उगने की शक्ति बीज में होती है । वह घुना हो तो उगेगा कैसे ? सही बीज और बोने की प्रक्रिया सही होने पर भी कुछ तथ्य ऐसे है जो उगने में अवरोध बन सकते है और अंकुरित होने के उपरान्त भी उसे पौधा या वृक्ष बनने के मार्ग में चट्टान की तरह अड़ सकते है । फलतः बीज की परिपूर्ण समर्थता भी उसकी प्रगति को कुँठित किये रह सकती है ।
साधना को बीज समझा और उसकी परिणिति को सिद्धि कहा जा सकता है । इस प्रक्रिया को-बीज के वृक्ष बनने-से उपमा दी जा सकती है । बीज का सक्षम होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिए उपयुक्त भूमि, खाद, सिंचाई और रखवाली की भी जरुरत पड़ती है । यह साधन न मिलें तो बोने वाले की आकाँक्षा एवं बीज को समर्थता का उपयुक्त प्रतिफल उपलब्ध न हो सकेगा ।
साधना विधान के जो माहात्म्य प्रतिफल कहे गये है वे तभी सच सिद्ध होते है जब साधक की मनोभूमि में उत्कृष्ट चिन्तन की उर्वरता और आदर्श चरित्र की नमी विद्यमान हो । मात्र कर्म काण्ड ही सब कुछ नहीं है । पूजा से ही देवता प्रसन्न नहीं होते । इस समस्त विधि-व्यवस्था की उपयोगिता तभी है जब साधक को अपने व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाना आता हो । कुशल किसान वह है जो बीजारोपण के साथ-साथ पौधे के उगने एवं फलने के लिए अभीश्ट आवश्कताओं को भी समझता और उन्हें जुटाने का प्रयत्न करता है । साधना एक कृषि कर्म एवं उदात्त आरोपण है उसे फलित करने के लिए उपासना क्रम ही पर्याप्त नहीं वरन जीवन साधना का वह उपक्रम भी जुटाया जाना चाहिए जो व्यक्तित्व को विकसित करने के साथ-साथ सिद्धियों का सुयोग भी प्रस्तुत करता है ।
‘अखण्ड-ज्योति’ को मिशन की वाणी कहानी चाहिए । विगत 43 वर्षो से युगान्तरीय चेतना इसी के पृष्ठों में लिपट कर प्रकट होती रही है । युग गंगा का अवतरण भले ही दिव्य लोक से होता है, पर उसका प्रत्यक्ष दर्शन तो अखण्ड-ज्योति की गंगोत्री से होता है । उसी के स्नान अबगाहन से इतना बड़ा प्रज्ञा परिवार उपजा है । असंख्य शिशु शावकों को उसने अपना पयपान कराने तथा अचंल का आश्रय देने की सतत साधना से इसे योग्य बनाया है कि वे युग शिल्पी अग्रिम पंक्ति में खड़े हो सकें । अवाँछनीयता, उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन का तूफानी प्रबाह उत्पन्न करने ओर विनाश को सृजन में बदलने की जो युग चेतना इन दिनों उभर रही है उसे ‘अखण्ड-ज्योंति’ की देन समझा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी ।
जो इस ‘बोधि वृक्ष’ की गरिमा समझते है वे उसके प्रति भाव श्रद्धा भी अर्पित करते है । साथ ही उसे सोच कर अधिक समर्थ बनाने की आवश्यकता भी अनुभव करते है । इस श्रद्धा सद्भावना का प्रत्यक्ष रुप एक ही हो सकता है कि उसके ‘सदस्य पाठक’ बनाने के लिए अधिक पुरुषार्थ किया जाय । पुरानी प्रतियाँ बढ़ाने, महत्व समझाने से लेकर आग्रह करने तक के समस्त उपाय इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किये जाने चाहिए कि नये सदस्य बढ़े और पुराने बने रहे ।
अश्रद्धा वश कम, आलस्य वश अधिक ग्रहण टूटते है । इसलिए दिसम्बर में ही यह प्रयत्न चल पड़ना चाहिए कि पुराने सदस्यों का चन्छा वसूल किया जाय और नयों की भर्ती करने के लिए एकाकी या टोली बनाकर सर्म्पक क्षेत्र में उतरा जाय । यह कार्य देखने में छोटा किन्तु परिश्रम से महान है । अखण्ड-ज्योति के सदस्य स्थिर रखने या बढ़ाने का सीधा परिणाम है, प्रज्ञा अभियान को-युग चेतना को-उज्जवल भविष्य को-परिपुष्ट करने के लिए देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में महान सहयोग अनुदान प्रस्तुत करना ।
युग शक्ति एवं महिला जागृति पत्रिकाएँ बन्द हो जाने से उनकी पाठ्य सामग्री तथा भावी सम्भावनाओं की अति महत्वपूर्ण जानकारी इस वर्ष से अखण्ड-ज्योति में नये आधार लेकर प्रस्तुत करेगी । अतएव पिछले वर्षो की तुलना में उसका महत्व और भी अधिक बढ़ेगा । अगले वर्ष की विचार सम्पदा ऐसी होगी जिसे आसाधारण ही कहा जाता रहेगा ।
जिन प्रज्ञा परिजनों ने अब तक अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने, बढ़ाने में योगदान दिया है उनसे विशेष रुप से अनुरोध है कि अपने उस प्रयास अनुग्रह को घटने तनिक भी न दें वरन् यथासम्भव उसमें कुछ बढ़ोत्तरी ही करें । इसी प्रकार जिसने इस सर्न्दभ में अभी कुछ विशेष पुरुषार्थ नहीं किया है, मात्र स्वयं ही सदस्य रहे है, उनसे अनुरोध है कि अपनी सुरुचि को एक कदम आगे बढ़ाकर अपने प्रभाव क्षेत्र से सर्म्पक साधें और कुछ नये ग्राहक बनाने के लिए इन दिनों विशेष रुप से प्रयत्न करें ।
बसन्त पर्व मिशन का-उसके सूत्र संचालक का जन्म दिन है । उस अवसर पर आत्मीय जन अपनी श्रद्ध शुभ कामना व्यक्त करते है । उस अभिव्यक्ति का सार्थक स्व्रुप एक ही हो सकता है कि श्रद्धा के साथ श्रम सहयोग का भी समावेश किया जाय और उसे अधिक परिपुष्ट बनाने में अपने जीवन्त सहकार का परिचय दिया जाय ।
अखण्ड-ज्योति अपने 44 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए सभी प्रज्ञा परिजनों के प्रति अपनी सहज ममता को अधिकाधिक सघन करते चलने का वचन देती है साथ ही सभी उदार स्वजनों के अपेक्षा करना ही युग चेतना के विस्तार में उसकी कार्य क्षमता बनाने में सम्भव योग दान करें । उपेक्षा कृपणता न वरतें ।
कपिलवस्तु में भगववान बुद्ध ने अपने संघ के साथ प्रवेश किया है, यह समाचार सुनकर शुद्धोधन का हृदय शोकविदग्ध हो गया । कैसा दुर्भाग्य है यह ? जिस पुत्र को चक्रवर्ती सम्राट बनाकर इसी राजधानी में, इसी राज सिंहासन पर आसीन होना था, जो मेरा एकमात्र पुत्र है और जिसे लेकर क्या-क्या स्वप्न नहीं सँजाये थे ? वही पुत्र आशा और कल्पना के विपरीत इसी नगरी में द्वार-द्वार जा कर भिक्षा माँग रहा है जबकि उसके नगर यात्रा पर निकलने पर लोग पलक पाँवड़े विछा देते, उसके अभिवादन में नतमस्तक हो उठते ।
शुद्धोधन इन्हीं विचार, भावतरंगों में डूब उतरा रहे थे कि किसी ने आकर सूचना दी, नियमानुसार अमिताभ गौतम राजभवन के द्वार पर भी भिक्षा के लिए आए है । दौड़ कर शुद्धोधन द्वार पर पहुँचे । देखा, उनका अपना सिद्वार्थ तापस वेश में सामने खड़ा है । उस वेश को देखकर पितृ हृदय चीत्कार उठा । शुद्धोधन ने कुछ उपालम्भ भरे स्वरों में भी कहा ‘क्या यही हमारे कुल की परिपाटी है ? फिर कुछ रुक कर बोले, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा सिद्वार्थ, तुम इस वेश का परित्याग कर यह सिंहासन सम्हालों ।
धीर-गम्भीर वाणी में गौतम ने कहा, ‘रजन ! यह आपके कुल की नहीं, बुद्ध कुल की परम्परा है । मै अब राज परिवार का सदस्य नहीं हूँ, आत्मकल्याण और लोकमंगल की साधना में लगे भिक्षु संघ का परिजन हूँ ।’
वाणी में जो दृढ़ता थी, जो संकल्प था उसने शुद्धोधन को निरुत्तर कर दिया और जैसे इतने में ही सन्तोष मान रहे हों, वह बोले, ‘तो भिक्षु ! क्या तुम मेरा आतिथ्य स्वीकार करोगे ?
‘अवश्य राजन ! अपने संघ सहित में कल मध्याहन समय पुनः आऊँगा’ बुद्ध ने कहा और वे चले गये ।
नियत समय पर बुद्ध देव आये । उन्होंने सभी परिजनों का अभिवादन स्वीकार किया, जैसे सर्वत्र करते थे और शाँत भाव से धर्मदर्शना की । उधर पति के चिर-वियोग से पीड़ित यशोधरा को तथागत के आगमन का समाचार मिला तो उसका हृदय प्रसन्नता से छल-छला उठा । पति समीम नहीं है तो क्या हुआ ? उनकी स्मृतियाँ तो मेरे साथ है । लोककल्याण के लिए उन्होंने भले ही मेरा परित्याग कर दिय हो ? अर्द्धागिनी के रुप में भले मेरा उन पर कोई अधिकार न हो परन्तु एक मानवी के रुप में तो में उनकी प्रियपात्र हूँ ही ।
यशोधरा इन्हीं विचारों में डूब उतरा रही थी कि भगवान पधारे । उन्होंने यशोधरा के त्याग की उपेक्षा नहीं की थी । वे उसके पास आए और पूछा यशोधरे ! कुशल से तो हो ?
‘हाँ स्वामी’ चिर प्रतिक्षित स्वर सुन कर यशोधरा का हृदय गद्गद् हो उठा । ‘
स्वामी नहीं भिक्षु कहो यशोधरे ! में अपना धर्म निभाने आया हूँ । बोलो तुम कुछ भिक्षा दे सकोगी?”
यशोधरा विचारमग्न हो उठी । अब क्या बचा है देने के लिए ? अपने दाम्पत्य की स्मृतियों को छोड़कर और कुछ भी तो नहीं है, जो देने योग्य हो । कुछ क्षण तक विचार करते रह कर उसके चेहरे पर निश्चय के भाव उभरे और बोली, ‘भन्ते ! अपने पूर्व सम्बन्धों को ही दृष्टिगत रख कर क्या आप भी कुछ प्रतिदान कर सकोगे ?
‘भिक्षु धर्म की मर्यादा का उल्लखंन न होता होगा तो अवश्य करुँगा आर्य,’ बुद्ध ने उत्तर दिया ।
यशोधरा ने अपने पुत्र राहुल को पुकारा और तथा-गत की ओर उन्मुख होकर बोली, ‘तो भगवान ! राहुल को भी अपनी पितृ परम्परा निभाने देकर उसे अपना अधिकार पाने दीजिए ।’
और फिर राहुल से बोली, जाओ बेटा ! अपनी पितृ परम्परा का अनुकरण करो । बुद्व की शरण में, धर्म की शरण में, धर्म की शरण में, संघ की शरण में जाओं ।
राहुल के समवेत स्वरों में गूँज उठा, बुद्ध शरणं गच्छामि.......... ।’ उस महान विदुषी ने अपने महात्याग का एक और परिचय दिया ।
जीव की मरणोत्तर सत्ता का सिद्धान्त भारतीय दर्शन में तो प्रधानता प्राप्त है ही, अन्यान्य धर्म-दर्शन भी उस विषय से विरत नहीं है ।
वैदिक धर्म के पश्चात् पारसी धर्म का क्रम है । उसमें भी जीवात्मा की मरणोत्तर सत्ता एवं कर्मफल पर आस्था व्यक्त की गयी है । पारसियों का मानना यह है कि कर्मानुसार र्स्वग-नर्क तो प्राप्त होता है और यह द्वन्द चलता रहता है, किन्तु अन्ततः सत्शक्तियों के देवता ‘अरमुज्द’ की असत् प्रवृत्तियों के प्रेरक ‘अहर्मन’ पर विजय होती है और व्यक्तिसता परमात्मा-सत्ता का सामीप्य प्राप्त करने में समर्थ होती है ।
प्राचीनता की दृष्टि से पारसियों बाद-बौद्धों का क्रम है । वे भी प्रारम्भ से ही मरणोत्तर जीवन को पूर्णतः स्वीकार करते है । परवर्तीकाल में तो बौद्धों में अनेकानेक स्वर्गां-नरकों की मान्यता प्रतिष्ठित हो गयी।
यहूदियों का विश्वास है कि जीवात्मा मृत्यु के पश्चात् किसी दिन उठेगा और ईश्वर-कृपा से उसका उद्धार होगा । कयामत के दिन की कल्पना का मूल आधार यह यहूदी मान्यता ही है ।
ईसाइयों की आस्था है कि यीशु मसीह मर कर तीसरे दिन उठ बैठे । इसे ‘रिसरेक्शन’ कहते है । कर्म-फल पर ईसाइयों की भी आस्था है । हाँ, साथ ही वे ये मानते है कि जो कोई प्रभु, पुत्र यीशु पर आस्था रखता है, उसके पक्ष में यीशु अभिमत व्यक्त करेंगे, और वे लोग र्स्वग के अधिकारी होंगे ।
वरभि8म के विशप डा. अर्नेस्ट विलियम बर्नेस ने अपनी पुस्तक ‘द वर्ड डिस्क्राइब्ड बाय सायन्स एँड इट्स स्प्रिचुअल इन्टरप्रिटेशन’ (पृष्ठ 637) में लिखा है कि ‘रसायन शास्त्र की आधुनिक शोधों से यह स्पष्ट हो गया है कि हमारे
भौतिक शरीर के आधारभूत प्राकृतिक परमाणु मृत्यु के बाद छिन्न-भिन्न हो जाते है । अतः शरीरों के पुनः उठने का जो विवरण वाइबिल में है, उसका अभिप्राय मात्र जीव की मरणोत्तर सत्ता से है ।
मुसलमानों में कयामत सम्बन्धी मान्यता का विवरण विस्तार के साथ प्रचलित है । जिसके अनुसार किसी एक विशेष तारीख को तमाम आत्माएँ उठेंगी, और ईश्वर उनका न्याय करेगा । हजरत मुहम्मद को मानने वालों को हजरत जन्नत में प्रवेश करा देंगे ।
श्री एफ.बी.जीन्स ने अपनी पुस्तक “एन इन्ट्रोडक्शन टु द हिस्टरी आफ रिलीजन्स” में सभी धर्मों के विवरण देकर स्पष्ट किया है कि मरणोत्तर सत्ता पर सभी का विश्वास है ।
दार्शनिक मार्टिन ने जीव की मरणोत्तर सत्ता के पक्ष में तीन प्रधान तर्क दिए है (1) बौद्धिक विकास का तर्क (2) चेतनात्मक विकास का तर्क (3) अभुक्त कर्मो का तर्क ।
जन्मना लोगों में बुद्धि एवं आन्तरिक चेतना के भिन्न-भिन्न स्तर पाये जाते है, कोई अद्भुत स्मरणशक्ति का धनी है तो कोई बिना पढ़े अनेक बातें जानता है, किसी में अन्तः प्रज्ञा अधिक विकसित है तो किसी में कोई विशेष अतीन्द्रिय क्षमता है । इसी प्रकार कुछ लोग अपने कर्मों के उचित परिणाम इस जीवन में नहीं पाते देखे जाते ! बुद्धि चेतना एवं कर्मफल की ये विषमताएँ मरणोत्तर जीवन की सम्भावना को पुष्ट करती है यानी बुद्धि या चेतना का निरन्तर विकास होता रहता है और अभुक्त कर्मफल अगले जीवन में भोगना पड़ता है ।
‘द वेल्य एंड डेस्टिनी ग्रन्थ के लेखक बी. बोसान्के ने लिखा है-आगामी जीवन एक तथ्य है । क्योंकि हमारा यह जीवन किसी अविच्छिन्न श्रृख्ला की ही अभिव्यक्ति है । इसी प्रकार ‘प्लूरलिज्म एंड थीइज्म आँर द रील्म आफ आन्क्स’ में लेखक जेन्स ने भी यही लिखा है कि ‘विश्व में जीवन की व्यवस्था एवं प्राकृतिक नियमों को देखते हुए मृत्यु, व्यक्ति एवं जाति की उन्नति के अगले सोपान की ओर बढ़ाने का साधन सिद्ध होती है ।”
मनुष्यों के बीच जन्मना विद्यमान विषमता के पीछे वंशानुगत कारणों (इनहेरिटेन्स) के साथ ही ‘एक्शन आफ प्रीवियस लाइफ’ पूर्व जन्म के कर्मों की बात अब पाश्चात्य जगत में भी मानी जाने लगी है ।
पुनर्जन्म के अनेक तथ्यों की परामनोवैज्ञानिकों ने खोज की है और उनका संकलन किया है । इससे भी मरणोत्तर जीवन की सत्यता प्रकट होती है । अब तक उपलब्ध साक्षियाँ इतनी अधिक एवं इतनी प्रामाणिक है कि उन्हें अविश्वस्त ठहरा पाना असम्भव है ।
आत्मा की मरणधर्मिता प्रेरणा से भी सिद्ध नहीं होती । क्योंकि मृत्यु यदि आत्मा का स्वभाव होती तो वह उसे इसी भाँति प्रिय लगती, जिस प्रकार खटमलों को खून, मच्छरों को मलिनस्थल, मछलियों को पानी और पक्षियों को नभ प्रिय है । किन्तु कोई भी आत्मा मृत्यु को पसन्द नहीं करती ।
मरणभय स्वयं में जन्मान्तर या पूर्वजन्म का प्रमाण है । क्योंकि चित्त में स्मृति मा़त्र उसी विषय की रहती है, जिसका पूर्वानुभव हो । तभी वह अनुभूति चित्त में अधिष्ठित रहती है और उसका पुनः बोध ही स्मृति कहलाता है । कोई भी व्यक्ति इस जन्म में प्रत्यक्षतः मरण को नहीं भोगता, अतः उसमें मरणभय की स्मृति कहाँ से आई ? अतः वह पूर्वजन्म की ही स्मृति प्रतीत होती है । स्वयं की विद्यमान सत्ता के प्रति जो अभिनिवेश होता है, वह पूर्वजन्म की ही अनुभूति का परिणाम है ।
कुछ लोग मरणस्मृति को स्वाभाविक कहते है, किन्तु कोई भी स्मृति स्वतः नहीं उत्पन्न होती, वह निमित्त से ही पैदा होती है । पूर्व अनुभव ही वह निमित्त है ।
यदि यह कहा जाय कि दुसरों को मरते देखकर स्वयं का मरणभय संस्कारारुढ़ होता है, तो देखा यह जाता है कि व्यक्ति जिस समय सामान्य मनः स्थिति में नहीं रहता तथा उसे चेतन मस्तिष्क द्वारा गृहीत अन्य विषय जिस मनः स्थिति में नहीं याद रहते, उस समय भी उसमें प्रगाढ़ मरणभय होता है । अतः यह गहराई में अंकित अनुभूति है । बिना प्रत्यक्ष भोग के इतनी गहरी अनुभूति सम्भव नहीं ।
मरणभय को अशिक्षित क्रियाक्षमता (अनटाट एबिलिटी) या सहजवृत्ति (इन्स्टिन्क्ट) भी कहा जाता है । किन्तु ‘इन्स्टिन्क्ट’ क्यों रहती है ? इसके दो ही उत्तर है-(1) वह ईश्वर कृत है-(2) वह अज्ञेय है । ‘इन्स्टिन्क्ट को ईश्वरकृत कहना गोलमटोल उत्तर है । क्योंकि ईश्वर प्रत्यक्षतः कर्त्ता नहीं है और जिस अभिप्राय से उसे कर्त्ता कहा जाता है, उस दृष्टि से तो सब कुछ का कर्त्ता वही है । मात्र ‘इन्स्टिन्क्ट’ का कतृत्व उस पर क्यों थोपा जाय ?
‘इन्स्टिन्क्ट’ को अज्ञेय कहना अपनी सीमा की स्वीकृति की दृष्टि से तो ठीक है । किन्तु ऐसे में उसके पूर्व अनुभूत स्मृति न होने की बात का खण्डन कैसे सम्भव है ?
मृत्यु का वैदिक भाषा में जो प्रयोग है, वह भी ध्यातव्य है संस्कृति में मृत्यु को नाश कहा जाता है । ‘नाश’ का अर्थ है, जो दिखे नहीं । सर्वथा अभाव को नाश नहीं कहते इसी प्रकार जन्म का अर्थ प्रादुर्भाव, प्रकटी कारण होती है । इस प्रकार जन्म-मृत्यु का अर्थ नवीन उद्भव एवं सम्पूर्ण अभाव नहीं, प्रकटकीरण एवं अदृश्यीकरण मात्र है ।
तार्त्पय यह है कि मृत्यु को जीवन का अन्त मानना एक दुराग्रह भर ही हो सकता है । जीवन अनन्त है । भविष्य सुविस्तृत है और पुनर्जन्म वास्तविकता है । अतः क्रमिकगति से धैर्यपूर्वक आत्मोर्त्कष की ओर अग्रसर रहना ही हमारा कर्तव्य है । शरीर की मृत्यु तो निश्चित है, किन्तुँ मानवीय चेतना अविनाशी है और उसकी प्रगति-धारा अविच्छित्र है । स्थूल जगत में अदर्शन ही मृत्यु है । सूक्षम जगत में सभी जीवित है । मरणोत्तर जीवन की सत्यता को हम समझें तथा उससे प्रेरणा प्राप्त कर योजनाबद्ध प्रगतिशील जीवनक्रम निर्धारित कर उस कर प्रसन्नतापूर्वक चलते रहें, इसी में बुद्धिमत्ता है ।
मनुष्यों में सभी का स्वभाव एक जैसा नहीं होता । कोई उपकारी प्रकृति का होता है ओर कष्ट पीड़ितों की, दुःखीजनों की सेवा सहायता बिना प्रत्युपकार की भावना से करता है, जहाँ इस तरह की परोपकारी वृत्ति के लोगों का बाहुल्य है वहाँ दुष्ट प्रकृति के लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जिन्हें दूसरों को अकारण कष्ट पहुँचाने में मजा आता है । दूसरों को दुःख पहुँचाकर, प्रसन्न के लोग परपीड़क कहे जाते है । इस प्रकार की प्रकृति के लोग मरने के बाद भूत, पिशाच स्तर के बनते है और वे उस योनि में रह कर भी दूसरों को दुःख पहुँचाया करते है ।
भूत प्रेतों द्वारा डराने, कष्ट पहुँचाने की अनेकों घटनाएँ आयेदिन प्रकाश में आती रहती है । डरावनी या घिनौनी प्रकृति के भूत प्रेतों का अस्तित्व जहाँ एक तथ्य है, वहीं यह भी एक तथ्य है कि अशरीरी आत्माएँ मनुष्यों का कल्याण करने उनका सहयोग करने में भी निरत रहती है । इस तरह की अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व भी है । साधारणतया उच्च आत्माएँ मनुष्यों की सहायता ही करती है और अपनी सदाशयी वृत्ति के कारण दूसरों को आगे बढ़ाने तथा खतरों से बचाने के लिए पूर्व संकेत की सेवा सहायता करने के लिए तैयार रहते है वैरो ही सूक्ष्म शरीर धारी आत्माएँ, लोगों को उपयोगी ज्ञान देने अथवा आत्मा का अस्तित्व, शरीर न रहने पर भी बना रहता है यह विश्वास दिलाने के लिए कुछ व्यावहारिक और उपयोगी सहयोग देती रहती है ।
प्लेटो, जेनोफेन, आदि विद्वानों ने सुकरात के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है तथा उन सभी ने स्वीकार किया है कि सुकरात ने अनेकों बार यह कहा कि मेरे भीतर एक रहस्य देवता ‘डेमन’ निवास करता है और वह समय-समय पर मुभे पूर्व सूचनाएँ दिया करता है । इस तथ्य की यथार्थता के अनेक प्रमाण उद्धरण भी उपरोक्त लेखकों ने प्रस्तुत किये है । प्लुटाकं ने अपनी पुस्तक ‘दी जेनियो मौक्रिटिस में एक ऐसी ही घटना का उल्लेख किया है, एक बार सुकरात अपने कोई मित्रों के साथ एक रास्ते पर जा रहे थे । सहसा वे रुक गये और कहाँ हमें इस रास्ते से नहीं चलना चाहिए, खतरा है । कइयों ने उनकी बात मान ली और वह रास्ता छोड़ दिया, पर कोइ साफ सुथरे रास्ते को छोड़ने के लिए तैयार न हुये । वे सुकरात की सनक को बेकार सिद्ध करना चाहते थे । जो लोग उनकी उपेक्षा कर दूसरे रास्ते से चल पड़े, वे कुछ ही दूर गए होगे, कि जंगली सूअरों का एक झुँड कहीं से आ धमका और उनमें से कइयों को बुरी तरह घायल कर दिया ।
प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘थीबिज’ में भी सुकरात से सम्बन्धित एक प्रसंग दिया है जिसमें लिखा है “एक दिन तिमार्कस नामक युवक सुकरात के पास आया । कुछ खाया पिया, बातचीत की और जब चलने लगा तो सुकरात ने उसे रोकते हुये कहा जाओ मत । तुम्हारे ऊपर खतरा मँड़रा रहा है । तीन बार उसने जाने की चेष्टा की पर तीनों बार उसे पकड़ कर बलपूर्वक रोक लिया । पीछे वह नहीं ही माना और हाथ छुड़ाकर चला गया । उसी शाम उसका एक अनजान व्यक्ति से झगड़ा हो गया और उसने उस आदमी का खून कर डाला । इस हत्या के अपराध में उसे फाँसी पर चढ़ाया गया ।
ऐसी अन्य कितनी ही घटनाएँ है जिनमें सुकरात के उसके सहचर देवता ‘डेमन’ द्वारा पूर्वाभास दिये जाने तथा सहायता करने के प्रमाण मिलते है । सुकरात पर जब मुकद्मा चला और प्राण दंड मिला तब उसके पास ऐसे अनेको प्रमाण और साधन थे, जिनसे उनका बचाव हो सकता था । सफाई प्रस्तुत किये जाने योग्य मजबूत प्रमाण उसके पास थे । ऐथेन्स की जेल से उसे उसके मित्र और शिष्य भगा ले जाने के लिए पूरी तैयारी कर चुके थे, पर उनने इन सबसे सर्वथा इन्कार कर दिया और बचाव के प्रयत्नों में कोई सहयोग नहीं दिया । भरे न्यायालय में उनने स्वीकार किया, अभी-अभी मेरा देवता ‘डेमन’ मेरे कानों में कह कर गया है कि मृत्यु दण्ड मिलेगा, उससे डरने की कोई बात नहीं है । ऐसी मृत्यु मनुष्य के लिए श्रेयस्कर ही होती है ।
मनुष्य इसी लोक, इसी शरीर को सब कुछ मान बैठता है और तात्कालिक सुखोपभोग के लिए दूरवर्ती भविष्य को अंधकारमय बनाने में लगा रहता है । इसका एक कारण परलोग सम्बन्धी मरणोत्तर जीवन सम्बन्धी अज्ञान भी है । यदि गहराई से और गम्भीरता से कुछ विचार किया जाय कि मरने के बाद भी शरीर बना रहेगा ओर उस स्थिति में उसके शुभ अशुभ विचार एवं कार्य ही सुख-दुःख देने के आधार होंगे तो निस्संदेह् मनुष्य के पैर कुमार्ग पर चलने से रुकें और सन्मार्ग पर चलने का उत्साह बढ़े । परलोक सम्बन्धी ज्ञान एवं विश्वास के प्रभाव से मनुष्य के दृष्टिकोण एवं आचरण को परिष्कृत बनने में सहायता मिलती है । इस दृष्टि से अशरीरी आत्माएँ अक्सर लोगों को अपना परिचय देती रहती है, साथ ही समय-समय पर उनकी ऐसी सहायता भी करती रहती है, जिससे परोक्ष जीवन के प्रति सर्वसाधारण की निष्ठा का विकास हो सके ।
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नेवारी एक बार एक होटल में ठहरा हुआ था । होटल के मालिक को मरे हुए थोड़े ही दिन हुए थे । उसके लड़कों में सम्पत्ति के बटबारे को लेकर बहुत ही झगड़ा चला रहा था बाप ने मरने से पहले जो वसीयत लिखी थी, इससे गुत्थी और उलझ गयी । नेवारी ने भी यह सारा वृत्तान्त सुना पर वह बेचारा आखिर कर क्या सकता था ? परदेशी जो ठहरा था, फिर भी उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इतना बढ़िया ओर प्रसिद्ध होटल इन लड़कों के झगड़े में नष्ट न हो जाए, इसके लिए वह कुछ करे ।
किस प्रकार जगड़ा सुलभे ? यह विचार करते हुये ही नेवारो उस रात सो गया । नेवारो ने उसी रात सपना देखा कि एक वृद्व व्यक्ति बार-बार उसके कमरे में आकर अलमारी को लाठी से ठोकता है । एक बार तो उसने चूल्हा आदि समझा पर बार-बार वही सपना, वही आवाज ! वह उठा और उसने होटल की उस अलमारी को खोला । उलट पुलट कर देखा तो उसी में वह वसीयत रखी हुई थी, जिसके न मिलने पर दोनों भाई झगड़ रहे थे । दूसरे दिन नेवारों ने वह वसीयत उन्हें सौंपी ओर आसानी से झगड़ा निपट गया ।
फ्राँस की सम्राट हेनरी चतुर्थ की हत्या से कुछ समय पूर्व एक अदृश्य आत्मा ने उसमे स्वप्न में आकर कहा था कि अब तुम्हारा अन्त समय निकट आ पहुँचा है । यह बात सम्राट ने दरबारियों को बताई तो उनने इतना ही कहा कि निरर्थक है । उन दिनों ऐसी कोई आशंका थी भी नहीं पर जब सचमुच कुछ समय बाद हेनरी की हत्या हो गई तो उस पूर्वाभास को सभी ने सही बताया ।
स्काटलैंण्ड का राजा जेम्स चतुर्थ अक्सर इग्लैण्ड पर आक्रमण कर बैठता था । अन्तिम आक्रमण के बाद उसे एक अदृश्य आत्मा दिखाई पड़ी उसने कहा यदि भविष्य में तुमने कोई और आक्रमण किया तो याद रखना तुम्हारी जान की खैर नहीं । राजा ने उस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया, यों ही उसकी उपेक्षा कर दी और सचमुच जब उसने अगला आक्रमण किया तो युद्ध स्थल में ही उसकी मृत्यु हो गई ।
प्रेतबाधा और भूतबाधा होने पर कई तान्त्रिक उनका निवारण इन उदार सदाशय आत्माओं की सहायता से करने में सिद्धहस्त होते है । य़द्यपि इस तरह की घटनाओं में से अधिकाँश का कारण मानसिक होता है । लोग छोटी मोटी शारीरिक परेशानियों को भी कई बार प्रेतबाधा मान लेते है, ओर जान लेवाओं की शरण में जाकर अपने को ठगाते रहते है । लेकिन प्रेतबाधा जैसी कोई चीज होती ही नहीं है, एक दम से यह कहा भी नहीं जा सकता ।
किस तरह की परेशानी प्रेतबाधा है और किस तरह की कठिनाई शारिरिक है ? इसका कोई स्पष्ट वर्ग विभाजन नहीं किया जा सकता । इस विबादास्पद विषय को यहीं छोंड़ देना चाहिए लेकिन प्रसंगवश यह चर्चा अनुचिन्तन होगी कि कुछ लोग कठिन शारिरिक रोगों का निवारण भी उदार आत्माओं के सहयोग से करने में सिद्ध हस्त होते है । प्रख्यात लेखिका मेरी काडिगटन ने अपनी पुस्तक ‘इन सर्थ आफ द हीलिंग पावर, में इस तरह के कई अफ्रीकी ताँत्रिको का विवरण लिखा है जो आत्माओं की सहायता से टूटी हड्डियाँ जोड़ देते है, तान्त्रिकों द्वारा प्रयुक्त मारक प्रयोगों को निष्प्रभावी कर देते है ।
‘वर्ड आफ पैराडाइज्ड, पुस्तक के लेखक ने अफरीका के सहारा क्षेत्र में रहने वाली जन जातियों के बारे में लिखा है, जो बाद में हवाई द्वीप में जाकर रहने लगी कि ये लोग कुछ सदाशयी आत्माओं को प्रसन्न कर लेते है । उस क्षेत्र में रहने वाले ताँत्रिकों को काहुन कहा जाता है । ये ताँत्रिक कई बार अपने वश में की गई दुष्ट आत्माओं से दूसरे व्यक्तियों पर मारक प्रयोग भी करते है । दूसरे तान्त्रिक किसी सदाशयी और शक्तिशाली आत्माओं के द्वारा उन आत्माओं को परास्त कर देते है ।
अशरीरी आत्माओं से सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते है और उनका सहयोग प्राप्त किया जा सकता है । ऐसा करने में एक विशेष स्तर पर विकसित अन्तः चेतना वाले व्यक्ति ही समर्थ है । अशरीरी आत्माओं से सर्म्पक स्थापित कर सकने की प्रविधि का विश्लेषण करते हुए एमाहार्डिज ने अपनी पुस्तक ‘पाईन अमेरिकन स्प्रिचुअलिज्म’ पुस्तक में लिखा है कि मन का कार्य केवल इच्छा, कल्पना और निर्णय करने जैसे सामान्य स्तर तक ही सीमित नहीं है, उसमें कुछ विलक्षण शक्तियाँ भी भरी पड़ी है, ऐसी जिनसे औरों से अर्थ-पदार्थ भी है और चेतना भी । अतीन्द्रिय विज्ञानी इस शक्ति को ‘साइको काइनेसिस नाम देते है । इस क्षेत्र में चल रही शोध यह बताती है कि इस बात के ढेरों प्रमाण है जिनसे मनुष्य की अन्तः चेतना द्वारा जड़ पदार्था को ही नहीं अशरीरी आत्माओं को भी प्रभावित किया जा सकता है और उनका सहयोग प्राप्त हो सकता है ।
फ्रेडार्टक मायर्स के अनुसार इस स्तर का विकास मनुष्य को अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ करा सकता है, जो ज्ञात नहीं है, उसे विज्ञात करा सकता है । इस तरह की अद्भुत और विलक्षण कही जाने वाली सभी क्षमताएँ मनुष्य में बीज रुप से विद्यमान है जिन्हें सबलिमिनला सेल्फ कहते है उन्होंने अपने निज के अनुभवों, प्रयोगों और निष्कर्षो की चर्चा करते हुए बताया है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसा तत्व है, जिसके आधार दूरवर्ती छिपी हुई तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी मिल सकती है । अप्रकट रहस्यों के प्रकटीकरण और अशरीरी आत्माओं के साथ सम्बन्ध स्थापित करने की सम्भावना को उन्होने इस चेतना स्तर वालों के लिए सहज की सुलभ बताया है ।
अशरीरी आत्माओं से सम्बन्ध स्थापित करने और उनका सहयोग लेने, उन्हें अपना सहचर बनाने की विद्या भारत में पहले काफी प्रचलित रही है आज भी इस विद्या के जानकार है, परन्तु वे प्रकाश में नहीं आते । अपने को इस क्षमता से सम्पन्न विज्ञापित करने वालों में अधिकाश् व्यक्ति इस विद्या के अस्तित्व का अनुचित ही लाभ उठाते है । सदाशयी, उदार और परोपकारी वृत्ति की अशरीरी आत्माएँ स्वयं इन व्यक्तियों का सहयोग करने के लिए प्रस्तुत रहती है, जिनकी अन्तः चेतना विकसित ओर परिष्कृत हो ।
एक राजकुमार बड़ा ही उद्दण्ड था । प्रजा को वह विविध प्रकार से सताया करता था । उसके व्यवहार से तंग आकर उसके पिता उसे गौतम बुद्ध के पास ले गये । बुद्ध ने उसे नीम के पौधे का एक पत्ता देते हुए कहा-राजकुमार इसे चख कर तो देखो ।’
राजकुमार ने उसे मुहँ में रखते ही थूक डाला और यह कहते हुए नीम के पौधे को जड़ से उखाड़ डाला इस कडुवे जहर को बढ़ने देने की कोई आवश्यकता नहीं है ।’
महात्मा बुद्ध बोले-’राजकुमार तुम्हारे कटु व्यवहार से पीड़ित जनता भी तुम्हारे साथ यही व्यवहार कर सकती है । व्यक्ति रुप के नहीं, गुणों के उपासक होते है । तुम जनता का विश्वास और सम्मान चाहते हो तो उदार और परोपकारी बनो ।,
महात्मा बुद्ध के उपदेश ने राजकुमार का इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उसी दिन से दुराचरण त्याग दिया ।
महात्मा गाँधी उन दिनों अफ्रीका में थे । भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के रंगमंच पर अभी उनका अवतरण नहीं हुआ था, फिर भी रंगभेद की नीति के विरुद्ध उन्होंने सत्याग्रह के शस्त्र का सफलतापूर्वक उपयोग किया था और अफ्रीका में मिली सफलता के कारण उनकी देश-विदेश में काफी चर्चा भी हुई थी ।
घटना सन् 1606 की है । उन दिनों गाँधी जी लन्दन गये हुए थे । लन्दन में ही कुछ
भारतीय नवयुवक भी पढ़ रहे थे । जब उन्हें पता चला कि बिना हथियार के लड़ाई लड़ने वाला और लड़ाई में जीतने वाला एक अद्भुत भारतीय सेनानी यहाँ आया हुआ है तो बरबस ही उनकी आकाँक्षा इस अद्भुत सेनानी को अपने बीच बुलाने की हुई ।
नवयुवक भारतीय छात्रों के प्रतिनिधि महात्मा गाँधी से मिले और उन्होंने सम्मान में आयोजित समारोह में उनसे भाग लेने के लिए अनुरोध किया । गाँधीजी ने भारतीय छात्रों का उत्सा् देखकर उनका मन रखने के लिए जलरो में भाग लेना स्वीकार कर लिया । यही नहीं छात्रों का उत्साह देखकर उनका मन रखने के लिए जलरो में भाग लेना स्वीकार कर लिया । यही नहीं छात्रों के अनुरोध पर उन्होंने समारोह का सभापतित्व करना भी स्वीकार कर लिया । इस समारोह में एक भोज का आयोजन भी निश्चित किया गया था । गाँधी जी ने भोज की स्वीकृति तो दे दी, पर उसके साथ यह शर्त भी लग लगा दी कि इस अवसर पर जो भोज दिया जायेगा उसमें माँस का जरा भी प्रयोग न किया जाएगा और न ही शराव का उपयोग होगा ।
विद्यार्थी अपने-अपने कामों में इस प्रकार व्यस्त थें । कि किसी को किसी की ओर देखने का अवकाश ही नहीं । इन विद्यार्थियों के बीच एक दुबला-पतला भारतीय युवक भी था जो दौड़-दौड़ कर काम कर रहा था । यह युवक थालियाँ माँज रहा था और बरतन साफ कर रहा था । एक काम से कोई बरतन खाली होता तो दूसरे काम में उसका उपयोग करने के लिए चट से वह युवक खाली बरतन ले आता तथा उसे साफ करके रसोई का काम कर रहे छात्रों को दे आता ।
जब भोजन बनकर तैयार हो गया तो आगन्तुक छात्रों ने भोजन किया । जिन विद्यार्थियों ने इस भोज की व्यवस्था का दायित्व सम्हला था, भोजन परोसने और जूठी थालियाँ उठाने का काम भी उन्हें ही सौंपा गया था । वे जूठी थालियाँ उठाकर लाते और बर्तन माँजने वालों के सामने रख जाते ताकि उनकी सफाई की जा सके । अब इस काम में अन्य छात्र भी जुट गये थें । और काम तेजी से होने लगा था । जब सभी लोग भोजन का निवृत्त हो गए जो छात्र समिति के उपप्रधान ने स्वयंसेवकों से भोजन के लिए कहा ।
वह अजनबी युवक अब भी अपने काम में लगा हुआ था । उपप्रधान उस अजनबी युवक के पास यह कहते पहुँचा, ‘जल्दी भोजन कर लो मित्र । गाँधी आते ही होंगे । फिर उनके साथ सबको बैठना है ।”
अजनबी युवक अपने हाथ की थाली साफ कर रखते हुए उठा तो उसे देखकर उपप्रधान दंग रह गया । उसके मुँह से आर्श्चयमिश्रित चीत्कार-सी निकल उठी । ‘गाँधी जी आपं”““““‘आपको यह करने की क्या आवश्यकता थी ?’
आसपास खंडे़ अन्य छात्र गाँधीजी को अपने बीच इस प्रकार पाकर दंग रह गए । सभा में उपप्रधान ने गाँधीजी से क्षमा माँगी कि उन्हें किसी ने पहचाना नहीं और यह काम सौंप दिया ।
इसके तुरन्त बाद गाँधीजी ने इस स्पष्टीकरण से अपना भाषण आरम्भ किया । ‘अकारण खेद मनाने की आवश्यकता नहीं है । मैने स्वेच्छा से यह काम चुना था और काम कोई भी छोटा नहीं है और न ही कोई बड़ा । सब काम काम है । हम लोग अपने परिवार में भी तो यह काम करते है । वहाँ तो कोई किसी काम को छोटा बड़ा नहीं मानता, फिर आप र्व्यथ क्यों दुःखी हो रहे है ?”
वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों से आत्यन्तिक आसक्ति को ही शास्त्रकारों ने बंधन माना है । बन्धन तो आसक्ति मात्र में है । भारतीय तत्वदर्शन की मान्यता है कि आसक्ति और तृष्णा का लेशमात्र रह जाने पर भी जीव को पुनः इस संसार में आना पड़ता है । इसे ही जन्म मरण के बन्धन का कारण कहा गया है । किन्तु आत्यन्तिक आसक्ति मरने के बाद भी अशरीरी अवस्था में भी आसक्ति के केन्द्रो से जीवात्मा को इस प्रकार आबद्व किये रहती है कि उससे न जन्म लेते बनता है और न मुक्त होते । मरने के उपरान्त सूक्ष्म शरीर कई बार जन्म ले लेता है लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि पुराने व्यक्तियों, पुरानी वस्तुओं से अत्यधिक मोह जुड़ जाने के कारण जीवात्मा को उन्हीं वस्तुओं में या उन्हीं के आस-पास रहना पड़ता है । जीवात्मा की ऐसी स्थिति को ही प्रेत-योनि कहा गया है और जीवात्मा उस स्थिति में रह कर पे्रत बनती हे, प्रेतों जैसे काम करती है, स्वयं उद्विग्न रहती है और दूसरों को भी अकारण परेशान करती रहती है ।
अपनी रुचि की परिस्थितियों में प्रेतात्मा को प्रसन्न, और प्रतिकूल परिस्थितियों में उद्विग्न, परेशान रहते तथा उन परिस्थितियों का प्रतिरोध करते देखा गया है । इससे प्रतीत होता है कि आत्मा का न केवल, अस्तित्व बना रहता है, वरन् उसका स्वभाव और रुचि भी लगभग वैसी ही बनी रहती है । इसी आधार पर जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर की गतिविधियाँ क्रियाशील रहती है । मरने के बाद जीवात्मा अपनी प्रिय परिस्थितियों, प्रिय वस्तुओं और प्रिय व्यक्तियों के साथ कई बार बहुत घनिष्ट सम्बन्ध बनाये रहती है । इसके कितने ही प्रमाण मिलते रहते है । अपने समय की विश्वविख्यात नर्तकी अन्ना पावलोवना की शिष्या नर्तकियों ने जब उसके पुण्य स्मरण में एक नृत्य समारोह का आयोजन किया तो दर्शकों ने प्रत्यक्ष देखा कि समारोह में भाग लेने वाली नर्तकियों के साथ-साथ मृतात्मा की छाया भी नृत्य कर रही है ।
इसी प्रकार इटली के प्रसिद्ध वायलिन वादक पागगिनी के स्मृति समारोह में उसका प्रिय वायलिन अपने आप बजने लगा । वायलिन एक मंच पर रखा हुआ था और उसके पास ही पागगिनी का चित्र भी था । दर्शकों को यह देख कर आर्श्चय हो रहा था कि वायलिन अपने आप बज रहा है ओर उसमें से ‘मैं पागगिनी हूँ’ मैं पागगिनी हूँ’ की ध्वनि निकल रही थी । इस विचित्र दृश्य को देखकर दर्शकों ने आर्श्चयचकित एवं आतंकित भाव से प्रेतात्मा की उपस्थिति अनुभव की । उन दिनों इस प्रसंग की घर-घर चर्चा थी ।
सबसे अधिक आर्श्चयजनक और साथ ही भयंकर घटना पिछली शताब्दी में मिस्त्र की समाधियों के पास घटी । हुआ यह कि कुछ अमेरिकी और ब्रिटिश पुरातत्व विदों ने मिश्र की इन समाधियों के पुरातत्व रहम्य जानने की योजना बनाई । ये समाधियाँ फराऊनी क्षेत्र में आज भी स्थित है । पुरातत्व विदों का उद्द्द्देश्य केवल इन समाधियों का रहस्य मात्र जानना नहीं था वरन् वे उन कब्रों में दबी हुई विपुल र्स्वण सम्पदा तथा रत्नराशि से भी लाभान्वित होना चाहते थे । इसके अतिरिक्त एक प्रयोजन यह भी था कि उन किंबदन्तियों की वास्तविकता जानी जाय, जो इन समाधियों की रक्षा प्रेतात्माएँ करती है और जो उन्हें छेडे़गा, उसे खतरा उठाना पडे़गा । एक समाधि पर तो स्पष्ट शब्दों में शिला लेख लगा था कि फराऊनी की इन कब्रों को जो कोई छेडे़गा और इनमें आराम कर रही रुहों को परेशान करेगा उसे अकाल मृत्यु खा जायगी ।”
लार्ड कानीवल ने इस तरह की चेतावनियों की उपेक्षा कर कब्रों की खुदाई का काम अपने हाथ में लिया । इनका परिवार भी इस कार्य में दिलचस्पी ले रहा था । क्योंकि इससे अगाध सम्पत्ति हाथ लगनी थी । अन्य लोग भी थे जो लार्ड कानीवल के साथ इस अभियान में जुटे थे और खुदाई के काम में सहयोग दे रहे थे । इस प्रयास की परिणति दुःख परिणामों में हुई । एक-एक करके बाईस व्यक्ति इस अभियान में कुछ ही समय के भीतर बड़े विचित्र ढंग से काल के गाल में समा गए । लार्ड बेस्टबरी को न जाने क्या सनक सूझी कि वह छत पर से कूद पड़े और मर गये । उनका बेटा भी खुदाई में सक्रिय भाग ले रहा था । रात को अच्छा खासा सोया और सुबह मरा हुआ मिला । डा. अर्चिवाल्ड डगलस रीड एक ममी का एक्सरे कर रहे थे कि अचानक गिर पड़े । जिस स्थान पर वह गिरे वह समतल था । न कोई ठोकर लगी ओर न किसी ने धक्का ही दिया । कटे पेड़ की तरह वह गिरे और उनका प्राणान्त हो गया ।
आर्ब्रेहर्वरन सहसा पगला गए तथा आत्महत्या कर बैठे । आर्थर बाइगाल को मामूली सा बुखार चढ़ा और चन्द ही मिनटों बाद उनके भी प्राण-पखेरु उड़ गये । लार्ड कार्नावलि की पत्नी लेडी एलिस को एक ततैये ने काटा ओर देखते ही देखते उनके शरीर का रंग पीला पड़ गया, जैसे किसी ने उनके शरीर का खून चूस लिया हो । इस प्रकार लार्ड कार्नावलि का पूरा परिवार ही इस अभियान में मृत्यु का ग्रास हो गया और किसी के हाथ कुछ भी न लगा, न ही कोई सुरक्षित वापस आ सका ।
इस घटना या आकस्मिक मृत्यु काण्ड की व्यापक चर्चा हुई । यह प्रसिद्ध था कि मिश्र में नील नदी की घाटी में अवस्थित ये कब्रें सबसे अधिक रहस्यमय है और साथ ही इनमें अपार रत्न राशि, हीरे-मोती और र्स्वण-आभूषणों के भण्डार भरे हुए है । एक साथ इतनी मौतें देखकर इन कब्रों के सम्बन्ध में प्रचलित किम्बदन्तियों के सामने सिर झुका रहे थे जो इन कब्रों से छेड़खानी करने वालों को जोखिम उठाने की चेतावनी देती दिखाई दे रही थी ।
यह खुदाई मिश्र के पुरातत्व विभाग के प्रमुख हार्वर्ड कारटर ने इंग्लैड के उत्साही धनपति लार्ड कार्नविन की साझेदारी में आरम्भ कराई थी परिणाम जो निकला, वह ऊपर बताया जा चुका है ।
अनेकों बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आई जिनमें प्रेतात्माओं ने अपने परिवार के लोगों की परिस्थितियों में दिलचस्पी ली है और यथासम्भव उनकी सहायता की है तथा उन्हें परेशान करने वालों को तंग किया है । रायल सोसायटी के फेलो जोसफ ग्लैनबिल इंग्लैढ के प्रतिष्ठित नागरिक थे । उनने अपने संस्मरणों में सन् 1662 में घटी एक प्रेत अस्तित्व की घटना का उल्लेख किया है । उनके इस संस्मरण में विल्ट शायर (इंग्लैंड) की एक अदालत में आये एक विचित्र केस का वर्णन है । हुआ यह कि एक अर्ध विक्षिप्त सा व्यक्ति कहीं से पुराना नगाड़ा खरीद लाया । वह उसे सड़क पर खड़ा होकर बजाता और भीड़ इकट्ठी कर पैसे बटोरता था । उसका नगाड़ा बजाने का ढंग विचित्र था ।
पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और अवाँछनीय भीड़ इकट्ठी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और अदालत में पेश किया । अदालत ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया और नगाड़े को जब्त करने का हुक्म दिया । कुछ दिन बाद बेकार पड़े नगाड़़ को पुलिस ने उस अदालत के मजिस्ट्र के घर ही पहुँचा दिया, मजिस्ट्रटे के घर वह नगाड़ा एक कोने में पटक दिया गया । जिस दिन से नगाड़ा मजिस्ट्रटे के घर में पहुँचा उसी दिन से वहाँ उसी दिन से वह्म्रँ प्रेतों के उपद्रव शुरु हो गए । किबाड़ों को खटखटाने की, छत पर धमा चौकड़ी और आँगन में उछल-कूद मचाने की घटनाएँ रोज ही घटने लगीं ।
बहुत तलाश करने पर भी कोई दिखाई नहीं पड़ता था । लेकिन घटनाएँ बराबर घटती रहती थी । बहुत प्रयत्न करने पर भी जब इन उपद्रवों का कोई समाधान नहीं निकला तो पुलिस की सहायता ली गई । लेकिन पुलिस वाले भी कुछ नहीं कर सके । वे देखते, सुनते, समझते पर कुछ कर नहीं पाते । कारण कि उपद्रव तो दिखाई देते थे; पर उपद्रव करने वालों का कहीं कोई पता ही नहीं चलता था । जो दिखाई ही नहीं देता उसको केसे रोका या पकड़ा जा सकता था ? एक दिन न्यायाधीश ने देखा कि किसी ने जोर का धक्का देकर बन्द किबाड़ खोल लिये है और चटखनी टूट गई है वह व्यक्ति ओबरकोट पहने हुए आँगन में होता हुआ जीने के रास्ते छत पर चढ़ गया । आर्श्चय तो यह था कि ओवरकोट तो आँखों से दिखाई दे रहा था, किन्तु पहनने वाले के हाथ-पैर चेहरा आदि कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था । इस घटना के बाद तो इन उपद्रवों को स्पष्टतः प्रेत लीला मान लिया गया ।
समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर थोड़े ही दिनों से यह उपद्रव क्यों खड़े हुए ? घर में कुछ अजनवीपन तो आया नहीं । इस ढूँढ़ खोज में जब्त किया गया वह नगाड़ा ही नजर आया जो एक पगले से छीना गया था और उसने भी वह एक कबाड़खाने से खरीदा था । इतना ही नहीं उसका भी पता लगाया गया और उसके बारे में छानबीन की गई तो मालूम हुआ कि वह सदा से विक्षिप्त नहीं था । कबाड़ खाने से सस्ता माल देखकर उसने वह नगाड़ा खरीद लिया था और जिस दिन से उसने वह नगाड़ा खरीदा था, उसी दिन से वह पगला गया था ।
सत्रहवीं सदी के पादरी जेरेन्सी टेलर ने अपनी स्मरण पुस्तक में एक प्रेतात्मा का आँखों देखा विवरण लिखा है । जब पादरी घोड़े पर सवार होकर वेलकास्ट से डिल्सगेरो जा रहा था । तो सहसा कोई अजनबी व्यक्ति उसके घोड़े की पीठ पर सवार हो गया । चकित होकर पादरी ने उसका परिचय एवं उद्द्द्देश्य पूछा तो उसने अपना नाम हैडक जेम्स बताया ओर कहा कि आप मेरी बिधवा पत्नी तक यह सन्देश पहुँचा दें कि उसका नया पति जल्द ही उसके साथ धोखा करने वाला है । उससे वह बचे । पादरी ने बताये हुए नाम पते पर वह सन्देश पहुँचा दिया किन्तु स्त्री ने न तो उस बात पर ध्यान ही दिया और न विश्वास ही किया । उल्टे पादरी का मखौल ही उड़ाया । लेकिन कुछ दिनाँ बाद सचमुच उस स्त्री की हत्या कर दी गई । हत्या के आरोप में उसका नया पति ही पकड़ा गया । यह मुकदमा कैरिकफोरेन्स की अदालत में चला । पुलिस का कहना था कि यह हत्या उसके नये पति ने पत्नी की सम्पत्ति हड़पने के लिए की है ।
इस सर्न्दभ में पादरी जेनेंसी टेलर ने अपनी प्रेत वार्ता की साक्षी प्रस्तुत की । अदालत ने पादरी की गवाही को प्रामाणिक नहीं माना और कहा कि यदि सचमुच ऐसी बात है तो प्रेतात्मा को अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात कहनी चाहिए । अदालत में सन्नाटा छा गया । प्रत को गवाही देने के लिए निमन्त्रित करने कौन जाये और कहाँ जाए ? किन्तु कुछ क्षण भी नहीं बीते थे कि अचानक जोर से बिजली कड़कने जैसी आवाज हुई । शून्य से एक हाथ निकला और उसने अदालत की मेज पर तीन बार जोर-जोर से थपकी दी । इस दृश्य को देखकर न्यायाधीश एवं अन्य लोग चकित रह गये ओर सिहर भी उठे अदालत ने मृत स्त्री के नये पति को दोषी घोषित करते हुए उसे समुचित दण्ड दिया ।
इस तरह के अनेकों प्रसंग है, जिनसें यह सिद्व होता है कि प्रिय वस्तुओं में उलभे रहने के कारण आत्मा अशान्त और उद्विग्न ही रहती है । जिस प्रकार घर के सम्बन्धी मृतक का अभाव अनुभव करते हुए दुखी रहते है, उसी प्रकार वह जीव भी बार-बार अपनी प्रिय वस्तुओं एवं परिस्थितियों के ईर्द-गिर्द मँडराता रहकर दुखी हो सकता है । वहीं डेरा डाल कर बैठा रह सकता है और उस उपस्थिति से घर परिवार के लोगों को भी असुविधा अनुभव हो सकती है । सम्भवतः इसीलिए भारतीय मनीषियों ने दिवंगत व्यक्ति से सम्बन्धित वस्तुओं को दान देकर अन्यत्र स्थानाँतरित कर देने का प्रचलन किया ताकि मृतात्मा को यह विश्वास हो सके कि वे पदार्थ अब परिवार के आधिपत्य में नहीं रहे वरन् किसी धर्मसत्ता के अधिकार में चले जाने के कारण पराये हो गये है ।
जो भी हो, मोह बन्धन जीते जी तो दुख ओर विपाद का कारण बनते ही है, मरने के बाद भी वे जीवात्मा को उद्विग्न अशाँत किये रहते है तथा उसे भटकाते रहते है । इसलिए यही उचित है कि जीते जी ही मोह-बन्धनों को शिथिल किया जाए ताकि अनिश्चित काल तक दुख, विषाद और भटकाव से छुटकारा मिल सके ।
वाराणसी नरेश ब्रहृदत्त को अपने राजपुरोहित देव मित्र के प्रति अटूट श्रद्धा थी और था अगाध विश्वास । देवमित्र के स्वभाव में विद्वत्ता, योग्यता और प्रतिभा के साथ-साथ शील, सदाचरण और नीति निष्ठा का भी समावेश था । उनके इन गुणों, योग्यता और सदाचार प्रतिभा और निष्ठा से अभिभूत होकर महाराज ब्रहृदत्त तो क्या वाराणसी की समस्त जनता उनके प्रति श्रद्वानत थी । राज्य के बाहर भी उन्हें श्रद्वा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था ओर लोगों में उनके प्रति अगाध श्रद्वा तथा भक्तिभाव था ।
नरेश ब्रहृदत्त से तो उनका निकट सर्म्पक था ही वे तो देवमित्र के उ़च्च उदात्त चरित्र और प्रखर प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व से इतने अधिक प्रभावित थे कि लगता था, देवमित्र आराध्य है और ब्रहृदत्त से तो उनका निकट सर्म्पक था ही वे तो देवमित्र के उ़च्च उदात्त चरित्र और प्रखर प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व से इतने अधिक प्रभावित थे कि लगता था, देवमित्र आराध्य है और ब्रहृदत्त आराधक । राजपुरोहित विग्रह है और सम्राट अर्चक, भला, ऐसे नीति भक्तिमान ब्राहृण के प्रति कौन श्रद्वावान न होता ?
देवमित्र के मन में एक दिन यह प्रश्न उठा कि राजा और प्रजा उनके व्यक्तित्व के किस पक्ष से प्रभावित है ? और किस कारण उन्हें श्रद्वा तथा आदर की दृष्टि से देखती है ? वे मेरे साहित्य, शास्त्रज्ञान, विद्वता और प्रतिभ के लिए मुभे सम्मानित करते है अथवा मेरे शील सदाचरण और नीति निष्ठा के कारण मुभे श्रद्वा की दृष्टि से देखते है ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए उन्होंने एक विचित्र आचरण किया ।
एक दिन राजसभा विसर्जित होने पर देवमित्र जब अपने घर लौट रहे थे तो उन्होंने राजकोष में से एक काषार्पण (मुद्रा) उठा लिया । कोषाध्यक्ष ने देवमित्र को यह अनुचित आचरण करते तो देखा, पर देखकर अनदेखा कर दिया । सम्भवतः वह यह सोचकर रह गया हो कि पुरोहित जीने किसी प्रयोजन विशेष से ऐसा किया होगा सो कल वे उस प्रयोजन को स्पष्ट कर देंगे । लेकिन दूसरे दिन भी राजपुरोहित ने राजसभा से लौटते हुए ऐसा ही किया । उस दिन भी कोषाध्यक्ष ने देखकर अनदेखा कर दिया। पर तीसरे दिन जब पुरोहित ने राज सभा की समाप्ति पर घर जाते समय मुट्ठी भर काषर्पण उछा लिए और वे अपनी राह चलने को उ़द्यत हुए तो कोषाध्यक्ष ने लपक कर उनका हाथ थाम लिया और इसकी शिकायत दण्डाधिकारी से की ।
दण्डाधिकारी ने नरेश तक देवमित्र के इस आचरण की सूचना दी और पूछा कि पुरोहित जी के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए ? तो उत्तर मिला, जैसा इस तरह का आचरण करने वाले किसी अपराधी के साथ होता है । अन्ततः इस तरह के आचरण के लिए दण्डाधिकारी ने उनके प्रति, वैसा ही व्यवहार किया, जैसा किसी चोर के प्रति किया जाता है । राजसभा में उन्हें बन्दी की तरह उपस्थित किया गया । दण्डाधिकारी ने आरोप पढ़कर सुनाया, राजा ने उनसे उसी प्रकार के प्रश्न पूछे, कोषाध्यक्ष से भी पूछताछ की गई और राजपुरोहित ने दुर्ष्कम किया है, इस विषय में आश्वस्त होकर निर्णय सुनाया गया, ‘यह व्यक्ति चोर है ।
निर्णय सुनाने के बाद ब्रहृदत्त असमंजस में पड़ गए । जिसका शील सदाचार दूर-दूर राज्यों में सराहा जाता हो, वह कैसे इतना पतिति हो गया । एकान्त में पूछा तो देवमित्र ने कहा, ‘यह तो एक प्रयोग था राजन् जो मैंने अपने मन में उठे एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए किया । मै देखना चाहता था आप और राज्य की जनता मुभे जो सम्मान और श्रेय देती है उसकी अधिकारिणी मेरी प्रतिभा और योग्यता है, या शील सदाचार । आज समाधान मिल गया कि विद्वता, ब्रहृणत्व और रुप का अपना महत्व तो है, पर यदि वह शील, सदाचार और नैतिकता से च्युत हो जाए तो उसकी अन्य योग्यता का मूल्य कुछ भी नहीं रह जाता ।’
‘मैं दण्ड के लिए प्रस्तुत हूँ । ताकि लोगों में राज्य की न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास बना रहे ।
अति प्राचीन काल में भारतीय समाज ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उच्चशिखरों पर पहुँच गया था और सभ्यता तथा संस्कृति की दृष्टि से अपना देश अति विकसित था, इस तथ्य को अब विदेशी लोग में अभी भी भारतीय समाज और राष्ट्र को ऊँचा उठाने वाली प्रतिभा का अपने देश में अभाव नहीं है, फिर भी इस विडम्बना को क्या कहें जो प्रगति और उन्न्ति के लिए पश्चिम की ही ओर निहारती तथा उसी का अनुकरण करने के लिए लालायित रहती है । विरासत के रुप में भारतीय संस्कृति के जो अवशेष अभी भी बचे हुए या जीवन्त है, उनकी उपेक्षा कर उपलब्ध तथ्यों को कवि कल्पना मानने तथा हलके स्तर के आयातित ज्ञान-विज्ञान में ही अर्थवत्ता खोजने की प्रवृत्ति आत्मविस्मृति ही नहीं आत्म प्रवंचना का भी परिचय देती है ।
भारतीय शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन समय में यहाँ विमानों का प्रचलन था। भारतीय वैज्ञानिक विमानों का आविष्कार करने में सफल हो गये थे । इस तरह के उल्लेख जहाँ कही भी आये है, उन्हें स्वीकार करने के स्थान पर तथाकथित पढ़ा-लिखा शिक्षित समुदाय इस विवरण का उपहास ही उड़ाया करता था । इस तथ्य का मजाक ही किय जाता था और कहा जाता था । कि मनुष्य भी कहीं आकाश में पशु-पक्षियों की तरह उड़ सकता है ? कैसा बचकाना विचार है । लेकिन जब वायुयान का अविष्कार कर लिया गया , तब कहीं जा कर लोगों ने यह माना कि ऐसा भी सम्भव है और प्राचीन ग्रन्थों, इतिहास के इन विवरणों की सत्यता को झिझकते-झिझकते स्वीकार किया ।
सौ डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की बातों को जाने भी दें । सोचा जा सकता है कि उस समय भारतीय मानस शताब्दियों से चली आ रही दासता से आक्रान्त था । उस पर गुलामी का प्रभाव था । फलस्वरुप स्वतन्त्रता में साँस लेने वालों की अपेक्षा गुलामी की घुटन में रहने के कारण लोगों का आत्मविश्वास घटा था और हम इस सन्ताप की अग्नि में बराबर झुलसते रहे थे कि हजारे पास वैज्ञानिक प्रतिभा का अभाव है । लेकिन अब तो स्वतन्त्र हुए करीब तेंतीस वर्ष हो चले । फिर भी प्राचीन संस्कृति के प्रति भारतीय ज्ञान विज्ञान के प्रति इतनी उदासीनता या उपेक्षा क्यों है कि उसी लीक पर चला जा रहा है ।
उत्तर में यही कहा जा सकता है कि भारत स्वतन्त्र भले ही हो गया हो, परन्तु यहाँ के नागरिकों में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव अभी तक जागृत नहीं हो सका है । यही कारण है कि लोग न केवल पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण करना श्रेयस्कर समझते है बल्कि वहीं के जीवनलदर्शन, वहीं की मान्यताओं और वहाँ के विचारकों का प्रतिपादन भक्ति भाव से ग्रहण करते अपनाते है, पश्चिमी संस्कृति के प्रति इसी मुग्ध भाव के कारण अपनी प्रतिभा का मौलिक विकास करने के स्थान पर पश्चिमी ज्ञान विज्ञान को श्रेष्ठ मानकर अपनी संस्कृति के प्रति हीनता की दृष्टि पनपने लगी है । अन्यथा यह सिद्व करने के पर्याप्त प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता प्राचीन काल में आधुनिक सभ्यता व संस्कृति अपेक्षा बहुत अधिक उन्नत और विकसित थी ।
किन्हीं दूसरे कारणों से आई गुलामी ने उन कड़ियों को तोड़ भले ही दिया हो और इस कारण ज्ञान विज्ञान की वह प्राचीन धारा टूट भले गई हो, पर अभी भी मृत नहीं हुई है । उसे पुनजीर्वित किया जा सकता है और अपनी प्रतिभा के मौलिक उपयोग द्वारा उसी गोरवास्पद स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है । प्रश्न उठता है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति के गौरव पूर्ण तथा महान होने के क्या प्रमाण है ? तथ्यों ओर प्रमाणों के तो ढेर लगाये जा सकते है तथा लगाये भी गये है । उन सबको यहाँ प्रस्तुत करने की गुँजायश नहीं है । लेख के कलेवर को दृष्टिगत रखते हुए कतिपय उदाहरण और विद्वानों के उद्वरण देना ही पर्याप्त होगा ।
सभ्यता और ज्ञान विज्ञान की विभिन्न धाराओं में से एक भवन निर्माण कला को ही लिया जाए । हजारों वर्ष पूर्व भवन निर्माण कला तथा नगरों का विकास अपने देश में प्रगति के चरम को छू चुका था । इस सर्न्दभ में प्रसिद्व, वास्तुकलाविद् ई.बी. हैवेल ने कहा है, भवन निर्माण के लिए आजकल जो प्रविधियाँ प्रचलित है वे बहुत अधूरी है । निश्चित ही यूरोप ने वास्तुकला के क्षेत्र में अद्भूत प्रगति की है, परन्तु वह अभी तक भारत की वास्तुकला के स्तर को छू नहीं पाया है लगभग दो हजार वर्ष पूर्व विनिर्मित अजन्ता एलोरा की गुफाएँ तथा उनके भित्ति चित्र, उन्हीं दिनों बनाये गये भव्य मन्दिर और प्रासादों में दृष्टिगोचर होने वाली श्रेष्ठतम कला कारिता को देखकर दाँतों तले अँगुली दबा कर रह जाना पड़ता है ।
भारत ने न केवल वास्तुकला तथा नगर निर्माण के क्षेत्र में चमत्कारी प्रतिभा को खरादा निखारा, वरन् चिन्तन द्वारा ऐसे सिद्वान्तों का निर्माण भी किया जिनके आधार पर आज भी उसी स्तर को प्राप्त किया जा सकता है । प्रगति के वही शिखर छुए जा सकते है । य़द्यपि भारत की ज्ञान सम्पदा का अधिकाँश भाग विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा जलाये गये ग्रन्थालयों तथा मारे गये अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिभा सम्पन्नों के कारण नष्ट हो गया है । फिर भी अब तक 141 ऐसे ग्रन्थों का पता लगाया जा चुका है, जिनमें वास्तुकला और शिल्प शास्त्र का विस्तृत विवेचन हुआ है । विश्वकर्म प्रकाश भानसार तथा भोजदेव कृत ‘समराँगण’, ‘सूत्राधार’, आदि ग्रन्थ अब भी बड़ी सुलभता से प्राप्त हो जाते है । इनके सम्बन्ध में विशेषज्ञों का कहना है कि इन ग्रन्थों में प्रतिपादित सिद्धान्तों का विवेचन पढ़ कर ही विस्मय विमुग्ध रह जाना पड़ता है ।
अंकविज्ञान एक और देन है । भारत की, जिसका उपयोग तो सारा विश्व अब भी धड़ल्ले से कर रहा है । आधुनिक प्रौद्योगिकी मूलतः अंकगणित पर ही आधारित है । उसके बिना उद्योग धन्धे से व्यवसाय रोजगार का काम एक दिन भी नहीं चल सकता और गणित के अंकोंका आविष्कार सर्व प्रथम भारत में ही हुआ । इस सम्बन्ध में प्रसिद्व पश्चिमी विद्वान जी.बी. हालस्टेड ने इस विश्व को इसके लिए भारत का ऋणी बताते हुए कहा है, हिन्दुओं के द्वारा किये गये शून्य के आविष्कार ने मानव जाति की बुद्वि और शाक्ति की प्रगति में अभूतपूर्व योगदान दिया है ।
भारत ने आध्यात्मिक क्षेत्र में तो विश्व को अनेकानेक अनुदान दिये है । भौतिक क्षेत्र में भी इतनी चमत्कृत कर देने वाली सफलताएँ अर्जित की है कि उनकी आज की वैज्ञानिक उपलब्धियोंसे तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि आज का विज्ञान तो उन्हें दोहरा भर रहा है । जैसे पश्चिमी वैज्ञानिकों से सैकड़ों वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने यह पता लगाया था कि पृथ्वी घूमती और सूर्य स्थिर है तथा यह भी कि 24 घण्टे में पृथ्ती सूर्य की एक परिक्रमा लगा लेती है । अब से दो हजार वर्ष पूर्व विक्रमादित्य के समय में अपना देश नक्षत्र विद्या के क्षेत्र में उन तथ्यों को खोज चुका था जो पश्चिमी वैज्ञानिकों को सैकण्ड़ों वर्ष बाद मालूम हुए । एक इतिहासकार ने अपने एक निबन्ध में यह बात बड़े ही सुन्दर ढंग से कही है, जिस समय गैलीलियों के प्रतिपादन को न्याय की तराजू पर तोला जा रहा था तथा परम्परागत धारणाओं को टूटने से बचाने के लिए उसे मृत्युदण्ड सुनाया जा रहा था तब भारतीय वैज्ञानिक अपनी वेधशाला में बैठे हुए इन निष्कर्षों से सैकड़ों कदम आगे की खोज कर रहे थे ।
पेड़ की शाखा से एक फल टूट कर गिरता देख पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का पता लगाने के लिए न्यूटन की प्रतिभा के आज भी गीत गाये जाते है, परन्तु यह कोई नई खोज न थी । न्यूटन से पाँच सौ वर्ष पहले ही भास्कराचार्य ने अपने ‘सिद्वान्त शिरोमणि’ ग्रन्थ में लिख दिया था कि पृथ्वी का कोई आधार नहीं है, यह अपनी ही शाक्त्िसे स्थिर है । पृथ्वी में आकर्षण शक्त्िहै, इसी लिए वह आकाश में फैंकी हुई भारी वस्तुओं को अपनी ओर खीचंती है।’ इस तथ्य को सर्वप्रथम उद्घाटित करने का श्रेय भी भास्कराचार्य को ही जाता है कि पृथ्वी गोल है समतल नहीं ।
वास्तुकला विज्ञान, अंक गणित, ज्योतिष तथा भूगोल के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् साहित्य, संगीत ओर अन्य कलाओं में भी भारतीय प्रतिभा ने निष्णात दक्षता प्राप्त की थी । भारतीय साहित्य शास्त्र विश्व का सर्वाधिक विकसित साहित्य शास्त्र है । अन्य किसी भी भाषा का साहित्य इतना समृद्व और समार्थ्य पूर्ण नहीं है जितना कि संस्कृत भाषा का । रस, सम्प्रदाय, अलंकार, रीति, ध्वन्यात्मकता तथा गत्यात्मकता के सिद्धान्तों की जितनी गहन और जितनो सूक्ष्म अभिव्यक्ति संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में हुई है उतनी अन्य भाषाओं में अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देती । लेकिन साहित्य का आधुनिक विद्यार्थी इन सबके अध्ययन से वंचित ही रह जाता है । भारतीय भाषाओं के आधुनिक लेखक प्राचीन मनीषियों द्वारा अगाध परिश्रम से खोजे तथा निर्धारित किये गये मानदण्डों की अपेक्षा फैशन के तौर पर पश्चिमी साहित्य के मानदण्डों की वैसाखियों का सहारा लेना ही अधिक उचित समझते है । यह प्रवृति जिस गति से बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए यह चिन्ता होना स्वाभाविक ही है कि कहीं कालान्तर में इन प्राचीन ग्रन्थों को पढ़ने वाले भी रह जायेंगे अथवा नहीं ।
साहित्य के क्षेत्र में ही नहीं भारतीय ज्ञान विज्ञान की उन समस्त क्षे़त्रों के सम्बन्ध में स्थिति चिन्ताजनक है, जिनमें असंख्यों प्रतिभाओं ने अपना जीवन होम कर अनिर्वचनीय उपलतब्धियाँ अर्जित की है । चूँकि यह सारी ज्ञान सम्पदा देवभाषा संस्कृत में लिपिबद्ध की गई है, इसलिए संस्कृत को मृतभाषा घोषित करने के साथ ही इस ज्ञान सम्पदा की भी सहज ही उपेक्षा होने लगी । इसमें कोई सन्देह नहीं कि विदेशी शासकों ने इस देश में अपने पैर जमाते ही इस तथ्य को जान लिया कि संस्कृत का प्रचलन रहा तो देश की जनता का सोया हुआ आत्मगौरव कभी भी जाग सकता है । इसलिए उन्होंने जान-बूझकर संस्कृत के अध्ययन व अध्यापन का निरुत्साहित किया और इसके साथ ही जन-मानस में उत्पन्न होने लगी हीनता, हताशा तथा कुण्ठा । मुगल काल से भी अधिक बुरी परिस्थितियाँ ब्रिटिश काल में रही । उस समय तो फिर भी ज्ञान सम्पदा में नया कुछ जोड़ने के लिए भारतीय प्रतिभा को प्रोत्साहन मिलता था । किन्तु ब्रिटिश काल में यंित्कचित प्रोत्साहन तो क्या उन्टे निरुत्साहित ओर निराश करने का उपक्रम चल पड़ा ।
अब तो भारत स्वतन्त्र है । अब तो वैसी कोई विवशता नहीं है, फिर क्या कारण है कि अभी भी भारतीय समाज में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जागृत नहीं हो पा रहा है । ख्ोद है कि इस दिशा में कोई ध्यान देने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं की जाती । ऐसी बात नहीं है कि भारत के पास प्रतिभा का अभाव हो । प्रतिभाओं के लिए उर्वर भारत भूमि अभी भी इतनी बीर प्रसूता है कि तथ्यों के प्रकाश में भारत प्रतिभाओं के विकास की दृष्टि से प्रथम क्रम में आता है । संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार कुशल इन्जीनियर, टैकनिश्यिन और डाक्टर तैयार करने में भारत अन्य सभी देशों से अग्रणी है । लेकिन कमी यही है कि हम अपनी प्रतिभा के साथ विरासित में मिली ज्ञान सम्पदा को जोड़ने में अभी तक समर्थ नहीं हो सके है या फिर इसकी आवश्यकता अनुभव नहीं करते ।
आवश्यकता अनुभव की जाए तो समर्थता भी अर्जित हो सकती है लेकिन यह तभी सम्भव होगा जब अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जागृत किया जाए । दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जिसे अपनी प्राचीन संस्कृति से मोह न हो, जो उसके प्रति गौरवान्वित न रहता हो । एक भारत ही ऐसा है जो अपने पुरखों की निन्दा, भर्त्सना और उपेक्षा कर रहा है । प्रत्यक्ष करने वाले भी है और परोक्ष करने वाले भी । विदेशी पश्चिमी सभ्यता की अन्धी नकल और अपनी संस्कृति के प्रति कुछ भी जानने की उत्सुकता का अभाव, उपेक्षा नहीं तो और क्या है ? आवश्यकता इस बात की है कि अपने गौरवपूर्ण अतीत का अध्ययन जाये और मौलिक प्रतिभा का विकास किया जाए, तभी भारत विश्व में आत्म सम्मान के साथ जी सकेगा और इसके पास जो रत्न भण्डार है उनसे वह विश्वन्द्य हो सकेगा ।
पिता नौकरी करते थे । उन्हें तीन रुपये मासिक वेतन मिलता था । घर में पत्नी बच्चों के अलावा माता पिता भी थे । इतने बड़े परिवार का खर्च तीन रुपये मासिक में मुश्किल में चलता था । ऐसी स्थिति में पुत्र को पढ़ा-लिखकर कर योग्य बनाने के साधन कहाँ से जुटते ? मन में बड़ी कसक उठती थी कि किसी भी प्रकार बच्चे को पढ़ा-लिखाकर सुयोग्य बनाया जाये, परन्तु प्रश्न वही साधनों का था । बालक ईश्वरचन्द्र भी गाँव के अन्य बच्चों को पढ़ने के लिए दूसरे गाँव के स्कूल में जाते देखकर मचल उठता, ‘पिताजी ! मुभे भी स्कूल में भरती करवा दो न ! मैं भी पढ़ूगाँ ।
पिता की छाती भर आती थी, पुत्र की उमंग और अपनी विवशता देखकर । वह समझाते, ‘बेटा तुम्हारे भाग्य मैं ही विधा नहीं है । अगर व़िद्या होती हो तुम मुझ जैसे निर्धन बाप के घर में क्यों जन्म लेते ।
पिता की विवशता देखकर ईश्वरचन्द्र मन मसोस कर रह जाता । इससे अधिक बह कर ही क्या सकता था ? पर पढ़ने की चाह कम नहीं हुई । जहाँ चाह वहाँ राह वाली उक्ति के अनुसार ईश्वर चन्द्र ने राह निकाल ही ली । उसने गाँव के उन लड़कों को मित्र बनाया जो स्कूला जाते थें । उनसे दोस्ती गाँठ कर उनकी पुस्तकों के सहारे अक्षर ज्ञान कर लिया और एक दिन कोयले से जमीन पर लिखकर अपने पिता को दिखाया । ईश्वरचन्द्र की विद्या के प्रति यह लगन देखकर पिता का हृदय अधीर हो उठा और वे अपनी गरीबी को कोसने लगे ।
एक दिन ईश्वरचन्द्र अपने पिता के साथ किसी काम से कलकत्ता की ओर जा रहे थे । रास्ते में एक जगह सुस्ताने के बाद पिता ने कहा, ‘न जाने कितनी दूर चले आए है ?” ईश्वरचन्द्र ने कहा कि नौ मील आ गये है ।
‘तुमने कैसे जाना ?” पिता ने पूछा !
‘रास्ते में हमने सबसे बाद में जो मील का पत्थर देखा था, उसे देखकर । उस पर नौ का अंक लिखा था ।
पिता यह जानकार हर्ष विभोर हो उठे कि उनके पुत्र ने अग्रेंजी के अंकों का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया है । मन में बड़ी उथल-पुथल हुई और काम में निबट कर घर लौटे तो अपनी पत्नी से रास्ते की सारी घटना कह सुनाई । पत्नी ने कहा, “लड़का है तो बुद्धिशाली पर दुर्भाग्य कि हमारे घर में पैदा हुआ है ।”
‘इस दुर्भाग्य का कलंक अब और न रहने दूँगा । पिता ने कहा-’भले ही हम लोग एक समय भोजन करें पर ईश्वर को स्कूल अवश्य भेजेगें ।’ पत्नी ने भी प्रसन्नता पूर्वक सहमति दे दी और ईश्वरचन्द्र को गाँव की पाठशाला में भरती करा दिया । वह बड़ी मेहनत से पढ़ता था । गाँव के स्कूल की सभी परीक्षाएँ ईश्वर ने प्रथम श्रेणी में पास की । गाँव की पढ़ाई पूरी हो गई तो आगं पढ़ने का सवाल था । शहर में पढ़ना तो उसके लिए सम्भव नहीं था । आर्थिक विवशता आड़े आती थी । ईश्वरचन्द्र ने स्वयं अपनी राह बनाई और आगे पढ़ने के लिए माता-पिता से केवल आशीर्वाद भर माँगा । उसने कहा-’आप मुभे किसी विद्यालय में भरती भर करा दें । फिर मैं आपसे किसी प्रकार का खर्च नहीं मागूगाँ ।
तदनुसार पिता ने ईश्वरचन्द्र को कलकत्ता के एक संस्कृत विद्यालय में भरती करवा दिया । व़िद्यालय में ईश्वर ने सेवा, लगन ओर परिश्रम, प्रतिभा के बल पर शिक्षकों को प्रसन्न कर लिया । शिक्षक इतने प्रभावित हुए कि उनकी फीस माफ हो गई । पुस्तकों के लिए वह मित्रों के साझीदार हो गए और पढ़ाई से बचे समय में मजदूरी कर गुजारे का प्रबन्ध करने लगे । इस अभाव ग्रस्तता में ईश्वरचन्द्र ने इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष आयु में पहुँचतेःपहुँचते उन्होंने व्याकरण, साहित्य स्मृति तथा वेदशास्त्रों में निपुणता प्राप्त कर ली । यही युवक आगे चलकर ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के नाम से शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हुआ ।
पुरुष सूक्त में परम सत्ता के स्वरुप का वर्णन “सहस्त्र शीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्, अर्थात् उसे हजार मस्तक, हजार हाथ पैर वाला कह कर किया गया है । यहाँ हजार का अर्थ दस सौ से नहीं, अनेकत्व से है । सृष्टि के संचालन-नियमन की व्यवस्था की महान प्रक्रिया शाक्ति के किसी एक स्वरुप द्वारा ही सम्भव नहीं होती । अपितु हजारों शक्ति-स्वरुपों, सहस्त्रों देव-शक्तियों का सहचरत्व ही इस व्यवस्था को नियोजित निर्देशित करता है। यह एक सनातन प्रक्रिया है ।
नक्षत्र अपनी धुरी एवं परिधि पर निर्धारित क्रम से बार-बार परिभ्रमण करते है । पृथ्वी अपनी धुरी पर एक दिन में और सूर्य की एक वर्ष में परिक्रमा करने का क्रम अनादिकाल से दुहराती चली आ रही है । समुद्र से वर्षा वर्षा का जी घूम फिरकर फिर समुद्र में । बीज से वृक्ष, वृक्ष से फल, फल से बीज । सनातन प्रक्रिया का अर्थ मात्र यही है कि सृष्टि में सभी कुछ अपनी क्रम व्यवस्था के अनुसार परिभ्रमण करता हुआ बार-बार उसी प्रक्रिया से गुजरता है । सृष्टि-चक्र की ही तरह इतिहास-चक्र की भी गति है । व्यक्तियों और घटनाओ। में हेर-फेर तो होता ही रहता है । प्रवाह की प्रक्रिया को देखा-समझा जाये, तो उसके मूल में एक निश्चित क्रम व्यवस्था क्रियाशील दिखाई पड़ंगी ।
समाज में मामूली गड़बड़ियाँ बार-बार होती-फैलती रहती है । समाज-सुधारकों द्वारा उनका सुधारकार्य भी सम्पन्न होता रहता है । किन्तु जब अनाचार की अति हो जाती है, जनमानस शुभप्ररेणा एवं सत्प्रवृति से प्रभावित-परिचालित होने की क्षमता खो बैठता है तब व्यापक उथल-पुथल की अनिवार्यता आ उपस्थित होती है । यही अवतारों की प्रक्रिया एवं पृष्ठ भूमि रही है । श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार-
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत ।अम्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनाँ, विनाशाय चादुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे-युगे ॥”
यही बात रामचरित मानस में इन-शब्दों में कही गई है -
“जब-जब होइ धर्म की हानी ।बाढ़हिं अधम असुर अभिमानी ॥
तब-तब प्रभु धरि मनुज शरीरा ।हरहिं सदा सज्जन उर पीरा ॥”
अनीति-अवाछनीयता के निवारण एवं विवेक-सदाचार की प्रतिष्ठापना का विराट् प्रयोजन ही अवतरण प्रक्रिया का उद्द्द्देश्य होता है । प्रत्येक अवतार की सामयिक परिस्थितियाँ बाहृ परिवेश भिन्न होता है । उसी के अनुरुप उन्हें संगठन एवं कार्यक्रमों की व्यवस्था करनी होती है । 24 अवतारों में से प्रत्येक में व्यवस्था के बाहरी स्वरुप की यह भिन्नता स्वाभाविक ही है । किन्तु उनके अन्तरंग स्वरुप में, प्रक्रिया एवं प्रयोजन में सराम्य है ।
व्यापक परिवर्तन के लिए महाशक्ति का जो भवना-प्रवाह, ज्ञान-प्रवाह एवं कर्म-प्रवाह उमड़ता है, उसे अवतार कहते है । यह प्रवाह जब अल्पशक्ति के रुपों में प्रकट होता है, तब वह विभूतियाँ कहलाता है मरीचि, मनु आदि को इसीलिए विभूति कहा जाता है । भागवत् में इसे ही ईश्वर की कला कहा गया है=
अवतारा हृसंख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्त्रशः ॥
ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः ।कलाः सर्वे हरेरेव स प्रजातपयस्तथा ।।”
अर्थात जैसी पानी के अट्ट स्त्रोतों वाले सरोवर से हजारों नहरें निकलती रहती है, उसी प्रकार अनन्त सत्वगुण-निधान भगवान से अनेक अवतार निकलते रहते है । साथ ही ऋषि, देव, मनु, प्रजापति और महा ओजस्वी मनुष्य से सभी ईश्वर की ही कलाएँ या विभूतियाँ है ।
जिनमें विभूतियों का विशेष और बहुविध उर्त्कष होता है, वे अवतार है । आवश्यक ध्वंस के अपार्द्धम और नधसृजन की सनातन प्रक्रिया के द्विविध उद्द्द्देश्यों की पूर्ति अवतारों द्वारा ही होती है ।
चेतना की सार्वभौम सत्ता को पुरुष कहा गया है । ब्रहृ, विष्णु और शिव-ये सृजन, पोषण -सरंक्षण तथासंहार के शाश्वत शक्ति केन्द्र है । इन्ही त्रिदेवों की समन्वित व्यवस्था-प्रक्रिया के अर्न्तगत ब्रहृण्ड का क्रियाकलाप गतिशील है । प्राणधारियों तथा पदार्थां की उत्पादन प्रक्रिया विश्व के ऐर्श्वय की वृद्वि करती है । उत्पादन के पोषण-अभिवर्धन से पुष्टता एवं परिपक्वता आती है । जराजीर्ण, अनुपायोगी की अन्त्येष्टि नये उत्पादन के लिए आवश्यक है । अतः अवसान वस्तुतः अभिनव सृजन का शुभारम्भ है । पोषण-अभिवर्धन मध्यवर्ती स्थिति है । प्रत्येक अवतार अवाँछनीय के अवसान विनाश और वाँछनीय के सृजन-विकास की प्रक्रिया को तीव्रता, गति एवं दिशा देता है ।
भारतीय मान्यता के अनुसार प्रमुख अवतार दस है-
“मत्स्यः कूर्म वराहश्च, नृसिंहो चैव वामनः । रामो, रामश्च, कृष्णश्च, बुद्धः, कल्किचेतेदश ॥”
अर्थात् मत्स्य, कर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्व और कल्कि ये 10 अवतार है नौ हो चुके है और दसवें अवतार का आविभवि इस युग में होना है ।
सभी नौ अवतार अनीति-अधर्म के उन्मूलन और विवेक नीति के अभिवर्धन के द्विविध पूरा करते रहे है।
महाप्रलय के उपरान्त, नइ्र सभ्यता का नये सिरे से विस्तार करना था । इस हेतु जल-विस्तार में डूबी पृथ्वी को उबारने और सत्यव्रत की रक्षा करने का दायित्व मत्स्यातवार द्वारा पूरा हुआ ।
प्रलय प्रयोधि के आँकाकारी विस्तार की समाप्ति और सत्यवत का संरक्षण ये दो कार्य उन्होंने परे किये। यही सत्यव्रत नये कल्प में वैवम्वत ‘मन कहलाये । नयी मानवीय सभ्यता संस्कृति के संस्थापक बने।
दीर्घ अन्तराल के बाद, फिर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई कि देव प्रवृतियाँ शिथिल और क्लाँत हो चलीं । असुर-प्रवृतियाँ और गतिशील थी, किन्तु विध्वंसक थीं । उत्पादन और सृजनात्मकता पराकाष्ठा तक पहुँच गये । जन-मन में हताशा, अभाव और अवसाद घर करने लगा ।
दीर्घ अन्तराल के बाद, फिर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई कि देव प्रवत्तियाँ शिथिल और क्लाँत हो चलीं। असूर-प्रवृतियाँ शक्तिशाली और गतिशाील थी, किन्तु विध्वंसक थी । उत्पादन और सृजनात्मकता का क्रम ठप्प हो चला । विलासिता ओर विध्वंसात्मकता पराकाष्ठा तक पहुँच गये । जन-जन में हताशा, अभाव और अवसाद घर करने लगा ।
तब महाकाल ने समुद्र मन्थन की प्रेरणा उत्पन्न की । देव असुरों के सम्मिलित सहयोग से समुद्र-मन्थन की योजना बनी । इस विराट आयोजन की रई मन्दराचल पर्वत बना । उस पर्वत का भार सम्हालना अन्य किसी के लिऐ सम्भव न था, अतः इस भार का सम्हालने का आधार जिन्होंने स्वीकार किया, वे है कच्छप अवतार । उस आधार पर ही समुद्र-मन्थन की सारी प्रक्रिया सम्पन्न हुँई । सहयोग की भूमिका का सुदृढ़ आधार न जुटता तो सम्मिलित प्रयासों की भी प्रेरणा न जगती और समुद्र मन्थन से प्राप्त 24 रत्नों की समृद्वि न उपलब्ध हो पाती । इस समुद्र मन्थन से बारहवें रत्न प्रकट हुए अमृत-कलश धारी धन्वन्तरि और तेरहवाँ रत्न थीं’ मोहिनी । धन्वन्तरि आयुर्वेद के प्रवर्तक है ।
स्वास्थ्य की गरिमा और सच्ची महानता के अमरत्व का लोक व्यापी प्रचार उन्होंने किया । सम्मिलित सहकार से जो व्यापक सामाजिक आन्दोलन चला, समुद्र जैसा विशाल समाज गहराई तक मथा गया, उसमें से ऐसी लोक कल्याणकारी प्रवृतियाँ का प्रादुर्भाव स्वाभाविक ही था । जब सामाजिक समृद्वि आती है तो उसमें ऐर्श्वय की मोहक चकाचौधं भी उत्पन्न होती है । भोगलोलुपता की दैत्य-प्रवृतियाँ ही इप समृद्वि का अमृत पीने पाती है, क्योंकि वे मोहिनी-रुपयक मोहित नहीं होती । उनकी दृष्टि चैतन्य अमृत-स्त्रोत पर रहती है।
लोकमानस का समुद्र मन्थन एक विराट् और विस्तृत प्रक्रिया है । उसके अनेक आयाम होते है । इसीलिए उसमें नवसृजन विकास, समृक्ष्द्व तथा अनौचित्य के द्रुत विनाश-तीनों की समन्वित गतिविधियाँ आवश्यक होती है । इस प्रक्रिया के आधार अवतार कच्छप ने लोकजागृति के लिये परस्पर विरोधी दीखने वाली शक्तियों को सहकारी एवं पूरक बनाकर अपेक्षित साधन उपकरण जुटानें की परिस्थितियाँ एवं मनःस्थितियाँ पैदा की । धन्वन्तरि ने अमृत-कलश द्वारा जीवन में परिपक्त चैतन्य के आधार प्रस्तुत किये और मोहिनी ने आसुरी शक्तियों के स्खलन, क्षरण, विनाश की प्रक्रिया के द्रुतगति से सम्पन्न होने की रणनीति बनायी । इन तीनों प्रकार की गतिविधियों का आधार कच्छप अवतार बने और समृद्वि तथा श्रेष्ठता का नया युग शुरु हुआ ।
वाराह अवतार में भी दोनों ईश्वरीय प्रयोजन पूरे कियेगये । अनति-अनाचार के भार से रसातल में गई पृथ्वी का उद्वार उन्होंने किया । साथ ही आर्थिक और राजनैतिक एकाधिकार के जाल से सम्पूर्ण पृथ्वी को जकड़कर, सर्वत्र भोगवादी दैत्य सभ्यता का प्रसार करने वाले धन को ही हिरण्याक्ष का नाश किया ।
इसी परम्परा में वामन अवतार अगली कड़ी है। दैत्यराज बलि की असीमित सत्ताकाँक्षा को नियंत्रित करने और देव-सभ्यता को फलने-फूलने का अवसर सुलभ कराने की युगीन भूमिका उन्होंने निभाई ।
छठवें अवतार है श्री परशुराम । मदान्ध सम्राट सहस्त्रबाहु निरंकुश और स्वेच्छाचारी थे । उसकी हजार भुजाएँ होना एक अलंकारिक उपमा है । सम्भावना यह है कि उसके सहयोगी ऐसे पाँच सौ बड़े सामन्त थे, जो हर बात में उसका समर्थन करते थे, लोक चेतना को जगाने के लिए प्रयास-रत महर्षि जमदग्नि को उसने इतनी शरीरिक यातना दी कि उनका देहावसान हो गया । जमदग्नि के ही पुत्र थे परशुराम ।
इस दुर्नीति के दुश्चक्र से क्षुब्ध व्यथित परशुराम ने महाकाल की साधना की । महाकाल ने उन्हें प्रचंड परशु दिया जो अजेय और अमोघ था । एक ओर थी सशस्त्र सेनाएँ, दूसरी ओर परशुधर परशुराम । परशु का अर्थ है प्रबल प्रचार, समर्थ ज्ञानयप्ज्ञ । सहस्त्रबाहु की निरंकुश फ्रूरताओं के आधार-ज्ञाता को विश्लेषित कर उन्हें तार-तार कर डालने हजार बार उनका सिर उतार लेने की आवश्यकता पड़ती है । इस सहस्त्रबाहु के संहार के लिए परशुराम का आविर्भाव आवश्यक है, क्योंकि अनचार-पाप का प्रतिरोध मानवता की पुकार है ।
अविवेक और अनाचार के आतंकाकारी साम्राज्य के अधिपति रावण ने अपने साथ बुद्विजीवी, मायावी, शक्तिशाली, कुटिल लोगों का एक विशाल तन्त्र तैयार कर लिया था । ऐसी स्थिति में लोकमंगल के लिए समर्पित विचार शील आदर्शनिष्ठ ऋषियों ने अपना-अपना रक्त प्राणानुदान देकर उसे एक ही घड़े में एकत्र कर पकाया, जिससे सजीव महाशक्ति महाकाली पराशक्ति सीता के उद्भव की सम्भावना बनी । कर्मयोगी, ब्रहृज्ञानी, राजा होकर भी अपने पसीने की कमाई खाने वाले, जनक ही उस सीता के पिता प्रणेता, उस महाक्राँति के सफल संचालक हो सकते थे । धन-साधन विहीन जननायक राम उस साँस्कृतिक क्राँति चेतना के पति बने । जन सामान्य के संगठित अभियान के सामने सोने की लंका जल भुनकर खाक हो गई ।
श्री कृष्ण ने यही कार्य द्वापर में किया । कंस के अनाचार तन्त्र को उन्होंने अपनी प्रचण्ड सामर्थ्य से उध्वस्त किया । कौरवों की अनीति के दुश्चक्र को नष्ट कराया । अज्ञान-व्यामोह की निविड़ निशा में सोती हुई सोलह हजार प्रबुद्व आत्माओं-गोपियों को उन्होंने घर-परिवार की संकीर्ण सीमाएँ लाँघ कर बाहर आने और नयी संतुलित-श्रेष्ठ, आन्तरिक संगति तथा सात्विक संगीत से परिपूरित व्यवस्था के लिए महारास रचाने की प्रेरणा दी । एक नया विश्व-दर्शन दिया, जा प्राणों में भिद जाय, जो व्यक्तित्व के अणु-अणु को आलोकित कर दे, नये सृजन के लय ताल में नाचने को विवश कर दे । आज पुनः ऐसे ही साँस्कृतिक, सामाजिक राजनैतिक, महारास की आवश्यकता है ।
नौवाँ बुद्वावतार श्रमण-संस्कृति के अभिनव उर्त्कष के लिए हुआ । बौद्ध भिक्षु की दो विशेषताएँ आवश्यक होती थी-ज्ञान और तप । तपस्वी, ज्ञानदीप्त भिक्षु परिव्राजक बन कर साँस्कृतिक नव जागरण के लिए निकल पड़ते थें । अशोक जैसे सम्पन्न, अम्बपाली जैसे आकर्षक आनन्द जैसे प्रबुद्ध व्यक्तित्वों ने इस विशाल बौद्धिक-क्राँन्ति का देश-विदेश में विस्तार प्रसार किया । जाति प्रथा पशुबलि, क्रूरता तथा मिथ्यावार के आधारों को सशक्त विचार जागरण द्वारा ढहा दिया गया । बिना खून-खराबी और उत्पीड़न के जमाने को पलटे जा सकने का अनूठा उदाहरण लोक में प्रस्थापित हुआ ।
इसी क्रम में दसवाँ अवतार है “निष्कलंक” या “कल्कि” अवतार । पिछले हजारों वर्षों की कलंक कालिमा को धौ-पोंछकर मानवता का मुख उज्जवल करना इस अवतार का उद्द्द्देश्य है । धरती पर र्स्वग के अवतरण हेतु युग-परिवर्तन का सुव्यवस्थित विश्वव्यापी भावना प्रवाह एवं विचार प्रवाह निरन्तर उर्त्कष की आरे गतिशील है । अनीति अन्याय का दृढ़तापूर्वक प्रतिकार और उत्कृष्टता का गम्भीर आचरण, आध्यात्मिकता-शुद्वता का विस्तार हर अवतार की तरह इस अवतार के भी प्रयोजन एवं कार्य है । अवाँछनीयता और अविवेक के उन्मूलन तथा विवेक, सदभावना, सत्प्रवृति के अभिवर्धन का अभिनव क्रम चल रहा है । रचना और ध्वंस के दोनों ही कार्य व्यापक जन सहयोग द्वारा होने पर ही युगीन प्रवाह का अंग बनते है ।
दसवाँ अवतार इसी विराट् जन चेतना को दिशा देगा । मनुष्य के भीतर प्रसुप्त देवत्व को जागृत कर वह प्रज्ञा-प्रवाह समस्त आसुरी तत्वों का विनाश करेगा । युगशक्ति की प्रखरता से हर प्रकार के अनाचार का अन्त होगा । बौद्विक, नैतिक और सामाजिक क्राँन्ति से जन-जन स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज की दिशा प्रेरगा एवं प्रकाश ग्रहण करेंगे । व्यक्ति परिवार एवं समाज-निर्माण के त्रिविध कार्यो का सम्पादन कर सम्पूर्ण मानव-जाति में आत्मबोध, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की अभिनव दिव्य चेतना का संचार करना ही निष्कलंक-अवतार का प्रयोजन है ! प्रजा का पाँचजन्य फूँका जा चुका है । ऋतम्भरा प्रज्ञा और युगशक्ति के रुप में ही यह नया अवतार अपना प्रयोजन पूरा करेगा ।
भगवान फूल से उसे दी हुई सुगन्ध की रंग की माँग करता है । कोकिल से कुहू-कुहू की ही अपेक्षा रखता है । वृक्ष से उसके फल की ही आशा रखता है ।
लेकिन मनुष्य के सम्बन्ध में उसकी अपेक्षा निराली है । उसकी इच्छा है कि मनुष्य दुःख में से सुख प्राप्त करें ! अन्धकार में से प्रकाश उत्पन्न करें । मरण में से अमृतत्व प्राप्त करे । आस-पास चारों ओर गन्दगी फैली है, असत् फैला है । ईश्वर चाहता है, मनुष्य इस असत् से सत् प्राप्त करें । इस विष में से सुधा का सर्जन करें । इस अमंगल में से मंगल का निर्माण करें ।
मनुष्य के साथ ही यह पक्षपात क्यों ? उसी के ऊपर यह महान उत्तरदायित्व क्यों ?
भगवान कठोर नहीं है,दुष्ट नहीं है । वे तो न्यायशील समदर्शी है । उन्होनें सारी सृष्टि में मानव को ही सबसे समग्र बनाया है । तब उससे ये अपेक्षाएँ न करें तो किससे करें ।
वस्तुतः मनुष्य के लिए तो यह गौरव की बात है कि उससे इतनी बड़ी अपेक्षाएँ की गई है । किसी वीर से छोटे-छोटे कीड़े मारने को कहना उसका अपमान करना है । उसी प्रकार क्षुद्र कार्यों या उपलब्धियों की ही मनुष्य से भी अपेक्षा की जाये, यह उसकी शक्ति का अपमान होगा ।
भगवान को आशा है कि मेरा लाड़ला बेटा मनुष्य सब कुछ कर सकेगा, जो उससे अपेक्षित है ।
आधुनिक सभ्यता की कृपा से जो मनोरोग बड़ी तेजी से उभरे और फैले है, उनमें निद्राचार एक है । इस रोग का मरीज रात में सोते हुए ही उठ कर चलने-फिरने लगता है । कई बार उसी स्थिति में कुछ काम भी करने लगता है और फिर वापस अपनी जगह आ कर सो जाता है । इसे एक प्रकार का अपस्मार कहा जा सकता है, जिसका सोते समय दौरा पड़ता है ।
हिस्टीरिया का रोगी दौरा पड़ने पर मानसिक दृष्टि से संज्ञा शून्य हो जाता है, भले ही उसकी शारीरिक क्रियाएँ चलती रहें । मिरगी की बीमारी में दौरा पड़ने पर रोगी बेहोश होकर गिर पड़ता है, उसके दाँत भिच जाते है, मुँह से झाग निकलने लगते है । कुछ प्रकार के अपस्मारों में न तो हिस्टीरिया के रोगी की तरह मन संज्ञा शून्य हुआ लगता है ओर न ही मृगी के समान बेहोशी आती है बल्कि रोगी दौरा पड़ने पर उसके पहले जो काम कर रहे होते है, उसी काम को तब तक कि होश में नहीं आ जाते । ऐसे रोगी यदि दौरा पड़ने से पहले चल रहे होते है तो उसी दिशा में उसी गति से चलते रहेंगें, जिस गति से कि चल रहे थे । ठीक उसी तरह जैसे चाबी से चलने वाले खिलौने चाबी भरी रहने तक चलते रहते है उसी प्रकार वे भी खिलौनों की भाँति चलते रहते है । हाथ से यदि पेंसिल छील रहे थे तो दौरा समाप्त होने तक पेंसिल का वही हिस्सा छीलते रहेंगं, जिसे वह छील रहे थे । यह भी एक प्रकार का अपस्मार है । इसमें मनुष्य स्वयं तो बोध शून्य हो जाता है, पर उसके शरीर की अमुक गतिविधियाँ यथाक्रम चलते रहने से वे लोग देखने वालों को साधारण स्थिति में ही काम कर रहे प्रतीत होते है इसी स्थिति का बढ़ा हुआ रुप निद्राचार है ।
निद्राचार से ग्रस्त व्यक्तियों में सोते-सोते चारपाई से उठकर चल देना और किसी अभ्यस्त क्रम से अभ्यस्त दिशा में पैरों का उठते जाना और होश आने पर अपने आपको अचानक विचित्र स्थिति में पाना या वापस लौट कर बिस्तर पर सो जाना आदि कोई लक्षण पाये जाते है । यह रोग कई व्यक्तियों में देखने में आता है । बचपन में प्रायः यह शिकायत अधिक रहती है । उम्र बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य का सचेतन भाग जागृत होने लगता है ओर अचेतन को इन गड़-बड़ियों से रोक देती है । प्रायः बचपन में होने वाली इस प्रकार की शिकायतें बदली उम्र के साथ समाप्त हो जाती है फिर भी बहुत से व्यक्ति ऐसे होते है, जिनके बचपन में यह लक्षण दिखाई देते हों अथवा नहीं, बड़े होने पर किन्हीं कारणों से यह रोग आ धमकता है ।
कई बार तो निद्राचार में रोगी की बड़ी विचित्र स्थिति हुई देखी जाती है जो देखने में ही नहीं, कहने सुननु में भी अजीव लगती है । रोगी कोई काम भले चंगों की तरह कर रहा होता है, पूरी समझदारी के साथ अपने काम के विभिन्न चरणों को निबटाता है । किसी को सन्देह भी नहीं होता कि यह सब वह अपने सचेतन की मूलसत्ता को प्रसुप्त स्थिति में छोड़ कर उसके काम-चलाऊ उदार अंश से ही अपना क्रिया व्यापार चला रहा होता है । इस सबके साथ एक विलक्षणता और जुड़ी हुई रहती है कि जब दौरा समाप्त होता है तो वह अपनी पूर्व स्थिति में वापस लौट आता है और जिस स्थिति में दौरा आरम्भ हुआ था ठीक उसी स्थिति में जा पहुँचता है । फलतः रोगी को उस घटना-क्रम का तनिक भी स्मरण नहीं रहता जो उसने घन्टों तक पूरे समझदार आदमी की तरह सम्पन्न किया था ।
इस तरह के सैकड़ों निद्राचार रोगियों का उपचार करने वाले फ्राँस के प्रसिद्ध मनोरोग चिकित्सक डाक्टर जैने ने अपने इलाज में आये अनेक रोगियों का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया है । सौमनेवूलिज्म (निद्राचार) पुस्तक में प्रकाशित यह विवरण कितने रोचक है । इसमें एक बीस वर्ष की युवती आईरीन का विवरण प्रकाशित हुआ है । उस पर घन्टों तक निद्रभ्रमण का दौरा रहता था । इस रोग का आरम्भ उसे अपनी माँ की मृत्यु के साथ आरम्भ हुआ और मुद्दतों तक चलता रहा । वह निद्राचार ग्रस्त स्थिति में घन्टों बनी रहती और अपनी माँ की मृत्यु का घटना-क्रम उस समय किया गया षोक विलाप आदि क्रियाएँ एक नाटक की रतह दुहराती रहती थी । पूरा नाटक सम्पन्न कर लेने के बाद कुछ घन्टों में जब दौरा समाप्त होता तो वह वापस विस्तर पर आ जाती । जब वह दौरे की स्थिति में रहती थी तो ने केवल माँ की मृत्यु के समय सम्पन्न की गई क्रियाओं को यथावत् दोहराती वरन् यहाँ तक कि वह कब्रिस्तान तक जाती और अपनी माँ की कब्र के पास खड़ी रहकर कुछ समय तक प्रार्थना करती रहती । यह सब करने के बाद जब वह वापस आ कर सो जाती और सुबह उठती थी तो उसे इन बातों के बारे में कुछ भी याद नहीं रहता था ।
‘सौमनेवूलिज्म’ (निद्राचार) से ग्रस्त एक डाक्टर का विवरण अतीव भयानक एवं विचित्र है । गहरी नींद में उठ कर उसने लन्दन में ऐसे अपराध किये जिनकी मिसाल अब तक दुनिया भर के पुलिस रिकार्डों में कहीं भी नहीं मिलती है । इस रोग के सम्बन्ध में कहा जाता है कि मरीज पर सौमनेवूलिज्म का दौरा तब पड़ता है जब रोगी का अचेतन उभर कर सचेतन मस्तिष्क को पूरी तरह अपने नियन्त्रण में ले लेता है । ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि मन्त्रों के द्वारा वश में किये गये भूत । इस अवस्था में अचेतन मस्तिष्क में दबी हुई प्रवृतियाँ उभरती है और वह सचेतन के एक भाग पर कब्जा करके उनसे मनचाहा काम करा लेती है । जब तक उसमें दबी हुई उभरी प्रवृतियाँ तृप्त नहीं हो जाती है तो वह शरीर को लाकर उसी चारपाई पर पटक देता है जहाँ से उसे उठाया था ।
उक्त डाक्टर नींद में उठकर इस तरह अपराध करता था कि जागने के बाद उसे अपने किये कुकर्मों की नीदं में देखे गये स्वप्नों जैसी धुँधली स्मृति भी नहीं रहती थी । इतना गहन विस्मरण भी अचेतन का ही अभिशाप था । यह घटना सन् 1888 की है । इन दिनों सारे लंदन में बुरी तरह आतंक छाया हुआ था । एक हत्यारा पुलिस थाने के-इर्द-गिर्द ही नृशंस हत्याएँ करने में संलग्न था । अस्पतालों में मुर्दों की जिस तरह चीर-फाड़ की जाती है, लगभग उसी तरह यह हत्यारा अपने शिकार की कतर-व्योंत करके रख देता था । यह हत्याएँ धन के लालच से जरा भी नहीं की जाती थी क्योंकि मारे गये लोगों के शवों के साथ उनकी कीमती वस्तुएँ तथा नकदी यथावत् मिलती थी ।
इन हत्याओं की संख्या दर्जनों को पार करके सौ का अंक छूने लगी थी । कहना नहीं होगा कि इस सर्न्दभ में पुलिस को बुरी तरह लज्जित होना पड़ रहा था कि वह इन हत्याओं को रोक पाने ओर अपराधी को खोजने में जरा भी सफल नहीं हो पा रही थी । य़़द्यपि पुलिस के जासूसी विभाग ने जी तोड़ कोशिश की थी और सन्देह में कितने ही लोगों को पकड़ लिया था, पर वास्वविक हत्यारे का कुछ सुराग मिल ही नहीं रहा था । अखबारों ने हत्यारे को ‘जैक द रिपर’ के कल्पित नाम से उल्लेखित करना आरम्भ कर दिया था ।
इस आतंक को मिटाने और हत्यारे का पता लगाने में एक साधारण व्यक्ति की अतीन्द्रिय शक्ति ने जो भूमिका निबाही उससे यह प्रसंग और भी अद्भूत बन गया । इंग्लैण्ड के एक सामान्य नागरिक जेम्स लीज ने ऐसे ही पडे़-पडे़ सपना देखा कि, ‘एक तगड़ा व्यक्ति एक युवती का पीछा करते हुए गली में मुड़ा और जैसे ही एकान्त पाया, उस व्यक्ति ने चीते की तरह लड़की पर आक्रमण कर दिया । चाकू से पहले उसने लड़की का गला काटा, फिर उसका पेट चीरा, छाती और हाथ-पैरों को कतरने के बाद वह खून से सने हाथ लाश से पोंछ कर चलता बना ।” यह स्वप्न देखकर लीज बुरी तरह डर गया और उसकी रिपोर्ट लिखाने के लिए पुलिस दफ्तर पहुँचा । पुलिस वालों ने उसकी रिपोर्ट तो लिख ली, पर उसे सनकी कह कर भाग दिया ।
एक दिन लीज अपनी पत्नी के साथ् ट्राम में कही जा रहा था । अपने पास बैठे हुए एक व्यक्ति को देखकर वह चौका कि शायद इसे कही देखा है । याद करने पर उसे स्मरण आया कि यह वही व्यक्ति है, जिसे वह सपने में देखता रहा है । उसने सोचा कि यही वह कुख्यात हत्यारा है, जिसका आतंक मचा हुआ है और उसी को वह स्वप्न में एक बार देख चुका है । अपनी पत्नी को घर जाने के लिए कह कर लीज उस व्यक्ति के पीछे हो लिया । रास्ते में ड्यूटी पर खड़े सिपाही से उसने अपने सपने के आधार पर पहचाने हत्यारे को पकड़ने के लिए कहा, पर उसने भी लीज को मा़त्र सनकी समझा और उसे टाल दिया ।
उसी रात लीज ने फिर सपने में हत्यारे को देखा । अपना यह स्वप्न सुनाने के लिए लीज फिर पुलिस दफ्तर पहुँचा और बताया कि हत्यारा लाश के कान काट कर ले जा रहा था । कान काटने की बात सुनकर पुलिस अफसर चौंक उठा क्योंकि उसी दिन हत्यारे ने पार्सल द्वारा कटे हुए कान भेजे थे तथा पुलिस को चुनौती दी की वह उसे पकड़ कर दिखाये । अस्तु, पुँलिस अधिकारी को लीज की बात में सार मालूम हुआ और उसने लीज की सहायता स्वीकार कर ली ।
लीज पुलिस अधिकारी को लेकर सपने में देखे व्यक्ति को खोजता हुआ एक शानदार कोठी के सामने जा खड़ा हुआ और बोला, हत्यारा इसी के अन्दर है । यह कोठी एक सुप्रसिद्ध और प्रतिष्ठित डाक्टर की थी । पुलिस अधिकारी को संकोच हो रहा था कि ऐसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहाँ कैसे प्रवेश करें तो भी वे लोग अन्दर गये । डाक्टर से पूछताछ की तो उसने हत्याओं के सम्बन्ध में अपने को सर्वथा अनजान बताया । डाक्टर की स़्त्री से पूछताछ की गई तो उसने इतना भर बताया कि वे कभी-कभी अपने को सर्वथा भूल जाते है ओर उठकर कहीं चल देते है । लौट कर आये है तो पूछने पर बताते है कि पता नहीं मै कहाँ भटक जाता हूँ । डाक्टर को कोठी में तलाशी ली गई तो एक अलमारी में खून से सने ढेंरों कपड़े पाये गये और भी कोई प्रमाण मिले मसलन वह चाकू जिससे हत्या की जाती थी ओर लाश को कार्ट छाँट दिया था । कहने का अर्थ यह कि विभिन्न प्रमाणों के आधार पर डाक्टर अपराधी सिद्ध हुआ ।
आखिर वह ऐसा क्यों करता था ? इसकी खोजवीन और विश्लेषण करने पर पता चला कि वह किसी ऐसे मानसिक रोग से ग्रस्त है जिसके कारण वह आप से बाहर हो जाता था और किसी विशेष मनोदशा में पहुँच जाता था तथा घर से बाहर जाकर यह कुकृत्य बड़ी कुशलतापूर्वक कर डालता था । घर लौटने पर उसे इतना ही याद रहता था कि उसने कुछ किया है और ऐसा कुछ किया है जो बुरा है । घर से निकलने से लेकर वापस आ कर खून से सने कपड़े यथास्थान रखने तक उसकी ऐसी ही स्थिति बनी रहती । यहाँ तक कि वह एक बड़ा ऊनी ओवरकोट इसी काम के लिए ले जाता था कि हत्या से पहले उसे उतार कर रख दे और खून के दाग वाले कपड़ों के ऊपर उसे पहन कर किसी को सन्देह करने का अवसर दिये बिना ही घर वापिस आ सके । मुकदमें के अन्त में जब डाक्टर ने जाना कि सचमुच उसने इतनी हत्याएँ की है तो वह रो पड़ा, उसने अदालत से आग्राहपूर्वक कहा, “मुभे जल्दी ही मौत की सजा दीजिए । मैं ऐसा नरपिशाच रहा हूँ, यह जानने के बाद अब मेरे लिए इस दुनिया में जी सकना कठिन है ।”
दार्शनिक एव किंसन ने लोगों से पूछा है, “बताओ तो, हम जीवन भर लम्बी यात्रा पर चलते रहते है, पर अन्त एक तनिक भी आगे नहीं बढ़ पाते जहाँ के तहाँ बने रहते है । ऐसा क्या सपने की स्थिति के अतिरिक्त और किसी प्रकार हो सकता है । हम क्या है ? जीवन क्या है ? जीवन का प्रयोजन क्या है ? जो कुछ हम कर रहे है वह उचित है या अनुचित ? आदि कई प्रश्न है जिनका समाधान खोजे बिना ही लोग उसी प्रवाह में बहकर खो.ही खो जाते है जिसे कि बेसुधी कहा जा सकता है । स्पष्ट ही इसका कारण आत्मविस्मृति है । इस महाव्याधि ने आम आदमी को निद्राचारग्रस्त व्यक्ति की सी स्थिति में पहुँचा दिया है, जिसे इस बात का होश नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है । यही प्रश्न यदि सामान्य व्यक्तियों से किया जाय तो सम्भवतः सार्थक उत्तर शायद ही किसी से देते बने ।
महानगरी बम्बई की पटरियों पर एक अन्धा भिखारी गीत गा-गा कर भीख माँग रहा था । उसका कण्ठ बहुत मधुर था । हजारों लोग रोज भीख माँगते है, जिसको किस पर ध्यान देने का अवकाश रहता है सो उस पर ही कौन ध्यान देता । बरहाल इतना जरुर था कि लोग उसके मधुर कण्ठ से आकर्षित होकर थोड़ा ठिठक जाते थे । वह जो कुछ गा रहा था, उन पंक्तियों में उसकी नेत्रहीनता के साथ-साथ दया की याचना से द्रवित होकर कोई कोई रुकता और दो-तीन पैसे उसके सामने रखे बर्तन में डाल जाता था।
जिस स्थान पर बैठा वह अन्धा भिखारी भीख माँग रहा था उसी स्थान पर एक कार रुकी, कार में बैठे थे विश्व प्रसिद्ध संगीतकार सिगप्रिड जान्सन जो स्वंय भी अन्धे थे । उन्होंने ड्राइवर से कहा, देखो क्या माजरा है ? कौन इतने मधुर कंठ से क्या गा रहा है ?”
ड्रायवर कार से उतरा ओर देखकर आया तो उसने सारी बात बताई । जोन्सन ने पूछा, ‘क्या इस देश में अन्धे व्यक्तियों को भीख माँग कर गुजारा करना पड़ता है ?”
‘लगता तो ऐसा ही है, मान्यवर !’ ड्रायवर ने कहा, और गाड़ी स्टार्ट कर दी । गाड़ी अपने स्थान से आगे बढ़ी और तेज गति से बम्बई की सड़कों पर दौड़ने लगी । उससे भी तेज गति के साथ दौड़ रहा था जोन्सन का मस्तिष्क । वे सोच रहे थे कि क्या यह मनुष्य समाज की गरिमा के अनुरुप है कि अपंग, अन्धे और शरीर से लाचार व्यक्ति अपने ही भाइयों की दया पर आश्रित रहगें । गर्हित है वह समाज जो अपने अपंग, असमर्थ सदस्यों के लिए सम्मानित जीवन की कोई व्यवस्था न कर सके और पराजित है वह व्यक्ति जिसमें शारीरिक असमर्थता के प्रति अपनी महान बिराट् आत्मा के प्रति विश्वास हट गया है ।
अन्धे, अपंगों के प्रति लोगों के मन में दया का नहीं सहानुभूति और सहयोग का भाव उत्पन्न हो, इसके लिए सिगप्रिड जोन्सन ने कुछ करने का निश्चय किया । वे स्वंय भी जन्म से अन्धे थे, पर जिस परिवेश में रहने का उन्हें अवसर मिला था, उसने उनके हृदय में इतमना विश्वास उत्पन्न कर दिया था कि वे आत्म-निर्भर हो कर सम्मान के साथ जीवन निर्वाह कर सके । जोन्सन का कण्ठ सुरीला तो था किसी ने उन्हें संगीत सीखने की प्रेरणा दी । साधना ने उनके कण्ठ को और भी सुरीला बना दिया । उनकी संगीत प्रतिभा निखरी और उन्होंने अपने मूल देश में जहाँ-तहाँ संगीत कार्यक्रम आयोजित किये ।
उनकी ख्याति देश काल की सीमाओं को लाँघकर विश्व भर में फैल गई और वे अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न प्राप्त होते थे । इन्हीं यात्रा कार्यक्रमों के अर्न्तगत एक बार वे भारत आये ओर भारत में जब उन्होंनें देखा कि यहाँ अन्धों की स्थिति अन्य दूसरे अपंगों से भी बुरी है तो उनकी आत्मा द्रवित हो उठी । उन्होने निश्चय किया कि वे भारत में एक ऐसा आश्रम स्थापित करेंगें जिसमें रह कर अन्धे व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें ।
अपने स्वप्न को साकार करने के लिए उन्होंने संगीत कार्यक्रमों की एक देशव्यपी श्रृंग्ला बनाई और अपनी स्वर माधुरी से जन मन को विनादित किया । उनके संगीत कार्यक्रमों में श्रोता टूट पड़ते थें । उससे होने वाली सम्पूर्ण आय को उन्होने अन्धाश्रम की व्यवस्था के लिए सुरक्षित रखा तथा दक्षिण भारत के ऐलम जिले में तिरुपड़ गाँव में एक विशाल आश्रम की योजना को मूर्तरुप देते रहे । उन्होंने आश्रम को करीब डेढ़ लाख रुपया अपनी ओर से दिया । आज आश्रम में सैकड़ों व्यक्ति शिक्षा प्राप्त कर अपने लिए सम्मानित जीविका कमा रहे है ।
सन् 1656 में आस्ट्रोलिया के एक पैंसठ वर्षीय उद्यागपात फ्रैंक व्यूरे पेयर का हृदयगति अवरुद्व हो जाने से देहान्त हो गया । यों रोज कितने ही व्यक्ति कितनी ही बीमारियों से मरते है । गरीब भी और अमीर भी, मजदूर भी और उद्योगपति । थोड़े बहुत दिनों तक लोग शोक मनाते है औपचारिकता निभाते है और फिर सब कुछ पूर्ववत चलने लगता है । किन्तु फ्रेंक व्यूरे पेपर का निधन हुआ तो उसके कारखाने में काम करने वाले चार हजार व्यक्ति ऐसे विलख उठे जैसे वे अनाथ हो गये हो । उसका कारण था फ्रेंक ने अपने कारखाने के श्रमिको और कर्मचारियों का इस प्रकार ध्यान रखा था, जैसे कोई स्नेही, वत्सल हृदय अभिभावक । वह अपने पीछे 1861 में हुआ था । निम्न वर्ग की स्थिति वाले परिवारों को जिन आर्थिक विपन्नताओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है , वही परिस्थितियाँ व्यरें पेयर परिवार के साथ भी रहीं और माता-पिता अपने बच्चे के लिए आवश्यक दूध तथा पौष्टिक आहार की व्यवस्था तक न कर सके । परिणाम स्वरुप फ्रेंक का स्वास्थ्य प्रारम्भ से ही कमजोर रहने लगा । प्रायः वह बीमार रहता और अपने माता-पिता के लिए इस तरह की आपदा के कारण उपस्थित करता रहता कि पता नहीं कब उनका लाड़ला चल बसे । गरीब है तो क्या हुआ ? अपने बच्चों से सभी को प्रेम और ममत्व रहता है ।
पाँच छह वर्ष की उम्र में ही फ्रेंक बुरी तरह बीमार पड़ा । उसे गठिया का बुखार हो गया था, दिन रात बुखार के पात से जलता और हाथ-पैरों में दर्द की शिकायत करता । माता-पिता के पास इतने साधन तो थे नहीं कि उपचार की कोई व्यवस्था कर पाते । अपनी कोई पूछ न होते देखकर बीमारी ने भी फ्रेंक को जल्दी ही मुक्त कर दिया । किन्तु जिस प्रकार भिक्षा न मिलने या अपमानित होने पर अघोरी सन्यासी दरबाजे पर चिमटा पटक कर चला जाता है; उसी प्रकार फ्रेंक के स्वास्थ्य पर भी बीमारी अपने चिन्ह छोड़ गई । बीमारी ने उसके हृदय को प्रभावित किया, वह कमजोर हो गया तथा उसमें विकार आ गया ।
इस विकार का पता कुछ वर्षा बाद चला जब फ्रेंक को हृदय रोग ने आ घेरा । स्थानीय डाक्टरों ने रोग को असाध्य बताया और कहा कि यह कुछ ही दिनों का मेहमान है । न जाने किस मिट्टी का बना हुआ था फ्रेंक । उसका रोग जो असाध्य बताया गया था, अपने आप शामिल होने लगा । उस समय वह बारह-तेरह साल का तो था ही । किस तरह रोग पर काबू पा लिया इस सम्बन्ध में वह कहा करते थें, मेरे मन में यह आकाँक्षा अदम्य रुप से उठती रहती थी कि मुभे जीवित रहना है, स्वस्थ होना है और स्वस्थ होकर दुनिया में कुछ कर दिखाना है । इस जिजी विषा का ही प्रताप कहा जाना चाहिए कि फ्रेंक ने बीमारी को परास्त कर दिया ।
सामान्य रुप से स्वस्थ हो जाने के बाद फ्रेंक ने अपने मन से इस विचार को उखाड़ फ्रेंका कि वह किसी असाध्य रोग से पीड़ित है । वह अन्य किशोरों की भाँति पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने में व्यस्त हो गया । कुछ दिनों बाद गाँव में एक तैराकी प्रतियोगिता हुई । फ्रेंक भी अपने साथियों के साथ तैराकी के करतब देखने के लिए तरणताल पर पहुँचा । प्रतियोगियों को उनके प्रशंसकों ने सम्मानित किया और विजयी होने के लिए शुभ कामनाएँ दीं । प्रतियोगिता के बाद विजेताओं को सम्मानित किया उससे वह असाधारण रुप से प्रभावित हुआ ।
फ्रेंक विचार करने लगा कि लोंगों का स्नेह और सम्मान अर्जित करने के लिए मुभे भी तैराक बनना चाहिए । यह विचार संकल्प बना और वह तैराफी का अभ्यास करने लगा । अब उसके सारे खेल बन्द होगए । महत्वाकाँक्षाएँ जैसे एक तैराकी के विभिन्न पेंतरे आजमाने का अभ्यास करने लगा । कुछ ही वर्षां में उसने आस्ट्रेलिया की चैम्पियन शिप हथिया लो । इसके बाद वह ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में भी तैराकी का प्रतियोगी बना ।
तैराकी के क्षेत्र में इतनी ऊँची सफलता प्राप्त करने के बाद दुर्देव ने अपना दाव फिर चलाया और बचपन में ही उसके शरीर में घुस बैठा हृदय रोग फिर उभरा । लेकिन फ्रेंक ने भी जैसे अपने संकप और जीवन्तता से दुर्दैव को परास्त करने की कसम खा रखी थी । कुछ दिनों बाद वह फिर स्वस्थ हो गया । चिकित्सकों के लिए यह आर्श्चय का विषय था कि फ्रेंक का हृदय इतना रुग्ण है, फिर भी वह स्वस्थ कैसे है ? सामान्य स्थिति में ही उस रोग के रहने पर कोई व्यक्ति अपना सामान्य काम-काज नहीं कर पाता फिर फ्रेंक तो उस रोग के उभार की स्थिति में भी बचा हुआ था । इतना जरुर हुआ कि उसका तैरना छूट गया । तैरना भले ही छूट गया हो पर तैराकों से उसका लगाव नहीं छूटा । वह तैराकी का प्रशिक्षक बन गया और नौसिखियों को तैराकी सिखाने लगा ।
सन् 1622 की घटना है । तब फ्रेंक ब्यूरे पेयर की आयु 32 वर्ष की थी । तैरना छोड़े उन्हें कई वर्ष हो चुके थे । समुद्र में वे अपने शिष्यों को तैराकी का अभ्यास करा रहे थे, तभी तक तैराक पर शार्क मछली ने आक्रमण कर दिया । नौसिखिया तैराक घायल हो गया और लगाकि उसमें किनारे पर वापस पहुँचने की सामर्थ्य नहीं है । फ्रेंक ने तत्क्षण तैराकी से अपना सम्बन्ध वापस जोड़ लिया और आव-देखा न ताव, अपने सहायक के साथ तुरन्त समुद्र में कूद पड़े । जब वे घायल प्रशिक्षार्थी को समुद्र में से निकालकर किनारे पर ला रहे थे, तभी उन लोगों पर दूसरी शार्क मछली ने हमला कर दिया । बड़ी मुश्किल से फ्रेंक तथा उनके साथी सहायक मछली से बचते-बचाते किनारे आ सके ।
इस घटना का विवरण समाचार पत्रों में छपा ओर विवरण में ही फ्रेंक के रुग्ण अतीत तथा डाक्टरों की चेतावनी के बारे में भी प्रकाशित हुआ । रोगी और कमजोर होते हुए भी फ्रेंक ने समचुच अद्भुत वीरता का परिचय दिया । उन्हें और उनके साथियों को आस्टे्रलिया सरकार ने पदक तथा पुरस्कार दिया । उनकी बहादुरी और साहस की लोग लम्बे समय तक प्रशंसाएँ करते रहे ।
अन्य लोगों ने उस पुरस्कार राशि का क्या किया ? यह तो नहीं मालूम परन्तु फ्रेंक ने उससे अपना कारोबार आरम्भ किया । पुरस्कार में मिली रकम से उन्होंने टायरों की मरम्मत का कार्य आरम्भ किया । इस काम का आरम्भ छोटे रुप में ही किया गया था, परन्तु इसके विकास के लिए फ्रेंक दिन-रात लगे रहते थें । अपने काम में परिश्रम और मनोयोगपूर्वक लगे रहने तथा ग्राहकों को यथासम्भव सन्तुष्ट रखने की नीति का ही परिणाम था कि उनका करोबार चल निकला और अगले बारह वर्षां में काफी धन कमा लिया ।
अब जो पूँजी एकत्रित हुई थी, उस धन से फ्रेंक ने सन् 1634 में टायर बनाने का एक छोटा-सा कारखाना खोल दिया । परिश्रम, प्रामाणिकता और ईमानदारी की दूरदर्शीं नीति ने उनके कारखाने का भी विकास किया और वे धीरे-धीरे प्रगति की मंज्जिले तय करते गए । कुल बाईस वर्षां में उन्होंने इतनी प्रगति की कि जब उनका देहान्त हुआ तो उनके पास बीस करोड़ रुपये से भी अधिक की सम्पत्ति थी ।
फ्रेंक एक सफल और आदर्श व्यवसायी तो थे ही हृदया से वे दूसरों के प्रति सम्वेदनशीली भी थे । दूसरों के दुख दर्द को वे जानते थे । उन्हें मालूम था कि गरीबी किसे कहते है ? उन्हें इस बात का भी अनुभव था कि कोई व्यक्ति अपने प्रति किस प्रकार का व्यवहार किये जाने की अपेक्षा करता है ? व्यक्ति किसी भी स्तर का हो, गरीब या अमीर, छोटा या बड़ा, प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अपने प्रति सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा रखता है । फ्रेंक इस बात को खूब अच्छी तरह जानते थे और उनके व्यक्तित्व में उदारता तथा व्यवहार कुशलता का अद्भुत समन्वय हो गया था ।
इन गुणों के आधार पर ही उन्होंने न केवल अपने सहयोगियों, कारखाने के कर्मचारियों का हृदय जीता बरन जनसाधारण के मन मस्तिष्क में भी अपना स्थान बनाया । उनके चरित्र की इन विशेषताओं का ही परिणाम था कि साधारण व्यक्ति से लेकर विशिष्ट व्यक्ति तक हर कोई उनका सम्मान करता था । न केवल सम्मान बल्कि वे अपने सर्म्पक में आने वाले व्यक्तियों का विश्वास भी अर्जित कर लेते थे । यही कारण था कि सन् 1640 में उनसे आस्टें्रलिया के दूसरे बड़े महानगर मेलबोर्न का महापौर बनने का आग्रह किया गया और उन्होंने जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए इस आग्रह को स्वीकार भी किया । इस पद पर रहते हुए उन्होंने मेलबोर्न वासियों की इतनी कुशल सेवा की कि उन्हें सन् 1642 में ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया गया ।
सम्पन्नता जैसे-जैसे बढ़ती गई, वैसे-वैसे फ्रेंक ब्यूरे-पेयर का हृदय और अधिक उदार होता गया । उन्होंने कई शिक्षण संस्थाएँ ,खुलबाई’ अनेकों अस्पताल बनाये, कर्मचारियों के लिए राहत कोष की स्थापना की जिससे विपत्ति के मारे लोगों की कठिन समय में सहायता की जाती थी । पैंसठ वर्ष की आयु में, सन्् 1643 में उनका हृदय रोग फिर उभरा । इस बार तो सभी चिकित्या सुविधाएँ उपलब्ध थी, परन्तु फ्रेंक, जैसे अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर चुके थे, दुर्दैव को पराजित करने का । इस काम को सफलतापूर्वक पूरा कर चुकने के बाद उन्होंने मृत्यु के सामने समर्पण कर दिया । उनके उपचार का प्रबन्ध किया जाने लगा तो वे बोले, मुभे जीवन से तृप्ति हो गई है । अब कोई इच्छा नहीं है । मेरे उपचार में लगने वाला पैसा उनके काम में लगा देना जिन्हें उपचार की आवश्यकता है ।
फिर भी उपचार तो चला ही किन्तु फ्रेंक ने शीघ्र ही नश्वर काया छोड़ दी । उन्होंने 20 करोड़ की सम्पति का एक बड़ा भाग जन-कल्याण के लिए दान में दे दिया था और शेष को अपने श्रमिक परिजनों के लिए छोड़ दिया । ऐसे मनस्वी, पुरुषार्थी और उदार स्वामी के लिए मजदूरों का बिलख उठना स्वाभाविक है।
केरल से प्रसिद्ध कलाकार कृष्णन के पड़ौस में एक मुसलमान के घर आग लगी । दो छोटे बालक प्रचण्ड आग में घिर गयें । माता-पिता बचाने की पुकार लगाते हुए खड़े चीत्कार कर रहे थें । कृष्णन आग में कूदे और बच्चा को सुरक्षित वापस निकाल लाये । पर वे इतने झुलस गये कि अस्पताल में जाकर चल बसे ।
कृष्णन के पीछे उनकी विघवा पत्नी, माँ, दो बच्चे थे । गुजारे का कोई सहारा न रहा । इस परमार्थी कलाकार के परिवार की सहायता के लिए कालीक्ट के समाचार पत्र मातृ-भूमि ने सार्वजनिक सहायता की अपील छायी । तदनुसार बीस हजार रुपये इकट्ठे हो गये ।
मातृभूमि के संचालक इस धन को लेकर कृष्णन की विधवा के पास गयें । तो उसने वह धन उस पड़ौसी मुसलमान का जला हुआ घर बनाने तथा आजीविका के साधन जुटाने के लिए दिला दिया। और स्वंय मेहनत मजदूरी करके अपना परिवार पालने लगी ।
सन् 1628 का अक्टूबर मास था । प्रथम महायुद्व समाप्त हो चुका था । इस युद्व में लाखें लोग मारे गये थे और हजारों का पता नहीं था कि वे कहाँ है ? इन्हीं दिनों मसजरेंक (पोबैंड) के उच्चाधिकारियों के पास एक लड़ी मैरिना आया करती थी और वह आग्रह करती थी कि वे उसके ब्वायफ्रेंड का पता लगायें जो महायुद्व में एक सैनिक की हैसियत से शामिल हुआ था और जिसके बारे में पता नहीं था कि वह जीवित है या मारा गया । अधिकारी उसके बार-बार आने और अपने ब्वायफ्रेंड़ का पता लगाने के आग्रह को सुन-सुनकर तंग आ चुके थे । वे उलटे उसी से प्रश्न करते थे कि बताओ बेबी ! तुम्हीं बताओं । हम उसे कहाँ ढूँढें़ ?
इसके उत्तर में मैरिना एक स्वप्न का हाल सुनाती जो प्रायः व देखा करती थी । अक्टूबर 1618 में जब वह अगली बार उच्चाधिकारियों से आग्रह करने के लिए गई थी, उसी रात उसने सपना देखा कि उसका साथी एक अन्धेरी सुरंग में रास्ता ढूँढ़ रहा है घेर अन्धकार है । अन्धकार में रास्ता टटोलने के लिए उसके साथी ने मोमबत्ती जलाई और उसके बाद चारों ओर बिखरे पड़े मलवे को हटाने की कोशिश की । मलवा हटाते-हटाते वह थक गया । उसकी शक्ति जवाब दे गई । हार कर घुटनों के बल झुक गया और सिसकने लगा ।
मैरिना यह स्वप्न कई बार देख चुकी थी । इस स्वप्न का प्रत्येक दृश्य चल चित्र के दृश्यों की भाँति उसे दिखाई देता । एक भी दृश्य में कहीं भी कोई भी परिवर्तन नहीं आता था । कुछ समय उपरान्त उसके स्वप्न में थोड़ा-सा परिवर्तन आया । अब वह देखती थी कि एक पहाड़ी है, उस पहाड़ी की चोटी के पास एक दुर्ग है । उस दुर्ग का बुर्ज टूटा हुआ है वह टूटे हुए बुर्ज के मलवे तक पहुँचती है । वहाँ जा कर वह खड़ी होती है तो मलवे में से उसे अपने खोये हुए मित्र स्टानी स्लोनिस की जानी-पहचानी आवाज सुनाई देती है जो मदद के लिए पुकार रहा है । यह आवाज उन पत्थरों के नीचे से आ रही थी, मैरिना ने मलवा हटाने की कोशिश की पर मलवा था कि खत्म ही नहीं होता था । मलवा हटाते-हटाते वह बुरी तरह थक जाती है ओर निराश होकर हाँपती हुई वापस लौटती है । इसी निराशा और हताशा के क्षणों में उसकी नींद टूट जाती है ।
यही सपना वह बार-बार देखती है । वह परेशान हो गई । अन्त में उसने अपने इस स्वप्न से अपनी माँ को अवगत कराया और माँ ने इसके बारे में नगर के एक वृद्व व्यक्ति को जो उसके परिवार का मित्र भी बताया । उस व्यक्ति को मैरिना के स्वप्न पर विश्वास नहीं हुआ । मैरिना ने अन्य लोगों से भी इस सम्बन्ध में सहायता प्राप्त करना चाहा परन्तु उसे निराशा ही हाथ लगी । हार कर मैरिना ने स्वयं उस स्थान को ढूँढ़ने और स्टानी की मदद करने के निश्चय किया । वह अकेली ही उस स्थान की ओर निकल पड़ी, यद्यपि उस स्थान को ढूँढ़ लेने ओर स्टानी की सहायता करने की सम्भावना बहुत कम थी फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी । वह दिन भर चलती और रात को सड़क के किनारे ही सो जाती ।
कई हफ्तों की यात्रा और भटकन के बाद अन्ततः मैरिना ने वह दुर्ग खोज ही लिया, जिसे वह स्वप्न में देखा करती थी । आस-पास की बस्तियों में रहने वाले कुछ नागरिकों को उसने अपनी मदद के लिए राजी कर लिया । दो दिन तक निरन्तर मलवा हटाने का काम चला । तीसरे दिन जमीन में भीतर घुसने का रास्ता मिल गया । मैरिना गाँव वालों के साथ सुरंग के मुँह पर रखा पत्थर हटा ही रही थी कि उसने तथा साथ काम करने वाले लोगों ने सुरंग के उस पार से किसी मनुष्य की आवाज सुनी । मैरिना इस आवाज को सुनते ही पहचान गई कि यह आवाज किसकी है ? आवाज सुनकर वह मारे खुशी के चीख-सी उठी । उसने अपने हाथों से चट्टान तोड़ी । अन्य लोंगों ने सुरंग में सूराख को इतना बड़ा किया कि उसमें से आदमी भली-भाँति भीतर प्रवेश कर सके । मैरिना ओर गाँव वालों न स्टानी सलोनिस को उस सुरंग से बाहर निकाल लिया । उसका चेहरा पीला और सख्त था । इतना लम्बा समय उसने अपने पास इकट्ठे रखे हुए पनीर और शराब पर बिताया था । प्रकाश के लिए उसके पास जो मोमबत्तियाँ थी, उन्हीं का उपयोग किया था ।
मैरिना ने कई दिनों तक लगातार जो स्वप्न देखा था वह आर्श्चयजनक रुप से सत्य सिद्व हुआ था । इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ है जो स्वप्नों के माध्यम से, तरंगें के माध्यम से, अनायास उठने वाली कल्पनाओं के माध्यम से दूर बोध या पूर्वाभाम के-सत्य को प्रमाणित करती है । गेटे ने अपनी आत्म कथा में लिखा है कि एक बार वह अपने निवास स्थान बाइम्नर में था तो उन्हें अचानक तीव्र अनुभूति हुई कि वहाँ से हजारों मील दूर सिसली में एक भयकर भूकम्प आया है । गेटे ने इस अनुभूति के समबन्ध में अपने मित्रों को बताया लेकिन किसी ने गेटों की इस बात का विश्वास नहीं किया । कि बिना किसी आधार के, बिना किसी सूत्र के इतनी दूर की बात इस प्रकार कैसे मालूम हो सकती है ? लेकिन कुछ दिन बाद आये समाचारों से पता चला कि ठीक उसी समय सिसली में वैसा ही भूकम्प आया था जमा कि गेटों ने अपने मित्रों को बताया था ।
बिना किसी आधार के, बिना किसी प्रत्यक्ष कारणों के किस प्रकार किसी व्यक्ति को सुदूर घटनाओं का, अनागत भविष्य का, व्यतीत हो चुके अतीत का विवरण ज्ञात हो जाता है, यह वैज्ञानिकों के लिए अभी शोध का विषय बना हुआ है । सामान्यत मस्तिष्क इन्द्रियगम्य ज्ञान की जाकारियों तक ही सीमित रहता है । शरीर विज्ञानियों की ऐसी मान्यता है । लेकिन अब पैरासाइकोलाँजी-मनोविज्ञान की एक शाखा में हुई नवीतम शोधें के आधार पर यह स्वीकार किया जाने लगा है कि मानवीय मन विराट् विश्व मन का ही एक अंश है और जो कुछ इस विराट् विश्व ब्रहृण्ड में हो रहा है या निकट भविष्य में होने जा रहा है उसकी सम्वेदनाएँ मानवी मन को भी मिल सकती है ।
मानवी मस्तिष्क की जितनी जानकारी सामान्य रुप से प्राप्त की जा सकी है उसके अनुसार मनुष्य के मस्तिष्क में स्नायुकोश, जर्वसेल्स की सख्या लगभग दस अरब है । इनकी सख्या से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कितने छोटे होते होंगे । लेकिन छोटे होते हुए भी इनकी क्षमता अपनी दक्षता के अनुरुप किसी परिपूर्ण मनुष्य से कम नहीं है । इन दस अरब कोशों की क्षमता और दक्षता का विश्लेषण किया जाए तो यही कहना पडे़गा इन कोशों में से प्रत्येक अपनी विशेषताओं के कारण देव या दानव स्तर का है ।
इन कोशों में से कुछ तो माइक्रों फिल्मों की तरह न जाने कब की स्मृतियाँ संजोये हुए है । इनमें न जाने कब की स्मृतियाँ सुरक्षित है ? मोटे तौर पर जिन बातों को हम भूल चुके होते है, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् इन कोशों में सुरक्षित रहती है या कहा जा सकता है कि मस्तिष्क के एक कौने में छिपी पड़ी रहती है और जब अवसर पाती है तो वर्षो में उग आने वाली घास की तरह उभर कर ऊपर आ जाती है ।
कनाडा के स्नायु विशेषज्ञ डा. पेनफील्ड ने इस तथ्य को को जाँचने के लिए एक व्यक्ति का स्मृति कोश विद्युत धारा से उत्तेजित किया तो उसने बीस वर्ष पहले देखी गई एक फिल्म के कथानक, दृश्य और सम्वाद इस प्रकार बताने आरम्भ कर दिए कि मानो वह वही फिल्म देखता जा रहा हो और सामने के दृश्यो का वर्णन करता जा रहा हो । मस्तिष्क में रहने वाले इन कोशों का सम्बन्ध शरीर के प्रत्येक अंग अवयव से है । इन कोशों से सम्बन्धित नाड़ी तन्तु समस्त शरीर में फैले पड़े है । वैज्ञानिकों ने इन्हें दो श्रेणियों में बाँटा है- एक सेन्सरी नब्ज अर्थात् सज्ञावाहक तन्तुओं का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रियों से होता है । जो कुछ हम देखते, सुनते, चखते, सूँघते और र्स्पश करते है उनकी अनुभूति सज्ञावाहकों के माध्यम से होती है और चलने, फिरने, खाने, पीने, पढ़ने, लिखने जैसे शारिरीक क्रिया कलाप कर्मेंन्द्रियों की गतिविधियाँ गतिवाहकों द्वारा नियन्त्रित तथा संचालित होती है
कहा गया है कि हमारा मस्तिष्क सामान्यतः इन्द्रियगम्य अनुभूतियों और सम्वेदनाओं की जानकारी तक ही सीमित रहता है किन्तु मस्तिष्क में ही इन सम्भावनाओं के बीज भी छिपे रहते है कि पिछले दिनों क्या-क्या हो चुका, इस समय कहाँ क्या हो रहा है और निकट भविष्य में कहाँ क्या होने वाला है ? इसकी जानकारी हो सके । यह क्षमता जिसे अतीन्द्रिय शक्ति कहा जा सकता है सामान्य स्थिति में प्रसुप्त अवस्था में ही पड़ी रहती है । केवल वर्तमान से सम्बन्धित प्रत्यक्ष की ही अधिक जानकारी होती है, भूतकाल की निज से सम्बन्धित घटनाएँ ही जब विस्मृत हो जाती है तो अन्यत्र घटने वाली घटनाओं की जानकारी कैसे रह सकती है ? लेकिन यह बात सामान्य स्तर के मस्तिष्कों पर ही लागू होती है । परिष्कृत मस्तिष्क इससे कहीं ऊँचे उठे होते है और वे त्रिकालज्ञ की सी स्थिति में वैसी ही क्षमताओं से सम्पन्न होते है ।
विज्ञान की परिधि में अभी भौतिक जानकारी संग्रह करने वाले चेतन मस्तिष्क और स्वसंचालित नाड़ी संस्थान को प्रभावित करने वाले अचेतन मस्तिष्क का परिचय ही आया था । अब अतीन्द्रिय मस्तिष्क के अस्तित्व को भी स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घटती रहती है जिनसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलने और उनके अक्षरशः सही उतरने के प्रमाण मिलते है । यह प्रमाण इतने स्पष्ट और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किये गए होते है कि उनमें किसी प्रकार के सन्देह की कोई गुँजाइश ही नहीं है ।
मानवीय सत्ता में अतीन्द्रिय चेतना का अस्तित्व स्वीकार किये बिना इन भविष्यवाणियों, पूर्वाभासों और दूरबोध की घटनाओं का कोई कारण ही नहीं रह जाता है । योगी और सिद्व पुरुष जिस दिव्य चेतना को अपनी तप साधना के माध्यम से विकसित करते है, वह कई बार कुछ व्यक्तियों में अनायास ही उत्पन्न हो जाती है । अनेक लोगों में वह जन्म-जात रुप से पाई जाती है । इस क्षमता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बन्धनों को काट कर असीम के साथ अपने सम्बन्ध सूत्र जोड़ सकता है और अपनी ज्ञान परिधि को उतना ही विस्तृत बना सकता है समय-समय पर इस प्रकार के जो प्रमाण मिलते रहते है उनसे इस सम्भावना को और भी बल मिलता है कि आत्मविश्वास का प्रयत्न मनुष्य को कहीं से कहीं पहुँचाने में समर्थ है ।
अतीन्द्रिय चेतना को प्रमाणित करने और उसका विश्लेषण करने वाले ढेरों प्रामाणिक ग्रन्थ मिलते है। थर्ड आई, सहस्त्र सिद्धों का सिद्धपीठ द मेका आफ है वनली ड्राइजर्स आदि पुस्तकों में उनके लेखकों ने अपनी निजी दिव्य अनुभूतियों के वर्णन लिखे है । उन्होंने अतीन्द्रिय दर्शन और अनुभूतियों का जो वर्णन विश्लेषण किया और जो प्रतिपादन दिये वे आज्ञाचक्र के जागरण और उसकी क्षमताओं की कसौटी पर पूर्णतया खरे उतरे है । भ्रूमध्य भाग में अवस्थित तीसरा नेत्र देवी-देवताओं के ही नहीं मनुष्य के पास भी होता है । आवश्यकता उसे जागृत करने, उसे विकसित बनाने भर की है । उस आधार पर सहज ही दिव्यदर्शी हुआ जा सकता है ।
सामान्य मनुष्यों की चेतना जिस स्तर पर होती है अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न मनुष्यों की चेतना इससे ऊपर उठी होती है । इसलिए उन्हें अनागत भविष्य, सुदूँर स्थित घट रही घटनाओं और बहुत पहले घट चुकी घटनाओं की भी जानकारी हो जाती है, इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि सड़क पर चल रहे लोगों को अपने आस-पास कुछ फूट दूर तक ही चीजें दिखाई देती है। जो लोग ऊँचे स्थान पर खड़े होते है उन्हें ज्यादा दूर तक दिखाई देता है। आसमान में उड़ने वाले हवाई जहाजों से और भी अधिक दूर तक अधिक विस्तार से देखा समझा जा सकता है। यही बात उच्चस्तरीय चेतना वाले व्यक्तियों पर लागू होती है। यदि अपनी चेतना को परिष्कृत बनाया जायें, प्रयत्न किया जाए तो कोई भी व्यक्ति अपने मं अतीन्द्रिय दिव्य शक्ति विकसित कर सकता है। योग साधना ऐसी ही सम्भावनाओं का पथ-प्रशस्त करती है
मानवीय अन्तरात्मा की भूख है प्रेम । इस क्षुधा की पूर्ति के लिए ही मनुष्य अपने मित्रों, प्रियजनों और परिजनों का परिवार व माता तथा उनकी परिधि बढ़ाता है, पे्रम का आदान-प्रदान दोनों ही पक्षों को, प्रेमी और प्रेमास्पद को बल प्रदान करता है । जहाँ प्रेम का आदान-प्रदान नहीं हो पाता है; वहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं का, साधनों का बाहुल्य होते हुए भी किसी को तृप्ति नहीं मिल पाती । इस अभाव के कारण अन्तः भूमिका तृषित और मूच्िछत ही रहती है । इस सम्बन्ध में अब तक जो प्रयोग और शोध अनुसंधान हुआ है उससे यही निर्ष्कष निकलता है कि प्रेम भावना मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है । न्यूयार्क, अमेरिका के डाक्टर रेनी स्पिट्ज ने ऐसे छोटे बच्चों का अध्ययन किया जिनमें विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का विकास आयु के अनुपात से कई गुना अधिक था । डा. स्पिट्रज ने उनकी पारिवारिक परिस्थितियों का अध्ययन किया तो विदित हुआ कि उनमें से निन्यानवें प्रतिशत ऐसे थे जिन्हें अपनी माँ का प्रेम नहीं मिला था । या तो उनकी माँ का देहावसान हो चुका था । सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें माँ से अलग कर दिया था । इस प्रारम्भिक अन्वेषण ने डा. रेनी स्पिट्ज में पे्रम भावना के प्रभाव और प्रतिक्रिया का वैज्ञानिक विश्लेषण करने की प्रेरणा उत्पन्न कर दी ।
इस प्रयोग के लिए उन्होंने दो भिन्न सुविधाओं वाले संस्थानों की स्थापना की । एक में ऐसे बच्चे रखे गए जिन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में माँ का वात्सल्य और दुलार मिलता था । वे जब भी चाहें, तभी अपनी माँ को पुकारें उन्हें अविलम्ब स्नेह, सुलभ किया जाता था और दूसरी ओर वे बच्चे रखे गए जिनके लिए बढ़िया से बढ़िया भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्या, क्रीड़ा के बहुमूल्य साधन उपलब्ध थे, परन्तु उन्हें मातृपे्रम के स्थान पर एक संरक्षिका भर मिली थी । इतने बच्चों को प्रेम और दुलार वह अकेली सरंक्षिका कहाँ से दे पती ? हाँ उन बच्चों को नर्स से कभी-कभी झिडकियाँ अवश्य मिल जाती थी । यही था, उन बच्चों का जीवनक्रम । एक वर्ष बाद दोनों स्थानों के बच्चों का परीक्षण किया गया । उनकी कल्पना शक्ति की मनोवैज्ञानिक जाँच की गई, शारीरिक विकास की माप, सामाजिकता से संस्कार, बुद्धि चातुर्य और स्मरण शक्ति का परीक्षण किया गया । दोनों संस्थानों के बच्चों में आर्श्चयजनक अन्तर पाया गया ।
जिन बच्चों को साधारण आहर दिया गया था, जिनके लिए खेलकूद, रहन-सहन और अन्य सुविधा साधन उतने अच्छे नहीं मिले थे किन्तु माँ का पे्रम प्रचुर मात्रा में मिला था; पाया गया कि उन बच्चों की कल्पना शक्ति, स्मरण शक्ति, सामाजिक सम्बन्धों के संस्कार तथा बौद्धिक क्षमता के विकास की गति बढ़ गई । दूसरे संस्थान के बच्चों की, जिनके लिए भौतिक सुख-सुविधाओं की भरमार थी, पर मातृ प्रेम के स्थान पर स्नेह शून्यता थी विकास दर घट गई । पहली संस्था के बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य और उनके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का भी आर्श्चय जनक विकास हुआ । इस संस्था में रखें गये 136 बच्चों में से कोई ही कभी कदा बीमार पड़ा जबकि दूसरे संस्थान में 38 प्रतिशत बच्चे बीमार पड़े ।
प्रेम और स्नेह की शक्ति तथा प्रभाव को लेकर डा. फ्रीट्स टालबोट के अनुभव भी कम विस्मयजनक नहीं है । एक बार डा. फ्रीट्स जर्मनी गये । वहाँ उन्होंने ड्यूरोल्फोर्ड नगर का बाल अस्पताल देखा । इस अस्पताल में उन्होंने एक वृद्धा स्त्री देखी जो देखने में तो आकर्षक नहीं थी, परन्तु उसकी भुखाकृति रो एक विलक्षण शाँतिप्रद सौम्यता और मुसकान देखी । हर समय उसकी गोदी में कोई न कोई बच्चा खेल रहा होता था । टालबोट ने उस स्त्री को देखा तो उसके बारे में जानने की जिज्ञासा अनायास उत्पन्न हुई । उन्होंने अस्पताल के डायरेक्टर से उस स्त्री का परिचय पूछा तो डायरेक्टर ने बताया कि वह तो अन्ना है श्रीमान जी ! डाक्टरों की भी डाक्टर । उसके पास एक ही चिकित्सा है प्रेम । जिन बच्चों को हम लाइलाज घोषित कर देते है, जिनके उपचार का कोई तरीका हमें नहीं सूझता, अन्ना उन्हें भी अच्छाकर देती है ।
क्वींप यूनिवर्सिटी, आण्टोरिया (कनाडा) के वैज्ञानिकों ने ‘निणियों पर प्रेम का भौतिक प्रभाव’ विषय पर खोज की और उसके आर्श्चयजनक परिणाम सामने आए है । इस विश्वविद्यालय के फार्माकोलाजी विभाग के प्राध्यापक डा. एल्डन वायड ने बताया कि उनके विभाग की एक महिला कर्मचारी को चूहों से बहुत प्रेम है । वह उन्हें दुलार भरी दृष्टि से देखती है, उनकी सुविधाओं का बहुत ख्याल रखती है और यथासम्भव अपने व्यवहार में पे्रम प्रदर्शन भी करती है । चूहो पर इसका आश्चयजनक प्रभाव हुआ है । उस महिला ने चूहों के नाम रख छोड़े है और वह जिसे भी पुकारती है, वही आगे आता है । जैसे ही वह पिंजड़े के पास जाती है, चूहे उसके पास इकट्ठे हो जाते है और एक टक उसे देखने लगते है जो भी वह खिलाती है उसे वे खुशी-खुशी खा लेते है । यद्यपि उस भोजन में तरह-तरह की औषधियाँ मिली रहती है और इस कारण वह भोजन चूहों की रुचि तथा प्रकृति के प्रतिकूल होता है । कई बार कष्टकर ढंग से चूहों के शरीर में विभिन्न औषधियाँ पहुँचाई जाती है । अनुभव होने पर तो किसी भी चूहे को इसके लिए तैयार नहीं होना चाहिए, पर वह महिला जिस चूहे को चाहती है, खुशी खुशी इस प्रयोग के लिए सहयोग देने हेतु तैयार कर लेती है । इससे भी आर्श्चयजनक बात तो यह कि कई बार चूहों पर विषौली दवाओं का प्रयोग किया । एक ही किस्म की एक ही मात्रा में दवा दो महिलाओं द्वारा खिलाई गई । आर्श्चय की बात तो यह है कि पे्रम भावना युक्त महिला के हाथ से दवा खाने पर 20 प्रतिशत चूहे मरे, जबकि उसी दवा को उती ही मात्रा में दूसरी महिला ने खिलाया तो 80 प्रतिशत चूहे मर गए ।
पे्रम और सद्भावनाओं की शक्ति का सबसे बड़ा और जीता जागता प्रमाण है श्रीमति डोरिस मुन्डे पचास वर्ष की वृद्धा, शरीर से सामान्य महिलाओं की तरह साधरण; किन्तु भावनाओं की दृष्टि से असाधारण श्रीमति डोरिस एटलस निकालकर देखती है कि वह स्थान वह देश किस महाद्वीप में है, जहाँ सूखा या अकाल पड़ा है ? इसके बाद वह ध्यान लगाकर बैठ जाती है और कुछ हो क्षणों में उसकी स्थिति समाधिस्थ योगियों जैसी हो जाती है । आसपास क्या कुछ हो रहा है, इसका कुछ पता नहीं । शरीर कमरे में रखा होगा और भाव शरीर उस सूखें वाले इलाके में । वह अपने सम्पूर्ण हृदय से, परिपूर्ण एकाग्रता और तल्लीनता के साथ भावना करती है कि मेरी अजस्त्र प्राण शक्ति बादलों में घुल रही है । अब मैं इन बादलों को लेकर उस सूखे वाले क्षेत्र की ओर उड़ चली । बादलो की क्या विसात जो मेरी आज्ञा न मानें ? आगे आगें मैं, पीछे-पीछे बादल । बादलो चलो, तुम्हें उस क्षेत्र में बरसना है । बादलो ! लो आगया वह सूख क्षेत्र जहाँ तुम्हें बरसना है । यह देखा प्यासी धरती, प्यासे जीव-जन्तु कितने दुखी हो रहे है ।
संसार का दुख और शान्ति करुणा पर टिकी है । हर सम्पन्न व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अभावग्रस्त प्राणियों के उत्थान और उद्धार के लिए कुछ दे । तुम स्वार्थी क्यों हो गए हो ? देने की कन्जूसी क्यों करते हो ? दोगे नहीं तो तुम्हारे पास नया तीर कहाँ से आएगा ? बरसो ! बरसो !! जल्दी बरसो ताकि प्यास से सूखे कण्ठ वाले लोगों की प्यास बुझ सकें । सूखी धरती गीली हो सके । तुम्हें बरसना पडे़गा, बादलों तुम्हें बरसना पडे़गा । लो बरसो ! चलो बरसो ।
सम्पूर्ण मन प्राण से डोरिस मुन्डे इस तरह की भावनाएँ करती है और बादलों के साथ ही अपनी चेतना को घुला मिला देती है । पानी बरसने लगता है । लोग खुशी से नाचने लगते है और डोरिस मुन्डे उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता घुला देती है, फिर उसकी आत्मचेतना वापस लौट आती है । अखबारों में समाचार छपता है कि अमुक सूखाग्रस्त क्षेत्र में इतनी वर्षा हुई कि सूखे से व्याप्त हुआ संकट समाप्त हो गया । यह समाचार पढ़कर श्रीमति डोरिस की प्रसन्नता का बारावार नहीं रहा । श्रीमति डोरिस का कहना है कि सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना के आगे बादल तो क्या भगवान को भी झुकना पड़ता है । उन्होंने एक समाचार एजेन्सी नाकिन को बताया कि अपनी इस भावना शक्ति के द्वारा उन्होंने लालचीन, पेरु, अमेरिका तथा भारत का सूखा दूर किया है । कुछ दिन पहले उन्होंने बिहार और करीब दस वर्ष पूर्व आस्टे्रलिया में पडे़़ जबरदस्त अकाल को दूर करने में उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग किया था और उन्हें सफलता मिली थी ।
अपने व्यक्तित्व को सीमित करने का नाम स्वार्थ है और उसे विस्तृत व्यापक बना लेने का नाम ही परमार्थ है । पे्रम भावनाएँ व्यक्तित्व की सीमाओं का विस्तार करती है और उसी के व्यक्तित्व सबल बनता है, परिपुष्ट होता है । सीमित प्राण दुर्बल होता है, पर जैसे-जैसे व्यक्ति का अहम् विस्तृत होता जाता है वैसे-वैसे आन्तरिक वलिष्ठता बढ़ती जाती है । प्राणशक्ति का विस्तार सुख-दुःख की अपनी छोटी परिधि में केन्द्रित कर लेने से रुक जाता है लेकिन यदि उसे असीम बनाया जाए और स्वार्थ को परमार्थ में परिणत किया जाए तो उसका लाभ प्रभाव, यश, सम्मान और सहयोग के रुप में तो मिलता ही है, अन्तः स्थिति भी द्रुतगति से परिष्कृत होती है और व्यक्तित्व प्रखर होता चला जाता है ।
देखा गया है कि किन्हीं विशेष व्यक्तियों को देखते ही उनके प्रति सहज की श्रद्धा, ममता और आत्मीयता जगती है, विश्वास उमड़ता है । इच्छा होती है कि अधिक से अधिक समय तक उनके सर्म्पक में रहा जाए । जब तक उनके साथ रहते है उच्चस्तरीय भावनाएँ उठती रहती है । यह उनके व्यक्तित्व में भावनात्मक प्रौढ़ता और उदारता की ही प्रतिक्रिया है । पे्रम और सद्भावनाएँ एक ऐसी सम्पदा है जो दूसरों पर अपना प्रभाव ही नहीं छोड़ती बल्कि उन्हें बदलती उनकी अन्तःस्थिति में हेर-फेर भी करती है । व्यक्तित्व को ढालने और उसे उन्नत करने के लिए जो कुछ आवश्यक है उसमें पे्रम तथा सद्भावनाओं का विकास प्रथम सीढ़ी है । बिना भावनाओं का विकास किये और उन्हें उदात्त तथा परिपक्व बनाए कोई व्यक्ति आत्मिक उन्नति कर ही नहीं सकता।
प्रिन्स आफ वेल्स हेनरी पंचम उन दिनों राजकुमार थे, शासक नहीं बने थे । तबकी बात है-एक न्यायाधीश ने उनके एक सहपाठी मित्र को कारावास की सजा सुना दी, हेनरी पंचम उस समय न्यायालय में ही उपस्थित थे । उन्होंने न्यायाधीश को डाँटकर कहा-यह मेरा मित्र है तुम उसे छोड़ दो ।
उत्तर में न्यायाधीश ने कहा-कानून की दृष्टि में जो अपराधी है यह किसी का भी मित्र क्यों न हो अपराधी है उसे क्षमा नहीं किया जा सकता है ।”
राजकुमार आग बबूला हो उठे और न्यायाधीश को कटु शब्द कहने लगे तो-न्यायाधीश ने सिपाहियों की बुलाकर कहा-’इन्हें भी पकड़कर जेल में डाल दो ।’ सिपाहियों ने आज्ञा का पालन किया राजकुमार भी जेल भेज दिये गये ।
इस बात का पता शासनाध्यक्ष हेनरी चतुर्थ को लगा तो उन्होंने न्यायाधीश को पदोन्नत करते हुये कहा-’जिस देश की न्याय व्यवस्था इस तरह की ही वहाँ कभी अपराध नहीं हो सकते । मुझे अपने लड़के के कैद किये जाने पर हार्दिक खुशी है ।
राजकुमार ने स्वयं भी सबक सीखा और वे इतिहास प्रसिद्ध न्यायशील राजा हुई ।
आकाश में घटाटोप बादल छाये हुए थे और घनघोर वर्षा हो रही थी । नदी में इतनी तेज बाढ़ आई हुई थी कि जहाँ तक दृष्टि जाती असीम और अगाध जल राशि ही दिखाई देती थी । बाढ़ के अतिरिक्त एक समस्या यह भी थी कई जगह-जर्मन सेनाओं का जबरदस्त पहरा बैठा हुआ था । इधर रुसी गुप्तचर संस्था का एक
गुप्तचर अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना लेकर रुसी अधिकारियों के पास पहुँचने के लिए बेचैन था । जिस नगर में वह रहता था, उस पर जर्मनी की सेनाओं ने कब्जा कर लिया था और उस गुप्तचर के बारे में उन लोगों को पता लग गया था कि वह रुस का भेदिया है । इसलिए वहाँ रहना किसी भी दृष्टि से खतरे से खाली नहीं था ।
इस गुप्तचर का नाम था कोत्सीनेन, साथ में उसकी पत्नी थी तानिया और दो बच्चे, यह दूसरे विश्वयुद्व के समय की बात है कोत्सीनेन और तानिया ने अपने दो बच्चों के साथ नदी के उस पार बसे गाँव में एक ग्रामीण की झोपड़ी में डेरा डाला, वह ग्रामीण कोत्सीनेन का परिचित था । लम्बा और पैदल सफर करने कारण दोनों बच्चों की हालत बहुत बुरी हो गई थी । रात का एक पहर बीत चुका था ।
कोत्सीनेन ने उठ कर सोने के लिए बिस्तर बिछाया आस-पास की झोपड़ियों में रहने वाले लोग समझ चुके थे कि उनके पड़ोस में आकर ठहरा परिवान कोई साधारण परिवार नहीं है । कोत्सीनेन और तानिया बच्चों को लेकर चर्चा कर रहे थे कि मौसम बहुत खराब है और बच्चों की हालत पहले से ही खराब है । फिर मोसम की मार न जाने कब क्या गुल खिला दें ?
विचित्र धर्म संकट में उलभे थे दोनो, कि क्या किया जाए ? तानिया ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा-शायद सुबह तक इन दोनों की हालत सुधार जाय ।
कुछ नहीं बोला कोत्सीनेन ।
तानिया ने अपने पति को चिंतित देखकर कहा-तुम चिन्ता मत करों । इस कारण हमें अपना कर्तव्य पालन करने में कोई बाधा नहीं आयेगी ।
कहने को तो कह दिया था तानिया ने, पर कोत्सीनेन जानता था कि वह एक माँ है और एक माँ के लिए अपने बच्चों की चिन्ता अपनी चिन्ता से भी बढ़ कर होती है ।
वह चुप रहा ।
दोनों पति-पत्नी अपने भीतर चल रहे अंतर्द्वन्द्व से जूझते हुए एक दूसरे की ओर ताक रहे थे । बच्चे बीच-बीच में जोरों से खाँसने लगते और तानिया दौड़ कर हड़बड़ा कर उन्हें सम्हालने में जुट जाती ।
तभी दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी । तानिया ने उठ कर दरवाजा खोला तो उसी झोंपड़ी में रह रही स्त्री थी । उसने पूछा क्या हुआ है बच्चों को ?”
‘बहुत तेज बुखार है और पसलियाँ भी चल रही है, तानियाँ ने कहा !
‘बहन मैं कोई वैद्य हकीम तो हूँ नहीं । बस थोड़ी सी घरेलू दवायें जानती हूँ, वह स्त्री अन्दर आ गई थी और कुछ देर तक बातचीत करने के बाद बोली मै जानती हूँ कि तुम लोग हमारे ही दुःख दर्द मिटाने के लिए अपने हृदय पर पत्थर रखे हो । सफर के कारण ये तुम्हारे कोमल फूल कुम्हला गये है । अगर तुम इन्हें मेरे पास छोड़ जाओ तो इनके इलाज का कोई प्रबन्ध हो सकता है । “
मकान मालकिन को सम्भवतः इन लोगों के मिशन का पता था । तभी उसने ऐसा प्रस्ताव रखा । वास्तव में इन लोगों का वहाँ से चल देना जरुरी था सुरक्षा की दृष्टि से भी, और कर्तव्य की दृष्टि से भी ।
बड़े ही भारी मन से तानिया अपने आप में यह प्रस्ताव मानने के लिए तैयार हुई और फिर उस घर से ऐसे बाहर आई कि पीछे भी मुड़ कर नहीं देखा ।
प्रकृति के कुछ नियम है, जिनके अनुसार यह संसार चलता है । जड़ जगत ही नहीं चेतन प्राणियों का नियमन नियन्त्रण भी प्रकृति के उन नियमों के अनुसार होता है । इन नियमों के या प्रकृति के विधान के अनुसार स्थिति में परिवर्तन आते रहना एक स्वाभाविक क्रम है । मनुष्य की स्थिति में भी परिवर्तन होते रहना प्रकृति नियमों के अर्न्तगत आता है । जीवन में उतार-चढ़ाव आना प्रकृति विधान के अनुसार स्वाभाविक है । इसे मनुष्य मन की दुर्बलता ही कहा जायगा कि वह उतार-चढ़ाव की नियति को स्वीकार नहीं कर पाता और अनुकूल परिस्थितियों में सुख का अनुभव करता है तो प्रतिकूल परिस्थितियों में दुःखी होता, पीड़ा अनुभव करत है ।
उस दुर्बलता के कारण ही मनुष्य ने कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि समानार्थी शब्दों की रचना की और सदैव यह चाहा कि किसी न किसी प्रकार इनसे बचते रहा जाये । जब कि कठिनाइयाँ जीवन प्रवाह का एक सहज स्वाभाविक क्रम है जो आता है, कुछ देर रुकता है ओर वह कर चला जाता है । यदि इस सत्य को स्वीकार कर लिया जाए तो कठिनाइयाँ भी अपने लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है और उनका उपयोग जीवन तथा व्यक्तित्व के विकास में किया जा सकता है । किन्तु इस सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता अथवा यह बात गले नहीं उतरती इसलिए कठिनाइयाँ विकरालता वन कर मनुष्य को डराती, दवाती और विपण्ण करती रहती है । वस्तुतः कठिनाइयाँ इतनी भयंकर नहीं होती, जितना कि उन्हें समझा जाता है । जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में कई लोग रोते-कलपते है, उन्हीं प्रतिकूलताओं में दूसरे व्यक्ति नई-नई प्रेरणाएँ प्राप्त कर सफलता का वरण करते है ।
कठिनाइयों को यदि मनःस्थिति पर निर्भर कहा जाये तो भी गलत नहीं होगा । एक कमजोर ओर दुर्लभ मनोभूमि के व्यक्ति के लिए प्रतिकूलताएँ अभिशाप बनकर बरसती है तो दूसरे सबल और सशक्त मनोभूमि वाले व्यक्ति उन्हीं कठिनाइयों का ऐसा उपयोग करते है कि वे उनके लिए वरदान तुल्य बन जाती है । इस प्रकार कठिनाइयाँ अपने आप में कोई विशेष महत्व नहीं रखतीं या कहा जा सकता है वे कुछ है ही नहीं बल्कि मन की स्थिति से ही उनका स्वरुप बनता है। निर्बल मनोभूमि तो अपनी कल्पनाजन्य कठिनाइयों में ही अशान्त हो जाती है जब कि मनोबल सम्पन्न व्यक्ति कठिनाइयों को सहज भाव से स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते है । सन्तुलित रहने वाले व्यक्तियों की जीवनयात्रा इसी सहज गति से आगे बढ़ी चलती है ।
कठिनाइयों में, प्रतिकूल परिस्थितियों में सन्तुलित किस प्रकार रहा जाए ? इसके उत्तर में अपनी मनःस्थिति को सुधारने, सन्तुलन साधने की आवश्यकता ही बताई जा सकती है स्मरण रखा जाना चाहिए कि परीक्षा की कसौटी पर कसे बिना कोई भी वस्तु अपनी उत्कृष्टता सिद्ध नहीं कर सकती । सोना अग्नि में तप कर ही शुद्ध बनता ओर निखरता है आग की गोद में पिघला कर ही लोहा साँचे में ढलने योग्य बनता है । इसी प्रकार मनुष्य भी कठिनाइयों की आग में तप-गल कर ही उत्कृष्ट, सौर्न्दय युक्त प्रभावशाली और महत्वपूर्ण स्थान रखती है । उनके साथ खेलने पर इच्छाशक्ति प्रखर बनती है और उन्हीं में व्यक्तित्व की परख होती है ।
जो व्यक्ति कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं से घबड़ा कर हिम्मत हार बैठा वह हार गया और जिसने उनसे समझौता कर लिया वह सफलता की मंजिल पर पहुँच गया । इस प्रकार हार बैठने, असफल होने या विजयश्री और सफलता का वरण करने के लिए और कोई नहीं मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है । चुनाव उसी के हाथ में है कि वह सफलता को चुने या विफलता को । यदि वह चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और चाहे तो अभिशाप भी । कठिनाइयाँ वरदान बनती है या अभिशाप यह इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य उनसे समझौता करता है, उनका स्वागत करता है अथवा उनसे घबड़ा कर भागता है ।
संसार में जितने भी महापुरुष हुए है या जिन लोगों ने भी अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की है, उनकी जीवनियाँ उठा कर देखी जाएँ तो स्पष्ट प्रतीत होगा कि कठिनाइयों से गुजरे बिना उनमें से कोई भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सका है । कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा से गुजरे बिना किसी भी व्यक्तित्व में कोई चमत्कार नहीं आता । कठिनाइयाँ एक खराद की तरह है जो मनुष्य के व्यक्तित्व को तराशकर चमका दिया करती है । उनका जीवन में वही अस्तित्व है जो धाम का ओर भोजन का ।
देखा जाए तो श्रम भी क्या है ? श्रम भी एक प्रकार की कठिनाई है । कठिनाई अर्थात् प्रतिकूलता । रोटी खाना है तो आटा गूँथने से लेकर तवे पर सेकने और आग पर फुलाने तक नह जाने क्या-क्या करना पड़ता है । जो चाहें वे इसे कठिनाइयों भी कह सकते है क्योंकि सुविधा तो सीधे थाली में रोटी आ जाने से ही बन पड़ती है । उपार्जन के लिए श्रम, स्वास्थ्य के लिए श्रम, शिक्षा के लिए श्रम प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य या उपलब्धि के लिए श्रम करना पड़ता है । सीधे और सहज कुछ भी प्राप्त नहीं होता । अतः श्रम को कठिनाई भी तो कहा जा सकता है । परन्तु श्रम और कठनाई में अन्तर यह है कि श्रम के प्रति सहज स्वीकार का भाव होता है जब कि कठिनाई के प्रति असहिष्णुता का भाव रहता है । कठिनाई थोड़े अधिक श्रम की माँग करती है और थम करने में थोड़ी कम कठिनाई सहनी पड़ती है । दोनों में मात्रा भेद है, गुण या स्वरुप में कोई विशेष अन्तर नहीं है ।
कठिनाइयाँ अथवा प्रतिकूलताएँ चरित्र निर्माण के लिए भी उपयोगी है । उत्तराधिकार में जिन्हें सम्पन्नता प्राप्त होती है, उनमें से अधिकाँश व्यक्तियों को दुर्ब्यसनों ओर विलासिता में फँसे देखा जा सकता है । किन्तु जो कठिनाइयों से जूझ रहा है उसे संसार की फिजूल बातों के लिए अवकाश कहाँ ? कष्ट और कठिनाइयाँ मनुष्य के अहकार को नष्ट करके उसमें विनम्रता तथा श्रद्धा भक्ति भर देती है । इतना ही नहीं उसे स्वस्थ और सुदृढ़ भी बनाती है । इस रुप में कठिनाइयों को वरदान ही कहा जाना चाहिए । परिश्रमी, पुरुषार्थी और साहसी व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में अनेक विभूतियाँ अर्जित कर लेते है । किन्तु जो कायर है, क्लीव है, आत्म बल से रहित है वे प्रतिकूलताओं को देखकर डर जाते है तथा हाय-हाय करते हुए जीवन के दिन पूरे करते है ।
छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि -’जब तक यह शरीर बना हुआ है तब तक सुख और दुःख का निवारण नहीं हो सकता ।” कठिनाइयाँ जीवन का उसी तरह अंग है जिस तरह दिन के बाद रात्रि का होना, ऋतुएँ बदलते रहना । अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं को अपने ऊपर हावी न होने दिया जाये और उनके बीच से रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहा जाए ।
कठिनाइयों को अपने ऊपर हाबी ने होने देने का एक मार्ग व्यस्त रहना है । मनुष्य के व्यस्त रहने के कठिनाइयों के प्रति शोक, चिन्ता एवं उद्विग्नता में डूबने के लिए समय ही नहीं मिलेगा । स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर लिखा है कि ‘व्यस्त मनुष्य को आँसू बहाने के लिए भी समय नहीं मिलता ।’ यह ठीक भी है । जो व्यस्त रहेंगे, उन्हें कठिनाइयों के सम्बन्ध में सोच-सोचकर दुःखी होते हरने का अवकाश ही कहाँ रहेगा ? इसके अतिरिक्त इन्हें जीवन का एक सजि क्रम मानकर भी निश्चित रहा जा सकता है । यह सोचकर भी प्रसन्न हुआ जा सकता है कि आपत्तियों का झझावात नरसिंहों को झखझोर कर उनका प्रमाद तोड़कर उन्हें पुरुषार्थ के लिए खड़ा कर देता है ।
विपत्तियाँ, प्रतिकूलताएँ अथवा कठिनाइयाँ जीवन का सहज स्वाभाविक क्रम है । उनसे प्रभावित होना ही हो तो इस रुप में होना चाहिए कि वे मनुष्य को शिक्षा देने के लिए आती है । वे आती है, जाती है और आती रहेगी व जाती रहेगी । इसलिए उनसे न तो भयभीत होने की आवश्यकता है और न ही उनसे भागने की ।
संसार में अच्छे लोग है और बुरे भी । परिस्थितियाँ अनुकूल है और प्रतिकूल भी । इन दोनों में ही सन्तुलन एवं समाँजस्य बिठा कर चलने वाले व्यक्ति जीवन में सफल रहते तथा इस विश्व वसुन्धरा का वास्तविक आनंद उठाते है । कठिनाई सामंजस्य के अभाव में पड़ती है । अपना सन्तुलन बना रहे तो बुरे व्यक्तियों और गई गुजरी परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी प्रसन्नचित रहा जा सकता है, जबकि मानसिक सन्तुलन एवं सूझ-बूझ के अभाव में अच्छे से अच्छे व्यक्तियों एवं अनुकूल परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी कितने ही व्यक्ति खित्र, व्यग्र एवं अशान्त बने रहते है । यह असन्तुलन का ही परिचायक है । ऐसे व्यक्ति जीवन के छोटे-मोटे बातों एवं सामान्य विरोधों के कारण अपना सन्तुलन खो बैठते है । उनकी प्रसन्नता अप्रसन्नता अनुकूल परिस्थितियों एवं व्यक्तियों पर निर्भर करती है । व्यावहारिक जीवन में आई सामान्य कठिनाइयों को भी वे पहाड़ जैसा देखते है । उनके कारण एवं निवारण ढूँढ़ने के स्थान पर खित्र एवं निराश बने अपनी असमर्थता का रोना रोते रहते है । बेसव्री एवं व्यग्रता स्वभाव का अंग बन जाने के कारण प्रस्तुत समस्या का जो हल थोड़ी सूझ-बूझ एवं दूरदर्शिता के आधार पर निकल सकता था वह भी असम्भव हो जाता है ।
भली बुरी परिस्थितियाँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रस्तुत होती है । उनका सामना करना पड़ता है । मनुष्य के मानसिक सन्तुलन, धैर्य एवं दूरदर्शिता की परख प्रतिकूल अवसरों पर ही होती है। जब तक प्रतिकूल अवसर न आये अथवा बुरे व्यक्तियों से सामना न पड़े तब तक किसी भी व्यक्ति की सूझ-बूझ की परख कर सकना सम्भव नहीं है । वास्तविकता की परख तो कठिन अवसरों पर ही होती है । किसमें कितना धैर्य, एवं सूझ-बूझ है, इसका मूल्याँकन प्रस्तुत संकटों के आधार पर किया जा सकता है ।
मानसिक सन्तुलन बना रहे तो हर प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है । कठिनाई असन्तुलन के कारण उत्पन्न होती है सामान्य और असामान्य व्यक्तियों मं अन्तर उनकी बौद्धिक क्षमता का नहीं मनःसन्तुलन का होता है । दूरदर्शी विवेकशील पुरुष प्रस्तुत संक्टों, अवरोधों का अध्ययन बारीकी से करते तथा अपना सन्तुलन बनाये रखते हुए समाधान ढूँढ़ते है । फलत; अभीष्ट प्रयोजन में सफल होते है । अन्ततः व्यक्ति एवं परिस्थितियाँ भी अनुकूल बन जाती है ।
पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की अधिकाँश समस्याएँ व्यक्तिगत सूझ-बूझ के अभाव के कारण ही उत्पन्न होती है । अपना सन्तुलन बना रहे तो बुरे से बुरे व्यक्तियों का प्रभाव भी नहीं पड़ सकता । अन्ततः वे भी अनुवर्ती हो जाते है । अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्राहिंम लिंकन की इस घटना से प्रेरणा ली जा सकती है-लिंकन की पत्नी उग्र स्वभाव की थी । जिसके कारण लिंकन को कई बार उनके कोप का भोजन बनना पड़ा । पर अपनी सहन शीलता एवं संतुलित मनःस्थिति के कारण कभी ध्यान नहीं देते थे । एक बार लिंकन के सम्मान में एक भोग का आयोजन किया गया । भोज के अवसर पर ही पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर मतभेद खड़ा हो गया । श्रीमति लिंकल इतना अधिक क्रोधित हो उठीं कि काफी का गरम प्याला लिंकन को दे मारा । कुछ काफी की छींटें श्रीमति लिंकन के ऊपर भी जप पड़ी । लिंकन ऐसे अवसर में भी मुस्कराते रहे और अपनी पत्नी के इस कृत्य पर बिन्कुल ध्यान नहीं दिया । उल्टे पत्नी के ‘र्स्कट’ पर पड़ी काफी की छींटो को रुमाल निकाल कर साफ करने लगे । श्रीमति लिंकन आत्मग्लानि से भर उठीं । उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसू भर आए । लिंकन सभा में उपस्थित व्यक्तियों को सम्बोन्धित करते हुए बोले-मेरी पत्नी समय-समय मुभे सहनशीलता का पाठ पढ़ाती रहती है ।
पारिवारिक जीवन के छोटे-मोटे मतभेदों के फलस्वरुप अपना सन्तुलन गँवा बैठने वाले व्यक्ति इस घटना से प्रेरणा ले सकते है । सामान्य बातों को लेकर कितने ही प्रकार के कलह परिवार में आये दिन पैदा होते है । उनके मूल में जाने पर पता चलता है कि कारण उतने बड़े नहीं थे जितना कि मान लिया गया । अभाव सामन्जस्य एवं स्वयं की सूझ-बूझ का पड़ता है जिनके रहते छोटे मतभेद का भी निवारण नहीं हो पाता । तात्कालिक सूझ-बूझ बनी रहे तो सर्वथा विपरीत, उद्दण्ड एवं उग्र प्रकृति वाले व्यक्तियों के बीच रहते हुए भी प्रसन्न चित्त बने रहना सम्भव है ।
सुकरात के जीवन की घटना है । सुकरात की पत्नी भी उग्र एवं तेज स्वभाव की थी । कार्यो की व्यस्तता के कारण सुकरात को घर लौटने में प्रायः देरी हो जाती है । एक दिन रात गये अपने मित्रों के साथ घर वापसलौटे । उन्हें मित्रों के साथ देखकर पत्नी आग-बबूला हो उठी । इतना अधिक क्रोधित हुई कि गन्दे पानी से भरी बाल्टी को सुकरात के ऊपर फेंक दिया । पत्नी के इस कुकृत्य पर उन्होंने बिलकुल ध्यान नहीं दिया । उन्टे मुस्कराते हुए बोले कि अब तक तो बादल गरजते थे आज बरस भी रहे है ।” पत्नी का क्रोध उनकी विनम्रता से समक्ष लुप्त हो गया । वे सुकरात से अपने कृत्य पर क्षमा प्रार्थना करने लगी । उस दिन से उसका स्वभाव भी परिवर्तित हो गया ।
दैनिक जीवन में भी कितने ही अवसर ऐसे आते है जिनके कारण मनुष्य अपना सन्तुलन खो बैठता है । आवेशग्रस्त और क्रोधित हो उठता है । फलतः असन्तुलन के कारण कितने ही संघर्षो का सामना करना पड़ता है । जबकि सन्तुलित ढंग से समाधान ढूँढ़ने से सहज ही बचा जा सकता था । संघर्षों के फलस्वरुप होने वाली हानियों को सूझ-बूझ के प्रयोग द्वारा रोकना इस प्रकार सम्भव है । घटना प्राचीन काल की है । यूरोप में द्वन्द्व-युद्ध को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त थी । दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा हो जाने पर, कोई भी युद्व चुनौती दे देता था । जिसके कारण कितने ही व्यक्तियों को जान से हाथ धोना पड़ता था । ऐसी ही विषम स्थिति एक बार फ्राँस के लुई पाश्चर के समक्ष आई’ । फ्राँस के एक व्यक्ति को किसी बात पर लुई पाश्चर के ऊपर कोध आ गया । उसने लुई को द्वन्द्व युद्व के लिए चुनौती दे दी । पाश्चर ने प्रतिद्वन्द्वी से बड़ी बुद्धिमत्ता से कहा “चुनौती मुभे दी गई है, इसलिए हथियार चुनने का अधिकार मुभे है । मेरे सामने दो बोतलें रखी है । एक में साधारण पानी है-दूसरे में हैजे के जीवाणुओं का घोल भरा है । एक बोतल मैं पी लेता हूँ । दूसरे बोतल को हमारे प्रतिद्वन्द्वी को पीना चाहिए ।” जिस सहजता के साथ यह बातें कही गई उन्हें सुनकर प्रतिद्वन्द्वी का सारा क्रोध समाप्त हो गया । मुस्कराते हुए पाश्चर के गले आ मिला ।
विकट संकटभरी परिस्थितियों में भी तात्कालिक सूझ-बूझ के सहारे अपनी सुरक्षा की जा सकती है, वाल्वेयर उन दिनों इंग्लैण्ड में थे । ब्रिटेन और फ्राँस के बीच आपसी सम्बन्ध अच्छे न होने के कारण अग्रेज फ्राँसीसियों की जान के दुश्मन बने हुए थे । वाल्तेयर एक दिन सड़क से होकर गुजर रहे थे । फ्राँसीसी को खुली सड़क पर घूमते देखकर अग्रेजों ने घेर लिया । प्रस्तुत संकट में बाल्वेयर ने भीड़ को सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर में कहा कि आप लोग इसलिए मारना चाहते है क्योंकि मै फ्राँसीसी हूँ । उग्र भीड़ ने उत्तर दिया हाँ । वाल्तेयर ने शान्त एवं सन्तुलित स्वर में कहा कि-आप चाहें जो करें पर मेरी एक बात का उत्तर दीजिए । क्या यही सजा मेरे लिए पर्याप्त नहीं है कि मै अग्रेज नहीं हूँ ? भीड़ में उपस्थित आक्रमण कारी भी इस सहजता भरे उत्तर के कारण अपनी हँसी नहीं रोक सके । उन्होंने अपना हिंसक इरादा बदल दिया ।
सामान्य से लेकर असामान्य संकट पूर्ण परिस्थितियों का सामना दूरदर्शी सूझ-बूझ के सहारे किया जा सकता है । अपना सन्तुलन बना रहे तो बुरे से बुरे व्यक्ति भी हानि नहीं पहुँचा सकते । व्यक्तियों एवं परिस्थितियों से सामन्जस्य बिठाने की कला जिसने विकसित कर ली वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल रहता है ।
बोलचाल की भाषा में ‘पशु’ शब्द विचारणा है-भावना रहित प्राणियों के लिए प्रयुक्त किया जाता है । शारीरिक और मानसिक दृष्टि से मनुष्य की तुलना में स्वरुप विकसित होने की बात कहना तो उचित है, किन्तु उन्हें विचारणा या भावना से रहित नहीं कहा जा सकता । उनमें से अनेकों में अपने ढंग की ऐसी विशेषताएँ पाई जाती है जिन्हें मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक अग्रणी कहा जा सकता है । भावना की दृष्टि से भी वे हेय नहीं है । उनमें से कितने ही ऐसे होते है जिन्हें नर-पशुओं की तुलना में कहीं विकसित और सराहनीय माना जा सकता है ।
हाथी अपने बच्चों को अनुशासन पालन करना सिखा लेते है । संकट में एक दूसरे की मदद करते है । नर-मादा में परस्पर स्नेह और सौहार्द्र होता है । सामान्य हाथी बूढ़ों की देखभाल करते है । ये हाथियों के कई वर्षों से निरीक्षण करने वाले व्यक्ति के निजी अनुभव है ।
केनिया के नैरोबी शहर की एक प्रख्यात सफरी कम्पनी जो यात्रियों का अफ्रीका के घने जंगल दिखाने के लिए वाहन व्यवस्था करती है, ‘केर एण्ड डाउनी’ कम्पनी में मैनेजर डोनाल्ड फेर अपने दो शिकारियों से अधिकृत निरीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर बताते है-हाथियों के झुण्ड पर शिकारियों ने गोली चलाई, एक हाथी घायल हो गया, दो हाथी उसकी मदद के लिए आये । दोनों हाथियों ने अपने-अपने बड़े दो दाँत घायल हाथी के शरीर के नीचे घुसाये और दोनों ओर अपने-अपने शरीर का आधार देकर घायल हाथी को जमीन से ऊपर उठा लिया । इतना ही नहीं वे उसे दो मील तक ले गये । शिकारी उनके पीछे-पीछे गये और देखा कि रास्ते में तीन चार बार घायल हाथी गिर गया किन्तु फिर से उठा लिया । दे मील के बाद घायल हाथी में चेतनता आ गई और झुण्ड में जाकर मिल गया ।
‘केर एण्ड डाउनी’ कम्पनी के सीनियर शिकारी ‘विलरियन’ ने 42 वर्षों तक हाथियों का निरीक्षण किया । उनका कहना है कि वे मनुष्यों की तरह काम किया और कई बार तो मनुष्य से अधिक चतुरतापूर्वक कार्य करते है । शिकारियों ने जंगल में एक स्थायी कैम्प बनाया था, उसमें एक बगीचा लगाया था । हाथियों का एक झुण्ड अक्सर उनके बगीचे को ध्वस्त कर देता था । बगीचे के चारों ओर एक मजबूत बाड़ बनाई गयी, इतना ही नहीं उसमें विद्युत के तार भी लगाये गए । हाथियों को यह पता लगाने में कुछ ही रातें लगीं कि जब बत्ती बुझ जाती है तो बाड़ में कोई खतरा नहीं रहता और फिर से बगीचा ध्वस्त कर दिया । इसके बाद सारी रात जनरेटर को चालू रखा गया फिर से हाथियों के झुण्ड ने पता नहीं कैसे अनुभव प्राप्त कर लिया कि उनके बाहर वाले दाँतों को बाड़ से कोई खतरा नहीं है और बाहर वाले दाँतों से ही बाड़ से तहस-नहस कर दिया तब बाद में सुरक्षा के लिए बन्दूक वाले चौकीदार रखने पडे़ ।
अफ्रीका में ‘मश्ियन प्रपात नैशनल पार्क’ में कुछ मकान बन रहे थे, तब एक हाथी जिसका नाम रखा गया था ‘लार्ड मेयर झझ वारा’ वह मकान बनाने वाले बढ़इयों को पीछा करके भगा देता था मानो वह यह कहना चाहता था कि वह प्रदेश उसी का अधिकार क्षेत्र है । मकान पूरा बन जाने के बाद भी उसने अपना गश्त लगाना जारी रखा । अपने फोटो लेने वालों के प्रति वह उदार रहता तथा अन्य किसी को नहीं आने देता था केवल अपना फोटो ख्िचवाने के लिए खड़ा हो जाता था । एक रात को उसको केलों से बनने वाली ‘पोम्बे’ नामक शराब की गन्ध आयी । जिस झोपड़ी में से गन्ध आ रही थी उसकी छत अपनी सूँड़ से उठा कर फेंक दी और जितने केले थे, सबका सफाया कर दिया । अब वह प्रत्येक कार की केले के लिए तलाशी लेने लगा था । अगर र्पीछे की ओर सामान के साथ केले रखे होते तो उसे तोड़कर केले ले लेता था ।
एक रात ऐसा हुआ कि यात्रियों ने अपने केलों की टोकरी कार के नीचे रख दी । रात्रि की नींद में वे यात्री लोग अपनी कार को उठाये जाने एवं पलटे जाने से घबरा गये । टार्च जलाकर उन्होंने देखा तो कार के नीचे रखी हुई केलों की टोकरी के केलों को ‘लार्ड मेयर’ बड़े मजे से खा रहा था ।
केनिया में ‘अम्बोसेली’ गाँव पास पशुओं के लिए एक ‘अभय आरण्य’ है जिसमें एक हाथी रहता था । वह विनोदी स्वभाव का था । सँकरे रास्ते के मोड़ पर वह खड़ा रहता, जैसे ही कोई कार आती दिखाई देती, दौड़ने का दिखावा करता तथा जोर से चिंघाड़ने लगता था । कार में बैठे हुए लोगों को घबराया देखकर उसे सन्तोष हो जाता, वह वापस लौट जाता और एक किनारे पर खड़ा होकर लोगों को देखता रहता और अपनी छोटी आँखें चमकाता ।
‘क्वीन एलिजाबेथ पार्क’ में हजारों हाथी देखने को मिलते । ‘वार्डेन बेरे’ ने देखा कि हाथियों के झुण्ड में से एक सुन्दर नौजवान हाथी बाहर निकला । थोड़ी देर बाद एक हथिनी उसके पीछे-पीछे सिर हिलाते-हिलाते चल पड़ी । लगभग 200 गज दूर जाने पर नर हाथी ने अपनी सूँड़ के साथ अपने सिर वहाँ तक ऊँचें किये जहाँ तक दोनों के होट चुम्बन के लिए मिले । इतना ही नहीं हथिनी ने हाथी को खेल-खेल में थपथपाया और हाथी ने घास का एक पूड़ा उठाकर और मिट्टी झाड़ कर हथिनी को उपहार स्वरुप भेंट किया ! हथिनी ने उसको अपने मुँह में डाल कर कन्धे से कन्धा घिसते हुए एक दूसरे का चुम्बन करते हुए, वे झाड़ियों में ओझल हो गए । उनका ‘हनीमून’ दस महीने तक चलता है । गर्भिणी हथिनी की देखभाल एक बूढ़ी हथिनी किया करती है । बच्चे को 21 मास तक माँ दूध पिलाया करती है । बच्चा सूँड़ को ऊपर उठा कर दूध मुँह से ही पीता है । हाथी अपने बच्चों पर मनुष्य जैसा वात्सल्य रखते है । जैसे मनुष्यों में कोई वाँयें हाथ से तथा कोई दाँये हाथ से काम करता है वैसे ही हाथी भी जमीन से आलू इत्यादि कन्द अपने एक ही दन्त दन्त सूँड़ से ही निकालता है । हाथी को अपनी खुराक के लिए 16 घण्टें तक परिश्रम करना पड़ता है । उसकी प्रतिदिन की 340-400 किलो घास या पत्तियाँ खुराक होती है तथा 30-40 गैलन तक पानी की जरुरत होती है । हाथी की नींद आदमी की आधी हुआ करती है ।
हाथी दो मील की दूरी से मनुष्य की गन्ध को पहचान लेता है, इतना ही नहीं पद चिन्हों को सूँघकर जान लेता है कि कोई उसका दुश्मन है या सामान्य आदमी । दुश्मन को वह कभी भूलता नहीं । ऐसे ही जिसने प्यार किया है उसके प्रति जिन्दगी भर बफादर रहता है ।
केनिया के कर्नल ‘ब्रूशमिथ’ ने एक हाथी के बच्चे के पिछले पैर में घाव पाया, वे बच्चे को अपने घर ले गये और कुछ दिन डे्रसिंग करके उसको ठीक कर दिया । कुछ महीनों बाद इस हाथी को नैरोबी जहाज पर चढ़ाया गया तब तक, जब भी हाथी का बच्चा कर्नल को देखता, अपनी सूँड़ से उसका हाथ पकड़ कर अपने घाव वाले स्थान पर ले जाता और आँखों से आभार व्यक्त करता ।
अपने भारतवर्ष में तो हाथी की चतुरता के बारे में अनेकों कहानियाँ है । मनुष्य से बढ़कर बुद्विमत्ता के कारण ही सबसे पहले हाथी की सूँड़ वाले गणपति की पूजा की जाती है ।
जर्मनी के ‘म्यूनिक विश्व विद्यालय’ के प्राणि शास्त्र के प्रोफेसर ‘डा. कोन्राड लारेन्ज’ ने विगत अनेकों वर्षों से विभिन्न पशुओं एवं पक्षियों के व्यवहार एवं भाषा पर अनुसन्धान कार्य किया है । उनका कहना है कि पशुओं के सामाजिक व्यवहार एवं मानवीय सामाजिक व्यवहारों में आर्श्चयजनक समानता पायी जाती है ।
सामान्यतः पशुओं के बारे में यह मान्यता रही है कि उनमें मानवीय गुण जैसे अनुभवी, योग्य एवं वृद्वों का सम्मान करना आदि गुण नहीं पाये जाते है और “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत चरितार्थ होती है अर्थात् शारीरिक बल की प्रधानता होती है । परन्तु डाक्टर लारेन्ज के अनुसन्धानों से ज्ञात हुआ है कि पशुओं में भी मानवीय गुण होते है । लापरवाह कौए जैसे क्षुद्र प्राणियों में भी बड़ों का आदर एवं उनकी योग्यता अनुभव, पद आदि का सम्मान करना जैसे गुण पाये जाते है । टेलीफोन के तार पर बैठे पंक्तिवद्व कौवों का सूक्ष्म अवलोकन करने से पता चलेगा कि वे दाँये आयु, योग्यता एवं अनुभव आदि के अनुसार बैठे हुए है । कौवों के समूह में निर्बलों का रक्षण सबलों के द्वारा अवश्य किया जाता है ।
पशु भी लड़ाई के नियमों का पालन करते है । मुर्गों की लड़ाई में प्रायः देखा जाता है कि जब कोई मुर्गा जीत न सकने की सम्भावना होने पर अपनी गर्दन झुका लेता है तो दूसरा बलवान मुर्गा उसके समर्पण को स्वीकार करके युद्व बन्द कर देता है ।
डा. लारेन्स ने हंसों पर भी हल गहन अध्ययन किया है और पाया कि उनमें विवाह आदि का सामाजिक स्वरुप होता है तथा स्नेह भरा दाम्पत्य-जीवन और सभी के मर जाने या बिछुड़ जाने पर मानवीय-विरह-व्यथा सम्बेदनाएँ व्यक्त करते है तथा ब्रहृचर्य जीवन व्यतीत करते है ।
हंस एवं अधिकाँश अन्य प्राणी विभिन्न प्रकार की ध्वनियों के द्वारा अपने भावों की अभिव्यक्ति करते है । इतना ही नहीं अपनी विभिन्न शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से भी वे भावाभिव्यक्ति करते है । इसको वैज्ञानिक लोग ‘रिलीजर मिकैनिज्म’ कहते है । हंसों में लम्बी गर्दन के कारण गर्दन को विभिन्न प्रकार से मरोड़ने की सैकड़ों मुद्राएँ पायी जाती है जो कि उनकी भाषा के संकेत है । डा. लारेन्ज के इन अध्ययनों से विज्ञान की शाखा (इयोलोजी) मानव व्यवहार विज्ञान को नये आयाम मिले है मानव ईश्वर की सर्वोकृष्ट रचना है लेकिन नैतिक मूल्य केवल मनुष्यों की ही सम्पति नहीं है वरन् पशु-पक्षियों में भी नैतिक मर्यादाएँ पायी जाती है ।
विश्व के सबसे अधिक विकसित केन्द्र बन्दरों के अध्ययन के लिये बने हुए है, इनमें तीन प्रमुख केन्द्र विशेष प्रसिद्ध हैं-(1) क्योटो यूनीवर्सिटी का ‘प्राइवेट रिसर्च इन्स्टीट्यूट (2) इन्यूयामा का जापान मंकी सेन्टर (3) ओसाका सिटी यूनीवर्सिटी । इन केन्द्रों से सर्म्पक बनाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों का आना जाना लगा रहता है ।
वहाँ के इन प्रमुख केन्द्रों में 2400 बन्दरों के 24 से 30 वर्षों तक के रिकार्ड रखे गये है जिनमें उनके व्यावहारिक ढ़ंग पारिवारिक एवं सामाजिक सम्बन्ध, स्वास्थ्य आदि का विस्तृत विवरण संकलित किया जा रहा है ।
जापान के ‘ऐथोपोलोजिस्ट’ जूनीकीरो इटैनी’ का कहना है कि बन्दर क्रमशः प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे है । वे नयी चीजें सीखते रहते है और उनके बच्चे नवीन आदतों को ग्रहण करते रहते है । बन्दरों में 60 प्रतिशत व्यवहार शिक्षण द्वारा प्राप्त किये जाते है ।
प्रारम्भ में बन्दर अधिक समय पेड़ों पर ही रहा करते थे । अनुसन्धानकर्त्ता टोली आने के बाद से वे अब अपना 80 प्रतिशत तक समय जमीन पर ही बिताते हैं तथा दो पैरों पर खड़े होकर काफी दूर तक चल लेते है ।
इसी प्रकार उन्होंने अपने खाने के तरीकों में नये-नये ढ़ंग सीख लिये है । पहले अनाज के मिट्टी या बालू में मिले होने पर एक-एक दाना बीनकर खाते थे और अब गेहूँ और बालू को मुट्ठी भरकर नदी के किनारे दौड़ जाते है तथा पानी में डाल देते है जिससें बालू तो नीचे बैठ जाती है और वे गेहूँ खा लेते है । ऐसे ही वे पहले पानी में कभी नहीं जाते थे । प्रारम्भ में तो पानी में मूँगफली आदि के दाने डालने पर उन्हें लेने जाने लगे फिर तो स्वंय ही तैरने, उछलने, खेलने आदि में खूब आनन्द लेने लगे है ।
अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए 38 विभिन्न प्रकार की ध्वनियों का आविष्कार भी बन्दरों ने किया है जिनके द्वारा वे अपनी भावनाओं, आदेशों एवं निर्णयों आदि को व्यक्त करते है जैसे ‘क्यान’ ध्वनि का अर्थ ‘खतरा’ होता है ।
विशेषज्ञों ने अध्ययन करके पता लगाया है कि बन्दरों में उत्तम सामाजिक व्यवस्था भी होती है । प्रत्येंक समूह का एक नायक होता है। नायक का चुनाव प्रजातन्त्र प्रणाली से होता है और स्त्रियों के बोटों को अधिक महत्व दिया जाता है। जिसे स्त्रियों का विश्वास प्राप्त नहीं होता, उसे निष्कासित कर दिया जाता है।
बन्दर जब विश्राम करते हैं तो दो वृत्ताकार घेरों में बैठते हैं । भीतर वाले घेरे में नायक, स्त्रियाँ एवं शरारती रहते हैं। भोजन के समय अपने-अपने ‘रैन्क’ के क्रम से भोजन करते हैं । उनमें बड़ों के प्रति सम्मान करने का तरीका है धीरे से उनके पीछे हो जाना तथा उनकी गरदन के बालों को सहलाना।अब ये बन्दर मनुष्यों के साथ मित्रता भी करने लगे हैं। एक समय, एक छोटे बन्दर के बच्चे को एक पेड़ की टहनी देते हुए वैज्ञानिक को देखकर एक बड़ा बन्दर वैज्ञानिक महोदय के ऊपर आक्रमण करने लगा। बच्चे की माँ ने तुरन्त ‘को-को-को’ ध्वनि द्वारा नायक को बुला लिया। नायक ने उस बन्दर को हटा कर भगा दिया।बन्दर तो मानवीय गुणों की नकल करके अपने स्वभाव में परिवर्तन करने लगे हैं, परन्तु मानव अपने गुणों को छोड़ता हुआ पशुता की सीमा से भी नीचे गिरता चला जा रहा है।ममता और स्नेह की भावना मनुष्यों में ही नहीं अन्य प्राणियों में पाई जाती है किसी न किसी में तो सभ्य कहे जाने वाले मानव से भी अधिक होती है।
कछुए और घड़ियाल ऐसे प्राणी तो अपने अण्डों को सुरक्षा की दृष्टि से बालू में छिपा रखती है किन्तु बच्चे के कुबुलाने लगने पर अण्डा तोड़ कर उसे उससे बाहर कर लेती है।
धनेश नामक पक्षी जब अण्डा देती है तो किसी पेड़ के खोखले में नर धनेश मादा धनेश को इस प्रकार घोंसला बना कर बन्द कर देता है कि मादा धनेश की चोंच तक ही दिखई पडत्रती है। नर धनेश अपने पारिवारिक उत्तरदायित्य अकेले ही उठाता है और काफि दौड़ धूप कर मादा धनेश के लिए भी भोजन इकट्ठा करता है और बाहर से ही उसकी चोंच में डाल-डालकर दिखलाता रहता है। अण्डों से बच्चे निकल आने पर नर धनेश मादा के ऊपर के घोंसले को तोड़कर उसे बाहर निकाल लेता है।
पनडुब्बी पक्षी सुरक्षा की दृष्टि से अपने बच्चों को उनके समर्थ होने तक पीठ पर लादे-लादे फिरती है और संकट आने पर बच्चे सहित डुबकि लगा कर दूर निकलती है। यह उसकी ममत्व की भावना का ही परिचायक है।
स्तनधरियों में स्पइनी एन्ट ईटर उण्डज प्राणी है। स्तन की जगह इसके ष्शरीर में स्तन ग्रन्थियाँ होती हैं। अण्डों से निकल कर इसके बच्चे चुँगते नहीं बल्कि मादा की स्तन ग्रन्थियों से एक प्रकार का तरल पदार्थ बहने लगता है जो इसके बालों में चिपक जाता है। एन्ट ईटर के बच्चे इस स्त्राव को चाट कर अपनी क्षुधा की पूर्ति करते हैं!
मदा कंगारु के पेट में एक शिशु धानी होती है। इस शिशु धानी में ही मादा कंगारु अपअने बच्चे को छिपा लेती है। शिशु धानी के अन्दर ही पेट में मादा कंगारु का स्तन होता है। जिससे दूध की धार स्वतः बहती रहती है और उसहाय बच्चे पीते रहते हैं।
बिल्ली अपने बच्चों को पालन-पोषण से लेकर उनके समर्थ होने तक उनका मार्गदर्शन करती है। बच्चों को शिकार करने से लेकर घर-घर घुमाकर बच्चों को हर परिस्थिति से परिचित करा देती है।
बन्दरों में ममत्व की भावना सबसे ज्यादा पायी जाती है। मादा बन्दर अपने बच्चों को पेट और पीठ में चिपकाए-चिपकाए फिरती रहती है। यहाँ तक कि बच्चे के मर जाने पर भी वह उसकी लाश को तब तक लिए रहती है जब तक कि वह सड़ने न लगे। प्राणियों में ममत्व की इसे पराकाष्ट ही कहनी चाहिए।
चतुरता एक बात है और सद्भावना दूसरी। सौभग्य एक बात है और सौष्टुव दूसरी। मनुष्य को अन्य प्राणियों से कई प्रसंगों में प्रकृति से अधिक अनुदान मिले हैं सो ठी है। पर यह नहीं मान बैठना चाहिए कि वे सद्भावना और सौष्टुव की दृष्टि से भी पिछड़े हुए है। सभ्यता नहीं मिली है तो भी वे अनेक बातों से मनुष्य की अपेक्षा अधिक शलीन देखे जाते हैं।
मगधराज शतंजय की कन्या जितनी रुपवती थी, उतनी ही गुणवती भी। उसके गुण और रुप की चर्चा दूर-दूर तक फेनले लगी। जिस युवराज या उच्च कुल के युवक के कानों तक उसकी चर्चा पहुँचती, वही उसके विवाह की कामना करने लगता। कई राज परिवार के ष्युवक तथा सुसम्पन्न जन उसे अपनी जीवन संगिनी बनाने के लिए लालायति थे। कइयों ने इस तरह के प्रस्ताव भी सम्राटष्शतंजय तक पहुँचाए थे।
महाराज को भी एक दिन विचार करना ही पड़ा कि सुवासिनी के लिए उपयुक्त वर का चयन कैसे किया जाए? मन्त्री परिपद के परामर्श से स्वयंवर के आयोजन का निश्चय हुआ ताकि स्वयं सुवासिनी अपने लिए उपयुक्त वर का चुनाव कर सके। इस आयोजन की सूचना अन्य राज्यों में तथा स्वयं के राज्य में श्रेष्ठजनों तक पहुँचा दी गई। राजकुमारी ने स्वयंवर की इस घोषणा में अपनी ओर से यह भी जोड़ा कि वह उसी का वरण करेगी जो पूरी तरह सुखी हो और अपनी भावी पत्नी को हर तरह से आनन्दित रखने की सामर्थ्य रखता हों।
नियत समय पर राजपुत्र, व्यवसायी और विद्वान वर्ग के अनेकों प्रतिभाशाली व्यक्ति एकत्रित हुए। सभी को यथा स्िन सम्मानपूर्वक बिठाया गया। जयमाला हाथ में लिए उ्घोपक कंचुकी ने उच्च स्वर में कहा, ‘आप सभी सम्भ्रान्त जानों को यह तो ज्ञात हो ही गया होगा कि हमारी राजकुमारी सुख और आनन्द की प्राप्ति के लिए व्यग्र है। इस वैभव सम्पन्न राजभवन में भी उन्हें सुख और आनन्द का अभाव ही दिखाई देता है तो आप सब एक-एक कर प्रमाणित करें कि राज कुमारी जी को सुखी और आनन्दित रख सकेगें।
एक-एक कर राजकुमारों ने अपने साधनों और क्षमताओं का जो परिचय प्रस्तुत किया, वह लगभग एक ही जैसा था। सभी का कहना था कि हमारे पास ऐर्श्वय की कमी नहीं है, हम लोग सुदृढ़ साम्राज्य के स्वामी हैं। सुख और आनन्द के विपुल साधन हमारे पास हैं, जिनके द्वारा हर प्रकार का आनन्द प्राप्त किया जा सकता है।
सभी राजकुमारों का परिचय सुनकर सुवासिनी ने कहा, आप लोग भावी सम्राट हैं, पर आपका राज्याध्यक्ष होना तो प्रजा ही इच्छा के अधिन है। जनता की आकाँक्ष्ज्ञा से ही आप सिहासना रुढ़ हो सकते हैं और सम्राट रह सकते हैं। आप लोगों को नियमों और मर्यादाओं में रहकर ही राज्य संचालन करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में आप स्वतन्त्र कहाँ रहे? और जो पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं है उसके लिए सुख कहाँ? आनन्द कैसा?
राजपुत्राो के पास सुवासिनी के इन प्रश्नों को कोई उत्तर नहीं था। तथ्य ही एकसा था कि प्रत्युत्तर की कोई गुँजाइश ही नहीं थी।
अब श्रेष्टि वर्ग की वारी थी। वही प्रश्न उससे भी पूछा गया। वणिक पुत्रों ने अधिक उत्साहपूर्वक कहा, हम स्वतन्त्रापूर्वंक व्यापारी करते हैं और न ही साधन विहीन। राजकुमारी ने उन सवों से कहा, आपकी बुद्धि और स्वतन्त्रता तो धन के लिए बिकि हुई है। धन की हानि लाभ के साथ आपका सुख और आनन्द जुड़ा हुआ है फिर सुखी और स्वतन्त्र कैसे हुए?
वैश्य पुत्र भी निरुत्तर होकर रह गए। अगला कक्ष विद्धानो का था। विद्या के धनी सुप्रसिद्ध, आचार्यो ने उपनी बात कही। अपने ज्ञान और सम्ममान सहित साधनों की विपुलता तथा वैभव सम्पन्नता का परिचय दिया एवं अपने आपको स्वतन्त्रता का पृष्ट पोषक तथा अधिपति बताया राजकुमारी ने अपने उत्तर में उनसे निवेदन किया ‘आप ज्ञानवान होते हुए भी लोभ, मोह और यश की कामना से बँधे हुए है। जीवन मृत्यु का ग्रास है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ और मृत्यु की घड़ियाँ कभी भी आपके आनन्द तथा स्वातन्त्रय को नष्ट कर सकती है।
विद्वज्जन क्या उत्तर देते? इस स्तर पर तो वे भी सचमुच पराधीन ही थे। अखण्ड आनन्द का उपयोग उनके लिए भी कहाँ सम्भव था। सो वे भी चुपचाप अपने-अपने स्िनों पर बैठ गए। अब कोई नहीं बचा था जो अपने सुखी और आनन्दी होने का दावा कर सकता था। अतः आयोजन बिना किसी निर्णय के विसर्जित हो गया।
महाराज को आयोजन की इस विफलता का भारी क्षोभ हुआ। इन परिस्थितियों में सुवासिनी को क्या कुमारीी ही रहना पडे़गा? शतंजय को यह चिन्ता सताये जा रही थी। इसके लिए उन्होंने महर्षि अगस्त से परामर्श किया। अगस्त ने उन्हें राजकन्या के साथ अपने आश्रम में कुछ समय तक निवास करने का आमन्त्रण दिया। थोडे़ ही दिनों बाद महाराज शतंजय अपने परिवार के साथ गंधमादन पर्वत पर बने महर्षि अगस्त के तपोपन में पहुँच गए।
अगले ही दिन महर्षि ने सुवासिनी को अपने अध्ययन कक्ष में बुलाया। उसने यही पूछा कि ‘उपयुक्त वर के चुनाव के लिए भद्रे तुमने सुखी और आनन्दित होने की कसौटी ही क्यों चुनी?’
सुवासिनी ने कहा-पूज्वर! ठस कसौटी का निर्धारण मैंने इस विचार से किया था कि जो स्वंय आनन्दित होगा वही तो मुझे सुखी रख सकेगा। जो स्वयं सुख हीन है, उससे मुझे कौन-सा सुख मिल सकेगा?”
‘अन्यों के निरानन्द और परावलम्बी होने का विवेचन हो चुका,’ महर्षि ने काह, ‘पर सुवासिनी यह तो बताओ कि जोइस आनन्द और स्वत त्रता का अभिलाषी है; वह कौन है? क्या वह स्वयं इन विभूतियों को पाने और पचाने की स्थिति में है। अपने अह्म को तो खोजों, उसे तो समझों।
स्वासिनी को लगा जैसे उसे किसी ने झखझोर कर रख दिया है। पाकर उसे पचाने वाली क्षमता भी तो होनी चाहिए। प्रश्न बहुत जटिल था और सुवासिनी उसका उत्तर नहीं खोज पा रही थी। वह चुपचाप बैठी जमीन ओर निहार रही थी। ऋषि ने राजकन्या को मौन देखकर कहा, ‘देवी! क्या दूसरों से आनन्द पाने की इच्छा आकाँक्षा स्वयं बन्धन नहीं है? क्या तुम्हारा आनन्द साथी की खोज में अन्यत्र अटका नहीं है? शैशव, यौवन, जरा और मृत्यु से, वाँछाओं की तृप्ति से तुम बँधी हुई पराधीन तथा आनन्दहीन नहीं हो? यदि हो तो आनन्द और सुख का स्त्रोत अन्यत्र कहाँ मिलेगा?
‘क्या मैं भी पराधीन हूँ, ‘सुवासिनी ने अत्यन्त अद्विग्न और व्यग्र होकर पूछा। महर्षि सहज वात्सल्य भव से मुस्करा रहे थे। कामना ग्रसित और कहाँ स्वातन्त्रय?”
फिर मेरा अभीष्ट क्या मुझे कभी न मिल सकेगा? मैं निरानन्द और पराधीन ही भटकती मरुँगी? क्या स्वतन्त्रता और आनन्द केवल स्वप्न है?’ एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लगा दी राजकन्या ने।
उसके चुप होने पर महामुनि ने कहा, ‘देवी जो हो, उसे अपने भीतर ही पाओगी, तप के प्रकाश में ही उसे देखोगी जो बाह्य जगत में कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। आत्मा ही आनन्द का आगार और केन्द्र है। बाहर तो उसकी सुवास मात्र बिखरी होती है।
सुवासिनी को जैसे समाधान मिल गया था और दिशा भी। राजपरिवार तपोवन में लगभग एक मास ठहरा। सुवासिनी इस बीच एकान्त आत्मचिन्तन में ही निमग्न। न उसे प्रकृति सौनदर्य के अवलोकन में रस आया और न उसने किसी अन्य दिशा में अपना ध्यान बँटने दिया।
मगधराज लौटने की तैयारीकरने लगे। पर सुविसिनी ने लौटने की कोई उत्सुकता नहीं दर्शाई। उसने अपने रत्न पड़ित आभूषण पिता के चरणों पर रखें और रुँधे हुए कण्ड से कहा, देव! मैने सुख और आनन्द की दिशा ढूँढ़ ली है। इसे प्राप्त करने के लिए कुछ काल तक मैं आश्रम में ही रुक कर तप साधन करुँगी और फिर राजभवन आने के सम्बन्ध में सोचूँगी।
योग मुख्यता जीव चेतना को ब्रह्मचेतना के साथ जोड़ देने वाली भावनात्मक एवं विचारणात्मक पद्धिती है। उसमें दार्शनिकता प्रधान है तथा हलचल कम। योगी अपनी हलचलों को समेटते हैं और शरीर की शिथिलता को मन की शान्ति एकाग्रता की स्थिति में ले जाने का प्रयत्न करते है। इससे अर्न्तजगत की थकान दूर हो होती है और ध्यान धारणा के सहारे समाधि स्तर को विश्रान्ति प्राप्त करने के उपरान्त वह स्थिति बन जानी है जिसमें नव जीवन का नये सिरे से निर्धारण सम्भव हो सके। ब्रह्म विद्या का तत्वदर्शन मन और चिन्तन परक है उपनिषद् में योग का प्रतिपादन इसीरुप में हुआ हैं।
योग का भौतिक पक्ष वह है जिसमें शारिरिक हलचलों पर अधिक ध्यान दिया गया है और उसके सहारे स्वास्थ्य रक्षा के लिए प्रयत्न किया गया है। इस प्रतिपादन का तर्क यह है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। इसलिए मन को सुसंस्कृत बनाने से पूर्व शरीर को स्वस्थ बनाने की आवश्यकता हैं।
तर्कों का यह सिलसिला र्व्यथं है। शरीर प्रथम या मन इस विवाद में पडे़ बिना भी यह माना जा सकता है कि स्वास्थ्य की अपनी उपयोगिता है और प्रधान या गोण ठहराने के झंझट में पडे़ बिना भी महत्वपूर्ण समझा जाए। इसके लिए जो योग साधन उपयोगी हो सकते हैं उन्हें काम में लाया जाय।
योग साधन के शरीर पक्ष में आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा जैसी क्रियापकर विधियों का समावेश है। हठयोग के अर्न्तगत नैति, धेति, वस्ति, न्यौलि, बजौली कपालमति, आदि जिन शोधन कृत्यों का विधि विधान हैं उन्हें भी इस स्तर का माना जा सकता है। व्रत उपवास एवं तितीक्षा उपचार भी लगभग इसी श्रेणी के हैं। इनका उद्देश्य षरीर को निरोग समर्थ बनाना है। फिर भी जिन सिद्धान्तों, उपायों का इस प्रकार के क्रिया-कृत्य में उपयोग किया जाता है उनका पराक्ष्ज्ञ रुप् में चेतना को परिष्कृत करने में भी कुछ न कुछ उपयोग रहता ही है। स्वास्थ्य सुधार का लाभ भी कम महत्व का नहीं है। उसके लिए जो उपचार का म में लाये जाते हैं उन्हें योग विद्या के भौतिक पक्ष की पूर्ति करने वाले माना और अपनाया जा सकता है।
विज्ञान क्षेत्र में षरीर को ही प्रधानता मिली है इस लिए योग के सर्न्दभ में उसका वही पक्ष आकर्षक लगा है जो स्वाथ्य सर्म्बधन के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए विदेशों में आसन प्राणायाम को ही योग माना गया है बहुत हुआ तो मानसिक एकाग्रता को भी इसमें सम्मिलित कर लिया जाता है।
आसनों के सम्बन्ध में जो शोध देश और विदेश में चला है उससे वे अंग संचालन की सामान्य व्यायाम प्रक्रिया न रह कर उससे अधिक बढे-चढे़ सिद्ध हो रहे हैं। स्पष्ट है कि जिसे प्रयोगशाला स्वीकार करती है उन्हें अन्य लोग भी अपनाने लगते है। अगता है जिन आसन अभ्यायाँ को पिछले दिनों उपहासास्प्द ठहराया जाता था उन्हें अगले दिनों ताथकथित लोगों को भी उपयोगिता देखते हुए आकर्षित होना पडे़गा।
रुस के व्यायाम-चिकित्सा के प्रोफेसर एम. सारकी सौव सैराजिनी ने “मैन मस्ट बी हेल्दी” नामक पुस्तक लिखी है। वे वहाँ अपने विषय के मर्मज्ञ एवं विशेषज्ञ मसझे जाते है। अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने स्व्स्थ रहने के लिए यौगिक श्वसन का परामर्श दिया है।
सेन्ट्रल क्लीनिकल हास्पीटल मास्को के बाल-रोग विशेषज्ञ एवं सर्जन डा. अनातोली मैड बैस्टकाई रोगी बालकों कमो सरल एवं साधरण योगासनों का नुस्खा बताते हैं और इस कार्य में वह विशेष सफलता प्राप्त करते हैं।
रुस के ही काँन्सटेनिटन बुटिको नामक हृदय रोग विशषज्ञ चिकित्सक ने सैकड़ों विभिन्न प्रकार के बीमारों को योगिक क्रियाओं द्वारा ठीक करने में आशातीत सफलता प्राप्त की उन्होने दमा से पीड़ित व्यक्तियों को औषधियाँ देने के बजाय यौगिक श्वसन की क्रिया का अभ्यास कराया। परिणाम स्वरुप् उनके शरीर में प्रवेश करने वाली आँक्सीजन व कार्बनडाय आक्साइड के बीच रहने वाला असन्तुलन दूर हो गया और दमा के रोगियों को बहुत लाभ हुआ। दमा के अतिरिक्त वह यौगिक क्रियाओं द्वारा मिर्गी, उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग जैसी भयानक बीमारीयों का सफल उपचार करते है।
वर्तमान समय में विश्व में करोड़ों की सख्या में मधुमेह के रोगी है। मेडीकल साइन्स के द्वारा अभी तकइसका कोई सुनिश्चित उपचार ज्ञात नहीं हो सका है। 400 ई. पू. सुश्रुत ने इस बीमारीयों के रोगियों कें मूत्र में मिठास की उपस्थिति बताई थी। ईसा की 17वीं शताब्दी में वैस्ट विली, ने मधुमेह से पीड़ित रोगी के मूत्र में शक्कर की उपस्थिति का परीक्षण करके दिखाया। मधुमेह के रोगी की समस्त अन्तस्त्रावी ग्रन्थियाँ प्रभावित होती हैं। प्रारम्भ में रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम एवं पैन्कियाज से त्रावित इन्सुलिन की मात्रा में कमी पाई जाती हैं।
सेन्ट्रल कौन्सिल फार रिसच इन इण्डियन इन्डिजिनस मेडीसन एण्ड होम्योपैथी, द्वारा आयोजित-प्रथम वैज्ञानिक सम्मेलन में डा. धर्मवीर, नारायण वरन्दानी और स्वामी आनन्द में मधुमेह की चिकित्सा में ‘योग का योगदान सम्बन्धी कुछ प्रयोगों का निर्ष्कष प्रस्तुत किया।
यौगिक ट्रीटमेंट रिसर्च सेन्टर” नामक संस्था में विभिन्न आयु वर्ग के 283 मधुमेह के रोगियों पर तीन महीने के लिए प्रयोग किया गया। रोगियों को सन्तुलित भोजन के रुप में 68 ग्राम वसीय पदार्थ, 400 ग्राम कार्बोहाईड्रेट्स, 200 ग्राम प्रोटीन और कुल 2600 कैलोरी नियमित ढंग से प्रदान किये गये। समय-समय पर उनका भार, मूत्र परीक्षण, खून में शूगर ग्लूकोज की जाँच तथा हृदय का ई.सी.जी. द्वारा परीक्षण किया गया।
रोगियों को प्रतिदिन प्रातः साय दो बार सर्वांगासन, हलासन मयूरासन, पादहस्त्रासन, शवाशन आदि सरल आसन एवं कुछ अन्यान्य यौगिक क्रियाएँ करायी जाती रहीं। साथ ही उनकी दिनचर्या नियमित क्रम सेरखी गयी तथा प्रार्थंना भजन-पूजन, ध्यान-साधनाआदि का भी समावेश रखा गया।
तीन महीने के पीरक्षण के बाद देखा गया तो ज्ञात हुआ कि 52 प्रतिशत रोगी लाभान्वित हुए उनमें से अधिकाँश पूर्ण स्वस्थ हो गए। इस अवधि में भी जिन्हें बहुत अल्प लाभ पहुचा या ठीक नहीं हुए वे या तो जन्म से रुग्ण थे अथवा लम्बों अवधि से बीमार रहे थे।
‘योग लाइफ’ के 1677 के अंक में डा. लक्ष्मीकान्तन का ‘योग ऐण्ड दी हार्ट’ नामक लेख छपा था। डाँ. लक्ष्मीकान्तन् मेडीकल कालेज मद्रास के प्रोफेसर है। उन्होंने गवर्नमेंन्ट जनरल हाँस्पीटल में विभिन्न हृदय रोगियों पर आसनों का प्रभाव देखने के लिए प्रयोग किए । उन्होने ऐसे उच्च रक्तचाप वाले रोगियों के ऊपर प्रयोग किये जिन्हें मेडीकल चिकित्सा से कोई विशेष फायदसव नहीं हुआ। प्रोफेसर लक्ष्मीकान्तन जी ने दो प्रकार के योगासनों का अभ्यास रखा (1) जिनके रक्तचाप अधिक उच्च थे और हृदय कमजोर थे उनको केवल (शवासन में ही पैरों के नीचे नरम तकिया लगाना) का अभ्यास कराया इनकों करने से रोगियों को काफी आराम मिला।
(2) जिनके हृदय मजबूत थे अनके उपरोक्त अभ्यास के साथ हलासन, सर्वागासन और विपरीत करणी मुद्रा का भी अभ्यास कराया।
टासनों के अभ्यास के उपरान्त रोगियों को अधिक स्फूर्ति एवं शक्ति का अनुभव हुआ और उन्हें पहले की अपेक्षा अधिक अच्छी गहरी नींद आने लगी।
इसी प्रकार के परिणाम डाँ. के.के. दाते ने भी शवासन के प्रभाव हृदय-रोग के रोगियों पर पायें हैं।
पटना के डा. श्रीनिवास एवं अमेरिका के डा. बेनसत ने प्रयोगो के आधार पर देखा कि हृदय रोगो पर ध्यान का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता हैं।
आसन व्यायाम पूर्णतः वैज्ञानिक व्यायाम-पद्धति है। इसमें माँस-पेशियों में खिंचाव एवं फेलाव होने से रक्त प्रवाह की गति में कुछ तीव्रता आती है जब कि उन्य व्यायाम जैसे दंड-बैठक आदि से दबाव पड़ता है जिससे पेशियाँ कठोर हो जाती हैं। आसनों से पेशियों में लचीला पन आता है। शरीर में स्फूर्ति की अनुभूति होती हैं।
शीर्षासन को आसनों में सबसे उत्तम कहा जाता है। इन पर वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण भी किये जा रहे हैं। सर्वप्रथम पोलैण्ड के थर्ड क्लीनीक आँफ मेडीशन के डायरेक्टर एलेक्जान्ड्रो विच [जूलियन] ने शीर्षासन के द्वारा शरीर के अवयवों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया। उन्होंने एक शरीरिक एवं मानसिक रुप् से सन्तुलित स्वास्थ्य वाले एकाग्र चित्त वाले व्यक्ति पर शीर्षासन के प्रभाव को देखने के लिए एक्सरे एवं ई.सी.जी. आदि उपकरणों की सहायता ली।
प्रोफेसर जूलियन ने उस व्यक्ति से खाली पेट की स्थिति में 30-40 मिनट शीर्षासन कराके षवासन में विश्राम कराया। आसन के पूर्व एवं बाद में किये गए परीक्षणों से निम्न निर्ष्कष निकाले।
शीर्षासन से रक्त को जमाने वाले पदार्थ सीरम, जो रक्त में पाया जाता हैं, उसकी मात्रा में सन्तुलन आने लगता हैं। उन्होंने शीर्षासन के नियमित अभ्यास से हृदय रोग के दौरे रोके जा सकने की सम्भावना व्यक्त कि है।
रक्त में श्वेत रक्त कणों की वृद्धि पायी गयी जिससे षरीर की जीवनी शक्ति एवं रोग-निरोधक क्षमता में वृद्धि पायी गयी।
शीर्षासन की स्थिति में एक्सरे द्वारा देखे जाने पर वक्षस्थल फेला हुआ जाया एवं हृदय पूरी तरह दबाव रहित देखा गया।
फेफड़ों को भी पर्याप्त खुला स्िन मिलता है। फेफड़ो में आँक्सीजन की खपत में 33 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी तथा ष्वास की दर एवं मात्रा में कमी पाई गयी। श्वास की मात्रा तो प्रति मिनट 8 लीटर के स्िन पर 3 लीटर हो गयी परन्तु फेफड़ो की उसकों ‘कन्ज्यूम’ करने की क्षमता बढ़ गयी। निष्कासित दूषित वायु में आक्सीजन की मात्रा में 10 प्रतिशत कमी हो गयी।
भुजंगासन पर अनुसन्धान जून 1678 चेकोस्लोविया में हुआ। “फर्स्ट कान्फ्रेंस आन दि एप्लीकेशन आफ योग इन रिहेविलटेशन थेराँपी” मेंइस आसन पर विशेष प्रयोग किये गये। प्रयोग कर्त्ताओं ने पाया है इस आधार पर रक्तचाप और मानसिक तनाव को नियमित करने में सहायता मिलती है।
ल्नवाला (महाराष्ट्र) के योगाश्रम में चलने वाले प्रयोगों में सार्वांगासन, मयूरासन को सामान्य स्वास्थ्य सर्म्बधन और दुर्बलताग्रसित रोगियों के लिए अन्य आसनों की तुलना में अधिक उपयोगी पाया गया।
देश-विदेश में आसन उपचार के सम्बन्ध में चल रहे अनुसन्धान यह बताती हैं कि उन्हें सरल व्यायामों की तरह प्रयुक्त करते हुए कई ऐसे रहस्यमय लाभ उठाये जा सकते हैं जो ऐसी ही अंग संचालक की अन्य साधरण क्रिया पद्धतियों के माध्यम से सम्भव नहीं हैं।
मधुमक्खी फूल पर बैठी थी और रस चूस रही थी।
फूल ने कहा-देवि, इस संसार में आदान-प्रदान का क्रम है। आप रस भले ही लें, पर बदले में भी तो कुछ दें।
मक्खी ने फूल की बात अनसुनी कर दी और रस चूसती रही। उसने समरथ को नहीं दोष गुसाई की उक्ति का मन ही मन दुहराया और उसी का समर्थन किया।
एक दिन बहेलिया आया और शहद ही नहीं छत्ता भी तोड ले चला। मधुमक्खी दुःखी तो हुई, पर साथ ही मन को यह कह कर समझाती रही-मुफ्त की किसी को भी नहीं फलती तो मेरे लिए ही फलवती क्यों होती?
ह्वश द्यक्वह्लह्व स्रद्ध द्बभ्स्नद्मद्ग ड्डश्चश"द्मर्द्धं; ;द्मह्यह्लह्वद्म
महत्वपूर्ण काम करने के लिए उसके अपयुक्त ढाँचा खड़ा करना पड़ता है। युद्ध छेड़ने से पहले समर्थ सैनिक, अपयुक्त शस्त्र एवं आवश्यक साधन जुटाने पड़ते हैं। खेती तब होती है जब जमीन, हल, बैल, खाद, सिंचाई, आदि की व्यवस्था बन सके। उद्योग चलाने होंतो कारखाना, मशीने, पूँजी, कारीगर, प्रबन्धक आदि का प्रबन्ध करना होता है। मनुष्य वयस्क होने पर ही पुरुषार्थ एवं उपार्जन कर सकने योग्य बनता है। इस स्थिति तक पहुँचाने में अभिभावकों को बालक का भरीण-पोषण एवं शिक्षा, स्वाबलम्बन
आदि का कष्ट साध्य ताना-बाना बुनना पड़ता है। सरकार का ढाँचा कितना भारी हैं। उस विशालकाय तन्त्र के खड़े होनेप र ही शासन व्यवस्था के अनेकानेक कार्य[म बनते हैं। धर्मतन्त्र के सम्बन्ध में ही चश्मों में फेर बदल करते ही वस्तुएँ दूसरे रंग की दीखने लगती हैं। चिन्तन की दिशा धारा में परिवर्तन होते ही गतिविधियों में उलट-पुलट होती हैं और तदनुरुप् परिस्थितियों में जमीन, आसमान जैसा अन्तर दृष्टिगोचर होने लगता है। युग परिवर्तन का आधारभूत सिद्धान्त एक ही है कि मनुष्य के चिन्तन को संकिर्ण स्वार्थपरता से विरत करके लोकहित के उदार उद्देश्यों के साथ जोड़ा जाय। ऐसा बन पड़े तो विग्रह, विलास, और बडप्पन में संलग्न क्रियाशीलता को बर्बादीसे बचने और नव सृजन में जुट पड़ने का आवसर मिलेगा। जो कुशलता और सक्रियता, विनाश और विग्रह की दुष्प्रवृत्तियों कोइतनी समर्थ बना सकती है वे यदि सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन में लगेगी तो कोई कोई कारण नहीं वर्तमान नरक को भविष्य के र्स्वग
यही बात है। अर्थतंत्र समाज व्यवस्था, शिक्षा चिकित्सा, संचार, परिवहन आदि सभी महत्वपूर्ण प्रसंगों के लिए यही एक मात्र मार्ग है कि पहले समर्थ ढाँचा खड़ा किया जाय। इसके बाद उपयुक्त प्रतिफल की आशा की जाय।
प्रज्ञा अभियान को अपने युग को सर्वोपरि महत्व विस्तार एवं प्रभाव वाली प्रक्रिया कह सकते है। उसके माध्यम से समस्त मानव जाति के चिन्तल एवं रुझान की दिशा धारा बदलने की बात सोची गई है। इसी प्रकार विग्रह में संलग्न शक्तियों को सृजन में नियोजित करने से धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने की तैयारी की गई है।
रेडियों की सुई घुमाते ही दूसरे स्टेशन सुनाई पड़ने लगते हैं, सड़क बदलते ही दूसरे नजारे दीखते हैं। रंगीन में न बदला जा सके।
प्रज्ञा अभियान का आरम्भिक कार्य धर्मतन्त्र का पुनर्जजिवन है। जिसके सहारे जन-मानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृति सर्म्बधन का दुहरा प्रयोजन एक साथ पूरा हो सके। प्रज्ञा संस्थनों को प्रज्ञा अभियान का दृश्य माना, ढाँचा समझा जा सकता ह। जिसके खड़े होने पर यह आशा की जा सकेगी कि लोकमानस में उत्कृष्टता की फसल उगाई और मनुष्यों के रहने योग्य नई दुनिया बनाई जा सकेंगी।
प्रज्ञापीठों का समग्र ढाँचा चार आधारों पर खड़ा किया जा रहा है-(1) छोटी-बड़ी इमारतें (2) स्थयीं कार्यकर्ताओं की नियुिक्त (3) ज्ञानघटों के माध्यम से अर्थ व्यवस्था (4) घर-घर अलख जगाने वाले युग साहित्य एवं उद्बोधन उभर उत्पन्न करने वाले जन्मदिवसोत्सवों के माध्यम से जन-सर्म्पक। यह चारों प्रयोजन बन पड़ने पर चार दीवार वाला वह भवन बनकर तैयार होता हैं जिसकी छाया में सुविधापूर्वक निर्वाह किया जा सके। चार पाये की चारपाई होती है। उपरोक्त चार आधारों के सहारें ही प्रज्ञापीठें समग्र मानी जायेंगी और अपनी समर्थंता का परिचय दे सकेंगी।
चरणचीठे प्रज्ञापीठे इन दिनों तेजी से बन रही हैं। भारत के सात लाख गाँवों में हर सात गाँव पीछे प्रज्ञा संस्थान बनाने की-एक लाख निर्माणों की योजना है। हर संस्थान में न्यूनतम दो कार्यकर्त्ता काम करें तो दो लाख स्थायी लोकसेवी भावनात्मक नव सृजन में संलग्न होंगे और अपने प्रभाव एवं प्रयास से अन्य अंसख्यों को प्रशिक्षित, उत्साहित, आन्दोलित करेंगे।
लोकमानस को उलटने का कार्य युग साहित्य करेगा और उस युगान्तरीय चेतना को सुनाने, समझाने के लिए जन्मदिवसोत्सवों की छोटी विचार गोष्टियाँ घर-घर में निवोजित होती रहेंगी। प्रज्ञा संस्थानों में दो-दो घन्टे की तीन कक्षाएँ बालकों, प्रौढ़ों एवं महिलाओं को शिक्षित बनाने के साथ-साथ सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व भी वहन करेंगी। हर प्रज्ञा संस्थान में स्िनीय पुस्तकालय रहेगा और सात गाँव के कार्य क्षेत्र में चल पुस्तकालय चलेगा। स्वास्थ्य सर्म्वधन के लिए व्यायाम, उपचार एवं प्रशिक्षण होगा। रात्रि की कक्षाओं में ऐतिहासिक उद्धरणों के माध्यम से व्यक्ति परिवार एवं समाज के नव निर्माण की बौद्धिक, नैतिक एवचं सामाजिक क्रान्ति की पृष्ठीमि खड़ी होती रहेगी।
संक्षेप में यही वह ढाँचा है जिसके आधार पर युग परिवर्तन की विशालकाय योजना को हाथ में लेने और क्रियान्वित करने का साहस किया गया है। प्रारम्भ भारत से-हिन्दू धर्मानुयायियों-किया जा रहा है। क्योंकि मिशन के वर्तमान सूत्र संचालकों का नीजि सर्म्पक, अध्ययन, अनुभव एवं प्रभाव उसी स्तर का हैं। अगले दिनों मिशन का व्यापक विस्तार होगा और सभी देश, सभी धर्म वर्ग उस प्रकाश की छत्र छाया में अपने प्रयासों कों सम्मिलित करते हुए उज्ज्वल भविष्य की संरचना में कदम से कदम मिलाकर काम करते हुए दृष्टिगोचर होंगे। आरम्भ छोटा होने पर भी उसकी दिशा सही रहने पर उसके विस्तार की पूरी-पूरी सम्भावना रहती है। बीज को वृक्ष और चिनगारी को ज्वाल माल बनतेजिनने देखा है वे जानते हैं कि एक दिन का शिलान्यास किसी दिन विशाल भवन बनकर अपनी कीर्ति पताका फहराता देखा जाता हैं।
समस्याओं का आत्यन्तिक समाधान ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सनातन प्रतिपादन को व्यवहार में उतारने से ही सम्भव होगा। विज्ञान ने दनिया को बहुत छोटा कर दिया है। परिस्थितियों ने विवश कर दिया हैं कि सहजीवन या सह मरण में से एक को अपनाने का निर्णय ठीक इन्हीं दिनों करना होगा। आशा यही है कि ‘सहजीवन’ को मानवी बुद्धिमत्ता स्वीकार कर लेगी और उसके एकमात्र उपाय ‘विश्व परिवार’ बनाने की नीति को मान्यता देगी। विश्व परिवार के चार आधार होंगे- (1) विश्वराष्ट्र (2)विश्वभषा (3)विश्व संस्कृति (4) विशव आचरण। इन चारों के लिए आवश्यक पृष्ठीमि बनाने का काम ‘महाप्रज्ञा’ का है। विचार क्रान्ति के रुप् में इन दिनों उसी को जागृत किया जा रहा है। प्रज्ञा अभियान का शुभारम्भ और चरम लक्ष्यस को इसी दृष्ट से देखा समझा जाना चाहिए।
इन बीस वर्षो में प्रज्ञा परिजनों को स्वयं आगे बढ़ कर उस मध्यवर्ती योजना को क्रियान्वित करना होगा जिससे अवाँछनीयता काप उन्हमूलन और सत्प्रवृति सर्म्वधन का दुहरा प्रयोजन एक साथ पूरा होता रहे।
युग सन्धि की बीस वर्षीय अवधि को सृजन शिल्पियों में पाँच-पाँच वर्ष के चार पंचवर्षीय योजनाओं में बाँटा है। सामर्थ्य अभिवर्धन एवं परिस्थितियों के अनुकूलन को देखते हुए-एक के बाद दूसरी योजना का स्वरुप एवं एवं कलेवर बढता चला जायगा। उस अवधि में दृष्टिवृत्तियों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के सर्म्वधन का दुहरा कार्यक्रम साथ-साथ चलता रहेगा।
प्रज्ञा अभियान द्वारा धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित करने के लिए प्रज्ञा संस्थानों का सजी ढाँचा खड़ा करने का आरम्भिक प्रयोजन योजना के प्रथम वर्ष में उस सीमा तक पूरा हो चलेगा कि उसके कन्धों पर कहने लायक बोझ डाला जा सके।
प्रथम पंचवर्षीय योजना में पाँच सृजनात्मक और पाँच सुधारात्मक कार्यक्रम हाथ में लिए गये हैं। सृजनात्मक कार्यक्रमों में-(1) शिक्षा विस्तार (2) स्वास्थ्य सर्म्वधन (3) स्वच्छता, श्रमदान (4) गृह उद्योग (5) हरितमा विस्तार यह पाँच प्रमुख हैं। सुधारात्मक कार्य-क्रमों में (1) नशा निवारण (2) शदियों में होने वाले अपव्यय का प्रतिरोध (3) हरामखोरी, कामचारी का विरष्कार(4) फैशन फिजूलखर्ची की रोकथाम(5) अवाँछनीयताओं का उन्मूलन। इन दसों का प्रमुख माना गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि ग्यारवहवाँ कार्य हाथ में लेने पर कोई रोक हैं। स्िनीय आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार वे सभी काम हाथ में लिये जा सकते हैं जो अनौचित्य को हटाने और शलीनता की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में सहायक हो सकें। उपरोक्त दस कार्य[मों में से किन्हें, कब, कहाँ, किस प्रकार, किस क्रम से क्रियान्वित किया जायगा यह रणनीति स्थानिय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को देख कर निर्धरित और परिवर्तित की जाति रहेगी।
देखने में उपरोक्त दस कार्यक्रम जाने-पहचाने से लगते हैं। उन पर बहुहत कुछ कहा-सुना और लिखा पढ़ा जाता रहा है किन्तु प्रगति पथ एक ही चट्टान से रुका रहा हैं कि चिन्तन को क्रिया में परिणित कर सकने वाली ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी। कितना श्रम, पुरुषार्थ, मनोबल एवं साधनों का ईधन झोकने पर वह भट्टी गरम होगी जिसमें गलाने और ढालने का दुहरा प्रयोजन साथ-साथ पूरा हो सके, यह किसी ने विचारा ही नहीं। प्रस्ताव और परामर्शो में घूम रहने से यह बातें जानी-पहचानी सी लगती है, पर यथार्थता यह है कि इस दिशा में चिन्ह पूजा के अतिरिक्त कोई ठोस काम हुआ ही नहीं। ठोस काम किसे कहतें हैं? उसे जानना हो तो बुद्ध के धर्मचक्र, प्रवर्तन, गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन, ईसाई मिशन, साम्यवादी विचार विस्तार जैसे सफल आन्दोलनों के ढाँचे और प्रयास पुरुषार्थ का गम्भीर अध्ययन करके यह पता लगना होगा कि आन्दोलन क्यों सफल होते और क्यों असफल रहतें हैं।
उपरोक्त दसों आन्दोलनों के पक्ष में लोकमत तैयार करने और उन्हें सफल बनाने के लिए समर्थन ही नहीं सहयोग भी प्राप्त करने के प्राणवान प्रायास जुझारु प्रज्ञा पुत्रों के नेतृत्व में चलेंगे तों कोई कारण नहीं कि जन-मानस को नव सृजन के-अभीष्ट परिवर्तन का पक्षधर न बनाया जा सके। समय की माँग ठीक तरह समझी और समझाई जा सके उसे पूरी करने के लिए प्रतिभाशाली लोगों द्वारा स्वंय अग्रगामी आदर्श उपस्थिति करते हुए अनुगमन का आहृन किया जाय तो बात अनसुनी कर दिये जाने का अवसर आ ही नहीं सकेगा।
प्रस्तुत दस सूत्री कार्यक्रम इतने महत्वपूर्ण के हैं कि उन्हें ठीक तरह समझा समझाया जा सके तो कार्य रुप में परिणित करने वाला प्रवाह चल पड़े तो इस पर विश्वास किया जाना चाहिए कि असंख्य जीवन्तों का समर्थन सहयोग उसे अनायास ही मिलने लगेगा।
(1) शिक्षा के अभाव में मनुष्य एक प्रकार से अन्धा होता है, उसे समीपवर्ती लोगों से मिलने वाली जानकारी के आतिरिक्त इतिहास के-अन्यत्र घटित होने वाले घटना-क्रमों के-सामयिक प्रवाहों के सम्बन्ध मन जानकारी होती है न ढलने, बदलने की आवश्यकता अनुभव होती है। इस पिछड़ेपन को अपने समय में गरीबी से भी अधिक कष्ट कर समझा जाना चाहिए। समस्या का हल अब तक सरकार के मत्थे थोपा जाता रहा है जब कि उसके लिये इतना बड़ा भार पूरी तरह उठा सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। हर साल जितने नयें स्कूल खुलते हैं उससे अधिक बच्चे पैदा हो जाते हैं फलतः निरक्षरता का अनुपात जहाँ का तहाँ बना रहता हैं। अपने देश में इन दिनों प्रायः 75 प्रतिशत निरक्षरता है उसे दूर करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में ही उपाय किये जाने चाहिए। इसके लिए प्रौठ शिक्षा के-दो-दो घन्टे चलने वाले पाठ्य-क्रमों के-दौर चलने चाहिए। विद्या ऋण चुकाने के लिए शिक्षितों से अध्यापन के लिए समयदान माँगा जाय और उस आधार पर गाँव-गाँव, गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले में ऐसी पाठशलाएँ चलाई जाँय जिनमें अपनी-अपनी सुविधा के समय पर (1) बालक, महिलाएँ और प्रौठ़ दो-दो घन्टे की कक्षाओं में पढ़ने के लिए पहुँचा करें। शिक्षितों से विद्या ऋण चुकाने का अनुरोध करने की तरह ही अशिक्षितों में शिक्षा के लिए उत्साह उत्पन्न करना और उन्हें पाठशाला के साथ जोड़ देना, देखने में छोटा किन्तु करने में कठिन काम है। जो भी करना हो होगा ही। इसी योजना के अर्न्तगत देश को शिक्षित बनाया जा सकेगा। यहाँ शिक्षा के साथ-साथ उस जीवन दर्शन को भी हृदयंगम करने की बात अविच्छिन्न रुप् से जुड़ी रहनी चाहिए जिसके आधार पर व्यक्ति को नागरिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का ज्ञान एवं उसके परिपालन का साहस उत्पन्न हो सके।
(2) स्वास्थ्य सर्म्वधन में आहार, बिहार का नये सिरे निर्धारण करना होगा और खेलकूद से लेकर व्यायाम तक की परम्परा को जन-जन के स्वभाव में उतरना होगा। गरीबी के रहते हुए भी रास्ते शाक-भाजियों के सहारे आहार में पोषण को सम्मिलित रखा जा सकता है। पकाने की विधी थोड़ी-सी बदली जा सके तो आहार के जीवन तत्वों को आधे से अधिक मात्रा में बचाया जा सकता है। खाने के ढंग में थोड़े से परिवर्तन से आये दिन उत्पन्न होने वाली पेट की खराबी से बचा जा सकता है और उस आधार पर दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु से बचना सम्भव हो सकता है। घरों में शाक-भाजी उगाने भर से हर परिवार के भोजन में उपयुक्त पोषण सम्मिलित रह सकता है। ब्रह्मचर्य के लिए निष्ठा उत्पन्न की जा सके तो स्वास्थ्य की बर्वादी भी रुके। यौन रोगों से भी बचा जाय और अन्धाधुन्ध प्रजनन से होने वाले व्यापक विनाश पर भी अंकुश लगे। व्यायायाम का स्वास्थ्य रक्षा के सर्न्दभ में अपना महत्व है। खेल कूदों को उत्कृष्ट स्तर का मनोरजन कह सकते है। आसन,प्रणायाम,ड्रिल कवायर, खेलकूदों के लिए व्यवस्था बनाने तथा प्रचलन आरम्भ करने की आवश्यकता है। इस प्रशिक्षण में प्रजनन जैसे अश्लील एवं रहस्यमय विषय को भी इस सीमा तक सर्वसाधारण को समझाना होगा कि शलीनता की मर्यादा भी बनी रहे और इस सर्न्दभ में छाये हुए व्यापक अज्ञान से होने वाली भयानक हासिनयों से भी बच सकना सम्भव हो सके। शिशु पालन जैसे अतिरक्त विषय को भी स्वास्थ्य सर्म्वधन में सम्मिलित रखा जायगा। शरीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य को भी समग्र स्वास्थ्य का अविच्छिन्न अंग मानकर चलना है स्वास्थ्य सवर्धन की आवश्यकता पूर्ति लोकशिक्षण स्तर पर ही पूरी हो सकती है। वह कार्य डाक्टर, अस्पताल या नई औषधियों की अभिवृद्धि भर से पूरा नहीं हो सकता।
(3) स्वच्छता, श्रमदान की इसलिए आवश्यकता पड़ी कि देश की तीन चौथाई जनता छोटे देहातों में रहती है और वहाँ मनुष्यों के मल-मूत्र तथा घर, कुँओं की कीचड को हटाने का कहीं कोई प्रबन्ध नहीं हैं। यह गन्दगी, दुर्गन्ध और बीमारी बढ़ाने में निरन्तर लगी रहती है। इसे हटाने के लिए सफाई कर्मचारी रखना जहाँ सम्भव नहीं वहाँ श्रमदान के सहारे ही उसे हटाया जा सकता है। लकड़ी से बने टाट से ढक पखाने खेतों में रखे जाँए। लोग उन्हीं में शैच जाँय और ऊपर से मिट्टी डालें। दूसरा विकल्प यह है कि एक हाथ में पानी का लोटा दूसरे में खुरपी लेकर जाने की प्रथा आरम्भ की जाय। जमीन में छोटा गड्ढा खोद कर टट्टी जाया जाय और उठते समय उसे मिट्टी से ढक दिया जाए। इन प्रचलनों से एक ओर गन्दगी हटेगी, दूसरी ओर बहुमूल्य खाद से खेती की पैदावार बढ़ेगी। जापान जैसे देशों में मनुष्य के मल को सुनहरी खाद कहा जाता है और उत्पादन वृद्धि में उसका पूरा-पूरा लाभ लिया जाता है। जहाँ सैप्टिक पखने बन सकें, वही उनका प्रबन्ध हो, जहाँ न बन सकें वहाँ खेतों में मल-मूत्र गाढ़ने का उपक्रम चले।
घरों के पानी को पक्की नाँद में इकट्ठा किया जाय। कुँओं के पानी को समीप में केले आदि के पेड़ों में खपाया जाय। नित्य निकलने वाले कूड़े-कचरे तथा घरों के पानी को जगह-जगह खाद के गड्ढे बनाकर उनमें दबाया जाय। रास्ते साफ रखे जाँय। कुँओं की कीचड़ निकालते रहने की व्यवस्था बने। जहाँ-तहाँ होते रहने वाले गड्ढे भरे जाते रहें। यह सब काम सामूहिक सफाई से सम्बन्धित है, जिनके लिए हर गाँव में श्रमदानी स्वयं सेंवियों की मण्डलियाँ खड़ी की जानी चाहिए।
व्यक्तिगत स्व्च्छता में, स्नान, मंजन, नाखून, कपडे़, जूते, घर, वर्तन, सामान, खद्य-पदार्थ, आदि की सफाई की आदत हर व्यक्ति में डाली जानी चाहिए। आलस्य और आदत के कारण अपने देश में हर जगह गन्दगी सुधारने के लिए प्रायः वैसा ही नया शुभारम्भ करना होगा जैसा कि छोटे बालकों को इस सम्बन्ध में सिखाया सधाया जाता है। स्वच्छता स्भ्यता का अंग है। सुव्यवस्था एवं सुसज्जता से मानवी गरिमा का कला बोध प्रकट होता है। इस क्षेत्र में हम कितने पिछडे़ है इसे किसी सच्चे अर्थो में ‘सभ्य’ व्यक्ति की आँखें से अपनी दुर्दशा देखी जा सकती है। कपड़े धोने से लेकर घरों को साफ-सुथरा और वस्तुओं को व्यवस्थित रखने तक की जताने की नहीं, व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है ताकि उसके बदले दृष्टिकोण से जीवन क्रम के हर क्षेत्र को सुन्दर सुव्रुवस्थित बनाने का अवसर मिल सके।
(4) गृह उद्योग सहकार। अपने देश में बेकारी का-उससे जुड़ी गरीबी का प्रश्न दिन-दिन विकट होता जाता हैं। उसका समाधान अन्न क्षेत्र खोजने से नहीं उद्योगों को पनपानें और हर व्यक्ति को काम देने की व्यापक जन योजना बनाने से ही लेगा। खेतों की जोतें छोटी होती जाती हैं। साधनों के अभाव में सिचाई जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाति फलतः किसानों का तथा कृषि मंजूरी का प्रायः आधा समय बेकारी में बीतता है। फलतः गरीबी बढ़ती है। शिक्षित लड़के नौकरी ढूँढते है, पर उतनी आवश्यकता ही नहीं जिनमें हर साल लाखों की संख्या में निकलने वाले शिक्षितों को खपाया जा सके। बेकारी से मात्र गरीबी ही नहीं बढ़ती, खुराफातें भी पनापती है।
ठसका समाधान कुटीर उद्योगों को पनपाने से ही सम्भव है। अब यह कार्य सहकारिता के अर्न्तगत ही हो सकता है। सहकारी संगठन बनें, कच्चा माल दे, उद्योग कौशल सिखायें, बना माल खरीद और उसे उपयुक्त स्िन पर सही मूल्य में खपाने का प्रबन्ध करें गाँधी जी के खा दी आन्दोलन की तरह हाथ श्रम से बनी वस्तुओं का उपयोग करने का एक नया आन्दोलन चलाया जाय ताकि कुटीर उद्योगों के उत्पादन की खपत हो। बड़े मिलों को कुटीर उद्योगों की प्रति द्वन्दता करने से रोका जाय। सहकारी संगठनों के अर्न्तगत देश में पशु-पालन, मधु उत्पादन, वरुत्र उद्योग, मिट्टी के बर्तन खिलौने, खपरैल बनाने कितने ही नये उद्योग हर गाँव में पनपाये जा सकते है। उससे खाली समय में होने वाली खुराफातें रुकेंगी-गरीबी घटेगी और जन-जन में रचनात्मक कौशल की-स्वातलम्बन की भावना जागेगी।
म्हिलाओं की श्रम शक्ति प्रायः निरर्थक ही चली जाती है उसे कुटीर उद्योगों में लगाया जाय तो वे घर की अर्थ व्यवस्थ में सहायक रह सकती है। और किसी विपत्ति के समय अपना बालकों का पेट स्वावलम्बन पूर्वक भर सकती है। हर दृष्टि से कुटीर उद्योगों का प्रचलन घर-घर में पहुँचाये जाने की आवश्यकता समझी और उसकी पूर्ति की जानी चाहिए।
(5) हरितमा विस्तार की उपेक्षा होती है और लोग यह नहीं समझ पाते कि मनुष्य और वनस्पतियों का जीवन क्रम एक-दूसरे के साथ जुड़ा हुआ है। वृक्ष वनस्पति घटने या मिटने से मनुष्य जीवन तो असम्भव हो ही जायगा। अन्य प्राणियों का अस्तित्व भी मिटने लगेगा। हर जीवधारी का आहार वनस्पति है। शिकारी जीव भी शाकाहारी प्रणियों को ही मारते खातें हैं। जलचरों को भी पानी में पाई जाने वाली दृश्य या अदृश्य हरितमा पर ही गुजर करनी पड़ती हैं।
आबादी बढ़ रही है और वनस्पतियों का स्िन घट रहा है, साथ ही उस ओर उपेक्षा भी बरती जा रही है। परिणामतः वायु प्रदूषण का परिशोधन करने वाले महत्वपूर्ण तन्त्र के नष्ट होने सेस घुटने एवं विषाक्तता का नया संकट बढ़ रहा है, पेड़ कटने से भुमि का उपाजाऊ भाग वर्षा में बह कर नदी समुद्र में चला जाता है। वर्षा कम होती हैं। पत्तों के जमीन पर सड़ने से गोबर जैसे खाद की कमी पड़ती है। पक्षियों का आश्रय टूटने से वे फसल के हानिकारक कीडे-मकोडे़ को समेट नहीं पाते। इमारती लकड़ी दुर्लभ होती जाती है, फलतः बढ़ती हुई आबादी के लिए नये आवास प्रबन्ध मँहगे होते जा रहे हैं। जलाऊ लकड़ी ही वर्तमान स्थिति में चूल्हा जलाने का प्रधान उपाय है। पेड़ घटने से अगले ही दिनों जलाऊ लकड़ी का संकट उत्यन्त उग्र होकर सामने आने वाला है। हरितमा के अभाव में मस्तिष्कीय शान्ति को आघात पहुँचता है और उद्विग्नता की मनःस्थिति पनपती है।
इन तथ्यों को देखते हुए देश में नये सिरे से वृक्षारोपण एवं वनस्पति सर्म्बधन का आन्दोलन चलना चाहिए। घरो के आसपास पेड़ लगाये जाँय। खाली जगह में इमारती या जलाऊ लकड़ी के पेड़ लगे। किसान भी थोड़ी जमीन में एक-एक छोटी बगीची लगा कर घर परिवार के लिए फल उगायें। शाक वाटिका के लिए नये सिरे से उत्साह उत्पन्न करने की आवश्यकता हैं। पक्के आँगन में भी गमले, टोकरीन पेटियाँ रखकर शाक-भाजी तथा फुल-पौधे उगाये जा सकतें है। इसके लिए छतें भी काम में आ सकती है। छप्परों पर बेलें छाइदै जा सकती हैं और उनसे फूल तथा शाक मिल सकते है। तुलसी का पौधा घरेलू औषधी की तरह हर आँगन में थाबला बना कर रखा जाना चाहिए। उस स्िपना में वनस्पति प्रतिमा के रुप में भगवान का देव मन्दिर बनाने एवं अर्घदान, दीपक जैसी सर आराधना का अवसर भी मिलता है। इस प्रयोजन के लिए बीज भण्डार तथा पौध नर्शरी जैसी सुविधए भी जगह-जगह उपलब्ध रहना चाहिए और बोने उगाने सम्बन्धी सस्ता साहित्य हर जगह मिलना चाहिए। घरेलू शाक बाटिकाएँ आहार में जीवन तत्वों के समावेश की आवश्यकता हर जगह पूरी करती रह सकती है।
यह सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों की चर्चा हुई। इस आधार पर ज्ञान, धन, स्वास्थ्य, कौशल, उत्साह जैसी कितनी ही साधनपरक एवं गुणपरक सम्पदाओं की आशाजनक वृद्धि हो सकती है। उसका प्रतिफल सम्पन्नता समर्थता और प्रगातिशीलता के रुप् में सर्वत्र दृष्टिगोचर हो सकता है। मोटे रुप् में किसी लाटरी खूटने या अनुदान वरदान मिलने, आकस्मिक लाभों को ही लाभ माना जाता है, वास्तविकता यह है कि यदि सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ चले तो सर्वतोमुखी प्रगति का ताना-बाना सुविस्तृत एवं स्थिर प्रगति समृद्धि बन कर सामने आ सकता है। बूँद-बूँद से समुद्र बनना और धूलि कणों से पर्वत उठता है। यह तथ्य सामझा जा सके तो यह अनुभव करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि सृजन की दिशा में बढ़तें हुए प्रज्ञा अभियान के यह कदम अन्ततः सर्वतीमुखी प्रगति की दृष्टि से कितने सुखद सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकते हैं।
सुधारात्मक कार्यक्रमों में से जिन पाँच को सर्वप्रथम हाथ में लिया गया है उनमें (1) नशा निवारण (2) विवाहोन्माद का प्रतिरोध (3) हरामखोरी का तिरष्कार (4) फैशन फिजूलखर्ची की रोकथाम (5) अवाँछनीयताओं का उन्मूलन प्रधान है। इनकी हानियों से सभी परिचित है। इनमें लगने वाले मनुष्य के श्रम, समय, धन का अपव्यय होने का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जा सके तो प्रतित होगा कि आधी से अधिक क्षमता और सम्पदा इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों में नष्ट हो जाती है। इस बर्वादी को रोका और उस बचत को प्रगति प्रयोजनों में लगाया जा सके तो आज का पिछडापन दूर होने और प्रगति के उच्चशिखर तक पहुँचने में तनिक भी बिलम्ब न लगें।
(2) सभी जानते हैं कि नशेबाजी की दुष्प्रवृत्ति से व्यक्ति औससर समाज को कितनी असीम हानि उठानी पड़ती है। स्वास्थ्य बिगड़ता है। बुद्धिबल घटता है। क्रिया शक्ति क्षीण होती है। दरिद्रता बढ़ती है। निन्दा होती है। परिवार में विक्षोंभ पनपता है। बच्चे कुसस्कारी परम्पराएँ अपनाते है। ऐसी अनेकों हानियों से भरी-पूरी नशेबाजी को मिटाया ही जाना चाहिए। इन दिनों नशें में तमाखू और शराब अग्रिणी है। इनके निमित्त, लगने वाली भूमि, पूँजी, श्रम शक्ति का मूल्याँकन किया जाय तो प्रतीभा होगा कि इतने धन में पूरे देश को सुशिक्षित अनाया जा सकता और मनुष्य का आयुष्य आरोग्य एवं कोशल अनेक गुना अधिक बढ़ सकता है।
(2) देश की 65 करोड़ आबादी में यदि छै आदिमियों का कुटुम्ब माना जाय तो प्रायः 11 करोड़ कुटुम्ब बनते है। एक कुटुम्ब में चार वर्ष बाद एक विवाह होता हो तो ढाई करोड़ विवाह हर साल होते हेंगे। एक विवाह में यदि औसर, पाँच हजार लगता हो तो यह राशि 12500000000000 रुपयों की होती है। इतने धन से सरकार का समूचा बजट पूरा होता रह सकता है। इस राशि को बचाया जा सके और कुटीर उद्योगों में लगाया जा सके तो कुछ ही दिनों में देश की अर्थ व्यवस्था का काया-कल्प हो सकता है और देखते-देखते प्रस्तुत दयनीय दरिद्रता का स्िन खुशहाली ले सकती है। न्यायपूर्वक इस अपव्यय के लिए कमाई कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में सर्वसाधारण के लिए किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता है। ऋण लेने अनीतिपूर्वक कामनि, कड़कियों को कुमारी रखने, अयोग्य हाथों में सौंपने जैसे अवाँछनीय दुष्परिणाम ही सामने आते है। दहेज की वेदी पर आयेदिन कितनी नव-वधुओं के बलिदान होते रहते है। उस रोमाँचकारी घटनाओं को देखने-सुनने वाले इसी नतीजे पर पहुँचते है। कि अपने समाज पर लगे हुए इस कलंक को एक दिन के लिए भी सहन नहीं किया जाना चाहिए।
(3) आलस्य वश ठालीपन को सौभाग्य बड़प्पान का चिन्ह मानने-श्रम का महत्व न समझने से देश के अधिकाँश लोग ऐसे ही बैठे ठाले समय गँवाते रहतें है। जिनके ऊपर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ लदी हैं, वे भी कामचोरी के अभ्यस्त पाये जाते है। फलतः उत्पादन क्षमता का आपे से अधिक भग ऐसे ही आलंस्य प्रमाद में नष्ट हो जाता है। यदि हर व्यक्ति निचर्या बनाकर काम करें, समय को नष्ट न होने दे, श्रम रत रहे तो स्वास्थ्य, धन तथा कौशल की दृष्टि से देश दिन-दिन अधिक सुसम्पन्न होता चलेगा। हरामखोरी एक प्रकार की महामारी है। जिसे व्यक्ति और समाज को बीमारी जैसी अपंग असमर्थता का अभिशाप सहना पड़ता है। आवश्यकता श्रम की प्रतिष्ठा तथा हरामखोरी की निन्दा का वातावरण बनाने की है। साथ ही जन-जन से सम्पक साध कर उसकी क्रियाशीलता में नया उत्साह भरन की है। उसमें व्यक्ति और समाज दोनों को ही उर्त्कष के मार्ग पर बढ़ चलने का नया मार्ग खुलेगा।
(4) फैशन फिजूल खर्ची को यों शैक-मौज की साधारण बात माना जाता हैं पर उस पर खर्च होने वाले समय एवं पैसें की बर्वादी का हिसाब लगाया जाय तो प्रतीत होगा कि इन ठाट-बाट एवं अंहकार प्रदर्शन की मदों में प्रायः रसोई घर में लगने वाली राशि के समान ही खर्च होता रहता है। चित्र-विचित्र डिजायनों के सन्दूक भरे कीमती कपड़े, सोने, चाँदी के आभूषणों, श्रंगार प्रसाधन, सजावट के फर्नीचर, उपकरण, मटरगश्ती, आबारागर्दी, ताश शतरंज, अनावश्यक वाहन, बडे़ भवन, प्रीति-भोज, विनोद साधन जैसे अनेकों दुर्व्यसन इन दिनो छोटे या बड़े रुप से जन-जन पर छाये हुए है। अमीरी का ढोग बनाने, दूसरों की आँखों में चकाचौध उत्पन्न करने के लिए समय और पैसे की बुरी तरह बर्वादी होती है और मिथ्या अंहकार के दिखवे का प्रचलन बढ़ता है। वस्तुतः यह बचकानापन मनुष्य को क्षुद्रता का-आत्महीनता के उद्वत परिचय का चिन्ह है। श्रंगारिकता के आकर्षण से व्यभिचार के लिए परोक्ष उत्तेजन मिलता है, ईर्षा उत्पन्न होती है और अनुकरण के लालच में लोग अनैतिक तरीके अपनाने पर उतारु होते है।
जेवरों वाली राशि को यदि पशु पालन जैसे घरेलू उद्योगो में लगाया जा सके तो देश में फिर से दूध घी की नदियाँ वह सकती है। बछड़ों सें ऐसे नये टैक्टरों की आवश्यकता पूर्ण हो सकती है जो लागात में सस्तें, चलाने में सरल और अपनी खुराक जितना गोबर उत्पन्न करते रह सकते है। फैशन की पोशाकें हटाकर यदि सादगी से तन ढकने की बात गले उतर सके तो उस बचंत से हर व्यक्ति को अपना नीजि मकान बनाने का लाभ निश्चित रुप से मिल सकता है।
इन दिनों फैशन और फिजूलखर्ची को अमीरी बड़प्पन और सौभाग्य का चिन्ह माना जाता है। प्रवाह बदला जाना चाहिए और इन बचकानेपन को अपनाने वालों को हेय स्तर का छछोरा और उद्धत मानने वाला लोक मत जगना चाहिए। जब देखा जायगा कि समय और पैसा बर्वाद करने पर भी भर्त्सना हाथ लगती हैं, तो निश्चय ही इस अपव्यय और अंहकार की उद्धत दुष्प्रवृत्ति से छुटकारा पाया जा सकना सम्भव हो सकेगा। यह छोटा सुधार भी देश की आर्थिक एवं नैतिक प्रगति में असधारण रुप से सहायक होगा।
(5) अवाँछनीयता इन दिनों हर क्षेत्र में घुम पड़ी है। न्याय, औचित्य और विवेक को तिलाँजलि देकर लोग इन दिनों मूढमान्यताओं कुरीतियों और अनैतिकताओं को अपनाये बैठे हैं। अभ्यास, ढर्रा और प्रवाह ही परम्परा बन गया है और जो चल रहा है उसे चलने देना चाहिए। जैसी दुर्बल मनःस्थिति का जन-जन को शिकार पाया जाता है।
मूढ मान्याताओं में, टोन टोटका, भूत पलीत, दर्द देवता, भाग्य ज्योतिष, शकुन-मूहूर्त जैसे कितने ही अन्धविश्वास चलते है। जिनके कारण भ्रम में फँसने, अशान्त आतकिंत होने एवं ठगाये जाने से लेकर मानामालिन्य विग्रह का दौर चलने जैसी अनेकों हानियाँ उठानी पड़ती है।
क्रीतियों में जाति-पाति के नाम पर चलने वाली ऊच-नीच की मान्यता, स्त्रीयों को पर्दे में रखने की प्रथा, लड़की, लड़के में भेदभाव, शादियों की धूम धाम, दहेज बाल-विवाह, मृतक भोज, भिक्षा व्यवसाय जैसी कितनी ही कुप्रथाएँ अपने समाज में पडे़ जमा कर बैठी है। जिनेस मात्र बर्वादी का माहौल बनता है।
अनैतिकताओं में आलस्य, अपव्यय, असंयम, दुर्व्यसन आवेश, कटुभाषण जैसी कितनी ही वैयक्तिक बुराईयाँ गिनाई जा सकती है। उसी उपक्रम में जब मनुष्य उद्धत बन जाता है तो आक्रमक आततायी जैसी दुष्टताएँ अपनाने में भी नहीं चूकता। चोरी, ठगी, रिश्वत, मिलावट, अपहरण, बलात्कार, लूट, डकैती, हत्या जैसे अपराध, भी उद्धत अनैतिकता के अर्न्तगत ही आते है।
सभ्य समाज की संरचना के लिए मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों एवं अनैतिकताओं, के तीनों ही प्रचलनों के विरुद्ध लोहा लेना होगा। अवाँछनीयता के यह तीनों ही स्तर ऐसे है जिनकी हानियाँ जन-जन को समझाई जानी चाहिए और इनके विरुद्ध लोकमत को गठित एवं प्रतिरोध के लिए तत्पर किया जाना चाहिए।
सृजन शिल्पियों की संख्या हजारों को पार कर चुकी लाखों में गिनी जा सकतीहै। और अगले दिनों वह करोंड़ों में जा पहुँचेगी। इतना बड़ा समुदाय अपने बीच से ही जिन प्रचलनों को क्रियान्वित करेगा उसका प्रभाव सर्म्पक क्षेत्र पर पडे़ बिना रह ही नहीं सकता। यों भवनात्मक उत्साह उत्पन्न कर श्रद्धासिक्त वातावरण में लोगों में अभीष्ट साहसिकता उत्पन्न की जा सकती है। वह की भी जायगी, पर प्रभावीकरण एक ही होगा अपना उदाहरण प्रस्तुत करके लोगों को अनुकरण की प्रेरणा देना।
स्वयं साथ रहकर सहयोगी उत्पन्न करना सरल है। बुरे कामों के लिए साथी मिल जाते है तों कोई कारण नहीं कि प्रतिभाशाली व्यक्ति आदर्शवादी प्रयोजनों को हाथ में लेकर आगें बढे तो उन्हें स
हमारे ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधन के फलस्वरुप् विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री-साधना से समुचित लाभ उठानेके इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभव गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजुद है।
(1) गायत्री माहविज्ञान (तीनों भाग)22)50
प्रथम भाग-गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार गुप्त शक्तियों रहस्य, नित्य अपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगायें जाने वाले बीज मन्त्रों का साधना-विधान, आत्तम-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग सें प्रतिपादन। मूल्य-7)50 सजिल्द।
द्वितीय भाग-गायत्री द्वारा वामार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आतिद के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री-गीता, गायत्री-स्मृति, गायत्री-संहितागायत्री-उपनिषद,गायत्री-रामायण, गायत्री-हृदय, गायत्री-सहस्त्रनामादि का संग्रह मू.-7)50 सजिल्द।
तृतीय भाग- गायत्री महाम-त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्याओं के साधन विषयक विधान। जन-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी योग, षटचक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय कोष, मनोमय कोष को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिर्ग्दशन मू-7)50 सजिल्द।
(2)- गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 6)
प्रथम भाग-गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व तर्क, प्रमाण व शास्त्रीय विधान के आधार पर अत्यन्त खोज पूर्ण वर्णन मू. 3)
द्वितीय भाग- (सामूहिक गायत्री हवन) गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि प्रक्रिया, जल-यात्रा, मण्डप प्रवेश, वेदी-पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थानपन, आहुति-मन्त्र पूर्णाहुति, वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि-विधान समझकर बडे़ यज्ञों का आचार्यतव किया जा सकता है। मू.-3)
3- गायत्री चित्रावली-
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 4)
4- गायत्री मन्त्रार्थ-
अनेक ग्रन्थों मे, अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेक प्रकार के किए हुए अर्थो का संग्रह। सक्षम राज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 3)50
5-गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य
1-छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट-आकर्षक कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री टैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रुप् से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि इन टैक्टारें का महत्व असाधरण है। प्रत्येंक टैक्ट का मू. 12) टै्रक्ओं के नाम इस प्रकार है-
गायत्री का स्वरुप और रहस्य। 2. गायत्री की गुप्तशक्ति। 3. सर्व सुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्त्रो-सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधी दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरुप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोंपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
(ब) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि मू. 60 पैसे।
(स) दैनिक गायत्री साधना मू. 60 पैसे।
(द) गायत्री चालीसा मू.10 पैसे।
*समाप्त*