1. बसन्त पर्व का दस दिवसीय साधना सत्र 15 जनवरी से 23 जनवरी तक है। उसमें अनुष्ठान करने वाले आगन्तुक स्वीकृतियाँ प्राप्त कर रहे हैं।
2. उन्ही दिनों 16 से 23 तक का एक विशेष परामर्श सत्र रखा गया है जिसमें प्राणवान परिजनों को अपने-अपने क्षेत्र में प्रस्तुत पंच वर्षीय योजना कार्यान्वित करने के सम्बन्ध में विशेष विचार विनियम करने के निमित्त बुलाया गया है। जो आ सकें नाम नोट करा दें।
3. इस वर्ष 16 फरवरी को सूर्यग्रहण है वह उत्तर प्रदेश में तो खण्ड ग्रास दीखेगा व अन्यत्र खग्रास रहेगा। अपने ढंग का यह अनौखा और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाला ग्रहण है। उस दिन अखण्ड गायत्री जप की तैयारी सर्वत्र की जानी चाहिए।
4. 22 जनवरी को बसन्त पर्व इस बार अधिक भाव श्रद्धा एवं तत्परता के साथ मनाया जाय। उस दिन सदैव की तरह अखण्ड जप यज्ञ आदि हों, जहाँ शक्ति पीठें बनने में अड़चन प्रतीत होती और बिलम्ब लगता दीखता हो वहाँ प्रज्ञा पीठ बनाने के लिए निश्चय बदला जा सकता है। इस बसन्त की प्रधान उपलब्धि शक्ति पीठ सम्बन्धी सुनिश्चित कदम उठाना है। प्रतीक्षा में समय न गँवाया जाय।
व्यक्ति लगता तो अपने में स्वतन्त्र है, पर वस्तुतः वह समष्टि का एक अवयव मात्र है। व्यक्ति के स्तर और कर्म से समूचा समाज प्रभावित होता है। इसी प्रकार समाज का वातावरण हर व्यक्ति को प्रभावित होता है इसी प्रकार समाज का वातावरण हर व्यक्ति को प्रभावित करके रहता है। दानों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। दोनों का उत्थान और पतन एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर रहता है।
व्यक्ति अपनी सुविधा और प्रगति की बात सोचे-इसमें हर्ज नहीं, पर जब वह समाज गत उर्त्कष एवं सामूहिक नियम अनुशासन का उल्लंन करता हे तो अनपे और समाज के लिए दूहरी विपत्ति खड़ी करने का कारण बनता है।
प्रकृति एक नियम है। विपत्ति एक अनुशासन है। इनमें व्यतिक्रम की छूट किसी को भी नहीं है। उच्छ्रंखलता यह असह्स हैं उद्धत आचरण अपनाने वाले आँतक उत्पन्न करते और अपरहण का प्रयास तो कई करते है, पर उसमें सफल नहीं होतें। उद्दण्डी की सफलता फुलझड़ी की तरह है, जो तनिक-सा कौतुत अपना अस्तितव गवाँ बैठने के मुल्य पर ही दिखा पाती है।
व्यक्ति का परस्पर सम्बन्ध है-शरीरगत कोश घटकों की तरह एक ही उद्दण्डतर सभी को कष्ट देती है, उसके लिए सबका प्रयत्न होना चाहिए कि किसी को एक को स्वेच्छाचार न बरतने दें। समूह जब अने इस उत्तदायित्व की उपेक्षा करता है और उच्छ्रंखलों का नियन्त्रण नहीं करता है तो प्रकृति उस समूचे क्लीव समाज को प्रताड़ना करती है। वैसी जैसी कि इन दिनों विपत्तियों, समस्याओं, विग्रहों एवं विभीषिकाओं के रुप में सर्वत्र सहन करनी पड़ रही है।
पतित पावनी भागीरथी के तट पर महर्षि रैम्य और महर्षि भारद्वाज के आश्रम आस पास ही स्थित थे। तपोबल, योगशक्ति और आत्मिक उर्त्कष की स्थिति में कोई किसी से कम नहीं थे, फिर महर्षि रैम्य के आश्रम में प्रतिदिन लोगों का आना जाना बना रहता था। आँगतुकों में हर वर्ग और स्थिति के व्यक्ति होते थे इसका कारण था कि महर्षि रैम्य ने तप साधना के साथ-साथ वेद वेदाँतो के पठन पाठन और अध्ययन मनन द्वारा अपनी ज्ञान संपदा भी बढ़ाई थी। लोग विभिन्न जिज्ञासुओं के समाधान तथा ज्ञान प्राप्ति की आशा से रैम्य आश्रम में आया करते थे।
भारद्वाज आश्रम में अपेक्षाकृत कम लोग ही आते। महर्षि पुत्र यवक्रीत को लगा कि शास्त्रज्ञान अर्जित न करने के कारण मेरे पिता को रैम्य के समान सम्मान नहीं देते व आश्रम की उपेक्षा भी करते है। यद्यपि ऐसी कोई बात नहीं थी, भारद्वाज भी रैम्य की तरह ही विख्यात थे पर यह जान कर लोग उनके आश्रम में कम आते थे कि इसके महर्षि की तप साधना में विध्न पड़ेगा। महर्षि भारद्वाज को भी जनसर्म्पक में कम ही रुचि थी।
यवक्रित ने आश्रम का सम्मान बढ़ाने उद्देश्य से स्वयं ज्ञानार्जन करने का निश्चय किया। इसके लिए वह पंचाग्नि तापते हुए उग्र तप द्वारा अपने शरीर को स्वाहरा करने लगे यवक्रित को कठोर तप करते देख कर इन्द्र देव ऋषिपुत्र के पास आये और उनसे तपक का उद्देश्य पूछा।
यवक्रित ने कहा मैं सम्पूर्ण शास्त्रों और वेदवेदाँतो का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही यह तप कर रहा हूँ।
परन्तु ज्ञान तो गुरुमुख होकर अध्ययन करने से प्राप्त होता है महर्षि कुमार’, इन्द्र ने कहा।
‘गुरुमुख से वेदों की शिक्षा प्राप्त करने से में अधिक समय लगता है। इतना धैर्य मुझमें नहीं है, इसी से तप का मार्ग चुना है भगवन्’-यवक्रित बोलें। ‘
ज्ञान प्राप्ति के लिए यह उत्कृष्ट अभिलाषा तो श्रेयस्कर है कुमार, पर मार्ग वही है, इन्द्र देव ने समझाया-तप द्वारा आत्मा का कल्याण तो संभव है, पर ज्ञान साधना गुरुमुख होकर ही की जाती है।
इसके बाद इन्द्र तो चले गये, किन्तु यवक्रित ने बातों ध्यान नहीं दिया। उन्होंने और कठोर तप आरम्भ कर दिया। निरन्तर कठोर तप साधना में लगे रहने पर यवक्रित का शरीर कृश हो गया। देह में केवल हडिडयों के उभार ही दिखाई देने लगे। फिर भी इष्ट सिद्धि नहीं हुई तो उन्होंने निश्चय किया कि वे और अधिक कठोर तितिक्षा पर करेंगे। इस निश्चय के लिए उन्होंने एक यज्ञ में अपने रक्त से उसमें आहुतियाँ देंगे।
इस निश्चय के बारे में जब देवराज इन्द्र को पता चला तो वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रुप धारण कर उस स्थान पर आये जहाँ यवक्रित तप किया करते थे और गंगा के उस स्थान पर इन्द्र प्रतीक्षा करने लगे जहाँ ऋषिकुमार गंगा स्नान के लिए आया करते थे। यवक्रित जब स्नान करने आए तो उन्होंने देखा कि वृद्ध ब्राह्मण अंजलि में बार-बार रेत भर कर गंगा में डाल रहा है। यह देख कर उन्होंने पूछा-विप्रवर! आप यह क्या कर रहे है?”
वृद्ध ब्राह्मण का रुप धरे इन्द्र ने कहा, “यहाँ से लोगों को गंगा पर पुल बाँध देना चाहता हुँ।”
‘भगवन, यवक्रित ने कहा, “आप इस महा प्रवाह को रेत से किसी प्रकार नहीं बाँध सकते। इसलिए इस असंभव कार्य को छोड़कर जो कार्य सम्भव हो, उसके लिए प्रयत्न कीजिए।
अब वृद्ध ब्राह्मण ने घुमकर यवक्रीत की ओर देखा और कहा, “ऋषिकुमार जब आप शरीर को कृश करने वाले तप और देह कठोर त्याग द्वारा विद्या प्राप्ति करने के लिए यत्न कर रहे है और उसमें सफल होने की आशा रखते है तो मेरा यह कार्य असम्भव कैसे है? यवक्रित को समझते देर न लगी कि वृद्ध ब्राह्मण कोन है? उन्होने नम्रता पूर्वक अपनी भूल को स्वीकार करते हुए कहा, ‘देवराज! मैं अपनी भूल समझ गया। मुझे क्षमा किजिए।” और ऋषिकुमार स्वाध्याय अनुशीलन द्वारा ज्ञान साधना करने में जुट गए।
ईश्वर के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण क्या हैं ? स्वामी रामकृष्ण परमहंस से जब यह पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया-” इस संसार से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है, जिससे कि ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो सके।” बात कितनी ही सरल क्यों न हो, पर इस संसार से बड़ा प्रमाण और को नहीं है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि ईश्वर है। संसार का प्रत्येक परमाणु एक निर्धारित नियम के अनुसार काम कर रहा है। यदि उस नियम में तनिक भी व्यक्तिक्रम आ जाये तो विराट् ब्रह्माण्ड का अस्तित्व एक क्षण में नष्ट-भ्रष्ट हो सकता है। एक कण के विस्फोट से अनन्त प्रकृति में आग लग सकती है और संसार में अग्नि-ज्वालाओं की लपलपाती जिहृ सब कुछ चट कर सकती है।
सारे संसार का, समूचे ब्रह्माण्ड का अस्तित्व ईश्वर की सत्ता को प्रमाणित करता है। ब्रह्माण्ड शब्द -ब्रह्म और ‘अण्ड’ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है, जिसमें अगाणित विराट् अण्ड अस्तित्वमान हों। वैज्ञानिक यह मानते है कि आकाश में स्थित समस्त पिंड एक शक्ति को केन्द्र मानकर उसके चारों ओर चक्कर लगा रहे है। ये सभी पिंड अण्डाकार वृत में घुमते है, इसी कारण वैज्ञानिक इन घुमने वाले समस्त पिंडो को ब्रह्माण्ड कहते है।
पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ भी जीवन विद्यमान है, उसका जीवन आधार सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। 8 लाख 85 हजार मील व्यास वाला सूर्य का गोला 10 करोड़ 30 लाख मील की दूरी से पृथ्वी पर अनी प्रकाश-किरणें फेंकता है, जो 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुँचती हैं। दिनभर में यहाँ के वातावरण में इतनी सुविधाएँ इन प्रकाश-किरणों से एकत्रित हो जाती है कि रात आसानी से कट जाय। दिन-रात के इस क्रम में एक दिन भी यदि अन्तर पड़ जाये तो जीवन-सत्ता सकंटाग्रस्त हो सकती है और जिस ऊर्जा-स्त्रोत सूर्य से पृथ्वी वासी जीवनी- शक्ति प्राप्त करते है। वैज्ञानिकों की भाषा में सूर्य-तप्त गैसों का विशाल गोला है। नदी के तेज प्रवाह में जिस प्रकार भँवर पड़ते है, उसी प्रकार सूर्य में चलती रहने वाली तप्त-ज्वालाओं के अन्धड़ भँवर पैदा करते हैं। ये भँवर भी पृथ्वी पर जीवन-सत्ता को बनाये रखने से सहयोगी होते हैं।
सूर्य के लिए पृथ्वी समुद्र में एक बूद का सा नगण्य अस्तितव रखती है। जिस प्रकार एक गेंद के चारों और मक्खी नाचती हुई दिखाई दे, सूर्य यदि गेंद के बराबर हो तो पृथ्वी भी इस मक्खी से अधिक बड़ी नहीं होगी। फिर भारत में उत्तर-प्रदेश के एक किसान के घर में जी रही चींटी का सूर्य के सामने क्या अस्तित्व हो सकता है। लेकिन वह भी सूर्य से प्राप्त ऊर्जा के द्वारा अपने दिन मजे से काट लेती है।
पृथ्वी और सूर्य की तुलना गेंद और मक्खी से कि जा सकती है। पृथ्वी से भी छोटे और बड़े कितन ही ग्रह-उपग्रह अपन इस सौर-मण्डल में विद्यमान है। सूर्य के चारों और पृथ्वी की तरह घूमने वाले ग्रह, उपग्रह (चन्द्र) उल्का और घुमकेतु ये सब मिलकर सौर-मण्डल कहलाते है। अभी तक सौर-परिवार के करीब 100 सदस्यों के बारे में ही पता लगाया जा सका है।
ब्रह्माण्ड में ऐसे अनेकों सौर-मण्डल है और विस्तृत ब्रह्माण्ड में-अन्नत अन्तरिक्ष में अपने सौर-मण्डल की वैसी स्थिति है, जैसी कि दस फीट लम्बे और दस फीट चौड़े सफेद कागज पर एक बिन्दु की। यदि कोई कहे कि मेरी आँख का आँसू समुद्र में खो गया है तो यह कहना जितनी छोटी-सी बात होगी, भला समुद्र की अगाध जल-राशि में एक बूँद आँसू की क्या बिसात ? वैसी ही स्थिति ब्रह्माण्ड में सूर्य की है। सूर्य से बड़ा तारा, जिसे नरकियता क्रम के आगे वाले स्थान पर रखा जा सकता है, उससे 15 हजार गुनास बड़ा है। उससे बड़ा दूसरा तारा अण्टेयर्स सूर्य जैसे 3 करोड़ 60 लाख गोलों को अपने भीतर आसानी से बिठा सकता है। सूर्य और पृथ्वी से बड़े ही नहीं, छोटे सूर्य और ग्रह भी है। किन्तु यह सभी छोटे-बड़े सौर-मण्डल और ग्रह-उपग्रह विराट् ब्रह्माण्ड में निद्वन्द्व विचरण कर रहे है।
विराट् ब्रह्माण्ड का थोड़ा-सा अनुमान इस बात से आँखों से तीन हजार तों ही देख सकते है, जब कि वैज्ञानिक यन्त्रों से जितने तारे देखें जा सके है, उनकी गणना का अभी तक कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। ज्येष्ठ और मार्गशीर्ष माह में आकाश में एक क्षितिज की ओर सफेद पट्टी-सी दिखाई देती है। यह आकाश में एक क्षितिज की और सफेद पट्टी-सी दिखाई देती है। यह आकाश-गंगा जैसे असंख्यों तारों के गुच्छक और तारों के बादल है। बादलों में जिस प्रकार पानी की बूँदे होती है, उसी प्रकार इन तारा-मेघों में भी दूरबीन की सहायता से असंख्यों तारे देखे जा सकते है। सबसे छोटा दिखाई देने वाला तारा गुच्छक-शौरी कहा जाता है। इस गुच्छक में सूर्य 50 हजार तारे आ जाते है। वैज्ञानिकों के अनुसार तारों की संख्या कम से कम दो अरब होनी चाहिए। दिखाई देने वाले तारा-मण्डलों की ही यात्रा करने की योजना बनाई जाये और 800 मील प्रति घंटा उड़ने वाले विमान यात्रा पर निकला जाये तो एक बार में दिखाई देने वाले तारों को छूकर आने में ही कम से कम साढ़े चार करोड़ वर्ष लग जायेंगे।
सर्वाधिक चमकने वाले तारों की संख्या 20 है इनमें व्याध नाम का तारा सर्वाधिक दीप्तिमान सूर्य की तुलना में यह तारा 21 गुना अधिक है। कल्पना की जाये कि परमात्मा सूर्य के स्थान पर यदि व्याध तारे को नियुक्त करदे और वह धरती को प्रकाश देने लगे तो ज्येष्ठ मास में पृथ्वी का तापमान 2310 डिग्री फारनेहाइट ही है।
आकार की दृष्टि से भी तारों का वर्गीकरण किया जाता है। बड़े आकार वाले विराट् कहे जाते है और छोटे आकर वाले वामन कहलाते है। विराट् से भी जो अधिक बड़े है, उन्हें अति विराट् कहा जाता है। आर्द्रा भ्रगमण्डल में लाल रेग का एक विराटृ तारा है, जो सूर्य की तुलना में तीस करोड़ गुना अधिक बड़ा है। वामन केवल नाम के ही वामन है, अन्यथा वे भी भगवान विष्णु के वामन अवतार की तरह कम आर्श्चयजनक नहीं है। भार की दृष्टि से ये तारे सबको मात दे सकते है। यदि वामन तारे से चार घनफुट मिट्टी खोद कर लाई जाये और उसे पृथ्वी पर तोला जाये तो इतनी मिटृटी का वनज ही 224 टन होगा। वहाँ यदि पेड़-पौधे होते होंगे और गुलाब के फूल जैसा उसी आकार कोई फूल लगता होगा, तो उसे तोड़ पाना तो दूर रहा, उसकी एक पंखुड़ी भी मनुष्य नहीं उठा सकेगा। गुलाब के फूल के बराबर वाले फूल को पृथ्वी पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर उठाने के लिए क्रेन की जरुरत पड़ेगी?
इतने महान् आश्चर्यों से भरा यह विश्व ब्रह्माण्ड अपने ढंग से व्यक्थित रीति से चल रहा है। ईश्वर होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या कहा जा सकता है। अलेक्जेर्डर पोप का यह कथन ठीक ही है ईश्वर है। क्योंकि यह संसार लाखों करोड़ो वर्ष से चल रहा है और अनन्त-काल तक चलता रहेगा। इस तथ्या को थोड़ा इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि सूर्य अपने केन्द्र में 16000000 डिग्री सेन्टीग्रेड है। पृथ्वी पर उसकी किरणें आठ मिनट में पहुँच जाती है और वे अपने साथ प्रचंड गर्मी साथ लिए चलती है। यदि उनके साथ आने वाली गर्मी पृथ्वी पर सीधे-सीधे पहुँचने लगे तो पृथ्वी पर एक चींटी और घास का एक तिनका भी न दिखाई दे। समुद्र का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाय। लेकिन ऐसा नहीं होता, क्योंकि पृथ्वी के ऊपर अयन मण्डल की पट्टियाँ न चढ़ी होतीं तो पृथ्वी कभी की जलकर राख हो गई होती।
इसके अलावा सूर्य पृथ्वी की ओर थोड़ा भी पास खिसक आये तो धू्रव-प्रदेशों की बर्फ से पिघल सकती है और सारी पृथ्वी पर जल-प्लावन का दृश्य प्रस्तुत हो सकता है। जरा भी पास खिसक आने पर इतनी गर्मी पैदा हो सकती है कि पृथ्वी पर विद्यमान प्राणी कड़ाही के उबलते हुए तेल में तले जा रहे पकाडौं की तरह पक कर जल जाय और यदि सूर्य अपने स्थान से पृथ्वी की दूरी से थोड़ा भी हटकर पृथ्वी से जरा भी दूर चला गया, अपने स्थान से पाँच-सात फीट भी पीछे हट गया तो पृथ्वी पर समुद्र तो क्या मिट्टी तक जमकर बर्फ बन सकती है।
ऊपर की में पंक्तियोंग्रह-नक्षत्रों और ब्रह्माण्ड के विस्तार का थोड़ा-सा उलेख किया गया है, ये सभी सौर मंडल और ग्रह-नक्षत्र अपने क्षेत्र में रहते हुए ही अपने क्रियाकलाप चलाते है। थोड़े भी अपने स्थान से इधर-उधर होने पर सर्वनाश हो सकता है। वे अपने स्थान और क्षेत्र में रहते है, इसी में सन्तुलन और व्यवस्था बनी हुई है। सूर्य पृथ्वी को ठीक उसी प्रकार खींचकर बाँधे रहता है, सूर्य अपनी इस शक्ति से पृथ्वी और अन्य ग्रह-उपग्रहों को भी खींचे रखता है। इसी कारण है कि सूर्य अपन सौर-मंडल का नेता, संचालक, अनुशास्ता कहा जाता है।
यह सारे तथ्य बताते है कि ग्रहों की स्थिति और व्यवस्था, ब्रह्माण्ड का संचालन अत्यन्त बुद्धिमता पूर्वक किया जा रहा है। व्यवस्था या संचालन करने वाली उस शक्ति को नियम, शक्ति, सन्तुलन अथवा कुछ भी कहा जाये। अन्ततः यह मानना पड़ेगा कि उसका अस्तित्व ही जीवन का और दृश्य-अदृश्य सत्ता का आधार है, उसे ही परमात्मा कहा गया है। उपरोक्त तथ्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संसार को बनाने और चलाने वाला अद्भुत गणितज्ञ, विलक्षण इंजीनियर, सुयोग्य चिकित्साधिकारी, मौसमवेत्ता और अप्रतिम वैज्ञानिक है, उस सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करना अपने आप को जीवित मानने से इन्कार करने जैसा है।
क्योंकि जीवन के आविर्भाव से ही उसका नियामक सत्ता का पता चल जाता है। जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस सृष्टि में ऐसी व्यवस्था है कि वे सब सरलातापूर्वक पूरी होती रहें। साँस लिए बिना प्राणी एक पल भी जीवित नहीं रह सकता, सो प्रचुर मात्रा में हवा में उपलब्ध हैं। इसके बाद जल की आवश्यकता है, वह भी थोड़ा-सा प्रयत्न करने से प्राप्त हो जाता है। अन्न, हवा और जल के बाद तीसरे का महत्व क्रम की आवश्यकता है, सो उसके लिए साधन न जुटा सकने वाले प्राणियों के लिए के लिए प्रकृति में फल-फूल की व्यवस्था है सो बुद्धिधारी प्राणी थोड़े प्रयत्नों से अपनी यह आवश्यकता पूरी कर लेते है। इसके बाद समस्त उपादान आवश्यकता के अनुपात से प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त होते रहते है। इन सार्वभौम आवश्यकताओं के पूर्ति बिना संचालक, व्यवस्थापश्क के कैसे सम्भव हो सकती थी?
इस विस्तार और सुव्यवस्था क्रम से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह अस्वीकार करने का कोई भी कारण नहीं है कि सृष्टि, जीवन या ब्रह्माण्ड के कण-कण में, अणु-अणु में अनुशासन और व्यवस्था बनाकर रहने तथा उसे तोड़ने पर दंड देने वाली व्यवस्थापिका नियामक सत्ता का अस्तित्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। इस व्यवस्था सन्तुलन का नियमन करने वाली सत्ता का नाम ही ईश्वर है। उसके अस्तित्व को प्रमाणित करते हुए प्रसिद्ध दार्शनिक हर्वर्ट स्पेन्सर ने कहा है-ईश्वर एक विराट् शक्ति है, जो संसार की सब गतिविधियों का नियन्त्रण करता है। दार्शनिक काँट ने कहा है-नैतिक नियमों की स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण है। इन नियमों के अर्न्तगत रहते हुए ही यह विश्व ब्रह्माण्ड व्यस्थित और सन्तुलित क्रम से चल रहा है। इतने पर भी कहा जाय कि ईश्वर का अस्तित्व झूठ है तो इस कहने में ही यह आशय भी छिपा है कि यह संसार भी झूठ है।
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्धिद्यते परम््् । सत्येन विधृंत सर्व सर्वं सत्ये प्रतिय्ठिम ॥25॥
सच बोलना सबसे श्रेष्ठ है, सत्य से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, यह सब कुछ सत्य से ही धारण किया हुआ है, सत्य में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, सत्य से ही प्रतिष्ठा होती है। ॥25॥
1. बसन्त पर्व का दस दिवसीय साधना सत्र 15 जनवरी से 23 जनवरी तक है। उसमें अनुष्ठान करने वाले आगन्तुक स्वीकृतियाँ प्राप्त कर रहे हैं।
2. उन्ही दिनों 16 से 23 तक का एक विशेष परामर्श सत्र रखा गया है जिसमें प्राणवान परिजनों को अपने-अपने क्षेत्र में प्रस्तुत पंच वर्षीय योजना कार्यान्वित करने के सम्बन्ध में विशेष विचार विनियम करने के निमित्त बुलाया गया है। जो आ सकें नाम नोट करा दें।
3. इस वर्ष 16 फरवरी को सूर्यग्रहण है वह उत्तर प्रदेश में तो खण्ड ग्रास दीखेगा व अन्यत्र खग्रास रहेगा। अपने ढंग का यह अनौखा और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाला ग्रहण है। उस दिन अखण्ड गायत्री जप की तैयारी सर्वत्र की जानी चाहिए।
4. 22 जनवरी को बसन्त पर्व इस बार अधिक भाव श्रद्धा एवं तत्परता के साथ मनाया जाय। उस दिन सदैव की तरह अखण्ड जप यज्ञ आदि हों, जहाँ शक्ति पीठें बनने में अड़चन प्रतीत होती और बिलम्ब लगता दीखता हो वहाँ प्रज्ञा पीठ बनाने के लिए निश्चय बदला जा सकता है। इस बसन्त की प्रधान उपलब्धि शक्ति पीठ सम्बन्धी सुनिश्चित कदम उठाना है। प्रतीक्षा में समय न गँवाया जाय।
व्यक्ति लगता तो अपने में स्वतन्त्र है, पर वस्तुतः वह समष्टि का एक अवयव मात्र है। व्यक्ति के स्तर और कर्म से समूचा समाज प्रभावित होता है। इसी प्रकार समाज का वातावरण हर व्यक्ति को प्रभावित होता है इसी प्रकार समाज का वातावरण हर व्यक्ति को प्रभावित करके रहता है। दानों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। दोनों का उत्थान और पतन एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर रहता है।
व्यक्ति अपनी सुविधा और प्रगति की बात सोचे-इसमें हर्ज नहीं, पर जब वह समाज गत उर्त्कष एवं सामूहिक नियम अनुशासन का उल्लंन करता हे तो अनपे और समाज के लिए दूहरी विपत्ति खड़ी करने का कारण बनता है।
प्रकृति एक नियम है। विपत्ति एक अनुशासन है। इनमें व्यतिक्रम की छूट किसी को भी नहीं है। उच्छ्रंखलता यह असह्स हैं उद्धत आचरण अपनाने वाले आँतक उत्पन्न करते और अपरहण का प्रयास तो कई करते है, पर उसमें सफल नहीं होतें। उद्दण्डी की सफलता फुलझड़ी की तरह है, जो तनिक-सा कौतुत अपना अस्तितव गवाँ बैठने के मुल्य पर ही दिखा पाती है।
व्यक्ति का परस्पर सम्बन्ध है-शरीरगत कोश घटकों की तरह एक ही उद्दण्डतर सभी को कष्ट देती है, उसके लिए सबका प्रयत्न होना चाहिए कि किसी को एक को स्वेच्छाचार न बरतने दें। समूह जब अने इस उत्तदायित्व की उपेक्षा करता है और उच्छ्रंखलों का नियन्त्रण नहीं करता है तो प्रकृति उस समूचे क्लीव समाज को प्रताड़ना करती है। वैसी जैसी कि इन दिनों विपत्तियों, समस्याओं, विग्रहों एवं विभीषिकाओं के रुप में सर्वत्र सहन करनी पड़ रही है।
पतित पावनी भागीरथी के तट पर महर्षि रैम्य और महर्षि भारद्वाज के आश्रम आस पास ही स्थित थे। तपोबल, योगशक्ति और आत्मिक उर्त्कष की स्थिति में कोई किसी से कम नहीं थे, फिर महर्षि रैम्य के आश्रम में प्रतिदिन लोगों का आना जाना बना रहता था। आँगतुकों में हर वर्ग और स्थिति के व्यक्ति होते थे इसका कारण था कि महर्षि रैम्य ने तप साधना के साथ-साथ वेद वेदाँतो के पठन पाठन और अध्ययन मनन द्वारा अपनी ज्ञान संपदा भी बढ़ाई थी। लोग विभिन्न जिज्ञासुओं के समाधान तथा ज्ञान प्राप्ति की आशा से रैम्य आश्रम में आया करते थे।
भारद्वाज आश्रम में अपेक्षाकृत कम लोग ही आते। महर्षि पुत्र यवक्रीत को लगा कि शास्त्रज्ञान अर्जित न करने के कारण मेरे पिता को रैम्य के समान सम्मान नहीं देते व आश्रम की उपेक्षा भी करते है। यद्यपि ऐसी कोई बात नहीं थी, भारद्वाज भी रैम्य की तरह ही विख्यात थे पर यह जान कर लोग उनके आश्रम में कम आते थे कि इसके महर्षि की तप साधना में विध्न पड़ेगा। महर्षि भारद्वाज को भी जनसर्म्पक में कम ही रुचि थी।
यवक्रित ने आश्रम का सम्मान बढ़ाने उद्देश्य से स्वयं ज्ञानार्जन करने का निश्चय किया। इसके लिए वह पंचाग्नि तापते हुए उग्र तप द्वारा अपने शरीर को स्वाहरा करने लगे यवक्रित को कठोर तप करते देख कर इन्द्र देव ऋषिपुत्र के पास आये और उनसे तपक का उद्देश्य पूछा।
यवक्रित ने कहा मैं सम्पूर्ण शास्त्रों और वेदवेदाँतो का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही यह तप कर रहा हूँ।
परन्तु ज्ञान तो गुरुमुख होकर अध्ययन करने से प्राप्त होता है महर्षि कुमार’, इन्द्र ने कहा।
‘गुरुमुख से वेदों की शिक्षा प्राप्त करने से में अधिक समय लगता है। इतना धैर्य मुझमें नहीं है, इसी से तप का मार्ग चुना है भगवन्’-यवक्रित बोलें। ‘
ज्ञान प्राप्ति के लिए यह उत्कृष्ट अभिलाषा तो श्रेयस्कर है कुमार, पर मार्ग वही है, इन्द्र देव ने समझाया-तप द्वारा आत्मा का कल्याण तो संभव है, पर ज्ञान साधना गुरुमुख होकर ही की जाती है।
इसके बाद इन्द्र तो चले गये, किन्तु यवक्रित ने बातों ध्यान नहीं दिया। उन्होंने और कठोर तप आरम्भ कर दिया। निरन्तर कठोर तप साधना में लगे रहने पर यवक्रित का शरीर कृश हो गया। देह में केवल हडिडयों के उभार ही दिखाई देने लगे। फिर भी इष्ट सिद्धि नहीं हुई तो उन्होंने निश्चय किया कि वे और अधिक कठोर तितिक्षा पर करेंगे। इस निश्चय के लिए उन्होंने एक यज्ञ में अपने रक्त से उसमें आहुतियाँ देंगे।
इस निश्चय के बारे में जब देवराज इन्द्र को पता चला तो वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रुप धारण कर उस स्थान पर आये जहाँ यवक्रित तप किया करते थे और गंगा के उस स्थान पर इन्द्र प्रतीक्षा करने लगे जहाँ ऋषिकुमार गंगा स्नान के लिए आया करते थे। यवक्रित जब स्नान करने आए तो उन्होंने देखा कि वृद्ध ब्राह्मण अंजलि में बार-बार रेत भर कर गंगा में डाल रहा है। यह देख कर उन्होंने पूछा-विप्रवर! आप यह क्या कर रहे है?”
वृद्ध ब्राह्मण का रुप धरे इन्द्र ने कहा, “यहाँ से लोगों को गंगा पर पुल बाँध देना चाहता हुँ।”
‘भगवन, यवक्रित ने कहा, “आप इस महा प्रवाह को रेत से किसी प्रकार नहीं बाँध सकते। इसलिए इस असंभव कार्य को छोड़कर जो कार्य सम्भव हो, उसके लिए प्रयत्न कीजिए।
अब वृद्ध ब्राह्मण ने घुमकर यवक्रीत की ओर देखा और कहा, “ऋषिकुमार जब आप शरीर को कृश करने वाले तप और देह कठोर त्याग द्वारा विद्या प्राप्ति करने के लिए यत्न कर रहे है और उसमें सफल होने की आशा रखते है तो मेरा यह कार्य असम्भव कैसे है? यवक्रित को समझते देर न लगी कि वृद्ध ब्राह्मण कोन है? उन्होने नम्रता पूर्वक अपनी भूल को स्वीकार करते हुए कहा, ‘देवराज! मैं अपनी भूल समझ गया। मुझे क्षमा किजिए।” और ऋषिकुमार स्वाध्याय अनुशीलन द्वारा ज्ञान साधना करने में जुट गए।
ईश्वर के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण क्या हैं ? स्वामी रामकृष्ण परमहंस से जब यह पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया-” इस संसार से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है, जिससे कि ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो सके।” बात कितनी ही सरल क्यों न हो, पर इस संसार से बड़ा प्रमाण और को नहीं है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि ईश्वर है। संसार का प्रत्येक परमाणु एक निर्धारित नियम के अनुसार काम कर रहा है। यदि उस नियम में तनिक भी व्यक्तिक्रम आ जाये तो विराट् ब्रह्माण्ड का अस्तित्व एक क्षण में नष्ट-भ्रष्ट हो सकता है। एक कण के विस्फोट से अनन्त प्रकृति में आग लग सकती है और संसार में अग्नि-ज्वालाओं की लपलपाती जिहृ सब कुछ चट कर सकती है।
सारे संसार का, समूचे ब्रह्माण्ड का अस्तित्व ईश्वर की सत्ता को प्रमाणित करता है। ब्रह्माण्ड शब्द -ब्रह्म और ‘अण्ड’ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है, जिसमें अगाणित विराट् अण्ड अस्तित्वमान हों। वैज्ञानिक यह मानते है कि आकाश में स्थित समस्त पिंड एक शक्ति को केन्द्र मानकर उसके चारों ओर चक्कर लगा रहे है। ये सभी पिंड अण्डाकार वृत में घुमते है, इसी कारण वैज्ञानिक इन घुमने वाले समस्त पिंडो को ब्रह्माण्ड कहते है।
पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ भी जीवन विद्यमान है, उसका जीवन आधार सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। 8 लाख 85 हजार मील व्यास वाला सूर्य का गोला 10 करोड़ 30 लाख मील की दूरी से पृथ्वी पर अनी प्रकाश-किरणें फेंकता है, जो 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुँचती हैं। दिनभर में यहाँ के वातावरण में इतनी सुविधाएँ इन प्रकाश-किरणों से एकत्रित हो जाती है कि रात आसानी से कट जाय। दिन-रात के इस क्रम में एक दिन भी यदि अन्तर पड़ जाये तो जीवन-सत्ता सकंटाग्रस्त हो सकती है और जिस ऊर्जा-स्त्रोत सूर्य से पृथ्वी वासी जीवनी- शक्ति प्राप्त करते है। वैज्ञानिकों की भाषा में सूर्य-तप्त गैसों का विशाल गोला है। नदी के तेज प्रवाह में जिस प्रकार भँवर पड़ते है, उसी प्रकार सूर्य में चलती रहने वाली तप्त-ज्वालाओं के अन्धड़ भँवर पैदा करते हैं। ये भँवर भी पृथ्वी पर जीवन-सत्ता को बनाये रखने से सहयोगी होते हैं।
सूर्य के लिए पृथ्वी समुद्र में एक बूद का सा नगण्य अस्तितव रखती है। जिस प्रकार एक गेंद के चारों और मक्खी नाचती हुई दिखाई दे, सूर्य यदि गेंद के बराबर हो तो पृथ्वी भी इस मक्खी से अधिक बड़ी नहीं होगी। फिर भारत में उत्तर-प्रदेश के एक किसान के घर में जी रही चींटी का सूर्य के सामने क्या अस्तित्व हो सकता है। लेकिन वह भी सूर्य से प्राप्त ऊर्जा के द्वारा अपने दिन मजे से काट लेती है।
पृथ्वी और सूर्य की तुलना गेंद और मक्खी से कि जा सकती है। पृथ्वी से भी छोटे और बड़े कितन ही ग्रह-उपग्रह अपन इस सौर-मण्डल में विद्यमान है। सूर्य के चारों और पृथ्वी की तरह घूमने वाले ग्रह, उपग्रह (चन्द्र) उल्का और घुमकेतु ये सब मिलकर सौर-मण्डल कहलाते है। अभी तक सौर-परिवार के करीब 100 सदस्यों के बारे में ही पता लगाया जा सका है।
ब्रह्माण्ड में ऐसे अनेकों सौर-मण्डल है और विस्तृत ब्रह्माण्ड में-अन्नत अन्तरिक्ष में अपने सौर-मण्डल की वैसी स्थिति है, जैसी कि दस फीट लम्बे और दस फीट चौड़े सफेद कागज पर एक बिन्दु की। यदि कोई कहे कि मेरी आँख का आँसू समुद्र में खो गया है तो यह कहना जितनी छोटी-सी बात होगी, भला समुद्र की अगाध जल-राशि में एक बूँद आँसू की क्या बिसात ? वैसी ही स्थिति ब्रह्माण्ड में सूर्य की है। सूर्य से बड़ा तारा, जिसे नरकियता क्रम के आगे वाले स्थान पर रखा जा सकता है, उससे 15 हजार गुनास बड़ा है। उससे बड़ा दूसरा तारा अण्टेयर्स सूर्य जैसे 3 करोड़ 60 लाख गोलों को अपने भीतर आसानी से बिठा सकता है। सूर्य और पृथ्वी से बड़े ही नहीं, छोटे सूर्य और ग्रह भी है। किन्तु यह सभी छोटे-बड़े सौर-मण्डल और ग्रह-उपग्रह विराट् ब्रह्माण्ड में निद्वन्द्व विचरण कर रहे है।
विराट् ब्रह्माण्ड का थोड़ा-सा अनुमान इस बात से आँखों से तीन हजार तों ही देख सकते है, जब कि वैज्ञानिक यन्त्रों से जितने तारे देखें जा सके है, उनकी गणना का अभी तक कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। ज्येष्ठ और मार्गशीर्ष माह में आकाश में एक क्षितिज की ओर सफेद पट्टी-सी दिखाई देती है। यह आकाश में एक क्षितिज की और सफेद पट्टी-सी दिखाई देती है। यह आकाश-गंगा जैसे असंख्यों तारों के गुच्छक और तारों के बादल है। बादलों में जिस प्रकार पानी की बूँदे होती है, उसी प्रकार इन तारा-मेघों में भी दूरबीन की सहायता से असंख्यों तारे देखे जा सकते है। सबसे छोटा दिखाई देने वाला तारा गुच्छक-शौरी कहा जाता है। इस गुच्छक में सूर्य 50 हजार तारे आ जाते है। वैज्ञानिकों के अनुसार तारों की संख्या कम से कम दो अरब होनी चाहिए। दिखाई देने वाले तारा-मण्डलों की ही यात्रा करने की योजना बनाई जाये और 800 मील प्रति घंटा उड़ने वाले विमान यात्रा पर निकला जाये तो एक बार में दिखाई देने वाले तारों को छूकर आने में ही कम से कम साढ़े चार करोड़ वर्ष लग जायेंगे।
सर्वाधिक चमकने वाले तारों की संख्या 20 है इनमें व्याध नाम का तारा सर्वाधिक दीप्तिमान सूर्य की तुलना में यह तारा 21 गुना अधिक है। कल्पना की जाये कि परमात्मा सूर्य के स्थान पर यदि व्याध तारे को नियुक्त करदे और वह धरती को प्रकाश देने लगे तो ज्येष्ठ मास में पृथ्वी का तापमान 2310 डिग्री फारनेहाइट ही है।
आकार की दृष्टि से भी तारों का वर्गीकरण किया जाता है। बड़े आकार वाले विराट् कहे जाते है और छोटे आकर वाले वामन कहलाते है। विराट् से भी जो अधिक बड़े है, उन्हें अति विराट् कहा जाता है। आर्द्रा भ्रगमण्डल में लाल रेग का एक विराटृ तारा है, जो सूर्य की तुलना में तीस करोड़ गुना अधिक बड़ा है। वामन केवल नाम के ही वामन है, अन्यथा वे भी भगवान विष्णु के वामन अवतार की तरह कम आर्श्चयजनक नहीं है। भार की दृष्टि से ये तारे सबको मात दे सकते है। यदि वामन तारे से चार घनफुट मिट्टी खोद कर लाई जाये और उसे पृथ्वी पर तोला जाये तो इतनी मिटृटी का वनज ही 224 टन होगा। वहाँ यदि पेड़-पौधे होते होंगे और गुलाब के फूल जैसा उसी आकार कोई फूल लगता होगा, तो उसे तोड़ पाना तो दूर रहा, उसकी एक पंखुड़ी भी मनुष्य नहीं उठा सकेगा। गुलाब के फूल के बराबर वाले फूल को पृथ्वी पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर उठाने के लिए क्रेन की जरुरत पड़ेगी?
इतने महान् आश्चर्यों से भरा यह विश्व ब्रह्माण्ड अपने ढंग से व्यक्थित रीति से चल रहा है। ईश्वर होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या कहा जा सकता है। अलेक्जेर्डर पोप का यह कथन ठीक ही है ईश्वर है। क्योंकि यह संसार लाखों करोड़ो वर्ष से चल रहा है और अनन्त-काल तक चलता रहेगा। इस तथ्या को थोड़ा इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि सूर्य अपने केन्द्र में 16000000 डिग्री सेन्टीग्रेड है। पृथ्वी पर उसकी किरणें आठ मिनट में पहुँच जाती है और वे अपने साथ प्रचंड गर्मी साथ लिए चलती है। यदि उनके साथ आने वाली गर्मी पृथ्वी पर सीधे-सीधे पहुँचने लगे तो पृथ्वी पर एक चींटी और घास का एक तिनका भी न दिखाई दे। समुद्र का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाय। लेकिन ऐसा नहीं होता, क्योंकि पृथ्वी के ऊपर अयन मण्डल की पट्टियाँ न चढ़ी होतीं तो पृथ्वी कभी की जलकर राख हो गई होती।
इसके अलावा सूर्य पृथ्वी की ओर थोड़ा भी पास खिसक आये तो धू्रव-प्रदेशों की बर्फ से पिघल सकती है और सारी पृथ्वी पर जल-प्लावन का दृश्य प्रस्तुत हो सकता है। जरा भी पास खिसक आने पर इतनी गर्मी पैदा हो सकती है कि पृथ्वी पर विद्यमान प्राणी कड़ाही के उबलते हुए तेल में तले जा रहे पकाडौं की तरह पक कर जल जाय और यदि सूर्य अपने स्थान से पृथ्वी की दूरी से थोड़ा भी हटकर पृथ्वी से जरा भी दूर चला गया, अपने स्थान से पाँच-सात फीट भी पीछे हट गया तो पृथ्वी पर समुद्र तो क्या मिट्टी तक जमकर बर्फ बन सकती है।
ऊपर की में पंक्तियोंग्रह-नक्षत्रों और ब्रह्माण्ड के विस्तार का थोड़ा-सा उलेख किया गया है, ये सभी सौर मंडल और ग्रह-नक्षत्र अपने क्षेत्र में रहते हुए ही अपने क्रियाकलाप चलाते है। थोड़े भी अपने स्थान से इधर-उधर होने पर सर्वनाश हो सकता है। वे अपने स्थान और क्षेत्र में रहते है, इसी में सन्तुलन और व्यवस्था बनी हुई है। सूर्य पृथ्वी को ठीक उसी प्रकार खींचकर बाँधे रहता है, सूर्य अपनी इस शक्ति से पृथ्वी और अन्य ग्रह-उपग्रहों को भी खींचे रखता है। इसी कारण है कि सूर्य अपन सौर-मंडल का नेता, संचालक, अनुशास्ता कहा जाता है।
यह सारे तथ्य बताते है कि ग्रहों की स्थिति और व्यवस्था, ब्रह्माण्ड का संचालन अत्यन्त बुद्धिमता पूर्वक किया जा रहा है। व्यवस्था या संचालन करने वाली उस शक्ति को नियम, शक्ति, सन्तुलन अथवा कुछ भी कहा जाये। अन्ततः यह मानना पड़ेगा कि उसका अस्तित्व ही जीवन का और दृश्य-अदृश्य सत्ता का आधार है, उसे ही परमात्मा कहा गया है। उपरोक्त तथ्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संसार को बनाने और चलाने वाला अद्भुत गणितज्ञ, विलक्षण इंजीनियर, सुयोग्य चिकित्साधिकारी, मौसमवेत्ता और अप्रतिम वैज्ञानिक है, उस सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करना अपने आप को जीवित मानने से इन्कार करने जैसा है।
क्योंकि जीवन के आविर्भाव से ही उसका नियामक सत्ता का पता चल जाता है। जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस सृष्टि में ऐसी व्यवस्था है कि वे सब सरलातापूर्वक पूरी होती रहें। साँस लिए बिना प्राणी एक पल भी जीवित नहीं रह सकता, सो प्रचुर मात्रा में हवा में उपलब्ध हैं। इसके बाद जल की आवश्यकता है, वह भी थोड़ा-सा प्रयत्न करने से प्राप्त हो जाता है। अन्न, हवा और जल के बाद तीसरे का महत्व क्रम की आवश्यकता है, सो उसके लिए साधन न जुटा सकने वाले प्राणियों के लिए के लिए प्रकृति में फल-फूल की व्यवस्था है सो बुद्धिधारी प्राणी थोड़े प्रयत्नों से अपनी यह आवश्यकता पूरी कर लेते है। इसके बाद समस्त उपादान आवश्यकता के अनुपात से प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त होते रहते है। इन सार्वभौम आवश्यकताओं के पूर्ति बिना संचालक, व्यवस्थापश्क के कैसे सम्भव हो सकती थी?
इस विस्तार और सुव्यवस्था क्रम से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह अस्वीकार करने का कोई भी कारण नहीं है कि सृष्टि, जीवन या ब्रह्माण्ड के कण-कण में, अणु-अणु में अनुशासन और व्यवस्था बनाकर रहने तथा उसे तोड़ने पर दंड देने वाली व्यवस्थापिका नियामक सत्ता का अस्तित्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। इस व्यवस्था सन्तुलन का नियमन करने वाली सत्ता का नाम ही ईश्वर है। उसके अस्तित्व को प्रमाणित करते हुए प्रसिद्ध दार्शनिक हर्वर्ट स्पेन्सर ने कहा है-ईश्वर एक विराट् शक्ति है, जो संसार की सब गतिविधियों का नियन्त्रण करता है। दार्शनिक काँट ने कहा है-नैतिक नियमों की स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण है। इन नियमों के अर्न्तगत रहते हुए ही यह विश्व ब्रह्माण्ड व्यस्थित और सन्तुलित क्रम से चल रहा है। इतने पर भी कहा जाय कि ईश्वर का अस्तित्व झूठ है तो इस कहने में ही यह आशय भी छिपा है कि यह संसार भी झूठ है।
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्धिद्यते परम््् । सत्येन विधृंत सर्व सर्वं सत्ये प्रतिय्ठिम ॥25॥
सच बोलना सबसे श्रेष्ठ है, सत्य से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, यह सब कुछ सत्य से ही धारण किया हुआ है, सत्य में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, सत्य से ही प्रतिष्ठा होती है। ॥25॥
परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म परमपिता आदि कई नामों से पुकारी जाने वाली एक अनादि शक्ति का प्रकाश और उसकी प्रेरणा से ही इस जगत का और जगत के पदार्थों को स्फुरण मिल रहा है। उसी के प्रभाव से सृष्टि के विभिन्न पदार्थो का ज्ञान, कार्य एवं सौर्न्दय प्रतिभासित होता है। वही अपने समय रुप् में अवतीर्ण होता रहता और सत्य रुप् में प्रतिष्ठित होता रहता है। साधक जब विराट् ‘जगत ‘ के रुप् में परमात्मा का दर्शन करता है, उन्हीं चेतना को सूर्य, पृथ्वी चन्द्रमा तारागण आदि में प्रकाशित होते देखता है तो सत्य का दर्शन होता है जगत और अध्यात्म का स्थूल और सूक्ष्म का, दृश्य और तत्व का जहाँ परिपूर्ण सामंजस्य होता है, वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है। और यह सत्य जब जीवन साधना का आधार बनता है तब जगत की प्रेरक और सर्जन शक्ति का परिचय प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रकारों ने सत्य को ही जीवन का सहज दर्शन माना है महर्षि विश्वामित्र ने कहा है -”सत्येनार्क प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्य व्यक्ति परोधर्मः स्वर्गे सत्ये प्रतिष्ठितः॥ अर्थात सत्य से ही सूर्य तप रहा है, सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है और सत्य पर ही र्स्वग प्रतिष्ठित है।”
समग्र अध्यात्म दर्शन का मूल आधार सत्य हैं पूर्व और पशिचम जिस प्रकार का एक ही अखण्ड क्षितिज में स्थित है उसी प्रकार जगतृ और अध्यात्म, दृश्य और अदृश्य सत्ता एक ही सत्य के दर्शन असम्भव है। सत्य के साथ शिव और सुन्दर भी जुड़े हुए है। शिव अर्थात आनन्द कल्याण और सुन्द अर्थात् पुलक उत्पन्न करने वाली भावनशत्मक विशेषत। सब जगत् की समस्त घटनाओं को केवल ब्राह्म घटनाएँ समझकर उनका विश्लेषण किया जाता है तो उनसे कोई आनन्द नहीं मिलता। उस स्थिति में घटनाएँ और विश्लेश्षण केवल एक शुष्क मशीनी उपक्रम मात्र बन कर रह जाते है। पटरी पर रेल के समान सड़क पर मोटर के समान, शिलाखंडी पर नदी की धारा के समान मन मानस पर भी जगत की धारा बहती रहती है। चित्त पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। और सब कुछ निर्जिव नीरसा, अरुचिकर परस्पर और अहोभाव का समावेश कर लिया जाये तो परमपित परमात्मा की यह सृष्टि के निर्माण में अपनी पूरी कलात्मकता का परिचय दिया है और इस सृष्टि को इतना सुन्दर बनाया है कि उसमें रस भाव से देखा जाये तो यह उपवन असंख्य प्रकार के पुष्पों से मंहकता पुलकता अनुभव होने लगे। रात को तारों भरे आकाश में कितने सुन्दर, टिमटिमाते हुए दिये जला दिये है, नीले आकाश की काली चादर में कैसे चमकते हुए मोती टाँग दिये है।
वैज्ञानिकों ने जब शक्तिशाली दूरबीनों से आकश की ओर देखा तो कविह्नदय विज्ञान वेत्ता और भी पुलक उठे। सान्माय दृष्टि से सभी तारें, ग्रह नक्षत्र एक समान दिखाई देते है। लेकिन दूरबीनों से देखने पर पता चलता है कि आकाश में तरह-तरह के रंग बिरंगे झाड़फानूस टंगे हुए है। सामान्य दृष्टि से लोग केवल चन्द्रमा को ही देख पाए और चन्द्रमा को देखकर ही लोगों के ह्नदय इतने तरंगित हो गये कि उसकी सुन्दरता ने अनेक व्यक्तियों का कवि बना दिया। विश्व की तमाम भाषाओं में चन्द्रमा को लेकर, उसकी सुन्दरता पर जितनी कविताएँ लिखी गई है उतनी कविताएँ कदाचित ही किसी विषय को लेकर लिखी गई हों। स्थूल दृष्टि से चन्द्रमा 2160 मील व्यास का बुझा हुआ आकाशीय गोला है वहाँ की जमीन ऊबड़-खाबड़ छोटे बड़े खड्डो और टेकरियों वाली है। लेकिन रात के समय जब तारों भरे आकाश में, पूर्णिमा के दिन सोलह कलाओं के साथ चमकता है तो उसकी सुन्दरता देखते ही बनती है।
पृथ्वी के अतिरिक्त आकाश में और भी ग्रह है। उन ग्रहों की संख्या नौ बताई जाती है। यह ग्रह अपने सौर मंडल के ही है। अपने सौरमंडल के अतिरिक्त आकाश में और भी लाखों करोड़ो असंख्य सौरमंडल है, जिनका अपना अपना परिवार है। स्थूल रुप में अपने सौरमंडल के ग्रह परिवार में ग्रहों की स्थिति संरचना चाहे जैसी हो परन्तु भारतीय मनीषियों ने उन्हें परमात्मा को अनुपम आद्धितीय और सुन्रतम कलाकृति के रुप् में जाना माना है तथा प्रत्येक माँगलिक अवसर उसकी पूजा का विधान किया है। इस परम्परा का कुल मिलाकर इतना ही कारण है। इस परम्परा का कुल मिलाकर इतना ही कारण है कि भारतीय मनीषा पदार्थो और वस्तुओं के स्थूल विश्लेषण की उपेक्षा जीवन की समग्रता और उसके आँतरिक्ष सौनदर्य को अधिक महत्व देती रही। पिछले दिनाँक वैज्ञानिकों ने अन्तरिक अनुसंधान के लिए कई अन्तरिक्ष यान छोड़ें। रुस नें स्पुतनिक-1 और 2 लूनिक 2, और 3, स्पुतनिक 3, वोस्टोक 1,2,3,4,5 और 6,7 और 10, जोड़ा 5 सीयूग 2 व 3, जोड़ 6 प्रोटन, 4 आदि अंतरिक्ष यान छोड़े। अमेरिका ने भी पायनियर, मीदास एक्स प्लोटर, मर्करी, रेड स्टोन, मेरीनर, सिनक्रीम रैजर, जेमिनि, सर्वेयर, ओ.ए.एस. अपोलो आदि ने कई एक अन्तरिक्ष यान छोड़ें। अंतरिक्ष अभियान के इस क्रम में इन कार्यक्रमों को भारी सफलता मिली।
इन यानों में से कुछ मंगल, वृहस्पति, शुक्र और शनि के पास तक भी पहुँचे है। यानों द्वारा पृथ्वी पर सम्बन्धित ग्रहों के जो चित्र भेजे गये, उनसे ग्रहों की वास्तविक स्थिति को तो पता चलता है पर सृष्टीकर्ता की अद्भुत कलाकारिता भी उनसे स्पष्ट होती है। हमारी पृथ्वी का तो केवल एक ही चन्द्रमा है किन्तु वरुणग्रह के दो चन्द्रमा है वहाँ के आकाश में ये दोनों चन्द्रमा चमकता दिखाई देता है इसी प्रकार यूरेनस ग्रह के पाँच चन्द्रमा है।
गत 5 मार्च को 1973 को अन्तरिक्ष अनुसंधान अभियान में भेजे गये वायजर 1 ने वृहस्पति ग्रह से 2 लाख 77 हजार कि.मी. की दूरी लगभग 15000 चित्र भेजे। स्मरणीय है यह ग्रह पृथ्वी से अधिकतम 72 करोड़ और न्यूनतम 64 करोड़ की.मी. दूर रहता है किन्तु यह आकार में पृथ्वी से 1912 गुना बड़ा है।
वायजर 1 ने वृहस्पति के जो चित्र भेजे, वे बहुत ही सुन्दर है। इन चित्रों की मदद से वृहस्पति ग्रह की संरचना, धरातल का स्वरुप, वातावरण रेडियोधर्मी विकिरण और रेडियोधर्मी तरंगो का बहाव तथा ग्रह के ऊपर व्सास गैस के बादलों और ग्रह के गुरुत्वाकर्षण वे चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र को समझने में बड़ी सहायता मिलती है। वायजर-1 अन्तरिक्ष यान द्वारा वृहस्पति ग्रह के 5 से 15 किलो मीटर और कही कही तो 1 किलोमीटर के सुस्पष्ट चित्र प्राप्त हुए। इस ग्रह के पास छह घंटे तक उड़ान भरने के बाद वायजर एक अपने उड़ान मार्ग में आने वाले 13 उपग्रहों में से 5 उपग्रहों के पास से गुजरा जिनके नाम अमेस्थ्या, पेरियासिस, गेनीमोड, आई.ओ.और केसिस्ये। वृहस्पति और उसक उपग्रहों का इतनी निकटता से अध्ययन ने अनेक तथ्यों का पता चला है उदाहरण के लिए कैलिस्ये नामक उपग्रह इतना ठंडा है कि उस पर ऊपर की ओर हमेशा बर्फ उठती रहती है। अंतरिक्षयान ने उसके जो चित्र भेजे उन्हें देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने सुन्दर मनोहरी गेंद को मुलायम रेशमी गुच्छों से लपेट दिया हो। वृहस्पति का एक उपग्रह आई.ओ.पृथ्वी के चन्द्रमा जितना बड़ा है। इस पर वृहस्पति ग्रह के विकिरण निरन्तर आते रहते है लेकिन इसके बावजूद भी उसके धरातल में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। यह ग्रह नाँरगी और लाल रंग का है। कैलिस्य गहरे मटमैले और पीछे धब्बों वाला तथा भूरा रंग लिये हुए है। वायजर एक ने वृहस्पति के तमाम उपग्रहों की रंग विरंगी चित्र प्रतिकृतियाँ भेजी है।
वायजर एक उपग्रह वृहस्पति और उसक चन्द्रमाओं की जानकारी जुटाने के बाद शनि, नेपच्यून, यूरेनस और प्लूटो ग्रहों क बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए आगे अग्रसर हो गया। यह अन्तरिक्ष यान शनिग्रह के पास संभवतः 13 नवम्बर 1980 को पहुँचेगा पर इसके पूर्व ही पायनियर इलेवन गत सितम्बर 1976 के प्रथम सप्ताह में शनिग्रह के पास पहुचٌ और वहाँ से इस अंतरिक्ष यान ने शनि के अनेकों चित्र भेजे। वृहस्पति के बाद अपने सौर मंडल में शनि सबसे बड़ा ग्रह है। यह ग्रह “पृथ्वी’ से दूरबीनों की सहायता से चमकीले तारे के समान दिखाई देता है। सूर्य के बाद क्रम से पड़ने वाले नौ ग्रहों में का स्थान छठवाँ है। यह सूर्य के चारों ओर 1 अरब 44 करोड़ की औसत दूरी पर चक्कर काटता है। शनिग्रह पर यदि रहना पड़े तो वहाँ का एक वर्ष पृथ्वी के साढ़े अट्ठाईस वर्षों के बराबर होगा। पृथ्वी के हिसाब से वहाँ के दिन भी छोटे है, केवल 5 घंटे 7 मिनट की रात और लगभग इतने ही समय का दिन। अर्थात् पृथ्वी पर जितनी अवधि में हम 365 दिन रात देख जलेते है उतनी ही अवधि में शनिग्रह पर लगभग 877 दिन रात देखने पड़ें इस का कारण यह है कि शनि अपनी धूरी पर बहुत तेजी से घूमता है।
अब तक तो शुक्र ग्रह को सुन्दरता का प्रतीक समझा जाता था किन्त शनिग्रह संभवतः सौरमंडल के सुन्दरतम ग्रहों में से है। इसके चारों ओर कई वलय है, जो पहनाई गई मालाओं के समान दिखाई देते है। यह वलय शनिग्रह की सुन्दरता को चार चाँद लगा देते हैं। पृथ्वी से टेलिस्कोप द्वारा देखने पर यह वलय अद्भुत और अनुपम सुन्दर दिखाई देते है। इन्हें सर्वप्रथम वैज्ञानिक गैलीलियों ने सन् 1910 में देखा था दिखाई पड़ने वाले तीन प्रमुख वलयों की कुल चौड़ाई लगभग 65 हजार किलो मीटर है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि ये वलय किसी भकटे हुए चन्द्रमा से बने है जो शनि के गुरुत्वाकर्षण से टुकड़े-टुकड़े हो गये। समझा जाता है तो शनि के धरातल से ये टुकड़े सूर्य के प्रकाश में इस तरह चमकते हुए दिखाई देते है। जैसे किसी ने असंख्यों बल्ब आकाश में टाँग दिये हों। पायनियर यान द्वारा भेजे गए इन वलयों के चित्र से यह पता लगाया गया है कि ये वलय हिम से लिपटी चट्टानों या बर्फीली चट्टानों से बने हो सकते है। पायनियर ग्यारह ने शनिग्रह के जिस भाग के चित्र भेज है वह पृथ्वी पर से नहीं दिखाई देता। कारण कि पृथ्वी से शनि का एक ही पहलू देखा जा सकता है । इस यान द्वारा भेजे गये संकेतों के आधार पर शनि के सबसे बड़े उपग्रह टाइटन पर जीवन का अस्तित्व होने संभावना आँकी गई है। यह उपग्रह बुध उपग्रह से भी बड़ा है। यह तथ्य उस अभियान के परिणाम स्वरुप सामने आए है जो मनुष्य ने पृथ्वी से दूर अन्तरिक्ष का अनुसंधान करने के लिए आरम्भ किया।
पृथ्वी से बहुत दूर अन्तररिक्ष में अभियान कर मनुष्य अपने और अपनी दुनिया के एक नये ही स्वरुप का दर्शन किया है । यह दुनिया कितनी सुन्दर है? यह सब देख जानकर उसके निर्माण कर्त्ता, सृष्टा और नियामक की सूझ-बूझ कलाकारिता पर मुग्ध हुए बिना नहीं रहा जा सकता। अभी तक इस विराट् ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में बहुत थोड़ा एक बआ हजारवाँ अंश भी जानने में नहीं आया है पर यह सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जून को जिस विराट् रुप का दर्शन कराया था, वैज्ञानिक अनुसंधानों से प्रकट होने वाले तथ्य उसके अनुरुप यर्थात ही सिद्ध हो रहे है। इस विराट् दर्शन के बाद ही अर्जुन के मुँ से हठात् यह शब्द निकल पड़॥ “आप तो अदिदेव और अनादि काल से चले आ रहे पुराण पुरुष है। आप इस जगत के पर आश्रय है और आप ही परमधाम है। यह अनन्त रुप् आप ही के द्वारा यह समाज विश्व विख्यात किया गया है। इस चराचर जगत को अहोभाव से देखने पर किसी भी व्यक्ति के मन में यह उद्गार फूट पड़ना स्वाभाविक है।
र्स्वग एक ‘ उपलब्धि’ मानी गई है, जिसे प्राप्त करने की इच्छा प्रायः हर मनुष्य को रहती है। कई लोग उसे संसार से अलग ही भी मानते है और विश्वास करते है कि मरने के बाश्द वहाँ पहुँचा जाता है या पहुँचा जा सकता है। इस मान्यता के अनुसार लोग र्स्वग प्राप्त करने के लिए जप, तप, पूजा, पुण्य परमार्थ और साधना उपासना भी करते है। इस पृथ्वी से अलग ही अन्यान्तर लोक में र्स्वग जैसै किसी स्थान का अस्तित्व है, अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकाँक्षा को द्योतक है जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।
मनुष्य की यह इच्छा स्वाभविक ही है जिस स्थान पर वह है, उससे आगे बढ़े। वह उन वस्तुओं को प्राप्त करे, जो उसके पास नहीं है। मनुष्य जन्म के रुप् में उसे संसार तो मिल चुका, जहाँ सुख भी है और दुःख भी, अनुकूलताएँ भी है तथा प्रतिकूलताएँ भी। लेकिन मनुष्य की इच्छा रहती हे कि दुःख, कष्टों और प्रतिकुलताओं से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहे। यह अधिकाधिक सुखी, सन्तुष्ट और सुविधा-समपन्न स्थिति को प्राप्त करे। यह स्थिति जीते-जी प्राप्त हो जाय अथवा मरने के बाद यह अलग विषय है। लेकिन आस्तिक और सरलविश्वासी व्यक्तियों से लेकर बुद्धिजिवी, हर वस्तु और विषय को तथ्य और तर्क की तराजू पर तोलने वाले परिष्कृत बुद्वि के यहाँ तक की नास्तिक और अश्रधालू लोग भी अधिक सुखी, अधिक प्रसन्न ओर अधिक सुविधा सम्पन्न जीवन जीने की आकाँक्षा रखते है।
इस दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार इस मिले हुए से आगे बढ़कर-जो अभी तक नहीं मिला है, उसे प्राप्त करने की आकाँक्षा करते है। उस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए जाने वाले प्रयत्नों से पुरुषार्थ को श्रेय मिलता है, वृत्ति को सन्तोष होता है और उपलब्धि को गौरव प्राप्त हुआ है। र्स्वग प्राप्त करने के लिए जप, तप, पूजा, पाठ करने वाले लोगों को साधना के क्षेत्र में बल-बुद्धि इसी भूमि पर प्राप्त की जा सकती है। यदि इस लोक को हटकर अन्यान्तर-लोक में कोई र्स्वग है भी सही, जो संदिग्ध है, पर यदि इस मान भी ले तो उसे प्राप्त करने में वही लो समथ्र हो पाते जो इस जीवन वह स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकी तो मरने के बाद, जब मनुष्य की अंधिकाँश शक्तियों और सामर्थ्य नष्ट हो जाती है तो किसी बलबूते पर उसे र्स्वग को प्राप्त किया जा सकता है?
यदि वास्तव में किसी दूसरे लोक में र्स्वग जैसा कोई स्थान है तो उसे प्राप्त करने के लिए इसी जीवन में पात्रता उपार्जित करनी पड़ती है। र्स्वग की कल्पना इस रुप में की जाती है कि वहाँ मनुष्य के आसपास आनन्द तथा प्रियता बनी रहती है। संसार के सारे धर्मग्रन्थों में र्स्वग का वर्णन आता है। उसके सम्बन्ध में न जाने कितनी कथाएँ प्रचलित है और अनेकानेक विशेषताएँ बताई जाती है। किसी भी धर्म अथवा मतसप्प्रदाएँ में र्स्वग के सम्बन्ध में चाहे जो मान्यताएँ अथवा धारणाएँ क्यों न प्रचलित रही हों, उनमें विभिन्न्ता भी क्यों न मिलती हो, लेकिन एक बात सभी प्रतिपादनों में समान रुप से मिलती है कि वहाँ सब कुछ प्रिय तथा आनन्ददायक है। र्स्वग में ऐसे कोई कारण नहीं है, जिनसे मनुष्य को कष्ट, क्लेश अथवा दुःख हो। ऐसा र्स्वग जिसकी विशेषता आनन्द तथा प्रियता है, मनुष्य अपने इसी जीवन में रच सकता है। यदि अपनी मनःस्थिति को परिस्थितियों के अनुसार इस योग्य ढाल लिया जाय कि उसमें कही कोई प्रतिकूलताएँ हों भी तो उनका कोई प्रभाव न पड़े तथा न ही उनके कारण दुःख या शोक-सन्ताप की अग्नि में जलना पड़े। वरन् प्रतिकूलताओं के रहते हुए भी मनुष्य प्रियता तथा आनन्द की अवस्था में बना रहे। यह स्थिति प्राप्त करना मनुष्य के अपन वश की बात है। वह इस प्रकार का वाँछित र्स्वग अपने लिए यहीं पर बना सकता है, निशिचत रुप से बना सकता है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। आवश्यकता केवल अपने दृष्टिकोण में थोड़ा-सा परिवर्तन भर करने की हैं। दुःख और कष्ट क्यों न उत्पन्न होते है, इसका कारण यदि ढूँढा जाय तो एक स्थूल-सा कारण बाधा का विरोध समझ में आता है। मनुष्य जो कुछ चाहता है या जो चाहने की इच्छा करता है। यह क्षोभ और निराशा ही दुःख के रुप् में अनुभव होती। यह क्षोभ और निराशा ही दुःख के रुप् में अनुभव होती है। इस स्थिति में यह मानकर चलना चाहिए कि इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसकी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हों। इच्छाओं की पूर्ति में सन्तोष करने के स्थान पर यदि प्रयत्नों और कर्तव्यों का पालन ही ठीक ढंग से सम्पन्न करने की रीति-निति अपना ली जाय तो जिस र्स्वग या आनन्द की परिस्थितियों पर निर्भर समझा जाता है, वह अपनी मुट्टी में आज जाता है। गीता के कर्मयोंग का यही तार्त्पय है कि हम अपनी प्रसन्नता को कर्तव्य-परायणता एवं प्रयतनशीलता पर अवलम्बित रखे जो कुछ करे, उच्च आदर्शो से प्रेरित होकर करे और इस बात में सन्तोष माने कि एक ईमानदार एवं पुरुषार्थी व्यक्ति को, जो कुछ करना चाहिए था, वह हमने पूरे मनोयोग के साथ किया । अभीष्ट वस्तु न भी मिले, किया हुआ प्रयत्न असफल भी हो जाय तो भी इसमें दुख मानने, लज्जित होने पर मन छोटा करने की कोई बात नहीं है। क्योंकि सफलता व्यक्ति के प्रयत्न पुरुषार्थ के अतिरिक्त और भी कई बातों पर निर्भर करती है। इनमें से कई कारण तो ऐसे है, जिन पर मनुष्य का अपना को वश नहीं चलता। उदाहरण के लिए-अच्छी प्राप्त करने के लिए खेत की भली-भाँति जुताई-बुआई की जाय, उत्तत बीज बोया जाये चाक-चौबन्द रखवाली ककी जाये, लेकिन वर्षा पर तो किसान का नियन्त्रण नहीं है, बादल यदि अधिक बरस पड़े अथवा बिल्कुल भी न बरसे तो इसके लिए क्या किया जा सकता है ?
किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरे मन से प्रयास किये जाये, लेकिन दूसरे व्यक्ति एक लक्ष्य-बिन्दु पर पहूँचते-पहुँचते आद्यात कर बैठे, अवरोध खड़े करदे तो क्या किया जा सकता है ? अस्तु, इच्छाओं को पूर्ति के स्थान पर कर्तव्य पालन या प्रयत्शीलता को ही अपने सूख का केन्द्र मान लिया जाये और अपने मन की बनावट भी ऐसी हो जाय कि सफलता-असफलता की चिन्ता किये बिना अपने कर्तव्य-पालन में ही वह सन्तुष्ट रहने लगे तो समझना चाहए कि दृष्टि कोण सही हो गया और अपना आन्न्द, अपनी प्रसन्नता अपने हाथों में आ गई, यदि प्रसन्नता को कर्तव्य परायणता पर आधारित कर लिया गया है तो अपनी प्रसन्नता भी अपने हाथ में है, उससे वह शक्ति स्वतः ही स्फूर्त होती रहेगी, चित्त को आनन्द, उत्साह और सन्तोष से भरे रह सकती हैं। इस प्रकार हर घड़ी प्रसन्न और प्रफूल्तित रहने का सूत्र हाथ आ जाने पर यह सोचना र्व्यथ है कि जब कभी सुलता मिलेगी या अभीष्ट वस्तु प्रापत होगी, तभी प्रसन्न होंगें इसकी प्रतीक्षा में न जाने कितना समय बीता सकता है और फिर भी निश्चित नहीं है कि सफलता मिलने पर प्रसन्न हुआ ही जा सकेगा।
गीताकार की यह प्रेरणा कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो- न तो सफलता के लिए आतुर बनों और न ही इच्छापूति के लिए परेशान ही हो ओ। अपना र्स्वग आप बनाने का अचूक नुस्खा है। चित्त को शान्त और स्वस्थ रखकर अपने कर्तव्यों को एक पुरुषार्थी के समान भली-भाँति पूरा करने में ही सन्तुष्ट रहने वाले व्यक्ति उस सुख-शान्ति, आनन्द और प्रिय परिस्थितियों को प्राप्त कर सकता है, जिसकी कल्पना र्स्वग के रुप् में की जाती है। अपने आप का बनाया हुआ यह र्स्वग अधिक सत्य, अधिक सरल और अधिक महत्पूर्ण है और सत्य तथा व्यवावहारिक भी।
महान शरीर के भीतर रहने वाली जीवात्मा के समान ही स्थूल भौतिक जगत के अन्तराल में भी एक प्राणवान चेतना भरी हुई। इस चेतना को ईश्वर, परमात्मा, बह्म भगवान कुछ भी कहा जाय, उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता पर इतना स्पष्ट है कि उसी व्यापक ब्रह्माण्डीय चेतना में जीवधारी अनेको घटक स्वतंत्र रुप से विचरण करते हैं। सागर में विद्यमान बूँदे को तरह ब्रह्माण्डीय चेतना में जीव चेतना का अस्तित्व बताया गया हैं सागर की बूँदो का जिस प्रकार कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता उसी प्रकार जीवात्मा भी परमात्मा से पृथक भिन्न नहीं है।
जीवसत्ता और ब्रह्मसत्ता एक दूसरे से इस प्रकार जुड़ी हुई है कि उनमें परस्पर आदान प्रदान का क्रम अनवरन रुप् से चलता रह सकता है। यह पारस्परिक संबन्ध सूत्र इतने मतले है कि उन्हें देख और समझसकना हर किसी के लिए संभव नहीं हो सकता। सामान्यतः लोग अपने को शरीर मात्र मानते है और उसी के पोषण पालन में लगे रहते हैं। उन्हें आत्मा की प्रतीती तक नहीं होती यदि यह प्रतीती होती तो इस दिशा में भी कुछ करने की बात सोची जा सकती थी। प्रतीती तक नहीं होती, यदि यह प्रतीती होती तो इस दिशा में भी कुछ करने की बात सोची जा सकती थीं। प्रतीती के इस अभाव के कारण ही ब्रह्मसत्ता को समझ पाना और उससे सर्म्पक मिलाना संभव नहीं होता। यदि इस दिशा में, आत्मसत्त की प्रतीती करते हुए, योगभ्यास और तप साधना द्वारा उसे ब्रह्मसत्ता के साथ संम्बद्ध करने का प्रयास किया जाय तो आत्म चेतना को जागृत करते हुए वह सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है, जिसमें ब्रह्मसत्ता ओत प्रोत है। किसी सूखे जलाशय को नदी से संबद्ध कर देने पर जिस प्रकार वह जल से परिपूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार जीवसत्ता भी ब्रह्मसत्ता के समान समर्थवान बन सकती है।
इस स्थिति की आत्म जागृति कहते है। पाँतजलि योगसूत्र विभूतिपाद में 18 से 44 सूत्र तक इस प्रकार योग और तप साधना से अनेकों प्रकार की सिद्धियों तथा दिव्यशक्तियों के प्राप्त होने का उल्लेख आता हैं। अतीत और अनागत का ज्ञान, सभी प्राणियों की भाषा समझने, पूर्वजन्म के बारे में जानने, दूसरों के मन की बात समझ जाने की क्षमता, अन्तध्यानि, आत्मबल दूरदर्शन, सर्वज्ञान, भूख प्यास होने का उल्लेख योग सूत्र में मिलता है। योगसूत्र के विभुतिपाद से 36 वे सूत्र में जिन छह सिद्धियों का उल्लेख किया गया है वे इस प्रकार हैं-
ततः प्रतिभश्रावण वेदनादर्शस्वाद वार्ता जायंते
अर्थात-उससे प्रातिभ, श्रवण, वेदन, आदर्श अस्वाद और वार्ता छः सिद्वियों का स्वरुप् इस प्रकार बताया है-
1.प्रातिभ-मनमें सूक्ष्म अर्थात् अतीन्द्रिय व्यवावहित अर्थात छिपी हुई वस्तु, विप्रकृष्ट अर्थात सुदूर स्थ्ति, अतीत और अनागत वस्तुओं घटनाओं को जानने की क्षमता।
2.श्रवण-श्रोत्रेन्द्रिय से दिव्य ध्वनि और दूरवती्र शब्दों का श्रवण ।
3.वेदना-दिव्य र्स्पश का अनुभव।
4.आदर्श-दिव्यदर्शन की क्षमता।
5.आस्वाद-दिव्य रस का आस्वादन करने की क्षमता।
6.वार्ता-नासिका द्वारा दिव्य गंधो का अनुभव करने की क्षमता।
इन क्षमताओं की प्राप्ति कैसे होती है ? इस संबन्ध में महर्षि पाँतजलि ने कहा है कि चेतना के विकास हेतु किये जाने प्रयासों, ध्यान धाराणा के अभ्यासों से ये क्षमताएँ प्राप्त होती है। विभूतिपाद में कहा गया है-
सत्व पुरुषयोर त्यन्ता संकीर्णयोंः प्रत्यम विशेषो
योगः परार्थान्यरवार्य सयंमात् पुरुष ज्ञानम॥
(विभूतिपाद 35)
अर्थात चित्त और पुरुष जो परस्पर भिन्न है, इन दोनों की प्रतीतीयों में किसी भेद का आभास न होना ही योग है। उनमें से पदार्थ प्रतीती से भिन्न जो स्वार्थ प्रतीती है, उस में सयंम करने से, पुरुष को ज्ञान होता हैं । अर्थात पुरुष विषयकः प्रज्ञा उत्पन्न होती है। इस प्रज्ञा प्रभाव से ही उपरोक्त छः सिद्धियाँ प्राप्त होती है। चित्त अर्थात बुद्धि और पुरुषः अर्थात चेतना बृद्धि और चेतना परस्पर भिन्न है किन्तु उनकी भिन्नता का भान नहीं होता। सुख, दुःख आदि का अनुभव व्यक्ति का हृदय, मन, मस्तिष्क ही करता है, किन्तु चेतना उन सबसे परे ओर अप्रभावित रहती है यद्यपित लगता यही है कि सुख दुःख की अनुभूति आत्मा को हो रही है।
सुख दुःख के अनुभव को भोग कहते है और भोग का अनुभव करने वाला भोक्ता कहा जाता है। सामान्य बुद्धि आत्म चेतना को ही भोक्ता समझती है किन्तु वस्तुतः ऐसा होता नहीं। स्वच्छ शाँत जलाशय में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब बनता है। उस पानी में कोई पत्थर फेंका जाय और लहरें उत्पन्न की जाँय तो चन्द्रमा का प्रतिबिमब भी लहरों के साथ हिलता, ढुलता, प्रतीत होता दिखाई देता है। किन्तु वास्तव में पानी में उठने वाली लहरों के कारण चन्द्रमा के कुछ बनता बिगड़ता नहीं। इसी प्रकार सुख दुःख आदि प्रिय अप्रिय परिस्थितियों में चेतना अप्रभावित ही रहती है। किन्तु आत्म चेतना में सुख दुःख का प्रभाव देखने वाली वृति या भ्राँति का शास्त्रकार ने कहा है। पदार्थ प्रतीति अर्थात् भ्राँति, वस्तुस्थिति से भिन्न, पर दूसरा होने का आभास।
इसके विपरित स्वार्थ प्रतीति समझनी चाहिए। सरल भाषा में इसे तत्वदृष्टि, आत्म बोध, आत्म चेतना के वास्तविक स्वरुप का ही ज्ञान भी कह सकते हैं। इस आत्म स्वरुप में ही ध्यान धारणा को संयम अथवा स्वार्थ प्रतीति में संयम कहा गया हे और उसी से प्रज्ञा की उत्पत्ति छह सिद्धियों के अतिरिक्त आठ अन्य सिद्धियों का भी उल्लेख किया गया है। इन सिद्धियों को भी संयम का ध्यान धारण समाधि का परिचय कहा गया है। यह आठ सिद्धियाँ इस प्रकार है-
1.अणिमा-अणू के समान सूक्षम रुप धारण कर लेना।
2.लधिमा-शरीर को हल्का कर लेना। इससे जल थल, नभ सर्वत्र चलने की क्षमता आ जाती है।
3.महिमा-शरीर को बड़ा कर लेना।
4.गरिमा-शरीर को भारी बना लेना।
5.प्राप्ति-इच्छित पदार्थों को संकल्प मात्र से ही प्राप्त कर लेना।
6.प्राकाम्प-बिना रुकावट भौतिक पदार्था संबंधी इच्छाएँ अनायास ही पूरी हो जाना।
7.वशित्व-पंच भूतों, पंचतत्वों और तज्जनित पदार्थो का वश में हो जाना।
8.ईशित्व-इन तत्वों और भौतिक पदार्थो को मन चाहे रुप में उत्पन्न करने तथा उन पर शासन करने की सामर्थ्य।
इन प्रसिद्ध अष्ट सिद्धियों के अतिरिक्त काय सम्मत और अनभिछात की सिद्धियों का प्राप्त होने का भी उल्लेख शास्त्रकार ने किया है। काय सम्मत् से तार्त्पय शरीर की सुन्दर आकृति, दीप्तिमान अंग, अंगो का बलवान और वज्र की भाँति, दृढ़ तथा परिपूर्ण हो जाना। अनाभिछात से तार्त्पय साधक के कार्य में पंचतत्व अपने गुण और लक्षणों के कारण बाधा न पहुँचने से है। वह पृथ्वी के भीतर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे कोई व्यक्ति जल में प्रवेश कर लेता है। पृथ्वी का धर्म स्थूल भाव (कड़ापन) कहा गया है। पृथ्वी का यह धर्म उसके लिए बाधा नहीं बनता। उस पर यदि पत्थरों की वर्षा की जाय तो भी वे उसके शरीर का पर आद्यात नहीं पहुँचा सकते। इसी तरह जल का गीलापन उसके शरीर को गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती अर्थात सर्दी, गर्मी, वर्षा आदि कोई भी भूतों के धर्म उसके शरीर में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकती। इन सिद्धियों की उपलब्धि का मार्ग बताते हुए शास्त्रकार ने कहा है कि ये सिद्धियाँ पाँचों भूतों पर विजय प्राप्त करने से होती है। योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र 44 में कहा है पाँचों भूतों की पाँच अवस्थाओं में संयम (ध्यान, धारणा, समाधि) करने से योगी को पाँचभूतों पर विजय प्राप्त हो जाती है।
ये पाँच भूत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच तत्व है। इन्द्रियों द्वारा अनुभव होने वाले रुप को स्थूल अवस्था, लक्षणों की स्वरुप अवस्था, तन्मात्रा और सुक्ष्म रुप को सुक्ष्मावस्था, प्रकाश क्रिया और स्थिति को अन्वन्य अवस्था नया प्रयोजन अर्थवत्ता को अर्थतत्व अवस्था कहते है। इनमें संयम अर्थात मन, बुद्धि, चित्त और भाव की एकाग्रता, तन्यमयता तथ तदृश्यकता को संयम कहा गया है।
यह सिद्धियाँ पढ़ने सुनने पर अतिर जिस लगती है परन्तु इनके पीछे एक सुनिश्चित विज्ञान निहित है। सुनिश्चित वैज्ञानिक कारणों से अतिरंजित लगने वाली ये सिद्धियाँ हस्तगत् कवत् करतलगत हो जाती है। यह प्रत्यक्ष ही देखा और अनुभव किया जा सकता है कि मनुष्य अपनी उपलब्ध क्षमताओं के सहारे प्रत्येक वस्तु का मनचाहा प्रयोग कर सकता है। दूसरे शब्दोँ में इसे मनुष्य की चेतन क्षमता का भौतिक वस्तुओं पर नियंत्रण भी कहा जा सकता है। उपलब्ध शक्ति और जाग्रत चेतना का ही यह प्रभाव है तो उसमें कोइ्र सन्देह कारण नहीं है कि यदि अपनी चेतना को पूर्णयता जागृत और विकसित कर लिया जाये तो उसका उपरोक्त प्रकार से उपयोग करना संभव न हो सके।
आत्मसत्ता ब्रह्मसत्ता की प्रतिनिधि है। प्रति ही नहीं अंश और प्रतीक भी है। बाधा इतनी मात्र है कि भ्राँतियों के कारण अथवा प्रमादे के कारण अथवा इस तथ्य को न जानने के कारण आत्मचेतना का ऐसा विकास संभव नहीं है। यदि उस आत्मचेतना को जागृत किया जा सके और योगाभ्यास तथा तप साधन के द्वारा उसका विकास किया जा सके जो उस जागृति के द्वारा जो कुछ इ्रंद्रिययातीत है वह सहज ही इन्द्रयम्य बन सकता है और जो बुद्धि की सीमा के बाहर है वह सहज ही उसकी पकड़ में जा सकता है।
मनुष्य को भगवान ने बहुत देकर इस पृथ्वी पर भेजा है। शारीरिक-दृष्टि से वह कई प्राणियों की तुलना में कमजोर जरुर ठहरता है, पर बोद्धिक-दृष्टि से उसके पास जो सामर्थ्य संचित है, परमात्मा ने बुद्धि और ज्ञान का-जो बहुमूलय उपहार उसे प्रदान किया है, वह अपने-आप में इतना महत्वपूर्ण है कि एक इसी के बल पर उसने संसार के समस्त प्राणियों की पीछे छोड़ दिया। कोई व्यक्ति दूसरों से तुलना करके अपने को भले ही अभाव-ग्रस्त और असहाय समझता रहे, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह न अभावग्रस्त है न निर्बल और निर्धन। यों रोना ही रोना हो तो-समपन्न से सम्पन्न व्यक्ति भी अपने पास किन्हीं वस्तुओं के अभाव की बात सोचते हुए असन्तोष की आग में जलते रह सकते है। लेकिन वास्तविकता यह है कि दयनीय से दयनीय हालत में पड़ा रहने वाला मनुष्य न अभावग्रस्त है और न दयनीय।
अपनी महत्ता और सर्वोपरिता को प्रत्यक्ष रुप् से स्वीकार न किये जाने के बाद भी मनुष्य को अन्तरंग चेतना में श्रेष्ठता का भाव छिपा हुआ है। यँहा इस बात से सिद्ध होता है कि दुःखी व्यक्ति भी अपने दुःखों से छूटकारा प्राप्त करने के लिए मरना पसन्द नहीं करते। भावावेश में आकर कोई व्यक्ति आत्महल्या करले, यह बात अलग है। किन्तु सच्चाई यह है कि लोगों की अन्तरंग चेतना में मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का भाव इस प्रकार अपने जड़े जमाये हुए है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने जीवन को खोना नहीं चाहता।
स्थिति और बाह्य उपलब्धियों की दृष्टि से कोई व्यक्ति भले ही साधन हीन दिखाई दे, पर यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्मजात रुप् से सब कुछ न सही, तो भी बहुत कुछ अवश्य मिला है। साधन सम्पन्न मनोबल प्रत्येक मनुष्य के पास है। बुद्धि की चमत्कारी क्षमता उसे प्राप्त है। इस क्षमता से वह संसार में उपलब्ध अगण्ति विशेषताओं से सम्पन्न पदार्थो को अपने लिए प्रयुक्त करता और उन पर अपना स्वामितत्व् स्थापित कर लेता है। उसकी बौद्धिक क्षमता को, उसके चमत्कारों को देखते हुएए कहा जा सकता है कि यह असीम साधन सम्पन्न संसार मानो उसी के लिए विनिर्मित किया गया है।
अपने बुद्धि-कौशल से उसने ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं का निर्माण किया है और अपनी सुविधा सामग्री की असीम मात्रा में बढ़ाया है। इतना होने पर भी मनुष्य को सन्तोष नहीं हुआ, यह आर्श्चय की ही बात है। वह अधिकाधिक साधन-सुविधाएँ प्राप्त करने के प्रयन्न कर रहा है। उसके ये प्रयत्न अभी भी शिथिल नहीं हुए है, वरन् दिनों-दिन प्रखर ही होते चले जा रहे है। इससे सहज ही यह आशा बनती है कि अगले दिनों मनुष्य और भी अधिक साधन-समपन्न होगा।
निस्सन्देह बुद्धि-कौशल से उपार्जित साधनों की अधिक मात्रा में प्राप्ति होने के कारण मनुष्य का वैभव अतिशय कहा जाता है, नगण्य समझा जाता है और अभाव माना जाता, इसका कारण सोचने-समझने की पद्धति में आई त्रुटियाँ ही है। यह अलग विषय है। संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि मनुष्य विशव के अन्यान्य प्राणियों की तुलना में अधिक साधन-सम्पन्न है और यही नहीं, मनुष्य अपने पूर्वजो की तुलना की जाय तो आकाश-पाताल का अन्तर प्रतीत होगा। यही नहीं, अभी सौ-दो-सौ वर्ष पूर्व के समाज से सम्पन्नता और साधन- सुविधाओं की दृष्टि से आज के समाज की तुलना की जाये तो यही कहना पड़ेगा कि वर्तमान स्थिति दो सौ वर्ष पूर्व के मनुष्य के लिए सर्वदा अकिंचित ही है। यह उपलब्धिलाँ असाधारण ही नहीं अदभूत भी है और इन्हें प्राप्त करने में एक ही मानवी-विशेषता सक्षम हो सकी है, वह-मनुष्य का बुद्धि-कौशल तथा उसका पुरुषार्थ।
मनुष्य की उपलब्धियों की विपुलता की दृष्टि से देखा जाये तो वर्तमान स्थिति को निस्सन्देह सुखद सौभाग्य कहा जायगा। लेकिन जब यह प्रश्न किया जाता है कि क्या इन उपलब्धियों का सदुपयोग किया जाता है, कि क्या इन उपलब्धियों का सदुपयोग किया तो उत्तर में निश्चित ही बगलें झाँकना पड़ेगा। जो प्राप्त किया गया है, उसका सदुपयोग किस प्रकार किया जाय, यह न जानने अथवा इस दिशा में कुछ न सोचने के कारण, जिस-तिस ढंग से जैसा भी जो भी उपयोग किया जा रहा है, उससे कष्ट और विनाश की विभिषकाएँ प्रस्तुत हुई है। विज्ञान को आज असीम शक्ति प्राप्त है। यदि उस शक्ति का उपयोग सृजनात्मक प्रयोजनों में किया जाये तो ऋतु-प्रभावों कें नियन्त्रण, आँधी-तूफान से होने वाले विनाश की रोकथाम, वर्षा और बाढ़ का सन्तुलन, समुद्र के खारेपन का निराकरण खाद्य -वस्तुओं का अभिवर्धन और उनके स्तर में सुधार, विद्युत-शक्ति की प्रखरता, थोड़े से व्यय से यातायात की सुविधाएँ तथा रोग-नियन्त्रण जैसे अनेकानेक उपयोगी-कार्य किये जा सकते है और वर्तमान दुनिया को अधिक सुखी, अधिक सुन्दर तथा अधिक सुमुन्नत बनाया जा सकता है।
इन दिनों शिक्षा, शिल्प-कला धन और शास्त्रास्त्रों के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने तथा उनकी सामर्थ्य विकसित करने की ही बात सोची जा रही है। यह ध्यान देना लगभग अनावश्यक ही समझा जा रहा है कि इन उपलिब्धयों का श्रेष्ठतम सदुपयोग किसी प्रकार किया जाये तथा उन्हें किस प्रकार प्रयुक्त किया जाये कि उससे सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ाई जा सकें। यदि इस दिशा में आगे भी उपेक्षा बरती जाती रही तो उपलब्धियों का बढ़ता जा रहा भंडार मनुष्य के लिए अगले दिनों विनाश की परिस्थितियाँ ही प्रस्तुत करेगा। उदाहरण क लिए विज्ञान परमाणु रहस्यों की खोज लाने में समर्थ हुआ और एक बड़ा शक्ति भण्डार मनुष्य के हाथ में आ गया। पर इस उपलब्धि का सदुपयोग करने के स्थान पर दूरुपयोग करने की दिशा में ही अधिक प्रसास हुए है। अणुबम बना लिये गये है और उनका निर्माण इतनी विपुल संख्या में किया जा चुका हें कि उससे समस्त धरती को क्षण भर में जला-भुनाकर भस्म कर दिया जाय। संयुक्त-राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित विवरणों के अनुसार यह विदित होता है कि संसार कके अणुशक्ति सम्पन्न देशों के पास अणुबम, परमाणु बम, उद्जन बम आदि विनाशकारी उपकरणों का इतना विपुल भंडार भरा हुआ है कि इस पृथ्वी को एक बार नहीं सात-सात बार नष्ट किया जाय।
इसी प्रकार विज्ञान की कृपा से पहले की अपेक्षा अधिक धन-सम्पत्ति उपार्जित की जा सकी है। सम्पन्नता के कई नये स्त्रोत हाथ लगे हे। इन स्त्रोतों का सदुपयोग न किये जाने के कारण बढ़ा हुआ धन विलासित और शोषण उत्पीड़न के नये आधार खड़े हुए है। कला ने पशु-प्रवृत्तियों को भड़ाकर उसे पतनोन्मुख तथा कुमार्गगामी बना दिया। शिक्षा ने मनुष्य को अंहकार बढ़ाया, धूर्तता ने अपने हथियार पैने किये और जनसाधाराण को दिग्भ्रान्त करने की कुशलता बढ़ाई। यह अनर्थ किसी एक क्षेत्र विशेष में नहीं हुआ, वरन् इसकी व्यापकता सर्वग्राही बन गई है।
मनुष्य का शरीर ऐसी विशेषताओं और विभूतियों से सम्पन्न है कि यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो इसी देह में देवत्व की झाँकी मिलती। उसकी मानसिक विशेषताएँ अद्भुत है और अद्भुत है-उनकी सामर्थ्य यदि उन्हे सृजनात्मक दिशा में लगाते और लोक-मंगल के लिए उपयोग की बात सोची जाती, इस धरती की गरिमा तथाकथित र्स्वग से कहीं बहुत अधिक बढ़ीि-चढ़ी हो सकती थी। लेकिन इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय कि सदुपयोग की बात सोचते गले उतरते ही नहीं बनती है।
मनुष्य की प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में रसानुभूति करती है और उसके माध्यम से जीवन-क्रम को सुव्यवस्थित रीति से चलाती है। जीवन-निर्वाह के लिए यह आवश्यक है और प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को इसके लिए प्रर्याप्त सम्पदा दी है, जिसे जीवन-शक्ति के रुप में देखा जा सकता है। उसका थोड़ा अंश ही इन्द्रियों के माध्यम से खर्च करना पर्याप्त है। लेकिन लोग इस जीवन-शक्ति का इन्द्रियलिप्सा के लिए इस बुरी तरह दुरुपयोग या अपव्यय करते है सारी जीवन-शक्ति ही इन प्रयोंजनों में खर्च हो जाती औ उच्च आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिउ कुछ भी नहीं बचता। इस विषय पर ‘लीगफार स्पिरिचुअल डिस्कवरी’ की इटली शाखा ने अन्त चेतना का विस्तार और उसकी ‘अभिव्यक्ति’ पर एक शोध-ग्रन्थ प्रकाशित किया है। इस ग्रन्थ में अनेकों तर्क। प्रमाण और उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बतायो गया है कि “अर्थ-परायण स्वार्थपरता और इन्द्रिय-प्रधान भोग-लिप्सा यदि प्रबल रहेगी इन दोनों प्रवृत्तियों में निम्न-स्तरीय आकर्षण इतना अधिक है कि वह मनुष्य को ऊँचा सोचने और ऊँचे आदर्शो को अपनाने का अवसर ही नहीं देती है-”
वस्तुतः यदि इन्द्रियों के माध्यम से अन्तः चेतना का उपयोग तुच्छ प्रयोजन में करके उनकी महान् शक्ति को बर्बाद होते रहने से रोका जा सके और उन्हें उद्देश्ययुक्त दिशा में नियोजित किया जाये तो इस महान् शक्ति के सदुपयोग द्वारा साधारण स्थ्ति का मनुष्य भी अति उच्च स्थिति में पहुँच सकता है। प्रश्न उठता है कि बर्बादी को रोकने और उपलब्धियों को उच्च प्रयोजन में लगाने की बात मनुष्य को क्यों नहीं सूझती ? इसका एक ही उत्तर है कि मनुष्य ने धर्म, नीति औ सदाचार के आदर्शो को महत्व देते हुए समा का अतिमहत्पूर्ण ढाँचा तैया करने का लक्ष्य तो घोषित किया, पर उस ढाँचा तैयार करने का लक्ष्य तो घोषित किया, पर उस ढाँचे में भसी सर्कींर्ण-स्वार्थपरता और पक्षपात की इतनी मात्रा भर दी गई है वे उपयोगी आधार एक प्रकार से अनुपयोगी बनते जा रहे हैं। मध्यकालीन सामन्वादी परम्पराएँ इसी प्रकार की रही है। उस मय एक वर्ग दूसरे वर्ग को लूटने-मिटाने में अपनी बहादुरी मानता रहा है और इस आधार पर समृद्धि ही नहीं, वरन् प्रशंसा भी प्राप्त करता रहा है। मध्यकाल का इतिहास ऐसी ही मार-काट से भरा पड़ा है और उसके पृष्ठों में आक्रमणकारियों को योद्धा के रुप में चित्रित किया जाता रहा है?
वीरता का यह कैसा मजाक है? इस तरह धर्मनीति का वर्ग विशेष के लिए प्रचलन प्रतिपादन करने पर भी उसकी महत्ता कोई बढ़ी नहीं, वरन् उन्हें उल्टे घटी ही है पिछले दिनों दुमुँही नैतिकता का मापदंड भी चलता रहा है। अपनों के लिए और मापदंड तथा दूसरों के लिए और तहर के मापदंड। इस तरह के तथाकथित धार्मिक और नैतिक प्रतिपादनों की इतनी भरमार है कि उसके उपदेशों में नीति, धर्म, उदारता, सहायता आदि का समावेश तो है, परायों से इस तहर के सदव्यवहार की उतनी आवश्यकता नहीं समझी गई है, उसे लूटना ठ्गना या सताया जाना उतना बुरा नहीं समझा जाता कई धर्मो में तो उस धर्म को न मानने वालों को म्लेच्छ और काफिर कहकर उन्हें लुटने की, उनसे दुर्व्यवहार करने की खुली छूट है।
कुछ व्यक्ति वर्तमान समस्याओं के समाधान और प्रगति के लिए सद्ज्ञान को पर्याप्त मानते है। उनकी मान्यता है कि शिक्षा ही मनुष्य को सभ्य बना सकती है। कुछ इस विचार धारा के भी है धर्म मान्यताएँ ही मनुष्य को उदास बना सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि समस्या की तह में पहुँच जाय और तथ्यों पर विचार करते हुए यह देखा जाये कि जो ज्ञान, प्रचलन एवं साधन उपलब्ध है उनका सदुपयोग हो रहा है अथवा नहीं।
जब समाज का इतना विकास नहीं हुआ था, आज जैसे साधन उपलब्ध नहीं हुए थे और मनुष्य अविकसित स्थिति में पड़ा था, तब कोई मनुष्य अपनी शक्ति से सीमित बुराई और सीमित हानि ही पहुँचा सकता था। उतनी अव वह स्थिति नहीं। अ बवह सुविधा-साधन उपलब्ध है जिनकी सहायता से यदि व चाहे तो असीम बुराई कर सकता है। यही बात अच्छाई के सम्बन्ध में भी है, साधनहीन अविकसित स्थिति में हमारे पुर्वज अपनी श्रेष्ठता को भी सीमित मात्रा में सीमित क्षेत्र में ही फैला सकते थे। इसी प्रकार पुरातन-युग में जब दुनिया बिखरी हुई थी और मनुष्य के साधन सीमित थे, तब उस समय के अवाँछनीय कार्य भी सीमित-हानि पहुँचाते थे और अनुचितदृष्टिकोण के कारण क्षति भी सीमित होती थी, लेकिन अब विज्ञान ने दुनिया को बहुत छोटा-सा बना दिया है। संचार और यातायात के साधनों ने दूरी समाप्त करदी है और दुनिया के देश एक ही नगर के गली-मुहल्लों जैसे बन गये है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति या समुदाय अनी उपल्धियों का दुरुपयोग करना चाहे तो वह बहुत हानि पहुँचा सकता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति चाहे तो श्रेष्ठतस को सारे संसार में बढ़ा और फैला सकता है। विज्ञान ने मनुष्य को इतने साधन और इतनी सुविधाएँ उपलब्ध करा दी है कि जब जाति, धर्म, रंग और सप्रदाय के आधार पर वर्गीय स्वार्थो को अलग रख कर सोचना संभव नहीं है, उसके लिए व्यापक दृष्टिकोण अपना पड़ेगा। दुनिया इतनी छोटी हो गई हैक् और विज्ञान ने प्रगति करली है कि अब विश्व को एक इकाई मान कर ही चलता होगा। यह परिसीमन या विकास मनुष्य के अपने बृद्धि कौशल का ही परिणाम कहा जाना चाहिए, आवश्यकता इस बात की है कि अपनी उपलब्ध्यों को सदूपयोग विश्व को एक इकाई मानकर किया जाय। जहाँ भी, जो भी, अवाँछनीयता जम गई है उसे उखाड़ कर ऐसा प्रचलन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी हो गया है कि उसमें उपलब्ध्यों का सदुपयोग किया जा सके।
एक दृष्टि से देखा जाये तो मृत्यु जीवन का अन्त है और जन्म जीवन का आरम्भ । दूसरी दृष्टि के विचार करने पर यही बात उलट जाती है और मृत्यु नये जीवन की तैयारी है तथा जन्म मृत्यु की ओर बढ़ ने लगता है, जीवन के जो गिने चुने क्षण या वर्ष प्राणी को मिलते है, वे एक-एक कर चुकने लगते है तथा मृत्यु के साथ ह नये जन्म की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। मनुष्य नया जीवन ग्रहण करने की तैयारी करने लगते है।
जन्म और मृत्यु वस्तुतः जीवन के दो पड़ाव है। उन्हें दो छोर कहना भी गलत होगा क्योंकि एक छोर से आरंभ कर दूसरे छोर पर अन्त हो जाता है। लेकिन जन्म और मृत्यु के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। जन्म लेने के बाद मनुष्य या प्राणी को निश्चित रुप से मरना पड़ता है। मरने के बाद पुनः जन्म होता है अथवा नहीं इस संबंध में मतभेद है। विभिन्न धर्मों की अलग अलग मान्यताएँ है पर जो तथ्य और प्रमाण मिलते है उससे पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि होती है।
सन 1929 की घटना है। दिल्ली में जन्मी तीन वर्षीया लड़की जिसका नाम शाँतिदेवी था, जैसे ही बोलने लगी वैसे ही अपने घर वालों से कहने लगी कि वह पिछले जन्म में मथुरा रहती थी, उसके पति का नाम केदारनाथ है आदि आदि। आरम्भ में इस बात पर घर वालों ने विशेष ध्यान नहीं दिया पर जैसे-जैसे लड़की बड़ी होने लगी वह इसी बात को कई बार दुहराती और अपने घर तथा घरवालों के बारे में बताती। नौ साल की होते होते वह अपने माता-पिता से जिद करने लगी कि उसे मथुरा ले जाया जाय ताकि वह अपने घरवालों से मिल सकें।
बहुत जिद करने पर शाँति के माता-पिता ने उसके बताये पते पर केदारनाथ जी को लिखा और आग्रह किया कि वे किसी दिन दिल्ली आये। एक दिन केदारनाथजी बिना कोई पूर्व सूचना दिये दिल्ली पहुँच गये। नौ वर्ष की लड़की उन्हें देखते ही पहचान गई और अपनी माँ को कासीफल का साग, आलु बड़े तथा पराठे बनाने के लिए कहा। यह केदारनाथ जी का प्रिय भोजन था। चौबैज ने शाँतिदेवी से कई ऐसे प्रश्न पूछे, जिनके उत्तर उनकी पत्नी जिवित होने पर ही दे सकती थी। शाँतिदेवी ने उन सभी प्रश्नों के ठीक ठीक उत्तर दिये। भोजन परोसते समय शाँतिदेवी ने अपने पूर्वजन्म के पति को उलाहना भी दिया कि तुमने तो वायदा किया था कि मेरे मरने के बाद दूसरा विवाह नहीं करोगे फिर क्यों विवाह कर लिया।
शाँतिदेवी के पुनर्जन्म का यह समाचार जब अखबारों में प्रकाशित हुआ तो इसे लेकर कई प्रतिक्रियाएँ हुई कईयों ने इसे पुनर्जन्म की घटना भी बताया और अनेकों ने मात्र स्तर कहा। वास्तविकता को परखने के लिए दिल्ली के तीन प्रतिष्ठित व्यक्ति जिनमें एक गाँधीजी के निकटतम मित्र पत्रकार, एक प्रसिद्ध वकील और एक बड़े व्यापारी थे शाँति को साथ लेकर मथुरा गये। वहाँ पहुँच कर उन्होंने स्टेशन पर ही शाँति को तरह-तरह से भुलावे दिये लेकिन शाँतिदेवी ने तमाम भुलावों में न आकर अपने श्वसुर, पुत्र, जेठ और घर के अन्य सदस्यों को पहचान लिया तथा यह प्रमाणित कर दिया कि पिछले जन्म में वह इस घर की कुल वधू थी। अमेरिका के डा. र्स्वावेन्सन जो पुनर्जन्म के मामलों का अध्ययन और शोध कर रहे थे, उन्होंने भी सन् 1951 में इस मामले की दुबारा जाँच की और तथ्यों को सही बताया।
सन् 1951 में सहारनपुर में भी ऐसी ही एक घटना घटी। इस घटना का विवरण धर्मयुग और नवनीत के भूतपूर्व संपादक श्री सत्यकाम विद्यालंकार ने नवनीत में प्रकाशित किया था श्रीमती वंदना का परिवार सहानपुर के सम्पन्न और प्रतिष्ठित परिवारों में से एक था। एक दिन उन्हें डाक से चिट्ठी मिली कि दो साल की एक लड़की बार बार आपके परिवार से संबंधित होने की बात कहती है। उसके माता पिता संकोच वश कुछ कहना नहीं चाहते लेकिन मुझे विश्वास है कि यह पुर्नजन्म का मामला है। पत्र में उस परिवार से सर्म्पक करने पर निवेदन भी किया गया था। पहले तो श्रीमती वंदना ने इसे फ्राड समझा और पत्र पर कोइ्र ध्यान नहीं दिया। एक बार जब वे हारनपर के ही एक महिलाश्रम को कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रही तो बालिका उनके पास आई, साथ में उसकी माँ थी। उस बालिका ने वंदनाजी की ओर इशारा कर कहा यह रही मेरी भाभी और यह गुड्डी है। श्रीमती वंदना जानती थी कि दो ही लड़कियाँ उन्हें भाभी कहती थीं एक तो उनकी स्वर्गीय लड़की सुधा, जिसकी 21 वर्ष की आयु में चार साल पहले मृत्यु हो चुकी थी और दूसरी जयमाला, जिसे बालिका ने गुड्डी कहा था और उस समय वह श्रीमती वंदना के पास ही बैठी थी। गुड्डी जयमाला का बचपन का नाम था, अब उसे सभी जयमाला कर कर पुकारते थे। श्रीमती वंदना को यकायक कुछ दिनों पहले मिली चिट्ठी की याद आ गई पर उनका मन इस बात पर विश्वास करने को नहीं हो रहा था। उक्त बालिका जिस का नाम, सरला था, वंदनाजी की गोदी में आकर बैठ गई। सरला की माँ उस समय महिलाश्रम द्वारा चलाये जा रहे स्कुल के प्रबंधकों में से थे। कई तरहों के सवाल जवाब के बाद वंदनाजी सरला को अपनी कोठी ले गई ताकि वास्तविकता का पता लगाया जा सके। वंदनाजी की कार जैसे ही कोठी के सामने पहुँची वैसे ही सरला ने अपनी सीट पर से उतरते हुए कहा आ गई मेरी कोठी कार में से सबसे पहले भी सरला ही उतरी। उतरते ही वह कोठी के अन्दर तेजी से इस तहर दौड़ती चली गई जैसे वह कोठी उसकी जानी पहचानी हो। सरला ने कोठी में पिछले जन्म की अपनी अलमारी, पुस्तकों कपड़ों और अन्य वस्तुओं के बारे में बताया जो अक्षरशः सत्य निकली।
नौ साल की आयु तक सरला को अपने पिछले जन्म की सभी बातें याद रहीं बाद में वह उन बातों को धीरे धीरे भूलने लगी। इस घटना का विवरण लिखते हुए श्री विद्यालंकार ने लिख है, पिछले दिनों यात्रा में मुझे श्रीमती वंदना, जिनकी आयु लगभ 60 वर्ष थी मिली। उन्होंने मुझे वह घटना बताई। यह घटना आत्मा की जन्म जन्मान्तरों में होने वाली यात्रा का समर्थन करती है। पूर्व जन्म संबंधी इस घटना के ये अनुभव पूरी तरह प्रामाणिक है ऐसा मेरा विश्वास है। क्योंकि श्रीमती वंदना से मैं स्वयं बहुत अच्छी तरह परिचित हूँ।
तुर्की के दक्षिण पूर्व इलाके में अदना नायक स्थान पर मारे गये एक व्यक्ति की आत्मा ने महमुद अतलिंकलिक केघर में पुत्र के रुप में जन्म लिया। लड़के का नाम इस्माइल रखा गया। एक दिन स्माइल अपने पिता क साथ बैठा हुआ था तभी एक फेरी वाला वहाँ से निकला। स्माइल ने उसे आवाज दी। पिता ने समझा कि बेदा शायद कोई खाने पीने की चीज खरीदना चाहता होगा। फेरीवाल भी यही समझा, पर दोनों ही उस समय दंग रह गये जब इस्माइल ने कहा कि, अरे महमूद! तुमने अपना धन्धा कबसे बदल दिया। तुम तो पहले साग सब्जी बेचा करते थे।
बात एक दम सही थी, पर फेरीवाल ताज्जुब में आ गया। चार वर्ष के इस लड़के को, जिसे पहले कभी नहीं देखा और न ही उसके परिवार से कोई जान-पहचन थी कैसे यह मालूम हुआ कि वह पहले सब्जी बेचता था। उसने पूछा-पर साहबजादे तुम्हें कैसे मालूम कि मैं पहले साग सब्जी बेचा करता था। इस पर स्माइल ने कहा, मालूम कैसे नहीं। तुम मुझसे ही तो साग सब्जी खरीदा करते थे। मेरा नाम आबिद है। महमूद को याद आया कि वह आबिद से ही सब्जी खरीदा करता था पर आर्श्चय और संदेह के मारे उसका बुरा हाल था। उसने कहा, “जहाँ तक मुझे याद है आबिद तो छः साल पहले कत्ल हो चुका है। आप वह कैसे हो सकते हो ?”
इस्माइल ने और भी ऐसी कई बाते बताई ‘जिनके कारण यह विश्वास करना पड़ा कि आबिद ने ही इस्माइल के रुप में फिर जन्म लिया था। जब आबिद की हत्या हुई तब उसके तीन बच्चे थे, गुलशरा, जैकी और हिकमत। आबिद की हत्या के बाद उसके दो बच्चों को भी हत्यारों ने मार दिया था। पुनर्जन्म के इस मामले ने तुर्की में तहलका सा मचा दिया था। सामान्यतः मुसलमान देशों में पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं किया जाता, इसलिए इस घटना की खूब छानबीन की गई, पत्रकारों से लेकर धर्मगुरुओं तक ने इस्माइल की तरह-तरह से परीक्षा ली। पर यह न मानने को कोई सूत्र हाथ में नहीं आया कि इस्माइल पूर्वजन्म में आबिद था। इस्तब्बल (तुर्की) की आत्मविधा तथा वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद ने इस घटना की जाँच की और कहा, “यह स्पष्ट ही जीवात्मा के देहातंरंण का मामला है। हम इस मामले की रिपोर्ट अध्यात्म वेत्ताओं की अन्तर्राष्ट्रीय परिषद में देंगे।
सन 1953-54 में अमेरिका के मर्सर नाम कस्बे में एक साधारण परिवार में जुड़वा लड़कियों ने जन्म लिया। दोनों को ही खेलन कूदने का बड़ा शौक था और पढ़ाई लिखाई में उनका कम ही मन लगता था। पर जैसे-जैसे दोनों बड़ी होने लगी, गेल गम्भीर रहने लगी और ऐसी बाते कहने लगी जो उसने न तो कभी पड़ी थी और न ही सुनी है। उदाहरण के लिए वह कुछ यहूदियों के नाम लेती। आरंभ में तो वह अपनी बहन से ही इस तरह की बातें करती परन्तु पिता को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने पूछा, “तम इन लोगों को कैसे जानती हो। यहाँ आस-पास तो कोई यहूदी नहीं है।” गेले ने बताया कि ये लोग जर्मनी के है और पिछले जन्म में उसके साथ रहे थे। इन लोगों के साथ वह हिटलर के यातना शिविर में रही थी और उस शिविर में ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
गेले बार बार इस तरह की बात दोहराती तो उसके पिता ने अमेरिका के एक पुनर्जन्म विशेषज्ञ को यह सब बताया। परामनोविज्ञान शास्त्री डा. जूलहर्ट ने इस मामले की गम्भीरता से जाँच की और पाया कि गेले जो बातें कहती है वे सब सही है। तथ्यों के रुप में उन के प्रमाण भी प्राप्त हुए है। आर्श्चय की बात तो यह कि ईसाई परिवार में जन्म लेने के बावजूद भी गेले अपने को यहूदी मानती थी। 18 साल की आयु में भी उस पर पिछले जन्म केक संस्कार इतने प्रभावशाली थे कि वह अपने कस्बे के गिरजे में न आकर वहाँ से 15 मील दूर स्थित यहूदियों के उपासनाग्रह में जाती थी।
पुनर्जन्म के प्रभाव स्वरुप ऐसी एक नहीं असंख्यो घटनाएँ है। आये दिन इस तरह की एक न एक घटना प्रकाश में आती ही रहती है और इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है वरन् जीवन यात्रा मील का एक पत्थर है जिसे पार करने के बाद यात्रा की ओर भी मंजिले आती है। अस्तु, मृत्यु से डरने का कोई कारण नहीं है।
यह निशिचत है कि एक बार जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित रुप से आयेगी ही। मृत्यु को निश्चित और अनिवार्य जानकर उससे भयभीत होने का न तो कोई कारण है और नहीं उससे घबड़ाने की आवश्यकता है जन्म और मरण का युग्म है। इसी तथ्य को स्पष्ट करते
हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वें नेभे जनाधियाँः । न चैव भविष्यामः सर्वे व्यमतः पद्म॥
देहिनो ऽसिमन्यथा देहे कौमार यौवन जरा। तथा देहान्तर प्राप्तिधीरस्थित न मुर्ह्मात॥ अध्याय 2/12/13
अर्थात कदाचित मै नहीं था ऐसी बात नहीं है और तुम नहीं थे ऐसी भी बात नहीं है। और ये राजा भी नहीं थे, ऐसी बात नहीं। इतना ही नहीं, इसके बाद हम सभी नहीं होंगे, ऐसी बात नहीं, जिस प्रकार इस देह में कमार युवा और वृद्धावस्था होती है उसी प्रकार इस आत्मा को दूसरी देह प्राप्त होती है।
इस धु्रव सत्य को जान कर मृत्यु के प्रति निर्भय और निश्चित रहते हुए जीवन को उल्लास के साथ जिया जा सकता है और उत्सव की तरह जीवन पर्व मनाया जा सकता है।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता निद्रा त्रन्द्रा भयं क्रोध आलस्य दीर्धसनित।
अपनी उन्नति चाहने वाले को निद्रा तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और कार्य बिलम्ब, छः दोषों का त्याग कर देना चाहिए।
जल की यह विशेषता है कि जिस भी बर्तन में रखा जाये वैसा ही आकार ग्रहण कर लेता है। लोटे में रखने पर लोटे जैसा और बाल्टी जैसा बन जाता है। नदी की धारा में मिलकर तंरगो के रुप में परिवार्तित हो जाता है। वस्तुतः उसका अपना कोई स्वरुप नहीं है। विभिन्न प्रकार के पात्र ही अपने अनुरुप जाल का स्वरुप गढ़ते है। भासित होने वाला स्वरुप पात्रों का होता है न कि जल का। पात्र बदल देने से उसका स्वरुप भी बदल जाता है। दिखाई पड़ने वाले स्वरुप को ही यर्थात मान बैठना भूल है।
संसार के विषय में भी यही बात लागू होती है। जो कुछ भी अच्छा बुरा दिखाई पड़ता है वह आन्तरिक कल्पनाओं, मान्यताओं, का प्रतिबिंब मात्र है। दर्पण वस्तुओं के स्वरुप को प्रतिबिम्बत करता है। अपनी मान्यताएँ ही अपने अनुरुप संसार को गढ़ती तथा दर्पण के बिंब के समान दिखाई पड़ती है। मन जैसी कल्पना करता है। वे कल्पनाएँ ही भले बुरे संसार को गढ़ती तथा सुख दुःख का कारण बनती है।
अपना आपा श्रेष्ठ हो तो श्रेष्ठताओं का दिर्ग्दशन होता है। अन्दर का आनन्द संसार में भी छलकता हुआ दिखाई पड़ता है। दृष्टिकोण परिष्कृत हो तो काँटो में पुण्य का सौर्न्दय ही परिलक्षित होता है। अन्यथा विकृत दृष्टि तो पुष्पों के सौर्न्दय सुरभित गंध को एक किनारे रखकर काँटो को ही देखती है। एक ही वस्तु एक ही परिस्थिति किसी के दुख एवं किसी के सूख का कारण बन जाती है। कारण स्पष्ट है अपनी मान्यताएँ कल्पनाएँ एवं विचारणाएँ एक ही स्थिति के दो व्यक्तियों को ही परस्पर विरोधी प्रकार की अनुभूतियों का कारण होती है। हँसने वाले व्यक्ति को संसार हँसता हुआ तथा रुदन करने वाले को रोता हुआ दिखाई पड़ता है। सामान्यतया इस तथ्य को उल्टे रुप में ही समझा जाता है। संसार की प्रसन्नता एवं दुःख को अपनी प्रसन्नता एवं दुःख का कारण माना जाता है। जबकि संसार रुपी दर्पण में अपना आन्तरिक स्वरुप में ही प्रतिबिंबित होता है। तीव्रगति से चलती हुई गाड़ी में बैठे यात्री को मार्ग की सभी वस्तुएँ गति करती जान पड़ती है। जबकि वह स्वयं ही गाड़ी की गति के साथ गतिशील है। ट्रेन से सम्बद्ध यात्री की गतिशीलता स्थिर वस्तुओं को भी गतिशील देखनी है।
मान्यताओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन का आधार बदल जाने पर ब्राह्म स्वरुप भी परिवर्तित हो जाता है। सुख दुःख भले बुरे की बीच अन्तर परिस्थितियों को नहीं वरन् चिन्तन के स्तर का है।
शास्त्रकारों ने इसी कारण मन को निर्लिप्त बनाने की प्रेरणा दी है। ब्राह्म जग्त अपने अन्तःजगत का प्रतिबिंब मात्र है। अन्तः संसार में परिवर्तन करके जैसा उसी रुप में संसार को गढ़ा एवं उसके अनुरुप सुख दुखा का अनुभव किय जा सकता है। मन चेतना की विशेषताओं एवं उसके अजस्त्र आनन्द की अनुभूति कर सके तो उसे बाहर भी आनन्द का निर्झर बहता दिखाई पड़ता है। विषमताओं को भी जीवन का एक आवश्यक अंग मान कर उसमें भी आनन्द की अनुभूति की जा सकती है परिस्थितियों में आमूल चल परिवर्तन कर सकना सम्भव नहीं है। किन्तु अपने दुष्टिकोण एवं चिन्तन में परिवर्तन करके प्रतिकुलताओं भीमें भी दर्शन किया जा सकता है।
बाह्म परिस्थितियों एवं संसार से प्रभावित होने उन्हें सुख दुख का कारण मानने के स्थान पर आवश्यकता इस बात की है कि अपने चिन्तन को उर्ध्वगामी बनाया जाय। मान्यताओं में परिवर्तन किया जाय। यह संसार को आन्तरिक विचारों को प्रतिबिंब मानने से ही सम्भव हो सकता है। इस तथ्य को समझने एवं अनुभव करने से ही मन को सन्तुलित रखा एवं प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नचित रहा जा सकता है।
मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करने वाली, उसे विशिष्ट सिद्ध करने वाली को चीज इस शरीर में है तो-मस्तिष्क, जहाँ विचार, कल्पनाएँ, इच्छाएँ और भावनाएँ सबसी है।
शरीर के अन्य किसी अवयव में इतनी सक्रियता, सम्वेदनशीलता औी नेनापन नहीं होता, जितना कि मस्तिष्क में। उसकी विशेषताओं के कारण ही मस्तिष्क को मानवीय-सत्ता को केन्द्र-बिन्दु आधार माना गया है। रेलगाड़ी में जो महत्व इज्नन का है, वही महत्व मानव-शरीर में मस्तिष्क का है। इसीलिए मस्तिष्क को हड्डियों से बनी एक पिटारी में रखी लुगदी की-छोटी-सी टोकरी को समस्त ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता के विकास का आधारभूत केन्द्र कहा गया है। जब किसी को बहुत अधिक पक्ष-पोषण दिया जाता है तो यही कहा जाता कि उसे सर पर बिठा लिया गया। सर्वाधिक सम्मानित व्यक्तियों के लिए सरताज सम्बोधन का उपयोग अकारण या निरर्थक ही नहीं है। यह सम्बोधन विशेषण मस्तिष्क के, सिर के महत्व को ही प्रतिपादित करते है।
वैज्ञानिकों ने जैसे-जैसे इस रहस्य पिटारी का, मानवीय सत्ता की आधार भित्ति का, मनुष्य अस्तित्व के केन्द्र-बिन्दु का अध्ययन किया, वैसे-वैसे वे चमत्कृत होते गये और यह सिद्ध होता गया कि शरीर के अन्यान्य अंग अवयवों में जो गतिशीलता दिखाई पड़ती है, वह उन अंगों की अपनी स्वयं की ही नहीं है, बल्कि मस्तिष्क उन पर पूरी तरह नियन्त्रण रखता है। अंगो के संचालन और नियमन की प्रेरणा उसे उन्हें मस्तिष्क से ही मिलती है। विचार, इच्छाएँ, कल्पनाएँ, वासनाएँ और भावनाएँ आदि मस्तिष्क में ही उत्पन्न होती है। इन प्रेरणाओं के सम्बन्ध में पिछले दिनों कई नये तथ्य प्रकाश में आये है। उदाहरण के लिउ मस्तिष्क शरीर की विभिन्न गतिविधियों और क्रियाकलापों का नियमन नियन्त्रण तो करता ही है, उसमें उठने वाली भावनाएँ भी शरीर को असाधारण रुप से प्रभावित करती है।
जीव-विज्ञान के विश्लेषणानुसार शरीर में दो तरह के स्नायु होते है, एक ऐच्छिक और दूसरा अनैच्छिक। शरीर में सभी भीतरी ओर बाहरी क्रियाओं का संचालन स्नायुओं द्वारा होताँ ऐच्छिक स्नायुओं से इच्नानुसार काम लिया जाता। उदाहरण के लिए चलना-फिरना, उठना-बैठना, बोला, बात कराना, हाथ पैर हिलाना आदि क्रियाएँ ऐच्छिक होती है और इनका सम्पादन ऐच्छिक-स्नायुओं द्वारा ही होता है। इन स्नायुओं द्वारा हृदय की धड़कन, फेफड़ो द्वारा श्वास-प्रश्वास की क्रिया, पाचन-क्रिया, गुर्दों कि क्रिया आदि क्रियाकलाप सम्पन्न होते है।, जिन पर मनुष्य की इच्छा-अनिच्छा का को प्रभाव नहीं पड़ता। यह स्नायुओं का नियन्त्रण मस्तिष्क भूमिका निवाहते है। इन स्नायुओं का नियन्त्रण मस्तिष्क में स्थित ‘हाइपोथैल्मस’ नामक केन्द्र द्वारा होता है। भावनाएँ इसी केन्द्र द्वारा अपना प्रभाव डालती या उत्पन्न करती है।
कहा जा चुका है कि ‘हाइपोथैल्मस’ केन्द्र से मनुष्य शरीर को अनैच्छिक गतिविधियाँ नियन्त्रित होती है। और भावनाएँ उसी केन्द्र को प्रभावित करती है। इसलिए इनके द्वारा अनैच्छिक-क्रियाओं पर, जो शरीर और जीवन-रक्षा के लिए आवश्यक है, प्रभाव पड़ना स्वाभविक है। पिछले तीस वर्षो में मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए अनेकानेक अनुसन्धानों से यह प्रमाणित हो गया है कि भावनाओं के द्वारा कई रोग उत्पन्न होते है, वहीं यह भी सिद्ध हा गया है कि मस्तिष्क को यदि ठीक ढंग से प्रशिखित किया जा सके, विचार पूर्वक नियन्त्रण द्वारा उसका उपयोग किया जा सके तो शरीर-स्वास्य एवं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आर्श्चयजन सफलताएँ प्राप्त की जा सकती है।
वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार प्रत्येक प्रौढ़-मस्तिष्क 20 वाट विद्युत-शक्ति से चलता है। मस्तिष्क के कुछ कोषाणु विशेष रुप से इस बिजली को उत्पन्न करने का काम करते है और शेष उनका उपयोग करके अपना काम में ग्लुकोज और आक्सीजन का रासायनिक-ईधन जलता है तथा उसकी ऊर्जा बिजली के रुप् में परिवर्तित होती है। उस बिजली के रुप् में परिवर्तित होतीं। उस बिजली से कोषाणुओं का काम-चलाऊ मात्रा में शक्ति प्राप्त होती है और यदि वह अनावश्यक मात्रा में बन जाती है तो स्वयमेव विसर्जित हो जाती है। उसका उपयोग विसर्जन मानिसिक-क्रियाओं के अनुसार घटता-बढ़ता है। इलेक्ट्रोऐन्सी-फेलोग्राफ से यह जाना जा सकता है कि उत्पन्न हुई मानसिक विद्युत का उपयोग और उपभाग कहाँ हो रहा है। इसमें घट-बढ़ हो जाने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। यों भी कहा जा सकता है कि मानसिक-सन्तुलन गड़बड़ाने से इन विद्युत-धाराओं में गड़बड़ी उत्पन्न होने लगती है।
भावनाएँ मानवीय-मस्तिष्क को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है। हाल ही की हुई स्नायु विज्ञान-सम्बन्धी खोजों से यह भी सिद्ध हुआ है कि इनके कारण मस्तिष्क में ऐसे रसायन उत्पन्न होते है, जो विषय जैसा प्रभाव भी छोड़ते है और जीवन-रस भी प्रदान करते है। मस्तिष्क-विज्ञानियों का कथन है कि स्नायु-तन्त्र का संचालन केवल मस्तिष्क में उतपन्न होने वाली विद्युतधारा से ही नहीं होता है बल्कि उनके संचालन से रासायनिक तत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इस आधार पर अब यह प्रयास किए जा रहे है कि भावनाओं और रसायनों का सम्बन्ध खोजकर, विशिष्ट रसायन को मस्तिष्क के अमुक भाग में पहुँचा कर व्यक्ति को दर्द से छुटकारा दिलाया जा सके, मनोरोगों की चिकित्सा की जा सके और उसकी बौद्धिक-क्षमताओं को प्रखर बनाया जा सके।
इन रसायनों के प्रयोग द्वारा मनुष्य की आदतें बदलने, नशे की लत छुड़ाने तथा उसका व्यवहार तक बदल डालने के प्रयोग किये जा सकते है यह सम्भवानाएँ आगे की है। फिलहाल तो यही माना जा रहा है। कि अमुक प्रकार की भावनाओं से मस्तिष्क के विशिष्ट केन्द्रों में अमुक प्रकार के रसायन उत्पन्न होते है और पूरे शरीर-तन्त्र को प्रभावित करते है। मस्तिष्क में विद्यमान न्यूटोने कोशिकाएँ कुछ विशिष्ट रसायन छोड़कर सूचनाओं का आदान-प्रदान करती है। इन सन्देशवाही रसायनों को ‘न्यूरेट्रोसी मीटर’ कहा जाता है की खोज हुई है, जिसे ‘पेप्टाइन’ कहते है। इस वर्ग के रसायन प्रोटीन के छोटे-छोटे कण होते है। इनमें से कुछ एमीनों एसिड की सीधी लड़ में एक दूसरे से जुड़ रहते है। कुछ पेप्टीइड हारमोन होते है, ये लड़े या जुड़ी हुई कोशिकाएँ अनेक तरह से जुड़ी रहती है।
इन रसायनों के उत्पादन और नियन्त्रण पर भावनाओ, उद्वगों और मनःस्थितियों का बड़ा प्रभाव पड़ता हैं। मस्तिष्क इस प्रकार के नियन्त्रण हारमोन स्वयं ही उत्पन्न करता है। स्टेन्फोर्ड विश्व-विद्यालय के औषधि-विशेषज्ञ आवारामगोल्ड स्टीन ने पिछले दिनों इस विषय में कई प्रयोग किये कि रसायनों का मस्तिष्क के किस भाग पर प्रभाव पड़ता है अथवा किन मनःस्थितियों में मस्तिष्क किन रसायनों का उत्पादन करता है। डा. गोल्ड स्टोन ने पहले चूहों, पर बन्दरों प्श्र और बाद में मनुष्यों पर प्रयोग किये । प्रयोगों से गोल्ड स्टीन इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि मध्य-मस्तिष्क का वह भाग, जहाँ से भावनाओ का नियन्त्रण होता है, वहाँ इस तरह के कोश होते है, जिनसे कई तरह के रसायन उत्पन्न होते है अथवा उस केन्द्र पर किसी प्रकार कोई रसायन पहुँच जाता है तो वैसी मनःस्थिति उत्पन्न होती है। इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि मीठा बनाते है अर्थात् पानी में ऐसे तत्व उत्पन्न हो जायँ, जो मीठेपन के उत्पादक हों तो पानी मीठा हो जाता है अथवा पानी में कोई मीठा तत्व घोल दिया जाये तो पानी मीठा हो जाता है।
मस्तिष्क में भावनाओं और मनःस्थितियों की उत्पत्ति तथा रसायनों का जन्म भी इसी प्रकार अन्योन्याश्रित हैं। किसी कारण शरीर में कहीं असामान्य स्थिति उत्पन्न होती है और पीड़ा या वेदना उत्पन्न होती है तो उस पीड़ा से राहत पाने की उत्कण्ठा मध्य-मस्तिष्क में ऐसे रसायन उत्पन्न होने की परिस्थितियाँ बनाती है, जो बहुत कुछ मारफीन या कोडीन जैसा होता है। पर यह भी देखा गया है कि पीड़ा की अनुभूति से मुक्ति पाने के लिए ऐसी औषधियों का प्रयोग कारगर होता है, इसका यही कारण है कि भावनाएँ और मस्तिष्कीय-रसायन एक दूसरे के उत्पादक-कारण है। किन्तु भावनाओं द्वारा स्वयमेव जो रसायन उत्पन्न होते है तथा उनसे शरीर की स्थिति में जो परिवर्तन होते है, वे अधिक उपयोगी और निरापद होते हैं। बाहरी उपचारों द्वारा इस तरह के रसायन पहुँचाने से उनके हानिकारक प्रभाव ही होते है। उदाहरण के लिए दर्द से मुक्ति दिलाने वाले बाहृयकारक रसायन पाचन-शक्ति पर बुरा प्रभाव डालते है और शरीर उनका आदि बन जाता है तथा उनसे छुटकार पाने मं परेशानी अनुभव होती है। वैज्ञानिकों ने पहले यही सोचकर प्रयोग किये थे कि रसायन ही भावनाओ का उत्पन्न और प्रभावित करते है।
अफीम और उससे बने पदार्थो द्वारा इस तरह के प्रयोग किये गये। पीछे यह प्रश्न उठा कि प्रकृति ने मस्तिष्क के कोशों में इस तरह की व्यवस्था क्यों की है ? शरीर की प्रकृति, प्रतिकूल या विजातीय तत्वों को बिलकुल सहन नहीं करती। प्रथम तो इस तरह के तत्वों को प्रवेश ही नहीं करने देते और किसी तरह प्रविष्ट हो भी जाते है तो उन्हें मार भगाते है या उनसे लड़ते-लड़ते स्वयं ही नष्ट हो जाते है। इस स्थिति में यह प्रशन उठना स्वाभाविक हे कि अफीम जैसा बुरा प्रभाव डालने वाले तत्वों को शरीर या मस्तिष्क किस प्रकार सहन कर लेता है ? इस प्रश्न के उत्तर की खोज में परीक्षण किये गये और यह तथ्य सामने आया कि अफीम से बने रसायन या उससे मिलते-जुलते रसायन से मस्तिष्क स्वयं ही बनाता है। भावनाएँ इन रसायनो को उत्पन्न करने में सहायक या उत्प्रेरक का काम करती है। मस्तिष्क के कोशों की व्यवस्था इन्हीं रसायनों को ग्रहण करने क लिए है। हर पीड़ा और दर्द-निवारक रसायनों क अणु मस्तिष्क द्वारा बनाये गये रसायनों के अणुओ से कई अर्थो में मिलते-जुलते है और इसी कारण बाहरी रसायनों को थोड़ी-सी समानता के आधार पर मस्तिष्क स्वीकार कर लेता है या बाहरी रसायन वहाँ घुसपेंठ कर अपना आधिपत्य जमा लेते है तथा वहाँ के उत्पादन केन्द्र को शिथिल या निष्क्रिय कर देते है।
बाहरी स्त्रोतों से पहुँचने वाले इन रसायनों का दुष्प्रभाव तो पड़ता ही है। मस्तिष्क अपनी व्यवस्था आप कर लेता है। उस व्यवस्था का आधार है-भावनाएँ भावनाओं के द्वारा मनःस्थिति और शरीर-स्थिति किसी प्रकार प्रभावित होती है ? इसका एक प्रमाण अन्तःस़्त्रावी ग्रन्थियों द्वारा छोड़े जोने वाले स्त्राव से भी मिलता है।
मनुष्य-शरीर में सात अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ होती है, जो कि सीधे ही अपने स्त्राव रक्त में मिला देती है। ये हारमोन्स शरीर में अनेक चमत्कारपूर्ण कार्य करते है। शरीर की प्रत्येक क्रिया को और मनुष्य के पुरे व्यक्तित्व को ये प्रभावित करते है। ये ग्रन्थियाँ बारह से भी अधिक प्रकार के हारमोन्स छोडती है। जब शरीर पर किसी रोग या कीटाणु का आक्रमण होता है तो इन ग्रन्थ्यों से कुछ ऐसे हारमोन्स पैदास होते है, जो रक्तकणों में कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति उत्पन्न करते है और स्वयं भी कीटाणुओं से लड़ते है। इस प्रकार शरीर युद्ध क्षेत्र बन जाता है। रुग्णावस्था में जो बेचैनी, क्षोभ और अशान्ति उत्पन्न होती है, उसका यही कारण है। भावनाओं का ज्वार आने प्श्र भी ये अन्तःस़्त्रावी ग्रन्थियाँ कुछ विशेष प्रकार के हारमोन्स छोड़ती है। ये हारमोन्स शरीर पर भावनाओ के पड़ने वाले भलेबुरे प्रभाव से संघर्ष करते है और उसी कारण हर्ष, उत्साह अथवा क्लान्ति और थकान जैसे लक्षण उत्पन्न होते है।
मस्तिष्क इस प्रकार प्रकृति को श्रेष्ठतम कलाकृति है। वह प्रतिकुल परिस्थितियों से संघर्ष के लिए , यथासम्भव प्रयन्त्न करता है। किन्तु कितना अच्छा हो, यदि हम मस्तिष्कीय-शक्तियों को प्रतिकुल परिस्थितियों से लड़ने में अपनी शक्ति नष्ट करने से बचाने का प्रशिक्षण देते हुए उसे उच्च् प्रयोजनों में लगाएँ।
फल जब पक जाता है, तब उसकी अन्तारात्मा सीमित के बाधा-बन्धन तोड़कर असीम बनने के लिए मचलती हैं फलतः वह वृक्ष के साथ निरर्थक रहने का मोह त्याग कर भूमि पर गिरता है और गूदे से दूसरोकं को क्षुधा बुझाता हुआ अपने को छूँछ बना देने को उद्यात होता है। इतना ही नहीं, अपने को गलाकर अभिनव वृक्ष उगाने का उपक्रम करता है।
दधीचि और भागीरथ बड़े थे। फल उनके समतुल्य तो नहीं हो सकता, पर परम्परा वही अपनाता है। आत्मिक-विकास इससे कम में बन नहीं सकता। आत्मिक प्रगति की सार्थकता इतने सत्साहस का परिचय दिये बिना सिद्ध नहीं होती। पके हुए फल की यही स्थिति है। जो इसे स्वीकार नहीं करता है और पत्तों के झुरमुट में मुँह छिपाने और जान बचाने की कोशिश करता है, वह चाहते भले ही हों-प्श्र सुरक्षित रह नहीं पाता। प्रकृति उसका वैभव छीन लेती है और पत्तों के बीच सूखे, दुर्गन्धित और कुरुप् जरा-जीर्ण जैसी दुर्गति में उसे धकेल देती है। मानवी-प्रगति का भी यही उचित गतिचक्र है। जो उसे तोड़ते है, वे चतुर बनते भर है, अन्ततः ऐसे व्यक्ति मूर्ख सिद्ध होते है।
निर्झर अपने पिता का उत्तराधिकार-धन-वैभव पाता तो है, पर उसका न तो उपभाग करता है और न संग्रहं। नियति की इच्छा को समझता है और गतिचक्र को अग्रगामी बने रहने में व्यवधान उत्पन्न नहीं करता है। यहाँ सब कुछ आगे बढ़ रहा है। पिछले पग को उठाने पर ही उसे आगे बढ़ाना सम्भव होता है। दौड़ने के लिए जो तैयार न हो, उसे पाने की आशा त्यागनी ही पड़ती है। सृष्टि का यही सनातन नियम है। निर्झर को अस्थायी जैसा ज्ञान-विज्ञान तो नहीं मिला, पर अनुकरण वह उन्हीं की नीति का करता है। पर्वत के दिये अनुदान को वह एक हाथ से पाता और दूसरे से आगे बढ़ाता है। उपलब्ध अनुदान की जल-राशि बहना आरम्भ करती है तो उसे अन्याय जल-धाराओं का स्नेह, सहयोग मिलता चला जाता है। निर्झर नद बनता है और पूण्य तथा यश अर्जित करता हुआ समुद्र में जा मिलता है। अपूर्णता को पूर्णता तक पहूँचाने के लिए इसके अतिरिक्त दूसरा मार्ग भी तो नहीं है।
बादलों की कुल परम्परा बरसने की है। अपने को गलाने और भूतल पर हरितमा उगाने में उन्हें घाटा नहीं दिखता। यों स्वार्थ-परायणों के लिए तो यह दूस्साहस कल्पानीतीत है। वे इसे उपहासास्पद मूर्खता ही कर सकते है। किन्तु बादलों को दूरदर्शिता और उदारता को जो वरदान मिला है, उसका परित्याग करते भी उनसे नहीं बन पड़ता। फलतः न घाटा बताने वाला गणित सीखते है और न उपहास की परख करते है। नियमि उनकी पीठ थपथपाती है। आकाश में उड़ने और असंखयों को आशा का केन्द्र बनने का अवसर देती हैं मेघ गरजते है तो सभी हरसते है। कोई उन्हे इन्द्र कहता है, को वरुण। उनका कतृत्व-काल पावस कहा जाता और धन्य बनता है। मोरों को नृत्य और मेघ-मल्हारों के गीत उन्हें अपनाई गई नीति की सार्थकता बताते है प्रत्यक्षवादियों के लिए इस प्रयास में मूख्रता के अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता। पर दूरदर्शी जानते है कि बादलों ने खोया कुछ नहीं, उन्हें मात्र परिवहन और वितरण भर करना पड़ा। श्रेय इतना अधिक मिला कि वास्तविक दानी समुद्र को उनके सौभाग्य पर गद्गद् हो जाना पड़ा।
फूल सुन्दर लगते है, सुगन्धित होते है और सम्मान पाते है। क्योंकि वे मधुर फलों की पूर्व भूमिका होते है। वृक्षों को आश्रयदाता कहा जाता है, क्योंकि वे शीतआतप सहते हुए अनेकानेंकों को सुविधा प्रदान करते है सूर्य देवता है और चन्द्रमा भी। निर्जीव पिण्डों को वह श्रेय-सौभाग्य कैसे मिलता है ? उसका उत्तर एक ही है देव-परम्परा का अनुगमन । अनवरत श्रम करते हैं। अपने लिए नहीं, उनके लिए-जिनको तमिस्त्रा से छुटकारा पाने की आवश्यकाता है। बालक माता को उदर दरी में सुविधा और सुरक्षा पाने को जब पर्याप्त नहीं मानता और विश्व-वैभव में अपने पुरुषार्थ को नियोजित करने के लिए मचलता है, तभी उसे जन्म धारण करने का अवसर मिलता है। दार्शनिकों के बहुचर्चित ‘मुक्ति ‘ या प्रत्यक्ष दर्शन शिशु-जन्म की प्रक्रिया को देखकर भली प्रकार समझा जा सकता है कि भारतीय-संस्कृति का मेरुदण्ड वर्षा धर्म है। उस विधान का शैशव भी है और यौवन भी। शैशव को पूर्वार्द्ध और यौवन को उत्तरार्द्ध कहते है । स्वकेन्द्रित शुद्र अ वेश्य। पर समर्पित ब्राह्मण और क्षत्रिय। एक सद्ज्ञान के लिए, दूसरा संरक्षण के लिए समर्पित। स्वकेन्द्रित बचपन और गृहस्थ। पर-केन्द्रित वानप्रस्थ और संन्यास। अविकसति पूर्वार्द्ध अपने लिए परिपक्व प्रौद्ध परमार्थ के लिए। यही है- वर्णाश्रम धर्म का तात्विक विवेचन। धर्म की इसके बिना गति नहीं। आम्मिक क्षेत्र में उदात्त उदारता अपनाये बिना एक पग प्रगति नहीं। महामानवों का यही राजमार्ग हैं। देवत्व पाने के लिए उसी का अवलम्बन करना होता है। पूर्णता के लक्ष्य तक इस पर अनवरत क्रम से चलने वाले पहुँच पाते है। समष्टि ही विराट् है। विराट् ही ब्रह्म है। स्व को पर में समर्पित करना ही परब्रह्म की प्राप्ति है। साधना के उपक्रम में जो भी अपनाया जाय। मध्यवर्ति ध्रुव-तत्व यही है।
भौतिक सुख ओर आत्मिक-शान्ति पाने की सुनिश्चित रीति-नीति नहीं है। सर्कींण स्वार्थपरता ही माया है। मृग मरीचिका उसी को कहते है। पाने की जिज्ञासा में खाने की विडम्बना यही है। बुद्धिमत्ता का कलेवर ओढ़कर मूर्खता अपना व्यंग नृत्य इसी तरह दिखाती और जन-जन को भ्रमाती है। उदारता, लाभ और कृपणता का घाटा यदि समझा जा सके तो मनुष्य निस्सन्देह सुखी बन सकता है और परलोक भी। (उसका लोक भी सध सकता है औरा परलोक भी) किन्तु दुर्बुद्धि को क्या कहा जाय ? हाथ और पैरो का ललक-लिप्सा जकड़े रहती है और लोभ-मोह के कोल्हू में पिलने के अतिरिक्त और कुछ सोचने तक नहीं देतीं। कुछ ऐसा करने की छूट तो मिल ही कहाँ पाती, जिसमें मानवी-जीवन की सार्थकता सम्भव हो सकें।
अखण्ड-ज्योति के परिजन उस दृष्टि से सौभाग्य शाली है कि उन्हें उत्कृष्ट चिन्तन और उपयुक्त कर्तव्य के लिए आवश्यक आलोक तो मिलता ही रहता है। द्वारा तो उनके लिए खुला है। अनजान तो उन्हें नहीं रहना पड़ रहा है। अन्धकार का घेरा तो उनके सामन नहीं है। यह दूसरी बात है कि मनःस्थिति में साहसिकता और परिस्थिता में प्रगतिशीलता का समावेश कर सकना उनसे बन पड़ता है या नहीं। होना यही चाहिए कि ज्ञान की प्रौढ़ता कर्म में विकसित हों। लिप्साओं पर अंकुश लगे। निर्वाह के साधनों को औचित्य तक ही बढ़ाया जाय। इसके बाद जो असीम बच रहता है, उसे लौटाया जाय, जिसने स्तर की जाँचने के लिए अनुदान की धरोहर को आशा और अपेक्षा के साथ सौंपा था। जो जीवन-तथ्य को समझ सकेगा, उसे इसी निर्ष्कष पर पहूँचना पड़ेंगा कि उपलब्धियों का उपभाग एवं संग्रह नही, वरन् उनका उदार उपयोग करने में ही बुद्धिमता है।
नीति-निर्धारण का सौभाग्य वरदान यदि किसी को मिल सके तो उसे उसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ेगा कि ललक-लिप्सा सीमित रखने से काम चल सकता है, सीमित समय, श्रम एवं साधनों में शरीर-निर्वाह एवं परिवार-पोषण का उत्तरदायित्व निभ सकता। अतृप्त तो तृष्ण ही रहता है। दरिद्रता तो लिप्सा भर की है। वैभव को कनिष्ठ और वर्चस्व को वरिष्ठ माना जा सके तो परिस्थितियाँ पूरी तरह उलट सकती है। शरीर को विलासी और परवार को अमीर बनाये, बिना काम चल सके तो स्वालम्बी तथा सुस्कारी बने रहकर निर्वाह के हजार उपाये सोचे जा सकते है। कठिनाई तो उस तृष्णा की है, जो विवके के अभाव में फलित भी नहीं होती। देव-जीवन जीना और स्वर्गीय सम्वेदनाओं का रसास्वादन करना-किसी के अनुग्रह पर नहीं, मात्र अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करने पर निर्भर है। ढर्रे का चिन्तन और अभ्यस्त क्रियाकलाप में उपयुक्त परिवर्तन करने में जो ऊर्जा प्रयुक्त होती है, उसी का नाम-’आत्म बल’ है। इसकी प्रचेर मात्रा हर किसी को जन्मजात रुप् से उपलब्ध है। कठिन तो पड़ता है, वह उसी अनुपात से कृतकृत्य बनता है। आत्म निर्माण बनता है। आत्म निर्माण और भाग्य निर्माण दोनों एक ही है, एक को क्रिया और दूसरे को परिणिति कह सकते है। सबसे बड़ा पुरुषार्थ एक ही है-जीवन-नीति का दूरदर्शी निर्धारण। देव अनुग्रह यही एक है। सौभाग्यों का सूर्योदय इसी को समझा जाना चाहिए। विपदाओं का पलायन और सम्दाओं का आगमन जिन ऋद्धि-सिद्धियों के अनुग्रह से होता है, वे आसमान से नहीं उतरती और न किसी की कृपा-अनुकम्पा से मिलती है। जीवन-क्रम में उत्कृष्टता का समावेश ही वह मन्त्र-साधन है जिसे सिद्ध कर लेने पर वह सब कुछ मिल जाता है, जो मिलने योग्य है।
उदार चेता ओर दूरदर्शी ऐसी नीति अपनाते है जिसमे सीमित स्वार्थ और और असीम परमार्थ की पूर्ति सुसंतुलित रीति से होती रहे। इसके लिए न किसी को भूखा मरने की आवश्यकता है और न परिवार को निराश्रित छोड़ने की। औचित्य की मर्यादा में दोंनों का परिपोषण करने में किसी सामान्य को भी असामान्य दौड़धुप या चिन्ता करने की आवश्यका नहीं पड़ती मानवी-काया में सन्निहित पुरुषार्थ एवं कौशल इतनी र्प्याप्ता मात्रा में विद्यमान है, जिसके सहारे औचित्य की परिधि में रहते हुए हँसते-हँसाते हर किसी का निर्वाह हो सकता है। साथ ही जीवनोद्देश्य की पूत्रि के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक परमार्थ-प्रयोजनों के लिए भी र्प्याप्त अवसर मिल सकता है। जो उसका सुसन्तुलित उपयोग कर सके, उनके निर्वाह और विकास की, सुख और शान्ति की, समृद्धि और प्रगति की उभयपक्षीय उपलब्धियाँ प्राप्त करता सकना तनिक भी कठिन न रहेगा। सुसंस्कृत ही समृन्नत होते है। दृष्टिकोण ऊँचा रहे तो उर्त्कष के प्रत्येक शिखर का दर्शन ही नहीं परिभ्रमण भी सहज हो सकता है। यही है-सुखद सफलता, जिस पर जीवन का उपभोक्ता और दाता-दोनों ही सन्तुष्ट और प्रसन्न हो सकते है।
आत्मिक-प्रगति का अर्थ है-अन्तः करण से उत्कृष्ता का अभिवर्धन। उत्कृष्टता का तार्त्पय है-दृष्टिकोण की शालीनता और व्यवहार में उदारता। इन दोनों का सर्म्वधन जिस उपाय से हो सकता है, वह है-सेवा, साधना का अवलम्बन। उपासना कृत्यों की तरह है इसकी भी गरिमा है। साधना और उपासना के युग्म को अन्योन्याश्रित-एक दूसरे का पूरक माना गया है।
सेवा-साधना में संलग्न की श्रेष्ठता की अभिवृद्धि भी होती है। सेवा-धर्म अपनाने से स्वार्थ और परमार्थ दोनों की पूर्ति होती है। आत्म-सन्तोष, लोक-श्रद्धा जन-सहयोग एवं देवी-अनुग्रह के चारों ही लाभ सेवा-धर्म अपनाने वाले ही हाथों-हाथ मिलने लगते है। सेवा-साधना यों हो तो एकाकी भी सकती है और कुछ न कुछ परमार्थ-व्यक्गित-सर्म्पक के सीमित क्षेत्र में भी किया जा सकता है।, पर दूरगामी और विशालकाय सत्परिणामों की दृष्टि से इस क्षेत्र में भी समविन्त प्रयास ही कारगर होते है। एक तिनके से रस्सा नहीं बनता और न एक फूल का हार गूँथा जाता है। लड़ तो एक सैनिक भी हो सकता है, पर बड़ा मोर्चा फतह करने के लिए उसे सैन्य-दल का अनुशासित-सदस्य बनकर ही काम करना होता है बूँदे मिलकर जलाशय बनती है। सीकों का समूह बुहारी है और धागों का समन्वय। ब्रह्माण्ड क्या है ? परमाणु और खगोल पिण्डों का सुगठन । विद्यालयों, कारखानों और सगंठनों की सफलता का मूल्याँकन उनकी सदस्य-संख्या देखकर ही लगाया जाता है। सरकारे बनाने या बदलने में मतदाताओं का बहुमत ही निर्णायक होता है। जागृत-आत्माओं का सुगठित समुदाय ही प्रस्तुत आस्था सकंट से निवारण एवं उज्जवल भविष्य के निर्धारण की भूमिका निभा सकने में समर्थ हो सकता है।
मनुष्य जीवन भर के संचित संस्कारों और अभ्यासों से जो स्वभाव अर्जित करता है, वह मरने के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। बल्कि मरने के बाद भी वे अभ्यास संस्कार मनुष्य के साथ जुड़े रहते है। ओर उसे अपने स्वभाव के अनसार कर्म करने के लिए प्रेरित करते है। यही कारण है कि एक ही वातावरण में पले, एक ही माता पिता की सन्तान दो बच्चों में दोनों अलग-अलग और पिता की सन्तान दो बच्चों में दोनों अलग-अलग और कभी-कभी तो सर्वथा भिन्न स्वभाव के पाए जाते है।
स्वभाव की यह विशेषताएँ जीवन काल में ही नहीं देखी जाती वरन् अशरीरी अवस्था में, मरने के बाद और जन्म लेने के पूर्व की अवस्था मरणोत्तर जीवन काल में भी आत्माएँ अपने सुक्ष्म शरीर के माध्यम से पूर्व अर्जित गुण व संस्कारों के अनुसार बर्तता है। परामनोविज्ञान के इतिहास में ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है जिनमें मृतात्माओं के किन्हीं व्यक्तियों का सहयोग किया और उन्हें मानसिक उलझनों, समस्याओं, विपत्तियों से छूटकारा दिलाया तथा प्रगति पथ पर आगे बढ़ चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित किया। हाल ही में लन्दन की एक अधेड़ संगीतकार महिला रोजमेरी ब्राउन का मामला प्रकाश में आया है, जिसके संबन्ध में कहा जाता है कि उसे बाख, बीथोवेन, शोपो, देबुसीजिल्ट, शुवर्ट आदि महान संगीतकारों की आत्माएँ संगीत का शिक्षण देती और अभ्यास कराती है। स्मरणीय है इन संगीतकारों को देहावसान हुए कई वर्ष बीत चुके है।
श्रीमती ब्राउन जब सात वर्ष की थीं तो उसने रात को देखा कि काला कोट पहने कोई छाया उसके बिस्तरे की ओर बढ़ रही है। इस दृश्य को देख क रवह इतनी भयभीत हो गई कि उनके मुँह से चीख भी नहीं निकल सकी। उस काली छाया ने ब्राउन को पुचकारा और उस की पीठ पर हाथ फेरा। आर्श्चय की बात है कि चारों ओर से बन्द उस कमरे में वह छाया किस प्रकार प्रकट हुई ओर बिना कोई आहट हुए रोजमेरी तक पहुँच गई ? जबकि पास में ही उसके माता पिता सोए हुए थे। उस काली छाया का चेहरा साफ दिखाई देने लगा और रोजमेरी को आश्वस्त भी कर रही थी, कहा “घबड़ाओं मत मेरी बेटी! मैं तुझे एक प्रसिद्ध संगीतकार बनाऊँगा और तुम्हें संगीत सिखाऊँगा। “
इसके वर्षो बाद तक उस काली छाया से कोई सर्म्पक नहीं हुआ। इस बीच रोजमेरी का विवाह हो गया, वह दो बच्चों की माँ भी बन गई और दुर्योगवशा सन् 1961 में उस के पति का निधन हो गया, परन्तु वह साधारण संगीत शिक्षा ही प्राप्त कर सकी थी। पति का निधन होने के बाद रोजमेरी को अपने और अपने बच्चों के निर्वाह की चिंता रहा करती थी। घर की हालत कोई अच्छी नहीं थी कि उस ओर से निश्चन्त रहा जा सके इसलिए उसका अधिकाँश समय गुजर बसर की व्यवस्था करने में ही बीतता था। इस मुफलिसी में उसे संगीत सीखने या संगीत सभाओं में जाने के लिए न पैसा था ओर न समय पर उसमें संगीत सीखने के तीव्र लालासा थी। वह काली छाया जो सात वर्ष की आयु में दिखाई दी, यही नहीं उसके साथ अन्य छायाएँ भी थी। अब तक रोज ब्राउन ने संगीत शाखा का जो अध्ययन किया था और जिन संगीतकारों के बारे में जाना पढ़ा था उन्हें देख कर उसने पहचाना कि वह आत्म विख्याता पियानों वादक फ्राँज लिज्ट की हैं फ्राँज लिज्ट के साथ और भी कुछ संगीतकारों की आत्माएँ थी।
इन भूत संगीतकारों ने उसे अब तक लगभग 400 संगीत रचनाएँ सिखाई। इनमें शुबर्ट का 40 पृष्ठों का सोनारा और 15 गीत शोपा की एक रचना तथा बीथोवन के दो सोनारा आदि है। कहा जाता है कि रोज ब्राउन को संगीत सिखाने और नई रचनाएँ तैयार करवाने में लिज्ट की आत्मा उसका हाथ पकड़ कर मार्गदर्शन करती है। कौन सी धुन किसी प्रकार निकलनी चाहिए यह सिखाने के लिए संगीतकारों की आत्माएँ उसे गाकर समझाती भी है। ऐसा नहीं कि ये दावे निराधारा हों इन दावों की सत्यता जाँचने के लिए कुछ पत्रकारों और परामनोवैज्ञानिक ने जाँच पड़ताल भी की। उन आत्माओं के चित्र भी लिए गये और इन दावों को सच पाया गया।
ब्रिटेन के प्रसिद्ध संगीतकार सर डोनोंल्डटोष की आत्मा भी रोजमेरी के पास आती है। स्मरणीय है कि डोनाल्डटोष का देहावसन सन् 1940 में ही हो गया था। पर उनकी आत्मा अभी रोजमेरी को संगीत की शिक्षा देती है। वह प्रतिदिन काम से निबट कर दस बजे शाम के चार बजे तक संगीत शिक्षा प्राप्त करती है। मृत संगीतकारों की आत्माएँ इस बीच छह घन्टे तक उसके पास रहती है।
सन् 1936 में न्यूयार्क से पेरीस आई एक महिला श्रीमती बीजरुस के साथ भी ऐसी ही घटना घटी, जब उसे श्रीमती बीजरुस के साथ भी ऐसी ही घटना घटी, जब उसे सौ वर्ष पूर्व दिवगंत हो चुके चित्रकार गोया ने चित्रकला सिखाई। बीजरुस चित्रकला सीखने के उद्देश्य से ही पेरिस आई थी। उनका विश्वास था ‘कि पेरिस में रह कर कलाकारों से सर्म्पक करने और उनसे कुछ सीखने के लिए भी तो थोड़ा बहुत पूर्वाभ्यास या कला के बीज के चाहिए। बीजरुस इन सब बातों से एक दम रहित थी। उन्होंने काफी प्रयत्न किया कि चित्रकला का कुछ अभ्यास किया जा सके और अपने आप को एक छोटे मोटे चित्रकार के रुप में प्रतिष्ठित कर सके, लेकिन बार-बार अभ्यास करने पर भी कुछ सफलता नहीं मिल सकी।
कई दिनों तक अभ्यास करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो बीजरुस निराश होने लगी, एक दिन वह निराशा के गहन अन्धकार में डूबी सोप रही थी कि मेरा पेरिस आना र्व्यथ रहा। यहाँ आए कई महीने हो जाने के बाद भी तो सृजन की कोई प्रेरणा, एक दिन वह निराशा के गहन अन्धकार में डूबी सोच रही थी कि मेरा पेरिसा आना र्व्यथ रहा। यहाँ आए कई महिने हो जाने के बाद भी तो सृजन की कोई प्रेरणा, का कोई मूर्त रुप सामने नहीं आ सका है। उन्हें पेरिस आये कई महीने हो चुके थे। आते समय यह सोचा था कि वहाँ के कलात्मक वातावरण में कई विषय मिलेंगे बैठी रहती थी और फिर उसे ज्यों का त्यो रख देती थी, उस दिन वह बहुत ब्लास और उदास थी। रात को सोने से पहले भी उन्हें घनघोर उदासी घेरे हुई थी।
इसी निराशा, हताशा और उदासी के बीच कब नींद आ गई ? कुछ पता नहीँ चला। उदासी के बीच, निराशा और थकान में डूबी वीजरुस को गहरी नींद आ गई ओर जब वह गहरी नींद में सो गई तो उन्हें लगा कि कोई अज्ञात शक्ति उन्हें झिझोड़ कर उठा रही है। वह परवशसी नींद में सोते हुए ही स्टुडियों की ओर चल पड़ी। वीजरुस को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों और कैसे हो रहा है ? स्टूडियो में आकर उन्होंने अंधेरे में कागज पर बु्रश चलाना शुरु कर दिया। उन्होंने पाया कि उनके हाथ बड़ी तेजी से चल रहे है और उन्हें अपने चित्र के बारे कुछ भी नहीं मालूम है। उन्हें लग रहा था कि कोई अज्ञात शक्ति उन्हें माध्यम बना कर अपनी मन चाही कलाकृति का सृजन करा रही है, और जो कुछ भी घट रहा है, उस पर उनका कोई वश नहीं है। कुछ देर बाद बीजरुस के हाथ अपने आप रुक गये, लगा चित्र पूरा हो गया है और वह जिस तरह बिस्तर से उठ कर स्टूडियो तक आई थी, उसी प्रकार वापस चलती हुई बेडरुम में पहुँच गई और बिस्तर पर सो गई।
सुबह उठते ही बीजरुस को रात वाली घटना याद आई। उन्होने स्टूडियो में जाकर देखा तो दंग रह गई। वह समझ ही न पाई कि बिना किसी प्रेरणा के बिना किसी अनुभव के और बिना किसी प्रेरणा के बिना किसी अनुभव के और बिना कुछ सोचे विचारे योजना बनाए इतना सुन्दर चित्र कैसे बन गया है ? चित्र सचमुच इतना उत्कृष्ट और असाधारण रुप में सुन्दर था कि उस की मुँह माँगी कीमत मिल सकती थी। पर बीजरुस को इससे ज्यादा यह जानना आवश्यक लग रहा था कि इस कलाकृति का निर्माण कैसे हो गया ? सारा दिन इस उधेड़बुन में लग गया। अगली रात फिर वैसी ही घटना घटी। अब तो बीजरुस की हैरानी को कोई ठिकाना नहीं था। जरुर ही कोई अदृश्य शक्ति उन्हें चित्रकला का अभ्यास करवा रही है।
उन्ही दिनों बीजरुस को एक ऐसी महिला के बारे में पता चला जो किसी भी वस्तु को देखकर या छूकर उसके सम्बन्ध में जानी अनजानी, प्रकट अप्रकट बातें बता सकती थी। बीजरुस ने उस महिला से संपर्क साधा और उस महिला ने कलाकृतियों को छूकर उनका अदृश्य इतिहास बताया। उसके अनुसार बीजरुस को नींद में उठाकर चित्रकला सिखाने वाली शक्ति स्पेन के प्रख्यात चित्रकार गोया की आत्मा थी, जिनकी मृत्यु सन् 1828 में हुई थी। वह अपने जीवन के अन्तिम दिनों में स्पेन स्थित अपने दुश्मनों से मुक्ति पाने के लिए गोया ने फ्राँस के दक्षिणी भाग में स्थित बीजरुस के पति के पूर्वजों के घर में शरण ली थी। वे उन दिनों काफी असहाय थे और मरने से पहले तथा मरने के बाद भी उनक हार्दिक आँकाक्षा रही थी कि वे मि. रुस के पूर्वजों के एहसास का बदला किसी प्रकार चुकाए। जिन लोगों के घर में गोया ने अपने जीवन के संध्याकाल में शरण प्राप्त की थी, उन्हीं के वंश की बीजरुस को कष्ट में देखकर गोया ने धन की सहायता करने का निश्चय किया और इस प्रकार निद्रित अवस्था में बीजरुस की सहायता की तथा उन्हें मार्गदर्शन दिया।
उदार और सहृदय व्यक्ति मरने के बाद भी अपने स्वभाव की इन विशेषताओ के अनुरुप औरों का हित साधन करते रहते है। ठीक उसी प्रकार जैसे कि दुष्ट आत्माएँ अपनी दृष्टता और कुसंस्कारो, परपीड़क वृत्ति के कारण मरने के बाद भी भूत प्रेत बन कर दूसरे लोगों को कष्ट पहुँचाती रहती है। उदार सहृदय और सद्भाव सम्पन्न आत्माओं को ही तत्व दश्ियों ने पितर और देव आत्माएँ कहा है। उनका सहयोग और मार्गदर्शन हर कोई प्राप्त कर सकता है और वे इसके लिए आतुर तथा उत्सुक भी रहती है।
राजा शतनीक बहुत दानी था। किन्तु वह प्रजा के कष्टों के निर्धारण की ओर समुचित ध्यान न देता था। उसके बाद उसका पुत्र सहस्त्रानोक राजा बना वह तत्ववेत्ता एवं कर्त्तव्य निष्ठ था किन्तु ब्राह्मणों को दान बहुत कम देता था। एक बार ब्राह्मणों के प्रतिनिधि राजा सहस्त्रानीक के पास पहुँचे वे उसके पिता को दान परम्परा का ध्यान दिलाते हुए उससे भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। सहस्त्रोनीक ने कहा ‘यदि परलोक विद्याविद् कोई योगी यह बता सके कि दानशील मेरे पिता इन दिनों उस पुण्य के क्या सुफल पा रहे है, तो मैं आप लोगों को अवश्य दान दूँगा। मेरी बुद्धि के अनुसार तो मैं जो न्याय दान कर रहा हूँ वह राजोचित दान है। राजा की बात सुन ब्राह्मणों ने देखा कि ऐसे योगी से सर्म्पक किया जाये जो स्वर्गीय नरेश का अता-पता बता सके।
बहुत प्रयास के बाद एक आरण्यकवासी तपस्वी ऋषि इस हेतु सहमत हुए। दिव्य शक्ति से सुक्ष्म शरीर द्वारा उन्होंने लोकान्तर भ्रमण किया और वहाँ दिवंगत नरेश शतानीक की स्थिति जानी। नियत समय पर सभा में सबके समक्ष वह विवरण रखना तय हुआ था।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सभी जुटी। राजा, राजकर्मचारी, ब्राह्मण वर्ग एवं नागरिकगण विशाल सख्या में उपस्थित थे। दिव्य योगी ने बताया “यद्यपि राजा शतानीक ने ब्राह्मणों के निर्देशानुसार 16 प्रकार के महादान दिये थे, ब्राह्मणों को रत्न वस्त्र दिया था। किन्तु वे नरक त्रास भोग रहे है। क्योंकि यह धन उन्होंने प्रजा को उत्पीड़ित कर संचित किया था। राजा का प्रथम कर्त्तव्य प्रजा का योग्य परिपालन है। वैसा करते हुए ही सुयोग्य ब्राह्मणों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है। धन बाँटना ब्राह्मणों का सच्चा सम्मान नहीं, राजा का यक्षलोभ था, लोकेषणा थीं दुःखी राजा के बेटे को सन्देश भेजा है कि मेरी गलती न दुहराना और प्रजा के परिपालन के कर्तव्य की ओर प्रथमतः ध्यान देना।
हिमालय के सभी लधु काय आत्मज निजी महत्वाकाँक्षा का परित्याग करके समवेत होते है और मिल जुलकर एक महान् उद्देश्य के लिए संयुक्त प्रयास करते है। इस सद्भाव सम्पन्न सहकारिता का नाम गंगा है। गंगा जब गोमुख से निकलती है, तब उसका स्वरुप बहुत छोटा होता है। उद्गम से प्रकट होने वाला उपहासास्पद बहुत छोटा होता है। उद्गम से प्रकट होने वाला उपहासास्पद निर्झर जब अग्रगामी होता है तो लगता है-उसकी पतली-सी जलराशि को सुखा धरती द्वारा बहुत आगे तक न चलने दी जायेगी और उसकी स्वरुप सम्पदा को कुछ ही मील का भूखण्ड आत्मसात कर लेगा। हवा के झोंके उस छोटी-सी जलराशि को सुखा देने और उड़ा देने में देर न लगने देंगें। उद्गम पर खड़ा व्यक्ति ऐसे ही अनुमान लगा सकता है। उद्भूत जल-प्रवाह का छोटा-सा अस्तित्व किसी बड़ी सम्भावना का आश्वासन नहीं देता।
वस्तु स्थिति में भारी परिवर्तन होता है। निर्झर उदार चेता बनते है। महान् उद्देश्य के लिए समवेत होने की देव-परम्परा स्वीकार करते है और अपने नाम रुप का-पृथक अस्तित्व के मोह का विसर्जन करके पुण्य प्रयोजन के लिए संयुक्त प्रयत्न करने की अपनाते है। हिम-प्रदेश के अनेकानेक निर्झरों की संघवद्ध प्रक्रिया अग्रगामी बनती है तो विशाल कलेवर धारण करती है। गंगा क्रमशः थोड़ी गहरी और गतिगामिनी बनती है। समर्पण और समन्वय यही है-वह तत्वज्ञान जिसके आधार पर महान् प्रयोजन सधते रहे है। आशंका र्व्यथ सिद्ध होती है। उस जल-धार को न भूमि सोख पाती है और न हवा को सुखाने में सफलता मिलती है यद्यपी दोनों की चुनौती और चेष्टा में कोई कमी नहीं आती। उनका वश चलता तो उस नन्ही-सी जलधारा का अस्तित्व देर तक, दूर तक ठहर ही न पाता। एक ही तीसरी चुनौती और भी बड़ी है। यदि हिम-पुत्रों की व्यक्ति महत्वाकाँक्षा अपना अलग अस्तित्व बनाये रहने, स्वयं सम्पन्न रहने और यशस्वी होने के लिए मचलती तो अवरोध निश्चित था। संकीर्ण-स्वार्थपरती व्यक्तिवादी अहमन्यता उन्हें समविन्त न होने देती। हर निर्झर अपने निजी वैभव की बात सोचता और गमाने के लिए, कमाने के लिए ही आग्रह करता। ऐसी दशा में गंगा की विशालता तो बनती ही नहीं। संकट यह भी था कि वे क्षुद निर्झर अपन अस्तित्व तक बनाये न रह पाते। यदि यह अवरोध बनता तो इस गंगा, हिमालय और निर्झर समुदाय पर दर्शकों को आँसू ही बहाने पड़ते। सुखाने वाली शक्तियाँ अट्टहास करती और धरती को हरितमा, सुषमा का और जन-समुदाय को जो पवित्रता, प्रसन्नता का सुअवसर मिलता है, उसका कही दर्शन भी न हो पाता।
जलनदों की छोटी-छोटी इकाइयाँ मिलती चली जाती है। हिमालय छोड़ने तक गंगा गौरवशालिनी बन जाती है मैदानी नदियाँ भी इस नीति को अपनाती है और गंगा के सहकार में घाटा नहीं, लाभ सोचती है। समन्वय क्रम चला है। गंगा का आकर, विस्तार बढ़ता है और उस समर्थता से संसार लाभाविन्त होता है। घटता कुछ नहीं, वैभव बढ़ता ही बढ़ता है। गंगा बिहार प्रान्त में पहुँचकर मूल उद्गम की तुलना में हजारों गुनी बढ़ जाती है। अजस्त्र अनुदानों के कारण जिसे घाटे की आँशका थी, वह निर्मूल हो जाती है। बंगाल में पहुँचने पर गंगा हजार रुपों में विभाजित होती है और वह समस्त भूखण्ड हरितमा और सम्पन्न्ता से शोभायान होता है। निरीक्षक देखता है और इसे सदुददेश्य के लिए समर्पण की गरिमा के रुप में प्रतिपादित करता है। गंगाजल प्रवाह का नाम नही, उस उदार सदाशयता का नाम है, जिसे अपनाकर, प्रत्येक जल-नद की श्रद्वा का पात्र बना। कृपण अहमन्यता को अवसर मिला होता और संकीर्ण-स्वार्थपरता को अवसर मिला होता तो यह समन्वय सम्भव न हो पाता और गंगा नाम की गरिमा का अस्तित्व तक दृष्टिगोचर न होता।
परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक बुद्धि, अधिक प्रतिभा और अधिक मेघा क्या प्रदान कि वह अपने को सृष्टि का अधिपति ही समझने लगा। जबकि यह सिवा मिथ्याभिमान के कुछ नहीं है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि यह संसार मनुष्य के लिए ही नहीं है। इसमें अनेक प्राणियों के निवास और निर्वाह की व्यवस्था तथा परिस्थितियाँ में अन्य प्राणी भी अपनी आवश्यकता पूरी करते है। एक संयुक्त परिवार में जैसे सदयों की अलग-अलग इच्छाएँ पूरी करने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की जाती है और सभी सदस्यों को अधिकतम सुविधाएँ प्राप्त हों यह ध्यान रखा जाता है, इसी प्रकार परमात्मा ने अपने प्राणी परिवार के लिए संयुक्त व्यवस्था की है। उस व्यवस्था से किसी का शिकवा शिकायत करना अनुचित है।
पृथ्वी पर करीब चार अरब मनुष्य रहते है। यह संख्या अपने आप में बहुत बड़ी दिखती है लेकिन अन्य प्राणियों को देखते है कि उनकी संख्या का पता चलता है तो मनुष्य एक अल्पसंख्यक प्राणि भर है। सभी देशों में रहने वाले समस्त धर्मानुयायी, भाषा भाषी और विभिन्न संस्कृतियों वाले मनुष्यों की इस संख्या से हजारों गुना चींटी, मक्खी, मच्छर, जैसे कीड़े थोड़े से क्षेत्र में ही मिल जायेंगे। ये तो छोटे-छोटे प्राणी है। बड़े और विशाल काय प्राणियों में हाथी, गेंडा, सिंह, हरिण जैसे प्राणी भी मनुष्य की अपेक्षा कहरी अधिक है। अन्य पशु पक्षियों का तो कहना ही क्या ? उड़ने वाली चिड़ियाओं की जाति और संख्या मनुष्य की सभी जातियों और समाज संख्यायों की अपेक्षा कहीं अधिक है।
इस स्थिति में यह सोचना और समझना कि इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य का ही अधिकारी है, सृष्टि के विधान को परमात्मा के नियमों को चुनौती देने जैसा है। अपने आपको सबसे बड़ा सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ समझना तथा सृष्टि पर केवल अपना ही एकाधिकार मान कर उसके अनुसार व्यवहार करना उद्धत अंहकार के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता। अपने सोचने समझने के ढंग में परिवर्तन करना चाहिए और रीति-नीति में तथ्य तथा विवेक का समन्वय करना चाहिए यह मानना चाहिए कि मनुष्य भी परमात्मा के अगणित असंख्य पुत्रों में से एक है उसे अन्य प्राणियों की अपेक्षा कुछ विशेषताएँ, कुछ सुविधाएँ, कुछ योग्यताएँ अधिक मिलीं, यह बात सच है । इन कारणों से उसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ कहा जा सकता है, पर इस श्रेष्ठता की सार्थकता उत्कृष्ट सौजन्यता में है न कि उद्धत अंहकार में। छोटे भाई के प्रति बड़े भाई के जो कर्तव्य होते है, अग्रज को अनुज के प्रति जिस उदारता मनुष्य को भी अपन छोटे भाइयों से बरतनी चाहिए इसी मनुष्य का बड़प्पन, उसकी श्रेष्ठता का परिचय छिपा हुआ है। उसका बड़प्पन, उसक मनुजता के साथ जुड़ा हुआ है और वह सहयोग तथा विवेक जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर ही श्रेय भाजन बन सकता है।
यदि संख्या, शक्ति और क्षेत्र की दृष्टि से मनुष्य का मूल्याँकन किया जाय और पृथ्वी पर यह अपने अधिकार का दावा करे तो औचित्य की दृष्टि से, अपन मापदण्डो के ही आधार पर वह सृष्टि के कई प्राणियों से पिछड़ जायेगा। बुद्धि के अलावा मनुष्य में ऐसी और कौन सी विशेषता है, जिसके आधार पर वह अन्य प्राणियों की तुलना में इक्कीस सिद्ध हो सके। सही बात तो वह है कि छोटे-छोटे कीड़े मकोड़ो में भी ऐसी अगणित विशेषताएँ है जो अपने क्षेत्र में कई तरह से मनुष्य को भी चुनौतियाँ दे सकती है और मनुष्य को पिछड़ा हुआ सिद्ध करती है।
उदाहरण के लिए मधुमक्खियों के जीवन क्रम का ही बारीकी से अध्ययन किया जाय तो उनकी बुद्धिमत्ता और क्रिया कुशलता को देखकर दाँतो तले अँगुली दबानी पड़ेगीं पहाड़ी मधुमक्खी मैदानी मधुमक्खी की अपेक्षा बड़ी होती है, उनके छत्ते भी बड़े होते हे। एक छत्ता प्रायः 7 फुट लम्बा और 4 फीट चौड़ा होता है। उन छत्तों में वर्ष भर में 25 से 40 किलोग्राम तक शहद प्राप्त होता है। सबसे छोटी मधुमक्खी जिन्हें ‘लिटिलबीज’ कहा जाता है, हथेली के बराबर छत्ता बनता है। एक वर्ष में उनसे अधिकतम एक पौंड शहद मिलता है। अब आइये देखे इनका परिवार और परिवार की व्यवस्था। बड़े छत्ते में लगभग 20 हजार मक्खियाँ रहती है। ये सभी मक्खियाँ रानी मक्खी का अनुशासन मानती है। वही प्रजनन और परिवार की बुद्धि का काम करती है। जब रानी मक्खी बूढ़ी हो जाती है। तो वह अण्डे देना बन्द कर देती है। और उसे अपना सिंहासन खाली करना पड़ता है। नई रानी के कार्य और अभिषेक का दायित्व भी बुढ़ी रानी ही निवाहती है। जब तक वह अण्डे देती रहती है तब सूतिका गृह में ही रहती है। अण्डे देना बन्द करने के बाद वह पहली बार सूतिका गृह छोड़कर बाहर आती है और यह देखती है कि 20 हजार मक्खियों के इस परिवार में कौन सी मक्खी निरन्तर अण्डे देते रहने की क्षमता से सम्पन्न है। यह चुनाव वह लगभग दस दिन में पूरा करती है।
रानी मक्खी एक दिन में लगभग 1000 अण्डे देती है और अधिकतम दो वर्ष तक जीवित रहती है। प्रौढ़ होते ही वह प्रतिदिन अण्डे देने लगती है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे प्रतिदिन भ नर समागम करना पड़ता है। रानी मक्खी जीवन में केवल एक बार ही नर समागम करती है और उसी में प्राप्त शुक्राणुओं को अपने पेट की विशिष्ट थैली में रख लेती है। अण्डे देने के बाद रानी का दायित्व समाप्त हो जाता है उनके पालनपोषण का काम अन्य मक्खियाँ सम्हालती है। रानी के लिए तो अण्डे भर देने का काम होता है। अण्डा तीन दिन के बाद लारवा बनता है। उसके हाथ पैर, मुँह आदि कुछ नहीं होते। इन लारवाओं को दाई मक्खियाँ अपने सिर की ग्रंथियों से निकलने वाला दूध पिलाकर पालती है। लारवा तीन दिन के बाद प्यूपा बन जाता है और उसमें से मक्खी निकल आती है।
इस प्रकार मधुमक्खियों का परिवार निरन्तर बढ़ता रहता है और उसका प्रत्येक सदस्य छत्ते का विस्तार करने में लगा रहता है। खोजी मक्खियाँ दुर दुर तक जा कर यह पता लगाती है कि इस समय कहाँ पर शहद देने योग्य फूल खिले है ? उसकी सूचना वे छत्ते की अन्य मक्खियों को भी देती है और तभी यह तय हो जाता है कि अगले दिन कहाँ और किस दिशा में शहद इकट्ठा करने के लिए जाना है। मधु संचय के अतिरिक्त यह मक्खियाँ छत्ते को छेड़ने वाले शत्रुओं पर हमला करती है। छोटे मोटे शत्रु तो इन हमलों में अपने प्राण ही गवाँ बेठते है। इतनी बुद्धिमता, सूझ बूझ, संगठन और एकता मनुष्य में आ जाएँ तो सम्भवतः सुव्यवस्थिति शासन स्थापित कर ले।
किसी ठीक ठिकाने पर रहने और योजन पूर्वक अपनी बस्ती बसाने में मनुष्य या मधुमक्खी ही सक्षम नहीं है, टरमाइडस् जाति का एक कीड़ा आथेपादा जमीन के भीतर बहुत ही कुशलता के साथ घर बसा कर रहता है। यह कीड़ा जमीन के भीतर शहर बसा कर रहता है। वह चींटी और दीमक से भी बुद्धिमान है इस जाति के कीड़ो लाखों की संख्या में इकट्ठे रहते है, और इतने सुयोजित ढंग से कि क्या मजाल तनिक भी अव्यवस्था फैल जाए। ये अपने समुदाय की रानी के आदेश निर्देशों का पालन करते है। कुछ कीड़े भोजन एकत्रित करने का काम करते है, कुछ निर्माण कार्य में लगते है, और किन्हीं को प्रजनन का कार्य सौंपा जाता है।
चींटियों की एक जाति खेती का काम करती है और उसी से अपना गुजारा चलाती है। यह पढ़ सुन कर शायद किसी को विश्वास न हो ,किन्तु यह सच है कि इस जाति की चींटियाँ हरी पत्तियों को तोड़ तोड़ कर अपने बिलों के पास दूर तक बिछा देती है इन पत्तियों पर फफूँदी लगती रहती है और ये चीटियाँ फफूँद खाकर ही लम्बे समय तक गुजारा चलाती है। सूखे पत्तों को हटाना और उन्हें जमा करना उनके दैनिक जीवन क्रम में सम्मिलित रहता है इसलिए उन्हें खाने पीने की चीजों की कमी नहीं पड़ती। दीमक लकड़ी खाती है किन्तु उसे पंचापाना दीमक के वश की बात नहीं होती। इस कार्य में सहयोग करता है एक अति सुक्ष्म जाति का जंतु फलेजीमर जो उसके पेट में घुस पैठ की जानकारी रहती है और वह फलेजीमेर का निरविरोध आँतो में घुसने देती है। उसे पता रहता है कि यह जन्तु आँतो में है अथवा नहीं ? यदि फलेजीमेर आँतो में न हो तो दीमक लकड़ी न खा कर और कोई वस्तुएँ चाट कर अपनी क्षुधा बुझाती है। मनुष्यों में से किये यह पता होता है कि उसके पेट में या आँतो में क्या है ?
समय की पाँबदी का कोई व्यक्ति शायद ही इतना ध्यान रखता है जितन कि ये छोटे छोटे जन्तु प्रत्येक कार्य समय पर करते है। मधुमक्खी निशिचत समय पर अपने छत्ते से शहद इकट्ठा करने क लिए उड़ती है उसमे एक मिनट भी आगे पीछे नहीं होते। मनुष्य समझता है, कि उसमे देखने समझने की अधिक क्षमता है, उसकी इन्द्रिय चेतना अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक तेजस्वी है लेकिन कई प्राणी इन्द्रिय संवेदना के क्षेत्र में मनुष्य को बहुत पीछे छोड़ देते है। उदाहरण के लिए कुछ कीड़ो की आँखे उनकी आँखो में हजारों लैंस लगे होते है। उनके द्वारा पृथक् पृथक बिम्ब मस्तिष्क में उतरते है, उनका सम्मिलित अनुभव कर कीड़े मनुष्यों से भी ज्यादा व्यापक क्षेत्र में देख और समझ लेते है, कीड़ो के कान नहीं होते, वे कान का काम अगली टाँगों के जोड़ो में रहने वाली ध्वनि ग्रहण शक्ति द्वारा पूरा कर लेते है। तितलियाँ पंखों से सुनने का काम लेती है। झिगुरों की आवाज उन के मुँह से नहीं टाँगों के रगड़ने से उत्पन्न होती है । स्वाद ग्रहण करने में तितलियाँ मनुष्य से कई गुना अधिक आगे है। वे नमक और चीनी के स्वाद को मनुष्य की तुलना में दो सौ गुना अधिक बारीकी से समझ लेती है।
अब से 20 करोड़ वर्ष पहले इस पृथ्वी पर पंतगे ही पंतगे भरे पड़े थे। अन्य जीवों की उत्पत्ति तो बहुत पीछे जाकर हुई। अभी समस्त प्राणियों में छोटे-छोटे जीव जन्तुओं की संख्या, कुल प्राणियों की संख्या का अस्सी प्रतिशत है। हिमाच्छादित पर्वत शिखरों से लेकर जलते हुए रेगिस्तानों तक में एक जैसे सूक्ष्म और छोटे छोटे जीव जन्तुपाये जाते है। ये प्राणी उत्तरी ध्रुव की ठंडक और उबलते झरनों के जल छिद्रों में रहने योग्य स्थिति आर्श्चयजनक ढंग से बना लेते है। मनुष्य में कहाँ वैसी क्षमता ? वह कहाँ विभिन्न ऋतुओं के अनुरुप अपने को रख सकता है या जी सकता है ?
प्रकृति ने अन्य अनेक तरह के प्राणियों को भी इस तरह की विशेषताएँ विभुतियाँ दे रखी है जो सामान्यतः मनुष्य के पास नहीं होती। मनुष्य को यह गुमान नहीं करना चाहिए कि नियति ने उसे ही समस्त विभूतियाँ और सम्पदाएँ दे रखी है। उसने आवश्यकतानुसार सभी को उपयुक्त शक्तियाँ विशेषताएँ बाँट रखी है। मनुष्य इसी अर्थो में श्रेष्ठ हो सकता है कि उसमें चेतना के विकास की अपूर्ण संभावनाएँ है। यदि इस चेतना को ससीम से असीम बनाया जा सके और आत्मविस्तार की यह उदात्त दृष्टि अपनाई जा सके तो प्रतीत होगा कि यह सुन्दर संसार केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं जीवधारियों के लिए भी बना है। इन्हीं जीवों में से एक मनुष्य भी है।
न्यायामूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे जब छोटे बालक थे, तो उनकी माँ ने उन्हे लड्डु देते हुए कहा, इसमें से एक जो तुम चाहो स्वयं ले लो और दूसरा अपने मित्र (जो नौकरानी का लड़का था) को दे दो। आकार में एक लड्डु बड़ा था, दूसरा छोटा। बालक रानाडे बड़ा लड्डु अपने मित्र को दे दिया| माँ ने आर्श्चय से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया रानाडे ने उत्तर दिया, “तुम्हीं ने तो कहा था, जो तुम चाहो, अपने मित्र को दे दो |ऐसा था बालक रानाडे की उदारता।
काय संस्कार एव चित्त-संस्कार इन त्रिविध संस्कारों की सामूहिक अभिव्यक्ति का नाम ही संस्कृति है। अतः संस्कृति का अर्थ और आधार सामूहिक-संस्कारों में सन्निहित रहता है।
संस्कार शब्द द्विअर्थी है। योग, मनोविज्ञान में ‘संस्कार’ कहते है, उस धुत-भाव या प्रभाव को, उस ‘इम्पे्रेशन’ को जो किसी चेष्टा या क्रिया के होने पर चित्त रह जाता है। इस प्रकार प्रत्येक चित्त-वृत्ति संस्कार उत्पन्न करती है और प्रत्येक संस्कार, वृत्तियों के उदय कारण बनता है। वृत्ति है वृक्ष और संस्कार का यह चक्र निरन्तर चलता रहता है। वृत्ति है वृक्ष और संस्कार उसका मूल यानी उसकी जड़। संस्कार का दूसरा अर्थ है-परिमार्जन, परिष्करण, शुद्धिकरण, परिपक्वीकरण। संस्कृति के आधारभूत तत्व ‘संस्कार’ में दोनों अर्थ सन्निहित है। जब मनुष्य अपनी कायिक, वाचिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आस्थागत प्रवृत्तियों को परिष्कृत उदात्त एवं श्रेष्ठ बना लेते है, तब उनके ‘इम्पेशन्स’ या संस्कार गहराई तक अंडिग हो जाते है और प्रत्येक क्रिया में वे अभिव्यक्त होते है। यह अभिव्यक्ति ही संस्कृति है।
जीवात्मा के तीन कलेवर ओढ़ रखे है, इन्हें स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर कहते है। शरीर-संस्थान, मनः संस्थान एवं अन्तः करण-संस्थान भी इन्हें कहा जाता है। क्रमशः क्रिया, चिन्तन एवं आस्था-इनकी मूलभूत शक्तियाँ है। इन तीनों शक्तियों का श्रेष्ठतम सदूपयोग की काय, वाणी एवं चित्त का संस्कार है। संस्कृत मनुष्य वही है, जो इन संस्कारों से सम्पन्न हो।
अपने शरीर को उसमें निवास करने वाली परम, पवित्र प्रकाशवान्, परम चैतन्य परमात्म-सत्ता का मन्दिर समझकर उसे सदा, पवित्र, पुष्ट, प्रखर, क्रियाशील बनाये रखना ही काय-संस्कार है। सक्रियता, श्रमशीलता, शुचिता की समुचित उपासना-शरीर को भगवान का मन्दिर की कसौटी और प्रमाण है।
वाक-संस्कार का अर्थ वाणी की चतुराई मात्र नहीं सत्यवत-वाक् ही संस्कारित-वाक् है। ऐसी ही वाणी को वैदिक-ऋषियो ने मधुमती वाणी, कल्याणी वाणी आदि कहा है। हमारे पूर्वज विचारक-मनीषियों का मत है।
“ शब्दब्रह्माणि निष्णातः परं ब्रह्माधि गच्छति।”
अर्थात्-शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परमब्रह्म को प्राप्त करता है।
परावाक् ही वाक् का मूल रुप है। वही शब्द-ब्रह्म है। भतृहरि के अनुसार प्रतिभा की समग्र अभिव्यक्ति वाक् में ही होती है। व्यष्टि-पिण्ड में वाक्-शक्ति अपने मूल रुप में प्रकाश-शक्ति के रुप में ही रहती है प्रकाशन, अभिव्यक्ति उसी का धर्म है। उसी सूक्ष्म-शक्ति को पश्यन्ती वाक् कहा जाता हैं। वह शक्ति जब चिन्तन के रुप् में सक्रिय होती है तो उसे मध्यमा-वाक् कहते है। वहीं जब ध्वनि-समूह के रुप् में अभिव्यक्ति होती है, तो वैखरी कहलाती है। इस प्रकार वाक्-शक्ति का समग्र रुप में चिन्तन-शक्ति है। अतः वाक्-संस्कार का अर्थ मधुर-सरस उच्चारण भर नहीं, वरन् चिन्तन का संस्कार है। परिष्कृत, उदात्त, सत्यनिष्ठ चिन्तन की वाक्-संस्कार है। इसलिए वैदिक-ऋषि कहते है-’
‘वाचः सत्यमशीय” (यजुर्वेद 364)
अर्थात-मैं अपनी वाणी में सत्य को प्रतिष्ठित करुँगा। यह भी कहा है कि-
सा मा सत्योक्तिः परिपातु विश्वतः (ऋग्वेद 10/37/12)
अर्थात-सत्य-भाषण द्वारा मैं सब बुराइयों से अपने को बचाता रहूँ।
वस्तुतः मनुष्य को सार्थक वाणी को जो विराट् वैभव परमात्मा ने प्रदान किया है, उसका सर्वोत्तम सदूपयोग करना वाक्-संस्कार द्वारा ही सम्भव है। उस हेतु ज्ञान-साधना, चिन्तन-परिष्कार, विचार-संयम आवश्यक है। शब्द की सहायता के बिना विचार नहीं होता। अतः विचार-साधना और वाक्-साधना पर्यायवत् है। छान्दीग्य उपनिषद् में सनत्कुमारजी नारद से कहते है।
“ वाग्वाब नाम्नों भुयसी, वाग्वा ऋग्वेद विज्ञापयति यजुर्वेद सामवेद माथर्वण चतुर्थमितिहास पुराणं पज्चमं वेदाना वेदं पिव्यं राशि दैव निधिं............धर्म चाधर्म च सत्यं चानृत च साधु चासाधु च.....................वागेवैर्त्सव विज्ञापति वाचमुपास्स्वेति॥ “ (छान्दोग्य 7/2/1)
अर्थात्-वाक् नाम से बढ़कर है। वही ऋग्वेद को विज्ञापति करती है। यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ अथर्व वेद, पंचम वेद इतिहास, पुराण, वेदो के वेद व्याकरण आदि समस्त विद्याएँ, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, साधु-असाधु यह सब वाक् ही विज्ञापति करती है। अतः वाक् की उपासना करो। शकंराचार्य ने मुख्य परोक्षानुभूति में कहा है-
“नीत्पद्यते बिना ज्ञानं विचारेणाऽन्य साधनैः।”
अर्थात्-ज्ञान की उपलब्धि विचार के अतिरिक्त अन्य किसी साधना से सम्भव नहीं। इसलिए विचार् साधना, ज्ञान-साधना ही वाणी-साधना का सही रुप है।
चित्त-संस्कार तीसरा एवं सर्वोपरि संस्कार है चित्त का लक्षण ‘चेतयितृत्व’ अर्थात-बोधयुक्त होता एवं निर्णय-समर्थ होता है। मन, बुद्धि, अंहकार आदि उसी के प्रयोजन-भेद से रखे गये नाम है। अन्तःकरण समुच्चय इन्ही का नाम है।
संस्कार, आस्थाएँ, भाव-सम्वेदनाएँ चित्त में पुच्जीभूत एवं क्रियाशील रहती है। काय-संस्कार एवं वाणी संस्कार की प्रेरणा भी परिष्कृत, संसस्कृत चित्त में ही उठती है। अतः चित्त-संस्कार सर्वोपरि संस्कार का स्वरुप-निर्धारण चित्त ही करता है। संस्कारित काया सक्रियता का सुख देती है। संस्कारित वाणी सरस्ता, मधुरता, अनुकूलता, सत्प्रेरणा उत्पन्न करती है। ये दोनों प्रक्रियाएँ संस्कारित चित्त में ही प्रेरित होती है। वाणी या विचार-शक्ति का कैसा उपयोग किया जाय, उसे प्रज्ञा के उर्त्कष का साधना बनाया जाय या पतन के प्रयोजन में प्रवृत्त रखा जाय, यह निर्धारण चित्त-तल में जीम आस्थाएँ करती है। सम्पूर्ण-जीवन का दिशाधारा का निर्धारण चित्त में सव्याप्त संस्कार जगत ही करता है। वाणी उसी के संकेत पर नाचती है। शरीर उसी के संकेत पर चलता है। व्यक्तित्व को मूल वे आस्थाएँ ही है, जो चित्त में छायी रहती है। उनके ही संकेत पर मनुष्य की गतिविधियाँ सच्लित होती है।
संकल्प की दृढ़ता चित्त-संस्कार पर निर्भर है। चित्त मं जो संस्कार जितना गहरा होगा, उससे पे्ररित संकल्प भी उतना प्रचण्ड होगा। बिना आस्था के बिना गहरे विश्वास के, संकल्प का प्रखर नहीं बनते विश्वास की ही प्रतिक्रिया संकल्प है। आस्थाएँ है-बीज और संकल्प है-वृक्ष। उन पर ही विचार एवं क्रिया के फूल-फल उगते है।
वैशेषिक दर्शन में संस्कार की तीन विशेषताएँ बतायी गयी है-भावना, वेग एवं स्थिति-स्थापकत्व संस्कार भावना रुप में फैले रहते है। वे वेगवान् संकल्प बनकर प्रकट होते है तथा संस्कारो के इर्द-गिर्द ही मनुष्य की समस्त गतिविधियाँ मंडराती रहती है।
चित्त-संस्कार से प्रज्ञा का उन्मेष होता है। संस्कारित चित्त की सबसे बड़ी शक्ति है-श्रद्धा। श्रद्धा ही मनुष्य को उल्लसित रखती है। वही विचाराणा एवं क्रिया का स्वयप निर्धारण करती है। सुँस्कृत-चित्त में सात्विक-श्रद्धा घनीभूत होती है। उसी स्थिति में भावनाएँ विचार एवं क्रियाएँ श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ती है। श्रेष्ठ भावनाएँ सद्भाव बनकर प्रकट होती है। श्रेष्ठ विचार सद्धिचार कहलाते है और श्रेष्ठ क्रियाएँ सदाचार कहलाती है। इन्हें ही सद्भव, सद्ज्ञान एवं सर्त्कम भी कहा जाता है। काय-संस्कार का परिणाम है-सद्धिचार तथा चित्त-संस्कार की परीणिति है। सद्भाव। जब इस त्रिविधि उर्त्कष कहते है। संस्कृति व्यक्ति की नहीं, समाज की ही होती है। इसलिए लिन्टन ने संस्कृति की ‘सामाजिक-विरासत’ कहा है। लाँबी के अनुसार समस्त सामाजिक परम्परा ही संस्कृति है।
विचारक टी.एस. इलियट ने अपनी पुस्तक “नोट्स टुबर्ड ए डेफिनीशन आव कल्चर” में कहा है कि व्यक्ति की संस्कृति समूह या वर्ग की संस्कृति पर ही निर्भर करती है और वर्ग या ‘क्लास’ की संस्कृति उस सम्पूर्ण समाज की संस्कृति पर आश्रित होती है, जिसका वह वर्ग अंग है। इलियट ने यह भी कहा है कि ‘जब परिवार रुपी इकाइयाँ संस्कृति-दान करने से विमुख हो जाती है, तब संस्कृति का अध-पतन होने लगता है।’
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संस्कृति को प्राणवान् रखने में परिवारों की भूमिका प्रधान है। काय, वाक् और चित्त इन त्रिविध-संस्कारों की सामूहिक-साधना से संस्कृति विकसित होती तथा जीवन्त रहती है। इस साधना की इकाई है-परिवार। परिवार ही शरीर, वाणी और अन्तः करण की सामूहिक संस्कार-साधना के आधारभूत घटक है। उनमें विकसित संस्कृति ही सामाजिक-संस्कृति का रुप निर्धारित करती है। अतः साँस्कृतिक-विकास के लिए पारिवारिक-सुव्यवस्था अत्यावश्यक है।
साँस्कृतिक-चेतना का अर्थ होता है-जीवन-मूल्यों की चेतना। जीवन-दर्शन एवं जीवन-व्यवहार दोनाँ ही उसके अंग है। शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य साँस्कृतिक-परम्परा एवं साँस्कृतिक-उत्तराधिकार का सम्प्रेषण भी होता है। सुव्यस्थित-परिवार शिक्षा के इस दायित्व की बड़ी हद तक पूरा करते है। अपने सदस्यों के शारीरिक, वाचिक एवं भावनात्मक व्यवहारों को परिष्कृत करने का प्रशिक्षण सुव्यवस्थित-परिवार दिया करते है। अतः जिस प्रकार संस्कृति के साधनात्मक आधार उसी प्रकार उसके व्यावहारिक आधार भी तीन व्यक्ति-निर्माण एवं समाज-निर्माण तीन स्तरों पर सम्पन्न संस्कृति की यह त्रिविध-साधना तीन परिणामों के रुप में सामने आती है-सामूहिक सद्भाव, सामूहिक-सद्विचार एवं सामूहिक सर्त्कम या सदाचार। इस प्रकार संस्कृति की साधना-जीवन की साधना है।
अन्वेशी आइजक न्युटन अपने अन्वेषण कार्यों में कितना तन्मय चिन्तन करते थे, इसकी एक बहुचर्चित घटना इस प्रकार है। न्यूटन किसी अध्ययन में निरत थे। एक भोजन पर आमत्रित मित्र उनसे मिलने आये और उन्हें व्यस्त देखकर कमरे के एक कौने में बैठ गये। नौकर एक ट्रे भोजन लेकर आया। अतिथि ने पहले तो कुछ इन्तजार किया, पीछे समय बचाने का दृष्टि से भोजन करना आरम्भ कर दिया। साथ ही दूसरी ट्रे न्यूटन के लिए लाने को कह दिया। शिष्टाचार के अनुसर खाली की गई ट्रे को ढकने वाले तौलिये से ढक दिया गया। इतने में ही न्यूटन का ध्यान बटा। उसने मित्र को अभिवादन किया। साथ ही भोजन की मेज पर जाकर खाने का उपक्रम करने लगे। खाली ट्रे देखकर उनने कहा-अरे, मैं तो पहले ही भोजन कर चुका, मुझे याद तक नहीं रहा। मित्र उनके भुलक्कड़पन पर हँसने और सारा घटनाक्रम उसे बताते हुए नई ट्रे आने पर उन्हें भोजन कराया।
कई बार ऐसी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है, जिनके लक्षण तो दिखाई देते है, पर यह समझ में नहीं आता कि क्यों पदा हुई है ? चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में जैसे-जैसे दिनों दिन प्रगति होती जा रही है वैसे-वैसे यह प्रामाणिक होता जा रहा है कि रोग के लक्षण भेले ही शरीर में दिखाई दें परन्तु उनका अधिकाँश कारण मन में छिपा रहता है। पिछले दिनो जर्मन पत्रिका ‘मेडिजिनेश क्लीनिक’ में एक लेख प्रकाशित हुआ उसमें कई चिकित्सा विज्ञानियों के अनुभव साररुप में छपे थे। लेख में कहा गया था कि शरीर के विभिन्न अंगो में होने वाली पीड़ा, वेदना आदि के लिए जितने कारण शरीर में विद्यमान होते है, उससे कही अधिक मानसिक कारण इसके लिए उत्तरदायी होते है।
इस लेख में मनःस्थिति के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का विवरण भी था। ऐसे कई प्रयोगों का उल्लेख इस प्रतिपादन की पुष्टि में किया गया था जिनसे सिद्ध होता था कि शरीर मन मस्तिष्क का एकनिष्ठ आज्ञानुवर्ती सेवक है और उसे जैसे निर्देश मिलते है, “एक बार मैंने केवल डिस्टिल्ड वाटर की सुई लगा कर रोगी को यह बताया कि उसे गहरी नींद की दवा दी गई है। वह कई दिनों अस्पताल में ठीक नींद नहीं ले पा रहा था। सुई लगाने के दस प्रन्दह मिनट बाद जब मैं उधर से निकला तो मैंने देखा कि वह गहरी नींद ले रहा है। एक दूसरे रोगी को, जिसे भी यही शिकायत थी नींद लाने वाली औषधि दी गई और कहा इससे थोड़ी नींद आ जायेगी और तुम्हारा दर्द भी हलका पड़ जायगा यह संदेह पैदा करने बाद रोगी को नींद नहीं आई और वह पूर्ववत् दर्द की शिकायत करता रहा।”
इस प्रयोग के बाद उन्हीं दवाओं के विपरित के निर्देश देकर, उनके दूसरे परिणाम बता कर दिया गया तो देखने में आया कि पहले वे सर्वथा भिन्न प्रतिक्रिया हुई है। पहले दिन पानी का इच्जैक्शन साधाराण दवा बता कर लगाया तो उससे न दर्द कम हुआ और नहीं रोगी को नींद आई।
इसके साथ ही दूसरे रागी को नींद लाने का आश्वासन दिया गया तो उसने गहरी नींद आई। इन प्रयोंगों के आधार पर डाक्टर जूलियस ने यह निर्ष्कष प्रतिपादित किया कि दवाएँ जितना परिणाम उत्पन्न करती है उनसे अधिक प्रभाव कहीं उनके सम्बन्ध में मान्यताओं को होता है। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि एक ही तरह के दर्द को भिन्न-भिन्न मनः स्थिति के लोग अलग-अलग प्रकार के दर्द के कारण बुरी तरह चीखते चिल्लाते है। मध्यम मनःस्थिति वाले मात्र हलके हलके कराहते रहते है। लेकिन साहसी लोग उसी कष्ट को बहुत हल्का मानते है। युद्ध के मोर्चे पर घायल होने वाले सिपाही अपनी बहादुरी की मान्यता के आवेश में कम कष्ट अनुभव करते है। जबकि उतने ही घाव लगने पर अन्य कई गुना अधिक कष्ट अनुभव करते है।
भावनात्मक तनाव भी कई बार दर्द में परिणत हो जाता है। सिर दर्द, पेट का दर्द, जोड़ो का दर्द, छाती का दर्द, कमर का दर्द आदि दर्द शारीरिक कारणों से अधिक मनोवैज्ञानिक कारण उत्तरदायी होते है। इनके मूल में कोई चिंता, कोई आँशका, कोई भय, भावी अशुभ की आशंका अथवा भूतकाल की कोई दुःखद स्मृति काम करती है। मन की यह अवस्था शरीर के किन्हीं भी अंगो पर आच्छादित होकर उन्हें पीड़ा का अनुभव कराती है।
कई बार ऐसी स्थिति भी देखी गई है कि डाक्टर अपने समस्त निदान परिक्षण करने के उपरान्त भी रोगी में अस्वस्थता के कोई कारण नहीं जान पाता या कोई कारण पता नहीं चलता, किंतु रोगी अपने दुबला होता जाता है और साधारण काम काज करने में समर्थ नहीं रहता। यद्यपि रोग का कोई कारण पकड़ में नहीं आता फिर भी उसका कष्ट स्पष्ट दीख पड़ता है। यह कहा जाय कि रोगी ढोंग कर रहा है तो उसका भी कोई कारण समझ में नहीं आता, क्योंकि उस रुग्णता का पूरा भार रोगी को उठाना पड़ता है। इस प्रकार के विचित्र रोगी की जड़ खोज लेने में अब मनोविज्ञान सफल होता जा रहा है।
मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुई नवीनतम खोजों के अनुसार इस प्रकार के विचित्र और न पकड़ में आने-वाले रोगों का कारण मानसिक होता है। कोई पुरानी कटुअनुभूति मस्तिष्क के किसी भाग पर आक्रमण करती है। और वहाँ के संतुलन को गड़बड़ा देती है। चूकिं मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिक आपस में एक दूसरे के साथ जुड़ी रहती है और आपस में कई प्रकार के आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है। इसी प्रक्रिया के अर्न्तगत लगे हुए अघात केन्द्र तक ही सीमित न रह कर शरीर के अन्य अंग अवयवों को भी प्रभावित करते है और वे अंग भी रुग्णता अनुभव करने लगते है। शारीरिक दृष्टि से वह अंग नीरोग रहता है किन्तु मस्तिष्क का विद्युत प्रवाह उस स्थान तक ठीक तहर से नहीं पहुँव पाता क्योंकि संवेदना अनुभव करने वाल कोश रुग्वावस्था में पड़े रहते है। यह गड़बड़ी संबन्धित अंग तक पूरी खुराक और सही निर्देश नहीं पहुँचने देती। इस विचित्र स्थिति के कारण ही मस्तिष्क के संवेदना केन्द्र अमुक रोग जैसा अनुभव करते है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं इस तरह के रोग न होने पर भी रोगी वस्तुत, कष्ट का वैसा ही अनुभव करता है जैसा कि वह अनुभव करता है जैसा िकवह अनुभव करता है। लेकिन डाक्टर के सामने भी यह समस्या रहती है कि वह क्या करे और क्या न करे ? इस तरह की मानसिक गुत्थियो और उलझनों की उसे जानकारी नहीं होतीं इसलिए ऐसे रोगियों को मनश्चिकित्सक के पास जाने की सलाह देकर वह अपना पिंड छुड़ा लेता है।
मानसिक कारणों से इस तरह के रोग कैसे प्रकट होते है ? इस प्रश्न का निशिचत उत्तर डाक्टरों के पास नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अलग अलग मनोभूमि होती है। उसके मनः सस्थान की अलग अलग संरचना होती है। इसलिए सबके सम्बन्ध एक जैसा विवेचन लागू नहीं होता। कई व्यक्ति आये दिन अपमान सहते है और उसके इतने अभ्यस्त हो जाते है कि उन पर अपमान को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कई व्यक्ति ऐसे भी होते है जो साधारण सी बात को बहुत को अधिक महत्व देकर तड़प उठते है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मनःस्थिति के अनुसार एक ही घटना का अलग अलग विवेचन करता है। कौन किस घटना पर कैसी प्रतिक्रिया अनुभव करेगा इस सम्बन्ध में निश्चित रुप से कुछ नहीं कहा जा सकता। सामाजिक और कानूनी मापदण्ड निश्चित रहते हैं कि इस तरह का आचरण असामाजिक या आध्यात्मि कहा जायेगा। लेकिन किस कौन सा व्यवहार कितना अप्रिय लगता है, इसका निश्चित मूल्याँकन करने के लिए मापदण्ड नहीं है।
कितने ही व्यक्तियों के सामने हत्या, मार-काट और उत्पीड़न के दृश्य आते रहते है। उन पर इनका कोई विशेष प्रभाव नहीं होता, किंतु अभ्यस्त और भावुक व्यक्ति पर उन्हीं घटनाओं का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वह किसी भंयकर अवसाद में डुब जाता है अथवा विक्षिप्त हो उठता है। अपमान, असफलता, हानि, बिछोह, जैसी अप्रिय घटनाएँ भी मनुष्य जीवन में घटती रहती है। इन की संभावनाओं को न निर्मूल किया जा सकता है और न ही इन से इन्कार किया जा सकता है। जब सम्मान सफलता, लाभ, मिलने जैसी प्रसन्नतादायक प्रसंग जीवन में आते रहते है तो उससे भिन्न प्रकार की घटनाओं के घटित न होने का कोई कारण नहीं हो सकता। रात और दिन की तरह जीवन की रचना भी प्रिय और अप्रिय प्रसंगो से मिलकर हुई है। सदा एक जैसी स्थिति बने रहना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।
धनवान, बलवान, विद्वान व्यक्तियों को भी प्रियजनों के विछोह, इच्छापूर्ति में बाधा और असफलता, शारीरिक रुग्णता तथा छल कपट जैसा व्यवहार दुख का कारण बन सकता है। इन सबसे ज्यादा मानसिक संतुलन को गड़बड़ा देने वाला कारण है कि अपने ही रचे हुए कल्पना लोक में अवाँछनीय चिंतन का चल पड़ना। आशंकाएँ प्रायः इसी स्तर की होती है। दूसरे व्यक्तियों का व्यवहार, परिस्थितियों का प्रवाह निकट भविष्य में हमारे प्रतिकुल चलेगा और उससे भंयकर विपत्ति आयेगी ऐसा चिंतन कितन ही व्यक्ति करते और उद्धिग्न रहते है। जबकि वैसा व्यवहार या घटनाक्रम कदाचित कम ही सामन आता है।
मानसिक संतुलन विपरीत परिस्थितियों के वास्तविक एवं काल्पनिक घटनाक्रमों के सहारे ही चलते है। यह व्यक्ति की भावुकता या संवेदनशीलता पर निर्भर करता है, कि वह उन्हें मजाक में टाल देता है, साहस समेट कर उनसे निपटने का फैसला करता है या भयभीत होकर अपना संतुलन खो बैठता है। यदि व्यक्ति डरपोक प्रकृति का और अतिभावुकता तो इसके लिए छोटी घटना भी बहुत बड़ी हो सकती है और नन्ही सी अशुभ कल्पना से भी तिलमिला कर उद्धिग्न हो सकता है। इस प्रकार परिस्थितियों के अघात सर्वप्रथम और संपूर्ण रुप से मानसिक संस्थान को प्रभावित करते है। ज्वर, सिरदर्द, आदि की स्थिति में शरीर असहाय बन जाता है, उसे कुछ करते नहीं बनता, बेचैनी सताती है। मानसिक संतुलन इससे भी बुरी स्थिति पैदा कर देता है। क्योंकि शरीर पूरी तरह मन के नियंत्रण में चलता है। रक्त माँस से नहीं मन के निर्देशों से शरीर की गाड़ी चलती है।
यही कारण है मन के विकृत होने पर शरीर का स्वस्थ बने रहन असंभव हो जाता है। इस प्रकार का स्वास्थ्य बने रहना असंभव हो जाता है। इस प्रकार का स्वास्थ्य संकट अमुक घटना या अमुक परिस्थिति के कारण उत्पन्न होगा, इसका सब पर लागू होने वाला कोई सिद्धाँत नहीं। कहा जा चुका है कि एक ऐसी घटना की अनेक व्यक्तियों पर परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ हो सकती है। विरोधी न हों तो भी निश्चित ही है कि सब पर अलग-अलग तरह की कम ज्यादा और भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ होती है। घटनाओं को रोका नहीं जा सकता और उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से बचा नहीं जा सकता। इसलिए स्वस्थ रहने का एक मात्र यही तरीका हे कि सोचने समझने का सही तरीका अपनाया जाय, परिस्थितियों से ताल-मेल बिठाने की कला सीखी जाय और अपनी चिन्तात्मक दुर्बलता के कारण उत्पन्न होने वाली ऐसी स्थितियों से बचा जाये जो व्यक्ति के जीवनक्रम को अस्त-व्यस्त और तहस् नहस् कर देती है।
किन्हीं अप्रिय अथवा अवाँछनीय घटनाओं की शारीरिक मानसिक स्थितियों में हलकी सी उद्धिग्नता चढ़ जाती है। यह उद्धिग्नगता, व्यक्ति की अपनी मनःस्थिति के अनुसार कम ज्यादा हो सकती है। इस स्थिति को खीझ, परेशानी, तनाव कुछ भी कहा जा सकता है। कमजोर मनःस्थिति वाले व्यक्ति साधारण सी बातों को लेकर इतने परेशान हो उठते है कि उनके मन पर कई समस्याएँ एक साथ चढ़ जाती है और सभी जल्दी जल्दी अपने संबंध में विचार किये जाने की माँग करत है। इस धमाचौकड़ी में अधूरी एकाँगी उथली समझ ही काम करती है। और उससे कोई निर्ष्कष निकलना तो दूर रहा उलटे सिर चकराने लगता है। प्रतीत होता है कि मानो उलझनो के घटाटोप चढ़ आये है। इन विचारो के हुड़दंग को रोकना चाहिए और एक समय में एक ही विचार को अपनाकर बारी-बारी शाँत चित्त से प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना चाहिए। इस तरह आसान से चित्त का बोझ हलका किया जा सकता है।
रोगों का जड़ शरीर में मन होती है, यह मान कर अपने मानसिक संतुन को सुस्थिर रखा जाय तो कोई शारीरिक रोग होने पर भी वह जीवन-क्रम सामान्य ढंग से चलाया जा सकता है। मानसिक संतुलन साधने के लिए यह मान्यता बड़ी ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दुनिया में सब कुछ अपने मन का ही हो, यह आवश्यक नहीं है। दुनिया किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बनी है, उसमें सभी व्यक्तियों प्राणियों और यहाँ तक कि वस्तुओं का भी महत्व है। उस प्रवाह में ही दुनिया अपने क्रम से चलती है, इसलिए परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाकर ही सुख शाँति के साथ रहा जा कता है। सामंजस्य स्थापित करने की यह भावना मानसिक संतुलन साधने में सहयोग देती है और व्यक्ति का चित्त नहीं शरीर भी स्वस्थ प्रफुल्लित और सशक्त बना रहता है।
25 अगस्त 1976 को घटना है। आस्ट्रेलियाँ के प्रसिद्ध शहर म्यूनिख के एक बड़े हाल में सैकड़ो डाक्टर पत्रकार और बुद्धिजीवि एकत्रित थें वातावरण बिल्कुल शान्त था। डाक्टरों के एक दल ने उस महिला का शारीरिक-परीक्षण किया और पाया कि उसे कोई दवा शारीरिक-परीक्षण किया गया और पाया कि उसे कोई दवा नहीं दी गई तथा वह सामान्य रुप से स्वस्थ है इसके बा सम्मोहन-विद्या विशेषज्ञ ने वह यन्त्र लगा दिये, जिससे निद्रावस्था में मस्तिष्क के भीतर चलने वाली विपुल तरगों का पता चलता है।
रानारिकों ने घोषित किया कि यह महिला 3 सितम्बर को सुबह के समय जागेगी। सामान्य अवस्था मं किसी व्यक्ति को आठ-दस घण्टे से अधिक की नींद नहीं आती। बहुत हुआ तो बारह-चौदह घण्टे। किन्तु वह महिला ठीक 3 सितम्बर को घोषित समय पर जागी। डाँक्टर इस बीच बराबर यह जाँचते रहे कि वह स्त्री सो रही है अथवा नहीं? दो सौ घण्टे बीतने पर रानारिको ने जब उसे जागने और नींद से उठने का निर्देश दिया तो वह बिल्कुल ताजा दम होकर उठी। डाँक्टरो ने जाँच कर बताया कि इस बीच उसके शरीर में को अस्वाभाविक परिवर्तन नहीं आया था।
पश्चिमी-देशों में सम्मोहन के इस प्रकार अनेकों प्रयोग किये जा रहे है और मनुष्य की इच्छा-शक्ति की प्रचण्डता को मापने के अनेकानेक प्रयास किये जा रहे है, इन प्रयोगों की विद्या को अंग्रेजी में ‘हिप्नोटिज्म’ कहा जाता है। पहले इसे बाजीगरी और हाथ की सफाई से अधिक महत्व नहीं दिया जाता था। किन्तु इस दिशा में जैसे-जैसे वैज्ञानिक प्रयोग किये गये और उनसे जो निर्ष्कष प्राप्त हुए उनके अनुसार हिप्नोटिज्म को एक विशेष प्रकार की सुझाई हुई ‘नर्वस निद्रा’ कहा जाता है। साधारण नींद में मनुष्य अपन सुधबुध खो कर लगभग अचेत-सा हो जाता है। प्रायः उसका सचेतन मस्तिष्क पूरी तरह सो जाता है, किन्तु सम्मोन द्वारा सुझाई गई नींद में मनुष्य का आधा सचेतन मस्तिष्क भर सोता है और उसके स्थान पर अचेतन मन अपेक्षाकृत अधिक जागृत हो जाता है तथा आदेश-कर्त्ता के निर्देशो के प्रति पूर्ण सजगता का परिचय देता है। इसे चेतना की सामान्य-स्थिति का असामान्य परिवर्तन, जागरण कहा जा सकता है।
अब तो इस विद्या को इतनी मान्यता मिल गइ्र है। कि चिकित्सा-क्षेत्र में भी इसका प्रयोग होने लगा है। शरीर का सुन्न करने में सम्मोहन प्रयोग बहुत सफल हुए है। प्रथम महायुद्ध के दिनों रुसी डाँक्टर पाडियों पोलेरकी ने 30 घायल व्यक्तियों के शरीर बिना क्लोरोफार्म दिये सुन्न करके दिखाये थे और उनके पीड़ा रहित आँपरेशन सम्पन्न किये थे। ब्रिटिश-डाँक्टर एस्टल ने इस प्रयोग के आधार पर लगभग 200 आँपरेशन सफलता पूर्वक किये। कई यूरापीय-देशों में दन्त चिकित्सक इस पद्धति को जरा भी कष्ट या पीड़ा उत्पन्न किये बिन दाँत उखाड़ने के लिए काम में लाते है। प्रसूति-गृहों में भी बिना कष्ट उठाये प्रसव करने के लिए सम्मोहन’-विद्या का प्रयोग बहुत ही उपयोग सिद्ध हो रहा है। सन् 1975 में अमेरिका की मेडिकल एशोसियेशन ने सम्मोहन को एक प्रामाणिक चिकित्सा-विज्ञान के रुप में मान्यता प्रदान की है। इसी प्रकार ‘ब्रिटिश एण्ड अमेरिका मेडीकल एसोसियेशन ने भी उसे उपयोगी चिकित्सा-विधि के रुप में मान्यता दे रखी है।
कहा जा चुका है किसी समय सम्मोहन को जादुई करिश्मे से अधिक नहीं समझा जाता था। इसके समर्थक और विरोधी अपने पक्ष में इतनी जोर-शोर से बाते करते और तर्क देते थे कि सर्वसाधारण के लिए उस सम्बन्ध में कोई स्पष्ट अभिमत बना पाना सम्भव ही नहीं होता था। परन्तु अब यह बात नहीं है और उसे विज्ञान की प्रमाणों पर आधारित एक तथ्यपूर्ण धारा के रुम में स्वीकार किया जा चुका है तथा सम्मोहन को अब कोई कला नहीं, अपितु विज्ञान के रुप में मान्यता मिल चुकी है। इसे आर्श्चयजन प्रदशनों के रुप में नही, अपितु मनुष्य के लिए उपयोगी और चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करने वाली विद्या के रुप में मान लिया गया है।
रुसी मनोविज्ञानवेत्ता पावलोव के अनुसार सम्मोहन में जादू जैसी कोई बात नहीं है। वह मनोविज्ञान सम्मत सहज प्रक्रिया है, जिसमें कुछ मस्तिष्कीय-कणों की अन्तः क्षमता को कृ़ित्रम रुप से सुला देने और जगा देने की प्रक्रिया को संकल्प-शक्ति के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। पावलोव का यह भी कहना है कि सम्मोहन द्वारा शरीर की सामान्य स्थिति में भी परिवर्तन किया जा सकता है। यह अन्तर उन्होनें कई प्रयोगों द्वारा भी स्पष्ट किया। अन्य वैज्ञानिकों द्वारा भी इस तरह के प्रयोग परीक्षण हुए तो पाया गया कि हृदय गति 82 से बढ़कर 143, रक्त का दवाब 105 से उठकर 136 और तापमान 66 डिग्री फारनेहाइट से बढ़कर 101 डिग्री तक बढ़ जाता है । इतना होने पर भी शरीर के भीतर कोई मौलिक परिवर्तन नहीं होते। उदाहरण के लिए जिन रक्त में जिन तत्वों को समावेश है, उनके अनुपात में कोई अन्तर नहीं पाया गया। लवण, शर्करा आदि की जो मात्रा शरीर में विद्यमान थी, उनका परिणाम नहीं बदला जा सका। लेकिन सम्मोहन द्वारा रोग के कारण होने वाली शारीरिक-पीड़ा पर अवश्य नियन्त्रण किया जा सकता है और बीमारियों के कारण होने वाले कष्ट में भी रोगी अपने को अच्छा अनुभव कर सकता है, बीमारी का जड़-मूल से कट जाता तो सम्मोहन द्वारा तत्काल सम्भव नहीं देखा गया, पर इतना अवश्य पाया गया कि सुधार की धीमा सिलसिला चल पड़ा है।
सम्मोहन द्वारा पूर्व निर्धारित नैतिक मान्यताओं को भी धीरे-धीरे बदल पाना सम्भव हो गया है और इस तरह के अनेक प्रयोग सफल हुए है। लड़ाइयो में पकड़े गये शत्रु-पक्ष के सैनिकों को पहले की अपेक्षा भिन्न मत बनाने के लिए सम्मोहक विज्ञान के आधार पर प्रयोग चलते रहे है। इन्हे ‘बेन वाशिंग’ कहा जाता है। इन प्रयासों में आशिंक-सफलता ही मिली है, क्योंकि है उनकी परिक्व और पुष्ट देश-भक्ति की मूल धारा को बदल देने के लिए अति कठिन कार्य थें इनकी तुलना में किसी अनाचारी व्यक्ति को उसके अनाचार कुकर्मों से छुड़वा कर सदाचार सत्कर्मों में प्रवृत करने की दिशा में अधिक सफलता मिली है। इसका कारण है-व्यक्ति के लाख अनाचार लिप्त होते हुए भी उसके भीतर आत्मा में सत् तत्वों के बीज रहते है और वे समय पाकर अंकुरित फलित होने की बाट जोहते रहते है।
सम्मोहन में इच्छा और संकल्प-शक्ति ही प्रधान रहती है। प्रयोग-कर्त्ता की इच्छा और संकल्प-शक्ति जिस है। फिर भी सम्मोहित-व्यक्ति में उसके विनिर्मित-व्यक्तित्व की सीमा के अर्न्तगत ही कार्य कराये जा सकते है। अचेतन की गहरी परतें, अपने भीतर कुछ नैतिक और आत्मिक-मान्यताएँ अत्यन्त सधन होकर जमाये रहती है। उन्हें सम्मोहित प्रयोगों से नहीं छुआ जाता। सामान्य कामकाजी बातों को ही शरीर और मस्तिष्क द्वारा पूरा कराया जा सकता है। किसी व्यक्ति की आत्तरिक-आस्था यदि जीव-दया पर आधारित है और उसे सम्मोहित-स्थिति में माँस खाने के लिए कहा जाये व्यक्ति उसका आदेश पालन करने से इन्कार कर देगा। कराने जैसे कुकुत्यों के लिए आदि यदि सम्मोहन-कर्ता कोई प्रयोग करे तो अन्तःकरण की अस्वीकृति होने पर वे प्रयोग सफल नहीं हो सकते। कहा जा सकता है कि दूसरे को सम्मोहित कर उससे कोई काम कराने में सफलता प्राप्त की जा सकती है, जितनी कि आमतौर पर उसे सामान्य अवस्था में सहमत कर-कराई जा सकती थी।
इच्छा और संकल्प-शक्ति द्वारा दूसरों को सम्मोहित करने क अपेक्षा आत्म-सम्मोहन का स्तर अधिक ऊँचा है और उस आधार पर आत्म-समर्पण के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में मनवाँछित परिवर्तन कर सकता है। इस प्रक्रिया द्वारा अपनी आत्म-शक्ति के माध्यम से ही अपने चतना-मस्तिष्क को अर्ध-तन्द्रा को धकेल देता है और अचेतन को सामान्य जीवन-संचार की व्यवस्था जुटाते रहने के लिए सीमित कर दिया जाता है। इसे योग-निद्राँ या समाधि भी कह सकते है। इस स्थिति में अहिर्निश श्रम करते रहने पर भी बाह्म-मस्तिष्क की कृत्रिम क्रिया शक्ति के साथ ही दिव्य-निद्रा का आनन्द मिलता है। इस विश्रान्ति के उपरान्त एक नई स्फूर्ति का लाभ मिलता है। इस विश्रान्ति के उपरान्त एक नई स्फूर्ति का लाभ मिलता है, साथ ही चेतना की अनावश्यक परतों को दुर्बल एवं आवश्यक परतों को सबल बनाने का अवसर मिलता है। योगीजन इस योग-निद्रा आत्मोर्त्कष के अन्यान्य लाभ भी प्राप्त करते हैं
सामान्य स्थिति में आत्म-संकेत द्वारा, आत्म-सम्मोहन भी अपना मनोबल बढ़ाने, बुरी आदतें छुड़ाने और उपयोगी निष्ठाएँ जाग्रत करने के लिए अतीवउपयोगी सिद्ध हो रहा है। इससे उच्च स्तर का आत्मसम्मोहन, जिससे योग-निद्रा को प्राप्त किया जा सके, कठिन है। वह स्थिति आत्म-बल को प्रखर बनाने के उपरान्त ही प्राप्त होती है। उस स्थिति में इतनी अधिक क्षमता उत्पनन होती है कि जागृत-मस्तिष्क को शिथिल बनाया जा सके और उस स्थिति का लाभ लेकर अनावश्यक को हटाने एवं आवश्यक को जमाने का कार्य सम्पन्न किया जा सके ? सामान्यता जागृत मस्तिष्क ही सबल बनाने मस्तिष्क ही सबल होता है। और वह अपनी सर्वोपरिता को चुनौती दी जाना स्वीकार नहीं करता। तर्क सन्देह के अस्त्रों से वह अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को रोकने की पूरी चेष्टा करता है। इस कारण आत्मसम्मोहन द्वारा अभीष्ट गहराई उत्पन्न होने में भरी कठिनाई उत्पन्न होती है। इतने पर भी शान्त-चित्त और एकाग्र मन से श्रद्धापूर्वक किन्हीं विचारों को यदि बार-बार दुहराया जाये तो उससे भी कुछ प्रभाव पड़ता ही है तथा उपयोगी मानसिक-परिवर्तन के लिए किये गये प्रयासों के काफी सफलताएँ मिलती है।
फ्राँस के प्रसिद्ध मनःशास्त्री प्रो. इमाहलकु ने अपनी पुस्तक ‘कान्श आटोसजेशन’ में इस तरह के अनेक उदाहरण देते हुए बताया है किस प्रकार इच्छा शक्ति का प्रयोग करके अपने आप में तथा दूसरों में असाधारण परिवर्तन किये जा सकते है। ये प्रयोग शारीरिक और मानसिक रुग्णता को दूर करने में भी बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुए।
बढ़े-चढ़े और प्रखर आत्म-बल सम्पन्न व्यक्ति ने केवल अपने व्यक्तित्व को आमूल-चूल बदल देते है, वरन् दूसरों को बदल डालने का भी असम्भव-सा लगने दूसरों को बदल डालने का भी असम्भव-सा लगने वाला कार्य कर दिखाते है। नारद ने थोड़े-से सर्म्पक द्वारा ही प्रहलाद, धुव्र, पार्वती, वाल्मीकि आदि कइयों की जीवन-धारा ही बदल दी। भगवान बुद्ध के सर्म्पक में आने के बाद अगुँलिमाल, आग्रपाली जैसे अगणित व्यक्ति पतनोन्मुख दिशा से विमुख होकर उच्चस्तरीय उत्कृष्ट जीवन-दिशा ग्रहण कर सके। महात्मा गाधी के प्रभाव से अगणित व्यक्ति त्याग-बलिदान के क्षेत्र में उतरे और उन्होंने बढ़े-चढ़े आदर्श उपस्थित किये इसे आत्म-बल की प्रखरता, प्राण-तत्व की तेजस्विता का चमत्कार ही कहना चाहिए कि जो अगणित असंख्यों की जीवन-धरा उलट सके। सम्मोहन-एक कला है छोटी-मोटी साधनाओं द्वारा उसमें पारगंत हुआ जा सकता है किन्तु व्यक्तित्व में यदि इतना सशक्त आत्म-तेज, आत्म-बल, प्राण-शक्ति, ब्रह्मवर्चस् विकसित किया जा सके तो लोगों को अपने व्यक्तित्व के जादू से सम्मोहित कर अनायास ही उन्हे उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की ओर अग्रसर किया जा सकता है।
अपने वैयक्ति-स्वार्थ के लिए सामाजिक हित को उपेक्षित कर समाज व राष्ट्र की क्षति करने वाला व्यक्ति समाज-द्रोही होता है। समाज-द्रोही एक प्रकार से स्वयं का भी द्रोही होता है। न तो उसे क्षमा ही किया जाना चाहिए और न उसे किसी प्रकार का संरक्षण ही किया जाना चाहिए। समाज-द्राहियों को क्षमा या संरक्षण देना भी एक सामाजिक अपराध है।
डाँ लोहिया
सामाजिक-निर्माण की दिशा मैं एक साहसिक प्रयास
इस वर्ष हरिद्वारा में कुभ पर्व है। यह 22 फरवरी आगन्तुकों की संभावना आँकी गई है। हरिद्वार कुम्भ का माहात्म्य भी अधिक माना जाता है उपस्थिति भी अधिक होती है और आकर्षण भी अधिक रहता है।
इस अवसर शान्तिकुँज हरिद्वारा द्वारा अनेक वर्गों के बड़े सम्मेलन रखे गये है। इनमें कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदि वर्गों के आधार पर है। कुछ गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रान्तो के आधार पर। उनका उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, समाज में सत्पवृत्तियों का संवर्धन और अवाँछनीयताओं का उन्मूलन है। मिशन की गतिविधियों को उन क्षेत्र समुदायों में किस प्रकार अग्रगामी बनाया जाय ? इस संर्न्दभ में भी गम्भीर विचार-विनमय इन सम्मेलनों में सहज सम्भव हो सकेगा। भावना घनिष्ठता और एकता की दृष्टि से आत्मीय जनों का मिलना-सब प्रकार सुखर्द और श्रेयस्कर ही होता है।
अपने देश में अनेकानेक कुरीतियाँ भिन्न-भिन्न जाति-उपजातियों में विभिन्न स्तर की है। किसी समुदाय में लड़के वाले दहेज माँगते है किसी में लड़की वाले। किसी में पर्दा प्रतिबन्ध है कि में तनिक भी नहीं । किसी में विधवा विवाह में छूट है-किसी में कठोर प्रतिबन्ध है। यह भेद एक ही गाँव-पड़ौस में बसे हुए लोगों के बीच जाति उपजातियों के आधार जड़ जमाये बैठै है। प्रथा परम्परायें एक जैसी होती, तो सार्वजनिक समाज-सुधार आन्दोनल सफल होता पर वर्तमान स्थिति में भिन्न स्तर की विकृतियों को ढूँढने और उखाड़ने के लिए वहीं पहुँचना होगा जहाँ उन्होंने अपने चित्र-विचित्र कोटर बना रखे है। जातियों के सम्मेलन अलग से बुलाने का यह कारण प्रान्तों की भिन्नता, भाषा-विभेद एवं वार्त्तालाप की सुविधा की दृष्टि है। यों भारतीय समाज की एकता और एक रुपता तो सभी को अभीष्ट है। विभेद और विग्रह कोई विचारशील नहीं चाहेगा। बढ़ना तो एकता की दिशा में ही है। वर्ग समुदायों की टोलियों में ही प्रगति के लक्ष्य तक बढ़ते चलना सम्भव हो सकता है। सेना की टुकड़ियों में गठन एकता की दृष्टि से कभी बाधक नहीं होता।
कुम्भ पर्व में आरम्भ होने वाले प्रगतिशील जातीय सम्मेलनों के साथ एक बड़ी सुधार प्रक्रिया यह जुड़ी हुई तलाश करना-ऐसे आयोजनों में सहज सम्भव हो जाता है। यह एक बहुत बड़ी कठिनाई का सरल समाधाना है। कितनी ही जातियों में इस प्रकार के विवाह भले लगते है और उसमें उस वर्ग के अधिकाँश लोगों की दौड़ धूप से बचने और थक कर निराश हो जाने की खिन्नता का सामना नहीं करना पड़ता।
युग निर्माण योजना के तत्वाधाना में होने वाले इन सम्मेलनो का लाभ यह है कि इनमें दहेज और धूम-धाम के अपव्यय से बचत हो जाती है। सभी जानते है कि मिशन का जोरदार उद्घोष यह है कि-खर्चीली शदियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है। इस उद्घोष को चरितार्थ करने के लिए नितान्त सादगी के साथ ही परिपूर्ण सम्मान के आदर्श विवाहों का प्रचलन भारी सफलता के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रुपों में सफल हुआ है। शान्तिकुँज में समपन्न होने वाले प्रगतिशील जातीय सम्मेलन में विवाह निश्चित होने की ही सहज सम्भावना है मध्य श्रेणी के सद्ग्रहस्थों को सम्बन्ध ढूढँने और खर्चीले साधन जुटाने में जो कुछ सहना पड़ता है उसे भुक्तभोगी ही जानते है। इन दोनों विपत्तियों से छूटकारा पाना एक भयानक संकट एवं अभिशाप से मुक्ति पाने की तरह है। इसी संभावना की आशा अपेक्षा इन आयोजनों से सहज ही की जा सकती है। अन्याय कुरीतियों का उन्मून और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन भी वह लाभ है जिसमें उपस्थित समुदायों में से प्रत्येक भी वह लाभ है जिसमें उपस्थित समुदायों में से प्रत्येक को अपने-अपने ढंग की विपत्तियों और विकृतियों से छूटकारा मिल सकेगा।
प्रगतिशील जातीय सम्मेलन पाँच-पाँच दिन के हैं। हर बड़ी जाति के बाद उसकी उपजातियाँ भी सम्मिलित होंगी। तत्सम समुदायों की अलग-अलग नहीं एक साथ ही बुलाया गया है। आवश्यतानुसार सम्मेलन में उनकी अलग-अलग गोष्ठियाँ-अलग-अलग समाधान ढुँढने और अलग-अलग कार्यक्रम बनाने क उद्देश्य से होती रह सकती है। पर एक बड़ा सम्मेलन एक ही रहेगा। एकता हमारा लक्ष्य है। अन्ततः पहुँचना है तो ‘वसुधैव कुटुम्कम’ के आदर्श पर ही। भले ही बड़ी छंलाग लगाने में कठिनाई होने पर एक-एक सीढ़ी पार करनी पड़े।
कुम्भ पर्व के दो महीनों में जो सम्मेलन रखे गये है। उनका निर्धारण इस प्रकार हुआ है- (1) ब्राह्मण वर्ग 5 से 6 मार्च सन् 80 (2) क्षत्रिय वर्ग 12 से 15 “ “ (3) गुजरात सम्मेलन (नवरात्रि) 17 से 25 “ “ (4) कुर्मी समाज 27 से 37 मार्च (5) वैश्य वर्ग 2 से 6 अपै्रल (6) सोनी समाज 7 से 12 अप्रैल (7) साहू समाज 15 से 18 “ “ (8) कायस्थ समुदाय 20 से 24 “ “ (9) यादव समाज 26 से 30 “ “ (10) परिणित वर्ग 1 से 5 मई “ “
जो समुदाय इनमे नहीं आ सकेंगे उनके लिए भविष्य में कुम्भ के बाद भी सम्मेलन बुलाये जाते रहेंगे।
ब्राह्मण वर्ग में सारस्वत, काव्यकुव्ज, गौढ़, सनाढ्य, औदीच्य, पाराशर, मुखजी, आयंगर आदि सभी उपजतियों और प्रान्तों के लोग समझे जायें। वैश्य वर्ग में अग्रवाल, ओमर, दोसर, गुप्ता, गहोई, आदि तथ कायस्थ् वर्ग में सक्सेना, निगम, भटनागर, माथुर, कुलश्रेष्ठ, श्रीवास्तव आदि सभी को आमन्त्रित किया जाय। इनके छोटे वर्ग ही सकते है। किंतु समय कम होने और अधिक समुदायों को उसी अवधि में आमन्त्रित करने की दृष्टि से कुल दस विभाजन ही रखे गये है। यों भी उपजातियों के दायरे जब तक चौड़े नहीं होते और वे चारों वर्गों के पेट में नहीं समा जाते-जब तक अपना देश, संगठित और समर्थ हो सकेगा यह कल्पना भी संदिग्ध ही बनी रहेगी। सम्मेलनों का निर्धारण अभी पूरी तरह नहीं हो पाया। मनोभूमि के श्री गणेश संस्कार की दृष्टि से प्रारम्भ उपजातियों से करना आवश्यक है। यदि विश्वकर्मा, लौहार, पुष्पद्य, नामदेव आदि चाहे तो अभी उनके भी पृथक-पृथक सम्मेलन रखे जा सकेंगे पर अगले दिनों इन सब को अपनी स्वायत्त सत्ता सहित चतुर्वर्ण में ही पुनः समाविष्ट करना होगा।
कुम्भ पर्व निकट है। विभिन्न जातियों और उपजातियों में विभक्त सारे भारतीय समाज को आमन्त्रित कर सकना संभव नहीं है। न उतना परिचय है और न साधन। इसलिए उपयुक्त उद्देश्य से सहमत सभी विज्ञ-जनों से अनुरोध है िकवे स्वयं आगे बढ़कर अपने वर्ग के तथा अन्य वर्ग के विचारवान् प्रगतिशील लोगों को सम्मिलित होने का आमन्त्रण दें और आग्रह करें। शान्ति कुँज के नव निर्मित गायत्री नगर में इस प्रकार के सम्मेलनों के लिए समुचित सुविधा बन गई है।
आगन्तुकों को सम्मेलन से एक दिन पूर्व शाम तक शान्तिकुँज हरिद्वारा में पहुँच जाना चाहिए। जिन्हें आना है पूर्व सूचना भेज कर अपने स्थान सुरक्षित करा लें । स्थान घिर जाने पर देर से आई सूचनाओं के लिए कुम्भ पर्व जैसी भीड़-भाड़ में स्थान सम्बन्धी कठिनाई खड़ी हो सकती है। प्रयत्न अभी से आरम्भ करने चाहिए ताकि सभी सम्मेलन पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न हो सकें। सर्म्पक साधने का पता-व्यवस्थापक-शाँति कुँज हरिद्वार।
पृथ्वी और सूर्य की मध्यवर्ती आधार श्रृखंला का सभी को ज्ञान है। सूर्य के उदय होते ही प्राणियों की हलचलें आरम्भ होती है और उसके अस्त होते ही अन्धकार बढ़ने और आलस्य छाने लगता है। पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक सभी निद्रा के अंचल में पड़े हुए अर्धमृतक जैसी स्थिति में पड़े दृष्टिगोचर होते है। पेड़-पौधे स्तब्ध हो जाते है। फूल तक खिलते है जब दिन निकलता है सूर्यमुखी का तो नाम ही इस आधार पर हुआ है। कि उस का फूल सूर्य की ओर ही मुँह किए अपना रुख बदलता रहता है।
सूर्य का प्रकाश पुरुषार्थ का बोधक है। रात्रि में तो निशाचर ही अपने दाव-घात लगाते रहते है। उत्पादन निर्माण से लेकर अन्यान्य सभी महत्पूर्ण कार्यों का समय दि नहीं है। सूर्य की उपस्थिति में ही प्राणियों द्वारा अपने पुरुषार्थ का प्रमाण प्रस्तुत किया जाता है। जब सूर्य पृथ्वी से दूर निकल जाता है तो सर्दी बढ़त है और लोग सिमटे ठिठुरे बैठे रहते है। गर्मी ही ऊर्जा के बिना कोई यन्त्र है उसे प्रकारान्तर से सूर्य का अनुग्रह अनुदान ही कहा जाता सकता है। श्रृति में सूर्य को ही इस जगत की आत्मा कहा है।
यह सामान्य जानकारी हुई। विशेष ज्ञातव्य यह है। कि पृथ्वी के वातावरण पर सुर्य की स्थिति का भारी प्रभाव पड़ता है। जब सूर्य की स्थिति का भारी प्रभाव पड़ता है। जब सुर्य की स्थिति में थोड़ा भी अन्तर आता है तो उसका प्रभाव पृथ्वी के वातावरण पर पड़ता है और उस परिवर्तन से प्राणियों की पदार्थों की स्थिति बुरी तरह प्रभावित होती है। इतना ही नहीं जीवधारियों की मनःस्थिति में भी भारी अन्तर उपस्थित होता है और वे कुछ से कुछ सोचने और कुछ से कुछ करने लगते है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि मनुष्यों के स्वभाव और क्रिया कलाप में कुछ ऐसे अन्तर आते है जिससे सामान्य लोक जीवन लड़खड़ाने लगता है और ऐसे विग्रह उपद्रव उठ खड़े होते है जिनकी सामान्यतः कोई आवश्यकता नहीं थीं।
प्रकृति प्रकोप के रुप में भी ऐसी अप्रत्याक्षित घटनाएँ घटित होती है जिनसे मनुष्यों तथा इतर प्राणियों को बिना किसी अपराध के विपत्ति में फँसना पड़ता है सूर्य की सामान्य स्थिति जहाँ संसार के लिए सुखद परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है वहाँ यह विचित्रता भी देखी गई है जब वह किसी कारणवश असामान्य स्थिति में विपत्ति में होता है तो स्वयं ही विक्षुब्ध नहीं होता वरन् अपने संकट में अपने सर्म्पक क्षेत्र को धरातल के प्राणियों और पदार्थों को लपेट लेता है।
विपत्ति सब पर आती है। सूर्य पर भी। आवश्यक नहीं कि संकटों के कारण जान बूझ कर किये गये कर्म ही हों। प्रारब्ध से लेकर दैवी प्रकोप भी इस सर्न्दभ में अपना काम करते है और आगत संकट को दैवी दुर्बिपाक मान कर ही सहन करना पड़ता है।
सूर्य पर आने वाले संकटों से धर्म भीरु लोग ग्रहणों की गणना करते है, पर विज्ञानी उस पर उभरने वाले धब्बों को न्हे सामन्यतः स्पाट या कलंक का जाता है को एक विशिष्ट विक्षोभ मानते है और कहते है कि उस स्थिति में सूर्य की स्थिति अपने कलेवर के भीतर असाधारण हो जाती है और उसकी विद्रपूता डरावनी प्रतीत होती है। उसका भयंकर प्रभाव दूर-दूर तक सौरमण्डल के साथ जुड़े हुए समस्त ग्रह-उपग्रहों पर पड़ता है। पृथ्वी सूर्य पर सर्वाधिक निर्भर है। इस संकट में भी उसी को साझीदार भी होना पड़ता है। साझेदारी का सिद्धान्त ही यह है कि उसमें दुःख सुख में-हानि लाभ दोनो में ही समान रुप से भागीदार रहना पड़ता है। सूर्य की विपन्नता, पृथ्वी को कष्ट न दे यह कैसे हो सकता है ?
सूर्य में धब्बे क्यों आते है ? उनमें उतार-चढ़ाव क्यों आता है ? नियत अवधि के उपरान्त ही लौट-लौट कर उत्तर खोजने में विज्ञान संलग्न है। पर अभी उसे उत्साहवर्धक सफलता नहीं मिली है। अभी कल्पनाओं, परिकल्पनाओं का ऊहापोह ही चल रहा है। खण्डन प्रतिपादन की उलट-पुलट का क्रम अभी समाप्त होता नहीं दीखता किसी सुनिश्चित तथ्य, निर्ष्कष तक पहुँचने का समय कभी आवेगा तो सही, पर अभी उसमें कुछ देर लगती प्रतीत होती है।
अब तक जो निश्चित रुप से जाना जा सका है, वह इतना ही है कि जब सूर्य पर धब्बे उभरते है तो उसकी स्थिति आमाम्य हो जाती है। उसके अन्तराल में भंयकर आँधी तूफान उठते है और लाखों मील के दायरे में अग्नि ज्वालाएँ लपलपाती है। इसे विस्फोट तो नहीं विक्षोभ कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। उस विषम स्थिति से सारा सौर मण्डल प्रभावित होता है। पृथ्वी के बीच आदान-प्रदान का विशिष्ट सूत्र सम्बन्ध जुड़ा हुआ है, इसलिए उस पर इस विषमता का प्रभाव भी अधिक पड़ता है। सामान्य स्थिति बदल जाती है और उत्पन्न पड़ता है। सामान्य स्थिति बदल जाती है और उत्पन्न विपन्नता ऐसे दृश्य और अदृश्य प्रभाव उत्पन्न करती है जिनसे हितकम और अहित अधिक होता है। सूर्य कलंको का उभरना भारतीय ज्योतिश शास्त्र में अशुभ माना गया है। इस सर्न्दभ में विज्ञान भी पुर्णतया सहमत है। अस्तु जब भी ऐसी स्थिति आती है तो सुक्ष्मदर्शी चिन्तित होते है और अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार आगत विपत्ति से बचने का उपाय भी करते है।
अलेक्जेंडर मारशेक ने अपनी पुस्तक ‘अर्थ एण्ड होराइजन” के पृष्ठ 185 में लिखा है कि भले ही पृथ्वी में घटने वाली घटनओं का सूर्य के अन्तर्विग्रह से प्रत्यक्ष सम्बन्ध न जोड़ा जा सके किंतु साँख्यिकी दृष्टि से उनका पृथ्वी से सम्बन्ध निर्विवाद सिद्ध हो गया है जब-जब यह सौर सक्रियता बढ़ती है वर्षा तथा तुफानों की बाढ़ आती है, वनस्पति में वृद्धि, ग्रीष्म की वृद्धि के साथ कहीं कहीं अकाल, सड़क दुर्घटनायें, वायुयान दुर्घटनाएँ युद्ध तथा रक्तताप बढ़ता है। अमरीका के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एन्डूई डगलस ने इनका सम्बन्ध पौधो की वृद्धि से भी बताया और सेक्वेइया नामक एक वृक्ष क वलय से गैलीलियों के समय के सूर्य कलंक का भी अध्ययन किया था और लिखा था कि सूर्य कलंक का भी अध्ययन किया था और लिखा था कि सूर्य कलंक का भी अध्ययन किया था और लिखा था कि सूर्य हमारी प्रकृति में इतना व्याप्त हो चुका है कि प्रत्येक कण से लाखों वर्ष पूर्व के इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
इस अवधि में न केवल भीषण भू चुम्बकीय उत्पात अर्थात भूकम्प, ज्वाला मुखी विस्फोट होते है अपित मेरु प्रकाश की असामान्य दिव्य चमक भी देखे में आई है उसका वैज्ञानिक उसकी तत्परता पूर्वक खोज करने में लगे है।
सोवियत संघ की जल-मौसम वैज्ञानिक संस्था ने दावा किया है कि सूर्य सक्रियता का उत्तरी व दक्षिणी दोनों धू्रवों के जलवायु परिवर्तन तथा बर्फ की मात्रा से स्पष्ट सम्बन्ध है।
1952 की 24 फरवरी को सूर्य की सतह पर एक सामान्य विस्फोट देखा गया। पराबैंगन किरणों की विराट्, सेना पृथ्वी की ओर चल पड़ी। उसके पीछे कुछ ऐसे तत्व थे जिनका अभी तक वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं कर सके। अगले वर्षों में भू भौतिक शास्त्री विशेष कर पूर्ण सूय्र ग्रहण के अवसरों पर विशेष अध्ययन की तैयारी कर रहे है तब शायद वे कुछ अधिक ज्ञात कर सकें। इस छोटे से विस्फोट के कारण ही ग्रीनलैंड, कनाडा, अलास्का, अटलाँलिक तथा बर्लिन में दो सप्ताह तक तूफानों का गतिचक्र तेजी से घूमता रहा । ऐसे ही 1955 में हुए एक विस्फोट का अध्ययन अमेरिका वैज्ञानिक डा. वाल्टर तथा राबर्टस ने किया और लिखा कि स्फोट से 13 वें दिन ऋतु परिवर्तन का क्रम सामान्य से असामान्य हो गया । रेडियो प्रसारण बन्द हो गये। तेज वर्षा, वायु, उत्पात और बिजली कड़कने की आवाजें कई दिनों तक गूँजती और छोटी प्रलय के से दृश्य उपस्थित करती रही। तब से निरन्तर यह अध्ययन किया जा रहा है कि सूर्य के इन स्फोटजन्य प्रवाहों का पृथ्वी के प्राणियों के जीवन से क्या सम्बन्ध है। प्रसिद्ध अमेरिकन मौसम वैज्ञानिक डा. वेक्सलर ने तो इन्हें मनुष्य ने अतंरग जीवन में अचानक और विलक्षण हस्तक्षेप की संज्ञा दी है। और नियमित उत्सर्जित ऊर्जा के साथ इस असामान्य क्रिया के तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता प्रतिपादित की है। हवा उन अदृश्य कणों को अवशोषण किस प्रकार करती और किस तरह असामान्य आचरण करने को विवश होते है इस पर गम्भीर खोजें चल रही है।
जब सौर कंलक उत्पन्न होते है तब पृथ्वी पर रेडियो व्यवहार में रुकावट पैदा होती है। इसका कारण सौरकलंक के समय अग्निमशालाओं में से निकलने वाली प्रबल किरणें है। पृथ्वी से छूटने की वाली रेडियों तरंगे अयनमण्डल से टकरा कर पृथ्वी की ओर लौट आती है। जिस दिन सूर्य पर बड़ा कलंक उभरता है उस समय सूर्य की अग्निमशालों से छूटने वाला रेडियो विकिरण अयनमंडल को छिन्न-भिन्न कर देता है। मिनटों के भीतर ही यह आवरण छिन्न-भिन्न हो जाता है और कभी-कभी लम्बे अरसे तक यह विलुप्त ही रहता है। सूर्य के धरातल पर सौर कलंक उत्पन्न होते ही वहाँ से रेडियो तरगें छूटना आरम्भ हो जाती है और बाद में लम्बी तरंगे भी छूटने लगती है। सूर्य के कैरोना को वेध क रवह 1600 किलो मीटर के वेग से दौड़ते है और 24 से 26 घण्टे के समय में पृथ्वी तक पहुँच जाती है। उसके पृथ्वी तक पहुँचते ही वहाँ की रेडियो तरंगो की लम्बाई भी ज्यादा रहती है।
23 फरवरी 1956 को रुस और अमेरिका की कुछ अन्तरिक्ष प्रयोगशालाओं में कास्मिक रेडियो विकिरण में अचानक वृद्धि देखी गईं आयोनाउण्ड कैमरों तथा कणों की गणना करने वाले यन्त्रों से लैस दूरबीनों की सहायता से कास्मिक किरणों में असाधारण वृद्धि देखी गई। फ्रीबर्ग तथा स्वीजलैंड के पर्वतीय स्टेशन में यह वृद्धि अचानक छह गुना हो गई और 4 घण्टे से भी अधिक समय तक बनी रही। इसके बाद धीरे-धीरे विकिरण घटने लगा। इसी प्रकार रोम में यह विकिरण तीन गुन बढ़ा आरिट्रया में तो विकिरण इतना बढा कि उसे मापने में कोई यन्त्र ही समर्थ नहीं हुआ। यह विकिरण सूर्य में उत्पन्न होने वाले धब्बों के कारण पृथ्वी के अध्यनमण्डल को बेध कर धरती तक आ पहुँचा था।
सूर्य कलंको के आस-पास वाले क्षेत्र में कलंक के दिनों सूर्य की चमक अचानक बहुत बढ़ जाती है। यह चमक सूर्य के अन्य स्थानों पर होने वाली चमक से अधिक होती है। इस चमक को सौर ज्वाला कहते है, इसमें से कई प्रकार के कण धीमे एवं तेजगति से निकलते है।
अब तक इनके वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि ये ज्वालाएँ चुम्बकीय क्षेत्र में गड़बड़ के कारण उत्पन्न होती है। इनके कारण रेडियो एवं टेलीविजन प्रसारणों में भी बाधा पड़ती है। इन ज्वालाओं से बड़ी तेज गति से निकलते है, उनकी शक्ति भी अपरीमित होती है ये कण ओजोन मंडल को पार कर पृथ्वी की सतह तक पहुँचजाते है और उनके मस्तिष्क को प्रभावित करते है। यही कारण है कि देखा गया है जब सूर्य कलंक बढ़ते है और उनके कारण सौर ज्वालाओं से प्रक्षेपित होकर ऊर्जा कण पृथ्वी पर जीव धारियों तक पहुँचते है तो उन के मानस पटल पर असाधारण प्रभाव डालते है और इस कारण बड़े-बड़े व्यक्तियों तक ही विचार धाराएँ प्रभावित होती है। इन कारणों से संसार में विभिन्न समस्याएँ पैदा होती है।
इन दिनों पुनः सूर्य कलंक का चक्र अपनी चरम स्थिति की ओर। सन् 80-81 में इनकी संख्या बढ़ना आरम्भ होगी और संभवतः 83 तक बढ़ती रहेगी। इस बार कलंको की संख्या 200 से भी अधिक होने की संभावना है। स्मणीय है द्धितीय विश्वयुद्ध के समय सूर्य कलंको की संख 150 से अधिक ही थी। अब जबकि इनकी संख्या 200 के आस-पास पहुँचने वाली है तब संसार में भयंकर उथल-पुथल होने की संभावना है। इस उथल-पुथल के लक्षण देखे भी जा रहे है। कुछ समय पहले चीन वियतनाम युद्ध हो चुका है, ईरान में भी भंयकर क्राँति हुई है। शक्ति संतुलन और महादेशों की नई-नई गुटबंदिया बन बिगड़ रही है। सन् 1983 में सूर्य पर पड़ने वाले कलंको की संख्या सबसे अधिक होगीं
सूर्य पृथ्वी पर प्राणियों की जीवन ऊर्जा का स्त्रोत है, सर्वविदित है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन निष्कर्षो के दौरान यह विस्मय जनक तथ्य सामने आता है कि इन सूर्य कलंक वर्षों का मानव जाति के विश्व इतिहास की घटनाओ से बहुत गहरा सम्बन्ध है। जिस वर्ष कलंकों संख्या बढ़ जाती है उस वर्ष पृथ्वी पर जीवन असाधारण रुप से असामान्य हो उठता है। विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ इन्हीं कलंक वर्षों में घटित होती रही है। जब-जब सूर्य पर कलंको की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई तब-तब संसार बड़े-बड़े युद्ध, विश्वयुद्ध और महान क्राँतियाँ हुईं।
सन् 1986 में फ्राँस की प्रसिद्ध, राज्य क्राँति हुई जिसने विश्व इतिहास को नया मोड़ दिया। इस समय सूर्यकलंक अपने चरमवर्ष में थे। सन् 1805 में ट्रैफलगर और सन् 1815 में वाटरलू की लड़ाइयाँ ने यूरोपीय इतिहास को एक नया मोड़ दिया।
सन् 1857 में भारतीय स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया उस वर्ष भी सूर्य पर कलंको की संख्या बहुत बढ़ गयी थी। यह कोई आवश्यक नहीं है कलंक 11 वर्ष बाद ही उत्पन्न होते हो और बीच में नहीं 11 वर्ष बाद तो इन कलंको की संख्या बढ़ती ही है बीच की अवधि में कभी भी ये बढ़ और रुक सकते है। 1861 से 1865 तक अमेरिका में चला युद्ध इन्ही कलंको की वृद्धि के वर्षों में चला सन् 1870 में फ्राँस और जर्मनी के बीच हुआ भयंकर युद्ध आदि लड़ाइयाँ जिन दिनों लड़ी गयी, उन दिनों सूर्यकलंक अपनी चरम स्थिति में थे,
सन् 1915 से 18 तक हुए प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों में सूर्य के कलंक अपनी चरम संख्या में थे। स्मरणीय है इन्हीं दिनों प्रथम युद्ध के साथ-साथ रुस में भी लेनिन के नेतृत्व में साम्यवादी क्राँति हुई। सन् 1939 से 45 तक का समय विश्व इतिहास में फिर उथल-पुथल मचाने वाला बना। दूसरा विश्वयुद्ध इन्हीं दिनों आरम्भ हुआ और सूर्य कलंको का चक्र दिनोंदिन तीव्र होता जा रहा था।सन् 1847 में सूर्य कलंको की संख्या करीब 160 थी। उस वर्ष भारत को स्वतंत्रता मिली, चीन में भी इन्हीं दिनो जन क्राँति हुई। सूर्य कलंको की यह संख्या सन् 1750 से तब तक हुए कलंको की संख्या में सबसे ज्यादा थीं।
आज से 370 वर्ष पूर्व अन्तरिक्ष विज्ञानी गैलीलियो ने इस सौर सक्रियता का प्रत्यक्ष दर्शन और प्रतिपादन सन् 1610-11 में किया था इसके बाद यह प्रचण्डता 1947 में आरम्भ हुई और उसने अन्तरिक्ष के 6300000000 वर्ग मील अर्थात पृथ्वी के आकार से लगभग 100 गुने क्षेत्र को प्रभावित किया। मध्य सौर ज्वालाएँ ढाई लाख मील ऊँची उठती और उतनी ऊँचाई तक मात्र 30 मिनट में पहुँचती देखी गई। इसका प्रभाव तब से लेकर अब तक धीरे-धीरे ही कम होता आया है। कुछ तो अभी तक बना हुआ है।
अब यह सूर्य का नया दौर सन् 1981-82 में तथा 82-83 में होने वाला है। यह प्रकोप अब तक क सभी स्फोटों से अधिक भंयकर होने का गणित लगाया गया है। जो इस सर्न्दभ में अधिक जानते है वे कहते है कि यह दुर्दिन धरती निवासियों को विशेषतया मनुष्यों के लिए अतीव कष्ट कारक होगा। इस आशंका में अपना बचाव कैसे हो सकता है यह प्रश्न ही मुख्य और महत्वपूर्ण है। प्रकृति प्रवाह का तो मनुष्य में कुछ न कुछ सोचने और कुछ न कुछ करने के लिए चिन्तन एवं प्रयास तो चल ही पड़ता है। वही सम्भव है।
सम्पत्तिवान होकर भी मनुष्य यदि विपत्ति में फंसे व्यक्तियों के काम न आए तो उसकी सम्पत्ति किस काम की ? समाज से संग्रहीत सम्पत्ति का उपयोग समाज काल्यण में ही किया जाना सज्जनों का काम है। कालिदास
सन् 1957-59 के सौर-सक्रिय वर्ष में 12 अक्टुबर 1985 को सूर्य ग्रहण पड़ा था। उस स्थिति के अध्ययन के लिए अमेरिका तथा रुस ने महत्वपूर्ण राकेट छोड़े थे। उस अध्ययन का निर्ष्कष यह था कि ग्रहण के समय जैसे-जैसे सूर्य ढकता जाता है, पृथ्वी पर पड़ने वाला अल्ट्रावालेट किरणों का प्रभाव कम होता जाता है। जीव-जन्तु चूँकि प्रकृति के बहुत समीप होते है, अतएव उनके रहन-सहन में अचानक परिवर्तन का कारण यही परिवर्तन हो सकता है।
ग्रहण की सम्भावना कब होती है ? इसका सामान्य नियम यह है कि पूर्णिमा समाप्ति के समय चन्द्रमा यदि राहु या केतु से 13 अंश से अधिक दूर हुए तो सूर्य-ग्रहण होता है । एक वर्ष में इस प्रकार अधिक से अधिक 7 ग्रहण पड़ते है, जिनमें से 4-5 सूर्य-ग्रहण और 2-3 चन्द्र-ग्रहण हो सकते है। एक सौर वर्ष में यदि दो ही ग्रहण पड़ते है तो वे दोनों सूर्य-ग्रहण ही ज्यादा दिखाई देता है। इसका कारण चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य का आकार में एक दूसरे से छोटा-बड़ा होना है।
खग्रास सूर्य-ग्रहण के समय करीब 8 मिनट तक सूर्य पूरी तरह छूप जाता है अर्थात्-चन्द्रमा की ओट में जाता है। जिस समय यह ग्रहण आरम्भ होता है, उस समय सूर्य-बिम्ब पर एक ओर से कालपान बढ़ता आरम्भ होता है। उस समय वातावरण का तापमान कम होने लगता है, आकाश में कालिमा फैलने लगती है। पक्षी व प्राणी रात होने जैसी स्थिति में घर वापिस लौटने लगते है। उस समय सूर्य-बिम्ब तो पूरी तरह चन्द्रमा की ओट में आ जाता है, परन्तु उसके चारों ओर फैला रहने वाला तेजपुज्ज, जिसे कारोना कहते है, बड़ा विलक्षण प्रतीत होता है। यह कारोना केवल खग्रास सूर्य-ग्रहण के समय ही देखा जा सकता है।
16 फरवरी 60 को मध्यान्ह तीन बजकर 36 मि. से यह अद्भुत सूर्य-ग्रहण प्रारम्भ होगा और 4 बजकर 1 मिनट तक चलेगा। इस बीच तीन मिनट तक सूर्य पुरी तरह चन्द्रमा की छाया से ढका रहेगा। उस समय सधन अन्धकार छाया होगा। लगेगा-रात्रि हो गई। दिन में तारे दीखने जैसी स्थिति उस समय बन जायगी। पक्षी घोंसलों में जा घुसेंगे और कितने ही प्राणी अपना सामान्य सन्तुजन खोकर चित्र-विचित्र क्रियाएँ करने लगेंगें।
इस शताब्दी में यों और भी कई खग्रास सूर्य-ग्रहण पड़े है, पर वे सभी केवल समुद्र में ही देखे जा सकते थे। मात्र यही एक ऐसा है, जो पृथ्वी पर-भारत में स्पष्टतया देखा जा सकेगा। चन्द्रमा की छाया दक्षिणी अटलाँटिक महासागर से आरम्भ होगी और सूर्य छिपने तक दक्षिणी-चीन में दृष्टिगोचर होती रहेगी। भारत-इसके मध्य में ही आता है। इस रुप में यह ग्रहण 700 वर्ष बाद दृष्टिगोचर होगा।
ऐसे समय में अन्तरिक्ष में आच्छादित एक्स किरणों और पराबैंगनी किरणों के स्तर एवं प्रवाह में असाधारण परिवर्तन होता है। ऐसे परिवर्तन पृथ्वी निवासियों की मन’ स्थिति और परिस्थिति का असाधारण रुप में प्रभावित करे तो इसमे कुछ भी आर्श्चय की बात नहीं है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने गुब्बारे, राकेट तथा आधुनिक उपकरणों की सहायता से इस घटना का अध्ययन करने की तैयारी प्रारम्भ कर दी है। विदेशी वैज्ञानिक भी इसका अध्ययन करने के लिए भारत के प्रमुख स्थानों में अपने शिविर लगायेंगे, जिससे कि सही प्रकार से पूर्ण सूर्य-ग्रहण का अध्ययन कर सकें।
इन पक्ितयो में मुख्य चर्चा भावी सूर्य-स्फोटों की पृथ्वी पर होने वाली प्रतिक्रिया की चर्चा की जा रही है, क्योंकि बड़ी विभीषिक वही है। अभी कुछ ही दिनो में आने वाली 16 फरवरी 60 के खग्रास सूर्य-ग्रहण की चर्चा तो इस सर्न्दभ में की गई है कि जब छाया पड़ने से उत्पन्न व्यतिवम कई प्रकार की विभिषिकाएँ उत्पन्न कर सकते है तो स्फोटों के कारण होने परिवर्तनों की प्रतिक्रिया किस स्तर की हो सकती है ? फलित ज्योतिषियों ने इसी फरवरी वाले ग्रहण को अशुभ बताया है, उसे न देखने के लिए कहा है उसका प्रतिफल कई अनिष्टीं के रुप में बताकर, उप समाधान को उपसनात्मक उपचारों से बताया था। यदि कुछ ही समय रहने वाला, यह छाया-प्रभाव इतना चिन्ताजनक है तो स्फोटों का वह प्रभाव-जो अन्तरिक्ष के व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करेगा, और भी अधिक विचारणीय होना चाहिए।
सन् 81 के सूर्य-कलंकों पर इन दिनों विश्व भर के अन्तरिक्ष-विज्ञानी गम्भीरता पूर्वक विचार कर है और इस निर्ष्कष पर पहुँचने का प्रयत्न कर रहे है कि उनकी प्रतिक्रिया किस क्षेत्र पर क्या हो सकती है। और उसके लिए सुरक्षात्मक तैयारी क्या की जानी चाहिए ?
इस सर्न्दभ में सर्वसाधारण की अधिक जिज्ञासा होना स्वाभाविक है। जिस संकट से मनुष्यों समेत समस्त जीवधारी और पदार्थ प्रभावित हो सकते है, उसके सम्बन्ध में अधिक जाने की अभिरुचि का बढ़ना सामान्य बात है। विस्तृत विवरण तो विज्ञानवेत्ता ही अपने प्रतिवेदनों में प्रस्तुत कर सकते है, पर सामान्य जानकारी के रुप में स्फोटो का सामान्य स्वरुप और इनका प्रभाव संक्षेप में यहाँ भी समझाया जा सकता है।
सूर्य-पिंड पृथ्वी से 330 हजार गुना अधिक बड़ा तथा कुल ग्रहों के पिण्डों के योग से 750 गुना अधिक बड़ा है। यही कारण है कि भारी सूर्य को उसके चारों और घुमने वाले ग्रह अपने सामुहिक आकर्षण से नहीं हटा पाते।
विज्ञान की दृष्टि में सूर्य केवल वायु पदार्थों से बना एक ज्योतिपिण्ड मात्र है और अन्य ग्रह घने तत्वों प्रभाहशील और वायु-पदार्थों के बने आकाशीय-पिण्ड है। सूर्य पर जितनी गर्मी है, उस गर्मी के अनुपात में अन्य ग्रहो का तापमान और दबाब अत्यन्त कम है और कारण ग्रहों के द्रव्य या तो स्थायी रुप में प्राप्त हुए परमाणुओं की या उनके घटकों की संरचना वाले है। ग्रहों पर भौतिक-प्रक्रियाएँ और रासायनिक संयोजन चलते रहते है। सूर्य में परमाणुओं के आँशिक घटकों की एंव नाभियों की टूट फुट अथवा अति उष्ण तापमान पर सिद्ध हो सके। सुर्य के भीतर प्रबल वायुघनता अन्य ग्रहों की भारी धातुओं से भी अधिक सघन होती है। इसका कारण उन ग्रहों की पारमाणविक संरचना है। सूर्य के अन्तराल में परमाणु अपने स्थायित्व को बनाये नहीं रख सकते, प्रचंड गर्मी व दवाब के कारण टूट जाते है। सूर्य की ऊपरी सतह का द्रव्य उत्तरात्तर गाढ़ा होता जात है। सूर्य त्रिज्या के आधे भाग पर आए हुए द्रव्य का घनत्व पानी जितना गाढ़ापन बताते है, सूर्य के केन्द्र भाग में आए हुए द्रव्य पानी का घनत्व से 75 गुना अधिक होता है। सूर्य के गर्भ पदार्थो का घनत्व शीशे के घनत्व से 11 गुना और पृथ्वी की सर्वाधिक भारी धातु ओसापियम के घनत्व से लगभग चार गुना अधिक होता है। सूर्य के केन्द भाग पर हवा का दवाब पृथ्वी के वायु दवाब से सौ अरब गुना अधिक है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि यह दवाब प्रति वर्ग संटीमीटर आठ करोड़ टन है। इसके अतिरिक्त सूर्य के गर्भ में प्रकाश का दवाब होता यह दवाब बीस लाख टन वर्ग सेंटीमीटर भी होता है।
सूर्य कंलक है क्या ? और उनसे पृथ्वी का किस तरह सम्बन्ध है। सूर्य से पृथ्वी में जो प्रकाश् कण टकराते है उनकी गति से पता चलता है कि उनकी पहुँच सूर्य में 18 से 24 घण्टे पूर्व सूर्य में हुई किसी विस्फोट या प्रज्वलन से होता है । सौर टेलेस्कोपों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि प्रकाश की एक छोटी सी चमकदार बगूली सी उठती है यह किसी काले धब्बे जैसे स्थान से उठती है और कुछ ही क्षणों में विराट् आकार अर्थात लाखों मील व्यास का रुप धारण कर लेती है उसमें असाधारण दिव्यता परिलक्षित होती है मानो आकाश में फुलझडियाँ छूट रही हों यह आधा घण्टे के लगभग ही जीवन धारण करने के बाद ही अदृश्य हो जाता है पर इतनी ही देर में एक्स किरणों इन्फ्रारे अल्ट्रा वायलेट तथा ब्रह्माण्ड किरणों की असीम मात्रा फेंक जाता है, अग्नि शिखाओं के इस उद्धोग का अभी तक भी वैज्ञानिक को निराकरण नहीं कर पाये। किन्तु इनको एक ऐसी खिड़की माना जा रहा है जिसेसे ब्रह्माण्ड को बहुत अच्छी तरह देखा और समझा जा सकता है।
सूर्य स्फोटों के समय के विकिरण का विस्तृत अध्ययन करने के बाद पता चला है कि उस मय उत्सर्जित प्रकाश कण सामान्य प्रकाश कणों से भिन्न और बेधक होते है उदाहरणार्थ एक बार क्लाईमेक्स पर्वत कोलोरेडा (अमेरिका) स्थित वेधशाला की सूचना पर कोलोनिअल अमेरिका जहाज ने जो तरंगी पकड़ी वह सामान्य पराबैंगनी (अल्ट्रा वायलेट) न होकर एक्स किरणें थी और वह इतनी तीव्र थी उनका विस्फोट जहाँ हुआ होगा वहाँ का तापमान न्यूतम 1 करोड़ अंश ऐन्टीग्रेड रहा होगा। सभी जानते हैं कि एक्स किरणों में अन्तःस्थिति के भी फोटो निकाल देने की क्षमता होती हैं।
सूर्य पर होने वाली परमाणु, विखण्डन की प्रक्रिया से जो कास्मिक प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई वह पृथ्वी पर भी अपने सूक्ष्म प्रीव छोड़ती है। वैज्ञानिक यंत्रों की पकड़ में केवल उनका स्थूल स्वरुप ही हैं पर वह भी कम चौंकाने वाला नहीं होता है। उदाहरण के लिए जुलाई 1959 में सूरज पर देखे जाने धब्बों के एक बडे़ समूह वाले क्षेत्र क्रोमोस्फियर की विशाल चमक देखी गई। उसी समय पृथ्वी पर रेडियो सम्बन्धों में शिथिलता अंकित की गई तथा 15-16 जुलाई के मध्य युरोप और अमेरिका के बीच रेडियो सम्बन्ध समाप्त हो गया, टेलीग्राफ के सम्बन्ध भी टूट गये और दूसरे भू भौतिकीय संबंध भी समाप्त हो गये। फिर वायुमंडल की गहरी परतों में 6070 किलोमीटर की ऊँचाई पर पारजंपु विकिरण ने प्रवेश किया जिसके कारण आयोनाइजेशन में अनियमित्ताएँ तथा हृस्व तरंगों की कर्ण गोचरता में कटाव पैदा हो गया। लगभग प्रकाश की गति से दौड़ती हुई कास्मिक रश्मियों के, जो सूर्य में होने वाले विशाल विस्फोटों की उपज थी, निरन्तर होने वाले कास्मिक रेडियेशन में परिवर्तन कर दिया।
सूर्य से पृथ्वी तक आने वाली पदार्थ कणों की धाराएँ पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उस समय चुम्बकीय आँधियाँ आने लगती है। ऐसे अवसरों पर दिशा सूचक यंत्र की सुई अपने स्वाभाविक स्थान से अनायास ही हटती हुई देखी गई हैं। इन चुम्बकीय आँधियों के प्रभाव के कारण पृथ्वी और धातुपदार्थों पर विशेषतः तारों पर, जिन विद्युत धाराओं का प्रवाह रहता है वे मनमाने ढंग से बदलती रहती है और इतनी अधिक तीव्र हो जाती है कि टेलिग्राफ टेलीफोन के काम में बाधाएँ खड़ी कर देती है। कभी-कभी तो तार द्वारा विद्युत संचार तक असम्भव हो जाता हैं।
यह चुम्बकीय आँधियाँ बार-बार आती रहती है और ध्रुव प्रदेशों में उनका वेग सबसे तीव्र होता हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुव प्रदेशो की ओर बढ़ते समय चुम्बकीय आँधियों का सिलसिला बढ़ता ही चला जाता हैं। जिस समय चुम्बकीय आँधियाँ आती है। उस समय ध्रुव प्रकाश भी निश्चित रुप से दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए सन् 1938 के जनवरी माह में जब एक बार अत्यंत तीव्र ध्रुव प्रकाश चमका था जो क्रीमिया और अफ्रीका तक दिखाई दिया, उस समय एक बहुत तेज चुम्बकीय आँधी भी उठी थी जिसने करीब-करीब पूरी पृथ्वी को अपनी लपेट में ले लिया था।
चुम्बकीय आँधियों के आने और धु्रव प्रकाश के उत्पन्न होने का एक ही कारण है और वह है पृथ्वी के वायुमण्डल पर सौर कणों की तीव्रतर वर्षा। स्मरणीय है सूर्य अपनी किरणों के माध्यम से जो कण उत्सर्जित करता है वह वास्तव में विद्युत धारा होती है अर्थात सूर्य रश्मियों के माध्यम से पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी का सूर्य के साथ विद्युतीय सर्म्पक रहता है। इस सम्बन्ध में किये गये कई प्रयोगों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि सूर्य द्वारा उत्सर्जित कणों धारा जो वास्तव में एक विद्युत धारा होती हैं अपने चारों ओर की खाली जगह में चुम्बकीय क्षेत्र पैदा करती है। यह क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर ऊपर से छा जाता है परिणाम स्वरुप चुम्बकीय आँधी पैदा हो जाती है।
सूर्य स्फोटो का गतिचक्र प्रायः 11 वर्ष 1 महीनें एवं 22 वर्ष दो महीने में लौट-लौट कर वापिस आता रहता है। फलस्वरुप उसी क्रम से कितनी ही उलट-पुलट धरती के वातावरण में भी होती रहती है। यह गतिचक्र अन्रु प्राणियों में एवं वृक्षों में भी पाया जाता हैं। सालमन मछली पर हर साड़े नौवे वर्ष ऐसा उन्माद चढ़ता है कि वह मछुओ के जाल पर दौड़ दौड़ कर कूदती हैं और बेमौत मरती हैं। कुछ पेड़ों की छाल भी ऐसी ही नियत अवधि पर साधारण की अपेक्षा अधिक मोटी होती देखी गई हैं।
पृथ्वी का जीवन सौर मंडल के परिवर्तनों से आबद्ध है इस तथ्य को अति प्राचीन काल से स्वीकारा गया है मिश्र में सिंचाई के समय एक त्यौहार मनाया जाता हैं यह उस दिन मनाया जाता हैं जिस दिन जुलाई माह में नील नदी में एकाएक बाढ़ आ जाती है। लम्बे समय तक के अध्ययन के बाद यह पाया गया कि बाढ़ ठीक उसी दिन आती हैं जिस दिन सूर्योदय के ठीक समय लुब्धक तारा दिखाई देता हैं इसका अर्थ यह हुआ नील नदी का परिवर्तन किसी न किसी रुप में लुब्धक के जीवन से जुडा हुआ हैं। यों एस्टोनोमी (खगोल विद्या) और एस्टोलाजी (फलित ज्योतिष) के मध्य तीर तुक्का जैसा संबंध है गणित एक विज्ञान है और फलित परिकल्पना। फिर भी जब दोनों कभी एक ही निर्ष्कष पर पहुँचते हों तो तथ्यों को बल ही मिलता है। सूर्य पर अगले दिनों उभरने वाले धब्बों की विभीषिका साथ ही खग्रास सूर्य ग्रहण की प्रतिक्रिया इसके अतिरिक्त एक राशि पर छः ग्रहों की युति उपस्थिति को देखते हुए उन आशंकाओं की परिपुष्टि हो जाती है जो भविष्य की विभीषिकाओं के संबंध में सतर्क करती है, और सुरक्षा की व्यक्तिगत एवं सामूहिक व्यवस्था बनाना सम्भव हो तो उसके लिए प्रोत्साहित करती है।
साप्ताहिक हिन्दुस्तान के गत 5 अगस्त अंक में इन ज्योतिषियो की भविष्य वाणियाँ छपी हैं। इनमें शनि राहु की सिहस्थ युति-मकर राशि में चन्द्र सूर्य, मंगल, बुध की युति मेष राशि में शुक्र, मंगल, बुध सूर्य की युति कर्क राशि में गुरु, बुध चन्द्र सूर्य की युति-एवं सिंह राशि पर छः ग्रहों की युति का उल्लेख करते हुए दैवी प्रकोप, युद्ध, महामारी, आक्रोश, असन्तोष विग्रह, दुर्भिक्ष आदि विपत्तियों की आशंका व्यक्त की हैं और कहा हैं कि ऐसा विचित्र योग संयोग लगभग 150 वर्ष बाद आया है।
यूरोप भर में चमत्कारी दिव्य पुरुष के रुप में माने गये अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न एक व्यक्ति हुए है-नोस्ट्राडेमस। वे 1503 में फ्राँस के एक कस्बे में जन्में। बचपन से ही भविष्यवाणी करने और उनके अक्षरशः सही निकलते रहने के कारण उनकी ख्याति युरोप भर में फैल गयी और तत्काल शासनाध्यक्ष एवं मूर्धन्य व्यक्ति उनसे भविष्य जानने के लिए आते रहे। कथन सही होते रहने के कारण अपने समय के वे दिव्यदर्शी गिने गये। उनकी सामयिक भविष्य वाणीयाँ सही होने के कारण दूरगामी भविष्य के संबंध में भी उनके कथन प्रतिपादनों को अभी भी सच निकलने पर विश्वास किया जाता है।
नोस्ट्राडेमस की एक-एक सौ भविष्य वाणियों की चार पुस्तकें प्रकाशित हुई है इन चारों भागो का नाम ‘शतियाँ’ है। इनमें वर्तमान शताब्दी में घटित होने वाले घटनाक्रम का भी उल्लेख है और वह अक्षरशः सही उत्तर रहा हैं। उनके एक भविष्य कथनों का कुछ उल्लेख जर्मनी से प्रकाशित एक पुस्तक “दी फ्यूचर आफ ह्यूमनिटी” में हुआ हैं। उसके अनुसार बीसवी सदी के अन्तिम वर्ष प्रकृति प्रकोपों और मानवी विग्रहों से भरे हुए है। इसमें दैवी दुर्घटनाओं से लेकर मनुष्य कृत उपद्रवों के कारण और स्वरुप बताते गये है। इस डरावने प्रतिपादन के साथ एक आशा किरण का भी संकेत है। वह यह कि भारत के हिमालय क्षेत्र से उसी अवधि में नवयुग के सृजन का एक प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न होगा और वह समस्त मानव जाति को सत्प्रवृतियाँ अपनाने की प्रेरणा देगा। इन दिनों घटित हो रहे घटनाक्रमों के साथ इन भविष्य वाणियों और सौर मण्डल की अदृश्य परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा कर विचार किया जाता है तो लगभग एक जैसे ही निर्ष्कष निकलते हैं।
भविष्य कथनों की श्रृंखला में ब्रिटेन के सात जनरलों और राजनायिकों द्वारा लिखित एक पुस्तक प्रकाशित हुई हैं ‘ थर्ड वर्ल्डवार एवं फ्यूचर हिस्ट्री।’ इसमें अगले दिनों तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावना का उल्लेख है कहा गया है कि यह युद्ध ईरान पर किसी अरब देश के आक्रमण से आरम्भ होगा और छः सप्ताह चलेगा। इस थोड़ी अवधि में प्रलय जैसे महा विनाश का संकेत हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय, राजनैतिक, आर्थिक, वैचारिक, सामाजिक एवं चारित्रिक गति प्रवाह जिस दिशा में चल रहा है उससे निकट भविष्य में दुर्दिनों की सम्भावना का आभास मिलता है। इसके साथ यदि अन्तरिक्षीय परिवर्तनो को सामने रखकर विचार किया जाता है तो अशुभ सम्भावनाएँ सामने आती हैं। ऐसी अशुभ जिनके संबंध में गम्भीर विचार करने की आवश्यकता है। नियति कितनी ही अप्रिय क्यों न हो मानवी पराक्रम उससे जूझने और कारगर परिवर्तन करने में समर्थ हो सकता हैं।
धरती की व्यवस्था सम्भालने का उत्तरदायित्व सृष्टा ने मनुष्य को सौंपा हैं। साथ ही उसे इतना समर्थ शरीर तन्त्र दिया हैं कि वह न केवल जीवधारियों के लिए सुख शान्त बनाऐं रहे वरन् ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य शक्तियों को भी अनुकूल रहने के लिए सहमत रख सकें। अपने उस उत्तरदायित्व में व्यतिरेक करके जब मनुष्य अनाचार और उद्दंडता बरतता हैं-चिन्तन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता हैं तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का सन्तुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती हैं। दैवी प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानो अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है। किन्तु अदृश्य और अप्रत्यक्ष को जो जानते हैं उनका स्पष्ट मत हैं कि पानी में पत्थर फेंकने और छींटे उठाने की जिम्मेदारी उन लड़कों की हैं जो तालाब के एक कोने पर बैठे शरारत करते रहते है। तालाब अकारण उछलने लगे और अपने जलचर परिवार के लिए संकट उत्पन्न करे ऐसी बात है नही, प्रतीत भले ही होती हो।
इन दिनों उभरने वाले प्रकृति प्रकोपों का सिलसिला अगले दिनों घटेगा नहीं बढ़ेगा। इस आँशका से सभी चिन्तित है। भय अकारण हैं या सकारण इसका अन्वेषण करने पर कितने ही तथ्य सामने आते हैं और अशुभ सम्भावना की पुष्टि करते हैं। आणविक विस्फोटों के कारण बढ़ता हुआ विकिरण, विषाक्त ईंधन से उत्पन्न वायु प्रदुषण- पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे प्रायः 4000 उपग्रहों के कारण सुरक्षा परतों में विक्षोभ-ऊर्जा के बढ़ते उपयोग से गर्मी का बढ़ना और उसके कारण हिमि प्रदेशों का असन्तुलित रीति से पिघलना-भूगर्भ से खनिज सम्पदा निचोड़ लेने पर उसका खोखला एवं ठन्डा होते जाना-आदि कितने ही कारण हैं जो धरती के भीतरी सतही और बाहरी वातावरण में विक्षोभ उत्पन्न करते देखे जा सकते हैं। इन्हे मनुष्य की प्रकृति के साथ उद्धत छेड़खानी कह सकते हैं। छेड़ने पर तो चींटी भी काटती है फिर नियति क्यों चूकने लगी।
अध्यात्म विज्ञान का प्रतिपादन हैं कि प्रकृति ही सब कुछ नहीं हैं उससे भी ऊपर एक चेतन सत्ता है, जिसको प्राणियों के साथ व्यवहार करने की विधि को ‘नियति’ कहते हैं। दिव्यदर्शी इस नियति को ही प्रधानता देते हैं, और प्रकृति के सन्तुलन को बनाने बिगाड़ने में इसी को उत्तरदायी मानते हैं। उनका कहना हैं कि प्रकृति से भौतिक छेड़खानी करने पर दैवी प्रकोप बरसना एक पक्ष तो है पर वही सब कुछ नहीं हैं। उससे भी बड़ी बात हैं मानवी चिन्तन और चरित्र से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया जो प्रकृति की नियामक सत्ता ‘नियति’ पर प्रभाव डालती है। अनाचरण से नियति की अन्तरात्मा क्षुब्ध होती है फलतः उसका प्रकृति कलेवर भी आक्रोश का-आवेश का-परिचय देता है। दैवी प्रकोपों के मूल में जितना दोष प्रकृति व्यवस्था को उद्धत रुप से छेड़खानी करने का है उससे भी अधिक भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण का आश्रय लेने वाली मानवी निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरुप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती-त्रास देती है।
अन्तरिक्ष विज्ञानी इन दिनो सौर-मण्डल तथा उससे ऊपर के ब्रह्माण्ड क्षेत्र का पर्यवेक्षण करते है, तो कहते है पृथ्वी के लिए यह परिस्थितियाँ संकटापन्न है। सभी जानते हैं कि पृथ्वी की अपनी निज की जितनी शक्ति और सम्पदा है उसे उससे कही अधिक अनुदान लेकर अपना गुजारा करना पड़ता हैं। सौर ऊर्जा उसका प्राण है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रहों से आने वाले ब्रह्माण्डीय अनुदान उसे उपलब्ध होते है। ऊपर के वातावरण की छलनी में छनकर ध्रुवों के माध्यम से जो सम्पदा धरती को प्राप्त होती है उसी से उसका गौरव एवं वैभव इस स्तर तक पहुँचा है। ऐसी परिस्थितियाँ न हो तो वह भी सौर मण्डल के अन्य सदस्यों की तरह बुध की तरह आग-बबूला होकर प्लेटों की तरह हिमपिण्ड बनकर शुक्र की तरह विषाक्त बादलों से आच्छादित रहकर निस्तब्ध श्मशान की तरह अन्तरिक्ष के एक कोने में पड़ी अपने दुर्भाग्य का रोना रो रही होती।
अन्तरिक्ष विज्ञानी अपनी गहरी जाँच पड़ताल से पृथ्वी और अन्तरिक्ष के मध्य चले आ रहे आदान-प्रदान में विक्षेप व्यवधान होता देखते हैं। सूर्य पर इन्ही दिनों ऐसे ‘कलंक’ उभरने वाले हैं जो महान देवता को ही बदनाम नहीं करेंगे। अपनी चपेट में धरती वासियों को त्रास देंगे। उन्मादी, रोगी, अपराधी स्वयं तो कष्ट सहते ही है उसके स्वजन सम्बन्धी भी तरह-तरह के कष्ट और ताने सहते है। पृथ्वी सूर्य से लाभ भी सर्वोपरि उठाती है तो हानि भी उसी का उठानी पड़ती है। अर्धांगिनी को पति के वैभव का जहाँ श्रेय मिलता है वहाँ से रोगी होने पर उपचार का तथा मरने पर वैधत्व का भार भी सहना पड़ता है। सूर्य की अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों ने समय-समय पर पृथ्वी को हँसाया, रुलाया है। अगले दिनो जो व्यतिरेक उत्पन्न होगा उससे उसके पदार्थ, वैभव एवं प्राणि परिवार को भी असन्तुलन सहना, त्रास विग्रह का सामना करना पड़े तो इसमें कुछ भी आर्श्चय की बात नहीं है। इस सर्न्दभ में अन्तरिक्ष विज्ञानी मनुष्य समाज को भावी कठिनाइयों से सचेत करते है तो उसमें यथार्थता भी है और बुद्धिमता भी।
सन् 81 से उभरने वाले सौर कलंको की-ब्रहस्पति के अत्यधिक विक्षुब्ध होने की-26 फरवरी को होने वाले असाधारण सूर्य ग्रहण की प्रतिक्रियाएँ फलित ज्योतिषी अपने ढंग से और खगोल विज्ञानी अपने ढंग से व्यक्त करते है। दोनों के कारण पृथक है पर निर्ष्कष एक। अगले दिनों की विभीषिकाओं का भविष्य कथन दोनों ही करते है। भविष्य कथन की बात चल पड़ी तो यहीं यह भी समझ लेना चाहिए कि सूक्ष्मदर्शी अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न ऐसे लोग भी इस धरती पर कभी-कभी देखने को मिलते हैं जिनमें अदृश्य दर्शन की क्षमता है। ऐसे लोगो को जो अनुभूतियाँ होती हैं उनमें ग्रह गणित नहीं दिव्य दर्शन की अद्भुत विशेषता ही कारण भूत होती है। इनकी भविष्य वाणियों में कदाचित ही कभी कोई असम्बद्ध बैठती हो। ऐसे लोगों की एक श्रृंखला हैं जिनमें कई जीवित हैं, कई दिवंगत हो चुके। इनने अपने भविष्य कथन में प्रधानतया दो तथ्य प्रस्तुत किये है-इन दिनों अवाँछनीयता एवं विपत्तियों का बढ़ना और कुछ समय उपरान्त स्वर्गीय सुख शान्ति का सृजन होना। इसे वे युग परिवर्तन की प्रसव पीड़ा बताते है जिसमें कष्ट सहन और सन्तान लाभ की कटु मधुर विसंगति जुड़ी होती है। प्रामाणिक भविष्य कथनों के विस्तृत विवेचन का साराँश इतना ही है।
दुःखद परिस्थितियों का काल क्या होगा ? और सुखद सम्भावनाएँ कब उत्पन्न होंगी ? इस संदर्भ में सूक्ष्मदर्शियों के कथन लगभग एक ही अवधि तक अपने निष्कर्षों को केन्द्रित करते हैं। सन् 1980 से 2000 तक के समय को अधिक कष्ट कारक पाया जायगा और 2000 के बाद की परिस्थितियों में सन्तोष की साँस लेने और उज्ज्वल भविष्य के सम्बन्ध में आश्वस्त होने का अवसर मिलेगा।
उपरोक्त पर्यवेक्षण से जिस निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है वह निकट भविष्य की अशुभ आशंकाएँ और जो सम्भावनाओं का चित्र सामने आता है। इससे किसी को भी आतंकित या भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी हड़बड़ी तो विपत्ति को और भी कई गुना बढ़ा सकती है। कठिन समय का एक ही तकाजा है धैर्य और साहस बनायें रहना-मनोबल न गिरने देना-साथ ही आशंकाओ को निरस्त करने वाले प्रयासों का निर्धारण करके उनकी पूर्ति में जूट जाना। हमारे लिए यही उचित है कि भौतिक और आत्मिक स्तर पर ऐसा प्रबल पुरुषार्थ सँजोये जिनसे रुष्ट नियति को मना लेने और क्रुद्ध प्रकृति को शान्त करने का अवसर मिल सके। रोग अपनी जगह है और उपचार अपनी जगह। विपत्ति अपना काम करती है और रोकथाम के लिए बरते गये पुरुषार्थ का अपना महत्व है। विषम बेला में यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी हैं कि आतंकित होने की मनःस्थिति उत्पन्न न होन दी जाय साथ ही प्रचण्ड पुरुषार्थ को सँजोकर असम्भव को सम्भव बनाया जाय। विपत्ति का परोक्ष वरदान यही हो सकता है कि वह सजुझारु साहस और प्रबल पराक्रम उभारे। ध्वंस को सृजन से ही निरस्त किया जा सकता है। आग को पानी से ही बुझाया जा सकता है।
अशुभ आशंकाएँ एवं दुःखद सम्भावनाएँ किनको, कितना, किस प्रकार त्रास देंगी। इसका ऊहापोह करने की अपेक्षा यह सोचना उत्तम है कि उन्हें निरस्त करने के लिए क्या कुछ सम्भव है ? यदि हैं तो उसे बड़े साधनों की अपेक्षा किये बिना उसके लिए जुट पड़ने का साहस है। सृजनात्मक साहस बड़ी बात हैं। टिटहरी का समुद्र पाटने का-जटायु का रावण से लड़ने का और गिलहरी का राम समर्थन में अपना योगदान प्रस्तुत करना ऐसे उदाहरण हैं जिनमें तुच्छ प्राणियों से भी समर्थ मनुष्य को प्राणवान मार्गदर्शन मिल सकता है। आवश्यक नहीं कि विपत्ति की आशंका से ही सृजन साहस सँजोया जाय। उज्ज्वल भविष्य की संरचना अपने आप में एक महान लक्ष्य है जिसे बिना किसी विपत्ति या आशंका के रहते हुए भी पूण्य पुरुषार्थ के सहारे सामान्य परिस्थितियों में भी आरम्भ किया जा सकता हैं।
युग निर्माण परिजनों का देव परिवार इस विषम बेला में नियति की चुनौती को लेकर सामने आया है। हर बसन्त पर उसे अभिनव प्रेरणाएँ प्राप्त होती हैं और परिवर्तन की महान प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिए क्रमिक जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर लदती रही है। इस बसन्त पर उसे प्रकृति और नियति की विभीषिकाओं से जूझने ताि उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए जुटने के दुहरे उत्तरदायित्व सौंपे गये हैं। इसे लंका दहन और रामराज्य स्थापना के लिए अंगद, हनुमान द्वारा निभाई गई दुहरी भूमिका समझा जा सकता हैं।
इस भूमिका का स्वरुप हैं-सन् 1980 से आरम्भ होकर सन् 2000 तक चलने वाली बीस वर्षीय युग परिवर्तन योजना। इसे चार, पंच वर्षीय योजनाओं में विभाजित किया गया है। विरामों पर ठहरते हुए एक-एक बाद दुसरा कदम उठाना ही उपयुक्त होता है। एक-एक मोर्चा जीतते हुए एक-एक सीड़ी पर कदम बढ़ाते हुए समग्र सफलता के लक्ष्य तक पहुँचना ही उपयुक्त है। बसन्त अपना अध्यात्म वर्ष है। इसे प्रेरणा पर्व के रुप में मनाया जाता रहा है। इस बार उसमें आपत्तिकालीन परिस्थितियों के अनुरुप साहसिक कार्यक्रमों का नियोजन हुआ है।
सन् 80 से 84 तक चलने वाली प्रथम युग परिवर्तन योजना में पाँच कार्यक्रमों पर ध्यान केन्द्रित करने और उन्हे सुदृढ़ परिपक्व बनाने का सन्देश सामने आया है। उसके पाँच कार्यक्रम इस प्रकार हैः-
(1) जाग्रत आत्माओं की विशिष्ट उपासना
(अ) नित्य नियमित रुप से गायत्री मंत्र की न्यूनतम पाँच मालाओं का जप, साथ में प्रातःकाल उगते सूर्य का ध्यान। उस आलोक से स्थूल शरीर में सत्कर्मों की-सूक्ष्म शरीर में सद्विचारों की-कारण शरीर में सद्भावों की क्रमिक अभिवृद्धि।
(ब) दिवाली से होली तक प्रातः 5॥ बजे और होली से दिवाली तक 4॥ बजे पन्द्रह मिनट चलने वाली प्राण आकर्षण की विशेष साधना। गहरे साँस खींचते हुए उसके साथ हिमालय के प्रेषित विशेष प्राण प्रवाह को खींचना और अपने कण-कण में उसे धारण करना।
(स) रात्रि को 8॥ बजे पूरे वर्ष भर चलने वाली पन्द्रह मिनट की नियति सन्तुलन साधना। साँस भीतर खींचना। इडा मार्ग से मूलाधार तक प्राण का ले जाना। प्राण और कुण्डलिनी का मन्थन। उत्पन्न ऊर्जा का सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मरंध्र तक लाना और वहाँ से अनन्त अन्तरिक्ष में नियति सन्तुलन के लिए बखेर देना। श्वाँस को पिंगला मार्ग से निकाल देना। फिर पिंगला से खींचकर इडा से निकालने के साथ ही प्राण प्रयोग दुहराना।
ध्यान धारणा के माध्यम से देव प्राण को अपने में आकर्षित एवं अवधारित किया जाता हैं। साथ ही उस अनुदान में अपना प्राण योगदान मिलाकर अनन्त अन्तरिक्ष में नियति अनुकूल बनाने के उद्देश्य से बखेर दिया जाता है। यह जागृत आत्माओं की व्यक्तिगत साधना देखते हुए भी सामूहिक सम्भव महान आत्म-शक्ति का उद्भव करते है। इसकी विशेषता नियत समय का परिपालन आवश्यक है। घड़ी की सहायता से ही यह सम्भव हो सकता हैं। यों इसे किया तो आगे-पीछे भी जा सकता है, पर तब उसका लाभ व्यक्तिगत ही रह जायगा। यह विश्व-शान्ति की सामूहिक साधना तभी बनेगी जब अधिकधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एक निष्ठ होकर समष्टि शक्ति उत्पन्न करने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करें।
(2) जीवन साधना
जागृत आत्माओं को इसका नियमित शुभारम्भ ‘आहार’ की सात्विकता और ‘बिहार’ की शालीनता की दृष्टि से कुछ संकल्प करते हुए करना चाहिए। व्रत चाहें छोटा-सा ही है, पर उसका परिपालन संकल्प पूर्वक समग्र निष्टा के साथ किया जाय।
आहार में सात्विक पदार्थ ही सम्मिलित रखे जाय। राजसी और तामसी वर्ग के घटाने और हटाने का प्रयत्न करें। मद्य, माँस से बचें। अनीति उपार्जित एवं अनुपयुक्त वातावरण में पकाया, अवाँछनीय व्यक्तियों द्वारा परोसा हुआ न हो।
बिहार में यथासम्भव ब्रह्मचर्य पर अधिक ध्यान दिया जाय। वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार आदि उपकरणों में सादगी बरती जाय। आलस्य और अपव्यय छोड़े। अशिष्टता न बरतें। अनीति न अपनायें। स्वार्थ को सीमित और परमार्थ को विकसित करें।
(3) सामूहिक साधना
गायत्री यज्ञों की सामूहिक साधना का क्रम नियमित रुप से जारी रखा जाय। हर पूर्णिमा को मासिक यज्ञ हो। सभी जागृत आत्माएँ अपने साथियों समेत सम्मिलित हों। बसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा को अखण्ड जप किया जाय। समाप्ति पर यज्ञ। दोनों नवरात्रियों में नौं-नौ दिन के सामूहिक अनुष्ठान सम्पन्न किये जाये।
(4) सत्प्रवृक्ति सर्म्वधन
यह कार्य परिवारों में धार्मिक वातावरण बनाने से आरम्भ किया जाय। पंचशीलों का परिपालन, पाँच आहुति का बलि वैश्व। नियमित नमन बन्दन। कथा प्रसंग। स्वाध्याय की अनिवार्यता। जन्म दिन संस्कारो का प्रचलन। शाखा संगठनों के माध्यम से सृजनात्मक प्रवृत्तियों के सामूहिक प्रयास। ज्ञान यज्ञ के लिए सुनिश्चित अंशदान।
(5) दुष्प्रवृत्ति निराकरण
वैयक्तिक कषाय-कल्मषों और सामाजिक अवाँछनीय प्रचलनों के उन्मूलन का प्रयास। मूढ़ मान्यताओं और भ्रष्ट परम्पराओं का उन्मूलन। मानवी मर्यादा को घटाने वाले आचरणों का असहयोग एवं विरोध।
उपरोक्त पाँच कार्यक्रम ऐसे है जिन्हे अपनाने के लिए निरन्तर कहा जाता रहा है। उनका परिपालन भी किसी न किसी रुप से होता है। युग परिवर्तन की प्रथम पंच वर्षीय योजना में विशेषता यह रहेगी कि सभी जागृत आत्माएँ इनका परिपालन शिथिलता, उपेक्षा के साथ नहीं वरन् सुदृढ़ निष्ठा के साथ सम्पन्न करेगी। शिथिलता एवं प्रमाद नहीं बरतेगी। इन पाँचों कार्यक्रमों को व्यापक बनाने का प्रयत्न किया जायगा। चुनाव के दिनो में प्रत्याशी जिस प्रकार वोट माँगने के लिए घर-घर जाते और जन-जन से भावभरा आग्रह करते है वही नीति जागृत आत्माओं द्वारा अपने समूचे सर्म्पक क्षेत्र में अपनाई जायगी। आजीविका उपार्जन की तरह ही इन कार्यो को वास्तविकता लाभ एवं श्रेष्ठतम परमार्थ मान कर पूरा किया जाता रहेगा।
गायत्री शक्ति पीठें और प्रज्ञा पीठें इसी उद्देश्य की पूर्ति में निरत रहेंगी। उनके साथ जुडे़ हुए संगठन एवं कार्यकर्त्ता समुदाय का नियमित कार्यक्रम उपरोक्त पाँचो कार्यक्रमों का प्रकाश अपने क्षेत्र में घर-घर तक पहुँचना और जन-जन को उससे प्रभावित करना ही होगा। अस्तु उसके निर्माण को प्रधानता देना इस बसन्त पर्व का प्रेरणा का प्रधान सूत्र संकेत है। जहाँ बड़ी इमारते बनने में कठिनाई आ रही हो वहाँ छोटी 30 म 30 जमीन में बन सकने वाली 25 हजार लागत वाली ‘प्रज्ञापीठ’ बनाली जाँय। बड़ी इमारतों की प्रतीक्षा में देर तक बैठे रहने की अपेक्षा सामयिक उद्देश्य की पूर्ति छोटे निर्माणों से भी आरम्भ की जा सकें तो हर्ज नहीं। समय की माँग है कि एक क्षण का भी समय न गँवाया जाय और वातावरण का परिशोधन करने के लिए मानवी प्रयत्नों में सर्वोपरि महत्त्व के इस पंच वर्षीय योजना को कार्यान्वित करने में जो भी बाधाएँ हो उनका निराकरण सोचा जाए। प्रस्तुत बसन्त पर्व पर सर्वत्र इस पाँच वर्षीय प्रयास का विधिवत् शुभारम्भ किया जाय और इसके लिए अपने स्थान की व्यवस्था का प्रबन्ध करने में समग्र बुद्धिमत्ता और तत्परता का उपयोग किया जाय। यह प्रथम पंच वर्षीय योजना की चर्चा हुई। इस प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाये जाने वाले भाषा, गणित, भूगोल, स्वास्थ्य, सामान्य ज्ञान की तरह अनिवार्य माना जाय। इस शिक्षा में प्रवीणता मिलते ही अगले कदम द्वितीय पंच वर्षीय योजना के रुप में प्रारम्भ कर दिये जायेंगें। उसमें भी पाँच कार्यक्रम है। यथा-
(1) समस्त धर्मो की एकता, समता, ममता, शुचिता को समर्थक बनाना। उनमें पारस्परिक सामंजस्य पैदा करना। धार्मिकता की संयुक्त शक्ति को नव सृजन में लगाना। एक विश्व धर्म-एक विश्व राष्ट्र-एक विश्व संस्कृति-एक विश्व भाषा एवं एक विश्व आचार संहिता के लिए जन-जन में समर्थन एवं उत्साह उत्पन्न करना।
(2) आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं नैतिकता समर्थक धर्म शिक्षा की सामान्तर शिक्षा व्यवस्था चलाना। भौतिक ज्ञान के लिए आवश्यक सरकारी शिक्षा को अपने ढंग से चलाना। धर्म शिक्षा, अवकाश के समय दैनिक साप्ताहिक पाठ्यक्रमों में चल सकता है। पत्रकार उसका माध्यम हो सकता है।
(3) विभूतिवानों को विशेष उत्तरदायित्व वहन करने के लिए तत्पर करना। संगीत, साहित्य, कला की दिशा मोड़ने और उसे सृजन प्रयोजन में लगाने के लिए बृद्धि, प्रतिभा एवं सम्पन्नता के लिए नया द्वार खोलना। प्रतिभा एवं मनीषा को युग चेतना का साथ देने के लिए कटिबद्ध करना। उनके प्रयासों को अग्रगामी बनाने के लिए वातावरण बनाना-साधन जुटाना।
(4) युग का उत्तरदायित्व सम्भालने वाली महान आत्माओं का अवतरण सम्भव करना। इसके लिए ऐसे पारिवारिक वातावरण एवं दम्पत्ति तैयार करना जिनमें दिव्य आत्माएँ अनुकूलता अनुभव करें और जन्म लेने को सहमत हो सके। जहाँ वे जन्म ले चुकी वहाँ उनकी घुटन दूर करना।
(5) धर्म तन्त्र को इतना समर्थ बनाना जो राजनीति को भी दिशा दे सके। शासन तन्त्र दूसरे सम्भालें। पर उसे स्वच्छ और समर्थ बनाने के लिए जिस जन जागरुकता की आवश्यकता है उसे बनाये रखने के लिए धर्म तन्त्र को तत्पर करना। प्राचीन काल में वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषि स्वच्छ शासन बनाये रखने में अपनी परोक्ष भूमिका निभाते थे। वही अगले दिनों भी करना होगा।
यह द्वितीय पंच वर्षीय योजना का व्यवहार स्वरुप है। साधकों की अध्यात्म साधना का स्तर भी इसी प्रकार ऊँचा उठेगा जैसी कि रचनात्मक प्रवृत्तियों के संबंध में प्रथम योजना की तुलना में द्वितीय का कार्यक्रम भारी और ऊँचा हैं। प्रथम स्तर को साधन सम्पन्न कर लेने वाले साधक पंचकोशों का अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण की वह शिक्षा प्राप्त करेंगे जो युग शिल्पियों को आवश्यक शक्ति एवं सामर्थ्य प्रदान कर सके। पात्रता विकसित हुए बिना साधना के चमत्कारी लाभ मिलते नहीं यह सर्वविदित है इसलिए ब्रह्म वर्चस साधना की पृष्ठभूमि तो अभी से बना दी गई है, पर उसमें सफल हो सकने योग्य अधिकारी विनिर्मित करने का ठोस कार्य सम्भवतः द्वितीय पंच वर्षीय योजना से ही व्यापक रुप से बन सकेगा। अभी तो उसके लिए अधिकारी साधक उत्पन्न करने के लिए प्राथमिक प्रयत्न ही चल सकेंगे।
यह तथ्य सभी को ध्यान रहना चाहिए कि अन्तरक्षीय शक्तियाँ जिस प्रकार पृथ्वी को, उसकी परिस्थितियों को तथा प्राणियों को प्रभावित करती है। ठीक उसी प्रकार प्राणवान आत्माएँ अपनी आत्मशक्ति से प्रकृति और नियति को प्रभावित और परिवर्तित करने में समर्थ हो सकती है। तरह-तरह के यन्त्र प्रकृति को प्रभावित करतें हैं। मनुष्य एक ऐसा यन्त्र है जिसमें वे सभी यन्त्र फिट है जो प्रकृति को प्रभावित एवं परिवर्तित कर सकें।
भावी अशुभ सम्भावनाओं को निरस्त करने के लिए अपने देव परिजनों को उसी तत्परता से कटिबद्ध होना चाहिए जैसे कि वे बंगला देश की गड़बड़ी, चीनी आक्रमण, पाकिस्तानी हमला, आपत्तिकालीन, स्काईलैव आदि की विपत्तियों के निवारण सफलतापूर्वक कर चुके। अब की बार आशंकाएँ बढ़ी है इसलिए हमारे सुरक्षा प्रयास भी बढ़े-चढ़े होने चाहिए। उसी का प्रारुप इस बसन्त पर्व के अवसर पर प्रस्तुत किया गया और उसमें परिपूर्ण सहयोग देने के लिए समस्त देव परिजनों को आमन्त्रित किया गया है।
(लाखन सिंह भदौरिया ‘सौमित्र’)
आज में जो जिया सो, जिया आदमी।गत-अगत का नहीं, मर्सिया आदमी!
भूत का या भविष्यत का ‘कल’ नाम दे,भूल के साथ भटका किया आदमी!
कल ही कल के लिये हाय रोता रहा,,आज को छोड़कर, चल दिया आदमी!
कल मिली हैं, किसे, आज को त्याग कर, सोचता ही नहीं क्यों जिया आदमी ?
काल का कौर हर बार बनता रहा, भोग ने आज भरमा लिया आदमी!
श्वास-उच्छवास ही जिन्दगी बन गया, घूँट विष के बनाकर, जिया आदमी!
ध्यान आया कि जब तीलियाँ चुक गई,रोपड़ा चीख कर तब, हिया आदमी!
बिन पते की लिये चिट्ठियाँ बाँटता, खुद झरे पात सा, डाकिया आदमी!
डस रहा आपको, आप फुसकार कर, बन रहा हैं स्वयं कालिया आदमी!
रोशनी का पता पूछता और से, देख तू ही है जलता दिया आदमी।
और के अवगुणों की मुनीमी करे, काँच से ही भरे, झीलियाँ आदमी।
लोक-हित के लिये जो हलाहल पिये, शिव, अमृत पुत्र बो बन गया आदमी!
‘आज’ में जो जिया सो जिया आदमी,गत-अगत का नहीं, मर्सिया आदमी!
*समाप्त*