जीवन एक प्रत्यक्ष कल्प वृक्ष

जीवन एक प्रत्यक्ष कल्प वृक्ष है। उसका गठन ऐसे तत्वों से हुआ है कि साधना करने पर उसे किसी भी कामना की पूर्ति हो सकती है। इच्छित फल देने के सन्दर्भ में कल्प-वृक्ष को ही प्रमुखता दी जाती है। किंवदन्ती है कि उसकी छत्र छाया में बैठने का जिसे भी अवसर मिलता है वह अभीष्ट वरदान पाता है और मनोरथों को पूर्ण करने का आनन्द लेता है। कल्प-वृक्ष की मान्यता कल्पना की उड़ान हो सकती है किन्तु जीवन की महत्ता समझने वालों को इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं लगती कि मानवी सत्ता में सन्निहित विशिष्टताएं असीम हैं।

चिन्तन एक अति शक्तिशाली चुम्बक है जो अपने अनुकूल साधन और सहयोग खींच बुलाने में पूर्णतया समर्थ है। सोचने से इच्छा जगती है और संकल्प उठता है। इसके बाद पुरुषार्थ का उपक्रम चल पड़ता है। मनोयोग युक्त पराक्रम की शक्ति इतनी बड़ी है कि उसके सहारे उतना कमाया पाया जा सकता है जिसे सामान्य प्रगति प्रक्रिया की तुलना में दैवी वरदान कहा जा सके।

जीवन एक दुधारी तलवार है जिसे उत्थान और पतन दोनों के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है। दुर्गुणों और दुष्कर्मों को अपना कर मनुष्य नर-पशु और नर-पिशाच जैसे हेय स्तर पर पहुँच सकता है और नारकीय यंत्रणाओं का सहन करते हुए सर्म्पक क्षेत्र को विषाक्त कर सकता है। इसके विपरीत जो जीवन को उत्कृष्टता से सींचते और सुसंस्कृत बनाते हैं और महानता की रीति-नीति अपनाते हैं वह लोग हर समय अपने सौभाग्य को सराहते है। वे अनुभव करते हैं कि जीवन सचमुच ही औधड़ वरदानी शिव है। उसकी छत्र छाया में अभीष्ट मनोरथों की उपलब्धि में कोई संदेह नहीं रह जाता यह बात दूसरी है कि उत्थान की आकाँक्षा की गई या फिर पतन की।


भूदेव की आराधना

एक बार र्स्वग के देवता धरती पर विचरण करने आये। उन्हें आशा थी कि धरती के निवासी उनका पुल स्वागत करेंगे।

उन दिनों खेतों में अनाज के पौधें लहलहा रहे थे। कलियाँ और वाले निकल रही थीं। लोग उन्हें देखकर फूले नहीं समा रहे थे। चारों ओर मस्ती छाई हुई थी, जहाँ देखो वहाँ वसन्तोत्सव मनाया जा रहा था।

देवताओं की तरफ किसी ने आँख उठाकर भी नहीं देखा। उन्हें जिस स्वागत की आशा थी वह कहीं नहीं मिला। वरदान देने की अपनी क्षमता पर उन्हें जो गर्व था वह गल चला।

वे सोचते थे कि अभावग्रस्त मनुष्य उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए बहुत गिड़गिड़ायेंगे और न जाने क्या-क्या माँगेंगे। याचकों की मनोकामना पूर्ण करने वाला सदा यशस्वी होता है और मान पाता है। देवा इसी का आनन्द लेने तो पृश्वी पर आये थे। जिसके स वरदान देने की क्षमता हो उसके लिए वैसी चाहना उचित भी थी।

जब देवता निराश लौटने लगे तो उनने धरती से पूछा - तुम्हारे पुत्र, किस उपलब्धि में हर्ष-विभोर हो रहे हैं? ये हम से क्यों कोई याचना करने नहीं आते?

धरती ने इतनी दूर से पधारे हुए अपने मान्य अतिथियों का झुक-झुककर स्वागत किया और नम्रतापूर्वक, बोली-इस लोक में यहाँ का भी एक देवा है, वह भी आपकी ही तरह सामर्थ्यवान है। मेरे पुत्र उसी की पूजा करते हैं और फलस्वरुप जो चाहते हैं सो प्राप्त कर लेते हैं। आजकल उसी की अनुकम्पा यहाँ बरस रही है, सौ सबका मन उसी की स्वागत में लगा हुआ है। आप कुसमय आये। यदि दूसरे दिनों में आते तो सम्भव था आपकी भी अर्चना होती।

देवताओं के आर्श्चय का ठिकाना न रहा। उनने पूछा - भला इस मनुष्य लोक में भी कोई देवता बसता है? और वह हम लोगों की तरह ही सामर्थ्यवान है? ऐसा हमें अब तक विदिन न था, यदि ऐसा है तो उसका नाम बताओ, स्था दिखाओ।

धरती मुस्कराई। उसने एक मनुष्य को पास बुलाया और उसकी हथेली दिखाते हुए कहा, वह देवता यहाँ रहता है, खेत-खेत में उसी की विभूति बिखरी पड़ी है। मेरे सब पुत्रों का भरण-पोषण उसी के द्वारा होता है। श्री और समृद्धि, सफलता और प्रगति सभी कुछ तो उससे मिलता है।

हथेली में रहने वाला, न दीखने वाला और इतनी विभूतियों का अधिपति भला कौन देखता होगा? र्स्वग से पधारने वाले अतिथियों के लिए यह एक पहेली थी। वे उसे न सुलझा सके तो पूछने लगे देवी ! जरा और स्पष्ट करो। उसका नाम रुप तो बताओ।

धरती की छाती र्गव से तन गई उसने कहा - वह देवा है, “श्रम”। मेरे पुत्रों ने उसी की आराधाना करने की ठान-ठानी है और वे आज नहीं तो कल इस लोक में र्स्वग की रचना करेंगे। खेत-खेत पर हरियाली के रुप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। जहाँ भी इस देवता की अर्चना होती है वही विभूतियाँ हाथ बाँध कर आ खड़ी होती है।

जहाँ श्रम की पूजा होती है वहाँ कोई ऐसी कमी नहीं रह सकती जिसके लिए देवताओं को कष्ट करना पड़े। इस तथ्य और सत्य के साथ-साथ र्स्वग निवासियों ने वस्तुस्थिति को समझा और वे अपनी निरुपयोगिता एवं मनुष्य की उपेक्षा का रहस्य समझते हुए अपने लोक को वापिस चले गये।


ब्रह्माण्ड में ओत प्रोत ब्रह्म सत्ता

जैसा कि आजकल के वैज्ञानिकों की मान्यता है कि आत्मा अथवा चेतना की स्थूल शरीर के समान ही पदार्थों का योगिक मात्र है। इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि यदि उक्त बात सत्य है तो इस बात अर्थात पदार्थों के मिश्रण की प्रक्रिया का ज्ञान कराने वाले किसी दूसरे मन की भी आवश्यकता पड़ेगी।

इसके उत्तर में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जान स्टुआर्ट मिन ने सत्य ही कहा है - “मानव मस्तिष्क का वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर भी जब कोई आत्मा या मन का किसी प्रकार का अस्तित्व नहीं समझ पाता और आत्मा या चेतना के सत्य को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होता अथवा आत्मा को मस्तिषक की एक प्रक्रिया मात्र मानता है तो वह यह भूल जाता है कि इस प्रकार का निर्णय ही आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करना है।”

आज के वैज्ञानिकों की मान्यता है कि गति की गति पैदा करती है। यदि हम इस प्रतिपादन को सत्य मानलें तो यह कैसे माना जा सकता है कि मस्तिषक की आणुविक संरचना चेतना या बुद्धि उत्पन्न करती है क्यों कि बुद्धि या चेतना षक्ति कोई गति नहीं अपितु गति जानने वाली शक्ति है। अस्तु वैज्ञानिकों का उक्त सिद्धाँत स्वयमेव गलत सिद्ध हो जाता है।

प्रो. जेम्स के अनुसार - “यह कहना और मानना निरर्थक बकवास होगा कि मस्तिष्क के कोषाणुओं की ब्यूहाणविक गति ही चेतना का मूल कारा है।

वैज्ञानिकों की यह मान्यता है कि मानव की स्मृति का आधार षरीर या उसकी आणुविक संरचना है। बिलकुल निराधार मालूम होती है क्योंकि प्रति 7 वर्ष में शरीर की समस्त आणुविक संरचना आमूल-चूल परिवर्तित हो जाती है बचपन का शरीर युवावस्था में व युवावस्था के कोषाणु वृद्धावस्था में नहीं रह जाते ऐसी स्थिति में भी बचपन तक की स्मृतियाँ बनी रहती है।

प्रसिद्ध भौतिकविद डा. फ्यूमेन का कहना है कि “जो फासफोरस इस समय हमारे मस्तिषक में है दा सप्ताह बाद पूर्णतया बदल जाता है मस्तिष्क के समस्त अणु बदलकर नए हो जाते हैं। अस्तु स्मृति का आधार मस्तिष्क के कोषाणुओं की रचना व प्रक्रिया नहीं हो सकती।”

वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार किसी भी वस्तु का कारण उसी में सन्निहित रहता है जैसा कि बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएं सन्निहित रहती है। अस्तु यह कहा जा सकता है कि परिणाम कारण की ही अभिव्यक्ति मात्र है।

भौतिक शास्त्री श्री जे.ए.वी. बटलर ने अपनी पुस्तक “इन साइड दि लिविंग सेल” में लिखा है कि “इस विश्व ब्राह्माण्ड को पदार्थ एवं चेतना मिश्रित एक विशिष्ट प्रक्रिया के रुप में माना जा सकता है। यद्यपि इस प्रक्रिया को सिद्ध नहीं किया जा सकता फिर भी यह अकाट्य सत्य है कि अन्त की सम्भावनाएं प्रारंभ में ही समायी रहती है।”

जीवन क्या है? इस सम्बन्ध में दो प्रकार की मान्यताएं हैं, प्रथम यह कि जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक विकास का क्रमिक रुप है जिसमें वातावरण और वश परम्परा का प्रभाव होता है। दूसरा पक्ष अध्यात्मवादियों का है उनके अनुसार जीवन में आत्मा का अलग अस्तित्व होता है जो शिशु में उसके पिण्ड स्वरुप अवस्था में ही प्रविष्ट करती है।

मृत्यु के संबंध में प्रथम मत के वैज्ञानिकों की मान्यता है कि शरीर बनाने वाले दोनों तत्व अर्थात अणु और चेतना शक्ति अपना-अपना कार्य बंद कर देते हैं तो मृत्यु हो जाती है। जबकि दूसरी मान्यता के समर्थक प्रायः सभी धर्म और आध्यात्मिक प्रतिपादन है जिनकी मान्यता है कि आत्मा या जीव की मृत्यु नहीं होती, अपितु मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है जिसे अपने भौतिक जीवन के कर्मों का फल भोग्ना पड़ता है। इस ब्रह्माण्ड की रचना के सम्बंध में पहिले वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि इसका निर्माण ठोस पदार्थों से हुआ है जिसकी रचना अणुओं से हुई है। बाद के वैज्ञानिक प्रतिपादनों से सिद्ध हुआ कि अणुओं की रचना परमाणुओं से होती है अर्थात परमाणुओं को सृष्टि सृजन का मूलाधार माना गया। लाडकेलविन ने यह सिद्ध कर दिखा है-”यदि एक बूँद पानी को इतना विस्त किया जाये कि वह इस पृथ्वी के आकार का हो जाय तो उसमें पाया जाने वाला सबसे छोटा परमाणु एक क्रिकेट के गेंद के बराबर होगा।”

रदरफोर्ड एवं वैज्ञानिक बोर के अनुसंधानों ने यह सिद्ध किया कि परमाणु असंख्य विद्युत अणुओं के संयोग से विनिर्मित एक लघु सौर प्रणाली के रुप में है। आगे चलकर जो अभी तक नवीन प्रयोग हुए हैं उनसे सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण विद्युत परमाणु पदार्थ तरंगों से बने हुए हैं, अस्तु अब तरंगों को ही सृश्टि की रचना का आधार माना जाता है। किन्तु विज्ञान की बढ़ती पकड़ इन तरंगों को भी असंदिग्ध नहीं मानती।

श्री फ्राँसिस मैसन ने आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यताओं पर कुठाराघात करते हुए अपनी पुस्तक “दि ग्रेट डिजाइन” में लिखा है - “यह पदार्थ क्या है? क्या यह विद्युतीय विकिरण है? तब यह विकिरण क्या है? विकिरण सृष्टि का आधार मूलतत्व है जिससे यह ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ है। यह विशुद्ध ऊर्जा हे जो कि इतनी सघन है कि यह ऊर्जा और तरंग दोनों के रुप में कार्य कर सकती है।”

इस प्रकार विज्ञान और अध्यात्मवादी दोनों ही सिद्धाँत ब्रह्माण्ड के निर्माण के सम्बंध में एक ही निर्ष्कष पर पहुँचते हैं जहाँ पर पदार्थ एवं चेतना का मिलन होता है। अध्यात्मवादी सारे विश्व ब्राह्माण्ड को चेतना में ओत-प्रोत मानती है यही चेतना अध्यात्म में आत्मा और विज्ञान में ऊर्जा कही जाती है। इसे इस रुप में भी कहा जा सकता है कि सीमित दायरे में चेतना को पदार्थ और विस्तृत दायरे में यह चेतना ही जीवित पदार्थ या आत्मा है। यह चेतना ही अधिक स्वतंत्र रुप से विशुद्ध चेतना (स्प्रिट) है इस प्रकार यह चेतना के विकास की पद्धति वैज्ञानिकों के विकासवाद का ही स्वरुप हुआ। इस विकास के एक किनारे में पदार्थ तथा दूसरे में चेतना या आत्मा है। चेतना के विकास का क्रम तब तक चलता रहता है जब तक चेतना (आत्मा) परमात्मा (परम तत्व) से एकाकार न हो जाय।

आत्म तत्व के इस चिरंतन सत्य की ओर हमारे प्राचीन मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व संकेत किया था - “रुपं रुप प्रतिरुपो बभूव।” अर्थात - प्रत्येक रुप में उकसी ही प्रतिछाया है।

इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध दार्शनिक मेटरनिक ने ठीक ही कहा है -”ब्रह्माण्ड के एक अणु का भी रहस्य मेरी समझ में जिस दिन ही आ जायेगा उस दिन यह विश्व बाटिका या तो नर्क तुल्य हो जायेगी अथवा मेरी चेतना ही जड़वत हो जायेगी।

(ऋग्वेद 6/47/18) में भी परम तत्व की व्यापकता की ओर संकेत किया गया है -

“रुपं रुपं प्रतिरुपों बभूव, तदस्य रुपं प्रति चक्षणाय इन्द्रो मायाभिः पुरु रुपईयते, तदस्य युक्ता हरयः शताशत॥”

अर्थात-उस परम ब्रह्म स्वरुप को समझने के लिए सभी रुप सुन्दर हैं, सभी रुपों में उसका ही प्रतिबिम्ब है बिन्दु रुपी इन्द्र नाना प्रकार के माया रुपी स्वरुपों में दिखाई पड़ रहा है उसकी हजारों हजार किरणें पूरे ब्रह्माण्ड में फ्रली हुई है। अस्तु उसके स्वरुप को समझने के लिए बिन्दु का ही प्रतिक्षण अवलोकन पर्याप्त है।


Quotation

नास्ति ध्यानम् अप्रक्षस्य प्रज्ञानास्ति अध्यायतः। यास्मिन् ध्यानाँ च प्रज्ञाच तस्य निर्वाण मत्तिके॥ -योग चूणामणि

विवेक जागरण के बिना ध्यान नहीं-ध्यान के बिना विवेक जागरण नहीं। ध्यान और प्रज्ञा के समन्वय से ही महा निर्वाण प्राप्त होता है।


सर्व खिल्विद ब्रह्म’ अब अधिक प्रत्यक्ष

प्राणियों की अपनी विशेषताऐं हैं, पर पेड़ पौधों को भी जड़ पदार्थ नहीं कहा जा सकता है। शरीर धारियों में पाई जाने वाली प्रवृतियाँ उनमें विद्यमान है। अंतर इतना ही रह जाता है कि वे मस्तिष्कीय क्षमता से रहित है। सोचने और अनुभव करने के लिए जिस विकसित मस्तिष्क तंत्र की आवश्यकता है वह उपलब्ध नहीं है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे चेतना में सर्वथा शून्य है। अविकसित रुप से यह विशेषता भी वनस्पतियों में विद्यमान है। वे अनुकूलता और प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं और तद्नुसार प्रसन्न या अप्रसन्न भी होते हैं।

गम्भीर पर्यवेक्षण से वनस्पति-जगत में पाई जाने वाली चेतना का जैसे-जैसे आभास मिलेगा मनुष्य और समझ जायेगा कि विश्व के कण-कण में एक चेतना विद्यमान है और उसी के नेतृत्व में सृष्टि की विविध विधि हलचलें चल रही हैं। तत्व-दर्शन का जैसे-जैसे परिष्कार होता चला जायेगा मनुष्य को कण-कण में एक ही ब्रह्म चेतना के दर्शन होंगे और वेदान्त को वह दृष्टि प्राप्त होगी जिसमें इस समस्त विश्व में एक ही आत्मा को संव्याप्त बताया गया है। इसी को समय्क दृष्टि कहते हैं।

अन्वेषण से तथ्यों का अधिकाधिक प्रकटीकण हो रहा है। फलतः विज्ञान और अध्यात्म की दूरी भी घट रही है। सब कुछ जड़ ही है यह सोचने की अपेक्षा अब यह तथ्य सामने आ रहे हैं कि सब कुछ चेतन ही चेतन है। वनस्पतियों में जीवन का प्रतिपादन इस दिशा में प्रगति की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वह दिन दूर नहीं जब पदाथ में भी चेतना का अस्तित्व देखा जा सकेगा। उस दिन ‘सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ की मान्यता अपनाने में कहीं कोई आपत्ति न रह जायेगी। वनस्पति जगत में विकसित चेतना के प्रमाण इस दिशा में नया मार्ग दर्शन करते हैं।

दक्षिणी अफ्रीका के एक क्षेत्र में ‘एसीटिव प्लाण्ट’ नामक एक ऐसा पौधा पाया जाता है जो किसी मनुष्य की उपस्थिति से डरकर अपने को दबाने छिपाने लगता है और किसी के आने से प्रसन्नता एवं उल्लास व्यक्त करता है। अन्य प्राणियों के साथ भी उसका व्यवहार ऐसा ही होता है। वह पौधा प्रसन्नता की स्थिति में अपनी पत्तियाँ गहरे गुलाबी रंग की कर लेता है। और उसके फूल की पंखुड़ियाँ फ्रलकर चौड़ी हो जाती हैं और असन्तोष एवं रोष की स्थिति में उसका गुलाबी रंग फीका पड़ जाता है, पंखुड़ियाँ अपेक्षाकृत सिकुड़ जाती है।

‘डेसिगोडियम-ट्राइक्वेट्रम’ नामक एक पौधा निरन्तर इस प्रकार की हलचल करता है जैसे टेलीग्राफिक यंत्र में होती है। इसकी ऊंचाई 3 सं 8 फुट तक होती है। इसकी पत्तियाँ संयुक्ताकार की तीन की संख्या में होती है बीच की पत्ती बड़़ी और अगल-बगल की दो छोटी होती है। बीच की पत्ती तो कोई विशेष हलचल नहीं करती, परंतु छोटी पत्तियों में दिन का तापमान 72 डिग्री होने पर तार करते समय होने वाले संकेतों की तरह हलचल होने लगती है। उसक समय पौधे की सभी संयुक्त पत्तियों की हलचल से पौधा तार करने की मशील जैसी ध्वनि करने लगता है।

इसकी पत्तियों में एक विशेषता और भी पाई जाती है कि ये प्रायः वृत्ताकार घूमती हैं और साथ ही अपनी धुरी पर भी घूमती हैं। वायु की गति या अवरोध का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और सुबह से शाम तक उसी प्रकार घूमती रहती है।

भारत में एक विशेष प्रकार के पौधे का नाम ‘छुई-मुई’ या लाजबन्ती है। यह पौधा दूसरे प्राणियों से तो प्रभावित नहीं होता, परंतु मनुष्य के समीप पहुँचने पर उसकी उंगली का र्स्पश पाते ही अपनी पत्तियों को इस प्रकार सिकोड़ने-समेटने लगता है। जसे कोई नव-वधू अपने ससुराल वालों को देखकर सर्माने, लजाने लगती है। छुई-मुई के पौधे में इमली की पत्तियों की तरह बारीक-बारीक पत्तियाँ होती है।

सूरजमुखी का फूल हमेशा उधर ही झुका रहता है जिधर सूर्य होता है। चाहे रात्रि हो अथवा दिन, बादलों से आकाश आच्छादित हो अथवा स्वच्छ, यह पौधा सूर्य की ओर उन्मुख रहने के अपने व्रत का नियमपूर्वक पालन करता है।

भारत में पाया जाने वाला “रात की रानी” नामक पुष्पी पौधा अपनी मोहक गंध के लिए बहुत प्रसिद्ध है जिसके पुष्प् केवल राशि के समय ही अपनी सुगन्ध बिखेरते हैं। इसी प्रकार ‘सिरियम ग्रेण्टीफ्लोर’ नामक पौधे के फूल रात्रि को ही खिलते हैं। रात के लगभग नौ बजे से फूल खिलना शुरु होते हैं और आधी रात के समय पूरी तरह खिल जाते हैं-सुगन्धि चारों ओर फ्रली रहती है। रात ढलने के साथ ही फूल मुरझाने लगते हैं और प्रातः तब पौधा अपनी सामान्य स्थिति में पहुँच जाता है।

‘अफ्रीकी बायलेट’ नामक पौधा लाजवन्ती की तरह शर्मीला परन्तु कुछ भिन्नता लिए हुए होता है। इस पौधे की पत्तियाँ छुई-मुई की भाँति सिकुड़ती तो नहीं परन्तु पत्ती पर जहाँ भी एक पानी की बूँद पड़ जाती है वहाँ पर एक दाग पड़ जाता है जो पत्ती के सूखने तक बना रहता है।

कुछ ऐसे भी विचित्र पौंधे प्रकृति में पाये जाते हैं जिनके बारे में अभी तक अनिश्चय की स्थिति बनी हुई है कि उन्हें वनस्पति माना जाय अथवा जन्तु। ‘डायटम’ का व्यवहार उसी तरह का होता है क्योंकि प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के अनुसार तो वह एक पौधे के समान है परंतु दूसरे अन्य गुण एक कोशीय जीवाणु के समान पाये जाते हैं।

‘कैटर पिलर’ तो और भी अधिक वैचित्र्य लिए होता है। प्रारम्भ में तो यह कीड़े की तरह इधर-उधर घूमता रहता है। उसमें न प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है और न ही कार्बनडाई आक्साइड ग्रहण करता है। उसके शरीर से एक छोटी-सी टहनी निकल पड़ती है, तभी उसके कीड़े वाले गुण समाप्त हो जाते हैं और वह टहनी प्रकाश संश्लेषण द्वारा बढ़ने लगती है। इस कीड़े में नर-मादा के संयोग का कोई चक्कर नहीं। शरीर से मूलाँकुर-प्राँकुर न निकलने तक तो ह कीड़ा रहता है और जब ये निकल आते हैं - प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रारम्भ हो जाती और कीड़ा वृक्ष में बदलने लता है। एक दिन वहीं कीड़ा बड़े वृक्ष में बदला दिखाई पड़ता है। इस रहस्य से वैज्ञानिक आर्श्चयचकित रह गये हैं।

सन् 1762 की घटना है। एक जीवन विज्ञानी की पुत्री क्रिश्चियानलिनी ने सायंकाल के समय उपवन में भ्रमण करते समय नोशदुशयम नामक फूल एवं उसके पत्तों से जुगुनू चमकने जैसा प्रकाश निकलते देखा। उसके पिता को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कई वैज्ञानिकों को यह दृश्य दिखाया। इसके बाद अनेकों फूल लोगों ने देखे जो रात्रि को प्रकाश देते हैं। इन निशा-प्रकाशी फूलों में ओरेन्ज, लिली, अफ्रीकी गेंदा, स्काँच और एक प्रकार का सूर्यमुखी प्रमुख है। इसके अतिरिक्त ओरिएण्टल पाँपी, जोनल पैलरगोनियम, लाल बर्बीना और हेरी पाँपी फूलों से भी हल्का प्रकाश निकलता देखा गया है।

फफूँद कुल की अनेक कुकुर-मुत्तों की जातियाँ भी रात्रि में प्रकाश देती है। इनमें ‘आर्मीलेरीआ-मेलिया’ (हनी-मशरुम), पालीपारेस सल्फ्यूरिअस (सल्फर मगरुम) क्लायटोसाइब इल्युडेन्स, कौलीबिआ लौंगिप्स, जायलेरिया हाययोक्सिलोन, यैनस-स्टिप्टिकस आदि प्रमुख रुप से जाने जाते हैं।

‘सिस्टोस्टेया ओस्मन्डींशिआ’ नामक माँसेज से हरायन लिये हुए सुनहरा प्रकाश देखा जाता है। प्रसिद्ध वनस्पति विशेषज्ञ ‘सर-जोसेफ हुकर’ ने अपने ‘हिमालय जर्नल’ में उल्लेख किया है कि उत्तर भारत की यात्रा करते समय अनेक बार रात्रि में प्रकाश देने वाली लकड़ियों को देखा है। दक्षिणी अमेरिका में मिलने वाले यूफोर्बिया फ्रमिली के ‘र्स्पज’ नामक वृक्ष के तने को रात में काटने पर उससे निकलने वाला रस चमकता है। वहाँ ऐसी लताएं भी हैं जिनसे अपार रस निकलता रहता है। यह रस लताओं के नीचे चलने वाले प्राणियों पर लग जाने से उनके शरीर से अद्भुत प्रकाश की चमक निकलती है। कहा जाता है कि इन पौधों की वृद्धि मुख्य रुप से रात्रि में अधिक होती है। इनके प्रकाश से रात्रि में कीड़ों-मकोड़ों द्वारा परागण क्रिया भी सम्पन्न होती है। मशरुम (कुकुरमुत्तों) में प्रकाश की उत्पत्ति की क्रिया का सम्बन्ध ष्वसन से होता है, आक्सीजन हटा लेने पर यह प्रकाश लुप्त हो जाता है।

वैज्ञानिक इन पौधों में स्फुरदीप्ति (फास्फोरेसेस) का गुण बताते हैं जो दिन में प्रकाश का संग्रह कर लेते हैं और रात को उसी को उत्सर्जित करते हैं। यह भी कहा जाता है कि इन पौंधों में अपेक्षाकृत अधिक फास्फोरस होता है जो वायु-मण्डल की आक्सीजन के सर्म्पक से सुलगता है और प्रकाश देता है। कुछ पौंधे पानी में छोड़ने पर ही प्रकाश देते हैं।

योगीजन अन्तःकरण में प्रकाश ढूँढ़ते हैं। रात्रि के समय सभी को कृत्रिम प्रकाश आवश्यकता पड़ेगी। भूले-भटके विज्ञजनों से प्रकाश मार्ग-दर्शन की उपेक्षा करते हैं। मानवी चेतना ने नियन्ता से ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय का अनुदान माँगा है। पर यह छोटे वनस्पति प्राणी कितने सौभाग्यवान हैं कि उन्हें स्वयं प्रकाशित रहने और दूसरों को अपनी प्रकाशवान सत्ता का परिचय देने का अवसर सहज ही मिला हुआ है।


सच्चा धन (kahani)

स्वामिनी सत्संग में गयी हुई थीं। घर में अकेली दासी रह रयी। तभी कुछ चोर घर में घुस आये और चोरी करने लगे। दासी ने यह देखा तो छिप कर तेजी से स्वामिनी को सूचित करने के लिये दौड़ी। यह देखकर चोरों का सरदार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

दासी ने पाया कि स्वामिनी सत्संग सुनने में बड़ी तल्लीन हैं। उसने दो तीन बार स्वामिनी से कहा कि चोर धन लिये जा रहे हैं। पर स्वामिनी पर कोई प्रभाव न पड़ा। अन्त में फिर चौथी बार दासी ने स्वामिनी को झकझौर कर अपनी बात कही। तब उनकी तल्लीनता भंग हुई और वह बोलीं, ‘चोर तो नकली धन ले जा रहे हैं। तू मुझे चुपचाप यहाँ बैठने दे। असली धन तो यही है।

चोरों के सरदार ने जब यह सुना तो सोचा कि इसके घर में नकली आभूषण हैं, असली धन इसने कहीं और छिपा कर रखा है। चोरों का सरदार वापिस अपने साथियों को बुलाने चला गया।

‘चलो सत्संग में चलकर हम सभी बैठते हैं। जब वह महिला घर जायेगी तो रास्ते में उसे घेर लेंगे। वह बहुमूल्य आभूषण पहनी है, उन्हें छीन लेंगे।’ चोरों के सरदार ने कहा।

सभी चोर सत्संग में जाकर बैठ गये। मुनि कोटिकर्ण ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से उन चोरों को पहचान लिया। उन्होंने इतने प्रभावशाली शब्दों में चोरी के बुरे परिणामों पर प्रकाश डाला कि चोरों का मन भी उससे भयभीत हो उठा। मुनि का शब्द चोरों की आत्मा का झकझोरने लगा। सम्मोहन की-सी अवस्था में चोरों का सरदार उठा, मुनि के चरणों पर गिर कर अपने सारे अपराध बताने लगा। उसकी आँखों से धराप्रवाह अश्रु बह रहे थे। वह गद्गद् कण्ठ से बोला - ‘महात्मन् मुझे इस नरकीय जीवन से अब उबार लीजिए।

मुनि बोले -’वत्स! अच्छा हुआ तुम समय रहते सही मार्ग पर आ गये। मानव जीवन का सत्कार्यों से सदुपयोग करो। पाप करके इसे अवनति के गर्त में मत गिराओ। तुमने अपने दुष्कार्यो के लिये पश्चाताप किया है, यह अच्छा ही हुआ। इसका प्रायश्चित अब यही होगा कि मनुष्यों की भलाई में अपना जीवन अर्पित कर दो।’

और सन्त की प्रभावपूर्ण वाणी के जादू से सभी चोरों ने कुकर्म छोड़ दिया।


सापेक्षवाद एवं पूर्वाग्रह रहित सन्यान्वेषण

सत्य की शोध एक लक्ष्य है। जिसे प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्न किया जाना चाहिए। इस दिशा मं जितनी प्रगति होती चलती है। पिछली पीढ़ियों का महत्व उतना ही घटता जाता है यों पीछे-पीछे चलकर आने वालों के लिए वे पिछली पीढ़ियाँ भी अगली के समतुल्य ही होती हैं।

मनुष्य क्रमिक गति से अविज्ञात से ज्ञात की दिशा में चल रहा है। अब तक लम्बी मंजिलें पार कर ली गईं है। किन्तु जितना चलना शेष है उसे भी कम नहीं माना जाना चाहिए। हम सत्य के शोधक भर हैं। क्रमिक गतिशीलता ही अपनी सफलता है। पूर्ण सत्य की उपलब्धि चरम ही लक्ष्य है।

दृश्य, बुद्धि एवं अनुभूतियों के सहारे जो जाना जाता है, वह आँशिक सत्य है। हमारी जानकारियाँ ‘सापेक्ष’ है। किसकी तुलना से क्या अधिक उपयुक्त है। इतना भर ही जाना जा सकता है। किन मान्यताओं को स्वीकार किया जाय? इसके उत्तर में छोटी एवं बड़ी के उपस्थिति में से बड़ी भारी या कीमती को चुन लेना ही उपयुक्त है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जिसे कनिष्ठ माना गया वह वस्तुत कनिष्ठ ही है। अपने से घटिया के साथ जब तुलना की जायेगी तो वह कनिष्ठ भी वरिष्ठ समझी जायेगी। इतने पर भी जब उसे वरिष्ठों में ही की जायेगी। तब यह नहीं कहा जाएगा कि अमुक चुनाव मं उसे सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा चुका है।

आइन्स्टाइन के सापेक्षवाद सिद्धान्त ने विज्ञान, दर्शन और व्यवहार के तीनों क्षेत्रों को चिन्तन की नई दिशा दी है और कहा है कि आग्रह एवं दुराग्रह पर न अड़ा जाय। प्रचलित सभी मान्यताएं आँशिक सत्य हैं और उनकी उपयोगिता एक स्थिति में बहुत अधिक हो सकती है किन्तु दूसरी स्थिति में उसे निरर्थक भी ठहराया जा सकता है। इसमें किसी को मान-अपमान का - हार-जीत का-अनुभव नहीं करना चाहिए। वरन् यह मानकर चलना चाहिए कि हम सभी पूर्ण सत्य की दिशा में क्रमिक खोज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सभी अपूर्ण हैं। साथ ही अमुक स्थिति में जो अधिक उपयुक्त है उसे स्वीकारणा, अपनाना भी अनुपयुक्त नहीं है। इस निर्ष्कष पर पहुँचने वाले को जिज्ञासु बनना और सहिष्णु रहना पड़ता है। अपने लिए जो सत्य है वहीं दूसरों के लिए वैसा ही होना चाहिए। इसके लिए आग्रह या दुराग्रह न करना ही समीचीन है।

तुलनात्मक अध्ययन से निकलने वाले निर्ष्कष सापेक्ष कहे जाते हैं। इस कसौटी को स्वीकारने पर कोई व्यक्ति दुराग्रही नहीं हो सकता। असहिष्णु होने का भी उसके लिए कोई कारण नहीं रह जाता। अध्यात्म तत्व ज्ञान में चिन्तन को परिष्कृत करने वाली प्रथम आवश्यकता ‘जिज्ञासा’ को माना गया है। जिज्ञासा उस ज्ञान पियासा को कहते हैं जिससे पूर्ण मान्यताओं के लिए दृढ़ नहीं रहता। विज्ञान की प्रगति इसी आधार पर हुई है धर्म इसलिए पिछड़ा कि उसने पुरातन को पत्थर की लकीर माना और बदलते हुए संदर्भों का ध्यान र रखते हुए जो पुराना सो भला-जो अपना सो सही का दुराग्रह अपनाया। क्रमिक गतिशीलता प्राणियों से लेकर पदार्थों तक की प्रगति व्यवस्था का अनिवार्य अंग है फिर पुरातन मान्यताओं में कभी कोई परिवर्तन न करना पड़े यह नहीं हो सकता। सापेक्षवाद को अंगुलिय निर्देश सत्यान्वेषी-तथ्यान्वेषी होने के लिए जन चेतना को सहमत करना है। इसमें प्रगति क्रम को अपनाने और पूर्वाग्रहों पर न अड़ जाने का भी अनुरोध है।

दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में दृष्टा माने जाने वाले आइन्स्टाइन ने दूरी, समय और पदार्थ कारणों को भी सापेक्ष कहा है और बताया है कि इनके सम्बन्ध में अपनाई गई वर्तमान मान्यताएं भी तुलनात्मक प्रयोजन से ही सत्य हैं। पूर्ण सत्य नहीं।

उदाहरणार्थ एक साइकिल पर यात्रा करने वाले व्यक्ति को मार्ग की वस्तुएं लगभग उसी रुप में दिखायी देंगी जिस रुप में वे है। जबकि ट्रेन में यात्रा करने वाले को वे छोटी दिखायी देंगी। किसी आणविक गाड़ी में यात्रा करने पर मार्ग की कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होगी। अभिप्राय यह कि लम्बाई, चौड़ाई की धारणा गति की सापेक्ष है। पृथ्वी पर समय की गणना सूर्य मण्डल की गति पर आधारित है जबकि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सापेक्ष यह गणना महत्त्वहीन है।

यदि हम किसी ऐसे नक्षत्र पर पहुँच जाँयें जो पृथ्वी से दो हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर हो तथा किसी शक्तिशाली टेलीस्कोप से पृथ्वी की ओर देखें तो पूर्वकाल में घटित हुए घटनाक्रमों का दृश्य उसी प्रकार दिखायी देगा जैसे आज ही घटित हो रहे हों। ऐसी स्थिति में राम-रावण युद्ध, महाभारत, भगवान बुद्ध का धर्म चक्र परिवर्तन अभियान स्थल सब देखा जा सकता है। इस क्रम में बढ़ते हुए क्रमशः वाद की घटनाएं और पिछले दिनों हुए विश्व युद्धों के दृश्य भी भलीभाँति देखे जा सकते हैं। इस प्रकार पृथ्वीवासियों के लिए जो वर्तमान काल है। अन्य ग्रहों के लिए वह भविष्य है, जो भूत था वह उनके लिए वर्तमान है। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों पर जो वर्तमान है, वही पृथ्वीवासियों के लिए भविष्य है, जो उनके लिए भूत था, वही यहाँ वर्तमान है। इस प्रकार स्पष्ट है, भूत, वर्तमान, भविष्य का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पृथ्वी से चला हुआ प्रकाश सभी दृश्यों को अपने साथ लेकर अरबों वर्षों बाद अन्य दूरवर्ती ग्रहों पर पहुँचता है। यही बात अन्य ग्रहों के सर्न्दभ में है। स्पष्ट है कि घटनाएं प्रकाश के गर्भ में निवास करती हैं। सम्भव है आइन्स्टीन ने इसी को चौथा आयाम की संज्ञा दी है। घटनाएं दृश्य कभी लुप्त नहीं होते वरन् कहीं न कहीं सूक्ष्म में विद्यमान रहते हैं। उन्हें दृश्यमान भी किया जा सकता है।

योगी गण विशिष्ट साधना प्रणालियों द्वारा भूतकाल की घटनाओं को साक्षात्कार करते हैं। इष्ट के रुप में राम, कृष्ण, हनुमान, बुद्ध, इसामसीह, चैतन्य, रामकृष्ण के दर्शन करने में यही तथ्य निहित है। वे भूतकाल में चेतन प्रक्रिया द्वारा पहुँचकर अदृश्य जगत में विद्यमान इन महापुरुषों के साक्षात्कार कर लेते हैं।

आत्मा अनन्त, सर्वव्यापी, सर्वत्र है। उसकी गति निरपेक्ष है। वर्तमान से भविष्य तथा भूत की ओर वह जा सकती है क्योंकि वह समय एवं दूरी के सीमा क्षेत्र से परे है। ‘जिमन जीन्स’ का कहना कि ‘यदि विश्व की कोई नियामक सत्ता होगी तो वह निश्चित ही समय एवं दूरी के नियमों से परे होगी। यह कथन भारतीय बनने की मान्यताओं का ही समर्थन करता है। जिसमें आत्मा को प्रकृति के नियमों से परे माना गया है।

गति की तीव्रता के साथ प्रकृति के बन्धन भी ढीलें पड़ जाते हैं। यदि गति निरपेक्ष हो जाये तो स्थूल बन्धन टूट जाते हैं। इसी को बन्धन मुक्ति कहा गया है। स्थूल वस्तुओं का बन्धन गति कम रहने के कारण बढ़ता जाता है। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति साइकिल से, हरिद्वार से लखनऊ जाता है, उसे समय अधिक लगेगा तथा खाने-पीने से लेकर अन्य वस्तुओं की आवश्यकता होगी। दूसरा व्यक्ति मोटर तथा तीसरा हवाई-जहाज से यात्रा करता है। तो इन स्थूल वस्तुओं की आवश्यकता उतनी ही कम होगी। प्रकाश की गति में जाने पर वस्तुओं की बिल्कुल ही आवश्यकता नहीं होगी। यही चेतन स्थिति है। योगी इसी में अवस्थित होकर हिमालय जैसे दुर्गम ठण्डे स्थान पर रहते हुए भी जीवित बने रहते हैं। प्रकाश की गति में स्थूल अस्तित्व लुप्त हो जाने से स्थूल चीजों की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

चेतना को आवृत्त किये रहने में इन्हीं दो की समय और दूरी की प्रमुख भूमिका होती है। बन्धन में यही बाँधते हैं। आत्मा साधना का लक्ष्य इसी दूरी एवं समय को समाप्त करता है।

स्थूल जगत में भी कभी-कभी इसी प्रकार की घटनाएं देखने को मिलती हैं जिनमें स्थूल अस्तित्व ही लुप्त हो गया। अटलाँटिक महासागर में ‘वरमूडा’ त्रिकोण के लेखक चालर्स वर्लिटज ने इस स्थान की विचित्रताओं का उल्लेख दिया है कि इस स्थान पर पहुँचने वाले यान जहाज देखते-देखते आँखों से ओझल हो जाते हैं। जब तक सैकड़ों वायुयान एवं समुद्री जहाज लुप्त हो चुके हैं।

भलीभाँति छानबीन करने के बाद भी वैज्ञानिकों को अब तक कोई ठोस कारण नहीं मिल सका है। सम्भावना यह व्यक्त की गई है कि इस क्षेत्र में चलने वाले साइक्लोन की गति प्रकाश की गति के बराबर है जिसके कारण पहुँचने वाले जहाज, हवाई जहाज प्रकाश गति पकड़ लेते हैं, तथा अदृश्य हो जाते हैं। 5 दिसंबर 1945 अमेरिका के नेवी से चले 6 वायुयान चालकों सहित लुप्त हो गये। प्राप्त संकेतों के अनुसार चालक यह कहते हुए पाये गये कि हम विचित्र स्थान पर पहुँच गये हैं। यहाँ कुछ भी नहीं दिखायी पड़ रहा है। यहाँ हम लोगों के अपने स्वरुप भी स्पष्ट नहीं दृष्टिगोचर हो रहे हैं। उस क्षेत्र से बचे हुए कुछ लोगों का कहना है कि वहाँ दिशा समुद्र, आकाश, हम सभी का स्वरुप एक सा लग रहा था। कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था।

अन्यान्य ग्रहों पर जीवन की खोज की जा रही है। सम्भव है कि उन पर सूक्ष्म शरीर धारी जीवों का अस्तित्व है। हमारी स्थूल मान्यताओं के कारण उनका पता नहीं लग पाता है। वे प्रकाश की गति से चलकर पृथ्वी का निरीक्षण करने भी आते हों किन्तु पृथ्वी के नियमों से अपने आपको अप्रभावित रखते हों। उड़नतश्तरियों की घटनाओं से विकसित सभ्यता का पता लगता है।

वेदान्त दर्शन में संसार को ‘मिथ्या’ - माया कहा है। यह इस अर्थ में सर्वथा सत्य है कि जो कुछ देखा या समझा जा रहा है वह निर्भ्रान्त नहीं है। जबकि उसकी प्रतीति सत्य जैसी होती है। विज्ञान की दृष्टि में दृष्टि-जगत परमाणुओं का अन्धड़ मात्र है। जहाँ जिस स्तर के जितने परमाणु एवं तरंग प्रवाह इकट्ठे हो जाते हैं वहाँ वैसे दृश्य दीखने और अनुभव होने लगते हैं। इसमें मनुष्य को अपनी संरचना एवं पदार्थों के साथ उनके सर्म्पक से उत्पन्न सम्वेदना ही प्रधान कारण होती है। तथ्य इन अनुभूतियों से भिन्न होता है।

सत्य को नारायण माना गया है। यह साधना का विषय है। उसकी खोज जारी रखी जाय। हठवादी न बना जाय। इसी मार्ग पर चलते हुए विग्रहों से बचना और तथ्य तथा सत्य तक पहुँच सकता सम्भव हो सकता है।


विद्या का सच्चा अधिकारी (kahani)

एक सन्त धर्मशास्त्रों के गहन अध्ययन में निरंतर लगे रहते थे। रात हो या दिन, वे निरंतर अपनी साधना में तन्मय रहते। एक बार आधी रात में उनके दीपक का प्रकाश धुँधला पड़ गया। कई दिनों के निरन्तर अध्ययन-मनन से सन्त भी थके हुए थे। उन्होंने ग्रन्थ बन्द किया और लेट गये।

स्वप्न में उन्होंने देखा विद्या की देवी सरस्वती कह रही है “वत्स! मैं तेरी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुझे कठोर परिश्रम नहीं करना होगा। मैं तुझे सभी विद्याओं का दान देने आयी हूँ।”

सन्त ने सिर झुकाया और कहा -”माँ, धृष्टता क्षमा करें। अभी मुझमें समस्त विद्याओं को पाने की पात्रता नहीं आयी है। निरन्तर अध्ययन-मनन से ही यह पात्रता सम्भव है। इसके लिये परिश्रम और तपस्या चाहिए। अपात्र के पास विद्या कभी सफल नहीं हुआ करती।”

सन्त का उत्तर सुनकर देवी प्रसन्न होकर बोली ‘मैं तेरी परीक्षा ले रही थी। उसमें तू खरा उतरा। तू वास्तव में विद्या का सच्चा अधिकारी है। तुझसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जो इच्छा हो वह माँग ले।’

सन्त ने उत्तर दिया ‘देवि! आप इतना ही वरदान दीजिये कि मेरा दीपक सदैव तेल से भरा रहे। उसके प्रकाश में मैं निरंतर अध्ययन करता रहूँ। ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में आने वाले कष्टों से मैं विचलित न होऊं। मैं निरन्तर ज्ञानार्जन की साधना में जुटकर विद्या का सच्चा अधिकारी बनुँ।


धर्म तर्क के न्यायालय में

तर्क एवं प्रमाण की अपनी उपयोगिता है। विज्ञान ने अपना सतत् विकास इसी आधार पर किया है। परीक्षण की कसौटियों पर कसने के बाद उसने अपना वर्चस्व सिद्ध किया है। उसकी प्रत्यक्षवादी मान्यताएं परीक्षण किये जाने के बाद ही अपनी प्रामाणिकता प्रस्तुत कर सकी है। धर्मतंत्र को भी प्रत्यक्षवाद ने चुनौती दी है कि परीक्षण की कसौदियों पर अपनी उपयोगिता सिद्ध करे।

इसे समय का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए कि धर्म ने लौकिक ज्ञान, तर्कशास्त्र से अपने को सिद्ध करना अस्वीकार किया। किसी समय मनुष्य की आस्था इतनी प्रगाढ़ एवं भावनाएं इतनी उदात्त रही होंगी कि शास्त्रों, महापुरुषों के वचनों में तर्क करने की आवश्यकता नहीं अनुभव की जाती रही होगी। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों एवं मनुष्य की मन स्थिति में भारी अन्तर आया है। बुद्ध का असाधारण विकास हुआ है। जिज्ञासा एवं तर्क शक्ति बढ़ी है। फलस्वरुप मानवी आस्था में कमी आयी है। बुद्धवाद धर्म के सिद्धान्तों को बिना परखे, तर्क एवं परीक्षण की कसौटी पर बिना कसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। धर्म को अब उसी बुद्धि, तर्क से प्रामाणिक एवं उपयोगी सिद्ध करने की आवश्यकता आ पड़ी है जिससे विज्ञान अपने प्रतिपादनों को सिद्ध करता है।

विवेकानन्द ने कहा था, “मेरा अपना विश्वास है कि वाह्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जिन अन्वेषण पद्धतियों का प्रयोग होता है, उन्हें धर्म क्षेत्र में भी प्रयुक्त किया जाना चाहिए। यह कार्य जितना शीघ्र हो उतना ही अच्छा। यदि कोई धर्म इन अन्वेषणों से ध्वंश हो जाय तो समझना चाहिए कि वह निरर्थक था। ऐसा धर्म जो तर्क प्रमाण एवं उपयोगिता की दृष्टि से खरा न उतरे, लुप्त हो जाना एक श्रेष्ठ घटना होगी। इस अनुसन्धान के फलस्वरुप सारा मल धुल जायेगा तथा धर्म के उपयोगी तत्व अपनी प्रखरता के साथ सामने आयेंगे।

वस्तुतः जो धर्म बौद्धिक अन्वेषण की उपयोगिता से इन्कार करते हैं वे आत्म विरोधी हैं। उनकी क्रिया प्रणाली कितनी भी सशक्त क्यों न हो, उपयोगिता के अभाव में कालान्तर में संदिग्ध बन जायेंगे। शास्त्रों आप्त वचनों के दुहराने एवं कर्मकाण्डों की लकीर पीटने मात्र से उनका महत्व नहीं बढ़ सकता, वरन् मनुष्य की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने से ही वे उपयोगी एवं प्रामाणिक बन सकते हैं। धर्म का मूल तत्व ग्रन्थों, कर्मकाण्डों से परे हैं जो परीक्षण एवं अनुभूति गम्य है। उसका अन्वेषण आज की परिस्थितियों में किया जाना अति आवश्यक है। इस सार्वभौम तत्व की सनातन गरिमा को प्रामाणित करना ही अन्वेषण का उद्देश्य है। बुद्धि का सदुपयोग इस दिशा में होना ही चाहिए।

धर्म का प्रमाण किसी ग्रन्थ की रचना पर नहीं वरन सत्यता पर आधारित है। ग्रन्थ मानवी रचना के बाह्य परिणाम है। जो सार्वभौम सत्ता एवं प्राणिमात्र की एकता का प्रतिपादन करते हैं। मनुष्य उनका प्रणेता है। बुद्धि भी मानव संरचना का ही परिणाम है। बुद्धि की शरण में न्याय के लिए जाना होगा। बुद्धि का उत्तरदायित्व है कि वह प्रचलनों के कारण एवं उद्देश्य की व्याख्या करके व्यक्ति को समाधान एवं सन्तोष प्रदान करे। उसी शाश्वत प्रयास को अन्वेषण कहते हैं। कोई घटना घटित होती है। उसे देखकर असमंजस होता है, पर यदि यह विश्वास हो जाय कि यह घटना अमुक नियम का परिणाम थी तो समाधान हो जाता है। पेड़ से सेव गिरा। न्यूटन की बुद्धि आविष्कार के लिए प्रवृत्त हुई। फलस्वरुप पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत का प्रतिपादन हुआ। इस सार्वभौम सिद्धाँत को सबने स्वीकार किया। अन्वेषण की इस पद्धति को धर्म क्षेत्र में भी प्रयुक्त करना होगा।

विज्ञान की मान्यता है कि किसी वस्तु की व्याख्या स्वयं उसकी प्रकृति में निहित है। इसी कारण वह वस्तु के स्वरुप को जानने के लिए प्रयोग परीक्षण करता है। पदार्थ सत्ता के रुप को जानने के लिए परमाणु रचना को देखना, जानना होता है। इस मान्यता के अनुसार सृष्टि में घटित होने वाली घटनाओं की व्याख्या किसी बाह्य सत्ता एवं शक्ति पर आधारित नहीं है, वरन् उसकी प्रकृति में विद्यमान है। रसायनशास्त्री अपने तथ्यों का प्रतिपादन करने मं दैत्य, भूत अथवा बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं अनुभव करता। विज्ञान के इस सिद्धाँत का प्रयोग धर्म क्षेत्र में भी करना होगा। उसके सिद्धाँतों मान्यताओं को उपयोगिता की कसौटी पर कसना होगा। पारेक्ष में, जीवनोपरान्त धर्माचरण का लाभ मिलेगा या नहीं, बुद्धिवाद इस प्रश्न पर विचार करने को तैयार नहीं है। प्रत्यक्ष में, इसी जीवन में धर्म को अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी होगी।

विज्ञान अपनी व्याख्याएं वस्तु सत्ता के भीतर से करता है जबकि धर्म ऐसा करने में पिछले दिनों असमर्थ रहा है। आवश्यकता आ पड़ी है कि धर्म भी इस पद्धति को अपनाये तथा अपनी महत्ता को अपने अन्दर से सिद्ध करे। विश्व से पूर्णतया पृथक ईश्वर की सत्ता एक प्राचीन मान्यता है। ऐसे ईश्वर का सत्ता को जो श्वि से पृथक है, बुद्धिवाद, उपयोगितावाद स्वीकार करने में असमर्थ है। ईश्वर है तो उसे मानवी जीवन के निकट उपयोगी बनकर रहना चाहिए। जीवन-क्रम की श्रेष्ठता के रुप में परिलक्षित होना चाहिए। उसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व के रुप में फलित परिणित होना चाहिए।

इस कसौटी पर कसे जाने एवं अनुसंधान पर खरा उतरने पर ही धर्म जीवन्त बना रह सकता है अन्यथा बुद्धिवाद उसे आसानी से स्वीकार नहीं करेगा, उल्टे उस पर प्रहार करेगा। अनुसंधान की उपेक्षा करके देवी-देवता की मात्र मान्यता से चिपके रहने से धर्म की उपयोगिता संदिग्ध बनी रहेगी।

वस्तु की व्याख्या उसकी प्रकृति में निहित है, भारतीय दर्शन भी पूर्ण रुप से इस सिद्धाँत का समर्थन करता है। ब्रह्म या वेदान्त में ईश्वर से ‘बाहर कुछ नहीं है।’ ‘यह सब वहीं है।’ विश्व में उसकी ही सत्ता है।’ ‘वह स्वयं विश्व ही है।’ इसी को हम देखते एवं अनुभव करते हैं। उसी में हमारी जीवनगति और हमारी सत्ता है। विश्व में अन्तर्व्याप्त ईश्वर की, समस्त वस्तु सारतत्व की एवं सर्वत्र अन्तर्यामी होने का भाव भी यही हे। वह जगत के साथ में अपने को व्यक्त कर रहा है। जड़ चेतन उसकी ही अभिव्यक्तियाँ है। व्यक्ति-व्यक्ति, देव-मानव, मानव-पशु, पशु-पौधे आदि के बीच जो विभेद दिखायी देता है वह तत्त्व की दृष्टि से नहीं परिमाण की दृष्टि से है। महान् व से लेकर सूक्ष्म कण सभी उसी चेतना के असीम सागर की अभिव्यक्तियाँ है। उपादान सबमें एक है। इस सिद्धाँत की व्याख्या के लिए किन्हीं बाह्य कारणों को ढूँढने की आवश्यकता नहीं, वरन् उसकी प्रकृति में ही जाना होगा।

धर्म की उपलब्धियाँ हैं-श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं आदर्श कृत्त्व। जो धर्म मानवी व्यक्तित्व के विकास में अपना योगदान देता है वही अपना अस्तित्व कायम रख सकता है। व्यावहारिक जीवन की समस्याओं का समाधान उसमें होना चाहिए। क्यों, किसलिए का समाधान उसे प्रस्तुत करना चाहिए। आज का विचारशील वर्ग कर्मकाण्डों में जीवन परिष्कार का दर्शन क्रम जुड़ा रहना अति आवश्क है। इसके अभाव में तो कलेवर विकृति ही खड़ा करेंगे। धर्म की गरिमा को गिरायेंगे। उसकी महानता तो तभी बनी रह सकती है जब जीवन-निर्माण की परिपूर्ण भूमिका सम्पन्न करे। मानव मानव के बीच वह भाव, विचार उत्पन्न करे जिससे वे सार्वभौम तत्व की एकता को एक दूसरे में अनुभव कर सके।

इसके लिए धर्म की मान्यताओं को विवेक के न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। तर्क एवं उपयोगिता की कसौटी पर कस कर उन सिद्धाँतों को अपनाना होगा जो जीवन के परिष्कार एवं उत्थान में अपना योगदान देते हों। मनुष्य-मनुष्य के बीच, प्राणी मात्र के बीच स्नेह-सौहार्द्र उत्पन्न करते हों। समाज की अन्यान्य समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हों। तर्क एवं परीक्षण की इन कसौटियों पर खरा उतरने के उपरान्त ही धर्म बुद्धिग्राह्य हो सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में जब कि व्यक्तित्व के विकास के सारे प्रयत्न असफल हो रहे हैं, धर्म तत्व को बढ़कर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करनी होगी। यह तभी सम्भव बन सकता है जब वह परीक्षण की भट्टी में समुख अपने को निर्भीकता-पूर्वक प्रस्तुत करे। भौतिकी ने जिन आधारों पर अपने को प्रामाणिक ठहराया है, उन्ही आधारों पर आत्मिकी को भी प्रामाणिक एवं उपयोगी सिद्ध करना होगा। समय की इस माँग को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।


जीवन और मरण की अविच्छिन्न शांखला

सुकरात को जहर दिए जाने की तैयारी चल रही थी।शिष्य, मित्र, सहयोगी, समबन्धी सभी के नेत्र सजल हो उठे। प्राणों से प्रिय अपने मार्गदर्शक के विछुड़ने की वेदना असहाय हो रही थी। पर सुकरात पर इसका कोई प्रभाव नहीं था। उल्टे उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा प्रसन्नता, प्रफुल्लता मुख मण्डल पर और भी अधिक परिलक्षित हो रही थी मृत्यु को गले लगाने की आतुरता सुकरात की देखते बनती थी। ऐसा लगता था कि किसी प्रिय जन से मिलने की उत्सुकता हो। मित्रों ने - शिष्यों ने इस आतुरता का कारण रोते हुए पूछा। सुकरात ने कहा - ‘मैं मृत्यु का साक्षात्कार करना चाहता हूँ तथा यह जानना चाहता हूँ कि मृत्यु के बाद हमारा अस्तित्व रहता है या नहीं। मृत्यु जीवन का अन्त है अथवा एक सामान्य परिवर्तन क्रम।’

सुकरात की निर्धारित समय पर विष दे दिया गया। सभी आत्मीय उन्हें घेरे हुए बैठे थे - नेत्रों से अश्रु की अविरल धारा बर रही थी। सुकरात ने कहा - “मेरे घुटने तक विष चढ़ गया है - पैरों ने काम करना बंद कर दिया - वे मर चुके किन्तु मैं फिर भी जीवित हूँ। मेरे अस्तित्व में थोड़ा भी अन्तर नहीं आया -मैं पूर्ण हूँ। देखो! मेरे हाथों ने, कमर ने, नेत्रों ने काम करना बन्द कर दिया -निर्जीव हो गये किन्तु मैं ठीक पहले जैसा हूँ।” उपस्थित स्नेही, सहयोगी फूट-फूटकर रोने लेग। सुकरात ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा “देखो! तुम्हें जीवन की वास्तविकता को समझने का एक अलभ्य अवसर मिला है। एक व्यक्ति मृत्यु की अवधि से गुजर रहा है तथा तुम सबको सन्देश दे रहा है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं-एक अविरल प्रवाह है। जीवन की सत्ता मरणोपरान्त भी बनी रहती है।

रुस के पसिद्ध गणितज्ञ डा. पी.डी. आस्पेंस्की की रुग्णता इस सीमा तक बढ़ी कि चिकित्सकों ने विस्तर से भी उठने को मनाकर दिया। तीन माह के भीतर चिकित्सकों ने उनके मरने की घोषणा कर दी। आस्पेंस्की ने सोचा कि जब मरना ही है तो विस्तर पर क्यों मरा जाय? मृत्यु का साक्षात्कार क्यों न किया जाय? वह उठा और चल पड़ा। निरन्तर चलता रहा। मित्रों ने अस्वस्थता की याद दिलायी तथा विश्राम के लिए सलाह दी। उनने कहा मैं अचेतन अवस्था में नहीं मरना चाहता। पूर्ण चेतना के साथ मृत्यु को देखना चाहता हूँ। विस्तर पर मरने की अपेक्षा चलते-चलते मृत्यु को गले लगाना चाहता हूँ। वह चलते-चलते मरा। अन्तिम पग रखने से पूर्व उसने कहा-”अब वह शरीर गिरने वाला है। तुम सब यह देखोगे किन्तु मैं तो बहुत समय पूर्व से देख रहा हूँ कि ‘शरीर ने साथ छोड़ दिया है, पर मेरी सत्ता पर कोई प्रभाव नहीं है - मैं यथावत हूँ। अन्तिम घड़ियों में उपस्थिति प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि ‘आस्पेंस्की की आँखों में जो चकम, चहरे पर शाँति देखी गई, वह उसके जीवन में पहले कभी नहीं दिखाई पड़ी थी।

जीवन शाश्वत है-एक सतत चलने वाला अविरल प्रवाह है, यह अनुभव उन व्यक्तियों का है जिन्होंने मृत्यु को जानने एवं साक्षात्कार करने का प्रयास किया। अविछिन्न प्रवाह के एक घोर जीवन के साथ तथा दूसरे घोर मृत्यु को एक सहज, स्वाभाविक घटनाक्रम मान लिया जाय तो मृत्यु के सम्बन्ध में व्याप्त अनावश्यक भय एवं भ्रान्तियों से सहज ही बचा जा सकता है। कठिनाई अनभिज्ञता की पड़ती है। परिचित स्थानों एवं व्यक्तियों से डर नहीं लगता। अनजान व्यक्तियों एवं स्थानों से मिलने एवं जानने में भय लगता है। किन्तु वे परिचित हो जाने पर स्वाभाविक लगते तथा अनुभव होता है कि भय अकारण था। अन्धकार इसलिए डरावना नहीं लगता कि वस्तुतः वह डरावना है वरन् अनजान होने के कारण प्रतीत होता है। अन्धकार में भूत-प्रेत रहते तथा मनुष्य को त्राण देते हैं यह मानसिक कल्पना उसी समय तक बनी रहती है, जब तक कि अंधेरे में प्रवेश न किया जाय। मानसिक भ्रान्तियों का निवारण तो अंधकार के साक्षात्कार से होता है।

मृत्यु के संबध में भी इसी प्रकार की भ्रान्तियाँ फ्रली है। उसे कष्टकारक एवं जीवन का अन्त कर देने वाला मान लिया जाता है। अपने अस्तित्व के अन्त होने की कुकल्पना मनुष्य को जीवनपर्यन्त व्यग्र बनाये रहती तथा उतना कष्ट देती है जितना कि मृत्यु की अवधि में भी नहीं होता।

मृत्यु जीवन की विश्राम स्थली है जहाँ जीवात्मा अपनी थकान दूर करती, नये जीवन के लिए शक्ति प्राप्त करती है। थकान दूर करने के लिए श्राम तो नित्य ही करते हैं। पुनः नई शक्ति-एवं स्फूर्ति से दैनिक कार्यों में जुट जाते हैं। विश्रामावधि में जाने में न तो डर लगता, न ही किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव होती है। विश्राम के अभाव में तो व्यय हुई शक्ति की आपूर्ति नहीं हो पाती। काया कमजोर तथा श्रम के अयोग्य हो जाती है। जीवन भर की थकान को मिटाने के लिए-भावी जीवन के लिए शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से मृत्यु रुपी विश्राम अवधि भी उतनी ही आवश्यक है। काय-परिवर्तन इसलिए आवश्यक हो जाता है कि लम्बी अवधि तक श्रम करने के कारण वह इस योग्य नहीं रहती कि कठोर श्रम कर सके। पुराने फटे वस्त्रों को बदल कर-नये पहन लिए जाते है। जर्जर हो गई मशीनों को पूर्ण रुपेण परिवर्तित कर देना ही उचित होता है। इन परिवर्तनों में न तो किसी प्रकार का दुराग्रह होता-न आशक्ति और न ही किसी प्रकार का भय। नये के प्रति परिवर्तन के प्रति भयभीत हो जाने अथवा पुरातन के प्रति आसक्ति बने हरहने से उन लाभों से बंचित रह जाना पड़ता है, जो नये वस्त्रों एवं वस्तुओं से मिलता है। मृत्यु के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।

मृत्यु इसलिए भी आवश्यक एवं उपयोगी है कि जीव नये जीवन का-परिवर्तन का-आनन्द ले सके। मृत्यु का क्रम रुक जाय, उस स्थिति की कल्पना की जाय तो पता चलता है कि जीवन कितना नीरस, एवं उभरा होगा। लम्बी आयु, अमर काया-जर्जर, अशक्त बनी लाश ढोने के समान होगी, बुढ़ापा वैसे ही कितना नीरस भरा-भरा प्रतीत होता है। उस पर भी यदि उसके साथ अमरता का वरदान जुड़ जाय तो कितनी कठिनाई होगी। निश्चित ही कोई विचारशील, काया रुपी अमरता को स्वीकार न करना चाहेगा। असमर्थ, अशक्त, जराजीर्ण काया की गठरी के बोझ को कौन सदा ढोना चाहेगा?

फिर मृत्यु से डर क्यों लगता है? शरीर के प्रति आशक्ति क्यों बनी रहती है? इन कारणों पर विचार करने पर पता चलता है कि मृत्यु एवं जीवन के स्वरुप की वास्तविक जानकारी न होने के कारण ही भय लगता है। हमारी सत्ता शरीर से अलग है-शाश्वत, अविनाशी एवं अमर है, यह बोध बना रहे तो मृत्यु की आशंका से भयभीत होने का कोई कारण नहीं दीख पड़ता। शरीर सत्ता को ही सब कुछ मान लेने, मृत्यु के साथ जीवन का अन्त समझ लेने से ही डर लगता है। शास्त्र इसीलिए निर्देश देते हैं कि अपनी सत्ता को जानो और पहचानो।

जीवन और मरण की परस्पर जुड़ी हुई अविछिन्न शांखला का स्वरुप समझा जाय और इस सुर-दुर्लभ कराया का श्रेष्ठतम सदुपयोग ध्यान में रखा जाय तो जागृति और निद्रा की तरह जन्म और मृत्यु में कोई भी अद्भुत अप्रत्याशित या अनुपयुक्त प्रतीन न होगा।


कंटीली पगदण्डी (kahani)

एक बार गौतम बुद्ध राजपथ को छोड़कर कंटीली पगदण्डी पर चल रहे थे। लोगों को यह देखकर आर्श्चय हुआ। कारण पूछने पर भगवान बुद्ध ने बताया-

‘मनुष्यों! इस पगदण्डी में सुख-दुःख दोनों ही भोगने पड़ते हैं। अतएव यह प्रेरणा देती है कि सुखों से अधिक आशक्ति रखने और दुःखों में अधिक उद्ग्नि होने से जीवन यात्रा बड़ी दूर्भर हो जाती है। सुख-दुःख दोनों में समभाव रखने से जीवन यात्रा सुगम बनती है। अतएव मैं मात्र सुखों वाले राजपथ पर न बढ़कर पगदण्डी पर चल रहा हूँ।


त्याग का अन्धानुकरण न किया जाय

सन्त-महात्माओं, ऋषियों के जीवन-क्रम में सादगी का अनिवार्य रुप से समावेश होता है। अपरिग्रह सिद्धाँत में नहीं उनके व्यवहार में उतरा दिखायी देता है। कम से कम में गुजारा करते हुए अपनी क्षमताओं का उपयोग वे लोकमंगल के कार्यों में करते हैं। समय, काल एवं परिस्थितियों के अनुरुप उनके वेशभूषा, रहन-सहन के क्रम में परिवर्तन तो होता रहता है किन्तु सादगी का क्रम एवं अपने लिए कम से कम साधनों के उपयोग का सिद्धाँत अनिवार्य रुप् से ड़ा रहता है। सामाजिक परिस्थितियों के अनुरुप वे जीवन-निर्वाह का क्रम अपनाते हैं। उसमें अस्वाभाविकता का थोड़ा भी समावेश नहीं रहता। उनके तप-त्याग एवं तितिक्षा में लोक-कल्याण की भावना ही जुड़ी होती है।

एक समय था जब भौतिक सभ्यता अविकसित अवस्था में थी। साधनों का अभाव था। ऐसी स्थिति में समाज का मार्ग-दर्शन करने वाले, उन्हें दिशा देने वाले महापुरुषों के ऊपर नैतिक दायित्व होता था कि वे साधनों का उपयोग अपने लिए कम से कम करें। यही कारण था कि वे वस्तुओं का उपयोग न्यूनतम करते थे। वस्त्रों पर होने वाले व्यय को बचाने के लिए वे मात्र कोपीन धारण करते हुए अपना गुजारा चलाते थे। उन्न की कमी दूसरों को न पड़ने पाये इसलिए स्वयं के उपयोग में बहुधा वे उसका त्याग करते थे। तब फल-फूल, दूध की प्रचुरता थी। इन पर ही वे निर्वाह चला लेते थे। इस त्याग का एकमात्र लक्ष्य यह था कि समाज की वस्तुओं का लाभ अधिक से अधिक मिल सके। बाल, जटा रखने एवं दाढ़ी बढ़ाने के पीछे भावना यह नीहित थी कि काट-छाँट, सज-धज में अनावश्यक समय, श्रम एवं साधनों का दुरुपयोग क्यों किया जाय? अभावग्रस्त समाज की आवश्यकताएं ही इतनी अधिक है कि उनकी पूर्ति करना पहले आवश्यक है। वस्त्रों का काम वे कड़ाके की ठण्ड में भी भभूत लपेट कर अपना बचाव ठण्ड से करते थे। इसके इस त्याग से जन-समुदाय को लाभ तो मिलता था। साथ ही तप-तितिक्षा का मार्ग अपनाने से उनकी अन्तः शक्ति का विकास भी होता था। आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक उन्नति का दोहरा लाभ उनके सरल, सादा त्याग भरे जीवन-क्रम को अपनाने से मिलता था। इसमें अस्वाभाविकता का लेश मात्र भी समावेश न था। त्याग का दम्भ अथवा दिखावे की प्रवृत्ति नहीं इस मितव्यतता के पीछे लोक-मंगल की भावना ही प्रधान थी। जिसके कारण वे अभावग्रस्त स्थिति को स्वेच्छा से वरण कते थे।

अविकसित साधनों के युग के महापुरुषों ने उन वस्तुओं का सर्वथा परित्याग किया, जिनका समाज में अभाव था। भौतिकता के प्रभाव से बचे रहने का लाभ तो उनको मिलता ही था। अन्यों को भी इसका अनुसरण करने की प्रेरणा मिलती थी। सारे क्रिया-कलाप का एकमात्र लक्ष्य थ-आत्म-परिष्कार एवं लोक का कल्याण।

परिस्थितियाँ बदलते ही जीवनयापन के तरीके में भी अभीष्ट हेर-फ्रर आवश्यक हो जाता है। उनके अनुरुप ढलने एवं पुराने ढर्रे से हटने का रास्ता अपनाना पड़ता है। लोक-कल्याण की भावना के साथ सामाजिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखकर चलना होता है। अन्धानुकरण करने से ढोंग को बढ़ावा मिलता है। प्रायः देखा यह जाता है कि धर्म क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले साधक प्राचीन सन्त महात्माओं की वेश-भूषा एवं रहन-सहन का स्थूल अनुकरण मात्र करते हैं। वर्तमान परिस्थितियों पर ध्यान न देकर पुराने ढर्रे को अपनाना भर गौरवास्पद मानते हैं। यह उनके अविवेक का परिचालक है। किन परिस्थितियों में क्या जीवन-क्रम अपनाना चाहिए यह साधक की दूरदर्शी सूझ-बूझ पर निर्भर करता है। अस्वाभाविकता तो तब उत्पन्न होती है जब सहज क्रम न अपनाकर तप-त्याग के नाम पर पुराने ढर्रे को ही अपनाया जाता है। साधना के नाम पर यह विचारशीलता पर लगा दोष है।

सन्त, महात्मा नंग-धड़ंग रहते थे, कोपिन धारण करते थे। शरीर पर भस्म लपेटे रहते थे। उनके बाल एवं दाढ़ी बढ़ी होती थी-जैसे बाह्य अनुकरण आज भी अनेकों साधक करते दिखायी देते हैं। बात लोक-मंगल की भावना की होती तो समझ में भी आती। किन्तु जब दम्भ त्याग का भरा जाता है तो दुःख होता है। इन क्रिया कृत्यों के अपनाने में वस्तुओं की विरक्ति नहीं त्याग के दम्भ की आसक्ति ही प्रधानतया दिखायी पड़ती है।

कभी इस देश में दूध-दही, फल-फूल की अधिकता थी। किन्तु अन्य इतना नहीं होता था कि सबको र्प्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सके। उस समय जन-कल्याण की भावना रखने वालों के लिए अन्न का कम से कम प्रयोग अथवा उसका परित्याग करन उचित था। दूध, फल पर गुजारा करने के पीछे समाज के प्रति उदात्त भावना जुड़ी थी। परिस्थितियों में भारी परिवर्तन आया है। अन्न का उत्पादन बढ़ा है। किन्तु जानवरों की कमी हो जाने के कारण दूध की मात्रा में कमी अयी है। बच्चों को तब उनकी आवश्यकता के अनुरुप दूध उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। बड़ों की पूर्ति कर सकना तो प्रायः असम्भव ही है। मूल्य में भी वृद्धि हुई है। वृक्षों के कटते जाने से फलों का उत्पादन अल्प हो गया है। सर्व साधारण की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे उनका उपयोग कर सकें। एक अन्य ही रह गया है जिससे किसी प्रकार उदर पोषण किया जा सके।

आज जब कि नवजात शिशुओं को ही दूध, फल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है तो दूध, फल पर जीवन-यापन करने का दम्भ न्याय संगत नहीं है। त्याग एक प्रवृत्ति है जो लोक-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होती है। त्याग को एक ढर्रे का कृत्य मान लेना भारी भूल है। वस्तुओं से विरक्ति होना अच्छी बात है। किन्तु इस विरक्ति का एक सुनिश्चित उद्देश्य होना चाहिए। उद्देश्य विहीन कृत्य से ढोंग पनपता एवं अन्ध-विश्वास को बढ़ावा मिलता है।

तप-साधना से अन्तःशक्तियाँ विकसित तभी होती है जब उसके साथ उदात्तत भावना का समावेश हो? भावनाओं एवं श्रेष्ठ लक्ष्य के अभाव में तो साधना-कृत्य मात्र एक कौतूहल बनकर रह जाते हैं। अमुक महापुरुष ने अमुक प्रक्रिया अपनायी। उनकी मनःस्थिति एवं उस समय की सामाजिक परिस्थितियाँ क्या थी? इस बात पर ध्यान न देकर उनके कृत्यों का स्थूल अनुकरण करने का ही प्रायः प्रयास किया जाता है। जब कि अनुकरण उन सनातन सिद्धाँतों का करना चाहिए जिनको अपना कर वे महानता की ओर बढ़ सके थे।

साधना से आत्म-परिष्कार तथा ईश्वरीय सानिनध्य में पहुँच सकना सम्भव होता है। किन्तु साधना एक निश्चित क्रिया-कृत्यों से जुड़ी न होकर श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए होती है। स्थूल परिवेश तो सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। दुराग्रह पुरानी प्रणाली को अपनाने का बना रहा तो यह साधना न होकर अविवेक का परिचायक होगा।

वर्तमान परिस्थितियों के अनुरुप सहज, सरल एवं सादगीपूर्ण जीवनयापन करना साधना का अंग है। लोक-कल्याण साधना के साथ अनिवार्य रुप से जुड़ा है। यह तभी बन पड़ता है जब समाज की स्थिति को देखते हुए सुलभ, सहज जीवन-क्रम अपनाया जाय। साधना का यही लक्ष्य है। आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक उन्नति का यही आधार है।


मनुष्य और प्रेतों की मध्यवर्ती शांखला

प्रेत तत्व का अन्वेषण करने वालों में से अधिकाँश का कहना है कि शरीर छोड़ने के बाद प्रेतात्माएं आमतौर से अपने अद्श्य लोक में रहती है। उनकी अपनी दुनिया है। लम्बे जीवन में निरंतर श्रम करने के कारण जीवात्मा का मौलिक शक्ति का एक बड़ा अंश चुक जाता है और वे उस थकान को मिटाने तथा नई स्फूर्ति प्राप्त करने के लिए विश्राम करती है।

इसी अवधि में उन्हीं अपने कृत्यों की प्रतिक्रिया का भला-बुरा अनुभव होता रहता है। पंच भौतिक शरीर छूट जाने पर भी सम्वेदन क्षमता वाला सूक्ष्म शरीर बना रहता है। उसमें मस्तिष्कीय विशेषताएं विद्यमान रहती है। जिस प्रकार चेतन और अचेतन मन की विविध-विविध क्रिया-प्रक्रियाओं से जन-साधारण को जागृत अवस्था में भले-बुरे अनुभव होते तथा निद्रा में स्वप्न दीखते रहते हैं उसी प्रकार मृतक को अपने अनुभवों और अभ्यासों की प्रतिक्रिया का अनुभव उस विश्रान्ति काल में होती रहती है। इसी को र्स्वग-नरक कहते हैं।

स्तकर्म करने पर आत्म-संतोष और दुर्ष्कम करने पर आत्म-ग्लानि का अनुभव होता है उसी प्रकार जीवन पर छाई विचारणाओं और क्रियाआँ के फलस्वरुप चेतना पर जमे हुए संस्कार उस समय उभर कर आते हैं और जीव भेल-बुरे अनुभव करता है। ऐसे सपने नवजात शिशुओं को भी दीखते हैं वे अर्ध निद्रित स्थिति में कई बार हंसने-मुस्कराने और कई बार खिन्न होने, डरने और रोने जैसी मुखाकृति बनाते बदलते रहते हैं। यह उनकी संचित स्मृतियों की प्रतिक्रिया भर होती है। मृतक को प्रेत लोक में एक प्रकार के नवजात शिशुओं की स्थिति में रहना पड़ता है। इस अवधि में अचेतन को अपनी संचित अनुभूतियों के प्रकटीकरण का अवसर मिलता है। घटनाक्रम न होने पर भी मनुष्य की निजी भावनाएं तथा मान्यताएं अवसर पाकर सम्वेदना बनती और अपेन स्तर का रुप बनाकर प्रकट होती है। भ्रान्तियाँ, सनकें और मान्यताएं कई बार वास्तविकता से भिन्न प्रकार के चिन्तन मस्तिष्क को इस तरह आच्छादित कर लेते हैं कि निजी मान्यताएं ही सत्य जैसी दिखाई पड़ने लगती है। र्स्वग और नरक स्व निर्मित होते हैं। प्रेत लोक का वातावरण शान्त है, इतने पर भी हर प्रेतात्मा को उसकी निजी मानसिक स्थिति से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं का अनुभव अपने-अपने ढंग से करना पड़ता है। अधर्मी नरक का और धर्मात्मा र्स्वग का अनुभव किस प्रकार करते हैं इसका विवरण दिव्य-दर्शियों ने कथा-पुराणों में विस्तारपूर्वक लिखा है।

विश्रान्ति और अनुभूतियों के मध्य गुजरने वाली परलोक की अवधि से कई बार प्रेतात्माएं मनुष्यों के साथ सर्म्पक साधतीं और कई प्रकार की घटनाएं प्रस्तुत करती देखी जाती है। यह व्यक्तिक्रम अस्वाभाविक है। इस दुनिया से चले जाने के बाद दूसरी दुनिया की स्थिति में ही रहना योग्य है। नये जन्म में प्राणी पुराने जन्म की स्थिति, घटनाएं एवं सम्बन्ध भूल जाता है और नये सर्म्पक के अनुरुप अपने को ढालने लगता है। ऐसा ही परलोकवासी आत्माएं भी करती है। वे पुराने सम्बन्धियों को भूल जाती है ओर जिस परिस्थितियों में उन्हं जीवन काटना पड़ा, उससे भी अन्यमनस्क रहती है। विश्राम ऐसी ही मनःस्थिति में बन सकता है। अन्यथा पुराने सम्बन्ध एवं स्मरण ही बेचैनी का कारण बने रह सकते हैं और थकान को दूर करने की अपेक्षा नये किस्म का शोकजन्य उद्वेग खड़ा कर सकते हैं।

जीवितों और मृतकों के प्रत्यक्ष सम्बन्ध की जो घटनाएं घटित होती रहती है उनका कारण क्या है? इस प्रश्न का उत्तर डा. मैस्यर ने अपनी निजी खोजों तथा अनुभूतियों के आधार पर दिया है। उनका कथन इस प्रकार है - ‘मरणोपरानत मृतक की कोई अन्तिम उत्कृष्ट इच्छा रहती है तो उसका आत्मा सूक्ष्म शरीर के माध्यम से उसे तृप्त करेन का प्रयास करती है। इसके लिए उनके सूक्ष्म शरी की किसी ऐसे जीवित शरीरधारी के साथ सर्म्पक साधना होता है जो इस आकाँक्षा को पूर्ण कराने के लिए उपयुक्त सिद्ध हो सके।

प्रेतात्मा को सूक्ष्म शरीर का गठन किस प्रकार हुआ है। इस संदर्भ मं उनका कथन है - ‘मानवी काया से एक प्रकार का विशिष्ट ततव निरन्तर प्रवाहित होता रहता है। उसे ‘एक्टोप्लाज्म’ कहते हैं। यह न केवल शरीर से निकलता है वरन् समस्त ब्रह्माण्ड उससे परिपूर्ण है। यह पदार्थ नितान्त सूक्ष्म और सर्वथा अद्श्य हैं तो भी उसकी प्रतिक्रियाओं के आधार पर उस अस्तित्व का प्रमाण परिचय प्राप्त किया जा सकता है।

“यह कोई प्रकाश छाया नहीं है। वरन् एक जीवन शक्ति है। यह अपने प्रकटीकरण के लिए किसी सहयोगी को तलाश करती है और जिसमें अनुकूलता प्रतीत होती है उसे वाहन बनाकर अपनी इच्छित चेष्टाओं को चरितार्थ करती ह। आत्माएं हर किसी से सर्म्पक नहीं साध सकती न किसी को डराने या वशवर्ती बनाने में सफल हो सकती है। सर्म्पक माध्यक का ‘एक्टोप्लाज्य’ उसी स्तर का होना चाहिए। जैसा कि मृतत्मा का है। सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व भर है उसे भौतिक जीवन में कुछ कृत्य करने के लिए किसी अनुकूल सहयोगी की सहायता चाहिए। जो इस प्रयोजन के लिए जिस प्रेत को उपयुक्त लगता है। उसी के साथ सर्म्पक साधते हैं और इच्छित स्तर की हलचलें खड़ी करते हैं।”

जीवितों और मृतकों की मध्यवर्ती कड़ी को खोजने वाले विज्ञानी विलियम क्रुक्स का कहना है कि प्रेत और पितर वर्ग की दो आत्माएं होती हैं। प्रेत वे जो उद्विग्न रहते और हानि पहुँचाते हैं। पितर वे जो सद्भाव सम्पन्न हैं और सेवा सहायता करने भर के लिए सर्म्पक साधते हैं। प्रेतों का सर्म्पक हानि कर भी है और डरावना भी। किन्तु साथ ही व इतना दुर्बल भी है कि यदि कोई अपनी प्रबल इच्छा शक्ति से उन्हें अस्वीकृत कर दे तो फिर अपनी ओर से कुछ अधिक हलचल नहीं कर सकते। पितरों के सम्बन्ध में भी यही बात है जो स्वागत करता है और सहयोग देता है उसी की सहायता करने में वे रस लेते हैं।

अब वे दोनों ही प्रतिपादन झीने पड़ते जाते हैं जिनमें अत्युक्ति भरा आग्रह था। प्रेत चाहे जिस पर चाहे जब हमला कर सकते हैं और मनुष्यों को जो भी कष्ट उठाने पड़ते हैं उनमें प्रेत ही मुख्य कारण होते हैं यह मूढ़ मान्यता अब क्रमशः समाप्त हो चली है। और भूतों के भय से अधिकाँश लोगों ने मुक्ति पाली है। इसी प्रकार जो पदार्थवादी यह कहते थे कि चेतना और कुछ नहीं मात्र शरीगत रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्रण भर है उसके लिए मरण के उपराँत आत्मा नाम की कोई पृथक वस्तु शेष नहीं रहती। इन दोनों ही पक्षों को और पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है। सब कुछ भूतों की करतूत है मानने वाले दुराग्रही शिथिल पड़ रहे हैं और आत्मा का अस्तित्व ही न मानने वाले भी नये प्रतिपादनों और आकाट्य प्रमाणों को देखते हुए अपना हठ छोड़ने और वस्तुस्थिति को नये सिरे से समझने का प्रयत्न कर रहे हैं।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक सरलाँज, सर विलियम वैरेट, प्रो. जानर तथा विलियम क्रुक्स आदि मनीषियों ने मरणो-परान्त आत्माओं के अस्तित्व को स्वीकार किया है। सरलाज ने तो यहाँ तक कहा है कि “मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मनुष्य मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है क्योंकि मैंने अपने कुछ ऐसे मित्रों से सशरीर बात की है जो आज से बहुत वर्ष पहले मर चुके।

प्रेतात्माओं के अस्तित्व के होने न होने का विवाद अब प्रायः शिथिल या समाप्त होता जा रहा है। आये दिन उपलब्ध होते रहने वाले प्रमाणों की विश्वसनीयता तो असंदिग्ध स्तर की होती है तो उसे भ्रम या मनगढ़न्त कहकर नहीं टाला जा सकता वरन् यह सोचना पड़ता है कि क्यों न वस्तुस्थिति पर पुनर्विचार किया जाय।

प्रेतों के अस्तित्व के सम्बन्ध में कुछ विश्वस्त घटनाक्रम इस प्रकार हैं - अमेरिकी चन्द्रयान अपोलो-11 जब अपनी विजय यात्रा पूरी कर चन्द्रतल से पत्थरों के नमूने लेकर वापस लौट रहा था और पृथ्वी से लगभग 2 लाख 96 हजार कि.मीटर दूर था। उस समय ह्यूस्टन के कन्ट्रोल रुम में लगे तीव्र सम्वेदनशील टेप रिकार्डरों पर एक अजीवो गरीब ध्वनियाँ टेप की गई। ये ध्वनियाँ हजारों लाखों रेड इण्डियनों की रण दुन्दुभी साथ की गई हुँकारें थीं। जिसमें भयानक प्रेतों की ऐसी अट्टहासें सम्मिलित थीं मानों वे अमेरिकी अभियान का माखौल उड़ा रही हों। अन्तरिक्ष यात्रियों नील आर्मस्ट्राँ, एरबिन एल्ड्रिन व माइकेल कालिंगस से इस विषय में पूछा गया तो उन्होंने यान में किसी प्रकार ध्वनि या यान्त्रिक गड़बड़ी होने से साफ इन्कार किया।

घटना 1890 ई. की है जब लार्ड डफरिन भारत के गवर्नर जनरल के पद पर कार्य कर चुकने के बाद ब्रिटिश सरकार के अन्रु उच्च पदों पर कार्य कर रहे थे। एक बाद अवकाश बिताने के लिए आयरलैण्ड के अपने मित्र के घर वैक् फोर्ड में आमन्त्रण पर गये हुए थे। अपने नवीन और पुराने मित्रों के साथ रात देर तक शराब पीने के बाद जब लार्ड डफरिन अपने विस्तर पर गए तो अचानक उस दिन उन्हें नींद नहीं आ रही थी नींद की गोलियों का भी कोई प्रभाव उन पर न पड़ा। वह बेचैनी की हालत में ही उठकर कमरे में चहल कदमी करने लगे। एकबार ठंडी वायु का झोका उन्हें झकझोर कर चला गया जिससे वह भयभीत हुए। फिर देखते ही देखते उनके कमरे में आँधी का एकाएक झोंका आया सभी कागज-पत्रों एवं विस्तर को अस्त-व्यस्त कर चला गया।

लार्ड डफरिन की अचानक निगाह खिड़की से बाहर लान पर पड़़ी। वहाँ पर उन्हें एक भयानक आकृति बाला व्यक्ति दीखा जो भारी बोझा कन्धे पर उठाए हुए था। लान के मध्य वह उस बोझ को उतार कर लगातार खिड़की पर खड़े डफरिन को घूरता रहा। डफरिन भय वश काँप रहे थे, परंतु करते ही क्या? भयवश खिड़की बन्द कर औधें विस्तर पर लेट गये। थोड़ी देर बाद जब फिर वह उठे और खिड़की से लान की ओर झाँका तो वह वीभत्स स्वरुप वाला व्यक्ति तो नदारत था किन्तु उसके द्वारा लाया गया भारी भरकम ताबूत अब भी लन में रखा था। साहस बटोर कर लार्ड उस गठरी के पास पहुँचे और उसमें देखा कि ‘कफन’ रखा हुआ है। डफरिन ने अपने मित्रों से जब यह बात बता दी तो सबने उनका मखौल उड़ाया ओर जब पुनः लाल में ताबूत देखने गये तो उन्हें वहाँ पर उसका कुछ भी प्रमाण न मिला किन्तु डफरिन अपनी बात पर अडिग ही रहे।

पाँच वर्ष बाद जब लार्ड डफरित फ्राँस में इंग्लैण्ड सरकार के राजदूत थे। तो एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए वह पेरिस पहुँचे वहाँ पर उन्हं विख्यात ग्रैण्ड होटल में ठहराया गया। बैठक का आयोजन होटल की पाँचवीं मंजिल में था जिसमें लिफ्ट से जाना था। ‘लार्ड’ जब लिफ्ट में चढ़ने ही जा रहे थे तो लिफ्ट मैन की जगह वही ताबूत उठाकर लाने वाला वीभत्स चेहरे वाला डरावना व्यक्ति खड़ा था जो डफरिन को घूरकर देख रहा था भयवश डफरिन लिफ्ट पर पैर भी न रख सके वह अजनबी किन्तु पूर्व परिचित भयानक चेहरा डफरिन की प्रतीक्षा में ही था किन्तु वह लिफ्ट में सवार ही न हुए, शेष लिफ्ट में चढ़े लोगों ने जल्दी ही लिफ्ट खोलने का आग्रह किया। किन्तु लिफ्ट मैंन डफरिन के बिना लिफ्ट खोलना ही न चाहताि। उधर डफरिन भयातुर उसके चेहरे को देखा जा रहे थे जो हू-बहू व्यक्ति था जिसने 5 वर्ष पूर्व ताबूत में कफन रख कर डफरिन को सचेत किया था। मजबूर होकर निराश मन से लिफ्ट मैंन ने लिफ्ट खोली किन्तु पाचवीं मंजिल तक पहुँचते ही लिफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो गई जिसमें लिफ्ट मैंन सहित 5 व्यक्ति मारे गए तथा कई घायल हुए।

दुर्घटना की काफी जाँच पड़ताल की गई। लार्ड डफरिन ने लिफ्ट मैंन के सम्बन्ध में जब जानकारी माँगी तो होटल वाले उसका कोई जबाव न दे सके क्योंकि वास्तविक लिफ्ट मैंन तो उस दिन अवकाश पर था और इस अपरिचित व्यक्ति को मात्र एक दिन के लिए ही लिफ्ट मैंन के रुप में नियुक्त किया गया था। तब से अब तक डफरिन के इस रहस्यमय दृश्य का कोई निर्ष्कष न निकला जा सका।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक हेनरी प्राइस ने अपनी पुस्तक ‘फिफ्टी पियर्स आफ साइकिल रिसर्च’ में एक ऐसी घटना का वर्णन किया है। एक लड़की के पिता प्रथम विश्व युद्ध में मारे जा चुके थे। 1921 ई. में जब उसकी लड़की रोसेली करीब 6 वर्ष की थी उसकी मृत्यु हो गई। रोसेली 1925 ई. से अपनी माँ को स्वप्न में दिखाई देने लगी। बाद में प्रत्येक बुधवार को अपने परिवार के सभी सदस्यों को दिखाई पड़ने लगी। इस घटना की सत्यता प्रामाणित करने के लिए वैज्ञानिक व पत्रकारों का दल 15 दिसम्बर 1937 ई को उस परिवार से मिला। प्रयोग के तौर पर एक कमरे की खिड़की, दरबाजे व रोशनदान बन्द कर दिए गये।

प्रयोग प्रारम्भ हुआ रोसेली की छाया धीरे-धीरे अपनी माँ के पास आयी। उसकी माँ ने पूछा रोसेली उसने उत्तर दिया, “हाँ” पत्रकार व वैज्ञानिक भी इस प्रयोग को देख रहे थे। रोसेली धीरे-धीरे अपनी माँ के पास जा रही थी। पत्रकारोँ ने दूछा कि क्या वे रोसेली को र्स्पश कर सकते हैं। उसकी माँ ने स्वीकृति दे दी तो इन लोगों ने रोसेली के सिर, गले व हाथ में हाथ फ्ररा, हाथ की नाड़ी भी देखी जो चल रही थी। बाद में रोशनी की गई। प्रकाश में रोसेली के पाँव व चेहरा अंगुली सभी साफ-साफ देखे जा सकते थे। उसका शरीर शुभ्र संगमरमर का ऐसा किन्तु बड़ा ही कोमल था। वह हाँ और नहीं में ही उत्तर देती थी। 15 मिनट तक प्रयोग चलाँ

ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं। भावुकों, डरपोकों या अन्धविश्वासियों की बात छोड़कर भी यह सर्न्दभ में इतनी प्रमाण सामग्री बची रहती है जो उनके अस्तित्व पर अविश्वास की गुँजायश नहीं रहने देगी।

अब प्रसंग यह चलता है कि मनुष्यों और प्रेतों के बीच आदान-प्रदान का जो सिलसिला चलता रहता है उसके हानिकारक पक्ष से बचाव कैसे किया जा सकता है? और उनकी सहायता से जो लाभ मिल सकता है उसे किस प्रकार सम्भव बनाया जा सकता है। अनुसंधान से इस सर्न्दभ में भी कुछ सूत्र हाथ लगे हैं। इन्हें अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए जो प्रयास चल रहे हैं उनके सफल होने की आशा, स्थिति को देखते हुए दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है।


भाग्यवाद पर अन्धविश्वास (kahani)

सकडाल का पुत्र कुम्हार का काम करता था। वह बड़ा भाग्यवादी था। पुरुषार्थ उसकी दृष्टि में विशेष महत्व नहीं रखता था।

एक बार भगवान महावीर उसके यहाँ रुके। महावीर को बात-बात में उसकी भाग्यवादिता अच्छी न लगी। उन्होंने पूछा - ‘तुम्हारे यहाँ चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाये जाते हैं? यह कैसे बनते हैं?

‘नियतिवश इन बर्तनों को बनाने की प्रेरणा मिलती है।’ कुम्हार बोला।

महावीर ने फिर पूछा - “तुमहारे इन पके पकाये बर्तनों को कोई तोड़ दे तो तुम क्या समझोगे?’

‘भाग्य में यही लिखा होगा तो ऐसा ही होगा।’ सकडाल - पुत्र बोला।

‘और तुम्हारी पत्नी से कोई दुराचरण करे तो?’ महावीर पूछने लगे।

यह सुनते ही कुम्हार क्रोध से भर उठा और बोला -’किसकी  हिम्मत है जो ऐसा कर सके? कोई मेरी पत्नी की ओर आँख भी उठाकर देखे तो उसकी मैं अच्छी तरह खबर ले लूँगा।

‘लेकिन यह भी ता नियतिवश ही होगा। इसमें क्रोध करने की क्या बात है?’ महावीर ने कहा।

अब सकडाल पुत्र की आँखें खुलीं। भाग्यवाद पर उसका अन्धविश्वास पल भर में दूर हो गया। वह विनम्र भाव से बोला ‘आप ठीक कहते हैं भगवन्! भाग्य पर अन्धविश्वास रखना मूर्खता है। जीवन में पुरुषार्थ ही प्रमुख है। वहीं भाग्य का निर्माता है।


जीवन की सभी विषमताओं से संघर्ष सम्भव

परिवर्तन जीवन्तता का प्रतीक है। स्थिर और अचल स्थिति में जड़-पदार्थ और निष्प्राण शरीर ही रहते है। यदि जीवन चेतना का अस्तित्व है तो परिस्थितियों में परिवर्तन उतार-चढ़ाव भी नितान्त स्वाभाविक एवं अनवार्य है। उनका प्रभाव भी पड़ता है। बहुत से लोग समझते हैं कि अनुकूल परिस्थितियाँ विकास एवं प्रगति में सहायक होती हैं तो प्रतिकूलताएं अवरोध। एक सीमा तक यह सही भी है। लेकिन जीवटदार और मनोबल सम्पन्न व्यक्तिया को प्रतिकूलताएं भी चुनौती देती है और अनुकूलताओं की अपेक्षा कहीं अधिक सहायक सिद्ध होती ह। इस चुनौती भरी स्थिति में मनुष्य की अन्तर्निहित ऊर्जा प्रसुप्त स्थिति से जागृत होकर अवरोधों को हटाने, मिटाने में लग जाती है। सामान्य अवस्था में वह शक्ति प्रसुप्त ही रहती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में किसी दैवी सहायता की तरह उभर कर आती है।

कई व्यक्ति प्रतिकूलताओं के भय से वर्तमान ढर्रे को बदलते हुए घबराते हैं और सोचते हैं कि परिवर्तन को सहन करना उनके लिए सम्भव न होगा। लेकिन यदि मानवी सत्ता का विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि परिस्थितियों के अनुरुप अपने को ढाल लेने की उसकी क्षमता अद्भूत है। जिन परिस्थितियों में उसे रहना पड़ता है वह उसी के अनुरुप अपनी रुचि और प्रकृति को ही नहीं, शारीरिक क्षमता को भी डाल लेती है।

परिवर्तन को सहन न कर पाने का भय या आशंका उस स्थिति में विशेष रुप से उत्पन्न होती है जब सुविधाजनक जीवन में से निकल कर किसी महान् उद्देश्य के लिए कष्टसाध्य जीवन अपनाने की जरुरत पड़ती है। निस्सन्देह सेवा, साधना और परमार्थ प्रयोजनों का मार्ग सुख सुविधाओं से भरा नहीं है। उसमें अपेक्षाकृत अधिक श्रम करना पड़ता हे और सुख सुविधाओं में भी कटौती करनी पड़ती है। लेकिन उस आदर्श को अपनाने से ऐसा कोई संकट उत्पन्न नहीं होता कि मनुष्य के लिए वह सहन करना भी दुष्कर हो जाय।

फिर भी इस तरह का भय तो उत्पन्न होता ही है कि सुविधायें छोड़ देने पर उनका अभ्यस्त अपना जीवन-क्रम किस प्रकार चलेगा। परमार्थ प्रयोजनों में सुख सुविधाओं की कटौती तभी तक डरावनी ओर शंकित लगती है जब तक कि उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया जाता। जिसने तैरना नहीं सीखा है उसे पानी में घुसना संकट को निमन्त्रण देना जैसा लगता है, पर जब नौसिखिये पानी में घुसते और हाथ-पैर चलाना आरम्भ करते हैं तो विश्वास होता है कि न तो पानी में घुसना उतना संकटापन्न था और न तैरने की प्रक्रिया ही इतनी जटिल थी।

अभ्यास हर कठिनाई को सरल बना देता है। क्योंकि मनुष्य में परिस्थितियों के अनुरुप अपने आपको ढालने की क्षमता अद्भुत और आर्श्चयजनक रुप से विद्यमान है। उसकी इस क्षमता का कहीं अंत ही नहीं है और अन्यास किया जाय तो कोई भी व्यक्ति ऐसी विकट परिस्थितियों में भी संतोष तथा आनन्द के साथ जीवन व्यतीत कर सकता है जो अनभ्यस्त लोगों को मृत्यु जैसी प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए शीत सम्बन्धी सहनशीलता को ही लिया जाए। साधारण सर्दी भी कई लोगों के लिए बाहर निकलना दुश्वार कर देती है। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की सर्दी तो इतनी भयंकर होती है कि उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। जहाँ सदैव असह्य शीत पड़ता हो और सर्वत्र बफ्र की मोटी परतें ही नजर आती हैं, बर्फीली हवाएं अधिक चलती हैं। वहाँ कैसे निर्वाह हो सकता है, सामान्य व्यक्ति के लिए इसकी कल्पना कर पाना भी कठिन है।

परंतु जब से यह पता चला कि ध्रुव प्रदोशों मं पहुँच कर वहाँ पृथ्वी के गहन रहस्यों का पता लगाया जा सकता है। वहाँ के अन्तर्ग्रहीय विकिरण के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का आसानी से अध्ययन किया जा सकता ह। इतना ही नहीं उस क्षेत्र में दबी पड़ी प्रचुर धातु सम्पदा का हस्तगत होना भी सहज सम्भव है। इन सम्भावनाओं को जाँचने के लिए यह आवश्यक हो गया कि शोधकर्ता वैज्ञानिकों का दल देर तक वहाँ रहे और अपना खोज कार्य जारी रखे। ध्रुव प्रदेश के बर्फीले भू-भाग पर हमेशा दो सौ मील प्रति घण्टे की चाल वाले बवण्डर, तूफान चलते हैं। इन बवन्डरों में बफ्र के टुकड़े और कण उसी तरह उड़ते, लहराते रहते हैं जिस प्रकार हवा और आँधी में धूलि कण। वहाँ का तापमान शून्य से 125 डिग्री नीचे रहता है। चारों ओर बफ्र ही बफ्र जीम रहती है, जमीन के कहीं दर्शन तक नहीं होते। नीरवता का साम्राज्य है, चारों ओर सन्नाटा तथा सुनसान वातावरण। सूर्यास्त के समय वहाँ ऐसी चित्र-विचित्र भयंकर आकृति वाली ज्योतियाँ दिखाई देती हैं कि लगता है प्रेतलीला हो रही हो।

ऐसे प्रदेश में जान, मौत के मुँह में घुसने जैसा ही हो सकता है। पर दुस्साहसी मनुष्य प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों की चुनौती स्वीकार कर अपने शौर्य एवं साहस का परिचय देते है। ध्रव प्रदेशों की खोज के लिए भी वही साहस आगे आया और उस हिमाच्छादित प्रदेश में बस्ती वसा कर रहना स्वीकार कर लिया गया। यह कार्य कई वर्षों से निरंन्तर चल रहा है और सुविधा पूर्ण जीवनयापन करने वाले अब इस असुविधा भरी परिस्थितियों के न केवल अभ्यस्त हो गए हैं, वरन् आनन्द भी अनुभव करते हैं।

इस शोध कार्य में बारह देशों के वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। ब्रिटेन, अमेरिका और रुस के वैज्ञानिकों ने तो दक्षिणी ध्रुव प्रदेश का धरातल ऐसा है कि वहाँ हल्के से हल्का खेमा भी गाढ़ा जाय तो भी प्रतिवर्ष खेमा छह फुट बफ्र में धंस जाता है। इस कठिनाई से बचने के लिए वैज्ञानिक डेरे गाढ़ते समय अपने साथ जहाजों में पत्थर लेकर आते हैं ताकि धसने की अड़चन अपेक्षाकृत कम उठानी पड़े। इस क्षेत्र में केवल पैगुइन पक्षी ही रहते हैं, जो वहाँ पहुँचे वैज्ञानिकों को हलचल कुतूहलपूर्वक देखने के लिए अक्सर पंक्तिबद्ध आकर खड़े हो जाते हैं।

इस प्रदेश में शोधरत वैज्ञानिकों और उनके कर्मचारियों को चमड़े के कपड़े पहनने पड़ते है। और दुहरे तिहरे गरम मौजे। फिर भी ठण्ड की अधिकता से बचा नहीं जा सकता। बिजली के उपकरण, तेल, आवश्यक यंत्र तथा खाद्य-पदार्थ आदि जरुरी वस्तुएं वहाँ जहाजों द्वारा पहुँचाई जाती है। वस्तुओं और कुछ भारी उपकरणों को ढोने के लिए वहाँ हलके टैंक भी पहुँचा दिये गये हैं। अब वहाँ शोधकर्ताओं और उनके साथ गये कर्मचारियों के लिए कुछ बस्तियाँ भी बसा दी गई है। विर्डस्टेशन, मैकमर्डी, अपडसन, स्कार्ट, एल्सवर्थ, हैलट आदि वैज्ञानिकों के नाम पर बनी इन बस्तियों में ही आवश्यक संयंत्र लगे हुए हैं जो उन सम्भावनाओं की खोज में निरत है जिनसे अगले दिनों संसार के भाग्य और भविष्य निर्माण में भारी सहयोग मिल सकेगा।

दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु प्रायः जनवरी, फरवरी के महीनों में आती है। पर उन दिनों भी अधिकतम तापमान जीरों डिग्री सेन्टीग्रेड रहता है। इसी ऋतु में वहाँ जहाजों से माल पहुँचाया जाता है। इस प्रदेश का क्षेत्रफल भारत से लगभग पाँच गुना अधिक है। करीब दो हजार मील दूर इस प्रदेश में कहीं कोई आबादी है। अब तक की खोज खबर से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि इस भू-भाग के नीचे सोना, चाँदी, टिन, कोयला, लोहा, जस्ता, अभ्रक, सीसा, यूरेनियम, क्रोफाइट आदि धातुओं का विपुल भण्डार है। इस सम्पदा को यदि निकाला जा सके तो संसार की समृद्धि में भारी बढ़ोतरी हो सकेगी। यदि इस प्रदेश को यातायात के उपयुक्त बना लिया गया और उधर से वायुयानों और जलयानों का गुजरना सम्भव हो सका तो पृथ्वी के किसी भी दूरवर्ती कोने से पहुँचना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जायेगा।

यह भी सम्भावना बताई जा रही है कि यदि मनुष्य दक्षिणी ध्रुव तक सरलतापूर्वक पहुँच सका तो वहाँ से राकेट, भारी वायुयान आदि चलाना सरल पड़ेगा। अमेरिका से अफ्रीका की और आस्ट्रेलिया से आस्ट्रेलिया की ओर वायुयान द्वारा यात्रा करने में बहुत कम समय लगेगा तथा बहुत कम दूरी तय करनी पड़ेगी। यही नहीं इस क्षेत्र में अन्तरिक्षयान छोड़ने में भी भारी सुविधा रहेगी। समस्त पृथ्वी की सूचनाएं एक स्थान पर एकत्रित करना इस एक जगह पर अपेक्षाकृत अधिक आसान रहेगा। धरती पर सर्वत्र फ्रले परमाणुआँ तथा इलेक्ट्रान किरणों का प्रभाव दक्षिणी ध्रुव पर बहुत कम है। यहाँ कास्मिक किरणों की अधिकता के कारण अंतरिक्ष संबंधी शोध कार्य भी आसानी से किये जा सकेंगे।

दक्षिणी ध्रुव की अपेक्षा उत्तरी ध्रुव की परिस्थितियाँ भिन्न और अधिक जटिल है वैज्ञानिक इस क्षेत्र में और भी फूँक-फूँककर पैर रख रहे हैं, इतने पर भी यह एक आर्श्चय की बात है कि इस क्षेत्र में मनुष्य जाति का अस्तित्व बहुत पहले से विद्यमान पाया गया। वैज्ञानिक जब तब और जहाँ तहाँ जाते हैं, पर आर्श्चय इस बात का है उन जैसे उपकरणों और सुरक्षा साधनों से वंचित रहते हुए भी घोर शीत के वातावरण में भी वहाँ मनुष्य चिरकाल से रह रहा है और उस गला डालने जैसी शीत की विभीषिका को चुनौती देता हुआ जीवन व्यतीत कर रहा है।

वैज्ञानिक पीटर स्क्लेंडर ने उत्तरी ध्रुव प्रदेश के मूल निवासी एस्किमो लोगों की जीवनचर्या का गहन अध्ययन किया और पता लगाया कि इन लोगों ने न केवल अपने शरीर में ही शीत सहने की क्षमता एकत्रित की है वरन् उससे निपटने के लिए ऐसी तरकीबें भी खोज निकाली है जिसे देखकर उनकी विज्ञान बुद्धि को सराहे बिना नहीं रहा जा सकता। उदाहरण के लिए वे बफ्र की सतह पर बफ्र से ही अपने लिए घर बनाते हैं जो काफी गर्म रहते हैं कारण कि उनके भीतर जो हवा कैद रहती है उसे ईंधन से गर्म कर लिया है कि वह गर्मी देर तक बनी रहती है जिसमें मनुष्य लम्बे समय तक सुविधापूर्वक साधारण वस्त्र पहन कर भी रह सके।

बफ्र पर, बफ्र से बने मकानों के भीतर भी गरम वातावरण रह सकता है वह वैज्ञानिक बुद्धि का ही कमाल है और परिस्थितियों ने यह वैज्ञानिक बुद्धि कथित सभ्य संसार में पिछड़े होने के बावजूद भी उन लोगों में उत्पन्न कर दी। मोमबत्ती की तरह चर्बी भरी मछली को वे लोग न जाने कहाँ से ढूँढ लाते हैं और उससे अपनी प्रकाश सम्बन्धी आवश्यकता पूरी करते हैं। आमतौर पर देर तक बफ्र में रहने से हाथ पैर की अंगुलियाँ गलने लगती है और शरीर के अन्य अंगों का भी यही हाल होता है, पर एस्किमों लोगों के शरीर मं परिस्थितियों के अनुरुप अपने आप को ढाल लिया है। उनका रक्त प्रवाह शीत के प्रतिरोध करने जितना ही तीव्र हो जाता है और गर्म बना रहता है तथा अंगुलियों सहित उनके शरीर का प्रत्येक अंग बफ्र को चूनौती देता हुआ उछलता, कूदता रहता है।

वह तो हुई वहाँ रहने वाले लोगों की बात। अब उस क्षेत्र के भू-गर्भ में छिपी उस सम्पदा का अध्ययन ही किया जा रहा है जिसे हथिया लेने के बाद मनुष्य कुबेर जैसा सम्पत्तिशाली बन जायेगा। ध्रुव प्रदेश के निकटवर्ती हिमाच्छादित क्षेत्रों में भी शीत की कमी नहीं, वहाँ भी शोधकार्य चल रहा है और पता लगाया गया है साइबेरिया में र्स्वण, अलास्का में पेट्रोल, उज्जावा में लोहा, उत्तरी कनाडा में ताँबा प्रचुर परिमाण में बफ्र की मोटी परतों के नीचे दबा पड़ा है।

पृथ्वी की इस विशाल सम्पदा को दुस्साहस भरे शोध कार्यें द्वारा ही हस्तगत किया जा सकता है। इसके लिए उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के असह्य शीत की चुनौती देते हुए दुस्साहसी लोगों ने वहाँ अड्डा जमाया है। ठीक उसी स्तर का दुस्साहस उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए भी चाहिए, जिससे नवनिर्माण जैसे महान लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके। यदि वे इस दिशा में सचमुच चल पड़े तो समय बतावेगा कि उस मार्ग में आने वाली जिन असह्य असुविधाओं की कल्पना की जा रही थी वे कितनी सरल हैं। मनुष्य का यह छोटा-सा दिखाई देने वाला कायकलेवर अद्भुत आश्चर्यो से भरा हुआ है। आवश्यकता केवल उसे चुनौती देने और साहस जुटाने भर की है।


आपु करे, आपुई फल पावे

प्रजापति की कृति इस काया को यदि बिना विकृत किये सुव्यवस्थित रुप से चलने दिया जाये तो सुन्दर स्वास्थ्य तो मिलता ही है, अभीष्ट आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति में भी सहायता मिलती है। सुरक्षा, सुसंचालन एवं सुनियोजित सहकार का सबसे बड़ा उदाहरण इस सृष्टि पर मानव शरीर है। साधारण से दैनिक जीवन के अवरोध, प्रतिकूलताएं हमें व्यथित उद्विग्न बना देते हैं। परंतु शरीर अपनी तितिक्षा शक्ति के सहारे मृत्यु जैसा संकट उत्पन्न होने पर भी अपनी जीवन रक्षा कर लेता है। इसे जीवनी शक्ति, जिजिविषा, वायटेलिटी, अन्तःबल, मोटिव फोर्स कुछ भी नाम दिया जाय, यह जटिल व्यवस्था मरते दम तक प्रतिकूलताओं से, आघातो-अवरोधों से हंस-हंसकर लोता लेती रहती है। सफल, समर्थ जीवन समस्त अड़चनों के बावजूद कैसे जिला जाय, यह शिक्षण सतत् देती रहती है।

अच्छी मशीन हो और अनगढ़ चलाने वाला, तो क्षण भर में उसे बर्वाद कर देता है। दुर्भाग्यवश मानव शरीर के साथ हर पल ऐसी ही दुर्घटना घटती रहती है। बीमारी इसी अनुचित हस्तक्षेप और अचानवश्यक तोड़-फोड़ के रुप में बरती जाने वाली उच्छृंखलता के बदले में प्रकृति द्वारा दिया गया दण्ड है। बीमारियाँ किस प्रकार आरम्भ होती हैं, इसके विस्तार में जब प्रवेश किया जाता है तो ज्ञान होता है कि जीवाणु-विषाणुओं को दोष देना र्व्यथ है। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे स्वयं का अपराध किसी और के मत्थे मढ़ देना।

मनुष्य एक मिनट में 18-20 बार साँस लेता है। प्रत्येक साँस के साथ 300 से लेकर 500 क्यविक सेण्टी मीटर हवा नाक की त्वचा द्वारा शुद्ध होकर 1 पोंड वजनी फ्रफड़ों में भर जाती है। फ्रफड़ों की सूक्ष्म इकाईयाँ है बुलबुलों के आकार के वायुकोष्ठ (एलावियोलाइ) जिनकी संख्या करीब 25 करोड़ होती है और उनकी दीवारों का बाहरी क्षेत्रफल साठ वर्ग मीटर होता है। साधारण साँस लेने वाला व्यक्ति जब 100 मीटर की लम्बी दौड़ में भाग लेता है तो एकसो अस्सी लीटर हवा श्वास के माध्यम से खींच सकता है। लचीले स्पंज जैसे ऊतकों के बने ये विलक्षण फ्रफड़े परिस्थितियों के अनुसार आठ गुना तक फ्रल सकते हैं।

जब मनुष्य गहरी साँस अन्दर लेकर उसे पूरी ताकत से छोड़ता है तो इसे वायलट केपेसीटी कहते हैं। यह 5000 घन सेण्टी मीटर के बराबर होती है। फ्रंफड़ों की कार्यक्षमता जाँचने का यह एक महत्त्वपूर्ण परीक्षण है। फ्रंफड़ों के प्रति मिनट 10 बार सिकुड़ने, फ्रलने से बाहरी वायु मण्डल से आक्सीजन अन्दर खिंचती है और सूक्ष्म रक्तवाहिनियों की दीवाल में बने छिद्रों से रक्त में बैठे विकार द्रव्य जो पूरे शरीर के मेटाबालिज्म के अन्तिम अवशेष हैं, कार्बनडाय आक्साइड के रुप में रक्त से वायुकोष्ठकों के आकार श्वास से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया हर श्वास-प्रश्वास की अवधि में होती है। प्राण तत्व आक्सीजन एवं विकास द्रव्य कार्बनडाय आक्साईड के परस्पर विनिमय में दो बाधाएं हो सकती है।

पहला है वायु कोष्ठकों का पूरी तरह न फ्रलना। दूसरा फ्रले वायुकोष्ठकों तक रक्त का न पहुँच पाना। पहली स्थिति में अशुद्ध रक्त आक्सीजन की तलाश में वायु कोष्ठकों तक पहुँच कर भी उसे नहीं ग्रहण कर पाना एवं वापस हृदय को भेज दिया जाता है। इससे धीरे-धीरे शरीर में प्राण तत्व की कमी होने लगती है। दूसरी स्थिति आक्सीजन को रक्त में मिलने-घुलने को तैयार है, पर वहाँ रक्त का दूर-दूर तक नामोनिशान न होने पर अथवा रक्तवाहिनियों के मार्ग में अवरोध आ जाने से यह नहीं हो पाता। फलतः असक्सीजन प्रश्वास द्वारा बाहर लौट जाती है। सामान्यतया पहली स्थिति ही अधिक गम्भीर है व वर्तमान में इस प्रतिपादन का केन्द्र बिन्दु है।

फ्रंफड़ों में रक्त हृदय से पम्प किया जाता है। गुरुत्वाषर्ण की शक्ति के उल्टे वह फ्रंफड़ों में बड़ी एवं छोटी तथा फिर उनसे भी छोटी कोशिकाओं में चढ़ता है। यह रक्त किसी प्रयोजन विशेष से हृदय भेजा गया होता है। अशुद्ध रक्त अपनी अशुद्धि से मुक्ति पाने तथा अपने साथ बाहरी वायुमण्डल का शुद्ध घटन आक्सीजन लेने आया होता है। हमारी साँस लेने की पद्धति उथली होने के कारण हम प्रति साँस में कुल 45-50 प्रतिशत वायु कोष्ठकों को खोल पाते हैं। झुकी छाती, उथली साँस, संकुचित पसलियाँ फ्रंफड़ों के ऊपरी एक तिहाई भाग को श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया से प्रभवित नहीं होने देते। फलतः बन्द अधखुले वायुकोष्ठकों तक इतनी ऊंचाई पर पहुँचा अशुद्ध रक्त निराश होकर वापस लौट जाता है। इसके दो दुष्परिणाम होते हैं। रक्त के साथ आये अथवा साँस से प्रवेशित आक्रमणकारी जीवाणु विषाणुओं को शरीर में प्रवेश करने का एक अच्छा माध्यम मिल जाता है। यहाँ आक्सीजन के अभाव में तमोगुण प्रधान ये असुर खूब बढ़ते, पनपते हैं। फ्रंफड़ों में होने वाले क्षय रोगों (टी.वी.) में इस स्थान का अनुपात 80 प्रतिशत होता है। यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि यहाँ जीवाणुओं की आक्रामक शक्ति नहीं जीत पायी, वरन् शरीर ने ही अपनी विकृत कार्य-पद्धति से उन्हें घुसने का, पनपने का अवसर दिया। फ्रंफड़ों के बीच के एवं निचले भागों में रक्त प्रवाह एवं कोष्ठकों के फ्रलाव में संगति होने से वहाँ इन जीवाणुओं की चल नहीं पाती।

दूसरा प्रभाव यह पड़ता है कि ऐसा अशुद्ध रक्त जब बैरंग लौटता है तो रक्तवाहिनीयों की बनावट के कारण शुद्ध रक्त के साथ मिलकर पूरे शरीर की 6 अरब कोशिकाओं में वापस भेज दिया जाता है। बार-बार की इस प्रक्रिया के कारण शरीर में खाद्य-पदार्थों के जलने से बचे अवशिष्ट विकार द्रव्य एकत्र होते चले जाते हैं। जो मनुष्य में आलस्य, प्रमाद, मानसिक कमजोरी, अशक्ति तथा व्याधयों से लड़ने में असमर्थता को जन्म देते हैं। मानव द्वारा सहज रुप में अपना ली गयी यह श्वास-पद्धति रोगों के कारण को स्वयं में न ढूँढ़ कर बाहर खोजती है, जीवाणु को दोष देती है और फिर चिकित्सा के अनगिनत उपचारक्रमों को आमन्त्रित करती है। अनुदान रुप में किसी एक उपयुक्त शरीर शोधन पद्धति के दुरुपयोग का मात्र यह एक छोटा-सा उदाहरण है। फ्रंफड़ों की टी.बी. एवं फ्रंफड़ों का कैंसर अधिकतर इसी क्षेत्र में होता है। अपराधी, चोर, लुटेरे घनी अंधररी उपेक्षित जगहों में ही प्रश्रय पाते हैं। ऐसे ही स्थानों पर उन्हें पनपने, उच्छृंखलता बरतने की छूट मिल पाती है। चाहे वह क्षय रोग का वृण हो अथवा कैंसर के उद्दण्ड कोष श्वास प्रक्रिया के दुरुपयोग के ही दुष्परिणाम है, यह आज के विख्यात चिकित्सकों की मान्यता है।

मानव शरीर का दूसरा महत्वपूर्ण अंग है पाचन संस्थान। आज अधिकाँश रोगी इसी व्यवस्था के सम्बन्धि पाये जाते हैं। अपच, मन्दाग्नि, अम्लपित्त, मधुमेह के शिकार ये रोगी घुटन भरा जीवन जीते हैं। सामने खाद्य-पदार्थ होते हुए भी खा पाने में असमर्थता अपनी ही करनी का प्रकृत द्वारा दिया गया दण्ड है। सामान्यतया भोजन भूख लगने पर ही लिया जाता है। शरीर जब इसकी आवश्यकता अनुभव करता है तब स्नायुओं द्वारा डाइवोथेलेम को संदेश पहुँचता है। वहाँ से उठने वाले विद्युत्प्रवाहों का परिणाम यह होता है कि डेढ़ लीटर की क्षमता वाले आमाशय में आकुचन-प्रकुँचन आरम्भ हो जाता है। इसे ही पेट में चूहे दौड़ना कहते हैं। इस में सबसे बड़ा योगदान भोज्य पदार्थ के स्वरुप वं सुगध का रहता है जिसे फ्लेवर एवं पेलेटेबिलिटी कहा जाता है। पाचक रसों का स्राव भोजन के प्रति सहज आकर्षण जुड़ जुड़ जाने से और भी तेजी से होने लगता है।

आमाशय का पत्तों में सा़ तीन करोड़ पाचक रस बनाने वाली ग्रन्थियाँ होती हैं जो करीब 2 से लेकर ढ़ाई लीटर रस एक दिन में बनाकर रख देती है। इसमें मुख्य होता है हाइड्राक्लोरिक एसिड (अम्ल) एवं एक इन्जाइम पेप्सिन। ये दोनों मिलकर भोजन को छोटी-छोटी इकाइयों अमीनों एसिड में तोड़ना आरम्भ करती है। धीरे-धीरे आमाशय से खिसकता हुआ यह अर्ध ठोस पदार्थ छोटी आँत में पहुँचता है। यदि आमाशय का वातावरण अम्लीकृत है तो इसके विपरीत छोटी आँत का सर्व प्रथम भाग ड्यूडनम क्षारयुक्त वातावरण बनाये रखता है। जब भी भोजन असमय में बिना पूरी तरह से चे ड्यूडनम में धकेल दिया जाता है तो थोड़ा-सा अम्ल भी उसके साथ प्रवेश कर जाता है। यह सर्वविदित है - तेज अम्ल किसी भी ठोस वस्तु को गला सकते हैं। प्रारम्भ में तो ड्यूडनम की दीवाले अपने क्षार से इसे प्रभावशाली नहीं होने देतीं। पर जब मनुष्य की बार-बार कुछ तो उत्तेजक आहार लेने की आदत अम्ल का स्राव भी बढ़ाने लगती है एवं उसे भोजन के साथ ड्यूडनम में भेजने लगती है तो उसका दीवालों में छाले पड़ने लगते हैं। इसी स्थिति को पेष्टिक अल्सर सिण्ड्रोम कहा जाता है। अम्लपित्त से आरम्भ हुआ यह रोग अन्ततः कष्टकर ही सिद्ध होता है। कुछ ऐसी ही स्थिति तनाव्रस्त व्यक्तियों में भी होती है जिनके स्नायु अचेतन में भी सक्रिय होते हैं एवं अन्ततः अत्यधिक स्राव द्वारा कोमल दीवालों को गलाकर ही छोड़ते हैं।

जब आधा पचा भोजन थोड़ा आगे बढ़ता है तो इसका सामना पित्ताशय की थैली से निकले पित्त, लीवर के पाचक रसों एवं पक्वाशय (अग्न्याशय) के रसों से होता है। इनका कार्य होता है आमाशय से आगे भोजन को और भी छोटी इकाइयों में विभक्त कर आँतों की दीवालों से सीधे रक्त परिवहन में पहुँचना देना, जहाँ से वे अपने गन्तव्य को चली जाती है।

किसी भी बारीकी का काम करने वाले कारीगर से यदि मजदूर का काम लिया जाये तो यह उसका दुरुपयोग ही हुआ। आधे पचे हुए भोजन की बड़ी यूनिटों को छोटी इकाईयों में बाँटना मजदूर द्वारा रोड़ी तोड़ने के समान है। जब यह काम भी लीवर, पैन्क्रियाज (पक्वाशय) तथा गाँलब्लैडर (पित्ताशय) को करना होता है तो उनकी पाचन क्षमता एवं स्वयं की कार्य-पद्धति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। बार-बार इनकी यही स्थूल भूमिका आरम्भ हो जाने से जो दबाव इन पर पड़ता है उसका परिणाम अनेकानेक व्याधियों के रुप में निकलता है। यह वस्तुतः एक सुनियोजित व्यवस्था तंत्र का जान-बूझकर किया गया दुरुपयोग है जो जीवर के कमजोर होने, अग्निमन्दता, अपच, मानएब्जार्पशन सिण्ड्रोम जैसी जानलेवा व्याधियों के रुप में प्रकट होता है। जो हितकर रुचिकर आहार को समय-समय का ध्यान करके ही ग्रहण करता है, अपनी पाचन प्रक्रिया के रसस्रावों का दुरुपयोग नहीं होने देता, वह अपनी जीवन यात्रा को सुचारु रुप से चलाता है। ऐसे व्यक्ति शान से जीते हैं, सफल सार्थक जीवन जीते हैं।

विवेकशील उसी को कहते हैं जो अपने अस्त-व्यत क्रम को समय रहते सुधार लेता है। समस्त सम्भावनाओं के जागरण की कुन्जी अन्दर ही है। सृजेता ने इस काया को कुछ ऐसा रचा है कि सब कुछ अन्दर सुव्यवस्थित बना रहे। एक रास्ता बन्द हो तो दूसरा खुल जाता है। सामंजस्य एवं तालमेल की सम्भावनाएं यहाँ असीम हैं। मनुष्य अपनी आदतों को विकृत की ओर से मोड़ें तो वे स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। मानव शरीर की रचना और कायै पद्धति यही सन्देश देते हैं कि इन अनुदानों का पूरा सदुपयोग किया जाना चाहिए।

साँस के माध्यम से प्राण तत्व को अन्दर खींचना एवं मुँह के माध्यम से आहार ग्रहण करना जीवन की दो अनिवार्यताएं हैं। इन दो के बिना जीवन सम्भव नहीं है। इनसे जुड़ी अस्त-व्यस्ताताओं को यदि क्रमबद्ध प्राकृतिक जीवन के अनुकूल बना लिया जाय तो जीने का सही आनन्द लिया जा सकता है। सही ढंग से गहरी ली गई श्वास एवं समय पर लिया गया उपयुक्त आहार स्वस्थ समुन्नत होने की दो प्रमुख शर्तें है। विलक्षण शरीर की गाथा यही रहस्योद्घाटन करती है।


Quotation

“प्रार्थना का एक चमत्कार यह है कि हमारे सामने जब विकट समस्याएं होती है और हमारी शक्तियाँ उन्हें सुलझाने में अपने को असमर्थ पाती है, इस स्थिति में यदि हम सरल भाव से प्रार्थना करें, तो मनःस्थिति में बिना किसी प्रयत्न के ऐसा परिवर्तन हो जाता है कि समस्याओं का समाधान आप ही आप सुझाई देने लगता है मैं इसे ईश्वर की कृपा मानता हूँ।”

- महात्मा गाँधी


निंदक नियरे राखिये

जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती है जो असह्य होती हैं और “मन को खिन्न, विषण्ण दुःखी तथा उदास बना देती है।” इसी तरह की परिस्थितियों में एक है किसी के द्वारा आलोचना या निन्दा किया जाना। सामान्यतः मनुष्य अपने लिए प्रशंसा ही सुनना चाहता है। किसी व्यक्ति में लाख कितने ही दोष-दुगफ्रण भरे हों, उसे अपनी कमियाँ दिखाई नहीं देतीं। दिखाई देती भी हैं तो वह उसके अपने स्वभाव को नहीं, परिस्थितियों को ही जिम्मेदार ठहराता है। गलतियाँ होती है तो कारण बताया जाता है कि परिस्थितियाँ ही अमूक प्रकार की थीं जिनमें ऐसा होना स्वाभावितक था। गलतियाँ करने और स्वभाव में त्रुटियाँ होने के बाबजूद भी मनुष्य उन्हें स्वयं तो नजरअन्दाज करता ही है, अपने सार्थियों, मित्रों-परिचितों और अन्य लोगों से भी यह अपेक्षा करता है कि वह भी उन परिस्थितियों को नजरअन्दाज कर दें।

एक तो मनुष्य को अपनी कमियाँ, त्रुटियाँ कम ही दिखाई देती है और दूसरे दिखाई भी देती है तो वह इतना असहिष्णु अनुदार होता है कि किसी और के द्वारा उनकी ओर इंगित किया जाना सह नहीं पाता। इसे व्यक्ति का अहंकार भी कह सकते हैं कि वह दूसरों को अपने दोष दर्शन के अधिकार देना नहीं चाहता और यदि कोई उसके दोष देखता या बताता है तो न केवल दुःखी होता है, वरन् उनका प्रतिकार करने के लिए भी कटिबद्ध हो जाता है। अपनी निन्दा आलोचना को न सह पाना एक कमजोरी ही कही जायेगी। उसी तरह की कमजोरी कि व्यक्ति सुखकर अनुकूल परिस्थितियों की कामना करता है और दुःखदायी प्रतिकूल परिस्थितियों से घबड़ाकर दूर भागता है। उसी प्रकार मनुष्य अपनी प्रशंसा सुनना तो पसंद करता है, किन्तु निन्दा या आलोचना से बचना चाहता है। जबकि निन्दा आलोचना प्रशंसा का ही दूसरा पक्ष है। दोनो एक सिक्के के दो पहलू हैं। जो व्यक्ति जितने प्रशंसित और चर्चित होते हैं उनकी उतनी ही निन्दा आलोचना भी होती है। बुरे कामों में लगे अपराधी प्रकृति के व्यक्तियों की निन्दा अलग बात है, उसे भर्त्सना और प्रताड़ना कहा जा सकता है। यहाँ निन्दा से आशय व्यक्ति की कमियों और त्रुटियों की चर्चा ही लगाना चाहिये।

इस स्तर की निन्दा आलोचना को सहज भाव से लिया जा सके तो व्यक्ति को अपने आपका सुधार करने के लिए भारी मदद मिलती है और यदि व्यक्ति दुसरों के द्वारा की गई आलोचना को रचनात्मक दृष्टि से देखने लगे तो उसे अपने उर्त्कष में इतनी सहायता मिलती है कि उसे सहज ही अपने सुधार की दिशा मिलती है। अपने में कौन-सी खामियाँ या त्रुटियाँ हैं, कौन-सी कमजोरियाँ है, क्या दोष है? यह स्वयं इतना पता नहीं चलता जितना कि दूसरे लोग अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि व्यक्ति स्वयं तो अपनी दृष्टि से अपने लिए हित कर आचरण ही करत है दूसरों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? अथवा दूसरों का उससे हित हो रहा है या अहित? इसकी नाप-जोख करने का कहाँ अवकाश रहता है और कहाँ इसकी आवश्यकता समझी जाती है? जबकि आवश्यक यह भी है कि अपनी रीति-नीति का, आचरण, व्यवहार का दूसरों पर भला-बुरा क्या प्रभाव पड़ता है? दूसरों का हित होता है अथवा अहित? यह भी ध्यान में रखा जाये। अपने व्यवहार या आचरण की परख दूसरों के द्वारा की गई आलोचना और निन्दा के प्रकाश में भलीभाँति की सकती ह। इसीलिए कहा गया है - निन्दक नियरै राखिए आँगन कुटी छबाय। बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुभाय॥

दिन्दा, आलोचना दुराग्रह वश भी की जा सकती है। यदि उससे भी उद्विग्न न हुआ जाये तो अपनी सहनशीलता बढ़ती है उससे कुछ घाटा नहीं होता। बल्कि मनीषियों ने तो यहाँ तक कहा है कि इस प्रकार की निन्दा से मनुष्य बन्दनीय स्थिति को प्राप्त हो कसता है। पाणिनी ने तो निन्दा को भी एक रस मानते हुए कहा - भूमि निन्दा प्रशंसा सु नित्य योगेऽतिशायने। सम्बन्धेऽस्ति विवक्षायाँ भवन्ति यातुवादयः॥

- रसानामानन्दंः रसानन्दः

‘जैसे शांगार, वीर आदि रस के साथ यथा सामायिक दृश्य एवं भावों के प्रदर्शन में आनन्दानुभूति होती है, उसी प्रकार निन्दा रस के प्रवाह में भी रसास्वादन होता है।’ दिन्दा को ग्यारहवाँ रस बताते हुए उसका स्थायी भावद्वेष कहा गया है। ईर्ष्या और किसी का यथोचित मार्गदर्शन करने के लिए की गई आलोचना उसके संचारी भाव बताए गए हैं।

सचमुच व्यक्ति यदि अपनी निन्दा को सकारात्मक भाव से स्वीकार करने लगे तो इसमें हित और उर्त्कष साधन ही होता है। कई बार यह निन्दा अपने प्रकट-अप्रकट दोर्षों की ओर इंगित करती है। तथा उन्हें सुधारने की प्रेरणा देती है तो कई बार जब अतिरंजित ढंग से आलोचना निन्दा की जाती है तो वह उन दोषों की ओर से सतर्क करती है। भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकारान्तर सं अजफ्रन की आलोचना करते हुए ही, उसमें युद्ध के सम्बन्ध में उत्सुकता और कर्मयोग के प्रति जिज्ञासा जागृत की थी। अजफ्रन की भर्त्सना-सी करते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं - कृतस्वा कश्पलमिदं विषमें समुपस्थितम् अनार्य जुष्टमस्वर्ग्य कीर्तिकरमजफ्रन॥ क्लैव्यं या रमगमः पार्थ नैतत्वच्युपद्यते क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यतत्वोतिष्ठ परंतम॥

-(गीता2/2,3)

अर्थात - हे अजफ्रन। तुम्हें इस विषमस्थल में यह अज्ञान किस कारण उत्पन्न हुआ? क्योंकि यह न तो श्रेष्ठजनों द्वारा आचरण किया गया है तथा न र्स्वग और कीर्ति को देने वाला है। इसलिए हे अजफ्रन! नपुँसकता को मत प्राप्त हो, तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है। तुम्हारे हृदय में जो तुच्छ दुर्बलता उत्पन्न हो गई है, उसे त्याग कर तुम युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

भगवान श्रीकृष्ण ने यह मित्रतापूर्ण परामर्श और मन को कचोट देने वाले शब्द नपुँसकता, क्षुद्र हृदय की दुर्बलता, श्रेष्ठजनों द्वारा असमर्थित आचरण बता कर अर्जन को यह प्रश्न करने के लिए ही प्रेरित किया और तैयार किया कि - “कार्यव्यदोषोपहत स्वभावः पुच्छामि त्वा धर्म संमूढ़ चेताः” (2/7)

कायरता रुप दोष से उपहत हुआ धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपको पूछता हूँ? जो कुछ निश्चय किया हुआ कल्याणकारण साधन हो, वह मेरे लिए कहिए! धर्मशास्त्रों और पुराण ग्रन्थों में ऐसे कई प्रसंग आते हैं, जिनमें चरित नायकों को किसी ने ऐसी कोई बात कह दी कि उससे उनका सोया हुआ पौरुष पराक्रम जागृत हो उठा तथा जिस कार्य को नायक असम्भव समझ रहे थे, उसे आनन-फानन में ही कर गये।

लोकतंत्र इसलिए अन्य सब शासन प्रणालियों से श्रेष्ठ हे और सफल सिद्ध हुआ है कि उसमें सत्तारुढ़ पक्ष केन्द्र अतिरिक्त एक सबल विपक्ष भी होता है जो शासकों की त्रुटियों और गलतियों को बताता रहता है। उसकी आलोचना करता है और उस आलोचना का अंकुश, विरोध का भय शासकों को मनमानी करने से रोके रहता है।

इसलिए निन्दा आलोचना से बजाय रुष्ट होने, दुःखी होने या प्रतिकार लेने की भावना रखने की अपेक्षा उसका रचनात्मक उपयोग करने की ही बात सोचनी चाहिए। इसी में भला है और इसी में हित। यदि निन्दा आलोचना को सहज भाव से स्वीकार किया जाए तो मनीषियों का कथन है कि इससे दुगफ्रणों का विनाश हो जाता है। “ज्योतिषा बाधते तमः निन्दा वाधते दोष।” संस्कृत की प्रसिद्ध सूक्ति है। तदनुसार निन्दा आलोचना का उपयोग अपने उर्त्कष, आत्म-परिष्कार के लिए भी किया जा सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। चाहिए वह दृष्टि जो निन्दा के प्रकाश में पने दुगफ्रणों-दोषों को ढूँढ सके और चाहिए वह सहिष्णुता जो निन्दा आलोचना को सह सके।


समस्त सफलताओं का मूल-मन

मनुष्य को आगे बढ़ने, ऊंचे उठने की प्रेरणा और शक्ति कहाँ से मिलती है? एक ही उत्तर है मन से। शास्कारों ने मन को ही बन्धन और मोक्ष का कारण बताया है -”मन एवं मनुष्याणं कारणं बंध मोक्षयो” मन में प्रचण्ड प्रेरक शक्ति है। इस प्रेरक शक्ति के द्वारा ही वह अपने कल्पना चित्रों को इतना सजीव कर देता है कि मनुष्य बालक की तरह उन्हं प्राप्त करने, साकार करने के लिए दौड़ पड़ता है। बच्चे जिस तरह रंग बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ते हैं, तितलियाँ जिधर जाती है उधर ही भागते हैं, उसी प्रकार मन में जैसी कल्पनाएं, इच्छाएं, बासनाएं, आकाँक्षएं और तृष्णाएं उठती है उसी ओर मनुष्य क्रियाशील हो जाता है।

इसलिए कहा गया है कि मन बड़ा चंचल है। वह किसी एक वस्तु और ध्येय पर केन्दित नहीं होता। कोई एक सुन्दर कल्पना आती है तो उसके लिए ताने-बाने बुनने लगता है। उसके बाद कोई और नई सूझ आती है तो वह पिछली बातों को भूल कर उनमें रम जाता है और उन्हें पूरा करने के लिए ताना-बाना बुनने लगता है।

ऐसी बात नहीं है कि मन यह सब अकारण या निरुद्देश्य करता हो। मन की इस चंचलता के पीछे सुख की आकाँक्षा ही निहित है। सुख की आकाँक्षा मन के अनतराल में प्रधान रुप् से काम करती है, इसलिए वह जिस बात मे, जिस दिशा में सुख प्राप्ति की कल्पना कर सकता है, जहाँ समझता है कि यहाँ सुख प्रापत हो सकता है वहाँ अपनी कल्पना के अनुसार उसे एक सुन्दर और मन-मोहक रुप प्रदान करता है तथा रंग-बिरंगी योजनाएं तैयार करता है। मस्तिष्क उसी की ओर लपकता है, शरीर उसी दिशा में काम करने लगता है। इसके साथ-साथ वह नई-नई कल्पनाएं भी करने लगता है। एक योजना पूरी नहीं हो पाती है कि उससे भी एक नई योजना और तैयार हो जाती है, पहली को छोड़कर नई योजना और तैयार हो जाती है, पहली को छोड़कर नई में प्रवृत्ति हुई, फिर वही क्रम आगे भी चला। उसे छोड़ कर और नया आयोजन किया। इस प्रकार अनेक अधूरी योजनाएं पीछे छूटती जाती है और नई बनती जाती है। अनियन्त्रित मन का यही क्रम, यही क्रिया-कलाप होता है। वह न जाने किन-किन तृश्णओं में भटकता और असफलताओं की, अधूरे कार्यक्रमों की अगणित ढ़ेरियाँ लगा कर जीवन को मरघट जैसा कर्कश बना देता है। अजफ्रन ने भगवान से मन की इस ‘चलता को सुख प्राप्ति में बाधक बताते हुए कहा है –

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येत मधुसूदन। एतस्याहं पश्यामि चंचल त्वारिस्थति स्थिराम्॥

चंचल हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद दृढ़म। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ - (गीता 6/33,34)

अर्थात - हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समत्व भाव से कहा है, इसकी मैं मन के चंचल होने से बहुत काल तक ठहरने वाली स्थिति को नहीं देखता। क्योंकि है कृष्ण यह मन बड़ा चंचल और प्रमथन स्वभाव वाला ताि बड़ा दृढ़ और बलवान है, इसलिए उसका वश में करना मैं वायु की भाँति अति दुष्कर समझता हूँ।

भगवान कृष्ण ने भी मन के निग्रह को दुष्कर बताते हुए उसकी उच्छृंखलता, चंचलता को आत्म-कल्याण के पथिकों के लिए हानिकर बताया है - यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः। इंद्रियाणाँ हि चरताँ यन्मनोऽनु विद्ययिते। तदस्य हरति प्रज्ञा वायुर्नावमिवाम्भासे। (गीता 2-60,67)

अर्थ- है कौतेय! अभ्यासशील बुद्धिमान पुरुष के भी मन को ये उद्दण्ड इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती है।

जैसे वायु जल में नाव को हर लेती है, वैसे ही इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन पुरुष का विवेक हरण कर लेता है।

भगवान बुद्ध ने मन की चंचलता के सम्बन्ध में कहा है-

यो सहस्सं सहस्सेन संगामे मानुसे जिने। एकं च जेय्य अतानं स वे संगाम जुत्तयो॥ (धमपद 103)

अर्थात - मनुष्य हजारों लोगों को युद्ध में हजारों बार जीत ले, पर सबसे बड़ा विजेता वही है जिसने एक अपने पर विजय प्राप्त कर ली हो।

मन की चंचलता स्वाभाविक है और उसे निग्रहीत कर पाया भी दुष्कर हैं, परंतु ऐसा नहीं है कि उस पर विजय प्राप्त की ही नहीं जा सके। मन की चंचलता और निग्रह के हानि-लाभ को यदि समझा जा सके तो निश्चित रुप से मनःसंयम को दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है। सूर्य की सामान्य धूप शरीर पर पड़ती है, कठिन गर्मी में भी उसे सहा जा सकता है। क्योंकि किरणें बिखरी हुई होती है इसलिए वे अपना सामान्य ताप ही दे पाती है। किन्तु नतोदर शीशे के लेन्स से एक इन्च स्थान पर पड़ने वाली धूप को यदि केन्द्रित कर लिया जाए तो उस ताप को शरीर का कोई भी अंग सहन नहीं कर सकेगा। कोई भी वस्त्र उसमें बिना जले न रहेगा। उससे कहीं भी अग्नि पैदा की जा सकती है। आजकल तो इसी पद्धति से सौर ऊर्जा के व्यापक उत्पादन की बात सोची जा रही है और उससे विविध कार्य सम्पन्न करने की योजनाएं बनाई जा रही है।

सूर्य किरणों की केन्द्रीभूत शक्ति के समान ही निग्रहीत मन की सामर्थ्य भी अपार है। अस्त-व्यस्त मनोदशा में जीवन का कोई प्रयोजन पूरा नहीं होता। किन्तु यदि उसे एक लक्ष्य पर ही स्थिर कर दिया जाए तो उससे साधारण जीवन में भी कई गुनी शक्ति दिखाई देने लगती है और मनचाही कल्पना पूरी की जा सकती है, योजनाएं कार्यान्वित की जा सकती है और विभिन्न क्षेत्रों में सफलताएं अर्जित की जा सकती है।

आत्म-कल्याण के क्षेत्र में तो मनःसंयम और भी आवश्यक है। शास्त्रों में मन को मनुष्य का शत्रु और मन को ही मनुष्य का मित्र बताया गया है तथा वश में किया हुआ मन अमृत के समान, कल्पवृक्ष के समान और अनियन्त्रित मन को हलाहल विष के समान बताया गया है। इका कारण यह है कि मन के ऊपर जब कोई नियन्त्रण या अनुशासन नहीं होता तो वह सबसे पहले ऐन्द्रिक भोगों में ही सुख खोजता है ओर उनके लिए दौड़ता है। जीभ से तरह-तरह के स्वाद चाटने की लपक उसे सताती है। रुप यौवन के क्षेत्र में काम-किलोल करने के लिए इन्द्र के दरवार की अप्सराओं को कल्पना जगत में ला कर वह खड़ा कर देता है। नृत्य, गीत, वाद्य, मनोरंजन, सैर-सपाटा, मनोहर दृश्य, सुवासित पदार्थ उसे लुभाते हैं और वह उनके निकट अधिक से अधिक समय बिताना चाहता है। सरकस, थियेटर, सिनेमा, खेल, क्लब आदि के मनोरंजन क्रीड़ास्थल उसे रुचिकर लगते हैं। शरीर को सजाने या आराम देने के लिए बिलासिता के उपकरण जुटाना उसे आवश्यक लगता है। इसका एक कारण यह भी है कि इन सब बातों में वह अपने अहंकार की पूर्ति समझता है।

अस्तु, मन को इस र्व्यथ निरुद्देश्य भाग-दौड़ को रोक कर उसे निग्रहीत करना चाहिए। सारी सिद्धियों का मूल मनःसंयम में है। परंतु वह केवल साधारण पुरुषार्थ से, योग से बढ़ कर है। कहा जा चुका है कि मन की शक्तियाँ विलक्षण हैं। संसार में जिस किसी ने भी जो कुछ उन्नति और उर्त्कष की स्थिति प्राप्त की है उसके मूल में मन की ही शक्ति विद्यमान है। मनुष्य का सुख-दुःख, बन्धन और मोक्ष भी मन के आधीन है। संसार में ऐसा कोई स्थल नहीं जहाँ मन ना जा सके, लोक और परलोक में भी मन क्षण भर में जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रमाणों से प्राप्त होने वाला ज्ञान भी मन के द्वारा ही प्राप्त होता है। इसकी महत्ता का विवेचन करते हुए ऋषियों ने कहा है, ‘रथ चक्र की नाभि में जिस प्रकार पहियों के अरे प्रतिष्ठित हैं उसी प्रकार ऋक, यजुःऔर सामवेद का ज्ञान मन में प्रतिष्ठित है (शुक्ल यजुर्वेद 34/5) यदि मन शुद्ध, पवित्र और संकल्पवान बन जाए तो जीवन की दिशाधारा ही बदल जाए। इसीलिए कहा गया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने सारा संसार जीत लिया।


अर्न्तमन का परिष्कार, योग साधना से

मनुष्य की बुद्धि वस्तुओं, प्राणियों और परिस्थितियों पर नियंत्रण करती है। इसी नियमन क्षमता द्वारा वह प्रकृति का लाड़ला बेटा कहलाता है और उसकी संचित सम्पदा में से मनचाहे उपहार पाता है। इतने पर भी आर्श्चय इस बात का है कि वह अपने पर नियमन नहीं कर पाता। स्वभाव में कुछ एी आदते घुस पड़ती है जो उपयोगिता की कसौटी पर सर्वथा अनावश्यक एवं हानिकारक दीखती है, फिर भी वे छूटती नहीं। नशेबाजी की लत ऐसी ही है जिसकी हानियों से उसका प्रयोक्ता भी परिचित होता है। बहुधा उसे छोड़ने की बात सोचता भी है, पर आदत इतनी गहराई तक भीतर घुसी होती है कि वह किसी के समझाने-बुझाने की - निन्दा, विरोध की परवा न करके अपने स्थान पर जमा रहता है। छूटने, हटने का नाम नहीं लेता। प्रयोक्ता अपने आपको विवश असहाय अनुभव करता है ओर आदत की गुलामी स्वीकार किये रहता है। भले ही उसमें उसे हर प्रकार की बर्वादी सहन करनी पड़े।

नशेबाजी एक उदाहरण भर है। ऐसी-ऐसी शारीरिक कुटेवों और मानसिक सनकें आदमी पर हावी रहती है। कुसंस्कार इन्हीं को कहते हैं, जो अशोभनीय, अहितकर होते हुए भी स्वभाव का अंग बनकर रहते हैं और छुड़ाये नहीं छूटते। दूसरों को समझाने फुसलाने में प्रवीण व्यक्ति भी बहुधा कुत्साओं से नहीं छूट पाते। कुण्ठाएं उन पर लदी रहती है और सुसंस्कारी बनने की इच्छा एक कोने पर धरी रह जाती है।

अर्न्तमन की संरचना ऐसी जटिल है कि उस क्षेत्र के प्रवाहों को रोकना, मोड़ना बहुत कठिन पड़ता है। तर्क में विचार बदले जा सकते हैं, पर जमे हुए विश्वासों को उलटना टेड़ी खीर है। व जिस गहराई में अपनी जड़ें जमाये रहते हैं वहाँ तक न तर्क पहुँच पाते हैं और न तयों का असर पड़ता है। मूढ़ मान्यताएं - अन्य परम्पराएं अपनाने तथा दुराग्रही होने का लाँछन लगने पर भी लोग अपनी पुरानी लकीर को पीटते रहते हैं। मौखिक समर्थन करने पर भी औच्ित्य का - स्वभाव का अंग बन सकना किन्हीं विरलों के लिए ही सम्भव होता है।

अचेतन को प्रभावित किये बिना संचित पशु प्रवृत्तियों से छूटकारा पाना कठिन है। यदि इस क्षेत्र में सफलता न मिले तो मनुष्य व्यक्तित्व के क्षेत्र में अनगढ़ ही बना रहेगा। भले ही वह समृद्ध शिक्षित समझा जाता रहे। अन्तरंग को बदलने की - आत्म नियमन की क्षमता जिस भाग्यवान को मिल सके समझना चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य का भाग्योदय सामने आकर खड़ा हो गया।

इस दिशा में सफलता प्राप्त करने का एक ही उपाय है - योगाभ्यास। ध्यानयोग के अर्न्तगत आने वाले धारणा और प्रत्याहार उपचारों को अपनाने से साधक की संकल्प शक्ति इतनी प्रखर हो सकती है कि मनोनिग्रह एवं स्वभाव परिष्कार सम्भव हो सके।

चित्त वृत्तियों का नियमन, सरकसों के लिए हिंसक पशुओं को साधने के समान कठिन होते हुए भी असाधारण लाभदायक है। इस प्रणाम में योगसाधना एवं तपश्चर्या का हंटर ही काम देता है। अन्यथा वे छेड़खानी करने वाले पर ही उलट कर हमला करती है। महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध को ‘योग’ कहा है। योग का अभिप्राय चित्त-वृत्तियों पर नियंत्रण करना है। इस साधना पथ को राजयोग या अष्टाँग योग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसका उद्देश्य मन को सही रुप से समझ कर उसकी अपार शक्ति को नियंत्रित करके सदुपयोग करने का है।

इस योग-प्रक्रिया के आठ सोपान हैं अंतिम सोपान समाधि है। समाधि का उद्देश्य मनुष्य की आन्तरिक चेतना का विकास वह महान क्षमता अर्जित करता है जिससे जीवन की वास्तविकता को समझ कर उसकी समस्याओं का आत्यन्तिक समाधान हो सके। प्रथम पाँच सोपान-यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार हैं। ये पाँच योग के बहिरंग साधन कहलाते हैं। इनके अभ्यास से ही शरीर और मन अगले सोपानों के लिए पृष्ठभूमि बनते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि ये तीन योग के अंतरंग अभ्यास कहे जाते हैं।

चित्त के संस्कार ही मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। चेतना के विकास के साथ-साथ संस्कार छूटते जाते हैं। योगाभ्यास द्वारा मानव-मन सशक्त एवं सक्षम बनता जाता है साथ ही निर्मल व परिष्कृत भी होता जाता है। वस्तुतः मन का परिष्कार ही चित्त का परिष्कार है। चित्त का परिष्कार होते समय बुरे एवं कुत्सित विचार निष्कासित होते हैं जिन्हें देखकर बहुत से साधक प्रारंभिक अवस्था में घबड़ा उठते हैं जब कि ऐसी कोई भयोत्पादक बात नहीं, यह स्वाभाविक है जब अशुद्धियाँ निष्कासित होती हैं तो दुर्गन्ध आती ही है। इसी प्रकार चित्त की शुद्धि के समय बुरे विचार, अनुभव बाहर निकलते हैं। गन्दगी विचारों के रुप में निकलती चली जाती है। जिनमें अनेकों दबी-छुपी इच्छाएं, वासनाएं सम्मिलित होती है।

मनुष्य का चित्त बड़ा ही विलक्षण है। चित्त जब पूर्ण रुपेण शुद्ध हो जाता है तो उसकी अंतिम स्थिति असाधारण शक्ति सम्पन्न उसी प्रकार की होती है जैसे यूरेनियम, प्लूटोनियम आदि की अवस्था आणविक ऊर्जा होती है। विभिन्न स्तरों पर ऊर्जा विभिन्न गुणों के रुप् में प्रकट होती है। तमोगुण की अधिकता वाले व्यक्ति में विकास की प्रक्रिया अत्यधिक मन्द गति से होती है। जिसका अनुभव बड़ी मुश्किल से होता है। रजोगुण प्रधान साधक में विकास की गति तीव्र होती है। सतोगुणी के विकास में संतुलिस स्थिति रहती है। जीवन के दैनिक क्रिया-कलापों में तीनों गुणों के माध्यम से ही चित्त कार्य करता है। अष्टाँग योग के सम्यक् अभ्यास से व्यक्ति चेतना के उच्चस्तर तक पहुँच जाता है। मस्तिष्क के विभिन्न भागों को क्रियाशीलता के आधार पर दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। बाँया भाग एवं दायाँ भाग इन्हें ही सेरेब्रल हेमिस्फिर्स कहते हैं। खोजों से ज्ञात हुआ है कि मस्तिष्क का दाहिना भाग जिसका संबंध व्यक्ति की मेधा व प्रज्ञा से होता है उसके विकसित होने से सृजनात्मक बुद्धि चित्रकला, नृत्यकला, स्नेह व उदारता व अन्तरप्रज्ञा का विकास होता है। इसके विपरीत बाएं भाग का सक्रियता के फलस्वरुप विश्लेषणात्मक व तार्किक बुद्धि का विकास होता है, इसके विषय गणित, विज्ञान, साहित्य, लेखन, कानून, शासन अदि हैं। अभी तक की उपेक्षित कला प्रियता के अभाव में शाविदों व मनोवैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क का एक पक्षीय विकास मानव जीवन पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।

प्रसिद्ध शिक्षा शोधार्थी श्री विवियनशेरमेन ने न्यूटन, आइन्स्टीन जैसे महान वैज्ञानिकों के उदाहरणों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उन्हें वैज्ञानिक उपलब्धि अन्तर्प्रज्ञा के विकसित होने के कारण मिली जो मस्तिष्क के दाएं भाग का कार्य है और बाद में बाएं मस्तिष्क के सक्रिय होने पर उसे भौतिक स्वरुप प्रदान किया गया। श्री विवियन के अनुसार यदि मस्तिष्क के बाएं भाग को सक्रिय न किया गया और भौतिक लिप्सा की प्राप्ति हेतु मात्र बाएं मस्तिष्क की कला कुशलता पर जोर दिया गया तो कुछ पीढ़ियों के बाद मस्तिष्क का एक भाग पूर्ण निष्क्रिय हो जाएगा, जिसके घातक परिणाम मानव समाज के समक्ष प्रस्तुत होंगे।

अध्यात्म विज्ञान के अर्न्तगत मस्तिष्क के दोनों भागों के बीच समन्वय स्थापित करने वाली नाना प्रकार की योग साधनाएं है इनमें मन्त्र जप से लेकर ध्यान, धारणा, आसन, प्राणायम, नाड़ीशोधन प्रक्रिया आदि वैज्ञानिकों द्वारा मन्यता प्रापत वापोधीडंबक के व्यायाम इस कार्य में विशष लाभकारी सिद्ध हुए हैं। योगाभ्यास के अंतर्गत इसे क्रियायोग की संज्ञा दी जाती है। वैज्ञानिक वेनक्वेट ने क्रियायोग के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिखाया है कि इसके सतत अभ्यास से दोनों मस्तिष्कों का समान विकास होता है जिससे मानसिक संतुलन बढ़ता है व असमान्य मनःस्थिति नियंत्रित होती है। ध्यान, धारणा व क्रियायोग के सतत् अभ्यास से एक समय ऐसा भी आता है जब कि मनुष्की अन्तर्प्रज्ञा जागृत होती है और बिना कसी प्रकार के अध्ययन के ही नाना प्रकार के गूढ़ रहस्यों का विवेचन सम्भव होता है तथा प्रकृति की अनेक रहस्यमयी जानकारियाँ उसके करतलगत हो जाती हैं। भारतीय ऋषि व योगी इसके अनुपम उदाहरण हैं। वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधानों में पाया कि दाएं मस्तिष्क का संबंध इड़ा नाड़ी से व बाएं का संबंध पिंगला नाड़ी से है।

मस्तिष्क विकास एवं कौशल अभ्यास के लिए प्रशिक्षण की अनेक व्यवस्थाएं मौजूद हैं। वे मनुष्य को चतुत बनाती है। चतुरता से सम्पन्नताओं और सफलतापओं का पथ-प्रशस्त होता है। इतने पर भी अन्तराल में सन्निहित मान्यताएं और प्शु प्रवृत्तियों के निष्कासन में इस बुद्धि वैभव का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। व्यक्तित्व की निकृष्टता पिछड़े और प्रगतिशील समझे जाने वाले दोनों ही वर्गों में प्रायः एक जैसी पाई जाती है। स्पष्ट है कि मनुष्य की उत्कृष्टता, प्रामाणिकता एवं चिरस्थायी सफलता के लिए व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय होना आवश्यक है। इसके लिए क्या कहा जाय यह तो सर्वविदित है, पर क्या किया जाय इसका उपाय खोजने पर दरवाजे बन्द प्रतीत होते हैं। अचेतन की हठवादिता को बदल सकना सहज काम नहीं है।

इस प्रसंग में एक ही उपचार बार-बार हो सकता है। वह है योगाभ्यास और तप साधना। तपश्चर्या की आग में कुसंस्कारों की गलाया जाता है और योग साधनों से उसे उपयुक्त ढाँचे में ढाला जाता है। कुसंस्कारिता से छुटकारा पाने और सुसंस्कारी व्यक्तित्व निर्मित करने के लिए योगसाधन का जितना महत्त्व है उतना और किसी उपाय, उपचार का नहीं है।


आत्म-विश्वास से असम्भव कार्य भी सम्भव बन जाते हैं(kahani)

एक बार विधाता अपनी सृष्टि को देखने निकले। धरती पर पहुँच कर उन्होंने देखा कि एक किसान फावड़ा लेकर विशाल पर्वत को खोद रहा है। विधाता को उसका दुस्साहस देखकर आर्श्चय हुआ। उन्होंने इसका कारण पूछा।

किसान ने बताया - ‘बादल आते हैं और इस पर्वत से टकरा कर इसके दूसरी ओर वर्षा कर देते हैं। मेरे खेत सूखे ही रहते हैं। अतएव इसे में यहाँ  से हटाकर ही चैन लूँगा।’

‘पर इतने बड़े कार्य को तुम अकेले कर पाओगे?’ विधाता अपना आर्श्चय न रोक सके और पूछने लगे।’

किसान बोला - ‘मेरा दृढ़ संकल्प है। मैं इसे निश्चित ही हटा दूँगा।’

विधाता किसान के आत्मबल से प्रभावित होकर आगे बढ़े। तभी पर्वतराज गिड़गिड़ाने लगे - ‘भगवन्! इस किसान से मेरी रक्षा कीजिये।’

‘तुम एक छोटे से किसान से इतने भयभीत हो?’ विधाता ने पूछा।

पर्वत बोला - ‘किसान छोटा है तो क्या, उसका संकल्प दृढ़ है, उसका आत्म-विश्वास अडिग है। इन दोनों के द्वारा वह मुझे निश्चित ही हटाकर मानेगा। संकल्प शक्ति आथ्र आत्म-विश्वास से असम्भव कार्य भी सम्भव बन जाते हैं।’


प्रतिमाओं की खेती रक्त-बीज तैयार करेगी

हमारी इस पृथ्वी पर मनुष्य जाति का अस्तित्व करीब दस लाख वर्षों से है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि करीब एक लाख वर्षों की कालावधि में मनुष्य के शारीरिक ढाँचे में कोइ्र परिवर्तन नहीं हुआ है। इन दिनों जीव वैज्ञानिक कुछ ऐसे प्रयोगों में निरत है जिनसे न केवल मनुष्य का शारीरिक ढाँचा अब की अपेक्षा काफी कुछ बदला होगा, वरन् वह बपने पूर्वजों से अधिक मेधावी प्रतिभाशाली, बुद्धिमान और क्षमता सम्पन्न होगा। वैज्ञानिक इसके लिए मनुष्यों की नस्ल में सुधार करने के प्रयास कर रहे हैं।

नस्ल में सुधार लाने का प्रयास अब तक पेड़ पौंधों और पशुओं तक ही सीमित था किन्तु अब ये प्रयोग मनुष्यों के लिए भी किये जाने लगे हैं। सर्वबिदित है कि इस तरह के प्रयासों की कल्पना सर्वप्रथम हिटलर ने की थी। उसकी मान्यता थी कि जर्मन नस्ल शुद्ध आर्य नस्ल है और वह संसार की सर्वश्रेष्ठ नस्ल है। इसी आधार पर हिटलर ने जर्मनवासियों के मन में यह धारणा बिठाई थी कि जर्मनी को समूचे संसार पर शासन करने का अधिकार है। इसके साथ ही उसने जर्मन जाति को शुद्ध बनाये रखने की आवश्यकता भी बताई थी और इसके लिए प्रयास भी किये थे। इन प्रयासों में यहूदियों को पूरी तरह नष्ट कर देने, कमजोर जर्मनों को बच्चे पैदा न करने देने और स्त्रियों को इस बात के लिए बाध्य करने के प्रयास किये थे कि वे सन्तानोत्पादन के लिए अपने पतियों पर ही निर्भर न करें वरन् बलिष्ठ और मेधावी व्यक्तियों के बच्चों की माँ बने।

हिटलर के चिकित्सक डा. जोसेफ मेनजेले ने तो यहाँ तक प्रयास किया था कि जर्मनी का बच्चा-बच्चा हिटलर की प्रतिकृति बने। उसकी कल्पना थी कि हिटलर के शरीर से कोशिकाएं लेकर असंख्य हिटलट पैदा कर लिए जाएं। किन्तु दुर्भाग्य से इसीलिए हिटलर का पतन हो गया और मेनजेले का यह स्वप्न साकार न हो सका। हिटलर के पतन के बाद मेनजेले भाग गया और कहा जाता है कि वह बवेशिया में छिपा रहा तथा बाद में अर्जेण्टाइना, पैराँग्वे आदि स्थानों पर छिपता रहा। इटालेविन ने अपनी पुस्तक ‘ब्वायज फाम ब्राजील’ में लिखा है कि मेनजेले जर्मनी से भागते समय हिटलर के रक्त और उसकी चमड़ी के नमूने साथ लेता गया था। उसने पैराम्वें की अपनी प्रयोगशाला में संजोए गये स्वप्न को साकार करने के प्रयास आरम्भ कर दिए। उसे अपने प्रयोगों में सफलता भी मिली। कहा जाता है कि मेनजेले ने हिटलर की कोशिकाओं के रेडइन्यिन जाति की 94 औरतों के गर्भ में भ्रूण स्थापित किये, जिनसे इतने ही बच्चे पैदा हुए। ये बच्चे हू-बहू हिटलर की प्रतिलिपि बताये जाते हैं। कहा जाता है कि उनमें से प्रत्येक की आयु अठारह वर्ष की है।

हो सकता है यह बात कल्पना पर आधारित हो किन्तु वैज्ञानिकों ने सिद्धाँन्ततः इस बात को स्वीकार कर लिया है कि कोशिकाओं के द्वारा भी नयी सन्तानों को जन्म दिया जा सकता है। पशुओं पर तो इस तरह के सफल प्रयोग भी किये जाने लगे हैं।

कोशिकाओं द्वारा नये बच्चों को जन्म देने की बात अभी भविष्य के गर्भ में है परंतु अमेरिका के एक वैज्ञानिक राबर्ट ग्राहम ने शुक्राणु बैंक की स्थापना की है और फरवरी 80 में अपने एक प्रयोग की सूचना दी है। इस प्रयोग को संसार भर में गंभीरता से लिया गया है। इस प्रयोग में अमेरिका की तीन महिलाओं में नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों से प्राप्त किये गए शुक्राणुओं से गर्भ स्थापित किया है। इन महिलाओं ने राबर्ट ग्राहम के ‘सीमेन बैंक’ से सन्तानोंत्पादन के लिए सहायता ली। जिन वैज्ञानिकों से इस बैंक के लिए शुक्राणु प्राप्त किये गये उनमें अधिकाँश अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित और मेधावी व्यक्ति हैं। एक वैज्ञानिक, विलियम शोकले को सन् 1956 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है।

ऐसी बात नहीं है कि राबर्ट ग्राहम ने इस तरह के प्रयोग की पहली-पहली कल्पना की हो। इस सम्बन्ध में प्रयास तो वर्षों से किये जा रहे थे। सर फ्राँसिस गाल्टन ने इस दिशा में ठोस कार्य किया था और काफी कुछ सफलता भी प्राप्त की थी। उस सफलता से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर विज्ञान की एक नई ही शाखा अस्तित्व में आई, जिसे ‘यूजेनिक्स’ (सुजनन विज्ञान) कहा गया।

सर फ्राँसिस गाल्टन के बाद इस दिशा में कई वैज्ञानिकों ने प्रतिभाशाली व्यक्तियों के शुक्राणुओं से उनके समान ही प्रतिभा सम्पन्न सन्तानों को जन्म देने का कार्यक्रम आगे बढ़ाया। हरमन भुल्लर ने इस विचार से इन प्रयोगों को आगे बढ़ाया कि लोग प्रतिभाशाली और मेधावी सन्तानों को जन्म दे सकें। यह तो सर्वविदित है कि मनुष्य का जन्म रज और वीर्य से होता है और अब वैज्ञानिक अनुसंधानों तथा प्रयोगों द्वारा सैकड़ों वर्षों तक वीर्य को जमाकर सुरक्षित रखने की विधि खोज निकाली गई है।

इस तरह के प्रयोगों की, जिनसे स्त्रियाँ अपनी पसंद की क्षमताओं वाली सन्तानों को जन्म दे सकेंगी। इन दिनों काफी चर्चा है। इन प्रयोगों के सफल होने पर, जो आज नहीं कल निश्चित रुप से सफल होंगे कई प्रश्न चिह्न उभर रहे हैं।

इन प्रयोगों को लेकर किये जाने वाले प्रश्नों और उत्पन्न होने वाले विवादों के सर्न्दभ में जानने से पूर्व यह जान लेना उचित होगा कि शुक्राणु बैंकों द्वारा किस प्रकार मनचाहे व्यक्तित्व वाले बच्चों या मनुष्यों को उत्पन्न करने की बात सोची जा रही है। मनुष्य शरीर की एक रहस्यमय इकाई है - ‘जीन’। यह ईकाई मनुष्य शरीर की ऐसी विशिष्ट आणविक सरचना है जिनमें समस्त जीव जगत की आनुवाँशिक विशेषताएं बीज रुप से विद्यमान है। सीधे शब्दों में इन्हें जैविक बीज कहा जा सकता है। इन्हीं जीनों के माध्यम से सन्तानों में माता-पिता के गुण, और उनकी दैहिक विशेषताएं सन्तानों में अवतरित होती है। इन जैव इकाइयों के सम्बन्ध में काफी कुछ जान लिया गया है और यह भी सम्भव हो गया है कि उनमें आवश्यक परिवर्तन किये जा सकें। अर्थात वैज्ञानिक उपायों द्वारा जीन में परिवर्तन कर अनुवाँशिक गुणों में भी परिवर्तन किया जा सकता है।

जीन क्या है? वैज्ञानिकों के अनुसार जीन्स डी.एन.ए. नामक एक अम्ल के, जो शरीर में रहता है, विशिष्ट घटक होते हैं। डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार के अणु हैं जो कोशिका के ‘क्रोमोमोम्स’ के घटक होते हैं। प्रत्येक जीन का सम्बन्ध एक विशेष प्रकार के ‘एन्जाइम प्रोटीन’ से होता है। प्राणियों के आनुवंशिक विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब किसी कोशिका का विभाजन होता है तो उस विभाजन की प्रक्रिया में दोहरे अणु पैदा हो जाते हैं और इनमें से प्रत्येक आनुवंशिकता के सूत्रबद्ध गुणों की प्रतिकृति को दोहराता है। यदि किसी जीव में कोई नई आनुवंशिक विशेषता उत्पन्न करनी हो तो उस जीव के डी.एन.ए. अणुओं में नए गुण वाला जीन रोपित करना आवश्यक हो जाता है।

संक्षेप में इच्छित और मनचाहे स्वभाव तथा गुणों वाली सन्तान को जन्म देने का यही आधार है। इस दिशा में जो प्रयोग अनुसंधान हो रहे हैं उन्हें आनुवंशिक इन्जीनियरी कहा जाता है। जीव विज्ञान की यह शाखा अर्थात आनुवंशिकी इन्जीनियरी विज्ञान की यह शाखा अर्थात आनुवंशिकी इन्जीनियरी विज्ञान अब इस स्थिति में पहुँच गया है कि उसके परिणामों को परमाणु ऊर्जा से भी अधिक सशक्त साधन समझा जा रहा है।

इस विज्ञान के द्वारा यहाँ एक उपाय किये जा रहे हैं कि एक बारगी मनुष्य जाति यदि नष्ट भी हो जाए तो उसका पुनर्जन्म सम्भव हो सकेगा। भौतिकी के वैज्ञानिक राल्फ लैप दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों को यह सलाह देते हैं कि अभी से ऐसा प्रबन्ध कर लेना चाहिए कि समृद्ध सीमेन बैंक स्थापित किये जाएं। इसके कारण बताते हुए राल्फ लैप तर्क देते हैं कि इन दिनों दुनिया जिस तेजी से परमाणविक शस्त्रास्त्रों की होड़ में लगी हुई है उससे यह निश्चित है परमाणविक युद्ध होकर रहेगा। निश्चित ही इस तरह के युद्ध से भारी विनाश होगा और रेडियोधर्मी धूल के प्रभाव के कारण युद्ध के बाद भी काफी लम्बे समय तक पृथ्वी पर मानव जीवन दूभर बना रहेगा। ऐसी स्थिति में कृत्रिम गर्भाधान की पूरी जानकारी सुरक्षित कर लेना अचेत होगा ताकि उसके आधार पर आने वाले समय में मनुष्य की नस्ल धरती पर फिर से उत्पन्न हो सकेगी।

आनुवंशिक इंजीनियरी इससे भी आगे की बात है। कहा जा चुका है कि डी.एन.ए. अपने में सम्पूर्ण जैविक विशेषताएं समाहित किये हुए हैं और प्रत्येक कौशिका अपने में सम्पूर्ण जीव इकाई के सृजन की क्षमताओं से सम्पन्न होती है। इसे जेनेटिक कोड या प्रजनन संहिता कहते हैं। कोशिकाओं पर ऐसे प्रयोग किये जा चुके हैं कि किसी भी स्त्री या पुरुष के शरीर के अंग से निकाली गई कोशिओं के नाभिकीय द्रव को यदि स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाए तो वह अपने ही समान अन्य कोशिकाओं को जनम देती चली जाएगी और उनसे शरीर के विभिन्न अंग अवयवों का निर्माण होने लगेगा, अर्थात पूरा भ्रूण विकसित होता चलेगा।

इस तरह के प्रयोगों से अमैथुनी सृष्टि की सम्भावना भी बलवती हो गई है। डेविड रोरविक नामक पत्रकार ने अपनी पुस्तक ‘इन हिज इमेज, द क्लोनिंग आफ मैन’ में इस प्रयोग का सविस्तार वर्णन किया है। डेविड रोरविक के अनुसार इस तरह का प्रयोग अमेरिका के अरबपति ने श्रेष्ठ चिकित्सा शास्त्रियों और जीव विज्ञानियों की टीम तैयार कर करवाया था। इस टीम ने गहन अनुसंधान प्रयोगों द्वारा ऐसी विधि खोज निकाली और एक एशियाई नस्ल की स्त्री के रज से उसका नाभि पदार्थ निकालकर उसमें अरबपति के सोमन का नाभि पदार्थ भर दिया और उस अण्डे को उस स्त्री की बच्चेदानी में स्थापित कर दिया, जिससे एक बच्चे का जन्म हुआ। रोरविक का दावा है कि वह स्वयं इस प्रयोग का साक्षी रहा है और जा बच्चा उत्पन्न हुआ है, उसकी आयु सवा तीन वर्ष की हो चुकी है।

यह सारे प्रयोग मनुष्य को एक जीवित यंत्र मान कर ही किये जाते हैं। इस तरह के प्रयोगों की सफलताओं के सम्बन्ध में बढ़-चढ़कर दावे करने के बाद भी वैज्ञानिकों के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि चेतना की दृष्टि से इन नई किस्म की सन्तानों का क्या स्तर होगा? जैविक प्रयोगों द्वारा चाहे जैसा मनुष्य तैयार कर लिया जाय, पर उसकी क्या नैतिकता होगी? चारित्रिक स्तर और आस्थाएं मान्यताएं क्या होगी? इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक मौन हैं। शारीरिक बल, मस्तिष्कीय तीक्ष्णता और अन्य विशेषताएं जो शरीर से सम्बन्धित है, उनकी अनुकृति तो तैयार की जा सकती है, परंतु चेतना, जिसे आत्म तत्व भी कहा जा सकता है वह तो सभी स्थूल उपकरणों से परे हैं। उसे भी क्या विकसित कर पाना सम्भव होगा?

विश्व के मूधन्य विचारक और समाज शास्त्री इस तरह के अनेकानेक सवाल उठा रहे हैं। कई लोग इसे परमाणु संकट से भी भयावह बता रहे हैं। उनका कहना है कि जब समस्त वैज्ञानिक संसाधनों पर समाज पर हावी चन्द सत्ताधीश आसानी से कब्जा कर सकते हैं तो वे पूरी मनुष्य जाति को अपने ही ढाँचे में ढालने का प्रयत्न करेंगे। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हिटलर ने अपनी-अपनी असंख्यों प्रतिकृतियाँ बनाने का प्रयास किया था। हिटलर को तो इस प्रयास में सफलता नहीं मिली, सफलता तो उसे अणुबमों के निर्माण में भी नहीं मिली, सफलता तो उसे अणुबमों के निर्माण में भी नहीं मिली। परंतु बाद के युग में ये दोनों सम्भावनाएं मूर्तिमान होती प्रतीत हो रही है।

यदि वैज्ञानिको ने इस दिशा में सफलता प्राप्त कर ली तो इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्र व्यक्तित्वों का उद्भव लगभग असम्भव हो जाएगा। एक तो मनुष्य की चेतना का स्तर यंत्र मानव से अधिक नहीं होगा, दूसरे उसमें किन्हीं अन्य औरों की विशेषताएं तथा क्षमताएं ही रहेंगी। अस्तु उनके दुरुपयोग की ही सम्भावना अधिक व्यक्त की जा रही है। एक प्रकार से इन प्रयोगों की सफलता प्रकृति के कार्य में आवाँछनीय हस्तक्षेप की ही परिचायक, कहा जायेगी और मनुष्य अपने सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के विवेक से रहित, साँचे में ढले जीवित खिलौने के समान हलचलें करने बाला पूतला मात्र बनकर रह जाएगा। या कहना चाहिए कि प्रयोग प्रकृति के पुत्रों का मूलोच्छेद कर मनुष्य निर्मित हाड़माँस के पुतलों के निर्माण का द्वारा खोल चुके हैं।


उद्दण्डता नहीं, सौम्य सज्जनता ही श्रेयस्कर

सामान्य गति से सुव्यवस्थापूर्वक चलने वाले सभी क्रिया-कलाप सन्तोषजनक परिणाम उत्पन्न करते हैं। उतावली, उत्तेजना, आवेश और अस्त-व्यस्तता अपनाने पर लगता तो यह है कि शक्ति और आकाँक्षा का भरपूर उपयोग किया जा रहा है और जो करना है उसे तुर्त-फुर्त निपटाया जा रहा है। ऐसी उत्तेजना बरतते और उतावले दिखते असंक्ष्यों पाये जाते हं। कितनी ही घटनाएं भी ऐसी होती है जिनमें आवेश की प्रचण्डता का परिचय मिलता है। इतने पर भी उससे संबंधित व्यक्तियों की अभीष्ट प्रयोजन की तथा कर्त्ता की उत्तेजना के इस असंतुलन में मात्र हानि ही हानि होती है।

सामर्थ्य का होना एक बात है और उसका सदुपयोग दूसरी। सामर्थ्य की उपलब्धि में कई परिस्थितिजन्य सुअवसर भी कारण हो सकते हैं किन्तु सदुपयोग में तो मात्र व्यक्ति की निजी दूरदर्शिता ही काम देती है। थोड़े से साधनों का सदुपयोग करके क्रमिक प्रगति करने वाले और अन्ततः सफलता के उच्च शिखर पर जा पहुँचने वाले असंख्यों उदाहरण अपने ही आस-पास उपलब्ध हो सकते हैं। इतिहास के पृष्ठ तो इसी प्रतिपादन की साक्षी देते-देते नहीं अघाते। सन्तुलन, सुव्यवस्था और क्रमिक गतिशीलता ही सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाला अवलम्ब है। इसमें धैर्य अपनाना पड़ता है। निष्ठापूर्वक अनवरत साधना में सलग्न रहने वोल ही आगे बढ़ते और ऊंचा उठते हैं।

उत्तेजना में शक्ति का प्रदर्शन तो रहता है, पर साथ ही अव्यवस्थाजन्य अनर्थ का प्रतिफल भी सामने आता है। भवुक लोग बिना विचारे किसी आकषर्ण पर टूट पड़ेते हैं और आगा-पीछा नहीं सोचते। फलतः वे बुधा ठगे जाते हैं अथवा लालच के कुचक्र में भारी हानि उठाते हैं। इसके विपरीत आकर्षणों का महत्व समझते हुए भी सन्तुलित मन से हित-अहित की नाम-तौल करते हैं और विपत्ति में फंसने से बच जाते हं। जबकि भावुक आतुरता से पछताते और बेमौत मरते देखा जाता है।

क्रोध के आवेश में होने वाले अनर्थों द्वारा अपनी तथा दूसरों की अपार क्षति होती है। हत्या और आत्महत्या की अगणित घटनाओं के पीछे प्रायः बहुत ही उथले कारण होते हैं। प्रमुखता आवेश की रहती है। आवेश में उद्विग्न मनुष्य विक्षिप्त जैसा हो जाता है और क्या करना क्या न करना इसका निर्णय करने वाली विवेक बुद्धि से हाथ धो बैठता है। विग्रहों के पीछे प्रायः ऐसी ही मनःस्थिति काम करती है। जिनमें मल्ल युद्ध अनिवार्य हो गया हो ऐसे अवसर कदाचित ही कभी आते हैं। आयेदिन प्रस्तुत होने वाले झंझट ऐसे होते हैं उन्हं बुद्धिमत्तापूर्वक आसानी से सुलझाया जा सकता है। इसी प्रकार कई संकट ऐसे होते हैं जिन्हें हंसते-हंसते हटाया, टाला या सहा जा सकता है। किन्तु आवेशग्रस्त व्यक्ति उन्हें तिल का ताड़ बनाते और किंकर्तव्य विमूढ़ होकर ऐसा कदम उठाते हैं जो प्रस्तुत संकट से भी अधिक अनर्थकारी सिद्ध होता है।

आवेश की तुलना नदियों में पड़ने वाले भंवर तथा हवा में उठने वाले तूफान चक्रवात से की जा सकती है। सामान्यतः प्रवाहमान जल जब स्वाभाविक गति से बहता है तो सुखद भी होता है और सुन्दर भी लता है। किन्तु जब वह अन्धड़ की तरह उफनता और समुद्री लहरों की तरह उछलता है तो उससे विनाशलीला ही विनिर्मित होती है। आतंक सदा डरावना ही होता है। वह दूसरों को कष्ट देता है और स्वयं उद्दण्डों की तरह भर्त्सना सुनता और दुःखद स्मृतियाँ अपने पीछे छोड़ता है।

वायु मण्डलीय चक्रवातों एवं नदी, समुद्र में पड़ने वाले भंवरों की प्रचण्ड शक्ति से सभी परिचित हैं। समय-समय इनके द्वज्ञरा असीम क्षति उठानी पड़ती है। इनकी चपेट में आने वाले जहाज के बचने की सम्भावना कम ही रहती है। अच्छे से अच्छा तैराक भी इन भंवरों में पड़ कर निकल पाने में असमर्थ होते हैं। नाविकों, गोताखोरों का सर्वाधिक भय इन भंवरों से ही होता है।

वायु मण्डलीय चक्रवात दो प्रकार से बनते हैं। वायु राशि के भंवर में केन्द्र भाग मं जब वायदाव कम होता है तो हवाएं बाहर से भीतर की ओर चक्राकार बहने लगती है। दूसरे प्रकार के चक्रवात जिन्हं प्रतिचक्रवात कहते हैं प्रक्रिया उल्टी है। वायु के भंवर के केन्द्र में हवा का दवाब अधिक तथा बाहर की कम होता है। इसमें हवा चक्रवात रुप में केन्द्रमुखी नह होकर बाहर की ओर चलती है। ये दोनों प्रकार के चक्रवात खतरनाक होते हैं। इनकी प्रचण्ड शक्ति का अनुमान आये हुए तूफानों से मिलता है। मार्च 68 दिल्ली और वजीरावाद के बीच रोशनआरा पार्क के निकट एक बवण्डर उठा जिसने बस और ट्रक जैसे भारी वस्तुओं को हवा में शेर के समान उछाल दिया। दुघटना का चपेट में आये हुए व्यक्तियों ने आँखों देखी घटना का वर्णन किया। उक्त बवण्डर के प्रभ्श्राव से स्कूटर, कुर्सिया उड़कर छतों पर जा चढ़ीं। सड़क पर जा रही बस तीन मीटर ऊपर तूफान में हवा में उड़ते गुब्बारे जैसी जा रही थी। तिनके के समान अनेकों व्यक्ति उड़े नगे। मकान की पक्की छतें टीन की पतरों के समान उड़ गईं। पेड़ निर्जीव लाश की तरह गिरने लगे। कुछ मिनटों के लिए इस क्षेत्र में प्रकृति का ताँडव दृश्य दिखाई पड़ने लगा। लगभग दो करोड़ रुपये की क्षति हुई और अनेकों व्यक्तियों की जानें गई। पिछले दिनों आन्ध्र में आये समुद्री तूफान में भी चक्रवातों की प्रचण्ड शक्ति ही प्रमुख कारण थी। जिसके फलस्वरुप हजारों व्यक्ति काल के गर्भ में समा गये। असीम सम्पति नष्ट हुई।

किन्ही-किन्हीं स्थानों पर तो ये चक्रचसत पाँता ख्नस काते है। इन स्थानों की इस विशेषता के कारण उन्हं साइक्लोन क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। अटलाँटिक महासागर में बरमूड़ा और फ्लोरिडा के बीच त्रिशंकु आकार का एक ऐसा ही क्षेत्र है। वज्ञानिकों ने जहाजों को इस क्षेत्र से निकलने के लिए वर्जित कर रखा है। सन् 45 से लेकर अब तक इस स्थान में सौ से भी अधिक जलपोत तथा कई विमान देखते ही देखते आँखों के सामने से लुप्त हो गये। हजारों व्यक्ति अब तक इस क्षेत्र में लुप्त हो चुके हैं। न तो जलपोतों, वायुयानों का कोई अवशेष मिल सका है न ही गुम हुए व्यक्तियों का। यह रहस्यमय क्षेत्र अब भी वैज्ञानिकों के लिए आर्श्चयजनक बना हुआ है। निरंतर चलने वाले साइक्लोन का कारण नहीं ज्ञात हो सका है।

सामर्थ्य हवा में आर पानी में मौजूद हे। जड़ ग्रह-नक्षत्र भी अपनी गतिशीलता का परिचय देते हैं। परमाणुओं के नन्हें से घटक अपनी शक्ति से सभी को चकित किये हुए हैं। फिर मनुष्य जैसे सचेतन की क्षमता को कम कैसे आँका जा सकता है।

आवश्यक नहीं कि इस सामर्थ्य का परिचय आवेश, आक्रोश या उत्तेजना में दिया जाय। ऐसे उद्धत्त प्रदर्शन वायु मण्डल में अपना आतक दिखाने वाले चक्रवातों की तरह होते हैं जिन्से लाभ किसी का कुछ नहीं होता मात्र विनाश की विभीषिका ही प्रस्तुत होती है। पानी के भंवर दर्शकों एवं नाविकों पर अपनी भयानकता की छाप छोड़ सकते हैं, पर अन्ततः उनका न तो अपना कुछ भविष्य होता है और न किन्ही दूसरों के लिए कोई स्मरण रखने योग्य अनुदान।

समर्थता का चक्रवातों और भंवरों की तरह उद्धत प्रदर्शन तो किया जा सकता है, पर इस आतंकवादी अनाचार से व्यवस्था उत्पन्न करने और खलनायकों की तरह घृणास्पद बनने में लाभ कुछ नहीं। उद्धत नहीं सज्जन ही श्रेयाधिकारी होते हैं।


Quotation

जीवन एक वृक्ष की तरह होना चाहिए कि उसका कुछ भाग हिलने-झूकने वाला हो और कुछ भाग स्थिर रहने वाला, यही जीवन की पूर्ण कृतार्थता है।

हम जीवन के विस्तृत व्यवहार में हिलते-झुकते रहें, समन्वयवादी रहं, पर सत्य के - सिद्धाँत के प्रश्न पर हम स्थित रहें, दृढ़ रहें और टूट भले ही जायें, पर हलें नहीं, समझौता करें नहीं। ....बिखरे मोती


हृदय रोग के तीन कारण मानसिक तनाव, शारीरिक बढ़ाव और रक्त का दबाब

मुट्ठी खोलने और बन्द करने की क्रिया से मिलता-जुलता क्रिया-कलाप हमारे हृदय का है। वह एक मिनट में प्रायः 72 बार सिकुड़ता, फ्रलता है। चौबीस घंटे में 103680 बार और वर्ष में लगभग चार करोड़ बार यह क्रिया उसे अनवरत गति से करनी पड़ती है। दो धड़कनों के बीच प्रायः आधी सैकिण्ड का वह विश्राम भी ले लेता है। हृदय को अपनी ड्यूटी बजाने में उतना ही परिश्रम पड़ता है जितना किसी मनुष्य को 10 पौंड वजन जमीन पर से तीन फुट ऊंचाई तक प्रतिमिनट दो बार उठाने, रखने में करते रहना पड़ेगा। दौड़ते आदमी के पैरों की माँसपेशियों को जितना श्रम करना पड़ता है उससे दूना श्रम हृदय कर माँसपेशियों को अहिर्निशि करते रहना पड़ता है।

शरीर का और कोई अंग इतना कठेर श्रम नहीं करता जितना कि हृदय। इसलिए इसके लिए ईंधन की खपत भी अधिक करनी पड़ती है। खाद्य के रुप में शरीर को जो ईंधन प्राप्त होता है उसका प्रायः आधा भाग हृदय को क्रियाशील रखने में खर्च हो जाता है। शरीर को प्राप्त होने वाली आक्सिजन का 25 प्रतिशत भाग भी उसी के निमित खर्च हो जाता है। मनुष्य कृत अच्छे से अच्छा भाप का टरबाइन केवल 25 प्रतिशत ईंधन को शक्ति का रुप में परिणत कर पाता है, पर हृदय है जो ईंधन का 50 प्रतिशत शक्ति के रुप में उपयोग कर लेता है।

धमनियों द्वारा रक्त हृदय में आता है और उसे आक्सिजन तथा अन्य पोषक तत्व पहुँचाता है। 24 घंटे में प्रायः 4 हजार गैलन रक्त का प्रवाह हृदय में होता है।

स्टेथेस्कोप से हृदय कर की धड़कन सुनने पर उसमें दो आवाजें सुनाई पड़ती है एक ‘लप’ दूसरी ‘ड’। डप की ध्वनि लप की अपेक्षा अधिक जोरदार किन्तु अल्प-कालिक होती है। इस बीच प्रायः पौन सैकिण्ड का विराम भी होता है यही हृदय का विश्राम काल है। हृदय की धड़कन को नाड़ी परीक्षा से भी जाना जा सकता है। उसकी चाल भी प्रति मिनट 72 बार ही रहती है। अधिक परिश्रम करने पर वह 120 तक हो सकती है, पर स्वाभाविक स्थिति आने पर फिर उतनी ही हो जाती है।

धमनियों और उसे शाखा-प्रशाखाओं में होता हुआ रक्त शरीर की समस्त रक्त बाहिनियाँ नापी जायें तो उनकी लम्बाई 70 हजार मील बैठेगी। रक्त को इतना सफर निरंतर करते रहना पड़ता हे।

हृदय यन्त्र अति कोमल होते हुए भी अतीव सुदृढ़ है। यदि उस पर अनावश्यक दवाब न पड़े तो दो सौ वर्षों तक निरंतर काम करता रह सकता है। दुर्भाग्य इस बात का है कि लोगों के दिल दिन-दिन कमजोर होते चले जाते हैं और हृदय रोग तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। आहार-बिहार की विकृतियाँ और मानसिक उद्विग्नता ही हृदयदय रोगों का मुख्य कारण है। शारीरिक, मानसिक अव्यवस्था अपनाकर हम अपने हाथों अपने पैर काटते हैं और हृदय रोगों के मरीज बनते हैं।

अमेरिका में दिल के दौरे से कोई छै लाख आदमी हर साल मरते हैं तथा 20 लाख से अधिक हृदय रोगों से रुग्ण अस्पतालों में दर्ज हैं। जिन्हें छोटी-मोटी शिकायत है और घरेलू डाक्टरों से दवादारु करते रहते हैं उनकी संख्या इसके अतिरिक्त है।

सम्पन्न देशों में अमीरी से उत्पन्न और गरीब देशों में अभावजन्य परिस्थितियों के कारण इन रोगों की वृद्धि हो रही है फिर भी गरीब देश या गरीब लोग इस बात से प्रसन्न रह सकते हैं कि उनका पिछड़ापन हृदय रोगों की दौड़ में भी अपेक्षाकृत पीछे ही रख रहा है।

अपने देश में दिल के रोगियों का विभाजन उपलब्ध अस्पतालों की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार किया जा सकता है। 20 प्रतिशत कोरोनरी, 20 प्रतिशत हाइपरटेन्शन, 20 प्रतिशत रोमोटिक, 15 प्रतिशत वेन्ट्रिकल, 5 प्रतिशत वंशानुगत तथा 20 प्रतिशत अन्यान्य कारण। हृदय रोग के मरीज तो बहुत पाये जाते हैं, पर उनमें से मृत्यु एक लाख आवादी पीछे 137 की होती थी अब थोड़े ही दिनों में बढ़कर वह 220 हो गई है।

अमीरों को होने वाले रोगों में ‘हार्ट अटैक’ की भी गणना है। अमेरिका में जितने लोग केन्सर से मरते हैं उससे दूने ‘हार्ट अटैक’ से मरते हैं। दिल की बीमारियों से ग्रसित रहने वालो लोगों की संख्या तो अन्य रोगों से बीमारों जितनी ही है। यह खतरनाक रोग विस्तार की दृष्टि से सामान्य रोगों की संख्या जितना ही पहुँच चुका है।

रक्त वाहनी नलियों के अन्दर की सतह एक बहुत चिकनी झिल्ली से ढकी रहती है। इस झिल्ली पर रक्त दोष के कारण एक पीला पदार्थ जमा होने लगता है इसे एथिरोस्क्लेरोसिस कहते हैं। इसके खुरदरेपन के कारण कई तरह की परतें उसमें जमा होने लगती हैं। यह परतें रक्त में बाधा डालती हैं और जहाँ रुकावट होती है वहाँ रक्त का जमाव होने लगता है।

धमनी के अन्दर जमने को थ्राम्वोसिस कहते हैं। धमनी के रुकने से मस्तिष्क को रक्त नहीं पहुँचता। ऐसी दशा में दिल का दौरा पड़ने या लकवा मार जाने की सम्भावना रहती है।

कारोनरी थ्राम्बोसिस ही प्रायः दिल का दौरा माना जाता है यो और भी कई कारण उसके होते हैं। इस स्थिति में सीने में तेज दर्द होता है - बाँये हाथ या पेट के बाईं ओर भी कष्ट प्रतीत होता है, साँस लेने में तकलीफ होती है, पसीना आता है।

दिल के दौरे का सबसे अधिक दोष रक्त में पाये जाने वाले कोर्लस्टाल को दिया जाता है और कहा जाता है कि यह अधिक चिकनाई उक्त पदार्थ खाने से होता है पर कई वार ऐसा भी होता है कि भोजन में उस तत्व को नहीं भी रहने दिया जाय तो भी यकृत अपने आप उसे बनाता रहता है। यों ऐसा कम ही होता है।

आवश्यकता से अधिक शरीर का वनज, बहुत चिन्ता, ज्यादा भोजन, कम परिश्रम यह बुराईयाँ ऐसी हैं जो हृदय रोगों के लिए रास्ता तैयार करती है। रक्त में शकर या चर्बी की मात्रा बढ़ना भी इस दृष्टि से खतरनाक है। जिन्हें रक्त चाप ऊंचा रहता है उनके लिए भी दिल का दौरा पड़ने का संकट बना रहेगा।

कई बार लोग दिल की धड़कन तेज हो जाने - पैल्पिटेशन को ही दिल का दौरा मान लेते हैं जब कि वस्तुतः दोनों सर्वथा अलग रोग हैं। धड़कन बढ़ जाना दिल का दौरा नहीं है।

दिल का दर्द अक्सर छाती के बीच में महसूस होता है। एक या दोनों बाँहों की ओर फ्रलने लगता है - पीठ, गर्द या जबड़ों की जकड़ता-सा लगता है।

हृदय धमियों, कारोनरी आर्टरीज-की विकास ग्रस्तता कई प्रकार के हृदय रोग उत्पन्न करती है जिनमें ऐजाइना पेक्टोरिस ही अधिक प्रख्यात है। दिल के दौरे पड़ने से रोगी छटपटा जाता है और लगता है अब दम निकला-तब दम निकला।

सच बात यह है कि हृदय रोगों का कोई कारगर उपचार अभी निकला नहीं है। जो उपचार हे वे केवल सामयिक और तात्कालिक सहायता देने भर के हैं। डाक्टर ऐमिल नाइट्राइट की डिबिया रोगी को थमा देते हैं और दर्द उठने पर उसे सूँघ लेने का निर्देश देकर अपनी जिम्मेदारी हलकी कर लेते हैं। तेज दौरा होने पर रोगी को कोई नींद की गोली या सुई देते हैं ताकि तात्कालिक घबराहट दूर हो जाय और दौरे की घड़ी टल जाय। हृदय के अवयव अपनी विपत्ति से स्वयं ही जूझते हैं और प्रकृति प्रस्तुत संकट का निरोकरण करती है। इतने समय बेचैनी की जो स्थिति रहती है, उसमें रोगी घबरा जाता है। इस घबराहट को दूर करना ही डाक्टर के वस की बात है।

इलाज के रुप में रोगी का वनज यदि बढ़ा हुआ है तो उसे भोजन में सुधार करके उसे घटाने की सलाह दी जाती है।

रक्त में कोलेस्टेरोल की मात्रा का बढ़ जाना हृदय रोगों का एक कारण माना जाता है। घी जैसे चिकनाई प्रधान पदार्थों की अधिक मात्रा में लेते रहने वाले लोगों के शरीर में - यह तत्व बढ़ता है। अनसैचुकेटिड फ्रटी एसिड कम करने वाले पदार्थ लेने का डाक्टर ऐसे रोगियों को सलाह देते हैं।

स्त्रियों को प्रायः 50 वर्ष की आयु तक मासिक धर्म होता है तब तक उन्हं दिल के दौरे की सम्भावना कम रहती है क्योंकि रक्त निकलते रहने से उनमें कोलेस्ट्राल भी इक्ट्ठा नहीं होने पाता। यह पदार्थ घी, मलाई, मक्खन, माँस, अंडा खाने से बढ़ता है किन्तु कुछ चिकनाइयाँ ऐसी भी हैं जो उसे बढ़ाती नहीं वरन् घटाती है जैसे - सरसों का तेल, नारियल का तेल, विनौले का तेल, जैतून का तेल आदि। जिन देशों में माँस, अण्डा, मक्खन आदि कम खाया जाता है उनमें उसी अनुपात के दिल का दौरा भी कम होता है। जापान और इटली इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

शारीरिक श्रम कम करना ऐसा दोष है जिससे रक्म की स्वाभाविक शुद्धता से अन्तर पड़ता है और प्रवाह में रुकावट डालने वाला गाढ़ापन बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त मानसिक उत्तेजनाएं खून सुखाती है और उसमें विषाक्तता बढ़ाती है। मात्र खुराक को दोष देना और घी छोड़कर तेल खाने लगना ऐसा उपाय नहीं है जिससे हृदय की बीमारियों से बचा जा सके। इसके लिए पूरे शारीरिक और मानसिक क्रिया-कलाप में ऐसा हेर फ्रर करना होता है, जिससे रक्त प्रवाह समेत सारी गतिविधियाँ सही और संतुलित रीति से अपना काम करती रह सके।

दिल के मरीजों को कठोर शारीरिक श्रम, मानसिक तनाव और भारी भोजन से बचना चाहिए। अक्सर भर पेट भोजन कर लेने पर दिल की चाल बढ़ती है और गड़बड़ी की सम्भावना रहती है। यदि भोजन की मात्रा कम ली जाय और खाने के बाद कुछ समय लेट लेने का नियम बनाया जाय तो बहुत कुछ रोकथाम हो सकती है। शारीरिक श्रम कम करना चाहिए किन्तु इतना कम नहीं कि पुर्जों को जंग ही लग जाय और पड़े-पड़े भोजन तक हजम करना कठिन पड़ जाय। चिन्ता, क्रोध, आवेश, भय, आशंका जैसी मनःस्थिति से बचना चाहिए। यदि कुछ सम्भावनएं भी ऐसी है तो भवत्व्यता को ईश्वर पर छोड़ कर अपना सामान्य कर्त्तव्य पूरा करते हुए निश्चिन्त रहने की - और जो होगा देखा जायेगा की - नीति अपनाने की चेष्टा करनी चाहिए।

बढ़े हुए हृदय रोग में कई और भी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। साँस फूलती है - हर घड़ी बैचेनी अनुभव होती है। उंगलियों, नाक, जीव तथा होठों पर नीलापन छा जाता है। बार-बार खाँसी आना, कफ के साथ खून आना, कनपटियों में दर्द, बढ़ा हुआ रक्तचाप, धड़कन में तेजी एवं अनियमिता यह सब हृदय रोगों के स्वामी बन जाने के चिन्ह हैं।

डाक्टर लेग हृदय रोगी की जाँच सीने पर हृदय के चारों बाल्वों की ध्वनि सुनकर भीतर की स्थिति का पता लगाने का प्रयत्न करते हं। साधारणतया लप, डप की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती है, पर हृदय रोगों में वे अनियमिताएं भी सुनी जा सकती है जिन्हें चिकित्सा शास्त्र में ‘मर-मर’ कहते हैं। रक्त में श्वेत कणों का तथा एन्जाइमों का बढ़ जाना भी हृदय की स्थिति को बताता है। इलेक्ट्रा कारडियो ग्राम से भी पता चलता है कि धड़कन में क्या अन्तर आने लगा है?

हृदय रोगों का भोजन हल्के से हल्का रखना चाहिए। फलों के रस, गाय का दूध आदि पेय पदार्थों पर रहा जा सके तो और भी अच्छा है। रक्तचाप बढ़ा हुआ हो तो नमक बन्द कर देना चाहिए या कम से कम लेना चाहिए। ग्लूकोज, कुचोडीन प्रकृति शक्तिवर्धक खाद्यों का भी सीमित मात्रा में प्रयोग करना अच्छा रहता है। रोगी की अधिक से अधिक विश्राम मिले इसकी व्यवस्था विशेष रुप से की जानी चाहिए।


Quotation

न श्रेयः सततं तेजो, न नित्य श्रेयसी क्षमा। तस्मान्निव्यं क्षमा तात, पण्डित रवादिता॥

बेटे न सदा क्रोध की कल्याणकर है न निरंतर क्षमा ही, इसलिए आचार्यों ने निरंतर क्षमा के लिए अपवादों की, विशेष अवसरों के लिए विशेष नियमों की रचना की है।


प्राण शक्ति का, चिकित्सा उपचार में प्रयोग

मनुष्य मात्र रासायनिक पदार्थों का ही बना नहीं है, उसमें विद्युत प्रवाह की भी स्वसंचालित व्यवस्था है। इसी आधार पर अवयवों की बुमुखी कार्यपद्धति गतिशील रहती है।

मशीनों को चलाने के लिए भाप, तेल, बिजली आदि के माध्यम से ऊर्जा जुटानी पड़ती है। यदि उसका प्रबन्ध न हो सके तो कीमती मशीनें भी जाम हो जायं। इसी प्रकार काया की रासायनिक संरचना हर दृष्टि से उपयुक्त होते हुए भी अपनी निर्धारित गतिविधियों को चलाने के लिए ऊर्जा की उपेक्षा करती है। सृष्टा ने इसकी समुचित व्यवस्था भी जीवन प्रदान करने के साथ-साथ ही की है।

शरीर एक अच्छाखासा बिजली घर भी है। मस्तिष्क उसका केन्द्र है। मेरुदण्ड में होते हुए अगणित तार समस्त अवयवों में कला पूर्व ढंग से गुँथे हुए हैं। इन्हें ज्ञान तंतु कहते हैं। समझा जाता है कि वे शरीर और मस्तिष्क के बीच जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। यह आँशिक सत्य है। बात उससे भी आगे बढ़ी-चढ़ी है। शरीर बिजली से चलने वाला यंत्र है। अवयवों का अपने घटकों को सजीव एवं सक्षम बनाये रहने के लिए रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है ओर वह आहार के माध्यम से उपलब्ध होती है। इतने पर भी इस जटिल यंत्र को गतिशील रखने के लिए एक विशिष्ट मात्रा में विशिष्ट स्तर की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है और वह र्प्याप्त मात्रा में प्रयुक्त एवं उत्पन्न भी होती रहती है। इस ऊर्जा का नाम है - “प्राण विद्युत”।

विद्युत दो ध्रुवों के पारस्परिक सहयोग से उत्पन्न होती है। इन्हें ऋण और धन कहते हैं। काया की विद्युत व्यवस्था में मूलाधार को ऋण और सहस्रार को धन विद्युत का केन्द्र माना गया है। मेरुदण्ड के माध्यम से उनके मध्यवर्ती प्रवाह गतिशील रहते हैं। इसके उपराँत ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से समस्त शरीर में उस प्राण ऊर्जा का वितरण होता रहता है। इसके आधार पर कार्या की चेतन और अचेतन गतिविधियाँ तो चलती ही है। साथ ही स्फूर्ति, प्रतिभा, मेधा, जीवट जैसी रहस्यमयी विभूतियाँ भी उसी आधार पर जगती और बढ़ती रहती हैं। पंच तत्वों से बने शरीर को चलाने में पंच प्राणों की सामर्थ्य ही काम करती है। इस ऊर्जा की उपयुक्त मात्रा होने से ही मनुष्य प्राणवान् बनता है। अन्यथा स्वल्प प्राण वाला मात्र प्राणी बन कर रह जाता है।

प्राण शक्ति की उपयोगिता जीवनचर्या की गतिशीलता रखने तथा विभिन्न प्रकार के पुरुषार्थ करने में तो है उसका अब नया उपयोग चिकित्सा प्रयोजन में भी होने लगा है। समर्थ व्यक्ति की प्राण शक्ति दुर्बल को उसी प्रकार दी जा सकती है जैसे कि सम्पन्न लोग अपने वैभव में निर्धनों की सहायता करते हैं।

प्राण विद्युत का सामान्य आदान-प्रदान तो अनायास ही चलता रहता है, मस्तिष्कीय तरंगे, दृष्टिपात, मुख मुद्रा, हस्त संचालन जैसे माध्यमों से एक की प्राण क्षमता का दूसरे के लिए सहज ही उपयोग होता है। शरीर को अति निकट लाने-सटा देने पर यह ऊजा सबल से निर्बल पक्ष में दौड़ती है। युवा नर-नारियों के बीच तो यह विद्युत अत्यंत उद्धत हो उठती है।

इस प्राण शक्ति को स्वस्थ समर्थ व्यक्ति दुर्बल पक्ष को अनुदान के रुप में देकर उनके अभाव एवं कष्टों में भारी सहायता कर सकते हैं। इसे एक दूसरे प्रकार का रक्तदान कहा जा सकता है। रक्तदानी कुछ बहुत घाटे में नहीं रहते। अनुदान की क्षति पूर्ति प्रकृति थोड़े ही समय में कर देती है। फलतः उदारचेता प्रत्यक्ष रुप में भी घाटा नहीं उठाते। परोक्ष रुप में तो उन्हें जो संतोष मिलता है उसका मूल्य किसी भी भौतिक लाभ की तुलना में अधिक होता है।

प्राचीन काल में प्राणदान, शक्तिगत आदि के अनेक अनुदानों का वर्णन मिलता है। गुरुजन अपने शिष्यों को उत्तराधिकार में बहुत कुछ देते रहे हैं। दुर्बलों और पीड़ितों की सहायता के लिए भी अपनी इस पूँजी में बहुत कुछ बाँटने की उदारता उन्होंने दिखाई है। यह गहरे अनुदान थे जिनमें अन्तःकरण में संचित पूँजी का भी आदान-प्रदान सम्भव होता है।

इन दिनों उस प्रक्रिया का उपयोग हल्के रुप में होने लगा है। मैस्मरेजम सिद्धाँतों के आधार पर की जाने वाली प्राण चिकित्सा को इसी स्तर का माना जा सकता है। उसमें मात्र शरीरगत विद्युत प्रवाह का आदान-प्रदान होता है। उसमें ग्रहणकर्त्ता को अधिक लाभ होता है, पर प्रदाता को कोई अधिक घाटना नहीं सहना पड़ता। क्योंकि दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों में इस विद्युत का निरंतर खर्च होता ही रहता है। चिकित्सा प्रयोजन में इतना ही करना पड़ता है कि प्राण विद्युत का कुछ समय तक बिखराव रोकना पड़ता है और एकाग्रता तथा संकल्प शक्ति के सहारे उसे दुर्बल पथ को देना पड़ता है। इसे शारीरिक स्तर का मोटा अनुदान कह सकते हैं। अतएव इस उपयोग के लिए किसी बड़े असमंजस की आवश्यकता नहीं पड़ती । उसे उपचार में सहज ही प्रयुक्त किया जा सकता है। जो कर रहे हैं उन प्रयोक्ताओं को कहीं कोई बड़ा घाटना नहीं उठाना पड़ा। जो राई रत्ती क्षति हुई भी वह सेवा साधना में उपलब्ध होने वाली प्रसन्नता के आधार पर सहज ही पूर्ण होती रही।

सभी जानते हैं कि प्राणियों के जीवन का आधार सूक्ष्म प्राण शक्ति है। मनुष्य में यह प्राण शक्ति विशेष होती है और विभिन्न साधनात्मक उपायों से सर्म्बधन करके बढ़ा भी सकता है। शरीर और मन दोनों प्राण पर अवलम्बित हैं। प्राण शक्ति के द्वारा रोगों की चिकित्सा के सम्बन्ध में योग व तंत्र ग्रन्थों में बहुत वर्णन मिलता है।

अमेरिका के कुछ व्यक्तियों के समक्ष फिलीपीनियों ने तो प्राण शक्ति के द्वारा शल्य-प्रयोग भी सफलतापूर्वक करके दिखाये हैं। डा. हिरोशी मोटोयामा ने अपनी “साइकिक सर्जरी इन द फिलीपिन्स” नामक पुस्तक में ऐसे अनेकों रोगियों का विवरण प्रस्तुत किया है जिनका उपचार इस विधि से किया गया और वे पूर्ण रुप से अच्छे हो गये। इन रोगियों में हृदय रोगी, मृगी, आँतों के फोड़े वाले रोगी भी थे। इन रोगों की सत्यता की जाँच वैज्ञानिक ढंग से कर ली गयी। खून, कफ, टट्टी, पेशाब की जाँच रिपोर्ट, एक्सरे व ई.ई.जी., ई.सी.जी. आदि रिपोर्टें पहले ही तैयार कर ली गयीं। प्राण चिकित्सा बाद में की गयी। वैज्ञानिक रिपोर्टों सहित होने के कारण इस जादुई-शल्य चिकित्सा की सत्यता की प्रामाणिकता में कोई सन्देह नहीं रह जाता। डाँक्टर हिरोशी मोटोयामा ने यहाँ तक परीक्षण करके देखा कि प्राण शक्ति का प्रभाव दूसरे कमरे में बैठे रोगी व्यक्ति पर भी उसी प्रकार पड़ता है जैसे कोई अवरोध बीच में न हो।

यह चिकित्सा प्रणाली सामान्य प्रशिक्षण द्वारा नहीं सिखायी जा सकती। इसमें शक्ति का प्रचण्ड रुप प्रदर्शित होता है। नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का दृढ़ होना इसके लिए बहुत आवश्यक है। अच्छे योगी या गुरु, अधिकारी सुपात्र को ही इस विद्या को सिखाते हैं। इस शक्ति का अपव्यय होने पर यह शक्ति धीरे-धीरे नष्ट भी हो जाती है और चिकित्सक शक्ति हीन हो जाता है।

आस्ट्रेलिया में किर्लियन फोओ विधि के विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जाँन मूर्री और डा. ग्रेडेन रिक्सेन ने पत्तों और अंगुलियों की छाप पर अनुसंधान कार्य किया है। उनका कहना है कि किर्लियन-फोटो पद्धति में यदि शरीर के किसी भाग का फाटोग्राफ लिया जाय तो उसके चारों ओर किसी शक्ति के अस्तित्व या उर्त्सजन का क्षेत्र स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है, इसी क्षेत्र को ‘औरा’ कहा जाता है और शक्ति को प्राण शक्ति अथवा शारीरिक विद्युत।

उनका कहना है कि वह दिन तो अभी दूर है जब मस्तिष्क की कार्य-पद्धति को किर्लियन उपकरणों के द्वारा दिखाया जा सकेगा, परंतु पत्ती को मरते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने अपने प्रयोगों के आधार पर कहा है कि पत्ती के मरते समय उसके बाहर का किनारा पहले अन्दर की ओर मुड़ता है और प्राण शक्ति अन्दर की ओर प्रयाण करने लगती है।

किर्लियन फोटो प्रणाली के द्वारा मैक्सिको एवं रुस में किये गये प्रयोगों के अनुसार जीवित पत्ती का ऊपरी कोना तोड़ देने पर भी फोटोग्राफ में स्पष्ट आ जाता है जैसे कि वह तोड़ा ही न गया हो। सरजाँन मूर्री एवं डा. रिक्सेन का कहना है कि यद्यपि वे अभी वास्तविक औरा नहीं देख पाये हैं किन्तु उनके यन्त्रों में स्पार्क्स आते हैं जो प्राण शक्ति के प्रमाण में बदले हुए होते हैं। उन्होंने दुःखी, सुखी, शराबी आदि के ऊपर प्रयोग करके सिद्ध किया है कि पीड़ित, प्रफुल्लित, दवा पिये हुये, शराब पिये हुये, उद्विग्न व्यक्ति का औरा अवश्य प्रभावित होता है। इस प्रभाव का अध्ययन उन्होंने एक निश्चित परिमाण का कृत्रिम औरा उत्पन्न करके किया है।

अमेरिका के कुछ भौतिकीविद् तथा वैज्ञानिक विलियम टीलर एवं थेलमा मास ने यह भी सि; किया है कि दो विभिन्न शरीरों से निकलने वाला औरा (उर्त्सजन) अलग-अलग प्रकृति का होता है तथा किर्लियन फोओग्राफ्स से यह भी बताया जा सकता है कि एक व्यक्ति की मानसिक अवस्था या भावनाएं दूसरे व्यक्ति से मिलती है अथवा नहीं। डा. रिक्सेन एवं जाँन मूर्री ने भावातीत ध्यान करते हुए व्यक्तियों का उपरोक्त प्रणाली से फोटोग्राफ्स लेकर देखा कि उंगुलियों के चारों ओर हल्के नीले रंग के स्पष्ट गोले से हो जाते हैं। उन्होंने कहा है कि यदि स्वेच्छा से इस अवस्था को प्राप्त किया जा सके तो विश्व का वातावरण अकल्पनीय शान्तिमय हो जायेगा।

प्राण-शक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में प्रवाहित हो रही है। यही शक्ति प्राणियों में संचरित होकर जीवन प्रदान करती है। शरीर के अस्वस्थ एवं अविकसित कोषों को प्राण शक्ति ही नव-जीवन देती है। गायत्री उपासना-सविता ध्यान के द्वारा प्राण शक्ति का आकर्षण एवं सम्बर्द्धन होता है। विभिन्न यौगिक क्रियाओं आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध और ध्यान आदि के द्वारा प्राण का संचार सुचारु रुप से होने लगता है।

हाथों की उंगलियों से प्राण शक्ति अन्य अंगों की अपेक्षा अधिक मात्रा मं निःसृत होती है। इस सर्न्दभ में न्यूयार्क विश्व-विद्यालय की नर्सों की प्रशिक्षण संस्था के डा. डोलारेस क्रीयर ने कुछ रोगियों को दो समूहों में विभक्त करके प्रयोग किया। एक समूह के रोगियों पर र्स्पश-चिकितसा प्रारम्भ की तथा दूसरे समूह के रोगियों की नित्स की भाँति परिचर्या की गयी तथा औषधियों दी जाती रहीं।

पहले समूह के रोगियों पर दिन में दो बाद नर्सें अपने हाथों के र्स्पश से विचारों द्वज्ञरा मानसिक शक्ति संचरित करती॥ एक ही दिन में डा. क्रीगर ने देखा कि पहले समूह के रोगियों के रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ गई जब कि औषधि प्रयोग करने वाले दूसरे समूह के रोगियों के खून में कोई परिवर्तन नहीं आया।

फ्रनिक्स के डा. विलियम मेगोरी ने डा. क्रीगर की खोज की सत्यता का समर्थन करते हुए कहा कि र्स्पश द्वारा प्राण शक्ति के संचार से रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाती है और यह कोई मनोवैज्ञानिक परिवर्तन नहीं है।


Quotation

जिस प्रकार मानवी काया एक चलता-फिरता बिजलीघर है, उसी प्रकार उसे एक साधन सम्पन्न अस्पताल भी कहा जा सकता है। अपने और दूसरों के काम में जिस तरह श्रम और समय का उपयोग होता रहता है उसकी प्रकार प्राण विद्युत को भी एक सम्पदा मानकर अपने आत्म-विकास तथा लोक-कल्याण में समुचित विनियोग किया जा सकता है। इस दिशा में होने वाली शोधें तथा उपलब्धियाँ यह आशा बंधाती है कि मानवी सुख शाँति में प्राण विद्युत का उत्साहवर्धक उपयोग होने लगेगा।

यदि आपके सौ मित्र हैं तो कम हैं उन्हें और बढ़ाओ। यदि आपका एक शत्रु है तो बहुत जादा है उसे और घटाओ।

- सिडनी


न कहीं संयोग है न कोई सर्वज्ञ

प्रसिद्ध फ्राँससी विचारक वाल्टेयर ने कहा था कि “इस दुनिया में संयोग जैसी कोई चीज नहीं होती न ही चमत्कार का कोई अस्तित्व हैं जिस हम संयोग या चमत्कार कहते है। वास्तव में वह एक अनदेखे कारण का दिखाई देने वाला परिणाम मात्र होता है।” इस तथ्य को अब सर्व सम्मति से स्वीकार किया जाने लगा है, जो कुछ हम देखते हैं, संसार वहीं तक सीमित नहीं है। इस तथ्य को नकारने वाला जमाना बीत चुका। वे दिन लद गये जब दृश्य के विपरीत प्रतिपादित तथ्य को अस्वीकार किया जाता था। अब गैलिलियों के यह कहने पर आपत्ति किये जाने तथा उसे फाँसी देने का जमाना नहीं रहा कि पृथ्वी सूरज की परिक्रमा लगाती है न कि सूरज पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। सही माने में तो यह प्रश्न ही बेमानी हो गया है कि जो कुछ हम आँखों से देखते हैं क्या यही संसार है? कौन इस तथ्य से इन्कार करता है कि जो कुछ हम देखते हैं वह उन अस्तित्वों का एक छोटा-सा अंश मात्र है जो हम नहीं देख सकते या कि जिनका अस्तित्व है। न केवल खुली आँखों वरन सूक्ष्मदर्शी यंत्र भी उन्हें देखने में असमर्थ हैं। देखना तो दूर रहा सम्वेदनशील से सम्वेदनशील यन्त्रों द्वारा भी उन्हें अनुभव नहीं किया जा सकता।

फिर भी चमत्कार जैसी कुछ बात देखी जाती है और समझा जाता है कि यह संयोग मात्र हुआ। मानने वाले तो यहाँ तक मानते हैं कि इस संसार का निर्माण भी नियति की संयोगजन्य घटनाओं का परिणाम है। परंतु सचाई इससे भिन्न है। सही बात तो यह है कि प्रत्येक परिवर्तन और घटनाक्रम के पीछे कोई न कोई कारण विद्यमान होता हैं संयोगवश कोई दुर्घटना नहीं घटती उनके मूल में कुछ त्रुटियाँ होती हैं। दो बसों में टक्कर हो जाती है, दसियों, बीसियों यात्री मारे जाते हैं तो यह दुर्घटना संयोगवश घटी कहना असंगत होगा। दुर्घटना के कूल में बस चलाने वाले ड्राइवरों का हाथ बहक जाना, समय पर ब्रेक न लगना, रास्ता देखकर गाड़ी की दिशा निर्धारित न करना जैसे हजारों कारण हो सकते हैं। चूँकि ये कारण जाने समझे हैं, इसलिए दुर्घटना को कोई चमत्कार नहीं कहेगा। परंतु कई बार ऐसी घटनाएं घटती है जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता इसलिए उन्हें चमत्कार कहा जाता है, परन्तु कारण उनके भी होते हैं।

शास्त्रीय भाषा में इस ही कार्य कारण विद्धान्त कहा जाता है। इस आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध भी किया जा सकता है और उसे असिद्ध भी ठहराया जा सकता है, सिद्ध इस आधार पर किया जाता है कि इतने बड़े विश्व ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और संचालन का कोई कारण, कोई आधार तो होना चाहिए। वह कारण या आधार ही ईश्वर है। असिद्ध इस ढंग से ठहराया जाता है कि जब सभी वस्तुओं, घटनाओं को अस्तित्वों का कोई कारण है तो ईश्वर का भी कोई कारण होना चाहिए। वह कारण क्या है? यदि ईश्वर का कोई कारण नहीं है तो इस जगत का भी कारण हो यह क्या आवश्यक है? खैर, हमारा उ्देश्य यहाँ ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करना या असिद्ध ठहराना नहीं है। कहा इतना भर जा रहा है कि हमारी समझ बहुत छोटी है, उसकी सीमाएं और उसके आधार पर सब कुछ जान लेने का न दावा किया जा सकता है तथा न ही दम्भ भरा जा सकता है।

कई बार दृश्य होने ओर अदृश्य के दृश्य में परिणत होने की घटनाएं घटित होती रहती है ओर वे घटनाएं इतनी विचित्र होती हैं कि उन्हें भूत प्रेत, देवी-देवता की करतूत, सिद्धि, चमत्कार अथवा अतीन्द्रिय चेतना की अनुभूति आदि कहकर मन समझाना पड़ता है। वास्तविकता क्या है? इसका सही पता लगा पाना और उन अद्भुत घटनाओं का कारण ढूँढ़ना, विश्लेषण कर सकता प्रायः सम्भव नहीं हो पाता। इस सर्न्दभ में जहाँ-तहाँ घटने वाली घटनाओं में से दो इस प्रकार हैं।

पहली घटना के तयि मनीला की यू. पी. आई. नामक प्रामाणिक समाचार ऐजेन्सी ने जुटाए थे। इस ऐजेन्सी ने पूरी खोजबीन के पश्चात् एक समाचार प्रकाशित कराया था कि कार्नेलियो क्लोजा नामक एक बारह वर्षीय छात्र जब तब अनायास ही अदृश्य हो जाता है। स्कूल के क्लास से गायब हो जाना और दो-दो तीन-तीन घंटे बाद वापस लौटना आरम्भ में लड़के की चकमेबाजी समझा गया किन्तु पीछे उसके दिये गये विवरण पर ध्यान देना पड़ा। वह कहता था कि कोई समवयस्क परी जैसी लड़की उसे अपने पास बुलाती है और वह रुई की तरह हल्का होकर उसके साथ खेलने व उड़ने लगता है। पुलिस ने बहुत खोज की। उस लड़के पर विशेष पहरा भी बिठाया गया। यहाँ तक कि उसे एक कमरे में बन्द भी कर दिया गया परन्तु उसका गायब होना नहीं रुका। पीछे तान्त्रिकों द्वारा मन्त्रोपचार किये जाने से उसका गायव होना बन्द हुआ।

दूसरी घटना का उल्लेख फ्राँसीसी वैज्ञानिक सेलारियर द्वारा किया गया है। उनकी प्रामाणिकता पर या विश्वसनीयता पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता। घटना पैरिस की एक प्राचीन प्रतिमा से सम्बन्धित है। वैज्ञानिकों का एक दल जब इस प्रतिमा की परीक्षा कर रहा था, तब देखते ही देखते प्रतिमा गायव हो गई और उसके स्थान पर एक-दूसरी विशालकाय मूर्ति आ विराजी जो पहले की तुलना में बड़ी थी।

इसी तरह की एक और घटना है जो बहुत पुरानी नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व टेनेसी राज्य के गालटिन नगर के एक धनी किसान डेविड लेंग के अचानक गायब हो आने के समाचार ने दूर-दूर तक आँतक पैदा कर दिया था और पूरे राज्य के निवासियों को हैरत में डाल दिया था। लेंग के गायब हो जाने की घटना की व्यापक जाँच पड़ताल भी हुई, पर इसका कोई कारण नहीं समझा जा सका और न ही यह पता चला कि वह गायव होकर कहाँ गया? वह किसी आवश्यक कार्य से घर से बाहर जा रहा था। जिस रास्ते पर वह चल रहा था, उस पर कई लोग आ जा रहे थे और लेंग से परिचित भी थे। वह रास्ते में दो तीन परिचितों के मिल जाने पर कोई आवश्यक चर्चा करने के लिए रुक गया। वह बातचीत कर ही रहा था कि उन तीनों व्यक्तियों के देखते-देखते गायब हो गया, यद्यपि उसके भाग जाने का कोई कारण नहीं था, पर वह जिनसे बातचीत कर रहा था, वे तो स्पष्ट देख रहे थे कि लेंग सामने खड़ा है और एक क्षण भी नहीं बीता है कि वह गायब हो गया है। मान भी लिया जाय कि वह भाग गया था, परंतु उसे घर तो वापस लौटना चाहिए था। वह घर भी वापस नहीं लौटा जबकि वह घर पर यह कहकर बाहर निकला था कि एक ढेढ़ घण्टे में वापस आ जाऊंगा। आर्श्चय की बात यह कि जिस स्थान पर वह गायब हुआ, जहाँ वह खड़ा था उस स्थान की घास बुरी तरह झुलस गई थी परन्तु जिन लोगों से वह बात कर रहा था उन्हें झुलसे न तो क्या मामूली तपन भी महसूस नहीं हुई थी। पुलिस तथा लेंग के अन्य परिचित जनोँ ने खूब भाग दौड़ की, उसे ढूँढ़ने के लिए सिरतोड़ प्रयत्न किये परन्तु उसका कुछ पता नहीं चल सका।

इस तरह की घटनाओं की विवेचना करते हुए वैज्ञानिकों में कई प्रकार की चर्चायें होती रहती हैं, लेकिन उससे किसी निश्चित निर्ष्कष पर पहुँच पाना, अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। यही मानना पड़ रहा है कि मनुष्य की इन्द्रिय चेतना के आधार पर विकसित बुद्धि जितना जान पाती है, दुनिया वस्तः उससे कहीं अधिक है। उसे समझ पाने में न बुद्धि समर्थ है और न ही कोइ्र यन्त्र या मशीन ही उसका विश्लेषण कर सकती है। यद्यपि ऐसे सम्वेदनशील यन्त्र या मशीन ही उसका विश्लेषण कर सकती है। यद्यपि ऐसे सम्वेदनशील यन्त्र तैयार किये जा चुके हैं जो मनुष्य की पकड़ से बाहर की चीजों के सम्बन्ध में थोड़ी बहुत जानकारी देते रहते हैं, किन्तु उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्रत्यक्ष दर्शन और प्रत्यक्ष अनुभव न केवल अधूरा होता है वरन् बहुत बार वह भ्रामक भी सिद्ध होता है। उदाहरण के लिए हम नित्य ही सूर्य की ‘धूप’ देखते हैं, पर सचाई यह है कि धूप कभी भी देखी नहीं जा सकती। जो दिखाई देता है वह धूप के प्रभाव से एक विशेष स्तर पर चमकने लगने वाले पदार्थों की चमक मात्र है। सूर्य की किरणें जो इस चमक का प्रधान कारण है, हमारी दृश्य शक्ति से सर्वथा परे है।

अन्तरिक्ष में प्रायः पूरे सौरमण्डल को प्रकाशित एवं प्रभावित करने वाली धूप वस्तुतः एक सोलर स्पेक्ट्रमा (सौरमण्डलीय वर्णक्रम) है। उसे ऊर्जा की तरंगों एवं स्फुरणाओं की एक सुविस्तृत पट्टी कह सकते हैं। इस पट्टी में करीब दस अरब प्रकार के रंग हैं। लेकिन उनमें से हमारी आँखें केवल सात प्रकार के रंगों और उनके मिश्रणों को ही देख पाती हैं। बाकी सारे रंग हमारे लिए सर्वथा अदृश्य, अपरिचित और अकल्पनीय है। कुछ विशेष यंत्रों की सहायता से थोड़ी -सी सूक्ष्म किरणों को देख समझ सकना भी अब सम्भव हो गया है। जैसे धूप में ‘इन्फ्रारेड’ किरणों देखी तो नहीं जो सकतीं परन्तु जलन के रुप में वे अनुभव जरुर की जाती हैं। फोटोग्राफी में इन किरणों का प्रयोग करने पर दुनिया का जो वास्तविक रंग चित्रित किया गया वह बहुत ही विचित्र और विस्मयकारी है। इतना ही नहीं ऐसे दृश्य भी कैमरे ने चित्रित किये जो आँखों से दिखाई ही नहीं पड़ते हैं। ट्रेचर जेम्स ने ‘इन्फ्रारेड मूडी फिल्म’ के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई.आर. 135 के द्वारा मोजापे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। इस फिल्म में ऐ पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी देखी ही नहीं जा सकते हैं।

अल्ट्रा वायलेट फोटोग्राफी से ऐसे प्राणियों के अस्तित्व का पता चला है जो हमारी समझ, परख और प्रामाणिकता के लिए काम में लाई जोने वाली सभी कसौटियों से परे है। इन प्राणियों को प्रेत प्राणी कहा जाए तो भी कोई अत्युक्ति नहीं होगी। हर्वट्र गोल्डस्टीन ने अपने शोध निबन्ध ‘प्राँपगेशन आफ शार्ट रिडियो बेनस’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ऐसे प्राणियों का भी अस्तित्व इस दुनिया में है जो अदृश्य रहते हैं अर्थात आँखों से नहीं देखे जा सकते। आप यदि यह पंक्तियाँ कहीं एकान्त कमरे में पढ़ रहे होंगे तो भी यह मच सोचिये कि आप अकेले हैं। आपके आसपास अदृश्य प्राणियों की एक भीड़ नाच रही होगी। न आपको उनसे कोई असुविधा हो रही होगी और न ही उनकी आप से।

इस तरह के अदृश्य प्राणियों की दुनिया हमारे साथ जुड़ी हुई है और उनमें से कई प्राणी तो दृश्यमान सहचरों से कम प्रभावित नहीं करते। वर्तमान सूक्ष्मदर्शी यंत्र उन्हें देखने समझने के लिए अपर्याप्त है तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस महत्वपूर्ण अदृश्य संसार से अपनी अनुभव चेतना के द्वारा सम्बन्ध जोड़ा जा सकता है। ताँत्रिक-माँत्रिक प्रेत, पिशाच, बेताल, ब्रह्मराक्षस और देव सत्ताओं से अपनी अनुभव चेतना के आधार पर ही सर्म्पक जोड़ते, सम्बन्ध स्थापित करते हैं।

जीवाणुओं की अपनी एक अनौखी दुनिया अलग ही है। वे मिट्टी, घास-पात, पानी ओर प्राणियों के शरीर में निवास करते हैं ओर बड़े बजे से अपनी जिन्दगी बिताते हैं। लेकिन उनमें से कुछ को ही सूक्ष्मदर्शी यंत्रों द्वारा देखा जा सकता है। उन्हें इसमें कोई सरोकार नहीं है कि हम हैं कि नहीं। हमारे होने न होने से उनके लिए कोई अन्तर नहीं पड़ता। शास्त्रकार ने चेतना को इसीलिए ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ कहा है। परमाणु से भी सूक्ष्म, उसका संचालन करने वाली शक्ति और उसके नियमों को देखा और जाना तो नहीं जा सका परंतु उनका आभास तो पा ही लिया गया है।

सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक एच.जी. वेल्स ने अपनी एक पुस्तक ‘द अनविजिवल मेन’ में उन सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला है, जिनके अनुसार कोई दृश्य पदार्थ या प्राणी अदृश्य हो सकता है और अदृश्य वस्तुएं दृष्टिगोचर होने लगती है। इस विज्ञान को उन्होंने अपर्वतनाक रिफ्लेक्टिव इन्सेन्स नाम देकर उसके स्वरुप एवं क्षेत्र का विस्तृत विर्णन किया है। निश्चित ही एक ऐसे सूक्ष्म जगत का अस्तित्व भी है जो अपने इस ज्ञात जगत की तुलना में न केवल अधिक विस्तृत वरन् अधिक शक्तिशाली भपी है। यह उचित ही है कि हम ज्ञात को भी पर्याप्त न मानें। प्रतयक्ष को ही सब कुछ न कहें। प्रस्तुत मस्तिष्कीय और यान्त्रिक साधनों को सीमित मान कर न चलें और जो अविज्ञात है उसकी शोध में बिना किसी पूर्वाग्रह के लगे रहें तो इस जगत के वे रहस्य जानने की दिशा में भी अग्रसर हो सकते हैं जो अभी तक अविज्ञात है।


मन की विलक्षण क्षमता

मनुश्य का मन एक अबूझ पहेली है। उसमें अगणित चमत्कारी क्षमताएं विद्यमान हैं और आर्श्चय की बात यह है कि वे सब क्षमताएं अपने के भीतर विद्यमान होने के उपरान्त भी उन सबका जान पाना और उपयोग कर पाना असम्भव नहीं, तो असम्भव जैसा अवश्य है। मन की विलक्षण ओर चमत्कारी शक्ति के प्रमाण आयेदिन यत्र-तत्र मिलते रहते हैं। इसके प्रमाण और घटनाओं से प्राप्त होने वाले निर्ष्कष के रुप् में इन दिनों हडसन द्वारा रचित ‘ला आफ साइकिक फिनोमिना’ पुस्तक बहुत चर्चित है।

पुस्तक में लेखक ने अपना एक निजी अनुभव लिखते हुए बताया है -

“वाशिंगटन के प्रो. कार्पेण्टर ने मेंरे सामने एक युवा आदमी को मोह निद्रित किया उसक समय जितने लोग एकत्र हुए थे वे सब विद्वान थे और जिस युवक पर प्रयोग किया गया था वह भी किसी विख्यात कालेज का पदवीधर था। साथ ही उसका दर्शनशास्त्र का अध्ययन भी अच्छाखासा था, उसके विचार उदार थे और भूत पुरुषों की आत्माओं को किसी साधन से बुलवा कर उनसे सम्भाषण करने की बात को वह बिल्कुल असम्भव मानता था। वह युवक ग्रीक दार्शनिकों के प्रति बहुत आदर और प्रेम रखता था। प्रो. कापेण्टर को यह बात मालूम थी इसलिए उक्त युक को मोह निद्रित करने के पश्चात उन्होंने उससे पूछा -

“क्या मैं सुकरात से तुम्हारी भेंट करा दूँ।”

उसने कहा, “हाँ यदि सुकरात जीवित हों और उनसे मेरी यहाँ भेंट हो जाय तो मैं अपना अहोभाग्य समझूँगा। इस पर कार्पेण्टर ने कहा सुकरात मर चुके हैं, परंतु उनकी आत्मा से मैं तुम्हारी भेंट करा सकता हूँ। देखो तुम्हारे सामने ही सुकरात की आत्मा मौजूद है।

यह सुनते ही वह युवक उस ओर देखने लगा लगा जिस ओर कार्पेण्टर ने उंगली का इशारा किया था। उक्त युवक ने किंचित भय के साथ कुछ प्रश्न किये। कछ समय पश्चात जब उसका साहस बढ़ा तब लगभग दो घण्टे तक उसने सुकरात की आत्मा से अनेक गहन प्रश्नों पर चर्चा की ओर सुकरात की आत्मा से मिलने वाले सभी जवाब उसने प्रो. कार्पेण्टर को समझाकर कहे। उनके सम्भाषण में सुकरात जैसे श्रेष्ठ दार्शनिक के अनुरुप विचार तथा वैसी ही गंभीर भाषा भी सुनाई दी। वह समस्त श्रोताओं को यही भासित हुआ मानों सुकरात ही उनके सम्मुख भाषण दे रहा हो।

इस पर कदाचित कोई यह कहे कि सम्भव है इसके समाधान हेतु एक और बात मि. हडसन के ग्रन्थ से नीचे दी जाती है -

प्रो. कार्पेण्टर ने उक्त युवक से कहा कि एक बहुभाषी विद्वान एवं दर्शन पराँगत सूअर से मैं तुम्हारी भेंट करा रहा हूँ यह सूअर पूर्व जन्म में हिन्दू पण्डित था ओर अपने कर्मों के अनुसार उसे यह योनि प्राप्त हुई है अपने पूर्व जन्म के संस्कारों तथा प्राप्त किये हुए ज्ञान की इसे पूर्ण स्मृति है। प्रो. कार्पेण्टर की इस सूचना को पाकर उक्त युवक का सम्भाषण उस कल्पनाजन्य सूअर से होने लगा और हिन्दू-धर्म तथा पुनर्जन्म सम्बंधी सिद्धाँतों पर उस सूअर से लम्बा एवं विद्वतापूर्व भाषण दिया।

हडसन ने अपनी पुस्तक में इस तरह के ढ़ेरों प्रसंग व उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि प्रयत्नपूर्वक मन की विलक्षण क्षमताओं को जागृत किया जा सकता है और उनसे लाभ उठा कर चमत्कारी व सिद्ध संत स्तर का बना जा सकता है।


शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का विकास

मनुष्य की स्थिति अन्य प्राणियों से सर्वथा भिन्न है। वह समाज में रहता है, उसकी एक सभ्यता है, सुसंस्कृत आचरण की उससे अपेक्षा की जाती है। साथ ही उसे इतना ज्ञान सम्पन्न भी होना चाहिए कि दुनिया जिस तेजी के साथ आगे बढ़ती जा रही है, उसके साथ कदम से कमद मिलाकर चल सके। यह योग्यता तभी विकसित होती है जब व्यक्तित्व और ज्ञान सम्पदा की दृश्टि से वह स्वयं कुछ उपार्जित करे, इस योग्य बनने के लिए उसे विरासत में कुछ संस्कार और जानकारी भी प्राप्त हो। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही प्राचीन काल से शिक्षा की व्यवस्था की जाती रही है। इस व्यवस्था का स्वरुप भले ही बदलता रहा हो, पर यह प्रचलन में हमेशा अनिवार्य रुप से रही है।

इसकी आवश्यकता और शाश्वत उपयोगिता के सम्बन्ध में एक मनीषी का कथन है कि “शिक्षा जीवन का शाश्वत मूल्य है। मानवीय चेतना जिन दो प्रकार के मूल्यों की परिधि में पल्लवित होती है उनमें कुछ शाश्वत होते हैं ओर कुछ परिवर्तनशील। शिक्षा को जीवन का शाश्वत मूल्य कहा जा सकता है क्योंकि कोई भी अज्ञानी अथवा अशिक्षित व्यक्ति अपने जीवन को विकासशील नहीं बना पाता। ज्ञान की अनिवार्यता हर युग में रही है इसीलिए शिक्षा को हर युग में मूल्य एवं महत्त्व प्राप्त होता रहा है।”

शिक्षा का अर्थ केवल वस्तुओं या विभिन्न विषयों का ज्ञान मात्र नहीं है। यदि अर्थ को यहीं तक सीमित मान लिया जाये तो वह अज्ञान से कुछ ही अधिक हो सकता है और कई बार तो उससे भी अधिक भयावह परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। ज्ञान की अथवा शिक्षा की सार्थकता वस्तुओं के ज्ञान के साथ-साथ अनुपयोगी और उपयोगी का विश्लेषण करने तथा उनमें से अनुपयोगी को त्यागने एवं उपादेय को ग्रहण करने की दृष्टि का विकास भी होना चाहिए। तभी शिक्षा अपने सम्पूर्ण अि को प्राप्त होती है। जैन दर्शन के आचाराँग सूत्रों में दो प्रकार की परिज्ञाओं का उल्लेख है एक ज्ञपरिज्ञा और दूसरी प्रव्याख्यान परिज्ञा। ज्ञपरिज्ञा से तार्त्पय वस्तुओं का बोध है ओर प्रव्याख्यान परिज्ञा में हेय का त्याग तथा उपादेश का ग्रहण किया जाता है। इस प्रव्याख्यान परिज्ञा की प्राप्ति ही ज्ञान की सार्थकता कही गई है।

प्रव्याख्यान परिज्ञा क्या है? इसे ज्ञान और आचरण का समन्वय भी कहा जा सकता है। ज्ञान और आचरण में सामंजस्य उत्पन्न होने पर ही कोई व्यक्ति वास्तव में ज्ञानी, पंडित तथा शिक्षित कहा जा सकता है। ज्ञान और आचरण में सामंजस्य क्या है? व्यक्तित्व का समय विकास। दूसरे शब्दों में उसकी प्रतिक्रिया परिणिति को विवेक भी कह सकते हैं और विवेक के प्रयोग से ही ज्ञान ही सार्थकता है। अन्यथा ज्ञान की कोई किताबी जानकारी का क्या महत्त्व?

ज्ञान और आचरण में - बोध और विवेक में जो सामंजस्य प्रतुत कर सके उसे ही सही अर्थों में शिक्षा या विद्या कहा जा सकता है। जब यह सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता तो शिक्षा अधूरी ही कही जाएगी और व्यक्तित्व भी अविकसित या एकाँगी विकसित रह जाएगा। जब भी कभी याह जिस किसी के भी साथ शिक्षा का इस सत्य से सम्बन्ध टूट जाता है तो विद्यार्थी प्रवंचनाओं का शिकार होता है, वहा अपने जीवन लक्ष्य से विचलित हो जाता है। आज के सर्न्दभ में देखें तो शिक्षा पद्धति इसी तरह की प्रवंचनाओं से पूर्ण है। छात्रों के सामने परीक्षा पास करने और डिग्री हासिल करने के अलावा कोई दूसरा लक्ष्य नहीं रहता। फलतः वह अपनी सभी प्रवृत्तियों का केन्द्र परीक्षा पास करना बना लेता है और जब यहीं एकमात्र लक्ष्य रह जाता है तो व्यक्तिव के अन्य पहलुओं पर स्वाभाविक ही विशेष ध्यान नहीं जाता। या यों भी कह सकते हं कि अन्य पक्ष गौण हो जाते हैं।

इस स्थिति में जीवन-विकास की आधारशिला, नैतिक मूल्यों के प्रति निष्ठा की जड़ें हिल जाना स्वाभाविक है। सर्वग्राही अनैतिकता के मूल में यदि शिक्षण पद्धति का यह दोश देखा जाए तो कोई अनुचित न होगा और जब सारे समाज के लगभग सभी वर्ग नैतिक मूल्यों की अवहेलना कर अनैतिकता का वातावरण विनिर्मित कर रहे हों तो छात्रों में नैतिक मूल्यों के प्रति निष्ठा पर दोहरी चोट पड़ती है। एक तो शिक्षा-पद्धति ही नैतिक आदर्शों के प्रति कोई आस्था नहीं जगाती, उन्हं नैतिक संस्कार नहीं देती, दूरे समाज का वातावरण भी वैसा कोई प्रभाव उत्पन्न करने में सक्षम न हो तो व्यक्तित्व की आधारशिला कहाँ से रखी जाएगी? विद्यार्थियों के मानस में जब अनैतिक मूल्य रसित होने लगते हैं तो वे परीक्षा में पास होने की बात हो या समाज के प्रति व्यवहार का विषय हो नैतिक मूल्यों की उपेक्षा ही करेंगे।

आये दिनों परीक्षा में नकल कर पास होने की साधारण घटनाओं से लेकर अनुचित साधन अपनाने के लिए आपराधिक स्तर की रीति-नीति अपनाने तक की विविध घटनाएं प्रकाश में आती रहती है। इन दिनों यह प्रवृत्ति कुछ विशेष रुप से बढ़ी है। नकल कर पास होने की प्रवृत्ति को साधारण-सा दोष या अपराध कर कर उसकी थोड़ी बहुत आलोचना करने के बाद चुप हो जाया जाता है। प्रश्न नकल करने या न करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि यह साधारण-सा दोष किस प्रवृत्ति का सूचक है। इस प्रवृत्ति को अनैतिकता की चिनगारी ही कहा जाना चाहिए और चिनगारी चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो समय पाकर वह भीषण अग्निकाण्ड लाकर रहती है ओर यही हो रहा है यदि उसका उपचार नहीं किया जाए तो अनैतिकता की प्रवृत्ति आयेदिन छोत्रों द्वारा तोड़-फोड़ तथा हिंसक घटनाओं के रुप् में अपनी विभीषिका का परिचय देती रहती है।

इस स्थिति के लिए विद्यार्थी इतने दोषी नहीं हैं, जितनी कि शिक्षा-पद्धति। प्रचलित शिक्षण-पद्धति छात्रों के सामने कोई ध्येय, कोई आदर्श उपस्थित नहीं कर पाती या कहना चाहिए वह ध्येयहीनता के अंधकार में धकेलती है तो उस स्थिति में जो ज्ञान जीवन को सुसज्जित और सुरक्षित बनाता है वह ज्ञान कहाँ उपलब्ध हो पाता है? कहा जा चुका है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्तित्व का समग्र विकास है। शिक्षा इसी उद्देश्य की ओर जरा भी उन्मुख हो तो ध्वंस की अपेक्षा सृजन की प्रेरणा ही जागेगी और ध्वंस का आयोजन करना भी पड़े तो वह सृजन की पृष्ठभूमि निर्मित करने के लिए ही अनिवार्य होगा। ज्ञान की, विवेक की प्रेरणा उन वस्तुओं, धारणाओं और संस्कारों को तोड़ने की है जो अपनी उपयोगिता खो चुके हैं और जिको नष्ट किया जाना आवश्यक, जिन्हें तोड़ कर ही नया सृजन किया जा सकता है। लेकिन जिन विद्यार्थियों का ज्ञान मात्र सूचनात्मक है, उससे आन्तरिक विकास कैसे हो सकता है? विवेक का जागरण उस स्थिति में हो ही नहीं सकता जब कि समग्र शिक्षा का उद्देश्य विवेक को जागृत करना ओर व्यक्तित्व को विकसित बनाना हो। इस संदर्भ मं एक संत विचारक का कथन है कि, “विद्यार्थी ज्ञानोपलब्धि के लिए, एकाग्र बनने के लिए, आत्मस्य बनने के लिए और दूसरों को आत्मस्य बनाने के लिए अध्ययन करता है। इस सर्न्दभ को यदि स्मृति में रखा जाये तो व्यग्रता, चपलता, हिंसा और तोड़-फोड़ की बात स्वयं समाप्त हो जाती है तथा इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि विद्या का अनुबंध ध्वंस के साथ नहीं निर्माण के साथ है।”

इस संदर्भ को स्मृति में रखने के लिए प्रचलित शिक्षा-पद्धति में आवश्यक सुधार करना ही एकमात्र उपाय है और वह सुधार इस सिद्धाँत को केन्द्रों में रखते हुए ही सम्भव है कि शिक्षा का उद्देश्य कोई सूचनाएं या जानकारियाँ देना मात्र नहीं है, वरन् व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है।


तोप के गोले जब फूल से कोमल बन गये

भारतीय धर्म-शास्त्रों ओर पुराण-ग्रन्थों में ऐसे कई पात्रों का विवरण मिलता है जो हाड़माँस की काया रखते हुए भी इतने मजबूत और सुदृढ़ है शरीर के स्वामी थे कि उन्हें बज्रदेह ही कहा जाता है। हनुमान, भीम आदि पौराणिक चरित्रों के सम्बन्ध में ऐसे अनेकानेक प्रसंग मिलते हैं कि उन पर सहज ही विश्वास नहीं होता। क्या सचमुच कोई व्यक्ति हाियों से रौंदे जाने पर भी जीवित बच सकता है। क्या पैने और विषबुझे वाणों का भी देह पर कोई असर नहीं होता है? आदि ऐसे अनेक प्रश्न उभरते हैं, जब इन पात्रों से सम्बन्धित चर्चा चलती है या ऐसे विवरण उपलब्ध होते हैं।

ऐसे विवरणों को संदेह की दृष्टि से भी देखा जाता है परंतु इसी शताब्दी के आरम्भ में अमेरिका का एक ऐसा व्यक्ति अपनी सुदृढ़ काया के कारण विख्यात हो चुका है जिसके शरीर पर कठोर से कठोर यातना का प्रभाव नहीं पड़ता था और उसने अपनी शारीरिक क्षमता सुदृढ़ता को इतना बढ़ाया कि सन् 1964 में जब वह वृद्ध हो चुका था अपने पेट पर बड़े-बड़े इस्पाती हथौड़ों के बार ऐसे सह लेता था जैसे उस पर हथौड़े नहीं फूल फ्रंके जा रहे हों।

इस व्यक्ति का ना था रिचर्ड। 08 अगस्त 1965 के नवभारत टाइम्स के बम्बई संस्करण मं रिचर्ड के एक प्रदर्शन का जो विवरण प्रकाशित हुआ था, वह इस प्रकार है - कैलीफोर्निया से स्टेडियम में सारा नगर उमड़ आया था। सहसा भीड़ में से एक बूढ़ा निकला और स्टेडियम के मध्य जाकर खड़ा हो गया। उसकी आयु किसी भी प्रकार साठ पैंसठ वर्ष से कम नहीं दिखाई दे रही थी। किन्तु कद काँठी में वह अच्छा खासा लम्बा चौड़ा और मजबूत था। उसने उस समय केवल एक जाँघिया पहन रखा था और शेष सारा शरीर निरावरण था।’

रिचर्ड के मंच पर पहुँचने के बाद पाँच हट्टे-कट्टे व्यक्ति मंच पर आए। उनमें एक एक ने लगभग पन्द्रह फुट लम्बी और छह इंच मोटी मजबूत लकड़ी उठा रखी थी। वह बड़ी तेजी से उस बूढ़े की ओर बढ़े और लकड़ी को बूढ़े के पेट के ऐन बीच रखकर पाँचों पूरी शक्ति से दबाने लगे। यह दृश्य इतना आर्श्चयजनक और भयंकर था कि कई स्त्रियाँ चीखें मारकर बेहोश हो गईं और कमजोर हृदय वाले पुरुषों ने भयभीत होकर अपनी आँखें पर हाथ रख लिये। किन्तु वह बूढ़ा एक फौलादी चट्टान के समान अपने स्थान पर ही खड़ा रहा। पाँचों व्यक्ति अपना एड़ी चोटी का जोर लगाकर पसीना-पसीना हो गये किन्तु रिचर्ड को एक कदम भी पीछे नहीं हटा सके, आर्श्चय की बात तो यह थी कि रिचर्ड न अपनी एक टाँग ऊपर उठा रखी थी।

जब वे पाँचों व्यक्ति अपने प्रयासों में सफल नहीं हुए तो रिचर्ड को पराजित करने के और भी कई प्रयत्न किये गये। उदाहरण के लिए सान फ्राँसिस्को से छह भीमकाय पहलवान इसी उद्देश्य के लिए बुलाये गये थे। उन्होंने रिचर्ड को घेर लिया ओर पूरी ताकत से पहलू बदल-बदल कर उसे घूसे मारने लगे। करीब पन्द्रह मिनट तक छहो पहलवान पूरी ताकत से जोर अजमाइस करते रहे किन्तु उन्हें सफलता न मिल सकी। वे सब तो पसीने से नहा गये किन्तु रिचर्ड को जैसे कुछ हुआ ही न हो। वह बड़े आराम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ था। जब वे पहलवान रिचर्ड पर आक्रमण कर चुकने के बाद हटते थे तो वह उन्हं “बस इतना ही दम है।” कह-कह कर और उत्तेजित करता था।

उसके बाद सान जोंस स्टेट यूनिवर्सिटी के करीब साढ़े छह फुट लम्बे और 240 पौंड वनज वाला पहलवान जाँग्योर्ड मंच पर आया। वह गोला फ्रंकने में अद्वितीय था। उसने पूरी ताकत से एक बहुत भारी गोला रिचर्ड के पेट पर फ्रंका पर लेकिन उसका जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा। रिचर्ड ने जाग्योर्ड को भी उसी तरह चिढ़ाया। इससे जाग्योर्ड बुरी तरह तिलमिला उठा और वह अपने बड़ी-बड़ी नुकीली कीलों वाले जूतों से रिचर्ड को चोट पहुँचाने लगा किन्तु रिचर्ड खड़ा-खड़ा मुस्करा रहा था।

इस प्रदर्शन के बाद रिचर्ड एक छह फीट ऊंचे चबूतरे के पास चित लेट गया। उसके चित लेट जाने पर एक बहुत भारी व्यक्ति उस ऊंचे चबूतरे पर चढ़ा और बूओं सहित उसके पेट पर पूरी शक्ति से कूदने लगा। लेकिन रिचर्ड के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। वह ऐसी लापरवाही से मुस्करा रहा था जैसे साल डेढ़ सल का कोई बच्चा उसके पेट पर खेल रहा हो।

ये सारे प्रदर्शन रिचर्ड की इस चुनौती के जबाव में आयोजित किये जा रहे थे, जिसमें उसने कहा था कि जो कोई भी व्यक्ति मुझे जमीन पर गिरा देगा या मुझे त्रस्त कर सकेगा, मैं उसे एक हजार डालर (करीब 8500) का पुरस्कार दूँगा। इस घोषणा के बाद रिचर्ड की चुनौती का जबाव देने के लिए कई व्यक्ति आये, उन्होंने अपने-अपने ढंग से जोर आजमाइश की परंतु कोई भी अपने को इनाम का हकदार सिद्ध नहीं कर सका। जब भी कोई उसकी चुनौती को स्वीकार कर उसे पराजित करने की बाजी रखता था और प्रदर्शन रखा जाता तो उसके आक्रमणों का रिचर्ड पर कोई असर नहीं होता था। अधिक से अधिक यही होता था कि उसका पेट स्पंजी गद्दे की तरह ऊपर नीचे दब जाता था। सन् 1964 में उस पर एक बड़ी नली की बन्दूक से सौ-सौ पौंड के वनज वाले गोले बरसाए गए, तब भी उसे कोई कष्ट होना तो दूर रहा, वह अपने स्थान से हटा तक नहीं।

सन् 1966 में सबसे रोमाँचक और हृदय दहलाने वाला प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में अमेरिका की जल सेना के इन्जीनियरों ने लाँगवीय के स्थान पर साढ़े बारह फुट लम्बी और करीब 2500 पौंड वनज वाली एक छोटी तोत बनाई। इसमें करीब 150 पौंड वनज का गोला डाला गया। रिचर्ड तोप से चार फुट दूर खड़ा हुआ। तोप दागी गई और उससे डेढ़ सो पौंड वजनी गोला, पाँच हजार पौंड वनज की शक्ति से रिचर्ड के पेट से टकराया गया और कोई व्यक्ति होता तो तोप के सामने खड़े होकर इतना भारी और शक्तिशाली गोले का बार सहने के कारण निश्चित रुप से समाप्त हो जाता। यहाँ तक कि उसके माँस के लोथड़े भी नहीं मिलते। परंतु रिचर्ड खड़ा मुस्कराता रहा।

रिचर्ड के इन प्रदर्शनों का विवरण विश्व भर के समाचार पत्रों ने विस्तारपूर्वक छापा और उसे लौहपुरुष, आयरन मैन, इस्पात का आदमी, माँस की चट्टान आदि विशेषणाँ से सम्बोधित किया। रिचर्ड ने यह विद्या कहाँ से सीखी थी? कैसे उसने अपने शरीर को इतना मजबूत बना लिया था कि तोप से छूटे गोले भी उस पर फूल की तरह बरसते थे? इस सम्बन्ध में रिचर्ड का कहना था कि वह सन् 1924-25 में अपने एक अधिकारी के साथ जो भारत की यात्रा पर आया था, भारत आया था। यहाँ आकर वह अपने उच्च अधिकारी के साथ वाराणसी, प्रयाग, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि स्थानों पर गया। इन स्थानों पर कई साधु सन्तों ओर सिद्ध योगियों को रिचर्ड ने देखा। उसने तथा उसके अधिकारी ने इन योगियों से योग साधन की विद्या भी सीखी।

एक विशेष प्राणायाम और आसन की विधि बताते हुए किसी योगी ने रिचर्ड को बताया कि इनका अभ्यास करने पर शरीर चट्टान से भी अधिक मजबूत बन सकता है। रिचर्ड ने अपने अभ्यास का क्रम इतना बढ़ा लिया था कि उस पर गोलों और लोहे की छड़ों का कोई असर नहीं होता।

योगशास्त्र में वर्णित अनेकानेक सिद्धियों में से एक सिद्धि, देह का वज्र के समान सुदृढ़ हो जाना भी है। भारतीय योगियों ने अति प्राचीन काल में योग विद्या को शोध और अनुसंधान द्वारा उस सीमा से भी काफी आगे पहुँचा दिया था जहाँ तक विज्ञान पहुँच सका है और भविष्य में उसको पहुँचाने की सम्भावना है। उसे अंतिम सीमा तो नहीं कह सकते, पर इतना स्पष्ट है कि भारतीय योग विज्ञान ने चेतना के उन शिखरों को छुआ था, जिनकी प्रतिक्रिया परिणिति, अविश्वसनीय आर्श्चय ही लगती है, किन्तु आज भी जहाँ-तहाँ उसके अवशेष मिलते हैं।


शीतऋतु में प्रज्ञापुत्रों के लिए अनुदान सत्र

मनुष्य के निजी पुरुषार्थ को जितना सराहा और प्रोत्साहित किया जाय उतना ही कम है। इतने पर ही यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि अनुदानों का अपना महत्त्व है। पृथ्वी का जीवन सूर्य के अनुदानों से चलता है। मनुष्य को धरती से अन्न, बादलो से जल, और आकाश से पवन की प्राप्ति होती है। वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, वाहन जैसी सुविधाएं उसने स्वतः नहीं कमाई हैं। दाम्पत्ति-जीवन का लाभ दूसरों के अनुग्रह से मिला है। पुरुषार्थ की तुलना में अनुदानों की उपलब्धियाँ ही मनुष्य को सुखी समुन्नत बनाने में अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। यह दूसरी बात है कि वे अनुदान व्यक्ति की पात्रता के अनुरुप् मिलते हैं और जो सत्पात्र होते हैं वे ही उन्हें पचा पाते हैं।

दाता घाटे में नहीं रहता उसे उच्चस्तरीय शक्ति के बढ़े-चढ़े अनुदान मिलते रहते हैं। हिमालय से अनेकों नयाँ निकलती हैं। वह अपनी बफ्र गला कर इन अनेक सरिताओं को अगाध जलराशि प्रदान करने का उपक्रम जारी रखता है। पर उससे उसका वैभव भंडार समाप्त नहीं होता। नियति उसे निरंतर नई बफ्र का उपहार देती रहती है। समुद्र ने आनादि काल से बादलों को असीम अनुदान दिय हैं, पर उसका भण्डार चुक जाने का कोई संकट नहीं। धरती वनस्पतियों द्वारा प्राणियों का परिपोषण करती है। इससे उसकी उर्बरता समाप्त नहीं होती। प्राणियों के मल-मूत्र तथा सूखी वनस्पतियों से वह वैभव उसे खाद रुप में वापिस मिल जाता है। उदारमना समाज सेवा के रुप में अपने पुरुषार्थ एवं कौशल का उदार उपयोग करते हैं बदले में उन्हें लोक-श्रद्धा एवं जन सहयोग के बल पर यशस्वी एवं उच्चपदासीन बनने का अवसर मिलता है। जनता सरकार को टैक्स देती है। सरकार अफसरों और उपकरणों पर उसे खर्च करती है उसकी सहायता से जनता की सुख सुविधा बढ़ती है।

यह अनुदान क्रम चक्र मात्र भौतिक जगत की ही विधि-व्यवस्था ही नहीं अध्यात्म जगत में भी इसी आधार पर प्रगति क्रम चलता है। साधक को गुरुजनों का प्रोत्साहन, मार्ग-दर्शन एवं दैवी शक्तियों का अनुदान उपहार उपलब्ध होता है यह ठीक है कि साधक के निजी पुरुषार्थ का भी महत्त्व रहता है, पर इतने भर से उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ सम्भव नहीं होतीं। वरदान देवता और आशीर्वाद सिद्ध पुरुष देते हैं। उन्हीं अनुदानों के आधार पर साधकों को प्रगति पथ पर बढ़ने की समर्थता एवं सफलता उपलब्ध होती है। महान साधकों का अपने पुरुषार्थ से ही सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव नहीं हो सकता था। विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस के अनुदान न मिले होते तो वे उतना न कर पाते जितना कर सके। चन्द्रगुप्त की सफलता का श्रेय चाणक्य के अनुदान पर निर्भर था। शिवाजी समर्थ रामदास के अनुग्रह से आगे बढ़ सके यदि वह सहयोग न मिलता तो जितना कार्य वे कर सके न कर पाते। गाँधी की घनिष्ठता के बिना विनोवा और नेहरु के सहयोग बिना लालबहादुर शास्त्री सम्भवतः उस स्थान तक न पहुँच पाते जिस तक वे पहुँच सके।

हनुमान, अजफ्रन, भागीरथ, परशुराम आदि ने भारी पराक्रम कर दिखाये इतने पर भी परोक्ष के ज्ञाता जानते हैं कि उन सबकी सफलताएं किन्हीं अन्य शक्तियों के अनुग्रह से सम्भव हो सकीं। राम के बिना हनुमान, कृष्ण के बिना अजफ्रन, गंगा के बिना भागीरथ, शिवजी के बिना परशुराम की क्या स्थिति होती। इसकी कल्पना करने भर से सहम कर रह जाना पड़ता है।

शरीरगत प्रत्यक्ष पुरुषार्थ का ही आँखें लेख-जोखा रखती हैं, पर वस्तुतः प्राणगत ऊर्जा ही इन समस्त गतिविधियों का सूत्र-संचालन करती है। समाज को व्यक्ति के श्रम का - व्यक्ति को प्राण का - प्राण को महाप्राण का अनुग्रह प्राप्त होता है। समाज की गतिविधियों से महाप्राण के समुद्र में ज्वार-भाटे आते हैं। पृथ्वी अन्य ग्रहों से अनुदान पाती है साथ ही अपनी क्षमता से अन्य ग्रह उपग्रहों की सहायता करती है। बच्चे अभिभावकों का स्नेह सहयोग पाते हैं और बड़े होने पर अपने बच्चों के अभिभावक बनकर उनका परिपोषण करते हैं।

आत्मिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण प्रगति के लिए इस अनुदान चक्रक के गतिशील रहने की बात भी सुनिश्चित है। गुरु, शिष्य के बीच मात्र प्रशिक्षण और मार्ग-दर्शन की बात ही नहीं चलती वरन् आदान-प्रदान का सिलसिला भी चलता है। यदि यह सम्भव न हो तो गुरु की प्रखरता पोखर के जल की तरह सड़ने सूखने लगेगी। स्वच्छता तो झरने का पानी बहते रहने से ही अक्षुण्ण रह सकती है। शिष्य के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसका एकाकी पुरुषार्थ कितना ही उच्चस्तरीय क्यों न हो बिना किसी स्रोत से अनुदान आकर्षित किये काम नहीं चल पाता। पेड़ों में बादलों को खींचने और उन्हें बरसाने की सामर्थ्य होती है वह ठीक है, पर यदि बादल उधर से निकले ही नहीं और हल्के होने के कारण बरसने की स्थिति में ही हों तो फिर पेड़ों की आकर्षण शक्ति से भी कुछ काम बनता नहीं है।

राम और लक्ष्मण ने लंका ध्वंस और राजराज्य स्थापना का श्रेय पाया था, पर इस तयि से कम लोग ही परिचित हैं कि महर्षि विश्वामित्र उन दोनों को यज्ञ रक्षा के बहाने अपने तपोवन में ले गये थे और वहाँ उन्हं बला (वैदिकी) और अतिबला (ताँत्रिकी) विज्ञान में पारंगत करके अभीष्ट लक्ष्य को पूरा करने के लिए समर्थ बनाया था। प्रदत्त समर्थना की जाँच-पड़ताल कराने के लिए वे उन्हें जनक के धनुष यज्ञ में ले गये थे। शिव धनुष तोड़ने पर यह निश्चय हुआ था कि जो मिला है उससे उन बड़े प्रयोजनों की पूर्ति हो सकेगी। सर्वविदित है कि राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन का जन्म यज्ञ चरु से हुआ था और उस चरु के विनिर्मित करने में भृंगी ऋषि की तप साधना ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

युग निर्माण मिशन की गतिविधियों के चमत्कारी विस्तार का केन्द्र इन दिनों शाँति-कुँज समझा जाता है। पर यह आँखों का भ्रम मात्र है। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा हिमालय के मध्य केन्द्र से उपलब्ध होती है। बड़े बिजली घर के साथ सम्बन्ध सूत्र जुड़े रहने के कारण छोटे-छोटे कारखाने अपनी गतिविधियाँ चलाते हैं। मशीनों में चलते और उत्पादन करते देखकर मोटा अनुमान यही लगता है कि सामर्थ्य का स्रोत यह मशीनें ही हैं, पर यह सूक्ष्म बुद्धि से ही जाना जा सकता है कि इस समस्त संचालन का श्रेय उस बिजली घर का ही है जो ओझल होते हुए भी उन मशीनों को गतिशील रहने एवं उत्पादन की सामर्थ्य प्रदान करता है। युग निर्माण अभियान की सफलता एवं सम्भावना भी ऐसे ही अदृश्य अनुदानों पर अबलम्बित समझी जा सकती है। महाकाल की प्रेरणाएं ही नहीं उनकी शक्तियाँ भी अदृश्य रुप से युग परिवर्तन का सारा सूत्र-संचालन कर रही है। अग्रिम पंक्ति में खड़े व्यक्तियों को तो मुफ्त में श्रेय मिलता रहता है।

वैटरी कमजोर पड़ने पर नई शक्ति पाने के लिए ‘चार्जर’ के साथ जोड़ना पड़ता है। आग को ईंधन, मोटर को तेल, पेट को आहार की निरन्तर जरुरत पड़ती है। यह जुट सके तो समझना चाहिए कि गतिशीलता का क्रम सुनिश्चित हो गया।

प्रज्ञा परिजनों को विदित है कि मिशन के सूत्र-संचालक को बार-बार हिमालय जाना पड़ता है और वहाँ से नये अनुदान लाकर नये-नये उत्तरदायितवों का निर्वाह करना पड़ता है। निजी उपासना की सामर्थ्य बहुत स्वल्प होती है, उससे निजी आवश्यकताओं को पूरे करने के लिए स्वावलम्बी भी रहा जा सकता है। यदि बड़े काम कन्धे पर लदें तो उनकी पूर्ति के लिए अन्यत्र से बड़ी व्यवस्था करनी पड़ती है। बड़े उद्योगों का काम अपनी निजी पूँजी से नहीं चलता उन्हें बैंकों से उधार लेकर काम चलाना पड़ता है। इसी प्रकार महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य से काम नहीं चलता, किसी सामर्थ्य स्रोत के साथ सम्बंध जोड़कर काम चलाना पड़ता है। प्राण प्रत्यावर्तन, शक्तिपात, वरदान आदि नामों से अध्यात्म क्षेत्र में इसी प्रक्रिया को बड़े के द्वारा छोओं के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है।

प्रज्ञा परिजनों को युग संधि के बीस वर्षों में निजी व्यक्तित्व की प्रखरता सम्पादित करनी होगी साथ ही उस अतिरिक्त सामर्थ्य का उपयोग युग सृजन के लिए भी करना होगा। आत्म-कल्याण और लोक-मंगल के अलग-अलग प्रयोग दीखते हैं पर वस्तुतः वे दोनों एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं। जो आत्मबल संग्रह कर सकेगा उसी के लिए लोक-मंगल का पराक्रम कर सकना सम्भव होगा। साथ ही यह भी तथ्य है कि जिसके मन में लोक-मंगल की उमंग है उसी के लिए आत्म-बल का अनुदान दिव्यशक्तियों द्वारा मिल सकना सम्भव है।

प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को अपनी मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरुप् नव-सृजन के छोटे बड़े उत्तरदायित्व बहन करने ही होंगे। जिन्हें कुछ अधिक न कर सकने की विवशता है उन्हें भी ‘न्यूनतम’ जितना अत्यन्त सरल घर, परिवार की सीमा तक सीमित कार्यक्रम सौंपा गया है।

जो समर्थ हैं उन्हें अधिक समय देने और अधिक पुरुषार्थ करने के लिए युग धर्म ने दबाव डाला है। दोनों को ही अपनी स्थिति के अनुरुप पुरुषार्थ करने होंगे। मूक दर्शक कोई भी नहीं रह सकता। चुप बैठने की छूट किसी को भी नहीं मिलेगी। जो उपेक्षा करेगा वह आत्म प्रताड़ना से, उससे भी अधिक घाटे में रहेगा जो कुछ परमार्थ अपनाने में सहन करना पड़ता। व्यक्ति और परिवार तक जिनकी साधना सीमित है उन्हें प्रज्ञा परिजन और जिन्हें समयदान, अंशदान की दृष्टि से अधिक पुरुषार्थ करने का सुयोग बन पड़ा रहा है, उन्हें ‘प्रज्ञा पुत्र’ की संज्ञा दी गई है। वैसे हैं तो वरिष्ठ दोनों ही अपने। कनिष्ठों को समर्पित बनकर देव स्तर में प्रवेश करने का आग्रह किया गया है।

ऐसी दशा में पूरे परिवार को अपने उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए इस विशेष समय में विशेष अनुदानों की आवश्यकता है। इसके बिना निजी पुरुषार्थ से उतना भर न बन पड़ेगा जितना इस विषम बेला में अभीष्ट है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए हिमालय के मध्य केन्द्र से इन दिनों अतिरिक्त शक्ति प्रवाह चल रहा है जिसे प्रातः व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधना के रुप में उपलब्ध किया जा सकता है। महापुरश्चरण के भागीदार उसे ग्रहण कर भी रहे हैं। (1) प्राण संचार, कुण्डलिनी जागरण, स्थूल शरीर के लिए, (2) दिव्य दृष्टि-तृतीय नेत्र उन्मूलन, सूक्ष्म शरीर के लिए (3) अमृता प्राप्ति, अन्तःकरण स्फुरण, कारण शरीर के लिए। इस प्रवाह की तीन धाराएं हैं जिन्हें वरिष्ठ साधक इन दिनों संकल्प श्रद्धा के साथ अपना रहे हैं और समुचित लाभ ले रहे हैं।

इसके अतिरिक्त इसी शीतऋतु में दिवाली से होली के बीच पाँच-पाँच दिन के विशेष् अनुदान सत्रों का प्रबंध किया गया है ताकि छपे निर्देशों द्वारा समझने अपनाने में कमी रह गई हो, उसकी पूर्ति हो सके। यों पत्राचार विद्यालय और रेडियो पाठ्यक्रम में चलते ही हैं, उनसे उतना काम नहीं बनता। रोग का निदान और औषधियों का निर्धारण पत्रों से भी किया जा सकता है। पर प्रत्यक्ष मिलने से जो सुयोग बन पड़ता है वह पत्राचार से कहाँ सम्भव हो पाता है। साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग भी प्राणवानों के सान्निध्य में रहकर विनिमय एवं आदान-प्रदान के माध्यम से अधिक प्रामाणिक रुप में मिल पाता है।

आठ वर्ष पूर्व शान्ति-कुँज में प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के लिए लगे थे। इसके उपराँत चान्द्रायण समेत उच्चस्तरीय साधना के लिए कुछेक व्यक्तियों को बुलाया था। ब्रह्म वर्चस् की पंचाग्नि विद्या का यह तीसरा दौर है। यों उसको समग्र लाभ उठाने के लिए अधिक दिन उपयुक्त वातावरण में रहकर साधना करने की आवश्यकता पड़ती है, पर उसको साधक की स्थिति को देखते हुए सीमित मार्ग-दर्शन एवं आवश्यक अनुदान स्वल्प समय में भी दिया जा सकता है। शीत ऋतु में पाँच-पाँच दिन के सत्र इसी प्रयोजन के लिए लगाये गये हैं और उनके प्रज्ञापुत्रों तथा प्रज्ञा परिजनों को सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया है। हरिद्वार में शीत ऋतु में हानि होने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए। वैसा कुछ होने वाला नहीं है। विशिष्ट साधनाओं के लिए शीत ऋतु ही सर्वोत्तम मानी गई है। इन सत्रों को पिछले प्राण प्रत्यावर्तन एवं चान्द्रायण सत्र का सार संक्षेप तथा पंचाँग विद्या का नया समावेश सम्मिलित समझा जाना चाहिए।

युग सन्धि का गतिचक्र क्रमशः तीव्र से तीव्रतम होता जा रहा है। अस्तु सामयिक आवश्यकता देखते हुए अनुदान सत्र पाँच-पाँच दिन जितने स्पल्पकालीन ही रखे गये हैं। अधिक तो नहीं पर दस हजार प्रमुख प्रज्ञा पुत्र एवं नैष्ठिक साधकों को इसी शीत ऋतु में निपटना है। बाद में तो उद्घाटन प्रवास के लम्बे दौरे चल पड़ेंगे। ऐसी दशा में फिर दुबारा यह सुयोग किसे कब मिल सकेगा यह कहा नहीं जा सकता। इसबार की शीत ऋतु ही कठिनाई से इस अनुदान प्रयोजन के लिए बनाई गई है। सत्र के दिन तो पाँच ही हैं, पर उनकी व्यस्त प्रक्रिया ऐसी है जिसमें हर साधक की स्थिति के अनुरुप् उसके भविष्य का साधनात्मक मार्ग दर्शन एवं सामयिक अनुदान की व्यवस्था वस्तुस्थिति को समझते हुए की जा सके। यह थोड़ा समय भी एक वर्ष की विशिष्ट साधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धि हो सके।

इन सत्रों में मात्र नैष्ठिक साधक एवं वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों को ही आमन्त्रित किया गया है। अस्तु अपनी साधना तथा लोकमंगल में प्रवृत्ति का परिचय देते हुए ही सम्मिलित होने के लिए आवेदन-पत्र भेजने को कहा गया है। गरिष्ट, पौष्टिक पदार्थ बिना श्रम साधना के नहीं पचते। इसी प्रकार दिव्य अनुदान भी बिना परमार्थ साधना के आत्मसात नहीं हो पाते। बिना आत्मसात हुए पाना न पाना सर्व निरर्थक है। इसीलिए स्वीकृतियाँ देख समझकर ही दी जायेंगी।

बाल बच्चे, पड़ौसी सम्बन्धी, साथ लेकर चलते पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। अनावश्यक भीड़भाड़ से इन वरिष्ठ सत्रों की गरिमा घटेगी। अतएव मात्र वरिष्ठ साधकों को ही उनमें सम्मिलित किया जाएगा। तीर्थयात्रा र्प्यटन जैसी सुविधा न मिलने से अनावश्यक लोगों को साथ लाना सभी के लिए असमंजस का निमित्त बनेगा। ऐसी भीड़ पर प्रतिबन्ध तो पहले भी था पर इन सत्रों में उसमें विशेष कड़ाई बरती जायेगी। प्रतिबन्ध तोड़ने वालों को बैरिंग वापिस भी लौटना पड़ सकता है। परिवार सत्र गर्मियों से आरम्भ हो जायेंगे। जिन्हें बच्चों समेत आना वे अपने आने की योजना उस शांखला के अर्न्तगत बनाये और फिर कभी आवें।

शिविर में आये परिजनों को हरिद्वार एवं ऋषिकेश के दर्शनीय स्थल देखने की सुविधा भी दी जायेगी, किन्तु उसका समय एवं क्रम निश्चित होगा। मन चाहे ढंग से किसी को भी कहीं भी जाने की छूट नहीं होगी।

सत्रों में सम्मिलित होने वाले हर साधक से प्रायश्चित विधान कराया जायेगा। प्राश्श्चित द्वारा शुद्ध हुई मनोभूमि पर ही अनुदानों की स्थापना और उनका फलित होना सम्भव होता है।

साधकों में दिव्य संस्कारों के उदय का प्रयास आहार के माध्यम से भी चलेगा। हिमालय की सिद्ध बनौषधियों का क्वाथ चाय की तरह पीने को दिया जायेगा। भोजन के साथ आँवले एवं वनौषधियों की चटनी रहेगी। भोजन में केवल हविष्यान्न और मूँग की दाल का ही समावेश होगा। उसके अतिरिक्त कुछ और खाने पर प्रतिबन्ध होगा। विशेष आवश्यकता पड़े तो संचालकों के परामर्श एवं स्वीकृति से ही हल निकाले जा सकेंगे।

हर साधक को निर्धारित साधनाक्रम पूरा करना होगा। साधकों की स्थिति देखकर उनके लिए कुछ विशेष साधनाओं तपश्चर्याच का निर्धारण भी किया जा सकता है। शक्ति संचार की तीनों ध्यान धारणाओं का अभ्यास स्वयं गुरुदेव करायेंगे।

शीत ऋतु के यह अनुदान सत्र 15 होंगे। उनकी सूची इस प्रकार है -

(1) 20 से 24 नवम्बर 80, (2) 26 से 30 नवम्बर 80, (3) 1 से 5 दिसम्बर 80 (4) 7 से 11 दिसम्बर 80, (5) 13 से 17 दिसम्बर 80, (6) 19 से 23 दिसम्बर 80, (7)1 से 5 जनवरी 81, (8) 7 से 11 जनवरी 81, (9) 13 से 17 जनवरी 81, (10) 19 से 23 जनवरी 81, (11) 1 से 5 फरवरी 81, (12) 7 से 11 फरवरी 81, (13) 13 से 17 फरवरी 81, (14) 19 से 23 फरवरी 81, (15) 25 फरवरी से 1 मार्च 81 ।

सम्मिलित होने वाले समय रहते अपना स्थान सुरक्षित करा लें। सीमित स्थान पूरे हो जाने पर अगले वर्ष या फिर कभी के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।


अपनों से अपनी बात

अगस्त, सितम्बर की अखण्ड-ज्योति में प्रज्ञा परिजनों से कुछ अनुरोध किये गये हैं जिनमें युग सन्धि के महान पर्व पर नव सृजन अभियान में कुछ सहयोग देने की प्रेरणा का समावेश है। जागृतों एवे मूर्धन्यों से ऐसी आशा, अपेक्षा की जाना उचित भी है और आवश्यक भी। व्यक्तिगत निर्वाह एवं सुख-सुविधा की व्यवस्था बनाना भी ठीक है किन्तु उसमें इतना व्यस्त और लिप्त होना उचित नहीं जिसमें आत्मकल्याण और लोकमंगल जैसे उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए कुछ भी करते धरते न बन पड़े।

युग सन्धि जैसे विशेष समय हजारों, लाखों वर्षों बाद आते हैं। उन दिनों विभूतिवानों की विशिष्ट परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए - निजी कामों को गौण मानते हुए - समय की माँग पूरी करने को प्रमुखता देनी पड़ती है।

इतने पर भी कुछ की मनःस्थिति या परिस्थिति ऐसी होती है जो चाहते हुए भी कुछ कर नहीं पाते। ऐसे परिजनों के लए एक सरल मार्ग यह है कि अपनी वे निजी विचारणा और जीवनचर्या में युग धर्म के अनुरुप परिवर्तन प्रारम्भ करें। नव सृजन की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने का प्रयत्न करें। भले ही वह न्यूनतम ही क्यों न हो।

(1) साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार उपचारों को आत्मोर्त्कष के आधार भूत अवलम्बन माना गया है। इन्हें किसी न किसी रुप में अपनी जीवनचर्या में स्थान देने और परिवार को भी विस्तृत शरीर मान कर उसमें भी वे हलचलें उत्पन्न की जानी चाहिए, यह हर स्थिति के व्यक्ति के लिए नितान्त सरल है।

साधना -

उपासना, पराशक्ति के साथ अपना सम्बन्ध सूत्र जोड़कर उसके अनुदानों के लिए द्वार खोलने की प्रक्रिया है। युग संधि में यह नितान्त आवश्यक है। भले ही वह दस मिनट जितनी स्वल्प ही क्यों न हो। इतने पर भी उसे निष्ठा युक्त तो होना ही चाहिए। नैष्ठिक अर्थात आस्था और दृढ़तापूर्वक अपनाया जाना। भोजन अथवा शयन के साथ उसका सम्बन्ध जोड़ा जाय। इतना किये बिना भोजन न करेंगे। पर सोयेंगे नहीं ऐसा नियम बना लेने पर दस मिनट की उपासना भी प्रभावी हो सकती है।

प्रातः आँख खुलते ही विस्तर पर ही गायत्री का मानसिक जप और सविता के प्रकाश का ध्यान किया जाय। प्रातःकाल के स्वर्णिम सूर्य को जीवन का सौभाग्योदय माना जाय और नमन करते हुए इस आलोक को आत्मसात करने की भावना की जाय। शरीर से सर्त्कम, मन से सद्विचार, अन्तःकरण से सद्भाव अपनाये जाने की दिव्य प्रेरणा ही सविता का अनुदान समझा जाय। रात्रि को भी सोते समय विस्तर पर गायत्री का मानसिक जय और अस्त होते हुए सविता का ध्यान किया जाय। सविता अर्थात जीवन। अस्त अर्थात् मरण। मरण को ध्यान में रखने तथा उसकी दूरदर्शिता तैयारी की बात सोची जाय।

यह न्यूनतम उपासना हुई। इनके अतिरक्त स्नान करने के उपराँत भी कुछ समय गायत्री का प्रतिमा पूजन, नमन, अभिनन्दन, जप, ध्यान का कुछ औपचारिक नियम बनाया जाय। परिवार में भी हर सदस्य को इतना करने की प्रेरणा दी जाय।

स्वाध्याय -

वर्तमान परिस्थितियों में महामनीषियों का सत्संग सम्भव नहीं रहा। वे या तो हैं ही नहीं, है तो व्यस्त रहते हैं। फिर अपनी सुविधा के अनुरु उनसे सर्म्पक साधना भी सम्भव नहीं। ऐसी दशा में समस्याओं के समाधान और उपयोगी मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए ‘स्वाध्याय’ ही एकमात्र अवलम्बन है। उगे आत्मा की भूख बुझाने के लिए अन्न की तरह ही अनिवार्य माना जाय और इसके लिए न्यूनतम आधा घण्टा समय निकाला जाय। भले ही वह काम-काज के बीच थोड़ी सुविधा मिलने के समय ही क्यों न किया जाय।

‘अखण्ड-ज्योति’ इस दृष्टि से उच्चस्तरीय मधु संचय है। अब इसी सहयोगिनी ‘युग निर्माण’ पत्रिका साथ में गुँथ गई हैं। दोनों समन्वय स्वाध्याय की आवश्यकता को अन्न, जल की तरह पूरी कर सकती हैं। अखण्ड-ज्योति का विषय चिन्तन को और युग निर्माण का कर्म को दिशा देना है। यह ज्ञान कर्म का समन्वय-कृष्ण, अजफ्रन का - राम हनुमान का समन्वय जैसा युग्म समझा जा सकता है। इन पत्रिकाओं को दो बार पढ़ा जाय। एक बार सिद्धान्त समझने की दृष्टि से और दूसरी बार यह सोचने के लिए कि क्या इन प्रतिपादनों में से कुछको अपने जीवन क्रम में समिमलित किया जा सकता है। यदि हाँ तो वर्तमान परिस्थितियों में उसके लिए किस प्रसंग में, किस क्रम से कदम बढ़ाया जाय? इस प्रगति पथ के आन्तरिक और बाहरी अवरोधों से किस प्रकार जूझा जाय? उच्चस्तरीय परिणामों के साथ सम्बद्ध होना ‘चिन्तन’ ओर उन्हें क्रियान्वित करने की योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है। स्वाध्याय सत्संग-प्रत्यक्ष और चिन्तन मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।

संयम -

संयम को तपश्चर्या कहा गया है। संयम अर्थात अनुशासन। अस्त-व्यस्त और अनियंत्रित जीवनचर्या ही प्रगति पथ की सबसे बड़ी बाधा है। अपने को आदर्शवादी अनुशासन में कसने के प्रयासों को तप साधना में सम्मिलित किया जा सकता है। रुझान, श्रम, विचार ओर धन की चारों सम्पदाओं पर ऐसा अनुशासन बिठाना चाहिए कि इनके अपव्यय को जितना बचाया जा सकना सम्भव हो बचाया जाय।

(1) समयगत अनुशासन यह है कि प्रातःकाल उठते ही व्यस्त दिनचर्या बनाई जाय ओर उस पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहा जाय। आलस्य में श्रम और प्रमाद में मनोयोग का एक क्षण या एक कण भी बर्बाद न होने देने का प्रयत्न किया जाय। इस निर्धारण में आजीविका, परिबार एवं सामान्य क्रिया-कलापों के अतिरिक्त लोकमंगल परमार्थ के लिए समयदान का भी समुचित स्थान रखा जाय।

(2) विचारगत अनुशासन यह है कि सृजनात्मक चिन्तन का अभ्यास डाला जाय। मनोविकारों तथा निरर्थक कल्पनाओं की धमाचौकड़ी को रोकने के लिए मस्तिष्क को खाली न रहने देना। अध्ययन या सृजन चिन्तन में लगाने की आवश्यकता है। बुरे विचारों को भले विचारों से काटने का संघर्ष निरंतर जारी रक्षा जाय। प्रमाद तनिक भी न बरता जाय। सदा जागरुक रहा जाय।

(3) रुझान संयम यह है कि इन्द्रिय लिप्सा, वासना एवं बड़प्पन की तृष्ण को अनियंत्रित न होने दिया जाय। इन्द्रियाँ अमर्यादित वासना के लिए ललकती रहती है। मन भी ग्यारहवीं इंन्द्रिय हे। उसे संचय की तृष्णा और बड़प्पन की अहंता छाई रहती है। उपलब्धियों की आतुरता, मर्यादाओं को तोड़कर किसी भी प्रकार मनोरथ पूरा करने की मचलती है। अभिलाषाओं के इस रुझान पर अंकुश लगाया जाय और मनमानी करने से रोका जाय।

(4) धन का अनुशान यह है कि ईमानदारी से कमाया जाय और दूरदर्शिता पूर्वक खर्चा जाय। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह र्प्याप्त माना जाय। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाई जाय। उत्तराधिकारियों के लिए संग्रह न करके उन्हें सुसंस्कारी स्वावलम्बी बनाना ही र्प्याप्त समझा जाय। बचत को पीड़ा और पतन के निवारण तथा सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया जाय। फ्रशन, ठाठ-बाट, दुर्व्यसन अनुपयाक्त प्रथा-प्रचलन आदि अपव्ययों में होने वाले खर्च को कठोरता से रोका जाय और बजट बना कर आय-व्यय का सुनियोजित निर्धारण किया जाय।

उपरोक्त चारों संयमों को व्यावहारिक जीवन की तर साधना कहा जा सकता है। अब तक की अभ्यस्त आदतों को रोकने और उन्हें शालीनता के ढाँचे में नये सिरे से ढालने, अनुपयुक्त को घटाने और उचित को बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय। आत्मचिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के तथ्यों पर विचार करते रहने से संयम साधना के उपाय सूझते और प्रबल होते चलते।

सेवा -

सेवा का तार्त्पय है पिछड़ेपन का प्रगतिशाला में - असमर्थता का समर्थता में परिवर्तन। दो सामयिक संकट से उबारने के लिए किन्हीं आपत्तिग्रस्तों की सहायता करना भी सेवा के अंतर्गत आता है, पर उस महान् प्रवृत्ति को इतनी छोटी सीमा तक अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। सेवा एक सतत प्रवृत्ति है। यदि उसे कष्ट पीड़ितों तक सीमित रखा जाय तो फिर उन्हीं को ढूँढते फिरना पड़ेगा। और यदि सत्पात्र न मिले तो सेवा का प्रवाह ही रुक जायेगा।

आज सर्वत्र आस्था संकट छाया हुआ है। अधोगामी विचारणा ने लोकमानस पर आधिपत्य जमा रखा है। व्यक्तिवादी संकीर्णता और सवार्थन्धता जन-जन पर छाई हुई है। सर्वतोमुखी पतन ओर पराभव का यह एक ही कारण है। व्यक्ति और समाज के लिए इस महासंकट ने सर्वनाश की विभीषिकाएं खड़ी की हैं। अस्तु दूरदर्शी सेवा साधना इन दिनों एक ही है - विचार क्राँति। समस्त समस्याओं का यह एक ही हल है। प्रज्ञा अभियान या प्रज्ञावतार का भी यही प्रयोजन है कि अवाँछनीयता पक्षधर प्रचलित विचार प्रवाह को उलट कर उस स्थान पर उत्कृष्ट आदर्शवादिता की नये सिरे से स्थापना की जाय। विवेक युक्त दूरदर्शिता का निर्धारण एक ही है कि इन दिनों समस्त साधनों को झोंक कर जन-मानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन की सेवा साधना अपनाई जाय।

इस प्रयोजन के लिए इन दिनों (1) युग साहित्य (2) प्रवचन परामर्श (3) जन सर्म्पक यह तीन उपाय अपनाये जा रहे हैं। जिनके पास अवकाश है वे इन प्रयोजनों को व्यापक क्षेत्र में विस्तृत करने के लिए अधिक पुरुषार्थ करने में संलग्न हैं। प्रज्ञापीठें भी इन्ही तीन प्रयोजनों को अपना केन्द्र बिन्दु बनाये हुए हैं। उनके चल पुस्तकालय, जन्मदिवसोत्सव, विचार सत्र एवं प्रव्रज्या कार्यक्रम इन दिनों प्रािम एवं प्रमुख माने जा रहे हैं और अपेक्षा की जा रही है कि विचार क्राँति की आरंभिक भूमिका सम्पन्न होते ही - प्रगति पथ पर अन्य अनेकानेक कदम उठा सकना सुनिश्चित रुप् से सम्भव हो सकेगा।

जिन्हें व्यस्तता की कठिनाई है। जो जन-सर्म्पक के लिए अवकाश नहीं पा रहे हैं उन्हें न्यूनतम कार्यक्रम के अनुसार यह तीनों कार्यक्रम अपने परिवार को ही छोटा समाज मानकर इन उपक्रम अपने परिवार को ही छोटा समाज मानकर इन उपक्रमों को इस परिधि में क्रियान्वित करने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसका सरल तरीका यह है कि प्रज्ञा परिवार को सदस्यता के साथ जुड़ी हुई अनिवार्य शर्त की ओर से यह उपेक्षा बरतना बन्द किया जाय और उसे आत्मकल्याण एवं लोकल्याण की दुहरी आवश्यकता पूर्ण करने में समर्थ मानकर अविलम्ब अपनाया जाय।

दस पैसा तथा एक घण्टा समय ज्ञान यज्ञ के लिए लगाते रहने पर ही कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में प्रज्ञा परिवार का परिजन कहा जा सकता है। झूठ-मूठ गायत्री परिवार का युग निर्माण परिवार के सदस्य कहने की आत्मप्रवचना करने से कोई लाभ नहीं। यदि सृजन शिल्पियो में अपना नाम सचमुच की सम्मिलित रखना है तो उस अनिवार्य सदस्यता शर्त का परिपालन भी ईमानदारी से होना चाहिए।

एक घण्टा समय परिवार में सुसंस्कारिता सर्म्वधन के लिए लगाना चाहिए और दस पैसा घरेलू ज्ञान मंदिर की साधना में लगाना चाहिए। इन दिनों पच्चीस पैसा जितने स्वल्प मूल्य की खोलते प्राण से भरी पूरी निताँत सस्ती पुस्तिकाएं भी युग साहित्य के रुप में छप रही है। दस पैसा से तीन रुपया मासिक होता है इतने से 12 पुस्तिकाएं खरीदी जा सकती है। इन्हें घर, परिवार के सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने का प्रबंध किया जाना चाहिए। दोनों पत्रिकाएं इसके अतिरिक्त खरीदी जा सकें तो इतना साहित्य घर, परिवार में स्वाध्याय की परम्परा को प्रखर बना सकता है।

जन-सर्म्पक के क्षेत्र में अपने निजी परिवार को तथा जो कार्यवश मिलते आते रहते हैं, उन्हीं एक सीमित कर लिया जाय तो भी नव सृजन का न्यूनतम कार्यक्रम र्भिता रह सकता है। परिवार निर्माण योजना के अंतर्गत वलिवेश्व, नित्य नमन वन्दन, आरती, सहगान रात्रि को कथा, कहानी, अवकाश के समय पारिवारिक पंचशीलों के निमित्त सामूहिक प्रयास जैसे कई छोटे किन्तु अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम सम्मिलित हैं। इन्हें अपनाने से परिवार में कायाकल्प जैसे सत्परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। श्रमशीलता, सहकारिता, मितव्यता, सज्जनता, सुव्यवस्था के पंचशीलों को-परिवार की आदतों में सम्मिलित करने के लिए लगाये गये समय को समाज सेवा का ही एक छोटा रुप माना जा सकता है। इसके लिए परिवार निर्माण योजना का नये सिरे से अध्ययन करना चाहिए। और उसके लिए योजनाबद्ध रुप से अपने संकल्पित समयदान का उपयोग करना चाहिए।

दफ्तर में - कारखानों में काम करने वालों को साथियों से वास्ता पड़ता ही है। दुकान पर ग्राहक और घर पर मित्र अतिथि, सम्बन्धी आते-जाते ही रहते हैं। इनसे नव सृजन मिशन की - प्रज्ञा अभियान की चर्चा करते रहना यह भी एक बड़ा काम है। स्वयं के कुछ अधिक करने की स्थिति न होने पर भी यह सम्भव है कि उस चर्चा के फलस्वरुप किसी को उत्साह एवं साहस मिले और वह अपने संस्कारों तथ परिस्थितियों के अनुरुप समय की माँग को पूरा करेन के लिए उपयोगी दिखा धारा एवं प्रेरणा प्राप्त करके उससे भी अधिक कर-गुजरे जितना कि अपने से भी न बन पड़ता। इस प्रकार यह चर्चा करना और प्रेरणा देना भी कई बार इतनी उपयोगी हो सकती है जिसे उच्चस्तरीय परमार्थ में सम्मिलित किया जा सके। अपनी पत्रिकाएं तथा पुस्तकें इन मिलने वालों को देते और वापिस लेते रहने का सिलसिला चलाते रहा जाय तो यह सेवा भी असामान्य ही कहा जायगी।

परमार्थ का एक स्वरुप यह है कि घर में धर्मघट (अन्न घट) रखा जाय और अपनी रोटी मिल बाँटकर खाने का सिद्धाँत निभाया जाय। इन दिनों ‘शालीनता’ से बढ़कर दुःखी दारिद्र पीड़ित ओर कदाचित ही कोई दुर्दशाग्रस्त हो। उसके घाव भरने एवं उपचार करने में सहायता करने के बराबर दूसरा कोई पुण्य परमार्थ आज की परिस्थितियों में हो नहीं सकता। युग धर्म की - समय की - माँग की पूर्ति के लिए उन प्रयासों का परिपोषण होना चाहिए जो मानवी चिन्तन को परिष्कृत करने में निरत हैं। अनेकों व्यक्ति अभी भी सच्चे ब्राह्मणाँ, वानप्रस्थों, परिव्राजकों की तरह इन दिनों भी प्राचीन काल की संत परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। इनके गुजारे का प्रबन्ध करना सच्चे अथों में ब्रह्मभोज है। ऐसे ही सार्थक दान पुण्य को शास्त्रों में देव अनुग्रह, वरदान, आशीर्वाद एवं र्स्वग सद्गति देने वाला बताया गया है। प्रज्ञा अभियान में संलग्न कार्यकर्त्ताओं का निर्वाह एवं उस प्रयोजनों के लिए साधनों के लिए पैसा चाहिए। यह अंशदान हर पुण्यात्मा की कमाई में से नियमित रुप से निकलना चाहिए। ‘धर्मघट’ (अन्न घट) स्थापित होने चाहिए। एक मुट्ठी अनाज उसमें पड़ते रहने से यह परम्परा बनती है कि हमारी पवित्र कमाई में ईश्वर का, धर्म का, समाज का हिस्सा स्वीकार किया गया और उसे सद्भावना पूर्वक चुकाया गया। यह एक मुट्ठी अन्न भले ही पैसे की दृष्टि से नगण्य-सा ही क्यों न हो, उसे न्यूनतम ही क्यों न कहा जाय, पर उसे एक उपयोगी स्थापना होती है, परम्परा बनती है। इसका शुभारम्भ प्रज्ञा परिवार के परिजनों को ही करना चाहिए।

जीवित की भट्टी जलती रहे इसके लिए ईंधन डालने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। नजी षरीर निर्वाह की राशि में स्वाध्याय के लिए - परिवार निर्माण में धरेलू पुस्तकालय के लिए और लोगमंगल में नव-सृजन के लिए दस-दस पैसा जैसी राशियाँ लगाई जाय और जहाँ समूची जीवनचर्या के साथ भारी खर्च बहन करने पड़ते हैं वहाँ इन तीनों क्षेत्रों के लिए दस-दस पैसे अर्थात् कुल मिलाकर तीस पैसा और बढ़ा दिये जायं। यह वृद्धि कठिन पड़ती हो तो किन्हीं मदों में कटौती करके उसे पूरा किया जाय। पर आत्मिक प्रगति के लिए इतनी उदार साहसिकता तो अपनाई ही जानी चाहिए। धर्मघटों वाली राशि को घर की उदार महिलाओं के जिम्मे छोड़ा जा सकता है ओर उसे अभियान के उद्गम केन्द्र शाँति-कुँज में सर्वश्रेष्ठ उपयोग के लिए भिजवाया जा सकता है।

प्रज्ञा परिजन अपना जन्मदिवसोत्सव हर वर्ष बनायें। इसकी विधि-व्यवस्था सस्ती, सरल, आकषर्ण, प्रभावोत्पादक होने के साथ-साथ परिवार का वातावरण बदलने में अत्यंत सहायक भी है। पूजा, उपचार, यज्ञ आतिथ्य में कुल मिलाकर पाँच रुपये से अधिक खर्च न होने पाये, इस अनुशासन से वह सर्व साधारण के लिए अति सुगम बन गई है। इस माध्यम से एकत्रित हुए मित्र परिजन जीवन के सदुपयोग तथा उसके साथ जुड़े हुए अनेकों समाधान लेकर वापिस लौटते हैं।

जिसे जन्मदिवसोत्सव है उसे अपनी बुरी आदतों में से एक घटाने और सत्प्रवृतियों में एक बढ़ाने के लिए व्रत लेना पड़ता है। इस प्रकार हर साल एक सुधारक्रम चलते रहने पर क्रमशः वरुक्ति निर्माण का वह आधार बनता चला जाता है जिसमें परिवार और समाज को प्रकारान्तर से अधिक समुन्नत बनने का अवसर मिलता रहे।

दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने से उन्हें बोलती पुस्तकें बनाने और नव सृजन के अनुरुप् वातावरण बनाने के प्रयास युग निर्माण योजना के अंतर्गत चलते हैं। इसका छोटा रुप घर में आदर्श वाक्यों के शीशे में मड़े चित्र, तस्वीरों की तरह लगाना हो सकता है। वर्षा, धूप से बची रहने वाली किवाड़ों, खिड़कियों पर - बड़े साइज के दर्पणों पर - भी उनहें चिपकाया जा सकता है। बच्चों की पाठ्य पुस्तकों पर जिल्द बनाकर उन पर छोटे साइज के आदर्श वाक्य चिपका दिय जायं तो उन्हें बार-बार आँख के सामने से निकलने पर एक धीमा संस्कार बनता है।

विनोद के लिए संगीत, सहगान का घर में अभ्यास चल पड़े। शाकवाटिका, पुष्पवाटिका लगाने जैसे शौक आरम्भ किये जायं तो घर में उदासी का वातावरण न रहेगा।

सर्म्पक साधन के तीन आधार हैं - (1) प्राण संचार की यह ध्यान धारणा जिससे इन दिनों युग धन्धि के पुरश्चरण के भागीदार लाभाविन्वत हो रहे (2) तीर्थ यात्रा एवं परिवार प्रतिक्षण के लिए शाँति-कुँज में समय-समय पर चलने वाले सत्रों में समिलित होना (3) पत्र-व्यवहार से प्रगति पथ पर अग्रसर करेन वाले परामर्श अनुदान प्राप्त करते रहना। इन तीनों से वे प्रज्ञा परिजन भी लाभान्वित होते रह सकते हैं जिन्होंने ‘न्यूनतम साधना’ अपनाये रहने का निश्चय किया है। अस्त-व्यस्त ओर अस्थिर मति के तो हर क्षेत्र में असफल रहते हैं। उनके लिए यह न्यूनतम साधना अति सरल होते हुए भी कठिन पड़ेगी और निभ न सकेगी। इसीसे कहा गया है कि ‘निष्ठा’ बन सके तो ही आत्म-कल्याण और लोकमंगल के उभयपक्षीय साधनों को न्यूनाधिक मात्रा में साधना सम्भव हो सकता है।

उपरोक्त सभी प्रसंगों में प्रज्ञा परिजन पत्र-व्यवहार द्वारा ‘शाँति-कुँज’ हरिद्वार से आवश्यक प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन प्राप्त करते रह सकते हैं। इस संदर्भ में जवाबी पत्र भेजने की बात अनिवार्य रुप से ध्यान में रखी जानी चाहिए। बढ़ते हुए पत्राचार का डाक-व्यय वहन कर सकना अब मिशन के लिए भी किसी प्रकार शक्य नहीं रह गया है। इसलिए जवाबी पत्र भेजने की शर्त पहले की अपेक्षा अधिक कड़ी कर दी गई है।

व्यस्त प्रज्ञा परिजन भी इतना तो कर ही सकेंगे


आत्म-आवरण

(मंगल विजय)


आत्म-आवरण (kavita)

जैसे सूरज को ढंक लेते, गहराये-कजरारे बादल। उसी तरह के आत्म-ज्योति पर, फ्रले हैं कलुषों के आँचल॥1॥

आत्म-शक्तियाँ सुप्त पड़ी है, कई आवरण चढ़े हुये हैं। आत्म-चेतना पर विस्मृति के, मोटे-ताले पड़े हुये हैं॥

कोषों पर जो पड़े आवरण, जब तक नहीं हटाये जाते। तब तक हमें विपुल-वैभव का, मिल न सकेगा कोई भी फल ॥2॥

कोषों से हट गये आवरण, कमी नहीं है फिर वैभव की। बंद-ग्रंथियाँ अगर खुल गई, दौलत मिली आत्म-उद्भव की॥

कोषों, चक्रों और ग्रन्थियों से अद्भुत-भंडार भरा है। जिस दिन यह भंडार मिल गया, सारं संकट जायेंग टल॥3॥

कोषों की हम करें साधना, चक्र ओर ग्रन्थियाँ जगायें। इतने वैभवशाली हो, क्यों कंगले हों? निहाल हो जायें॥

सदाचार, संयम, तप-निष्ठा और तितीक्षा-वृत ही पालन। सेवा, स्नेह और जन-जन के प्रति समता, ममता हो निश्छल॥4॥

हो प्रकाश के पुँज, भटकते रहें नहीं हम अन्धकार में। रखे हाथ पर हाथ न बैहे रहें, निराशामय-विचार में॥

हम अज्ञान, भाव, अशक्ति को हते रहें न अब जीवन में। अथक-आत्म-विश्वास जगायें और उजागर करें आत्मबल॥5॥

स्वयं प्रकाशित हो, प्रकाश दें अंधकार में खोये जन को। आत्म-शक्ति को जगा, जगामें आओ! हम सोये जन-मनको॥

भूली-भटकी-भौतिकता की, आत्म-ज्योति का मिले उजाला। ऐसे आध्यात्मिक-प्रकाश से करें प्रकाशित सारा भूतल॥6॥

*समाप्त*