स्थिरता जड़ता का चिन्ह है और परिवर्तन प्रगति का। स्थिरता में नीरसता है, निस्तब्धता और निष्क्रियता। किन्तु परिवर्तन नये चिन्तन, नये अनुभव और नये अनुभव का पथ प्रशस्त करता है। जीवन प्रगतिशील है, अस्तु उसमें परिवर्तन आवश्यक होता है और अनिवार्य भी।
प्रगतिशील परिवर्तन से डरते नहीं, उसका समर्थन करते हैं और स्वागत भी। आकाश में सभी ग्रह गोलक गतिशील हैं। इससे उनका चुम्बकत्व स्थिर रहता और उसके सहारे उनका मध्यवर्ती सहकार बना रहता है। यदि वे निष्क्रिय रहे होते तो अपनी ऊर्जा गँवा बैठते। जो आगे नहीं बढ़ता वह स्थिर भी नहीं रह सकता। स्थिरता पर संकट आते ही, विकल्प विनाश ही रह जाता है। अस्तु जीवन को गतिशील रहना पड़ता है। जो निर्जीव है वह भी गतिहीन नहीं है।
युग बदलते हैं परिवर्तन क्रम में आशा औ निराशा के अवसर आते और चले जाते हैं। रात्रि और दिन स्वप्न और जागृति, जीवन और मरण,शौत और ग्रीष्म, हानि और लाभ, संयोग और वियोग का अनुभव लगता तो परस्पर विरोधी है, पर अन्ततः वे एक-दूसरे के साथ गुँथे रहते हैं और दुहरे रसास्वादन का आनन्द देते हैं। ऋण और धन धाराओं का मिलन ही बिजली के सामर्थ्यवना् प्रवाह को जन्म देता है।
आपत्तियाँ मनुष्य को सशक्त और जागरुक साहसी बनाती हैं। असुविधाएँ उत्साह बढ़ाती और प्रगति के लिए सुविधाएँ प्रदान करती हैं। एकाकी रहने पर दोनों अपूर्ण हैं। पूर्णता के लिए ऐसा कुछ चाहिए जिसमें अग्रगमन का उत्साह और अवरोध से जूझने का पराक्रम प्रकट होता रहे।
इन दिनों युग सन्धि का श्भारम्भ है। अदृश्य दर्शियों से लेकर राजनेताओं और दार्शनिकों से लेकर अर्थ शास्त्रियों तक इस तथ्य को समझते ओर स्वीकार करते हैं। तर्क और तथ्य दानों ही किसी महान परिवर्तन की आवश्यकता ही नहीं सम्भावना भी देखते हैं।
क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। रात्रि का अन्त दिन में होता है और मरण कालान्तर में जीवन बनकर प्रकट होता है। पेड़ से टूटा फल कुछ ही समय बाद अंकुरित होता और स्वयं उस स्तर का बनता हैं जैसा कि पिछले समय उसे आश्रय के लिए मिला था।गति चक्र की प्रक्रिया में यह भी सम्मिलित है कि संकटों से सताये जाने पर पौरुष उभरे और ऐसा कुछ कर गुजरे जैसा कि सामान्य जीवन में सम्भवतः बन ही नहीं पड़ता। लंघन के बाद तेजी से भूख बढ़ती ओ रस्वास्थ्य सुधरता है। प्रसूताएँ भारी क्षति उठाने के कारण उन दिनों अत्यन्त क्षीण, दुर्बल दीखती हैं। किन्तु प्रसव के उपरान्त उनका स्वास्थ्य इतनी तेजी से सुधरता है कि उस क्षति का पता भी नहीं चलता। गर्मी में घास सर्वत्र जल जाती है। किन्तु वर्षा होते ही धरती पर हरा कालीन बिछा दिखाई पड़ता है। विनाश और विकास का, पतन और उत्थान का भी यही क्रम है। प्रकृति का गति चक्र इसी प्रकार घूमता है। न पतन स्थिर रहता हैं न उत्थान। बचपन, बुढ़ापे तक पहुँचता है और बुढ़ापा बचपन पाने के लिए परिवर्तन का नया रौल अपनाता है। संयोग और वियोग की पेण्डुलम प्रक्रिया के सहारे ही सइ संसार की सारी व्यवस्था चल रही हैं।
प्राचीन काल में इस धरती पर र्स्वग बिखरा हुआ था। मनुष्य में देव स्तर की उत्कृष्टता विद्यमान थी। संस्कृति का वह भव्य भवन जराजीर्ण होते-होते खण्डहर की स्थिति में पहुँच गया। किन्तु महत्वपूर्ण वस्तुएँ दुर्गतिग्रस्त भी तो नहीं रह सकतीं। मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और सौराष्ट्र का सौमनाथ मन्दिर टुटे तो सही पर प्रतिक्रिया ने उन्हें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समुत्रत बना दिया।
मध्यकाल अन्धकार युग की तरह बीता है। उसमें हर स्तर की विकृतियाँ बढ़ीं। अँधेरे की प्रकृति ही कुछ ऐसी है। निशा स्तर का हर प्राणी अपने-अपने ढंग के कुचक्र रचता और अनाचार करता है। मध्य काल में शासन में सामन्तवाद घुसा। साथ ही पूँजीवादी शोषण, तान्त्रिक-अनाचार, साम्प्रदायिक, विखराव, दास और स्वामी, छूत-अछूत जैसी विकृतियाँ अपने ढंग से बढंती चली गई। मत्स्य न्याय का बोलवाला हुआ। दुर्बल समर्पण करते चले गये। तूफान में विशाल वृक्ष भी टूटते उखड़ते देखे जाते हैं।
संसार की समग्र परिस्थिति पर विचार करने पर भी वैसा ही अँधेरा दिखाई पड़ता है। यों वायु प्रदूषण, रेडियो प्रकरण, जल की कमी, जनसंख्या वृद्धि, ऊर्जा संकट, उत्पादन स्रोतों का सूखना, प्रकृति प्रकोप जैसी विभीषिकाएँ भी कम भयानक नहीं हैं, पर अणु आयुधों के माध्यम से लड़े जाने वाले भावी युद्ध की परिणिति पर विचार करने मात्र से रोमा´च खड़े होते हैं और लगता है प्रलय का दिन अब दूर नहीं रहा। सामूहिक आत्महत्या के लिए मनुष्य का प्रमाद अब तक में आरम्भ होन ही बाला है।
खुली आँखों से देखने पर लोग चलते-फिरते, कमाते, खाते, सोते, जागते, सामान्य जीवन जीते दिखाई पड़ते हैं और छुटपुट उपद्रवों के अतिरिक्त कोई बड़ा प्रत्यक्ष संकट दिखाई नहीं पड़ता किन्तु जो अप्रत्यक्ष को देख और समझ सकते हैं वे जानते हैं कि स्थिति कितनी भयावह है। शहतीर में लगा घुन, रक्त में घुसा केन्सर, चढ़ा हुआ ऋण, प्रत्यक्ष नहीं दीखते, पर वे विपत्ति को क्रमशः सघन करते और निकट बुलाते रहते हैं। प्रत्यक्ष न होने के कारण उनकी विभीषिका को हलका नहीं माना जा सकता। स्थिति को और भी अधिक अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है ताकि उसका उपाय समय रहते कुछ सोचा और उपचार असम्भव होने से पहले ही कुछ किया जा सके।
यह पृथ्वी ब्रह्माण्ड में उड़ने वाले असंख्य ग्रह-पिण्डों से असाधारण और अद्भुत है। लगता है उसे सृष्टा ने अपनी समस्त कलाकारिता संजोकर बनाया है और उस पर रहने वाले मनुष्य को कुछ ऐसा बनाया है कि वह उसकी इच्छा के अनुरुप धरती के वातावरण को सुरम्य बना सकने में समर्थ हो सकें इतने पर भी विकृतियाँ तो विकृतियाँ ही हैं। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की तरह निकृष्टता भी मानवी चेतना को पतनोन्मुखी प्रेरणा देती रही। रोकथाम में ढील पड़ने पर पतन क्रम वैसा ही तेजी से घूमने लगता है जैसा कि इन दिनों देखा जा सकता है। इन परिस्थितियों के बेकाबू होने से पूर्व ही, सृष्टा को साज-सँभाल करनी पड़ती है। असन्तुलन को मनुष्य जब तक सँभाल सके तब तक ठीक-अन्यथा सृष्टा अपनी विशिष्ट सत्ता को गतिशील करते और अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलते हैं। भगवान के अवतारों की शांखला भूतकाल में भी यही करती रही हैं और इन दिनों भी यही करने जा रही है। ऐसे विश्ष्टि अवसरों को युग सन्धि कहते हैं।
इन दिनों उत्थान और पतन के मध्य भयानक संघर्ष छिड़ा हुआ है। ध्वंस ने मरता सो क्या न करता की नीति अपनाई हु ई है। रात्रि के अन्त में सघन दाव तमिस्रा दृष्टिगोचर होती है। हारा जुआरी दूना दाव लगाता है। मरणासत्र की साँस तेजी से चलती है। चींटी की मौत आती है तो पर उगते हैं। बुझते दीपक की लौ जोरों से उठती है। युग परिवर्तन की इस सन्धि बेला में विनाश की विभीषिकाएँ अधिक भयावह होने जा रही हैं। दूसरा पक्ष सृजन का है। शुभारम्भ के दिनों की तत्परता देखते ही बनती है। शिशु जन्म, नया ग्रहस्थ, शिलान्यास जैसे अवसरों पर लोग भावावेश में होते और भार दौड़ धूप करते देखे जाते हैं। सुजन की शक्तियाँ भी इन दिनों उतनी ही सक्रिय हैं जितना कि मरणासत्र विध्वंस।
युग सन्धि की प्रसव पीड़ा से उपमा दी गई है। एक ओर असह्म व्यथा वेदना दूसरी ओर सुखद सम्भवना की गुदगुदी। ऐसे समय में डाक्टर और नर्स पूरी सतर्कता बरतते हैं। इन दिनों जागृ आत्माओं की भूमिका भी ऐसी ही होनी चाहिए जिससे विनाश से आत्म-रक्षण और विकास का परिपोषण भली प्रकार सम्भव हो सके।
इस अं में परोक्ष के गर्भ में पल रही उन सम्भावनाओं का संकलन है जो ध्वंस और सृजन के प्रवाहों का उपक्रम क्या चल रहा है-क्या चलने वाला है? क्या पक चुका-क्या पकने वाला है उसका पूर्वाभास प्राप्त कर सके। अशुभ से न तो डरना चाहिए और न शुभ के हर्षातिरेक में अकर्मण्य बनना चाहिए। विशेष अवसरों पर विशेष स्तर के धैर्य, सन्तुलन, साहस और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। असन्तुलन में हानि ही हानि है। हड़बड़ाने से विपत्ति बढ़ती है और सुखद सम्भावनाओं के अस्त-व्यस्त होने का भय रहता है।
विशिष्ट अवसरों को आपत्तिकाल कहते हैं और उन दिनों आपत्ति धर्म निभाने की आवध्यकता पड़ती है। अग्निकाण्ड, दुर्घटना, दुर्भिक्ष, बाढ़ भूकम्प, युद्ध, महामारी जैसे अवसरों पर सामान्य कार्य छोड़कर भ सहायता के लिए दौड़ना पड़ता है। छप्पर उठाने, धान रोपने, शादी-खुशी में साथ रहने, सत्पयोजनों का समर्थन करने के लिए भी निजी काम छोड़कर उन प्रयोजनों में हाथ बँटाना आवश्यक होता है। युग सन्धि में जागरुकों को युग धर्म निभाना चाहिए। व्यक्तिगत लोभ, मोह का गौण रखकर विश्व संकट की इन घड़ियों में उच्चस्तरीय कर्त्तव्यों के परिपालन की इस प्राथमिकता देनी चाहिए। यही है परिवर्तन की इस प्रभात बेला में दिव्य प्रेरणा, जिसे अपनाने में ही हर दृष्टि से हर किसी का कल्याण है।
ध्वंस और सृजन की सम्भावनाओं का पूर्वाभास देने वाले तथ्य इस अं में संग्रहीत हैं। इनके आधार पर स्थिति की गम्भीरता और विषमता को भली प्रकार समझा जा सकता है। ध्वंस क्या कर सकता है और सृजन क्या चाहता है? इन दिनों तथ्यों पर जागरुकों को प्राणवानों को गम्भीर चिन्तन एवं कर्त्तव्य निर्धारण के अवसर मिल सके यही है इस संकलन का प्रयोजन सम्भावनाओं का साहसपूर्वक सामना करने की आवश्यक तैयारी करना ही पुरुषार्थ है। आशंकाओं से घबरा वाले तो अपने और दूसरों के लिए कठिनाई ही उत्पन्न करते हैं। युग सन्धि की विषम वेला में हम सबके चिन्तन में प्रौढ़ता और प्रखरता की अधिकाधिक मात्रा बढ़ने चाहिए।
संसार के सभी विद्वान, ज्यौतिर्विद और अतीन्द्रिय दृष्टा इस सम्बन्ध में एकमत हैं कि युग परिवर्तन का समय आ पहुँचा। उनके अनुसार यह समय युग संधि की बेला है और इन दिनों संसार में अधर्म, अशान्ति, अन्याय, अनीति तथा अराजकता का जो व्यापक बोल बाला दिखाई दे रहा है, उसके अनुसार परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई है। ऐसे ही समय में धर्म की रक्षा और अधर्म का विध्वंस करने के लिए भगवान का अवतार लेने की शास्त्रीय मान्यता है। ‘यदा यदा हि धर्मस्य की प्रतिज्ञा के अनुसार ईश्वरीय सत्ता इस असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए कटिबद्ध है और संतुलन साधने के लिए सूक्ष्म जगत में उसी की प्रेरणा से परिवर्तन कारी हलचलें चल रही हैं।
युग परिवर्तन के समय ईश्वरीय शक्ति के प्राकट्य और अवतरण की प्रक्रिया सृष्टिक्रम में सम्म्लित है। असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए, अपनी प्रेरणा पुरषार्थ प्रकट करने के लिए भगवान वचन वद्ध हैं। ऐसे ही अवसरों पर गीता में दिया गया उनका ‘तदा त्मान सृजाम्यहं का आश्वासन ऐसे ही अवसरों पर प्रत्यक्ष होता रहा है। आज की स्थितियाँ भी ऐसी हैं कि उनमें ईश्वरीय शक्ति के प्राकट्य की भगवान के अवतार की प्रतीक्षा की जा रही है और सूक्ष्मदर्शी ईश्वरीय सत्ता की अवतरण प्रक्रिया को सम्पन्न होते देख रहे हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह समय कलियुग के अंत तथा सतयुग के आरम्भ का है, इसलिए भी इस समय को युगसंधि की बेला कहा जा रहा है। यद्यपि कुछ रुढ़िवादी पंडितों का कथन है कि युग 4लाख 32हजार वर्ष का होता है। उनके अनुसार अभी एक चरण अर्थात् एक लाख आठ हजार वर्ष ही हुये हैं। इस हिसाब से तो अभी नया युग आने में 3लाख 24 हजार वर्ष की देरी है। वस्तुतः यह प्रतिपादन भ्रामक है। शास्कों में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता हक 4 लाख 32 हजार वर्ष का एक युग होता है। सैकड़ों वर्षों तक धर्म-शास्त्रों पर पंड़ितों और धर्म जीवियों का ही एकाधिकार रहने लम्बे समय तक की युग गणना के कारण उसने न केवल मनो वैज्ञानिक दृष्टि से पतन की निराशा भरी प्रेरणा दी वरन् श्रद्धालु भारतीय जनता को अच्छा हो या बुरा, भाग्यवाद से बँधे रहने के लिए विश्व किया इस मान्यता के कारण ही पुरुषार्थ और पराक्रम पर विश्वास करने वाली भारतीयों को अफीम की घूँट के समान इन अति रंजित कल्पनाओं का भय दिखा कर अब तक बौद्धिक पराधीनता में जकड़े रखा गया।
इस सम्बन्ध में ज्ञातव्य है कि जिन शास्त्रीय सन्दर्भों से युग गणना का यह अति रंजित प्रतिपादन किया है, वहाँ अर्थ को उलट पुलट कर तोड़ा मरोड़ा ही गया है। जिन सन्दर्भों को इस प्रतिपादन की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया गया है, वे वास्तव में ज्योतिष के ग्रन्थ हैं। वह प्रतिपादन गलत नहीं है, प्रस्तुतीकरण ही गलत किया गया है अन्यथा मूल शास्त्रीय वचन अपना विशिष्ट अर्थ रखते हैं। उनमें ग्रह नक्षरों की भिन्न-भिन्न परिभ्रमण गति तथा ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन में सुविधा की दृष्टि से ही यह युग गणना है।
जितने समय में सूर्य अपने ब्रह्माण्ड की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है उसी अवधि के चार बड़े भागों में बाँट कर चार देव युगों की मान्यता बनाई गई और 4 लाख 32 हजार वर्ष का एक देख युग माना गया। प्रचलित युग गणना के साथ ताल मेल बिठाने के लिए छोटे युगों को अतर्दशा को संज्ञा दे दी गई और उसी कारण वह भ्रम उत्पन्न हुआ। अन्यथा मनुस्मृति लिंग पुराण और भागवत आदि ग्रन्थों में जो युग गणना प्रस्तुत की गई है वह सर्वथ भिन्न ही है। मनुस्मृति में कहा गया हैं-
ब्राह्मस्यतु क्षपाहस्य यत्प्रामणं समारुतः।एकैकशो युगानान्तु क्रमशस्त्रात्रर्बाधत॥
चत्वार्याहु सहस्राणि वर्षाणाँतु कृतं युग।तस्यतावत् शती संध्या संध्याशश्च तथाविधः॥
इतेयेरेषु सु संध्याशेषु च त्रिपु। एकोयायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च॥
अर्थात्-ब्रह्माजी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश होने में जो युग माने गए हैं वे इस प्रकार हैं-चार हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात् चार सौ वर्ष की पूर्व संध्या और चार सौ वर्ष की उत्तर संध्या इस प्रकार कुल 4800 वर्ष का सतयुग इसी प्रकार तीन हजार छह सौ वर्ष का त्रेता, दो हजार चार सौ वर्ष का द्वापर और बारह सौ वर्ष का कलियुग।
हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में भी युगों का हिसाब इसी प्रकार बताया गया है यथा-
अहोरात्रं विभज्यनो मानव लौकिकं परं।सामुपादाय गणानाँ शाणु संख्य, मन्दिरमृ॥
चत्वार्यैव सहस्राणि वर्षाणानुकृत युगं।तावच्छसी भवेत्संध्या संध्याशश्च तथानृप॥
त्रीणि वर्ष सहस्रणि त्रेतास्या स्परिमाणतः।तस्याश्च त्रिशती संध्याशश्च तथाविधः॥
तथा वर्ष सहस्रे द्वै द्वापरं परिकीर्तित।तस्यापि द्विशती संध्या संध्याँशश्चैवतद्वियः॥
कलिवर्ष सहस्रं व संख्यातोऽत्र मनिषिभिः।तस्यापि शतिक संध्या संध्याँशश्य तथा विध॥
अर्थात्-हे अरिदंम! मनुष्य लोक के दिन रात का जो विभाग बतलाया गया है उसके अनेसार यूगों की गणना सुनिए, चार हजार वर्षों का एक कृतयुग होता है और उसकी संध्या चार सौ वर्ष की तथा उतना ही संध्याँश होता है। त्रेता का परिमाण तीन हजार वर्ष का है और उसकी संध्या तथा संध्याँश भी तीन-तीन सौ वर्ष का होता है। द्वापर को दो हजार वर्ष कहा गया है। उसकी संध्या तथा संध्याँश दो-दो सौ वर्ष के होते हैं। कलियुग को विद्वानों ने एक हजार वर्ष का बतलाया है और उसकी संध्या तथा संध्याँश भी सौ वर्ष के होते हैं।
लिंग पुराण तथा श्रीमद् भागवत में भी इसी प्रकार की युग गणना मिलती है। भागवत के तृतीय स्कन्ध में कहा गया है-
चत्वारि त्रीणि द्वै चैके कृतादिषु यथाक्रमम्।संख्यातानि सहस्रणि द्वि गुणानि शातानि च॥
अर्थात्-चार, तीन, दो और एक ऐसे कृतादि युगों में यथा क्रम द्विगुण सैकडत्रों की संख्या बढ़ती है। आशय यही है कि कृतयुग को चार हजार वर्ष में आठ सौ वर्ष और जोड़कर 4800 वर्ष माने गए। इसी प्रकार शेष तीनों युगों की कालावधि समझी जाए। कुछ स्थानों पर मनुष्यों के व्यवहार के लिए बारह वर्ष का एक युग भी माना गया है। जिसको एक हजार से गुणा कर देने पर देवयुग होता है, इस बारह वर्ष के देवयुग को फिर एक हजार से गुणा करने पर 1 करोड़ 20 लाख वर्ष का ब्रह्मा का एक दिन हो जाता है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसी युग की बात कही है-
सहस्र युगपर्यन्त मर्ध्यद् ब्रह्मणो विदुः।रात्रि युग सहस्रान्ताँ तेऽहोरात्र विदोजना॥
अहोरात्र को तत्वतः जानने वाले पुरुष समझते हैं कि हजार महायुगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही एक युगों की उसकी रात्रि होती है। लोकमान्य तिलक ने इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि महाभारत, मनुस्मृति और यास्कनिरुक्त में इस युग गणना का स्पष्ट विवेचन आता है। लोकमान्य तिलक के अनुसार “हमारा उत्तरायण देवताओं का दिन है और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि स्मृति ग्रन्थों और ज्योतिष शास्त्र की संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है कि देवता मेरु पर्तत पर अर्थात् उत्तर ध्रुव में रहते हैं। अर्थात् दो अयनों छः-छः मास का हमारा एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर और हमारे 360 वर्ष देवताओं के 360 दिन रात अथवा एक वर्ष के बराबर होते हैं। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग माने गये हैं। युगों की काल गणना इस प्रकार है कि कृत युग में चार हजार वर्ष, त्रेत युग में तीन हजार, द्वापर में दो हजार और कलि में एक हजार वर्ष। परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता, बीच में दो युगों के संधि काल में कुछ वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृत युग के आदि और अन्त में प्रत्येक और चार सौ वर्ष का, त्रेता तथा कलियुग के पूर्व और अनन्तर प्रत्येक ओर सौ वर्ष का सन्धिकाल होता है, सब मिलाकर चारों युगों का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का होता है। ये दो हजार वर्ष और पहले बताये हुए साख्य मतानुसार चारों युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल बारह हजार वर्ष होते हैं। (गीता रहस्य भूमिका, पृष्ठ 193)
इन गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रमण काल है। प्राचीन ग्रन्थों में हमारे इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। (1) महत् कल्प 1 लाख 9 हजार 8सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक (2) हिरण्य गर्भ 85800 विक्रमीय पूर्व से 61800 वर्ष पूर्व तक (3) ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक (4) पाद्म कल्प 37800 वर्ष तक और (5) वाराह कल्प 13800 विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर अब तक चल रहा है।
कलियुग संवत् की शोध के लिए राजा पुलकेश्नि ने विद्वान ज्योतिषियों से गणना कराई थी। दक्षिण भारत के ‘इहोल’ नामक स्थान पर प्राप्त हुए एक शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है, जिससे यही सिद्ध होता है कि कल्कि का प्राक्टय इन्हीं दिनों होना चाहिए। ‘पुरातन इतिहास शोध संस्थान’ मथुरा के शोधकर्त्ताओं ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है और ज्योतिष के आधार पर यह सिद्ध किया है कि ‘इस समय ब्रह्मरात्र का तमोमय सन्धिकाल है।
इसी सन्धिकाल में असन्तुलन उत्पन्न होता है। दैवी शक्तियों पर आसुरी प्रवृत्तियों का संघात होता है तथा अनीति मूलक अवाँछनीयताएँ उत्पन्न होती हैं। नव निर्माण की सृजन शक्तियाँ ऐसे ही सवसरों पर जन्म लिया करती हैं, क्योंकि तपसाधन होने के कारण ऐसे समय विभिन्न अनयकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। मनुष्य कृत संकटों और प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि जब चरम सीमा पर पहुँचने लगती है तो उसी समय निर्माणकारी सत्ता अपने सहयोगियों के साथ अवतरित होती है और जहाँ एक ओर अधर्म, अन्याय, अनाचार बढ़ता है वहाँ ये शक्तियाँ धर्म, संसकृति, सदाचार, सद्गुण तथा सद्भावों को बढ़ाकर संसार में सुख-शान्ति की स्थापना के लिए यत्नशील होती हैं।
संक्रमण बेला में किस प्रकार की परिस्थितियाँ बनती और कैसे घटनाक्रम घटित होते हैं इसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में इस प्रकार आता हैं-
ततस्तु मुले संघाते वर्तमाने युगे क्षये।यदा चन्द्रस्य सूर्यस्य तथा तिष्य बृहस्पति॥
एक राशौ समेष्यन्ति प्रयत्स्यति तदा कृतम्।काल वर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च॥क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥
अर्थात्- जब एक युग समाप्त होकर दूसरे युग का प्रारम्भ होने को होता है; तब संसार में संघर्ष और तीव्र हलचल उत्पन्न हो जाती हैं। जब चन्द्र, सूर्य, बृहसपति तथा पुष्य नक्षत्र एक राशि पर आयेंगे तब सतयुग का शुभारम्भ होगा। इसके बाद शुभ नक्षत्रों की कृपा वर्षा होती है। पदार्थों की वृद्धि से सुख-समृद्धि बढ़ती हैं।
इस प्रकार का ग्रह योग अभी कुछ समय पहले ही आ चुका है। अन्यान्य गणनाओं के आधार पर भी यही सिद्ध होता है कि युग परिवर्तन का ठीक यही समय है। ठीक इन्हीं दिनों युग बदलना चाहिए। अनय को निरस्त करने और सृजन को समुत्रता बनाने वाली दिव्य शक्तियों का प्रबल पुरुषार्थ इस युग सन्धि में प्रकट होगा जो सन् 1980 से 2000 तक बीस वर्षों का है।
विश्व के मूर्धन्य विचारकों ने अपनी सहज प्रज्ञा के आधार पर प्रस्तुत परिस्थितियों की सूक्ष्म विवेचना करते हुए यह अभिमत व्यक्त किया है कि युग परिवर्तन का समय सन्निकट है। वे इस प्रयोजन में ध्वंस और सृजन की दुहरी प्रक्रिया को पूण्र प्रखरता के साथ अपना-अपना रौल पूरा करने की सम्भावना व्यक्त करते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि अन्ततः जीतेगा सृजन ही। इतने पर भी यह सब सरल नहीं है। उज्जवल भविष्य का समय आने से पूर्व मानवी दुष्कृतों और प्रकृति प्रकोपों की काली घटाएँ बरसेंगी और उनसे उड़ने के लिए स्वभावतः मानवी पुरुषार्थ प्रबल और प्रचण्ड बनेगा।
सन् 1963 में अमेरिका की प्रसिद्ध जीवशास्त्री महिला प्रो. राशेल, क्रार्सन ने अपनी पुस्तक’ साइलेंट स्प्रिंग’ में लिखा है कि पद्रह बीस वर्ष बाद दुनिया के अधिकाँश महानगरों की स्थिति ऐसी हो जायगी कि वहाँ के सभी निवासियों पर अकाल मृत्यु की सम्भावना हर घड़ी छाई रहेगी। न केवल नगर निवासी वरन् उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणियों को भी कभी मरना पड़ सकता है। इस पुस्तक में उन्होंने इस तरह की सामूहिक मौतों का कल्पना के आधार पर चित्रण भी किया है। उस समय तो लोगों ने इन प्रतिपादनों का मखौल उड़ाया पर अभी कुछ वर्षों पहले अमेरिका के डेट्रायट शहर में इटली के जोर्निया तथा जापान के मिनिमाता कस्वे में ‘साइलेंट’ स्टिंग’ पुस्तक में दी गई स्थिति हूबहू देखने में आई।
डेटा्रयट की हवा में कारखानों की चिमनियों से निकले धुँए के कारण इतनी सल्फरडाइ आक्साइड जमा हो गई कि वह बादलों के साथ मिलकर दहकते तेजाव के रुप में बरस पड़ी। इटली के जोर्निया शहर में एक कारखाने से इतनी अधिक कार्बन डाइ आक्साइड छोड़ी गई कि मुर्गियाँ मरने लगीं। पेड़ सूखने लगे और बूढ़े खाँसते-खाँसते परेशान हो गये। जापान के मिनिमाता कस्बे में भी यही स्थिति उत्पन्न हो गई थीं।
इस तरह की घटनाओं को देख जान कर अब काफी लोग यह मानने लगे हैं कि हर व्यक्ति और हर प्राणी के सिर पर मौत नाच रही है। वह कभी भी सैकड़ों क्या हजारों लोगों को अपने पंजे में जकड़ सकती है।
सन् 1975 में अमेरिका में सम्पन्न हुए खगोल शास्त्रियों के सम्मेलन में प्रो. कार्ल सायमन ने बताया कि कुछ वर्षों बाद पृथ्वी का वातावरण अचानक शुक्रग्रह के समान गरम हो जायगा। उल्लेखनीय है कि सूर्य को छोड़ कर शुक्र अपने सौर परिवार का सबसे गर्म वातावरण वाला सदस्य है। वहाँ प्रायः 380 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहता है, जबकि हमारी पृथ्वी का औसत तापक्रम 47 से 52 डिग्री सेंन्टीग्रेड के बीच है। इसका कारण बताते हुए प्रो. कार्ल सायमन ने कहा कि शुक्र पृथ्वी और बुध के बीच में सूर्य के सबसे समीप पड़ने वाला ग्रह है। वहाँ सूर्य की अधिक रोशनी पहुँचती है। और सूर्य की गर्मी के कारण पानी की भाप तथा कार्बनडाइ आक्साइड का एक घना आवरण बन गया है, जो गर्मी को बाहर नहीं जाने देता। इसी कारण शुक्र पर भयानक गर्मी पड़ती है।
इन दिनों पृथ्वी पर जिस तेजी से औद्योगीकरण बढ़ता जा रहा है और वायुमण्ल में कार्बन डाइ आक्साइड की जितनी मात्रा घुलती जा रही है उससे पृथ्वी के अयन मण्डल पर धीरे-धीरे एक आवरण बनता जा रहा है। धीरे-धीरे स्थिती यह बनती जा रही है कि उस घने आवरण में ही पृथ्वी द्वारा फेंकी जाने वाली अतिरिक्त गर्मी कैद होती जा रही है। कोई आर्श्चय नहीं कि कुछ वर्षों बाद ही पृथ्वी पर असह्य गर्मी पड़ने लगे और अनेक स्तर के संकट खड़े करे।
सुप्रसिद्ध पश्चिमी दार्शनिक ओस्वाल्ट स्पेंगुलर ने अपनी पुस्तक “दि डिक्लाइन आफ द वेस्ट” में लिखा है कि “वर्तमान सभ्यता अब बुढ़ापे के दौर से गुजर रही है। उसने संसार में क्टनीति और युद्ध का जो रंग मंच तैयार कर दिया है वह वास्तव में विनाश नदी की एक ऐसी कागार है जो अब, और एक भी बाढ़ बर्दाश्त नहीं कर जायेगी तृतीय विश्तयुद्ध अवश्य होगा और उसके बाद वर्तमान भौतिकतावादी सभ्यता का सदा के लिए अन्त हो जायगा।”
स्पेगुलर ने जो तर्क प्रस्तुत किये हैं वे जीवाश्यों की विस्तृत गवेषणा पर आधारित हैं और ये तर्क तथा तथ्यों पर इतने आधारित हैं कि प्रत्येक विचारक उन्हें मानने के लिए अपने को लगभग बाध्य-सा अनुभव करता है।
प्रसिद्ध विचारक और दिव्यदर्शी रोम्याँ रोला ने लिखा है “मुझे विश्वास है कि श्वेत सभ्यता का एक बड़ा भाग अपने गुणों अवगुणों सहित नष्ट हो जायगा फिर एक नई सभ्यता का उदय होगा।” रोम्या रोला ने उस नई सभ्यता को भारतीय सभ्यता माना है और कहा है कि आगे भारतीय संस्कृति और दर्शन ही विश्वधर्म विश्व संस्कृति के रुप में प्रतिष्ठित होगे तथा एक नये समाज की रचना होगी। मुझे जीवन का अन्त होने की चिन्ता नहीं, पश्चिम ही नहीं पश्चिमी देश आत्मा की अमरता पर विश्वास नहीं करते पर मैं करता हूँ। जो लोग इस समय पश्चिमी दुनिया में जन्म ले रहे हैं, पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो रहे हैं, उन्हें भषण विपत्तियों का सामना करना पडेगा।”
स्पेन से प्रकाशित होने वालजी एक पत्रिका “साइन्स वेस्ट मिरर” में सन् 1926 के एक अंक में जी. वेजी लेटीन नामक भविष्य वक्ताका लेख छपा था जिसमें बतया गया था कि ‘56 वर्ष अर्थात् (1983 में) वायुमण्डल की जीवनदायी गैंसें विषाक्त हो जायेंगी तब प्रकृति का अग्रतम रुप देखने को मिलेगा। यह उग्रता सन् 1980 के बाद क्रमशः बढ़ती ही जायगी। प्रकृति का इतना भयंकर प्रकोप मनुष्य ने पहले कभी नहीं देखा होगा। इसमें अतिवृष्टि और अनावृष्टि से लेकर उलका पात ताि ज्वालामुखी के विस्फोट से लेकर चुम्बकीय तुफानों तक विनाश के अनेक कारण उत्पन्न होंगे। समुद्र में कई नये टापू निकलेंगे। मित्र जैसे लगने वाले अनेक देशों में परस्पर युद्ध होगा। उसके बाद एक नई सभ्यता और संस्कृति का उदय होगा जो पूर्व के देश (भारतवर्ष) की होगी। उससे ही वायुमण्डल शुद्ध होगा, बीमारियाँ दूर होंगी, आपसी कलह शान्त होंगे और संसार में फिर से अमन चैन कायम होगी। लोग भाई-भाई की तरह प्रेमपूर्वक रहने लगेंगे। देश जाति की सीमाएँ टूट कर भ्रात भावना का ही विस्तार होगा।
अन्य भविष्य वक्ताओं की तरह श्री.जी बेजीलेटीन ने भी यह स्वीकार किया है 1930 से सन् 2000 तक का समय ही विश्व के नये उद्धारक का कार्य काल होगा। उसकी विचार शक्ति इतनी तीक्ष्ण होगी कि दुनिया के तीन चौथाई नास्तिकों को तो वह अपने जीवनकाल में ही बदल देगा। उसके सहायक के रुप में न केवल उसके देशवासी अपितु सारे संसार के लोग शरीर, धन, परिवार सब का मोह त्याग कर कूछ पडेंगे। भीतर ही भीतर दीर्घकाल तक सुलगने वाली उसकी क्रान्ति के सम्मुख संसार के बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति हतप्रभ हो जायेंगे।
अन्तग्रही प्रवाहों का प्रभाव धरती के वातावरण पर उसके पदार्थों और प्राणियों पर असंदिग्ध रुप से पड़ता है। सौर मंडल से जो अदृश्य विवरण प्रवाहित होते हैं उन्हें अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण नवजात शिशु असाधारण रुप से ग्रहण करता है फलतः उसके व्यक्तित्व में उस स्थापना का प्रभाव एक स्थायी तथ्य बन कर जमा रहता है। यों प्रबल पुरुषार्थ से उसे मिटाया या घटाया भी जा सकता है।
अन्तरिक्ष विद्या के दो स्वरुप हैं एक ग्रह नक्षत्रों की गतिविधियों का निर्धारण और उसके प्रत्यक्ष प्रभावों का आकलन। मौसम, तूफान, ज्वारभाटा, चुम्बकीय विकरण जैसे आकलन इसी प्रत्यक्ष अन्तरिक्ष विद्या के अंग है। परोक्ष खगोल विद्या वह है जिसमें ग्रह नक्षत्रों के विकरण का मनुष्यों के व्यक्तित्वों और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का पता चलाया जाता है। ग्रहों का गतिचक्र के वातावरण पर प्रभाव पड़ता हे और प्राणियों की मनोदशा तथा गतिविधियों पर उसका दबाव अनुभव किया जाता है। अनतरिक्ष के प्रत्यक्ष निर्धारण को ऐस्ट्रोनोमी और परोक्ष आकलन को-एस्ट्रोनोमी कहते है।
इन दोनों प्रसंगों पर बहुत समय से ऊहा पोह होता रहा है और प्रतिपादन तथा मतभेद का क्रम चलता रहा है। फिर भी दोनों का अपना-अपना पक्ष है। कटु आलोचना और विरोध भर्त्सना का प्रसंग वहाँ खड़ा होता है जहाँ तीरतुक्का मिलाने वाले ज्योतियों अनजान होते हुए भी उस विज्ञान का आवरण ओढ़ कर लोगों को डराते और पूजा पाठ के नाम पर जेब काटते है। अन्धविश्वास भाग्यवाद और निहित स्वार्थों का दबाव यदि हटाया जा सके तो ज्योति र्विज्ञान अपेन आप में एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसकी गणना अनादिकाल से एक मान्यता प्राप्त शास्त्र के रुप में होती रही है।
आधुनिक शोधकर्त्ता और विज्ञान वेत्ता जैसे-जैसे तथ्यों की गहराई में उतरते जाते हैं वैसे-वैसे उन्हें यह स्वीकारना पड़ रहा है कि ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव प्राणियों की मनःस्थिति एवं परिस्थितिया पर पड़ता है। साथ ही उसके दबाव से पृथ्वी के वातावरण तथा पदार्थों के स्तर में अनुपेक्षित परिवर्तन आते हैं।
जान एण्टनी वेस्ट और जान गेरहार्ड टुण्डा नामक दो पत्रकारों ने फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता प्रमाणित करने का एक अभिनव प्रया किया है। उनकी नवीनतम पुस्तक ‘द केस फाँर एन्ट्रालाजी’ में यही प्रतिपादन हैं। उनके अनुसार तर्क और वैज्ञानिकता के उदयकाल से लेकर वर्तमान तक ज्योतिष विज्ञान के विरोध एवं पक्ष में लगभग एक सी बातें कही जाती रही हैं।
लेखकों के अनुसार एक ही जगह, एक ही समय में जन्में लोगों में बहुत कुछ साम्य होता हैं। यहाँ तक कि थोड़े से अन्तर से पैदा हुए जुड़वाँ बच्चों का भी। सैमुअल हेमिंग और जार्ज तृतीय दोनों एक ही दिन जन्में (4 जून 1738)। एक ही दिन उन्हें विरासत में राज मिला। (सैमुअल को लुहारी दुकान, जार्ज को इंग्लैण्ड की गद्दी। दोनों देखने में और स्वभाव में एक से थे। दोनों का विवाह एक दिन हुआ एवं दोनों की सन्तानों की संख्या भी एक सी थी। दोनों एक ही समय बीमार पड़ते रहे और दोनों एक ही दिन (21 जनवरी 1820) मरे।
हालही के वर्षों में एक ही दिन, एक ही समय, एक ही जगह जनमें वैज्ञानिक आइंस्टाइन और ओटोहान लेखक जेम्स स्टीफेन्स और जेम्स जायस जैसी कई जोड़ियों के जीवन में अद्भूत साम्य देखा दिखाया गया है। आमतौर से एक ही समय जन्मने वाले अनेकों बालकों की मनः स्थिति एवं परिस्थिति में कोई साम्य नहीं होता। लेखकों के अनुसार व्यक्ति का एकाकी- भाग्य-पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं है, वह समूह के भाग्य के साथ भी जुड़ा है। ऐसे कई वैज्ञानिक अनुसन्धानों के भाग्य के साथ ही जुड़ा है। ऐसे कई वैज्ञानिक अनुसन्धानों की चर्चा लेखक करते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि प्रकृति के अनुकानेक कार्यकलाप कुछ सधे-बँधे समय चक्रों में होते हैं।
वैज्ञानिकता के इस दौर में फलित ज्योतिष जैसी विद्या के सम्बन्ध में यह प्रश्न स्वाभाविकताः उठता है कि क्या इस पुरातन विद्या में कोई वैज्ञानिक तत्व है? कोपर निकस, कैपलर तथा गैलीलियों जैसे खगोल विदों ने सूर्य को सौर मण्डल का स्थिर केन्द्र सिद्ध करके प्राचीन ज्योतिष को ध्वस्त तो किया पर साथ ही वे स्वयं फलित ज्योतिष के परम भक्त भी रहे। स्चयं न्यूटन जिन्होंने आधुनिक भौतिक शा़ बड़ी रचना में भारी योगदान दिया है। फलित ज्योतिष के आधार पर कितने ही निर्धारण किय करते थे। एक वैज्ञानिक प्रयोग में फ्रेंक ब्राउन ने यह सिद्ध किया हे कि मटर के दाने हो, या आलू के कड़े हाँ या सीपियाँ, सभी की भतरी घड़ियाँ (बायलाँजीकल क्लाँक) सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। इस प्रभाव का रोशनी से कोई सम्बन्ध नहीं। यदि अन्धेरे में बन्ध कर दिया जाये, तो भी इनका क्रम सूर्य चन्द्र की स्थिति के अनुसार चलता रहता हैं। पड़वा के चाँ में शिथिल और पूर्णिमा के चाँद में सक्रिय गतिविधियाँ रहती हैं। सीपियाँ ज्वार-भाटे से कोई सम्बन्ध न रख चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार खुलती बन्ध होती हैं। यह भी परीक्षणों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।
वैज्ञानिक जान नेलसन के अनुसार आयनमण्डल में तूफानों का, जो रेडियों प्रसारणों में बाधा डालते हैं, सूर्य के सर्न्दभ में ग्रहों की स्थिति से सीधा सम्बन्ध है। जब भी दो या दो से अधिक ग्रह, सूर्य की राशि में होते हैं या उससे 180ह् अथवा 90ह् दूर राशि में तब भी ऐसे ही तूफान आते हैं। जब भी बहुत से ग्रह सूर्य की राशि से 60ह् या 120ह् की दूरी पर होते हैं, आयनमण्डल शान्त रहता है। इस सर्न्दभ में यह याद रखने योग्य है कि पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 90ह् और 180ह् का सम्बन्ध कठोर और 60ह् या 120ह् का सम्बन्ध कोमल माना जाता रहा है।
इटली के रासायनल विच्चार्दी के अनुसार रसायनों एवं विशेषकर पानी पर चफमबकीय क्षेत्रों और तरंगों का बहुत असर पड़ता है।
वैज्ञानिक द्वष ड्यूवी एवं इंटिग्टन के अनुसार प्रकृति के सधे बँधे चक्रों के उदाहरण हमें हैरत में डाल देते हैं।
प्रति 6-6 वर्ष बाद सालमन मछली बड़े पैमानों पर जाल में फँसती हे, हर 6-6 वर्ष बाद पेड़ों पर छाल का छल्ला मोटा हो जाता है। सूर्य के धब्बों के भड़कने का 11-1 एवं 22-2 वर्ष का चक्र है और इस चक्र का सृष्टि के कई व्यापारों के चक्र से सीधा सम्बन्ध है। पैदावार मन्दी, तेजी, सर्दी-गर्मी, सूखा बरसात सभी के ऐसे चक्र खोज डाले गये हैं।
अस्पतालों में मानव शरीर और मन पर मौसम, चन्द्रकला, सूर्य की प्रखरता आदि के प्रभावों के बारे में एवं प्राणियों के शरीर की भीतरी विद्युत एवं आकाशीय विद्युत से उसके सम्बन्ध के बारे में भी इस पुस्तक में चर्चा ज्योतिषी द्वय ने की है। वे ‘सायमेटिक्स’ नामक एक नये विज्ञान का प्रतिपादन करते हुए कहते है कि हर स्वर, हर नाद, हर कम्पन एक विशेष प्रकर को जन्म देता है। ग्रह नक्षत्रों का एक अपना वायुमण्डल है और उसका अपना इलेक्ट्रोनिक नाद है और यही नाद जातक को प्रभावित करता है। गर्भाधान के समय जब माता-पिता से मिले जीन नये शिशु की नींव रखते हैं, तब यही ब्रह्माण्ड व्यापी नाद जीनों के क्रम को वह विशिष्टता प्रदान करता है जो जातक के जीवन और भाग्य में परिलक्षित होती है।
प्रस्तुत अन्तर्ग्रही परिस्थितियों पर दृष्टिपात करने वाले इस निर्ष्कष पर पहुँचते हैं कि युगसन्धि के अवसर पर जैसी उथल पुथल होती है वैसी ही सम्भावना इन दिनों भी उभरने के लक्षण प्रतीत हो रहे हैं। इनमें विनाशकारी घटना क्रमों की प्रखरता तो उनके कष्टकारक होने के कारण मानी ही जायेगी किन्तु साथ ही उसके पीछे उज्जवल भविष्य का आश्वासन भी सुनिश्चित रुप से विद्यमान है।
समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के अनुसार ईसा के समय विश्व की कुल जनसंख्या 30 करोड़ थी अब तो अकेले भारत की ही आबादी इतनी है कि यह ईसा के समय की आबादी से दुगनी हो जाती है, ईसा के 1750 वर्ष बाद जनसंख्या लगभग ढाई गुनी अर्थात् 75 करोड़ हुई। इसके बाद से अब तक चक्रवृद्धि गणित के क्रम से जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। सन् 1850 में आबादी 110 करोड़ हुई, 1900 में 160 करोड, 1920 में 181 करोड़ 91 लाख, 1940 में 224 करोड़ हो चुकी है। इस प्रकार जनसंख्या की वृद्धि निरन्तर तीव्र से तीव्रतर ही होती जा रही है।
कहा जा चुका है कि पृथ्वी के पास सीमित प्राणियों के लिए ही स्थान और साधन उपलब्ध है। अन्य प्राणियों की तरह यह नियम मनुष्यों पर भी लागू होता है। मनुष्येत्तर प्राणें के सम्बन्ध में देख गया है कि जब उनकी संख्या बढ़ने लगती है और सीमा रेखा को लाँध जाती हे तो प्रकृति उनका सफाया करने लगती है। यह स्वाभाविक भी है। प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले सुविधा साधन अधिक संख्या में प्राणियों के लिए कम पड़ने लगते हैं। कम साधन और अधिक उपभोक्ताओं के कारण निश्चिय ही संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। शक्तिशाली दुर्बल को दबाता है और उसके हिस्से का भाग छीनता है। इस प्रकार के संघर्ष में जो सशक्त होते हैं, वही बचते हैं और दुर्बल मारे जाते हैं, संघर्ष की यह स्थिति अन्ततः पूरे के पूरे वर्ग को ही नष्ट करके रख देती है। नृतत्व शास्त्रियों को प्राचीनकाल में विद्यमान रहे ऐसे कई प्राणियों के अवशेष मिले हैं, जो उन दिनों काफी शक्तिशाली और विशालकाय थे किन्तु उनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रकृति के पास उपलब्ध साधन स्त्रोत कम पड़ने लगे, संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई और फलतः वह पूरा का पूरा प्राणी वर्ग ही अपना अस्तित्व नष्ट करा बैठा।
क्या मनुष्य के लिए भी प्रकृति यही न्यायनीति बरतने वाली है? उसके विद्यान में किसी से भी पक्षपात करने या किसी को भी छूट देने की गुँजाइश नहीं है, सो इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि मनुष्य के लिए भी संघर्ष और अन्ततः विनाश का चक्र घूमने को तैयार बैठा है। इस आधार पर संसार भर के विचारशील और बुद्धिजीवी व्यक्ति लेगों को तरह-तरह से सीमित सन्तानोत्पादन के लिए समझाते, बड़े परिवारों की हानियाँ और जनसंख्या वृद्धि के पुष्परिणामों की विवेचना करते रहे हैं। इन बातों का कोई प्रभावशाली परिणाम उत्पन्न हुआ हो ऐ देखने में नहीं आता, आखिर प्रकृति को ही अपना कुल्हाढ़ा तेज करने के लिए बाध्य होना पड़ता रहा है।
इन दिनों संसार में हिंसा की आग बड़ी तेजी से फैल रही है। हत्या, मारपीट, उपद्रव, दंगे, लूटमार और अपराधों में बड़ी तेजी से बाढ़ जा रही है। मनोवैज्ञानिकों और प्रकृति विज्ञानियों की दृष्टि में इसका एक बड़ा कारण जनसंख्या का बहुत अधिक बढ़ जाना है, पिछले दिनों ब्रिटेन के दो प्रसिद्ध समाजशास्त्री क्लेअर रसल और डब्ल्यू.एस. रसेल, ने कई मामलों का अध्ययन करने के बाद जो निर्ष्कष प्राप्त किये, उनसे यहीं सिद्ध होता है कि इस तरह की घटनाओं के मूल में वस्तुतः प्रकृति प्रेरणा ही काम कर रही है। इन दिनों छुट-पुट कारणों से उत्पन्न हुए मन मुटाव भी भयंकर हिंसावृत्ति के रुप में उभरते हैं और उनकी चपेट में प्रतिद्वन्द्वियों के निरीह बाल बच्चे भी आ जाते हैं। धन के लालच में चोरी ठगी की अपेक्षा सफाया करके निश्चिन्ता पूर्वक लाभान्वित होने की आपराधिक प्रवृत्तियाँ पिछले दिनों तेजी से बढ़ी हैं। क्योंकि हिंसावृत्ति इतनी उग्र होती जा रही हैं? इस पर विभिन्न दृष्टियों से विचार और कई परीक्षण करने के बाद यही सिद्ध हुआ कि जनसंख्या का दबाव मनुष्य को उथलाः असहिष्णु और असंतुलित बना देता है, इसी कारण लोग जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं अथवा हत्या और हिंसा करने में जरा भी नहीं झिझकते हैं।
संख्या के दबाव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव जाँचने के लिए किये गए प्रयोगों में देखा गया कि छोटे-छोटे जानवर जब छिरछिरे, खुले और शाँत वातावरण में रहते थे, तब उनकी प्रकृति बहुत शान्त थी किन्तु जब उन्हें भीड़ भाड़ में रखा गया तो वे उत्तेजित और थके माँदे रहने लगे तथा उनमेंएक दूसरे पर आक्रमण करने की प्रवृत्ति भी पनपती पाई देखी गई। सर्वविदित है कि भीड़ भाड़ के कारण मल-मूत्र, पसीना तथा रद्दी चीजों की गंदगी भी बढ़ती है और शरीर से निकलने वाली ऊष्मा अपने निकटवर्ती वातावरण को प्रभावित करती हैं, मनःशास्त्रियों के अनुसार यह विकृतियाँ ही प्राणियों तथा मनुष्यों को उत्तेजित करती एवं उन्हें अशान्त बनाती है। यही कारण है कि छोटे गाँवों की अपेक्षा कस्वों में तथा कस्वों की अपेक्षा शहरों में अधिक अपराध होते हैं। हत्याओं और आत्महत्याओं का अनुपात भी इन्हीं कारणों से सघन आबादी वाले क्षेत्रों में अधिक पाया गया है।
सामाजिक और पारिवारिक वातावरण यदि संतोष जनक समाधान कारक बना रहे तो उसमें रहने वाले व्यक्ति भी शान्त प्रकृति के हो सकते हैं किन्तु जब परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ती है तो उसमें परिवार का वातावरण शाँत, संतुलित बना रहना प्रायः कठिन ही होता है, फलस्वरुप कलह पैदा होता है और इस कलह के कारण परिवार के प्रत्येक सदस्य को खिन्न, दुःखी एवं अशान्त होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही रोष उत्पन्न होता है और यही रोष हिंसावृत्ति मं बदल जाता है। उन दिनों जितने भी उपद्रव हो रहे हैं उनके मूल में इस तरह की पारिवारिक परिस्थितियों एक बड़ी सीमा तक उत्तरदायी हैं।
शहरों में आबादी बढ़ रही है और परिवारों में संतान की संख्या कुल मिला कर जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है और जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ एक दूसरा खतरा भी मनुष्य जाति के सिर पर मँडरा रहा है, वह है औद्योगिकरण के कारण स्वच्छ जल और शुद्ध वायु का दिनोदिन दुर्लभ होते जाना। इन दिनों नये-नये उद्योग धंधे, नये नेय कल कारखाने खुलते जा रहे है। इन कल कारखानों और फैक्ट्रियों के लिए बड़ी मात्रा में पानी भी चाहिए और वह पानी उपलब्ध जलस्रोतों से ही प्राप्त किया जाता है। बात यहीं तक सीमित रहती तो भी गनीमत थी, समस्या तो तब और विकराल रुप धारण कर जाती है जब कल कारखानों से निकलने वाला कूड़ा कबाड़ा जलस्रोतों में फेंक दिया जाता है और फेंकी गई उन गंदगियों के कारण जलस्रोत दूषित हो जाते हैं। यों पृथ्वी पर पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है पर अधिकाँश जलस्रोत इतने दूषित हो गए हैं कि पीने योग्य पानी का एक तरह से अकाल ही पड़ता जा रहा है। अपनी पृथ्वी का 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्र से ढंका हुआ है। समुद्र का वह पानी न तो पीने योग्य होता है और न ही कल कारखनों या कृषि उद्योगों के ही उपयुक्त है। दो प्रतिशत जल बर्फ के रुप में उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों तथा ऊँचे पर्वतों की चोटियों पर जमा रहता है। एक प्रतिशत जल ही ऐसा होता है जो खेती, जंगल, उद्योग धन्धों तथा पीने के काम में लाया जा सकता है। उसमें भी काफी पानी बेकार चला जाता है, जितना पानी वचता है उसका सातवाँ भाग नदियाँ समुद्रों में फेंक देती हैं। अब जो पानी बचता है उसी में कल-कारखानों, खेती बागवानी और पीने पकाने की आवश्यकता पूरी करनी पड़ती है।
कल कारखानों और फैक्ट्रियों की बाढ़ पेयजल का एक बहुत बड़ा भाग झपट लेती हैं। इतना ही नहीं उत्सर्जित गंदगी से आस पास के जल स्रोतों को भी दुषित कर देती है। कल कारखानों के कारण मनुष्य को अपने भाग में से कितनी कटौती करनी पड़ती है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि महानगरों में रहने वाले लोंगो को अपनी आवश्यकता का केवल 40 प्रतिशत ही स्वच्छ जल मिल पाता है। इसी में उन्हें खींच तान कर काम चलाना पड़ता है।
स्वच्छ जल का कितना बड़ा भाग कारखाने और फैक्टरियाँ झटक लेते है? यह कल्पना करने के लिए इन तथ्यों से अनुमान लगाना चाहिये कि एक लीटर पैट्रोल बनाने के लिए 10 लीटर पानी फूँकना पड़ता है। 1 किलो सब्जी पर 40 लीटर, 1 किलो कागज के लिए 100 लीटर तथा 1टन सीमेंटके लिए 3500 लीटर पानी जलाना पड़ता है। इतना होने के बाद कारखाने जो जहर फेंकते हैं वह भी उपलब्ध पानी का एक बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर ड़ालता है क्योंकि उसे भी नदी तालाबों में ही फेंका जाता है। इसके कारण उन नदी तालावों का पानी किसी काम का नहीं रह जाता, वह इतना विषाक्त हो जाता है। कि न केवल झील तालाबों की सुन्दता नष्ट हो जाती है वरन् उनमें रहने वाले जीव जन्तु और उनका प्रयोग करने वाले सभी अपनी संम्पदा नष्ट करने के लिए विवश हो जाते हैं। इन दिनों अमेरिका के कई झील झरने जो कभी अपनी सुन्दरता के कारण प्रकृति प्रेमियों का जी ललचाते थे और लोग उनके किनारे बैठकर अपना थोड़ा बहुत समय शाँति से बिताया करते थे, अपना आकर्षण खो बैठे हैं। प्रशासन ने अब कई झील, झरनों और नदी जलाशयों के किनारों पर बड़े-बड़े सूचनापट लगा दिए हैं, जिन पर लिखा है “डेन्जर, पोन्यूटेड वाटर, नो स्वीपिंग” खबरदार पानी जहरीला है तैरिये मत। वहाँ के औद्योगिक नगरों के निकटवर्ती सरोवर अब एक प्रकार से ‘मृतक जलाशय’ बन चुके हैं। नदियाँ अब बहाने वाली गटरें मात्र रह गईं।
यह कैसे हुआ? मात्र एक ही कारण है कि कारखानों में जो कुछ वेस्टेज कूड़ा कबाड़ा निकलता है वह इन नदी तालाबों में फेंक दिया जाता है। विशेषज्ञों का कथन है कि इस प्रकार अगले दिनों पेयजल का गम्भीर संकट उत्पन्न होगा। प्रसिद्ध रसायन विशेषज्ञ नाटवल्ड डफिमराइट ने नार्वे की सेंट फ्लेयर झील से पकड़ी गई मछलियों का रासायनिक किया तो पाया कि उनमें पारे की खतरनाक मात्रा मौजूद है। मछलियों में पारे का अंश कहाँ से आया? अधिक बारीकी से पता लगाया गया तो मालुम हुआ कि उस झील के किनारे से लगे हुए कारखाने से जो औद्योगिक रसायन फेंका जाता था, उसमें पारे की भी एक बड़ी मात्रा होती है और वह गंदगी के रुप में बहती हुई झीलों में पहुँचती है। सोचा यह गया था कि यह पारा भारी होने के कारण जल की तली में बैठ जाएया कुछ मछलियाँ यदि पारे से मर भी गई तो कुछ विशेष हानि नहीं होगी। पर यह अनुमान गलत निकला और मछलियाँ पारे की प्रतिक्रिया से प्रभावित हुई तथा वह प्रभाव उनके शरीर में एक इकाई बनकर जम गया। उल्लेखनीय है कि इन मछलियों का भोजन के रुप में उपयोग करने के कारण कई मनुष्य अन्धे और पागल हो गए तथा सैकड़ों की तो मृत्यु हो गई।
इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ, सैकड़ों जाँचे हो चुकी हैं जिनमें किसी क्षेत्र विशेष में कोई बीमारी अचानक फैली और उस बीमारी के कारणों की गम्भीरता से खोज बीन की गई तो पता चला कि यह विपत्ति निकटवर्ती दूषित उन जी स्रोतों का पानी प्रयोग करने से आई है, जिनमें कारखानों द्वारा गंदगी छोड़ी जाती है। औद्योगीकरण के कारण केवल जल स्रोत ही दुषित हो रहे हों, ऐसा भी नहीं हे बल्कि कल कारखानों और रेल मोटरों से जो धुँआ हवा में घोला जाता है वह भी बड़ी भारी विपत्ति बनकर निकट भविष्य में ही बरसने वाला है।
फिलहाल तो व्रिटेन, जर्मनी, फ्राँस, बेलजियम, अमेरिका जैसे उन्नत देशों में ही स्थिति विषम से विषय तर होती जा रही है किन्तु शीघ्र ही धुँए के जहरीले प्रभाव से सारा संसार संकट में पड़ने वाला है रोम की राष्ट्रीय अनुसंधान समिति के निर्देशक रावर्टो पैसिनों ने वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों की ओर संकेत करते हुए कहा है कि इससे व्यापक जीवन की समस्या निकट भविष्ट में ही खड़ी होने जा रही है। भले अभी कुछेक उन्नत देश ही इससे प्रभावित होते दिखाई दे रहे हो कितु शोघ्र ही संसार भर के देश कम ज्याद रुप में इन संकटों से प्रभावित होंगे। उद्योग धंधों और कल कारखानों के कारण वायु में घुलते जा रहे विषों के प्रभाव से यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि संभवतः इन विषैले तत्वों के कारण सारी पृथ्वी ही भयंकर रुप से गर्म हो कर जल जाये अथवा उस पर रहने वाले प्राणी धुँए के कारण घुट-घुट कर मरने लगे।
इस दुःखद और दुर्भाग्य पूर्ण सभावना का वैज्ञानिक आधार बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि कारखानों की भट्टियों और रेल मोटरों से निकलने वाला धुँआ आकाश में छाने लगता है तथा अवसर पाते ही धरती की ओर झुकने लगता है। यह झुकाव कभी भी इतना घना हो सकता है कि कभी भी कहीं भी कोई भी दुर्घटना घट सकती है और हजारों लोगों को अपनी चपेट में लेकर मृत्यु की गोदी में फेंक सकती है। थर्मल इर्न्वशन (ताप व्यतक्रमण की प्रक्रिया शुरु होते ही धुआ धुँध के रुप में बरसने लगता है। जब तक वायु गर्मी से प्रभावित रहती है, तब तक तो धुँआ धुँध हवा के साथ ऊपर उठता रहता है लेकिन जब शीतलता के कारण वायु नम हो जाती है तो धुलि का उठाव रुक जाता है और वह वायु दूषण नीचे की ओर गिरने लगता है। हवा का बहाव बन्द हो जाने पर तो यह विपत्ति और भी बढ़ सकती है। पिछले दिनों कई देशों में पाँच-पाँच सात दिन तक इस तरह के विषैले धुँए की धुँध छाई रही और इस धुँध के दोरान ही सैकड़ों लोगों को घुट-घुट कर बुरी तरह खाँसते-खाँसते अपने प्राण गँवाना पड़े। इस तरह की घटनाएँ अगले दिनों यत्र-यत्र घटेंगी।
हजारों लोगों को एक साथ मार डालने वाली घटनाओं का ताँता न भी लगे, तो भी कल कारखाने और रेल, मोटरें जिस तेजी से वायुमंडल का विषाक्त करते जा रहे हैं उनके कारण नये-नये रोगों के उत्पन्न होने की संम्भावना निश्चित ही समझनी चाहिए। वायु प्रदूषण के भयंकर खतरों की ओर वैज्ञानिक समय-समय पर ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। हाल ही ब्रिटेन की पर्यावरण प्रदूषण शोधसंस्था के वैज्ञानिक ने यह वक्तव्य प्रसारित किया है कि “पिछले दिनों धुँए के रुप में जितना विष वायु मण्डल में छोड़ा गया है और अब भी छोड़ा जा रहा है। यदि शीघ्र ही कोई नियन्त्रण नहीं किया गया तो बहुत जल्द ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने वाली है जिसमें विश्व के अधिकाँश जीवों का, जिसमें मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य प्राणी आते हैं, सबको दम घोट कर चट कर जायेगा।”
भावी युद्ध में अणु आयुधों का निर्माण भारी मात्रा में हो रहा है। उनके परीक्षण बिस्फोटों से जितना विकरण अन्तरिक्ष में भर चुका उसके फल स्वरुप अप्रत्यक्ष रुप से करोड़ों का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है और इससे नई पीढ़ियों की विकलाँक, विक्षिप्त, एवं अविकसित स्तर का जीवन-यापन करना पडे़गा। यह बिस्फोटों का सिलसिला अभी चल ही रहा है और उससे सर्वनाश का खतरा दिन-दिन बढ़ रहा है। अणु युद्ध हुआ तब तो समझना चाहिए कि कहा प्रलय जैसी स्थिति ही उत्पन्न होगी और इस धरती का वातावरण मनुष्य ही नहीं किसी अन्य प्राणी के जीवित रहने योग्य न रहेगा।
बढ़ता हुआ कोलाहल, नशों का अन्धा धुन्ध प्रयोग, रासायनिक खाद, कीट मारक छिड़काव आदि के फलस्वरुप मनुष्य की जीवनी शक्ति दिन-दिन घटने तथा बिपाक्तता बढ़ने का दौर घटता नहीं बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी दशा में न शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा हो सकेगी और न मानसिक सन्तुलन की।
कुछ विपत्तियाँ ऐसी होती हैं जो शस्त्र प्रहार की तरह तत्काल प्राण संकट उत्पन्न करती है कुछ क्षय रोग की तरह अविज्ञात रहती और धीरे-धीरे गलती, घुलाती मरण के मुख में धकेलती हैं। जनसंख्या वृद्धि, वायु प्रदूषण; अणु विकरण, कोलाहल, रासायनिक विषाक्तता, नशे जैसे संकट होते हैं जो गलाकर समस्त मानव समाज को विनाश के गर्त में धकेलते जा रहे हैं।
स्थिति बताती है, संकट बढ़ते चले जो रहे हैं। इनसे जूझाना या मरण के सम्मुख सिर झुकाना यही दो मार्ग सामने हैं। अच्छा यही है कि विनाश के साथ मुठभेड़ करने की तैयारी की जाय। इसी में अपना बचाव है, और इसी में समस्त मानव समाज का संरक्षण।
इन दिनों विज्ञान ने जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति की है। जो जानकारियाँ एवं सुविधाएँ पूर्वजों को उपलब्ध थीं, उनकी तुलना में अपनी उपलब्धियाँ कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं। इन उपलब्धियों को ही प्रगति कहा जाय तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि मानवी सभ्यता ने प्रगति की है। लेकिन प्रगति को दिशा की कसौटी पर कसा जाय, यह प्रश्न किया जाय कि प्रगति किस दिशा में हुई? उत्थान की दिशा में अथ्वा पतन की दिशा में, तो स्थिति निस्सनदेह शोचनीय हो जाती है। क्योंकि प्रगति उत्थान की दिशा में भी हो सकती है और पतन की दिशा में भी। प्रगति का अर्थ बढ़ना है तो बढ़ना आगे भी हो सकता है और पीछे भी। मानव जाति आगे बढ़ी या पीछे बढ़ी, यह विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इन दिनों सुवा साधनों के साथ-साथ विनाश, विग्रह और पतन के साधन भी उतनी ही तेजी से , कहा जाय कि उससे भी अधिक तीव्रता के साथ विकसित किये गए हैं तो कोई आर्श्चय नहीं होना चाहिए। वर्तमान प्रगति किस दिशा में हुई है, उससे मनुष्य ने क्या पाया है? शान्ति, सुरक्षा, सुव्यवस्था और प्रगति की दृष्टि से मनुष्य ने क्या अपलब्धियाँ अर्जित की हैं? यह विचार करने योग्य है। शान्ति, प्रगति ओर सुरक्षा की दृष्टि से विज्ञान ने मनुष्य को जितने सुविधा साधनों से लैस किया है, उससे भी अधिक मनुष्य के पास विनाशकरी और संहारक अस्त्र-शस्त्रों का भण्डार एकत्रित हो गया है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार इस समय विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों के पास इतनी अधिक मात्रा में गोला बारुद जमा है कि उससे पृथ्वी को एक बार नहीं सात-सात बार जलाकर राख किया जा सकता है।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में जो विनाश और नरसंहार हुआ, वह सर्वविदित है। इसके बाद तीसरे विश्व युद्ध में होने वाले विनाश की सम्भावनाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइस्टीन से किसी ने एक बार तीसरे विश्व युद्ध के सम्बन्ध में पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि तीसरे विश्व युद्ध के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, पर चौथे विश्व युद्ध के सम्बन्ध में जरुर कुछ-कुछ कल्पना की जा सकती है।
इसी कल्पना को स्पष्ट करते हुए आइस्टीन ने कहा था कि तीसरे विश्व युद्ध के बाद यदि कोई लड़ाई लड़ी गई, यदि इसके बाद थोड़े-बहुत मनुष्य बचे और उनमें कोई युद्ध हुआ तो वह युद्ध ईंट, पत्थरों से लड़ा जायगा। अर्थात् तीसरे विश्व युद्ध में इतना प्रलयंकार विनाश होगा कि मनुष्य जाति का अस्तित्व बचेगा, इसमें सन्देह है। यदि मनुष्य का अस्तित्व किसी प्रकार बचा रहा तो भी यह निश्चित है कि सभ्यता और संस्कृति का तो अन्त हो ही जायगा। यह सच है कि इन दिनों सुरक्षा और शान्ति के साधन बढ़ाने के नाम पर जो साधन सरंजाम जुटाये जा रहे हैं, उन साधनों के रुप में मृत्यु को अति सरल और अति निकट बना देने वाले साधनों का ही विकास तेजी से हो रहा है। लाठी, फरसेसे होने वाली मारकाट की तुलना में यह स्थिति निश्चय ही प्रगति कही जा सकती है, यदि व्यापक विनाया को सस्ता और सरल बना देना ही प्रगति कहा जाय तो कोई एक व्यक्ति, जो इस तरह के साधनों का संचालन, नियन्त्रण और प्रबन्ध का उत्तरदायित्व सम्हालता यदि थोड़ी देर के लिए बहक जाय तो इस सुन्दर संसार को भस्मीभूत करके रख सकता है।
आइये, थोड़ा इन विनाश साधनों का विवरण जानें। इन दिनों अमेरिका ने एक नये किस्म का प्रक्षेपक विमान बनाया है। इस विमान में अणुबमों से लैस मिसायलें फिट कर दी जाती हैं और उन्हें आकाश से ही चलाकर लक्ष्य पर छोड़ा जा सकता है। अब तब ऐसी मिसायलें केवल जमीन पर से ही छोड़ी जा सकती थीं। शत्रु पक्ष गुपतचरों द्वारा यह जानकारी रख सकता था कि प्रतिपक्ष के पास इस तरह के अणुबम प्रक्षेपण करने वाले अड्डे कहाँ-कहाँ हैं। इस जानकारी के आधार पर उन्हें नष्ट करने की व्यसस्था बनाई जा सकती थी। अणु अस्त्र फेंकने और शत्रु पक्ष की मार से बचने के लिए इसी आधार पर अब तक युद्ध नीति विर्धारित की जाती थी। किन्तु अब बी-बन नामक विमानों ने कई समस्याएँ पैदा कर दी हैं। मिसायलें उस पर लदी होंगी, उनमें अणुबम फिट किये हुए होंगे औ आकाश से ही निशाने पर बम दाग दिये जायेगे। ये बम वर्षक इतने ऊपर उड़ रहे होंगे कि वहाँ तक तोपों के गोले नहीं पहुँच सकेंगे। उन्हें राँकेटों से तोड़ने की बात सोची जाय तो वह भी कठिन होगा क्योंकि उस बम वर्षक यान के चालक उसे सीधी दिशा में एक गति से नहीं उड़ा रहे होंगे। आकाश में वे कभी दाएँ, कभी वाएँ, कभी आगे, कभी पीछे, कभी ऊपर, कभी नीचे इस तरह उलटी-पुलटी दिशाओं में ऊँचाई-नीचाई पर उड़ेंगे और उन्हें जमीन से राँकेट दाग कर नष्ट करना प्रायः असम्भ्व ही रहेगा। इस प्रकार ये बम वर्षक विमान बिना जोखिम उठाये अपना काम कर सकेंगे।
कैलिफोर्निया के रासवेल इन्टर नेशनल प्लाँट ने जब इसी बीवन बम वर्षक विमान को पहली बार उड़ाया तो उस समय जेट 2400 किलोमीटर प्रति घण्टे की चाल से उड़ रहा था। इसकी मार करीब दस हजार किलोमीटर पहुँचती थी। उसका भार 1लाख 15 हजार पौंड तथा मूल्य करीब 50 करोड़ डालर हे। लम्बाई 143 फीट, ऊँचाई 34 फीट और इसके पंख 137 फीट के हैं। इसमें अभी और विकास किया जाना है। आकाश से अणुबम दागने की तकनीक तक हीं बात सीमित होती तो भी गनीमत रहती लेकिन इन दिनों तो युद्ध में शत्रु पक्ष को मारने के लिए नए-नए तरीके विकसित किये जा रहे हैं।
स्मरणीय है युद्ध का उद्देश्य सदैव यही रहता है कि शत्रु राष्ट्र के जन-धन को अधिक से अधिक हानि पहुँचाई जाय। अभी तक की लड़ाइयों में यह स्पष्ट रहता था कि यु़द्ध किन देशों के बीच चल रहा है। किन्तु अब इस तरह के प्रयास चल रहे हैं जिससे कोई देश किसी के सामने न आए, यह स्पष्ट न हो कि लड़ाई किन देशों के बीच चल रही है और व्यापक स्तर पर प्रतिपक्षी को हानि पहुँचाई जा सके। इस सावधानी के लिए युद्ध के नये से नये तरीके खोजे जा रहे हैं। अब तक खोजे गये तरीकों में से नवीनतम दो तरीकों में जीवाणु युद्ध तथा भूगर्भीय युद्ध हैं।
जीवाणु युद्धों के सम्बन्ध में प्रायः चर्चाएँ होती रहती हैं और इनके कारण होने वाले भयंर विनाश के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता है। प्रतिपक्षी देश को इस युद्ध के द्वारा हानि पहुँचाने की प्रक्रिया में न ऐसा लगता है कि कोई देश हमला कर रहा है और न ही ऐसा लगता है कि कहीं किन्हीं शास्त्रास्त्रों का उपयोग हो रहा है। युद्ध का उपक्रम चुपचाप बिना किसी हल्ले के चलता रहता है, ऊपर से देखने में बेहद शान्त स्थिति लगती है, पर विनाश अपना ताण्डव नृत्य नेपथ्य में रचता रहता है, पर विनाश अपना ताण्डव नृत्य नेपथ्य में रचता रहता है, जिसकी प्रतिक्रिया असाधारण रुप से देखने में आती है। इस प्रक्रिया में विषाक्त जीवाणुओं को चुपचाप दुसरे देश में पहुँचा दिया जाता है। यह विषाणु इतने सूक्ष्म होते हैं कि आमतौर पर शक्तिशाली माइक्रोस्कोप यन्त्रों के द्वारा भी नहीं देखे जा सकते। सुई की नोक के बराबर स्थान में ये जीवाणु लाखों की संख्या में बड़ी आसानी से आ जाते हैं औंर उन्हें किसी व्यक्ति के नाखून पर लगाकर भी दूसरे देशों में बड़ी सरलतापूर्वक पहुँचाया जा सकता है।
उन देशों में पहुँचने के बाद ये जीवाणु जब सक्रिय होते हैं ता असाध्य बीमारियाँ महामारी के रुप में फैलती हैं। उनका कोई कारण भी समझ में नहीं आता, लेकिन वे इतनी तेजी से फैलती हैं कि लाखों लोग अपनी जान गँवा बैठते हैं। अब तक के युद्धों में तो ऐसा होता है कि सेनाएँ एक दूसरे पर आक्रमण करती हैं, गोली, बारुद और अग्नियास्त्रों के प्रयोग द्वारा इस प्रकार के युद्धों के केवल सैनिक ही मारे जाते हैं, परन्तु अगले दिनों जो युद्ध लड़े जायेंगे उनमें निरीह लाखों लोगों की भी हत्या होगी।
जीवाणु युद्धों के अतिरिक्त दूसरे प्रकार के युद्धों में भू-भौतिकीय अथवा भूगर्भीय युद्ध भी कम विनाशकारी नहीं है। इन युद्धों में पृथ्वी की ऊर्जा का उपयोग करके भूकम्प लाने, जलवायु बदलने तथा पृथ्वी के वायु-मण्डल में परिवर्तन कर दूसरे देशों को हानि पहुँचाने का उपक्रम रचा जायगा। इस प्रकार के युद्धों में कुछ क्रियाओं का तत्काल असर पड़ेगा और कुछ धीरे-धीरे सामान्य जीवन को प्रभावित करेंगी। प्रभाव चाहे तत्काल हो या धीरे-धीरे वे होंगे अत्यन्त घातक ही।
इस प्रकार के युद्धों में सौर ऊर्जा के प्रयोग की भी सम्भावना है। स्मरणीय है सूर्य पृथ्वी पर सात लाख मैगावाट अणुबमों की शक्ति के बराबर ऊर्जा प्रतिदिन पृथ्वी पर फेंकता है। इस असाधारण ऊर्जा का एक बहुत बड़ा अंश प्रकृति पर विभिन्न रुपों में समा जाता है। समुद्र और वायु-मण्डल इस ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भाग सोख लेते हैं और इस ऊर्जा से ही पृथ्वी पर मौसमों का चक्र बनत है। समुद्र और वायु-मण्डल इस ऊर्जा को एक समान नहीं सोंखते। कहीं-कहीं यह ऊर्जा बहुत अधिक मात्रा में केन्द्रित हो जाती है। इस केन्द्रित ऊर्जा के कारण समुद्र में तूफान के कारण जल प्रलय से ठीक वैसा ही विनाश उत्पन्न होता है, जितना होते हैं। इस तरह के तूफान प्रायः समुद्र में उड़ते रहते हैं। युद्ध विज्ञानी इस बात के लिए प्रयास कर रहे हैं कि इन तूफानों की दिशा व गति बदलकर मनचाही दिशा में मोड़ी व घटाई-बढ़ाई जा सके। इस तरह के कई प्रयोग सफल भी हुए है। अब अनुमान लगाया जा सकता है कि युद्ध के रुप में इस तकनीक का उपयोग किया गया तो इसके कितने घातक परिणाम हो सकते हैं।
आकाश में घूमती हुई अगणित उल्काएँ पृथ्वी के वायु-मण्डल में प्रवेश करती हैं। इनमें से अधिकाँश उल्काएँ तो वायु-मण्डल के ताप और घर्षण से ही जलकर नष्ट हो जाती हैं। किन्तु जो उल्काएँ पृथ्वी पर आ गिरती हैं उनका प्रभाव निश्चित होता है। इन उल्काओं का रास्ता बदलकर दूसरे क्षेत्रों में गिराने के वैज्ञानिक प्रयास भी चल रहे हैं और उनसे ठीक वैसा ही विनाश प्रस्तुत किया जा सकेगा जैसा कि बड़ी उल्काओं पृथ्वी पर गिरने से होता है। ये उल्काएँ तो कहीं भी जंगल में या आबादी में गिर सकती हैं और आमतौर पर जंगलों में ही गिरती हैं। किन्तु अणु शक्ति के सहारे इन उल्काओं का युद्ध के लिए प्रयोग किया जायगा तो निश्चित ही उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में गिराया जाएगा। बड़ी उल्काओं के गिरने से पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्थानों पर हुए विनाश के चिन्ह अभी भी मौजूद हैं। अफ्रीका में कुछ वर्षों पूर्व हुए एक उल्कापात के परिणाम स्वरुप’ऐरीजोना क्रेटर’ नाम का विशाल गड्ढा इ सर्न्दभ में उल्लेखनीय है। इसका व्यास एक धातु कण छितरे पाये गए हैं। यदि इस प्रकार उल्काओं की दिशा मोड़कर उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में गिराया गया तो कहा नहीं जा सकता कि कितना और कैसा विनाश ताण्डव खड़ा हो जायगा?
बर्फ को पिघलाकर भूभागों को जलमग्न कर देने, अतिवृष्टि, अनावृष्टि करने तथा भीषण गर्मी या भयंकर शीत का मौसम बदल देने जैसे प्राकृतिक परिवर्तन प्रस्तुत करने के अनेकों सफल प्रयोग किये जा रहे हैं। युद्ध की यह नई पद्धतियाँ पिछली सभी पद्धतियों की अपेक्षा विनाश की ओर, सामूहिक आत्मघात की ओर ही अधिक कदम उठाए हैं। ये तथ्य यह भी सिद्ध करते हैं कि बुद्धि और साधन क्षेत्र में मनुष्य कितना ही विकास क्यों न कर ले, चेतना और अन्तःस्थिति का परिष्कार किये बिना वह प्रगति अधूरी, एकाँगी और घातक ही है।
यह स्थिति मानवीय अस्तित्व की रक्षा के लिये अनिवार्य है। उथल-पुथल, उलट-फेर, भय और संकटों से तो नहीं बचा जा सकता, किन्तु प्रकृति उसके लिये सत्रद्ध और सचेष्ट दीखती है, सूक्ष्मदर्शी इस बात के लिये एक मत है कि अगले दिनों व्यापकक्रान्ति के मध्य नये युग का सूत्रपात सुनिश्चित है।
युग सन्धि की अवधि में कितनी ही उथल पुथल होने की सम्भावना है। इस सर्न्दभ में प्रख्यात ज्योतिषियों ने कुछ महत्वपूर्ण अभिमत व्यक्त किये हैं। इनमें से कई समयानुसार सही सिद्ध हो चुके। कुछ ऐसे हैं जिनका सम्बन्ध भविष्य से है। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से सम्बन्ध रखते हैं कुछ भारत से। समय आने पर यह विदित होगा कि भूत काल की तरह उनके भविष्य कथन भी सही सिद्ध होते हैं या नहीं।
इन कथनों में से जिनका भारत से सीधा सम्बन्ध हैं उन्हें देखते हुए इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि अगले दिन भारी कठिनाइयों के हैं। इन से भारत को भी बहुत कुछ सहना पड़ेगा साथ ही एक तथ्य यह भी उभर कर आता है कि समस्त विश्व को नया प्रकाश देने और सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में भारत की भूमिका असाधारण रहेगी। भूतकाल में भी विश्वशान्ति के लिए, मानवी प्रगति एवं समृद्धि के लिए भारत ने बहुत कुछ किया है। अब फिर उसी की पुनरावृत्ति होने जा रही है। यहाँ की ऋषि कल्प आत्माएँ प्राचीन काल की तरह लोक कल्याण के लिए बहुत कुछ करने की तैयारी में जुटी हुई हैं। समय बतायेगा कि इन प्रयासों के फलस्वरुप सृजन को कितना बल मिला और संकटों को टालने में इस तत्परता ने कितना चमत्कार उत्पन्न किया। इस सर्न्दभ में प्रख्यात ज्योतिर्विदों के कुछ कथन चीने प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
सितम्बर 72 में दुनिया के प्रमुख ज्योतिषियों का एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में ऐसे ज्योतिषी सम्मिलित हुये थे जिनकी 80 प्रतिशत से भी अधिक भविश्यवाणियाँ सही निकलती रही हैं। कोरिया ने स्यूत नगर में सम्पन्न हुए इस सम्मेलन में 104 भविष्यवक्ता सम्मिलित हुए थे, सबने आम सहमति से, अपने ज्योतिष ज्ञान के अनुसार जो भविष्य कथन कहे, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं, सन् 1984 के आसपास अमेकरका और रुस में यु़द्ध तो होगा किन्तु सन् 1984 के पूर्व इस बात की कोई सम्भावना नहीं है। यह युद्ध ‘विश्वयुद्ध हो सकता है।
“आज जो राष्ट्र महाशक्तियों द्वारा विभक्त कर लिए गये हैं, जैसे जर्मनी, कोरिया और वियतनाम वह भविष्य में पुनः संयुक्त हो जायेंगे, उनकी सरकारों दो न होकर एक होगी राष्ट्रवादी और आह्यशक्तियों के दबाव में आये बिना, काम करने वाली होगी,।
“व्यापार, धन-धान्ध, कृषि, गौ विद्या, विज्ञान तथा तकनीकी क्षेत्र का एशियाई प्रभुत्व भारतवर्ष में आ सकता है।”
“चीन काफी समय तक जोड़-तोड़ की राजनीति में कामयाव रहेगा और प्रबल शत्रुओं को भी धोखा देने तथा मित्रता का नाटक रचने में वह सफल होगा किन्तु उसकी पोलें जल्दी ही खुलेंगी अपने आन्तरिक विग्रह के कारण ही वह विनाश के गर्त में जा सकता है। विश्व के कई राजनेताओं की हत्याओं के योग हैं
इन भविष्य वाणियों में अधिकाँश का समय 1980 के बाद का बताया गया है। इस सम्मेलन के अध्यक्ष, जो स्वंय भी कोरिया के विश्व प्रसिद्ध, देवज्ञ हैं, श्री हर्सारों असानों ने उस सम्मिलित विज्ञप्ति को प्रसारित करते हुए लिखा है कि इसमें केवल इन्हीं भविष्यवक्तओं को सम्मिलित किया गया है जिनकी भविष्य वाणियाँ 80 प्रति शतसे भी अधिक सत्य हुई हैं। इस सम्मेलन के समाचार और यह भविष्य वाणियाँ दुनिया के प्रायः सभी अखबारों में विवरण् सहित प्रकाशित हुईं। भारत में भी यह विवरण ‘इंडियन ढक्सप्रेस’ दैनिक के 12 सितम्बर में सार रुप में छपा था। इसमें उपरोक्त घटना क्रमों की चर्चा के अतिरिक्त विश्वव्यापी बौद्धिक परिवर्तनों का भी संकेत है। घोषणा में कहा गया है कि, अगले दिनों एशिया में भारी उथल-पुथल होगी। यह उथल-पुथल एक ओर बिचार क्रान्ति के रुप में परिलक्षित होगी तो दूसरी तरफ एक बार भयंकर अकाल पड़ेगा। तीन भयंकर भूकम्प आयेंगे,
सितम्बर 72 में दुनिया के प्रमुख ज्योतिषियों का एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में ऐसे ज्योतिषी सम्मिलित हुये थे जिनकी 80 प्रतिशत से भी अधिक भविष्यवाणियाँ सही निकलती रही हैं। कोरिया ने स्यूत नगर में सम्पन्न हुए इस सम्मेलन में 104 भविष्यवक्ता सम्मिलित हुए थे, सबने आम सहमति से, अपने ज्योतिष ज्ञान के अनुसार जो भविष्य कथन कहे, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं, सन् 1984 के आसपास अमेरिका और रुस में युद्ध तो होगा किन्तु सन् 1984 के पूर्व इस बात की कोई सम्भावना नहीं है। यह युद्ध ‘विश्वयुद्ध हो सकता है।
“आज जो राष्ट्र महाशक्तियों द्वारा विभक्त कर लिए गये हैं, जैसे जर्मनी, कोरिया और वियतनाम वह भविष्य में पुनः संयुक्त हो जायेंगे, उनकी सरकारें दो न होकर एक होगी राष्ट्रवादी और बाह्यशक्तियों के दबाव में आये बिना, काम करने वाली होगी।’
“व्यापार, धन-धान्य, कृषि, गौ, विद्या, विज्ञान तथा तकनीकी क्षेत्र का एशियाई प्रभुत्व भारतवर्ष में आ सकता है।”
“चीन काफी समय तक जोड़-तोड़ की राजनीति में कामयाव रहेगा और प्रबल शत्रुओं की भी धोखा देने तथा मित्रता का नाटक रचने में वह सफल होगा किन्तु उसकी पोलें जल्दी ही खुलेंगी। अपने आन्तरिक विग्रह के कारण् ही वह विनाश के गर्त में जा सकता है। विश्व के कई राजनेताओं की हत्याओं के योग है
इन भविष्य वाणियों में अधिकाँश का समय 1980 के बाद का बताया गया है। इस सम्मेलन के अध्यक्ष, जो स्वयं भी कोरिया के विश्व प्रसिद्ध, देवज्ञ हैं, श्री हर्सारोंअसानों ने उस सम्मिलित विज्ञप्ति को प्रसारित करते हुए लिखा है कि इसमें केवल इन्हीं भविष्यवक्ताओं को सम्मिलित किया गया है जिनकी भविष्य वाणियाँ 80 प्रतिशतसे भी अधिक सत्य हुई हैं। इस सम्मेलन के समाचार और यह भविष्य वाणियाँ दुनिया के प्रायः सभी अखबारों में विवरण सहित एक्सप्रेस’ दैनिक के 12 सितम्बर में सार रुप में छपा था। इसमें उपरोक्त घटना क्रमों की चर्चा के अतिरिक्त विश्वव्यापी बौद्धिक परिवर्तनों का भी संकेत है। घोषणा में कहा गया है कि, अगले दिनों एशिया में भारी अथल-पुथल होगी। यह उथल-पुथल एक ओर बिचार क्रान्ति के रुप में परिलक्षित होगी तो दूसरी तरफ एक बार भयंकर अकाल पड़ेगा। तीन भयंकर भूकम्प आयेंगे,
“बिचार क्रान्ति का असर सारी दुनिया पर पड़ेगा। सन् 2000 से पूर्व ही बौद्धिक क्रान्ति की यह लहर न क्वल दक्षिणपंथी वरन् वामन्थी कम्युनिष्ट देशों में भी फैल जायगी। क्रान्ति का स्वरुप आध्यात्मिक धार्मिक विचार होगा। मत मतान्तरों के वर्ण सम्प्रदाय के भाषा-भेष के भेद मिट जायेंगे और लोगों में धार्मिक समभाव तथा भाई चारे की भावना का व्यापक विस्तार होगा।
परिवर्तन जब एक सुनिश्चित विधान के अनुसार होगा तो उसका सूत्रपात और सूत्र संचालन कौन करेगा, इस बात पर भी विश्व भविष्य वक्ताओं में विचार विमर्श हुआ। दृष्टा इस मामले में एक मत थे कि “एशिया के किसी देश में जन्मा एक महान् सन्त विश्व में भारी परिवर्तन लाने के लिए कार्यरत है। इस शताबदी के अन्त तक इस सन्त का प्रयास इतना सफल होगा कि उसकी गरिमा का मूल्याँकन करने के लिए उपयुक्त कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध भविष्यवक्ता कीरों, जो ज्योतिष शास्त्र के आधार पर भविष्यवाणियाँ करते थें, ने वर्तमान परिस्थितियों के बारे में कहा था, यूरोप की ईसाई जातियाँ एक बार फिर से यहूदियों को पैलेस्टाइन में बसाएँगी जिसके कारण अरब राष्ट्र और उनके इस्लामी मित्र भड़क उठेंगे (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी आदि देशों से खदेडे गये यहूदियों को पैलेस्टाइन में बमाया गया और एक नया राष्ट्र इजराइल अस्तित्व में आया) वे बार-बार इग्लैंण्ड, अमेरिका आदि के विरुद्ध उत्तेजक नारे बुलन्द करेंगे। यहूदियों से उनकी टक्कर भी होगी, इन सबके बावजूद यहूदियों की शक्ति बढ़ेगी। कम संख्या में होते हुए भी यहूदी अरबों को पीटेंगे और उनका बहुत सा प्रदेश अपने कब्जे में कर लेंगे। 1980 के बाद कभी भी एक बार बहुत ही भयानक टक्कर होगी, जिसमें अरब राष्ट्र बुरी तरह तहस नहस होंगे। यह विनाश पूर्ण होने के बाद एक नई सनातन सभयता का अभ्युदय होगा और सारे विश्व में उसका प्रसार होगा। यह सब सन् 2000 के पूर्व ही हो जायगा।
कीरो ने यह पक्तियाँ सन् 1927 में लिखी थीं तब किसी को इजराइल की कल्पना भी नहीं थी परन्तु करीब बीस वर्षों में ही दुनिया भर के यहूदी पैलेस्टाइन में आये, सचमुच ईसाइयों ने उन्हें मदद दी और इस तरह छोटा सा किन्तु बाघ और बाज की तरह इजराइल एक सशक्त राष्ट्र के रुप में उठ खड़ा हुआ और एक ही मिश्र का सारा सिताई प्रान्त ही हड़प लिया।
प्रो. कीरो ने कहा था, अरबों की नील (नदी) यहूदियों का आदाब बजाएगी” सो भी सच हुआ और अब उस भविष्य वाणी के उत्तरार्ध की प्रतीक्षा की जा रही है। प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड-ज्योति का जनवरी अंक उठाकर देखें जिसमें पृष्ठ 23 पर छपा है “इग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहवी फिसाद के कारण भारत तबाह हो जायगा यहाँ तक कि हिन्दू, बौद्ध और मुसलमानों में बराबर बराबर विभक्त हो जायगा।”
जिन दिनों यह भविष्यवाणी प्रकाशित हुई थी उन दिनों ब्रिटिश दमक चक्र अपने पूरे जोर पर था कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, “भारत वर्ष का सूर्य ग्रह बलवान है और कुम्भ राशि पर है परन्तु उसका अम्युदय संसार की कोई ताकत नहीं रोक सकती।” यह कथन सच ही होकर रहा पर दूसरी भविष्य वाणी जिसमें इस देश के बेट जाने की बात थी उस पर तो किसी का कतई विश्वास नहीं था फिर भी सारी दुनिया ने देखा कि भारत के ही बहुत से बौद्ध, मतावलम्बी राज्य अलग हो गए, पाकिस्तान बना और आज तक वह भारत के लिए सिर र्दद पैदा कर रहा है।
लंका के प्रसिद्ध जयोतिषी श्री नटराजन अपनी सफल भविष्यवाणियों के लिए एशिया में तथा अन्य देशों में भी लोकप्रिय हुए हैं। विश्व के घटनाचक्रों के बारे में इनकी भविष्यवाणियाँ बहुधा सही ही निकली हैं। भारत-पाक विभाजन, भारत पाक युद्ध आदि सम्बन्धी उनके भविष्य कथन शत-प्रतिशत सही उतरे। भावी विश्व के बारे में उनकी कुछ विशेष भविष्यवाणियाँ हैं-
1-तिब्बत सन्1982 में स्वतन्त्र हो जायेगा। 2-अगले भारत-पाक युद्ध में या उसके पूर्व पाँकिस्तान का एक हिस्सा पृथक बिलोचिस्तान के रुप में बदल जायेगा। 3 भारत का गौरव निरन्तर बढ़ता ही जायेगा 4 जापान निरन्तर औद्योगिक प्रगति करता रहेगा। 4.1980 में भारत का अपने एक ऐसे पड़ौसी देश से एक छोटे भूखण्ड को लेकर विवाद बढ़ेगा, जिससे अभी उसके मधुर रिश्ते हैं। पर यह विवाद युद्ध का रुप लेने के पहले ही मामला सुलझ जायेगा। 6. सन् 1987 में एक भयंकर तूफान आयेगा, जिसमें असंख्य प्राणियों का संहार हो जायेगा।
राजस्थान के सुप्रसिद्ध ज्योतिषी डा. नारायण दत्त श्रीमाली की ज्योतिष से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें प्रसिद्ध हैं। अमेरिका के एक विश्वविद्यालय ने उनकी वार्ता ‘शेष शताब्दी का विश्व’ पर टेप की है। इसमें से कुछ प्रमुख भविष्यवाणियाँ ये हैं-
अमरीका 1980 में चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से भी सर्म्पक स्थापित कर सकने में समर्थ होगा। 2,1981 में पाकिस्तान का अस्तित्व नगण्य हो जायेगा। 3. 1982 तक भारत भी अपना एक नागरिक अंतरिक्ष में भेज सकेगा। 4.1983 में एक व्यापक युद्ध प्रायः 19 वर्षों तक चलेगा। 5-24 जुलाई 1984 विश्व इतिहास में ‘अशुभ दिन’ अशुभ दिन’ के रुप में अंकित होगा। र्क्योंकि उस दिन विश्व में बहुत अधिक प्राणी मौत के मुँह में समा जायेंगे। 6.1985 से 1988 तक का समय जापान के लिए विशेष कष्टकर रहेगा। 7. चीन महाशक्ति बनकर उभरेगा। उसके विरुद्ध अमरीका तथा रुस एक होंगे। 8.1987 में एक अति भयंकर तूफान आयेगा, जिसमें करोड़ों लोग पेड़ों की जड़े खाकर जीवित रहने का प्रयास करेंगे। 10 1991 में फरवरी महीने में पहली बार अंतरिक्ष के किसी ग्रह का प्राणी इस धरती पर कदम रखेगा। 11 भारत निरन्तर प्रगति प्रगति करेगा तथा विश्व की प्रमुख हस्तियों में से एक होगा।
बराबर के विद्धान ज्योतिषी श्री गोपीनाथ शास्त्री चुलैट ने एक रात स्वप्न देखा कि ‘नये युग का आविर्भाव सन्निकट है। “उठ कर उनने उस स्वप्न समय की कुण्डली बनाई है।
इस लग्न कुण्डली को बनाने और अध्ययन के बाद इन निष्कर्षों पर पहुँचने के बाद शास्त्री जी ने ‘युग परिवर्तन’ नामक एक पुस्तक लिखी जो अकोला (महाराष्ट्र) से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उन्होंने ज्योतिष गणना के आधार पर बताया है कि इस समय युग संधि चल रही है, जिसमें पिछले अज्ञानान्धकार का अन्त और नवयुग की अरुणिमा निरंतर बढ़ती ही जाएगी। यह समय एक ओर जहाँ भारतर्तनों का है। वहीं सारे विश्व के लिए भी कम कष्टप्रद नहीं है।
शास्त्रीजी द्वारा समय-समय पर की गई भविष्यवाणियाँ सही सिद्ध होती रही हैं। इस आधार पर उनका युग परिवर्तन कथन भी विश्वसनीय ही माना जा सकता है।
सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष के स्वतन्त्र होने की भविष्य वाणी की थी, वह सच हुई, उन्होंने सन् 1938 में ही महात्मागाँधी की मृत्यु का ठीक ठीक समय वता दिया था, यह भी सही सिद्ध हुआ, शास्त्रीजी ने भविष्य वाणी की थी कि सन् 1970 के आस-पास अमेरिका का कोई मनुष्य चन्द्रमा की परिक्रमा करेगा। ‘कलिवर्ज्य प्रकरण में पृथ्वी की प्रदक्षिणा नहीं करनी चाहिए इसका खंडन करते हुए शास्त्री जी ने लिखा था कि ‘भारतीय विमान आदि काल से ही पृथ्वी और अन्य ग्रहों की प्रदक्षिणा करते हुए उड़ते तथा वहाँ की यात्रा करते रहे हैं। निकट भविष्य में यह स्थिति भी देखने में आएगी जब सन् 1970 तक अमेरिका, नवासी चन्द्रमा पर उतर जाएँगे। इसलिए हम भारतीयों को भी प्रदक्षिणा (अंतरिक्ष) विज्ञान की शोध करनी चाहिए, शास्त्रीजी की अनेक भविष्यवाणियों में अत्तरी सीमान्त से आक्रमण (चीन के हमले) आदि की भविष्य वाणी भी ‘सही सिद्ध हो चुकी है। ऐसी दशा में उनका युग परिवर्तन सम्बन्धी विश्वस्त समझा जा सकता है।
हरियाणा के प्रसिद्ध सन्त बाँगड़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है- संवत बीसा द्धौ बीसा कूँ असा जोग अनौखा आवै सै, नौ ग्रह मिलसी एक राशि पर गुरु दशा विचलावें सै। फाल्गुण मासै सूर्य ग्रहण दृश्य दिखावै सै,
राजा प्रजा का घणा दुःखनू सौ, कोहराम मचावै सै। पड़सी विकट अकाल बाद सूँ अनावृष्टि दिखलावै है, धरती फटै, आकाश टूटि के महाणास समहावै है। असा वखत नो ज्योति प्रगट्या सबको राह-यह दिखावै है
कह बाँगड़ की बात झूँठना कतै कणै ह्वै पावै है। लड़सी दयाख्या गोरा तुरकाँराज राजसा धणी धणी, तुरक तबारा मिटसी देखी अमरीसा घेर छणी। उसै जंगड़ी जंग चबारा धरणी कोय देखावेणी, दुःख पर दुःख पावसी दुणियाँ धुन्ध कोण ली छावैसी।
अकबर के समकालीन इन महान संत का उल्लेख “फरमान-ए रशीदी” पुस्तक में भी मिलता है उपरोक्त छन्द में जो स्थितियाँ बताई गई हैं, उनकी संगति वर्तमान परिस्थितियों से बहुत मिलती जुलती है। लोक श्रुति के रुप में प्रचलित यह पंक्तियाँ कई पुराने लोगों को कंठग्र हैं और “फरमान ए रशीदी” में भी संत बाँगड़ की इसी तरह की भविष्यवाणियाँ मिलती है। इस छन्द का अर्थ इस प्रकार है, सम्वत् 2040 (बीसा द्वी बीसा) को ऐसा विचित्र संयोग पड़ने वाला है, जिसके कारण दुनिया पर अगणित आपदाएँ और भयंकर विपदाएँ आयेंगी इस तरह की संम्भावना उस समय प्रत्यक्ष होने लगेगी जब नौ ग्रह एक ही राशि में स्थित होंगे तथा फाल्गुन मास में पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा (उल्लेखनीय है कि 16 फरवरी को पड़ा सूर्य ग्रहण फाल्गुन मास में ही था, तथा नौ ग्रह भी अगले दिनों सूर्य के एक सीध में आ रहे हैं) इस योग से शासन चलाने वालों के साथ-साथ जनता को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। अकाल अतिवृष्टि’ अनावृष्टि, भूकम्प, उल्कापात आदि प्राकृतिक विपदाओं के अतिरिक्त विभिन्न देशों में युद्ध की भी संम्भावना है। अँग्रेज (गोरा) और तुरका (मुस्लिम) राष्टा्रें के बीच संघर्ष की पूरी-पूरी सम्भावना संत बाँगड़ ने बताई है। मनुष्य कृत उत्पातों और प्राकृतिक बिपदाओं के कारण कई देशों के तहस-नहस हो जाने तथा जनःजीवन के बुरी तरह अस्त व्यस्त होने की बात उपरोक्त पंक्तियों में स्पष्ट कही गई ळे
‘ज्योतिष बाध’ मासिक पत्रिका के जनवरी 80 अंक में भविष्य में क्या होगा? शीर्षक एक लेख प्रकाशित हुआ है। इस लेख में कहा गया है कि, ‘शनि एक राशि पर लगभग ढाई वर्ष तक रहता है अतएव प्रत्येक राशि पर वह 12+2॥ अर्थात् तीस वर्ष पश्चात् आता है कर्क, सिंह व कन्या राशि के शनि भयंकर परिवर्तन प्रस्तुत करते हैं। सन् 1857, 1917, 1947 और 1977 से अब तब के तीन चार वर्षों की अवधि में घटी घटनाएँ स्पष्ट हैं। सन् 1982 में शनि के चित्तार्द्ध कन्या राशि पर रहने तक भारत ही नहीं अपितु विश्व में भयंकर परिवर्तन होते रहेंगे। अनिश्चितता कनी रहेगी। भारत में अशान्ति तथा उपद्रवों में वृद्धि ही होगी।
पटना की “खुदाबख्श औरियण्टल लाइब्रेरी” में फारसी कसीदों (कविता) की पुस्तक है, जो बुखारा के सुप्रसिद्ध सन्त शाहनिया मतुल्ला वल्ली साहब की लिखी हुई है।इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है, ‘जापान और रुस में युद्ध होगा (1904 में रुस और जापान में युद्ध हुआ भी जापान में में भयंकर भूकम्प आयेगा (1913 में भूकम्प आया) प्रथम विश्व युद्ध में अलफ (अँग्रेज) और जीम (जर्मन) लड़ेंगे उसमें अँगेज जीतेंगे पर युद्ध में एक कराड़ इकस्तीस लाख व्यक्ति मारे जायेंगे (ब्रिटिश कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सचमुच इस युद्ध में एक करोड़ तीस लाख लोगों की मृत्यु का विवरण दिया गया है) दो जीम जर्मनी दो भागों में बँट गया आपस में तनावपूर्ण स्थिति में आ आएँगे। द्वितीय विश्व युद्ध में उनके द्वारा बम विस्फोट की-की गई भविष्य वाणी अभी तक गलत नहीं हुई है।
भारत के प्रसंग में वली साहब ने लिखा है, मुसलमानों के हाथ से यह मुल्क विदेशियों के हाथ चला जायगा, फिर हिन्दू मुसलमान मिल कर उनके खिलाफ लड़ाई लड़ेगें। विदेशी यहाँ से चले तो जाएगे पर हिन्दुस्तान को दो टुकड़ो में बाँट जाएँगे। दोनों ही देश बन जायेंगे और परस्पर इतनी शत्रुता बढ़ जायगी कि दोनों में युद्ध का तनाव तब बना रहेगा जब तक मुसलमान भू भाग पुरी तरह पराजित नहीं हो जायगा।
तृतीय विश्वयुद्ध के सम्बन्ध में वल्ली साहब ने लिखा है, ‘यह युद्ध बड़ा भयंकर होगा। श्वेत जातियाँ बहुत कमजोर पड जायेंगी। भारत का अभ्युदय एक सर्वोच्च शक्ति के रुप में हो जायगा, पर उसके लिए उसे बहुत कठोर संघर्ष करने पड़ेंगे देखने में यह स्थिति कष्टकारक होगी, पर इस देश में एक फरिश्ता आयगा जो हजारों छोटे-छोटे लोगों को इकट्ठा करके उनमें इतनी हिम्मत पैदा कर दगा कि वही नन्हे-नन्हे लोग ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर देंगे जिससे संसार में सीधे सच्चे लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और अमन चैन फैलत चला जायगा।
मिश्र की एक बहुत प्राचीन मीनार पर यह भविष्य वाणी अंकित है जिसमें कहा गया है कि चौदहवीं सदी बीत जाने पर (हिजरी सन् के अनुसार चौदहवीं सदी अब बीत चुकी है) कयामत आयेगी अर्थात् भीषण विनाश और सघर्ष उत्पन्न होगा। इसी मीनार पर जल्द ही एक नया जमाना आने की बात भी लिखी है जिसमें सत्य ही धर्म होगा, न्याय ही कानून होगा सारी पृथ्वी के लोग एक परिवार की तरह रहेंगे तथा कोई किसी से वैर-भाव नहीं रखेगा। सब और सुख शान्ति रहेगी किन्तु इससे पहले भयंकर युद्ध अकाल और प्राकृतिक प्रकोज इतने सघन होंगे कि संसार की आबादी का एक बड़ा भाग नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा। इस नये युग का आरम्भ थोड़े से लोगों के द्वारा किये जाने की भविष्यवाणी भी उस मीनार पर अंकित है।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भविष्यवक्ता और एस्ट्रोलाँजिकल’ मैगजीन” के सम्पादक बी. बी. रमन ने सन् 1980 के सम्बन्ध में कहा है कि इस वर्ष का आरम्भ मंगल, राहू की युति से होता है। वृहसपति, चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह स्थितियों के प्रभाव स्वरुप विश्व में ऐसी विकट परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी जो अभी तक इतिहास के किसी भी काल में विनिर्मित नहीं हुई हैं। बी.बी. रमन के अनुसार विश्व की अधिकाँश देशों के आपसी सम्बन्ध तनावपूर्ण रहेंगे। राजनीजि में अपना वर्चस्व रखने वाले नेतागण सत्तालोलुप, और अदूरदर्शी हाने के कारण आसन्न समस्याओं पर नियन्यत्र करने में असमर्थ ही रहेंगे।
चन्द्रहण आमतौर से पड़ते रहते हैं सूर्य ग्रहणों की संख्या कम होती है। पर उसका प्रभाव धरती के वातावरण पर अधिक पड़ता है। विशेषतया तब, जबकि वह अधिक ढंके और ख्रग्रास जैसी स्थिति उत्पन्न हों।
युग सन्धि के बीस वर्षों में जो विशेष सूर्य ग्रहण शांखला सन् 1980 से आरम्भ हो 2000 तक चलने वाली है। वह असाधारण है उसका प्रभाव अन्तरिक्ष विज्ञानी तथा ज्योतिर्विद समान रुप से अशुभ बता रहे हैं।16 फरवरी 1980 के बाद अगले बीस वर्षों में दो पूर्ण सूर्य ग्रहण और होंगे। एक 24 अक्टूबर 1995 में दूसरा 11 अगस्त 1999 में। दोनों ही भारत में भली प्रकार देखे जा सकेंगे। 16 फरवरीी 1980 को पूर्ण सूर्य ग्रहण हुआ जो इस शताब्दी की सर्वाधिक महत्वपर्ण घटना इस देश के लिए थी। क्योंकि ग्रहण की पुर्णता का पथ भारतीय महाद्वीप के ऊपर से गुजरता है। पिछला पूर्ण सूर्यग्रहण जो स्पष्टतः भारत में देखा जा सका था, 22 जनवरी 1980 को हुआ था।
सम्पूर्ण पृथ्वी को दृष्टिगत रखकर यह अनुमान लगाया गया है कि ग्रहण 11-45 दोपहर (भारतीय समयानुसार) आरम्भ होकर 5-01 पर शाम को समाप्त हुआ। यह गोलार्द्व के लाँगीट्यूड 30 परिचम से 120 पूर्व तक एवं लैटीट्यूड 60å उत्तर से लैटीट्यूड 34å दक्षिण तक देखा। गया। इस परिधि में पूरा अफ्रीका, सऊदी अरब, ईराक ईरान, अफगान्स्तान, पाकिस्तान , भारत नैपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, वर्मा, मलाया, थाइलैण्ड फिलिप्पीन्स, इन्डानेश्या, चीन, मंगोलिया एवं रुस आ जाते हैं।
भारतीय महाद्वीप में ग्रहण का आरम्भ पश्चिमी घाट के अकोला (कर्नाटक के) में 3 बजकर 39 मिनट पर आरम्भ हुआ। चन्द्रमा की पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया तब उत्तर-पूर्व दिशा में घूमती हुई आँध्र प्रदेश एवं उड़ीसा प्रान्त पर होती हुई पूर्वी समुद्री छोर पर पुरी के नजदीक 3 बजकर 56 मिनट (भारतीय समयानुसार) पर छूती हुई निकल गई। इसके बाद एक छोटा सा हिस्सा मिजेरम का भी इसके प्रभाव क्षेत्र में आया।
ग्रहण की पूर्णता की अवधि में अँधेरे आकाश में केवल चमकदार तारे एवं यह (बुध एवं शुक्र) ही आँखों से दिखाई पड़े।
इस अवधि में सूरज का प्रकाश सीधे न देख कर उसकी तेजी की 100,000 गुना कम करके देखा जाना चाहिए। सौर विकरण का अल्झवायोलेट एवं इन्फ्रारेड वाला हिसा दृष्टि में नहीं आये, इसकी व्यवस्था करने के लिए विशेष फिल्टर ग्लास उपयुक्त होते हैं।काली एक्सपोज की गई फाटोग्राफी की फिल्म को दुहरा कर ग्रहण को देखा जा सकता है। बेल्डर का डार्क-आर्क, लान्स भी प्रयोग किया जा सकता है।
इसी वर्ष 16 फरवरी को जो खग्रास सूर्य ग्रहण पड़ा उसे ज्योतिषियों ने ही नहीं वैज्ञानिकों ने भी सारे संसार के लिए अनिष्ट बताया है “दैनिक हिन्दुस्तान के 14 जनवरी अंक में वैज्ञानिकों की इस मान्यता का उल्लेख है कि ‘इस सूर्य ग्रहण के समय बड़ी मात्रा में गामा आदि किरणों का निर्माण होगा। ये किरणें समस्त जीवधारियों के स्वास्थ्य पर कुछ न कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस समय मनुष्यों का रक्तचाप बढ़ जाने और प्राणियों में दहशत फैल जाने की सम्भावना व्यक्त की गई है। वैज्ञानिकों ने गर्भवती महिलाओं को विशेष रुप से सतर्क किया है कि वे सूर्य ग्रहण के समय बाहर न निकलें। क्योंकि ग्रहण के समय सूर्य से निकलने वाली विभिन्न किरणें गर्भस्थ शिशु को असाधारण रुप से प्रभावित कर सकती हैं।
सन् 1980 में पूर्ण खग्रास सूर्यग्रहण भी पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण घटना घटित हो रही है और वह यह कि यह एक ऐसा वर्ष है जब कि सूर्य पर बनने वाले काले धब्बों का ग्यारह वर्षीय चक्र पूर्ण होगा। इस वर्ष सूर्य पर इन धब्बों की संख्या बढ़ेगी, परिणाम स्वरुप पृथ्वी पर जबर्दस्त चुम्बकीय तूफान उठेंगे, और साथ ही सौरवायु एवं सूर्य की ऊष्मा और घातक हो उठेगी। इन दिनों घातक पराबैंगनी रश्मियों की तीव्रता भी अधिक हो उठेगी जिसके परिणामस्वरुप भूमध्य रेखा के समीपवर्ती अक्षाँश वाले (भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, वर्मा आदि एशियाई) देशों में भयंकर गर्मी पड़ेगी, जोरदार आँधियाँ आयेंगी या मूसलाधार वर्षा होगी।
सूर्य का पूर्ण ग्रहण प्रकृति की अनूठी छवियों में से एक होता है। यह मात्र नव चन्द्रोदय के समय सम्भव है। इसका अर्थ हे कि जब चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच हो। चन्द्रमा जब धरती और सूर्य के बीच आ जाता है वह प्रकाश पथ को ढक लेता है और ग्रहण का कारण बनता है। चन्द्रग्रहण अपने सम्पूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता हैः किन्तु सूर्यग्रहण अधिक से अधिक 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिक से अधिक 711 मिनट ही होती है।
खगोल विज्ञानियों और भौतिकविदों की दृष्टि में भी पूर्ण सूर्यग्रहण एक महत्वपूर्ण अध्ययन के योग्य घटना है। क्योंकि इस समय सौर वातावरण का अत्युतम रीति से अध्ययन सम्भव है।
खग्रास सूर्यग्रहण के समय सूर्य की ऊपरी सतह पर क्रमशः ये परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं- सौर वर्णपत में विभिन्न रासायनिक संयोगों के कारण काले धब्बे वाली रेखाएँ दिखायी पड़ती है। प्रारम्भ और अन्त में क्रोमोस्फियर रक्ताभ-सा दिखाई पड़ता है।
सर्वप्रथम चन्द्रमा की काली-सी छाया दीखती है, जो सूर्य के गोले के एक हिस्से को छूती सी दिखाई पड़ती है। धीरी-धीरे पूरा सूर्य ढंकता जाता है, प्रकाश मद्विम पड़ता जाता है। हवा में ठंडक और सिहरन बढ़ने लगती है। जब सूर्य की संकटी सी आभा मात्र ही अवशिष्ट रहती है, उस समय पूरे आकाश में अँधेरा छाने लगता है। कभी-कभी सूर्य मण्डल के चारों ओर एक हीरक-अँगूठी जैसी आभा दिखाई पड़ती है। इसके कुछ ही क्षणों बाद पूरा सूर्य मण्डल अदृश्य हो जाता है और एक हल्की सी सफेदी भर बच रहती है। कभी-कभी लाल-लपटें जैसी फैलती देखी जाती है। इसी समय जब राक्षसी अँधेरा अपनी भुजाएँ चारों ओर फैलाता है, जानवर उत्तेजित हो उठते हैं, पक्षी घोंसलों में दुबक जाते हैं और कई फूल अपनी पंखुड़िया समेट लेते हैं। इस समय सिर्फ खगोलवेत्ता पूरी मुस्तदी के साथ चुपचाप अपने औजारों, उपकरणों के द्वारा अध्ययन में तल्लीन रहते हैं।
खगोलविद् अधिक अच्छी तरक अध्ययन कर सकने की दृष्टि से एसे खग्रास सूर्यग्रहण पृथ्वी के जिस हिस्से में कुछ अधिक क्षणों तक दिखाई पड़ सकें, वहाँ ही अपने अड्डे जमाते हैं। महीनों पहले से उसकी तैयारी की जाती है। वैज्ञानिक उपकरण ताि अन्य औजार हजारों किलोमीटर तक ढोकर ले जाये जाते हैं। फिर वह घने जंगल के बीच में स्थिति केन्द्र हो अथवा भले ही बची समुद्र में अवस्थित द्वीप हो। जैसा कि 20 जून 1955 में श्रीलंका में दिखाई पड़ने वाले सूर्यग्रहण के लिए किया गया था।
1982 में होने वाले अपूर्व अन्तिरिक्षीय ग्रह संयोग के सदृश इस शताब्दी में पहले सिर्फ दो बार ही ग्रह सम्मिलित हुए हैं। यह है एक ही वर्ष में सात ग्रहण पड़ना। इस शताब्दी में पहली बार ऐसा 1917 में हुआ था। उस समय वर्ष चार सूर्य ग्रहण तथा तीन चन्द्रग्रहण पड़े थे। इनमें से जनवरी, जुलाई तथा दिसम्बर में दो-दो तथा जून में एक ग्रहण पड़ा था। दूसरी बार 1935 में सात ग्रहण पड़े- पाँच सूर्य ग्रहण तथा दो चन्द्रग्रहण। जिनमें से जनवरी में दो, फरवरी में एक जुलाई में तीन तथा दिसम्बर में एक ग्रहण पड़े। अब 1682 में भी सात ग्रहण पड़ने वाले हैं। इनकी शांखला ठीक 1617 जैसी ही है यानी जनवरी में दो, जून में एक जुलाई में दो तथा दिसम्बर दो।
ग्रहणों की यह शांखला धनु, मिथुर धुरी पर पड़ रही है। इसीलिए वे राष्ट्र तथा शहर जो इस धुरी के बीच में हैं या जिनकी भूमध्य रेखीय युति इस धुरी पर पड़ती है। वे इन ग्रहणों के प्रतिकूल प्रभाव की चपेट में विशेषकर आयेंगे। इस प्रकार संयुक्त राज्य अमरीका, बेलजियम, इंग्लैड, तुर्की, वेस्टइंडीज, ब्राजील, मिश्र, स्विटजरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, हंगरी, स्पेन, पुर्तगाल, लंकाशायर, सहारा का रेगिस्तानी क्षेत्र, नार्वे आदि इस संयोग शांखला से बुरी तरह प्रभावित होंगे। ग्रहों की युति तुला में हो रही है। इसलिए चीन, हिन्दचीन, रुस तथा मुस्लिम देशों पर भी इसका हानि का असन पड़ेगा।
16 फरवरी 1980 को होने वाले खग्रास सूर्य ग्रहण 1682 की विभीषिकाओं की पूर्व सूचना ही समझा जाना चाहिए। लगभग ऐसे ही कुछ सूर्यग्रहण 21 अगस्त 1614 को तथा 26 मई 1638 को हुए थे। ये दोनों ही क्रमशः प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व घटित हुए थे। 1980 का खग्रास सूर्य ग्रहण सन् 14 और 38 से भी बड़ा है। इतना भकर खग्रास सूर्यग्रहण इस शताब्दी में पहले कभी नहीं हुआ। वह इस शताब्दी के प्रारम्भ के दो वर्ष पूर्व सन् 1968 में पड़ा था। उन दिनों लगभग 30 वर्ष लम्बे अकार का दौर अपनी चरम सीमा पर था। अगले दिनों भी ऐसे ही भयंकर दुर्भिक्ष की विपत्ति की सम्भावना सिर पर मँडरा रही है।
फरवरी 1982 में सूर्य के जिस ओर पृथ्वी रहेगी, उससे विपरीप दिशा में शेष समस्त ग्रह एक सीधी पंक्ति में होंगे और उनका नेतृत्व कर रहे होंगे- वृहस्पति। लेकिन इन सभी ग्रहों के तल एवं स्तर भिन्न-भिन्न होंगे।
नवम्बर 1982 में सूर्य, शनि, गुरु और फ्लूटों की तुला में युति हे। यह मानव समाज के लिए अशुभ संकट है। लेकिन इससे भी अधिक हानिकारक संयोग इसके पूर्व 21 अगस्त से 11 सितम्बर 1982 के बीच सामने आने वाला है, जब छः ग्रहों राहु, शनि, गुरु, सूर्य, बुध एवं शुक्र की प्रचण्ड सिंह लग्न में युति हो रही है। ज्योतिर्विज्ञानियों के अनुसार निश्चय ही ऐसी युतियाँ सम्पूर्ण संसार के लिए विशेष हानिकारक हैं। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं समझ लेना चाहिए कि सम्पूर्ण मानव-जाति का समूलोच्छेद हो ही जायेगा।
अब तक जिन सूर्यग्रहणों के वितरण नोट किये जा सके हैं उनमें प्राचीनतम हैं ई. पूर्व 2137 को 22 अक्टूबर को देखा गया सूर्यग्रहण इसका विवरण चीनी पत्र ‘शू चिंग’ में दर्ज है। उस समय के दोनों शाही ज्योतिषियों ‘सी’ और ‘हो’ ने इतनी ज्यादा शराब पी ली कि वे लड़खड़ाने लगे और अध्ययन न करे सके। सम्राट ने उन्हें इस पर कठोर दण्ड दिया।
आस्ट्रियन खगोलवेत्ता टी. अपोलजर ने 1887 में एक शोध ग्रन्थ प्रकाशित किया जिसका नाम था “केननडेर फिन्स्टरनिसें। इसमें 8 हजार सूर्य ग्रहणों तथा 5200 चन्द्रग्रहणों का विवरण दिया था। जो 1207 ईस्वी पूर्व से उन दिनों तक घटित हुए थे, और आगे सन् 2161 तक होने वाले हैं।
19वीं सदी में कुल चार खग्रास सूर्यग्रहण भारत मेंदेखे गये। पहला 21 दिसम्बर 1843 को जिसे मुख्यतः दक्षिणी भारत में देखा गया, पर जिसका कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। दूसरा 18 अगस्त 1838 को देखा गया। इसका रिकार्ड अध्ययन मछलीपटनम में खगोलविद् जे. जानसीन भी इस हेतु भारत आये थे। तीसरा खग्रास सूर्यग्रहण 12 दिसम्बर सन् 1871 को पड़ा। मद्रास के खगोलवेत्ता अवनाशी ने कोयम्बतूर वेधशाला में इसका अध्ययन किया।
19वीं शताब्दी का अन्तिम खग्रास सूर्यग्रहण 22 जनवरी 1868 को पड़ा, जो मध्यभारत में देखा गया, इसे अनेक प्रख्यात अंग्रेज एवं अमरीकी खगोलविदों ने देखा व जाँचा-परखा, विवरण नोट किये। सर जार्मन लाकेर तथा प्रो. ए. फाउलर ने विजय दुर्ग में खगोल वेत्ता सर विलियम क्रिस्ट्री ताि प्रोफेसर एच.एच. टर्नर ने शहडोल में अमरीकी ज्योतिर्विद डब्लू. केम्पबेल ने जेबर में, तथा जान एवरशेड ने तालनी में इसका पर्यवेक्षण-अध्ययन किया। इस बार उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद में 16 फरवरी के ग्रहण का पर्यवेक्षण किया गया। इसके लिए चार लाख मूल्य के विशेष उपकरण मँगाये गये। संसार भर के वैज्ञानिकों ने इस प्रभाव को जाँचने के लिए अपने-अपने ढंग से प्रयत्न किये।
16 फरवरी 1980 को घटित होने वाला खग्रास सूर्यग्रहण भारतीय पेनिनसुला में देखा गया। यह दक्षिण पश्चिमी अफ्रीका के दक्षिण में स्थिति अटलाँटिक समुद्र में सूर्योदय से आरम्भ हुआ। इसके बाद मध्य अफ्रीका,हिन्दमहासागर होते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में देखा गया। तदुपरान्त वर्मा हेते हुए वह चीन में सूर्यास्त के समय समाप्त हो गया।
भारत में ग्रहण पश्चिमी तट स्थिति करवाड़ में सर्वप्रथम दिखाई दिया। मानक समय के अनुसार दिन के 2ः17 पर। तदुपरान्त गड़ग, रायपुर, दोरनाकल होते हुए पूर्वीतट स्थिति पुरी में समाप्त हुआ। रायपुर मेंयह 2 बजकर 25 मिनट पर तथा पुरी में 2 बजकर 42 मिनट पर दिखाई देना शुरु हुआ। करवाड़ में कुल दो घन्टे 40 मिनट, गडग में 2ः11घन्टे, रायपुर में 2 घन्टे 40 मिनट, दोरनाकल में 2ः11 घन्टे और पुरी में 2 घन्टे 20 मिनट तक दिखाई दिया, अन्य स्थान, जहाँ से पूरा ग्रहण देखा गया। धारवाड़, हुवली, महबूवनगर, नालगोंडा, खम्भास, भद्राचलम, कोरापुट, वाबिली और भुवनेश्वर।
भारत के कुछ मुख्य शहरों में सूर्यग्रहण दिखाई देना निम्नानुसार रहा-
हेदराबाद- 2 बजकर 28 मिनट, दिल्ली 2 बजकर 36 मिनट, कलकत्ता-2 बजकर 47 मिनट पर, अहमदाबाद में 2 बजकर 20 मिनट पर, भोपाल में 2ः11 बजे से, लखनऊ में 2 बजकर 40 मिनट पर।
सन् 1980 में चार ग्रहण पड़ते हैं। पहला 16 फरवरी को पूर्ण सूर्यग्रहण दूसरा 1 मार्च को चन्द्रग्रहण तीसरा 27 जुलाई को चन्द्रग्रहण तथा चौथा 10 अगस्त को पुनः सूर्यग्रहण। उल्लेखनीय है कि ये चारों ग्रहण क्रमशः सूर्य और चन्द्र तथा चन्द्र और सूर्य पन्द्रह दिन की अवधि के भीतर ही पड़ने वाले हैं। इस्लाम धम्र की प्रसिद्ध पुस्तक “मौज जात मसीह” के पृष्ठ 145 पर हजरत इमाम वाकर के सर्न्दभ में कहा गया है- “जब चाँद एवं सूर्यग्रहण पन्द्रह दिन के फर्क में (अवधि) होंगे तो उससे यह साबित होगा कि कयामत का समय करीब आ गया हैं”।
सूर्य ग्रहणों की शांखला में 16 फरवरी 80 का ग्रहण ऐसा है जिनकी अपनी ऐसी विशेषताएँ है जैसी पिछली कई सौ वर्षों में नहीं पाई गई। इसलिए उसका महत्व असाधारण रुप से बढ़ जाता है। वस्तुस्थिति को देखते हुए वैज्ञानिकों की दृष्टि इस अवसर पर विशेष खोजबीन पर केन्द्रित है वे प्रकृति के रहस्यों में से कुछ और प्राप्त करने की आशा इस विशेष अवसर से करते हैं।
यह अंक पाठकों के हाथ में 5 मार्च के लगभग पहुँचेगा। यह पंक्तियाँ 10 फरवरी को पूरी की जा रही हैं। प्रस्तुत सूर्य ग्रहण के इस दिन से छै दिन शेष है। ऐसी दशा में समय से पूर्व यह कहना तो कठिन है कि उस अवसर की गई शोधों का क्या प्रतिफल निकला। यह समयानुसार प्रकट होगा कि धरती पर उसके साधनों और प्राणियों पर सौर मण्डीय हलचलें क्याप्रभाव डालती हैं, पर इतनी आशंका तो बनी ही रहेगी कि चलते हुए सामान्य क्रम में जब व्यतिरेक होता है तो उसका परिणाम भी उठक पटक के रुप में देखा जाता है। सामान्यतया हर उथल-पुथल असुविधाजनक ही होती है।
सर्वविदित है कि चन्द्र ग्रहण एवं सूर्य ग्रहण के समय पर धरती के साथ जुड़े हुए संबंध सूत्र और प्रवाह क्रम में व्यतिरेक उत्पन्न होता हैं व्यतिरेक से सामान्य प्रक्रिया में अन्तर पड़ता है। फलतः प्रतिक्रिया और परिस्थिति में अनतर पड़ना भी स्वाभाविक है। ग्रहणों के प्रभाव को चिरकाल से अनुभव किया जाता रहा है और उनके सम्बन्ध में कितनी ही चित्र-विचित्र मान्यताएँ भी हें उनमें से कुछ अलंकारिक, कुछ वास्तविक और कुछ निरर्थक है। प्राचीन काल के अलंकारिक प्रतिपादनों में ऐसी रहस्यमय वास्तविकताओं का पता चलता है और जो सत्य के अत्यन्त समीप होती है। ग्रहणों का प्रभाव असामान्य होता है। इस मान्यता में कोई भ्रान्ति नहीं है। सूर्य का प्रभाव अधिक है इसलिए उस पर लगने वाले ग्रहण को धरती पर श्रस्त व्यस्तता भी अधिक होती है। उस्त व्यस्तता से अस्वाभाविक ही नहीं अवाँछनीय परिणित भी होती है इसलिए ग्रहणों को सदा से चिन्ता का विषय माना जाता रहा है विशेषतया सूर्य ग्रहण की। सूर्य ग्रहणों की शोध का प्रामाणिक प्रयास 28 जुलाई 1851 के सूर्यग्रहण से आरम्भ हुआ। स्पेन के पूर्वी प्रायःद्वीप से सैनी और वारेन नामक ज्योतिषियों ने उसके चित्र खींचे और ग्रहण के समय की वस्तुस्थिति का पता लगाया। इसके बाद नये उपकरों की सहायता से विज्ञानी जानसन 18 अगस्त 1868 के सूर्य ग्रहण की तस्वीरें मलाया प्रायःद्वीप में जाकर उतरी। सन् 1870 में सिरुली ने और भी अधिक स्पष्ट चित्र खींचे। इनसे पता चला कि उस अवसर पर सूर्य पर कुछ चमकीली रेखाएँ दृष्टिगोचर होती हैं और इर्द-गिर्द खास किसम की तेजोवलय छाया रहता है। सन् 1871 में नया ‘स्वक्टा स्कोप’ यन्त्र बना और उसने नई गैसों के प्रवाह तथा वर्णमण्डल का अधिक परिचय दिया। पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय वर्ण मण्डल की गइराई 15000 किलोमीटर आँकी गई है उसे लाल रंग की विलक्षण निकारियाँ छूटती देखी गई। 17 मई 1882 को सूर्य ग्रहण मिश्र में देखा गया था उसमें एक चमकीला पुच्छल तारा पकड़ में आया। 22 जनवरी 1998 कोसूर्य ग्रहण ब्रिटीश वैज्ञानिकों ने अतिरिक्त लाल लपटें उछलती देखीं। खण्ड ग्रहण तो समय-समय पर होते रहते हैं पर उनसे इतनी जानकारी नहीं मिलती जितनी कि पूर्णग्रहण से। 30 जून 1954 का सूर्य ग्रहण बाल्टिक सागर क्षेत्र में था और 12 अक्टूबर 1958 का प्रशान्त महासागर में। इस अवसर पर डेजर द्वीप में एक विशेष वेधशाला फिट की गई और पाया गया कि ग्रहण काल में पराबैंगनी विकरण घटता है किन्तु एक्स किरणों में कोई अन्तर नहीं आता है।
सन् 1680 से लेकर 88 तक के आठ वर्षो में चलने वाली सूर्य ग्रहण श्रंखला आसाधरण होने से ज्ञातव्य है। इस अवधि में 23 सूर्य ग्रहण पड़ेगे। इनमें से 6 पूर्ण खग्रास होगे। 5 खण्ड ग्रस और दो कंकणा कृति पूर्ण ग्रहणों में 26 फरवरी 80 का अफ्रीका और भारत में। 31 जुलाई 82 का सोवयत संघ में। 11 जून 83 का हिन्द महासागर में। 23 नवम्बर 1684 का न्यूगिनी दक्षिणी प्रशान्त मे। 12 नवम्बर 85 का एन्टाकीटक, दक्षिणी प्रशान्त मे। और 18 मार्च 8 का प्रशान्त, सुमात्रा बोर्नियों में खग्रस दीखेगा। अन्यत्र उन्हें खण्डग्रास देखा जा सकेगा।
ग्रहण के समय देसी महत्वपूर्ण खोजे सम्भव होती है जो अन्य समयों पर नहीं की जा सकी। सन् 1668 में लार्कय और जानसन नामक वैज्ञानिकों ने सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मण्डल में हीलियम गैस की उपस्थ्ज्ञति का पता लगाया था। आस्टीन का वह प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर भी सही सिद्ध हो सका, जिससे उनने अन्य पिण्डो के गुरुत्वाकर्ष से प्रकाश के पड़ने की बात कही थी। अवज्ञान ग्रह उपग्रहों की खोज के लिए यह ग्रहण काल सर्वोत्तम सुविधाजनक रहता है।
सूर्य ग्रहण के अवसर पर प्रकाश की तीव्रता ही कम नहीं होती वरन उसके गुण भी बदल जाते है जानवरो में बैचैनी पाई जाती है। खाना, सोना सभी को हराम हो जाता है पक्षी अपने घोसलों की ओर भागते हैं खिले हुए फूल सिकुडने और बन्द होने लगते है। तापक्रम इतना गिर जात है कि ओस पड़ने लगती है। अचानक सर्दी बढ़ने लगती है। ओर मासम में आश्चयजनक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है प्रकाश के मोती जैसे तैरते दिखाई पड़ते है। ग्रहण लगने से प्रायः पन्द्रह मिनट हले धूप अनास ही हलकी पड़ जाती है। 26 फरवरी 80 के ग्रहण अवसर पर सूर्य मकर और कुम्भ राशि की सीमा रेखा पर होगा। अवएवं उस समय बुध और श्क्र ग्रह आकाश में उगे हुए दिखाई देगे। भाद्र पद, उत्तर भाद्र पद पुनर्वसु ता प्राश्व और व्याध निग्रह भी उगे हुए दीखेंगे।
22 जनवरी 1868 में ठीक इन्ही दिनों जैसा पूर्ण सूर्य ग्रहण भारत में देखा गया था। 82 वर्ष पूर्व को घटनाओं का उल्लेख विजय दुर्ग (महाराष्ट्र) के परीक्षण कर्त्ताओं ने नोट किया था। उस समय सूर्य का रथ चक्र तेजी से पश्चिम की ओर भागता हुआ और चन्द्र पिण्ड को तोजी से उस पर झपटता हुआ देखा गया। भयानक अंधेरा छाया ओर सूर्य अस्त हो गया। दो बडे और तीन छोटे धब्बे उभरे हुए दीखे। ग्रहण लाल वर्ण का था। चाँदनी सी निकल आई। आकाश में तारे दीखने लगे। इन सत्र में मंगल अधिक स्पष्ट था। क्षतिज पर पहले कत्यई रंग की आभा देखी गई और फिर वह हलके बेंगनी तथा सुनहरे रंग में बदलती देखी गई। ग्रहण जिस तेजी से लगा उसी तेजी से समाप्त भी हुआ।
सूर्य के परिमण्डल (कोरोना) और वर्ण मण्डल (क्रोमोस्फियर) की सरंचना, गर्मी तथा दबाव की जैसी सही जानकारी ग्रहण के समय मिल सकती है, वैसी और किसी समय नहीं। वैज्ञानिक इस अवसर पर जिन तथ्यों का पता लगाते है उनमें रेडियों लहरो का उत्सृजन आयनोस्फिर में परिवर्तन, भू चुम्बकत्व का प्रभा प्रमुख है।
हैदराबाद के सेन्टर आव एडवाँस स्टीडी इन एस्टोनोभी ने क्रोना के धु्रवीकरण वर्णक्रम का विश्लेषण अन्तर्ग्रही तरंगो के परिवर्तन की जाँच पड़ताल की ओर पता लगाया कि जलचरों और नभचरों को सूर्यग्र्रहण किस सीमा तक और सि प्रकार प्रभावित करता है। इस शोध को अब ‘क्रोनोवायोलाजी’ के नाम से अब अतिरिक्त नाम दिया जाने लगा है।
इण्डियन इस्टीट्यूट आँफ ऐस्ट्रो फिजिक्स के अनुसार किसी विशिष्ट स्थान से 50 सालों में 80 चन्द्र ग्रहण और 20 खण्उ सूर्य ग्रहण देखे जा सकते है। किन्तु पूर्ण ग्रहण देखने का अवसर 360 वर्ष में एक बार ही आता है। चन्द्र ग्रहणों की तुलना में सूय्र ग्रहणों का अनुपात 3ः 2 होता है। ग्रहण पथ समूची पृथ्वी पर नहीं फैलता उसका विस्तार मात्र 262 किमी रहता है।
223 चनद्रमासों अर्थात 6545 दिनाँक के उपरान्त हर बार सूर्य और चन्द्रमा ऐसी स्थिति में लौट आते है कि ग्रहण चक्र की पहले की तरह पुनरावृति होने लगे। इस आधार पर प्रायः 15 वर्ष 20 दिन का ग्रहण क्रम जान लेने के उपरान्त बहुत समय तक के ग्रहणों की भविष्यवाणियाँ की जा सकती है। इतने पर भी चन्द्र पथ की विलक्षणता के कारण ठीक उसी स्थान पर इसी रुप में दीख पड़ने में हेर-फेर भी होता रहता है।
भारत में 26 फरवरी वाले सूर्य ग्रहण का पर्यवेक्षण करने के लिए विशेष रुप से तैयारियाँ की गई। इसके लिए 60 बड़े केन्द्र और 120 छोटे निरीक्षण केन्द्र कर्नाटक, उडीसा ओर आन्ध्र के कितने ही स्थानों पर लगाये गये। कई वेधशालों से गुब्बारे छोडे जायगे पर आकाश में उस समय होने वाले परिवतनो का पता लगाया जायेगा। आन्ध्र प्रदेश चल चित्र स्थान ने इस अवसर पर ऐसी फिल्म बनाई जिससे प्राणियों और पदार्थो पर होने वाले सूर्य ग्रहण का पता चल सके।
इन्डियन इन्स्टीट्यूट आँफ ऐस्टो फिजिक्स ने रायपुर जिले के ज्वालाकन्टे गाँव में एक 21 मीटर ऊचा लोह म´च बनाया है उस पर सेलोस्टेट स्येक्टोग्राफ जैसे बहुमूल्य यन्त्र लगाये गये है। इनकी सहायता से ग्रहण से अवसर पर वर्ण मण्डल एवं प्रभा मण्डल की जानकारी देने वाले महत्वपूर्ण चित्र लिए जा सकेगे।
साधारण ज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण की विद्या बड़ा जटिल और आर्श्चयजनक है। भूगोल के छात्र जानते है कि सूर्य का व्यास 564000 मील और चन्द्रमा का मात्र 2160 मील है। इसका अर्थ है सूर्य में 400 चन्द्रमाओं का समावेश। सूर्य पृथ्वी से 62657200 मील की औसत दूरी पर है। चन्द्रमा की औसत दूरी 238840 मील है। इसका अर्थ भी यही होता है कि चन्द्रमा जितनी दूरी पर विराम देते हुए सूर्य तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाय तो वसे विराम 400 होगे। ऐसी दशा में पृथ्वी ओर सूर्य के बीच में आ जाने पर भी चन्द्रमा की छाया पूरी तरह सूर्य को ढंक नहीं सकती। फिर भी पूर्ण सूर्य ग्रहरण दीखता है इस आर्श्चय का कारण पृथ्वी से चन्द्राम की समीपता ही हैं यदि वह अपेक्षाकृत देर होता तो फिर सूर्य के एक भाग को ही उसकी छाया ढंक पाती।
पूर्ण ग्रहण दो मिनट पचास सैकिण्ड का ही होगा। इसका 12 बजकर 42 मिनट पर दक्षिण अटलाँटिक महासागर में दक्षिण अफ्रीका के मध्य भाग से प्रायः ढाई हजार किलोमीटर दूरी से आरम्भ होगा इसके उपरान्त वह काँगे, जैरे, तंजानिया, केनिया होकर आगे बढता हुआ अरब सागर में अफ्रिका के पूर्वी तट तक चला जायगा। इस स्थान पर वह चार मिनट 12 सैकिण्ड दिखाई देगा। धरती पर यह ग्रहण देर्शन की अधिकतम अवधि होगी। भारत के कर्नाटक, आन्ध्र, मध्यप्रदेश, उडीसा, मिजोरम प्रान्तों को पार करता हुआ वह बंगाल की खाडी में बढेगा। बंगाल देश ओर वर्मा होते हुए अन्ततः वह चीन के चुँग किंग नगर में 100 किलोमीटर दूर पर समाप्त हो जायेगा। देशों के साथ इस ग्रहण की संगति जोडी जाय तो उस परिधि में प्राय पूरा अफ्रिका महाद्वीप, साऊदी अरब, ईराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नैपाल, भूटान, श्रीलंका, बंगादेश, वतर्मा, मलाया, थाइलैण्उ, फिलिपाइन्स, इण्डोनेशिया, चीन, मंगोलिया तथा सोवियत संघ के देश आते है। अन्य देशों को इस अदभुत दर्शन के वंछित रहना पडेगा। पूर्ण ग्रहण की पट्टी 115 से 130 किलोमीटर की सीमा में रहेगी। अन्यत्र वह खण्ड ग्रस दिखाई देगा।
भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की भ्रमण गति प्रति घण्टा 1700 किलोमीटर पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। चबकि चन्द्रमा की छाया पृथ्वी को काटते हुए प्रति घण्टा 3430 किलोमीटर है इस अन्तर को ध्यान में रखते हुए यदि पृथ्वी से अधिक समय तक यह ग्रहण देखना हो तो सामान्य अवधि 6 मिनट को बढ कर 80 मिनट तक किया जा सकता है। सुपरसोनिक विमानों की जो गति है उसे देखते हुए उनमें बेठे हुए अन्वेषकर्त्ता अपना शोध काल इतना लम्बा बढा सकते है। इस सर्न्दभ में प्रयत्न किये भी जा सकते है क्योंकि अभी जो थोडी-सी अवधि है वह अन्तरिक्ष की उथल-पुथल के पक्षो को जानने के लिए अपर्याप्त ही कही जा सकती है।
सूर्य के चारों और फैले हुए प्रभा मण्डल में विद्यमान गैस की परत का तापमान 10 लाख सेन्ट्रीगेट पाया गया जबकि सूर्य के धरातल का मात्र छै हजार सेन्टीग्रेट। यह अद्भुत अन्तर किस कारण है इसकी जानकारी ग्रहण के अवसर पर बिनने वाली विशेष स्थिति से अपेक्षाकृत अधिक सरलता से मिल सकती है।
कोणाक के सूर्य मन्दिर पर ग्रहण की मध्य रेखा आती है अस्तु वहाँ से यह अन्वेषण अधिक अच्छी तरह हो सकने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों के जत्थे वहाँ पहुँच रहे है। यह मन्दि 700 वर्ष पूर्व ठीक ऐसे स्िन पर बना है जहाँ सूर्य ग्रहण का प्रभाव अधिक स्पष्ट और अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में देखा जा सकता है। भारत के विभिन्न केन्द्रो में प्रस्तुत सूर्य ग्रहण का पर्यवेक्षण करने के लिए संसार भर से प्रायः एक हजार वैज्ञानिक आ रहे है जो अपने-अपने शोध क्षेत्र पर होने वाली ग्रहण प्रतिक्रिया की बहुमूल्य यन्त्रों के आधार पर जाँच-पडताल करेंगे।
ज्योतिषी और विज्ञानी इस सम्बन्ध में एक मत है कि ग्रहण काल से अन्तरिक्षीय विकरण का मनुष्यों औ पदार्थो पर अनुपयुक्त प्रभाव पडेगा। इसलिए उस समय भोजन न करे। खुली आँख से ग्रहण को न देखने, गर्भवतियों को भीतर रहने, बीमारों और कमजोरों की खुली जगह की अपेक्षा भीतर रहने की चेतावनी दी गई और कहा गया है कि उस विकरण के सर्म्पक में न अना उपयुक्त समझा गया हैं ससे सिद्ध होता है कि यह प्रभाव किसी न किसी रुप में अनुपयुक्त है।
सूर्य ग्रहण होते यो हर साल है, पर वे खग्रास नहीं होते। साथ ही एक क्षेत्र में भी बार-बार नहीं दीखते। एक ही स्थान पर दुबारा खग्रास का दृश्य देखना हो तो उसके लिए 360 वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पडेगी। इस बार भी भारत में इस रुप में वह इसी रुप में इतनी ही लम्बी अवधि के बाद देखा जा रहा है।
भूतकाल में जब-जब ऐसे सूर्य ग्रहण पड़े है उसके कुप्रभाव ही सामने आये है। इस बार भी यदि ऐसा होगा तो समझना चाहिए कि आज की परिवर्तन प्रक्रिया को देखते हुए उससे अवाँछिनिय तत्वों का ही विनाश होगा। हर विराश के पीदे विकास की सम्भावना भी रहती है और वही सन्तुलन को बनाती है। इस आधार पर देर तक चलने वाले इस सूर्य ग्रहण का एक परिणाम सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का सर्म्वधन भी होना चाहिए। इस प्रकार समूची प्रतिक्रिया के शुभ और अशुभ का सम्मिश्रण कह सकते है। संक्षेप में इसे युग परिवर्तन में सहायक ही समझा जाना चाहिए।
प्रस्तुत सूर्य ग्रहण देखने वालों के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय चिकित्सकों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि इससे आँखों का ‘रेटीना’ जल सकता है और देखने वाला सदा सर्वदा के लिए अन्धा हो सकता है इसी प्रकार इससे नपुसंक होने का भी खतरा है। इन्फ्रारेडो का सीधा असर धरती के वातावरण पर आने से कोमल काया वालों पर उसकी जल्दी और ज्यादा बसर पडेगा। पखी इससे अधिक प्राभावित होगे। इसी प्रकार बालको की कामल छाया पर विपरीत असर पडने की अधिक सम्भावना रहेगी। इसलिए उन्हे यथा सम्भव ग्रहण को देखने और उसकी धूप में जाने से रोकना ही उचित है। यही बात गर्भवती स्त्रियों के सम्बन्ध में भी है। वे उन दिनों नाजुक स्थिति में से गुजरती है विशेषतया उदरस्थ्ज्ञ बालक तो ओर भी कोमल तथा सम्वेदनशील होते है। उन किरणों के प्रभावित होने पर उनकी शारीरिक सरचना एवं मानसिक विकास में अवाँछनीय गड़बड़ियाँ हो सकती है।
अन्तरक्षि विज्ञानी डाँ. श्रीवास्तव के अनुसार-सूर्य की घातक किरणों के रक्षा करने वाली वायुमण्डल में उपस्थित गैस की परत दस प्रतिशत घट जाने के कारण ग्रहण के समय पृथ्वी पर अधिक विध्वंसक प्रभाव पड़ेगे।
इन दिनों सूर्य में कम्पन चल रहा है। वह प्रतिवर्ष 13 किलोमीटर सकुड रहा है। साथ में उसमें धब्बे भी असाधरण रीति में उभर रहे है जो अपने कुप्रभाव के लिए बहुत उत्तरदायी होंगे। इन सबके उतार-चढाव स्वरुप अगले दिनों व्यापक उथल-पुथल की कल्पना निराधार नहीं कही जा सकती।
17 मार्च 1978 को ऐसा ही भयानक चक्रवात दिल्ली में आया था। गे्रटर कैलाश के एक प्रत्यक्षदर्शी का कथन है कि धरती में चारपाई के ऊपर बैठी स्वेटर बुन रही एक महिला चक्रवात के वेग से उछल कर एक मकान की तिमंजिली छत पर जा पहुँची थी। इस बबन्डर और उस क्षेत्र में व्याप्त रेडियो सक्रियता का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक दल ने बताया कि पृथ्वी के तापमान को नियन्त्रित करने का और मानवीय सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व अयन मण्डल की उस रक्षा-पट्टी का है जो ओजोन नामक गैस से बनी और सम्पूर्ण धरती को आवृत्त किये हुये है। उसमें किसी तरह की उथल-पुथल दो ही कारणों से हो सकती है (1) ग्रह-नक्षत्रों के गुरुत्वाकर्षण में अत्यधिक परिवर्तन (सौर स्फोट भी इसी के अर्न्तगत आयेगा) (2) पृथ्वी के पर्यावरण में विषैली रासायनिक खादों, प्रसाधन सामग्री हवाई जहाजों के नाइट्रोजन व क्लोरीन छोड़ने, औद्योगिकरण से उत्पन्न वायु प्रदूषणकारी गैसों और कार्बन डाईआँक्साइड की अत्यधिक वृद्धि निकट आती दीखती है।
इन दिनों अन्तरिक्ष में तीन प्रक्रियाएँ ऐसी उभर रही हैं जो घटना की दृष्टि से दूरवर्ती होने के कारण सामान्य कही जा सकती है। किन्तु उनकी परोक्ष प्रतिक्रिया ऐसी है, जिससे जन-जीवन के बुरी तरह प्रभावित होनेकी आशंका है।
सन् 1947 के बाद सूर्य कलंक के दो परम वर्ष क्रमशः 1958 और 1969 गुजर चुके हैं। आने वाला सूर्य कलक का परम वर्ष सन् 1680-82 में है। अभी पिछले दिनों चीन ओर वियतनाम के बीच घमासान लडाई होकर चुकी है। ईरान में भी भयंकर क्रान्ति हुई है, अभी भी वहाँ स्थिति सुधरी नहीं है, स्थिति तनावपूर्ण है। रक्तपात और हिंसक घटनाओं के दौर जारी है। आफगानिस्तान में भी रुसी सेनाएँ डेरा डाले पडी है। विश्व के और भी कई दूसरे देशों में तनाव पैदा हो रहे है। उनकी आन्तरिक ओर बाह्य स्थिति बेहद उलझी हुई हैं विश्व पुनः संकटपूण्र स्थिति में है। विभिन्न राष्ट्रों के बीच तनावपूर्ण सम्बन्धें को देखते हुए सर्वत्र यह आशंकाएँ व्यक्त की जा रही है कि पता नहीं कब विश्व युद्ध की चिनगारी फूट पड़े ? यह आशंका ही नहीं सम्भावना भ्ज्ञी समझी जा रही है। जिन्हे भी वर्तमान परिस्थितियों का थोड़ा बहुत ज्ञान है, वे इन्हे अशुभ ही अनुभव करते है। विशेषज्ञ तो यह निश्चित ही मानते है कि इन दिनोँ दुनिया सचमुच बारुद के ऐर पर बैठी हुई है, कभी भी उसमें आग की कोई चिनगारी लग सकती है ओर आग सुलग कर भीषण भंयकर अशान्ति में परिणत हो सकती है। यह समय सौर कलाकों को अभिवृद्धि का तो है ही सन् 1682 में जब नौ ग्रह सूर्य की एक सीध में होंगे तो एक ही सीध में आने से चुम्बकीय क्रिया बहुत अधिक होने से बहुत अधिक धब्बे बनने लगते है।
‘जूफ्टिर इफेक्ट’ पुस्तक में कहा गया है कि इस कारण महासागरों, सागरों और नदियों का पानी अधिक तेजी से भाप में परिवर्तित होने लगता है हिमनदों के पिघलने की गति बढ़ जाएगी। समुद्र को धाराओ में परिवर्तन होने लगेगा। सामान्य सौर कलंको के समय भी समुद्र को धाराओँ में परिवर्तन होने लगता है। और नीचे का ठण्डा पानी ऊपर आ जाता है। उत्तरी और दक्षिणी धु्रवों पर जमी हुई बर्फ पिघलने लगती है कुछ क्षेत्रों में वर्षा अधिक होने लगती है, फलस्वरुप नदियों में बाढे आने लगती है। कुछ क्षेत्रों में वर्षा न केवल घट जाती है वरन् बन्द ही हो जाती है।
अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग की अलबुकर्क स्थित साडिया लेबोरेटरी ने गत 35 वर्षो में हुई दुर्घटनाओं क आँकडे़ एकत्रित किये और उनका अध्ययन किया तो इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि- “सौर कलंक जब अपनी चरम स्थिति में होते है तो दुर्घटनाएँ प्रायः छहः गुनी हो जाती है।”
न्यूयार्क के डा. बेकर ने बताया कि “तीव्र सोर क्रिया के दिनों में मानसिक रोगियों की संख्या में असाधारण रुप में वृद्धि होती है।
भारतीय ज्योतिष खगोलीय तथा फलित दोनों ही पद्धतियाँ सूर्य मण्डल में होने वाले विस्फोटो का स्वरुप, कारण तथा पृथ्वी के चराचर पर उससे होने वाले प्रभाव पर विस्तृत वर्णन मिलता है। महर्षि गर्ग, पाराशर, देवल, कश्यप, नारद तथा वरिष्ठ आदि ने इन विस्फोटो के बारे में पर्याप्त अनुसंधान किया है।
इस पद्धति से विचार कर वर्तमान ज्योतिर्विद जो निर्ष्कष निकाल रहे है, उसके अनुसार-”आगामी सूर्य कलंको का प्रभाव कम से कम एक वर्ष तक रहेगा। इस प्रभाव के कारण भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, चीन तथा मध्यपूर्व के देश विशेष रुप में प्रभावित होंगे।” दुर्भिक्ष, सूखा, युद्धोन्माद बढ़ने, रोग, बाढ़, तूफान, भूकम्प आदि दैवी आपदाओं से जन धन को क्षति होने की भी सम्भावना है।”
संसार में आसन्न विपत्तियों ओर संकटो की जब भी चर्चा है तो उसमें विख्यात दिव्यदर्शियों की भविष्यवाणी के साथ बाईबिल की पुरानी संहिता (ओल्ड टेस्टामेंट) का उल्लेख प्रमुख रुप से किया जाता है बाइबिल का यह भ्ज्ञाग ईसा से भी पहले रचा गया था और इसमें ईसा के जन्म से लेकर अब तक की घटनाओँ का सविस्तार उल्लेख मिलता है।
बाइबिल की यह भविष्यवाणियाँ ‘सात समय’ अथवा ‘सेवन टाइम्स’ के नाम से जानी जाती है। इन्हे लेकर कई पुस्तकें लिखी गई, इनकी विवेचनाओँ के लिए सैकड़ो विद्वानों ने अपना समय और श्रम खपाया है। बाइबिल की यह भविरुवाणियाँ ‘डेनियल तथा रिवेलेशन’ अध्यायों में दी गई है। यद्यपि इन सबकी भाषा काफी गूढ है और इन्हे मुख्यतः रुपक शैली में ही लिखा गया है। इन भविष्यवाणियों में कहा गया है जब यह सात समय का जमाना आएगा और नये युग की शुरुआत होगी, उस समय तमाम दुनिया में लडाई-झगड़े फैल जाएगे और प्रकृति इतनी क्रुद्ध हो उठेगी कि उसके कारण बड़ी संख्या में लोग मरने लगेंगे। बाईबिल के “मैथ्यू” अध्याय 24 में इस समय की विभीषिकाओं का चित्रण इन शब्दो में किया गया है, उस वक्त चारो तरफ लडाइयाँ होने लगेंगी और लड़ाई की अफवाहे सुनाई देने लगेंगी। एक मुल्क दूसरे मुल्क के लिखलाफ खड़ा होगा और एक सल्तनत दूसरी सल्तनत के। उस समय अकाल पड़ेगे, महामारी फैलेगी ओर जगह-जगह भूकम्प आऐंगे। यह हालत तो शुरु में होगी और इसके बाद इससे कही ज्यादा कष्ट भोगने पड़ेंगे।
बाइबिल के ‘रिवेलेशन’ अध्याय में महात्मा जान की निम्नलिखित भविष्यवाणियाँ उल्लेखनीय है- जब उसने दूसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से दूसरा जानकर निकला। यह लाल रंग का घोडा था। जो उस पर बैठा था, उसे इस बात की शक्ति दी गई थी कि संसार की शान्ति को भंग कर दे और युद्ध आरम्भ करा दे। उस सवार के हाथ में एक बहुत बड़ी तलवार दी गई थी। (रिवेलेशन अ॰ 6)
लाल रंग का आशय युद्ध से लगाया गया है। यद्यपि इन दिनों प्रकट तौरपन किन्ही देशो में युद्ध नहीं चला रहा, परन्तु इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि विभिन्न देशों में जो आपसी तनातनी, गुटबन्दी ओर गीत युद्ध की-सी स्थिति बनी हुई है, वह कभी भी युद्ध विस्फोट कर सकती है। कब किस बात को लेकर कौन-सा देश युद्ध की घोषणा कर देगा ? इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
बाइबिल के रिवेलेशन ‘अध्याय छह’ में कहा है-’जब उसने तीसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से तीसरा जानवर निकला। वह एक कोले रंग का घोड़ा था और उसके ऊपर बैठे हुए सवार के हाथ में एक तराजू दी गई थी। मैंने यह आवाज सुनी कि एक सिक्के का एक पैमाना गेहूँ मिलेगा और तीन पैमाने जो का दाम एक सिक्का होगा।
यों मँहगाई और वस्तुओं का अभाव तो पिछले कई वर्षो से चला आ रहा है। किन्तु इन दिनों वस्तुओं के मूल्य जिस तेजी से बढ़ रहे है। उसे वृद्धि ने निश्चित ही अब तक हुए मूल्यों की वृद्धि के हिंसक है। मूल्य वृद्धि का एक कारण वस्तुओं का अभाव भी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे अन्न संकट ओर भयंकर होता जायेगा।
बाइबिल ‘लैमेनटेशन’ नामक पुस्तक में इसका वर्णन करते हुए लिखा है-लोगों के चेहरे कोयले की तरह काले हो जाएँगे। वे गलियों में मारे-मारे फिरेंगे। जो लोग तलवार से मारे जाते है वे उन भूख से मरने वालों की अपेक्षा सुख में रहेंगे।
अकाल के अतिरिक्त विनाश की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाले दूसरे कारणों की ओर संकेत करते हुए रिवेलेशन अध्याय 6 में लिखा गया है-”जब उसने चौथी मोहर को तोड़ा तो उसमें से चौथा जानवर निकला। वह एक पीले रंग का घोड़ा था। उस पर मृत्यु का देवता बैठा था इस देवता को इस बात की ताकत दी गई थी कि वह पृथ्वी के चौथाई भाग में तलवार, प्लेग, अकाल और जंगली जानवरो आदि के द्वारा मनुष्यों का नाश करे।
“जब उसने छठी मोहर को तोड़ा तो मैने एक भयंकर भूकम्प देखा। उस समय सूय काले कपड़े की तरह लाल पड़ गया। आसमान के तारे इस तरह टूटने लगे जिस प्रकार किसी पेड़ को हिलाने से पके फल गिरने लगते है। हर एक पहाड़ और टापू हटने लगा। राजा बादशाह से लेकर गरीब आदमी तक ईश्वर के इस भयंकर कोप से घबड़ाकर पहाडो की गुफाओ ओर चट्टानो में जा छुपे।”
बाइबिल में उल्लेख आता है कि यह वृतान्त लिखते हुए वह स्वयं चौंक पडत्रे और अपने आप से पूछ बैठे ‘हाऊ लाँग शैल इट वी टू द एण्ड आफ दीज वर्न्डस’ अर्थात् ‘ये आर्श्चयजन बाते कितने समय बाद दिखाई पड़ सकें।’
तब एक देवदूत प्रकट होता है और डेनियल को बताता है जब पवित्र जाति वालों का अर्थात् सदाचारी सर्त्कम परायण लोगों का ह्नास होने लगेगा तब ये सब घटनाएँ सही सिद्ध होंगी।” डैनियल ने कहा-मैं आपकी बात सुन रहा हूँ पर मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। कृपया कर बताइए कि संसार का अन्तिम परिणाम क्या होगा और मनुष्य जाति को आगे चलकर क्या-क्या सहना पड़ेगा ?”
उस समय डैनियल को चुप रहने के लिए कहते हुए देवदूत ने कहा-हे डैनियल! तुम अपने रास्ते पर चलते चले जाओं, क्योंकि भविष्यवाणी के शब्दो का अर्थ गुप्त रखा गया है और उस पर मुहर लगा दी गई है। तब तक के लिए जबकि इस समय का अन्तर आ जाए। जो बुद्धिमान होंगे वे अन्तिम दिनो इसका अर्थ समझ सकेंगे।
सन् 1864 में डाँ. गाँमीग तथा 66 में जेम्स ग्राण्ट ने इस भविष्यवाणियों का अर्थ निकाला और यहूदियों को उनके पुनर्वास का समय आखिरी समय बताया। स्मरणीय है इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक यहूदियों के मूल निवास स्थान पर दूसरे देशों का अधिकार था। फ्लेस्टाइन पर तुर्की का राज्य था। सन् 1648 में उन्हे फ्लेस्टाइन में फिर से बसाया गया तथा इजराइल संसार के नक्शे पर एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रुप में उभरा।
प्रसिद्ध पुरातत्व वेत्ता और यहूदियों की प्राचीन भाषा के विद्वान् डाँ. विलियन अलब्राइटने इस घटना का सर्न्दभ बाइबिल की भविष्यवाणियों से जोडते हुए लिखा है कि अब तक सभी भविष्य कथन सही सिद्ध होते आए है। इसमें तुर्की का पतन, हिटलर का उदय, तानाशाही शासको का वर्चस्त्र आदि कई भविष्यवाणियाँ है जो सात समय बीत जाने का लक्षण बताई गई है।
ट्रम्पेट्स या बिगुलों से आशय युद्ध के उद्घोषो का निकाला गया है। इन दिनों जिस तरह के शास्त्रीय और युद्ध में काम आने वाले उपकरण खोज निकाले गए है, उनमें से ज्ञात शस्त्रास्त्रों की ही सहारक क्षमता पढ़-सुनकर ही रोमाँच ही उठता है। स्मरणीय है कि युद्ध वान के क्षेत्र में तिनी भी खोजें ही रही है। उनमें से नब्बे प्रतिशत गोपनीय रखी जाती है। जो कुछ जानकारियाँ सामने आती है, वे भी दूसरे देशों द्वारा की गई गुप्तचरी के परिणामस्वरुप प्रका में आती है। अन्यथा अधिकाँश तो गुप्त ही रहती है। फिर भी जितनी जानकारियाँ प्रकाश में आई है, उससे उपरोक्त विभीषिकाओं का शब्दशः चित्र प्रस्तुत होता है।
उपरोक्त भविष्यवाणियों के समय निर्धारण के सम्बन्ध में जेम्स ग्राण्ट ने लिखा है कि बाइबिल में उल्लेखित सात समय का अर्थ 1510 वर्ष बताया है अर्थात एक समय को 360 वर्ष का माना है स्मरणीय है ये भविष्यवाणियाँ ईसा से करीब 500-600 वर्ष पूर्व की गई थी। जेम्स ग्राण्ट ने हिसाब लगाकर बताया है यह भविष्यवाणियाँ 1680 के आसपास वाले समय से सम्बन्ध रखती है। प्रख्यात ज्योतिषी काउण्ड लुईस हैमन ने भी यही वह समय बताया है, जब रोग बीमारियों तथा युद्धों के कारण मनुष्य जाति बुरी तरह वस्त्र अर्थात् विनाश की चरम सीमा पर पहुँचेगी।
अन्तरिक्ष विज्ञान, भु-विज्ञान से कम महत्पूर्ण नहीं है जल और थल की तरह आकाश पर विजय प्रापत करने के लिए प्रयत्नशील मनुष्य यदि चाहे तो अपने पुरुषार्थमें एक कड़ी और जोड़ सकता है। कि ग्रहो के सूक्ष्म प्रभाव से पृथ्वी के वातावरण तथा प्राणि परिवार को जो अनुकलता प्रतिकूलता सहन करनी पडती है। उसके सम्बन्ध में उपयुक्त जानकारी प्राप्त करे ओर तदनुरुप उपाय खोज निकाले। प्राचीनकाल में ज्योतिष विज्ञान के दोनों पक्ष्ज्ञ है-ग्रहों की गतिविधियाँ तथा उनकी सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की जानकारी भली प्रकार उपलब्ध रहती थी फलतः वे प्रतिकूलताओं से बचने तथा अनुकूलताओं से लाभ उठाने का मार्ग भी निकाल लेते थे। मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान को अनेक शाखा प्रशाखाओं में विकसित करके प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ चलने में सफलता पाई है ग्रह विद्या का महत्व इन सबकी तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही है। अन्य विज्ञान, सामयिक, सीमित और सम्बद्ध लोगों की ही प्रभावित करते है, पर ग्रहों की सामर्थ्य भ प्रचण्ड है और क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक। ऐसी दशा में उनके साथ जुडे हुए सम्बन्ध सूत्रों और आदान-प्रदानों के सम्बन्ध में भी हमारी जानकारी उपयुक्त स्तर की होनी चाहिए।
मौसम से लेकर राजनैतिक घटनाक्रमों तक को देखकर लोग अपनी योजनाओं का निर्धारण परिवर्तन करते रहते है। ग्रहों की स्थिति से उत्पन्न प्रभावों के सम्बन्ध में भी यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है। अनुकूलताओं का-सम्भावनाओं का यदि पूर्वाभास मिल सके तो निश्चय ही वैयक्तिक एवं सामूहिक सुख शान्ति एवं प्रगति के ऐसे सूत्र मिल सकते है जो उज्जवल भविष्य की संरचना लाभदायक सिद्ध हो सकें।
अन्तरिक्ष का महत्व विज्ञान क्षेत्र ने समझा है। इसमें भरी हई सम्पदा सूक्ष्म होने के कारण धरती और समुद्र में पाये जाने वाले सम्पदा भण्डार से कही अधिक है। अब तक भी जो कुँज पाया गया है उसमें जल ओर थल की अपेक्षा आकाश का अनुदान अधिक है। वर्षा आकाश से होती है। हवा भी आकाश में भरी है। बिजली, रेडियो, लैसर आदि के संचार आकाश से है। ध्वनि, ताप, प्रकाश आदि की तरंगो का प्रवाह आकाश में ही चलता है। धरती को अन्तंग्रही अनुदान भी उसी क्षेत्र से मिलते है। अदृश्य जगत की सत्ता उसी का घोल है। दिव्य प्राणी इसी में निवास करते है। विचार तरगें इसी में परिभ्रमण करती है। ऐसे-ऐसे अनेको आधार हैं जिनसे स्पष्ट है। कि दृश्य भू-मण्डल की तुलना में अदृश्य आकाश में विद्यमान साधन सम्पदा का महत्व और स्तर अंसख्य गुना अधिक है।
अध्यात्म विज्ञानी तो अनादि काल से अपनी गतिविधियों को आकाश पर केन्द्रीभूत रखे रहे है। अदृश्य जगत्, सूक्ष्म जगत् ही उनका उत्पादन क्षेत्र रहा है। उस कमाई का दृश्य पृथ्वी पर तो खर्च भर करते है। ऋद्धि ओर सिद्धियों का प्रयोग प्रदर्शन हो प्रत्यक्ष है। यह तो उपाजन का प्रयोग उपभोग करना भर है। जहाँ से यह सब कमाया जाता है वह परोक्ष है। परोक्ष का विस्तार आकाश में है मानवी अन्तराल में तो उसकी बीज सत्त भर साधना का आरम्भ अन्तराल में किया जाता है, पर उस आरम्भ को प्रतिफल तक पहुँचने के लिए अन्तरिक्षीय शक्तियों का ही सहयोग लेना पड़ता हे।
भौतिक विज्ञानी इस तथ्य को अब पहले की अपेक्षा ओर भी अधिक अच्छी तरह समझने लगे है। धरती से वनस्पति और खनिज सम्पदा उपलब्ध करने के प्रयास चिरकाल से चलते आ रहे है। इन दिनों उनमें कटोती की गई है और अन्तरिक्ष की खोज पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि धरती ओर समुद्र के उपर्जन की आवश्यकता नहीं रही या वे क्षेत्र अब सम्पदा रहित हो गये। अन्तरक्षि को प्रमुखता देने का अर्थ है कि वहाँ से अधिक मूल्यवान उपार्जन सम्भव है। उदाहरण के लिए सौर ऊर्जा को लिखा जा सकता हैं धरती पर कोयला, भाप, तेल, बिजली, अणु यह पाँचो ईधन जितने उपलब्ध हो सकते है वे कम भी पड़ते जा रहे है और मँहगे भी सिद्ध हो रही है। अस्तु प्रयत्न यह चल रहा है कि सौर ऊर्जा करतलगत की जाये। यह सस्ती है ओर अखूट भी। लैसर से लेकर मृत्यु किरणों तक एक से एक बढ़कर ऐसी शक्तियाँ आकाश से ही उपलब्ध हो रही है। जो अणु विस्फोट जैसे आत्मघाती युद्धोन्माद के परिणाम उत्पन्न कर सकती है। न केवल युद्ध विजय वरन् सुविधा सर्म्वधन की दृष्टि से बहुमूल्य उपलब्धियाँ भी उसी से मिल सकती है। उदाहरण के लिए तार, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए छोटे-छोटे उपग्रहों से काम लिया जा रहा है। यह पद्धति नित्तान्त सरल और सरती है। सोचा यह जा रहा है। कि आकाश विजय के साथ ऋतुओं पर नियन्त्रित किया जा सकेगा। जब जहाँ इच्छा हो, वहाँ उतनी वर्षा करा लेने-गर्मी-सर्दी को बटा-बढ़ा लेने से वनस्पति उपार्जन और प्राणियों की सुविधा में भारी प्रगति हो सकती है। सौर ऊर्जा के हस्तगत होते ही ईंधन का सकट सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जायेगा। तब समुद्र की लहरों से बिजली बना लेना और उसके खारी जल को मीठा बना लेने में कोई कठिनाई न रहेंगी। यही है वे स्वप्न अथवा लक्ष्य जिन्हे परा करने के लिए अब विज्ञान, वैभव और वर्चस्व ने मिलकर आकाश विजय की ठान-ठानी है।
प्रस्तुत सकटो से सबसे भयानक है वायु प्रदूषण। विषाक्तता बढ़ते जाने से आकाश में कचरा इतना भर गया कि उसके रहते मनुष्यों एवं प्राणियों के लिए दुर्बलता रुगणता दुःख भोगते-भोगते अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाने के अतिरिक्त ओर काई चारा न रहेगा। धुँआ, विकरण, कोलाहल आदि ने आकाश को विषवमन करते और अभिशाप बरसने रहने की स्थिति में डाल दिया है। इसका परिशोधन करने का कारगर उपाय एक ही हैं कि इस कचरे को अनन्त अन्तरिक्ष में कही अन्यत्र धकेल दिया जाये। धरती के इर्द-गिर्द फैले हुए वायु मण्डल के घेरे में इस अभिवृद्धि को कैसे रोका जाये? जो भरा हुआ है उसे शुद्ध कैसे किया जाय? इन दोनों प्रश्नों के कोई उत्तर सूझ नहीं रहे हे, साथ ही यह तक नहीं सूझ रहा है कि दिन-दिन बढ़ने वाला कचरा किस प्रकार रुक सकता है। मशीनों का चलना बन्द किया जा सकता कठिन है फिर ईधन जलने ओर विषैली भाप उड़ने पर भी अंकुश कैसे लगे ? इस जीवन-मरण की समस्या के लिए अपने आकाश की महान आकाश के साथ कुछ तालमेल बिठाने की बात सोचनी पड़ रही हैं अन्तरिक्ष का महत्व ऐसे-ऐसे अनेक कारणो से स्वीकार गया है और उसे अन्वेषण, परीक्षण, आधिपत्य से लेकर दोहन तक के लिए कदम बढ़ाया गया है।
इस सर्न्दभ में यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि अन्तरिक्ष क्षेत्र से अध्यात्म क्षेत्र का दूर रखने से अब काम चलने वाला नहीं है। वरन् समय को देखते हुए पूर्ण काल की अपेक्षा उस क्षेत्र में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भूतकाल में अन्तरिक्ष में कोई संकट नहीं था। प्रतिकूलताओं से लड़ने जैसी कोई बात नहीं थी। अनुकूलताएँ बढाने भर का उद्देश्य सामने था। इसके लिए कुछ थोड़ से ही लक्ष्य और प्रयत्न पर्याप्त माने जाते थे। वर्षा पर नियन्त्रण प्राप्त करने और उसके साथ प्राण तत्व की धरती पर उतारने की पर्जन्य प्रक्रिया काम में लाई जाती थी, फलतः अन्न, वनस्पति एवं पशुधन की प्रचुरता तथा समर्थता का समुचित लाभ मिलता था। सतयुग में कहीं कोई अभाव नहीं था। इस सर्न्दभ में मानवी प्रयत्न यज्ञोपचार द्वारा अन्तरिक्ष के अनुकुल के रुप में सफल होते रहते थे। प्राणियों के लिए सबसे प्रमुख आहार वायु है। सास के द्वारा जो ग्रहण किया जाता है वह मूख के द्वारा खाये और पेट के द्वारा पचाये आहार की तुलना में असख्य गुना अधिक मूल्यवान है। यज्ञोपचार द्वारा प्राणवायु की उच्च स्तरीय मात्रा जीवधारियों को मिलती रहती थी और उनकी शारीरिक ही नहीं मानसिक स्थिति भी ऊँची रहती थी। सतयुग उन्ही उपलब्धियों की काल परिधि को कहा जाता था।
साधना स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोडती थी जिसमें जन मानस को अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
ज्योतिविज्ञान का एक एक और पक्ष है अर्न्ग्रही प्रवाहों में हेर-फेर कर सकने की क्षमता का उपार्जन। चेतना की शक्ति का तत्वज्ञान जिन्हे विदित है। वे यह भी समझते है। किन्जड पर नियमन करने की सामथ्य भी उसे प्राप्त है शरीर के बहुमूल्य यन्त्र को प्राण की चेतना ही चलाती और जीवन रखती है। रेल, मोटर, जहाज स्वसंचलन यन्त्र उपग्रह आदि चलते भले स्वयं हो पर उनका संचालन विचारशील मनुष्य ही करते है। उनमें प्रचण्ड शक्ति विद्यमान तो है। पर मात्र अपनी धुरी पर ही परिभ्रमण कर सकती है। उसे दिशादेनी हो अथवा उलट-पुलट करनी हो तो उसमें चेतना को ही अपना पुरुषार्थ प्रकट करना होगा। अन्तग्रही प्रवाह जैसी भी चलने है उनका सामान्य क्रम अपने ढरें पर ही चलता रहेगा। उसमें अतिरिक्त परिवर्तन करना हो तो चेतना की सामर्थ्य का ही उपयोग करना होगा।
अन्तर्ग्रही शक्तियों की विशालता और प्रचडता अद्भुत है और कल्पना तीत है इतने पर भी यह तथ्य समझा जाना चाहिए कि चेतन की प्राणशक्ति का प्रहार उस प्रवाह में सारे परिवर्तन कर सकता है ऐसे परिवर्तन जो पृथ्वी के उसके प्राणियों के लिए उत्पन्न अविज्ञात कठिनाईयों को रोकने ओर अदृश्य अनुदानों को बढाने में समर्थ हो सके। ग्रह विज्ञान की पूर्णता इसी में ही कि स्थिति की जानकारी तक सीमित न रह कर अभीष्ट हेरफेर भी कर सके। रोग का निदान ही पर्याप्त नहीं कुशल चिकित्सक को रुगणता हटाने और आरोग्य बढाने का उपचार भी करना होता है। ज्योतिविज्ञान ने केवल ग्रह नक्षत्रों की स्थिति से अवगत कराता है। वरन् सूक्ष्म जगत में उसके अदृश्य प्रभावों के अनुकूलन का भी प्रबन्ध करता है।
जो इन अविज्ञान तथ्यों को समझ सके उन्हे यह जानने में कठिनाई न होगी कि मानव जाति के समने प्रस्तुत अनेकानेक विभीषिकाओं के पीदे विद्यामान अदृश्य कारणों का निराकरण करने से यह विज्ञान कितना अधिक कारगर हो सकता है। युग निर्माण के लिए मानवी पुरुषार्थ की आविश्यकता और महत्ता तो निश्चित रुप से ही किन्तु साथ ही समझना यह भी चाहिए कि इस पुष्ट प्रयोजन में अदृश्य शक्तियों का अनुकूलन भी अभीष्ट है। इस क्षेत्र की जानकारी तथा परिवर्तन की विधि व्यवस्था में ज्योतिविज्ञान की सहायता लेना आवश्यक है। अभीष्ट परिवर्तन में मानवी प्रयासों के अतिरिक्त अदृष्टि का अनुकूलन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
इस सर्न्दभ में एक बात और जान लेने योग्य है कि ब्रह्माण्ड में मात्र जड़ ग्रह पिण्ड ही परिभ्रमण नहीं करते इससे सचेतन शक्तियों का अस्तित्व, प्रयास, प्रभाव भी कम नहीं है। ब्रह्ममाण्ड के शोधकर्त्ता अब इस निर्ष्कष पर पहुँच चुके है। कि अन्तरक्षि में पृथ्वी जैसी स्थिति कितने ही अन्य ग्रहों की भी है और उनमें मनुष्यों से भी अधिक विकसित प्राणी रहते है। उनका ज्ञान और विज्ञान धरती निवासियों की तुलना में कही अधिक बढ़ा-चढा है। यह कपोल कल्पना नहीं है। अब ऐसी प्रमाण मिल रहे है। जिनसे प्रतीत होता है कि अन्याय ग्रह-नक्षत्रों में न केवल विकसित स्तर के प्राणियों का अस्तित्व है। वरन् वे अन्तर्ग्रही उडाने उडकर पृथ्वी निवासियों के साथ सर्म्पक साधने क लिए भी प्रयत्नशील है।
उड़न तश्तरियों के पृथ्वी पर आवागमन की बात सर्वविदित है। आरम्भ में इन्हे आकाश में वायु, बिजली, गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न प्रकृति-व्यक्तिक्रम कहा गया। बुद्धि, भ्रम एव नेत्र विभ्रम की संज्ञा दी गई। दर्शकों के विवरण अत्युक्तिपूर्ण बताये गये, पर जब उड़न तश्तरियाँ अपने प्रत्यक्ष प्रभाव प्रस्तुत करने लगी तो गम्भीरतापूर्वक उनके अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ा। इनके भीतर किन्ही बुद्धिमान प्राणियों के होने का जो सर्न्दभ किया जाता था। वह भी अब हुत हद तक दूर हो चुका है। यह भी स्पष्ट है। कि यानों और उनके संचालकों का ज्ञान और विज्ञान हमसे कही अधिक बढ़ा-चढा है। प्रकाश से अधिक गति अपनाने वाले यान ही इस प्रकार धरती पर आ सकते है। इसी प्रकार अन्तर्ग्रही यात्रा में आने वाले अवरोधों का समाधान भी सामान्य काम नहीं है। फिर इतनी लम्बी यात्राएँ पूरी करके लौटने के लिए ईधन भी ऐसा चाहिए जो हमारी जानकारी से बाहर है।
इन सुविकसित प्राणियों के साथ सर्म्पक साधना सम्भव हो सके तो निश्चित ही मनुष्यों को विशेष लाभ प्राप्त होगा। निश्चय ही इतना बड़ी सभ्यता के अधिकारी धरती जैसी दरिद्रा और उस पर रहने वाले पतित पीड़ित लोगों पर आक्रमण करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य यात्राएँ नहीं कर सकते। उनका उद्देश्य इस लोक के प्राणियों को अपनी उपलब्धियों से लाभान्वित करना ही हो सकता है। भारत के ऋषि, मुनि समस्त संसार में ज्ञान और विज्ञान का वितरण करने के सदुद्देश्य से परिभ्रमण करते रहे है। इससे कम सदुद्देश्य इन अर्न्तग्रही महामानवों का भी नहीं हो सकता। वे हमसे सर्म्पक साधने का प्रयत्न करते है, पर वह सधता नही। क्योंकि इस लोकवासियों की क्षमता उनकी ओर हाथ बढाने एवं सहयोग करने की नहीं है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक बाधक अर्न्तग्रही विशिष्ट विज्ञान के सम्बन्ध में अपना अनजान होना ही है। यदि विज्ञान के सम्बन्ध में अपना अनजान होना ही है। यदि विद्या प्राचीनकाल की तरह विकसित स्तर की रही होती तो वह सर्म्पक सध सका होता जिसके लिए उड़न तश्तरियों में अन्तर्ग्रही यानों में बैठ कर आने ले महाप्राण प्रयत्नशील है।
प्राचीनकाल में नारद आदि ‘विशिष्ट’ अन्तर्ग्रही यात्राएँ करते रहे है। लोक-लोकान्तरों में उनके परिभ्रमण का वृत्तान्त मिलना है और वह सही है। जो निश्चय ही उस सफलता का आधार वह उच्चस्तीय ज्योतिविज्ञान ही रहा होगा जो इन दिनों एक प्रकार से लुप्त ही हो गया।
प्रेतों और पितरो के सम्बन्ध में आस्तिक और नास्तिक, श्रद्धालु और तार्किक कुछ न कुछ जानते ओर मानते है। इनकी भी एक दुनिया है परलोक, प्रेतलोक, र्स्वग, नरक आदि के नाम से इसकी चर्चा होती रहती है। यह भी जीवित मनुष्यों जैसी एक दुनिया है। आदान-प्रदान का रास्ता ख्ला रहाता तो जिस प्रकार जलचरों और नभचरों का अस्तित्व मनुष्यों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से प्रभावित करता है। उसी प्रकार इन दिवंगत आत्माओं का सहयोग जीवितों के लिए कई प्रकार से उपयोगी हो सकता है। जीवाणु, परमाणु, विषाणु की जानकारी ने मानवी सुविधा क्षेत्र को बढ़ाया है। अनन्त अन्तरक्षि में बसी हुई इन सूक्ष्य शारीरधारियों की दुनिया यदि जीवितों के साि सहकार बना सकी होती तो दिवंगतों को अतृप्त घूमना न पड़ा और न मनुष्य को उनके दिव्य सहयोग से वंछित रहना पड़ता। दिवंगत स्वजन सम्बन्धियों के साथ प्रेमाचार तो और भी अधिक सरल है।
देवता इससे ऊँची स्थिति की चेतन सत्ता है सौर मण्डल के ग्रह और उपग्रह भौतिक दृष्टि से रासायनिक पदार्थो से बने बउ आकार वाले चलते-फिरते ढेले भर हैं किन्तु आत्मविज्ञानी जानते है। कि प्रत्येक जड़ सत्ता का एक चेतन ‘अभियान’ होता है। उसी के नियमन में इन घटकों को अपनी गतिविधियाँ उपयुक्त रीति से चलाने का अवसर मिलता है। नव ग्रहों की अध्यात्म शास्त्र में देवता माना गया है। खगोल विद्या में वे पदार्थ पिण्ड गिने जाते है। अपने-अपने स्थान पर दोनों परिभाषाएँ सही है। दिव्यदर्शियों ने तैतीस कोटि देवता गिनाये है। कोटि का अर्थ यहाँ ‘करोड़’ नहीं ‘श्रेणी’ ही समझा जाना चाहिए। इस समुदाय में ग्रहपिण्ड, निहारिकाएँ, पंचतत्व, पंच प्राण, देवदूत, तीवन मुक्त, व्यवस्थापक, सहायक वर्ग की उन दिव्य सत्ताओं को गिना जा सकता है। जो पर ब्रह्म न होते हुए भी उसकी व्यवस्था में हाथ बँटाती रहती है। देवाराधन की प्रक्रिया से इन्ही के साथ सर्म्पक साधने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने का प्रयत्न किया जाता है।
भू-मण्डल से बाहर अनन्त अन्तरिक्ष बिखरा पड़ा है। विज्ञान में पृथ्वी तथा उसके सम्बन्ध वाले अतिनिकट क्षेत्र से सर्म्पक साधा और अनुसन्धान किया है। इससे बाहर का ब्रह्माण्ड विस्तार अत्यन्त व्यापक है।
इसमें पदार्थ भी है और चेतना भी। ग्रह-नक्षत्रों से लेकर असंख्य स्तर की ऊर्जा तरंगो तक का पदार्थ भाण्डागार इसी ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है। पितरों से लेकर महाप्राण और देव समुदाय तक के अनेकों सूक्ष्य शरीरधारी इसी विस्तार में निवास करते ओर अपना विशिष्ट संसार चलाते है। यह प्रत्यक्ष और परोक्ष आज एक-दूसरे के साथ ऐच्छिक आदान-प्रदान स्थापित नहीं हो पा रहा है। प्रकृति प्रवाह से जो अनायास ही मिल जाता है। उतने भर से सन्तुष्ट रहना पड़ रहा है।
युग परिवर्तन और नव सृजन के लिए मात्र मनुष्यों के ज्ञान, श्रम एवं साधना को नियोजन तो होना ही चाहिए, पर उतने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो नहीं सकेगा। परिवर्तन की अधिकाँश प्रक्रिया सूक्ष्म जगत में सम्पन्न होगी। प्रत्यक्ष में तो उसकी प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। प्रत्यक्ष में तो उसकी प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। इस प्रयोजन के लिए जागृत आत्माओं की तत्परता और विभूतियों की सहायता को जहाँ आमन्त्रित किया गया है। वहाँ परोक्ष का सहयोग प्राप्त करने की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा गया है। ज्योतिविज्ञान का पुनः निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
फार्म - 4
(1) प्रकाशन स्थान - मथुरा
(2) प्रकाशन अवधि - मासिक
(3) मुद्रक का नाम - मृत्यु´जय शर्मा
क्या भारत का नागरिक है। - हाँ
(4) प्रकाशक नाम - मृत्यु´जय शर्मा
पता - अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
(5) सम्पादक का नाम - माता भगवती देवी शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है) - हाँ
(6) उन व्यक्तियों के नाम व पते - मृत्यु´जय शर्मा
जो समाचार पत्र के स्वामी हो तथा जो समस्व पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक क साझेदार या हिस्सेदार हो। - अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
मैं मृत्युक्ष्ज्ञय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी द्वारा विश्वास के अनुसार ऊपर दिए गये विवरा सत्य है।
प्रकाशक के हस्ताक्षर - मृत्यु´जय शर्मा
अपनी पृथ्वी देखने में अपनी धुरी पर घूमती, अपनी कक्षा में दौड़ लगाती और आत्म निभ्रर दीखाती है, पर वास्तविकता वेसी है नही। सौर परिवार के सदस्यों की आकर्षण शक्ति उन्हे एक व्यवस्था क्रम में जकड़े हुए । उनमें गड़बडी पडे़ तो किसी भी ग्रह-नक्षत्र के अनियन्त्रित होकर किसी दूसरे के साथ टकरा जाने-स्वयं मरने और दूसरे को मारने का पूरा-पूरा खतरा उत्पन्न हो जायेगा। पृथ्वी को जीवन सूर्य से प्राप्त हुआ है। उीस की रोशनी और गर्मी से धरातल पर अगणित गतिविधियाँ चलती और अनेकों सम्पदाएँ उत्पन्न होती है। ऋतुओं की उपयोगिता सभी समझते है। वे अपने आप नहीं आ टपकती वरन् पृथ्वी और सूर्य की दूरी बदलते रहने से ही ऋतु परिवर्तन सम्भव होता है। पराश्रित तो किसी न किसी अंश में सभी ग्रह नक्षत्र होते है, पर पृथ्वी की जो विशेष स्थिति है। उसमें उसका अपना वैभव कम और अर्न्तग्रही अनुदान विशेष है। सूर्य तो पृथ्वी का जीवनदाता प्राण है। इस आदान-प्रदान का सिलसिला टूट जाय या घट-बढ जोय तो समझना चाहिए कि भूतल का सारा वैभव देखते-देखते तिरोहित हो जायगा। तब यहाँ श्मशान जैसी स्वबन्ध छाई होगी।
मात्र सूर्य से ही नहीं पृथ्वी को अन्याय ग्रह-नक्षत्रों से भी असंख्य अनुदान मिलते है उत्तरी ध्रुव की विशेषताओं में एक यह है कि उसका विचित्र चुम्बकत्व अपने उपयोग की आवश्यक वस्तुएँ अनन्त अन्तरिक्ष में खीचता रहता है। यह सूक्ष्म अनुदान एक ग्रह दूसरे की सुविधा के लिए आकाश में बखेरता रहता है। लेन देन तो दूसरे ग्रहों में भी चलता रहता है। पर इस सर्न्दभ में पृथ्वी की चतुरता और क्षमता अत्यधिक है कि वह दूसरो के द्वारा बखेरी हुई सम्पदाओं में अपने काम की चीजे बड़ी मात्रा में कुशलता पूर्वक समेट ले। यदि ध्रुवों के चुम्बकत्व में यह विशेषता न होती तो पृवी को ग्रह परिवार से ये गोरव न मिला होता जो अद्भुत सौभाग्य की तरह उपलब्ध है।
उपरोक्त विश्लेषण से इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि मात्र व्यक्ति या समाज ही नहीं ग्रह-नक्षत्र भी एक दूसरे पर आश्रित हैं और पारस्परिक सहयोग एवं आदान-प्रदान से अपना काम चलाते है। इसे बैंकिंग पद्धति या सहाकरी व्यवस्था के समतुल्य माना जा सकता हैं शासन, अर्थ, तन्त्र, कानून, समाज का स्वरुप आदि संसार की अधिकाँश गतिविधियाँ इसी आधार पर चल रही । यह सौर मण्डल ही नहीं सारा ब्रह्माण्ड उसी आधार पर जीवित ओर गतिशील है।
ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव समय-समय पर पृथ्वी पर पड़ता है। विशेषतया सूर्य की स्थिति में तनिक-सा भी उन्तर पड़ने पर उसकी प्रतिक्रिया तुरन्त ही धरातल पर दिखाई पड़ती है। तापमान घटने-बढ़ने का तो प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव पड़ता ही है। अन्तरिक्ष में संव्याप्त सूक्ष्म तरंगों की स्थिति में हेर-फेर होने पर पृथ्वी के अनेक क्षेत्र अनेक प्रकार से प्रभावित होते है उसका प्रकृति सम्पदा तथा प्राणियों के शारीरिक मानसिक स्थिति पर अप्रत्याशित प्रभाव पड़ता है।सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण के अवसर पर आदान-प्रदान में थोड़ा सा ही अन्तर पड़ता है। पर उसकी प्रतिक्रिया दूरगामी होती है कई बार तो उस व्यतिरेक का प्रभाव तत्काल ही दृष्टिगोचर होता है। चन्द्रमा की कलाएँ घटने-बढने से समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटों से सभी परिचित है। यह ग्रह प्रभाव ही है जो पृथ्वी की परिस्थितियों में फेर बदल प्रस्तुत करता है। मानसून, तूफान आदि की आकाश में घटित होने वाली घटनाओं में धरती की परिस्थितियाँ उतना कारण नहीं होती जितना कि सूर्य या सौर मण्डल के साथ पृथ्वी के साथ चल रहे तालमेल का व्यतिरेक।
अमुक वनस्पतियों का अमुक ऋतु में पैदा होना न होना-बढ़ना न बढना। इस बात पर निर्भर रहता है कि सौर ऊर्जा की अमुक मात्रा का अवसर उन्हे मिलता है या नहीं मिलता। पृथ्वी के रासायनिक प्रदार्थ तो सदा एक जैसे रहते है। फिर वनस्पतियों का एक रस पोषण मिलने और उपयुक्त तापमान रहने पर भी यह अन्तर क्यों होता है कि नियत समय पर ही अमुक वनस्पतियाँ उगे या न उगे। उस रहस्य का स्पष्टीकरण इतना ही है कि अन्तर्ग्रही अनुदान भू-मण्डल को समान रुप से प्रभावित नहीं करते वरन् उसके विभिन्न जड़, चेतन, घटको को भी अलग-अलग प्रकार के अनुदान देते है।
आत्म-हत्याओं ओर अपराधो के घटने-बढने की जाँच-पडताल से पाया गया कि समयानुसार सन्तुलन और विक्षोभ के भी ज्वार-भाटे आते है। इनसे प्रभावित होकर असंख्य मनुष्य उत्तेजना के कारण होने पर भी शान्त रहते और सामान्य परिस्थितियों में भी नाम मात्र के कारण आपे से बाहर होते देखे गये। इसे सामूहिक जीवन पर पड़ने वाला ग्रह प्रभाव कह सकते है। कितने ही वृक्षो में यह विशेषता पाई जाती है। कि ग्यारह वर्षीय सूर्य चक्र के अनुरुप उनमें रासायनिक उतार-चढाव होते है और वृद्धि में उत्साह तथा अवरोध पड़ता है।
बसन्त ऋतु में वृक्ष वनस्पतियों के फूलने का प्रत्यक्ष कारण तापमान के घट-बढ़ से भी जोड़ा जा सकता है। पर इसका क्या उत्तर है कि अधिकाँश प्राणियों में उन दिनों कामुकता उभरती है। और गर्भ धारण दौर व्यापक रुप से चलता है। इससे प्रतीत होता है कि ऋतुएँ न केवल परिस्थितियाँ को प्रभावित करती है। वरन् मनःस्थिति में भी परिवर्तन प्रस्तुत करती है। कहा जा चुका ळै। कि ऋतु परिवर्तन धरती की विशेषता नहीं, सूर्य की निकटता तथा दूरी की प्रतिक्रिया मात्रा है।
बिनाश की प्रस्तुत विभीषिकाओं में मानवी दुष्कर्मों की प्रधानता तो प्रमुख कारण है ही - पर उसके अतिरिक्त भी एक महत्वपूण्र तथ्य है-ग्रहो की स्थिति का भू-मण्डल पर प्रभाव। उसे न तो नगण्य ठहराया जा सकता और न उसे अमान्य रखा जा सकता है। इस सम्बन्ध में हम सब पूर्णतया अनजान है। यदि विनाशकारी अर्न्तग्रही विवरण का स्वरुप और स्तर समझा जा सके तो रोकथाम का उपाय ढूँढ निकालना भी कठिन नहीं है।
भौतिक विज्ञान मात्र प्रकृति क्षेत्र तक सीमित है। अध्यात्म विज्ञान का चेतना क्षेत्र पर अधिकार है। चेतना इतनी समर्थ है कि पदार्थ की स्थिति में आवश्यक परिवर्तन करती रही है और करती रहेगी। प्रस्तुत ग्रह संकट का निवारण कर सकने के लिए प्रकृति विज्ञानी अपनी असमर्थता व्यक्त कर सकते है। किन्तु चेतना की शक्ति को निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह अपनी प्रचण्ड सामर्थ्य से प्रकृति प्रवाह को मोड़ने और परिस्थिति में परिवर्तन करने की सामर्थ्य से सम्पन्न है।
पृथ्वी और अन्तरिक्ष का समान अस्तित्व है। एक को समीपवर्ती दूसरे को दूरवर्ती अथवा एक को प्रत्यक्ष दूसरे को परोक्ष कह सकते है। प्राचीन काल से भी इनके समन्वय की आवश्यकता समझी गई थी आज भी उसे फिर से क्रियान्वित करना आवश्कय हो गया है। दोनों के मध्य आदान-प्रदान का उतना ही क्रम चल रहा है। जितना कि प्रकृति प्रवाह से अनायास उपलब्ध हो सकता है इसकी अभिवृद्धि में मानवी प्रयत्न जुडने की आवश्यकता है प्रकृति से तो आग और बिजली जैसे तत्व भी अनादि काल से विद्यमान थे, पर मनुष्य ने उन्हे प्रयत्नपूर्वक हस्तगत किया है। अन्तरिक्ष के अनुदान अन्ततः उच्चस्तरीय है। उनकी उपलब्धि इस युग सन्धि की बेला में तो अनिवार्य रुप से आवश्यक हो गई है। बिनाश से सुरक्षा और विकास की सफलता में मानवी प्रयत्नों और साधनों को आवश्यक तो कहा जा सकता है, पर पर्याप्त नहीं। इस अपूर्णता को पूर्णता में बदलने के लिए अन्तरिक्षीय सहयोग इन दिनों नितान्त आवश्कय हो गया है। इस समन्वय का-आदान-प्रदान का-द्वार खुल जाने से कितनी सुखद सम्भावनाएँ सामने आ सकती है।
यह विज्ञान की शोध में प्रयुक्त हविष्य में सूक्ष्म क्षमताओं के समावेश का बहुत महत्व है। पुष्प नक्षत्र में उपलब्ध पुनर्नवा में अन्य समय की अपेक्षा अधिक उच्चस्तरीय रासायनिक पदार्थ पाये गये है। किस सामग्री एवं किस समिधा को कब बोया कब उखाड़ा तोड़ा जाय यह सतर्कता अपनाने पर हव्य पदार्थो की क्षमता में असाधारण हेर-फेर रहता है, तदनुसार प्रभाव परिणाम भी भिन्न होते है। ब्रह्मवर्चस् की यज्ञ शोध में जिन हव्य पदार्थो की आवश्यकता पडेगी वे उपयुक्त समय पर संग्रह किये जाने चाहिए। यह मुहूर्त प्रक्रिया सही ग्रह स्थिति को जानने से ही बन पड़ेगी। इसके लिए सही पंचाँग की नितान्त आवश्यकता है।
नव निर्माण में विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिनन विशेषताओं वाली प्रतिभाओ को नियोजित करना पड़ेगा। आन्तरिक्ष क्षमता ओर उथली प्रतिभा में भारी अन्तर होता है। जीवट और सुसंस्कारिता के आधार पर ही किसी व्यक्तित्व का सही मूल्याँकन हो सकता है। इस परख में सही जन्म कुण्डलियों के आधार पर आवश्यक सहायता मिल सकती है। इस दृष्टि से भी अपने कदम आर्ष ज्योतिविज्ञान का अभिनव निर्धारण करने की दिशा में बढ़ रहे है। पिछले फरवरी अंक के अन्तिम लेख में इस सर्न्दभ में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। इन दिनों नव सृजन का प्रयोजन पूरा करने में अग्रिम भूमिका निभा सकने वाली आत्माएँ अवतरित हो रही है-हो चुकी है। उनकस पता लगाना आवश्कय उद्बोधन प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन भी एक ऐसा कार्य है। जिसके लिए हसी जन्म कुण्डलियों से आवश्यक सहायता मिल सकती है। ऐसी अवतरित आत्माओं के अभिभावकों को उनके सही परिपलन के सर्न्दभ में आवश्यक परामर्श दे सकना भी इस आधार पर सम्भव हो सकता है।
परिजनो से भी अपेक्षा की जा रही है कि जन्म कुण्डलियाँ बनवाने में जबावी लिफाफा भेजने का ध्यान अवश्य रखे। मिशन पर पहले से ही बढ़े आर्थिक भार को बढाये नहीं, लम्बे और जटिल गणित का हलकरने के लिए कम्प्यूटर की भी व्यवस्था की जा रही है।
युग सन्धि के पावन पर्व पर प्रस्तुत बसन्त ने जो अभिनव प्रेरणाएँ दी है। उनके अनुरुप देव परिवार के हम सब सृजन शिल्पी अपने-अपने कर्त्तव्य उत्तर-दायित्व को समझे। उनके निर्वाह का साहसिक प्रयत्न करें इसी युग सृजन की अग्रगामिता का गौरव है।
युग प्रवर्तन का उद्गम उल्लसा हिमालय के ध्रुव केन्द्र से उभरता है। उसकी प्रत्यक्ष जानकाीर ब्रह्मवर्चस् से मिलती है। इसे केन्द्र की अनुसन्धान और प्रशिक्षण की प्रचलित रीति-नीति में नये उभार लाने का निर्देश हुआ है।
ब्रह्मवर्चस् अनुसन्धान में अब तक (1) अध्यात्म का विज्ञान द्वारा समर्थन (2) तीनों शरीरों को निरोग परिपृष्ट बनाने वाली यज्ञोपचार प्रक्रिया (3) जन जीवन में अध्यात्म के समावेश की व्यावहारिक विधि व्यवस्था, यह तीनों काय्र अपने ढंग से भली प्रकार चल रहे है और सफलताएँ मिल रही है। उनसे विश्वास होता है कि आशा से कम समय में ही कुछ ऐसी उपलब्धियाँ प्रस्तुत की जा सकेंगी जिन्हे विश्व इतिहास की अभूत पूर्व घटना माना जा सके। इन प्रतिपादनों के सहारे मानवी चिन्तन और प्रवाह को नये आधार मिल सकेंगे। फलतः प्रस्तुत परिस्थितियों में काया-कल्प जैसी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो सकेगा।
इस श्रृंखला में प्रस्तुत बसन्त से तीन नई धाराएँ जुडी रही है। (1) अध्यात्मवादी अन्तरिक्ष विज्ञान का अभिनय निर्धारण (2) प्रशिक्षण सत्र श्रृंखला में प्राण प्रखरता का विशिष्ट समावेश। (3) जागृतों को प्राण वितरण यह तीनों ही कार्यो में पिछले दिनों की अपेक्षा अधिक तत्परता एव अधिक ऊर्जा का समावेश किया जायेगा। यह कार्य तत्काल आरम्भ किया जा रहा है।
भौतिकी के अर्न्तगत आने वाली खगोलविद्या में अन्तर्ग्रही प्रभावों का आकलन किया जाता है और प्रकृति के अन्तराल में छिपी सामथर्यो के मणिमुक्तकों को डुबकी मार कर खोजा जाता है। उडाने अब परिवहन मात्र के लिए नहीं, अन्तग्रही सम्पदाओं के बटोरने के लिए हो रही है।
आत्मिकी की अन्तरिक्ष विद्या ज्योतिविज्ञान के नाम से प्रख्यात है। इसमें अदृश्य जगत से सर्म्पक साधने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने की जानकाीर तथा प्रक्रिया के दोनों पक्षो का समावेश है। जानकारी की वर्णमाला ग्रहगणित तब मिलती है। जब ब्रह्माण्डव्यापी चेतना प्रवाहों के साथ देवसत्ताओं के साथ घनिष्ठता जुड़ती है ओर उसके सहारे परिस्थितियों में परिवर्तन सम्भव होता है। प्रत्यक्ष जगत के हानि लाभों से सभी परिचित है। अन्तरिक्ष से जो सिद्धियाँ और विभूतियाँ पाई जा सकी है। उसका द्वार इसी विज्ञान के सहारे सम्भव होता है। योग साधना, मन्त्र विज्ञान, तपश्चर्या ब्रह्मविद्या की स्थूल गतिविधियाँ वस्तुतः अन्तरिक्ष को ही प्रभावित करती है और उसी महान भाण्डागार से अपने उपयोग की सम्पदाएँ उपलब्ध करती है। अध्यात्म और उसे प्रधानतया अन्तरिक्ष से सम्बन्धित माना जाना चाहिए।
इस प्रसंग को ब्रह्मवर्चस् शोध का एक और अंग माना गया है। और अब तीन विषय से बढ़ करर चार हो गये है। अन्तरिक्ष शोध के लिए प्राचीन काल के ज्योति विज्ञानियों द्वारा प्रयुक्त होने वाली विशिष्ट रीति-नीति को अपनाया गया है साथ ही आधुनिकतम शोधप्रक्रिया के सिद्धान्तों का भी इसमें समुचित समावेश किया गया है। अब एक उसे चिर पुरातन और चिर नवीन का सामायिक समीकरण कहा जा सकता है।
ग्रह गणित सही होने पर अन्तरिक्ष की गतिविधि को सही समझा जा सकता है और अन्तर्ग्रही ही प्रभावों की धरती के वातावरण प्राणि समुदाय की परिस्थिति का-मनुष्य की मनःस्थिति का -भी सही आकलन हो सकता है। आधार सही न होने पर कुण्डली बनाना फलादिश निकालना तीरतुक्का भर रह जाता है। आयुर्वेद में यही हुआ। जड़ी बूटियों का स्तर गड़बडा देने से औषधियाँ प्रभावहीन बनी और वह चिकित्सा प्रद्धति अपनी गरिमा गंवाती चली गई। एलोपैथी इस सम्बन्ध में जागरुक है अतएव उसकी प्रामाणिकता बनी हुई है। ज्योतिविज्ञान को पुनजीवन देना इसलिए आवश्यक हो गया है कि युग सन्धि के बीस वर्षो में अन्तर्ग्रही प्रभावों का मनुष्य के भाग्य निर्धारण में असाधारण महत्व रहेगा। अतएव इस क्षेत्र के अनुकूलन का मूलभत आधार सही होना चाहिए। प्रस्तुत वेधशाला इसी उद्देश्य से बनाई गई है। अगले वर्ष से दृश्य गणित पचाँड इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए छपने की तैयारी की गई है। दृश्यगणित के लिए बहुमूल्य टैलिस्कोप और कम्प्यूटर लगाने की योजना चल रही है। इस आधार की सुसंस्कारी आत्माओं को ढूँढा और उन्हें उपयुक्त मार्ग दश्रन कर सकना भी सम्भव हो सकेगा।
युग सन्धि के इस प्रथम चरण में दूसरा काम जो हाथ में लिया गया है। वह प्राणदीक्षा का है। मन्त्रदीक्षा का स्वरुप प्राथमिक और सर्वजनीन है। बोल चाल की भाषा में परामर्श, मार्ग दर्शन, प्रशिक्षण की प्रक्रिया को मन्त्रदीक्षा कह सहते है। यह अध्यापक एवं उपाध्याय स्तर का काम है यह सरल ओर सर्वजनीन गायत्री मन्त्र को गुरुमन्त्र कहा गया है। विद्यारम्भ उपनमन के साथ उसे हर शिक्षार्थी को दिया जाता है। उसे मन्त्र धारण ॐ धारण कहते है। संक्षेंप में यह प्रवेशिका प्रकरण है इसे देने और लेने में विशेष अड़चन नहीं है।
अगला चरण प्राणदीक्षा का है। इसमें प्राण फूँके जाते है जीवितों में ही जीवट उभारी जा सकती है। और जिनकी अन्तःस्थिति में उर्वरता का समुचित अनुपात है। उनमें प्राण तत्व का अतिरिक्त आरोपण हो सकता है। विवेकानन्द, शिवाजी, चन्द्रगुप्त आदि को अपने मार्ग दर्शकों से इसी प्रकार के प्राण अनुदान प्राप्त हुए थे। कहना न होगा कि शिक्षा एक बात है और प्रगति के साधन जुटा देना दूसरी। मन्त्रदीक्षा को शिक्षा प्रेरणा कह सकते है। और प्राणदीक्षा को अनुदान हस्तान्तरण। सत्पात्रों को ढूँढने में जन्म गुण्डलियों का सहारा लिया जाएगा और प्राण संस्कारों का नया आधार आरम्भ किया जायेगा।
परिवार सत्र गायत्री नगर में आरम्भ होने जा रहे है। उसमें बालकों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन यज्ञोपवीत आदि संस्कर होंगे, इनमें प्राणदीक्षा के तत्व रहेंगे। जिनमें उर्वरता होगी उनमें इस बीजारोपण का सुनिश्चित प्रभाव पड़ेगा। सामान्यों को असामान्य बनाने में इस प्रक्रिया का असाधारण योगदान रहेगा।
गायत्री नगर में सत्र श्रृंखला चलेगी। उसमें सृजन शिल्पियों का शिक्षण ही प्रधान होगा। जन साधारा के प्रशिक्षा सत्र भविष्य में नवनिर्मित शक्तिपीठों में चलते रहेंगे। हरिद्वार में समय दानायें को ही प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा। इसमें युग सृजन के लिए सामयकि गतिविधियों की क्षमता उत्पन्न करना जहाँ उद्देश्य है वहाँ एक यह भी है कि जागृतों को जीवट प्रदान किया जाय। जीवट अर्थात् क्षमता। क्षमता स्वउपार्जित भी होती है और अनुदान स्तर की भी। दोनों ही उपायों से सृजन शिल्पियों के देव परिवार को इस योग्य बनाया जायेगा कि वे युग सन्धि में अपनी भूमिका सही रीति से निभा सकें। स्वयं धन्य बन सके और अपने कार्यक्षेत्र को अपने युग को धन्य बना सके।
प्राणदीक्षा का यह अनुदान मात्र गायत्री नगर में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले शिविरार्थियों को ही नहीं मिलेगा वरन् शक्तिपीठ उद्द्याटन के अवसर पर होने वाले युग सम्मेलनों में भी उपयुक्त व्यक्तियों को इस अनुदान का लाभ मिलेगा। गुरुदेव के इस प्रवास को तथ्यतः प्राणवानों को ढूँढने और उन्हे जीवट प्रदान करने की प्रक्रिया कह सकते है। युग सन्धि की प्रक्रिया आवश्यक समझी गई तभी प्रवाह का उपक्रम बना है अन्यथा उद्घाटन की रस्म इतनी बड़ी संख्या में इतनी लम्बी और इतनी थकाने वाली यात्रा पूरी करना उनकी व्यवस्तता को देखने हुए सम्भव न हुआ होता।
आशा की जानी चाहिए कि (1) गायत्री नगर में युग शिल्पी प्रशिक्षण और - (2) उद्घाटन समारोह में प्राण वितरण तथा (3) परिवार सत्रों में आते रहने वाले सद्गृहस्थों की नई पुरानी पीढ़ी को लिने वाले अनुदान इन तीनों को ही अपने-अपने स्तर की प्राण दीक्षा कहा जा सकता हैं यह व्यापक प्रक्रिया इन्हीं दिनों अपनाई जा रही है।
सभी परिजनों के जन्म दिन नोट किये जा रहे हैं इसके लिए अतिरिक्त विभाग बना देय गये हैं इस संकलन पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया जाता रहेगा। आवश्यकतानुसार इस पर्यवेक्षण के सहारे परिजनों का उपयुक्त मार्गदर्शन किया जाता रहेगा। जन्म कुण्डली विभाग को गायत्री नगर की एक विशेष स्थापना ही कहा जाना चाहिए। प्रत्यक्षतः तो यह होई पंडिताऊ या ज्योतिष स्तर की प्रक्रिया प्रतीत होती है। पर वस्तुतः उसे देव परिवार की प्रगति और सुख शनित से देवी अनुदानों का ही रहस्यमय समावेश ही कहना चाहिए।
प्राण वितरण की सर्वोपयोगी एवं सर्वसुलभ प्रक्रिया वह है जो प्रातःकाल की प्राण संचार साधना के रुप में भी सभी परिजनों को घर बैठे उपलब्ध होती रहेगी। सूर्योदय से पूर्व एक घन्टा से लेकर सूर्योदय तक के एक घन्टे में कभी भी दस बीस मिनट एकाग्र बैठने और निर्धारित धारण करने से यह लाभ सरलता पूर्व क पाया जा सकता है। यह एक विशेष टानिक है जो हर जागृत को उसके स्तर का नव जीवन-प्रदान करेगा। यह उपक्रम आरम्भ तो अभी से हो गया है , पर उसका विधिवत् ओर सर्वजनीय उद्घाटन गायत्री जयन्ती से होगा।
गायत्री नगर में देव परिवार बसने की सूचना गत अंक से सभी को मिल चुकी है निवृत्त एवं स्वावलम्बी प्रथम चरण में बुलाये गये है। द्वितीय चरण में वे बुलाये जायेंगे जिनकी छोटी गृहस्थियाँ है ओर स्वल्प अनुदान से जिनका निर्वाह हो सकता है। इस देव परिवार को केन्द्र की गतिविधियाँ में हाथ बटाने से लेकर विश्वव्यापी आलोक वितरण की योजनाओं की आग्रगामी बनाने के लिए कार्यक्षेत्र में जाने तक के अनेकानेक कार्य भार सौपे जाएँगे।
कुछ मिला कर हरिद्वार केन्द्र से युग सन्धि का प्रेरणा वितरण और मथुरा द्वारा उसका क्रियान्वयन ऐसा कदम है जिसमें नवयुग के अवतरण को विशेष बल मिलेगा। समय की विषमता को देखते हुए इससे कम तत्परता से काम चलने वाला भी नहीं था। जो आवश्यक है उसे समय पर करना ही उचित था। इस औचित्य को अपनाने के लिए जो प्रेरणा वसन्त पर्व पर उतरी है उसे तत्काल क्रियान्वित करने में तनिक भी प्रमाद नहीं बरता गया है।
शान्ति कुँज से उठने वाले इन अति महत्व पूर्ण कदमों के साथ-साथ समूचे देव परिवार को अपने चिन्तन और प्रयास में उस तत्परता का समावेश करना है-जो युग सन्धि के ऐतिहासिक अवसर पर युग प्रहरियों द्वारा अपनाई ही जानी चाहिए। यह समय न आलस्य का है न प्रमोद का। न ललक लिप्स में फँसे रहने का है न लोभ मोह के बन्धनों में जकड़े रहने का। वासना और तृष्णा किसी कृमि कीटक की योनि में भी पूरा करनेका अवसर रहता है। पेट ओर प्रजनन के लिए मरने खपने से कभी कोई रोक-टोक नही। युग सन्धि जैसे अवसर हजारो लाखो वर्ष बाद आते है। ऐसे अवसरों पर ही देवी नियन्त्रण मिलते है। जो उन्हे अनसुना करते है उनकी चतुरता बस्तुतः बहुत मँहगी पड़ती है। जो समय को पहचानने और अवसर न चूकने की तत्परता दिखाते है। वस्तुतः वे दूरदर्शी ही बुद्धिमान सावित होते है। लाभ और श्रेय कमाने की दृष्टि से सौभाग्यशाली वे ही बनते है।
जागरुक प्राणवानों को युग सन्धि के दिनों समय दान के लिए अदृश्य का आमन्त्रण उतरा हैं जिन्हे वह रुचे वे भविष्य में यह सुविधा होने पर यह करेंगे जैसे अपने सँजोना बन्द कर दे और यह देखे कि वर्तमान परिस्थितियों में वे अपने समय का कितना अंश नव सृजन के निर्मित लगा सकने में समर्थ हो सकते है। उसके लिए पुराने ढर्रे, पुराने अभ्यास ओर पुराने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने की आवश्यकता पड़ेगी। जिस ढंग से सोचने की और करने की आदत है उसके रहते कुछ बन नहीं पडेगा। बनेगा तब जब नया दृष्टिकोण अपनाया और नया निर्धारण किया जाय। जो ऐसा कर सकेंगे व देखेंगे कि ढर्रे में थोडी उलट-पुलट करते ही ढेरो समय ऐसा निकल पड़ा जिसे युग देवता के आमन्त्रण को स्वीकार करने और अनुदान का उत्साहवर्धक श्रद्धा´जलि प्रस्तुत करने की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माना जा सके। आये दिन अप्रत्याशित मुसीबते एवं आवश्यकताएँ सामान्य जन जीवन में आती रहती है और उनके निर्मित अपने वर्तमान ढरे में से ही समय किल आता हैं महत्व समझा जा सके तो कोई कारण नहीं कि युग की पुकार पर कुछ समय देने का अवसर ही न मिल सके। उदासी और उपेक्षा ही बाधक रही है। युगधर्म की अवमानना ही व्यस्तता का बहाना औढती रहती है। अन्तस् में परिवर्तन आसके तो उभरने वाला उल्लसा हर स्थिति के भावनाशील शक्ति को इतना अवसर प्रदान कर सकता है कि उतने में किया गया पुरुषार्थ चमत्कार प्रस्तुत कर सके।
यह पूछने की आवश्यकता नहीं कि समयदान का क्या करना है ? करने के लिए हर क्षेत्र में हर दिशा में पहाड़ जितने काम करने को पड़े है। युग को बदलना तभी सम्भव है जब उसका स्थान ्रहण करने को नया तत्पर हो। यो हटेगा उसका स्थान ग्रहण करने वाला चाहिए। इस अभाव की पूर्ति हुए बिना ही सभी क्रान्तियाँ निष्फल होती है। अवाँछनीय तो तोड़-फोड आवश्कय तो है पर पर्याप्त नही। ध्वंस की सार्थकता तब है जब रिक्ता को सृजन भर सके। ताजा उदाहरण अपने देश में सरकारे उलटने की दो पटको को बारीकी से देखने पर मिल सकता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त आई शिथिलता को भी इस तथ्य का उदाहरण माना जा सकता है। सृजन बलिष्ठ न होगा तो ध्वंस की तोड-फोड में वह काना कुण्डा भी हाथ से चला जायेगा जिसके सहारे कुछ तो काम चल रहा था असजकता, वयवस्था और अस्तव्यस्तता में तो हानि ही हानि है।
शुभारम्भ कहाँ से किया जाय ? इसका प्रथम चरण स्पष्ट है देव परिवार के सभी परिजन गायत्री शक्ति पीठो के केन्द्र को आधार मान कर अपने-अपने क्षेत्रों में संगठित हो और मिल जुल कर काम करे। इस वर्ष निर्माण कथा संगठन के यह दोनों कार्य पूरे होने चाहिए। शक्ति पीठ अपने काय्र क्षेत्र बनाले ओर समयदाीन अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के सर्म्वधन का प्रयास करे। जो घर से बाहर नहीं जा सकते वे अपना समय स्थानीय सर्म्पक परिधि को साथ लेकर कार्य आरम्भ करे। जो घर से बाहर जा सकते है। वे परिवारजको की तरह नव युग का अलख जगाने और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण करने को साथ लेकर परिभ्र्रमण करे। फरिवारिक उत्तदायित्व से निवृत्त लोगों से बार-बार कहा गया है कि वे घ्ज्ञर से बाहर चले और विश्व परिवार में अपनी आत्मीयता का विस्तार करे। ऐसे लोग शान्ति कु´ज अथवा शक्तिपीठों में रहकर उपासना, स्वाध्ययाय, संयम, सेवा की चतुविधि श्रेय साधना में संलग्न रह सकते है।
तात्कालिक काय क्रम तो सभी को यह सौपा गया है कि अपने क्षेत्रों के शक्तिपीठो तथा उद्घाटन समारोहो को सफल बनाने का प्रयत्न करे। झोला पुस्तकालय और चल पुस्तकालय बने, बढ़े और चले यह विचार क्रान्ति को सफल बनाने की कारगर भूमिका निवाहें यह आवश्कय है, जन्म दिनों, संस्कारो के माध्यम से परिबार निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बन सकता है। और महिला संगठन इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते है।
यह तथ्य हजर बार समझा और अपनाया जाना चाहिए कि हम सब मिल जुलकर ही महान तथ्य की पूर्ति कर सकने में समर्थ हो सकते है डेढ ईंट की मसजिद ढाई चावल की खिचडी पकाने की महत्वाकाँक्षा सजोने और अलग करने और अलग श्रेय पाने की ललक अपनाने की क्षुद्रता किसी को भी नहीं अपनानी चाहिए। नदियों के समन्वय से समुद्र बना है और उसी विशालता के सहारे वर्षा का उपक्रम एवं वनस्पति का उत्पादन बना हैं देव परिजनों को व्यक्तिगत महत्वकाँ से बचने की दूरदर्शिता अपनानी चाहिए और अनुशासित सैन्य दल की तरह सृजन प्रयोजनों में जुटना चाहिए। स्त्रोत के साथ जुड़ा रहने पर ही प्रवाह में ताजगी रहेगी। युग निर्माण के प्रस्तुत केन्द्र सूत्रों के साथ जितनी सघनता जुडेगी उतना ही अधिक ठोस एवं प्रभावी प्रतिफल उत्पन्न होगा। यह तयि गम्भीरता पूर्वक समझा और अपनाया भी जाना चाहिए। इसी में प्रयास की सफलता ओर सार्थकता सन्निहित है बिखराव में किसी के भी पल्ले कुछ नहीं पडेगा।
(माया वर्मा)
हो न निराश कभी, हमारी इच्छा-शक्ति प्रबल होहो शरीर बल चाहे कम, पर सुदृढ़ भावना-बल हो।
पूरे करे सदा हम अपने ऊँचे-नेक इरादे। चाहे घन घिर आये, अम्बर बड़ी मुसीबत ढा दे॥
ऊँचा रहे हौसला, साहस कभी न चुकने पाये। अपने प्रबल मनोबल का सिर कभी न झुकने पाये॥
अपने पास हरेक समस्या का सुनियोजित हल हो। हो शरीर बल चाहे कम, पर सुदृढ़ भावना-बल हो॥
बढे भावना का बल अपना, देवी गुण हम धारें। मूल्य दिव्यता का समझे, उस पर भौतिक बल वारे॥
सद्भावना बढाने में उत्साह सहित जुट जायें। र्स्वग कही भी हो उसको उर में उतार हम लाये।
द्वेष, दम्भी की गन्ध न आये, अपना मन निरछल हो। हो शरीर बल चाहे कम पर सुदृढ भावना बल हो॥
करुणा, ममता को विकसाकर कोमल हृदय बनाये। सेवा करे दीन-हीनों की, स्नेह-दया अपनायें॥
त्याग हमारा धर्म बने, कर्त्तव्य हृदय की शोभा। प्यार भरा हो इतना, उसकी मुख पर छाये आभा॥
सम्वेदन इतना-कि समूचा जीवन ही उज्जवल हो। हो न निराशा कभी, हमारी इच्छा शक्ति प्रबल हो। हो शरीर बल चाहे कम पर सुदृढ भावना बल हो॥
*समाप्त*