विशिष्ट अनुदान सत्र-स्पष्टीकरण

इस अंक में दीपावली से होली तक चलने वाले अनुदान एवं परामर्श सत्रों का विवरण छपा हैं। उनके सर्न्दभ में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन एवं स्पष्टीकरण इस प्रकार हैं।

1. यह सत्र “अनुदान एवं परामर्श सत्र” के स्थान पर ‘युग सन्धि के विशिट अनुदान सत्र होंगें। प्राणप्रत्यावर्तन सत्र, चान्द्रायण व ब्रह्मवर्चस् साधनासत्रों के संयुक्त स्व रुप जैसें होंगे।

2. इसका लाभ सभी नैष्ठिक ‘प्रज्ञापुत्र’ प्राप्त कर सकेंगे। ‘नैष्ठिक प्रज्ञापुत्र’ वे हैं जो मिशन द्वारा निर्धारित युग साधना के लिए अपने समय, प्रभाव, प्रतिभा एवं साधनों का योगदान उल्लेखनीय स्तर पर नियमित रुप से, सतत करते चले आ रहे हैं। ऐसे प्रज्ञा पुत्र यदि युग सन्धि की नैष्ठिक साधना को शर्ते पूरी नहीं कर पा रहें हैं वे भी इन सत्रों का लाभ लें।

3. विशिष्ट अनुदान सत्रों में जो अनुदान दिए जाने वाले हैं, वे ऐसे गरिष्ठ, पौष्टिक भोजन जैसे होंगे, जिन्हें भरपूर श्रम किये बिना हजम नहीं किया जा सकता। युग साधना में श्रम समय अथवा साधनों के योगदान को त्रीव सक्रियता ही वह व्यायामहै जो इन दिव्य अनुदानों को पचाकर साधक को आत्मबल-ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न बना सकती हैं इसीलिए यह शर्त अनिवार्य हैं।

4. आवेदनों में अपनी उपासना एवं युग साधना के अनुदानों का संक्षिप्त पर स्पष्ट विवरण अवश्य दें।

5. इन सत्रों की विशेषताएँ इस प्रकार होंगी -

(1) सत्र के हर साधक कों प्रारम्भ में प्रायशिचत्त विधान कराया जायगा।

(2) हिमालय की आध्यात्मिक गुणसर्म्बधक जड़ीबूटियों का क्वाथ चाय की तरह दिया जाएगा।

(3) भोजन में दो बार हविष्यान एवं मूँग की दाल का ही सेवन कराया जायगा। उसके अतिरिक्त कुछ भी खनें पर प्रतिबन्ध रहेगा, विशेष आवश्यकता पड़े तो संचालकों से परामर्श एवं स्वीकृति प्राप्त करके ही समाधान निकाला जा सकेगा।

(4) शक्ति संचार सम्बन्धी ध्यानधारणा स्वयं पूज्य गुरुदेव नित्य करायेंगे।

(5) साधक का स्तर देखकर उसके लिए, विशेष साधनाओं-तपश्चर्याओं का निर्धारण सत्राो में किया जायेगा।

(6) इन सत्रों का अनुशासन कड़ा रहेगा, इसलिए शरीर से जर्जर व्यक्ति, बालक, महिलाओं को साथ लाने वाले, उनका लाभ न उठा सकेंगें।

(7) हरिद्वार, ऋषिकेश, के दर्शनिय स्िलों के भ्रमण को अनुशासन बद्ध व्यवस्था रहेगी। उसी के अर्न्तगत घूमने की सुविधायें भी रहेंगें। मनमोजी ढ़ग से घूमने को छूट नहीं होगी।

(8) इन सत्रों को विस्तृत विवरण 28 सितम्बर के साप्ताहिक में भी देखा जा सकता हैं।


नवरात्रि साधना-विशेष ज्ञातव्य

नवरात्रि साधनों के साथ चलायें जाने वाले ज्ञानयज्ञ को इस पत्रिका के लेखों के आधार पर ही चलाया जाय। इन्हें पू॰ गूरुदेव के विशेष सन्देश के रुप में सब तक पहूँचाना है। सम्पूर्ण ‘अखण्ड-ज्योति’ को नौ खण्डों में विभक्त कर प्रत्येक दिन एक खण्ड के नबाह्न पारायण की व्यवस्था इन नौ दिनों तक चलती रहे तो इसीसे आलोक विस्तार की प्रक्रिया पूर्ण हुई मान ली जाएगी। युग सन्धि के बीजारीयण वर्ष के कारण इस आश्विन नवरात्रि का विशेष महत्व हैं। इस पर्व पर कोई परिजन विशेष साधना से वंचित न रहें। साधना की सूचना मिलने पर उसके संरक्षण एवं दोष परिमार्जन की व्यवस्था शान्ति कुन्ज हरिद्वार में कर दी जायेगी। उत्तर के लिए जबाबी पत्र भेंजें।


परिवर्तन असुविधाजनक होते हुए भी अपरिहार्य हैं

रात्रि का अन्त और दिन का प्रारम्भ प्रभात कहलाता हैं। वह परिवर्तन, आर्श्चयजनक अद्भुत एवं नये स्तर की सम्भवनाओं से भरा होता हैं। इसलिए उनींदे लोगों की असुविधाजनक एवं नये उत्तरदायित्वों को विवशता लादने वाला और भारी लागता हैं इतने पर भी उन्हें नई स्थिति में नये प्रवाह में बहना ही पड़ता हैं। रात्रि लौटनी नहीं और दिन रुकना नहीं। परिवर्तन के अनुरुप ढलने के अतिरिक्त किसी के सामने और कोई चारा रह नहीं जाता।

भ्रुण अँधेरी कोठरी में भी निरापद निर्वाह करता हैं, पर उसकी विकसित स्थिति को देखते हुए नियति उसे उन्मुक्त आकाश और स्वच्छन्द वातावरण में प्रवेश करने की सुविधा प्रदान करती हैं। प्रगतिक्रम में परिवर्तन की आवश्यकता अनिवार्य हैं और अपरिहार्य भी। प्रसव को बेला सभी को कष्टकारक और असुविधाजनक होती हैं प्रसूता, शिशु, नर्स और परिवार के अन्य सभी को सामान्य काम छोड़कर उस प्रसूति बेला में असाधारण जागरुकता एवं तत्परता का परिचय देना पड़ता है। इतने पर प्रसव का परिणाम अन्ततः हैं सभी के लिए सुखद और श्रेयस्कर।

युग परिवर्तन की सन्धि बेला में चल रही अनुपयुक्त की गलाई और अभीष्ट की ढलाई का जो उपक्रम इन दिनों चल रहा है, उसमें अनभ्यस्त ढर्रे पर भारी चोट पड़ती है और हर वर्ग एवं प्रचलन को न रीति-नीति अपनाने में खीज और असुविधा हो सकती हैं किन्तु नियति की विध-व्यवस्था ने जो नव सृजन का निर्धारण किया है उसे अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा हैं नहीं।


विनाश की विभीषिकाओं का एक मात्र समाधान

सर्वभक्षी विनाश की विभीषिकाओं को निरस्त ओर उज्ज्वल भविष्य को विनिर्मित करने के दो मोर्चो पर दुधारी तलवार से इन दिनों सभी सृजन सैनिको को प्राणपण की लड़ाई लड़नी पडेगी। दैवी अवतरण इन्हीं दो प्रयोजनोकं के लिए होकता हैं। उसे दुष्कृतों का विनाश और धर्म का संस्थापन करते हुए “यदा-यदा धर्मश्य.....” वाली अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनी और असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने की व्यवस्था बनानी होती है। यह पुण्य प्रयोजन निराकार ब्रह्मसत्ता स्वयं नहीं करती अपने साधपनोकं और वाहनों से कराती है। प्रेरणा निराकार होती है और तत्परता साकार। महाकाल का आकार नहीं-किन्तु उनके सन्देशवाहक अग्रदूत होने के कारण सूत्र संचालक की भूमिका निभाते हैं। जीतता पुरुषार्थ हैं, पर लड़ाई में चमत्कार तो तलवार ही दिखाती हैं। युगान्तरीय चेतना को वहन करने वालों को पुरुषार्थ तो ईश्वर प्रदत्त होता है, पर श्रेयाधिकारी वही बनते है, स्वर्णाक्षरों में उल्लेख उन्हीं का होता है और अनन्तकाल तक लोकश्रद्धा उन्हीं के चरणों पर बरसती है। ऐसा सौभाग्य जिन्हें मिले समझना चाहिए कि अवतार न सही उसके प्रतीक प्रतिनिधि बनने का श्रेय सौभाग्य तो उन्हें मिल ही गया।

नवयुग को सतयुग कहा जा सकता है। सतयुग अर्थात धर्म धारण का प्रचलन। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। चिन्तन और चरित्र का स्तर एवं प्रतिफल ही भली-बुरी परिस्थिति बनकर सामने आता है। समस्याओं और विपत्तियों से जुझने में जितना काम साधनों और पराक्रमी के सहारे होता है, उससे हजार गुनी भूमिका लोकचिन्तन की गतिशीलता सम्पन्न करती है। इसलिए पराक्रमी सृजन प्रयोजनों के साधन जुटाते हैं और तत्वदर्शी ऐसी योजना बनाने की भूमिका निभाने में संलग्न रहते हैं, जिससे लोकचिन्तन के प्रवाह को उत्कृष्टता की पक्षधर दिशाधारा मिल सके। संक्षेप में यही युग सृजन कातात्विक स्वरुप और योजनाबद्ध क्रिया- कलाप-जिसे इन्हीं दिनों सम्पन्न किया जाना है। विलम्ब करने और अनर्थ सहने की गुँजायश अब नहीं रह गई हैं।

नवयुग जिस प्रचण्ड शत्ति सामर्थ्य के सहारे विनिर्मित होता है, उसे एक शब्द में आत्मशक्ति कह सकते है। आत्मशक्ति का अर्थ है-आदर्शो को क्रियान्वित करने की अदम्य उमंग और प्रचण्ड साहसिकता। आमतौर से जीवधारी पेट-प्रजनन की कीचड़ खाते और उसी सड़न में दिन गुजारते हैं, पर सृजेता दूसरी धाती के बने होते हैं। उन्हें अर्ध-विक्षिप्तों के न तो परामर्श सुहाते हैं और न उनकी उन्मादी उछल-कूद का अनुकरण करने की इच्छा होती है। वे अपना रास्ता आप बनाने हैं और भीतर के ईमान तथा बाहर के भगवान से निर्देश प्राप्त करने के उपरान्त और किसी की सलाह लेने कि जरुरत नहीं पड़ती। महानता के मार्ग पर हर किसी को एकाकी संकल्प के सहारे ही आगे बढ़ना पड़ता है। भीड़ तो बहुत दिन पीछे चलने और जय बोलने के लिए सहमत होती है। आदर्शवादियों के मार्ग में आने वाले मील के पत्थरों में प्रथम उपहास, दूसरा विरोध, तीसरा आक्रमण आता है। सफलता और प्रशंसा के लक्षण इतनी मंजिल पार कर लेने के उपरान्त दिखाई पड़ते है। सहयोग-समर्थन का लाभ इससे पूर्व कदाचित ही किसी को मिला हो। सुदुद्श्य के अग्रगामी धन्य भी बनते हैं और अभिनन्दनीय भी, पर वह स्थिति आरम्भ में नहीं बहुत दिन उपरान्त आती हैं। जिसमें इतनी प्रतीक्षा का धैर्य और अवज्ञा सहने का साहस होता है, उन्ही को अग्रगामी महामानव बनने का सौभाग्य मिलता है। ईश्वर के पार्षद,युग सृजेता इन्हीं विभूतियों को कहतें हैं। उन्हीं के पद चिन्हों पर चलकर असंख्यों को श्रेय साधक स्वानाम धन्य बनान का अवसर मिलता है।

आत्मशक्ति का उदय ही अपने इस नवयुग का आधारभूत निमित्त कारण है। यह अग्रगामियों में तो अन्तः-प्ररणा के आधार पर स्वतः ही उदय हो जाती है, उन्हें जगाने, उठाने एवं कटिबद्ध करने का कार्य ईश्वर स्वयं ही सँजों देता है। पूर्व संचित सुसंस्कारों के सहारे उपयुक्त समय आतें ही वे अपना उत्तरदायित्व बिना किसी दबाव के स्वयं ही वहन करने लगतें हैं, किन्तु सर्वसाधारण के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है, उन्हें बालकों की तरह उठाने, नहलाने, कपड़े पहनाने, नास्ता कराने से लेकर स्कूल पहूँचाने तक के सारे काम अभिभावकों को ही करने पड़ते हैं। साथ ही नखरे सहने के लिए भी तैयार रहना होता है। मरीजों के नखरे भी देखते ही बनते हैं। वे उम्र में बड़े होने पर भी बालकों के कान काटते हैं। सनकी अर्ध-विक्षिप्त,उद्दण्उ अपराधी प्रकृति के लोग भी सदा कुचाल चलते है, उन्हें भलमनसाहत अपनाने के लिए सह-मत करना भी एक पूरा सिरदर्द है। कुचाल को सुधार सकना भी एक पूरा सिरदर्द है। कुचाल को सुधार सकना भी इतना बड़ा पुरषाथ है, जिन्हें कुबेर जैसा अनुदान बाँटना कहा जा सकता है। सरकार को जितने साधन शिक्षा, चिकित्सा, सिंचाई, परिवहन आदि उपयोगी कामों में लगाने पड़ते हैं, उससे भी अधिक चोरों, हरामखोरों, उद्दण्ड और अपराधियों को रोकने से लेकर प्रताड़ना दिलाने तक के लिए झोंकने पड़तें हैं। पुलिस, फौज, कचहरी, जेल, फाँसीघर जैसे संस्थानों में लगी हुई जनशक्ति तथा साधनशक्ति कोई अन्न, वस्त्र उत्पादन जैसा उपयोगी काम थोड़े ही करती है? इसकी समस्त क्षमता उद्दण्डता से जूझने में ही समाप्त हो जाती है। मनुष्य में ईमान और भगवान् की ज्योति है तो पर प्रबल हैवान और शैतान भी पाया जाता है। इसलिए उत्थान के लिए जितने पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती हैं। पतन को रोकने में उससे कम नहीं अधिक ही पराक्रम करना होता है। समाज में एक स्वतन्त्र वर्ग ही कभी इस प्रयोजन के लिए बना था, क्षत्रिय उसे ही कहते थे। अब तो उसे वर्ग की व्यापकता और आवश्यकता पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गई हैं।

भगवान् के अवतार लीलाओं के वर्णनों सृजनात्मक श्रेय प्रसंग कम और ध्वंस प्रकरण अधिक मिलते हैं, असुरता के निवारण में उनकी जितनी शक्ति लगी उससे कम ही उन्होंने सृजने प्रयोजनों में लगाई हैं। यदि अधिक भी लगी हो तो स्मरण ध्वंस प्रकरणों का ही किया जाता है। रामचरित में सुबाहु, ताड़का, मन्थरा, कैकेयी, खरदूषण, सूर्पणखा, गारीच, सूरसा, त्रिजटा, रावण, कुम्भकरण, मेघनाद आदि के प्रकरणों की चर्चा बडे़ जोर-शोर से होती है। शबरी, केवट, विभीषण, जटायु जैसे भक्तजनों की चर्चा संक्षेंप में ही होती हैं। राम-राज्य की स्िपना में भी उन्हें सम्मान दिया गया हैं किन्तु उसका उल्लेख बहुत खोजने पर ही मिलता हैं।

कृष्ण चरित्र में भी यही बात है। उस समय जेल के प्रहरी, यमुना का उफान, सर्पो का आक्रमण पूतना, तृणावत, वृतासुर, कालिय सर्प से लेकर कंस, चाणुर, मुष्टिकासुर, दुर्योधन आदि सभी उनके प्राणघातक बने रहे। गोपियों का भीलों द्वारा अपहरण, यादवों का गृह-कलह में निधन, रण छोड़कर द्वारिका पलायन और अन्ततः व्याध के हाथों काय-विर्सजन जैसी दुखःद घटनाएँ भुलाये नहीं भुलतीं। महाकाल की योजना और पाण्डवों के आतवास, गोपी विछोह में उन्हें क्या कुछ नहीं सहना पड़ता। यह कर्मयोग नहीं वरन् तप-साधना की वह श्रखला है, जिसका अवलम्बन हर श्रंयाधिकारी को अपनाना पड़ता हैं।

उसके पूर्व के अवतारों और उनके सहकारी पार्षर्दो का कार्य विवरण पढ़ने पर भी इसी निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है कि उन सभी को परिवर्तन की महान् प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिए अग्रगामी बनना पड़ा है। यह कार्य सरलतापूर्वंक अनायास नहीं हो गया वरन् उन्हें स्वयं कष्टकारी व्यवधानों को अपने सिर पर ओढ़ कर अन्यायों का उत्साह एवं साहस जगाना पड़ा है। भगवान बुद्ध, महावीर, हनुमान, परशुराम, नृसिंह, वामन आदि को अपमान और कष्ट सहने के अगणित प्रसंग पग-पग पर सहने पड़े हैं। देखने में यह प्रसंग कितने ही अरुचिकर क्यों न लगते रहे होकं, पर उन्हीं के सहारें वे अपने को महान् एवे अनुकरण के अलिए प्रामाणिक सिद्ध कर सके है। बुद्ध के गृह त्याग का प्रसंग उनके जीवन-क्रम में से हटा दिया जाय और घर बैठे नौकर की सहायता से धर्मचक्र प्रवर्तन की सम्भावना पर विचार किया जाए तो सरलता की बात समझ में आतें हुए भी सम्भावना पूर्णतया तिराहित हो जाती हैं। साधनों से भौतिक उत्पादन हो सकता है, पर आत्मिक उपलब्धियों के लिए तो अग्रगामियों का त्याग, बलिदान ही एकमात्र उपाय है। जहाँ यह न जुट सका, समझना चाहिए कि वहाँ सब कुछ मखौल बन कर रह जायेगा। नाटक आकर्षक होते हैं, उनसे विनोद अच्छाखासा हो जाता है, पर सत्प्रयोजनों की पूर्ति में उनसे योगदान तो राई-रत्ती मिल पाता है।

पतन पराभव के गर्त में जन-मानस को घसीट कर ले जाले का काम तो घिनौने आदमी की अपने साधन एवं चातुर्य के बल पर सरलतापूर्वक करते रहते है। व्यभिचारी, मद्य व्यवसायी, लेखक, अभिनेता, नायक, वक्ता, ठग, कुचक्री एवं जुआरी जैसे लोगों की कमी नहीं जो असंख्यों को जाल में फँसाने और भले चंगों को बेमौत मरने के लिए विबश करते हैं। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व इन कुकर्मो में आर्श्यचजनक सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं। डाकू, हत्यारे, राहजन, उचक्के, तस्कर आदि भी इसी स्तर के होते हैं। वे अपनी प्रतिभा का उपयोग दुरभि-सन्धियों में करते हैं। साथ ही मूँछो पर ताव देते हुए सफलता की शेखी भी बढ़-चढ़कर बघारते हैं। इतने पर भी उनका पुरषार्थ उनके निज का और समस्त समाज का घोर अहित ही करता है। आक्रमणकारियों को छोड़ दें तो बिलासी, संग्रही, स्वर्थी, अनुदार प्रकृति के लोग भी प्रकारान्तर से इसी वर्ग में आतें हैं। गर्मागर्म लड़ाई और शीतयुद्ध में देखने का अन्तर तो रहता है, पर परिणाम में प्रायः दोनों ही समान रहते हैं। समय लगने की जल्दी या देरी होने की बात दूसरी है। घुन भी उतना ही हानिकारक होता है जितना कूल्हाड़ा। क्षय के विषाणु भी प्राणहरण तो करते ही हैं-यह बात दूसरी है कि वे छूरा भोंकने जैसा वीभत्स दृश्य उपस्थित न करें। आक्रमणकारी आततायी और लालची-बिलासी के बीच प्रत्यक्ष अन्तर हर किसी को विदित है कि एक बड़ा भला-भोला सा लगता है और दूसरा उद्दण्ड उच्छृखंल जैसा। पर जहाँ तक आत्म हनन और लोकपतन का प्रश्न है दोनों के बीच कोई बड़ा अन्तर नहीं होता।

यही मनःस्थिति है जो मूलतः अकेली ही समस्त समस्याओं के लिए उत्तरदायी है। इसे बदला न जा सका तो इस तथ्य को भी सुनिश्चित समझना चाहिए कि परिस्थितियाँ सुलझेंगी नहीं। ऊपरी लीपा-पोती से इतना ही हो सकता है कि कठिनाइयों का स्वरुप बदलता रहे। एक सुलझने के साथ-साथ नई आकार-प्रकार और नये ढग, नये रुप की, नये नाम से पुकारी जाने वाली नई विपत्ति खड़ी होती रहे। पेट में सड़न और रक्त में विकृति को यथावत् बनाये रखकर कोई रोगमुक्त नहीं हो सकता। ऊपरी दवा-दारु का इतना ही असर हो सकता है कि फोड़ा फूटते-फूटते दूसरी जगह खूजली, फुन्सी, दाद, खाज, छाजन, छाले, चकत्ते आदि उभरते रहें। गठिया, सिरदर्द से लेकर सूजन, अकड़न, अपच जैसी असंख्य नामरुप लक्षण और कष्टवाली व्यथएँ प्रकारान्तर से पेट में आहार की सड़न से ही उत्पन्न होती हैं-यही है वह मूलकारण जो रक्त को दूषित करने से लेकर सभी उपयोगी अवयवों को दुर्बल क्षतिग्रस्त बनाते-बनाते उन्हें रुग्ण रहने और अकाल मृत्यु का ग्रास बनने के लिए विवश करता है। कीच्ड़ की सड़न कितने चित्र-विचित्र कृमि, कीटक और विषाणु उत्पन्न करती है उसे कौन नहीं जानता? इस दुर्गन्ध से बचने के लिए अगरबत्ती जलाने से नगण्य जितना प्रयोजन ही सिद्ध होता है। स्वच्छता अपेक्षित हो तो सड़ी-कीच्ड़ को हटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। यही तथ्य वर्तमान समस्याओं, कठिनाइयों, विपत्तियों, विभीषिकाओं के सम्बन्ध में लागू होता है। अनेक संकटों से जूझने के लिए अनेक उपाय करने में कोई हर्ज नहीं किन्तु किसी समाधानकारक परिणाम की आशा नहीं की जानी चहिऐ।

हमारा कर्त्तव्य इस समय यही है कि हम वस्तुस्थिति को समझे ओर अपने कर्त्तव्य का ध्यान रखते हुए अपने आपको सुधारने का पूर्ण प्रयत्न करें। हमकों यह अच्छी तरह हृदयंगम कर लेना चाहिए कि यदि हम अपना सुधार कर लेते हैं तो हमसे सर्म्पक रखने वाले असंख्यों व्यक्ति भी उससे प्रभावित होंगे और हम अपने उद्देश्य में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करेंगें।

क्या किया जाए? कया विनाश के अतिरिक्त और कोई मार्ग ही नहीं? इस प्रकार जब निराशात्मक चिन्तन जीवन-क्रम को घेरने लगे तो आशा की किरण एक ही रह जाती है कि मानवी अन्तराल के किसी कोने में प्रसुप्त पड़ी उस शालीनता को जगाया जाए, जिसे आध्यात्म की भाषा की में श्रद्धा और बोल-चाल में उदार सज्जनता कहा जाता रहा है। यह श्रद्धा और सज्जनता आदर्शवादी तत्वज्ञान को हृदयंगम करने पर ही उभरती है। एक शब्द में इसी को धर्म-धारणा कहा है, साम्प्रदायिक हठवादिता और अन्ध-विश्वासी भावुकता से यदि इस तत्वज्ञान को बचाया जा सके तो इस एक ही अव लम्बन को डूबते को तिनके का सहारा कहा जा सकता है। भौतिक जगत के संकटों-विग्रहों और अन्तःजगत के उद्वेग-विक्षोभों का समाधान भी इसी एक केन्द्रबिन्दु पर आधारित है। व्यक्त्िभी और समाज भी एक अवलम्बन के सहारे सुखी ही नहीं समुन्नत भी हो सकता है। मनःस्थिति को परिस्थिति की जन्मदात्री माना जा सके और श्रम को सींचने पर पेड़ के हरे-भरे, फूले-फले हो सकने पर विश्वास किया जा सके तो उस परिणाम को निश्चयपूर्वक प्राप्त किया जा सकता है, जिसके लिए अज्ञसे विज्ञ तक सभी एक जैसे लालायित हो रहे हैं।

आन्तरिक परिष्ट की समस्याओं का समाधान माना जा सके तो फिर करने योग्य एक ही काम रहा जाता है कि भौतिक महत्वाकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को घटा कर सादगी अपनाने और ‘सादा जीवन, अच्च विचार का सिद्धान्त-व्यवहार में उतारने का प्रयत्न किया जाए। विलासी औरी संग्र्रही लोक प्रवाही को देखते हुए यह लगता है, पर यदि कोई साहसपूर्वक इस नीति को अपना सके, तो फिर उसके पास प्रायः वह तीन-चौथाई सामर्थ्य सदुद्देश्यों के लिए बच जाती है जो आमतौर से कभी पूरी न हो सकने वाली लालसा-लिप्सा के निमित्त अस्त-व्यस्त और नत्टभ्रष्ट होती रहती है। लोभ और व्याह-मोह से ग्रस्त दिग्भ्रान्त जनमानस एक से दूसरे में यह छूत ग्रहण करता है कि उसे बड़ा आदमी बनना चाहिए। योग्यता, तत्परता और परिस्थिति की अनुकूलता न होने पर वैसी सफलता तो कदाचित ही किसी को यत्किचिंत माज्ञा में मिल जाती है, पर जलते झूलसते सभी हैं। सबसे बड़ी हनि यह होती है कि आत्मनिर्माण और विश्व-कल्याण जैसे महान प्रयोजनों में जिस सामर्थ्य को नियोजन करने में कई-गुजरी स्थिति का व्यक्ति भी महामानव बन सकता था, उस सौभाग्य से उसे पूर्णतया वंचित रहना पड़ता है। इतना ही नहीं बहिरंग सकंटों और अन्तरगं उद्वेगों की दुहरी फाँसी इस कदर कसी रहती है कि उस घुटन में न जीना बन पड़े और न मरना सम्भव हो सके। नवयुग में जिस दमन को सर्वप्रथम नियोजन करना है, वह है लिप्सा को घटा कर उदात्त को उभारना। इसी में व्यक्ति की महानता है और इसी में समाज की समर्थता, इसे करे कौन?

इसके लिए दशों-दिशाओं में दृष्टिपात करने के अपरान्त नजर एक ही केन्द्रबिन्दु पर रकती है, वह है जागृत आत्माओं का अग्रगमन। युग-निर्माण परिवार के परिजनों को यह शुभारम्भ अपने निजी दृष्टिकोण में परिवर्तन और जीवनक्रम में हेर-फेर करतेहुए करना चाहिए। करना इतना भर है कि औसत भारतीय नागरिक स्तर के निर्वाह साधनों को पर्याप्त माना जाय और महत्वकाँक्षाओं के क्षे़त्र से भौतिक बड़बप्पन को निरस्त करके इतना भर सोचा जाय कि प्रगति का वास्तविक स्वरुप वह है जिसे व्यक्त्वि की संयमशील सज्जनता और परमार्थ प्रयोजन में बरती गई उदार परमार्थ परायण कहा जा सके। जो अपने आपको इतना समझने-सुधारने में सफल होगा-उसी के लिए यह भी सम्भव होगा कि बिना किसी प्रकार का प्रचार प्रोपेगंडा किये सर्म्पक क्षेत्र को समृद्ध एवं सुसंस्कृत बनाता चले। कहना न होगा कि मिशन के लाखों परिजन यदि अपने दृष्टिकोण और व्यवहार में उपरोक्त क्रम अपना न तो उनके सर्म्पक की जो परिधि करोड़ो व्यक्तियाँ तके फेली हुई है, वह बदलेगी और ‘हम बदलेगे युग बदलेगा’ का उद्घोष अक्षरशः सत्य एवं सार्थक सिद्ध होता चला जायेगा।


युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि और आधार

युग परिवर्तन इतना बड़ा काम है जिसके विस्तार कीसही कल्पना कर सकना सामान्य मस्तिष्क के बते से बाहर है। इन दिनों अपनी धरती पर प्रायः 450 करोड़ मनुष्य रहते हैं। इनके स्वभावों और प्रयासों में इतनी अधेक अवाँछनियता भर गई है जिसे विद्यमान सुसंस्कारिता की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक माना जा सकता है। आदमी जितना बुद्धिमान है उसकी तुलना में हजार गुना अधिक मूर्ख। वह बनाता और कमाता भी बहुत है, पर जितना विगाड़ता उजाड़ता है उसे देखते हुए यह असमंजस उत्पन्न होता है कि उसे अन्य प्राणियों की तुलना में बुद्धिमान कहा जाय या मूर्ख। यह ठीक है कि अन्य प्राणी बुद्धि वैभव के अभाव में निर्वाह लाभ तक सीमित रहे और कोई चमत्कारी प्रगति न कर सके। इतने पर भी उनमें से प्रत्येंक को यह सन्तोष करने का अधिकार है कि प्रकृति के सहज अनुदानों का वे प्रसन्नतापूर्वक उपभेग करते हैं और मोद मनाते हुए जीवित रहते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर मनुष्य इससे भी वंचित प्रतीत होता है। शरीर में रुग्णता,मस्तिष्क में अद्विग्नता, परिवार में विपन्नता, समाज में आक्रमकता, साधनों में दरिद्रता और व्यवहार में अनुदारता का बाहुल्य देखते हुए प्रतीत होता है कि ठाट-बाट कितना ही बढ़ा-चढ़ क्यों न हो मनुष्य की जीवनचर्या दयनीय स्तर की बन गई है। वह अर्ध मृतक की जीवनचर्या दयनीय स्तर की बन गई है। वह अर्ध मृतक औससर अर्ध जीवित बनकर रह रहा है। श्शरीर की सुविधा सज्जा देखते हुए भी मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा अनुपयुक्त घुस पड़ा है जो विष की तरह काटता और काँटों की तरह चुभता है। चैन, सन्तोष, अल्लास और आनन्द जैसे तत्व कहने-सुनने के चर्चा प्रसंग भर रह गये हैं। उन्हें अनुभव करने वालों को पा सकना कठिन है। हर व्यक्ति अपने-अपने ढ़ंग की बेचैनी और खीज में जलता-भुनता रहता हैं।

टाज न तो सम्पन्नता की कमी है और न अक्लमंदी की। साधन की प्रचुर है और विज्ञान ने सुविधाओं के पर्वत आसमान से उतारकर जमीन पर ला खड़े किये है। इतने पर भी हर व्यक्ति अभावग्रस्त और अशिक्षित समझे जाने वाले पूर्वंजों की तुलना में व्यक्त्वि की दृष्टि से कहीं अधिक दीन-दुर्बल, खोखला और घिनौना बनता चला जा रहा है। एक के बाद दूसरी पीढ़ी अधिक क्षीण अधिक असहाय और अधःपतित होती चली जा रही है। उसके कारण अर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक भी कहे जा सकते है। किन्तु वास्तविकता दूसरी ही है मनःक्षेत्र में घुसी हुई निकृष्टता ही मदारी की तरह वह रंग-बिरंगे जादुई खेल तमाशे खडे़ करती रहती है जिन्हें न समझते बनता और न सुधारते। चिन्तन में समाया हुआ ‘भ्रष्ट’ और चरित्र में जमा हुआ ‘भ्रष्ट’ इतने प्रकार की अवाँछनियताएँ अपनाने के लिए विवश करता है कि भ्रमित मस्तिष्क उस भूल भूलैयाँ से भरे-पूरे तिलस्म में से छुटकारे का कोई रास्ता ही नहीं खोज पाता। शासकीय कानून व्यवस्था और दण्ड विधान का प्रबन्ध तो है पर अपराधियों में से कितनों को सुधारने, बदलने में वह खर्चीला प्रबन्ध सफल हो पाता है इसे हम सभी जानते हैं। कभी समाज का अनुशासन था और लोग लोक-लाज जनमत तथा समाजगत अवमानना से डरते थे। फलतः नीतिमत्ता का पक्षधर अनुशासन किसी कदर बना रहता था। अब तो सभी धोती के भीतर नंगे हैं। कौन किसे सिखाये और कौन किसे रोके। जब स्वयं ही ऐड़ी से चोटी तक दलदल में फँसे हैं तो दूसरों को उबारने सुधारने की हिम्मत कौन करे। संगठित और सदाशयता त्योरी बदलने और घूसा तानने भर से संव्याप्त उद्दण्डता की रोकथाम कर सकती है पर उसका तो कहीं अस्तित्व तक दर्शन नहीं होता। हर एक को खुदगर्जी के अतिरित्त और कुछ सूझता ही नहीं। अपने ऊपर मुसीबत आये तो दूसरों से सहायता पाने की इच्छा तो होती है, पर यह किसी बिरलेका ही मन चलता है कि दूसरों की मुसीबत में हाथ बँटाने, उसका वनज हल्का करने, और सहारा देकर ऊपर उठाने में मदद करे। जहाँ लोक प्रवाह ऐसी आपाधापी का चल रहा हो। साथी को शोषण का निमित्त भाजन बनाने की बात प्रथा परम्परा की तरह मान्यता प्राप्त करने लगे तब मित्रता के साथ जुड़ी हुई सुखद सम्ीवना की कल्वना करना र्व्यथ है। जब मित्रता के नाम पर बलवान कमजोंरों को फाँसने, पछाड़ने की ही बात सोचें तब दुर्बलों की भलाई इसी में है कि भाग्य भरोसे एकाकी निर्वाह की बात सोचे और बुरे दिनों मो धैर्यपूर्वक काटें। समर्थो की मित्रता इस वर्ग को कदाचित ही कभी लाभदायक सिद्ध होगी। वह तो मात्र चतुर लोगों का व्यवसाय है जिमें चित्त भी उनकी और पट्ट भी उनकी रहती है।

आर्थिक सम्पन्नता से समस्याओं का हल होने-उसी कठिनाई को समस्त विपत्तियों की जड़ बताने के जोश खराश भरे प्रतिपादन अब बूढ़े हो गये और उन दलीलों में कोई दम नहीं रहा। असमर्थो को भड़काने में वह हथियार अब भी काम आतात रहता है, पर इस तथ्य को स्वीकारने में अब किसी का मन नहीं होता कि सम्पन्नता ही सुख-शान्ति की जननी है। योरोप और अमेरिका के अधिकाँश देश धनी है। एशिया में जापान के अतिरिक्त तेल देशों को भी समृद्धि कहा जाता है। वहाँ जाकर निकट से देखने पर यह भली-भाँति जाना जा सकता है कि दौलत और दुर्बुद्धि का संयोग होने पर व्यक्ति विलासी तो हो सकता है, पर सुखी समुननत होने की आशा तो तब भी मृग मरीचिका ही बनी रहीती है। तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि निर्धनों की तुलना में धनाध्यक्षों की परिस्थितियाँ कुचक्रों एवं दुर्व्यसनों के कारण अपेक्षाकृत अधिक गई-गुजरी देखी जाती है। इस स्थिति को बदलना ही युग परिवर्तन है। इसके लिए चिन्तन और स्वभाव का ढाँचा ही उलटना होगा। प्रचलनों में से अधिकाँश को निरस्त करने के अतिरिक्त अगणित ऐसी स्िपनाएँ करनी होंगी जिन्हें आज भी लोग जानते और पसन्द तो करते हैं, पर अपनाने के लिए किसी के भी कदम नहीं बढ़तें। प्रस्तुत विपन्नता को एक प्रकार से उलट देना ही युग परिवर्तन है। इतने भरे से वे सभी सपने साकार होने लगेंगे जिन्हें सतयुग का पुरावर्तन या उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण कहा जा सकें।

प्राचीन काल में आज की तरह न तो साधन सम्पन्नता थी न सुविधाओं का विज्ञान ही विकसित हो सका था। फिर भी उस समय के उपलब्ध विवरण बताते हैं कि पहले का मनुष्य आज की अपेक्षा सुखी था। कारण एक ही था कि पहले लोग अपेक्षाकृत निश्छल होते थे, नीति, सदाचार के प्रति, उनमें गहन निष्ठा होती थी व्यवहार में स्वार्थ को इतना महत्व नहीं दिया जाता था कि दूसरों उचित हितों को नुकसान पहुँचे। उस समय परम्परा यह थी कि अपनी हानि होने देकर दूसरों को लाभ पहुँचाया जाए। व्यष्टि के हितों को समष्टि के हितों पर बलिदान किया जाये। जब इस तरह की उदार परमार्थ परायणता का प्रचलन था तो समाज में सेख, शान्ति और सुव्यवस्था समुन्नति क्यों न रहेगी?

आस्थाएँ बदलें, व्यक्ति के सोचने, विचारने की काम करने की और व्यवहार की रीति-नीति की दिशाएँ सद् हों तो आज भी वैसी ही सुख, शान्ति उपलब्ध हो ही सकती है, जैसी पहले कभी थी बल्कि पहले से अधिक सुखी और समुन्नत जीवन जिया जा सकता है क्योंकि विज्ञान के रुप् में एक ऐसी शक्ति मनुष्य को करतलगत हो गई है जिससे आज और अभी धरती पर र्स्वगं बसाया जा सकता है। कहने-सुनने में यह कल्पना कितनी सरील लगती है? बाल बुद्धि यह परिवर्तन किसी जादुई चमत्कार की तरह आसमान से टूट पड़ने की कल्पना भी कर सकती है। परन्तु वस्तुतः ऐसी है नहीं। पुरुषार्थ चाहे मनुष्य ने अपने संकल्प से किया हो अथवा दैवी प्रेरणा से उभरा हो, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, काम तो मनुष्य की आस्थाओं में परिवर्तन लाने से ही चलेगा।

इसके लिए लोकमानस को जगाना और उसका परिष्कार कर नई दिशा में अग्रसर करना है। यह कार्य एक ही प्रकार से सम्भव है जगृत आत्माओं के अग्रगमन द्वारा। इसके बिना औसर किसी उपाय से लोक-मानस को जगाना और उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत कर सकने का कठिन कार्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता। यह कार्य मात्र वही कर सकते हैं, जिनमें जागरण की पूर्व प्रेरणा को समझने और अपनाने की क्षमता विद्यमान हो। सूर्योदय की प्रथम किरणें पर्वतों के शिखर पर चमकती हैं-धरती पर उतने में तो उन्हें बहुत विलम्ब लगता है। प्रभात का परिचय उषा की लालिमा देती है, या फिर पर्वत शिखरों पर उतरने वाली आभा। इन दो प्रतीकों को देखकर ही जन-जन का प्रभात की उपस्थिति पर विश्वास जम जाता है। यों उन तक गर्मी रोशनी पहुँचने में वब भी विलम्ब ही रहता हैं।

युग-निर्माण परिवार विशालकाय है। विस्तार की दृष्टि से उसे अनुपम भी कहा जा सकता है। पच्चीस लाख व्यक्ति बहुत होते हैं। उनके चिन्तन, श्रम और साधन की संयुक्त शक्ति इतनी बड़ी है कि युग प8रिवर्तन जैसे दुष्कर कार्य में सरलता और सफलतापूर्वक बन सकने की आशा उसका प्रयोग बन पड़ने पर हसज ही की जा सकती है। संसार के बीस मनुष्यों पीछे एक युग परिवार परिजन की संख्या आती है। इतने लोगों के परिवार को गृहपति सम्भाल सकता है, तो कोइ कारण नहीं कि भावनात्मक परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन जैसे लोक-प्रिय कार्यो को अग्रसर करने में उतनी जागृत आत्माएँ समर्थन हो सके। फिर कठिनाई क्या रही? इसका उत्तर ढूँढ़ने पर लौट कर वहाँ पहूँचना पड़ता है, जहाँ से चर्चा आरम्भ हुई थी। सोतों को जगायें कौन? जागे को झकझोरे कौन? आलसियों का विस्तर उलटने और उन्हें घसीट कर खड़ा कौन करे? जागरण की बेला में जागने का मन तो सभी का है, परी खुमारी छोड़े तब न? अभ्यस्त ढर्रे के जंजाल से छुटकारा मिले तब न? प्रश्न यही आता है कि यह सब कैसे किया जाए? इस परिवर्तन को किस आधार पर प्रयुक्त किया जाए? उत्तर एक ही है कि मनुष्यों के अन्तःकरण में सोई उस विशेषता को जगाया जाए जिसे श्रद्धा कहते हैं।

आदर्शवादिता का महत्व समझने और उसके तत्वज्ञान को हृदयंगम करने पर अर्न्तजगत में जो सम्बेदनशील निष्ठा उभरती है, जिसे श्रद्धा भावना कहते हैं वही धर्म धारणा मनुष्य की जीवन दिशा, चिन्तधारा और कतृव्व प्रवाह में परिवर्तनकारी स्थिति उत्पन्न करती है। इसी श्रद्धा निष्ठा के बल पर भौतिक जगत में अनेकानेक संकटों और विपत्तियों से पार पाया जाता है। व्यापार क्षेत्र में लोग पूर्वानुमानों के आधार पर बड़ी-बड़ी जोखिम उठा लेते है। यह जोखिम अन्तःजगत में साहस मनोबल के अभाव में किसी भी प्रकार नहीं उठाया जा सकता है। इस स्तर का मनोबल कहाँ से उभरता है? श्रद्धा निष्ठा, विश्वास और सहस के बल पर ही न। इन्हीं तत्वो से अन्तःक्षेत्र में वह सशक्तता उभरती है जिसके कारण मनःस्थिति को जरिस्थिति की जन्मदात्री कहा जा सकता है।

युग सन्धि की इस विषम बेला में लिप्सा को घटा कर उदात्त तत्वों को उभारना ही प्रमुख कार्य है। इसी से व्यक्ति महान् बनता है और समाज समर्थ। बादल बरसने को हों तो पहली बूँद बनने का साहस कौन करे? ताकि बाद की बूँदे भी बरसने लगे। यह पहली बूँदे बनने का साहस युग निर्माण परिवार के परिजनोकं को करना चाहिए और अपनी रीति-नीति अपनानी चाहिए जिससे कि अन्य औरों को प्रकाश तथा प्रेरणा प्राप्त हो सके। अपने दृष्टि-कोण और व्यवहार में आदर्शवादी चिन्तन तथा उत्कृष्ट कतृत्व को प्रधानता दिया जाने लगें तो युग निर्माण परिवार के लाखों परिजन करोड़ो मनुष्यों के समाज को प्रभावित कने में निश्चिय सक्षम हो सकेंगे ? इसमें कोई सन्देह नहीं हैं।


Quotation

“मैं भूखा था, तुने खाना दिया। मैं प्यासा था तुने पानी दिया मैं निराश्रित था, तुमने स्िन दिया। मै नगाँ था, तुने कपड़े पहनाये। मे। बीमार था तुमने सेवा की। मैं संकटों में जकड़ा पड़ा था तुमने मुझे सहायता पहुँचाई-चलो मेरे र्स्वग में।”

धर्मात्माओं ने पूछा-’हमने कब आपको भोजन, पानी आश्रय,वस्त्र आदि दिये और कब सेवा, सहायता की?’

ईशु ने उत्तर दिया- मैं तमसे सच कहता हूँ-जो कुछ दीन-दुःखियों के लिए किया गया है वह मेरे ही लिए है।- बाइबिल


युग सन्धि की विषम बेला में जागृत आत्माओं को आह्वान

यह युग परिवर्तन की प्रभात बेला है। अनौचित्य का अन्धकार, मरण के मुख में जा रहा है और उज्जवल भविष्य के अरुणोदय की मधुर मुस्कान क्रमशः कमल पुष्प् की तरह खिलती चली जा रही रही है। इस सुनिश्चित तथ्य से साझेदारी ग्रहण कर लेने में इतनी बड़ी दूरदर्शिता है जिसकी सराहना का कभी अन्त नहीं आ सकता। उषा काल की निजी सत्ता नगण्य होने पर भी वह भी वह इसलिए विश्व वन्दित होती है कि परिवर्तन काल में अग्रगामी ध्वजा पताका बनकर अपनी सामर्थ्य का, कहीं अधिक सदाश्यता पूर्ण परिचय देती है। इस बसन्त में हर पेड़ पादप को पुष्पित फलित होने का अवसर मिल सकता है। शर्त अनुकूल भर की है। प्रतिकूलता अपनाने, मुख मोड़ लेने पर तो स्वाँति वर्षा भी किसी का कुछ भला नहीं कर सकती पबकि उसके तनिक से सहयोग से सीप को मोती, केले को कपूर बनाने का अनायास ही अजस्त्र सौभाग्य मिलता रहता है।

युग सिन्ध में पज्ञावतार की भुमिका ऐसी है जिसे पिछले सभी अवतारों की तुलना में अधिक व्यापक और अधिक स्थायी कहने में संकोच की गुजाइश नहीं है। साथ ही यह भी निश्चित है कि तुलनात्मक प्रखरता के अनुपात में उसके सहयोगी भी अधिक श्रेयाधिकारी बनेगें। अन्धकार में भी जागृति का सन्देश देने वाला उलूक तक जब लक्ष्मी का वाहन बन सकता है तो जागृत आत्माओं के द्वारा युग सृजन के निमित्ति अपनाई गई भुमिका क्यों उन्हें कृत-कृत्य बनने का अवसर न देगी?

इन दिनों सभी जागृत आत्माओं को महाकाल ने नव-सृजन में सहयोग देने के लिए भाव-भरा निमन्त्रण दिया है, इसलिए नहीं कि उनके बिना सृष्टा का संकल्प पूरा न हो सकेगा। सर्व समर्थ सत्ता के संकेतों पर यहाँ उदय-अस्त से लेकर जन्म-मरण तक के कित करने वाले परिवर्तन होते रहते हैं। वह पूर्व काल में भी अनेक अवसरों पर असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने की ब्युह रचना करता और सफल होता रहा है। इस बार उसके बलबूते से बाहर कुछ भी नहीं है। अभीष्ट परिवर्तन की भविष्य वाणी सुनिश्चित शाब्दों में की जा सकती है। जागृतो को युग निमन्त्रण मिलने का तार्त्पय इतना ही है कि स्वनाम धन्य बन सकें और भावी पीढ़ी के लिए आदर्शवादी मार्गदर्शक बनने का श्रेय प्राप्त कर सकें। भगवान ने अपने सच्चे भक्तो को सदा यह एक ही बहुमूल्य वरदान दिया है। अन्यान्यों को तो मनोकामनाओं में खेलतें रहने के लिए खिलौने झुनझुने देकर पीछा छुड़ाने में ही उन्होने औचित्य समझा हैं।

ढलाई और गलाई का दुहरा उपक्रम इन दिनों चल रहा है। महाकाल अनगढ़ एवं जीर्ण-शीर्ण को जलाने-गलाने क साथ-साथ उसे उपयोगी उपकरणों के साँचें में ढालने के लिए इन दिनों व्यस्त और व्यग्र है। काम का विस्तार इतना बड़ा है कि कतिपय प्रयोजनों के लिए सहकारियों की जरुरत पड़ गई है। सहयोगियो के स्वल्प सहयोग से भी सफलता सुनिश्चित है। जो इस प्रयोजन में सम्मिलित होंगें, उन्हे श्रेय के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष अनुदानों में से एक की भी कमी न पडे़गी।

सामर्थ्य का स्त्रोत तो जनता है, पर उसे जगाने वाले प्रहरियों को ही अग्रिम भुमिका निभानी पड़ती है। घडी़ चलती तो तभी है जब उसके सभी कल पुर्जे सहयोग पूर्वक काम करते हैं। इतने पर भी यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि उन करने का उत्तरदायित्व चाबी पर ही आता है। चाबी मरोड़ी जाती है तो फनर कड़ा हो जोता हैऔर उसके दबाब से सभी कलपुर्जे हरकत में आते हैं। यदि चाबी ढीली हो-फनर अड़ गया हो तो फिर समझना चाहिए कि अन्य कलपुर्जों के सही होने पर भी घड़ी नई और ठीक होन पर भी समय बताने की सारी व्यवस्था ठप्प पड़ी रहेंगी और वह बहुमूल्य यन्त्र बच्चों के खिलौने जैसे बन कर रह जायेंगे।

यहाँ चर्चा उस तन्त्र की हो रही है जो गतिशीलता उत्पन्न करने के लिए विशेष रुप् से उत्ततरदायी है। शरीर में हृदय का स्थान मुट्ठी जितने का आकार का है किन्तु समस्त शरीर को गतिशील रखने की जिम्मेदारी उसी की है। हृदय रक्त पहुँचाने और फेफड़े सफाई करने में प्रमाद बरतने लगें तो समझना चाहिए अन्यान्य अवयवों की क्षमता एवं विशेषता का कोई उपयोग न रह जायद्धरण इसलिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि नवनिमार्ण की भूमिका जन समुदाय में विद्यमान जागृतों ओर जीवन्तों को ही निभानी होगी। जनता को वे ही प्रेरणा देते हैं। प्रसुप्ति को जागृति में वे ही बदलते हैं। संकीर्णता और कृपणता के बन्धनों में बन्धनों में बँधी हुई जनशक्ति को सत्प्रयोजनों में निरत करने की जिम्मेदारी उन्ही की है। यदि वे उनींदे पड़े रहें तो फिर समझना चाहिए लोकमानस का कुम्भकरण पौराणिक दैत्य से भी अधिक आलसी सिद्ध होगा। वह छे महीने तो क्या छै हजार वर्षो में भी करवट बदलने को सहमत न होगा।

इसलिए युग सन्धि के इस बीजारोपण वर्ष में सभी प्रज्ञापुत्रों को जागृत और जीवन्त होने के लिए कहा गया है। आदर्शवादी कल्पना,मान्यता, भावना अपने समय पर अपने स्थान पर उपयुक्त है, पर इतने भर से काम चलता नहीं। मनमोदक खाने से किसका पेट भरा है। शेख चिल्ली को उसका मन चाहा गृहस्था कहाँ मिला था। आदर्शवादिता अपनाने में अपने अभ्यस्त चिन्तन और निर्धारित जीवनचर्या में क्रान्तिकारी उलट-पुलट करनी होती है। जो ऐसा साहस जुटा पाते हैं जुटाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करतेहैं उन्हीं को साधक कहतें हैं। साधना से सिद्धि मिलने का सिद्धान्त सुनिश्चित है। सिद्धि का तात्पयै जादुई चमत्कार दिखा कर किसी को अचम्भे में डालना नहीं वरन् यह है कि अपनी प्रबल मनस्विता और पुरुषार्थ परायणता के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक हर कीमत पर पहुँच कर ही रहा जाए। युग शिली यदि यह अनुभव करते हैं कि महाकाल ने इन दिनों उनके लिए युग सृजन की साधना ही सर्वोपरि सहत्व की समक्षी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जून, विवेकानन्द, रामतर्थ, गोविन्दसिंह, समर्थरामदास चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी विनाबा आदि के चरणचिन्हों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एक निष्ठ भाव से लग जाना चाहिए। इसके लिए प्रवचन कला इतनी प्रभावी नहीं हो सकती जितनी कि अपना आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत कर सकने की साहसिकता। इन दिनों इसी उभार की अत्यधिक आवश्यकता हैं।

इन्ही दिनों प्रत्येक प्रज्ञा पुत्र को अपने स्वरुप को समझने और तदनुरुप् जीवन की दिशाधारा निर्धारित करने लिए आग्रह किया जा रहा है। इसे व्यक्ति विशेष का अनुरोध न समझा जाय, पर महाकाल का ऐसा निर्देश निर्धारण माना जाय जिसे मानने पर ही आत्मिक जागरुकता सार्थक होती है। जो बहाने तकेंगें, कृपणता की व्यस्तता और चिन्ताओं के आवरण में छिपाने का प्रयत्न करेंगे वे मुँख छिपा लेने पर भी प्रस्तुत कठिनाईयों से बच नहीं सकेंगें। अमूल्य समय को गँवा बैठने की हानि इतनी बड़ी सहेंगे जिसके लिए अनन्त काल तक पश्चाताप करना पडे़गा और उसकी क्षति पूर्ति कदाचित भविष्य में कभी भी सम्भव न हो सकेगी।

धरती पर र्स्वग और मनुष्य में देवत्व के उदय की स्वर्णिम सम्भावना लेकर द्रुतगति से दौड़ता आ रहा नवयुग विश्व व्यवस्था को बदलने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं से परिपूर्ण है। यह समष्टिगत लाभ कि बात हुई। वैयक्तिक रुप् से इस परिवर्तन का सर्वाधिक लाभ उएन्हें मिलेगा जो महाकाल के सृजन सहयोगी बनने के लिए अभीष्ट साहस जुटा सकेंगे। इस साहस का श्री गणेश नीति निर्धारण में होता है। क्या करना है यह निश्चय हो जाने के उपरान्त कैसे करने की बात धीमी या ती्रव गति से चलती रहती है। एक उपकरण अनूकूल न पड़ने पर दूसरा ढूँढ़ निकालने का प्रयोग भी चलता रहाता है। यह काम काजी व्यवस्था क्रम है। जिसका महत्व अत्यन्त सामान्य होता है। बड़ी बात है-नीति निर्धारण। वह सुनिश्चित हो सके तो समझना चाहिए कि लक्ष्य तक पहुँचने की अधिकाँश कठिनाई हल हो गई।


सह सुयोग गँवा देने वाले पछतायेंगे

ईश्वर ने मनुष्य जीवन का अपहार सुर-दुर्लभ अनुदान के रुप् में प्रदान किया है। साथ् ही उसके साथ उच्च स्तरीय उत्तदायित्च लाद दिये है। स्पष्ट है कि बड़े पद या गौरव जिन्हें प्रदान किये जाते हैं उन्हे बड़ी जिम्मेदारियों सें भी लाद दिया जाता है। सेनापति का पद, दर्जा, सम्मान, अधिकार, वेतन आदि अन्यान्यों से बढ़ा-चढ़ा होता हैख् पर साथ ही उसके ऊपर जिम्मेदारियों भी इतनी अधिक होती हैं कि तनिक-सा प्रमाद करने पर भी क्षम्य नहीं समझा जाता वरन् कोई मार्शल के निर्णयानुसार गोली से उड़ाया जाता है। सफाई कर्मचारी के प्रमाद की छोटी चेतावनी या प्रमाड़ना से भरपाई हो जाती है, पर सेनापति को उतने भर से छुटकारा नहीं मिल सकता। कारण स्पष्ट है, कर्मचारी की लापरवाही से थोड़ी भी गन्दगी बढ़ने भर की सीमित हानि होती है, किन्तु सेनापति की भूत से तो सारी सेना का ही नहीं पूरे देश का ही सर्वनाश हो सकता है। इसके विपरीत उसकी कुशलता एवं सूझ-बूझ के फलस्वरुप् सारा देश सुरक्षित रह सकता है और सकृद्धिवान बन सकता है। सेनापति को सम्मान, अधिकार, वेतन आदि का जो अनुदान मिलता है वह किसी का अनुग्रह नहीं, वरन् थोपी गई जिम्मेदारियों का ठीक तरह पालन कर सकने के लिए आवश्यक सुविधा भर है। वह इसलिए कि अपना कर्त्तव्य ठीक तरह पालन कर सकने में किसी असुविधा के कारण असन्तुलित न होने लगें। उच्च अधिकारियों को कितने ही ऐसे साधन और सहायक मिलतेहैं जो साधरण कर्मचारियों को उपलब्ध नहीं होते। इसमें किसी पक्षपात का आरोपण करने की आवश्यकता नहीं हैं। यह विशुद्ध रुप् से विशिष्ट उत्तरदायित्वों के निर्वाह के निमित्त सुविधा जुटाने की शासकीय सुव्यवस्था मात्र है। सभी जानते हैं कि छोटे कर्मचारियों की लापरवाही की चेतावनी आदि देकर दर-गुजर होती रहती है, पर अफसरों से हर घड़ी जागरुकता अपनाने की अपेक्षा की जाती है। वे तनिक सा प्रमाद करने पर शासन को नष्ट करते हैं, देश का अहित करतेहैं, जनता के कोपभजन बनते हैं और ऐसी प्रताड़ना सहते हैं जिससे उन्हें अपने वर्ग में बुरी तरह जलील होना पड़े। इस प्रकार उच्च पद की प्राप्ति जहाँ एक प्रकार से सौभाग्य है वहाँ दूसरे प्रकार से काँटों का ताज भी। इस तथ्य को जो समझता है उनका अफसरी बनना सार्थक है। अन्यथा जलील ही होना हो तो चपरासी रहना बेहतर है।

मनुष्य जीवन की गरिमा न समझी जा सके तो उसे एक प्रकार से अभिशाप ही कहा जाएगा, क्योंकि वह हअन्य प्राणियों की तुलना में अधिक रुग्ण, चिन्तित, उद्विग्न और समस्याअहों से ग्रसित पाया जाता है। पग-पग पर दुर्गति भी उसी की होती है और मरणोत्तर जीवन में वही सबसे अधिक कष्ट सहता है। इसके विपरीत यदि कोई यह समझ सके कि यह ईश्वर के बड़े भण्डार का सर्वोपरि उपहार उपलब्ध है और इसके साथ असंख्य सम्भावनाएँ और अगणित विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं तो उसके उत्साह का ठिकाना न रहेगा साथ ही यह अनुभव भी होगा कि इतने बड़े पद का मिलना जहाँ अनुपम सौभाग्य है वहाँ उसके साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों का भार भी कम नहीं है। मनुष्य जीवन ईश्वर का उपहार है। उसे सार्थक, सुखद और सफल बनाना मनुष्य का नीजी उत्तरदायित्व हैं।

ईश्वर एक समदर्शी और न्यायकारी सत्ता है। उसे न किसी से राग है न द्वेष। सभी को पात्रता में उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण होने का अवसर वह क्रमानुसार देता है। स्कूली छात्रों में से जो उत्तीर्ण होते हैं वह अगले दर्जे में चढ़ जाते है। जो अधिक अच्छे नम्बर लेते है। वे छात्र वृत्ति पाते हैं। उतना ही नहीं बड़े चुनावों में भी उन्हीं को प्राथमिकता मिलती है। इसके विपरीत जो फेल होते रहते हैं वे साथियों में उपाहासास्पद बनते, घर वालों की र्त्सना सहते, अध्यापकों की आँखें में गिरते और अपना भविष्य अन्धकारमय बनातेहैं। इसमें ईश्वर की विधि-व्यवस्था को अन्य किसी को कोसना र्व्यथ है। मनोयोग ओर परिश्रम में अस्त-व्यस्तता भर लेने से ही छात्रों को प्रगति अवरोध एवं अवमानना का अभिशाप सहना पड़ता है। मनुष्य जीवन निस्सन्देह सुर-दुर्लभ उपहार और ईश्वरीय वरदान है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखने की बात है कि उसका दुरुपयोग करना ऐसा अभिशाप भी है, जिसकी प्रतापड़ना मरने के उपरान्त नहीं तत्काल हाथों हाथ महनी पड़ती है। विपन्न, उपहासास्पद, पिछडा, तिरस्कृत, असन्तुष्ट जीवन-क्रम ही सच्चे अर्थो में नरक है। उसे भेगने का सिलसिला जिन्दगी के साथ ही जुड़ा है। इसके लिए कभी बाद के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

शासनाध्यक्ष अपना सुविस्तृत कार्य अकेले नहीं सँभाल पाते हैं। इसकेलिए उन्हें सुयोग्य पाषदों, अफसरों की सहायता से काम चलाना पड़ता है। मनुष्य की गणना ऐसे ही राजकुमारों में की गई हैं। उसे सृष्टा ने मात्र इसीलिए विभूतियों से सम्पन्न बनाया है कि वह अपनी विशिष्ट प्रतिभा एवं क्षमता के सहारे इस विश्व उद्यान को अधिक समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में उसकी सहायता करें। सहायता वहीं कर सकता है जिसे उपयुक्त सुविधए उपलब्धर हों। इस दृष्टि से भगवान ने उसे ऐसी संरचना की काया प्रदान की है जैसी अन्य किसी प्राणी को नहीं मिली। ऐसी विलक्षण बुद्धि प्रतिभा ही है उसका उदाहरण समस्त प्राणि समुदाय में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलता। इतनी प्रचुर साधन सामग्री प्रदान की है मानासृष्टि सम्पदा का स्वामित्व ही उसे सौंप दिया गया हो। इसके अतिरिक्त पारस्परिक सहयोग सद्भव का अनुदान मानवी समाज व्यवस्था के अनुरुप् उसे मिलता रहता है। ऐसा आदान-प्रदान किसी अन्य समुदाय में नहीं मिलता।

समाज व्यवस्था और शासन तन्त्र के द्वारा मिलने वाले अद्भुत लाभों की तो चर्चा ही कौन करें। ऐसी सुनियोजित परिवार संस्था का कहीं नाम निशान तक नहीं मिलता। दाम्पत्य-जीवन का आनन्द केवल मनुष्य ही उठाता है। वात्सल्य की इतनी लम्बी और सरस श्रखला अन्यत्र मिल सकनी सम्भव नहीं। अभिभावकों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन कौन करता है? मात्र मनुष्य ही है जिसे कर्मठता, विचारणा, भावना जैसे प्रत्यक्ष देवी वरदान मिले हैं। इसके लिए प्यार, करुणा, उल्लास, उमंग, आनन्द, सेवा, आत्मीयता, उदारता जैसी भाव सम्वेदनाओं की एक दुनिया अनौखी है, जिसका र्स्पश करके व्यक्ति कवि, कलाकार, दार्शनिक, योगी और देवात्मा बनता है। इस सरसता के अमृत में डुबकी लगा कर अनुभव करना है कि वह वस्तुतः पंच तत्वों से बनी धरती पर रहेते हुए भी स्वर्गीय सम्वेदनाओं के भाव क्षेत्र में बिना पंख लगाये ही विचरण कर रहा हैं।

श्रद्धा और भक्ति ऐसे अनुदान हैं; जिन्हें निरन्तर बरसने वाले ईश्वरीय अनुदानों में बिना संकोच गिना जा सकता है। इसके अतिरिक्त उन दैवी सहायताओं का क्षेत्र अलग ही है जो समय-समय जर सत्प्रयोजनों के लिए कदम बढ़ाने वालों कोमिलतेरहते है॥ ये आर्श्चयजनक सफलताएँ पाते हैं और सिद्धि सम्पन्न महामानव कहलाते हैं। अवरुद्ध और विषम परिस्थितियों से घिरे रहकर भी जब सामान्य योग्यता के मनुष्य ऐतिहासिक महामानवों की श्रेणी में जा पहुँचते हैं और कोटि-कोटि मानवों की श्रद्धा के पात्र बनकर इतिहास को अजर-अमर करते हैं तो प्रतीत होता है कि ईश्वर ने न केवल सुर-दुर्लभ मनुष्य जीवन ही दिया है वरन् उसके साथ-साथ सफलताएँ प्राप्त कर सकने के निमित्त अन्तरंग और बहिरंग वैभव इतने प्रचुर परिणाम में प्रदान किये हैं जिन्हें पा कर कोई भी विचारशील अपने सौभाग्य सुअवसर की सराहना करते-करते निहाल गद्गद् हो सकता है।

मनुष्य जीवन इसीलिए अपने इस लोक की सर्वोपरि कहीं जाने वाली सम्पदा है। इसके दो ही उपयोग है-आत्म-कल्याण और विश्वकल्याण। आत्मकल्याण यह कि वे सदुद्देश्य में निरत रह कर आत्मसन्तोष लोकसम्मान, दैवी अनुग्रह प्राप्त करते हुए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करे। विश्वकल्याण यह कि ईश्वर की इच्छा पूरी करे। सृष्टि में सद्भवनाएँ और सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने में प्रयत्नशील रहे। चिन्तन की उत्कृष्टता और व्यवहार की आदर्शवादिता ही वे तत्व हैं जिनके संहार इस धरती की सुख शान्ति प्रगति और समृद्धि फलती-फूलती है। यदि उन्हें निरस्त कर दिया जाय तो फिर पदार्थ वैभव कितना ही प्रचुर क्यों न हो मात्र विनाशकारी दुष्परिणाम ही उत्पन्न करेगा। मूल्य वैभव का नहीं उसके उपयोग का है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। वस्तुओ का सदुपयोग सामर्थ्यों का नियोजन और पारस्परिक स्नेह, सहयोग मात्र आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ है। यसह जिसमें जितनी होंगी वह उसी अनुपात में आत्मकल्याण का स्वार्थ और विश्वकल्याण का परमार्थ सम्पदित कर सकेगा। कहना न होगा कि जीवन की सरसता और सार्थकता इन्ही दो तथ्यों पर टिकी हुई है। ईश्वर द्वारा यह सुर-दुर्लभ उपहार दिया जाना भी इन्हीं दो प्रयोजनों के सहारें सार्थक सिद्ध होता है।

हर मनुष्य के पास ऐसा अवसर मौजूद है कि वह चाहे तो जीवन को सार्थक बनाने वाले सन्मार्ग पर सरलतापूर्वक चल सकेऔर अभीष्ट लक्ष्य को बिना किसी कठिनाई के प्राप्त कर सके। अवरोध दो ही हैं एक अवाँछनीय अपयोग की लिप्सा, वासना और दूसरी संग्रह और स्वामित्व की तृष्णा, अहंता। यही है वह महा पिशाचिनी जो पूर्णतया निरर्थक होते हुए भी मनुष्य को बेतरह लुभाती है और उसे फँसा लेती है। उसे मकड़ी की तरह कुतर-कुतर कर काटती, खाती रहती है। स्वा-भविक और सौम्य जीवन के लिए निर्वाह के इतने साधन पर्याप्त हैं जिनसे पेट भरने और तन ढकने की आवश्यकता पूरी होती रहे। इसके लिए नियन्ता ने हर प्राणी के लिए आवश्यक व्यवस्था उसके जन्म से पूर्व ही विनिर्मित की है। मनुष्य को ही इस दिशा में चमत्कार का वैभव प्रदान किया है। इतने पर भी लालच ही है जो आग की तरह भड़कता रहता है और कितना ही ईंधन डालने पर भी शन्ति नहीं होती।

लालच का दूसरा भाई है, व्यामोह जो सम्बद्ध पदार्थो और व्यक्तियों को सुसंस्कृत बनाने एवं सदुपयोग की बात नहीं सोचने देता वरन् उन्हें अधिकाधिक रंगीला बनाने के लिए ऐसे कृत्य करता है जिससे उनका और अपना विनाश ही प्रस्तुत होता है। लालच से दुर्व्यसन और व्यामोह से दुष्वृत्तियाँ पनपने की सम्भावना सुनिश्चित है। इस तथ्य को लाखों बार परखा जा चुका हैं। करोडो बार परखा जा सकता है। इतने पर भी लोग हैं जो अपने पैरोँ आप कूल्हाड़ी मारतेहैं और जब दर्द होता है तब जिस-तिस को दोष देते हैं। इस स्वनिर्मित विपत्ति से कितने ही अपने को दीन-हीन बताते हुए जिस-तिस के सामने सहायता का पल्ला पसारे देखे जाते हैं। इस प्रकार कुछ मिल भी जाय तो जलते तवे पर पड़ने वाली बूँदों की तरह उतने भर से कुछ समाधान निकलता भी तो नहीं।

यह जीवन का स्वरुप और सदुपयोग की चर्चा प्रसंग जागृत आत्माओं के सामने बोध की तरह इस विषम बेला में विशेष प्रयोजन के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। यह युग सन्धि का पावन पर्व है ऐसा पर्व जो लाखों वर्ष उपरान्त ही आता है। ऐसा पर्व जिसमें भगवान स्वयं लीला संचार करते हैं और जागृतों को अपना सहचर बनने का स्वयं सुयोग प्रदान करते हैं। इन

दिनों मनुष्य जाति के महाविनाश का-उज्ज्वल भविष्य का-निर्धारण हो रहा है। इन दिनों जागरुकों के स्वल्प श्रम में ऐसा सुयोग पाने का अवसर मिल रहा है जैसा कि जन्म-जन्मातरों तक योग तप करने वालों में से कदाचित ही किसी को मिलता है। जो समय की प्रकृति को जाने है। वे यह भी समझते ळें कि सुयोग संयोग सदा नहीं आते वे बिजली तरह कभी-कभी ही चमकते और घटा की तरह कभी-कभी ही बरसते है। जो समय का लाभ उठा लेते हैं वे अपनों से दूरदर्शिता को सराहते-सराहते नहीं थकते। इतिहास उनका गुणगान गाते-गाते नहीं रुकतें। पिढ़ियाँ उनको नमन करती हैं और अनुगमन की प्रेरणा ग्रहण करती है, किन्तु जो समय को चूक जाते हैं। जो जागरुकों की उपब्धियाँ देख-देखकर मन ही मन कुढते,पछताते रहते हैं उन्हें वह सस्ती स्वार्थपरता तब परले सिरेकी मूर्खता प्रतीत होती है, जो आरम्भ में चतुरता प्रतीत होती थी।


Quotation

अयशः प्राप्यते येन येन चायगति भवेत्। स्वर्गाच्च भ्रश्यते येन तर्त्कमन समाचरेत॥

जिसके करने से अयश प्राप्त हो तथा जिस कर्म से बुरी गति हो और जिस कार्य से र्स्वग से भ्रष्ट हो उस कर्म को कभी नहीं करना चाहिए।


पवनपुत्र हनुमान का आदर्श अपनाएँ

दैवी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए पूजा उपासना ही एक मार्ग नहीं है। उसके अतिरिक्त परमार्थ में प्रयोजनों रत रहने वालों ने भी अध्यात्म क्षेत्र की अभीष्ट सफलताएँ पाई है। लोक-सेवा भी किसी भजन-पूजन से कम महत्व की साधना नहीं है। ऐसे व्यक्ति नित्य नियम तिजनी थोड़ी उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे। गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदा, चाणक्य, आदि की गणना भी ऐसे ही कर्मयोगियो में की जाती है। जिनने भजन कम और परमार्थ अधिक किया हैं। देवर्षि नारद के संदर्भ में उल्लेख है कि वे ढाई घड़ी से अधिक कहीं ठहरते नहीं थें और भक्ति-भावना के विस्तार में हरिगुण गाते हुए निरन्तर परिभ्रमण करते रहते थे। महर्षि व्यास ने अठारह पुराण लिखे है। उनका समय निश्यच ही इस लोक साधना मेकं अधिक और पूजा अर्चा में कम लगता रहा होगा।

चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट आदि ऋषियो ने भजन म औससर रोगियों की व्यथा निवारण के लिए पुरुषार्थ अधिक किया था। वे जानते थे किक भगवान की अनुकम्पा के अधिकारी वे अधिक होते है जो उनकी सन्तान को सुखी समुन्नत बनाने में निरत रहते हैं। जिन्हें उपासनारकी सरलता देखकर उतने भर से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति और भगवत् कृपा उपलब्ध हो जाने की बात सूझती है उन्हें भी बताया जाता हैं कि आराधना बीजारोपण के समान है, उसे अंकुरित, पल्लवित, और फलित, विकसित बनाने के लिए साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मगंल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।

इन दिनों आपत्तिकाल जैसी विशिष्ट परिस्थिति है इसमें सब काम छोड़ कर जीवन और मरण के झूले में झूलती हुई मानवता की प्राण रक्षा को सर्वोपरि महत्व मिलना चाहिए। इन दिनों युग-सृजन के लिए अबतरित हुए आह्वान को ही सर्वोपरि महत्व मिलना चाहिए। व्यक्तिगत उपासना की दृष्टि से युग-सन्धि पुरश्चरण की भागीदारी पर्याप्त है। उसमें सन्निहित जप, अर्चन, व्रत अनुशासन एंव विशिष्ट ध्यान के त्रिवेणी संगम को इतना पर्याप्त न मान लेना चाहिए कि उतने भर से आत्मशोधन का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता रहेगा। प्रयास पुरुषार्थ का नियोजन उस युग-सृजन प्रक्रिया में किया जाना चाहिए जिसमें स्वार्थ और परमार्थ का आत्म कल्याण और लोक-मंगल का उभयपक्षीय प्रयोजन पूर्ण होता है।

ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति के लिए कैसा जीवन-क्रम अपनाया जाना चाहिए इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है पवन पुत्र हनुमान। उन्हें राम के निकटतम आत्मीयों में गिना गया है। रमा पंचायतन में कुटुम्ब की दृष्टि से तो चारों भाई तथा सीता मिलकर पाँच होते हैं पर स्थापनाओं में हनुमान को भी रखा गया है और नाम पंचायतन होते हुए भी उसके सदस्यों की संख्या पाँच न रहकर छः हो जाती है जबकि हनुमान रघुवंशी तो क्या मनुष्य वंशी भी नहीं थें।

पवन पुत्र की चरम उपलब्धि है-रामावतार का निकटतम ही नहीं उसका सूत्र संचालक बन जाना। इस वस्तुस्थिति का प्रकटीकरण उस चित्र से होता है जिसमें हनुमान को विशालकाय दिखया गया है और राम लक्ष्मण उनके दोनो कन्धों पर छोटे बालकों की तरह दिखाई पड़ते हैं। प्रकारान्तर से इसका तार्त्पय होता है उन उत्तरदायित्वों का पराक्ष्ज्ञ रुप से वहन करना जो प्रत्यक्षतः राम लक्ष्मण द्वारा निभाये गये समझे जाते है। समयानुसार उन्हें इस साहसिक श्रद्धा का सत्परिणाम भी व्यापक कृतज्ञता के रुप् में मिला है। भारत में पाये जाने वाले राम मन्दिरों की तुलना में हनुमान मन्दिरों की संख्या प्रायः दस गुनी अधिक है। इसका तार्त्पय राम के प्रति अश्रद्धा नहीं वरन् हनुमान की निष्ठा के प्रति कृतज्ञता का प्रकटीकरण है।

यह उच्चस्तरीय सफलता हनुमान को उपहार अनुदान में नहीं मिली थी वरन् उन्होने उसे मँहगा मूल्य देकर खरीदा था। उनने अपने रोम-रोम में राम को बसा लिया था। “राम काज कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम।” की रट लगी रहती थी और इसके लिए अपनी समग्र चेतना और तत्परता नियोजित किये रहते थे। उनके हृदय में उन्य कोई नीजी इच्छा महत्वापकंक्षा न थी। एकात्म की स्थिति में निजी लिप्सा-लालसाएँ विसर्जित ही करनी पड़ती हैं। सीता को यह वस्तुस्थिति एक बार उनने हृदय चीर कर दिखाई थी।

पवन पुत्र के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हुए राम ने अयोध्या लौटने पर गुरु वशिष्ठ के सम्मुख अपनी समस्त सफलताओं का श्रेय हनुमान को देते हुए उन्हें भरत की तरह प्राण प्रिय बताया था। यह उभयपक्षीय आत्मीयता इतनी सघन कैसे हो सकी, इसमें भावुकता का उभार या अनुग्रह जैसा कोई कारण नहीं था। उसके मूल से उस साधना का चमत्कार था जो इष्टदेव का ध्यान पूजन करने तक सीमित नहीं रहती वरन् उसकी इच्छा को अपनी इच्छा का समर्पण करके अपने साधनों को उसी की पूर्ति में खपा देती है। राम पंचायतन में अन्य सदस्य वस्त्राभूषण पहने सम्मानित स्थान पर बैठे दृष्टिगोचर होते हैं पर पवन पुत्र के शरीर पर लज्जावस्त्र की तरह लँगोटी मात्र है और उनने अपना स्थान सबसे नीचे चीरणों के समीप बैठने का बनाया है।

राम से हनुमान का सर्म्पक जिस दिन से हुआ उस दिन से जीवन पर्यन्त वे उन्ही के छोटे बड़े कार्यो की पूर्ति में अहर्निशि लगे रहे। उन सभी कृत्यों की गणना कर सकना तो कठिन है पर पाँच उनमें प्रमुख हैं-(1) सुग्रीव को अपनी समस्त सेना राम काज में नियोजित करने के लिए सहमत कर लेना (2) सीता को खोजे बिना वापिस न लौटने का प्राण-पण संकल्प करना और उसे निभाना (3) समुद्र लाँघने और लंका दहन का एकाकी दुस्साहस करना। (4) लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने के लिए सुखेन वैद्य को चुरा कर लीना ही नहीं वरन् पर्वत समेत संजीवनीबूँटी प्रस्तुत करना (5) रामराज्य की स्थापना में अश्वमध सरीखे असंख्य प्रयोजनों की पूर्ति में अन्तिम साँस तक लगे रहना। ऐसे-ऐसे अन्याय कार्य भी हैं जिनकी पूर्ति में सर्वतोभवेन निरत रहकर उन्होंने वह श्रेय पाया जिसे “राम से अधिक रामके दास” वाली उक्ति में रामायणकार ने प्रकट किया हैं।

पवन पुत्र की जीवनचर्या में पूजा अर्चना के सस्ते मनुहार उपचार कितने थे इसका कुछ अता पता नहीं चलता। सम्भव है वे नित्य कर्म तिजने स्वल्प रहने के कारण पर्यवेक्षकों की दृष्टि में महत्व हीन रहे हों। सर्वविदित वे प्रसंग ही हैं जिनमेकं उनकी सघन श्रद्धा सेवा साधना बनकर उफनती उछलती दृष्टिगोचर होती है।

अवतारों की पुण्य प्रक्रिया जहाँ अधर्म का नियमन तथा धर्म का सर्म्वधन करके सृष्टि सन्तुलन बनाने की प्रतिज्ञा निभाती है वहाँ एक काम और भी करती है कि अपने सहचरों को उच्चस्तरीय श्रेय के अनुदान देकर जाती है। शवरी, केवट, भरत, लक्ष्मण, उर्मिला, विभीषण, रीछ, बानर, गिद्ध, गिलहरी जैसे सहयोगियों के अनुदान की चर्चा करते समय भी जन-जन की भाव श्रद्धा उमड़ती और अश्रु धारा बहती है। राम कथा में से इन प्रसगों को हटा दिया जाए तो फिर उसमें सामान्य हलचल ही शेष रह जाती हैं और उस अमृत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है जिके कारण राम-नाम, राजराज्य, रामकथा की महिमा गरिमा का बखान किया जाता है।

अवतारों के मध्य अनेक बातों में समानता रहती है। प्रज्ञावतार और रामावतार में इस दृष्टि से समस्वरता दृष्टि गोचर होती है कि उनकी इच्छाओं और जिम्मेदारियों का वहन भी उच्चस्तरीय सहकर्मियों को ही करना पड़ रहा है। पवन पुत्र का अनुकरण प्रज्ञा पुत्र करते हुए प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। सृजन शिल्पियों को निराकार महाकाल के साकार कार्य वाहक कहा जा सकता है। हनुमान के अविस्मरणीय उपरोक्त पाँच निर्धरीणों को क्रियान्वित करने एवं व्यापक, सफल बनाने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लेना पड़ रहा है। इस श्रद्धा सिक्त साहसिकता को अपनाने में उन्हें कितनी ही भीतरी कुसंस्कारों और बाहरी दबाव अवरोधें की विपन्नताओ से उसी तरह जूझना पड़ रहा है जैसा कि पवन पुत्र को त्रिजटा, सुरसा आदि से जूझना पड़ा था। राम को रोकने के लिए भी तो वे ताड़का, सूर्पणखा बन कर आई थीं। जब महानों के मार्ग रोके बिना वे दुष्ट दुरभिसन्धियाँ चूकि नही।तो प्रज्ञा पुत्रों का मार्ग सरल कैसे रह सकता है। उनमें से प्रत्येंक को अपनी लोभ लिप्सा से ही नहीं उलझनों परिस्थितियों से अपने-अपने ढंग से निपटना पड़ रहा है। अग्नि परीक्षा में से गुजरे बिना खरे सोने की प्रामाणिकता भी तो सिद्ध नहीं होती।

तराजू का एक पलडत्रा भारी होगा तो दूसरा उठेगा। परमार्थ सधेग तो स्वार्थ में निश्चित रुप से कमी पडे़गी। जो स्वार्थ सिद्धि के लिए परमार्थ की सोचते हैं वे भूल करते हैं वस्तुतः परमार्थ परायण होने पर श्रेय और प्रेय दोनो का लाभ मिलता है। प्रकाश की ओर चलने से चेहरे पर आभा चमकती है और छाया को पीछे-पीछे चलते देखा जा सकता है। छाया के पीछे दौड़ने वाले उसे पकड़ भी नहीं पाते, थकते ही हैं और चेहरे पर अँधरा छाया रहने से कुरुप भी लनते हैं। श्रेय साधकों को इन दिनों-इसी असमंजस मेंदोनों पक्षों को तौलने और एक को प्रधानता देने का निर्धारण करना पड़ रहा है। तराजू के किस पलड़े को भरी किया जाय, और किसे हलका किया जाय इसका निर्धरीण इन्हीं घड़ियों में करना पड़ रहा है। जो असमंजस की अनर्णीत स्थिति में पड़े रहेंगे और समय टालते रहेंगे वे अवसर चूकने वालों की तरह घाटे में रहेंगे। श्रेय स्वाँति वर्षा की तरह कभी-कभी अनायास ही आकाश से बरसता है पर जो सीपें मुहँ बंद किये ही पड़ी रहें उन्हें मोती उगाने के सौभाग्य से वंचित ही रहना पड़ता है। पज्ञापुत्रों की दूरदर्शिता उन्हें ऐसी चूक न करने के लिए कहती हैं। देखते है सामयिक अद्बोधन की उपेक्षा, अवमानना तो नहीं हो रही है। प्रज्ञापुत्रों के निर्धारण को उनके अग्रगमन में परिणत होते हुए देखा जा सकता है। बीजारोपण वर्ष के पाँच सूत्रों को परिवार ने सामयकि चुनौति के रुप में स्वीकार है और उसे क्रियान्वित करने का नश्चय किया है। फलतः निर्धारणों को उत्साहवर्धक अनुपात में अग्रगामी होता देखा जा रहा हैं।

पिछले दिनों सृजन कार्यों में जो निराशा दीखती और कठिनाई लगती रही है उसका रहस्य अब समझा जा रहा है कि पर उपदेश कुशल बनने की नाटकीयता कौतुक ही उत्पन्न कर सकती है। उसकी सामर्थ्य विउम्बनाएँ रचकर खड़ी कर देने तक सीमित है। ऊर्जा तो प्रवाह मोड़ने से उत्पन्न होती है इसे पानी से बिजली निकालने वाले इंजीनियर भर कहते थे अब उसी कथन का समर्थन सृजन शिल्पी करने लगे है। वे सोचते हैं यदि अपनी जीवनचर्या में ऐसे आदर्शवादी मोड़ देने का इससे पूर्व ही साहस बन पड़ा होता तो अब तक सफलताएँ कब की गगन चुँबी बन गई होती। साली गाँव के डेमान्या भील ने आदर्श वादिता अपनाने का छोटा सा उदाहरण अपने आप में आरम्भ करके प्रकारान्तर से समूचे प्रज्ञा परिवार को चेताया है कि आरम्भ यदि अपने से ही किया जा सके तो श्रेय सम्मान और सहयोग की त्रिवेणी रैदास की कठौती में से गंगा की तरह प्रकट हो सकती है। आदिवासी गायत्री शक्तिपीठ के सुविस्तृत निर्माण और उस समुदाय में नव जागरण लाने का जो अविस्मरणीय आधार बना है उसका एक ही कारण है उसका स्वतः त्याग बलिदान की अग्रिम पंक्ति में खड़े होना। यदि वह कृपणता को छाति से चिपकाये रहता तोकदाचित ही वह व्यवस्था बनती जो थोडे़ से समय में ही इतिहास के पृष्ठो पर स्वर्णाक्षरों में लिखी जायगी यह परिणिति अकस्मिक नहीं है। उसे अपना कर कोई भी अपनी प्रभाव प्रक्रिया में देखते-देखते सैकड़ों हजार गुनी अभिवृद्धि कर सकता है।


शालीनता की सीता को ढूढ़ निकाला जाय

कहने-सुनने में युग परिवर्तन की बात किसी जादू चमत्कार के अप्रत्याशित रुप से प्रकट होने जैसी लगती है किन्तु जो वास्तविकता समझते हैं, उनके लिए यह कोई आर्श्चय अस्वाभाविक नहीं है। वे यह और भी जानते है कि यह कार्य अत्यधिक विस्तृत और भारी होने के कारण उसे सम्पन्न करने में मानवी अन्तराल से उभरने वाली श्रद्धासिक्त भाव सम्वेदना ही सफल हो सकेगी। छोटे-छोटे निर्माण कितना श्रम, कौशल और कितने साधन माँगते है यह किसी से छिपा नहीं है। अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भूमण्डल पर बिखरे हुए सुविस्तृत मनुश्य समुदाय की परिस्थितियों को ही नहीं मनःस्थिति को भी उलट देने का अभिनव सृजन कर सकना कितना कठिन हो सकता है ? अवतार प्रक्रिया के रहस्य को समझने वाले व्यक्ति इस कठिन, दुःसाह्म और असम्भव जैसे लगने वाले कार्य को भी सहज सम्भव होने पर विश्वास कर सकते हैं और करते भी हैं। यह कठिन और दुःसाह्म कार्य कैसे सम्भव हो सकेगा। इसका अनुमान लगाने में किसी को भी भ्रमग्रस्त नहीं रहना चाहिए। इसके लिए अगले दिनों इतने बड़े कार्यक्रम बनाने और सरंजाम जुटाने पड़ेंगे जिनकी आज तो कल्पना तक कर सकना कठिन है।

जिनने राष्ट्रीय प्रगति की पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई हैं, जिनके समीप जाकर देखा जा सकता है कि एक सीमीत क्षेत्र की भौतिक कठिनाइयों को एक सीमित मात्रा में सरल करने के लिए उन्हें कितना सोचना पड़ा है और आवश्यक सान जुटाने के लिए जमीन आसमान के कुलावे मिलाने जैसा कितना बड़ा ताना-वाना बुनना पड़ा है। फिर युग सृजन के साथ जुड़े हुए परिवर्तन और सृजन के निमित्त खड़ा किये जाने वाले ढाँचे की विशालता को हलका मानकर कैसे चला जा सकता है। अनगढ़ धातुओं को गलाने और उनका संशोधन करने के उपरान्त उपयोगी उपकरण बनाने के लिए जिन्हें गलाने-ढालने वाले विशालकाय संयन्त्र लगाने पड़े है मात्र वे ही यह अनुमान लगा सकते हैं कि मानवी जीवन-मरण की समस्या से सम्बन्धित नव सृजन का ढाँचा कितना बड़ा होगा और उसके लिए कितने साधनों की-कितने पराक्रम की आवश्यकता पड़ेगी ?

इस महान नियोजक, संयोजक के लिए दूरदर्शी और विवेकवानों की तरह क्रमिक गति से साहस भरे सुनिश्चित काम उठाने पड़ेंगे। शुभारम्भ के रुप में युग निर्माण परिवार की जागृत आत्माओं को अपना अन्तराल झकझोरने और उसके किसी न किसी कोने में विद्यमान आदर्शवादी भाव श्रद्धा को उभारने के लिए आग्रह किया गया है। वह जागेगी तो वासना प्रधान पशुता और तृष्णा प्रधान असुरता के वे भव-बंधन शिथिल होने में देर न लगेगी जो व्यस्तता, समस्या, विवशता आदि का बहाना ओढ़ कर आत्म प्रबंचना कराते रहते हैं। निर्वाह मनुष्य की प्रतिभ को देखते हुए किसी के लिए कोई बाधक समस्या बन कर नहीं रह सकता। परिवार भार तभी होता है जब वह अनगढ़ और असंस्कृत हो। उसे थोड़ा सा सुनियोजित कर देने पर ऐसी व्यवस्था सहज ही बन सकती है कि उसे सुनियोजित करने के साथ-साथ युग धर्म के निर्वाह को समुचित सुविधा अत्यन्त सरलता पूर्वक मिल सकें। चिन्तन और स्वभाव का सड़ा-गला ढर्रा अपनाये रहने वाले तो यह सोच सकते है कि उन्हें किन्हीं कठिनाईयों ने जकड़ रखा है और वे समय की माँग को पूरा करने में कुछ भी कर सकने में असमर्थ हो गये हैं। यह बुद्धि भ्रम कके सहारे बुना गया मकड़ी का जाल भर है जो नागपाश जैसा लगता है। दूरदर्शिता को अपनाकर निजी जीवन की समस्याओं को सुलझाया जाय तो वे इतनी सरल और सीधी सादी प्रतीत होंगी उसके समाधान में किसी को रक्ती भर भी कठिनाई का सामना न करना पड़े। औसत भारतीय का निर्वाह स्वीकारने और महत्वाकाँक्षाओं को आदर्शवादिता की ओर से मोड़ देने भर से मनःस्थिति उलट सकती है और परिस्थितयों की विषमता देखते-देखते तिरोहित हो सकती है। वस्तुतः व्यस्त से व्यस्त समझा जाने वाला व्यक्ति भी जीवन में आत्मा की आवश्यकता और ईश्वर की साझेदारी अनुभव करने लगे तो उसके कपाट खुल सकते है और ऐसी जीवनचर्या बन सकती है जिसमे आत्मकल्याण और लोकनिमार्ण के दोनो प्रयोजन श्ली-शँती पूरे होते रहे, साथ ही निर्वाह एवं परिवार पोषण में राई भर भी कठिनाई अनुभव न करनी पडे। चिन्तन के इसी परिष्कार की चर्चा इस अड्ड में की गई है। इसे गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके तो जागृत आत्माओ में से प्रत्येक को युग धर्म के निर्वाह का न्यूनाधिक अवसर निश्चित रुप से मिल जायगा और वह युग सन्धि को इस पुण्य बेला में आरम्भ हुए द्दोटे-द्दोटे क्रिया-कलापो को पुर्ण करने में इतना सफल हो सकेगा जिसे सन्तोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके।

आठ घण्टे कमाने के लिए-सात घण्टे विश्राम के लिए पाँच घण्टे घरेलू काम-काजो के लिए समय निकाला जा सके तो नित्य कुआ ख्रोदने और नित्य पानी पीने वालो की निर्वाह आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रह सकती है साथ ही चार घण्टे का समय सामयिक परमार्थ प्रयोजनो की पूर्ति के लिए नित्य प्रति सरलतापूर्वक निकल सकता है।

यदि इस निर्ष्कष पर पहुँच सकना सम्भव हो सके तो करने योग्य र्सवप्रथम और सर्वोपरि कार्य एक ही है कि शालीनता की सीता को ढूढ़ने के लिए सभी रीछ, वानर निकल पं और उसकी तलाश में धरती का पत्ता-पत्ता खोज ले। पौराणिक रामराज्य की स्थापना लिए सदभाव सम्पन्न प्रयत्नो का शुभारम्भ इसी प्रकार हुआ था। सीता अपहरण की अनिति जिन्हे खली थी वे कौने में बैठे आँसू नहीं बहाते रहे वरन् उन्हे खोज निकालने के लिए घरती का चप्पा-चप्पा खोज लने के लिए उतारु हो गये।

अपने समय में जिस सीता का अपहरण हुआ है उसका नाम शालीनता है-शालीनता अर्थात् शराफत, सादगी, सज्जनता, श्लमनसाहत, नेकी उदारता आदि ।

आज हर क्षेत्र में आडम्बरों के पर्वत खडे है , पर उन्हे खोजने, टटोलने पर ढोल की पोल के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ा। स्वार्थान्धों और व्यामोहग्रसतो की बात जाने दे तो श्ी जो परमार्थ का दावेदार धर्म क्षेत्र बच रहता है उसके मूर्धन्यो तथा क्रिया-कलापों की जाँच पड़ताल करने पर शालीनता खोजने पर निराशा ही हाथ लगती है। यश और पद के श्खे लोगो से लोकसेवा का क्षेत्र इस बुरी तरह भर गया है कि भाव सम्वेदना खोज निकालना असम्भव जैसा लगता है। देवताओं की हजामत वनाने वाले पुजारियों के पाखण्ड देखते ही बनते है। धर्माडम्बरों के बहाने अपनी कीर्ति ध्वजा फहराने वालो में जो प्रतिस्पर्धा चल रही है उससे प्रतीत होता है कि इससे पूर्व ऐसा धर्म युग कदाचित ही कभी रहा हो। अखण् कीर्तनों और रात्रि जागरणों का कुहामा सुनकर लगता है अब क्षीर सागर में सोने वाले श्गवान को इच्छा या अनिच्छा से विस्तर समेटना ही पडे़गा। तीर्थयात्रा और दान-पुण्य में हर साल बढ़ोतरी ही हो रही है इतने पर श्ी उस शालीनता का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा है जिसके सहारे व्यक्ति को न्यूनतम निर्वाह अपनाने के उपरान्त जो समर्थता बची रहती है उसे सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन के लिए नियोजित किया जा सके। यदि शालीनता का आस्तित्व रहा होता तो यह क्षेत्र इतना सुनसान न रहता कि युग सृजन के लिए जरा-जरा से श्रम, सहयोग के लिए बुरी तरह भटकना और खिन्नतापूर्वक निराश रहना पड़ें।

॥द्मद्मद्भह्द्ध; द्यड्डरुस्रक्वद्धह् ठ्ठह्यश द्यड्डरुस्रक्वद्धह् द्दस््न ठ्ठह्यश क्स्नद्मर्द्मंह्− द्यड्ड;द्गद्ध क्द्मस्द्भ द्यह्यशद्म ॥द्मद्मशद्ध्न ठ्ठह्यशद्यक्रह्द्म स्रद्म द्बभ्क्र;म्द्म ठ्ठ'र्द्मंह्व द्वठ्ठद्मद्भ 'द्मद्मब्द्धह्वह्द्म स्रद्ध फ्द्धह्द्धशद्ध/द्म;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्दद्ध द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न ड्ढद्य [द्मद्मह्यह्ल स्रह्य द्धब्, द्धह्वस्रब्ह्वह्य शद्मब्ह्य क्/द्मह्यद्भह्यड्ड द्गह्यड्ड ॥द्मंकस्रह्ह्य द्दद्ध ठ्ठद्ध[द्म द्बरु+ह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्द्मश';स्रह्द्म ड्ढद्य ष्द्मह् स्रद्ध द्दस् द्धस्र ह्लद्मफ्क्वह् क्द्मक्रद्गद्मक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य द्बभ्क्र;ह्यस्र स्रह्य द्गह्य ;द्द ठ्ठर्ठ्ठं द्वक्चह्य द्धस्र शह्य 'द्मद्मब्द्धह्वह्द्म स्रद्मह्य द्यद्धह्द्म स्रद्ध [द्मद्मह्यह्ल स्रद्भस्रह्य द्दद्ध द्भद्दह्यड्डफ्ह्य्न द्वद्यस्रद्म क्ह्द्म द्बह्द्म ह्लद्मह्य ॥द्मद्ध द्धद्गब्ह्यफ्द्म द्वद्यद्ध द्यह्य द्बख्हृह्यड्डफ्ह्य क्द्मस्द्भ द्बभ्द्म.द्म&द्ब.द्म द्यह्य ड्ढद्य द्धह्वद्धद्गक्रह् द्बभ्;क्रह्वद्भह् द्भद्दह्यड्डफ्ह्य द्धस्र 'द्मद्मब्द्धह्वह्द्म स्रद्मह्य क्द्यह्नद्भह्द्म स्रह्य श्चँफ्ह्नब् द्यह्य हृह्नरु+द्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्यड्ड्न


जागृतों की अंतरात्मा में इस उषा का उदय इन्ही दिनों

पशु इन्द्रिय प्रेरणा में कार्यरत रहता है। मनुष्य का दर्जा उससे ऊँचा है उस बुद्धि की विशेषता रहती है। सामान्यता वह स्वार्थ प्रधान और अहंतारत होती है। इसी परिधि में सोचती तथा कार्य करती है। उच्चस्तर देवता का है वे शवना प्रधान होते है। शवनाएं उत्कृट सोचती और आदर्शां के परिपालन की उमंगे उत्पन्न करती है। वैसे तो प्राणी समुदाय तीन स्वंतन्त्र वर्ग माने जाते है,पर वस्तुतः इन्हे मानवी चेतना के तीन विभाजन ही समझा जाना चाहिए।

नर पशु वे है जिन पर पेट और प्रजनन की प्रकृति प्रेरणा ही छाई रहती है और इस दबाव में विवशतापूर्वक कुछ न कछ कृत्य करते रहते है। उसके लिए उन्हे बहुत सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं पडती। प्रकति प्रेरणा के प्रवाह में वे अनायास ही बहते रहते है। शरीर यात्रा ही उनके लिए सब कुछ होता है। इन छोटी परिधि में दिन काटते हुए उन्हे उल्लास की अनुभूति तो नहीं होती, पर कुछ असंन्तोष भी नहीं उठता। ज्यो-त्यो करके समय गुजर जाता है। नर-पशुओं के समुदाय की यही स्थिति रहती है।

औसत मनुष्य अक्लमंद और चतुर होता है। इस विशेषता का उपयोग वह प्रधानतया स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है। वह सोचता, समझता तो है, पर वह उसकी समझ की परिधि अपने लिए सम्पन्नता एवं बड़़़प्पन जुटाने की परिधि में ही परिभ्रमण करती है।

पशु वासना प्रधान है। मनुष्य में वासना भी होती है, साथ ही तृष्णा भी प्रबल रहती है। फलतः वह साथियों की तुलना में अधिक साधन सम्पन्न बनने और सुख पाने का ताना-वाना बुनता रहता है। यह आकाँक्षा सीमित हुई तो उसे अनुदार रखती है, ताकि अहंता की पूर्ति के लिए उपलब्धियों का समान उपयोग हो सके। यह ललक थोड़ी और आगे बढ़ती है तो जल्दी ही अधिक पाने के लिए उद्धत आचरण पर उतारु होती है। अपराधि एंव आततायी इसी वर्ग के होते है। औंसत मनुष्य को सम्पन्नता, सम्पन्नता एवं बड़़़प्पनपाने के लिए लालायित देखा जाता है और उसका चातुर्य इसी सीमा बन्धन में समाप्त होता रहता है। वे प्शुओ की तुलना में धाटे में रहते है। तृष्णा उनसे वह कृत्य कराती है जो ईश्वर प्रदत मानवी गरिमा को उठाते नहीं गिराते है।

उन्हे पग-पग पर अन्तद्वन्द्वो और उर्द्वगों की आग में झुलसते रहना पड़ता है। दर्शन की शषामे नरक इसी को कहते है। औसत मनुष्य को नारकीय कहते है। वह श्गवान के दरबार में लौटता है तो अपने को उत्तर-दायित्वों की अवहेलना करने वाले अपराधियो की श्रेणी में खडा़ पाता है। यह आत्मप्रताड़ना ही उसे ईश्वरीय दण्ड़ की तरह इतना कष्ट देती है जितना कि निर्वाह रत नर-पशु श्ी सहन नहीं करता। उन्हे महत्वाकाँक्षा पूरी करने का अवसर नहीं मिलने पर असंन्तोष की आग में जलते-झुलसते रहने की व्याथा बेदना श्ी सहन नहीं करनी पड़ती।

देवताओं की दुनिया इन दोनो से ऊँची होती है। उनमें इन्द्रियाँ श्ी होती है और बुद्धि श्ी, पर दोनो को उच्छड्ढल नहीं होने देने वाला विशेषसंयम का अकुँश उन पर रहता है।

अतएवं वे सरलतापूर्वक सज्जनों जैसी जीवनचर्या अपना कर निरन्तर आत्मसन्तोष मर्यादा पालन का रसास्वादन करते रहते है। देवताओं की-मनःस्थिति शवना प्रधान होती है। इनका उत्पादन इन्द्रिय क्षैत्र एंव बुद्धि संस्थान में नहीं क्रअन्तःकरण में होता है। आत्मीयता और उदारता की उमगें हर समय उठती रहती है। वह प्रायः इतनी प्रबल होती है कि तृप्ति पाये विना चैन ही नहीं लेने देती। अपनी सम्पन्नता बाँटने और दूसरो की विपत्रता बाँट लेने के लिए उनकी अन्तःप्रेरणा इतनी प्रबल होती है जितनी कि वासना, तृष्णा और अहन्ता की तीनो ललक लिप्साएँ श्ी मिलकर श्ी उत्पन्न नहीं कर सकती। यही कारण है कि देव मानव संचित पशु प्रवृतियों और प्रचलित लोकप्रवाह की उपेक्षा करने में तनिक श्ी कठिनाई अनुभव नहीं करतें। वे अपना रास्ता आप चुनते है और मस्त हाथी की तरह अन्तःप्रेरणा का अनुसरण करते हुए उत्कृष्टता की चरम सीमा तक जा पहुँचने के लिए अनवरत गति से बढ़ते रहते हैं। रास्ते में कितने कुत्ते शैके, कितने कंकड़-पत्थर बाधक बने इस पर ध्यान देने की उन्हे आवश्यकता तक नहीं पड़ती। उच्चस्तरीय शव सम्वेदनाएँ इतनी अधिक रसीली होती है कि जिन्हें उनका एकबार रसास्वादन करने का अवसर मिल गया उनमें कदाचित ही कोई अपना अपवाद प्रस्तुत करता है और वापस लौट कर कीचड़ में लोट-पोट करता है।

देव मानवों को बोल-चाल की शषामें महामानव,आर्दशवादी, लोकसेवी, सन्त ब्राह्मण, सुधारक, श्देव ऋर्षि दृष्टा, देवता आदि नामों से जाना जाता है। उनमें तीन विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है। एक उत्कृट चिन्तन अर्थात् र्स्वग, दूसरे लोकप्रवाह की उपेक्षा अर्थात् मुक्ति, तीसरे प्रामाणिकता और उदार परमार्थ परायणता के आधार पर वरसने वाला असीम सहयोग सहित लोक-सम्मान। असी को देवनुग्रह, ईश्वरीय वरदान कहते है।

नवयुवक को देवयुग कहा जायेगा। उसकी तुलना सतयुग एवं राम-राज्य सें होगी। उसी स्थिति में धरती पर र्स्वग का अवतरण कहा जायेगा। इसकी श्मिका निभाने की पूरी-पूरी जिम्मेदारी मनुष्य के अन्तराल में उद्भूत होने वाले देवत्व को वहन करनी होगी। यही है वह देवी निर्धारण जो जागृत आत्माओं के शग्य-विधान में इन दिनों प्रकट होने के लिए विधाता ने अपनी लेखनी लिख रक्खा है। युग सन्धि के इस पावन पर्व पर हर ऐसा जागृत आत्मा को अपनी जीवनचर्या में ऐसा ही प्राण-वान परिवर्तन प्रकट होते दृष्टिगोचर होगा ये नर-प्शुओं की तरह पेट प्रजनन के लिए जीवित रहने की निकृष्टता साहसपूर्वक अस्वीकार कर देगें इतना ही नहीं चतुर लोगो द्वारा अपनायी जाने वाली अक्लमंन्दी श्ी उन्हें रुचेगी नहीं और लगेगा कि सचय ‘विलास एवं बड़प्पन के कोहलू में पिलन वाली तथाकथित बुद्धिमानी में भी कुछ सार नहीं है। अन्ततः वह बज्र मूखता से श्ी मंहगी पडती है।

कहते है कि प्रजापति के शुभमूहुर्त देखकर समुद्र मंथंन की योजना बनाई थी। फलत; उस पराक्रन के फलस्वरुप बहुमुल्य रत्न राशि पाने का लाभ इस संसार को मिल सका।

उस गाथा की सामयिक पुनरावृत्ति इस प्रकार होती दिखाई है कि जागृत और जीवन्तों को इन दिनो प्रचण्ड आत्म मंथन का सामना करना पडेगा और उनमें से कुछ ऐसा अमृत उद्भूत होगा, जैसा गोमुख से गंगावतरण के रुप में श्रद्धालुओ को परिलक्षित होता है।

आर्दशवादी शव सम्वेदनाओ को श्रद्धा कहते यही है नवयुवग के-देवयुग के स्वप्न को साकार बना सकने वाली प्रचण्ड शक्ति। इसी के अभाव में दुर्गति हुई है उसी के प्रभात-उषा के उदर में उस अरुणोदय के दर्शन होगे जिसके सहारे संव्याप्त अन्धंकार और उसके दुष्प्रभाव से छुटकारा मिल सकेगा।

युग अंवतरण के लिए साधनो की, परिश्रम की, मनोयोग की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पडे़गी। एक से एक शरी प्रयोजनो के सरंजाम खडे़ करने होगे, पर वे न तो समृद्धवानो के जुटाये जुटेगे और न बुद्धिमानो ने उसकी व्यवस्था बन पड़ेगी, सामर्थ्य तो शैतिक उथल-पुथल श्र कर सकती है। जब कि आवश्यकता इन दिनो शवनाशील श्रद्धा की, उदार आत्मीयता की और प्रचण्ड़ परामर्थ परायणता की है। कुछ बनना है तो इस देव व के बलबूते ही बनेगा। समय ने इसे उभारने और कार्य क्षैत्र में उतारने के लिए देव मानवों की विशेष रुपम में निर्देश श्जा है। वे जो जागेगें और प्रसुप्तों को जगायेगें। उनकी श्रद्धा उभरेगी तो सर्वत्र उसे बर्षा और बंसन्त की तरह अपने प्रभाव का उल्लास श्रा परिचय देनें का अवसर मिलेगा। यही है नवयुवक की पृष्ठभूमि जिसे जागृत आत्माओं में से श्रद्धा सम्वेदना के रुप में उभरती हुई सहज ही सर्वत्र देखी जा सकेगी।


जागृत आत्माओं से अग्रगामी बनने का आहान

प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण के तथ्य के आधार पर जो विश्वास कर सके और उस आधर पर नवयुवक को सम्भावना प्रत्यक्ष होने के तथ्य को हदयंगम कर सके उन्हे इतना और जान लेना चाहिए कि निराकार शक्तियाँ अपने प्रभाव का परिचय किसी साकार -आधार के सहारे ही दें पाती। युद्ध में पराक्रम तो योद्धा का शैर्य और श्जाओ का बल ही दिखाता है, पर शत्रु की गरदन पर चमकती तलवार ही है। प्रज्ञावतार को जो श्ी करना है वह दृश्य देवताओं के माध्यम से ही सम्भव होगा। धरती के दृश्य देवता वे है जिनने शैतिक महत्वकाक्षाऔं के-वासना-तृष्णाओं के लोह वन्धन शिथिल करके औसत शरतीय की जीवनचर्या में सन्तुष्ट रहने की मनोभूमि वनाली है और जो अपने चिन्तन तथा कर्म को सर्त्यवृत्ति संम्वन्ध में, युग साधना में नियोजित कर सकने का अवसर प्राप्त करते है। जागृत आत्माएँ-युग शिल्पी, सजृन-सैनिक, देवमानव, प्रज्ञापुत्र आदि नामों से समय-समय पर इसी समुदाय का उल्लेख होता रहता है। उज्जवल श्विष्य की आँशाओ के केन्द्र विन्दु दन्ही को माना गया है। शेष तो मोह मदिरा पीकर उन्मादियों अथवा अर्धमतृको की तरह मनुष्य जीवन को मखौल बनाते हुए दिन गुजारते है। प्रतिभाओं की कमी नही। साधनों के पर्वत खडे है। सामर्थ्य बिखरी पडी है पर उन सबका उपयोग तो लोभ लिप्स की नरक ज्वाला जलाने में ईधन की तरह ही होता रहता है। वह सदाशयता कहाँ से ढूढँ निकाली जाय जो मनुष्य को प्रदान की गई अन्नत सामर्थ्य को सदुद्देयों की पूर्ति के लिए नियोजित कर सके। ऐसा कर सकना विवेकशील विचारणा और सम्वेदनशील सहदयता के लिए ही संम्भव है। जिन्हें यह वरदान मिले हो उन्हीं से युग सृजन जैसे महान प्रयोजन के निमित कुछ बन पड़ने की आशा की जा सकती है। दूसरे तो ऐसे ही दाँत निपोरतें और कल्पना-जल्पना की उड़ान उड़ते रहते है। सनक, सदाशयता की श्ी हो सकती है, पर मनमोदक खाते रहने से पेट किस का श्रता है। काम तो पराक्रम ही आता है। उसका अभाव हो तो फिर दिवा स्वप्न ही बँधते है।

युग सृजन अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए जनमान का परिष्कार और सत्प्रवृति संम्वन्ध के दो कार्य ही करने होगे। इन्ही के सत्परिणामो को मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर र्स्वग का अंवतरण कहा जाता रहा है। विनाश की विभिषिकाओं से जुझना और उज्जवल श्विष्य की संरचना लोक-मानस में उत्कृत का संम्बन्ध करने के अतिरिक्त और किसी प्रकार संम्भव नहीं हो सकता। यह कार्य हर किसी के करने का नही। इसे बुद्धिमान , बलवान , मिलकर श्ी न कर सकेगे। कुबेर जितनी सम्पन्नता और इन्द्र जितनी समर्थता एकत्रित कर लेने पर श्ी सतयुगी वातावरण के साथ जुड़ी हुई सुख-शान्ति की-प्रगति, संस्कृति का पुनरुत्थाम संम्भव नहीं हो सकता। अतीत वाला र्स्वग युग, मात्र देवमानवों की विशिष्टताओं से सुसज्जित महामानव ही संम्पन्न कर सकेंगें। आज उन्ही की तलाश के लिए पीड़ित मानवता बेचैन दृष्टिगोचर हो रही है। सुसज्जित युग निर्माण योजना के बहुमुखी क्रिया-कलापो का कंन्द्र बिन्दु एक ही है। सृजन शिल्पी की श्मिका निभा सकने बाले-चिन्तन और चरित्र की दृष्टि से देवत्व सम्पन्न प्रतिभाओं का उपार्जन संचय एवं संगठन। इस प्रयोजन में जितनी सफलता मिलेगी उसी अनुपात से यह समझा जा सकेगा कि मानवी शग्योदय का समय निकट आ गया। युग परिर्वतन या र्स्वग का अवतरण इसी स्थिति को कहा जाता रहा है।

युग निर्माण परिवार के परिजनों में से अधिकाँश ऐसे ही सुसंस्कारी है जिन्हे थोड़ा-सा खराद देने पर बहुमूल्य हीरो जैसी उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकती है और समय कि माँग पूरी हो सकने की आँशा बन्ध सकती है। इसी उत्पादन के निर्मित पिछले दिनो से शगीरथी प्रयत्नच ल रहे है।

युग सन्धि की विशिष्ट बेला में आवश्यक है कि विशेष दूरदर्शिता अपनाई जाए। इसका एक मार्ग है कि इन दिनों लिप्सा के पलडे़ में बजन न डाला जाये । इन दिनों अमीरी नहीं महानता अपेक्षित है। कामनाओं को शवनाओं में बदला जाय और चरित्र चिंतन को ऐसा मोड़ दिया जाए संम्भव जिसके सहारे महामानवों की श्मिका सम्पन्न कर सकना सम्भव हो सके। यह प्रथम चरण है। दूसरा चरण उपलब्ध प्रतिभा का युग सृजन में शवभरा नियोजन है। जो अपनी दिशाधारा को इस शैली में ढाल सकेगे उन्ही के लिए संभव होगा कि वे समुद्र लाँधते, पर्वत उठाने, लंका जलाने, मृत लक्ष्मण को जिलाने, राम को सीता दिलाने और विश्व वन्ध, श्क्त शिरोमणि हनुमान वन सकने का सौभग्य प्राप्त कर सके।

परिजनों की मनःस्थिति यदि इन दो आधारो पर युग साधक जैसी बन सके तो फिर ढर्रे का सड़ा-गला जीवनक्रम गले से बाँधे रहना उसके लिए किसी श्ी प्रकार संम्भव न होगा। उदात्त चिन्तन का यदि सचमुच ही अन्तराल में प्रवेश हो सका तो जीवनक्रम के उद्वेश्य और आचरण में जमीन आसमान जैसा अन्तर पडे़ बिना रह नहीं सकता। तब निर्वाह की समस्या हल करने और परिवार का ब्राह्मणोचित क्रिया-कलाप चलते रहने में किसी को श्ी रत्ती श्र श्ी कठिनाई नहीं हो सकती। पत्तियों के मर जाने या अपंग हो जाने की स्थिति में जो अपने शरीर पुरुषार्थ केवल पर अपना ही नहीं चार-चार बच्चों का पालन और विकास श्ी श्ली प्रकार कर लेती हैं। ऐसे प्रतिभा को जगाया जा सके तो गृहव्यवस्था ही नहीं उपार्जन का श्ी उत्साहवर्धक मार्ग निकल सकता है। वे चाहे तो छोटा-मोटा काम करके इतना कमा सकता है कि धर से एक शवनाशील व्यक्ति को युग सृजन जैसे आपत्ति धर्म का परिपालन करने के लिए बिना किसी असविधा के अवसर प्रदान कर सके। हर धर में पूँजी जेबर, जायदाद एवं ठाठ-बाठ के साधनों में कैद नहती है। ब्याज शडे़ में पडी रहती है। इसक समेट-बटोर कर यदि परिवार के आवश्यक निर्वाह में लगाया जा सके तो आजकल की शरी बैक-ब्याज तो किसी छोटे परिवार का गुजारा आसानी से चला सकती है। बच्चो को बड़ा साहब बनाने की अपेक्षा यदि कारीगर, अध्यापक जैसी मध्वर्ती गुजारे की योजना बनाई जा सके तो निश्चय ही उनकी संन्तान अवाँछित तरीके अपनाकर दौलत बटोरने चालों की तुलना में लाख गुनी अधिक सुखी और सुसंस्कृत रह सकती है। सोचने श्र की माया का जाल है , जिसमें उलझे हुए व्यक्ति कभी व्यस्तता का, कभी समस्याओं का, कभी जिम्मेदारीयो का वहाना गढ़ कर आत्म प्रबंचना करते रहते है।और युग धर्म की महती आवश्यकता को झूठलाते, समय की चुनौती को अस्वीकारते रहते है। तथ्यतः अधिकाँश के सामने ऐसी समस्याएँ होती नहीं जिनके कारण वे अपना पूरा या अधूरा समय परमार्थ प्रयोजनों में देकर धन्य न बन सकें। मकडी़ का जाला श्र है जिसमें फँसे जकडे रहकर आम-तौर से विवशता दुहाई दी जाती रहती है। असल में व्यामोह के दलदल में एडी से चोटी तक फँसा हुआ म नहीं उन समस्त उलझनों का एकमात्र केन्द्र बिन्दु है, जो समय की पुकार की अवज्ञा करते रहने के लिए गूँगा वहरा वनाये रहती है। श्ीतर वाला यदि बदल सकें तो उन तथा कथित कठिनाईयों को हल करने के हजार रास्ते निकल सकते है, जिनके आधार पर महाकाल के आह्नान पर कम से कम कुछ कदम बढ़ा सकना तो सम्भव हो ही सकता है। क्या आवश्यकता है कि हर साल एक बच्चा उत्पन्न किया जाय और सौ रुपये मासिक का नया खर्च हर साल बढ़ाया जाय?

दाम्पत्य जीवन एक बात है और बच्चे पर बच्चा जनते जाना सर्वथा दूसरी। विवेक से काम लिया जाय तो समय रहते उस विपत्ति से बचा जा सकता है, जो पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों का भविष्य उपार्जन कर्ता को बोझ और देश व्यापी संकट उत्पन्न करने के लिए मुख्य रुप से जिम्मेदार है। जिन्हं आदर्शो के प्रति निष्ठा है और जो अपनी सामर्थ्य को सदुद्देश्यों के लिए लगाना चाहते हैं उन्हें यह समझने में रत्ती भर भी कठिनाई न होनी चाहिए कि इन दिनों प्रजनन में उत्साह दिखाना लगभग देशद्रोह और आत्मघात जैसा अपराध है। बच्चों के प्यार या पालन में रुचि हो तो पड़ौस में ही असहायों के दर्जनों बालक इस प्रयोजन के लिए सहज ही मिल सकते हैं। तब न सन्तान के कुपात्र निकलने का दुख होगा और न उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर जूते खाने मूँछ उखड़वाने का संकट उत्पन्न होगा। यह गम्भीर प्रश्न है जिसे समझने के लिए दिवान्धों से तो कुछ नहीं कहा जा सकता किन्तु जन-कल्याण में रुचि रखने वालों को तो एक बार नहीं हजार बार इस सर्न्दभ में सोच-विचार करना चाहिए और अकारण भार लादने की मूर्खता से बचना चाहिए।

यहाँ हैं वे व्यावहारिक कठिनाईयाँ जिनमें उलझे रहने के कारण भावनाशीलों में से भी अधिकाँश व्यक्ति परिस्थितियाँ सर्वथा अनुकूल होने पर भी युग धर्म के निर्वाह के लिए तनिक-सा समय दे सकना भी शक्य नहीं मानते। कमाऊ बच्चों को पैतृक अनुदान वापिस करने की नीति शिक्षा दी जा सकती है और उन पर अपने छोटे भाई-बहनों तथा अभिभावकों के भरण-पोषण में सहृदयता करने के लिए दबाव डाला जा सकता है। पर कोई किससे, किस प्रकार क्या कुछ कहें? जब कुएँ में भाँग पड़ने के कारण पीने वाले सभी लोग वाबले हो रहे हों तो कोई किसी को क्या समझायें ?

इन दिनों जागृत आत्माओं के अग्रगमान की सर्वोपरि आवश्यकता है। ऊपा निकले तो सूर्य उगे। इंजन बढ़े तो डिब्बे खिसकें। जब विचारशीलों ने ही अपनी आदर्शवादित को, मनःस्थिति को दुर्बलता के कारण दीनहीन दयनीय बना रखा हो तो फिर सामान्यजनों से कोई क्या कहे? तब नव सृजन के लिए उपयुक्त प्रतिभाएँ कहाँ से उपलब्ध हों। अध्यात्म तत्वज्ञान की खदान से ही नर-रत्न निकलते हैं जब उसका सर्वनाश हो गया और पूजा पत्री की खिलवाड़ से मनोकामनाएँ पूर्ण कराने के लिए देवताओं को फुसलाना ही अध्यात्म बन गया हो तब मात्र अन्धकार ही अन्धकार शेष रह जाता है।

नव सृजन के लिए सर्वोपरि आवश्यकता है युग शिल्पियों के सत्प्रवृत्तयों के सर्म्बधन में निरत होने की। प्रतिभाओं का समयदान ही वह प्राथमिक आवश्यकता है जिसकी पूर्ति होने लगे तो अन्य सभी साधन चुटकी बजाते जुटते चले जायेंगे। प्राचीनकाल में गृह निवृत्त भावनाशीलों के लिए वानप्रस्थ परम्परा अपनाकर आत्मकल्याण और लोक निर्माण के उभयपक्षीय प्रयोजनों में निरत होना पडता है। गृहस्थ के उत्तरदायित्व रहने पर भी ब्राह्मणोचित औसत नागरिक जैसा संतोषी जीवनजिया जा सके तो भी यनव सृजन की आवश्यकता में कन्धा दे सकने वालें अंसख्यों मिल सकते है। साधनों की कमी बहुत है। कभी सरकार के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है कभी चन्दे की रसीद बही लेकर द्धार-द्धार पर अपमान सहना पड़ता है। भावनाशीलों को यदि अपने निजी उपार्जन का सदुपयोग करने की बात सूझ पड़े तो उतने भर से वे सभी कार्य सहज ही पूरे हो सकते है जो नवयुग के प्रथम चरण में अनिवार्यतः आवश्यक है। दस पैसा नित्य और एक एक मुट्ठी अन्य नित्य देने देने में कोई निर्धन भी ‘न’ नहीं कर सकता। महीने में एक दन की कमाई बिना किसी कठिनाई के कोई भी भावनाशील सहज ही देता रह सकता है। अपव्यय, संचय और उत्तराधिकार के लिए बची हुई मान्यताओं एवं आदतों को यदि बदला जा सके तो युग निर्माण परिवार के वर्तमान सदस्य ही इतनी बड़ी धन राशि जुटा सकते है जिससे कि यह छोटा देव समुदाय ही नव सृजन का उत्तरदायित्व वहन करने एवं श्रेय पाने में सहज ही समर्थ हो सके।

युग परिवर्तन नितान्त आवश्यक है, पर उसके लिए अग्रगामी ऐसे मनस्व चाहिएँ जो पहले अपने को बदले। जो अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति को नव निर्माण में कुछ योगदान दे सकने के उपयुक्त बना सकेंगे उनही से यह आशा की जा सकेगी। मृत्यु और जीवन के बीच झूलने वाली स्थिति से मनुष्यता को उवारने में कुछ कारगर सहयोग वेही दे सकेंगे। जिन्होंने आदर्शो को वाचालता का विष भर बना लिया उन्हें मनोनिग्रहियों से अनुदान की मनुहार करना तो एक प्रकार से बालू का तेल निकालने के प्रयत्न जेसा निरर्थक ही रहेगा।


यह नवरात्रियाँ असामान्य हैं

नवरात्रि को देवत्व के र्स्वग से धरती पर उतरने का विशेष पर्व माना जाता हैं। उस अवसर पर सुसंकारी आत्माएँ अपने भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें उभरती देखते हैं। जो उन्हं सुनियोजित कर सकें वे वैसी ही रत्न राशि उपलब्ध करते हैं जैसी कि पौराणिक काल में उपलबध हुई मानी जाती है। इन दिनों परिष्कृत अन्तराल में ऐसी उमंगे भी उठती हैं जिनका अनुसरण सम्भव हो सकें तो देवी अनुग्रह पाने का ही नहीं देवोपम बनने का अवसर भी मिलता है यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सदा ही बरसता है, पर ऐसे कुछ विशेष अवसर भी आते हैं जिनमें अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। इन अवसरों को पावन पर्व कहते हैं। नव रात्रियों का पर्व मुहूतों में विशेष स्थान है। उस अवसर पर देव प्रकृत की आत्माएँ किसी अदृश्य प्रेरणा से प्रेरित होकर आत्म कल्याण एवं लोक मुँगल के क्रिया कलापों में अनायास ही रस लेने लगती हैं।

बसन्त आते ही कोयल कूकती और तितलियाँ फुदकती दृष्टिगोचर होती है। भोरे गूँजते हैं जबकि अन्य ऋतुओं में उनके दर्शन भी दुर्लभ रहते हैं। वर्षा आते ही मेंढ़क बोलते और मोर नाचने लगते हैं जबकि साल के अन्य महिनों में उनकी गतिविधियाँ कदाचित ही दृष्टिगोचर होती है। आँधी तूफान और चक्रवातों का दौर गर्मी के दिनों में रहता है। ग्रीष्म का तापमान वदलते ही उनमें से किसी का पता नहीं चलता। ठीक यही बात नवरात्रियों के समय पर भी लागू होती है। प्रातः काल और सायं काल की तरह इन दिनों की भी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं उनसे सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह उभरते और मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। न केवल प्रभावित करने वाली वरन् अनुमूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बनती है। इसे समय की विशेषता कह सकते हैं। जीवधारियों में से अधिकाशं को इन्ही दिनों प्रजनन की उत्तेजना सताती हैं और वे गर्भाधान सम्पन्न कर लेते हैं। इसमें प्राणी तो कठपुतली की तरह अपना रौल पूरा करते हैं-सूत्र संचालन तो किसी ऐसे अविज्ञात मर्मस्थल से होता है जिसे सूक्ष्म जगत या अर्न्तजगत के नाम से मनीषी व्याख्या-विवेचना करते रहते है। नवरात्रियों में कुछ ऐसा वातावरण रहता है जिसमें आत्मिक प्रगति के लिए प्रेरणा और अनुकूलता की सहज शुभेच्छा बनते देखी जाती हैं।

सूर्य के उदय और अस्त होते समय आकाश में लालिमा छाई रहती है और उस अवधि के समाप्त होते ही वह दृश्य भी तिरोहित होते दिखता है। इसे काल प्रवाह का उत्पादन कह सकते हैं। ज्वार भाटे हर रोज नहीं अमावस्या पूर्णमासी को ही आते हैं। उमंगों के संबंध में भी ऐसी ही बात है कि वे मनुष्य की स्व उपार्जित ही नहीं होतीं वरन् कभी-कभी उनके पीछे किसी अविज्ञात उभार का ऐसा दौर काम करता पाया गया है कि चित्न ही नहीं कर्म भी किसी ऐसी दिशा में बहने बढ़ने लगता है जिसकी इससे पूर्व वैसी आशा या तैयारी जैसी कोई बात नहीं थी। ऐस अप्रत्याशित अवसर तो यदा-कदा ही आते हैं पर नवरात्रि के दिनों अनायास ही अन्तराल में ऐसी हलचलें उठती हैं जिनका अनुसरण करने पर आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनने में ही नहीं सफलता मिलने में भी ऐसा कुछ बन पड़ता है मानो अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसा हो।

ऐसे ही अनेक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शि ऋषियों, मनीषियों ने नवरात्रि में साधना का अधिक माहात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।

नवरात्रि देव पर्व है। उसमें देवत्व की प्रेरणा और देवी अनुकम्पा बरसती है। उसमें देवत्व की प्रेरणा और देवी अनुकम्पा बरसती है। जो उस अवसर पर सतर्कता बरतते औ प्रयत्नरत होते है, व अन्य अवसरों की अपेक्षा इस शुभ मुहूर्त का लाभ ही अधिक उठाते हैं, भौतिक लाभों को सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। संकटों के निवारण और प्रगति के अनुकूलन में सिद्धियें की आवश्यकता पड़ती है। उस आधार पर जो मिलता है उसे वरदान कहा जाता हैं। नवरात्रियाँ वरदानों की अधिष्ठात्री कही जाती है, पर इस शुभावसर का वास्तविक लाभ है देवत्व की विभूतियों का जीवनचर्या में समावेश। वह जिसे जितनी मात्रा में मिलता हैं वह उतनी ही कला क्षमता का नर देव कहलाता हैं। देवता र्स्वग में ही नहीं रहते अपितु महामानवों के रुप में इस धरती पर विचरते हैं।

नवयुग देवत्व प्रधान होगा। उसमें वे प्रयत्न चलेंगे जो मनुष्य में देवतव का उदय कर सकेंगे। जहाँ देवता बसते हैं वहाँ र्स्वग होता है। जहाँ र्स्वग होगा वहाँ देवता ही बसते होंगे। इसी तथ्य के आधर पर यह अपेक्षा की गई है कि उत्कृष्ट व्यक्तियों द्वारा जो सुखद वातावरण बनेगा उसे धरती पर र्स्वग के अवतरण की उपमा दी जा सकेगी।

युग सन्धि की नवरात्रियों में विशेष सम्भावना इस बात की हैं कि उनमें अदृश्य लोकों में देवत्व की अतिरिक्त वर्षा हो और उस अनुदान को पाकर देव मानवों का समुदाय अधिक प्रखरता सम्पन्न होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगे। युग परिवर्तन की अवतार प्रक्रिया को गतिशील बनाने में इन देव मानवों का ही योगदान प्रमुख रहा हैं। तत्वदर्शी कहते हैं कि अवतार अकेले ही अपना प्रयोजन पूरा नहीं कर लेते उनके साथ-साथ अनेक सह-योगी भी होते हैं और वे भी देवलोक से उसी प्रयोजन के लिए शरीर धारण करते हैं। पाँचों पाण्डव पाँच देवताओं के अनुसार थं। अनुमान-अंगद आदि के बारे में भी ऐसी ही मान्यता हैं। इन दिनों सृजन योजनाओं में देव मानवों का यह साहस एवं प्रयास ही अग्रिम मोर्चा संभालते दिखाई देगा। नवयुग सृजन की प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने तथा उस दिशा में कदम बढ़ानें का यही शुभ मुहूर्त हैं। प्रज्ञा युग की प्रेरण को अपनाने और विधि व्यवस्ि को चरित्र करने के लिए योंह्र घड़ी पवित्र और महत्वपूर्ण है, पर इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि पर्व की अत्यधिक गरिमा मानी गई हैं। यों उपासना की चिन्ह पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रुप में किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भीउसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय कर की जाने वाली साधाना के साथ अविच्छिन्न रुप से सम्बन्धित हैं।

नवरात्रि पर्व का ऋतु संध्या मुहूर्त विज्ञान की दृष्टि से ही नहीं विशिष्ट साधना पद्धति के कारण भी महत्व पूर्ण माना गया हैं। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्ड परम्परा के रुप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही हैं।

सर्दी और गर्मी दो ही प्रधान ऋतुएं है उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही सन्धि काल है जैसा कि रात्रि के अन्त और दिन के प्रारम्भ मं प्रभातकाल के रुप में उपस्थित होता है। सन्धियाँ सदा मार्मिक होती है। शरीर में अस्थिपिंचर से बने हुए जोड़ों को भी सन्धियाँ कहते है। इन्हीं के यथावत् रहने पर काया की विभित्र क्रिया-प्रक्रियाओं गतिशील रहती है। यह जोड़ यदि जकड़ने लगें तो फिर चलना फिरना तो दूर मुड़ना भी सम्भव न रहेगा। मशीनों के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। उनकी क्षमता एवं गतिशीलता उनकी सन्धियों के सही गलत होने पर ही निर्भर रहती है। इन दिनों युग सन्धि चल रही है अतएव जागृत आत्माओं को अपील कालीन व्यवस्था की तरह युग धर्म के निर्वाह में जुटना पड़ रहा है। ऋतु संध्या आश्विन और चैत्र में जिन दिनों आती है उन नौ-नौ दिनों की अवधि को नवरात्रि कहते है। ऋतुओं में ऋतुमती होने और वातावरण में नये-नये अनुदान भर देने का दृश्य सूक्ष्म जगत में इन्हीं दिनों दृष्टिगोचर होता है। ऐसे-ऐसे अनेकों कारण हैं जिनके कारण अध्यात्म क्षेत्र में साधना प्रयोजनों के लिए यह समय विशेष रुप से उपयुक्त माना गया है। जिस प्रकार प्रभात काल की उपासना अधिक फलवती होती और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों सन्ध्याओं के समतुल्य माना गया है।

सबंविदित है कि युग सन्धि की इस परिवर्तन बेला में अनिष्ट के परिमार्जन तथा सृजन के सर्म्बधन को लक्ष्य रखकर जो बीस बर्षीय योजना बनी है उसमें नैष्ठिक महापुरुश्चरण को विशेष महत्व दिया गया है। एक लाख नैष्ठिक उपासकों द्वारा बीस वर्षीय संकल्प लेकर इतिहास काल के इस अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान का नियोजन हुआ है। उसकी भागीदारी लेने वाले साधकों को आधा घन्टें में सम्पन्न हो सकने वाली पाँच मालाओं का नित्य जप करना होता है। साथ ही गुरुवार के दिन अस्वाद ब्रह्मचर्य एवं मौन व्रत साधना का भी अनुशासन जुड़ा है। इसके अतिरिक्त सामूहिक रुप में मासिक यज्ञ करने की व्यवस्था उन्हें बनाये रखनी होती है। सामान्यतया चलने वाले यही अनुबन्ध है जिनका परिचालन करते हुए युग सन्धि महापुरश्चरण की भागीदारी को गतिशील रखा जाता है।

इन सामान्य नियमों के अतिरिक्त असामान्य तप साधना के रुप में वर्ष की दोनों नवरात्रियों में उन्हें 24 हजार के गायत्री अनुष्ठान भी करने होते हैं। उस समय वे नहीं कर सकते तो आगे पीछे हटकर भी उसकी पूर्ति करनी होती हैं। यह अनिवार्यता इस लिए रखी गई है कि इन नौ दिनों के साधना सत्रों में वे सभी प्रयोजन पूरे होते हैं जो जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रंवृति सर्म्वधन की उभयपक्षीय युग चेतना के अग्रगणी बनाने के लिए नितान्त आवश्यक हैं।

गायत्री अनुष्ठानों के नवरात्रि परम्परा के पीछे ऐसे ऐसे अनेको कारण सन्निहित हैं इसलिए उपासना में अभिरुचि रखने वाले इन दिनों की प्रतीक्षा करते रहते हैं और उस अवसर पर कुछ न कुछ व्रत पालन निश्चित रुप से करते हैं।

जो साधारणतया दैनिक उपासना के अभ्यस्त नहीं हैं और यदा-कदा ही कभी कुछ पूजा पाठ करते हैं ऐसे लोगों पर भी जोर दिया जाता हैं कि वे कम से कम उन दिनों तो कुछ नियम निवाहें और निश्चित साधना की बात सोंचे। इन अभ्यासो के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तार्त्पय मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है। यह किसी के लिए भी भारी नहीं पड़ना चाहिए। मन्त्र लेखन हर रोज 112 करने में नौ दिन में एक हजार लिख जाते हैं यह भी एक अनुष्ठान है। गायत्री चालीसा के हर दिन बारह पाठ करने से नवरात्रि में 108 हो जाते है। ‘ऊँ भूभुर्वः स्वः’ यह पंचाक्षरी गायत्री है। इतना तो अशिक्षित एवं बालक भी याद कर सकते हें और सुविधानुसार संख्या निर्धारित करके उसकी पूर्ति कर सकते हैं। प्रमुख तथ्य नियमितता है, न्यूनाधिकता नहीं। नियमित साधना को अनुष्ठान कहते हैं। उसके साथ तपश्चयाओं का अनुशासन जुड़ जाने से उनकी संज्ञा पुरश्चरण हो जाती है अनुष्ठान पुरश्चरण हलके भारी स्तर के भी होते हैं।

अनभ्यस्त लोगों के लिए उपासना क्रम में सरलता उत्पन्न करने तरह व्रत अनुशासनों में भी ढील देकर उन्हं मनीषियों ने बाल सुलभ बना दिया हैं। भूमिशयन, स्वयं सेवा, उनके लिए अनिवार्य नहीं। ब्रह्मचर्य तो आवश्यक है। पर उपवास में भी ढील की काफी गुँजायश बना दी गई है। रोटी-शाक, दाल-चावल जैसे दो वस्तओं के युग्म अपना कर नौ दिन काट लेने में मात्र पदार्थो का सीमा बन्धन ही हैं भूखा रहने जैसी कोई कठिनाई नहीं है। जो इसमें आगे बढ़ सकते हैं वे बिना नमक शक्कर का अस्वाद व्रत पालने की हिम्मत भी दिखा लेते हैं। एक समय पूरा भोजन एक समय फल दूध जैसी सरलता उन्हीं लोगों के लिए बनाई गई हैं, जो उपवास करना चाहते हैं पर ऐसी सरलता ढूँढ़ते हैं जिसमें भूखा न रहना पड़े। ऐसे लोगों को निराश न होने देने और न कुछ से कुछ! अच्छा की सरलता की गई है। इस आधार पर बाल-वृद्ध और व्यस्त लोग भी नवरात्रि में कुछ न कुछ निर्धारित नियमित साधना का सुयोग बना सकते हैं।

गायत्री परिवार का जहाँ भी छोटा बड़ा संगठन है वहाँ नवरात्रि पर्व मनाने का प्रयत्न निश्चित रुप से किया जाता हैं। यो व्यक्तिगत एकाकी साधना करने पर भी कोई रोक नहीं है, पर प्रयत्न यही किया जाता हैं कि सामूहिक उपासना का उपक्रम बने और उसे एक उत्साह आयोजन का स्वरुप मिले। ऐसी व्यवस्था बनाने में उत्साही लोगों को स्वयं आगे रहने, थोड़ी दौड़ धूप करने साधन जुटानें एवं जन-सर्म्पक साधकर उत्साह दिलाने जैसे प्रयत्न करने होते हैं। ऐसा कुछ कर पाने वाले उत्साही जहाँ एक दो भी हों वहाँ नवरात्रि आयोजन की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। वह न तो मँहगी है और न कठिन कष्ट साध्य। जो इसके लिए आगे बढ़कर साहस दिखाते है उन्हं अनुभव से इस निर्ष्कष पर पहूँचना होता है कि भारत जैसे धर्म प्रकृति वाले देश में नवरात्रि आयोजनों को साधना सत्रों के रुप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।

युग सृजन अभियान में नवरात्रि पर्व को साधना सत्र आयोजन के रुप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरम्भ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा हैं। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीमा को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने में आधारभूत कारण बना था। इन पुराण गाथाओं से सृजन शिल्पियों को भी यहीं प्रेरणा मिलती है कि वे जागरुकों को तलाश करें और उनकी आन्तरिक प्रखरता जगाने के भाव भरे प्रयास करें। इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि के नौ दिन तक चलने वाले साधना सत्रों से बढ़द्यकर अधिक उपयोगी एवं अधिक सरल व्यवस्था अन्य कदाचित ही कोई बन पड़े। महान साँस्कृतिक परम्पराओं का पुनर्जीवन नव सृजन के अभीष्ट आत्म-ऊर्जा का अभिवर्धन तथा जन जीवन में उत्कृष्टता के समावेश का जैसा र्स्वण सुयोग इन साधना सत्रों में मिल सकता हैं। उसकी तुलना का उपाय उपचार कदाचित ही कोई खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञान यज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता हैं जो प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक हैं। इस अवसर पर ऐसे संगठित प्रयासों के लिए उपयुक्त वातावरण भी रहता हैं जिससे साधकों को भी व्रतशील जीवन जीने के अतिरिक्त सृजन प्रयोजनों में सहयोग देने के लिए भी तत्पर किया जा सकें।

इन तथ्यों की जानकारी तो प्रज्ञा पुत्रों को पहले से भी रही है और व नवरात्रि आयोजनों को इसी उद्देश्य को लेकर पूरा करने एवं अधिकाधिक उत्साहवर्धक बनाने का प्रयत्न करते रहें हैं। इस बार उसमें युग सन्धि के बीजारोपण वर्ष के अभिनव उत्तरदायितव भी जुड़ गये हैं। महापुरश्चरण में भागीदार नैष्ठिक साधकों को सुविस्तृत समुदाय इन्हीं दिनों साधना क्षेत्र में नये संकल्प लेकर अग्रसर हुआ है। उसमें से प्रत्येक को न केवल नवरात्रि की अनुष्ठान साधना स्वयं करनी है वरन् जन समपर्क साधनों में अभी से लगना हैं तथा पुरानों को प्रोत्साहित और नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद वन सकें इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न कर सकने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता हैं।


नवरात्रि अनुशासन का तत्व दर्शन

नवरात्रि की अनुष्ठान साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है। इसमें पूजा अर्चा की निर्धारित विधि व्यवस्था का अपना महत्व हैं और ऋतु सन्धि के अवसर पर इस बेला की समयपरक विशेषता है। इतने पर भी इस रहस्य को भली प्रकार हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से इन अनुष्ठानों का मर्म उस अवसर पर पालन किये जाने वाले अनुबन्ध, अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। वे नियम सामान्य व्यवहार में कुछ कठिन तो पड़ते है, पर ऐसे नहीं है जिन्हें सच्ची इच्छा के रहते व्यस्त समझे जाने वाले व्यक्ति भी पालन न कर सकें। समझे जाने योग्य तयि यह है कि इन अनुशासनों का इन दिनों अभ्यास करने के उपरान्त जीवन दर्शन में स्थायी रुप से सम्मिलित करने की जो प्रेरणा है उसी को अपनाने पर प्रगति एवं सिऋि का समस्त आधार केन्द्रीभूत हैं।

नवरात्रि साधना को प्रखर बनाने और साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो अनुबन्ध रखे गये हैं। उन्हें व्रत कहते है। नवरात्रि में उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, चर्मत्याग, स्वयंसेवा जैसे कुछ नियम पालन की परम्परा इसी दृष्टि से शास्त्रकारों ने बनाई है कि उपासना में अधिक प्रखरता का वह समावेश हो सकें जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता।

स्वयं हजामत बनाने, स्वयं कपड़े धोने जैसे काम तो सहज पूरे होते रहते है। कठिनाई भेजन के सम्बन्ध में रहती है, स्वयं पकाना कठिन है। बिना पकाई हुई वस्तओं या फलहार उपवास को महत्व इसी दृष्टि से मिला है, पर सरलता की दृष्टि से छूट इतनी भी रखी गई है कि एक लगावन और एक सब्जी, दाल जैसा ठोस वस्तु का आहार में उपयोग करना भी बाल उपवास मान लिया जाए। शाकं-रोटी या दाल-रोटी जैसी दो वस्तुओं पर ही नवरात्रि काट ली जाए तो इतना व्रतबन्ध भी उद्देश्य की पूर्ति में सहायक और कामचजाऊ सन्तोषजनक माना जाता हैं। इस तर्क के अनुसार शरीर सेवा से स्वावलम्बी होने से यह सुविधा मिल सकती है कि जिनकी शरीर सेवा स्वयं भी करते रहते हैं उनका श्रम बदले में स्वीकार कर लिया जाता है। माता, पिता, पत्नी एवं सन्तान की गणना ऐसे ही समुदाय में की जा सकती है, असतु इस सन्दभ्र में यदि दूट की बात सोचनी हो तो उनकी सेवा स्वीकारते हुए नवरात्रि में उनके बने भोजन को लेते रहा जा सकता है। कड़ाई इतनी तो बरती ही जानी चाहिए कि बाजार से वह आहार न खरीदा जाए जिस में दूसरों का कुससंकारी श्रम लगा हो।

यहाँ स्मरणीय इतना ही है कि अनुबन्ध आदर्शो परिपालन का स्मरण दिलाने और उस सम्बन्ध में अधिक सतर्क करने की दृष्टि से ही बने या लगे हैं। उन्हें आँखें बन्द करें पालन करने में तो सामाजिक व्यक्तियों की जीवनचर्या ही कठिन हो जायेगी। रेल, मोटर आदि की सवारी तक कठिन हो जायेगी। कमरे में झाडू लगाने से लेकर डाक प्राप्त करने जैसे काम भी स्वयं करने की बात सोचने में गतिरोध उत्पन्न हो जायेगा और दैनिक क्रिया कृत्यों का चलना ही सम्भव न रहेगा। उनकी बात अलग है जो एकान्त में एकाकी रहते हैं और अपना निर्वाह अपने बलबूत स्वतः ही कर लेते हैं। जहाँ तक जिसके लिए जितने अनुबन्धों का पालन कर समना सम्भव हो व उसमें कड़ाई बरतें इसमें सर्तकता और ईमानदारी बरतने से काम चल जाता हैं।

भूमिशयन से तार्त्पय कोमलता के स्थान पर कठोरता अपनाना है। यह प्रयोजन पंलग छोडद्यकर लकड़ी के तख्त से भी चल सकता है। इसके विपरीत यदि धरती पर फोम के मोटे गदेले डालकर सोया जाये तो वे पलंग से भी अधिक कोमल हो सकते हैं। ऐसी दशा में मूल प्रयोजन की पूर्ति कहाँ हुई ? बात चिन्ह पूजा से नहीं तपश्चर्या में सन्निहित आदर्शो के लिए कप्ट सहन में प्रसन्नता अनुभव करने की मनःस्थिति निर्माण करने से बनती है।

चमड़े के उपयोग से न केवल नवरात्रि में वरन् अन्य समय में भी कमी करने या बचने की आवश्यकता हैं। क्योंकि इन दिनों निन्यान्वे प्रतिशत चमड़ा पशु बध से ही उपलब्ध होता हैं। जिन्हें माँसाहार से परहेज है उन्हें वर्तमान परिस्थितियों में चमड़े का उपयोग भी बन्द करना चाहिए। इस दृष्टि से उस रेशम का उपयोग भी अग्राह्म ठहरता है जिसमें कीड़ों को जीवित ही उबाल कर रेशा उपलब्ध किया जाता हैं। कस्तूरी का यों प्रचलन हैं नहीं, पर उस स्तर की अन्य वस्तुएँ जो प्राणियों के वध करने से उपलब्ध होती हैं। साधना की मनःस्थिति बनाने में बाधा उत्पन्न होती हैं। मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, अपनी मौत मरने वालों से प्राप्त होते थे तब पवित्र रहे होंगे। आज तो कहीं भी वैसा चमड़ा उपलब्ध नहीं होता। अतएव प्राचीन काल में मृगचर्म, व्याघ्रचर्म आदि के आसनों को जो मान्यता मिली थी आज की परिस्थिति में वह पूर्णतया समाप्त हो जाती हैं। चर्म त्याग की चिन्ह पूजा तो ऐसे भी हो सकती हैं कि नौ दिन रबड़ की चप्पल पहन कर काट लिये जाएँ, पर नवरात्रि उपासना तत्वज्ञान में सन्निहित संकेत सभी ऐसे हैं जिन्हें साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की अध्यात्म मान्यता का प्राणि वध से उपलब्ध साधनों का उपयोग करने से बढ़ती नहीं वरन् घटती और बुझती ही चली जाती हैं। अस्तु नवरात्रि में चर्मत्याग की लकीर पीट लेने से ही नहीं प्राणियों के प्रति करुणा बरतने, यहाँ तक कि अत्यधिक भार से लदे घायल पशुओं के श्रम का उपयोग करते समय भी उसी करुणा को अपना कर कुछ निर्णय करना होगा। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्या के पीछे अहिसाँ वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए।

नवरात्रि अनुष्ठानों में उपवास का नियम हैं। कठिन उपवास मात्र जल पर चलते हैं।, उसमें नीबू, गुड़ आदि का उपयोग हो सकता हैं, पर इसमें आने वाली दुर्बलता जिन्हें सहन नहीं वे दूध, दही, फल, शाक आदि अन्नाहार से रहित वस्तुओं को भी प्रयुक्त करते रह सकते हैं। एक समय ही भोजन करना उपवास की परिधि में आता हैं यहाँ तक कि दोनों समय रोटी शाक जैसी दो वस्तुओं का जोड़ा दोनों समय लेते रहने वाले भी हलके उपवासकर्ता गिने जाते हैं। बालकों, बीमारों, वृद्धों, गर्भवतियों को प्रायः ऐसे ही सरल उपवास कर लेने का परामर्श दिया जाता हैं। क्षुधाजन्य विक्षुब्धता के बढ़ जाने पर तो अनुष्ठान काल के लए आवश्यक शान्त मनःस्थिति में ही व्यतिरेक खड़ा हो जाता हैं।

उपवास का तत्वज्ञान आहार शुद्धि से सम्बन्धित है, “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रुप से आवश्यक समझी गई हैं। इसके लिए न केवल फल, शाक, दूध जैसे सुपाच्य पदार्थो को प्रमुखता देनी होगी, वरन् मात्र चटोरेपन की पूर्ति करने वाली मसाले तथा खटाई, मिठाई, चिकनाइ्र की भरमार से भी परहेज करना होगा। यही कारण है कि उपवासों से भी परहेज करना होगा। यही कारण हैं कि उपवासों की एक धारा, ‘अस्वाद व्रत’ भी हैं।

साधक सात्विक आहार करें और चटोरेपन के कारण अधिक खा जाने वाली आदत से बचें, यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किय जाए और उसकी अधिक मात्रा से अधिक बल मिलने वालों की प्रचलित मान्यता से पीछो छुड़ाया जाए। वस्तुतः आम आदमी जितना खाता है उससे आधे में उसका शारीरिक एवं मानसिक परिपोषण भली प्रकार हो सकता हैं। एक तत्व ज्ञानी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “आधा भोजन हम खाते हैं और शेष आधा हमें खाता रहता हैं।” लुकमान कहते थे कि-”हम रोटी नहीं खाते-रोटी हमें खाती है।” इन उक्तियों में संकेत इतना ही है कि शारीरिक और मानसिक स्वस्थ्य का महत्व समझने वालों को सर्वभक्षी नहीं स्वल्पाहारी होना चाहिए। नवरात्रि उपवास में इस आदर्श को जीवन भर अपनाने का संकेत हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से पौष्टिक एवं सात्विक आहार वह है जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है। उसमें सात्विक खाँद्यों का कम मात्रा में लेना ही नहीं, न्यायोपार्जित होने की बात भी सम्मिलित है। इतना ही नहीं उसी सिलसिले में एक और बात भी आती है कि इस प्रकार आत्म संयम बरतने से जा बचत होती है उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में होना चाहिए न कि संचय करके अमीर बनने में। यहीं कारण हैं कि जहाँ नवरात्रि अनुष्ठानों मं उपवास करकें जो कुछ बचाया जाता हैं उसे पूर्णाहुति के अन्तिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च कर दिया जाता है। ब्रह्मभोज अर्थात् सत्कर्मो का परिपोषण। प्राचीन काल में एक वर्ग ही इस प्रयोजन में रहता था, अस्तु उसका निर्वाह एवं अपनाई हुई प्रवृत्तियों का व्यवस्थाक्रम मिलाकर जो आवश्यकता बनती हैं उसकी पूर्ति को ब्रह्मभोज कहा जाता था। इस प्रयोजन के लिए दी गई राशि को दान या दक्षिणा भी कहा जाता था। नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्णता यज्ञायोजन तथा ब्रह्मभोज के साथ सम्पन्न होती है। इसका कारण तलाश करने पर उपवास का रहस्य विज्ञान और विस्तार समझ में आता हैं।

नवरात्रि को ब्रह्मचर्य प्रतिबन्ध के साथ-साथ कुमारिका पूजन की भी एक प्रक्रिया है। कुमारिकाएँ किशोरियाँ होती है। देवियों की वय भी यही है। इसका तार्त्पय यह हुआ है कि यौबन का उभार खिलते हुए फूल भर की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उसे मरोड़ने की नहीं सींचने की भावना उमड़नी चाहिए। सींचने, सँजोनें का तार्त्पय है उसकी गरिमा में अभिवृद्धि। बालकाँ की सुन्दरता देखकर सहज प्रसन्नता होती और वात्सल्य अनुदान देने को जी करता है। यौवन को भ्ी इसी दृष्टि से देखा जाए उसे निगलने की अजगर जैसी कुत्सा न उठे इसी का नाम आध्यात्यिक ब्रह्मचर्य है नवरात्रि की व्रतशीलता में रतिकर्म से विरत रहने क अनुबन्ध है। पर ब्रह्मचर्य का स्थूल एवं प्रारम्भिक निर्वाह है। इसे विकसित करने का प्रयास आजीवन चलते रहने में ही उसकी परिपक्वता बनती है।

नर और नारी के मध्य भाई-बहित का-पिता-पुत्री का-माता सन्तान का रिश्ता चले और यदि वे दाम्पत्य सूत्र में बँधते हैं तो परम्पर धर्म-पत्नी और धर्म-पति बनाकर उच्चस्तरीय आत्मीयता एवं सहकारिता का प्रमाणा प्रस्तुत करें। यही हैं ब्रह्मचर्य का तत्व ज्ञान।

नवरात्रि की साधना पर्व पर विश्ष रुप से प्रयुक्त करने और अनुबन्ध से अपनी जीवनचर्या को जोड़े रहने का वास्तविक उद्देश्य यह है कि थोड़े दिन बन्धन में बँधकर की गई साधना पीछे सामान्य दिनचर्या में उतरे और स्वभाव व्यवहार का अंग बनकर रहें। पूजा अर्चा की उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।

नवरात्रि अनुष्ठानों की एक विशेषता नियमितता के अनुशासन का कठोर परिपालन भी है। हर दिन सत्ताईस मालाएँ या ढ़ाई घण्टे का जप ही सम्पन्न होना चाहिए। प्रायः साँय की आरती प्रार्थना में नागा नहीं होनी चाहिए। आहार-विहार के लिए निर्धारित अनुबन्धों का परिपालन संकल्पपूर्वक चलना चाहिए। 240, आहुतियों की व्यवस्था बननी चाहिए। ब्रह्मभोज के रुप में परमार्थ प्रयोजन के लिए उदार अनुदान जुटना ही चाहिए। इस प्रकार के अनुशासनों का नियमितता और निष्ठापूर्वक पालन करने से ही अनुष्ठान का उद्देश्य पूरा होता है। अनियमिता और स्वेच्छाचार बरतने की गन्दी चाल अपना कर साधना की चमत्कारी परिणिति का लाभ ले सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।

अनगढ़ और उच्छृलंगल जीवनयापन पशु स्तर का गिना जाता है उसे उच्चस्तरीय, आध्यात्मिक, देवी बनाने के लिए संयम बरतने, मर्यादा पालने एवं आदर्शवादिता अपनाने के लिए साहसिकता का परिचय देना होता है। इन्हीं तथ्यों को नवरात्रि अनुष्ठानों के साथ जुड़े हुए अनुबन्धों का सार संक्षेप समझा जाना चाहिए। मनुष्य मं देवत्व का उदय उद्भव करने की वात देखने में सामान्य किन्तु परिणाम की दृष्टि से उसे महान् सम्भावनाओं से परिपूर्ण माना जा सकता हैं।


नवरात्रि पर्व पर भाव श्रद्धा की परिणति उदार अनुदानों में है

प्रस्तुत आश्विन नवरात्रियाँ हर वर्ष मनाये जाने वाले साधना पर्व जैसी सामान्य नहीं वरन् आसाधारण स्तर की हैं। उनमें युगसंधि के बीजारोपण वर्ष की विशेष प्रयोजन भी जुड़ गया है। अमावश्या, पूर्णिमा को यों सदा ही पर्व माना जाता है। और शुभ कर्मों के लिए उनहं विशेष अवसर या उपयुक्त मुहूर्त माना जाता है। किन्तु जब उनके साथ कुछ विशिष्टता जुड़ जाती है तो स्थिति और भी उच्चस्तरीय हो जाती हैं। सोमवती अमावश्या हरियाली अमावश्या को अतिरिक्त पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा आदि का महत्व भी बढ़ जाता है। चन्द्र ग्रहण वाली पूर्णिमा और सूर्य ग्रहण वाली अमावस्या की स्थिति भी असामान्य होती है। इन पर्व अवसरों पर श्रद्धालुओं को कुछ अतिरिक्त योजना बनाते देखा जाता है। इस बार का नवरात्रि पर्व भी ऐसी ही अतिरिक्त विशेषताओं से भरा होने के कारण सामान्य नहीं रह गया हैं और न उसे परम्परागत साधना प्रक्रिया तक सीमित रहने की बात है। बीजारोपण वर्ष के उपयुक्त युग साधकों जैसी मनःस्थिति जिन साधकों की बन रही है वे इस पर्व बेला को ऐतिहासिक बनाने की अपनी योजना बना रहे हैं। आत्म सत्ता में देवत्व का आवेश भर देने ओर संपर्क क्षेत्र को आलोकमय बनाने की उमंग जिस प्रकार समुद्री तूफान की तरह उभर रही हैं उसे देखते हुए लगता हैं महाकाल का प्रेरणा प्रवाह युग परिवर्तन की परिस्थितियं उत्पन्न करके ही रहेगा।

इस बार के साधना अनुष्ठान का संकल्प सर्वत्र एक ही होगा कि साधकों को महामानवों जैसी मनोभूमि एवं शूरवीरों जैसी उदात्त साहिसिकता का वरदान मिलें। इस अनुष्ठान के फलस्वरुप ऐसा वातावरण बने जिससे युग प्रवार को उलटना संभव हो सकें। अवाध्नयीता को निरस्त और सदाशयता को समर्थ बनाने में देवमानवों का पुरुषार्थ ही निर्णायक होता हैं। यह उथला-हलका पड़ा तो गाड़ी रुक जाती है किन्तु यदि उसमें आवेश जैसा पराक्रम सम्मिलित हो गया तो समझना चाहिए कि लक्ष्य वेध में अब कहीं कोई अड़चन शेष नहीं रह गई। इस दृष्टि से इस बार नवरात्रि साधना के साधकों का दूसरा लक्ष्य वातावरण का अनुकूलन ही हैं। यों आत्मकल्याण और लोकमंगल दोनों एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रुप से जुड़े हुए हैं। वे परस्पर पूरक बनकर ही दो पहियों की तरह संयुक्त प्रयास से प्रगति की आकाँक्षा को प्रत्यक्ष उपलब्धि में परिणत करते हैं। फिर भी वर्गीकरण की दृष्टि से समझने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें यों भी कह दिया जाता है। यों एक के बिना दूसरे की पूर्ति हो सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं है। इस बार इस तत्य को अधिक अच्छी तरह समझा जा रहा है और भौतिक मनोकामनाओं के लिए नहीं, सभी साधक उच्चस्तरीय उद्देश्य एवं संकल्प लेकर साधनारत हो रहें हैं।

प्रयत्न तो अभी से चल रहें हैं कि पंचसूत्री कार्यक्रर्मो की पूर्णता के लिए प्रज्ञा पुत्रों में से कौन कहाँ, क्या और कैसे कर सकता है ? साथ ही यह प्रयत्न भी चल रहा है कि समय की माँग को पूरा करने के लिए कुछ विशिष्टता औ वरिष्ठता का समावेश कैसे किया जाए ? इस संदर्भ में प्रज्ञा परिजनों की मनःस्थिति और परिस्थिति कई प्रकार से भावी प्रयत्नों को अग्रगामी बनाने का स्वरुप गढ़ रही हैं। पर एक निश्चय सभी का है कि जहाँ नवरात्रि आयोजन हों वहा प्रज्ञा संस्थन का कोई न कोई रुप बन कर खड़ा होना ही चाहिए।

बड़ी शक्तिपीठ बनान वरिष्ठ प्रतिभाओं के जिम्मे सौंप दिया गया है। सस्ती प्रज्ञापीठ प्रायः हर जगह हर परिस्थिति में बन सकना संभव है। पन्द्रह बीस हजार की बड़ी और सात-आठ हजार की छोटी प्रज्ञापीठ बनाने में, जहाँ जीवन्त समुदाय हो, वहाँ कुछ भी कठिनाई नहीं पड़ सकती। श्रद्धालु साधक कृपण नहीं होते, वे उदारता की याचना अन्यान्यों से ही नहीं करते-फिरते वरन् प्रेरणाप्रद आदर्श अपने से ही आरम्भ करते है। समयदान से लेकर अंशदान तक के साहस सदा से श्रद्धालु साधकों को स्वयं ही प्रस्तुत करने पड़े हैं अन्य लोगों ने तो सहानुभूति बाद में ही दिखाई है।

अपने लोगो में से कितने ही ऐसे हैं जो उच्चस्तरीय प्रेरणा से प्रेरित होकर न सही अपनी या पूर्वजों की कीर्ति समृति के निमित्त ही ऐसा कुछ उदार साहस कर सकते है, जैसा कि बेटी के विवाह, तीर्थयात्रा, प्रीतिभोज, चुनाव प्रचार। ठाट-बाट, व्यसन, सनक या मजा चखाने जैसे छोटे-छोटे आवेशों से प्रेरित होकर आमतौर से सामान्य लोग खर्च करते रहते हैं। प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर कई लोगों की कई खचींली योजना आये दिन बनती और पूरी होती रहती है। प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण को यदि इस श्रेणी में भी रख लिया जाए तो भी भावभरे प्रयास उनकी पूर्ति अपने लोगों से ही पूरा करा सकते है। भले ही वे मध्य वर्गीय रोज कुआँ खोदने रोज पानी पीने वाले स्तर के ही क्यों न हों कुछ बीमारी, शादी, मुकदमा आदि कितनी आकस्मिक घटनाएँ ऐसी आ पड़ती है जिनके लिए किसी प्रकार कुछ प्रबंध करना ही पड़ता है। ऐसा ही कुछ प्रज्ञा संस्थान के निर्माण के सम्बन्ध मं सोचा जा सकें तो इतनी सस्ती किन्तु इतनी महान योजना को क्रियान्वित करने में कहीं भी कुछ भी कठिनाई सामनें नहीं आयेगी।

अड़चन तो एक ही है। सदुद्देश्यों के प्रति आन्तरिक निष्ठा का अभाव। यदि भक्ति भावना के पीछे उदात्त श्रद्धा का समावेश भी रहा होता तो समर्पण शब्द का बार-बार उच्चारण करने वाले कम से कम कुछ कहने लायक अनुदान तो प्रस्तुत करते। कृपणता के अवरोध में इस बार प्रत्येक श्रद्धावान को जूझना पड़ेगा और देखना होगा कि क्या वह इ संदर्भ में कुछ उदार साहस कर सकने की स्थिति में है या नहीं ? कृपणता जहाँ हजार बहाने गढ़ती है वहाँ उदारता हजार रास्ते भी बना देती हैं।

नवरात्रि आयोजन की परिस्थिति छोटे-बड़े प्रज्ञा संस्थान के रुप में होनी चाहिए। भूमि सरकार के माँगने की अपेक्षा अपने ही लोगों में से कोई उपयुक्त स्थान पर अपनी भूमि होतो उसका एक टूकड़ा दे सकते हैं जिनके पास निवास से अतिरिक्त मकान है वे उनमें से एक को यदि इसी इसी निमित्त दे दें तो कृपणता को दुत्कारने के अतिरिक्त और कोई कठिनाई तनिक भी नहीं पड़ेगी। बेटी और बेटों को इतना कुछ दिया जा सकता है तो उस सत्ता के लिए भी तो इतना कुछ दिया जा सकता हैं जिसे कभी उपास्य कभी इष्टदेव कहा जाता है और तभी अपने आपको भक्त, शरणागत होने की दुहाइ दी जा सकती हैं। भक्त याचकों को नहीं उन आत्मवानों को कहते है जो अनुदानों से अपनी अध्यात्म यात्रा आरम्भ करके सर्वस्व समर्पण की स्थिति तक पहुँचते हैं।

इन दिनों प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना पर जोर इसलिये दिया जा रहा हैं कि वे कलेवर की दृष्टि से भव्य भवनों की तुलना में नगण्य होते हुए भी जनमानस के परिष्कार और सत्प्रवृत्ति बनाने के लिए वे ऊर्जा उत्पादन की भूमिका गरिमा को पुनर्जीवित करने में इन प्रज्ञा संस्थाओं का असाधारण योगदान होगा। स्थान के साथ व्यक्ति जुड़ते हैं और फिर उनकी गतिविधियाँ चमत्कार उत्पन्न करती हैं। पाठशाला, कारखाने, दफ्तर, छावनी आदि की तरह प्रज्ञा युग लाने के लिए संचालित की जाने वाली गतिविधियों के लिए केन्द्र स्थल तो होना ही चाहिए। महत्ता और आवश्यकता को देखते हुए प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण पर इन दिनों अधिक जोर दिया जा रहा है। यदि बात देव मंदिर बनाने जैसी रही होती तो उसकी पूर्ण उपेक्षा की जा सकती थी और कहा जा सकता था कि प्रस्तुत मंरों का जीर्णोद्धार एवं सुनियोजन पर जोर देने की आवश्यकता है न कि कीर्ति स्तम्भ खड़े करने जैसे नये-नये मंदिर बनाते चलने की।

जहाँ कुछ भी प्रबन्ध न हो सकें वहाँ कोई उदार प्रज्ञापुत्र अपना एक कमरा बिना किरायें देवें ओर उसमं चौकी पर चित्र की स्थापना करे प्रज्ञामंदिर बना दिया जाए। स्मरण रहे प्रज्ञा संस्थानों का प्रथम कार्य उस क्षेत्र के हर शिक्षित व्यक्ति तक युग साहित्य पहुँचाना और प्रज्ञा परिजनों के जन्म दिवसोत्व मनाया जाता हैं। यह दो कार्य जहाँ नहीं हो रहें हैं, वहाँ के प्रज्ञा संस्थाओं को निर्जीव निरर्थक माना जायेगा। माँगे हुए कमरे में बनाया गया प्रज्ञा मंदिर भी मात्र पूजा उपचार तक सीमित नहीं रहेगा वरन् चल पुस्तकालय के सहारे अपने निर्धारित कम्र क्षेत्र में हर शिक्षित व्यक्ति को युग साहित्य पढ़ानें और हर सहयोगी का जन्म दिवसोत्सव माने का अनिवार्यक्रम किसी न किसी प्रकार पूरा करेगा।

बड़े प्रज्ञापीठों में दो कार्यकताओं की स्थायी नियुक्ति आवश्यक है ताकि साल गाँवों के एक मंडल क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन का कार्य अपने-अपने मुहल्ले बाँटकर करते रह सकते हैं। समय सम्बन्धी अड़चन पड़े तो “समय के बदले धन” देकर भी प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है। आधे दिन के लिए किसी खाली व्यक्ति को घर-घर पुस्तके पहुँचानें के लिए नियुक्त किया जा सकता है। उसका वेतन तथा साहित्य मंगाते रहने की न्यूनतम आवश्यकता वही पूरी करें। इस ज्ञानघटों के माध्यम से पूरी करते रह सकते हैं। जिन्होनें नवरात्रि आयोजनों में श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान साधना की है उनकी श्रद्धा को जीवन्त रखने के लिए दक्षिण की परम्परा है। यज्ञ ब्रह्मभोज को इसी लिए अनुष्ठान के साथ जोड़ा गया है कि कहीं चतुर लोग माला घुमाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री न करलें। वे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने पर ही साधना की पूर्ति होने का स्मरण बनायें रखें।

प्रज्ञा संस्थानों का निर्वाह सर्वत्र ज्ञानघटों की स्थापना से होगा। वही अपनी अर्थ व्यवस्था की रक्तवाहिनी है। पिछले तीस वर्षो से झोला पुस्ताकालयों की आवश्यकता ज्ञानघटों से पूरी होती रही हैं। उस प्रकार ज्ञानयज्ञ का उपक्रम अपने ढर्रें पर चलता रहा है। अब प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना के साथ ब्रह्मभाोज की-कार्यकर्ता निर्वाह की नई धारा जुड़ी है। उत्तरदायित्व दूना हो गया तो उसकी व्यय व्यवस्था भी दूनी करनी पड़ेगी। इसका उपाय यही हो सकता है। कि हमारे अनुदानों का अनुपात दूना कर दिया जाय। पुरुष ज्ञानयज्ञ का उत्तरदायित्व निभायें और महिलाएं ब्रह्मभोज की पूत्रि करें। पुरुषों का दस पैसे वाला ज्ञानघट चले और महिलाएं मुठ्ठी फण्डका धर्मघट चलायें। इस प्रकार हर प्रज्ञा परिवार को अपने अनुदान दून कर देने चाहिए। मात्र ज्ञानघटों से ही कार्यकर्ता का निर्वाह और घर-घर युग साहित्य पहुँचानें का कार्य पूरा न हो सकेगा। बढ़ी हुई जिम्मेदारियों की पूर्ति बढ़ी हुई उदारता ही पूर्ण कर सकती हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नवरात्रि साधना में सम्मिलित होने वाले तथा प्रज्ञा अभियान में रुचि लेने वालों का समर्थन करने से आगे बढ़ाने की योजना बननी चाहिए। यह कार्य ज्ञान घटों और धर्मघटों की स्थापना से ही हो सकता है। प्रज्ञा संस्थानों में से प्रत्येक को कार्यकर्ता निर्वाह का घर-घर युग आलोक पहुँचानें का प्रबंध करना होगा। जम्न दिवसोत्सव की सुव्यवस्था में भी एक नियमित एवं नियुक्त कार्यकर्ता की आवश्यकता पड़ेगी। भले ही वह प्रज्ञा मन्दिरों की दुर्बल स्थिति में आधे समय का ही क्यों न रखा जाए। अवैतनिक कार्यकर्ताओं के होते हुए भी एक अवैतनिकों को खटखटाता रहें और उनका सहयोग सम्पादन का माध्यम सूत्र रह कर शिथिलता न आने देने का आधार बना खड़ा रहे।

नवरात्रियों इस बार अत्यधिक उत्साह के साथ बनेंगी यह निश्चित है। उसमें प्रातःकाल साधकों की संख्या भी अपेक्षाकृत कहीं अधिक रहेगी। रात्रि के ज्ञान या में यदि सुरुचि सम्पन्नों को घसीट कर लाया जायेगा तो प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित होने वालों की उपस्थिति भी कम न रहेगी। इस भाव समुदाय की उदार संवेदनाओं को यदि उभारा जा सके तो युग की महती आवश्यकता पूरी करने के लिए नितान्त आवश्यक प्रज्ञा संस्थान की आवश्यकता किसी न किसी रुप में पूरी होकर ही रहेगी। छोटे-बड़े प्रज्ञापीठ की लागत इतनी अधिक नहीं है जिसे प्रस्तुत नवरात्रि आयोजनों में उपस्थित लोग अपने निजी उदार अनुदान से अथवा सर्म्पक क्षेत्र के सहयोग से पूरा न करे सकें।

जहाँ भी नवरात्रि आयोजनों की तैयारियाँ चल रही हैं वहाँ साथ-साथ यह नियोजन भी चल रहा है कि प्रस्तुत साधना पर्द के नौ दिनों में स्थानीय प्रज्ञा संस्थान बनने का कुछ न कुछ प्रबन्ध अवश्य हो जायेगा। इस आकाँक्षा से अनुप्राणित प्रज्ञापुत्र इस छोटी स्थापना में असफल रहें यह तो हो ही नहीं सकता।


छोटे शुभारंभों में निहित महान संभावनाएँ

बीजारोपण वर्ष के कार्यक्रमों में चरणपीठाँ से लेकर शक्तिपीटों तक के कई स्तर के प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना को प्रमुखता दी गई हैं और उनमें प्राण भरने वाले लोक सेवियों के रुप में दृष्टिगोचर होने वाली शालीनता को ढूँढ़ निकालने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करके दूसरे प्रयोजन को भी साथ-साथ लेकर ही चलना चाहिए। अश्वमेघ का खोया अश्व ढूँढ़ने के लिए सगर पुत्र ‘को या मरो’ का व्रत लेकर निकले थे। वानरों ने भी सीता को खोजे बिना वापिस न लौटने की प्रतिज्ञा की थी। गाँधीजी साबरमती आश्रम छोड़ते समय यह कहकर गए थे कि स्वतन्त्रता लाए बिना वे वापिस न लौटेंगे। इन सभी ने महंगा मूल्य चुकाकर सफलता पाई थी। फिर कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा परिजन अपने ही समुदाय में से समय की आवश्यकता पूरी कर सकने वाले सृजन शिल्पी न निकाल सकें।

प्रज्ञा संस्थाओं के निर्माण में जन सहयोग तो अपेक्षित भी है और आवश्यक भी। पर यदि उसमें अड़चन दिखें तो सात हजार वाले संस्थान तो दो-चार व्यक्ति मिलकर भी बना सकते हैं। कितने ही ऐसे है जो इतनी राशि धर्म प्रयोजन में निकाल देने के उपरान्त भी अपने निर्वाह में कोई कमी अनुभव न करेंगे। एक वर्ष तक दो सौ रुपया मासिक देने वाले दो सौ ज्ञानघट रखकर भी यह छोटा निर्माण सहज सम्भव हो सकता हैं। उपाय हजार हैं। कमी केवल उदार आस्था जगाने भर की है कृपणता का दवाब हलका हो सके तो दरिद्रता की बाधा तो देखते-देखते हल हो सकता है। प्रज्ञापीठों की स्थापना के लिए उदारतापूर्वक सहयोग प्रस्तुत करने के साथ इन संस्थानों से चलने वाली गतिविधियों के निर्धारण भी करना और समझ लेना चाहिए।

प्रज्ञापीटों की दिनचर्या आस्था उत्पन्न करने वाली पूजा, आरती, भावना उभारने वाली सामूहिक प्रार्थना, दो-दो घण्टे के तीन वर्गो में चलने वाली प्रौढ़ शिक्षा, शाम को स्वास्थ्य संबधन उपक्रम, रात्रि को कथा प्रसंगो द्वारा व्यक्ति, परिवार, समाज में उत्कृष्टता भरने वाला लोक शिक्षण। संक्षेप में यही हैं प्रज्ञा संस्थाओं की कार्य पद्धति। समयानुसार परिस्थितियाँ में तालमेल बिठाते हुए वे रचनात्मक गतिविधियाँ भी अपनाई जायेगी जो जनमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संबर्धन का उद्देश्य पूरा कर सकें।

प्रौढ़ शिक्षा, चल पुस्तकालय, वृक्षारोपण, शाक वाटिका, नारी जागरण, शिशु जागरण, शिशु कल्याण, सामूहिक श्रमदान, गृह उद्योग, सहकारी संस्थाएँ, स्वच्छता अभियान जेसे कितनी ही सृजनात्मक काम करने हैं। साथ ही सुधारात्मक अभियान के माध्यम से नशा निवारण शादियों के अपव्यय तथा दहेज की रोकथाम, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, मृतक भोज, जातिगत भेदभावन, चोरी, बेईमानी, अन्धविश्वास, दुर्व्यसन, आलस्य, प्रमाद जैसी विकृतियों से जूझने जैसी कितनी ही जुझारु प्रखरताएं उत्पन्न करनी हैं। प्रज्ञा संस्थान जैसे-जैसे सृदढ़ होते जायेंगे और लोकसेवियों को जन समर्थन जितना-जितना उपलब्ध होता लाएगा उसी अनुपात से इन निर्धारणों में उभार आता चला जाएगा।

जो कार्य बिना एक क्षण गंवाए तत्काल करने हैं उनमें दो प्रमुख है। एक जन-जन तक युग चेतना का आलोक पहुँचाना और दूसरा जन्म-दिवसोत्सवों के माध्यम से व्यक्तियों और परिवारों को झकझोर कर उन्हें प्रगतिशीलता की दिशा में तत्परतापूर्वक धकेलना। इन दोनों कार्यो को जहाँ जिस प्रकार जिस स्तर पर क्रियान्वित किया जा सकें वहाँ उसके लिए कोई न कोई उपाय खोज ही निकालना चाहिए।

युग निर्माण मिशन में ईसाइयों के सस्ते साहित्य की स्पर्धा में बिक सकने वाला युग साहित्य नगण्य अर्थ साधनों के सहारे विनिर्मित कर लिया है। इसमें युगान्तरीय चेतना की आभा भर दी गई है। इन्हें पुस्तकें नहीं, प्राणवान प्रेरणाएं ही कहना चाहिए। इन्हें घर-घर पहुँचाने, पढ़ानें, वापस लाने का प्रयास चलता तो पहले से ही रहा है पर उसे अब एक सुनिश्चित कार्य की अनिवार्य आवश्यकता मानकर बढ़ना चाहिए। जो पढ़े व अन्यों को भी पढ़ायें। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें सुनाने का प्रबन्ध किया जाय। विचार क्रान्ति को व्यापक बनाने के लिए जितने भी उपाय उपचार हैं उन सबमें इस प्रक्रिया को मूर्धन्य मानकर चला जाय। उसे प्राथमिकता प्रदान की जाए।

नियमित जन सर्म्पक साधने का इससे अच्छा और सस्ता अन्य कोई उपाय हो नहीं सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए युग निर्माण परिजनाँ का ज्ञानघट में दस पैसा जमा करने और उससे खरीदा गया युग साहित्य सर्म्पक क्षेत्र में पढ़ानें के लिए झोला पुस्तकायल चलाने के लिए कहा गया था। वह निर्धारण ज्यों-त्यों गतिशील होता भी रहा हैं, पर अब उसे सुव्यवस्थित रुप से समग्र तत्परता अपनाते हुए कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

प्रज्ञापीठों में एक परिव्राजक विशुद्ध रुप से इसी प्रयोजन के लिए नियुक्त किया जाना है कि वह समीपवर्ती छै अन्य गाँवों में तथा एक दिन अपने गाँव में, कुल सात गाँवों में हर शिक्षित बाल-वृद्ध तक उसकी रुचि एवं आवश्यकता देखते हुए युग साहित्य पहुँचानें और पढ़ लेने पर वापिस लाने का क्रम चलता रहे। इसका दूहरा लाभ हैं। दृष्टिकोण परिवर्तन से विचार क्रान्ति का उद्देश्य तो पूरा होता ही है साथ ही हर सप्ताह एक बार अर्थात् वर्ष में 52 बार किसी के पास पूर्ण निस्वार्थ उद्देश्य लेकर पहुँचने का भी कुछ अर्थ होता है। जहाँ यह प्रक्रिया चलेगी वहाँ घनिष्ठता भी निश्चित रुप से उत्पन्न होगी। जो भी इस ज्ञान दान का लाभ लेगा- जो भी बादलों और वायु झोकों की तरह निरन्तर इस दिव्य अनुदन की उपयोगिता समझेगा- उसके पीछे सदाश्यता का जिसे भी भान होगा वह बदले में अनुगृहीत हुए बिना रह नहीं सकता। इस आधार पर बढ़ती हुई घनिष्ठता को निष्फल नहीं जाने देना चाहिए। साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उत्पादन क्रम जिस उच्च उद्देश्य को लेकर आरम्भ किया गया है उसकी पूर्ति के लिए इस उभार के साथ-साथ ही प्रयत्नशीलता भी चलती रहे।

चल पुस्तकालय से जुड़ा हुआ अतिरिक्त काम है- जन्म दिवसोत्सवों का आयोजन। इन दोनों को एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न बनाया और परस्पर पूरक माना जाना चाहिए। युग-निर्माण मिशन की कार्य पद्धति में सद्भाव सम्पन्नों के जनम दिवसोत्सव मनाये जाने का बहुत महत्व हैं। इस प्रक्रिया को सरलतम और अत्यन्त आकर्षक इसलिए बनाया गया है कि उसका प्रचार प्रचलन व्यापक रुप में हो सकें।

जन्म दिवसोत्व प्रकारान्तर से पारिवारिक ज्ञानगोष्ठियाँ है जिनमें धर्म-परम्पराओं का-साँसकृतिक प्रचलनों का निर्वाह भी होता है और साथ ही ऐसा वातावरण भी बनता है जिससे उच्चस्तरीय प्रेरणाओं को जड़ जमाने अंकुरित एवं फलित होने का अवसर मिल सकें। कर्मकाण्ड संक्षिप्त-सा है। गायत्री परिवार के प्रायः सभी सदस्य इसके अभ्यस्त होते हैं। न जानने वाले उसे अत्यन्त सरलतापूर्वक सीख भी सकते हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी बात है सहगान एवं कथा प्रवचन। मिशन के सुयोग्य कार्यकर्ता उसे थोड़ा-सा प्रशिक्षण प्राप्त करके सम्पन्न कर सकने में भली प्रकार समर्थ हो सकते हैं। इसी अवसर पर सहगान के उपरान्त कथा प्रवचन की परम्परा है। जो प्रवचन कर सकते हों वे व्यक्ति, परिवार और समाज में उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए जीवनचर्चा किस प्रकार बनानी चाहिए।-इस प्रसंग की किसी भी धारा पर प्रकाश डालें, जो उस परिवार या उपस्थित समुदाय के लिए उपयुक्त पड़नी हो। इतना न बन पड़े तो किसी धार्मिक कथा प्रसंग को ऐसी व्याख्या के साथ कहा जा सकता है जिसके माध्यम से उपस्थित लोगों को सोचने, ढलने और करने को प्रगतिशील दिशा-धारा उपलब्ध होती रहे। कथावाचकों की एक नई पीढ़ी भी युग-निर्माण मिशन ने विनिर्मित की है जो रामायण कथा से अपना प्रसंग आरम्भ करकें अन्यान्य प्राणवान प्रतिपादनों की आवश्यकता पूरी करती रह सके। भारतीय जन-मानस की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस प्रकार के कथा मिश्रित प्रवचन जितने सफल हो सकते है उतने सामान्य भाषणों के प्रभावी बन सकने की आशा नहीं हैं।

किसी जन्म दिन पर प्रातः या सायंकाल सुविधा के समय यह दो घण्टे का कार्यक्रम बड़ी सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। एक घण्टे का धामिक कर्मकाण्ड और एक घण्टे का सहगान-कथा प्रवचन। इतने थोड़े समय में मित्र, पड़ोसी भी और सम्बन्धियों का उपस्थित परिकर आर्कषक समारोह का आनन्द लेता रह सकता हैं और साथ ही ऐसी दिशा धारा भी पा सकता है जो व्यक्ति और समाज की वर्तमान परिस्थिति को उलटने तथा अभिनव सम्भावनाओं के लिए नितान्त आवश्यक है।

जन्म दिन मनाने वालों पर आर्थिक भार न पड़े इसलिए यादि कर्मकाण्ड परस्पर सहयोग से ही पूरे कर लिए जाते है और उनमें पूजा सामग्री का व्यय दो रुपये से आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। इसी प्रकार आतिथ्य में सौंफ सुपाड़ी जैसे नितान्त सस्ते उपचारों को ही मान्या दी गई है। पेय में ठण्डा जल ही पर्याप्त माना गया है। यह प्रतिबन्ध इसलिए लगाये गये हैं कि गरीब-अमीर सबको समान रेय सम्मान के साथ इन आयोजनों को आतिथ्य के संयुक्त व्यय की अधिकतम सीमा पाँच रुपया कर दी गई है ताकि जनम दिवसोत्सव के आनन्द को देखते हुए उस निमित्त होने वाले व्यय को विपनन आर्थिक स्थिति वाले भी बिना किसी कठिनाई के खुशी-खुशी वहनकर सकें।

युगसंधि के बीजारोपण वर्ष में जन-मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संबर्धन का लक्ष्य लेकर अनेकों विधि-निषेधपुरक कार्यक्रम बनाये गये हैं। इन्हें क्रियान्वित करने के लिए जिन प्राथमिक प्रयोजनों को अपनाया गया है उनमं उपरोक्त दोनों को प्रमुखता दी गई है और जहाँ भी सृजन चेता उभरे वहाँ सर्वप्रथम इन्हीं दो उपक्रमों का श्रीगणेश करने के लिए कहा गया है। यह चल पड़े तो समझना चाहिए कि बीज, पानी देने की दोनों व्यवस्थाएं बन पड़ने पर अच्छी फसल की, उज्जवल भविष्य की सुखद सम्भावना बन गई।

युग-साहित्य के माध्यम से चिन्तन को दिशा मिलती है और जन्म-दिवसोत्सव जैसे आयोजनों से उसे उत्साह बनकर उभरने का आधार मिलता है। सदुद्देश्य को लेकर एकत्रित हुए सदभाव-सम्पन्नों की श्रद्धा एवं उल्लास भरे वातावरण में जो परोख्ज्ञ प्रेरणाएं दी जाती हैं वे निरर्थक नहीं जाती वरन् अन्तराल की गइराई तक प्रवेश करती और समयानुसार अपने चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इसलिए घर-घर युग-साहित्य पहुँचाने, वापिस लाने और जनम दिन मनाने का श्रीगणेश किया गया है कि इस अश्रद्धा के युग में दूसरों पर बिना किसी प्रकार का भार डाले सहज सेवा के सहारे उपेक्षा को भी समर्थन में बदला जा सकें। यह प्रक्रिया खर्चीली या झंझटभरी होती तो उसे जन-जन द्वारा अपनाया जा सकना सम्भव न बन सकता। फलतः घर-घर में युग-चेता को पहुँचानें और जन-जन को उससे प्रभावित करने का सुयोग ही न बनता।

करने का बहुत कुछ पड़ा हैं। पर सब कुछ एकबारगी तो नहीं हो जाता। विद्धत्ता के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए लोग भी आरम्भ में प्राथमिक पाठशाला में ही प्रवेश लेते हैं और वर्णमाला एवं गिनती से अपनी पढ़ाई का श्रीगणेश करते हैं। युग सृजन के उच्चस्तरीय एवं भारी भरकम प्रयोजनों का ढ़ाँचा खड़ा करने के लिए जन-जन की भाव श्रद्धा एवं उदार साहसिकता उभारने की प्राथमिक आवश्यकता पूरी करनी होगी। क्रमिक गति से चलकर ही लम्बी मंजिल पार की जा सकती हैं।

“मन तेरी गति कितनी विचित्र है-कितनी रहस्य से भरी हुई है-कितनी दुर्भेद्य है! तू कितनी जल्द रंग बदलता हैं। इस कला में तू निपुण है। आतिशवाज की चर्खी को भी रंग बदलने में कुछ देर लगती है, पर तुझको रंग बदलने में उसका शताँश भी समय नहीं लगता।”

“दुखते फोड़ में कितना मवाद भरा है यह उस समय मालूम होता है, जब नश्तर लगाया जाता है। मन का विष उस समय मालूम होता हे जब कोई उसे खोलकर हमारे सामने रख देता हैं।”


युग साधना में निष्ठा का समावेश

आत्मिक समर्थता और सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक की निष्ठा किस स्तर की बन पड़ी। उपासनात्मक कर्मकाण्डों को कलेवर और निष्ठा को उसके अन्तरंग को प्राण शक्ति कहा जाता है। साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है। चमत्कार तो निष्ठा की प्रखरता एवंपरिपक्वता ही दिखाती है।

युग संधि महापुरश्चरण को लक्ष्य समष्टिगत सन्तुलन को बनाने एवं अदृश्य वातावरण में अनुकूलता उत्पन्न करने की जानकारी सभी को हैं। उसे विशिष्ट आत्माओं द्वारा सम्पन्न किया गया इस युग का अभूत पूर्व सहकारी धर्मानुष्ठान समझा जा सकता है और यह विश्वास किया जा सकता है कि इस माध्यम से सूक्ष्म अन्तरिक्ष में उत्पन्न हुई अदृश्य ऊर्जा प्रस्तुत परिस्थितियाँ को बदलने में आसाधारण भूमिका सम्पन्न करके रहेगी। युग परिवर्तन की सम्भावना कोटि-कोटि मानवों को उज्जवल भविष्य का आश्वासन दे सकने में समर्थ हैं।

यह सर्वजनीन सार्वभौम हित साधन की-सृष्टि सन्तुलन की-अवतारी प्रक्रिया की चर्चा हुई। अब साधकों के निजी लाभ पर विचार करने से प्रतीत होता है कि वे भी इस प्रक्रिया को अपनाकर कम लाभ में न रहेंगे। ‘निष्ठा’ की उपलब्धि इतनी महान है कि उसे पारस मणि की, कामधेनु की उपमा देने में तनिक भी अतयुक्ति नहीं हैं। आदर्शवादिता के प्रति आगध श्रद्धा और उन्हं क्रियान्वित कर सकने की सहसिकता को ‘निष्ठा’ कहते हैं। प्रकारान्तर से यही देवत्व है। भौतिक और आत्मिक सिद्धियों का भाण्डागार इसी भाव गरिमा के अन्तराल में छिपा रहता हैं जो अन्तराल के उस मर्मस्थल को जगाने की समर्थता को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। यह उपलब्धि जिसने हस्तगत कर ली उसके लिए संसार में ऐसा कुछ शेष नहीं रह जाता जो इस उपलब्ध के बदले सम्भव न हो सकें।

संसार में अनेक प्रगति क्षेत्र है। उन सब में निष्ठा की प्रखरता ही जीतती है। यहाँ तक कि भौतिक सफलताओं में ही दृढ़ निश्चयी, पराक्रमी आर साहसी ही सफल होते हैं। शेष तो ऐसे ही असमंजस के पिछड़ेपन से ग्रसित न रहकर किसी प्रकार जिन्दगी के दिन काटते रहते हैं। भौतिक क्षेत्र में तो कईवार छद्य और भाग्य भी काम दे जाता है ओर कु तात्कालिक सफलताएँ सामने ला खड़ी करता है भले ही सत्परिणाम उत्पन्न करने एवं स्थिर रहने योग्य न बन सकें। यह अपवाद आत्मिक क्षेत्र में नहीं देखे जाते। उसमें ओजस्वी, मनस्वी और तपस्वी ही सफल होते हैं। यह तीनों ही विभूतियाँ ‘निष्ठा’ की ही परिणितियाँ मानी जाती हैं।

युग सन्धि महापुरश्चरण की भागीदार सामान्य स्तर का पूजा-पाठ करते रहने वालों की नहीं वरन् ‘नैष्ठिकों’ को मिली हैं। आस्ि को परिपकव करने के लिए उन्हें कई आदर्शवादी अनुशासन पालने के लिए वचनबद्ध किया गया है। गुरुवार को अस्वाद, ब्रह्मचर्य एवं मौन की व्रत शीलता है साथ ही यह भी अनुबंध है कि पाँच माला या आधा घण्टे का जप ध्यान खाने तक न सही सोने तक तो पूरा कर ही लिया जाय। व्यतिरेक व्यस्तता से नहीं मनःस्थिति की दुर्बलता एवं बहानेवाजी से हो ही होता रहता हैं। आपत्ति कालीन अपवाद तो यदा-कदा ही आते हैं और उनमें आगे चलकर छूटी हुई उपासना को पू कर लेने की सुविधा भी है। पर निष्ठा के अभाव में लड़खड़ानें वाले अन्तराल में तो नियमित पूजा-पाठ तक नहीं बन पड़ता। फिर व्यक्तित् के उच्चस्तरीय बनाने वाले जिस आन्तरिक पराक्रम की आवश्यकता है वह तो बनेगा ही केसे ? ऐसी मनोभूमि के लोग ही असफलता का रोना रोते और उसका कारण यहाँ-वहाँ-ढूँढ़ते रहते हैं। जब कि निष्ठा का अभाव ही अशक्तता के रुप में असफलता का एकमात्र निमित्त कारण हैं।

अगले दिनों मनस्वी प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ेगी। तेजस्वी व्यक्तित्व ही बड़े कार्यो का भार वहन कर सकेंगे। उनका उत्पादन इन्हीं दिनों आवश्यक है। देवत्व की प्रगति में तपश्चर्या ही माध्यम बनती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझा गया कि निष्ठा का अभयास कराया जाय। युग सन्धि महापुरश्चरण का जहाँ एक समष्टिगत उर्त्कष एक उद्देश्य है वहाँ दूसरा यह भी है कि निष्ठावाद महामानवों की पीढ़ी उत्पन्न करने के लिए उन्हें सर्वप्रथम उपासनात्मक अभ्यास सौंपा जाय। तद्नुसार एक लाख साधकों द्वारा प्रतिदिन 4 करोड़ गायत्री जप के युग पुरश्चरण की योजना बनाई गई है। यहाँ यह स्मरणीय है कि इसमें मात्र उनहीं को लिया गया है जो निष्ठा को परिपक्व करने वाले अनुबन्धों का कड़ाई से पाल कर सकें। यही कारण है इस युग साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते है। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है। युग सृजन में यह मानवी निष्ठा ही दिव्य ऊर्जा के रुप में परिणित होगी। व्यष्टि में देवत्व के उदय और समष्टि में स्वर्गीय वातावरण की आशा अपेक्षा इसी आधार पर की गई कि निष्ठावानों का समुदाय सृजन शिल्पियों के रुप में भागीरथ, हनुमान, अर्जुन जैसे पराक्रम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होंगे और समय की आवश्यकता पूरी करेंगे।

उपासना में अधिकाधिक निष्ठा का समावेश, युग साधकों की साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।

युग पुरश्चरण की नैष्ठिक साधना के अतिरिक्त सामान्य जनों को गायत्री उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।

‘नियमित उपासना’ में समय एवं संख्या का बन्धन तो नहीं है, पर नियमितता को जीवन्त रखने के लिए इतना तो करना ही होगा कि जो भी करना हो उसे संकल्पपूर्वक तथा नियमित रुप से किया जाय। अस्त-व्यस्तता अश्रद्धा की परिचायक है। निष्ठा में अनुशासन जुड़ा हुआ है। भले ही न्यूनतम मात्रा में उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।

शारीरिक नित्य कर्मो की तरह मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिए उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। समय का अभाव य अन्य कोई कारण हो तो न्यूनतम उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है। पाँच मिनट की न्यूनतम गायत्री जप उपासना में प्रकाश मंडल के अर्न्तगत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए। प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्य-उसकी दिव्य किरणों का साधक की काया में प्रवेश-स्थूल शरीर काय कलेवर में सत्पुरुषार्थ-सूख्म शरीर-ज्ञान संस्थान में सद्भाव-कारण शरीर-अन्तःकरण में सद्भाव के रुप में सविता प्रकाश में अनुभूति। यही है वह सरलतम ध्यान जो पाँच मिनट की नितय जप साधना करने के रुप में चलता रह सकता है।

यह सरलतम साधना समय, स्थान, स्नान आदि के अनुबन्धों से तो मुक्त रखी गई है, पर निष्ठा को जीवन्त बनाये रहने के लिए इतना अनुशासन तो उसमें भी रखा गया हैं कि खाने या सोने से पूव उसे कर ही लिया जाय। इतनी नियमितता बनी रहने से भी उस निष्ठा का परिपोषण होता रहेगा जो उपसनात्मक कर्मकाण्डों में जीवन प्राण मानी जाती है। अस्त-व्यस्त रखने पर तो स्वास्थ्य, साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?

इस न्यूनतम किन्तु नियमित साधना को अपनाने के लिए प्रज्ञा युग के प्रत्येक व्यक्ति को कहने एवं सहमत करने का प्रयत्न चलते रहना चाहिए। प्रज्ञा पुत्रों का सर्म्पक जिनसे भी उन्हें आत्मिक पुरुषार्थ और प्रकारान्तर से वातावरण अनुकूलन में योगदान के लिए तथ्य समझाते हुए अनुरोध किया जाय तो कोई कारण नहीं कि इस पाँच मिनट जितने सरलतम पुरुषार्थ को अपनाने पर इनकार ही सहमत होंगे। कितनों से ही कहने पर कुछ तो अवश्य ही सहमत होंगे। जिनके अन्तराल में सुसंस्कारिता अवश्य ही सहमत होंगे। उन्हें इस आधार पर उपलब्ध होने वाली युग चेतना से लाभान्वित होने का सहज ही उत्साह उभरेगा। अपेक्षा की जानी चाहिए कि यह अनुरोध टाला कम और अपनाया अधिक जायेगा।

नैष्ठिक साधकों को यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि उपासना के अखाड़े में बलिष्ठता का-निष्ठा का-अभ्यास करना होता है, पर उस उपार्जित सामर्थ्य को इतने छोटे क्षेत्र में कैद नहीं रखा जाता। पहलवान दंगल पछाड़ते और दूसरे प्रकार के पराक्रम प्रस्तुत करते हैं। ठीक यही बात नैष्ठिक साधकों के सम्बन्ध में भी हैं। वे निर्धारण, जप संख्या एवं व्रतशीलता का उपक्रम चलाते हुए उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं। बढ़ना और आगे पड़ता है। गाड़ी एक पहिये नहीं दो से चलती है। ताली एकनही दो हाथ से बजती है। संता-नोत्पादन एक नहीं नर-नारी का युग्म करता है। प्रगति पथ की लम्बी यात्रा एक पैर से नहीं दोनों सही होने पर बन पड़ती है। उपासक को साधक भी बनना पड़ता है। उत्कृष्ठ चिन्तन के साथ आदर्श कर्तव्य आवश्यक है। देवत्व के पक्षधर मात्र अपने को सन्त, सज्जन बना कर ही नहीं रह जाते वरन् उन्हें लोकमंगल की साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते है। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरुपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।

युग सन्धि पुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों का शुभारम्भ तो पूजा, उपासना के अमुक विधि-विधान पूरे करने से ही कराया गया है, पर उन्हें उतने छोटे दायरे तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। मात्र वातावरण संशोधन का उपक्रम ही पर्याप्त नहीं, युग सृजन में हमारा प्रत्यक्ष योगदान भी सम्मिलित रहना चाहिए। नवनिर्माण की प्रस्तुत गतिविधियों को विशुद्ध रुप से सृष्टा की इच्छा आवश्यकता समझा जाना चाहिए और पराक्रम भरे अनुदान की माँग को थोड़ी-सी पूजा-पत्री को पर्याप्त मानकर अनसुनी नहीं करना चाहिए। युग पुरश्चरण के नैष्ठिक उपासकों को यह भी समझने की आवश्यकता है कि महाप्रज्ञा की आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।


भावना के साथ सेवा भावना का समन्वय

विचारों में परिपक्वता कृत्यों के सहारे आती हैं। साधना में अभ्यास करना पड़ता है। भक्तिभावना का परिपोषण पूजा उपचारों के कर्मकाण्ड़ों से ही होता है। जिस प्रकार भावना और उद्देश्य के अभाव में पूजा कृत्य भी लकीर पीटने जैसे रह जाते हैं उसी प्रकार भावनाएं भी निरर्थक निष्फल बनी रहती है और कल्पना की उड़ानें तो उडती है पर क्रिया में परिणत होने का साहस नहीं जुटा पाती। थोथे ब्रह्मज्ञानी और ओछे कर्मकाँडी दोनों ही उपहासास्पद बनते और परिणाम की दृष्टि से निरशअसफल पाये जाते हैं। जब तक ज्ञान और कर्म का समन्वय न हो तब तक किसी महत्वपूण सत्परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि आत्मकल्याण की बात सोचने वालों को उपासना उपचार करने के अतिरिक्त लोकमंगल की साधना को भी सम्मिलित करना और उसके लिए साहस जुटाना आवश्यक समझा जाता है। जो इनमें से एक के लिए अपनाते और दूसरे को छोड़ते हैं वे एक पंख के सहारे उड़ने का प्रयास करने वाले पक्षी की तरह निराश ही रहते हैं। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चल पाती है ? एक पैर के लम्बी यात्रा कर सकने में सफलता कहाँ मिलती है ? लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी का सहारा लेकर ही खड़े होते और आगे चलने में समर्थ हो पाते हैं। उपासना और साधना का सज्जनता और उदारता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।

आर्थिक असमर्थता की स्थिति में दान से छूट मिल सकती हैं, पर पुण्य से नहीं। दान, धन से आता है और पुण्य श्रम से। दान पुण्य का साथ रह सकें तो उत्तम, अन्यथा साथी न मिलने पर एकाकी चल पड़ने की तरह एकाकी पुण्य अपनाया जा सकता है। दान तो सुविधा पर निर्भर है पर जिसके शरीर एवं मन अपंग नहीं हो गये है उनके लिए किसी न किसी रुप में समयदान की-श्रमदान की-सम्भावना बनी रहती है। अतएव साधु स्तर के अपरिग्रहियों का धनदान से तो छुटकारा मिल जाता है। पर श्रम-समय दे कर पुण्य प्रयोजनों में संलग्न रहने का कर्तव्य धर्म भी, उन पर लदा रहता हैं यहीं कारण है कि अनुष्ठानों की पूर्ति में जप का पूरक यज्ञ माना गया है। अग्निहोत्र ब्रह्मभोज जैसी खदार प्रक्रिया अपनाये बिना मात्र जप संख्या पूरी कर लेने से किसी का भी अनुष्ठान पूर्ण हुआ नहीं माना जाता। यहाँ यज्ञ और और ब्रह्मभेज को कर्मकाण्ड विशेष नहीं मान बैठना चाहिए वरन् उन्हें लोकमंगल के प्रति उदार अनुदान प्रस्तुत करने की एक परम्परागत शैली मानना चाहिए। यज्ञ माव अग्निहोत्र को ही नहीं कहते। इसके अतिरिक्त अन्यान्य परमार्थ प्रयोजनों को इसी शब की परिधि में सम्मिलित किया जाता है। उदाहरणार्थ नेत्र दान यज्ञ, भूदान यज्ञ, ज्ञानयज्ञ आदि में अग्निहोत्र न रहने पर भी परमार्थ का समावेश रहने से अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है। सन्यासी यज्ञ नहीं करते तो भी उन्हें पुण्य प्रयोजनों में निरत रहने से छूट नहीं मिलती।

विरक्तों को जन, ध्यान आदि साधनाएं करने के लिए आरण्यकों का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु साथ ही वानप्रस्थों के लिए आवश्यक परिवाज्रक प्रक्रिया अपना कर लोकमंगल में भी निरत रहना पड़ता है। जो मात्र जप आदि के उपचारों को ही पर्याप्त मानकर पूजा-पाठ भर में अपने को केन्द्रित कर लेते है, जन कल्याण में श्रम, समय लगाने की आवश्यकता नहीं समझते वे न तो भक्ति का तत्वज्ञान समझते हैं और न भगवान की प्रकृति प्रसन्नता को। ऋषि परम्परा में भजन का जितना स्थान है उससे कहीं अधिक लोकव्यवस्था को सुनियोजित रखने के लिए अधिक परिश्रम करने का। व्यास जैसे साहित्यकार, नागार्जुन जैसे रसायन शास्त्री चरक सुश्रुत जैसे चिकित्सक, वशिष्ठ और चाणक्य जैसे राज निर्देशक लोक मंगल में निरत देखे जा सकते है। अन्यान्य ऋषि तपस्वी भी भजन के समकक्ष ही परमार्थ के लिए प्रबल पुरुषार्थ करते रहे है। भवन संस्कृत भाषा का ‘भज’ धातु से बनता है। जिसका शुद्ध अर्थ है-सेवा। सेवारहित भजन को तो प्राण रहित निर्जीव शरीर भर कहा जा सकता हैं।

युग साधकों को अपनी नित्य नैमित्तिक उपासनाएं चलाते हुए यह ध्यान रखन होगा कि उपासना की पूर्णता के लिए जीवन साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।

परमार्थ प्रयोजनों के लिए भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करते रहने से भगवत् भक्ति का प्रयोजन पूर्ण होता है। आत्मसुधार और आत्म विकास की दुहरी पुण्य प्रक्रिया भी इसी अवलम्बन के सहो सधती रहती है। सद्गुणों का अभिवर्धन सत्कर्मों के सहारे ही होता है। स्वाध्याय सत्संग की ध्यान-धारणा की महिमा तो बहुत है पर वह है तभी जब साधक को उदार परमार्थ परायणता, लोक मंगल के सद्उद्देश्यों में निरल देखा जा सके। अन्यथा उन्हें मानसिक विलासिता कहकर उपहास करने वालों को भी निरुत्तर नहीं किया जा सकता।

युग साधना में निरत प्रज्ञापुत्रों में से प्रत्येक को जन सर्म्पक के लिए समयदान करने के निमित्त अनुरोध आग्रह किया गया है। यह जन सर्म्पक युगान्तरीय चेतना से जन जन को परिचित एवं प्रभावित करने के लिए हैं

इन दिनों तो यह आवश्यकता सामान्य लोक साधना न रहकर आपत्ति धर्म जैसी युग साधना बन गयी है। जागृतों को दूसरों को जगाने का ठीक यही समय है। इन दिनों नव जागरण के अग्रदूत बनकर बादलों की तरह हर खेत पर बरसने के लिए निकल पड़ने की आवश्यकता है। पवन जन-जन तक पहुँचता और प्रत्येक को प्रचुर परिणाम में जीवन तत्व प्रदान करता है। पवन पुत्र की तरह प्रज्ञापुत्र का भी कर्तव्य है कि ‘राम काज कीन्हे बिना” विश्राम ने लेने का निश्चय करें और देवर्षि नारद की तरह जन-जन से सर्म्पक साधने और युग प्रयोजन से परिचित सहमत करने के लिए अथक परिश्रम करता रहे। समयदान ही इन दिनों महाकाल की सबसे बड़ी माँग है। और उसकी पूर्ति में आगे आने के लिए जागृत आत्माओं के नाम प्रथम आमंत्रण आया है। युग निर्माण योजना के सदस्यों की प्रारम्भिक शर्त में ज्ञानयज्ञ के लिए हर दिन एक घण्टा समय देने का नियम है, अब उसे परिस्थितियों की गम्भीरता देखते हुए अधिक बढ़ाने की आवश्यकता पड़ गयी है। राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट आते ही सभी अफसरों की छुट्थ्टयाँ रद्द कर दी जाती है। अनिवार्य भर्ती के अर्न्तगत हर युवक को आवश्यक रुप से सेना में भर्ती होना पड़ता है। यह समय भी ऐसा ही है जिसमें निजी प्रयोजनों की उपेक्षा करें भी विश्व समस्या को प्राथमिकता दी जायें। और सृजन साधना में संलग्न रहकर युग धर्म का निर्वाह किया जाये यह कार्य समयदान से ही हो सकता है।

जिनके लिए समयदान सम्भव न हो उसके बदले साधन दान भी दे सकते हैं। समय के मूल्य पर साधन उपलब्ध किये जाते हैं। साधनों के बदले समय भी खरीदा जा सकता है। जो स्वयं जन सर्म्पक पर नहीं जा सकते वे ऐसे लोगों की निर्वाह व्यवस्था में सहायक हो सकते हैं जो साधनों के अभाव में सेवा क्षेत्र में जा सकने से वंचित रह रहे हैं। अंशदान की ही धार्मिक जीवन का एक अनिवार्य कर्तव्य माना गया है। अंशदान में साधन दान और समयदान दोनों का समन्वय है। युग निर्माण परिवार की सदस्यता में दस पैसा अंशदान को नहीं एक घण्टा नित्य के समयदान की शर्त भी जुड़ी हुई है। ज्ञानघट बाल सुलभ जैसा छोटा अनुदान होते हुए भी उसमें अंशदान की उस अनिवार्यता को बताया गया है जिसके बिना महानता के लक्ष्य तक पहुँच सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।

बीजारोपण वर्ष में पाँच अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम क्रियान्वित किये जा रहे हैं। इसलिए समयदान एवं अंशदान दोनों की ही प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ रही है। आठ घण्टे उपार्जन के सात घण्टे विश्राम के पाँच घण्टे विभिन्न झंझटों के लिए रख लेने के उपरान्त चार घण्टे युग साधना के लिए सरलता पूर्वक निकाले जा सकते है। तीस दिन के उपर्जन में से एक दिन की आजीविका इस कार्य के लिए लगाई जा सके, तो इससे किसी पर भी अर्थ संकट नहीं आने वाला है। थोड़ी सी बचत कर लेने पर उस एक दिन की कमाई की पूति हो सकती है। जो समय नहीं दे सकते, व उतने साधन देकर दूसरों का समय खरीद सकते हैं। इस सर्न्दभ में प्रत्येक युग साधक को गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए और समय की माँग को देखते हुए अधिकतम उदारता का परिचय देना चाहिए। दान-पुण्य दानों न बन पड़ तो शक्य हो उस एक को अपनाना चाहिए।

जन सर्म्पक के लिए समयदान इन दिनों प्रज्ञा पुत्रों के लिए महाकाल का प्रमुख आमन्त्रण हैं। जो इसे कर सकें समझना चाहिए वे अपने उदार साहसिकता का प्रमाण परिचय कर अन्य अनेकों को प्रभावित करते और क्रमशः अिकाधिक जन-सहयोग अर्जित करते चले जायेंगे। प्रज्ञावतरण की समग्र प्रक्रिया सज्जनों की उदार सहकारिता पर निर्भर है। इस साधन को जुटाने के लिए मूधंन्य प्रज्ञापुत्रों को सर्व प्रथम स्वयं ही आगे आना होगा और आने उदारहण से अनेको को अनुगमन-अनुकरण के लिए सहमत बनाने में सफल होने का अवसर मिलेगा। दूसरों को समझा तो कोई भी सकता है पर किसी में कुछ आदर्शवादी साहस अपनाने की-वैसा कुछ कर गुजरने वाली सक्रियता उभारने की अपेक्षा हो तो एक ही उपाय है कि सर्व प्रथम अपना उदाहरण प्रस्तुत किया जाय। जो स्वयः नियमित रुप से सृजन प्रयोजनों के लिए समय देगें उन्हें यह शिकायत करने का अवसर न मिलेगा कि कोई उनका साथ नहीं देता और स्थानीय गतिविधियाँ शिथिल पड़ी या बन्द हो गई।

जलता दीपक ही दूसरे को जला सकता है अपने समय दान अंशदान मं प्रमुखता रखने वाले ही दूसरों में उत्साह भरते है। उन्हीं के अनुरोध का प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुत पाँच सूत्री कार्यक्रम को सफल बनाने का सही उपाय यही है कि प्राणवान् परिजन अपने समयदान अंशदान का सुनिश्चित संकल्प करें। उद्देश्य पूर्ण सर्म्पक साधनें पर निकलें और वह प्रयोजन पूरा करें जिसकी आज नितान्त आवश्यकता अनुभव की जा रही है।

युग सृजन जैस महान् प्रयोजन में सामूहिक प्रयत्नों की आवश्यकता है। उनके लिए बड़ी संख्या में सहयोगी चाहिए। वे सहयोगी भी चिन्तन चरित्र और व्यक्तित्व की दृष्टि से अपेक्षा कृत ऊँचे उठे होने चाहिए। यही है वह युग-शक्ति, जिसके सहारे नव सृजन की विशालकाय योजना एवं आवश्यकता को साकार कर सकना सम्भव है।

इन दिनों ऐसी कितनी ही सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियाँ आरम्भ की गई है जिनमे सहयोग देने का निमन्त्रण देने के लिए जन सर्म्पक साधा जा सकें और इस बहाने यह ढूँढ़ा जा सके कि किस में कितनी सुसंस्कारिकता जीवन्त है। जिसके पास कुछ है उसी से पानी की आशा की जा सकती है। युग शक्ति को सज्जनों की उदार सहकारिता कहा जा सकता है। वह जितनी ही उभरेगी उतना ही सृजन प्रयोजन सरल एवं सफल होता चला जायेगा। लक्ष्य तक पहुँचने का यही प्राथमिक उपाय है जिसे अपनायें बिना और कोई चारा नहीं।

प्रस्तुत कार्यक्रमों में सभी ऐसे हैं जो जन सहयोग से ही सम्पादित होंगे और उस सहयोग के लिए मात्र विचारशील एवं भावनाशील ही उत्वाह व्यक्त कर सकेंगे। अस्तु ढूँढ़ना उन्हीं को पड़ेगा। यही है रीछ वानरों की तरह शालीनता की सीता खोज निकालने की सृजन शिल्पियों की प्रारम्भिक चेष्टा जिसके सहारे प्रगति पथ पर बढ़ने वाले अग्रिम चरणों की बात सोची जा सकती है।

प्रस्तुत प्रयोजन के लिए उदार भावनाशील व्यक्तियों को तलाशने तथा उन तक नवयुग की पुकार पहुँचाने के लिए प्रत्येक जागृत आत्मा को निकलना चाहिए। औरों को प्रभावित तथा प्रोत्साहित किया जा सकें, इसके लिए सर्वप्रथम उससे बढ़ चढ़ कर योगदान प्रस्तुत करना आवश्यक है। स्वयं जिस स्तर के अनदान प्रस्तुत किये जाते हैं, जिस स्तर का सत्साहस किया जाता है उसे अधिक बड़े स्तर की प्रेरणाएं प्रोत्साहन नहीं दिये जा सकते। अपनी परमार्थ परायणता में युग साधना के प्रति श्रद्धा निष्ठा में भावना का समावेश कर लोक मंगल के लिए समयदान तथा अंशदान प्रस्तुत करने हेतु प्रत्येक परिजन को उत्साह पूर्वक आगे आना चाहिए।


चरणपीठों के सम्बन्ध में ज्ञातव्य एवं स्पष्टीकरण

सस्ते गायत्री चरणपीठों की स्थापना सम्बन्धी अभिनव योजना इन दिनों असाधारण महत्व मिला है। उन्हं आदिवासी क्षेत्र में अत्यधिक उत्साह के साथ अपनाया गया है। देश में प्रायः 4 करोड़ आदिवासी बनवासी हैं वे अभी भी सामान्य जन-जीवन में पूरी तरह घुल नहीं पायें हैं। परिगणित जातियाँ अब पूरी तरह जन-जीवन में घुल गई हैं। बहुत थोड़े लोग है ऐसे जिन्हें जीवनयापन करने एवं व्यवसाय अपनाने से रोका जाता हो। सम्बिधान के निर्धारण एवं सरकारी संरक्षण अनुदानों के सहारे उनकी स्थिति तेजी से सुधरी है और कठिनाई प्राय समाप्त हो चली जो कभी विभेद की कष्टकारण दीवार बनकर खड़ी हुई थी।

इतने पर भी आदिवासी समुदाय के जन-जीवन में घुलने की समस्या प्रायः ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें जहाँ प्रयत्नकर्ताओं का दोष है वहाँ उन वन जातियाँ का असहयोग ीी कम बाधक नहीं है। एकात्मता की दिशा में जो प्रयत्न हुए हैं उनकी पृष्ठभूमि राजनैतिक या आर्थिक रही है। शिक्षा, चिकित्सा, सुविधाएँ तो दी गई है। चुनावों में उनकी सीटें निर्धारित हुई हैं तथा नौकरियों में संरक्षण मिला है। आर्थिक सुधार के उपक्रम भी चले हैं। यह सब होते हुए भी एक भारी कमी यह रह गई है कि उनको सामाजिक जीवन में प्रवेश नहीं किया गया। जबकि उनके पिछड़ेपन तथा पृथकतावादी चिन्तन की विषैली जड़े उसी क्षेत्र में जमी हुई है। उनका सामाजिक गठन, परम्परा प्रचलन, चिन्तन का ढर्रा, स्वभाग आदि के न मिलने से एक प्रवाह ऐसा बन गया है जिसकी प्रचण्ड धारा से पार हो सकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल रही है। न तो जन-जातियाँ अपने पुरुषार्थ से उस गर्त से उबार पा रही है और न उद्धार की बात सोचने वालों की समझ में आ रहा है कि इस खाई को पाटने के लिए उनका सामाजिक जीवन में प्रवेश करना और साथ लेकर चलना आवश्यक है।

आदिवासियों का पिछड़ापन दूर करने तथा उन्हें समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष ला खड़ा करने के लिये धर्मतन्त्र का सहारा लेना अत्यन्त आवश्यक है। प्रज्ञा अभियान के अनतर्गत इन्हीं क्षेत्रों में गायत्री चरणपीठों की स्थापना की बात सोची गई। यह दिशा परिवर्तन का ध्वजारोपण समझा जा सकता है। प्रज्ञा की अधिष्ठात्री गायत्री के संबंध में श्रद्धा एवं जिज्ञासा उत्पन्न करके उस समुदाय को एक भावनात्मक मोड़ दिया जा सकता है। इस मोड़ से उनका चिन्तन एवं प्रचलन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। चरणपीठों के स्थापनकर्त्ता यदि उस समुदाय का धार्मिक मोड़ देने की श्रृंखला में अगली कड़ियाँ सामाजिक मान्यताएँ, अभ्यस्त आदतों, रुढ़ि परम्पराओं एवं मूढ़ मान्यताओं के बदलने को जोड़ते रहे तो निश्चित रुप से प्रतिगामिता घटती और उसके स्थान पर प्रगतिशीलता बढ़ती चली जायेगी।

प्रज्ञा अभियान के अर्न्तगत ‘गायत्री चरणपीठ’ की योजना प्रधानतया पिछड़े वर्ग को ध्यान में रखकर ही बनी थी। क्योंकि वह नितान्त सस्ती और समस्त झंझटों से रहित है। किसी छाया दार पेड़ के नीचे एक बड़ा चबूतरा-चबूतरे के ऊपर चबूतरी-चबूतरी पर गायत्री माता के चरण-अगल-बगल में तुलसी के दो थावले-चबूतरे के चारों ओर नागफनी आदि को कटीली बाड़-पेड़ के ऊपर लम्बे बाँस पर पवित्रता की संस्कृति का प्रतीक पीला झंडा। यह ही चरणपीठों की स्थापना का स्वरुप है। यह कच्ची मिट्टी से बनना हो तो निन्तात रमदान से बन सकता है। चरण खुदा पत्थर और झण्डा यह दो चीज ही ऐसी है जिनके लिए थोड़ा-सा पैसा खर्च करना पड़ सकता है। यदि यह धारा सरंजाम पक्का करना हो तो श्रमदान को काटकर ईंट चूने आदि की लागत ढाई सौ के लगभग ही पड़ती है। दोनों में से जहाँ जैसी सुविधा हो वहाँ प्रबन्ध किया जा सकता है।

दैनिक पूजा में चरणों के नमन, खड़े-खड़े प्रजा जप ध्यान, तुलसी में जल, परिक्रमा जितन, वधान पर्याप्त समझा गया। साप्ताहिक समारोह के रुप में भजन, कीर्तन, कथ-प्रवचन और सम्भव हो तो खरी जैसे किसी घरेलू खाद्य-पदार्थ की हवन की व्यवस्था बनाई गई। इस छोटे समारोह का स्वरुप धार्मिक रखने के साथ-साथ उस समग्र लोक-शिक्षण को उपस्थित समुदाय के गले उतरा जाय तो स्थिति को बदल जा सकता है। विचार-क्रान्ति की औषधि के अन्यत्र भी धर्म तन्त्र की पिचकारी के सहारे जन-मानस में प्रवेश कराने का उपक्रम चल रहा है और यह इंजेक्शन पद्धति आशातीत सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा है। फिर आदिवासी क्षेत्राो में यह स्थापना अपनी क्रमिक श्रृंखला को विकसित करते हुए-”उँगली पकड़ कर कलाई तक पहुँचाने” में कारगर क्यों सिद्ध नहीं हो सकती ?

चरणपीठ स्थापन योजना का चिन्तन पिछड़े वर्गो को ध्यान में रखते हुए किया गया है। क्योंकि उसमें सस्तेपन, उपक्रम की सरलता साथ ही प्रगतिशीलता सर्म्मधन के सारे तत्व मौजूद हैं। उनके संचालन में किसी वैतनिक कार्यकर्त्ता की नियुक्ति नहीं कनी पड़ती। संस्थापक ही मिल-जुलकर उसके लिए अनुकूल वातावरण बनाने उपयोगी कार्यक्रमों के साथ् उस श्रृंखला को जोड़ते विकसित करते रह सकते है।

उपरोक्त योजना बनाते समय आदिवासी क्षेत्र ही ध्यान में था। पर इस धार्मिक स्थापना की ओर सर्वसाधारा का ध्यान भी आकर्षित हुआ है और उसके लिए जन-जन में उत्साह जगा है। इसमें स्वरुप लागत से उपयोगी स्थापना और उसके साथ जुडी हुई योजना एवं सम्भावना को देखते हुए अन्यत्र भी यह अनुभव किया गया है कि यह स्थापना अपने देश के हर गाँव के लिए उपयोगी हो सकती है और इस ध्वजाोपण के माध्यम से प्रज्ञा अभियान को सरलतापूर्वक जन प्रवाह के माध्यम से प्रज्ञा अभियान को सरलतापूर्वक जन प्रवाह को मोड़ने का निमित्त कारण बताया जा सकता है।

भारत आर्थिक और शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ा देश है। मँहगी योजना बडत्रे नगरों में घनिष्ठ वर्ग की सहायता से ही पूरी हो सकती है। पिछड़े देहात में सस्ती धार्मिकता ही लोक मान्यता प्राप्त कर सकती हैं।

प्राचीनकाल में देवालय जन-जागृति के केन्द्र बने हुए थे और उनके साथ जुड़ी हुई जन शक्ति एक साधन शक्ति का व्यक्ति एवं समाज स्तर ऊँचा बनाने एवं बढ़ाने में लगता था। उसी यथार्थता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना द्वारा देव परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। इन निर्माणों में अधिकतम सस्ता, सरल एवं लोकोपयोगी बनाने का जो प्रयत्न चल रहा है उसमें आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित न रखकर अन्य लोगों के लिए भी श्रद्धा जागरण के साथ-साथ युग चेतना उभारने का निमित्त साधन सरलतापूर्वक बनाया जा सकता हैं।

झण्डा स्थापन की तरह, चबूतरी पर शिवलिंग की स्थापना भी प्रतीक का काम दे सकती है और उसके साथ तारतम्य बिठाकर लोक मानस को अभीष्ट प्रयोजन के लिए वातावरण बनाने में सहायता मिल सकती है। फिर भी अच्छा यह है कि इन स्थापनाओं को थोड़ा और अधिक सामर्थ्य, साधन सम्पन्न एवं सुविधाजनक बनाया जाय। इसके लिए चरणपीठों की एक बड़ी श्रेणी बनाई जा सकती है। जिसमें स्थायित्व, आकर्षण एवं मिलन सम्मेलन के लिए सुविधाजनक आच्छादन भी हों। छायादार पेड़ का काम कर सकने के लिए इन स्थापनाओं के साथ बहुद्देश्यी झोंपड़ा तो चाहिए ही। पेड़ से हर ऋतु में एवं हर समय काम नहीं चल सकता, पर यह खपरैल के आच्छादन वाला हाल सस्ता होते हुए भी उन सभी प्रयोजनों की पूर्ति कर सकता है जिन्हं प्रज्ञापीठों के माध्यम से पूरा करने की बात सोची गई हैं।

प्रज्ञापीठों और चरणपीठों के अन्तर को समझा जाना चाहिए। प्रज्ञा पीठें दो स्तर की हैं एक सात-आठ हजार लागत वाली छोटी, दूसरी पन्द्रह बीस हजार की बड़ी। दोनों में कार्यकर्त्ता निवास है और दोनों में प्रतिमाओं वाले मन्दिर। चरणपीटों में न कार्यकर्त्ता निवास है न मन्दिर। दोनों में प्रतिमाओं के स्थाप पर पत्थर पर खुदे हुए चरण खुले चबूतरी पर रखे गये है। चरणो की चबूतरी पर दोनों और तुलसी के दो थाँवले हैं। दोनों कच्चा या पक्का होना स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर है। इतनी बात छोटी और बड़ी चरणपीटों पर निर्भर ह। इतनी बात छोटी और बड़ी चरणपीटों में समान है। महत्वूपर्ण अन्तर यह है कि छोटे निर्माणों में मात्र पेड़ की छाया है जबकि बड़ी चरणपीठ में एक 14ग्26 फुट आकार के झोंपड़े की स्थायी व्यवस्था है। इसकी अगल-बगल की दो चौड़ाई वाली दीवार ठोक होगी और लम्बाई में पाये बने होंगे जिनसे दोनों ओर हवा रोशनी का खुला आवागमन बना रहे। इन्हें बन्द करना हो तो बाँस या छड़ों से बने खिड़के जैसे दरवाजे लग सकते हैं। बगल की ठोक दीवारों में दोनों ओर तीन तीन अलमारियाँ रहेंगी, जिनमें विद्यालय के कथा सम्मेलन के आवश्यक उपकरण रखे रहें और यदि कोई व्यक्ति उसमें निवास करना चाहे तो दिन में एक अलमारी में कपड़े, दूसरी में भोजन बनाने के उपकरण बन्द करकें निर्वाह भी कर सकें। रात्रि में वही ह्ल निवास का काम दे सकता है और दिन में प्रौढ़, पाठशाला, चल पुस्तकालय कथा-प्रवचन व सहगान कीर्तन, ह्वन आदि के काम भी आ सकता हैं खुले चबूतरे पर चरण और प्रज्ञा वाले मन्दिर भी रहें और समय-समय पर उनका उपभोग पढ़ने-पढ़ाने जैसे कामों के लिए भी होता रहे। इस प्रकार जो कार्य छोटी-बड़ी प्रज्ञापीठों द्वारा सोचा गया है वह बड़ी चरणपीठ द्वारा भी सम्पन्न हो सकता है। दीवारें पक्की ईंट की और पक्की खपरैल लगाने पर यह चरण पीठ अनुमानतः ढाई हजार में बन सकती है। चबूतरा और फर्श पक्का बन जाने से उसका उपेयाग वर्षा के दिनों में भी ठीक तरह हो सकता है और सफाई शोभा एवं सुविधा भी ठीक रह सकती है। स्थानीय इमारती साधन एवं मजूरी में न्यूनाधिकता होने, श्रमदान का सुयोग बन पड़ने से कम लागत में अधिक अच्छे साधन भी न सकते हैं। जिन्हं इस सम्बन्ध में दिलचस्पी हो वे साइज, डिजाँइन लागत आदि के सम्बन्ध में अपनी परिस्थितियों से तालमेल खाने वाला परामर्श शान्ति-कुँज से पत्र द्वारा अथवा स्वयं पहुँच कर प्राप्त कर सकते हैं। स्थानीय विज्ञ व्यक्ति भी इस प्रयोजन में कारगर परामर्श दे सकते हैं।

मुख्य प्रश्न है प्रज्ञा अभियान के लिए स्थान का निर्माण एवं प्रतीक के निर्धारण को प्राथमिक आवश्यकता का समाधान। यह उपरोक्त आधार पर विनिर्मित किया जा सकता है। भवन वाले चरणपीठ प्रायः ढाई हजार की लगभग के आँके गये हैं और पेड़ की छाया वाले ढाई सौ में भी बन सकते है। जहाँ जैसी सुविधा हो इन संस्थाओं को इन्हीं दिनों बना लिया जाय। कस्बों और बड़े गाँवों में किराये का माँगे का मकान लेकर प्रज्ञा मन्दिर बनाने से जो प्रयोजन पूरा हो सकता है वह छोटे देहातों में इन ढाई हजार वाले निर्माणों से भली प्रकार पूरा हो सकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति कहाँ किस प्रकार होती है यह निर्माणरत प्रतिभाओं के पुरुषाथ्र एवं स्थानीय साधन सहयोगपर निर्भर है। इतने पर भी मूल उद्देश्य उन सभी निर्माणों का एक है-जनमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन। वह आदिवासी क्षेत्र की तरह अन्य क्षेत्रों में भी आवश्यक है। इसलिए चरणपीठ स्थापना के लिए अपने देश के पिछड़ेपन को देखते हुए उचित एवं उपयुक्त ही है। व्यापकता के लिए सस्तेपन की सुविधा का होना आवश्यक हैं।

ज्ञान मोम की तरह है। कला की गर्मी उसे गलाती है और आकर्षक प्रतिमाओं की आकृति में उसे ढालती है। इसी नयनाभिराम संरचना को सौर्न्दय की संज्ञा दी जाती है।

कला क्या है ? इसका उत्तर रस्किन के शब्दों में इस प्रकार दिया जा सकता है कि मनुष्य की बहूमुखी भावनाओं का प्रबल प्रवाह जब रोके नहीं रुकता तो वह कला के रुप में फूट पड़ता हैं।


प्रज्ञा संस्थाओं की सफलता के आधार

लोक तान्त्रिक संस्थाओं में निर्णय तो चुनें हुए प्रतिनिधि ही करते हैं किन्तु उन्हें क्रियान्वित करने के लिए सरकारी कर्मचारी नियुक्त रहते हैं। ग्राम पंचायतों में मन्त्री, नगरपालिकाओं में एक्जीक्यूटिव आँफिसर आदि संस्थाओं में प्रतिनिधियों औ प्रशासकीय कर्मचारियों का युग्म हर कहीं देखा जा सकता है। प्रतिनिधियों का समय दफ्तर सम्हालने में नहीं जन सर्म्पक करने और वातावरण बनाने में लगता हैं। प्रज्ञा संस्थानों के सम्बन्ध में भी यही नीति अपनानी पड़ेगी। अब तक के अनुभवों ने यही सिखाया है कि नियमित विधि-व्यवस्था सम्हालने के लिए तदनुप व्यक्तियों की नियुक्ति की जाए।

पिछले दिनों ज्ञानरथ चले थे। विचार क्रान्ति और जन-सर्म्पक के लिए उनकी आवश्यकता भली प्रकार समझी औ समझाई गई। वे बने भी और चले भी, पर सफल नहीं हो सके। कारण कि उन्हें चलाने के लिए मिल-जुलकर समय देने और बिना किसी वैतनिक कार्यकर्ता के उसे स्वतन्त्र चला लेने का निश्चय किया गया था, जो उत्साह में शिथिलता आते ही लड़-खड़ाने लगा और अस्त-व्यस्त हो गयाँ अब इस निर्ष्कष पर पहुँचा गया है कि यदि ज्ञानरथ चलाने हैं तो उनके लिए निर्वाह व्यय देकर कार्यकर्ताओं की नियुक्ति ही एकमात्र ऐसा उपाय है जिसके द्वारा मूर्छित जैसी स्थिति में चली गई ज्ञानरथ योजना को पुनजागृत किया जा सकता हैं।

प्रज्ञापीठों का निर्माण तीव्रगति से हो रहा है। उपलब्ध तथ्यों पर विचार किया जाए तो यह विश्वास करने के पर्याप्त आधार मिल जाते हैं कि भारत के सात लाख गाँवो में, प्रत्येक सात गाँवों पीछे एक प्रज्ञापीठ बनकर आसानी से तैयार हो जायेगा। इन तथ्यों की विस्तृत चर्चा का यहाँ अवकाश नहीं है, पर ऐसे ढ़ेरों उदाहरण हैं जिनसे प्रतीत होता है कि ऐसे प्रयास पहले भी किये गये हैं औ वे सफल रहे हैं। एक हजार से अधिक स्थानों पर प्रज्ञा संस्थानों का निर्माण आरम्भ हो चुका है। कई स्थानों पर वह पूरा हो गया है और अनेक स्थानों पर प्रज्ञा संस्थानों का निर्माण पूरा होने के समीप है। इस सर्न्दभ में निर्माणों के पूरे होने पर कुछ विलम्ब भी हो सकता है किन्तु नवरात्रि पर्व पर प्रज्ञामन्दिरों की स्थापना की जो बात सोची गई है वह इतनी सरल और सुनिश्चित है कि जहाँ सामूहिक नवरात्री आयोजन मनायें जायेंगे वहाँ किसी माँगे हुए या किराये के कमरे में स्थापना होकर ही रहेगी। इस तरह की स्थापनाएँ विजयाशमी पर्व पर हजारों की संख्या में हुई देख जा सकेगी। प्रज्ञापीठों का अपना भवन तो पीछे भी बनता रहेगा, इस रुप में प्रज्ञालोक के विस्तार और नव-सृजन का अभियान तो उसी दिन आरम्भ हो जाएगा।

यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है लकड़ी, मिट्टी से बनी हूई इमारत तो मात्र कलेवर है। उनका आकार देखकर आँखों की जानकारी मात्र बढ़ती है। उद्देश्य की पूर्ति तो जीवन्त प्राण चेतना के सहारे ही सम्भव होती है। प्रज्ञा संस्थाओं में प्रतिमा स्थापना का जितना महत्व है ठीक उतना ही, बल्कि उससे भी अधिक महत्व प्रज्ञा संस्थाओं में सम्बन्धित गतिविधियों को अग्रगामी बनाने में रित किसी उपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति का है। इसके बिना वही स्थिति बनी रहेगी जो बिना प्रतिमा के देवालय की। प्रज्ञा मन्दिर हो या प्रज्ञापीठ दोनों को जीवन बनाने वाला तथ्य स्पष्ट है-कार्यवाहक, कार्यकर्ता की नियुक्क्ति और उसके निर्वाह की व्यवस्था। जहाँ यह नींव मजबूत होगी, वहीं इन स्थापनाओं की सार्थकता रहेगी अन्यथा इमारतों के लिए किया गया प्रयत्न निर्जीव पड़ा रहेगा और वह उत्साहवर्धक परिणाम उतपन्न करने के स्थान पर उपहासास्पद ही बनकर रह जाएगा।

प्रज्ञा संस्थानों के कार्यवाहकों को औसत भारतीय स्तर का निर्वाह व्यय ही अपनाना पड़ेगा और उन्हीं को आगे आना पड़ेगा जिनके ऊपर बहुत बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हैं। कुछ घर का सहारा है, कुछ बाहर का से कमा कर जो गुजारा करने का ताल-मेल बिठा सकें, साथ ही जिन्हें मिशन की दिशा धारा की जानकारी हैं एवं उसमें दिलचस्पी है, ऐसे व्यक्ति अपने ही गाँव या क्षेत्र में तलाश करने पर निश्चित रुप से मिल सकते हैं। क्षेत्र में तलाश करने पर निश्चित रुप से मिल सकते हैं। देखना यह है कि संचालकाँ के पास आजीविका के वर्तमान स्त्रोंत कितने हैं ओर उनके बढत्रने की सम्भावना क्या है ? इस आधार पर ही यह निर्णय हो सकता है कि नियुक्त कार्यकार्त को किस स्तर का, कितने समय का और कितने वेतन में रखा जा सकता है ? न्यूनतम आधे दिन की नियुक्ति तो होनी ही चाहिए। आधे दिन का अर्थ होता है चार घण्टे। यहाँ पूरे चार घण्टे से तार्त्पय है, दो घण्टे काम और दो घण्टे मटरगश्ती का प्रचलित ढर्रा अपने यहाँ चलने वाला नहीं हैं। अतएव काम की खाना-पूरी न करके जो वस्तुतः उतना समय देना चहें उनके द्वारा पूरी लगन औ तत्परता से दिये गये चार घण्टे भी काम चलाने की दृष्टि से सन्तोषजनक हो सकते हैं।

कितने समय के लिए कितने वेतन पर कार्यकर्ता नियुक्त किया जाग, इसके पूर्व भी सोचना होगा कि उसे करना क्या है ? तथा उसे विधि-व्यवस्था चलाने में कितने साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। स्मरण रखा जाना चाहिए कि प्रज्ञा संस्थानों के कार्यवाहक किसी प्रतिमा के पुजारी नहीं होंगे जो बैठे-बैठे दिन गुजारते रहें। उनका इष्टदेव जीवन्त है, उसके लिए हर समय जीवन का मूल्य चुकाना पड़ता है। अस्तु, प्रज्ञा संस्थानों के कार्यवाहक इन दिनों प्रधानतया दो काम करेंगे। एक युग साहित्य घर-घर पढ़ाने का उपक्रम और दूसरा जन्मदिवसोत्सव शानदार ढंग से मनाने का प्रबन्ध। आगे तो सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन के अनेक कार्यक्रम अपनाये जायेंगे, पर आरम्भ सभी प्रज्ञा संस्थान इन कामों पर पूरा ध्यान देकर बीजारोपण के साथ खाद, पानी देने जैसी व्यवस्था वनायेंगे ताकि जड़ें मजबूत हो सकें।

जन्मदिवसोत्सवों में तो अर्थ-व्यवस्था का भार उन्हीं पर डाला है जिनका जन्म दिन है। उसमें लगने वाली न्यूनतम पाँच रुपये जैसी छोटी-सी राशि का परिणाम इतना उत्साहवर्धक होते देखकर उसे हर कोई खुशी-खुशी वहन कर लेता है। इसलिए इस प्रसंग में मिशन को केवल व्यवस्था बनाने की भाग दौड़ भर करनी पड़ती है। शेष के लिए किसी अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता नहीं पड़ती। किन्तु दूसरा कार्य ऐसा है जो लगातार खर्च माँगता है। घर-घर युग साहित्य पहुँचाने और जन-जन को उसे पढ़ने तथा दूसरों को उसे पढ़ाने की योजना ही वह ज्ञान यज्ञ है जिसे विचार क्रान्ति का नाम दिया गया है।

यह प्रयत्त अग्निहोत्र की तरह ही खर्चीला है। यज्ञ मं होताओं द्वारा आहुति देने का श्रम, समय ही पर्याप्त नहीं होता वरन् यजन सामग्री के लिए पैसा भी खर्चना पड़ता है। जिस साहित्य को पढ़ाना है वह आसमान से नहीं बरसेगा वरन् हर बार नई व्यवस्था करते रहने की आवश्यकता पड़ेगी।

हर प्रज्ञा मन्दिर की प्रायः 240 सदस्यों की एक स्वाध्याय मण्डली होनी चाहिए। नवरात्रि आयोजन में सम्मिलित हुए परिजनों को उसी अवसर पर इस स्वाध्याय मण्डली का सदस्य बना लिया जाना चाहिए। प्रश्न आता है कि यह साहित्य जुटाया कैसे जाए ? प्रथम चरण में यह हो सकता है कि पुरानी पत्रिकाएँ और पुस्तकें एकत्रित करके उन्हें बाँसी कागज की जिल्द लगा कर ऐसा बना लिया जाए कि वह फटने न पायें। इन्हें नये या अपरिचित लोगों को पढ़ाया जा सकता है। नया साहित्य मँगाने की व्यवस्था वाद में बनाई जा सकती है।

नियुक्त कार्यकर्ता के निर्वाह बाद में बनाई जा सकती है। धर्मघटों से हल किया जा सकता है। कार्यकर्ता की नियुक्तिके लिए उपयुक्त व्यक्तियों पर नजर डाली जाए। कर्ठ स्वस्थ रिटायर, चैतन्य विद्यार्थी अथवा बेरोजगार प्रौढ़ व्यक्ति ऐसे हो सकते है जो थोड़ी-सी आजीविका मिलने पर बेकारीका समय उत्तम कार्य में खर्च करने से प्रसन्नता अनुभव करेंगे। ऐसे लोगों को ढूँढ़ निकाला जा सकता है और उन्हें पूरे समय या आधे समय के लिए नियुक्त किया जा सकें। इन्हीं नवरात्रियों में इतना वन पड़े तो प्रज्ञा संस्थाओं को आलोक, केन्द्र में रुपान्तरित करने का बीजारोपण हो गया समझना चाहिए अगले कदम इस प्रयास की सफलता से उद्भुत उत्साह में बढ़ते रह सकते हैं।


प्रज्ञापुत्र अपनी प्रौढ़ता का परिचय दें....

गायत्री को वेदमाता, देवमात और विश्वमता कहा गया है। वेद अर्थात् ज्ञान, माता अर्थात् प्रसूता। वेदमाता द्वारा प्रसूत ज्ञान देवमाता के रुप में व्यक्तित्व में देवत्व भरता है और विश्वमाता के रुप में उसे विश्वमानव की, विश्व परिवार की अर्भ्यथना में नियोजित करता है। यही है महाप्रज्ञा का, ऋतम्भरा का विराट् रुप। दूसरे पर्यायवाची शब्द ‘महाप्रज्ञा का विराट् रुप। दूसरे पर्यायवची शब्द ‘महाप्रज्ञा’ का इन दिनों अधिक उपयोग करने की आवश्यकता इसीलिए अनुभव की गई कि मध्य काल में आद्यशक्क्ति का उपयोग जिस प्रकार सीमित प्रयोजन और सीमित समुदाय के लिए किया जाने लगा उससे आगे का विस्तार एवं उपक्रम समझने में सहायता मिली।

इस उद्देश्य से अपने मिशन और परिवार का नामकरण गायत्री परिवार किया गया। अगले दिनों इसका स्वरुप ज्यों का त्यों रहेगा, पर बोलचाल की भाषा में उसे प्रज्ञा परिवार कहना भी उपयुक्त है। अब तक गायत्री परिवार के सदस्य परिजन कहलाते रहे हैं किन्तु अब उन्हें अपने समुदाय और उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला चिर प्राचीन किन्तु नवीन नाम ‘प्रज्ञा परिजन’ दिया आ रहा है।

गायत्री उपासक के स्थान पर ‘प्रज्ञापुत्र’ कहे जोन का महत्व आत्मबोध की दृष्टि से इसलिए अधिक है कि युग चेतना को उभारने औ नवयुग का सृजन करने में निरत महाकाल की महाकाली महाप्रज्ञा के अग्रदूत होन के गौरव का अनुमान किया जा सके।

नित्य उपासना के अतिरिक्त “एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य” ज्ञानयज्ञ के निमित्त निकालते रहने की सदस्यता शर्त देव परिवार के परिजनों के लिए आरम्भ से ही निर्धारित की गई है। अपने समय में अग्निहोत्र को प्रतीक और ज्ञानयज्ञ को युग धर्म के रुप में मान्यता मिली थी। कभी सब लोग देवमानव थे और सभी ज्ञान सम्पन्न, इसलिए ज्ञानयज्ञ को उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना कि वह महत्वूपर्ण है। आज इसलिए महत्वपूर्ण है कि इन दिनों चारों और अज्ञानान्धकार की ओर तमिस्त्रा ने सर्वत्र अपना साम्राज्य जमा लिया है इस स्थिति में ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल जलानी पड़ेगी और उसी को युग यज्ञ की मान्यता देनी पडे़गी।

इसी दृष्टि से प्रज्ञापरिवार का सदस्यता शुल्क एक घण्टा समय के रुप में श्रमदान और दस पैसा नित्य के रुप में अंशदान का रखा गया थाँ पर उस मूलभत निर्धारण पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। पता न हो सो बात नहीं है। हजार बार कहा गया है और सौ बार उसकी सदस्यता शर्त पूरी करने का साहस जुटायें। पर जिनके सिर पर मुफ्त का माल हाथ लगने का भूत सवार है, वे इतनी छोटी उदारता दिखाने की भी आवश्यकता क्यों समझे ?

यह समीक्षा पिछले गायत्री परिवार की है। उस शैशव की अवधि समाप्त हो गई। अब परिपक्वता की आयु है। प्रज्ञापरिजनों ने प्रौढ़ता विकसित होते ही यह अनुभव कर लिया है कि उन्हें देव परिवार में सम्मिलित होने और प्रज्ञापुत्र कहलाने का अनिवार्य शुल्क जमा करना ही चाहिए। यह चिन्तन निखरते ही अब ज्ञानघटों की ही नहीं धर्मघटों की स्थाना का भी उपक्रम चल पड़ा है। जो इतनी नगण्य-सी उदारता दिखाने में भ्ी आना-कानी करते हैं वे देव बिरादरी में बचकाने ही गिने जाते हैं और अपनी दृष्टि में भी उस कृपणता के कारण अपना मूल्य गिराते है।

प्रज्ञा परिवार के परिजनों ने इस परिवर्तन को समझा है और अपना रवैया बदला है। उसे प्रज्ञावतार का-सहयोगी सहचर बनने का-सौभाग्यपूर्ण सुअवसर मिला है तो यह आत्मबोध भी जगा है कि इस सुअवसर कस सदुपयोग बढ़ा-चढ़ाकर अनुदान प्रस्तुत करने से ही हो सकता है।

आश्विन नवरात्रि से प्रज्ञासंस्थानों के माध्यम से युग प्रवर्तन का धर्मचक्र दु्रतगति से अग्रगामी बनेगा। अतएव उसके नये उत्तदायित्वों का वहन करने के लिए परिपक्वों की भर्ती की जा रही है। चयन यहाँ से आरम्भ हो रहा है। कि जो प्रज्ञापरिवार की गरिमा और उसका सदस्यता शुल्क चुकाने की आवश्यकता समझते हैं उन्हें ही वयस्क माना जाए। इस नवरात्रि से गायत्री परिवार का नवगठन होना चाहिए और उनके सदस्य मात्र उन्हीं को माना जाना चाहिए जो एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य देने के रुप में अपनी प्रौढ़ता का परिचय देते हैं। कहा जाता रहा हे कि इस न्यूनतम अनुदान का सदस्यता शुल्क का उपयोग प्रज्ञा विस्तार में ही किया जाना चाहिए और मात्र इसी से हो भी सकता है, अन्य किसी कार्य में नहीं। भले ही वह काम कितना ही उपयोगी क्यों न लगे। युग की आवश्यकता एक ही है लोकमानस का अनस्था संकट से उद्धार और हमारा लक्ष्य अर्जुन के मत्सयभेद की तरह इसी एक केन्द्र पर केन्द्रित रहना चाहिए।

प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण में इमारत, युग साहित्य तथा एक कार्यवाहक यह तीनों पक्ष समान महत्व के हैं। इस त्रिवेणी के अवगाहन से ही लोकमानस के पाप धुलेंगे और इसें संगम स्नान से कायाकल्प जैसा कथित पुण्य फल मिल सकेगा अस्तु इन दिनों प्रज्ञा परिवारों का गठन और उनका प्रारम्भिक प्रयास एक ही प्रयोजन पर केन्द्रीभूत होना चाहिए कि इस पावन पर्व पर सामाजिक स्थापना का प्रयोजन निश्चित रुप से पूरा कर लिया जाए। कमरे का प्रबन्ध ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके लिए कार्यवाहक की नियुक्ति एवं घर-घर पहुँचाने के लिए नये साहित्य की अनवरत व्यय-व्यवस्थ का प्रबन्ध भी करना पड़ेगा।

यह उत्तरदायित्व प्रज्ञा प्ररिजनों ऊपर ही है और वह उन्हें प्रारम्भ में अपने ही ज्ञान घटों और धर्मघटों से ही पूर्ण करना हैं। बाद मं अन्य लोग भी इस प्रयोजन में उदार सहयोग दे सकते है, पर मान कर यही चलना चाहिए कि महाप्रज्ञा को विश्वमाता कहलाने योग्य बनाना मूलतः उन्हीं का उत्तरदायित्व है, जिसकी पूर्ति उन्हें मात्र सदस्यता शुल्क चुकाने भर से नहीं वरन् दो कदम आगे बढ़कर अविस्मरणीय अनुदान प्रस्तुत करने की साहसिकता के सहारे करने की बात सोचनी चाहिए।

गायत्री परिवारों का गठन इन्हीं नवरात्रि में कर लिया जाना चाहिए तथा उनके सदस्य वही माने जाने चाहिए जो सदस्यता शुल्क चुकाने में ईमानदारी बरतें। चुनाव में अब दो कार्यवाहक और एक कोषाध्यक्ष का खर्च सम्हालने के निमित्त ब्रह्मभोज के लिए धर्मघटों की व्यवस्था करने वाला और दूसरा युग साहित्य का खर्च वहन करने वाला और दूसरा युग साहित्य का खर्च वहन करने वाला ज्ञान यज्ञ का उत्तरदायी। ब्रह्मभोज की कार्यवाहिका कोई महिला रहे और ज्ञानयज्ञ का कार्यवाहक कोई पुरुष, यह आवश्यक नहीं है, आवश्यकतानुसार दोनों ही मला या दोनों ही पुरुष भी हो सकते हैं पर प्रयत्न यही किया जाना चाहिए कि दोनों वर्गो को समान उत्तरदायित्व सम्हालने तथ समान श्रेय पाने का अवसरमिले। दोनों को अपनी इच्छानुसार प्रामाणिक सदस्यों एवं सदस्याओं में से अपनी कार्यसमिति, सहायक मंडली नियुक्ति कर लेने का अधिकार रहे। तीसरा कोषाध्यक्ष इन दोनों की सहायता करेगा किन्तु पैसे के विषय में प्राथमिकता बनाये रहने का उत्तरदायित्व विशेष रुप से वहन करेगा। प्रज्ञा परिवारों के अब नये शाखा संगठन इसी आधार पर बनेंगे। नवरात्रि में उभरे हुए उत्साह के आधार पर जिनने अपनी सदस्यता पुर्नजीवित की हो, उन्हें मिल जुल कर पूर्णाहुति के बाद दूसरे दिन विजयादशमी को मीटिंग बुलाकरयह कार्य भी विधिवत सम्पन्न कर लेना चाहिए।

शाखा संगठनों को अपना हासब किताब पूरी तरह सही रखना चाहिए। उनका गठन और वार्षिक निर्धारण आश्विन नवरात्रि के अवसर पर ही हुआ करेगा। जिसका विधिवत आरम्भ इन्हीं दिनों हो रहा है। इस समय उनका प्रमुख कार्य बीजारोपण वर्ष मं निर्धारित उन पाचँ क्रियाकलापों को करना है जिनमें प्रज्ञामंदिरों की त्रिविधि साधनों से संपन्न स्थापना प्रमुख है।


नवरात्रि की पूर्णाहुति इस प्रकार सम्पन्न हो

इस अवसर पर नव सृजन की गतिविधियाँ उभरें इस अवसर पर किये गये शुभारम्भों का भविष्य उज्जवल होगा।

जप, यज्ञ और ज्ञान यज्ञ का उपक्रम आठ दिन तक चलने के उपरान्त नौवें दिन नवरात्रि साधना की पूर्णाहुति होती है। पूर्णाहुति की विशेष परम्परा में दो बातें अनिवार्य रुप से सम्मिलित हैं-एस यज्ञ दूसरा ब्रह्मभोज। इनके न करने पर मात्र जप भर करने की प्रक्रिया को अनुष्ठान संज्ञा नहीं मिल सकती। अधूरे-उपक्रम का प्रतिफल भी अधूरा ही रहता है। अस्तु जहाँ भी अनुष्ठानों का व्यक्तिगत एवं सामूहित आयोजन होता हैं वहा इन दोनों की व्यवस्था किसी न किसी रुप में की ही जाती है, चाहे वह संक्षेप में छोटे स्तर की ही क्यों न हो।

प्रत्येक कर्म काण्ड के पीछे एक दूरदर्शिता पूर्ण उद्देश्य छिपा हुआ है उसे न समझने पर वह प्रक्रिया मात्र लकीन पीटने जैसी रह जाती है। होना यह चाहिए कि इन कृत्यों में सन्निहित मूल प्रेरणाओं को गम्भीरता पूर्वक समझाया और उस आलोक को अपनाया जाए तो उन्हीं क्रिया कृत्यों का माध्यम श्रेयार्थी साधकों की सफलता का आधारभूत कारण बन जाता है।

यज्ञ का प्रत्यक्ष अर्थ अग्नि होत्र है उसका मूल प्रयोजन हवा को शुद्ध करना नहीं वातावरण के परिशोधन का उपक्रम है। अपनी प्रिय वस्तुओं को वायु भूत बनाकर आकाश में बखेर देने और उससे प्राणिमात्र को पोषण पहुँचाने की भावना ही यज्ञ की मूल प्रवृत्ति है। सूयार्घ में भ्ी अपने लौटे का जल सूर्य के माध्यम से भाप बनकर उसका लाभ समस्त विश्व वसुध को देने की भावना है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति एवं सफलता के लिए पारमार्थिक साहस आवश्यक माने गये हैं।

ब्रह्मभोज के पीछे भी यही भावना है। प्राचीनकाल में धर्म-धारणा को जन जीवन में समाबिष्ट बनाये रहने वाले लोक सेवी ब्राह्मण कहलाते थे। जो सेवा साधना में अहर्निशि निरत है, उसे जीवन्त रखने के लिए शरीर यात्रा के साधन तो देने ही होंगे इस उत्तर दायित्व का निर्वाह ही ‘ब्रह्मभोज है। प्राचीन काल में ऐसे लोक सेवी ब्रह्म परायण सर्वत्र उपलब्ध थे। उनके चरण इन बहाने अपने घर में पड़ें। हाथ से खिलाने का कभी तो सौभाग्य मिले। इस भावना से ओत-प्रोत भावुक साधकों को ब्रह्मपरायणों को अपने घर बुलाने का भी आग्रह रहता था। जहाँ संभव होता वहीं किन्हीं का पहुँचना संभव होता था अन्यथा कोई महत्वपूर्ण कार्यो में व्यस्त व्यक्ति मात्र पक्वान मिठाई खाने के लिए किसी के घर जाने और उस विडम्बना में अपन दिन खराब करने के लिए तैया क्यों होगा? ब्रह्मभोज की प्राचीन परम्परा यह भी थी कि लोकसेवी निवास केन्द्र, धर्म संस्थान में आटा, दाल आदि खाद्य पदार्थो पहुँचा दिये जाते थे और आवश्यकतानुसार उनका उपयोग होता रहता था। जितने का भोजन उससे अधिक मूल्य का समय गँवाना दूरदर्शिता की कसौटी पर सही सिद्ध नहीं होता। अनाथ भिक्षुओं क बात दूसरी है। उनके समय का मूल्य नहीं होता फिर उन्हें ढूँढ़ना भी कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में उन्हें बुलाकर ही खिलाना पड़ता है।

साधना उपक्रमों में पुण्य परमार्थो को जोड़ रखने की बात उपयोगी भी है और आवश्यक भी है अन्यथा लोग साधन दान के लिए तैयार ही न होते। मात्र फालतू समय में थोड़ा सा पूजा पाठ करके निवृत हो जाते। चन्द्रायन व्रत की पूर्णाहुति पर गोदाम का विधान है। उसी प्रकार अन्यान्य सभी साधनात्मक उपक्रमों में वियोजित हुए श्रमदान समय दान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता बताई गई है इससे कृपणता को उदारता में विकसित करने के लिए दबाब पड़ता है। साथ ही लोक मंगल की सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण का सुयोग भी बनता है। इसलिए तत्वदर्शियों ने प्रत्येक धर्मानुष्ठान के साथ दान पुण्य क व्यवस्था रखी है और उसमें उदार साहसिकता अपनाने पर जोर दिया है।

आश्विन नवरात्रि के अवसर पर सामूहिक यज्ञों की व्यवस्था सर्वत्र होगी। शास्त्र मर्यादा के अनुसार दशाँस होम के लायक इन दिनों अश्रद्धा के वातावरण में उतनी अर्थ व्यवस्था नहीं जुट पाती। फिर प्रत्यक्षवाद की कुतर्के अग्नि होत्र की उपयोगिता पर भी संदेह करती है। ऐसी दशा में उस प्रक्रिया को संक्षिप्त करके ही काम चलाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मभोज की बात ऐसे ही असमंजस में रह जाती है। जिनके लिए सच्चे अर्थो में ब्राह्मण शब्द का उपयोग हो सके ऐसे ब्रह्म परायण लोकसेवी ढूँढ़े नहीं मिलते जो मिलते है वे न पक्वान खाकर अपना पेट खराब करते हैं और न उस झंझट में अपना बहुमूल्य समय गँवाने के लिए सहमत होते है। ऐसे ही नाम धारियों में भोजन कराने की कोई उपयोगिता नहीं समझी जाती। अतएव वह प्रसंग ऐसे ही छूट जाता है। संक्षिप्त अग्निहोत्र के साथ पूर्णाहुति सम्पन्न कर दी जाती है। ब्रह्मभोज की उमंग उठती है तो कहीं कन्या भोजन की चिन्ह पूजा बन जाती है। यह प्रतीक पूजन भी है तो आवश्यक किन्तु ये संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। अनुष्ठानकर्ताओं की उदारता को उस अवसर पर उभाग जाना चाहिए और उससे जो श्रद्धा सहयोग उभर कर अये उसे अत्यन्त दूरदर्शितापूर्ण दृष्टि से श्रेष्ठतम सत्प्रयोजन में लगाया जाना चाहिए।

इन दिनों प्रज्ञापीठों के निर्माण की प्रक्रिया समस्त प्रज्ञा परिवारों से चल रही है। इसके लिए व्यवस्था बनाने की बात उन सभी स्थानों पर सोची जानी चाहिए जहाँ सामूहिक अनुष्ठान सम्पन्न हों। इसके लिए सब लोग मिलजुलकर प्रयत्न करें और पन्द्रह-बीस हजार लागात की इमारत बनाने की योजना बनायें। पर वह जब तक बने उस प्रक्रिया को रोक रहने की आवश्यकता नहीं जिसके माध्यम से युग चेतना का उभार एक दिन आरम्भ किया जाना है।

तात्कालिक शुभारम्भ की दृष्टि से माँगे या किराये कमरे में प्रज्ञा मंदिर की स्थापना करली जाए। चौकी पर चित्र स्थापित करने से भी काम चल सकता है। मूल उद्देश्य है-जन-जन को युग साहित्य को पढ़ाने वापिस लेने और रुचि लेने वालों का जन्मदिन मनाने का कार्य इतना महत्वपूर्ण है कि उसे किये बिना प्रज्ञा संस्थान की सार्थकता ही नहीं बनती। यह कार्य प्रज्ञा मन्दिरों के माध्यम से भी आरम्भ किया जा सकता है। जहाँ भी ऐसी स्थिति हो वहाँ इस प्रकार चलपुस्तकालय की प्रक्रिया आरम्भ कर दी जाए। साथ ही इस नामाँकन में उनके जन्मदिन भी नोट किये जाएं और उन्हें नियत समझा दी जाए। इ प्रकार प्रज्ञा पीठ के प्राण प्रवाह का वह उपक्रम भी चल पड़ेगा जिसके लिए निजी इमारत बनाने की आवश्यकता समझी जा रही है, ध्यान रखने की बात है कि इमारत नहीं उद्देश्य मुख्य है। बिना इमारत के टैन्ट तान कर भी बड़े-बड़े काम सम्पन्न कर लिये जाते है। इसके विपरीत अनेकों अनुपयुक्त खण्डहर चमगादड़ अथवा चीलों के घासलों से भरे सुनसान पड़े रहते है।

प्रज्ञापीठ आवश्यक व्यवस्था जुटाने पर ही बनेगी पर प्रज्ञा मन्दिर का शुभारम्भ नवरात्रि आयोजन की पूर्णाहुति के दिन ही हो सकता है। आधे दिन का एक आदमी रखने के लिए आवश्यक खर्च महिलाओं द्वारा घरों में रखे धर्मघटोँ से जुटाया जाय और साहित्य खरीद की आवश्यकता पुरुषों द्वारा रखें गये ज्ञान घटों के सहारे चल पड़े। जन्मदिन मनाने की व्यवस्था मुहल्लों के हिसाब से टोली नायम नियुक्त करके उसी समय बना दी जाए। कार्यपद्धति सरल है। जन्मदिवसोत्सव मनाने पूजन भवन आतिथ्य आदि का खर्च पाँच रुपय से अधिक न बढ़ने दने का निर्धारिण किया गया है। उसके कारण ऐसा सुयोग कोई भी छोड़ना न चाहेगा जिससे उसके घर में ऐसा प्रेरणाप्रद उत्सव हो और आनन्द उल्लास भरा वातावरण बने।

पुरानी पत्रिकाएँ तथा युग साहित्य की पुस्तकें संग्रह करके उन पर बाँसी कागज चिपकाया जाए और उतने भर से चलपुस्तकालयों का कार्य आरम्भ कर दिया जाए, पैसा हो ता नया भी मँगाते रहा जाए। शुभारम्भ के समय तो कुछ अधिक साहित्य की आवश्यकता पड़ेगी। इसलिए ब्रह्मभोज के निमित्त अनुष्ठान कर्ताओं तथा अन्य लोगों से जो एकत्रित हो सके उससे पुस्तकालय की स्थापना के लिए नया साहित्य ही मंगा लिया जाय। ब्रह्मभोज की यही प्रक्रिया आज की स्थिति में सर्वोत्तम है।

नैष्ठिक उपासको के अतिरिक्त जो अन्य लोग इस अवसर पर ज्ञान-यज्ञ में उपस्थित रहें उनसे संपर्क साधने का उपक्रम जारी रखा जाए और उन्हें नियमित पासक बनाने का प्रबन्ध किया जाए। यह कार्य भी बीजारोपण वर्ष के पंचसूत्री कार्यक्रम में सम्मिलित है। युग संधि पुरश्चरण के नैष्ठिक उपासकों को सामान्य साधक बढ़ाने का उत्तरदायितव सौंपा गया है इसकी पृष्ठभूमि नवरात्रि के ज्ञान यज्ञ से बनाते रहा जाए तो पूर्णाहुति के दिन ऐसे कितने ही नये व्यक्ति निकल सकते हैं जो पाँच मिनट की नियमित साधना करने लगें और साथ ही अपने परिवारों में धार्मिक वातावरण बनाने के लिए प्रयास आरंभ करें, जो परिवार निर्माण अभियान के अर्न्तगत बताया जाता रहा है। इस प्राकर वे वरिष्ठ स्तर के न होते हुए भी अपनी व्यक्तिगत उपासना का शुभारम्भ कर सकेंगे और निजी परिवार में सृजनात्मक वृत्तियों का सूत्र संचालन करते हुए वही प्रक्रिया आरम्भ कर सकेंगे जो बड़े रुप शाखा संगठन एवं प्रज्ञापीठों के माध्यम से किया जाना है।

आश्विन नवरात्रि से पूर्व उसकी तैयारी में निरत रहा जाए। आयोजन को आकर्षक एवं सफल बनाने में कोई कमी न रहने दी जाए। अधिक लोगों को सम्मिलित करने के लिए घरों पर जाने और अनुरोध करने में आलस्य न किया जाए। प्रातः की जप ध्यान और रात्रि की ज्ञान यज्ञ भावश्रद्धा की जगाने में सफल रहे इसकी सूझ-बूझ और भाग दौड़ भरी तैयारी समय से पूर्व सम्पन्न करली जाए। आयोजन चल पडत्रे तो सूच संचलाकों के मस्तिष्क में यही बात घुमड़ती रहीं कि उपस्थिति लोगों में से किसे नव सृजन की किस प्रवृत्ति का समथक सहयोगी बनाया जा सकता है। पंचसूत्री कार्य पद्धति में से कई को अपना सकने वाले व्यक्ति उसमें सम्मिलित अवश्य रहेंगे। इन पर दृष्टि रखी जाए औ परामर्श सुझाव के रुप में कुछ छोटे बड़े कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहे तो इसी अवसर पर कितने ही लोगों को कितने ही रचनात्मक प्रयत्नों में भाग लेने के लिए सहमत एवं तत्पर बनाया जा सकता है।

प्रज्ञापीठों स्थापना के संबंध में यदि दृढ़ निश्चय हो तो उसके लिए आर्थिक सहयोग का अभाव कहीं भी पड़ने वाला नहीं हे। सात हजार वाला छोटा-सा धर्म संस्थान तो इन उपस्थित लोगों में से ही कोई एक बनाकर दे सकता है। मिल-जुलकर सम्मिलित प्रयत्न करने पर तो एक अच्छी स्थापना हो जाने और आश्विन नवरात्रि की स्मृति उपलब्धि स्थायी बनने में किसी प्रकार के संदेह की गुजायंश नहीं है। इतने पर प्रज्ञा मन्दिर की स्थापना और चल पुस्तकालय का व्यवस्थाक्रम तो पूर्णाहुति के दिन ही बना लिया जाए और उस छोटे स्वरुप को तब तक चलने लिया जाए जब तक कि बड़े निर्माण को ठीक तरह चल पड़ने का समय नहीं आता।

नैष्ठिक साधकों की एक शर्त मासिक यज्ञ रखा भी हैं। प्रयत्न यह होना चाहिये कि उसकी व्यवस्था प्रायः इस पूर्णाहुति स्तर की ही बनती रहे। प्रातः जप हवन और रात्रि को ज्ञान यज्ञ का मासिक कार्यक्रम कहाँ, किस प्रकार सम्पन्न हुआ करेगा इसका निश्चय ही इसी अवसर पर कर लिया जाना चाहिए। एक छोटी नवरात्रि पूर्णाहुति हर महीने होती रहे तो वह उत्साह जो इस अवसर पर उत्पन्न हुआ है, ठंडा न होने पायेगा। पूर्णिमा पहली तारीख या महीने का अन्तिम अवकाश दिन इन्हीं तीन में से मासिक यज्ञ का निर्धारण परिजनों की सुविधा को देखते, इसी अवसर पर कर लिया जाना चाहिए।

इस वर्ष शान्ति कुन्ज के सत्र, शिविरों में प्रायः सभी प्रज्ञा परिजनों को बुलाया गया है। कई प्रयोजनों के लिए कई सत्र सम्पन्न हो रहे हैं। जिनकी चर्चा पिछले अंक में हो चुकी है। यह सभी विभिन्न वर्गो के लिए उपयोगी है। मलाओं को परिवार निर्माण अभियान का उत्तरदायित्व अपने घरों तथा क्षेत्र में सम्भालना है। कन्या को गृहलक्ष्मी बनना हे अधिक समय न सही तो महीनेभर शान्ति कुन्ज रहकर भी वे बहुत कुछ प्राप्त कर सकती है। दो महीने के संगीत, कथा, यज्ञादि, कर्मकाण्ड एवं सेवा संदर्भ्र के सत्रों में धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की सभी आवश्यक योग्यताएं काम चलाऊँ मात्रा में उपलब्ध हो सकती है। इन सत्रों में जिन्हें इस वर्ष सम्मिलित होना हो वे भी इन्हीं दिनों अपना स्थान जब आना हो तबके लिए सुरक्षित करा सकते है।

युग संधि की प्रथम नवरात्रि में उदात्त दृष्टिकोण लेकर सम्मिलित हुए प्रत्येक साधककों इन दिनों निर्धारित साधनाक्रम पूरा करने के साथ-साथ एकान्त में शान्त चित्त से अन्तमुर्खी होने का अवसर भी ढूँढ़ना चाहिए और यह भी सोचना चाहिए कि वर्तमान जीवनचर्या में आदर्शवादित्ता का कितना समन्वय किस प्रकार हो सकता है ? सोचने में ईमानदारी और तथ्यान्वेषी दृष्टि का समोवश हो सके तो हर किसी को अपने वर्तमान ढर्रे में यह गुजायंश दिखाई पड़ेगी कि वह प्रस्तुत समय और साधनों में से अपव्यय अंश काटने और उसे पुण्य प्रयाजनों में लगा सकने की इतनी गुजायंश निकाल सकता है जिसे संतोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके। अब तक जो बन नहीं पड़ा हैं उसका कारण कोई भौतिक अवरोध नहीं वरन् चिंतन में कृपणता का समावेश भर रहा है। यदि उस अभ्यस्त ढर्रे में थोड़ा सा परिवर्तन किया जा सके तो सहज ही उस दिशा में कुद कदम उठने लगेंगे जिससे युग-धर्म का निर्वाह होने लगे। नवरात्रि साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।

आत्म परिष्कार का एक ही उपाय है-तृष्णाओं का नियमन। समस्त दोष दुर्गुणों की जन्मदात्री लिप्सा ही है। संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बन्धन को शिथिल करते ही जीवन मुक्ति की दिशा में प्रगति क्रम तेजी से चल पड़ता है। दुष्कर्मो और दुर्व्यसनों में क्षमताओं का विनाश करने वाला एक ही असुर है-वितृष्णा का व्यामोह। उस मानसिक असंयम पर अंकुश लगते ही मनुष्य के असंख्यों दोष दुर्गुण सहज ही समाप्त होते चले जाते हैं। सत्प्रवृत्ति संवर्धन की सेवा साधना का व्रत लेते ही इसी जीवन में देवत्व का सहज प्रकटीकरण होने लगता है। अलग-अलग सद्गुणों के लिए अलग-अलग उपाय अपनाने की आवश्यकता नही। सत्प्रवृत्ति संवर्धन की सेवा साधना अपने आप में परिपूर्ण योग साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।

मनुष्य के पास दो ही विभूतियाँ हैं-एक समय, श्रम। दूसरा-प्रभाव वैभव। इन दिनों सम्पदाओं का अनुदान हर किसी का न्यूनाधिक मात्रा में मिला है। उसमें से अंशदान करने की बात सोची जानी चाहिए। निर्वाह के लए बीस घण्टे लगायें तो चार घण्टे परमार्थ के लिये निकल सकते हैं, इतना न सही तो कुछ तो बन ही पड़ेगा। महीने में एक दिन के उपार्जन को नव सृजन के लिए नियोजित कर सकना किसी भी उदार चेता के लिए भारी नहीं पड़ेगा और न घाटे का सौदा सिद्ध होगा।

प्रस्तुत नवरात्रि पर्व को अनेक सत्प्रवृत्तियों के शुभारम्भ का शुभ मुहूर्त मानकर चला जाए और अगली छमाही तक के लिए एक सुनिश्चित कार्य पद्धति बनाई जाए जिसे पूरा कर सकना प्रज्ञापुत्रों को अपने पुरुषार्थ के अर्न्तगत प्रतीत होता है। व्रतशीलों को सफलता प्रदान करने में देवी अनुग्रह एवं वरदान सदा-सदा ही प्राप्त होता रहा है। इस अवसर पर अग्रगामी कदम बढ़ाने वालों को भी वह सहज ही उपलब्ध होगा।


न्यूनतम कार्यक्रम जो सभी प्रज्ञा परिजनों को पूरे करने हैं

नवरात्रि के पावन पर्व पर जब सर्वत्र नव सृजन की उमंगे उभर रही हैं ओर प्रज्ञापुत्र महाकाल के निमन्त्रण पर भावभरे कदम उठाने के लिए मचल रहे हैं, तब उस समुदाय को भी सर्वथा निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए जो परिस्थितिवश अधिक कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं है। ऐसे परिजनों को भी ऐसे हलके कदम उठाने चाहिए जो नितान्त व्यस्त एवं परिस्थितिवश लोकमंगल के लिए कुछ प्रत्यक्ष अनुदान प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। यहाँ तक कि अपनी निजी साधना उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रुप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।

(1) न्यूनतम उपासना-

उपासना में जिनकी रुचि नहीं हैं वे सबेरे सोकर जागने और रात्रि को बिस्तर पकड़ने के बाद पाँच मिनट को महाप्रज्ञा का प्रकाशपुँज के रुप में ध्यान कर लिया करें। प्रज्ञा का अधिष्ठाता सविर्ता को माना गया है। सविता अर्थात् प्रकाशपंज सूर्य। प्रभात काल का उदीयमान सूर्य अपनी प्रभातकालीन उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे। प्रकाशपुँज के ध्यान में तेजस् का साथ सर्म्पक जुड़ता है और उससे प्रकाश की दिशा में प्रगति देने वाला साहस भी जगता है।

उस दृश्य ध्यान के साथ-साथ इतना भर जोड़ना चाहिए कि जीवन के रुप में प्रभातकालीन अरुणोदय जैसा अनुदान किसी विशेष प्रयोजन के लिए मिला। रात्रि को सोते समय अस्तकाल की तरह नियति ने उसे वापस ले लिया। प्रकाराँतर से प्रभात संध्या को जन्म और अस्त संख्या को मरण कहा जा सकता है। इन दोनों तथ्यों को आमतौर से विस्मृति के गर्त में ही पड़ा रहने दिया जाता है। यह सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन के सौभाग्य और उसके साथ जुड़ी जिम्मेदारी तथा संभावना पर विचार करने का तनिक-सा भी अवसर मिलेगा और रात्रि में बिजली कौंधने की तरह सघन अंधकार में भी कुछ देखने और कुछ सोचने का ऐसा अवसर मिलेगा जिसे उज्जवल भविष्य की संभावनाओं के साथ पूरी तरह जोड़ा जा सके। इसी प्रकार सोते समय अस्त सूर्य से तार्त्पय जीवन समापन मरण से जोड़ा जा सके और यह सोचा जा सके कि उस सुनिश्चित संभावना को पश्चाताप भरी न होने देने के लिए अभी से क्या किया जा सकता है ? तो समझना चाहिए कि प्रस्तुत ढर्रे पर नये सिरे से विचार करने का अवसर मिला। अस्तु इस न्यूनतम उपासना उठते समय अरुणोदय और सोते समय सूर्यास्त का ध्यान करने की प्रक्रिया का शुभारम्भा इन्हीं दिनों कर देना चाहिए।

(2) पाक्षिक युग निर्माण की अनिवार्य सदस्यता-

प्रगति पथ पर दूसरा कदम पाक्षिक युग निर्माण योजना मंगाने का उठाना चाहिए। मिशन के बौद्धिक प्रतिपाद “अखण्ड ज्योति” में छपते हैं। उनके क्रियान्ययन का मार्गदर्शन इस पाक्षिक में छपा करेगा। इस प्रकार ज्ञान और कर्म का समन्वय एक बड़े अभाव की पूर्ति करेगा। अस्तु, पाक्षिक का चंदा आठ रुपया अतिरिक्त रुप में भेजने की गुँजायश इन्हीं दिनों निकालनी चाहिए।

परिजनों में से अधिकाँश को पता है कि मिश्न की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने के लिए लम्बे समय से साप्ताहिक युग निर्माण योजना का प्रकाशन चल रहा हैं। उसका वार्षिक चंदा 16 रुपये हैं। उसकी उपयोगिता असंदिग्ध होते हुए भी आर्थिक कठिनाई अनुभव करते हुए अधिकाँश प्रज्ञापरिजन उसे पढ़ नहीं पाते थे और प्रतिपादन के साथ-साथ मार्गदर्शन की उपलब्धि से वंचित ही रह जाते थे। अब उसका चन्दा आधा घटा दिया गया है। इसके लिए उसे साप्ताहिक से पाक्षिक करना पड़ा है और आठ रुपए का संतुलन बिठाना पड़ा है। अब एक स्थान पर यह दोनों पत्रिकाएँ मँगायी जायें और अंखड ज्योति का चन्दा 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये होगा ऐसा समझा जाय। याँ हिसाब की दृष्टि से दोनों अलग-अलग ही रहेगी और अखण्ड ज्योति का चंदा “अखण्डज्योति” के पुराने पते पर, युग निर्माण योजना का चन्दा “गायत्री तपोभूमि संस्थान” के पते पर अलग-अलग भेजना पडेगा। तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है। साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रुपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे। परिजनों के आर्थिक दबाब को ध्यान में रखकर मासिक नयी प्रकाशित होने वाली पत्रिका “युग निर्माण योजना” को भी बन्द किया जा रहा है। उसकी आवश्यकता को भी पाक्षिक द्वारा पूरा किया जायेगा।

दोनों पत्रिकाओं को प्राणप्रिय समझें, उनसे अन्यों को लाभान्त्रित करने का नया प्रयास आरम्भ करं। इसके लिए सर्वप्रथम अपने निजी घर परिवार के सदस्यों से श्रीगणेश किया जाय। उनमें से जो शिक्षित है उन्हं पढ़ने के लिए आग्रहपूर्वक उत्साहित किया जाय और जो बिना पढ़े हैं उन्हें पढ़ों द्वारा सुनाये जाने का प्रबन्ध किया जाय।

एक तरीका यह भी हो सकता है कि घर में रात्रि के समय घण्टे का स्वाध्याय एवं सत्संग मिरित कार्यक्रम चलें। शिक्षितों में से कोई एक लेख नित्य पढ़े और अन्य सब लोग उसे सुनें। इस प्रकार पूरे एक महीने के लिए ओध घण्टा नितय सुनाये जाने योग्य सामग्री मिलती रहेगी। यह प्रक्रिया रुचिकर बने तो उसे कथा प्रसंगो के साथ जोड़कर एक घण्टे का बनाया जा सकता है। समय बढ़ने के अनुसार उसका प्रीव और सतपरिणाम बढ़ना भी निश्चित है। परिवार निर्माण की दृष्टि से यह छोटा कदम भी आगे चलकर इतने सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकता हैं जिसकी आज तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

(3) जनसर्म्पक के लिए समयदान

जनसर्म्पक के लिए समयदान का अनुरोध इन दिनों प्रज्ञा परिजनों से विशेष रुप से किया जा रहा हैं। जिनकी परिस्थिति इसके लिए अनुकूल नहीं है जो बाहर जाने की परिस्थिति में नहीं हे वे यह नया तरीका अपनायें कि अपने सर्म्पक में घर या दुकान पर आने वालों से अन्य बातों के साथ-साथ कहीं न कही युग निर्माण मिशन और उसकी लाभदायक गतिविधियों की चर्चा का समावेश किसी न किसी प्रकार कर ही दिया करें। इस प्रकार जन सर्म्पक के लिए न निकल सकने पर भी प्रकारान्तर से उसकी पूर्ति होती रहेगी। स्वयं न जा सकें तो आने वालों से चर्चा करते रहने का सिलसिला तो बिना किसी कठिनाई के चलता ही रह सकता है। युगनिर्माण सदस्यों को एक घंटा समय झोला पुस्तकालय चलाने के लिए जन सर्म्पक में देते हने के लिए कहा जाता रहा है। जिनकी परिस्थितियाँ वैसा करने की नहीं है। वे उसी कार्य को दूसरी तरह करते रह सकते हैं। हैण्डबैग में कुछ पत्रिकाएँ हर समय साथ रखी जाएँ और उपयुक्त आगन्तुकों को उन्हें देने वापिस लेने का श्री गणेश किया जाय। यह घर बैंठे झोला पुस्तकालय चलाने का न्यूनाधिक मात्रा में जनसर्म्पक के लि निकलने जैसा ही हो सकता है।

(4) नैष्ठिक साधकों के लिए अनुदान सत्र

युग सन्धि महापुरश्चरण की नैष्ठिक साधना में संलग्न साधकों के लिए इन दिनों हिमालय के धुवकेंद्र में विशिष्ठ अनुदान उपहार उतर रहे हैं। वे उस लाभ को अनायास ही उपलब्ध कर रहे हैं जिन्हं प्रातः और साँयकला ग्रहण करने का स्वर्णित सुअवसर निष्ठावानों को मिल रहा हैं। नवसृजन अभियान का जन समाज को मिल रहा है। नवसृजन अभियान का जन समाज को, भावपीढ़ी को जो लाभ मिलेगा उससे कहीं अधिक लाभान्वित प्रज्ञापुत्रों का वह समुदाय होगा, जिसमे नैष्ठिक भागीदार प्रमुख है।

इस समुदाय के लिए कुछ विशेष परामर्श एवं अनुदान देने के लिए पाँच-पाँच दिन के सत्र लगाने का उच्चस्तरीय संदेश इन्हीं दिनों उतरा है। तदनुसार उसकी व्यवस्था बना दी गई है। उद्घाटन प्रवास को कुछ दिन और आगे खिसका दिया गया है। वह गर्मी के दिनों में भी चलता रहेगा। शीतऋतु में कुछ समय मिशन के सूत्र संचालक को उद्घाटन समारोहों में बाहर जाना है। इन दिनों को छोड़कर शेष दिनों में पाँच-पाँच दिन के 15 सत्र निर्धारित किये गये है। शीतऋतु में महापुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों के लिए जो परामर्श अनुदान सत्र आयोजित किये गये हैं, वे इस प्रकार हैं (1) 20 से 24 नवम्बर (2) 26 से 30 नवम्बर (3) 1 से 5 दिसम्बर (4) 7 से 11 दिसम्बर (5) 17 दिसम्बर (6) 16 से 23 दिसम्बर (7) 1 जनवरी से 5 जनवरी 91 (9) 7 से 11 जनवरी (6) 13 से 5 जनवरी (10) 16 से 23 जनवरी (11) 1 से 5 फरवरी (12) 7 से 11 फरवरी (13) 13 से 17 19 से 23 फरवरी (15) 25 फरवरी से 1 मार्च।

इन सत्रों में पड़ोसियों, पर्यटकों, स्त्री बच्चों एवं कठष्ठ पीड़ितों, मनोकामना पूर्ण करने वालों को लेकर चलने का निषेध है। पर्यटन अथवा स्वार्थ विशेष के लिए चल पड़ने वाली भीड़ को साथ लाने से शिविरार्थियों का ध्यान बँटा रहेगा और व पूरे मन से बात सुनने समझने की अपेक्षा जहाँ तहाँ भटकते फिरेंगे। अस्तु मात्र नैष्ठिक साधकों को ही इन सत्रों में बुलाया गया है। जिन्हें आना हो वे नवरात्रि के समय ही यह निश्चित कर लें कि किसको कब आना है। दीपावली तक यह स्थान सुरक्षित करने की व्यव्स्था पूर्ण करनी चाहिए। बाद में आवेदन भेजने वालों को अगली शीतऋतु के लिए ठहरना पड़ेगा क्योंकि गर्मियों में उद्घाटन प्रवासों पर जाने के कारण नैष्ठिक श्विर सम्पन्न नहीं हो सकेंगे।

(5) नियमित अशंदान

पाँचवा कदम यह है कि अगले दिनों नव-जागरण के संदेशवाहक परिव्राजकों का एक बड़ा समुदाय कार्य क्षेत्र मं उतरेगा। उनका प्रशिक्षण चलेगा। कार्यक्षेत्र में भेजने का मार्ग-व्यय तथा शरीर निर्वाह के खर्च का भी प्रबन्ध करना पड़ेगा। इसकी पूर्ति के लिए उनका भी योगदान रहना चाहिए, जो प्रज्ञा-पुत्रों की अग्रिम श्रेणी में नहीं है और निजी व्यवस्था के सीमित क्षेत्र में ही कुद पढ़ते और कुछ सोचते रहते हैं। इसके लिए लम्बे समय से युग निर्माण परिवार के परिजन अपने घरों में ज्ञान घट निर्माण परिवार के परिजन अपने घरों में ज्ञान घट स्थापित कर दस पैसा नित्य निकालते रहे हैं। महिलाओं को यह स्थापना धर्मघट के रुप में करनी चाहिए।

इस स्तर के परिजनों से अपेक्ष की गई है कि वे ब्रह्मभोज की इस पुनीत प्रक्रिया में अपने योगदान का हाथ बटायें। भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो। परिव्राजकों का औसत निर्वाह व्यय 150 मासिक (अर्थात् 5) प्रतिदिन आता है। इसमें उनका दोनो समय का भोजन, एक समय का जलपान, वस्त्र, विस्तर एवं तेल, साबुन हजामत आदि का सभी खर्च शामिल है। ब्रह्मभोज में पंडित को एक समय पक्वान्न मिष्ठान्न खिलाने पर इससे कम नहीं वरन् अधिक ही व्यय पड़ जाता हैं, फिर परिव्राजक को पूरे दिन का अन्न-वस्त्र आदि का निर्वाह औसत भारतीय स्तर को रखने पर किसी भी प्रकार कम में नहीं होता।

जितने अपने यहाँ ज्ञानघट नहीं रखे है और जो मिशन के लिए कोई नियमित अनुदान नहीं देते वे वर्ष के लिए कोइ्र नियमित अनुदान नहीं देते, वे वर्ष में कम से कम एक दिन का परिव्राजक का व्ययभार उठाने और साल में पाँच रुपये जैसी राशि निकालने का प्रयत्न करें। यह सच्चे कुम्हार से ढक्कन वाले मिट्टी के छोटे बड़े बनवा लें और उन्हें पीले रंग से रंग लें। इन धर्मघटों को नवरात्रि पूर्णाहुति के समय समारोह पूर्वक महिलाओं को वितरित किया जाएं तथा उनरसे नियमित का मुट्ठी अन्न प्रतिदिन ब्रह्मभोज के लिए निकालने का अनुरोध किया जाय।

(6) चरण वन्दन और चरण स्थापना

महाप्रज्ञा का आलोक जन-जन तक फैलाने के लिए गाँव-गाँव में प्रज्ञा संस्थान स्थापित किये जाने चाहिए। जहाँ बड़ी स्थापनाएँ सम्भव नहीं है उनके लिए छोटे, कम लागत वाले प्रज्ञा संस्थानों की रुपरेखा भी बनाई गई है। इस सम्बन्ध में “गायत्री प्रज्ञापीठ, स्वरुप और कार्यक्रम” पुस्तिका में सविस्तार विवरण दिया गया है।

इतना भी सम्भव न हो सके तो अपने घरों में ही गायत्री माता के चरण की परम्परा आरम्भ करनी चाहिए। घर के सभी सदस्य अपने से बड़ों की प्रणाम् करने का सिलसिला आरम्भ करें। श्रद्धा सर्म्बधन के लिए यह अति उपयोगी कार्यक्रम है।

(7) सदवाक्य लेखन अभियन

इन्ही दिनों प्रत्येक शाखा को अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता का वातवरण निर्मित करने के लिए प्रारम्भिक और छोटा-सा कदम सद्वाक्य लेख अभियान के रुप में अपनाना चाहिए। इस तरह के सद्वाकय युग निर्माण योजना के प्रकाशनों में कई स्थानों पर दिये गये हैं कुछ सद्वाक्य यहाँ भी दिये जा रहे है। इनका भी उपयोग किया जा सकता है।

1. जो बच्चो को सिखाते है, उन पर बड़ खुद अमल करें तो यह संसार र्स्वग बन जाय।

2. दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।

3. असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं हुआ।

4. पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट भी लेकर आता है।

5. उन्हें मत सराहो जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई ओर सम्पत्ति कमाई।

6. धन से ज्ञान बड़ा है क्योंकि धन हम रखते हैं और ज्ञान हमारी रखवाली करता है।

7. बुद्धिमान मूर्खो से इतनी शिक्षा प्राप्त करते हैं जितनी मूर्ख बुद्धिमानों से नही।

8. गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमं संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।

9. सभ्यता का स्वरुप है सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता है।

1å. परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परयणों के लिए सुरक्षित है।

11. शान्ति से क्रोध को, भलाई से बुराई को, शौर्य से दुष्टता को और सत्य से असत्य को जीतें।

12. ईर्ष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है जैसे कपड़े की कीड़ा।

13. शालीनता बिना मोल मिलती है, पर उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।

14. पढ़ने योग्य लिखा जाय, इससे लाख गुना बेहतर यह है कि लिखने योग्य किया जाय।

15. ईश्वर ने आँख, कान दो-दो और जीभ एक दी है ताकि हम सुनें अधिक और बोले कम।

16. सबसे बड़ा दीन दुर्बला वह है जिसका अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं है।

17. अपनी रोटी मिल बाँटकर खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सकें।

18. दूसरों के साथ वैसी उदारत बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है।

19. ईमानदार होने का अर्थ है हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।

20. जो अपनी सहायता आपन करने को तत्पर हैं ईश्व केवल उन्हीं की सहायता करता है।

21. बुद्धिमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हें मूर्ख हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में है।

22. जीवन का अर्थ है-समय। जो जीवन से प्यार करते है व आलस्य में समय न गँवायें।

23. अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो यदि इसमें सफल हो गये तो हर काम में सफलता मिलेगी।

24. जिसने जीवन में स्नेह सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वही सबसे बड़ा कलाकार है।

25.़ कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं क्योंकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता।

26. आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं।

27. कायर मृत्यु से पूर्व अनेकों बार मर चुकता है जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है।

28. जिन्हें लम्बी जिन्दगी जीनी हो वे बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी खाने की आदत न डालें।

26. शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संयम बरतने वाले ही शक्तिशाली बन सकते है।

30. जो जैसा सोचता है और करता है-वह वैसा ही बन जाता है।

31. मनुष्य परिस्थितियाँ का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियन्त्रणकर्त्ता और स्वामी है।

युग सन्धि के बीजारोपण वर्ष की प्रथम नवरात्रि में समस्त प्रज्ञा परिजन नव सृजन के निमित्त नये उत्साह के साथ नये अनुदान प्रस्तुत करने की उमंगों से भरते जा रहे है। इन दिनों उनमें से कितनों के ही उदार साहस ऐसे होंगे, जिन्हें अविस्मरणीय एवं अनुकरणीय माना जाता रहे।


जिन्दगी एक पड़ाव नहीं

(लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’)


जिन्दगी एक पड़ाव नहीं (kavita)

जिन्दगी तो है लम्बा सफर, जिन्दगी एक पड़ाव नहीं।

प्राण की श्वास-श्वास गतिवान, पवन का रुकता नहीं बहाव। नदी का टहरा नहीं प्रवाह, नीर का वहना सहज स्वभाव॥

यहाँ पर चरण-चरण गतिवान, यहाँ कोई ठहराव नहीं। जिन्दगी तो है लम्बा सफर, जिन्दगी एक पड़ाव नहीं॥

सृष्ठि-सरिता, पथरीली धार, धार का तीखा तेज प्रहार। इसे तरना आसान नहीं-धार, विरले कर पाते पार॥

खड़े तट गिनते, लहर-उभार-तारती उनको नाव नहीं। जिन्दगी तो है लम्बा सफर, जिन्दगी एक पड़ाव नही॥

नीर में ही मछली का वास, जाल में फँसी हुई हर मीन। देखते-चलते हम चल-चित्र, राह का चित्र-चित्र ग्गीन॥

दृष्टि के लिए अनेकों दृश्य, दृश्य है अपना गाँव नहीं। जिन्दगी तो है लम्बा सफर, जिन्दगी एक पड़ाव नहीं॥

जन्म कब उसका पहला प्रात, मृत्यु कब उसकी अन्तिम रात। जिन्दगी, जन्म-मरण के पार-जागती रहती है दिन-रात॥

सफर है धूप-छाँव के साथ, डगर से मगर लगाव नहीं। जिन्दगी तो है लम्बा सुर, जिन्दगी एक पड़ाव नहीं॥

राह की बेचैनी में राम, राम की बेचैनी अराम। बने रस घूँट लक्ष्य का चाव, नहीं नीरस चलना अविराम॥

भाव के साथ-साथ भगवान, भाव का कभी अभाव नहीं। जिन्दगी तो है लम्बा सफर, जिन्दगी एक पड़ाव नहीं॥

*समाप्त*