सत् को समझें सत् को पकड़ें

द्यड्डस्रंक ,शड्ड द्धशफ्भ्द्द ष्द्मठ्ठब्द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्द्भद्द क्द्मह्ह्य क्द्मस्द्भ श्चब्ह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न शस्॥द्मश स्रद्म ॥द्मद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं द्धक्चस्रद्मह्वद्म ह्वद्दद्धड्ड शद्द द्दड्डद्यद्मह्यरु+द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्द्भद्द क्द्मड्ड[द्म द्धद्गश्चद्मस्ह्वद्ध [द्मह्यब्ह्द्म क्द्मस्द्भ क्फ्ख्ड्डक्चद्म द्धठ्ठ[द्मद्मस्रद्भ] ह्लष् श्चद्मद्दह्य ह्ष् ॥द्मद्मफ् [द्मरु+द्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न [द्मह्नठ्ठ ह्लद्धशह्व द्बभ्शद्मद्द ह्स्र ह्द्मह्य क्द्धरुस्नद्मद्भ द्दस््न ष्ष्ख्ब्ह्य स्रद्ध ह्द्भद्द ह्लद्मह्य क्॥द्मद्ध&क्॥द्मद्ध द्वहृब्ह्द्म&क्तह्नठ्ठस्रह्द्म स्नद्मद्म] शद्द क्द्बह्वद्म क्द्धरुह्क्रश [द्मद्मह्यस्रद्भ ह्व ह्लद्मह्वह्य स्रद्दद्मड्ड श्चब्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न ह्लद्मह्य ठ्ठद्ध[द्मह्द्म द्दस् शद्द क्/द्मरु+ स्रद्ध ह्द्भद्द द्बभ्शद्मद्द द्गद्म= द्दस््न ब्द्दद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्धफ्ह्वह्वह्य शद्मब्ह्य ष्द्मब्स्र स्रद्ध ह्द्भद्द द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् श्चड्डश्चब्ह्द्म स्रद्मह्य क्द्म'र्श्च;श्चद्धस्रह्] द्दह्द्बभ्॥द्म द्दद्मह्यस्रद्भ ठ्ठह्य[द्मह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न ;द्दद्मड्ड द्यद्गरुह् फ्ह्नद्धक्रस्नद्म;द्मड्ड क्ह्व द्यह्नब्>द्ध क्द्मस्द्भ द्यद्गरुह् द्बद्दह्यद्धब्;द्मड्ड क्ह्वष्ख्> द्दद्ध ष्ह्वद्ध द्भद्दह्द्ध द्दस्ड्ड्न

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नियति के अन्तराल का सूक्ष्म प्रवेश अध्यात्म

पदार्थ जगत से हमें निर्वाह प्राप्त होता है और .... रजन भी। अतएवं उसकी उपयोगिता से .... हुए भी हमें चेतनात्मक रसास्वदन के लिए एक कदम आगे बढ़ना होगा। आनन्द की अनुभूति इन्द्रियों में नहीं चेतना के स्तर एवं उभार में है। विक्षिप्त, अविकसित एवं प्रसुप्त मूर्छित व्यक्ति इन्द्रियों के समक्ष रहने पर भी रसानुभूति से वंछित ही रहता है। प्रचुर साधना सामग्री लेने में असमर्थ ही रहा है।

निर्वाह और मनोरंजन ही पर्याप्त हो तो बात दूसरी है, अन्यथा प्रकृति के अन्तराल में गहराई तक प्रवेश करना होगा और उस क्षेत्र में विद्यमान उल्लास एवं रहस्य समुच्चय के साथ सम्बन्ध साधना होगा। मनुष्य जीवन में सन्निहित गहन सरसता की अनुभूति तथा विलक्षण जानकारियोँ की उपलब्ध इसी मार्ग को अपनाने से सम्भव हो सकती है।

भौतिक जगत की क्षमता, गतिशीलता तक सीमित है। शरीरगत हलचालों को समक्ष बनाये रखने तक ही पदार्थों की उपयोगिता सीमित है। आने की विशिष्ट प्रगति के लिए विश्व-वसुधा के अन्तराल को टटोलना होगा। प्रत्यक्ष से आगे बढ़कर अप्रत्यक्ष तक पहुँचने का प्रयत्न करना होगा। हाथ पैरों जैसे अवसर और त्वचा केश जैसे अवारण अनायास ही दृष्टिगोचर होते रहते है, किन्तु हृदय-मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अवयवों का परिचर प्राप्त करने के लिए सूक्ष्य आधार अपनाने होगे। मात्र आँखों के सहारे ही शरीरगत विशिष्टताओं का परिचय प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं हो सकता।

प्राणियों का भावनात्मक मिलन कितना सुखद, सरस और समर्थ होता है। ऐसे मिलन एवं मैत्री द्वारा मिलन वाली उपलब्धियों एवं प्रतिक्रियाओं का पर्यवेक्षण करके भली प्रकार जाना जा सकता है।

गहराई में प्रवेश करने से उन तथ्यों का पता चलता है, जिन्हे येन-केन प्रकारेण मनुष्य ने अब तक विज्ञान दर्शन के सहार उपलब्ध किया है और अपना स्तर तथ गौरव बढ़ाया है। इस दिशा में सीमित रहना हो तो बात दूसरी है, अन्यथा प्रकृति की पुस्तक का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करने के उपरान्त वह भी जाना जा सकता है जो अभी तक अविदित है। ज्ञातव्य को प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से प्रकृति के अन्तराल में प्रवेश करके ही जाना जा सकता हैं अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए भी प्रकृति सम्पदा एवं प्राणि चेतना में सन्निहित रहस्य समुच्चय का ही पय्रवेक्ष्ज्ञण करना होगा। विज्ञान अथवा तत्वज्ञान के क्षेत्र में इसी मार्ग पर चलते हुए भावी प्रकृति की महत्वाकाँक्षायें पूर्ण हो सकती है। आनन्द की उपलब्धि और रसास्वादन की आकाँक्षा तो मात्र इसी एक अवलम्बन से सम्भव हो सकती है।

सृष्टि की संरचनाओं का, जड़ चेतन के शाश्वत सौर्न्दय का यदि गम्भीर अवलोकन करे तो लगेगा कि प्रकृति के आनन्द की निर्झरिनी सदा-सदा से प्रवाहित होती रही है। जड़ प्रकृति तो अपना सौर्न्दय दिखाती है ही। प्राणि समूह नन्हे जीव-जन्तु, वृक्ष वनस्पति, पशु-पक्षि भी उसके आँयल में मनोरम दृश्य, दर्शाते है। इनकी दुनिया जितनी आकर्षक है। उतनी ही बुद्धिमत्तापूर्ण एवं विलक्षण भी। इनकी गतिविधियों का सूक्ष्य दृष्टि से अवलोकन किया जाय तो चैतन्य जगल की ऐसी सरस आकर्षण क्रियाएँ परिलक्षित होती है, जिन्हे सृष्टा की विलक्षण कलाकारिता ही कहा जा सकता है।

मनुष्य अपने आप को भगवान की सर्व श्रेष्ठ कृति मानता है। इस मान्यता में यदि कुछ सच्चाई है तो भी उसका यह भ्रम कि उसकी तुलना में वृक्ष-वनस्पति, जीव-जन्तु तुच्छ है, तथ्य से परे है। परम पिता ने इस विश्व के सभी प्राणियों को इतना साधन सम्पन्न बनाया है कि कई उपलब्धियों में वे मानव को छोटा पिछड़ा साबित कर देते है। ऐसी अनेकानेक विलक्षणताएँ है जो वस्तुतः मनुष्य की मौलिक खोज नहीं हैं वरन् उसके भाई बान्धव इन वृक्ष-पुष्पों, कीट-पतंगो की मूलभूत विशेषताएँ हैं प्रकृति के उस अभिनव स्वरुप में सौर्न्दय है, वास्तुशिल्प के विभिन्न आयाम है। यह सब देखकर मन बरबस उस जगन्नियंता के प्रति श्रद्धानत हो जाता है जिसका ही स्वरुप चारों ओर दृष्टिगोचर हो रहा है। इससे प्रेरित होकर प्रफुल्लित मन से उपनिषदकार गा उठता है।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा।

रुपं रुपं प्रतिरुपों बहिश्च।

वृक्ष-वनस्पति के इस विशाल संसार को जब हम सूक्ष्य दृष्टि से देखते है तो हमारे वर्तमान आविष्कारों के प्रेरणा बिन्दु वही पाते है। जिस भी व्यक्ति ने आज के सुविधा-साधनों यन्त्रों का आविष्कार किया हे उसने इस की कल्पना प्रकृति की गोद में बैठकर ही की है।

‘बैरल कैक्टस’ रेगिस्तान में पाया जाने वाला पौधा है जिसे अपने वातावरण में व्याप्त शुष्कता एव असहय गर्मी का अनुमान है। तदनुरुप ही वह ठण्डे पानी को अपनी तहों में छिपाकर उसी तरह रखता है जिस तरह गर्मी के दिनाँ में हम क्षुधा तृप्ति हेतु शीतल जल रेफ्रिजरेटर में एकत्रित करते है। इसकी बनावट के पीछे रेफ्रिजरेटर का ही सिद्धान्त छिपा पड़ा है।

वायुयान में खराबी आने पर आत्मरक्षार्थ विमान से सुरक्षित बाहर आने के लिए एवं शत्रु देश में छापामार सैनिक गिराने के लिए मनुष्य ने अपने बुद्धि चातुर्य का उपयोग कर पैराशूट का आविष्कार कया पर वस्तुतः यह कोई मौलिक खोज नहीं। ‘डेण्डेलियान’ के बीज एवं मील्क-वीड बीज अपनी यात्रा पैराशूट द्वारा ही करते है। इस यात्रा में वे परागण का मुख्य उद्देश्य लेकर चलते है व अपने शरीर पर छाये पंख रुपी पैराशूट के द्वारा मीलों की यात्रा पूरी कर लेते हैं। प्रकृति की यह व्यवस्था अपने आप में इतनी सुघढ़तापूर्ण है कि आर्श्चय से दाँतो तले अँगुली दबानी पड़ती है। पिस्तौल चलाना वस्तुतः ‘विच हैजेल’ नामक झाड़ी के फूलों का अनुकरण है। अपनी बीजों की सम्पदा बिखेरने के लिए ये उन्हे झटके से बाहर फेंकते है जो चारों ओर फैलकर अपनी नस्ल की वंशवृद्धि करते है। प्रकृति में चारों ओर यही लीला दिखाई देती है। भवन निर्माण की कला में आज मनुष्य का ज्ञान चरमोन्नत अवस्थ पर पहुँचा हुआ है। गुफा में रहने वाला आदि मानव आज गगनचुम्बी एवं वास्तुशिल्प की दृष्टि से श्रेष्टतम भवनों में रहता है। पर इन सबके मूल है किसी भी....निर्मित करने का प्राथमिक चरण-गडर डालना यदि ..............चाहते है कि यह कल्पना मानव ने कहाँ से की तो लिलि के पौघे को देखिए। यह पौधा पत्तों का अपने स्थान पर रखने के लिए गर्डर रुपी आधारों का उपयोग करता है। इस तरह ये अपनी उँचाई भी बढ़ाते जाते है एवं हवा के झोकों से अपनी रक्षा भी कर लेते है। यह मजबूती इन्हें ‘गर्डर’ व्यवस्था के कारण ही मिली है।

आज दृश्य श्रव्य प्रचार की ही महत्ता है तथा विज्ञापन कला चरम सीमा पर है। इसके द्वारा ही हर निर्माता अपने उत्पादन की खपतजन सामान्य में बढ़ाता है और इसके लिए जितना बन सके, अपनी कल्पना को अनगिनत रंग देकर प्रचारित, प्रसारित करता है, पर इस विद्या में पारंगत प्रकृति के इन कुशल चितेरों को तो देखिये। जो भाँति-भाँति के आकार, रंग-बिरंगी पंखुड़ियों, सुगन्धित पराग द्वारा मनुष्य को तो आकर्षित करते ही है, अपने सखा भौंरो तथा कीट-पतंगों को भी भाव-भरा आमंत्रण देते है। वे उन्हे बता देते है कि कहाँ उन्होंने अपनी मधुनिधि छिपा रखी है। कृपणता का विचार दिल से निकाल वे उनहें अपना मुध छककर पीने देते है। यह सब कार्य करने के लिए उन्हें अपना स्वरुप इस तरह आकषक बनाना होता है जो विज्ञापन से भी बढ़कर है।

अपनी कमाई का अपने उपयोग का हिस्सा छोड़कर बाकी समाज को दे देना ऋषि परम्परा रही है। वनस्पति जगत से हमें यही संदेश चिरंतन काल से कुछ पौधों की जड़ों से मिलता आ रहा है जिनकी गाँठे पौधे का अस्तित्व समाप्त होने पर भी जमीन की उर्वरता बढ़ाने के लिए स्वयं को बनाये रखती हैं इनमें विद्यमान विशेष रसों के जीवाणु वायुमंडल से सतत नाइट्रोजन अवशोषित करते रहते है।

वनस्पति जगत के हमारे इन साथियों को देखकर कठोरनिषद की यह उक्ति सत्य लगने लगती है कि

यौनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय दैहिनः। स्थाणुमन्येअपु संयन्त यथाकर्म यथाश्रुतमः।

अर्थात् अपने-अपने कर्मा के अनुसार जिसने श्रवण द्वारा जैसा भाव प्राप्त किया उसके अनुसार कितने ही जीवात्मा देहधारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते है और अनेक जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्षलता, पर्वत आदि को प्राप्त होते है।

संभवतः इसी कारण ये हमारे सखा सहयोगी वातावरण प्रदूषण रोककर मनुष्य के जीने हेतु प्राणवायु देते रहते है और स्वयं विषपान करते है। नवस्पति विज्ञान के मनीषी बताते है कि इनके विशाल संसार में कई वृक्ष ऐसे होते है जो अधिक मात्रा में मनुष्य द्वारा छोड़ी गई कार्बनडाईआक्साइड अवशोषित कर स्वयं ओषजन छोड़ते रहते है। इसी कारण इनके आस-पास की वायु में नीरोगिता एवं स्वास्यि संवर्धन के तत्व अधिक होते है। सम्भवतः यही कारण था कि इन नीलकण्ठों को लगाने की परम्परा को आर्य कालीन महा-मानवों ने आध्यात्मिक महत्व एवं स्वरुप दिया।

ये सभी प्रतिपादन इस तथ्य की व्याख्या करते है कि एक ही चैतन्य आत्मा सब में विद्यमान है। यही अनुभव करते हुए हमें विराट ब्रहमा की असीम चेतना अपने चारों ओर फैली देखनी चाहिए और सबके साथ सहृदयता पूर्ण व्यवहार करना चाहिए। शास्त्रकार कहता है कि ब्रहमा ही विभिन्न प्राणियों में भिन्न-भिन्न रुप में समाया हुआ है।

यस्तुसर्वाणि भूतानि आत्मन्नेवानुपश्यति। सर्व भूतेषु चात्मन ततो न विचिकित्सति। (यजु.)

अर्थात् जो अपने में सबको और सब में अपने को देखता है वही तत्वदर्शन और आनन्द का अनुभव करने में समर्थ होता है।

सहयोगिता, सहकारिता के सिद्धान्त समाज में किस तरह सुख-शान्ति प्रदान करने में सहायक होगे, ये दिशा निर्देश हमें प्रकृति की पाठशाला में ही मिलते हैं। प्राकृतिक संतुलन सृष्टा की नियम व्यवस्था का एक अंग है। इसी के सहारे यह संसार टिका है।

स्थूल के अन्तरात में सन्निहित सूक्ष्य का मर्मबेधी प्रज्ञा के सहारे अध्ययन-अनुसन्धान करने का नाम ही अध्यात्म है। अध्यात्म मानवी चेतना की प्रचक्षण प्रतिभा है। इसे विकसित किया जा सके तो आत्म-दर्शन, ब्रहमा साक्षाकार, स्वर्गीय उल्लास, सिद्धि सामर्थ्य, प्रकृति संतुलन, वातावरण की अनुकुलता जैसी असंख्यों विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती है। साथ ही उन प्रकृति रहस्यों को भी सहज ही करतल गत किया जा सकता है। जो वैज्ञानिक शोध कत्ताओं न इधर उधर भटकने के उपरान्त आधी अधूरी मात्रा में बड़ी कठिनाई के साथ उपलब्ध किए है।


बुद्धिहीन वैज्ञानिक (kahani)

एक बार चार मित्र यात्रा पर निकले। उनमें तीन ‘बुद्धिहीन वैज्ञानिक’ थे और एक बुद्धिमान अवैज्ञानिक मार्ग में उन्हें एक मरे हुए शेर का अस्थि पंजर मिला। बुद्धिहीन वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों नहीं हम उस पर अपनी विद्या की परीक्षा करलें तुरन्त एक ने उसका अस्थि संचय किया दूसरे ने उसमें चर्म माँस और रुधिर संचारित किया और तीसरा उसमें प्राण डालने ही वाला था कि चौथे बुद्धिमान अवैज्ञानिक ने कहा-अरे अरे यह आप क्या कर रहे है? आप सिंह को जीवित करने जा रहे है वह जीवित होते ही हमें खा जायेगा पहले अपनी रक्षा का उपाय तो कर लो। लेकिन उसकी बात किसी ने न मानी।

लाचार, वह अकेला वृक्ष पर चढ़ गया। इधर तीनो ने जैसे ही उसमें प्राण डाले शेर जीवित होकर तीनों को खा गया। प्रत्यक्ष को दोने वाला आज का संसार भी बुद्धिहीन वैज्ञानिकों की तरह है जो शरीर के लिए तो साधन बढ़ाते चले जा रहे है पर आत्मा का तनिक भी ध्यान नहीं देते।


उपासना की मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमि

‘यथेल’ अपनी पुस्तक ‘साइकोलाजी आँफ रिलिजन में लिखते है कि सेन्ट कैथोराइन एक विशेष समय शरीर के विभिन्न अंगों पर तीव्र पीड़ा अनुभव करती थी। यह पीड़ा उसी प्रकार की होती थी जिस प्रकार की शरीर में कील ठोकने पर होती है, उस अवधि में डाँक्टर देखभाल के लिए पहले से ही नियुक्त रहते थे। मनोवैज्ञानिकों ने अपने विस्तृत अध्ययन के उपरान्त कहा कि यह उपासना की एकाग्रता का परिणाम है। संत कैथेराइन ‘ईसा’ के ध्यान में इतनी तन्मय हो जाती है कि उन्हं वह अनुभूतियाँ भी होने लगती है जो क्रास पर लटकाये जाने के समय ईसा को हुई थी। उनकी सघन संवेदनाएँ अपने इष्ट से जुड़कर अनुभूति का रुप ले लेती थी।

मनुष्य का व्यक्तित्व उसके विचारों का प्रतिबिंब है। चिन्तन मन ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करते है। मनोकायिक अधिकाँश रोग निकृष्ट चिन्तन के ही परिणाम होते है। इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में एक मत से स्वीकार किया जा रहा है। उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का च्िन्तन चल पडे़गा। तद्नुरुप क्रिया-कलाप होगे। वातावरण का व्यक्ति पर पड़ने वाला प्रभाव एक तथ्य है। दुर्जन, अनाचारी के साथ रहने वाला व्यक्ति उनसे प्रभावित होता है। संत, महात्मा के सानिध्य में रहने वाला उनके आचरण को ग्रहण करता है। यह उनके व्यक्तित्व का प्रभाव है जो समीप आने वाले को अपने अनुरुप बना लेता है। मानवी चिन्तन व्यक्तियों एवं वातावरण से प्रभावित होता है। गतिविधियाँ एवं अनुभूतियाँ भी उसी स्तर की होती है।

वर्तमान समय में श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्तियों का अभाव है। बहुलता हेय-गये गुजारों की है तो अनुकुल वातावरण की अपेक्षा करना एक विडम्बना है। इन परिस्थितियों में समस्या यह खड़ी होती है कि मानवी व्यक्तित्व को श्रेष्ठ कैसे बनाय जाय? विचार करने पर एक ही रास्ता दिखाई पड़ता है उपासना का अवलम्बन।

उपासना से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणाएँ ही चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती है। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली-भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का एक सुदृढ़ आधार मिल सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार ही उपासना का लक्ष्य होता है।

इसका निर्धारण उससे जुडें़ आदर्शो एवं उच्च स्तरीय सिद्धान्तों द्वारा साधक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। इष्ट में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरुप आचरण करना। उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। उपासना में तन्मयता की पराकाष्ठा साधक-साध्य के बीच विभेदकों समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर ‘अद्वैत’ की स्थिति बन जाती है। फलस्वरुप इष्ट की अनुभूतियाँ साधक को होने लगती है। सेन्ट कैथेराइन की पीड़ा, मीरा का कृष्ण के प्रति भक्ति में एकाकार हो जाना, रामकृष्ण परमहंस द्वारा सर्वत्र काली का दर्शन करना, काली के स्वरुप में स्वयं का अस्तित्व भूल जाना उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाआँ का ही प्रभाव है। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी साधक के विचारों का परिशोधन होता जाता है। भाव-संवदेनाओं में आदर्श वादिता जुड़ने लगती हैं

उपासना में इष्ट का निर्धारण क्या हो यह व्यक्तिगत अभिरुचि एवं मनःस्थिति के उपर निर्भर करता है। चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी। उपासना के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे साधक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।

आधुनिक मनोविज्ञान ने नये तथ्यों का उद्घाटन किया है जो आध्यात्मिक मान्यताओं की पुष्टि करते है। चिन्तन को व्यक्तित्व का मूल आधार माना जाने लगा है। मनोविज्ञान की शोधों ने सिद्ध किया हे कि मनुष्य का जैसा भी आदर्श होगा उसके अनुरुप ही उसका व्यक्तित्व ढलेगा। आदर्श यदि श्रेष्ठ है तो चिन्तन और गतिविधियों में भी उत्कृष्टता का समावेश होगा। इसके विपरीत निकृष्ट आदर्श निम्नगामी प्रवृत्तियों को प्रोत्सान देगे। हेय व्यक्तित्व ही गढ़ेगें। उपासना में इष्ट का निर्धारण परोक्ष रुप में श्रेष्ठ आदर्शों की ही प्रतिष्ठापना है। जिसके निकट आने, तादात्म्य स्थापित करने वाला भी उसी के अनुरुप ढलता-बनता चला जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सक डाँऋ ‘हेनरी लिंडलहर’ अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस आँफ नेचरल थेरोप्यूटिकस’ में उपासना के प्रभावों के विषय में लिखते है कि हम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को किसी दिव्य सत्ता, देवदूत अथवा सर्व व्यापी चेतना से एकत्व स्थापित करके निश्चय पूर्वक सुधार करते है। उनका कहना है कि “हम जिस प्रकार की आत्मा का ध्यान करते है उससे हमारा सर्म्पक उसी प्रकार स्थापित हो जाता है उससे हमारा सर्म्पक उसी प्रकार स्थापित हो जाता है जिस प्रकार वायरलेस के द्वारा संसार के विभिन्न रेडियों स्टेशनों से सर्म्पक हो जाता है। दिव्य-सत्ताओं से सर्म्पक एवं उनसे मिलने वाली दिव्य प्रेरणाओं से आध्यात्मिकही नहीं शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य सर्म्बधन का लाभ भी प्राप्त कर सकते है। प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क वायरलेस सैट के समान है जो हर समय भले-बुरे विचारों को ग्रहण करता रहता है। मन में किस प्रकार के विचार उत्पन्न होगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार की आत्मा से सर्म्पक जोड़ रहे है अर्थात् इष्ट से जुडे़ आदर्श कैसे है।

विचारों की परिपक्वता एवं दृढ़ता, समीपवर्ती व्यक्तियों एवं वातावरण को भी प्रभावित करती है। ‘उपटन सिकलेयर’ मेन्टल रेडियों नामक पुस्तक में लिखते है कि उपासना व्यक्तित्व निर्माण की एक समग्र प्रक्रिया है। जिसका अवलम्बन लेने वाला स्वयं श्रेष्ठ बनता तथा अन्यों को भी प्रभावित करता है। वह अपने विचारों का प्रसारण अभौतिक माध्यमों से अन्य लोगों तक कर सकता है। इसमें व्यक्ति एवं वातावरण को अनुपवर्ती बनाने के सभी तत्व विद्यमान है।”

उपासना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के रुप में स्वीका करते हुए प्रसिद्ध मनवैज्ञानिक ‘चार्ल्सथुग’ ने कहा है कि “सभी धर्मों में प्रचलित उपासनाएँ मानव स्वास्थ्य एवं समग्र विकास के लिए आवश्कय है।” उनका कहना है कि “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी उतने रोगियों को आरोग्य प्रदान नहीं कर पाते जितना कि संसार का छोटे से छोटा धर्म करा पाता हैं

मानसिक अशान्ति एवं असंतोष का कोई स्थाई उपचार किसी भी चिकित्सा प्रणाली में उपलब्ध है।

चिन्तन में उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व में समग्रता के समावेश के लिए उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। इसमें व्यक्ति एवं समाज के सर्वतोमुखी परिष्कार एवं प्रगति के सभी आधार विद्यमान है। समस्याओं की जटिलता एवं परिस्थितियों की विषमता के निराकरण के लिए उपासना आज की सर्वोत्तम आवश्यकता है।

चक्रवर्ती भरत छह खण्डों को विजितकर वृमाचल पर्वत पर अपना नाम लिखने गए। वे सोचते थे “मैं बड़ा चक्रवर्ती हूँ। इस पर्वत पर मेरा ही नाम रहेगा।” परन्तु पहाड़ पर हुँचने पर उन्होने देखा कि वहाँ तो पहिले से ही अगणित नाम लिखे हुए है जिन्हे अनेकों चक्रवर्ती लोग आ-आकर लिख गये है। पर्वत पर नया नाम लिखने की जगह ही नहीं बची थी। यह देख भरत का गर्व चूर-चूर हो गया। वह बिना नाम लिखे ही लौट आये। जो मृत्यु को ही न जीत पाया वह कैसा चक्रवर्ती?


स्थूल से असंख्य गुना समर्थ सूक्ष्य

जो कुछ आँखों से दिखाई देता है उस स्थूल के परिणाम स्वल्प है और प्रभाव सीमित। उससे आगे गहराई में सूक्ष्य तक उतरना आरम्भ करते ही बहुमूल्य सम्पदाएँ उपलब्ध होने लगती है। धरती की उपर परत कूड़े कंकर और धूल मिट्टी से ढकी रहती है, खोदना आरम्भ करते ही पानी से लेकर अनेकानेक बहुमूल्य खनिज संपदाएँ मिलती चली जाती है। सागर की उपरी सतह पर प्रथम तो खारे पानी के अलावा कुद मिलता ही नहीं मिलता भी है तो कोइ और कचरे से भिन्न नहीं होता, पर गहराई में तलहटी तक जाने वाले गोताखोर उसमें से बहु मूल्य मोती मूँगा रत्न सम्पदा बटोर लाते है।

यह तो हुई स्थूल की स्थूल विशेषताएँ प्रभाव की दृष्टि से भी स्थूल की शक्ति सामर्थ्य सीमित ही है। एक मिर्च खाने वाले का मुँह ही जलाती है, अय औरों पर उसका कोई असर नहीं पड़ता परन्तु वही मिर्च जलकर वायुभूत होती है तो आस-पास कई वर्ग मीटर के क्षेत्र में बैठे लोगों की नाक में छींक और सिर में दर्द पैदा करवा देती है। होम्योपैथी जैसी निरापद और स्थाई प्रभाव डालने वाली चिकित्सा पद्धति का आधार दर्शन भी सूक्ष्य परक है। होम्योंपैथी इसी विज्ञान पर आधारित है कि वस्तु जितनी सूक्ष्माति सूक्ष्म होती जायगी अपनी गुणकारी होती जायेगी। इसलिए मूल औषधि के हजारवें लाखवें हिस्से तक उसका विभाजन किया जाता है और वह परिणाम में उतनी ही गुणकारी होती है।

कील दो वस्तुओं को जोड़ने में ही काम आती है। ज्यादा से ज्यादा उसे दीवार में गड्ढा किया जा सकता है अथवा किसी के चुभ जाने पर छोटा सा घाव भर हो सकता है। पर उसका अरब-खरब का भी अरब-खरब वाँ मात्र परमाणु लाखों मनुष्यों को मारने, पहाड़ों को मिटा कर खाई बनाने और बडे़-बडे़ राकेट चलाने, बिजली पैदा करने में समर्थ होता है। जिसे परमाणु शक्ति कहा जा सकता है। कील के उस सूक्ष्माति सूक्ष्य भाग की, जिसे परमाणु की सीमा रेखा में भी बाँधना सम्भव नहीं है। अन्तनिहित उर्जा का केन्द्रीयकरण किया जा सके और ध्वंस कृत्य में लगाया जा सके तो उतने से ही इस समस्त भूमिमण्डल का विनाश हो सकता है। स्मरणीय है कि अब किये जाने वाले परमाणु विस्फोटों में विस्फोट से उत्पन्न होने वाले परमाणु उर्जा का एक सीमित अंश ही प्रयुक्त हो सका हैं अधिकाँश तो तत्काल अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है। इस शक्ति का सृजनात्मक प्रयोग भी इतना व्यापक प्रभावोत्पादक और शक्तिशाली है कि उससे उतनी ही गर्मी मिल सकती है जितनी कि सूर्य से प्राप्त हो सकती हैं।

अब तक जड़ पदार्थों की सूक्ष्म सामर्थ्य का ही विवेचना किया गया, चेतन की सूक्ष्म सामर्थ्य उससे असंख्य गुना सामर्थवान है। भारतीय ऋषियों ने आरम्भ से ही गागया है-” अणोरणीयान महतो महीयान आत्मा गृहयायाँ विहितो सृजन्तों।” परन्तु इस तथ्य को कुछ वर्षों पूर्व तक कल्पना की उड़ान और वायवीय दर्शन भर समझा जाता था परन्तु परामनोविज्ञान की अधुनातन शोधें इसी निर्ष्कष बिन्दु पर पहुँच रही है कि अदृश्य अतिसूक्ष्य चेतन सत्ता की सामर्थ्य कल्पना तथा अनुमान से परे है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वालकालियर ने कहा है कि भौतिकशास्त्र और जीवशास्त्र के क्षेत्र में आने वाले स्थूल शरीर के अतिरिक्त जीवधारियों का एक सूक्ष्य शरीर भी है जो अलौकिक क्षमताओं से भरा पड़ा है। यह शरीर मृत्यु के बाद भी बना रहता है। सूक्ष्म की जब शोध चली तो मेटा साइकिक, साइकिक, पेरासाइकोलौजी, मेटा साइकोलौजी जैसी मनोविज्ञान की कितनी ही धारायें निकल पड़ी और सूक्ष्य चेतना की अलौकि सामर्थ्य पर्तदर पर्त निरन्तर खुलती जा रही है।

भारतीय मनीषियों ने अपने ढंग से इस तथ्य का पता काफी पहले ही लगा लिया था और योगसाधनाओं के रुप में व्यक्ति की रहस्यमयी क्षमताओं को शुद्ध, प्रखर, तथा विकसित बनाने की तकनीक विकसित कर ली थी। उन उपलब्धियों को अब तक चाहे जो कुछ कहा जाता रहा हो परन्तु ज्ञात इतिहास के आधुनिक युग में भी ऐसी असंख्याओं घटनायें घटी है जो मनुष्य की अलौकिक अभौतिक सामर्थ्य को प्रमाणित करती है।

योगसाधनाओं और सूक्ष्म की सामर्थ्य को कोरी गप्प तथा मनगढ़न्त मानने वाले सरजौन वुडरफ भारत में आकर कुछ ऐसी अनुभूतियों से गुजरे कि उन्हें अपनी मान्यता को तिलाँजलि देनी पड़ी। ब्रिटिश काल में सरजौन वुडरफ कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ मजिस्टे्रट थे। उन्होंने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि एक बार वे ताजमहल के संगमरमरी फर्श पर बैठे थे, साथ में भारतीय मित्र भी थें बातों में किसी प्रसंग वश संकल्पशक्ति की चर्चा चल पड़ी। सरजौन वुडरफ के भारतीय मित्र ने संकल्पशक्ति की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कहा- इतना तो मैं भी कर सकता हूँ कि सामने जो लोग बैठे है उनमे से जिसे आप कहे उसे उठा दूँ और वापस आप कहें जहाँ बिठा दूँ।” वुडरफ ने उन व्यक्तियों में से एक को चुन लिया और यह भी बता दिया कि उसे किस स्थान पर बिठाना है। मित्र ने अपनी शक्ति का प्रयोग किया। फलतः वही व्यक्ति अकारण उठा चला और वुडरफ के बताये गये स्थान पर जा बैठा।

व्यक्तिगत जीवन में मनुष्य के सामान्य क्रिया-कलाप भी संकल्पशक्ति के सहारे चलते है, संकल्पशक्ति को चेतना की ही स्फुरण कहना चाहिए इसे मनःशक्ति भी कहा जाता है और सूक्ष्म शरीर का एक नाम मानस शरीर भी है। मनःशक्ति के संकल्प शक्ति के साधरण प्रयोग हर कोई कर सकता है। उदाहरण के लिए रात को संकल्प करके सोया जाय कि सुबह तीन बजे उठना है तो ठीक तीन बजे ही आँख ख्लती है। सामान्य व्यक्तियों की संकल्प शक्ति इससे अधिक विकसित नहीं हो पाती जैसे साधारणतया कुँआ खोदने के लिए खुदाई का क्रम पानी निकलने तक जारी रखा जाता है। आकस्मिक रुप से किन्हीं विशेष अवसरों पर संकल्प शक्ति का विस्फोट व्यक्ति से चमत्कारी काम भी करवा लेता है। उस स्थिति में शरीर की चाहे जो दशा हो संकल्प पूरे कर ही लिए जाते है। गतवर्ष 1977 के 22 अगस्त की ही घटना है। मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की एक बस नागपुर से इलाहाबाद जा रही थी। नागपुर से ही उसमें कुछ डाकू चढ़ गये।

जब बस नागपुर जबलपुर के बीच सबसे बेहड़ रास्ते से गंजर रही थी तभी एक डाकू ने रिवाल्वर तानकर ड्राइवर से बसे रोकने का आदेश दिया। उस समय बस एक ऐसी सड़क से गुजर रही थी जिसके आस-पास बहुत नीची ढलान थी। आगे पुल था। अचानक बस रोकने से बस उन खाइयों मं भी लुढ़क सकती थी और पुल पर पहुँचते-पहुँचते नदी में भी गिर सकती थी ऐसी स्थिति में बस में बैठे सभी यात्री समाप्त हो जाते। डाकू इस बात को नहीं समझ रहे थे और उन्होंने ड्राइवर के पेट में गोली मार दी। गोली लगने पर भी ड्राइवर ने स्टियरिंग नहीं छोड़ा। जब बस नहीं रुकी तो डाकू ने दूसरी गोली ड्रायवर के सिर में मार दी। सिर और पेट से खून के फब्बारे छूट गये परन्तु ड्राइवर ने फिर भी स्टियरिंग नहीं छोड़ा। करीब एक किलोमीटर तक बस को चलाने के बाद, जब बस ने पुल पार कर लिया और सीधी सड़क पर पहुँच गई तो ड्राइवर ने ब्रेक दबाया और उसी समय निष्प्राण होकर स्टियरिंग पर लुढ़क गया।

सामान्यतः सिर और पेट में गोली लगने के बाद व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाती है परन्तु ड्राइवर के मन में बस में सवार यात्रियों को बचाने का संकल्प था परिणामस्वरुप उसने मृत प्राय स्थिति में भी अपना काम पूरा किया। इस संकल्प शक्ति को परामनोविज्ञानवेत्ताओं ने सूक्ष्य उर्जा का नाम भी दिया है। इस मानवीय उर्जा से ही दैनिक जीवन के क्रिया-कलाप चलते है पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि इसकी मात्रा इतने तक ही सीमित है। इस शक्ति को किसी प्रकार बढ़ाया जा सके तो चमत्कार जैसे लगने वाले कार्य भी बाँये हाथ का खेल बन जाते है। योगीजन इस शक्ति को भले कार्यों में लगाते है और दुष्ट प्रकृति के लोग दुष्प्रयोजनों में। आग का भोजन बनाने और घर जलाने में कुछ भी प्रयोग किया जा सकता है।

एक रुसी महिला नेल्या मिखायलोव में सहसा यह शक्ति असामान्य रुप से विकसित हुई। नेल्या उन दिनों चल रहे युद्ध के समय मोर्चे पर घायल सैनिकों की परिचर्या सुश्रृषा का काम कर रही थी। युद्ध के मोर्चे पर वह स्वयं जाती और हताहत सैनिकों को चिकित्सा कैम्प तक पहुँचाने का कार्य करती। एक बार वह शत्रृ पक्ष द्वारा छोड़ी गई गोली से घायल हो गयी। गम्भीर आहत स्थिति में उसे अस्पताल में भरती कराया गया और वहीं उसमें इच्छा शक्ति से वस्तुओं को हटाने गिराने की शक्ति अनायास प्राप्त हुई। मास्को विश्व विद्यालय के जीव शास्त्री एडवर्ड नामोवने नेल्या का परीक्षण किया। प्रयोगशाला में उसने मेज पर बिखरी माचिस की तीलियों को बिना हाथ घुमा कर जमीन पर गिया दिय। फिर वही तीलियाँ काँच के डिब्बे में बन्द की गई। जीवशास्त्री को यह आश्का थी कि कहीं नेल्या कोई गुप्त टेकनीक का उपयोग तो नहीं कर रही है। नेल्या ने फिर हाथ घुमाया तो काँच के डिब्बे में बन्द तीलियाँ हिलने सरकने लगी।

इसी तरह नेल्या ने मेज पर थोड़ी दूर पडे़ रोटी के टुकड़े पर अपना ध्यान केन्द्रित किया तो वह टुकड़ा खिचकर नेल्या के पास आ गयाँ। नेल्या का भली-भाँति परीक्षण किया गया। उसने एक चम्मच को बिना हाथ लगाये वहीं बैठे-बैठे बरतन से निकाल कर अपनी मेज पर खींच लिया। बरतन उस मेज से लगभग दो मीटर दूर रखा था। चम्मच इतनी दूर पर हवा में तैरता हुआ सा आया। जैसे कोई व्यक्ति हाथ में पकड़ कर उसे वहाँ ला रहा हो। इन सारे परीक्षणों और प्रयोगों के बाद जीवशास्त्री एडवर्ड नोमोव तथा उनके अन्य सहयोगी इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि नेल्या के मस्तिष्क में विद्युत शक्ति सी बाँधती है और उसकी देह से चुम्बकीय शक्ति निकलती है जबकि नेल्या का कहना था वह इच्छा और उस इच्छा पर अपना ध्यान केन्द्रित करने के अलावा कुछ नहीं करती, तो क्या संकल्प और इच्छा शक्ति इतनी अद्भुत तथा चमत्कारी है। शास्त्रों ने कहा है “ संकल्प मयोअयं पुरुष” यह पुरुष (शरीर पर में रहने वाली चेतना) संकल्प मय है।

संकल्प को ही ब्रहमा की शक्ति भी कहा जाता है। आप्त वचन है-एकोअहं वहुस्यामः ब्रहमा ने संकल्प किया कि एक से अनेक हो जाउ और वह एक से अनेक हो गया। संकल्प शक्ति को सूक्ष्म का चमत्कारी विज्ञान कहा जाता हैं। प्राचीनकला में ऋषियों महर्षियों ने इसी सूक्ष्म तत्व की शोध और खोज में अपना समय लगाया तथा आधुनिक काल के यशस्वी भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अनेक गुना लाभों से लाभान्वित हुए। यह तो असंदिग्ध तथ्य है कि मनुष्य शरीर में अनेकों प्रकट और सूक्ष्म शक्तियाँ विद्यमान है। योग साधना द्वारा उन शक्ति केन्द्रों को, चक्रों को, ग्रन्थियों और मातृकाओं को ही जागृत किया जता है तथा अलौकिक सिद्धि सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है। योगसाधना द्वारा व्यक्तिकी सीमित चेतना को विराट की असीम चेतना के साथ उसी प्रकार सम्बन्धित कर दिया जाता है जिस प्रकार किसी रेडियों के यन्त्र आकाश में तैरने वाली ध्वनि तरंगों से संबंधित होते है।

यह तो स्पष्ट है ही कि मनुष्य का अस्तित्व के दिखाई पड़ने वाले बाहरी कायकलेवर तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह उससे बहुत सूक्ष्म, चेतन और शक्तिशाली है। आवश्यकता इस बात की है कि उसकी कार्य प्रणाली को समझा और विश्लेषित किया जाय तथा उससे लाभान्वित हुआ जाय। जड़ परमाणु से इतने चमत्कारी लाभ उठाये जा सकते है तो चेतन सूक्ष्म का लाभ कितना चमत्कारी होगा न कहना आसान है न कल्पना करना।


मकरंद एकत्रित करने लगी (kahani)

मधुमक्खी उड़ती-उड़ती एक फूल पर बैठ मकरंद एकत्रित करने लगी तो निकट उड़ती तितली ने पूछा- बहिन क्या कर रही हो? मधुमक्खी बोली-’मधु एकत्रित कर रही हूँ॥” और अपने काम में जुट गई।

तितली ने कहा- बहन! तुम र्व्यथ ही अपना श्रम गँवा रही हो। इस छोटे से फूल में मधु कहाँ। चलो, हम दोनों मधु के सरोवर को खोजे।’

मधु मक्खी ने उसके इस आग्रह का कोई उत्तर नहीं दिया। वह अपने काम में जुटी रही। कई दिनों बाद वह तितली उसे दिखाई दी जो उसने पूछा- क्यों बहिन मधु का सरोवर मिला, नहीं मिला।

“हमारे छत्ते को देखों हमने कितना मधु जमा कर लिया है।” मधुमक्खी बोली।


विश्व शक्ति का उद्गम प्रति पदार्थ और प्रति व्यक्तित्व

पदार्थ की सूक्ष्मतम इकाई कभी परमाणु को माना जाता था, पर अब वैसी मान्यता नहीं रही। ढेले के भीतर असंख्यों कण होते है उसी प्रकार परमाणु अब एक ढे़ला भर है। उसके अन्तराल में अनेकों सूक्ष्म और उनके अर्न्तगत भी अति सूक्ष्म कण प्रतिकण मिलते चले जा रहे है। इलेक्ट्रोन प्रोटोन के नाम अब बहुचर्चित है। अब उनके भी अन्तराल में खोजी गई इकाईयाँ ही चर्चा का विषय बनी हुई है और शक्ति का उद्गम इन्ही अति सूक्ष्मों के सम्मिलन अमिश्रम एवं परिभ्रमण के क्रम को ठहराया जा रहा है। शक्ति का प्रकटीकरण की अनुभव में आता है। उसका उद्भव कहाँ से होता है इसके लिए अधिकाधि गहराई में लगातार उतरते जाने की आवश्यकता पड़ती जाती है।

यूरोप के 12 विभिन्न राष्ट्रों ने आधुनिक युग की सबसे महत्व की अनुसंधान के लिए 385 करोड़ रुपये की लागत का एक ‘सुपर प्रोटीन सिक्रोट्रान’ एस. पी. एस.) के नाम से प्रसिद्ध संरचना बनायी है जिसकी परिधि 7 किलोमीटर और 2.2 किलो मीटर चौड़ाई है जिसमें 18 टन के चुम्बक लगे हुये है इसमें से एक स्टेनलेसस्टील की वैकुअम ट्यूब लगी है जिसके अन्दर करोड़ों एटामिक पार्टीकिल्स को बड़ी तीव्रगति से ले जाया जाता है। यह संयंत्र जेनेवा में स्विटरलैण्ड एवं फ्रान्स की सीमा पर बनाया गया है। यह 12 यूरोपीय राष्ट्रों की संस्था (सी.ई.आर.एन) सर्न (कौन्सिल यूरोपियन फार रिसर्च न्यूक्अिर) नाम से प्रसिद्ध है।

सन् 1930 से लेकर एक नया युग भौतिक विज्ञान में आरम्भ हुआ है इसी के फलस्वरुप इलेक्ट्रान प्रोटान न्यूट्रान आदि छोटे कणों से भी सूक्ष्म 200 से अधिक सब न्यक्लियर पार्टीकिल्स पाये गये है जिन्हे वैज्ञानिक प्राय, जू आँफ स्ट्रेन्ज बीस्ट्स’ कहते है।

इन सूक्ष्म कणों का प्रायः दो प्रमुख वर्गों में विभाजन किया गया हैः-

(1) हेड्रान्स जिसका अभिप्राय है बडे़ और मजबूत जैसे न्यूट्रान, प्रोटान, मेसान आदि।

(2) लेप्टन्स-सूक्ष्म एवं कमजोर जैसे इलेक्ट्रान्स, म्यूकान्स एवं न्यूट्रिनोस सन् 1964 में जेलमान एवं सहयोगी जार्ज ज्विग को ओमेगा माइनस नामक सूक्ष्म कण के क्वार्क परिकल्पनानुसार भविष्य कथन करने पर नोवल पुरुस्कर मिला था।

इन कणों के साि-साथ अन्य प्रतिकणों का भी अनुसंधान से पता लगा हैं क्वार्क या ऐन्टीक्वार्क नाम के सूक्ष्मतम कणों से मिलकर ही हेड्रान्स एवं लेप्टन्सस बनते है। प्रत्येक हेड्रान दो या तीन क्वार्क और (या) ऐन्टीक्वार्क मिलकर बना होता हैं।

पदार्थ की संरचना की पहेली का समाधान करने में भौतिक विज्ञानी कहाँ तक सफल होंगे! इसके बारे में सर्न के रिसर्च डायरेक्टर जनरल डाँ. लियोन वान होव कहते है कि हमारा अनुसंधान प्रोढ़ावस्था में है लेकिन हम अनेकों जटिल समस्याओं की उलझन में फँस गये है।

जन उलझनों में पार्टीकल फिजिक्स के मूर्धन्य विज्ञानी फँस गये है, उनमें प्रमुख है-प्रति पदार्थ एण्टी मैंटर। पदार्थ के शक्ति कण विदित है उसका सामान्यपरिय अणु विखण्डन से उत्पन्न उर्जा द्वारा मिलता है यों इस उर्ज का जो आकलन मापक यन्त्रों द्वारा किया जाता है वह समग्र नहीं आँशिक ही होते है। विखण्डन और आकलन के मध्य जो अवधि और परिधि रहती है उतने से ही उत्पन उर्जा का तीन चौथाई भाग अतरिक्ष में तिरोहित हो जाता हैं। आकलन प्रायः एक चौथाई का ही हो पाता हैं इसलिए आँकी जाने वाली क्षमता वस्तुस्थिति की अपेक्षा कहीं कम ही होती है।

अब प्रश्न यह है कि अणु परिवार की निताँत क्षुद्र इकाइयाँ इतनी सामर्थ्य लाती कहाँ से है और उन्हें धारण कैसे, कहाँ और किस रुप में और किस प्रकार करती है। इस प्रश्न का एक नया तथ्य उभर कर सामने आया है- प्रतिकण। यह पदार्थ कणाँ के साथ-साथ रहते है। वे छाया की तरह ही साथ बन कर रहते है। धुले हुये है और परिस्थिति विशेष में उठते बैठते रहते है यही है वह प्रसंग जिसमें डाँ. हावे के कथनानुसार पार्टीकल फिजिक्स उलझनों के दल-दल में फँस गई है।

अब इन निर्ष्कष पर पहुँचा जा रहा है कि कण प्रतिकण प्रतिद्वन्द्वी होते हुए भी पूरक है। ऋण और धन प्रवाह यो एक दूसरे के प्रतिद्वन्दी है, तो भी उनके मिलने पर ही शक्ति का प्रवाह उत्पन्न होता है। अन्यथा उनकी प्रतिद्वन्दता कुछ कर नहीं पाती। दोनों अगति में ही पड़ें रहते है। गतिशील होने के लिए कुछ उपलब्धि नियेजित करने के लिए उन्हे रचनात्मक न सही प्रतिद्वन्दात्मक ही क्यों न हो। देव और दैत्यों की लड़-झगड़ का उस युद्ध में नाश विनाश का इतिहास कथा-पुराणों में प्रचुरतापूर्वक भरा पड़ा है। साथ ही वह कथानक भी महत्वपूर्ण है, जिसमें दोनों ने मिलकर समुद्र मन्थ किया था और बहुमूल्य रत्न राशि का वैभव कमाया था। गण और प्रतिकण के सम्बन्ध भी कुछ ऐसे ही है, जैसे देव और दैत्यों के। दोनों का जन्म दिति और अदिति दो सगी बहिनों से हुआ था। दोनों के पिता भी एक ही थ। इतने पर भी उनके अस्तित्व और पारस्परिक संबंध ऐसा था, जिसे विचित्र ही कह सकते है। न मित्र न शत्रु। साथ्ज्ञ ही प्रगाढ़ मित्र और प्रचण्ड शत्रु भी। पदार्थ और प्रतिपदार्थ का अस्तित्व स्वभाव और उपक्रम भी प्रायः ऐसा ही विचित्र हैं दोनों साथ-साथ रहते है, एक दूसरे को गति सहयोग देते है। साथ ही परस्पर विरोधी होने के काण एक-दूसरे को आघात पहुँचाने से भी नहीं चूकते, घड़ी के पेण्डुलम से चलती रहने वाली क्रिया प्रतिक्रिया के समतुल्य उसे समझा जाता रहा है। साथ रहते हुए भी सहयोग और संघर्ष का समन्वय किस प्रकार सम्भाव है और पदार्थ प्रतिपदार्थ एक दूसरे के सहयोगी, विरोधी साथ-साथ कैसे रह सकते है, इसका अनुमान लगाया जा सकता हैं।

शरीर और आत्मा का परस्पर सहयोग भी है और संघर्ष भी। सहयोग इस अर्थ में कि जीवन क्रम दोनों मिलकर चलाते है। संघर्ष इस अर्थ में अपने-अपने स्वार्थ के लिए खींच तान बनी रहती है। भले बुरे पुरुषार्थों का प्रकटीकरण इस संघर्ष से ही होता है।

अभी तक प्राप्त जानकारी के आधार पर वैज्ञानिक यही कहते थे कि प्रतिकण केवल प्र्रयोगशालाओं में ही प्राप्त किये जा सकते है क्योंकि उनकी उत्पत्ति इलेक्ट्राँन और न्यूट्रान के टकराव से ही होती है किन्तु न्यूमैक्सिको विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाँ. रावर्ट गौल्डेन जिनके नेतृत्व में दो युवा वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे है, ने टेक्सास से 21 जुलाई 1979 को एक गुब्बार छोड़ा जिसमें 5 हजार पौण्ड के वजन के यंत्र थे जिसमें 300 पौण्ड वजन का एक तीव्र सम्वेदन शक्ति चुम्बक भी था 35 किलोमीटर की उँचाई तक उड़ने पर गुब्बारे के सूक्ष्म उपकरणों में चुम्बकीय क्षेत्र के माध्यम से 28 ‘एन्ट्री प्राटोन की मौजूदगी अंकित की अभी तक एन्ट्री प्रोटोन केवल प्रयोग शालाओं में ही देखे गए थे किन्तु यह प्रथम अवसर है जबकि खुले अन्तरिक्ष में उन्हें देखा गया।

अब तक की मान्यता यह थी कि पृथ्वी पर भारी मात्रा में जो ब्रहमाण्ड किरणें बरसती है, उनका उद्गम स्त्रोत किन्ही तारकों सौरमण्डलों या नौहारिकाओं में रहा होगा। यह भूली भटकी किरणें किसी अविज्ञात की ओ चलती होगी और रास्तें में पड़ने वाली पृथ्वी को अपने अस्तित्व का परिचय तथा यत्किचित उपहार, अभिशाप देती जाती होगी। पर अब प्रति पदार्थ की सत्ता और प्रक्रिया को समझने पर उस पूर्व मान्यता में आमूल चूल परिवर्तन करना आवश्यक हो गया है। नये निर्ष्कष यह बताते हे कि ब्रहमाण्ड किरणें दूरगामी यात्रा करती हुई पृथ्वी पर नहीं आती वरन् अणु परिवार के घटको में विद्यमान गतिशीलता ही यह उपार्जन करती है। यह बाहरी अनुदान नहीं वरन् अपनी निजी उत्पादन ही है। जो टकराने, सहयोग देने की समन्वित नीति के कारण उद्भूत होता और प्रचण्ड शक्ति स्त्रों तक की भूमिका सम्पन्न करता है।

प्रति पदार्थ की खोज एक प्रति प्रकृति के असित्व की ओर संकेत करती है। प्रतिकण, प्रति पदार्थ, प्रति विश्व की मान्यता अब एक कल्पना नहीं रही, उसे वास्तविकता के रुप में अपनाया जा रहा है। ऐन्ट्री मैटर, ऐन्टी यूनिवर्स कभी उपहासास्पद चर्चा के रुप में वैज्ञानिकों के विनोद भर प्रयुक्त होती थी। अब उस सर्न्दभ में गम्भीरता और जिम्मेदारी के वास्तविकता के विचार किया जाता है। पदार्थ की संरचना के बारे में अभी भी कोई मद भेद नहीं है। पर शक्ति का उद्गम उसे न मानने की बात चल पड़ी है। परमाणु परिवार में जो समर्थ प्रतीत होती है, वह उसके माध्यम से प्रकट तो होती है, किन्तु वह उपयोग मात्र है। उत्पादन या आधार नहीं। इस तथ्य को शरीर और आत्मा के उदाहरण से अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है। हलचलें शरीर में होती है और विभिन्न क्रिया-कलाप उसी के द्वारा सम्पन्न होते है। इतने पर भी शरीर जीवन नहीं है। प्राण ही सामर्थ्य का उद्गम है। उसी की सत्ता तथा प्रेरणा शरीर को जीवित एवं गतिशील बनाती है। प्रति पदार्थ को प्रकृति की आत्मा और पदार्थ को उसकी काया कहा जाना चाहिऐ। नई खोजें इसी निर्ष्कष तक इन दिनो भौतिक विज्ञान को ले पहुँची हैं।

प्रति पदार्थ के अस्तित्व को स्वीकार करने और उसे प्रकृति की समस्त गतिविधियों एवं शक्तियों का उद्गम मानने के उपरान्त एक जटिल प्रश्न है कि उस क्षे़त्र का तनिक भ्ज्ञी अनुभव न होने के कारण प्रवेश के लिए की गई छेड़-छाड़ उपयोगी होगी भी या नहीं? श्रम निरर्थक जाने तक का खतरा उठाया जा सकता है, पर डाइना माइट की छड़ी से फुलझड़ी का खेल, खेलने का साहस कौन संजोये? इस प्रवेश कर्त्ता का ही नहीं, इस समूचे भूमण्डल और परिवार का यहाँ तक कि ब्रहमाण्ड का भी प्रचलित प्रवाह उलट सकता है, और जिस प्रति विश्व की अभी कल्पना मात्र की जा रही है वह दृश्यमान ब्रहमाण्ड को विस्मृति के गर्त में धकेल कर स्वयं सिंहासन रुढ़ हो सकता हैं। तब भौतिकी प्रकृति के वर्तमान नियम और आधारों का कही पता भी न चलेगाँ उस स्थान पर प्रति प्रकृकत अपनी नई रचना और नई व्यवस्था के अनुरुप इस ब्रहमाण्ड का नया ढ़ाँचा खड़ा करती, नया शासन चलाती दृष्टिगोचर होगी।

यह पदार्थ और प्रति पदार्थ के स्परुप और सम्बन्ध का प्रसंग है। ठीक इसी प्रकार की आर्श्चयजनक, कौतूहल भरी एक सत्ता व्यक्ति और प्रतिव्यक्ति की भी समझी जा सकती है। व्यक्ति अर्थात शरीर, मन सहित। प्रतिव्यक्ति अर्थात् प्राण, महा प्राण सहित। हमें अभ्यास मात्र शरीर की इच्छा, आदतें और रसानुभूति भर का है। जो निकटवर्ती क्षेत्र में होता है उसी के अनुकरण का जो आकर्षण है उसी का अनुगमन मन करता है और उसी प्रवाह में जीवन संकट ज्यों त्यों करके किसी अनिश्चित दिशा में बढ़ता भटकता रहता है। शरीर यात्रा की समग्र प्रकृति क्रम के साथ बिठाई जा सकती हैं। शक्ति आत्मा की है। इस शक्ति के साथ सर्म्पक बनाने में मन डरता है कि कही इसका आधिपत्य काय जगतपर भौतिक जीवन पर न हो जाय। यह डरावनी स्थिति है। अन्तस में विद्रूप उठ पड़े तो उसका स्वरुप पशु की परिधि को पार करता हुआ, पिशाच तक पहुँच सकता है, यदि उसमें विशिष्ट जग पड़ें तो देवत्व और र्स्वग के प्रकटीकरण में भी कोई अड़चन शेष नहीं रहेगी।

प्रति पदार्थ की तरह यदि प्रति व्यक्ति भी चर्चा और शोध का विषय बने, उसकी मात्र सामर्थ्य के सदुपयोग का सूत्र हाथ लगे तो प्रचलन व्यवस्था में आमूल चूल परिर्वतन हो सकता है। तब मनुष्य को देवता और संसार को र्स्वग के रुप में परिणत होने में भी देर न लगेगी। भौतिक चेतना की गतिविधियाँ पशु प्रवृत्तियों के प्रकटीकरण तक सीमित है। इसके स्थान पर आत्मिक चेतना का आधिपत्य मानवी सत्ता पर आत्मिक चेतना का आधिपत्य मानवी सत्ता पर जम सके तो ऐसे अप्रत्याशित परिवर्तन की पूर्ण सम्भावना विद्यमान है, जिसमें सतयुग की स्वर्गीय परिस्थितियों को इसी धरती पर विद्यमान देखा जा सके।


Quotation

बुद्धिमान वह है जो किसी को गलतियों से हानि खाते देखकर अपनी गलतियाँ सुधार लेता है।


चेतना जगत के अदृश्य संदेश वाहक

मनुष्य जीवन का सर्वाधिक समय सोने में लगता है। यद्यपि दिन के 24 घन्टों में से सामान्यतः 16 घन्टे जागते हुँए ही बीतते है परन्तु इन 16 घन्टों में अनेक विध क्रिया कलाप अपनाया जाता रहता है। यदि एक ही काम में समय लगने की दृष्टि से समय विभाजन और उकस मूल्याकंन किया जाये तो इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ेगा कि निद्रा ही मनुष्य का सबसे ज्यादा समय लेती है। स्वस्थ मनुष्य के लिए प्रायः आठ घन्टे नींद लेना आवश्यक समझा गया है।

नींद के सम्बन्ध में एक तथ्य यह भी प्रकाश में आया है कि उस समय शरीर तो सोया रहता है किन्तु मन जागता रहता है और वह तरह-तरह की हलचलें किया करता है। जागृत अवस्था में मन के जो क्रिया-कलाप, व्यवहार, आचरण और कार्यों के रुप में अभिव्यक्त होते जान पड़ते है सुप्तावस्था में मन की वही हलचलें स्वप्न के रुप में दिखाई देती है। जागृत स्थिति में मन की उचंगों को सामाजिक दबाब, नैतिकता और सभ्यता के मानदण्डों से दबाना पड़ता है उन्हें व्यक्त होने से रोकना पड़ता है। लेकिन स्वप्न एक ऐसी स्थिति है कि वहाँ इस तरह का कोई दबाब अथवा नैतिक बाध्यता नहीं रहती, इसलिए सपनों में मन स्वच्छन्द हेकर विहार करता है। इसी आधार पर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्राइड ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया, कि “ प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों और दैहिक संवेदनों, विकारों का संयुक्त परिणाम होता है। स्वप्न यह स्पष्ट करते है कि हमारा चेतन मन, हमारी भावनाओं के हाथ का एक खिलौना मात्र है।

फ्राइड ने यह भी कहा कि मन की उचित वासनाएँ ही प्रायः स्वप्न के रुप में प्रकट होती है और तरह-तरह के रंग गिरंगे चित्र दिखाकर अपनी तृप्ति का उपाय सृजती रहती है। लेकिन अब यह धारणा पुरानी पड़ चुकी है और यह स्वप्नों का एक पक्ष सिद्ध हुई, न कि उन्हे समझने या व्याख्यायित करने का सम्पूर्ण आधार। फ्रायड के अनुसार व्यक्ति के अवचेतन को किन्ही सामान्य और संकीर्ण सिद्धान्तो द्वारा स्वप्न के माध्यम से समझने का दावा किया जाता था और उन्हें अतृप्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति मात्र समझा जाता था। किन्तु अब स्वप्नों को सामान्यतः तीन वर्गों में रखा जाता है, एक तो वह स्वप्न जो शारीरिक दबावों से प्रभावित होने के कारण दिखाई देते है, दूसरे प्रकार के स्वप्न मानसिक स्थिति की प्रक्रिया स्वरुप उत्पन्न होते है, तीसरी श्रेंणी में उन स्वप्नों को रखा गया है जिन्हें आध्यात्मिक स्वप्न कहा जा सकता है।

शारीरिक दशाओं से प्रभावित स्वप्नों में अपच, उदर, विकार, सर्दी गर्मी की अधिकता, भूख-प्यास, शरीर से किसी वस्तु के र्स्पश होने, सोते समय वातावरण में विशेष बदलाव आ जाने के कारण दिखाई पड़ने वाले दृश्य आते है। ऐसे स्वप्नों में अतिरंजना और विकृति की प्रधानता होती है। उदाहरण के लिये सोते समय यदि कोई सुई या कील वगैरह चुभ रही हो तो स्वप्न में जान पड़ता है कि किसी ने भाला या तलवार घुसेड़ दिया हो। सर्दी की अधिकता में बर्फ की सिल्लियों पर लेटने या ठन्डे पानी में डूबने तथा गर्मी में आग से झुलसने जैसे अनेक दृश्य दिखाई पड़ते है।

मनमस्तिष्क पर पड़ने वाले विभिन्न दबावों, इच्छाओं वासनाओं के आघातों से उत्पन्न स्वप्न दृश्य दूसरी श्रेणी के स्वप्नों की कोटी में आते है। इस प्रकार के स्वप्नों के संबंध में प्रसिद्ध मनःशास्त्री कार्य शेरनल का कथन है कि “शरीर या मन का प्रत्येक विक्षोभ एक विशिष्ट प्रकार के स्वप्न को उत्पन्न करता है। यह ठीक है कि स्वप्न तथ्यों पर आधारित होते है किन्तु वे तथ्यों की सीमाओं से बँधे नहीं होते। उनमें कल्पनात्मक उड़ान भी भरपूर होती है।

तीसरी श्रेणी के स्वप्न वे है जिन्हें आध्यत्मिक कहा जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय भी कहा जा सकता है। फ्रायड ने इस तरह के स्वप्नों को योन कुष्ठाओं के द्वारा प्रेरित और दमित इच्छाओं का प्रतीक कहा था, वहीं स्वप्न अब अतीन्द्रिय अनुभूतियों के आधार सिद्ध हो रहे है। विभिन्न अनुसंधानों, प्रयोगों और परीक्षणों द्वारा यह भली भाँति स्पष्ट हो चुका हैं कि स्वप्न मात्र दमित यौन आकाँक्षाओं अथवा कल्पित क्लिष्ट मनोविकृतियों के दायरे में नहीं सिमट सकते अपितु उनके विविध वर्ग एवं स्तर है। अतीन्द्रिय अथवा आध्यात्मिक स्वप्न भी उनमें से एक है।

अतीन्द्रिय अनुभूतियों स्पष्ट प्रमाण देने वाले विभिन्न स्वप्नों की वैज्ञानिक छान-बीन से यही संकेत मिल रहे है कि व्यक्ति का अवचेतन मनुष्य के सामूहिक अवचेतन का ही एक अंग है। उसका विस्तार विराट् और महत् है विश्व के अनेक आविष्कार इसी अवचेतन की कृपा से सम्भव हुए है। हेनरी फार डेसफाटिस, डन पाइनकेयर जैसे गणितज्ञों को स्वप्न से मार्गदर्शन मिलने की घटनाएँ सर्व विदित है। सिलाई की सुई से लेकर बन्दूक के लिए शीसे के छर्रों और मनुष्यों तक की सैकड़ों वैज्ञानिकों आविष्कारों की सफलताओं का आधार स्वप्न प्रेरणाएँ रही है। विश्व विख्यात संगेतकार मीजार्ट को एक ललित संगीत धुन एक ही बग्घी में बैठकर कही जाते समय जरा भी झपकी लेने के वक्त सूझी। वायलिन बाद तारालिनी को द डेविल्स सानेट’ नामक धुन पूरी की पूरी स्वप्न में दिखाई पड़ी थी। ये धुने काफी प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुई। विश्व प्रसिद्ध संगीतकार चैम्पीन भी अपने संगीत सृजन की प्रेरणाएँ सपनों में पाते थे। प्रसिद्ध नृत्याँगना मेरी विगमैन ने ‘पास्तेरोल’ नामक एक नृत्य की प्रेरणा एक स्वप्न द्वारा ही प्राप्त की थी। हेनरी भूर पाठलो पिकासो, ‘एडयू वेथ, वान गाँगासल्वाडोर डाली आदि प्रख्यात चित्रकारों की सृजन चेतना में स्वप्नों का बड़ा हाथ रहा है।

साहित्यकारों का तो कहना ही क्या? पुश्किन, गेटे, शेक्सपीयर, टालस्टाय आदि सैकड़ों लेखकों स्वप्न में प्राप्त हुए संकेतों, प्रेरणाओं, निर्देशों और परामर्शो के आधार पर एक से एक अनूँठी और ऐतिहासिक कृतियाँ सृजीं। प्रख्यात यूनानी लेखक होमर अँग्रेजी साहित्यकार कालरिज, एडगर एलनपो आदि ने अर्द्ध चेतन स्थिति में,स्वप्न लोक में विचरण करते उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर अनेक रचनाओं का सृजन किया।

इसी प्रकार अनेक गणितज्ञों ने गणित की जटिल समस्याओं को स्वप्नों के माध्यम से अवचेतन की झलकियों के आधार पर सुलझाया। वैज्ञानिकों ने इस आधार पर अनेकों महत्वपूर्ण आविष्कार किये है, कवियों ने अमर काव्यकृतियाँ रची है, कथाकारों और नाट्यकारों ने स्वप्नों के माध्यम से रचनाओं के प्लाट प्राप्त किये है इन स्वप्नों का विश्लेषण अभी संभव नहीं हुआ है पर यह तथ्य है कि अनेक व्यक्तियों ने स्वप्नों के माध्यम से वर्तमान में प्रस्तुत जटिल गुत्थियों का समाधान प्राप्त किया और उन्हें सुलझाया। अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों के मूल में स्वप्नों की प्रेरणा होने तथा साहित्यिक कृतियों का आधार मिलने की सैकड़ों घटनाएँ मिलती है। उनमें से कई तो विश्व विख्यात है। प्रश्न उठता है कि स्वप्नों का कारण यदि मन की दमित और कुँठित इच्छाएँ वासनाएँ ही है तो ये महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्वप्नों के पीछे कौन-सी दमित आकाँक्षाएँ काम करती रही थीं जिन्होने सृजन और निर्माण की नई-नई धाराओं को निःसृत किया।

इन सभी घटनाओं का विश्लेषण करने के बाद इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है कि स्वप्न में मानवीय मस्तिष्क का अधिक विस्तृत और सशक्त भाग, जिसे अवचेतन कहा जाता है जागृत और क्रियाशील रहता है तथा व्यक्ति के मन की संरचना के अनुसार वह विश्वव्यापी गतिविधियों से गहराई के साथ सम्बद्ध हो सकता है। अतीन्द्रिय स्वप्नों का यह एक प्रकार है और सर्व सामान्य भी यदा-कदा इस प्रकार की अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। जब कोई सुलझाये नहीं सुलझ रही हो, मन बहुत बेचैन और व्यथित हो तो न जाने कहाँ से कई बार ऐसे समाधान सूझ पड़ते है कि चमत्कृत रह जाना पड़ता है। इसे सृष्टा की अनुकम्पा और करुणा ही कहा जाना चाहिए कि उसने अपनी प्रिय सन्तान के लिए स्वयं उत्पन्न की गई समस्याओं के लिए भी समाधान के ऐसे स्त्रोत प्रस्तुत किऐ और न सही समस्याएँ, अनेक महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ सृजन के सन्देश इस विचित्र माध्यम से प्राप्त होते है।


मृत्यु-भय का कारण और निवारण

प्रत्येक मनुष्य जानता है कि मृत्यु जीवन का अनिवार्य अतिथि है। जिसने जन्म लिया है उसका मरना निश्चित है। मृत्यु इतनी अधिक, आत्याँतिक और अनिवार्य, निश्चित है कि उससे ज्यादा निश्चित और कुछ नहीं है। लोग रोज अपने सामने एक न एक मृत्यु की घटना देखते है। कोई न कोई प्रतिदिन मरता हुआ दिखाई दे जाता है इस के उपरान्त भी शायद ही कोई अपनी मृत्यु के बारे में सोचता है। अपने मरने का विचार आते ही मनुष्य के मन में भय मिश्रित सिहरन व्याप जाती है और यह असंभव कल्पना संभव होने की आशा की जाने लगती है कि काश अमर हुआ जा सके।

मरने से ज्यादा निश्चित कुछ नहीं है जितना यह सच है उतना ही यह भी सच है कि मृत्य से ज्यादा भयानक वह कुछ नहीं है। यही कारण है कि कई व्यक्ति मरने का नाम आते ही होठों पर अंगुली रख लेते है और प्रियजन ऐसी अशुभ बात मुँह से निकालने के लिये रोकते है स्पष्ट ही यह मृत्यु से भयभीत मनःस्थिति का द्योतक है प्रश्न उठता है कि हिन्दू धर्म आत्मा की अमरता और कर्मो के अनुसार पुनः मिलने के सिद्धान्त को आधार भूत रुप सेमानता है, आत्मा की अमरता और इस नहीं तो अगले जन्म में अच्छे बुँरे कर्मों का निश्चित फल मिलता है, यह सिद्धात हिन्दू धर्म का सामान्य से सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति जानता है। न केवल जानता है वरन उसे स्वीकार करता और मानता भी है। फिर क्या कारण है कि अधिकाँश व्यक्ति मृत्यु से भय-ग्रस्त रहते है।

हिन्दुओं में भगवद्गीता का जितना प्रचार हे और जिनमें अधिक लोगों ने इसे धर्मग्रन्थ की भाँति पढ़ा है उतना शायद ही अन्य किसी ग्रन्थ का पढ़ा गया होगा। भगवद्गीता की पृष्ठभूमि ही मृत्यु भय से आरम्भ होती है। स्वजनों के मोह से वशीभूत होकर अर्जुन युद्ध न करने की इच्छा व्यक्त करते हुये कहता है, हे कृष्ण मुझे न तो विजय की आकाँक्षा है न राज्य की और न सुखों की। स्वजनों को मार क यदि विजय सुख, राज्य, भोग आदि उपलब्ध हो जाय तो उसका क्या मूल्य है। जिन लोगों के लिय मझे राज्य भोग और सुख अभीष्ट है वे ही ये प्राणों की और धनों की बाजी लगाकर उस युद्ध में लड़ने के लिए तैयार है। इन लोगों को मारने से हमें कौन सी प्रिय वस्तु मिलेगी स्वजनों को मार कर हम कैसे सुखी हो सकेगे इससे तो कुल का ही नाश होगा। अपने स्वजनों का नाश करने के कारण उत्पन्न हुए दोष से हमें पाप ही लगेगा गीता 1। 32-40

अर्जुन न तो कायर था और न ही युद्ध से भागने के स्वभाव वाला स्वजनों के प्रति मोह ही वह कारण था, जिससे प्रेरित होकर वह युद्ध न करने की बात कर रहा था। इस मोह को निरस्त करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने यही कहा कि मनुष्य मरण धर्मा है। युद्ध में अनीति का पक्ष लेने वाले लोग कितने ही घनिष्ठ स्वजन क्यों न हो आज नहीं तो कल मरेगे और जो नीति के पक्ष में लड़ने के उद्यत है उनका भी मरना निश्चित है। अतएव मृत्य के भय से उपराम नहीं होना चाहिये आत्मा की अमरता सिद्ध करते हुये भगवान श्री कृष्ण कहते है-

नासतो विद्यते भावो नाभावो विधते सताः उभयोरपि दृष्टोअन्त स्त्वनयोस्तत्व दर्शिभि॥

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्या क्रोशरीरिणः। अनाशितोअप्रमेयस्य तस्माद्यु ध्यस्व भारत॥

य एनं वेत्ति हन्तारं पश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न दिजानितो नायं हति न हन्यते॥ (गीता 2। 16, 18, 19)

जो असत् है उसका अस्तित्व नहीं है और जो सत्य है उसका अभाव नहीं है। तत्वदृष्टा लोगों ने इसी प्रकार इन दोनों का अंतिम तत्व देखा है अर्थात् तत्वज्ञानियों ने इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है। कभी नष्ट न होने वाले माप में न आ सकने वाले नित्य इस शरीर (आत्मा) के ये समस्त दैह नाशवान कहे गये हैं। अतः हे भरत कुल में उत्पन्न अर्जुन तुम अपना कर्तव्य पालन करो जो इस आत्मा को मारने वाला है ऐसा समझता है और जो इसे मारा गया ऐसा एमझता है वे दोनों वास्तविकता को नहीं जानते क्योकि यह न तो मरता है और न ही मारा जाता है।

आशय यह कि आत्मत्व की नित्यता के कारण उसमें जन्म लेने, मरने, एक बार हो कर पुनः दुबारा होने आदि परिवर्तन संभव नही। यद्यपि वह सदा से था और रहेगा। शरीर के रहने या नष्ट होने से उसके नष्ट होने की बात ही नहीं उठती। मृत्युके दर्शन को और स्पष्टता से समझाते हुए श्री कृष्ण कहते है-

वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि ग्रहणाति नरोअपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही। (गीता 2। 22)

जिस प्रकार कोई मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र ग्रहण करता है। उसी प्रकार आत्मा पुराने वस्त्र को छोड़कर नया शरीर प्राप्त करता है। पुराने वस्त्र को छोड़ कर नये वस्त्र पहनने वाले व्यक्ति के शरीर में कोई परिवर्तन नहीं होता वैसे ही पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करने वाली आत्मा भी वही रहती है उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता।

मृत्यु की इतनी स्पष्ट मीमाँसा कदाचित ही किसी अन्य स्थान पर मिलती हो और भगवद्गीता का जितना अध्ययन या पाठ किया जाता है शायद ही किसी अन्य हिन्दू ग्रन्थ का पाठ किया जाता हो, फिर भी लोग मृत्यु से इतने भयभीत रहते है कि लगता है शायद किसी ने इन तथ्यों को गंभीरतापूर्वक लिया हो। सत्य को गंभीरता से समझा जाय अथवा उथले मन से देखा जाय उसका निश्चित प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिये आग को छूने पर जल जाने की वास्तविकता किसी भी ढंग से समझी जाय, गंभीरता से या अगंभीरता से एक बार समझ लेने पर छोटा बच्चा भी आग से सतर्क रहता है फिर क्या कारण है कि आत्मा की अमरता और .... शरीर की वास्तविकता जानने मानने के बाद भी लोग मृत्यु से भय खाते है! उत्तर एक ही है .... मनःस्थिति। जन्म से लेकर जीवन पर्यन्त साथ रहने वाले शरीर में सुख, दुख, कष्ट, सुविधा और हर्ष .... की अनुभूतियाँ होती है। यह अनुभूतियाँ शरीर और मन के तल पर ही होती है। इसलिये बहुँत गहराई.... अब चेतन मन में यह धारणा बैठ जाती है कि अपने अस्तित्व शरीर तक ही सीमित है कहने सुनने को लोग भले ही तत्वज्ञान, आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म बातें करते हो पर यह विचार मान्यता या आस्थाओं .....स्थान नहीं ले पाती।

सूरज की उपस्थिति भी बादलों में छुप जाती है चन्द्रमा पृथ्वी की ओट में आ जाने पर होते हुये भी होने जैसा लगता है। उसी प्रकार सर्वाधिक निकट .... सब से समीप होने के कारण शरीर की ओट में .... तत्वज्ञान छुप जाता है। शास़्त्रकारों ने इसी का .......शरीराभ्यास कहा है। लेकिन यह सर्वविदित है कि शरीर मरण धर्मा है। कितनी ही आशक्ति होने पर फिर .... से भय कैसा। मकान को गिरते या जलते देख कर .... अच्छे से अच्छे और कीमती से कीमती भवन को छोड़ कर भागते है। यह जान कर कि मकान गिर रहा है या गिरने वाला है। फिर मृत्यु को निश्चित जान कर अधिकाँश लोग मरते समय रोते कलपते क्यों है! क्यों .....चेष्टा करते है कि किसी प्रकार मृत्यु को टाल दिया जाये।

प्रसिद्ध राजनेता और विचारक लेखक ने मुत्यु .... का कारण जिजीविषा बताते हुये कहा है कि जिजीविषा इतनी प्रबल है कि दहनाश स्वीकारने के बाद भी मनुष्य को यशः काय से जीवित रहना चाहिए। इस तथ्य भुला कर कि जब हमी न रहे तो रहेगा मजार क्या पिरामिड मकबरे आदि अपने जीवन काल में ही .... डालता है-यदि किसी में फटे पुराने कपड़े त्याग ....नये कपड़े बनवाने की सामर्थ्य है परन्तु फटों को उतारता तो वह समाज में हास्यास्पद बन जाता है अति जिजीविषा का भी परिणाम यही होता है। शरीर जरा जीर्ण हो गया अनेका बीमारियाँ घेरे हैं परन्तु जिजीविषा बाध्य करती है कि इसी फटे पुराने को चलाओं परन्तु यह जीना नहीं है, देहरुपी बोझ का ढोना मात्र है। इस दुखद स्थिति से उबारने वाली मृत्यु को सबसे श्रेष्ठ सखा बताते हुए उन्होंने लिखा है, अनेक लोग मृत्यु को मनुष्य के लिए निकृष्ट दशा मानते है, मुझे वृद्धावस्था बदतर प्रतीत होती है। मुत्यु सर्वोत्तम मित्र है जो बुढ़ापा रुपी शत्रु द्वारा जनित सभी कष्टों से उबार लेती है। किसी महा मेधावी का जनजीर्ण हो कर सठियाई बकवास करते देखा जाना किसी देवापम सौर्न्दय शाली शरीर का घृणित होकर लकुटी के सहारे चलते देखा जाना और सदा उन्नत मस्तक का दैहिक एवं मानसिक दोनों दृष्टियों से झुका देखना एक ऐसी त्रासदी है, जिस पर जितने ही आँसू बहाये जाय थोड़े ही होगें।

जिजीविषा के अतिरिक्त मृत्यु भय का एक और कारण वह है भविष्य के प्रति अनिश्चिय। यह सोच कर कि अगले जन्म में न जाने किन परिस्थितियों में रहना पडे़। इस जन्म में यदि परिस्थितियाँ सुखद है, साधन सुविधायें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है तो यह आँशका सताने लगती है कि पता नहीं अगले जन्म में भी वैसी ही साधन सुविधायें मिलेगी अथवा नही। यदि कोई मनुष्य दुखद परिस्थितियों में रह रहा है तो सोचता है कि क्या मालूम अगले जीवन में इससे भी बुरी स्थिति में रहना पड़े यद्यपि कर्म फल का सिद्धान्त अपने स्थान पर अटल और धु्रवसत्य है फिर भी लोग इस बात का निर्णय नहीं कर पाते कि कौन से कर्म का अच्छा फल मिलेगा और कौन से कर्म का बुरा फल मिलेगा और कौन से कर्म का बुरा फल मिलेगा और कौन से कर्म का बुरा फल मिलेगा। इसलिए मृत्यु के बाद बाद का यह संशय मनुष्य को मरणोत्तर जीवन के प्रति तरह-तरह की शंका कुशंकाओं से भयभीत करता रहता है।

जो भी हो मृत्यु के प्रति भय न उचित है और न अनावश्यक किसी स्थिति का निराकरण कर पाना वास्तव में यदि सम्भव है तो उसकी चिन्ता की भी जानी चाहिये मृत्यु से किसी प्रकार छुटकारा नहीं है तो उसकी चिन्ता करना भी र्व्यथ है और उससे भयभीत रहना भी र्व्यथ है। मृत्यु परमसखा है। क्योंकि वह जराजीर्ण काया के कारण होने वाले संवास से छुटकारा दिलाती है बच्चों के वस्त्र फटने लगते है। पुराने हो जाते है तो अभिभावक नये वस्त्र तैयार कराते और पुराने फटे वस्त्रों को उतरवा कर नये कपड़े पहनाते है। प्राणिमात्र के अभिभावक करुणा वरुणालय परमात्मा के भी जीवों के लिये इसी प्रकार को व्यवस्था कर अपनी करुणा का परिचय दिया है।

बच्चे भी पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र पहनते समय उल्लास से भर उठते है, तो क्या मनुष्य का बौद्धिक और मानसिक स्तर बच्चों से भी पिछड़ा हुआ है जो मृत्यु की वास्तविकता को जान कर उसे नये जीवन की तैयारी का सूत्रपात समझ कर भी दुखद घटना के रुप में लेता है और आजीवन उससे बचने की निष्फल चेष्टा करता है मृत्यु की अनिवार्यता के साथ जुड़ा हुआ पुनर्जन्म का तथ्य एक ऐसा स्वर्णिम सिद्धान्त है जिसे सोने में सुहागा ही कहना चाहिए।


साहूकार ने तिजोरी खोली (kahani)

साहूकार ने तिजोरी खोली यह जाँचने के लिए उसमें भरे सिक्कों में से कौन खरा है और कौन छोटा। खोटे सिक्के निकाल कर वह अलग करता गया। फिर उसने लेन देन में भी सावधानी बरतना शुरु किया। खोटे सिक्कों को तिजोरी में बैठना बड़ा भाता था और साहूकार हो गया था सचेत।....अब खोटे सिक्कों ने तिजोरी तक पहुँचने के लिए उपाय ढूढ़ा और सोचा कि हमें ज्यादा चमकना चाहिए।

खोटे सिक्कों की यह चाल सफल हो गयी। अब वे पुनः तिजोरी में पहुँचने लगे। एक दिन साहूकार के हाथ से एक नकली सिक्का जो ज्यादा चमक रहा था गिर पड़ा और उसे पता चल गया कि यह तो खोटा है। तिजोरी में भरे सिक्कों पर भी उसे संदेह हुआ और फिर उसने परख-परख कर उन सबको अलग निकाल दिया अपात्र और खोटे व्यक्तियों की प्रतिष्ठा क्षणिक ही होती है। जिस दिन पोल खुलती है वे न केवल अपयश के पात्र बनते है अपितु कुडे़ में भी फेके जाते है।


ब्रहमाण्ड में विद्यमान, विकसित सभ्यताएँ

सृष्टि का विस्तार असीम है। जितनी जानकारियाँ अब तक मिल पायी है वे इतनी अल्प है कि उनके आधार पर सब कुछ जानने का दावा नहीं किया जा सकता। सीमित बुद्धि अपनी प्रतिभा, योग्यता एवं वर्चस्व का गुणगान भले ही कर ले पर इतने मात्र से वह सर्वज्ञ नहीं हो सकती है। कितने ही तथ्य एवं रहस्य ऐसे है जिनके सर्न्दभ में मनुष्य अब भी कुछ नहीं जान सका है। बुद्धि बल एंव विज्ञान भी उनको समझ सकने में असमर्थ रहा है। अपनी सभ्यता के लिए भी वह अभिमान नहीं कर सकता न ही इस बात की घोषणा की जा सकती है कि चेतन प्राणियों का अस्तित्व मात्र पृथ्वी तक सीमित है। जो प्रमाण मिले है उनसे पता लगा है कि अन्यान्य ग्रहों पर भी जीवन है। ब्रहमाण्ड में पृथ्वी से अधिक विकसित सभ्यताओं की सम्भावना भी की जा रही है।

सम्भव है अन्य ग्रहों के जीवों का आकार प्रकार जीवनयापन का तरीका पृथ्वीवासियों से सर्वथा भिन्न हो। आवश्यक नहीं है यहाँ की परिस्थितियाँ जीवित रहने के लिए पृथ्वी जैसी हो। उनकी आवश्यकताएँ तथा अभिरुचियाँ भिन्न भी हो सकती है। जीवित रहने के लिए आँक्सीजन जीवधारियों के लिए आवश्यक है। पर अन्य ग्रहों पर स्थिति उल्टी भी हो सकती है। जरुरी नहीं है कि वे इन आँखों से दिखाईही पड़े। मिआयाभिक दृश्य जगत से उनकी स्थिति अलग भी हो सकती है। सम्भव है वे सशरीर अन्य ग्रहों से पृथ्वी आदि की ....लेने के लिए भी उतरते हो। हमारी आँखें उनको देख पाने में असमर्थ हो।

यह मात्र कल्पना नहीं वरन् एक तथ्य है। समय-समय पर दिखाई पड़ने वाली उड़नतस्तरियों के प्रमाण उस तथ्य की पुष्टि करते है। उड़नतस्तरियों की वनावट अचानक प्रकट होकर लुप्त हो जाना कुशल वैज्ञानिक मस्तिष्क एवं विकसित सभ्यता का प्रमाण देती है। सैकड़ों वर्षों से वैज्ञानिक यह जानने का प्रत्यन्न कर रहे है कि ये अचानक कहाँ से प्रकट होती तथा कहा चली जाती है पर उनके ये प्रयत्न असफल ही सिद्ध हुए है। मात्र उनकी संरचना एवं मिले प्रमाणों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि जहाँ से उड़नतस्तरियाँ आती है, वहाँ की सभ्यता पृथ्वी की तुलना में कही अधिक विकसित है।

उड़नतस्तरियाँ अनेकों बार देखी गई है ...अपने रहस्यों को साथ समेटे देखते-देखते आँखों से ओझल हो गई है। सन् 1947 अमेरिका के पश्चिमी तट ....के निकट मोटर बोट में बैठे दो रक्षक एच.एत्र ....एवं फ्रैड एल क्रैसवैल समुद्र तट की निगरानी कर रहे थे। अचानक डहल ने दो हजार फीट की उँचाई आकाश में छै फुटवाल की तरह गोल आकृति की मशीन को घूमते हुए देखा, पाँच मशीनें एक के चारों ओर रही थी। वे क्रमशः नीचे उतरने लगी और साकगर मात्र 500 फुट की उँचाई पर आकर रुक गई। तटरक्षक डहल ने अपने साथी की सहायता से अपने ...से एक फोटो खींचने का प्रयत्न किया। अभी कैमरे स्वीचि दबाया ही था कि आकाश में जोर का ...हुआ। मोटर बोट में सवार अंग रक्षक छलाँग ...कर पास की एक गुफा में घुस गये। पर उनके साथ कुत्ता वही मर गया। कुछ देर बाद बाहर निकले देखा आकाश में उड़न वाली वस्तुओं का नमों निशान नहीं है। विस्फोट से फटी मशीन के टुकड़े तट पर थे जो चमकीले एवं गरम थे। दुर्घटना की सूचना रक्षकों ने मोटर बोट में लगे ट्रान्समीटर द्वारा देनी ...पर उन्हें यह देखकर आर्श्चय का ठिकाना नहीं....... किसी ने रेडियोंलाजीकल मशीन से मोटर बोट....ट्रान्समीटर को जाम कर दिया है।

निरीक्षण को आये अनुसन्धान दल ने वाशिंगठन उक्त टापू मरे पर लगभग 20 टन धातु के टुकड़े .....किए। परीक्षा पर मालूम हुआ कि धातु के टुकड़ों में अन्य सोलह धातुओं का सम्मिश्रण है तथा उनके उपर कैल्शियम की मोटी चादर चढ़ी है। वैज्ञानिकों को यह जानकर विशेष आर्श्चय हुआ कि इन धातुओं में से एक भी पृथ्वी पर नहीं पाई जाती। वे इनके नाम तक बता पाने में असमर्थ रहे। उन्होंने संभावना व्यक्त की कि अन्तरिक्षयान विशेष शक्तिशाली आणविक यन्त्रों से संचालित था।

लेकन हीथ (इग्लैंड) 13 अगस्त 1956 को रात्रि तीन बजे रायल एयरफोर्स के दो राडार स्टेशनों से तेज गति से उड़ती हुई उड़नतस्तरियों को देखा। पृथ्वी से मात्र 1100 मीटर की उँचाई पर साढ़े तीन हजार किलोमीटर प्रति घन्टा की गति से ये विचित्र संरचनाएँ पश्चिम दिशा की ओर उड़ रही थी। रायल एयरफोर्स के एक लड़ाकू विमान ने इनका पीछा किया किन्तु देखते-देखते वे अदृश्य हो गई।

10 अक्टूबर 1966 को सायं 5 बजकर 20 मिनट पर ‘न्यूटन इलिनाय’ (अमेरिका) में पृथ्वी से मात्र 15 मीटर की उँचाई पर एक यान जैसी वस्तु उड़ती दिखाई दी। देखने वालों ने बताया कि वह मात्र 6 मीटर लम्बी 2 मीटर व्यास वाली ‘सिगार’ की शक्ल जैसी थी। जो अल्युमिनियम जैसी किसी चमकीली धातु से बनी प्रतीत होती थी। अग्रभाग का छिद्र प्रवेश द्वारा जैसा लगता था उड़ती हुई वस्तु के चारों ओर हलकी नीली रंग की धुग्ध छाई थी। यान से किसी प्रकार की ध्वनि तो नहीं सुनाई पड़ी रही थी। पर वातावरण में एक विचित्र प्रकार के कंपन का आभास मिल रहा था। कुछ मिनटों के बाद यह वस्तु गायब हो गई।

पिछले दिनों भारत में भी उड़नतस्तरियाँ देखी गई। अप्रैल 1978 को अहमदाबाद में उदयपुर विश्व विद्यालय के प्रो. दिनेश भारद्वाज ने रात्रि नौ बजे तस्तरी जैसी पिछले दिनों भारत में भी उड़नतस्तरियाँ देखी गई। अप्रैल 1978 को अहमदाबाद में उदयपुर विश्व विद्यालय के प्रो. दिनेश भारद्वाज ने रात्रि नौ बजे तस्तरी जैसी वस्तु को उड़ते देखाँ। वह प्रकाश पुन्ज जैसी दिखाई पड़ रही थी जिसके पीछे पाँच या सात मीटर लम्बी पूँछ जैसी संरचना थी। उक्त अग्नि के ज्वाला जैसी वस्तु को राजस्थान, महाराष्ट्र एवं आन्ध्र प्रदेश में भी सैकड़ों व्यक्तियों ने उड़ते देखा। बंगलौर के दो व्यक्तियों का कहना है कि कुछ देर तक तो दो चमकीली वस्तुएँ समानान्तर एक साथ उड़ती रही। पर अचानक एक दूसरे के विपरित दिशा की ओर मुड़ गई तथा कुछ देर बाद लुप्त हो गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें उल्का पिण्ड नहीं माना जा सकता क्योंकि उल्का पिंड अपनी इच्छानुसार दिशा नहीं बदल सकते। उहें किसी कुशल मस्तिष्क द्वारा संचालित माना जाना चाहिए।

अपने अन्दर अनेकों रहस्य छिपाये हुए वैज्ञानिकों को चुनौती देती हुई ये उड़नतस्तरियाँ समय-समय पर दिखाई पड़ती है। पृथ्वीवासियों की वैज्ञानिक क्षमता, बुद्धि का उपहास करते हुए आँखों से ओझल हो जाती हैं उनकी शक्ति, सामर्थ्य का अनुमान इन बात से लगता है। अनेकों बार प्रयत्न किए जाने के बाद भी मनुष्य उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जान सका है। पीछा करने वाले यान असमर्थ रहे है। इन विचित्र आकृतियों के साथ सुरक्षा की भी पूरी-पूरी व्यवस्था हैं यही नहीं खतरे की सम्भावना भी उन्हे तुरन्त मिल जाती है।

कितनी बार तो पीछा करने वाले यानों के चालकों को जीवन से हाथ धोना पड़ा है। उनकी वैज्ञानिक क्षमता बढ़ी-बढ़ी है इनका अनुमान इस घटना से लगता है। ‘मेलवोर्न’ 24 अक्टूबर 78 को एक विमान चाक सहित एक उड़नतस्तरी जैसी वस्तु को देखने के बाद लापता हो गया। बीस वर्षीय युवा चालक श्री ‘फ्रेडरिक वाकेटिच’ ने आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया के बीच चाटर्ड उड़ान भरी। चालक फ्रेडरिक ने हवाई अड्डे के उपर से चाटर्ड रेडियों सन्देश द्वारा अधिकारियों से पूछा कि 1524 मीटर की उँचाई पर उसी क्षेत्र में कोई दूसरा विमान तो नहीं उड़ रहा है। फ्लाइट सर्विस ने नकारात्मक उत्तर दिया। फ्रेडरिक ने अधिकारियों से बताया कि वह 182 मील दूर 137 मीटर की उँचाई पर किंग आइसलैण्ड के पास से उड़ रहा है। उसे एक लम्बी आकार की वस्तु तेज गति से उड़ती दिखाईपड़ रही है। वह मेरे विमान के उपर आकर चक्कर काट रही है। उस तस्तरी जैसी आकृति के भीतर हरी रोशनी का प्रकाश दिखाई दे रहा है। यान सहित लुप्त होने के पूर्व फ्रेडरिक वालेंटिच के अन्तिम शब्द थे कि मेरे विमान के इंजन में रुकावट आ रही है तथा वह विचित्र यान अब भी मेरे विमान के उपर छाया है। इसके बाद रेडियों पर धातु के टकराने जैसा शोर सुनाई पड़ा तथा विमान का सर्म्पक नियन्त्रण कक्ष से टूट गया। मेलवोर्न हवाई अड्डे से अनेकों जहाजों ने खोज करने के लिए उड़ाने भरी किन्तु चालक और यान का कुछ भी पता न चल सका न ही दुर्घटना का कोई चिन्ह मिला।

पृथ्वी के वैज्ञानिक अन्यान्य ग्रहों की स्थ्ज्ञत का पता लगाने के लिए प्रयत्नशील है। समय-समय पर वैज्ञनिकों के दल अन्तरिक्ष में खोज के लिए जाते है अन्य ग्रहों की स्थिति के खोज का कार्य मनुष्यों द्वारा ही नहीं किया जा रहा है वरन् जो प्रमाण मिले है उनसे पता चलता है कि अन्य ग्रहों पर पृथ्वी की तुलना में अधिक विकसित सभ्यताएँ हैं वे भी खोज के लिए पृथ्वी पर आते रहते है। ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ 5 जनवरी 1979 में प्रकाशित समाचार के अनुसार दक्षिण अ्िरफका जोहान्सवर्ग ने निकट महिला एवं उसके पुत्र ने अपने घर के निकट एक उड़न तस्तरी को उतरता हुआ देखा। उड़नतस्तरी की अन्य घटनाओं से इसमें भिन्नता यह थी कि श्रीमति की गन क्वीगेट ने यान जैसी आकृति के निकट पाँच मनष्य की शक्ल से मिलते जीवों का खड़े देखा।

अलग-अलग इन्टरव्यू लेने पर उसके पुत्र ने भी यही बात बताई। श्रीमति क्वीगेट ने बताया कि जैसे ही उसने अपने से कहा कि “ अपने पिता को बुलाओं” यान के निकट खड़े सभी व्यक्ति उड़न तस्तरी में बैठ गये। और कुछ ही क्षणों में वह यान हवा में विलीन हो गया। पूरी घटना में 5 या 6 मिनट लगे होंगें।

अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने भी उड़नतस्तरी देखा। अमेरिकी के वैज्ञानिकों ने उड़न तस्तरी को अपने शोध का विषय बनाया है। इसका नाम उन्होंने रखा है अनआइडेण्टी फाइड फ्लाइंग अब्जेक्टस (यू.एफ.ओ.) जे. एल. हाइनेक ने नार्थ बेर्स्टन यूनिवसिटी में यू.एफ.ओ. अध्ययन केन्द्र की स्थापना की है। इस शोध संस्थान का कार्य रहस्यमय उड़ने वाली वस्तुओं के सर्न्दभ में तथ्य एवं जानकारी एकत्रित करना है।

अब वैज्ञानिकों में भी यह मान्यता परिपुष्ट हो रही है कि सभ्यता पृथ्वी तक ही सीमित नहीं है। डाँ. फ्रेड मैन जैसे वैज्ञनिकों का विश्वास है कि जीवन मं कही अधिक विकसित हैं। इसका प्रमाण है कुशल वैज्ञानिक यन्त्रों से सुसज्जित रहस्यमय उड़न तस्तरियाँ। जिनका रहस्योद्घटना कर सकना वैज्ञनिकों द्वारा अब तक सम्भव नहीं हो सका है। डाँ. फ्रेडमैन ने संभावना व्यक्त करते हुँए कहा कि पृथ्वी उर्जा का स्त्रोत हैं। सम्भव है अन्य ग्रहों के निवासी पृथ्वी पर उर्जा संगह करने आते है और इस कार्य के लिए उन्होंने वैज्ञानिकों तकनीकी का विकास कर लिया हो।

बहुत समय पूर्व सन् 1956 में रुसी वैज्ञाकन एलेक्जेंडर काजन्तसेव ने अपने अनुसंधान कार्यो के उपरान्त घोषणा की थी कि जिस प्रकार हम चन्द्रमा और अन्य ग्रहों की जानकारी प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के यानों का प्रयोग कर रहे है, उसी प्रकार की खोजबीन अन्य ग्रहों के निवासियों द्वारा भी की जा रही है। जर्मन वैज्ञानिक’एरिकबन डेनिकेन’ ने अपनी पुस्तकें चैरिथटस आँफ गाँडस और रिटर्नमद स्टार्स में भी इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि अन्य ग्रहों के निवासी पृथ्वीवासियों की टोल लेने के लिए समय-समय पर उतरते है। यहाँ के वैज्ञानिकों की तुलना में विज्ञान के क्षेत्र में उनकी पहुँच अधिक है।

बुद्धिमता एवं सभ्यता के क्षेत्र में मनुष्य ही सबसे अग्रणी नहीं है। पृथ्वी की तुलना में विकसित सभ्यताएँ भी ब्रहमाण में मौजूद है। मनुष्य को अपनी तुच्छता समझना चाहिए। मिथ्या र्गव की अपेक्षा ईश्वर प्रदत्त क्षमता का उपयोग मानवोचित रीति-नीति अपनाने में करना ही श्रेयस्कर है।


दो मित्रों (kahani)

दो मित्रों ने ईख को खेती की। खेत तैयार होने पर बाँटने की बात चली तो भोले मित्र ने कहा-तुम्ही वट कर दो, जो दोगे वही ले लूँगा। चालक मित्र ने कहा- कि जड़ मैं लेता हूँ तु उपर का भाग ले लो। उसने स्वीकार किया अतः गन्ने चालाक मित्र ने ले लिये और उपर का भाग जिसे अगोला कहते है। भोले मित्र के पल्ले पड़ा। संसार में अधिक भोलापन भी हानिप्रद है।


अति विलक्षण अचेतन की माया

विश्व के अगणित जीव जन्तुओं में विविध प्रकार की ऐसी समता पाई जाती है जिनसे मनुष्य वंचित रहता है। उदाहरण के लिए चमगादड़ के ज्ञानतंतु राडार क्षमता सम्पन्न होते है। वह अपनी इस क्षमता के आधार पर विभिन्न वस्तुओं से निकलने वाली विद्युत तरंगो को भलीभाँबति पहचान लेता है और घने अन्धकार में भी अपने आसपास की वस्तुओं का स्वरुप एवं उनका स्थान समझ कर बिना किसी से टकराये उड़ता रहता है।

समुद्र में एक मछली पाई जाती है जिसे डाल्फिन कहा जाता है। इस मछली के शरीर से एक प्रकार की रेडियों तरंगे निकलती है, जो पानी के भीतर ही दूर तक फैल जाती है और उस क्षेत्र के जीव जन्तुओं से टकराकर उसी के पास वापस लौटा आती है। इस क्षमता के आधार पर मस्तिष्क क्षण में यह जान लेता है कि कौन सा जीव किस आकृति प्रकृति का हे और कितनी दूर है। उसी आधार पर डाल्फिन मछली अपने बचाव तथा आक्रमण की योजनाबद्ध तैयारी करती है।

विकासवाद के अनुसार के कई जीव जन्तुओं ने आवश्यकतानुसार अपने शरीर में ऐसी विशेषताऐ उत्पन्न कर ली, जो आरम्भ में नहीं थी। जैसे मेढ़क ने जल में प्रवेश करने पर गोताखोरों के द्वारा चढ़ाये जाने वाले चश्में की तरह एक आवरण विकसित कर लिया जो पहले नहीं था। रावण प्लाँट और ग्रेटमुलर पौधों ने पशुओं द्वारा चरे जाने से आत्मरक्षा के लिए नोंकदार काँटे विकसित किये है। तितलियों के बच्चे और रेशम के कीड़े अपने शरीर से रस निकाल कर उस पर पत्तियाँ चिपका लेते है और आत्मरक्षा की सुविधा उत्पन्न करते है। कछुए ने मगरमच्छों से अपने स्वादिष्ट माँस को बचाने के लिए चमड़ी को काफी मोटा और सख्त बना लिया व्हेल मछली ने पनडुब्बियों की सारी खास-खास विशेषताए। अपने शरीर में उपस्थिति करा रखी है। लगता है कि मनुष्य ने व्हेल की शरीर रचना देख कर ही पनडुब्बियों का विकास किया है।

गिलहरी ने अपने गालों में दो जेबे विकसित की है ताकि वह उसमें उपलब्ध खाद्य समग्री जल्दी से जमा कर सके। बन्दर के गले में भी ऐसी ही थैलियाँ होती है ताकि उसमें वह अपने बचे रख सके। आहार उपलब्धि की दृष्टि से असुविधा का समय पास आते ही चीटियाँ तथा दूसरे कीड़े अपने लिये आहार जमा करने लगते है। उनका भविष्य ज्ञान बिल्कुल सही होता है।

दीमक और चींटीयों के झुन्ड की लड़ाई देखते ही बनती है उनकी मोर्चा बन्दी आक्रमण तथा बचाव के ढंग से योद्धा मनुष्यों को बहुत सीखने के लिए मिल सकता है। अफ्रीका का काटन रले जाति का खरगोश हिंसक जंतुओं का खतरा देख कर अपनी पिछली टाँग एक खास तरीके से जमीन में मरता है, उससे एक विद्युत धारा उत्पन्न होती है जो भूमि के उपर वाले परत पर दूर तक फैल जाती है। दूसरे खरगोश उस को तुरन्त सुन लेते है और सजग होकर अपने बचाव की तैयारी भी करने लगते है। खरगोश ही नहीं दूसरे अन्य कई जानवर भी इस तरह के संकेतों को समझकर उनसे लाभ उठाते है तथा बचने की व्यवस्था बना लेते है, उत्तरी अमेरिका की नदियों में पाई जाने वाली “ईल”‘ मछली अपने आप में एक अच्छा खासा डायनुमा है। घरों की बत्तियाँ 220 वोल्ट पर जलती है पर उसके शरीर से 500 से भी अकिध वोल्ट टेज की बिजली उत्पन्न होती देखी गई हे।

कुछ विशेषताएँ तो आम भी देखी जा सकती है। वर्षा की संभावना निकट आते ही मकड़ अपना जाला खाली जगह में से समेट कर बचाव की जगह पर चली जाती है। गिरने वाले मकान में से बिल्ली अपने बच्चों को लेकर कुछ ही समय पूर्व सुरक्षा के लिए प्रयास करती देखी गई है। कछुआ बालू में अण्डे देता है और दूर रह कर अपनी मानसिक चतना द्वारा उन्हे सेता रहता है। अनुकुल ऋतु की तलाश में पक्षी हजारों मील उड़कर समुद्र और पर्वतों को लाँघते हंए कही से कही चले जाते है और सुविधा की ऋतु आने पर इतनी ही लम्बी यात्रा बिना भूले भटके पर कर के वापस आ जाते है। कई मछलियाँ अण्डे देने के लिए अपनी पूर्व जानकारी के उपयुक्त स्थान पर पहुँचने के लिए हजारों मील की समुद्र में यात्रा करती है और फिर वापस आती है।

इन पशु-पक्षियों में कोई मस्तिष्क तो होता नहीं, मनुष्य जैसी प्रखर बुद्धि भी नहीं होती। फिर किस आधार पर इनमें ये विशेषताएँ उत्पन्न हो सकी है इसका विश्लेषण करते हुए अतीन्द्रिय विद्या के शोधकत्ताओं परामनोवैज्ञानिको का कथन हे कि यह सब क्रिया-कलाप इन छोटे जीव-जन्तुओं का अचतन मन कराता है। चेतन मस्तिष्क की विशेषताएँ तो सर्वविदित है। वह मनुष्य के ही पास है। इसके आधार पर विद्धान, लेखन, कलाकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यवसायी, उद्योगपति, राजनेता आदि अनेकों वर्ग के बुद्धिजीवी अपन बौद्धिक चेतना के बल पर अपना तथा दूसरों का हित साधन करते है, यह किसी से नहीं छिपा हें ये सब चेतन

मस्तिष्क के ही चमत्कार है।

मनोवैज्ञानिक भी अब इस बात को स्वीकार करने लगे है कि अचेतन मस्तिष्क चेतन मस्तिष्क से कही अशिक रहस्यपूर्ण और विलक्षण क्षमताओं से सम्पन्न है। अभी उसके क्रियाकलापों का सात प्रतिशत भाग ही मनोवैज्ञानिक जान पाते है और उस आधार पर यह कहा जात है कि शरीर यात्रा की स्वसंचालित गतिविधियों तथा रक्त परिभ्रमण, हृदय स्पंदन, पाचन, उर्त्सजन आदि क्रियाओं का संचालन नियमन यह अचेतना मस्तिष्क ही करता है अभिरुची, प्रकृति स्वभाव और आदतों की जड़ भी इसी अचेतन मस्तिष्क में जड़ जमाये रहती हैं। अचेतन मस्तिष्क के सम्बन्ध में अभी इतना जाना ही जा सकता है। आगे चलकर परामनोविज्ञान और अतीन्द्रिय विद्या की खोज आरभ हुई तो पाया गया कि मस्तिष्क तो सर्वाधिक रहस्मय, विलक्षण और चमत्कारपूर्ण है ही अचेतन मस्तिष्क उससे हजार लाख गुना रहस्यपूर्ण है। यह संसार का सबसे अधिक रहस्यमय, उद्भुत और शक्तिशाली यन्त्र है। यदि उनमें सन्निहित संभावनाओं को पूरी तरह समझा जा सके और उन्हें साकार किया जा सके तो इतना बड़ा चमत्कार उत्पन्न हो सकता है कि कुछ ही वर्षों में अब तक हुई प्रगति से हजार गुना प्रगति संभव हो सकती है और तब जो दुनिया विनिर्मित हो सकती है, वह अब की अपेक्षा लाख गुना उन्नत और विकसित स्थिति की हो सकती है।

यो पदार्थ विज्ञान के क्षेत्र में ही अब तक जितना जो कुछ खोजा और जाना जा सका है, उससे बहुत अधिक खोजना और जानना शेष है। मानवीय शरीर के बारे में ही अभी बहुत कम खोजा जा सका है। जो कुछ जाना जा सका है वह अभी स्थूल जानकारी ही हे वह भी इतनी विलक्षण है कि उसे जानकर सहज ही आर्श्चय होता है, मस्तिष्क विद्या न्यूरोलाजी साइकोलाजी का क्षेत्र उससे भी गहन है। इसके बाद अतीन्द्रिय विद्या आती है, जिस का संबंध अचेतन मस्तिष्क से है।

यदि इस शक्ति केन्द्र का समझा जा सके तो यहाँ सब कुछ देवलोकों के अद्भुत वर्णन, चित्रण जैसा दिखाई पड़ सकता है। अतीन्द्रिय विद्या के शोधकत्ताओं का कथन है कि चेतन मस्तिष्क की सक्रियता-अचेतन की क्षमता तरंगों को काटती है। इसलिए यह अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहता है। यदि बौद्धिक संस्थान की गतिविधियाँ मंद से शिथिल की जा सके तो उसी अनुपात से अचेतन केन्द्र जागृत हो सकता है। सामान्यतः हमारे चेतन मस्तिष्क में प्रतिक्षण कोई न कोई विचार कोई न कोई कल्पनाएँ और आकाँक्षाएँ उठती रहती है। एक क्षण भी ऐसा नहीं बीतता जिसमें मस्तिष्क शाँत या शून्य हो। हर समय चेतन मस्तिष्क व्यस्त और सक्रिय रहता है। यहाँ तक कि सोते समय भी वह स्वप्न देखता रहता है। यदि इस मस्तिष्क को कुछ समय के लिए शाँत, शिथिल और शून्य किया जा सके तो अचेतन को कार्य करने का अवसर मिल जाता है और वह अपनी विलक्षण विभूतियों से लाभान्वित कर सकता है।

मनोविज्ञान तो अब इस निर्ष्कष पर पहुँचा है, लेकिन योग विद्या के आचार्य बहुत पहले से ही इस निर्ष्कष पर पहुँच चुके है। इतना ही न ही उन्होंने प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाओं के माध्यम से चेतन मस्तिष्क को शिथिल निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाने में भी सफलता प्राप्त कर ली थी। यह सफलता आज भी प्राप्त की जा सकती है, जो अनेक चमत्कारों की जननी है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि कितनी ही ऐसी विशेषताएँ प्राप्त की जा सकती है, जो साधारणतय मनुष्यों में नहीं होती।

अचेतन मस्तिष्क को यदि विकसित किया जा सके, उसे थोड़े समय के लिए भी सक्रिय होने का अवसर मिल सके तो व्यक्ति अपने शरीर, मन, स्वभाव प्रकृति आदि का काया कल्प करा सकता है। यह संभावनाएँ योग-साधना द्वारा प्रत्यक्ष की जा सकती है। योग साधना का मूल उद्देश्य ही चित्त वृत्तियों का निरोध है। कहा भी गया है-

योगश्चित वृत्ति निरोधः। (योग दर्शन 1। 2)

इसका तार्त्पय है मस्तिष्क की अतिशय अनावश्यक सक्रियता को नियन्त्रित करके चेतन उर्जा का अपव्यय होने से बचा लेना और उस बचे हुए प्राण प्रवाह को अचेतन का विकास करने में नियोजित कर देना। इसके लाभ अलौकिक उपलब्धियों के रुप में देखे जा सकते है। समाधि स्थिति तक पहुँचा हुआ व्यक्ति इसी आधार पर विश्व की जड़ चेतन सत्ता को प्रभावित करने में सक्षम समर्थ होता है।

चेतन मस्तिष्क को निष्क्रिय और शिथिल बनाने का अर्थ यह नहीं है कि बुद्धि से कोई काम ही न लिया जाय। यह समझना गलत होगा। योग साधना विद्यार्जन, ज्ञान साधना या बौद्धिक विकास के प्रयत्नों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। उसमें मानसिक उर्त्कष, विद्याध्ययन कलाकौशल आदि के विकास और संवर्धन की पूरी छूट है। प्रतिबन्ध केवल इस बात का है कि मनः क्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अंशात न होने दिया जाय। अनाशक्ति, स्थित प्रज्ञा आदि पर योगशास्त्रों में बहुत जोर दिया गया है। इनका तार्त्पय इतना ही है कि अनुकुल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ सदैव आती जाती रहती है। इनसे क्षुग्ध न होने और संतुलित बने रहने के लिए यदि मन को साध लिया जाय-वह स्थिति अचेतन मन की दिव्य क्षमता को काटने वाली उथल-पुथल भरी उष्मा को भी नहीं बढ़ने देती। यही मानसिक सन्तुलन योग का प्रथम चरण है।

एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति अग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋग्वेद 6। 32। 4)

दूसरे चरण में चेतन मस्तिष्क की सभी गतिविधियों को रोक कर उस संस्थान में कार्य करने वाली शक्ति को अचेतन मस्तिष्क का विकास करने में लगाना होता है इस साधना में एकाग्रता को बढ़ाना होता है और मन में उठने वाले विभिन्न संकल्पों को रोककर उसे एक केन्द्र पर स्थिर रखने का प्रयत्न करना पड़ता है। योग साधना में इसके लिए ध्यान को सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया गया है। ध्यान के द्वारा योगीजन अपनी एकाग्रता को बढ़ाते हुए चित्त को जागृत अवस्था में ही संकल्प पूर्वक लय कर देते है। इस स्थिति को समाधि कहा गया है और यह स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रत्याहार, धारणा ध्यान आदि भूमिकाएँ पार करनी पड़ती है। इन साधनाओं के द्वारा सचेतन बुद्धि संस्थान में लगी हुई चिन्तन और संकल्प की क्षमता को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी अद्भुत और अनुपम दिव्यताएँ जागृत होना आरम्भ कर देती है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। इन प्रयोगों को यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके तो निस्संदेह मनुष्य साधारण न रह कर असाधारण बन जाता है।


Quotation

“सत् तो एक ही है, पर ब्राहमण उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते है। कोई उसे अग्नि कहता है, कोई यन्त्र कहता है, कोई मातरिश्वा (पवन) कहता है।”


प्रकृति विध्वंस का आयोजन भी करती है

प्रकृति में समय-समय पर प्रचंड उथल-पुथल होती रहती है। कभी भूकम्प के कारण पूरे देश के देश पृथ्वी के गर्भ में समा गये और जहाँ उत्पन्न सभ्यताएँ थी, वे देश महासागर में परिणत हो गये। कई बार इस उथल-पुथल के कारण सैकड़ों मील गहरे समुद्र में से उँचे और विस्तृत टापू निकले आये, जहाँ मनुष्य ने फिर से एक नई सभ्यता का विकास किया। सिन्धुघाटी की अति उत्न्नत सभ्यता इसी तरह किसी के प्राकृतिक परिवर्तन से विनष्ट हुई माना जाता है।

विकास को विनाश में और विनाश को विकास में परिणत कर देने वाली इस तरह की कई स्मृतियाँ इतिहास में सुरक्षित है। पुराण कथाओं में उनका रोचक वर्णन भी मिलता है। कई बार पृथ्वी के वैयक्तिक जीवन क्रम में अन्य ग्रह नक्षत्र भी हस्तक्षेप करते है और भारी उथल-पुथल मचा देते है। पिछले दिनों एक बड़े उल्कापिंड जो किसी ग्रह नक्षत्र का ही टूटा हुआ हिस्सा था देखा गया। इसे इकोरस नाम दिया गया। इकोरस यूनान की पैराणिक गाथाओं का एक उद्दंड युवक है। उसने संबंध में में कथा है कि वह सूर्य से मिलने की महत्वाकाँक्षा लेकर नकली पंख लगाकर चल पड़ा। पंख उसने मोम से चिपका लिए थें वह नकली पंख लगाकर उड़ा। अधिक उँचें जाने पर उसके पंख को जोड़ने वाली मोम गर्मी के कारण पिघल गई और पंख गिर गये। इसके साथ ही इकोरस भी औंधे मुँह नीचे समुद्र में आ गिरा तथा मर गया।

इस उद्दंड महत्वाकाँक्षी युवक के नाम पर ही उक्त उल्कापिंड का नाम इकोरस रखा गया। यह उल्कापिंड कभी सूर्य के अधिक निकट जा पहुँचता है, इतना अधिक निकट कि थोड़ा और पास जाय तो जल झुलस कर राख ही नहीं गैस बन जाने में भी कोई कसर न रह जाय। कभी वह अपनी चाल इस तरह बदलता है मंगल और शुक्र से टकराने में अब तब की देरी प्रतीत होती है। सूर्य के अति निकट पहुँच जाने पर वह आग का तप्त गोला बन जाता है तो सूर्य से बहुत दूर निकल जाने पर उसमें शीत की अति हो जाती है। जून 1968 में इस उद्दंड क्षुद्र ग्रह के पृथ्वी के ध्रुव प्रदेश से आ टकरान की सम्भवना बढ़ गई थी। यदि खगोल शास्त्रियों की यह आकाँक्षा सत्य सिद्ध होती तो इस बात की निश्चित संभावना थी कि पृथ्वी में हिमपात, भूकम्प और भयंकर चक्रवात आते। समुद्र उफन कर पृथ्वी के कई भू भागों को लील जाता और लाखों मील भू भाग में बहुत गहरा गड्ढा हो जाता इस प्राकृतिक असन्तुलन में करोड़ो व्यक्तियों का सफाया हो जाने की सम्भावना बताई गई थी।

बडे़ उल्कापिंड से हाने वाली क्षति का अनुमान सन् 1908 में मात्र हजार फुट व्यास वाली उल्का के गिरने से ही लगाया जा सकता हैं यह उल्का साइबेरिया के जंगल में गिरी थी। इसके गिरने से उस स्थान पर अणु विस्फोट जैसा दृश्य उपस्थित हो गया था। हालाँकि वहाँ कोई आबादी वाला क्षेत्र इस उल्कापात की चपेट में नहीं आया पर जहाँ यह गिरा वहाँ मीलों लम्बा और सैकड़ो फुट गहरा गड्ढ़ा बन गया। इकोरस तो इस उल्कापिंड से हजारों गुना बड़ा है। उसके इतने विस्तार से परिणाम का अनुमान लगाया जा सकता है। सौभाग्यवश इकोरस प्रृथ्वी के समीप होकर निकल गया और यह आपदा टल गई। किन्तु खगोलविदों का कहना है कि सौरमण्डल में ऐसे कितने ही क्षुद्र उपग्रह है जो पृथ्वी से कभी भी टकरा कर उसके अस्तित्व को संकट में डाल सकते है। इस तरह के उपग्रहों में हिडालगो, इटोस, अलवर्ट, अलिंडा, एयोर, अपोलो, एडोरस, हर्मेस आदि कई पृथ्वी का चक्कर काट रहे है, और कई बार अपनी कक्षा बदल कर इधर-उधर आवारा गर्दी करने को भी निकल पड़ते है। इनके टकराने से कभी भी विनाश हो सकता है।

इसके अतिरिक्त अमेरिका के दो खगोल विदों जानग्रिवन और स्टीफेन प्लेगमन ने सन् 1982 में एक और संकट की सम्भावना बताई है। उक्त खगोल शास्त्रियों का कथन है कि सन् 1982 में सौर मण्डल के नौ ग्रह यानी मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, पृथ्वी, यूरेनस प्लेटो और नेपच्यून सूर्य के बिलकुल एक तरफ एकत्र हो जायेंगे। इससे सूर्य पर कई बड़े धब्बे पड़ जायेगे। स्मरणीय हे सूर्य पर प्रति ग्यारवें वर्ष कुछ धब्बे से बन जाते है उनके कारण पृथ्वी सहित सभी ग्रह प्रभावित होते है। यह धब्बे भी इसलिए पड़ते है कि सौर परिवार के सदस्यों की गतिवधियों से इस परिवार का मुखिया सूर्य भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। जिस तरह सूर्य की हर गतिविधि से सौरमण्डल के अन्यान्य ग्रह प्रभावित होते है, उसी प्रकार अन्य ग्रहों की गतिविधियों से सूर्य भी प्रभावित होता है।

सभी ग्रह पूर्व से पश्चिम की ओर सूर्य की परिक्रमा करते है और पृथ्वी की ही भाँति अपनी धुरी पर भी घुमते है। इस परिभ्रमण काल में सूर्य पर उत्पन्न होने वाले धब्बों के कारण पृथ्वी सहित सभी ग्रह उपग्रह प्रभावित होते है। खगोल शास्त्रियों का कथन है कि सन् 1982 में जब नौ ग्रह सूर्य के एक ओर एकत्रित हो जायेंगे तो उसके कारण सूर्य पर कई बड़े-बड़े धब्बे पडेंगे। यह धब्बे ग्यारहवें वर्ष के चक्र से सर्वथा भिन्न और अधिक भयावह परिणाम प्रस्तुत करेगे। उस अवधि में विश्व के विभिन्न हिस्सों में भयानक, भूकंप, प्रलयंकर बाढे़, प्राकृतिक विपदाएँ और समुद्री ज्वार भाटे आयेगे। इन दोनों वैज्ञानिकों के अनुसार सन् 1906 में समुद्री ज्वार भाटों का क्रम प्रबलतर हो जायेगाँ। कैलीफोनिया में एक प्रचंड भूकंप आएगा जो कि सन् 1906 में सैनफ्रासिस्कों में आये भूकम्प से भी प्रबल और विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।

आरम्भ में ही कहा जा चुका है कि पृथ्वी पर इस तरह की हलचले समय-सयम पर आती रही है और उथल-पुथल मचती रही है। सर्व विदित है कि भूमण्डल के सभी महाद्वीप परस्पर एक दूसरे से सृष्टि के आरम्भ में जुडे़ थे। इस तरह के प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण, ग्रहों के प्रभाव के कारण पृथ्वी में होनें वाले परिवर्तनों की वजह से वे एक दूसरे हटते, सरकते और अलग होते गये। हिमालय अभी भी लगाकर उत्तर की ओर खिसकता जा रहा है और भूगर्भ शास्त्रियों का कथन है कि यदि हिमालय इसी गति से खिसकता रहा तो 5 करोड़ वर्षों में उत्तर भारत का अधिकाँश इलाका हिमालय के पेट में समा जाएगा।

सन् 1966 में मास्कों में सम्पन्न हुए द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में प्रो. डाँ. ब्रस सी. हीजन और डाँ. नील यू. डाइक ने घोषणा की थी कि आज से लगभग 2 हजार 32 वर्ष बाद पृथ्वी के चुम्बकीय बल अपना स्थान बदल देगें। साथ ही पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति घटेगीं। इससे मनुष्यों का आकार व जीवन भी प्रभावित होगा। वृक्ष वनस्पति, कीट-पतंग आदि पर भी व्यापक प्रभाव पड़ेगा। भूगर्भवेत्ताओं द्वारा किये गये शोध अनुसंधनों से भी इस बात की पुष्टि हुई है कि पृथ्वी के चुम्बकीय बल क्षेत्र अपना स्थान बदलते रहते है। प्रशाँत महासागर की तलहटी से निकाली गई मिट्टी और रेडियों सक्रियता तथा लारिया नामक एक कोशीय जीव में हो रहे क्रमिक परिवर्तनों के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निर्ष्कष निकाला है कि सन् चार हजार तक चुम्बकीय क्षेत्रों में परिवर्तन होगा इससे धु्रवों का स्थान भी बदल जायेगा। फलस्वरुप पृथ्वी पर खण्ड प्रलय की सी स्थिति बन जायगी। बर्फीले तूफान चारों ओर उठेगें, धरती में बेहद गर्मी और बेहद ठण्डक की स्थितियाँ उत्पन्न हुआ करेगी। समुद्र तल भी लगातार उपर उठ रहा है। इसका भी परिणाम अवश्यंभावी है। ऐसी ही विशिष्ट प्राकृतिक उथल-पुथल प्राचीनकाल में भी जल प्रलय जैसी घटनाओं का कारण बनती रही है। और इन घटनाओं के कारण संसार की कई सभ्यताएँ नष्ट होती रही है विश्व के प्राचीन धर्मों के इतिहास में अनेक स्थानों पर जल प्लावन तथा उसके बाद सृष्टि के निर्माण का, नये क्रम का वर्णन मिलता है इसे धार्मिक पुट दिया गया हैं। लेकिन भूगर्भ शस्त्रियों का अनुमान है कि पृथ्वी के विशेष खण्ड समय-समय पर टूटते रहे हे तथा धरती पर जल ही जल हो जाता रहा हैं। भूगर्भवेता डाँ. टिकलर के अनुसार हिमालय के आसपास प्राप्त ध्वंसावशेषों से यह सिद्ध हो चुका हैं शास्त्र में वर्णित जल प्रलय की कथाएँ काल्पनिक नहीं वरन् ध्रुव सत्य रही है।

यूनान के प्राचीन साहित्य में भी इसी प्रकार जल प्रलय का उल्लेख मिलता हैं एक कथा के अनुसार आर्ट का जलमय थी दूसरी कथा के अनुसार जीयस ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए जब डयूकालियन अपनी पत्नी पैरहा के साथ जल यात्रा कर रहा था तो जीयस ने भीषण जल वृष्टि करके पृथ्वी को सागर में डुबा दिया नौ दिन तक डयूकालियन और पैरहा पानी में ही अपनी नाव पर तैरते रहे। तब व पैरालस पहुँचे तो जल प्लावन कुछ कम हुआ। तब उन दोनाँ ने अपने अंग रक्षकों को देवताओं पर बली चढ़ा दिया। इससे जीयस प्रसन्न हो गया और उनको सन्तान का वरदान दिया। डयूकालिन और पैरहा ने वरदान पाकर जीयस पर पत्थरों की वर्षा की। जो पत्थर ड्यूकालियन ने फेंके वे पुरुष हो गये और जो पैरहा ने फेके वे नारी हो गये।

इस तरह की घटनाओं में कवि कल्पना और घटनाओं का अलंकारित वर्णन भी कम नहीं होता पर जल प्लावन की पुष्टि अवश्य होती है। केवीलोनिया में भी ऐसी ही एक दन्त कथा प्रचलित है। तीन सौ वर्ष ईसवी पूर्व वहाँ वोरमस नामक पुरोहित हुआ था उसने लिखा है कि आरडेट्स की मृत्यु के बाद उसके पुत्र ने अठारह सर तक राज्य किया। एक सर 3600 वर्ष का माना गया है। इसी अवधि में एक बार भीषण बाढ़ आई । राजा को इसकी सूचना स्वप्न द्वारा पहले ही मिल चुकी थी। अतः उसने अपने लिए एक नाव पहले से ही तैयार करवा ली थी और जल प्लावन के समय वह नाव में बैठकर तैरता रहा। जब जल प्लावन का वेग कुछ कम हुआ तो उसने नाव में बैठे-बैठे ही तीन बार पक्षी उड़ाया। अन्तिम बार जब पक्षी वापिस लौटकर नहीं आये तो उसने देवताओं को बलि दी। इससे देवता प्रसन्न हंए और शान्ति का वातावरण बना।

बाइबिल में भी इसी प्रकार जल प्लावन की कथा आती है। उसके अनुसार जल देवता नूह को खबर मिली कि धरती पर जल प्रलय होगी और ऐसा हंआ थी। चराचर जगत जलमग्न हो गया। जल देवता ‘नूह’ तथा उनके कुछ साथी नौका में बैठकर बच निकले। नौका द्वारा आमाकन पर्वत पहुँचे। वहाँ नौ महीने बाद जल धीरे-धीरे कम होने लगा और धीरे-धीरे पर्वत श्रेणियाँ दिखाई देने लगी, फिर अन्य हिस्से भी। इस जल प्लावन में केवल हजरत नूह ही बचे थे उन्होने फिर से मानवता का विकास कियाँ। सुमेरियन ग्रन्थों में भी जल प्लावन का संकेत है । चीनी पुराण साहित्य मैं भी जल प्रलय की कई कथाएँ मिलती हैं। भारत में तो शतपथ ब्राहमण से लेकर महाभारत विविध पुराणों तक जल प्रलय का वर्णन मिलता है।

महाभारत के बन पर्व में मत्स्योपरायान में यह कथाऐ आती है कि विवस्वान मनूनेदसहजारवर्ष तक हिमालय पर तपस्या की। उस समय एक मछली की प्रार्थना पर उन्होंने उसकी जीवन रक्षा की। इस उपकार का बदला मछली ने आगामी भीषण जलप्लावन की पूर्व सूचना देकर चुकाया साथ यह भी कहा कि तुम सप्त ऋषियों के साथ नौका में मेरी प्रतीक्षा करना। अन्य पर्वो में भी इस जल प्लावन का सुविस्तृत वर्णन है। इस प्रकार सम्पूर्ण प्राचीन विश्व साहित्य में जल प्रलय की ये कथाएँ निश्चय ही किसी घटित घटना की ही पूर्व स्मृत्तियाँ है अभिव्यक्ति की शैली भिन्न-भिन्न सभ्यताओं के परिवेश और साँस्कृतिक चेतनाके अनुरुप अलग-अलग है किन्तु उनमे एक अविभिन्न आतरिक एकता है, पर उसके छोटे रुप भूकंप, विस्फोट, बाढ़, अतिवृष्टि का महामारी आदि के रुप में जब तब दिखाई देते है।

खगोल शस्त्रियों द्वारा सन् 1982 में जिस विनाश की सम्भावना बताई गई है वह भी प्रकृति मं होते रहने ववाले परिवर्तनों का ही एक अंग है। करोड़ों लोगों के लिए यह घटना रोमाँचकारी भले ही हो पर सृष्टि इतिहास के लिए नई नहीं है। विनाश के बाद विकास, विध्वंस क बाद सृजन, और मृत्यु के बाद नये जन्म की तरह ही प्रकृति इन घटनाओं का आयोजन करती हैं इस तथ्य से विकास और विनाश के गतिचक्र को समझना चाहिए उत्पादन, अभिवृद्धि, सुरक्षा के लिए हम भरपूर प्रयास करे किन्तु साथ यह ध्यान भी रखे कि परिवर्तन और विनाश भी इस सृष्टि की ऐसी गतिविधियाँ है, जिनसे बचा नहीं जा सकता। अतः तैयार इसके लिए भी रहे कि विक्षोभकारी परिवर्तनों के समय उत्पन्न होने वाली ..... को धैर्य और साहस पूर्वक सहन किया जा सके।


वास्तुकला विशेषज्ञ ये नन्हें प्राणी

डाँ. ‘फ्रेजडाफिलन’ जीव विज्ञानी के रुप में प्रख्यात है। जीव-जन्तुओं पर शोध कार्य के लिए एक बार वे जावा एवं श्रीलंका के जंगलों में गये। वहाँ उन्होनें ‘इकोफाइला प्रगति’ की चीटियों को वृक्षों के शिखर पर पक्तियों से घोंसला बनाते देखा। कुछ दिनों पूर्व तक यह एक रहस्य का विषय बना था कि इतनी उँचाई पर सुन्दर ढंग से घोंसला बनाने वाला कौन सा जीव है। यह देखकर वे आर्श्चयचकित रह गये। आर्श्चय का कारण यह था कि इन चीटियों को जमीन पर घूमते हुए कभी भी बुनाई का काम करते नहीं देखा गया था। उनकी बुराई का कार्य भी कम आकर्षक एवं विचित्र न था। जिस सूझ-बूझ का परिचय वे इस कार्य में दे रही थी, उसे देखकर लगता था कि उन्हे किसी विश्वविद्यालय से इनकी इन्जीनियरिंग का विधिव प्रशिक्षण दिया गया हो। मुँह से निकलने वाले ............को धागे के रुप में परिवर्तित कर वे पंक्तियों को आपस में इन धागों से सी देती थी, जिस प्रकार पुल, मकान आदि के निर्माण में विभिन्न तरह के व्यक्तियों का ग्रुप बटा होता है तथा सभी अपनी-अपनी भूमिका सम्पादित करते है। कोई ईंट ले आने का कार्य करता है तो कोई जोड़ने काँ कोई गारा लाता उसी प्रकार इन चीटियों का भी गु्रप बना थाँ अपने 6 पाँव का सहारा लिए एक गु्रप पत्ते को पकडे़ रहता तो दूसरा गु्रप सिलाई का कार्य सम्पन्न करता तीसरा चीटियों का समूह मुँह से लार निकालकर रेशनी धागे बनाने का कार्य सम्पन्न कर रहा था।

चींटियों की वास्तुशिल्प विशेषता उनके अपने सीमित क्षेत्र में भी कुशल इन्जीनियर होने का प्रमाण देती है मनुष्य को तो इस प्रकार की विशेषता अर्जित करने के लिए विधिवत् प्रशिक्षण लेना पड़ता है किन्तु इन छोटे-छोटे कीड़ों को नैसर्गिंक रुप में प्राप्त है। परमात्मा ने मनुष्य को शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमताओं से युक्त करके भेजा है। किन्तु अन्य प्राणियों जीव-जन्तुओं को भी वे क्षमताएँ विशेषताएँ दी है जिनसे वे अपना जीवन-यापन कर सके। मनुष्य सर्वश्रेष्ठ होने का अहकार करता है तो उसका ऐसा सोचने मिथ्या है। कौशल, कला, बुद्धि के क्षेत्र में अन्य प्राणी मनुष्य से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं।

बच्चों की देख-रेख एवं सुरक्षा की व्यवस्था में मनुष्य अपने स्नेह, सद्भाव का परिचय देता है। भोजन, चिकित्सा विकास के सारे सरंजाम जुटाता है। आवश्यकता पड़ने पर बच्च्ो के लिए बडे़ से बड़ा त्याग करने में भी न ही चूकता। अपनी सुविधाओं, सुखो को बच्चें की सुविधाओं के समक्ष गौढ़ मानता है। यह विशेषता मात्र मनुष्य जाति में ही नहीं वरन् अन्य क्षुद्र प्राणियों में भी देखी जाती है। ‘स्फेम्स’ जाति का एक पतंगा अपने अण्डों की सुरक्षा एवं पोषण की व्यवस्था में जिस कौशल का परिचय देता, उसे से पतंगे की भाव संवेदना एवं बुद्धिमत्ता का पता लगता है। सुरंग बनाने का कार्य यह अपनी पतली सूँड़ से लेता है। डेढ़ से लेकर दो इन्च तक गहरी लम्बाकार सरंग बनाता है। पत्येक सुरंग में वह अपने अण्डे के पास एक कीडे़ का सुन्न करके रख देता है। अण्डे से जैसे ही बच्चा पतंगा निकलता है। माँ के द्वारा रखा गया आहार उसे तत्काल उपलब्ध हो जाता है। सुरंग से बाहर जब भी मादा बाहर निकलती है अपना सूँड़ से मिट्टी को नरम करके सुरंग के दरबाजे को बन्द कर देती है जिससे सुरंग का वातावरण गर्म बना रहे और बाहर जीव-जन्तु हमला न कर सके। सुरंग पर ही एक छोटा सा छेद बना देती है, ताकि अण्डे तक शुद्ध हवा पहुँचती रहे। अपने सिर एवं सूँढ़ से यह नन्हा जीव किस प्रकार एक उपकरण का कार्य लेता है उसे देखकर आर्श्चयचकित रह जाते है प्रकृति पदत्त क्षमता एवं कौशल का यह जन्तु भरपूर उपयोग करता हैं।

जीव जन्तुओं की दुनिया में इस प्रकार के उदाहरण भरे पड़े है जो हमें इनके बुद्धि चातुर्य का परिचय देते है। मनुष्य किसी भी वस्तु अथवा निर्माण का कार्य बिना टे्रनिंग प्राप्त किये तथा औजारों के बिना नहीं कर सकता। जबकि पशु-पक्षी अपनी आवश्यकतानुसार निवास की व्यवस्था अपनी अन्तःप्रेरणा से बना लेते है। लोमड़ी विलाव, श्रृंगाल आदि के छोटे किन्तु सुरक्षित निवास कक्ष देखने योग्य होते है। क्या का घोंसला मधुमक्खी का छत्ता एवं मकड़ी के जाले को देखकर यही कहना पड़ता है कि उस सत्ता ने इन क्षुद्र समझे जाने वाले जीवों को भी अनेकों प्रकार के कला कौशल से युक्त बुद्धि देकर पूरा-पूरा न्याय किया है। इनकी शिल्पकला की बारीकियों को देखकर तो कुशल शिल्पज्ञों को भी ईर्ष्या होने लगती है।

किसी विचारक का कथन है कि कोई भी वैज्ञानिक उपलब्धि किसी भी वैज्ञानिक की मौलिक देन नहीं है बल्कि प्रकृति एवं विभिन्न जीव-जन्तुओं की नकल मात्र है। उदाहरणार्थ पक्षियों की उड़ान के सिद्धान्त से अभिप्रेरित विचारों ने हवाई जहाज बनाने की प्रेरणा दी तो मछलियों की स्वछन्द पानी में विचरण से पानी के जहाज बनाने की परिकल्पना मानव मस्तिष्क में आई। इन उपलब्धियों को पक्षियों, जीव जन्तुओं की मौलिक विशेषताओं की नकल मानना चाहिए।

आस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला पक्षी ‘इन्म्यूवेटवर्ड जब घोंसला बनाता है तो उसका वास्तुशिल्प देखने योग्य होता है। चिकित्सालयों में प्रयुक्त होने वाला ‘इन्म्यूवेटर’ के निर्माण की प्ररेणा उस पक्षी के घोसलें को देखकर प्राप्त हुई। नर, मादा मिलकर साढे़ चार मीटर उँचा व 10 मीटर व्यास का रेतीली मिट्टी का घोंसला बनाते है। उपरी हिससे में एक छेद करके उसे मुलायम घास से ढक देते है तथा उसके उपर मिट्टी से लेपकर ढ़क देते है। इस पं्रकार यह गर्म कमरा पूरी तरह बच्चों की सुरक्षा करता हैं कक्ष का तापक्रम 33 सेन्टीग्रेड के निकट बना रहता हैं। यदि कमरा अधिक गरम हो जाता है तो यह पक्षी उपर के हिस्से में कुछ छिद्र बना देता है जिससे बाहर की ठण्डी हवा प्रविष्ट कर अन्दर के तापमान को कम कर सके। कमरे का तापक्रम कम होने अथवा ठण्डा होने पर उपरी हिस्से पर बड़ी सफलता से वह मिट्टी की परत चढ़ा देता है इस प्रकार भीतर का तापक्रम बढ़ जाता है। नर इन्म्यूवेटर पक्षों को तापक्रम के कम एवं अधिक होने की पूरी जानकारी उसी प्रकार मिलती है जैसे थर्मामीटर। जब तक अनुकुल तापक्रम नहीं हो जाता नर मादा को अण्डे नहीं देने देता। एक परिचारिका चिकित्सक एवं शिल्पज्ञ की भूमा पूरी मुस्तैदी के साथ यह पक्षी निभाता है।

दीपक पर विशिष्ट अध्ययन करने वाले प्रो. ‘हीय’ इनकी व्यवस्था बुद्धि को देखकर लिखते है कि “यद्यपि दीमक एक छोटा कीड़ा है किन्तु सार्वजनिक जीवन में जिस कुशलता व्यवस्था बुद्धि का परिचय देता है उससे मनुष्य को प्रेरणा एवं शिक्षा लेनी चाहिए। ईश्वर प्रदत्त विशिष्ट क्षमताओं अनुदानों को भी उपयोग यदि मनुष्य अपना पारिवारिक पोषण तक ही करता तो वे वह इन जीव जन्तुओं से भी पीछे है।”

नन्हे जीव जन्तुओं की विशेषताओं पर डाँ. ‘विलीले’ अपनी पुस्तक सेलेमेर्ण्डस एण्ड अदर वर्ण्डस में लिखते है कि मनुष्य यह सोचता है कि अन्य जीव जन्तु उसकी तरह बोल नहीं सकते तो उनके अन्दर विचार करने की क्षमता का भी सर्वथा अभाव होगा। किन्तु यह सोचना गलत है। परमात्मा ने इनको भी बुद्धि दी हैं। अपने सीमित क्षेत्र में मिली बौ0िक क्षमता का ये भरपूर उपयोग करते देखे जाते है जबकि परमात्मा ने मनुष्य को अनेकों विशेषताएँ एवं क्षमताएँ प्रदान की है। शारीरिक बौद्धिक, भावनात्मक, प्रत्येक क्षेत्र में वह चेतन जगत नेतृत्व करता है। यदि मानव इन क्षमताओं का उपयोग मात्र जीने खाने तक ही सीमित रखता है तो वह इन क्षुद्र कीड़ों से किसी भी प्रकार श्रेष्ठ नहीं है।

इन छोटे जीव जन्तुओं के व्यवस्थित अनुशासित एवं उल्लसित जीवन से मानवजाति मो प्ररेणा लेनी चाहिए। ईश्वर प्रदत्त अतिरिक्त अनुदानों एवं विशेषताओं का सदुपयोग पारिवरिक सीमाओं से आगे बढ़कर प्राणी मात्र के लिए किया जाना चाहिए। मानवी गरिमा को महत्ता एवं मिली क्षमताओं की उपयोगिता भी इसी में निहित है।


अभिवर्धन ही नहीं परिशोधन भी

परिशोधन एवं अभिवर्धन के सन्तुलित प्रयास से ही प्रगति को टिकाउ और अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। इन दोनों में से एक को भी नहीं छोड़ा जा सकता है। अभिवर्धन के लिए प्रयास भौतिक समृद्धि साधनों को साथ लेकर आता है, पर साथ ही अनुपयोगी एवं हानिकारक तत्वों को भी छोड़ जाता है। उनके परिशोधन की व्यवस्था न बनाई जाय, उपेक्षा कर दी जाय तो अनेकों प्रकार के संकट उठ खडे़ होते है। शरीर की सर्मथता के लिए शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए पौष्टिक आहारों की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। पर साथ ही विजातीय तत्वों के निष्कासन एवं रोगों से सुरक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए। तभी शरीर समर्थ एवं निरोग बना रह सकता है। प्रयास एकाकी हो सामर्थ्य सम्पादन के लिए प्रोष्टिक आहर ही जुआए जायं। रोग से बचाव का प्रबन्ध न हो तो पौष्टिक तत्वों द्वारा स्वास्थ्य सर्म्वधन का लाभ नहीं मिल सकता। न ही शरीर निरोग बना रह सकता है। सन्तुलन स्वस्थ जीवन क्रम के लिए दोनों ही तरह के प्रयास आवश्यक है।

प्रकृति की दौड़ में सुख-समृद्धि की अभिवृद्धि के लिए मानवी पुरुषार्थ एवं उत्साह भरा प्रयास प्रशंसनीय है। पर साधन सम्पन्नता के लिए किये जा रहे प्रयत्नों के दूरगामी परिणामों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। रोग को दूर करने में दी जाने वाली दवाओं से उत्पन्न ‘साइड एफेक्ट’ के समान उत्पन्न हो रही प्रदूषण विभीषिका पर भी ध्यान जाना चाहिए। अन्यथा उनसे नये रोग उठ खड़े होगे तथा रोग निवारण का प्रयास असफल ही सिद्ध होगा और निराशा ही हाथ लगेगी। पिछले दिनों सम्पन्न अभिवर्धन के लिए उत्साह उमड़ा तथा प्रयास भी चला। इस प्रयास में सफलता भी मिली। समृद्धि बढ़ी। पर इस उत्साह में दूरगामी परिणामोँ पर ध्यान न दिया गया। अभिवर्धन के प्रयास में परिशोधन के अनिवार्य क्रम को भुला दिया गयाँ। फलस्वरुप अनेको प्रकार की समस्याएँ उठ खड़ी हुई। बड़े उद्योगों, कल-कारखानों की निरन्तर अभिवृद्धि एवं उनसे पैदा होने वाला प्रदूषण नई परमाणु विभीषिका लेकर सामने प्रस्तुत है। वातावरण में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ती जा रही है कि अनुमान है कि मनुष्य को अगले दिनों वायु एवं जल की विषाक्तता से घुट-घुट कर मरना होगा। प्रकृति प्रकोपों एवं विश्व युद्धों से ही भयंकर क्षति होने की प्रचलित मान्यता थी पर उनसे कम हानि मनुष्य जाति को बढ़ते हुए प्रदूषण से नहीं उठानी होगी। यदि अभिवृद्धि का क्रम यही बना रहा, उसे रोका नहीं गया तो प्रकृति प्रकोपों अथवा विश्व युद्ध से मानव जाति मरे या नहीं पर वातावरण की विषाक्तता ही उसे नष्ट कर देने के लिए पर्याप्त होगी।

उत्पादन क्षमता ही नहीं प्रदूषण को रोकने के लिए प्रबन्ध किया जाना चाहिए। भौतिक प्रगति की दौड़ में अनेकों राष्ट्र आगे बढ़े है। अनुमान किया जाता है विगत 25 वर्षों में जापान की राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता चार गुनी जर्मनी की दुगुनी अमेरिका की आठ गुनी बढ़ी है। इस अभिवृद्धि से इन देशों को सरकार एक ओर तो प्रसन्न है। पर दूसरी ओर बढ़ती हुई विषाक्तता से चिन्तित है। नित्य नई बीमारियाँ उत्पन्न हो रही है। फेफडे़ सिर, आँख, गले के अनेकों ऐसे रोग उत्पन्न हो रहे हे जिनका निदान कर सकना भी मुश्किल पड़ रहा है। पशु पक्षियों की संख्या निरन्तर घटती जा रही है। खाद्यान्न में पौष्टिक तत्व नष्ट होते जा रहे है। जापान का माउन्ट फिगी पर्वत विभिन्न प्रकार के पक्षियों की चहचहाहट से भरा रहा था, वहाँ उनकी संख्या में भारी कमी आई है।

मनोरोगों की तो दिनोदिन वृद्धि हो रही है। अनिद्रा तनाव, सिरदर्द, थकान, उत्तेजना, पागलपन के शिकार तो अधिकाँश व्यक्ति है। नदियों समुद्रो में रहने वाले जल चर भी पानी में मिले विषाक्तता के कारण दम तोड़ रहे है। औद्योगीकरण के कारण जो जापान के टोकियों जैसे शहर में वाहनों कार, ट्रक, बस आदि की संख्या आठ गुनी हो गई है। स्थिति यहाँ तक पहुँची है कि दमे, लक्बे पागलपन से ग्रस्त रोगी बच्चे पैदा हो रहे है। टोक्यों, स्वास्थ्य विभाग की सूचना के अनुसार ‘..........’ नगर के कीशों हाईस्कूल के 6000 बच्चे आँखों में जलन, सिर दर्द, हाथ पैरों में अकड़न जैसे रोगों से ग्रस्त है। पूरे शहर में 13000 व्यक्ति विभिन्न प्रकार के रोगों के शिकार है। इसका कारण वैज्ञानिकों ने वायु में कार्बन मोनाआक्साइडक का सामान्य से दस गुना बढ़ जाना बताया है। कारखानों से निकली सल्फर डाईआक्साइड भी कम घातक नहीं है। टोक्यों मेट्रोपालीटन एवं वायरनमेंटल रिसर्च इन्स्टीट्यूट के डाइरेक्टर मिचीटाका कैमो का कहना है कि ‘सल्फर डाई आक्साईड बच्चों के विकास में घातक है।

वातावरण में फैलती हुई इस विषाक्तता को रोकने के लिए कई राष्ट्रों ने कार्यक्रम बनाये एवं प्रयास भी आरम्भ कर दिए है। टोक्यों में समाज कल्याण द्वारा प्रदूषण उन्मूलन विभाग खोला गया है। इसके कार्यक्रमों को सख्ती से लागू करने के लिए स्थानीय सरकार ने कठोर कानून भी बनाये है। ‘कावासाकी’ नगर के मेयर ईटों ने पाँच मंजिला प्रदूषण नियंत्रण केन्द्र की स्थापना कराई। कल कारखानों के मालिकों एवं सम्बन्धित अधिकारियों की प्रयोग की जाने वाली सल्फर की मात्रा तो तीस प्रतिशत रहती थी, उसको एक प्रतिशत रखने का आदेश दिया है। बड़े उद्योगों को जिनसे अधिक प्रदूषण पैदा होता है उन पर भी पाबन्दी लगा दी है।

इस प्रकार के प्रयास अन्य स्थानों पर भी चल रहे है। स्वीड़ेन में सबसे बड़ा उद्योग कागज बनाने का है जिसमें कुल सामग्री का दो तिहाई भाग पानी की आवश्यकता होती है। प्रतिटन कागज तैयार होने के बाद उतने ही वजन के लकड़ों के टुकड़ें, रसायन एवं गन्दा पानी भी पैदा होता था जिसको नदी या सरोवर में बहा दिया जाता था। नवीन पद्धति के अनुसार ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि एक टन निकलने वाले मलवे के स्थान पर मात्र एक किलोग्राम ही मलवा निकले। लकड़ी के टुकड़े, छिल के आदि को अलग करके’रफ पेपर’ बना दिया जाता तथा शेष भाग वायलर की भट्टी में जला दिया जाता है। स्वीडन की राजधानी ‘स्टाकहोम’ में यूरोप का सबसे बड़ा अस्पताल में बनी ‘हीटिंग सिस्टम’ की व्यवस्था के कारण चिमनियो के धुँए से प्रतिवर्ष 20 टन कालिख एवं 300 टन सल्फर डाई आक्साइड निकलती थी। अब उसमें ऐसी व्यवस्था वैज्ञानिकों द्वारा की गई है जिससे कालिख की मात्रा 90 प्रतिशत ओर सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा 98 प्रतिशत कम हो जाय।

स्वीडन के पार्लियामेन्ट ने कानूनी संरक्षण भी दिया हैं जिसके अनुसार प्रत्येक छोटे और बड़े कारखानों को प्रदूषण रोकने के लिए निर्धारित प्लान्ट लगाना पड़ता है। इसका कड़ाई से पालन करवाने के लिए कृषि मंत्रालय के आधीन राष्ट्रीय वातावरण संरक्षण बोर्ड की स्थापना की गई है। इस बोर्ड ने समाज के विभिन्न अंग जैसे शिक्षा विभाग उद्योगों से सम्बन्ध प्रत्येक व्यक्ति सरकारी कर्मचारीगण प्रत्येक को प्रदूषण रोकने में सहेयाग करने की एक समग्र प्रशिक्षण व्यवस्था बनाई है। प्रदूषण को रोकने दूर करने संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण भी समय-समय पर रेडियों एवं टेलीविजन पर किया जाता है। स्कूलों में बच्चों एवं कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों को ‘वातावरण संरक्षण कोर्स’ अनिवार्य रुप से सिखाया जाता है। युद्ध स्तर पर अनेकों क्षेत्रों में चल रहे इन प्रयासों से प्रदूषण को रोकने में विशेष सफलता मिली है।

सुरसा की तरह मुँह फाड़े आ रही इस विभीषिका से बचने के लिए छोटे-बडे़ प्रयास प्रत्येक स्थानों पर चलने चाहिए। प्रदूषण से हाने वाली हानियों से अवगत राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को कराया जना चाहिए। समझाने प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाने तथ बड़े उद्योगों की स्थापना पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। राजतंत्र को भी ऐसे कठोर कानून बनाना चाहिए, जिसका उल्लघंन कोई व्यक्ति न कर सके। बड़े उद्योगों की जगह ऐसे छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए जिसमें प्रदूषण उत्पन्न होने की कम से कम गुँजाइश हो।

वातावरण में व्याप्त विषाक्तता की भावी विभीषिकाओं से बचा सकता है। इसको दूर करने के लिए यज्ञीय पुरा-

(शेष पृष्ठ 38 पर)


मस्तिष्क पगलाता क्यों है?

मनोरोग दिखाई नहीं पड़ते। उसकी हानि प्रत्यक्ष नहीं है। ध्यान देने पर समझ में आती हैं साधारणतया तो ऐसा लगता है कि मानसिक रोगी ढीठता दिखाता और उच्छखलता भर बरतता है। यह प्रतीत ही नहीं होता कि यह किसी विकृति से ग्रसित होने के कारण अपनी भौतिक क्षमता गँवाता और विकृतियों के दलदल में फँसता चला जा रहा है। जब रोग का आभास ही नहीं तो उसका इलाज कौन करे। कईबार महिलाओं की बीमारियों को बहाने बाजी कहकर टाल दिया जाता है। मानसिक रोगों की बात तो इसलिए भी उपेक्षा में पड़ी रहती है कि उनकी उपस्थिति की कोई जानकारी तक सर्वसाधारण को नहीं है। फिर भी यह एक तथ्य है कि मानसिक रोगों से मनुष्य समाज का जो अहित होता है वह शारीरिक बीमारियों से होने वाली हानि की तुलना में किसी भी प्रकार कम भयंकर नहीं है। शरीर के पीड़ित या अपंग रहते संसार के असख्य व्यक्तियों ने अति महत्वपूर्ण काम करने में सफलताएँ पाई है, पर ऐसा एक भी व्यक्त नहीं हुआ जो मानसिक दृष्टि से अपंग होने पर कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त कर सका हो। सच तो यह है कि ऐसे लोग अपनी जीवन यात्रा तक शान्ति और सम्मानपूर्वक परी नहीं कर पाते।

महर्षि अष्टावक्र आठ जगह से कुबड़े थे, चाणक्य को अति कुरुप कहा जाता है। सुकरात की कुरुपता भी प्रख्यात है। आद्यशंकराचार्य भगन्दर के कोडे़ से ग्रसित थे। सूरदास अन्धे थे। कुमारी केलर गूँगी, बहरी और अन्धी होते हुए भी अनेक भाषाओं और विषयों की स्नातक है। ऐसे असंख्य प्रसंग है जिनमें अस्पतालों के विस्तरों पर पड़े-पडे़ लोगों ने माहन कृतियाँ तैयार की है। शरीर एक उपकरण है, पर मस्तिष्क की स्थिति सूत्र संचालक की है। मस्तिष्क लड़खड़ा जाने पर तो मनुष्य अपने और साथियों के लिए भार बन जाता है जबकि अन्धे और अपंग भी अपनी उपस्थिति से परिवार को कई तरह लाभान्वित करते रहते है।

पूर्ण पागलों की संख्या तो संसार में इस अनुपात में बढ़ रही है जिसे देखते हुँए संसार की सभी बीमारियों की दौड़ उससे पीछे रह गई है। खुले फिरने वाले पागलों की संख्या और उनके द्वारा जनसाधारण को होने वाली असुविधा ऐसी है, जिसे दूर करने के लिए पागल खानों की बड़ी संख्या में आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जेलखानों से भी अधिक पागलखानों के लिए स्थान बने तब उपद्रवी पागलों के द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले संकटों से बचा जा सकता है। अध पगले-सनकी, असन्तुलित अस्त व्यस्त, अव्यवस्थित, अदूरदर्शी लोगों की संख्या तो इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सही मनुष्य की संख्या सामान्य आबादी का एक छोटा अंश ही मिल सकेगा। शारीरिक दृष्टि से जितने लोग रुग्ण है मानसिक विकृतियों से ग्रसित की संख्या उसे कम नहीं अधिक ही मिलेगी। यह अधूरे और अस्त-व्यस्त मनुष्य मानव समाज की प्रगति, एवं सुव्यवस्था में अवरोध ही कहे जा सकते है। खेद इस बात का है-गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, अपराधी उद्दण्डता से भी अधिक कष्टदायक और भयानक बढ़ती हुई विक्षिप्तता की हानि को समझने और उसकी रोकथाम करने के लिए प्रयत्न नहीं किया जा रहा है।

अपराध भी वस्तुतः एक प्रकार का आवेश है। जिन्हें मनुष्य एक प्रकार के उन्माद से ग्रसित स्थिति में करता है। चोर, उच्क्के अपने कुकृत्यों की हानियाँ समझते है, उन पर पछताते भी है, छोड़ना भी चाहते है, भलमनसाहत के रास्ते चलने पर लोग कितनी उन्नति कर गये और कितने सम्मानित हुए यह तथ्य वे आँखों से देखते और कानों से सुनते है। दूसरे उन्हें समझाते है और वे बात को समझाते भी है कुछ समय उनका विवेक जागृत भी रहता है और भले आदमियों की तरह रहते भी है, फिर कभी ऐसी उचंग उठती है कि रोके नहीं रुकती यहाँ तक कि व्यक्ति उस छोड़े हुँए कार्य को करने के लिए एक प्रकार से विवश ही हो जाता है और फिर उसे dj gh xqtjrk gSA u'ksckth dh gkyr Hkh izk;% ,slh gh gksrh gSA chM+h flxjsV rks 'kkSd&ekSt ds fy, Hkh pyrh gS] ij 'kjkc] xkatk] pjl] vQhe dh ry iM+ tkus ls iSls dh] 'kjhj dh] lEeku dh fdruh {kfr tkus ls iSls dh] 'kjhj dh] lEeku dh fdruh {kfr gksrh gS mls os izR;{k ns[krs gSa] Hkyh izdkj le>rs gSaA NksM+us ds ladYi fodYi jkst gh eu esa mBrs jgrs gSaA le>kus ij yfTtr Hkh gksrs gSa vkSj nq[kh Hkh ij vius vkidks foo'k ikrs gSaA dksbZ v/kM+ Hkhrj ls ,slk mBrk gS fd Kku&foosd dks ,d vkSj iVd dj og djk ysrk gS ftls djus dh dqN Hkh vko';drk ugha FkhA lekt 'kkL=h bls ?k`"Vrk] nq"Vrk vkfn dk uke ns ldrs gSa] ij eu%jksx 'kkL= dh n`f"V ls ;g ml O;fDr dh vlgk; fLFkfr gSA Bhd oSlh gh tSlh Toj ;k f'kj nnZ ls vkØkr euq"; dh gksrh gSA vijk/k djus dh fn'kk esa ftuds eu epyrs jgrs gSa mgsa eu%'kkL= dh Hkk"kk esa *lknw dks iSFk* dgk tkrk gSA fo'ys"k.k djus ij mudh eu%fLFkfr lkek; yksxksa tSlh ugha gksrh oju~ vlkek; vkSj vlrqfyr ikbZ tkrh gSA

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क्द्मद्धठ्ठ स्रद्म द्बभ्॥द्मद्मश ॥द्मद्ध द्गह्वत्नद्यड्डरुस्नद्मह्व द्बद्भ ष्ह्नद्भद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न ;द्द द्धशस्रक्वद्धह्;द्मँ ड्ढद्यद्धब्, द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्ड्ड्न द्धस्र द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य द्यद्दद्ध ठ्ठक्वद्ध"कस्रद्मह्य.द्म क्द्बह्वद्मस्रद्भ द्यद्गरु;द्मक्द्मह्यड्ड द्बद्धद्भरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्मस्नद्म ह्द्मब्द्गह्यब् द्धष्क्चद्मह्वह्य स्रद्म क्ह्वह्नह्न॥द्मश ह्वद्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म्न द्गह्व ह्ड्ड= स्रद्म द्यह्नद्यड्डश्चद्मब्ह्व स्रद्भ द्यस्रह्वह्य शद्मब्ह्य द्धश्चह्ह्व यद्ग /द्मर्द्गं क्द्मस्द्भ क्/;द्मक्रद्ग स्रह्य ह्क्रश य़द्मह्व द्यह्य ह्लह्नरु+द्म द्दह्नक्द्म द्दस््न ;द्धठ्ठ द्वद्यह्य क्द्बह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्य ह्द्मह्य द्यड्डद्यद्मद्भ द्गह्यड्ड क्तस्ब्ह्य द्दह्न, द्बद्मफ्ब्द्बह्व क्द्मस्द्भ क्द्यड्डह्ह्नब्ह्व द्यह्य हृह्नंकस्रद्मद्भद्म द्धद्गब् द्यस्रह्द्म द्दस््न


प्रगति के लिए न अधीर हों, न आतुर

द्गद्मह्वशद्ध; द्य॥;ह्द्म स्रद्म द्धशस्रद्मद्य द्धस्रद्यद्ध श्चद्गक्रस्रद्मद्धद्भस्र क्द्मद्धक्रद्गस्र द्धशस्रद्मद्य स्रह्य म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ;द्दद्ध द्धह्व;द्ग ब्द्मफ्ख् द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्र;द्धष्ठह् द्गड्ड= द्ब ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड ड्ढद्य ह्द्भद्द स्रद्ध ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म ॥द्मब्ह्य द्दद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं द्बभ्क्र;म्द्म क्ह्वह्न॥द्मश ह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दद्मह्य द्धस्र द्बभ्फ्द्धह् यद्ग'द्मत्न द्दह्नर्ड्ढं] द्बद्भ शरुह्ह्नह्त्न शद्द द्धरुस्नद्मद्धह् ब्श्वष्ह्य क्द्मस्द्भ द्यह्नठ्ठद्ध?र्द्मं द्बभ्;द्मद्यद्मह्यड्ड द्यह्य द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्धह्वद्ध'श्चह् द्धह्व;द्ग स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ यद्गष्) द्धशस्रद्मद्य ड्ढद्य द्यक्वद्ध"क स्रद्म 'द्मद्म'शह् द्धह्व;द्ग द्दस््न ड्ढद्यद्गह्यड्ड स्रद्दद्धड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं क्द्बशद्मठ्ठ ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न क्द्बशद्मठ्ठ द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ॥द्मद्ध द्बरु+ह्ह्य द्दस्ड्ड ह्द्मह्य द्वद्दड्डह्य द्धशस्रद्मद्य ह्वद्दद्धड्ड स्रद्दद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म्न क्ड्डह्ह्त्न द्वह्वस्रद्ध द्बद्धद्भ.द्मद्धह् क्शफ्द्धह् द्गह्यड्ड द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न ड्ढद्य ह्स्न; स्रद्म द्धशशह्यश्चह्व द्धस्र;द्म ह्लद्म; क्द्मस्द्भ ड्ढद्य द्धह्व;द्ग द्बद्भ फ्श्व॥द्मद्धद्भह्द्म द्यह्य द्धशश्चद्मद्भ द्धस्र;द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य ड्ढद्यस्रद्ध द्बह्नद्ध"क द्गड्डह्य शस्य़द्मद्धह्वस्रद्मह्यड्ड स्रद्ध द्गद्म;ह्द्म द्दस् द्धस्र द्गह्वह्न"; ठ्ठख्द्यद्भह्य द्बभ्.द्मद्मद्धब्;द्मह्यड्ड स्रह्य द्दद्ध द्धशस्रद्मद्य स्रद्ध ,स्र स्ररु+द्ध द्दस््न ह्लद्धश'द्मद्मद्धरु=;द्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ द्गह्वह्न"; स्रह्य क्द्मद्धठ्ठ द्बर्ख्शंह्ल] क्द्मद्धठ्ठ द्गद्मह्वश द्बह्यरु+द्मह्यड्ड द्बद्भ द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य्न शद्द द्दद्मस्नद्म द्बस्द्भद्मह्यड्ड स्रद्ध द्गठ्ठठ्ठ द्यह्य श्चद्मस्द्बद्म;ह्य ह्लद्मह्वशद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध ह्द्भद्द श्चब्ह्ह्य स्नद्मह्य्न शस्य़द्मद्धह्वस्रद्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ द्गह्वह्न"; स्रह्य ड्ढद्य द्बर्ख्शंह्ल स्रह्य ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड द्धह्लद्यह्य शह्वद्गद्मह्वह्न"द्म स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् क्फ्ब्ह्य ठ्ठद्मह्य द्बस्द्भद्मह्यड्ड स्रद्म ष्द्दह्नह् द्गद्दक्रश स्नद्मद्म्न द्बह्यरु+ द्बद्भ श्च क्द्मह्ल द्गह्वह्न"; स्रह्य द्दद्मस्नद्म द्धह्लद्य ह्द्भद्द स्रह्य द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्ह्य द्दस्ड्ड] क्द्मद्धठ्ठ द्गद्मह्वश स्रह्य द्दद्मस्नद्म ड्ढद्यद्यह्य र्द्यशंस्नद्मद्म द्ध॥द्मह्व स्नद्मह्य्न शस्य़द्मद्धह्वस्रद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्दह्वद्म द्दस् द्धस्र श्चद्मद्भद्मह्यड्ड द्दद्मस्नद्म द्बस्द्भ स्रह्य ष्ब् द्बद्भ श्चब्ह्वह्य स्रद्म द्यड्डरुस्रद्मद्भ द्गह्वह्न"; स्रद्ध श्चह्यह्ह्वद्म द्गड्डह्य क्द्मह्ल ॥द्मद्ध द्धशस्त्रद्गद्मह्व द्दस््न ड्ढद्यस्रद्ध द्बह्नद्ध"क द्गह्यड्ड ह्स्र द्धठ्ठ;द्म ह्लद्मह्द्म द्दस् द्धस्र द्गह्वह्न"; ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड द्बस्द्भ द्यह्य श्चब्ह्द्म द्दस् ह्ष् द्वद्यस्रह्य ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड द्दद्मस्नद्म ॥द्मद्ध क्ह्वह्लद्मह्वह्य द्गह्यह्यड्ड द्धद्दब्ह्वह्य ब्फ्ह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्चद्धस्र द्वद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ ह्लस्द्यह्य द्धस्र शद्द श्चद्मद्भद्मह्यड्ड द्दद्मस्नद्म द्बस्द्भद्मह्यड्ड स्रह्य ष्ब् द्बद्भ श्चब्ह्द्म स्नद्मद्म्न ठ्ठद्मँ;द्म द्बस्द्भ क्द्मफ्ह्य ष् क्द्मद्धठ्ठ द्गद्मह्वश स्रद्म द्ध'द्मम्द्मस्र स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्वद्दद्धड्ड स्नद्मद्म ड्ढद्यद्धब्, द्वद्यह्वह्य ह्लद्मह्य स्रह्नहृ ॥द्मद्ध द्यद्ध[द्मद्म शद्द क्द्बह्वह्य द्बभ्;क्रह्व क्द्मस्द्भ क्ह्वह्न॥द्मशद्मह्यड्ड द्यह्य रुश;ड्ड द्दद्ध द्यद्ध[द्मद्म्न क्द्मह्ल ॥द्मद्ध द्गह्वह्न"; स्रद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् ,ह्यद्यद्ध द्दस् द्धस्र शद्द द्धष्ह्वद्म द्धस्रद्यद्ध स्रह्य द्धद्य[द्मद्म, स्रह्नहृ ह्वद्दद्धड्ड द्यद्ध[द्मह्द्म] ;द्धठ्ठ द्धस्रद्यद्ध द्गद्मह्वश द्ध'द्म'द्मह्न स्रद्मह्य ह्लड्डफ्ब् द्गह्यड्ड हृद्मह्यरु+ द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य द्वद्य स्रह्य ष्श्चह्वह्य स्रह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यड्ड॥द्मद्मशह्वद्म ह्वद्दद्धड्ड द्दस्ड्ड्न द्धह्वद्ध'श्चह् :द्ब द्यह्य शद्द द्गद्भ ह्लद्म;ह्यफ्द्म्न ;द्धठ्ठ शद्द स्नद्मद्मह्यरु+द्म ष्रु+द्म द्दह्नक्द्म क्द्मस्द्भ द्वद्यद्गह्यड्ड ;द्धक्रस्रद्धश्चड्डह्] द्धह्लह्लद्धद्धश"द्मद्म द्भद्दद्ध क्द्मस्द्भ द्बभ्द्धह्स्रख्ब् द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्यह्य द्यड्ड?द्म"र्द्मं स्रद्भह्वह्य स्रद्ध स्नद्मद्मह्यरु+द्ध ष्द्दह्नह् म्द्मद्गह्द्म द्भद्दद्ध ह्द्मह्य शद्द स्रड्डठ्ठ द्गख्ब् क्तब् [द्मद्म स्रद्भ ह्लद्धद्धशह् द्भद्दह्वह्य स्रद्ध श्चह्य"कद्म स्रद्भह्यफ्द्म्न ड्ढद्यद्यह्य क्द्मफ्ह्य शद्द स्रह्नहृ ह्वद्दद्धड्ड स्रद्भ द्यस्रह्यफ्द्म] ह्व क्द्मफ् स्रद्म द्वद्ब;द्मह्यफ् ह्लद्मह्वह्यफ्द्म क्द्मस्द्भ ठ्ठद्भशद्मह्लह्य द्बद्भ [द्मरु+द्म स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य ह्व द्दद्ध शद्द द्वद्यह्य [द्मद्मह्यब् द्यस्रह्यफ्द्म्न ड्ढद्य ह्द्भद्द स्रद्ध द्यद्मद्भद्ध ष्द्मह्ह्यड्ड द्गह्वह्न"; क्द्बह्वह्य द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्यह्य] द्बरु+द्मस्द्धद्य;द्मह्यड्ड द्यह्य द्धद्ग=द्मह्यड्ड द्यह्य क्द्मस्द्भ क्;द्म; द्धह्वस्रंकशह्द्ध ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्यह्य द्यद्ध[द्मह्द्म द्दस््न द्गद्मह्वश स्रद्मह्य ;द्द द्यष् द्धद्य[द्मद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, स्रद्मह्यर्ड्ढं द्ध'द्मम्द्मस्र ह्द्मह्य स्नद्मद्म ह्वद्दद्धड्ड] क्ह्,श द्वद्यह्वह्य ह्लद्मह्य स्रह्नहृ ॥द्मद्ध द्यद्ध[द्मद्म क्द्बह्वह्य द्दद्ध द्बभ्;क्रह्वद्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्धद्बहृब्ह्य क्ह्वह्न॥द्मशद्मह्यड्ड द्यह्य्न

;द्द द्यष् द्वद्यस्रद्मब् स्रद्ध ष्द्मह्ह्यड्ड द्दस्ड्ड द्धह्लद्यह्य द्बभ्द्मफ्स्द्धह्द्दद्मद्धद्यस्र स्रद्मब् स्रद्दद्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न ड्ढद्य स्रद्मब् स्रद्मह्य क्/;;ह्व स्रद्ध द्यह्नद्धश/द्मद्म स्रह्य द्धब्, ह्द्धह्व ॥द्मद्मफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ष्द्मँकद्म फ्;द्म द्दस् द1ड्ट द्बर्ख्शं द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् द2ड्ट द्वनद्मद्भ द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् क्द्मस्द्भ द3ड्ट /द्मद्मह्ह्नस्रद्मब््न द्बर्ख्शं द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् द्गह्यड्ड] ह्लष् द्गह्वह्न"; ह्वह्य ठ्ठद्मह्य द्बस्द्भद्मह्यड्ड द्यह्य श्चब्ह्वद्म क्द्मस्द्भ ठ्ठद्मह्य द्दद्मस्नद्मद्मह्यड्ड द्यह्य स्रद्मद्ग स्रद्भह्वद्म द्यद्ध[द्मद्म ह्स्नद्मद्म द्बह्यरु+द्मह्यड्ड द्यह्य द्वनद्मद्भ स्रद्भ ह्लद्गद्धह्व द्बद्भ द्भद्दह्वह्य ब्फ्द्म ह्ष् द्वद्यस्रह्य द्यद्मद्गह्वह्य स्रर्ड्ढं द्यद्गरु;द्म, क्द्मर्ड्ढं्न ड्ढद्यद्ध स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्वद्यह्वह्य द्बक्रस्नद्मद्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्दद्धस्नद्म;द्मद्भ ष्ह्वद्म, ह्द्मद्धस्र ह्लड्डफ्ब्द्ध द्बभ्द्मद्ध.द्म;द्मह्यड्ड द्यह्य द्यह्नद्भम्द्मद्म स्रद्ध ह्लद्म द्यस्रह्य्न द्दद्धस्नद्म;द्मद्भ द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्वद्य द्यद्ग; द्गह्वह्न"; ह्वह्य द्बक्रस्नद्मद्भ द्यह्य ठ्ठख्द्यद्भद्ध शरुह्ह्न, ॥द्मद्ध ष्ह्वद्मर्ड्ढं्न द्बह्नद्भद्मह्द्मद्धक्रशस्र क्ह्वह्नद्यड्ड/द्मद्मह्व द्यह्य ह्लद्मह्य ष्द्मह्ह्यड्ड ह्लद्मह्वह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्मर्ड्ढं द्दस्ड्ड] द्वह्वद्यह्य द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्य स्रद्मब् स्रह्य ब्द्मह्यफ् /द्मद्मह्ह्न द्यह्य द्बद्धद्भद्धश्चह् ह्वद्दद्धड्ड स्नद्मह्य्न द्वह्वस्रह्य द्दद्धस्नद्म;द्मद्भ क्द्मद्धठ्ठ द्बक्रस्नद्मद्भद्मह्यड्ड द्यह्य ष्ह्वह्य द्दद्मह्यह्ह्य स्नद्मह्य क्द्मस्द्भ द्वह्वद्गह्यड्ड ह्लद्मह्वशद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध द्दद्धरु−रु;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्गख्क्चह्यड्ड ब्फ्द्म ठ्ठद्ध ह्लद्मह्द्ध स्नद्मद्धड्ड्न द्बक्रस्नद्मद्भ क्द्मस्द्भ द्दरु−रुद्ध स्र क्ब्द्मशद्म ष्द्मठ्ठ द्गह्यड्ड ब्स्ररु+द्ध स्रद्म ॥द्मद्ध द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वह्य ब्फ्द्म क्द्मस्द्भ द्गह्वह्न"; ह्वह्य /द्मद्धद्भह्य&/द्मद्धद्भह्य द्दस्नद्मद्मस्रु+ह्य] ?द्मह्व रुरुह्य] ष्द्भद्गह्य] [द्मह्नद्भद्बद्ध] स्रह्नंघद्दद्मरु+द्ध] क्तद्भद्यह्य] हृद्मह्यंकह्य ष्रु+ह्य श्चद्मस्रख्] ष्द्भहृह्यड्ड] [द्मड्डह्लद्भ क्द्मद्धठ्ठ शरुह्ह्न, ष्ह्वद्मह्वह्य ब्फ्द्म्न द्बर्ख्शं द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्वद्य ष्द्मह् स्रह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यड्डस्रह्यह् ह्वद्दद्धड्ड द्धद्गब्ह्ह्य द्धस्र ड्ढद्य द्यद्ग; द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य शरु= द्बद्दह्वह्वह्य स्रद्म य़द्मह्व स्नद्मद्म्न द्वद्य स्रद्मब् द्गह्यड्ड ब्द्मह्यफ् ह्वड्डफ्ह्य द्दद्ध द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य्न ह्व द्वद्दह्यड्ड [द्मह्यह्द्ध स्रद्म य़द्मह्व स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ ह्व शरु= ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्म्न क्द्मफ्ह्य श्चब् स्रद्भ द्वह्व ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड ह्वह्य द्बह्यरु+ स्रद्ध द्बद्धनद्म;द्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ हृद्मब् द्यह्य क्द्बह्वह्य ह्ह्व स्रद्म द्धह्वह्द्मड्डह् क्द्य॥;] ह्लड्डफ्ब्द्ध क्द्मस्द्भ द्यड्डरुस्रद्मद्भ द्भद्धद्दह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य द्वद्बद्भद्मड्डह् ॥द्मद्ध ;द्द क्द्म'र्श्च; स्रद्ध द्दद्ध ष्द्मह् स्रद्दद्ध ह्लद्म;ह्यफ्द्ध द्धस्र द्वद्य द्यद्ग; स्रह्य ब्द्मह्यफ् ठ्ठद्धशद्मद्भद्मह्यड्ड द्बद्भ द्धश्च= ष्ह्वद्मह्वह्य ब्फ्ह्य स्नद्मह्य्न ;ह्य द्धश्च= द्बभ्द्म;त्न ष्द्मद्भद्दद्धद्यड्ड?द्मह्य] द्दद्मस्नद्मद्ध] ?द्मद्मह्यरु+ह्य] द्भद्धहृ] ॥द्मस्ड्डद्यह्य क्द्मद्धठ्ठ स्रह्य द्दद्मह्यह्ह्य स्नद्मह्य्न स्रद्दद्धड्ड स्रद्दद्धड्ड रु=द्ध द्बह्नप्त"द्मद्मह्यड्ड स्रह्य द्धश्च= ॥द्मद्ध ठ्ठह्य[द्मह्व स्रद्मह्य द्धद्गब्ह्ह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढह्व द्धश्च=द्मह्यड्ड स्रह्य क्द्धह्द्धद्भष्ठह् स्रद्दद्धड्ड&स्रद्दद्धड्ड ष्द्मद्भद्दद्धद्यड्ड?द्मह्य] द्दद्मस्नद्म] ?द्मद्मह्यरु+ह्य क्द्मद्धठ्ठ स्रह्य रुह्द्भ स्रद्ध द्बभ्द्धह्द्गद्म, ॥द्मद्ध ठ्ठह्य[द्मह्वह्य स्रद्मह्य द्धद्गब्ह्द्ध द्दस्ड्ड द्धह्लद्दह्यड्ड ठ्ठह्य[द्म स्रद्भ ;द्द रुशद्धस्रद्मद्भ स्रद्भह्वद्म द्बरु+ह्यफ्द्म द्धस्र द्वद्य स्रद्मब् स्रह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य स्रब्द्म स्रद्मस्'द्मब् स्रद्म य़द्मह्व स्नद्मद्म्न

ड्ढद्य स्रद्मब् स्रद्म क्/;;ह्व स्रद्भह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ ;द्दद्ध द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्धस्र द्वद्य द्यद्ग; स्रह्य द्गह्वह्न"; द्गह्यड्ड द्यड्डशह्यठ्ठह्व ह्क्रश स्रद्म ह्लद्मफ्द्भ.द्म द्दद्मह्य फ्;द्म स्नद्मद्म्न ड्ढद्यद्ध द्यड्डशह्यठ्ठह्वद्म स्रह्य क्तब्रुश:द्ब द्वद्यद्गह्यड्ड स्रंघद्मद्मक्रद्गस्र द्बभ्ह्यद्भ.द्मद्म, द्वक्रद्बह्व द्दह्नर्ड्ढं्न ;द्धठ्ठ ;द्द स्रद्दद्म ह्लद्म; द्धस्र द्यड्डशह्यठ्ठह्वद्म क्द्मस्द्भ स्रब्द्मक्रद्गस्र द्बभ्ह्यद्भ.द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग रुश:द्ब शद्द द्धह्वद्भह्द्भ द्य॥;ह्द्म स्रह्य द्बस्नद्म द्बद्भ क्फ्भ्द्यद्भ द्दद्मह्यह्द्म फ्;द्म] ह्द्मह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं क्द्म'र्श्च; ह्वद्दद्धड्ड द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,] द्बर्ख्शं द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् स्रह्य ष्द्मठ्ठ द्गह्वह्न"; ह्लद्मद्धह् ह्वह्य द्वनद्मद्भ द्बद्म"द्मद्म.द्म स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्यड्डयद्ग.द्म द्धस्र;द्म्न क्ष् द्गह्वह्न"; द्बद्दब्ह्य स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म द्य॥; द्दद्मह्य श्चह्नस्रद्म स्नद्मद्म्न ;स्त्रद्धद्ब क्॥द्मद्ध ॥द्मद्ध द्बक्रस्नद्मद्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्दद्ध क्द्मस्ह्लद्मद्भ ष्ह्वद्म;ह्य ह्लद्मह्ह्य स्नद्मह्य] द्बद्भ द्वह्वद्गह्यड्ड द्बद्दब्ह्य स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म स्रब्द्मक्रद्गस्रह्द्म स्रद्म द्यद्गद्मशह्य'द्म स्रद्भ द्धब्;द्म फ्;द्म स्नद्मद्म्न क्द्मस्ह्लद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्ष् द्भफ्रु+स्रद्भ ह्वह्नस्रद्धब्द्म क्द्मस्द्भ श्चद्गस्रठ्ठद्मद्भ ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्मह्वह्य ब्फ्द्म स्नद्मद्म्न

ड्ढद्य स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्गह्वह्न"; ह्वह्य ,स्र रुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ द्धंकस्र स्रद्भ द्भद्दह्वद्म ॥द्मद्ध 'द्मह्न: द्धस्र;द्म्न द्वद्यद्गह्यड्ड द्ब'द्मह्नक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्बद्मब्ह्वह्य ह्स्नद्मद्म द्वह्वद्यह्य ब्द्म॥द्म द्वक्चद्मह्वह्य स्रद्म ॥द्मद्ध य़द्मह्व द्धशस्रद्धद्यह् द्दह्नक्द्म्न शद्द फ्द्म;] ष्स्ब्] ष्स्रद्भद्ध] ?द्मद्मह्यरु+ह्य] स्रह्ननद्मह्य क्द्मद्धठ्ठ द्ब'द्मह्न द्बद्मब्ह्वह्य ब्फ्द्म्न ठ्ठस्द्धह्वस्र ह्लद्धशह्व स्रद्ध क्द्मश';ह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्ध द्बख्द्धह् स्रह्य द्धब्, द्धशद्ध॥द्मह्व स्रद्मद्ग&स्रद्मह्ल ॥द्मद्ध द्धस्र;ह्य ह्लद्मह्वह्य ब्फ्ह्य्न ड्ढद्य स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्गह्वह्न"; ह्वह्य क्द्धंगह्व स्रद्म क्द्मद्धश"स्रद्मद्भ ॥द्मद्ध स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म स्नद्मद्म्न द्धह्वशद्मद्य स्रह्य द्धब्, >द्मह्यड्डद्बरु+द्ध स्रक्वद्ध"द्म] द्ब'द्मह्नद्बद्मब्ह्व क्द्मद्धठ्ठ ष्द्मह्द्मह्यड्ड ह्वह्य द्बद्धद्भशद्मद्भ द्यड्डरुस्नद्मद्म स्रद्मह्य ह्लद्ग द्धठ्ठ;द्म्न क्तब्ह्त्न ॥द्मद्मर्ड्ढं&ष्द्दह्व] द्गद्मह्द्म&द्धद्बह्द्म] द्बद्धह्&द्बक्रह्वद्ध ह्लस्द्यह्य द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र द्यड्डष्ड्ड/द्म रुस्नद्मद्मद्धद्बह् द्दह्न,्न

ड्ढद्य द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्भद्दह्ह्य द्दह्न, स्रह्नहृ 'द्मह्द्मद्धष्टठ्ठ;द्मह्यड्ड स्रह्य ष्द्मठ्ठ द्गह्वह्न"; ह्वह्य /द्मद्मह्ह्न स्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् स्रद्भह्वद्म द्यद्ध[द्मद्म्न द्बक्रस्नद्मद्भ स्रद्ध ह्ह्नब्ह्वद्म द्गह्यड्ड /द्मद्मह्ह्न द्यह्य क्द्ध/द्मस्र क्क्कहृद्ध 'द्मष्ठब् स्रह्य ह्स्नद्मद्म क्द्ध/द्मस्र द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध हृह्नद्भह्य] श्चद्मस्रख्] स्रह्नंघद्दद्मरु+द्ध] द्दस्नद्मद्मस्रु+ह्य क्द्मद्धठ्ठ ष्ह्वद्म;ह्य ह्लद्म द्यस्रह्ह्य द्दस्ड्ड ;द्द द्यद्मह्यश्च स्रद्भ द्गह्वह्न"; ह्वह्य /द्मद्मह्ह्न स्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् स्रद्भह्वद्म क्द्मद्भश्व॥द्म स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म्न द्यष्द्यह्य द्बद्दब्द्ध /द्मद्मह्ह्न ह्लद्मह्य द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य द्धद्गब्द्ध शद्द ह्द्मँष्द्म ष्ह्द्मर्ड्ढं ह्लद्मह्द्ध स्नद्मद्ध *द्बद्भह्ह्न ह्द्मँष्ह्य द्यह्य ष्ह्वह्य द्वद्बस्रद्भ.द्म ह्लंघठ्ठद्ध द्दद्ध द्गह्यस्नद्मद्भ ह्स्नद्मद्म ष्ह्यस्रद्मद्भ द्दद्मह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड ;द्द ठ्ठह्य[द्मस्रद्भ द्गह्वह्न"; ह्वह्य ह्द्मँष्ह्यड्ड द्गह्यड्ड कद्धह्व स्रद्मह्य द्धद्गब्द्मस्रद्भ ,स्र ह्वर्ड्ढं /द्मद्मह्ह्न स्रद्मड्डद्यद्म ष्ह्वद्मर्ड्ढं्न ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्मड्डरु; ;ह्नफ् स्रद्म क्द्मद्भश्व॥द्म द्दह्नक्द्म्न

द्गद्मह्वशद्ध;&द्यड्डरुस्रक्वद्धह् क्द्मस्द्भ द्य॥;ह्द्म स्रह्य द्धशस्रद्मद्य द्गह्यड्ड /द्मद्मह्ह्न स्रद्म ह्र;शद्दद्मद्भ ,स्र द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं स्रठ्ठद्ग स्नद्मद्म्न ड्ढद्यद्यह्य द्गह्वह्न"; स्रद्ध स्रर्द्म; म्द्मद्गह्द्म ष् द्गह्वह्न"; स्रद्ध ड्ढद्य द्धशस्रद्मद्य ;द्म=द्म स्रह्य ष्ह् स्रद्मह्य ब्ह्यस्रद्भ द्धशत्त्द्मह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्गह्॥द्मह्यठ्ठ द्दस्] द्बद्भ ड्ढद्य ह्स्न; स्रद्मह्य द्य॥द्मद्ध रुशद्धस्रद्मद्भ स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड द्धस्र द्वह्वद्धह् द्धस्रद्यद्ध ॥द्मद्ध म्द्मह्य= द्गह्यड्ड द्दद्मह्य] यद्धद्गस्र द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न ष्द्धह्ल ,स्र द्धठ्ठह्व द्गह्यड्ड द्दद्ध क्तख्कस्रद्भ क्ड्डस्रह्नद्धद्भह् ह्वद्दद्ध द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्म क्द्मस्द्भ ह्व द्दद्ध शक्वम्द्म ष्ह्व ह्लद्मह्द्म द्दस््न द्बस्ठ्ठद्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं ष्क्कश्चद्म द्बभ्द्मस् स्रद्दह्वह्य स्रद्म क्स्नर्द्मं ;द्द द्धस्र द्यद्मद्भह्य द्बद्धद्भशह्ह्व क्द्मस्द्भ द्यद्मद्भद्म द्धशस्रद्मद्य श्चह्नद्बश्चद्मह्व द्दद्मह्यह्द्म श्चब्ह्द्म द्दस््न द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य स्रह्नहृ द्बह्द्म ह्वद्दद्धड्ड श्चब्ह्द्म क्द्मस्द्भ द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्धह्व;द्ग क्द्बह्वद्म स्रर्द्म; स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्द्मद्धक्रद्गस्र द्धशस्रद्मद्य स्रद्ध द्यद्म/द्मह्वद्म द्गह्यड्ड ब्फ्ह्य द्यद्म/द्मस्र ॥द्मद्ध ,स्र द्दद्ध द्धठ्ठह्व द्गह्यड्ड द्धद्य) द्यड्डह् ह्लस्द्यह्य ह्वद्दद्धड्ड द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्वह्य ब्फ्ह्ह्य क्द्मस्द्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्य ;द्म द्बभ्ठ्ठद्ध'र्द्मंह् स्रद्भह्य ह्द्मह्य द्यद्ग>ह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र शद्द द्बद्मह्वह्य स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ह्लंघठ्ठद्ध द्दद्ध द्धह्वद्भद्म'द्म द्दद्मह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ क्द्बह्वह्य द्बभ्;क्रह्व हृद्मह्यरु+ ष्स्क्चह्ह्य द्दस्ड्ड्न


परिस्थितियाँ भौतिक, कारण आत्मिक

ष्ह्नद्ध) स्रद्ध द्बभ्[द्मद्भह्द्म स्रह्य द्यद्मस्नद्म ,स्र स्रद्गह्लद्मह्यद्भद्ध ;द्द ह्लह्नरु+द्ध द्दस् द्धस्र शद्द ह्स्र ,शड्ड द्बभ्क्र;शद्मठ्ठ स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्दद्ध द्यष् स्रह्नहृ ह्लद्मह्वह्वह्य ,शड्ड ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्ह्य ह्स्नद्मद्म ?द्मंकह्वद्म स्रद्म द्गख्ब्॥द्मख्ह् स्रद्मद्भ.द्म द्गद्मह्व ब्ह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढद्य ठ्ठह्नद्भद्मफ्भ्द्द द्बख्.र्द्मं ,स्रद्मड्डफ्द्ध द्गद्म;ह्द्म स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्दद्ध शह्य द्यक्र; ह्स्र द्बद्दह्नँश्च द्बद्मह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्यद्गस्नर्द्मं द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न

द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्मद्मस्नर्द्मं ष्ठ्ठख्स्र स्रद्ध फ्द्मह्यब्द्ध श्चब्द्ध्न ,स्र ह्र;द्धष्ठह् फ्द्मह्यब्द्ध ब्फ्ह्वह्य द्यह्य ह्क्रस्रद्मब् द्गद्भ फ्;द्म्न स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल क्द्मद्भश्व॥द्म स्रद्भह्यड्ड ह्द्मह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड स्रद्मद्भ.द्म द्व॥द्मद्भ स्रद्भ द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;ह्यड्डफ्ह्य्न ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्धस्रद्यद्ध ,स्र स्रद्मह्य द्वष्ठह् ?द्मंकह्वद्म स्रद्म क्स्रह्यब्द्म स्रद्मद्भ.द्म ह्वद्दद्धड्ड द्गद्मह्वद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म्न द्गद्भह्य द्दह्न, ह्र;द्धष्ठह् द्यह्य फ्द्मह्यब्द्ध श्चब्द्मह्वह्य शद्मब्ह्य स्रद्म शस्द्गह्वरु; ,स्र स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस्] द्धस्रह्ह्न ;द्द ॥द्मद्ध द्यक्र; द्दस् द्धस्र ष्ठ्ठख्स्र श्चद्मब्स्र स्रह्य द्बद्मद्य ;द्धठ्ठ ष्ठ्ठख्स्र ह्व द्दद्मह्यह्द्ध ह्द्मह्य फ्द्मह्यब्द्ध ह्व श्चब्ह्द्ध्न शद्द ह्र;द्धष्ठह् ह्वद्दद्धड्ड द्गद्मद्भद्म ह्लद्मह्द्म्न रुद्ब"क द्दस् द्धस्र द्वद्यस्रद्ध द्गक्वक्र;ह्न द्गह्यड्ड ष्ठ्ठख्स्र स्रद्म ह्स्नद्मद्म फ्द्मह्यब्द्ध स्रद्म द्दद्मह्यह्वद्म ,स्र स्रद्मद्भ.द्म द्दस््न क्द्मफ्ह्य ष् द्गद्मह्वद्धद्यस्र ॥द्मभ्द्गद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म ;द्द द्दस् द्धस्र द्धह्लह्व ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वह्य ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड ह्लस्द्यद्म ठ्ठह्य[द्मह्ह्य ,शड्ड फ्भ्द्द.द्म स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड द्वद्दह्यड्ड शस्द्यद्म द्दद्ध द्गद्मह्व ब्ह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न द्यद्गद्धद्बशह्द्ध द्गद्म;ह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ ह्द्मह्य ;द्द ,स्र द्यद्धद्गद्म ह्स्र क्चद्धस्र द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस्] द्धस्रह्ह्न ठ्ठख्द्भशह्द्ध द्यश्वद्बख्.र्द्मं द्यक्वद्ध"क स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य ठ्ठह्य[द्मद्म ह्लद्म; ह्द्मह्य रुद्ब"क द्दद्मह्यफ्द्म द्धस्र द्गद्म;ह्द्म, द्धस्रह्ह्वद्ध क्द्बख्.र्द्मं ,शड्ड ॥द्मभ्द्ग;ह्नष्ठह् स्नद्मद्ध्न ;द्द ष्द्मह् स्रह्यशब् ड्ढद्धठ्ठभ्; ॥द्मभ्द्गद्मह्यड्ड स्रह्य ष्द्मद्भह्य द्गह्यड्ड द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड शद्भह्व− द्यद्गरुह् द्धह्वद्भद्धम्द्म.द्मद्मह्यड्ड स्रह्य द्यश्वष्/द्म द्गह्यड्ड ठ्ठह्य[द्मद्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस््न शरुह्ह्नह्त्न द्धह्वद्भद्धम्द्म.द्म शद्मह्द्मशद्भ.द्म ,शड्ड द्धह्वठ्ठर्ह्यं'द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रह्य द्यद्मद्बह्यम्द्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दह्यड्ड्न द्यद्मद्बह्यम्द्म द्गद्म;ह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ ह्लद्मह्य ह्स्न; द्व॥द्मद्भ स्रद्भ क्द्मह्ह्य द्दस्ड्ड द्वह्वस्रद्मह्य ष्ठ्ठब् ठ्ठह्यह्वह्य द्बद्भ ह्व;ह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड स्रद्मद्भ.द्म द्धह्वस्रब्स्रद्भ द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न

द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्म स्रह्य द्धब्, द्भह्यह्लद्भष्टब्स्रु स्रद्मह्य ब्ह्यड्ड्न क्द्बह्वद्ध द्धह्वर्ठ्ठंह्य'द्मह्व ह्र;शरुस्नद्मद्म द्गह्यड्ड द्भह्यह्लद्भ स्रद्ध /द्मद्मद्भद्म द्धह्वद्भह्द्भ द्यद्ध/द्मद्ध द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं द्बरु+ह्द्ध द्दस्&द्यख्म्द्ग ठ्ठ'र्द्मंस्र द्गह्यड्ड ठ्ठह्य[द्मह्वह्य द्बद्भ शद्दद्ध /द्मद्मद्भ कख्कद्ध क्तख्कद्ध क्चद्मह्यद्य द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं द्बरु+ह्द्ध द्दस््न ड्ढब्ह्यष्ठंकऊद्मंखह्व द्गद्मड्ढयद्मह्यरुस्रद्मह्यद्ब द्यह्य शद्द ष्द्दह्नह् ष्रु+द्म ;= द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं द्बरु+ह्द्म द्दस््न द्भद्यद्म;ह्व 'द्मद्मरु=द्ध /द्मद्मद्भ द्गह्यड्ड ब्द्मह्यद्दह्य क्द्मस्द्भ स्रद्मष्ह्व स्रह्य द्बह्ब्ह्य कह्नस्ररु+ह्य ठ्ठह्य[द्मह्द्म द्दस््न ॥द्मद्मस्द्धह्स्र'द्मद्मरु=द्ध क्द्बह्वद्ध ;स्नद्मद्मस्नर्द्मंशद्मठ्ठद्ध ह्र;द्म[;द्म स्रद्भह्द्म द्दस््न द्धशद्ध॥द्मह्व द्बभ्स्रद्मद्भ /द्मह्व ,शड्ड ट्ठ.द्म क्द्मशह्य'द्म;ह्नष्ठह् स्र.द्मद्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्गह्नक्कश्च; द्गद्मह्वह्द्म द्दस््न द्दह्लद्मद्भद्मह्यड्ड द्गद्धब् द्बभ्द्धह् ?द्म.कद्म स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड ह्द्धशभ् शह्यफ् द्यह्य ठ्ठद्मस्रु+ह्वह्य शद्मब्ह्य द्धशद्ध॥द्मह्व द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य स्र.द्मद्मह्यड्ड द्यह्य द्धशद्धह्वद्धर्द्गंह् द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं स्रह्य :द्ब ठ्ठह्य[द्मह्द्म द्दस््न द्भह्यह्लद्भ स्रद्ध ह्ह्यह्ल /द्मद्मद्भ स्रह्य स्र.द्मद्मह्यड्ड स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल द्गह्यड्ड द्भद्यद्म;ह्व 'द्मद्मरु=द्ध ॥द्मद्मस्द्धह्स्र 'द्मद्मरु=द्ध स्रह्य द्बद्मद्य द्बद्दह्नँश्च ह्लद्म; ह्द्मह्य द्वह्वस्रद्म द्वनद्मद्भ क्ब्फ्&क्ब्फ् क्द्बह्वद्ध द्गद्म;ह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्न:द्ब द्दद्मह्यफ्द्म्न ड्ढह्लद्धद्धह्व;द्भ द्वद्यह्य ड्ढह्लद्धद्धह्व;द्धद्भड्डफ् स्रद्म स्रब्द्मस्रद्मस्'द्मब् ,शड्ड द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रद्भह्वह्य शद्मब्द्ध द्ग'द्मद्धह्वद्मह्यड्डड्ड स्रद्ध स्रह्न'द्मब्ह्द्म स्रद्मह्य ष्ह्द्म;ह्यफ्द्म्न ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड ॥द्मद्मस्द्धह्स्र स्रद्मद्भ.द्म द्व॥द्मद्भ स्रद्भ द्यद्मद्गह्वह्य क्द्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य द्बख्.र्द्मं ह्वद्दद्धड्ड स्रद्दद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ह्व द्दद्ध द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य फ्ब्ह् द्धद्य) द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ड्ढह्व द्धश'ब्ह्यह्य"द्म.द्मद्मह्यड्ड द्यह्य ,स्र द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं ष्द्मह् द्दद्मस्नद्म ब्फ्ह्द्ध द्दस् द्धस्र द्धस्रद्यद्ध ॥द्मद्ध ?द्मंकह्वद्म स्रह्य स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल द्गह्यड्ड ह्लस्द्यह्य&ह्लस्द्यह्य क्द्मफ्ह्य ष्ह्य द्भद्दह्वह्य स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्दद्ध शद्मरुह्द्धशस्रह्द्म द्यह्य ठ्ठख्द्भ द्दंकह्ह्य श्चब्ह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न ह्लद्मह्य ॥द्मद्मस्द्धह्स्र स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मस्नद्म ब्फ्ह्ह्य द्दस्ड्ड द्वद्दद्धड्ड स्रद्मह्य द्बख्.र्द्मं द्गद्मह्व ब्ह्यह्वह्य स्रद्म ठ्ठह्नद्भद्मफ्भ्द्द स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्डड्ड्न क्तब्रुश:द्ब द्यक्र; ह्स्र द्बद्दह्नँश्च द्यस्रह्वद्म द्यश्व॥द्मश ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्य द्बद्मह्द्म्न

ष्ह्नद्ध) स्रह्य ह्द्मद्धर्स्रंस्र रुस्नद्मख्ब् द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गद्मह्यड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ शरुह्ह्नक्द्मह्यड्ड] ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य रुश:द्ब ,शड्ड द्वह्वस्रह्य स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्मठ्ठ'र्द्मं रुश:द्ब ठ्ठह्य ठ्ठह्यह्वद्म द्गद्धरुह्"स्र स्रद्ध स्रद्गह्लद्मह्यद्भद्ध द्दस््न द्धह्लह्वस्रद्ध द्गद्म;ह्द्म, रुस्नद्मख्ब् द्बद्भ द्धंकस्रद्ध द्दस्ड्ड द्वह्वद्गह्यड्ड क्द्ध/द्मस्रह्द्भ ;द्द स्रद्गह्लद्मह्यद्भद्ध ठ्ठह्य[द्मद्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस््न द्गद्मह्वश द्धशश्चद्मद्भ स्रद्ध द्बभ्द्धय;द्म द्बभ्द्म;त्न ठ्ठक्व'; स्रह्य द्धह्वद्भद्धम्द्म.द्म ,शड्ड द्यद्मद्गद्म; ष्ह्नद्ध) द्बद्भ क्द्म/द्मद्मद्धद्भह् द्दस््न ड्ढद्य स्रद्मद्भ.द्म ष्ह्नद्ध) द्बद्भ द्बख्.र्द्मं द्धश'शद्मद्य द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म्न ह्व द्दद्ध द्वद्य स्रह्य द्यद्दद्मद्भह्य ;स्नद्मद्मस्नर्द्मं ह्स्र द्बद्दह्नँश्च द्यस्रह्वद्म द्यश्व॥द्मश द्दस््न

द्यड्डद्यद्मद्भ स्रद्ध ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड ,शड्ड द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रद्मह्य ह्लद्मह्वह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्बभ्द्म;त्न य़द्मह्वह्यद्धठ्ठभ्;द्मह्यड्ड ,शड्ड ह्स्र'द्मद्धष्ठह् स्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न द्धह्लह्व ॥द्मद्मस्द्धह्स्र स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्म द्बह्द्म ब्फ्ह्द्म द्दस्] शह्य द्बभ्द्म;त्न ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्गख्ब् ॥द्मख्ह् स्रद्मद्भ.द्म स्रद्मह्य ष्ह्द्म द्बद्मह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्यद्गस्नद्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न ;द्द द्यश्व॥द्मश ॥द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड ,शड्ड द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्गख्ब् स्रद्मद्भ.द्म क्॥द्मद्मस्द्धह्स्र द्दस््न द्वद्दह्यड्ड ह्लद्मह्वह्वह्य श क्ह्वह्न॥द्मश स्रद्भह्वह्य द्यह्य द्दद्ध शद्मरुह्द्धशस्र द्यद्गद्म/द्मद्मह्व द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न ड्ढद्यस्रह्य द्धब्, क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र म्द्मह्य= द्गह्यड्ड द्बभ्द्धश"क स्रद्भ श्चह्यह्ह्व द्धशय़द्मह्व स्रद्म द्दद्ध क्शब्श्वष्ह्व ब्ह्यह्वद्म द्दद्मह्यफ्द्म्न द्यष्स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म शद्द द्बद्भद्ग द्यनद्मद्म द्दस् द्वद्यह्य ह्लद्मह्वह्वह्य द्यह्य द्दद्ध द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्भद्दरु;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्ग> द्यस्रह्वद्म द्यश्व॥द्मश द्दस््न

द'द्मह्य"द्म द्बक्व"क्च 30 स्रद्मड्ट

ह्ह्व द्बद्भश्वद्बद्भद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म ॥द्मद्ध द्बभ्श्चब्ह्व द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड शस्य़द्मद्धह्वस्र 'द्मद्मह्य/द्मद्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म ;द्द द्बभ्द्गद्मद्ध.द्मह् द्दद्मह्य श्चह्नस्रद्म द्दस् द्धस्र क्द्धंगह्वद्दद्मह्य= शद्मह्द्मशद्भ.द्म स्रद्मह्य द्बद्धद्भ'द्मद्मह्यद्ध/द्मह् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ,स्र द्यद्गस्नर्द्मं द्ब)द्धह् द्दस््न द्वद्यद्गह्यड्ड शद्म;ह्न द्गह्यड्ड ?द्मह्नब् द्धद्गब्ह्य द्धश"द्मद्म.द्मह्नक्द्मह्यड्ड ह्लद्धशद्म.द्मह्नक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्गद्मद्भह्वह्य स्रद्ध क्ठ्ठ−॥द्मह्नह् म्द्मद्गह्द्म द्दस््न

द्बद्धद्भ'द्मद्मह्य/द्मह्व स्रह्य द्धब्, स्रर्ड्ढं रुह्द्भ द्बद्भ द्बभ्;द्मद्य स्रद्भह्वह्य द्दद्मह्यड्डफ्ह्य्न ह्स्नद्मद्म क्द्ध॥द्मश/र्द्मंह्व स्रह्य द्धब्, द्धस्र;ह्य ह्लद्म द्भद्दह्य द्धशद्ध॥द्मह्व द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य ॥द्मद्मस्द्धह्स्र द्बभ्;द्मद्यद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ठ्ठख्द्भठ्ठद्ध'र्द्मंह्द्म स्रद्म द्यद्गद्मशह्य'द्म स्रद्भह्वद्म ,शड्ड ठ्ठख्द्भफ्द्मद्गद्ध द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गद्मह्यड्ड द्बद्भ /;द्मह्व ठ्ठह्यह्वद्म द्दद्मह्यफ्द्म्न ह्॥द्मद्ध ॥द्मद्मस्द्धह्स्र द्बभ्फ्द्धह् द्गह्वह्न"; ह्लद्मद्धह् स्रह्य द्धब्, द्यद्दद्म;स्र द्धद्य) द्दद्मह्य द्यस्रह्द्ध द्दस््न

शद्म;ह्नद्ग.रुब् द्गह्यड्ड द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् द्बभ्ठ्ठख्"द्म.द्म स्रद्ध द्दद्ध ह्द्भद्द क्द्मठ्ठह्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड] द्धश्चह्ह्व द्गह्यड्ड श्चद्धद्भ= द्गह्यड्ड] ?द्मह्नद्यद्म द्दह्नक्द्म द्बभ्ठ्ठख्"द्म.द्म ॥द्मद्ध स्रद्ग द्दद्मद्धह्वस्रद्मद्भस्र ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न द्धश"द्मद्मष्ठह्ह्द्म 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्म ह्वद्म'द्म स्रद्भह्द्ध द्दस््न ठ्ठह्न"कह्द्म ,शड्ड ॥द्मभ्"कह्द्म स्रह्य क्तब्:द्ब:द्ब ह्र;द्धष्ठह् ह्स्नद्मद्म द्यद्गद्मह्ल स्रद्म र्द्यशंह्वद्म'द्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्धब्, द्यह्नद्धश/द्मद्म द्यश्वश/र्द्मंह्व स्रह्य द्धब्, द्दद्गद्मद्भह्य द्बभ्;क्रह्व श्चब्ह्यड्ड द्बद्भ ;द्द ह्व ॥द्मह्नब्द्म द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म; द्धस्र ष्<+ह्द्ध द्दह्नर्ड्ढं द्धह्व"स्रक्व"कह्द्म स्रद्मह्य द्भद्मह्यस्रह्य द्धष्ह्वद्म ष्<+द्म द्दह्नक्द्म शस्॥द्मश क्द्मक्रद्ग?द्मद्मह् स्रह्य द्धब्, द्दद्ध द्बभ्;ह्नष्ठह् द्दद्मह्यफ्द्म्न द्वद्य द्भद्मह्यस्र स्नद्मद्मद्ग स्रद्मह्य द्बभ्फ्द्धह् स्रह्य द्यद्गह्ह्नंघ; द्दद्ध द्गद्दक्रश द्धद्गब्ह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न


आत्महीनता की महाव्याधि और उससे छुटकारा

स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र द्दद्मस्नद्मद्ध स्रद्मह्य क्; द्बभ्द्म.द्मद्ध रुद्धब्&रुद्मस्ब् द्गह्यड्ड द्वह्व स्रह्य शद्मरुह्द्धशस्र क्द्मस्रद्मद्भ&द्बभ्स्रद्मद्भ द्यह्य स्रद्दद्धड्ड ष्रु+ह्य द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न द्वद्यस्रद्ध क्द्मँ[द्म स्रद्ध ष्ह्वद्मशंक ,ह्यद्यद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस् द्धस्र शद्द क्; द्बभ्द्मद्ध.द्म;द्मह्यड्ड स्रद्म क्द्मस्रद्मद्भ स्रर्ड्ढं फ्ह्नह्वद्म ष् क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ॥द्मद्मशह्वद्म द्यह्य फ्भ्रुह् ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्म रुश॥द्मद्मश ठ्ठष्टष्ख्द्बह्व स्रद्म ष्ह्व ह्लद्मह्द्म द्दस््न शह्य द्यद्दद्ध क्द्मस्द्भ द्वद्धश्चह् द्यद्मद्गद्म; ष्द्मह् ॥द्मद्ध द्धस्रद्यद्ध द्यह्य ह्वद्दद्धड्ड स्रद्द द्बद्मह्ह्य्न द्गह्नँद्द [द्मद्मह्यब्ह्वह्य द्गह्यड्ड द्वद्दह्यड्ड रुद्भ ब्फ्ह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्दह्यड्ड रुद्भ ब्फ्द्म द्भद्दह्द्म द्दस् द्धस्र द्धह्लद्यद्यह्य ह्लद्मह्य स्रह्नहृ शद्द स्रद्दह्वह्य ह्लद्म द्भद्दह्य द्दस्ड्ड] शद्द द्बह्द्म ह्वद्दद्धड्ड ष्ठ;द्म द्यद्ग> ष्स्क्चह्य] :"क ह्व द्दद्मह्य ह्लद्म, स्रद्दद्धड्ड द्ध>रु+स्र ह्व ठ्ठह्य्न शरुह्ह्नह्त्न ;द्धठ्ठ ,ह्यद्यद्म द्दद्मह्य ॥द्मद्ध ह्लद्मह्द्म द्दस् ह्द्मह्य द्यद्मद्गद्म;ह्त्न स्रद्मह्यर्ड्ढं ष्रु+द्ध द्दद्मद्धह्व ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यह्द्ध द्बद्भ क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ह्र;द्मद्ध/द्म द्यह्य फ्भ्रुह् ह्र;द्धष्ठह् ड्ढद्य द्यद्धद्गद्म ह्स्र रुद्भह्य ठ्ठष्ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड द्धस्र ॥द्मब्ह्य द्दद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं द्दद्मद्धह्व द्दद्मह्य ह्लद्म, शह्य द्धस्रद्यद्ध ॥द्मद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड क्द्बह्वद्ध ष्द्मह् स्रद्मह्य द्यद्भब् द्यद्ध/द्मह्य स्रद्भ क्द्बभ्क्र;द्मद्ध'द्मह्] क्रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र] द्दद्मद्धह्वस्रद्मद्भस्र ह्र;शद्दद्मद्भ स्रद्भ ष्स्क्चह्य्न ;द्द द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्वह्न"; स्रद्मह्यह्य द्धह्वद्ध'श्चह् द्दद्ध ठ्ठ;ह्वद्ध; द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड रुद्मब् ठ्ठह्यह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ड्ढद्यस्रह्य द्धब्, स्रह्यद्मर्ड्ढं क्; स्रद्मद्भ.द्म ठ्ठद्मह्य"द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्दस्] ह्र;द्धष्ठह् स्रद्म क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म फ्भ्रुह् रुश॥द्मद्मश रुश;ड्ड द्दद्ध ठ्ठद्मह्य"द्मद्ध द्दस््न

द्धशश्चद्मद्भ.द्मद्ध; द्दस् द्धस्र ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ;द्द ॥द्मद्मशह्वद्म ष्ठ;द्मह्यड्ड द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्गह्वत्न'द्मद्मरु=द्ध द्वद्यस्रह्य स्रर्ड्ढं स्रद्मद्भ.द्म ष्ह्द्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न द्वह्वस्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ ष्श्चद्बह्व द्गह्यड्ड क्द्मश';स्र रुह्वह्यद्द द्यश्वद्गद्मह्व ह्व द्धद्गब् द्बद्मह्वद्म] द्गद्मह्द्म&द्धद्बह्द्म ;द्म क्द्ध॥द्म॥द्मद्मशस्रद्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्मह्यद्भ द्यह्य द्वद्बह्यम्द्मद्म द्धद्गब्ह्वद्म] द्वद्बद्दद्मद्य स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म ष्ह्वह्ह्य द्भद्दह्वद्म ;द्म क्॥द्मद्मश फ्भ्रुह् द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्यद्ग; फ्ह्नह्लद्मद्भह्ह्य द्भद्दह्वद्म क्द्मद्धठ्ठ ,ह्यद्यह्य स्रद्मद्भ.द्म द्दस्ड्ड ह्लद्मह्य ष्श्चद्बह्व द्गह्यड्ड ,ह्यद्यद्ध द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मँ द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड द्धह्लह्वस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ष्क्कश्चह्य ष्रु+ह्य द्दद्मह्यस्रद्भ ॥द्मद्ध क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध द्गद्दद्मह्र;द्मद्ध/द्म स्रह्य द्ध'द्मस्रद्मद्भ ष्ह्वह्ह्य द्दस्ड्ड्न ष्द्धद्गद्मद्भ] क्द्बड्डफ् क्द्मस्द्भ द्गठ्ठष्ह्नद्ध)] स्रद्गह्लद्मह्यद्भ] ष्क्कश्चह्य ॥द्मद्ध ष्द्मद्भ&ष्द्मद्भ रुद्मँक रुद्बंक द्यह्नह्वह्ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्तब्ह्त्न द्वह्वस्रद्म द्गह्व ;द्द द्गद्मह्व ष्स्क्चह्द्म द्दस् द्धस्र द्वह्वस्रद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म फ्ड्ढ फ्ह्नह्लद्भद्ध द्दद्ध द्दस्] ॥द्मद्मंग; द्दद्ध स्रह्नहृ ,ह्यद्यद्म द्दस््न द्धद्बहृरु+द्ध द्यद्ग>द्ध ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध ह्लद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रह्य रु=द्ध द्बह्नप्त"द्म क्द्मद्गह्द्मस्द्भ द्बद्भ क्द्बह्वह्य स्रद्मह्य ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध ह्ह्नब्ह्वद्म द्गह्यड्ड ?द्मद्धंक;द्म क्ह्वह्न॥द्मश स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ क्द्बह्वह्य द्यद्मह्यश्चह्वह्य द्धशश्चद्मद्भह्वह्य स्रद्म ,ह्यद्यद्ध ष्द्मह् ह्वद्दद्धड्ड द्दस् द्धस्र क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ;द्द ह्र;द्मद्ध/द्म स्रह्यशब् द्धद्बहृरु+ह्य क्द्मस्द्भ ष्श्चद्बह्व द्गह्यड्ड द्वद्बह्यद्धम्द्मह् द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्दद्ध द्बद्मर्ड्ढं ह्लद्मह्द्ध द्दस््न द्य॥; क्द्मस्द्भ द्ध'द्मद्धम्द्मह् स्रद्दह्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्ह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ड्ढद्य ह्र;द्मद्ध/द्म स्रह्य ब्म्द्म.द्म :द्ब ठ्ठष्टष्ह्नद्बह्व स्रद्ध द्बभ्शक्वद्धह् द्बद्मर्ड्ढं ह्लद्मह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ शह्य क्द्बह्वह्य ड्ढद्य रुश॥द्मद्मश स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म रुश;ड्ड स्रद्मह्य द्दह्य; द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड रुद्मब् ब्ह्यह्ह्य द्दह्यड्ड्न ,ह्यद्यह्य ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्दह्ल द्दद्ध द्बद्दश्चद्मह्वद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध फ्भ्द्धस्नद्म क्स्रद्मद्भ.द्म द्दद्ध द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य क्द्मब्द्यद्ध] क्द्यड्डह्ह्न"क ठ्ठष्टष्ख्] श्चद्मद्बब्ख्द्य ह्स्नद्मद्म ष्द्मह्&ष्द्मह् द्बद्भ द्ध[द्मह्व क्द्मस्द्भ म्द्मह्नष्ट/द्म द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य रुश॥द्मद्मश स्रद्म ष्ह्वद्म ठ्ठह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यद्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ॥द्मद्ध ष्ह्यफ्द्मद्भ ब्ह्य द्यस्रह्द्म द्दस्] क्चफ् द्यस्रह्द्म द्दस््न द्गह्व द्गह्यड्ड शस्द्यद्म ह्व स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ष्द्मह् द्भद्दह्ह्य द्दह्न, ॥द्मद्ध ड्ढस्रद्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्धद्दश्वद्गह् ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यह्द्ध ह्द्मह्य द्यद्मद्गह्वह्य शद्मब्ह्य स्रद्म क्द्मफ्भ्द्द कद्मब्ह्ह्य ह्वद्दद्धड्ड ष्ह्वह्द्म द्दस््न

ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य ठ्ठष्टष्ख्द्बह्व स्रह्य क्द्धह्द्धद्भष्ठह् क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध द्धशस्रक्वद्धह् द्व)ह् ष्ह्वस्रद्भ ॥द्मद्ध द्व॥द्मद्भह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ शद्द ,ह्यद्यह्य स्रक्वक्र; स्रद्भह्वह्य स्रद्मह्य द्वस्रद्यद्मह्द्ध द्दस्] द्धह्लद्यद्यह्य द्धस्र ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म /;द्मह्व क्द्बह्वद्ध क्द्मह्यद्भ क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्य] द्धशद्ध/द्मशह्− क्द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म ष्ह्वह्वह्य स्रह्य द्धब्, ह्द्मह्य क्द्मश';स्र द्दस् द्धस्र ह्र;द्धष्ठह्क्रश स्रद्म द्यद्गफ्भ् द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्धस्र;द्म ह्लद्म; क्द्मस्द्भ द्वद्यह्य क्द्मक्रद्गद्धश'शद्मद्य द्यह्य द्यश्वद्बह्व ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म,्न स्रद्दह्वद्म ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यफ्द्म द्धस्र ह्र;द्धष्ठह्क्रश स्रद्म द्यद्गफ्भ् द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, क्द्मठ्ठ'र्द्मंशद्मठ्ठद्ध फ्द्धह्द्धशद्ध/द्म;द्मँ क्द्बह्वद्मह्वह्य स्रद्म द्यद्मद्दद्य ह्लह्नंकद्मह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस् ह्स्नद्मद्म द्वद्य द्गद्मफ् द्बद्भ श्चब्ह्ह्य द्दह्न, छ्वह्य"क्च द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्बभ्द्धह्म्द्मद्म स्रद्भ द्यस्रह्य] ड्ढद्य रुह्द्भ स्रद्म /द्मर्स्; ह्लह्नंकद्मह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न क्द्मक्रद्गद्धश'शद्मद्य द्यह्य द्भद्धद्दह्] क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ह्र;द्मद्ध/द्म द्यह्य फ्भ्रुह् ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ,ह्यद्यद्म द्यद्मद्दद्य क्द्मस्द्भ /द्मर्स्; ह्लह्नंकद्मह्वह्य स्रद्ध द्यद्मद्गर्स्न; स्रद्दद्मँ द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्यद्मह्य शद्द द्व)ह् क्द्मश्चद्भ.द्म स्रद्भस्रह्य द्दद्ध ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वद्ध क्द्मह्यद्भ क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्भद्धद्धह्&ह्वद्धद्धह् क्द्बह्वद्म ब्ह्यह्द्म द्दस््न ;द्मह्यड्ड ड्ढद्य ह्द्भद्द स्रद्ध फ्द्धह्द्धशद्ध/द्म;द्मँ क्द्बह्वद्मह्वह्य क्द्मस्द्भ क्द्बद्भद्म/द्म स्रद्भह्वह्य द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध द्धद्दश्वद्गह् स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्म द्बरु+ह्द्ध द्दस् द्यद्म ड्ढद्य द्भद्मरुह्ह्य द्यह्य ह्लंघठ्ठद्ध द्यक्तब्ह्द्म द्धद्गब्ह्ह्य ठ्ठह्य[द्मस्रद्भ द्दद्धह्वह्द्मफ्भ्रुह् ह्र;द्धष्ठह् ,ह्यद्यह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्मस्नद्म क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म द्दद्ध शद्द स्रद्मद्भ.द्म द्दस् ह्लद्मह्य रुश;ड्ड स्रद्मह्य द्वद्बह्यद्धम्द्मह् द्धह्द्भरुस्रक्वह् क्द्मस्द्भ द्द;ह्य रुह्द्भ स्रद्म क्द्म॥द्मद्मद्य ठ्ठह्यह्द्ध द्दस् द्यद्मस्नद्म द्दद्ध द्वद्य क्द्म॥द्मद्मद्य स्रद्मह्य क्द्ध/द्मस्र ष्ह्व क्चह्व स्रद्भ] द्यद्मह्ल&लद्मड्डक्वफ्द्मद्भ स्रह्य त्त्द्मद्भद्म ठ्ठख्द्यद्भह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म /;द्मह्व क्द्बह्वद्ध क्द्मह्यद्भ क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध .... स्रद्भह्द्ध द्दस् ह्द्मद्धस्र ष्द्दह्नह् द्यह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वद्ध क्द्मह्यद्भ क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् द्दह्नक्द्म ठ्ठह्य[द्मस्रद्भ द्दह्य; क्द्म॥द्मद्मद्य स्रद्ध ह्र;स्नद्मद्म द्बद्भ क्द्मस्र"र्द्मंस्र द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म द्गद्भद्दद्ग ब्फ्द्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्य्न क्द्ध/द्मस्र ष्ह्व क्चह्व स्रद्भ द्भद्दह्वह्य] द्यद्मह्ललद्मड्डक्वफ्द्मद्भ स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धह्वद्ध'श्चह् :द्ब द्यह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्ड'द्म ,ह्यद्यह्य द्दद्ध द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड ह्लद्मह्य क्द्बह्वह्य क्द्मद्बस्रद्मह्य द्धह्द्भरुस्रक्वह्] द्वद्बह्यद्धम्द्मह् ,शड्ड द्दह्य; रुह्द्भ स्रद्म द्गद्मह्वह्ह्य द्दस्ड्डड्ड्न ॥द्मब्ह्य द्दद्ध शह्य क्द्बह्वह्य ष्द्मद्भह्य द्गह्यड्ड ष्ख्क्चह्य ष्रु+ढ्ढद्बह्व स्रद्ध हृद्मद्ब हृद्मह्यरु+ह्वह्य स्रह्य द्धब्, क्द्मद्गठ्ठह्वद्ध द्यह्य क्द्ध/द्मस्र [द्मर्श्चं ॥द्मद्ध द्वद्दह्यड्ड स्रद्भह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गह्त्न ट्ठ.द्मद्मह्यड्ड ष्ह्वह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस् क्स्नद्मशद्म क्द्मद्धस्नर्द्मंस्र ह्ड्डफ्द्ध स्रद्म द्यद्मद्गह्वद्म स्रद्भह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न

;द्द ह्द्मह्य द्दह्नर्ड्ढं क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ॥द्मद्मशह्वद्म स्रद्मह्य ठ्ठष्द्मह्वह्य] द्बभ्द्मह्य- द्दद्मक्तह्वंक स्रद्म स्रद्दह्वद्म द्दस् द्धस्र 25 श"र्द्मं स्रद्ध क्द्म;ह्न ह्स्र स्रह्य ;ह्नशस्र ;ह्नशद्धह्;द्मँ द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र क्द्मक्रद्गद्दक्र;द्म स्रद्म द्बभ्;क्रह्व स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढद्यद्मह्य क्द्म;ह्न शफ् द्गह्यड्ड द्धरु=;द्मँ द्बह्नप्त"द्मद्मह्यड्ड द्यह्य ठ्ठह्नफ्ह्वद्ध द्यड्ड[;द्म द्गड्डह्य क्द्मक्रद्गद्दक्र;द्म स्रद्भह्द्ध द्दस्ड्ड्न 25 श"र्द्मं स्रद्ध क्द्म;ह्न द्यह्य टद्बद्भ क्द्मस्द्भ 50 श"र्द्मं ह्स्र स्रद्ध क्द्म;ह्न शद्मब्ह्य रु=द्ध द्बह्नप्त"द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ;द्द क्ह्वह्नद्बद्मह् ब्फ्॥द्मफ् ष्द्भद्मष्द्भ द्दस्ड्ड्न द्बभ्द्मह्य- द्दद्मक्तह्वंक क्द्मस्द्भ द्वह्वस्रह्य द्यद्द;द्मह्यद्धफ्;द्मह्यड्ड ह्वह्य ठ्ठह्य[द्मद्म द्धस्र ह्लद्मह्य ब्द्मह्यफ् क्द्मक्रद्गद्दक्र;द्म स्रद्भह्ह्य द्दस् द्वह्वद्गह्यड्ड द्यह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्ड'द्म द्धस्रद्यद्ध ह्व द्धस्रद्यद्ध ह्व'द्मद्धब्ह्य द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं स्रद्म द्यह्यशह्व स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्य द्दस्ड्ड्न क्द्मक्रद्ग द्दह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र क्द्मस्द्भ द्यद्मद्गद्मद्धह्लस्र द्बद्धद्भशह्य'द्म स्रद्म क्/;;ह्व स्रद्भह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ द्बद्म;द्म फ्;द्म द्धस्र ड्ढह्व द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्मक्रद्गद्दक्र;द्म स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य ब्द्मह्यफ् क्द्बह्वह्य क्द्मद्बस्रद्मह्य ,स्रद्मड्डस्रद्ध द्वद्बह्यद्धम्द्मह् क्द्मस्द्भ क्स्रह्यब्द्म क्ह्वह्न॥द्मश स्रद्भह्ह्य स्नद्मह्य क्द्मस्द्भ द्वद्दद्धड्ड द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ,ह्यद्यह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्मह्यद्भ क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्ह्य स्नद्मह्य] ह्लद्मह्य द्धस्रद्यद्ध ह्व द्धस्रद्यद्ध द्गद्मठ्ठस्र द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं स्रद्म द्यह्यशह्व स्रद्भह्ह्य स्नद्मह्य्न

क्द्गह्यद्धद्भस्रद्ध क्द्मस्द्भ द्धष्भ्द्धंक'द्म शस्य़द्मद्धह्वस्र द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् :द्ब द्यह्य क्द्बह्वह्य ,स्र 'द्मद्मह्य/द्म र्द्यशंह्यम्द्म.द्म द्गह्यड्ड ड्ढद्य द्धह्व"स्र"र्द्मं द्बद्भ द्बद्दह्नँश्चह्य द्दस्ड्ड द्धस्र द्गद्मठ्ठस्र ठ्ठभ्ह्र;द्मह्यड्ड स्रद्म क्द्मठ्ठद्ध ह्र;द्धष्ठह् 'द्मद्ध?द्मभ् द्दद्ध क्द्बह्वह्य द्यश्वद्बर्स्रं द्गह्यड्ड क्द्मह्वह्य शद्मब्ह्य ह्व;ह्य ह्र;द्धष्ठह् स्रद्मह्य क्द्बह्वह्य ह्लस्द्यद्म द्दद्ध ष्ह्वद्म ब्ह्यह्द्म द्दस््न द्गह्लह्य स्रद्ध ष्द्मह् ह्द्मह्य ;द्द द्दस् द्धस्र रुश;ड्ड स्रद्मह्य ,स्रद्मड्डस्रद्ध] द्वद्बह्यद्धम्द्मह् क्द्मस्द्भ क्स्रह्यब्द्म क्ह्वह्न॥द्मश स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य ह्र;द्धष्ठह् द्दद्ध ,ह्यद्यह्य ह्व'द्मह्यष्द्मह्ल स्रद्ध क्द्मह्यद्भ ह्लंघठ्ठद्ध क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् ह्स्नद्मद्म द्वद्य द्बद्धद्भशह्य'द्म द्गह्यड्ड क्द्बह्वह्य स्रद्मह्य द्यह्नद्भद्धम्द्मह् क्ह्वह्न॥द्मश स्रद्भह्वह्य ब्फ्ह्द्म क्स्नद्मशद्म क्द्मक्रद्ग द्धशरुद्गद्भ.द्म स्रह्य फ्द्दह्व क्/द्मस्रद्मद्भ द्गह्यड्ड रुख्ष् ह्लद्मह्द्म द्दस््न ;द्द ॥द्मद्ध ठ्ठह्य[द्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र द्गद्मठ्ठस्र द्बठ्ठद्मस्नद्मद्मर्ह्यंड्ड स्रद्ध क्द्मह्यद्भ द्बभ्द्म;त्न ,ह्यद्यह्य ;ह्नशस्र ;ह्नशद्धह्;द्मँ द्दद्ध क्द्ध/द्मस्र क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड] द्धह्लद्दह्यड्ड द्गद्मह्द्म&द्धद्बह्द्म द्यह्य ॥द्मद्भद्बख्द्भ रुह्वह्यद्द ह्वद्दद्ध द्धद्गब्द्म द्दस् क्स्नद्मशद्म ह्लद्मह्य द्बभ्द्म;त्न द्वद्बह्यद्धम्द्मह् द्भद्दह्य द्दस्ड्ड्न ष्श्चद्बह्व द्गह्यड्ड ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्वद्बह्यद्धम्द्मह् द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धश्चह्द्मह्लह्वस्र :द्ब द्यह्य क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ॥द्मद्मशह्वद्म द्बद्मर्ड्ढं ह्लद्मह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ द्बभ्द्म;त्न ;द्दद्ध ब्द्मह्यफ् ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड द्बस्नद्म॥द्मभ्"क द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न

क्द्बह्वह्य द्यशर्ह्यंम्द्म.द्म द्यह्य द्बभ्द्मढ्ढह् द्धह्व"स्र"द्मद्मह्यर्ड्डंड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्बभ्द्मह्य- द्दद्मक्तह्वंक ह्वह्य द्बभ्द्धह्द्बद्मद्धठ्ठह् द्धस्र;द्म द्दस् द्धस्र द्धह्लह्ह्वह्य ब्द्मह्यफ् ठ्ठद्धद्भठ्ठभ्ह्द्म] ष्ह्यस्रद्मद्भद्ध] द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र स्रब्द्द] क्द्यक्तब् द्बभ्ह्यद्ग] द्धह्वद्भद्म'द्मद्म] द्दह्द्म'द्मद्म क्द्मस्द्भ क्द्यद्म/; ष्द्धद्गद्मद्भद्ध क्द्मद्धठ्ठ स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड द्यह्य क्द्मक्रद्ग?द्मद्मह् स्रद्भह्ह्य द्वद्यद्यह्य ॥द्मद्ध क्द्ध/द्मस्र क्द्मक्रद्ग?द्मद्मह् शह्य ब्द्मह्यफ् स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड ह्लद्मह्य क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध द्गद्दद्मह्र;द्मद्ध/द्म द्यह्य फ्भ्रुह् द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न ;द्दद्ध शद्द स्रद्मद्भ.द्म द्दस् द्धह्लद्यस्रद्ध द्बभ्द्धह्द्धय;द्म द्गद्मह्वद्धद्यस्र क्द्यह्ह्नब्ह्व स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्बद्धद्भब्द्धम्द्मह् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ब्द्मह्यफ् हृद्मह्यंकद्ध&हृद्मह्यंकद्ध स्रद्धक्चह्वद्मड्ढ;द्मह्यड्ड ;द्म क्द्यक्तब्ह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ष्द्दह्नह् ष् द्गह्वत्न'द्मद्मद्धरु=;द्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ॥द्मद्मशह्वद्म क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध ह्व ह्लद्मह्वह्य द्धस्रह्ह्वह्य द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध] क्द्मद्ध/द्म ह्र;द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्लह्वह्वद्ध द्दस््न क्ह्त्न द्वद्यद्यह्य हृह्नंकस्रद्मद्भद्म द्बद्मह्वद्म द्दद्ध छ्वह्य;रुस्रद्भ द्दस््न द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ष्ह्वह्य स्रद्म रुश॥द्मद्मश द्दद्ध क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म स्रद्ध ह्र;द्मद्ध/द्म स्रद्म द्बभ्द्गह्न[द्म ब्म्द्म.द्म द्दस््न ड्ढद्य ह्र;द्मद्ध/द्म स्रद्मह्य ह्लरु+द्गख्ब् द्यह्य द्धद्गंकद्मह्वह्य स्रद्म द्वद्बश्चद्मद्भ द्यह्न>द्मह्ह्य द्दह्न, द्गह्वत्न'द्मद्मरु=द्ध स्रद्दह्ह्य द्दह्यड्ड द्धस्र द्बभ्क्र;ह्यस्र ह्र;द्धष्ठह् स्रद्मह्य द्वद्धश्चह् क्द्मस्द्भ क्ह्वह्नद्धश्चह् स्रद्म क्ह्द्भ स्रद्भह्वद्म क्द्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न ,ह्यद्यह्य ब्द्मह्यफ् क्द्बह्वह्य क्द्मद्ब द्गह्यड्ड ड्ढह्ह्वद्म द्यद्मद्दद्य द्यँह्लद्म,ह्य द्धस्र ह्लद्मह्य द्यद्दद्ध द्दस् द्वद्यद्ध स्रद्मह्य क्द्बह्वद्म;ह्यड्ड क्द्मस्द्भ ह्लद्मह्य फ्ब्ह् द्दस् द्वद्यद्यह्य रुद्ब"क ड्ढह्वस्रद्मद्भ स्रद्भ द्यस्रह्यड्ड्न द्यद्दद्गह् द्दद्मह्यह्वद्म क्द्मस्द्भ द्दद्मँ स्रद्दह्वद्म क्क्कहृद्ध ष्द्मह् द्दस् द्बद्भ शद्द ड्ढह्ह्वद्ध क्क्कहृद्ध ष्द्मह् ह्वद्दद्धड्ड द्दस् द्धस्र ;द्धठ्ठ स्रद्मह्यर्ड्ढं ष्द्मह् क्ह्वह्नद्धश्चह् ब्फ् द्भद्दद्ध द्दस् क्द्मस्द्भ क्ह्वह्नद्धश्चह् ब्फ्ह्वह्य स्रह्य द्ब;र्द्मंढ्ढह् स्रद्मद्भ.द्म द्दस् ह्द्मह्य ॥द्मद्ध द्दद्मँ द्धस्र;द्म द्दद्ध ह्लद्म; क्द्मस्द्भ द्यद्दद्गह् द्दह्नक्द्म द्दद्ध ह्लद्म;्न रुद्ब"क :द्ब द्यह्य] द्धह्वरुद्यड्डस्रद्मह्यश्च ॥द्मद्मश द्यह्य क्रुशद्धस्रद्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्धद्दश्वद्गह् ॥द्मद्ध द्भ[द्मह्वद्ध श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्दद्भ द्यद्दद्ध फ्ब्ह् ष्द्मह् द्गह्यड्ड द्दद्मँ&द्दद्मँ स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्वह्य द्यह्य ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्गह्यड्ड क्द्बह्वह्य ह्र;द्धष्ठह्क्रश स्रद्म शह्लह्व ?द्मंक ह्लद्मह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ क्द्मक्रद्गफ्द्मस्द्भश स्रद्मह्य क्चह्यद्य द्बद्दह्नँश्चह्द्ध द्दस् शद्द ह्द्मह्य क्ब्फ् द्दद्ध्न

द्धशस्रद्धद्यह् क्द्मस्द्भ द्बद्धद्भ"स्रक्वह् ह्र;द्धष्ठह्क्रश स्रद्म क्स्नर्द्मं द्दस् क्द्बह्वद्ध द्गद्म;ह्द्म स्रद्मह्य रुद्ब"क द्धस्रह्ह्न ह्वद्गभ् क्द्मस्द्भ द्यह्ह्नद्धब्ह् 'द्मष्टठ्ठद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्र;ष्ठह् स्रद्भ द्बद्मह्वद्म्न ह्लद्मह्य ,ह्यद्यद्म ह्वद्दद्धड्ड स्रद्भ द्बद्मह्ह्य शद्द क्द्बह्वद्म द्गख्घ; क्द्मद्ब द्दद्ध द्धफ्द्भद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न

क्द्बह्वह्य ष्द्मद्भह्य द्गह्यड्ड ;द्द स्र॥द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्यद्मह्यश्चह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्गस्ड्ड स्रह्नहृ ह्वद्दद्धड्ड द्दख् ष्द्धंघस्र ;द्द द्गद्मह्वह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्गस्ड्ड ॥द्मद्ध ड्ढद्य द्यड्डद्यद्मद्भ स्रद्म ,स्र द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं ?द्मंकस्र द्दख् द्बद्भद्गद्मक्रद्गद्म स्रह्य ड्ढद्य द्वद्बशह्व स्रद्म ,स्र द्यह्नठ्ठद्भ क्द्मस्द्भ द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध क्द्मश';स्र क्तख्ब् द्दँख् द्धह्लद्यह्य क्द्यद्ग; स्रह्नश्वद्दब्द्मह्वह्य स्रद्म स्रद्मह्यर्ड्ढं स्रद्मद्भ.द्म ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्बभ्द्धह् क्द्मस्द्भ क्द्बह्वह्य द्बभ्द्धह् ह्द्मह्य द्धश'द्मह्य"द्म :द्ब द्यह्य क्द्बह्वह्य द्धशश्चद्मद्भद्मह्यड्ड द्गद्म;ह्द्मक्द्मह्यड्ड ,शड्ड ॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म द्गख्घ; द्दस््न द्धश'श ॥द्मद्भ द्गह्यड्ड द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् क्द्यद्धद्ग ष्ह्नद्ध) श्चह्यह्ह्वद्म क्द्मस्द्भ द्बभ्श्च.रु 'द्मद्धष्ठह् द्यद्मद्गर्स्न; स्रद्म द्वद्ब;ह्नष्ठह् ह्स्नद्मद्म क्द्मश';स्र क्ड्ड'द्म द्बभ्क्र;ह्यस्र द्बभ्द्म.द्मद्ध द्गह्यड्ड] द्बभ्क्र;ह्यस्र ह्र;द्धष्ठह् द्गह्यड्ड द्धशस्त्रद्गद्मह्व द्दस््न क्द्बह्वह्य ॥द्मद्धह्द्भ द्धह्वद्धद्दह् ड्ढद्य 'द्मद्धष्ठह् क्द्मस्द्भ द्यद्मद्गर्स्न; स्रद्मह्य द्बद्दश्चद्मह्वह्वह्य स्रद्ध द्यद्मद्गर्स्न; द्बभ्क्र;ह्यस्र ह्र;द्धष्ठह् द्गह्यड्ड द्दद्मह्यह्वद्ध श्चद्मद्धद्द, क्द्मस्द्भ ह्वद्दद्धड्ड द्दस् ह्द्मह्य द्वद्यस्रद्म द्धशस्रद्मद्य स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न


पू. गुरुदेव से भेंट के लिए जुलाई अगस्त ही उपलब्ध गायत्री शक्तिपीठों और व्यक्तिगत परामर्श के लिये इन्हीं दिनों आये

;ह्नफ्द्मह्द्भद्ध; श्चह्यह्ह्वद्म ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्ख्क्तद्मह्वद्ध फ्द्धह् द्यह्य द्बभ्[द्मद्भ द्दद्मह्य द्भद्दद्ध द्दस्] ड्ढद्यस्रद्म द्बद्धद्भश्च; ठ्ठह्य'द्म ॥द्मद्भ द्गह्यड्ड फ्द्म;=द्ध 'द्मद्धष्ठह् द्बद्धक्चद्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रह्य द्बभ्द्धह् ह्ख्क्तद्मह्वद्ध द्वक्रद्यद्मद्द द्यह्य द्धद्गब्ह्द्म द्दस््न द्धद्बहृब्ह्य ष्द्यह् र्द्बशं स्रह्य क्शद्यद्भ द्बद्भ 24 फ्द्म;=द्ध 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्ध रुस्नद्मद्मद्बह्वद्म स्रद्म द्वठ्ठ−?द्मद्मह्य"द्म द्धस्र;द्म फ्;द्म स्नद्मद्म्न द्धब्;ह्य फ्;ह्य द्वद्य द्यरु−स्रंघद्ब द्गह्यड्ड ,स्र श"र्द्मं द्गह्यड्ड ठ्ठद्य फ्ह्नह्वद्ध शक्वद्ध) द्दह्नर्ड्ढं द्दस््न ठ्ठह्य'द्म ॥द्मद्भ द्गह्यड्ड द्धह्वद्गर्द्मं.द्मद्म/द्मद्धह्व ष्रु+ह्य 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्ध द्यड्ड[;द्म 240 द्यह्य ॥द्मद्ध क्द्ध/द्मस्र द्दद्मह्य फ्ड्ढ द्दस््न ह्लद्दद्मँ ॥द्मद्ध द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रर्द्म; द्बख्द्भह्य द्दद्मह्य फ्;ह्य द्दस्ड्ड द्वह्व द्बभ्द्मह्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व द्बभ्शद्मद्य द्गह्यड्ड ठ्ठद्मह्य द्गद्मद्द स्रह्य द्धब्, फ्;ह्य द्दह्न, द्दस्ड्ड्न ;ह्य द्बभ्द्मह् द्दस्ड्ड&फ्ह्नह्लद्भद्मह्] द्ग/;द्बभ्ठ्ठह्य'द्म] द्धष्द्दद्मद्भ] द्वरु+द्धद्यद्म] द्वनद्मद्भद्बभ्ठ्ठह्य'द्म] द्भद्मह्लरुस्नद्मद्मह्व क्द्मस्द्भ द्दद्धद्भ;द्म.द्मद्म्न ड्ढह्व द्बभ्द्मह्द्मह्यड्ड स्रह्य ह्स्;द्मद्भ 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्म द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व स्रद्भह्ह्य द्दह्न, ह्स्नद्मद्म द्धह्लद्यस्रद्ध ह्स्;द्मद्भद्ध श्चब् द्भद्दद्ध द्दस् द्वह्वस्रह्य द्वठ्ठ−ष्द्मह्य/द्मह्व स्रद्भह्ह्य द्दह्न, शह्य 15 ह्लख्ह्व ह्स्र शद्मद्धद्बद्य 'द्मद्मद्धह् स्रह्नह्ल द्बद्दह्नँश्च ह्लद्म;ह्यड्डफ्ह्य्न फ्द्म;=द्ध ह्द्बद्मह्य॥द्मख्द्धद्ग द्गस्नद्मह्नद्भद्म स्रह्य द्यड्डश्चद्मब्स्र द्बड्ड- ब्द्धब्द्मद्बद्धह् 'द्मद्गर्द्मं ह्स्नद्मद्म द्धद्ग'द्मह्व स्रह्य क्; द्बभ्द्गह्न[द्म स्रर्द्म;स्रह्द्म ॥द्मद्ध द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश स्रह्य द्यद्मस्नद्म द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व द्बभ्शद्मद्य द्बद्भ फ्;ह्य द्दह्न, द्दस्ड्ड्न

द्यद्धद्धद्गह् द्यद्म/द्मह्वद्मह्यड्ड शद्मब्द्ध 'द्मद्म[द्मद्मक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड हृद्मह्यंकह्य द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रह्य द्बभ्द्धह् क्द्मस्द्भ ह्द्धशभ् फ्द्धह् द्यह्य द्बभ्;द्मद्य श्चब् द्बरु+द्म द्दस््न द्बभ्ष्ब् ड्ढक्कहृद्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दह्न, ॥द्मद्ध द्यद्म/द्मह्व ,शड्ड द्यह्नद्धश/द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्॥द्मद्मश द्गह्यड्ड हृद्मह्यंकद्ध 'द्मद्म[द्मद्म, ड्ढह्व द्यड्डरुस्नद्मद्मह्वद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्वद्दद्धड्ड ष्ह्वद्म द्बद्म द्भद्दद्ध स्नद्मद्धड्ड्न ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड द्गँद्दफ्द्मर्ड्ढं क्क्र;द्ध/द्मस्र ष् हृद्मह्यंकह्य द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्बद्भ द्दद्ध ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड क्द्ध/द्मस्र /;द्मह्व द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म द्भद्दद्म द्दस््न ड्ढद्दह्यड्ड द्यद्भब्ह्द्म द्यह्य हृद्मह्यंकह्य ठ्ठह्यद्दद्मह्लद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न द्बद्मँश्च&द्बद्मँश्च द्गद्धब् स्रह्य म्द्मह्य= ,शड्ड द्बभ्द्म;त्न ठ्ठद्य फ्द्मँशद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यक्वह्लह्वद्मक्रद्गस्र द्यक्रद्बभ्शक्वद्धह्;द्मँ श्चब्द्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्बभ्क्र;स्र द्बभ्य़द्मद्बद्धक्च स्रद्मह्य स्रह्यठ्ठभ् द्धष्ठ्ठह्न ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य] ड्ढद्गद्मद्भह्द्मह्यड्ड स्रह्य स्रर्ड्ढं ह्वस्र'द्मह्य स्रर्ड्ढं द्धरुह्लद्मड्ढह्वद्भद्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ ष्ह्वह्ह्य ,शड्ड द्यद्ग;&द्यद्ग; द्बद्भ हृद्बह्ह्य द्भद्दह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्यह्य द्यष्द्यह्य द्यरुह्द्म] द्यद्भब् ,शड्ड द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध ह्व;द्म द्धरुह्लद्मड्ढह्व ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्दस््न ड्ढद्गद्मद्भह् स्रह्य ष्द्धश्च द्गह्यड्ड 16 म 24 स्रद्म ,स्र स्रद्गद्भद्म ष्ह्वह्य्न द्वद्यस्रह्य श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ क्द्मक्च&क्द्मक्च क्तह्नंक स्रद्म ष्द्भद्मद्गठ्ठद्म द्भद्दह्य्न ष्द्भद्मद्गठ्ठद्मह्यड्ड स्रह्य स्रद्मह्यह्वह्य द्बद्भ श्चद्मद्भ स्रद्मह्यक्चद्धद्भ;द्मँ ष्ह्वद्म;द्ध ह्लद्म;ह्यड्ड्न ड्ढद्गद्मद्भह् स्रद्ध हृह् द्यद्धद्गह्यंक स्रद्ध श्चद्मठ्ठद्भ द्बद्भ [द्मद्बद्भस्ब् स्रद्ध ॥द्मद्ध ष्ह्व द्यस्रह्द्ध द्दस््न द्दद्मब् स्रह्य श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ श्चद्मद्भ क्तह्नंक श्चद्मस्रु+द्ध श्चष्ख्ह्द्भद्ध ,शड्ड द्ग/; द्गह्यड्ड क्द्मस्त्र'द्मद्धष्ठह् फ्द्म;=द्ध स्रद्ध ,स्र द्बभ्द्धह्द्गद्म स्रद्म द्गद्धठ्ठद्भ ष्ह्वद्मह्वह्य द्गह्यड्ड द्बभ्;ह्नष्ठह् द्दद्मह्य द्यस्रह्द्ध द्दस््न ठ्ठस्द्धह्वस्र ;य़ क्द्मद्धठ्ठ स्रह्य द्धब्, ष्द्मद्दद्भ [द्मह्नब्ह्य द्गह्यड्ड] ष्द्भद्मद्गठ्ठह्य द्गह्यड्ड क्स्नद्मशद्म द्दद्मब् द्गह्यड्ड ह्र;शरुस्नद्मद्म ष्ह्वद्म;द्ध ह्लद्म द्यस्रह्द्ध द्दस््न द्धद्बहृब्ह्य ड्ढब्द्मस्रह्य] क्द्मद्धठ्ठशद्मद्यद्ध म्द्मह्य=द्मह्यड्ड] द्यरुह्द्ध द्यद्मद्गफ्भ्द्ध द्यह्य द्बद्मँश्च द्दह्लद्मद्भ ह्स्र द्गह्यड्ड ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ह्लद्मह्य स्रर्द्म; ष्रु+द्ध 'द्मद्धष्ठह् द्बद्धक्चह्यड्ड स्रद्भह्यड्डफ्द्ध] शद्दद्ध द्बभ्;द्मह्यह्लह्व ड्ढह्वस्रह्य त्त्द्मद्भद्म ॥द्मद्ध द्बख्द्भह्य द्दद्मह्य द्यस्रह्ह्य द्दस्ड्ड्न हृद्मह्यंकद्ध ब्द्मफ्ह् स्रह्य ड्ढह्व द्धह्वद्गर्द्मं.द्मद्मह्यड्ड स्रद्म ह्वद्मद्ग फ्द्म;=द्ध द्बभ्य़द्मद्बद्धक्च द्दद्मह्यफ्द्म्न

द्धह्वद्गर्द्मं.द्मद्म/द्मद्धह्व 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड ,शड्ड द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्ध द्यड्ड[;द्म ब्फ्॥द्मफ् ,स्र द्दह्लद्मद्भ द्दस््न ;ह्नफ् द्यद्ध/द्म स्रह्य द्बभ्स्नद्मद्ग श"र्द्मं द्गह्यड्ड द्बभ्;द्मद्य ;द्द द्दद्मह्यह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र ड्ढह्वस्रद्ध द्यड्ड[;द्म श्चद्मस्ष्द्धद्य द्यद्मस् द्दद्मह्य ह्लद्म;्न द्बभ्क्र;ह्यस्र स्रह्यठ्ठभ् स्रह्य द्यद्मस्नद्म ठ्ठद्य फ्द्मँश ह्लह्नरु+ ह्लद्म;ह्यड्ड ह्द्मह्य ;ह्नफ्द्मह्द्भद्ध; श्चह्यह्ह्वद्म स्रद्म द्धशरुह्द्मद्भ स्रद्म स्रर्द्म; श्चद्मस्ष्द्धद्य द्दह्लद्मद्भ फ्द्मँशद्मह्यड्ड द्यह्य द्बभ्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न

;ह्नफ् द्यद्ध/द्म स्रद्ध ष्ह्यब्द्म द्गह्यड्ड श्चब्ह्वह्य शद्मब्ह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड द्यक्रद्बभ्;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ,स्र ब्म्; द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रद्म ॥द्मद्ध द्दस््न ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड हृद्मह्यंकद्ध 'द्मद्धष्ठह् द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्बभ्द्मस्नद्मद्धद्गस्रह्द्म ठ्ठद्ध ह्लद्म द्भद्दद्ध द्दस््न ष्रु+द्ध ह्द्मह्य ष्द्मठ्ठ द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ष्ह्वह्द्ध द्भद्द द्यस्रह्द्ध द्दस््न द्यद्मह्यश्चद्म ;द्द फ्;द्म द्दस्&द्धस्र ह्लद्दद्मँ ह्लद्गद्धह्व ह्व द्धद्गब्ह्वह्य स्रद्ध द्यद्गरु;द्म द्दस् शद्दद्मँ द्बह्नद्भद्मह्वह्य स्रद्मद्ग श्चब्द्मट द्गस्रद्मह्व [द्मद्भद्धठ्ठ स्रद्भ द्वह्वद्गह्यड्ड स्नद्मद्मह्यरु+द्म द्बद्धद्भशह्ह्व स्रद्भस्रह्य द्यक्वह्लह्वद्मक्रद्गस्र द्बभ्शक्वद्धह्;द्मह्यड्ड स्रह्य द्धशरुह्द्मद्भ स्रद्म स्रर्द्म; ह्ह्नद्भह् क्द्मद्भश्व॥द्म द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ह्वस्द्धह्स्र] ष्द्मस्द्ध)स्र ,शड्ड द्यद्मद्गद्मद्धह्लस्र यद्मद्धह् स्रह्य द्धशरुह्क्वह् म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ह्स्नद्मद्म ह्र;द्धष्ठह् द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्बद्धद्भशद्मद्भ द्धह्वद्गर्द्मं.द्म ,शड्ड द्यद्गद्मह्ल द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रह्य द्धब्, ष्द्दह्नह् स्रह्नहृ द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म द्दस््न /शड्डद्य स्रद्ध द्धश॥द्मद्धद्ध"द्मस्रद्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य ह्लख्>ह्वह्य ,शड्ड द्वञ्जह्लशब् ॥द्मद्धश"; स्रद्ध द्यश्व॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्धय;द्मद्धशह् स्रद्भह्वह्य स्रद्म ;द्दद्ध क्शद्यद्भ द्दस््न द्धह्लद्यस्रद्म ,स्र म्द्म.द्म ॥द्मद्ध ष्ह्यस्रद्मद्भ ह्व"क ह्वद्दद्धड्ड द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म्न

क्द्मस्त्र 'द्मद्धष्ठह् फ्द्म;=द्ध ;ह्नफ्&'द्मद्धष्ठह् स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड क्शह्द्धद्भह् द्दद्मह्य द्भद्दद्ध द्दस्ड्ड्न ;द्दद्ध क्द्बह्वह्य द्यद्ग; स्रद्म द्बभ्य़द्मशह्द्मद्भ द्दस््न ड्ढद्य द्गद्दद्म'द्मद्धष्ठह् स्रद्मह्य /द्मद्मद्भ.द्म स्रद्भह्वद्म ,शड्ड द्बभ्;द्मह्यफ् द्गह्यड्ड ब्द्मह्वह्य स्रद्ध क्॥द्मद्ध"क द्वद्बब्ष्ट/द्म स्रद्भह्वद्म ह्वस्द्ध"क्चस्र द्यद्म/द्मह्वद्म त्त्द्मद्भद्म द्दद्ध द्यश्व॥द्मश द्दस््न ह्वशद्यक्वह्लह्व स्रह्य द्धब्, क्द्मश';स्र द्यद्मद्गर्स्न; द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य ह्लद्मफ्क्वह् क्द्मक्रद्गद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्वस्द्ध"क्चस्र द्वद्बद्मद्यस्र ष्ह्वह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न ड्ढद्यद्यह्य रुशद्मस्नर्द्मं क्द्मस्द्भ द्बद्भद्गद्मस्नर्द्मं स्रद्म&क्द्मक्रद्गस्रंघ;द्म.द्म क्द्मस्द्भ ब्द्मह्यस्र स्रंघ;द्म.द्म स्रद्म ठ्ठह्नद्दद्भद्म द्बभ्;द्मह्यह्लह्व द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न

द्यद्गरुह् ह्लद्मफ्क्वह् क्द्मक्रद्गद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ;ह्नफ् द्यद्ध/द्म स्रद्ध क्द्मद्भद्धश्व॥द्मस्र ष्ह्यब्द्म द्गह्यड्ड ह्वस्द्ध"क्चस्र द्वद्बद्मद्यस्र ष्ह्वह्वह्य क्द्मस्द्भ ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्म क्ह्वह्नद्भद्मह्य/द्म द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न द्यद्गद्धद्बशह्द्ध म्द्मह्य= द्गह्यड्ड स्रद्दद्मँ द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चह्यड्ड ष्ह्व द्यस्रह्द्ध द्दस् ड्ढद्यस्रद्म द्बह्द्म ब्फ्द्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस््न क्॥द्मद्ध द्यह्य ;द्धठ्ठ द्बभ्;द्मद्य श्चब् द्बरु+ह्य ह्द्मह्य फ्द्म;=द्ध ह्ल;ह्द्ध 23 ह्लख्ह्व क्स्नद्मशद्म फ्ह्नप्तद्बख्द्ध.र्द्मंद्गद्म 27 ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं स्रह्य द्बद्मशह्व द्बशद्मर्ह्यंड्ड ह्स्र ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड द्बभ्;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड स्रद्ध द्बख्द्धह् द्गह्यड्ड क्द्म'द्मद्मह्द्धह् द्यक्तब्ह्द्म द्धद्गब् द्यस्रह्द्ध द्दस््न

;ह्नफ् द्यद्ध/द्म द्गद्दद्मद्बह्नद्भ'श्चद्भ.द्म क्द्मफ्द्मद्गद्ध ष्द्धद्य ष्द्भद्यद्मह्यड्ड ह्स्र ,स्र ब्द्म[द्म ह्वस्द्ध"क्चस्र द्वद्बद्मद्यस्रद्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म श्चब्ह्द्म द्भद्द द्यस्रह्द्म द्दस््न ड्ढद्य /द्मद्गर्द्मंह्वह्न"क्चद्मह्व द्यह्य क्ठ्ठक्व'; शद्मह्द्मशद्भ.द्म स्रह्य द्बद्धद्भ'द्मद्मह्य/द्मह्व ,शड्ड ह्लह्व द्गद्मह्वद्य स्र द्बद्धद्भ"स्रद्मद्भ स्रह्य द्व॥द्म;&द्बम्द्मद्ध; द्बभ्;द्मह्यह्लह्व द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यह्वह्य द्गह्यड्ड द्यक्तब्ह्द्म द्धद्गब्ह्यफ्द्ध्न

द्वद्बद्भद्मह्यष्ठह् ब्म्; द्यह्व− 80 ह्स्र द्बख्द्भद्म स्रद्भह्वद्म द्दस््न द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश स्रह्य द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व द्बभ्शद्मद्य ॥द्मद्ध ड्ढद्यद्ध श"र्द्मं द्यद्गद्मढ्ढह् द्दद्मह्य ह्लद्म;ह्यड्डफ्ह्य्न ,ह्यद्यद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्बद्धद्भह्लह्वद्मह्यड्ड द्यह्य क्क्र;द्ध/द्मस्र ह्क्रद्बद्भह्द्म क्द्बह्वद्मह्वह्य स्रद्मह्य स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस््न ठ्ठह्य'द्म ॥द्मद्भ द्गह्यड्ड क्तस्ब्द्ध फ्द्म;=द्ध द्बद्धद्भशद्मद्भ 'द्मद्म[द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्, ड्ढद्दद्धड्ड द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्व;द्म द्यड्डद्धश/द्मद्मह्व ह्स्;द्मद्भ द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न द्वद्यस्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्य॥द्मद्ध द्यद्गस्नर्द्मं 'द्मद्म[द्मद्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य क्ह्वह्नद्भद्मह्य/द्म द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र शह्य क्द्बह्वद्म द्भद्धह्लरुंकऊह्य'द्मह्व द्यद्भस्रद्मद्भ द्यह्य ॥द्मद्ध स्रद्भद्म ब्ह्यड्ड द्धह्लद्यद्यह्य फ्द्म;=द्ध द्बद्धद्भशद्मद्भ कऊरुंक स्रह्य ह्क्रशद्म/द्मद्मह्व द्गह्यड्ड ष्ह्वह्य द्यद्गरुह् फ्द्म;=द्ध 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्यड्डश्चद्मब्ह्व स्रद्म द्यद्गरुह् क्द्ध/द्मस्रद्मद्भ द्वद्दह्यड्ड द्यद्मस्ड्डद्बद्म ह्लद्म द्यस्रह्य्न


त्रुटि संशोधन

द्गर्ड्ढं 80 स्रद्ध क्[द्म.रु ञ्ज;द्मह्यद्धह् स्र कद्मड्ढद्धंकब् ह्वड्ड- 3 द्बद्भ द्बभ्द्ध'द्मम्द्मद्मद्धस्नर्द्मं;द्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्मश';स्र द्यख्श्चह्वद्म, हृद्बद्ध द्दस््न द्वद्यस्रद्ध द्यख्श्चह्वद्म ह्वड्ड- 1 द्गह्यड्ड रुशद्धस्रक्वद्धह् द्बभ्द्मढ्ढह् ह्र;द्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्गस्नद्मह्नद्भद्म द्बद्दह्नँश्चह्वह्य स्रद्ध ष्द्मह् ॥द्मख्ब् द्यह्य हृद्ब फ्;द्ध द्दस््न द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्मद्म द्य= 'द्मद्मद्धह् स्रह्नह्ल द्गह्यड्ड द्दद्ध श्चब्ह्यड्डफ्ह्य्न

ह्लद्दद्मँ ह्व;द्ध द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चह्यड्ड ष्ह्वह्वद्ध द्दद्मह्य द्वह्वस्रह्य द्यड्डस्रंघद्ब ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं द्गद्मद्द द्गह्यड्ड द्बख्द्भह्य द्दद्मह्य ह्लद्मह्वह्य श्चद्मद्धद्द, ड्ढद्यस्रह्य द्यद्मस्नद्म द्दद्ध द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश स्रद्मह्य द्यह्व− 80 द्गह्यड्ड ह्लद्दद्मँ द्बद्दह्नँश्चह्वद्म द्दद्मह्य ड्ढद्यस्रद्म द्धह्व'श्च; ॥द्मद्ध ड्ढद्दद्धड्ड द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड द्दद्मह्य ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न ड्ढद्यस्रह्य द्धब्, ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं ,शड्ड क्फ्रुह् द्गद्मद्द द्गह्यड्ड 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्च द्ध'द्मद्धशद्भ 'द्मद्मद्धह्&स्रह्नह्ल द्गह्यड्ड ब्फ्द्म;ह्य ह्लद्म द्भद्दह्य द्दस्ड्ड्न द्ध'द्मद्धशद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध द्धह्द्धस्नद्म;द्मँ ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्दस्&

5 द्यह्य 9 ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं & द्बख्शर्द्धं द्ग- द्बभ्-

11 द्यह्य 15 ** & द्बद्ध'श्चद्गद्ध द्ग- द्बभ्-

17 द्यह्य 21 ** & द्वनद्मद्भद्बभ्ठ्ठह्य'द्म] द्धष्द्दद्मद्भ

23 द्यह्य 28 ** & फ्ह्नह्लद्भद्मह्

30 द्यह्य 3 क्फ्रुह् & द्भद्मह्लरुस्नद्मद्मह्व ,शड्ड क्;

5 द्यह्य 9 क्फ्रुह् & फ्ह्नह्लद्भद्मह्

द्धह्वद्गर्द्मं.द्मद्म/द्मद्धह्व ह्स्नद्मद्म ह्व;ह्य द्यड्डस्रंघद्ब ब्ह्यह्वह्य शद्मब्ह्य द्य॥द्मद्ध 'द्मद्धष्ठह् द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्बद्धद्भह्लह्वद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ड्ढह्वद्गह्यड्ड क्द्मद्गद्ध=ह् द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न

ड्ढह्व द्य=द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ॥द्मद्मफ् ब्ह्यह्वह्य शद्मब्ह्य द्य॥द्मद्ध द्यद्म/द्मस्रद्मह्यड्ड स्रद्ध ;ह्नफ् ठ्ठद्मद्ध;क्रश द्बख्द्भद्म स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्धशद्ध'द्म"क द्यद्म/द्मह्वद्म स्रद्भह्वद्ध द्दद्मह्यफ्द्ध्न 'द्मद्म[द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्भस्रद्मद्भद्ध द्भद्धह्लरुंकऊह्य'द्मह्व ह्स्नद्मद्म रुस्नद्मद्मह्वद्ध; 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रद्ध 'द्मद्म[द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्ध/द्मस्रद्मद्भ स्रह्य द्दरुह्द्मह्द्भ.द्म स्रह्य द्यश्वष्/द्म द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध द्यह्नद्धशरुह्क्वह् श्चश्चर्द्मं ड्ढद्यद्ध क्शद्यद्भ द्बद्भ द्यश्व॥द्मश द्दद्मह्य द्यस्रह्यफ्द्ध्न ,स्र द्बभ्द्मह् स्रह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्र ,स्र द्यद्मस्नद्म ड्ढस्रंक−क्चह्य द्दद्मह्यह्वह्य द्यह्य द्वह्व म्द्मह्य=द्मह्यड्ड स्रह्य स्रर्द्म;यद्गद्मह्यड्ड स्रद्ध :द्बद्भह्य[द्मद्म ष्ह्वद्मह्वद्म ॥द्मद्ध द्यद्भब् द्दद्मह्यफ्द्म्न रु=द्ध] ष्क्कश्चद्मह्यड्ड] ह्द्धस्नर्द्मं;द्मद्ध=;द्मह्यड्ड] ठ्ठ'र्द्मंह्वद्मद्धस्नर्द्मं;द्मह्यड्ड स्रद्ध ॥द्मद्धरु+ ब्द्मह्वह्य स्रद्म स्ररु+द्म द्धह्व"द्मह्य/द्म ड्ढह्व द्य=द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न ड्ढद्यद्यह्य फ्श्व॥द्मद्धद्भ द्धश"द्म;द्मह्यड्ड द्बद्भ शद्मह्द्मब्द्मद्ब स्रद्भह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्यह्नद्धश/द्मद्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न श"द्मर्द्मं स्रह्य द्धठ्ठह्व द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्बभ्द्म;त्न शस्द्यह्य ॥द्मद्ध क्द्ध/द्मस्र स्रद्धक्चह्वद्मर्ड्ढं द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न ड्ढह्व स्रद्धक्चह्वद्मड्ढ;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य /;द्मह्व द्गह्यड्ड द्भ[द्मह्ह्य द्दह्न, क्द्म"द्मद्म द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश 15 ह्लख्ह्व ह्स्र द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व द्बभ्शद्मद्य द्यह्य शद्मद्धद्बद्य ब्द्मस्कह्यड्डफ्ह्य्न श"द्मर्द्मंह् स्रह्य ह्द्धह्व द्गद्दद्धह्वह्य क्स्नद्मर्द्मंह्− 15 द्धद्यह्श्वष्द्भ ह्स्र द्दद्धद्भत्त्द्मद्भ द्दद्ध प्तस्रह्यड्डफ्ह्य्न 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्चद्मह्यड्ड स्रह्य द्वठ्ठ−?द्मद्मंकह्व स्रद्म द्वह्वस्रद्म ठ्ठद्मस्द्भद्म ड्ढद्यस्रह्य ष्द्मठ्ठ द्बह्नह्वत्न क्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्य ह्लद्म;ह्यफ्द्म्न द्बभ्द्म;त्न द्यह्व− 80 स्रह्य 'द्मह्य"द्म द्गद्दद्धह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड शद्द द्धह्वद्भह्द्भ श्चब्ह्यफ्द्म्न क्ह्,श 'द्मद्धष्ठह्द्बद्धक्च ,शड्ड द्बभ्य़द्मद्बद्धक्च स्रह्य द्धब्, क्द्म"द्मद्म द्वद्बद्भद्मह्यष्ठह् द्य=द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्मह्वह्य शद्मब्ह्य ह्र;द्धष्ठह् क्॥द्मद्ध द्यह्य क्द्बह्वद्म रुस्नद्मद्मह्व द्यह्नद्भद्धम्द्मह् स्रद्भद्म ब्ह्यड्ड्न द्बख्- फ्ह्नप्तठ्ठह्यश स्रह्य द्बभ्शद्मद्य द्यह्य ब्द्मस्कह्वह्य क्द्मस्द्भ द्धक्तद्भ स्रर्ड्ढं द्गद्मद्द ह्स्र ष्द्मद्दद्भ ह्लद्मह्वह्य द्यह्य श"द्मर्द्मंह् स्रह्य ;ह्य द्धठ्ठह्व ॥द्मद्ध क्द्मफ्ह्नह्स्रद्मह्यड्ड द्यह्य ॥द्मद्भह्य द्भद्दह्यड्डफ्ह्य्न ,ह्यद्यद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड ;द्दद्मँ क्द्मह्वह्य स्रह्य द्बर्ख्शं क्द्बह्वद्म रुस्नद्मद्मह्व द्यह्नद्भद्धम्द्मह् स्रद्भद्म ब्ह्यह्वह्य द्यह्य द्दद्भ ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य द्यह्नद्धश/द्मद्म द्दद्मह्यफ्द्ध्न

शह्यठ्ठद्गद्मह्द्म फ्द्म;=द्ध कऊरुंक क्द्म;स्रद्भ द्गह्नष्ठह्

द्गद्मह्वह्वद्ध; क्द्म;स्रद्भ क्द्म;ह्नष्ठह् द्गद्दद्मह्यठ्ठ; द्गह्यद्भक्च ह्वह्य क्द्बह्वह्य द्ब= यद्गद्मड्डस्र 19 द6ड्टञ्चस्रद्भद्गह्नद्धष्ठह्ञ्च;द्मद्ध;स्रञ्च 79&80ञ्चद्दद्धद्भत्त्द्मद्भञ्च113 द्धठ्ठह्वद्मड्डस्र 2&5&80 त्त्द्मद्भद्म छ्वद्ध शह्यठ्ठद्गद्मह्द्म फ्द्म;=द्ध कऊरुंक 'द्मद्मद्धह्&स्रह्नह्ल द्दद्धद्भत्त्द्मद्भ स्रद्मह्य द्धठ्ठह्वद्मड्डस्र 1&4&80 द्यह्य 31&3&81 ह्स्र स्रद्ध क्शद्ध/द्म स्रह्य द्धब्;ह्य क्द्ध/द्मद्धह्व;द्ग 80 ह्लद्ध स्रह्य क्ह्फ्ह् क्द्म;स्रद्भ द्गह्नष्ठह् स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म द्दस््न ह्लद्मह्य क्द्मश';स्र द्यद्ग>ह्यड्ड क्द्मठ्ठह्य'द्म द्ब= स्रद्ध द्बभ्द्धह्द्धब्द्धद्ब 'द्मद्मद्धह् स्रह्नड्डह्ल स्रह्य द्धठ्ठ;ह्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्ह्य क्ह्वह्नठ्ठद्मह्व द्बद्भ द्धह्व;द्गद्मह्वह्नद्यद्मद्भ क्द्म;स्रद्भ ह्वद्दद्धड्ड ब्फ्ह्यफ्द्म्न


मनौभावों का स्वास्थ्य पर प्रभाव

द्गह्वह्न"; 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्ध द्यद्मद्भद्ध फ्द्धह्द्धशद्ध/द्म;द्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्धय;द्मस्रब्द्मद्बद्मह्यड्ड स्रद्म द्यड्डश्चद्मब्ह्व द्गद्धरुह्"स्र त्त्द्मद्भद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न शस्य़द्मद्धह्वस्रद्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं ॥द्मद्ध ड्ढक्कहृद्म] क्द्मस्रद्मड्डम्द्मद्म] द्धशश्चद्मद्भ] ॥द्मद्मशह्वद्म क्द्मस्द्भ द्यड्डस्रंघद्ब द्गद्धरुह्"स्र द्यह्य द्दद्ध द्वक्चह्ह्य द्दस्ड्ड ह्स्नद्मद्म द्वद्दह्यड्ड द्बख्द्भद्म स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ;द्मह्यह्लह्वद्म ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्म स्रर्द्म; ॥द्मद्ध द्वद्यद्ध स्रह्य द्धह्लश्वद्गह्य क्द्मह्द्म द्दस््न द्गद्धरुह्"स्र 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्म द्बभ्'द्मद्मद्यस्र] द्धह्व;ह्द्म] द्यड्डश्चद्मब्स्र क्द्मस्द्भ द्धह्वठ्ठर्ह्यं'द्मस्र द्दस् ह्द्मह्य रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र द्दद्ध द्दस् द्धस्र द्वद्यस्रद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् ठ्ठ'द्मद्म स्रद्म द्बभ्॥द्मद्मश 'द्मद्भद्धद्भ द्बद्भ ॥द्मद्ध द्बरु+ह्य्न द्बभ्'द्मद्मद्यस्र ;द्धठ्ठ क्;द्मह्यंग; क्द्मस्द्भ क्स्रह्न'द्मब् द्दद्मह्यफ्द्म ह्द्मह्य ह्र;शरुस्नद्मद्म ॥द्मद्ध फ्रु+ष्रु+द्म;ह्यफ्द्ध द्दद्ध्न द्यड्डश्चद्मब्स्र स्रह्य द्दद्मस्नद्मद्मह्यड्ड द्दह्नर्ड्ढं द्धस्रद्यद्ध ॥द्मद्ध फ्ब्ह्द्ध स्रद्म द्बभ्॥द्मद्मश द्वद्यस्रह्य क्/द्मद्धह्व म्द्मह्य= द्बद्भ ॥द्मद्ध द्बरु+ह्द्म द्दस््न क्द्म/द्मह्नद्धह्वस्र द्गह्वद्मह्यद्धशय़द्मह्व ड्ढद्य द्धठ्ठ'द्मद्म द्गह्यड्ड स्रर्ड्ढं द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं [द्मद्मह्यह्लह्यड्ड स्रद्भ श्चह्नस्रद्म द्दस् क्द्मस्द्भ ड्ढद्य द्धह्व"स्र"र्द्मं द्बद्भ द्बद्दह्नँश्च श्चह्नस्रद्म द्दस्] द्धह्लह्वस्रद्म द्बभ्द्धह्द्बद्मठ्ठह्व द्बभ्द्मश्चद्धह्व स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्गद्दद्ध"र्द्मं;द्मह्यड्ड ह्वह्य द्धस्र;द्म स्नद्मद्म्न

द्गह्वद्मह्य॥द्मद्मशद्मह्यड्ड स्रद्म रुशद्मरुस्न; द्बद्भ ष्ठ;द्म द्बभ्॥द्मद्मश द्बरु+ह्द्म द्दस्झ्र ड्ढद्य द्धठ्ठ'द्मद्म द्गह्यड्ड स्रर्ड्ढं द्बभ्;द्मह्यफ् द्दह्न, द्दस्ड्ड्न द्धद्बहृब्ह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड क्द्गह्यद्धद्भस्रद्म स्रह्य ;ख्;द्मर्स्रं 'द्मद्दद्भ द्गह्यड्ड द्भद्दह्वह्य शद्मब्द्म ,स्र ;ह्नशस्र ,ब्ह्यष्ठद्यद्ध द्यह्यड्डंक द्गद्मद्धंर्कंह्व क्द्बह्वह्य ,स्र द्धद्ग= त्त्द्मद्भद्म क्द्यद्मश/द्मद्मह्वद्ध द्यह्य श्चब् फ्ड्ढ ष्ठ्ठख्स्र स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ?द्मद्म;ब् द्दद्मह्य फ्;द्म्न फ्द्मह्यब्द्ध द्बह्यंक द्गह्यड्ड ब्फ्द्ध स्नद्मद्ध क्द्मस्द्भ द्बह्यंक द्गड्डह्य ठ्ठद्मह्य ड्ढड्डश्च ह्र;द्मद्य स्रद्म हृह्यठ्ठ द्दद्मह्य द्भद्दद्म स्नद्मद्म्न ब्फ्ह्द्म स्नद्मद्म द्धस्र ष्श्चह्वद्म द्गह्नद्ध'स्रब् द्दस्] द्धक्तद्भ ॥द्मद्ध रुद्म- द्धशद्धब्;द्ग ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं ह्वद्मद्गस्र ,स्र द्धश्चद्धस्रक्रद्यस्र ह्वह्य द्वद्यह्य ष्श्चद्मह्वह्य स्रद्म ॥द्मद्भद्यस्र द्बभ्;द्मद्य द्धस्र;द्म्न रुद्म- ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं स्रह्य द्बभ्;द्मद्यद्मह्यड्ड द्यह्य द्गद्मद्धंर्कंह्व स्रद्ध द्बभ्द्म.द्म द्भम्द्मद्म ह्द्मह्य द्दद्मह्य फ्ड्ढ द्बद्भ] द्बह्यंक स्रह्य ॥द्मद्धह्द्भ शद्द द्यख्द्भद्म[द्म ष्ह्वद्म द्भद्दद्म्न द्वद्यस्रह्य द्बह्यंक स्रद्ध ष्द्मद्दद्भद्ध क्द्मस्द्भ क्द्मड्डह्द्धद्भस्र क्रशश्चद्म ह्द्मह्य ह्लह्नरु+ फ्;द्ध] द्बद्भ द्बह्यंक स्रह्य ॥द्मद्धह्द्भद्ध क्ड्डफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ,ह्यद्यद्म द्धशस्रद्मद्भ क्द्म फ्;द्म द्धह्लद्यद्यह्य द्धस्र द्वद्यस्रद्म [द्मद्म;द्म द्दह्नक्द्म ॥द्मद्मह्यह्लह्व द्यद्मक्त द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्द्म स्नद्मद्म्न

रुद्मंखष्ठंकद्भ ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं ह्वह्य द्गद्मद्धंर्कंह्व स्रद्ध [द्मद्मद्धढ्ढह् द्यद्दद्म;ह्द्म क्द्मस्द्भ ठ्ठह्य[द्म॥द्मद्मब् स्रद्ध] द्वद्यह्य क्द्बह्वह्य द्यद्मस्नद्म ॥द्मद्ध द्भद्बस्नद्म ह्द्मद्धस्र शद्द ॥द्मद्मह्यह्लह्व स्रद्ध द्बद्मश्चह्व द्बभ्द्धय;द्म स्रद्मह्य द्वद्यस्रह्य द्बह्यंक द्गह्यड्ड ठ्ठह्य[द्मस्रद्भ क्/;;ह्व स्रद्भ द्यस्रह्य्न रुद्मंखष्ठंकद्भ ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं ह्वह्य द्गद्मद्धंर्कंह्व द्बद्भ स्रह्नब् द्धद्गब्द्मस्रद्भ 283 द्बभ्;द्मह्यफ्द्मक्रद्गस्र क्/;;ह्व द्धस्र;ह्य क्द्मस्द्भ द्वह्व द्बभ्;द्मह्यफ्द्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म द्बभ्द्मढ्ढह् द्धह्व"स्र"द्मद्मर्ह्यंड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ ,स्र द्बह्नरुह्स्र द्धब्[द्मद्ध ड्ढद्य द्बह्नरुह्स्र द्गह्यड्ड ष्ह्द्म;द्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र द्बह्यंक द्यष् द्यह्य क्ठ्ठद्भ स्रद्ध द्बह् ब्द्मब्] फ्ह्नब्द्मष्द्ध] द्ग[द्मद्गब् द्यद्ध ठ्ठद्ध[द्मह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ शद्द 'ब्ह्य"द्गद्म द्यह्य ;द्द ह्द्भब् द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं ॥द्मद्मह्यह्लह्व स्रद्मह्य क्द्बह्वह्य द्गह्यड्ड द्धब्द्बंकद्म स्रद्भ द्वद्यह्य फ्ब्द्मह्वह्य ब्फ्ह्द्म द्दस््न ,स्र द्बभ्;द्मह्यफ् स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्गद्मद्धंर्कंह्व स्रद्मह्य फ्ह्नरुद्यद्म द्धठ्ठब्द्म;द्म फ्;द्म्न फ्ह्नरुद्यह्य स्रद्ध द्दद्मब्ह् द्गह्यड्ड द्दद्ध द्गद्मद्धंर्कंह्व ह्वह्य ॥द्मद्मह्यह्ल द्धस्र;द्म्न द्व/द्मद्भ रुद्म- ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं द्बद्भद्धम्द्म.द्म स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्य्न द्वद्दद्मह्यड्डह्वह्य ठ्ठह्य[द्मद्म द्धस्र द्बभ्;द्मह्यफ् स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्भद्मह्यफ्द्ध&द्गद्मद्धंर्कंह्व स्रद्मह्य फ्ह्नरुद्यद्म क्द्मह्यह्व द्बद्भ ॥द्मद्मह्यह्लह्व द्बश्चद्मह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्ध/द्मस्र द्यद्ग; ब्फ्द्म्न रुद्म- ष्द्मह्यद्गद्मह्यंर्कं स्रह्य ड्ढह्व द्धह्व"स्र"द्मद्मर्ह्यंड्ड स्रद्ध द्बह्नद्ध"क क्; शस्य़द्मद्धह्वस्रद्मह्यड्ड ह्वह्य ॥द्मद्ध स्रद्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ष्ह्द्म;द्म द्दस् द्धस्र द्वनद्मह्यद्धह्लह् द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्डह्य द्धस्र;द्म फ्;द्म ॥द्मद्मह्यह्लह्व रुशद्मरुस्न; द्बद्भ ष्ह्नद्भद्म द्बभ्॥द्मद्मश रुद्मब्ह्द्म द्दस््न [द्मद्मद्यह्द्मस्द्भ द्यह्य द्बद्मश्चह्व द्यड्डरुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ ह्द्मह्य द्वद्यस्रद्ध ह्ह्नद्भह् द्दद्ध द्बभ्द्धह्द्धय;द्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न

ह्व स्रह्यशब् द्वनद्मह्यह्लह्वद्म शद्भह्व− द्धह्वद्भद्म'द्मद्म] ?द्मक्व.द्मद्म] द्वठ्ठद्मद्यद्ध] र्ड्ढं";र्द्मं] त्त्ह्य"द्म क्द्मस्द्भ ह्ह्वद्मशफ्भ्रुह् द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् ॥द्मद्ध द्बद्मश्चह्व द्धय;द्म स्रद्मह्य द्बभ्॥द्मद्मद्धशह् स्रद्भह्द्ध द्दस््न ;द्धठ्ठ ;ह्य द्गह्वद्मह्यद्धशस्रद्मद्भ ठ्ठह्यद्भ ह्स्र द्धंकस्रह्य द्भद्दह्य ह्द्मह्य द्बह्यंक स्रह्य द्भद्मह्यफ् ;द्दद्मँ ह्स्र द्धस्र क्घद्यद्भ ॥द्मद्ध द्दद्मह्य द्यस्रह्ह्य द्दस्ड्ड्न रुद्म- ह्लस्ष्ठद्यह्व स्रद्म ह्द्मह्य ;द्दद्मँ ह्स्र स्रद्दह्वद्म द्दस् द्धस्र द्बह्यंक द्यश्वष्/द्मद्ध द्य॥द्मद्ध द्भद्मह्यफ् क्रुह्&ह्र;रुह् द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न

क्घद्यद्भ स्रह्य क्तद्मह्यरु+ह्य द्बभ्द्म;त्न द्बष्ठशद्म'द्म; दरु−;ख्क्द्मह्यरुह्यह्वद्गड्ट द्गह्यड्ड द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड] ह्लद्मह्य हृद्मह्यंकद्ध क्द्मड्डह् स्रद्म शद्द ॥द्मद्मफ् द्दस् द्धह्लद्यद्यह्य द्बह्यंक स्रद्ध /द्मह्नद्भद्ध ठ्ठख्द्यद्भद्ध द्धद्यद्भह्य द्यह्य ह्लह्नरु+द्ध द्भद्दह्द्ध द्दस््न ह्ह्वद्मशफ्भ्रुह् ;द्म द्धह्वद्भद्म'द्म द्वद्धत्त्गह्व द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्बह्यंक स्रद्ध ब्द्दद्भद्मद्भ द्धद्यस्रह्नरु+ह्व स्रद्ध फ्द्धह् ष् द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्म स्रह्य द्धब्, द्भष्ठह्श्चद्मद्ब क्द्मस्द्भ सठ्ठ; द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्दद्ध ब्द्मह्य द्धस्रद्यद्ध ॥द्मद्ध द्वनद्मह्यह्लह्वद्मद्बख्.र्द्मं द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड सठ्ठ; स्रद्ध /द्मरु+स्रह्व ष् द्वह्द्मशब्द्ध क्द्मस्द्भ द्दरु+ष्रु+द्ध द्गह्यड्ड द्भद्दह्वह्य स्रद्ध द्बभ्शक्वद्धनद्म द्बभ्द्म;त्न ड्ढह्व द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्लह्वह्वद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न स्रद्मद्गस्रद्मह्ल द्धह्वष्कद्मह्वह्य द्गह्यड्ड द्वह्द्मशब्द्ध द्यह्य स्रद्मद्ग ब्ह्यह्वद्म क्द्मस्द्भ क्द्मद्भद्मद्ग स्रद्भह्ह्य द्यद्ग; ॥द्मद्ध स्रद्मद्गस्रद्मह्ल स्रद्ध द्धश्चह्द्म ड्ढह्व द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म रुशद्मफ्ह् स्रद्भह्द्ध द्दस््न स्रह्नहृ श"द्मद्मर्ह्यंड्ड द्बर्ख्शं क्द्म;द्भब्स्ड्डरु द्गह्यड्ड ह्लद्गह्य 575 ह्लह्नरुशद्मँ ष्क्कश्चद्मह्यड्ड द्बद्भ ह्ह्नब्ह्वद्मक्रद्गस्र क्/;;ह्व द्धस्र;द्म फ्;द्म्न ष्द्मठ्ठ द्गह्यड्ड ठ्ठद्मह्य ह्लह्नरुशद्मँ ॥द्मद्मड्ढ;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य ,स्र स्रद्मह्य क्द्गह्यद्धद्भस्रद्म स्रह्य ष्द्मह्यरुंकह्व 'द्मद्दद्भ द्गह्यड्ड ब्ह्य ह्लद्म;द्म फ्;द्म्न ह्लद्मह्य शद्दद्मँ स्रह्नहृ द्गद्दद्धह्वद्मह्यड्ड ह्स्र द्भद्दद्म्न ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड ॥द्मद्मड्ढ;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ,स्र द्यद्गद्मह्व ॥द्मद्मह्यह्लह्व द्धठ्ठ;द्म फ्;द्म] ,स्र द्यद्गद्मह्व स्रद्मद्ग द्धठ्ठ;द्म फ्;द्म ब्ह्यद्धस्रह्व ष्द्मठ्ठ द्गह्यड्ड द्बद्म;द्म फ्;द्म द्धस्र ष्द्मह्यरुंकह्व द्गह्यड्ड द्भद्दह्वह्य शद्मब्द्म ॥द्मद्मर्ड्ढं] रुष्द्धब्ह्व दक्द्म;द्भब्स्.रुड्ट द्गह्यड्ड द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य ॥द्मद्मर्ड्ढं स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म सठ्ठ; द्भद्मह्यफ् स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भह्य स्रद्ध द्यश्व॥द्मद्मशह्वद्म द्यह्य ञ्ज;द्मठ्ठद्म फ्भ्रुह् द्दस््न ;द्द द्वद्य द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड ह्लष् द्धस्र रुष्द्धब्ह्व शद्मब्द्म ॥द्मद्मर्ड्ढं क्द्ध/द्मस्र ?द्म.कह्य ह्स्र स्रद्मद्ग स्रद्भह्द्म स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ क्द्बह्वह्य ठ्ठख्द्यद्भह्य ॥द्मद्मर्ड्ढं द्यह्य ञ्ज;द्मठ्ठद्म द्गद्मह्यंकद्म ॥द्मद्ध स्नद्मद्म्न क्ह्द्भ स्रह्यशब् ड्ढह्ह्वद्म द्दद्ध स्नद्मद्म ष्द्मह्यरुंकह्व शद्मब्द्म ॥द्मद्मर्ड्ढं क्द्बह्वद्म द्दद्भ स्रद्मद्ग स्रद्भह्ह्य द्यद्ग; द्वह्द्मशब्द्ध क्द्मस्द्भ द्दरु+ष्रु+द्मद्दंक ष्द्भह्ह्द्म स्नद्मद्म ह्लष्द्धस्र रुष्द्धब्ह्व शद्मब्द्म ॥द्मद्मर्ड्ढं क्द्ध/द्मस्र स्रद्मद्ग स्रद्भह्द्म स्नद्मद्म्न

;द्मह्यड्ड सठ्ठ; स्रद्म ठ्ठद्मस्द्भद्म क्स्ररुद्गद्मह् द्दद्ध द्बरु+ह्द्म द्दस् द्बद्भह्ह्न ;द्द द्भद्मह्यफ् स्रद्मह्यर्ड्ढं क्श्चद्मह्वस्र द्बस्ठ्ठद्म द्दद्मह्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध ष्द्धद्गद्मद्भद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न द्बभ्द्धद्य) सठ्ठ; द्भद्मह्यफ्द्म द्धश'द्मह्य"द्मय़ रुद्म- ह्लह्य- ष्ह्वर्द्मंर्रुं स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ ;द्द ष्द्धद्गद्मद्भद्ध ब्श्वष्ह्य द्यद्ग; ह्स्र ;द्दद्मँ ह्स्र द्धस्र स्र॥द्मद्ध&स्र॥द्मद्ध 20 श"र्द्मं ह्स्र द्बह्वद्बह्द्ध क्द्मस्द्भ ष् ड्ढह्व द्भद्मह्यफ्द्मड्डह्य द्यह्य ष्श्चद्मश स्रह्य द्धब्, रुद्म- ह्लह्य- ष्ह्वर्द्मंर्रुं ह्वह्य स्रद्दद्म द्दस्ड्ड] क्द्मद्ब श्चद्मद्दह्य द्भद्मह्यफ्द्ध द्दद्मह्यड्ड ;द्म ह्व द्दद्मह्यड्ड्न द्भद्मह्यफ्द्ध द्दद्मह्यड्ड ह्द्मह्य रुशरुस्नद्म द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, क्स्नद्मशद्म द्भद्मह्यफ्द्ध ह्व द्दद्मह्यड्ड ह्द्मह्य ड्ढद्य द्भद्मह्यफ् द्यह्य ष्श्चह्वह्य स्रह्य द्धब्, क्द्मश';स्र द्दस् द्धस्र क्द्म/द्मह्नद्धह्वस्र द्य॥;ह्द्म त्त्द्मद्भद्म द्बभ्ठ्ठनद्म ह्लद्धशह्व ठ्ठ'र्द्मंह्व ष्ठ्ठब्द्म ह्लद्म;्न ष्द्दह्नह् द्दष्रु+ ठ्ठष्रु+] ॥द्मद्मफ् ठ्ठद्मस्रु+] ह्र;फ्भ्ह्द्म द्वह्द्मशब्द्ध क्द्मस्द्भ ह्द्धशभ् द्गद्मह्वद्धद्यस्र द्यड्डशह्यफ्द्मह्यड्ड द्यह्य ष्श्चद्म ह्लद्म;्न ह्लस्द्यद्म ह्लद्मह्य स्रह्नहृ ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड द्दस्] द्वद्यह्य रुशद्धस्रद्मद्भ द्धस्र;द्म ह्लद्म; क्द्मस्द्भ द्यह्नद्धह्व;द्मह्यद्धह्लह्] 'द्मद्मह् द्वक्चद्मह्वद्म द्दद्भ ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य द्दद्मद्धह्वस्रद्मद्भस्र द्दद्ध द्दस््न

द्बद्मश्चह्व द्यड्डरुस्नद्मद्मह्व] द्भष्ठह्श्चद्मद्ब क्द्मस्द्भ सठ्ठ; द्भद्मह्यफ् द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं ह्लस्द्यद्म द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म द्भद्मह्यफ् ॥द्मद्ध द्बभ्द्म;त्न द्गद्मह्वद्धद्यस्र क्द्यह्ह्नब्ह्व स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न रुद्मंखष्ठंकद्भद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्दह्वद्म द्दस् द्धस्र द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं स्रद्ध द्ध'द्मस्रद्म;ह् स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य 90 द्बभ्द्धह्'द्मह् द्भद्मह्यफ्द्ध स्रह्यशब् द्गद्मह्वद्धद्यस्र ह्ह्वद्मश स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं द्यह्य द्बद्धद्धरु+ह् द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्ड्ड्न ,स्र क्/;;ह्व द्गह्यड्ड द्भद्मह्यद्धफ्;द्मह्यड्ड द्यह्य स्रद्दद्म फ्;द्म द्धस्र ह्लष् ॥द्मद्ध द्वद्दह्यड्ड द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं द्दद्मह्य ह्ष् शह्य द्वद्य द्धरुस्नद्मद्धह् स्रद्मह्य ह्वद्मह्यंक स्रद्भह्यड्ड] ह्लद्मह्य द्धस्र द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं द्दद्मह्यह्ह्य द्यद्ग; स्नद्मद्ध्न ड्ढद्य क्/;;ह्व द्यह्य द्बभ्द्मढ्ढह् द्धह्व"स्र"द्मद्मर्ह्यंड्ड स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ स्रद्दद्म फ्;द्म द्धस्र द्य॥द्मद्ध द्भद्मह्यद्धफ्;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्वद्यद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्धद्यद्भ ठ्ठर्ठ्ठं द्वक्रद्बह्व द्दह्नक्द्म द्धह्लद्यद्गह्यड्ड द्धस्र द्वद्दद्मह्यड्डह्वह्य ठ्ठह्न[द्म क्ह्वह्न॥द्मश द्धस्र;द्म्न

ठ्ठह्न[द्मद्मह्यक्रद्बद्मठ्ठ ॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म फ्ठ्ठह्व क्द्मस्द्भ द्धद्यद्भ स्रद्ध द्गद्मड्डद्यद्बह्यद्ध'द्म;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ,ड्डह्यक्चह्व द्दद्मह्यह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ;द्द ,ड्डह्यक्चह्व द्दद्ध द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड क्ह्वह्न॥द्मश द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न ड्ढद्य क्/;;ह्व स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व [द्मद्मद्यह्द्मस्द्भ द्यह्य ;द्द ह्वद्मह्यंक द्धस्र;द्म फ्;द्म द्धस्र ,ह्यक्चह्व स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म स्रद्मह्यर्ड्ढं 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र ;द्म द्गद्मह्वद्धद्यस्र छ्वद्ग ह्वद्दद्धड्ड स्नद्मद्म शद्भह्व− द्वत्त्ह्यफ् क्स्नद्मशद्म ठ्ठह्न[द्म स्रद्ध क्ह्वह्न॥द्मख्द्धह् स्रह्य द्बद्धद्भद्गद्म.द्म द्यह्य द्दद्ध ,ह्यड्डक्चह्व द्दद्मह्यह्द्ध स्नद्मद्ध्न 'द्मद्भद्धद्भ 'द्मद्मद्धरु=;द्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं स्रद्म] द्गद्धरुह्"स्र द्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यश्वष्/द्म ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यह्द्म्न द्गद्धरुह्"स्र स्रह्य श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ [द्मख्ह्व ब्ह्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध द्ध'द्मद्भद्म, द्दद्ध द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं स्रद्मह्य ह्लद्ग ठ्ठह्यह्द्ध द्दस्ड्ड्न ह्ह्वद्मश क्स्नद्मशद्म ठ्ठह्न[द्मद्मह्यक्रद्बद्मठ्ठह्व ॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्ग; ;द्द ह्वद्धब्स्रद्म;ह्यड्ड क्तस्ब् ह्लद्मह्द्ध द्दस्ड्ड्न ड्ढद्य क्तस्ब्द्मश स्रद्मह्य स्र॥द्मद्ध&स्र॥द्मद्ध स्रह्वद्बंकद्ध स्रद्ध क्रशश्चद्म द्बद्भ द्दद्मस्नद्म द्भ[द्म स्रद्भ ॥द्मद्ध क्ह्वह्न॥द्मश द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न द्गद्मड्डद्यद्बह्य'द्मद्ध स्रद्ध ,ह्यड्डक्चह्व द्यह्य द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्द्म द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं ड्ढह्व ह्वद्धब्;द्मह्यड्ड स्रह्य ञ्ज;द्मठ्ठद्म द्धद्यस्रह्नरु+ ह्लद्मह्वह्य द्यह्य द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न

द्गद्मड्ढफ्भ्ह्यह्व ॥द्मद्ध द्धद्यद्भठ्ठर्ठ्ठं स्रद्म ,स्र द्बभ्स्रद्मद्भ द्दस््न ;द्द द्धद्यद्भ स्रह्य ,स्र ह्द्भक्त द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न स्रर्ड्ढं ष्द्मद्भ ड्ढद्यस्रद्म क्द्मयद्ग.द्म द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ ह्लद्ध द्धद्गश्चब्द्मह्वह्य] द्वंघंकद्ध द्दद्मह्यह्वह्य ह्स्नद्मद्म क्द्मँ[द्मद्मह्यड्ड द्यह्य क्चद्धस्र&क्चद्धस्र ह्व द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्वह्य स्रद्ध द्ध'द्मस्रद्म;ह् ॥द्मद्ध द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्ध द्दस््न रुद्मंखष्ठंकद्भद्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ द्गद्मड्ढफ्भ्ह्यह्व स्रद्म द्दद्गब्द्म द्वह्व ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्बद्भ ञ्ज;द्मठ्ठद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस्ड्ड ह्लद्मह्य रुश;ड्ड स्रद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् क्द्मस्द्भ क्द्मद्य&द्बद्मद्य स्रद्ध द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्यह्य ष्द्दह्नह् क्द्ध/द्मस्र क्द्यड्डह्ह्न"क ;द्म ब्फ्॥द्मफ् म्द्मह्नष्ट/द्म द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र द्दद्ध ,ह्यद्यद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्यड्ड द्गद्मह्वद्धद्यस्र ह्ह्वद्मश द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्भद्मह्यफ् द्दद्गब्द्म स्रद्भ ष्स्क्चह्द्म द्दस््न

द्धश्चह्द्म] ह्ह्वद्मश] द्धह्वद्भद्म'द्मद्म] द्दह्द्म'द्मद्म] द्वद्धत्त्गह्वह्द्म] यद्मह्य/द्म] र्ड्ढं";र्द्मं] त्त्ह्य"द्म क्द्मद्धठ्ठ ॥द्मद्मशह्वद्म, द्गह्वद्गह्यड्ड म्द्मद्मह्य॥द्म क्द्मस्द्भ 'द्मद्भद्धद्भ द्गड्डह्य द्भद्मह्यफ् द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्द्ध द्दस्ड्ड] ड्ढद्यद्गह्यड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यठ्ठह्यद्द ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न द्बभ्स्रक्वद्धह् ह्वह्य 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड ,ह्यद्यद्ध ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रद्भ द्भ[द्मद्ध द्दस् द्धस्र रुह्रद्मद्म॥द्मद्मद्धशस्र यद्ग द्यह्य द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य द्धशस्रद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्म द्बद्धद्भ'द्मद्मह्य/द्मह्व क्द्बह्वह्य क्द्मद्ब द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म द्भद्दह्य] द्बद्भह्ह्न ह्लष् ॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म ॥द्मद्ध द्धशस्रद्मद्भ द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्ह्य द्दस्ड्ड ह्द्मह्य 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्ध द्यह्नद्भम्द्मद्म ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रद्गह्लद्मह्यद्भ द्बरु+ ह्लद्मह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्यस्रद्ध द्बभ्द्धह्द्धय;द्म द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्ध द्दस््न ड्ढह्वद्यह्य ष्श्चह्वद्म श्चद्मद्धद्द, क्द्मस्द्भ ,ह्यद्यद्ध द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मँ द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यड्ड ॥द्मद्ध] ह्लष्द्धस्र शद्मरुह्श द्गह्यड्ड ॥द्मद्मशह्वद्म म्द्मद्मह्य॥द्म द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यड्ड] ह्द्मह्य द्वह्वस्रद्म द्यद्गद्म/द्मद्मह्व द्यद्दह्ल रुशद्धस्रद्मद्भ ॥द्मद्मश द्यह्य स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न

॥द्मद्मशह्वद्मक्रद्गस्र द्यह्ह्नब्ह्व] ह्व स्रह्यशब् ह्लद्धशह्व स्रद्ध ,स्र क्ह्वद्गद्मह्यब् द्धह्वद्ध/द्म द्दस्] शद्भह्व− शद्द ह्लद्धशह्व ह्लद्धह्वह्य स्रद्ध ,स्र स्रब्द्म ॥द्मद्ध द्दस् ड्ढद्य स्रब्द्म स्रह्य त्त्द्मद्भद्म ह्लद्धशह्व द्दद्भद्म&॥द्मद्भद्म] द्बंघब्द्धशह्] द्बह्नद्ध"द्बह् क्द्मस्द्भ द्यह्न[द्मद्ध 'द्मद्मड्डह् ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न द्बद्भह्ह्न ड्ढद्य ॥द्मद्मशह्वद्म म्द्मद्मह्य॥द्म स्रद्म द्वद्बश्चद्मद्भ ष्ठ;द्म द्दस्झ्र रुद्मष्ठंकद्भ ह्लद्मर्ह्लं रुंकद्धशह्यद्यह्व स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ ह्लष् ॥द्मद्ध ॥द्मद्मशह्वद्म म्द्मद्मह्य॥द्म ;द्म ह्ह्वद्मश द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दस् ह्द्मह्य द्वद्यद्गह्यड्ड रुख्ष्ह्वह्य] >ह्नब्द्यह्वह्य स्रद्ध ष्ह्लद्म; द्वद्यह्य द्बद्दश्चद्मह्वह्वह्य स्रद्ध स्रद्मह्यद्ध'द्म'द्म स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्वद्यस्रद्म ष्ठ;द्म स्रद्मद्भ.द्म द्दस््न शद्द स्रद्मद्भ.द्म स्रह्नहृ ॥द्मद्ध द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस्] ह्लद्मह्य ॥द्मद्ध स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्य द्वद्यस्रद्म द्वद्बश्चद्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्ध ष्द्मह् द्यद्मह्यश्चह्वद्म श्चद्मद्धद्द, ह्व द्धस्र द्वद्यद्यह्य द्वनद्मह्यद्धह्लह् द्दद्मह्यह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न

रुद्गद्भ.द्म द्भ[द्मद्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्यद्गरु;द्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य द्गह्नष्ठह् स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्वद्दद्धड्ड द्भद्द द्यस्रह्द्म द्दस््न क्ह्वद्मद्धठ्ठस्रद्मब् द्यह्य द्बभ्द्धह्द्धठ्ठह्व स्रर्ड्ढं&स्रर्ड्ढं ब्द्मह्यफ् ,ह्यद्यद्ध द्यद्गरु;द्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य द्ध?द्मद्भ ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड द्धस्र स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यद्गद्म/द्मद्मह्व ह्वद्दद्धड्ड द्यख्>ह्द्म क्द्मस्द्भ क्द्मक्रद्ग?द्मद्मह् स्रद्भ ब्ह्यह्वह्य स्रद्म द्गह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्बद्भह्ह्न शह्य द्यद्गरु;द्म, ह्लष् द्धह्वद्बंक ह्लद्मह्द्ध द्दस् ह्द्मह्य द्धक्तद्भ द्यष् स्रह्नहृ द्यद्मद्गद्म; द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्म द्दस््न ड्ढद्यद्धब्, द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रह्य द्ध'द्मस्रद्मद्भ ह्र;द्धष्ठह् ॥द्मद्ध /द्मर्स्; त्त्द्मद्भद्म क्द्बह्वद्म द्गद्मह्वद्धद्यस्र द्यह्ह्नब्ह्व ष्ह्वद्म, द्भद्द द्यस्रह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्स्रद्मद्भ.द्म ॥द्मद्मशह्वद्म म्द्मद्मह्य॥द्म द्बद्मब्ह्वह्य क्द्मस्द्भ द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्धह्वद्ग=.द्म ठ्ठह्यह्वह्य द्गह्यड्ड ह्द्मह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यद्ग>ठ्ठद्मद्भद्ध द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न

द्यड्डह् द्धह्ब्ह्नशंघब्ह्नशद्भ द्बभ्शश्चह्व स्रद्भ द्भद्दह्य स्नद्मह्य&द्बद्भद्गद्मक्रद्गद्म स्रद्ध ठ्ठ;द्म] द्वह्वस्रद्ध स्रप्त.द्मद्म द्वह्वस्रद्ध द्वठ्ठद्मद्भह्द्म क्द्यद्धद्ग द्दस््न द्वह्वस्रद्म ठ्ठद्भशद्मह्लद्म द्धस्रद्यद्ध स्रह्य द्धब्, स्र॥द्मद्ध ष्ठ्ठ ह्वद्दद्धड्ड द्दह्नक्द्मझ्र

,स्र ॥द्मष्ठह् ह्वह्य [द्मरु+ह्य द्दद्मह्यस्रद्भ क्द्म'द्मड्डस्रद्म ह्र;ष्ठह् स्रद्ध क्द्मस्द्भ ष्ह्द्म;द्म द्धस्र द्यह् क्ह्वद्मद्ग ह्द्मह्य स्रद्दह्ह्य द्दस्ड्ड द्धस्र द्बद्भद्गद्मक्रद्गद्म स्रद्मह्य द्बद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्धह्वद्भह्द्भ द्बभ्;क्रह्व स्रद्भह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस् ब्फ्द्मह्द्मद्भ ठ्ठद्भशद्मह्लद्म [द्मंक [द्मंकद्मह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ त्त्द्मद्भ [द्मह्नब्ह्द्म द्दस्झ्र

द्यह् द्धह्ब्ह्नशष्टब्ह्नशद्भ ष्द्मह्यब्ह्य&द्वह्वस्रद्म स्रस्नद्मह्व क्द्यक्र; ह्वद्दद्धड्ड द्दस् द्धह्लह्वस्रद्ध क्द्मँ[द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्ड्डद्दस्रद्मद्भ स्रद्म 'द्मद्ध'द्मद्म श्च<+द्म द्दद्मह्य द्वद्यह्य ठ्ठद्भशद्मह्लद्म ष्ठ्ठ द्दद्मह्य ठ्ठद्ध[द्मह्यफ्द्म द्वद्यह्य द्दद्ध ष्द्मद्भश्वष्द्मद्भ कस्रद्भद्मह्वद्म द्बरु+ह्यफ्द्म्न द्धह्लद्यस्रद्म क्द्दड्डस्रद्मद्भ द्धष्फ्द्धब्ह् द्दद्मह्य फ्;द्म द्वद्यस्रह्य द्धब्, द्धह्व"द्मह्य/द्म स्रद्दद्मँझ्र


रोग से ज्यादा रोगी की शत्रु औषधियाँ

द्यह्व− 1970 द्गह्यड्ड ह्लर्द्गंह्वद्ध स्रद्ध ,स्र क्द्मस्"द्मद्ध/द्म द्धह्वद्गर्द्मं.द्म स्रश्वद्बह्वद्ध स्र श्चस्ह्व स्रद्ध ह्वद्धड्डठ्ठ ब्द्मह्वह्य शद्मब्द्ध ठ्ठशद्म **स्नद्मस्द्धब्रुद्मह्य द्गद्मड्ढब्** ष्ह्वद्मर्ड्ढं्न ह्ह्वद्मश] ॥द्मद्मफ्ठ्ठद्मस्रु+ क्द्मस्द्भ द्बभ्द्धह्रुद्ब/द्मर्द्मं द्यह्य ॥द्मद्भद्ध क्द्मह्ल स्रद्ध द्धह्लठ्ठफ्द्ध द्गह्यड्ड क्द्धह्वठ्ठभ्द्म ,स्र क्द्मद्गद्भद्मह्यफ् द्दद्मह्य श्चब्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्धशस्रद्धद्यह् ठ्ठह्य'द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्द्मह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्ड'द्म ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्धष्ह्वद्म ह्वद्धड्डठ्ठ ब्द्मह्वह्य शद्मब्द्ध ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्धब्, ह्वद्धड्डठ्ठ ह्वद्दद्धड्ड क्द्मह्द्ध्न ब्द्मह्यफ् ह्वद्धड्डठ्ठ स्रह्य द्धब्, ड्ढह्व ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् स्रद्भह्ह्य द्दस्ड्ड] *रुद्म;ह्लह्यद्बद्म;* *द्गह्यद्बभ्द्मशद्मह्यद्गह्यंक ष्द्मद्भद्धष्प्तश्चह्यंक−द्य* क्द्मद्धठ्ठ 'द्मद्मद्गस्र क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड द्यह्य ह्स्;द्मद्भ स्रद्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस््न द्बद्भह्ह्न ड्ढह्व ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म द्यह्यशह्व स्रद्भह्वह्य द्बद्भ 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड क्; द्धशस्रद्मद्भ द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्ह्य द्दस्ड्ड्न ह्लर्द्गंह्व स्रश्वद्बह्वद्ध ह्वह्य ह्वर्ड्ढं ठ्ठशद्म *स्नद्मस्द्धब्रुद्मह्य द्गद्मड्ढब्* स्रद्म द्धशय़द्मद्बह्व द्धस्र;द्म द्धस्र ड्ढद्यस्रद्म 'द्मद्भद्धद्भ द्बद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं ष्ह्नद्भद्म द्बभ्॥द्मद्मश ह्वद्दद्धड्ड द्बरु+ह्द्म्न ड्ढह्ह्वद्म द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड ;द्द ॥द्मद्ध स्रद्दद्म फ्;द्म द्धस्र ;द्धठ्ठ ॥द्मख्ब् ;ह्य ड्ढद्यस्रद्ध ञ्ज;द्मठ्ठद्म द्गद्म=द्म ॥द्मद्ध ब्ह्य ब्द्ध ह्लद्म; ह्द्मह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्वह्नस्रद्यद्मह्व ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यह्द्म] ह्लष्द्धस्र क्; 'द्मद्मद्गस्र ठ्ठशद्म, क्द्ध/द्मस्र द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड [द्मद्म ब्ह्यह्वह्य द्बद्भ द्बभ्द्म.द्म द्यड्डस्रंक द्वक्रद्बह्व स्रद्भ ठ्ठह्यह्द्ध द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ द्यद्मद्गद्म; द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड क्; ब्ह्यह्वह्य द्बद्भ द्धशस्रद्मद्भ ह्द्मह्य द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्द्ध द्दस््न

ठ्ठशद्म स्रह्य द्दद्मद्धह्व द्भद्धद्दह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म ह्लद्मह्यद्भठ्ठद्मद्भ द्धशय़द्मद्बह्व द्धस्र;द्म फ्;द्म क्द्मस्द्भ ड्ढद्यस्रद्म द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग ;द्द द्दह्नक्द्म द्धस्र ठ्ठशद्म श्चब् द्धह्वस्रब्द्ध्न स्नद्मद्मह्यरु+ह्य द्दद्ध द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड द्गह्यह्यड्ड क्स्रह्यब्ह्य ह्लर्द्गंह्वद्ध द्गह्यड्ड द्बठ्ठभ्द्द स्रद्भद्मह्यरु+ फ्द्मह्यद्धब्;द्मँ द्बभ्द्धह्द्गद्मद्य द्धष्स्रह्वह्य ब्फ्द्धड्ड्न स्रह्नहृ द्यद्ग; स्रह्य ॥द्मद्धह्द्भ द्दद्ध द्धश'श स्रह्य स्रद्भद्धष् 50 ठ्ठह्य'द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रद्म द्धशद्ध॥द्मह्व ह्वद्मद्गद्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ ब्ह्यद्धष्ब्द्मह्यड्ड द्यह्य द्बभ्श्चब्ह्व द्दह्नक्द्म्न क्द्मद्भश्व॥द्म द्गह्यड्ड ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रद्म 'द्मद्भद्धद्भ द्बद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं द्बभ्द्धह्स्रख्ब् द्बभ्॥द्मद्मश ह्वद्दद्धड्ड द्बरु+द्म द्धस्रह्ह्न स्रह्नहृ द्दद्ध द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ष्द्मठ्ठ स्रद्ध फ्ड्ढ द्यद्मद्भद्ध ?द्मद्मह्य"द्म.द्मद्म, क्द्मस्द्भ द्धशय़द्मद्धद्बह् ह्द्गद्मद्ग द्धश'द्मह्य"द्मह्द्म, स्नद्मद्मह्यस्नद्मद्ध द्यद्मद्धष्ह् द्दह्नर्ड्ढं्न ह्लद्मह्य द्गद्धद्दब्द्म, ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रद्म द्यह्यशह्व स्रद्भह्वह्य ब्फ्द्ध स्नद्मद्धड्ड] द्वह्वस्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ द्बद्भ स्रह्नहृ ,ह्यद्यद्म द्बभ्॥द्मद्मश द्बरु+द्म द्धस्र शह्य द्धशस्रब्द्मड्डफ् ष्क्कश्चद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्लद्ग ठ्ठह्यह्वह्य ब्फ्द्ध्न ड्ढह्व ष्क्कश्चद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्ड'द्म **क्तद्मह्यस्रद्ध ॥द्मह्यद्धब्;द्म** ह्वद्मद्गस्र द्भद्मह्यफ् स्रह्य द्ध'द्मस्रद्मद्भ द्दद्मह्यह्ह्य स्नद्मह्य्न ड्ढद्य द्भद्मह्यफ् द्गह्यड्ड ह्लद्ग द्यह्य द्दद्ध द्दद्मस्नद्म&द्बस्द्भ ष्ह्नद्भद्ध ह्द्भद्द द्गह्नरु+ह्य&ह्ह्नरु+ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न ड्ढद्य द्भद्मह्यफ् स्रह्य स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्ध ह्लद्मँश्च स्रद्भह्वह्य द्बद्भ द्बद्म;द्म फ्;द्म द्धस्र ;द्द द्धशस्रद्मद्भ स्नद्मस्द्धब्रुद्मह्य द्गद्मड्ढब् द्गह्यड्ड द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य *गब्ह्यंकह्यद्धह्वस्र ,ह्यद्धद्यरु* स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न ह्लष् ड्ढद्यस्रह्य ह्र;द्मद्बस्र द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;ह्य ह्द्मह्य ड्ढड्डंगब्स्.रु ह्स्नद्मद्म स्रह्वद्मरुद्म द्गह्यड्ड ड्ढह्वस्रद्ध द्धष्यद्ध ह्ह्नद्भह् ष्ठ्ठ स्रद्भ ठ्ठद्ध फ्ड्ढ्न क्द्गह्यद्धद्भस्रद्ध द्बभ्'द्मद्मद्यह्व स्रद्मह्य ड्ढद्य क्द्मस्"द्मद्ध/द्म स्रद्ध द्बभ्द्मद्गद्मद्ध.द्मस्रह्द्म द्बद्भ द्बद्दब्ह्य द्दद्ध द्यठ्ठह्यद्द स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ द्वद्यह्वह्य ठ्ठशद्म स्रद्म ब्द्मड्ढद्यह्यड्डद्य द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भह्वह्य शद्मब्द्ध स्रश्वद्बह्वद्ध स्रह्य क्द्मशह्यठ्ठह्व स्रद्मह्य द्भद्मह्यस्र द्भ[द्मद्म स्नद्मद्म्न ह्लष् ;द्द द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;ह्य ह्द्मह्य क्द्मशह्यठ्ठह्व ह्ह्नद्भह् द्भर्िस्रद्भ द्धठ्ठ;द्म फ्;द्म्न ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रह्य स्रह्नद्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग ह्र;द्मद्बस्र :द्ब द्यह्य द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;ह्य ह्द्मह्य ह्लर्द्गंह्वद्ध स्रह्य क्द्धह्द्धद्भष्ठह् क्द्मरुंकऊह्यद्धब्;द्म] द्धरुशंक−ह्लद्भब्स्.रु] ब्ह्यष्ह्वद्मह्व] ड्ढह्लद्भद्म;ब् क्द्मस्द्भ :द्य क्द्मद्धठ्ठ ठ्ठह्य'द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ड्ढद्यद्ध ह्द्भद्द स्रद्ध द्बभ्द्धह्द्धय;द्म द्दह्नर्ड्ढं्न

;द्द ह्द्मह्य ,स्र ठ्ठशद्म स्रह्य स्रह्नद्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग स्रद्ध श्चश्चर्द्मं द्दह्नर्ड्ढं्न ,ह्यब्द्मह्यद्बस्द्धस्नद्मस्र द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्ब)द्धह् द्गह्यड्ड द्बभ्;ह्नु स्रद्ध ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध क्द्ध/द्मस्रद्मड्ड'द्म क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मँ ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्धस्र शह्य द्भद्मह्यफ् स्रद्मह्य ह्व"क स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्मह्य ॥द्मद्ध द्दद्मद्धह्व द्बद्दह्नँश्चद्मह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ स्र॥द्मद्ध&स्र॥द्मद्ध ह्द्मह्य द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्मह्य द्दद्ध द्गद्मद्भ रुद्मब्ह्द्ध द्दस््न क्द्गह्यद्धद्भस्रद्म द्गह्यड्ड द्धद्बहृब्ह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ट्टरुद्मड्ढ,द्धस्नद्मद्धब्ह्व गब्द्मड्ढस्रद्मह्यह्ल* ठ्ठशद्म स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्यस्स्ररु+द्मह्य ह्र;द्धष्ठह् द्गद्मद्भह्य फ्;ह्य्न ळद्मड्डद्य द्गह्यड्ड ट्टरुद्मड्ढ क्द्म;रुह्य,द्धस्नद्मब्* ह्वद्मद्ग ठ्ठशद्म स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ॥द्मद्ध ड्ढद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ द्यस्स्ररु+द्मह्य ह्र;द्धष्ठह् द्गद्भह्य्न

द्धद्बहृब्द्ध ष्द्मद्भ ह्लष् लब्ख् ह्र;द्मद्बस्र :द्ब द्गह्यड्ड क्तस्ब्द्म ह्द्मह्य द्वद्यस्रद्ध द्भद्मह्यस्रस्नद्मद्मद्ग स्रह्य द्धब्, ,स्र द्धह्वद्भद्मह्य/द्मस्र कद्धस्रह्य स्रद्म क्द्मद्धश"स्रद्मद्भ द्दह्नक्द्म्न ड्ढद्य कद्धस्रह्य स्रद्म द्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ ह्ह्यह्लद्ध द्यह्य ह्र;द्मद्बस्र रुह्द्भ द्बद्भ द्वद्ब;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म्न शद्मठ्ठ द्गह्यड्ड द्बह्द्म श्चब्द्म द्धस्र कद्धस्रह्य ह्वह्य लब्ख् स्रद्मह्य ह्द्मह्य द्भद्मह्यस्र द्धठ्ठ;द्म] द्बद्भ द्वद्यस्रह्य द्यड्डफ्द्ध द्यद्मस्नद्मद्ध ठ्ठख्द्यद्भह्य द्भद्मह्यफ्ह्यड्ड द्यह्य 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड क्द्मद्ग=.द्म द्धठ्ठ;द्म द्दस््न कद्धस्रह्य स्रह्य ठ्ठह्न"द्बभ्॥द्मद्मशद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्लद्मँश्चह्वह्य स्रह्य द्धब्, 'द्मद्भद्धद्भ 'द्मद्मद्धरु=;द्मह्यड्ड स्रद्ध ,स्र द्गद्धद्धंकड्डफ् द्यह्यह्वळद्मद्धद्यरुस्रद्मह्य द्गह्यड्ड द्दह्नर्ड्ढं्न ड्ढद्य द्गद्धद्धंकड्डफ् द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म ष्द्मह्यर्रुं स्रह्य क्द्ध/द्मस्रद्मद्भद्ध रुद्मंख- द्भद्मह्वह्ल ह्वह्य स्रद्दद्म द्धस्र ट्टलब्ख् द्यह्य द्धह्लह्ह्वह्य ब्द्मह्यफ् द्गद्भह्यड्डफ्ह्य] द्वद्यद्यह्य ञ्ज;द्मठ्ठद्म ब्द्मह्यफ् ड्ढद्य कद्धस्रह्य स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्गद्भह्यड्डफ्ह्य्न

,ह्यब्द्मस्द्बह्यद्धस्नद्मस्र द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्ब)द्धह् द्यह्य द्धह्वह्ह्वख्ह्ह्व ह्लद्मह्य क्द्मद्धश"स्रद्मद्भ द्दद्मह्यह्ह्य द्भद्दह्य द्दस्] द्वद्यस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ;द्द द्ब)द्धह् ड्ढह्ह्वद्ध द्यद्गक्व) द्दद्मह्य फ्ड्ढ द्दस् द्धस्र द्बभ्द्म;त्न द्य॥द्मद्ध द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध ठ्ठशद्म क्द्मस्द्भ द्वद्बश्चद्मद्भ ड्ढद्यस्रह्य द्बद्मद्य द्गद्मस्ह्लख्ठ्ठ द्दस््न द्बद्भह्ह्न ड्ढद्यस्रह्य द्गख्ब् द्गह्यड्ड स्रह्नहृ ठ्ठद्मह्य"द्म ,ह्यद्यह्य द्दस् ह्लद्मह्य द्भद्मह्यफ् स्रह्य द्गख्ब् स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड द्यह्य ठ्ठख्द्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म द्वद्यस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य स्र"क द्यह्य द्भद्मद्दह् द्धठ्ठब्द्मह्वह्य स्रद्म स्रद्मद्ग क्द्ध/द्मस्र द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्गख्ब् स्रद्मद्भ.द्म स्रद्म द्धह्वशद्मद्भ.द्म द्धस्र;ह्य द्धष्ह्वद्म फ्ब्ह् क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्धशय़द्मह्व स्रद्मह्य क्फ्भ्द्यद्भ द्धस्र;ह्य ह्लद्मह्वह्य स्रद्म द्दद्ध द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्दस् द्धस्र द्भद्मह्यफ्द्मह्यद्बश्चद्मद्भ स्रह्य द्यद्मस्नद्म क्; स्रर्ड्ढं ठ्ठह्न"द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग ॥द्मद्ध द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ शह्य द्भद्मह्यफ् द्यह्य क्द्ध/द्मस्र ?द्मद्मह्स्र द्धद्य) द्दद्मह्यह्ह्य द्दस््न

क्द्म/द्मह्नद्धह्व द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्धशय़द्मह्व ,ह्यद्यद्ध क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मड्ड द्बभ्रुह्ह्नह् स्रद्भह्वह्य द्गह्यड्ड ब्फ्द्म द्दह्नक्द्म द्दस््न ह्लद्मह्य ष्द्धद्गद्मद्भद्ध स्रह्य स्रद्धंकद्म.द्मह्नक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्गद्मद्भह्वह्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म ह्लद्धशह्व द्भम्द्मस्र रुशरुस्नद्म स्र.द्मद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ॥द्मद्ध द्यद्गद्मह्व :द्ब द्यह्य द्गद्मद्भह्द्ध द्दस््न ,ह्यद्यद्ध क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मँ ह्स्;द्मद्भ स्रद्ध ह्लद्म द्भद्दद्ध द्दस् द्धह्लह्वस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ह्व;द्म द्भह्यद्मफ् द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्य ह्लद्मह्वह्य द्यह्य ब्फ्ह्द्म द्दस् द्गद्मह्वद्मह्य द्बह्नद्भद्मह्वद्म द्भद्मह्यफ् श्चब्द्म फ्;द्म द्दह्यद्म्न ;द्द क्चद्धस्र शस्द्यद्म द्दद्ध द्दस् ह्लस्द्यह्य द्धस्र ॥द्मह्यद्धरु+;द्म ॥द्मफ्द्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, 'द्मह्यद्भ स्रद्मह्य ब्द्मस्रद्भ द्धष्क्चद्म द्धठ्ठ;द्म द्दह्यद्म्न ड्ढद्य द्वद्बश्चद्मद्भ द्यह्य ष्ठ;द्म ब्द्म॥द्म द्दह्नक्द्मझ्र ड्ढद्यद्यह्य ह्द्मह्य ;द्द >ख्क्चद्ध द्यद्मड्डक्रशह्वद्म द्दद्ध द्धद्गब्द्ध द्धस्र ॥द्मह्यद्धरु+;द्म श्चब्द्म फ्;द्म ब्ह्यद्धस्रह्व द्वद्यस्रह्य रुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ 'द्मह्यद्भ स्रह्य क्द्म /द्मद्गस्रह्वह्य द्यह्य ॥द्म;द्मह्ह्नद्भ स्रद्मह्य स्रद्दद्मंख द्भद्मद्दह् द्धद्गब्द्ध झ्र द्दद्मह्यह्वद्म ;द्द श्चद्मद्धद्द, स्नद्मद्म द्धस्र द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्धशय़द्मह्व द्भद्मह्यफ् स्रह्य द्गख्ब् स्रद्मद्भ.द्म क्द्यड्ड;द्ग स्रद्मह्य द्भद्मह्यस्रह्वह्य ह्स्नद्मद्म रुशद्मरुद्ध; स्रद्मह्य द्यह्नद्भद्धम्द्मह् द्भ[द्मह्वह्य स्रद्ध द्ध'द्मम्द्मद्म क्द्मस्द्भ ह्र;शरुस्नद्मद्म द्बद्भ ह्लद्मह्यद्भ ठ्ठह्यह्द्म्न ब्ह्यद्धस्रह्व द्दद्मह्य ड्ढद्यस्रद्म द्वंघंकद्म द्दद्ध द्भद्दद्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्यद्ध क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ क्द्मस्"द्मद्ध/द्म क्शह्य"द्म.द्म स्रह्य म्द्मह्य= द्गह्यड्ड द्वद्दद्धड्ड क्द्म/द्मद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ब्ह्यस्रद्भ ह्वर्ड्ढं&ह्वर्ड्ढं [द्मद्मह्यह्लह्य द्दद्मह्य द्भद्दद्ध द्दस् ह्स्नद्मद्म द्धह्वह् ह्व;ह्य ड्ढह्लह्यष्ठ'द्मह्व] स्रस्द्बद्यख्ब् द्धह्वस्रब्ह्ह्य श्चब्ह्य क्द्म द्भद्दह्य द्दस््न

ड्ढद्य क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड द्यह्य ह्क्रस्रद्मब् ह्द्मह्य द्भद्दह् द्धद्गब्ह्द्ध द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्द्ध द्दस्] द्बद्भ शद्मरुह्श द्गह्यड्ड ह्वक्तद्म क्द्मस्"द्मद्ध/द्म द्धशयह्यह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्दद्मह्यह्द्म द्दस्ड्ड द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्मह्य ह्क्रस्रद्मब् क्द्मद्भद्मद्ग द्बद्दह्नँश्चद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, रुद्मंखष्ठंकद्भ ॥द्मद्ध ,ह्यद्यद्ध ठ्ठशद्म, द्धब्[द्म ठ्ठह्यह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ क्द्बह्वद्म /द्म/द्म श्चद्गस्रद्मह्वह्य द्गह्यड्ड ब्फ् ह्लद्मह्ह्य द्दस््न ?द्मद्मंकह्य द्गह्यड्ड ष्ह्यश्चद्मद्भद्म द्भद्मह्यफ्द्ध द्दद्ध द्भद्दह्द्म द्दस््न द्धह्लद्यस्रद्म द्बस्द्यद्म ॥द्मद्ध ह्लद्मह्द्म द्दस्] 'द्मद्भद्धद्भ ॥द्मद्ध [द्मद्भद्मष् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्बख्.र्द्मं द्वद्बश्चद्मद्भ स्रद्ध क्द्म'द्मद्म द्गह्यड्ड ह्वर्ड्ढं ह्वर्ड्ढं ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड ह्स्नद्मद्म ठ्ठब्द्मह्लद्मह्यड्ड स्रह्य ह्लड्डह्लद्मब् द्गह्यड्ड द्वब्>ह्द्म श्चब्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस्

ड्ढद्य द्धरुस्नद्मद्धह् द्बद्भ द्धक्तद्भ द्यह्य द्धशश्चद्मद्भ द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द, ह्लष्द्धस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्/द्मद्म/द्मह्न/द्म द्बभ्द्म;ह्यफ् द्यह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड ठ्ठह्न"द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म द्भद्दह्य द्दस््न क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड द्यह्य द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्द्ध द्दद्मद्धह्व;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य /;द्मह्व द्गह्यड्ड द्भ[द्मद्म ह्लद्मह्वद्म क्द्मश';स्र द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड क्द्धह्वशर्द्म; द्दस््न स्रह्नहृ ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्धश"द्मस्ब्ह्य द्बभ्॥द्मद्मशद्मह्यड्ड स्रद्ध श्चश्चर्द्मं ह्द्मह्य क्द्मद्भश्व॥द्म द्गह्यड्ड स्रद्ध ह्लद्म श्चह्नस्रद्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध स्रर्ड्ढं क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड स्रह्य ठ्ठह्न"द्बभ्॥द्मद्मश द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;ह्य द्दस््न द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्म स्रह्य द्धब्, ह्द्बस्द्धठ्ठस्र द्यह्य ष्श्चद्मश स्र द्धब्, ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ष्द्ध-द्यद्ध-ह्लद्ध- स्रद्म कद्धस्रद्म ब्फ्द्म;द्म ह्लद्मह्द्म द्दस् ड्ढद्य कद्धस्रह्य स्रद्म क्/द्मद्म/द्मह्न/द्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्दद्मह्य द्भद्दद्म द्दस््न ब्ह्यद्धस्रह्व क्॥द्मद्ध ड्ढद्य ष्द्मह् द्धह्व"स्र"र्द्मं ह्वद्दद्धड्ड द्धह्वस्रब् द्यस्रद्म द्दस् द्धस्र ह्द्बस्द्धठ्ठस्र स्रद्म कद्धस्रद्म ब्फ्द्मह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ द्वद्यस्रद्ध द्यश्व॥द्मद्मशह्वद्म द्धह्वद्ध'श्चह् :द्ब द्यह्य द्यद्गद्मढ्ढह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्ध द्दस््न

ड्ढद्य द्धठ्ठ'द्मद्म द्गह्यड्ड क्॥द्मद्ध क्/द्मह्यद्भह्य द्गह्यड्ड कंकद्मह्यब्ह्वह्य स्रह्य द्यद्गद्मह्व द्दद्ध द्बभ्;द्मह्यफ् श्चब् द्भद्दह्य द्दह्य्न द्धक्तद्भ ॥द्मद्ध ड्ढद्य कद्धस्रह्य स्रद्मह्य द्धह्वद्भद्मद्बठ्ठ ह्वद्दद्धड्ड स्रद्दद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म्न द्धष्भ्कह्यह्व स्रह्य रुशद्मरुस्न; द्ग=द्मब्; स्रद्ध द्गह्यद्धरुस्रब् द्गह्यद्गद्मह्यंकह्यरुद्ग यद्गद्मड्डस्र 324 द्गह्यड्ड रुद्ब"क् स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र शद्ध-द्यद्ध-ह्लद्ध- स्रद्म कद्धस्रद्म द्दद्मद्धह्व द्भद्धद्दह् द्दस्] ड्ढद्य ष्द्मह् स्रद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं द्धह्वद्ध'श्चह् फ्द्मद्भंकद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न ड्ढद्यद्ध क्द्मस्"द्मद्ध/द्म स्रह्य द्धश'द्मह्य"द्मय़ रुद्म- स्रह्य ह्वद्मह्यद्धशब् ह्वह्य क्द्बह्वद्ध द्बह्नरुह्स्र ट्टट्टष्द्ध-द्यद्ध-ह्लद्ध- ष्ह्यष्ठद्यह्वह्य'द्मह्व स्न;द्मह्यद्भद्ध ,.रु द्बभ्ह्यद्धष्ठंकद्य** द्गह्यड्ड क्ह्वह्यस्र द्बभ्;द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्धह्व"स्र"र्द्मं ठ्ठह्यह्ह्य द्दह्न, द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रह्य क्तब्रुश:द्ब ह्द्बस्द्धठ्ठस्र द्यह्य द्बख्द्भद्ध ह्द्भद्द हृह्नंकस्रद्मद्भद्म द्बद्म द्यस्रह्वद्म ह्द्मह्य द्यड्डद्धठ्ठंग/द्म द्दस् द्दद्ध द्वद्यस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्धस्रह्ह्वद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्दद्ध फ्द्मँक्चह्य द्व॥द्मद्भ क्द्मह्वद्म] ?द्मद्मश द्दद्मह्य ह्लद्मह्वद्म] ॥द्मद्धह्द्भद्ध क्तद्मह्यरुद्म द्धह्वस्रब्ह्वद्म ह्लस्द्यद्ध ठ्ठह्नत्न[द्मठ्ठ द्बभ्द्धह्द्धय;द्म,ह्यड्ड ठ्ठह्य[द्मद्ध फ्ड्ढ द्दस््न रुद्मंख- ह्वद्मह्यद्धशब् ह्वह्य श्चह्यश्चस्र स्रह्य कद्धस्रद्मह्यड्ड स्रह्य ष्द्मद्भह्य द्गह्यड्ड ॥द्मद्ध द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्यह्य ब्फ्द्मह्वह्य स्रह्य ष्द्मठ्ठ ॥द्मद्ध द्धह्वद्ध'श्चह् :द्ब द्यह्य ;द्द ह्वद्दद्धड्ड स्रद्दद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस् द्धस्र श्चह्यश्चस्र द्धक्तद्भ ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यफ्द्ध्न

ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्बभ्श्चद्धब्ह् क्द्मस्"द्मद्ध/द्म;द्मह्यड्ड त्त्द्मद्भद्म द्भद्मह्यफ् द्बद्भ द्धह्व;=.द्म द्यड्ड'द्म;द्मरुद्बठ्ठ ह्द्मह्य द्दस् द्दद्ध] ड्ढद्यस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड ठ्ठह्न"द्बभ्॥द्मद्मश ॥द्मद्ध द्दद्मह्यह्ह्य ठ्ठह्य[द्मह्य फ्;ह्य द्दस््न ,द्धरुद्बद्धंकह्व क्द्मस्द्भ द्बह्यह्वद्धद्यद्धब्ह्व स्रद्म ड्ढह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्लद्मह्य क्/द्मद्म/द्मह्न/द्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म ह्लद्म द्भद्दद्म द्दस् द्वद्यस्रह्य द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गद्मह्यड्ड स्रह्य द्यश्वष्/द्म द्गह्यड्ड द्धष्भ्द्धंक'द्म द्गह्यद्धरुस्रब् ,द्यद्मह्यद्धद्य;ह्य'द्मह्व स्रह्य द्यठ्ठरुद्मह्यड्ड ह्वह्य द्धश्चह्द्म ह्र;ष्ठह् स्रद्ध द्दस््न द्बह्यह्वद्धद्यब्ह्व स्रह्य ह्र;शद्दद्मद्भ द्यह्य ह्द्मह्य ड्ढह्ह्वद्ध क्द्ध/द्मस्र ठ्ठह्न?र्द्मंकह्वद्म, ?द्मंकह्द्ध ठ्ठह्य[द्मद्ध फ्ड्ढ द्धस्र क्ष् द्वह्वस्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्म द्बर्ख्शं द्बद्भद्धम्द्म.द्म द्धस्र;ह्य द्धष्ह्वद्म ह्वद्दद्धड्ड द्धस्र;द्म ह्लद्मह्द्म्न द्धष्भ्द्धंक'द्म द्गह्यद्धरुस्रब् ,द्यद्मह्यद्धद्य;ह्य'द्मह्व स्रह्य रुद्म- द्दह्यद्धश्चद्य ह्वह्य ,ह्यब्द्मह्यद्बस्द्धस्नद्मस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्दद्मद्धह्वस्रद्मद्भस्र द्बद्धद्भ.द्मद्मद्गद्मह्यड्ड स्रद्ध श्चश्चर्द्मं स्रद्भह्ह्य द्दह्न, ;द्दद्मँ ह्स्र स्रद्दद्म द्दस् द्धस्र द्धह्वह् ह्व;ह्य ह्वद्मद्गद्मह्यड्ड द्यह्य द्धह्वस्रब्ह्वह्य शद्मब्द्ध ड्ढह्व क्शद्मड्डहृह्वद्ध; ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्भद्मह्यस्रह्वह्य स्रह्य द्धब्, ष्ठ;द्मड्डह्य ह्वद्दद्धड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं द्बभ्;द्मद्य द्धस्र;ह्य ह्लद्म द्भद्दह्य द्दस् झ्र

द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्धश'द्मह्य"द्मय़ ॥द्मद्ध ,ह्यब्द्मह्यद्बस्द्धस्नद्मस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्/द्मद्म/द्मह्न/द्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्यह्य द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य [द्मह्द्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्बभ्द्धह् द्धश्चद्धह्ह् द्दस््न द्धद्बहृब्ह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ट्टट्टद्धष्भ्द्धंक'द्म द्गह्यद्धरुस्रब् ह्लह्वद्भब्** द्गड्डह्य ,स्र द्बभ्द्धद्य) शस्य़द्मद्धह्वस्र स्रद्म क्ह्वह्न॥द्मश हृद्बद्म स्नद्मद्म द्धस्र ट्टंकह्यंकऊद्मद्यद्मड्ढद्धष्ठब्ह्व* शफ् स्रद्ध ,ह्यंकद्ध ष्द्म;द्मह्यद्धंकस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्बभ्;द्मह्यफ् द्यह्य ,स्र ष्द्मद्भ स्रह्नहृ द्भद्मह्यद्धफ्;द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्लद्ध॥द्म द्बद्भ ष्द्मब् द्वफ् क्द्म;ह्य्न द्वह्वह्वह्य द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्म क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध द्वद्बठ्ठभ्श द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न रुद्मष्ठंकद्भद्ध द्बद्ध=स्रद्म ब्द्मद्यह्यंक द्गह्यड्ड ,स्र द्यद्गद्मश्चद्मद्भ हृद्बद्म द्दस् द्धस्र द्धस्रद्यद्ध द्धस्रद्यद्मह्व ह्वह्य क्द्बह्वद्ध फ्द्म; स्रद्मह्य द्भद्मह्यफ्द्गह्नु द्भ[द्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, ठ्ठद्मह्य श"र्द्मं ह्स्र द्बह्यद्यब्द्धह्व स्रह्य ड्ढह्लह्यष्ठ'द्मह्व द्धठ्ठ;ह्य ड्ढद्यस्रह्य द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग रुश:द्ब द्वद्यस्रद्म ठ्ठख्/द्म द्धश"द्मद्मु द्दद्मह्य फ्;द्म द्धस्र द्वद्यह्य द्बद्धह्वह्य शद्मब्ह्य श्चर्द्गंद्भद्मह्यफ् स्रह्य द्ध'द्मस्रद्मद्भ द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्य्न

द्बद्मह्यद्धब्;द्मह्य द्धह्वद्भद्मह्य/द्म कद्धस्रह्य स्रद्म क्द्मद्धश"स्रद्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, स्रह्वद्मरुद्म स्रह्य कद्मह्यंकह्यंकद्मह्य द्धश'शद्धशस्त्रद्मब्; द्गह्यड्ड ष्ठ्ठद्भद्मह्यड्ड द्बद्भ द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;ह्य फ्;ह्य्न ड्ढद्य द्बभ्;द्मह्यफ् स्रह्य द्धब्, 18 द्दह्लद्मद्भ ष्ठ्ठद्भद्मह्य स्रद्मह्य श्चह्नह्वद्म फ्;द्म्न द्बभ्;द्मह्यफ् स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व ष्ह्यश्चद्मद्भह्य द्य॥द्मद्ध ष्ठ्ठद्भ द्गद्मद्भह्य फ्;ह्य्न ड्ढद्यस्रह्य ष्द्मठ्ठ ?द्मद्मह्यरुह्य] द्धश्चश्वद्बह्लद्ध क्द्मस्द्भ द्गह्नफ्द्ध स्रह्य ष्क्कश्चद्मह्यड्ड द्बद्भ द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म फ्;द्म ह्द्मद्धस्र द्बद्मह्यद्धब्;द्मह्य स्रद्म स्रद्मह्यर्ड्ढं स्रद्मद्भफ्द्भ कद्धस्रद्म द्धह्वस्रद्मब्द्म ह्लद्म द्यस्रह्य्न द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग ह्द्मह्य स्रह्नहृ ह्वद्दद्धड्ड द्धह्वस्रब्द्म] द्गद्मस्ह् स्रह्य द्गह्नँद्द द्गह्यड्ड द्वद्दह्यड्ड ॥द्मद्ध ह्लद्मह्वद्म द्बरु+द्म्न

द्धक्तब्द्मह्यरुद्धरुस्र;द्म स्रह्य रुद्म- द्भद्मशंर्कं शद्मड्ढह्ल क्द्बह्वह्य द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्मस्रद्ध; क्ह्वह्न॥द्मशद्मह्यड्ड स्रह्य ष्द्मठ्ठ ड्ढद्य द्धह्व"स्र"र्द्मं द्बद्भ द्बद्दह्नँश्चह्य द्दस् द्धस्र द्यंघक्तद्मरुऊफ् क्द्मस्द्भ ,कद्ध ष्द्म;द्मह्यद्धंकस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य स्रह्यशब् द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म छ्वह्य.द्मद्ध स्रह्य स्रद्धंकद्म.द्मह्न ह्व"क द्दद्मह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस््न द्धस्रह्ह्न द्वह्वस्रह्य द्बभ्;द्मह्यफ् द्यह्य रुंकह्यद्धक्तब्द्धस्रद्मह्यष्ठद्य ह्लद्मद्धह् स्रह्य [द्मह्द्भह्वद्मस्र स्रद्धंकद्म.द्मह्न द्वनद्मह्यद्धह्लह् द्दद्मह्यस्रद्भ क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध ष्ब्शद्मह्व ष्ह्व ह्लद्मह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ द्बद्दब्ह्य द्यह्य क्द्ध/द्मस्र द्दद्मद्धह्व द्बद्दह्नँश्चद्मह्ह्य द्द्न रुद्मष्ठंकद्भ द्गह्यद्धब्द्धशह्व स्रद्धस्नद्म स्रद्ध द्बह्नरुह्स्र ट्टट्टह्वद्भस्र ह्लद्मह्वह्य स्रद्म द्यद्ध/द्मद्म द्भद्मरुह्द्म** द्बह्नरुह्स्र द्गह्यड्ड द्यद्बभ्द्गद्म.द्म ड्ढद्य द्यश्व॥द्मद्मशह्वद्म स्रद्म द्बभ्द्धह्द्बद्मठ्ठह्व द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस्] द्बद्ध ष्द्मह्लद्मद्भ स्रह्य द्धष्स्रह्वह्य शद्मब्ह्य क्ह्व] क्तब्] 'द्मद्मस्र] ठ्ठख्/द्म] श्चद्धह्वद्ध क्द्मद्धठ्ठ द्बठ्ठद्मस्नद्मद्मर्ह्यं स्रद्ध स्रद्धंकद्म.द्मह्न द्भद्धद्दह् ष्ह्वद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्वह्व द्बद्भ स्रर्ड्ढं ह्द्भद्द स्रद्ध ठ्ठशद्म, द्धहृरुस्रद्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस््न ड्ढद्य द्धश"द्मद्मु द्धहृरुस्रद्मश स्रद्ध द्गद्म=द्म स्नद्मद्मह्यरुद्ध द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ ॥द्मद्ध द्गह्वह्न"; 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्य क्ह्वह्यस्र द्धश—द्धह्;द्मँ द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्द्ध द्दस् क्द्मह्यद्भ ड्ढद्दह्य द्धष्ह्वद्म द्धहृरुस्रह्य ह्लद्मह्य द्दद्मद्धह्व द्दद्मह्य द्यस्रह्द्ध स्नद्मद्ध द्वद्यद्यह्य ॥द्मद्धक्द्ध/द्मस्र द्दद्मद्धह्व स्रद्भ द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्द्ध द्दस्ड्ड ह्लर्द्गंह्वद्ध स्रद्मह्य क्तद्मह्यरुद्भब्क्तख्रु ब्ह्यष्द्मह्यद्भह्यंकद्भद्ध स्रह्य क्/;म्द्म द्बभ्द्मह्य- शद्मंघंकद्भ द्यद्यद्ध ह्स्नद्मद्म क्; रुद्मंखष्ठंकद्भद्मह्य स्रद्म स्रस्नद्मह्व द्दस् द्धस्र ड्ढद्य द्भद्मद्यद्म;द्धह्वस्र द्यद्धश्वद्गछ्व.द्म स्रद्म द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग ,ह्यद्यद्ध क्ठ्ठ−॥द्मह्नह् ष्द्धद्गद्मद्धद्भ;द्मँ द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म द्यस्रह्द्म द्दस्] द्धह्लह्वस्रद्म द्धह्वठ्ठद्मह्व क्द्मस्द्भ स्रद्मद्भ.द्म द्यद्ग> द्बद्मह्वद्म ॥द्मद्ध क्द्यश्व॥द्मश द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न द्गद्मड्डद्य शक्वद्ध) स्रह्य द्धब्, द्ब'द्मह्नक्द्मह्यड्ड स्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य ड्ढह्लह्यष्ठ'द्मह्व ब्फ्द्म;ह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड द्वद्य द्गद्मड्डद्य स्रद्म द्बभ्॥द्मद्मश ह्वद्बह्नद्यड्डस्रह्द्म ह्लस्द्यह्य द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ,ह्यद्यद्धद्ध क्ह्वह्यस्र ?द्मंकह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्गद्मश्चद्मद्भ स्रह्वद्मरुद्म स्रह्य स्रर्ड्ढं क्[द्मष्द्मद्भद्मह्यड्ड द्गह्य द्बभ्स्रद्मद्ध'द्मह् द्दह्न, द्दस््न

टद्बद्भ क्द्म/द्मह्नद्धह्वस्र ,ह्यब्द्मह्यद्बस्द्धस्नद्मस्र ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य स्नद्मद्मह्यरु+ह्य द्यह्य द्धशशद्भ.द्म द्दद्ध द्धठ्ठ;ह्य फ्;ह्य द्दस्] ह्लद्मह्य क्द्म;ह्य द्धठ्ठह्व क्द्मस्"द्मद्ध/द्म द्धशस्त्रद्म स्रह्य क्तब्रुश:द्ब ष्रु+द्ध द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड द्वक्रद्बह्वह्व द्दद्मह्य द्भद्दह्य द्दस््न क्द्मश';स्र ह्द्मह्य ;द्दद्ध द्दस् द्धस्र द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म द्धशय़द्मह्व स्रद्म क्द्म/द्मद्मद्भ ष्ठ्ठब् ह्लद्म; क्द्मह्यद्भ द्भद्मह्यफ् स्रह्य द्गख्ब् स्रद्मद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्व"क स्रद्भह्वह्य द्बद्भ /;द्मह्व द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म;्न ;द्द शस्य़द्मद्धह्वस्रस्रद्मह्यड्ड स्रद्म स्रह्ह्र; द्दस््न र्द्यशंद्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म स्रद्मह्य ह्द्मह्य ड्ढद्य ष्द्मह् स्रद्म /;द्मह्व द्भ[द्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्धह्वद्भद्मह्यफ् द्भद्दह्वह्य स्रह्य द्धब्, ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड द्बद्भ द्धह्व॥र्द्मंद्भ द्भद्दह्वह्य स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म द्बभ्द्म—द्धह्स्र ह्लद्धशह्वश्च;र्द्मं क्द्बह्वद्मह्वह्य द्बद्भ क्द्ध/द्मस्र ष्ब् द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म; क्द्मस्द्भ ठ्ठशद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म क्/द्मद्म/द्मह्न/द्म द्बभ्;द्मह्यफ् ष्ठ्ठ द्धस्र;द्म ह्लद्म;्न


कबिरा चिहृ बावरी, ताते नास-बिनास

ठ्ठद्य ड्ढद्धठ्ठभ्; क्द्मस्द्भ ,स्र द्गह्व शद्मब्ह्य द्गह्वह्न"; द्गह्यड्ड ड्ढह्व द्य॥द्मद्ध द्वद्बस्रद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रह्य द्बक्वस्नद्मस्र&द्बक्वस्नद्मस्र स्रर्द्म; म्द्मह्य= द्धह्व/द्मर्द्मंद्धद्भह् द्दस््न द्बभ्क्र;ह्यस्र ड्ढद्धठ्ठभ्; क्द्बह्वद्म स्रद्ग द्यश्वद्दद्मब्ह्द्ध द्दस््न क्द्मस्द्भ द्बभ्द्म;त्न द्य॥द्मद्ध स्रह्य द्बद्मद्य ,स्र&,स्र द्धश॥द्मद्मफ् द्दस््न द्धह्लस द्दद्ध ,स्र ,ह्यद्यद्ध ड्ढद्धठ्ठभ्; द्दस्] द्धह्लद्यह्य ठ्ठद्मह्य द्धश"द्म; द्धद्गब्ह्य द्दस् ,स्र द्भद्यह्वद्म] ठ्ठख्द्यद्भद्म शद्म.द्मद्ध्न ड्ढह्व ठ्ठद्मह्य द्धश"द्म;द्मह्यड्ड स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ द्वद्यह्य य़द्मह्वह्यद्धठ्ठभ्; क्द्मस्द्भ स्रद्गर्ह्यंद्धठ्ठभ्; ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्य द्यड्डय़द्म, ठ्ठद्ध फ्ड्ढ द्दस््न द्धह्लसद्म स्रद्मह्य ठ्ठद्मह्यद्दद्भद्म स्रर्द्म; स्रद्भह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न ठ्ठद्मह्यद्दद्भद्म ठ्ठद्मद्ध;क्रश द्यश्वद्दद्मब्ह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस््न ड्ढद्यद्धब्, द्वद्यस्रद्म द्गद्दक्रश ॥द्मद्धक्; ड्ढद्धठ्ठ;द्मँ स्रद्ध क्द्बह्यम्द्मद्म क्द्ध/द्मस्र द्दस््न द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्म स्रह्य द्धब्, 'द्मद्भद्धद्भ रुशद्मरुद्ध; स्रद्मह्य द्दद्ध ब्ह्य्न रुशद्मरुस्न; स्रद्मह्य ष्ह्वद्मह्वह्य ;द्म द्धष्फ्द्मरु+ह्वह्य द्गह्यड्ड ह्लद्ध॥द्म द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं रुस्नद्मद्मह्व द्भ[द्मह्द्ध द्दस्ड्ड क्क्कहृह्य रुशद्मरुस्न; स्रह्य द्धब्, द्यश्व;स्र− छ्वद्ग क्द्मस्द्भ द्यश्वष्स्र− द्धशछ्वद्मद्ग द्धह्लह्ह्वद्म क्द्मश';स्र द्दस्] द्वद्यद्यह्य ॥द्मद्ध ञ्ज;द्मठ्ठद्म स्रद्दद्ध द्यश्व;स्र− क्द्मद्दद्मद्भ स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्म द्बरु+ह्द्ध द्दस््न द्ब;र्द्मंढ्ढह् द्बद्धद्भछ्वद्ग द्धस्र;द्म ह्लद्म; क्द्मस्द्भ द्धशछ्वद्मद्ग स्रद्ध द्यद्गह्नद्धश्चह् :द्ब द्यह्य द्धब्;द्म ह्लद्म;] ब्ह्यद्धस्रह्व ;द्धठ्ठ [द्मद्मह्वद्बद्मह्व स्रद्म द्यड्ड;द्ग ह्व द्भ[द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य रुशद्मरुस्न; ष्ह्वह्वह्य ;द्म द्यह्नद्भद्धम्द्मह् द्भद्दह्वह्य स्रद्मह्य क्द्म'द्मद्म /द्मख्द्धद्गब् द्दद्ध द्भद्दह्यफ्द्ध्न

'द्मद्भद्धद्भ द्धह्वशर्द्मंद्द ;द्म रुशद्मरुस्न; द्यड्डद्भम्द्म.द्म स्रह्य द्धब्, द्धह्लह्ह्वद्ध द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड ॥द्मद्मह्यह्लह्व स्रद्ध क्द्मश'स्र;ह्द्म द्भद्दह्द्ध द्दस्] ब्द्मह्यफ् द्बभ्द्म;त्न द्वद्यद्यह्य क्द्ध/द्मस्र द्दद्ध [द्मद्म ब्ह्यह्ह्य द्दस््न द्बद्मह्य"द्म.द्म क्द्मस्द्भ द्यद्गह्नद्धश्चह् क्द्मश';स्र 'द्मद्धष्ठह् द्बभ्ठ्ठद्मह्व स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य [द्मद्मस्त्र&द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं क्द्मद्यद्मह्वद्ध द्यह्य द्धद्गब् ह्लद्मह्ह्य द्दस््न ब्ह्यद्धस्रह्व ब्द्मह्यफ् रुशद्मठ्ठ स्रह्य श'द्मद्ध॥द्मख्ह् द्दद्मह्यस्रद्भ [द्मद्मस्त्र&क्[द्मद्मस्त्र क्द्मस्द्भ द्गँद्दफ्ह्य&द्यरुह्ह्य स्रर्ड्ढं ह्द्भद्द स्रह्य ॥द्मद्मह्यह्लह्व स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस््न ह्लह्द्धशह्व द्धह्वशर्द्मंद्द स्रह्य द्धब्, द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म क्द्मह्यद्भ द्यरुह्ह्य ॥द्मद्मह्यह्लह्व द्यह्य द्दद्ध स्रद्मद्ग श्चब् ह्लद्मह्द्म द्दस््न द्वद्यह्य ह्ह्य;द्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, ह्र;स्नर्द्मं स्रह्य कड्डंक&?द्म.क ॥द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड स्रद्भह्वह्य द्बरु+ह्ह्य्न ब्ह्यद्धस्रह्व ;द्द रुशद्मठ्ठ द्दद्ध द्दस् द्धह्लद्यस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ब्द्मह्यफ् क्क्कहृद्ध&॥द्मब्द्ध [द्मद्मस्त्र द्यद्मद्गफ्भ्द्ध स्रद्मह्य द्धद्गर्श्चं&द्गद्यद्मब्ह्य ह्ह्यब् क्द्मस्द्भ ?द्मद्ध द्गह्य ह्ब्द्म&फ्ब्द्म स्रद्भ क्[द्मद्मस्त्र ष्ह्वद्म ब्ह्यह्ह्य द्दस्

;द्धठ्ठ रुशद्मठ्ठ स्रह्य श्चष्ठस्रद्भ द्गह्यड्ड ह्व द्बरु+ह्य ह्लद्म; क्द्मस्द्भ द्वद्बब्ष्ट/द्म [द्मद्मस्त्र द्यद्मद्गफ्भ्द्ध स्रद्मह्य द्वद्यस्रह्य द्बभ्द्म—द्धह्स्र :द्ब द्गस्ड्ड द्दद्ध फ्भ्द्द.द्म द्धस्र;द्म ह्लद्म;ह्य ह्द्मह्य द्यद्भब्ह्द्म द्यह्य रुशद्मरुस्नद्म स्रद्मह्य ष्ह्वद्म;ह्य द्भद्दद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ॥द्मद्मद्भह्द्ध; ;द्मह्यद्धफ्;द्मह्य ह्वह्य ड्ढद्यद्धद्धब्, द्यद्म/द्मह्वद्म द्गह्यड्ड द्यड्ड;द्ग स्रद्मह्य द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं रुस्नद्मद्मह्व द्धठ्ठ;द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्यद्गह्यड्ड ॥द्मद्ध रुशद्मठ्ठ द्यड्ड;द्ग द्बद्भ क्द्मस्द्भ क्द्ध/द्मस्र ष्ब् द्धठ्ठ;द्म फ्;द्म द्दस् रुशद्मठ्ठ स्रह्य ष्द्मस्रद्भ.द्म द्दद्ध ब्द्मह्यफ् [द्मद्मस्त्र द्बठ्ठद्मस्नद्मद्मर्ह्यं स्रह्य द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध क्ड्ड'द्म ह्व"क स्रद्भ ठ्ठह्यह्ह्य द्दस््न ह्स्नद्मद्म स्रह्यशब् द्धह्वत्नद्यक्रश] क्ह्वह्नद्ब;द्मह्यफ्द्ध ॥द्मद्मह्यञ्ज; द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं द्दद्ध [द्मद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, ष्श्चद्म द्भद्दह्द्म द्दस््न

रुद्मशद्मरुस्न; द्भम्द्मद्म स्रद्म द्बद्दब्द्म क्द्मस्द्भ द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं द्यख्= द्दस् रुशद्मठ्ठ स्रह्य द्धब्, ह्वद्दद्धड्ड रुशद्मरुस्न; क्द्मस्द्भ द्बद्मह्य"द्म.द्म स्रह्य द्धब्, ॥द्मद्मह्यह्लह्व्न ;द्द द्यख्= ह्॥द्मद्ध द्य/द्म द्यस्रह्द्म द्दस् ह्लष्द्धस्र रुशद्मठ्ठह्यद्धठ्ठभ्; स्रह्य ह्द्मस्द्भ द्बद्भ द्धह्लसद्म स्रद्म द्यड्ड;द्ग द्धस्र;द्म ह्लद्म;्न [द्मंक−कद्म] द्गद्धक्चद्म] ह्द्धह्द्म] श्चद्भद्बद्भद्म क्द्मद्धठ्ठ स्रर्ड्ढं ह्द्भद्द स्रह्य रुशद्मठ्ठ द्दद्मह्यह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ ड्ढह्व द्यशद्मठ्ठद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य द्यष्स्रद्ध क्द्बह्वद्ध&क्द्बह्वद्ध द्बद्यठ्ठ द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न क्द्बह्वद्ध द्बद्यठ्ठ स्रह्य रुशद्मठ्ठ स्रद्म द्भद्य ब्ह्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, ब्द्मह्यफ् क्द्मश';स्रह्द्म क्द्मस्द्भ द्वद्ब;द्मह्यद्धफ्ह्द्म स्रद्ध द्वद्बह्यम्द्मद्म स्रद्भ ठ्ठह्यह्ह्य द्दस््न ह्स्नद्मद्म क्[द्मद्मस्त्र क्द्मस्द्भ ठ्ठह्न"द्बद्मक्क; ॥द्मद्मह्यह्लह्व फ्भ्द्द.द्म स्रद्भह्ह्य द्दस््न ड्ढद्यद्ध द्यह्य ह्द्भद्द&ह्द्भद्द स्रह्य द्भद्मह्यफ्] ठ्ठह्नष्ब्ह्द्म क्द्मस्द्भ रुशद्मरुस्न; द्धशस्रद्मद्भद्मह्य स्रद्म ह्लद्ग द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्धस्रद्यद्ध क्द्मद्दद्मद्भ 'द्मद्मरु=द्ध ह्वह्य ड्ढद्य द्यठ्ठ॥र्द्मं द्गह्यड्ड द्वद्धश्चह् द्दद्ध स्रद्दद्म द्दस् द्धस्र द्गह्वह्न"; क्द्बह्वद्ध ह्लद्ध॥द्म द्यह्य द्दद्ध द्यद्ग; स्रह्य द्बर्ख्शं रुश;ड्ड क्द्बह्वद्ध स्रष्भ् [द्मद्मह्यठ्ठह्द्म द्दस् ;द्द द्वद्धु क्म्द्मद्भ'द्मत्न द्यक्र; द्दस््न रुशद्मठ्ठ द्धब्ढ्ढद्यद्म क्द्मस्द्भ ॥द्मद्मह्यह्लह्व स्रद्म द्बद्मह्य"द्मद्म स्रह्य द्धब्, ह्वद्दद्धड्ड द्भद्यद्मरुशद्मठ्ठह्व स्रह्य द्धब्, द्धह्व/द्मर्द्मंद्भ.द्म द्दद्ध शद्द स्रद्मद्भ.द्म द्दस्] द्धह्लद्यस्रह्य श'द्मद्ध॥द्मख्ह् द्दद्मह्यस्रद्भ द्गह्वह्न"; क्द्बह्वद्म ष्द्दह्नद्गख्घ; रुशद्मरुस्न; फ्शद्मह्द्म क्द्मस्द्भ ह्व"क स्रद्भह्द्म द्दस््न

य़द्मह्वह्यद्धठ्ठभ्; स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड ह्लद्ध स्रद्म स्रर्द्म; द्भद्य फ्भ्द्द.द्म स्रद्भह्वद्म द्दस् ह्द्मह्य स्रद्गर्ह्यंद्धठ्ठभ्; स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड ह्लद्ध॥द्म ष्द्मह्यब्ह्वह्य] ह्र;शद्दद्मद्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्म स्रद्मद्ग स्रद्भह्द्ध द्दस््न ठ्ठख्द्यद्भह्य ह्र;द्धु;ह्यद्म द्यह्य क्क्कहृह्य ष्ह्नद्भह्य द्यश्वष्/द्म स्रह्यशब् ह्लद्ध॥द्म स्रह्य त्त्द्मद्भद्म द्दद्ध ष्ह्वह्ह्य द्दस््न ,स्र द्दद्ध ष्द्मह् स्रद्मह्य ठ्ठद्मह्य ,ह्यद्यह्य द्ध॥द्मह्व&द्ध॥द्मह्व द्धद्बस्ररुह्द्म शंघ—".द्मत्न द्बद्भद्ग:.द्म;द्म द्ब'श्चद्धह् ठ्ठक्व'द्मद्म

द्बद्भद्मद्बक्र;ठ्ठ−शह्य"द्मद्ध रुशद्यह्नह्द्गद्धद्ब ह्वद्मह्य द्बद्मब्;द्धह् ;त्न्न

;म्द्मद्मस्नर्द्मं ;द्मह्यकद्गद्ध"द्मद्मड्ड द्यस्रब् ह्लफ्ह्द्मड्ड शब्॥द्म ह्द्गद्मह्यड्ड

ह्व ठ्ठद्मह्य"द्मद्म फ्.;ह्ह्य [द्मब्ह्न द्ग/द्मह्नद्भ शद्मश्चद्मड्डष्ठशद्धश्चठ्ठद्धद्ब्न्न

क्स्नद्मर्द्मंह्− & स्रद्मह्य;ब् स्रद्मह्य ठ्ठह्य[द्मद्मह्य] 'द्मष्ठब् द्यह्य ,स्रठ्ठद्ग स्रद्मब्द्ध ब्ख्कद्ध] क्द्मँ[द्मह्य द्दद्गह्य'द्मद्म ब्द्मब्] ठ्ठख्द्यद्भह्य द्बद्धम्द्म;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्यह्द्मह्व द्यह्य------- स्रद्भह्वह्य शद्मब्द्ध क्द्मस्द्भ क्द्बह्वद्ध द्यह्द्मह्व स्रद्म ॥द्मद्ध द्बद्मब्ह्व ह्व स्रद्भह्वह्य शद्मब्द्ध] द्धक्तद्भ ॥द्मद्ध द्धह्लद्यह्य ठ्ठह्य[द्मद्मह्य शद्दद्ध द्वद्यह्य द्बभ्ह्यद्ग द्यह्य रुद्गद्भ.द्म स्रद्भह्द्म द्दस् द्यश्च ह्द्मह्य ;द्द द्दस् द्धस्र द्धह्लद्यस्रद्ध शद्म.द्मद्ध द्गह्यड्ड द्गद्म/द्मर्ह्न; द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्वह्वस्रह्य ठ्ठद्मह्य"द्मद्मह्य स्रद्मह्य ॥द्मद्ध ब्द्मह्यफ् ॥द्मख्ब् ह्लद्मह्ह्य द्दस््न

क्चफ्] ष्ह्यर्ड्ढंद्गद्मह्व] /द्मर्ख्ह्] ॥द्मभ्"कद्मश्चद्मद्भद्ध] ह्र;द्मद्बद्मद्भद्ध] ह्र;शद्यद्म;द्ध] ,ह्लह्यंक क्द्मस्द्भ क्;द्म; ब्द्मह्यफ् शद्म.द्मद्ध स्रह्य त्त्द्मद्भद्म] शद्मह्द्मब्द्मद्ब स्रह्य त्त्द्मद्भद्म द्दद्ध ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्यह्य क्द्बह्वद्म स्रद्मद्ग द्धह्वस्रद्मब्ह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ ॥द्मद्धह्द्भ स्रद्म स्रह्नद्धंकब् ॥द्मद्मशह्वद्म द्भद्दह्ह्य द्दह्न, ॥द्मद्ध द्धह्लह्वद्यह्य द्यश्वद्बर्स्रं स्रद्भह्ह्य द्दस्] द्वद्दह्य शद्मह्द्मब्द्मद्ब त्त्द्मद्भद्म ड्ढद्य ह्द्भद्द द्बभ्॥द्मद्मद्धशह् स्रद्भ ब्ह्यह्ह्य द्दस् द्धस्र द्वह्वस्रद्म द्गड्डह्ह्र; द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दद्ध ष्ह्वह्द्म द्दस् ह्लष् ष्ह्नद्भह्य द्वठ्ठ−ठ्ठह्य';द्मह्यड्ड स्रद्ध द्बख्द्धह् स्रह्य द्धब्, द्धस्र;द्म फ्;द्म द्यश्वद्बर्स्रं ॥द्मद्ध द्गद्म= शद्मह्द्मब्द्मद्ब क्द्मस्द्भ द्ग/द्मह्नद्भ शद्म.द्मद्ध त्त्द्मद्भद्म द्यक्तब् द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्म द्दस् ह्द्मह्य ड्ढद्यस्रद्म स्रद्मह्यर्ड्ढं स्रद्मद्भ.द्म ह्वद्दद्धड्ड द्दस् द्धस्र ह्र;द्धुक्रश स्रह्य द्धशस्रद्मद्य द्गह्यड्ड द्ग/द्मह्नद्भ शद्मह्द्मब्द्मद्ब द्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं द्यद्दद्म;ह्द्म ह्वद्दद्धड्ड द्धद्गब्ह्य्न

द्यश्च ह्द्मह्य ;द्द द्दस् द्धस्र द्ग/द्मह्नद्भ ॥द्मद्म"द्मद्ध ह्र;द्धु द्दद्ध क्; ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्यद्गद्मह्ल द्गह्यड्ड ब्द्मह्यस्रद्धद्बभ्; ष्ह्वह्ह्य द्दस् ह्स्नद्म ठ्ठख्द्यद्भद्मह्य द्यह्य ष्द्मठ्ठद्भ श छ्व)द्म द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भह्ह्य द्दस््न क्क्कहृह्य द्वठ्ठ−ठ्ठह्य'; द्यह्य] द्यठ्ठ−॥द्मद्मशह्वद्म द्भ[द्मह्ह्य द्दह्न, ॥द्मद्ध द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य स्रंकह्न ;द्म स्रर्स्रं'द्म शश्चह्व स्रद्दह्य ह्लद्म, ह्द्मह्य क्द्बह्यद्धम्द्मह् द्बभ्॥द्मद्मश द्बरु+ह्वह्य स्रह्य रुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ ष्द्भद्म द्बभ्॥द्मद्मश द्दद्ध द्बरु+ह्द्म द्दस््न ह्वद्धद्धह्'द्मद्मरु= स्रह्य क्ह्वह्नद्यद्मद्भ ह्द्मह्य ;द्द द्धरुस्नद्मद्धह् क्द्मह्वद्ध द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड ठ्ठद्ध ह्लद्मह्द्ध श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्धस्रद्यद्ध द्यह्य ष्ठब्ह्य'द्म स्रब्द्द ष् ड्ढद्य द्यश्वष्ह्व/द्म द्गह्यड्ड ह्लर्द्गंह्व ॥द्मद्म"द्मद्म स्रह्य द्गद्दद्मस्रद्धठ्ठ फ्ह्यंकह्य स्रह्य ह्लद्धशह्व स्रद्ध ,स्र ?द्मंकह्वद्म ष्द्दह्नह् द्गद्मद्धर्द्बंस्र द्दस् ह्लष् द्वह्वस्रद्ध द्बभ्स्नद्मद्ग द्बह्नरुह्स्र द्बभ्स्रद्मद्ध'द्मह् द्दह्नर्ड्ढं ह्द्मह्य क्द्मब्द्मह्यश्चस्रद्मह्यड्ड ह्वह्य द्बह्नरुह्स्र स्रद्ध ड्ढह्ह्वद्ध ह्द्ध[द्मद्ध क्द्मब्द्मह्यश्चह्वद्म स्रद्ध द्धस्रद्यद्मद्गद्म; ह्र;द्धु स्रठ्ठद्मद्धश्चह् द्दद्ध द्वह्व क्द्मब्द्मह्यश्चह्वद्मक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्बह्वद्म द्यह्ह्नब्ह्व द्यद्म/द्मह्य द्भद्द द्यस्रह्द्म स्नद्मद्म्न फ्ह्यंकह्य ह्वह्य ह्लद्मह्वष्ख्> स्रद्भ द्वह्व क्द्मब्द्मह्यश्चह्वद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्मह्यर्ड्ढं द्वनद्मद्भ ह्वद्दद्धड्ड द्धठ्ठ;द्म्न ह्ष् द्वद्यस्रह्य द्धद्ग= द्वह्वस्रह्य द्बद्मद्य क्द्मस्रद्भ ष्द्मह्यब्ह्य] क्द्मद्ब ड्ढह्लद्मह्लह् ठ्ठह्य ह्द्मह्य क्द्मद्बस्रद्ध क्द्मह्यद्भद्यह्य द्दद्ग ब्द्मह्यफ् द्वह्व क्द्मब्द्मह्यश्चस्रद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्गह्नँद्द ह्द्मह्यरु+ द्वनद्मद्भ ठ्ठह्यड्डड्ड्न

ट्टह्र;स्नर्द्मं द्दस्] स्रद्दह्ह्य द्दह्न, फ्ह्यंकह्य द्दँद्यह्ह्य द्दह्न, ष्द्मह्यब्ह्य] द्गह्नद्दँ ह्द्मह्यरु द्वनद्मद्भ ठ्ठह्यह्वह्य द्यह्य द्बद्दब्ह्य क्द्मद्ब ब्द्मह्यफ् ,स्र फ्द्धह् द्यह्नद्धह्व,्न* ;द्द स्रद्दस्रद्भ द्वद्दद्मह्यह्वह्य ह्लद्मह्य फ्द्धह् द्यह्नह्वद्म;द्म] द्वद्यस्रद्म ॥द्मद्मशद्मस्नर्द्मं ;द्द स्नद्मद्म] ह्लष् द्धह्वठ्ठद्म स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य स्रद्ध द्धह्लसद्म ह्ह्नश्वद्दह्य स्र"क ठ्ठह्यह्वह्य ब्फ्ह्य ह्द्मह्य द्वद्य स्र"क स्रद्मह्य द्दद्ध द्यद्मड्डक्रशह्वद्म द्गद्मह्वस्रद्भ >ह्यब्द्मह्यड्ड्न ;द्द द्यठ्ठद्म ;द्मठ्ठ द्भ[द्मद्मह्य द्धस्र ॥द्मद्मस्द्भह्य द्वद्यद्ध क्तख्ब् द्बद्भ क्द्मस्रद्भ ष्स्क्चह्ह्य द्दस्] द्धह्लद्यद्गह्यड्ड स्रह्नहृ द्भद्य क्द्मस्द्भ फ्/द्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न**

क्स्नद्मर्द्मंह्−&क्द्धद्बभ्; द्बभ्द्यड्डफ्द्मह्य स्रद्मह्य ॥द्मद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्ह्नब्ह्व ष्ह्वद्म;ह्य द्भ[द्मस्रद्भ कद्मब्द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्ग/द्मह्नद्भ ॥द्मद्म"द्म.द्म त्त्द्मद्भद्म द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य ॥द्मद्ध क्द्बह्वह्य श'द्म द्गह्यड्ड द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस्] ठ्ठख्द्यद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वद्म ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस्] ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रह्य सठ्ठ; द्गह्य रुस्नद्मद्मह्व द्बद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न द्धस्रद्यद्ध स्रद्धश ह्वह्य स्रद्दद्म द्दस् &

स्रद्मफ्द्म स्रद्मस्रद्मह्य /द्मह्व द्दद्भह्य] स्रद्मह्य;ब् स्रद्मस्रद्मह्य ठ्ठह्य;्न

द्गद्धक्चद्ध शद्म.द्मद्ध ष्द्मह्यब् स्रद्भ] ह्लफ् ष्द्य द्गह्यड्ड स्रद्भ ब्ह्य;्न्न

शरुह्ह्नह्त्न द्गक्वठ्ठह्न क्द्मस्द्भ द्ग/द्मह्नद्भ ॥द्मद्म"द्म.द्म द्यह्य ठ्ठह्न'द्गह्व ॥द्मद्ध क्द्बह्वह्य ष्ह्व ह्लद्मह्ह्य द्दस्] ड्ढद्यस्रह्य द्धशद्बद्भद्धह् स्रंकह्न] ह्द्धम्द्म.द्म ह्लब्द्ध स्रंकद्ध ष्द्मह्ह्यड्ड क्द्मस्द्भ ह्र;ड्डफ् शद्म.द्मद्मह्यड्ड द्यह्य द्धद्ग= ॥द्मद्ध 'द्म=ह्न ष्ह्व ह्लद्मह्ह्य द्दस््न

द्यड्डरु—ह् द्गह्यड्ड द्यद्मँद्ब स्रद्मह्य द्धत्त्द्धह्लश्द्ध स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धह्लद्यस्रद्म क्स्नर्द्मं द्दस् ठ्ठद्मह्य ह्लद्ध॥द्म शद्मब्द्म्न स्रर्द्म; स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य द्गह्वह्न"; स्रद्ध द्धह्लश्द्म ॥द्मद्ध ठ्ठह्यद्म द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य स्रद्मद्ग स्रद्भह्द्ध द्दस् ,स्र द्यह्य ह्द्मह्य 'द्मद्भद्धद्भ रुशद्मरुस्न; स्रद्म द्यह्ह्नब्ह्व ष्ह्वह्द्म द्धष्फ्रु+ह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ ठ्ठख्द्यद्भह्य द्यह्य द्यद्मद्गद्मद्धह्लस्र द्धरुस्नद्मद्धह् ;द्म द्यश्वद्गद्मह्व ष्<+ह्द्म ?द्मंकह्द्म द्दस््न द्धह्लश्द्म स्रह्य ड्ढह्व ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्य :द्बद्मह्यड्ड द्बद्भ] ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्य स्रद्म;द्मर्ह्यं द्बद्भ ठ्ठक्वद्ध"क द्भ[द्मद्ध ह्लद्म; ह्द्मह्य द्गह्वह्न"; क्द्बह्वद्ध ह्लद्धशह्व द्यद्मस्नर्द्मंस्रह्द्म स्रद्ध क्द्म/द्मद्ध क्द्धंह्लब् ह्; स्रद्भ श्चह्नस्रद्म द्गद्मह्वह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न ;द्धठ्ठ ;द्द द्यड्ड;द्ग द्यह्ह्नब्ह्व ह्व द्भ[द्मद्म फ्;द्म ह्द्मह्य रुशद्मरुस्नद्म; क्द्मस्द्भ द्यश्वद्गद्मह्व ह्व"क द्बभ्द्म;त्न द्दह्नक्द्म द्दद्ध ह्लद्मह्वह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न


अपनो से अपनी बात


शक्तिपीठों के लिये कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता

फ्द्म;=द्ध 'द्मद्धुद्बद्धक्चह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्बभ्य़द्मद्बद्धक्चह्य ॥द्मद्मद्भह्व स्रह्य स्रद्मह्यह्वह्य&स्रद्मह्यह्वह्य द्गह्यड्ड ष्ह्व द्भद्दद्ध द्दस््न द्वह्वद्दह्य द्यद्गद्धद्बशह्द्ध म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ह्लह्व&द्यश्वद्बर्स्रं रुस्नद्मद्मद्धद्बह् स्रद्भह्वह्य द्गह्यड्ड द्बभ्शक्वनद्म द्दद्मह्यह्वद्म द्दद्मह्यफ््न द्धह्व;ह्नु स्रर्द्म;स्रनद्मर्द्मं /द्मर्द्गं ह्= द्यह्य ब्द्मह्यस्रद्ध'द्मम्द्म.द्म स्रद्ध स्रर्द्म; द्ब)द्धह् क्द्बह्वद्म स्रद्भ द्धशश्चद्मद्भ यद्मद्धह् क्द्ध॥द्म;द्मह्व स्रद्मह्य क्द्मफ्ह्य ष् ड्ढह्वस्रद्म द्बभ्/द्मद्मह्व स्रर्द्म;यद्ग द्ध'द्मद्धम्द्मह्द्मह्य स्रद्मह्य ;ह्नफ् द्यद्मद्धद्दक्र; द्ब द्वद्बद्भद्मह्यष्ठह् द्बभ्;द्मह्यह्लह्व स्रह्य द्धब्, ठ्ठह्य'द्म स्रह्य स्रद्मह्यह्वह्य&स्रद्मह्यह्वह्य द्गह्यड्ड ,ह्यद्यह्य स्रर्द्म; स्रह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्म द्दद्मह्यफ्द्ध ह्लद्मह्य द्ध'द्मम्द्मद्म स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य ॥द्मब्ह्य द्दद्ध द्यद्मद्गद्म; स्रद्मद्गश्चब्द्मट द्ब द्धह्लह्वस्रद्ध द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् ,शड्ड द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह् द्वद्बद्भद्मह्यु स्रर्द्म; स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्दद्मह्य शह्य क्द्बह्वद्म द्धशरुह्क्वह् द्बद्धद्भश्च; द्धब्[द्मह्ह्य द्दह्न, 'द्मद्मद्धह् स्रह्नह्ल द्दद्धद्भत्त्द्मद्भ स्रह्य द्बह्ह्य द्बद्भ द्ब= ह्र;शद्दद्मद्भ स्रद्भ ब्ह्यह्यड्ड्न

फ्द्म;=द्ध क्द्मद्भ.;स्र स्रद्म म्द्मह्य= द्धशरुह्द्मद्भ

फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड ठ्ठह्यश द्बद्धद्भशद्भ ष्द्यह्वह्य स्रद्ध द्यख्श्चह्वद्म स्रद्म द्बद्धद्भह्लह्वद्मह्य ह्वह्य ॥द्मद्मश॥द्मद्भद्म रुशद्मद्गह् द्धस्र;द्म द्दस् द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र द्वनद्मठ्ठद्मद्ध;क्रशद्मह्यड्ड द्यह्य द्धह्वशक्वह्] क्द्मक्रद्गद्मक्रस्र"र्द्मं स्रद्म द्गद्दक्रश द्यद्ग>ह्वह्य ब्ह्य द्यद्मस्स्ररुद्मह्य द्बभ्य़द्मशद्मह्वद्मह्य स्रह्य क्द्मशह्यठ्ठह्व द्बभ्द्मढ्ढह् द्दह्न, द्दस् द्वद्दद्मह्यह्वह्य रुशद्म/;द्म;] द्यड्ड;द्ग ठ्ठह्यश द्यह्य द्यद्गद्धशह् ड्ढद्य क्द्मद्भ.;स्र द्भम्द्मद्म द्ब)द्धह् स्रद्मह्य क्द्बह्वह्य द्धब्, द्दद्भ ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध द्बद्म;द्म द्दस््न क्तब्ह्त्न क्द्मशह्यठ्ठह्वद्मह्य स्रद्ध >रुद्ध ब्फ् फ्ड्ढ द्दस् ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्यह्य क्द्ध/द्मस्र द्वद्ब;ह्नष्ठह्द्मह्य स्रद्मह्य द्बभ्द्मस्नद्मद्धद्गस्रह्द्म ठ्ठह्यह्वह्य स्रद्ध ह्वद्धद्धह् क्द्बह्वद्मस्रद्भ द्बभ्द्मस्नद्मद्धद्गस्रद्मह् ठ्ठद्ध ह्लद्म द्भद्दद्ध द्दस््न

ड्ढद्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म द्गह्यड्ड ठ्ठद्मह्य शफ्द्मर्ह्यं स्रद्मह्य क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् स्रद्भह्वद्म क्द्मश';स्र द्यद्ग>द्म फ्;द्म द्दस््न ,स्र शह्य ह्लद्मह्य 'द्मद्धु द्बद्धक्चद्मह्य द्भद्दस्रद्भ द्धह्व/द्मर्द्मंद्धद्भह् स्रर्द्म;यद्ग द्यह्य द्यक्वह्लह्वद्मक्रद्गस्र द्यक्रद्बभ्शक्वद्धनद्म;द्मह्यड्ड ष्द्धह्लद्मद्भद्मह्यद्ब.द्म ह्स्नद्मद्म क्द्ध॥द्मष्/र्द्मंह्व स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न ठ्ठख्द्यद्भह्य शह्य ह्लद्मह्य ॥द्मद्ध द्बख्.र्द्मं द्धह्वशक्वह् ह्द्मह्य ह्वद्दद्धड्ड द्दह्न, द्दस् द्बद्भ शह्द्गद्मह्व द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड ॥द्मद्ध ;ह्नफ् द्यद्ध/द्म स्रद्ध ष्ह्यब्द्म द्गह्य क्द्ध/द्मस्रद्मद्ध/द्मस्र द्यह्यशद्म द्यड्डद्म/द्मह्वद्म ठ्ठह्यह्वद्म श्चद्मद्दह्ह्य द्दस््न ड्ढह्व ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्य शफ्द्मर्ह्यं स्रह्य द्धब्, ॥द्मद्ध क्द्मद्भ.;स्र द्यद्म/द्मह्वद्म ड्ढद्यद्धब्, क्द्मश'स्र; द्दस् द्धस्र शह्य क्द्बह्वह्य द्धश"द्म; द्गह्यड्ड शद्ध.द्म&द्बद्मद्भफ्ड्डह् ह्व द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ ॥द्मद्ध द्धह्व/द्मर्द्मंद्धद्भह् द्वनद्मद्भठ्ठद्मद्ध;क्रशद्मह्यड्ड द्यक्तब्ह्द्मद्बर्ख्शंस्र द्धह्वशर्द्मंद्द स्रद्भ द्यस्रह्यड्डफ्ह्य्न क्;स्नद्म ॥द्मद्मद्भद्ध ठ्ठद्मस्रु+ स्रद्भह्ह्य द्भद्दह्वह्य द्बद्भ ॥द्मद्ध द्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग द्यह्द्मह्य"द्मह्लह्वस्र ह्व द्धद्गब् द्यस्रह्यफ्द्म्न

क्द्मद्भ.;स्र ;द्मह्यह्लह्वद्म स्रद्म स्रद्म;र्द्मंश;ह्व फ्द्म;=द्ध ह्ल;ह्द्ध द्यह्य द्दद्मह्यह्वह्य ह्लद्म द्भद्दद्म द्दस् क्ष् ह्स्र द्बभ्द्म;त्न द्बख्.द्मभ् द्धह्वशक्वह् रुस्नद्मद्म;द्ध :द्ब द्यह्य ष्द्यह्वह्य शद्मब्द्मह्यड्ड स्रह्य क्द्मशह्यठ्ठह्व द्ब= द्दद्ध द्गद्मँफ्ह्य स्नद्मह्य्न क्रुह्ह्न शह्य द्दद्ध द्वद्बब्ष्ट/द्म द्दह्न, द्दस््न क्ष् द्धरुस्नद्मद्धह् क्द्मस्द्भ क्द्मश'स्र;ह्द्म स्रद्मह्य ठ्ठह्य[द्मह्ह्य द्दह्न, ड्ढद्य द्यठ्ठ॥र्द्मं द्गह्यड्ड ह्व;द्म द्धह्व/द्मर्द्मंद्भ. द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न द्धस्र द्वद्बद्भद्मह्यष्ठह् ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्य शफ्द्मर्ह्यं स्रह्य द्धब्, ड्ढद्य द्ध'द्मम्द्म.द्म द्बभ्द्धय;द्म द्गह्यड्ड फ्ह्नह्लद्मड्ढ'द्म द्धह्वस्रद्मब्द्ध ह्लद्म;्न क्रुह्ह्न क्ष् रुद्धद्मद्मह्व द्वह्वस्रह्य द्धब्, ॥द्मद्ध द्यह्नद्भद्धम्द्मह् द्भ[द्मह्य फ्;ह्य द्दस््न ह्लद्मह्य द्बद्धक्चद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्भद्दस्रद्भ स्रद्मद्ग स्रद्भह्यफ्ह्य ,शड्ड ?द्मद्भद्मह्य द्बद्भ द्भद्दह्ह्य द्दह्न, द्यश्वद्बर्स्रं म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ह्वश द्यक्वह्लह्व स्रद्म क्द्मब्द्मह्यस्र द्धशह्द्भ.द्म स्रद्भह्ह्य द्दस््न फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड रुस्नद्मद्म;द्ध ह्वद्दद्धड्ड द्भद्दह्यफ्ह्य] द्धक्तद्भ ॥द्मद्ध द्वह्वस्रद्म क्रुस्नद्मद्म;द्ध द्दद्मह्यह्वद्म ॥द्मद्ध द्बभ्द्म;त्न द्वह्ह्वद्म द्दद्ध द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध त्रस्] द्धस्र ष्द्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्मह्य स्रद्म द्वक्रद्यद्मद्द्न

ड्ढह्व ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड शफ्द्मर्ह्यं स्रद्म द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म ह्द्धह्व द्गद्दद्धह्वह्य स्रद्म द्दद्मह्यफ्द्म्न ड्ढद्यद्यह्य स्रद्ग द्गह्य ड्ढह्ह्वह्य क्द्ध/द्मस्र द्धश"द्म;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्बभ्शद्ध.द्मह्द्म ष्ह्व ह्वद्दद्धड्ड द्बरुह्यफ्द्ध्न क्क्र;द्ध/द्मस्र द्वह्द्मशब्द्ध द्गह्यड्ड द्बंघब्ह्य स्रह्नहृ ह्वद्दद्धड्ड द्बरु+ह्द्म्न द्वद्बद्दद्मद्य क्द्मस्द्भ क्द्यह्द्मह्य"द्म द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न

रुस्नद्मद्म;द्ध क्द्मस्द्भ क्रुस्नद्मद्म;द्ध शफ्द्मर्ह्यं स्रद्ध द्ध'द्मम्द्मद्म द्ब)द्धह् द्गह्यड्ड स्नद्मद्मह्यरुद्म&द्यद्म द्दद्ध क्ह्द्भ द्दद्मह्यफ्द्म्न द्यद्म/द्मह्वद्म] रुशद्म/;द्म;] द्य;द्ग] द्यह्यशद्म स्रद्ध श्चद्मद्भद्मह्य /द्मद्मद्भ.द्मद्म, द्दद्भ क्/;द्मक्रद्गशद्मठ्ठद्ध स्रह्य द्धब्, /द्मर्द्गं म्द्मह्य= द्गह्यड्ड स्रद्मद्ग स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य स्रह्य द्धब्, क्द्धह्वद्मश; :द्ब द्यह्य क्द्मश'स्र; द्दस््न ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्यह्य ,स्र ॥द्मद्ध ,ह्यद्यद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्धह्लद्यह्य हृद्मह्यरुद्म ह्लद्म द्यस्रह्य ;द्म द्धह्लद्यह्य ,स्र स्रह्य द्यद्दद्मद्भह्य द्दद्ध क्द्मद्धक्रद्गस्र द्बभ्फ्द्धह् ,शड्ड ह्र;द्धष्ठह्क्रश स्रद्मह्य द्बद्धद्भ"—ह् द्यश्व॥द्मश द्दद्मह्य द्यस्रह्य्न ड्ढद्यद्धब्, ड्ढह्व क्द्मद्भ.;स्रद्मह्यड्ड द्गह्य क्द्धशद्धहृह्व :द्ब द्यह्य क्द्बह्वद्मह्य; ह्लद्मह्वह्य शद्मब्ह्य ड्ढह्व श्चद्मद्भद्मह्य द्बद्मक्च−;यद्गद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्गद्मह्व द्गद्दक्रश द्धठ्ठ;द्म ह्लद्म;फ्द्म्न ड्ढह्ह्वद्म क्ह्द्भ ह्द्मह्य द्भद्दह्यफ्द्म द्दद्ध] ब्श्वष्द्ध क्शद्ध/द्म ह्स्र द्भद्दह्वह्य शद्मब्द्मह्य स्रह्य द्धब्, द्यह्नद्धशरुह्क्वह् द्धह्व/द्मर्द्मंद्भ.द्म द्दद्मह्य क्द्मस्द्भ ह्द्धह्व द्गद्दद्धह्वह्य द्धह्लह्ह्वह्य रुशंघद्ब स्रद्मब् द्गह्यड्ड द्दद्भ द्बभ्द्यड्डफ् स्रद्ध द्यद्धद्धद्गह् द्यद्धम्द्मढ्ढह् द्धस्र;द्म ह्लद्म;्न

फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड ष्द्यह्वह्य शद्मब्द्मड्ड स्रद्म द्यह्यशद्म द्यद्म/द्मह्वद्म स्रद्म स्रर्द्म;म्द्मह्य= 'द्मद्मद्धह्&स्रह्नह्ल] ष्भ्हशर्श्चंद्य−] फ्ह्न:स्रह्नब् ,शड्ड क्द्मद्भ.;स्र स्रद्मह्य द्धशद्ध॥द्मह्व क्द्मश';स्रह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य त्त्द्मद्भद्म स्रद्भह्वह्य ह्स्र द्यद्धद्धद्गह् द्भद्दह्यफ्द्म्न द्वह्वस्रद्म स्रर्द्म;म्द्मह्य= द्वह्ह्वद्म द्दद्ध द्भद्दह्यफ्द्म क्रुह्ह्न द्वह्वस्रद्ध द्बभ्शद्ध.द्मह्द्म ड्ढद्यद्ध द्बद्धद्भद्ध/द्म स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य /;द्मह्व द्गह्यड्ड द्भ[द्मस्रद्भ ष् ड्ढह्व क्रुस्नद्मद्म;द्ध द्बभ्द्ध'द्मम्द्मद्मद्धस्नर्द्मं;द्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्, ॥द्मद्ध रुस्नद्मद्मह्व द्यद्धद्धद्गह् द्दद्ध द्दस् द्धह्लद्दह्य द्यद्मद्धद्गब् द्दद्मह्यह्वद्म द्दद्मह्य फ्द्म;=द्ध ह्ल;ह्द्ध द्यह्य क्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य ड्ढद्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म द्गह्यड्ड द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्ध रुशद्ध—द्धह् द्यद्ग; द्यह्य द्बर्ख्शं 'द्मद्मद्धह्&स्रह्नंह्ल] द्दद्धद्भत्त्द्मद्भ द्यह्य द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भब्ह्य्न


प्रगति-पत्रक

दरुद्मंख द्दद्भफ्द्मह्यद्धशठ्ठ द्धद्यड्डद्दड्ट

ठ्ठह्य ह्व द्बद्म;ह्य ह्ह्नद्ग क्॥द्मद्ध ह्स्र द्धठ्ठह्व द्गह्वह्नह्लह्द्म स्रद्मह्य द्यह्नद्गद्धह् स्रह्य्न

द्धस्रह्ह्न द्धक्तद्भ ॥द्मद्ध हृद्मद्बह्ह्य द्दद्मह्य द्धह्वह्&ह्व;ह्य द्ब=स्र द्बभ्फ्द्धह् स्रह्य्न्न

क्चद्धस्र द्दस्]द्दद्मद्धह्लद्भ ह्ह्नश्वद्दद्मद्भह्य ?द्मद्भ श:.द्म ह्वह्ह्लद्मह्वह्न द्दद्मह्यस्रद्भ]

ह्वद्मश्चह्द्ध द्दस् द्धष्ह्लब्द्ध ह्ह्नश्वद्दद्मद्भह्य द्दद्ध ड्ढ'द्मद्मद्भद्मह्य द्बद्भ द्धह्वद्भह्द्भ]

द्यर्ख्; ह्द्बह्द्म द्दस् द्भद्यद्मह्यर्ड्ढं] शद्म;ह्न ह्वह्य द्बस्ररुद्ध ष्ह्नद्दद्मद्भद्ध]

स्रद्मब् स्रद्मह्य ष्द्मँ/द्मद्म स्रब्द्मर्ड्ढं द्यह्य] द्धशह्ल; क्ठ्ठ−॥द्मह्नह् ह्ह्नश्वद्दद्मद्भद्ध]

द्धस्रह् द्गह्व स्रद्ध हृठ्ठ&फ्द्धह् द्गह्यड्ड द्भ[द्म ह्व द्बद्म;ह्य द्धश्चद्द ;द्धह् स्रह्य्न

ठ्ठह्य ह्व द्बद्म;ह्य ह्ह्नद्ग क्॥द्मद्ध ह्स्र द्धठ्ठह्व द्गह्वह्नह्लह्द्म स्रद्मह्य द्यह्नद्गद्धह् स्रह्य्न्न

क्द्मशद्भ.द्म ड्ढह्ह्वद्म ब्द्बह्यंकद्म] श्चह्यह्ह्वद्म स्रद्म ठ्ठद्ग ?द्मह्नंकद्म द्दस्]

द्भद्मह्य द्भद्दद्ध द्यश्वशह्यठ्ठह्वद्म,] द्यद्मह्ल स्रह्नहृ ,ह्यद्यद्म ह्लह्नंकद्म द्दस्]

स्रस्ठ्ठ ह्ह्नद्गह्वह्य ॥द्मख्द्धद्ग;द्म स्रद्मह्य रुश.र्द्मं&ह्वफ्द्भद्ध द्गह्यड्ड द्धस्र;द्म द्दस्]

द्बभ्द्धद्धह् स्रद्मह्य द्धह्व"द्बभ्द्म.द्म स्रद्भस्रह्य द्बभ्ह्यह्&द्यद्म ह्लद्धशह्व द्धह्ल;द्म द्दस्]

ह्लद्मँश्च ब्द्मह्य ब्ह्य[द्मद्म द्धस्र;ह्य स्रद्म] क्ड्डस्र द्व॥द्मद्भह्य द्गद्म= म्द्मद्धह् स्रह्य्न

ठ्ठह्य ह्व द्बद्म;ह्य ह्ह्नद्ग क्॥द्मद्ध ह्स्र द्धठ्ठह्व द्गह्वह्नह्लह्द्म स्रद्मह्य द्यह्नद्गद्धह् स्रह्य्न

द्दद्भ द्धह्व;द्ग द्यह्य द्गह्नष्ठह् द्दद्मह्यस्रद्भ रुशद्मरुस्न; क्द्मस्"द्म/द्म द्गह्यड्ड कंकद्मह्यब्द्म]

;द्मह्यफ् स्रह्य द्वद्ब;द्मह्यफ् स्रद्मह्य ॥द्मद्ध ॥द्मद्मह्यफ् द्दद्ध स्रह्य ?द्मद्मंक ह्द्मह्यब्द्म]

क्द्मद्ध/द्म स्रद्म द्वद्बश्चद्मद्भ स्रद्भह्द्ध शद्मद्यह्वद्म रुशक्कहृठ्ठ द्दद्मह्यस्रद्भ्न

क्स्नर्द्मं स्रह्य रुह्यद्भह्य ह्लद्गद्म;ह्य] छ्वद्ग&द्धद्गह्ह्र;; ह्वद्धश [द्मद्मह्यस्रद्भ]

द्बद्धंकह्द्ध द्गद्मस्नद्मद्म द्यह्नद्यड्डरु—द्धह्] ष्स्क्च क्द्मँफ्ह्व द्गह्यड्ड द्धश—द्धह् स्रह्य्न

ठ्ठह्य ह्व द्बद्म;ह्य ह्ह्नद्ग क्॥द्मद्ध ह्स्र द्धठ्ठह्व द्गह्वह्नह्लह्द्म स्रद्मह्य द्यह्नद्गद्धह् स्रह्य्न्न

द्बद्मद्ब ह्लष् स्रह्नहृ ॥द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड] क्द्बद्भद्म/द्म द्दद्ध क्द्ध/द्मद्बद्धह् ष्ह्वह्यफ्द्म]

द्धस्रह्ह्न ष्ठ;द्म द्धह्वफ्द्भद्मद्धह्व;द्मह्यड्ड स्रद्म यद्ग क्द्दद्धर्ह्वं'द्म द्धह्व॥द्म द्यस्रह्यफ्द्म झ्र

/द्मर्द्गं द्यह्य ;द्धठ्ठ द्दस् क्:द्धश्च ह्द्मह्य 'द्मष्टठ्ठ स्रद्मह्यर्ड्ढं क्द्मस्द्भ द्भश्च ब्द्मह्य्न

द्बद्भ क्द्गद्म स्रद्ध स्रद्मद्धब्द्गद्म द्गह्यड्ड ठ्ठद्धद्ब स्रद्ध ष्द्मह्द्ध ह्व स्रह्नश्चब्द्मह्य]

द्धद्यद्ध) &द्भस्नद्म स्रद्मह्य ह्र;द्मह्यद्ग&द्बस्नद्म ठ्ठह्यद्म] द्यद्मद्भस्नद्मद्ध ब्ह्यस्रद्भ द्यह्न—द्धह् स्रह्य्न

ठ्ठह्य ह्व द्बद्म;ह्य ह्ह्नद्ग क्॥द्मद्ध ह्स्र द्धठ्ठह्व द्गह्वह्नह्लह्द्म स्रद्मह्य द्यह्नद्गद्धह् स्रह्य्न्न

*समाप्त*