नमस्याओ देवान्नतु हतविधेस्तेऽपि वशगाः, विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियत कर्मैकफलदः ।फलं कर्मायतं किममरणैं किं च विधिना नमस्तत्कर्मेभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवित ॥ (भतृहरिकृत नीति शतक 75 वाँ श्लोक)
हम सब जिन देव शक्तियों को अर्चना-आराधना के उपायों और विधानों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, वे देव-सत्ताएँ भी विधि-व्यवस्था से ही बँधी दीखती है । दैवी विधानों की अवहेलना वे भी नहीं करतीं । तो क्या उस सृष्टि-संचालक विधान की और उसके विधाता की ही वन्दना की जाय ? पर हमारे भाग्य का निर्धारण तो वह विधि-व्यवस्था हमारे ही कर्मो के अनुसार करती है । यही उसका सुनिश्चित नियम है । हमारे अपने ही कर्मो का फल प्रदान करने की प्रक्रिया वह चलाता रहता है ।
इस प्रकार हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं । तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है । वही वन्दनीय है-अभिनन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है । दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता । कर्म ही सर्वोपरि है । परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है । उसी की साधना से अभीष्ट की उपलब्धि सम्भव है ।
जागृत आत्माओं में से अनेकों की एक आकाँक्षा रही है कि देव-लोक में देव-परिवार के सदस्य बनकर देव-जीवन जियें । देव-कर्तव्यों में निरत रहें और इसी शरीर में रहते देव-गति से मिलने वाले आनन्द का उपभोग करें ।
इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिये ऐसे वातावरण की आवश्यकता थी जिसमें उपयुक्त साधन विद्यमान हों, जिसमें मार्गदर्शन और कार्यक्रम ऐसे हों कि अभीष्ट मनोरथ सुविधा पूर्वक पूरा होता चले ।
इस स्तर की सुविधा उत्पन्न करने के लिए शान्तिकुन्ज हरिद्वार में प्रयत्न किया गया है । इसी उद्देश्य को लेकर पहले ब्रह्मवर्चस् आश्रम नाया बगया और फिर गायत्री नगर बनाने की बात सोची गई । अब उसका इतना भाग बन गया है जिसमें देव वातावरण बनाना, देव-परिवार बसाना और तदनुरुप कार्यक्रम चलाना सम्भव हो सके । अस्तु पिछले कई वर्षो से स्थान न होने के कारण जिनके आग्रह को अनसुना किया या टाला जाता रहा है, अब उन्हें प्रथम बार यह हर्ष समाचार देना सम्भव हुआ है कि वे गायत्री नगर में ब्रह्मवर्चस् में बसने की बात पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर सकते हैं । ताल-मेल न बैठे-दृष्टिकोणों में-स्वभाव में सामंजस्य न बने तो बात दूसरी है, अन्यथा स्थान न होने के कारण जो असुविधा थी उसे एक सीमा तक हल हुआ समझा जा सकता है ।
युग-सन्धि की इस पुण्यबेला में प्राणवान देवताओं को अन्तःकरण नवसृजन में प्रज्ञावतार के सहगामी बनने के लिए मचलता है । यह स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी है । ऐसी विषम बेला में भी जो मूर्छित ही पड़े रहे उन्हें मृतक जीवितों में ही गिना जायेगा ।
प्रश्न उठता है कि क्या किया जाय ? कहाँ किया जाय ? इन प्रश्नों का उत्तर एकाकी कर्तृत्व का ताना-बाना बुनने से नहीं मिल सकता । एक व्यक्ति कितना भी समर्थ क्यों न हो-अपने बलबूते कुछ करने लायक काम नहीं कर सकता । महान प्रयोजन सामूहिक रुप से ही हो सकते हैं । युग निर्माण अभियान एक गढ्डा है जिसमें छोटी-बड़ी जल धाराएँ मिलती चली जायेंगी और अपनी संयुक्त शक्ति के बलबूते ही कुछ बड़ा काम करेंगी । इस दृष्टी से गायत्री नगर की ओर चल पड़ने और संयुक्त प्रयास से गोवर्धन उठाने और ग्वाल-बालों को श्रेय मिलने वाला उदाहरण ही हम प्रत्येक दूरदर्शी के लिए मार्गदर्शक हो सकता है ।
इस सुविधा का उद्घाटन विक्रमी संवत् 2037 के प्रथम दिन से किया जा रहा है । चैत्र नवरात्रि (17 से 25 मार्च) इसके लिए शुभ मुहूर्त समझा गया है । सन् 1980 से 2000 तक की युग-संधि का यह प्रथम वर्ष है । इस बीस वर्ष की अवधि में नव-निर्माण की चार पंचवर्षीय योजनाएँ बनी हैं । इस कार्यक्रम के अर्न्तगत जागृत आत्माओं में से कुछ चुने हुए लोगों का एक परिवार बसाने को भी सम्मिलित रखा गया है । “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संरचना का एक छोटा नमूना गायत्री नगर में देव परिवार बसाकर किया जा रहा है ।
यहाँ निवास करने वालों को अपना जीवन-यापन उन चारों कार्यक्रमों को अपनाते हुए करना होगा जिन पर आत्म-कल्याण और लोक कल्याण के-स्वार्थ और परमार्थ के दोनों उद्देश्य भली प्रकार पूरे होते हैं । (1) साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार तथ्यों का समन्वय ही सच्चे अर्थो में जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकता है । प्रस्तुत देव-नगर में बसने वालों को शारीरिक नित्यकर्मो के अतिरिक्त इन्हीं चार कार्यक्रमों में निरत रहना पड़ेगा । व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरुप उनके कार्यक्रम बना दिये जायेंगे ।
शरीर से जर्जर और रोगी, अशिक्षित, असंस्कृत एवं अनुशासनहीन, स्वभाव के संकीर्ण, विग्रही लोगों को बसाया न जासकेगा । जो अपनी शारीरिक, मानसिक स्थिति से इस आदर्श संरचना का गौरव बढ़ा सकें और इस वातावरण में अपने को ढाल सकें वे यहाँ रह सकेंगे । प्रयोग के लिए आरम्भ में चार महीने का अवधि रखा गयी है । इतने समय में जिनकी पटरी बैठ जाय वे फिर स्थायी रुप से भी आ सकेंगे । प्रयोग काल के चार महीनों में सभी को अपना निर्वाह व्यय स्वयं वहन करना होगा, इसके उपरान्त यदि आर्थिक स्थिति स्वावलम्बन जैसी नहीं है तो ब्राह्मणोचित निर्वाह के लिए मिशन की ओर से भी प्रबन्ध हो सकता है । पर यह होगा उन्हीं के लिए जिनका पिछला उपार्जन वस्तुतः नहीं है । संचित कमाई घर वालों को दे आने और निर्वाह सार्वजनिक धन से प्राप्त करने का ताना-बाना बुनने वालों को सफलता न मिल सकेगी । आर्थिक रुप से स्वावलम्बी या बिना स्वावलम्बी सभी को अपनी श्रम साधना से समान रुप से निरत रहना होगा । आलस्य और प्रमाद बरतने, अनुशासन न माने की छूट किसी को भी न मिल सकेगी ।
(1) ब्रह्मवर्चस्-शोध-संस्थान के कार्यक्रमों में स्वाध्याय एवं अनुसंधान का विशाल कार्यक्षेत्र पड़ा है । सुशिक्षितों एवं अध्ययनशीलों के लिये वह कार्य रुचिकर रहेगा । (2) गायत्री-नगर में कई स्तर के सत्र निरन्तर चलेंगे, जिनमें नवयुग के अनुरुप जीवन ढालने और कार्यक्रम अपनाने का प्रशिक्षण अनवरत चलता रहेगा । प्रशिक्षण क्षमता वाले इस विभाग में योगदान दे सकेंगे । (3) गायत्री शक्ति पीठें देश भर में बड़ी संख्या में बन रही हैं, जो एक आश्रम को चलाने एवं कार्यक्षेत्र को जगाने की प्रतिभा से सम्पन्न हैं, वे वहाँ थोड़े-थोड़े समय के लिए भेजे जाते रहेंगे । (4) जन-जागरण एवं लोकशिक्षण के लिये देश-विदेशों में अगणित छोटे-बड़े सम्मेलन होते रहते हैं, उनमें वक्ता एवं गायक की भूमिका निभा सकने वालों को उसमें उपयोग होता रह सकता है । (5) गायत्री-नगर में बसे परिवारों के बच्चों तथा महिलाओं को सुशिक्षित करने में सहायक अध्यापक-इसमें प्रौढ़ महिलाएँ भी आगे आ सकती हैं । इसी प्रकार के अन्याय कितने ही छोटे-बड़़ काम है जिनमें सेवा साधना भली-प्रकार होती रह सकती है। इसमें अपनी भाव भूमिका योग्यता बढ़ने और सेवा का आनन्द मिलता रह सकता है ।
जो परिवार के उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके हैं-उन्हें प्राथमिकता दी जायेगी । पत्नी समेत भी रहा जा सकता है । विशेष परिस्थितियों में छोटे कुटुम्ब वाले भी रह सकते हैं । बच्चों के प्रशिक्षण की गुरुकुल जैसी उपयुक्त व्यवस्था बनाई जा रही है । दिनचर्या सभी की ऐसी बनी हुई होगी जिसमें समय की बर्बादी तनिक भी न हो । नित्यकर्म के अतिरिक्त उपासना, स्वाध्याय और व्यक्तित्व को सुसंयत बनाने वाली संयम-साधना का उपक्रम ऐसा सुनियोजित रहेगा, जिसमें अव्यवस्था की असुरता को जीवन क्रम में प्रवेश पाने के लिये गुँजायश ही न रहे । अपने हाथ भोजन बनाने की सुविधा भी है और सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था भी । दैनिक जीवन की अन्य आवश्यकतायें पूरी करने वाले सभी साधन गायत्री नगर में मौजूद हैं ।
वरिष्ठ, कनिष्ठ वानप्रस्थों, सेवानिवृत्तों, उपार्जन उत्तरदायित्वों से छुटकारा पाने वालों एवं अविवाहितों के लिये गायत्री नगर में निवास हर दृष्टि से सन्तोष और आनन्द से भरा पूरा रहेगा । अपवाद के रुप में छोटे परिवार वाले भी स्थान पा सकते हैं, जिनको अब तक मन-मसोस कर रहना पड़ा है । उपयुक्त वातावरण की तलाश में जो अनेक आश्रमों में भटकते और निराश होकर लौटते रहे हैं, उनके लिये यह घोषणा देवी-सन्देश की तरह है । जिनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति इस वातावरण में निवास करने को हो वे सर्म्पक स्थापित करें ।
जिन्हें आना है वे आवेदन के साथ अपना विस्तृत परिचय-अब तक के जीवन क्रम का विवरण, आयु, जाति, स्वास्थ्य, शिक्षा अनुभव, अभ्यास, सेवा, रुचि आदि की समस्त जानकारी विस्तार पूर्वक लिख दें । साथ ही यहाँ रहने पर निर्वाह-व्यय सम्बन्धी व्यवस्था का उल्लेख कर दें । इन आवेदनों पर विचार करने के उपरान्त ही किन्हीं को स्वीकृति दी जा सकेगी । स्मरण रहे प्रथम चरण में चार महीने की अस्थाई स्वीकृति ही मिलेगी । स्थायी निवास का निर्धारण उतने समय में बैठी ताल-मेल के आधार पर ही सम्भव हो सकेगा ।
गायत्री-नगर में देव-परिवार बसने की व्यवस्था उस लक्ष्य का प्रथम प्रत्यक्ष चरण है, जिसमें मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर र्स्वग के अवतरण का संकल्प प्रकट किया जाता रहा है । इस दिव्य स्थापना का शुभारम्भ इसी चैत्र नवरात्रि से होने जा रहा है । स्थान सीमित है । भावभरी आत्मायें इसमें प्रवेश पाने की बात सोचें और तैयारी करें ।
बुद्धि की प्रखरता में एक दुर्बलता भी सम्मिलित है कि वह पूर्व मान्यताओं के मोह में फँस जाती है जबकि दर्शन जीवन और सत्ता के सत्यानुसंधान के लिए प्रत्यत्नशील रहता है । वह मान्यताओं का नहीं विवेक का अनुयायी होता है । दर्शन जीवन का गम्भीर प्रवृत्ति है तथा इसका लक्ष्य है-आत्म तृप्ति । यह मानसिक तथा बौद्धिक कसरत नहीं बल्कि सत्य की खोज का विवेक सम्मत प्रयास है । बुद्धि जीवन संचालन की महत्वपूर्ण चेतना है । विचारों एवं कल्पनाओं से व्यावहारिक प्रश्नों का समाधान मिलता है । किन्तु बुद्धि सामान्य स्तर से उठकर आत्मा का स्वरुप जानने तथा चरम लक्ष्य पाने के सर्न्दभ में जिज्ञासा उठती है तो वह दर्शन का साधन बन जाती है । यह कहा जाय कि दर्शन का विकास परिष्कृत बुद्धि से होता है तो अत्युक्ति नहीं होगी ।
उत्कृष्ट चिन्तन एवं श्रेष्ठ विचार मानव विकास के लिए अति उपयोगी हैं किन्तु दार्शनिक प्रवृत्ति की सन्तुष्टि इतने मात्र से नहीं हो जाती । मनुष्य की इस जिज्ञासा की तृप्ति तो सत्य-सत्ता के दर्शन से ही होती है । इसके बिना जीवन अपूर्ण तथा अशान्त बना रहता है । दर्शन के साथ जुड़ी भावना का लक्ष्य है-परमात्म सत्ता का साक्षात्कार ।
हम प्रगति के युग में रह रहे हैं । भौतिकवाद का असाधारण विकास हुआ है । फलस्वरुप सुख साधनों की वृद्धि हुई है । ज्ञान के ़क्षेत्र में भी हमारी उपलब्धियाँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक हैं । साधनों की बहुलता एवं ज्ञान की उपलब्धियों से व्यावहारिक जीवन में निश्चिन्तता एवं सन्तोष का दर्शन होना चाहिए था, किन्तु दिखायी इसके विपरीत ही पड़ रहा है । सम्पूर्ण समाज ही भयाक्रान्त दिखायी दे रहा है । ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियों से विशालतर जीवन, समृद्धतर जीवन, आशापूर्ण तथा सन्तोषप्रद जीवन की प्राप्ति होनी चाहिए थी, किन्तु असन्तोष एवं निराशाजनक परिस्थितियाँ कुछ और ही सोचने पर बाध्य करती हैं ।
कारणों का पता लगने पर स्पष्ट होता है कि इस विकट स्थिति का एक मात्र कारण है-जीवन दर्शन का अभाव । वस्तुतः वैज्ञानिक चिन्तन एवं ज्ञान में निरपेक्ष ज्ञान की तुलना में भौतिक ज्ञान को ही अधिक महत्व दिया गया । सारा मानवी पुरुषार्थ प्रकृति एवं जड़ पदार्थो की खोजबीन करने में सिमट कर रह गया । पदार्थो की उधेड़-बुन से स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों तरह के परिणाम दृष्टिगोचर हुए । अच्छे परिणामों से अनेकों सुख-साधन मिलें किन्तु दुष्परिणाम यह हुआ कि मनुष्य आन्तरिक जीवन से दूर हटता गया । पदार्थो के आकर्षण ने उसे अपनी चेतना से दूर धकेल दिया । परिणाम अनेकानेक समस्याओं के रुप में सामने हैं । मनुष्य जाति का असन्तोष-निराशाओं से भरा जीवन ।
इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जीवन दर्शन के अभाव में भौतिक साधनों की बहुलता मनुष्य को स्थायी शान्ति एवं सन्तोष नहीं प्रदान कर सकती । भौतिक ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ जीवन सत्ता तथा परम सत्ता के ज्ञान के बिना मनुष्य को सन्तुष्ट नहीं कर सकती । वैज्ञानिक जिज्ञासा का होना अच्छी बात है । अनुसन्धान से नये-नये तथ्यों के उद्घाटन होते तथा उपलब्धियों के द्वार खुलते हैं । किन्तु यह खोज जड़-पदार्थो, प्रकृति के अणु-परमाणुओं तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि उससे आगे बढ़कर चेतन परतों तक पहुँचना चाहिए । जिनके रहस्योद्घाटन पर ही स्थायी शान्ति एवं सन्तोष अवलम्बित है ।
चिन्तन की परिष्कृत धाराएँ जब आन्तरिक क्षेत्र में प्रविष्ट करती हैं तो वे ही जीवन-दर्शन बन जाती है जो सत्य एवं सत्ता की खोज का सशक्त आधार बनती हैं । दार्शनिक भावना का परम लक्ष्य यही है।
सर्वव्यापक सत्ता का पौराणिक नाम विष्णु है । वही परम सत्ता एवं परम सत्य है । उपनिषदों में उसी चिन्मय सत्ता को महेश्वर कहा गया है । पौराणिक काल में प्रतिपादन के शैली भेद से उसी अद्वैत सत्ता को शैवों में शिव, परमशिव, पशुपति, महादेव, महेश, महेश्वर आदि कहा तो वैष्णवों ने विष्णु, देवाधिपति, हरि, परमात्मा, मायापति आदि विशेषणों से उसकी स्तुति की । उन्हीं विष्णु के बारे में गया है-
“यस्माद्विश्वमिदं सर्व तस्य शकत्या महान्मनः ।तस्मादे वोच्यते विष्णुः विशुधातोः प्रवेशनात् ॥
अर्थात् विष् या विशु धातु में ‘नुक्’ प्रत्यय लगाने पर विष्णु शब्द बनता है, यह शब्द उस सत्ता के लिए है जिसकी शक्ति से यह सम्पूर्ण विश्व है ।
वही अविनाशी शक्ति अपने संकल्प से सृष्टि का सृजन करती है । उपनिषदकार ऋषि ने इसी प्रक्रिया का वर्णन यों किया है । -
“यशोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च ।यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ॥यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि ।तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥ (मुण्डक उ॰ 1।1।7)
अर्थात् जैसे मकड़ी अपने ही शरीर से तन्तु उत्पन्न करती है और फिर उन्हें ही समेट कर गृहण कर लेती है, जैसे वनस्पतियाँ, औषधियाँ धरती से पैदा होती है और उसी में मिल जाती हैं, जैसे व्यक्ति के शरीर से बाल निकलते हैं, उसी प्रकार अविनाशी चैतन्य ऊर्जा से, अक्षर ब्रह्म से यह विश्व उत्पन्न होता है ।
इस प्रकार प्रकृति का आदि स्रोत वह चिन्मय सत्ता ही है किन्तु स्वयं वह चिन्मय सत्ता अचिन्त्य, अज्ञेय, अनिर्देश्य है इसलिए प्रकृति का आविर्भाव काल भी अज्ञेय है । इसी कारण उसे अनादि कहा जाता है । उसका आदि काल जानना असम्भव है । इसी बात को वैदिक ऋषि ने विलक्षण शैली में व्यक्त किया गया है ।
“इयं विसृष्टिर्यत आबभूव, यदि वादधे यदिवान ।योअस्याध्यक्षःपरमेव्योमन्त्सोअड.ग्वेद यदिंवानवेद ॥” (ऋ010।126।अन्तिम ऋचा)
अर्थात् जिससे यह सृष्टि आविर्भूत हुई उसने इसे बनाया या नहीं बनाया (यानि केशलोमवत अथवा मकड़ी के जाले की तरह स्वतः उत्पन्न हो गई) यह तो परम व्योम में व्याप्त जो इस सृष्टि का अध्यक्ष है, नियन्ता है, वही जानता है या शायद वह भी न जानता हो।
परमेश्वर, परमात्मा की वीजशक्ति, जिससे यह प्रकृति उत्पन्न है और जिसमें यह सृष्टि या प्रकृति अवस्थित है, उसी का नाम ‘माया’ है ।
जो माया का स्वरुप है, वही प्रकृति का स्वरुप है । माया और प्रकृति दोनों त्रिगुणात्मिक हैं । वस्तुतः माया और प्रकृति में कोई भेद नहीं मानना चाहिए । माया उस चित्-शक्ति का नाम है, जो प्रकृति का बोध कराती है । वस्तु जगत की आदिरुपा एवं समष्टिरुपा प्रकृति है । उसी प्रकार मनोजगत या विज्ञानजगत की आदिरुपा, समष्टिरुपा ‘माया’ है । जीव- सत्ता को प्रकृति का बोध माया की ही शक्ति से होता है, इसीलिए जीवमात्र को माया के स्वरुप के ही अनुसार प्रकृति का बोध होना सम्भव है । इसी कारण व्यष्टि-चेतना की दृष्टि से माया एवं प्रकृति में कोई भी भेद नहीं । श्वेताश्वतर उपनिषद् में इसी से कहा है-
“मायाँ तु प्रकृतिं विद्यात, माथिनं तु महेश्वरम् । (श्वेता0 उ॰ 4।10)
अर्थात् माया को ही प्रकृति समझना चाहिए और मायापति को महेश्वर ।
जो लोग विष्णु की माया को कोई कौतुक चेष्टा समझते हैं, उन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है, न ही सत् का । माया किसी नियम-मर्यादा विहीन कलाबाजी का नाम नहीं है और न ही मायापति काअर्थ कोई शरारती जादूगर होता है । या सामान्य जादूगर भी जादू का खेल तभी दिखा पाता है, जब वह जादू के नियमों को जाने तथा उनका पालनकरें । सर्वव्यापी चेतन-सत्ता तो स्वयं ही सृष्टि संचालक नियमों की सर्जक है, अतः वह उन नियमों की अवहेलना कैसे सहन कर सकती है ? मायाशक्ति स्वयं ही नियमबद्ध है, नियमों की प्रतिष्ठापिका-शासिका है वह प्रकृति से अभिन्न है । प्रकृजि जिन नियमों से संचालित होती है, वे माया-शक्ति के ही नियम हैं । जो प्रकृति की शक्तियों को, नियमों को जितना अधिक जानता है, वह माया के लीला नियमों का उतना ही अधिक ज्ञाता है । प्राकृतिके सम्पूर्ण स्वरुप को, उसके वास्तविक आधार को जानना ही माया को जानना है ।
जो लोग मायावाद का अर्थ यह समझते हैं कि यह संसार माया है यानी असत् है, है ही नहीं, वे न तो माया का अर्थ जानते, नहीं, मायावाद का स्वरुप समझते ।
माया या प्रकृति असत् नहीं है । अपितु वह अनिर्वचनीया कही गई है, अर्थात् ऐसी जिसका शब्दों द्वारा विवेचन सम्भव नहीं । आज आधुनिक वैज्ञानिक भी तो यही कह रहे हैं । प्रख्यात वैज्ञानिक एडिंगटन ने कहा है-’वस्तु-जगत’ का सारभूत अंश पिघलकर छायावत् बन गया है ।वह एक अज्ञात परिणाम मात्र रह गया है जिस के लिए गणितीय संकेत ‘क्ष’ का प्रयोग किया जासकता है । मात्र वह संकेत, जो अनिर्वचनीय है, अमूर्त है, अव्यक्त है, वही यथार्थ है । जो रंग हम देखते हैं, जो ध्वनि हम सुनते और अंकित करते हैं, जो उष्मा हम महसूस करते हैं, जो प्रकाश हमारे देखने का माध्यम बनता है, वह सब अन्ततः हमारी दिमागी बुनावट है । यही बात डा0 बर्टन ने कही है -”मनुष्य के प्रक्षेपण के तल में यथार्थ जगत प्रतीकों का एक कंकाल ढाँचा मात्र है ।”
अब यह सर्वस्वीकृत वैज्ञानिक तथ्य है कि नाना रुपों, नाना वेशों, नाना नामों वाले पर-नारी, पशु-पक्षी, प्राणी, पौधे, पहाड़, नदी-नाले, नक्षत्र, फल-फूल, संगत-शब्द, आदि सभी कुछ वैज्ञानिक विश्लेषण में मात्र विद्युत प्रवाह या अव्यक्त-निर्वचनीय तरंग प्रवाह बनकर रह जाता है । तब क्या यह सब असत्य है ? तब तो स्वयं वैज्ञानिक भी असत्य हैं, उनके उपकरण असत्य हैं, क्योंकि वे सब तरंगें प्रवाह मात्र हैं । स्पष्ट है कि कोई भी वैज्ञानिक स्वयं को अपने प्रयोगों को असत्य नहीं मानता । न ही संसार को असत्य मानता। किन्तु साथ ही वह पदार्थो के वर्तमान रुपों को अंतिम सत्य भी नहीं मानता । व्यावहारिक दृष्टि से, वे सत्य हैं, किन्तु पारमार्थिक दृष्टि से चरम अर्थो में वे इस रुप में सत्य नहीं है । उस दृष्टि से उनका वास्तविक रुप भिन्न है । यही अनिर्वचनीयता की स्थिति है, जो मायावादी प्रतिपादन का भी निर्ष्कष है ।
जगत् को सत्य न मानने का कारण, मनीषी पूर्वजों की सत्य की भिन्न परिभाषा थी । सत्य की शास्त्रीय परिभाषा यह है कि -
“ त्रिकालाबाध्यं सत्यम् ।”
भूत, वर्तमान और भविष्य इन तीनों कालों में, जागृत स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों दशाओं में जो एक ही रुप से अवस्थित रहे, जिसका रुप बाधित न हो वह सत्य है । आचार्य शंड.कर ने कहा है-
“यद्रुपेण यन्निश्चितं तद् रुपं न व्यभिचरति येत् सत्यम् ॥”
अर्थात् “जिसका जो रुप निश्चित है उसका वह रुप कभी भी अन्यथा न हो, तब वही सत्य है । सामान्य अर्थो में जिसे सत्य कहा जाता है, वह सापेक्ष सत्य है । निरपेक्ष दृष्टि से वह सत्य नहीं है, किन्तु वह असत्य भी नहीं है । इस गम्भीर दार्शनिक प्रतिपादन को न समझने वाले मूढ़मति कल्पनाजीवी ‘ ब्रह्मसत्य जगन्मिथ्या’ जैसे कथनों की आड़ में मनमानी व्याख्याएँ और मनमाने आचरण करते रहते हैं ।
त्रिकालावाधित निरपेक्ष सत्य एक ही है सर्वव्यापी भूमा प्राण, चैतन्य-ऊर्जा, परम सत्ता, विष्णु । वही एक है, अद्वितीय है । शेष सब सापेक्ष सत्य हैं । इस सापेक्ष सत्य का बोध कराने वाली शक्ति माया है यह माया सृजन और संहार के बीच के नाना नाम रुपों वाली नाना क्रियाओं का जो बोध कराती रहती है, उसे ही व्यक्ति सत्य मानता रहता है । जबकि इस सृष्टि का जगत नाम ही इसलिए पड़ा कि यहाँ हर वस्तु निरन्तर गतिशील है । परिणाम प्रवृत्ति या परिवर्तन जगत का स्वभाव है । एक क्षण के लिए भी जगत प्रवृत्ति शून्य नहीं रहता । परिवर्तन की प्रक्रिया यहाँ अविराम चलती रहती है । इस प्रतिक्षण परिणामी, नियत परिवर्तनशील, सतत चन्चल जगत के तात्कालिक अनुभवों को जीवधारी, माया-शक्ति के कारण स्थिर सत्य समझ बैठते हैं ।
इस प्रकार सापेक्ष सत्य को स्थिर सत्य मान बैठने की प्रवृत्ति ही माया बन्धन है । जगत की सत्ता है ही नहीं, ऐसा वेदान्तविद् कभी नहीं कहते । वे मात्र यही कहते हैं कि जगत की व्यावहारिक सत्ता है । पारमार्थिक दृष्टि से जगत सत्य नहीं है, न ही असत्य है अपितु वह ‘मिथ्या’ है । यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वेदान्त में मिथ्या का अर्थ ‘असत्’ नहीं, अपितु अनिर्वचनीय होता है ।
त्रिकालावाधित सत्य एक ही है-ब्रह्म या विष्णु । जगत मिथ्या या अनिर्वचनीय है । उसकी स्वयं की सत्ता तो वास्तविक है । किन्तु वह सत्ता सतत परिवर्तनशील है, परिणामशील है । व्यक्ति जब इस परिवर्तनशील जगत के किसी अनुभव विशेष को परम सत्य मान बैठता है, तो वह भ्रम में होता है, माया-पाश में बँधा होता है । स्पष्ट है कि यह प्रतिपादन आधुनिक विज्ञान के अन्वेषणों से भी खरा उतरता है ।
सर्वव्यापी चैतन्य ऊर्जा विष्णु है । इस विष्णु की चार भुजाएँ या चार चेतनात्मक प्रवृत्तियाँ हैं । सम्भूति और असम्भूति उनकी दाहिनी भुजाएँ हैं और विद्या एवं अविद्या वाम भुजाएँ हैं । यह फोटान कणों आदि से भी परे चित्-शक्ति प्रवृत्तियाँ हैं । सम्भूति का प्रतीक है-चक्र, एवं असम्भूति का प्रतीक है-गदा । ये दोनों ‘भूमा-प्राण’ की अभिव्यक्तियाँ हैं, जो सृजन एवं संहार की क्रियाशक्ति का आधार हैं ।
सम्भूति-शक्ति से प्राण ऊर्जा तथा असम्भूति-शक्ति से अपान-ऊर्जा प्रफुटित होती है । दोनों ही शक्तियाँ भूमा प्राण का अंश हैं, जो सर्वव्यापक हैं । द्यान्दोग्य उपनिषद् के अध्याय 24 मंडल 1 में सनत्कुमार ने नारदजी से स्पष्ट किया है-
“यत्र नान्यत्पश्यचि नान्यच्छृणोति’नान्यद्विजानाति स भूमाथ ॥”
अर्थात्- ‘जहाँ और कुछ नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता और कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है ।’ भूमा सर्वत्र है । वह अपनी ही महिमा में प्रतिष्ठित है । वही विष्णु शक्ति है ।
“विसिनोति सर्वान प्राणिनः विशति वा सर्वेषुप्राणिषु इति विष्णु- ।”
अर्थात् जो सभी प्राणियों को परस्पर अविच्छिन्न सूत्र में संग्रथित किये हैं और जो सबके भीतर भी विद्यमान है, वह विष्णु है । चराचर जगत की सभी गतिविधियाँ इसी भूमा प्राण या विष्णु के आधीन है । इनकी दो मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं (1) स्थितिक ऊर्जा (2) गतिज ऊर्जा यानि सम्भूति एवं सम्भूति । गतिज ऊर्जा या सम्भूति निर्वाध प्रसार की ओर प्रवृत्त रहती है । स्थितिक ऊर्जा सदा शून्य में समाहित होने की ओर प्रवृत्त रहती है । ब्रह्माण्ड निरन्तर फैल रहा है और सतत शून्य में भी समाहित हो रहा है, यह अर्वाचीन विज्ञान की एक प्रसिद्ध अवधारणा है ।
सृजन और संहार एकाँगी प्रक्रियाएँ नहीं है । उत्पत्ति और विनाश सदा साथ रहते हैं । जन्म के साथ ही मृत्यु की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है । ब्रह्माण्ड विस्तार और ब्रह्माण्ड-विलय साथ-साथ हो रहा है । यह संसार अनादि काल से सृष्टि और प्रलय के मध्य दोलायमान है । सृजन के अधिदेव ब्रह्मा सम्भूति-शक्ति के प्रतिनिधि हैं और संहार के अधिदेव रुद्र असम्भूति शक्ति के प्रतिनिधि हैं । सृष्टि और लय का सह समन्वित क्रम सतत गतिशील है । इन्हीं दो छोरों के बीच मानों पेन्डुलम की तरह संसार निरन्तर दोलायमान है । प्रत्येक क्षण सृजन-संहान का, जन्म-मरण का वृद्धि-क्षय का उर्त्कष-अपकर्ष का यह क्रम चल रहा है । आधुनिक विज्ञान की भाषा में असम्भूति को स्थितिक ऊर्जा और सम्भूति गतिज ऊर्जा कहते हैं । दोनों का अविकल द्वन्द्व जारी है । दोनों का प्रत्याहरण-बल सदा ही मध्य-बिन्दु की ओर उन्हें निर्देशित करता रहता है । चेतना मनुष्य में यही द्वन्द्व संस्कार एवं वासना के रुप में उभरता है । संस्कार का आधार स्थितिक ऊर्जा है और वासना गतिज ऊर्जा से संचालित होती है । इन दोनों के बीच निरन्तरदोलन की मायापति विष्णु की योगमाया का आकर्षण है । सम्भूति शक्ति को रजोगुण एवं असम्भूति शक्ति को तमोगुण भी कहा जाता है । इन दोनों का ही प्रकाशन या बोध सतोगुण है । उस बोध से प्राणी में आत्मिक सुख का भाव उत्पन्न होता है ।
सम्भूति-शक्ति संकल्पमूलक तथा आसक्तिमूलक आवेग बनकर व्यक्ति में प्रकट होती है यह रागात्मि का वृत्ति है जो प्राणी को कर्म में प्रवृत्त कराती है।
असम्भूति शक्ति मोह एवं मूढ़ता-भाव के रुप में अभिव्यक्त होती है । वह जड़तामूलक वृत्ति है । स्थिति एवं धृति के रुप में वह प्राणी में देखी जाती है ।दोनों का यथार्थ-बोध सतोगुण है, जो सन्तुलन की शक्ति देता है तथा सत् के चिदानन्द-स्वरुप के निकटतर ले जाता है । विष्णु की बाँयी भुजाएँ हैं विद्या और अविद्या । विद्या का प्रतीक है-शंख । अविद्या के स्रोत से शक्ति प्राप्तकर चेतना की दिशा में अभिमुख होने का प्रतीक है । पंकज जो कि पंक में होता है, किन्तु सविता की किरणों का साधक-आराधक होता है। यहाँ भी विद्या में प्रवृत्ति रजोगुणी है, सतोगुणी बोध में ही उसकी सार्थकता है । अन्यथा विद्या भी बन्धन कारक है । अविद्या वस्तुतः असत् की प्रतीति है । इस प्रतीति का सही-सही रुप जानने पर वह भी चेतना के अभिज्ञान में सार्थक एवं सहायक सिद्ध हो सकती है । कमल इसी सार्थकता का प्रतीक है। यदि अविद्य का ऐसा सार्थक उपयोग नहीं किया गया और उसके द्वारा चेतना के मूल स्वरुप की उपासना में सहायता नहीं ली गई, तब पद्य का प्रस्फुटन सम्भव नहीं, तब तो बस कीचड़ ही कीचड़ होगा, जिसमें जोंक आदि पैदा होंगीं, कमल नहीं खिलेगा । व्यक्ति चेतना में विद्य और अविद्या के बीच निरन्त द्वन्द्व चलता रहता है । इसी चिन्मूलक द्वन्द्व का नाम माया है । ईशावास्य उपनिषद् में कहा है कि सत्य का मुख्य हिरणमय पात्र के ढंका हैः-
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्या विहितं मुखम् ।”
यही हिरण्मय पात्र या आवरण माया है । माया को एक चकाचौंध, कहा जा सकता है, जो अपने तीव्र एवं चपल प्रकाश में आँखों में ऐसा प्रभाव डालती है कि उसमें वस्तुएँ दिखती तो हैं किन्तु ठीक से नहीं देखी जा सकतीं । विद्या और अविद्या, सत् और असत्, सम्भूति और असम्भूति के इस द्वन्द्व के यथार्थ स्वरुप को समझा लेने पर ही व्यक्ति माया के स्वरुप को तथा मायापति विष्णुको समझता है । उसी स्थिति में नानात्व के मूल में सक्रिय एकत्व का साक्षात्कार होता है । ईशोपनिषद् में इसी तथ्य का निर्देश करते हुए कहा गया हैः-
“विद्याँ च अविद्याँ च यस्तद्वेदोभयं सह ।अविद्याया मृत्युँ तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥”
“सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।विनाशेन मृत्युँ तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥”
अर्थात्-’जो विद्या और अविद्या, को साथ-साथ जानता है, वही अविद्या द्वारा मृत्यु को पार कर विद्या की शक्ति से अमृतत्व को प्राप्त करता है ।
जो सम्भूति, असम्भूति दोनों को यथार्थ सम्यक् ज्ञान प्राप्ति कर लेता है वह असम्भूति से मृत्यु को पार कर सम्भूति से अमृतत्व को प्राप्त करता है । इस प्रकार सर्वव्यापी विष्णु की उभयात्मक शक्तियों का यथार्थ स्वरुप जानना और निरन्तर सक्रियता के बीच भी सनातन चित् तत्व का ध्यान रखना ही विष्णु पूजा है । संस्कार रुपी स्थितिक ऊर्जा या सम्भूति और वासना रुपी गतिज ऊर्जा या सम्भूति दोनों के यथार्थ स्वरुप को जानकर वासनाओं को श्रेष्ठ कामनाओं में रुपान्तरित करते हुए, संस्कारों का सतत परिष्कार करते हुए भूमा की उपासना में प्रवृत्त रहने में ही जीवन की सार्थकता है । माया-बन्धन से मुक्ति का वही मार्ग है । दोनों ही प्रकार की शक्तियों की संचालक विष्णुसत्ता सूक्ष्म रुप में प्रत्येक प्राणी के हृदयाकाश में सच्चिदानन्द रुप में विद्यमान है । उस चेतन-तत्व का प्रकाश जीवन में अधिकाधिक संव्याप्त होता चले, यही प्रयास मनुष्य का पुरुषार्थ है, कर्त्तव्य है ।
“आरोप्यते शिला शैली यत्नेन महता यथा।’ निप्पात्यंतं क्षणोनाध स्तथात्मा गुणदोषयोः॥”
किसी ऊँचे स्थान पर शिला बड़ी कठिनाई से चढ़ाई जाती है कन्तु वही शिला क्षण भर में नीचे आसानी से गिराई जा सकती है । अपने गुण-कर्म और स्वभाव की भी यही स्थिति है । इन्हें उच्च स्तर का बनाने में बड़ी कठिनाई होती है परन्तु मनुष्य इनको पतोन्मुख सरलता से कर लेता है । आत्मा के उत्थान व पतन की भी यही स्थिति है ।
मौत क्यों डरावनी लगती है, इसका एक ही उत्तर है- उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी का अभाव । यदि जीवन और मरण का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध समझा जा सके तो विदित होगा कि फल से बीज और बीज से फल की तरह दोनों एक दूसरे से सधन सहयोगी हैं । ग्रहण और विसर्जन का क्रम ही इस सृष्टि का आधारभूत कारण है । शरीर आहार ग्रहण करता है और मल विसर्जन । जीवन को भी नवीन का ग्रहण आवश्यक है । उसके लिए पुरातन का विसर्जन किये बिना कोई गति नहीं ।
स्थिरता और जड़ता एक ही बात है । मनुष्य चेतन है इसलिए उसका एक स्थिति में बने रहना सम्भव नहीं । यहाँ सब कुछ बदलता चलता है तो जीवन यात्रा में गतिशीलता क्यों नहीं रहेगा ? यात्रा क्रम में इन पड़ावों को ही जन्म और मरण कहते हैं इसमें न तो कुछ अप्रत्याशित है और न आर्श्चयजनक । फिर मरण से भय किस बात का ।
प्रियजनों का विछोह एवं सम्पत्ति का व्यामोह भी मरण भय का एक कारण है । यदि साथियों और साधनों का आरम्भ से ही ईश्वर की सम्पदा समझा जाय और उनके साथ सेवा साधना एवं कर्त्तव्य परायणता के अभ्यास का क्रम जारी रखा जाय तो व्यामोह की उतनी जटिलता उत्पन्न नहीं होने पावेगी । जिसमें मरण की घड़ी असह्य वेदना उत्पन्न करें । स्वागत और विदाई के अपने-अपने खट्टे मिट्ठे स्वाद हैं, जो आये दिन इच्छा या अनिच्छा से चखने पड़ते हैं । सम्पत्ति साधनों के प्रति बैंक के खजान्ची जैसी और प्रियजनों के प्रति हर्षोत्सव में एकत्रित होने वाले मित्रों जैसी दृष्टि रखी जा सके तो विदाई में व्यथा नहीं, नवीनता भार की अनुभूति होगी ।
मृत्यु के सम्बन्ध में आमतौर से लोग विचार नहीं करते । उसकी जिम्मेदारी एवं तैयारी के संदर्भ में उपेक्षा बरतते रहते हैं । फलतः समय आने पर मरण अविज्ञात रहस्य के रुप में सामने आता है और भयानक एवं त्रासदायक लगता है ।
अज्ञात डरावना होता है और कौतूहलपूर्ण भी । मनुष्य की मानसिक बनावट भी कुछ ऐसी है कि वह अनजान की ओर बढ़ने एवं रहस्यों को समझने में झिझकता है । पर इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर यथावत् बना है कि अज्ञात की ओ बढ़ने का साहस जुटा पाने वाले ही महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित करते हैं । इतिहास उन व्यक्तियों, महापुरुषों से बना है जिन्होंने जन प्रवाह से विपरीत अज्ञात दिशा में बढ़ने कुछ करने का साहस भरा पुरुषार्थ किया । उपलब्धियाँ चाहे भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक दोनों में ही यह साहस भरा पुरुषार्थ ही झाँकता दिखायी देता है । जिन्होंने प्रयत्न किया उन्हें अनुभव हुए, अनजान क्षेत्रों को जितना डरावना, कठिनाइयों से भरा समझा गया था वस्तुतः वे उतने नहीं है वरन् अनुभव तो कुछ विपरीत ही तथ्यों का प्रतिपादन करते हैं ।
ऋषियों ने जीवन को सतत अविराम गति से चलने वाला प्रवाह बताया है । यह मात्र विचारणा नहीं वरन् उनके अनुभव के तथ्यों पर आधारित है शरीर क्षेत्र से पार जाकर उन्होंने जीवन-मृत्यु की गुत्थियों को सुलझाया और बताया कि मृत्यु जीवन का एक पड़ाव मात्र है । जहाँ जीवात्मा रुककर नयी शक्ति, नयी स्फुरणा प्राप्त करती है । तत्पश्चात् अगले जीवन की ओर प्रवेश करती है । साधना पुरुषार्थ द्वारा किये गये अनुभवों के आधार पर ऋषियों ने मृत्यु को भी एक सामान्य घटना के रुप में प्रतिपादित किया है । डरने, अनजान काल्पनिक पीड़ा से घबड़ाने जैसी बातें मृत्यु की अवधि अथवा उसके बाद नहीं होती । मृत्योपरान्त जीवन के अस्तित्व को अपनी योग साधनाओं के माध्यम से देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की । इस तथ्य की पुष्टि अब परामनोविज्ञान की नवीन शोधों द्वारा हो रही है ।
मरण काल में अनुभूतियों के सम्बन्ध में जो संकलन किये गये हैं उनसे पता चलता है कि वह घड़ी न कौतुक कौतूहल जैसी होती है, न कोई ऐसा कष्ट मिलता है जिसे असह्य कहा जा सके । सब कुछ उतनी ही सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है जितना कि रात्रि को सोते समय वस्त्रों को उतारना । बढ़े हुए नाखून या बाल काट कर शरीर से अलग किये जाते रहते हैं । न्यूनाधिक मात्रा में मरण का परिवर्तन भी प्रायः वैसा ही होता है ।
परामनोविज्ञान में किये गये कार्यो के लिए डा0 ‘किंग ह्वेलर’ प्रसिद्ध है । अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी इम्मार्टल सोल’ में इस प्रकार की अनेकों घटनाओं का संकलन किया है जिसमें मृत्यु से वापस लौटे व्यक्तियों की अनुभूतियों का वर्णन है । इस पुस्तक में एक हृदय रोगी का वर्णन है ।
ओंटेरियो (कनाडा) कोस्टल क्षेत्र में मानव सम्पदा निर्देशक हर्वग्रिफिन हृदय के मरीज थे । सन् 1974 में उन्हें मात्र तीन दौरे पड़े । हर बार उन्हें डाक्टरों द्वारा मरा घोषित किया गया। पर आर्श्चय कि दौरे कुछ मिनटों बाद वे जीवित हो उठते थे । डाक्टरों ने उसे एक अनहोनी एवं चमत्कारी घटना के रुप में स्वीकार किया । मृत्यु के पश्चात् उन्हें जो अनुभूतियाँ होती थीं वे लगभग एक सी थीं । ग्रिफिन का कहना है कि “प्रत्येक मृत्यु के उपरान्त के अनुभव में मैंने अपने को उज्जवल तेज प्रकाश से घिरा पाया, जिसमें गर्मी की भी अनुभूति होती थी । मुझे याद है वह बिजली के कड़कने से निकलने वाले प्रकाश जैसा था । ध्यान से देखने पर पाया वह मेरी ओर बढ़ रहा है । मेरे और प्रकाश के बीच में एक काली छाया थी, जो उस तेज प्रकाश से मेरी रक्षा कर रही थी । उस समय हमने स्वयं को मुड़े हुए शरीर के रुप में अनुभव किया । ऐसा लग रहा था कि मैं समुद्र तट पर पड़ा एक भू्रण हूँ और मुझ पर सूर्य का तीव्र प्रकाश पड़ रहा है । इसके साथ ही गहरी काली छाया के किनारों पर तैरने की भी अनुभूति हो रही थी । इतने में पुनः उज्जवल प्रकाश मेरी ओर बढ़ा । डर तो नहीं लगा पर रहस्यात्मक अनुभूति से रोमाँचित हो उठा । सोच रहा था कि कहीं यह प्रकाश पूरी तरह से घेर न ले । ठीक उसी समय हमारा एक पुराना परिचित प्रकट हुआ जो सलेटी रग का सूट पहने था । अति निकट होने के कारण मैं उसको छू सकता था । उसने निडर भाव से कहा ‘आ जाओं, सब ठीक है । अचानक मुझे सीने पर तेज आघात महसूस हुआ । आवाज भी सुनाई दी ‘क्या मैं बिजली के झटके दूँ” दूसरी ओर से आवाज आयी ‘नहीं अभी नहीं । उसकी पलकें झपक रही हैं । ‘इसकी आयु अभी पूरी नहीं हुई है । इसे जिन्दा रहना चाहिए । इसके बाद मैं अस्पताल में पड़े अपने शरीर में वापस पहुँच गया ।”
हर्व ग्रिफिन की अनुभूतियाँ अस्पष्ट होते हुए मरणोत्तर जीवन का ही नहीं, एक ऐसे लोक के अस्तित्व का भी प्रतिपादन करती हैं जहाँ स्थूल शरीर की मर्यादाएँ समाप्त हो जाती हैं । इसी से मिलती-जुलती घटना ‘वैली कैमरान की, भी है जो मृत्यु के बाद भी जीवात्मा के बने रहने तथा अपने पूर्व संस्कारों के अनुरुप अनुभूतियाँ करने के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करती हैं । नित्य की भाँति जुलाई 1977 को वैली कैमरान टोरंटो (कनाडा) से रिहर्सल से वापस घर लौटे । वे घर की चाभी स्टूडियों में ही भूल आये थे । ऊपरी मंजिल की खिड़की तक पहुँचने के लिए उन्होंने पाइप का सहारा लिया। पर चढ़ते ही पैर फिसल जाने के कारण गिर पड़े । खोपड़ी में चार फ्रैंक्चर हो गये । गिरते ही अचेत हो गये । पड़ौसियों ने टोरंटो के एक अस्पताल की इंटेसिव केंयर यूनिट में भर्ती कराया । भर्ती होने के बाद डाक्टरों ने बीस मिनट तक हृदय को रुका पाया । डाक्टरों ने तो मरा घोषित कर दिया था पर पुनः हृदय की धड़कन आरम्भ हो जाने से उन्हें अपनी मान्यता बदलनी पड़ी । शरीर से अलग होने पर उन्हें विचित्र अनुभव हुए । वैली कैमरान ने अपनी अनुभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि, “दुर्घटना के कुछ क्षणों बाद हमने अपने को शरीर से अलग पाया । मेरे लिए संसार की सर्वाधिक आर्श्चयजनक घटना थी । मेरा शरीर निर्जीव मेरे सामने पड़ा था तथा स्वयं को मैं बहुत हल्का अनुभव कर रहा था । मुझे लगा कि प्रयत्न करने पर उड़ भी सकता हूँ । देखते ही देखते छत की दीवार पर जा पहुँचा । इतने में एक प्रकाश पुन्ज दिखायी पड़ा । न जाने उसमें क्या आकर्षण था कि मैं उसके साथ खिंचता चला गया। लम्बे समय तक प्रकाश पुन्ज के पीछे चलता रहा । एक स्थान पर जाकर प्रकाश पुन्ज रुक गया । दौड़ कर आगे बढ़ा । प्रकाश की आभा में एक सुनहला विशाल महल दिखायी पड़ा । जिसमें बड़ा सा फाटक लगा था । मैंने उसे धकेल कर खोलने की कोशिश की । जो आसानी से खुल गया । भीतर एक बड़े आलीशान सजे कमरे में मेरे पिताजी खड़े थे जो दो वर्ष पूर्व मर चुके थे । पर आर्श्चय, कि वे युवक जैसे दिखायी पड़ रहे थे, जब कि वृद्धावस्था में मरे थे । उस स्थान पर अनेकों व्यक्तियों के बातचीत की आवाज सुनाई दे रही थी, पर कोई अन्य व्यक्ति दिखायी नहीं पड़ रहा था । मुझे साथ लेकर दूसरे कमरे में पिताजी बैठ गये । सामने एक दर्पण सा स्वच्छ परदा लगा था। उसमें मेरे जीवन की सभी घटनाएँ क्रमबद्ध रुप से उभरने लगीं । की गई गल्तियों के लिए मैं चित्रों को देखकर मन ही मन ग्लानि करने लगा। साथ ही सोचता भी जाता था कि ये सब घटनाएँ तो मात्र मुझे मालूम थी । यहाँ कैसे मालूम हुई ? पर कोई उत्तर न मिल सका । घटनाओं के अन्त के साथ पुनः वही प्रकाश पुन्ज प्रकट हुआ । उसका आदेश मिला तुम्हारी आयु अभी बाकी है । कुछ ही क्षणों में अपने शरीर में वापस पहुँच गया । “
मृत्यु को जीवन का अन्तिम अतिथि मान कर उसके स्वागत की पूर्व तैयारी की जाती रहे । उसके साथ सुखद प्रयासों के लिए आवश्यक साधन जुटानें में तत्परता आनन्ददायक हो सकता है जैसा कि सुरम्य पर्यवेक्षण के लिए नियोजित किया गया पर्यटन ।
आत्मोर्त्कष के लिए दो आधार प्रमुख्य माने गये हैं । श्रद्धा और विश्वास । साधना रुपी गाड़ी के यही दो पहिये हैं जिनके सहारे वह गतिशील होती तथा अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचती है । इनके बिना साधना पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता । आध्यात्मिक सफलताओं में साधना उपचारों को महत्व दिया जा सकता है किन्तु गहराई में जाने पर पता चलता है कि साधना रुपी बीज को सिंचित, पुष्पित, पल्लवित करने में परोक्ष किन्तु प्रमुख योगदान इन दोनों का ही है । खाद और पानी के बिना तो अच्छे किस्म के बीज भी अंकुरित नहीं हो पाते । किसी प्रकार अंकुरित हो भी जाये तो भी उनके बढ़ने, फूलने-फलने की सम्भावना बनी रहती । इसी प्रकार श्रद्धा- विश्वास का अवलम्बन न हो तो प्रभावशाली उपासना प्रणाली भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती । समस्त आध्यात्मिक उपचार इन्हीं दो का अवलम्बन पाकर सफल होते हैं । यही कारण है कि सभी धर्मशास्त्र इनकी महत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।
विकास की दृष्टि से तर्क की जितनी उपयोगिता है उससे कम श्रद्धा की भी नहीं है। इन दोनों के समन्वय सन्तुलन से ही विवेकशीलता का प्रादुर्भाव होता है । सर्वागीण प्रगति का क्रम चलता है । क्षेत्र चाहें भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक दोनों में से किसी को छोड़ा नहीं जा सकता । गाड़ी के दो पहिये, शरीर के दो हाथ, दो पैर की तरह परस्पर दोनों ही जुड़े हुए हैं । तर्क अथवा श्रद्धा किसी का भी एकाँगी अवलम्बन प्रगति क्रम को अवरुद्ध कर देता-आगे नहीं बढ़ने देता । आगे बढ़ने-ऊँचे उठने-भौतिक अथवा आत्मिक प्रगति के लिए इन दोनों का होना आवश्यक है ।
तर्क विचारणा को जन्म देता- श्रद्धा विश्वास को । विचारणा भी विचार के लिए आधार ढूँढ़ती है । आधार तभी बन सकता है जब विश्वास हो । अन्यथा तर्क बुद्धि तो किसी भी केन्द्र पर चिन्तन को केन्द्रीभूत नहीं कर सकती । यह तो तभी बन पाता है जब विश्वास के सहारे किसी भी विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि श्रद्धा के अभाव में विचारणा-तर्क का प्रार्दुभाव सम्भव नहीं है । किसी विषय पर आस्था ही तर्को का सृजन करती उस पर सोचने, सत्यता को ढूँढ़ निकालने को प्रेरित करती है । श्रद्धा मानवी व्यक्तित्व के मूल में घुली-मिली है जिसके बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता । आगे बढ़ने, प्रगति करने की बात तो दूर रही । यह बात अलग है कि हम उसका अनुभव न कर सकें ।
मानव मन की यह विशेषता होती है कि वह उन चीजों का अनुभव नहीं कर पाता जो उसे जन्मजात मिली हैं । इससे परिचित न होने कारण ही मनुष्य अपने में विद्यमान क्षमता का अवलोकन नहीं कर पाता । जीवन क्षेत्र में असफलताओं का कारण यही है-अपनी क्षमता से अपरिचित रहना,उनका उपयोग न कर पाना । जो यह पहचान लेते, उनका अवलम्बन लेकर आगे बढ़ने का प्रयत्न करते, वे ही जीवन क्षेत्र में सफल होते हैं । आत्म-विश्वास इसी बोध प्रक्रिया की परिणिति है जो सामान्य व्यक्ति को असामान्य-प्रतिपादन-महामानव के स्तर तक घसीट ले जाती है ।
यही बात श्रद्धा के सर्न्दभ में भी है । मनुष्य की प्रवृत्ति में घुली-मिली होने के कारण वह अनुभव नहीं कर पाता । अज्ञानवश कह उठता है कि श्रद्धा मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं । अधिकाँश भौतिकवादी यह कहते सुने जाते हैं ।
समीक्षा की जाय तो पता चलता है कि विश्वास के बिना तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता । जो इसकी उपयोगिता से इन्कार करते हैं वे स्वयं भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रुप से इसका ही आश्रय लेकर आगे बढ़ते है । व्यवसायी अपने व्यवसाय में जन- श्रद्धा का लोगों का विश्वास ही जीतने का प्रयास करता है । दुकानदारी में वही व्यक्ति सफल होता है जो अपनी वस्तुओं की प्रामाणिकता एवं उनके मूल्य के प्रति लोगों को आश्वस्त कर दे । यह क्रम बन जाने पर तो प्रगति के शिखर पर पहुँचने में देरी नहीं लगती । बेईमान भी जन श्रद्धा के आश्रय में ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है । विश्वास टूट जाने पर तो सफल होना दूर रहा उलटे जन तिरस्कार एवं सामाजिक दण्ड का भागी बनता है ।
सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो स्पष्ट होगा कि सम्पूर्ण जीवन प्रवाह एवं उसकी उपलब्धियाँ वस्तुतः श्रद्धा की ही परिणिति हैं माँ अपने अभिन्न अंग मानकर नौ माह तक अपने गर्भ में बच्चे का सेचन करती है । अपने रक्त माँस को काटकर शिशु को पोषण प्रदान करती है । श्रद्धा का यह उत्कृष्ट स्वरुप है जिसका बीजारोपण माँ बच्चे में संस्कार के रुप में करती है । निस्वार्थ भाव से उसको संरक्षण देती है । अनावश्यक भार कष्टों का जंजाल समझने का तर्क उठे तो नवशिशु प्रादुर्भाव ही सम्भव न हो सकेगा ।
यह श्रद्धा ही है जिसके कारण बच्चा माँ के सीने से चिपकने, स्नेह-दुलार पाने के लिए लालयित रहता, रोता कलपता रहता है । मूक-भाषा, वाणी से रहित नवशिशु की श्रद्धा एक मात्र माँ के ऊपर ही होती है । माता-पिता भी निश्च्छल हृदय से बच्चे के विकास के लिए हर सम्भव प्रयास करते हैं । खाने’पीने, स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर शिक्षा-दीक्षा के झंझट भरे संरंजाम जुटाते हैं । समग्र विकास ही उनका एक मात्र लक्ष्य होता है । तर्क तो हर बात को उपयोगिता की कसौटी पर कसता है । इस आधार पर कसने पर माता-पिता को हर दृष्टि से घाटा ही घाटा दिखायी पड़ेगा । बात तर्क की मान ली जाय । तो बच्चे का अस्तित्व ही संका में पड़ जायेगा । दृष्टिमात्र उपयोगितावादी हो जाय तथा यह परम्परा प्रत्येक क्षेत्र में चल पड़े, तो परिवार एवं समाज विशांखलित हो जायेगा। सभ्यता को अधिक दिनों तक जीवित नहीं रखा जा सकेगा ।
श्रद्धा ही पारिवारिक जीवन को स्नेह-सूत्र में बाँधें रहती है । सहयोग करने, अन्य सदस्यों के लिए अपने स्वार्थो का उर्त्सग करने की प्रेरणा देती है । पारिवारिक विघटनों में इसका अभाव ही कारण बनता है । पति-पत्नी के बीच मन-मुटाव, सदस्यों के बीच टकराहट का कारण अश्रद्धा है । तर्क एवं उपयोगिता की कसौटी पर कसने पर तो वृद्ध माता-पिता का महत्व भी समझ में नहीं आता । वे भार के रुप में ही दिखायी पड़ते हैं । किन्तु श्रद्धा दृष्टि जानती है कि उनका कितना ऋण चढ़ा है । उनके आशीवार्द, स्नेह को पाने की कामना आजीवन बनी रहती है । यह भाव दृष्टि तो श्रद्धा की ही उपलब्धि है । जो सदा एक युवक को माता-पिता के समक्ष नत-मस्तक किये रहती है ।
समाजिक सुव्यवस्था भी इसमें रहने वाले सदस्यों के आपसी विश्वास पर टिकी है । सहयोग करने दुःखों में हाथ बँटाने की उमंग तो अन्तरंग की महानता के कारण ही उत्पन्न होती है । यह न हो, पीड़ा-पतन को देखकर हृदय द्रवित न हो तो मानव समाज एवं पशुओं में कोई भेद नहीं रह जायेगा ।
तर्को, ईश्वर के प्रति बौद्धिक प्रश्नों का प्रार्दुभाव तभी होता है जब कि आस्था का प्रकाश पहले से ही विद्यमान हो । आस्था न हो तो अकेले तर्क एवं प्रमाण कभी भी मनुष्य के हृदय में ईश्वरीय भावना को प्रतिष्ठापित नहीं कर सकते । तार्त्पय यह है कि ईश्वर के प्रति आत्म-सत्ता के प्रति आस्था हृदय में पहले से ही अव्यक्त रुप में रहती है । तर्को का उपयोग तो मात्र भावनाओं, आस्थाओं को परिपुष्ट करने के लिए होता है । वस्तुतः विश्वास से ही तर्क की उत्पत्ति होती है । ऐसी स्थिति में तर्क का अवलम्बन तो लिया जाय, पर उसका उपयोग अन्तःश्रेष्ठता श्रद्धा तत्व को विकसित करने में किया जाय।
मानवी जीवन में आधी गलतियाँ तो केवल मात्र इसलिए हो जाता हैं कि जहाँ हमें विचार से काम लेना चाहिए वहाँ हम भावना से काम लेते हैं और जहाँ भावना की आवश्यकता रहती है । वहाँ विचारों को अपनाते हैं । -इमर्सन
समझा जाता है कि प्रतिभाएँ जन्मजात रुप से विशिष्ट गुण क्षमताएँ सम्पन्न होती हैं और उपयुक्त परिस्थितियाँ ही किसी मनुष्य को आगे बढ़ातीं व ऊँचा उठाती है । इसी क्रम में यह भी सोचा जाता है कि लाख प्रयत्न किये जाँय, किसी में जन्मजात प्रतिभा न हो तो वह आगे नहीं बढ़ सकता और उपयुक्त अवसर न मिले तो कितने ही हाथ-पैर मारने पर भी सफलता हाथ नहीं लगती । संसार में कितने ही व्यक्ति ऊँचे उद्देश्यों को सामने रख कर प्रयत्न करते हैं, लेकिन उनमें थोड़े बहुत ही सफल हो पाते हैं । हजारों लोग उन्नति के लिए, गुण और योग्यता सर्म्वधन के लिए प्रयास करते हैं, पर उनमें किन्हीं-किन्हीं का ही मंतव्य पूरा होता है ।
इसके विपरीत अनेक व्यक्तियों को अनायास ही सफलता मिलती और उन्नति के शिखर उनके चरण चूमते हैं । जन्मजात रुप से प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के ऐसे ढ़ेरों उदाहरण हैं, जिसमें महापुरुषों ने छोटी उम्र में ही बड़े काम कर दिखाये और जब वे थोड़े बड़े हुए तो महानता के शिखर पर जा पहुँचे । महान् विजेता शंकराचार्य ने सत्रह वर्ष की आयु में शेरोनिया का युद्ध जीता था । शंकराचार्य ने सोलह वर्ष की उम्र में सारे भारत के पंडितों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया था । बादशाह अकबर ने तेरह वर्ष की आयु में राजगद्दी प्राप्त की और सत्रह वर्ष की उम्र में राजकाज सम्भाल लिया था । छत्रपति शिवाजी ने तेरह वर्ष की अवस्था में तोरण का किला जीत लिया था ।
सन्त ज्ञानदेव ने मात्र बाहर वर्ष की आयु में भगवद् गीता पर प्रसिद्ध टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिख डाली थी । राज्य कार्य हाथ में लेते समय महारानी लक्ष्मी बाई की आयु 18 वर्ष थी । महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगौर ने चौदह वर्ष की आयु में ही शेक्सपीयर के महान नाटक ‘मैकबैथ’ का बंगला में अनुवाद कर लिया था । अँग्रेजी में कविताएँ लिखकर विदेशों तक में प्रसिद्धि पा लेने वाल बंगाली कवियत्री तोरुदत्त ने 18 वर्ष की आयु में ही यह स्थिति प्राप्त कर ली थी । भारत कोकिला कही जाने वाली श्रीमती सरोजनी नायडू ने 13 वर्ष की अवस्था में ही तेरह सौ पंक्तियों की एक अँग्रेजी कविता लिखी थी, जो अँग्रेजी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है । प्रख्यात नाटककार हरींद्र चट्टोपाध्याय ने अपना सबसे प्रसिद्ध नाटक ‘अब्ब हसन’ चौदह वर्ष की आयु में लिखा था । इस तरह के ढेरों उदाहरण हैं जो जन्मजात प्रतिभाओं की महान उपलब्धियों को प्रामाणित करते हैं ।
इसके साथ ही यह प्रमाण उन निराश व्यक्तियों को अपनी हताशा का औचित्य सिद्ध करने के लिए भी एक बहाना बनते हैं जो कि क्षेत्र में थोड़ा बहुत प्रयत्न करने के बाद हार थक जाते हैं और अपने प्रयत्नों को वहीं विराम दे देते हैं । इस सर्न्दभ में यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे यह समझा जाय कि जिन व्यक्तियों में जन्मजात रुप से कोई प्रतिभा मिली हुई दिखाई देती है, उन पर ईश्वर की कोई विशेष कृपा है और उसने पक्षपात करने हेतु यह विशेषताएँ वरदान स्वरुप दे डाली हैं । वस्तुतः ऐसा कुछ नहीं है । जिन व्यक्तियों में जन्मजात रुप से कोई प्रतिभा दिखाई देती है, वस्तुतः वह पिछले जन्म के किये गये प्रयासों, साधनाओं का ही परिपाक परिणाम होती है । बहुधा ऐसे व्यक्ति पिछले जन्म में इस दिशा में अविराम श्रम करते हुए हार-थक कर असफल हुए हैं और इस जन्म में उन्हें पिछले जन्मों की साधना का सत्परिणाम प्राप्त हुआ है । जिस प्रकार बुरे कर्मो का फल इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में मिलता है, उसी प्रकार अच्छे कार्यो का परिणाम कार्यो का परिणाम भी निश्चित है वह भी इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित रुप से मिलता है ।
कर्मफल की निश्चितता का विश्वास भले ही तत्काल कोई परिणाम न भी मिले तो भी निरुत्साहित नहीं करता और पुनर्जन्म तो एक ऐसा ध्रुव सत्य है जो अब केवल मानने या विश्वास करने का ही विषय नहीं रह गया है वरन् विज्ञान सिद्ध विषय बन चुका है । इस दृष्टि से असफलता के लिए भाग्य को दोष देकर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने का कोई कारण नहीं है । प्रख्यात साहित्यकार और विचारक श्री इलाचन्द्र जोशी ने जन्मजात प्रतिभा सम्पन्न दिखाई देने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में लिख है-”विराट् जीवन के जो असंख्य पहलू और अनगिनत रुप हमारी कल्पना में उतरते रहते हैं, उनका विकास एक छोटे से जीवन की सीमित परिधि में कदापि सम्भव नहीं है, उसके लिए कई जन्म चाहिए। प्रत्येक प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने भीतर इस महासत्य को अनुभव करता है ।”
भगवान बुद्ध के सम्बन्ध में तो प्रख्यात है कि उन्होंने पिछले सौ जन्मों की यात्रा पूरी करने के बाद बुद्धत्व को प्राप्त किया था । इन पिछले सौ जन्मों में वे गाय-बैल लेकर कूकर शूकर आदि कई मानवेतर योनियों में रहे और इतनी लम्बी साधना के बाद जाकर कहीं बुद्ध बन सके । ऋषि-मुनियों के सम्बन्ध में तो पूर्व जन्मों में अगणित बार असफल होने का विवरण मिलता है । सन्त ज्ञानेश्वर, तुलसीदास, शंकराचार्य, कबीर, मीरा, सूरदास, चन्द्रगुप्त चाणक्य, पाणिनी आदि के बारे में भी ऐसी कई गाथाएँ प्रचलित हैं, जिनके अनुसार उन्हें पिछले जन्मों में विफलता का मुँह देखने को मिली थी । आत्मिक उर्त्कष के क्षेत्र में तो अनेक जन्मों में सिद्धि प्राप्त होने का उल्लेख शास्त्र ग्रन्थों में कई स्थानों पर मिलता है । एक जन्म में असफल हो जाने के बाद साधक की क्या स्थिति होती है यह दर्शाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
तत्रं तं बुद्धि संयोगं लभते पौर्नदेहिकम् ।यतते च ततो भूयः ससिद्धै, कुरुनन्दन ॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव हियते ह्यवशोऽविसः ।जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द ब्रह्माति वर्तते ॥
प्रयत्नाद्यत मानस्तु योगी संशुद्ध किंत्विषः ।अनेक जन्म ससिद्ध स्ततो यानि परमंगतिम् ॥ (गीता 6 । 43, 44, 35 )
अर्थात्-हे कुरुनन्दन अर्जुन वह योगियों के कुल में जन्म लेकर पूर्व जन्म के संस्कार को प्राप्त करता है औ उसके प्रभाव से वह उस दिशा में और अधिक प्रयत्न करता है । उसी पूर्व अभ्यास से अवश ही खिचा जाता है, क्योंकि योग का जिज्ञासु भी सकाम कर्मो के फल का अतिक्रमण कर जाता है । प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पाप रहित और अनेक पूर्व जन्मों के संस्कारों की सहायता से सिद्ध होकर तत्काल परमगति को प्राप्त कर लेता है ।
यही तथ्य प्रगति और उन्नति के अन्याय क्षेत्रों में भी लागू होता है । पश्चिमी देशों में तो अब यह भी माना जाने लगा है कि शेक्सपीयर, गेटे और बर्नार्डशा आदि प्रभृति विद्वानों की प्रतिभा को एक जन्म की नहीं अनेक जन्मों की साधना और संस्कारों की पूँजी से उच्च स्थिति में पहुँचा माना जाता है । कुछ ऐसे उदाहरण सामने भी आये हैं, जिनमें ख्याति प्राप्त व्यक्तियों ने अपनी पूर्व जन्म की स्मृतियाँ बताई और वे पूरी तरह सही निकलीं । इस आधार पर यह दावे के साथ कहा जाने लगा कि महान व्यक्तियों की महान् उपलब्धियाँ अथवा जन्मजात प्रतिभाएँ एक ही जीवन की देन नहीं होतीं और न ही प्रकृति या परमात्मा का पक्षपातपूर्ण अनुदान ।
इस सर्न्दभ में सन् 1923 में नोबल पुरस्कार विजेता आयरलैण्ड के विश्वविख्यात कवि विलियम बटलर यीट्स का उदाहरण पूर्णतया प्रामाणिक भी है और सन्देह से परे भी । यीट्स ने काव्य, नाटक, निबन्ध और साहित्य की अन्य विधाओं में लगभग 40 पुस्तकें लिखीं । एक आत्म कथा में यीट्स ने स्वयं स्वीकार किया है कि “मैं जब कभी अपने कमरे में अकेला होता हूँ तो कुछ होने लगता है । जिसके आधार पर मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरे अन्तः व्यक्तित्व की परिचालना मुख्यतः पूर्व जन्मों के संस्कार ही करते हैं । अवचेतना में निहित जन्म-जन्म के ये संस्कार मुझे समय-समय पर चेतावनी भी देते हैं और परामर्श भी ।”
हालीवुड के प्रख्यात अभिनेता और संगीतकार ग्लैनफोर्ड पर तो विशेष रुप से जाति स्मरण के प्रयोग किये गये । स्वयं फोर्ड भी पुनर्जन्म में आस्था रखते थे अतः वे इस प्रस्ताव पर सहर्ष तैयार हो गये । उन पर जब प्रयोग किया गया तो वे उन्नीसवीं सदी के प्रचलित विशुद्ध अँग्रेजी बोलने लगे । प्रयोगकर्त्ता ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं तो फोर्ड ने बताया कि मैं संगीत शिक्षक हूँ । इस पर एक पियानों मँगवाया गया तो उन्होंने ऐसी धुन निकाली जो उस समय कहीं प्रचलित ही नहीं थी । स्पष्ट ही वह उन्नीसवीं सदी की धुन थी । इसके बाद उनसे पूछा गया कि अच्छा बताइये आपका सबसे बढ़िया शौक क्या है ?.पूर्व जन्म की स्मृतियों में पहुँच फोर्ड ने कहा घुड़सवारी करना मेरा सबसे प्रिय शौक है । कहने पर फोर्ड ने घोड़े की सवारी करके भी बताया जबकि वर्तमान जीवन में व्यस्त अभिनेता को घुड़सवारी करने की बात तो दूर रही उसे सीखने का भी कभी समय नहीं मिला था । फोर्ड ने अपने पूर्वजन्म के बारे में आगे बताया, मैं ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहा । क्षय रोग के कारण सन् 1892 में ही मेरी मृत्यु हो जाती है । मुझे स्काटलैंड के एक छोटे से गाँव में गिरजाघर के कब्रिस्तान में दफनाया गया है । वहाँ मेरी कब्र पर अमुक-अमुक लिखा हुआ है । लेकिन जिस स्थान पर मुझे दफनाया गया है, वह देखने में कोई बहुत सुन्दर जगह नहीं है फिर भी मुझे इस बात का कोई रंज नहीं है, क्योंकि मेरे आसपास के प्लाँटों में मेरे कई प्रिय मित्रों को दफनाया गया है ।
जब प्रयोग समाप्त हुआ तो ग्लैन फोर्ड को ये सारी बातें जो टेप कर ली गई थी, सुनाई गयी । आर्श्चय की बात है कि ग्लैनफोर्ड ने अभी तक कभी स्काटलैंड की यात्रा नहीं की थी । बाद में समय निकाल कर वे अपने कुछ मित्रों के साथ स्काटलैण्ड गये और उस को स्थान देखा जहाँ कि जाति-स्मरण प्रयोग के दौरान ग्लैनफोर्ड ने अपने दफनायें जाने की बात कही थी । वहीं गाँव वहीं गिरजा और वही कब्रिस्तान सब स्थानों पर फोर्ड तथा उनके मित्र की टेप की गई बातों के आधार पर इस तरह पहुँच गये जैसे किसी ने कागज कलम से नक्शा बनाकर दे दिया गया हो । कब्र पर गड़े हुए जिस पत्थर की बात कही गई थी, वह पत्थर तो नहीं मिला शायद कोई उखाड़ ले गया था लेकिन कब्रिस्तान वास्तव में ऊबड़-खाबड़ जगह पर था ।
यदि संसार के सफलतम और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों पर जाति-स्मरण का प्रयोग किया जाय तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि उनकी उपलब्धियाँ एक जीवन की देन नहीं है, वरन् उसके पीछे पिछले कई जन्मों की साधना शक्ति पूँजी के रुप में जुड़ी हुई है । उसी पूँजी में सफलता के वर्तमान शिखर छुए जा सके हैं । इसलिए वर्तमान जीवन में किये गये प्रयासों की असफलता के बारे में सोच-सोचकर निराश होने का कोई कारण नहीं है कि किये जा रहे प्रयत्न र्व्यथ जा रहे हैं । किसान बीज बोता है तो बोते समय तो यही लगता है कि बीज र्व्यथ मिट्टी में जा रहे हैं, पर जब वे फसल के रुप में उग आते हैं तो प्रतीत होगा कि बोये गये बीज र्व्यथ नहीं गये वरन् उनका निश्चित परिणाम प्राप्त हुआ है । इसी प्रकार प्रगति और उर्त्कष की दिशा में किये गये कोई भी प्रयास र्व्यथ नहीं जाते । उनके परिणाम निश्चित रुप से मिलते हैं । यह बात अलग है कि उनका परिणाम आज अभी या इसी जन्म में नहीं मिलता लेकिन मिलता अवश्य है । इसी तथ्य को गीताकार ने स्पष्ट करते हुए कहा है, “नेहाभिक्रम नाशोऽरुप् प्राण्यवायो ने विद्यते,’ अर्थात् -जिसका प्रारम्भ कर दिया जाता है उसका कभी नाश नहीं होता और न ही परिणाम में कोई उलट-फेर होता है । इसलिए परिणाम न होता दिखाई देने पर भी प्रयत्नों को शिथिल नहीं करना चाहिए । यह मानकर अनवरत यत्नशील रहना चाहिए कि साधना का फल निश्चित रुप से मिलेगा, आज न मिल पाये तो कल मिलेगा, पर मिलेगा वह निश्चित है ।
आध्यात्मिक सिद्धान्तों के अतिरिक्त ऐसा कोई केन्द्र नहीं है-जो मनुष्य की आस्थाओं पर नियन्त्रण रख कर उसे उचित और सार्थक दिशा प्रदान कर सके । मनुष्य के लिए उसके जीवन की अपने लिए सार्थकता और समाज के लिए उपयोगिता तभी सिद्ध होती है जबकि जीवन को पवित्र एवं शालीन बनाया जाय । उससे जहाँ व्यक्तिगत संतोष प्राप्त होता है वहीं उन सिद्धाँतों के रुप में सामाजिक सुव्यवस्था की आधारशिला भी रखी हुई है । उन सिद्धाँतों को अपनाने से ही सर्वजनीन प्रगति एवं सुख शान्ति का पथ प्रशस्त होता है ।
शरीर की नश्वरत, आत्मा की अमरता, कर्मफल की सुनिश्चितता तथा परलोक और पुनर्जन्म की सम्भावना ये चार ऐसे सिद्धाँत हैं जो धर्म और अध्यात्म की सभी शाखाओं में किसी न किसी रुप से प्रतिपादित किये गये । यों कई धर्मो में पापों से क्षमा हो जाने और मरणोत्तर जीवन की स्थिति में भिन्न-भिन्न मान्यताएँ हैं, पर वे इतनी कठोर नहीं हैं कि उनमें उपरोक्त चार सिद्धाँत जड़ मूल से ही कट जाते हैं । सभी धर्मो की मान्यता है कि मरणोत्तर जीवन किसी न किसी रुप में बना ही रहता है । कर्मो को भले ही नैतिक रुप में न माना गया हो । भले ही उसे साम्प्रदायिक विश्वासों की परिधि में इस प्रकार लपेट लिया गया हो तो भी यह नहीं कहा गया है कि कर्मो का कोई फल नहीं मिलता । इस तरह के छोटे मोटे मतभेद प्रायः सभी धर्म संप्रदायों में पाये जाते हैं फिर भी ऊपर वर्णित चार मूल सिद्धाँतों में आम सहमति ही पाई जाती है ? और प्रत्येक धर्म इन सिद्धाँतों के माध्यम से अनेक अनुयायियों को सर्त्कम करने की प्रेरणा देता है ।
यह सच है कि वर्तमान जीवन में शुभ कर्म करने वाला भले ही तत्काल सुखद परिणाम प्राप्त न कर सके लेकिन उसे मरणोपराँत जीवन में या अगले जन्म में इन कर्मो का पुरुस्कार ब्याज सहित मिलना सुनिश्चित है । पुनर्जन्म में आस्था और मरणोत्तर जीवन में विश्वास व्यक्तियों को बुरी से बुरी और कष्ट कर से कष्ट कर परिस्थितियों में भी शुभ कर्म करने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करता है । इसी विश्वास के आधार पर लोग त्याग और बलिदान के बड़े-बड़े साहस पूर्ण कदम उठाते रहते हैं । यही विश्वास व्यक्ति को पाप कर्मो से बचाये रहता है क्योंकि पुनर्जन्म और कर्मफल में विश्वास रखने वाला व्यक्ति अनिवार्य रुप से यह मानता है कि इस समय और वर्तमान जन्म में भी सही पाप कर्मो के दंड से बच पाना भले ही सम्भव हो जाय, किसी प्रकार चतुरता से उनके बुरे परिणामों से बचाव कर लिया जाय लेकिन आगे चलकर इस जन्म में न सही, अगले जन्मों में उनका दंड भुगतना ही पड़ेगा । यह विश्वास मनुष्य को दुर्ष्कम करने से रोक लेता है और उसे कुकर्मो से अपना हाथ खींचने के लिए विवश सा कर देता है । यदि इस मान्यता को हटा दिया जाय तो सत्कर्मो का परिणाम तत्काल न मिलने पर उनके प्रति किसी में न अभिरुचि जिंदा बचेगी और न ही उत्साह जीवित रहेगा । इसी प्रकार पापकर्मो से सामाजिक बचाव करने की चतुरता और चालाकी भरी तरकीबें ढूँढ़ कर तथा उन्हें अपना कर कोई भी व्यक्ति अनीति अपनाने पर मिलने वाले लाभों को छोड़ने की इच्छा कदापि नहीं करेगा । इसके विपरीत नैतिकता और सत्कर्मो की मूर्खता समझा जायगा। कई लोग जिन्हें पुनर्जन्म तथा कर्मफल की सुनिश्चितता के प्रति विश्वास नहीं है, आज भी नैतिकता और ईमानदारी को मूर्खता ही समझते हैं ।
समझने वाले चाहे जो समझते रहें पर तथ्य तो तथ्य है । सूर्य के अस्तित्व को आँख मूँद कर कितना ही झूठ लाया जाय अथवा जन्मजात अन्धा व्यक्ति प्रकाश के अस्तित्व को भले ही स्वीकार न करे, पर न उससे सूर्य झूठा होता है और न प्रकाश मिथ्या होता है । नैतिक आदर्शो को मूर्खता बता कर उनकी चाहे जितनी उपेक्षा की जाय और चाहे जितना मजाक बनाया जाय । लेकिन वे सत्य हैं और उपयोगी तथा आवश्यक भी । यदि उनकी उपेक्षा की जायगी तो यह निश्चित है कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति और समाज में अनैतिक तथा अवाँछनीय तत्वों और प्रवृत्तियों की बाढ़ आ जायगी । इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने में धार्मिक मान्यताएँ और आध्यात्मिक आदर्श ही समक्ष है । विचार किया जाना चाहिए कि धार्मिक मान्यताओं का अंकुश रहते हुए भी लोग दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने में संकोच नहीं करते तो उन्हें खुली छूट मिल जाने पर तो और भी भंयकर स्वेच्छाचार फैल आयगा तथा उस उच्छृंखलता से सारे समाज का, समस्त मनुष्य जाति का और समूचे संसार का और भी भारी अहित रहेगा ।
मरने के बाद फिर से जन्म लेना पड़ता है, यह मान्यता चिंतन के लिए कितने ही उत्कृष्ट आधार खड़े करती है । आज कोई व्यक्ति हिन्दू, भारतीय और पुरुष है तो अगले जन्म में वह ईसाई, यूरोपियन और स्त्री भी हो सकता है । ऐसी दशा में सहज ही यह प्रेरणा उठती है कि र्व्यथ ही क्यों साम्प्रदायिक कलह के बीज बोये जाँय और ऐसी परम्पराएँ बनाई जाँय जिनसे अगले जन्म में अपने लिए ही विपत्ति खड़ी हो जाय । आज जो सत्ता की कुर्सी पर बैठा है या कुलीन है, पुनर्जन्म की मान्यता उसे सोचने के लिए प्रेरित करती है कि अगले जन्म में वह साधारण प्रजाजन भी हो सकता है और उस स्थिति में उच्च स्थिति वालों को स्वेच्छाचार कितना कष्टकारक होगा । यह विचार अथवा चिंतन व्यक्ति को मर्यादाओं में रहने और दूसरों के प्रति आत्मवत् व्यवहार करने के लिए भी आँतरिक रुप से विवश करता है । इस तरह के विचार दूसरों की स्थिति में अपने को रख कर उदात्त दृष्टिकोण अपनाने की प्रबल प्रेरणा देते हैं ।
भौतिक विज्ञान ने अभी तक जितने भी तत्वों का पता लगाया है उनमें किसी में भी चेतना के गुण नहीं मिले हैं, इस स्थिति में चेतना की एक स्वतंत्र सत्ता स्वीकार किये बिना कोई चारा नहीं दीखता । यह भी कहा जा सकता है कि चेतना के अस्तित्व को विज्ञान की प्रयोगशाला में सिद्ध करके नहीं दिखाया जा सकता । उसके प्रमाण भले ही मिल जाँय पर चेतना इतना सूक्ष्म है कि उसे स्थूल उपकरणों के माध्यम से नहीं पकड़ा जाता । हवा को पकड़ने के लिए मुट्ठी को कितना ही कसा जाय वह मुट्ठी से सूक्ष्म है और उसकी पकड़ में आ ही नहीं सकती । चेतना तो वायु, अग्नि, आकाश आदि सूक्ष्म तत्वों से भी सूक्ष्म है फिर उसे स्थूल उपकरणों द्वारा कैसे पकड़ा जा सकता है ? जो भी हो, चेतना का अस्तित्व असंदिग्ध है और उसका अस्तित्व स्वतंत्र है । यह बात अलग है कि वह अमुक शरीर में अमुक स्तर की हो, किन्तु है वह स्वतंत्र ही ।
चेतना के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रमाण मृतात्माओं की हलचलों के उन विवरणों में मिलते हैं जो समय समय पर अधिकृत और प्रामाणिक ढंग से सामने रखे जाते हैं । पिछले जन्मों की सही स्मृति के प्रमाण देने वाले घटनाक्रमों का प्रत्यक्ष परिचय भी इन दिनों इतनी अधिक संख्या में सुविस्तृत रुप से मिलता है कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता । ऐसी दशा में पिछली पीढ़ी के वैज्ञानिकों द्वारा दिया जाने वाला है फलवा अपने आप निरस्त हो जाता है, जिसमें उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को एक सिरे से इन्कार किया था ।
इन प्रमाणों के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी आत्मा के अस्तित्व को प्रभावशाली ढंग से सिद्ध करता है । कोई भी मनुष्य अपने बारे में स्वयं ही विचार करने पर किसी भी दशा में यह स्वीकार नहीं होता कि अपना अस्तित्व समाप्त हो जायगा । चाहे मुक्ति की कल्पना की जाय अथवा मृत्यु की या और किसी भी स्थिति की कल्पना की जाय भीतर यह विचार टिकता ही नहीं है कि अपना अस्तित्व समाप्त हो जायगा । चेतना इस तथ्य को कभी स्वीकार ही नहीं करती । यही कारण है कि लोग प्रतिदिन दूसरे व्यक्तियों को मरते हुए देखते हैं, उस समय श्मशान का भय भी उत्पन्न होता है पर भीतर से यह प्रेरणा स्फूर्ति होती है कि मैं तो अमर हूँ । इस प्रेरणा को लोग भले ही शारीरिक स्तर पर ग्रहण करते हैं या मृत्यु के भय से शरीर को नष्ट न होने देने की बात सोचते हैं पर मूल रुप में वह चेतना का ही स्पंदन होता है, जो अपने मस्तिष्क को शाश्वत सिद्ध करता है अथवा समझता है । मनःशास्त्र के इस स्वतः प्रमाण द्वारा यह आसानी से समझा जा सकता हे कि जीव चेतना की स्वतंत्र सत्ता है । भौतिक विज्ञान के अनुसार तत्वों को मूलभूत गुण धर्मो को नहीं बदला जा सकता । उनके सम्मिश्रण से पदार्थो की शक्ल बदली जा सकती है । रंग को गन्ध में, गन्ध को स्वाद में, स्वाद को रुप में और रुप को र्स्पश में नहीं बदला जा सकता । वे अपने मूल रुप में बने रहकर अन्य प्रकार की शक्ल या स्थिति तो बना सकते हैं किन्तु रहेंगे सजातीय ही । दो प्रकार की गन्ध मिलकर तीसरे प्रकार की गन्ध बन सकती है, इसी प्रकार दो तरह के स्वाद मिलकर तीसरे प्रकार का स्वाद बन सकता है, दो रंग मिलकर तीसरे प्रकार का रंग भी बन सकता है, पर गंध गंध ही रहेगी, स्वाद, स्वाद ही रहेगा और रंग भी रंग ही रहेगा । वे गंध से स्वाद में या स्वाद से रंग में अथवा रंग से गंध में नहीं बदल सकते । यह विभिन्न प्रकार के परमाणुओं की विभिन्न प्रकार की हलचलों के कारण होता है पर इससे चेतना के अस्तित्व का कहीं भी पता नहीं चलता ।
संवेदनाओं को अनुभव मस्तिष्क में होता है लेकिन मस्तिष्क के कण स्वयं संवेदनशील नहीं होते । यदि उन कणों में संवेदनशीलता होती तो मरने के बाद भी शरीर को अनुभूतियाँ होनी चाहिए थीं, लेकिन ऐसा नहीं होता । ध्वनि या प्रकाश के कम्पन भी जड़ हैं और मस्तिष्कीय अणु भी जड है । दोनों के मिलने पर जो विभिन्न तरह की अनुभूतियाँ मस्तिष्क में होती हैं उनका कारण पदार्थ को नहीं माना जा सका । इस प्रकार चेतना की स्वतन्त्र सत्ता अब विज्ञान सिद्ध होती जा रही है । इस प्रकार अध्यात्म सिद्धान्त न केवल उपयोगी है, बल्कि प्रामाणिक भी है और उनकी प्रामाणिकता को एक-एक कदम चलने हुए प्रतिष्ठा मिल रही है, मान्यता प्राप्त हो रही हैं ।
वर्तमान युग की समस्याओं के उत्पन्न होने के कारण बाहरी लगते हैं, परन्तु उनके मूल कारण बहुत गहरे हैं । पेड़ जितना बड़ा होता है उसकी जड़ें उतनी ही गहरी भी होती हैं । इन जड़ों से ही पेड़ के तने, शाखा और पल्लवों को खुराक मिलती है । वृक्ष पर लगे फल फूल बाहर वृक्ष के माथे पर दीखते हैं लेकिन ये कहीं बाहर से आये या उतरे नहीं होते । वृक्ष का अस्तित्व, वैभव और विस्तार जड़ों के कारण ही बाहर बना फैला रहता है और जड़ों को आँखों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वे जमीन के अन्दर होती हैं ।
भगवान कृष्ण ने गीता में इस जगत को उर्ध्वमूल अधः शाखा वाला वृक्ष कहा है । जिसका अर्थ जड़े ऊपर और पेड़ शाखाएँ नीचे होती हैं । यह उक्ति विचित्र पहेली सी लगती है, पर विचारपूर्वक इसका विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि उक्ति यथार्थ है । बादल ऊपर से बरसते और जमीन पर नमी तथा शीतलता बनाये रहते हैं । प्रतीत होता है कि जल धरत की सम्पदा है, पर वास्तव में वह आकाश का ही अनुदान होता है । सृष्टि के आरम्भ में धरती आग का जलता हुआ प्रचंड गोला था । उस पर आच्छादित रही गैसें मिलकर पानी बनीं और बरसीं । उसी से समुद्र बना तथा समुद्र का पानी भाप बनक बादल बनने का सिलसिला चल पड़ा । पृथ्वी पर पाया जने वाला यह जल ही प्रकारान्तर से प्राणियों के जीवन का आधार है । वह मिलता तो धरती पर ही है पर वास्तव में वह सृष्टि के आरम्भ से ही आकाश का वैभव था और अन्त तक भी उसी का अनुदान बना रहेगा ।
सूरज की सन्तुलित गर्मी पहुँचने से पृथ्वी पर जीवन का विकास आरम्भ हुआ । यह गरमी ऊपर सूरज से उतरती है और उसी से पृथ्वी धधकती रहती है, छूने पर भी गरम लगती है । चूँकि पृथ्वी गरम लगती है अतः सामान्य बुद्धि गर्मी और प्रकाश को पृथ्वी की सम्पदा कह सकती है लेकिन वास्तविकता यह है कि व्याप्त ऊष्मा और ऊर्जा का स्रोत सूर्य ही है । उसी के अनुदान से पृथ्वी पर वनस्पति के रुप में जीवन उगता और प्राणियों के रुप में चलता फिरता दिखाई देता है । सूर्य किरणें यदि असन्तुलित हो उठे जो यह धरती अग्निपिंड या शीतपिंण्ड बन कर पूरी तरह निर्जीव स्थिति में जा पहुँचेगी ।
पृथ्वी पर प्राप्त होने वाली अगणित प्रकार की सम्पदा क्षमता और विशेषताएँ उसकी अपनी ही प्रतीत होती है लेकिन विशेषज्ञों का निर्ष्कष है कि यह सब दूसरे ग्रहों से मिला हुआ अनुदान है जो ध्रुवों के चुम्बकत्व से अर्जित और संग्रहित किया जा रहता है । यदि पृथ्वी को अन्तर्ग्रही अनुदान न मिले होते तो वह अन्य निर्जीव ग्रहों की भाँति इस वैभव से शून्य और निस्तेज स्थिति में पड़ी रहती ।
फसल उगाने और वनस्पति के रुप में खाद्य पदार्थो का उपयोग करने की प्रक्रिया धरती की कृपा से ही संपन्न की गई लगती है । लेकिन सचाई कुछ और ही है । अन्न और जल से भी अधिक प्राणियों को जीवन निर्वाह के लिए वायु की आवश्यकता रहती है । अन्न और जल के बिना तो फिर भी कुछ समय तक जीवित रहा जा सकता है लेकिन हवा के बिना एक क्षण भी गुजारा नहीं । प्राणियों को खुराक के द्वारा जितना पोषण मिलता है उससे हजार गुना अधिक पोषण हवा से प्राप्त होता है। आँखों से हवा की आवश्यकता और महत्ता न दिखाई दे तो क्या हुआ वस्तुस्थिति तो यथावत् बनी ही रहती है ।
पिंड ब्रह्माण्ड का छोटा रुप है और परमाणु के अन्तःक्षेत्र में काम करने वाले घटकों के रुप में सौर मंडल की झाँकी देखी जा सकती है । ब्रह्माण्ड में भरी चेतना परब्रह्म कही जाती है, जीव उसी का छोटा घटक है । जीव और ब्रह्म के बीच पारस्परिक आदान प्रदान का क्रम जितना निर्वाध चलता रहता है उसी अनुपात से जीवधारी को समर्थ और शक्ति सम्पन्न पाया जा सकता है इसी शांखला पर जीव का प्रगति क्रम अवलम्बित है ।
इसलिए जीव और ईश्वर के बीच आदान प्रदान का द्वार खोल लेना, उस मार्ग के अवरोधों को हटा देना परम पुरुषार्थ माना गया है । यही कारण है कि इस दिशा में किये गये साधनात्मक प्रयासों को सर्वोच्च माना गया है । उद्योग, व्यवसाय, शिल्पकला, साहित्य, शोध आदि के प्रयास निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं पर आत्मा और परमात्मा के मध्य प्रभावी विनियोग स्थापित करने के प्रयोगों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता रहा है । ऊर्ध्वमूल अधः शाखा वाले अश्वास्थ का यही रहस्य है जिसे देखने जानने वाले समझते और मानते थे तथा न देखने वाले अमान्य ठहराते हैं ।
पृथ्वी की सतह पर अपार वैभव बिखरा है और उसकी परतों में अकूत सम्पदा बिखरी पड़ी है लेकिन अन्तरिक्ष में संव्याप्त अदृश्य जगत की सम्पन्नता और गरिमा के आगे उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती । पृथ्वी पर पदार्थ और ऊर्जा यही दो घटक प्रधान है । इसी प्रकार अन्तरिक्ष में संव्याप्त समृद्धि को वायुमंडल और वातावरण इन दो रहस्यों में बाँटा जा सकता है । वायुमंडल प्रकृति प्रधान है और वातावरण चेतनात्मक । वायुमंडल से वस्तुओं की मात्रा और स्तर की स्थिति का का सम्बन्ध है तो वातावरण से मनुष्य की आकाँक्षा और विचारणा प्रभावित होती है ।
मनुष्य को एक सीमा तक स्वतंत्र माना गया है । उसकी अपनी पुरुषार्थ परायणता ही उसे स्वतन्त्र बनाती और सिद्ध करती है, लेकिन वातावरण का दबाव आँधी, तूफान की तरह पड़ता है और उसके आवेग से जनमानस अमुक दिशा में दौड़ता उड़ता दिखाई देता है । अंधड़ के साथ तिनके और पत्ते अपने आप उड़ते चले जाते हैं, पानी की धारा में हलका भारी सब कुछ बहने लगता है । उसी प्रकार अन्तरिक्ष में व्याप्त वातावरण को चेतनात्मक प्र्रवाह जनमानस को किसी दिशा विशेष में अनायास ही धकेलता और घसीटता चलता है ।
वातावरण के चेतनात्मक प्रभाव की तरह वायुमंडल के उतार चढ़ावों को भी विश्व की सम्पत्ति और परिस्थिति पर पड़ने वाले प्रभावों के रुप में आये दिन देखा जा सकता है। वायुमंडल की असन्तुलित हलचलों के कारण ही उत्पन्न हुई अतिवृष्टि और अनावृष्टि से समस्त प्राणी जगत बुरी तरह प्रभावित होता रहता है । मौसम यदि प्रतिकूल हो तो उसका दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है । उस स्थिति में दुर्बलता और रुग्णता का ऐसा दौर आता है कि स्वास्थ्य सम्भाले नहीं सम्भलता । मलेरिया कालरा, मस्तिष्क ज्वर, अदि का ऐसा दौर चलता है कि रोके नहीं रुकता । लू लगने और निमोनिया होने जैसी बीमारियों में मनुष्य का कम दोष होता है मौसम की प्रतिकूलता अपेक्षया अधिक कारण बनती है ।
प्रकृति की सहायता वायुमण्डल की अनुकूलता के रुप में प्राप्त होती है । कहा जाता है कि सतयुग में प्रकृति अनुकूल रहती थी और मनुष्य की आवश्यकता के अनुरुप वस्तुओं में कभी कोई कमी बेशी नहीं पड़ती थी । उस समय मौसम सन्तुलित रहता था, इससे प्रचुर मात्रा में आवश्यक पदार्थ उत्पन्न होते थे । खाद्य पदार्थो में पोषक तत्व प्रचुर परिमाण में भरे रहते थे । वर्षा सन्तुलित होती थी न अतिवृष्टि का डर था न अनावृष्टि की आशंका रहती थी । शीत और आतप में भी असन्तुलन नहीं होता था । श्वाँस द्वारा ग्रहण की जाने वाली वायु में पोषक तत्वों का परिमाण और स्तर बढ़ा चढ़ा रहता था । ऐसी ऐसी अनेकानेक अनुकूललाएँ रहने के कारण प्राणि स्वस्थ हष्ट पुष्ट, प्रखर और तेजस्वी रहते थे । यह समर्थता शरीर तक ही सीमित नहीं रहती थी वरन् उसके अन्तराल में रहने वाले मन मस्तिष्क को भी प्रभावित करती थी । कहा भी गया है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास रहता है। शरीर रोगी और व्याधिग्रस्त हो तो मनः क्षेत्र में भी रुग्णता और दुर्बलता आयेगी ही ।
वायुमंडल का स्वास्थ्य पर कितना अनुकूल और कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है यह एक तथ्य से और अच्छी तरह समझा जा सकता है । संसार के विभिन्न भागों में बसे हुए मनुष्य तथा प्राणी स्वास्थ्य की दृष्टि से कहीं बहुत अच्छी तो कहीं बहुत बुरी दशा में रहते हैं । इसमें प्राणियों के पुरुषार्थ को श्रेय या दोष कम ही दिया जा सकता है, वायुमंडल का प्रभाव ही इसमें अधिक जिम्मेदार है । भारत में पंजाब और बंगाल के निवासियों का यदि स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया जाय तो आकाश पाताल जितना अन्तर दिखाई देगा । उसके लिए इन क्षेत्रों के निवासी उतने अधिक दोषी या श्रेय भागी नहीं हैं जितना कि प्रकृति का प्रभाव उन्हें इन परिस्थितियों में रहने के लिए विवश करता है । आहार-विहार में थोड़ा बहुत अन्तर तो सर्वत्र पाया जाता है किन्तु किसी क्षेत्र का प्रखर और किसी क्षेत्र का दुर्बल होना दैवयोग ही कहा जायगा।
रुस के एक प्रान्त उजबेकिस्तान में संसार में सबसे अधिक आयु तक जीवित रहने वाले व्यक्ति रहते हैं । इन दिनों वहाँ के निवासियों की औसत आयु सौ वर्ष से अधिक है । बहुत से लोग तो डेढ़ सौ वर्ष की आयु को पारकर चुके हैं और अभी स्वस्थ हालत में हैं । कितनों के ही पुत्र पौत्रों और प्रपोत्रों की संख्या उनके जीवन काल में ही एक-सौ से अधिक जा पहुँचती है । उनके आहार-विहार में क्या विशेषता है, जिसके कारण दीर्घायुष्य का यह सुअवसर उन्हें सामूहिक रुप से प्राप्त हुआ है । इस तथ्य की गहराई से खोजबीन करने पर भी ऐसी कोई बात सामने नहीं आई जिससे इसे चमत्कार का कारण कहा जा सके । वहाँ रहने वाले लोग भी अन्यत्र निवास करने वालों की तरह की सामान्य जीवनयापन करते हैं । अन्य क्षेत्र के निवासियों जैसा ही उनका आहार-विहार है । नशेबाजी जैसे दोष उनमें भी मौजूद हैं । ऐसी दशा में पुरुषार्थ संयम आदि की गरिमा स्वीकार करते हुए भी मात्र उन्हें ही स्वास्थ्य उपलब्धि का एक मात्र कारण नहीं ठहराया जा सकता । समाधान के रुप में यही तथ्य सामने आता है कि प्रकृति का अनुदान ही कारण है । विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाने वाला वायुमण्डल ही उस क्षेत्र के सामूहिक स्वास्थ्य को निर्धारित करता है । भारत में बिहार, बंगाल और उड़ीसा प्राप्त के निवासियों की स्वास्थ्य स्थिति अन्य क्षेत्रों में निवास करने वालों की अपेक्षा बुरी है । इस भिन्नता के कारण में वायुमण्डल की भिन्नता स्वीकार करनी ही पड़ती है । बड़े लोग अक्सर पहाड़ी या उपयुक्त स्थानों पर वायुसेवन के लिए जाते और ठहरते हैं । उसके कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।
वायुमण्डल के अलावा मानवी काया पर सामूहिक रुप से वातावरण का क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अनुसन्धान करने पर और भी चोंकाने वाले निर्ष्कष सामने आते हैं सतयुग में मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों के शरीर विशालकाय भी होते थे और बलिष्ठ भी । पीछे उनमें गिरावट आती चली गई । इसका क्या कारण रहा ? परिवर्तन के दिनों में प्राणियों ने क्या अच्छाई अपनाई और क्या बुराई बढ़ाई ? इसका अध्ययन करने पर प्रत्यक्ष तथ्यों की सहायता अत्यन्त स्वल्प मात्रा में ही मिलती है । दोष या श्रेय किसी को भी दिया जा सकता है, पर तथ्य यह है कि प्रकृति क्रम के नियोजित चक्र के सामने प्राणी असहाय ही प्रतीत होते हैं । लगता है उन्होंने भला-बुरा उगाया नहीं, प्रकृतितः उन पर शाप छ वरदान अनायास ही लदते-बरसते रहे हैं ।
वस्तु स्थिति का विश्लेषण सूक्ष्म दर्शियों द्वारा ही सम्भव है । वे मानवीय पुरुषार्थ का महत्व स्वीकारते हैं, फिर भी अन्ततः इसी निर्ष्कष पर पहुँचते है कि वायमुण्डल का प्रभाव प्राणि जगत की प्रगति एवं अवगति के लिए बड़ी सीमा तक उत्तरदायी रहा है । प्राणिजगत की बलिष्ठता ही नहीं, वृक्ष वनस्पतियों, ख्,निज पदार्थो के आकार, स्तर एवं गुण धर्म पर भी वायुमण्डल के परिवर्तन का प्रभाव पड़ा है । प्रागैतिहासिक काल में जो स्थिति थी वह पीछे नहीं रही । बीच-बीच में उत्थान पतन के दौर भी आते रहे । इसमें पदार्थो को, वनस्पतियों को जीवधारियों को निजी रुप से दोषी नहीं माना जा सकता । परिस्थ्तियाँ ही कारण रही हैं और परिस्थितियों के उतार चढ़ाव के कारण ही मदारी की तरह उँगली हिलाते और कठपुतली नचाते रहे थे ।
यही बात वातावरण के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है । प्राचीनकाल में मानवी चिंतन का स्तर उच्च स्तरीय था । उनकी कामनाएँ, रुचियाँ और महत्वाकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थीं । उस समय के लोग ऊँचा सोचते और ऊँचा चाहते थे । फलतः उनके क्रियाकलापों में भी पग-पग पर आदर्शो का पुट परिलक्षित होता था । ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता और व्यवहार में उदारता का धुला रहना स्वाभाविक है । इसी स्तर के लोग धरती के देवता कहे जाते हैं । सम्भवतः ऐसे ही महामानवों, की देवताओं की परिकल्पना दिव्य-लोकवासी देवताओं के रुप में की गई होगी, और पीछे इन्हीं देव मान्यताओं का दर्शन एक स्वतन्त्र शास्त्र बन गया होगा ।
जो भी हो, यह माने में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि भावना और आस्था की दृष्टि से सतयुग के मनुष्य अब की अपेक्षा कई गुनी उत्कृष्टता से सुसम्पन्न थे । इसी कारण उनका स्वभाव, पारस्परिक व्यवहार और सामान्य क्रिया-कलाप ऐसा होता था कि उससे सर्वत्र सौजन्य और सौमनस्य भरा-पूरा बना रहा । इसी कारण भारत को देवभूमि कहा जाता रहा तथा उसे “स्वर्गादपि गरीयसी” बताया जाता रहा है । इस देश के निवासियों का उच्चस्तरीय व्यक्तित्व, चरित्र चिन्तन एवं क्रिया-कलाप ही इस देश को इस गौरव गरिमा के स्तर तक पहुँचाने में समर्थ रहा । प्राचीन भारत के देवमानवों ने अपने आदर्श कतृत्व और उत्कृष्ट चिन्तन से न केवल अपने देश को समृद्ध, समर्थ और सुसंस्कृत बनाया वरन् अपने अनुदानों से विश्व के कोने काने में बसे मनुष्यों को भी नव-जीवन प्रदान किया । प्राचीनकाल की सुखद परिस्थितियों का कारण उस समय के लोगों की उत्कृष्ट मनःस्थिति ही कही जानी चाहिए ।
इस सर्न्दभ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस ऐतिहासिक गौरव गरिमा का श्रेय तो उस समय के हर नागरिक को दिया जा सकता है, पर सचाई यह है कि उन दिनो समष्टिगत वातावरण ही कुछ ऐसा था जिसके प्रवाह में ऊँचा सोचने और ऊँचा करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था । प्रवाह चीर कर उल्टा चलना कठिन होता है । आज निकृष्टता के प्रवाह में व्यक्ति विशेष को अपने निजी मनोबल के सहारे उत्कृष्टता अपनाना और उसे अन्त तक मजबूरी के साथ पकड़े रहना अति कठिन पड़ता है । ऐसा पौरुष कोई अपवाद ही दिखा पाते हैं । ठीक इसी प्रकार प्राचीन काल में भी भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा, अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं, अतीव दुष्कर ही था ।
इन दिनों आकाँक्षाओं और विचारणाओं का प्रवाह मानवी आदर्शो की विपरीत दिशा में उद्दण्ड दिशाहीन अन्धड़ की तरह बह रहा है । इससे अनेकानेक परिष्कृत मस्तिष्क भी प्रभावित हो रहे हैं । अनुकरण के रुप में हिप्पीकट बाल और नट-नटनियों की-सी वेशभूषा लोकप्रिय हो रही है । नई पीढ़ी उसी फैशन को आँखें मूँदकर अपना रही है । आततायी उद्दण्डता को शौर्य साहस का परिचायक माना जाने लगा है । मर्यादाएँ तोड़ने, नीति नियमों को भंग करने, आँतक फैलाने और विग्रह के लिए उकसाने वाले लोग रातों रात नेता बन जाते हैं । मात्र लेखनी और वाणी से ही दुष्प्रवृत्तियों का विरोध हो रहा है, व्यवहार में तो उनकी बढोत्तरी ही होती जाती है । यह सब क्यों है ? इसके लिए किन किन को दोषी ठहराया जाय ? यह गणना करने का जिन्हें अवकाश हो वे वैसा कर भी सकते हैं, पर वास्तविकता जाननी हो तो इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ेगा कि चिन्तन की दिशाधारा को प्रभावित करने वाला अदृश्य वातावरण ही कुछ विचित्र है और उसी से निष्कृष्टता को बहुत कुछ परिपोषण मिल रहा है ।
इन विपन्नताओं के लिए वायुमण्डल को और विभीषिकाओं के लिए वातावरण में बढ़ते जाने वाले आवंछनीय तत्वों को कारण माना जाय और उसके निवारण का ठोस उपाय सोचा जाय, सही मार्ग निकाला जाय, तभी परिस्थ्तियों में बदलाव सम्भव हो सकेगा । अन्य और किसी उपाय से समस्याओं का समाधान सम्भव नहीं है ।
सम्पन्नता और समर्थता की शक्ति से सभी परिचित हैं । बुद्धि और परिश्रम की सहायता से प्रगति पथ पर बढ़ना और सफलताएँ पाना सम्भव होता है, यह तथ्य भी अविज्ञात नहीं है । किन्तु उससे भी अधिक जिनकी गरिमा और उपयोगिता है उन दो महान विभूतियों से लोग प्रायः अपरिचित ही बने रहते हैं। वे दिव्य सम्पदाएँ हैं-सज्जनता और सहृदयता । इसके बिना श्रेय पथ पर अग्रसर हो सकना और जीवन के सुअवसर का आनन्द ले सकना सम्भव ही नहीं हो सकता ।
सज्जनता के साथ मनुष्य की प्रामाणिकता और सदाशयता जुड़ी रहती है । फलतः मनुष्य का वजन अपनी और दूसरों की आँखों में कहीं अधिक बढ़ जाता है । अप्रामाणिक और कुचक्र्री मनुष्य दुरभिसंन्धियाँ रचने रहते हैं । इसमें उन्हें छद्म के सहारे आरम्भ में कुछ लाभ भी मिलता है पर कुछ ही दिनों में वस्तुस्थिति प्रकट होकर रहती है और उन्हें छूत के रोगी की तरह सब से अलग-थलग होकर रहना पड़ता है। अविश्वासजन्य असहयोग कितना कष्ट कारक होता है और कितना भारी पड़ता है उसे यदि आरम्भ में ही जाना जा सके तो कोई दुर्जन बनने की मूर्खता न करे । आतंक तो कोई भी मचा सकता है किन्तु आत्मिक प्रगति और संसार की सेवा करने का श्रेय प्राप्त कर सकना सज्जनता अपनाये बिना सम्भव नहीं ।
सहृदयता इससे भी उच्चस्थिति है । कला और करुणा के सहारे उत्पन्न होने वाली भाव संवेदना ही अन्तःकरण को आनन्द विभोर बनाती है । उदारता और आत्मीयता का समन्वय ही देवत्व है ।देवता स्वयं धन्य बनते और अन्य असंख्यों को धन्य बनाते हैं । उनका यह वैभव जिस आधार पर बना और बढ़ा है- उसे सहृदयता ही कह सकते हैं । इस संसार में जो कुछ अभिनन्दनीय और अनुकरणीय है उस सब का उद्भव सहृदयता की पृष्ठ भूमि पर ही सम्भव हुआ है ।
हृदयहीन होना मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है । इस दुष्प्रवृत्ति के कारण अपराध और अनाचार पनपते हैं । आततायी जिस शस्त्र के सहारे विनाश लीला रचते, आतंक फैलाते, और चीत्कार उत्पन्न करते हैं वह और कुछ नहीं निष्ठुर दुष्टता ही है । इसी को हृदयहीनता कहते हैं । यों रक्त फेंकने वाली थैली सभी के सीने में विद्यमान है पर जिस अर्थ में हृदय-हीनता का उल्लेख होता है वह करुणा और मैत्री का अभाव ही है । इस दरिद्रता के कारण मनुष्य घृणित बनता और जन-जन का कोप भाजन बनता अभिशाप सहता है, जबकि आर्थिक तंगी वाले दरिद्र लोग सहानुभूति एवं सहायता भी अर्जित कर लेते हैं ।
रक्त फेंकने वाली थैली-हृदय का नाम करुणा की भाव संवेदना के साथ किस प्रकार जुड़ गया ? यह एक असमंजस जैसा प्रश्न है । शरीर में अनेको अवयव हैं वे सभी अपनी हलचलों से शरीर यात्रा के साधन भर जुटाने और जड़ तत्वों से विनिर्मित समझे जाते हैं । फिर हृदय को क्या भाव सम्वेदनाओं की अध्यात्म विभूतियों के साथ जोड़ा गया ?
इस प्रश्न का उत्तर एक सीमा तक विज्ञान देता है। उसने चेतना की उच्चस्तरीय विभूतियों में से मस्तिष्क को बुद्धि का और हृदय को भावना का केन्द्र माना है । जड़ शरीर के साथ चेतना का समीकरण करने वाले इन दो अवयवों को अपना विशेष स्थान है । इसलिए आत्मिक प्रगति के प्रयोजनों में समय-समय पर इनका विशेष उपयोग होता रहता है ।ध्यान धारणा की साधनाएँ प्रायः इन्हीं दो केन्द्रों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है ।
सूक्ष्म संस्थानों में मस्तिष्क एवं हृदय का महत्व सर्वोपरि है । सामान्य वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर तो मस्तिष्क में स्नायु तन्तुओं का जाल बिछा दिखायी पड़ता है रासायनिक तत्वों का सम्मिश्रण मात्र दीखता है । पर सूक्ष्म विश्लेषण-अध्ययन करने पर पता चलता है कि भली-बुरी विचारणाएँ इसी क्षेत्र में उपजती अवतरित होती है । मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं, रासायनिक तत्वों में वे कहीं प्रत्यक्ष दिखायी नहीं पड़तीं, पर अनुभव बताते हैं कि इनके माध्यम से ही विचारों को प्रकट होने का अवसर मिलता हैं । इन्द्रियों की सम्वेदनाओं को ग्रहण करने, उन्हें उपयुक्त निर्देश देने-संचालन करने में मस्तिष्क की ही प्रधान भूमिका होती है ।
हृदय आकुँचन प्रकुँचन करता हुआ रक्त से भरी थैली जान पड़ता है, जो शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता-अशुद्ध रक्त को एकत्रित, परिशोधित करता मात्र प्रतीत होता है । जीव-विज्ञान इसी सीमा तक हृदय का महत्व स्वीकार करता रहा है कि यह संस्थान शरीर में उक्त संचार की भूमिका सम्पन्न करता है । यह तो इसका स्थूल पक्ष रहा । आध्यात्मिक प्रतिपादनों में इस संस्थान को सर्वाधिक महत्व दिया गया है । योगियों ने इस अंग को चेतना का केन्द्र-बिन्दु माना है । तीन शरीरों से बनी मानवी काया में सबसे महत्वपूर्ण शरीर कारण शरीर का स्थान बताया है । इसे जाग्रत विकसित करने पर अत्यधिक जोर दिया है । यह अकारण नहीं है। इस आग्रह के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार हैं । जिन्हें समझा और लाभ उठाया जा सके तो मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसकी सामर्थ्य कई गुनी अधिक प्रखर हो सकती है ।
धड़कते हृदय एवं उससे निकले वाली ध्वनि में भाव सम्वेदनाओं की सघनता हो तो उसका चमत्कारी प्रभाव-परिणाम दिखायी पड़ता है । दूसरी को प्रभावित करने, अनुकूल बनाने तथा श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरित करने में भाव-सम्वेदनाओं की ही प्रमुख भूमिका होती है । सर्व महात्माओं, महापुरुषों में यह विशेषता देखने को मिलती है कि वे अन्तःकरण की महानता द्वारा ही दूसरों को अनुवर्ती बनाते हैं । अन्यों को श्रेष्ठ जीवन जीने-परमार्थ प्रयोजनों में जुटने को बाध्य करते हैं । आध्यात्मिक क्षेत्र में हृदय की महत्ता, उसमें उठने वाली भाव सम्वेदनाओं की उपयोगिता को बहुत पहले से ही स्वीकार किया जाता रहा है ।
इस तथ्य को अब वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी मान्यता मिल रही है । सामान्यतया माताएँ नव जात शिशुओं को अपने बायें वक्षस्थल से चिपकाये रहती हैं । इसका कारण दाहिने हाथ का कामों में व्यस्त रहना कहा जा सकता है । पर कारण यह नहीं है ।एक सर्वेक्षण के अनुसार बायें हाथ से काम करने वाली महिलाएँ भी शिशुओं को बायीं गोद में ही लिए रहती हैं । पुरातत्व संग्रहालयों में संकलित मूर्तियों, प्राचीन तैल चित्रों में उन चित्रों, कलाकृतियों का अध्ययन किया गया जिसमें नवजात शिशु को माँ के साथ चित्रित किया गया है । निष्कर्षो में पाया गया कि 80 प्रतिशत महिलाएँ अपने शिशुओं को बायें वक्षस्थल से चिपकाये हुए हैं । इसे चित्रकारी की परम्परागत विशेषता कहकर नहीं टाला जा सकता । मूर्तियाँ चित्र अपने काल की स्थिति का वास्तविक चित्रण करती हैं । कर्नेल विश्वविद्यालय अमेरिका के मानव शास्त्री ने नये तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है । प्रख्यात अमेरिकी पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन में उपरोक्त विषय से सम्बन्धित एक लेख में डा0 ली साल्क ने लिख है कि, “माताओं को शिशुओं को बायीं ओर चिपकाये रहने में विशेष कारण है । हृदय बायीं ओर अवस्थित होता है । जाने-अनजाने माँ बच्चों को हृदय का अधिक सामीप्य देना चाहती है । मातृ हृदय की धड़कन के साथ भाव सम्वेदनाएँ भी तरंगित होती उभरती रहती है । उनके आदान प्रदान से वे स्वयं तो सन्तोष की अनुभूति करती ही हैं। बच्चों के ऊपर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है । हृदय की ध्वनि तरंगों को सुन कर, बच्चा एक अनिर्वचनीय आनन्द में डूबा रहता है । इस संदर्भ में प्रख्यात मानवशास्त्री डा0 डिस्पाण्ड मारिस द्वारा लिखी पुस्तक ‘द इन्टिमेट बिहेवियर” एण्ड द नेकेड एथ’ उल्लेखनीय है । इस पुस्तक में डा0 डित्माण्ड ने महत्वपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन किया है । उनका कहना है कि हृदय की ध्वनि ही एक मात्र एवं शाश्वतः ध्वनि है जिसे शिशु गर्भावस्था में सुनता है । माँ के गर्भ से बाह्य संसार में आने पर वह विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ सुन कर परेशान रहता है । पूर्व परिचित ध्वनि की आस लगाये रहता है । माँ जब उसे गोद में लेती है तो उसे सुखद अनुभूत होती है । देखा यह गया है कि रोते हुए बच्चों को वक्ष से चिपकाते ही चुप हो जाते हैं । माँ के धड़कते सम्वेदनशील हृदय की प्रतिक्रिया है, जिसकी सुखद ध्वनि को सुनते ही बच्चे रोना बन्द कर देते हैं ।
इस तथ्य को परीक्षण की कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका कार्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा0 ली साल्क ने कुछ प्रयोग किये जिसके आर्श्चयजनक परिणाम निकले । यह परिणाम मातृ हृदय के साथ जुड़ी संवेदनशीलता की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।डा0 ली साल्क ने मातृ हृदय की धड़कन की ध्वनि को टेप में रिकार्ड किया । रोते हुए नव जात शिशुओं को रिकार्डेड ध्वनियों को सुनाया। बच्चों ने तत्काल रोना बन्द कर दिया । उनके मुखमण्डल पर शान्ति एवं प्रसन्नता के भाव उभरने लगे । डा0 ली साल्क ने निर्ष्कष निकाला की माताओं के धड़कने हृदय के साथ उनी सुकोमल भावनाएँ जुड़ी रहती हैं । इस ध्वनि से पूर्व परिचित होने के कारण बच्चे सहज ही आकर्षित हो जाते । ध्वनि तरंगों में घुली भाव सम्वेदनाएँ बच्चे के हृदय को उद्वेलित करती सुखद प्रभाव डालती हैं ।
इस निर्ष्कष की और भी प्रामाणिक पुष्टि के लिए इन्होंने कुछ शिशुओं पर अन्य प्रकार की रिकार्ड की गई ध्वनि टेपों का प्रयोग किया । उन्हें तीन माह तक निरन्तर सुनाया। परिणामस्वरुप उनका विकास रुक गया । वे अन्यमनस्क तथा अस्वस्थ बने रहे। उनमें से कुछ तो टेप आरम्भ करते ही रोना आरम्भ कर देते थे । कुछ शारीरिक हलचलों द्वारा अपनी दुखद प्रतिक्रिया व्यक्त करते । स्थिति संकट पूर्ण हो जाने पर डा0 ली को अपना प्रयोग रोक देना पड़ा । इस प्रयोग द्वारा निर्ष्कष निकाला कि सामान्य ध्वनियों एवं मातृ हृदय के धड़कन से निकलने वाली ध्वनि तरंगों में विशेष अन्तर है । जहाँ माँ के हृदय की ध्वनि तरंगों को सुनकर बच्चा प्रसन्न चित्त हो जाता है वहीं अन्य ध्वनियों की दुखद प्रतिक्रिया व्यक्त करता है ।
यह तो प्रकृति प्रदत्त मातृ हृदय के साथ जुड़ी भाव सम्वेदनाओं का सामान्य पक्ष रहा, जिसका लाभ बच्चे सहज ही उठाते रहते हैं । असामान्य पक्ष की सामर्थ्य एवं सम्भावनाएँ अनन्त हैं । कारण शरीर में विद्यमान भाव सम्वेदनाओं को उभारा-उछाला जा सके तथा उन्हें मानव मात्र की भावनाओं के साथ जोड़ा जा सके तो मनुष्य जाति को एकता, स्नेह, सौहार्द्र के सूत्र में बाँध सकने का एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग जाय । प्रार्थना, उपासना, साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भाव सूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है ।
इस दृष्टि से शरीर के अन्य अंगों की तुलना में हृदय का महत्व कहीं अधिक है । सामान्य बोल-चाल के प्रसंगों में सबसे प्रिय वस्तु व्यक्ति का सम्बन्ध हृदय से जोड़ने के पीछे यही कारण है । नारी की सहज संवेदनशीलता बच्चे ही नहीं अन्यों को भी प्रभावित करती है । भाव सम्वेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असँख्यों को अपना बना लेते सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं । वस्तुतः यह भावनाओं का ही चमत्कार है । मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध बनी रहेगी? जब तक कि भाव संवेदनाओं को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी ।
सम्पन्न, समर्थ और सफल बनने के लिए किये जाने वाले प्रयास सराहनीय हैं किन्तु स्मरण यह भी रखा जाय कि सज्जन और सहृदय बने बिना संसार की समस्त सम्पदाएँ और विभूतियाँ नीरस एवं अपूर्ण ही रह जाती हैं । उपार्जन जिस किसी का भी अभीष्ट हो, प्रगति किसी भी दिशा में की जाय पर यह भुलाया नहीं जाना चाहिए कि मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सज्जनता और सहृदयता के सहारे ही उपलब्ध होता है ।
किसी से लुकमान से पूछा, “आपने शिष्टता कहाँ से सीखी” “अशिष्टों से। लुकमान ने उत्तर दिया। कारण कि अशिष्ट व्यवहार करने वालों की बुरी बातों से मैं दूर रहने लगा व इस तरह एक के बाद एक बुराई मुझ से दूर होती गई”। मानवी जीवन में आधी गलतियाँ तो केवल मात्र इसलिए हो जाता हैं कि जहाँ हमें विचार से काम लेना चाहिए वहाँ हम भावना से काम लेते हैं और जहाँ भावना की आवश्यकता रहती है वहाँ विचारों को अपनाते हैं । -इमर्सन
प्रभावशाली व्यक्तित्व ही समग्र विकास का मूल कारण होता है । इसी आधार पर ही मनुष्य अपने जीवन की सर्वोपरि उपलब्धियाँ हस्तगत कर सकने में सफल हो पाता है । परिष्कृत और प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व के अभाव में कुछ कहने लायक सफलता पाना असंभव होता है । इतिहास के परदे पर जितने भी महामानव हुए हैं उनने इसी आधारशिला पर अपनी सफलता के भवन निर्मित किये हैं । व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने में जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रतिभा, शिष्टता इत्यादि घटक सहयोगी बनते हैं, वहीं ‘मधुर-भाषण’ प्रिय बोलना भी एक प्रधान घटक है ।
सुसंयत, शिष्ट और मधुरवाणी व्यक्ति को प्रभावित किये बिना नहीं रहती । प्रत्येक व्यक्ति मधुरवक्ता से सन्तुष्ट रहता है । तथ्यपूर्ण भी कटुवाणी लोगों द्वारा स्वीकार्य एवं सह्य नहीं होती है । कटु बोलने वाले को अपमान और तिरस्कार प्राप्त होता है, जबकि प्रिय बोलने वाले को सर्वत्र सम्मान होता है, उसका प्रभाव क्षेत्र बढ़ता जाता है । प्रिय बोलने के लोभ में न तो असत्य का आश्रय लेना चाहिए और न सत्य के साथ अप्रियता का कलंक मिलाना चाहिए ।
सत्यं ब्रूयात्प्रिय ब्रूयात न बू्रयात्सत्यमंप्रियम् ।प्रियं च नानृतं व्रूयादेवधर्मः सनातनः ॥
सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए किन्तु सत्य होते हुए भी ‘अप्रिय’ नहीं बोलना चाहिए । साथ ही प्रिय होते हुए पूर्णतया असत्य भी नहीं बोलना चाहिए । यही सनातन धर्म है ।
मधुर और प्रिय बोलने का सिद्धाँत सर्वविदित होते हुए भी व्यक्ति प्रायः अहंकार एवं कुसंस्कार वश कटुभाषी बन जाता है । वस्तुतः मधुर बोलने में किसी प्रकार की क्षति नहीं होती उलटे मैत्री क्षेत्र बढ़ने का लाभ ही होता है ।सुधीजनों का कथन है-
प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।तस्माद् तदेव वक्तत्यं वचने का दरिद्रता ॥
सभी प्राणी प्रिय बोलने से सन्तुष्ट रहते हैं, इसलिए सर्वदा प्रिय ही बोलना चाहिए, प्रिय बोलने में कृपणता क्यों की जाय ?
शास्त्रों का सदा से यही प्रतिपादन रहा है । वे हमें सर्वदा सत्य प्रिय और मधुर बोलते रहने का उपदेश देते हैं । वैदिक स्वर में साधक भगवान् से प्रार्थना करता है-
जिह्वाया अग्रे मधु में जिह्वामूले मधूलकम् ।ममेदह क्रतावसो मम चित्त मुपायसि ॥ अथर्व 1। 34।2
हे प्रभो । मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर मधु (मधुरता) हो, जिह्वा के मूल हृदय में भी माधुर्य हो । हे मधुरता । तुम मेरे व्यवहार और चित्त में प्रविष्ट हो जाओं ।
मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम् ।वाचा ददाभि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशः ॥ अथर्व0 1 । 34। 5
मेरा चलना फिरना माधुर्य युक्त हो । मैं वाणी से मीठा बोलूँ तथा मैं मधुर के समान (मधुर) दीखने वाला हो जाऊँ ।
ईश्वर की यही आकाँक्षा है कि उसकी सन्तानें सभी परस्पर मिल जुल कर स्नेह पूर्वक रहें, मधुर वाणी व मधुर व्यवहार वाले बनें ।
होतरसि भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः ।सूक्तवाकाय सूक्ता ब्रूहि ॥
हे विद्वान् । तू कल्याणकारी उपदेश के लिए भेजा गया है । तू मननशील मनुष्य बन कर भद्र पुरुषों के लिए उत्तम उपदेश कर ।
वाणी का माधुर्य संसार को प्रभावित करने वाले साधनों में प्रमुख है ।
इस वशीकरण मन्त्र के प्रयोग को व्यवहार का विषय बनाया जा सके, वाणी में कटुता का समावेश न होने दिया जा सके तो निश्चित ही अपना प्रभाव और वर्चस्व दूसरों पर स्थापित करने रह सकने में सफलता प्राप्त की जा सकती है ।
प्रकृति ने शरीर की संरचना इस प्रकार की है कि यदि उसे आहर विहार के प्रकृति प्रदत्त निर्देशों पर चलने दिया जाय और असंयम अव्यवस्था में न उलझा जाय तो आजीवन स्वस्थ बना रहा जा सकता है और रुगणता एवं दुर्बलता का कष्ट न सहना पड़ेगा । इसी प्रकार मन यदि उच्छृंखल तृष्णा के लिए उद्विग्न न रहा हो और परिस्थितियों से निपटने की रीति-नीति समझाता हो तो उस बुद्धिमत्ता विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर संतोष तथा संतुलन बनाये रहा जा सकता है । उद्विग्न तो प्रायः वही लोग रहते हैं । जिन्हें सोचना नहीं आता ।
सारणीय है कि सब कुछ हमारी इच्छा के अनुकूल ही होता रहे- जो चाहते हैं वही मिलता रहे, यह कदापि सम्भव नहीं है प्रतिकूलनाएँ बनी ही रहेंगी । आवश्यकता इस बात की है कि उनसे किस प्रकार निपटा जाय इसकी कला सीखी जाय । जिसे यह कला आती है, जो परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की कला जानता है वह खीझता झल्लाता नहीं वरन् उनका कोई हल निकाल लेता है। ऐसे मनुष्य ही मानसिक दृष्टि से संतुलित और प्रसन्न चित्त रहने देखे जा सकते हैं । साधनों का बाहुल्य रहने से सुखी रहने की बात आमतौर से सोची जाती है । किन्तु वस्तु स्थिति इससे भिन्न है । जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है, इस तथ्य को यदि कोई ठीक तरह से जानता हो तो स्वल्प साधनों में भी हँसी-खुशी की जिन्दगी जियी जा सकती है । साधन सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो किन्तु उसका सही उपयोग न आता हो तो उनसे लाभ मिलना तो दूर उलटे समस्यायें उत्पन्न होंगी । कितने ही धनाढ्य लोग, संग्रहीत सम्पदा का उपयोग न हीं जानते । फलतः उससे विग्रह और अनाचार जन्य संकटों की घटायें ही घुमड़ती रहती हैं । उन्हें सम्पन्नता-निर्धनता से भी मँहगी पड़ती है उछृंखल अपव्यय अथवा कृपण संग्रह तरह-तरह के विक्षोभ उत्पन्न करता है और उस व्यक्ति की स्वाभाविक शान्ति का अपहरण कर लेता है ।
जीवन जीना वस्तुतः एक कला है और यह कला मनुष्य जीवन धारणा करने वालों की सर्वोपरि, सर्वप्रधान तथा महानतम आवश्यकता है, उसे समझा और सीखा जाना चाहिए। यहाँ इस असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है कि जीवन जैसी जटिल संरचना वाले सरंजाम के कलपुर्जो को समझना और उनके बनाव बिगाड़ को सुधारने सम्हालने के लिए बहुत लम्बा चौड़ा अध्ययन करना पडे़गा । ऐसा है नहीं । वस्तुतः यह प्रक्रिया जितनी जटिल और कठिन दिखाई पड़ती है उतनी ही सरल भी है । इस विद्या को एक शब्द में कहा जाय तो दृष्टिकोण का परिष्कार कह सकते हैं, यदि यह मान कर चला जाय कि हमें विवेक से प्रेरणा लेनी है और कर्त्तव्य का अवलम्बन करना है तो इतने भर से काम चल जायगा। लोग क्या चाहते हैं ? लोग क्या करते हैं ? क्या कहते हैं ? उस प्रवाह से यदि मुँह मोड़ लिया जाय और आदर्श क्या चाहता है, क्या कहता है, इसे आधार मान कर अपने ‘चिंतन में उत्कृष्टता और कर्त्तव्य की आदर्शवादिता भर ली जाय तो उतने भर से काम चल जायगा तथा जीवन कला का रहस्यमय विज्ञान सहज ही करतलगत हो जायगा । तदनुसार शरीर, मन साधन और परिवार का सुसंचालन कर सकने में निपुणता प्राप्त हो जायगी । तब सुखयुक्त परिस्थिति और शान्तिपूर्ण मनःस्थिति का रसास्वादन पग-पग पर उपलब्ध होने लगेगा।
जीवन की नीति निर्धारण करने में आत्म बल की और परिष्कृत क्रिया-पद्धति अपनाने में मनोबल की आवश्यकता पड़ती है । संक्षेप में इसे आन्तरिक साहसिकता कह सकते हैं । आर्ष ग्रन्थों और आप्तपुरुषों की भाषा में इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं । स्वाध्याय सत्संग द्वारा उसी जीवन दर्शन को समझने का प्रयत्न किया जाता है और उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है । आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निर्मित्त खड़ा किया गया है । ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है । उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण सम्भव हो सकता है । साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है । आत्मा की पवित्रतम और उदारतम स्थिति का नाम ही परमात्मा है । लोभ, मोह के बन्धनों को काटकर आदर्श और कर्त्तव्य के अपनाने का नाम ही मुक्ति है । र्स्वग न तो स्थान है और न परिस्थिति । वह विशुद्ध रुप से परिष्कृत दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाला देव संज्ञा में गिना जाने लगता है और अति आनवी आनन्द का रसास्वादन करता है। प्रशंसा गान अथवा नाम जय से ईश्वरीय अनुग्रह मिलने की कल्पना बाल-विनोद मात्र है । उसका न कोई आधार है और न कारण । अमुक कर्मकाण्ड को देख कर अथवा अमुक उच्चारण को सुन कर ईश्वर प्रसन्न हो सकता है ऐसा सोचना परमब्रह्म की सत्ता और महत्ता का उपहास करने जैसा ही है । उपासना का तथ्य यदि न समझा जाय तो उस दिशा में किये गये प्रयत्न काल-क्षेपमात्र बनकर रह जायेंगे । हमें हजार बार जानना चाहिए और लाख बार समझना चाहिए कि अध्यात्म का एकमात्र अर्थ परिष्कृत दृष्टिकोण का अवलम्बन ही है ।उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अन्तःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है । अन्यथा ईश्वर को किसी निन्दा-प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है ?
दृष्टिकोण का परिष्कार सर्वप्रथम अपने अन्तःकरण में विकसित करना होता है । जब उसकी पौध उपज आती है तब शरीर, मन, साधन एवं परिवार में प्रयोग करना पड़ता है । धान की फसल इसी तरह उगती है । उसे पहले एक जगह सधन बोते हैं । पीछे उसे उखाड़ कर जहाँ-तहाँ आरोपित करते हैं उद्यान नर्सरी भी पौध उगाने का व्यवसाय करती है । अपनी जमीनों में पेड़ लगाने वाले, नर्सरी में पौध खरीद कर ले जाते हैं। यही क्रम दृष्टिकोण के सम्बन्ध में भी चलता है ।
अपना वास्तविक स्वरुप मानव जीवन का असाधारण महत्व-नर जन्म का चरम लक्ष्य, उसकी प्राप्ति का राजमार्ग यदि भली भाँति समझ में आजाय तो कहना चाहिए कि परिष्कृत दृष्टिकोण के अंकुर उग आये और उनका स्थूल जीवन के चारों क्षेत्रों में आरोपण सम्भव हो सकेगा। कहना न होगा कि इस आरोपण के फलस्वरुप उगने वाली फसल इतनी बहुमूल्य है कि उसे प्राप्त करने वाला हर दृष्टि से-हर दिशा में अपने आपको सुसम्पन्न सौभाग्य शाली अनुभव करता है ।
सुखशान्ति की स्वर्गीय परिस्थिति और आनन्द उल्लास की देवोपम मनःस्थिति को प्राप्त करने के लिए दृष्टिकोण के परिष्कार की ही रीत-नीति अपनानी पड़ेगी । समस्त विपत्तियों से छूटने और सदैव हर्ष सन्तोष का रसास्वादन करने की आकाँक्षा इसी मार्ग पर चलने से पूर्ण होती है । श्रेय साधन का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं । दृष्टिकोण का परिष्कार किये बिना निविड़ नरक से और किसी प्रकार छुटकारा हो ही नहीं सकता । समुन्नत और सुविकसित जीवन की महान उपलब्धि चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, धर्म और अध्यात्म का एकमात्र प्रयोजन मानवी चेतना को इसी पुण्य पथ पर अग्रसर करना है । ईश्वर अनुग्रह का सर्वोपरि वरदान यही हो सकता है कि भक्ति के साथ अविछिन्न रुप से जुड़ी रहने वाली सद्भावनाएँ उमड़े और सत्प्रवृत्तियों के रुप में प्रत्यक्ष परिलक्षित हों । जहाँ इन उपलब्धियों का दर्शन नहीं होता हो, समझना चाहिए वहाँ आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना ही है यथार्थता नहीं।
मानवी गरिमा के अनुरुप भावनात्मक उत्कृष्टता और क्रियात्मक आदर्शवादिता जब वस्तुतः अपनाई जाती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वार्थ के विकास परमार्थ में विकसित होने के रुप में परिलक्षित होती है । ओंछा आदमी लोभ में निमग्न और मोह में ग्रसित देखा जाता है । उसे पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं । वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ रुचिकर होता ही नहीं । शरीर और परिवार से आगे भी कुछ है क्या यह समझ में ही नहीं आता । ऐसा अनुदार, सड्डीर्ण स्वार्थी और पाषाण हृदय मनुष्य मानव-जीवन की गरिमा समझता ही कब है- जो उसके सदुपयोग की बात सोचे । जो सोचा ही नहीं गया है वह किया तो जा सकेगा ही कैसे ?
परिष्कृत दृष्टि जब विकसित होगी तो वह लोभ मोह और वासना तृष्णा की क्षुद्रता से छलाँग मारकर परमार्थ के क्षेत्र में प्रवेश करेगी । आत्मवत् एर्व भूतेषु की प्रतिध्वनि उसके हृदयाकाश के कण-कण में गूँजेगी और वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता अपना सुख दूसरों को बाँट देने की-दूसरों को दुख स्वयं बटा लेने की व्याकुलता उत्पन्न करेगी । उसे समझेगा कि समस्त विश्व उसका घर है और समस्त मनुष्य उसके अपने सहोदर । जीवन पेट और प्रजनन पर उर्त्सग करने के लिए नहीं वरन् देश,धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति-विश्व मानव के प्रति-लोक मंगल के प्रति भी उसके कुछ कर्त्तव्य उत्तरदायित्व हैं । इन्हें पूरा करने की आकुलता उत्कृष्ट अन्तःकरणों में पीड़ा और व्यथा के रुप में इस प्रकार प्रकट होती है कि उसका समाधान ढूँढ़े बिना क्षण भर के लिए चैन नहीं पड़ता । परिष्कृत दृष्टिकोण की प्रखरता का चिन्ह यह है कि समस्त विश्व ब्रह्माण्ड भगवान की साकार प्रतिमा दीख पड़े और उसे सुविकसित बनाने के लिए अपने मनोयोग युक्त श्रम बिन्दुओं की श्रद्धाँजलि समर्पण करने की भक्ति भावना जागे । इस सेवा साधना के दोनों रुप हो सकते हैं-अभिवर्धन भी और उन्मूलन भी । कुशल माली अपने बगीचे को सुरम्य बनाने के लिए उसमें कुछ आरोपण करता है कुछ उखाड़-पछाड़ कुछ काट-छाँट । आरोपण की तरह यह उन्मूलन भी एक महत्वपूर्ण विद्या है । सहयोग का सहोदर ही संघर्ष है । आवश्कतानुसार दीपक और जल कलश की तरह उन दोनों ही शीत-ताप पुण्यों का प्र्रयोग करना पड़ता है । परिष्कृत दृष्टि से मानव जीवन की सार्थकता लोक मंगल के क्रिया कलाप को व्यक्तिगत लाभ व्यवसाय की तरह ही परम रुचिकर मानने और उसमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त होने में मानी जा सकती है । जिसे सभी अपने दीखने लगेंगे वह परिवार के चन्द लोगों को ही अपना मान बैठने और अन्य सबों को पराया समझने की भूल नहीं कर सकता है । सब के सुख-दुख में अपनी साझेदारी, सबके विकास अभिवर्धन में अपनी प्रगति का अनुभव करना यही तो अध्यात्म दृष्टि है । साधना और उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रुप में ही उपलब्ध होता है संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ के फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है । र्स्वग के दो पक्ष हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व । जिसके अन्तःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, समझाना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही ‘देवयोनि’ प्राप्त कर ली ।
देव मानव न केवल आत्म-कल्याण का लक्ष्य सम्पन्न करते हैं वरन् शरीर, मन साधन एवं परिवार की दृष्टि से भी सुसन्तुलित रहते हैं । विकृतियाँ तो अपने ही दृष्टिकोण की होती हैं जो रुग्णता, उद्विग्नता, दरिद्रता और गृह कलह के रुप में प्रकट होती है । जीवन की जड़ में यदि सुसंस्कुत चिन्तन का जल लगता रहे तो उसके सभी पत्र-पल्लव हरे-भरे बने रहेंगे और उसे फला-फूला सुरम्य सुविकसित देखा जा सकेगा । इसी सर्वागीण सुख-शान्ति को मानव जीवन की सार्थकता कहा जा सकता है । इसकी उपलब्धि पूर्णतया अपने हाथ में है । आत्म चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही वह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं । यदि कोई उनसे वंचित है तो उसका कारण यह नहीं है कि इनमें कोई अवरोध नहीं है । अवरोध है तो अपनी ही ओर से दृष्टिकोण परिष्कार की आवश्यकता को समझा और पूरा किया जाय तो निश्चित मानना चाहिए कि जीवन साधना में सफलता और सिद्धि प्राप्त कर ली गई है ।
दृष्टि डाल कर भूमि पर पाँव रखे वस्त्र से पवित्र करके जल पीवे । सत्य के पवित्र की हुई सत्य से युक्त वाणी बोले और मन से पवित्र करके कर्मो का आचरण करें ।
कामबीज से ही शरीर की उत्पत्ति हुई है । जन्म लेने के बाद उसका बहिरंग रुप दुग्धपान से लेकर किशोरावस्था के जोश, शरीरगत परिवर्तनों एवं नूतन उपंगों के रुप में प्रकट होता है । किशोर मन की कल्पनाएँ विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण से युक्त होती हैं जिनकी परिणति आगे चलकर प्रणय में होती है । दाम्पत्य बन्धन में बँधा यह युवक आदान-प्रदान का क्रम आरम्भ करता है एवं संतानोत्पत्ति की ओर अग्रसर होता है । नया परिवार बनना है बढ़ता है । नई व्यवस्थाएँ जुटाने एवं बच्चों के लालन पालन में ही पति-पत्नी की अधिकाँश क्षमताएँ लग जाती हैं । यह विशाल वट वृक्ष उसी कामबीज का है जिसका विस्तरण विभिन्न रुपों में होता देखा जाता है । इसका परिष्कार संवर्धन कर व्यक्ति महामानव बनते चले जाते हैं तो इसका एक अन्य पक्ष है-स्वछन्द यौनाचार द्वारा व्यक्ति का अधोगामी प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाना।
आर्यकालीन महामानवों के अनुसार जीवन क्रम की सफलता के चार महत्वपूर्ण आधार माने गये हैं । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । ‘काम’ शब्द का सही अर्थ न समझने एवं उसका जीवन में सही उपयोग करने की विधा का ज्ञान न होने से ही असमंजस उत्पन्न होता है । ‘काम’ वस्तुतः प्रत्येक प्राणी के अन्तराल में समाहित एक दिव्य उल्लास है, जो आगे बढ़ने, ऊँचा उठने एवं साहसिक प्रयत्न करने के लिए निरन्तर उभरता रहता है ।
जड़ पदार्थो में यही ऋण और धन विद्युत के रुप में कार्य करता है । सृष्टि की गतिविधियों का उद्गम यही है । प्राणियों में इसका उभार उत्साह, उल्लास एवं उमंगों के रुप में होता है । ‘आत्मा’ इस स्तर के प्रयत्नों के स्वाभाविकतः रस लेती है और सहज विनोद के लिए इन्हीं प्रयत्नों में प्रवृत्त भी होती है । यही है ‘काम’ की व्याख्या जिसकी उपयोगिता का समर्थन शास्त्रकाल चिरकाल से करते आये हैं ।
‘यौनाचार’ इस प्रवृत्ति का एक छोटा सा अंग मात्र है । काम तत्व का यह अतिसामान्य प्रकृति प्रयोजन यदा कदा ही क्रियान्वित हो सकता है । मनुष्य ने इस उपलब्धि का सही उपयोग न कर मर्यादा उल्लंघन एवं स्वेच्छाचार का दुस्साहस किया है जो आधुनिक युग में व्याप्त नैतिक एवं सामाजिक समस्याओं के रुप में परिलक्षित होता है ।
मनुष्य जीवन का अर्थ केवल मात्र शरीर और श्वाँस का समागन नहीं है। यदि जीवन का अर्थ मात्र यही होता तो बिना हाथ, सिर, पैर के जमीन पर रेंगने वाले कीड़ों मकोड़ों और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहता । मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है । उसे शक्ति, विवेक और सदाचार का अधिकार मिला है । कीटोपम जीवन मनुष्य के लिये न तो योग्य है और न श्रेयस्कर । नीति मर्यादाओं का पालन समाज की सुव्यवस्था हेतु किस तरह जरुरी है इसका महत्व समझना हो तो यूरोप के कुछ देशों के उदाहरण हमें देखना चाहिए । डैनमार्क, स्वीडन जैसे राष्ट्रों में स्वच्छन्द यौनाचार पर कोई बन्धन नहीं है । फ्रायडवादी विचारणा वाले समाज शास्त्रियों ने मनोग्रन्थियों के निवारण के लिए यही उपयुक्त उपाय पाया है । वहाँ प्रति वर्ष नग्न मेले आयोजित किये जाते हैं । परिणामतः वहाँ यौन रोगों की बाढ़ आ गई है । साथ ही विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण की सहजता समाप्त होते ही इसका विकृत स्वरुप सामने आया है । सामाजिक नीति मर्यादाओं के पालन की बात तो दूर ही है ।
इस प्रेरक तत्व को इतना तुच्छ नहीं माना जाना चाहिए । इसकी सामर्थ्य असीम है । इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ही एक शरीर से दूसरे शरीर की उत्पत्ति है जो सृष्टि के अद्भुत आश्चर्यो का परिचायक है । सृष्टा की घोषणा “एकोऽहं बहुस्यामि” मनुष्य की इसी सामर्थ्य में प्रतिभासित होती है । परन्तु यदि मनुष्य अपना सारा जीवन कृमि कीटकों की तरह सन्तानोत्पादन में ही बिता दे तो यह सामर्थ्य का दुरुप्योग ही हुआ ।
काम को हेय तब से समझा जाने लगा जब से उसे यौनाचार के रुप में प्रतिपादित किया जाने लगा । वस्तुतः काम शब्द की परिभाषा क्रीडा, उल्लास ही हो सकती है । उसे उभार या उमंग ही कहा जा सकता है। यह प्रयोजन जिन भी उपाय उपचारों से सम्भव होता है उन्हें ‘काम’ की परिधि में सम्मिलित किया जा सकता है । धर्म एवं मोक्ष आत्मिक प्रगति के तथा अर्थ एवं काम भौतिक प्रगति के माध्यम माने गये हैं । मनुष्य जीवन की चतुर्दिक उपलब्धियों में गरिमानुकूल ही ‘काम’ को इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है ।
प्रजनन प्रक्रिया पशुपक्षियों कृमि कीटकों के जीवन की एक अनिवार्य स्थिति है । इस समुदाय में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जो संयम न बरतने के दुष्परिणामों एवं स्वच्छन्द यौनाचार से सम्भावित हानियों पर प्रकाश डालते हैं । ‘सील’ नामक स्तनपोषी प्राणी उत्तरी ध्रुव के बर्फीलें इलाके में रहता है । मादा सील के कारण पशुओं में जो लड़ाइयाँ होती हैं उनका सबसे भयावह स्वरुप इस प्राणी में दृष्टिगोचर होता है । प्रजनन ऋतु आरम्भ होते ही इनमें पारस्परिक संघर्ष आरम्भ हो जाता है । चालीस पचास मादा सीलों का मालिक नयी मादा लाने के लिए पड़ोसी सील पर हमला करता है। जब तक वह इस संघर्ष में विजय पाता, वह देखता है कि उस की स्वयं की मादाओं में से कुछ को काई ओर नर अपने साथ ले जा रहा है । नर सील की अधिकाँश शक्ति इसी तरह के काम युद्ध में नष्ट हो जाती है। चींटी, दीमक मकोड़ों आदि में नर केवल एक बार सहवास कर पाता है क्योंकि तुरन्त पश्चात उसकी मृत्यु हो जाती है । बिच्छू और मकड़ी में यह हिंसात्मक प्रेम बड़ा विचित्र स्वरुप ले लेता है । मादा मिलने के बाद अपना सन्तुलन खो देती है एवं नर को ही मारकर खा जाती है ।
यही स्थिति ईल मछली एवं रेशम के कीड़ों की है । रेशम के कीड़े का ‘कोये’ से निकलने के बाद एक ही लक्ष्य होता है मादा से मिलन । इसके तुरन्त बाद नर अपने प्राण छोड़ देता है । ईल मछली केवल नर से सहवास हेतु समुद्र के मध्य जाती है । उसके बाद दोनों मृत्यु की गोद में चले जाते हैं । दोनों के अण्डे इसके बाद प्रकृति द्वारा ऐस जाते हैं । फीजी द्वीप में समुद्र के किनारे पलोलो नामक एक कीड़ा पाया जाता है प्रजनन ऋतु आते ही बड़ी संख्या में ये समुद्र की सतह पर तैरने लगते हैं । सहवास में सफल एक ही हो पाता है , शेष का पिछला हिस्सा प्रयत्न में फट जाता है और इनका जीवन समाप्त हो जाता है ।
जीव जगत के इन्हीं प्राणियों जैसा जीवन जीने वालों को नर पशु कहा जाता है । अधोगामी प्रवृत्तियों में ही जिसका सारा जीवन नियोजित हो, उससे सामान्य मानवी कर्त्तव्य, मानवोचित्त गुण, सदाचार आदि के पालन की अपेक्षा क्या रखी जाय ? ऐसे मनुष्य असंयम के दुष्परिणाम स्वयं तो भोगते ही हैं इसका परोक्ष प्रभाव सारे समाज पर भी पड़ता है । समाज का सारा सन्तुलन ही इस मानवी व्यवस्था पर टिका है जिसमें एक दूसरे के सम्मान की रक्षा की जाती है एवं कुकर्मो में निरत व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो व्यक्ति एवं समाज का वही भविष्य होगा जैसा आज पाश्चात्य देशों में हमें दृष्टिगोचर हो रहा है । प्राणि जगत में जिसके उदाहरण निरन्तर हमें सीख देते रहते हैं ।
वस्तुतः यह तथ्य समझने योग्य है कि पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाली और जीवनरुपी सम्पदा को सुमार्गगामी बनाने वाली कामुकता को परिष्कृत किया जा सकता है । स्थूल यौनाचार के आकर्षण से उसे विरत किया जाना सम्भव है । यह तभी हो सकता है जब भावनात्मक श्रेष्ठ संवेदनाओं के साथ उसे जोड़ दिया जाय । यह परिष्कृत स्वरुप ही प्रसुप्ति का जागरण है । ‘काम’ के साथ जुड़ी उमंग और उत्साह जब विधेयात्मक स्वरुप ले लेते हैं तो फिर ऊर्ध्वगमन ही एकमेव मार्ग शेष रह जाता है।
प्राचीन काल में योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इस तथ्य का अच्छी तरह जाना था और प्रतिपादित किया था कि वह प्राणशक्ति जो काम सेवन में क्षरित होती है, मानव जीवन का मूलाधार है । इसीलिए उन्होंने काम शक्ति के परिष्कार हेतु योग साधना के विभिन्न उच्च स्तरीय पक्ष सामने रखे । संवेदन क्षमता को ऊर्ध्वमुखी बनाना ही इसका उद्देश्य था। अभी तक संयम का जो स्वरुप माना जाता रहा है, वह एकाँगी है । अर्थात् शक्तियों के प्रवाह को रोकना । नदियों को पानी बाँध बनाकर रोक तो लिया जाय पर सिंचाई एव विद्युत उत्पादन का काम लिया न जाय तो उसकी परिणिति विनाश में ही होगी ।
संयम का अर्थ है शक्ति प्रवाह को निरर्थक हानिकारक दिशा में रोककर सार्थक कल्याणकारी दिशा में लगाना । ऐसे प्रयास व्यक्तित्व को प्रखर एवं जीवन को समृद्धबनाते चलते हैं । इसके अभाव में उत्कृष्ट जीवन अकल्पनीय है । काम एक शक्ति है । हम चाहेंतो उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर जीवन को उल्लास से भर सकते हैं ।
काम काविधेयात्मक परिष्कृत रुप् अनेक स्तर के व्यक्तियों में अनेक प्रकार सेउभरता है । यही कामोल्लास है । बच्चों का अकारण उछलना-मचलना किशोरों को क्रीड़ा के क्षेत्र में अपनी स्फूर्ति का परिचय देनाएवं कलाकार का भावविभोर हो थिरकते हुए नृत्य करना अन्तरंग के उल्लास कावाह्य स्वरुप् है । इसी अन्तः स्फूर्ति को,जिसकेआधार पर जीवन के सामान्य क्रिया-कलापों में मन लगने एवं आनन्द प्राप्ति का अवसर मिलता है, परिष्कृत काम कहते हैं । संसार में जितने भी महामानव हुए हैं, जितने भी व्यक्तित्व उभरे हैं, उन सबके मूल में अदम्य अभिलाषा एवं साहसिक पुरुषार्थ की ही प्रधान भूमिका रहीं है । उमंग भरी साहसिकताएवं उच्चस्तरीय गुण है जोजीवन साधना से काम के परिष्कार से जीवन समाविष्ट होती है। काम की ही परिणति महात्वाकाँक्षाओं के रुप् में होती है। जब मनुष्य उस दिशा मेंप्रयास करता हैतो वही पुरुषार्थ एवं साहसिकता केरुप् में देखा जाता है। काम जयी ऋषि तपस्वियों की भाँति जार्जबनार्ड शा भी अन्दर से बाहरतक उल्लास एवं पुरुषार्थ के सजीव रुपथे । उन्हें वववाह के लिए कभी अवकाश नहीं मिला । उसी ‘काम’ शक्ति को ज ब ऐसे महामानवों ने विधेयात्मक दिशा में लगा दिया तो अन्तरंग की प्रसन्नता कालाभ इन्हें तो मिला ही, समाज को उनकी प्रतिभा के भरपूर योगदान मिले ।
यदि परिष्कृत संयमित जीवन के सिद्धाँतों के पालन से संभावित लाभों पर ध्यान दिया जाय तो हर व्यक्ति अपने जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सफल हो सकता है। काम बीज से फलित वृक्ष का ऊर्ध्वगामी दिशाओं में विस्तार कर, संयम की मर्यादाओं का पालन कर हर व्यक्ति स्वयं तो शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास कर ही सकता है, समाज के सर्वागीण विकास में भी योगदान दे सकता है । इन मानवोचित गुणों का पालन जीवन में कर हर व्यक्ति कृमि कीटक के स्तर से ऊँचा उठ कर मानव एवं महामानव बन सकता है ।
ईरान और टर्की के बीच युद्ध चल रहा था । इसी बीच तुर्की ने ईरान के सन्त फरीदुद्दीन अन्सार को पकड़ लिया और उसे जासूसी का आरोप लगाकर फाँसी की सजा सुना दी ।
ईरानी सन्त को बहुत प्यार करते थे । वहाँ के एक धनी ने सन्त को छोड़ देने के बदले उनके वजन के बराबर सोना देने का प्रस्ताव किया, पर टर्की ने उसे न माना ।
अन्त में ईरान के बादशाह ने टर्की के सुलतान के पास सन्देश भेजा कि वे उनका सारा राज्य लेकर सन्त को छोड़ दें ।
सुल्तान अचम्भे में रह गये । उनसे पूछा जिस राज्य को हम इतनी लम्बी लड़ाई के बाद भी न ले सके-वह हमें एक आदमी के बदले क्यों दिया जा रहा है ?
ईरान के बादशाह ने जवाब दिया राज्य नाशवान है पर सन्त अविनाशी । राज्य खोकर उसे फिर पाया जा सका है । पर सन्त को खोकर तो हम दरिद्र और कलंकित हो जायेंगे।
सुलतान ने समझ लिया, जिस देश में सन्त का इतना मूल्य समझा जाता है उसे कोई पराजित नहीं कर सकता। उसने युद्ध बन्द कर दिया और सन्त अन्सार को आदर पूर्वक मुक्त कर दिया ।
आज मनुष्य विकास की जिस स्थिति तक पहुँचा है, वह अनादि काल से किये गये लोगों के सहयोग का सत्परिणाम कहा जा सकता है। यदि उसे परस्पर एक दूसरे का सहयोग न मिले-कोई उसे सहारा न दें, तो उसे व्यक्त्वि का समुचित विकास कर पाना तो दूर, जीवन धारण करना भी दुर्लभ होगा । सेवा-सहकारिता की इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु व्यक्ति सामाजिक-जीवन स्वीकार करता है और समाज के सहयोग से व्यक्तित्व का समग्र विकास करता हुआ सुख-शान्तिपूर्वक जीवनयापन करता है। इस सहयोग देने की वृत्ति ने ही मनुष्य को आज इतना गौरवशाली पद प्रदान किया है । वास्तव में देखा जाय तो यह ज्ञात होता है कि मानव ही क्या समस्त प्राणियों, वृक्ष-वनस्पतियों आदि में भी कोई न कोई ऐसी भावना कार्य करती है, जो बिना किसी प्रतिदान की आशा के भी निरन्तर दूसरों को सहयोग देने की प्रेरणा देती रहती है । इसे परहित की या परोपकार की भावना कहा जा सकता है। सृष्टि का सम्पूर्ण क्रम, समाज की समग्र व्यवस्था इसी भावना से ओत-प्रोत होकर क्रियाशील है। इसके प्रमाण हमें यत्र-तत्र-सर्वत्र मिलते रहते है-
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भःस्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।नादन्ति शस्यं खलु वारिवाहाःपरोपकाराय सताँ विभूतयः ॥
नदियाँ स्वयं ही अपना जल नहीं पीतीं, वृक्ष स्वयं ही अपना फल नहीं खाते, बादल स्वयं ही अपने फसलें या अनाज नहीं खाते, सज्जनों की सम्पदायें परोपकार के लिए ही हुआ करती हैं । इसीलिए शास्त्रों में व्यक्ति के लिए सवश्रेष्ठ पुण्य के रुप में परोपकार को बताया गया है, और उसे सदा-सर्वदा इस पुण्य के संचय करने का निर्देश दिया गया है -
परोपकारः कर्त्तव्यः प्राणैरपि धनैरपि ।परोपकारणं पुण्यं न स्यात् क्रतु शतैरपि ॥
प्राण और धन की बाजी लगाकर भी परोपकार करना चाहिए, क्योंकि जो पुण्य परोपकार से प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञ करने से भी नहीं प्राप्त होता है
परोपकरणं येषाँ जागर्ति हृदये सताम् ।नश्यन्ति विपदस्तेषाँ सम्पदः स्यु पदे पदे ॥
जिसके हृदय में सदा परोपकार की भावना रहती है, उसकी विपदायें नष्ट हो जाती हैं और पग-पग पर उसे सम्पत्तियाँ (सहयोग) प्राप्त होती हैं ।
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
बुद्धिमान व्यक्ति को परोपकार के लिए धन और जीवन भी समर्पित कर देना चाहिए ।
परोपकार न करने वाले व्यक्ति की सर्वत्र निन्दा होती है, उन्हें पशुओं से भी तुच्छा माना जाता है, क्योंकि कम से कम पशुओं का चर्म भी मनुष्यों का उपकार कर देता है -
परोपकार शून्यस्य धिड.् मनुष्यजीवितम् ।यावन्तः पशवः तेषाँ चर्माप्युपकरिष्यति ॥
परोपकार से रहित मनुष्यों का जीवन धिक्कारने योग्य है, क्योंकि पशु कहलाने वाले प्राणियों का भी चर्म मनुष्य का उपकार कर देता है।
प्रकृति का प्रत्येक क्रिया-कलाप परोपकारी जीवन की प्रेरणा देता है, क्योंकि वह स्वयं उसी में संलग्न है ।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि दुनिया के सभी कार्य जिस सहयोग वृत्ति द्वारा सम्पन्न हो रहे हैं, उनमें परहित की भावना ही कार्य कर रही है । इसीलिए परहित करने को ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है और दूसरों को अहित करना उन्हें कष्ट पहुँचाना सबसे बड़ा पाप ।
परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।परपीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
हमें इस पुण्य का संचय और पाप का निरसन (समाप्त) करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
मस्तिष्क को ज्ञान का केन्द्र माना गया है । वस्तुतः वह ज्ञान ग्रहण की क्षमता का केन्द्र है, ज्ञान का नहीं । ज्ञान तो बाहर से आता है । उसे प्रधानतया नेत्रों और कानों के माध्यम से ग्रहण किया जाता है दृश्य जगत से सर्म्पक साध कर संसार के स्वरुप को समझने में सहायता मिलती है और कानों के माध्यम से उपलब्ध होने वाली ध्वनियाँ, विचारों और हलचलों की अदृश्य स्थिति का परिचय देती हैं । सामान्य जीवन में मनुष्य को अपने को समर्थ समझदार बनाने एवं सफल सम्पन्न बनने में इन्हीं माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है ।
इन्द्रियों की शक्ति सामान्य है । प्रकृति ने हर प्राणी को उतनी ही क्षमताएँ प्रदान की हैं, जितनी से कि वह अपनी सामान्य जीवन-चर्या एवं निर्वाह आवश्यकता पूरी कर सके । आवश्यकता एवं पात्रता से जो बाहर है उसे उपलब्ध करना आमतौर से हानिकारक ही सिद्ध होता है । अतएव प्रकृति ने अपने विपुल भण्डार में से उतने ही देने की उदारता दिखाई है जितने से कि दुरुप्योग से उत्पन्न संकटों का सामना न करना पड़े ।
जितना चक्षुओं से दीखता है, वस्तुतः उसकी तुलना में दृश्य जगत असंख्य गुना विस्तृत है। इसी प्रकार कान जो सुनते हैं उसकी तुलना में संसार में विद्यमान ध्वनि प्रवाह का विस्तार ही नहीं स्तर भी बड़ा है । विज्ञानी इस अदृश्य को सूक्ष्मदर्शी एवं दूरदर्शी यन्त्रों से एक सीमा तक देखते हैं । उसी प्रकार वे कानों की पकड़ से बाहर की ध्वनियों को भी सुनते हैं । इस अदृश्य और अश्रव्य श्रवण से मनुष्य ने अत्यधिक लाभ उठाया है । टेलीविजन और रेडियों के माध्यम से अदृश्य देखना और अश्रव्य सुनना सर्वसाधारण के लिए सम्भव हो गया है ।
अब इससे आगे बढ़ने की बात है । भौतिक विज्ञानी प्रकृति के अंचल में छिपे हुए उन विशिष्ठ साधनों को उपलब्ध करने के लिए बेचैन हैं, जिनके आधार पर दर्शन और श्रवण क्षमता बढ़ सके और उस आधार से अविज्ञात को जानने तथा उस जानकारी से लाभ उठाने का अवसर मिल सके ।
पाया गया है कि इस संसार में अगणित ध्वनियाँ प्रवाहित होती हैं । जिनमें से कुछ तो प्राणियों द्वारा उत्पन्न की गई हलचलों की होती हैं और कुछ बादल गरजने जैसे घटनाक्रमों की, किन्तु कुछ ऐसी भी होती हैं जो पृथ्वी को अन्तरिक्ष की-वातावरण की सम्भावनाओं की वह जानकारियाँ देती हैं जो सामान्यतया विदित नहीं होतीं । इन्हें सुनना या समझना सम्भव हो सके तो मनुष्य निकटवर्ती भूत एवं भविष्य के सम्बन्ध में बहुत कुछ जान सकता है । उस आधार पर संकटों से बचने एवं सम्भावनाओं का लाभ उठाने में भारी सहायता मिल सकती है। इस सर्न्दभ में हुई प्रगति से आशा बँधती है कि योगाभ्यास स्तर पर इस दिशा में यदि ठोस प्रयत्न किये जा सकें तो मानवी ज्ञान की परिधि सामान्य से आगे बढ़कर असामान्य तक पहुँच सकती है ।
आयन मण्डल में प्रतिक्षण सीटी की सी आवाज सुनाई देती है । यह ध्वनि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की सेना के रैडार विभाग ने पकड़ी थी । उसके बाद सुप्रसिद्ध जर्मन वैज्ञानिक बेर्कहासिन तथा ब्रिटिश वैज्ञानिक एकर्स्ली ने उस ध्वनि से स्रोतों का पता लगाया और पाया कि अयन मण्डल में विद्युत कणों से अनौखे राजपथ बने हुए हैं । पृथ्वी को चुम्बक मानकर ग्राफ बनाया जाये तो जिस स्थान पर चुम्बकीय विषुवत् रेखा बनती है ठीक उसी के ऊपर विद्युत कण 9 हजार मील की आर्श्चयनजक ऊँचाई से यह गुजरते हैं। अर्थात् अभी तक सृष्टि के उन पोले भागों को जिन्हें शून्य समझा जाता है, अत्यधिक समर्थ संस्थान समझा जाने लगा है यह ध्वनि उन विद्युत तंरगों की गोलार्द्धों की ओर उछाली गई प्रतिक्रिया के फलस्वरुप उत्पन्न होती हैं । तड़ित तरंग पहले विस्फोट के रुप में फूटती हैं या उसमें चटाका होता है जिससे एक आवाज होती है । यही लम्बे चुम्बकीय पथ पर फैल कर सीटी की ध्वनि ग्रहण कर लेती है । कई बार अन्य विलक्षण प्रकार के शोर भी सुन पड़ते हैं जिससे देव-दावनों के युद्ध का सा दृश्य उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है । धं्रुवों पर आने वाले इस ध्वनि प्रवाह ने तो उसे और अधिक विस्मय कारी बना दिया है ।
चेशायर इंगलैंड की जोड्रेल वेधशाला में दुनियाँ का सबसे बड़ा रेडियों दूरदर्शी यन्त्र लगा है यह आकाश गंगा तथा सूर्य की सापेक्षता में उसके ग्रह नक्षत्रों की ध्वनियाँ सुन सकता है और उनका ग्राफ भी बनाता है । इस ध्वनि की परावर्ती शक्ति द्वारा वैज्ञानिक किसी भी क्षेत्र का रेडियो चित्र बना देने में समर्थ हुये हैं । फैदम मीटर ऐसा ही एक यन्त्र है जो इस ध्वनि में आघात-प्रतिघात के द्वारा समुद्री जहाजों को यह सूचना देता रहता है कि उस स्थान से खाड़ी, द्वीप, अन्य जहाज या प्रायद्वीप कितनी दूरी पर हैं ।
1942 की 28 फरवरी की इंगलैण्ड के सैनिकों को अपने रैडार यन्त्र में एकाएक एक विलक्षण ध्वनि सुनाई दी । उसे सुनकर वे सम्मोहित से हो गये किन्तु तभी उनके ध्यान में आया कि कहीं ऐसा न हो यह जर्मनी जहाजों की कोई करामात हो । अतएव उस ध्वनि का पीछा किया गया। वैज्ञानिक उस समय आर्श्चयचकित और आविर्भूत हो उठे जब उन्होंने पाया कि वे सूर्य और उसके समूचे जगत में एक बार में जो ध्वनि उत्पन्न हो रही है उसे सुन रहे हैं । केवल उसी दिन इस तरह का दिव्य नाद सुन पाने का कारण यह था कि उसी दिन सूर्य के मध्यवर्ती क्षेत्र में एक तेज स्फोट हुआ था।
वर्जीनिया अमेरिका के फोर्ट बेलवोइट में इसी उद्देश्य के लिए विश्वसूचना केन्द्र स्थािपत है,जब भी कोई सूर्य स्फोट होता है वह दुनियाँ भर को सूचना देकर चुम्बक क्षेत्र के अध्ययन की प्रेरणा देता है । इन स्फोटों के अध्ययन की प्रणाली विकसित हो जाने के कारण ही आज रेडियों कारपोरेशन आफ अमेरिका कई दिन पूर्व ही यह भविष्यवाणी कर सकने में सक्षम हो गया है कि किस दिन पृथ्वी के किस भाग में कैसी स्थिति होगी । आज तो प्रायः हर देश में मौसम कार्यालय विकसित हो रहे हैं ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र की यह “क” स्तर की उपलब्धि है “ज्ञ” तक पहुँचने तक मनुष्य के सामने आज खड़ी काल, दिक् और ब्रह्माण्डों की सीमायें टूट जायेंगी और वह यान्त्रिकी के सहारे भी त्रिकालदर्शी हो सकता है । वस्तुतः कुण्डलिनी विज्ञान यान्त्रिकी ही है जिसमें शरीर जैसे सर्वशक्ति सम्पन्न यन्त्र को गतिशील बनाकर उस स्थिति को प्राप्त किया जाता है ।
भूकम्प के क्षणों में होनेवाले परिवर्तनों की जाँच के लिए 1958 के सक्रिय और कलक वर्ष में भू भौतिक शास्त्रियों ने बेधशालाओं में अनेक तरह के उपकरण लगाये थे उन उपकरणों से ज्ञात हुआ कि भूकम्प के क्षणों में पृथ्वी अनेक प्रकार की ध्वनियाँ करती है यह कराहने जैसी वायु की सी साँय-साँय अथवा हाथी के चिंघाडने जैसी, कई बार तो यह ध्वनियाँ पिस्तौल और तोप छूटने जैसी वीभत्स होती हैं । हमारी पृथ्वी सूर्य और आकाश से बरसने वाली ऊर्जा तरंगों के प्रति अधिक सम्वेदनशील है । यह ध्वनियाँ उसी का परिणाम है । इन ध्वनियों की समीक्षा प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री अलक्जेंडरमारशैक ने इन शब्दों में की है “सूर्य की प्रत्यक्ष क्रियाओं के कारण पृथ्वी के गहन अन्तराल में उत्पन्न बलों के कारण यह शोर सुनाई देते हैं इसे न देखा जा सकता है न अनुभव किया जा सकता है।
साइबेरिया प्रायद्वीप के प्रशान्त तट पर एल्युशन द्वीप समूह फैला हुआ है उसी में एक स्थान कामचत्मा भी है। 1952 में वहाँ एक भयानक भूकम्प आया ।भूकम्प की तरंगें इतनी लम्बी थीं कि उसकी तरंग का एक सिरे से दूसरे सिरे का अन्तर कोई 1200 मील था । प्रत्येक साढे़ 6 मिनट बाद एक तरंग आती थी और बीस तरंगें मिलकर पृथ्वी का घेरा डाल लेती थीं । यह स्थिति प्रायः 24 घन्टे तक बनी रही । इन 24 घण्टों में सामान्य पृथ्वी के निवासी तो भयग्रस्त अवस्था में बने रहे किन्तु वैज्ञानिक ने सूक्ष्ममापी यन्त्रों से पृथ्वी के थरथराने की जो ध्वनि सुनी वह पुराणों के उस आख्यान से सर्वथा मेल खाती है जिसमें प्रलय के दृश्य का चित्रण करते हुए लिखा गया है कि पृथ्वी इस तरह उद्वेलित होती है जैसे कोई विशाल काय घंटा । उससे घंटा निनाद की सी प्रलयंकर ध्वनि सुनाई देती है । वैज्ञानिकों ने जो आवाज सुनी वह भी घन्टे के झनझनाने की सी ध्वनि थी । इस नियम बद्ध आन्दोलन के पीछे और किसी का नहीं सूर्य के अन्तः आन्दोलन का ही हाथ था ।
योगाभ्यास से मानवी अन्तराल में छिपे अति महत्व पूर्ण उपकरणों को जागृत किया जाय तो वे इतने सक्षम हो सकते हैं, जितने कि अब तक के बने उपकरणों में से कम भी नहीं है ।चेतना की प्रयोगशाला सूक्ष्म शरीर है उसमें इतने बहुमूल्य यन्त्र जुड़े हुए हैं कि प्रयोग का अभ्यास होते ही चमत्कार प्रस्तुत करने लगते हैं । सूक्ष्म दर्शी के लिए आज्ञाचक्र में सन्निहित तृतीय नेत्र त्राटक के अभ्यास से जागृत किया जाता है । और उससे अदृश्य दर्शन का लाभ मिलता है । उसी प्रका सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय के सहारे नाद योग की साधना द्वारा दिव्य श्रवण की क्षमता प्राप्त होती है । साधना से पात्रता बढ़ती है । और तद्नुसार प्रकृति का रहस्य मय भण्डार साधक को करतल गत होता है । इन्हीं उपलब्धियों में सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकने की सफलता का अपना स्थान और महत्व है ।
आचार में व्यक्तित्व के स्तर का परिचय मिलता है । दूसरों के साथ सज्जनोचित व्यवहार करने वाला अपनी सज्जनता की जानकारी कराता है । व्यक्तिगत रहन सहन भी दूसरों के साथ व्यवहार का सम्मिश्रित स्वस्थ आचार है । यदि उसमें शिष्टता सौम्यता का समावेश है, तो उसे शिष्टाचार कहा जायेगा । शिष्ट आचार का अभ्यस्त व्यक्ति अपने गुण, कर्म स्वभाव से परिष्कृत व्यक्तित्व का प्रमाण देता है । इसके फलस्वरुप उसे लोक सम्मान और जन सहायता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है । कहना न होगा कि इन्हीं आचरणों के सहारे सामान्य स्थिति के व्यक्ति भी उच्चस्तरीय प्रगति कर सकने में समर्थ हुए हैं । महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करने वालों ने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत किया है और दूसरों को उस सुसंस्कारिता का परिचय शिष्टाचार द्वारा कराया है । प्रत्येक प्रगतिशील और स्वाभिमानी व्यक्ति को शिष्ट होना चाहिए । शिष्टता के लक्षण शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताये है
अभिवादयीत वृद्धाश्च दद्याच्चै वायनंस्वयम् ।कृताञ्चकजरुपासीत गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वियात् ॥
जब कोई वृद्ध (अपने से बड़ा) पुरुष अपने पास आवे, तब उसे प्रणाम करके बैठने को आसन दे और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवा में उपस्थित रहे, फिर वह जब जाने लगे तब उसके पीछे-पीछे कुछ दूर तक जाय ।
कुचैलिनंदन्तमलोपधारिणं वह्वासिनंनिष्ठुरवाक्य भाषिणम् । सूर्योदये ह्यस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरति चक्रपाणिम् ॥
जिसके वस्त्र व दाँत गन्दे रहते हैं, जो बहुत खाता है, निष्ठुर होकर बोलता है, सूर्योदय तथा सूर्यास्त में भी सोया रहता है, वह चाहे चक्रपाणि-विष्णु ही क्यों न हो उसे-लक्ष्मी त्याग देती है ।
नारुतुन्दःस्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददाति ।ययास्य वाचा पर उद्विजेत न ताँ वदेदरुशतीं पालोक्यान् ॥
दूसरों के मर्म पर आघात न करें । क्रूरतापूर्ण बात न बोले, दूसरों को नीचा न दिखावे, जिसके कहने से दूसरों को उद्वेग होता हो, वह रुखाई से भरी हुई बात पापियों के लोक में ले जाने वाली होती है । अतः वैसी बात कभी न बोले ।
एताबानेव पुरुषःकृतं यस्मिन्न नश्यति ।यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यांद् बहुगुणं ततः ॥
मनुष्य की मनुष्यता यह है कि किसी के उपकार को न भूले, अन्य मनुष्य जितना इसका उपकार करे, उससे बहुत अधिक उसका उपकार करनें का प्रयास करें ।
सुखं दुःखान्तमालस्यं दाक्ष्यंदुःख सुखोदयम् ।भूतिः श्रीहृीघृतिः किर्तिदक्षे वसति नालसे ॥
आलस्य सुख रुप प्रतीत होता है, परन्तु उसका अन्त (फल) दुःख रुप होता है तथा कार्य दक्षता दुःख रुप प्रतीत होती है, परन्तु उससे सुख का उदय होता है । इसके सिवा ऐर्श्वय, लक्ष्मी, लज्जा, धृति और कीर्ति ये कार्य-दक्ष पुरुष में निवास करती हैं, आलस्ययुक्त पुरुष में नहीं ।
इस प्रकार सद्गुण-सदाचार की महत्ता सर्वत्र प्रतिपादित हुई है । इसका एक मात्र कारण यही है कि इसके माध्यम से व्यक्त्तिव में उन विशिष्टताओं को संचय-सर्म्बधन किया जाना सम्भव हो सकता है, जिसके मूल्य पर लोक सम्मान और आत्मतुष्टि की प्राप्ति हुआ करती है । सम्पूर्ण मानव जाति के लिए श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसरित होने की प्रेरणा प्राप्त होती है । सदाचरण का सौरभ अपनाने धारण करने वाले पुरुष को ही सुरभित नहीं करता अपितु सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धि से परिपूर्ण बना देता है- सारा समाज उससे लाभान्वित होता है । हमें इस सौभाग्य से वंचित नहीं रहना चाहिए ।
सच्चरित्रता अपने में एक महान् गुण है । इसका तार्त्पय विशिष्टताओं से होता है, जिससे मनुष्य में शालीनता, विनम्रता, आज्ञाकारिता, सरलता, सहनशीलता, जैसे सद्गुण विकासित होते हैं । यह गुण जिस किसी के पास होते हैं, वे सदाचारी कहे जाते हैं । व्यक्तित्व का समग्र विकास इन्हीं गुणों के आधार पर हो पाता है । दूसरे शब्दों में यों भी कह सकते हैं कि सच्चरित्रता की आधारशिला पर ही व्यक्तित्व का समग्र विकास निर्भर है ।
सदाचरण से व्यक्ति में आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है, जिससे वह श्रेष्ठ कार्यो में निष्ठापूर्वक अग्रसर हो सके । भले ही परिस्थितियाँ विकराल रुप धारण करके सामने कयों न खड़ी हों ? महात्मा लूथर की यह घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है-
‘मुझे खेद है कि मेरे पास एक ही सिर है यदि हजार सिर होते और वे सब इस धर्म सुधार की पुण्य वेदी पर बलिदान हो जाते, तो मैं अपने को अधिक धन्य समझता’ यह कथन मार्टिन लूथर ने उस समय कहा था, जब तत्कालीन पोप द्वारा सुधारवादी आन्दोलन चलाते रहने पर भयंकर त्रास मिलने की धमकी दी थी । किन्तु लूथर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने सत्प्रयत्न में अविचल भाव से आजीवन लगे रहे ।
सच्चरित्रता अपने में एक महान् सम्पदा है । महापुरुषों के पास सबसे बड़ी पूँजी उनके चरित्र की ही होती है, जिसके सहारे वे निरन्तर अपने प्रगति पथ पर बढ़ते जाते हैं चरित्र की महत्ता धन सम्पदा से कहीं अधिक बढ़कर है । महाभारतकार ने भी लिखा है-
‘वृत्तं’ यत्नेन संरक्षेत् वित्तमेत च याति च । अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥
‘चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए धन तो आता और जाता रहता है, धन से हीन व्यक्ति हीन नहीं होता, किन्तु चरित्र नष्ट हो जाने पर पूर्णतया नष्ट हो जाता है ।’
जिसने धन के लोभ में चरित्र खोया अथवा चरित्र खोकर धन कमाया उसने मानों अनर्थ कमाया है । चरित्र हीन व्यक्ति का संसार में कहीं भी आदर नहीं होता, भले ही वह कितना ही धनी मानी बन गया हो, इसके विपरीत चरित्रवान् व्यक्ति अभाव ग्रस्त स्थिति में भी सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ।
धनी का आदर तो लोग स्वार्थ वश करते हैं । स्वार्थ निकल जाने पर अथवा आशा न रहने पर स्वार्थी व्यक्ति तक उस धनवान् का आदर करना छोड़ देते हैं, जिसके पीछे चरित्र का बल नहीं ।
धन के अभाव में व्यक्ति ऊँचा उठ सकता है, विद्या के बिना निर्वाह कर सकता है, किन्तु सदाचार के अभाव में वह सदैव हेय एवं घृणित ही बना रहेगा । ढे़रों धन कमा लेने और पर्याप्त ज्ञानार्जन कर लेने पर भी यदि मनुष्य अपने चरित्र को उज्ज्वल न रख सका तो लोग उसके धन से घृणा करेंगे और ज्ञान में अविश्वास । वह जहाँ भी जायेगा एक आदर पूर्ण भाव बिन्दु के लिए तरसेगा । उसके सर्त्कम तक लोगों के लिए शंका एवं सन्देह के विषय होते हैं ।
संसार में वन्दनीय अभिनन्दनीय कार्य करने वालों में से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं रहा, जो चरित्रवान् न रहा हो । जन-नेतृत्व करने अथवा समाज की गति बदलने की शक्ति केवल चरित्र से ही प्राप्त होती है । मानव समाज का जो भी विकास आज तक हुआ है या आगे होगा उसके पीछे चरित्र से धनी सदाचारी लोगों का ही हाथ रहा है और आगे भी रहेगा ।
वस्तुतः सदाचार ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है, जिसके आधार पर मनुष्य ऊँचे उठते और आगे बढ़ते हैं । साथियों का सहयोग-सद्भाव लिये बिना कोई व्यक्ति एकाकी प्रयत्नों से कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है, इसमें सन्देह है । दूसरों की सहायता बिना हँसी खुशी भी स्थिर नहीं रह सकती । कठिनाइयों में दूसरों का सहारा चाहिए ही । यह सब जुटा सकना, उसी के लिए सम्भव है जो अपने मधुर स्वभाव से दूसरों को प्रभावित एवं आकर्षित कर सकता है । ऐसा चुम्बकत्व सच्चरित्रता में ही सन्निहित रहता है ।
चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति-सम्पदा है। संसार की अनन्त सम्पदाओं के स्वामी होने पर भी यदि कोई चरित्रहीन है, तो वह हर अर्थ में विपन्न ही माना जायेगा निर्धन एवं साधनहीन होने पर भी चरित्रवान् का मस्तक समाज में सदैव ऊँचा रहता है । इसके विपरीत चरित्रहीन का व्यक्तित्व अपनी आन्तरिक कुरुपता को मँहगी साज-सज्जा ओढ़े फिरने पर भी छिपा नहीं सकता ।
चरित्रवान् व्यक्ति को यह विश्वास रहता है कि उस के सदाचरण से प्रभावित होकर जनमत उसके पक्ष में ही रहेगा ।वह सदा सच्ची निष्ठा के साथ वही काम करता है जिसमें लोकहित और आदर्शो का प्रतिपालन समाहित है । इसी विशेषता के कारण उस पर्याप्त जन सहयोग भी प्राप्त होता है, फलतः वह आर्श्चयजनक समझे जाने वाले कार्यो को भी पूरा कर लेता है ।
जितने भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्व रखने वाले कार्य हुए हैं, वह चरित्रवान् व्यक्तियों द्वारा जन सहयोग के बल पर ही पूरे हुए हैं । जन-समर्थन प्राप्त न होने पर अच्छे उद्देश्य को लेकर किये जाने वाले कार्य भी असफल होते देखे जाते हैं ।
सच्चरित्रता की पूँजी द्वारा सहयोग और सम्मान उसी प्रकार से खरीदा जा सकता है, जिस प्रकार रुपये पैसे द्वारा विभिन्न वस्तुएँ । सदाचार को वह हुण्डी कहा जा सकता है, जिसे भुना कर जन-सहयोग व जन-सम्मान सहज ही प्राप्त किया जा सकता है ।
आत्म-सन्तोष मानव-जीवन की महानतम उपलब्धि है । इसे प्राप्त करने के लिए उच्चस्तरीय चरित्र की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है । कुटिलतापूर्वक अनीति अपना कर कोई व्यक्ति तात्कालिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले पर आत्मगलानि और आत्म प्रताड़ना की आग में सदा ही झुलसते रहना पड़ेगा । आत्मग्लानि-तिरस्कार जैसे प्रेत पिशाच उनके पीछे लगे ही होते हैं, जो चरित्र की दृष्टि से दुर्बल होते हैं, अविश्वास और असहयोग का दण्ड ऐसे लोगों को हर घड़ी भुगतना पड़ता है । इस प्रताड़ना को सहन करने वाले कभी सिर ऊँचा उठाकर नहीं चल सकते और सदा अपने को एकाकी अनुभव करते हैं । इतनी हानि उठाकर किसी ने कुछ वैभव अर्जित भी कर लिया तो समझना चाहिए उसने गँवाया बहुत और कमाया कम । उच्च-चरित्र को अपनाए रहने की महत्ता को जो समझते हैं, वे आत्म-सन्तोष, लोक सम्मान के साथ-साथ दैवी अनुग्रह भी प्राप्त करते हैं और महामानवों को मिलने वाले सम्मान से लाभान्वित होते हैं ।
सो जाने के बाद व्यक्ति जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाता है । उसे अपने आसपास की परिस्थितियों वस्तुओं और सम्बन्धों की कुछ भी स्मृति नहीं रहती । एक तरह से उस व्यक्ति की आँशिक मृत्यु ही हो जाती है । हृदय की धड़कन, रक्त का संचार और श्वाँस प्रश्वाँस भले ही चलते रहें, परन्तु उसकी चेतना का सम्बन्ध उस समय तो स्थूल जगत से कट ही जाता है । उस समय मन अपनी ही दुनियाँ में घूमता है और चित्र विचित्र सपने देखता है । जागने पर तो यह लगता है कि बे सिर-पैर के सपने देखे गये हैं परन्तु जिस समय वे देखे जाते हैं उस समय तो वास्तविक ही लगते हैं ।
निद्रा और स्वप्न में परस्पर क्या सम्बन्ध है । शरीर का कौन-सा अंग स्वप्नों के लिए उत्तरदायी है, यह जानने के लिए शिकागो विश्वविद्यालय के दो छात्र नेपोलियन क्लीरमाँ और यूजोन एसेटिस्की शोध करने लगे ।दोनों की खोज पूरी तो नहीं हो सकी, पर उससे कई नये तथ्य प्रकाश में आये हैं उन्होंने पाया क कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है तो उसकी आँखों की पुतलियाँ ठीक उसी प्रकार घूमती है जैसे जागृत अवस्था में कोई दृश्य देखते समय घूमती हैं । अर्थात् आँखें उस समय बन्द रहते हुए भी देखती है ।
आधुनिक विज्ञान ने स्वप्नों के सन्म्बन्ध में कई नये तथ्यों का पता लगाया है और उनमें से अधिकाँश तथ्य भारतीय ऋषियों के निष्कर्षो से मेल खाते है उदाहरण के लिए निद्रा के समय व्यक्ति का शरीर शिथिल पड़ जाता है, उसकी इन्द्रियाँ काम करना लगभग बन्द कर देती हैं । फिर भी स्वप्नों की दुनियाँ में पहुँचकर व्यक्ति जागृत होने की अवस्था जैसे ही काम करता है । इस आधार पर प्रसिद्ध मनोविज्ञानी हैफन राबर्ट ने प्रतिपादित किया है कि ज्ञान और अनुभव का आधार इन्द्रियाँ नहीं है । बल्कि मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता ही उनके माध्यम से ज्ञान और अनुभव प्राप्त करती है ।
अभी उस सूक्ष्म सत्ता की खोज में मन तक ही पहुँचा जा सकता है और बताया जाता है कि मन ही विभिन्न स्तरों पर देखी, सुनी, जानी और अनुभव की हुई बातों की स्मृति व कल्पना करते हुए सपने के रुप में देखता है । मानसिक गुत्थियाँ और जीवन की उलझनें, अनुभूतियाँ मस्तिष्क में लुक-छिपकर बैठी रहती हैं और जब बुद्धि का दबाव घट जाता है तो निद्रावस्था में स्वप्नों के रुप में बाहर निकल आती हैं । इसके अतिरिक्त यह भी माना जाने लगा है कि मन कई बार ऐसी तरंगों को भी पकड़ लेता है, जो किसी स्थान पर घटी घटना के कारण सूक्ष्म जगत् में उत्पन्न हुई हैं अथवा निकट भविष्य में होने वाली है । इस स्तर के स्वप्नों को मन की अतीन्द्रिय चेतना कहा जाता है ।
परन्तु भारतीय मनीषियों की दृष्टि में मन ही एक मात्र समर्थ या सूक्ष्म सत्ता नहीं है । उससे भी सूक्ष्म सत्ता मनुष्य की चेतना है जिसे जीवात्मा कहा जाता है और वही मन तथा इन्द्रियों का उपयोग कर ज्ञान व अनुभव प्राप्त करता है । ऐतरेयोपनिष्द् में इस सम्बन्ध में कहा है-
यदेत हृदयं मनश्चैतत्। संज्ञानपाज्ञान विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्घृति र्मनीषा जूति स्मृतिः संकल्प क्रतुरसुः कामो वश प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥
अर्थात्-यह अन्तःकरण ही मन है । इस मन की ज्ञानशक्ति, विवेचन शक्ति, तत्काल समझने, अनुभव करने, देखने की शक्ति तथा धैर्य, बुद्धि, स्मरण, संकल्प, मनोरथ , प्राण, कामना, अभिलाषा आदि शक्तियाँ उस परमात्मा से ही प्राप्त होती हैं जो जीवात्मा के रुप में इस शरीर में अवस्थित रहता है ।
मन की शक्तिस्रोत परमात्म सत्ता का प्रतिनिधि जीवात्मा है । इसलिए कई बार ऐसे स्वप्न आते हैं जिन्हें परोक्ष दर्शन, पूर्वाभास जैसी अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कहा जा सकता है । कुछ समय पूर्व समाचार पत्रों में रोम की एक घटना छपी थी, जिसमें स्त्री ने अपने पति की हत्या और उसके हत्यारे में बारे में बता दिया था । उस युवती का नाम था एमेलिया रुसों । उसका पति फ्राँसिस्कों रुसों कुछ दिनों के लिए व्यापार सम्बन्धी कार्यो से बाहर गया था । एमेलिया घर में अकेली थी ।
एक दिन जब वह गहरी नींद में सो रही थी तो उसने देखा कि एक बहुत बड़े खाली कमरे में उसके पति का शव पड़ा हुआ है और उस शव पर एक युवती बैठी हुई है । इस डरावने स्वप्न को देख कर एमेलिया की चीख निकल गई और उसे लगने लगा कि उसके पति को कुछ हो गया है । वह किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी, क्योंकि स्वप्न के आधार पर कही गई बात पर कौन ध्यान देगा । तीन दिन तक वह इसी पेशोपेश में पड़ी रहीं । अन्ततः उससे रहा न गया और वह पुलिस अधिकारियों के पास पहुँची । आरम्भ में पुलिस अधिंकारियों ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु कुछ ही दिनों बाद रोम से 50 किलोमीटर दूर एक दुर्घटना ग्रस्त कार में फ्राँसिस्कों का शव मिला ।
अधिकारियों ने इसे एक दुर्घटना माना और शव को पोस्टमार्टन के लिए भेज दिया । पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने अधिकारियों की धारणा को भ्रम सिद्ध किया और डाक्टरों ने बताया कि फ्राँसिस्कों की मृत्यु दुर्घटना के कारण नहीं विष देने के कारण हुई है । इसके बाद तो एमेलिया द्वारा देखे गये स्वप्न तथा उसके बारे में और अधिक पूछताछ करने के बाद उस स्त्री को गिरफ्तार किया जा सका, जिसने फ्राँसिस्कों की हत्या की थी । उस स्त्री को देखते ही एमेलिया ने पहचान लिया कि स्वप्न में उसे ही फ्राँसिस्कों के शव पर बैठे हुए देखा था ।
यदि स्वप्न मन की ही कल्पना और तरंग हैं तो इस तरह की घटनाओं के क्या कारण हैं ? प्रश्नोपनिषद् के तीसरे अध्याय में पाँचवाँ मन्त्र है जिसमें पिप्पलाद ऋषि कहते हैं-
अन्नेव देवः स्वप्ने महिमा नमनुभवति यद् दृष्टं दृष्टमनु प्श्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थ मने श्रृणोति ॥ देशदिगन्तैरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्व पश्यति सर्वः पश्यति ॥
अर्थात्- इस स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है । इसने पहले जहाँ कहीं भी जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है, उसी को यह स्वप्न में देखता, सुनता और अनुभव करता है । परन्तु यह नियम नहीं है कि जागृत अवस्था में इसने जिस प्रकार, जिस ढंग से और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करता है । अपितु स्वप्न में यह देखे और न देखे हुए को भी देखता है, सुने और न सुने हुए को भी सुनता है, अनुभव किये और न अनुभव किये हुए को भी अनुभव करता है।
आमतौर पर मनुष्य का मन जीवात्मा के साथ उस स्तर का सम्बन्ध नहीं बना पाता, बिजली का बल्व तार द्वारा बिजली घर से सम्बद्ध होता है, तभी प्रकार दे पाता है। अन्यथा उसका उपयोग किसी खिलौने से अधिक नहीं हो सकता, वही बात मन के साथ लागू होती है । मन का सम्बन्ध सूत्र भी परमात्म सत्ता के प्रतिनिधि जीवात्मा से सीधा जुड़ा रहता है तो वह परम साम्थ्यवान हो जाता है, अन्यथा वह क्रीड़ा कौतुकों में ही रमा रहता है ।
कई बार यह सम्बन्ध सूत्र अनायास ही जुड़ जाते हैं रेडियों का बटन घुमाते जिस तरह कभी-कभी ऐसे स्टेशन भी पकड़ में आ जाते हैं जिन्हें लगाने में कई बार प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिलती, उसी प्रकार मन का सम्बन्ध भी जीवात्मा-परमात्म सत्ता के साथ यदाकदा अनायास ही जुड़ जाता है और उस अवस्था में परोक्ष-दर्शन, पूर्वाभास जैसी दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती हैं । आयरलैण्ड में एक सराय मालिक राजर्स की पत्नी ने अपनी सराय में ठहरे एक युवक की हत्या का पूर्वाभास इसी प्रकार स्वप्न में पा लिया था ।
हुआ यह कि उक्त युवक जिसका नाम हिकी था, वह कहीं यात्रा पर गया था, परन्तु निर्धारित समय पर हिकी अपने घर नहीं पहुँचा तो घर के लोगों ने इसकी सूचना पुलिस में दी । पुलिस ने छानबीन के दौरान पता लगाया कि वे राजर्स की सराय में ठहरे थे । राजर्स ने पूछताछ के समय बताया कि वह हिकी को रोकना चाहता था । क्योंकि जिस दिन हिकी अपने साथ एक मित्र को लेकर उस सराय में आकर ठहरा था उसी दिन रोजर्स की पत्नी ने एक विचित्र स्वप्न देखा । सुबह उठकर राजर्स की पत्नी ने बताया कि उसने अपने में हिकी के मित्र को एक झोंपड़ी में उसकी हत्या करते हुए देखा है। कहीं यह सपना सच न हो जाय इस भय से वह हिकी को रोकना चाहता था ।
रोजर्स की पत्नी ने पुलिस का बताया क वह उस झोंपड़ी को दिखा सकती है जिसमें हिकी की हत्या होती हुई देखी थी । उसने यह भी बताया कि वह हत्यारे युवक को पहचान भी सकती है । श्रीमती रोजर्स द्वारा स्वप्न के आधार पर बताये गये सूत्रों से हिकी का हत्यारा पकड़ लिया गया । वह वस्तुतः हिकी का दोस्त ही था और उसने यह भी बताया कि जिस दिन वे सराय से लौट रहे थे उसी दिन रोजर्स ने हिकी को रुकने तथा उसे चले जाने को कहा था । हमने समझा कि रोजर्स हिकी से कोई बात करना चाहता है, इसलिए उसी समय बात करने के लिए कहा । परन्तु रोजर्स का आग्रह था कि हिकी अधिक समय के लिए अकेला रुके तभी बात हो सकती है । इस पर हम लोग चले आये थे ।
आत्म-चेतना समय, देश और काल के बन्धनों से बँधी हुई नहीं है, क्योंकि ईश्वरीय सत्ता को तो असीम, कालातीत और सर्वव्याप्त कहा गया है । जीव सत्ता मूलतः है तो उसी का प्रतिनिधि, उसी का अंश है और उसी की प्रेरणा-उपस्थिति मात्र से मन, प्राण, इन्द्रिय अपने-अपने कार्यो में प्रवृत्त होते हैं। केनोपनिषद् ने शिष्य गुरु से प्रश्न करता है -
केनेषितं पतति प्रेषितंमनः केन प्राणः प्रथमः प्रैतियुक्तः । केनेषिताँ वाचमिमाँ वदंतिंचक्षुः श्रोत्र करदेबो युनक्ति ॥
अर्थात् अन्तःकरण, प्राण, वाणी आदि कर्मेन्द्रिय तथा चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों को अपना-अपना कार्य करने की शक्ति देने वाला तथा अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त करने वाला देव कौन है ?
इसके उत्तर में गुरु कहते हैं-
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो य़द्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः चक्षुषश्चक्षुरति मुच्च धीराः प्रत्योस्मा ल्लोकदमृताभवति ।
अर्थात् जो इन मन, प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियों का कारण है, जिसकी शक्ति को पाकर ये सब अपना अपना कार्य करने में समर्थ हैं और जो इन सबको जाने वाला है वह (आत्मा) ही इन सबका प्रेरक है, जिसे जानकर जन्म-मृत्यु के क्लेशों का नाश हो जाता है ।
दैनंदिन जीवन में घटने वाली सामान्य घटनाओं और व्यवहारों में तो हमारी मनःचेतना इतनी लिप्त रहती है कि इस जगत और जीवन के सभी व्यवहार सामान्य स्वाभाविक प्रतीत होते हैं तथा उनका कारण भी स्थूल जगत में-स्थूल अस्तित्व में ही प्रतीत होता है । परन्तु स्वप्नों में दिखाई पड़ने वाले दृश्य, जब सारी इन्द्रिदयाँ शिथिल हो जाती हैं, शरीर सो जाता है तथा मस्तिष्क का सोचना विचारना भी लगभग बन्द-सा ही हो जाता है, उस समय दिखाई पड़ने और अनुभव होने वाला एक नया संसार आत्म-चेतना के अस्तित्व को प्रमाणित करता है । ऊल-जलूल और बेसिर-पैर के स्वप्नों को जाने दें, जो हमारे चित्त की मलीनता के ही प्रतीक हैं तथा उन स्वप्नों का अध्ययन करें जो पूर्वाभास, परोक्ष दर्शन तथा दूरानुभूति कराते हैं तो प्रतीत होता है कि आत्म-चेतना अति समर्थ, शक्तिशाली और समग्र व्यक्तित्व का मूल आधार है । जिसे समझ लिया जाय, जान लिया जाय तो व्यक्ति मानव से महामानव, साधारण से सिद्ध पुरुष और नर से नारायण बन सकता है ।
पिछले दिनों ब्रिटेन मेन्चेस्टर मेडिकल, रिसर्च इन्स्टीटयूट ने इस विषय पर शोध कार्य हाथ में लिया कि आधार का मनुष्य और प्राणियों के स्वभाव, गुण तथा प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ता है । इसके लिए कई परीक्षण किये गये । उनमें से एक इस प्रकार था । चूहा स्वभावतः शाँत प्रकृति का होता है किसी से लड़ता झगड़ता या आक्रमण नहीं करता । प्रयोगशाला में पाले गये चूहों में से एक को निकाला गया और उसे सामान्य आहार न देकर मिर्च मसाले तथा माँस और नशीली चीजों से बना आहार दिया गया । यह आहार लेने से पूर्व तक चूहा बेहद शान्त था, पर इसके कुछ ही घन्टे बाद वह उद्दण्ड और आक्रामक बन गया । उसे वापिस पिंजरे में छोड़ा गया तो पिंजरे के दूसरे चूहों को उस अकेले ने इस बुरी तरह सताया कि कुछ चूहे लहू-लुहान हो गये ।
इसके बाद उसी चूहे को दूसरी बार सरल, शुद्ध, और सात्विक भोजन दिया गया । इस पर भी पिछला प्रभाव तो बाकी था किन्तु चूहा अपेक्षाकृत शान्त था । कई बार साधारण खाना लेने के बाद चूहा अपनी वास्तविक स्थिति में आ पाया। इस तरह के सैकड़ों प्रयोगों द्वारा इस निर्ष्कष पर पहुँचा जा सका कि जो कुछ खाया जाता है उससे शरीर का पोषण ही नहीं होता बल्कि लिया गया भोजन मनुष्य का व्यक्तित्व बनाने में भी असाधारण भूमिका निबाहता है । आत्म-विज्ञान की दृष्टि से स्थूल शरीर और कारण शरीर के समान आहार के भी तीन प्रकार और तीन स्तर होते हैं जिन्हें सत् रज और तम कहा जाता है। आहार में तम अंश से रक्त माँस बनता है, रज अंश से मस्तिष्कीय क्षमता प्रभावित होती है और सत् अंश भावनाओं को निर्माण करता है।
चिकित्सा शास्त्र की खोजबीनें और प्रयोग विश्लेषण आहार के स्थूल स्वरुप तक ही सीमित हैं क्या खाने से शरीर के कौन से रासायनिक पदाथों के बढ़ाया जा सकता है और क्या खाने से शरीर में कौन से रासायनिक तत्व घटते हैं चिकित्सा शास्त्र इतनी ही खोजबीन कर पाया है । विश्लेषण का क्षेत्र इस सीमा तक भी बढ़ा है कि मस्तिष्क पर आहार के कौन से अंश क्या और किस प्रकार का प्रभाव डालते हैं सम्भवतः आगे चल कर आहार की कारण शक्ति के बारे में भी कुछ प्रयोग किये जायँ । परन्तु भारतीय ऋषि मुनियों ने इस विषय पर पहले से ही विशद प्रकाश डाल रखा है कि क्या खाने से बौद्धिक प्रखरता बढ़ती है और कौन-सा आहार स्वभाव तथा व्यक्तित्व की मूल परतों को र्स्पश करता है ।
स्मरणीय है योगशास्त्रों और साधनों ग्रन्थों ने अन्तःकरण को पवित्र एवं परिष्कृत करने के लिए सात्विक आहार ही अपनाने को कहा है। गीता में भगवान कृष्ण ने सात्विक, राजसी और तामसी आहार की सुस्पष्ट व्याख्या की है तथा शरीर, मन और बुद्धि पर उसके पड़ने वाले प्रभावों का भी स्पष्ट विवेचन किया है । आत्मिक प्रगति के आकाँक्षी और साधना मार्ग के पथिकों के लिए इस बात को निर्देश दिया गया है कि सात्विक आहार ही अपनाया जाय और उसकी सात्विकता को भी भावनाओं का सम्पुट देकर आत्मिक चेतना में अधिक सहायता दे सकने योग्य बनाया जाय । भगवान का भोगप्रसाद, यज्ञाग्नि में पकाया गया चरुद्रव्य इसी प्रकार के पदार्थ हैं जिनकी स्थूल विशेषता न दिखाई देने पर भी उनकी सूक्ष्म सामर्थ्य बहुत अधिक होती है ।
प्रत्यक्ष रुप में यदि आहार का मस्तिष्क और स्वभाव पर क्या प्रभाव पड़ता है यह देखना हो तो नशों के रुप में देखा जा सकता है। हल्का या तेज नशा मस्तिष्क पर अपना कसा प्रभाव छोड़ता है यह सुस्पष्ट है । सामान्य स्वस्थ मनोदशा में लोग बहुत कम अपराध कर्म करते हैं जबकि शराब पीकर या अन्य तेज मादक द्रव्यों का सेवन कर ज्यादातर अपराध होते हैं । प्रायः सभी अपराधी शराब, चरस, गाँजा जैसे तेज मादक द्रव्यों के आदी होते हैं । शरीर विज्ञानियों के अनुसार हल्के से हल्के मादक द्रव्यों का सेवन भी शरीर पर विषाक्त प्रभाव छोड़ता है । मस्तिष्क को कुँठित कर देने वाले नशे जिस प्रकार हानिकारक प्रभाव दिखाते हैं उसी प्रकार ऐसे रसायन भी ढूँढ़ निकाले जा रहे हैं जो मस्तिष्क के अविकसित अंगों में पुनर्जीवन भर सकते हैं । नशेबाजी के ठीक विपरीत प्रकार की यह रचनात्मक दिशा हुई ।
पश्चिमी देशों में इस विषय को लेकर काफी खोजबीन हो रही है । अमेरिका के वाल्टीमोर शहर के एक स्कूल में 52 विद्यार्थियाँ को स्मार्टपिल्स नामक दवा एक महीने तक खिला कर देखा गया । एक महीने बाद उनके मस्तिष्क की परीक्षा की गई तो पाया गया कि इस थोड़ी-सी अवधि में उन छात्रों की मस्तिष्कीय क्षमता पहलें से अधिक बढ़ गई थी । मिशीगन विश्वविद्यालय के जीवनशास्त्री ने मस्तिष्क पर आहार का प्रभाव जाँचने के लिए मनुष्येतर प्राणियों पर भी प्रयोग किये हैं । उक्त जीवशास्त्री डा0 वर्नार्ड एग्रानोफ ने अपने प्रयोग के दौरान मछलियों की खुराक में फेर-बदलकर उन्हें चतुर और भुलक्कड़ बनाने के सफल प्रयोग किये । डा0 बर्नार्ड के अनुसार हार में प्यरोमाइरिन नामक प्रोटीन मात्रा से घटने-बढ़ने से मस्तिष्क की क्षमता भी घटती-बढ़ती है । दस वर्षो तक लगातार प्रयोग और परीक्षण करने के बाद कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञानी रिचार्ड थापंसन इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि बुद्धि दैवी वरदान नहीं है उसी मानवी प्रयत्नों से घटाया अथवा बढ़ाया जा सकता है । इस प्रयोग श्रृंखला में उन्हों कत्तों, बिल्लियों, चूहों और बन्दरों को भी शामिल किया और प्रतिपादित किया कि अन्य शारीरिक परिवर्तनों के समान ही आहार द्वारा मस्तिष्कीय क्षमता में भी हर स्तर का परिवर्तन कर सकना सम्भव है।
मिशीगन विश्वविद्यालय के ही प्रो0 जेम्स मेकानेल ने तो अपने प्रयोगों द्वारा यह भी सिद्ध कर दिया कि आहार में हेर-फेर करके स्मरण शक्ति और सम्वेदनशीलता को भी कम-ज्यादा घटाया बढ़ाया जा सकता है । इतना ही नहीं दो व्यक्तियों में स्मृति और अनुभवों का प्रत्यावर्तन भी किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक व्यक्ति का रक्त दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कराया जा सकता है और टूटे-फूटे अवयवों को बदल कर उनके स्थान पर नये अंग का प्रत्यारोपण किया जा सकता है । कहा जा चुका है कि चिकित्सा विज्ञान का ढाँचा शरीर पर पड़ने वाले खाद्य-पदार्थो के प्रभाव की जानकारी के आधार पर, भले ही वह औषधि के रुप में ही क्यों नहीं, खड़ा किया गया है । वर्तमान में जारी प्रयोगों के आधार पर यह निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि अगले दिनों बुद्धि की मन्दता, अकुशलता और मानसिक विकृतियों का उपशंमन भी खाद्य-पदार्थो की सूक्ष्म शक्ति के आधार पर सफलतापूर्वक किया जाने लगेगा । सम्भव है अगले दिनों इस प्रकार की औषधियाँ बाजार में आने लगें जिनका सेवन कर मनुष्य अपनी स्मरण शक्ति, बुद्धि कौशल, सूझबूझ को बढ़ा सके ।
मस्तिष्कीय क्षेत्र में यह सफलता आहार की सूक्ष्म शक्ति के आधार पर ही सम्भव हो सकेगी । इस प्रयोजन के लिए पदार्थो की सूक्ष्म शक्ति के विषय में अनेक प्रयोग और अन्वेषण कार्य चल रहे हैं । यह सूक्ष्म शक्ति शरीर का पोषण करने वाली स्थूल शक्ति से भिन्न स्तर की है । इस आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि जो खाद्य शरीर के लिए उपयोगी हों वे मस्तिष्क के लिए भी उपयोगी हों, यह न तो आवश्यक है और न अनिवार्य ही ।
आहार की स्थूल और सूक्ष्म शक्ति जो शरीर और मस्तिष्क को प्रभावित करती है, कारण शक्ति उससे भिन्न स्तर की है । कहना न होगा कि भावना क्षेत्र शरीर और मस्तिष्क से भिन्न और बढ़कर है । इसी के आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव को दिशा मिलती है और उससे समूचे व्यक्तित्व का निर्माण होता है । जो व्यक्ति शरीर से बलवान है कोई आवश्यक नहीं कि वह मस्तिष्क से भी बुद्धिमान हो । उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति भावना स्तर पर उच्चस्थिति सम्पन्न हो यह आवश्यक नहीं है । शरीर से बलवान और मस्तिष्क से बुद्धिमान होने पर भी कोई व्यक्ति भावना स्तर पर गया गुजरा हो सकता है और निकृष्ट कोटि का दुष्ट जीवन जी रहा हो सकता है । ऐसे व्यक्ति अपने दोष-दुर्गुणों के कारण पग-पग पर ठोकरें खाते हैं और प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी असफल जीवन जीकर रोते-कलमते रहते हैं । इसके विपरीत अपेक्षाकृत सामान्य स्वास्थ्य और साधारण बुद्धि के लोग परिष्कृत भावना स्तर के कारण महामानवों की स्थिति में जा पहुँचते हैं और वन्दनीय स्थान प्राप्त कर लेते हैं ।
यह विज्ञान आज भी अपने स्थान पर सही और निश्चित परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ है । यह बात अलग है कि वह विज्ञान लुप्त हो गया है, पर उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह तो पता चलता ही है कि इस शक्ति के विकास में खाद्य-पदाथों की कारण शक्ति का भी सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता था । पिप्पलाद ़ऋषि ने इसके लिए पीपल के फल खाकर निर्वाह किया था और इसी कारण विप्पलाद ऋषि कहलाये औदम्बर ऋषि का नाम भी इसी आधार पर पड़ा कि वे औदुम्ब फल (गूलर के फल) खाकर अपनी जीवन यात्रा चलाते थे । केवल मूँग ही खाकर निर्वाह करने के कारण मौद्गल ऋषि का नाम मौद्गल पड़ा । यह खाद्य पदार्थ भी विशिष्ट उपचारों से अभिमन्त्रित किये जाते थे ताकि उनकी कारण शक्ति विशिष्ट रुप से उभर कर आ सके । यज्ञ विज्ञान के अनुसार विशिष्ट अग्निहोत्रों से विभिन्न प्रयोंगो द्वारा हवन सामग्री को परिष्कृत और उन्न को संस्कारित इसीलिए किया जाता है कि उनकी कारण शक्ति का उपयोग किया जा सके ।
आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली सभी साधनाओं में आहार की कारण शक्ति को विकसित करके उसके उपयोग का विधान है । इस सम्बन्ध में उपेक्षा बरती जाने पर आत्मबल सर्म्वधन के लिए किये जा रहे साधनात्मक प्रयोगों में यत्िकचित ही सफलता मिलती है, जबकि आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता है और वही सबसे मूल्यवान सम्पदा भी । यदि यह पूँजी अभीष्ट मात्रा में विद्यमान हो तो मनुष्य लौकिक दृष्टि से और आत्मिक दृष्टि से, सर्वप्रकारेण सफल हो सकता है । उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह स्वयं अपना आत्मिक उर्त्कष करने के साथ-साथ सिद्ध पुरुषों की तरह अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पारकर सकता है। इस सर्न्दभ में आहार-शुद्धि की, उसकी सतोगुणी कारण शक्ति की उपयोगिता असंदिग्ध ही नहीं उपयोग अनिवार्य भी है। मनुस्मृति में साधकों के लिए भक्ष्य-अभक्ष्य आहार की लम्बी सूची बताई गई है और कहा गया है कि आत्मिक प्रगति के इच्छुकों को अभक्ष्य आहार अनजाने में भी नहीं करना चाहिए । अनजाने में हुए अभक्ष्य-भक्षण का प्रायश्चित विधान करते हुए कहा गया है”अमत्यैतानि वद् जग्ध्वा कृच्छं सान्तपनं चरेत् (5120) अर्थात््-अनजाने में उपरोक्त अभक्ष्य भोजन कर लेने पर कृच्छसान्तपन अथवा यदि चाँद्रायण व्रत करना चाहिए ।
आहार विहार के ये कड़े नियम इसलिए बनाये गये थे कि साधक आत्मिक प्रगति के पथ पर निर्बाध गति से बढ़ता हुआ रह सके । खेद है कि प्राचीनकाल के तत्वदर्शियों द्वारा जो प्रयोग किये थे, वे अब प्रायः लुप्त ही हो गये हैं मात्र उनकी छाया छुटपुट कर्मकाण्डों के रुप में खण्डहरों की तरह जहाँ-तहाँ अपनी कुरुप और विद्रूप स्थिति में पड़ी दिखाई देती हैं । भवन का प्रयोजन खण्डहरों से पूरा नहीं हो सकता और न ही योग साधना का उद्देश्य प्रचलित एकाँगी कर्म-काण्डों से पूरा हो सकता है । यही कारण है कि मात्र शरीर श्रम और वस्तु समुच्चय के आधार पर योग के नाम की जो लकीर भर पीटी जाती रही है उसके उत्साहवर्धक सत्परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं । उसके लिए तो पदार्थ की आहार की कारण शक्ति को भी समझना और उपयोग में लाना पड़ेगा ।
जिनके पास अच्छे विचारों का भण्डार है, वे कभी निर्धन तथा एकाकी नहीं रहते
-सर फिलीप सिडनी
क्रोध होने पर मनुष्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है । क्रोधाक्रान्त मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि वह क्या कह रहा है और क्या कर रहा है । क्रोध में आकर लोक अधिकतर अपनी ही हानि कर लेते हैं । दो परस्पर विरोधी व्यक्तियों में जो अपेक्षाकृत अधिक शान्त और सन्तुलित रहता है, वही जीतता है। बुद्धिमान लोक अपने शत्रु को क्रोध से नहीं, शान्ति ने नष्ट करते हैं । क्रोधी व्यक्ति जब एक बार किसी एक से क्रुद्ध हो जाता है, तब उसका संतुलन यहाँ तक बिगड़ जाता है कि वह अन्य असम्बन्धित व्यक्तियों से भी क्रोधपूर्ण व्यवहार एवम् वार्ता करने लगता है और इस प्रकार अपने और भी विरोधी बना लिया करता है ।
क्रोधी व्यक्ति जब किसी पर क्रूद्ध होकर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो अपने को क्रोध करने लगता है, अपने को दण्ड देने और अपनी ही हानि करने लगता है क्रोध मनुष्य को पागल की स्थिति में पहुँचा देता है । बुद्धिमान और मनीषी व्यक्ति क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध का आक्रमण अपने पर नहीं होने देते । वे विवेक का सहारा लेकर उस अनिष्ट कर आवेग पर नियंत्रण कर लेते हैं और इस प्रकार अपनी हानि से बच जाते हैं ।
प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे । स्वयं भी साधक थे, वेद वेदाँग के ज्ञाता थे । संयम और नियम से रहते थे दिन अनुदिन तप संचय कर रहे थे । किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था । उन्होंने क्रोध को एक व्यसन बना लिया था और जब-तब उससे हानि उठाते रहते थे । किन्तु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे। इस दुरभिसन्धि की उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लम्बी साधना प्रचेता से जो आध्यात्मिक शक्ति संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिये साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथा स्थान ही ठहरे रहते थे । होना तो यह चाहिए था कि अपनी इस अप्रगति का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयम् पर ही इस अप्रगति से क्रूद्ध रहा करते थे । अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब हो गया था और वे जरा-जरा सी बात पर उत्त्जित हो उठते थे ।
एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे । उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया । दोनों एक दूसरे के सामने आ गये । पथ बहुत सकरा था । एक के राह छोड़े बिना ,दूसरा जा नहीं सकता था, लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार न हुआ और हठपूर्वक आमने-सामने खड़े रहे । थोड़ी देर खड़े रहने पर उन दोनों ने हटना न हटना प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया । अजीव स्थिति पैदा हो गई ।
यहाँ पर समस्या का हाल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से अधिक सभ्य, शिष्ट और समझदार समझता होता वह हट कर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता निश्चित था कि प्रचेता कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे। एक साधक थे और आध्यात्मिक उन्नति में लगे थे। कल्याणपाद एक धृष्ट और ढीठ व्यक्ति था यदि ऐसा न होता तो एक महात्मा को रास्ता तो देता ही, साथ ही नमन भी करता । प्रचेता को यह बात समझ लेनी चाहिए थी । किन्तु कुस्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया बल्कि उसी के स्तर पर उतर कर अड़ गये । कुछ देर दोनों खड़े रहे । पर फिर प्रचेता को क्र्रोध हो आया । उन्होंने उसे श्राप दे दिया, कि राक्षस हो जाए । तप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया । क्रोध से विनष्ट प्रभव हुए प्रचेता अपनी रक्षा न कर सके ।
क्रोध अपने आप तो पैदा नहीं होता वह अपनी मानव संतान के समान अपने से ही पैदा होती और अपना ही नाश करती है, ऐसी सन्तान से दूर रहने में ही भलाई है ।
नवयुग सृजन का बड़ा काम है।उसके लिए सहयोगी तो गीद, गिलहरी भी हो सकते हैं, पर महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए अंगद, हनुमान जैसे वानरों और नल, नील जैसी रीछों की आवश्यकता पड़ती है। गौ चराने, गेंद खेलने और गोवर्धन उठाने में लाठी का सहयोग देने के लिए तो ग्वाल-वाल भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके, किन्तु महाभारत जीतने में भीम, अर्जुन से ही काम चला । स्वतन्त्रता संग्राम के जीतने में भी सत्साहसियों की जेल यात्रा को ही सराहा जायगा पर नेहरु पटैल जैसी हस्तियाँ आगे न आतीं तो महान प्रयोजन कदाचित ही पूर्ण हो पाता, महान परिवर्तनों में योगदान तो असंख्यों का रहा है किन्तु उसका सूत्र संचालन महामानव ही करते रहे हैं । छप्पर तो बाँस बल्लियों पर भी खड़े रहते हैं, पर नदी या नाले का पुल बनाने में ऐसे मजबूत पाये लगाने पड़ते हैं जो उस परिवहन का भार सह सकें ।
युग सृजन में सहयोगी कोई भी हो सकता है यह उसका उत्तरदायित्व कंधों पर ओढ़ने वाले सृजन शिल्पियों को नल-नील जैसा प्रबुद्धि एवं परिपक्व होना चाहिए। ऐसी भूमिका निभा सकना हर किसी के बस की बात नहीं है । सिखाने पढ़ाने से थोड़ा सा काम तो चलता है पर प्रखरता मौलिक एवं संस्कारगत होनी चाहिए । लोहे की मजबूती उसकी संरचना में ही सन्निहित है। कारखानों में ढालने, खरादने का काम होता है, कृत्रिम लोहा नहीं बन सकता और न उसका स्थानापन्न किसी अन्य धातु को बनाया जा सकता है ।
प्रशिक्षण, वातावरण, एवं सर्म्पक का प्रभाव तो पड़ता है पर महामानव इतने से ही नहीं बन जाते । उनके लिए संस्कार गत मौलिकता एवं संचित प्रखरता की भी आवश्यकता होती है । विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक माँगा था और उन्हें वला अतिवला विद्याएँ सिखा कर महान परिवर्तन के लिए उपयुक्त क्षमता सम्पन्न बनाया था । चाणक्य ने चन्द्रगुप्त-समर्थ रामदास ने शिवाजी, बुद्ध ने आनन्द, महीन्द्रनाथ ने गौरख रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को बड़ी कठिनाई से ढूँढ़ा था । आगन्तुकों की भारी भीड़ में से इन सभी शक्ति सम्पन्नों को कोई काम का न लगा । बड़ी कठिनाई से ही वे अपने थोड़े से अनुयायी उत्तराधिकारी ढूँढ़ने में सफल हुए । विवेकानन्द ने निवेदिता से कहा था मुझे मात्र तुम्हाने लिए योरोप की यात्रा करनी पड़ी ।
अवतार के समय देवता उसकी सहायता करने आते और देह धारण करते है। सामान्य मनुष्यों की मनःस्थिति नर पशुओं जैसी होती है वे पेट और प्रजनन के लिए मरते खपते हैं तथा लोभ, मोह अहंकार की लिप्साओं से बने कोल्हू में पिलते रहते हैं । यही उनकी प्रवृत्ति और नियति होती है।उनमें थोडा सा उत्साह तो भरा जा सकता है और एक सीमा तक प्रगतिशील भी बनाया जा सकता है किन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे देव भूमिका निभा सकने में सफल नहीं हो पाते । इसके लिए संचित संस्कारों की आवश्यकता है । खिलौने बालू के नहीं चिकनी मिट्टी के बनते हैं हथौड़े की चोट जंग लगे लोहे नहीं, फौलादी इस्पात ही सह पाते हैं ।
युग सृजन के आरम्भिक चरण बाल-कक्ष जैसे हैं । उनमें हर स्तर के व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ कर सकने योग्य-शत सूत्री कार्यक्रम बनाये गये हैं । जन आन्दोलन इसी प्रकार का होता है । गाँधी जी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को सर्व सुलभ बनाने की दृष्टि से नमन सत्याग्रह विदेशी वस्त्र एवं शराब की दुकानों पर धरना, प्रतिबन्ध उल्लंघन जैसे कार्यक्रम बनाये थे । वे व्यापक भी हुए थे इतने पर भी उस आन्दोलन का सूत्र संचालन कर सकने की क्षमता नेहरु, पटेल, जैसे मुट्ठी भर लोगों में ही थी, स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय हस्तियाँ बागडोर न सँभालतीं तो जेल आन्दोलन को उतनी जल्दी और उतनी आर्श्चयजनक सफलता न मिल पाती जैसी कि उसमें मिल सकी । महामानव ही किसी देश, समाज, या युग की वास्तविक सम्पदा होती है । प्रखर व्यक्तित्वों का कुशल नेतृत्व ही उफनती नदी में नाव खेतो और तूफानों से टकराते हुए जहाज को किनारे लगाता है।
युग सृजन के अनेक महत्वपूर्ण कामों में सबसे प्रमुख है-उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ क्षमताओं को ढूँढ़ निकालना और उन्हें प्रशिक्षित परिपक्व करना ।यह कार्य धीमी गति से तो अभियान के प्रथम दिन से ही चल रहा है, पर अब उसमें अधिक तीव्रता लाने की आवश्यकता पड़ रही है । क्योंकि उत्तरदायित्व क्रमशः अधिक भारी होते चले जा रहे हैं । सामान्य भार वहन सामान्य क्षमता के सहारे भी होता रहता है । जब-जब अधिक उठाना अधिक ढोना एव अधिक दौड़ना हो तो वाहन तथा साधन उसी स्तर के जुटाने होंगे । आरंभिक चरण में जागृत आत्माओं से भी काम चलता रहा है, पर अब अधिक क्षमता सम्पन्नों की आवश्यकता पड़ रही है । अस्तु ढूँढ़ने का प्रयास अधिक सुविस्तृत किया जा रहा है । उपयुक्त प्रतिभाओं से सर्म्पक साधना उन्हें तत्पर तथा सक्षम बनाना एवं कार्य क्षेत्र में उतर सकने की सामर्थ्य से सुसम्पन्न करना ही इन दिनों मिशन की परोक्ष गतिविधियों को मूर्धन्य प्रयास है। प्रत्यक्ष कार्यक्रम तो पूर्ववत् हैं । व्यक्ति, परिवार और समाज के नव निर्माण की जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं । उनमें हेर-फेर कुछ नहीं करना है। मात्र उनका स्तर एवं विस्तार ही बढ़ना है । प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों में इतना अभिवर्धन होगा किन्तु परोक्ष ढूँढ़ खोज के लिए उन प्रयासों पर विशेष ध्यान दिया जायगा जो समर्थ प्रतिभाओं को ढूँढ़ने, और उछालने की सामयिक माँग पूरी कर सकें ।
एक जैसी शकल सूरत और समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के मध्य भी कई बार स्तर की दृष्टि से जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है यह उनकी उस आन्तरिक संरचना का होता है जो जन्म-जन्मान्तरों से संचित संस्कारों से बनती है । यह सम्पदा किस के पास है यह जाँचना, जन-जन की तलाशी लेने के समान है। तलाशी ऐसी भी नहीं जो चारों जमाखोरों के यहाँ पुलिस द्वारा छापा मार कर पकड़ने की तरह सरल हो । वस्तुएँ तो पकड़ी जा सकती हैं, पर अन्तस् की प्रवृत्तियों की जाँच पड़ताल और खोजबीन करना कठिन है । लोग भीतर कुछ होते हैं और बाहर कुछ बनते रहते हैं। दंभ बहुत और तथ्य कम वाले बहरुपियों, अभिनेताओं और बाजीगरों से जनसमाज भरा पड़ा है । इनकी गहराई में कैसे उतरा जाय? खारी जल राशि से भरे समुद्र में गहरी डुबकी मार कर मोतियों को किस तली तलहटी में ढूँढ़ा जाय । उन क्षेत्रों में पाये जाने वाले मगरमच्छों से बचने और जूझने की कुशलता के बिना कोई गोताखोर सफल नहीं हो सकता । इस प्रयास में भी ऐसी ही तैयारी करनी पड़ रही है ।
युग परिवर्तन सृष्टि के इतिहास में अभूत पूर्व अवसर है। पिछले दिनों दुनिया बिखरी थी । स्थानीय समस्याओं के सामयिक समाधान करना ही तत्कालीन महामानवों का छोटा सा उत्तरदायित्व रहता था। रावण, कंस, दुर्योधन आदि के अनाचार सीमित क्षेत्र में थोड़े से व्यक्तियों के द्वारा होते हैं । अधिक होने से उसके समाधान भी लंका युद्ध, महाभारत जैसे उपचारों से निकले और मुट्ठी भर प्रतिभाओं ने वे कार्य सम्पन्न कर दिये । वैसी स्थिति अब नहीं है दुनिया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई है । हवा का प्रभाव एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचता है । 400 करोड़ मनुष्य अब एक दूसरों को प्रकारान्तर से प्रभावित करते हैं ।
इन विषम परिस्थितियों में बहुमुखी समस्याओं की जड़े लोक मानस में अत्यन्त गहराई में घुसी हुई होने के कारण, युग परिवर्तन अतीव कठिन है । गुण, कर्म, स्वभाव लोक धारा को उलटना-समुद्र के खारी जल को हिमालय की सम्पदा बना देना कितना कठिन है उसे हर कोई नहीं समझ सकता । उसे भुक्तभोगी बादल ही जानते हैं कि उसमें कितना साहस करने कितना भार ढोने कितना उड़ना, और कितना त्याग करना पड़ता है । युग परिवर्तन के भावी प्रयासों को लगभग इसी स्तर का माना जाना चाहिए।
युग सन्धि की अत्यन्त महत्वपूर्ण मध्य वेला सन् 1980 से 2000 तक की है। इन बीस वर्षो में महान परिवर्तन होंगे और विकट समस्याओं को समाधान करना होगा । बुझते दीपक की लौ, प्रभाव से पूर्व की सघन तमिस्रा मरणासन्न की साँस, चींटी के उगते पंख, हारे जुआरी के दाव को देख कर, मरता सो क्या न करता की उक्ति को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखा जा सकता है । असुरता अपनी अन्तिम घड़ियों में जीवन-मरण की लड़ाई लड़ेगी और संकट, विक्रह अपेक्षाकृत अधिक बढ़ेंगे । इसी प्रकार देवत्व की प्रतिष्ठापना के लिए भी बीजारोपण के साथ प्रचंड उत्साह के साथ काम करने वाले किसान जैसी भूमिका की दर्शनीय होगी। दोनों पक्ष एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी परम साहसकिता का परिचय देंगे । एक दूसरे के साथ टकराने से भी पीछे न हटेंगे । साँड़ लड़ते हैं तो खेत खलिहानों को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। युग परिवर्तन प्रसव पीड़ा जैसे कष्ट कारक होते हैं उसमें डाक्टरों, नर्सो की पूर्णतया जागरुक रहना पड़ता है। प्रसूता की तो जान पर ही बीतती है । उसकी सुरक्षा सान्त्वना में अतिरिक्त इन लोगों को नव जात शिशुओं के लिए आवश्यक सुविधाएँ भी पहले से ही जुटानी होती है।
युग संधि में दुहरे उत्तरदायित्व जागृत आत्माओं को सँभालने पड़ते हैं । विनाशकारी परिस्थितियों से जूझना और विकास के सृजन प्रयोजनों को सोचना । किसान और माली को भी यही करना पड़ता है । खर पतवार उखाड़ना-बेतुकी डालियों को काटना- पशु पक्षियों से फसल को रखाना जैसी प्रतिरोध सुरक्षा की जागरुकता दिखाने पर ही उनके पल्ले कुछ पड़ेगा अन्यथा परिश्रम निरर्थक चले जाने की आशंका बनी रहेगी। उन्हें एक मोर्चा सृजन का भी सँभालना पड़ता है । बीज-बोना, खाद देना, सिंचाई का प्रबन्ध करना, रचनात्मक काम है । इसकी उपेक्षा की जाय तो उत्पादन की आशा समाप्त होकर ही रहेगी। इसे दो मोर्चो पर दुधारी तलवार से लड़ने के समतुल्य माना जा सकता है । युग संधि में जागृत आत्माओं को यही करना पड़ता है। समस्या 400 करोड़ मनुष्यों की है। वे एक स्थान पर नहीं समस्त भूमंडल पर बिखरे हुए बसे हैं । अनेक भाषा बोलते हैं । अनेक धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण करते हैं । शासन पद्धतियों और सामाजिक परम्पराओं में भिन्नता है। मनःस्थिति और परिस्थिति में भी भारी अन्तर है । इतना होते हुए भी उन सबसे सर्म्पक साधना है। युग चेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं सर्म्पकै प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है जिसके दबाव में लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए हिम्मत ही नहीं तत्पर भर हो सकें । यह कार्य कहने सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है । पर वस्तुतः उतना कठिन और जटिल है । ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती-घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का-उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझा उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए ।
आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को समाज की संरचना के लिए आन्दोलन परक कार्य ही करना पड़े । वह क्षेत्र छोटा होता है और उसमें थोड़े से व्यक्ति ही खप सकते हैं ।सृजन प्रोजन बहुत बड़ा है । उसके असंख्यों पक्ष है । उनमें से जो जिसे कर सके वह उसे सँभाले । कला, साहित्य, विज्ञान, उत्पादन, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैने अनेकों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें बिना अधिक जन-सर्म्पक साधे भी अभीष्ट प्रयोजनों में निरत रहा जा सकता है और आन्दोलनकारियों से भी अधिक महत्व का ऐसा कार्य किया जा सकता है जो नवयुग की आवश्यकता में अपने ढंग से पूरा करने में असाधारण योगदान कर सके । युद्ध जीतने में सभी को तलवार नहीं चलानी पड़ती । वे लोग भी द्वितीय पंक्ति के सैनिक ही हैं जो युद्ध सामग्री बनाते अथवा सैनिकों पर पड़ने वाले खर्च को अपने परिश्रम से जुटाते हैं। आन्दोलकारियों-प्रचारकों की तरह ही वे लोग भी उपयोगी हैं जो उनके लिए साधन सामग्री जुटाने अथवा कार्य क्षेत्र बनाने में तत्पर रहते हैं । ऐसे लोगों का घर रह कर काम करना भी परिव्राजको की ही तरह महत्वपूर्ण कार्य है । हर व्यक्ति की मानसिक संरचना एवं परिस्थिति परिव्राजकों की भूमिका निभाने की नहीं होती । होती भी हो तो उस कार्य के लिए सीमित संख्या में ही सुयोग्य व्यक्ति चाहिए। अधिक सृजन शिल्पी तो अपने-अपने ढंगों के उत्तरदायित्व सँभालते हुए अपने निर्वाह की व्यवस्था चलाते हुए समन्वित प्रक्रिया अपनायेंगे और लक्ष्य की प्राप्ति में अपने ढंग का ऐसा योगदान करेंगे जिसकी महत्ता को किसी प्रकार कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता । जन्म समय के आधार पर यह निर्धारण भी किया जाता हैं कि कौन प्रतिभा किस प्रयोजन में लगे, जिससे उसका साँसारिक निर्वाह भी चलता रहे । और युग सृजन में भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता रहे।
ऐसे जागरुकों को युग प्रयोजनों के सही रुप में कर सकने की क्षमता एवं कुशलता विकसित करने की आवश्यकता अनुभव की गई । इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यकता थी। बिना ट्रेनिंग पाये कोई महत्वपूर्ण कार्य किसी से भी नहीं बन पड़ता । रेल, मोटर आदि वाहन कल कारखाने के संयंत्र यहाँ तक कि टाइप राइटर जैसे छोटे उपकरणों को चलाने के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। अध्यापक, सैनिक, शिल्पी, कलाकार बिना प्रशिक्षण पाये शक्ति सामर्थ्य होते हुए भी अपना कार्य सफलता पूर्वक नहीं कर सकते । फिर युग सृजन जैसा काम ही हर कोई कैसे कर लेता ? युग शिक्षण के लिए आवश्यकता तंत्र खड़ा किया गया है। गायत्री तपोभूमि से युग साहित्य का सृजन हो रहा है और शान्ति कुँज में युगान्तरीय चेतना को क्रियात्मिक करने का समग्र शिक्षण विधिवत् चल रहा है। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से चल रहे हैं और उनका गति चक्र निरन्तर दु्रतगामी बन रहा है।
इतने पर भी एक आवश्यकता यथावत् बनी हुई है देव आत्माओं में पायी जाने वाली विशिष्टता का अवतरण विशिष्ट समय पर ऐसी ही विशिष्ट आत्माओं का अवतरण होता है। वे जन्म जात रुप से ऐसी धातु से बने होते हैं कि उनका उपयोग विशेष प्रयोजनों के लिए संभव हो सके । अणु शक्ति उत्पन्न करने के लिए यूरेनियम जैसे रासायनिक पदाथों की जरुरत पड़ती है। सोने की अपनी मौलिक विशेषता है । र्स्वणकार उसे आभूषणों में गढ़ तो सकता है पर कृत्रिम सोना अभी तक बनाया नहीं जा सका । यों नकली नग ही जेवरों में प्रयुक्त होते हैं, पर उनका निर्माण भी बहुत होता है फिर भी असली मणि-मणिक अभी भी विशेषता के कारण अपना मूल्य और महत्व यथा स्थान बनाये हुए हैं । महामानवों की ढलाई, गढ़ाई के लिए शान्ति कुँज की फैक्टरी अनवरत तत्परता के साथ लगी हुई है । उसके उत्पादन का स्तर भी बढ़ रहा है और परिमाण भी । इस प्रगति को सन्तोषजनक रहते हुए भी उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता । उस विशिष्टता की मात्रा अभी भी कम ही दृष्टिगोचर हो रही है जिसे देव स्तर की प्रतिभा कहा जाय । जो महामानवों की भूमिका निभा सकने के लिए अभीष्ट सुसंस्कारिता की पूँजी अपने साथ लेकर जन्मी हो ।
कृषि कार्य में किसान का पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है, उपयुक्त भूमि और सही बीज का भी उसकी सफलता में कम योगदान नहीं होता । शिल्पियों की कुशलता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हों उन्हें भी उपयुक्त उपकरण चाहिए । कच्चा माल सही न हो तो कारखाने में बढ़िया चीज कैसे बनायें ? बालू से कोई कुम्हार टिकाउ बर्तन नहीं बना सकता । चिकित्सकों के उपचार रोगी की जीवनी शक्ति के आधार पर सफल होते हैं । कच्चे लोहे की तलवार से मोर्चा जीतना बलिष्ठ योद्धा के लिए सम्भव नहीं होता । मौलिक विशिष्टता की अपनी आवश्यकता है। खरादा तो उसी को जा सकता है जिसमें अपनी कड़क हो । तेल तिली में से निकलता है, आग ईंधन के सहारे जलती है । तिली का प्रबन्ध न हो तो बालू से तेल निकालने में कोल्हू कैसे सफल हो ? पानी मथने के लिए कितना ही श्रम क्यों न किया जाय मक्खन निकालने में सफलता न मिलेगी । ईंधन के बिना आग की लपटों का दर्शन होने और अभीष्ट गर्मी उत्पन्न करने का प्रयोजन नहीं ही सध सकता ।
युग परिवर्तन की इस ऐतिहासिक बेला, में ऐसी देवआत्माओं की विशिष्ट आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिनमें मौलिक प्रतिभा विद्यमान है । सामान्य स्तर की श्रेष्ठता हर मनुष्य में मौजूद है। उसे सीमित समय में सीमित मात्रा में उभार सकना ही सम्भव हो सकता है । कम समय में, कम परिश्रम से जिन्हें महान उत्तरदायित्वों का वहन कर सकने के लिए उपयुक्त बनाया जा सके ऐसी प्रतिभाएँ सर्वत्र उपलब्धि नहीं हो सकती और न उनसे उतने बड़े पुरुषार्थ की आशा की जा सकती है जैसी कि इस विषम वेला में आवश्यकता पड़ रही है । इसके लिए विशेष रुप से खोज’बीन करने की आवश्यकता पड़ेगी ।
मोती पाये तो समुद्र में ही जाते हैं पर उन्हें निकालने के लिए पनडुब्बी को गहरी डुबकी लगाने की और सुविस्तृत क्षेत्र की खोज बीन करनी होती है। मोती न तो इकट्ठे मिलते और न तो किसी किनारे पर जमा रहते हैं । बहुमूल्य वस्तुएँ सदा से इसी प्रकार खोजी जाती रही हैं । प्रकृति के अन्तराल में बिजली, ईथर आदि तत्व अनादि काल से भरे पड़े थे, पर उनसे लाभान्वित हो सकना तभी सम्भव हुआ जब उन्हें खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने असाधारण श्रम किया । जंगलों में बहुमूल्य जड़ी बूटियाँ पुरातन काल में भी उगती थीं और अब भी उनकी संजीवनी क्षमता यथावत् मौजूद है। पर उन्हें हर कोई, हर जगह नहीं पा सकता चरक ने दुर्गम स्थानों की यात्रा की और उस परिभ्रमण में वनस्पतियों के गुण धर्म खोजे । इस शोध का परिणाम ही चिकित्सा विज्ञान के रुप में सामने आया और उसका लाभ समूची मानव जाति से उठाया । चरक यदि वह प्रयास न करते तो बूटियाँ अपने स्थानों पर बनी रहतीं, और रोगी अपनी जगह । उनका आपस में संबंध ही न बनता तो दोनों ही घाटे में रहते । न जड़ी बूटियाँ यश पातीं और मनुष्यों को रोग निवृत्त का अवसर मिलता ।
भूगर्भ में खनिज सम्पदा के अजस्र भंडार अनादि काल से भरे पड़े हैं ।पर उनका उत्खलन और दोहन जिस लगन के आधार पर सम्भव हो सका उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती रहेगी। धातुएँ गैंसे, तेल, जैसी अनेकों बहुमूल्य वस्तुएँ भूगर्म की गहरी खोज बीन करने से ही सम्भव हुई । पौराणिक गाथा के अनुसार समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकाले गये और उन से देवताओं तथा मनुष्यों ने सौभाग्यशाली बनने का अवसर पाया । यदि मंथन प्रयास न किया जाता तो समुद्र की सम्पदा उसके गहन अन्तराल में ही धँसी रहती। लाभ उठाना तो दूर उनका किसी को पता तक नहीं चलता ।
ज्ञान और विज्ञान की सुविस्तृत सम्पदा ही मनुष्य को समर्थ, सम्पन्न कुशल बना सकी है। यह उपलब्धियाँ बादलों से नहीं बरसतीं, वरन् अनवरत अध्यावसाय के द्वारा ही एक-एक मंजिल पार करते हुए इन्हें खोज निकालना सम्भव हुआ है।यदि शोध प्रयासों को मानवी प्रवृत्ति में स्थान न मिला हो तो आग जैसी क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ करतल गत न होतीं और आदिम मनुष्य की पीढ़ियाँ अभी भी अपने वानर वर्ग के अन्य साथियों के साथ गुजर कर रही होतीं । कोलम्बस ने अमेरिका खोज निकाला और संसार के विकास, विस्तार में एक नये अध्याय का समावेश हुआ । खोजियों ने अन्तरिक्ष खोजा है और उसमें से उतना पाया है जितना कि रत्नाकर कहे जाने वाले समुद्र से भी न मिल सका । कहते हैं कि खोजने वालों ने ही भगवान को ढूँढ़ निकाला अन्यथा वह क्षीर सागर में शेष नाग के ऊपर चादर ताने गहरी नींद में सो रहा था । मनुष्योत्तर प्राणियों के लिए वह अभी भी उसी तरह अविज्ञात स्थिति में पड़ा हुआ है । आत्मा का अस्तित्व मनुष्य ने ही खोजा है। अन्यथा अन्य जीवधारी अपनी सत्ता शरीर तक ही सीमाबद्ध किये रहते । धर्म और अध्यात्म मनुष्य की अपनी खोज है।
अपने समय में एक बहुत बड़ा काम युग मानवों को खोज निकालना है । बड़े काम के किए बड़ी हस्तियाँ ही चाहिए। उन्हें एक सीमा तक ही शिक्षा और परिस्थितियाँ विकसित कर सकती है । नैपोलियन और सिकन्दर किसी सैनिक संस्था द्वारा विनिर्मित नहीं किये जा सके। वशिष्ठ औरन विश्वामित्र किस आश्रम में किस साधन के सहारे विनिर्मित किये जा सके । इसका पता लग नहीं पा रहा है । अंगद और हनुमान, भीम और अर्जुन, चाणक्य और कुमार जीव, बुद्ध और महावीर, गाँधी और पटैल, शिवाजी और प्रताप किस प्रकार तैयार किये जाय उसका कोई उपाय अभी भी सूझा नहीं पड़ रहा है।ईसा जटाथुस्त-अरस्तू और सुकरात, लिंकन और वाशिंगटन-विवेकानन्द और गोविन्दसिंह, नानक और कबीर किस प्रकार तैयार किये जाँय, इसका कोई मार्ग मिल नहीं रहा है, शतरुपा, कौशल्या, सीता, सावित्री, मदालसा, शकुन्तला उपलब्ध करने के लिए क्या किया जा सकता है इसके लिए भारी माथा पच्ची के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। अरविन्द और रमण, रामकृष्ण परमहंस और विरजानन्द जैसी हस्तियाँ ही युग निर्माण जैसे महा-प्रयोजन को पूरा करने में अग्रिम भूमिका निभा सकती है ।काम बड़ा है तो उसके अनुरुप व्यक्तित्व भी चाहिए । यह आवश्यकता जब भी जितनी मात्रा में भी पूरी हुई तब उसी अनुपात से व्यापक समस्याओं के समाधान सम्भव हुए हैं। जन साधारण के लिए तो कर्तव्य पालन ही सम्भव होता है।वे अपनी निज समस्याओं को सुलझाने में ही अधिकाँश क्षमता खो बैठते हैं जो बचती है उससे लोक मंगल का प्रयोजन एक सीमा तक ही पूरा करपाते हैं । यों बूँद-बूँद से भी घड़ा भरता है पर उन बूँदों का संचय करने और उस संचय का सदुपयोग करने की प्रतिभा भी तो किसी में चाहिए ।
नव निर्माण में असंख्य दिशा धाराएँ हैं-विकृतियों से जूझने के लिए असंख्य मोर्चे हैं, पाटने के लिए अनेक खाई, खन्दक और बनने के लिए अनेकों पुत्रल बाँध सामने है । इनके लिए जितनी साधन सामग्री चाहिए उससे अनेक गुनी आवश्यकता उन हस्तियों की है जो मौलिक विशेषताओं से संचित सपदाओं की दृष्टि से सम्पन्न एवं समर्थ कही जा सकें ।उथले लोग गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते हैं ।
युग सृजन के लिए सम्पदा, प्रतिभा, शिक्षा, श्रमशीलता जैसी विभूतियाँ प्रचुर परिमाण में चाहिए ही । पर उससे भी अधिक आवश्यकता उन देवात्माओं की है जिनमें आन्तरिक वर्चस् विपुल परिमाणों से भरा पड़ा हैं वर्चस् ही आत्मबल हैं । ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, व्यक्ति वही होते हैं जिनमें इस आन्तरिक वैभव की दैवी अनुदान की-समुचित मात्रा विद्यमान हो ।
इस खोज को इन दिनों सबसे अधिक महत्व दिया जाना है । कठिन उत्तरदायित्व सामने हैं उन्हें निभाने योग्य प्रतिभाओं के आगे आने और लाने की आवश्यकता ऐसी है जिसे एक क्षण के लिए भी आगे नहीं टाला जा सकता ।
कुछेक घुने बीजों को छोड़कर प्रायः सबमें उगने की सामर्थ्य होती है । उसर जमीनें भी होती तो हैं, पर आमतौर से हर जमीन में ऐसी क्षमता होती है कि उसे थोड़ा प्रयत्न करके उपजाऊ बनाया जा सके । बादलों का पानी टीलों पर रुकता नहीं और वे भारी वर्षा होने के उपरान्त भी सजल रहित ही बने रहते हैं । इतने पर भी यदि उन्हें थोड़ा खोदा-कुरेदा जा सके तो पर्वत शिखरों पर भी तालाब बन सकते हैं ।नदी, सरोवरों के तट पर रहने वालों की तरह उन दुर्गम स्थानों पर भी उद्यान लग सकते हैं । यह प्रयत्न परायणता की महिमा का है। किसान अपने घर से फसल नहीं लाता और न माली की जेब से फल सम्पदा भरी रहती है । प्राकृतिक साधनों का उपयोग भर वे लोग करते हैं और उसी बुद्धिमत्ता पूर्ण नियोजन का लाभ उठाते हैं । बुद्धि हर किसी में मौजूद है । मूढ़ और विक्षिप्त थोड़े से ही होते हैं । हर मस्तिष्क में प्रतिभा रहती है और उसे शिक्षण एवं वातावरण के सहारे विज्ञ एवं प्रबुद्ध बनाया जा सकता है।अध्यापक और विद्यालय इसी प्रयोजन की पूर्ति करते रहते हैं ।
सचित संस्कारों वाली प्रतिभाएँ उन बहुमूल्य हीरों की तरह हैं जिनमें मौलिक विशिष्टता विद्यमान है, उन पर किया गया थोड़ा-सा तराशने, खरादने का प्रयत्न
अधिक लाभ और श्रेय दे सकता है । फिर भी उन शिल्पियों का महत्व बना ही रहेगा जो घटिया पत्थरों को भी इस प्रकार काटते घिसते हैं कि उन्हें हीरों का स्थानापन्न बनने का सौभागय मिल सके । सोने का अपना महत्व है उसे लड़ी के रुप में भी उचित मूल्य पर बेचा जा सकता है। इतने पर भी र्स्वणकारों का कला को सराहा ही जाता रहेगा । वे आभूषण बनाकर सोने का आकर्षण का केन्द्र बना देते हैं । यहाँ तक कि घटिया धातु या मिलावट के सहारे ऐसा बना देते हैं कि उससे भी साज सज्जा का काम चल सके । प्राचीन काल में उपाध्याक्षों के हाथ में यही कला भी वे मनुष्यों को गढ़ते थे, उन्हें सामान्य से असामान्य बनाते थे । संयोगवश कोई सुसंस्कारी आत्मा हाथ लग सके तब तो उन शिल्पियों को, उनके कौशल को, ढलाई के कारखने गुरुकुलों को अनौखा ही श्रेय मिल जाता था । संदीपन ऋषि के आश्रम में कृष्ण और विश्वामित्र आरण्यक में राम की ढलाई हुई थी । यही सब प्रयोक्ता धन्य माने जाते हैं ।
युग परिवर्तन की महती आवश्यकता पूरी करने के लिए इन दिनों देवत्व में सम्पन्न आत्माओं को ढूँढ़ निकालना एक बड़ काम है । साथ ही उन्हें-उभारना प्रशिक्षित परिपक्व करना भी उतने ही महत्व की प्रक्रिया है । तेल के कुँए ढूँढ़ निकालना एक बड़ी सफलता है, पर उस कीचड़ जैसे खनिज की सफाई करने वाला तन्त्र खड़ा न हो सका तो उस ढूढ़ने भर से भी अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध न होगा । कच्ची धातुओं की खदान-खोजने वालों की प्रशंसा होती है किन्तु उन्हें पकाने, ढालने का कारखाना न लग सके तो उस भारी मिट्टी से कोई प्रयोजन सिद्ध न होगा ।
जन-समूह में भीड़-भाड़ का ही बाहुल्य रहता है। उनमें नर-पशुओं की संख्या ही प्रधान होती है । आम आदमी पेट और प्रजनन के लिए ही मरता खपता है । लोभ लिप्सा उसे उत्तेजित करके अधिक संग्रही विलासी बनने की ललक पैदा करती है, फलतः उस आतुरता में अपराधी, अहकारियों जैसी उच्छृंख्लता ही गले बँधती है । इस विपन्नता के फलस्वरुप, उद्वेग, तिरस्कार, विग्रह और संकट ही सामने आते हैं लोग इसी कीचड़ में सड़ते और इसी भाड़ में भुनते रहते हैं । नरक में से जन्मते-नरक में पलते और अन्ततः नरक में ही चले जाते हैं मनुष्य शरीर उन्हें मिलता है, उसका आनन्द, गौरव और प्रतिफल तो उनके सामने स्वप्न में भी नहीं आता है । जन-समूह की यही सुदर्गति है। वे अपनी समस्याओं के समाधान में हर किसी के सामने पल्ला पसारते फिरते हैं इन अभागों से देश धर्म की समाज संस्कृति-युग परिवर्तन में सहकार देने की चर्चा करना और आशा रखना र्व्यथ है । वे चैन से जी लें और साथ वालों को शान्ति से दिन काट लेने दें, इतना भी उनसे बन पड़े तो बहुत है ।
प्रसंग असामान्यों के ढूँढ़ने, उभारने का चल रहा था । उनका अस्तित्व रहता तो हर युग और हर क्षेत्र में है, पर खोजने और पकाने की प्रक्रिया शिथिल हो जाने से प्रतिभाएँ जहाँ-तहाँ छिपी और उपेक्षित पड़ी रहती हैं । अभी भी भूमि में इतना वैभव दबा पड़ा है जिसे उपयोग में आने वाली सम्पदा की तुलना में असंख्य गुना कहा जा सके । सराहना खोज की ही । उसी के बलबूते प्रस्तुत उपलब्धियाँ करतल गत हो सकी हैं और भविष्य में जो कुछ मिलेगा उसमें खोजी और पकाने वाले ही श्रेयाधिकारी बनेंगे । युग परिवर्तन की परिस्थितियाँ मौजूद हैं । लोक चेतना के अन्तराल में असाधारण विक्षोभ है वह प्रस्तुत परिस्थितियों को बदलने के लिए घुटन से छुटकारा पाने के लिए आतुर है । सृष्टा को भी परिवर्तन ही अभीष्ट है । विनाश को निरस्त और विकास को प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया को अध्यात्म भाषा में अवतार और लौकिक भाषा में प्रचंड परिवर्तन कहते हैं । अदृश्य में इसी की परिपूर्ण तैयारी है । भूमिका दृश्य को निभानी है । नसों में समर्थता और मस्तिष्क में प्रेरणा रहते हुए भी काम तो हाथ ही करते हैं । उठना इन्हीं को पड़ता है । चलते तो पैर ही हैं । आकाँक्षा भले ही अन्तःकरण की हो ।
इन हाथों को ही इस सन्धि बेला में समर्थ और गतिशील बनाया जाता हे । आलस्य उन्हीं का छुडाना हैं । जागृत आत्माएँ ही युग सृजन का महान प्रयोजन पूरा कर सकेंगी । युग सृजन की भूमिका निभा सकने वाले शिल्पियों और साहसियों के कन्धों पर ही यह बोझ जाने वाला है । अपने को अपने अश को-समय को, इतिहास को धन्य बनाने का श्रेय इसी स्तर के जागरुकों को मिलता है। महाकाल के शंखनाद ने इन्हीं योद्धाओं को आमन्त्रित किया है। डमरु बजते ही शम्भुगुण साथ चल पड़ते थे । कृष्ण की बंशी को सुनकर गोपियों के पग थिरकने से रुकते ही नहीं थे । युग निमन्त्रण ने जिनके अन्तराल को आन्दोलित क्या है वे तथाकथित समस्याओं, कठिनाइयों, आकर्षणों और दबावों में से एक की भी परवा किये बिना तरकस से निकलकर लक्ष्य पर टूट पड़ने वाले तीर की तरह गतिशील हो रहे हैं नियति को सुव्यवस्थित करना ही इन दिनों का महत्वपूर्ण काम है । राशन, आयुध, सैनिक, मोर्चा सब कुछ सही होने पर भी युद्ध संचालन का सुव्यवस्थित तन्त्र तो होना ही चाहिए ।
असामान्यों की खोज और उनकी परिष्कृति के लिए आधार तैयार है, अब उसे गतिशील ही करना शेष है । प्रशिक्षण के लिए शान्ति कुन्ज ब्रह्मवर्चस् गायत्री नगर का तन्त्र आवश्यक साधन जुटाने और व्यवस्था बनाने के आरम्भिक चरण पूरे कर चुका है । विश्व विद्यालय स्तर की कितनी ही सत्र योजनाएँ चल पड़ी हैं । इन्हें संदीपन आश्रम, विश्वामित्र आरण्यक की उपमा दी जा सकती है । बौद्ध और जैन काल के चैत्य, विहार और संघारामों की कार्य पद्धति उसमें अपनाई गई है । समय कम और कार्य अधिक होने से प्रक्रिया को सरल एवं संक्षिप्त किया गया है फिर भी प्रयोजन प्रायः वही पूरा होना है जिसमें समर्थ महामानवों की नई पीढ़ी ढाली और कार्यक्षेत्र में उतारी जा सके । इस शिक्षण में भीड़ भरने से काम नहीं चलेगा । उच्चस्तरीय विद्यालयों में चुने हुए छात्र ही प्रवेश पाते हैं प्रवेश के अवसर पर कड़ी जाँच-पड़ताल होती है । छात्र-वृत्ति देने समय तो अधिकारी वर्ग को छात्रों में से अधिक प्रतिभा सम्पन्नों को चुनाव करना पड़ता है। ब्रह्मवर्चस प्रशिक्षण के लिए पूर्व संचित संस्कारों की सम्पदा वाले ढूँढ़े जाते हैं । साथ ही छात्र-वृत्ति जैसी शक्तिपात प्रक्रिया के अनुदान देने के लिए उपयुक्त पात्रता की जाँच पड़ताल का और भी कड़ा उपक्रम चलता है।
इस सर्न्दभ में कई योजनाएँ तैयार की गई हैं और कई कदम उठाये गये हैं । प्रचार की दृष्टि से जन-जन को यह समझाया जाता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता का समर्थन करने वाली प्रचलित लोक मान्यता सर्वथा अदूरदर्शिता पूर्ण है । लोभ और मोह तक चिन्तन और प्रयास को सीमित रखने वाले नफे में रहते हैं यह सोचना अवास्तविक है। उस नीति को अपनाने वाले असन्तोष, असम्मान और दैवी, आक्रोश सहते और दुर्बुद्धिजन्य अनेकानेक दुर्व्यसनों, अनाचरणों से ग्रसित होक पग-पग पर संकट असहते हैं । इसके विपरीत उदार चेता परमर्थ का आनन्द तो लेते ही हैं, आत्मबल उच्च चरित्र एवं जन सहयोग के सहारे सुख साधनों से भी वंचित नहीं रहते । महामानवों के जीवन इतिहास का प्रत्येक पृष्ठ बताता है कि उन्हें स्व उपार्जित समाज प्रदत्त और दैवी अनुग्रह के रुप में इतनी अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त हुई जितनी किसी संकीर्ण स्वार्थपरायण को कभी भी मिल नहीं सकीं । यह उनकी इच्छा का विषय था कि उनने उन्हें खाया नहीं दूसरे को खिला दिया । जो खाने और खिलाने के बदले मिलने वाले आनन्दों के स्तर को समझते हैं उनके लिए इस वितरण में भी बुद्धिमता ही बुद्धिमता प्रतीत होती है ।
आज हर व्यक्ति के सोचने का तरीका विचित्र है । संकीण स्वार्थ परायणता ही लोगों को रुचि कर लगती है और उसी को अपनाये रहने के लिए सृजन सम्बन्धी भी दबाव डालते हैं । क्षणिक लाभों के लिए महान उपलब्धियों को तिरस्कृत करना यही है आज की अदूरदर्शी लोक नीति । इसका विश्लेषण किया जा सके तो यह कहना होगा कि बीज को बेचकर सिनेमा देख लेने की तरह यह अबुद्धिमत्ता पूर्ण हो, इस आचरण से तत्काल तो लाभ मिला, पर खेत बिना बोया रह गया । परीक्षा में न बैठ सकने पर जो एक वर्ष मारा गया वह उस दिन के खेल मनोरंजन की तुलना में अधिक घाटे का रहा । अदूरदर्शिता आज की सबसे बड़ी बीमारी है । इससे लोक मानस को छुटकारा दिलाने के लिए महानता अपनाने के लिए मिलने वाली भौतिक और आत्मिक उपलब्धियों का सुविस्तृत इतिहास प्रस्तुत करना होगा । आदर्शवादी उदाहरणों के अभाव में आज उत्कृष्टता अपनाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती । अनुकरण के लिए महामानवों की बिरादरी का आज तो दर्शन नहीं होता, किन्तु भूतकाल में उसी का बाहुल्य रहा है । साक्षी के लिए यह भी कम महत्वपूर्ण, कम प्रामाणिक एवं कम उत्साहवर्धक नहीं है । जन-जन को उस अतीत की झाँकी कराई जा सकती है । जिसमें मनुष्य ने देवत्व की नीति अपनाकर अपने को गौरवान्वित बनाया और दूसरों के लिऐ स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न किया । सतयुग, देवत्व ओर दूरदर्शी उदारता एक ही तथ्य की त्रिविधि प्रक्रिया है ।
आज की लोक नीति में लिप्सा ही सब कुछ है तो उसकी परिणिति भी सामने है । मछली, कबूतर और हिरन आये दिन जाल में फँसते और प्राण गँवाते हैं । अदूरदर्शी आतुरता ने ही मनुष्य के सामने भी उसी प्रकार के संकट खड़े किये हैं उससे छुटकारा पाये बिना ललक लिप्सा को शालीनता में बदले बिना न किसी को भौतिक प्रगति का लाभ मिलेगा और न आत्मिक शान्ति का दर्शन होगा । इस पतथ्य से जन-जन को अवगत कराने के लिए प्रचण्ड प्रचार अभियान चलाया जाय । लेखनी वाणी और प्रचार की समूची प्रक्रिया को उसी केन्द्र पर नियोजित किया जाना चाहिए कि मनुष्य अपना प्रत्यक्ष लाभ आदर्शवादी दूरदर्शिता अपनाने में समझने लगे । इस प्रतिपादन के समर्थन में आज भी अगणित उदाहरण ढूँढ़े और सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत किये जा सकते हैं ।
यह प्रचार अभियान जितना ही तेज होगा उतना ही सर्वसाधारण को यह समझने का अवसर मिलेगा कि सच्चे, चिरस्थायी और सर्वागीण स्वार्थ की पूर्ति वस्तुतः आदर्शवादी रीति-नीति अपनाने से ही है । लाभ में हानि-हानि में लाभ समझने की तमिस्रा दूर करने के लिए ज्ञान यज्ञ की लाल मशाल का आलोक क्रमशः तीव्रतर किया जा रहा है । आशा की जा सकती है कि निकट भविष्य में विचारशील व्यक्ति जीवन नीति-निर्धारण करने में वातावरण के दबाव को स्वीकार करके साहसपूर्वक स्वयं निर्णय कर सकने में समर्थ हों । इसी प्रकार सच्चे शुभ-चिन्तन भी अपने प्रियजनों को क्षुद्रता से उबरने के प्रयासों में इस प्रकार अड़चन उत्पन्न न करेंगे जैसे कि पिछले दिनों करते रहे हैं और इन दिनों करते हैं । गुरुकुलों के ऋषि आश्रमों में अपने बालकों को भेजते समय अभिभावकों को संकोच नहीं होता था । आज तो विलासिता और अहंता उभारना ही बच्चों के प्रति अभिभावकों का अनुग्रह माना जाता है । यह परिवर्तन जैसे-जैसे आवेगा । कीचड़ में से कमल उगेंगे और महामानवों की-युग पुरुषों की आवश्यकता इसी समाज में से पूरी होती चलेगी । सदाशयता को प्रोत्साहन देने वाली प्रचार प्रक्रिया को इन दिनों असाधारण रुप से तीव्र करने की आवश्यकता है । युग सृजेताओं की आवश्कता पूरी करने के लिए यह प्राथमिक एवं आवश्यक उपाय उपचार है ।
महामानवों की भूमिका निभाने की क्षमता जिनमें है उनकी रुचि अपने अन्तःकरण के अनुरुप साधन सामने आते ही मचलने लगती है । इस कसौटी पर किन्हीं का भी अन्तराल जाँचा जा सकता है । शराबी, जुआरी, व्यभिचारी अपने अनुरुप परिस्थितियाँ देखते ही मचलने लगते और रोकथाम होते हुए भी सर्म्पक साधने और सहयोग साधने का ताना-बाना बुनने लगते हैं । बाजीगर का खेल होते ही मनचले बच्चे पढ़ाई छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और तमाशें का मना लेते हैं । सन्त, सज्जनों की सुसस्कारिता भी अपने अनुरुप अवसर सामने आने पर न केवल वहाँ किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं वरन् रुचि लेने और सहयोग देने का भी प्रयास बिना माँगे ही करने लगते हैं । अन्तः प्रेरणा उन्हें उसके लिए विवश जो करती है। पकड़ का यही सबसे सरल तरीका है । सीता की खोज में राम सघन वन में विचरते हैं और लक्ष्मण से कहते हैं-इस क्षेत्र में सीता होंगी तो नदी तट पर संध्या करने अवश्य आयेंगी । चलकर उसे वहीं खोजना चाहिए । इस प्रसंग से प्रकट होता है क मूल प्रकृति मनुष्य को किस प्रकार विवश करती है और कठिन परिस्थितियों से भी वह उसकी पूर्ति का प्रयास करता है। युग साहित्य के प्रति अभिरुचि, श्रेष्ठ वातावरण में प्रसन्नता-सत्प्रवृतियों में सहयोग यह तीन प्रयोजनों के इर्द-गिर्द उच्च आत्माएँ इन दिनाँ जमा हुई पाई जा सकती हैं । वन्य जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ किसी जलाशय के निकट बैठ जाना चाहिए । प्यास बुझाने के लिए आने पर उन्हें आँखें भर कर देखा जा सकता है । युग निर्माण योजना के विविध प्रयास ऐसे हैं जिनसे सामान्य स्तर के लोगों को न रुचि हो सकती है न उत्साह । सहयोग की बात तो उनके बस से बाहर ही होती है किन्तु जिनमें देवत्व के अंश अधिक परिमाण में विद्यमान है वे अपनी मर्जी से नये शुभारम्भ न कर पाने पर भी जहाँ भी अपने अनुरुप वातावरण देखते हैं, उसमें सम्मिलित हुए बिना, योगदान दिये बिना रह ही नहीं सकते । युग निर्माण मिशन में इसी प्रक्रिया से अधिक जागृत आत्माओं की एकत्रीकरण हुआ है अब उनकी समर्थता और संख्या अधिक चाहिए तो उन खोज प्रयासों को अधिक उच्चस्तरीय, आकर्षण एवं परिमाण में सुविस्तृत किया जायगा ।
इन दिनों धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण-गायत्री महापुरुश्चरण, धर्मानुष्ठान, शक्तिपीठ संस्थापन, विचार क्रान्ति अभियान, महिला जागरण जैसे अनेकों सृजनात्मक कार्यक्रम क्रियान्वित किये गये हैं । उनकी जानकारी तो सभी को मिल जाती है, पर उनमें सम्मिलित होने, सहयोग देने की प्रवृत्ति किन्हीं विरलों के ही मन में उठती है । वातावरण से प्रभावित लोग उस दिशा में कुछ करना तो दूर गम्भीरतापूर्वक सोचने तक के लिए तत्पर नहीं हो पाते । इन परिस्थितियों में भी जिनमें आकर्षण उत्पन्न हो और सहयोग के लिए अन्तःकरण मचलें तो समझना चाहिए कि देवत्व की चेतना यहाँ जीवन्त है ।
चिनकारी विद्यमान है थोड़े ईंधन की व्यवस्था बन सके तो लपट उठने और ज्वाला जलने में देर न लगेगी । इन आयोजनों के संयोजक यह ध्यान रखें कि यह धर्म रुचि किन में कितनी मात्रा में प्रकट हो रही है । कौन इतनी श्रद्धा एवं तत्परता से इन प्रयोजनों में योगदान दे रहा है । इस प्रकार का उत्साह एवं साहस इस बात का प्रमाण है कि वहाँ दिव्य तत्वों की उपस्थिति विद्यमान है । ऐसे लोगों को युग साहित्य नियमित रुप से पढ़ने के लिए मिलता रहे, उन्हें सत्संग, परामर्श एवं प्रोत्साहन का खाद पानी मिलता रहे तो अंकुरों को पादप्, पादपों को विशाल वृक्ष बन सकने की सम्भावना सहज ही साकार हो सकती है ।
परिवार निर्माण अभियान को अग्रगामी बनाना है । पिछले दिनों यह प्रक्रिया महिला जागृति के नाम से चलती थी, अब उसका क्षेत्र अधिक व्यापक बनाया गया है और उसे परिवार निर्माण की सुविस्तृत योजना के अर्न्तगत विकसित किया गया है । पंचशीलों का परिपालन-धार्मिक वातावरण का प्रचलन, पर्व संस्कारों के माध्यम से नव जागरण जैसी कार्य पद्धति इसमें सम्मिलित की गई है । इस प्रयास से घर परिवारों का सूक्ष्म वातावरण ऐसा बनेगा जिसमें देवत्व के अंशों को उभारने का अवसर मिल सके । वर्षा ऋतु में सूखी घास हरी हो जाती है और उगाई गई वनस्पति तेजी से बढ़ती है । पतझड़ और ग्रीष्म में भले, चंगे पौधें भी मरते झुलसते देखे गये हैं । घरों में यदि धार्मिक वातावरण रहे तो सुसंस्कारिता के बीजाकुँर जहाँ भी विद्यमान होंगे वे स्वयंमेव प्रकट एवं परिपुष्ट होते चलेंगे ।
युग सन्धि में देवात्माएँ बड़ी संख्या में अवतार का साथ देने के लिए जन्म लेती हैं पाण्डव देव पुत्र थे । हनुमान अंगद भी देवता थे । इन आत्माओं को अवतरित होने के लिए उपयुक्त माध्यम चाहिए । सदाश्यता सम्पन्न माता ’िपता के रज बीज का आश्रय वे लेते हैं । दुष्ट-दुरात्माओं की उन्हें गंध ही नहीं भाती तो उनसे सम्बन्ध कैसे साधें ? उनके शरीर से प्रवेश कैसे करें ? स्वायम्भु, मनु और शतस्या रानी ने तप करके अपनी काया ऐसी बनाई थी कि उसमें देवात्माओं को गर्भ निवास करते हुए कष्ट न हो । मदालसा, सीता, शकुन्तला जैसी महान महिलाएँ ही अपनी कोख से दिव्यात्माओं को जन्म दे सकने में समर्थ हुई । इन दिनों यह प्रयास नये ढंग से किये जा रहे हैं कि दाम्पत्ति जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न की जाय । उच्चस्तरीय आत्माओं के जोड़े मिलें । आदर्श विवाह के रुप में उनका शुभारम्भ हो । आजकल दैत्य विवाहों का चलन है । आत्माओं की गरिमा कोई नापता नहीं, रुप के ऊपर सब पागल है । शादियों में दहेज एवं अपव्यय की धूम रहने से गरीबी और बेईमानी पनपती है । जमा पूँजी की होली जलाकर परिवार का भविष्य अन्धकारमय बनाने की प्रक्रिया परोक्ष रुप से अभिशाप ही बरसाती रहती है । पीड़ितों के घाव चिरकाल तक नहीं भरते । फलतः विवाह का स्वरुप और प्रतिफल दानवी बन कर रह जाता है । पति-पत्नी के बीच भी इस निष्ठुरता से उत्पन्न हुई खाई किसी न किसी रुप में आजीवन बनी रहती है । इन दैत्य विवाहों को एक प्रकार से कन्या का-उस परिवार के धन का अपहरण ही कहना चाहिए । जहाँ भी यह प्रचलन होगा वहाँ सुसंतति की आशा नहीं ही की जानी चाहिए । देव विवाहों से ही देवात्माओं के सुसन्तति रुप में जन्म लेने की आशा बँधती है । इसलिए इन दिनों उस प्रचलन पर भी जोर दिया जा रहा है। प्रगतिशील जातिय सम्मेलनों के पीछे दिव्य आत्माओं के अवतरण की भूमिका बनाना ही रहस्यमय प्रयोजन है । धन की बचत और कुरीति उन्मूलन तो उसका सामाजिक पथ है ।
दिव्य आत्माएँ यदि किसी प्रकार किसी अनुपयुक्त वातावरण में जन्म ले भी लें तो वहाँ घुटन अनुभव करती हैं और वापिस लौट जाती हैं । कितने ही होनहार बालक ऐसी परिस्थितियों में बड़े होने से पहले ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं । बहुमूल्य पौधे और प्राणी जब-तब अपने लिए उपयुक्त जलवायु की माँग करते हैं तो दिव्य आत्माओं को सुसंस्कृत परिवार में रहने और पलने की बात में भी कोई औचित्य है। परिवार निर्माण अभियान की प्रक्रिया से व्यक्ति और समाज में नव-निर्माण का प्रत्यक्ष उद्देश्य तो सन्नहित है ही उसके पीछे रहस्यमय प्रयोजन ऐसा वातावरण बनाना भी है जिसमें दिव्य आत्माओं को जन्म लेने और ठहरने के लिए अनुकूलता मिल सके ।
शान्ति कुन्ज गायत्री नगर में पाँच-पाँच दिन के परिवार सत्र लगने की योजना बनी है उनमें पर्यटन तीर्थाटन की भाव तुष्टि भी जोड़ दी गई है । इन सत्रों में बालों नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराने की व्यवस्था इसलिए रखी गई है कि यदि देवत्व की कहीं कुछ विद्यमानता हो तो उसे अभीष्ट परिपोषण मिल सके । साधकों को शक्ति पात बड़ों को अनुदान, आशीर्वाद के माध्यम से कई बार महापुरुषों को अनुग्रह मिलता है। बालकों को वह लाभ समर्थ हाथों से उपरोक्त संस्कार कराने से भी उपलब्ध हो सकते हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य का आधार बन सकता है।
शक्तिपीठों के उद्घाटन में इस वर्ष गुरुदेव का जाना व्यावहारिक दृष्टि से अति कठिन है। 240 शक्ति पीठों और 1000 प्रज्ञा पीठों उद्घाटन की प्रक्रिया में कुछ महीने ही लगाने हैं तो तूफानी दौरे करने से ही बात बनेगी । ब्रह्मवर्चस शान्ति कुन्ज में चल रही युगान्तरकारी प्रवृत्तियों में से दौरे के लिए समय निकालना अति कठिन है। फिर भी प्रवास में निकलने की जो प्रेरणा हिमालय से आई है उसके पीछे रहस्यमय उद्देश्य यह है कि उच्च आत्माओं को बेधक दृष्टि से देखा जाय और उनके अनुरुप काम उन्हें सौंपने का उपक्रम किया जाय। उद्घाटन के समय होने वाले समारोह और सर्म्पक से यह कार्य सरलतापूर्वक हो सकेगा। इस विशेष उद्देश्य से हिमालय की मार्गदर्शक सत्ता ने उन्हें प्रवास में निकलने का निर्देश दिया है । यों धीमी गति से यह कार्य ब्रह्मवर्चस् में चलते रहने वाले सत्र शिविरों से भी किसी कदर पूरा होता रहता है।
यह भी आधार ऐसे ही हैं जिनसे युग सृजन के लिए उपयुक्त आत्माओं को खोजा और विकसित किया जा सकता है । युग सृजन का काम बड़ा है उसके लिए समर्थ व्यक्तित्व चाहिए । उनकी खोज हो रही है। साथ ही उपयुक्त प्रशिक्षण की-समर्थ अनुदान देने की-पृष्ठभूमि भी बन रही है । युग निर्माण योजना के विविध क्रिया कलापों का प्रत्यक्ष प्रभाव और परिणाम की जानकारी तो सभी को है, इस परोक्ष प्रक्रिया से भी विज्ञ परिजनों को अवगत होना चाहिए । साथ ही उसे सफल बनाने में तत्पर भी ।
नव सृजन का उत्तरदायित्व युग निर्माण परिवार के कन्धों पर प्रधान रुप से आया है अतएव यह भी निश्चित है कि देवात्माओं का बाहुल्य ही इसी परिकर में होगा । परिजनों में से आत्मिक स्तर पर कौन-कौन श्रेणी का है । इसकी जानकारी उनके जन्म समय को जानने से भी मिल सकती है । जन्म कुण्डली यदि सही बनी है तो उसके आधार पर मनुष्य के सम्बन्ध में रहस्यमय जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं । अतएव यह सोचा गया है कि वर्तमान परिजनों की जन्म कुण्डलियों पर एक बार दृष्टि डाल ली जाय और इस आधार जिसमें कुछ विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है उन्हें अधिक अनुदान देने, दिलाने का कुछ ऐसा उपक्रम किया जाय जिससे वे अपनी विशिष्टता को सार्थक ना सकें ।
खोज का एक नया आधार और भी प्रयुक्त किया जा रहा है, यह अत्यन्त सूक्ष्म है । जन्म समय मनुष्य की सूक्ष्म स्थिति तलाश करने का एक रहस्यमय मार्ग है । प्राचीन काल में यह विद्या अपने चरम उर्त्कष पर थी । उन दिनों व्यक्ति के संचित संस्कारों का इस आधार पर पता लगा लिया जाता था । अतएव यह जाने से कठिनाई नहीं पड़ती थी कि उसी सहज रुचि क्या है और वह किन प्रयोजनों में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है ? भविष्य कथित एक बात है और भविष्य निर्धारण दूसरी । चिन्तन और पुरुषार्थ बदलना मनुष्य के अपने हाथ में, उन्हें बदलने पर किसी का भी भविष्य बदल सकता है। इसलिए उसमें स्थिरता नहीं होती । अस्तु सामान्य मनुष्यों के भविष्य कथन प्रायः गलत निकलते हैं । विशिष्ट व्यक्तियों की बात दूसरी है । ‘कम्प्यूटर’ भविष्य कथन करते हैं और वे सही निकलते हैं । आत्म शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ऐसे दिव्यदर्शी भी हो सकते हैं । जो किसी स्तर के वातावरण, रुझान, प्रयास एवं परिस्थिति एवं संभावना का नपा तुला निर्धारण करके यह बता सके कि कौन व्यक्ति कब क्या किन परिस्थितियों में होगा ? किन्तु यह असाधारण बात है । जिसे असाधारण व्यक्ति किन्हीं असाधारण प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करते हैं । आमतौर से भविष्य कथन न करना ही श्रेयस्कर माना गया है । किन्तु भविष्य निर्धारण के सम्बन्ध में यह बात नहीं है । हर व्यक्ति के भीतर कुछ मौलिक तत्व होते हैं उनका उपयोग अपने स्तर के अनुरुप् ही ठीक पड़ता है। लौहे के औजार और सोने से आभूषण बनाये जाँय तो भी बुद्धिमत्ता है । कपड़ा पहनने के और कागज लिखने के लिए ठीक है । यों उलट-पुलट करके कपड़े पर लिखा जा सकता है और कागज पहना जा सकता है, पर उसमें समय, श्रम और साधनों का अपव्यय ही होगा और परिणाम भी निराशाजनक ही निकलेगा । वस्तु की सँरचना देखकर उसका उपयोग करना जिस प्रकार बुद्धि संगत है, उसी प्रकार मनुष्य की आन्तरिक संरचना जानी जा सके, संचित संस्कारों का पता चल सक तो उसे ऐसी दिशा दी जा सकती है जिसमें उसे सरलातपूर्वक अधिक महत्वपूर्ण श्रेय मिल सकना सम्भव हो सके । जन्म समय के आधार पर स्तर का पता लगाने में तथ्य है। उस पुरातन विज्ञान को इन दिनों नये सिरे से उभारने और प्रयोग में लाने की आवश्यकता इन दिनों इसलिए पड़ रही है कि उच्च प्रखरता और प्रतिभा को तलाशा जा सके और उनका उपयोग तदनुरुप प्रयोजनों के लिए किया जा सके ।
इस प्रयोजन के लिए सभी परिजनों से उनकी पत्नि और बच्चों के सह जन्म समय की माँग की जा रही है । यह शान्ति कुन्ज हरिद्वार के पते पर भेजे जाने चाहिए । इनका निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण विशिष्ट तरीके से किया जायगा। इनकी जन्म कुण्डलियाँ नई बनाई जायेंगी । अन्यों की बनाई हुई कुण्डलियाँ अपने पर्यवेक्षण के लिए काम न आ सकेंगी ।
खगोल विद्या अति कठिन विषय और विज्ञान है । उसमें गणित प्रायः वैसा ही करना पड़ता है, जैसा कि अन्तरिक्षयान छोड़ने तथा उन पर नियन्त्रण करने वाले ‘कम्प्यूटर’ करते हैं । ज्योतिष में उच्चस्ततरीय गणितज्ञों की आवश्यकता होती है । आज तो मात्र लकीर पिटती है । पंचाग हर क्षेत्र का अलग होना चाहिए कयोंकि स्थानों के हिसाब से ‘पलभा’ बदलता है । तद्नुसार हर स्थान के पंचाँगों में अन्तर पड़ना चाहिए। आज तो पंचाग बना देते हैं । उसी को दूर-दूर के पंडित प्रयोग में लाते हैं । गृह गणना का गणित अति कठिन है । उसे कर सकने के लिए एम0ए॰ से अधिक की ही गणितज्ञता होनी चाहिए और हर छोटे प्रयोजन के लिए पूरा गणित किया जाना चाहिए । आज ऐसी प्रतिभाओं को सर्वथा अभाव है। छपी सारणियों के आधार पर मिनटों में लम्बे गणितों का प्रयोजन पूरा कर लिया जाता है । ऐसी दशा में उनका सही होना कठिन है ।
ज्योतिष गणना में समय-समय पर हेर-फेर होते रहना आवश्यक है । पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 360 या 365 दिन में नहीं करती । उनमें घण्टों, मिनट, सैकिण्ड़ों का अन्तर रहता है । वर्ष का सही गणित नहीं बन सका । मोटा अनुमान ही चला आ रहा है । जो आगा पीछा होता है, उसे अँग्रेजी कलैण्डर में महीनों की तारीखें न्यूनाधिक करके ठीक किया जाता है। भारतीय गणित में तिथियों का ही नहीं महीनों तक का क्षय एवं वृद्धि क्रम चलता रहता है । इतने पर भी सबकुछ सच नहीं बैठता । पाँच हजार वर्ष में ग्रहों की स्थिति में और पंचाग की गणना से इतना अन्तर पड़ जाता है कि तारकों और ग्रहों के उदय-अस्त में कई बार तो सप्ताहों तक का अन्तर देखा जाता है । जो ग्रह अस्त हो गया वह दृश्य रुप में उदय दीखता है । जिसके उदय का उल्लेख है वह कई दिन पहले अस्त हो चुका होता है । पुराने समय में दृश्य गणित के आधार पंचागों का समय-समय पर परिशोधन किया जाता था । अब वह स्थिति नहीं रही । ऐसे ही अन्धेरगर्दी चलती है और जन्म कुण्डलियाँ बनती हैं । उनके आधार पर किसी सही निर्ष्कष पर पहुँचना कठिन है । इसलिए जब यह नया कम हाथ में लिया ही गया है तो उसे पूरी जिम्मेदारी और तत्परता से ही पूर्ण किया जायगा । जिनका भी सूक्ष्म पर्यवेक्षण करना है उनकी कुण्डली स्वयं ही बनाई और स्वयं ही देखी जायगी । दिव्य आत्माओं का स्तर समझने और उन्हें पकड़ने का प्रयोजन इससे कम में पूरा नहीं हो सकता ।
इस प्रयोजन के लिए अपनी निजी वेधशाला बनाई जा रही है । उसमें आधुनिक और पुरातन दोनों ही आधार रहेंगे । इन दिनों बहुमूल्य ‘टैलीस्कोपों’ से यह काम पूरा होता है। प्राचीन काल में वेधशालाएं इस प्रयोजन को पुराने ढंग से कराती थीं । दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, अहमदाबाद, वाराणसी आदि की वेधशालाएँ प्रख्यात है । जयपुर नरेश ने इस सम्बन्ध में विशेष रुचि ली थी और विशेष निर्माण कराये थे । आज तो वे विद्याएँ एक प्रकार से लुप्त हो ही गई हैं और उन वेध शालाओं का उपयोग करना तो दूर-विनिर्मित यन्त्रों का उद्देश्य समझ सकने वाले तक ढूँढ़े नहीं मिलते । यह सारा बिखरा सरंजाम एक जगह इकट्ठा करना और उसमें पूर्वात्य पाश्चात्य खगोल विद्या का समावेश करना लगभग उतना ही कठिन है जितना ब्रह्मवर्चस का शोध प्रयोजन । ऐसे कार्य श्रमसाध्य, साधन साध्य एवं कष्ट साध्य होते हैं । इनके निर्माण में उच्चस्तरीय ज्ञान और प्राचीन आधुनिक का समन्वय करने के लिए अभीष्ट अध्यवसाय की भी आवश्यकता पड़ती है । जो हो, बड़ा काम हाथ में लिया है तो बड़ा प्रयोजन भी पूरा ही करना पड़ेगा । वेधशाला बनाने और आकश दर्शी दुर्बीन खरीदने का प्रयास आरम्भ कर दिया गया है । प्रस्तुत बसन्त पर्व को उसका भी शुभारम्भ दिन समझा जायगा । ज्योतिविज्ञान का उसे पुनर्जीवन कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी ।
मूर्ति पूजा का खण्डन करने वालों के आक्रोश में इस प्रक्रिया के पीछे चलने वाला पाखण्ड एवं स्वार्थ साधन ही प्रधान कारण रहा है । तथ्य की दृष्टि से तो इसाईयों को क्रूस, मुसलमानों का संगेअसवाद, राष्ट्रवादियों का झंडा जब श्रद्धा के प्रतीक बन सकते हैं । चित्रों का उद्घाटन वन्दन हो सकता है तो मूर्ति पूजा से झगड़ने की क्या बात रही ? वह आक्रोश सैद्धान्तिक नहीं परिस्थितिजन्य है । यही बात खगोल है विद्या की यथार्थता उपयोगिता से कोई इन्कार नहीं कर सकता । पृथ्वी के वातावरण पर, प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थो पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का प्रभाव पड़ता है, तो जन्म के समय पर अन्तर्ग्रही सूक्ष्म परिस्थितियों का प्रभाव व्यक्तित्व पर पड़ना अवास्तविक नहीं कहा जा सकता । विरोध वहाँ खड़ा होता है जहाँ उस विज्ञान की आधारभूत प्रक्रिया ग्रह गणित में अनजान लोग ऐसे ही तीर-तुक्का छोड़ते और बहकाने ठगने का धन्धा चलाते हैं । यदि उस दोष से ज्योतिर्विज्ञान को उचारा जा सके तो वह भी छै शास्त्रों में से एक अति महत्वपूर्ण शास्त्र है । इतना महत्वपूर्ण जिसे आयुविज्ञान से भी अधिक उपयोगी कहे जाने में कोई अत्युक्ति नहीं है ।
युग निर्माण परिवार में सम्मिलित प्रतिभाओं का स्तर तथा भविष्य जाने की दृष्टि से इस विज्ञान को नये सिरे से हाथ में लेना पड़ रहा है । उसमें तीन लाभ हैं, एक तो विज्ञान का स्वरुप निखरने से उसकी प्रामाणिकता एवं उपयोगिता का लाभ जन-जन को मिलेगा दूसरे मिशन को प्रतिभाएँ ढूँढने और उन्हें उपयुक्त दिशा देने में सफलता होगी । तीसरे जिसकी देखभाल की जायगी, वे अपने लिए सफलता पाने योग्य मार्ग का निर्धारण एवं अनुसरण कर सकेंगे । ज्योतिषियों की तरह फलदिश बताने, लिखने की बात तो नहीं बन सकेगी, पर अधिक सफल होने के लिए दिशा निर्धारण का लाभ तो सम्बद्ध लोगों में से हर किसी को मिल सकेगा ।
युग सृजन में आन्दोलन ही या लोक शिक्षण ही एक काम नहीं है । अनेक साधनों का उत्पादन, अभिवर्धन, अवस्था, काल, साहित्य, शिल्प अन्वेषण जैसे जनहित अनेकों काम हैं जिसमें लगना भी जन नेतृत्व जैसा ही महत्वपूर्ण काम है । अगले दिनों जहाँ अनेकों अवानीयताएँ निरस्त करनी हैं वहाँ अनेकों सत्प्रवृत्तियों उपयोगी साधनों को नये सिरे से बनाना बढ़ाना भी इसके लिए यह देखना होगा कि किन में क्या जन्म विशेषता है, उसे उभारना किन उपायों से सम्भव हो सकता है । और किसे क्या काम सकरने में सहज सफलता मिल सकती है । सही जन्म समय और सही गणित के आधार पर बनी हुई जन्म कुण्डलियाँ इस प्रयोजन के लिए बहुत सहायक हो सकती है ।
परिजनों से अपने-अपने कुटुम्बियों के जन्म समय भेजने के लिए कहा गया है । जन्म पत्रिका कोई न भेजें, क्योंकि उनमें से अधिकाँश गलत ही होगी । उन्हें देखने जाँचने में जितना श्रम पड़ेगा, समय लगेगा, उतने में नई कुण्डली सही गणित के आधार पर बन सकती है । इसके लिए अपने पास सभी आवश्यक ग्रन्थ एवं साधन मौजूद है । भविष्य फल बताने का पंडिताऊ ढर्रा अपने यहाँ नहीं चलेगा । जिस उद्देश्य के लिए यह खोज की जा रही है । उसी तक सीमित रहा जायगा । भाग्य एवं भविष्य बताने में अनेकों समस्याएँ उत्पन्न होती है । शुभ भाग्य कहना कर्मण्यता उत्पन्न करता है और अशुभ कहने से लोग डरते घबराते हैं । दोनों ही परिस्थितियों में सन्तुलन बिगड़ता है । और मनुष्य पुरुषार्थ पराणयता छोड़कर कल्पना जगत में विचरना आरम्भ कर देता है । अनावश्यक उत्साह सा भय उत्पन्न करना अपना उद्देश्य नहीं । इसलिए फलदिश तो नहीं बताये जायँगे पर भावी मार्ग दर्शन के लए उस आधार पर उपयुक्त परामर्श प्र्राप्त कर सकना, सरल एवं सम्भव हो जायगा । परिजन उससे इतना ही लाभ उठा सकेंगे, मिशन को अपनी खदान में मणि माणिकों की उपस्थिति का पता चल जायगा वही बड़ा लाभ है ।
जिनका आग्रह होगा, उनकी जन्म कुण्डलियाँ बनाकर भेजी भी जा सकती हैं । इसके लिए जवाबी लिफाफा और छपे कुण्डली फार्म के लिए बीस पैसा कुल पचास पैसा खर्च करने से काम चल जायगा । जो मँगाना चाहें वे पत्र के साथ पचास पैसे का टिकट भेज दें । कुण्डली बनाने में लगने वाले लम्बे परिश्रम की किसी से कोई फीस दक्षिणा नहीं ली जायगी । यह सेवा मात्र मिशन के परिजनों को-नियमित रुप से पत्रिकाएं पढ़ने वालों को-ही की जा सकेगी । अन्य लोगों के लिए इतना श्रम कर सकना शक्ति और समय की सीमा से बाहर चला जायगा । इसलिए परिवार से बाहर के लोगों से यह कष्ट न करने के लिए कहा गया है ।
इस सर्न्दभ में एक बात विशेष रुप से ध्यान रखने की है कि अगले दिनों इस विषय पर पत्र-व्यवहार असाधारण रुप से बढ़ जायगा । अस्तु उत्तर पाने की जिन्हें इच्छा हो वे जवाबी लिफाफा भेजें और पत्र के ऊपर ‘जन्म कुण्डली विभाग’ एक कोने पर लिख दिया करें । जवाबी पत्र भेजने के लिए सामान्य पत्र-व्यवहार में भी आग्रह किया जाता रहा है, पर इस कुण्डली प्रसंग में तो वह अनिवार्य ही कर दिया गया है । इसके बिना आर्थिक दबाव बढ़ जाने से उत्तर देने न बन पड़ेगा ।
(राजेन्द्र कुमार पाण्डेय)
यदि ग्रीष्म न हो तो सागर से क्या श्याम मेघ बन पायेंगे ?बोंया न जाय यदि बीज कहीं, क्या वृक्ष स्वयं उग आयेंगे ?
परहित में सृजन प्रकृति का है, जगती क्रम, श्रम का ही विधान । पुरुषार्थ-समपण की महिमा, से प्राणी होते प्राणवान् ॥
रवि भी करके पुरुषार्थ प्रबल, जगती को देता है प्रकाश । परहित-उर्त्सग, सृजन गौरव-त्यागों से बनते श्री निवास ॥
यह अखिल सृष्टि के मूल नियम-जो लागू होते हैं समान । युग परिवर्तन के लिए करों, अब ते प्रयाण हे प्राणवान ॥
पर श्रद्धा, निष्ठा औ तप से, जो बन जाते मानव समर्थ ।वे अनायास कर देते हैं, ये नियम और उपनियम र्व्यथ ॥
तब गुण मनस्विता देती है, जो रचती रहती संस्कार ।उसके पीछे-पीछे चलती, यह प्रकृति उसी का पग निहार ॥
वे मनुज नहीं, हैं काल पुरुष, युग शक्ति, विधा कहलाते हैं ।उनके पावों के रज कण भी जगती में पूजे जाते है ॥
हम भाग्य सृजन कर सकते हैं, यदि हो जायें हम ज्योतिमान । उर्त्सग करो मानवता पर, कर दो, प्रयाण है प्राणवान् ॥
तप से तेजस् उपन्न करो, तप जाय, हमारी यह काया । हो स्वयं भस्म कलि की छाया, भागें खुद दनुजों की माया ॥
वर्चस का गौरव हो असीम, रुक जाय कालगति का विधान ।तुम ब्रह्म पुत्र, माँ ब्रह्म शक्ति, हो जा विवके से ज्योतिमान ॥
तुम समर्थ-असमर्थ नहीं, तुम स्वयं सृष्टि की शक्ति । अव्यक्त रही जो महाशक्ति, पर हित में दे भावाभिव्यक्ति ॥
तेरे नामों के पाहन भी, कहलायेंगे आगे महान स्वागत करने इस नव युग का, आगे आओ हे प्राणवान्
*समाप्त*