अक्लमन्दी नहीं बुद्धिमत्ता अपनाये।

मस्तिष्कीय तीक्ष्णता और बुद्धिमत्ता में भौतिक अन्तर है। मस्तिष्क रासायनिक पदार्थों की संरचना है। उसकी ललक अपने सजातीय पदार्थो का अधिकाधिक उपभोग करने की आतुरता के साथ जुडी रहती है। अस्तु मन इतना ही चाहता और सोचता है कि रुचिकर लगने वाले पदार्थों और प्रयि लगने वाले व्यक्तियों की अनुकूलता एवं बहुलता बनी रहे। चिन्तन और कर्म को इसी प्रयोजन में लगाये रहना ही ‘अक्लमन्दी’ की सीमा है। चतुरता यही सिखाती है। वह अपने खेत्र में जब उच्छृंखल होने लगती है तो कृपणता, धूर्तता और दृष्टता के रुप में बढ़ती और ऐसे अनाचारी कृत्य करती है, जिससे कर्त्ता को पतन, तिरस्कार, प्रतिशोध एवं प्रताड़ना का भाजन बनना पड़ता है। उपलब्धियों की मात्रा तो चतुरता के सहारे बढ़ जाती है, पर वह विग्रह और संकट ही खडे़ करती है।

वृद्धि मानवी काया में आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी विशेषता है तथ्य खोजने और परिणाम सोच करने की क्षमता। विवेकशाीलता और दूरदर्शिता इन्हीं सत्यप्रत्तियों का नाम है। भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान का निर्धारण करने की क्षमता के रहते मन को अचिन्त्यचिन्तन तथा शरीर को अनय आचरण करने की छूट नहीं मिल सकती। बुद्धिमान भविष्य का निर्माण करते है और उसके लिए मन की ललक लिप्सा पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ भी रहते है और सफल भी होते है।

अक्लमन्दी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। ऐसा परामर्श और सहयोग देने वालों की कमी नहीं। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गत में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव-बन्धन है। इस नाश पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बु़िद्धमत्ता में ही है। बुद्धिमता अर्थात विवेकशीलता, दूरदर्शिता। इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।


दो पुण्य प्रयास जो इन्हीं दिनों करने हैं।

युग सन्धि की इस अति महत्वपूर्ण बेला में जागृत आत्माओं के कन्धों पर कुछ विशेष कर्तव्य और उत्तरदायित्व आयें है। इनकी पूर्ति में उन्हें बिना असमंजस और प्रमाद अपनाये तत्परतापूर्वक लगना चाहिये। यह तथ्य गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिये कि युग समस्याओं एवं प्रत्यक्ष विभषिकाओं के मूल में आस्था संकट ही प्रमुख कारण है। सुधार समाधान के लिये किये जाने वाले भौतिक प्रयत्नों से सहयोग देने के अतिरिक्त सूक्ष्मदर्शियों को अदृश्य के अनुकूलन, जन-मानस के परिष्कार एवं प्रज्ञा विस्तार के लिये विशेष रुप से प्रयत्न करना चाहिये। इन क्षेत्रों में इन दिनों प्रयत्नशीलता नहीं के बराबर है जबकि वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुए इन्हीं प्रयत्नों पर अधिकाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इस उपेक्षित किनतु सर्वोपरि महत्व के कार्यक्षेत्र को अध्यात्म अभिरुचि के लोग सम्भालें, यही उपयुक्त है। युग परिवर्तन के इस विशिष्ट अवसर पर गायत्री परिवार के परिजन युग पुरश्चरण आरम्भ कर रहे हैं। जिसमें हर दिन 240 करोड़ गायत्री जब नैष्टिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा। यह सकल्प प्रस्तुत गायत्री जयन्ती 13 जनू 90 से आरम्भ होकर आगामी बोस वर्ष तक चलेगा। युग सन्धि की यही मध्य बेला है।

नैष्ठिक उपासकों को पाँच नियम पालन करने होते हैं (1) न्यूनतम पाँच माला गायत्री जप, शक्ति संचार साधना सहित। (2) गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घन्टे का मौन। (3) महीने में एक बार अग्नि-होत्र। (4) आश्विन, चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान (5) दस अन्य व्यक्तियों को साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।

गायत्री महामन्त्र में सन्निहित ऋतम्भरा प्रज्ञा का आलोक ही नवयुग का आधार भूत कारण बनेगा। नवयुग के समस्त सूत्र संकेत एवं सन्देश महाप्रज्ञा में बीज में रुप में विद्यमान हैं। इस आलोक को जन-जन तक पहुँचाने के लिये इन दिनाँक बडे़ गायत्री शक्ति पीठों मझालें प्रज्ञा पीठों और छोटे प्रज्ञा मन्दिरों का निर्माण हो रहा है। इनमें से प्रज्ञा मन्दिर सबसे सस्ता और हर गाँव में अति सरलतापूर्वक बन जाने योग्य है। प्रयत्न यह होना चाहिये कि यह छोटे देवालय हर गाँव में बन सकें और उनके माध्यम से युगान्तरीय चेतना का आलोक जन-जन के अन्तराल तक पहुँचाया जा सकना सम्भव हो सके।

युग संन्धि के इस प्रथम वर्ष में प्राणवान अग्रदूतों से अनुरोध है कि वे यह अंक पढ़ने के दिन से लेकर गायत्री जयन्ती तक का समय निजी कामों से अवकाश लेकर अपने परिचित क्षेत्र में जन-सर्म्पक के लिये निकलें। मिशन से परिचितों के और साधना में श्रद्धा रखने वालों के सर्वप्रथम दरवाजा खट-खटाएँ। नैष्ठिक उपासना की आवश्यक जानिकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगालें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अनतरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रुप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्दों की स्थापना केलिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं में इन्ही दिनों अनेकों प्रज्ञामन्दिर बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पडे़गा। सभी जागृत आत्माओं से गायत्री जयन्ती तक की अवधि इस प्रयोजन के लिय समयदान करने के लिए इन पक्तियों द्वारा विशेष अनुरोध किया जा रहा हैं।


आवश्यक अनुरोध

डाक विभाग की अनियमित वितरण व्यवस्था के कारण गत कई उपासों से अखण्ड ज्योति अत्यधिक विलम्ब से पहुँच रही है। अप्रैल की पत्रिका 2-3 अप्रैल को डाक घर से रवाना कर दी गई थी फिर भी अनेक स्थानों पर अप्रैल के अन्त तक नहीं पहुँची। बहुत-सी मार्ग में भी खो गई। इस अव्यवस्था से पाठकों को बड़ी असुविधा हो रही है- इसके लिए डाक अधिकारियों से हम बराबर वितरण व्यवस्था ठीक करने का अनुरोध कर रहे हैं।

इस सम्बन्ध में उच्च अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है हम भी यहा से प्रयास कर रहे है। इस मास से पत्रिका भेजने की तारीख की मुहर पत्रिका के रैपर पर लगी रहेगी जिससे यहाँ की प्रेषण तिथि की निश्चितता हो सके। पाठकों से अनुरोध है यदि पत्रिका यहाँ से भेजने की तिथि के एक सप्ताह बाद पहुँचे (यद्यपि डाक तीन दिन के अन्दर बँट जाने का प्रावधान है) तो कृपया निम्न विवरण के साथ पोस्ट मास्टर जनरल उ.प्र. लखनऊ को मूल रैपर भेजने हुए-विलम्ब की जाँज का अनुरोध करें। चूँकि पत्रिकाएँ मार्ग में रुकती है। अतः स्थानीय डाक अधीक्षकों के नियन्त्रण क्षेत्र में नहीं आती।

प्रेषक- अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा।

प्रेषक- डाकघर गायत्री तपोसूपि मथुरा डाकघर

प्रेषक तिथि

प्राप्ति का डाकघर

प्राप्ति की तारीख

रजिर्स्टड बण्डल की स्थिति में रजिस्ट्री संख्या-

प्रतियाँ की संख्या के साथ ही शिकायत की एक प्रति निम्न पते पर भी प्रेषित करें

महानिर्देशक डाक तार नई दिल्ली।

जो प्रतियाँ न पहुँचे उनके सम्बन्ध में भी उक्त पतों पर पत्र व्यवहार किया जाये।

उक्त पतों पर जो भी शिकायतें भेजी जाये वे अपने डाक घर को हाथों हाथ दी जाय उन पर किसी प्रकार का डाक व्यय देय न होगा। शिकायत देने की रसीद सम्बन्धित डाक घर से प्राप्त कर ली जाये इस सम्बन्ध में डाकघर गाईड भाग-1, धारा-76 में स्पष्ट निर्देश है।

96. जनता की शिकायतों का पारेषण

सेवा के खिलाफ डाकघर के किसी अधिकारी की भेजी गई वास्तविक शिकायतें जिनमें पहली शिकायतों के अनुस्मारक भी शामिल है, यदि किसी डाकघर या तार घर पर खुले रुप मै यह किसी खुले लिफाफे में दी गई हो तो परिषण के लिए निःशुल्क स्वीकार की जायेगी।

जो भी पत्र-व्यवहार करें उसकी एक प्रति अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पतें पर भी भेजने का अनुग्रह करें।


धर्म, विज्ञान और दर्शन का समन्वय

दर्शन का लक्ष्य है परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करना धर्म का उद्देश्य है-आध्यात्मिक मूल्यों को भावनात्मक ढंग से स्वीकार करना। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि दर्शन विचारात्मक प्रसाय है, जबकि धर्म व्यावहारिक। दर्शन सन्देह, तर्क, प्रमाण के समस्त उपादानों के सहारे सत्य को तौलना चाहता है जबकि धर्म आस्था, विश्वास, श्रद्धा तथा भक्ति द्वारा ह्नदय को स्नेह से अभिसिंचित करना चाहता है। धर्म तर्क से परे जाना चाहता है। जबकि दर्शन में तर्क की पूरी गुन्जाइश है। धर्म भावना से परिपुष्टि होता है जबकि दर्शन विचारों से। वस्तुतः दोनों एक दूसरे के पूरक है। धर्म को दर्शन की आवश्यकता इसलिए है कि भावना प्रवाह में अन्धविश्वास असत्य वातों का समावेश होना सम्भव है। उनका निराकरण दर्शन की विचारणा द्वारा ही हो सकता है। दर्शन को धर्म की आवश्यकता इसलिए है। कि वैचारिक उड़ान जब तक जीवन का अंग नहीं बन जाती तब तक वह उपयोगी नहीं हो सकती। दोनों के सम्मिलन से ही अध्यात्मक का समग्र स्वरुप बनता परिपुष्ट होता है।

मानव बुद्धि सीमित होते हुए भी विराट् को विराट्त्त बता सकने में सक्षम है। विराट्ता का प्रतिपादन भी तो बुद्धि विराट् का अनुभव करती है। अगली भूमिका भावनाओं की होती है। वह उस अनन्त सत्ता से सर्म्पक जोड़ती है। दर्शन की-विचारों की उपयोगिता यहाँ मात्र इतनी है। कि कहीं भावनाएँ तुच्छ को ही तो महान् विराट् नहीं समझ बैठी है। सीमित-असीम का भेद वृद्धि ही कर पाती है। ईश्वर ने बुद्धि का वरदान भी मनुष्य को इसीलिए दिया है, जिससे वह सत्यासत्य का निर्धारण कर सके। पक्षी अनन्त आकाश में उड़ते हैं अनन्नता की अनुभूति उन्हें उड़ने के पश्चात ही होती है। बिना प्रयास के अनन्त मान लेने बात अनुभूति नहीं भावकुता होगी। सच तो यह है कि गहन अनुभूतिया गहरे ज्ञान के पश्चात ही होती तथा टिकाऊ रहती है।उसके बिना धर्म के स्वस्थ्य स्वरुप का दिर्ग्दशन कर सकना असम्भव है। दर्शन बौद्धिक स्तर पर किया गया वह प्रया है जो अनुभूति की पृष्ठभूति बनाता है इसकी गहराई में पहुँचने वाला व्यक्ति ही सच्चा धार्मिक हो सकता है। दर्शन धर्म को माँजता, संवारता तथा उसमें उग रहे झाड़-झकाडों को काटता छाँटता है।

धर्म के सिद्धान्तों, मान्यताओं में जहाँ पूरे विश्व में विषमतायें दिखायी पड़ती है। वहीं विज्ञान के सिद्धान्तों में सार्वभौमिकता देखने को मिलती है। वैज्ञानिक चाहे एशिया के हों अथवा यूरोप के, सबसे विचारों में एक रुपता है। उनके फार्मूलें एक है, उनकी भाषा एक है, सिद्धान्त एक है। उनमें आपसी सहयोग भी है। यही कारण है कि विज्ञान का इतना विकास सम्भव हो सका जबकि चारों और धर्मो में विषमताएँ दिखायी पड़ती हैं।

धर्म को यदि अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है तो उसे अपना स्वरुप ऐसा रखना होगा जो तर्क संगत, प्रामाणिक एवं उपयोगी हो। यह तथ्य धर्म की मूल सत्ता में आरम्भ से ही मौजूद है। दुराग्रहों ने उन्हें कुँठित किया था। तथ्य और सत्य जो जानना विज्ञान और दर्शन का उद्देश्य रहा है। फलतः वे फले-फूले और विश्व भर में अपनी एक रुपता बनाये रहे। धर्म को भी प्रगतिशील होना होगा इसके लिए एक ही उपाय है विज्ञान और दर्शन के सहारे अपने शाश्वत एवं उपयोगी स्वरुप का अभिनव प्रस्तुतीकरण।


पदार्थ और प्राणियों की सामर्थ्य का उद्गम

पृथ्वी क्या है? इसका उत्तर रसायन शास्त्री उसका रासयनिक विश्लेषण करके इतना ही कह सकते है कि यह विभिन्न पदार्थ घटकों एवं तत्वों का समुच्चय मात्र है। बढे़ ढेले कीतरह वह भी इस विशाल ब्रह्माण्ड की एक नन्ही सी इकाई भर वन कर अपना गुजारा कर रही है।

जीव विज्ञानी के लिए पृथ्वी की स्थिति अधिक जटिल और रहस्यपूर्ण है। पदार्थ और चेतन के समन्वय से बने हुए प्राणी दृष्टिगोचर तो असख्यों होते हैं, पर यह विदित नहीं होता कि जीवन का उद्गम स्त्रोत क्या है ? धरती पर भरा हुआ पदार्थ जिन घटकों से बना है, उनमें हलचल भर ले। उनमें जीवन का कोई लक्षण नहीं है। फिर यह जीवन है क्या ? आता कहाँ से हैं ? पदार्थों के साथ क्यों जुड़ता बिछुड़ता है ? प्राणियों की सत्ता पदार्थ मूलक है या चेतना मूलक है ? आदि प्रश्नों की एक सुविस्तृत श्रंखला ऐसी है। जिसके सम्बन्ध में रिचकाल से दार्शनिक एवं वैज्ञानिक माथा-पच्ची करते रहे हैं, किन्तु अभी तक किसी निर्विवाद तथ्य तक पहुँच सकना सम्भव नहीं हुआ है।

विज्ञानिकों का कहना है कि पदार्थ ही अमुक परिस्थितियों में जीवन के रुप में विकसित हो जाता है। किन्तु प्रयोगों से अभी तक इस मत की पुष्टि नहीं हुई विशुद्ध पदार्थ से किसी प्राणी का सृजन सम्भव नहीं हो सका। चेतना का जहाँ पहले से ही अस्तित्व मौजूद है उसी को घटा-बढ़ाकर रुपान्तरण समभव हो सका है। नये सिरे से एक भी जीवाणु की संरचना सम्भव नहीं हो सकी। प्रयोग क्षेत्र की इस निराशा से इस निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है। कि चेतना एक स्वतन्त्र सत्ता हैं। पदार्थ उसका उपकरण है उद्गम नहीं।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीवन यदि स्वतन्त्र है तो उसका धरती पर अस्तित्व किस रुप में है ध्यात्म दर्शन के समाधान अलग है। पदार्थ विज्ञानी किसी प्रत्यक्ष तथ्य के बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकते। उनका अनुमान है कि जीवन धर्य का अनुदान है। जो पृथ्वी को अनुग्रहपूर्वक उपलब्ध हुआ है।

जीवन है क्या? इसके उत्तर में तत्व-दर्शन और विज्ञान एक प्रकार से सहमत जैसे दिखते है कि जीवन एक प्रकार का विशिष्ट विद्युत प्रवाह है जिसमें जड़ और चेतन की दोनों विशेषताएँ विद्यमान है। इसकी परिकल्पना विचारशील चुम्बकत्व के रुप में की गई है। अध्यात्म भाषा में इसी को प्राण कहा जाता रहा है। प्राण का चेतन पक्ष पदार्थ को अपने चुम्बकत्व से प्रभावित करता है, उस पर अधिकार जमाता और उपयोग करता है। इतने पर भी उसकी निजी सत्ता मौलिक एवं स्वतन्त्र है। वह पदार्थ के वशवर्ती नहीं है।

प्राण की विवेचना दार्शनिकों नपे परब्रह्म की शक्ति प्रवाह के रुप में लगभव वैसी ही की है जैसी कि विज्ञानी पदार्थ की मूल-सत्ता परमाणुओं के रुप में नहीं तरंगों एवं कम्पनों के रुप में मानते हैं किन्तु विज्ञानी प्रमाण उनका प्रत्यक्षवाद अब तक इतना ही जान सका है कि जीवन सूर्य से उतरता है और वह पदार्थ को चुम्बकत्व के रुप में और जीवनधारियों को संकल्प के रुप में उपलब्ध होता है। पदार्थो में हलचल और प्राणियों में संकल्प की गतिविधियाँ अलग-अलग हैं फिर भी उनके मध्य बहुत कुछ प्रवाह साम्य देखा जा सकता हैं।

जहाँ तक चुम्बकत्व का सम्बन्ध है उसे कई दृष्टियों से पदार्थ जगत पर छाया हुआ विशिष्ट अनुशासन कह सकते हैं। धरती की भीतरी और बाहरी गतिविधियाँ उसी पर निर्भर है। अपनी धुरी पर घूमता-कक्षा में परिभ्रमण करना-अनायास ही नहीं होता रहता। इसमें उसका वह चुम्बकत्व ही कारण है जो भीतर से गति उभारता है और उसे अग्रगामी रहने के लिए आगे धकेलता है। पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा और उसके परमाणुओं की अन्तःसंरचना में उसी स्तर की भ्रमण चर्या का चलना यह बताता है। कि यह उसी चुम्बकत्व की करतूत है। पृथ्वी के शक्ति प्रवाहों का पर्यवेक्षण करने पर जाना जाता है कि पृथ्वी एक विशाल चुम्बक है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव उसके मध्य केन्द्र हैं। यह चुम्बक ऊपरी परत पर ही छाया हुआ नहीं है वरन् उसके अन्तराल में भी भरा पड़ा है और जब भी उसे अवसर मिलता है ऊपर आकर अपने अस्तित्व का परिचय देता है।

पिछले दिनों जो ज्वालामुखी पृथ्वी पर फूटे हैं और उनके लावे में लोहे के कण बहकर जम गये हैं। उनमें चुम्बक के वह गुण विद्यमान हैं जिनसें पृथ्वी के 60000000 वर्षों तक के चुम्बकीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मारशैक अलेक्जैंडर ने अपनी पुस्तक में लिखा है- भूतत्व वेत्ता जितना अधिक ज्ञात करते जाते हैं उनका यह विश्वास उतना ही पृष्ट होता जाता है कि पृथ्वी के अनेक रहस्यों का उत्तर चुम्बकत्व में निहित प्रतीत होता है।

काफी समय तक वैज्ञानिकों की यह धारणा रही है कि चुम्बत्व का केन्द्र उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव है किन्तु पिछली शताब्दियों में जिन दिनों नौ सेना का तेजी से विकास हुआ समुद्रों में तैरने वाले जहाजों ने पाया कि पृथ्वी के विषुवत वृत्तीय क्षेत्र में जाने पर दिक्सूचक (कम्पास) की सुई बिलकुल सीधी सिर के बल खड़ी हो जाती है। इस तथ्य की खोज ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी स्वयं में एक चुम्बक है। उसके गर्भ में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती हुई एक ऐसी चुम्बक धारा प्रवाहित होती रहती है। जिस तरह मनुष्य शरीर में उत्तरी धु्रव मस्तिष्क और दक्षिणी ध्रुव मूलाधार को सुषुम्ता शीर्षक का विद्युत चुम्बकीय जीवन प्रवाह।

पिछलें दिनों जब-जब पृथ्वी पर भयंकर चक्रवात या तूफान उमडे़ यह पाया गया कि उस समय पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हुआ। उस स्थिति में न केवल मनुष्य अपितु जीव जन्तु तक बुरी तरह प्रवाहित होते हैं। भूकम्पों की सबसे अधिक अच्छी भविष्य वाणी उस क्षेत्र के पक्षियों तथा जीव-जन्तुओं की हलचलों से मिलता है। भूकम्प आने से पूर्व पक्षियों यहाँ तक कि सर्प जीवों का पलायन इस बात की पुष्टि करता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की सूक्ष्म हलचलें, जीवों के उस चुम्बकीय क्षेत्र को जिससे चिन्तन प्रादुर्भूत होता है प्रभावित करती है। अतएव पृथ्वी में व्याप्त चुम्बकत्व से जैव चुम्बकत्व में कोई न कोई साम्य अवश्य होना चाहिये।

इस दिशा में भूगर्भ शास्त्री गिर्ल्वट और मैक्सबेल के प्रयोगों का जिक्र करते हुये डाँ. अलेक्जैंडर मारशैक ने अपनी पुस्तक”पृथ्वी ओर अन्तरिक्ष” के पृष्ठ 121 में यह स्वीकार किया है। कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर नित्य सूर्य के किसी अज्ञात विकिरण का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव जिस क्रम में घटता बढ़ता है उसी क्रम में पृथ्वी के जीवन में भी हल्के-भारी परिवर्तन होते हैं अतएव कहना न होगा कि प्रत्यक्षतः मनुष्य की, जीवधारियों की अन्तचेतना को भी सूर्य ही प्रभावित करता है।

सूर्य के सीधे अनुदान भी पृथ्वी को कम नहीं मिलते, पर उससे भी बड़ी उपलब्धि ब्रह्माण्ड किरणों की है। यह ब्रह्माण्ड किरणें यों अर्न्तगही मानी जाती हैं फिर भी उनका अनुदान पृथ्वी को सूर्य के माध्यम से ही मिलता है। बिजली उत्पादन केन्द्र से ट्रान्सफारमर और मीटरों में होती हुई चलने वाले उपकरणों तक पहुँचती हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्डीय किरणें भी सीधी समस्त पृथ्वी पर अनियन्त्रित रुप से बरस कर महाविनाश का खतरा उत्पन्न नहीं करतीं वरन् क्रमिक गति से भूलोक पर अवतरित होती है। यह अवतरण सर्वप्रथम ध्रुव क्षेत्र में होता है और फिर वहाँ से आवश्यकतानुसार प्राणियों और पदार्थों के लिए वितरित होता रहता है।

उत्तरी धु्रव पर दृष्टिगोचर होने वाले मेरु प्रकाश को सूर्य का प्राण, अनुदान एवं ब्रह्माण्डीय किरणों के उपयोगी अवतरण का प्रतीक प्रतिनिधि कह सकते हैं। ब्रह्माण्ड किरणों और सूर्य अनुदानों का विशिष्ट पर्यवेक्षण करने पर पृथकता रहते हुए उनके भीतर अद्भूत साम्य पाया गया है। इससे प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्डीय किरणें धरती से सर्म्पक साधने से पूर्व सूर्य से सरोवर में स्नान कर लेती हैं और उसके रंग में रंगी हुई साड़ी पहन कर इस लोक में प्रवेश करती हैं। यदि वे निर्वस्त्र होकर बरसने लगे तो उस गुगुप्सा को सहन करना ही कठिन हो जाय।

मेरु प्रकाश ध्रुवों पर सर्वाधिक रहता है पूर्वी ग्रीनलैण्ड का वह भाग जहाँ एस्किमों लोग रहते हैं वहाँ का आकाश ही पृथ्वी के सामान्य आकाश से सर्वथा भिन्न है। वहाँ जाडे़ के दिनों में प्रायः प्रतिदिन आकाश में रंग-बिरंगे दीप्तिवलियाँ देखते ही बनती है। दर्शक इस तरह आत्म विभोर हो उठते हैं मानो वह कोई स्वप्नों का र्स्वग हो। ऐसे मेरु प्रकाश भूमध्य सागर में भी जब-तब अनायास देखने को मिल जाते हैं अलास्का उत्तर कनाडा एन्टार्कटिका उत्तरी साईबेरिया तथा नार्वे में भी यदा-कदा देखने को मिलते हैं। वह दृश्य कितना विलक्षण होता है उसका वर्णन करते हुए- रोमन इतिहास कार लिवों ने लिखा है-इस क्षण आकाश एकाएक करोड़ों अदृश्य अग्नि शिखाओं से दमकने लगा-लोग भयभीत हो उठे और आँख मूँदकर ईश्वर का भजन करने लगे। रोमन सम्राट ने तो यह समझा कि शहर में आग लग गई हैं अतएव उसने अति शीघ्र अग्नि शामक दस्ते भेज दिये। यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने इस मेरु प्रकाश को देखकर लिखा था-आकाश में विलक्षण आकृतियाँ खाइयाँ और भीषण अन्तराल लाल लाल रंग की दूर तक फैली चादर किसी इन्द्रजाल से कम नहीं लगता थी।

मेरु प्रकाश का जब-जब सर्म्पक स्थापित हुआ ऐसी मनोरम ध्वनियाँ सुनाई दी जो अद्भूत थी। उन्हें नक्षत्रों की ध्वनियाँ मना गया है, पर उनका अध्ययन सौर सक्रियसता में ही अब तक सम्भव हो पाया है।

इस मेरु प्रकाश की संरचना के मूल में भी सूर्य ही है जिसके लिये सूर्य-संक्रान्ति काल को अध्ययन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया है।

मेरु प्रकाश अनेक प्रकार के होते है, प्रकाश की उद्दीप्ति, ज्वाला किरणों की चाप तथा पहियों जैसा कुछ अद्दंश्य कुछ दृश्य और कहीं-कहीं उभयनिष्ठ अर्थात् मरुस्थल की-सी बनती बिगड़ती झिलमिल। रंगे विलक्षण एकदम सफेद जैसे आतिशबाजी सुर्ख पीलापन लिये हरे-नीले, बैंगनी तथा भूरे रंग के भी। जिस समय यह अस्तित्व में आते हैं, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो उठता हैं। उस समय वायुयानों के दिक् सूचक यन्त्र काम करना बन्द कर देते है ऐसी उड़ान को “अन्धी उड़ान” की संज्ञा दी गई है वायुयान चालक उससे हमेशा सावधान रहते हैं।

वैज्ञानिकों ने व्याख्या की है कि यह अलौकिक संरचना सूर्च के अति सूक्ष्म उत्सर्जित कणों इलैक्ट्रान तथा प्रोटानों की गति में अनायास परिवर्तन का प्रतिफल है सामान्य अवस्था में यह कण 1000 मील प्रति घण्टे की चाल चल सकते हैं जबकि असामान्य अवस्था में उनकी गति सूर्य प्रकाश की गति अर्थात् 186000 मील प्रति सेकेण्ड की गति से होती है। पृथ्वी की ओर चलते हुए वे अपने चुम्बकीय गुणों के कारण ध्रुवों की ओर मुड़ते हैं यह सामान्य प्रकाश की दिशा में हस्तक्षेप होता है, इसी कारण इस तरह के दृश्य दिखाई देने लगते हैं।

सुर्य द्वारा पृथ्वी पर बरसने वाले अनुदान का दृश्य रुप ध्रुवों का मेरु-प्रकाश और अदृश्य रुप में बरसने वाले चुम्बकत्व हैं। यह विभिन्न किरणों के रुप में धरती पर आता है और पदार्थों को विद्युत एवं प्राणियों को संकल्प का अनुदान देता है। इन अनुदानों का एक उदाहरण पराबैंगनी किरणो का है। वे ही प्राणियों के निर्वाह के लिए आवश्यक रसायन विटामिन डी. का उत्पादन करतीं तथा हानिकारक उत्पादनों को निरस्त करने में लगी रहती हैं।

सूर्य के माध्यम से धरती को जो मिलता है भविष्य में मानवी प्रयत्नों से उसमें घट-बढ़ हो सकेगी, ऐसी मान्यता है। जहाँ तक प्राण-प्रवाह का सम्बन्ध है वहाँ तो और भी बड़ी सम्भावनायें एवं आशाएँ विद्यमान हैं ब्रह्माण्डीय किरणें धरती को सीमित मात्रा में सीमित गति से प्राप्त होती हैं, पर यदि सूर्य को अनुकूल बनाया जा सके तो उसकी शिफारिस से विश्व भण्डार से इतने बडे़ अनुदान मिल सकते हैं जिससे मनुष्य सृष्टा का युवराज न रहकर स्थानापत्र भी बन सकता है। सूर्य के प्रकाश को जितनी मात्रा पूरी करने में दो दिन लगते हैं उतनी यात्रा ब्रह्माण्डीय किरणें दस मिनट में पूरी कर सकती हैं। इनकी अनुमानित गति 286000ग्10000000000 (दस अरब) इलैक्ट्रान वाल्ट मील प्रति सेकेण्ड की है। इस गति से चल सकना यदि किसी के लिए सम्भव हो तो वह समय की गति का अवरोध समाप्त कर सकता है और भूतकाल की परिस्थितियों के-उस समय के प्राणियों के साथ रह सकने का आनन्द ले सकता है। ब्रह्माण्ड के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचने में उसे कुछ ही समय लगेगा। सूर्य अक्षाँश पर प्राय 27 दिन में एक बार इन किरणों को विशेष प्रभाव पड़ता है। उस दिन इस तारक को-पसीना छूटता और कँप कपी आती है।

पृथ्वी के अस्तित्व का विश्लेषण करते हुए इस निर्जीव ढेले में पाई जाने वाली अगणित विशिष्टताओं का प्रधान आधार सूर्य ही सिद्ध होता है। सूर्य ही निमित्त है। उसे भी उपलब्ध ऊर्जा ब्रह्माण्डीय किरणों से मिलाती है। इतना जानने के बाद अन्तिम निर्ष्कष तक पहुँचने का एक ही कदम शेष रह जाता है कि यह ब्रह्माण्डीय किरणें आखिर क्या हैं ? और कहाँ से आती है। इसका उत्तर देर-सवेर में यही स्वीकार करना है कि जिस प्रकार सूर्य की सप्त किरणें होती हैं और उसी प्रकार ब्रह्म की ऊर्जा तरंगे ब्रह्माण्डीय किरणों के रुप में न केवल धरती का-सूर्य का, वरन् समस्त ब्रह्माण्ड का अस्तित्व बनाये रहने एवं अग्रगामी बनने के लिए अनुग्रह पूर्वक अभीष्ट सामर्थ्य प्रदान करती है। प्राण उन्हीं से बरसता है स्वरुप ओर बल, ज्ञान और सम्वेदन उसी के अनुदान हैं।

पृथ्वी की सत्ता सूर्य का अनुदान, ब्रह्माण्डीय किरणों का वैभव समझ सकने वाले ब्रह्म सत्ता की महत्ता भी स्वीकार कर सकते हैं। शोध प्रयत्नों की सर्वोच्च स्थिति नहीं हो सकती है कि परब्रह्म से सम्बन्ध साधा जाय-उसका अनुग्रह पाया जाय और अपनी सत्ता को उसी महत्ता के अनुरुप बनाया जाय जैसी की उन क्षमताओं के महान भाण्डागार-परब्रह्म परमेश्वर की है।


Quotation

राजयोग के प्रति अमरीका में सर्वप्रथम उल्लेखनीय आकर्षण विवेकानन्द के कारण जागा। जून ......... में उन्होंने मिस एस. ई. वाल्डो को बोल-बोलकर राजयोग पर अपनी प्रसिद्ध टीका लिखाई। इसमें विलियम जेम्स प्रभृत अमरीकी शरीर शास्त्रियों का ध्यान आकृष्ट किया। टाल्स्टाय में भी तभी राजयोग के प्रति उत्साह जागा था। किन्तु ऐसा लगता है कि राजयोग के प्रति अमरीकी मुख्यतः उसके शारीरिक स्वरुप के कारण ही आकर्षित हुए। यही प्रवृत्ति अमरीकियों में हठयोग के प्रति प्रचण्ड आकर्षण जगाती है।

वस्तुतः अमरीकी लोग योग को भौतिक उपयोगिता की दृष्टि से ही तौलते हैं। वे उसे भौतिक सामर्थ्य बढ़ाने वाले एक साधन के रुप में ही देखते हैं। अमरीकी जनता आकार में दैत्य के समान और बुद्धि में बालक के समान है। वह केवल उसी सृझ में रुचि लेती है जिससे उसे कोई भौतिक लाभ मिल सके। वहाँ तत्वमीमाँसा और धर्म को बिगाडद्यकर झठ वैज्ञानिक प्रयोगों का रुप दे दिया जाता है जिसका वास्तविक उद्देश्य होता है, सत्ता की, धन की, बल की, संसार-सुख की सिद्धि। विवेकानन्द इस तथ्य को शीघ्र ही समझ गये, इसी से उन्होने वहाँ शीघ्र ही राजयोग पर व्याख्यान बन्द कर दिये और उनके व्याख्यानों का नया विषय ज्ञानयोग हो गया।

-रोम्याँ रोलाँ


लो! अब पदार्थ ही मर गया।

मनुष्य ने जबसे सोचना, समझना आरम्भ किया तथी से उसने अपने आसपास की चीजों को कौतूहल की दृष्टि से देखना और उनका रहस्य उघाड़ने का प्रयास शुरु किया। कौतूहल ओर रहस्य जानने की उत्कट लालसा तथा प्रयत्नों से ही ज्ञान विज्ञान का इतना विपुल और विस्तृत विकास सम्भव हुआ। कभी लगता है कि मनुष्य ने अमुक रहस्य या गुत्थी सुलझा ली लेकिन दूसरे ही क्षण पता चलता है कि सचाई कुछ और है तथा रहस्य अभी ज्यों का त्यों बना हुआ है। यही नहीं उसने रहस्य को जानने केलिए जो प्रयास किये, उन प्रयासों से जो तथ्य सामने आये उनमें और भी कई रहस्यपूर्ण गुत्थियाँ सामने आ गई। कुल मिलाकर यह कि दो हजार साल के ज्ञात-अज्ञात वैज्ञानिक अनुसंधानों, उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों और प्राप्त ज्ञान भण्डार के उपरान्त भी मनुष्य किसी क्षेत्र में यह दावा नहीं कर सकता कि उस क्षेत्र में उसने पूरी जानकारी प्राप्त कर ली है।

ज्ञान के विकास और रहस्यों को सुलझाने के इस दौर में कई बार ऐसा लगा कि अब सब कुछ जान लिया गया है और कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है। उदाहरण के लिए डारबिन ने जब विकासवाद के सिद्धान्तों को खोज निकाला और उसकी पुष्टि में अनेकों प्रामण खोज लिय गये तो समझा जाने लगा कि पृथ्वी पर जीवन का विकास कैसे सम्भव हुआ, यह पूरी तरह जान लिया गया है। लेकिन आगे चलकर यह पता चला कि यह खोज तो बहुत ही आधी अधूरी है। इसके न केवल अपवाद मिले वरन् ऐसे तथ्य भी मिले जिनसे विकासवाद के सिद्धान्त ही संशयास्पद बन गये। जाँन डारबिन ने परमाणु सिद्वान्त की व्याख्या की तो लगने लगा, पदार्थ की छोटी-से-छोटी इकाई के सम्बन्ध में जान लिया गया। लेकिन जल्दी ही यह धारणा निताँत भ्रम सिद्ध हो गई और परमाणु के सम्बन्ध में नये-नये तथ्य प्रकाश में आये। डौल्टन का परमाणु सिद्धान्त धराशायी हो गया और जहाँ यह मान लिया गया था कि परमाणु के सम्बन्ध में अब कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है, वचहीं अब यह माना जा रहा हैं। कि परमाणु के सम्बन्ध में एक प्रतिशत भी पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हुई हैं।

पिछले बीस-तीस वर्षों में इतनी अधिक वैज्ञानिक जानकारियाँ एकत्रित की गई है, जितनी अब तक कभी भी नहीं हुई। इन अनुसंधानों और जानकारियों के आधार पर गत दो तीन दर्शकों को वैज्ञानिक प्रगति का युग कहा जा सकता है। लेकिन आर्श्चय की बात यह है कि इन दो-तीन दशकों में विज्ञान अपने आपको जितना अपूर्ण और अधूरा अनुभव करने लगा है उतना पहले कभी नहीं था। वैज्ञानिकों की वर्तमान पीढ़ी निस्संकोच भाव से यह कह रही है कि हमने अब तक जितने रहस्य सुलझाये हैं, रहस्यों को सुलझाने की इस प्रक्रिया में उससे कहीं अधिक रहस्य पैदा हो गए हैं और कह नहीं सकते कि प्रकृति के ये रहस्य कभी सुलझ भी सकेंगे अथवा नहीं। रहस्यों के उलझते जाने की इस प्रक्रिया का मूल कारण चेतना के नियमों से अनभिज्ञता है। या यों कह सकते हैं कि चेतना के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि वह कब किस तरह का व्यवहार करेगी? इसलिए किसी व्यक्ति या चेतन प्राणी के सम्बन्ध में निश्चित रुप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

भीड़ या व्यक्तियों और वस्तुओं के समुदाय के बारे में तो फिर भी अनुमान लगाये जा सकते हैं और वे अनुमान करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष अथवा वस्तु विशेष के सम्बन्ध में अनुमान लगाना तो दूर रहा कल्पना तक नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास जैसे शहरों में प्रतिदिन दस-पाँच दुर्घटनाएँ होती है। 20-25 व्यक्ति इन दुर्घटनाओं में मर भी जाते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि एक वर्ष में तीन-चार हजार दुर्घटनाएँ होगी और पाँच-सात हजार व्यक्ति मरेगे। इस तरह के आँकडे इकठ्ठे किये भी जाते हैं उनकी घोषणा भी की जाती है कि इस वर्ष इतनी दुर्घटनाएँ घटने की सम्भावना है। ये आँकडे़ करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष या वाहन विशेष के सम्बन्ध में विचार किया जाय कि वह किसी दुर्घटना का शिकार होगा अथवा नहीं, तो इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन दुर्घटनाओं में से कौन-सी दुर्घटना किस व्यक्ति के साथ या किस वाहन की घटेगी।

विज्ञान जब तक अपना शोध अनुसंधान पदार्थ को जड़ मानकर करता रहा, तब तक वह दावे के साथ कहता रहा कि सचाई यह है। लेकिन पदार्थ का विश्लेषण करते-करते वैज्ञानिक अब वहाँ तक पहुँच गये हैं कि पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। अब पदार्थ बचा ही नहीं है। पदार्थ की परिभाषा यही की जाती है कि वह जड़ होता है, उसका आकार होता, बजन होता है निश्चित स्वरुप होता है। लेकिन पदार्थ का सूक्ष्मतम विश्लेषण करने के बाद यह परिभाषा ध्वस्त हो गई है। उदाहरण के लिए पदार्थ के सम्बन्ध् में निश्चित धारणा थी कि अमुक परिस्थितियों का पदार्थ पर अमुक तरह का प्रभाव पडे़गा और उस पर अमुक तरह की प्रतिक्रिया होगी। लेकिन अब इस सम्बन्ध में नये तथ्य सामने आये हैं और कहा जा रहा है कि सब कुछ अनिश्चित है।

पिछले दिनों कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) के क्षेत्र में हाइसन वर्ग के अनिश्चय सिद्धान्त की बड़ी चर्चा हुई। उनके अनुसार एक ही समय में एक साथ एक ही तरह के करण किस तरह का व्यवहार करेंगे। यह नहीं जाना जा सकता। कण विशेष की गति और परिस्थिति के सम्बन्ध में भी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है। केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है और अनुमान कोई सही निकले यह कोई जरुरी नहीं है। अनेक प्रयोग किए गये कि किन परिस्थितियों में कौन-से कण किस तरह का व्यवहार करते हैं? एक ही परिस्थिति में एक ही प्रक्रिया से एक ही तरह के कणों का हजारों बार अध्ययन किया गया। लेकिन यह जान कर हैरानी हुई कि प्रत्येक बार हर कण का व्यवहार अनुमान से भिन्न था। यही नहीं पिछली प्रतिक्रिया भी नहीं दोहराई गई। इस आधार पर घोषणा की गई कि पदार्थ की जैसी परिभाषा की जाती रही है वैसा कोई पदार्थ इस जगत में है ही नहीं। दूसरे शब्दों में यह घोषणा की गई कि पदार्थ मर गया है। पहले कभी नास्तिकतावादी विचारक नीत्से ने यह घोषणा की थी कि ईश्वर मर गया है लेकिन अब विज्ञान को यह घोषणा करनी पड रही है कि पदार्थ मर गया है। अब वैज्ञानिकों को यह कहना पड़ रहा है कि पदार्थ विज्ञान से बार भी एक अत्यन्त विशाल दुरुह और अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के अभी तक कोई उपाय नहीं ढूँढे़ जा सकते हैं। लेकिन वह क्षेत्र विज्ञान की सभी ज्ञात धाराओं का मूल स्त्रोत और नियन्त्रण कर्त्ता है।

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है कि, विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी और निश्चित सम्भावना है जो ज्ञानयुक्त और इच्छायुक्त हो। उसी के कारण विश्व की गतिविधियाँ अनियन्त्रित और अनिश्चित रुप से चल रही है।” डाँ. मोर्डेल का कहना है कि अणु और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों के इस विचित्र व्यवहार से यही सिद्ध होता है कि कोई चेतन शक्ति है अवश्य, जिसके प्रभाव से ही अणु अथवा कणों का स्वभाव पकड़ में नहीं आता।

वह कौन-सी शक्ति हैं और किस प्रकार काम करती हैं ? उसके क्या नियम हैं ? कैसे वह पदार्थों को प्रभावित करती है? आदि प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास अभी नहीं है। इस सर्न्दभ में विख्यात वैज्ञानिक इंगोल्ड का कथन है कि, “जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही हैं। उसका वास्तविक स्वरुप समझने पे अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ, अधूरी , अप्रामाणिक और असंतोषजनक है।”

इस प्रकार की तमाम रहस्यपूर्ण वैज्ञानिक गुत्थियों का संकलन करते हुए प्रख्यात विज्ञान लेखक एफ.एल. वोश्के ने एक पुस्तक लिखी है-”द अनएक्सप्लेड”। इस पुस्तक में बोश्के ने जो प्रतिपादन किये हैं, उनसे यही निर्ष्कष निकलता है कि एक सच्चा वैज्ञानिक सब कुछ जान लेने का दावा कभी नहीं करता। बल्कि जैसे जैसे वह अपनी शोध साधना के क्षेत्र में गहरा उतरता जाता है उसे एक से एक रहस्मय गुत्थियों का पता लगता है और अनुभव होता है कि प्रत्यक्षतः जगत जैसा प्रतीत होता है, वैसा तो वास्तव में कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ रहस्यपूर्ण है। यह बात और है कि भीड़ की सम्भावनाओं के समान पदार्थ के स्थूल नियमों का पता लगाकर विज्ञान उससे रुत्किचिंत लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच गया है। परन्तु सचाई कुछ और ही है इन स्थूल नियमों से लाभ उठाने के कारण यह भ्रम हो सकता है कि विज्ञान ने शायद सत्य को जान लिया हो। पर वैसा है नहीं। मोटी बातें जो दिखाई देती है उनका थोड़ा-सा परिचय भी पर्याप्त लाभ दे सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी वास्तविकता जान ली गई। सूर्य रोज उगता है, प्रकाश देता है, उस प्रकाश से सौर ऊर्जा के रुप में लाभ उठाया जा सकता है यह जान लेना ही पर्याप्त है। इसमें यह जानने से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है अथवा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है।

प्रकृति की स्थल गतिविधियों का अनुकरण करते हुए ही अब तक दिखाई पड़ने वाली मशीनी सैद्धान्तिक पहलुओं पर अभी भी मतभेद हैं। “द अन ऐक्सप्लैड” के लेखक एफ.एल. वोश्के ने लिखा है कि विज्ञान के क्षेत्र में परस्पर विरोधी सिद्धान्तों का द्वन्द्व अनवरत चलता रहता है और सचाई क्या है, यह अभी भी अज्ञात है। उनके अनुसार चाहे दूरबीन से देखी जा रही आकाश गंगा हो, अथवा माइक्रारेस्कोप से देखे जाने वाले, अन्वेषित किये जाने वाले जीवाणु-परमाणु वैज्ञानिक किसी भी क्षेत्र में एक निर्ष्कष पर नहीं पहुँच सके है।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है। उसके अनुभव, निर्ष्कष और ज्ञान नित्य निरन्तर विकसित परिमार्जित होते जा रहे हैं। अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। फिलहाल तो उसे अपनी पिछली गलतियाँ सुधारने से ही फुरसत नहीं है। अभी तक जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन किया जाता है, जब उन्हीं के सम्बन्ध में मान्यताएँ बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। जैसे-जैसे नये तथ्य सामने आते जायेगे, नये निर्ष्कष और नये सत्यों तक विज्ञान पहुँचता जायेगा वैसे-वैसे वर्तमान कई नयी मान्यतायें बदलेगी। और उन तथ्यों का समर्थन होता जायेगा, जिन्हें भारतीय ऋषि-मुनियों ने पहले ही जान लिया था। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व चेतन की सर्वव्यापकता, ब्रह्म, की सत्यता को उद्घोषित किया था। सर्व खल्विद ब्रह्म, आत्मै वेद सर्व” “एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति” आदि घोषणाओं में इन्हीं सत्यों की घोषणा की गई है। कोई आर्श्चय नहीं कि कल को चलकर विज्ञान भी इन घोषणाओं का समर्थन करने लगे और इसकी पुष्टि के प्रमाण जुटाने लगे।

जो भी हो, इतना सही है कि प्रकृति और उसके अधिपति परमात्मा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना हर किसी के लिये सम्भव नहीं है। दोनों ही रहस्यपूर्ण है दोनों का या कहे दोनों के समुच्चय एक ब्रह्म का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसे स्थूल और सीमित साधनों उपकरणों द्वारा नहीं जाना जा सकता। न ही मनुष्य की सीमित सामर्थ्य के यह बस में है कि वह वस्तुस्थिति को जान सके। अस्तु, यह करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपने आसपास का यह सारा जगत अनेक रहस्यों के आवरण में लिपटा हुआ है। उसे जानना पूरी तरह समझना शायद ही कभी सम्भव हो सके। पूर्ण ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गया है, पूण् ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गाया है अपने को जानो अपने को देखों।” अपने अस्तित्व में अवश्य ही विराट् परमात्मा की झाँकी देखी जा सकती है।


समस्त सम्भावनाओं से परिपूर्ण मानवीय व्यक्तित्व

परमात्मा ने मनुष्य को सभी सामर्थ्यो और सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं से विभूषित कर इस पृथ्वी पर भेजा है। यदि अपने ही भीतर सन्निहित इन शक्तियों और सम्भावनाओं के स्नोतों को पहचान लिया जाये तथा उन्हें विकसित करने के लिए कटिबद्ध हुआ जाये तो कोई कारण नहीं कि परमात्मा का सबसे बड़ा पुत्र, ईश्वरीय अंश, राजकुमार आत्मा इसी दीन-हीन अवस्था में पड़ा रहे, इसके विपरीत जो लोग प्रगति और उन्नति के आधार बाहर तलाशते हैं, आगे बढ़ने और उन्नति करने के लिए दूसरों पर निर्भर करते हैं उन्हें यथास्थिति में ही पड़े रहना पड़ता है। किसी की सहायता और अनुदान उसका थोड़ा बहुत भला कर दे, सामयिक लाभ भले ही पहुँचा दें, परन्तु उससे बात बनती नहीं है वह सहायता अनुदान तो सामयिक उपचार ही सिद्ध हैं। इसीलिए कहा गया है कि ईश्वर उन्ही की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते है। इस कथन का आशय यही है कि जो परमात्मा के दिये हुए अनुदानों, मानवी व्यक्तित्व में सन्निहित विशेषताओं को पहचानने में समर्थ होते है, उन्हें जागृत कर पाते है वही किसी दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति कर पाते है। क्योंकि परमात्मा ने उन्नति और प्रगति की समस्त सम्भावनाएँ प्रत्येक व्यक्ति को उसे निजके उपयोग हेतु ही दे रखी है, उसे इतना सामर्थ्यवान भी बनाया है कि वह प्रगति क्रम में आने वाले अवरोधों से जूझते हुए निरन्तर उन्नति करता रह सके।

उदाहरण के लिए परमात्मा ने मनुष्य ही इस नश्वर और मिट्टी का पुतला कही जाने वाली काया को ही इतना सशक्त और मजबूत बनाया है कि वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी अपना सन्तुलन बनाये रह सकती है और दीर्घकाल तक कार्य करती रह सकती है। आये दिनों इस तरह की घटनाए सामने आती रहती है। जिनसे यह तथ्य सिद्ध होता है। पिछले दिनों अमेरिका का एक हवाई जहाज समुद्र पर उड़ते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो गया। किसी मशीनी खराबी के कारण विमान में आग लग गई और वह समुद्र में गिर पड़ा। किसी प्रकार प्राण रक्षा न होते देखकर उसका पाइलट जहाज के समुद्र में गिरने से पहले ही कूद पड़ा और जिस जगह जहाज का मलवा गिर रहा था वहाँ से दूर हटकर पानी में कूदा। दुर्घटनाग्रस्त जलते हुए वायुयान से कूदने के कारण उसे चोट तो बहुत आई फिर भी वह तैरता रहा और लगातार घण्टे तक तैरता हुआ बहुत बुरी तरह थकने के बाद किनारे तक पहुँचा। बुखार, निमोनिया, भूख, थकान, दर्द, चोट और बदहवासी के कारण उसकी बड़ी बुरली हालत हो गई थी और इसी हालत में उसे अस्पताल पहुँचाया गया। पायलट की स्थिति इतनी गम्भीर थी कि डाक्टर उसके अब तक बचे रहने पर आर्श्चय करते रहे। बचने की कोई सम्भावनाएं न रहने के बावजूद भी वह पाइलेट अपनी जीवनी शक्ति के सहारे धीरे-धीरे अच्छा होता चला गया।

पोर्टलैड में एक आठ वर्षीय बालक के साथ इन प्रकार की दुर्घटना घटी कि उसका बच पाना असम्भव ही लग रहा था। हुआ यह कि वह किसी प्रकार एक सड़क कूटने वाले तीन टन भारी इंजिन के नीचे आ गया। किसी को उसके बचने की आशा नहीं थी, पर उसकी जीवनी शक्ति ने काम किया और वह एक वर्ष अस्पताल में रहकर अच्छा हो गया। उसके पैर भले ही चलने लायक न हो सके पर उसकी जीवन रक्षा तो हो ही गई। न्यूयार्क की पन्द्रह मील ऊँची इमारत से एक बार दो वर्ष का बालक गिर पड़ा। इतनी ऊँचाई से गिरने के कारण हड्डियाँ बुरी तरह टूट जाने के बाद भी वह जीवित बचा रहा।

इस प्रकार की ढ़ेरों दुर्घटनाएं जिनके शिकार होने वाले का जीवन बचपाना किसी भी स्थिति में असम्भव लग रहा था किन्तु मानवी काया में विद्यमान जीवनी शक्ति ने जोर मारा और लोग देखते ही देखते मृत्यु के जाल में से निकल कर बाहर आ गये। परमात्मा ने जीवन को निश्चित ही इस योग्य बनाया है कि वह कठिन से कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आत्म-रक्षा कर सके। परमात्मा ने मनुष्य की काया को यों ही नहीं बनाया है। उसने मानवीय व्यक्तित्व में तो प्रगति और उन्नति की तमाम सम्भावनायें भर ही दी है, उनके शरीर को भी इतनी विशेषताओं में परिपूरित बनाया है कि उसके समान विशेषताओं से भरा-पूरा कोई यन्त्र अभी तक नहीं बनाया जा सका है जो सभी परिस्थितियों में अपने आपकों अनुकूल बना सके।

कैलिफोनिया विश्व विद्यालय में भौतिकी विभाग के प्राघ्यापक डा. क्रेग टेलर ने स्वयं अपने ऊपर प्रयोग कर के यह सिद्ध किया है कि संसार के सबसे अधिक गरम क्षेत्र में रहकर भी औसत स्वास्थ्य वाला व्यक्ति हफ्तों तक आसानी से जीवित रह सकता है। यदि स्नायु संस्थान अपेक्षाकृत अध्कि समर्थ हो तो यह अवध्िमहीनों तक की हो सकती है। उल्लेखनीय है कि साधारणतया अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में अध्कि से अधिक चौबीस घण्टे तक जीवित रह सकने की मान्यता प्रचलित है। डा. टेलर ने अपने प्रयोगों द्वारा 220 डिग्री तक की गर्मी देर तक सहन करके दिखाई और वे 250 डिग्री का तापमान भी 15 मिनट तक सहन करने में सफल रहे। स्मरणीय है कि 100 डिग्री गर्मी में पानी भाप बन कर गायब होने लगती है।

मनुष्य कितनी गर्मी सह सकता है इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि वह अधिक से अधिक कितना शीत सह सकता है मेजर डोनमल्ड ने इस सम्बन्ध् में कई परीक्षण किये और बताया कि शरीर में शीत सहने की कोई अन्तिम सीमा नहीं है। उन्होंने बर्फीले पानी की शीत को घण्टों तक सहन करके दिखाया और यह भी प्रमाणित किया कि यदि किसी व्यक्ति ने शीत रक्षक सूट पहन रखा हो तो शीत से मृत्यु नहीं हो सकती। कहा जा सकता है मेजर डोनमन्ड ने पहले से ही इस तरह की व्यवस्था कर रखी होगी ओर यह अति रंजित प्रतिपादन किया हो। किन्तु किसी आकस्मिक दुर्घटना में भी मनुष्य के बच जाने की सम्भावना को क्या कहेंगे? द्वितीय महायुद्ध के दौरान ऐसी ही एक घटना घटी। इंग्लैण्ड का एक विमान चालक इस युद्ध के दौरान विपत्ति में फंस गया। उसके साथ दो और साथी भी थे। इन तीनों को भयंकर शीत वाले बर्फीले प्रदेश में भूखें प्यासे दम दिन गुजारना पड़े। इन लोगों के पास कपड़े भी गरम नहीं थे। बर्फीले हवाओं, तूफानों और आँधियों का सामना करते हुए ये तीनों व्यक्ति करीब दो सप्ताह की प्राणान्तक यात्रा करते हुए उस प्रदेश की सीमा ने बाहर बच सकने की स्थिति में पहुँचे।

बुखार के समय शरीर का तापमान अधिक बढ़ने लगता है तो डाँक्टर लोग सिर पर बर्फ रखने की सलाह देते है ताकि बढ़ा हुआ तापमान कम हो सके। किन्तु इस प्रतिपादन को पिछले दिनों ब्रुकलिस (अमेरिका) की नर्स ने झुठला दिया जिसने 110 डिग्री बुखार को कई दिनों तक सहा। न केवल सहन किया वरन् बुखार से लड़ाई भी लड़ी ओर आखिर वह अच्छी हो गई। डाँक्टर कह चुके थे कि इसका बचना सम्भव नहीं है। जब उसका बुखार ठीक होने लगा तो डाँक्टर कहने लगे कि इतनी अधिक गर्मी सहने के कारण उसका दिमाग जरुर विक्षिप्त हो जाएगा। पर नर्स ने न तो मृत्यु को ही पास फटकन दिया और न ही अपना मानसिक सन्तुलन खोया।

आहार मनुष्य को जीवित रखने वाला प्रमुख साधन माना जाता है। दस बारह दिनों तक तो कोई व्यक्ति निराहार रह भी सकता है, पर इससे अध्कि समय तक भूखे रहने पर स्वास्थ्य लड़खड़ाने सा लगता है। ज्यों-ज्यों अधिक दिन तक भूख का सामना करना पड़ता है, त्यों-त्यों स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है ओर कुछ ही समय में जीवन संकट उत्पन्न हो जाता है। किन्तु आयरिश स्वाधीनता युद्ध के उद्घाता टेटेन्स मेकस्विनी ने जेल में अनशन किया और 128 दिन तक निराहार रहकर मौत से जूझते रहे तथा अन्ततः विजयी हुए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सेनानी यतीन्द्रनाथ दास बिना भोजन किये दिन तक निराहार रहकर मौत से लड़ते रहे।

आँपरेशन के समय कितने ही लोगों का एक-एक फेफड़ा, एक गुर्दा, जिगर का एक भाग और आँतों का एक हिस्सा काट कर अलग कर दिया जाता हैं इतने पर भी उनका जीवन क्रम आसानी से चलता रहता है। सामान्य स्थिति में मनुष्य शरीर का 36.6 तापक्रम डिग्री सेंटीग्रेड होता है। खून में शकर की मात्रा 0.1 होती है। रक्तचाप साधारण स्थिति में 100 से 140 मिली मीटर मर्कुचुरी कोलम होता है। यह तापमान शरीर के भीतरी अवयवों का ही होता है। ठन्ड के दिनों में हाथ-पैरों का ताप तो डिग्री से भी कम रहता है फिर सारा कार्य यथावत् चलता रहता है, पर इससे अधिक भीतरी गर्मी नहीं गिरनी चाहिए और वह 45 से आग भी नहीं बढ़नी चाहिए अन्यथा जीवन संकट के भीतर ही हीटर और कूलर जैसी व्यवस्था है। शरीर का सचेतन नाड़ी संस्थान तापमान को सन्तुलित रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। मासपेशिया इससे उष्मा उत्पन्न करने कार्य करती है। उन्हीं से उष्मा बनती पकती और बढ़ती है। इनके अतिरिक्त हृदय, फुफ्फुस, वृक्क, यकृत आँते आदि अंग भी एक प्रकार से भट्टी की तरह जलते और गर्मी पैदा करते है।

शरीर दिन-रात में 160 से 180 लाख कैलारी ऊष्मा नित्य बाहर फेंकने का क्रम चलाता है। बिजली के हीटर भी प्रायः इतना ही ताप उत्पन्न करते है। जब कभी गर्मी कम पड़ती है, तो ठन्ड लगने लगती है। दाँत किट किटाव हैं, अंग काँपते है। यह अतिरिक्त क्रिया-कलाप प्रकृति द्वारा अतिरिक्त गर्मी उत्पन्न करने के लिए घर्षणात्मक हलचल उत्पन्न करने के लिए आरम्भ किए जाते है।

रक्त भी शरीर में एक अच्छे ऊष्मा वाहक का काम करता है। ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए रक्त संचार पद्धति की द्रुत गामिता ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा करती है। यह रक्त यदि दौड़ता न हो तो गर्मी जहाँ बनी है वही बनी रहती है। ताप उत्पन्न करने वाले अवयव जलने लगते है और शेष ही शीत निवारण कठिन पड़ता है। रक्त दौडने का ही काम नहीं करता वरन् वह स्वयं गर्मी भी पैदा करता ओर गरम तो रहता हैं उसकी यह विशेषता हीटर और कूलर दोनों के प्रयोजन पूरे करती है। जब देह की गर्मी लगती है तो रक्त की दौड़ शरीर से गर्मी को बाहर फेंकने लगती है और जब ठंड प्रतीत होती है तो वह गर्मी शरीर के भीतर संचित रह कर अंशों को गरम करती है। इस प्रकार शीत ऋतु में ताप संचय का क्रम चलता है और अपना रक्त ही आवश्यक गर्मी की व्यवस्था बना देता है।

शरीर को भले ही मिट्टी का पुतला या नश्वर खिलौना कहा जाय पर वस्तुतः यह परमात्मा की या प्रकृति की ऐसी अनुपम कलाकृति है जिसकी तुलना में सृष्टि की और कोई वस्तु नहीं ठहरती उसकी रचना ऐसी है कि साधारण बीमारियाँ अथवा दुर्घटनाएं कोई विशेष अनर्थ नहीं कर सकती। शरीर की यह तितिक्षा भक्ति अपने भीतर इतनी अधिक मात्रा में संजोकर रखी हुई है कि मृत्यु जैसा संकट उपस्थिति होने पर भी जीवन की आशा की जा सकती है कहा जा सकता है कि मनुष्य की विपत्तियों और संकटों से कोई विशेष हानि नहीं पहुँचती है तो अपने ही मन के द्वास बुने हुए जाल जजालों बुजदिली और साहस की दुर्बलताओं से। इसीलिए कहा गया है कि परमात्मा ने मनुष्य को अमित सामर्थ्य और अद्भुत सम्भावनाओं से भरपुर बनाया है इस तथ्य को समझने वाले विचारशील लोग प्रगति के साध्न बाहर नहीं ढूँढते वरन् भीतर खोजने है। अपने दोष दुर्गुण सुधारते है अस्त व्यस्त स्वभाव एवं कार्यक्रम क्रिया पद्धति को ठीक करते है तथा अभीष्ट दिशा में बढ़ चलने का पथ सहज ही प्रशस्त करते चलते है। अम्युदय, अम्युत्थान की समस्त सम्भावनाएं मनुष्य के अपने भीतर ही विद्यमान है, जिसने इस तथ्य की वास्तविकता समझ ली स्वीकार कर ली वह अपने को सम्भाल सुधार कर अबोध गति से आगे बढ़ता चलता है।


लिंग भेद शाश्वत नहीं, परिवर्तनशील है!

ईश्वर की स्तुति में उसे त्वमेव माता व पिता ‘त्वमेव’ कहा जाता है। उसे नर और नारी दोनों के रुप् में नमन किया जाता है। अर्ध नारी नटेश्वर के रुप् में भगवान शिव का आध अंग नारी और आधा नर है। इससे स्पष्ट है कि परब्रह्य में नर, और नारी जैसा कोई मौलिक भेद नहीं है। आवश्यकता एवं भावना के अनुरुप् एक ही सत्ता अपने अस्तत्व का परिचय दोनों लिंगों में देती रहती है।

आत्मा के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह परिस्थिति के अनुसार कभी नर बन जाता है कभी मादा। जो वस्त्र एक बार धारण कर लिया वह यदा ही उसी तरह बना रहेगा यह भी आवश्यक नहीं। साड़ी की काट छाँट कर कुर्त्ता बनाया जा सकता है। फटी हुई बनियान का कतर ब्योंढ़ करके रुमाल बनाया जा सकता है। आत्मा के सम्बन्ध् में भी यही निर्यात है। स्वभाव एवं पसन्दगी के कारण कोई भी प्राणी नर या मादा बना रह सकता है। अभिरुचि एवं परिस्थिति बदल जाने पर यह लिंग भेद बदल भी सकता है। जो एक जन्य में नर था वह दूसरे जन्म में नारी बन गया है और नारी ने नर का चोला बदला। ऐसे उपाख्यानों की कथा, पुराणों में भरमार है।

एक ही शरीर में इस प्रकार के यौन परिवर्तन अनेकों होते रहते है। ऐसी घटनाओं की कमी नहीं जिनमें जन्म समय का लिंग बड़े होने पर पूर्णतया परिवर्तित हो गया। आरम्भ में चिन्ह् बदले फिर परिवर्तन प्रबल हुआ और यौन परिवर्तन का आर्श्चयजनक दृश्य सामने आ खड़ा हुआ विदेशों में ऐसी घटनायें सरकारी अस्पतालों के रिकार्ड में हजारों की संख्या में दर्ज हो चुकी है। भारत में भी ऐसी घटनाओं की कमी नहीं। समाचार पत्रों में ऐसे समाचार छपते रहते है। जिनसे प्रतीत होता है कि लिंग परिवर्तन आर्श्चयजनक तो है पर असम्भव नही। परिवर्तनों के अनेकानेक उपक्रमों में लिंग परिवर्तन भी एक मान्यता प्राप्त तथ्य बन गया है।

प्रकृति में इस प्रकार के अन्तरों के प्रमाण तो असंख्यों दृष्टिगोचर होते है जिनमें पुरुष के हाव-भाव, स्वभाव, रुचि एवं गतिशीलता एवं सफलता नारी वाले क्षेत्र में ही दृष्टिगोचर होती रही। कितनी ही नारियाँ ऐसी होती है, जिनकी शरीर रचना भले ही प्रकृति प्रदत रही हो पर स्वभाव एवं पराक्रम की दृष्टि से उन्होंने पुरुषों जैसा जीवन यापन किया और उसी स्तर पर पराक्रम भी दिखाया।

हिजडे वर्ग के लोग ऐसे ही होते है जिनकी आकृति और प्रकृति यौन प्रभाव की मर्यादा को तोड़कर सर्वथा विपरीत स्तर की होती है समलिंगी समागमों में दोनों की यौन संरचना एक जैसी रहते हुए भी प्रकृति में विपरीत स्तर भरा होता है।

कइयों में प्रत्यक्षः तो ऐसे दृश्य दिखाई नहीं पड़ते पर भीतर ही भीतर चिन्तन एवं रुझान ऐसा चलता रहता है जिसे लिंग भेद की प्रतिक्रिया से विपरीत कहा जा सके। इस प्रकार के लक्षण यह बताते है कि आत्मा अपने कलेवर से असन्तुष्ट है और अगले दिनों अपना लिंग परिवर्तन करने के लिए भीतर ही भीतर बदलता और ढलता जा रहा है। संकल्प बल में परिस्थितियों के बदल डालने की परिपूर्ण क्षमता है उसके प्रमाणों में एक लिंग परिवर्तन को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

नर नारी का भेद स्थूल कलेवर तक सीमित है। काया में विद्यमान आत्मा न नर है और न ही नारी। उपनिषद में वर्णन है-

नैव स्त्री न पुमानेषु न चैवार्थ नपुँसक। यद मच्छरी मादन्ते तेन-तेन स युज्येन॥

यह जीवात्मा न तो स्त्री है न पुरुष है और न नपुँसक ही है। वह जिस शरीर को ग्रहण करता है उसी के सम्बद्ध हो जाता है।

इस तथ्य का परिचय कभी-कभी अनौखी घटनाओं द्वारा भी मिलता है। यौन परिवर्तन की घटनाएं इस सत्य की पुष्टि करती है कि नर-नारी के बीच अन्तर कायिक धरातल तक ही है। आत्मा में दोनों के गुण विद्यमान है।

‘सोलन’ निवासी र्स्वणकार जियालाल को इस बात का दुःख बना रहता था कि उसके कोई पुत्रा नहीं है। तीन लड़कियों में एक लड़की का नाम सुनीता है। माता-पिता को यह देखकर आर्श्चय हुआ कि बच्ची में पुरुष के चिन्ह हैं। स्थानीय अस्पताल में दिखाये जाने पर डाक्टरों ने सुझाव दिया कि सुनीता के सेक्स अंग पुरुष की भाँति है। आपरेशन द्वारा पुरुषत्व के चिन्हों को उभारा जा सकता है। र्स्वणकार जियालाल ने तत्काल निर्णय लिया तथा अपनी चार वर्षीय बच्ची को अस्पताल में भर्ती कर दिया। छः डाँक्टरों के प्रयत्न से आँपरेशन सफल रहा। सुनीता अब माता-पिता के लिए एक पुत्र की भूमिका सम्पन्न कर रही है।

इसी प्रकार की घटना अप्रैल 79 में कोल्हापुर के सिविल अस्पताल में घटी। सत्तरह वर्षीय कुमारी रंजना कोल्हापुर से अठारह कि.मी. दूर हतकना नगले के निकट स्थित ग्राम ‘हुपारी’ के रहने वाली है। उसे मासिक ध् न होने के कारण माता-पिता सरकारी अस्पताल में लाये। परीक्षा करने पर डाक्टरों ने पाया कि रंजना में पुरुष के चिन्ह् विद्यमान है। आँपरेशन द्वारा उसका यौन परिवर्तन किया जा सकता हैं उनके परामर्श से रंजना के माता-पिता ने अनुमति दे दी। रंजना अब रणजीत के नाम से जानी जाती है। उसका स्वभाव पुर्णतया पुरुषी जैसा ही है।

इन घटनाओं द्वारा आत्मा अपनी भक्ति को बोध् कराती तथा यह बताती है कि वह प्रकृति के नियमों से परे है। बन्धनों से जकड़ी काया में भी वह परिवर्तन कर सकने में समर्थ है जिसे सामान्यतया असम्भव और आर्श्चयजनक समझा जाता है। जीव-विज्ञान के नियम एवं मान्यताओं को भी यह घटनाएं चुनौती देती तथा अन्त में विद्यमान सर्व समर्थ सत्ता आत्मा को बोध कराती है।

इन्दौर से प्रकाशित दैनिक पत्र नई दुनिया के अनुसार मार्च के अंक के अनुसार 12 मार्च 1979 के अंक के अनुसार ‘शहडोल’ के अस्पताल में एक चालीस वर्षीय व्यक्ति रामदीन हर्निया का आपरेशन कराने आया। डाक्टरों को यह देखकर आर्श्च का ठिकाना नहीं रहा कि रामदीन के पेट में एक पूर्ण विकसित गर्भाशय मौजूद है। इसे निकाल कर रीवा मेडिकल काँलेज के संग्रहालय में रखा गया है।

प्रकृति भी असामान्य घटनाओं द्वारा आत्म सत्ता की समर्थता का परिचय देती तथा यह बताती है कि आत्मा के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।

इस प्रकार की घटनाए मनुष्यों में ही नहीं जीव जन्तुओं में भी देखी जाती है। अविकसित जीवों में तो इस सत्य का बोध् और भी स्पष्ट रुप् में मिलता है। उन्हें देखकर लगता है कि सृष्टा ने सृष्टि चक्र को सुचारु रुप में संचालन के लिए ही मात्र विकसित जीवों में नर-नारी का अन्तर पैदा कर दिया। अन्यथा कितने जीव तो एक ही शरीर में आरम्भ से ही नर नारी की विशेषताओं को धारण किए हुए है। केचुओं इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। दोनों ही प्रकार के सेक्स अंग उसके अन्दर मौजूद हाते है। कई जीव अपनी मर्जी के अनुसार लिंग धारण कर लेते है तथा अपने जीवन काल में अनेकों बार लिंग परिवर्तन करते देखे जाते है। ‘ओइस्टर’ नामक जन्तु नर के रुप में पैदा होता है। दो वर्षो के उपरान्त मादा बन जाता है। ‘ओरटन’ नामक जीव विज्ञानी ने अपने प्रयोग द्वारा पाया कि नर से मादा में परिवर्तित ‘ओइस्टर’ मादा की तरह ही अण्डे देने का कार्य करता हैं आर्श्यच यह है कि अण्डा देने के एक माह बाद वह पुनः नर में बदल जाता है।

मनुष्य ही नहीं अन्य जीव-जन्तुओं के उदाहरण इस बात के साक्षी है कि प्राणि मात्र में कार्य कर रही चेता नर-नारी कोइ्र भी स्वरुप् ग्रहण कर सकती है। अर्थात वह इन विभेदों से रहित है।

नर और मादा में से किसी को भी न तो अपनी विशिष्टता पर अहंकार करना चाहिए और न हीनता अनुभव करने की आवश्यकता है। क्योंकि लिंग भेद शाश्वत नहीं परिवर्तनशील हैं जो आज एक कलेवर में है वह कल दूसरे में बदल सकता है। ऐसी दशा में दोनों के मध्य वरिष्ठ, कनिष्ठ की मान्यता बनाने अथवा सौभाग्य दुर्भाग्य जैसा अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। दोनों के मध्य एकता ही नहीं समता भी वाँछनीय है।


जातस्य हि ध्रुवों मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च॥

मृत्यु के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न धर्मा की भिन्न-भिन्न धारणाए है लेकिन एक विषय में सभी एकमत है कि मृत्यु का अर्थ जीवन का अन्त नहीं है। इसी आधार पर कुछ धर्मो ने मरने के बाद फिर से जन्म लेने की मान्यता को स्वीकार किया है और कुछ के मतानुसार मृत्यु एक ऐसी घटना है जिसमें चेता या प्राण सदा के लिए सो जाते है और सृष्टि के अन्त में फिर जाग उठते है इस दृष्टि से आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता को अन्यान्य धर्मो ने भी स्वीकार किया है लेकिन यह सिद्धान्त भारतीय दर्शन का तो प्राण ही है।

इसके साथ ही पुनर्जन्य का सिद्धान्त भी जुड़ा हुआ है। जिसके अनुसार प्राणी को मरने के बाद फिर जन्म लेना पड़ता है। भारतीय दर्शन के अनुसार पुनर्जन्म की मान्यता के साथ कर्मफल का सघन सम्बन्ध् है। जिन्हें भले या बुरे कर्मो का परिणाम तत्काल नहीं मिल सका, उन्हें अगले जन्म से कर्मफल भोगना पड़ता है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने पर पाप फल और दुष्कर्मो से दण्ड से डरने तथा पुण्य फल के प्रति आश्वस्त रहने की मनःस्थिति बनी रहती है। फलतः पुनर्जन्म के मानने वालों को अपने कर्मा का स्तर सही रखने की आवश्यकता अनुभव होती है और तत्काल फल न मिलने से किसी प्रकार की उद्धिग्नता उत्पन्न नहीं होती। पिछले दिनों भौतिक विज्ञान की प्रगति से उत्पन्न हुए उत्साह के कारण यह कहा जाने लगा कि सत्य केवल उतना ही है, जितना कि प्रयोगशाला में सिद्ध हो सके। जो प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष नहीं हो सकता वह सत्य नहीं है।

चूँकि चेतना भी प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष नहीं किया जा सका इसलिए घोषित कर दिया गया कि शरीर ही आत्मा है और मृत्यु के बाद उसका सदा-सर्वदा के लिए अन्त हो जाता है। इस घोषणा के अनुसार मनुष्य को चलता फिरता पौधा भर कहा गया । यह मान्यता मात्र एक सिद्धान्त या प्रतिपादन भर बनकर नहीं रह सकती उसकी प्रतिक्रिया, चिन्तन और चरित्रा पर भी होती है। पुनर्जन्म, कर्मफल, परलोक और पाप-पुण्य में आस्था जिस प्रकार व्यक्ति को दुष्कर्मो से बचाये रहती है उसी प्रकार शरीर को ही सत्य और आत्मा को मिथ्या मान लिया जाय तो लगता है कि पाप-पुण्य के पचड़े में पड़ने से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी सम्भव हो सके स्वार्थ सिद्ध किया जाना चाहिए।

अब जो प्रमाण सामने आये है और उनकी वैज्ञानिक गवेषणाए की गई है उनके अनुसार यह भ्रम ढहढहाता जा रहा है कि जीवन चेतना का अस्तित्व शरीर तक ही सीमित है। यह धारणा भ्रम तो पहले भी थी, पर अब इस सचाई के प्रमाणो पर भी वैज्ञानिक ध्यान देने लगे है कि पुनर्जन्म वास्तव में एक ध्रुव सत्य है। पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि करने वाले अनेकानेक प्रमाण आ रहे है। भारत में तो इस सम्बन्ध् में चिरकाल से प्रचलित विश्वास के कारण यह कहा जाता रहा कि पुनर्जनम की स्मृति बताने वाले यहाँ के वातावरण से प्रभावित रहे होने या किसी कल्पना की आधी-अधूरी पुष्टि हो जाने पर यह घोषित किया जाता होगा कि यह बालक पिछले जन्म में अमुक था। यद्यपि इस तरह के प्रकरणों में जिस कठोरता के साथ जाँच पड़ताल की गई, उससे यह आशंका अपने आप ही निरस्त हो जाती थी। उदाहरण के लिए पिछले जन्म के सम्बन्धियों के नाम और रिश्ते बताने ऐसी घटनाओं का चिक्र करने जिनकी जानकारी दुरस्थ व्यक्तियों का भी नहीं रही, नितान्त व्यक्तिगत और पति-पत्नी तक ही सीमित बातों को बता देने, पिछले जन्म में जमीन में गाढ़ी गई चीजे उखाड़कर देने तथा अपने और पराये खेतों का विवरण बताने जैसे अनेक सर्न्दभ ऐसे है जिनके आधार पर पुनर्जन्म की प्रामाणिकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।

लेकिन भारत के बाहर भी इस तरह की घटनाओं पर गम्मीरता पूर्वक ध्यान दिया गया है और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से गवेषणा करने वालों में प्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक डाँ. इवान स्टीवेन्सन का नाम लिया जाता है। यूनिवसिटी आफ वर्जीनिया मेडिकल सेंटर के मनोचिकित्सा विभाग में कार्यरत डाँ. स्टीवेन्सन पुनर्जन्म की वास्तविकता को वैज्ञानिक ढंग से परखने का सिलसिला शुरु किया। सन् 1966 में इस विषय पर उनकी पहली पुस्तक ‘ट्वटी कैसेज सजेस्टिव आफ रिइन्कार्नेशन’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के बाद उनकी तीन पुस्तक और प्रकाशित हुई जिनमें पुनर्जन्म की कई प्रामाणिक घटनाओं का विवरण देते हुए इस विषय का प्रतिपादन किया।

ये तीनों पुस्तकें अलग-अलग देशों में घटी घटनाओं के आधार पर लिखी गई है। एक में भारत में जन्में ऐसे व्यक्तियों का विवरण है जिन्हें अपने पिछले जन्मों की याद रही। दूसरी में श्रीलंका और तीसरी पुस्तक में तुर्की की घटनाओं का विवरण है। इन तीनों पुस्तकों में कुल मिलाकर 1300 घटनाओं का वर्णन है, जिनकी वास्तविकता और प्रामाणिकता असंदिग्ध बताई गई है।

भारत में भी हाल ही में पुस्तक प्रकाशित हुई है”लिविंग एण्ड डाईंग” इस पुस्तक में 3 सितम्बर 1969 को उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्यण परिवार में जन्मी कन्या का उल्लेख है। लड़की का नाम र्स्वणलता रखा गया। जब वह साढे तीन वर्ष की हुई तो उसक घर उसके पिता से मिलने के लिए कुछ सफाई करने वाले जमादार आये। उन्हें देखकर र्स्वणलता सूअर का गोश्त खाने की जिद करने लगी। ब्राह्यण परिवार में गोश्त अण्डे की बात तो दूर रही चीटी भी नहीं मारी जाती। फिर लता ने यह कहाँ सुना और सीखा? पिता जब उसे टालने और डपटने लगे तो र्स्वणलता ने बताया कि वह भी सफाई जमादारों की जाति की ही थी। उसने यह भी बताया कि उसका पूर्वजन्म का नाम शान्ति था और उसके पिता का नाम राजिदर था। उसने अपने पिछले जन्म के निवास ग्राम और घर का पता बताया, जो वर्तमान निवास में कुल दो किलोमीटर दूर ही था। उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई यह पूछा जाने पर र्स्वण लता ने बताया कि वह रोज पास ही रेल्वे लाइन पर कोयले बीनने के लिए जाया करती थी। जिस दिन उसकी मृत्यु हुई वह रामनवमी का दिन था। उस दिन किसी बात पर पति से तकरार हो गई और उसके पति ने शान्ति को झाडू की मूँठ से पीटा। इससे वह बेहद दुःखी हुई। उसी दिन जब वह रेल की पटरी पर कोयले बीनने गई तो रेल के नीचे कुचलकर मर गई र्स्वणलता ने अपने पुराने परिवार और विशेषतः अपनी बेटी जिसका नाम गीता था और जो अविवाहित थी, देखने की हार्दिक इच्छा व्यक्त की।

र्स्वणलता ने जो भी बात बताई थी, उन सारी बातों की छानबीन प्रसिद्ध परामनोविज्ञान वेताओं द्वारा की गई, जो ऐसे मामलों की पहले भी कई बार जाँच कर चुके थे, इन विशेषज्ञों ने जिन मामलों की पहले जाँच की थी उनका नीर-क्षीर विश्लेषण कर सूच-झूठ को निष्पक्ष ढंग से प्रतिपादित किया गया। इसलिए उनके निष्कर्षो पर जरा भी सन्देह करने की गुन्जाइश नहीं थी। अनुसन्धन करने वाले परामनोविज्ञानवेत्ता इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि र्स्वणलता ने जो कुछ भी बताया था वह अक्षरक्षः सच था। उन्होंने यह भी पाया कि पिछले जन्म के संस्क्र उसके इस जन्म से भी विद्यमान थे। उन्होंने यह भी पाया कि अपनी पिछली जाति के अनुसार ही उसकी व्यक्तिगत आदतें भी थी। वह घर के दूसरे बच्चों से अलग-अलग ही रहती ओर यह कहकर उसने स्कूल जाने से भी इन्कार कर दिया कि वह तो नीच जाति की है। इसके साथ ही वह रेलगाड़ियों से भी बहुत डरती थी। सन् 1975 में उससे अनुसन्धान कत्ताओं ने आखिरी बार मुलाकात की। इस समय भी उसे अपने पिछले जन्म का स्मरण था, पर तब वह पहले की तरह बातें नहीं करती थी।

जून 1975 में जन्मी पुष्पा नाम की लड़की जब डेढ़ वर्ष की हुई तभी से एक घर की ओर इशारा करने लगी, जिसे बाद में उसने अपने पिछले जन्म का घर बताया बोलने योग्य हाते ही उसने अपने आप को एक सिक्ख परिवार की बहू बताया ओर अपने बच्चों के नाम भी बताने लगी, वह अपने पिछले जन्म का नाम मनजीत कौर बताती थी। वह पूछने पर कि उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई मनजीत कौर (पुष्पा) ने भयभीत होकर कहा कि उसकी सास उसके पति को उल्टी सीधी पढाती रहती थी और उसक वि( कान भरती रहती थी। एक दिन तो उसका पति इस तरह भड़क उठा कि उसने मनजीत को चाकू से मार ही डाला। जब इन बातों की पुष्टि के लिए पुनर्जन्म में रुचि रखने वाले व्यक्तियों ने छानबीन की तो इस तथ्य को बिल्कुल सही पाया गया कि मनदीप कौर की पुष्पा क जन्म से ठीक चार वर्ष पहले हत्या कर दी गई थी।

हाल ही के 10-12 वर्षो में पुनर्जन्म के ये दो बहुचर्चित प्रमाण है। इसके अलावा भी अनेकानेक प्रमाण आये दिन सामने आते रहते है। डाँ. स्टीवेन्सन ने अपनी पुनर्जन्म सम्बन्धी तीन पुस्तकों में जिनमें करीब डेढ़ सौ पुनर्जन्म की घटनाओं का विवरण विश्ले्रषण प्रस्तुत किया है, जो उन देशों में घटी जहाँ आमतौर पर पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता। अमेरिका के कोलोराडीप्यूएली नामक नगर में रुथ सीमेनस नामक लड़की ने अपने पुर्वजन्म की घटनाओं को बढ़ाकर ईसाई र्ध्म के उन अनुयायियों को असमझस में डाल दिया जो पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानते है। इस लड़की को मोरेवर्नस्टाइन नामक आत्म विशारद ने प्रयोग द्वारा उसी के पूर्वजन्म की अनेक घटनाओं का पता लगाया। प्रयोग के दौरान उसने बताया कि वह सौ वर्ष पूर्व आयरलैण्ड के पार्क नगर में पैदा हुई थी। उसका नाम ब्राइडीमर्फी था और उसके पति का नाम मेकार्थी था। रुथ सीमेन्स ने अपने विगत जन्म के बारे में जो भी बाते बताई उनकी जाँच की गई तो वे अक्षरक्ष्शः सत्य पाई गई।

विलियम बाकर एवं केन्सन ने अपनी पुस्तक इिस्कार्नेशन में ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण दिया है। जिनमें पुनर्जन्म में विश्वास न करने वालें परिवारों में जन्में बच्चों को भी पूर्वजन्म की स्मृतिया थी। बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये विवरणों से इस सिद्धान्त की पुष्टि ही होती है। बड़ी आयु हो जाने पर यद्यपि ऐसी स्मृतियाँ नहीं रहती या धुँधली पड़ जाती है, पर बचपन में बहुतों को ऐसे स्मरण बने रहते है जिनके आधार पर उनके पुर्वजन्म के सम्बन्ध् में काफी जानकारी मिलती है। मोटे रुप् में जीवात्मा के योनि परिभ्रमण का यह अर्थ समझा जाता है कि वह छोटे बड़े कृमि कीटकों पशु-पक्षियों की चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के बाद ही मनुष्य जन्म प्राप्त करता है। पुनर्जन्म की इन घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को दूसरा जन्म मनुष्य के रुप में ही मिलता हैं इसके पीछे तर्क भी है। जीव की चेतना का इतना अधिक विकास-विस्तार हो चुका होता है कि उतने फैलाव को निम्न प्राणियों के मस्तिष्क में समेटा नहीं जा सकता। बड़ी आयु का मनुष्य जिस प्रकार अपने बचपन के कपड़े पहनकर काम नहीं चला सकता उसी प्रकार मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद छोटी योनियों में प्रवेश करने से गुजारा नहीं चलता।

रही बात बुरे कर्मो के दण्ड की तो कर्मो का फल भुगतने के लिए दुष्कर्मो का अधिका अधिक दण्ड मनुष्य जन्म से ही मिल सकता है। मनुष्य को शारीरिक कष्ट से भी अध्कि मानसिक यातनाए सहनी पड़ती है। शोक, चिन्ता, भय, अपमान, घाटा, बिछोह आदि से वह तिलमिला उठता है, जबकि अन्य प्राणियों को मात्र शारीरिक कष्ट ही होते है। मस्तिष्क अविकसित रहने के कारण उनमें भी उतनी तीव्र पीड़ा नहीं होती जितनी मनुष्यों को होती है। इस स्थिति में पापकर्मी का दण्ड भुगतने के लिए मनुष्य को निम्न योनियों में जाना पड़े यह आवश्यक नही। जो भी हो पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य और जितनी वह मान्यता सत्य है उतनी ही लोकोपयोगी भी। आत्मा की अमरता और मरणोपरान्त फिर से शरीर धारण करके कार्य क्षेत्र में उतरने की आस्था बनी रहे तो व्यक्ति दूर दर्शी विवेक अपनाये रह सकता है ओर उसे नैतिकता,, शालीनता तथा सामाजिकता के पालन की सहज प्रेरणा मिलती रहती है।


संस्कारों की महत्ता एवं उपयोगिता

भारतीय संस्कृति में संस्कारों पर सर्वाध्कि जोर दिया गया है। अनगढ़ व्यक्तित्व को सुगढ़ बनाने-ढ़ालने के लिए आदि कालीन ऋषियों ने संस्कारों की व्यवस्था बनायी। शोडम संस्कारों के सृजन में ऋषियों क मूल प्रयोजन या मानवी चेतना पर सूख्म विध्िसे उन आदर्शो की प्रतिष्ठापना करना। जिनके द्वारा व्यक्तित्व परिष्कृत एवं श्रेष्ठ बनता हो। यह परम्परा पूर्णतया वैज्ञानिक थी। व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठ एवं शालीन बनाने में संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान होता था। ऋषियों की इस परम्परा में मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण का सशक्त आधार मौजूद है।

सभ्य एवं सुसंस्कृत संस्कृति की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। वे ऐसे आधर ढूढे जा रहे है जो व्यक्ति को शालीन एवं समर्थ बनाते हो। शिष्टाचार सिखाने के लिए एटीकेट्स विद्यालय खोले जा रहे है। मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की बाध्य व्यवस्था भी बनायी जा रही है। यह सभी प्रयास इस बात के प्रमाण है कि संस्कारों की आवश्यकता इन दिनों भी पूर्व काल की तरह ही अनुभव की जा रही है।

इटली के मेंडले नामक विद्वान ने संस्कार शास्त्र पर आधारित एक शास्त्र की नींव डाली जिसे यूजेनिक्स कहा गया। हिन्दी में इसे सुसन्तान शास्त्रा, अभिजनन शास्त्र कहते है। मेडले के कार्यो से प्रेरणा लेकर इस सदी के आरम्भ में इंग्लैण्ड के विद्वान सर फानिक्स गाल्टन’ ने अपनी सम्पत्ति का एक बढ़ा भाग लन्दन विश्वविद्यालय को इस क्षेत्र में शोध के लिए दिया। इस विश्वविद्यालय में ‘यूजेनिक्स’ के शोध कार्य में अनेको विद्वान लगे हुए है। यूरोप के अन्य देशों में भी यह शास्त्र लोकप्रिय हो रहा है। यूजेनिक्स के वंश परम्परा, विवाह आदि के सम्बन्ध में विस्तृत शोध चल रहेी है। इसमें भारतीय संस्कृति में विवाह सम्बन्ध्ी मर्यादाओं एवं निषेधाओं से सम्बन्ध्ति सभी तथ्यों का समावेश हैं उस क्षेत्र में शोध् कर रहे विद्वानों का कहना है कि “सन्तति को सुसंस्कारी एवं शरीर बनाने में प्रत्यक्ष उपदेशों प्रशिक्षणों का कम धर्मिक संस्कारों का अधिक योगदान होता है।”

मनोविज्ञान का यह सिद्धान्त है कि मनुष्य किसी भी बात के सामान्य उपदेशों प्रशिक्षणों अथवा परामर्शो द्वारा दिये गये निर्देशों की तुलना में अनुकूल वातावरण में शीघ्रता से सीखता है।

नाटक सिनेमा में देखे गये दृश्यों का भला-बुरा प्रभाव दर्शक के ऊपर स्थायी रुप से पड़ता है। मन की प्रकृति निम्नगामी होने के कारण स्वभावतः मनुष्य अच्छी प्रेरणाओं को ग्रहण नहीं कर पाता। कुप्रभाव से निम्नगामी प्रवृत्तियाँ अपनाता है। बच्चे अध्कि सम्वेदनशील होते है। उत्तेजक, अश्लील दृश्यों का प्रभाव तो उनके मानस पटल पर स्थायी रुप् से पड़ जाता है। फलस्वरुप् वे भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं।

वातावरण का बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव ने मनोवैज्ञानिकों का ध्यान धार्मिक संस्कारों की ओर आकर्षित किया है। ‘यूनेक्सि’ के शोध में लगे वैज्ञानिकों ने विश्व भर में प्रचलित सभी धर्म सम्प्रदायों में किये जाने वाले संस्कारों पर गहन शोध् करना आरम्भ किया है। हिन्दू र्ध्म के संस्कारों की शोध में लगे एक वैज्ञानिक का कहना है कि इन संस्कारों की पृष्ठभूमि मनोवैज्ञानिक सूझबूझ पर बनी है। जिसमें व्यक्तित्व के समग्र विकास की पूरी-पूरी सम्भावना है। संस्कार मात्र कर्मकाण्ड नही, आत्म निर्माण के सशक्त माध्यम हैं। इनका नये सिरे से अध्ययन एवं व्यापक स्तर पर प्रचलन किया जा सके तो व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है।


अदृश्य का अनुकूलन आवश्यक अपेक्षित

क्षुद्रता की भौतिकता और महानता को आध्यात्मिकता कहा जाता है। एककीअणु दूसरे को विभु कहते हैं। एक सीमित है दूसरा असीम। सीमित दृश्यमान होता है, असीम अदृश्य। पदार्थ का नाप-तौल आकार और आयतन है। भले ही वह आँख से नहीं देखा जा सके बुद्धि अथवा यन्त्र उपकरणों की सहायता से समझा जाय? किन्तु चेतना के सम्बन्ध् में यह बात नहीं है, उसका क्षेत्र व्यापक है। उसका विस्तार सीमित नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि चेतना जितनी परिष्कृत होती जाती है उतनी ही सुविस्तृत होती और व्यापक बनती है। धूमिल होने पर ही वह संकीर्णता और कृपणता के दल-दल में फँसती है।

तत्व दर्शन के इस प्रतिपादन को तथ्य माना जा सकता है। इसके पफलितार्थ पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि जिसे जड़ता जितना घेरे हुए होगी वह उतना ही स्वार्थी होगा। व्यक्तिगत लोभ लालच ही उसे जकड़ रहेंगे। क्षुद्र महत्वाकाएं उस पर छाई रहेगी और ऐसे कृत्य कराती रहेगी जो आकर्षक लगते हुए भी व्यक्ति ओर समाज के लिए कल्याणकारी नहीं होते। सामान्य लोकजीवन ऊपर से नीचे की ओर ही प्रकृति के गुरुत्वाकर्षण से प्रेरित होकर अधोगामी प्रवाह में बहता रहता है। नर पशुओं का चिन्तन, निर्धारण, स्तर एवं भविष्य इसी स्तर का रहता है। वे दुःख देते ओर दुःख पाते अपना समय बिताते, गंवाते, अंधकार में गिरते मरते है। यह दैत्य परम्परा है।

इस तत्व दर्शन का दूसरा पक्ष है-ऊर्ध्वगमन। इसी को उत्थान, उर्त्कष अभ्युदय आदि के नाम से पुकारते है। अग्नि की लपटे ऊपर उठती है। अपने प्रभावित वातावरण को भी गरम करती और ऊपर उठाती है ऊपर उठने का स्वरुप् तीर की तरह आसमान में एक दिशा विशेष में उढ़ते जाना नही, वरन् उपग्रहों की तरह धरती की परिक्रमा लगाने लगता है। समुद्र में भाप आरम्भ में ही ऊपर उठती है इसके बाद उसकी गतिविधियाँ अग्रगामी बनती और परिभ्रमण पर निकलती है। उन्मुक्त आकाश में पक्षियों की तरह परिभ्रमण करते और अपनी उदारता बरसा कर धरातल को कृतकृत्य करते हुए अपना अस्तित्व सार्थक करता है। भाप से लेकर सन्त महामानवों तकका यही नीति निर्धारण है। पवन, विद्युत, प्राण, ईथर जैसे तत्व व्यापक और गतिशील देखे जाते है। उनका अस्तित्व और कार्यक्षेत्र सीमा बंधनों में नहीं बंधता। इसी को मुक्ति कहते है। मानवी सत्ता का लक्ष्य यही है।

उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने से यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि शुद्रता, संकीर्ण स्वार्थपरता और स्थानीय गतिविधियों एवं प्रत्यक्ष उपलब्ध्यों तक सीमित रहती है। जबकि महानता परमार्थ में रुचि लेती और वसुधैव कुटुम्बकम् की उदार गतिविधियों को अपनाती है। उसका कार्यक्षेत्र उतना ही विस्तृत होता है जितनी की उसकी उदगम सत्ता है। परमात्मा असीम है। चेतना को जब जितना अवसर अपने मूल स्वरुप में विकसित होने को मिलता है तब वह उसी परिमाण में व्यापक, उदार एवं उदात्त बनने का प्रयत्न करती है।

व्यापकता को आकाश कहते है। आकाश जितना विस्तृत है उतना ही उपलब्धियों की दृष्टि से महान है। धरती पर जितना कुछ है उसकी तुलना में आकाश अनन्तगुना अधिक है। पृथ्वी की सत्ता और सौर मण्डल के विस्तार वैभव की दृष्टि से नगण्य है। ब्रह्यण्ड के विस्तार को देखते हुए उसका स्थान बाल की नोंक जितना भी नहीं रहता, पृथ्वी का वैभव स्वल्प, इसमें भी मनुष्य की सत्ता और सम्पदा को तो तुच्छता की दृष्टि से उपहासास्पद ही कह सकते हे। वैभव का अनन्त भाण्डागार आकाश में भरा पड़ा है। विकसित चेतनाएं अपना सर्म्पक उसी से साधती और कार्यक्षेत्र उसी को बनाती हैं। यही है सच्चे, अर्थो में वैभववान और प्रगतिशील बनने का भाग। महा पुरुषों की विश्व हित की प्रधानता देने वाली दृष्टि ही उन्हें प्रातः स्मरणीय बनाती है। अध्यात्मवादी अदृश्य जगत से अपना सम्बन्ध साधते और सिद्धियों की देव सम्पदा का प्रचुर परिमाण में उपार्जन करते हैं। यहाँ तक कि वैज्ञानिक भी प्रकृति के व्यापक रहस्यों को खोजते रहे है। कारखानों में ढलाई करने वाले कारीगर होते है वैज्ञानिक नही। सीमित श्रमिक या शिल्पी कहलाते हैं। असीम से सम्बन्ध जोड़ने वाले कलाकार, दार्शनिक, विज्ञानी एवं देवात्मा कहलाते है।

अदृश्य सम्पदा की दृष्टि से भी महान है और अनुभूति की दृष्टि से भी आनन्द मय। व्यक्ति के उत्थान में जितना क्षेय पुरुषार्थ का है उससे अध्कि संव्याप्त वातावरण एवं अदृश्य के अनुदान का। विभूतियाँ परोक्ष से उपलब्ध होती है। इन दैवी सम्प्रदायों की गरिमा कल्पनातीत है। जो पाता है सो निहाल बनता हैं चन्दन वृक्ष की तरह उनका अस्तित्व समीपवर्ती सारे वातावरण को सुगन्ध् से भरता रहता है।

युग परिवर्तन में प्रत्यक्ष पुरुषार्थ तो करने ही होंगे। बौद्धिक, नैतिक, और सामाजिक कान्ति के लिए लोकशिक्षण से लेकर रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रमों तक की अनेकानेक गतिविधियाँ अपनानी और क्रियान्वित करनी होगी। यह प्रत्यक्ष है। परोक्ष के अनुदानों का उसमें सवावेश अत्यध्कि आवश्यक है। प्रस्तुत विपत्तियों के कारण यदि प्रत्यक्ष ही रहे हाते तो उनका समाधन मानवी पुरुषार्थ से सरलता पूर्वक हो गया होता, किन्तु तथ्य इसमें कही आग है अन्तरिक्ष की प्रतिकूलता असाधारण रुप से बाधक है। यह प्रकृति प्रदत्त है या मनुष्य कृत इस विवाद में पड़ने की अपेक्षा इस तथ्य को समझना आवश्यक है कि अदृश्य का अनुकलन आवश्यक है। सूक्ष्म जगत में प्रतिपक्षी परिस्थितियाँ बनी रही तो सुरक्षा और सृजन के उदृदेश्य अधूरे ही बने रहेंगे।

प्रत्यक्ष कारणों से जो समस्याएँ एवं विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं उनकी जानकारी प्रायः सभी को रहती है और साध्नोंके अनुरुप सुधार प्रक्रिया भी चलती है। पर इसके अतिरिक्त भी कुछ सोचना और करना शेष रह जाता है। इस दिशा में कुछ नया सोचने की सामग्री इन पृष्ठों पर मिलती है। इस प्िरतपादन का यदि महत्व समझा जा सके तो अगला कदम यही रह जाता है कि अन्तरिक्ष परिशोधन एवं अनुकूलन का उपाय भी किया जाय। प्रत्यक्ष पुरुषार्थ के साथ-साथ अदृश्य का अनुकूलन बन पड़ने पर ही वह स्थिति उत्पन्न होगी जिसमें समग्र समस्याओं का समाधान और उज्जवल भविष्य का निर्धारण सम्भव हो सके।

अध्यात्म का कार्य क्ष्त्रा अन्तरिक्ष है। व्यापक दृष्टि अपनाने की ब्रहम विद्या में अभिरुचि एवं गतिशीलता को विश्वव्यापी बनाने की प्रेरणा भरी पड़ी है। साधना में अनन्त के साथ सम्बन्ध जोड़ा और और अदृश्य अनुदानों को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रत्यक्ष अनुदानों की तुलना में परोक्ष वरदान कितने अधिक समर्थ होते हैं इसे सभी जानते है।

र्स्वग ऊपर है। देवता भी ऊपर रहते हैं। इस अंलकार का तार्त्पय उस उदात्त सत्ता की ओर संकेत करना है जो अन्तरिक्ष व्यापी है। जो व्यक्तित्व को महान और वातावरण को सुखद बनाने में समर्थ है। विज्ञान धरती पर प्रयोगशाला बनाते है पर खोजते अन्तरिक्ष को हैं। अध्यात्म में साधना तक उपचार तो शरीर और साधनों के सहारे ही किये जाते है किन्तु साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि जो मिलना है वह अन्तरिक्ष से बरसेगा और धरती पर उगेगा। दैवी अनुग्रह, साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।

अदृश्य का अनुकूलन युग परिवर्तन जैसे महान कार्य को सम्पन्न करने के लिए अनिवार्य रुप् से आवश्यक है। मानवीय दृष्टिकोण में उत्कृष्टता के समावेश और प्रचलन प्रवाह में आदर्शों का अभिवर्धन। यही है मनुष्य में वत्व का उदय और धरती पर र्स्वग का अवतरण जिसके लिए अदृश्य में अन्तरिक्ष में सघन सर्म्पक साधने की आवश्यकता है। युग ‘सृजेताओं को रचनात्मक प्रत्यक्ष प्रयत्नों में इस अदृश्य के अनुकूलन को भी साथ लेकर चलना है।’


सावधान् स्वर दूषण-त्रिशिरा-मारीच आ रहे हैं

विज्ञान ने मनुष्य को कितनी ही साधन सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं और उसे पहले की अपेक्षा समृद्ध सम्पन्न बनाया हैं। उसकी शक्ति बढ़ी है और सामर्थ्य भी। विकास की गवेषणा करते समय वर्तमान शताब्दी को विज्ञान का युग कहा जाता है। परन्तु इस विज्ञान का एक और पहलू भी है वह है वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग और उस आधार पर खड़ी की गई साधन सुविधाओं से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण। यह प्रदूषण हवा, पानी और खाद्य वस्तुओं को विषाक्त कर किस प्रकार मानव-जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर रहा है? अब इस दिशा में भी गम्भीरता से विचार किया जाने लगा है।

उदाहरण के लिए वायु को ही लें। वह मनुष्य ही नहीं संसार के समस्त जीवित प्राणियों और वृक्ष वनस्पतियों के लिए आवश्यक महत्व है। सम्भवतः इसी लिए प्रकृति ने समस्त पृथ्वी मण्डल को वायु से आच्छादित कर रखा है। एक सामान्य व्यक्ति दिन भर में लगभग 35 पौंड वायु का सेवन करता है। यह मात्रा सारे दिन में ग्रहण ये गये अन्न और जल से आठ गुना अधिक है। इसी से प्रतीत होता है कि मनुष्य जीवन में वायु का महत्व समस्त खाद्य वस्तुओं में कितना अधिक है? अन्न और जल के अभाव में तो मनुष्य फिर भी कुछ समय तक जीवित रह लेता है किन्तु वायु के बिना तो कुछ ही क्षणों में उसके प्राण घूटने लगते है।

इसके साथ ही यह भी एक तत्य है कि जीवित रहने के लिए केवल अन्न और जल का होना ही पर्याप्त नहीं हैं, उसे स्वस्थ बनाये रखने के लिए स्वच्छ और पौष्टिक भोजन चाहिए। वह न मिले तो भी कोई कठिनाई नहीं है, किन्तु कम से कम भोजन और पानी गन्दा तथा सड़ा हुआ तो नहीं ही होना चाहिए। गन्दा और सड़ा भोजन कर लेने से जी मिचलाने लगता है और तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन में और तरह की त्रुटियाँ हो तो उसके विष शरीर में घुलते रहते हैं तथा कुछ समय बाद अपनी दूषित प्रतिक्रिया शारीरिक, मानसिक व्याधि के रुप में प्रकट करने लगते है। आठ गुना कम आवश्यक और सेवित दूषित अन्न के प्रदूषण की मात्रा में जब मनुष्य इतना प्रभावित हो सकता है, तब दूषित वायु मनुष्य के स्वास्थ्य पर कितना घातक दुष्प्रभाव डालती होगी? इनकी कल्पना नहीं की जा सकती।

विश्व के मूर्धन्य विचारक और मनीषि अब इस समस्या पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और मान रहे कि औद्योगीकरण तथा आधुनिक सभ्यता द्वारा मशीनी ढाँचे में ढाली जा रही मनुष्य की जिन्दगी जिन अभिशापों से त्रस्त हुई है, वायु प्रदूषण उनमें एक है और सम्भवतः सबसे प्रमुख भी। अमेरिका की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तथा राष्ट्रीय केंसर संस्थान के निर्देशक कथन है कि इन दिनों जिस गति से वायु प्रदूषण हो रहा है यदि यही क्रम कुछ और वर्षों चलता रहा तो मनुष्य को मारने के लिए किसी बड़े युद्ध की अथवा आणविक अस्त्रों के उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी वरन् वायु प्रदूषण ही इस काम को पूरा कर देगा।

वायु प्रदूषण के परिणाम कितने घातक हो सकते हैं? इस सम्बन्ध में आए दिनों चर्चाएँ तो चलाई जाती हैं किन्तु उसकी रोकथाम के लिए कोई बड़े प्रयास कम ही किये जाते है। अमेरिका में प्रति वर्ष 200 करोड़ टन दूषित तत्व वायु में मिलते रहते है। जर्मनी, फ्राँस, इटली, रुस, और ब्रिटेन भी इससे पीछे नहीं है। इन देशों में तथा विश्व के अन्य दूसरे देशों में उत्पन्न हो वाला प्रदूषण वायु को इतना विषाक्त बना रहा है, उसमें इतने प्रदूषण वयु को इतना विषाक्त बना रहा है, उसमें इतने विषैले तत्व घोल रहा है कि क्रम इसी प्रकार चलता रहा तो प्रदूषण के कारण पृथ्वी के भंयकर रुप से गर्म हो उठने की संभावना है और धुएं के कारण प्राणियों के घुट घुटकर मर जाने की आशंका है।

यह आशंका तो जब पूरी होगी तब होगी परन्तु इन दिनों वायु प्रदूषण जन जीवन पर अपना बुरा प्रभाव डालने से नहीं चूक रहा है। उन्नत, विकसित और आधुनिक देशों के महा नगरों की स्थिति देखी जाए तो प्रतीत होगा कि इस कारण वहाँ का जीवन आए दिन अस्तव्यस्त होता रहता है। पिछले दिनों बी.बी.सी. के एक प्रसारण में बताया गया कि लन्दन की सड़को पर नियुक्त ट्रैफिक पुलिस को अक्सर अपने चेहरे मास्क से ढकने पड़ते है। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि वहाँ की सड़कों पर दौडने वाले वाहन इतना धुँआ उगलते है कि कई बार दिन में ही धुँध छा जाती है। टै्रफिक पुलिस के सिपाह यदि ऐसा न करें तो उनके लिए पाँच घण्टे खड़ा रह पाना मुश्किल हो जाय।

यही हाल जापान की राजधानी टोक्यो का है। वहाँ की सड़कों पर भी कई बार वाहनों की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि धुँए के कारण छाई हुई ध्ध से बचने के लिए सरकारी तौर पर घोषणा करनी पडती है। पिछले वर्ष इस तरह की घोषणा 120 बार की गई ओर ट्रैफिक पुलिस को आधा आधा घण्टे बाद अपनी ड्यूटी छोड़कर चौराहों की बगल में आक्सीजन टंकियों से साँस लेने के लिए जाना पड़ा।

यह धुँआ आदमी को घुट-घुट कर मरने के लिए बाध्य करेगा तब करेगा किन्तु दुष्प्रभाव विभिन्न रुपों में जनस्वास्थ्य से अभी ही खिलवाड़ करने लगे जापान में सौ व्यक्तियों पीछे एक व्यक्ति अनिवार्य रुप् से ‘ब्राकाँइटिस’ का रोगीहै। इसका कारण और कुछ नहीं धुँआ ही है, जिसे मोटर कारें, रेलगाडियों और कल कारखानें की चिमनियाँ निरन्तर उगलती रहती है बढ़ते हुए औद्योगीकरण के कारण कई मानसिक रोग, कैंसर, हृदय रोग तथा यक्ष्मा जैसे राजरोग भी बढे है। अमेरिका की राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान समिति के अनुसार इन रोगोंकी बाढ़ का एक बड़ा कारण हवा में घुला हुआ यह जहर है।

जर्मनी के उद्योग धन्धे प्रतिवर्ष 2 करोड़ टन विषाक्त द्रव्य हवा में उड़ाते हैं। इनमें कोयला ओर तेल जलाने से उत्पन्न हुई गैस तथा जमीन खोदकर इन पदार्थों को निकालते समय उड़ने वाली गैस प्रमुख है। अमेरिका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘डाइवमैगजीन’ में बताया गया है कि एक कार साल भर इतना धुँआ उगल देती है कि उसके कार्बनडाई आक्साइड से ईसाइयों के प्रसिद्ध चर्च सेंटपाल का गुम्बद दो बार कार्बन मोनो आक्साइड से तीन कमरो वाला बंगाला नौ बार तथा नाइट्रोजन से एक डबल डैकर बस दोबार भरी जा सकती है।एक कार द्वारा सात वर्ष में उगले गये धुँए का यदि सीसा छान लिया जाय तो वह एक गोता खोर के सीने को ढकने के लिए बनाये जाने वाले बख्तर के लिए पर्याप्त होगा।

यह नापतौल तो एक कार से उत्पन्न होने वाले विषाक्त तत्वों के बारे में है, जबकि इस समय विश्व भर में करोड़ों कारें हैं। अकेले ब्रिटेन में डेढ करोड कारें और मोटर गाड़िया हैं। अमेरिका के सम्बन्ध में कहते हैं कि कारों का उत्पादन बच्चों से भी ज्यादा होता है। जितनी देर में वहाँ पाँच बच्चे पैदा होते उतनी देर में वहाँ सात कारें बन कर तैयार हो जाती है। वहाँ के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने लिखा है कि पिछले वर्ष केवल कार मोटरों द्वारा 360 लाख टन धुँआ वायुमण्डल में छोड़ा गया तो यह भी एक तथ्य है कि पैट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन वायु प्रदूषण के लिए केवल तीस प्रतिशत ही जिम्मेदार हैं जबकि बाकी शतप्रतिशत वायु प्रदूषण ‘कल’ कारखानों और छोटी बड़ी फैक्टरियों द्वारा होता है।

इन स्रोतों से हवा में घूलने वाला विष मानव स्वास्थ्य पर तो प्रभाव डालता ही है अन्य जीवजन्तुओं को भी समान रुप से प्रभावित करता तथा प्राकृतिक स्रोतों को भी गन्दा ओर जहरीला बनाता है। अमेरिका तथा यूरोप के कतिपय देशों में इन दिनों पशु पक्षियों की प्रजनन क्षमता में भारी कमी आई है। लारेंड (मेरीलैंड) स्थित “ब्यूरो आफ स्पोर्ट फिशरीज एण्ड वाइल्ड लाइफ” संस्थान के दो वैज्ञानिक आर.डी.पोर्टर तथा एस.एन.वायत्रेयरने कुछ पक्षियों पर परीक्षण किए ओरपाया कि औद्योगिक महानगरों में तथा उनके आस-पास के क्षत्रों में रहने वाले पक्षी अन्य स्थानों पर रहने वाले पक्षियों से कम अण्डे तो देते ही है, वे अपने अण्डे स्वयं ही नष्ट भी करने लगते हैं इसके अतिरिक्त इन पक्षियों के अण्डो को ऊपरी पर्त अपेक्षाकृत पतली पाई गई और वे तनिक से आघात के कारण यहाँ तक कि उन्हें साँस लेने के लिए बैठने वाली मादा द्वारा हिलने डुलने भर से टूटने लगे।

वृक्ष वनस्पति वायु प्रदूषण के संकट को कम करने में कुछ सहायक होते है किन्तु इन दिनों बढ़ती हुई आबादी के लिए भरण-पोषण के उपयुक्त अन्न पैदा करने के लिए कृषि योग्य जमीन की भी माँग भी तो बढ़ी है। कृषि के लिए बढ़ती हुई जमीन की माँग को पूरा करनेके लिए जंगल सफाया करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचता। सो, वहीं उपाय अपनाया जा रहा है। और वायु प्रदूषण की भयावहता कम करने लिए रहे बचे उपाय भी नष्ट होते जा रहे है।

वायु प्रदूषण के कारण होने वाली रासायनिक प्रक्रियाएँ वायु दुर्घटनाओं, बीमारियों का ही कारण नहीं बनेगी वरन् उससे भूकम्प ज्वालामुखियों के विस्फोट तथा समुद्र में तुफान जैसी प्राकृतिक विपत्तियाँ भी कहर ढाएंगी। गर्भस्थ शिशु पर तो इस प्रदूषण का प्रभाव अभी से पड़ने लगा है। अमेरिका के महानगरों में कुछ तथा टेडे मेडे बच्चों की जन्म दर पिछले वर्षों से निरन्तर बढ़ती जा रही है। कुछ ही दिनों में वायु में घुले जहर से प्रभावित होकर खरप्रदूषण त्रिशिरा और मारीच जैसी कूबड़ी भंयकर विचित्र संतानें उत्पन्न होने लगें तो कोई आर्श्चय नहीं होगा। वायु प्रदूषण मनुष्य जीवन को अनेक पहलुओं से दबोचता बढ़ रहा है और उसके कारण मनुष्य जीवन का अन्त बहुत ही निकट दिखाई देने लगा है। उससे कैसे बचा जाए? अब इस प्रश्न को उपेक्षित नहीं किया जा सकता।


अवरोध पुरुषार्थ के निरीक्षक, परीक्षक

आवरण और अनुबंधो की कमी नहीं। वे कष्ट कारक प्रतीत होते हैं और प्रगति पथ में अवरोध उत्पन्न करने के कारण खीज भी उत्पन्न करते हैं। इतने पर भी एक तथ्य स्पष्ट है कि विशेष पुरुषार्थ के मूल्य पर विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त करने की व्यवस्था बनी रहनी ही श्रेयस्कर है। इससे प्रबल पुरुषार्थ को उत्तेजन मिलता है और अकर्मण्य को झकझोरने वाला वातावरण उत्पन्न होता है।

अवरोधों का अस्तित्व न हो और हर उपलब्धि हर किसी के लिए सम्भव रहा करे तो फिर साहसिकता और पुरुषार्थ परायणता की कोई आवश्यकता ही न रह जायगी। ऐसी दशा में सुविधा सम्पन्न लोगों का व्यक्तित्व भी गया गुजरा बन कर रह जायगा। वे उन उपलब्ध्यों का आनन्द भी न ले सकेंगे, जिनकी अपेक्षा एवं कामना किया करते हैं। प्राप्त कर लेना ही सब कुछ नहीं है।

उपब्धियों की सुरक्षा एवं उनके सदुपयोग की दूर दर्शिता भी सहज ही नहीं मिल जाती। उसके लिए भी पराक्रम चाहिए। भोजन मिल जाना ही सब कुछ नहीं है, उसे पचाने की क्षमता भी चाहिए। उपलब्धियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। सृष्टि व्यवस्था में बहुत कुछ बहुमूल्य है किंतु वह रहस्यमय बना रहता है। यह इसलिए है कि पुरुषार्थ की प्रतिद्धन्दता में उतरने वाले इस विशिष्ट का उपहार प्राप्त कर सकें और अन्यान्यों को वैसा ही करने का उत्तेजन दे सकें।

पृथ्वी के वातारवरण एवं स्िल में सीमावद्ध होने के कारण हमें प्रकृति की अनेकों सूक्ष्म शक्तियों का अनुभव नहीं हो पाता। वद्ध क्षेत्र से परे जाने के प्रयत्न में पता चलता है कि प्रकृति अपनी शक्तियों द्धारा किस प्रकार रास्ता रोके खड़ी है। उदाहरणार्थ पृथ्वी से चन्द्रमा पर जाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वार्षण शक्ति से पार जाने के लिए 25 हजार प्रति घण्टे मील से चलने वाले राकेट की आवश्यकता होती है। इससे कम में प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण शक्ति से निकल सकना सम्भव नहीं है गति कम हो तो उल्टे हानि की सम्भावना होगी। राकेट कुछ दूर जाकर पुनः पृथ्वी की कक्षा में ही परिक्रमा करते हुए गिर जायेगा। दो सौ मील की ऊचाँई पर जाने पर हवा का दबाव समाप्त हो जाता है। अधिक ऊचाँई के लिए आक्सीजन साथ ले जाने की आवश्यकता होती है।

शून्य आकाश में तो हम हलके गुब्बारे की तरह तैरने लगते है। चन्द्रमा पर भी शरीर अत्यन्त हलका मालूम पड़ता है। वायु न होने के कारण निकटवर्ती ताप की आवाज भी नहीं सुनाई पड़ती। अन्य ग्रहों की परिस्थितियाँ भिन्न भिन्न हैं। इस कारण उन पर अनुभूतियाँ भी एक जैसी नहीं होंगी। इस ब्रह्ममाण्ड में अनेकों ग्रह नक्षत्र ऐसे हैं जहाँ वनज हवा की तरह हलका तथा पहाड़ जैसा भारी हो सकता है। यह वस्तुतः उस स्थान पर कार्य कर रही आकर्षण शक्ति के कारण होता है।

उदारणार्थ सूर्योदय सूर्यास्त के समय में परिवर्तन होने से पृथ्वी के मौसम भी बदल जायेंगे। हवा क दबाव न रहे तो हम आकाश में उड़ने लगेंगे। पृथ्वी के वातावरण में परिवर्तन होने अथवा इस क्षेत्र के परे जाने पर जिस प्रकार अनुभूतियों के स्तर भी बदल जाते हैं। उसी प्रकार सृष्टि जब तक स्थूल में केन्द्रित होती हैं, चेतना की असीम सामर्थ्यें मा पता नहीं लग पाता। साधनात्मक उपचार ही वह तीव्र गति से चलने वाले राकेट हैं जो वस्तुओं के प्रचण्ड़ आकर्षण शक्ति से साधक को परे ले जाते तथा चेतना की गहराइयों में प्रविष्ट कराते हैं।

पृथ्वी के सीमाबद्ध वातावरण में बहुत कुछ है सीमित पराक्रम वालों को उतने से ही सन्तोष करना पड़ता है असीमता आनन्द लेने के लिए असीम साहस और असीम प्रयास की आवश्यकता होती है। इसी कटु सत्य का दर्शन पृथ्वी क इर्द गिर्द छाये हुए वातावरण और उससे ऊपर निकलने क प्रयास करने वालों की सफलताओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता है।


सहकारिता ही उर्त्कष का आधार

यह सारा संसार सहकारिता के सिद्धान्त पर काम कर रहा है। यदि कोई यह विचार करे कि वह इस जीवन यात्रा में एकाकी ही रहकर अपना लक्ष्य पा लेगा तो यह असम्भव ही माना जाना चाहिए। सृष्टा ने इसी कारण असंख्यों ग्रह नक्षत्रों-तारामण्ड़लो एवं गुच्छकों का एक परिवार बसाया है। आपसी सहकार के आधार पर ही उनकी विधि व्यवस्था टिकी हुई है। यदि इनमें से एक भी ग्रह बिना दूसरे की चिन्ता किये अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करने लगे तो अन्त विनाशकारी ही होगा।

विश्व का एक छोटा सा संस्करण परिवार व्यवस्था के रुप में दीख पड़ता है। समाज की यह इकाई अपने आप में समग्र हो पाती है तो मात्र उसके सदस्यों की परस्पर सहजीवी भावना के कारण। परस्पर स्नेहसौहार्द्र एवं सहयोग जिन्दा न रहे तो देखते-देखते बने बनाये संयुक्त कुटुम्ब विघटित होते चले जाते हैं। ऐसी ही कुछ व्यवस्था विश्व नियन्ता ने प्रकृति के अपने साम्राज्य में की है। कीट-पक्षी, वृक्षपुष्प, मानव-वनस्पति इत्यादि परस्पर सहकारिता के आधार पर ही जीवन जीते हैं। अध्यात्म प्रतिपादन यह बताते हैं कि विराट् बह्म की असीम चेतना ही चारों ओर व्याप्त है। लघुतम इकाई में संव्याप्त चेतना सहज स्वभाव है-स्नेह-सहयोग। ‘इकाँलाजी’ विज्ञान के अध्येता बताते हैं कि प्रकृतिगत सन्तुलन इसी स्नहे-सहयोग पर आधारित है।

मनुष्य का प्रतिक्षण साँस से प्राणवायु ग्रहण करना, उन वृक्षों के कारण सम्भव हो पाता है जो वातावरण में निरन्तर इसे उत्सर्जित करते रहते है। भले ही इसके लिये उन्हें बदले में कार्बनडाइआक्साइड के रुप में विष क्यों न पीना पड़े। वृक्षो का स्वंय का विकास, उनका फलना-फूलना भी कीट-पतंगो तथा पशु पक्षियों के समुदाय के सहयोग पर निर्भर है। सह-अस्तित्व के ऐसे अनोखे उदाहरण मनुष्य को प्रेरणा देते रहते हैं कि वह भी अकेला न रहकर परस्पर सहयोग की अपनी अन्तवृत्ति का विकास करे।

सृष्टा ने प्रकृति को अनगिनत रंगों से भर दिया है। दिन रात फूलों के बीच रह कर भी क्या कोई ऐसा बना सकता है कि फूलों से खुशबनमा रंग, मनमोहक गन्ध और मादक रस क्यों होते हैं? इसका समाधान हमें मिलता है फूलवीटों के उस अद्भूत साहचर्य को देखकर, जिसके कारण कीट उनकी वृद्धि में सहायक होते हैं। परागण प्रक्रिया के लिए फूलों को पक्षियों-पतंगो कीटों की आवश्यकता होती है। पर यह सेवा एकाँगी नहीं है। बदले में वह अपना मधुर मधु उन्हें छानकर पीने से दूसरे पौधे पर जाती है। साथ ही अपने परों और परों में उनका पराग लपेटकर यहाँ से वहाँ बिखेरती जाती हैं। फूलों का परिवार अपनी वंशवृद्धि इसी प्रकार करता है। शहद की मक्खी इसी पराग को अपने पुरुषार्थ से मधु में बदल देती है, जो मानव के लिए उपयोगी होता है। संगठन और सहयोग को इसी प्रक्रिया को अपना कर प्रत्येक घटक उर्त्कष के पथ पर बढ़ता है।

फल अपने मित्रो को रिझाने के लिए तरह-तरह क रंगरुप एवं गन्धों से अपने का सुसज्जित करते हैं। कई तो चटकीले रंगो की सज धज दिखाते है और कई अलग समय निर्धारित हैं। तेज आँधी तूफान में फूल स्वंय अपने पट बन्द कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आँधी तूफान में उनके सखा ये जन्तु टिक नहीं सकेंगे। कीटों तथा पक्षियों की ध्राणेन्द्रिय इतनी तीव्र होती है कि मीलों दूर से अपने पुष्प् मित्रों क निमन्त्रण पाकर प्रेम की डोर सेिखंचे चले आते हैं। जिन पेड़ो पर कभी फूल नहीं आते, वे पक्षियों,-कीटों के द्धारा लना क ही पात्र होते हैं। ‘पौपलर’ ऐसा ही एक हीन वृक्ष है, जिस पर किसी भी पक्षी को नाज है। इसमें बसन्त में पत्ते तो नये आते हैं, पर फूल नहीं आते। ऐसे वृक्ष एकाकी एवं मनहूस व्यक्ति तरह अर्ध विकसित रह जाते हैं। अपनी देने की के अभाव, असहयोग के कारण ही अपने प्रकृति वार के सदस्यों से उन्हें अवमानना का ही मुख देखना है।

बुलबुल को गुलाब पर एवं कुमरी को अशोक वृक्ष ही बैठना अच्छा लगता है। दोनों को ही अपने जगाओं पर नाज है। वृक्ष पर बैठा पक्षी-परिवार देखने को सुन्दर तो लगता ही है, उनका गान-चहकना प्रकृति प्रसन्नता की लहर फैला देता है। ये पक्षी गण मात्र प्रकृति में सौर्न्दय वृद्धि के लिए ही नहीं बल्कि अपनी के वृक्षों की वंश-वृद्धि हेतु भी मित्रता का सूत्र पड़े हुए है। सूक्ष्म, अल्प जीवन काल वाले पराग कणों का कम से कम समय में मीलों दूर तक इसी जाति के अन्य पुष्पों तक पहुँचाने का कार्य ये पक्षी गण करते हैं। मधुमक्खियाँ ‘क्रास पालिनेशन’ की प्रक्रिया में विशेष कार्य करती हैं। वे सामान्यता प्रति मिनट तीस फलों पराग लेती है और अपने पिछले पैरों से एक लाख पराग कण चिपका लेती हैं।

बहुत से वृक्ष ऐसे हैं, जिनके फल जमीन पर गिरकर बोये जाने पर मुश्किल से अंकुरित होते हैं। ये ही जब पक्षी मित्र के उदर में प्रवेश कर लेते हैं, तो कीट के साथ बाहर निकलने पर सहज ही अंकुरित हो जाते है। बीजों पर पक्षी के पेट में जो प्रतिक्रिया होती है, उससे उनकी उर्वरकता में अत्यधिक वृद्धि होती देखी गई है। ऐसे बीजो से उत्पन्न वृक्ष पीपल, वट, नीम के रुप में कई बार ऐसे स्िनो पर पाये जाते हैं, जहाँ उनके उगने की कोई सम्भावना नहीं थी।

जीवजगत में कमेन्सल्स के रुप में कुछ खास किस्म के सूक्ष्म जीवणु होते हैं। इनकी जीवन व्यवस्था भी ‘जियो और जीने दो की समाजवादी व्यवस्था का आदर्श उदाहरण है। इन्हें अपने विकास के साधनों का कुछ ज्ञान नहीं होता। इसीलिए अपने आपको जीवित रखने एवं आजीविका के लिए इनहे समाज के परिगणित, पिछडे़ पद्दलित व्यक्तियों की तरह साधनों की आवश्यकता होती है। इसे दूसरे सहयोगी महत्वपूर्ण जीवाणु ‘एमिनो एसिड’ का निर्माण कर पूरा करते है। ये एरोब्ज जीवणु इस तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि मनुष्य को अपने ही नहीं, दूसरों के विकास का भी ध्यान रखना चाहिए।

कुछ पौधों की जड़ो में अत्यन्त सूक्ष्म बैक्टीरिया होते हैं। ये वायुमण्डल के नाइट्रोजन साइकल से सीधे नाइट्रोजन खींच कर उसे नाइट्रेट के रुप में बदल देते हैं। इस परिवर्धित तत्व को पौधे आसानी से आत्मसात कर लेते हैं। रेंगने वाले केंचुऐ इसी तरहज मिट्टी को निगल कर उसे शरीर के अन्दर रासायनिक प्रक्रिया द्धारा विशिष्ट बनाकर मलद्धार से निकाल देते हैं जो बडी उपजाऊ हो जाती है।

प्रकृति जगत के ये अनेकानेक उदाहरण सहकारिता द्धारा एक दूसरे के विकास के सिद्धान्त का ही समर्थन करते है। पक्षी एवं वृक्षों का परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध पृथ्वी के सूक्ष्म जीवी बैक्टीरिया का वातावरण संन्तुलन को बनाये रखने में योगदान, वृक्षों द्धारा वातावरण संशोधन एवं प्राणवायु की वृद्धि से मानव के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण-ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें इकालाँजी विज्ञानी पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। सह अस्तित्व एवं परस्पर सहकार के ये ज्वलन्त उदाहारण मानव को सामाजिक जीवन में भी इन्ही गुणों को उतारने के लिए अभिप्रेरित करते हैं।

चाहे जन समुदाय की बात हो, चाहे प्रकृतिगत जड़ समझे जाने वाले पदार्थों की, सबके मूल में एक ही तथ्य काम करता है। वह है संगठन और सहयोग। व्यक्तिगत विकास के साथ ही सामूहिक उर्त्कष भी अनिवार्य है। इस प्रक्रिया का जितना अधिक अपनाया जा सकेगा- मनुष्य के लिए स्थायी सुख शन्ति, वाँछनीय एवं सुखकर परिस्थितियों के आधार ढूँढे जो सकेंगे। विश्व परिवार की कल्पना को साकार किया जा सकना तभी सम्भव हैं जब प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर से एक दूसरे के प्रति उदाहरणता-आत्मीयता-सहकारिता के भाव उमड़े, अपनी नहीं सबकी प्रगति की कामना जन्म लेने लगे।


विचारों और भावनाओं की शक्ति सामर्थ्य

सरोवर में तरगों की भाँति, सागर में लहरों की भाँति मन क्षेत्र में भी कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी वह शान्त सरिता की भाँति शान्त, मन्द और शीतल वायु का र्स्पश करता हुआ बहता है। तो कभी उसमें समुद्री ज्वार और चक्रवात की तरह जोर के उफान आते रहते हैं। मन का यही स्वभाव हैं ओर इसी विशेषता के कारण उसे चेतना का अंग कहा गया है। जो सदा सर्वदा एस-सी स्थिति में ही पड़ा रहे उसे जड़ नहीं तो ओर क्या कहा जायगा। चेतन प्राणियों की चेतन सत्ता ही नहीं वस्तु, व्यक्ति ओर परिस्थिति की दशा भी एक जैसी नहीं रहती। प्रकृति जड़ वस्तुओं को भी नचाती रहती हैं। उनमें प्रकृति चक्र के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव होता है, वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। यह व्यक्ति की अपनी मनोदशा, मानसिक बनावट पर निर्भर है कि वह इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करे आर क्या न करे ? घटनाक्रम पर किस द्रष्टि से सोचा जाय औश्र किस द्रष्टि से न सोचा जाए ? यह भी व्यक्ति की अपनी मानसिक बनावट पर निर्भर करता है।

जिन लोगों को सही द्रष्टि से सोचना नहीं आता वह सामान्य परिस्थितियों में भी उद्धिग्न ओर क्षुब्ध हो उठते हैं तथा जो सही ढंग से सोचना जानते हैं वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह समय हँसते-खेलते गुजार देते हैं। जिन्हें तैरना आता है वे विपरीत दिशा में हवा चलने पर, झंझा और तूफान आने पर, उ6म वेग से बाढ़ आई नदी में भी तैरकर पार हो जाते हैं ओर जो तैरना नहीं जानते वे शान्त, स्थिर जल में भी होशोहवाश खो बैठते हैं ओर डूब मरते हैं। सही द्रष्टि से सोचने की कला भी ऐसी ही है। यदि वह आ गई तो व्यक्ति सभी परिस्थितियों में शान्त, सन्तुलित और सन्तुष्ट रह लेता है ओर ठीक ढग से सोचना नहीं आता, वस्तुओं ओर परिस्थितियों को उनके सही सर्न्दभ में देखना जिन्हें नहीं आता वे साधारण परिस्थितियों में भी उद्धिग्न और दुःखी हो उठते हैं।

इसका क्या कारण है ? उत्तर एक ही है विचारों का प्रभाव, विचारों की शक्ति। विचार ही व्यक्तियों को प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने और साहसपूर्वक उन्हें चीरकर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं और विचार ही अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में व्यक्ति को निराश, हताश, ओर पस्त हिम्मत बना देते हैं। वस्तुतः विचार एक शक्ति है और शक्ति का भला या बुरा कैसा भी उपयोग किया जा सकता है। शक्ति का सदुपयोग होता है या दुरुपयोग यह उपयोग करने वाले पर निर्भर है। आग एक खाना भी पकाती है ओर उसी से मकान भी जलाया जा सकता है। विचार भी आग से कम नहीं है, वरन् अधिक ही है। उनसे परिस्थितियों और जीवन के गम्भीर व बड़े उतार-चढ़ावों को बड़ी आसानी से भी पार किया जा सकता है और उनके कारण सीधी-सपाट सड़क पर भी ठोकर खाकर गिरा जा सकता है।

विचारों की शक्ति के सम्बन्ध में प्रो. एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक ‘मिरेकल्स आफ नेचर’ में लिखा है- ‘प्रकाश की तुलना में विचार विघुत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। इसे अभी यन्त्रों द्धारा मापा या देखा नहीं जा सका तो भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ है। उनकी गति ओर क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।’ वस्तुतः विचारों की शक्ति के कुछ साधारण से अनुभव ही हमें होते है। जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया, विचारों के प्रभाव का ज्ञान बहुत सामान्य ही हो पाता है। यघपि वह भी कोई कम नहीं है। फिर भी विचारों में कितनी शक्ति है ? इसका अनुमान लगा पाना अभी तक न विज्ञान के लिए सम्भव हुआ है ओर न ही कोई विचारक उसका अनुमान कर पाये हैं।

लुईरा क्राउन ने विचारों के शक्ति के सम्बन्ध में कहा है- ‘ताप, विघुत आदि की ऊर्जा केवल भौतिक पदार्थो को ही नरम-गरम करती ओर उनमें परिवर्तन कर सकती है, किन्तु विचारों की शक्ति समूचे वातावरण से ही आर्श्चयजनक मात्रा में परिवर्तन कर सकती है। तना को प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में चारों का स्थान ही सर्वपरम है। वे आने उद्गम स्थान को, विचार करने वाले को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं ओर फिर अपने समीप क्षेत्र पर प्रभाव डालते हुए असीम दूरी तक बढ़ते चले जाते है। उनकी सामर्थ्य का स्तर प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरुप करता है ओर उसी के अनुसार अन्यान्य व्यक्तियों, प्राणियों ओर यहाँ तक कि वस्तुओं का भी प्रभावित किया जा सकता है।

विचार शक्ति का वह अति सामर्थ्यवान स्तर गहन अनुसन्धान का विषय है। यहाँ चर्चा इतनी ही की जा रही है कि किस प्रकार कोई व्यक्ति इस शक्ति का उपयोग अपने सामान्य जीवन क्रम में करके सुखी व सन्तुष्ट रह सकता है ? विचारधारा को सही खा जाए तो कोई भी व्यक्ति किन्ही भी परिस्थितियों में सुखी रह सकता है, और जीवन के किसी भी क्षेत्र में अवाँछनीय कूड़ा-करवट अनुपयुक्त विचारों के रुप में भर लिया गया तो उनकी सड़ाँद से जीवन का एक-एक कण और एक-एक क्षण विषाक्त हो जाता है। शरीर सन्तुलन गड़बड़ा जाता है और साधारण जीवन की सामान्य समस्याओं का सही हल ढूँढना भी सम्भव नहीं रह जाता।

मानवीय मस्तिष्क में उठने वाली विचारणाओं भावतरंगों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है- एक सृजनात्मक ओर दूसरा ध्वंसात्मक। सृजनात्मक विचारों या भावनाओं में उन्हें लिया जा सकता है जो जीवन में आनन्द और सुख-सन्तोष की सृष्टि करते हैं। इस श्रेण्ी में प्रसन्नता, सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा आदि की गणना की जा सकती है। ध्वंसात्मक भावनाओं और विचारणाओं में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, निराश, खीझ आदि को गिना जा सकता है। जीव विज्ञानियों और मनःशास्त्रियों के अनुसार सृजानात्मक चिन्तन शरीरी पर उत्साहवर्धक अनुकल प्रभाव डालता है और इसके विपरीत ध्वंसत्माक चिन्तन के कारण उद्धिग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क कि कर्त्तव्य विपूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा ही जाती हैं। मकन में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पात कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विवारने और उपाय ढूँढने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्ताएँ विचारणएँ भभक उठती हैं।

दोनों स्तर के विचारों भावों का शरीर पर भी प्रत्यक्ष अभाव देखा जा सकता है। प्रसन्नता की मनःस्थिति में मनुष्य की आँखे चमकने लगती हैं, चेहरा गुलाबी हो उठता है, गालो व पुलकन उभरी हुई दिखाई पड़ती है और समूचा मुख मण्डल दीप्तिमन्त हो उठता है। इस स्थिति में व्यक्ति सहज ही आकर्षक और सुन्दर प्रतीत होने लगता है। इसके विपरीत क्रोध और घृणा के आवेश में व्यक्ति काँपने और हाँपने लगता है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। चेहरे पर तनाव ओर उत्तेजना के लक्षण प्रत्यक्ष दिखाई देने लगते हैं। होठ सख जाते हैं ओर मुहँ से ऐसे शब्द निकलते हैं जिनसे न कुछ लाभ होता है और न ही किसी प्रयोजन की सिद्धि होती है। इसके विपरीत आरोप और अपमान का ऐसा वातावरण बनता है, बन जाता है कि दूसरों की अपेक्षा अपनी ही हानि अधिक होती है।

विचारों और भावनाओं की शक्ति को, उनके प्रभावों को समझना चाहिए तथा सही ढंग से विचार करने की शक्ति विकसित करनी चाहिए ताकि जीवन को सरस, सरल, सुखद तथा आनन्दपूर्ण बनाया जा सके।


स्वास्थ्य और शान्ति का शत्रु क्रोध

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कई व्यक्तियों के नित्य सर्म्पक में आना पड़ता है और विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ व्यक्तियों का व्यवहार या कुछ परिस्थितियाँ मन को अनुकूल प्रतीत होती हैं और कुछ प्रतिकूल। अनुकूल व्यवहार अथवा परिस्थितियाँ पाकर सुखा होना स्वाभाविक है, उसी प्रकार प्रतिकूल व्यवहार या परिस्थितियाँ पाकर क्षोभ भी होता है। बहुधा यह क्षोभ इतनी उत्तेजना उत्पन्न करता है कि व्यक्ति अपने पूरे आवेग से उन परिस्थितियों को नष्ट कर देने के लिए चढ़ दौड़ता है। यह आवेग कई बार इतना तीव्र होता है कि व्यक्ति अपनी समझ बूझ और विवके को ताक पर रखकर अपनी शक्तियों को नष्ट-भ्रष्ट करने लगता है। इस प्रकार की आवेगपूर्ण स्थिति को क्रोध भी कह सकते हैं।

क्रोध के समय व्यक्ति यह श्ल जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। इस स्थिति में क्रुद्ध व्यक्ति अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को बड़ी बुरी तरह नष्ट कर चलता है। जब किसी व्यक्ति पर क्रुद्ध हुआ जाता है, कोई व्यक्ति दूसरे पर या परिस्थितियों पर क्रोध करता है तो वह दूसरे व्यक्ति में भी संचरित हो जाता है ओर ऐसी दशा में लड़ाई से लेकर आत्मघात जैसी स्थितियाँ बन जाती है।

क्रोध के सम्बन्ध में अब तक किये गये अध्ययनों के अनुसार एक स्वस्थ्य, शान्त व्यक्ति कमजोर, दुर्बल और तनावग्रस्त व्यक्ति ज्यादा क्रोधित होता है। कहावत प्रसिद्ध भी है कि ‘कम कुब्बत गुस्सा बहुत।’ वैसे नीति शास्त्रियों के अनुसार क्रोध करना आवश्यक भी है। किन्तु नीतिकारों ने जिस क्रोध को आवश्यक बताया है उसके सम्बन्ध में यह भी लिखा है कि वह विवेकपूर्ण होना चाहिए। यदि क्रोध को पूरी तरह त्याग दिया जाय तो अनीति, अन्याय का विरोध, दुष्ट तत्वों का दमन और असुरता का प्रतिकार किस प्रकार सम्भव होगा ? मनीषियों ने अनीति, अन्याय, दुष्टता और असुरता का प्रतिरोध करने के लिए सात्विक क्रोध का उपदेश किया है। पर मनोविकार के रुप में जिस क्रोध की यहाँ चर्चा की जा रही है वह निश्चित ही अमंगलकारी ओर हानिप्रद है। कवि बाणभट ने इस मनोविकार के सम्बन्ध में कहा है, ‘अति क्रोधी मनुष्य आँख वाला होते हुए भी अन्धा ही होता है।’ वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-’क्रोध प्राणों तलवार के समान है औ सर्वनाश की ओर ले जाने वाली राह है।

क्रोध का मन की दूसरी दुःखकारी भावनाओं से गहरा सम्बन्ध है। यदि क्रोध शीघ्र ही समाप्त हो जाए तो उससे होने वाली शक्ति का क्षरण तत्काल रुक ही जाता है, पर यदि क्रोध मन की गहराइयों में पहुँचकर जम जाए तो वह बैर की भावनाएँ बन जाती है और दूसरों के गुण, प्रेम, भावना, उच्चसंस्कार सब भूलकर प्रतिपक्षी का नुक्सान करने, दूसरे को हानि पहुँचाने की बुरी भावना निरन्तर सताती रहती है। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार जब क्रोध आता है तो शरीर की आन्तरिक तथा बाह्य क्रियाएँ सभी प्रभावित होती है। इस स्थिति में कुछ रसायनों की उत्पति अधिक होने लगती है ओर कुछ की कम। फलतः शरीर स्वास्थ्य को बुरी तरह क्षति पहुँचती है।

क्रोध आते ही शरीर की माँसपेशियाँ खिंचने लगती हैं। हाथ और पैर की माँसपेशियों में तो विशेष रुप से खिंचवा आता है क्योंकि लड़ाई की स्थिति में इन्हीं अंगो को सबसे ज्यादा जोखिम उठाना पड़ता है। चेहरे पर भी ख्िचाव आने लगता है। माँसपेशियों के ख्िचाव का परिणाम पूरे शरीर पर पड़ता है और हाथ-पैर तथा चेहरे के अतिरिक्त अन्य अंग भी ख्िचने सिकुड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त क्रोध की अवस्था में श्वसन संस्थान भी बहुत प्रभावित होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सब इस कारण होता है कि क्रोध की अवस्था में शरीर ऊर्जा का तेजी से क्षरण होने लगता है। इस क्षरिता ऊर्जा की पूर्ति के लिए श्वसन क्रिया तीव्र हो जाती है। फेफड़े पहले की अपेक्षा अधिक क्रियाशील होने लगते हैं और साँस की गति बढ़ जाती है। साँस की गति बढ़ जाने से, तेजी से साँस लेने और तेजी से साँस छोड़ने के कारण शरीर मं आक्सीजन की मात्रा अधिक पहुँचने लगती है जो वहाँ उपस्थित भोजने से अतिरिक्त ऊर्जा का अवशोषण करती है।

क्रोध की स्थिति में शरीर अपनी सुरक्षा व्यवस्था के अनसार विभिन्न परिवर्तन करता है। उस समय यकृत भी अधिक मात्रा में ग्लाइकोजिन निकालने लगता है। इस प्रकार जो अतिरिक्त ऊर्जा का क्षरण होता है। उसकी पूर्ति यदि न की जाय तो शरीर में कई विकार ओर रोग पनपने लगते है। उदाहरण के लिए ज्यादा क्रोध करने वालों को रक्तचाप तथा हृदय सम्बन्धी रोग होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है। यह तो सभी जानते है कि जब क्रोध आता है तो हृदय की धड़कन आम स्थिति की अपेक्षा कई गुना अधिक दबाव पड़ता है। इस स्थिति में हृदय की धड़कन बढ़ जाने के कारण शरीर में रक्त का परिभ्रमण भी पहले की अपेक्षा ज्यादा होने लगता है।

क्रोध की स्थिति में पाचन क्रिया भी विशेष रुप से प्रभावित होती है। एक प्रकार से उस समय तो पाचन संस्थान अपना काम करना ही बन्द कर देते हैं। उदर तथा आन्त्र की क्रियाशीलता उस समय अत्यन्त मन्द पड़ जाती है। इस सम्बन्ध में किये गये अध्ययनों से यह निर्ष्कष सामने आए हैं कि अगर गुस्से की स्थिति में कुछ भी खाया जाय तो उसका पाचन नहीं होता है बल्कि उस समय पेट में जो भोजन रहता है उसका पाचन बन्द हो जाता है। कई लोगों को इसी कारण अत्यन्त क्रोध की अवस्था में उल्टियाँ होने लगती है। जी मितलाने, उबकाई आने और पेट में भारीपन अनुभव होने की शिकायते तो बहुतों को होती है।

क्रोध की अवस्था में यह भी देखा गया है कि मुहँ एकदम सूख जाता है। समय मुहँ के भीतर लार बनने की प्रक्रिया एकदम मन्द पड़ जाती है यही कारण है कि गुस्सा उतर जाने के बाद बहुतों को जोर की प्यास लगती है। कई लोग तो क्रोध की स्थिति में ही पानी पीते हैं। ‘पानी पी-पीकर कोसने’ की उक्ति सवविदित है। इस अवस्था में ठीक से बोलते भी नहीं बनता, क्योंकि मुहँ की वे ग्रन्थियाँ जो बोलने में विशेष रुप से सहायक होती है, अकड़ने-जकड़ने लगती हैं और उस कारण शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं हो पाता। ‘त’ के स्थान पर ‘ट’ या ‘प’ के स्थान पर ‘फ’ जैसे शब्दों का उच्चारण न चाहते हुए भी हो ही जाता है।

आँखों पर भी क्रोध का प्रभाव पड़ता है। उस समय आँख की द्रष्टिसीमा में फेलाव आ जाता है। यही कारण है कि बहुत अधिक क्रोध करने वालों को कई नेत्र रोग उत्पन्न हो जाते है। शरीर के विशेष अंगो पर क्रोध के प्रभाव की ही यहाँ चर्चा की गई है। वस्तुतः तो पूरा शरीर ही क्रोध से प्रभावित होता है और उस स्थिति का हजारों नसों पर दबाव पड़ता है। तंत्रिका तन्त्र भी इससे प्रभावित होता है।

इस सर्वनाशकारी क्रोध पर कैसे नियन्त्रण किया जाय ? बहुधा देख गया है क्रोध न करने का संकल्प लेने के बावजूद भी कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जब सारे संकल्प विकल्पों को तोड़कर क्रोध का आवेश उमड़ आता है। शान्त मनःस्थिति में ही यह अनुभव होता है कि क्रोध आया था। क्रोध पर विजय प्राप्त करने में ध्यान धारणा और शान्त चित्त से उपासना से बड़ी सहायता मिलती है।

मस्तिष्क को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों और अप्रिय व्यवहार में भी उत्तेजित न हो। उस शान्त और सन्तुलित मनःस्थिति का प्रभाव सामने वाले व्यक्ति पर तो पड़ता ही है, अपने व्यक्तित्व में भी द्रढ़ता, शान्ति और प्रफुल्लता का अभिवर्धन होता है। कुल मिलाकर क्रोध पर विजय प्राप्त करना हजारों शत्रुओं को जीत लेने के बराबर है।


तीन महान तथ्य-अनुशासन,संयज एवं संरक्षण

संरक्षण और अनुशासन का कितना महत्व है इसे हम पृथ्वी के इर्द-गिर्द चढ़े हुए पर्यावरण को देखकर सहज ही जान सकते है।

शरीर पर जो चमड़ी की परत चढ़ी है उसे संरक्षण कह सकते हैं। इससे भीतर की रक्त, साँस सम्पदा को अपने स्थान पर बने रहने के सुरक्षा मिलती है। हवा में उड़ती रहने वाली विषाक्तता त्वचा के आवरण से ही भीतर नहीं पहुँच पाती अन्यथा धूलिकणों का सीधा प्रवेश रक्त माँस तक जा पहुँता और उस कोमल शरीर सम्पदा का देखते-देखते विषाक्त एवं रुग्ण बना कर रख देता। साथ ही यह भी आश्का बनी रहती है कि भीतर की वस्तु तनिक सा दबाव पड़ते ही बाहर निकल कर इधर उधर छितराने लगती। त्वचा का संरक्षण ही है जो बहुमूल्य कायिक ढाँचे को सुसंचालित रखे रह रहा है।

अभिभावकों का संरक्षण न हो तो शिशुओं का निर्वाह एवं भरण-पोषण किस प्रकार सम्भव हो ? अनुशासन सिखाये बिना वे सभ्यता और शिक्षा का लाभ कैसे ले सकें ?

शासन देश का संरक्षण करता है ओर प्रयाजनों पर अनुशासन रखता है। नागरिकों को दुष्प्रवृतियों से रोकने और उपयुक्त किया-कलाप अपनाने की प्रेरणा देना एवं व्यवस्था जुटाना शासन का काम है। यदि वह इतना न कर सके तो स्वंय नष्ट होगा ओर समूचे प्रजाजनों को डूबेगा। अनुशासन और संरक्षण की व्यवस्था बने रहने से ही व्यक्ति और समाज को मर्यादा में रहने और प्रगति पथ पर अग्रसर होने का सुअवसर मिलता है। इन दो तत्वों को हटा दिया जाय तो फिर उच्छृंखलता, अव्यवस्था, विग्रह और विनाश के दृश्य ही उपस्थित होगे।

न केवल मनुष्यों पर वरन् समूची सृष्टि व्यवस्था पर उन्ही दो दबावों का आधिपत्य है। ब्रह्याण्ड के सभी ग्रह तारक इसी आधार पर गतिशील रहते और अपने-अपने अस्तित्व की रक्षा करते हैं। इसमें तनिक भी शिथिलता आने लगे तो वे अपनी कक्षाओं से भटक कर जिधर-तिधर दौड़ने लगें -उन्हें परस्पर बाँधे रहने वाले अनुशासन आकर्षण समाप्त हो जायें। इस अराजकरता में वे अपने अस्तित्व तक की रक्षा न कर सकेंगे। ब्रह्याण्ड के सुसंचानल में अनेकानेक शक्तियाँ और व्यवस्थाएँ काम करती है। उन सबमें मूर्धन्य आधार दो ही हैं, संरक्षण ओर अनुशासन। इनकी स्िपना के उपरान्त ही प्रगति एवं समृद्धि की अन्यान्य धाराओं का क्रियान्वित हो सकना सम्भव होता है।

अपनी पृथ्वी को ही लें। उसकी सत्ता और व्यवस्था के कण-कण में यही तथ्य द्रष्टिगोचक होता है। जिधर भी द्रष्टि डाली जाय उधर ही क्षण-क्षण में उसी संचालन सूत्र का परिचय मिलता है। जीवधारियों की अपनी नीति मर्यादा है। जो उसे पालते हे वे जीवित रहते और प्रगति करते है। जो व्यतिवम पर उतारु होते हैं- उच्छृंखलता बरतते हैं वे स्वयं नष्ट होते हैं और सम्बद्ध प्राणियों तथा पदार्थों के लिए संकट उत्पन्न करते है। अणु-परमाणुओं से लेकर रासायनिक परिवर्तनों तक के मध्य में उसी व्यवस्था का आधिपत्य है। समूचा लोक व्यवहार इन्ही सूत्रों पर आधारित है। शिथिलता एवं उच्छृंलता उत्पन्न होते ही अनेकानेक समस्याएँ और विभीषिकाएँ सामने आ खड़ी होती है।

नियन्त्रण भी प्रगति प्रयासों के साथ जुड़ा रहता है। नर नारी एक दूसरे के पूरक है। एक से दूसरे की अनेकों सुख सुविधाएँ मिलती है। किन्तु साथ ही एक-दूसरे की सुरक्षा सभी रखते, सरक्षण रखते तथा भीतरी बाहरी अवाँछनीयता की रोकथाम करते है। दाम्पत्य जीवन के अनेकों लाभों में सुरक्षा और सुव्यवस्था मुख्य है उन्हें संरक्षण और अनुशासन भी कहा जा सकता है। इसे दोनों समान रुप से बरतते हैं। पत्नी व्रत और पतिव्रत इसी नैतिक सुनियाजन का नाम है।

पृथ्वी के ऊपर 5 कि.मी से 26 कि.मी. तक जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते हैं तापक्रम कम हो जाता है। ओर अन्तत -45 से. ग्रे. तक पहुँच जाता है। 5 कि.मी. से 13 कि.मी. का क्षेत्र ट्रोपोस्फीयर कहलाता है। इससे आगे ट्रैटोस्फीयर आरम्भ होता है जो 40 कि.मी. तक है इस क्षेत्र में क्रमशः तापक्रम बढ़ता तथा-35 से. ग्रे. तक जा पहुँचता है। ओजोन की परत इसी क्षेत्र में होती है। 20 से 240 कि.मी. तक का क्षेत्र ट्रेटापोज है। इसे रेडियो एक्टिव क्षेत्र भी कहा जाता है। रेडियो एक्टिव विकिरणों का सर्वाधिक तरंग दैर्ध्य 2500 इस क्षेत्र में पाया जाता है।

यह एक प्रकार की संरक्षण परतें हैं जिसके कारण अन्तरिक्ष के विकिरणों का धरती पर अनावश्यक प्रवेश न हो सके। साथ ही धरती की ऊर्जा एवं सम्पदा आकाश में उड़कर नष्ट भ्रष्ट न होने लगे।

वातावरण एक छाते की तरह हे जो हमें हानि-कारक अन्तरिक्षीय विकिरणों से बचाता है। ओजोन जैसी सक्रिय गैसे अन्तरिक्षीय विकिरणों को रोकती तथा उनके हानिकारक प्रभाव से हमारी सुरक्षा करती हैं। अमेरिकी सर्वेक्षण द्धारा यह ज्ञात हुआ है कि ऊँची हवाई जहाजों की उड़ानों से ओजोन की यात्रा वातवरण में कम होती जा रही है जिससे रेडियों एक्टिव विकिरणों ओजोन परत को छोड़कर पृथ्वी पर आ रही हैं। जिसके प्रभाव से चमड़ी में जलन, कैन्सर जैसी बीमारियाँ बढ़ रही है। पेड़ पौधों के विकास में बाधा पड़ती है। वातावरण में असामान्य परिवर्तन होता है। सूखा बाढ़, तूफान आता है। ओजोन परत सूर्य से उत्सर्जित 1650 से 3200 की तरंग दैर्ध्य वाली गामा किरणों को अवशोषित कर लेती है।सर्व विदित है कि ‘गामा’ किरणें विषैली होती है। पर सुपरसेनिक ट्रान्सपोर्ट एयर क्राफ्ट इस ओजोन रक्षा कवच का क्षति पहुँचाते हैं। जहाजों की ऊँची उड़ानों को रोकने के लिए अमेरिका द्धारा एक प्रोग्राम क्लाइयेटिक इम्पैक्ट एससमेन्ट भी चलाया गया था। सुपरसोनिक ट्रान्सपोर्ट से दो प्रकार की हानियाँ होती है। (1) यानो से निकलने वाली एक्जास्ट गैसें नाइट्रस आक्साइड नाइट्रिक आक्साइड ओजोन से मिलकर आक्सीजन बनाते हैं (2) ऊँची उड़ान भरने वाला कार्न्कडयान ऐरोसाल स्प्रै निकलता है जिसमें क्लोरीन की बहुलता होती है जो ओजोन के साथ क्रियाशील होकर आक्सीजन बनाता है। इस प्रकार ओजोन की रक्षा परत नष्ट हाती जाती है। इस स्थिति को देखतेहु अमेरिका सरकार ने कार्न्कड विमानों को अपने ऊपर से उड़ान भरने से रोक लगा दी हैं।

वैज्ञानिक प्रयोगों द्धारा यह सिद्ध हुआ है कि घटती हुई ओजोन की यात्रा मानव जाति के लिए हानिकारक सिद्ध होती। ‘वातावरण में एक प्रतिशत ओजोन की कमी होने से रेडियो एक्टिव विकिरण जिसे यू.पी.वी. फलक्स कहते हैं। दुगुना हो जाता है । जिसके फलस्वरुप प्रतिवर्ष 200000 व्यक्ति कैन्सर के शिकार होते है। ओजोन की कमी के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी हो जाती है। जिसके कारण उनकी वृद्धि रुक जाती है। वातावरण में असन्तुलन पैदा होता है। नवीन आँकड़ो के अनुसार सन् 1025 तक दुनिया की आबादी दुगुनी हो जाती है। जबकि अनाज की वृद्धि कम हो रही है। वर्तमान वृद्धि को देखते हुए हवाई उड़ाने 6 गुनी हो जायगी। वायु प्रदूषण कितनी तेजी से बढ़ रही हैयह उपरोक्त आँकड़े बताते हैं। इसी का ध्यान में रखकर सी.ओ. ए.पी. प्रोगाम का गठन किया गया है।

सृष्टि क्रम एवं पृथ्वी का वातवरण एक संरक्षण नियन्त्रण व्यवस्था के अर्न्तगत ही सुरक्षित एवं गतिशील है। मनुष्य के लिए भी यह अनुशासन अभीष्ट है। उसे जब दूरदर्शी बुद्धिमता के साथ स्वेच्छा पूर्वक अपनाया जाता है तो उसे संयम कहते है। संयम की महिमा सर्वविदित है।


गायत्री नगर में देव परिवार

अतीत को वापिस लाना जागरुकों का दायित्व

भारत के गौरव भरे अतीत का आधार भूत कारण तलाश करने पर इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता ळे कि यहाँ कक महान जीवन दर्शन ने जन-जन को प्रभावित किया। उसे अपनाकर वे देवमानव बने और अपनी उत्कृष्ट किया पद्धति से सर्म्पक क्षेत्र भारत तक सीमित था, तब यह भूमि स्वगदिपि गरीयसी कहलाई। जब विश्व भर में बादलों की तरह जा पहुँचने क अवसर मिला तो उन देव मानवों ने उन सभी क्षेत्रों का समुन्नत ओर सुसंस्कृत बनाया जहाँ उन्हे खड़े होने को जगह मिल गई।

कहना न होगा कि उन दिनों अपना देश जगद्गरु कहलाता था, भावनात्मक ओर बौद्धिक अनुदान देने के लिए जिसके पास प्रचुर ज्ञान सम्पदा के भण्डार हों, उसे अघ्यापक, मार्ग दर्शक एवं उदार अनुदानी का यह गौर सम्पदा पद मिलना ही चाहिए। उन दिनों भारत ने चक्रवर्ती शासक का उतरदायित्व अपने कन्धों पर उठाया था यह भार कुशल व्यवस्थापक एवं समर्थ शक्तिवान ही वहन कर सकता हैं इस देश के महान नागरिकों में वह क्षमता प्रचुर परिमाण में विघमान थी, उन दिनों भारत र्स्वग सम्पदाओं का स्वामी था। समृद्धि और सन्मति का अन्योनधय सम्बन्ध है। सद्भावना और सत्प्रवृतियाँ के धनी सम्पन्न तो रहेंगे ही। दरिद्र उन तक पहुँच ही कैसे सकेगा जो स्वंय वैभववान है वही तो दूसरों को कुछ देने में समर्थ हो सकेगा।

विश्व इतिहास भारत के अनुदानों का ऋणी है। जो बदला न माँगे, और अनुदानों की अनवरत वर्षा करे, उस के प्रति मानवा अन्तःकरण क कृतज्ञ तो होना ही चाहिये उस देश को विश्व मानव की गहन श्रद्धा उपलब्ध होती है। अस्तु यहाँ के नागरिकों को देवता और उनके निवास क्षेत्र को र्स्वग कहा जाना अत्युक्तिपूर्ण नहीं, सहज स्वाभाविक एवं स्तर के अनुरुप हो है।

आर्श्चय होता है कि उन दिनों आज की तुलना में साधनों का भारी अभाव था। वे सुविधायें थी ही नहीं, जिनका लाभ आज हर मनुष्य को मिलता है। नदियों के पुल, रेल, मोटर, वायुयान आदि के साधन न होने पर लम्बी यात्रायें कितनी कठिन रही होंगी। प्रेस, प्रकाशन, कागज आदि का प्रबन्ध न रहने पर विचार विस्तार कितना कठिन रहा होगा। बिजली न होने पर उघोग कितने सीमित रहे होंगे डाक-तार रेडियों की व्यवस्था न होने पर कितना सीमित, मंहगा ओर कष्ट साध्य रहा होगा, इसकी आज तो कल्पना भी कठिन है। विशाल उघोगों ओर संयंत्रो का तब कहीं आता-पता भी नहीं था। आत्म रक्षा के लिए तीर कमानों पर निर्भर रहना पड़ता था। दुर्भिक्ष पड़ने पर अन्न जल के अभाव में उस क्षेत्र के निवासी तड़प तड़प कर मर जाते थे। न परिवहन के साधन थे न साधनों का इतना बाहुल्य कि अपनी आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त बचत बाहर भेजी जा सकें। शिक्षा, चिकित्सा, कला, शिल्प आदि का जो थोड़ा बहुत विकास हुआ था उसका लाभ राज परिवार के लोग ही उठा पाते थे। भवन, वस्त्र, व्यंजन, विनोद के साधन सीमित थे। फलतः सम्पन्न लोगों को ही उनकी सुविधा मिलती थी। नकली दाँत ओर नकली आँख सर्व साधारण का तब कहाँ उपलब्ध थी, माचिस और सुई तक की सुविधा नह थी । अंगाो का प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों की तब कहीं कल्पना भी नहीं थी। मुद्रा, बैंक, बीमा, जैसी सुविधाओं क न होने से अर्थव्यवस्था कितनी सीमित रही होगी, इसका अनुमान लगाना, उनके लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए जो वर्तमाना और भूत का तुलनात्मक अध्ययन कर सकने में समर्थ है।

इतने पर भी पूर्वज कितने स्वस्थ, कितने समंर्थ, कितने सम्प्न्न, कितने उदार, कितने साहसी, कितने सुसंस्कृत और कितने प्रराक्रम थे, इसका कारण ढूँढूने पर इसी तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि उन दिनों उत्कृष्ट जीवन दर्शन जन-जन क चिन्तन में आत-प्रोत थाँ गति विधियों में आर्दशवादी अनुप्राणित थ। चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। द्रष्ट्रिकोण को दर्शन कहते है। कतृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। भारत की आस्था अध्यात्म पर केन्द्रीभूत थी फलतः व्यक्तियों में महानता भरी रही। उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न को देवता कहते है। देवता स्वयं महान होते है। इसलिए उनके सहज अनुदान सर्म्पक क्षेत्र का समुश्रत बनात रहते है। बादल, पारस, चन्दन की समीपता से मिलने वाल लाभों को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रह जाता कि किस प्रकार हमारे पूर्वज ध्न्य बनते और असख्यों का धन्य बनाने का श्रेय सौभाग्य प्राप्त करते होगे। कार्यो की संरचना तो समान थी, पर साधनों की नितान्त कमी रही, इतने पर भी अतीत की गौरव गरिमा का देखते हुए यह कहना पड़ता है कि उच्चस्तरीय जीवन दर्शन प्रत्यक्ष देव वरदान है। यह जिन्हें उपलब्ध होगा, उनकी गरिमा वेसी ही रहेगी, जिसकी चर्चा करने, सुनने में इतिहास विघार्थी पुलकित गद्गद् हो उठते है।

भारतीय अध्यात्म और दर्शन का सार तत्व इतना ही है कि शरीर की तरह आत्मा को भी महत्व देना और भौतिक सुख-साधनों की तरह ही आत्मिक सन्तोष और गौरव को महत्व देना, आत्मा का जानते है वे यदि उसको वरिष्ठता पर शरीर सज्जा जितना ध्यान दे सकें तो उनके लिए उभय पक्षीय प्रगतिकी योजना बनाना और उसे कार्यान्वित कर सकना तनिक भी कठिन नहीं पड़ता शरीर की आवश्यकता सीमित है। उसकी पूर्ति स्वल्पथम और समय लगाने भर से अत्यन्त सरलता पूर्वक पूरी होती रह सकती है। इसके उपरान्त इतना कुछ बच रहता है जिसे आत्मोर्त्कष में लगाना और फल स्वरुप देवोपम महानता उपलब्ध कर सकने में कहीं कोई कठिनाई शेष नहीं रह जाती। अवरोध एक ही है शरीर को सब कुछ मान लेना और उसी के सुख-साधनो की ललक में निमग्न रहना, यदि इस कुटेव से छूटा जा सके तो उस विवके का उदय हो सकता है, जो आस्थाओं और आकाक्षाओं का उच्चस्तरीय बना कर नर को नारायण बना देता है।

प्राचीन काल में यही दूरदर्शी, विवेक शीलता अपनाई जाती है। वह परम्परा जब तक अपनाई गई तब तक गरिमा भी अक्षुण रही, शिथिलता आई तो स्वार्थ परता की जड़ जमने लगी। एक सीढ़ी और नीचे उतरने पर व्यक्ति दादी लिप्सा ही सब कुछ बन गई। फलातः निकृष्टता के प्रवाह में लोक मानस बहने लगा। आज की अनेकानेक विकृतियों एवं विभीषिकाओं का मूल भूत कारण एक ही है आस्थाओं का अघोगामी होना, सभी जानते हैं कि मनःस्थिति कि अनुरुप परिस्थितियाँ बनती है। निकृष्ट द्रष्ट्रिकोण अपनाने की प्रतिक्रिया ही विपति बन कर बरसती हैं आज हम बस इसी कुचक्र में फसे अगणित संताप और संकट सह रह है।

अभ्यस्त होने पर तो गन्दगी के बीच रहना भी रुचने लगता है। कई कैदी छूटते ही फिर जेल जाने की तैयारी करते हैं। नशेबाजों की अपनी दुनिया है। भिखारी अपनी आदतों में जकड़े होते है। अपराधियों को घिनोनी जिन्दगी भी अखरती नहीं। आज की हेय परिस्थितियाँ जिन्हे रुचने लगी है और ढर्रा अभ्यास में आ गया ह उनकी बात दूसरी है। अन्यथा जो पतन और उत्थान के मध्यवर्ती अन्तर का समझ सकें, जो लदी हुई परिस्थितियों की समीक्षा कर सकें, उन्हें यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि जिस स्तर का जीवन इन दिनों जिया जा रहा है, उसमें न सुविधा है, न शन्ति, न गौरवहै ने भविष्य। मात्र आदतों का कुचक्र ही जकड़े हुऐ है। दाद खुजाने ओर रक्त बहान की विपन्नता भी कई बार रुचने लगती है और उससे छूटने की इच्छा नहीं होनी। यह सब होते हुए भी जिज्ञ पर्यवेक्षक को यह सकझने में कठिनाईं नहीं होनी चाहिए कि हम विपतियों में फँस गये हैं और विनाश की दिशा में बढ़ रहे है।

स्वास्थ्य दिन-दिन दुर्बल् होता जा रहा है। रुग्णता के पने पंजे काया में गहराई तक घुसते जा रहे है। भीतर कुछ बाहर, कुछ का छद्म अन्तराल का सारा सन्तुलन गड़बड़ाये दे रहा है। दुहरा व्यक्तित्व अन्तर्द्धनद खडे़ करता है और उनसे अगणित उद्धिग्नताएँ एव सनके उत्पन्न होती हैं। आम आदमी आज दिग्र भ्रान्त, उद्धिग्न, विक्षुब्ध होकर विक्षिप्तों जेसी मनःस्थिति लिए फिरता है। न चैन है न सन्तोष। न आशा है न उल्लास। सरसता और प्रसन्नता देने वाला मनःक्षेत्र जब श्मसान जैसा बीभत्स बन चले तो फिर जीवन का आनन्द समाप्त ही समझा जाना चाहिए।

आर्थिक अभाव हर किसी का खा रहा है। कम कमाने वालों की तरह अधिक कमाने वाले भी अर्थ संकट का रोना रोते हैं। पारिवारिक क्षेत्र में मात्र यौनाचार के कहीं कुछ आकर्षण दिखाई नहीं देता। न सहयोग न सौजन्य। न स्नेह है, न सद्भाव, भेड़ो के वाडे़ की तरह परिवारों में घिचपिच ओर भीड़-भाड़ तो रहती है पर उनमें वह वातावरण कहीं नहीं दीखता, जिसके आधार पर घर घरौंदे स्वर्गीय संवेदनाओं का रसास्वादन करते है। समाज से सर्म्पक तो रहता है पर उसका स्तर उचक्कों से आगे नहीं उठता। एक दूसरे पर घात लगाने और नीचा दिखाने की ही दुरभि सन्धियाँ रचते रहते है। मित्रता के सहारे शत्रुता का कुछ ऐसा प्रचलन हो गया है कि साथी से भी सतर्क रहना पड़ता है। विश्वास और वफादारी की प्रथा ही उठती जा रही है औश्र उसका स्थान कुटि लता का मिल रहा है। नीति और मर्यादा कहने सुनने भर के लिए बच रही है। अनास्था के वातावरण में अविश्वास, सन्देह, भय एवं आशंकाओं का घटाटोप ही छाया रहता है। नैतिक अराजकता में मानवी मूल्य अस्त-व्यस्त होते चले जा रहे है।

गतिविधियों और प्रवृतियों ऐसी हैं जिनसे विनाशकारी भविष्य दिन-दिन निकट आता जा रहा है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कोलाहल घटन, रासायनिक खाद, कीट नाशक छिड़काव, जनसंख्या वृद्धि, अपराधों का

वर्गों के बीच छीना झपटी, राजनैतिक प्रतिस्पर्धा एवं अणुयुद्ध की तैयारी के फल स्वरुप जो घटित होने वाला है उसका अनुमान लगाने से यह तथ्य सामने आ खड़ा होता है कि विनाश की विभीषिका अब बहुत दूर नहीं रह गई। इन घटाओं में से हर एक ऐसी है जो इस छोटी सी धरती पर बसे हुए मात्र 800 करोड़ जनसमुदाय का अस्तित्व खतरे में डालने के लिए पर्याप्त है। फिर इनमें कई प्रबल हो उठें तो उनकी संयुक्त विनाश लीला सर्वनाश करके ही रहेगी।

व्यक्तिगत जीवन में घुसी विकृतियाँ ही, समाज गत विभीषिकाएँ बनती है। मनुष्यों का समुदाय ही समाज है। मनुष्यों की प्रवृतियाँ ही संयुक्त होकर व्यापक परिस्थितियाँ बनती हैं। प्राचीनकाल में व्यक्ति के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टावादी जीवन दर्शन ओत-प्रोत था। फलतः साधनों की कमी रहने पर भी उन दिनों देवत्व उभरा-उभरा फिरता था। आज सुविधाओं की कमी नहीं। शिक्षा ओर परम्परा का आर्श्चयजनक उर्त्कष हुआ है। विज्ञान औ व्यवसाय में ही नहीं कला ओर शिल्प में भी अभ्युदय के उच्च् शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई है। इतने पर भी मनुष्य दिन-दिन दुर्बल दरिद्र एवं पतित होता चला जा राह है। वर्तमान संकटो में भरा भविष्य अन्धकार पूर्ण है। इस विषष्ठजा का दोष तो किसी पर भी जा सकता है, पर वास्तविकता एक ही है मनुष्य जे निकृष्ट जीवन दर्शन अपनाया और संकटों के दलदल में जा फँसा।

स्थिति में परिवर्तन लाया जाना आवश्यक है। यथा स्थिति नहीं रहने दी जा सकती। क्योंकि प्रवाह यथावत चलते रहने दी जा सकती। क्योकि प्रवाह यथावत चलते रहने दी जा सकती। क्योकि प्रवाह यथावत चलते रहने पर सर्वनाशी विनाश के गत में जा गिरना कुछ ही समय की बात रह जायगी। कोई नी चाहता कि ऐसा हो। मूर्धन्य विग्रही सत्ताधारी भी ऐसा नहीं चाहते। जिससने अनौच्ित्य को अपना कर अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारी है वह भी उपभोग और विलास भर चाहता है। विनाश नहीं, ऐसी दशा में सभी चिन्तित हैं कि प्रवाह को उलटा जाय, परिस्थितियों को सुधारा जाया हर किसी को उत्थान अभीष्ट है, पतन नहीं। विकास अभीष्ट है, विनाश नहीं। इतने पर भी कुचक्र ऐसा फँस गया है, जिसमें से निकलते नहीं बनता।

परिवर्तन और प्रगति के लिए जो सामुदायिक प्रयास चल रहे हैं, उनमें समृद्धि संवर्धन प्रमुख है। सुरक्षा व्यवस्था शिक्षा आदि भी उत्थान योजनाओं में सम्मिलित हैं, यह सभी प्रयत्न सराहनीय होते हुए भ्ज्ञी निश्चित रुप से एकाँगी हैं। चिन्तन और चरित्र को साथ सम्बद्ध व्यक्तित्व को परिष्कृत करने को भी समझा जाना चाहिए ही अनुभव किया जाना चाहिए कि जीवन दर्शन ही वह बीज है, जिसकी परिणित, परिस्थितियों का वृक्ष बनती है। दार्शनिक क्रान्ति के सहारे ही मनुष्य की आस्थाओं को ऊँचा उठाया जा सकेगा। उस क्षेत्र का उर्त्कष ही चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्धि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेगे।

युग परिवर्तन अभियान के अर्न्तगत इस उपेक्षित को उजागर करने ओर उसे अपनाने में जन-जन को सहमत करने के लिए प्रयत्न किये जा रहे है। इन्हें चिर पुरातन के साथ चिर नवीन की संगति बिठा देना भी कहा जा सकता है। विचार क्रान्ति की लाल मशाल इसी स्तर का आलोक वितरण कर रही है। लक्ष्य है-जन मानस का सद्भावनाओंका सर्म्बधनख् सत्प्रवत्तियोंका उभार परिष्कार इस प्रयास में जितनी सफलता मिलेगी, उसी अनुपात से विभीषिकाओं का निराकरण और सुखद सम्भावनाओं का निर्धारण सहज क्रम से होता चला जायगा।

युग परिवर्तन का तार्त्पय है-जीवन दर्शन में उत्कृष्टता का समावेश। यह जहाँ भी जितनी मात्रा में होगा, वहाँ परिवर्तन का एक लक्षण निश्चित रुपसे प्रकट होगा। लोभ-लिप्सा में कटौती और उस बचत का सत्पवृत्तियों के समाधान में नियोजन। प्राचीन काल में वही होता रहा है। महत्वाकाक्षाओं को तृष्णा के गतं में गिरने से रोका जाना और सामर्थ्य को सत्प्रयोजनों में लगाया जाना ही देव दर्शन है। भारतीय नागरिक श्रद्धापूर्वक इस अपनाते रह और आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याण का दुह्रा लाभ उठाते हुए, मनुष्य जन्म को धन्य बनाते रहे।

जीवन का आधा भाग शक्ति संचय एवं सम्पति सर्म्बधन में लगाया जाना ही ब्रह्मचर्य ओर गृहस्थ है। शेष आधा जीवन सम्पदा परमार्थ प्रयोजन में लगाया जाना आवश्यक था। यही था वानप्रस्थ ओर संन्यास। आदर्श-वादिता कहने सुनने तक सीमित रखने की वस्तु स्थिति नहीं है। इस प्रतिपादन की उपयोगिता क्रियान्वयन में ही है। उपासना का बीजारोपण जीवन साधना की उर्वरभूमि पर ही उगता और फेलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?

व्यक्ति और समाज को विनाश से बचाने और प्रगति पथ पर आगे बढ़ाने काएक ही उपाय है-मानवी जीवन दर्शन में क्रान्तिकारी परिवर्तन। इस परिवर्तन का स्वरुप है-सामर्थ्य का स्वार्थपरता में न्यूनतम और परमार्थ परायणता में अधिकतम उपयोग। सम्पदा का उपभोग नहीं उपयोग होना चाहिए। संग्रह नहीं वितरण लक्ष्य बनना चाहिए। अमीरी नहीं महानता बढ़ानी चाहिए। इसके लिए दूसरों को परामर्श देने की अपेक्षा अपने को तत्पर करना अधिक कारगर सिद्ध हो सकता है। युग-निर्माण परिवार के परिजनों से यह महान परिवर्तन अपने आप में आरम्भ करने के लिए कहा जा रहा है। प्राचीन काल जैसी सुखद परिस्थितियों को वापिस लौटाने का एक ही मार्ग है-पूर्वजों की परम्परा एवं संस्कृति का अनुकरण। इस मार्ग पर जागरुकों को अग्रिम पंक्ति में चलना है ताकि अनुकरण करने के लिए असंख्यों को पीछे आने का साहस जुटाना सरल सम्भव हो सके।


विवेकवान् अपना जीवन दर्शन बदलें

भूमि की उर्वरता बीज के सहारे, पेड़ पौधे बन कर प्रकट होती है। इस तथ्यकों न समझने वाले, वृक्षके विशाल रुप को ही सब कुछ मानते रहते है। व्यक्ति रुपी वृक्ष और समाज रुपी उघान के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष चर्चा जो भी होती है- पर तथ्य इसी ओर इंगित करेंगे कि भूमि में कितनी उर्वरता रही और बीजारोपण में कितनी कुशलता बरती गई। प्राचीन काल के उत्थान ओर आज के पराभव की तात्विक विवेचना कर सकना जिनके लिए सम्भव हो वे उसका कारण एक ही पायेंगे-जीवन दर्शन में परिवर्तन। जिन दिनों आस्था ओर आकाँक्षा में शरीर निर्वाह के लिए भौतिक उपार्जन ओर आत्म पोषण के लिए परमार्थ प्रयोजन पर समान रुप से ध्यान दिया जाता था, उन दिनों मनःस्थिति में उत्कृष्टता भरी रहती थी। फलतः कृर्तव्य का क्रम आदर्शवादिता में भरा रहता था। ऐसी दशा में परिस्थितियाँ खुख-शान्ति से भरी पूरी रहनी ही चाहिए थीं, रहीं भी।

आत्मा के प्रति उपेक्षा बरती जाय, उसे भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाय, तो फिर एकाकी शरीर पक्ष का मात्र सुविधा ही अपेक्षित रहेगी। आदर्शो का आत्मिक अंकुश हट जाने से वह उपभोग की लिप्सा और स्वामित्वकी लालसा में कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वच्छन्दता बरतेगा और चस्का पड़ने पर उद्ण्डता अपनाने में भी नहीं चूकेगा। नीति पथ का अनुगमन छोड़ने पर जो विपत्तियाँ सामने आती हैं, वही हैं आज की विषम परिस्थितियाँ। विनाश को आमंत्रित यह विपन्नता ही करती है। आज के संव्याप्त संकट का तात्विक विवेचन इतना ही है।

समाधान ढूँढना हो तो, जड़ तक जाना होगा, रक्त शुद्धि का उपाय किये बिना फोडे़-फुन्सियों से छुटंकारा पाना कठिन है। ऊपरी उपचारों से लीपा-पोती भर होती है। आवरण कमजोर होने पर एक छेद बन्द करते ही दूसरा अन्यत्र में खुल पड़ता है। समस्याओं का बाहरी उपचार कुछ क्षण के लिए ही थोड़ी रोक थाम कर सकता हैं। स्थायी समाधान के लिए जड़ की गहराई तक पहुँचना पड़ेगा। विपत्तियाँ आसमान से नहीं बरसतीं, वह मनुष्य द्धारा अपनाई गई रीतिनीति की प्रतिक्रिया भर होती है।

भले और बुरे परिणामों के उत्थान और पतन की पूरी पूरी जिम्मेदारी आस्था संस्थान के स्तर पर ही निर्भर रहती है। कोई उसे समझ पाये न समझे दूसरी बात है। व्यक्ति या समाज के सामने जो भी संकट है उसके बाहृयोपचार और सामयिक समाधान भी होने चाहिए। पर यह न भुजा दिया जाना चाहिए कि उद्गम के छेद बन्द किये बिना फूटने वाली जलधारा इस सही, मार्गसे न उससे सही अपना रास्ता बनाती रहेगी। एक समस्या को हल करने से पूर्व ही नई उलझन उठ खड़ी होगी, इन दिनों यही हो भी रहा है। प्राचीन काल की साधन हीन परिस्थितियों में स्वर्गीय वातावरण का होना और आज देव दुर्लभ उपयोग सामग्री का बाहुल्य रहतेभ्ज्ञी दुख दारिद्र में डूबना यही सिद्ध करता है कि उत्थान और पतन के मूल भूत कारण बाहर नहीं भीतर है। विपन्नताएँ चर्म चक्षुओं से बाहृय परिस्थितियों पर निर्भर दीखती है। किन्तु तनिक सी गहराई में उतरते ही यह पता चल जाता है कि सारा प्रपंच द्रष्ट्रिकोण और दर्शन पर निर्भर है। ज्वालामुखी जैसे विस्फोट धरती की दरारों में से फूटते है। दुश्चिन्तन ही अगणित समस्याएँ उत्पन्न करता है।

भटकन को ही प्रयत्न माना जाय और उछल कूद में ही समाधान सोचा जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा गहराई तक उतरना और लोक चिन्तन की दिशा मोड़ने के लिए साहस जुटाना पड़ेगा। भले ही कितना ही कष्ट साध्य समय साध्य ओर श्रम साध्य क्यों न हो। युग समस्याओं के समाधान में यही नीति अपनानी होगी। सही निदान चिकित्सा बन पड़ती है और सही उपचार होने रोग निवृति का सही आधार बनना है। आवश्यकता जीवन दर्शन में घुसे हुए विभ्रम को निरस्त करने की है। उसके स्थान पर जैसे ही दूरदर्शी विवेक की स्िपना होगी व काल जैसा स्वर्णिम युग सहज ही सामने आ खड़ा होगा।

भारतीय जीवन दर्शन का सार तत्व इतना ही है कि शरीर पोषण जितना ही महत्व, आत्मोर्त्कष को भी दिया गया। इस सन्तुलन को बिगड़ने ने दिया जाय। शरीर पोषण के लिए उपयोगी साधन चाहिए, उनका सीमित उपार्जन और सीमित उपयोग करने की नीति अपनाई जाय, ताकि आत्मिक प्रगति के लिए समय, श्रम और विनोयोग की कुछ मात्रा बच सके। उपभोग और संग्रह की प्रवृति जब अनियन्त्रित हो जाती है तो वह वासना हलाती है ओर लिप्सा बनकर उद्धिग्नता, आतुरता और का कारण बनती है। इसी प्रकार सम्बन्धित पदार्थो और व्यक्तियों के प्रति अनावश्यक ममता जोड़ से स्वामित्व की अहंता बढती है। सम्पति का विपुल और कुटुम्बियों का धन-कुबेर बनाने का व्यामोंह एक ऐसा जाल बुनते हैं, जिसमे जकड़ा हुआ मनुष्य चिन्तन और पराक्रम की द्रष्ट्रि से अपंग ओर प्रति जैसा बनकर रह जाता है। उससे ऐसा कुछ सोचते नहीं बन पड़ता जिससे आत्मिक प्रगति, शान्ति शक्ति उपर्जित कर सकना सम्भव हो सके।

अन्तःक्षेत्र की, लोक चिन्तन की यही स्थिति जब बनी रहेगी विपतियों ओर विपन्नताओं का ताँता टूटने नहीं है। प्राचनी काल में अन्तःक्षेत्र की सुव्यवस्था ध्यान दिया गया था। फलतः भौतिक द्रष्ट्रि से सुखी, आत्मिक द्रष्ट्रि से समुन्नत बनने का दुहरा लाभ उनने लगा था। स्वंय धन्य बने और संसार को धन्य बनाया। आज संकीर्ण स्वार्थपरता खाये जा रही है। लोभ मोह के प्रेतों ने चिन्तन क्षेत्र पर पूरी तरह आधिपत्य कर लिया है। फलतः मनुष्य शरीरचर्या के अतिरिक्त कुछ सोचता ही नहीं। आत्म सत्ता को उसकी आवश्यकता का एक प्रकार से भुला ही बैठा है। उपभोग संचय औश्र ममत्व के परिपोषण में ही सामर्थ्य का सारा स्त्रोत चुक जाता है। भीतर से खोखला बाहर से ढकोसला बना आज का मनुष्य अपने ओर दूसरों के लिए समस्या बन कर रह रहा है। अन्तः स्थिति के बदले बिना विषम परिस्थितियों का बदला जाना अति कठिन हैः

भारतीय जीव दर्शन की झाँकी एक दर्पण में करनी हो तो उसे वानप्रस्थ परम्परा में देखा जा सकता है। आधा समय, श्रम शरीर के लिए आधा, आत्मा के लिए नियोजित है। दोनों पहिये सही रहने पर गाड़ी ठीक तरह चलती है। दोनों टाँगों के सहारे यात्रा सही रुप में बन पड़ती है। स्वार्थ ओर परमार्थ का समन्वय होना ही चाहिए। मात्रपरमार्थी शरीर यात्रा कैसे सँजोये। भावस्वार्थी को शान्ति और प्रगति क दर्शन कैसे हो ? एकाकी पन की अपूर्णता असमंजस ही खड़ा किये रहेगी। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति का उभयपक्षीय प्रयोजन पूरा करने वाली यदि रीति-नीति अपनाई जाय तो लोक भी बनेगा और परलोक भी, सुख भी मिलेगा और सन्तोष भी, इसके विपरीत यदि आदि से अन्त तक लोभ-मोह ही छाया रहे तो समझना चाहिए कि वह सुख भी मृग तृष्णा की तरह दूर ही हटता चला जायगा, जिसके लिए कि इतनी व्याकुलता वरती और अवाँछनीयता अपनाई गई थी।

आम आदमी लोभ के लिए ही मरता और मोह के लिए ही खपता है फिर भी वह उनमें से एक को भी पूरा कर सकने में सफल नहीं होता। तृष्णा जहाँ की तहाँ बनी रहती है। कमाया सीमित ही जा सकता है। पर लिप्सा तो असीम है। खाई को मुट्ठी रेत से कैसे पाटा जाय? आग को ईधन से कैसे बुझाया जाय ? न अतृप्ति हटती न अशन्ति मिटती है। कोल्हू का बैल कैसे थकान से बचे ? इन्द्रिय तृप्ति में दाद जैस्ी खुजली भर है। व्यामोह में कुछ को देना ओर असंख्यों से छीनना होता है, इस नीतिको अपनाने वाला आत्म प्रताड़ना से कैसे बचे ?

पूर्वजों का द्रष्ट्रिकोण स्पष्ट था। शरीर से काम लेना है, इसलिए स्वास्थ्य बनाये रहने भर की साधन सामग्री जुटानी हैं। सम्बन्धित कुटुम्बियों को स्वावलम्बी, सुसंस्कारी भर बनाना है, इसके लिए औचित्य की सीमा के अर्न्तगत स्नह-सहयोग देने भर से काम चल जाता है। आवश्यक नहीं कि उनके लिए वैभव जमा किया जायया ऊँची पदवी पर पहुँचाया जाय। नागरिकों का औसत स्तर ही अपने सम्बन्धियों के लिए पर्याप्त माना जा सके तो उतनी चिन्ता न करनी पड़ेगी जितनी आज करनी पड़ती है। इसी औचित्य भरे द्रष्ट्रिकोण को सन्तोष कहते है। जो सन्ताषी है, वही सर्वदा सुखी रहता है।

दुःख तो दरिद्रता का है। दरिद्रता उस पिछड़े द्रष्ट्रिकोण का नाम है जो वैभव ओर विलास की असीम कामना संजोये रहती है अर अतृप्ति की आग बन कर निरन्तर जलाती है। दरिद्रता वस्तुओं की कमी को नहीं, तृष्णा की ललक को कहते हैं जो आत्म हीनता और अशन्ति बनकर तथा कथित सम्पन्नों पर भी छाई रहती है, यही असन्तोष उद्धिग्नता बनकर उभरता और आवेशग्रस्त भूत पिशाचों की तरह कुकृत्य करता है यदि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ओर कुटुम्बियों का सुसंस्कारी स्वाबलम्बन पर्याप्त माजा जा सके तो हर किसी क आत्मिक प्रगति के लिए असीम पुरुषार्थ करने का अवसर मिल सकता है। भवबन्धन, मायापाश आदि के नाम से जिस तमिस्त्रा का अध्यात्म क्षेत्र में हेय वर्णन किया जाता है वह और कुछ नहीं मात्र विलास और स्वामित्व की वितृष्णा भर है इस भार के हलका होते ही आत्मा विश्व आकाश में स्वच्दन्द पक्षी की तरह विचरने का आनन्द लेने लगता है। इसी को जीवन मुक्ति कहते है।

यह न कठिन है, न सरल। जो वस्तु स्थिति का समझने और तदनुरुप जीवन नीति निर्धारित करने का साहस कर सक उसके लिए भव बन्धनों से मुक्ति पाना नितान्त सरल है। जिनने लोभ और मोह की हथकड़ी, बेडी कसकर जकड़ली है उनके लिए व्यथा वेदना सहने ओर चिन्ता चिता में जीवित काया का जलाते रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। सफलता कितनी ही बड़ी क्यों न हों, उपलब्धियाँ किसी भी स्तर की क्यों न हों, तृष्णों से कम ही पड़ेगी और अतृप्ति का घटाने में तनिक भी सहायता न करेंगी।

अपने महान पूर्वज इन शाश्वत तथ्यों से परिचित थे। इसलिए वे उत्कृष्टता अपनाते थे ओर वितृष्णा से बचते थे। फलतः उन्हे वैयक्तिक जीवन में उल्लास और उमंगो से भरे रहने का अवसर स्वल्प साधनों में ही मिल जाता था। कुटुम्बियों की अनावश्यक संख्या बढ़ाना वज्र मूर्खता का चिन्ह है। खाई खोदने औ उसे पाटनेका जंजाल बुने बिना जिनका काम चल सकता है वे प्रस्तुत कुटुम्ब क उत्तर-दायित्व पूर्ण करना ही पर्याप्त समझते हैं। नये-नये भार लादते जाने क दुस्साहस करते हुए दुष्परिणामों का ध्यान रखते और उससे हाथ सकोड़ते हैं। सन्तान वृद्धि कभी क्षम्य भी समझी जाती होगी पर आज की स्थिति में तो उसे अक्षम्य और अभिशाप ही कहा जा सकता है।

प्राचीन काल में भी गृहस्थ जीवन में भी थोड़ी सी अवधि ही सीमित सन्तानोत्पादन के लिए खुलती थी। शेष तीन चौथाई जीवन तो ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास में ही बीतता था। आज असीम ओर अनगढ़ सन्तानें किस प्रकार अपने अभिभावकों के लिए अभिशाप बन कर रहती हैं, इसे हर विवेकवान अच्छी तरह जानता हैं। प्राचीन काल में यह विवेक शीलता लोक प्रथा में सम्मिलित थी कि सन्तानोत्पादन का उतना ही दुस्साहस किया जाय, जितना कि उनके परिपोषण में लगन वाली सामर्थ्य से परमार्थ प्रयोजनों में घाटा न पड़ने पाये।

उन दिनों बड़ा भाई छोटे भाई-बहनों क उत्तरदायित्व सँभलता था और अभिभावकों की परमार्थ परायणता में जो उत्तरदायित्व वाधक बनते थे उन्हें अपने कंधों पर वहन करता था। आज तो अभिभावकों की सहायता करने की रीति ही बदल गई। उनसे जितना अधिक पाया जा सकें, उसे झपटना ही प्रचलन बनकर रह गया है। देने लेने वाले उसी के अभ्यस्त हो गये है। फलतः कुटुम्ब अव आत्म विकास का अभ्यास करने के माध्यम नहीं रहे। व्यामोह और अनाचार के जेलखाने बन कर रह रहें हैं।

उपयुक्त गुजारे भर का यदि पर्याप्त माना जा सके तो अर्थ संकट की शिकायत किसी का भी न करनी पड़ेगी घर के सभी लोग श्रम करें तो किसी एक पर उपार्जन का असीम भार क्यों पडे़़? सादगी ओर शालीनता की मित्तव्ययी रीति-नीति अपनाई जाय तो वे अनावश्यक खर्च क्यों बढ़े, जिनके लिए ऋणी, चिन्तित एवं अनीतिरत रहना पड़ता है संचय की निरर्थकता अर अमीरी की दुष्परिणित को ध्यान में रखा जा सके ता हर किसी के लिए हलका-फुलका जीवन जीना ओर परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत कुछ कर सकना सम्भव हो सकता है। आत्मिक प्रगति का अवसर वहीं मिलेंगा, जहाँ इस प्रकार की मनःस्थिति एवं परिस्थिति बन रही होगी।

कितनों का ही संचित उपार्जन इतना होता है, जिस की बैक ब्याज भर से निर्वाह क्रम अत्यन्त सरलता पूर्वक चलता रह सकता है, फिरभी अभागा मन न लोभ छोड़ता है न मोह। फलतः आत्मा को बलिष्ठ बनाने का वह सुअवसर मिल नहीं पाता, जिसे अपनाने वाला आत्म कल्याण ओर लोक महा मानवों जैसा अभिनन्दनीय जीवन जी सकता है। महा पुरुषों ओर नर पशुओंमे मात्र इतना ही अन्तर हाता है कि एक पक्ष विवेक अपनाता ओर आदर्शो के लिए कुछ कर सकने की व्यवस्था बनाता हैं। दूसरा व्यामोह की सड़ी कीचड़ में फँसा हुआ रोता कल्पता भर है, उससे उवरने का प्रयत्न नहीं करता। यही वह अन्तर है जिसमें एक जैसी स्थिति के दो व्यक्तियों में से एक महानता का गर्व गौरव प्राप्त करता है और दूसरा क्षुद्रता जन्य प्रताड़नाँए निरन्तर सहता है।

यह एक और विडम्बना आड़े आती है। आत्म कल्याण के लिए एक सस्ता सा उपचार पूजा पाठ का मान लिया जाता है और सोचा जाता है कि इतने भर से भगवान को रिझान और पक्षधर बनाना सम्भव हो सकेगा। वे वह भूल जाते हैं कि उपासना का तत्व दर्शन जीवन साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित विनमित हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रुप में विघमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रमग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित जीवन साधना करन की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्माकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।

पूर्व पुरुष भ्रम ग्रस्त नहीं थे, वे उपासना भी करते थे ओर साधना भी। दोनो की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।

सामार्थ्य किसी के पास कम नहीं, सुविधा सबको समान रुप से उपलब्ध है। समय सबके पास पर्याप्त है। शरीर की श्रमशीलता ओर मन की विचारशीलता की द्रष्ट्रि से कोई भी दरिद्र नहीं। अपंगो को छोडकर सभी स्वस्थ मनुष्य प्रायः एक जैसी स्थिति में है। भिन्नता इतनी है कि एक का जीवन प्रवाह उत्थान की दिशा में वहता है, दूसरे को पतन रुचता है। एक को उत्कृष्टता प्रिय है, दूसरे को सड़ी कीचड़ में रहने की आदत पड़ गई है। आस्था और आकाँक्षा का परिवर्तन सम्भव हो सके तो अपना यहीं मस्तिष्क अपनी इन्ही परिस्थितियों में ऐसा मार्ग निकाल सकता है, जिस पर चलते हुए आज की तुलना में हजार गुन श्रेष्ठ स्तर की जीवनचर्या बन सके।

जिन्हे ऊँची ऊँची आध्यात्मिक डिग्रियाँ प्राप्त करनी हों, उन्हें तो अनंत-अनंत जाँच और परिक्षाएँ पास करनी पड़ती है। परन्तु ज्यादातर लोग परीक्षक को घूँस देने की ही साचते रहते है। श्री अरविन्द

कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि द्रष्ट्रिकोण बदला तो जीवन यापन की रीति-नीति में तत्काल अन्तर पड़ेगा। यही वह अन्तर है, जिसे आन्तरिक काया-कल्प कहा जाता रहा है। भीतर का परिवर्तन बाहर की परिस्थितियों में चमत्कारी परिवर्तन करता है। यही वह चमत्कार है जो भूतकाल के देव मानवों के जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। उत्कृष्टता की विभूतियाँ ऋद्धियाँ कहलाती है और दूसरों को ऊचाँ उठाने वाली क्षमताओं को सिद्धियाँ कहते हैं। पूर्व पुरुषो ने उस मार्ग को अपनाकर अपने समय को सतयुग और अपने क्षेत्र को र्स्वग बनाया था। हमें भी उसी मार्ग पर अनुगमन करने का साहस जुटाना है।


प्रवाह में न बहते रहें, औचित्य भी देखें

प्रवाह में बहना सरल पड़ता है, उसमें निजी निर्धारण और साहस की आवश्यकता नहीं पड़ती। नदी में पेड़ो से लेकर हाथियों तक बहते चले जाते है। चलते हुए ढर्रे के सहारे किसी भी दिशा को पकडे़ हुए कहीं भी पहुँच जाना सम्भव है। आँधी आती है ओर पते-तिनके को पहँचा दें, उसी का वे नियति मान लेते है।

यही गति उनकी भी होती है, जिनमें न विवेक है न साहस। उचित अनुचित का अन्तर तो कई समझते भी है किन्तु जा ग्राहृय है उसी को अपनाया जाय, ऐसा सोचते हूए भी वैसा करते नहीं बन पड़ता। इसे व्यक्तित्व का पिछड़ापन ही कहा जा सकता है। पराक्रम में प्रखर दीखते हुए भी कितने ही व्यक्ति नीति निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण में भारी भूल करते रहते है। स्वतन्त्र चिन्तन का अभ्यास न होने से इस सर्न्दभ में दूर तक जाने में अनख लगता है। प्रचलित ढर्रा स्वभाव का अंग बन जाता है, तो उस का अनुकरण ही सरल लगता है।

नये निर्णय करने में असाधारण सूझ-बूझ का परिचय देना पडता है, फिर जीवन क्रम की सक्ष्म समीक्षा करना ओर उसे औचित्यकी कसौटी पर कसना और फिर ढर्रे को उलटकर उत्कृष्टता की रीति-नीति अपनाना तो ओर भी कठिन पड़ता है। इसके लिए आत्मबल चाहिए। आम तौर से लोगो में शरीर बल ही होता है। किसी-किसी में मनोबल भी पाया जाता है। आत्मबल का तो एक प्रकार से अभाव ही दीखता हैं। इसके बिना आत्म निर्धारण हो नहीं पाता। इन्ही कठिनाइयो से घिरी हुई मानवी सत्ता किसी दैत्य के जाल में फँसी हुई अधिक की मर्जी के सम्मुख शिर झुकाय बैठी रहती है। यही है प्रवाह क्रम, जिसमें औसत मनुष्यों का क्रम विधान और भाग्य बंधा रहता है।

मुट्ठी बाँधकर जन्म लेने और हाथ खोले मर जाने वाले असंख्यो का जीवन इसी प्रकार टूटे पत्ते की तरह अनिश्चित दिशा में उड़ता हुआ, प्रायः ऐसी स्थिति में समाप्त होता है, जिसे दुर्भाग्य के समतुल्य ही कहा जा सकता है।

भेड़ो की आँखे तो होती हैं, पर स्वतन्त्र चिन्तन की कभी रहने से उन्हे मुहावरे में अँधी कहते हैं। अंधी इसलिए कि झुण्ड जिधर भी चलता है, वे सभी बिना सोचे समझे उधर ही चलती जाती हैं। अगर उनके मार्ग में कोई कुआँ, खाई आवे तो एक के पीछे एक उसी में गिरती चली जाती है। स्वतन्त्र चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।

परम्परागत प्रवाह और समूहगत प्रचलन में अपना खिचाव और दबाव तो होता है, पर इतना नहीं कि उसे अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न हो। मछली में स्वतन्त्र निर्धारण की क्षमता होती है मूलतः वह शरीर से तुच्छ और बल में उपहासास्पद होते हुए भी धारा को चीर कर उल्टी भी लोट सकती है। इसमें उस का मनोबल ही चमत्कार प्रस्तुत करता है। शरीरगत शक्ति तो उस स्तर के अन्य जलचरों जितनी ही होती है। स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण ही वह विशिष्टता है जिसके सहारे किन्ही भाग्यवानों को सामान्य स्थिति में रहते हूए भी महा मानव बनने और असाधरण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

मनुष्य महान् सम्भावनाओं से भरा पूरा है। सृष्टा ने उसे अपने समतुल्य ही बनाया हैं। उसमें बीज रुप से इतनी समर्थता विघमान है कि उसे जगाने और उपयोग में लाने वाले कुछ ऐसा कर गुजरते हैं, जिसे देखकर साथियों को भी आर्श्चयचकित रह जाना पड़ता है। दिशा निर्धारण मनुष्य को स्वंय करना पड़ता है। उस पर चलने का साहस समेटना भी उसी का काम है। आदर्शो के मार्गे पर चलने वाले निजी प्रयास से इतना ही पराक्रम प्रकट करते हैं, आगे की बात तो स्वंय ही बनती जाती है। हर दिशा में सड़के और सवारियाँ मौजूद हैं, चलने का निर्णय स्वयं ही करना पड़ता है। साथियों की कमी किसी भी सड़क पर नहीं हैं। हर धर्मशाला में उसी दिशा में चलने वाले अनेकों मुसाफिर मिलते है और सहचरों में सहयोग भी बन जाता है।

मनुष्य जन्म जीवधारी के लिए असाधारण सौभाग्य है। इस सुअवसर का लाभ उठा सकने वाले कई ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त करत हैं, जिनके लिए असंख्यों तरसते रहते हैं। इसी जन्म में पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकना नितान्त सरल ओर सर्वथा सम्भव है। इसी जन्म में लोक सम्मान और जन सहयोग का लाभ प्रचुर परिणाम में कमाया जा सकता है। इतना प्रचुर जिसे भावी पीढ़ियाँ भी नत मस्तक होकर भाव -क्षद्धा के साथ प्रस्तुत करती रहे। इसी जन्म में दैवी अनुग्रह अर अद्रश्य सहयोग का लाभ उठाया जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति कठिन उनके लिए है, जो उस तक पहुँचने के मार्ग से अपरिचित है। सरल उनके लिए जो सफलता पाने वालों का अनुकरण करने का साहस करते है।

पानी स्वभावतः नीचे की ओर बहता है। समस्त नदी-नाले इसी क्रम से बह रहें है। ऊपर से नीचे कूद पड़ना सरल हैं। नीचे से ऊपर चढ़ना कठिन। कुँए से पानी ऊपर खींचने में कितने साधन जुटाने एवं श्रम करने की आवश्यकता पड़ती है। इसे सभी जानते हैं। यहाँ पशु प्रवृतियों का बाहुल्य है। क्योकि निम्न स्तर के जीव धारियों का ही, इस धरती पर बाहुल्य है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते समय उसी स्तर के संस्कारों का संग्रह समुच्च्य मनुष्य जन्म में भी बना रहता है। उच्च अवसर मिल जाने पर भी आदतें और इच्छायें , पुराने स्तर की बनी रहती हैं। फिर अधिकाँशो की गति विधियाँ नर पशुओं जैसी ही चलती हैं। संचित कुसंस्कार और कुप्रवृतियों का प्रवाह मिलकर एक ऐसा ढर्रा बना देते हैं, जिसमें तथाकथित बु़िद्धमान भी बुद्धिहीनों की तरह ही बहते चले जाते हैं।

प्रायः भवसागर से उबारने की प्रार्थना ईश्वर सेकी जाती है। पर भवसागर और कुछनहीं अधोगामी दुष्प्रवृतियों कावह प्रवाह-प्रचलन है, जिसमें अधिकाँश जन समूह बहता है। डूबते-उछलते वे किसी अनिश्चित दिशा में बहते चले जाते हैं और वहाँ जा पहँचते है जहाँ अन्धकार और पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

पेट भरना अन्य प्राणियों के लिए एक समस्या है, क्योंकि उनकी शरीर रचना, बौद्धिक स्थिति एवं निर्वाह की आवश्यकता को देखते हुए अनवरत प्रयास करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। मनुष्य की संरचना इससे भिन्न है। वह शरीर यात्रा की उचित सामग्री अपने श्रम, कौशल और प्रस्तुत व्यवस्था के सहारे तनिक से प्रयास में उपलब्ध कर सकता है। पेट भरने , तने ढकने और छाया आश्रय पाने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। 6 इन्च का पेट, 6फुट की भुजायें अत्यन्त सरलता पूर्वक कुछ ही घण्टे के पुरुषार्थ से भर सकती है, पर मनुष्य का उसके लिए उद्धिग्न रहना और सारा समय उसी में खपा देना विवेक द्रष्ट्रि से आर्श्चयजनक है। फिर भी देखा यही जाता है कि पेट की रट लगाये हुए, हर कोई अभावों का रोना रोते, हर व्यक्ति बेतरह उसी में व्यस्त पाया जाता है। इस व्यस्तता से न किसी के पास समय बचता है, और न अन्य कुछ सोचने की फुरसत रहती है।

परिवार प्राणियों के सहयोगपूर्वक विकसित होने की एक स्वस्थ परम्परा है। उसमें भार जैसा कुछ नहीं है। माली पेड़-पोधों का संजोता है। पेड़-पौधे माली की आवश्यकताएँ पूरी करते है। सह जीवन को एक अनोख आनन्द परिवार है, वह भार तब बनता है, जब अचिन्त्य चिन्तन अपनाया जाता है। कर्तव्य पालन की बात भुला कर जब व्यामोह की अवाँछनीयता अपनाई जाती है, तो परिजन दुर्गुणी और लोभी विलासी बनते जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हे सन्तुष्ट करने के लिए किये गए पक्षपात पूर्ण प्रयास भी कारगर सिद्ध नहीं होते, वरन् उल्टे पड़ते जाते है। हेय द्रष्ट्रिकोण के रहते प्रजनन बढ़ता ओर समस्याओं का बोझ सिर पर लदता जाता है। स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने की अपेक्षा जब परिजनोंको सुविधाओं से लादने की द्रष्ट्रि रहती है तो फिर उस विष सिचन से मात्र नरक का ही उत्पादन हो सकता है। आज परिवार में र्स्वग की अनूभूति करने वाले भाग्यशाली कहीं ढूँढू नहीं मिलते। इस कारण परिवार संस्था का स्वरुप ही बदल गया। उनमें से अब नररत्न कहा निकलते है। पालने वाले ओर पलने वाले दोनों ही उस वातारण में घुटन अनुभव करते है। जेलखाने सराय में भी लोग साथ रहते है। इसी स्तर के परिवार प्रकारान्तर से धुँआ अर दुर्गन्ध बखेरने वाले श्मशान ही बने रहते हैं। उस उल्टी स्थिति का कारण वह व्यामोह ही है, जिसमें असीम सुविधा जुटाना और प्रजनन बढ़ाना भर लक्ष्य रहता है।

प्रवाह यही है, औसत मनुष्य इसी में बहता रहता है। माँगा या बिना माँगा परामर्श इसी स्तर का मिल सकता है। जो करता ओर सोचता है वही उसका अभ्यास ओर विश्वास बन जाता है। ऐसी दशा में साथियों के परामर्श में ढर्रे पर लुढकते रहने और दिन काटते रहने से अधिक ऊँचे हो ही नहीं सकते। जो चल रहा है, जो सामने दीखता है, वह भी इसी स्तर का है। लोग अनीतिपूर्वक कमाते ओर अपव्यय में लुटाते ही द्रष्ट्रिगोचर होते है। अलास्य और विलास ही लोक रुचि का विषय है। दुर्व्यसनों ओर दुर्गुणों को प्रगतिशीलता का चिन्ह समझा जाता है। उदाहरण ढूँढने हों तो निष्ठुरता , निर्दयता और कृतघ्नता अपनाये हए स्वार्थ सिद्धि में निरत समुदाय ही इर्द गिर्द घूमता फिरता नजर आता है। यही है, वह प्रवाह जो दुर्बल मन वालों को अपने साथ घसीटता और अन्योंकी तरह बहते चलने को विवश करता है। औसत मनुष्य की यही गति ओर यी नियति है। इसका परिणाम भी स्पष्ट है। दुर्बलता, रुग्णता, उद्धिग्नता दरिद्रता, विपन्नता से हर व्यक्ति संत्रस्त है। समस्याओं और चिन्ताओं का अन्त नहीं। आश्का, अतृप्ति से हर व्यक्ति भयभीत ओर कातर बना हुआ है। निराश ओर खीज का असन्तुलन मनःक्षे़त्र को अर्ध विक्षिप्त बनाये रहता है। मरण की समीपता ओर जीवन की असफलता को साथ मिलाकर देखने पर लगता है अलस्य अवसर हाथ से चला गया। भविष्य की आशा लगाकर भी जिया जा सकता है, पर जिसे वर्तमान से भी बढ़कर भविष्य भी अन्धकारामय दीखे उसकी व्यथा का अनुमान लगा सकना भी कठिन है।

नशे की खुमारी में वस्तुस्थिति को सोच सकना तक सम्भव नहीं रहता। अदूरदर्शिता की खुमारी भी विचित्र है। उसकी तुलना में सब नशे हलके पडते हैं। माया की चर्चा जब तब होती रहती है। आत्म विस्मृति और भवबन्धनों की दःखद परिणिति की भवानकता भी विज्ञजन दर्शाते रहते है इन सबका संकेत उस उनींदी मन’स्थिति से है जो जीवन के मूल्य, महत्व और सदुपयोग के सम्बन्ध में विचार करने तक का अवसर नहीं मिलने देती।

आत्मा-ज्ञान का महत्व शास्त्रकारों और आप्त पुरुषों द्धारा समय समय पर बताया जाता रहता है इसमें न तो कुछ जादू जैसी बात है और न चमत्कारी उपलब्धियों को रहस्य है। यह सीधी सी बात इतनी ही है कि उपलब्ध अवसर की गरिमा, आत्म सत्ता की प्रचण्ड क्षमता ओर उज्जवल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना का गम्भीरता पूर्वक समझा जाय। प्रवाह में बहने वालों की दुर्गति को ध्यानपूर्वक देखा जाय और स्वतन्त्र चिन्तन अपना कर उज्जवल भविष्य की संरचना के लिए उठ खडे़ होना, यह ही है वह निर्धारण जिसका गुरु कृपा, ईश्वरीय अनुकम्पा साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।

इस श्रेय पथ पर आरम्भा से एकाकी चलना पड़ता है साथियों का असहयोग, विरोध, उपहास सहने की कठिनाई तो आरम्भ से ही रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है। यों उनके शुभचिन्तक होने से किसी प्रकार के सन्देह की गुँजाइश नहीं है, और न उनकी ममता, आत्मीयताही कम होती है। अपने द्रष्ट्रिकोण से वे जा उचित समझते हैं, वंही सलाह देते है दूरदर्शिता क अभाव में उनके लिए वह समझना सम्भव ही नहीं होता, जिस पर अत्यन्तिक हित साधन ओर उज्जवल भविष्य निर्भर हैं। अभ्यस्त संकीर्ण स्वार्थपरता की पशु प्रवृतियाँ, प्रचलनकी परम्परा, जन जन द्धारा अपनाई जाने वाली रीति नीति और शुभ चिन्तकों का दबाव मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह बनता है, जिसमें से निकल सकना केवल उन्ही के लिए सम्भव होता है जो स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण के सहारे अपना मार्ग स्वयं बना सके।

मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपलब्ध सौभाग्य का सदुपयोग कर सके। व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय निर्माण सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। जिसके सहारे ने केवल अपना वरन् अपने समय ओर सर्म्पक क्षेत्र का काया कल्प कर सकना भी बन पड़ता है। विशिष्टता ओर वरिष्ठता उपलब्ध करने के लिए इतना ही आन्तरिक परिवर्तन पर्याप्त है कि प्रवाह की अनुपयुक्तता को समझाजाय ओर उससे पृथक अपन रास्ता अपना भविष्य आप बनाने का निश्चय किया जाय।

महानता अंपनाने में उतना जोखिम, उतना कष्ट, उतना सन्तोष और उतना घाटा नहीं है जितना कि व्यामोह में संग्रस्त ओछी रीति-नीति अपनाने मे। उत्कृष्टता अपनाने में जो घाटा है उसे संयम ओर सन्तोष अपनाने भर से सहज ही पूरा किया जा सकता है। सादगी अपनाने, सन्तोष से रहने ओर व्यामोह सेबचने में इतना ही घाटा है कि चकाचौंध उत्पन्न करने वाली विडम्बना नहीं बन पाती और आकाँक्षा को गुजरे ओर कर्तव्य पालन तक सीमित रखना पड़ता है।

अमीरी की वितृष्णा में जो जितनी कमी कर सके, अहन्ता का उन्माद जो जितना घटा सके वह उसी अनुपात से अपने भीतर महानता की सत्प्रवृतियाँ विकसित होती देखेगा। कहना न होगा कि महानता का मूल्य वितृष्णाओं पर अंकुश रखने के रुप में जो चुका सकेगा वह उतना बहुमूल्य सौभाग्य खरीदेगा ऐसे दूरदर्शी न भौतिक द्रष्ट्रि से घाटे में रहते हैं ओर न आत्मिक आनन्द उपलब्ध करने से वंचित रहते है। उन्हे दुहरा लाभ है। साँसारिक द्रष्ट्रि से वे व्यामोह ग्रस्तों की तुलना में कहीं अधिक अर समुन्नत रहते है। उन्हे अपेक्षाकृत अधिक स्नेह सम्मान मिलता है। सच्चे मिंत्रो ओर सहयोगियों की उन्हें कमी नहीं रहती। साथ ही आत्ससन्तोष का लाभ अनायास ही मिलता रहता है जिसकी झाँकी मात्र पाने के लिए संसारी लोग न जाने कितना कमाते और कितना लुटाते रहते है।

अहृन्ता की तृप्ति के लिए लोक सम्मान पान के उपाय खोजे जाते है। इसके लिए फिजूल खर्ची और उदण्ड़ता का प्रदर्शन ही लोगों से बन पड़ता है। यदि इस मूर्खता से मुह मोड़ा और शालीनता तथा उदारता का उपक्रम अपनाया जा सके तो निश्चय ही उतना गहरा लोक सम्मान मिलने लगेगा जिसके सहारे आत्म गौरव का आनन्द हर घड़ी मिलता रहे।

दैवी अनुग्रह ही याचना ओर अभिलाषा अनेकों करते रहते है। वे जानते हैं कि जो अपने पुरुषार्थ से नहीं मिलता वह दैवी अनुकम्पा से मिल सकता है। इसके असंख्यो उदाहरण भी है। भक्त गाथा का प्राचीन इतिहास और वर्तमान का प्रत्यक्ष अनुभव यह बताता ह कि जो ईश्वरीय अनुकम्पा के अधिकारी बन सके, वे असाधारण उपलब्धियाँ करललगत करने में भी सफल हुए है।

साधना के चमत्कारों की आधारशिला तो उत्कृष्ट द्रष्ट्रिकोण और आदर्श चरित्र पर ही रखी गई है। ब्राह्मणतत्व में उज्जवल चरित्र और साधुता में परमार्थ परायणता की अवधारणा है। जो व्यक्तित्व को जितना परिष्कृत करता जायेगा उसके नगण्य से पूजा उपचार, भी आर्श्चयजनक चमत्कारों का आधार बनते जायेगे। उत्कृष्ट जीवन ही ईश्वरीय अनुदानों का ऋद्धि-सिद्धियों का आधारभूत कारण है, उसे जितना ज्यादा समझा जा सके उतना ही उतम है।

अशक्तों ओर पराबलम्बियों का प्रवाह में बहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। किन्तु जो जागृत ओर जीवन्त है। विवेकी ओर साहसी हैं उन्हें ईश्वर से अमानत जीवन सम्पदा का उपयोग करने सम्बन्धी सर्वोपरि महत्व के प्रश्न का समाधान करने के लिए दूरदर्शिता का ही आश्रय लेना चाहिए। जा जीवन्त ओर जागृत है उन्हें उपलब्ध अवसर का सर्वोतम उपयोग करने की बात सोचनी ओर तदनुरुप नये कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए। इसकेलिए आज का मुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है।


प्रभात की पुण्य बेला में आत्म परिवर्तन अपेक्षित....

रात्रि की गतिविधियाँ प्रभात होते ही बदल जाती हैं। सोने वाले जागते हैं और निष्क्रियता छोडकर प्रस्तुत समस्याओं का सामना करने के लिए कटिबद्ध होते हैं। पक्षी घोंसला छोडकर शरीरचर्या में प्रवृत होना पडता है। फूल खिलते हैं और अंकुर उगते हैं। दिनकर की उर्जा तमिस्त्रा को विदा करती है और निशाचर को अपनी हलचलें बन्द करने की सूक्षती हैं। युग सन्धि की यह घडी पुण्य प्रभात जैसी है, उसमें अन्धकार युग की तमिस्त्रा का अन्त और आलोक उर्जा का आरम्भ प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

इस पावन बेला में मूधन्यों का कुछ विशेष कर्त्तव्य है, उन्हें मन्दिरों में आरती सँजोनी और शंख घडियाल बजाकर उनीदों में चेतना भरनी चाहिए। अचेतनों की गतिविधिचाँ जो भी रहें, चेतन तो अदीयमान सूर्य के अभ्मुख होते और सन्घ्या वन्दन करते ही ष्िगोचर होगे। प्रभात पर जिनकी द्धा हैं, वे उस पावन बेला का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सोच सकते हैं। जागक स्वयं उठते और दूसरों को उठाते हैं। सौभाग्य की तरह उदीयमान आलोक की अवमानना कुछ अभागे ही करते हैं। अन्यथा जागरण की बेला में विवेकवानों के लिए एक ही मार्ग है। आज की आवश्यकताओं को समझना और उनकी पूर्ति में योजनावद्ध क्रम बना कर जुट पडना।

व्यक्तिगत चिन्तन के लिए सर्वोपरि समस्या है जीवन का सदुपयाग। यह अलभ्य अपहार कुचक्र से निकल कर पूणर्पता तक पहुँचने के लिए समस्त सुविधाओं से भरा पूरा है। उसने बडा स्वार्थ साधन दूसरा क्या हो सकता है कि वाहय जीवन में बन्धन मुक्ति की अनुभूतिका आनन्द उठाते हुए इस सुअवसर का लाभ उठाया जायै इसी समस्या का दूसरा पक्ष है प्रगति पथ पर अग्रगमन, अभिनव उपलब्धियों का रसास्वादन। यह सफलता भी आत्मिक क्षेत्र की ही है। भौतिक प्रगति की निर्वाह भरके लिए आवश्यकता है। इससे अधिक करनी हो तो वह सामूहिक सुविधा सर्म्बधन के रूप में ही श्रेयस्कर है। निजी सम्पदा औरत माप दण्ड से बढने पर अनेकानेक विकृतियाँ उत्पन्न करती है। पेट में अधिक खाया गया भोजन और सामर्थ्य से अधिक उठाया गया वनज कितना कष्ट कारक होता है यह सभी जानते हैं। महत्वाकाँक्षाये आत्मिक क्षेत्र की हि होती हैं। लोभ और मोह की आग भडकाने वाले स्वंय जलते और जलाते भर है। आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा को परमार्थ परायणता कहते हैं। मनुष्य को ईश्वरीय अनुदानों का दूसरा उददेश्य यही है कि वह उदार एवं सह्रदयता का प्रमाण देकर अपनी विशिष्टता सिद्ध करे। इस प्रतियोगिता में जो जितने नम्बर लाता हैं, उसे उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुदानों का पुरस्कार मिलता है।

सामान्य जन पेट और प्रजनन के कुचक्र में ही फँसे मौत के दिन पूरे करते है। उन्हें न आगे की कुछ सूझती है और न अधिक की आवश्यकता अनुभव होती हैं। पर असामान्यों की बात दूसरी है, वे जीवन्तों की तरह अग्र गमन की बात सोचते हैं और उन्मुक्त आकाश में स्वतन्त्र चिन्तन एवं विशिष्ट साहस के दोनों पंख खोलकर लम्बी उडान भरते हैं। ईश्वरीय अनुग्रहों में महा मानव ऋषि कल्प, देवदूत अवतार जैसी कितनी ही ऐसी विभूतियाँ है। जिन्हें पाने वाला धन्य होकर रहता है। इन्हें पाने के लिए परमार्थ अपनाना पडता हैं।

परमार्थ का तार्त्पय है सत्प्रवृत्तियों का सम्बर्न्धन सदाशयता का प्रचलनच, पीडा और पतन का उन्मूलन यही है वह विशिष्टता जो क्षुद्रजनों के गल नहीं अतरती जो इस अग्नि परीक्षा में प्रवेश करने का साहस करते है वह खरे सोने की तरह अपना समुचित और सम्मानजनक मूल्य प्राप्त करता है। कृपणों की गर्दन पर संकीर्ण स्वार्थपरता लदी रहती है, फलतः वेल पर वार्थ की बात सोचते हैं और न ईश्वरीय अनुदानों के अधिकारी बनते हैं। प्रगतिशीलों को न क्षुद्रता भाती है, और संकीर्णता रचती हैं। वे अपना मार्ग आप बनाते और अपने पैरो पर आप चलते हैं। यही है प्रगतिशीलता की रीति नीति जो इसे अपनाते है, वे देव मानव होकर होती हैं।

सूरज तो रोज ही निकलता है और रोज ही अस्त होता हैं, पर जीवन प्रभात की पुण्य वेला उस दिन आती जिस दिन मनुष्य शान्त चित्त से अपनी स्थिति पर विचार करता और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए सिरे से सोचने और नये निर्धारण करने के लिए होता हैं। यह अवसर जिसे मिले उसे सच्चे अर्थो में सौभाग्यशाली कहा जाता है। ईश्वर का अनुग्रह इसी में बरसता है। सद्गुर इसी रण में अपने अनुदान देते सौभाग्योदय इसी उपलब्धि को कहते हैं। आत्म जागरण आत्मोपलब्धि आदि अनेक नामों से इसे बखाना जाता है। ईश्वर दर्शन भी यही है। इस प्रभात की रचना करते हुए ही अन्तःकरण में तमसोमा ज्योतिर्गमय हूक उठती रहती है।

युग प्रभात विराट ब्रहम की इच्छा और आवश्यकता नमित होता है। विनाश को निरस्त और विकास सशस्त करने के लिए जग अश्य जगत में अभिनव लय उठती है तो उसकी प्रखरता और प्रचण्डता युगा चेतना स्तर की होती हैं। भक्त लोग इसे अवतार मानते हैं। तत्वदर्शी इसी को युग अवतरण मानते हैं। न का प्रकटीकरण इसी रूप में होता है, यही युग है। इस पुण्य बेला में जागरूको बुलाया जाता और वे अघ्श्य प्रेरण के हश्य प्रयासों में अपनी भाव भूमिका निभाते हैं। इतिहास पुराणों के पृष्ठ इसी से भरे पडे हैं कि अध्श्य की प्रेरणाओं को अपना जागरूकोंन अग्रदूतोंका अत्तरदायित्व उठाया, अरू की प्रथम झाँको पर्वत शिखरों पर चमकने वाली ही कराती हैं। मूर्धन्यों की गति विधियाँ सामान्यों वहीं रहतीं, वे शिखरों की तरह सर्वप्रथम हैं, और न केवल प्रभात का वरन् शिखरों के का भी परिचय देती हैं। दर्शक इस प्रथम दर्शन से विमुग्ध होकर शिखरों का भी नमन करते हैं।

कई बार सामान्य समय में भी जीवन प्रभात का सौभाग्य कईयों मिलता हैं, पर युग प्रभात में तो एक प्रवाह आता है और विशिष्टों को अनायास ही अग्रिम पंक्ति में खडा देखा जाता हैं। जागने और जगाने की प्रक्रिया देवालयों में दूसरों से पूर्व ही चल पडती हैं। जागरूकों कों देवात्मा कहा जाता हैं। वे जीवन्त देवालयों की र्पूणी में ही गिने जाते है।

युग सन्धि की इस पुण्य वेला में दश्य क्षेत्रों में प्रभात का परिचय और दर्शन सहज ही मिलता हैं। जागृतों के अन्तःक्षेत्र में समुद्र मन्थन चल रहा है। वे ईश्वरीय अनुदान के रूप में उपलब्ध हुई मनुष्य जीवन की गरीमा का अनुभव इस प्रकार कर रहे हैं मानो निद्रा त्याग कर प्रथम बार अनसे सत्य को को देखा हो। स्वार्थ सिद्धि के लिए उत्कृष्टता अपनाने और परमार्थ सिद्धि के लिए आदर्शपथ पर चल पडने में ही उन्हें कल्याण दिखता है, युग प्रभात को इसके लिए नया निमन्त्रण भेजा हैं। महान परिवर्तन की भूमिकाएँ समय समय पर देव मानवो ही निभाई है। इन दिनों भी उन्हीं का पुरषार्थ जन नेतृत्व करेगा। अध्यापकों की बात दूसरी है, उनका काम छात्रो कों समझाने के लिए वाणी का उपयोग कर लेने से चल जाता है, पर लोक मानस में उच्चस्तरीय प्रवृत्त्याँ उभारने के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करने के अतिरिक्त दूसरा चारा नहीं। यह कार्य जागरुकों का है। वे ही इस प्रयाजनको समय समय पर पूरा करते रहे हैं। इस आडे समय में भी उन्हें अपनी पूर्व भूमिका निभानी है।

अंमद, हनुमान, नल, नील, गीध, गिलहरी की भूमिका निभाने वाली आत्माएँ मात्र त्रेता के लंका काण्ड में ही प्रकट हुई हों, ऐसी बात नहीं है, युग परिवर्तन के समस्त अवसरों पर उन देवदूतों ने विभिन्न आवरण ओढकर विभिन्न भूमिकायें पर उन देवदूतों ने विभिन्न सामयिक आवश्यकताओं के अनुरुप् निभाई हैं। प्रसतुत युग संधि भी ठीक ऐसी ही वेला हैं। जिसका आपत्ति कालीन आमन्त्रण जीवन्तों के क्षेत्र में अनसुना किया ही नहीं जा सकता।

तमिसा के अवसान और आलोक के पुनरोदय के अवसर पर पूर्वजों की महान परम्पराओं का पुनर्जीवन होना स्वाभाविक है। कहना न होगा कि भारतीय तत्वदर्शन का मेरुदण्ड वह प्रचलन है, जिसमें जीवन काके दो भागों में विभक्त किया गया है। आधे में शरीर यात्रा और आधे में ईशवरीय प्रयोजन की पूर्ति का विभाजन ही वर्णाश्रम धर्म हैं। यह क्रम जब तक चला अतीत का गौरव भी अक्षुण्ण रहा। जैसे जैसे कृपणता बढने लगी वैसे वैसे तमिस्त्रा छाई। अब नव प्रभात के उदीयमान होते ही उन परम्पराओं का व्यवहार में उतरना भी स्वाभाविक है, जो मनुष्य में देवत्व और धरती पर र्स्वग के अवतरण की कल्पना जल्पना नहीं रहने देती, वरन् यथार्थता में परिणिता करती है।

जागरुकों में इन दिनों वे प्रवृत्तियाँ उभार की उच्च सीमा को छूती दिखाई पडती हैं जिन्हें अपना स्वयं का निर्धारण और दूसरों के लिए अनुकरण का पथ प्रशस्त करना है। अध्यात्म युग में लोक जीवन का यही क्रम होगा कि भौतिक लिप्साओं को नियंत्रित करें और आत्मिक विशिष्टताओं को उभारने में उतना पुरुषार्थ करें जो जन जन में अभिनव चेतना भरने के लिए समर्थ हो सके।

उच्चस्तरीय जीवन दर्शन अपनाने पर भी जन समाज को विपत्तियों और विभीषिकाओं से उवरने का अवसर मिलेगा। समृद्धि और शालीनता की उभयपक्षीय सुखद संभावनाएँ उत्कृष्टता अपनाने से ही सम्भव हो सकती हैं। इस दिशा धारा को अपनाने के लिए उपयुक्त लोक शिक्षण की व्यवस्था रहना प्रगति का प्रथम चरण हैं। इसके लिए युग प्रवक्ता चाहिए, जो मात्र वाणी से ही कहते सुनते न रहे, वरन् अथवा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध भी करें कि जो कहा जा रहा है वह सरल एवं व्यावहारिक ही नहीं वरन् सुखद एवं श्रेयस्कर भी हैं। प्रतिपादनों के अनुरुप प्रवक्ताओं का चरित्र एवं व्यक्तिव न होगा तो उसका प्रभाव नहीं के बराबर ही होगा। लोग सुनेंगे तो सही पर अपनाने के लिए किसी की अन्त प्रेरण न उठेगी। दीपक को दीपक ही जलाता है और चरित्र ही चरित्र को प्रभावित करता हैं। जगरुक को अपना जीवन क्रम नवयुग की प्रयोगशाला के रुप में प्रस्तुत करना होगा जिसमें झाँक कर यह देखा जा सकेगा की आर्दशवादिता व्यावहारिक एवं उपयोगी भी हो सकती है या नहीं, यह विश्वास कराये बिना लोक मानस को न पुराना ढर्रा छोडने के लिए सहमत किया जा सकता है। और न नया अपनाने के लिए।

प्रतिपादनों और प्रवचनों का जमाना चला गया। पिछले दिनों आदर्श वादिता के समर्थन में इतना लिखा जा चुका है कि उनकी निरर्थकताको देखते हुए उसी की पुनरावृत्ति करने में कुछ सार दिखाई नहीं पडता। कारगर परिणाम निकलने की सम्भावना इसी एक तथ्य पर निर्भर हैं कि कुछ लोग आगे बढकर यह सिद्धि करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, वरन् हर दृष्ट से लाभदायक भी है। दिग्रभ्रान्त लोक मानस को इससे कम में असके लिए सहमत नहीं कर सकते, जिसे किये जाने की आशा संजोकर नव युग का स्वत्न देखा गया हैं।

आदर्शवादिता न केवल समाज कल्याण के लिए, ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं वरन् उससे स्वार्थ भी पूरी तरह सधता है। सादगी और संयम अपनाने में हानि इतनी भर है कि अन्धों में काना राजा बनने का अवसर नहीं मिलता। मूर्खा के बीच धूर्त जिस प्रकार अपनी नाक बढाते और ठाठ बनाते देखे जाते है, उस बचकानेपन में कमी आने के अतिरिक्त और कहीं कोई बाटा नहीं हैं। लोभ और मोह की आग में ईधन की तरह जलने वाली क्षमताओं को तृष्णाके व्यामोह में से छुटकारा पाते ही इतनी बचत हो सकती है कि उसके सहारे आत्म कल्याण और लोक कल्याण का दुहरा प्रयोजन पूरा हो सके।

इसके लिए मात्र इतना ही करना पडता है कि अभ्यस्त इच्छाओं और आदतों का नये सिरे से पर्यवेक्षण कर सकने की सूक्ष्म बुद्धि अपनाई जाय, यह एक कदम हुआ। दूसरा यह है कि अनुपयुक्त को छोडने और औचित्य को अपनाने का इतना साहस संजोया जाय जिसमें सचित कुसंस्कारों और तथाकथित प्रियजनों को बाधक बनने का अवसर ना मिल सके। इन्हीं दो कदमों को अठाते हुऐ उस महान लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँचा जा सकता है जिसमें आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह से सम्बन्धित विपुल विभूतियाँ उपलब्ध करने का अवसर मिल सके।

हर व्यक्ति यह सोचता है कि वह बहुत व्यस्त एवं उत्तर उदायित्वों से लदा है। इसलिए सत्प्रयोजनों में भाग लेने की स्थिति उसकी नहीं है। इस मान्यता में सार कम और भ्रम अधिक है। जिस प्रकार सोचने की आदत है और जिस प्रकार से समाधान चाहें गये हैं, उसी पर अडे रहना हो तो बात दूसरी है अन्यथा हर समस्या के हजार समाधान हैं। एक प्रकार से बात न बनती हों तो उसे दूसरे प्रकार बनाया जा सकता हैं। एक रास्ता रुक गया हो तो दूसरे रास्ते जाया जा सकता है। आर्दशवादी रीति नीति अपनाने में परिस्थितियाँ उतनी बाधक नहीं होती जितनी की पूर्वाग्रहों के दलदल में फँसी हुई मनःस्थिति। दृष्टि बदलने और दूसरे मार्ग खोजने पर हर स्थिति के व्यक्ति को इतना अवसर मिल सकता है वह अपनी दिन चर्या में गतिविधियों उत्क का समावेश करने के लिए पयाप्त अवसर प्राप्त कर सके

एक नई दृष्टि से सोचा जाय कि विपति कि विपत्ति की घडी आई, शरीर रुग्ण या अपंग हो गया तब अभ्यस्त ढर्रा छोडकर कोई न कोई दूसरी राह खोजनी और गाडी किसी दूसरे रास्ते चलानी पडेगी । कई बार ऐसे कमाउ व्यक्तियो की भी मृत्यु हो जाती है, जिनके सहारे गृह व्यवस्था चला करती थी। उन दिनों घबराने वाले यही देखते थे कि सब कुछ चौपट हो गया और उवरने का काई रास्ता शेष नहीं रहा। घबराहट दूर होने और शोकावेग हलका होने पर देखा जाता है कि दूसरा रास्तिनिकल आया और रुका हुआ गतिचक्र फिर किसी रास्ते चल पडा। सृष्टा की इस विश्व व्यवस्था में हर घटक बहुमूल्य है। उसका अपना कार्य और उपयोग है। इतने पर भी दूसरी सचाई भी यथास्थान है किसी के भी न रहने पर यहाँ कहीं भी अवराध उत्पन्न नहीं होता। गति चक्र अडता नहीं, वह एक रास्ता रुकते ही दूसरा नया रास्ता खोज लेता है। जिसने अपने ही सिर पर धरती लदी हुई समझी उसकी बात दूसरी है, पर जो तथ्यों से परिचित हैं वे जानते हैं कि दुर्घटनाओं की क्षतिपूर्ति होते रहने की यहाँ परिपूर्ण व्यवस्था विद्यमान है। यदि पुराने ढर्रे को बदल कर नये में प्रवेश करने की बात को भी दुर्घटना जैसी मान लिया जाय तो प्रतीत होगा कि उस परिवर्तन से जो भय प्रतीत होता था, जो आशंका दीखती थी वह सब कुछ काल्पनिक प्रतीत हुआ। वयवस्था ने परिस्थितियों के साथ अपना, ताल मेल बिठा लिया और अपने हटते ही जो अनर्थ होने का भय था, वह सर्वथा निर्मूल सिद्ध हुआ।

यहाँ असकी चर्चा है, जो वस्तुतःउत्तरदायित्वों से लदे हैं और जिन्हें सचमुच ही गाडी खींचनी पडती है ऐसे लोग भी यदि पूरी तरह युग प्रयोजनों में लगना चाहें तो भी उनका स्थान लेने लिएदूसरी सम्भावना मौजद है। पर यहाँ तो उतनी बात भी नहीं हो रही है। इस समय तो इतने भर से काम चल सकता है कि लाभ और मोह की कीचड से उवारा जाय और निर्वाह तथा परिवार सम्बन्धी महत्वाकाँक्षाओं को थोडा हलका कर लिया जाय। जिस परमार्थ को असम्भव और निरर्थक माना जाता है, उसे उपयोगी और आवश्यक समझा जाय। इतना आन्तरिक परिवर्तन जो भी कर सकेंगे वे देखेगे कि जीवन प्रभात और युग प्रभात में जागरुकों का जो कर्त्तवय था, उसका परिपालन तनिक भी कठिन नहीं रहा। आदर्शवादी निर्धरण न केवल सरल है वरन् सुखद और श्रेयस्कर भी। इस तथ्य की सचाई की कोई भी कभी भी जाँच कर सकता है। इस प्रयोग परीक्षण के लिए आज जैसा उपयुक्त अवसर फिर कदाचित् ही कभी किसी को मिल सके।


पुण्यात्मा गृहस्थ के घर एक अतिथि बनकर आये (kahani)

एकबार एक पुण्यात्मा गृहस्थ के घर एक अतिथि बनकर आये उनके शरीर पर सारे कपडे काले थे। गृहस्थ ने तनिक ख्न्निता से कहा “तुमने काले कपडे क्यों पहन रक्खे हैं?” मेरे काम क्रोधादिमित्रों की मृत्यु हो गई है, उन्हीं के शोक में ये काले वस्त्र धारण कर दिए हैं। अतिथि ने उत्तर दिया।

ग्हस्थ ने उथ्त अतिथ्िको घर से बाहर निकाल देने का आदेश दिया, नौकर ने तत्काल आज्ञा पालन की । थोडी देर बाद उन्होंने अतिथि को वापिस बुलाया और पास आते ही फिर निकाल देने की आज्ञा दी इस प्रकार यह क्रमपात बार चलता रहा। किनतु अतिथि तनिक भी खिन्न न हुए अन्त में गृहस्थ ने अतिथि का सम्मान किया और अनुभव किया कि ये सच्चे इन्द्रियजित हैं।


आत्मोर्त्कष और श्रेय साधना स्वर्णिम अवसर

कभी कभी कुछ प्रतिभायें ऐसी भी होती हैं, जो अन्तःप्रेरण से उत्कृष्टता का वरण करती, संकल्प बल से उसे सींचतीं और अपने एकाकी पुरुषार्थ से लक्ष्य जक जा पहुँचती हैं। अन्हें दूसरों की हायता नहीं लेनी पडती हर व्यक्ति मूलतः इतना क्षमता सम्पन्न है कि सन्निहित विशिष्टिताओं को प्रसुप्त से जागृत कर सकें, और उन्हीं के सहारे पर्गति पथ पर चलते हुए वह प्राप्त कर सकें, जिसके लिए कि मानवी अस्तित्व का निर्माण हुआ है।

तथ्यतः यही वस्तुस्थिति है। मनुष्य को न तो अपूर्ण बताया गया है और न दरिद्र, असहाय, पराश्रित। उगने और उठने की समग्र क्षमता उसमें विद्यमान है। फिर भी इसे दुर्भागय, माया चक्र, प्रपंच, व्यामोह अथवा और कुछ नाम देते हुए, यह मानाजा सकता है कि इस सत्य को कोई विरले ही समझ पाते हैं। जो समझते हैं, उनमें से अधिकाँश में इसना मनोबल नहीं होता कि प्रसुप्त वैशिष्ठ को जगायें और उसे चरमोर्त्कष का साधन बनाये। आमतौर से सहकारी समाज का अभ्यस्त होने के कारण लोग वातावरण का प्रभाव ग्रहण करते और प्रवाह में बहते रहते हैं। संकल्प पूर्वक बने थोडे होते हैं। अधिका्रश को परिस्थितियाँ बनाती हैं। इस सचाई को गले उतारना ही होगा। इस व्यावहारिक कठिनाई को भी समझना ही होगा। जिस प्रकार आत्म पौरुष से उच्चस्तर पर पहुँच सकने की संभावना असंदिग्ध है, वहाँ दूसरा पक्ष यह भी है कि संगति का प्रभाव इतना अधिक होता है, जिसे सामान्य स्थिति में, सामान्य लोगों के लिए नियति की भूकतका निभाते हुए देखा जा सकता है।

विश्व विख्यात माह मानवों में से अध्काँश को अपन लक्ष्य का निर्धारण और परिपोषण आत्म बल के सहारे स्वयं ही करना पडा है और वे अपने निश्चय पर आप आरुढ रह कर, अपना मार्ग स्वयं बनाते और अपने पैरों आप पार करते रहे हैं। परिस्थितियाँ उन्हें प्रभावित नहीं कर सकीं। अवरोधों ने उन्हें रोका तो, पर वे रुके नहीं न तो किसी ने सहयोग दिया न प्रोत्साहन। अपने को आप ही समझाते रहे, और अपने समर्थन से, आप आगे बढते रहे। अन्ततः उस लक्ष्य तक पहुँचे जिसे दैवी अनुग्रह भाग्योदय अथवा चमत्कार माना है। वस्तुतः यह सब किसी का उपहार नहीं अपना ही पराक्रम है जिसे मनस्वी अपने बल बूते समग्र करते और सफलताओं पर अहंकार न करते हुए, नम्रता वश बडों का अनुदान कहते हैं।

श्रेय और सराहनीय तो यही स्तर है, पर किया क्या जाय यहाँ प्रौढ और परिपक्वों की भारी कमी है। परिवार में बच्चों कच्चों का ही बाहुल्य होता है और उनका परिपोषण एवं परिष्कार बडों को ही करना पडता है। आत्म विकास के लिए उन्हें स्वतन्त्र छोड दिया 5जाय तो फिर वह स्वतन्त्रता उनके लिए मँहगी पडेगी। निकृष्टता धूल की तरह हवा में उडती है, पर उत्कृष्टता सुगन्ध की तरह प्रयत्नपूर्वक अर्जित करनी पडती है। सभी जानते हैं कि परिवार की परिस्थितियाँ ही अधिकाँश लोगों को बनाने बिगाडने की भूमिका निभाती हैं। स्वनिर्मित तो कोई विरले ही होते हैं। जिनने संचित कुसंस्कारों को घिरे हुए वातावरण और प्रियजनों के परामर्श को अनसुना करके कोई महान परिवर्तन प्रस्तुत किया हो ऐसे लोग भी संसार में इए तो अनेकों हैं, पर उतनी साहसिकता हर किसी में प्रकट नहीं होती।

बुद्ध ने दिशा परिवर्तन अपने ही बल बूते किया था, उनके अनुयायियों में से भी अनेकोंने वही परम्परा अपनाई आनन्द, हर्षवर्धन, अंगुलिमाल, अम्बपाली आदि उनके निकटवर्ती जन्म जात रुप् से तैसे नहीं थे, जैसे कि परिवर्तित स्थिति में विकसित हुए। अन्यान्य महा मानवों के सम्बन्ध में भी, यही बात कही जा सकती है। उन्हें परिस्थितियों ने बनाया। मनःस्थिति के आधार पर ही उनने उँची छलाँगें लगाई और वहाँ जा पहुचे, जहाँ अवस्थित लोगों को चमम्कारी सिद्ध पुरुष एवं महा मानव कहा जाता हैं। यह उदाहरण भले ही थोडे हों, पर सिद्ध इसी सिद्धान्त को करते हैं कि मनुष्य का संकल्प और पुरुषार्थ यदि सुनिश्चित हो तो वह सूर्य को जमीन पर तो नहीं ला सकता पर आमतौर से जो असम्भव समझा जाता है, उसे समभव कर सकता है। इसन पर भी यह मानना पडेगा कि ऐसे अदाहरण कम मिलते हैं। अस्तु उन्हें अपवाद की रेणी में रखा और तथ्यों क प्रतिपादन में अन्हें प्राण कहा जा सकता है। सामान्य प्रचलन, अनुगमन और अनुकरण का ही मिलता है। समुदाय का प्रवाह और उसीमें जन साधारण की बहाव प्रचलन असी का देखा जाता है।

निकृष्टता का अपना आकर्षण है। गुरुत्वाकर्षण की तरह उसीि पकड सर्वत्र है। वह शक्ति बिना किसी प्रयत्न के उत्पन्न होती और अपलब्ध रहती है। किन्तु उत्कृष्टता को प्रयत्न पूर्वक उपार्जित करना और संकल्प पूर्वक पकडना पडता है। भौतिक उपलब्धियों की तरह ही आत्मिक विशिष्टताएँ भी पराक्रम ही नहीं वातावरण और साधन भी चाहती हैं। कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला शोध साहित्य आदि प्रगति प्रसंगो में जिनने भी सफलताएँ पाई हैं, उनमें एकाकी सूझ बूझ ही सत कुछ नहीं रही।इन्हें सहयोग, वातावरण एवं साधनों के कलए भी काँी दौड घ्प करनी पडी है। जो इन्हें जुट पाये वे सफल हुए, शेष के मनोरथ ऐसे ही मर गये। असफलता में निर्वारण की त्रुटि नहीं, वरन् साधनों की कमी ही प्रमुख अवरोध बनाी है।

आत्मिक प्रगति को, इस संसार की, इस योजन की सबसे बडी सफलता कहा जा सकजा है। इससे बढकर दूसरी उपलब्धि यहाँ अन्य कोई भी नहीं है। व्यक्तित्व की प्रखरता ही सच्चे अर्थो में वह विभूति है जिसके बदले किसी भी क्षेत्र की, किसी भी सफलता को खरीदा जा सकता है। व्यक्तित्व की दर्बलता ही प्रकारान्तर से दरिद्रता कही जाती है। पिछडापन कोर्द किसी पर थोपता नहीं, अन्दर की कुसंस्कारिता ही उसे न्योत बुलाती है।

प्रगति शीलता आकाश से नहीं बरसती और न किसी से अनुदान उपहार में मिलती है। हर व्यक्ति असे अपने आन्तरिक स्तर के अनुरुप संसार की खुली मण्डी में से खरीदता है। जिसके पास जिस स्तर की जितनी पूँजी है उसे उसी स्तर का विनिमय करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती। उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्ति जहाँ जाते हैं, वहाँ वे अपने लिए स्थान बनाते, सहयोग पाते, और सफल होते देखे जाते हैं। जबकी दीन दुर्बलो को जिस तिस पर आरोप लगाते व खीज उतारते देखा जाता है। यों इनमें से कई वस्तुत88 प्रताडित और परिस्थितियों के शिकार होने के कारण सहानुभूति के पात्र भी होते है,फिर भी व्यापक तथ्य यही मानना पडेगा कि व्यकित्तव की उत्कृटता ही विभिन्न क्षेत्रो की सफलता अर्जित करती है।

शिक्षा का उदेश्य भौतिक जानकारी और व्यवहार कुशलता उपार्जित करना है। सुशिक्षतों को आजीविका उपार्जन तथा किया कौशल में सुविधा रहती है। इसलिए शिक्षा प्राप्ति का प्रचलन भी है। उसकी उपयोगिता समझी और चेटा की जाती है, किन्तु दुर्भागय से विद्या की महता को क्रमश विस्मृत ही किया जा रहा है। विद्या सुसंस्कारिता का नाम है। वह शिक्षा के साथ साथ भी चल सकती है और लिखने पढने का प्रबन्ध न होने पर भी उसका आधार बन सकता है। प्राचीन काल में विद्यालयों का प्रबन्ध किया जाता था आज मात्र शिक्षालयों की भरमार है। जानकारी की कमीं नहीं, किन्तु प्रतिभायें 8888 नहीं मिलती। इसका एक ही कारण है विद्यालयो का अभाव। शिक्षालयों की सीमा,मस्तिष्कीय विकास और कौशल के अभ्यास तक सीमित है। सुसंस्कारिता का अपाज।न विद्यालयों में ही हो सकता है। विद्यालय से तार्त्पय फिर एक बार भली प्रकार समझा जाना चाहिए। जहाँ सुसंस्कारिता के सर्म्वधन का वातावरण हो, विद्यालय उसी को कहा जायगा। मात्र पाठ्यक्रम से संस्कार नहीं बनते, वह ढलई तो एसी भट्टी के माध्यम से हो सकती है, जिसमें आदर्शवादिता का प्रशिक्षध नहीं प्रचलनकी व्यवस्था रहने के कारण अभीष्ट उ र्जा उत्पन्न होती है।

प्राचीन काल से बालकों के लिए गुरुकुल और प्रौढों केलिए आरण्यकों को व्यवस्था थी। उन्हीं खादानों से व्यक्तित्व सम्पन्न नर रत्न निकलते थे । वे सच्चे अर्थो में कवद्यालय और विद्यार्धियों को क्या मिलना चाहिए इसका प्रत्यक्ष प्रभाव प्रस्तुत करते थे। जिस विद्या की महिमा सर्वस्व अपनाई जाती है वह मात्र अर्ककरी शिक्षा से कहीं अधिक उँची हैं। उसके लिए पाठयक्रम पूरा कराना नहीं शालीनताकी विधि वयवस्था को जीवन क्रममें उतारने का विशिष्ट प्रबन्ध करना हैं। उसके लिए उपयुक्त वातावरण अपेक्षित हैं। यह ऋषि कल्प अध्यापकों की व्यवस्था बनाने में संभव होती हैं। वातावरण प्रचलन का नाम है।ऐसे विद्यालयों का अस्तित्व जब तक रहा इस देश के नागरिक देवत्व से सुसंम्पन्न बने रहे। भले ही उनकी साक्षरता उतनी न रही हो नितनी कि आज कल बडी चढी दिखाई पडती है।

विद्या के प्रति उपेक्षा, विद्यालयों का अभाव और विद्यार्थी अभिरुचि का समापन यह तीनों ही मिलकर ऐसी दुःखद परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जिन्हें दुर्भिक्ष से भी बढ़कर कट कारक कहा जा सके। चतुरता की कमी नहीं, सुविधा साधन बहुत है। परिश्रमियों में से एक का गरीबी बेकारी की शिकायत नहीं हो सकती। इतने पर भी व्यक्तियों का अभाव बुरी तरह खटकता है। पिछड़े स्तर के लोगों की संख्या वृद्धि धरती के लिए भार और समाज के लिए संकट बनती जा रही है। वे प्रतिभाएं कहें से भी उभरती नहीं दीखती जो अपने उदाहरण प्रस्तुत करके शालीनता की गरिमा जन-जन के मन-मन में बिठा सकें। श्रेय और सफलता को देखकर ही सामान्य लोग ललचाते और अनुगमन के लिए चलते है। यदि उच्चस्तरीय नेतृत्व उपलब्ध रहा होता तो सदाशयता के मार्ग पर चल पड़ने वालो की कहीं कोई कमी न रहती।

प्रतिभा और पवित्रता के समन्वय को प्रखरता कहते हैं। कौशल और चरित्र को मिला देने से ह ीवह उत्कृष्टता बनती है, जिसे पाकर मनुष्य का देवत्व उभरता और आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याण का प्रयोजन पूरा करता है। कहना न होगा कि यह विशिष्टता आत्म शिक्षा से तो कभी-कभी ही उपलब्ध होती है, गुरुकुलों और आम्यकों के वातावरण में विद्याभ्यास करने में सहज सम्भव बनती है। इन दिनों उसी महान परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जिसमें विद्यालयो के लिए उपयुक्त केन्द्र संस्थानों की कमी नहीं पड़ने दी जाती है।

बच्च्ो के लिए गुरुकुल, निवृतों के लिए आरम्यक औश्र गृहस्थों के लिए तीर्थ सेवन की त्रिविध व्यवस्था जिन दिनों अपनी प्रौढ़ावस्था में थी उन दिनों मनुश्य में देवत्व के उदय औश्र धरती पर र्स्वग के अवतरण की बात कल्पना-जन्पना नहीं गिनी जाती थी। वरन पग-पग पर एक सहज स्वाभाविकता के रुप में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती थी। आज खदानें ही अवरुद्ध हो गई तो नर-रत्नों के दर्शन कहाँ से हो? युग समस्याओं का एक ही कारण है उच्च स्तरीय व्यक्तित्वों का अभाव, इस अभाव का कारण है विद्यालयों का न होना। यह फिर समझा जाना चाहिए कि शिक्षालयों और विद्यालयों में मौलिक अन्तर है। पढ़े गये डालने वाली फैक्टरियों की आज कमी नहीं, वे तेजी से बढती भी जा रही हैख् पर जिनका वातावरण नर-नत्नों को ढाल सकें ऐसे विद्या मन्दिरों के तो अब दर्शन ही दुर्लभ हो रहे है।

कई लोग घोषणा और चेष्टा तो कते है। बोर्ड और विज्ञापन भी इसी स्तर के बनाते है, पर बन उनसे भी कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि अध्यापकों का रीति-नीति का विधि व्यवस्था का क्या क्रम होना चाहिए इसका स्वरुप् न तो सूझता है और न वैसा प्रबन्ध करते, साधन जुटाते ही बन पडता है। फलतः वह बन ही नहीं पडता जो सोचा गया है, वैसे इस प्रकार सोचने की परम्परा ही नहीं है। शिक्षा का महत्व अर्थापार्जन से अधिक भी कुछ हो सकता है, इसे जानते तो कई लोग हैं पर जो मानते भी हों ऐसों को ढूँढ निकालना दुस्तर है।

इस अभाव की पूर्ति के लिए, एक आरम्भिक प्रयास गायत्री नगर की आरण्यक व्यवस्था में किया गया है। शान्ति कुँज हरिद्धार की इस नव निर्मित इमारत में इसी जुलाई से प्रशिक्षण की उस परम्परा को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जिसमें कुरुकुल, आरण्यक औश्र तीर्थ सेवन की त्रिविध व्यवस्था संजोई जाती थी। वह एक प्रयोग है। प्रयोगशाला का उद्देश्य उपलब्धियों को छोटे रुप् में इस प्रकार प्रस्तुत करना होता है जिसे अन्य लोग बड़े परिणाम में अपनाकर लाभान्वित हो सकें। नर्सरी में अनेक प्रकार के पौधे उगाये जाते है। उद्याओं में कुछ ही पेड फलते है। गायत्री नगर को नर्सरी बनाया जा रहा है। वह प्रयोग शाला की भूमिका सम्पन्न करेगी।

ड्ढद्य द्धशस्त्रद्म द्गद्धठ्ठद्भ द्गह्यड्ड फ्ह्न:स्रह्नब्] क्द्मद्भ>;स्र रुह्द्भ ह्द्धस्नर्द्मं द्यह्यशह्व स्रद्ध द्ध=द्धशद्ध/द्म द्बद्भश्वद्बद्भद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य हृद्मह्यंकह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्धय;द्मद्धशह् ,शड्ड द्बह्नह्वह्लर्द्धंद्धशह् स्रद्भह्वह्य स्रद्म क्द्ध॥द्मह्व; द्बभ्;द्मद्य द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न ड्ढद्य ड्ढद्य द्बभ्;द्मह्यफ् स्रद्ध द्यक्तब्ह्द्म स्रद्म रुह्द्भ द्धशय़ द्यद्गद्मह्ल स्रद्मह्य ;द्द सठ्ठ;फ्द्ग स्रद्भद्म द्यस्रह्यफ्द्म द्धस्र ह्र;द्धु क्द्मस्द्भ द्यद्गद्मह्ल स्रद्म द्वक्रस्र"र्द्मं ,शड्ड ॥द्मद्मस्द्धह्स्र ह्स्नद्मद्म क्द्मद्धक्रद्गस्र द्बभ्फ्द्धह् स्रद्म क्द्म/द्मद्मद्भ] द्वक्कश्चरुह्द्भद्ध; द्ध'द्मम्द्म.द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म द्बद्भ द्धह्व॥र्द्मंद्भ द्दस्] द्वक्कश्चरुह्द्भद्ध; क्स्नद्मर्द्मंह् शद्मह्द्मशद्भ.द्म ,शड्ड ह्र;शरुस्नद्मद्म यद्ग द्यह्य द्यड्ड;ह्नु्न ड्ढद्य द्बद्मक्च−; यद्ग द्बख्द्भद्म स्रद्भद्मह्वह्य द्यह्य क्द्मफ्ह्य स्रद्ध ह्र;शरुस्नद्मद्म द्दस््न ड्ढद्यद्गह्यड्ड द्धशस्त्रद्मस्नद्मर्द्धं स्रद्मह्य द्ब फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड ष्द्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, र्द्यशंद्बभ्स्नद्मद्ग द्वद्दह्यड्ड ष्ह्नब्द्म;द्म फ्;द्म द्दस् ह्लद्मह्य द्वद्ब;ह्नष्ठह् शद्मह्द्मशद्भ.द्म ष्ह्वद्मह्वह्य क्द्मस्द्भ क्/;;म्द्म स्रद्ध ॥द्मख्द्धद्गस्रद्म द्धह्व॥द्मद्मह्वह्य द्गह्यड्ड क्द्बह्वद्ध द्धशद्ध'द्म"कद्म स्रद्म द्बद्धद्भश्च; ठ्ठह्य द्यस्रह्य्न ;द्मह्य द्ध'द्मम्द्मद्म स्रद्म द्वठ्ठ−ठ्ठह्य'; क्ह्वफ् ह्वश द्यक्वह्लह्व स्रह्य द्धब्, ह्लह्व&द्गद्मह्वद्य स्रद्म द्बद्धद्भ"स्रद्मद्भ क्द्मश';स्र द्दस्ड्ड द्वद्यस्रह्य द्धब्, द्बभ्[द्मद्भह्द्म द्यश्वद्बह्व ह्र;द्धुक्रश स्रद्म ह्वह्यह्क्वक्रश श्चद्मद्धद्द,्न ड्ढद्य ह्वह्यह्क्वक्रश स्रद्मह्य ;ह्नफ् ठ्ठह्यशह्द्म ह्वह्य द्यद्गरुह् ह्लद्मफ्:स्रद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्वश द्यक्वह्लह्व द्गह्यड्ड ह्लह्नंक द्बरु+ह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्यद्ग; ठ्ठद्मह्व स्रद्ध द्गद्मँफ् स्रद्ध द्दस्] ह्लद्मह्य ह्र;रुह् द्दस््न शह्य क्द्बह्वह्य&क्द्बह्वह्य म्द्मह्य=द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्वश द्यक्वह्लह्व स्रह्य द्धब्, स्रह्नहृ स्रद्मद्ग स्रद्भह्य क्द्मस्द्भ द्वद्यस्रह्य द्धब्, क्द्बह्वह्य ठ्ठक्वद्ध"कस्रद्मह्य.द्म] ह्र;द्धष्ठह्क्रश ,शड्ड द्धय;द्मस्रब्द्मद्ब द्गह्यड्ड द्बभ्॥द्मद्मशद्ध ह्क्रश द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्वद्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म द्गह्यड्ड द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्य फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड ;ह्नफ् द्ध'द्मद्धंघद्ब;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्बभ्द्धह्॥द्मद्म द्धह्व[द्मद्मद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, श्चब्ह्यफ्द्म्न द्धस्रह्ह्न द्वद्यद्यह्य द्बर्ख्शं द्वद्दह्य द्यह्न;द्मह्यंग; ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्म;फ्द्म्न द्धह्लद्दह्य क्फ्ब्ह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड क्/;;ह्व स्रद्ध] ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्ध म्द्मद्गह्द्म द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्वद्ध द्दस््न क्द्मद्भश्व॥द्म ड्ढद्यद्ध शफ् शद्मह्द्मशद्भ.द्म स्रद्मह्य क्द्मद्गद्ध=ह् स्रद्भस्रह्य द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न

शद्मह्वद्बभ्रुस्नद्म द्दद्ध क्द्मद्भ.द्म;स्रद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धंकस्रह्ह्य स्नद्मह्य] द्धशस्त्रद्मस्नद्मर्द्धं ,शड्ड ह्र;रुह् ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म ह्द्मह्य शद्दद्मँ क्द्मशद्मफ्द्गह्व द्दद्ध ष्ह्वद्म द्भद्दह्द्म स्नद्मद्म्न द्धह्लह्वस्रद्ध द्धरुस्नद्मद्धह् द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र द्वनद्मद्भठ्ठद्मद्ध;क्रशद्मह्यड्ड द्यह्य द्धह्वशक्वनद्म ह्लस्द्यद्ध द्दस्] द्धह्लह्वस्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ क्द्मस्द्भ द्गह्व द्गह्यड्ड द्बह्न:"द्मद्मस्नर्द्मं स्रद्ध म्द्मद्गह्द्म 'द्मह्य"द्म द्दस््न ,ह्यद्य द्धशश्चद्मद्भ'द्मद्धब् ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध ॥द्मह्द्ध स्रद्ध ह्लद्म द्भद्दद्ध द्दस््न ड्ढद्यद्गह्यड्ड द्वक्कक्क द्ध'द्मम्द्मद्म क्द्मश';स्र ह्वद्दद्ध] द्यठ्ठद्म'द्म;ह्द्म द्यह्य ॥द्मद्ध स्रद्मद्ग श्चब् ह्लद्म,फ्द्म्न ष्ठ;द्मह्यड्डद्धस्र द्ब<द्मर्ड्ढं ह्वद्दद्ध ॥द्मद्मशद्मह्वद्मक्रस्र ,शड्ड श्चद्मद्धद्भद्ध=स्र द्दद्मह्यफ्द्ध] द्धह्लह्वद्गह्यड्ड ॥द्मद्मशह्वद्म द्धशस्त्रद्गद्मह्व द्दस् क्द्मस्द्भ क्द्बह्वद्ध म्द्मद्गह्द्म स्रह्य क्ह्वह्न:द्ब छ्वद्ग स्रद्भह्वह्य द्यह्य स्रह्द्भद्मह्ह्य ह्वद्दद्धड्ड द्वह्व द्य॥द्मद्ध स्रद्मह्य फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ स्रद्ध द्बभ्द्मस्नद्मद्धद्गस्र द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म द्गह्यड्ड क्द्मद्गद्ध=ह् द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न शद्मह्द्मशद्भ.द्म /द्मह्व द्यस्रह्वह्य द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य द्यद्द;द्मह्यफ्द्ध द्धद्य) द्दद्मह्यड्डफ्ह्य शह्य ;द्दद्मँ रुस्नद्मद्मर्ड्ढं :द्ब द्यह्य ष्द्य ह्लद्म;ह्यड्डफ्ह्य क्द्मस्द्भ द्बभ्[द्मद्भह्द्म द्यश्वद्बह्व ह्र;द्धष्ठह्क्रश रुद्मब्ह्वह्य स्रद्ध ड्ढद्य द्बभ्;द्मह्यफ्'द्मद्मब्द्म स्रद्म ,स्र क्ड्डस्र ष्ह्वस्रद्भ द्भद्दह्यड्डफ्ह्य्न


Quotation

,स्र क्/द्मद्म ॥द्मद्ध[द्म द्गद्मँफ्द्म स्रद्भह्द्म स्नद्मद्म्न ह्लद्मह्य द्बद्मर्ड्ढं द्बस्द्यह्य द्धद्गब् ह्लद्मह्ह्य] द्वद्यद्ध द्यह्य क्द्बह्वद्ध फ्ह्नह्लद्भ स्रद्भह्द्म] ,स्र द्धठ्ठह्व ,स्र /द्मह्वद्ध द्व/द्मद्भ द्यह्य द्धह्वस्रब्द्म द्वद्यह्य क्/द्मह्य स्रह्य क्तंकह्य द्दद्मब् द्बद्भ ष्द्दह्नह् ठ्ठ;द्म क्द्मर्ड्ढं क्द्मस्द्भ द्वद्यह्य द्बद्मँश्च :द्ब;ह्य स्रद्म ह्वद्मह्यंक द्वद्यस्रह्य द्दद्मस्नद्म द्बद्भ द्भ[द्मस्रद्भ क्द्मफ्ह्य स्रद्ध द्भद्मद्द ब्द्ध्न

द्वद्यह्वह्य स्रद्मफ्ह्ल स्रद्मह्य कंकद्मह्यब् स्रद्भ ठ्ठह्य[द्मद्म क्द्मस्द्भ द्यद्ग>द्म द्धस्रद्यद्ध ह्वह्य द्धक्चक्चद्मह्यब्द्ध स्रद्ध द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्य ह्वद्मह्यंक स्रद्मह्य द्ध[द्मह्व द्गह्व ह्लद्गद्धह्व द्बद्भ क्तस्ड्डस्र द्धठ्ठ;द्म्न ,स्र द्यञ्जह्लह्व ह्वह्य ह्वद्मह्यंक स्रद्मह्य द्वक्चद्मस्रद्भ क्/द्मह्य स्रद्मह्य द्धठ्ठ;द्म क्द्मस्द्भ ष्ह्द्म;द्म ;द्द द्बद्मँश्च :द्ब;ह्यड्ड स्रद्म ह्वद्मह्यंक द्दस््न ह्ष् शद्द द्बभ्द्यह्व द्दह्नक्द्म क्द्मस्द्भ द्वद्यद्यह्य क्द्बह्वद्ध क्द्मश';स्रह्द्म, द्बख्द्भद्ध स्रद्ध्न य़द्मह्व श्चम्द्मह्नक्द्मह्यड्ड स्रह्य क्॥द्मद्मश द्गह्यड्ड द्दद्ग ॥द्मद्ध द्बद्भद्गद्मक्रद्गद्म स्रह्य क्द्बद्मद्भ ठ्ठद्मह्व स्रद्मह्य ठ्ठह्य[द्म क्द्मस्द्भ द्यद्ग> ह्वद्दद्ध द्बद्मह्ह्य द्दस््न द्बद्भ ;द्धठ्ठ द्दद्गह्यड्ड ह्लद्मह्य ह्वद्दद्धड्ड द्धद्गब्द्म द्दस् द्वद्यस्रद्ध द्ध'द्मस्रद्म;ह् स्रह्वद्म हृद्मह्यरु+स्रद्भ ह्लद्मह्य द्धद्गब्द्म द्दस् द्वद्यद्ध स्रद्ध द्गद्दनद्मद्म स्रद्मह्य द्यद्ग>ह्य ह्द्मह्य द्गद्मब्ख्द्ग द्बरु+ह्यफ्द्म द्धस्र ह्लद्मह्य स्रह्नहृ द्धद्गब्द्म द्दह्नक्द्म द्दस् शद्द स्रद्मद्ग ह्वद्दद्धड्ड क्ठ्ठ−॥द्मह्नह् द्दस््न


स्वार्थ और परमार्थ का असाधारण समन्वय


Quotation

द्भद्मह्लद्म ह्लह्वस्र स्रद्ध द्य॥द्मद्म द्गह्यड्ड क्"कद्मशय ह्वह्य क्द्बह्वह्य शय 'द्मद्भद्धद्भ स्रह्य द्धब्, क्द्बद्गद्मद्धह्वह् क्शरुस्नद्मद्म ठ्ठख्द्भ स्रद्भह्वह्य स्रद्म द्धह्व'श्च; द्धस्र;द्म्न छ्वह्नद्धह् ह्वह्य ष्ह्द्म;द्म ड्ढद्य ह्लफ्ह् स्रद्म द्धह्वद्गर्द्मं.द्म ष्भ्हद्म ह्वह्य द्धस्र;द्म द्दस््न द्बद्मब्ह्व स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य द्धश".द्मह्न द्दस् क्द्मस्द्भ द्यड्डद्दद्मद्भ स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य द्गद्दह्य'शद्भ 'द्मड्डस्रद्भ द्दस््न द्वह्वस्रद्ध 'द्मद्भ.द्म ह्लद्मह्वह्य द्यह्य द्दद्ध स्रंघ;द्म.द्म द्यश्व॥द्मश द्दस््न

क्"कद्मशय ह्वह्य ष्भ्हद्म स्रद्ध क्द्बद्मद्यह्वद्म द्बभ्द्मद्भश्व॥द्म स्रद्ध्न श"द्मद्मर्ह्यं ह्स्र क्ह्व ह्लब् क्द्मद्धठ्ठ स्रद्म द्बद्धद्भक्र;द्मफ् स्रद्भ द्वद्दद्मह्यह्वह्य द्धशद्ध/द्म स्रद्म क्श्चह्व द्धस्र;द्म्न द्वह्वस्रद्ध ह्द्ब'श्च;र्द्मं द्यह्य क्द्धश॥द्मख्द्धह् ष्भ्हद्म द्बभ्स्रंक द्दह्न, क्द्मस्द्भ द्बख्हृद्म&ष्क्रद्य ह्ह्नद्गह्वह्य क्द्मसशद्मह्व द्धस्रद्य द्दह्यह्ह्न द्धस्र;द्म झ्र

क्द्मद्ब द्धश/द्मद्मह्द्म द्दस् क्"कद्मशय ह्वह्य द्बख्हृद्म&क्द्मद्ब स्रद्ध द्यक्वद्ध"क स्रद्म द्यक्वह्लह्व स्रद्भह्ह्य द्दद्मह्य झ्र द्धह्वत्नद्यठ्ठह्यद्द द्गह्यड्ड द्दद्मह्य&ष्भ्हद्म ष्द्मह्यब्ह्य झ्र ह्द्मह्य द्धक्तद्भ क्द्मद्बह्वह्य द्गह्न>ह्य द्धशस्रब्द्मड्डफ् ष्ठ;द्मह्यड्ड ष्ह्वद्म;द्म्न ष्ठ;द्म क्द्मद्बस्रद्मह्य द्यह्नठ्ठद्भ द्यक्वद्ध"क द्भश्चह्वह्य स्रद्म य़द्मह्व ह्वद्दद्धड्ड क्"कद्मशय स्रह्य 'द्मष्टठ्ठद्मह्य स्रद्ध :"कह्द्म रुद्ब"क द्बभ्स्रंक स्रद्ध्न द्बद्भ ष्भ्हद्म ह्लद्ध द्धह्वद्धशस्रद्मद्भ द्भद्दह्य&ष्द्मह्यब्ह्य ह्द्मह् ;द्द ह्द्मह्य ह्ह्नश्वद्दद्मद्भह्य क्द्बह्वह्य द्बभ्द्मद्भष्ट/द्म स्रद्म क्तब् द्दस््न

ट्टट्टद्बभ्द्मद्भष्ट/द्मट्टट्ट & ;द्धठ्ठ क्द्मद्ब द्यक्व"कद्म द्दद्मह्यस्र ॥द्मद्ध द्बभ्द्मद्भष्ट/द्म स्रह्य ठ्ठद्मद्य द्दस् ह्द्मह्य द्गह्न>ह्य क्द्मद्बद्यह्य क्द्मस्द्भ स्रह्नठ्ठ ह्वद्दद्धड्ड स्रद्दह्वद्म क्द्मद्ब ह्लद्म द्यस्रह्ह्य द्दद्मह्य्न

,स्र द्धठ्ठह्व ॥द्मफ्शद्मह्व 'द्मड्डस्रद्भ ॥द्मद्ध द्बभ्स्रंक द्दह्न,्न क्"कद्मशय ह्वह्य ॥द्मफ्शद्मह्व द्ध'द्मश स्रद्मह्य द्बभ्.द्मद्मद्ग स्रद्भ स्रद्दद्म&द्गक्वक्र;ह्नंह्ल; क्द्मद्बस्रह्य द्धब्, द्यक्वद्ध"क द्गह्यड्ड स्रह्नठ्ठ क्द्यश्व॥द्मश ह्वद्दद्ध्न 'द्मद्ध?द्मभ् स्रद्धद्धह्ल;ह्य द्गह्यड्डद्भह्य ड्ढद्य द्धश—ह् 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्म ह्वद्म'द्म स्रद्भ ष्द्य ब्ञ्जह्लद्मह्लह्वस्र ह्लद्धशह्व ;ड्ड=.द्मद्म द्यह्य द्गह्न>ह्य द्गह्नष्ठह् स्रद्धद्धह्ल;ह्य्न

॥द्मफ्शद्मह्व 'द्मड्डस्रद्भ द्गह्नरुस्रद्भद्म;ह्य क्द्मस्द्भ ष्द्मह्यब्ह्य शक्रद्य! द्गह्यड्ड द्यड्डद्दद्मद्भस्र द्दख् क्श'; द्बद्भ द्बभ्द्मद्भष्टद्म/द्म ष्द्य द्दद्ध ,ह्यद्यद्म स्रद्भ द्यस्रह्द्म द्दख्] क्द्बह्वह्य ॥द्मद्धह्द्भ ठ्ठह्य[द्मद्मह्य] क्द्बह्वह्य द्बभ्द्मद्भष्ट/द्मद्मह्य स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल स्रद्भ द्वद्दह्यड्ड द्यह्न/द्मद्मद्भद्मह्य ह्द्मह्य ह्लद्मह्य शरुह्ह्न ह्ह्नद्ग द्गह्न>>ह्य श्चद्मद्दह्ह्य द्दद्मह्य शद्द रुशह्त्न द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ ब्द्मह्यफ्ह्य्न

॥द्मफ्शद्मह्व 'द्मड्डस्रद्भ द्गह्नरुस्रद्भद्म;ह्य क्द्मस्द्भ ष्द्मह्यब्ह्य शक्रद्य! द्गह्यड्ड द्यड्डद्दद्मद्भस्र द्दख् क्श'; द्बद्भ द्बभ्द्मद्भष्टद्म/द्म ष्द्य द्दद्ध ,ह्यद्यद्म स्रद्भ द्यस्रह्द्म द्दख्] क्द्बह्वह्य ॥द्मद्धह्द्भ ठ्ठह्य[द्मद्मह्य] क्द्बह्वह्य द्बभ्द्मद्भष्ट/द्मद्मह्य स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल स्रद्भ द्वद्दह्यड्ड द्यह्न/द्मद्मद्भद्मह्य ह्द्मह्य ह्लद्मह्य शरुह्ह्न ह्ह्नद्ग द्गह्न>>ह्य श्चद्मद्दह्ह्य द्दद्मह्य शद्द रुशह्त्न द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ ब्द्मह्यफ्ह्य्न

फ्द्म;=द्ध ह्वफ्द्भ द्गह्यड्ड ठ्ठह्यश द्बद्धद्भशद्मद्भ] ष्द्यद्मह्वह्य स्रद्ध ;द्मह्यह्लह्वद्म] द्धह्वद्ध'श्चह् :द्ब द्यह्य क्[द्म.रु&ञ्ज;द्मह्यद्धह् द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रह्य द्बद्धद्भह्लह्वद्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्वद्ब;ह्नष्ठह् द्यद्ग; द्बद्भ द्वद्ब;ह्नष्ठह् स्रठ्ठद्ग द्वक्चद्म;ह्य ह्लद्मह्वह्य स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड रुश॥द्मद्मशह्त्न द्धद्बभ्; ब्फ्ह्यफ्द्ध्न द्धह्ह्वद्ध द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् क्द्मस्द्भ द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह् द्वद्यस्रह्य द्धब्, द्वद्ब;ह्नष्ठह् द्दस््न शह्य द्वद्यद्गह्यड्ड द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म द्बभ्;क्रह्व ॥द्मद्ध स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न ,ह्यद्यह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य स्रह्नहृ ष्द्मह्ह्यड्ड द्धश'द्मह्य"द्म :द्ब द्यह्य ह्लद्मह्वह्वह्य ;द्मह्यंग; द्दस््न

द1ड्ट ;द्द 'द्मह्न॥द्मद्मद्भश्व॥द्म फ्द्म;=द्ध ह्ल;ह्द्ध ह्द्मत्न 23 ह्लख्ह्व द्यह्य द्बभ्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्यफ्द्म्न द्धह्लद्दह्य रुशद्ध—द्धह् द्धद्गब्ह्य शह्य ह्द्मत्न 22 स्रद्ध 'द्मद्मद्ग ह्स्र द्गस्नद्मह्नद्भद्म द्बद्दह्नँश्च ह्लद्मँ;्न

द2ड्ट द्बभ्स्नद्मद्ग द्बद्भद्धम्द्म.द्म 34 द्धठ्ठह्व स्रद्म द्दद्मह्यफ्द्म्न फ्ह्न:द्बख्द्ध.द्मद्गद्म 29 ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं स्रद्ध द्दस्] द्वद्य द्धठ्ठह्व रुस्नद्मद्म;द्ध द्बभ्शह्य'द्म द्धद्गब्ह्यफ्द्म्न ड्ढद्य क्शद्ध/द्म द्गह्यड्ड द्वद्ब;ह्नष्ठह्द्म क्द्मस्द्भ क्ह्वह्नस्रह्नब्ह्द्म स्रद्ध ह्लद्मँश्च द्बरु+ह्द्मब् ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड द्बम्द्म स्रद्भ द्यस्रह्यड्डफ्ह्य्न

द3ड्ट द्बभ्शह्य'द्मद्मस्नद्मर्द्धं क्द्बह्वद्ध द्धद्बहृब्द्ध ह्लद्धशह्वश्च;र्द्मं ,शड्ड क्द्बह्वद्ध शह्द्गद्मह्व द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रद्म द्धशरुह्द्मद्भ द्बर्ख्शंस्र द्वंघब्ह्य[द्म स्रद्भह्य्न 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र द्गद्मह्वद्धद्यस्र] 'द्मस्म्द्मद्ध.द्मस्र] द्बद्मद्धद्भशद्मद्धद्भस्र ,शड्ड क्द्मद्धस्नर्द्मंस्र द्य॥द्मद्ध द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रद्म द्धशशद्भ.द्म द्धब्[द्म द्भद्दह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्धशशद्भ.द्म ,शड्ड द्बद्धद्भश्च; ड्ढह्ह्वद्म द्धशरुह्क्वह् द्दद्मह्य द्धस्र द्बभ्शह्य'द्मद्मस्नद्मर्द्धं स्रद्ध द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् ,शड्ड द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह् स्रद्ध ह्लद्मह्वस्रद्मद्भद्ध क्/द्मह्नद्भद्ध ह्व स्रद्दद्ध ह्लद्म द्यस्रह्य्न

द4ड्ट ?द्मद्भ द्यह्य द्धह्वशक्वह् द्दद्मह्यस्रद्भ द्गह्व द्गद्मस्ह्लद्ध हृह्नद्धंक−क;द्मँ द्गह्वद्मह्वह्य स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"कद्यह्य स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्व क्द्मशह्य्न ;द्द द्गद्मह्वस्रद्भ श्चब्ह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र द्यस्द्धह्वस्रद्मह्यड्ड ह्लस्द्यह्य क्ह्वह्न'द्मद्मद्यह्व] द्यद्म/द्मह्वद्मह्यड्ड ह्लस्द्यह्य ह्द्ब&द्यद्म/द्मह्व स्रह्य द्धह्वद्धद्गह् क्द्बह्वह्य स्रद्मह्य ह्व;ह्य द5ड्ट द्धह्वशक्वद्धनद्म ह्र;द्धु द्बक्रह्वद्ध द्यद्धद्दह् ॥द्मद्ध द्भद्द द्यस्रह्ह्य द्दस््न ॥द्मद्मह्यह्लह्व क्द्बह्वह्य द्दद्मस्नद्म ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्ध द्बख्.र्द्मं द्यह्नद्धश/द्मद्म द्दस््न क्द्मछ्वद्ग स्रह्य द्यद्दस्रद्मद्भद्ध ॥द्म.रुद्मद्भ द्गह्यड्ड ठ्ठस्द्धह्वस्र द्वद्ब;द्मह्यफ् स्रद्ध द्य॥द्मद्ध शरुह्ह्न, द्धद्गब् ह्लद्मह्द्ध द्दस््न

द6ड्ट द्धह्लह्वस्रह्य द्बद्मद्य क्द्बह्वह्य क्द्मह्लद्धद्धशस्रद्म रु=द्मह्यह् द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रह्य ॥द्मद्भ.द्म द्बद्मह्य"द्म.द्म द्धह्लह्ह्वह्य द्गद्मस्ह्लख्ठ्ठ द्दस् शह्य ष्क्कश्चद्मह्यड्ड द्यद्धद्दह् ॥द्मद्ध क्द्म द्यस्रह्ह्य द्दस््न द्धह्वस्रद्मद्य स्रद्ध द्यद्गह्नद्धश्चह् द्यह्नद्धश/द्मद्म द्दस््न द्यद्मस्नद्म द्दद्ध क्द्मछ्वद्ग स्रह्य फ्ह्न:स्रह्नब् द्गह्यड्ड ष्द्मब्स्रद्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्, द्वद्ब;ह्नष्ठह् द्ध'द्मम्द्म.द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म द्गद्मस्ह्लख्ठ्ठ द्दस््न

द7ड्ट फ्ह्न:द्बख्द्ध.र्द्मंद्गद्म स्रह्य द्वद्बद्भद्मह् द्य॥द्मद्ध द्यद्म/द्मस्र क्द्बह्वद्म ॥द्मद्मह्यह्लह्व रुश;ड्ड द्बस्रद्म;ह्यफ्ह्य ह्ष् ह्स्र स्रह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्स्र क्द्मछ्वद्ग स्रह्य ॥द्मद्मह्यह्लह्वद्मब्; द्गह्यड्ड द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्भद्दह्वह्य स्रद्ध ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रद्ध फ्ड्ढ द्दस््न

द8ड्ट द्बभ्शह्य'द्मद्मद्धस्नर्द्मं;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्म/द्मह्वद्म] रुशद्म/;द्म;] द्यड्ड;द्ग] द्यह्यशद्म स्रह्य श्चद्मद्भ स्रर्द्म;यद्गद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्बह्वद्ध द्धठ्ठह्व श्च;र्द्मं द9ड्ट ठ्ठह्यशद्बद्धद्भशद्मद्भ स्रह्य द्बभ्शह्य'द्मद्मस्नद्मर्द्धं ह्द्म 30 ह्स्र क्द्मशह्यठ्ठह्व द्ब=] 'द्मद्मद्धह्स्रह्नड्डह्ल द्दद्धद्भत्त्द्मद्भ स्रह्य द्बह्ह्य द्बद्भ ॥द्मह्यह्लस्रद्भ रुस्नद्मद्मह्व द्यह्नद्भद्धम्द्मह् स्रद्भद्मब्ह्य्न द्यद्मह्यद्धद्गह् रुस्नद्मद्मह्व द्बख्द्भह्य द्दद्मह्य ह्लद्मह्वह्य द्बद्भ] ष्द्मठ्ठ शद्मब्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्लफ्द्द ह्व द्धद्गब् द्यस्रह्यफ्द्ध्न

द्य=द्मह्यड्ड द्यश्वष्/द्मद्ध ह्द्धह्व द्यख्श्चह्वद्म,

द1ड्ट ड्ढद्य ष्द्मद्भ ठ्ठह्यश द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रह्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म स्रद्ध ह्वर्ड्ढं द्धशद्ध/द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म क्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्यह्वह्य द्यह्य द्यद्मद्भद्म /;द्मह्व द्बभ्;क्रह्व ड्ढद्यद्ध ,स्र द्बभ्द्धय;द्म स्रह्य द्यह्नद्यड्डश्चद्मब्ह्व द्बद्भ स्रह्यद्धठ्ठह् द्भद्दह्यफ्द्म्न ड्ढद्यद्धब्, ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं] क्फ्रुह्] द्धद्यह्श्वष्द्भ द्गह्यड्ड द्बद्धद्भशभ्द्मह्लस्र द्य=] द्गद्धद्दब्द्म द्य= ,शड्ड द्यड्डफ्द्धह् द्य=] द्यद्म/द्मह्वद्म द्य= रुस्नद्मद्धफ्ह् द्भद्दह्यफ्ह्य्न द्वद्यस्रह्य द्वद्बद्भद्मह् द्दद्ध द्वद्दह्य क्द्मद्भश्व॥द्म द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्यफ्द्म्न क्रुह्ह्न ड्ढह्व ह्द्धह्व द्गद्दद्धह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्, क्; शफ् स्रह्य द्ध'द्मम्द्मद्मस्नद्मर्द्धं क्द्मशह्यठ्ठह्व द्ब= ह्व ॥द्मह्यह्लह्य्न

द2ड्ट ष्भ्हशर्श्चंद्य 'द्मद्मह्य/द्म द्यड्डरुस्नद्मद्मह्व स्रह्य द्यठ्ठरु;द्मह्यड्ड स्रद्म ,स्र द्बद्मँश्च द्धठ्ठशद्यद्ध; स्रद्मद्ग&स्रद्मह्लद्ध द्य= ह्द्म- 25 द्यह्य 26 ह्लख्ह्व ह्स्र श्चब्ह्यफ्द्म्न द्यड्डरुस्नद्मद्मह्व स्रह्य द्यठ्ठरु; द्दद्मह्य द्वद्यद्गह्यड्ड ॥द्मद्मफ् ब्ह्य द्यस्रह्यड्डह्यफ्ह्य्न ह्लद्मह्य क्द्मह्वह्य श्चद्मद्दह्यड्ड] रुशद्ध—द्धह् द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ ब्ह्यड्ड्न

द3ड्ट स्र;द्म द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म द्यठ्ठद्म स्रद्ध ॥द्मद्मँद्धह् 1 ह्लह्नब्द्मर्ड्ढं द्यह्य क्द्मद्भश्व॥द्म द्दद्मह्यफ्द्म्न द्बभ्शह्य'द्म स्रह्य द्धब्, ;ख्ह्वह्द्ग क्द्म;ह्न 26 श"र्द्मं क्द्मस्द्भ द्ध'द्मम्द्मद्म द्गस्द्धंकऊस्र स्रद्भ ठ्ठद्ध फ्ड्ढ द्दस्] स्रद्ग द्ब<द्ध क्द्मस्द्भ स्रद्ग क्द्म;ह्न स्रद्ध ब्रुद्धस्र;द्मँ ;द्दद्मँ स्रद्ध ॥द्मद्मद्भद्ध द्ध'द्मम्द्मद्म द्धशद्ध/द्म स्रद्मह्य फ्ब्ह्य द्वह्द्मद्भ ह्वद्दद्धड्ड द्बद्मह्द्ध्न ड्ढद्य श"र्द्मं द्यह्य ब्रु+द्धस्र;द्मह्यड्ड स्रह्य द्धद्गब् ह्लह्नब् स्रद्भ] हृद्मह्यंकह्य&हृद्मह्यंकह्य ह्लक्रस्नद्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड क्द्बह्वद्म ॥द्मद्मह्यह्लह्व क्द्मद्ब ष्ह्वद्म ब्ह्यह्वह्य स्रद्ध द्धश'द्मह्य"द्म द्यह्नद्धश/द्मद्म स्रद्ध फ्ड्ढ द्दस््न हृद्म=द्म, 25 द्गर्ड्ढं ह्स्र रुशद्ध—द्धह् द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ ब्ह्यड्ड्न


बालको से भी गये बीते

दद्गड्डफ्ब् द्धशह्ल;ड्ट

ष्द्मब्स्रद्मह्य द्यह्य ॥द्मद्ध द्दद्ग ह्वद्मठ्ठद्मह्व्न

ड्ढद्य ह्द्भद्द द्दद्मशद्ध द्दस् क्य़द्मह्व्न1्न

[द्मह्यब्ह्द्म द्दस् ह्लष् ष्द्मब्स्र [द्मह्यब्] ह्लह्नंकद्म स्रड्डस्रद्भ] द्बक्रस्नद्मद्भ] [द्मद्बद्भह्यब््न

ष्द्यद्मस्रद्भ ह्ष् >ख्क्चद्ध ठ्ठह्नद्धह्व;द्म] द्धष्क्चद्मह्द्म द्दस् ;स्नद्मद्मस्नर्द्मं द्यह्य द्गह्यब्द्म्न्न

[द्मह्यब् ह्लष् ह्स्र ॥द्मद्ध श्चब्ह्द्म द्भद्दह्य्न

[द्मह्यब्ह्द्ध क्/द्मद्भद्मह्यड्ड द्बद्भ द्गह्नरुस्रद्मह्व्न्न2्न्न

द्धस्रह्ह्न ह्लष् क्द्मह्द्ध ?द्मद्भ स्रद्ध ;द्मठ्ठ्न क्र;द्मफ् ठ्ठह्यह्द्म द्दद्भ द्द"र्द्मं द्धश"द्मद्मठ्ठ्न

[द्मक्रद्ग स्रद्भ ठ्ठह्यह्द्म द्यद्मद्भद्म [द्मह्यब्] ष्द्यद्मर्ड्ढं ठ्ठह्नद्धह्व;द्म स्रद्मह्य ष्द्भष्द्मद्भ्न

[द्मह्यब् द्दद्ध स्नद्मद्म] द्यद्मद्भद्म द्ध[द्मब्शद्मरु+्न

द्वद्यह्य द्भद्दह्द्म द्दस् ड्ढह्ह्वद्म ॥द्मद्मह्व्न्न3ड्ड्न

ह्व द्भ[द्मह्द्म ष्द्मब्स्र द्गह्व द्गह्यड्ड फ्द्मँक्च] [द्मह्यब् स्रह्य द्भद्मफ्&त्त्ह्य"द्म स्रद्ध ष्द्मह््न

॥द्मह्नब्द्म ह्ह्यद्भह्य द्गह्यद्भह्य स्रद्म ॥द्मद्मश] रुह्वह्यद्द क्द्मद्बद्य द्गह्यड्ड ब्ह्यह्द्म ष्द्मँक्न्न

;द्दद्ध द्धह्व'हृब्] द्धह्वर्द्गंब् ह्र;शद्दद्मद्भ्न

ष्द्मब्स्रद्मह्य स्रह्य ह्लद्धशह्व स्रद्ध 'द्मद्मह्व्न्न4्न्न

ष्द्मब् द्दक्च स्रद्मह्य द्दद्गह्वह्य ठ्ठद्ध द्गद्मह्] ह्व हृद्मह्यरु+द्म ह्व'शद्भह्द्म स्रद्म द्यद्मस्नद्म्न

ठ्ठह्नद्भद्मफ्भ्द्द द्यह्य द्धश्चद्बंकह्य द्दद्ग द्भद्दह्य] द्गद्मस्ह् ह्व ॥द्मद्ध ह्लष् द्बस्ररुह्य द्दद्मस्नद्म्न्न

फ्;ह्य द्दद्ग द्धश्चद्भ ;;द्मस्नर्द्मं स्रद्मह्य ॥द्मख्ब््न

द्भद्दह्य क्द्बह्वह्य द्यह्य द्दद्ध क्ह्वह्लद्मह्व्न्न5्न्न

ह्वद्भस्र स्रद्भ रुद्मब्द्ध क्द्बह्वद्ध द्यक्वद्ध"क] ष्ठ्ठ द्दद्मह्य फ्ड्ढ रुशद्मस्नर्द्मंश'द्म ठ्ठक्वद्ध"क्न

द्दह्न;ह्य ह्लष् द्दद्ग ड्ढह्ह्वह्य रुशद्मस्नद्मर्द्मं/द्म] द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठद्ध द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्यद्गद्ध"क्न्न

ठ्ठह्यश ष्ह्व द्यस्रह्द्म स्नद्मद्म ह्लद्मह्य द्गह्वह्नह्ल्न

शद्दद्ध ष्ह्व फ्;द्म द्दद्म;! 'द्मस्ह्द्मह्व्न्न9्न्न

*समाप्त*