परिष्कृत जीवन प्रत्यक्ष कल्प वूक्ष

परिष्कृत जीवन प्रत्यक्ष कल्प वूक्ष है। इस उपहार को मनुष्य के हवाले करने के उपरान्त सृष्ठा ने उस पर यह उत्तरदायित्व भी छोड़ा है कि वह उसकी गरिमा को समझें और बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहे।

साधना से सिद्धी का सिद्धान्त सर्वविदित है। पर साधना किसकी ? सह समझने में प्रायः भूल होती रहती है। जिस देवता की आराधना से अभीष्ट की उपलब्धि होती है वह जीवन के अतिरिक्त दूसरा और कोई नहीं हो सकता।

उपसाय निर्धारण में दृष्टि भेद हो सकता है, पर उपासना के तत्व ज्ञान को समझा जाय तो उसमें सार तत्व इतना ही है। आत्म परिष्कार का हर सम्भव उपाय अपनाया जाय। इस पुरुषार्थ में जो जितनी प्रगति करता है उस पर उपसाय का अनुग्रह उसी अनुपात से बरसता है। उपसाय का बाह्य कलेवर कुछ भी क्यों न हो उसकी आत्मा साधक की आत्मा में ही घुली रहती है।

साधना किस की ? उत्तर एक ही है-आत्म सत्त की। अपने को परिष्कृत करने पर ही कोई पदार्थों और परिस्थितियों का लाभ उठा सकता है। कुशल माली ही उद्यान को सुरभ्य बनाता और यशस्वी होता है। जीवन-परिष्कार के लिए की गई साधना उन समस्त सफलताओं समेत उपस्थित होती है, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के आकर्षक एवं अलंकारिक नामों से जाना जाता है ।

इस तथ्य को समझा ही जाना चाहिए कि सुसंस्कृत जीवन का ही दूसरा नाम कल्पवृक्ष है जिसने उसे प्राप्त कर लिया उसके लिए किसी भी अभीष्ट को प्राप्त कर सकना कठिन नहीं रहता ।


सफलता के लिए समग्र पुरुषार्थ

सफलता चाहे वह आध्यात्मिक क्षेत्र में हो अथवा साँसारिक क्षेत्र में, प्रचण्ड पुरुषार्थ के आधार पर ही अर्जित की जा सकती है। बडी उपलब्धियों के लिए उनके अनुरुप ही श्रम करना एवं मनोयोग जुटाना पड़ता है। जो भी व्यक्ति साहस पुरुषार्थ के क्षेत्र में अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर देता है, उसके लिए इस सम्पदा को प्राप्ति का राजपथ खुल जाता है। अपने असाधारण शौर्य प्रदर्शन में युद्ध के नायकों को वीरता पदक दिये जाते हैं। ‘ परम विशिष्ट’ सेवा मेडल एक ऐया

मेडल है जो अभी तक गिने-चुने 10 व्यक्तियों को ही मिला है। यह इस कार्य से जुडे जोखिम, असाधारण शौर्य एवं उस व्यक्ति की सम्पादन करने की महानता का परिचायक है।

प्रकृति का भाण्डागार भी ऐसे ही अनेकानेक विलक्षण सम्पदाओं से भरा पडा है। धरती को अन्तर्स्थल हो अथवा समुद्र की तली, जिस किसी भी व्यक्ति ने खतरा उठा कर कुछ खोज निकालने का बीड़ा उठाया, वह उसे अपने मनोबल के आधार पर पा गया। उपलब्धि चाहे भौतिक रही हो, माध्यम हमेशा यही आध्यात्मिक गुण रहा है- मुसीबतो से, खतरों से लड़ने की जीवट । प्रकृतिगत सम्पदा को प्राप्त करने के लिए कितने ही सरजाम जुटाने पड़ते हैं। प्रकृति यह चाहती भी है कि पुरुषार्थ द्वारा ही कमाया जाय। मूल्यवान सम्पदाँएं श्रम से जी चुराने वालों को न प्राप्त हो जायें, इसलिए प्रकृति ने यह व्यवस्था बनायी है।

दक्षिण अमेरिका के ब्राजील देश की अमेजान घाटी खनिज सम्पदाओं के लिए विश्व-विख्यात है। इसी नदी के तटवर्ती क्षेत्र में आक्साइड का विशाल भण्डार बिखरा पडा है। यहाँ के शहर कटाजस 125 मील भतर घने जंगलों में एक ऐसे भण्डार का पता लगा है जिसमें अनुमानतः दस हजार टन सोना छिपा

पड़ा है। पर यह अनमोल उपहार आसानी से उपलब्ध हो जाये, ऐसी बात नहीं। कुछ ऐसे प्रकृतिगत अवरोधक इसके साथ जुडे हैं जो मनुष्य की मौत का कारण बन सकते हैं। बिना दूर-दर्शिता, साहसिकता एवं उपयुक्त साधनों के जिन-जिन ने भी अब तक प्रयास किये हैं, उनमें से अधिकाँश मृत्यु के मुख में चले गये।

यहाँ एक विशिष्ट प्रकार की तितली पायी जाती है। जिसके दंश से मृत्यु तक हो सकती है। सम्पदा की खोज में गये एवं किसी तरह उन संकटों से बचकर आये व्यक्तियों का कहना है कि पहुँचते ही तितलियाँ समूह के रुप में इस प्रकार आक्रमण कर देती हैं, मानो कोई दुश्मन उनके बीच में आ गया हो। मलेरिया एवं हिपेटाइटिस रोग की यहाँ बहुलता है। कालरा के कीटाणु भी यहाँ के पानी में घुले पाये गये हैं। जो भी व्यक्ति तितली के दंश से बच गए, वे या तो रोगों के शिकार हो मृत्यु को प्राप्त हुए अथवा ड़र कर वापस लौट आये। फिर भी मानवी पुरुषार्थ कभी रुका है। इतने व्यवधानों के बावजूद हर वर्ष कई साहसी सोना बटोरने जाते हैं। उस सम्पदा के भण्डार तक पहुचने में अभी तक पूर्ण सफलता किसी को नहीं मिल पायी है। जो मिलता है उससे इतना भर विश्वास जमता है कि इस क्षेत्र में असामान्य सम्पदा दबी पड़ी है। शासकीय स्तर पर भी ब्राजील प्रशासन ने कई सुविधाएं इन खोजियों को दे रखी हैं।

प्रकृति के ये विलक्षण सम्पदागार समुद्र की तलहटी में छिपे तेल-रत्नों के भण्डार, पृथ्वी के अन्तराल में सोये बहुमूल्य खनिज पदार्थ ऐसे ही मानवी पुरुषार्थ का आहृन करते रहते हैं। जो अवरोधकों से टकराते हुए, बिना निराश हुए अपने निर्धारित पथ पर चलता चला जाता है, वह निश्चित ही लक्ष्य को पा लेता है।

ब्राजील का र्स्वणकोष तब तक भूमिगत ही बा रहेगा जब तक कि उसे प्राप्त करने के लिए समग्र पुरुषार्थ करने वाले साधक सम्पन्न लोग आगे नहीं आते। अधूरे मन से- अधूरे साधनों से-आतुर लोग बिनापूर्ण कल्पना का सहारा लिए बिना परिपूर्ण योजना बनाये ऐसे ही आवेशग्रस्त होकर निकल पड़ते हैं। स्वल्प साधनों से असीम लाभ पाने की लालसा भटकती और भटकाती रहती है। अगले दिनों जब प्रबल पुरुषार्थ योजनावद्ध प्रयास चलेगा तो समुद्र और आकाश को मथ डालने वाला मनुष्य इस भूमिगत से भी वंचित न रहेगा।


ईश्वर क्षमा करदे तो भी पाप दण्ड नहीं मिटेगा

लोग नीति-अनीति बरतते हैं, दूसरों का शोषण करते हैं, अन्यायपूर्वक धन कमाते हैं और उसका एक अंश पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा भजन-पूजन, मन्दिर, देवालय में व्यय करके सोचते हैं कि इससे पाप कर्मों का प्रक्षालन हो गया। प्रथम तो यह सोचना ही गलत है। पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा और भजन पूजन का जो पुरस्कार मिल सकता है, तो वह पाप कर्मों के प्रक्षालन में नहीं, अन्तः चेतना के विकसित होने के रुप में मिलता है। उसके बदले किये गये पाप कमो्र्र से क्षमा मिल जाने का विधान ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में कहीं भी नहीं है। ईश्वर की न्याय व्यवस्था बहुत ही सूक्ष्म और तटस्थ है। एक हाथ आग में डालने की बात यह मानकर सोची जाय कि दूसरा हाथ पानी में डाल देंग और जलने से मुक्ति मिल जायगी तो ऐसा कहीं नहीं होता। आग में हाथ डालने का परिणाम जलने के रुप में भेगना ही पडेगा, जो हाथ पानी में डाला गया, वह भले ही ठण्डक महसूस करता रहे परन्तु आग से तो जलना ही पडेगा। पाप और दुर्ष्कम किये गये हैं तो उनका दण्ड भुगतना ही पडेगा, भले ही दान-दक्षिणा का पुरस्कार मिलता हो। उस पुरस्कार के बदले दण्ड से छुटकारा पाने, कर्मफल से मुक्त हो जाने का कोई उपाय ही नहीं है।

ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में कहीं भी ढ़ील ढ़ाल न होने की बात मानते हुए भी एक क्षण को यह मान लिया जाये कि ईश्वर हमारे पापों को क्षमा कर देगा। लेकिन अपने भतर बैठी उस चेतना का, उस व्यवस्था का क्या कीजिएगा ? जो प्रत्येक भले-बुरे कर्मों का निरीक्षण करती रहती है और अपने लिए उसी आधार पर परिणाम निर्धारित करती है। उसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए प्रसिद्ध विचारक और वैज्ञानिक विलियम जेम्स ने कहा है, “हो सकता है भगवान हमारे पापों को क्षमा कर दे किन्तु अपने भीतर काम कर रही वह व्यवस्था हमें हरगिज नहीं बख्शती जो सत्कर्मों से सुकृत्तियों के रुप में प्रभावित होती है और दुष्कर्मों से विकृतियों की ग्रन्थियाँ बनाती है तथा पीड़ा देती रहती है।”

डा॰ होप का कथन है कि “पाप और बीमारी में कोई अन्तर नहीं है। बीमारियाँ पैदा ही इसीलिए होती हैं कि मनुष्य आन्तरिक बिकृतियों से त्रस्त रहता है और बिकृतियाँ मनुष्य द्वारा किये जाने वाले दुष्कृत्यों के परिणाम स्वरुप जन्मती हैं।” इस तथ्य को तो अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि शारीरिक रोगों की जड़ मनुष्य के मनःसंस्थान में छिपी रहती है। शरीर पर मन का नियंत्रण है, इस तथ्य को पगतिक्षण अनुभव किया जा सकता है। मस्तिष्क की इच्छा, प्रेरणा और संकेतों के अनुसार प्रत्येक अंग अवयव काम करता है। प्रत्यक्ष रुप में दिखाई देने वाले क्रिया-कलापों की प्रेरणा पहले मनःसंस्थान में उठती है, यह तो सभी कोई जानता और अनुभव करता है। जो कार्य अपनी इच्छा के बिना सम्पन्न होते दिखाई देते हैं, जिन हलचलों पर अपना कोई नियंत्रण प्रतीत नहीं होता वे भी वस्तुतः हमारे अचेतन मन की क्षमता और प्रवीणता के अनुसार संचालित होते हैं। श्वास-प्रश्वास, रक्त संचार, आकुचंन-प्रकुचंन, हृदय स्पन्दन, पाचन आदि क्रियाएं जिन पर अपनी इच्छा आकाँक्षा का कोई वश नहीं है, इस अचुतन मन द्वारा ही गतिशील रहती है।

शरीर विज्ञानियों के अनुसार मन यदि उद्विग्न और आकुल असन्तुलित रहता है तो रोग बीमारियों का होना निश्चित है। डा. डब्ल्यू॰ सी॰ डालवीरिस के मेयो-क्लीनिक में पन्द्रह हजार उदर रोगियों का उपचार करने के साथ उनके रोग का भी गहन अध्ययन किया गया । इस शोध अनुसंधान से यह निर्ष्कष सामने आया कि 70 प्रतिशत रोगी परिस्थितियों के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण उत्पन्न हुई मानसिक उद्विग्नता की बजह से अपने पेट को रोगी बना बैठे। औद्योगिक क्षेत्राो के अमेरिकी डाक्टरों के वार्षिक सम्मेलन में एक अनुभवी चिकित्सक डा॰ हेराल्ड सी॰ ऐर्जन ने अपने विश्लेषण का सार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि व्यवसायियों में से 44 प्रतिशत रक्तचाप और उदर रोगों से पीडित हैं। इसका कारण उनकी मानसिक स्थिति का तनावपूर्ण होना है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ बहन करने वालों में से आधे आदमी ढ़लती आयु से पहले ही स्नायविक रोगों के शिकार बन जाते हैं। इसका कारण उनका निरन्तर चिन्तित और उद्विग्न रहना ही होता है।

संसार के मूर्धन्य शरीरशास्त्री और चिकित्सा विज्ञानी भी अब इस निर्ष्कष एवं उपचार में प्रमुखता दी जानी चाहिए, क्योंकि दो तिहाई से अधिक रोग पेट से या रक्त से पर पहुँचने लगे हैं कि अस्वस्थता की जड़ें शारीरिक पदार्थें एवं अवयवों में ढूढ़ते रहने से ही काम नहीं चलेगा। अब मस्तिष्कीय स्थिति को भी निदान नहीं वरन् मस्तिष्क से उत्पन्न होते है। इस सर्न्दभ में ‘साइकोसोमेटिक’ नामक एक स्वतंत्र शास्त्र विकसित किया जा रहा है। विख्यात चिकित्सक ओ॰ एफ॰ ग्रोवर बारह वर्ष तक उदर व्रण से पीड़ित रहे। बहुत उपचार कराने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी, तो वे एक मनोविज्ञान वेत्ता के पास गए। उसने बताया कि यदि आप चिन्ता मुक्त हंसता-हसाता जीवन जीनें लगें तो आसन्न व्यथा से छुटकारा मिल सकता हैं।

मनोयोगपूर्वक डा॰ ग्रोवर अपने मस्तिष्क और स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए लग गये तथा जब वे अपने प्रयासों में सफल हो गए तो रोग ने भी उनका पिण्ड छोड़ दिया। इसके उपरान्त उन्होंने अपने रोगियों को भी वैसा ही परामर्श देना आरम्भ कर दिया। फलतः उपचार की सफलता आर्श्चयजनक रुप से बढ़ती गई। उनके मरीज उनकी चिकित्सा से पहले की अपेक्षा अधिक लाभान्वित होने लगे। अपने अनुभवों का निचोड़ बताते हुए डा॰ ग्रोवर ने लिखा है कि यदि रोगियों की मनःस्थिति को चिन्ता मुक्त एवं हल्का-फुल्का बनाया जा सके तो औषधोपचार की सफलता कई गुना अधिक बढ़ सकती है। मेरा यह दृढ़ मत है कि स्नायु दोर्बन्य, हृदयरोग, अजीर्ण, अनिद्रा, गठिया तथा रक्तचाप र्जसे जटिल रोगों की जड़ वास्तव में उद्विग्न मनःस्थिति में ही होती है। शरीर पर मन का असाधारण रुप से अधिकार है। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह हृदयगम किया जा सके उतना ही अच्छा है।

अलसर, संसार में व्याप्त उदर रोगों में पगथम स्थान प्राप्त करता जा रहा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार उदर रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों में पन्द्रह प्रतिशत इसी रोग के मरीज है। यह व्याधि खर्चीले उपचारों को भी अंगूठा दिखाती हुई गहरी जडें जमाये बैठी रहती है और टस से मस नहीं होती। इस रोग के विशेषज्ञ जोसेफ एफ॰ मोस्टग्यूमरी ने अपनी पुस्तक ‘नर्बस स्टमक ट्रवल’ में लिखा है कि यह महाव्याधि आहार सम्गन्धी विकुतियों से उतनी नहीं होती जितनी कि चिन्ता, आश्का और भयाक्रान्त मनःस्थिति के कारण होती हैं।

नेबल पुरस्कार विजेता एलेग्जी केरेल का कथन है कि संसार में जितने लोग शारीरिक बिकृतियों से मरते हैं, उससे कहीं अधिक की अकाल मृत्यु मनोविकारों के कारण होती है। उनके अनुसार रोगों की रोकथाम के लिए औषधी अपचार एवं शल्य चिकित्सा जैसे प्रयत्नों से ही काम नहीं चलेगा वरन् यह रहस्य भी लोंगों के गले उतारना होगा कि किस प्रकार चिन्ताओं से मुक्त रहा जा सकता है ? लम्बे समय तक स्नायु दौर्बल्य से पीड़ित रोगियों की मरणोत्तर पोस्टमार्टम द्वारा जाँच की गई तो पता चला कि उनके स्नायु संस्थान तो साधारण मनुष्यों के समान ही निर्दोष थे, पर वे जो कष्ट भुगत रहे थे इसका कारण मस्तिष्कीय विकृतियों की प्रतिक्रिया मात्र थी।

‘स्टाँप वरी एंड गेट वेल’ नामक ग्रन्थ के लेखक डा॰ एडवर्ड पोडोलन ने रक्तचाप, गठिया, जुकाम, मधुमेह, उदर विकार जैसे रोगों को मूल कारण मानसिक उद्विग्नता को बताया है और कहा है कि भली-चंगी शारीरिक स्थिति के लोग भी मानसिक खोने पर इन या ऐसे ही अन्य रोगों के शिकार होते देखे गए हैं। यूरोप और अमेरिका के सभ्यताभिमानी देशों में जिन पाँच प्रमुख कारणों या रोगों से लोग मरते हैं उनमें ‘आत्महत्या’ भी एक है। कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि आत्महत्या का प्रमुख कारण मानसिक उद्वेग है। दूसरे विश्व युद्ध में तीन लाख से कुछ अधिक व्यक्ति लड़ाई के मैदान में मरे थे, पर उन्हीं दिनों दस लाख से अधिक व्यक्ति हृदयरोग से आक्रान्त होकर काल कबलित हो गए। हृदयरोग में अचानक आई इस बाढ़ का क्या कारण है ? यह तलाशा गया तो विदित हुआ कि युद्धजन्य विभीषिका से भयभत और उद्विग्न होकर ही अधिकाँश लोग अपना सुतुलन खोने लगे और इस महाव्याधि के चंगुल में फँसकर अपनी जान गँवा बैठे।

क्यों उत्पन्न होती है यह मानसिक उद्विग्नता, लोग अपना मानसिक संतुलन क्यों खो देते हैं ?इसके उत्तर में परिस्थितियों का कारण बताया जाता है। पर वास्तविकता इससे एकदम भिन्न है। मानसिक कुसंस्कारों के कारण, चिन्तन की सही रीति-नीति से अपरिचित रहने के कारण ही तरह-तरह के विक्षोभ धरते हैं। अन्यथा संसार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं हैं जो अनेकों समस्याओं और कठिनाइयों से घिरे रहने के बावजूद भी अपनी मनःस्थिति को विक्षुब्ध नहीं होने देते और हंसते-हंसाते सामने आई उलझनों को सुलझानें के लिए धैर्य और साहसपूर्वक जुटे रहते हैं। उसके विपरित ऐसे लोगों की भी कमी नहीं हैं जो राई बराबर कठिनाई को भी पहाड़ के बराबर मान लेते है और तिल का ताड़ बना कर निरन्तर उद्विग्न बने रहते हैं।

यह सब मानसिक दुर्बलता के कारण ही है और मानसिक दुर्बलता का कारण व्यक्ति द्वारा स्वयं ही भले-बुरे कर्मों से आमंत्रित की गई आत्म प्रताड़ना है। यह आत्म प्रताड़ना अच्छी खासी मनोभुमि को धेन की तरह खोखला कर देती है। इसलिए कहा गया है कि एक बार ईश्वर भले ही किये गये दुष्कर्मों को क्षमा कर दे परन्तु मनुष्य की आत्म-चेतना उसे कभी क्षमा नहीं करती।


युवक रहता था (kahani)

एक नगर में एक युवक रहता था। वह सब्जियाँ बेचकर जीवन यापन करता था। कुछ ही सालों में किराने की दुकान खोल ली और धीरे-धीरे उसकी सात दुकानें हो गईं। अब वह धनपतियों में गिना जाने लगा।

कुछ ही दिन बाद वह हज की यात्रा जा कर आया जिससे उसे लोग “हाजी साहब” कहने लगे।

वह जिधर भी निकलता लोग उसे “आदाब” ! हाजी साहब ! झुककर कहते।

लेकिन वह आदाब के जबाव में सिर्फ “कह दूँगा” कहकर आगे बढ़ जाता था।

लोगों को “कह दूँगा” का अर्थ समझ में नहीं आ रहा था। आखिर इतने बड़े आदमी से पूछने की हिम्मत भी तो किसी में नहीं थी।

एक दिन हाजी साहब टहलने जा रहे थे इतने में एक युवक ने साहस करके हाजी साहब को रोककर व्यंग भरे लहजे में पूँछ ही लिया- “हाजी साहब आपको जब लोग आदाब करते हैं तब आप “कह दूँगा” कहकर टाल देते हैं आखिर क्यों ? उस युवक की बात सुनकर वह मुस्करा उठे और उसे अपने साथ अपनी विशाल इमारत के तहखाने में ले गए । जहाँ हीरे, जवाहरात, सोना, चाँदी थे।

युवक ने पूछा- हाजी साहब आप मेरे सवाल को जबाव देने के बजाय धन का अम्बार क्यों दिखा रहें हैं। “ भाई यही तो आपके सवाल का जबाव है। मैं जब सब्जी बेचता था तब तो आदाब नहीं करते थे जब से मेरे पास यह धन का अम्बार लग गया तभी से तो आदाब करते हैं। आप यह आदाब मुझे नहीं मेरे धन को करते हैं इसलिए मैं इस धन को आप लोगों का आदाब कह देता हूँ यही मेरे “कह दूँगा” का अर्थ है।”

मान सम्मान धन का नहीं बल्कि व्यक्ति के सदगुणों का होना चाहिए, यही सोचता युवक चला गया।


सीस दीयो जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान

गुरु शब्द का सामान्य अर्थ शिक्षक से लिया जाता है। शिक्षक अर्थात् साक्षरता का अभ्यास कराने वाला, शिल्प-उद्योग, कला-व्यायाम आदि क्रिया कौशलों की शिक्षा देने वाला। इसे अध्यापक वर्ग में रखा जा सकता है। वर्ग के अतिरिक्त भी गुरु की और कितनी ही श्रेणियाँ हैं। तीर्थ गुरु, ग्राम गुरु, कलगुरु आदि कितने ही गुरुओं के वर्ग बन गए हैं। असाधारण रुप् से चतुर और अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कुशल व्यक्तियों को भी व्यंग से गुरु कहा जाता है। इसका अर्थ होता है तिगड़मबाज अथवा धूर्तराज। कितने ही लोग धर्म की ओट में चेली-चेला बनाने और उनकी जेब हल्की कराने का गुरुक्रम भी चलाते हैं, उन्हें भी गुरु कहते हैं। परम्परा से गुरु बनाने का भी प्रचलन है। हमारा पिता तुम्हारे पिता का गुरु थाख् इसलिए हम भी तुम्हारे गुरु बनेंगे, यह दावा करने वाले और इस तर्क से दूसरों को प्रभावित करने वालों का भी एक बड़ा वर्ग है। परम्परा वादी लागों के गले यह दलील आसानी से उतर भी जाती है और वे योग्य-अयोग्य का विचार किये बिना इन तथाकथित गुरुओं को नमन करते हुए उनकी भेंट-पूजा और नमन वन्दन करते रहते हैं।

ग्ले में कण्ठी बँधाए और कान फुकाए तो आजवन कुछ न कुछ दान-दक्षिणा देती ही रहनी पड़ती है। हालाँकि इससे कोई लाभ नहीं है, परन्तु शिष्य वर्ग इससे एक प्रकार का धर्म सन्तोष कर लेते हैं, भले ही वह निराधार हो। गुरु लोग इस बिडम्बना को को मुफ्त में मान और धन प्राप्त करते रहने का एक र्स्वण सुयोग समझ कर अपने सौभग्य पर गर्व करते रहते हैं। कोई भी क्षेत्र क्यों न हो उसमें यह मानसिक जड़ता आसानी से अपने पैर जमाये आसानी से देखी जा सकती है। ऐसे लोगों में शास्त्राो में वर्णित गुरु की महिमा के आधार पर अपनी जड़ें जमाने का अवसर मिल जाता है। पिनश्चित ही गुरु की महिमा गाते-गाते शास्त्राकार थकते नहीं। मनीषियों ने निरन्तर यही कहा है कि आत्मिक प्रगति के लिए गुरु की सहायता अनिवार्य रुप से आवश्यक है। इसके बिना आत्म-कल्याण का द्वार नहीं खुलता, साधना सफल नहीं होती। शास्त्राकारों ने सामान्य जीवनं क्रम में माता, पिता और गुरु को देव माना है तथा जीवन भर उनकी अर्भ्यथना करते रहने का निर्देश दिया है। परन्तु ऊपर जिस गुरुवाद की चर्चा की गई है वह भिन्न बात है और इसे गुरुवाद ही कहा जा सकता है।

इस गुरुवाद के चलते रहने और सद्गुरु प्राप्त करने के सौभग्य से वंचित रह जाने का कारण है। लागों की बुद्धि विलक्षण है। एक ओर यहाँ-वहाँ फूँक-फूँककर कदम रखने और गुण दोष परखने की क्षमता उनमें पाई जाती है वहीं दूसरी परम्परागत बातों में उनका मानस इतना रुढ़िवादी हो जाता है कि ढर्रे को ही सही मानने के अतिरिक्त उनकी बौद्धिक क्षमता एक इन्च भी आगे नहीं बढ़ती । विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाशाली और अपने विषय के अधिकारी व्यक्तियों को ऐसी रुढ़ियों एवं मान्यताओं से जकड़े देखा जा सकता है जिन्हें तात्विक दृष्टि से देखने पर उपहासास्पद और रिर्थक ही ठहराया जा सकता है। इतने पर भी ये लोग इन मान्यताओं को यथार्थता की कसौटी पर कस कर ही अधिकार किया हो।

यह कैसी विचित्र बिडम्बना है कि एक ही व्यक्ति एक ही दिशा में प्रखर बुद्धि और दूसरे क्षेत्र में सर्वथा मूढ़मति सिद्ध होता है। प्रचलित गुरुडम या गुरुवाद की परम्परा पर यह बात आर्श्चयजनक रुप से लागू होती है। कोई विरला व्यक्ति ही ऐसा होगा जो इस क्षेत्र में उपयोगिता, आवश्यकता एवं यथार्थता की कसौटी को लेकर आगे बढ़ता हो । अन्यथा अधिकाँश तो अनुकरण, अनिशयोक्ति, मूढ़ मान्यताओं एवं अन्ध परम्पराओं के वशीभूत होकर इस क्षेत्र में दिग्भ्राँत होकर भटकते हैं। गुरु शिष्य परम्परा का वर्तमान रुप जैसा बन गया है, उसे न तो वाँछनीय कहा जा सकता है और नहीं उचित। इस रुढ़िगत परम्परा के कारण आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध ही हुआ है। शास्त्राकारों ने जिस गुरुतत्व की महिमा का वर्णन किया है। उसका प्रचलित बिडम्बना के साथ कहीं कोई तालमेल नहीं बैठता। शब्द सम्मिश्रण उनमें है और इसी साम्य के कारण यह बिड़म्बना है अन्यथा वर्तमान स्थिति और वस्तुस्थिति में तो जमीन आसमान का अन्तर है।

शास्त्र सम्मत गुरुतत्व और बिडम्बनाग्रस्त गुरुवाद एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। जिस सद्गुरु का महात्मय शास्त्राकारों ने बताया हैं वह वस्तुतः मानवी अन्तःकरण ही है। निरन्तर सत् शिक्षण और ऊर्ध्वगमन का प्रकाश दे पाना इसी केन्द्र के लिए सम्भव है। बाहर के गुरु शिष्य की वास्तविक मनःस्थिति का स्वरुप परिचय ही प्राप्त कर सकते हैं और उनके अनुरुप आत्मिक प्रगति के लिए आँशिक सहयोग ही दे पाते हैं। अस्तु उनके परामर्श भी आधे-अधूरे ही हो सकते हैं। यह भी कटिनाई है कि बाहरी गुरु हर समय शिष्य के साथ नहीं रह सकता, जबकि उसके सामने पग-पग पर क्षण-क्षण में अगणित समस्याएँ और अनेकों कठिनाईयाँ आती रहती है। इनमें से किन कठिनाइयों और किन समस्याओं का किस प्रकार समाधान किया जाए ? इसके लिए व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, भले ही वह कितना ही सुयोग्य व्यक्ति उपलब्ध थे, वे अपने ज्ञान और अनुभव से हर किसी को उसकी स्थिति के अनुरुप मागर्ग्दशन दे सकते थे और उनका परामर्श भी ऐसा सरीक होता था कि वह जिसे दिया जाता था उसके लिए वास्तव में अन्धकार में प्रकाश की तरह सिद्ध होता था। लेकिन वह परामर्श सबके लिए एक समान नहीं होता था। व्यक्ति की स्थिति और मनःस्थिति के अनुरुप वह बदल जाता था। दूसरों की स्थिति में अन्तर रहने के कारण परामर्श का स्तर भी बदल जाता था। आज जबकि ऐसे योग्य गुरुओं का लगभग अभाव ही है, यह अन्तर कौन करे ? यह अन्तर कर सकने का सामर्थ्य ही कितनों में है ? आज तो असके लिए अपने अन्तःकरण में विराजमान परमात्मा की शरण में जाना और उसी से मार्गदर्शन ग्रहण करना एकमात्र समाधान है। क्योंकि आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों की वास्तविक जानकारी जितनी अपने आपको होती है उतनी और किसी के लिए सम्भव नहीं है।

अपनी परिस्थितियों के अनुरुप मार्ग खोज निकालना भी हर किसी के लिए संभव नहीं है। उसके लिए भी प्रखर मस्तिष्क, परिष्कृत अन्तःकरण और सुविकसित चेतना चाहिए। हर किसी में ये सब विशेषताएँ नहीं होती इसलिए ऐसे गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है जो व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति को इतना सुविकसित करने में सहयोग हो सके। व्यक्ति विशेष को गुरु मानने, बनाने की आवश्यकता इसीलिए बताई गई है और ऐसे गुरु की उपलब्धि सीस दिये जाने पर भी सस्ती बताई गई है। इसका कुल कारण ही है कि इस स्तर का व्यक्ति गुरु भले ही थोडी सी सहायता करता हो, परन्तु वह साधक के लिए अमूल्य और प्राणदायी ही होता है। गुरु का कार्य केवल अपने अन्तःकरण में विराजमान सद्गुरु की पहचान करा देना, उसका भक्त और शिष्य बना देना भर से उसकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। शास्त्रों ने जहाँ स्थान-स्थान पर गुरु की महिमा गाई है, उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहकर उसका वन्दन किया है तथा उस पर बलिहारी जाने की बात कही गई है, वह इस उपकार की कृतज्ञता स्वरुप ही है कि गुरु भटकाव और भूलभुलैया में से निकाल कर साधक को सद्गुरु की शरण में जाने का मार्ग सुझाता है। वह न इस बात का आग्रह करता है कि उससे बंधा जाए और न ही प्रत्युपकार की-प्रतिदानकी-अपेक्षा रखता है। अस्तु किसी व्यक्ति का सद्गुरु कहना उसकी अहंकारिता का पोषण करना है। यात्रा पूरी करने के लिए काम तो अपने ही पैर आयेंगे, तैर कर नदी पार करने के लिए अपने ही हाथों से पानी काटना पड़ेगा उसके लिए रास्ता बताने वाले केवल मार्ग को इंगित ही कर सकते हैं। आत्मिक प्रगति भी सद्गुरु की शरण में जाने से ही संभव होती है। शरीरधारी गुरु उसकी शरण में पहुँचने के एि अपने ढ़ंग से आरम्भिक किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न कर सकता है। इसलिए उनका पूजन वन्दन किया जाता है।

उस गुरु की शरण में जाने और गुरु दीक्षा ग्रहण करने का अर्थ यह व्रत धारण करना है कि हम अन्तरात्मा की प्रेरणा का अनुसरण करेंगें। यह व्रत धारण करने वाला व्यक्ति मानवोचित चिन्तन और कृर्तत्व से विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अवाँछनीय चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है। वैसे ही प्रतिरोधी देव तत्व उसके परिणाम के सम्बन्ध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचल कर मूर्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि वह अचिन्त्य चिन्तन के प्रति विद्रोह खड़ा कर देती है और उन अवाँछनीयताओं के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है। इसके विपरित यदि अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहा जाय, उसकी पुकार अनसुनी की जाती रहे तो स्वभाविक है उससे आत्मा की आवाज मन्द पड़ती है और पग-पग पर आवश्यक प्रकाया देने का उसका क्रम शिथिल हो जाता है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्विग्रस्त और कुकर्मों में लिप्त पाया जाता है, अन्यथा जीवन्त आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि उस स्थिति में मनुष्य के लिए कुमार्ग का अनुसरण कर पाना सम्भव ही नहीं होता। यह आत्मिक प्रखरता ही वस्तुतः सद्गुरु है। गुरु भक्ति इसी का नमन, पूजन और परिपोषण करने का नाम है।

सद्गुरु की शरण में जाने के बाद, अन्तरात्मा की प्ररणा का अनुसरण आरम्भ करने के बाद कदाचित किसी कुकर्म में लिप्त होने की स्थिति आती है तो उस दशा में अन्तरंग में विराजमान दिव्य चेतना का विद्रोह देखते ही बनता है। पैर काँपते हैं, दिल धड़कता है, गला सूखता है, सिर चकराने लगता है तथा और भी न जाने क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ होती हैं। सरलतापूर्वक कुकर्मों को देखने के लिए कदम बढ़ जाने पर भीतरी स्थिति ठीक वैसी ही हो जाती है- जैसी कि किसी निरीह पशु को वध के लिए खड़ा करते समय कातर स्थिति में देखा जा रहा हो। कई सामान्य व्यक्तियों की आन्तरिक स्थिति भी ऐसी ही हो जाती है कि वे उस अवाँछनीय कार्य को पूरा नहीं कर पाते, उस काम का विचार अधूरा छोड़कर अथवा असफल होकर वाचस लौट आते हैं। यह असफलता या पराजय वस्तुतः उस अन्तर्द्वन्द्व का ही परिणाम होता है जो कुकृत्य करने और न करने के पक्ष में विवद की तरह भीतर ही भीतर उठता, उफनता और उमड़ता रहता है। सद्गुरु छूबते हुए को बारते हैं, यह उक्ति ऐसे अवसरों के लिए पूरी तरह लागू होती है।

इसीलिए जिन्हें हर कर्म करने होते हैं वे उसके लिए प्रायः गहरा नशा कर लेते हैं ताकि उस कुकृत्य को करने में अन्तःचेतना के प्रबल प्रतिरोध का सामना न करना पड़े। अन्तःचेतना की पुकार निरस्त करने, अनसुनी कर देने में नशा शैतान के प्रमुख अस्त्र का काम करता है। जो हो, अन्तरात्मा को कुचलते जाने अपने आपको सर्वतोमुखी पतन के गंत में धकेल कर आत्म-हत्या का ही उपक्रम किया जाता है। विष खाकर, आग लगाकर, रेल से कटकर, पानी में डूबकर तथा और तरीके अपनाकर तो केवल शरीर की ही हत्या की जाती है, अन्तरात्मा को कुचलना ही आत्महत्या का घोर अपराध करना है क्योंकि उसकी पुकार को अनसुनी करते रहने से ही उज्जवल भविष्य अन्धकारमय बनता है और आन्तरिक स्थिति क्षीणतम तथा दीन-दुर्बल बनती जाती है।

इसलिए जिन्हें आत्मिक प्रगित का लक्ष्य प्राप्त करना हो, अपनी अन्तःस्थिति को ऊंचा उठाना हो उनके लिए सद्गुरु की शरण में जाए बिना कोई उपाय नहीं है। व्यक्तिक गुरु इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं, वे मन में सच्चे सद्गुरु की शरण में पहुँचाने का काम निर्लिप्त, निर्लोभ होकर करते हैं। ऐसे गुरु का प्राप्त होना भी असाधारण सौभाग्य कहना चाहिए। अन्यथा आज के स्वार्थी संकीर्णता प्रधानयुग में ऐसे निस्वार्थ और उदार व्यक्ति आसानी से कहाँ मिल पाते हैं ? लक्ष्य भले ही सद्गुरु हो, अन्तरात्मा की शरण में जाये बिना कल्याण नहीं, महत्व उस सत्ता या व्यक्तित्व का भी कम नहीं है जो वहाँ तक पहुँचता है।


श्रद्धावान होने का अर्थ अन्ध श्रद्धा नहीं है

श्रद्धा मनुष्य जीवन के उन आधरभूत सिद्धान्तों में से एक है जिससे वह पूर्ण विकास करता है। श्रद्धा न हो तो मनुष्य साँसारिक सफलताएँ प्राप्त करके भी आत्मिक सुख प्राप्त न कर सकेगा, क्योंकि जिन गुणों से आध्यात्मिक सुख मिलता है उसकी पृष्ठभूमि श्रद्धा पर ही निर्भर है। मानसकार ने इसीलिए श्रद्धा और विश्वास को शंकर का रुप बताया है। ‘शंकरह्न शिवत्व’ जीवन के बुरे तत्वों का संहार करने का प्रमुख कारण है किन्तु शिव अकेला अपूर्ण है उसके साथ उमा भी चाहिए, उमा अर्थात गुणों का अभिवर्धन। शिव का अर्थ असुरता का संहार और भवानी का अर्थ भावनाओं का परिष्कार। शिव के रुप में विश्वास दृढ़ होता है, पर भवानी के रुप में विश्वास सुदृढ़ होता है, पर भवानी के रुप में श्रद्धा, सरल और सुखदायक होती है। अतः विश्वास जगाना हो तो श्रद्धा की ही शरण लेनी चाहिए। श्रद्धा साधना को सरल बना देती है।

श्रद्धा का समावेश मनुष्य के पारलौकिक जीवन को भी आनन्दमय बनाता है। मनुष्य मृत्यु से इसीलिए दुःखी रहता है कि वह जानता है उस ओर अकेला जाना पड़ेगा। भय की, भूल की, अज्ञान की जड़ अकेलापन है। उससे सभी को दुःख मिलता है, पर हृदय की श्रद्धा जीवित रहे तो अकेलापन भी नहीं अखरता। श्रद्धा स्वयं अन्तःकरण में आनन्द का उद्वेग करती है तो ऐसा अभ्यास होता है कि हमारी प्रिय वस्तु हमारे बहुत समीप अपनी कल्पना में ही ओत-प्रोत है। अपना अन्तर्देवता श्रद्धा के वश में है, वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति अन्तःकरण में ही कर लिया करता है और उससे मनुष्य को असीम तृप्ति मिलती है।

आत्मिक विकास और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्रद्धा जितनी आवश्यक और उपयोगी है, जितनी लाभप्रद है उतनी ही घातक है- अन्ध श्रद्धा। अन्धश्रद्धा का अर्थ है बिना सोचे समझे, आँख मूँदकर किसी पर भी घनघोर विश्वास। इस तरह की अंधश्रद्धा किस प्रकार सर्वनाश के कगार पर ले पहुँचती है इसका उदाहरण पिछले दिनों (अमेरिका) 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या कर लिये जाने के समय देखने में आया। 21 नवम्बर 78 को विश्व के लगभग सभी समाचार पत्रों में यह समाचार छपा। 900 व्यक्तियों द्वारा सामूहिक रुप से आत्महत्या कर लिए जाने के पीछे अमेरिका के एक धर्मगुरु का हाथ था, जो स्वयं को अपने अनुयायिओं का पिता बताता था।

दक्षिण अमेरिका के एक प्रान्त गुयाना की राजधानी जार्ज टाउन से 238 किलोमीटर दूर घने जंगलों में करीब 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में एक नगर सा बसा हुआ था- जोंस टाउन। यह कस्बा जिम जोंस के अनुयायिओं द्वारा बसाया गया था और वही लोग यहाँ रहते थे। अन्य व्यक्तियों का प्रवेश निषिद्ध था। 18 नवम्बर को शाम के समय इस कस्बे में बने एक उपासना घर में एकत्रित करीब नौ सौ व्यक्ति जिमजोंस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन व्यक्तियों के कान में अपने गुरु की आवाज गूँजी-”अब वह समय आ गया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को सदैव तैयार रहने के लिए कहता रहा हूँ। हम सबको आज ही मरना है, इसी वक्त।

इसके बाद उपस्थित सभी पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को विष मिला शरबत बाँटा गया। कुछ लोग ऐसे भी थे जो मरना नहीं चाहते थे। वे भागने की सोच रहे थे। इसके लिए उन्होंने अपने आस-पास देखा तो पाया कि चारो ओर बन्दूक तथा विष बुझे तीर चढ़ाये कमान ताने पहरेदार नियुक्त हैं। कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उनसे कहा गया कि बेहतर है स्वयं ही विषपान कर लिया जाय- क्योंकि यहाँ से बचकर कोई नहीं जा सकता।

पहले छोटे-छोटे बच्चों को चम्मच से विष पिलाया गया। इसके बाद उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने विषपान किया। जिन्होंने अपने गुरु की अवज्ञा करते हुए भागने की चेष्टा की वे पहरेदारों के तीरों और बन्दूक की गोलियों का निशाना बने। कुछ ही घण्टों में जोंस टाउन लाशों ही लाशों से पटा था। न केवल मनुष्यों की वरन् पशु-पक्षियों की लाशें भी वहाँ बिछ गयीं और पीपुल्स टेम्पल के गुरु जिम जोंस ने स्वयं को गोली मार ली थी।

जिमजोंस पश्चिम में अन्धश्रद्धा का व्यापार चलाने वाले अधर्म गुरुओं में से एक था, जो पश्चिम की चौंधिया देने वाली भौतिक समृद्धि से ऊबे आध्यात्मिक क्षुधा का दोहन करने में लगे हुए हैं। पिपासा इतनी तीव्र है और अज्ञान इतना गहरा है कि कौन सही तथा कौन गलत ? इसका निर्णय करने का किसी को अवकाश ही नहीं है। जहाँ थोड़ा बहुत आकर्षण दिखाई दिया, वहीं प्रभावित हो गए और इन्हीं को अपना इष्ट, आराध्य मानकर उनकी उचित-अनुचित आज्ञाओं, आदेशों का आँख मूँदकर पालन करने लगे।

जिमजोंस ने पश्चिमी सभ्यता से ऊबे लोगों की इस कमजोरी का लाभ उठाने के लिए सन् 1950 में पीपुल्स टेम्पल नामक एक सम्प्रदाय चलाया लोगों में अपना प्रभाव बढ़ाने तथा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की हर संभव कोशिशें की। परिणामतः बड़ी संख्या में लोग जिमजोंस के अनुयायी बनने लगे। जब उसके शिष्य वड़ी संख्या में बनने लगे तो उसने सन् 1970 में अपना मुख्यालय कैलीफोर्निया से सैनफ्राँसिस्को स्थानाँतरित कर दिया। एक वर्ष पूर्व तक जिम का सितारा पूरी बुलन्दी पर था, लेकिन पिछले साल उसके कुछ अनुयायिओं ने पीपुल्स टेम्पल के रहस्य खोलना आरम्भ कर दिये। उनका कहना था कि पीपुल्स टेम्पल देखने भर को ही आदर्शों का प्रचार करने वाला संगठन है अन्यथा इस सम्प्रदाय में आतंक और नाटकीय यातनाओं का राज्य है। वहाँ जिम की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। उसकी मर्जी के थोड़ा भी विरुद्ध जाने वालों को बुरी तरह पीटा जाता है तथा अन्य दण्ड दिये जाते हैं। जिमजोंस पर झूठा धार्मिक उपचार करने और भक्तों की सम्पत्ति हथियाने का आरोप भी लगाया।

अमेरिकी अधिकारियों से यह शिकायत की गई कि जिम अपने अनुयायिओं से बहुत ही पाशविक व्यवहार करता है। न केवल उनके अनुयायिओं को मारापीटा जाता है बल्कि उनसे दिनभर कसकर मेहनत कराई जाती है और नाम मात्र का भोजन दिया जाता है। कड़ी मेहनत करने वाले यह व्यक्ति वही लोग होते हैं जो अपनी सम्पत्ति पीपुल्स टेम्पल को सौंप चुके होते हैं। एक बार उसके चंगुल में फँसकर बच निकलना मुश्किल है। जिम ने अपने अनुयायिओं के बीच ही काफी गुप्तचर छोड़ रखे हैं और छोटी सी सेना भी बना रखी है ताकि बाहरी संकट का सामना किया जा सके।

पिछले वर्ष तो अमरीका जैसे जिम विरोधी हवा ही बहने लगी। ‘न्यू वेस्ट’ और ‘सैनफ्राँसिस्को एग्जामिनर’ पत्रिकाओं ने पीपुल्स टेम्पल के बारे में सनसनी खोज विवरण प्रकाशित किये और अमरीकी प्रशासन से उसकी जाँच कराने की माँग की। यह माँग जोर पकड़ने लगी तो जिमजोंस अपने अनुयायिओं सहित गुयाना भाग गया।

स्वयं और सम्प्रदाय पर संकट के बादल मँडराते और पोल खुलती देखकर जिम अपने अनुयायिओं को समझाने लगा था कि कोई बाधा सिर पर आती देखकर हम लोग आत्महत्या कर लेंगें। उसने सामूहिक आत्महत्या की योजना को कई बार अपने अनुयायिओं के बीच स्पष्ट किया था। जिमजोंस से विद्रोह करने वाले उसके एक भूतपूर्व अनुयायी डैवी ब्लैकी ने अदालत को यह बताया कि उसके गुरु ने कुछ खास अनुयायिओं को आश्रम के सभी बच्चों को मार डालने की जिम्मेदारी सोंप दी थी। उसके साथ यह भी बता दिया था कि बच्चों को मारने के बाद वे एक दूसरे की हत्या कर देंगें।

अपने ऊपर लगाए गये अभियोगों से बचने का यह कौनसा तरीका है ? समझ में नहीं आता। लेकिन जनता और अखबार जैसे-जैसे पीपुल्स टेम्पल की असलियत जानने और उसकी जाँच कराने की माँग करने लगी, उससे जिम का मनोबल टूटने लगा। उसने एक वक्तव्य दिया कि यदि सरकार या अन्य किसी बाहरी व्यक्ति ने आश्रम में घुसने का प्रयास किया तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे।

जनता की माँग और पीपुल्स टेंपल की गतिविधियों का रहस्य जानने के लिए अमेरिकी सीनेटर लियोरियान की अध्यक्षता में एक बारह सदस्यीय दल गुयाना पहुँचा। 18 नवम्बर यह दल अपने साथ कुछ असंतुष्ट जोंस पंथियों को लेकर मठ से बाहर निकल रहा था कि आश्रम के कुछ लोगों ने उन्हें चाकू दिखाकर रोका। बीच बचाव करने और समझाने, बुझाने के बाद वह लोग सुरक्षित निकल सके। वहाँ से निकल कर दल के लोग प्रतिनिधि उस जंगल में बनी पोर्ट कैतुमा हवाई पट्टी पर खड़े विमान में सवार होने लगे तो पीपुल्स टेंपल के अनुयायिओं का एक दस्ता वहाँ तुरन्त ही आ पहुँचा और विमान और गोलियों की बौछार करने लगा। उससे लियोरियान सहित जाँचकर्ता चार प्रतिनिधि मारे गये।

स्पष्ट था यह आक्रमण जिम द्वारा अपने मठ की सुरक्षा के लिए गठित सेना द्वारा ही किया गया था। इस आक्रमण के संगठित परिणामों से जिमजोंस इतना भयाक्राँत हो उठा कि उसे अगले दिन अपने सहित नौ सौ शिष्यों की सामूहिक आत्म-हत्या अथवा हत्या के लिए बाध्य होना पड़ा। अमेरिकी प्रतिनिधि मण्डल पर हमले की खबर जब गुयाना की राजधानी पहुँची तो वहाँ के सैनिक जोंसटाउन पहुँचे। सैनिकों ने जोंसटाउन में प्रवेश किया तो उन्हें लाशों का अम्बार मिला। नौ सौ लाशों के अलावा आश्रम में 17 शारगन, 15 रायफल, 7 रिवाल्वर एक फ्लोयर गन और भारी मात्रा में गोला बारुद का भण्डार भी मिला। इसके अलावा करीब 800 पासपोर्ट, कीमती सामान और नकद डालर भी बरामद हुए।

एक ही पंथ के अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में एक साथ आत्म-हत्या करने की यह घटना वियव इतिहास में अनोखी और अकेली घटना है। यों व्यक्तिगत रुप से तो कई लोगोंने धर्म के नाम पर अपनी आपकी बलि दी है। देवी के सामने अपना सिर काटकर चढ़ा देने, जीभ काट देने और अंग-भंग कर लेने की घटनाये तो आये दिन अपने देश में भी घटती रहती हैं। जिम जोंस और उसके अनुयायियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मौत को गले लगाने की घटना इसी तरह की अन्धश्रद्धा का व्यापक प्रतिफल है।

अंधविश्वास या अंधश्रद्धा व्यक्ति और समाज की दुर्बल मनोभूमि का परिचायक है और यह सिद्ध करता है कि उसमें स्वतः विचार कर निर्ष्कष करने की क्षमता का अभाव है। विश्वास श्रद्धा में भी तो किया जाता है फिर प्रश्न उठता है कि अंधश्रद्धा और श्रद्धा में कोई सीमा रेखा खींची जा सकती है ? श्रद्धा और अंधश्रद्धा स्वरुपतः एक जैसी ही दिखाई पड़ने पर भी दोनों में मूलभूत अन्तर है। श्रद्धा का अर्थ है आत्मविश्वास, ईश्वर पर विश्वास। प्रतीक कुछ भी चुन लिए जाएँ, परन्तु श्रद्धा अपने विवेक को ताक पर रखने की प्रेरणा नहीं देती। स्मरण रखा जाना चाहिए कि श्रद्धा के आधर प्रतीक चुन लिए जाएँ तो भी उसमें किसी भी प्रतीक पर पूर्णतः निर्भर नहीं हुआ जाता, क्योंकि कोई भी प्रतीक प्रतिमान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। वह आधार सहायता के लिए चुने जाते हैं न कि उनपर निर्भर होने के लिए। जबकि अंधश्रद्धा प्रतीकों को ही पकड़कर बैठ जाती है और उन्हीं पर निर्भर रहने लगती है। हमें श्रद्धावान तो बनना चाहिए, अंधश्रद्धा और अन्ध भक्ति से सदैव बचना चाहिए।


श्रमनिष्ठा और उसकी परिणिति

अनवरत श्रम और अनियमित दिनचर्या के कारण अमेरिका के अश्वपति जोंस का स्वास्थ्य गिरता गया। पचास वर्ष की अवस्था में वे रक्तचाप एवं अजीर्ण से ग्रस्त हो गए। अमेरिका के मूर्धन्य चिकित्सकों से उन्होंने चिकित्सा कराई, पर रोग से मुक्ति न मिल सकी। विदेशों से भी सर्म्पक साधा किन्तु स्वास्थ्य में कोई सुधार न हो सका। उन्हें मृत्यु सामने खड़ी दिखाई देने लगी। निराश होकर जोंस ने व्यवसाय में भी रुचि लेना बन्द कर दिया। स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। उन दिनों मनोचिकित्सकों के क्षेत्र में फ्लेमिंग का नाम शिखर पर था। जोंस के एक मित्र ने उन्हें फ्लेमिंग से सर्म्पक करने का परामर्श दिया। मनोचिकित्सा में आस्था ना होते भी एक बार जोंस ने परीक्षण करने की दृष्टि से फ्लेमिंग से मिलना ही उचित समक्षा। इसके पूर्व भी जोंस ने अनेकों मनोवैज्ञानिकों से चिकित्सा करायी थी। पर कोई सुधार ना होने के कारण उनकी आस्था जाती रही। किन्तु फ्लेमिंग की ख्वाति से प्रभावित होकर उन्होंने स्वयं को दिखाने का निर्णय लिया।

पूर्व निर्धारित समय पर जोंस फ्लेमिंग के पास जा पहुँचे। रोग का पूरा विवरण सुनने के पश्चात फ्लेमिंग ने पूँछा- “क्या आपको मनोचिकित्सा पद्धति में आस्था है ? जोंस ने उत्तर दिया कि “अनेकों मनोचिकित्सकों से मुझे असफलता ही मिली है। आपकी ख्वाति सुनकर सोचा आपको भी दिखा लूँ।” फ्लेमिंग ने दुबारा आने का परामर्श देकर वापिस भेज दिया। इस विचित्र व्यवहार पर जोंस को आर्श्चय हुआ और साथ ही क्रोध भी। बिना कोई उपचार का परामर्श दिये वापिस लौटा देने तथा पुनः आने के लिए कहने पर जोंस विचार करते रहे। कोई कारण समझ में नहीं आया। इस बीच अन्य चिकित्सकों से उपचार कराते रहे। जिस मित्र ने फ्लेमिंग से मिलने का सुझाव दिया था। वह पुनः मिला तथा जोंस की स्थिति जाननी चाही। जोंस ने पूरी वार्ता सुनायी। मित्र फ्लेमिंग को जानता था। उसे विश्वास था कि फ्लेमिंग का कोई सुझाव निरर्थक नहीं होगा। उसका कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होगा। उसने जोंस को पुनः फ्लेमिंग से मिलने का आग्रह किया। इस बार मिलने पर फ्लेमिंग के सेक्रेटरी ने तीन दिन बाद मिलने को कहा। नियत समय पर पहुचने पर फ्लेमिंग ने पूँछा “क्या आप सचमुच कष्ट मुक्त होना चाहते हैं ? जोंस को उस प्रश्न पर क्रोध आया, पर नियंत्रित करते हुए उत्तर दिया “इस प्रकार के प्रश्न द्वारा आप अपना और मेरा दोनों का समय नष्ट क्यों कर रहे हैं। मनोचिकित्सक ने फ्लेमिंग ने पुनः यह कहते हुए लौटा दिया कि जब आपकी मेरे ऊपर आस्था दृढ़ हो जाए तभी चिकित्सा को आएं।

जोंस को फ्लेमिंग के विचित्र व्यवहार में अवरुचि उत्पन्न हुई। फ्लेमिंग के चरित्र एवं चिकित्सा के सन्दर्भी में प्रामाणिकता प्राप्त करने के उद्देश्य से यह कार्य गुप्तचरी करने वाली एक फर्म को सौंपा। इसके लिए जोंस को मोटी रकम भी खर्च करनी पड़ी। फर्म ने रिपोर्ट दी कि “फ्लेमिंगमूर्धन्य मनोचिकित्सक हैं। उनके पास आने वाले अधिकाँश रोगी ठीक होकर जा चुके हैं। उनमें पैसे के प्रति थोड़ा भी लालच नहीं है। रिपोर्ट के द्वारा जोंस की आस्था फ्लेमिंग के प्रति सुदृढ़ हो गई।

इस बार फ्लेमिंग ने चिकित्सा करना स्वीकार कर लिया। बातचीत की अवधि में जोंस ने निकटवर्ती झील के किनारे एक सुन्दर मकान बनवाने की इच्छा प्रकट की। भली-भाँति देखने के बाद फ्लेमिंग ने जोंस को परामर्श दिया कि मकान का एक कमरा वह स्वयं अपने हाथों से बनायें, चाहे इसमें कितना भी समय क्यों न लग जाय। उपचार पूँछने पर मनःचिकित्सक ने उक्त कमरा बनाने के उपरान्त आने को कहा। निर्देश को उपचार का अंग मानकर जोंस ने निर्माण कार्य आरम्भ कर दिया। मकान निर्माण सभी यन्त्र खरीद लिये। कला सीखी। छै माह के निरन्तर श्रम से एक कमरा तैयार हो गया। जोंस ने किसी अन्य का सहयोग नहीं लिया। जोंस की अनुपस्थिति के कारण व्यवसाय को भी धक्का लगा। पर उसकी चिन्ता न करते हुए अपने निर्माण कार्य में जुटे रहे। इस बीच जोंस का रोग समाप्त हो गया और स्वास्थ्य में अत्यधिक सुधार हुआ। वह प्रसन्न, स्वस्थ एवं सन्तुष्ट था।

मनोचिकित्सक के पास मिलने चल पडे। अपनी पूरी रिपोर्ट दी। तथा रोग मुक्ति एवं स्वास्थ्य सर्म्बधन का कारण पूँछा, ‘फ्लेमिंग ने उत्तर दिया, “श्रम के प्रति आस्था ही आपके आरोग्य का कारण हुई। इसके बाद व्यवसाय के साथ शारीरिक श्रम उनकी दिनचर्या का अ्रग बन गया। वे जीवनपर्यन्त स्वस्थ बने रहे। अधिकाँश रोग तो वस्तुतः श्रमाभाव के कारण उत्पन्न होते हैं। स्वस्थ एवं प्रसन्न सुक्त जीवन के लिए श्रम के प्रति निष्ठा का होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि मानसिक श्रम।


आँख भी सच कहाँ देखती है

हम जो कुछ अनुभव करते हैं, वस्तुस्थिति प्रायः उससे उलटी ही हुआ करती है। इन्द्रियाँ अपूर्ण जानकारी देती हैं, यह तो सर्वविदित है किन्तु सच्चाई यह भी है कि कईबार वे भ्रामक सूचनाएँ देती हैं और एक तरह से हमें ठगती हैं। उनके ऊपर निर्भर रहकर, प्रत्यक्षवाद को मानकर सत्य की खोज में सफल होना तो दूर रहा वस्तुस्थिति को समझ पाना भी सम्भव नहीं होता। उदाहरण के लिए प्रकाश को ही लिया जाय। प्रकाश क्या है ? उसे विद्युत चुम्बकीय लहरों का बबंडर ही कहा जा सकता है, वह कितना मन्द है ? या कितना तीव्र है ? यह तो उसकी मात्रा पर निर्भर है। लेकिन उसकी चाल हमेशा एक सी रहती है। प्रकाश चाहे सूर्य का हो या बिजली के बल्ब का, कहीं जल रही आग का हो अथवा किसी मोमबत्ती का वह एक लाख छियासी हजार मील की गति से दौड़ता रहने वाला पदार्थ है।

प्रकाश किरणों के सात रंग होते हैं। इन्हीं के सम्मिश्रण से हलके भारी, अनेकानेक रंगों का सृजन होता है। कहने, सुनने और जानने मानने में यह बात बड़ी विचित्र लगेगी कि संसार में कोई रंग नहीं है, हर वस्तु रंग रहित है। किन्तु यह विशेषता अवश्य है कि वे प्रकाश की किरणों में रहने वाले सातो रंगों में से किसी को स्वीकार करें और किसी को वापस कर दें। वस्तुओं की इसी विशेषता के कारण विभिन्न वस्तुएँ विभिन्न रंगों की दिखाई देती हैं।

पदार्थ जिस रंग की किरणों को अपने में नहीं सोखता है वे उससे टकराकर वापस लौटती हैं। इस वापसी में वे आँखों से टकराती हैं और उस टकराव के कारण पदार्थ का अमुक रंग दिखाई देता है। पौधे वास्तव में हरे नहीं होते, उनका कोई रंग नहीं होता, हर पौधा सर्वथा रंगहीन होता है। लेकिन उनमें से अधिकाँश हरे रंग के दिखाई देते हैं। इसका कुल मिलाकर इतना ही कारण है कि उनमें हरी किरणें सोखने की शक्ति नहीं होती इसलिए वे उनमें प्रवेश नहीं कर पाती और वापस लौट आती हैं। यह प्रत्यावर्तित किरण आँखों से टकराती है और पौधे हरे रंग के दिखाई देते हैं। एक तरह से वापस लौटते हुए ये किरणें हमारी आँखों को इस भ्रम में ड़ाल जाती हैं कि पौधे हरे होते हैं। हम इसी छलावे को शाश्वत सच मानते रहते हैं और प्रसंग आने पर पूरा जोर लगाकर यह सिद्ध करते रहते हैं कि पौधे निश्चित रुप से हरे होते हैं। कोई उससे भिन्न बात कहता है तो हँसी उसकी बुद्धि पर आती है, भ्रान्त और दुराग्रही उसी को बताया जाता है। यह जानने और समझने का कोई आधार दिखाई नहीं पड़ता है कि हमारी ही आँखें धोखा खा रही हैं, प्रकृति की जादूगरी कलाबाजी हमें ही छल रही है।

पेड़ पौधों का तो उदाहरण मात्र दिया गया है। हर पदार्थ के बारे में रंगों को लेकर इसी तरह का भ्रम फैला हुआ है । जिन आँखों को प्रामाणिक समझा जाता है, जिस मस्तिष्क की विवेचना पर विश्वास किया जाता है, यदि वही भ्रम ग्रस्त होकर झुठलाने लगे, बहकाने लगे तो फिर प्रत्यक्षवाद को तथ्य मानने का आग्रह बुरी तरह धूल धूसरित हो जाता है। समझा जाता है कि काला रंग सबसे गहरा रंग है और सफेद रंग कोई रेग नहीं है। लेकिन वास्तविकता एकदम उलटी है। काला रंग कोई रंग ही नहीं है और सफद रंग ही सम्पूर्ण रंग है। किसी भी रंग का न दिखाई देना काला रंग है और सात रंग जब सम्मिलित होकर दिखाई देते हैं तो दिखाई देता है- सफेद रंग।

सफेदी क्या है ? सातों रंगों की किरणें को सोख सकने में जो पदार्थ समर्थ है वह सफेद दिखाई पड़ता है। कारण यह है कि उनसे टकरा कर जो प्रकाश किरणें वापस लौटती हैं उनके सातों रंगों का सम्मिश्रण हमारी आँखों से सफेद रंग के रुप में दिखाई पड़ता है। कैसी विचित्र कैसी असंगत-सी लगने वाली और कैसी भ्रम जंजाल भरी बिडम्बना है यह ? जिसे न स्वीकार करते बनता है, और नहीं अस्वीकार करते। अपने ही अपूर्ण उपकरणों पर क्षोभ व्यक्त करते हुए मन मसोस कर बैठना पड़ता है। लेकिन जो बातें वैज्ञानिक विश्लेषणों से निर्ष्कष के रुप में सामने आती है, उन्हें अस्वीकार कैसे किया जाए ?

हलका, भारी, गहरा उथला कालापन भी एक पहेली है। अन्धकार कहीं या कभी गहरा होता है और कहीं या कभी उसमें हलकापन रहता है। यह भी उतने अंशों में प्रकाश को सोखने न सोखने की क्षमता पर निर्भर रहता है। काले रंग का प्रकाश का सारा अंश सोख लेने की क्षमता का एक प्रमाण यह है कि वह धूप में अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक जल्दी और अधिक गर्म हो जाता है।

प्रकाश सतरंगी किरणों का सम्मिश्रण है तो एक नया प्रश्न उभरता है कि प्रकाश किरणों में रंग कहाँ से आता है ? इस स्थान पर उत्तर और भी विचित्र बन जाता है। प्रकाश लहरों की लम्बाई का अन्तर ही रंगों के रुप में दीखता है। वस्तुतः रंग नाम की कोई चीज इस विश्व में कहीं कोई है ही नहीं। उसक अस्तित्व सर्वथा भ्रामक है। विद्युत चुम्बकीय तरंगें ही प्रकाश हैं। इन तरंगों की लम्बाई अलग-अलग होती है, अस्तु उनका अनुभव हमारा मस्तिष्क भिन्न-भिन्न अनुभूतियों के साथ करता है। यह अनुभूति की भिन्नता ही रंगों के रुप में विदित होती है।

बात यहीं तक सीमित नहीं है। रंगों की दुनियाँ बहुत बड़ी है। उस मेले में हमारी जान-पहचान बहुत थोड़ी-सी है। बाकी तो सब अनदेखा ही पड़ा है। लाल रंग की प्रकाश तरंगें एक इंच जगह में तैंतीस हजार होती हैं। जबकि कासनी रंग की सोलह हजार। इन्फ्राटेड तरंगें एक इंच में मात्र 80 ही होती हैं। इसके विपरित रेडियो तरंगों की लम्बाई बीस मील से लेकर दो हजार तक पाई जाती हैं। यह अधिक लम्बाई की बात हुई। जब छोटाई की बात देखी जाये तो पराकासी किरणें एक इंच में बीस लाख तक होती हैं। एक्स किरणें एक इंच की परिधि में पाँच करोड़ से एक अरब तक पाई जाती हैं और गामा किरणें तो कमाल ही करती हैं, वे एक इंच में 220 खरब होती हैं। इतनी सघन घोर विरल होने पर भी इन सबकी चाल एक जैसी है अर्थात वही एक लाख छियासी हजार मील।

प्रकाश किरणों को यंत्रों की अपेक्षा ‘खुली आँखों से देख पाना सम्भव होता तो जिस प्रकार एक सात रंगों का सप्तक हमें दीखता है, उसके अतिरिक्त अन्यान्य ऐसे रंगों के जिनकी आज तो कल्पना कर सकना भी कठिन है। सात रंगों के सड़सठ सप्तक और दीखते हैं अर्थात इन सप्तकों से कुल 469 रंगों का अस्तित्व सिद्ध होता है। इन रंगों के मिश्रण से कितने अधिक रंग बन सकते हैं इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल सात रंगों के सम्मिश्रण से हजारों प्रकार के हलके भारी रंग बने हुए दीखते हैं।

प्रातःकाल के अरुणोदय के समय दिखाई देने वाला लाल रंग का सूर्योदय आँखों के भ्रम जंजाल का एक अच्छा उदाहरण है। सूर्य तो सफेद ही होता है परन्तु सबेरे वह सिर पर नहीं होता, पूर्व दिशा में तिरछी स्थिति में दिखाई देता है इसलिए उसकी किरणों को बहुत लम्बा वायुमण्डल पार करना पड़ता है । इस मार्ग में बहुत अधिक धूलीकण आड़े आते हैं। वे कण लाल रंग को नहीं सोख पाते अस्तु वे किरणें हम तक चली आती हैं और सबेरे का उगता हुआ सूर्य लाल दिखाई पड़ता है। आँखें कितना अधिक धोखा खाती हैं और मस्तिष्क कितनी आसानी से बहक जाता है इसका एक उदाहरण रंगों की दुनियाँ में पहला पैर रखते ही विदित हो जाता है। अन्य विषयों में तो अपनी भ्राँति का कहीं कोई ठिकाना ही नहीं हैं। जीवन का स्वरुप, प्रयोजन और लक्ष्य इसी तरह के भ्रम जंजाल में फँसकर भुला दिया जाता है। आत्म जन की सूक्ष्म दूष्टि यदि मिल सके तो लगेगा कि हम अज्ञान, माया और भ्रम के किस जंजाल में फँसे हुए हैं। और उस जंजाल से निकले बिना कोई त्राण नहीं है।


मनोबल ही जीवन शक्ति है

इटली के एक प्रमुख शहर गिएरुपे में बारुद के एक कारखाने में फिनोज पी॰ वेग नामक फोरमैन काम करता था। इस कारखाने के बारुद के मिश्रण से धातुओं की छोटी परतों में छेद करने का काम होता था। फिनोज पी॰ वेग के साथ एक विचित्र दुर्घटना घटी। हुआ यह कि वह सुराख करने के एक बरमे के पास काम कर रहा था। बरमा करीब पौने चार फीट लम्बा और तेरह पौंड वनज का था। काम चल ही रहा था। कि अचानक न जाने क्या गड़बड़ी आई जो मशीन से एक भारी ध्माके के साथ बरमा निकल कर उचटा और वेग के मस्तिष्क को बेधता हुआ बाहर निकल गया। बरमा चेहरे के बाँई ओर वाले भाग से घुसा था और भतरी हड्डियों को तोड़ता हुआ आँख के निचले भाग को छेदता हुआ बाहर निकल गया। आस-पास काम कर रहे कर्मचारियों को लगा कि वेग के परखचे उड़गये हैं।

वह झटके के साथ नीचे गिरा और ऐंठ गया। फिर भी आर्श्चय था कि उसमें जान बाकी थी। उसे कारखाने से करीब एक मील दूर स्थित अस्पताल में पहुँचाया गया। अस्पताल के प्रमुख चिकित्सकों ने उसका परीक्षण किया आर मुख्य चिकित्साधिकारी इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि घायल के साथ कितना ही परिश्रम क्यों न किया जाये असे बचाया नहीं जा सकता। फिर भी चिकित्सकों ने अपना कर्त्तव्य निभाया और साधारण मरहम पट्टी कर दी। आर्श्चय तो उस समय हुआ जब उसी दिन वेग की बेहोशी टूटी। डाँक्टर बेहोशी टूटने की आशा करना तो अलग रहा, इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वेग की साँसें कितनी देर तक साथ देती हैं ?

उसका खन बहना बन्द नहीं हुआ था, फिर भी दर्द को सहा और रात दस बजे वहाँ उपस्थित लोगों से बातें करने लगा। इसके बाद तो डाँक्टरों में भी वेग के जीवित बच जाने की आशा जगी। वह तेजी से अच्छा होने लगा और तीन माह तक अस्पताल में रहने के बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से घर आ गया। अस्पताल के अधिकारियों ने जो अन्तिम रिपोर्ट तैयार की, वह विश्व के मूर्धन्य चिकित्सकों के लिए आज भी अध्ययन और आर्श्चय की वस्तु बनी हुई है। वेग की नेत्र ज्योति तो चली गई थी, पर उसका बाकी मस्तिष्क पूरी तरह ठीक हो गया और वह अपना सामान्य जीवन क्रम ठीक तरह से चलाने लगा। इतने भयानक मस्तिष्कीय आघात के बाद भी कोई व्यक्ति जीवित बच सकता है, वरन् स्वस्थ सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है, इस पर शरीर विज्ञानियों को सहसा विश्वास नहीं हो सकता। परन्तु वेग की टूटी हुई खोपडी के अस्थि खण्ड तथा उससे सम्बन्धित पदार्थ कागजात हार्वर्ड मेडिकल कालेज बुकलिन के संग्रहालय में सुरक्षित रखी हैं, साथ ही वह बरमा भी रखा हुआ बरमा भी रखा हुआ है जो वेग की खोपड़ी को चीरता हुआ बाहर निकला था।

यह घटना इस बात की साक्षी है कि जीवन मृत्यु से अधिक बलवान है। यहाँ जीवन का अर्थ जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि नहीं है, अपितु उस जीवटता से है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को सक्षम बनाये रखती है। शरीर वैसे हाड़-माँस से बना दिखाई देता है। इसे मिट्टी का पुतला और क्षणभंगुर कहा जाता है, परन्तु इसके भीतर विद्यमान जीवटता को देखते हैं तो कहना पडेगा कि उसकी संरचना अष्ट धातुओं से भी मजबूत तत्वों द्वारा मिलकर बनी हुई है। छोटी-मोटी, टूट-फूट, हारी-बीमारी तो रक्त के श्वेतकण तथा दूसरे संरक्षणकर्ता, शामक तत्व अनायास ही दूर करते रहते हैं, परन्तु भारी संकट आ उपस्थित होने पर भी यदि साहस न खोया जाय तो उत्कट इच्छा शक्ति के सहारे उनका सामना सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

निश्चित ही मृत्यु की विभीषिका और अनिवार्यता से इन्कार नहीं किया जा सकता, न ही विपत्ति का संकट हल्का करके आँका जा सकता है, परन्तु इतना होते हुए भी जिजीविषा की-जीवन आकाँक्षा की-सामर्थ्य सबसे बडी है और उसके सहारे संकटों को पार किया जा सता है।

जीवन के लिए संकट प्रस्तुत करने वाले क्षण बहुत लोगों के सामने आते हैं। उनमें से आधे लोग तो भयभीत होकर हिम्मत हार बैठते हैं। और उस कातर मनःस्थिति में ही बेमौत मारे जाते हैं। पेड़ के नी चीते को खड़ा देखकर बन्दर हक्का-बक्का हो जाता है और हड़बडी घबड़ाहट में नीचे आ गिरता है। चीता उसे चुपचाप मुँह में दबाकर चल देता है। विपत्ति की घड़ी सामने आने पर अक्सर लोग ऐसी ही भयभीत स्थिति में फंस जाते हैं और बेमौत मरते हैं। इसके विपरित यदि उस कठिन समय में उनने अपने मनोबल को स्थिर रखा तो बहुत सम्भव है कि वह विपत्ति बच जाती। इच्छा शक्ति की प्रचण्डता अंग प्रत्यंग में ऐसी अद्भुत सुरक्षा उत्पन्न कर देती है जिसके सहारे माटी का पुतला कही जाने वाली अपनी यही देह मृत्युँजय बन जाती है। मनस्वी और मनोबल सम्पन्न लोगों के ऐसे अगणित उदाहरण अपने चतुर्दिक बिखरे देखे जा सकते हैं।

सन् 1891 की घटना है। एक अंग्रेज मछियारा अपना जहाज लेकर दलबल के साथ ह्वेल मछली का शिकार करने के लिए निकला। आकलैंड द्वीप समूह के पास उसे एक विशालकाय ह्वेल दिखाई पड़ी। दो नावों पर सवार मछुओं ने उस पर ‘भाला’ द्वारा आक्रमण किया। ह्वेल ने पलटा खाया तो एक नाव उसकी पूँछ की चपेट में आ गई। एक नाविक तत्काल डूब गया। दूसरा जेम्स वर्टली गायब हो गया। उसे ह्वेल ने निगल लिया था उसके भी जीवित न बचने की आशा थी। टनों भारी ह्वेल मछली के उदर में समा जाने के बाद साढ़े पाँच छह फुट आदमी का बच सकना सम्भव भी कैसे हो सकता है ? पर यह सम्भव हुआ।

वर्टली जब ह्वेल मछली के पेट में पहुँच गया तो भी उसने अपना होशो-हवास कायम रखा और उसने अपनी पेंट की जेब में रखे हुए शिकारी चाकू से ह्वेल का पेट चीरना आरम्भ कर दिया। हालाँकि ऐसा करने में बडी परेशानी हो रही थी। भीतर की जकड़न कुछ करने नहीं दे रही थी, फिर भी उसने अपना प्रयास जारी रखा और ह्वेल का पेट चीरकर बाहर आने में सफल हो गया। दो दिन बाद वह अचेत अवस्था में समुद्र की सतह पर तैरता हुआ पाया गया। नाविकों ने उसे देखा तो बाहर निकाला और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया। ह्वेल मछली के पेट में रहने के कारण उसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था। उसका सारा शरीर पीला पड़ चुका था और चमड़ी का रंग तो अन्त तक वैसा ही बना रहा। तीन हप्ते तक उपचार के बाद उसके मस्तिष्क ने काम करना शुरु किया और उसकी बेहोशी टूटी। धीरे-धीरे वह ठीक होता गया और करीब दो महीने में पूरी तरह स्वस्थ होकर घर वापस आ गया।

ह्वेल मछली के पेट में पहुँच जाने के बाद बर्टली को अपने जीवन की रक्षा के लिए जो संघर्ष करना पड़ा था उसका विवरण “डेट डिवैट्स” पत्र के जनवरी 1892 अंक में प्रकाशित हुआ था। वर्टली ने अपने अनुभव बताते हुए लिखा है कि “ह्वेल के मुँह में मैंने एक अंधेरी गुफा में घसीटे गए व्यक्ति की तरह प्रवेश किया। उस तालाब जैसे पेट में साँस लेने की गुँजाइश तो थी पर गर्मी इतनी तेज पड़ रही थी मानों खोलते पानी में उबाला जा रहा हो, फिर भी मैंने साहस से काम लिया। बड़ी कठिनाई से मैंने अपना चाकू निकाला और खोला। मैं मछली की आँतों में बेहतर कसा हुआ था। हिलने-डुलने की गुँजाइश नहीं थी फिर भी किसी तरह चाकू निकाला और मछली का पेट चीरने का सिलसिला चलाया। पेट की परत इतनी मोटी थी कि उसकी परतों को फाड़ने में घण्टों लग गये तब कहीं बाहर निकलने का रास्ता बन सका।

शरीर की शक्ति, सामर्थ्य सीमित है यह ठीक है, पर शरीर से भी अधिक शक्तिशाली और सामार्थ्यवान है- मनोबल। यह मनोबल दुर्बल से दुर्बल काया को भी मृत्युँजयी बना देता है, बड़े से बड़े संकटों को भी पार करा देता है और इसका अभाव साधारण संकटों में भी परास्त कर देता है। स्वामी विवेकानन्द ने मनोबल की महत्ता बताते हुए कहा है, “मनोबल ही सुख सर्वस्व है। यही जीवन है और यही अमरता है तथा मनोदौर्बल्य ही रोग है, दुःख और मृत्यु है।” मनोबल के द्वारा शरीर को अजेय वज्र के समान बनाया जा सकता है। यदि इस शक्ति का भली-भाँति विकास किया जाय तो साधारण से दीखने वाले मानवीय व्यक्तित्व में ही ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न की जा सकती है जो साधारणतया असम्भव महसूस पड़ती हैं। परन्तु जो लोग शरीर पर मन के नियंत्रण का तथ्य जानते हैं उन्हें यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि इस शक्ति के बल पर देह के अवयव अपनी प्रकृति बदल सकते हैं और मन की इच्छानुसार ऐसी हलचलें भी कर सकते हैं। जो सामान्य प्रयत्नों के द्वारा सम्भव ही प्रतीत हो। साम्राज्ञी मेरीलुइस के संबंध में प्रसिद्ध है कि वह अपनी इच्छानुसार अपने कानों को बिना हाथ से छुए किसी भी दिशा में मोड़ सकती थीं और आगे पीछे हिला सकती थी।

एक फ्राँसीसी अभिनेता अपनी इच्छानुसार अपने बालों को घुमा सकता था। बालों को गिराने, उठाने और घुँघराले बनाने की क्रिया इच्छानुसार कर सकने में अपनी अद्भुत क्षमता के बल पर उसने ढ़ेरों रुपये कमाये। वह एक बाल को घुघ्राला बना लेता और ठीक उसी के बगल वाला बाल चपटा कर लेने का अपना आर्श्चयजनक करतब भी कर दिखाता था। डाक्टरों ने उसका परीक्षण किया और ‘प्रो॰ आगस्ट कैवेनीज’ ने बताया कि उसने अपने सिर की माँस-पेशियों और त्वचा के तन्तुओं को अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा असाधारण रुप से विकसित और संवेदनशील बना लिया है।

एक व्यक्ति ने अपने पेट को प्रशिक्षित किया और उसने असाधारण खुराक खाने में ही नहीं उसे पचाने में भी सफलता प्राप्त की। ग्रीस का क्रोटोनाकामिलो नामक पेटू अधिक खाने और पचाने के लिए प्रसिद्ध था। वह एक दिन में 150 पौंड माँस तक खा जाता था। डेट्रायर (मिशीगन) के एडिको, जो एक रेल्वे मजदूर था, ने तो कमाल ही कर दिया। उसने 60 सुअरों के माँस से बनी हुई टिकिया एक दिन में खाकर पचाई। एडिको की सामान्य खुराक सत्तर आदमियों के बराबर थी। उसने केवल इसीलिए शादी नहीं की कि वह जो कमाता था उससे उसका अपना पेट ही नहीं भरता था। फिर बीबी को क्या खिलाता? उसे जितना कुछ वेतन मिलता था, वह उसके लिए प्रायः कम पड़ता था और ऐसी दश में उसके मित्र लोग उसकी सहायता करते थे ताकि वह भूखा न मरे।

कहा जाता है कि नींद न आने पर आदमी पागल हो जाता है और अकाल मृत्यु हो जाती है किन्तु ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें बिल्कुल न सोने वाले लोग सामान्य जीवन जीते रहे और अपना काम ठीक प्रकार चलाते रहे। पेरिस का प्रख्यात वकील जैक्विसल हरवेट 72 वर्ष तक जीवित रहा। इस अवधि में वह 68 वर्ष तक एक क्षण के लिए भी नहीं सोया। चार वर्ष की आयु में ही उसकी नींद खो गई थी। हुआ यह था कि फ्राँस के सम्राट सोलहवें लुई को जब सन् 1793 में फाँसी दी गई तो जैक्विसल भी अपनी माँ के साथ वह दृश्य देखने गया। शूली पर चढ़ाये जाने का दृश्य देखकर जैक्विसल के मन में ऐसी दहशत बैठी कि वह बुरी तरह डर गया और मूर्छित अवस्था में उसे अस्पताल पहुचाया गया। वहाँ वह ठीक तो हो गया, पर उसकी नींद बिल्कुल गायब हो गई। वह इसके बाद एक क्षण के लिए भी नहीं सोया। परन्तु इसका उसके स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा।

कहा गया है कि मन की शक्ति का कोई वारापार नहीं हैं। कई बार तो सये शक्तियाँ अनायास ही जागृत हो जाती हैं, परन्तु ऐसा होता अपवाद रुप में ही है। उन्हें जागृत करने के अलग अभ्यास है जिन्हें योग-साधना भी कहा जा सकता है।

यदि मनोबल का महत्व समझ लिया जाये और उसे अर्जित किया जा सके, संचित किया जा सके तो न केवल बडे-बडे विचलित कर देने वाले संकटों को आसानी से पार किया जा सकता है, वरन् चमत्कार कही जाने वाली सफलताँ भी अर्जित की जा सकती हैं।


नियंत्रण भावनाओं का भी किया जाय

मस्तिष्क यों हर प्राणी के शरीर में होता है परन्तु सभी प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य का मस्तिष्क सर्वाधिक विकसित है। उसके बल पर ही वह संसार के सभी प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध हो सका है। और उनपर अपना आधिपत्य जमा सका। मोटे तौर पर मस्तिष्क के क्रिया-कलापों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-स्मृति, चिन्तन और भावनायें। ये तीनों क्रियायें क्रमशः प्रभावशाली, महत्वपूर्ण और जटिल होती है। आलोच्च विषय का सम्बन्ध भावनाओं से है जो सभी मनुष्यों मस्तिष्क में जन्मती है। स्मृति और विचार की दृष्टि से कोई व्यक्ति कमजोर और बलवान होते हुए भी भावना क्षेत्र में कम ज्यादा नहीं होता। वे सभी व्यक्तियों के मस्तिष्क में जन्मती है।

वस्तुतः मनुष्य का सारा जीवन भावनाओं से ही संचालित होता है। दुःख और आनन्द, घृणा और प्रेम, क्रोध और सहिष्णुता, कृपणता और उदारता, सन्देह और विश्वास आदि भावनायें मस्तिष्क से ही उपजती हैं तथा मनुष्य की विभिन्न गतिविधियों को संचालित, प्रेरित करती हैं। भावनाओं के क्रीड़ा केन्द्र वाला मस्तिष्क का रुप अन्तःकरण भी कहा जाता है। इन भावनाओं का मनुष्य जीवन पर, उसके शरीर स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है यही मनोविज्ञान का विषय है।

शरीर और मनःस्थिति पर भावनाओं के प्रभाव को मुख्यतः दो भागों में समझा जा सकता है। पहले प्रकार की भावनाएँ वे हैं जिनके कारण शरीर के विभिन्न भाग अतिरिक्त रुप से उत्तेजित हो उठते हैं तथा दुःख क्षोभ से लेकर रोग बीमारियों जैसे विकार उत्पन्न होने लगते हैं। दूसरी श्रेणी में उन भावनाओं को रखा जा सकता है जिनका प्रभाव मनःसंस्थान और शरीर संस्थान पर अच्छा पडता है। पहली श्रेणी की भावनाओं में क्रोध, चिन्ता, भय, शोक, ईर्ष्या, द्वेष को रखा जा सकता है तथा दूसरी श्रेणी में आशा, उत्साह, विश्वास, प्रेम, साहस, प्रफुल्लता आदि भावनाओं को रखा जा सकता है।

पहले प्रकार की भावनायें शरीर में रोग और मन में ‘बुझाहट’ के लक्षण पैदा कर देती है जबकि वास्तव में शरीर में रोग का कोई कारण नहीं होता। लम्बे समय तक अध्ययन, परीक्षण करने के बाद मनःशास्त्री इस निर्ष्कष पर पहुँचे कि वे स्नायुओं तथा नलिका विहिन ग्रन्थियों द्वारा शरीर को प्रभावित करती हैं। हमारे शरीर में दो प्रकार के स्नायु (नर्व्स) होते हैं जिन्हें ऐच्छिक और अनैच्छिक स्नायु कहा जाता है। शरीर में भीतरी और बाहरी सभी क्रियाओं का संचालन स्नायुओं द्वारा ही होता है। ऐच्छिक स्नायु से हम अपनी इच्छानुसार काम लेते हैं जैसे उठना, बैठना, चलना, किसी चीज को पकड़ना।

अनैच्छिक स्नायुओं द्वारा होने वाले कार्यों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। हृदय की धड़कन, फेंफड़ों द्वारा श्वसन, पाचन, स्वेदन, गुर्दों की क्रिया आदि कार्य अनैच्छिक स्नायुओं द्वारा ही सम्पादित होते हैं। भावनाओं का प्रभाव इन्हीं स्नायुओं पर होता है। इन स्नायुओं का नियंत्रण निर्देशन, मस्तिष्क में स्थित ‘हाइपोथैल्मस’ केन्द्र द्वारा होता है।

प्रसिद्ध शरीरशास्त्री डा॰ बर्नहार्ट का कहना है कि ‘हाइपोथैल्मस’ केन्द्र भावनाओं के प्रति बहुत संवेदनशील है। फलतः भावनाओं का प्राथमिक प्रभाव शरीर के किसी भी भाग में होने वाली पीड़ा के रुप में होता है। उदाहरण के लिए अत्यधिक चिन्ता के समय सिरदर्द होने लगता है, दुःखद घटना देखकर या समाचार सुनने पर चक्कर से आने लगते हैं। कोई भयावह दृश्य देखकर या अप्रत्याशित समाचार सुनकर हृदय की धड़कनें बढ़ जाती है। डा॰ बर्नहार्ट का कहना है कि सिर दर्द के साथ-साथ गर्दन का दर्द, छाती का दर्द, पेट का दर्द, पेट्, बाँहों, छातियों, पिण्डलियों आदि शरी के किसी भी स्थान में होने वाले दर्द का अस्सी प्रतिशत कारण भावनाओं द्वारा ‘हाइपोथैल्सम’ नामक केन्द्र का प्रभावित होना है।

पेशियों में उत्पन्न होने वाली पीड़ा के अतिरिक्त भावनायें कईबार रक्त वाहिनी नलिकाओं को भी प्रभावित करती हैं। फलस्वरुप कई तरह के रक्तविकार उत्पन्न हो जाते हैं। पित्ती उछलना, खुजली लगना, और यहाँ तक कि चिन्ता और परेशानी के कारण एग्जिमा जैसा चर्म रोग होने के तथ्य भी प्रकाश में आये हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि भावनाओं के प्रभाव से कोई एक प्रकार का लक्षण ही उत्पन्न हो। कईबार भिन्न-भिन्न प्रकार के लक्षण भी देखे जाते हैं। डा॰ जे॰ रेमण्ड ने अपनी पुस्तक ‘डिसीज एण्ड रीजन’ में लिखा है- मेरे पास कईबार ऐसे रोगी आते हैं जो कई तरह-तरह की शिकायतें करते हैं। कोई कहता है मुझे भूँख नहीं लगती, किसी की तबीयत गिरी पड़ी रहती है, कोई लगातार थकावट महसूस करता, किसी का काम में मन नहीं लगता। मैं सभी की जाँच करता हूँ। अधिकाँश के शरीर में रोग का कोई कारण नहीं होता। फिर मैं उनके रोजमर्रा के जीवन, पारिवारिक स्थिति आदि के बारे में पूँछने लगता हूँ। इससे वे कुछ आत्मीयता अनुभव करते हैं और अपनी समस्या तथ कठिनाइयाँ मुझे बताने लगते हैं। वहीं मैं उनके रोग का कारण पकड़ लेता हूँ। प्रायः ऐसे व्यक्ति चिन्ताओं, परेशानियों, समस्याओं, शंकाओं, सन्देहों और कितने ही भयों से लदे रहते हैं। उनका यह भावना-क्षोभ ही उनके रोग का वास्तविक कारण होता है।

भावनायें स्नायुओं के अलावा शरीर को एक दूसरे ढ़ंग से भी प्रभावित करती हैं। शरीर के रक्त में कई तत्व विभिन्न नलिका विहिन ग्रन्थियों द्वारा मिलते रहते हैं। इन ग्रन्थियों का पता डा॰स्टीनाक ने सर्वप्रथम 1920 में लगाया और अपने शोध परिणाम प्रकाशित किया। इन नलिका विहिन ग्रन्थियों- जिन्हें ‘एण्डोक्राइम ग्लैण्डस्’ भी कहा जाता है- की खोज से मानव शरीर के अध्ययन में एक नया अध्याय खुला। पूरे शरीर में से ग्रन्थियाँ सात प्रकार हैं जिन्हें-’पिट्यूटरी,’ ‘थायराइड,’ ‘पेराथायराइड,’ ‘पैन्क्रियाज’ गोनाड्स’ थायसम और ‘एड्रेनल्स ग्लैण्डस्’ कहा जाता है।

ये ग्रन्थियाँ शरीर के विकास, यौवन और शक्ति को बनाये रखने में महत्वपूर्ण केन्द्रों पर एक विशेष स्त्राव (हारमोन्स) रक्त में मिलाया जाता है जो शरी के अंग-प्रत्यंग में पहुँचकर उन्हें प्रभावित करता है। इन ग्रन्थियों द्वारा स्त्रावित होने वाले (हारमोन्स) बारह प्रकार के होते हैं। इस विश्लेषण में अधिक जानने की आवश्यकता नहीं है। इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि मनुष्य का पूरा शरीर और व्यक्तित्व (हारमोन्स) द्वारा प्रभावित होता है।

शरीर जब किसी रोग के या कीटाणु के संक्रमण का शिकार होता है तो उन ग्रन्थियों से कुछ ऐसे हारमोन्स निकलते हैं जो रक्तकणों में उनसे लड़ने की शक्ति पैदा करते हैं। और स्वयं भी कीटाणुओं से संघर्ष करते हैं, फलतः रोग की अवस्था में शरीर एक युद्धभूमि बन जात है। इसी कारण बेचैनी, क्षोभा और अशान्ति का अनुभव होने लगता है। चिन्ता, भय और परेशानियों के समय ‘एण्डोक्राइमग्लैण्डस्’ उन्हीं हारमोन्स को स्त्रावित करने लगती है। संघर्ष उनका स्वभाव है इसलिए कोई कीटाणु न मिलने पर वे रक्त में विद्यमान रक्षक तत्वों को ही चट करने लगते हैं। फलतः इन भावनाओं के कारण बेचैनी, परेशानी और कष्ट तो होता ही है, शरीर में रोगों को आमन्त्रण भी मिलता है क्योंकि शरीर की रक्षापंक्ति दुर्बल पड़ जाती है। परिणामस्वरुप शरीर कभी भी रोग का शिकार हो जाता है।

इस प्रकार की भावनाओं से कुसंस्कारी मन और विकृत धारणाओं की ही उपज होती है। किसी भी वस्तु या घटना को उसके सही परिप्रेक्ष्य में न दीखने, जरा-सी अप्रिय घटना को भी अपने लिए बहुत बड़ा संकट मान लेने, अत्यधिक आत्मकेन्द्रित और स्वार्थ परायण जीवन व्यतीत करने के कारण इस प्रकार की दुःखद भावनायें व्यक्ति के मस्तिष्क में घर कर जाती हैं और वहाँ अपना अड्डा बना लेती हैं।

इसके विपरित वस्तुओं तथा घटनाओं को उनके यथार्थ सर्न्दभ में देखने और सही ढ़ंग से सोचने समझने की आदतें व्यक्ति में मंगलमय और सुखद भावनाओं को जन्म देती हैं। इसी रीति-नीति को अपनाने, चिन्तन पद्धति का अभ्यास होने के बाद स्वभाव में सम्मिलित सुखद भावनायें सब ओर से सुख-शान्ति की वर्षा करती हैं। आशा, उत्साह, प्रफुल्लता और प्रेम के समय ये सुखी ग्रन्थियाँ कुछ दूसरे ही प्रकार के हारमोन्स निकालती है परिणामस्वरुप उन क्षणों में शरीर को एक सुखद आभास की अनुभूति होती है। दुःखद भावनाओं के प्रभाव को प्रत्यक्ष देखना हो तो एक क्रोधित मनुष्य के चेहरे के हावभाव से देखा जा सकता है। मनुष्य जब क्रुद्ध होता है तो उसका चेहरा लाल हो जाता है, आँखों के पलक चौडे पड़ जाते हैं, नेत्रों की सफेद पुतलियाँ सुर्ख हो उठती हैं, होंठ भिंच जाते हैं, जबड़ा जकड़ जाता है, हाथों की मुट्ठियाँ भिंच जाती हैं और शरीर काँपने लगता है। किसी हद तक उसकी आवाज भी अस्वाभाविक होने और लड़खड़ाने लगती है।

शरीर की स्वाभाविक स्थिति में होने वाले ये परिवर्तन तो बाहरी हैं। इनके कारण तो भीतर होने वाले परिवर्तनों में विद्यमान रहते हैं जो इनसे अधिक गम्भीर और घातक होते हैं। आवेश के समय शरीर के भीतरी अ्रगों में कई परिवर्तन होने लगते हैं। जैसे सारे शरीर के खुन में जमने की शक्ति बढ़ जाती है। प्रकृति इस प्रकार जीवन रक्षा की पूर्व व्यवस्था करने लगती है। प्रकृति किन उपायों द्वारा जीवन के रक्षा के प्रयत्न करती है यह जानकर विस्मय विमुग्ध हो जाना पड़ता है। खून जमने की क्रिया प्रकृति का एक रक्षात्मक उपाय है क्रोध के समय लडाई होने और चोट लगने की बहुत सम्भावना रहती है। स्वाभाविक है कि चोट में खून भी बहुगा ही। प्रकृति खून में पहले ही जमाव लाने लगती है ताकि चोट लगने पर कम से कम खून बहे।

इसी प्रकार रक्तपरिभ्रमण क्रिया में एक परिवर्तन यह भी आता है कि उस समय ‘श्वेत रक्तकण’ करोडों की संख्या में बढ़ जाते हैं जो घाव को भरने और विजातिय तत्वों को शरीर में प्रवेश न होने देने का काम करते हैं। क्रोध के समय पेट की पेशियाँ इतनी सख्ती से ऐंठने लगती हैं कि उसमें कोई चीज आगे न बढ़ पाये। कुछ परिवर्तन इनसे भी गम्भीर होते हैं जैसे हृदय की गति तेज हो जाना और रक्त दबाव बढ़ जाना। प्रकृति के ये सारे उपाय क्रोध के समय बाहरी अथवा भतरी कारणों से होने वाली क्षति को रोकने के लिए रक्षात्मक उपाय ही हैं परन्तु यही उपाय कई बार घातक सिद्ध हो जाते हैं। रक्तचाप व हृदय की गति बढ़ जाने के कारण कईबार क्रोधित व्यक्ति तुरन्त काल के पात्र बन ग्रास बन जाते हैं। रक्त में होने वाले परिवर्तन के कारण मस्तिष्क की रक्तवाहिनी नस फट जाती है।

आकस्मिक उत्पन्न संकट के समय हड़बड़ाहट में किये गये रक्षात्मक उपाय जिस प्रकार बाद में लम्बे समय तक कई परेशानियाँ पैदा कर देते है। उसी प्रकार प्रकृति के ये उपाय तत्काल जीवन रक्षा का उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त बाद की परेशानियाँ पैदा करते हैं जैसे पेट का दर्द, अधिक दबाव पडने के कारण, थका हुआ हृदय और मृत्यु का खतरा हमेशा बना रहता है।

उत्तेजना के समय शरीर संस्थान पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव शरीर की सुरक्षित शक्ति को नष्ट करता है। यही कारण है कि आप ‘तुनक मिजाज’ हमेशा चिन्तित, खिन्न और उदास रहने वाले व्यक्ति को कभी भी हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ और शक्तिशाली नहीं पायेंगे।

दुःखद या निषेधात्मक भावनाओं से शरीर प्रभावित होता है और सुखद या विधेयात्मक भावनाओं से भी। लेकिन प्रभाव भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। इसका अन्तर असफलता जनित क्षोभ और सफलता जनित प्रफुल्लता सं समझा जा सकता है। इसलिए भावनाओं को सन्तुलित रखने और उन पर नियंत्रण करने को ही जीने की कला कहा गया है। किसी विचारक ने कहा है कि- “हम मंगलमय भविष्य की आशा रखें, वर्तमान में जियें, असन्तोष से दूर रहें, प्रफुल्ल रहें और केवल अपने लिए ही न जियें तो भय, चिन्ता, उदासीनता और स्वार्थ के कारण उत्पन्न होने वाले कितने ही संकटों से बच सकते हैं। वस्तुतः जीवन को आनन्दपूर्ण बनाने का यही सही ढ़ंग है क्योंकि सारा जीवन और व्यक्तित्व ही भावनाओं का खेल है। किसी कवि ने भावना क्षोभ की तुलना दावानल से करते हुए कहा है-

चिन्ता ज्वाला, शरीर वन, दावा लगि लगि जाय। प्रकट धुँआ नहि देखिए, उर अन्तर धुधियाय॥


मस्तिष्क को सृजन प्रयोजनों में लगायें

सोचा यह जाता है कि बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को सम्पन्न अथवा विपन्न बनाती हैं। मान्यता यही है कि साधनों के सहारे ही सफलता, असफलता मिलती है। कुटुम्बी, सम्बन्धी ही कष्ट देते और सुखी बनाते हैं। भाग्य ही उठता, गिराता है। यह मान्यताएँ प्रत्यक्ष घटना क्रम के अनुसार तो सही प्रतीत होती है, पर यदि गहराई में उतर कर देखा जाय तो प्रतीत होगा वस्तुस्थिति भिन्न है। अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरुप व्यक्तित्व बनता है और उसी के चुम्बकत्व से खिंचती हुई भली या बुरी परिस्थितियाँ हमारे निकट बढ़ती चली आती हैं। इस संसार में भला-बुरा सबकुछ है। इस बाजार में से अपनी इच्छानुसार हम जो भी चाहें खरीद सकते हैं। गलती इतनी ही होती है कि सुख चाहते तो हैं, पर उसके साधन जुटाने की अपेक्षा गलत संग्रह कर लेते हैं और प्रतिकूल परिणाम निकलने पर परिस्थितियों एवं व्यक्तियों को दोष देते हैं।

हँसती-हँसाती, खिलती-खिलाती, हलकी-फुलकी जिदंगी जी सकना हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है यदि अपने चित्त क्षेत्र का दूरदर्शिता के आधार पर पुननिर्माण करने के लिए अभिनव साहस जुटाया जा सकना सम्भव हो सके। जो मिला हुआ है उस पर हर्ष मनाया जाय, सन्तोष किया जाय और गर्व किया जाय। जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम उपयोग करने की योजना बनाई जाय। साथ ही अधिक पाने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास किया जाय। आवश्यक नहीं आकाँक्षा के अनुरुप मात्रा में ही प्रतिफल मिले। परिस्थितियों के चक्र में बहुत करने पर भी स्वल्प परिणाम निकलने की आशंका बनी ही रहती है। ऐसी दशा में स्वल्प सन्तोष का दृष्टिकोण रखा जाना बुद्धिमतापूर्ण है। जितना मिला उतने की खुशी मनाई जाय और शेष के लिए फिर नये सिरे से नये उत्साह और तैयारी के साथ प्रयत्न आरम्भ किया जाय। इस प्रकार थोड़ी-थोड़ी सफलताएँ मिलते चलने पर भी प्रसन्नता बनी रह सकती है। खिलाड़ी की तरह हार-जीत को बहुत महत्व न देते हुए खेल को अपने आप में एक मनोविनोद और स्वास्थ्य सर्म्वधन का स्थिर आधार माना जा सकता है। नाटक के पात्र कई तरह के प्रिय-अप्रिय अभिनय करते हैं। उनके लिए यह सब विनोद, कला एवं आजीविका उपार्जन भर होता है। नाटक में प्रदर्शित घटनाओं की कोई भली-बुरी छाप उनके मन पर नहीं होती। इसी दृष्टि से यदि हलकी-फृलकी जिन्दगी जीने का निश्चय किया जा य तो मात्र दृष्टिकोण बदलने से काम चल सकता है। वर्तमान परिस्थितियाँ जो आज जटिल दिखाई पड़ती हैं, कल ही सामान्य कामचलाऊ सन्तोषजनक प्रतीत होने लगेंगी और प्रतीत होगा कि अवरोधों एवं विक्षोपों का बहुत बडा पहाड़- धुँए के बादलों की तरह विवके पवन के एक ही झोंके में उड़ता हुआ कहीं से कहीं चला गया। सन्तुलित और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाते ही हमारी आधी से अधिक चिन्ताओं-समस्याओं का समाधान निकलता आता है और चित्त पर लदा हुआ अनावश्यक और अवास्तविक बोझ सहज ही हलका हो जाता है।

दृष्टिकोण की विकृतियाँ हमें अकारण ही उलझनों में पटकती और खिन्न रहने के लिए विवश करती हैं। हम गरीब हैं या अमीर इसका निर्णय दूसरों के साथ तुलना करने से ही होता है। जब अपने को अमीरों की तुलना में तोला जाता है तो हलके पड़ते हैं और गरीब लगते हैं। पर यदि अपने से दरिद्रों के साथ तोलना आरम्भ करें तो प्रतीत होग कि पग-पग पर हार होती रही है, ठोकरें लगी हैं और पराभव का बार बार मुँह देखना पड़ा है। किन्तु यदि सफलताओं की दूसरी सूची तैयार की जा सके तो प्रतीत होगा कि सौभाग्य ने कितना साथ दिया है और ईश्वर के अनुग्रह से समय समय पर मिलती रही सफलताओं का कितना अधिक अवसर मिलता रहा है। सुख-दुःख, सफलता-असफलता, लाभ-हानि के उभय पक्षीय अवसर नित्य ही सामने आते हैं। इनमें हम जिन्हें महत्व देते हैं वे ही सामने खडे हो जाते हैं। सौभाग्य और दुर्भाग्य में से जिन्हें भी हम गिनना चाहें, उन्हीं की भरमार दिखाई देगी। संसार में न कोई पूर्ण सुखी है और न दुःखी। मिश्रित जीवन क्रम ही हर किसी के सामने रहता है। रात-दिन मिलकर ही समय चक्र घूमता है। नमक और शक्कर के मिले-जुले स्वाद ही सरस लगत हैं। ताने और बाने से मिलकर ही कपड़ा बुना जाता है। जन्म और मरण के चक्र पर जीवन की धुरी घूमती है। एक की हानि दूसरे का लाभ बनती है। यदि इस दुरंगी दुनियाँ की संरचना को विवेकपूर्ण समझा जा सके तो धूप-छाँव का-झूले पर आगे-पीछे जाने का-समुद्र के ज्वार-भाटे का आनन्द लिया जा सकता है। दुनियाँ हमारे लिए नहीं बनी है। अपनी इच्छानुरुप ही सबकुछ होता रहे ऐसा सम्भव नहीं। संसार भर से काँटें नहीं बीने जा सकते। अपने पैर में तूते पहन कर चला जा सकता है और काँटों की चुभन से बचा जा सकता है। संसार में फैली बुराइयों को ही देखते रहने के स्थान पर यदि अच्छाइयों पर भी दृष्टि डाली जाय तो सन्तुलन बना रह सकता है। अपने साथ उपकार करने वालों की सूची के साथ-साथ यदि उपकारों को भी गिन लिया जाय तो खिन्नता का आधा भाग प्रसन्नता के अधिकार में चला जायगा। निकट भविष्य में विपत्ति की आशंका करते रहने से मन भारी रहता है। यदि उज्जवल भविष्य की आशा सजाने लगे तो उतने भर से आँखों पर छाया हुआ निराशा का अंधेरा हट सकता है और सुखद सम्भावना की कल्पना से नई ज्योति चमक सकती है।

संसार के सफल मनुष्यों में यह गुण रहा है कि वे अपनी बहुमूल्य विचार सम्पदा को मात्र उपयोगी एवं आवश्यक कार्यों में ही नियोजित किये रहते हैं। एकाग्रता इसी का नाम है। कल्पना शक्ति को सर्वथा कुण्ठित कर देना- मन को एक बिन्दु पर ही केन्द्रित किये रहना- किन्हीं योगियों के लिए ही सम्भव हो सकता है। सामान्यतया एकाग्रता इतनी ही सम्भव है कि अपने अभीष्ठ प्रयोजन में चिन्तन को तन्मयतापूर्वक नियोजित रखा जा सके। साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, योगसाधक तथा दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति मन की इतनी ही साधना कर पाते हैं कि चिन्तन को नियत प्रयोजन के लिए तत्पर कर सकने- उसे बिखरने न देने में समर्थ रह सकें। इतनी सिद्धी जिसे प्राप्त हो सके वह अपने विषय में गहराई तक उतर सकता है। उथले मन से सोचने पर आधी-अधूरी बातें ही हाथ लगती हैं।, पर तन्मयतापूर्वक सोचने से मस्तिष्कीय शक्तियाँ केन्द्रीभूत होने के कारण प्रखर बन जाती हैं और ऐसे आधार ढूँढ़ निकालती हैं। जिन्हें सूझ-बूझ, दूरदर्शिता एवं विशेषता सम्पन्न कहा जा सके। अनेकों अद्भुत सफलताएं इसी एकाग्रता के बल पर प्राप्त होती हैं।

प्रस्तुत समस्याओं के समाधान का-तथा भावी प्रगति के आधार खड़े करने का- इतना बड़ा क्षेत्र सामने पड़ा होता है कि मस्तिष्कीय क्षमता को पूरी तरह उसमें जुटाने पर ही प्रगति का पथ-प्रशस्त हो सकता है। अनावश्यक विचार प्रायः अवाँछनीय होते हैं। खाली दिमाग शैतान की दुकान माना जाता है। अनियन्त्रित विचार सदा निम्नगामी होते हैं। पानी सदा नीचे की ओर बहता है। प्रवृतियाँ भी पाप और पतन की ओर दौड़ती हैं यदि उन्हें उच्छृखल छोड़ दिया जाय तो मात्र अशुभी ही सोचेंगी और कुकर्मो की ही प्ररणा देंगी। उन्हें रचनात्मक दिशा लगाये रहना ही वह उपाय है जिससे यह महत्वपूर्ण शक्ति विग्रह और विनाश में न जुट जाय। जिस प्रकार निठल्ले रहने से शरीर आलसी, व्यसनी और अस्वस्थ बनता है उसी प्रकार मन को निरुद्देश्य फिरते रहने की छूट मिलने पर उससे पतन और पराभव का पथ-प्रशस्त होता है। अस्तु शरीर के लिए निर्धारित दिनचर्या की तरह मस्तिष्क के सामने भी ऐसे विषय सुनियोजित रखे रहने चाहिये जिनमें तनिक भी फुरसत मिलने पर विचारणा को जुटाया जा सके।


दूसरों के काम में दिलचस्पी लेना

अपने मतलब से मतलब रखें, या दूसरों से संबंधित कामों में भी हाथ ड़ालें ? इस प्रश्न के उत्तर में आमतौर से समझदारी यह कहती है कि जिन कामों से अपना कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध न हो-कोई लाभ उपलब्ध होता न दीखे उससे दूर रहना ही अच्छा है।

यह दृष्टिकोण अपनाने वाले प्रायः झंझटों से बचे रहते हैं और अपने धन्धे में लगे रहने के लिए अवसर भी पूरा पाते हैं। दूसरों के काम में हाथ बंटाने से अपना समय तो जाता ही है, कईबार आर्थिक में भी कमी आती है। इस आशंका से अधिकाँश लोग अपने को दूसरे के झंझट में न फँसाने की नीति ही अपनाते हैं। लगता है कदाचित यही नीति लाभदायक भी है।

पर बात ऐसी है नहीं। अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बडे लाभ से वंचित हो जाता है। वह है- दूसरों की सहानुभूति खो बैठना स्वार्थी व्यक्तियों किसी का प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता किन्तु अपने लिए सम्वद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना ऐसा घाटा है जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पडता है जो सामाजिक जीवन में परस्परिक स्नेह सहयोग पर टिके हुए हैं। स्वार्थी से दूसरों को आदान-प्रदान की आशा नहीं होती इसलिए वे भी अपनी मुट्ठी सिकोड़ लेते है। तिरस्कृत न सही उपेक्षित तो ऐसे व्यक्ति निश्चित रुप से रहते हैं। ऐसी स्थिति मिलजुल कर उपार्जित की जाने, पर प्रसन्नता का आनन्द हाथ से चला ही जाता है। आर्थिक न सही भावनात्मक हानि तो यह है ही। आगे चलकर एकसक व्यक्तियों को अपनी प्रगति के लिए अपने पर ही निर्भर करना पड़ता है। दुःख, शोक में साथी भी ढूँढ़े नहीं मिलते। आर्थिक न सही मनुष्य को नैतिक, सामाजिक तथा भावनात्मक सहायता की कभी न कभी किसी न किसी रुप में आवश्यकता पड़ती ही है। जो अपने मतलब से मतलब रखने की चतुरता बरतते हैं उन्हें एकसक अवसरों पर निराश रहना पड़ता है। स्वयं किसी के काम न आया जाय तो दूसरा क्यों कोई पने काम आये। जब अपनी दिलचस्पी किसी में नहीं तो कोई अपने कामों में हाथ क्यों बटाये? क्यों दिलचस्पी दिखाये? एकाकीपन कितना नीरस होता है इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। स्वार्थ सीमित दृष्टिकोंण पर एकाकीपन की नीरसता छाई रहती है।

किसी दुर्घटना या अपराध को देखते हुए भी अनेक लोग साक्षी देने के झंझट से बचना चाहते हैं। सबूत के अभाव में अपराधी छूट जाते हैं। यह संकट अपने ऊपर भी आ सकता है। और अपराधी तत्व यह समझकर कि हमारे विरुद्ध कोई गवाह तक न मिलेगा निर्भयतापूर्वक अपनी दुष्टता चलाते हैं रहते हैं। इसकी चपेट में वे भी आ सकते हैं। जिनने अपराध को रोकने या सच्ची गवाही देने में भी उत्साह नहीं दिखाया। यह अनुत्साह भी समाज में बढ़ते हुए अपराधों का एक बहुत बड़ा कारण हैं।

सार्वजनिक संस्थाओं में भाग लेने वालों को उनके स्वजन, सम्बन्धी आमतौर से बुरा मानते हैं और इसे बेवकूफी कहते हैं। किन्तु यह भुला दिया जाता है कि जन-सर्म्पक से उपलब्धि होने वाली योग्यता वृद्धि का कितना मूल्य है। कितने ही व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में विशुद्ध सेवा भावना से ही आये किन्तु इस आधार पर उन्हें मिलने वाले श्रेय, अनुभव तथा कौशल ने कहीं से कहीं पहुँचा दिया। महामानवों को प्रगति के उच्च शिखर तक चहुचने का अवसर दसी आधार पर मिला है। स्वार्थियों के लिए यह द्वार सदा बन्द ही रहते हैं।

किसी अपरिचित के संकट में सहायता करना, अन्याय के विरुद्ध लड़ना, लोकहित के कामों में हिस्सा बटाना, संयमी जीवन बिताना, यों तत्काल तो घाटे का सौदा प्रतीत होता है, पर बदले में अनेकों की श्रद्धा, मित्रता एवं सहायता के जो हाथ बढ़ते हैं उससे देखते हुए लगता है वस्तुतः यह रास्ता नफे का है। जो गँवाया जाता है उससे अनेक गुना वापिस होकर लौटता है।

निस्वार्थ सेवा में जो आत्म-सन्तोष मिलता है उससे आन्तरिक प्रसन्नता तो बनी ही रहती है। साथ ही स्वभाव में उच्चस्तरीय तत्व मिल जाने से जीवनचर्या हंसते-हंसाते, खिलते-खिलाते बीतती है। इतना ही नहीं सर्म्पक क्षेत्र में शालीनता के सर्म्वधन का एक नया दौर चलता है। ऐसे वातावरण में रहने वाले सम्पन्न न होते हुए भी वैभववानों से भी बढ़ा-चढ़ा आनन्द लाभ करते हैं।

मानव एक धागे के समान है। अकेलेपन में उसका कोई महत्व नहीं, पर जब उस धागे को समाज रुपी अनेक धागों वाले वस्त्र में जोड़ देते हैं तो इस एकाकी का भाग्य चमकता है। तब उसके टूटने का भी खतरा नहीं रहता। शोभा और उपयोगिता तो बढ़ती ही है।

अमेरिका में एक रिवाज है दूसरे देशों के विद्यार्थियों को अपने देश में बुलाना तथा अपने देश के विद्यार्थियों को दूसरे देशों में भेजना इसे ‘स्टूडेन्ट एक्सचेंज’ कहते हैं। ऐसे ही एक एक्सचेंज की आर्थिक व्यवस्था करने वाली एक कम्पनी के मैनेजर को एक विदेशी विद्यार्थी को अपने घर में रखने की इच्छा हुई लेकिन उसके मन में कई शंका कुशंकाएँ उत्पन्न हुआ करती थीं, लेकिन उसने साहस करके एक ‘जापानी’ विद्यार्थी को एक साल तक अपने घर में रखने का निर्णय लिया। एक वर्ष के अनुभव के बाद लड़का कहने लगा, “मेरे भी माँ-बाप के दो सैट हैं- “एक अमेरिका और एक जापान में।” मेरे घर वाले भी कहने लगे कि हमें दूसरा लड़का मिल गया जो अमेरिकी परम्पराओं एवं संस्कृति से अवगत है।”

‘जार्ज ब्राकमैन’ ने अपनी पुस्तक ‘ह्यू मैनिटी एंड हैपीनेस’ में लिखा है कि जब नार्वे पर हिटलर ने कब्जा जमाया था तो वह एक देशभक्त के नाते कई अन्य देशभक्तों के साथ कई बर्षों तक भूमिगत रहे। उस समय की स्मृति का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि देश हित के लिए सही गयीं यातनाएँ और सतत् भयावह वातावरण में अपने साथियों के साथ जो घनिष्ठता पायी गई वह चिरस्मरणीय है। इस प्रकार के कामों में यदा-कदा हानि भी उठानी पड़ सकती है।

‘सी॰ एस॰ लुइस’ अपनी पुस्तक (दी फोर लव्स) में लिखते हैं कि आप कोई हानि न उठाना चाहते हो तो आप अपने आपको स्वार्थपरता के सन्दूक में बन्द कर लीजिये और अवाँछित, गमिहीन, अनन्त शान्ति की अनुभूति लीजिए। सामान्यतः हर किसी के अनुभव की यह बात है कि जहाँ कहीं भी अन्याय हो रहा हो या प्रत्येक नागरिक की असुविधा हो ऐसे कार्यो की लोग टीका-टिप्पणी तो करते रहते हैं लेकिन समाधान हेतु उचित कार्यवाही करने के लिए कोई आगे कदम नहीं बढ़ाता।

बर्ट्रोन्ड रसल ने अपनी 92 वर्ष की अवस्था में कहा है-”वही मनुष्य सुखी है जिसका प्रेम अपने पडोसी, मित्र आदि के प्रति असीम है।”

इंगलैंड के प्रसिद्ध प्रधानमन्त्राी ‘विन्सनचर्चिल’ अन्त तक प्राणवान बने रहे इसका कारण यही था कि “दुनियाँ भर की प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना में दिलचस्पी से अपने आपको ‘इन्वाल्ड’ रखता था। उसका कहना था कि प्राणवान बने रहने की यही मुख्य चाबी है।”


सामयिक पाँच पुण्य प्रयोजन जो प्रज्ञा पुत्रों को इन्हीं दिनों पूरे करने हैं


प्रकृति द्वारा निद्रा का उपयोग स्वप्न

जागते हुए जो स्वप्न देखे जाते हैं वे कल्पनाएँ कहलाते हैं तथा सोते हुए जो कल्पनाएँ की जाती हैं उन्हें स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न और कल्पना में प्रायः यही अन्तर देखा और समझा जाता है, परन्तु इतना मात्र ही अन्तर नहीं है। जिस प्रकार जागृत स्थिति में कई विचित्र और अबूझ अनुभव होते हैं उसी प्रकार निद्रित अवस्था में भी अनेक स्वप्न ऐसे होते हैं जो अदृश्य जगत की वास्तविक अनुभूति कराते हैं और वह अनुभूति ऐसी होती है कि उन्हें स्थूल नेत्रों से प्रायः नहीं देखा जा सकता।

साधारणतः स्वप्न में होने वाले अनुभवों को प्रत्यक्ष अनुभवों से कोई सम्बन्ध नहीं दिखाई देता, लेकिन कईबार स्वप्न में ऐसी अनुभूतियाँ होती हैं जिन्हें विचित्र और विलक्षण ही नहीं चमत्कारिक भी कहा जा सकता है। ऐसे स्वप्नों का विश्लेषण करते हुए मनःशास्त्रियों का कथन है कि उस समय मनुष्य की निद्रितावस्था में काम करने वाली मानसिक शक्ति ऐसे कार्य कर दिखाती है जो जागृतावस्था में मन को अत्यन्त कठिन या असम्भव मालूम होती है। किसी गणितज्ञ को एक प्रश्न बहुत कठिन मालूम होता था। अनेक बार प्रयत्न करने पर भी वह प्रश्न हल न हो सका। एक दिन उक्त प्रश्न को स्लेट पर सोचते सोचते ही वह गणितज्ञ सो गया। सुबह उठते ही उसे यह मालूमत हुआ कि उसके मन ने उक्त प्रश्न को हल कर लिया है। तत्काल उसने स्लेट पर उस प्रश्न का पूरा हल स्लेट पर लिख डाला और वह आनन्द से नाचने लगा।

कुछ विचारकों ने अपने अनुभवों में लिखा है कि उनकी जागृत अवस्था में न सूझने वाले उदात्त तथा प्रगल्भ विचार स्वप्नावस्था में उनके मन को सूझ पड़े और उनको मालूम हुआ कि मानो उनके मन ने अतिसुन्दर तथा यथायोग्य भाषा में सब विचार उनके सन्मुख रख दिये हैं। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रकृति के अत्यन्त गहन रहस्य का पता उन्हें स्वप्नावस्था के मन के व्यापार से लगा। कईबार अनुभव होता है कि स्वप्नावस्था में कार्य करने वाले मन के व्यापार दिक्कालादि की मर्यादा से बँधे हुए नहीं हैं। उदाहरणार्थ कभी कभी स्वप्नावस्था में हजारों मील के फासले पर रहने वाले सम्बन्धियों के व्यवहार हमें यथावत् मालूम हो जाते हैं प्रत्यक्ष अनुभव की बातों से हमें मालूम होता है कि जागृत अवस्था में काम करने वाले मन में जो शक्ति नहीं है वह निद्रितावस्था में काम करने वाले अचेतन मन में है। बातों का समाधान करने के लिए यह मानना पड़ता है कि अचेतन मन एक प्रकार से विवके शून्य है। वह स्वपन में बाहरी वस्तुओं से मिलने वाली किसी भी प्रेरणा के तत्काल अधीन हो जाता है। साधारण व्यवहार में असत्य मालूम होने वाली कई विचित्र बातें स्वप्न में दिखाई देती हैं और स्वप्नावस्था में वे सब सत्यवत् मालूम होती हैं। कईबार स्वप्न में हजारों फुट ऊँचे आदमी दिखाई देते हैं। कभी अपनी मृत्यु होती हुई मालूम होती है और दिखाई देता है कि अन्य लोग हमारे प्रेत का संस्कार कर रहे हैं। कभी मालूम होता है कि गगनचुम्बी पहाड़ों पर से हमें कसी ने ढकेल दिया है। परन्तु फिर भी अंग-भंग न होकर प्रहलाद की तरह हम चलने लगे हैं। इसका अर्थ यही है कि जागृतावस्था में सत्य या असत्य का निर्णय करने वाला मन स्वप्नावस्था में अनुपस्थित रहता है। और अन्य कोई मन उस समय कार्य करता रहता है। उस मन को सारासार विचार बिल्कुल नहीं होता। इस मन का धर्म है कि किसी भी बाहरी प्रेरणा को पाकर उसके अनुसार भटकता रहे। मिष्ठान भोजन के बाद पेट भारी होने पर सोने वाले मनुष्य को स्वप्न आता है कि कोई उसकी छाती पर बैठकर उसका गला घोंट रहा है। इसका कारण यह है कि पेट के भारीपन से श्वासोच्छवास में रुकावट पैदा होती है। और इस प्रेरणा के कारण स्वपनावस्था में मन नाना प्रकार के कुतर्क करने लगता है। स्वप्नावस्था का अनुभव करने वाले मनुष्य को ये कुतर्क सत्यवत् प्रतीत होते हैं।

‘एवर क्राम्वी’ नामक ग्रन्थकार ने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है कि “किसी सोये हुए मनुष्य के पैरों पर गरम पानी से भरी हुई बोतल रखी गई तब उसे स्वप्न में मालूम हुआ कि वह एकटा नामक ज्वालामुखी के निकटवर्ती गरम प्रदेश में यात्रा कर रहा है।” इस ग्रन्थकर्ता ने एक और उदाहरण लिखा है “एक आदमी अपने कमरे में सो रहा था। खिड़की से ठण्ड़ी हवा आने के कारण उसके शरीर पर का कपड़ा हट गया। उसे तत्काल स्वप्न आया कि वह हडसन उपसागर के निकट ठएड के दिन बिता रहा है। और वहाँ की वर्फ के कारण उसे ठण्ड का कष्ट हो रहा है।”

स्वप्नों के सम्बन्ध में ये साधारण बातें हुई। इन दिनों वैज्ञानिकों के लिए स्वपन एक अलग ही विज्ञान बना हुआ है और इस सम्बन्ध में अनेकों खोंजें हो रही हैं। इन निष्कर्षो को विभिन्न प्रयोजनों के लिए महत्वपूर्ण उपयोग किये जाने की सम्भावना है। स्वप्न विज्ञान के विश्व-विख्यात अमेरिकी वैज्ञानिक “एडबिन डायमन्ड”ने अनेक वर्षों तक स्वप्नों के सम्बन्ध में गहन अध्ययन तथा अनुसन्धान किया है। उन्होने कहा है-”संसार में औसत मनुष्य रात्रि को सोते समय पाँच या छः बार स्वप्न देख लिया करता है। इसके बहुत ही कम अपवाद होते हैं।

लेगों के स्वप्नों का औसत काल 20 मिनट होता है। श्री डायमन्ड का कहना है कि “स्वप्न देखने से मनुष्य मानसिक रुप से स्वस्थ एवं प्रसन्न बने रहते हैं उन्होंने परिक्षणों से पता लगाया कि जिन व्यक्तियों ने बिल्कुल स्वप्न न आने देने का प्रयास किया, उनका मानसिक सन्तुलन गिबगड़ गया और बहम के शिकार हो गए।

जो भी हो, स्वप्न प्रकृति की विचित्र माया, विलक्षण व्यवस्था है। इसे अभी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है। स्वप्नों का विश्लेषण करने पर यह जान समझ पाना सम्भव हो सकता है कि शरीर की इस प्रक्रिया का क्या उद्देश्य है और इसका किन प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जा सकता है ? प्रकृति ने मनुष्य शरीर को एक एक क्षण के लिए उपयोगी कार्य में व्यस्त कर रखा है तो व्यक्ति सात, आठ घंटे जो नींद लेता है वह समय केवल विश्राम के लिए ही व्यतीत करने की व्यवस्था तो नहीं हो सकती। प्रकृति ने उस अवकाश के समय का उपयोग भी किसी न किसी उच्छे उद्देश्य के लिए रिने की व्यवस्था कर रखी हे।


जो बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए (kahani)

एक बार भगवान् बुद्ध अपने उन शिष्यों के साथ बैठे बात कर रहे थे जो बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए जाने वाले थे। बुद्ध ने उनसे प्रश्न किया- “भन्ते ! यदि तुम कहीं उपदेश दो और वहाँ के व्यक्ति उसे सुनें नहीं तो उनके प्रगति तुम्हारे कैसे विचार होंगें ?”

“भगवन् ! हम सोच लेंगें कि व्यक्ति बुरे नहीं हैं। उन्होंने हमारे उपदेश नहीं सुने तो कोई बात नहीं । हमसे कोई कड़वी बात तो नहीं कही ।” भिक्षु बोले।

“और यदि कड़वी बात कहें तो ?” बुद्ध ने प्रश्न किया । शिष्य बोले- तो हम सोचेंगें कि कड़वी बात ही तो कही मार-पीट तो नहीं की है । व्यक्ति अच्छे हैं ।”

‘और मारपीट करें तो क्या सोचेंगे ? पुनः प्रश्न हुआ। ‘तो भी हम यही सोचेंगें कि व्यक्ति अच्छे हैं । उन्होंने हमें जान से तो नहीं मारा है ।’

शिष्यों की बात सुनकर भगवान् बुद्ध बोले- ‘भिक्षुओं अब तुम धर्म प्रचार के लिये जा सकते हो । धर्मप्रचारकों में जिस सहिष्णुता और उदात्त विचार धारा की आवश्यकता होती है, वह दिखलाई देती है । इसे निरन्तर बनाये रखना ।’


दोष जाने और हटायें बिना स्वयं को शुद्ध न मान लें

मन को शुद्ध करने कामना सभी व्यक्त करते रहते हैं। किन्तु मन शुद्धि के लिए मन के दोषों को भी जानना आवश्यक है और फिर उन्हें समाप्त करने की साधना आवश्यक है। यह प्रक्रिया पुरुषार्थ-साध्य है। इसीलिए उसे साधना समर कहा गया है।

मन पाँच क्लेशों या पाँच दोषों से पीड़ित और लिप्त रहता है। वस्तुतः मन स्वयं में मात्र संकल्पक इन्द्रिय है। यह संकल्प उसमें स्वतः नहीं अद्भुत होता है। मन स्वयं तो छठी इन्द्रिय मात्र है, वह उपकरण है। दोष मूलतः चित्त-वृति की स्थिति विशेष है। सामान्यतः मन है। परन्तु जिसे प्रचलन में मन कहा जाता रहता है, वह वस्तुतः अन्तःकरण है।

अन्तःकरण त्रिविधि होते हैं। ये हैं बुद्धि, अंहकार एवं मन। वाचस्पति मिश्र ने “साँख्यतत्व कौमुदी” में 33 वीं कारिका की व्याख्या में लिखा है-

“अन्तःकरण त्रिविधि-’बुद्धिरहंकारो मनः इतिः शरीराभ्यन्तखर्तित्वादन्तःकरणम्। “दशधा बाह्यं” करणं, “त्रयस्य” अन्तःकरणस्य “विषयारव्यम्” विषयमारब्याति विषयसंकल्पाभिमानाध्यवसायेषु कर्त्तव्येषु द्वारी भवति । तत्र बुद्धिन्द्रियाग्यलोचनेन, कर्मेन्द्रियाणि तु यथास्वं व्यापारेण।”

अर्थात्- बुद्धि, अहंकार तथा मन के भेद से ‘अन्तःकरण’ तीन प्रकार के हैं। शरीर के अर्न्तगत होने से ये अन्तःकरण कहलाते हैं। बाह्करण दश होते हैं। ये तीनों अन्तःकरण के विषयों को प्रस्तुत करते हैं। विषयों के सम्बन्ध में होने वाले संकल्प, अभिमान और निश्चय में ये द्वार या साधन बनते हैं। इनमें ज्ञानेन्द्रियाँ विषय प्रकाशन द्वारा तथा कर्मेन्द्रियाँ यथायोग्य व्यापारों द्वारा सहायक बनती हैं। मन विषयों का ग्रहण कर उन्हें बुद्धि तक पहुँचाता एवं बुद्धि से प्राप्त निर्देश इन्द्रियों को देता रहता है। अहंकार ही संस्कार-जगत होता है। इसे ही चित्त भी कहते हैं। अहंभाव ही समस्त करण व्यापारों का मूल है। इसीलिए इसे अन्तःकरण कहा जात है। अंह के प्रत्यय यानी मैं ज्ञाता हूँ मैं कर्ता हूँ आदि अन्तर्भाव ही बुद्धि तत्व है। इसे ही ‘अस्मि’ का, स्वयं के होने का भाव या अस्मिता कहते हैं। अंहकार एवं बुद्धि- इन दोनों को अस्मिता मात्र कहा जाता है। इनमें उदित संस्कारों के अनुभव विषाय का ग्रहण, तद्नुसार चेष्टा एवं धारण ही संकल्पात्मक मन के कार्य हैं।

प्राण मन की ही प्रेरणा से ही चलता है। जब तक स्वयं कुमार्गगामी है, अन्तःकरण कुसंस्कार-युक्त है, तब तक प्राण का संयम सम्भव नहीं। प्राण-प्रवाह गतिशील अश्व के समान है, उसका नियंत्रण निर्देशन करने वाला अश्वारोही मन है। उन्मत घुड़सवार घोड़े पर लगाम नहीं रख सकता। इसीलिए मनःसंयम की प्राथमित आवश्यकता है।

मन के असंयम का कारण होती है-उसकी विषयों के प्रति लोलुपता का वृत्ति। यही मन की अशुद्धि का कारण है। चित्त-मन की इस अशुद्धि की अवस्था को ही योगशास्त्र की भाषा में क्लेश कहते हैं। मन को शुद्ध करने के लिए अशुद्धि का अर्थात् क्लेशों का स्वरुप जानना आवश्यक है। ये क्लेश पाँच हैं-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश। योगसूत्र में कहा है-

“अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पच्च क्लेशाः।” (योग सूत्र 213)

समस्त क्लेशों का सामान्य स्वरुप है’-विपर्यस्त ज्ञान, जो चंचलता, अशान्ति और कष्ट की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसीलिए अविद्या या पिर्यस्त ज्ञान को समस्त क्लेशों का आधार कहा जाता है। असत्य को असत्य समझना भ्रान्ति को यथार्थ समझना, जड़ जगत को ही जीवन सार समझना अविद्या है। पाँतजलि ने कहा है-

“अनित्याशुचि दुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।”

अर्थात्- अनित्य, अशुचि, दुःखमय तथा अनात्म विषय में नित्यता, शुचिता, सुख तथा आत्मस्वरुपता की अनुभूति एवं बोध ही अविद्या है।

वस्तुतः अविद्या ही मूल क्लेश है। अनात्म तत्व को ही आत्मतत्व माने रहने की अविद्या, अस्मिता का आधार है। मूलतः अपवित्र, असुन्दर वस्तुओं को पवित्र, सुन्दर मान बैठने की अविद्या ही राग है। दुःखद, पीड़क, उत्तापकारी मनःस्थिति उत्पन्न करने वाली क्रियाएँ ही द्वेषपूर्ण चित्त को सुखद, हर्षदायक, जी जुड़ाने वाली प्रतीत होती है। अनित्य, नश्वर शरीर को नित्य मान बैठने, उसके ही नाते, रिश्तों में बंधें रहने की अविद्यापरक स्थिति ही अभिनिवेश है। अयथार्थ ज्ञान ही अविद्या है और यथार्थ ज्ञान ही अविद्या है। जिसे अज्ञान कहा जाता है, वास्तविक अर्थों में में वह अयथार्थ ज्ञान है। यह भली भाँति समझ लेने योग्य तथ्य है कि अविद्या और विद्या के विषय पर परस्पर विपरित नहीं होते, अपितु मात्र उनकी बोध स्थिति ही परस्पर विपरित होती है। इसलिए किसी कार्य क्षेत्र या विषयक्षेत्र से विद्या-अविद्या का सम्बन्ध नहीं है। जो लोग समझते हैं कि अमुक कार्य-क्षेत्र मूलतः विद्या का है, शेष अविद्या के क्षेत्र हैं, वे स्वयं भ्रान्त हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई यह समझ ले कि धार्मिक कही जाने वाली क्रियाओं में माला, जप, पंचोपचार, यज्ञ, हवन, बह्मभोज, दान आदि में प्रवृत रहना विद्या है और सामाजिक गतिविधियों, राजनैतिक हलचलों में भाग लेना अविद्या है, तो वह भ्रम में हैं। चाहे पहली कोटि की क्रियाएँ हों, चाहे दूसरी, यदि उनमें यथार्थ बोध के साथ, दार्शनिक समय के साथ कोई प्रवृत होता है, तभी वह विद्या प्रेरित सक्रियता है, यदि यह उनके यथार्थस्वरुप को समझे बिना लिप्त रहता है, तो उसकी सारी सक्रियता अविद्या मूलक है। भले ही वह उन क्रियाओं में लगा हो, जो ब्रह्मविद्या का क्षेत्र मानी जाती हैं यानी भले ही कोई व्यक्ति शास्त्रों के पठन-पाठन, योग आदि पर प्रवचन, देव-चर्चा आदि में प्रवृत रहा आये, किन्तु यदि वह लोकेषणा, वित्तेषणा आदि से प्रेरित होकर यह सब कर रहा है, तो वह अविद्या की उपासना कर रहा है, विद्या में रत दीख रहा होने पर वह अन्धकार में ही भटक रहा है। अनात्मतत्वों को आत्म-दर्शन का आधार मान बैठना अस्मिता मूलक अविद्या है, विद्या नहीं।

नाशवान शरीर आदि को ही अपनी आत्मसत्ता समझकर, फिर उनके नाश से मानो हमारी सम्पूर्ण सत्ता ही नष्ट हो जायगी, ऐसा भय अभिनिवेश चित्त-तन के सूक्ष्म दोष हैं, जो अविद्याजन्य हैं।

दैनन्दिन जीवन में ऊपर उभर कर आने वाले न के दो प्रधान दोष हैं- राग और द्वेष। महर्षि पाँतजलि ने इनकी यह व्याख्या की है-

“सुखानुश्यी रागः। दुःखानुशयी दोषः।”

(योगशास्त्र 217-8)

अर्थात्- सुखानुशयी क्लेश वृति राग है और दुःखानुशयी क्लेश वृत्ति द्वेष है।

दोनों ही स्म्वेदन-अनुभूतियों का यथार्थ स्वरुप न जानने के परिणाम हैं। इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुखी हैं। जब इन्द्रियों के उनके वाँछित विषय उपलब्ध होते हैं, तो उन्हें स्वभवतः सुखानुभूति होती है। जैसे स्वादिष्ट भोजन रसना को, सुन्दर दृश्य आँखों को, सुहानी ध्वनियाँ, मीठी बातें, संगीत आदि कानों को, सुगन्ध नाक को, मृदुल र्स्पश त्वचा को सुखानुभूति देता है। अनुभूतियों के ये सन्देश मन ही नहीं बुद्धि में पूर्व संचित वासना-संस्कारों को उससे क्षणिक तृप्ति का अनुभव होता है। इससे सुखानुभूतियों के इन साधनों में स्पृहा, तृष्णा और लोभ का भाव जड़ जमा लेता है, यहीराग है। यह राग वृतिएक दुःखसह चक्र को जन्म देती है। विषयानुभूतियाँ तो क्षणिक होती हैं और मन अपनी चंचलता के कारण एक से दूसरे विषय की ओर दौड़ता रहता है। जिधर मनोयोग होता है, उधर ही इन्द्रियाँ भी सक्रिय होती हैं। मन की निरन्तर चपलता का कारण अन्तःकरण में संस्कार रुप में जड़जमाये बैठी है करोड़ों वासनाएँ हैं, जो कालक्रम तथा संयोग सुविधा से होने और प्रबल हो उठने की ताक में ही रहती हैं। उनसे प्रेरित मन जिस विषय में दौड़ता है, इन्द्रिय चेष्टाएँ उधर ही अभिमुख हो जाती हैं और विषयास्वादन की प्रक्रिया सम्पन्न होने लगती हैं। दूसरी ओर प्रत्येक विषयानुभूति मन पर एक आसक्तिजनक संस्कार छोड़ जती है। इस संस्कार से प्रेरित मन पूर्वानुभवजन्य आसक्ति भाव के आधार पर उन्हें पाने के ताने-बाने उस समय भी बुनता-रचता रहता है। राग मन को अवश और विवश बनाता है। जिसके प्रति राग होता है, उधर ही इच्छा और संकल्प दौड़ते रहते हैं। उसे पाने की ललक मन में उठती रहती है, यही स्पृहा है। उसके बिना अतृप्ति का अनुभव होता रहता है, जैसे पानी की प्यास लगने पर पानी के बिना होता है। यह प्यास या अतृप्ति ही तृष्णा है। तृष्ण, लोभ उत्पन्न करती है। विषय प्राप्ति की इच्छा ही लोभ है। वह इच्छा अपनी प्रबलता के कारण हित-अहित, उचित-अनुचित का विवेक-विचार, अस्त-व्यस्त, छिन्न-भिन्न करके रख देती है। राग की प्रबलता में उस क्षण बुरा भी बहुत भला लगने लगता है, अनुचित ही सर्वथा वाँछनीय और अधर्म ही आवश्यक धर्म लगने लगता है। असुखकर पदार्थ ही अतिशय सुखद प्रतीत होने लगते हैं।

राग की तृप्ति में, विषय सुख की प्राप्ति में जो बाधक प्रतीत होता है, उस पर प्रतिघात करने की, उसे विनिष्ट कर देने की इच्छा उत्पन्न होती है। उसके प्रति मानसिक रोष एवं क्षोभ उत्पन्न होता है। यही सब द्वेष के लक्षण हैं। इनमें यद्यपि चित्त, मन जलता-तपता रहता है और दुःख पाता रहता है, किन्तु द्वेष, दुर्भावना की तीव्रता व्यक्ति को उसी में सुख का भ्रम पैदा करती रहती है।

राग और द्वेष के ही प्रकट रुप काम एवं क्रोध हैं। अधिकाधिक संग्रह का लोभ, जिस पर अपना स्वत्व नहीं, उसे भी अधिपत्य में करने की चोरी, छीना-झपटी, अपहरण आदि की वृत्ति, राग का ही परिणाम है। राग द्वेष ही छल-कपट, ईर्ष्या-निन्दा, असत्य, अनुदारता, असहिष्णु, कुटिलता, कृतघ्नता, कटुता, कायरता एवं पशुता को जन्म देती है तथा मनुष्यत्व का हरण कर लेते हैं। इसी प्रकार अविद्या के तामसिक परिणाम प्रमाद, आलस्य, अपवित्रता आदि दुर्गुणों के रुप में सामने आते हैं। यही मन के दोष हैं जो निकृष्ट आचरण की प्रेरणा देते तथा कुसंस्कारों को स्थायी बनाते रहते हैं। साथ ही बुद्धि को कुतर्क-परकता, कुटिलता और कुविचार-प्रेरणा से भरता रहता है।

अतः आत्म-शुद्धि के आकाँक्षी प्रत्येक मनुष्य को अन्तःकरण के इन सभी दोषों को समझ कर इन्हें निकाल फेंकने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए। इसी अभ्यास का नाम साधना है।

इन प्रवृतियों के मूल स्वरुप को तथा उनके आधारभूत आकर्षणों की क्षणिकता और हानि उत्पादकता को समझकर उनसे विरत होना ही वैराग्य है। इस तथ्य का पुनः पुनः स्मरण, दुष्प्रवृतियों को समाप्त करने की प्रक्रिया का पुनः अनुशीलन तथा साथ-साथ आत्मा की दिव्यता के भाव को बार बार चिन्तन, आत्म-ज्योति की निरन्तर धारणा के प्रयास का नाम अभ्यास है। अभ्यास वैराग्य की विविध साधनाप्रणाली ही आत्म-शुद्धि की सामर्थ्य प्रदान करती है। यह सामर्थ्य उपार्जित करना और दोषों, दुष्प्रवृतियों को समाप्त कर शुद्ध विवेक को जागृत रखना ही परम पुरुषार्थ है।


प्राकृतिक जीवन जिएँ, निरोग रहें

कोई भी बीमारी प्रारम्भ में बीज रुप में ही घर करती है यदि उस समय उस बीमारी की जड़ अर्थात् कारण को ही समूल नष्ट कर दिया जाय तो बीजरुपी रोग का पादप, विशालकाय वृक्षरुपी असाध्य रोग का रुप ही न धारण कर सके। किसी भी प्रकार की दवा रोग के वर्तमान स्वरुप को तो ठीक कर देती है किन्तु उस मर्ज की उत्पत्ति का कारण पता न चलने के कारण वही रोग भीतर ही भीतर जड़ जमाता चला जाता है।

रोगों का प्रमुख कारण अप्राकूतिक जीवन जीने का अभ्यास है, जैसे बिना नींद के आलस्यवश विस्तर में लेटे रहना अथवा आती हुई नींद को रोकने के लिए गर्मागर्म चाय व काँफी का उपयोग करना। बिना भूख लगे भोजन, कुसमय पर भोजन व स्नान, दाम्पत्य जीवन का असंयमपूर्ण निर्वाह, दुर्व्यसनों के माया-मोह में फंसना। शास्त्र वाक्य हैं-”अपथ्ये सतिगतार्थ स्याकती मौषधं निवेषणाँ” अर्थात्- जो लोग आहार-बिहार के नियमों का पालन करते हैं उनको दवाओं की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

बदहजमी बीमारी की जड़ है। इससे मल-मूत्र का सही अंग से विसर्जन रुक जाता है और वह शरीर के विभिन्न अवयवों में इधर-उधर जमा होने लगता है। जिससे सारे शरीर में ऊष्मा जमा होने जाती है। बदबूदा, गन्दा, गाढ़ा पेशाब, काली और सूखी टट्टी इसकी ही प्रतिक्रिया होती है।

दवाओं के प्रयोग से निर्जीव द्रव्य जो सहज रुप से उत्सर्जित हो जाना चाहिए रुक जाता है जिससे श्शरीर में खुश्की बढ़ना, हृदय की धड़कन कम होना, शरीर में आवश्यक गर्मी की कमी अनुभव होती है। इसे दूर करने के लिए और तीव्र औषध्यों का प्रयोग किया जाता है, जो पहले वो अपना असर दिखाती हैं बाद में रोग की जड़ को ही मजबूत बनाती हैं। यही विकार रुप में अतिसार खाँसी, जुकाम आदि के रुप में जब बाहर निकलती हैं तो पुनः उसी को बीमारी मानकर पुनः दबाने वाली दबाएं दी जाती हैं। जिसमें इन्जेक्शन आदि तक का प्रयोग करके विजातीय द्रव्यों को भीतर ही भयंकर बीमारी का रुप धारण करती हैं।

दवा के रुप में विष, गन्धक, अलकोहल आदि पदार्थ हमारे शरीर में प्रवेश पाकर बीमारियों को असाध्य अवयवों को जीर्ण बना देते हैं। बार बार एक ही किस्म की दवाओं के प्रयोग से शरीर पर उनका असर कम होंने लगता है और औषधी भी विजातीय द्रव्य के रुप में हमारे शरीर में एकत्र होने लगती हैं। अन्दर जमा मल जब विभिन्न रुपों में बढ़ा होकर शरीर के विभिन्न अ्रगों में जमा हो जाता है तो रक्तचाप, मूर्छा हिस्टीरिया, पागलपन, लकवा आदि की बीमारियाँ होने लगती हैं। यही विजातीय द्रव्य जननेन्द्रिय में पहुँचकर नपुँसकता, धातु रोग आदि रुपों में सामने आता है। सन्धियों में जमा होने पर सन्धिवात, दर्द पेट में जमा होने पर लीवर, नपेट बढ़ना, मूत्र-पिण्डों में जमा होने पर मूत्र विकार पथरी, सिक्वामेह आदि के रुप धारण करता है।

रोग उत्पत्ति का कारण और कुछ नहीं केवल कृत्रिम जीवन ही है। यदि अपने जीवन में समाविष्ट कृत्रिमताओं का परित्याग किया जाये और सहज स्वाभाविक अकृत्रिम जीवन जिया जाये तो कोई कारण नहीं कि बार बार बीमार पड़ना पड़े या बिस्तर पकड़ना पड़े।


श्विष्य में मनुष्य कैसा होगा।

यह दृष्टि कैसे उत्पन्न हुई, आविर्भाव कैसे हुआ, कैसे वह सभ्यता की अनेक मंजिलें तय करता हुआ वर्तमान उन्नत स्थिति तक पहु्रँचा, यह मंजिलें तय करने में उसे किन-किन उतार चढ़ावों का सामना करना पड़ा? आदि कई प्रश्न हैं जो मनुष्य को न जाने कब से मथते जा रहे हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए वह अपनी बुद्धि को दौड़ता है, कल्पनाएँ करता है, तथ्य और प्रमाणों के सर्न्दभ में उन कल्पनाओं में से उपयुक्त को छाँटता और अनुपयुक्त को छोड़ देता है। परन्तु अभी तक इसका कोई उत्तर नहीं मिल पाया है। एक मान्यता नहीं स्थापित होने पाती है कि दूसरी मान्यता उभर कर आती है और पहले वाली मान्यता को छिन्न-भिन्न कर स्वयं प्रतिस्थापित हो जाती है। नई मान्यता के प्रमाण में पूरे तथ्य जुटते भी नहीं है कि और नई-नई कल्पनाएं उठने लगती हैं । इस प्रकार मनुष्य अभी यही नहीं तय कर पाया है कि उसका अविर्भाव कैसे हुआ? वह कैसे अस्तित्व में आया? और कैसे सृष्टिक्रम में उठने वाले झंझावातों के बीच गिरते पड़ते वह अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सका है और उससे आगे बढ़ा सका है?

पौराणिक मान्यता है कि आदिमानव मनु थे और उनकी सन्तानें मनु कहलाई॥ अन्य धर्म सम्प्रदाय के लोग मानते हैं कि वर्जित फल चखने के कारण आदम और हब्बा र्स्वग से धकेल दिये गये। भारतीय धर्म ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पन्न की और उसी समय सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रुप में मनुष्य को सृजा। इन पौराणिक आख्यानों और प्रतिपादनों से अभिवृद्धि का समाधान नहीं होता इसलिए समाधान के उद्देश्य से विज्ञान की ओर निहारा गया और वैज्ञानिकों ने कई पुष्ट प्रमाणों के आधार पर इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर देने के प्रयास किये हैं। परन्तु इन उत्तरों से भी पूरी तरह समाधान नहीं होता है।

मनुष्य सर्वप्रथम पृथ्वी के किस भूखण्ड में अवतरित हुआ? आदिमानव सबसे पहले कहाँ जन्मा ? इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों के बीच मत-मतान्तर मिलते हैं। परन्तु इस विषय में विकास शास्त्री प्रायः एकमत हैं कि अब से 35 करोड़ वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज अमीवा और मछली जैसे छोटे-छोटे जल-जन्तुओं के रुप में थे। 27 करोड़ वर्ष पहले वे धरती और पानी दोनों स्थानों पर रहने लायक बने अर्थात् उनका शारीरिक विकास इस प्रकार कि वे जल और थल दोनों पर सुविधापूर्वक विचरण कर सकें। 20 करोड़ वर्ष पूर्व सरिसृप जीवों का अस्तित्व रहा, यह बताया जात है और कहा जाता है सात करोड़ वर्ष पहले ही वे स्तनपायी बन पाये हैं। मनुष्य जैसी आकृति और प्रकृति से सर्वथा भिन्न थे। उन्हें वनमानुष जाति के बन्दरों में रखा जाता है। इस रुप में अस्तित्व धारण करने वाले आदि मानव को पेकिन कहा जाता है, वह बिल्कुल ही विचित्र ढ़ंग का था। कनपटियाँ बहुत चौड़ी थीं, भवों के नीचे की हड्डियाँ बेड़ौल उभरी हुई और ठोड़ी नदारत। यदि वैज्ञानिकों की परिकल्पना के आधार पर उसका चित्र बनाया जाये तो वह बहुत ही डरावना और घिनौना प्रतीत होगा।

मनुष्य के समान ही अन्यान्य जीव-जन्तुओं में भी विकास हुआ बताया जाता है। पुराने जमाने के ‘कायोट’ जिनसे भेड़िया अस्तित्व में आया, आज के जमाने के भेड़िये से असाधारण अन्तर रखता था। यह अन्तर कई दृष्टियों से बड़ा और घटा है।

पुराने महागज और सरीसृप आज के हाथी और गिरगिटों की तुलना में कई गुना बड़े थे। आदि मानव भी आज के मनुष्य की तुलना में कई गुना बड़ा और बहुत अधिक शक्तिशाली था। किन्तु मनुष्य शरीर और शारीरिक शक्ति की दृष्टि से अपने पूर्वजों की अपेक्षा कमजोर ही होता गया है, यही वह पुराने ज्ञान-कौशल, उपकरण और साधनों के क्षेत्र में उसने बहुत ज्यादा विकास किया है। इस प्रकार एक और घटोतरी तथा दूसरी ओर बढ़ोतरी का क्रम चलता रहा है। इन दोनों ही पहियों पर टिका हुआ प्रगति-रथ इधर-उधर हिचकोरे खाता हुआ अब यहाँ तक पहुँच गया है।

मनुष्य के अब तक के विकास क्रम और अब तक प्राप्त की गई उन्नति को देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भविष्य में मनुष्य कैसा होगा? इस प्रश्न के उत्तर के कतिपय वैज्ञानिकों का कथन है कि प्रागैतिहासिक काल के ‘युमा’ और आज के बिलाव में जितना अन्तर है सम्भवतः अब से पाँच हजार वर्ष बाद आज के मनुष्य में और तब के मनुष्य में भी इतना ही अन्तर होगा। यह तथ्य तो सर्वविदित है कि इन दिनों मनुष्य की बुद्धि और उसके साधनों में असाधारण वृद्धि हो रही है। इस असाधारण अभिवृद्धि के परिणाम स्वरुप उसका विकास भी असाधारण गति से हो रहा है। विकास और प्रगति की दर अब पहले की अपेक्षा कई गुना बढ़ गई है और दिनोंदिन वह बढ़ती ही जा रही है। पिछले पाँच लाख वर्षों में मनुष्य ने जितना विकास किया है उतना ही, बल्कि कहीं उससे भी ज्यादा प्रगति उसने पिछले पाँच हजार वर्षों में मनुष्य ने जितनी प्रगति की है लगभग प्रगति विगत पाँच सौ सालों में हुई है और पिछले पचास वर्षों की प्रगति का लेखा-जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि मनुष्य ने इस अवधि में अपना ज्ञान-विज्ञान इतना अधिक कर लिया है जितना वह गत पाँच सौ वर्षों में नहीं कर पाया है।

प्रगति का यह क्रम बढ़ने ही वाला है, घटेगा नहीं। यदि ऐसा कोई युद्ध न छिड़ जाय, ऐसी कोई प्राकृतिक आपदा न आ जाय जिसमें अब तक विकसित समूचि मनुष्य जाति ही नष्ट हो जाए तो यह सभ्यता आगे ही बढ़ेगी। छोटे-मोटे युद्ध तो हमशा ही चलते रहे हैं, कुछ सौ व्यक्ति ने लेकर हजारों लाखों लोगों को मार ड़ालने वाली युद्ध विभीष्काएँ हमेशा ही मँड़राती रहती हैं। जब तक पूरी मनुष्य सभ्यता को नष्ट करने वाला कोई युद्ध न छिड़े तब तक प्रगति की सम्भावनाओं को नष्ट हुआ नहीं कहा जा समता और ऐसे किसी युद्ध की सम्भावनाएँ फिलहाल क्षीगतर ही मानी जा रही हैं, अस्तु मनुष्य और आगे बढ़ेगा या विकसित होगा इसमें सन्देह की गुँजाइश लगभग नहीं है।

अगली कुछ ही पीढ़ियों में मनुष्य द्वारा इतना विकास कर लिये जाने के सम्बन्ध में वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त है कि उसकी तुलना में पिछले पाँच हजार वर्षों की प्रगति को तुच्छ ठहराया जा सके। इसलिए सभी क्षेत्रों में यह प्रश्न उछाला जा रहा है कि भविष्य में विकसित होने वाली मनुष्य सभ्यता का स्वरुप कैसा होगा? इसका उत्तर उसकी इच्छा और आवश्यकता को देखते हुए ही दिया जा सकता है। यदि चिन्तन का प्रवाह वर्तमान स्तर का ही बना रहा और पहल जीवनशास्त्रियों के हाथ में रही तो वे नये सिरे से जीव कोषों को ढ़ालना आरम्भ कर देंगे और ऐसा मनुष्य पैदा करेंगे जो अन्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सकें। इस आधार पर वर्तमान मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थितियों को ऐसे मोड़ सकते हैं जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक तालमल बिठाये रह सकते हैं उनका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके। विज्ञान के हाथों में इन दिनों जितनी शक्ति केन्द्रित हो गई है, उसे देखते हुए यह असम्भव नहीं कहा जा सकता। यह भी हो सकता है कि विज्ञान की इस शक्ति का उपयोग सत्ताधीशों की सहायता से, उनकी मनमर्जी के अनुकूल मनुष्य को टालने के लिए किया जाय और वर्तमान स्तर के मनुष्यों को हटाकर उसकी स्थानापन्न नई मनुष्य जाति बनायी जाये।

कृत्रिम जीवकोषों के आधार पर मनुष्य जाति में क्या कुछ परिवर्तन किये जा सकते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में ब्रिटेन के जीवशास्त्री जेम्स डेनियल ने कहा है कि, ‘कृत्रिम जीवकोष बनाने में सफलता प्राप्त करने के बाद निकट भविष्य में ही सम्भव हो जायगा कि मनुष्य के डिजायन किये हुए प्राणी उत्पन्न किये जा सके, उनकी आकृति और प्रकृति लगभग वैसी ही होगी वैसी कि उनके निर्माणकर्ता चाहेंगे। ऐसे मनुष्यों को ड़ालना भी सम्भव हो जायगा जो अन्य ग्रहों में जीवन यापन कर सकें।

नैसर्गिक रुप से शरीर निर्माण की प्रक्रिया में, नई पीढ़ी तैयार होने अथवा सन्तानोत्पादन के क्रम में वंश परम्परा के अर्न्तगत केवल के शरीरगत कोशिकाएँ ही अपनी भौतिक विशेषताओं के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी खिसकती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि स्वभाव साथ-साथ चलता है। पिछले दिनों अमेरिका के वेलर विश्वविद्यालय में डाँ. ज्योजर्स अन्गर द्वारा किये गये प्रयोगों से यह तथ्य प्रकाश में आया । डाँ. अन्गर ने इस तरह के प्रयोगों के लिए अपनी प्रयोगशाला में कुछ चूहे पाले। उन्हें अन्धेरे में बिजली के तारों के झटके का खतरा पैदा करके डराया गया और प्रकाश में रहने की आदत ड़ाली गई। धीरे-धीरे चूहों में झटके ड़र से प्रकाश में रहने की आदत पड़ गई। पहले तो वे झटका सुनते ही अन्धेरे से भागते और प्रकाश में पहुँच जाते। पीछे बिना कोई झटका हुए भी वे अन्धेरे से भागकर रोशनी में पहुँचने लगे और प्रकाश में ही रहते, यह आदत चूहों की तीन पीढ़ियों तक हुबहू पाई गई।

प्रयोगों के अगले क्रम में इन चूहों के मस्तिष्क से स्मृति रसायन निकाला गया और उसे अन्य साधारण चूहों के शरीर में पहुँचाया गया। देखा गया कि जिन चूहों के शरीर में यह रसायन पहुँचाया गया था वे अन्धेरे में जाने से डरने लगे और प्रकाश में ही रहना पसन्द करने लगे। चूहों के मस्तिष्क सक निकाले गये इस रसायन का नाम ‘स्कोटोफोविन’ रखा गया। चूहों के बाद यह प्रयोग अन्य छोटे-छोटे जीवों पर भी किया गया तो पाया गया कि इस तरह के रासायनिक फेर-बदल से स्वभाव की विशेषताएँ भी बदली जा सकती हैं। एक प्राणी के मस्तिष्कीय तत्व दूसरे के शरीर में प्रवेश कराये जा सकते हैं और उसकी आकृति में भी अभीष्ट परिवर्तन लाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि वंश परम्परा में भी यही सिद्धान्त बहुत हद तक काम करता है। अन्य प्राणियों के समान, चूहों के तरह के यह प्रयोग मनुष्यों पर भी हो सकते हैं उसकी इच्छायें, आदतें और चेष्टायें इस प्रकार की बनाई औरढ़ाली जा सकती हैं जैसी कि सत्ताधीश और वैज्ञानिक पसन्द करें। कहना नहीं होगा कि अब राजशक्ति और विज्ञान दोनों मिलकर संयुक्त रुप से इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि मनुष्य उनका कदाचित ही सामना कर सकें, इसे मनुष्य जाति के सिर पर निरन्तर लटकती रहने वाली तलवार ही कहा जा सकता है।

न केवल स्वभावगत विशेषताओं में वरन् शारीरिक विशेषताओं में परिवर्तन करने की सफलता भी विज्ञान ने प्राप्त कर ली है। ‘अमेरिकन रिपोर्टर’ पत्र में पिछले दिनों विज्ञान स्तम्भ के अर्न्तगत यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि व्रिसवेन के कुछ जीव वैज्ञानिकों ने कुत्ते की एक ऐसी जाति तैयार की है जो अपनी नस्ल में सबसे छोटी है। इन कुत्तों की ऊँचाई सात सेन्टीमीटर, लम्बाई पच्चीस सेन्टीमीटर तथा वनज सवा किलो के करीब है। ओवरकोट की जेब में रखकर इस कुत्ते को कहीं भी ले जाया जा सकता है। पत्र के अनुसार लोगों ने इस संशोधित नस्ल के कुत्तों को बहुत पसन्द किया है। क्योंकि एक तो अमेरिका में कुत्ते पालने को बहुत शौक है और दूसरे यहाँ के महानगरों में बढ़ती हुई आबादी के कारण स्थानों की कमी भी होती जा रही है। इस तरह के लघुकाय कुत्ते शौकीनों की कई कब्नाइयों को हल कर सकते हैं कुत्तों के खाने आदि का कम खर्च, काम पर जाते समय उन्हें सूने मकान में रखने की परेशानी, हरदम साथ रखने का शौक जो बड़े कुत्तों को पालने में कठिन ही होता है अब यह कठिनाईयाँ हल हो गईं है और लोग बड़े शौक से अपने साथ कुत्तों को कहीं भी ले जा सकते हैं तथा उसे कम जगह में, कम खर्च में पाला जा सकता है और कहीं भी ले जाया जा सकता है।

यह तो समय ही बतायेगा कि भविष्य में मनुष्य का क्या स्वरुप होगा ? मनुष्य जाति का भग्य निर्धारण किन तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए किया जाता है ? किन्तु इतना निश्चित है कि रस्सा-कसी भौतिकवाद और अध्यात्मवाद में ही चलने वाली है। यदि भैतिकवाद की प्रधानता रही तो निश्चित ही मनुष्य जाति का भविष्य अन्धकारमय है और वर्तमान परिस्थितियाँ भौतिकवाद की ही प्रधानता दर्शा रही हैं। किन्तु प्रबुद्ध अध्यात्म भी चुप नहीं बैठा है। वह भी मनुष्य जाति को विनाश और कतरब्योंत की सर्वभक्षी विभीषिका से निकालने के लिए अपना कर्त्तव्य पालन करने को कटिबद्ध हो रहा है। इस समय जब मानवी भाग्य एवं भविष्य का भला-बुरा निपटारा होने की घड़ी सामने है तो देव पक्ष की सत्ता भी निष्क्रिय नहीं बनी रह सकती। मनुष्य के ईश्वरीकृत सनातन रुप को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए अध्यात्म शक्तियाँ भी दृश्य और अदृश्य रुपों में काम कर रही हैं। यदि अध्यात्म शक्ति विजयी हुई तो मनुष्य महान् ही बनेगा। तीव्र परिवर्तनों की वर्तमान जाति उसे महामानव और अतिमानव भी बना सकती है। सूक्ष्मदर्शी निकट भविष्यों में ऐसे अवतरणों की सम्भावना देख रहे हैं। जो मनुष्य को दिव्य शक्ति सम्पन्न बनायेंगे। इन अवतरणों का प्रभाव मनुष्य की चेतना को देव स्तर बनायेगा, जिससे धरती पर स्नेह और सौजन्य की अमृतधारा बहने तथा इसी संसार में र्स्वग का वातावरण बनने की सम्भावनाएँ साकार होंगी।


जीव-जगत का संकट आगे मनुष्य जाति पर आयेगा

पिछले दिनों प्रगति की होड़ में दूरगामी परिणामों पर ध्यान नहीं दिया गया। अधिक उपार्जन एवं संग्रह की लालसा ने कम समय एवं कम श्रम की कीमत पर अधिक उत्पादन करने की प्रेरणा से बड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया। तुरन्त का लाभ अधिक उत्पादन के रुप में मिला तो, पर दूरगामी परिणाम प्रदूषण की विभीषिका के रुप में आया। इसका प्रभाव मनुष्यों एवं वातावरण पर भयंकर रुप से पड़ा है। वायु एवं जल में विषाक्त तत्वों के मिल जाने से विभिन्न प्रकार के नये रोग उठ खड़े हुए हैं। अदूरदर्शी प्रगति के इस प्रयास का सबसे घातक प्रभाव मनुष्योत्तर जीवों पर पड़ा है। प्रदूषण के खतरों से बचने के लिए मनुष्यों के पास बुद्धि है और विभिन्न प्रकार के साधन, उपचार भी। पर जीव-जन्तू, पक्षी तो असहाय एंव असमर्थ हैं। उनके पास न तो इस संकट से बचने की न तो इतनी बुद्धि है और न ही उपचार पद्धति। इसका परिणाम यह है कि वे प्रदूषण की विषाक्ता से दम तोड़ते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिकीकरण इसी प्रकार बढ़ता गया और उससे निकले प्रदूषण की रोकथाम की व्यवस्था नहीं बनी तो वायुमंडल में उड़ने वाले पक्षी ही नहीं, नदी, सागरों के निकट रहने वाले जीव-जन्तुओं का वंश भी सदा के लिए लुप्त हो जायगा।

युद्ध के समय प्रयुक्त हो रहे आग्नेय आयुधों, अणुआयुधों की चपेट में भी अधिकतर यह असहाय जीव ही आते है। कोरिया, वियतनाम, इजराइल, अरबों, बंगलादेश के युद्धों से पशु-पक्षियों की कई जातियाँ समूल रुप से नष्ट हो गईं। उदाहरणार्थ वियतनाम युद्ध में कुप्रे जाति की गाय सदा के लिए समाप्त हो गई। सारे जंगलों में फौज के फैल जाने के कारण यह शर्मीला जानवर भाग न सका और युद्ध के घेरे में आकर दम तोड़ दिया।

अमेरिका, जापान, वियतनाम, रुय ने बढ़ते हुए औद्योगीकरण से अन्तरिक्ष में उड़ने वाले पक्षियों का दर्शन दुर्लभ हो गया है। अमेरिका में पाये जाने वाले ‘बाज’ पक्षी की विशिष्ट स्में अब कहीं नहीं दिखाई देती। जो थीं वे प्रदूषण की विषाक्ता से बचने के लिए अन्यत्र चली गईं। कल-कारखानों से निकलने वाले रसायन एवं कचरे नदी, नालों के माध्यम से सागरों तक पहुँचते है। समुद्र के किनारे एवं अन्दर रहने वाले जीव उस विषाक्ता की चपेट में आ जाते हैं। समुद्र में रहने वाली मछलियों की कितनी ही जातियाँ तो लुप्त हो गईं और कितनी ही समाप्त होती जा रही हैं। लुप्त होते हुए जीव-जन्तुओं के सर्वेक्षण में निकले प्रसिद्ध जीवशास्त्री ‘फ्रला मोरफन्ड, ने भारत में आने पर बताया कि विश्व भर में ढ़ाई सौ दुधारु जानवरों की नस्लें, तीन सौ पक्षियों तथा अन्य कुछ दुर्लभ जीव अन्तिम मरण के सन्निकट हैं। भारत का उल्लेख करते हुए उन्होने बताया कि “यहाँ भी हाथी, जहरीले साँप, कछुए, सिंह, गेन्डे, मणिपुरी मृग, फ्रेगेड, मोर, शेर जैसे जीव तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं।

पशु-पक्षी, जीव-जन्तुओं के लुप्त होते अस्तित्व के संकट को देखते हुए पर्यावरण विशषज्ञों ने ये आगाह किया है तथा प्रकृति सन्तुलन के लिए घातक बताया है। कई राष्ट्रों में इस संकट से बचने के लिए कुछ प्रयास भी चल पड़े हैं। कुछ विचारशीलों ने मिलकर विश्व जंगली जीव सुरक्षा फंड नामक संस्था का निर्माण किया है। इसके डारेक्टर हैं ‘फ्रला मोरमन्ड’। यह संस्था जीव-जन्तुओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करती तथा उन कारणों का पता भी लगाती है जिससे वे तेजी से मरते हैं। प्रस्तुत संकट से बचने के लिए संस्था उस राष्ट्र को उपयोगी सुझाव देती है।

यह प्रारम्भिक चेतावनी है कि यदि मनुष्य अपना जीवन क्रम नहीं बदलता तो जीव-जन्तु ही नहीं मनुष्य भी एक दिन नष्ट होकर रहेगा।


संकट के लिए बचत आवश्यक

किसी पात्र में यदि छिद्र किये जायें एवं इसे भरने का प्रयास किया जाय तो यह प्रयास निरर्थक ही जाता है। खर्च के कई साधन हों पर आमदनी सीमित हो बचत की कोई गुँजाइश ना हो तो शीघ्र ही ऐसा व्यक्ति आर्थिक संकट में स्वयं को पाता है नित्य के जीवन व्यापार में ऐसे कई व्यक्ति पाये जाते हैं जो बचत का महत्व न समझते हुए अपने संचित भण्डार को शनैः शनैः नष्ट करते रहते हैं। अदुरदर्शीतावश ये व्यक्ति यह कहीं सोच पाते कि यदि अपनी आर्थिक सम्पदा को बचाये रखकर उन्होंने मितव्ययता से खर्च किया होता तो स्वयं को कठिनाई के क्षणों में मानसिक उद्वेगों से बचाया जा सकता था दूसरों की देखादेखी अपव्यय की आदत अन्ततः उन्हें कर्जे के बोझ से लाद देती है।

राष्ट्रिय बचत योजना, डाकखानों के सेविंग प्रमाण-पत्र एवं बैंकों की फिक्सड्डिपाजिट योजना के पीछे एक दूरदर्शी चिन्तन होता है। अपनी आपातकालीन जरुरत के लिए व्यक्ति बचत का उपयोग कर सकता है। शादी-ब्याह, बच्चों की ऊँची पढ़ाई या किसी अप्रत्याशित कारण से कोई खर्चे आ ही पड़े तो समझदार व्यक्ति संचित भंडार से ही व्यवस्था बनाता है। बचत की नीति अन्ततः लाभकारी ही सिद्ध होती है।

मानव शरीर की सुगढ़तापूर्ण व्यवस्था में इन सिद्धान्तों को भली प्रकार समझा जा सकता है। प्रकृति ने सारी रहस्यमय विलक्षणताएं इस कलेवर में भर दी हैं। मनुष्य मात्र इन्हें देखकर ही अपने जीवन को सुनियोजित, व्यवस्थित बना सकता है। हमारे शरीर में बैंकिंग एवं स्टोरेज सिस्टम के रुप से बड़ी सुन्दर व्यवस्था जुटाई गयी है। इस व्यवस्था के कारण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी, अप्रत्याशित जरुरत के बावजूद आन्तरिक संस्थान सारा क्रिया-कलाप सुचारु रुप से चलते हैं।

शरीर में रक्त का आयतन कुल 5 लीटर है। हृदय एक पम्प की तरह 0.8 सैकिण्ड में एक बार धड़कता है और इस रक्त को धनियों केपीलरीज के माध्यम से जीवकोषों तक पहुँचाता है। इतना रक्त शरीर को चयापचमिक गतिविधियों के लिए काफी होता है। आपरेशन के समय रक्तस्त्राव के कारण, चोट लगने से रक्तस्त्राव के कारण, खून की उल्टी होने पर, रक्ताल्पता के कारण समुचित मात्रा में आक्सीजन जीवकोषों को न मिलने के कारण रक्त का उपलब्ध आयतन कम हो जात है। ऐसे में रक्त की स्टोरेज व्यवस्था (केन्द्रिय भण्डागार) सक्रिय होती है। यह होती है बोनमेरो (अस्थ मज्जा) में। यहाँ पर विशिष्ट कोषों के माध्यम से अतिरिक्त रक्त का निर्माण होता है जो तुरन्त रक्तवाहिनियों में पहुँचा दिया जाता है। शरीर में मस्तिष्क एवं हृदय को रक्त समुचित मात्रा में न मिले तो उनकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। रिजर्ब स्टोर से आया रक्त इसीलिए महत्वपूर्ण अंगों को भेज दिया जाता है। रक्त का वौल्यूम पूरे शरीर में पहले जैसा ही हो जात है।

यह प्रक्रिया बड़ी जटिल है। रक्त क्षय की स्थिति में रक्तदाब व रक्त की मात्रा बनाये रखने के लिए शरीर तुरन्त आपातकालीन व्यवस्था करता है। मस्तिष्क के मेडुला आब्लागेंटा के बासोमोटर केन्द्रों को इसका आभास सबसे पहले होता है। वे तुरन्त ऐड्रीनेलिन नामक रस के स्त्राव हेतु एडरीनल ग्रन्थियों को सन्देश भेजते हैं। यह स्त्राव धमनियों-कोशिकाओं को संकुचित कर हृदय की गति को बढ़ा देता है। प्रतिमीटर 5 लीटर रक्त को औसतन 70 धड़कनों के माध्यम से फेंकने वाला हृदय अब करीब 5 लीटर रक्त को 10,100 धड़कनों के माध्यम से प्रत्येक धड़कन में पहले से कम भेजता है। इसी समय किड़नी में उत्पन्न होने वाला इरिथोपाइटिन नामक रस रक्त में मिलकर हड्डियों के सिरों पर स्थित उत्पादन इकाइयों तक जा पहुँचता है। यहाँ पर हिमोसाइटो ब्लास्ट नामक सेल्स होते हैं जो उक्त रस के प्रभाव से नये रक्त कणों को तेजी से बनाने लगते हैं। आक्सीजन के परिवहन के लिये उत्तरदायी रक्तकण इस संचित कोष से मिल जाते हैं तो गुर्दों के माध्यम से, पसीने के माध्यम से होने वाली को रोककर बचा लिया जात है। यह व्यवस्था की व्यवस्था आने से पूर्व यथासम्भव की जाती है।

जब सीमाओं पर तैनात सुरक्षा सेना के हौंसले आक्रमणकारियों के सामने परस्त होने लगते हैं तो रक्षा शासन द्वारा रिजर्व फोर्स सीमा पर भेजी जाती है। इसी प्रकार राज्स में कहीं अराजकता की स्थिति आने पर पुलिस बल के अतिरिक्त केन्द्रिय आरक्षी पुलिस (सी. आर. पी.) के जवान भेजे जाते हैं। शरीर में कुछ ऐसी ही व्यवस्था है। रक्त के श्वेत कण जब जीवाणु-विषाणु के हमलों से लड़ते-लड़ते ढेर हो जाते हैं। तब शरीर का इम्यून संस्थान अपने स्टोर से एण्टीबाँडीज भेजता है। यह शरीर की रिजर्व फोर्स है। ऐसी व्यवस्था बनाकर रखी जाय तो विभिन्न संस्थानों की कार्यक्षमता तुरन्त गिर जायेगी एवं मृत्यु होते देर न लगेगी।

हमारे भोजन विभिन्न प्रकार के पदार्थ होते हैं और इनमें से अधिकाँश का उद्दंश्य होता है, जलकर जलोरी अर्थात् ऊर्जा प्रदान करना, जिससे शरीर की त्रिविधियों के लिए ईंधन बराबर मिलता रहे। जिस प्रकार रेल्वे इंजन पानी की भाप से चलता है उसी प्रकार शरीर के अवयव कार्बोहाईड्रेट, चर्बी, प्रोटीन के सूक्ष्मतम कणों के कैलोरीज में बदलने से चलते हैं। जब ये तत्व समुचित या अधिक मात्रा में मिलते हैं, तब कैलोरीज को, अतिरिक्त फैट स्टोरेज के रुप में जमा कर लिया जाता है। तुरन्त नष्ट नहीं कर दिया जाता है। स्टोरेज है- चमड़ी के नीचे चमड़ी की परत के रुप में जमा माँसपेशियों के साथ-साथ चर्बी के रुप में, पेट में ओमेण्टम या पेरिटोनियम के बाहर फैट के पैड के रुप में। जब अनाहार अथवा अधिक परिश्रम के कारण कैलोरीज की आवश्यकता होती है तो यही चर्बी जलकर गर्मी जाती है। इसी स्टोरेज के कारण शरीर कई दिनों तक खा रहकर भी शरीर के संस्थानों को गतिमान बनाये रख सकता है। अपने शरीर की अवस्था के कारण स्वयं को जीवित बनाये रखते हैं। वियतनाम से भागी एक शरणार्थी लड़की प्रशान्त महासागर पर एक टापू पर 38 दिन तक निराहार पड़ी रही। उसके साथ आये परिवार के सभी सदस्य एक एक करके मौत के मुँह में चले गये। पर यह असाधारण लड़की मात्र कभी-कभी हो जाने वाली वर्षा के जल पर अपने को जीवित बनाये रही, जब तक कि एक अमरिकी जहाज ने उसे बचा न लिया। शरीर के स्टोर सथासम्भव अन्दर से ही उपलब्ध होने वाली आपातकालीन व्यवस्था बनाये रखते हैं।

हमारी आँखें हमेशा नम, गर्म, धूल भरे वातावरण के सर्म्पक में रहती है। इनके सम्वेदनशील काँनिया वाले काले हिस्से को बचाये रखने के लिये एक पतली परत आँसुओं की लेक्राइमल से स्त्रावित रस से बनती हैं। ये ग्रन्थियाँ ऊपरी पलक के अन्दर छिपी होती हैं। जब मन दुःखी होता है, फूट पड़ने को जी चाहता है तो सम्वेदना केन्द्र से आये सन्देशों के प्रभाव से ये ग्रन्थियाँ रस स्त्राव आरम्भ कर देती हैं। अगर आँसू न हों, उनका रिजर्व स्टोर न किया जाये तो आँखें सूखेपन के कारण शीघ्र अन्धी हो जायेंगी। जिनकी ग्रन्थियाँ व्याधि के कारण स्त्राव बन्द कर देती है उनकी काँनिया में छाले पड़ जाते हैं, इससे आँसुओं की स्वस्थ आँखों के लिए आवश्यकता का पता चलता है।

उपरोक्त उदाहरणों के अतिरिक्त ऐसी कई व्यवस्थाएँ मानव शरीर में भरी पड़ी है जो बचत सिद्धान्त का ही पालन करती हैं। यदि शरीर ने ऐसा न किया होता तो उसकी भी वही हालत होती किसी कर्ज में डूबे अपव्ययी की होती है।

इसी से कुछ सीखकर मानव अपव्यय की हानिकारक प्रवृति पर नियंत्रण लगा सकता है। जीवन में आवश्यकताएँ अनन्त है, पर अनिवार्य और साधारण का अन्तर समझकर ऐसी व्यवस्था विवेकशील व्यक्ति को बनानी चाहिए कि अनिवार्य की पूर्ति समय पर की जा सके। यह बचत से ही सम्भव है।


अनैतिकता छिपाये नहीं छिपती

अनैतिकता अस्वाभाविक है उसका मानवी प्रवृति के साथ ताल-मेल नहीं बैठता। ऐसे तत्व विजातीय कहे जाते हैं जो अनुकूल एवं उपयोगी न होने के कारण जीव प्रकृति द्वारा खदेड़कर बाहर किये जाते है। विषाक्त भोजन उदरस्थ करने पर उल्टी एवं दस्त होने लगते हैं। रक्त में ऐसे तत्व घुस पड़े तो तो उन्हें फोड़े, फुन्सियों द्वारा बाहर निकलना पड़ता है। पारा हजम नहीं हो सकता और पाप को भी कोई पचा नहीं सकता। देर-सवेरे में उसका भेद खुलता ही है। न खुले तो भी उसके कारण अन्तःक्षेत्र में हुई गड़बड़ी शारीरिक, मानसिक रोगों के रुप में उभरती और कष्ट कर त्रास देती हुई बाहर निकलती हैं। छिपाने के प्रयत्न भी एक सीमा तक ही सफल होते हैं। आमतौर से अनुचित चिन्तन और आचरण करने पर सहज प्रवृति में ऐसा अन्तर पड़ता है जिसे विचित्र कहा जा सके। सामान्य बुद्धि को भी इसका आभास मिल जाता है। सूक्ष्मदर्शी बुद्धि तो उसे और भी आसानी से पकड़ लेती है। अब तो ऐसे यंत्र भी बन गये है। जो मनुष्य को अस्वाभाविक हरकतों को देखकर यह पता लगा सके कि यह अनौचित्य के अपराधी प्रवाह में बह रहा है।

झूठखोजी मशीन का सिद्धान्त यह है कि व्यक्ति जब झूठ बोलता है तो तनाव की वजह से उसके शरीर में कुछ परिवर्तन होते हैं, जिन्हें यह मशीन जान लेती है। पाँलीग्राफ या लायडिटेक्टर नामक यह उपकरण भारत में भी मुख्य संस्थानों के पास एवं विदेशों में सभी पुलिस हेडक्वार्टर्स पर हैं।

इज्रायल ने एक यन्त्र विकसित किया है- जिसका नाम है-अणुतरंग श्वासप्रबोधक (माइक्रोवेव रेस्पीरेशन माँनीटर)। इसकी मदद से आधे मील की दूरी से यह तय किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति सच बोल रहा है या नहीं। इज्रायली पुलिस इस मशीन का प्रयोग अरब हमानों’ पर करती है। सीमा पर ही यह निर्णय ले लिया जाता है कि यह व्यक्ति वाँछनीय है अवाँछनीय। सैनिक सवाल करते हैं और इस बीच अणुतरंग संकेत शरीर में प्रवेश कर तय करते हैं कि सवाल जबाव के दौरान व्यक्ति अधिक तेजी से साँस ले रहा है।

ओहिया की कैट स्टेट प्रयोगशाला में एक अन्य मशीन तैयार की है जो सवाल पूछे जाते वक्त व्यक्ति की आँख पर निगाह रखती है। पुतली का हिलना व भावभंगिमा में परिवर्तन पर सूक्ष्म दृष्टि रखी जाती है। आदमी कुछ न बोले, परन्तु यह मशीन बोल देगी ।

अतीन्द्रिया क्षमता सम्पन्न मनुष्य किसी के नैतिक और अनैतिक स्तर को आसानी से समझ लेते हैं। इस जानकारी के आधार पर अवाँछनीय तत्वों के आक्रमण से बचे रहना ही नहीं, उन्हें रोकना, पकड़ना, दएड़ देना अथवा सुधारना भी सम्भव हो सकता है। चोर की चारी पकड़ने में जासूसी कुत्तों तक के लिए सम्भव हो जाता है फिर कोई कारण नहीं कि सूक्ष्मदर्शी पर्यवेक्षण से मनुष्यों की प्रकृति जानना और उनसे तदनुरुप व्यवहार करने का कौशल सम्भव न हो सके।

साधना सम्पन्न आत्मवेत्ता तो ऐसे सफल प्रयोग करते ही रहते हैं। कभी-कभी सामान्य स्तर के लोगों में भी वह क्षमता उभरी हुई पाई जाती है कि वे व्यक्ति स्तर की विशेषताओं और अनैतिक आचरण वाली प्रकृति को समझ सके और अपराधों तथा अपराधियों की रोकथाम में समुचित सहायता कर सके।

रेग मैकहग कुछ समय तक कनाडा में पुलिस अफसर भी थे और चोरियाँ पकड़ने में उसे ख्वाति प्राप्त थी। यह सफलताएँ उसे बुद्धि कौशल या साधन सूत्राो से नहीं वरन् ऐसी विशिष्ट क्षमता के सहारे मिलती रही, जिसे आतीन्द्रिय समर्थ्य कहा जा सकता है। चोर के समीप आते ही उसका जी मिचलाता। फलतः वह अनुमान लगा लेता कि इसी का दुष्कृत्य है। छान-बीन करने पर तथ्य उजागर होते, चोरी का भेद खुलता, माल मिलता और चोर सजा पाता। इस सफलता ने उसे अपने विभाग में अच्छी ख्वाति प्रदान की।

पीछे उसने नौकरी से निवृतिल ले ली और यह कार्य स्वतंत्र व्यवसाय के रुप में करने लगा। बहुत सी व्यवसायिक कम्पनीयों का ढ़ेरों माल हर साल चोरी हो जाता था। चोरों का पता न चलने से वे हर साल भारी घटा उठाती थीं। रेग ने उनसे आर्थिक आधार पर ठेके लिए जाने जितनी चोरी पकड़ी जाय उसका लाभाँश उसे मिले।अनेकों कम्पनीयाँ खुशी-खुशी इसके लिए तैयार हो गईं । इससे दोनों पक्षों को भारी लाभ हुआ। चोरियाँ पकड़ी गईं। कोई जादूगर चोरी पकड़वा देता है इस अफवाह के फैलते ही आधी तो अपने आप रुक गईं जो चलती थीं वे धड़ाधड़ पकड़ी गईं। फलतः रेग कुछ ही समय में धनवान बन गया।

सरकारी अफसरों एवं सामान्य लोगों को भी उसने सहायता की और चोरी के माल पकड़वाये। यह ख्वाति सारे अमेरिका में फैली। उसके विवरण रेडियों पर सुनाये गये और घटनाक्रम टेलीवजन पर दिखाये गये। सन् 1973 में उसकी विलक्षता प्रदर्शित करने वाली एक फिल्म भी टोरेन्टो नगर में बनी।

अपने इस कौशल के सम्बन्ध में रेग का कहना यह है कि यह विशेष क्षमता बीज रुप से हर मनुष्य के भीतर मौजूद है। किसी को बिना श्रम के अनायास ही मिल जाती है, पर प्रयत्न करने पर उसे अन्य विशिष्ट क्षमताओं की तरह ही जगाया और परिपक्व किया जा सकता है। इससे किसी मन्त्र या देवता के अनुग्रह की आवश्यकता नहीं।

रेग ने बाद में अपना व्यवसाय बड़े रुप में चलाया। सन् 1971 में उसने एक विधिवत् कम्पनी खोली ‘इनवेस्टीगेशन एण्ड सिक्योरिटी’। उसकी सहायता हर किसी को उपलब्ध हो सकती है। इस विज्ञापन ने उसका कारोबार बहुत बढ़ा दिया। कम्पनी में सैकड़ों कर्मचारी काम करने लगे।

काम बढ़ने से उसने कई सहायकों को प्रशिक्षित उनकी सहायता से काम हलका हुआ और केस भी कई गुने सुलझाये जाने लगे। यह शिष्यों में से कई को आशाजनक सफलता मिली। फलतः कम्पनी की कई शाखयें कई नगरों में खोली गईं।

रेग के प्रयोग परीक्षण और निर्ष्कष यह बताते हैं कि मनुष्य को सामान्यजनों द्वारा प्रयुक्त होने वाली क्षमताएँ ही होती हों ऐसी बात नहीं है। उसमें और भी ऐसी विशेषताएँ बीज रुप से विद्यमान हैं जो काम ना आने से पगसुप्त पड़ी रहती हैं। वे बुद्धि एवं बलिष्ठता की तरह प्रयत्नपूर्वक यदि कई जगाई जा सके तो अधिकाँश को इस रहस्यमय क्षेत्र में सहज सफलता मिल सकती है।

यह परीक्षण कुछ अधिक कठिन नहीं है। थोड़े से अभ्यास से यह विशेषता किसी में भी उभर सकती है। अपराधी और नीतिवान व्यक्तियों की आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखा जाये तो प्रतीत होगा कि नीतिवानों के चेहरे पर एक सहज सौम्यता, शान्ति, सन्तोष स्थिरता तथा प्रसन्नता के लक्षण पाये जाते हैं। इस अन्तःस्थिति के प्रकटीकरण में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के मुख मण्डल की पेशियाँ, विभिन्न प्रकार से मुड़ती, सिकुड़ती, फैलती तथा ठहरती हैं। आवाज में भी यही विशेषताएँ घुली रहती हैं। इनके विपरित अनीत के कारण उत्पन्न हुए अन्तर्द्वन्द, घबराहट, भय, चिन्ता, दुराव, ग्लानि, असन्तोष जैसे भाव चेहरे पर उभरते हैं। इन उभारों का अन्तर बहुत समय तक देखते रहा जाय और उस अनुभव को अभ्यास में उतारा जाता रहे तो यह जानने में सहज बुद्धि ही समर्थ हो सकती है कि नीतिवान तथ अनाचारी किस प्रकार अपने आन्तरिक रहस्यों को स्वयं ही प्रकट करते रहते हैं।

जिन्हें इस प्रकार का आभास नहीं हैं वे भी व्यक्ति के अन्तराल को- विशेषतया चरित्र चिन्तन को-किसी कदर समझते रहते हैं। यही कारण है कि अपराधियों के कुचक्र में फँसने से अधिकाँश व्यक्ति बचते रहते हैं। यह सहज बुद्धि न होती तो अनाचारी छझ व्यक्ति अधिकाँश लोगों को अपने चंगुल में फँसा लेते ।


बड़प्पन सादगी और शालीनता में है

सामान्यजनों की बड़प्पन की भाषा यह है कि अधिक से अधिक लोगों का ध्यान उनकी ओर आर्षित हो। ज्यादा लोग उनकी चर्चा करें। इसके लिए वे फैशन, सजधज, ठाट-बाट, और अमीरों जैसा चार्च करके लोगों पर यह प्रभाव जमाने की असफल चेष्टा करते हैं कि वे विशिष्ट हैं। परोक्ष रुप में इस सजधज के पीछे यह आग्रह रहता है कि उनकी विशेष स्थिति को स्वीकार किया जाये, उनके बारे में बार-बार सोचा जाये। यह उद्देश्य पूरा करने के लिए जितना आड़म्बर रचना पड़ता है, जितना सरंजाम जुटाना पड़ता है और जितना समय खर्च करना पड़ता है, उसे सामान्य रुप से नहीं किया जा सकता। उसके लिए असामान्य तरीके अनपनाने पड़ते हैं। अतिरिक्त साधन जुटाने के लिए सीधे तरीकों से तो काम नहीं चलता। उसके लिए अपनानी पड़ती है- धूर्तता, नाटकीयता, उच्छृखलता, आड़म्बर और पाखण्ड। क्योंकि इतने साधन और सरंजाम बिना छझ नीति अपनाये तो जुटाये नहीं जा सकते, इतना बड़ा ढ़ाँचा बिना बेईमानी किये तो खड़ा नहींकिया जा सकता, जिसे कि लोग घूर-घूर कर देखें और उस सम्बन्ध में बार-बार सोचें।

लोग यह भूल जाते हैं कि बड़प्पन बौर महानता केवल सादगी तथा शालीनता अपनाने से ही प्राप्त होती है। यह बात अलग है कि सीधी, सरल और सज्जनता की नीति अपनाकर तत्काल ही चर्चा का विषय बना जा सकता। इसमें देर लगती है, परन्तु बड़ा बनने का राजमार्ग यही है। महानता तथा बड़प्पन वटवृक्ष की तरह है, जिसका विकाय क्रमबद्ध ढंग से ही होता है। उसकी अभिबृद्धि एवं सुरक्षा के लिए लम्बे समय तक तत्परता और सतर्कता का खाद पानी मिलना चाहिए। जिन्हें बाहवाही की आतुरता है, वे इतनी प्रतीक्षा क्यों करेंगे और सज्जनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कष्ट क्यों सहेंगे ? आतुरता के लिए इतने मँहगें मूल्य पर बाहवाही खरीद सकना कठिन ही है। उसके लिए धूर्तता ही सरल उपाय रह जाता है। उसमें कहीं कोई त्याग करने या शौर्य, साहस प्रदश्ित करने की आवश्यकता पड़ती है तो वह नाटकीयता एवं उच्छृंखलता के ऐसे तरीके अपनाने भर से पूरी हो जाती है जो सर्वसाधारण के स्वभाव में सम्मिलित नहीं है। ऐसे काम जिनमें दूसरों की हानि में भी अपने लाभ की दृष्टि प्रमुख रखी जाती है अनैतिक ही कहे जायेंगे। अनैतिक न सही क्षुद्रता से भरे तो होते ही हैं। उन्हें ओछे, बचकाने एवं छिछोरे भी कहा जा सकता है। नाटकीय सजधज बनाने वाले लोग प्रायः ऐसी आत्महीनता से ग्रस्त होते हैं।

इस तरह की आत्महीनता से ग्रस्त लोगों की क्षुद्रता का बड़ा मनोरंजक वर्णन अंग्रेजी उपन्यासकार सामरसेट माम ने अपनी पुस्तक ‘दि सामंग अप’ में किया है। इस पुस्तक में माम ने ऐसे बचकाने लोगों की मनःस्थिति, तर्क एवं मान्यताओं का विवरण देते हुए उन पर करारा व्यंग किया है और यह भी बताया है कि आतुर व्यक्ति ही आतंकवादी बनते, उद्धत आचरण करते और गुण्डागर्दी अपनाते हैं। यहाँ तक कि अपराधी बनकर फाँसी पर चढ़ने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। चर्चा बुरी ही क्यों न हो, पर होनी अवश्य चाहिए, यह उनकी धारणा होती है। अनेकों आततायी और अपराधी किसी अभाव के कारण नहीं बल्कि इसी उद्धत ओछेपन से पीड़ित होकर कुकृत्य करने पर उतारु हो जाते हैं और अपनी गणना शूरवीरों में कराने की सनक लेकर इस कदर अनाचार-दुराचार करने की पैशाचिकता अंगीकार करते हैं।

कई लोग अपनी शक्ति और प्रभाव की सार्थकता इसी बात में समझते हैं कि उसके द्वारा वे दूसरों को कितनानुकसान पहुँचा सकते हैं। यह एक भ्रान्त धारणा ही कही जायगी कि दूसरों को नुकसान पहुँचाने की क्षमता का नाम शक्ति है। ऐसे कृत्य प्रायः लुक छिपकर ही किये जाते हैं। असावधान व्यक्ति पर छिपकर पीछे से हमला करके तो कोई अदना सा आदमी भी किसी सशक्त व्यक्ति के प्राण हरण कर सकता है। पीठ पीछे से बार करने में क्या दिक्कत है ? विशस घात करने की धूर्तता में कौनसा बड़प्पन है ? इसकी तुलना में सज्जनता और शालीनता से दूसरों को प्रभावित करने की रीति-नीति अपनाई जाये तो यह अनुभव का ही विषय है कि वह कितनी असरकारक होती है। और यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि बड़प्पन के लिए जिस सज्जनता की आवश्यकता पड़ती है वह नाटकीयता, बनावटीपन से पूरी नहीं होती, बल्कि उसे स्वभाव का, चरित्र का एक अंग बनाना होता है। यह काम समय और श्रम साध्य ही नहीं है, इसके लिए आदर्शवादिता पर दृढ़ रहने का मनोबल आत्मबल भी चाहिए। कहना नहीं होगा कि इस स्तर का बड़प्पन साधनात्मक जीवन अपना कर ही प्राप्त किया जा सकता है।

सौजन्यता और शालीनता को कुँठित करने वाले कई कुसंस्कार हैं जो हमें असभ्य और भ्रष्ट बनाते जाते हैं। दूसरों को छोटा बनाकर अपने आपको बड़ा सिद्ध करने का तरीका गलत है। अच्छाई दृष्टि से दूसरों से आगे बढ़ा जाए यही स्वस्थ प्रतियोगिता है। श्रेष्ठता की प्रतियोगिता में आगे निकलने के उत्साह को सराहा जा सकता है, पर साथियों को लात मार कर गिरा देना और इस स्थिति का लाभ उठाकर अपने आपको विजेता घोषित करना न तो सराहनीय है तथा नहीं शिष्ट इसी प्रकार अपनी वर्तमान स्थिति से खीझे रहना शील सौजन्य के विपरित है। जो उपलब्ध है उसपर प्रसन्नता भरा सन्तोष अनुभव करें और साथ ही आगे जाने का उत्साह भी जारी रखें। इतना कर लिया जाये तो प्रसन्न रहने और शील सदाचार का पालन करने के लिए पर्याप्त है किन्तु जो सदा असन्तुष्ट ही रहते और खीझते रहते हैं उनकी खीझ और खिन्नता उनकी शक्तियों को नष्ट करती है।

अंहकार व्यक्ति को दूसरों से प्राप्त होने वाली सद्भावनाओं से वंचित करता है। दसरों का व्यंग उपहास करके वयक्ति अपना बड़प्पन सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। कई सम्वेदन शून्य सहानुभूति रहित और निर्भय प्रकृति के व्यक्ति दूसरों की स्थिति समझे बिना ही उनके व्यवहार और आचरण पर उल्टी-सीधी टिप्पणियाँ करते रहते हैं। उन्हें दूसरों की स्थिति समझने का अवकाश ही नहीं रहता और उनका हृदय इतना विशाल होता है कि किस कारण किस पर क्या बीत रही है ? यह अनुभव कर सकें। इन प्रवृतियों के रहते उस शील सौजन्य का विकास नहीं हो सकता, जिससे मनुष्य अपनी तथा दूसरों की आँखों में ऊँचा उठता तथा सम्मानित बनता हो।

यदि तत्काल बड़प्पन पाने या बड़ा बनने की अपतुरता न हो और सर्म्पक क्षेत्र में अपने लिए भावभरा सम्मान प्राप्त करने की सच्ची आकाँक्षा हो तो उसका सुनिश्चित मार्ग है सज्जनता अपनाई जाय। आने सम्मक क्षेत्र के सभी वयक्तियों से व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण रखा जाय। व्यवहार और आचरण न्याय संगत रहे। यदि स्वार्थो में कहीं कोई टकराव होता हो, पीछे हटने से थोड़ा बहुत घाटा भी पड़ता हो तो उसे सह लिया जाये किन्तु सद्भाव गँवा देने की क्षति ऐसी है जो अन्ततः अधिक घाटे की सिद्ध होगी जब टकराव का कोई बहुत ही बड़ा कोई कारण न हो, सामने वाले का पथ अनैतिकता पूर्ण न हो तब तक व्यवहार कुशलता इसी में है कि सद्भावों को बनाये ही रखा जाये।

सौजन्यता का प्रभाव निजी जीवन में सादगी के रुप में दीखता है और व्यवहार क्षेत्र में वह विनयशीलता के रुप में दिखाई पड़ता है। उसमें दूसरों के सम्मान का भाव है न कि छोटापन प्रदर्शित करने का। किसी का सम्मान करने का अर्थ है बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाए, शालीनता बरती जाये और दूसरों को सन्तुष्ट रखकर उन पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने ऊँचा उठाने का कोई उपाय है ही नहीं।


तृतीय विश्वयुद्ध के गहराते बादल

सामान्य क्षमताओं का व्यक्ति दुष्प्रवृतिग्रस्त हो जाये तो उसके दुष्प्रभाव से थोड़े व्यक्ति पीड़ित हो सकते हैं। इन अवसरों पर यदि भलाई की सीमित शक्तियाँ भी प्रतिरोध में खड़ी हो जाये तो वह उस अवाँछनीयता को तत्काल दबोच कर ठिकाने लगा सकती है, किन्तु यदि अवाँछनीयता संगठित हो जाये तो प्रतिरोध की शक्तियाँ भी उतनी ही संगठित और शक्ति सज्जित लगानी पड़ती हैं। चोर, डकैत और बागी बटालियनों को पुलिस पी.ए.सी. और सेना के जवान ही नियंत्रित कर पाते हैं, उन्हें काबू में करना सामान्य व्यक्तियों के बलबूते ही बात नहीं होती।

औद्धत यदि शासन सत्ता में आ जाये तब परिस्थितियों का निराकरण व्यक्ति के वश में नहीं रह जाता। एक समय था जब शासनतंत्र, धर्मतंत्र के अनुशासन में रहता था तब ऐसी विकृतियों की सम्भावना कम रहती थी किन्तु अब राजसत्ता सर्वोपरि हो गई है, उस पर किसी का नियंत्रण नहीं रहा। सेना और अर्थतंत्र की समस्त शक्तियाँ उसी के हाथ में चली गई हैं ऐसी स्थिति में यदि सत्तासीन व्यक्ति ही पूर्वाग्रहग्रस्त और अंहकारी हो जाये तो उस स्थिति के दुष्परिणाम भी भयंकर हो सकते हैं। रावण, कंस और दुर्योधन पुराणकाल के कहे जा सकते हैं। अभी पिछली कुछ शताब्दियों में ही नादिरशाह, सिकन्दर, मुसोलिनी, नैपोलियन के कृत्यों को और उनके दुष्परिणामों को संसार अच्छी तरह देख, सुन और भुगत चुका है और यह भली प्रकार अनुभव कर चुका है कि राजसत्ता का पथभ्रष्ट होना कितना वीभत्स हो सकता है।

आज की परिस्थितियाँ तो और भी भयावह हो चुकी हैं अब एटमबम, हाइड्रोजन बम, प्रेक्षेपास्त्र, लेजर बम, और रसायन विस्फोट वाले ऐसे अस्त्र-शस्त्र भारी मात्रा में बनकर शासनसत्ता के हाथ में आ गये हैं। विश्व के किसी भाग की उथल-पुथल सम्पूर्ण विश्व को ले डूबने की स्थिति बन गई है। इन परिस्थितियों में ग्रह-गणित, मूर्धन्य भविष्य वक्ताओं की बात छोड़ भी दे तो भी कहा नहीं जा सकता, राजसत्ता औद्धत कब कहाँ फूट पड़े और सम्पूर्ण संसार को सर्वनाश की कगार पर पहुँचा दे।

परिस्थितियों के आधार पर भीविष्य की सम्भावनाओं का पता लगाने की एक नई वैज्ञानिक पद्धति विकसित हुई है जिसे ‘फ्यूचरालाजी’ या भविष्य विज्ञान कहा जाता है। कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा वर्तमान तथ्यों के आधार पर भावी घटनाओं का पता लगाने में यह पद्धति इन दिनों अधिक प्रामाणिक सिद्ध हुई है। भविष्यवाणियों का आधार होते हैं- अन्तर्राष्ट्राीय, राजनैतिक, आर्थिक, भैगोलिक एवं साँस्कृतिक घटनाक्रमों के तथ्य। कम्प्यूटर उन्हीं आधारों पर भविष्य के घटनाक्रमों का पता लगाता है। अमेरिका स्थित ‘वर्ल्डफ्यूचर सोसायटी के अध्यक्ष ‘एडवर्ड सी. कार्निश’ का कहना है कि ‘अन्तर्राष्ट्रीय प्रवृतियों का बारीकी से अध्ययन करके उनके सम्भावित प्रवाह का तर्क सम्मत् आँकलन करना भविष्य विज्ञान है। इस प्रकार के अध्ययन असाधारण मेधा सम्पन्न व्यक्ति ही कर पाते हैं तथा समय भी पर्याप्त लगता है। क्योंकि उपरोक्त आधारों पर तथ्यों का संकलन कठिन है और समय साध्य भी।’

इस विज्ञान के समर्थक उत्तर अटलाँटिक सन्धि संगठन (नारो) के ब्रिटिश सेना के भूतपूर्व कमाण्डर इनचीफ जनरल ‘सर जान हैकेट’ ने राजनैतिक पर्यवेक्षण के उपरान्त घोषणा की है कि “अगले दिनों विश्व-व्यापी तनाव और भी अधिक जोर पकड़ेगी सोवियत साम्यवाद की छत्रछाया में पलने वाले समाजवादी देशों की स्थिति और भी बिगड़ेगी। अगले तीन वर्षों में अमेरिका और रुस के बीच शीतयुद्ध छिड़ने की सम्भावना है। जिसके कारण पश्चिमी शक्तायाँ अपने-अपने स्वार्थों के वशीभूत होकर संगठित होंगी। युद्ध युगोस्लाविया से आरम्भ होकर पश्चिमी और अन्य साम्यवादी देशों में फैल जायेगा।”

प्रसिद्ध राजनैतिक भविष्य वक्ता ‘विलियन पफ्फ’ का कहना है कि “तृतीय विश्वयुद्ध का कारण अरब राष्ट्र होंगे। धार्मिक कट्टरता से ग्रस्त मुस्लिम तेल निर्यातक देश पश्चिम का वायकाट करेंगे। रुस अपने स्वार्थों से अभिप्रेरित होकर अरब राष्ट्रों को पश्चिमी पूँजीवाद देशों को भड़कायेगा। पर कुछ अरब राष्ट्र सोवियत रणनीति के खतरे से अवगत होकर अमेरिका के साथ हो जायेंगे। उनके अन्य सहयोगी देश बहिष्कार करेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप में सोवियत प्रभाव को कम करने की दृष्टि से अमेरिका विभिन्न देशों में शास्त्रागार भेजेगा। युद्ध की चिन्गारी सर्वप्रथम पश्चिम एशिया में भड़केगी। फलस्वरुप सोवियत संघ के मित्र देश संगठित होकर अमेरिका के विरुद्ध युद्ध छेड़ देंगे। भारत भी प्रभावित होगा। युद्ध से पश्चिमी देशों, सोवियत सुघ एवं अरब तेल निर्यातक राष्ट्रों को भीषण क्षति जन एवं धन के रुप में होगी। विश्व आणुविक युद्ध के कगार पर पहुँचेगा। किन्तु अचानक युद्ध विराम हो जाएगा। इस बीच इसी संकट का हल भी ढूँढ़ लिया जायेगा। उससे तेल का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। फलस्वरुप विश्व राजनीति में एक असामान्य मोड़ आयेगा। क्षमता, शुचिता, एकता, सौहार्द्र से भरी-पूरी एक नयी स्वस्थ राजनीति का पादुर्भाव होगा।

‘पीटरश्वीट्ज’ के भविष्य कथन का आधार राजनैतिक न होकर धार्मिक एवं साँस्कृतिक है। उनका कहना है “साम्प्रदायिता ही अतिवादी मान्यता के कारण धर्म के शाश्वत मूल्यों का पतन होगा। धर्मान्धता से विश्व में तृतीय विश्वयृद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। सोवियत संघ सहित सभी साम्यवादी राष्ट्रों में उथल-पुथल होगी। पश्चिमी देशों में धार्मिक कट्टरता से जो स्थिति बन रही है वह हिसंक एवं अधिक भयावह है। फलस्वरुप पश्चिमी देशों, सोवियत संघ समर्थक एवं तृतीय विश्व युद्ध के देशों के बीच एक भयंकर संघर्ष छिड़ जायेगा। उस युद्ध के बाद एक विश्व संस्कृति का उदय होगा जिसमें भारत की प्रमुख भूमिका होगी। 21 वीं सदी के पूर्व भारत का अभ्युदय एक सशक्त आध्यात्मिक राष्ट्र के रुप में होग तथा समस्त विश्व पर छा जायेगा। शक्ति एवं सामर्थ्य की दृष्टि से वह विश्व में मूर्धन्य होगा।”

राजनैतिक, आर्थिक, साँस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर इन भविष्यवक्ताओं के उद्घोष को वर्तमान घटनाक्रमों के परिवेश में स्पष्टतया देखा जा सकता है। विश्व की महा शक्तियों का विभिन्न राष्ट्रों के साथ जो गठबन्धन हो रहा है वह संसार को युद्ध की कगार पर घसीट रहा है। यह पंक्तियाँ लिखे जाने से उनके प्रकाशित होकर पाठकों के सम्मुख आने तक परिस्थितियाँ कितने मोड़ ले चुकेंगी, आज की स्थिति में यह तक कहना कठिन है।

हिन्द महासागर में विभिन्न राष्ट्रों की बढ़ती हुई सैनिक गतिविधियाँ तृतीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि बना रही हैं। ईरान की घटनाओं, अफगानिस्तान में सोवियत रुस का हस्तक्षेप, मुस्लिम राष्ट्रों की आन्तरिक अव्यवस्था तथा पश्चिम की महा शक्तियों द्वारा अपने तेल हितो के लिए चलाये जा रहे राजनैतिक दाँव-पेंचों के कारण यह क्षेत्र अशान्ति का केन्द्र बना हुआ है। इस क्षेत्र में अमेरिका और रुस दोनों की ही महा शक्तियाँ अपनी-अपनी नौ सेना को दृढ़ बनाने में लगी हैं। प्राप्त जानकारियों के अनुसार हिन्द महासागर में अमेरिका के 25 तथा रुस के 24सैनिक पोत विद्यमान हैं। दोनों देशों की जंगी पोत अपने झण्डे लगायें जागरुक हैं। अमेरिकी नौ सेना के तीन विमानशाही जलपोत एवं फ्रिगेट विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। ये फारस की खाड़ी के पास अरब सागर में अपना अड्डा जमाये हुए हैं। सभी जलपोत अणु शक्ति से चालित है। अन्य पाँच विशाल अमेरिकी लड़ाकू जहाज लाल सागर एवं फारस की खाड़ी में हैं। डीगोगार्सिय में नौ सेना के बड़े सैनिक अड्डे का निर्माण खतरे का संकेत देता है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार उस सैनिक अड्डे में आधुनिकतम विध्वंशक आणुविक प्रक्षेपास्त्र लगाये गये हैं। ‘डीगोगार्सिया’ का सैनिक अड्डा हिन्द महासागर के मध्य में स्थित है। निर्माण के समय अमेरिका ने यह घोषित किया था कि इस अड्डे का जहाजों एवं विमानों को ठहराने एवं तेल आदि की सुविधा प्रदान की दृष्टि से विकसित किया जा रहा है, पर वास्विकता यह है कि इस क्षेत्र में अमेरिका अपनी सैनिक शक्ति केन्द्रिभूत करना चाहता है। यहाँ से अमेरिका अपने हवाई जहाजों को कुछ ही मिनटों में पश्चिमी एवं दक्षिणी एशिया के किसी भी देश में भेज सकता है।

रुस भी पीछे नहीं हैं। उसने सैनिक अड्डे का निर्माण तो नहीं किया , पर हिन्द महासागर के अदन, मसावा, मोजाम्विक स्थानों पर अपने पाँव मजबूत कर रहा है। अमेरिकी सैनिक गतिविधियों के विरुद्ध में उसने ‘काकेशस’ के पार तथा ‘काकेशस’ के जिलो में 23 डिवीजन रुसी सेना 800 लडाकू विमान तैनात कर रखे हैं। अफगानिस्तान एवं दक्षिणी यमन में भी उसके सैनिक तैनात हैं। ईरान और अफगानिस्तान की वर्तमान घटनाओं से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1971 में इस क्षेत्र में विसैन्यीकरण का जो शान्ति प्रस्ताव पास किया था वह निरर्थक हो गया।

हिन्द महासागर अब महा शक्तियों की संघर्ष स्थली बन गया है। इसका प्रधान कारण है-फारस की खाड़ी की तेल सम्पदा। साथ ही पश्चिमी एशिया के भ-भाग की सामरिक स्थिति।

सोमालिया के ‘वरवरा’ एवं ‘केन्या’ के ‘मौम्वासा’ स्थित अड्डों पर 1200 अमेरिकी विशेषज्ञ नियुक्त हैं जो सउदी अरब की पैदल हवाई एवं समुद्री सेनाओं को प्रशिक्षण दे रहे हैं। सउदी अरब जो कभी अमेरिका का विरोधी इजरायल के समर्थन करने के कारण था, अब अमेरिका का समर्थक बना हुआ है। सउदी अरब को अमेरिका की तुलना में रुस से खतरा अधिक बढ़ गया है। सउदी अरब की सरकार अमेरिकी सेनाओं को अपने यहाँ ठहरने की सहर्ष अनुमति दे रही है।

रुसी युद्ध पोत ‘अदन’ की खाड़ी के पश्चिमी क्षेत्र में सक्रिय रुप से गश्त कर रहे हैं। ‘डियेगोगार्शिया’ के सैनिक अड्डे पर अमेरिका का 20 करोड़ डालर खर्च कर चुका है। आधुनिक मिशाइलों से युक्त विमानों के उतरने के लिए ऐसे हवाई अड्डे का निर्माण हुआ है जिसकेी पटरी 4 किलोमीटर लम्बी है। 720 करोड़ वर्ग किलोमीटर के हिन्द महासागर क्षेत्र पर पूण्तया आधिपत्य स्थापित करने के लिए अमेरिका प्रयत्नशील है। इस समय सैनिक अड्डों पर 21 अमेरिकी जंगी जहाज हैं जिसमें ‘किटीहार’ तथा ‘मिडये” जैसे विशाल विमान एवं 160 से अधिक युद्धक विमान मौजूद है।

अभी हाल में हुई ईरान एवं अफगानिस्तान की क्रान्ति ने परिस्थितियों में खतरनाक मोड़ दिया है। ईरानी शाह को अमेरिकी सरकार द्वारा शरण दिये जाने की प्रतिक्रिया स्वरुप ईरान से अमेरिकी नागरिकों को बन्धक बना लिया । शाह की वापसी पर अमेरिकी बन्धकों को छोड़े जाने की शर्त असफल सिद्ध हो चुकी है। ईरान ने भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। वह बन्धकों की हत्या करने की धमकी दे रहा है। अमेरिका की चेतावनी है कि ईरान यदि ऐसा करता है तो अमेरिका सैनिक कार्यवाही करने में पीछे नहीं हटेगा। राष्ट्रपति कार्टर का कहना है कि ‘ईरान यदि शीघ्र उसके नागरिकों को नहीं छोड़ता है तो अमेरिका ईरान के आयात एवं निर्यात को रोकने के लिए नौ सेना घेराबन्दी का आश्रय लेगा।

इधर अफगानिस्तान में रुसी घुसपैठ ने तनाव को और भी अधिक बढ़या है। 27 दिसम्बर 1979 को अफगानिस्तान में सैनिक क्रान्ति हुई जिसमें रुस की प्रमुख भूमिका थी। क्रान्ति में राष्ट्रपति हफीजुल्लाह की हत्या क्रान्तिकारी परिषद ने कर दी। रुसी सैनिकों की मदद से वरवक करपाल ने सत्ता सम्भाली तथा राष्ट्रपति पद पर आरुढ़ हुए। सत्ता परिवर्तन में अफगान की युनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रमुख का हाथ है। सत्ता को सुरक्षित बनाये रखने के लिए रुस ने अपनी सैनिक शनि का भरपूर प्रयोग किया है। रुस द्वारा अभीष्ट मात्रा में सैनिक हथियार भी भेजे जा रहे हैं। इन दिनों काबुल की सड़कों पर रुसी सैनिको को गश्त करते देखा जा सकता है। रुस ने नीति 1956 में हेगरी में तथा 1968में चेकोस्लोविया में भी अपनायी थी। मध्य एशिया में अफगानिस्तान एक बफर स्टेट के रुप में घोषित था। पर इन दिनों रुसी सैनिकों की घुसपैठ में अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक कुचक्रों के फलस्वरुप कम्बुजिया समूल विनाश की कगार पर जा पहुँचा है। सन् 1975 में इसकी जनसंख्या 70 लाख थी। चार वर्षों बाद वहाँ की जनसंख्या मात्र 40 बची है। 30 व्यक्ति निरंकुश ‘पोलपोत’ सरकार की शिकार बन गये। पोलपोत सरकार को चीन, अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। राजधानी सोयपेन्ट के सभी बुद्धिजीवी असलिए मौत के घाट उतार दिये गये कि उस सरकार की अमानवीय नीतियों का उन्होने विरोध किया। पोलपोत सरकार ने शीर्षक वर्ग की समाप्ति के लिए दमन का ऐसा मार्ग अपनाया जिसमें 20 से 30 लाख व्यक्तियों की हत्या कर दी गई। दूसरे देशों को इसकी जानकारी न मिले इसके लिए दूतावासों पर ताले ड़ाल दिये गये। विदेश पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगा दिया गया। विद्रोही जनता ने सोवियत संघ की मदद ने जनवरी 1979 में पोलपोत की सरकार का तख्ता उलट दिया। इन दिनों ‘हेग समरिन’ सरकार पदासिन हैं। जिसे सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त है।

दूसरी ओर अमेरिकी तथा थाइलैंड एवं चीनी सरकार पोलपोत की पुनः सत्ता में लाने के लिए प्रयत्नशील है। अपना प्रभुत्व जमाने की अर्न्राष्ट्रीय कुचक्रों की प्रतिक्रिया स्वरुप कुम्बुजिया विनाश के कगार पर जा पहुँचा है। महाशक्तियों के बीच तनाव भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

कुचक्रों के फलस्वरुप दो महाशक्तियों के इर्द-गिर्द विभिन्न राष्ट्रों का ध्रुवीकरण होता जा रहा है। सोवियत रुस के साथ वल्गेरिया, पोलैन्ड, रुमानिया, अफगानिस्तान, ईरान, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लाविया, वियतनाम का गठबन्धन एवं अमेरिका के साथ चीन, फ्राँस, इंगलैण्ड, पश्चिमी जर्मनी, जापान की मोर्चाबन्दी तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका को और भी पुष्ट करती है। विश्व की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियाँ इस तथ्य का समर्थन करती हैं। प्रस्तुत लेख के लिखे जाने की उपरोक्त परिस्थितियाँ हैं। इनके आधार पर भावी संकटों के जो परोक्ष संकेत मिल रहे हैं उनसे हृदय दहल उठता है।

ऐसे अवसरों पर जबकि सारे अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास परिस्थितियों के अनुकूलन में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं, आध्यात्मिक उपचारों की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। मँडराते हुए महासंकटों के बादलों को हटाने के लिए सर्वसमर्थ आध्यात्मिक उपचारों-साधनाओं का अवलम्बन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। प्रस्तुत संकट को निरस्त करने के लिए इस सशक्त उपचार का आयअध्यापक स्तर कर लिया जाना चाहिए।


अपनों से अपनी बात

शरीर संरचना की दृष्टि से मानव प्राणी-अन्य जीवधारियों में से कितनो से ही पिछड़ा हुआ है। कितनी ही ऐसी विशेषताएँ क्षुद्र जीवों में भी पाई जाती हैं जिनके सौभाग्य से आमी को वंचित ही रहना पड़ता है। प्रकृति प्रकोपों को अन्य प्राणी जितना सह सकता है उतना मनुष्य के लिए शक्य नहीं है। उसे परिधान पहनने और आच्छादित ढूँढ़ने की अनिवार्य आवश्यकताएँ पड़ती हैं जबकि जीवधारियों में से असंख्यों को इसके बिना ही काम चलाते देखा जा सकता है। बुद्धिमत्ता की विशेषता को ही उसे सुविधा-साधनों से भरा-पूरा, प्रगतिशील और प्राणी जगत क मणि मुकुट बनाया है। यह बुद्धिमत्ता उसकी स्वयं की उपार्जित है। आदर्शवादी सद्भावनाओं को ईश्वर प्रदत्त अनुदान ही उसे सहकारी उदार जीवन जीने धर्म कहते हैं। वैसे इन दोनों को तत्वज्ञान, नीतिशास्त्र, ब्रह्म विद्या, धर्म धारणा आदि नाम भी दिये जाते रहे हैं। भौतिक प्रगतिशीलता और आँतरिक सुसंस्कारिता की विशेषताएँ मानवी गरिमा के नाम से जानी जाती हैं। यदि इस सत्प्रवृति का अभाव रहा होता तो मनुष्य प्राणी अपनी दुर्बल शारीरिक संरचना के कारण प्रकृति संघर्ष में कब का हार गया होता। जब महागज, महासरीसृप, महाव्याघ्र जैसे विशाकाय प्राणी अपने अस्तित्व की रक्षा न कर सके और प्रागैतिहासिक काल की गाथा मात्र बनकर रह गये तो निश्चित ही मनुष्य की दुर्बल काया कब की इस धरती पर से निहित हो गई होती। बुद्धिमत्ता ने ही उसे जीवित और प्रगतिशील रखा है। कहना न होगा कि यह बुद्धिमत्ता मनुष्य का

/द्मर्द्गंह्= स्रद्मह्य द्बह्नह्वह्लर्द्धंद्धशह् स्रद्भह्वह्य स्रह्य क्द्ध॥द्मह्वश द्बभ्;द्मद्य

की प्रेरणा देता रहा है और उसी आधार पर उसने क्रमिक विकास के मार्ग पर अग्रसर होते हुए बुद्धिमत्ता पाई है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को अन्य किसी दृष्टि से विशिष्ट नहीं माना जा सकता। मौलिक विशेषता एक ही है- उत्कृष्टता की पक्षधर उदार सद्भावना। यही सहकारिता के रुप में प्रकट हुई और मानवी प्रगति के अगणित आधार प्रस्तुत करने में समर्थ हुई है।

मनवी मौलिक विशिष्टता को अंतरंग जीवन में उत्कृष्टता और बहिरंग क्षेत्र में शालीनता कहते हैं। इन्हीं दोनों को संस्कृति एवं सभ्यता नामों से जाना जाता है। पुरातन भाषा में उत्कृष्ट चिन्तन को, संस्कृति को, अध्यात्म एवं उदार सहकारिता को, सद्व्यवहार को निजी उपार्जन है-दैवी अनुदान नहीं। इस तथ्य को वन्य क्षेत्र में रहने वाले पशु परम्परा अपनाये हुए मनुष्य की पिछड़ी स्थिति का देखते हुए आज भी जाना जा सकता है। सदाश्यता की वह विशेषता है जिसने चिन्तन और चरित्र को ऊँचा उठाने और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने के वरदान उपलब्ध कराये हैं।

उत्कृष्टता का पक्षधर तत्व-दर्शन और नीति निर्धारण ही अध्यात्म है। इसी को भौतिक व्यवस्था के सर्न्दभ में राजतंत्र और आत्मिक निर्धारण के सम्बन्ध में धर्मतन्त्र कहा गया है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिसे दुर्बल होने दिया जाये। राजतन्त्र लड़खड़ाने लगे तो अराजकता फैलेगी औश्र व्यवस्था तथा प्रगति का सारा ढाँचा लड़खड़ाजायेगा। इसी प्रकार धर्मतन्त्र पर अस्त-व्यस्तता छाई तो नियम, अनुशासन एवं सद्व्यवहार की रीति-नीति को जीवन्त न रखा जायेगा। मत्स्य न्याय का प्रचलन मानव समाज में चल पड़ा तो बुद्धिवादी आक्रमकता अन्ततः आदवी कलह उत्पन्न करेगी और परस्पर लड़ कर समाप्त हो जाने की स्थिति बनेगी। न सुरक्षा दृष्टिगोचर होगी न निश्चिन्तता। चिन्तित और शंकाशील-कातर और आतंकित मनुष्य निर्वाह के साधन तक न जुटा सका तो बेमौत मारा जायगा। राजतन्त्र और धर्मतन्त्र ही वे आधार है जो भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों की सुव्यवस्था बनाये रहते हैं।

मध्यकालीन अन्धकार युग में भ्रान्तियों एवं विकृतियों ने सभी क्षेत्र में प्रवेश किया उससे राजतन्त्र और धर्मतन्त्र जैसी व्यवस्थाएँ भी बेहतर लड़खड़ाई। राजतन्त्र के क्षेत्र में सामन्तवाद, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद जैसी दुष्प्रवृतियों घुसी और उस व्यवस्था को निहित स्वार्थों का आगधापी का क्षेत्र बनाकर रख दिया। जन साधारण ने उस कुचक्र में फँसकर सुरक्षा के स्थानों पर त्रास ही पाये। धर्मतन्त्र की भी ऐसी ही दुर्गति हुई। उस क्षेत्र के अनुयायी मात्र भ्रम जेजालों में श्रद्धा एवं श्रम सम्पदा का अपव्यय करते रहे हैं। इसके विपरित धर्मजीवी पुरोहितों को सम्मान एवं वैभव अर्जित करने का बिना किसी त्याग पुरुषार्थ के ही मिलता रहता है।, पस्तुत परिस्थितियों को देखने से लगता है कि धर्म की आत्मा रुष्ट होकर कहीं अन्यत्र चली गईं और अपना निष्प्राण कलेवर सड़न और दुर्गन्ध फैलाते रहने के लिए पड़ा छोड़ गई है।

नव जागरण की इस प्रभात बेला में आवश्यक परिवर्तन और उपयोगी निर्धारण हो रहा है। सभी क्षेत्र उससे प्रभावित हुए हैं। राजतंत्र की अधिक शुद्ध और प्रखर बनाने के लिए उस क्षेत्र के शूरवीर अपने ढ़ंग से प्रयास कर रहे हैं। जागरुकता और गतिशीलता-संघर्ष और कर्मठता जहाँ भी रहती है, वहाँ देर-सबेरे में औचित्य तक पहुँचने का साधन बन जाता है। उस दृष्टि से राजतन्त्र का भविष्य आशाजनक है। असमंजस धर्मतन्त्र के सम्बन्ध में है। क्योंकि उस क्षेत्र में जागरुकता, कर्मनिष्ठा और प्रगतिशीलता की तीन आवश्यकताओं में से एक भी पूरी नहीं हो रही हैं। उस क्षेत्र की प्रतिभएँ अपने निहित स्वार्थों से बेतरह चिपकी हुई हैं। न कहीं मार्टिन लूथर दिखते हैं न दयानन्द। गुरु गोविन्दसिंह और समर्थ रामदास से सच्चे धर्म रक्षकों का अनुकरण भी कोई नहीं कर रहा है। ऋषि परम्परा की तो चर्चा ही क्या की जाय? सन्त और सुधारकों की पीढ़ी भी धीरे-धीरे बबरशेरों की तरह घटती विलुप्त होती चली जा रही है। राजतन्त्र में पीड़ित प्रजाजनों ने स्थान-स्थान पर समय-समय पर विद्रोह किये और अन्धकार पाये, पर धर्मतंत्र के समूचे क्षेत्र में कहीं वैसी हलचल भी दिखाई नहीं पड़ती। सर्वत्र शमशान जैसी निस्तब्धता छाई हुई है। चमत्कार देखने और मनोकामना पूरी कराने की बिड़म्बना ही साधना सिद्धी का कलेवर ओढ़े जहाँ-तहाँ दिखाई पड़ती है। कर्मकाण्डों के खर्चीले ढकोसले भी धनीमानी लोगों को आगे करके जब तब खड़े किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त वैसा कहीं कुछ हीं दीखता जिसमें धर्म को, आत्मा को जीवन्त स्थिति में देखा, जाना जा सके ।

निकृष्टता अपनाने पर व्यक्तियों का स्तर गया-गुजरा हो जाता है। प्रतिभाएँ जब भ्रष्टता और दुष्टता अपनाने पर उतारु होती हैं तो प्रगति का प्रवाह रुकता है और सन्तुलन लड़खड़ाता है। संक्षेप में विश्व-व्यवस्था में अवरोध उत्पन्न होने का कारण धर्मतंत्र का लड़खड़ाना ही प्रमुख है । राजतंत्र के उत्थान-पतन पर भी उसी का प्रभाव पड़ता है। कोई समय था जब ‘यथा राजा तथा प्रजा’ की उक्ति सही थी। अब जनतंत्र का प्रचलन होन पर ‘यथा प्रजा तथा राजा’ की नई स्थापना हुई। अब वोटर ही शासन सत्ता किसे सौंपी जाय इसका निर्णय करते हैं। ऐसी दशा में मतदाता का जागरुक, दूरदर्शी और आदर्शों के प्रगति निष्ठावान होना आवश्यक है। यह कार्य विशुद्ध रुप से धर्मतंत्र का है।

राजतंत्र भौतिक क्षुत्र व्प्यवस्थाएँ बना सकता है, पर उसकी प्रकृति कूटनीति प्रधान, दमन नियंत्रण पर निर्भर होने के कारण आस्थाओं का निर्माण करने जैसी जटिल प्रक्रिया को सम्भाल सकने में असमर्थ ही रहती हैं। शिक्षा और प्रचार जैसे कार्य तो सरकार या सम्पन्न लोगों द्वारा हो सकते, पर अन्तःकरण की गहराई पहुँचकर व्यक्ति को उदात्त एवं उदार बना सकना उसके बस की बात नहीं है। आस्था क्षेत्र को प्रभावित कर सकना धर्मतंत्र की ही परिधि में आता है। अस्तु उसे सर्वोपरि महत्व मिलने की बात हर दृष्टि उचित एवं उपयुक्त है।

प्रस्तुत परिस्थिति को बदलने के लिए आवश्यक हो गया है नीति सत्ता के प्रगति निष्ठा उत्पन्न करने का काम नये सिरे से आरम्भ किया जाय। इसे धर्म तत्व का पुनर्जीवन काया-कल्प या नव-निर्धारणभी कह सकते हैं। पुरातन का जीर्णोद्धार तो होना ही चाहिए। समय की आवश्यकता को देखते हुए उसमें नये तत्वों का समावेश भी अनिवार्य हो गया है। वैज्ञानिक, बौद्धिक और आर्थिक प्रगति को इन शताब्दियों में प्रगति की दिशा धारा अत्यन्त तीव्र हुई है। उसने नई आवश्यकताएँ और समस्याएँ उत्पन्न की है। भौतिक क्षेत्र में ही नहीं आत्मिक क्षेत्र में भी। इब बिजली और द्रुतगामी वाहनों के बिना काम चल सकना कठिन है। दो शताब्दी पूर्व इसके बिना भी काम चल सकता था, पर अन्न, वस्त्र की तरह आवश्यक हो चले हैं। उसी प्रकार चिन्तन और व्यवहार में भी भारी उथल-पुथल हुई हैऔर उनने व्यक्ति तथा समाज को आर्श्चयजनक रुप से प्रभावित किया है। इन नई उपलब्धियों को धर्मतंत्र में भी जगह मिलनी चाहिए। अब परमार्थ प्रयोजनों को ब्रह्मभोज, गौदान, तीर्थ स्थान, कथा-प्रवचन, एवं धर्मनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उसमें पीड़ा और पतन निवारण कर सकने वाले अनेक तथ्यों का समावेश करना होगा। कुरितियों का उन्मूलन भी अब परमार्थ में ही माना जायगा। शिक्षा प्रसार और वृक्षारोपण जैसे कार्य भी अब धर्म क्षेत्र का ही आश्रय पाना चाहेंगे। ज्ञान-यज्ञ की जो परिधि जो पुरातन काल में थी अब उसका दायरा कहीं अधिक विस्तृत करने की आवश्यकता पड़ेगी। धर्मक्षेत्र न केवल परिशोधन चाहता है वरन् उसमें बहुत कुछ परिवर्धन भी चाहिए। समय की दौड़ कहाँ से कहाँ पहुँच गई आस्थाओं को प्रभावित करने प्रक्रिया को भी समय को पहचानना और तद्नुरुप तालमेल बिठाना पड़ेगा।

धर्मतन्त्र की गरिमा प्राचीन काल की तरह आज भी यथावत् है। उसका महत्व घटा नहीं बढ़ ही गया है। इन दिनों धर्म नाम से विज्ञ समाज को चिढ़ है, उसका कारण समझा जाना चाहिए। निहित स्वार्थो की लूट-खसोट, मूढ़ मान्यताओं की भरमार तथा प्रतिगामी प्रचलनों ने ही यह चिढ़ पैदा की है। अन्यथा धर्म तत्व तो चिन्तन क्षेत्र पर उत्कृष्टता का आरोपण और अभिवर्धन करने वाला आधार है। उसे शान्ति और प्रगति का मुरुदण्ड ही माना पड़ेगा। नीतिसत्ता, उदारता और कर्मनिष्ठा का परिपोषक धर्म यदि लोकचेतना पर से अपने अंकुश हटाने लगा तो समझना चाहिए कि बिना दैवी प्रकोप के ही पारस्परिक विग्रह से इस धरती पर महाप्रलय की सर्वनाशी विभीष्काएँ उठ खड़ी होंगी।

धर्मतन्त्र को जीवन्त एवं प्रखर बनाने वाले आधार रहे हैं- (1) गतिविधियों का सूत्र संचालन कर सकने के लिए भवन, देवालय (2) निर्धारित प्रयोजनों को व्यापक बनाने के लिए जन सहयोग, सन्त ब्राह्मण, वानप्रस्थ आदि लोकसेवियों का समुदाय (3) कार्यकर्ताओं का निर्वाह तथा क्रिया-कलापों को अग्रगामी बनाने के लिए अर्थ साधन। इन्हीं तीन आधारों पर कोई समर्थ तन्त्र खड़ा रह सकता है। शासन को भी अपने अगणित उत्तरदायित्वों की पूर्ति सूत्र संचालन इमारतों के आश्रम में ही करना पड़ता है। बड़े कारखाने अथवा छोटे निवास गृह सर्वप्रथम आश्रय स्थान माँगते हैं। धर्म को भी यदि देवालयों की आवश्यकता पड़ती है तो यह सर्वथा उचित ही है। जन-समुदाय के सहारे ही शासन-व्यवस्था चलती है। कारखाने, छावनी, कला-कौशल, विद्यालय आदि में जन-शक्ति का ही बोलवाला है। धर्म ने यदि सन्त, ब्राह्ममणों, वानप्रस्थ जैसे पूरा समय देने वाले तथा धर्म प्रेमी, भक्तजनों के रुप छुटपुट श्रम साधना प्रस्तुत करते रहने वालों का एक बड़ा वर्ग कार्य संलग्न रहता है तो उसे कर्म कौशल ही कहा जाएगा। कार्य संलग्न लोगों का निर्वाह तथा क्रिया-कलापों में खर्च होने वाली राशि का प्रबन्ध सभी को करना पड़ता है। सरकार टैक्स लगाती है। कारखाने मुनाफे लेते हैं। संस्थाएँ शेयर बेचती या चन्दा वसूल करती हैं। धर्म ने दान-दक्षिणा के माध्यम से श्रद्धाभक्ति, स्वेच्छा, सहयोग उपलब्ध करने का मार्ग निकाला है तो उसे औचित्य के अर्न्तगत ही लिया जायगा। तन्त्र चाहे शासकीय हो, आर्थिक हो, बौद्धिक, कलापरायण या धर्म धारणा से सम्बन्धित हो, हर हालत में इन तीनों साधनों को जुटाने की आवश्यकता अनिवार्य रुप से पूरी करनी हीपड़ेगी। इन दिनों धर्म को प्रगतिशील बनाने और नव-सृजन में समुचित योगदान के लिए समर्थ बनाने में भी इन तीन साधनों को नये सिरे से सरंजाम जुटाना पड़ेगा।

अच्छा होता कि धर्म के सुविस्तृत ढाँचे को ही परिवर्तित कर दिया गया होता और उसके हाथ में जो प्रचुर साधना है उनका उपयोग सामयिक आवश्यकता की पूर्ति में सम्भव हो सका होता। पर यह कार्य वर्तमान परिस्थितियों में लगभग असम्भव जैसा है। निहित स्वार्थो का शिकंजा इतना कसा हुआ है किसमें से साधनों का छुटकारा दिला सकना कठिन है। इसमें धर्म व्यवसायियों की समर्थता नहीं, वरन् सम्बन्धित जन-समुदाय की भावनात्मक दुर्बलता भी बहुत बड़ा निमित्त कारण हैं। पिछड़ी हुई परिस्थितियों में धर्म बिड़म्बनाओं को ही धार्मिकता का स्थान मिल गया है और मूढ़गति को पूर्वाग्रहों के साथ जकड़े रहना ही रुचता है। धर्म ध्वजी और भक्तजनों का पारस्पिरिक खाँचा ऐसा गुँथ गया है कि वे एक दूसरे से असन्तुष्ट रहते हुए भाी यथास्थिति बनी रहने के ही समर्थक हैं। जन-तन्त्र की ढ़ाील-पोल में बड़े सुधारों के लिए बड़े कदम उठ सकने सम्भव नहीं। इसमें भौतिक अधिकारों की-जनमत की-बात आड़े आती है और कितनी ही कुरीतियों को भी सहन करना पड़ता है। वर्तमान धर्म बिड़म्बना का अभीष्ट परिवर्तन इन परिस्थितियों में इतना नहीं हो सकता जितना तत्काल आवश्यक है। सुधार क्रम मंथर गति से चलाया जय तो इसमें सैकड़ों वर्षों का समय लगेगा। आर्य समाज जैसी सुधारक संस्थएँ एक शताब्दी का लम्बा समय बीत जाने पर भी उतना कुठ कर नहीं सकी हैं जितनी कि अपेक्षा थी।

ऐसी दशा में एक मात्र उपाय यही रह जाता है कि युग धर्म का निर्वाह कर सकने के लिए उपयुक्त ढ़ाँचे का धर्मतन्त्र खड़ा किया जाय। प्राचीनकाल में भी समय-समय पर इसी प्रकार सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति की गई है। भगवान बुद्ध, समर्थ गुरु रामदास, गुरु गोविन्दसिंह, सन्त कबीर, दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि के प्रयासों को इसी श्रेणी के गिना जा सकता है। अपने-अपने ढ़ंग से ऐसे तन्त्र खड़े किये थे जिनमें भवन, जन-सहयोग एवं अर्थ साधनों की आवश्यकता जुटाई गई थी और भावनात्मक उर्त्कष का कार्य आगे बढ़या गया था। पुरातन को सुधारने का लम्बा रास्ता उनमें से किसी को भी सफल होता नहीं दीखा। फलतः अपने-अपने ढ़ंग से अपना ढाँचा खड़ा करके कार्य आरम्भ कर दिया। इन प्रयत्नों की शानदार परम्परा और सराहनीय सामयिक उपलब्धि रही है। यह बात दूसरी है कि पीछे उन प्रयासों में विकृतियाँ घुस पड़ीं। यह भी नियति की बिड़म्बना है कि कालान्तर में हर वस्तु जराजीर्ण हो जाती है। उसकी प्रखरता घटती और कुरुपता बढ़ती है। काया की भी ऐसी ही दुर्गति होती है। नव यौवन और जराजीर्ण काया के बीच जमीन-आसमान जैसा अन्तर दीखता है और पतन पराभव पर निराशा होती है। इतने पर भी सृष्टा की यह व्यवस्था उत्साहवर्धक है कि अनुपयोगी होते हैं दूसरी समर्थ शक्तियाँ उसे चदच्युत कराने से नहीं चूकती। जराजीर्ण काया को मौत आ दबोचती है और अनुपयुक्त संसाधनों की मरम्मत न बन पड़ने पर उसे तोड़कर नया ढ़ाँचा खड़ा करने के लिए जागरुकता सदा तत्पर रहती है। धर्मतंत्र भविष्य में अनुपयुक्त बनेंगे इसकी चिन्ता कोई विचारशील नहीं करता। क्योंकि उसे विश्वास रहता है कि जिस प्रकार पुरातन विकृतियों को ताड़ने में अपना प्रयत्न चला है, उसी प्रकार अपने निर्धारण में अवाँछनीयता का प्रवेश होने पर दूसरी जागरुक शक्तियाँ उसे धर दबोचने के लिए भविष्य में भी जीवन्त ही बनी रहेंगी।

स्मय की माँग है कि संव्यास विकृतियों से जूझने और उनके स्थान पर शालीनता की स्थापना का प्रबल प्रयत्न किया जाय। कहना न होगा यदि आवश्यकता की पूर्ति चिन्तन और चरित्र को प्रभावित, परिष्कृत कर सकने में समर्थ पा्रणवान धर्मतन्त्र के सहारे ही सम्भव हो सकती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए युग धर्म का वह ढाँचा खड़ा किया गया है जो शाश्वत सिद्धान्तों का परिपूर्ण पालन करते हुए-विकृतियों से जूझने और सत्प्रयोतनों का समावेश करने के लिए कटिवद्ध, समर्थ एवं सफल हो सके। समर्थ धर्मतन्त्र के सहारे ही लोकशिक्षण और लोकनिर्माण के उभय-पक्षीय प्रयोजन सही रीति से-सही रुप से सम्पन्न हो सकते हैं।

इन दिनों युग निर्माण अभियान द्वारा गायत्री शक्ति पीठों का निर्माण-लोकसेवियों के कर्मरत होने का आहृन और नियमित अंशदान के लिए सद्भाव सम्पन्नों के लिए सहयोग अर्जित किया जा रहा है। इस त्रिविधि कार्य पद्धति में धर्मतन्त्र को युग धर्म का निर्वाह कर सकने के लिए समर्थ बनाने को दूरगामी योजना बनाने का समावेश है। बड़े शक्तिपीठ बनाने की बात इन दिनों गौण कर दी गई है और छोटे चरण पीठ हर गाँव बनाने की योजना की योजना दु्रतगति से अप्रगामी हो रही है। देश के सात लाख गाँवों में से एक लाख गायत्री चरणपीठ के नाम से छोटे-बड़े धर्म संस्थान स्थापित किये जा रहे हैं। इनकी लागात ढ़ाई सौ रुपये से लेकर बीस हजार तक रहने का प्रबन्ध स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए किया जायगा। यह प्रबन्ध बन पड़ने पर उन गतिविधियों का सूत्र संचालन भली प्रकार बन पड़ेगा जो जन-मानस को परिष्कृत करने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है।

वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करके ढलती आयु के सभी सद्भाव सम्पन्नों को युग सृजन में जुट पड़ने के लिए कहा गया है। ग्रस्त व्यक्ति भी अन्य कामों में से समय की बचत करके नव सृजन में योगदान कर सकें ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है। जो ब्राह्ममणोचित निर्वाह कर सकते हैं एवं जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हैं उनके लिए निर्वाह जुटाने के लिए दस पैसा या मुट्ठी अन्न जमा करने वाले धर्मघटों की स्थापना की जा रही है। सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन के लिए अनेकों रचनात्मक काम आ गये हैं। उनके लिए भी अर्थ साधन चाहिए। इसके लिए अधिक भावनाशीलों को महीने में एक दिन की अजीविका देने का अनुरोध किया गया है। सम्पन्नों से इस प्रकार के कार्यों में सहयोग मिलने की बात परिष्कृत वातावरण में ही सम्भव हो सकती है। आज की स्थिति में उनका सहयोग कठिन है। इसके लिए लोकश्रद्धा को जीवन्त करके बूँद-बूँद अनुदान से ही सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति का मार्ग निकालना पड़ेगा। ऐसा ही कुछ इन दिनों किया जा रहा है। जो किया जा रहा है उसमें जन-जन के मन-मन में अभिनव आशा का संचार किया है। जन समर्थन की उपलब्धि इतनी बड़ी है कि उसके सहारे असम्भव दीखने वाले कार्य सम्भव हो सकते हैं।

युगनिर्माण मिशन के दो लक्ष्य हैं-- एक मनुष्य में देवत्व का उदय, दूसरा धरती पर र्स्वग का अवतरण। इन दोनों का आधार एक ही है चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश। यह कार्य धर्म तन्त्र का तत्व दर्शन एवं प्रचलन प्रवाह ही सम्पन्न कर सकता है। युग परिवर्तन के लिए यही अभीष्ट था सो सृष्टा की सन्तुलन व्यवस्था के अर्न्तगत यही सुनियोजित रीति से हो भी रहा है।

युग सन्धि के बीजारोपण वर्ष में गायत्री शक्तिपीठों, चरणपीठों के निर्माण के प्रयास में हो रही प्रगति से प्रतीत होता है कि प्रज्ञा युग के आगमन में देर नहीं। अगले दिनों विवेक को ही सर्वोपरि मान्यता मिलेगी अनौचित्य के उन्मूलन और औचित्य के संस्थापन में जिस भावनात्मक प्रखरता की आवश्यकता है उसका अरुणोदय होते हुए इन प्रयासों के साक्षी में देखा जा सकता है जो धर्म संस्थापनों की स्थापना-समवर्दानी परिव्राजकों की सेवा साधना एवंज न-जन के बूँद-बूँद अंशदान सहायता के सहारे तनकर खड़े हो रहे हैं। इन छोटे प्रयासों के पीछे महान् सम्भावनाओं को गतिशील होते और उज्जवल भविष्य की सम्भावनाओं को सार्थक बनते, देखने वाले स्वपनदर्शी नहीं यथार्थवादी ही समझे जायेंगे।


जीवन साधना


जीवन साधना (kavita)

ऐसा जीवन जियें, हमारा जीवन ही पूजा बन जाये। पूजन की पावनता जैसी, जीवन में पावनता आये॥

आत्म-जागरण की विधि द्वारा, हम अपना भगवान जगायें। धोकर निज-कषाय-कल्मष को, प्रभु को पावन स्नान करायें॥

हम अपने दैनिक-जीवन में, उदाचार की करें साधना। सदाचार की दिनचर्या ही, ईश्वर का परिधान हटायें॥

हम अपने शीतल स्वभाव से, शान्ति प्रदान करें जन-जन को। और सुगन्धित कर दें, अपने व्यवहारों से जन-जीवन को॥

शान्ति प्रदान करें जन-जन को, सौम्य, शान्त संसर्ग हमारा॥ सबके प्रति शालीन-भावना ही, शीतल चन्दन हो जाये॥

जीवन में आलस्य नहीं हो, हो प्रमोद में नहीं श्क्ति क्षय। पर-हिताय जीवन भर साधें, हम पुरुषार्थ-साधना-अक्षय॥

टूट न पाये स्वेद बिन्दुओं का, ताँताअपने मस्तक से। भ्रम-मंत्रित हर स्वेद-विन्दु हो, अक्षत प्रभु के शीश चढ़ाये॥

अधरों पर मुस्कान सजाकर, जन-जन को मुस्कानें बाँटें। सुख-दुख कुछ भी हो जीवन, में हम हँसते-हँसते ही काटें॥

देखा नहीं फूल को हमने, काँटों में भी हँस लेता है। रोतों को हम अगर हँसा दें, यह ही पुष्पाँजलि हो जाये॥

वाणी में इतनी मिठास हो, शब्द-शब्द हो मधु सा मीठा। अपने शब्दों की मिठास से रस छलके, हो स्वाद अनूठा॥

जन-जन के विष की ज्वाला को, शान्त करे वाणी का अमृत। वाणी सुधा पिलायें सबको, वाणी प्रभु को भोग लगाये॥

सुनते रहें जिन्दगी भर हम, संवेदित हों करुण कथाएँ। अगर हृदय-सर्स्पश कर सकीं, व्यथित जनों की मर्म-कथाएँ॥

तो समझों वेदान्त सुन लिया और सुनी रामायण गीता। दर्द मिटाने गये किसी का, वह ही सच्चा तीर्थ कहाये॥

ऐसा जीवन पूजा ही है, नहीं किसी पूजा से कम है। भौतिक-पूजा स्वार्थ जन्य है मात्र कर्मकाण्ड का क्रम है॥

पूरा जीवन करे समर्पित जन हिताय, ववह ही सच्चा जन। जो कि भक्ति की, ज्ञान, कर्म की, त्रिविधि त्रिवेणी में अवगाहे॥

*समाप्त*