तीन असाधारण सौभाग्य

मनुष्य जीवन उस दुर्गम घाटी के समान है, जिसमें पग-पग पर फिसलन, हर अगले क्षण या तो उतार या फिर चढाव । कँटाीली झाँडियाँ भी हैं और ऐसे गहरे गड्ढे जहाँ गिरकर फिर ऊपर तक पहुँच पाना सम्भव ही न हो। जो लोग यह मानते हैं कि वे अपनी अकेले की शक्ति से आगे बढ सकते हैं, उनकी समझ को ऐसी दुर्गम घाटी में बिना प्रकाश और पाथेय घूमने वाले पथिक की तरह मूर्खता पूर्ण ही कहा जायेगा । जीवन पग-पग पर प्रकाश चाहता है, पथ-प्रशस्ति चाहता है, उसका मिल जाना मनुष्य जीवन मिलने जैसा परम सौभाग्य समझा जाता है ।

यह सौभाग्य कैसे मिले ? जीवन का पथ कौन आलौकित करे- विवादों के घेरे में उलझे इस प्रश्न को मैंने बहुत कठिनाई से सुलझा तो लियसा । महापुरुष ह ीवह सुयौग हैं- यह बात समझ तो ली - हृदय की गहराई में उतार तो ली किन्तु महापुरुष कहाँ मिलें यह प्रश्न फिर सामने आ खडा हुआ । मैं समझता हूँ उसे सुलझा लेना मनुष्य जीवन का दूसरा असाधारण सौभाग्य है ।

मुझसे कोई कहे कि मैं ऐसा कुतुबनुमा जानता हूँ जिसकी सुई सदैव उस ओर रहती है जिधर महापुरुष रहते हों तो उसे मैं अपना सब कुछ बेचकर खरीद लूँगा और उसे जीवन का असारधारण सौभाग्य मानूँगा।


चरणपीठों की स्थापना प्रत्येक गाँव में हो

सन् 80 युग सन्धि का बीजारोपण वर्ष है इसका प्रधान कार्यक्रम है - प्रज्ञावतरण का ध्वजारोपण। यह हर गाँव में किया जाना है।गायत्री चरण-पीठ की स्थापना के रुप में यह पुण्य प्रयोजन सम्पन्न किया जाना है । भारत भूमि का एक भी गाँव ऐसा न बचने पाये जाहँ गायत्री चरणपीठ की स्थापना न हो । इसके माध्यकम से उन सत्प्रवृतियों को अग्रगामी बनाये जाने +++ परिवार और समाज +++ सम्भव हो सके ।

यह चरणपीठों +++ सुलभ एवं नवयुग को +++ में पूर्णतया समर्थ ऐसी शक्तिपीठ है जिसके माध्यम से हर गाँव, हर घर, हर व्यक्ति तक युग-चेतना का प्रवेष पदार्पण सम्भव हो सके ।

गाँव के मध्य या समीप एक हरा-भरा वृक्ष-उसके नीचे न्यूनतम 6 ग् 6 फुट का पक्का चबूतरा-चबूतरे के तकियो में गायत्री माता के चरणो की स्थापना,सूर्यार्व मात्र से उसकी पूजा, अर्घ के लिए चबूतरे के नीचे एक छोटा पत्थर बहते हुण् ज्ल का उपयोग तुलसी के थावले में। बस यही है गायत्री चरणपीठ जो प्रायः ढाई सौ रुप्ये की लागात से बन सकती है । इसके लिए उपयुक्त स्थान सामूहिक श्रमदान तथा थोडा-थोडा करके एकत्रित किया गया धन, किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति के प्रयत्न से सहज हो उपलब्ध हो सकता है । इसे बनाने बनवाने के लिए एकाकी या टोली बनाकर निकलने बाले हर जगह इस निर्माण से सफलता प्राप्त कर सकते है । हजारी किसान ने बिहार प्रान्त के एक क्षेत्र में अपने प्रयत्न से हजार आम्र उद्यानों से चरणपीठों की दूरगानी उपयोगिता कम नही, वरन् अधिक ही है । आवष्यकता मात्र शारीरिक आलस्य और मानसिक अवसाद छोड कर निकल पडने भर की है । सूक्ष्म जगत में बहने वाला प्रज्ञा प्रवाह इस प्रयत्न को सफल बनाने में हर जगह अनुकूलता उत्पन्न करेगा।

जहाँ भी चरणपीठ बनें वहाँ उसके निकट हर सप्ताह श्रद्धालु लोग जल चढाने ,दीपक जलाने एवं हवन कराने जाया करें हवन में गुड मिश्रित खीर का शाकल्य और मात्र गायत्री मन्त्र का उच्चारण पर्याप्त है। हर शक्तिपीठ के निकट सप्ताह में या महीने में एकबार भजन-कीर्तन भी हुआ करे। ×

चरणपीठ की व्यवस्था का उत्तरदायित्व कोई श्रद्धालुजन सँभाले । पूजा व्यवस्था के साथ उस क्षेत्र के षिक्षितों को युग साहित्य पढाने एवं वापिस लाने का क्रम भी तत्काल आरम्भ कर दिया जाय। सहयोगीजनों के जन्म दिन मनाने और इस माध्यम से परिवार गोष्ठियाँ चलाने का प्रयत्न आरम्भ किया जाय। सहवोगी बढने पर बीस हजार या उससे भी कम में बन सकने वाले छोटे प्रज्ञापीठ भी वहाँ बन सकते हैं।

श्रद्धालूजनो यहाँ नित्य दस पैसे वाले ज्ञान घर और मुट्ठी अन्न वाले धर्मवट रखे जाँय । उस संग्रह से चरणपीठ के क्रिया -कलापों में पूरे या अधूरे समय तक सहयोग देने वाले स्वयं सेवक का खर्च चल सकता है । साथ ही चल-पुस्तकालय,प्रौढ षिक्षा, घरों में तुलसी आरोपण,दीवारों पर आदर्ष लेखन जैसे रचनात्मक कार्या का खर्च भी निकल सकता है।

गायत्री परिवार के हर प्राणवान सदस्यो को इस बीजारोपण वर्ष में यही लक्ष्य लेकर चलना चाहिए कि उसे अपने क्षेत्र में अधिकाधिक चरण-पीठों की स्थापना करनी एवं करानी है । प्रज्ञा पुत्रों में से एक भी ऐसा न बचे जिसने इस पुण्य प्रयास में अपना सहयोग, समयदान न दिया हो ।


महामानवों से सम्बद्ध उपकरण

यह एक मान्यता युगो-युगो से चली आ रही है कि महामानवों , देव पुरुषों के सर्म्पक में आने वाली हर वस्तु उनकी दैवी शक्ति से ओत-प्रोत होने के कारण श्रद्धास्पद पूजनीय हो जाती है । कथा-पुराणों में ऐसे कई आख्यान आते हैं जिनमें देवमानवों के अनुयायी उनके र्स्पश किये हुए पदार्थों को उनकी शक्ति सामार्थ्य से ओतप्रोत मानकर उसे ही प्रतीक मान पूजा करते रहे है । भरत जब राम द्वारा वन से लोटा दिये गये तो अपने साथ भगवान की खडाऊ लेते आये, जो उन्हे आत्मिक सम्बल, मार्गदर्शन देते रहे । इन सबके पीछे र्स्पशजन्य सामर्थ्य की महत्ता छिपी पडी है , साथ ही श्रद्धा की अपार शक्ति भी उसमें जुडती है ।

परस पत्थर अपने समीपवर्त्ती लोहे के कणों को र्स्वण बना देता है । चन्दन का वृक्ष आसपास के बाता वरण को भी सुवासित कर देता है । इसी तरह महामानवों की प्राण विद्युत न केवल उनके अंग-प्रतयंग से बल्कि हाव-भाव , प्रत्ये क क्रिया-कलाप एवं वेधकदृष्टि के माध्यम से निरन्तर उत्सर्जित होती रहती है ।

ईसामसीह के कफन के साथ भी कुछ इस प्रकार के तथ्य जुडे हैं। काफी समय तक इन्हें किंबदन्ती माना जाता रहा । सन् 1868 में सेकोन्दोपिया नामक छविकार ने उक्त वस्त्र में ईसामसीह का चित्र नेगेटिव के रुप् में अंकित कर ईसाईयों के इस श्रद्धा आधार को बहुत बडा सम्बल प्रदान किया । यह छायाँकन कैसे अभरा यह वैज्ञानिको के लिये एक अचम्भा ही बना हुआ है ।

यह वस़्त्र 14 फीट लम्बा एवं 311 फीट चौडा है । हाथ से बुने गये हल्के पीले रंग का यह कफन अब किसी को देखने के लिये उपलब्ध नहीं है । केवल इसकी नकल ही दर्शनार्थ उपलब्ध है ।

यह पवित्र धरोहर उत्तरी इटली के ट्यूरियन कस्बे में स्थित चर्च में चाँदी की एक छोटी पेटी में विशेष प्रार्थनाग्रह की वेदी पर 14 वीं शताब्दी से रखा है । पहली शताब्दी में चरुशलम से भागने वाले ईसाई अपने साथ इसे लाये थे। पिछले 300 वर्षा में 12 बार ही जनता को इसके दर्शन कराये गये हैं। इसे पाँचवा ‘इन्जील’ मानकर इसकी पूरा ईसाई समाज श्रद्धा से पूजा करता है ।

देवदूत ईसा के महान उर्त्सग की प्रत्यक्ष गवाही देने वाले इस वस्त्र पर स्वर्गीय आत्मा की छवि किस प्रकार उभरी, इसके सम्बन्ध में बहुतों ने खोज की है । उन्ही खोजियों में से एक ब्रिटिश लेखक ज्याफ्रेएश कहते हैं कि मृतक के शरीर से फूटने वाला विकिरण ही वस्त्र पर आकृति के उभर आने का कारण है। क्योंकि मृतात्मा देवदूत स्तर की थी विकिरण का प्रभाव इतना अधिक था कि उसकी आकृति उनके परिधान पर स्वयमेव उतर आयी । अमेरिकी अन्तरिक्ष वैज्ञानिक डा. जैन जैक्सन ने कम्प्यूटर एनासिसिस के बाद इस चित्र को त्रिआयामीय बताया है । यह अपने आप में एक ऐसा आर्श्चय है जिसकी वैज्ञानिकता खोजने पर भी मिल नहीं सकती

हजरत साहब का बाल जो जम्मू की एक मस्जिद में रखा है एवं बुद्ध का दाँत जो रंगून के एक पूजागृह में रखा गया है , अपने-अपने मतावलम्बियों के लिये वे प्रेरणा स्त्रोत बने हुए हैं। मुस्लिम मूर्ति पूजा को नहीं मानते पर सहज उपजने वाल श्रद्धा किसी भी मतभेद से परे हैं। यह श्रद्धा उस महामानव के प्रति प्रकट होती है जो अपने समय में अपने सुकर्मो से असंख्यो को प्रेरणा दे जाते है ।

उत्कृष्ट व्यक्तित्व असंख्यों को अपने तेजोवलय से प्रभावित करते हैं। उन्हीं प्रभावितों में उनके सर्म्पक में आने वाले पदार्थो को भी यह सौभाग्य मिलता है कि उन ज्योति पुज्जों की ऊर्जा अपने में संग्रह करें और चिरकाल तक अनेकों की श्रद्धा एवं दिव्य क्षमता जगाने में सहायता करते रहें । प्रायः दो हजार वर्ष पुराने ईसा का कफन इस तथ्य को प्रत्यक्ष साक्षी देता है । इस प्रभाव शक्ति का एक अतिरिक्त प्रमाण है कफन पर ईसा की वैसी छवि का उभरना जिसमें किसी भी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं हुआ है ।


भव-बंधनों से मुक्ति के लिए सम्बन्धों का पुनर्निर्धारण

भ्रमग्रस्त मायाबद्ध जीवन क्रम ही मनुष्य को अवाँछनीय , चिन्तन ओर हेय कर्तृत्व में उलझाता है । इसी से वर्तमान पर शोक-सन्तोष की घटायें छाई रहती है ओर भविष्य अन्धकारमय बनता है । यदि अपने और संसार के सम्बन्धों का पुनर्निर्धारण किया जा सके तो उस तत्वबोध के आधार पर सहज ही विचार क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है । फलस्वरुप बाह्ना जीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अन्तः-जीवन में आनन्द और उल्लास के द्वारा मुक्ति जैसा आलोक अपने भीतर उत्पन्न किया जा सकता है ।

इस स्थिति को प्राप्त करने में बाधा एक ही और वह है हमारे चिन्तन की त्रुटि । हमारे चिन्तन में एक भारी भूल यह है कि शरीर और आत्मा को एक ही मान लिया गया है । हम अपने स्वरुप को भूल बैठे हैं और शरीर के साथ इतने रम गये हैं कि दोनों की सत्ता एक ही मानने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हूआ है कि शरीर के-मन के-स्वार्थ अपने सुख-दुःख प्रतीत होने लगे हैं। जबकि वस्तुतः वे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर का स्वार्थ वासना में और मन का तृष्णा की पूर्ति में हो सकता हैं, पर आत्मा की शान्ति तो जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गये प्रयासों के साथ ही जुडी हुई हैं।

समुद्र के खारे जल में नमक और पानी दोनों मिले होते हैं अतएव वह किसी काम में नहीं आता । यदि जल और नमक पृथक कर दिये जाँये तो दानों ही उपयोगी हो सकते है ।यदि शरीर आत्मा का बाहन मात्र बनकर रहे तो उसे महामानव, देवदूत, ऋषि स्तर का बनने-सुखी एवं यशस्वी बनने का-अवसर मिल सकता है । आत्मा को भी शान्ति सद्गति मिलेगी । पर यदि वे दानों इकट्ठे हो जाते हैं, आत्मा अपना स्वरुप भूल कर शरीर स्तर की बन जाती है तो वासना और तृष्णा की-लाभ और मोह की दल-दल में गहराई तक धँस जाना पडे़गा और गहरी कीचड़ में गरदन तक फँसे हाथी की तरह दयनीय दुर्दशा के साथ जीवन गँवाना पडे़गा ।

अस्तु,स्मरण रखा जाना चाहिए कि आत्मा और शरीर एक नहीं हैं। आत्मा के साथ शरीर का, मन का और परिवार का क्या सम्बन्ध है इस तथ्य पर विचार करना चाहिए और अपनी धारणाओं तथा मान्यताओं में आवश्यक फेर बदल करना चाहिए इस तथ्य को भुला न दिया जाए कि शरीर और मन यह दो औजार उप-करण हैं-वाहन अथवा सेवा है जो सौपे गये उत्तरदायित्वों को निबाहने में समुचित सहायता प्रदान के लिए मिले हैं । बडे़ अफसरों को सरकार मोटर की, ड्राइवर की सुविधा देती हैं ताकि वे लम्बे क्षेत्र में सुविधापूर्वक भाग दौड़ कर सकें । हमें उत्कृष्ट स्तर का शरीर और मन ऐसे उपकरण के रुप में मिले हैं कि निर्धारित कर्त्तव्यों को पूरा कर पाना सुविधा के साथ सम्भव हो सके। आत्मा औ शरीर के बीच उपयोगकर्त्ता तथा उसके वाहन , सेवक , उपकरण , औजार के बीच रहने वाला रिश्ता ही यथार्थ है । दोनों की सत्ता पृथक है, दोनों के स्वार्थ अलग हैं दोनों एक नहीं हैं।

शरीर इसलिए मिला हैं कि उससे आदर्शवादी कार्य कराये जाँय, मन इसलिए मिला है कि जीवनोद्देश्य को पूरा करने की योजनायें बनायें और अवरोधों की गुत्थियाँ सुलझायें । परिवार इसलिये मिला है कि सद्भावनाओं और सत्प्रवृतियों को सुविकसित करने, अपनी आन्तरिक परिपुष्टता के लिये इस प्रयोगशाला में वैसा ही अभ्यास करते रहा जाय जैसा पहलवान अखाडे़ में जाकर किया करता है । भगवान ने परिवार के कुछ लोगों को सुविकसित बनाने के लिए हमें संरक्षक की तरह नियुक्त किया है और माली की तरह इस छोटे उद्यान को सुरम्य बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा है यह मान्यतायें हम रखें तो इन तीना में से किसी पर भी अपना आधिपत्य जमाने की आवश्यकता न मिले । तीनों के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने भर की बात रहे और यह चेष्टा बनी रहे कि इन आधारों की सहायता से अधिक अच्छी तरह जीवन-लक्ष्य की पूर्ति किस तरह हो सकती है ।

भ्रान्तियों की भूलभुलैया हमें कुछ का कुछ दिखाती बताती हैं, अतएव हम सथार्थता से विपरीत स्थिति में अपने को फँसा लेते हैं और न सोचने जैसा सोचने न करने लायक करने लगते हैं उसका परिणाम पग-पग पर अशान्ति, उद्विग्नता, खीज और खि।न्नता के रुप में सामने आता है। यदि कर्तव्या पालन और सदुपयोग भर की बात ध्ययान में बनी रहे तो हरिस्थति में प्रसन्न एवं सन्तुलित रहा जा सकता है ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग के अम्त , पारस एवं कल्प-व्क्ष की त्रिविधि सिद्धिया इसी स्तर की मनोभूमि में उपलब्ध होती हैं।

आत्मा को शरीर और मन से भिन्न मानने पर सहज ही यह विवेक जागृत होता है कि जीवन सम्पदा का कितना अंश इन वाहनों की आवश्यकता पूर्ति के लिए खर्च किया जाये और कितना निर्दिष्ट लक्ष्य की पूर्ति में लगाया जाय न्यायोचित विभाजन हो सके तो समय , श्रम , बुद्धि, प्रतिभा एवं सम्पत्ति की ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का एक बडा अंश आत्म-कल्याण के लिए निकल सकता है । अन्यथा यदि अपना आपा-काय कलेवर में ही धुला, खपा दिया गया तो लोभ और मोह के अतिरिक्त आकाँक्षा एवं क्रिया का सारा उपार्जन उसी को समर्पित करना पडे़गा । शरीर और मन की लिप्सा में ही सुख दीखने लगेगा ऐसी दशा में वासना और तृष्णा की भूख बुझाने में ही अपनी सामर्थ्य कम पड़ने लगेगी । आत्म-कल्याण की बात तो बन ही न पडे़गी ।

यह दृष्टि यदि विकसित हो जाय तो अपने से सम्बद्ध व्यक्तियों तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में फैली हुई दुष्प्र वृत्तियाँ क्रोध या उद्वेग उत्पन्न नहीं करतीं, न ही प्रतिशोध पैदा करती हैं, वरन् शान्तिपूर्वक सुव्यवस्थित रीति से विकृतियों को सुधारने में जुट जाने की प्रेरणा देती हैं। डाक्टर रोग को मारता है और रोगी को बचाता है । विवेकवान पाप को मिटाता और पापी को बचाता है । क्रोध से नहीं सन्तुलित सुधार प्रक्रिया अपनाने से ही विकृतियों का समाधान होता है। संसार में फैली हुई विकृतियाँ हमारे लिए सेवा साधना की-सुधार ,उपक्रम के लिए ही है । रोगी न रहे ता डाक्टर की क्या उपयोगिता । परमार्थ परायण, पुरुषार्थ को प्रखर करने का सुअवसर पाने के लिए ही सम्भव है समीपवर्ती क्षेत्र में विकृति उत्पन्न हुई हो ऐसा भी तो सोच सकता है ।

तत्वदर्शी यह भी जानता है कि पूजा उपक्रमों का उद्देश्य ईश्वर को फुसला करभौतिक एवं आत्मिक वरदान झटक लेना नहीं, वरन् उच्च भावनाओं और उच्च क्रियाशीलता के लिए आवश्यक प्रेरणा प्राप्त करना हैं । ताकि व्यक्तित्व में देवी तत्वों का अधिकाधिक समावेश करके पूर्णता की दिशा में दु्रतगति से बढ़ चलना सम्भव हो सके । जीवनोद्देश्य की पूर्ति छुटपुट पूजा-पुत्री मात्र से ही सकती हैं, ऐसा तत्वदर्शी नहीं मानता । अस्तु उसकी उपासना-साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकम्पा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है ।

शरीर और मन को पृथक् मानने, उनके बीच स्वामी सेवक जैसा सम्बन्ध स्पष्ट करने से भ्रमग्रस्तता के भवबन्धनों से छुटकारा मिल सकता है। बाहृ आकर्षणों में खिंचते फिरने की, अपेक्षा विवेक के आधार पर अपनी मान्यताओं, आकाँक्षाओं एवं क्रिया-कलापों का पुनः निर्धारण करना होता है , इसी आधार पर समुन्नत जीवन धारा के साथ प्रबाहित होता हुआ अन्ततः आनन्द को उपलब्ध किया जा सकता है ।


Quotation

सतत पुरुषार्थ का स्थान न मेधा ले सकती है न प्रतिभा , न शिक्षा । संसार में ऐसे असंख्य मेधावी , प्रतिभाशाली तथा शिक्षित लोग भरे पडे़ हैं , जो जीवन में बिफल रहे हैं, मगर ऐसा एक भी वयक्ति नहीं मिलेगा जिसने सतत पुरुषार्थ किया हो और वह विफल रह गया हो ।

कालविन कूलिज


क्या मनुष्य सर्वतः स्वतन्त्र है ?

यों देखने और कहने-सुनने में तो प्रत्येक मनुष्य एक स्वतन्त्र इकाई हैं। उसके किये गये दुष्कर्मों का स्वयं उसे ही दण्ड भोगना पड़ता है । उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति यदि शराब पीता है । तो शराब पीने से हाने वाली हानियाँ, पीने वाले को ही उठानी पड़ती हैं । जाहाँ तक स्वयं से सम्बन्धित रहने वाली बुरी आदतों या कामों को बात है , उनका दुष्परिणाम स्वयं करने वाले व्यक्ति को ही उठाना पड़ता है । इस दृष्टि से मनुष्य को स्वतन्त्र कहा जा सकता है, पर वास्तव में ऐसा है नहीं कोई भी व्यसन या कुटेव जो प्रत्यक्ष रुप में व्यक्ति का ही अहित करती दिखाई देती है अप्रतयक्ष रुप से समाज को भी प्रभावित करती हैं । उन व्यससनों को देखकर दूसरे लोगों को भी वैसी ही आदतें अपनाने का मन होता है और अधिक गहराई में जायें तो उस कुकृत्य का दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है । आदतें ही नहीं बुरे विचार तक जिनका कहीं प्रकटीकरण नहीं किया जाता पूरे समाज को प्रभावित करते है ।

यह तथ्य तो अब सिद्ध हो ही चुका हैं कि पदार्थां की तरह विचारों का भी अस्तित्व रहता हैं और वे भी कभी नष्ट नहीं होते । मनमें उठने वाले विचार और भावनाएँ किस छेडे़ गये तार की तरह वातावरण में अपनी झंकार से कम्पन उत्पन्न करते हैं और उस पर प्रभाव उलते हैं। भले ही वह प्रभाव नगण्य हो, पर ऐसे प्रभावों का समुच्चय बडे़ परिणाम उत्पन्न करता है । इस दृष्टि से मनुष्य दूसरों का बुरा करने या बरा सोचने में ही नही, अपना बुरा करने अपना बुरा सोचने में भी स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता । क्योंकि उसका समाज पर अनिवार्य प्रभाव पड़ता है ।

परमात्मा ने इस सृष्टि का निर्माण ही इस प्रकार किया है कि उसका कोई भी घटक अपने आप में स्वतऩ् और अकेला नहीं हैं। वह दूसरे अन्य घटकों से जहाँ प्रभावित होता हैं वही स्वयं भी उन पर अपना प्रभाव डालता हैं । दीखने में प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र अपने आप में अकेला रहता और अपनी धुरी पर घूमता दिखाई पड़ता है, पर वस्तुतः प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र आपस में एक-दूसरे के साथ ऐसी मजबूत जंजीरों से बँधे हुए दिखाई तो नहीं पड़ते, पर उनकी मजबूती आर्श्चयजनक होती है। इसी भाँति मनुष्य अपने आपमें अकेला और स्वतन्त्र दीखता भर है, पर वह जीवनयापन से लेकर प्रभाव ग्रहण करने तक अन्यान्य वयक्तियों और वस्तुओं वातावरण पर इतना अधिक निर्भर है कि यदि उसे निर्भरता के सूत्र तोड़ने के प्रयास किये जाँय तो मानसिक सरसता और क्षुधा निवृति एक सारे सूत्र टूट जायेंगे । इस अनभ्यस्त स्थिति में पड़ जाने पर निश्चित ही मनुष्य के अस्तित्व का अन्त हो जायेगा।

प्रकृति प्रेरणा के अनुरुप या ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार ग्रह-नक्ष़त्र एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह परस्पर निर्भरता और आदान-प्रदान का क्रम ही उन्हें जिलाये और गतिशील किये रखता है । उदाहरण के लिए सूय्र अपने नियमि क्रम से उगता और अस्त होता है थोडे़ बहुत अन्तर से बारह-बारह घण्टे के दिन रात होते है । यदि इस क्रम में तनिक भी व्यतिक्रम उत्पन्न हो तो पृथ्वी पर बहुत बड़ा अनर्थ घटित हो जायेगा । यदि सूर्य केवल 72 घनटे ही पृथ्वी पर उदय न हो तो पृथ्वी पर अन्धकार इतना घनीभूत हो जायेगा कि उस अन्धकार में आसमान से चमकने वाले तारे भी नहीं दिखाई देंगे । सूर्य किरणों से पृथ्वी पर ऊष्मा उत्पन्न होती हैं , यदि बहत्तर घण्टे की रात हो जाय तो सारी धरती पर इतनी भयंकर शीत पड़ सकती है कि उस पर तीन मीटर ऊँची बर्फ की पर्त जम जायगी।

सूर्य की अल्ट्राबायलेट किरणें शरीरधारियों को धरती पर प्राण धारण किये रहने योग्य बनाती है । उन्हीं से अन्न और वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं जो मनुष्य और अन्य प्राणियों के आहार का प्रमुख अग्ड है । यदि यह किरणें पृथ्वी तक पहुँचना बन्द कर दें तो अन्न और वनस्पतियों का उत्पन्न होना बन्द हो सकता हैं। इतना ही नहीं यह अल्ट्रावायलेट किरणें अन्तरिक्ष से आने वाले विषाणुओं को भी रोकती हैं। इन किरणों के अभाव में ये विषाणु निरविरोध रुप से पृथ्वी पर आने लग सकते हैं और हर किसी को रुग्ण बनाकर ही रहेंगें।

सूर्य में होने वाले परिवर्तनों का पृथ्वी बासियों पर क्या प्रभाव पड़ता है यह जानने के लिए रुस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक चिजोब्स्की ने विगत चार सौ वर्षो का इतिहास और सूर्य की पिछली गतिविधियों का अध्ययन किया । इस अध्ययन से चिजाब्स्की इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि इन महामारियों और सूर्य के परिवर्तनों में गहरा सम्बन्ध है । सूर्य के सम्बन्ध में थोडा़ बहुत ज्ञान रखने वाले भी यह जानते हैं कि प्रत्येक ग्यारह वष्र पश्चात् सूर्य में काले धब्बे पड़ते है। चिजाब्स्की के अनुसार इन धब्बों और पृथ्वी पर पिछले दिनों फैली महामारियों का गहन सम्बन्ध रहा हैं। जितनी अवधि तक यह धब्बे गहरे या उथले रहते हैं उतनी अवधि तक उसी अनुपात से महामारिंयाँ पृथ्वी पर हलका या गहरा उत्पात मचाती हैं। इसके अतिरिक्त इन सूर्य धब्बों के कारण पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र भी लड़खडा़ने लगता हैं, रेडिया संचार में बाधा आती है तथा मौसम पर भी उसका प्रीव पड़ता हैं।

अभी तक समझा जाता था कि सूर्य और चन्द्र के अमावश्या, पूर्णमा पर पड़ने वाले प्रभावाँ के कारण केवल समुन्द्र में ही ज्वार-भाटे आते थे । लेकिन वैज्ञानिक माइकेलसन ने यह पता लगाया है कि अमावस्या, पूर्णिमा को पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य, चन्द्र के प्रभाव से न केवल समुन्द्र में ही ज्वार-भाटे आते है वरन् पृथ्वी भी करीब नौ इंच फूलती और पिचक जाती हैं। विभिन्न समयों पर साँर में जो भूकम्प आते रहते हैं, उनमें से अधिकाँश अमावश्या या पूर्णिमा के आसपास ही आते है ।

डाक्टर बुड़ाई के अनुसार इन्हीं तिथियों में मृगी उन्माद और कामुक दुर्घटनाओं का दौर आता है । अमेरिका में तो इस बात का सर्वेक्षण कर पता लगाया गया है और इस तथ्य को एकदम सही पाया गया है कि इन तिथियों में विक्षिप्त और पागल लोगों पर सबसे ज्यादा पागलपन सवार होता है । इन वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य, चन्द्र की स्थिति का न केवल मौसम पर वरन् मनुष्य शरीर में काम करने वाली पिट् यूटरी , थायोराइड एंड्रीनल आदि हारमोन स्त्रावी ग्रन्थियों पर भी प्रभाव पड़ता है और वे उत्तेजित होकर शरीर एवं मन की स्थिति में भी असाधारण प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करती हैं यही कारण है कि इन दिनों दुर्घटनाओं और अपराधों की संख्या और दिनो की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है ।

सूर्य, चन्द्र की स्थिति का केवल मनुष्य पर और अन्य जीव-जन्तुओं पर ही प्रभाव पड़ता हो ऐसा भी नहीं हैं। वृक्ष वनस्पति तक इससे प्रभावित होते है। वृक्षों के तने में प्रतिवर्ष एक पर्त बढ़ती हैं, जिसे “ट्रीरिंग” कहा जाता हैं। इन पर्तों के द्वारा ही वृक्ष की आयु का पता लगाया जाता है । यह पाया गया है कि सूर्य पर पड़ने वाले ग्यारह वष्र में धब्बों के प्रभाव से उस वर्ष की पर्त कुछ मोटी हो जाती है । सम्भवतः ऐसा इसलिए भी होता हो कि ग्यारह वर्ष के चक्र में उत्पन्न होने वाले सूर्य कलंक ( सन स्पाट ) के सूक्ष्म विकिरण से बचाव के लिए प्रकृति उस वर्ष वृक्ष की खाल मोटी कर देती हो।

ब्रिटेन के वैज्ञानिक आरनात्ड मेयर और कोलिस्को ने भी अपने पर्यवेक्षणों द्वारा यह सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की स्थिति मनुष्यों , प्राणधारियों तथा वनस्पतियों को प्रभावित करती है। स्वीडन के वैज्ञानिक सेवेंट एहैनियस के अनुसार समुद्र, मौसम , तापमान, विद्युत स्थिति और चुम्बकीय क्षेत्र तो इन परिवर्तनों से प्रभावित होते ही हैं। स्त्रियों का मासिक धर्म तक चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होता है उनके अनुसार सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण को खुली आँखो से नहीं देखना चाहिए क्योंकि इन घड़ियों में उनका सन्तुलित क्रिया - कलाप लड़खड़ा जाता है और उस कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न होता है जिससे आँख जैसे कोमल अंगो को क्षति पहँच सकती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार न केवल सूर्य और चन्द्रमा वरन् अन्य ग्रह-नक्षत्र भी पृथ्वी पर अपना प्रभाव छोडते हैं। अमेरिकी खगोलवेत्ता जान हेनरी नेल्सन के अनुसार अन्य ग्रहों के प्रभाव से भी मौसमी उथल-पुथल एवं प्राणियों की शारीरिक मानसिक स्थिति में उतार-चढ़ाव आते हैं। जिन दिनों आकाश में धूमकेतु दिखाई देता है , उन दिनों पृथ्वी पर पड़ने वाले अन्तरिक्षीय प्रवाह में यात्किचित गतिरोध उत्पन्न हो जाता है उसके परिणाम स्वरुप प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ने से तरह-तरह के उपद्रव खड़े होते है। शरीरगत रुग्णता और मानसिक आवेश्ग्रस्तता लोगों में इन दिनों अधिक बढ़ी-चढ़ी देखी जा सकती हैं।

सन् 1975 में 7 फरवरी 19 जुलाई और 17 अगस्त के आसपास संसार के अनेक भागों में समुद्री तूफान आये और उस वर्ष मौसम भी प्रायः गड़बड़ ही रहा इसका कारण मालूम करने के लिए अमेरिका के समुद्र एवं मौसमी प्रशासन संगठन ने अन्वेषण किया। यह अन्वेक्षण पूरा होने के बाद जो प्रतिवेदन प्रकाशित किया गया उसमें कहा गया कि , इन दिनों चन्द्रमा और पृथ्वी की निकटतम दूरी 18200 किलामीटर पर रही चन्द्रमा , पृथ्वी के इतना अधिक निकट 300 वर्षो में पहली बार आया और सूर्य भी प्रायः उसी देशान्तर पर भ्रमण कर रहा हें, जिस पर कि पृथ्वी और चन्द्रमा कर रहे हैं , परिणाम स्वरुप पृथ्वी और चन्द्रमा दोनों ही सूर्य की परिक्रमा करते हुए उसके निकटतम होते जा रहे हैं । इसी कारण यह उत्पात पैदा हुए । उक्त प्रतिवेदन के अनुसार अगले दिनाँक यह निकटता और भी बढ सकती है और उसके फलस्वरुप पृथ्वी के मौसम में ऐसे परिवर्तन , उत्पात पैदा हो सकते है।

अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों का पृथ्वी पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अध्ययन या विवेचन तो अलग बात है, अभी तक इसी बात का पूरी तरह पता नहीं लगाया जा सका है कि सूर्य का पृथ्वी के जीवन पर क्या और कितना प्रभाव पड़ता हैं। फिर भी इतना तो स्पष्ट हो ही चुका है कि सूर्य ही पृथ्वी पर जीवन का केन्द्र हैं। वनस्पतियाँ उसी से जीवन ग्रहण करती हैं और प्राणी अपनी प्राणशक्ति के लिए बहुत कुछ सूर्य पर ही निर्भर करते है । सूर्य और पृथ्वी के बीच जो दूरी है , उस दूरी के कारण ही धरती पर जीवन का अस्तित्व उद्भूत हुआ और सुरक्षित रह सका है । भविष्य में भी इसी दूरी पर जीवन अस्तित्व की सुरक्षा सम्भव हैं । यदि यह दूरी कुछ घट जाय तो इतनी गर्मी पैदा होने लगे कि उसमें प्राणियों का जीवित रहना ही सम्भव न हो सके । ध्रुवों की बर्फ पिघला कर सारी पृथ्वी को जलमग्न कर दे , इतना ताप उत्पन्न हो सकता है यदि सूरज थोड़ा और निकट आ जाय तो । इसके उपरान्त यदि सूरज और पृथ्वी की दूरी थोड़ी बढ़ जाय तो धरती पर इतना शीत उत्पन्न हो सकता है कि पूरी पृथ्वी ही हिमाच्छादित हो जाय ।

जिस प्रकार सूर्य और अन्य ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है उसी प्रकार पृथ्वी भी अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों को प्रभावित करती है । प्रकारान्तर से यह आदान-प्रदान का प्रभावित होने और प्रभाव छोड़ने का क्रम चिरकाल से चल रहा है और भविष्य में अनन्तकाल तक चलता रहेगा । इसे नियति की सुदृढ नियम व्यवस्था कहा जा सकता है और यह नियम व्यवस्था ग्रह-नक्षत्रो पर ही नहीं मनुष्यों पर भी लागू होती है । जीवन की परम्पराएँ एक है । क्या जड़ और क्या चेतन ? क्या व्यक्ति और क्या ग्रह-नक्षत्र सभी को नियति के इन सुदृढ नियमों में बँधकर चलना पड़ता हे। छोटे-बडे़ सभी पर यह नियम समान रुप से लागू होते है। नियति के लिए सभी समान है और व्यक्तिक्रम अथवा नियमों के उल्लंघन की दण्ड व्यवस्था भी उसके पास है ।

अस्तु ! मनुष्य देखने, कहने-सुनने के लिए भले ही स्वतऩ् हो । स्थूल दृष्टि से उसकी स्वतन्त्रता इस सीमा तक है कि वह दूसरों की स्वतन्त्रता इस सीमा तक है कि वह दूसरों की स्वतन्त्रता या हितों को हानि न पहुँचाए । परन्तु नियति की आचार-संहिता के अनुसार उसे इस बात के लिए भी बचनबद्ध होना चाहिए कि वह स्वयं अपना भी अहित न करें। बुरा होने पर ,अपना ही अहित करने पर भी उसका सूक्ष्म प्रभाव समाज पर तो पडे़गा ही । इसलिए अपना अहित करना भी प्रकारान्तर से समाज को क्षति पहुँचाने वाला सिद्ध होता है । मनुष्य चारों और नीति-नियमों की मर्यादाओं में बंधा हुआ है और वह उन मर्यादाओं में रहते हुए ही स्वतन्त्र कहा जा सकता है । इससे आगे वह जरा भी स्वतन्त्र नहीं है अपना अहित करने की छवि भी नियति की ओर से नहीं मिली है ।


बुद्धिमान होने के कारण मनुष्य सर्वश्रेष्ठ नहीं है

मनुष्य अपनी स्थिति और क्षमताओं को देखते हुए जितना परिपूर्ण दिखाई देता है , सृष्टि की अन्य कोई रचना अन्य कोई जीव भी कम परिपूर्ण नहीं हैं। यह बात अलग हैं कि मनुष्य को उपहार के रुप में कई विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं , जो अन्य प्राणियों के पास नहीं हैं। लेकिन उन विभूतियों के साथ उत्तरदायित्वों की शर्त भी जुड़ी हुई है । लेकिन जगत में भी उसी व्यक्ति को विशेष अधिकार मिलते हैं, जिन्हें विशेष उत्तरदायित्व निभाना पड़ता है। इसी प्रकार परमात्मा ने मनुष्य को कुछ विशिष्ट उत्तरदायित्व पूरे करने के लिए विशेष अधिकारों के रुप में वे विशेष क्षमताएँ प्रदान की हैं । यह नहीं सोचना चाहिए कि परमात्मा ने उसे किसी पक्षपात के कारण अथवा विशेष लाड़-दुलार के कारण से विभूतियाँ प्रदान की हैं। उसे तो अपनी सभी सन्तानें समान रुप से प्रिय है और अपने प्रत्येक शिशु शावक को उसकी आवश्यकता के अनुरुप साधन क्षमताएँ प्रदान की है ।इनमें से कई विशेषताएँ ऐसी हैं जो लाख प्रयत्न करने पर भी मनुष्य अर्जित नहीं कर सकता । अर्जित करना तो दूर रहा , वह उनकी कल्पना भी नहीं कर सकता ।

इतना होने पर भी परमात्मा नें, प्रकृति ने प्रत्येक जीव को उसकी दुनिया के हिसाब से परिपूर्ण और साधन सक्षम बनाया है । उदाहरण के लिए लीभट प्राणी को ही लें । उसके शरीर पर बहुत घने बाल होते हैं आर वह इन बालों की सफाई अपनी जीभ से करता है , यह सफाइ करते समय उस बेचारे प्राणी के बहुत से बाल दाँतो में फंस सकते थे । किन्तु रचसियता ने उसे जीवन भर की इस परेशानी से मुक्त रहने के लिए जीभी के नीचे एक दूसरी छोटी जीभनुमा कंघी लगा दी है । इस कंघी की सहायता से वह पहले फँसे हुए बालों को निकाल लेता है और जीभ की सहायता से उनकी सफाई करता है ।

घेंघे को अपना आहार खुरच-खुरचकर खाना पड़ता है । इसलिए प्रकृति ने उसकी जीभ में इतने अधिक दाँत लगा दिये हैं कि उसे भोजन करने में कोई परेशानी नहीं हो । जीव शास़्ियो के अनुसार घोंघे की जीभ में 12 सौ से 1400 दाँत होते हैं। अनातीदी जाति के पक्षियों में प्रकृति ने पंखों के नीचे ऐसी ग्रन्थियाँ लगा दी है , जिनसे एक तैलीय पदार्थ निकलता रहता है । इस तैलीय पदार्थ के कारण उनके पंखों का विकास होता रहता है तथा वे चिकने और स्वस्थ बने रहते है। एक प्रयोग में इस जाति के पक्षी की इस द्रव को उत्पन्न करने वाली ग्रन्थि को आप्रेशन करके निकाल दी गई । इसके बाद देखा गकया कि इस पक्षी के पंख तेजी से झड़ने लगे और धीरे-धीरे पूरे पंख झड़ गये।

बटिल कीटक पानी के भीतर भी रहता है और सतह पर भी तैरता है । प्रकृति ने उसकी आँखो पर एक विशेषे प्रकार का चश्मा चढ़ा दिया है । इस चश्मे के कारण वह जब सतह पर होता है तो हवा में देखने के लिए ऊपर की आँखे काम में लाता है तथा जब पानी में उतर जाता है तो नीचे की आँखों से देखने लगता है । सात-आठ फुट लम्बा एक-डेढ़़ क्िवटल भारी शुतुर्मुग जिस तेजी के साथ भागता है , उतनी तेजी से भागना मनुष्य तो क्या उस जैसे किसाी दूसरे पक्षी के भी बस की बात नहीं है। इसकी दौड़ने की गति प्रायः 70 किला मीटर प्रति घन्टा है । वह अपनी चोंच से इतना तीखा प्रहार करता है कि लोहे की एक-ढेढ़ इन्च मोटी चादर में भी छेद हो जाए । इतना बड़ा शरीर होने पर कुछ तो भी खाते रहना स्वाभाविक ही है । इसलिए परमात्मा ने इसकी पाचन शक्ति को इतना प्रखर बनाया है कि वह कठोर से कठोर वस्तु भी खाकर पचा सकता है ।

भार की दृष्टि से हृल मछली सबसे बजनी जीव है 100 फीट लम्बी हृल मा भर 125 टन के लगभग होता है । यउसके शरीर में 35 टन चर्बी और 70 टन माँस होता है। अकेले उसकी जीभ का चजन एक क्िवटल वजन का होता है, जो उसके शरीर में रहने वाले 8 टन खून की नियमित रुस्प से सफाई करता रहता है। हृल के बच्चों का वजन 6 टन के लगभग होता है और वह प्रतिदिन एक क्िवटल के हिसाब से बढ़ता है । इस गति से विकास करना किसी भी मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है ।

इतनी बडी़ काया लेकर किसी शिकार के पीछे भागना बेचारी हृल के लिए बडे़ ही झंझट का काम हो सकता है। इसलिये परमात्मा ने उसमें ऐसी विद्युत क्षमता उत्पन्न कर दी कि वह इसी शक्ति द्वारा शिकार करती है। सैकड़ो मीटर दूर हृल मछली अपने एक ही झटके से तैरते हुए घोड़े को भी मार गिराती है। विद्युत शक्ति की बात चली तो इस सर्न्दभ में तारपीडोफिश का उल्लेख किये बिना बात अधूरी रहेगी । इसकी विद्युत क्षमता के कारण ही इस इलेक्ट्रिक फिश भी कहा जा सकता है । देखने में यह कोई खास आकार की नहीं होती, परन्तु विद्युत क्षमता इतनी गजब की होती है कि उसी से यह अपना शिकार प्रयोजन पूरा करती है।

तारपीडो फिश की विद्युत क्षमता उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध जीव शास्त्री डा. जेराल्ड ड्यरेल ने एक घटना का उल्लेख किया है । घटना कुछ इस प्रकार है कि कोई लड़का त्रिशुल से मछलियों का शिकार किया करता था । उसने एक बार इस मछली का निशाना साधा और उस पर त्रिशूल फेंका । मछली के शरीर में त्रिशूल लगा ही था कि लड़के को इतना तेज विद्युत करन्ट लगा कि वह वहीं बेहोश होकर पानी में जा गिरा । उसे इतना जबर्दस्त् विद्युत झटका लगा था कि काफी समय बाद वह स्वस्थ हो सका ।

प्रकृति ने मछलियों को कोई विशेष क्षमताएँ प्रदान कर रखी हैं, जिन्हें देखकर मनुष्य को भी दग्ड रह जाना पड़ता है । सुप्रसिद्ध जीवशास्त्री जान॰एच॰टाड ने एक बार मछलियों पर एक प्रयोग किया । यह प्रयोग ऐसी मछलियों पर किया गया था जो नियत समय पर अपने सामान्य निवास से बहुत दूर जार कर किसी विशेष स्थान पर अण्डे देती हैं। ये अण्डे निश्चित अवधि के बाद फूटते हैं। इस बीच अण्डे देने वाली मछलियाँ वापस अपने स्थान पर चली जाती हैं। उनके बिना भी बच्चे विकसित होते हैं और वे विकसित होने के बाद स्वतः ही अपने माता-पिता के पास पहुँच जाते है। श्री टाड ने अपने प्रयोग में उस स्थान को छोड़ दिया जहाँ मछलियाँ थीं और उस स्थान का सम्बन्ध एक कुए से जोड दिया ऐसा करने पर वे मछलियाँ कुएँ की ओर नहीं गई , अपितु उसी समुद्री स्थान की ओर बढ़ने लगी जहाँ वे अण्डे देने जाती थीं । टाड के अनुसार वे मछलियाँ नियत स्थान से कोई रासायनिक संकेत ग्रहण करती हैं और उसी के सहारे नियत स्थान की ओर बढ़ती है ।

उल्लू को मूर्खता को प्रतीक समझा जाता है , पर इतना मूर्ख वह है नहीं । प्रकृति ने उसे ऐसी विलक्षणताएँ दे रखी है कि उनकी कल्पना करने पर ही प्रकृति की सचेतन कलाकारिता पर आर्श्चय किये बिना नहीं रहा जाता । कहते हैं कि उल्लू रात का राजा होता है और उसे दिन में दिखाई नहीं देता । यह सच है कि उस दिन में नहीं दिखाई देता । किन्तु इस कमी की पूर्ति के लिए प्रकृति ने उसे ऐसे कान दिये हैं , जिनमें विचित्र ढक्कन से लगे होते हैं । यह कान को पूर्ण तरह नहीं ढकते । जब कोई ढवनि होती है तो उल्लू पहले उसे अध ढके कानों से सुनता है और कुछ क्षणों बाद पूरे कान से , सुनने के इस अन्तर द्वारा ही वह कुछ ही क्षणों में किसी राडार यन्त्र की भाँति यह हिसाब लगा लेता है कि आवाज किस दिशा से और कितनी दूर से आई है ?

आमतौर पर गाँव , मुहल्लों में कोई सूचना देने , कोई घोषणा करने के लिए ढोल पीट कर मुनादी करने की प्रथा है । यह परम्परा दीमकों में भी बडे़ आर्श्चयजनक रुप से पाई जाती हैं । सैनिक दीमकों को जब किसी शत्रु का पता चलता है तो वे एक विशेष ध्वनि उत्पन्न करके अपने कुनवे को सचेत कर देते है और बात की बात में सारे दीमक नगर को पता हो जाती है तथा उसके सभी निवासी अपना माल असबाब सब इकट्ठा कर दूसरे आश्रय के लिए चल पड़ते है । ठी उसी प्रकार जैसे सीमा पर स्थित नगरों , बस्तियों में रहने वाले लोग शत्रु देश का आक्रमण होने के समय अपना माल असबाब लेकर दूसरे स्थानों पर पहुँच जाते हैं। मनुष्य यदि अपने कला-कौशल और बौद्धिक सामर्थ्य का गौरव करे और इसे ही श्रेष्ठता का मानदण्ड मान लिया जाय तो सृष्टि के अन्य प्राणी उससे इस मामले में उन्नीस नहीं इक्कीस ही सिद्ध होगें ।

यह ठीक है कि मनुष्य ने अपने कला-कौशल और बौद्धिक सामर्थ्य के बल पर धरती , वायु , जल , सागर आकाश सर्वत्र अपनी कीर्ति-पताका फहरा दी है । अन्य प्राणियों के पास मनुष्य जैसी बौद्धिक क्षमता और कला-कौशल भले ही उपलब्ध न हो किन्तु प्रकृति ने उन्हें सहज ही ऐसी क्षमताएँ प्रदान कर रखी हैं , जो मनुष्य अपनी बुद्धि, कुशलता के द्वारा भी अर्जित नहीं कर सकता है । उदाहरण के लिए अमेरिका में ऐसी गिलहरियाँ पाई जाती हैं, जो जमीन पर भी साधारण गिलहरियों की तरह भग लेती हैं, पेड़ों पर चढ़ जाती हैं और आकाश में उड़ भी लेती है । भलाया सिंगापुर की छिपकलियाँ और साँप उड़ने के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। एक समय था जब टेरोडक्टाइल नामक विशालकाय सरीसृप प्राणी आकाश में उन्मुक्त होकर उड़ते थे । यह प्राणी सामान्यतः पृथ्वी पर रेंग कर चलते थे और उस समय हुआ करते थे जब मानवी सभयता अस्तित्व में भी नहीं आई थी ।

परिवार केवल मनुष्य ही नहीं बसाते और न ही पृथ्वी पर पारिवारिक जीवन बिताने वाला वह कोई एकमात्र प्राणी है। “एक्सोसिरायडी “ नामक मछलियाँ भी मनुष्य की तरह ही पारिवारिक जीवन बिताती हैं। वे हमेशा समूह बना कर रहती हैं , जैसे मनुष्य गाँव , मुहल्ले और नगर बसा कर रहते हैं । इसके अतिरिक्त वे प्रसव , रोग, बीमारी में अपने सहचरों , पडौ़सियों का ध्यान रखती हैं कि मनुष्य भी अपने पडौ़सायों का क्या ध्यान रखता होगा ? और दुःख विपदा के समय क्या उनकी सहायता करता होगा ? निस्सन्देह पारिवारिकता और परस्पर सहायता के मामले में मछलियाँ मनुष्य से कही अधिक आगे बढ़-चढ़ कर हैं। ये मछलियाँ न केवल कठिनाई के समय अपने साथियों की सेवा सहायता करती हैं , बल्कि अपने बच्चों का उस समय तक ध्यान रखती हैं, जब तक कि वे आत्म-निर्भर नहीं हो जाते।

इन मछलियों के साथ आर्श्यच की बात यह जुडी हुई हैं कि ये न केवल पानी में तैरती हैं, वरन् हवा में उड़ भी सकती है । मछलियाँ अपने बच्चों को भी विधिवत् उड़ना सिखाती हैं, इस तरह समूचा समुदाय ही उड़नदस्ते की तरह जीवन जीता है । कुछ मछलियो को तो प्रकृति ने पीठ और पेट पर पंख भी लगा दिये है । यह अपने पीठ के कन्धों से ग्लाईडर का काम लेती है। उड़ने वाली मछलियाँ में पेलभिक मछली बहुत प्रसिद्ध है। उसमें यह विशेषता है कि वह आकाश में उड़ते हुए किसी स्थान विशेष पर ठहरना चाहे तो अपने पंखो को हवा में लहराती हुई ठहर भी जाती है । इतनी उन्नत किस्म की उड़ान भरने वाले विमान तो अभी मनुष्य भी नहीं बना पाया । मनुष्य ने तो उड़ान के जितने भी तरीके खोजे हैं , लगता है उनकी प्रेरणा उसने हैचेक तथा बटरफ्लाई मछलियों को देखकर ही प्राप्त की । ये मछलियाँ पहले पानी में ही बडा बेग लेकर ऊपर उड़ जाती है।

यह ठीक है कि प्रकृति ने , परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि, भावना , प्रतिभा , कौशल और विश्लेषण करने की विशेष क्षमताएँ प्रदान कर रखी हैं। किन्तु इसी कारण मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी सिद्ध नहीं होता । अधिकार और विशेष स्थिति मनुष्यों में भी कई व्यक्तियों को प्राप्त होती है , किन्तु यदि वे उनका दुरुपयोग करते हैं तो भ्रष्ट ही कह जाते है । उनकी निन्दा भर्त्सना भी की जाती है । इसी प्रकार मनुष्य यदि परमात्मा के दिये हुए विशेष अधिकारों और सभ्यताओं का दुरुपयोग करता है तो वह भ्रष्ट और पतित अधिकारी के समान ही निन्दा और भर्त्सना का पात्र बनता है । न कि इस कारण वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जायेगा ।


दैवी प्रकोपों में मानवी दुष्कृत भी सहयोगी

दैवी प्रकोपों से भी मनुष्य को अपार हानि उठानी पड़ती हैं। बाढ़ , भूकम्प , सूखा , महामारी , कृमिकीटक आदि के सम्बन्ध में यही समझा जाता है कि मनुष्य के ऊपर समय-समय पर बरसने वाली इन विपत्तियों में मनुष्य का कोर्इ्र दोष नहीं । दैवेच्छा ही इन प्रसग्डो प्रधान रहती है । पीड़ितों को सहायता करने के अतिरिक्त और कुछ बन नहीं पड़ता । सहज करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं सूझता ।

दुर्देव कहलाने वाली विपत्तियों में बहुत-सी प्रकृति असन्तुलन से भी होती हैं और सचमुच उनकी रोकधाम में मानवी प्रयत्न कुछ कारगर नहीं होते । ईश्वर से प्रार्थना करके मन का समाधान करना पड़ता है। सामान्य प्रचलन इतना ही है फिर भी यदि गम्भीरता पूर्वक पर्ववेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इन विपत्तियों के मनुष्यकृत व्यक्तिक्रम भी बहुत बड़े कारण होते हैं । यदि नियति मर्यादाओं से बचा जा सके तो इन प्रकृति प्रकोपों में सहज ही भारी कमी हो सकती है।

उदाहरण के लिए बाढ़ प्रकोप के देवी संकट को लिया जा सकता है। इससे समय-समय पर भारी हानि उठानी पड़ती है । भारत के सिंचाई आयोग द्वारा किये गये पर्यवेक्षण से पता चलता है कि देश में प्रति वर्ष औसतन 730 मनुष्य तथा 43000 जानवर मारे जाते हैं तथा अरबों रुपयों की फसल एवं चल-अचल सम्पति नष्ट होती है ।

सन् 78 को बाढ़ वर्ष कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी । उसने पिछले सभी रिकार्ड तोड दिये । उपलब्ध सूचनाओ। के अनुसार देश भर में 2284 मनुष्य तथा 206602 पशु मारे गये । ढाई करोड़ से अधिक व्यक्तियों में उससे किसी न किसी प्रकार हानि उठानी पड़ी । अन्न तथा सम्पति की हानि तो इतनी अधिक है कि उसने देश की अर्थ-व्यवस्था को बुरी तरह चरमरा दिया ।

बाढ़ सम्बन्धी रिकार्डो से पता चलता है कि यह सिसिला चिन्ताजनक स्थिति में सन् 1980 से आरम्भ हुआ । उस वर्ष की हानि 21 करोड़ की आँकी गई थी । इसके बाद उसमें क्रमशः अभिवृद्धि ही होती गई । और सन् 71 से 632 करोड़ तक जा पहुँची ।

बाढ़ प्रकोप की विभीषिका आखिर बढ़ क्यों रही है ? इस प्रश्न के विभिन्न क्षेत्रों से विभिन्न उत्तर मिलते हैं । सूक्ष्मदर्शी कहते हैं कि दुष्प्रवृत्तियों के कारण अदृश्य जगत में बढ़ा हुआ प्रदूषण इन दैवी प्रकोपों का प्रमुख कारण है । सूक्ष्म वातावरण की स्थूल वातावरण पर प्रतिक्रिया होती है और प्रकृति असन्तुलित होकर विशाल लीला रचने लगती है । अन्तरिक्ष विज्ञानी कहते हैं कि मानवी उपयोग में अधिक ऊर्जा आने लगी है । ईंधन की अनेक किस्में विषाक्त गैसे उत्पन्न करके वायु प्रदूषण तथा तापमान बढ़ाती है। फलतः अधिक बादल बनते एवं बरसते हैं बर्फ के भण्डार तेजी से पिघलते हैं , नदियाँ उतना वेग धारण न कर सकने के कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती हैं। अणु शक्ति का उपयोग एवं उत्पादन से जो विकिरण उत्पन्न होता है, वह ही अनेकों प्रकृति असन्तुलन उत्पन्न करता है फलतः बाढ़ जैसी कितनी ही त्रासदायक विभीषिकाएँ उत्पन्न होती है ।

उपरोक्त सभी कारण विचारणीय हैं । दैवी प्रकोप मात्र भारत में ही नहीं संसार भर में होते हैं उनसे धन , जन की अपार क्षति सहन करनी पड़ती है । इन प्रकोपों में बाढ़ का एक सामान्य स्थान है फिर भी उससे होने वाली हानि के आँकडें बहुत डरावने हैं । इस प्रक्रिया में अधिक चिन्ता इसलिए होती है कि उसकी प्रतिक्रिया सामयिक क्षति पहुँचा कर ही समाप्त नहीं हो जाती , वरन् दुरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करती है। वे सामयिक त्रास बनकर ही समाप्त नहीं हो जाते वरन् ीविष्य को भी अन्धकारमय बनाते है ।

बाढ़ के कारण तेजी से नदियों में पानी पहुँचता है। वर्षा का वेग एवं दबाव अधिक होने से यह स्वाभाविक भी है। निकासी के पुरातन रास्ते सामान्य एवं सीमित बने होते है । वेगवान जल-प्रवाह उन रास्तों में होकर सामान्य गति से नहीं निकल पाता तो उतावली करता और विग्रह ठानता है। इस उथल-पुथल में पृथवी की ऊपरी सतह पर जमी हुई उपजाऊ मिट्टी की सतह घुलती है और पानी के साथ नदियों में चली जाती है। इससे दुहरी हानि होती है ।

एक तो उपजाऊ परत घुलने से भूमि की उर्वरता घटती है और फसल का उत्पादन स्वल्प रह जाता है । जो अनाज उत्पन्न होता है वह घटिया किस्म का रहता है । घस भी कम और पोषण रहित होने से उस पर निर्भर रहने वाले पालतू पशुओं को अशक्ता घेरती है । इस प्रकार मनुष्य और पशु दोनों ही घाटे में रहते है ।

दूसरी हानि है नदियों की सतह ऊँची उठते जाना । उथली नदियाँ बहुत कम पानी बहापाती हैं। फलतः वह फैलता है और समीपवर्ती क्षेत्रो में दूर-दूर तक बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है । पानी के साथ जलाशयों में मिट्टी का पहुँचना उनकी क्षमता एवं उपयोगिता को नष्ट करता है । उथली नहरें , बाँध , तालाब , सभी की संचय शक्ति घटती है और उनका थोडा़ सा पानी जल्दी ही सूखता , समाप्त होता देखा जाता है। बाढ़ जिन दिनों आती है उन दिनों जल जंगल एक कर देती है अतएव उसमें डूबने से घस एवं फसल सड़कर नष्ट होती है । मिट्टी भरने से बाढ़ में जलाशय उथले होते हैं और पानी का संचय घटने से न केवल वनस्पतियों के लिए वरन् मनुष्य के अन्य उपयोगों के लिए जल संकट खड़ा होता है । इससे निर्वाह एवं उद्योग के दोनो ही क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होते है और प्राणियों का आरोग्य एवं जीवन संकट में फँसता है ।

बाढ़ की हानियों को यदि समझा जा सके तो उसे प्रकृति प्रकापों में मूर्धन्य गिना जायगा । ऐसी दशा में उसकी रोकधाम के उपायों पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार होना चाहिए । इस सर्न्दभ में प्रत्यक्ष कारणों में सब से अधिक महत्वपूर्ण और मूर्धन्य है - वृक्षों का अन्धाधुन्ध कटना वृक्षों की जड़े जमीन को गहराई तक जकडे़ रहती हैं और उसे सहज ही पानी के साथ नहीं बहने देती । इसके अतिरिक्त वृक्ष तेज वर्षा के दबाब को अपने ऊपर छाते की तरह सहन करते हैं और जमीन पर पहुँचने तक उसे काफी हलका कर देते है। धीमी गति से पानी पहुँचने पर पृथ्वी उसका बहुत बड़ा अंश अपने भीतर सोख लेती है । फलतः वह कुँओं , झरनों आदि से क्रमबद्ध रुप से पहुँचता और समयानुसार भप बनकर ऊपर उड़ता रहता है। तेज वर्षा तो तूफानी को रोकने में वृक्षों का अवरोध हर दृष्टि से कारगर होता है और उससे धरती की सुरक्षा छाता तानने जैसी होती है।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि इन दिनों लकड़ी का अन्धाधुन्ध अपव्यय हो रहा है और जंगल बुरी तरह कट रहे हैं। खेती के लिए जमीन साफ करने के लिए पेड़ो का सफाया हो रहा है । जितने कटते हैं उतने लगते नहीं । फलतः वन सम्पदा का निरन्तर हृस होता चला जाता है । यह हानि धन हानि से भिन्न है । भूमि की उर्वरता और उसकी जल सम्पदा में कमी आने पर मनुष्यों को ही नहीं अन्य प्राणियों को भी भारी क्षति सहन करनी पड़ रही है । यह क्रम आगे भी इसी तरह चलता रहा तो विनाश की विभीषिका का जल संकट तक सीमित ही नहीं रहेगी वरन् अन्य अनेकों प्रकार की ऐसी समस्याएँ उत्पन्न करेगी जिनका समाधान समय बीत जाने पर सम्भव न रहेगा ।

प्रकृति असन्तुलन को रोकने के लिए उसके सभी कारणों पर विचार करना और रोकधाम के लिए प्रयत्नशील होना आवश्यक है । इस प्रसंग में बाढ संकट और उसका प्रमुख कारण वृक्ष विनाश सर्वोपरि महत्व के प्रश्न है । इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।


समग्र-सफलताओं का मूलभूत आधार

ईसा मसीह ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कह है , जो द्वारा खटखटायेंगा उसके लिए दबाजा खोला जायेगा और जो माँगेगा वह दिया जायगा । “ इस उक्ति में आध्यात्मिक और भौतिक जीवन के , सम्पूर्ण क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने का अचूक रहस्य उद्घाटित किया गया है । सफलता का द्वारा खटखटाने का अर्थ है उसे प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प और माँगने पर मिलने का अर्थ पूरी शक्ति के साथ अपनी शक्तियों का उपयोग । स्मरणीय है सफलताएँ भोतिक हों अथव अआध्यात्मिक , उन्हें प्राप्त करने के लिए कोई बाहरी साधनों का आवश्यकता नहीं पड़ती , मूल आवश्यकता तो अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत करने तथा उन्हें सक्रिय बनाने की होती है , बाहरी साधन और उपकरण भी आवश्यक होते है , पर वे एक सीमा तक ही उपयोगी सिद्ध होते हैं । यदि उनका ठीक प्रकारसे उपयोग करने की कला न आती हो , संकल्प , साहस और पुरुषार्थ न किया जाय तो वे साधन एक तरह निरर्थक और र्व्यथ ही सिद्ध होते हैं । मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है ,हृदय से पूरे प्राण से जो संकल्प करता है उसी के अनुरुप परिस्थितियाँ उसके निकट एकत्रित होने लगती हैं । इस इच्छा या संकल्प को एक प्रकार का चुम्बक कहा जा सकता है , जिसके आकर्षण से अनुकूल शक्तियाँ खिंची आती हैं। जहाँ गड्ढा होता हैं वहाँ चारों ओर से वर्षा का पानी बहता हुआ सिमट आता है और गड्ढा भर जाता है , लेकिन जहाँ ऊँचा टीला है वहाँ भरी वर्षा होने पर भी पानी नहीं ठहरता । इच्छा और संकल्प एक प्रकार का गड्ढा है जिसमें सब ओर से अनुकूल स्थितियाँ खिंच-खिंच कर चली आती है।

प्रश्न उठता है सफलता और सुख-शाँति की इच्छा तो सभी करते हैं , प्रत्येक व्यक्ति उन्नति करना और आगे बढ़ना चाहता है , फिर सभी की इच्छाएँ पूरी क्यों नहीं होती ? इस प्रश्न का समाधान खोजने के लिए एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा । पैर में काँटा चुभता है और पीड़ा होती है , तो मनुष्य सभी काम छोड़ कर अपना पूरा ध्यान उस काँटे को निकालने में लगा देता है । उसे तब तक चैन नहीं आता जब तक कि पैर से काँटा नहीं निकल जाय । इच्छा या आकाँक्षा का यही वास्तविक स्वरुप है । सुख-शाँति से सभी रहना चाहते हैं ,प्रगति और उन्नति करने की आकाँक्षा हर कोई करता है , पर कितने व्यक्ति हैं जो इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए समग्र तत्परता से प्रयत्न करते हैं । स्पष्ट है कि जिन्हें इच्छा या आकाँक्षा कहा जाता है वे सतही स्तर की होती हैं । यदि पूरे मन और प्राण से इच्छा की जाती है , वर्तमान परिस्थितियाँ शूल की तरह चुभती हैं तो उन्हें दूर करने के लिए भी उसी स्तर की तत्परता होनी चाहिए ।

इस स्तर की इच्छा जहाँ भी रहेगी वहाँ अभिरुचि , मनोयोग और आवश्यक साधन जुटाने के लिए समस्त शक्तियाँ सक्रिय हो उठेंगी। इसके विपरीत सतही इच्छाएँ तथा अकाँक्षाओं की कमी रहने पर विभूतियाँ प्राप्त नहीं हो सकेंगी । स्मरण रखा जाना चाहिए कि मन में जो इच्छा प्रधान रुप से काम करती है, उसे पूरा करने के लिए शरीर की समस्त शक्तियाँ काम करने लगती है । निर्णय शक्ति , निरीीक्षण शक्ति , आकर्षक , अन्वेषण , चिन्तन और कल्पना आदि मस्तिष्क की सभी शक्तियाँ उसी दिशा में सक्रिय हो जाती हैं और तब एक जीवित चुम्बकत्व तैयार हो जाता है । जिस प्रकार चुम्बक को कूडे़ कचरे में भी फिराया जाय तो धातुओं के इधर-उधर बिखरे हुए टुकडे़ उससे चिपक जाते हैं उसी प्रकार विशिष्ट आकाँक्षाएँ मन में उत्पन्न होती हैं ता व्यक्ति की जागृत शक्तियाँ उस सभी तथ्यों को ढूँढ और प्राप्त कर लेती हैं जो सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है

ईसा मसीह के उक्त कथन का यही रहस्य है कि खटखटाने पर द्वारा खुलता है और माँगने पर मिलता है अर्थात् आकाँक्षा उत्कट और बलवती होनी चाहिए । उत्कट और बलवती आकाँक्षा मनुष्य में वह तत्परता उत्पन्न करती है जो प्रत्येक क्षेत्र में अवरोधों को चीरती , रुकावटों को हटाती और बाधाओं को मिटाती अभीष्ट दिशा में बढ़ती जाती है । तत्परता के बल पर ही किसी भी क्षेत्र में सफल हुआ जा सकता है, क्योंकि उसके द्वारा प्रेरित क्रियाशीलता अभीष्ट शक्ति सम्पादित कराती हैं और यह सुविदित है कि सक्रियता अथवा निरन्तर अभ्यास से पूरे शरीर को या उसके किसी भी अंगा को अथव व्यक्तित्व के किसी भी पक्ष को बलवान बनाया जा सकता है । लुहार का दाहिना हाथ अपेक्षकृत अधिक मजबूत होता है , क्योंकि अधिक काम में आने के कारण उसकी क्षमता बढ़ी हुई रहती है । पैदल चलने के अभ्यासी लोगों की रगें मजबूत पाई जाती हैं । नफीरी बजाने वालों के गलफडे़ फेंफडे़ दूसरे लोगों की तुलना में अधिक पुष्ट होते हैं। इसका एक मात्र कारण उन अंगो की क्रियाशीलता ही है।

उत्कट आकाँक्षा आध्र तज्जन्य तत्पर क्रियाशीलता के बल पर कितने ही लोगों ने विभिन्न क्षेत्रो में आर्श्चयजनक प्रगति की है। दुबले-पतले शरीर वाले कितने ही लोगों ने वलवान बनने की उत्कट आकाँक्षा से प्रेरित होकर व्यायाम, आहार , बिहार, संयम , नियम का पालन कर अपने को उच्च क्षेणी का बलवान तथा पहलवान बना लिया । विश्व विख्यात पहलवान सेंडो बचपन में बहुत दुबला-पतला और प्रायःबीमार रहा करता था । परन्तु जब उसमें बलवान बनने की भावना जागी और इसके लिए नियमित रुप से व्यायाम करने के साथ-साथ आहर-बिहार का संयम अपनाया तो उसने अपनी पहलवानी की धाक सारे संसार में जमा दी । भारत के माने हुए पहलवान मास्टर चन्दगीराम 21 वर्ष की आयु तक जुकाम , सर्दी , बुखार, आदि रोगों से इस बुरी तरह ग्रस्त रहते थे कि उनका शरीर सूख कर काँटा हो गया था । चलते-चलते उन्हें चक्कर आने लगते । किन्तु जब उन्होनें अपना ध्यान शारीरिक बल वृद्धि पर केन्द्रित किया और व्यायाम , कसरत करने लगे तो फिर शरीर का काया-कल्प ही हो गया । ऐस अगणित उदाहरण हैं जो मनुष्य की उत्कट आकाँक्षा, एकाग्रता , लग्न और तत्परता के सम्न्य द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में आर्श्चयजनक प्रगति के प्रमाण प्रस्तुत करते है।

मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बुद्धि की प्रखरता बढा़ने में इग्लैण्ड के डब्ल्यू॰जे॰एम॰ बाटन की कोई सानी नहीं रखता । इगलैण्ड के केंट कस्बे में जन्मा बाटन आरम्ी में इतना मन्दबुद्धि था कि उसे पढ़ी हुई कोई बात याद नहीं रहती । वह कमजोर भी काफी था और कमजोरी बीमारी के कारण उसे 11 वर्ष की आयु में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा । अब मस्तिष्क या बुद्धि के विकास की क्या कल्पना या आशा की जा सकती थी । लेकिन इस स्थिति में भी बाटन ने अपने पिता की प्रेरणा से मनारंजन का एक शौक बढ़ाया। वह इधर-उधर की बाते याद कर लेता और उनका स्थान , समय, घटनाक्रम आदि का ठीक-ठीक विवरण बताकर लोगों पर अपनी स्मरण शक्ति का रोव जमाता ।

धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया वह चलता-फिरता विश्व कोश समझा जाने लगा । यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गाँठ-बाँधकर किया कि उसो अपनी याददास्त को बढाना है । पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददास्त को इतना तेजकर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी । एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों , राजनीतिज्ञो और प्रतिष्ठित व्याक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गये ही प्रतीत होते थे , पर उसने पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेवार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वाले को आर्श्चयचकि रह जाना पड़ा । बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सि 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहसय मालूम किया जा सके ।

इच्छा शक्ति का केन्द्रकरण तथा पूरी तत्परता के साथ प्रयात्नशील रहना ही वह आधार है जिसके बल पर इच्छित उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती है । मनुष्य उन्हीं वस्तुओं अथवा उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता हैं जिनके लिए वह आग्रहपूर्वक प्रयत्न करता है । अगर किसी लक्ष्य विशेष का निर्धारण न कर काम किया जाये तो उनका परिणाम भी शून्य या नगण्य ही रहेगा और कहना नहीं होगा कि लक्ष्य का निर्धारण तभी होता है जब मन में किसी विशिष्ट आकाँक्षा का निवास हो और उसे प्राप्त करने के लिए तत्परता के स्तर की व्यग्रता हो । अनेक जीव-जन्तु कीट पतंगे फूलों के आसपास घूमते रहते है , पर उनमें से केवल मधुमक्खी ही शहद निकालती है , क्योंकि उसे मधु प्राप्त करने की आकाँक्षा और व्यग्रता रहती है । इस सम्बन्ध में ब्रिटेन के प्रसिद्ध विचारक कार्लाईल का कथन है कि , ‘एक ही विषय पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करने से कमजोर व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है, जबकि बलवान व्यक्ति भी यदि अपनी शक्तियों को कई दिशाओं में बिखेर देता है तो वह बलवान होते हुए भी कुछ नहीं कर सकता । एक-एक बूँद पानी अगर एक ही स्थान पर निरन्तर पड़ता रहे तो कडे़-से-कडे़ पत्थर में भी छेद हो जाता है लेकिन यदि पानी का बड़ा भारी बहाव भी शीध्रतापूर्वक उसके ऊपर से शीघ्रतापूर्वक निकल जाय तो उसका नाम-निशान भी उस पर नहीं दिखाई पड़ता । “

अँग्रेजी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार बुल्वर लिटन शौकियातौर पर ही लिखा करते थे लेकिन उन्होनें जो कुछ भी लिखा वह इतना श्रेष्ठ था कि उसके कारण लिटन की गणना अँग्रेजी के अग्रणी लेखकों में की जाती हैं । एकबार किसी ने उनसे इसका रहस्य पूछा तो लिटन ने कहा कि , ‘मै कभी शीघ्रतापूर्वक बहुत अधिक काम कर डालने की कोशिश नहीं करता बल्कि उसे उत्तम रीति से करना ही ज्यादा पसन्द करता हूँ । अगर आज अपनी शक्ति से अधिक काम कर डाला जाय तो कल तक थकान आ जायेगी और फिर थोड़ा-सा काम भी ठी क ढंग से नहीं हो सकेगा । जब मैंने कालेज छोड़ा और साँसारिक कामों में पड़ा तो उसके पहले वास्तव में मैंने ऐस कामो का कोई अध्ययन नहीं किया था लेकिन इसके बाद मैं पढ़ने लगा और मेरा विश्वास हे कि मैनें सामान्य लोगों से कम नहीं पढ़ा । मैने बहु-सी दूर-दूर देशों की यात्राएँ की , राजनीति में भाग लिया और उद्योग धन्धों में भी समय विताया । फिर भी साठ से अधिक किताबें लिख डाली । आपका विश्वास नहीं हो कि मैंने इस पढ़ने-लिखने में कभी तीन घन्टे से अधिक समय खर्च नहीं किया । लेकिन इन तीन घन्टो में जो भी पढ़ता-लिखता था वह पूर एकाग्रता , तन्मयता और तत्परता के साथ । “

सफलता का मूलभूत आधार उत्कट इच्छा , तत्पर सक्रियता और क्रियाशीलता ही है । इसके बिना कोई भी व्यक्ति ऊँचा नहीं उठ सका है और कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्ता कर पाया है । तत्परता , तन्मयता, सक्रियता और मनोयाग के मूल में भी उत्कट आकाँक्षा ही उत्प्रेरक का काम करती है । यद्यपि सुख-दुःख भली-बुरी परिस्थितियों और उत्थान पतन का मुख्य कारण मनुष्य का कर्म समझा जाता है लेकिन कर्म रुपी वृक्ष भी तो विचार और इच्छा रुपी बीज से ही उत्पन्न होता इच्छा से प्रेरणा की और प्रेरणा से कर्म की उत्पत्ति होती है ।

मनुष्य अपनी आकाँक्षा के अनुरुप सोचता है और जैसा वह सोचता है वैसे ही साधन उपलब्ध करता है । जैसे साधन उपलव्ध होते हैं वैसा ही कर्म वह करने लगता है । जैसे कर्म किये जाते हैं वैसी ही परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं और उसी तरह के परिणाम प्रस्तुत करती है । इसे भाग्य , कर्मा का फल, किस्मत , चाहे, जो नाम दे दिया जाय, पर सचाई यह है कि यह सब अपनीं ही इच्छाओं की परिणति और फलश्रुति है । जो चाहा जाता है वही प्राप्त होता । इसलिए कहा गया है कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता और तकदीर का लेखक स्वयं है । संसार में जितने भी व्यक्तियों ने सफलताएँ प्राप्त की हैं उन्होंने अपने प्रात्व्य के लिए पूरे मन से अभिलाषा की है और वे इस बात के लिए तड़पते , बेचैन होते रहे हैं कि किस प्रकार अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त की जाय । इस आकाँक्षा और तड़प ने ही उन्हें क्रियाशील बनाया तथा समस्त बाधाओं से जूझते हुए , असफलताओं की घड़ी में भी आशन्वित रहते और पराजय के बाद भी नये प्रयत्न करते रहकर अन्त में अपने अभीष्ट को प्राप्त किया । अस्तु उत्कट आकाँक्षा ही एक शब्द में सफलता का मूलभूत आधार कही जा सकती है ।


आत्मिक विकास के लिए स्वप्नों का उपयोग

मनोवैज्ञानिकों का कथन हे कि कोई भी व्यक्ति बिना स्वप्न देखे एक पल भी नहीं सोता । जागृत स्थिति में आँखे कुछ न कुछ देखती रहती है , मन में कई तरह के विचार और कल्पनाएँ घुमड़ती रहती है । मनःशास्त्र के अनुसार वही विचार और कल्पनाएँ सुप्तावस्तथा में भी उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं और तरह-तरह के चित्र-विचित्र दृश्य दिखती है । स्वप्न को सामान्यतः इच्छाओं और कल्पनाओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी कही जाता है । चूँकि निद्रित अवस्था में शरीर तो सोता रहता है , किन्तु मन मस्तिष्क के क्रिया-कलाप , चिन्तन , विचार और कल्पनाओं की उड़ान चलती ही रहती है । मन मस्तिष्क के यही क्रिया-कलाप स्वप्न के रुप में दिखाई देते हैं । मनोविज्ञान अब तक इसी रुप में स्वप्न को व्याख्यायित करता रहा हे । किन्तु अब मनावैज्ञानिक के अनुसार स्वप्न का एक और पक्ष उद्घाटित हुआ है , जिन्हें अतीन्द्रिय स्वप्न कहा जाता है । रुसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार मनुष्य का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है , उसे सामान्य रीति से समझ पाना अति दुष्कर है । इस सर्न्दभ में सन् 1883 में वोस्टल ग्लोव नामक अमरीकी समाचार पत्र के सम्बाददाता द्वारा प्रालेप द्वीप में भयन्कर ज्वालामुखी विस्फाट का स्वप्न दृश्य देखने और उसे खबर के रुप में प्रकाशित होने की घटना उल्लेखनीय है। इस तरह की और भी अगणित घटनाएँ है , जिनमें लोगों ने स्वप्न द्वारा किसी सुदूर स्थान में घट रही घटनाओं की जानकारी प्राप्त की , भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास प्राप्त किया और हजारो मील दूर स्थित अपने प्रियजनों के हाल जाने । इस तरह के सैकड़ो प्रसग अब विश्व विख्यात हो चुके हैं जिनकी वैज्ञानिकों द्वारा छान-बीन किये जाने के बाद उन्हें सही पाया गया । मनःशास्त्रियों के अनुसार इस तरह के स्वप्त अतीन्द्रिय स्वप्त होते हैं और सामान्य लोगों को भी स्वप्न में कभी-कभी ऐसी अनुभूतियाँ हो जाती है।

भारतीय मनीषियों ने इस तरह के स्वप्नों को आध्यात्मिक स्वप्न कहा है और बताया गया है कि आत्म-चेतना ही मन के द्वारा जागृत अवस्था में लौकिक दृश्यों को और सुप्तावस्था में स्वप्न जगत को देखता है । आत्मा की शक्तियों का विवेचन करते हुए ऋषि ने कहा है -

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभी येनानुपश्यति । महान्तं विभुभात्माभत्वा ............................॥

अर्थ - निद्रा की स्थिति में स्वप्न के दृश्यों को और जागृत अवस्था में प्रत्यक्ष अनुीत दृश्यों को मनुष्य बार-बार देखता है , वह शक्ति आत्मा से ही प्राप्त होती है और आत्मा महान विभु परमात्मा ही है।

ऋषि के अनुसार परमात्मा चेतना सर्वव्यापी है। आत्म-चेतना उसी एक अंश है । किन्तु विकारों , कषाय-कल्मषों के कारण उसका सम्बन्ध परमात्म सत्ता से एक तरह टूटा हुआ रहता है । दोनों के बीच माया का , भ्रान्ति का , अज्ञान का आवरण है जो दानों को एक - दूसरे से पृथक् करता है । फिर भी यदा-कदा बिजल की चमक के समान आत्म-चेतना में परमात्मसत्ता की दीप्ति चमक उठती है और उस स्थिति में व्यक्ति को इस स्तर की अनुभूतियाँ होने लगती हैं जिन्हें इन्द्रियों और मस्तिष्क द्वारा न अनुभव किया जा सकता है तथा न ही जाना जा सकता है , स्वप्नों के माध्यम से अतीन्द्रिय संकेत प्राप्त करना और आध्यात्मिक अनुभव करना भी उसी स्तर की अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कहा जा सकता है ।

कहा जा चुका है कि व्यक्ति का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भंडार है । स्वप्नों के माध्यम से अतीन्द्रिय दर्शन , दूरानुभूति उन्ही सम्भावनाओं की एक झलक मात्र है । इस तथ्य को समझने के लिए यसोगनिद्रा क थोडा़ परिचय देना आवश्यक होगा । योगनिद्रा वस्तुतः अवचेतन पर से चेतन का दबाव हआ लेने की विद्या है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति की अन्तःचेतना अनन्त ब्रहृसत्ता की तरंगों की गतिविधियाँ देख पकड़ पाने में समर्थ हो जाती है और तब वह अतीत की बीत चुकी घटनाओं , वर्तमान में घटित हो रही तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को सहज ही जान समझ लेती है । उस स्थिति में देशकाल की कोई सीमाएँ चेतना की पहुँच के मार्ग में बाधा नहीं बनती ।

अतीन्द्रिय दर्शन का आभास देने वाले स्वप्न भी उसी स्तर के होते है । चूँकि जागृत स्थिति में चेतन मन अधि जागृत और सक्रिय रहता है इसलिए उस दशा में अवचेतन मन प्रायः प्रसुप्त और निष्क्रिय अवस्था में ही रहता है । निद्रित अवस्था में चेतन मन अपेक्षाकृत शिथिल पड़ जाता है तो अवचेतन को थोड़ा जागने ओर सक्रिय होने का अवसर मिलता है । यदि व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध , पवित्र और निष्कलुष होगा तो उस स्थिति में व्यक्ति की अन्तरिक शक्तियाँ उतना ही अधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त करेंगी और तब न देखे हुए और न सुने हुए को भी देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हो सकता है । प्रश्नोपनिषद में गार्ग्य मुनि के तीसरे प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद यही बताते है -

अत्रैव देवः स्वप्ने महिमानमनु भवति ।

यद् दृष्टं दृष्टमनु पश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थनु श्रृणेति ॥

देश दिगन्तरैश्य प्रत्यनु भूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्र तं चाश्रुतं चानुभूत चानुनू भ्तं च सच्चासच्य सर्व पश्यति सर्वः प्रश्यति ।

गार्ग्य मुनि का प्रश्न था कि कौन देवता स्वप्नों को देखता है। उत्तर में महर्षि पिप्पलाद बताते है कि इस स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभतियों का अनुभव करता है । इसका पहले जहाँ कहीं भी , जो कुछ बार-बार देखा ,सुना और अनुभव किया होता है उसी को वह स्वप्न में बार-बार देखता , सुनता और अनुभव करता रहता है । परन्तु यह नियम नहीं है कि जागृत अवस्था में इसने जिस प्रकार और जिस ढंग से , जिस स्थान पर जो घटना देखी , सुनी या अनुभव की है उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करे । स्वप्न में तो मन स्वच्छन्द विचरण के लिए स्वतन्त्र रहता है इसलिए वह किसी भी घटना का अपने अनुकूल और वाँछित अंश लेकर उसे अनुभव करने लगता है। ऐसा भी होता है कि शुद्ध-बुद्ध , पवित्र और निर्विकार आत्मा न देखे हुए को भी देखने लगे , न सुने हुए को भी सुनने लगे और न अनुभव किये हुए को भी अनुभव करने लगे ।

महर्षि पिप्पलाद ने मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा जीवात्मा को ही स्वप्न देखने वाला बताया है और जब जीव चेतना इतनी पािवत्र तथा प्रखर हो जाय कि ब्रह्मण्ड-व्यापी चेतना से सर्म्पक करने में कोई व्यवधान न रहे तो सुनिश्चित रुप से व आध्यात्मिक अनुभूतियों का अधिकारी बनता चला जाता है । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आत्मा को पवित्र , निष्कलुष और निर्विकार बनाने के बाद व्यक्ति दिव्य अनुीतियाँ प्राप्त करने की क्षमता से सम्पन्न होता चला जाता है । अतीन्द्रिय स्वप्न मनःशास्त्रियों के अनुसार अवचेतन की जागृति मात्र है। और संस्कार शुद्ध व्यक्ति का अवचेतन भी शुद्ध होने से उसके स्वप्न भी यथार्थ की अभिव्यक्ति कर सकते हैं। यह यथार्थ सुदूर वर्तमान का भी हो सकता हे तथा सूक्ष्म जगत में सुनिश्चित हो चुके भविष्य का भी ।

व्यक्ति जब संस्कार शुद्धि के लिए योगतप का अनुष्ठान करता है तो उससे साधक की मनाभूमि का दिशा विशेष में निर्माण होने लगता है । श्रद्धा , विश्वास तथा संस्कार शुद्धि के लिए किये गये प्रयासों से उसकी अन्तःचेतना में आध्यात्मिक एवं सात्विक प्रवृतियाँ प्रमुख होने लगती है और उस स्थिति में निरर्थक स्वप्त बहुत ही कम आते है ।

शास्त्रकारो ने तो स्वप्नों के माध्यम से साधन मार्ग में प्रगति का लेखा - जोखा लेने की कसौटियाँ भी निर्धारित कर रखी है । कौन से ओर कैसे स्वप्न किन तत्वों की वृद्धि और निष्कासन की सूचना देते हैं , यह बहुत व्यापक और विस्तृत विषय है । सामान्यतः इस तरह के स्वप्नों को चार भागों में विभक्त किया गया है - ( 1) पूर्व संचित कुस्संकारों के विसर्जन , निष्कासन की सूचना देने वाले स्वप्न ( 2 ) श्रेष्ठ तत्वों के अभिवर्धन का स्वप्नों में प्रकटीकरण ( 3 ) भावी सम्भावना का पूर्वाभास और ( 4 ) दिव्य दर्शन ।

साधना मार्ग पर अग्रसर होते हुए साधक में जब आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि होने लगती है तो उन तत्वों का स्थान नियुक्त होने से पूर्व संचित का निष्कासन आवश्यक हो जाता है । उन संस्कारों के निष्कासन की प्रतिक्रिया स्वरुप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है , जो कि स्वाभाविक ही है उसे स्वप्नावस्था में भयन्कर , अस्वाभाविक , अनिष्ट एवं उपद्रवकारी रुप में देखा जाना स्वाभाविक ही है। दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है कि साधक के भीतर सात्विकता की वृद्धि हो रही है सात्विक कार्यों को करने या किसी अन्य के द्वारा इस तरह के कार्य होते दिखाई देने वाले स्वप्न ऐसा ही परिचय देते है ।

श्वेताश्तवरोपनिषद् में योगाभ्यास के ठीक चलने की कसौटी भी कुछ विशेष दृश्यों के रुप में दिखाई देने के रुप में विवेचित की गई है। इस उपनिषद् में दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कहा गया है-

नीहार धूमाकी निल्मनल्पनाँ, खद्यातेविद्यु तस्फटिक शशीनाम् । एतानि स्पाणि पुरः सराणि , ब्रह्मण्यभिव्यक्ति कराणियोगे ॥

अर्थात् - परमात्मा की प्राप्ति के लिए किय जाने वाले योग में साधन में कुहरा , धुँआ , सूर्य , वायु और अग्नि के समान तथा जुगनू बिजली , स्फाटिक मणि और चन्द्रमा के समान बहुत से दृश्य योगी के सामने प्रकट होते हैं । ये सब योग की सफलता को स्पष्ट रुप से सूचित करते है ।

योगसाधना में चेतन मन के उत्पातों को रोकने के लिए शिथिलता , शून्यावस्था , समाधि , शवासन आदि को बहुत महत्व दिया जाता है । इन्हें योगनिद्रा कहते है । स्नायु संस्थान पर से तनाव दबाव हटाकर यदि श्राँत, विश्राँत , और सौम्य मनःस्थिति प्राप्त की जा सके तो उसे जागृत निद्रा समतुल्य माना जा सकता है । स्मरणीय है ध्यान धारणा की सीढ़ियाँ पार करते हुए समाधि तक पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है । स्वपनावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है । इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है । इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रख जा सकते है । इन संकल्पो से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता हे । अतीन्द्रिय स्वप्न व्यक्ति चेतना और विराट् चेतना के बीच कोई सेतु होने का परिचायक है और सिद्ध करते हैं कि स्वप्नों के माध्यम से भी आत्म-परिष्कार सम्भव है , लेकिन उसके लिए योगनिद्रा जैसी स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है । आत्म-परिष्कार की प्रधान योगसाधना इसी प्रकार सम्भव होती है । मन्त्र जप में , ध्यान तन्मयता में चित्त के भीतर उच्च स्तरीय सकल्प जागृत रखे जाते हैं । यदि इन प्रयागों को सही उद्देश्य समझकर सही रीति से कार्यान्वित किया जाय तो उसके आशाजनक परिणाम सामने आना सुनिश्चित है । भारतीय तत्व वेत्ताओं ने इसीलिए योगनिद्रा एवं समाधि के स्तर सामान्य असामान्य सभी तरह के साधकों की मनोभूमि को ध्यान में रखते हुए बनाये हैं। इनमें सचेतन को तन्द्रित करने और अर्न्तमन को प्रशिक्षित करने के तीनों ही उद्देश्य पूरे होते है । इस दिशा में जितनी सफलता मिलती है उतने ही सामान्य स्वप्नों में भी ऐसी अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलने लगती हैं जिन्हे दिव्य-दर्शन अथवा अतीन्द्रिय प्रतिभा कहा जा सके ।


परावलम्बन, अमरबेल की तरह हेय

परावलम्बन हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होता है। परावलम्बी व्यक्ति अथ्वा समाज दोनों ही घाटे में रहते हैं। श्रम से बचे रहने और दूसरों की कमाई पर जीवित रहने का तुरन्त का लाभ भले ही मिल जाय,होता अन्ततः दुःखदायी ही है। श्रम से जी चुराने वाले स्वयं के पैरों में कुल्हाडी़ तो मारते ही हैं, समाज को भी क्षति पहुँचाते हैं। पुरुषार्थ का अभाव जीवन्तता को समाप्त कर देता हैं और मनुष्य शरीरिक और मानसिक दृष्टि से कमजोर हो जाता हैं। परावलम्बी बने रहने से समाज में घृणा एवं तिरष्कार का पात्र बनता है, लाभ उसका नहीं होता । किन्हीं कारणों से आश्रय टूट जाने पर अथवा जिनसे सहयोग मिलता रहा , उनके मुँह फेर लेने से वह कहीं का नहीं रहता। पुरुषार्थ बनता नहीं और जो आधार था वह भी टूट गया । इस दोहरे आघात को वह सहन नहीं कर पाता और किसी प्रकार जीवन के दिन काटता है।

परावलम्बन से सामजिक घाटाप भी कम नहीं होता इस प्रकृति का अनुकरण अन्य वयक्ति भी करते हैं। फलस्वरुप पुरुषार्थ न करने , दूसरोँ के श्रम से लाभ उठाने की अनैतिक परम्परा-सी चल पड़ती है। श्रम की कीमत पर सफलताएँ अर्जित करने की प्रवृति से व्यक्ति एवं समाज नैतिक बने रह सकते हैं । परावलम्बन तो अनैतिकता को ही बढ़ावा देता है । दूसरों की कमाई को उड़ा लेने वाले चोर, उठाईगीर , जेबकट , डाकू समाज में कितनी अव्यवस्था फैलाते हैं , इससे सभी परिचित हैं। इस प्रकृति से सामाजिक ,नैतिक आधार भी टूटते जाते हैं । परावलम्बी व्यक्ति और समाज क्रमाशः अपनी जीवन्तता खोते जाते और अधःपतन के गर्त में गिर जाते हैं। व्यक्तिगत अथवा सामाजिक दोनों ही हस्तियों से परावलम्बन हानिकारक है।

प्रगति के दौड़ में पिछडा़ समाज अवगति-अभाव, दरिद्रता से घिरा व्यक्ति दोनों ही इस बात के प्रमाण हैं कि स्वावलम्ब का अभाव है तथा परावलम्बी तन्त्र विद्यमान हैं। यह स्थिति न भी हो - सम्पन्नता हो तो भी वह स्थायी नहीं हो सकती क्योंकि वह दूसरो की कृपा पर अवलम्बित होगी । जो किसी भी क्षण टूट सकती है। किसी प्रकार यह स्थिति बनी रहे तो भी परावलम्बी व्यक्ति के जीवन की कोई परिणति नहीं होती । उसका कोई लक्ष्य और आदर्श नहीं होता । खाने और जीवित रहने की पशुवत प्रवृति तक उसका जीवन सिमट कर रह जाता है। मानव जीवन की महान गरिमा को न तो वह समझ पाता और न ही श्रेष्ठ उद्देश्य की ओर कदम बढ़ा पाता । परावलम्बन के बने रहने एवं जीवित रहने के अवलम्बन को टूट जाने पर तो उल्टे उसकी स्थिति परोपजीवी लता ‘अमरबेल’ जैसी हो जाती हैं। जीवन-मरण का संकट उत्पन्न हो जाता है।

अमरबेल एक परजीवी लता होती है जो अपना भोजन पूर्णतया वृक्षों से प्राप्त करती है। खुराक के लिए वह स्वयं तो उपार्जन नहीं करती । वृक्षों पर चढ़ जाती तथा उनके संग्रहित जीवन तत्वों को अपने तन्तुओं के सहारे अवशोषित कर लेती हैं। जब तक पौधे में पोषक तत्व बने रहते हैं अमरबेल उनका शोषण कर अपना विस्तार करती जाती है । पोषक तत्वों की कमी पड़ जाने से पौधे मर जाते हैं। पौधे के मर जाने से जब आहार नहीं मिलता तो वह अपने ही तन्तुओं को चूसना आरम्भ कर देती और अन्ततः स्वयं भी सूख जाती है। अमरबेल को यदि आहार मिलता रहे तो उसमें आर्श्चयजनक रुप से वृद्धि होती है। वनस्पति होते हुए इसका स्वभाव आक्रमणकारी जीव-जन्तुओं जैसा होता है । जिस प्रकार कुत्ते , बिल्ली के बच्चे अपने शिकार पर झपटते हैं उसी प्रकार अमरबेल से फूटने वाला अंकुर भी जन्मते ही दूसरे पौधों की ओर दौड़ता है । एक प्रयोग में देखा गया कि अमरबेल से फूटने वाल अंकुर निकटवर्ती रखे पौधे को निकट से हटा देने पर फूटने वाला अंकुर मुरझा कर सूख गया ।

परावलम्बी व्यक्तियों की भी यही स्थिति होती है। शरीरगत आवश्यकताओं एवं साधनों को प्राप्त करने के लिए उनसे पुरुषार्थ तो बनता नहीं। दूसरों के परिश्रम की कमाई का लाभ उठाने की ताक-झाँक में रहते हैं। इसके लिए अनीति युक्त मार्ग अपनाना पडे़ तो भी नहीं चूकते । पराश्रय की यह प्रवृति उन्हें अनैतिक तो बनाती ही हैं । श्रम न करने से पुरुषार्थ घटता और आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है । ऐस व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से समर्थ होते हुए कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में असमर्थ ही हाते हैं। किसी प्रकार जीवन के दिन गिन-गिन कर पूरा करते हैं।

अमरबेल सम्पूर्ण संसार में पायी जाती है। इसकी लगभग 150 किस्में हैं। इनकी काट-छाँट एवं पेड़ों की सुरक्षा की व्यवस्था न की जाय तो समूचे पेड़ को ही आच्छादित कर लेती है। वनस्पति शास्त्र विशेषज्ञों ने तो अमरबेल की कई आर्श्चयजनक जातियों की खोज की है जिनकी प्रकृति चालाक एवं धूर्त मनुष्यों जैसी होती है । चोर , डाकू दूसरों के घरों में घुसकर उनकी सम्पति हड़प कर जाते हैं , आवश्यकता पड़ने पर हिंसा तक का सहारा लेते हैं। अमरबेल को तालाब आदि में घुसकर छोटे-पौधों की पोषक सामग्री चूसते हुए भी पाया गया है । अपहरण न कर पाने पर वह मर तो जाती है किन्तु भूमि से भोजन उपार्जित करने का प्रयत्न नहीं करती और परावलम्बी ही बनी रहती है।

वनस्पति जगत में इस प्रकार के कई पौधे पाये जाते हैं। चीन और अमेरिका में पायी जाने वाली ‘एन्डोथिया पैरासिटिका “ नामक फफूँदी भी इसी तरह की होती है । वह ‘चेस्ट नट’ नामक पौधे पर जीवित रहती और उसे ही खा जाती है। पौधे के नष्ट होते ही वह भी मर जाती है।

इस दुष्ट प्रकृति के कारण न तो काई इन्हें गले लगाता है और न ही आश्रय देता है। उल्टे यह पता लग जाने पर कि वृक्षों-पौधों के निकट अमरबेल उग आयी है, उसे उखाड़कर फेंक दियसा जाता है। कोई भी उन्हें पौधों के निकट आने नहीं देता परावलम्बी व्यक्ति भी उसी प्रकार तिरष्कृत होता । अन्ततः वह घाटे में ही रहता है। परावलम्बन से तुरन्त का लाभ तो यह होता है कि श्रम नहीं करना पड़ता और दूसरों की संचित कमाई से लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है, पर यसह स्थिति स्थायी और अधिक दिनों तकनहीं रहती । परावलम्बी जीवित तो रहते हैं, पर मृत्यु तुल्य ही । परिवार एवं समाज दोनाँ ही स्थानों पर उपेक्षा होती एवं विरष्कार का भाजन होना पड़ता है।

इस प्रवृति के रहते न तो व्यक्ति प्रगति कर सकता है और न ही समाज । यह आश्रयदाता को अवनति एवं पतन के द्वार पर पहुँचा देती हैं। परावलम्बी वयक्ति अथवा समाज अधिक दिनों तक अस्तित्व नहीं बनाये रख सकते और समाप्त हो जाते हैं। परावलम्बन जहाँ भी होगा अभाव , दरिद्रता ,रोग एवं शोक को साथ लेकर प्रकट होगा , व्यक्ति एवं समाज को जर्जर एवं सामर्थ्य विहीन बनायेगा । इस प्रवृति का हर तरह से बहिष्कार करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए ।


सूफी सन्त (kahani)

एक सूफी सन्त , राविया से बार-बार पूछा करते थे - ‘मानव जीवन का चरम लक्ष्य क्या हैं।’

बार-बार पूछने पर राविया ने इसके उत्तर में उनके पास दो चीजें भेजी - मोम और सुई । साथ ही यह सन्देश भी दिया--’मोम की भाँति जनहित में स्वयं को गलाकर दूसरों को प्रकाश दो, जनमानस का अन्धकार दूर करो । सुई की भाँति अपने लिये कुछ भी न चाहकर दूसरों की निस्वार्थ सेवा करो। यही जीवन का सर्वोंपरि लक्ष्य हैं। इसी में प्रभु की प्रसन्नता निहित है।’


इच्छित दिशा में जीवधारियों का विकास

जीव विज्ञान के क्षेत्र में पिछली शताब्दी में प्रतिपादित विकासवाद के सिद्धान्त ने मनुष्य के गौरव , उसके मूलस्वरुप , स्तर , स्वभाव और आधार पर जिस तरह चोट की है वह मनुष्य को नियति के हाथ का एक खिलौना भर सिद्ध करती है। ‘जीवन संघर्ष ‘ विकासवाद का एक प्रमुख सिद्धान्त है । उसके अनुसर पृथवी पर सर्व प्रथम एक कोशीय अमीबा के रुप में जीवन अवतरित हुआ । अमीबा इतने बढ़े कि उनके लिए पोषण की वस्तुओं का अभाव होने लगा । फलतः अमीबा का तेजी से हृस होने लगा और जो अमीबा बलवान तथा योग्य थे वे अधिक विकसित रुप में जीवित रहे । इस जीवन संघर्ष में योग्य बचे और अयोग्य मारे गये। संघर्ष का यह क्रम अनवरत चलता रहा साथ ही योग्य प्राणी बचे और अयोग्य लुप्त हो गये। जो बचे, परिस्थितियों के अनुसार उनके आकार-प्रकार भी बदलते रहे और इसी क्रम से क्रमशः मछली , मेंढ़क , साँप , पक्षी , गाय , बैल , घोड़े , बन्दर , बनमानुष और मनुष्यय की उत्पति हुई।

दूसरे प्राणियों से उन्नत प्राणियों का विकास हुआ- इस सिद्धान्त के खण्डन में कई तर्क दिये जा सकते हैं और यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि पृथ्वी पर चलन वाले जीवन संघर्ष में योग्य बलवान अयोग्य , अशक्तों को मार कर जीवित बचे तथा विकसित हुए जैसे अमीबा अभी भी इस रुप में पाये जाते हैं, जिस रुप में कहा जाता हैं कि वह पृथ्वी पर सर्व प्रथम अवतरित हुआ । यदि अमीबा ही विकसित होकर दूसरे रुप में बढ़ा तो अमीबा जीवित क्यों है ?

फिर भी जातिविधान ,लुप्तजन्तु , गर्भशारुत्र , संधियोनियाँ आदि को जैविक परिभाषाओं के अनुसार यह सिऋ करने का निरन्तर प्रयास चलता रहा है कि पृथ्वी पर जीवन क्रमशः विकसित हुआ । क्रमिक विकास का यह सिद्धान्त इतना बहुसमर्थित है कि उसके कारण मनुष्य को पूर्व इतिहास नितान्त ही दीन , हीन और मूल्यहीन ही ठहरता है। मनुष्य जाति के पूर्वज वर्तमान की अपेक्षा बहुत गिरे हुए , अविकसित , असभ्य और कहना चाहिए बन्दर थे - यह मान्यता हमें अपने अतीत के प्रति अश्रद्धालु और स्वयं को अहंकारी ही बनाती है।

सवाल केवल भावनाओं और साँस्कृतिक मूल्यों का ही नहीं है । विकासवाद की यह धारणा तथ्यों से भी परे है । क्रमिक विकास के सिद्धान्त का एक अंश ही ग्राह्म हो सकता हैं जैसे बालक का शरीर और मस्तिष्क अविकसित होता है। समय के अनुसार उसकी प्रगति होती है और सुवावस्था तक पहुँचने पर वह प्रौढ़ प्रगल्भ , परिपक्व बन जाता है।

लेकिन मनुष्य की या अन्य जीव-जन्तुओं की मूल परम्परा में एकरुपता और समान्ता बनी रहती । जीवधारियों में इस परम्परागत समानता की सम्भावना उनके शुक्राणुओं में विद्यामान मानी जाती है। गेहूँ के बीच से ही गेहूँ उत्पन्न होता है। आम की आकृति और स्वाद का पूरा ढाँचा उस गठली में भरा रहता है जिससे कि नया पौधा उत्पन्न होता है। इस वंशधर में अपने पूर्वज के गुण ही विकसिक पाये जायेंगे । विकास क्रम की यह परम्परा कभी भी देखने में नहीं आती कि सरसों का बीज क्रमशः विकसित होते-होते कटहल जैसे फूल लगाने लगा हो । मूँग की बल पर कद्दू जैसे स्वाद और आकार के फल लग सकना शायद कभी भी सम्भव न हो सकेगा ।

विकासवाद के अनुसार जिस अण्डों का उपयोग न किया जय वह जंग खाकर नष्ट हो जाता है । जिन अंडो का उपयोग किया जाय वही अण्डे विकसित होते हैं। ‘थ्योरी आफ यूज एण्ड डिसयूज ‘ के इसी सिद्धान्त के अनुसार जीवों में अवशेष तथा विभिन्न प्राणियों की शारीरिक संरचना का तुलनात्मक अध्ययन कर विकासवाद का क्रम निरुपण किया जाता है। जैस बन्दर ने पेड़ो परसे उतर कर जमीन पर रहना आरम्भ किया तो उसकी पूँछ का उपयोग भी बन्द हो गया । फलस्वरुप पूँठ धीर-धीरे कमजोर पड़ती गयी और बन्दर से मनुष्य बनने तक पूरी तरह नष्ट हो गयी।

यह संगति भी कल्पना और अनुमान के आधार पर ही बिठायी गयाी है। प्रकृति के परमाणुओं में भी ऐसी व्यवस्था नहीं कि एक बीज से दूसरे भिन्न बीज की या भिन्न बीज वाले पदार्थ की उत्पति हो सके । इस क्रम निरुपण की प्रामणिकता को परखने के लिए पिछल दिनों कार्नेल यूनिवर्सिटी के ‘सेल’ फिजियोलौजी ग्रोथ एण्ड डेवलम मेण्टस्’ विभाग के निर्देशक श्री एफ॰सी॰स्टीवड्र ने एक प्रयोग किया और उस प्रयोग में एक गाजर काटी। गाजर में असंख्य कोशिकायें थीं।प्रत्येक कोशिका में समान गुण थे । स्टीवर्ड ने कुछ कोशिकायें निकाल कर काँच की नलियों में रखी और उनमें नारियल का पानी भर दिया ।

एक कोशिका के और अधिक टुकडे़ नहीं किये जा सकते , परन्तु नारियल का पानी पीते ही गायजर की वे कोशिकायें एक से दो, दो से चार , चार से आठ के क्रम में बढ़ने लगीं और अन्त में प्रत्येक काश एक स्वतन्त्र गायर का पौधा बन गया । इस प्रयोग के आधार पर प्रो॰स्टीवर्ड ने सिद्ध किया कि कोई भी कोशिका अपनी जाति के नये कोश बनाने की शक्ति तो रखती है, परन्तु वह नयी जाति के कोष नहीं बना सकती है।

फिर भी यह मान लिया जाय कि जीवधारियों में धीरे-धीरे परिवर्तन हुए तो प्रश्न उठता है कि परिवर्तन का वह क्रम अब रुक क्यों गया है ? ज्ञात इतिहास से अब तक मनुष्य शरीर में कोई परिवर्तन के संकेत नहीं मिलते ? क्या प्रकृति की विकास प्रक्रिया रुक गयी है ? दूसरा प्रश्न यह है कि विकासवाद के अनुसार जीव में सामान्य से विकास में करोड़ो वर्ष लग गये तो मनुष्य जैसे विलक्षण जीव के रुप में वनमानुष सहसा किस प्रकार विकसित हुआ ।

स्मरणीय है विकासवाद के अनुसार पृथ्वी पर तीन हजार लाख वर्षो में जो जीवन-चक्र चला वह प्रारम्भ के ढ़ाई हजार लाख वर्षो तक बहुत ही मन्द गति से चला - उसमें केवल जीवन के लक्षण थे। पाँचा करोड़ वष्र पूर्व से ही जीवन के विकास की गति अति तीव्र हुई तथा एक करोड़ वर्ष पूर्व पशु तथा वनस्पति जगत में जीवन के विभिन्न प्रमाण मिले । मनुष्य के पूर्वज तो कुछ लाख वर्ष पूर्व ही विकसित हुए और वे भी एक लाख वर्ष पूर्व तब गुफावासी और पाषाण युग में थे मनुष्य का मानसिक विकास तो गत 10-11 वर्षो से ही हुआ और उसमें भी अधिकतम विकास पिछले दो हजार वर्षो में हुआ । कहा जाता है कि ज्ञान-विज्ञान का जितना विकास पिछले दो हजार वर्षो में उससे अधिक पिछले दो सौ वर्षो में हुआ । दो सौ वर्षो में भी पिछले पचास वर्ष ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अब तक के विकास के अद्वितीय उदाहरण है।

यहाँ यह विचारणीय है कि ज्ञान-विज्ञान का विकास इतनी तीव्रगति से हुआ तो शरीर का विकास अवरुद्ध क्यों हो गया ? और मनुष्य को बौद्धिक विकास हुआ तो उसके कथित पूर्वज बन्दर बौद्धिक दृष्टि से जहाँ के तहाँ ही क्यों हैं ? मनुष्य जैसे विलक्षण जीव के रुप में विकसित होनेउ के बाद मनुष्य उससे भी अधिक विलक्षण-विचक्षण क्यों नहीं हो सका ? सुलझे हुए वैज्ञानिको नें विकासवाद पर इस तरह के कई प्रश्न चिन्ह लगाये है ।

विकासवादी सिद्धान्ता के अनुसार अब से छह हजार वर्ष पूर्व सुमेरिया में गुफावासी आदिम मानव ‘नियालिथिक ‘ रहता था । लेकिन पुरातत्व शोधों के अनुसार तब वहाँ एक सुविकसित सभ्यता विद्यमान थी । वहाँ के लोग नगरों में रहते थे, खेती करते थे और कला-संगी के क्षेत्र में भी विकास कर चुके थे । हिन्दू सभ्यता और मय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यतायें मानी जाती है। दानों सभ्यताओं में प्रचलित और लिपिबद्ध, गाथाओं के अनुसार उन दिनों अन्तरिक्ष से विमान आते जाते थे और पृथ्वीवासियों का अन्य ग्रहों,लोकों के निवासियों से भी सर्म्पक था ।

सृष्टि पर जीवन का क्रमशः विकास हुआ और फिर कुछ हजार वर्ष पूर्व मनुष्य आज की तरह चलना सीख सका , उपलब्ध प्रमाणों के बाद भी यह मानना पूर्वाग्रह पूर्ण होगा । जीवन का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है, जिसे भरतीय तत्वविदों के जीव सत्ता का नाम दिया है। यह जीवात्मा अपनी इच्छा और कर्मा के अनुसार किन्हीं भी योनियों में किन्हीं भी प्राणियों के देह में निवास करने लगती है। मनुष्य की जीव चेतना, अन्य प्राणियों का देहधारण भी कर सकती है और अन्य प्राणी मनुष्य योनि में भी जन्म ले सकते हैं , मनुष्यों के समान कई प्राणियों के व्यवहार और कई मनुष्यों का पाशविक आचरण इस बात का प्रतीक है कि जीव सत्ता अपने पूर्व जीवन के संस्कारों को साथ लेकर विभिन्न योनियों में भ्रमण करती है।

इस परिवर्तन या विकास की जड़वादी व्याख्या अधूरी है और अब तो भू गर्भवेत्ता भी इस व्याख्या को असंगत ठहरा रहे है । विकासवादी विश्लेषण के अनुसार प्राणियों की पूर्व स्थिति में वापसी असम्भव है। विश्व के विभिन्न भागों में प्राप्त हाथियों के फासिल्स के आधार पर भूवत्ताओं ने निर्ष्कष निकाला है कि करोड़ो वर्ष पूर्व हाथी की उत्पति हुई तथा उस समय हाथी का आकार कुत्ते के बराबर था ।

कहा जाता है कि करोंड़ो वर्ष पूर्व भारत की शिवालिक पहाड़ियों में हाथी विशाल संख्या में विद्यमान थे । हाथी का अिदम विकास ‘मोटोथिटियम’ जीव से हुआ बताया जाता है । गेण्डे के आकार के स्तनधारी जीव थे । इसी वर्ग से पहला हाथी ‘फियोफिय ‘ उत्पन्न हुआ जिसकी ऊँचाई तीन फुट थी । इसके बाद टैटरा बैलोजन , मास्टाउन , स्टोगोडन वग्र की पीढ़ियाँ विकसित हुई । जिनकी ऊँचाई क्रमशः पाँचा , आठ , और पन्द्रह फुट थी । पन्द्रह फुट ऊँचे हाथी ‘स्टोगोडन’ के बाहरी दाँत 12 फीट लम्बे और सवा दो फुट व्यास के थे ।

लेकिन इसके बाद हाथी की ऊँचाई और आकार घटने लगा । अब 10 से 12 फुट ऊँचे हाथी ही होते हैं। इन दिनो भारतीय हाथियों की ऊँचाई 10-11 फुट होती है। भूतत्व शास्त्रियो के अनुसार हाथी की ऊँचाई फिर घटनें लगी है और सम्भव है कि वे अगल 1-1 करोड वर्षो में 3 फीट ऊँचे अर्थात् कुत्ते जैसे होने लगें ।

विकासवाद इन्ही विसंगतियों के करण स्वयं ही सन्देहों और आक्षेपाँ का केन्द्र बनता जा रहा है। प्रस्तुत कर्त्ताओं के तर्क उन्ही के प्रतिवादित तथ्यों को काट रहे हैं एक ओर तो अमीबा को हृवेल जैसे विशाल आकार वाले प्राणी के रुप में परिणत होने की बात कही जाती है और दूसरी ओर आदिम काल के महागंजो को भैंसे , कुत्ते जितनी ऊँचाई के हाथियों की स्थिति में लौअ पड़ने और महा सरीसृपों को छोटी छिपकली मात्र रह जाने के प्रमाण दिये जाते हैं।

पूर्वजों तथा उनके वर्तमान वंशजों में आकृति और प्रकृति का इतना अन्तर अस्वाभविक है। क्योंकि इससे तो उनकी मूलसत्ता का ही कोई आधार शेष नहीं रह जाता । प्राणियों में विकास और पतन दानों की सम्भाबनायें समान रुप से विद्यमान हैं। हाथी कभी कुत्ते जैसे आकार से विशालकाय प्राणी बन सकते हैं तो विशालकाय प्राणी से वापस उसी स्थिति में भी लौट सकते हैं। मोटे रुप में यह बात गले न उतरे , परन्तु सिद्धान्ततः यह सही है कि प्राणधारी अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार ही उठत,गिरते हैं। जीव सत्ता को ऊँचा उठाने और नीचे गिराने में , प्रगति करने अथवा अवनति के गर्त में धकेलने के लिए इच्छा शक्ति ही प्रधान हैं । प्रकृति ने अथव ईश्वरीय विधि-व्यवस्था ने प्राणी को न तो प्रगति के लिए विवश ही किया है और न पतन के गर्त में गिरने से रोका है।

वह अपनी स्वतन्त्र इच्छा शक्ति के अनुसार किधर भी बढ़ या घट सकता है। परिवर्तन उत्थान की दिशा में ही नहीं पतन की दिशा में भी हो सकता है। गति आगे बढ़ने का कारण भी हो सकती है और पीछे हटने में भी सहायक हो सकती है । आकाश की ओर भी आगे बढ़ा जा सकता है और पाताल की ओर भी प्रवेश किया जा सकता है। ईश्वर ने हर प्राणी की स्वतन्त्र सत्ता सृष्टि के आरम्भ में ही दी है। जीवात्मा किस स्थिति में रहना और किस दिशा में बढ़ना चाहता है यह उसके मनमर्जी की बात है ?


क्या मानवी प्रतिमा ध्वस में ही लगनी चाहिये ?

परमात्मा ने मनुष्य को ध्वंस और सृजन की दोनों सम्भावनाओं को समाहित कर इस संसार में भेजा है। उसमें सृजन की शक्ति भी है और ध्वंस की शक्ति भी । शक्ति मात्र दानों सम्भावनाओं को लिए रहती है। आग से मकान जलाया भी जा सकता है और लोहे को तपागला कर उसे इस्पात भी बनाया जा सकता है पानी जीवन रक्षा के लिए आवश्यक है, प्यास बुझाने से लेकर खेतों में सिंचाई करने, फसल उगाने तक उससे कई काम उपयोगी हो सकते हैं किन्तु वही पानी आदमी को डुबो सकता है, फसलों को चौपट कर सकता है और कई तरह के विनाश विध्वंस खड़े कर सकता है। हवा प्राणियों को स्वस्थ प्राण वायु प्रदान करती है और सुगन्ध को इधर से उधर वहा कर ले आती है, किन्तु अन्धड़, चक्रवात और तूफान के रुप में वह भयंकर विनाशकारी दृश्य भी प्रस्तुत कर सकती है । कहने का आशय यह है कि शक्ति जिस किसी भी दिशा में नियोजित हो जाय उसी दिशा में सृजन के सत्परिणाम और विध्वंस की विनास लीला प्रस्तुत कर सकती है। मनुष्य को परमात्मा ने अपना श्रेष्ठ प्रतिनिधि बना कर इस सृष्टि पर भेजा है, स्वाभाविक ही है कि उसे अनेकानिक विभूतियों और शक्तियों के अनुदान दिये । यह मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह अपनी शक्ति का सृजनात्मक उपयोग करता है कि विध्वंस के लिए ।

दुर्भाग्य से इन दिनों मानवीय प्रतिभा सृजन की अपेक्षा विध्वंस के उपाय रचने में ही अधिक संलग्न है। उदाहरण के लिए युद्धो को ही लें । युद्ध और महायुद्धों में कितने लोग अकार मृत्यु के गाल में जा समाते है और कितनी सम्पति का विनाश होता है यह मुद्दतों से देखा और सुना जाता रहा है। जिन नगरो , बाँधें और पुलों को अगणित मनुष्यों ने अपने स्वेद सरोवर से बनाया , जिनके निर्माण में प्रचुर साधन उपादान झोंके गये थे , जो जनसाधारण की आशा और आकाँक्षाओं के केन्द्र थे और जिनके बारे में समझा जाता था कि उनकी छाया में अनेक व्यक्ति चिरकाल तक सुखद आश्रय प्राप्त करते हुए चैन के दिन गुजार सकेगें, परवह सारी आशा धूमिल हो गई या हो जाती है उस समय , जब युद्ध हुए अथवा होते हैं । एक-एक टोकरी बारुद के कचरे से बनाये गये बम उन संस्थानों पर गिरते ही वे देखते-देखते धूरिसात हो जाते हैं और असंख्य मनुष्य काल कवलित हो जाते हैं।

युद्धो से होने वाले विनाश का केवल इतने मात्र से अनुमान नहीं लगाया जा सकता इन दिनाँ युद्ध को अपना पक्ष अधिकाधिक प्रबल सिद्ध करने के लिए विभिन्न देशों में जो उपाय किये जा रहे हैं, उन्हे देखकर लगता है कि मनुष्य अपना आत्मघात करने के लिए जैसे उधार खाये बैठा है। युद्ध अभ्यास में इस समय पूरे संसार में करीब दो करोड आदमी लगे हैं। इनका एक ही काम है अस्त्रशस्त्रों के चलाने , नये हथियार बनाने , मनुष्यो की हत्या और सम्पति को नष्ट करने के नये-नये उपाय रचना । यही इनका कला-कौशल हैं। इनके व्यक्तितत्व की सारी विशेषताएँ जैसे इसी प्रयोजन के लिए समर्पित हैं। इसके अतिरिक्त कोई सात करोड व्यक्ति शस्त्रास्त्रों के निर्माण और सेना सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने में लगे हुए हैं । वे मूर्धन्य मस्तिष्क इन लोगों से अलग हैं जो अपने बुद्धि कौशल से ऐसी शोधे करने , ऐसी विधियाँ निर्मित करने में लगे हुऐ हैं जिनकी सहायता से अधिकाधिक विनाश सम्भव हो सके । धन जन की अधिकाधिक हानि के लिए शक्तिशाली , प्रभावपूर्ण और सस्ते उपाय ढूँढ निकालना ही उनकी प्रतिभा की सफलता और सार्थकता समझी जाती है।

आइये , देखें इन दिनों युद्ध में किस प्रकार के विनाशकारी उपाय रचे जा रहे हैं । इन दिनों जीवाणु युद्ध , मौसम युद्ध जैसे उपाय तो खोज ही लिए गये हैं । इन उपायों के द्वारा किसी भी देश को बिना प्रकट युद्ध के हानि पहुँचाई जा सकती है। युद्ध के ये तरीके प्रयोग में लाये जायें तो पता ही नहीं चलता कि कौन-सा देश यह सक बकर रहा है ? प्रथम तो यही निश्चय नहीं हो पाता कि इन प्राकृतिक विपदाओं के पीछे किसी देश का हाथ है अथ्वा ये अपने स्वाभाविक क्रम से उत्पन्न हुई है ? जीवाणु युद्ध और मौसम युद्ध के अलावा समुद्र की जल धाराओं को प्रीवित करके भी प्रतिपक्षी देश को हानि पहुँचाने के उपाय खोज लिण् गये हैं ।

पृथ्वी के दो जिहाई भाग में फैले हुए समुद्र में विभिन्न तापक्रम की कई जल धाराएँ प्रवाहित होती हैं। मोटेतौर पर उन्हें ठण्डी और गर्म जलधाराओं के रुप में ही जाना जाता है। इन धाराओं के कारण समुद्र के तापक्रम पर तथा उसससे आसपास के भू-भागों के मौसम पर प्रभाव पड़ता है। कारण कि सागर के तापक्रम का प्रभाव वायु के दबाव और वगे पर , मौसम में नमी पर और बादलों के बनने पर भी पड़ता है। ऐसे स्थानों पर जहाँ बर्फ की अधिकता हैं गर्म धाराओं को प्रवाहित कर वह बर्फ पिघलाया जा सकता हैं और उसके द्वारा सम्बन्धित क्षेत्रों में जलप्लावन की स्थिति बनाई जा सकती है। हिम खण्डों को पिघलाकर समुद्र तल में अन्तर पैदा कर तटवर्ती क्षेत्रों को पानी में डुबोया जा सकता है।

वायुमण्डल की संरचना मं साधारण-सा परिवर्तन कर उस क्षेत्र के निवासियों के लिए जीवन संकट उत्पन्न करने के उपाय भी खोज लिए गये हैं । उदाहरण के लिए वायु-मंडल में यदि कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ा दी जाय तो उस क्षेत्र के निबासियों का बचना लगभग असम्भव ही हो जाये । हालाँकि औद्योगीकरण के कारण शहरों और महानगरों में कारखानों की चिमनियों और रेल-मोटरों से निकलने वाले धुएँ के कारण वहाँ के वायुमंडल में काफी मात्रा में कार्बन डाइआक्साइड गैस घुल गई है । इस कारण उत्पन्न होने वाले वायुप्रदूषण की चचा्र आमतौर पर कही , सुनी और लिखी जाती है। वायु प्रदूषण के कारण होने वाली जल स्वास्थ्य की हानि से थोड़े बहुत प्रायः सभी लोग परिचित हैं । लेकिन युद्ध विज्ञानियों ने ऐस उपाय खोज लिये हैं, जिनके कारण वायुमण्डल में कार्बन डाईआक्साइड अत्यन्तिक मात्रा में बढ़ाई जा सके ।

इसी प्रकार प्रतिक्षा देशों में चुम्बकीय असन्तुँलन पैदा करके , अयन-मण्डल की ओजोन परतो में छेद करके सूर्य की रेडियोधर्मी , पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी के विभान्न क्षेत्रों में मनचाहे केन्द्रों पर केन्द्रित की जा सकती हैं। इस प्रकार की विधियाँ खोजकर युद्ध विज्ञानियों ने किसी भी क्षेत्र में बिना धाम-धमाका किये जन-जीवन का नामोनिशान मिटा देने से सरंजाम जुटा लिए हैं।

कृत्रिम वर्षा के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक विधियों का भी युद्ध प्रयोजनों के लिए उपयोग करने की सम्भावनाएँ हैं। बादलों में बर्फ का अथवा सिलवर आयोडाइड का छिड़काव करके किसी दुश्मन देश की ओर उड़ने वाले बादलो को अपने देश की सीमा में अथवा मित्र देशों में अथवा उसी देश की सीमा पर रोककर बरसात कराई जा सकती है और शत्रु राष्ट्र में सूखे की स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। इतना ही नहीं दूसरे देश के क्षेत्रों में भूकम्प लाने व विनाशकारी समुद्री तुफान पैदा करने के वैज्ञानिक तरीके खोज लिए गये है।

कृत्रिम भूकम्प लाने के कई सफल प्रयोग पिछले दिनों रुस और अमेरिका के युद्ध विज्ञानियों ने किये। सर्वविदित है कि अपनी यह पृथ्वी आरम्भ में सूर्य की तरह ही आग का एक जलता हुआ पिंड थी । धीरे-धीरे यह ठण्डी होती गई और इस पर जीवन का आवतरण तथा अस्तित्व सम्भव हो सका । चूँकि पृथ्वी धीरे-धीरे तत्प पिंड से ठण्डी होती गई इसलिए उसकी कई परते बनी । पृथ्वी की ऊपर वाली परत को ‘भूकपव’ कहते हैं। इसमें मिट्टी , पत्थर , कोयला , धातु आदि चीजें हैं। धरती की यह ऊपरी परत केवल 40 मील मोटी है। यह परत के नीचे एक तरल परत है इसकी नाम भूरस है। इस भूरस के ऊपर धरती तैरती रहती है। धरती की ऊपरी परत का दबाव घटने बढ़ने के कारण जब इस तरल परत में कोई खलल पैदा होती है तब भूकम्प आते है।

वैज्ञानिकों ने इस तरल-परत से भी नीचे वाली परत जिसका नाम शिलावरण है और जो 70 मील मोटी है , प्रभावित करने के उपाय खोज लिए हैं। नियन्त्रित भूमिगत परमाणु परीक्षणों द्वारा भूकवच के नीचे वाल तरल परत को प्रभावित कर कृत्रिम भूकम्प आसानी से पैदा किये जा सकते है। इसी प्रकार नियंत्रित परमाणु विस्फोटों से भी बडी-बडी समुन्द्र लहरें पैदा की जा सकती हैं और तटीय क्षेत्रों के लिए विनाशकारी जल-प्रलय पैदा किया जा सकता है। इस प्रकार की समुद्रीय लहरें उत्पन्न करने के प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही किये जाने लगे थे । उस समय योजना बेहद खर्चीली होने के कारण यह विचार त्याग दिया गया, किन्तु अब इस योजना पर अन्वेषण और शोधो द्वारा कृत्रिम भूकम्प तथा समुद्री लहरे पैदा करना बेहद आसान और बहुत सस्ता हो गया है।

मानवी प्रतिभा और पुरुषार्थ के ध्वंस में लगने की तस्वीर का यह एक पक्ष है, जो आँखों से दिखाई देतहा है और इसके प्रत्यक्ष परिणाम भी देखे जा सकते है। किन्तु स्थिति के और भी पहलू हैं। जिसमें प्रत्यक्ष परिणाम भले ही न दिखाई दें, पर वह अपनी विभीषिका के संहारी परिणाम तो प्रस्तुत करती ही रहती है । उदाहरण के लिए नशों को ही लें । नशेवाजी और मादक पदार्थो के उत्पादन , खपत तथा सेवन में भी उतनी ही जन शक्ति और धनशक्ति लगी हुई है कि जितनी कि युद्ध उपकरणों के उत्पादन, विकास और अभ्यास में । मनुष्य की औसत आयु यदि साठ वष्र मानी जाय और अब तक युद्ध में मारे गये आबल बृद्ध नागरिकों की आयु का हिसाब लगारकर उसके बाद औसत आयु निकाली जाय तो वह 35 वर्ष से अधिक नहीं बैठती । अर्थ्त् औसतन 25 वर्ष की आयु में युद्ध की बलिवेदी पर होम दिये गये। हाम दिय कहना भी ‘होम’ जैसे पवित्र शब्द का अपमान होगा । कहा जाना चाहिए इतने वर्ष नष्ट कर दिये गये।

युद्ध के समान ही नशेबाजी भी मनुष्य की आयु और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। सम्भ्वतः दुनिया की आधी आबादी अनेक तरह के नशों और मादक द्रव्यो का सेवन करती है। उनसे कितनी हानि होती है कितने लोगों का जीवनकाल कितना घटता है ? यह अभी तक जाँचा देखा नहीं गया । पर यह स्पष्ट है कि नशों के कारण युद्ध से कम नहीं अधिक ही विनाश उत्पन्न होता है। इन साधनों को तैयार करने, बनाने और खपाने में जो श्रम एवं धन लगता है उस पूँजी की यदि युद्ध पूँजी और युद्ध श्रम से तुलना की जाँय ता प्रतीत होगा कि नशा आगे है युद्ध पीछे। बारुद जल जाती है , युद्ध उपकरण नष्ट हो जाते हैं और अपने साथ मानवीय जीवन तथा धन को भी नष्ट कर देते हैं । उनका काई उत्पादक परिणाम नहीं होता । नशे के उपकरण भी इस्तेमाल के साथ ही नष्ट हो जाते हैं, उनका प्रभाव होता है तो वह भी अशुभ ही , जीवन और धन दानों का नाश होता है। इस प्रकार युद्ध और नशों को विनाश करने वाले तत्वों को एक ही वर्ग में रखा जा सकता है।

युद्ध और नशो की ही भाँ ति कला द, साहित्य , संगीत आदि क्षेत्रो में भी सृजन कक्ष विकृत वीभतस प्रवृतियाँ ही ज्यादा चलती है। वे प्रवृत्याँ नैतिकता को नष्ट-भ्रष्ट कर मनुष्य जीवन को नहीं तो , मानवता को अवश्य ही नष्ट करती हैं। इस स्थिति में वही कहा जायगा कि मानवी क्षमता का अधिकाँश भग ध्वंस में लगे हुए हैं। क्या ध्वंस में लगी हुई इस मानवीय क्षमता को मोड़ा नहीं जा सकता ? उसे सृजन की दिशा नहीं दी जा सकती ? क्या विनाश और विध्वंस इतना आकर्षक है कि उसका प्रलोभन छोड़ा नहीं जा सकता ? क्या विकास इतना निरर्थक है कि उसके लिए कुछ सोचा समझा नहीं जाना चाहिए ? आदि ऐस प्रश्न हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए और अपनी रीति-नीति का पुनर्निधरण करना चाहिए ।


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एक दिन ऐसा जरुर आवेगा जब लोग औषधियो से निराश होकर यह सोचगे कि यदि निरोग रहना है तो प्रकृति की शरण में लौटना चाहिए और उच्छखलता छोड़कर सयमित और संयमित जीवन पद्धति अपनानी चाहिए ।


अंतरिक्ष के प्रचंड ऊर्जा स्त्रोत

आकाश देखने में पोला, खोखल लगता है ऐसा प्रतीत होता है मानो बहुत ऊँचाइ्र पर किसी ने गीली चादर तातकर उसमें फाड, टाँगे और टिमटिसाते दिये लटकाये हों। दृश्य के रुप में इतना ही विदित होता है , पर वस्तुतः उसमें भारी सामथ्य्र सम्पदा और विशालता को देखकर आर्श्चयचकित रह जाना पड़ता है।

इन दिनाँ जिसे खग्रास ग्रहण का सामना करना पड़ रहा है, वह सूर्य अकेला ही इस आकाश में नहीं है। अपनी आकाश गंगा में ऐस करोड़ो तारे हैं ओर उनमें से सैकड़ो उससे कही अधिक बड़े है । उनमें निसत होने वाली ऊर्जा समस्त ब्रह्माण्ड में फैलता है । दूरी के आधार पर धूमिल होना स्वाीविक है। फिर ीी उस वितरण में से कुछ हिस्सा पृथ्वी के हिस्से में भी निश्चित रुप से आता है।

ब्रह्मण्ड में गैस के असंख्य वादल परिभ्रमण करते हैं। इनमें पाया जाने वाला पदार्थ आर्श्चयजनक है। कही वह इतना हलका है कि 100 किला मीटर जगह में उसका वजन मात्र एक ग्राम हो । कही वह इतना भारी है कि एक इन्च व्यास में हजारों टन तोला जा सके । विस्तार की दृष्टि से ब्रह्माण्ड का विस्तार अकल्पनीय है। एक प्रकाश वर्ष 63000000000 किलो मीटर का माना जाता है । अपनी आकाश गंगा में प्रायः 150 अरब तारे है । उनका मध्यान्तर इतना बड़ा है कि आकाश गंगा के एक सिरे में दूसरे सिरे तक पहुँचने में एक लाख प्रकाश वर्ष लगे । अब पिण्डो की गतिशीलता परिधि पर दृष्टिपात किया जाय अपनी सूय्र 220 किला मीटर प्रति सैकिण्ड की चाल से अपनी मण्डली की साथ लेकर आकाश गंगा के केन्द्र धु्रवतारे की परिक्रमों के लिए चल रहा है। यह एक परिक्रमा 25 करोड वर्षा में पूरी होती है धरती का जिस दिन जन्म हुआ होगा उस दिन से लेकर अब तक सूर्य ने केन्द्र की एक परिक्रमा तक पूरी नहीं की है। वह अवधि पूरी होने तक पृथ्वी जीवित भी रहेगी या नहीं इसमें सन्देह है।

हर तारा ऊर्जा उमलता है और वह इतनी प्रचण्ड होती है कि उसका सूक्ष्मतम घटक परमाणु तक में पाई जाने वाली सामर्थ्य आर्श्चयचकित करती हैं अणुओं में सनिनहित ऊर्जा जिस शक्ति केन्द्र का नगण्य सा अनुदान है वह कितनी महान होनी चाहिए इसकी कल्पना भी ठीक से करते नहीं बन पड़ती । ब्रह्माण्ड में अवस्थिति अरबों आकाश गंगाओं की बात छोडे़ मात्र अपनी मंदाकिनी का ही अनुमान लगायें तो आर्श्चयजनक आँकडे़ सामने आते है। 200000000020 करोड टन है। ऐसे 300 अरब सूर्या का वजन अपनी आकाश गंगा का है

गैसीय मेघ ऐसे ही रुई के पुलन्दे की तरह नहीं उड़ते फिरते वरन् उनमें असाधारण ऊर्जा के स्त्रोत रहते हैं। इन वादलों से ही ग्रह-नक्षत्र बनते हैं और वे बूढे़ होकर जब टूटते है तो अपनी सामर्थ्य इसी भाण्डागार को वापिस लौटा देते है।

आये दिन मरते रहेने वाले सूर्य और उनके परिवारी ग्रह-उपग्रह जन्मने पर अपनी भट्टी जलाते और गर्मी बखेरते हैं। मरते-मरते भी उनकी अन्त्येष्ठि इतनी गर्मी बखेरती है कि आकाश में ढलाई की भट्टियों और चित्ता की ज्वाले मालाओं से भरे-पूरे श्मशान की तरह हर घड़ी गरमागरम देखा जा सकता है। गुरुत्वाकर्षण , तापमान , परिभ्रमण, परिवर्तन , आकंचन-प्रकुँचन की ऐसी हलचले अनन्त आकाश में चलती रहती हैं, जिनसे प्रचण्ड क्षमता सम्पन्न शक्ति तरंगो का उत्सृजन अनवरत होता रहता है। वे तालाब की लहरो की तरह फैलती और आगे बढ़ती चली जाती है। दूरी बढ़ने से उनकी समर्थता हलकी तो होती है, पर पूर्णतया समाप्त होने की स्थिति कभी भी उत्पन्न नहीं होती । अगणित स्त्रोतों से उत्पन्न और अनेक आकर्षण विकर्षणों से प्रभावित प्रेरित वे लरंगे आगे बढ़ती है। साथ ही परस्पर मिलकर नये-नये आधार खडे़ करती हैं। अति सघन न्यूटोन तारे एक सैकिण्ड में तीस चक्कर लगाने की भंयकर चाल से गतिशील रहते हैं। इतनी ऊर्जा उत्सृजित करते हैं कि उनसे प्रभवित क्षेत्र को विद्युत चुमबकत्व का भण्डार कहा जा सके।

पोले आकाश में खेखलापन दीखता भर है, वस्तुतः उसमें सामर्थ्य के अजस्त्र भाण्डागार ीरे पडे़ हैं। उन्हीं को पृथ्वी अपनी आवश्यकतानुसार उपलब्ध करती हुई गुजरा करती है । जब कभी उसके स्वाभाविक व्यवस्था क्रम में अन्तर पड़ता है, तभी विपन्न परिस्थितियाँ उत्पन्न होतीं और सनतुलन बिगड़ता है। सूर्य ग्रहण, सूर्य के धब्बे , चुमबकीय तूफान जैसी अन्तरिक्षय परिस्थितियाँ पृथ्वी की सुव्यवस्था में व्यतिरेक उत्पन्न करती हैं तो उस पर निवास निर्वाह करने वालों को चिन्तित होना और प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने का प्रयत्न करना स्वाभाविक है।

सौर मण्डल के अन्य ग्रह-उपग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी के वातावरण , वनस्पति जगत तथा प्राणि समुदाय को सूय्र और चन्द्र दो ही अधिक प्रभावित करते हैं। चन्द्रमा का प्रभाव समुद्र पर अधिक आसानी से देखा जाता है। ज्वार-भाटों की हलचलों में पृथ्वी पर पड़ने वाला प्रभाव आकर्षण ही प्रमुख कारण है। यह एक प्रत्यक्ष दृश्य है इसके अतिरिक्त यह प्रभाव सूक्ष्म रीति से सूक्ष्म परिस्थितियों पर भी पड़ता है जिससे धरती को अनेक परिस्थितियाँ प्रभावित होती हैं। यहीं तक नहीं , प्राणियों की विशेषतया मनुष्यों की मनःस्थिति पर भी इन परोक्ष दवाओं के कारण अप्रत्याशित रुप से उथल-पुथल होती है। अनिच्छित रुप से कुछ ऐसा होने लगता है जिसमें कर्त्ताओं का श्रेय या दोष उतना नहीं होता जिसके लिए उनहें उत्तरदायी ठहराया जाता हैं।

सूर्य के सम्बन्ध में यह बात और भी अधिक जोर देकर कही जा सकती हैं। उसके उदय, अस्त का - प्रभाव मध्यान्ह का पृथ्वी की-उसके निवासियों की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे दैनिक जीवन की घटनाआँ से जोड़ कर सहज ही अनुभव किया जाता है। रात आते ही शरीर शिथिल होने लगता है। नींद आने लगती है। प्रभाव काल में ही सभी बिना जगाये जग जड़ते है। जहाँ तक कि पक्षियों को घोसले से निकल कर चहचहाने और फुदकने, उड़ने की तरंग उठती है। सवेरे के और मध्यान्ह के परिश्रम का परिणाम कितना भिन्न होता है यह सभी जानते हैं। फूलों का खिलना सूर्योदय के साथ - साथ आरम्भ होता है, जब कि रात्रि को स्थिर ही नहीं रहते सिकुड़ने भी लगते हैं। हवा गर्मी में नहीं अन्य परिस्थितियों में भी सूर्य की समीपता और दूरी का अन्तर पड़ता है। ऋतुओं के प्रभाव में सूर्य ही आधार भूत कारण होता है।

पृथ्वी का जीवन और जहाँ का सुखद वातावरण सूर्य का ही अनुदान है। भू-लोक के निवासियों को निर्वाह की ही नहीं चेतनात्मक उर्त्कष के लिए भी उपयुक्त सुविधा उपलब्ध रहती है। उदासीनों, उपेक्षा करने वालों और अब मानना पर उतारु रहने वालों का तो अमृत भी भला नहीं कर सकता । गायत्री मन्त्र सूर्य का मन्त्र है। सविता , देवता से ब्रह्म तेजस् प्राप्त करने का रहस्यमय विधान उसका साधना पद्धति में सन्निहित है। सूर्य की सत्ता का मूल्यान्कन करते हुए तत्वदर्शियों ने ठीक ही कहा है- “त्वम्मानो जगतश्चक्षु.” हे सूर्य आप ही इस संसार के नेत्र हैं। “त्वम् आत्मा सर्व देहिनाम्” आप ही सब प्राणियों की आत्मा हैं। “त्वम् योनिः सर्व भूतानाम्” आप ही सब प्राणियों की काया हैं। “त्वमा चारः क्रियावताम” आप ही पुरुषार्थियों के आचरण हैं। इन सूत्रों में सूर्य और प्राणियों के मध्य विद्यमान सम्बन्ध -सूत्र पर ऋषियों ने संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित प्रकाश डाला है।


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आराम करना उनके प्रति विश्वासघात करना है जिन्होने अनवरत श्रम करके हमें उठ सकने योग और सुख पा सकने योग्य बनाया यह विश्वासघात इन असंख्य लोगों के प्रति भी है जो कभी-कभी आराम कर ही नहीं पाते । जवाहरलाल नेहरु


जीवन से भागिये नहीं उसे स्वीकार कीजिए

जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते रहते है। कभी सुखद और अनुकूल परिस्थितियाँ रहती हैं तो कभी दुःखद और प्रतिकूल यह उतार-चढाव ही जीवन को रसमय बनाते है। रात के अन्धकार से दिन का प्रकाश विविधता उत्पन्न करता है ता पतझड के मौसम से बसन्त की बहार का पता चलता है। इसी प्रकार दःख् और कष्टों से सुख तथा आनन्द का रस आता है। यदि जीवन में दु’ःख और कष्ट हो ही नहीं तो सुख और सुविधाओं में कोई रस ही न आये । मीठा खाते-खाते जब अरुचि हो जाती है तो स्वाद बदलने के लिए नमकीन भी खाना आवश्यक हो जाता है उसी प्रकार सुख-सुविधाओं की एकरसता तोड़ने के लिए कष्ट, कठिनाइयाँ भी आवश्यक हो जाती है।

मनस्वी तथा विचारशील व्यक्ति यही सोचकर दुःख परेशानियों को भी उसी प्रकार हँसी-खुशी सह लेते है जिस प्रकार सुख-सुविधाओं का उपभोग करते है, परन्तु कमजोर और दुर्बल मनःस्थिति के लोग दुःखो तथा कष्टों से इस प्रकार घबड़ा जाते हैं, जैसे उनके सामने आग के कुण्ड में कूद पड़ने की स्थिति आ गयी हो । ऐसाी स्थिति में उनके पास वास्तविकता से आँख-मूँद लेने और सथार्थ से भागने का ही उपाय सूझता है और वे तरह-तरह से इस उपाय को अपनाते हैं।

सर्वविदित है कि अनुभूतियों और सम्वेदनाओं का केन्द्र मनुष्य का मस्तिष्क है। सुख-दुःख का , कष्ट-आनन्द का , सुविधा और अभावों का अनुभव मस्तिष्क को ही होता है तथा मस्तिष्क ही प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के जोड-तोड बिठाता हैं कठिनाइयों से न घबराने और प्रतिकूलताओं से संघर्ष करने की इसी क्षमता का नाम मनोबल है। मनोबल सम्पन्न मनस्वी व्यक्ति कष्ट-कठिनाइयों में रास्ता और उत्पन्न समस्याओं के समाधान खोजने में जरा भी परेशानी अनुभव नहीं करते । लेकिन मनोबल की दृष्अि से कमजोर व्यक्ति उन परिस्थितियों से भागने की ही बात सोचते हैं।

यह कोई आवश्यक नहीं है कि समस्याये आर्थिक या भौतिक ही हों । समस्याओं का स्वरुप कुछ भी हो सकता है और वे व्यक्ति के निजी , पारिवारिक सामाजिक तथा व्यावसायिक जीवन में किसी भी तरह उठ खड़ी हो सकती है। उचित तो यह है कि उन्हें सुलझाने के लिए धैय्र और सूझबूझ से काम लिया जाय । परन्तु लोग प्रायः उनसे भागने की बात सोचते हैं। घर में यदि आग लगी हो तो उसमें से भागकर कहीं निकला भी जा सकता है, पर समस्या जीवन के किसी ऐसे क्षेत्र में उत्पन्न हुई है जहाँ से न भागते बनता है तथा दुर्बल मनःस्थिति के कारण न उसका सामना ही करते बनता है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति उनसे आँख मूँदने, उनकी ओर से ध्यान हटा लेने अथवा किसी प्रकार उनके बोझ को फेंक देने की कोशिश करता है।

इसी का नाम जीवन से पलायन हैं । जीवन से पलायन का अथ्रजीवन को छोड़ देना तो नहीं होता । हालाँकि कई व्यक्ति इन समस्याओं से घबड़ा कर अपना जीवन ही नष्ट कर डालते है । परन्तु अधिकाँश व्यक्ति जीवन से पलायन करने के लिए कुछ ऐसे उपाय अपनाता है, जैसे शुतुरमुर्ग आसन्न संकट को देखकर अपना सिर रेत में छुपा लेता है । इस तरह की पलायनवादी प्रवृतियों में मुख्य है मादक द्रव्यों की शरण में जाना । शराब ,गाँजा ,भाँग ,चरस ,अफीम ,ताडी आदि नशे वास्तविक जीवन से पलायन करने की इसी मनोवृति के परिचायक है। लोग इनकी शरण में या तो जीवन की समस्याओं से घवडा जाते है अथवा अपने संगीसाथियों को देखकर इन्हें अपनाकर पहले से ही अपना मनोबल चौपट कर लेते है।’

वैसे आजकल मादक द्रव्यों का प्रचलन फैशन के रुप में बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है। कोई समस्या या परेशानी न होते हुए भी लोग पार्टी, क्लबों अथवा अन्य स्थानों पर अपने चार दोस्तों के साथ बैठकर इन माध्यमों से अपने स्वास्थ्य तथा मानसिक शान्ति को नष्ट करते रहते है। मादक द्रव्यों की शरण में जाने से स्वास्थ्य की हानि तो होती ही है, उसके कारण सबसे बड़ी हानि जो होती है वह है मानसिक शाँति और शक्ति के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने के रुप में । जीवन की सचाइयों से भाग कर आदिमी उन समस्याओं से छूट नहीं जाता और न ही कोई उनका समाधान पा लेता है । बल्कि होता यह है कि मादक द्रव्यों का जब तक प्रमवि रहता है तब तक व्यक्ति अपनी समस्याओं को भूते रहता है । उस समय वह कल्पना की अथवा बेहोशी की दुनिया में पहुँच जाता है तथा अनुभव करता है कि उसे वर्तमान समस्याओं के कारण होने वाली चिन्ता , घबड़ाहट तथा परेशानी से उतने समय के लिए मुक्ति मिल गयी ।

वस्तु ऐसा होता नहीं है बल्कि उतने समय के लिए मस्तिष्क का सम्वेदना केंद्र निष्क्रिय बेहोश हो जाता है। जब मादक द्रव्य का प्रभाव मिटता है तब समस्या पुनः और विकराल रुप में खड़ी दिखाई देती है। उनसे घबड़ाकर व्यक्ति फिर उसी दुनिया में भागती है और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि वह अपनी अनुभूतियों , सम्वेदनाओं , तथा भावनाओं के साथ-साथ सामान्य समझ-बूझ और सोचने विचारने की क्षमता भी खो नहीं देता । मादक द्रव्यो के आदी लोगो में से अधिकाँश कई मनोरोगों के शिकार होते देखे गये है। आगरा के मानसिक चिकित्सालय द्वारा प्रसारित एक सूचना के अनुसार वहाँ के अनुसार वहाँ के 368 पागलो में से 100 तो ऐसे थे जो केवल मादक द्रव्यो के कारण ही पागल हुए । आदमी के मानसिक स्वास्थ्य की चौपट कर देने तथा उसे पागलपन तक पहुँचा देने में शराब,अफिम,कोकीन,हीरोइन, आदि का पहला स्थान है।

आजकल तो ऐसे-ऐसे नशे ईजार कर लिये गये है जिनकी एक खुराक लेते ही आदमी किसी दूसरे ही लोक में पहुँच जाता है। एल॰एस॰डी॰ कैनेविस , मारिजुआना, मैण्ड्रेक्स अिद इसी प्रकार के नशे हैं इन नशों को साथ लेकर पश्चिम का भटकी हुई युवा पीढी हमारे देश के युवको को भी मादक द्रव्यो के इस संसार का वासी बनने के लिए उकसाती जा रही है। ये मादक द्रव्य इतने उत्तेजक होते हैं कि सेवन करने वाले का तत्काल ही अपने आसपास की दुनिया से काट देते है और उससे विक्षिप्त से कर देते है । पिछले दिनो समाचार पत्रो में मादक द्रव्यों के कारण घटी दुघ्रटनाओं अथवा उनसे प्रभावित होकर अस्वाभाविक व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के जो विवरण प्रकाशित हुए है वे बडे़ रोचक भी हे तथा दुःखद भी । रोचक इसलिए कि इनका सेवन करने के बाद व्यक्ति किस तरह की अव्यावहारिक कल्पनायें करने लगता है और दुःखद इसलिए कि उन कल्पनाओं में व्यक्ति किस कदर रम जाता है कि वह अपना घात करने से भी नहीं चूकता ।

कैलीफोनियों के एक एल॰एस॰डी॰ प्रेमी को नशे की झोंक में यह सनक सवार हो गयी कि वह पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है। इसी सनक को पूरा कर दिखाने के लिए वह एक इमारत की दसवी मंजिल पर चढ़ा और वहाँ से कूँद पडा । उसने उड़ने के लिए बहुत हाथ पैर फड़ँफड़ाये परन्तु जो होना थ हुआ । वही के एक होस्टल में र रहे दूसरे विद्यार्थी की यह समझ में आ गया कि वह अपने आकार से दुगुना हो गया है और उसके पैर छह फुट लम्बे हो गये हैं। छह फुट लम्बे पैर से उसने पास वाली मंजिल पर कूदने के लिए उसी अन्दाज से छलाँग लगायी और वह आठ मंजिल नीचे जमीन पर गिर पड़ा ।

डेक्साम्फेटाइन सल्फेट और बारबिरु चेट्स पिल्स’ के आदी व्यक्ति किस कदर मानसिक दृष्टि से विक्षिप्त और पागल हो जाते है, इसका विवरण लिखते हुए एक पत्रकार ने लिखा है कि वह मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले लड़को के कैम्प में गया । वहाँ एक लड़का यकायक चीख उठा , मै मर रहा हूँ और देर तक यही शब्द दौहराता रहा । वहाँ जमा हुए दूसरे छात्र भी अपने इस काल्पनिक मृत्यु को प्राप्त हुए युवक को घेर कर बैठ गये और शोक प्रदर्शित करने लगे । आसपास बैठे युवकों ने कुद गोलियाँ निकालीं और गटकली । तभी वह लड़का जो अपने मरने की घोषणा कर रहा था , उठा और बोला अपने को निगम बोध घाट ले जा रहा हूँ । नगर निगम वाले लोगों से शव गाड़ी मँगवाई थी , उन्होने भिजवायी ही नहीं , अब खुद ही अपने को ले जाना पड़ रहा है। वह लड़का इतना कहकर फिर लेट गया । थोडी देर में वह चिड़िया के पंख की तरह अपने हाथ फड़फड़ाने लगा और फिर बोला अब मैन चिंड़िया के रुप में फिर से जन्म ले लिया है।

यह विवरण एक ऐसी जमात का लिखा गया है जिसके सभी सदस्य तेज मादक द्रव्यों के डोज लेने के आदि थे । उनमें से कोई अनर्गल प्रलाप कर रहा था । कोई नाच रहा था , कोई हँस रहा था , कोई काल्पनिक गिटर बजा रहा था , कोई चुपचाप बैठा था, कोई अपने ही हाथ उलट पुलट कर देख रहा था यानी वे सब मानसिक विक्षिप्तता की निशानी थे । यह तो कुछ तेज मादक द्रव्यो का असर हुआ । कम तेज या सामान्य उत्तेजक मादक द्रव्य भी मन मस्तिष्क के सन्तुलन को इसी प्रकार छिन्न भिन्न कर देते हैं तथा व्यक्ति को अपनी ही काल्पनिक दुनिया में इस प्रकर धकेल देतेह हैं कि उसे वास्तविक दुनिया का कुछ भी पता नहीं लगता ।

यद्यपि मादक द्रव्यों के बढ़ते हुए प्रचलन के लिए आधुनिक संभ्यताओं भी जिम्मेदार ठहराया जाता है जिसमें व्यक्ति यान्त्रिक जीवन व्यतीत करता हुआ भीड में इस कदर खो गया कि उसे अपने संगी साथियों को बात तो दूर रही अपने परिवार के लोगो का भी ध्यान नहीं रहता । जो भी हो आधुनिक सभ्यता से उत्पन्न हुई समस्याओ के समाधान का एकमात्र यही रास्ता नहीं है। कहा जा चुका है कि किसी भी समस्या के समाधान का सही-सही रास्ता तो यह है कि उससे सीधें मुकाबला किया जाय, वास्तविकता से आँख न मूँदी जाय और जो जिस रुप में हैं उसे उसी रुपी में स्वीकार करने तथा परिस्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए सशक्त मनोबल से काम लिया जाय।

मंिस्तष्क मनुष्य शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग हे और जीवन क्रम को सुचारु रुप से चलाने में वही मुख्य भूमिका निवाहता है। मस्तिष्क को सक्रिय रखने अथवा प्रभावित करने में कुछ रसायन बहुत महत्वपूर्ण काम करते है। आवश्यकतानुसार शरीर संस्थान उन नशों की व्यवस्था अपने आप ही करता है। लेकिन मादक पदार्थो में प्रयुक्त किये जाने वाले रसायन मस्तिष्क के कुछ अंगो को उत्तेजना देते है तो कुछ को निष्क्रिय कर देते हैं। उन रासायनिक प्रभावों के कारण मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रो में आवश्यक तालमेर बिगड़ जाता है । मस्तिष्क आवश्यकता से अधिक सतर्क अथवा प्रसुत हो जाता है। और साधारण सी बात भी असाधारण तथा बड़ी बात भी बहुत मामूली लगने लगती है। यही स्थिति पागलपन की निशानी है।

इस प्रकार लोग झंझटो परेशानियों से मुक्त होने के लिण् नशों का सहारा लेते हैं और उसके सहारे चलते चलते पागलपन की स्थिति में भटक जाते है । अतः किसी भी स्थिति में मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिए चिन्ताओं और समस्याजव्य परेशानियों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार नशे का सेवन तो करना ही नहीं चाहिए । समस्याओं से सीधा सामना और अपने बुद्धि विवेक से उनका समाधान खोजना ही जीवन जीने का सही मार्ग हैं। इसके साथ ही समस्याओं को इतने बढ़े-बढें और अस्वाभाविक ढंग से देखना भी नहीं चहिए कि उसके कारण यह जीवन ही भार स्वरुप लगने लगे ।

सहायक और अनुकूल परिस्थितियों की तरह कष्टप्रद तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को भी उपयोगी मानते हुए उन्हें सहज स्वाभाविक मानकर चला जाय तो मनःस्थिति को शान्त और सन्तुलित रखते हुए जीवन मार्ग पर आगे बढ़ते रहा जा सकता है। उसके लिए फिर जीवन से पलायन करने अथवा कोई अस्वाभाविक आचरण करने की आवश्यकता नहीं रह जाती ।


सत्यनिष्ठा के अनुकरणीय प्रसंग

अविचल सत्य निष्ठा-

एथेन्स में अमीर उपरावों की एक सभा चल रही थी । सभासद उस समय एथेन्स के ही एक नवयुवक द्वारा अमीर उमरावों की की जाने वाली आलोयना पर विचार कर रहे थे। समझा-बुझाकर , लालच प्रलोभन देकर या डरा ध्मका कर जैसे भी सम्भव हो उस युवक को आलोचना करने के लिए मनाने हेतु सभा में बुलाया गया । युवक सभा में उपस्थित हुआ । प्रधान ने कही,”तुम ही हो जो हम लोंगो पर चरित्रहीनता का दोष लगाते हो ?”

युवक ने कहा ,”हाँ मैं ही हूँ और अब भी आप सब लोगों से यह आग्रह करता हूँ कि आप लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि धनवान और सत्ता सम्पन्न होने का अर्थ छोटों के स्वत्व तथा शील का अपहरण करना होता है। युवक की इस निर्भीक वाणी को सुनकर झल्लाये परन्तु उन्हें मालूम था कि इस युवक के साथ काफी लोगों की सद्भावनाएँ हैं, इसलिए जहाँ तक हो सके इसे कोई हानि नहीं पहुँचाना चाहिए , यह सोचकर उन्होंने युवक को तरह-तरह के प्रलोभव दिये परन्तु वह किन्हीं भी प्रलोभनों के आगे नहीं झुका । अन्त में उसे दण्ड का भय दिखाया गया । युवक ने यही उत्तर दिया कि ‘मैं प्राण दे सकता हूँ किन्तु धमकियों के आगे झुक कर सत्य का परित्याग नहीं कर सकता । इतिहास साक्षी है कि इस युवक को जहर पिला कर मृत्यु दण्ड दिया गया , पर मरते समय भी उसके मुख मण्डल पर सत्य की आभा दीप्तिमान हो रही थी ।

संन्यासी का धर्म-

मैसूर के महाराजा चाराजेन्द्र बगडियार बहादुर स्वामी विवेकानन्द से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने स्वामी जी से आग्रह कर उन्हें अपने यहाँ रहने के लिए राजी कर लिया । स्वामी जी वेदान्त धर्म के प्रसार का कुछ काम करना चाहते थे । यहाँ काफी सुविधाएँ थी , सो वे खुशी-खुशी राज भवन में अतिथि बन कर ठहर गये । राज भवन उन दिनों कई विकृतियों और बुराइयों का घर बना हुआ था। स्वामी जी प्रायः महाराजा को इस सम्बन्ध में सचेत किया करते थे। नरेश को यह सब पसन्द नहीं था । एक दिन खीझकर उन्होनं स्वामी जी से कहा-’महाराज मैंने ही आपको आश्रय दिया और आप ही मेरी आलोचना करते हैं।’

स्वामी जी ने कहा -’जहाँ बुराई हो उसे बताना और दूर करने के लिए आवश्यक प्रयत्न करना मेरा धर्म है। यदि आप सुख सुविधाएँ देकर मुझ से अपना धर्म छोड़ देने की अपेक्षा रखते हैं तो मुझे नहीं चाहिए यह सब ।” और यह कह-कर उन्होंने अपना झोला उठाया तथा वहाँ से चल दिये ।

महाराज को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उन्होंने स्वामी जी से तुरन्त क्षमा माँगी और उन्हं रोक लिया । वाल सुलभ सरलता के धनी स्वामी जी रुक गये। स्वामी जी इस अविचल सत्यनिष्ठा और सहज सरलता को देखकर महाराज ने अपने दुर्व्यसन छोड़ ही दिये ।

हम क्यों भागें ?

आस्ट्रेलिया के एक जंगल में भंयकर आग लगी । आग इतनी भंयकर थी कि वह आस-पास के नगरों में भी फैलने लगी । इस आग से कई जाने गई लाखो रुपये की सम्पत्ति नष्ट हुई । इसी क्षेत्र में एक कारावास भी आता था । कारावास के कैदी यदि चाहते तो भाग सकते थें, पर नहीं भागे । उल्टे अपने प्राणों की बाजी लगाते हुद छत्तीस घण्टे आग बुझाते रहे । जेलर के पूछे जाने पर कैदियों ने कहा ,”महोदय! बन्धन किसे पसन्द होता है ? किन्तु कारावास भोगने की अवधि से पहले भाग कर नियम तोड़ना अच्छी बात नहीं लगी । न्यायालय ने हमें अपने पापों का प्रायष्चित करने के लिए अवसर दिया है तो हम उससे क्यों भागें ?


जिनसे मौत भी डर गई

मनुष्य के जीवन में भला-बुरा दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ आती है। सामान्य व्यक्ति उनसे प्रभावित होता , अनुकूल में प्रसन्न एवं प्रतिकूल में खिन्न होता दिखायी देता है। असामान्य व्यक्ति दोनों में ही एकरस रहते और उन्हें सहर्ष स्वीकार करते हैं। प्रतिकूलताओं में वे घबड़ाते नहीं वरन् अपना सन्तुलन बनाये रखते हैं। कितने ही व्यक्ति छोटे-मोटे आघातों को भी सहन नहीं कर पाते । साहस एक सन्तुलन के अभाव में सामने आये संकट का सामना नहीं कर पाते । थोडे प्रयत्न पुरुषार्थ से प्रस्तुत संकटो को टाला जा सकता था उनसे भी जूझ पाने में असमर्थ होते हैं। जब कि कितने ही साहसी जीवट सम्पन्न व्यक्ति जीवन-मरण के तुल्य सवटों में भी धैर्य नहीं खोते । साहस एवं सन्तुलन बनाये रखते हैं तथा भविष्य के प्रति आशन्वित रहते हैं।

ऐसे जी जीवट वा व्यक्ति मौत को भी चुनौती देत-उन्हे खेल खिलवाड समझ कर जुझते है। उनके प्रचण्ड पुरुषार्थ साहस एवं जीवन के प्रति अदम्य प्रेम को देखकर थोडे समय के लिए मृत्यु को भी सिर झुकाना और अपने इरादे में परिवर्तन करना पड़ता है। परिस्थितियों को उनके समक्ष नतमस्तक होना होता है। मृत्यु के निकट पहुँच कर वे भी अपना अस्तित्व बनाये रखने में सफल होते है।

सच तो यह है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को उतना प्रभावित नहीं कर सकती जितना कि उसकी स्वंय की मनःस्थिति । अन्तर का जीवट, साहस बना रहे तो हर स्थिति का सामना किया जा सकता तथा सामने आये अवरोधों को टाला जा सकता । यह न हो तो साहस के बलबूते अपना सन्तुलन बनाये रखा जा सकता है। अनेको ऐसे व्यक्तियों के उदाहरण समय-समय पर मिलते हैं जिन्होने विषम परिस्थितियाँ में भी असामान्य सूझ-बूझ एवं साहस का प्रदर्शन किया और मृत्यु को भी टाल सकने में सफल हुए ।

जर्मन के लेफ्टीनेन्ट वुर्त एजंलवी घटना उल्लेखनीय है। जुलाई 1957 में एक दिन उनके जहाज ने उड़ान भरी । कुर्त एंजील पैराटूपद-विग के कमान्डर थे। जर्मनी के आवेरहठान के निवट उनके विमान में आग लग गई । 1500 फीट की ऊँचाई से उन्हे छलाँग लगाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था । पैराशूट की रस्सियाँ ढीली-ढीली होने के कारण उससे भी विशेष सहयोग न मिल सका । असन्तुलित अवस्था में 90 किलामीटर प्रति घण्टे की गति से नीचे की ओर चले। गति अधिक होने के कारण पृथ्वी पर अपने ही भार से दो फीट नीचे धँस गये । कुछ समय बाद होश आने पर उन्होने शरीर में असह्म पीडा का अनुभव किया लगा कि पीठ का खून जम गया हो । एंजील की सीने की पसलियाँ टूट गई । एक फेफड़ा फट गया तथा रीढ़ की हड्डी भी टूट गई । खोजी दल उनके खतिग्रस्त शरीर को एम्बुलेन्स पर लादकर निकटवर्ती हास्पिटल में ले आया। डाक्टरों ने परीक्षण के उपरान्त घोषणा की लेफ्टीनेन्ट एंजील के बचने की सम्भावना नहीं है। उसके गूर्दे खराब हो चुके है । शरीर में पीठ एवं रीढ़ की हड्डियाँ बुरी तरह टूट गई हैं। फेंफड़ा फट गया हैं। डाक्टरो की इस घोषणा एवं शरीर की असह्म पीडा में भी एंजील ने हिम्मत नहीं हारी । डाक्टरो से उसने बडे़ साहस एवं विश्वास के साथ कहा , “मैं मर नहीं सकता । अभी मुझे बहुत काम करने है। आप सभी अपना कर्तव्य पूरा करे ।” डाक्अर को उनके इस साहस अटूट विश्वास पर आर्श्चय हुआ और प्रेरणा भी मिली । निरन्तर दो माह तक मृत्यु से जूझते हुए वह अपने को साहस एवं संकल्प के सहारे बचा सकने में सफल हुए । चिकित्सको ने एंजील का मृत्यु की गोद से लोट आना एवं असामान्य घटना मानी । उसकी जिजीविषा एवं साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की ।

आशा ही जीवन और निराशा ही मौत है। प्रस्तुत संकटा के समक्ष हिम्मत हार कर घुटने टेक देना कायरता का प्रती है। कई बार तो लोग भावी आशंकाओ से अथवा संकट का नाम सुनकर भी इतना घबड़ा जाते हैं कि उन्हे अधिक क्षति उठानी पड़ती है। कथा प्रचलित है कि एकबार यमराज ने एक दूत को दस हजार व्यक्तियों को मार कर लाने का आदेश दिया । दूत वापिस लौटा तो उसके साथ बीस हजार व्यक्ति थे । यमराज द्वारा पूछे जाने पर दूत ने बताया कि उसने मारा तो दस हजार व्यक्यों को ही था । पर अतिरिक्त दस हजार भयभीत होकर अपने आप बेमौत मर गये। अनेकों व्यक्ति प्रतिकूलताओं में अपना साहस एवं सन्तुलन गँवा बैठते तथा असमय मृत्यु की गोद में जा पहुँचते हैं। जब कि जीवन को पार करने भीषण संकटो में भी अपना मनोबल बनाये रखते और अदम्य साहस का परिचय देते हैं।

8 जुलाई 1975 जर्मनी निवासी 24 वर्षीय नव-युवक भुरे घास की गठरी बनाने वाली अपनी नर्इ्र खरीदी हुई मशीन का परीक्षण कर रहा था । घर से तीन किलो मीटर दूर खेत में वह कार्य कर रहा था। अन्धेरा होने को आया, उसने मशीन को ठीक करने के लिए हाथ बढ़ाने पर उसका दाहिना हाथ पट्टे में फँस गया । उसने वाँया हाथ बढ़ाया , पर दुर्भाग्यवश वह भी फँस गया । खींचने के प्रयास में हाथ की हड्डियाँ टूट गई । कन्धो तक दानों हाथ की हड्डियाँ पिस गई । भूरे की पत्नी इधर वर पर उसके आने का इन्तजार कर रही थी । अधिक देर होने पर खोज खबर लेने वह खेत पर पहुँची । दूर से ही उसे भूरे की चींख सुनायी पड़ी । दौड़ते हुए उसने खेत पर जाकर जो हृदय विदारक दृश्य देखा उसको देखर रोंगटे खड़े हो गये। भूरे जीवन-मरण के मध्य मशीन से चिपटा जूण् रहा था। पर इतने पर भी उसका सन्तुलन यथावत बना था । पत्नी को मशीन बन्द करने का निर्देश दिया । पर दुर्भाग्य ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा । कुछ तकनीकी गड़बडी होने से मशीन बन्द न हो सकी । दौड़ती हुई वह निकट के फार्म पर किसी को सहयोग के लिए बुलाने गई । कुछ व्यक्ति सहयोग के लिए पहुँचे । अथक प्रयत्न के बाद भी भूरे को मशीन से झुड़ाया न जा सका । इतने में सूचना दिये जाने पर डाक्टर एवं एम्बुलेन्स भी पहुँच गई भुरे को मंशीन से अलग करने के लिए हाथ काटन के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं था । डाक्टर भी इस विदारक स्थिति को दखकर दहल गये। पर भूरे ने साहस नहीं खोया । सन्तुलित स्वर में उसने कहा,”डाक्टर मेरे दोनो हाथ काट कर अलग करो। डाक्टर हिचकिचाये , पर भूरे की जान इससे कम में नहीं बच सकती थी । उसने पूनः डाक्टरों को हाथ काटने का निर्देश दिया । पूरे चार घण्टे तक वह मशीन से जूझता रहा । हाँथ कटने के बाद डेढ़ माह तक उसे अस्तपाल में रहना पड़ा । चिकित्सकों से उसने कृत्रिम हाथ लगाने का अनुरोध किया जिससे वह कृषि कार्य को पूर्ववत कर सके। निरन्तर अभ्यास से उसने कृत्रिम हाथों के सहारे इतना कुछ सीख लिया जिससे खेती के तथा स्वयं से जुडे़ आवश्यक कार्यो को कर सके। मनोबल, साहस एवं सन्तुलन न होता तो मशीन में चार घण्टे मृत्यु से जुझने के बाद वह नहीं बच पाता । पर उस विषम स्थिति में भी उसने जिस जीवट का परिचय दिया वह प्रेरणास्पद है।

संकट तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ तो प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आते हैं और प्रभावित भी करते हैं, पर वे मानवी सामर्थ्य से सशक्त नहीं हो सकते। जीवन के प्रति आशा एवं उत्साह बना रहे , साहस एवं पुरुषार्थ का क्रम जुड़ा रहे तो संकट भी टल जाते हैं और परिस्थितियाँ भी ऐस जीवट सम्पन्न व्यक्ति के समक्ष नत-मस्तक होती है।


Quotation

उस पर विश्वास न करो जो मुँह सामने तुम्हारी प्रशंसा के पुल बाँधता रहता है। सच्चे प्रशंसक को वैसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।


अनीति के दूरगामी दुष्परिणाम

अनीति, अत्याचार, दूराचार व्यक्तियों को ही नहीं वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। अचिन्त्य चिन्तन और अकरणीय कर्मो का प्रभाव वातावरण में बना रहता हैं और सर्म्पक में आने वाले व्यक्यों एवं वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। उनका प्रभाव स्थायी रुप से विद्यमान रहता है। इस तथ्य को सूक्ष्मदर्शी जानते है। यही कारण है कि शास्त्रो से लेकर महामानवों तक सबने ही नीतियुक्त उपार्जन एवं उपभाग पर ही बल दिया है। दुष्कर्मा से बचने तथा सत्कर्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है। अनीति अनाचार से तुरन्त का लाभ तो मिल जाता है, पर लाभ कमाने वाला भी अनततः नफे में नहीं रहता । अनैतिक उपार्जन विभिन्न प्रकार के रोग-शोक साथ लेकर प्रकट होता तथा मानव मन पर वैसा ही संस्कार भी डालता है। यह संस्कार इसी जीवन तक नहीं रहते वरन् जन्म-जन्मान्तरों तक बने रहते तथा मनुष्य को परेशन करते हैं । मन की सूक्ष्म परतों मर जमे इन संस्कारों को दूर कर सकतना अति कठिन पड़ता हे। साधना उपचार की सामान्य क्रियाओं से लेकर कठोर असामान्य तपश्चर्याओं तक का अवलम्बन लेना पड़ता है ?

दुष्कर्मा का प्रभाव अपने तक ही सीमित नहीं रहता । वातावरण पर भी पड़ता हे। सर्म्पक में आने वाले उसी स्तर की प्रेरणाऐं लेते तथा कर्म करते देखे गये हैं। कमजोर मनोभूमि के व्यक्ति उनके प्रभाव में आकर पतन की ओर बढ़ते हैं ? अनीति युक्त उपार्जन एवं दुष्कर्मो का प्रभाव जड़ वस्तुओं पर भी पड़ते देखा गया हैं। वैभव एवं अनैतिक संग्रहित सम्पति को देखकर प्रत्येक व्यक्ति के मन में स्वाभाविक घृणा एवं ईर्ष्या उत्पन्न होती है आक्रोश उभरता है अनीति के शिकार बने पीडित हुए व्यक्तियों की संवेदनाएँ एक ऐसे उत्तेजनापूर्ण विचारों से युक्त वातावरण का निर्माण करती है, जो प्रयोगकर्ता के इर्द-गिर्द चारों ओर छायी रहती है। अनैतिक व्यक्ति उन विचारों के कारण सदा उत्तेजित एवं अशान्त बना रहता है। शान्ति एवं सन्तोष उसके लिए दुर्लभ वस्तु बन जाती हैं। उसकी स्वयं की अन्तरात्मा भी सदा कोसती रहती है। आत्म प्रताड़ना एवं दूसरों के संवेदनात्मक विचारों के दोहरे प्रहार से उसकी स्थिति विक्षित्तों जैसी हो जाती है।

अनीति मार्ग से उपार्जित वस्तुएँ भी अभिशिप्त बन जाती हैं और उपयोगी साधन के स्थान पर बाधक सिद्ध होती हैं। कई बार तो उसके प्रयोग करने वाले अनेंको व्यक्ति जान से तक हाथ धोते देखे गये है।

आस्ट्रिया के युवराज अंकिड्यूक फ्राँज फर्डिनेड की खरीदी हुई आलीशान कार एक ऐसे ही दुर्भाग्य की कहानी है जिसमें अनेकों व्यक्तियों की जाने गइ। युवराज की क्रूरता एवं अत्याचार अपने समय पर चरम सीमा पर था । शोषण और दमन के चक्र में अनेकों बेगुनाह पीसे गये । कितनों को कर न दे सकने के कारण जान से मरवा दिया ।

शोषित धन से युवराज फर्डिनेड ने एक लाल रंग की कार खरीदी । 28 जून 1914 को वह अनी पत्नी ‘डचेस होहेनवुर्ग’ को ‘वेस्तियाँ’ के गवर्नर के यहाँ एक निमन्त्रण में रवाना हुआ । नगर अभी दूर था । अचानक एक बम का गोला सनसनाता हुआ कार के निकट आकर फूटा । कार के साथ चल रहे चार अंगरक्षक घुड़सवार विस्फोट से घायल हो गये। उनकी स्थिति आगे बढ़ने की नहीं थी, पर युवराज ने मरहम पट्टी कराकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए किसी प्रकार राजी किया । ‘सराजेलो’ नामक नगर में पहुँचते ही एकाएक ड्राईवर का हाथ अपने आप स्टेयरिंग पर एक गली में घूम गया । जहाँ एक व्यक्ति रिवाल्वर लिए खड़ा था । इसके पूर्व की अंगरक्षक पहुँचे और युवराज सम्भले, बिना एक पल रुके रिवाल्वरधारी अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाने लगा । देखते ही देखते युवराज एवं उसकी पत्नी ‘तत्कार मृत्यु की गोद में पहुँच गये । हत्यारे आक्रमणकारी का कोई सुराग न मिल सका ।

सरजिवी के पाँचवी आस्ट्रियन सेना के सेनापति जनरल पोत्योरके ने उक्त कार की ओर आकर्षित होकर अपना आधिपतय जमाया । जिस दिन कारसेनापति के कब्जे में आयी उसके इक्कीसवे दिन वह युद्ध में हार गया तथा कार से भागते हुए रास्ते में एक दुर्घटना के फलस्वरुप मृत्यु हो गई । जनरल पोत्येरेक की मृत्यु के बाद उक्त सेना के कप्तान ने ‘कार ‘ का प्रयोग आरम्भ किया । किन्तु दुर्भाग्यवश ठीक नवे दिन दो किसानों को कुचलती हुई पुलियामें जा टकरायी । इस प्रकार कप्तान सहित दोनों किसान मारे गये । अब सेना के अन्य किसी अधिकारी को भयवश कार प्रयोग करने की हिम्मत नहीं पड़ी । फलस्वरुप उसे गवर्नर के पास भेजा गया। कार के आकर्षण से गवर्नर के पास भेजा गया। कार के आकर्षण गवन्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा । उसे ठीक कराकर उसने प्रयोग करने की बात सोची । अभी दो माह ही मरम्मत के बाद प्रयोग करते हुए होंगे। इतनी ही अवधि में पाँच दुर्घटनाएँ हुई। जिसमें अन्तिम दुर्घटना इतनी खतरनाक थी कि किसी प्रकार गवर्नर की जान बच सकी । पर उसे अपने दाहिने बाजू से हाथ धोना पड़ा । क्रोधित होकर गवर्नर ने कार को नष्ट करा देने की बात सोची । पर एक डाक्टर के अनुनय-विनय पर कम कीमत में ही कार को दे दी ।

दुर्भाग्य ने साथ यहाँ भी नहीं छोड़ा एक रात डाक्टर हास्पिटल से वापस लौट रहा था कि कार के ब्रेक ने काम करना बन्द कर दिया , कार सडक के किनारे एक बिल्डिग से जा टकरायी और उलट गयीं। डाक्टर की तत्कार मृत्यु हो गई।

पर इसे एक आर्श्चय ही कहा जाना चाहिए कि इतनी दुर्घटनाओं के बाद भी कार का इन्जिन चालू स्थिति में बना रहा । लगता था कोई अदृश्य आत्मा उसके साथ बैठी सुरक्षा कर रही हो। यह सिसिला यहीं समाप्त नहीं हुआ । कार को कम कीमत पर एक व्यापारी खरीद कर ले गया । एक सप्ताह बाद उसने आत्म हत्या कर ली । पुलिस ने कार को अपने संरक्षण में लिया । जिसे स्विटजरलैण्ड के एक रेस ड्राईवर ने खरीद लिया । उसने कार की ठीक प्रकार से मरम्मत करायी । ‘डेलायाइट’ नामक स्थान पर एक ‘कार’ रेस प्रतियोगिता’ आयोजित हुई । रेस में कार का प्रयोग किया गया । पर कार ने अपनी करामात यहाँ भी दिखायी । ड्राईवर एक दीवार से जा टकराया दुर्घटना के फलस्वरुप उसकी जीवनलीला समाप्त हो गई।

एक व्यक्ति द्वारा पुनः यह कार अपने पुराने स्थान ‘सेराजेवा’ पहुँची । एक किसान ने सस्ते दाम पर खरीदा तथा दो बैलगाडियों में बाँधकर बनवाने के लिए चला । कुछ ही दूर चलने के बाद अचानक कार का इन्जन अपने आप स्टार्ट हो गया । कार दौड पडी । फलस्वरुप गाडी बैलो समेत कुचल गई और किसान भी मारा गया इस बार कार चकनाचूर हो गई । फिर भी उसका आकर्षण बना रहा पुरानी कारो की खरीद बिक्री करने वाले ‘टाईवर इर्शफील्ड’ नामक व्यक्ति कार की मरम्मत कराकर चलाने लगा । कार इतनी अच्छी चलने लगी जैसे कभी कोई दुर्घटना न हुई हो । एक दिन इर्शफील्ड अपने छै मित्रो के साथ कार में बैठ कर एक भोज में भाग लेने के लिए चला । कुछ ही दूरचलने के बाद सामने आती हुई एक दूसरी कार से जा टकरायी । अपने चार साथियों के साथ वह मारा गया । बचा हुआ एक मित्र घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती हुआ ।

इस बीच कार की ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी । उसके अभिशप्त होने की खबर सबको लग चुकी थी । आस्ट्रिया सरकार ने उसको ठीक कराकर एक मुर्दा घर को सौंप दिया । उन दिनों द्वितीय महायुद्ध आरम्भ हो चुका था। एक दिन अचानक मुर्दा घर में कई बम गोले फट पडे़ और साथ ही आग लग जाने के कारण कार भी ध्वस्त हो गई । अपने साथ अनेको व्यक्तियो की जान लेते हुए कार सदा के लिए समाप्त हो गई सूक्ष्य-दर्शियो ने दुर्घटनाओं का तारतम्य युवराज के शोषण एवं दमन की शिकार से व्यक्तियों की सम्वेदनाएं भूत बनकर साथ लगी हुई है। वे नहीं चाहतीं कि उनके शोषण से खरीदी गई कार का कोई उपयोग करे। अतः जिसने भी प्रयोग किया उनके कोप का भाजन बना ।

अनीति युक्त उपाज्रन सदा हानिकारक ही सिद्ध होता है। आत्म प्रताड़ना, लोक प्रताड़ना से लेकर अनेकों प्रकार के कोपों का भाजन बनना पड़ता है।


प्रकाश की अपराजेयता

सूर्यदेव ने अपनी अन्तिम किरणें समेट लीं । चारों और घना अन्धकार छा गया । प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई दे रही थी । सूर्य के अस्त होते ही सर्वत्र नीरवता छा गई। अन्धकार की घनी तमिस्त्रा को देखकर भयाकान्त हुए सभी एक स्वर से बोल उठे अब क्या होगा ?

सर्वत्र अपना ही साम्राज्य देखकर अन्धकार गर्वोन्मत हो उठा । उसने बडे़ दप्र के साथ घोषणा की “मैने प्रकाश को जीत लिया है। सूर्य को , प्रकाश के अस्तित्व को समाप्त कर दिया है। उनका अवसान हो गया । अब तो सर्वत्र मेरी ही सत्ता है राज्य है। प्रसन्न होकर बोला अब मेरी ही पूजा, अर्चना होगी ।

एक छोटा दीपक अन्धकार की दर्प भरी बातें सुन रहा था । उसने सोचा प्रकाश के अभाव में कही अन्धकार सचमुच ही आधिपत्य न जमाले । भयातुर संसार का कौन मार्ग दर्शन करेगा । उसने अपने अन्दर झाँका तो पाया कि नन्हा हुआ तो क्या हुआ वह भी कुछ कर सकता है। अपनी नन्हीं लौ को उसने बाहर किया प्रकाश किरणें विखेरते हुए अन्धकार से बोला “तुम्हारा यह अंहकार मिथ्या है। तुम्हारा कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। हमारी अनुपस्थिति तुम्हारी सत्ता का कारण बनती है। सूर्य न सही किन्तु जब तक हम है प्रकाश मिट नहीं सकता ।

दीपक की बात सुनकर अन्धकार अट्टहास कर उठा और कहने लगा ,”इस तुच्छ से दीपक की इतनी धृष्टता, इतना साहस । प्रकाश पुँज विशाल सूर्य को तो निगलते मुझे देरी नहीं लगी, मेरे आते ही उसका अवसान हो गया । फिर इसकी क्या विसात जो मुझसे संघर्ष कर सके । अन्धकार ने क्रुद होकर अपनी कालिमा और घनी कर दी नन्हे दीपक की प्रकाश किरणों को ढकने का प्रयत्न करने लगा ।

किन्तु नन्हा दीपक तनिक भी भयभीत न हुआ । उसे अपने पुरुषार्थ पर विश्वास बना रहा । स्थिर लौ से सतत प्रकाश बखेरता रहा । समय बीतता जा रहा था अन्धकार तीव्र वेग से अपनी गहनता ओर भी बढाता जा रहा था। बढ़ती हुई कालिमा का नन्हे दीपक पर थोडा भी प्रभाव न पडा । दृढ संकल्पो से युक्त अटूट निष्ठावान साधक की भाँति वह अपने लक्ष्य में जुटा रहा और स्वर्गीय लौ से प्रकाश फैलाते हुए भयाक्रान्तो को पथ दिखाता रहा । रात बीतती जा रही थी । धीर-धीरे एक दो और तीन पहर रात्रि समाप्त हो गई और यह नन्हा साधक अन्धकार से जुझने के लिए लडता रहा । अन्धकार ने अपनी सारी शक्ति लगा दी किन्तु नन्हे दीपक को पराजित न कर सका । वह छोटा प्रकाश स्त्रोत अविचल भाव जलता रहा और स्तत प्रकाश बिखेरता रहा । अन्धकार नन्हे दीपक के प्रचण्ड पुरुषार्थ , ध्येय , निष्ठा एवं साहस को देखकर भयभीत हो उठा । जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था उसका डर और भी बढ़ता जा रहा था ।

रात्रि का अन्तिम पहर बीता और पूरब दिशा से उषा का आगमन प्रारम्भ हो गया । प्रभात में सूर्यदेव की स्वर्गीय किरणो से अपनी सुरक्षा करने के लिए अन्धकार कूच करने लगा । सर पर पाँव रखकर भाग गया । भगवान सूर्य को नन्हे दीपक ने अभिवादन किया और निवेदन किया -हे ज्योति पुँज संसार के प्रकाश स्त्रोत तुम महान हो । अब अपनी आभा से जगत को प्रकाश दो ।

जलते हुए नन्हे दीपक की अनवरत साधना त्याग एवं बलिदा वे समक्ष भगवान सूर्य भी नत-मस्तक हो उठे। उनकी आँखो में स्नेह की अश्रुधारा बहने लगी । प्यार से दीपक पर हाथ थपथपाते हुए उन्होंने कहा कि, “तुमने अपनी सतत साधना से प्रमाणित कर दिया कि प्रकाश कभी पराजित नहीं हा सकता । महान तुम हो । तुम्हारा त्याग अनुकरणीय होगा । तुम्हारी महानता के समक्ष मैं नत-मस्तक हूँ। मेरा प्रणाम्-अभिनन्दन स्वीकार करो।” उन्हे दीपक ने सन्तोष की साँस ली और अपनी लौ को समेटते हुए विश्राम को चल पड़ा ।


वृद्धावस्था शरीर का नही,मन का रोग

यूनान के एक प्राचीन चिकित्सा शास्त्री और सन्त इब्नेसिया से किसी ने पूछा कि मृत्युपर्यन्त युवा और स्वस्थ रहने के लिए हमें क्या करना चाहिए ? इब्नेसिया ने जो उत्तर दिया वह बहुत ही साधारण था। उन्होने कहा ‘आजीवन युवा और स्वस्थ रहने के लिए किसी कठिन या विशेष उपाय की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी भूलों को सुधार लें और भ्रान्तियों से छुटकारा पा ले । क्या हैं वे भूले, जो असमय ही बुढ़ापा ला देती हैं और क्या हैं वे भ्रान्तियाँ जो रोग बीमारियों को नियन्त्रण देती हैं ? इसका उत्तर भी साधारण-सा ही है कि मनुष्य अपने आहार-बिहार और आचार-विचार को न जाने क्यों इतना बिगाड़ लेता है कि स्वास्थ्य संकट उत्पन्न् हो जाता है ? वस्तुतः किसी को स्वस्थ रहने के लिए डाक्टरों से सलाह लेने और मल्टी विटामिन, आँनिकों के सेवन की आवश्यकता नहीं है, डाक्टर की सलाह और औषधियों का सेवन तो तब आवश्यक है जब बीमार पड़ा जाय । प्रश्न उठता है कि बीमार हुआ ही क्यों जाए ? स्वस्थ रहना जब अपने हाथ की बात है तो बीमार होना भी अपनी ही इच्छा पर निर्भर है। चाहे तो स्वस्थ रहें, चाहे तो बीमार पडे़।

खानपान का असंमय, दिनचर्या की अनियमितता, श्रम-विश्राम का असन्तुलन और कृत्रिम अप्राकृतिक जीवन ही वे कारण है जो मनुष्य के स्वास्थ्य को चौपट करते है। अन्यथा खानपान में सादगी और संयम रखा जाय, नियमित दिनचर्या बना कर रहा जाय, पर्याप्त श्रम और पर्याप्त विश्राम किया जाय तो शरीर यन्त्र के किसी कलफर्जे को बिगड़ने-गड़बड़ाने की स्थिति ही नहीं आती और लम्बे समय तक स्वस्थ, निरोग और शक्तिशाली रहा जा सकता है। कहा जा सकता है कि बुढ़ापा तो अनिवार्य है। वह तो आना ही है, उसे रोका नहीं जा सकता । वह कहावत पुरनी हो चली जिसमें कहा जाता था कि ‘जवानी वह देखी जो जाकर के नहीं आती और बुढ़ापा वह देखा जो आकर के नहीं जाता ‘ हाल ही में हुई वैज्ञानिक शोधों के निर्ष्कष को दृष्टिगत रखते हुए इस कहावत में यदि कोई संशोधन करना पडे तो वह इस प्रकार होगा कि ‘जवानी वह देखी जो आने पर भगा दी जाती बुढ़ापा वह होता जो न आने पर बुलाया जाता ।’

स्वास्थ्य विज्ञानियों ने पिछले दिनों जो शोध अनुसंधान किये हैं उनसे यह निर्ष्कष सामने आये हैं कि जवानी का उम्र से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। वह उस समय भी बनी रह सकती है जिसे हम आमतौर पर वृद्धावस्था कहते हैं । जीवन की सभी अवस्थाएँ मनुष्य की आयु से कहीं किसी रुप में सम्बन्धित हैं तो उसकी धुरी चिन्तन पर ही टिकी हुई है। यदि कम उम्र का व्यक्ति अपने आपका प्रोढ़ समझे और तदनुरुप उत्तरदायित्व ओढे़ तो वह प्रौढ़ो की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है इसके विपरीत उपेक्षा और अवसाद के कारण जवानी भी बुढ़ापे में बदल सकती है। बुढ़ापे में भी जवान रहा जा सकता है यह मनुष्य के साहस, उत्साह, परिश्रम और मनोबल पर निर्भर है। ऐसे कई ऐतिहासिक उदाहरण मिल सकते हैं जिन्होंने वृद्धावस्था में जवानों से अधिक स्फूर्ति दर्शायी और जीवन के सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किये। गोस्वामी तुलसीदास ने पचास वर्ष की आयु हो जाने के बाद रामचरित मानस लिखना श्रु किया था । रवीन्द्रनाथ टैगार 90 वर्ष की उम्र तक साहित्य लेखन का काम करते रहे थे । वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान सालवलेकर पचपन वर्ष की आयु तक अध्यापकी करते रहे थे । रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत का अध्ययन आरम्भ किया और जीवन के उत्तरार्ध में संस्कृत तथा संस्कृति की वह सेवा की कि आज उन्हें इस देवभाषा के पुनरुद्धारकर्ता के रुप में ही जाना जाता है।

सन् 1932 में महात्मा गाँधी ने एक विदेशी पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि मै 63 वर्ष का जरुर हो गया हूँ, पर मुझे कभी ख्याल ही नहीं आता कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ जिस आदमी को ऐसा लगेगा वह पाठशाला के विद्यार्थी की तरह उर्दू का अध्ययन करेगा और कैसे बंगला तमिल, तेलुगू पढ़ने के सपने देखेगा ?” प॰जवाहर लाल नेहरु अस्सी वर्ष के करीब जा पहुँचे थे, पर उस उमर में भी वे दौड़ कर सीढ़ियाँ चढ़ते थे। भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी इसी के लगभग है, परन्तु वे अभी भी जवानों के से स्फूर्तिवान दिखाई देते है। दो वर्ष पूर्व ही समुन्द्र में एक जहाज से दूसरे जहाज पर रस्से के सहारे गये।

इतिहास में भी इस तरह के कई उदाहरण मिलते हैं जब लोगों ने जीवन के उत्तरार्द्ध में ही ऐसे काम किये जिनसे वे विश्वविख्यात हो गये । यूनानी नाटककार सोफोक्लीन ने 90 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिखा था । अंग्रेजी कवि मिल्टन 43 वर्ष की आयु में अन्धे हो गये थे । अन्धे होने पर उन्होंने अपना सारा ध्यान साहित्य सृजन पर केन्द्रित किया और 50 वर्ष की आयु में ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखा । जर्मन कवि गेटे ने 80 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘फास्ट ‘ पूरा किया था । 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी अपने क्षेत्र के अन्य सभी विद्वानों में अग्रणी था।

अंगे्रजी राजनीति का इतिहास जिनने पढ़ा होगा वे जानते होंगे कि ढलेडस्टन 79 वर्ष की आयु में तीसरी बार प्रधानमंत्री बना था और 85 वर्ष की आयु में उन्होनें ‘ओडेसी आँफ हारस’ नामक ग्रन्थ की रचना की । आठवीं जर्मन सेना का सेनापतित्व जअ पाल्वान हिन्डैन वर्ग को सौंपा गया तो वे 67 वर्ष के थे। 78 वर्ष की आयु में वह पार्लामेण्ट के अध्यक्ष चुने गए और 87 वर्ष की आयु तक इसी पद पर प्रतिष्ठित रहे। हैनरी फिलिनिम पिटैन जब फ्राँस के प्रधानमंत्री बनाये गए तब उनकी आयु 84 वर्ष की थी लायड जार्ज ब्रिटेन के मूर्धन्य राजनेता रहे हैं, 85 वर्ष की आयु में भी उनमें युवकों जैसी स्फूर्ति और काम करने की शक्ति थी । चर्चिल ने दूसरे विश्व युद्ध के समय जब इंगलैण्ड का प्रधानमन्त्री पद सम्हाला तो वे 80 वर्ष के थे। जनरल मेक आर्थर 90 वर्ष की आयु में भी 45 वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों के समान सक्रिय रहे। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति सिगमन 80 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह सक्रिय रहे।

अमेरिका के प्रख्यात उद्योगपति राकफैलट ने पूरी 100 वर्ष की आयु पाई और उन्हें कभी बेकार समय गुजारते नहीं देखा गया । एक-दूसरे व्यवसायी कोमोडोर विण्डरविट ने 70 वर्ष की आयु में व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश किया और 90 वर्ष की आयु में उनकी गणना संसार के प्रसिद्ध उद्योग पतियों में की जाने लगी। मोटर उत्पादक हैनरी फोर्ड 82 वर्ष की आयु में भी युवकों के समान चुस्त और क्रियाशील रहते थे।

महान साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशाँ ने 90 से 93 वर्ष की आयु के बीच इतना अधिक साहित्य लिखा जितना कि वे 50 से 90 की आयु के बीच नहीं लिख पाये थे। दार्शनिक वेनेदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रुप से 10 घण्टे काम करते थे । उन्होने दो पुस्तकें तो 85 वर्ष की अवस्था में ही लिखी। नोबुल पुरस्कार विजेता साहित्यकार मारिल मैटरलिक ने 88 वर्ष की आयु में ‘द ऐवाट आँफ सेटुवाल’ नामक पुस्तक लिखी जिसे उनकी रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लार्डबीवन वर्क 80 वर्ष की आयु में भी दस घण्टे नियमित रुप से अपने दफ्तर में बैठ कर काम करते थे।

टैनीसन ने 88 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘क्रासिंग द वार’ पूरा किया । दार्शनिक काण्ट ने 74 वर्ष की आयु में ख्याति अर्जित की और ‘गनथृपोलाजी’ ‘मेटाफिक्स आँफ ईथिक्स’ और ‘स्ट्राइफ आफ फैकल्टिज’ नामक पुस्तकें लिखी जो दर्शन की उच्चकक्षाओं में पढ़ाई जाती है। होबस ने 88 वर्ष की आयु में ‘इलियड’ का अनुवाद प्रकाशित कराया था चित्रकार टीटान का विश्व विख्यात चित्र ‘बैटिल आफ लिटाण्टो’ जब पूरा हुआ था तब उनकी आयु 98 वर्ष की थी।

अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री दादी रेनाल्डम ने पश्चिमी जगत में बहुत ख्याति अर्जित की । 65 वर्ष की आयु में जब वे चार बच्चो की माँ और दर्जनो नाती-पोतों की दादी बन चुँकी थी तब शिक्षा प्राप्त करने की सूझी और काँलेज जाने लगी । 69 वर्ष की आयु में वे कैलिफोनिया विश्वविद्यालय में स्नातिका हुई । इसके बाद वे हालीवुड पहुँची । उनकी रुचि, लगन और मधुर व्यवहार देखकर फिल्म डायरेक्टर ने उन्हे एक छोटा-सा रोल दे दिया । इस भूमिका को उन्होंने इतनी कुशलता के साथ निभाया कि बाद में उनके सामने फिल्मों के ढेर लग गये और वे लगातार 13 वर्ष तक फिल्मो में काम करती रही ।

कहा जा चुका है कि यौवन का आयु में कोई सम्बन्ध नहीं है वह वृद्धावस्था में भी वैसा रहा सकता है और छोटी आयु में भी विकसित हो सकता। बुढापे में भी जवान रहा जा सकता है और लोग वृद्धावस्था में युवको कीसी स्फूर्ति तथा कुशलता के साथ काम करते है इसके कुछ उदाहारण ऊपर दिये गए हैं। इसी प्रकार कम आयु में भी परिष्कृत और विकसित व्यक्तित्व का परिचय देने वालों की कमी नहीं है। आद्यशपराचार्य ने 32 वर्ष की आयु में ही इतना साहित्य रच डाला था कि उसे पढ़ने और समझने के लिए कई जीवन चाहिए । इतना ही नहीं उन्होने चारों धामों की स्थापना की , देशभर में घूम-घूमकर पंडितों से शास्त्रार्थ किया। 16 वर्ष की आयु से लेकर 32 वर्ष की आयु तक के सोलह वर्ष यदि लगन के साथ किसी दिशा में जुटा दिये जाये तो हर किसी के लिए उतना कुछ कर सकना सम्भव है जितना कि आद्यशंकराचार्य ने कर दिखाया ।

वायुयान के अविष्कारक विल्वट राइट और आरविल राइट बीस और तीस वर्ष के ही थे जबकि वे वायुयान उड़ाने का परीक्षण करने लगे थे और कुछ ही वर्षो में उन्होंने हवाई उड़ान भर कर संसर को आर्श्चय चकित कर दिया था । ब्लेज पास्कल ने +++ पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 19 वर्ष की अवस्था में लिखी और उसी आयु में गणना यन्त्र एडिन मशीन का अविष्कार कर लिया । वैज्ञानिक क्षेत्र में कितनी ही प्रतिभाएँ ऐसी हुई जिन्होने छोटी आयु में अविष्कार किये । एलीब्हिरची ने 28 वर्ष की आयु में कपास ओटाने की मशीन का आविस्कार किया । चार्ल्स मार्टिन हाल ने 23 वर्ष की आयु में विद्युत संश्लेषण द्वारा अल्युमिनियम उत्पादन की नई विधि पेटेण्ट कराई ।

इन बाल प्रतिभाओं के सम्बन्ध में यह भी कहा जा सकता है कि ये विलक्षण विभूतियों से सम्पन्न रही होगी। पूर्वजन्म के संस्कार इनके इस जन्म में छोटी अवस्था में ही उत्पन्न हो गए होगे। किन्तु इससे यौवन की अवस्था से कोई सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता । पूर्व जन्म के संस्कार स्वरुप ही सही इस जन्म में बचपन में ही प्रतिभा के अंकुर तो फूटे। फिर भी इस विषय को यही छोड़ दिया जाए तो उन लोगो को क्या कहेंगे जो वृद्धावस्था में भी जवानों से अधिक स्फूर्तिवान रहे हैं और । स्वस्थ, चुस्त ढंग से सक्रिय जीवन व्यतीत करते रहे है। वस्तुतः युवावस्था का आयु से उतना सम्बन्ध नहीं है जितना कि मनोभूमि और चित्र की दशा से । ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध साहित्यकार और रजानेता बेगामिन डिजरायली यौवन का सम्बन्ध मन की अवस्थासे बताते हुए कहा करते थे कि जिनने जवानी गँवा दी उनके पास कुछ और बचा ही नहीं । उनका अभिप्राय था कि महत्वपूर्ण कार्य करने का उत्साह, क्रियाशीलता, जोश, उमंग , स्फूर्ति और लगन का नाम ही यौवन है और यह यौवन स्वस्थ शरीर के भीतर विद्यमान स्वस्थ मन में निवास करता है।

इस सर्न्दभ में यूनान के प्रसिद्ध सलय चिकित्सक इब्नेसिया का कथन है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विचारों को स्वस्थ रखना आवश्यक हे । स्वास्थ्य रक्षा के सभी आवश्यक साधन निबाहते रहने पर भी यदि विचार शुद्ध नहीं हैं, मन निर्मल नहीं है तो स्वास्थ्य प्राप्ति का उद्देश्य कदापि प्राप्त नहीं किया जा सकता । शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार के स्वास्थ्यो पर आचार विचार का गहरा प्रभाव पड़ता है। अस्तु अपने आचार विचार को ठीक रखते हुए मन में उत्साह और उमंग रखकर स्फूर्ति , आशा तथा उत्साह को ही जीवन धन बनाया जाए तो चिरयौवन की प्राप्ति कोई असम्भव बात नही। वह तो एक मनःस्थिति का नाम है, जिसे तैयार करने के लिए आचार-विचार से लेकर रहन-सहन तक सर्वागपूर्ण साधना करनी पड़ती है।


आत्मिक प्रगति के तीन सुनिश्चित आधार अवलम्बन

विद्यार्थी को अच्छे नम्बर से उत्तीर्ण होने और उस सफलता के आधार पर उच्च पद पाने के लिए कई बातों पर आश्रित रहना पड़ता है। अपना निजी मनोयोग एवं परिश्रम तो सर्व प्रथम हे ही, उसके बिना तो गाड़ी एक कदम नहीं बढ़ती , पर इसके अतिरिक्त भी अन्य दो साधन चाहिए । इनमें एक है-उपयुक्त शिक्षक एवं सुनिश्चित पाठ्य-क्रम । दूसरा हे-अभिभावकों का सहयोग,अनुदान । यह तीनों सुयोग जब बन पड़ते है तो सफलता सुनिश्चित हो जाती है। इनमें से एक आधार भी लड़खडाने लगे तो समझाना चाहिए कि प्रगतिक्रम रुका और सफलता संदिग्ध हो गई अपवाद रुप में तो कोई एकाकी मात्र अपने बलबूते भी बहुत कुछ कर सकता है, पर साधारण क्रम यही है। निजी पुरुषार्थ के अतिरिक्त साधन और सहयोग को भी हर प्रसंग में आवश्यकता पड़ती है। उनके न मिल सकने पर सुयोग्यों को असफलता का दुःख उठाना पड़ता है।

छात्र की सफलता का उदाहरण देकर यह बताया गया है कि भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए सर्वत्र उपरोक्त त्रिविधि साधनों की आवश्यकता पड़ती है । जिन्हे मिल जाते है वे सफलता का श्रेय लेते हैं, जिन्हें इनसे वंचित रहना पड़ता है वे अपने प्रयत्न पुरुषार्थ में कोई कमी न पाते हुए भी दुीर्भाग्यग्रसित रहते है। पुरुषार्थ में कोई कमी न पाते हुए भी दुर्भाग्यग्रसित रहते हैं। पुरुषार्थ का महत्व सर्वोपरि होते हुए भी वह एकाकी ऐसा नहीं है जो अभीष्ट प्रतिफल उपलब्ध कर सके । साधन और सहयोग के बिना प्रबल पुरुषार्थ भी असफल रहता पाया गया है। विद्यार्थी को उपयुक्त अध्यापन न मिले और अभिभावक उसके लिए भोजन,वस्त्र , पुस्तक, फीस आदि का प्रबन्ध न करे ,तो पुरुषार्धी और मेधावी होते हुए भी उसे अभीष्ट प्रतिफल से वंचित रहना पडे़गा ।

आत्मिक क्षेत्र की सफलता के सम्बन्ध में भी यही बात है । साधना पद्धति सही और सुनिश्चित होनी चाहिए । दुर्भाग्य से इन दिनों भारतीय आध्यात्मिकता के क्षेत्र में इन दिनों आराजकता का साम्राज्य है। अन्य धर्मा में सुनिश्चित साधन पद्धतियाँ अपना प्रगति क्रम जारी रखते है। मुसलमानों में मौलवी और ईसाइयों में पादरी अपना-अपना नया मजहव नहीं चलाते । अपनी-अपनी नई साधना पद्धतियाँ नहीं गढ़ते । अपनी मनमर्जी के नये-नये मन्त्र और विधान नहीं उगाते, पर इस सम्बन्ध में हिन्दू समाज को दुर्भाग्यग्रस्त ही कहना चाहिए कि हर धूर्त गुरुनामधारी ने अपनी डेढ़ ईट की अलग मसजिद खडी की और ढाई चावल की खिचडी पकाई है। आठ कनीजिया नौ चूल्हे की कहावत व्यावहारिकतः कितनी सच हे यह कहना कठिन है। पर उपासना के क्षेत्र में हर गुरु नामधारी ने अपना एक विशेष सम्प्रदाय शास्त्रों , आप्त वचनों एवं परम्पराओं की पूरी अवहेलना करते हुए गढ़ लिया है। पर्यवेक्षण में उसे हारना न पड़े इसलिए यसह तुर्रा लगा दिया है कि जो विधि बताई गई है उसे प्रकट न किया जाय जब कि समस्त संसार में विज्ञ-जन अपने प्रतिपादनों की प्रामाणिकता एवं विशिष्टता सिद्ध करने के लिए उन्हें साहसपूर्वक तर्क एवं प्रमाणें सहित प्रस्तुत करते हैं तब अपने यहाँ किसी को न कहने का प्रतिबन्ध लगाया जाता है। इसका और कोई कारण नहीं, उस मनगढंत जाल-जंजाल की पोल खुल जाने का भय ही गोपनीयता का प्रतिबन्ध लगाता है। साधना विधियों की बहुलता और गोपनीयता की इस अराजकता के दिनों किसी सहज जिज्ञासु के लिए यह निर्णय करना कठिन पड़ता है कि इन तथाकथित गुरुजनों द्वारा बताई जाने वाली अनेकानेक उपासना विधियों में से किसे अपनाये, किसे छोडे़ । भ्रान्तियों, शंकाओं, सन्देहों और अनिश्चित दिशा धारा की मनःस्थिति साधक की निष्ठा में सबसे बड़ी बाधा है। इसके रहते किसी का अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचना कठिन है।

इस कठिनाइ्र के निवारण का गायत्री अभियान के सूत्र संचालकों ने प्राण-पण से प्रयत्न किया है और शास्त्र तथा आप्त परम्पराओं का लम्बे समय तक पर्यवेक्षण करने के उपरानत वह राजमार्ग प्रस्तुत किया है, उसे चुनौती दे सकना किसी भी तर्क, तथ्य एवं प्रमाणों को मान्यता देने वाले के लिए शक्य नहीं हो सकता । अध्ययन अनवेषण ही नहीं , अनुभव भी इस राजमार्ग का उत्कृषृता के सम्बन्ध में प्रमाण स्वरुप प्रस्तुत किया गया है। ‘साधना में सिद्धि का उपलब्ध होना ही उसके सही होने की सबसे बड़ी साक्षी है। प्राचीन काल के उदाहरणो पर जिन्हें सन्देह हो वे गायत्री युग लाने वाले सूत्र संचालक की निजी साधना और सिद्धि का पर्यवेक्षण करते हुए भी प्रतिपादन की प्रामणिकता का पता लगा सकते हैं। सन्देह निवारण की दृष्टि से यह साक्षी काफी वजनदार है।

आत्मिक प्रगति के लिए सुनिश्चित साधना पद्धति में गायत्री के अवलम्बन से बढ़ कर दूसरा मार्ग हो नहीं सकता इसे, भारतीय धमनियायाी क्रमशः अधिक अच्छी तरह समझते और अनुभव करते जा रहे है। उसके लिए उपयुक्त विधान क्या होना चाहिए, उसकी समुन्द्र मंथन जैसी लम्बी अनुसन्धान प्रक्रिया का जो निर्ष्कष नवनीत निकला है वह सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत है। गायत्री महाविज्ञान ये छोटी पुस्तिकाओं में उसे सरलतापूर्वक देखा,समझा जा सकता है । अब तो उनका प्रचलन भी इतना हो गया कि किसी नैष्ठिक साधक से पूछ कर निभ्रन्ति साधना पद्धति को जाना जा सकता हैं कोई सन्देह हो तो हरिद्वार मथुरा के केन्द्र उनका निराकरण समाधान करने के लिए विद्यमान हैं। ऐसी दशा में साधना से सिद्धि प्राप्त करने के मार्ग में जो प्रथम अवरोध ‘सही मार्ग-दर्शन ‘ न मिलने का-सही अध्यापक अध्यापन न मिलने का था , उसका समाधान मिल गया ही समझा जा सकता है।

मार्ग-दर्शन के अतिरिक्त प्रगति पथ पर अग्रसर होने का दूसरा अवलम्बन है पुरुषार्थ । पुरुषार्थ के दो पक्ष है एक श्रम, दूसरा मनोयोग। श्रम में स्फूर्ति और तत्परता होनी चाहिए । मनोयोग में तनमयता, निष्ठा का समावेश होना चाहिए । अन्यथा इन दिनों का स्तर नहीं बनता और चिन्ह पूजा होने जैसी स्थिति बनी रहती है। लकीर पिटते रहने को पुरुषार्थ नहीं बेगार भुगतना कहा जाता है। उसका प्रतिफल भी नगण्य ही मिलता है। साधना के क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए साधक की उपासना में साधन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कषृता का अधिकाधिक समनवय करना चाहिए । भजन-पूजन बेगार भुगतने की तरह क्रिया-कृत्य बन कर ही नहीं चलते रहना चाहिए वरन् उसमें सघन निष्ठा का समावेश होना चाहिए । इन दिनों युग पुरश्चरण का जो महान संकल्प चल चडा है उसमें संख्या और समय स्वल्प है, पर निष्ठा का स्तर बढ़ाने पर पूरा जोर दिया गया है। कहा गया है कि उसकी नियमितता और आवश्यकता भोजन, शयन से कम नहीं वरन् अधिक ही अनुभव की जानी और वत्र लिया जाना चाहिए कि भोजन या शयन से पूर्व निर्धारित साधना क्रम पूरा किया जाययेगा । किसी कारणवश बन नहीं पडा तो उसे छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, वरन् अगले दिनो साधन बढा कर उसे पूरा किया जाना चाहिए यह नैष्ठिक अनुशासन हैं । इसी को व्रत कहते है। व्रत के बिना साधना में शक्ति उत्पन्न ही नहीं होती । प्रत्यंचा खींचे बिना वाण की प्रखरता कहाँ दृष्टिगोचर होती है ?

साधनात्मक पुरुषार्थ में (1) उपासना का नियमित और निश्चित होना (2) व्यक्तित्व में पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश बढ़ना । (3) तपश्चया्र की संयम एवं सेवा शर्तो की पूरा किया जाना-यह तीन चरण हैं। साधक इन्ही के सहारे इतना सशक्त बनता है कि अन्तराल से सिद्धियों का उभार-संगम से सम्मान, सहयोग और अदृश्य जगत की देवी अनुग्रह की विद्युत वर्षा होने लगे । इस वर्ष की नैष्ठिक उपासना में सप्ताह में एक दिन अस्वाद ब्रह्मचर्य एवं मौन की संयम साधना पर जोर दिया गया है। साथ ही नव सृजन के लिए अंशदान की उदारता बरतने में निष्ठावान रहना चाहिए इनहें तपश्चर्या की नीति अपनाने का अंगुलि निर्देश समझा जाना चाहिए इन्हें मात्र कृत्य की तरह पूरा भर नहीं कर लिया जाना चाहिए , वरन् उन्हें तपस्वी जीवन के आधार भूत सिद्धान्त समझा जाना चाहिए और निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि यह आदर्श व्यक्तित्व के अंग बनकर दबे देवत्व को उभारने का चमत्कार दिख सके ।

अध्यात्म क्षेत्र का आत्म-शोधन एवं आत्म-परिष्कार करना ही परम पुरुषार्थ है। इसी के लिए व्रत, संयम, तप के विभिन्न अनुशासन अपनाने पड़ते है। उपासना पद्धति में भी निष्ठा और नियमितता का अधिकाधिक समावेश करना पड़ता है। जो इस तथ्यों पर जितना अधिक ध्यान देता है वह उसी अनुपात से सच्चा साधक माना जाता है ओर उसी परिमाण से चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करता है। जो उस ओर ध्यान नहीं देते मात्र उपासना कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठते हैं उनको बाल बुद्धि की जादूगरी में रस लेने वाला कहा जा सकता है। हाथों की हेरा-फेरी और जीभ को लपालपी भर से तो बाजीगर ही चमत्कार दिखा सकते हैं। जो इतना भी नहीं समझते कि सस्ते उपचारों से बडे़ चमत्कार दिखाने वाले बाजीगर वस्तुतः खोखले होते हे और बाल मनोरन्जन करके पेट भरने मात्र की कमाई कर पाते है। साधना को जो बाजीगरी भर मानते हैं और देवताओं की छुट-पुट उपहार मनुहार से बरगलाये जा सकने जैसे मूर्ख मानते है वे भारी भूल करते हैं। तत्वतः आत्मिक क्षेत्र का पुरुषार्थ उपासना पद्धति और जीवन प्रक्रिया से उच्चस्तरीय निष्ठा का समावेश करते चलना ही है।

गायत्री परिवार के परिजनों ने अपनी साधना में निष्ठा का समावेश करने का प्रयत्न सदा से किया है अब युग सन्धि की बेला में वे उस प्रयास को और भी अधिक तत्परता के साध सम्पन्न करने जा रहे हैं। इन दिनों जागृत आत्माओं के कन्धों पर जो विशिष्ट उत्तर-दायित्व आये है उनका निर्वाह कर सकने में नैष्ठिक साधना अपनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा हैं । जो इस दिशा में जितनें शोर्य पराक्रम कर सकेंगे वे उतने ही बडे़ पुरुषार्थी कहे जायेंगे और आत्मिक प्रगति के सुनिश्चित परिणाम उत्पन्न करने वाले विविधि अवलम्बनों में से एक अति महत्वपूर्ण पक्ष की पूर्ति करेगे।

भौतिक प्रगति एवं समृद्धि का जितना महत्व समझा और ध्यान दिया जाता है उतना ही यदि आत्मिक क्षेत्र की उपलब्ध्यों के सम्बन्ध में दृष्टि रही होती तो निश्चय सामान्य परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति भी देव मानवो की भूमिका निभा सकने में समर्थ हो सके होते । चलता इतना है कि भौतिक सफलताओं के लिए छुट पुट आध्यात्मिक उपचार उपेक्षापूर्वक किये जाते हैं यदि आत्मबोध उगा और तत्व ज्ञान जगा होता तो आत्मिक प्रगति को प्रमुखता मिलती और भौतिक सुविधाओं की वैसी ही उपेक्षा बन पड़ती जैसी कि इन दिनों वैभव के निमित्त जीवनोद्देश्य की अर्वज्ञा होती रहती है। यह आन्तरिक परिवर्तन प्रस्तुत कर सकना ही सच्चे अर्थो में आत्मिक क्षेत्र का पुरुषार्थ है जो इसे जिस मात्रा में कर पाता है वह इसी कायकलेवर में रहते हुए अपने में देवी विशिष्टताओं का अनुभव करता और परिचय देता है।

आत्मिक प्रगति का तीसरा अवलम्बन है-वरिष्ठों का अनुदान । छात्र की सफलता का उदाहारण देते हुए कहा जा चुका है कि उसे अभिभावकों का बहुमुखी सहयोग मिलना चाहिएं। भोजन ,वस्त्र ,पुस्तक ,फीस, जअ खर्च अिद का सारा प्रबन्ध छात्र को स्वयं ही करना पडे़ तो अधिकाँश क्षमता उसी को जुटाने में नष्ट हो जायगी और फिर पढ़ने के लिए न फुरसत मिलेगी, न ताजगी रहेगी । ऐसी दशा में अत्यधिक भार बढ़ जाने से न उसकी पढ़ाई ठीक प्रकार चलेगी न सफलता ही सुनिश्चित रहेगी । छोटे बच्चे को माता दूध भी पिलाती है और उसकी अन्य सुविधाओं को भी जुटाती रहती है। यदि यह लाभ न मिले तो नवजात शिशु के लिए अपनी स्वल्प सामर्थ्य के बल पर जीवन धारण किये रहना भी कठिन हो जायेगा ।

आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त काम करता है। साधना के प्रति सच्चे अर्थो में जो निष्ठावान हैं, उन्हे सिद्ध पुरुषों के उच्चस्तरीय अनुदान मिलते हैं और वे स्वल्प पुरुषार्थ में भी उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकने में सफल होते है। विवेकानन्द को परमहंस का, शिवाजी को समर्थ का, चन्द्रगुप्त को चाणक्य का , बिनावा को गाँधी का अनुदान मिला और वे मूलतः अंिकचन होते हुए भी अन्ततः महान बन सकने में सफल हुए । हनुमान, अंगद और नल-नील को चमत्कारी उपलब्ध्याँ उनकी अपनी उपार्जित नहीं थीं वे अनुदान में मिली थी। कुन्ती पुत्र पाण्डव जो पराक्रम दिखा सके वह उनका निज का नहीं देव प्रदत्त था । गंगा लाये तो भागीरथ ही थे , पर उस सफलता में उन्हें शिवजी का अनुदान कम नहीं मिला था । तपश्चर्याएँ ऐसे ही अनुदान,वरदान प्राप्त करने के निमित की जाती है।

सर्वविदित है कि युग-निर्माण योजना के सूत्र संचालकों की अपनी उपार्जित आत्मिक सम्पदा जितनी है उससे असंख्य गुनी अनुदान स्वरुप मिलती है। यदि ऐसा न होता तो गोवर्धन उठाने और समुद्र सेतु बनाने जैसे जो महान प्रयत्न चल रहे हैं उनमें से एक भी अग्रगामी न हो सका होता ।

गुरु और शिक्षक में नैतिक अन्तर है। शिक्षक मार्ग दर्शक भर होता है। बतान, पढाने के उपरान्त उसकी जिम्मेदारीपूर्ण हो जाती है किन्तु गुरु की गरिमा इतनी सीमित नहीं है, उसे शिष्य को प्रशिक्षण से भी अधिक अनुदान देना पड़ता है अध्यापक कोई भी हो सकता है, पर अनुदान देने वाले अभिभवक तो भगयवानों को ही मिलते हैं। यदि यह आवश्यकता पूर्ण न हो सके तो मार्ग-दर्शन और पुरुषार्थ के दोनों आधार बन पड़ने पर भी एक बड़े महत्व का अवलम्बन अनुपलब्ध ही रह जाता है और उच्चस्तरीय सफलता संदिग्ध बनकर रह जाती है।

कई व्यक्ति ऐसे सिद्ध पुरुषों की तलाश में रहते हैं जिनके वरदान, आशीर्वाद से उनकी कठिनाई हल निकले एवं अभीष्ट सफलताओं में सरलता हो सके । ऐसे सिद्ध पुरुष प्राचीन काल में तो बहुत थे, पर अब भी उनका वंश नष्ट नहीं हुआ है। सत्पात्रों की उनकी सेवा सहायता अभी भी प्राचीन काल की तरह उपलब्ध होती है। फिर क्या कारण है कि प्राचीन काल में साधकों को ऐसे अनुदान मिलते रहते थे और अब वैसे सुयोग नहीं बनते । सिद्ध पुरुषों के वरदान प्राप्त करके जो गुरु कृपा की सराहना कर सके ऐसे भाग्यशाली कठिनाई से ही कहीं दीखते हैं। इच्छुकों की कमी नहीं वे भाग दौड़ भी कम नहीं करते-फिर भी जब निराशा हाथ लगती है तो अनेक प्रकार के सन्देह मन में उठते हैं । उनमें एक यह भी है कि सिद्ध पुरुषों की समाप्ति तो नहीं हो गई अथवा वे अनुदार तो नहीं बन गये ?

इस शंका के समाधान में इस तथ्य को भली प्रकार उजागर करना होगा कि महत्वपूर्ण अनुदान पात्रता के स्तर से सम्बन्धित है। पानी माँगने पर कहीं से भी मिल सकता हैं मनुष्यता का तकाजा एक दूसरे को सहयोग देते हुए जीवनयापन करने का है, पर बडी सहायता देने जैसे बडे़ कदम उठाने के लिए कोई तभी तैयार होता है जब प्रापत करने वाले की पात्रता परख ली जाय उदाहरण के लिए किसी के भी माँगने पर उसे बेटी नहीं दी जा सकती । जामाता को हार तरह ठोक-बजा कर देखना पड़ता है कि वह उसकी सुयोग्य बेटी के उपयुक्त है या नहीं । बडे़ अनुदान भी मिलते तो मुफ्त में ही हैं, पर उसके लिए पात्रता को कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ता है । माँगते ही मिल जाने की कोई परम्परा इस संसार में नहीं होते । याचना पूरी हो ही जायेगी इसकी कोई गारण्टी नहीं । बैंको से मुफ्त में धन लेकर सभी चैक भुनाने वाले निकालते हैं, पर इस लाभ को पाने से पूर्व अपनी जमा राशि अथवा लौटाने की जमानत का प्रबन्ध करना होता है। हर किसी की मनोकामना पूरी करने वाले अनुदान बढ़ने लगें तो बैंक ही नहीं देवता एवं सिद्ध पुरुष भी दिवालिया बन जायेंगे। पात्रता की कसौटी पर खोटे सिद्ध होने वाले याचकों को प्रायः खाली हाथ ही लौटना पड़ता है । ठीक यही बात देव मानवों द्वारा सामान्य-जनों को उपयोगी अनुदान देते समय भी ऐसी ही जाँच-पडताल करनी होती है और वैसी ही नीति बरती जाती है।

बैंको से पैसा उधार तो मिलता है, पर मजा उड़ाने या जमा करने के लिए नहीं । किसी ऐस उपयोगी काम के लिए दिया जाता है, जिससे देश की समृद्धि बढ़े और अनेकों को रोजगार मिले । लेने वाले उस ऋण को ब्याज समेत वापिस लौटाते और देश का उत्पादन बढ़ाने का परमार्थ करते रहते हैं। कमीशन से अपना मध्यवर्ती लाभ कमाते और समृद्धि भी बनते हैं। ठीक यही तरीका दिव्य सत्ताओं से वरदान, अनुदान प्राप्त करने का है। वह किसी को भी अमीर बनने के लिए नहीं मिला । यदि देव सत्ताएँ ऐसा करतीं तो वे पक्षपाती और चापलूसी के इशारे पर नाचने वाली कहलातीं। फिर उनकी गरिमा के साथ जुडी हुई उत्कृष्टता का कोई आधार न रह जाता और पूरा भाई-भतीजावाद, बिरादरीवाद पनपता। ऐसा लेन-देन ओछे मनुष्य ही निहित स्वार्थे से प्रेरित होकर कर सकते है । देवत्व की गरिमा अपनाने वाले दृश्य या अदृश्य सत्ताओं से कभी किसी की ननोकामना पूर्ति की नहीं-उच्च प्रयोजनों के लिए अनन्त रुप में अनुदान पाने की ही अपेक्षा करनी चाहिए यह परम्परा अभी भी मौजूद है। आत्मिक प्रगति के लिए सत्पात्रों को उच्चस्तरीय अनुदान देने वाली देवी बैंके अभी भी अपना लेन-देन प्राचीन काल की भाँति ही चलती रहती हैं। आत्मिक प्रगति का तार्त्पय है उच्चस्तरीय व्यक्तित्व और उसके साथ अविच्छिन्न रुप से जुड़ा हुआ लोक-मंडल परक कर्तृत्व। उच्च उद्देश्य के लिए उच्च अनुदान प्राप्त करने की सुविधा अभी भी जी चाहे प्रसन्नता पूर्वक प्रचूर परिमाण में उपलब्ध कर सकता है।


दिव्य अनुदान दिव्य प्रयोजनों के लिए

दैवी अनुदान उपलब्ध करने वालों की सूची तैयार की जा सके तो अनादिकाल से लेकर अद्यावधि एक भी ऐसा न मिलेगा जो उन वरदानों को पुण्य-प्रयोजनों में खर्च न करके अपनी वासना-तृष्णा की पूर्ति में लगाता बर्वाद करता रहा हो । जिनने ऐसी भूल की है या जिन देवताओं ने भूल की है उन दानों को ही दुर्गति सहन करनी पड़ी है । भस्मासुर का प्रसंग सर्वविदित है जिसमें उपलब्धकर्त्ता और दानी दानों को ही यातना और निन्दा का भागी बनना पड़ा था । रावण, कंस, रिण्यकश्यपु, मारीच ने दैवी-सिद्धियाँ प्राप्त करके उनसे निकृष्ट स्वार्थो की सिद्धि सोची और उनका प्रयास परिश्रम लाभदायक सिद्ध न होकर हानिकारक परिणाम ही उत्पन्न कर सका , यही सनातन क्रम है। ‘देवी अनुदान दिव्य प्रयोजनों के लिए’ -का अकाट्य सिद्धान्त जो सही रुप से समझ पाते हैं उन्हीं की सर्वागीण प्रगति में दैवी अनुकम्पा का , गुरु कृपा का समुचित सदुपयोग बन पड़ता है। उन्हीं को सच्चा लाभ मिलता है।

इन दिनों यह सुविधा अधिक सरलतापूर्वक असंख्यों को उपलब्ध हो रही है। वर्षा के दिनों नमी और हरितमा का दृश्य अधिक स्थानों पर देखा जा सकता हैं । युग सन्धियों में दैवी तत्वों को उभारने के लिए दिव्य अनुकम्पा वर्षा की तरह झरती है और जहाँ भी थोड़ी अनुकूलता पाती है वहीं अपनी उत्पादन शक्ति का परिचय देने लगती है। गड्ढे और नाले भी बिना प्रयास के भरेपूरे दीखने लगते है। अवतारों के प्रकटीकरण की बेला में यह प्रवाह और भी तेजी से बहने लगता है। रीछ-बानरों ने, ग्वाल-बालो ने अपनी सदाशयता भर निश्चित की थी इतने भर से उन्हें सामर्थ्य और श्रेय का अजस्त्र अनुदान मिलने लगा था, ठीक वैसी ही अवसर इन दिनों भी है।

कुछ समय ऐसे होते हैं जब साधकों को सिद्ध ढूँढते रहते हैं । कुछ समय ऐसे आते हैं जिसमें सिद्ध को साधक ढूँढने पड़ते है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं । समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए भगवान तूफान की तरह युगान्तरीय चेतना बनकर आते हैं और अपने प्रवाह में धूलिकणों और तिनकों तक को उछाल कर गगनचुम्बी बनने का अवसर प्रदान करते हैं । इसमें सारा पुरुषार्थ प्रवाह का होता है। उड़ने वालों में मात्र हलका होने की पात्रता भर होती है। भारी लठ्टों को तो तुफान भी नहीं उड़ा पाता । बुद्ध के परिब्राजक और गाँधाी के सत्याग्रही उन कृपणों की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ में रहे जिन्हे लोभ,मोह की हथकड़ी, बेडी पुण्य पव्र के रहते हुए भी ढीली करते न बन पड़ी ।

सामान्य अवसरों पर सेना में भर्ती होने के लिए अनेक प्रकार की जाँच प्ड़तालों में पास होना पड़ता है तब जगह मिलती है किन्तु देश पर शत्रु चढ़ आने की स्थिति में आपत्तिकालीन नियम बनते हैं और अनिच्छुक वयस्कों को भी बलपूर्वक सेना में भर्ती होने के लिए विवश किया जाता है। युग सन्धि ऐसी ही असामान्य बेला है जिसमें ध्वंस को सृजन में-दैत्य को देव में परिवर्तित करने के लिए सूक्ष्म और स्थूल जगत में कायाकल्प जैसी प्रक्रिया उफनती दृष्टिगोचर होगी । लोक चेतना में भरी हुई अवाँछनीयता की गलाई और उसकी उपयुक्तता के ढाँचे में ढलाई होने जा रही है। इसका दृश्य कैसा होता है इसकी झाँकी किन्हीं इस्पात गलाने ढालने वाले विशालकाय कारखाने में जाकर की जा सकती है। इस बीस वर्षो में ऐसी ही उथल-पुथल चलेगी। अन्ततः उसके सत्परिणाम ही निकल कर आवेंगे । समुद्र मन्थन के समय कैसा ही कुहराम, कोलाहल क्यों न मचा हो, अन्ततः उसके फलस्वरुप बहुमूल्य रत्न ही निकले थें । उज्जवल भविष्य की सम्भावना सुनिश्चित हैं । कष्ट कर तो परिवर्तन काल की प्रसव पीड़ा भर हैं।

युग सन्धि का पर्व बीस वर्ष का है। सन् 80 से 2000 तक चलेगा । इसमें नैष्ठिक साधकों की सहायता से युग पुरश्चरण चल रहा है, उन्हें आत्मबल संग्रह करने के लिए सूर्यादय से पूर्व और सूर्यास्त के उपरान्त जो दिव्य अनुदान प्रस्तुत गायत्री जयन्ती (23जून) से मिलने लगे हैं उनका विस्तृत विवरण अखण्ड-ज्योति के पिछले अंगो में आ चुका है। तदनुरुप अनेकों साधक उस विशेष अनुदान को अति सरलतापूर्वक उपलब्ध करने लगे हैं। यह युग पुरश्ररण के भागीदारों और नैष्ठिक उपासना का युग सन्धि अवधि तक साधना में रहनें वालों का उच्चस्तरीय अनुदान है। इस आधार पर वे अपनी नैष्ठिकता बनाये रहकर आत्मबल सम्पादित करेंगे और आत्म-कल्याग का लाभ अर्जित करेंगे ।

यह एक विशिष्ट वर्ग के लिए विशेष प्रकार के अनुदान है। इसका लाभ प्रायः एक लाख ऐसे साधक उठा सकेंगे जिनमें संचित संस्कारों की पूँजी तो पहले से ही विद्यमान थी । इस समय उसे निखारा और गतिशील भर किया गया है। सिद्ध पुरुष अपनी ओर से ऐसे ही लोगों को तलाशते रहते हैं, जिनके साथ स्वल्प श्रम करके अधिक लाभ कमाया जा सके। युग पुरश्चरण से जहाँ अदृश्य वातावरण के अनुकूलन और दृश्य हलचलों में सत्प्रवृति सर्म्बधन की सम्भावना बढ़गी, वहाँ उसमें सम्मिलित होने वालों के व्यक्तित्व भी बिखरेंगे। इस निखार से महामानवों की शक्ति और संख्या में आशाजनक अभिवृद्धि होगी ।

युग पुरश्चरण की भागीदारी लम्बे समय की है और उसके साि कइ्र प्रतिबन्ध भी जुडे हुए हैं- इसलिए उसके निर्वाह का साहस सीमित व्यक्ति ही जुटा सकेंगे-यह निश्चित है। धार्मिकता और साधना के इतने बड़े क्षेत्र में इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक लाख साधकों का लक्ष्य रखा गया है और उतने भर लोगों से ही युग पुरश्चरण की दैनिक साधना 240 करोड बनाये रहने का व्रत लिया गया है। यह महापुरश्ररण सामूहिक अध्यात्म उपचारों के इतिहास में अनुपम और अद्भुत है। उस प्रयोग के सत्परिणाम भी दूरगामी होंगे । इतने पर भी यह मानना ही होगा कि यह सीमित लोगों द्वारा वातावरण अनुकूलन जैसे विशिष्ट प्रयोजन को लेकर किया गया उपचार है। इससे सद्भाव सम्पन्न साधारण जनों को लाभ नहीं मिल सकेगा। क्योंकि वे नियमितता और निष्ठा के साथ जुडी हुई व्रतशीलता का निर्वाह उच्चस्तरीय मनोबल के अभाव में कर नहीं सकेंगे । ऐसे भी बहुत हैं जो कर तो सकते हैं, पर उसके लिए आवश्यक मनोबल न होने के कारण हिचकिचाते ही रहेंगे और वैसा साहस जुटा नहीं सकेंगे । इस वर्ग को द्वतीय श्रेणी के परिजन कहा जा सकता है। उन्हें पिछले निर्धारण के अनुसार युग सन्धि में बहने वाले विशिष्ट प्राण प्रवाह का वह अनायास लाभ नहीं मिल सकता जो युग पुरश्चरण के भागीदारों के निमित्त निश्चित है।

इस द्वितीय वर्ग के असमंजस को ध्यान में रखते हुए इसी गायत्री जयन्ती के (23जून) से एक नया निर्धारण किया गया है कि गायत्री परिवार के परिजनों में से कोई भी इस दिव्य अनुदान प्रवाह का सीमित लाभ उठा सकेगा और आत्मिक प्रगति के लिए जिस ‘अनुदान’ प्रयोजन की आवश्यकता पड़ती है उससे वंचित रहने का असमंजस सहन न करेगा ।

कहा जा चुका है कि हिमालय के मध्यवर्ती ध््राव केन्द्र से एक विशिष्ट ऊर्जा प्रवाह गायत्री जयन्ती से निसृत होगा । उसके साथ सम्बन्ध जोड़कर युग पुरश्चरण के भागीदार उसके सहारे उपलब्ध होने वाले अनुदानों से लाभान्वित होते रहेंगे । उसकी विधि-व्यवस्था से सभी भागीदारों को परिचित कराया जा चुका है। अब उसी सर्न्दभ में दूसरा प्रवाह उस वर्ग के लिए आरम्भ होने की व्यवस्थ बन गई है जिसका लाभ सामान्य गायत्री उपासक बिना किसी प्रकार का व्रत लिए जब भी चाहे ग्रहण कर सकते हैं। असुविधा होने पर उसे छोड़ा भी जा सकता है।

यह शक्ति संचार के त्रिविधि अनुदान इन्हीं दिनों आरम्भ होने है। इससे सामान्य गायत्री उपासक भी अपने स्तर के ऐसे दिव्य अनुग्रह उपलब्ध कर सकते हैं जिनको अभिभावकों द्वारा अपनी सन्तान को दिये जाने वाले सहज अनुदानों के समतुल्य माना जा सके ।


अब सभी जाग्रत परिजनों को यह लाभ मिलेगा

युग परिवर्तन की दो निर्धारणाएँ हैं-(1) मनुष्य में देवत्व का उदय (2) धरती पर र्स्वग का अवतरण इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जन-जन की मनःस्थिति में उत्कृष्टता का समावेश और परिस्थिति में आदर्शवादिता का समन्वय करना पड़ेगा । यही दो चरण हैं जिन्हे उठाते हुए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता हे। संक्षेप में इन कार्यक्रमों को विचार क्रान्ति और सत्प्रवृति सर्म्बधन कह सकते हैं।

इन प्रयासों को अग्रगामी बनाने का उत्तरदायित्व जागृत आत्माओं को उठाना पड़ेगा । नव-सृजन के अग्रदूतों में उन्ही की गणना होगी। साँचे में खिलौने या पुर्जे ढलते हैं। इसलिए पहले साँचे बनते हैं, पीछे खिलौने या पुर्जे सरलतापूर्वक ढलते चले जाते हैं। परिवर्तन तो 400 करोड़ मनुष्यों का होना है और परिस्थितियाँ मील व्यास वाले धरातल की बदली जानी हैं, इतना विस्तार एकाकी नहीं हो सकता । उसके लिए क्रमिक गतिशीलता आवश्यक है। लेखनी या वाणी द्वारा किया गया प्रचार मात्र मस्तिष्कीय हलचल उत्पन्न करता हैं। अनुगमन के लिए जन समुदाय को तैयार करने के लिए ऐसे अग्रगामियों की आवश्यकता पड़ती है जो अपने उदाहरण से दूसरों में साहस उत्पन्न कर सकें । उनके प्रयासों से सपरिणाम उत्पन्न होते या नहीं, यह देख कर ही सर्वसाधारण को उस प्रतिपादन को अपनाने का उत्साह मिल सकता है। इसलिए व्यापक क्षेत्र में सुगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए प्रतिपादनों की लाल मशाल ही नहीं उसे मजबूती से पकड़ने वाली संकल्पवान भुजा भी होनी चाहिए । विचार-क्रान्ति की ज्ञान गंगा का जब कभी उल्लेख किया जाता है तो उसे कर सकने वाले भागीरथों का-जागृत आत्माओं की भूमिका भी आवश्यक बताई जाती हैं।

प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों के निर्माण और प्रतिमा प्रतिष्ठा का अभियान एकाँगी नहीं है। उद्देश्य रहित बनते चले जाने वाले मन्दिरों में उनकी गणना नहीं हो सकती । दृश्य निर्माणो के पीछे वे अदृश्य योजनाएँ हैं जिन्हे नियुक्त परिव्राजकों द्वारा स्थानीय एवं क्षेत्रीय गतिविधियों द्वारा सत्प्रवृत्ति समबर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के रुप में सम्पन्न किया जायगा । दृश्य को काया और अदृश्य को प्राण कहते हैं। प्रज्ञा अवतरण की कार्य पद्धति जनमानस के परिष्कार और नव सृजन के रचनात्मक क्रिया कलापों को गतिशील करने में उभयपक्षीय है।

इसके लिए धर्म तन्त्र की पृष्ठ भूमि को अपनाया गया है। अर्थशास्त्र, राजनीति, समाज शास्त्र आदि भी सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन के लिए तर्क, उत्साह एवं कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकते हैं, पर उन सबमें एक ही कमी है कि आधार सुविधा सर्म्बधन मात्र रहने से भौतिकता की परिधि में लिपट कर छोटा रह जाता है। जबकि यह सारी प्रक्रिया उत्कृष्टता की भाव सम्वेदना पर आधारित है। आत्मीयता, उदारता, सज्जनता, सेवा, शालीनता, संयम त्याग बलिदान जैसी सद्भावनाएँ ही उन प्रयोजनों को किसी से पूरा करा सकती है जो युग अवतरण के लिए अभीष्ट है। भौतिकता की सीमा सुविधा सर्म्बधन तक हैं। उसके तर्क और उत्साह इससे आगे नहीं बढ़ते । आध्यात्मिकता ही है जो किसी को स्वंय तपस्वी रहने और दूसरों के प्रति असीम करुणा बखेरने के लिए सहमत कर सकती हैं, धर्म ही उच्चस्तरीय कर्तव्य निष्ठा के साथ मनुष्य को जोडे़ रह सकता है।

यु सृजन का आधार चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करना है। यह दोनों ही कार्य उथले भोतिक दर्शनों के आधार पर चिरस्थायी रुप से सम्पन्न नहीं किये जा सकते हैं। इन्हें लालच, लुभा कर नहीं-श्रद्धा भरे सद्भावना जगाकर ही सम्पन्न कराया जा सकता है। यह कार्य वस्तुतः धर्म और अध्यात्म का है। भौतिक दर्शन के आधार पर समृद्धि सर्म्बधन में अमेरिका, रुस, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्राँस आदि कितने ही देश आर्श्चयजनक परिमाण में सफल हुए है । इतने पर भी वहाँ सतयुग जैसी मनस्थिति और परिस्थिति बनने के लक्षण कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रहें । सर्वविदित है कि शालीनता के अभाव से समृद्धि उपयोगी नहीं रहती। कई बार तो वह दरिद्रता से भी अधिक विघातक बन जाती है। सम्पन्नता का अपना महत्व है किन्तु उत्कृष्टता की गरिमा तो उससे भी असंख्य गुनी बड़ी है।

इन समस्त तथ्यों पर विचार करने के उपरान्त युग निर्माण योजना के प्रतिपादनों से सन्निहित दूरदर्शिता और सुखद सम्भावना में सन्देह करने की गुन्जाइश नहीं रह जाती । प्रस्तुत विभीषिकाओं को सुखद सम्भावनाओं में परिवर्तित करने के लिए ही किया जाना है जो युग सृजन अभियान के द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है।

प्रतिपादनों के क्रियान्वयन के लिए अग्रगमन का साहस करने वाले जागृत आत्माओं पर ही घुमा-फिरा कर वे समस्त उत्तरदायित्व आ जाते हैं जिसके द्वारा उज्जवल भविष्य को प्रत्यक्ष बनाया जाना है। तर्क और तथ्य की दृष्टि से युगान्तरीय चेतना का समर्थन करने वालों की कमी नहीं । पर कभी उस साहसिकता की है जो इस पुण्य प्रयोजन के लिए कुछ कर सकने का पराक्रम प्रदर्शित कर सकें। परिस्थितियाँ असंख्यो की ऐसी हैं जो चाहें तो सरलतापूर्वक युग सृजन के लिए आत्म-कलयाण और विश्व-कल्याण के लिए-बहुत कुछ कर सकते है, पर मनःस्थिति में विपन्नता भरी रहने के कारण वे बहाने बाजी करते और बगले झाँकते देखे जाते है। आदर्श जब उभरते हैं विपन्नता और व्यस्त लाभों से भी आर्श्चयजनक स्तर के सर्त्कम करा लेते हैं । इसके विपरीत जब अन्तःक्षेत्र सोया रहता है, तो सुयोग्य और सुविधा सम्पन्न भी मनसुबे भर बाँधते हैं कुछ कर नहीं पाते । जबकि आज की स्थिति में हर स्तर को, विचारशील को आपत्तिकालीन, कर्तव्य पालन की तरह युग सृजन के लिए कुछ न कुछ करना ही चाहिए । क्या करना चाहिए ? इस सर्न्दभ में नव-सृजन अभियान के अर्न्तगत बहुत कुछ कहा और किया जा रहा है। उस दिशा में हर स्थिति का प्राणवान व्यक्ति किसी न किसी रुप से कुछ न कुद योगदान कर ही सकता है।

जागृत आत्माओं में उच्चस्तरीय आत्मबल कैसे जागे ? और वे किस प्रकार सच्चे अर्थो में स्वार्थ परमार्थ की साधना करते हुए आत्म-सन्तोष एवं ईश्वरीय अनुग्रह के भागी बन सके ? इसका उपाय युग प्रवाह के सूत्र-संचालकों को यह सूझा है कि सत्पात्रों को अतिरिक्त प्राणचेतना का अनुदान दिया जाय और उन्हे बाहर से सामान्य रहते हुए भी भीतर से असामान्य बनाया जाय। शक्ति और प्रगति का मूलभूत आधार अन्तरंग से ही रहता है इसे सभी विज्ञ-जन भली-भाँति जानते है।

अनुदान उपलब्ध करना और कराना भी अध्याय क्षेत्र की एक महान परम्परा है। उसे साधनात्मक पुरुषार्थ से कम नहीं वरन् अधिक ही महत्व दिया जा सकता है। साधना दीर्घकालीन तपश्चर्या के आधार पर फलित होती है किन्तु अनुदानों का लाभ तत्काल मिलता है । युग सन्धि की इस पुण्य बेला में उच्च सत्ता ने सत्पात्रों का दिव्य प्रयोजनों के लिए अनुदान वितरण का क्षेत्र और भी अधिक बढ़ा दिया है। अब तक वह नैष्ठिकों के लिए था । अब उसे जागृतों के लिए उपलब्ध किया जा रहा है।

पूर्व अंका में नैष्ठिक उपासकों के लिए प्राण संचार के विशिष्ट अनुदान का उल्लेख किया गया है अब उसकी हलके स्तर की उपलब्धि उनके लिए भी सुलभा हो गई है जा युग पुरश्चरण में ता सम्मिलित नहीं हो सके किन्तु प्रज्ञा परिवार में सम्मिलित हैं और आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याण के लिए कुछ करने की बात गम्भीरतापूर्वक सोचते रहते है। ऐसे लोगों के पैरों में गति और हाथों में प्रगति के सूत्र थमाने वाले अनुदान की आवश्यकता पडे़गी। इसकी पूर्ति करने के लिए महाकाल ने नया कदम उठाया है और दिव्य उपलब्ध कराने वाल ध्यान धारणा कानया द्वार खोला है । इस सुविधा का लाभ अब बिना युग पुरश्चरण में सम्मिलित हुए भी सभी जागृत आत्माओं को मिल सकेगा । इसे युग संधि का असाधारण उपहार समझा जाना चाहिए और उससे लाभन्वित होने का परिजनों में से प्रत्येक को प्रयत्न करना चाहिए ।


आत्मश्रेय और देवी अनुग्रह पाने का दुहरा सुयोग

मनोनिग्रह के लिए एकाग्रता की साधना करनी पड़ती हैं बिखराव को एकत्रित कर देने पर क्षमता कितनी अधिक बढ़ जाती है, इसे सभी जानते हैं। छोटे से अतिसी शीशे पर फैली हुई सूर्स किरणे जब एक बिन्दु पर जमा होती है तो देखते-देखते आग जलने लगती है। भाप को एक छिद्र में होकर निकालने पर उस शक्ति से रेल का ईन्जन चलने लगता है। थोड़ी-सी बारुद बन्दूक की पतली नली में होकर गुजरती है तो निशाने को पार करती चली जाती है। मानसिक बिखराव जब किसी लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित होता है तो अर्जुन के मत्स्य बेध जैसी चमत्कारी सफलता मिलती है। कला-कौशल के नाम से जानी जाने वाली अनेक विशिष्टताऐं तन्मयता के आधार पर ही उत्पन्न होती है। वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों में जो प्रतिभा उभरती है उसे एकाग्रता का ही प्रतिफल कहना चाहिए योग साधना की चरम परिणित ‘समाधि’ और कुछ नहीं तत्मयता की ही उच्चस्तरीय परिणिति है। उस क्षेत्र में आकर्षक चर्चा होती रहती है। इसे एकाग्रता का माहात्मय वर्णन ही समझा जाना चाहिए ।

अनुदानों के प्रसंग में भी श्रद्धापूर्ण तन्मयता ही अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती हैं। कीट भृंग का उदाहारण प्रख्यात है। भृंग कीडे़ को अपने समान बनाती है इसमें कीडे़ की तन्मयता का भी कम योगदान नहीं होता । इष्ट देव के अनुरुप साधक का ढल जाना । भौतिक क्षेत्र में भी संकल्पों को पूर्ण कर सकना इसी आधार पर सम्भव होता है कि तादात्मय किस स्तर का बन पड़ा भक्त की साधना भगवान के निकटतम सालोक्य, सामीप्य, और सामुजय स्थित तक पहुँचा देती है। भगवान की अनुकम्पा बरसती तो सभी पर है, पर उसे अन्तरंग में आकर्षित एवं धारण करने वाले ही ग्रहण कर पाते है।

दूध तो माता के स्तन से ही प्राप्त होता है, पर उससे लाभान्वित होने के लिए बच्चे को भी चूसने और पचाने का प्रयत्न करना पड़ता है। न तो अकेले बच्चे के चूसने से काम बनता है न माता ही स्तर निचोड़ने कर दूध को पेट में पहुँचाने और हजम करा देने में समर्थ होती है। अनुदानों के बीच भी दाता और ग्रहीता को अपने-अपने ढंग की भूमिका निभानी पड़ती है। रेडियो स्टेशन उपयोगी प्रसारण करते रहते है किन्तु उनका लाभ उन्हीं ट्रान्जिस्ळरों को मिलता है जो उन्हें पकड़ने की क्षमता से सम्पन्न होते हैं। समर्थ सद्गुरु की अनुकम्पा का लाभ सभी शिष्ट समान रुप से नहीं उठा पाते। उनकी श्रद्धा एवं चेष्टा भी उस सुयोग का लाभ ले सकने में एक बहुत बड़ा कारण होता है। मात्र बादल ही बरस कर हरियाली उत्पन्न नहीं कर देते इसके लिए भूमि की उर्वरता भी अपना काम करती है।

यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि युग सन्धि में जागृत आत्माओं को विशिष्ट प्रयोजन के लिए जो अनुदान मिलने लगे हैं उनसे लाभान्वित होने के लिए ग्रहीता की क्या भूमिका होनी चाहिए इस तथ्य को भली प्रकार समझा जा सके।

उच्चस्तरीय अनुदान दे सकने वाल सत्ताएँ न पूर्व काल में काम थीं और न अब कोई कमी हुई है। मात्र ग्रहणकर्ताओं की पात्रता ही घटी है। इस अभाव में अनुदान मिलने का सुयोग रहने पर भी इच्छुकों को खाली हाथ रहना पड़ता है । वर्षा होती तो चट्टानों पर भी है, पर कठोरता के कारण पानी का भीतर प्रवेश कर सकना ही सम्भव नहीं होता । गड्ढों में जल राशि जमा होती है पर टीलों की चोटियों में स्थिति अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ने जैसी ही बनी रहती है। गाय अपने बच्चे को दूध पिलाती है किन्तु भैंस का पड्डा यदि थनों से जा सलगे तो उसके लिए उदारतानहीं बरतती । गाय की अन्तःचेतना जानती है कि उसे किसे पिलानी चाहिए किसे नहीं।

युग संधि के दिनों में वर्षा ऋतु की तरह उच्चस्तरीय अनुदानों का प्रवाह सूक्ष्म जगत में चल पड़ा है। इसका प्रथम उद्देश्य सृष्टि सन्तुलन बनाने की ईश्वरीय इच्छा को पूरा करना है। अवतरण इसी प्रयोजन के लिए होते हैं। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन ही अवतारो का उद्देश्य रहा है। इन दिनों भी इसी उद्देश्य के लिए प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना गतिशील हो रही है। उसके अनुकूल वातावरण बन सके इसके लिए देव पक्ष का समर्थन करने वाले प्रवाह अदृश्य लोक से चल पड़े हैं।

दूसरा उद्देश्य संचित संस्कार सम्पदा वाले सत्पात्रों जागरुकों को सामयिक श्रेय मिल सके। सूखी हुई दूब भी वर्षा ऋतु आते ही हरी-भरी हो उठती है। यह उसका पुरुषार्थ नहीं सौभाग्य अनुदान है। सीप को मोती की उपलब्धि उसका पुरुषार्थ नहीं, समय का सुयोग एवं वरिष्ठ का अनुग्रह है। इसमें दाता और ग्रहीता दानों ही कृत-कृत्य होते हैं। दुर्भाग्य और कुछ नहीं, पात्रता के अभाव का प्रतिफल मात्र है विशेषतया सुअवसरों की उपेक्षा करना तो एक प्रकार स्वंय अपनाया गया अभिशाप है।

सामान्य समय पर याचकों को ही दौड-धूप करते देखा जाता है, पर कई बार प्रतिभाओं को उपयुक्त प्रयोजनों के लिए जब ढूँढना पड़ता है तो उन्हे छात्र-वृति का लालच देकर ढूँढा और बुलाया जाता है। अफसरों की भर्ती के लिए नियुक्ति आवेदन विज्ञापन छपाते हैं और मार्ग व्यय देकर साक्षात्कार के लिए बुलाते हैं। नियुक्ति की आकाँक्षा तो आवेदनकर्ताओ को भी रहती है, पर सुयोग्य ढँढ निकालने में नियुक्ति तन्त्र को उत्कंठा एवं तत्परता भी कम नहीं होती। परमहंस ने चिरकाल की खोजबीन के उपरान्त हजारों लाखों के भक्तजनों में से विवेकानन्द को ढूँढ निकाला था । सुयोग मिलने पर प्रसन्नता एक को नहीं वरन् दोनों ही पक्षों को हुई थी ।

युग सन्धि के इस पावन पर्व पर ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए निमित्त पुरुषार्थ करने और श्रेय पाने वालों की तलाश चल रही है। मार्ग व्यय देकर अनेकों आवेदन कर्त्ताओ को आग्रहपूर्वक बुलाया जा रहा है । इस खोजबीन में एक मौलिक अन्तर है। सरकारी नियुक्ति तन्त्र अपनी आवश्यकता के अनुरुप छाँटकर लेने के उपरान्त शेष को दो टूक मनाही कर देते है । पुस्तुत दैवी आमन्त्रण में ऐसी नहीं है। इसमें सर्वधा निराश किसी को भी नहीं किया जायेगा । जो जितने का -जिस स्तर का अधिकारी है उसे उतना तो दिया ही जायेगा । खाली हाथ किसी को भी लौटने की आशंका नहीं है।

हिमालय के मध्यवर्ती आध्यात्मिक धु्रव केन्द्रग से युग सन्धि के दिनों एक विशिष्ट प्राण प्रवाह रेडियो प्रसारण की तरह-वर्षा मानसून की तरह उमड़ता रहेगा । उससे लाभन्वित होने के लिए सभी जागरुकों को आमन्त्रित किया गया है। युग पुरश्चरण के भागीदारों का साहस एवं उत्तरदायित्व अधिक होने के कारण उन्हें अनुदान भी उसी स्तर का मिलेगा किन्तु जो उतना साहस न जुटा सकेंगे उन्हे भी अपनी पात्रता के अनुरुप हलके स्तर के उपहार पाने का अवसर मिलेगा । वर्षा में बडे़ तालाब और सरोवर भी अगाध जल राशि एकत्रित करते हैं किन्तु खाली रह जाने की शिकायत छोटे गड्ढो और पोखरों को भी नहीं रहती है। उन दिनों गणना उनकी भी सौभाग्यशलियों और उपलब्धकर्ताओं में ही होती है।

अकाल पड़ने पर कुँआ खोदने आदि के लिए तकाबी बाटने के लिए सरकारी अफसर स्वयं गाँव-गाँव घूमते हैं। इतना ही नहीं खोदने की सुविधा एवं जानकारी देते हुए प्रयत्नरत होने के लिए किसानों की खुशामद भी करते हैं। यों प्रत्यक्ष लाभ किसानों का ही है। पीने का पानी और सिंचाई का साधन मिलने से राहत उन्हीं को मिलती है, फिर भी सरकार जानती है कि समर्थ किसानों पर ही देश की खुशहाली निर्भर है। इसलिए तकाबी लेने और कुँए खोदते देखकर उन्हें भी कम प्रसन्नता नहीं होती युग सन्धि में हिमालय की दिव्य शक्तियाँ जो अनुदान वितरण कर रही हैं वे कई प्रकार की है और उनकी गरिमा का स्तर भी क्रमशः अधिकाधिक बढ़ा-चढा हैं जो उन्हें प्राप्त करेगा । वह आत्म श्रेय और दैवी अनुदान का दुहरा लाभ प्राप्त करने वाला सौभाग्यशाली होगा ।


दिव्य अनुदानों का सुयोग सौभाग्य

जिनके मन में देव समुदाय में पाई जाने वाली आत्मकलयाण और लोक-मंडल की ज्योति विद्यमान है, उनके लिए सदा की भाँति अभी भी देव सत्ता का अनुग्रह उपलब्ध करना सरह है । अड़चन तो दैत्य ही उत्पन्न करता है, जिसे तृष्णा और लिप्सा के अतिरिक्त और कुछ सझता ही नहीं जिनकी साधना उच्च उद्देश्यों के निमित है उन्हें पात्रता के अनुरुप दिव्य अनुदानों को प्राप्त करते रहने में कभी कोई बाधा नहीं पड़ती । शुी प्रसंगो पर देवताओं द्वारा पुष्प वृष्टि होने के उल्लेख कथा, पुराणों में आते रहते हैं। इस अलंकारिक वर्णन में इसी तथ्य को उजागर किया गया है कि सत्प्रयोजनों में दिव्य सत्ता की सहानुभूति ही नहीं, अनुकम्पा और सहायता भी मिलती है। यदि ऐसा न रहा होता तो विपन्न परिस्थितियों में जन्मे और असंख्य अवरोधों से घिरे रहने पर महापुरुषों को उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकना किस तरह सम्भव हो सका होता ?

यह नवयुग की संधि बेला है। इसमें आकुलता भक्तों को कम और भगवान को अधिक है आमतौर से वोटर ही चुने प्रतिनिधियों से अपना कुछ काम करने के लिए उनका द्वार खटखटाते रहते हैं। सामान्य समय में यही चलता है। किन्तु चुनाव के दिनों स्थिति ठीक उलटी हो जाती है, जब खड़े हुए उम्मेदवार ही वोटरों के दरवाजों पर चक्कर काटते हैं और सहायता प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ कहते और करते देखे जाते हैं। इन दिनों की परिस्थिति ऐसी है जिसमें निराकार भगवान का साकार वाहनों, उपकरणों की सहायता तलाश करनी पड़ रही हैं बिजली की सामर्थ्य सर्वविदित है, परउसे भी अपना सामर्थ्य का परिचय देने के लिए वल्व, पंखा, हीटर, मोटर आदि उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। लम्बे सफर जल्दी पूरे करने हों तो वाहन तलाश करने होते हैं। महाकाल की समर्थता में सन्देह नहीं, पर सदा की भाँति इस समय भी उसे प्रत्यक्ष परिवर्तन कर सकने के साधनों से युक्त सहयोगियों की जरुरत पड़ रही है।

राम ऋष्यमूक पर्वक पर पहुँचे थे और हनुमान सुग्रीव को सहयोग देने के लिए-सहमत करने के लिए-मनाते रहे थे । अर्जुन ने जब महाभारत लगने में आना-कानी दिखाई थी तो कृष्ण समझाने से लेकर नाराज होने तक और अन्ततः उनका रथ चलाने की शर्त पर समझौता कर पाये थे। परमहंस ने विवेकानन्द के घर पर चक्कर काटे थे और साथ देने के लिए कई तरह के प्रलोभन देते रहे थे । तब तक पीछे ही लगे रहे जब तक कि लड़का सहयोगी बन नहीं गया । चन्द्रगुप्त चाणक्य को ढूँढ़ने नहीं गये थे चाणक्य ने ही उन्हें धरदबोचा था। समर्थ और शिवाजी के सम्बन्ध में भी यही बात है। इस प्रकार के असंख्य घटना क्रम मौजूद हैं जिनमें विशेष अवसरों पर विशेष आवश्यकता की पूर्ति के लिए दिव्य सत्ता साजृत आत्माओं को तलाश करने और उनका सहयोग पाने के लिए प्रयत्न रत रही है। आमतौर से ऐसा नहीं होता । सामान्य समय में जिज्ञासुओं को ही समर्थो का मनुहार करना पड़ता है। भगवान अकारण भक्तों के दरवाजे पर नहीं पहुँचते । समदर्शी को न किसी से मोह होता है न द्वेष । न उन पर निन्दा का असर पड़ता है न प्रशंसा का । भगवत कृपा का एक ही सुनिश्चित उद्देश्य है-

सत्प्रयोजनों में सहयोग पाने के लिए माध्यम उपलब्ध करना । निराकार होने के कारण उन्हे आकारधारी मनुष्यों की सहायता जुटानी पड़ती है।

सृष्टा ने इस धरती को अपनी सर्वोत्कृष्ट कलाकृति रुप में विनिर्मित किया है। ऐसा सुन्दर ग्रह इस ब्रह्माण्ड में और कोई नही। मनुष्य को जब उसने गढ़ा है तो उसमें अपनी समस्त विशेषताएँ बीज रुप से भर दी हैं। धरती और मनुष्य से सृष्टा को असाधारण प्यार है इस लिए उनके पराभव का संकट जब कभी खड़ा होता है तो वे स्वयं दौड़ते चले आते हैं और सन्तुलन बनाये रखने का अपना “यदा-यदा हि धर्मस्य “ वाला आश्वासन पूरा करते है।चेतना को कृत्य करने के लिए शरीर की आवश्यकता पड़ती है। इसकी पूर्ति वे जागृत आत्माओं का सहयोग प्राप्त करके पूर्ण करते हैं। अवतारों के सहयोगी अपनी तुच्छ-सी सहायता का इतना बड़ा उपहार प्राप्त करते रहे हैं जितना सामान्य रुप में बहुत कुछ कर गुजरने पर भी सम्भव नहीं था। यों दिव्यलोक से अवतरण मात्र अदृश्य प्रवाह का होता है उसे युगान्तरीय चेतना जैसे किसी अदृश्य हलचल के नाम से जाना जा सकता है, पर आँधी का परिचय तो पत्तो के हिलने और धूलि कणों के उड़ने जैसे दृश्य घटनाओं से ही मिलता है। युगान्तरीय चेतना जागृतों का वरण करती है और उन्ही के माध्यम से अपना प्रयोजन पूर्ण करती है। इन वरण-वाहनों का सौभाग्य अनन्तकाल तक सराहा जाता रहता है। प्रज्ञावतार की इस पुण्य बेला में, युग सन्धि में भी ऐसा ही सुयोग सामने है उसमें जागृतों के लिए अनपम अनुदानों का सुअवसर अनायास ही प्रस्तुत है। किन्तु उसके साथ सदा की तरह अभी भी पुण्य प्रयोजनों के लिए अनुदानों का उपयोग करने की शर्त जुड़ी हुई है। जो दूसरों की जेब काट कर अपनी मजेदारी का ताना-बाना बुनते रहते हैं उनके लिए तो यह सुयोग भी सन्तोषप्रद सिद्ध न हो सकेगा । देव समुदाय में प्रवेश करने की प्रामणिक पात्रता ता उदात्त चरित्र, उदार व्यवहार के सहारे ही विकसित होती है।

युग संधि में नैष्ठिकों को विशिष्ट स्तर के और जागृतों को सामान्य स्तर के अनुदान मिल रहे हैं। प्रयास और परिश्रम की तुलना में यह उपलब्धि भी इतनी बड़ी है जिसे चन्दन के निकट उगे झाड़ो और पारस का र्स्पश करने वाले लौह खण्डों को मिलने वाले अनायास सौभाग्य के समतुल्य समझा जा सकता है। सूर्य के उदय होने पर उसके प्रकाश क्षेत्र में आने वाले सभी प्राणी और पदार्थ गर्मी प्राप्त करते हैं। वर्षा के समय खुले में जा खडे़ होने पर किसी को भी गीले होने का अवसर मिल जाता हैं इसमें प्रयास स्वल्प और लाभ असाधारण हैं । ऐसे लाभ अवसर पहचानने वालों को ही मिलते हैं। जब चाहे-जहाँ चाहे वहीं सूर्य की ऊर्जा-वर्षा की तरलता का लाभ नहीं मिलता । युग संधि की दैवी अनुग्रह प्राप्त करने का एक विशिष्ट अवसर माना जा सकता है।

अध्यात्म धु्रव केन्द्र से इन दिनों ऐस विवरण निसृत हो रहे हैं वे जागृत आत्माओं को विकसित एवं समर्थ बनाने की दृष्टि से अतीव उपयोगी है। इस अनुदान प्रवाहों के तीन स्तर है-(1) स्थूल चेतना के लिए प्राण संचार कुण्डलिनी अनुदान (2) सूक्ष्म चेतना के लिए-ज्योति अवतरण दिव्य दृष्टि जागरण (3) कारण चेतना के लिए-ब्रह्म सर्म्पक अमृत अनुीव। यह तीनों जीवन के तीनों क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं । इन्हें कर्म योग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग की साधना की सहज पूर्ति कर सकने वाले अनुदान कह सकते हैं। सर्त्कम, सद्ज्ञान और सद्भाव ही वे उपलब्धियाँ हैं जिनके सहारे मनुष्य को महामानव, ऋषि और अवतार अग्रदूत बनने का अवसर मिलता है। इनमें से जिसे अपने लिए जिस स्तर की आवश्यकता अनुभव होती हो वह उन्हें इन दिनो बिना किसी अड़चन के उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। प्रमाद वितरण चल रहा हो तो उससे राहगीर भी लाभ उठा लेते हैं।

गायत्री जयन्ती (23जून) के उपरान्त दिव्य वितरण की उपरोक्त तीन धाराएँ हिमालय का अध्यात्म धु्रव केन्द्र निसृत करेगा । प्राण ऊर्जा, दिव्य दृष्टि और सरस श्रद्धा के रुप में इन तीनों का अनुभव किया जा सकता हैं साधना की भाषा में इन्हें क्रमशः कुण्डलिनी ज्योति धारा एवं रसानुभूति के नाम से जाना जाता है। इन तीनों के ग्रहण केन्द्र क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते हैं । समर्थता,प्रतिभा एवं वरिष्ठता यह इन तीनों क्षेत्रों की सिद्धियाँ हैं। इन्हीं हुण्डियों को बाजार में भुना कर मनचाही परिस्थितियों एवं सफलताओं को उपलब्ध किया जा सकता है। सिद्ध पुरुष अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियों एवं क्षमताओं से सम्पन्न व्यक्ति को ही कहते है। फूलों का उद्यान लगा कर पाया जाने वाला लाभ इन दिनों इत्र उपहार की तरह अनायास ही मिल रहा है। इसे जो प्राणवान परिजन प्राप्त कर सकेंगे निश्चय उन्हें सौभाग्यवान कहलाने का अवसर मिलेगा ।


ध्यानमुद्रा साधक का निजी पुरुषार्थ

जागृत आत्माओं को-नव सृजन की समर्थता प्राप्त करने के लिए दैवी अनुदानों का जो सहज वितरण इन दिनों हो रहा है, उसका लाभ उठाने की सुविधाप्रत्येक सत्पात्र को मिल सकती है। इसकी पृष्ठभूमि पिछले पृष्ठों पर प्रस्तुत की जा चुकी है। वही समझने और ध्यान देने योग्य है। दिशाधारा का तालमेल बैठ जाने पर आदान-प्रदान की क्रिया-पद्धति को समझने और उसका लाभ मिलने में फिर कोई बड़ी कठिनाई शेष नहीं रह जाती ।

प्रसारण ही कठिन होता है। उसे उपलब्ध करने के लिए छोटे से टाँ्रजिस्टर में सही नम्बर पर सुई घुमा देने भरसे काम चल जाता है। प्रसारण समर्थ सत्ता का है। उसे इसके लिए क्या करना पड़ रहा होगा, इसकी चिन्ता करने या जानकारी की गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं है। अपना रेडियो ठीक रखने और समय परसही जगह सुई घुमा देने भर की छोटी-सी प्रक्रिया अभीष्ट आनन्द दे सकती है। युग सृजन की पुण्य-प्रकिया में निरत महाकाल ने इस प्रसारण का प्रबन्ध किया है। सूक्ष्म होने के कारण उसे इन्द्रियों से-यन्त्रों से तो अनुभव नहीं किया जा सकता किन्तु जागृत अन्तरात्मा की भाव-सम्बेदना उसकी अनुभूति भली प्रकार कर सकती है।

इस प्रसरण का समय और उद्देश्य निर्धारित है- प्रातःकाल दिन निकलने से एक घण्टा पूर्व से लेकर ठीक सूर्योदय तक । रात्रि को दिन छिपने से दो घण्टा उपरान्त से लेकर तीन घण्टा रात्रि गये तक । दोनों समय मात्र एक-एक घण्टा ही इस वितरण और ग्रहण के लिए नियत है। प्रातः एकाकी ध्यान धारणा के लिए और रात्रि की सामूहिक साधना के लिए । जहाँ जैसी आवश्यकता और सुविधा समझी जाय वहाँ वैसा प्रबन्ध किया जाय । चूँकि दिन घटते-बढते रहते हैं और सर्दी-गर्मी के बीच-घड़ी घण्टों के समय की स्थिति में काफी अन्तर पड़ जाता है, इसलिए समय का निर्धारण सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अनुरुप ही करते रहना चाहिए इसमें घण्टे-मिनटों का अन्तर प्रायः हर महीने या हर सप्ताह करते रहने की आवश्यकता पडे़गी।

स्नान करके उपासना पर बैठने की उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते । किन्तु इस ध्यान धारणा में उसकी अनिवार्यता नहीं है। नित्य कर्म से निपट कर बिना स्नान के भी इसे किया जा सकता है। रात्रि की सामूहिक साधना में तो हाथ-पैर धोकर बैठ जाना ही पर्याप्त है। आसन बिछा कर बैठा जाय। खुली जमीन पर न बैठें। ऊपर से आने वाली बिजल शरीर में प्रवेश करने के उपरान्त धरती में न उतर जाय-इसके लिए अवरोध आसन बिछाया जाना आवश्यक है। कुशा, चटाई, जूट, ऊन का हो तो और भी उत्तम है, अन्यथा कपडे़ का आसन भी काम दे सकता है।

साधक पालथी मारकर बैठें । पंच पात्र आदि अन्य किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं है। स्थान जहाँ तक हो सके खुला हवाहदार ही ढूँढा जाय । बन्द और घुटन के स्थान में दीवारों का अवरोध उत्पन्न होता है।

सभी प्रकार की ध्यान साधना में “धान मुद्रा” बनाने का नियम हैं उस का पालन इस विशिष्ट ध्यान धारणा में तो अनिवार्य रुप से किया जाना चाहिए । ध्यानमुद्रा के पाँच अनुशासन हैं- (1) स्थिर शरीर (2) शान्त चित (3) कमर सीधी (4) हाथ गोदी में (5) आँखे बन्द । शरीर और मन की स्थिति इस स्तर की बना लेने के उपरान्त ही ध्यान योग की साधना सधती है।

स्थिर शरीर का तार्त्पय है-देह को लकड़ी, पत्थर की बनी प्रतिमा जैसी बना लेना। अंगो का ऐन्द्रिक संचालन रोक देना । श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन, निमेष-उन्मेष जैसी अनैच्छिक क्रियायें भर चलने देना । ऐसी स्थिति लाने के लिए शिथिलासन, शवासन, अर्ध मृतक मूर्छित जैसी भावना करनी पड़ती है । शरीर की हलचले जितनी कम होंगी - ध्यान उतना ही अच्छी तरह लगेगा । हिलते-जुलते, मटकते-फरवते रहने से मन की चंचलता बनी ही रहती है।

शान्त चित का अर्थ है- कलपनाओं की उड़ाने बन्द करना-एकाग्रता। यह स्थिति तभी प्राप्त होती है जब किसी श्रेष्ठ के साथ अपने को गुथा देने की-घुला देने की भावना की जाय। स्व को किसी विशिष्ट से तादात्मय बना देने को ही समर्पण या लययागे कहते है। एकता ही एकाग्रता है । तन्मयता से ही चित्त शान्त होता है। इसका भोंडा उदाहरण समर्पित रतिक्रिया है। विषयानन्द की उपमा देकर ब्रह्मनन्द की सरसता का परिचय दिया जाता है। अपने ‘स्व’ को इष्टदेव की सत्ता में भाव्यरिक के साथ गुथा दिया जाय- मन में मन को, प्राण में प्राण को, आत्मा में आत्मा को घुला देने का अभ्यास करें तो भक्ति भाव की उच्च भूमिका उत्पन्न होती है और शान्त चित्त की मनःस्थिति बन जाती है। ईधन का आग में बूँद का समुद्र में ,नमक का पानी में- जिस प्रकार विलय हो जाता हैं। दो शरीर जिस प्रकार एक प्राण बन जाते हैं उसी स्तर की भावना इष्टदेव के साथ करने में जितनी सफलता मिलेगी वह उतना ही ‘शान्ति चित्त का अनुभव करेगा । द्वैत ही चंचलता और अद्वैत ही एकाग्रता की भूमिका है। इष्टदेव का प्रथम निर्धारण सदगुरु के रुप में भी हो सकता है और प्रत्यक्ष परिचय होने के कारण उस माध्यम से अभ्यास और भी सरल पड़ता है।

मेरुदण्ड सीधा रखना इसलिए आवश्यक है कि ब्रह्मरन्ध्र उत्तरी ध््राव और मूलाधार-कुण्डलिनी केन्द्र दक्षिणी धु्रव । दोनों के मध्य प्रवाहक्रम जारी रहने से ही इस संसार में समर्थता एवं सम्पन्नता विद्यमान है। इसमें अवरोध होने से सुव्यवस्था लड़खड़ाती है और विश्व व्यवस्था में कई प्रकार की गड़बडी उत्पन्न होती हैं। ठीक यही बात मेरुदण्ड के सम्बन्ध में भी हैं। इडा,पिगला,सुषुम्ना के त्रिविधि प्राण प्रवाह उसी में होकर चलते है। षटचक्रों के दिव्य भण्डार इसी मार्ग में सन्निहित हैं। इस मार्ग को सीधा और साफ रखने के लिए मेरुदण्ड सीधा रखना योगाीयास का आवश्यक नियम हैं कमर में दर्द होता हो तो सहारा लेकर जितना सम्भव हो, सीधा रखने का प्रयत्न करना चाहिए ।

हाथ गोदी में रखने के साथ दोनों हाथ खुले रहें। बाँई हथेली के ऊपर दाहिना हाथ रहे । कर्मेन्द्रियों में हाथ ही सबसे अधिक सक्षम हैं, वे दोनो मिलते हैं तो नमस्कार से लेकर पुरुषार्थ तक के समस्त काम मिलकर भली प्रकार सम्पन्न करते हैं। साधना में भी दोनों के साथ होने से अन्तः विद्युत का एक उपयोगी सर्किल बनता हैं । ध्यान मुद्रा में यह स्थिति अतीब उपयोगी मानी गई है।

आँखे बन्द करने के दो उद्देश्य हैं- एक है बहुमुँखी वृत्तियों को अन्तर्मुखी बनाना । दूसरा है आँखो से निरन्तर निस्तृत होने वाले विद्युत प्रवाह को इस महत्वपूर्ण अवसर पर बाहर बिखरने न देना । वाणी की मौन तपश्चर्या की तरह आँखो को बन्द रखना भी नेत्र-तप माना गया है। चित्तवृत्ति अन्तुर्मुखी होने से अर्न्तजगत के वैभव को समझना और कहाँ क्या छिपा है ? इस जानकारी के आधार पर उसे प्राप्त करना तभी सम्भव होता है जब उस क्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाय । बहिर्मुखी वृत्तियाँ बाहर ही उलझी रहती हैं। अतएव उस दिव्य भाण्डागार को देखने, समझने और उखाड़ने के लिए कुछ बन ही नहीं पड़ता । नेत्र बन्द करना, अन्तर्मुखी होना अर्थात् अर्न्तजगत में प्रवेश करना हैं आत्मोर्त्कष के लिए की जाने वाली ध्यान धारणा में सदा नेत्र बन्द रखे जाते है।

अकेली ध्यान मुद्रा में भी यदि आत्मिक उत्कृष्टता और श्रेष्ठता के प्रति समर्पण की धारणा जारी रखी जाय तो उतने से भी ध्यानयोग का सामान्य प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता रह सकता है। इसके साथ यदि हिमालय के अनुदानों का ग्रहण और धारण करने का उपक्रम भी चल चड़े तो सोने में सुगन्ध की स्थिति बन पड़ती । पुरुषार्थ के रुप में ध्यान मुद्रा और अनुग्रह के रुप में अनुदान उपलब्धि कासुयोग बनने पर तो प्रगति का क्रम अनेक गुने वेग से दु्रतगति से चल पड़ता है।


अनुदानों का ग्रहण अभ्यास

(1) प्राण ऊर्जा स्फूर्ति, समर्थता साहसिकता, जीवट जैसे शब्दों से प्राण ऊर्जा, कुण्डलिनी शक्ति का परिचय कराया जाता है। यह सभ विशेषताएँ काय-कलेवर में सन्निहित रहती हैं। इसलिए इन्हें प्राण सामर्थ्य कहा जाता है। क्रियाशीलता , तत्परता, कर्मनिष्ठा इसी सामर्थ्य की पिरणिति मानी जाती है। सर्त्कम इसी के सहारे बन पड़ते है । इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्राण संचार प्रक्रिया है। इसे कुण्डलिनी जागरण का प्रथम सोपान समझा जा सकता हैं जिन्हें यह क्षेत्र अभीष्ट हो उन्हें प्राण प्रवाह के वितरण का लाभ लेना चाहिए।

(2) ज्योति अवतरण का तार्त्पय है-तृतीय नेत्र उन्मीलन दूरदर्शिता , विवेकशीलता का जागरण । ज्योति का अर्थ अध्यात्म क्षेत्र में सद्ज्ञान के लिए होता है। आत्म-बोध-एवं आत्म ज्ञान, ब्रह्मज्ञान की उपलब्धि के लिए ज्योति अवतरण की साधना की जाती हैं । तपों के सहारे अन्धकार में भटकने की व्यथा से मुक्ति मिलती है और माया की ग्रन्थि खुलती है। आज्ञाचक्र को दिव्य दर्शन का केन्द्र संस्थान माना गया है। शिव और दुर्गा की छवियों में तीन नेत्र हैं। दो सामान्य तीसरा भृकुटि स्थान पर दिव्य नेत्र । इसे गीता में दिव्य चक्षु कहा गया है और इसके सहारे विराट् ब्रह्म का दर्शन सम्भव बताया गया है। दिव्य दर्शन, दिव्य श्रवण भविष्य ज्ञान, दूसरों को प्रभावित करने जेसी अनेक सिद्धियों का संस्थान इसी को माना गया हैं। प्रतिभा एवं प्रखरता यहाँ से उभरती है। यह सूक्ष्म शरीर का कार्य-क्षेत्र है जिन्हें इस क्षेत्र की उपलब्धियाँ अभीष्ट हों उनके लिए ज्योति अवतरण के प्रवाह से सर्म्पक साधना चाहिए ।

(3) रसानुभुति का तार्त्पय है आत्मा और परमात्मा के मिलने से मिलने वाली सरसता का रसास्वादन । ऋण और धन विद्युत प्रवाहों की तरह आत्मा और परमात्मा की सत्ताएँ हैं। जब भी दोनों का मिलन होगा, उमंग भीर फुलझडियाँ उडे़गी। बिजली के दो तार मिलने पर चिनगारियाँ उठती है। ओर करेन्ट चल पड़ता है। अध्यात्म क्षेत्र की फुलझडियाँ हैं- तुष्टि, तृप्ति, शान्ति । जिन्हे उत्साह सन्तोष आनन्द आदि के रुप में अनुभव किया जाता है।

चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता की मात्रा देखकर ही यह अनुमान लगाया जाता है कि किसे ईश्वर की कितनी समीपता प्राप्त हुई और कौन कितनी रसानुभूति कर रहा है। अमृतत्व इसी प्रकार की भाव सम्वेदना को कहा गया है। इस स्थिति में एक विशेष प्रकार का आवेश छाया रहता है। जिसमे उच्च स्तरीय निर्णय,साहस एवं प्रयास करने में तनिक भी कठिनाई का अनुभव नहीं होता । परिष्कृत दृष्टिकोण ही र्स्वग है। क्षुद्र समुदाय का लोक प्रवाह ही बन्धन है। उससे छुटकारा पाने और यथार्थतावादी अबलम्बन अपना सकने की साहसिकता का नाम मुक्ति है । इन्हीं दोनों को परम पुरुषार्थ एवं पूर्णता का प्रतिफल कहते है। यह चेतना का “कारण” क्षेत्र है । इसमें भाव सम्वेदनाएँ ही प्रधान रहती है । ‘भक्ति यही है। इस क्षेत्र का व्यक्ति योगी, यदि ऋषि, देवात्मा जैसी स्थिति तक जा पहुँचता है।

इसी उच्चस्तरीय भूमिका को लक्ष्य मानने वाले आरम्भिक छोटे चरण उठाने की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए रसानुभूति स्तर के वितरण से लाभान्वित हो सकते हैं। इस ध्यानों में से जिसे भी करना हो पन्द्रह मिनट से आरम्भ करना चाहिए । सप्ताह में एक मिनट बढ़ाते हुए आधा घण्टे तक पहुँचाना चाहिए ।

जिस प्रकार सरस्वती, लक्ष्मी, काली के तीन बीज ह्नी, श्री , क्लीं का उपयोग गायत्री मन्त्र के साथ करते हुए बुद्धि समृद्धि और सामर्थ्य की आराधना करते हैं, उसी प्रकार उपरोक्त तीनों वितरणों में से अपनी स्थिति और आवश्यकता को देखते हुए कोई भी साधनाक्रम अपनाया जा सकता है, पर जा अपनायाजाय उसे जल्दी-जल्दी बदला न जाय । उतावले लोग चंचल मनःस्थिति में बार-बार अपना साधना क्रम बदलते हैं फलतः अपने श्रम को निरर्थक करते हुए संकल्प शक्ति को दुर्बल करते रहते हैं। अच्छा हो निर्धारण के समय शान्ति-कुँज हरिद्वार से परामर्श कर लिया जाय। जो इसकी आवश्कता समझे वे हर वर्ष गायत्री जयन्ती या बसन्त पर्व पर वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का लेखा-जोखा भी भेज दिया करें । स्मरण रहे इस सर्न्दभ में परामर्श या उत्तर प्राप्त करने के लिए जबावी पत्र भेजना अनिवार्य रुप से आवश्यक है।

साधनाओं का उपक्रम इस प्रकार है । ध्यान अवधि में इन्हीं भावनाओं में निमग्न रहा जाय क्रम पहले से ही याद कर लिया जाय ।

(1) प्राण संचरण ( कुण्डलिनी स्फुरण )

-हिमालय के मध्यवर्ती अध्यात्म श्रव केन्द्र से उमड़ता दिव्य प्राण प्रवाह।

-शुभ्र चमकीले बादल जैसा। प्रवाह साधक की ओर । पहुँचना साधक तक ।

साधक ब्रह्मरंध्र द्वारा प्राण प्रवाह का स्वागत, आकर्षण, अभिनन्दन, ग्रहण, अवधारण, मस्तिष्क मध्य के सहस्त्रार चक्र में ।

सहस्त्रार मस्तिष्क मध्य, मूलाधार मल-मूल छिद्रो का मध्य ।

-सहस्त्रार से मूलाधार तक, मूलाधार से सहस्त्रार तक, सहस्त्रार से मूलाधार तक , मूलाधार से सहस्त्रार तक प्राण ऊर्जा का मंथन, मेरुदण्ड मार्ग, मंथन-मंथन-मंथन

-मंथन से प्राण ऊर्जा की उत्पत्ति, अग्नि शिखा की जागृति, कुण्डलिनी में स्फूर्ति।

-कण-कण में प्राण विद्युत, नस-नस में प्राण विद्युत, नस-नस में प्राण विद्युत, रोम-रोम में प्राण विद्युत कुण्डलिनी ।

-साधक पा्रण पुँज-अगिन पिण्ड, प्राणवान, ओजवान।

ॐ कार का पाँच बार गुँजन शंखनाद वत्।

ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मासद्गमय,मृत्योममृतंगमय

-तीन बार । तमसो मा, तमसो मा, तमसो मा। ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय। शाँति समाप्ति।

(2) ज्योति अवतरण दिव्य दृष्टि जागरण

- हिमालय के अध्यात्म धु्रव केन्द्र में स्वर्णिम सूर्यादय।

- ज्योति किरणों का प्रसारण, पहुँच साधक तक ।

- नमन-वन्दन-ग्रहण। आज्ञा-चक्र में। आज्ञा-चक्र भृकुटि केन्द्र, प्रवेश दिव्य-ज्योति का आज्ञाचक्र में, दिव्य ज्योति प्रज्ञा ।

- कण-कण में ज्योंति, नस-नस में ज्योति, रोम-रोम में ज्योंति, साधक ज्योति वान, तेजवान, प्रज्ञावान।

रक्त ज्योतिवान्, माँस ज्योतिवान्, अस्थि ज्योतिवान्, स्थूल शरीर ज्योतिवान्।

- मन ज्यातिवान, बुद्धि ज्योतिवान, चित्त ज्योतिवान, सूक्ष्म शरीर ज्योतिवान्।

अर्न्तजगत ज्योतिवान, अन्तःकरण जयोतिवान, अन्तरात्मा ज्योतिवान, कारण शरीर ज्योतिवान ।

- स्थूल शरीर जयोतिवान, सूक्ष्म शरीर ज्योतिवान , कारण शरीर ज्योतिवान ।

साधक ज्योति पिण्ड, तेज पुँज प्रज्ञा पुँज ।

ॐ कार का पाँच बार गुँजन शंखनाद बत्।

ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा-सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय, तीन बार ।

- तमसो माँ , तमसो मा, तमसो मा ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय शान्ति समाप्ति।

(3) रसवर्षण ( प्रभु मिलन )

- हिमालय के अध्यात्म धु्रव केन्द्र से अमृत उफान-दूध झाग जैसा ।

- रस सिन्धु की हिलोरें-साधक तक ।

नमन वन्दन ग्रहण, ह्नदय केन्द्र में प्रवेश भाव श्रद्धा का ।

- अमृत वर्षा घन-घोर अमृत वर्षा, साधक रस विभोर, आनन्द से सरावोर ।

- कण-कण में अमृत, नस-नस में अमृत, रोम-रोम में अमृत।

- समर्पण साधक का-परब्रह्म को विलय-विसर्जन, एकत्व, अद्वेत, भक्त भगवान एक ।

पय पान, सोम पान , अमृत पान ।

- परिवर्तन - तमसा का ऊषा में, कामना का भावना में जड़ता का चेतना में, श्रुद्रता का महानता में , आत्मा का परमात्मा में ।

- तृप्ति-तुष्टि-शान्ति।

- साधक की अनुभूति सत्-चित् आनन्द, आत्म दर्शन, ब्रह्म-दर्शन ।

- ॐ कार गुँजन पाँच बार शंखनादवत्।

ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय, असता मा सद्गमय, मृत्योममृतंगमय । तीन बार ।

तमसो मा, तमसो मा , तमसो मा, ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्गमय शान्ति सामाप्ति ।

यह तीनो ही धाराणाएँ अभ्यास में अति सरल एवं सर्वथा हानि रहित हैं। इन्हे बाल-बृद्ध, नर-नारी, रुगण स्वस्थ कोई भी कर सकते है। सथासम्भव शरीर और वस्त्रों की शुद्धि करके ही बैठना चाहिए । व्यक्तिगत उपासना में उतर मुख बैठने का प्रयत्न किया जाय । किन्तु सामूहिक साधना में वैसा प्रतिबन्ध नहीं है। वहाँ बैठने की सुविधा को ही प्रधानता देनी चाहिए ।

गायत्री जयन्ती के उपरान्त सभी जागृत आत्माएँ बिना किसी धर्म सम्प्रदाय का भेद-भाव किये उस उपक्र को अपना सकती है। गायत्री उपासना का न्यूनाधिक क्रम चलता रहे तो इसका लाभ विशेष मिलता है। न करने पर भी हानि या रुकावट कुछ नहीं है गायत्री परिवार के सभी परिजन इस उपक्रम का आरम्भ तत्काल कर दें। जहाँ सामूहिक या मासिक रुप से इसे चलाया जा सकता है । इस अनुदान का लाभ अपने ग्रहण शक्ति के अनुरुप न्यूनाधिक मात्रा में हर कोई उठा सकता है। इसलिए उसका प्रसार प्रशिक्षण करने में काई हर्ज नहीं है ध्यानकर्ता अपना नामाँकन शान्ति-कुँज में करालें और समय-समय पर अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए परामर्श प्राप्त करते रहना चाहें तो अधिक मात्रा में अधिक उच्चस्तर का उपयुक्त अनुदान मिलने की अधिक सम्भावना रहेगी ।


आदमी की आह

(लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र)


आदमी की आह (kavita)

आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती । ध्यान पल-पल टूटता है, पीड़ितो की चीख सुनकर । वृतियाँ रहती नहीं थिर, छटपटाता देख पिंजर ॥

सिसकियाँ उनकी विकल, आराधना करने न देतीं। आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती ॥

मन्त्र-स्वर ही मौन हो जाते, मनुष्य कराह सुनकर । आचमन जल फैल जाता , आँसुओं का देख निर्झर ॥

पीड़ितों की पीर-प्रतिमा,प्रार्थना करने न देती । आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती॥

देखते है रोज दुनियाँ, दीन दूर धकेलती है। खून पीकर मुस्कुराती, जिन्दगी से खेलती है॥

वेदना उनकी हमें, विभु वन्दना करने न देती । आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती ॥

चाहते हम दर्द का मन्दिर बनें, संसार सारा । पीड़ितों की पीर में ही मिल सके , वह प्राण प्यारा॥

वीर-प्लावित भावनायें, वंचना करने न देती । आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती ॥

*समाप्त*