क्रम।

मचलते, इतराते युवा उमंगों से युक्त पशु-पक्षियों के मस्त जीवन का रहस्योद्घाटन करते हुए सन्त फ्राँसिस कहते है कि प्राणि सृष्टि ईश्वर के पितृ हृदय के बहुत समीप हुआ करते है। इस तथ्य से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। प्रकृति की सहज प्रेरणा से अभिप्रेरित होकर प्रत्येक प्राणी जीवन से असीम प्यार करता एवं उसका भरपूर आनन्द उठाया है। इसमें चिर उत्साह का यही कारण है।

‘एलन डिवाय’ प्रकृति प्रेमी रहे है। उसका अधिकाँश समय जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों के अध्ययन में बीता है। उन्होंने रहस्योद्घाटन किया है कि प्रकृति के इन नन्हे जीवों में चिरउत्साह का कारण है, उनकी प्रकृति प्रेरणा के अनुरुप क्रियाएँ। लिखते है कि मेरा अधिकाँश समय पशुओं की जानकारी में बीता है। घनिष्ठ साथियों में खरगोश, गिनीपिग्टन सफेद चूहे, हिरण, रैकून्स, स्कन्कस, लोमड़ियाँ सदा मेरा मन बहलाते रहे तथा प्रेरणाएँ देते रहे है। मैंने 80 वर्ष से इन प्राणियों से इतना कुछ सीखा है जितना कि तत्वज्ञान की पुस्तकों में भी नहीं। वे कहते है कि फुदकते हुए जीव मूक रुप से कहते है कि “प्रत्येक क्षण का आनन्द लूटना सीखो।’ सृष्टि का प्रत्येक प्राणी अपने जीवन का भरपूर आनन्द उठाता हैं गोधूलि बेला में गिलहरियाँ नटों की भाँति हवाई कौशल प्रदर्शित करती है। उन्हें न तो रात के अन्धकार का डर होता है न ही कल की चिन्ता। चौकड़ी भरता हिरन सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना अधिकार जताता है। हरी-भरी घास का आनन्द लेते समय उसके मनोयोग को देखते ही बनता है।

एलन डिवाय लिखते है कि “एक बार मैंने एक बुड्ढे़ हिरन को घास चरते देखाँ इतने में एक सर्प उसकी नासिका के पास आ पहुँचा। उस समय उसकी सतक्रता एवं परिवर्तित भाव मुद्रा देखते ही बनती थी। एक क्षण में ही आनन्द के भाव तिरोहित हो गये और व वीर रस के भाव में हुँकार भरने लगा। पैने खुरों से आवाज करते हुए उसने साँप का दवोच कर काम तमाम कर दिया। तुरन्त बाद वह अपनी पूर्ववत् स्थिति में आ गया और इस प्रकार घास चरने का आनन्द लेने लगा जैसे कोई घटना ही न हुई हों इन जीवों के जीवन क्रम से मनुष्य प्रेरणा ले सकता हैं। सामान्य घटना एवं बातों से प्रभावित होकर अपना सन्तुलन खोने वाले, निराशा, चिन्ता से घिर जाने वाले मनुष्य यदि उद्विग्नता और चिन्ता से मुक्ति पाले तो 80 वर्ष की आयु में भी वे हिरन की-सी कुलाचे भरते रह सकते है।

प्रकृति की प्रेरणा है कि अनावश्यक चिन्ताएँ छोड़ों ईश्वर प्रदत्त जीवन का सर्वोत्तम उपयोग करो। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता का प्रत्येक कार्य में समावेश रखो। इस प्रेरणा के अनुरुप जीवनक्रम अपनाकर पशु-पक्षी सदा प्रसन्न रहते तथा जीवनपर्यन्त यौवन का आनन्द लेते है। कृत्रिमता से वे सदा दूर रहते है।’ समय पर उठना प्रकृति का अभिवादन करना, आहार जुटाना, एवं निश्चिन्त होकर सोना ही उनके सदा स्वस्थ एवं चिर युवा रहने का रहस्य हैं।

आकृति सामर्थ्य एवं बुद्धि की दृष्टि से सबसे पिछड़ी चिड़ियों के फुदकन को देखकर लगता हे कि जैसे प्रकृति ने सम्पूर्ण आनन्द उनकी झोली में भर दिया हो। बच्चों को भोजन कहाँ से प्राप्त होगा। कल के लिए आहार की क्या व्यवस्था होगी इसकी बिल्कुल ही चिन्ता नहीं करती। बस सूर्योदय का अभिवन्दन करके अपने काम में जुट जाती है। जो आहार प्राप्त होता उसे अपने बच्चों में मिल-बाँटकर खाती है। हाथी जैसे विशालकाय जीव को सर्वाधिक आहार की आवश्यकता होती है, पर उसे थोड़ी भी चिन्ता नहीं रहती। भूख लगने पर वह घने जंगल में स्वच्छन्द निकल पड़ता तथा हरी फूल-पत्तियों का आहर करता है। मनुष्य जैसे संग्रह की चिनता उसे नहीं सताती। फलतः वह सदा स्वस्थ रहता है। बिल्लियाँ, बकरियाँ, घोडे़, कबूतर यदा-कदा ही रुग्ण होते है। सूर्य देवता अनी प्रातःकालीन स्वर्गीय आभा लिए उन्हें उछलने,मचलने के लिए जैसे बाध्य कर देते है।

प्रकृति विज्ञानी एलनडिवाय ने अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख किया है कि किस प्रकार नन्हें पक्षी प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने के लिए जान की बाजी तक लगा देते है। वे लिखते है कि एकाबार मैंने एक पुराने लकड़ी के पुल के नीचे एक पक्षी का घौसला बना देखों। उसके अण्डे दखने के लिए सावधानी से आगे बढ़ रहा थ। एकाएक मादा पक्षी ने मेरी नाक से एक इंच दूर मेरी आँखों पर अपने पंखों से प्रहार किया। चौक कर सिर उठाया कि उतने में नर-पक्षी ने झपट्टा मारकर मेरा चवश्मा गिरा दिया। इस अप्रत्याशित संघबद्ध आक्रमण्या से मैं घबड़ा उठा और पैर फिसल जाने के कारण कमर तक पानी मं जा गिरा। किसी प्रकार उठकर वहाँ से भागा। मुझे उस घटना से प्रेरणा मिली कि आने वाली कठिनाइयाँ का जब नन्हे-नन्हें जन्तु वीरों की तरह सामना कर जाते है तब छोटे-छोटे उतार च्ढ़ावों में घबड़ा कर अपनी जीवनी शक्ति मनुष्य नष्ट करे, यह उसका दुर्भाग्य ही है।

एक अन्य घटना का वर्णन करते है’ एक कठफोड़वा पक्षी उड़ता हुआ, मेरे खेत में आया और किनारे रखे हुँए एक बड़े पत्थर पर बैठ गया और कुछ ही क्षणों में शरीर को निश्चेष्ट छोड़कर मृत्यु की गोद में समा गया। अन्तिम समय में भी उसे न किसी प्रकार का कष्ट थ। न ही मृत्यु का भय। मुझे उसकी शानदार मौत पर विशेष आर्श्चय हुआ। मनुष्य से तुलना की तो मालूम हंआ कि रोता-बिलखता कष्ट से कराहता मनुष्य की तुलना में जीवों की मृत्यु भी कितनी सरल एवं कष्ट रहित होती है। निःसन्देह यह उनके स्वच्छन्द, चिन्ता रहित प्राकृतिक रहन-सहन का ही प्रतिपादन है।

मनुष्य पशु-पक्षियों से बुद्धिमान है और सामर्थ्यवान भी। प्रकृति के सर्वाधिक अनुदान उसे ही मिले है। नन्हें जीवों को तो सीमित क्षेत्र में सीमित साधनों के सहारे असीम आनन्द अनुभव करते है। किन्तु मनुष्य के लिए इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि उसे जीवन का आनन्द लेना नहीं आ सका। कारणों की खोज में जाते है तो एक ही तयि हाथ लगता उसका चिन्ताओं, आशंकाओं एवं कृत्रिमता से भरा जीवनक्रम।

प्राकृतिक दिनचर्या, प्रसन्नता, प्रफुल्लता से युक्त जीवनक्रम अपनाने वाले मनुष्यों में भी अधिकाँशतः चिरयुवा बने रहे। ढलती उम्र में भी उनमें असाधरण उत्साह एवं उमंग देखा गया। चर्चिल वृद्धावस्था को सर्वोत्तम काल कहते थे। उनका कहना था, जबानी खिला हुआ है तो बुढ़ापा पका हुआ फल -एक रंग का खजाना दूसरा रस का कलश। दोनों की अपनी सुवास है और अपना सौर्न्दय। इस दृष्टिकोण के करण ही उनमें 80 वर्ष की आयु में भी युवकों जैसी उमंग और बच्चों जैसी मस्ती थीं। इग्लैण्ड के शासकीय कार्यो में भी आयु के अन्तिम अवधि में भी वह परामर्श देते रहे। महात्मा गाँधी 80 वर्ष की आयु में भी अपने को युवक मानते थे। उनकी फुर्ती देखते बनती थी। वृद्धावस्था में भी बर्नाइश की चुस्ती एवं फुर्ती को देखकर उनके युवा होने का सन्देह होने लगता थाँ उसका कारण वे सक्रियता, प्रसन्नता, प्रफुल्लता एवं प्राकृतिक दिनचर्या को बताते थे।

एक जापानी सन्त का कथन है-बुढ़ापे की झुर्रियाँ, ईश्वर का दिया हुआ वरदान है। निश्चय ही प्रसन्नता मुख्य मण्डल पर सतत बनी रही तो वृद्धावस्था, अभिशाप नहीं बन सकती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डाँ. राधाकृष्णन ने चिरयौवन का रहस्य बताते हुए कहा है कि चिरयुवा बने रहने के लिए मनुष्य को हंसमुख स्वभाव को वास्तविक एवं गम्भीर रुप में विकसित करना चाहिए। उन्होने संयमित प्रकृति के अनुरुप आहार-बिहार को चिरयौवन की कुन्जी माना।

डाँ. मेलविल कीथ अपनी पुस्तक ‘रायल रोड टू हेल’ में लिखते है कि अप्राकृतिक दिनचर्या के कारण मानव जाति दिन-प्रतिदिन शक्ति सामथ्य की दृष्टि से क्षीण होती जा रही हैं जिसका प्रतिफल है असमर्थ बुढ़ापा-अनेकानेक रोगों की उत्पत्ति। मनुष्य को प्रकृति के अन्य पशु-पक्षियों से प्ररेणा लेनी तथा अनुकरण करनी चाहिए जो आयु के अन्तिम समय में भी असीम उत्साह एवं उमंग से भरे रहते है। जबकि मनुष्य अनेकों प्रकार के रोगों से ग्रस्त हुआ रोते-कलपते जीवन के अन्तिम दिन पूरे करता है।

अविकसित प्राणी जो मनुष्य से हर दृष्टि से छोटे है। उनके पास न तो रहने के मकान है न ही अन्य साधन। कल के लिए आहार की समस्या है। संचय के नाम पर कुछ भी नहीं है। ऐसी स्थिति में भी सदा स्वस्थ एवं प्रसन्न चित्त रहते है। वृद्धावस्था की असमर्थता का अभिशाप उन्हें नहीं लगने पाता। जबकि मनुष्य साधनों, योग्यता, प्रतिभा की दृष्टि से सबसे आगे है। फिर भी रोग-कलेशों का, असमर्थता का, बुढ़ापे का रोना उसे ही रोना पड़ता है। निस्सन्देह यह अप्राकृतिक रहन-सहन, अनावश्यक चिन्ताओं एवं आशंकाओं का ही दुष्परिणाम है। शारीरिक सक्रियता, मानसिक प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता बनी रहे तो कोई कारण नहीं है कि उसे चिर-यौवन के आनन्द से वंचित रहना पड़े। इस तथ्य को समझा एवं अपनाया जा कसे तो उसी प्रकार जीवनपर्यन्त स्वस्थ एवं प्रसन्न चित्त रहा जा सकता है। जिस प्रकार पशु-पक्षी।


राजा विक्रमादित्य (kahani)

उद्यान में भ्रमण करते-करते सहसा राजा विक्रमादित्य महाकवि कालिदास से बाले- ‘आप कितने प्रतिभाशाली है, मेधावी है, पर भगवान् ने आपका शरीर भी आपकी बुद्धि के अनुसार सुन्दर क्यों नहीं बनाया? कुशल कालिदास राजा की रुप की गर्वोक्त्िसमझ गये। उस समय तो वे कुछ भी न बोले। राजमहल में आकर उन्होने दो पात्र मँगाये-एक मिट्टी का और एक सोने काँ दोनों में जल भर दिया गया। कुछ देर बाद कालिदास ने विक्रमादित्य से पूछा-’राजन् किस पात्र का जल अधिक शीतल है?”

‘मिट्टी के पात्र का।’ विक्रमादित्य ने उत्तर दिया। तब मुस्कराते हुए कालिदास बोले-’जिस प्रकार शीतलता पात्र के बाहरी आधार पर निर्भर नहीं है, उसी प्रकार प्रतिभा भी शरीर की आकृति पर निर्भर नहीं है। विद्वता और महानता का सम्बन्ध शरीर से नहीं आत्मा से है।’


वृद्धावस्था अर्थात अमृत-आनन्द

वृद्धावस्था जिसे कभी परिपक्व आनन्द, प्रगाढ़, जान, अनुभव कोष और मानवीय गरिमा का पर्याय माना जाता था, आज की परिस्थितियों में सर्वत्र भार प्रतीत होती दीखती है तो परमात्मा के विधान में कहीं कोई भूल हुई जान पड़ती है। अधिकाँश लोग इस अवस्था में दुःखी खीझते दिखाई देते है वे इस स्थिति का दोष या तो अपने भाग्य और भगवान को देते है या फिर आज के समाज को कोसने में सन्तोष मानते है। किन्तु तथ्य ठीक इससे विपरीत है वृद्धावस्था के क्षोभ का कारण वह स्वयं ही है सच तो यह है कि चिन्तन की विकृति के कारण वह असायिक वृद्धावस्था का आवरण स्वतः ओढ़ लेता है।

फ्रैक एण्ड वैगनाल्स कम्पनी द्वारा एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘स्टेइंग यंग वियाँड योर डयर्स’ लेखक है-डाँ. एच. डब्ल्यू. हैगर्ड। इस पुस्तक में लखक ने कहा है कि ‘काहिली वृद्धावस्था की जननी है। ‘एक जर्मन चिकित्सक क्रिस्टोफ विलहेल्स हम्यूफलैंड ने अपनी प्रस्तुक मैक्रोविओटिया नामक पुस्तक में लिखा है कि हमारी भावनात्मक आदतें ही हममें बुढ़ापा ला देती है। यदि हम निराश, उदास एवं चिन्ताग्रस्त मनोवृत्ति के है तो वृद्धावस्था का शीघ्र आना सुनिश्चित है।” वे कहते है कि चिर युवा बने रहने का सूत्र है- प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता।

हाइजिया नामक पत्रिका में डाँ. ए.सी.आड़ती ने डाँ. रेमाण्ड पर्ल के किए गये पर्यवेक्षण निर्ष्कष का उल्लेख किया है। डाँ. रेमण्ड ने 5000 व्यक्तियों का अध्ययन किया जो 90 वर्ष की आयु से उपर थे। अध्ययन का निर्ष्कष यह निकला कि एक विशेषता सबके साथ जुड़ी थी- निश्चिन्तता का जीवन क्रम। आशावादी दृष्टिकोण प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता से परिपूर्ण मनोभूमि।

वृद्धावस्था का कारण बताते हुए ‘गैलेट वर्गेस’ लुक एलेविन डयर्स यंगर’ नामक पुस्तक में लिखते है कि एकाकी अथवा एकान्त प्रिय मनोवृत्ति चिन्ता एवं निराशा का कारण बनती है। यह प्रवृत्ति इस बात का परिचायक है कि वृद्धावस्था शीघ्र आने वाली है। उदासी, खिन्नता, निराशा के रहते कोई भी शक्ति सम्पन्न बने रहेन का प्रयत्न कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। अधि दिनों तक जीना हो- चिरयौवन की आकाँक्षा हो तो लोगों में घुलना, मिलना सीखिये। सदा प्रसन्न रहिए और पत्येक छोटे-बड़े कार्य में रुचि लिजिए।

‘लीविंग’ नामक पत्रिका में ‘ऐंडूज एलन’ नामक विद्धान ने वृद्धावस्था न आने देने की 6 सूत्रीय योजनाएँ प्रकाशित कराई थी जो हर व्यक्ति के मनोबल को उँचा बनाये रखने- चिरयौवन का आनन्द लेने की कुन्जी है। वे इस प्रकार है-

(1) भूतकाल की कल्पनाओं में अपना समय निरर्थक न गँवाइयें। यौवन के वे दिन जीवन में अग्रसर होने के लिए संघर्ष के थे। अब पुनः उस संघर्ष और अनिश्चितता को आमन्त्रित करना विवेक सम्मत नहीं है। संघर्ष की उस अवस्था को अब आप पार कर चुके है। आनन्द अतीत नहीं है- वर्तमान है और वर्तमान अपनी झोली में आनन्द का भण्डार लिए सामने खड़ा है। देर बस आमन्त्रण के स्वीकार करने की है।

(2) अतीत की अपनी असफलताओं पर क्षोभ मत प्रकट कीजिए। उनसे प्रेरणा लिजिए और वर्तमान का अधिक कुशलता से उपयोग कीजिए। ईश्वर को धन्यवाद दीजिए जिसके सहारे जीवन के पूर्वार्ध के संघर्षों का पार कर लिया। अब तो केवल जीवन का आनन्द लेना आपके लिए अब शेष है। चिन्ता छोड़िये और प्रकृति के अक्षय आनन्द भण्डार को अपने बाहों मं समेट कर सदा प्रसन्न रहे।

(3) यदि आप कुछ अधिक उम्र के दिखाई पड़ते है तो उसकी किंचित चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। अतीत के संघर्ष कारण चेहरे पर जो झुर्रिया उभर आयी है वे प्रौढ़ता, परिपक्वता की घोतक है जिन्हे देखकर लोग सम्मान देते हैं। उसे परिपक्वता का चिन्ह मानकर गर्व अनुभव करना तथा अनुभवों का लाभ दूसरों को देना ही इस आयु का वास्तविक सदुपयोग है।

(4) अधेड़ आयु में लम्बी-चौड़ी अनेकों योजनाएँ बनाने से व्यक्ति और भी संकट में पड़ जाता है कई कार्यो में हाथ डालने की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य एवं स्थिति के अनुरुप एक कार्य में मनोयोग लगाना अधिक उपयुक्त है। अनावश्यक भाग-दोड़ एवं चिन्ता से थकान आती और बुढ़ापें का प्रभाव दिखाई पड़ने लगता है। काम करे पर अपनी सामर्थ्य के अनुरुप और साथ ही विश्राम की उपेक्षा भी न करे।

(5) कभी यह न सोचे कि हमारी क्षमता की ‘इति श्री’ यही तक है। नवीन स्फुर्ति के लिए नई दिशाओं की तलाश करें और नये काम सीखने में मन लगायें। नयी-नयी खोजें आपकों आनन्द देगी।

(6) भविष्य की अनावश्यक चिन्ता करना उचित नहीं। कभी यह न सोचें कि संसार हमे इसलिए छोड़ देगा कि हमारी शक्ति क्षीण हो चुकी है। यह सोचना निराश को जन्म देगी। वास्तविकता यह है कि संसार को अनुभवशीलों के मार्ग-दर्शन की विशेष आवश्यकता है। आयु ने आपको छह अनुभवों की पूँजी दी हैं इसका सदुपयोग करने में कभी पीछे न हटे। आत्मविश्वास सदा बनाये रखे।

योग्यता, प्रतिभा एवं अनुभवों की दृष्टि से आयु का उत्तरार्ध पक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। पर देखा जाय तो अधिकाँश के आयु का यह पक्ष यो ही बेकार चला जाता है कारण स्पष्ट है अनावश्यक चिन्ताओं एवं आशंकाओं के कारण असमय बुढ़ापा हावी हो जाता है। यह सच है कि अवस्था के अनुरुप शारीरिक चिन्ह प्रकट होते हैं बालों का पकना, आँखों से कम दिखाई देना, कानों से कम सुनाई देना जैसे चिन्ह असमर्थता के नहीं आयु के अनुरुप परिवर्तन के लक्षण है। जिनकों एक सीमा तक ही रोका जा सकता है, पर इनको ही बढ़ापें का, असमर्थता का लक्षण मान लेना भारी भूल है।

संसार के परदे पर सैकड़ों ऐसे व्यक्ति हुए है जो जीवन पर्यन्त युवा उमंगों से भरपूर बने रहे। आयु के अनुरुप शारीरिक परिवर्तन तो उनमें भी दिखाई पड़े किन्तु इन लक्षणों को उन्होंने अपने उपर हावी नहीं होने दिया। हर क्षण का उसी उत्साह एवं उमंग के साथ उपयोग किया, जितना कि युवावस्था में।

मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में यह मान्यता जोर पकड़ती जा रही है, यौवन का सम्बन्ध आयु से नहीं मनःस्थिति से है। वह यदि सन्तुलित प्रसन्न चित्त बनी रहें तो मनुष्य सदा बुढ़ापें से बचा रह सकता है। गाँधी जी 80 वर्ष की आयु में भी अपने को युवक मानते थे। इस अवस्था में भी उनकी स्फूर्ति देखते बनती थी। इसका रहस्योद्घाटन करते हुए उहोंने एक बार कहा था कि-”मैंने कभी भी परिस्थितियों का अपने उपर हावी नहीं होने दिया। अपने समय के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना एवं अनावश्यक चिन्ताओं से मन को विमुक्त रखना ही मेरे चिरयौवन का रहस्य है। ‘चर्चिल’ बुढ़ापे को एक गाली मानते थे ‘उनका कहना था कि-”वृद्धावस्था पके हुए फल के समान है। जिसमें मिठास अधिक है। इस आयु में मनुष्य समाज के लिए सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है।” जार्ज वर्नाडश’ का कहना है कि “ प्रकृति का वास्तविक आनन्द जीवन के उत्तरार्ध में ही उठाया जा सकता है। भूत के अनुभवों से प्रेरणा लेकर मनुष्य संसार का आनन्द लेते हुए समाज के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है” वे कहते है कि बुढ़ापे को मै जीवन का अभिशाप मानता हूँ।

मनस्थिति निराशा एवं आशंकाओं से ग्रस्त हो तो असमय वृद्धावस्था के चिन्ह प्रकट होने लगते है और मनुष्य अपने को असमर्थ, असहाय अनुभव करने लगता है। इस स्थिति से बचने के लिए शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुरुप सतत रचनात्क कार्यो में संलग्न रहना श्रेयष्कर है। सत्कार्यो में सतत निरत रहने पर आत्म-सन्तोष की अनुभूति होती है। जो स्वयं प्रेरणादायक है। भावी आशंकाओं से भी सहज ही बचा जा सकता है।


अपनों से अपनी बात - समय की विषमता और जीवन्तों का उत्तरदायित्व

व्यक्ति की आन्तरिक उत्कृष्टता ही इस बात की गारण्टी है कि वह स्वयं सुखी रहेगा और अपने सम्पक्र क्षेत्र को शान्ति एवं प्रगति से लाभान्वित करेगा परिस्थितियाँ मनःस्थिति की प्रतिक्रिया भर है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इन सनातन तथ्यों की कोई भी अपने चिन्तन और चरित्र के अनुरुप उत्थान और पतन का अवसर प्रस्तुत करते हुए दोकर यथार्थता परख सकता है वर्तमान की विभीषिकाओं को निरस्त करने और भविष्य को उज्जवल सम्भावनाओं से भरा-पूरा देखने का जो सपना संजोया गया है उसके मूल में इसी प्रतिष्ठा को आधार भूत माना गया है उसके मूल में इसी प्रतिष्ठा को आधार भूत माना गया है कि जन-जन को उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत किया जायेगा, फलतः शालीनता और सद्भावना का वातावरण बनेगा। इतना बन पड़ने पर सामान्य सुविधर साधनों के सहारे भी शान्ति और प्रगति की परिस्थितियाँ विनिर्मित होती चली जायेगी। नव सृजन का, युग परिवर्तन का, उज्जवल भविष्य का आधार खड़ा करने वाले तत्व इस तथ्य से पूर्णतया आश्वास्त है कि मनुष्य की अन्तरात्मा को जगाया जा कसे तो वह सहज ही शलीनता अंगीकार करेगी। इतनी बात बन सकी तो फिर सुख्या शान्ति की समग्रता में कही कोई कमी न रहेगी।

इन्हीं विश्वासों के सहारे युगान्तरीय चेतना प्रकट और प्रखर होती चल रही है। वातावरण की विषाक्तता में सन्देह नहीं, तो भी मानवी अन्तरात्मा इतनी समर्थ है कि घेरे का दबाब उसे मूर्छित भर कर सकता है आत्यन्तिक हनन करने में सफल नहीं हो सकता। भयानक ग्रीष्म में धरती की घास सर्वत्र सूख जाती है तो भी उसकी जड़ों में अमृतत्व विद्यमान रहता है। ज्यों ही बादल बरसते है, देखते-देखते सूखी जड़ें उगती और धरती पर मखमली कालीन की तरह फैलती चली जाती हैं। पतनोन्मुखी गुरुत्वाकर्षण निश्चित रुप से प्रबल है वह उत्थान को पतन में परिणित करने के लिए सतत संलग्न रहता है। फिर भी उर्ध्व गमन की प्रक्रिया निराश नहीं होती। अग्नि की लपटे उपर ही उठती है। गर्मी हर वस्तु को फुलाती और उठाती है। पृथ्वी के आकर्षण से अग्नि के विकर्षण ने पराभूत होने से इन्कार कर दिया हैं।

इन शाश्वत सिद्धान्तों ने आज की विषम बेला में अपनी प्रामाणिकता का परिचय देने के लिए अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना स्वीकार कर लिया है। प्रस्तुत विषाक्तता से जूझने के लिए सृजन की शक्तियों ने समय की चुनौती सवीकार की है और कहा है ध्वंस नहीं सृजन जीवन्त है। असत्य नहीं, सत्य प्रबल है। नियन्ता का समर्थन पतन के नहीं उत्थान के साथ है। अन्धकार कितना ही सघन या विस्तृत क्यों न हो उसे दीपक की एक छोटी-सी बाती ललकारती रहती है। फिर परिस्थितियों की विषमता देखकर सृजन के मुख पर भलीनता आने का कोई कारण नहीं।

विलासी, लिप्सा और अधिपत्य की अंहता ने मनुष्य को ब्यामोह के बन्धन में बाँधा है। उसे वासना, तृष्णा के प्रपंच में जकड़ा और अपंग, असहायों की दयनीय स्थिति में ला पटका है। पतन का दाव चल गया। क्योकि उसे अवरोध का सामना नहीं करना पड़ा। यदि आत्मा पर जागृतो जैसी तेजस्विता दृष्टिगोचर होती तो क्षुद्रता को ऐसा दुस्साहस करते न बन पड़ता कि वह महानता को पदच्युत करके स्वयं सिंहासनारुढ़ होती है। दुर्देव का प्रकोप ही कहना चाहिए कि संसार भर को प्रकाश देने वाले पूर्व ने अन्धकार का अधिपत्य स्वीकार कर लिया और लम्बा समय उनीदा तमस्त्रा में पडे़-पडें़ गँववा दिया। ग्रहण का कलंक देर तक सूर्य, चन्द्र को अपने चंगुल में ग्रसित किये नहीं रहता। प्रकाश की सत्ता है, अन्धकार की नहीं। प्रकाश का अभाव ही अन्धकार है। अदीयमान प्रकाश का सामना न करना पडे़ तभी तक उसकी सत्ता है। आलोक के उदित होने पर उसका पलायन देखते ही बनता है।

उद्बोधन और आलोक न मिले तो ब्यामोह और भटकाव की स्थिति देर तक भी बनी हर सकती है, पर प्रभात की जागरण बेला अपना शंखनाद करती रहे और तंद्रा पर उसका कोई प्रभाव न पड़े ऐसा हो नहीं सकता। अणोदय के साथ अन्तरिक्ष से अवतरित होने वाली उर्जा जब वृक्ष वनस्पतियों से लेकर कीट, पतंगों और पशु-पक्षियों तक को जगरुकता एवं सक्रियता अपनाने के लिए उत्तेजित करती है तो कोई कारण नहीं कि मानवी अन्तःकरण रखने वालों पर उसका कोई असर न पड़े। उनकी बात दूर है जो काया तो मनुष्य आकृति की पहने बैठे है, पर उसके भीतर निवास अभी भी पशु ही कर रहा है।

नव-जागरण की इस प्रभात बेला में इन दिनों सर्वत्र नये ढंग से सोचना और नया क्रम अपनाने की हलचल दृष्टिगोचर ही रही है। सघन तमिस्त्रा में गहरी निद्रा बनी रहे और प्राणी मृतवत् पड़ा रहे तो आर्श्चय की बात नहीं किन्तु जब दिनमान प्रखरता बढ़ती ही चल रही हो और हलचलों में तूफानी गतिशीलता उछल रही हो तो फिर आलसी और प्रसादी भी लम्बी चादर तान कर सोये एवं निष्क्रिय पडे़ नहीं रह सकते। स्वयं न जगे तो समय जगा देता है। कोई कुछ करना न चाहे तो भी परिस्थितियाँ कुछ करने कराने के लिए विवश करती है। इन दिनों ऐसा ही हो भी रहा है। जागरण का दौर शरीरगत सक्रियता में ही नहीं मनोगत विचार मंथन में भी प्रकट और प्रकट हो रहा है। चिन्तन को नई दिशा मिली है। पिछले दिनों पेट भरना ही प्रमुख रहा हैं। लोभ को प्रमुखता मिली है और विलास एवं संचय को ही सौभाग्य का चिन्ह समझा जाता रहा है। पिछले दिनों लोभ की ही तरह मोह भी मनुष्य को निर्विवाद बन्धनों में बाँधने के लिए वेदी की भूमिका निभाता रहा है। दोनों अभिन्न मित्र जो है। लोभ की हथकड़ी बनने का अवसर मिल रहा है तो मोह भी सहचरत्व का आनन्द क्यों न ले। वह बेड़ी बनकर साथ क्यो न रहा हो। जब किसी को जकड़ना, पकड़ना ही ठहरा तो दोनों अभिन्न मित्र समान पराक्रम क्यों न करे? समान लाभ क्यों न उठायें? समान श्रेय और क्यों न पाये?

तमिस्त्रा भरी लम्बी काल रात्रि में निशाचरों की ही पाँचों घी में रही है। हिस्त्र पशु-पक्षी आक्रमक बनते रहे है। उल्लू और चमगादड़ स्वच्छन्द विचरे है। चोर चाण्डालों ने निद्वन्द होकर घातें लगाई है। इसमें साधनों का अपव्यय, अपहरण तो हुआ ही है। सबसे बडे़ दुर्भाग्य की बात यह रही कि तन्द्रा ने आलस और .... बनकर स्वभाव पर आधिपत्य कर लिया और मनुष्य को अपंग जैसा बना कर रख दिया। अपंग का एक अर्थ बाधित भी होता। बाधित अर्थ बन्दी। बन्दी अर्थात् जकड़ा हुआ। यह जकड़न थोपी गई या स्वेच्छापूर्वक अपनाई गई यह बात दूसरी है। लोभ की हथकड़ी पहने हुए व्यक्ति हाथों के अवरुद्ध हो जाने पर कुछ कर नहीं सकता, इसी प्रकार मोह की बेड़ियों में कस जाने के उपरान्त किसी के लिए कुछ चल सकना भी शक्य नहीं रहता। श्रेय पथ पर वे लोग चल नहीं सकते जिन्हे मात्र अपने छोटे-से कुटुम्ब को ही इन्द्रासन सौंपे जाने की बात सूझती है। ऐसा को लोक-मंगलके लिए कुछ करने की इच्छा क्यों उठेगी? जिन्हें लालच के लिए ही खपना खटकता है वे क्यों परमार्थ को प्रश्रय देगे? उनके लिए संव्याप्त पीड़ा और पतन को हलके करने के लिए उपलब्धियों में से कुछ कारगर अंशदान कर सकना कठिन है। लम्बी तमिस्त्रा ने पिछड़ों को निष्क्रिय और प्रगतिशीलों को संकीर्ण स्वार्थ परायण बनाकर रख दिया। लिप्सा और लालसा की ललक बढ़ती ही गई। वासना और तृष्णा में मन ऐसा रमा कि यह सूझना तक रुक गया कि जीवन क्रम में इससे आगे की भी कोई मंजिल या जिम्मेदारी है। बड़प्पन और विलास की वारुणी जब मनःतन्त्र पर पूरी तरह हावी हो रही हो तो दीन दुनिया को समस्याएँ, आवश्यकताएँ सूझे भी कैसे? सूझे तो उनके समाधान का कोई उपाचार कैसे बने?

यह है कि उस भूत का पर्यवेक्षण जो अभी आधा अधूरा ही विगत हो पाया है। फिर भी इतना तो निश्चित हैकि नव प्रभात की उर्जा ने झकझोरे बिना छोड़ा किसी को नहीं। जीवन्तों में से हर एक को यह विचार करना पड़ रहा है कि परिवर्तन की इस पुण्य बेला में क्या उसे भी कुछ करना पडे़गा? समय के साथ चलने के बिना क्या उसका भी काम नहीं चलेगा?

यह अन्तःमथन उन्हें खासतौर से बेचैन कर रहा है जिनमें मानवी आस्थाएँ अभी भी अपने जीवन्त होने का प्रमाण देती और कुछ सोचने करने के लिए नोंचती, कचोट्ती रहती है। उन्हे सोचना पड़ रहा है कि परिवर्तन से भरी इस युग सन्धि में उस तरह नहीं रहा जा सकता जैसा कि पिछले दिनों चलता रहा है। इन दिनों न समय की माँग अनसुनी की जा सकती है और न आत्मा की पुकार को देर तक दबाया जा सकता है। विनाश से जूझने और विकास को सींचने के लिए जब जागरुकों की सेना कमर कस कर अग्रगामी हो रही हो- प्रमाण ही शंख ध्वनि से दिगंत गूँजे रहा हो तो मुँह छिपा कर बैठे रहना भी तो सरल नहीं है। उसमें भी भीतर का रुदन और बाहर का उपहास बाधक बनता हैं संकीर्ण स्वार्थपरता में आवद्ध बने रहने की स्थिति तब तक तो अखरती नहीं थी जब अन्यत्र भी वैसा ही दौर चल रहा थाँ। पर जब जागृति ने हर जगह सक्रियता उत्पन्न की है और आदर्शो को जीवन्त करने के लिए कुछ कर गुजरने की ठान ठानी है तो मुँह छिपा कर बैठे रहना भी कठिन है। लोकभर्त्सना से तो किसी बहाने बैचा भी जा सकता है, पर आत्म-प्रताड़ना से छुटकारा कैसे मिले?

यह प्रकट रहस्य है कि अखण्ड-ज्योति के परिजनों में से अधिकाँश ऐसे है जिन्हे जागृत आत्मा कह जाने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। रुचि और रुझान के अनुरुप ही समुदाय एकत्रित होते है। प्रकृति की अनुरुपता ही वर्ग बनाती और घनिष्ठता के सूत्र जोड़ती है। पत्रिका तो निर्मित मात्र है। पठन का व्यसन-साहित्य की खरीद बेच भर का ताना-बाना बुनता है और वह भी ऐसा होता है जो कच्चे धागे की तरह स्थापित पकड़ नहीं पाता। उससे अच्छी वस्तु दीखी कि पुरानी छूटी। पर ऐसा यहाँ कभी हुआ ही नहीं। लेखा-जोखा साक्षी है कि जो एक बार इस परिवार में प्रवृष्ट हुआ वह सदा सर्वदा के लिए उसी का परिजन होकर रह गया। अखण्ड-ज्योति को एक ऐसा सूत्र कह सकते है जिसमें बहुमूल्य मणि-मुक्तकों की माल गुँथी हुई है। हम लोग जागृत जीवन्तों की तरह एक आदर्शवादी परिवार बन कर रह रहे है।

यह मिलन पठन-पाठन की सामग्री जुटाने या खपाने के लिए नहीं वरन् उस महान उद्देश्य के लिए हुआ है जिसमें व्यक्ति और समाज का समान रुप से हित-साधन सत्रिहित है। जिसमें आत्मा और परमात्मा को समान रुप से सन्तुष्ट होने का अवसर है। महानता का रास्ता ऐसा है जिस पर वाहन के सहारे नहीं अपने पैरो से ही चलना पड़ता। जो इतना साहस सँजो लेते है उनके लिए मंजिल के हर विराम पर अपेक्षाकृत अधिकाधिक आनन्द की सामग्री मिलती जाती है। प्रगति के हर चरण पर पहले से अधिक प्रसन्नता की स्थिति उपलब्ध होती है।

व्यष्टि को क्षुद्र और समष्टि को महत् कहते है। विराट ब्रहमा है। संकीर्ण स्वार्थपरता की कीच्ड़ में सना हुआ व्यक्तिवाद ही भव-बन्धन है। इसी में फँसा हुआ कुँभीपाक नरक में सड़ने का कष्ट उठाता है। कहते है कि नरकों में एक ऐसा भी है जिसमें घड में बन्द होकर रहने का कष्ट सहना पड़ता है। यह कुँभीपाक व्यथा और कुछ नहीं व्यक्तिवादी संकीर्णता में आवद्व रहने की घुटन भर है। पेट और प्रजनन में लिप्त मनुष्य सोचता तो कुछ इसी प्रकार है कि वह दूसरों की तुलना में अधिक चतुर है। लेना सबसे देना किसी को कुछ नहीं की नीति आकर्षक भी लगती है, चतुरता युक्त भी। किन्तु वास्तविकता कुछ दूसरी ही हैं ऐसे मनुष्य अत्यधिक घाटे में रहते है। आत्म-सन्तोष, लोक-सम्मान अैर देवों अनुग्रह के तीनों की महान लाभों से उन्हें सर्वथा वंचित रहना पड़ता है, फिर प्रगति भी सीमित क्षेत्र में ही सम्भव होती है। ऐसे लोग जो पाते है अपव्यय में गँवाते है। साथ ही जन-सहयोग के अभाव में अपने बलबूते उतना कम जमा कर पाते है, जिन पर कोई गये गुँजरे स्तर वाला ही सन्तोष कर सकता है। यह संग्रह जिन्हे मुफ्त में मिलता है उनका चिन्तन और चरित्र उठता नहीं गिरता है। इस प्रकार यह हराम में मिला उत्तराधिकार उनके लिए भी अभिशाप ही सिद्ध होता है जिन्हे इच्छा या अनिच्छा से देना पड़ा।

चतुर लोगों की इन दिनों भरमार है। बुद्धिमानों के दर्शन दुर्लभ हो गये है। बुद्धिमता का निर्धारण और निर्देशन एक ही है कि ‘महानता का मार्ग अपनाया जाय। इसमें किसानों को बीज बोने, उद्योंगी को कारखाना लगाने, विद्वान को अध्ययन करने के समय त्याग करना पड़ता हैं लाभदायक प्रतिफल को देखते हुए यह आरम्भिक विनियोग किसी भी दृष्टि से घाटे का सौदा नहीं हैं। महानता का वृक्षारोपण कुछ ही समय में कल्पवृक्षों क नन्दन वन की तरह फूलता-फलता है। तत्काल होने की आतुरता हो तो फिर हथेली पर सरसों जमाकर दिखाने वाली बाजीगरी के कुचक्र फँसने और जंजालों में भटकने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगता नहीं है।

महानता का अवलम्बन करके असंख्य व्यक्ति क्षुद्र परिस्थितियों में जन्मने-पलने पर भी अपनी विशिष्टिता के आधार पर उच्च स्थिति पर पहुँचे और यशस्वी हुए है। इन उदाहरणों में एक ही निर्ष्कष निकलता है कि महानता उस उद्यान को लगाने की तरह है जो आरभ में परिश्रम और साधन चाहता है किन्तु समयानुसार सुरभि और सम्पदा के उभयपक्षीय अनुदान उत्साहवर्धक मात्रा में प्रदान करता है। यह महानता आखिर है क्या जिससे व्यक्तित्व विशिष्टता युक्त एवं वर्चस्व वैभव सम्पन्न बनता चला जाता है? उसका उत्तर एक ही है-समष्टि की साधना। लोकसेवा-जनकल्याण इसे अपनाने का एक ही उपया है-स्वार्थ को परमार्थ के निमित्त विसर्जित करना। इस दुस्साहस को जो जिनी मात्रा में क्रियान्वित कर पाता हे वह उसी अनुपात से अपने को बुद्धिमान एवं भाग्यवान अनुभव करता है। परिणामों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर सकने वाले अपने अनुभव एक स्वर से यही सुनाते रहे है कि समष्टि की सेवा साधना से बढ़कर लाभदायक उद्योग इस संसार में और कोई है ही नहीं। इसे अपनाने पर स्वार्थ और परमार्थ की उभयपक्षीय पूर्ति सहज ही होती रहती है।

इस युग सन्धि की ऐतिहासिक बेला में दूरदर्शिता और सदाशयता की संयुक्त माँग एक ही है कि इन दिनों संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया जाय और जो बच सके उसे नव सृजन के पुण्य प्रयोजन में भावनापूर्वक लगाया जाय। धन का अभाव हो सकता है किन्तु श्रम, समय एवं मनोयोग की किसी के पास भी कमी नहीं हो सकती है। रुचि होने पर भी निरर्थक कामों में भी अत्याधिक व्यस्त समझे जाने वाले लोग भी ढेरों श्रम, समय और साधना लगाते रहते है। फिर इसमें तो निर्धनों को भी कठिनाई नहीं हो सकती। व्यस्तता का बहाना करके समय दान और तंगी की आड लेकर अंशदान न दे सकने का तक्र तो दिया जा सकता है, पर औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। न बहानेबाजी को सच्चाई बताने का प्रयास सफल हो सकता है। तथ्य में ‘अरुचि’ भी काम कर रही होती है। जागृतो के उत्तरदायित्व और समय की माँग की संगति बिठाई जा सके तो इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है कि इन दिनों वैयक्तिक जंजालों को थोड़ा हलका किया जा सकता है और उस बचत को उन परमार्थ प्रयोजनों में लगाया जा सकता है जो युग सन्धि के इस पर्व पर मानवी सभ्यता के विकास या विनाश में ये एक का चुनाव करने के साथ सम्बद्ध हैं। लिप्सा, लालसा में हो तो चौरासी लाख योनियो में भटकते हुए लम्बा समय बीता है अब यदि इस जीवन के बचे-खुचे समय का कहने लायक अंश युग धर्म के निवार्ह में लगा दिया जाय तो कोई बड़ा घाटा पड़ने वाला नहीं है। पेट प्रजनन की प्रक्रिया तो अगले दिनाँक हेय योनियों के कुचक्र में फँसे रहने पर भी भली प्रकार चलती रह सकती है।


गायत्री चरण पीठे ओर नव सृजन की सम्भावनाएँ

इन दिनों युग सन्धि का परिवर्तन चक्र द्रुगति से चल से चल पड़ा हैं महाप्रजा का अवतरण नये विश्व का अभिनव सुविस्तृत सरजाम इकट्ठा कर रहा है। साथ ही उस पुण्य प्रयाजन के लिए जीवन्तों एवं जागृतों के सहायोग की अपेक्षा आवश्यकता भी प्रबल हो रही हैं ऐसे समय ऐसे असंख्य कार्यक्रम सामने आखडे़ हुए है, जिनमे हर योग्यता का व्यक्ति अपनी योग्यता एवं स्थिति के अनुरुप कुछ न कुछ सहयोग कर सकने में समर्थ हो सकता हैं। क्या किया जाय? इस प्रश्न के उत्तर में क्रिया कलाप की रुप-रेशा निर्धारित करने से पूर्व यह देखना होगा कि किस के लिए कितना समय और कितना अंशदान दे सकना सभ्भव हो सकता है। योग्यता कितनी ही छोटी क्यों ने हो-परिस्थिति कितनी ही दुर्बल क्यों न हो-हर जीवित व्यक्ति का योगदान किसी न किसी रुप में उपयोगी हो ही सकता है। जटायु के असमर्थ और वयोवृद्धि भी अनीति के सम्मुख अड़ सकत है और गिलहरी के समान साधनहीन भी इन दिनों अपने अनुदान प्रस्तुत करते है भले ही वे नाप-तौल की दृष्टि से अकिचन ही क्यो न कहे जायँ।

यहाँ एक बात स्मरण रखने योग्य है कि युग सृजन जैस व्यापक अभियान एकाकी नहीं संयुक्त प्रयासों के सहारे ही अग्रगामी हो सकते है। भजन, पूजन, दान-पुण्य, व्यायाम, उपवास जैसे कार्य तो एकाकी भी हो सकते है, पर जिस प्रयोजन में व्यक्ति समाज का ढाँचा ही बदलना हो-प्रचलनों और परिस्थितियों में भारी उलट-पुलट करनी हो उसके लिए संयुक्त प्रयासों से कम से काम चल ही नहीं सकता। अतएवं जो कुछ सोचा जाना है तो कुछ किया जाना है उसका स्वरुप संयुक्त प्रयास के रुप में ही होगा।

यह संयुक्त प्रयास किसी न किसी माध्यम से करना होगा। यह माध्यम ‘महाप्रज्ञा का प्रतीक ही उपयुक्त हो सकता है। व्यक्ति प्रधान संगठन अपनी पिछड़ी मनोभूमि में किस कदर दुर्दशाग्रस्त एवं विग्रह केन्द्र बन रहे है यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए माध्यम के चुनाव में प्रज्ञा प्रतीकों को ही प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। युग सृजन के केन्द्र स्थान गायत्री पीठ हरिद्वारा के रुप में चल रहे है। यह व्यक्ति प्रधान नहीं वरन् देवता के संरक्षण में चल रहे हैं। इन दोनों केन्द्रों के माध्यम से विगत तीस वर्षों से जो हो सका है वह उत्साहवर्धक भी है और कलह रहित भी। समय आ गया कि इस देवालय प्रक्रिया को अन्य भी अपनाया जाय और अपने-अपने क्षेत्र में नव-सृजन का अभियान उसी रुप में चलाया जाय जैसा कि मथुरा और हरिद्वार के दोनों केन्द्रों द्वारा उस विश्वव्यापी विधि-व्यवस्था के रुप में चलाया जा रहा है।

गत वर्ष गायत्री शक्ति पीठो और प्रज्ञा पीठों के निर्माण का दौर चला हैं उनकी संख्या एक हजार के लगभग हो चली, पर देश के विस्तार को देखते हुए इतने देवालय जलते तबे पर पड़ने वाली बूँद की तरह ही समझे जा सकते हैं कहाँ सात लाख गाँव और उमें रहने वाला साठा करोड़ जन समुदाय और कहाँ एक हजार प्रज्ञा पीठों की छोटी-छोटी इमारतें और उनमें काम करेन वाले दो चार हजार कार्यकर्ता। इतनी मंथर गति से समस्त भूमण्डल पर बसने वाली 400 करोड़ जनसंख्या तक युगान्तरीय चेतना का आलोक पहुँचा सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता हैं सो भी तब जब उसे मात्र बस वर्ष की अवधि में पूरा करने की आवश्यकता एवं विवशता सामने आ खड़ी हुई हो।

समय की कमी एवं कार्य की विशालता को देखते हुए नया निश्चय यह किया गया कि हर बड़े गाँव में गायत्री चरण पीठ नाम से एक छोटा धर्म संस्थान बनाया जाय जिसमें उपासना की अनिवार्यता वाली बात भी पूरी होती रहे और धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण का उपक्रम भी चलता रहे। व्यक्ति, परिवार एवं समाज निर्माण की व्यापक कार्य पद्धति को गाँव-गाँव, घर-घर, जन-जन तक पहुँचाने के लिए आवश्यक हो गया है कि इन छोटे देवालयों की स्थापना की जाय और उनकी लागत तथा विधि इतनी स्वल्प एवं सरल हो कि कहीं भी उन्हं बनाने में कठिनाई अनुभव न हों।

यों गायत्री चरण पीठे यदि कच्ची मिट्टी से बनाई जाँय और उनका चबूतरा तथा चरण प्रतिमा भर पक्की ईंटों से बने तो ढाई सौ से भी काम चल सकता है, पर यदि देवालय, यज्ञ स्थान, सत्संग आच्छादन पक्की ईटों से स्थायी स्तर के बनाये जाँय तो उनकी लागत तीन हजार भी हो सकती है। टिन शेड का स्थायी सत्संग आच्छादन बनाया जाय तो उसकी लागात चार हजार तक पहुँच सकती है। इसमें जमीन मात्र 30ग50 फुट की आवश्यकता पडे़गी। थोड़ी कम हो तो भी काम चल सकता था। इतनी भूमि और राशि इन दिनों कहीं भी किसी भी प्रतिभाशाली व्यक्ति के नेतृत्व में सहज विनिर्मित हो सकती है। यह न्यूनतम भूमि की चर्चा है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि अधिक बड़ी जगह मिले। गाँव के समीप यदि एक-दो बीघे जमीन इस कार्य के लिए मिल सके तो इसमें उद्यान, खेलों का मैदान, व्यायाम शाला बडे़ सम्मेलन, विद्यालय आदि के लिए गुजायश बनी रहेगी।

यह इमारत की बात हुई जिसकी छत्र-छाया तके अनेकों सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ एवं धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण की जन-जागरण प्रक्रिया का सहज संचालन हो सकता है। पौढ़ शिक्षा, साक्षरता, प्रसार, वृक्षारोपण, चलपुस्तकालय, स्वास्थ्य सर्म्वधन, स्वच्छता, नारी जागरण, शिशु कल्याण जैसी रचनात्मक और विवाहों में अपव्यय, दहेज, बाल-विवाह, मृतक-भोज, छुआछूत, पर्दाप्रथा, नशेबाजी, जुआ, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट आदि प्रचलित अवाँछनीयताओं के उन्मूलन का सुधारात्मक अभियान चलाया जा सकता है। इस प्रकार के संगठित प्रयास जन-जन में सृजन चेतना उत्पन्न करके उनके श्रम सहयोग के सहारे सम्पन्न किये जायेंगे। इसके लिए आवश्यक अर्थव्यवस्था दस पैसा जमा करने वाले ज्ञान घटों एवं मुट्ठी अन्न वाले धर्म घटों के सहारे अर्जित की जायेगी। युग निर्माण अभियान की सदस्यता में एक घन्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान यज्ञ के निमित्त लगाते रहने की शर्त है। अब तक वह ढीली-पोली भी चलती रही है अब उस पर अधिक जोर और दबाव दिया जा रहा है। इसके लिए किसी भी भावनाशील धर्म प्रेमी ने अमान्य नहीं किया है। फलतः इन छोटी गायत्री चरण पीठ की स्थापनाओं के माध्यम से उस गाँव में तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्र में उस नव सृजन के चल पड़ने की पूरी-पूरी सम्भावना है जिनके सहारे जनमानस का परिष्कार एवं परम्पराओं का नव निर्धारण हो सकने की विश्वासपूर्वक अपेक्षा की गई है।

आरम्भ में हर गायत्री चरण पीठ के पाँच कार्यक्रम प्रधान रहेगे। (1) घर-घर जन-जनतक युग साहित्य पढ़ाने और वापिस लेने की व्यवस्था। इसी के साथ दीवारों पर आदर्शवाक्य लेखन की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। इस योजना के अर्न्तगत सभी शिक्षितों को युग चेतना का प्रतिपादन पढ़ने और अशिक्षितों को नियमित रुप से सुनने का अवसर मिलेगा। (2) सम्पक्र में आने वाले प्रज्ञा प्रेमियों के जन्मदिवसोत्सव मनाये जाँय। उनके घरों पर गायत्री यज्ञ एवं भजन कीर्तन समेत ज्ञान गोष्ठियों का होना। सम्भव हो तो बालकों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन विद्यारम्भ आदि संस्कारों की व्यवस्था बना कर परिवार निर्माण गोष्ठियों की व्यापक व्यवस्था बनाना। (3) गायत्री चरणपीठ पर साप्ताहिक यज्ञ, सत्संग, भजन कीर्तन एवं प्रवचन का प्रबन्ध किया जाना । (4) रात्रि को रामायण कथा एवं कीर्तन की व्यवस्था। (5) युग सृजन के निमित्त समय दान एवं अंशदान के लिए भावनाशालों को प्रोत्साहित करना उनके यहाँ ज्ञान घटों की स्थापना कराना। यह पंच सूत्री योजना सभी गायत्री चरण पीठों को अपनानी होगी।

इसके लिए अधिकाँश कार्यकर्ता तो अवैतनिक सेवा भावी ही काम करेगे, पर एक की स्थिर नियुक्ति ऐसी भी होगी जिसे पूरे दिन या आधे दिन के लिए वेतन देकर नियुक्त किया जाय और उसे नियमित रुप से पाँच कार्यक्रमों की व्यवस्था बनाने के लिए इधर-उधर भेजा, दौड़ाया जाता रहे। यों अधिकाँश कार्य तो अवैतनिक एवं सुयोग्य कार्यकर्ता ही अपना समयदान नियमित रुप से देकर सम्पन्न किया करेगें।

न्यूनतम दस पैसा एक घन्टा का अंशदान- ज्ञानयज्ञ के लिए-सद्भाव सर्म्बधन के लिए-नियमित रुप से निकालने और उसे दैवी उत्तरदायित्वों के निर्वाह का अनिवार्य कर्तव्य मानने की शर्त इस देव परिवार में सम्मिलित रखी गई है। इसमें व्यक्ति को दवे प्रयोजनों के लिए अपनी क्षमता का उपयोग करने के निमित्त व्यवहारिक कदम उठाने का अवसर मिलता है और अभियान का इतना बड़ा काम करने के लिए श्रम साधनों की आवश्यकता जुटाने का मार्ग मिलता है। अतएवं इस प्रवृत्ति को अधिकाधिक उत्तेजना देने की आवश्यकता है। न्यूनतम शर्त को अधिकतम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो दैवी अंश और दिव्य-ज्योति का प्रतिनिधि मनुष्य सामान्य परिस्थिति में अवरुद्ध होते हुए भी युग सृजन जैसे महान कार्य में अत्यधिक महत्व पूर्ण भूमिका सम्पन्न कर सकता है।

वर्णाश्रम धर्म का अनुशासन यह बताता है कि जिनकी आयु पचास की हो चली उन्हें वानप्रस्थ लेना चाहिए और विराट् ब्रहमा की साधना के निमित्त लोक-मंगल रत जीवन जीना चाहिए। इस महान मर्यादा को न्यनाधिक मात्रा में उन्हें तो पालन करना ही चाहिए जिनमे पारिवारिक और आर्थिक उत्तरदायित्व हलके हो गये है। इसी प्रकार प्राचीन मर्यादाओं के अनुसार उपार्जन का दशवाँ अर्थ अंश परमार्थ के लिए निकालने की बात न बन पड़े तो महीने में एक दिन की आजीविका का अंशदान निर्धारण रहना चाहिए। युग अभियान में रुचि लेने वालों का इस अपनी जीवनचर्या में इस उदार प्रयोजन को स्थान देने और उसका नित्य नियम की तरह पालन करेन की आवश्यकता अनुभव करने पर जोर दिया गया है। न्यूनतम एक घन्टा समय और दस पैसा अनुदान निरन्तर प्रस्तुत करते रहने की शर्त इसी लिए लगाई गई है कि यह देव संस्कार हर किसी के स्वभाव का अंग बन सके। जिनकी स्थिति है वे बच्चों के ज्ञान घट भी अलग से रखायें और उनमें दस पैसा डालने का अभ्यास करें। यह प्रवृत्ति आगे चलकर उन्हे देव मानव बनाने में सहायता करेगी। थोडे़ समर्थ होते ही उन्हें तुलसी का उद्यान एवं पुष्प वाटिका सीचकर संसार को सौर्न्दय वृद्धि में सहयोगी बनने जैसी प्रेरणाएँ देनी आरम्भ कर देनी चाहिए।

कहा जा चुका है कि ज्ञान घटों में जमा होने वाली राशि के आधार पर ही गायत्री शक्ति पीठो, प्रज्ञा पीठों और चरण पीठों की प्रत्यक्ष गतिविधियों का सूत्र संचालन किया जाना है। आर्थिक आवश्यकताएँ श्रम, समय, एवं मनोयोग के योगदान की है वह समयदान के लिए हर विचारशील पर दबाव डालने से सम्पन्न हो सकेगी। युग सृजन अभियान का मेरुदण्ड यह समयदान ही है जिसके लिए प्रत्येक जागृत आत्मा को बार-बार उकसाया और दबाया जा रहा है।

गायत्री चरण पीठ स्थापना के साथ-साथ ही उनके संस्थापकों को सम्बद्ध कार्यक्षेत्र में जन-सम्पक्र स्थापित करने के लिए निकलना चाहिए और नव सृजन की आवश्यकता समझाते हुए अंशदान की उदारता अपनाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि उस अनुरोध का सब न सही कुछ तो स्वीकार करेगे ही और इतने भर से गाड़ी पटरी पर चलने लगेगी। पीछे तो देर-सबेर में उपयोगिता समझने पर अन्य लोग भी उस सदाशयता का अनुसरण करने लगेंगे।

निवृत्त या व्यस्त किसी भी स्तर के व्यक्ति का युग सृजन जैसे सामयिक आपत्ति धर्म का पालन करने के लिए जिना सम्भव हो उतना समयदान देते रहेन के लिए सहमत किया जा सकता है और उकसे सहारे निर्धारित गतिवधियों का कार्यक्रम सरलतापूर्वक आगे बढ़ाया जा सकता है। ,

अपने देश में आलस्य और बेकारी का अभिशाप जन-जन पर छाया हुआ हैं। वास्तविक अर्थो में व्यस्त कहे जाने वाले लोग भी जब लोक-मंगल के महत्व को अनुभव करते है तो कई आवश्यक कामों में कटौती करके भी समाण सेवा का उत्तरदायित्व निबाहते है। फिर जिनके पास ढेरों समय आलस्य और प्रमाद में गँवाने के लिए मिलता है उनकी अन्तरात्मा हो जगाना और उसका उपयोग युग सृजन जैसे महान कार्य में लगाने के लिए सहमत कर लेना कुछ भी कठिन नहीं है। प्रवृततें और निवृत्तो का ढेरों समय सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के सर्म्बधन में लगने के लिए उपलब्ध हो सकता है। इसी प्रकार निर्धन एवं सम्पन्नों में से हर स्तर का व्यक्ति थोड़ा बहुत अंशदान देते रहने के लिए तत्पर हो सकता है। मुट्ठी फण्ड वाले अन्न घट-दस पैसे वाले ज्ञान घट किसी के लिए भार रुप नहीं हो सकते। कठिनाई आर्थिक तंगी की नहीं-अनुदार कृपणता की हैं। या फिर इस बात की है कि सड़न को बुहारने और अभिनव उद्यान लगाने की रुपरेखा और उसके आधार पर प्रस्तुत होने वाली सुखद सम्भावना का स्वरुप ठीक तरह समझना सम्भव हो सके। यदि यह अंधकार हट सके तो पैसा भी मिलेगा और समय भी। तब नव सृजन का कोई काम अटका नहीं रहेगा। नव निर्माण के निमित्त साधन तो चाहिए ही। उन्हें न धनवानों से पूरा किया जा सकता है और न सरकारों से। उसकी पूर्ति मात्र लोक श्रद्धा के जागरण से ही सम्भव है। हमे आसमान से अमृत बरसाने की प्रतीक्षा करते रहने की अपेक्षा कुँआ खोदने और पानी पीने की नीति अपनानी चाहिए। तथ्यों से अवगत करके लोक श्रद्धा उभारने और जन सहयोग से युग सृजन के आवश्यक साधन उपलब्ध करने की योजना बनानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति परिवार में ऐसी अगणित प्रतिभाएँ मौजूद है जो टोली बनाकर अपने क्षेत्र में निकल पडे़ तो हजारी किसान द्वारा लगाये गये हजार उद्यानों की आदर्शवादिता के नये उदाहरण प्रसतुत कर सकती है। तीन हजार या पाँच हजार के धर्म संस्थान बनाना किसी भी गाँव के लिए भारी नहीं हो सकते, शर्त यही है कि भाव उत्तेजना के निमित्त प्रामाणिक प्रतिभाएँ आगे आये। इन दिनों मिशन की पत्रिकाओं के चार लाख के लगभग सदस्य है। वे अपने सहयोगियों का साथ लेकर कुछ समय के लिए इस प्रयोजन के लिए सम्पक्र क्षेत्र में निकल पड़े तो एक लाख चरण पीठें सहज ही बन सकती है। युग निर्माण परिवार के परिजनों की संख्या प्रायः 24 लाख आँकी गई है। चौबीस प्राणवान चाहें तो मिलजुल कर एक चरण पीठ का निर्माण अपनी-अपनी जेबों के सहारे भी कर सकते हैं। फिर ऐसे पुनीत कार्य में जन सहयोग मिलने की कोई कठिनाई कहीं भी प्रस्तुत होने की आशंका नहीं है।

एक लाख चरण पीठें उनमें से प्रत्येक को सौंपा गया एक हजार व्यक्तियों का कार्यक्षेत्र-10 करोड़ व्यक्तियों तक अपनी घनिष्ठता स्थापित कर सकने में समर्थ हो सकता है। देश की 60 करोड़ आबादी में 10 करोड़ वयस्क और बुद्धिमान व्यक्ति कुछ मानी मतलब रखते है। इतने लोगों के नियमित रुप से प्रेरणा मिलते रहते।

की बन पडे़ तो समझना चाहिए युग परिवर्तन की .... के सुनिश्चित यथार्थता में परिणित होना तनिक ...कठिन नहीं है। इन पीठों में से प्रत्येक में एक वैतनिक .... रखा जाने में कहीं भी आर्थिक कठिनाई आड़े आने वाली नहीं है ‘ज्ञान घट’ उसकी पूर्ति सहज ही कर दिया करेगे। पूरे या आधे समय नियमित रुप से काम करने वाले भावनाशील एक लाख कार्यकर्ताओं के प्रयास का मूल्य आँका जाय तो परिणित पुलकित एवं रोमाँचित कर देने जितनी हो सकती है। फिर जन साधारण में से निकलने वाले समयदानियों के श्रम को यदि ठीक तरह से रचनात्मक कार्मों में लगाया जा सके तो उसका परिणाम ऐसा हो सकता है जिसे अप्रत्याशित एवं चमत्कारी कहा जा सके।

गायत्री चरण पीठों के धर्म संस्थान रचानात्मक सत्प्रवृत्तियों के प्रति लोक श्रद्धा जगाने वाले जागरण केन्द्र होगे। उनका आकार छोटा होने पर भी उद्देश्य महान है। झन्डा जरा-सा होता है, देव प्रतिमाएँ भी छोटी-सी होती है पर उनके साथ जिस गहन आस्था का समावेश होता है उसके कारण उनका शासन असंख्य अन्तःकरणों पर देखा जा सकता है। ठीक इसी प्रकार लागत एवं आकार की दृष्टि से छोटी दीखते हुए भी उनके साथ जुड़ी हुई योजना अत्यन्त सुविस्तृत और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली होगी।

मनःस्थिति एवं परिस्थिति संशोधन करने वाले सृजनात्मक शालीनता बढ़ाने वाले अनेकों कार्यक्रम हर जगह स्थानीय परिस्थितियाँ एवं आवश्यकताओं को देखते हुए बनाये जा सकते है और उनमें हर योग्यता का-हर स्थिति का-हर स्तर के श्रम समय का-उपयोग सुनिश्चित रुप से हो सकता है। एक कार्यक्रम होता तो कठिनाई यह रहती कि एक योग्यता के व्यक्ति ही काम आते, पर जब वृक्षारोपण एवं स्वच्छता सर्म्बधन जैसे श्रमदान पर आधरित कार्यक्रम भी चरण पीठों की सृजन योजना में सम्मिलित है तो किसी भी समयदानी को इसकी शिकायत न रहेगी कि हमारे सहयोग को निरर्थक ठहराया गया। पैसे की आवश्यकता तो है ही वह जहाँ जितना जुट सके वहाँ उतने से ही बडं़ निर्माण एवं विशाल कार्यक्रमों का विस्तार होता चला जायेगा इसलिए इन स्त्रोतों को खोलना भी इन धर्म संस्थानों के निर्माणकत्ताओं का कर्तव्य है। जहाँ इसमें जितनी सफलता मिलेगी वह उसी अनुपात से नव सृजन की सम्भावना प्रखर होती चलेगी।

अखण्ड-ज्योति के परिजनों में से प्रत्येक को नव-सृजन के इस पुण्य पर्व पर युग धर्म के निर्वाह के निमित्त कुछ साहसिक कदम बढ़ाने चाहिए। इस सर्न्दभ में किस की क्या मन स्थिति एवं क्या परिस्थिति है और उनके लिए कहाँ क्या कुछ कर सकना सम्भव हो सकता है? इसके लिए शान्ति कुन्ज हरिद्वार से पत्र-व्यवहार करके किसी उपयुक्त निर्ष्कष पर पहुँचा जा सकता है। अपेक्षा की गई है कि युग सन्धि के पुण्य पर्व पर प्रत्येक जागृत आत्मा को अपने-अपने ढंग से कुछ प्रेरणा मिलेगी और उस आधार पर उत्पन्न हुई उदारता से उज्जवल भविष्य के अभिनव सृजन में उत्साहवर्धक सहायता मिलेगी।


VigyapanSuchana

कार्यकर्ताओं के शिक्षण सत्र

गायत्री शक्ति पीठों, प्रज्ञापीठों और चरण पीठों को पूरा एवं आँशिक समय देने वाले कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता पडे़गीं। वे वैतनिक भी हो सकते है और अवैतनिक भी। किन्तु उन सबका इन नये उत्तरदायित्वों को कुशलतापूर्वक निर्वाह कर सकने की साँगोपाँग जानकारी तथा योग्यता होनी ही चाहिए।

इस प्रशिक्षण के लिए शान्ति कुन्ज हरिद्वार में एक महिने के सत्रों की व्यवस्था की गई है जो हर अँग्रेजी महीने की एक तारीख से तीस तारीख तक चला करेगे। जिनके गले ठीक है, तथा स्वर की पहचान हे वे दो महिने में संगीत की भी काम चलाड शिक्षा प्राप्त कर सकेगे।

शिक्षार्थी भोजन व्यय अस्सी रुपया मासिक स्वयं वहन करेगा। भेजने वाली पीठें भी यह भा उठा सकती है। जिन्हे इस प्रशिक्षण के लिए जिस महीने आना हो वे अपना स्थान समय से पूर्व ही सुरक्षित करालें। ओवदनकर्ता स्वीकृति प्राप्त करने के उपरान्त ही आवें।

चरणपीठों के संकल्प सितम्बर से

युग सन्धि का यह प्रथम बीजारोपण वर्ष है। इसमें गायत्री शक्ति पीठें और प्रज्ञा पीठें तो यथावत् बनती ही रहेगी। साथ ही गायत्री चरण पीठों को गाँव-गाँव स्थापित करने पर अत्यधिक जोर दिया जायेगा। युग प्रवाह के अनुरुप वे इन्हीं दिनों हजारों की संख्या में बन भी जायेगी।

चरण पीठ स्थापना एवं संचालक एक सुनियोजित अभियान है इसके लिए मनस्वी प्रतिभाएँ सुनिश्चित संकल्प करेगी और इसके लिए मार्ग-दर्शन, आशीर्वाद एवं अभीष्ट आत्मबल प्राप्त करेगी। इसके लिए चार-चार दिन के छैः सत्र सितम्बर मास में लगाये जा रहे है। यह सत्र शान्ति कुन्ज में हरिद्वारा में चलेगें। यह इसे प्रकार है। (1) 1 से 4 (2) 6 से 9 (3)11 से 14 (4) 16 से 19 (5) 21 से 24 (6) 26 से 29। गुरुदेव अक्टूबर से उद्घाटन प्रवास पर चले जायेगे। इसलिए चरण पीठ स्थापनकर्ताओं को उनकी उपस्थिति, आकर संकल्प लेते एंव मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए सितम्बर में ही बुलाया गया है। जो इनमें से जिस सत्र में आवे पूर्व सूचना भेजकर स्थान सुरक्षित करालें।


स्वर गूँजे निर्माण के

(बाबूलाल जैन ‘जलज’)


स्वर गूँजे निर्माण के (kavita)

धर्म-कर्म के चरण बढे़ है, धरती पर इंसान के। सदियों के पश्चात आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण के॥

धरती अननी, अंबर अपना। सूरज-सा हम सबको तपना॥ कर्म-मंत्र जीवन भर जपना। पूरा होगा नव युग सपना॥ मंगल घट रखना है घर-घर, प्रेम त्याग सद्ज्ञान के। सदियों के पश्चात् आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण कें।

संकल्पों ने ली अँगड़ाई। जागी आत्म ज्ञान तरुणाई॥ पुरश्चरण की बेला आई। झूम उठी आशा अमराई॥ खुलते जाते नये क्षितिज्ञ अब, ज्ञान और विज्ञान के। सदियो के पश्चात् आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण के॥

श्रम संयम का सौरभ उड़ता। दूर हुई जीवन की जड़ता॥ लेकर ज्ञान मशाल हाथ में। मिला कदम से कदम साथ में॥ परिजन बंद कपाट खोलते, अंधकार अज्ञान के। सदियों के पश्चात् आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण के॥

उँच-नीच का रहा न अंतर। करनी कथनी एक बराबर॥ पथ अनेक, एक है मंजिल। कण-गण में वसता प्रभु अविकल॥ फूट रहे है अभिनव अंकुर, भक्तिभाव सद्भाव के। सदियो के पश्चात् आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण के॥

आदर्शों की फसल न सूखे। रहे न जग में कोई भूखे॥ समता भाव हृदय में जागे। गले लगाये बढ़कर आगे॥ परहित में जो अर्पित रहता, वही निकट भगवान के। सदियों के पश्चात् आज फिर, स्वर गूँजे निर्माण के॥

*समाप्त*