हम सब उनके पुत्र

यह विश्व संगीतमय है। शब्द से जिसकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी चराचर सृष्टि के विराट् विश्व संगीत में सूर्य, चन्द्र, तारे, जीव-जन्तु वनस्पति सदैव अपना विशेष सुर बजाते रहते हैं। जिस प्रकार वीणा का कोई तार मध्यम, कोई पंचम में बाँधा जाता है, ताकि उसमें से विभिन्न प्रकार के स्वर निकलें, उसी प्रकार हमें ईश्वर के साथ विशेष सम्बंध स्थापित करना होता है, कोई एक विशिष्ट सुर जगाना होता है ताकि मानव जीवन भी संगीत युक्त हो, प्रवाहमान बने।ll

एक अपूर्ण व्यक्ति वही है जिसके जीवन को अभी तार सप्तक में नहीं बाँधा गया। उसके जीवन के मूलतार तुच्छता के कारण विच्छिन्न हो गये हैं। किसी भी प्रकार उन्हें क्रमबद्ध कर एक नित्य सुर को ध्रुव बनाना होगा, इसी में उस मानव का कल्याण है।

तार को बाँधा कैसे जाय? ईश्वर की वाणी में इसे बाँधने के ऐसे अनेकों स्थल हैं। इन्हीं में से किसी एक को निश्चित करना होगा।

मन्त्र एक इसी प्रकार का बंधन है। मंत्र द्वारा मन के विषय को समष्टि मन के साथ जोड़ा जा सकता है जैसे वीणा की खूँटी से तार बाँध दिया जाता है, फिर वह छटकता नहीं। ईश्वर के साथ मानव का जो ग्रंथि बंधन किया गया है, उसमें मंत्र ही मदद करता है। ऐसा ही एक मंत्र है “पितानोऽसि”। जीवन को इस सुर में बाँधने से हमारे सारे विचारों और कार्यों में एक विशेष रागिनी बज उठती है। “मैं उनका पुत्र हूँ” यह मंत्र ही संगीत रूप में मूर्तिमान होकर शरीर के हर तार से झंकृत होने लगता है।


VigyapanSuchana

नवीनतम निर्धारण के अनुसार गुरुदेव मई और जून के दोनों महीने उद्घाटन प्रवास को निरस्त करके शान्ति कुँज हरिद्वार में ही रहेंगे और उन दिनों चार-चार दिवसीय पूर्व निर्धारित परिवार सत्रों का संचालन स्वयं करेंगे। इसके अतिरिक्त इन्हीं दिनों सर्वसाधारण की सुविधा के लिये समस्त प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों के संचालन की व्यवस्था जो नहीं बन थी, उनकी गुत्थियों का तात्कालिक समाधान, प्रज्ञा पुत्रों का अभिषेक संस्कार, अध्यापकों से विशेष वार्ता, सभी अन्तरंग परिजनों से विशेष परामर्श जैसे अति महत्वपूर्ण कार्य इन्हीं दो महीनों में सम्पादित करते रहेंगे। इस दृष्टि से यह चार-चार दिन के बारहों सत्र अति महत्वपूर्ण होंगे। जो परिजन इच्छा रहते हुये भी पिछले दिनों के सत्रों से उपस्थित नहीं हो सके हैं एवं जो भविष्य में किसी सत्र में आने की बात सोचते हैं, उन सभी के लिये यह अलभ्य अवसर है कि वे मई, जून के चार-चार दिवसीय सत्रों में से किसी में पहुँचने की तैयारी करें और समय से पूर्व अपना स्थान सुरक्षित करा लें। मई जून के दोनों महीनों में चार-चार दिन के सत्रों की तारीखें इस प्रकार है- दोनों महीनों के छः-छः सत्र मिला कर कुल बारह सत्र होंगे। स्थान भर गया हो तो इच्छित सत्र के स्थान पर दूसरे किसी सत्र में स्थान दिया जाय यह बात भी आवेदन पत्र के साथ ही लिख दी जानी चाहिये।


नैतिकता का संबंध धर्म धारणा से है।

यह प्रतिपादन अब बहुत पुराना हो गया, जिसमें कहा जाता था कि निर्धनता ही अनैतिकता का कारण है। ‘खाली बोरा खड़ा नहीं रह सकता’ की उक्ति इसी आधार पर प्रचलित हुई कि गरीब आदमी ईमानदार नहीं रह सकता। इस प्रतिपादन में आँशिक सत्य ही है उसे तथ्य मानकर नहीं चला जा सकता।

यह ठीक है कि गरीबी के कारण जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी न होने पर मनुष्य के अनीति के उपाय अपनाकर निर्वाह के साधन ढूंढ़ निकालने की इच्छा हो सकती है। इसकी बहुत कुछ संभावना भी है, पर इसे कोई तथ्य मानकर नहीं चला जा सकता। यदि ऐसा रहा होता तो सन्त और ऋषि जो अपरिग्रह अपनाकर अभावग्रस्त जीवन जीते रहे वे वैसा क्यों कर पाते। अभाव उन्हें अनीति की ओर ललचाते और कैसे ही उपाय अपनाकर अपने अभाव दूर करते।

इसी प्रकार यह कथन ही अंशतः ही सत्य है कि- ‘शिक्षा के बिना प्रगति नहीं हो सकती।’ यह सही है कि अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित, अधिक कमाऊ, कुशल तथा अधिक जानकार हो सकते हैं इतने पर भी चारित्रिक दृढ़ता के संबंध में यह सोचना गलत है कि जो शिक्षित होंगे पिछड़े ही बने रहेंगे।

प्रगतिशीलता और पिछड़ेपन का विवेचन यदि अमीरी ठाठ-बाठ होने न होने से किया जाय तो बात दूसरी है अन्यथा यदि व्यक्तित्व और चरित्र के आधार पर इसकी परख की जाय तो कुछ दूसरे ही तथ्य सामने आते हैं। तब इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि नीतिमत्ता एक भिन्न वस्तु है और उसका सीधा संबंध सम्पन्नता या शिक्षा से नहीं वरन् उस आदर्शवादी निष्ठा से है जिसे नीति धर्म, श्रद्धा या आस्तिकता कहते हैं। इसके अभाव में धनी, निर्धन- शिक्षित, अशिक्षित दोनों ही वर्ग गये गुजरे स्तर के अनीति अपनाने वाले एवं अपराधी हो सकते हैं।

उदाहरण के लिये सम्पन्नता आर शिक्षा की दृष्टि से अमेरिका को इन दिनों मूर्धन्य माना जाता है। वैज्ञानिक प्रगति और सुविधा साधनों की दृष्टि से भी उसे विश्व के राष्ट्र समुदाय में प्रमुखता मिली हुई है। इतने पर भी वहाँ नीतिमत्ता को जन-जीवन में वैसा स्थान नहीं मिल सका जैसा कि सम्पन्नता और शिक्षा को ही सब कुछ मानने वाले कहते हैं।

गत वर्ष मध्य अमेरिका की कुल आबादी 4,00000 है। जिसमें 1,13,05,000 अपराध हुए। जिनमें 9 लाख 87 हजार हिंसात्मक थे शेष 1 करोड़ 31 लाख 8 हजार यौन संबंधी थे। गत वर्ष 18,800 हत्यायें, 56700 बलात्कारपूर्ण व्यभिचार, 9,11000 आक्रमण, 30,90,000 बड़ी चोरियां तथा 6271,000 छोटी चोरियां हुईं। वर्ष भर में 9,58,000 कारें चुराई गईं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रस्तुत की गई यह संख्या संसार के अन्य धनी निर्धन देशों की तुलना में अनुपाततः कहीं अधिक है। गैर सरकारी आंकड़े इसके अतिरिक्त हैं। सभी अनीति युक्त घटनाएं पुलिस और अदालतों में कहाँ पहुँच पाती हैं।

यहाँ किसी देश विशेष की निन्दा स्तुति करने का प्रयोजन नहीं। मात्र यह कहा जा रहा है कि ‘नीतिमत्ता’ एक स्वतंत्र विषय है और उसे चिंतन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाली धर्म धारणा से संबंधित समझा जाना चाहिये। ऋषियों की तरह निर्धनता के रहते हुये भी उच्च चरित्र रखा जा सकता है और ऊंचे पदों पर रहने के कारण ऊंचा वेतन पाने पर भी रिश्वत से घर भरते रहने वालों की तरह धनवान अनैतिक भी हो सकते हैं।


सिद्ध न होना ही चेतना का प्रमाण

भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य चिकित्सा, शिक्षा दीक्षा और मनोरंजन की पर्याप्त सुविधायें उपलब्ध होते हुये भी लोगों को बुरी तरह अशाँत, क्लान्त, दुःखी और विषादग्रस्त देखा जा सकता है। जीवन निर्वाह के लिये पर्याप्त सुविधा साधन हैं। समृद्धि और सम्पन्नता की दृष्टि से अच्छी खासी स्थिति है फिर भी दुःख, खिन्नता निराशा और शोक क्यों? शरीर निर्वाह और जीवनयापन के लिये जो वस्तुयें या स्थितियाँ आवश्यक हैं, वे प्रचुरता से उपलब्ध होने पर भी असंतुष्ट रहने का कोई कारण नहीं होना चाहिये। फिर लोग क्यों असंतुष्ट और दुःखी दिखाई देते हैं? इसके उतर में हजारों वर्ष पूर्व भारतीय मनीषी कह चुके हैं कि ये उपलब्धियाँ केवल स्थूल या बाह्य जीवन से संबंधित हैं तथा उसी क्षेत्र की आवश्यकता पूरी करती हैं जबकि जीवन की एक आँतरिक स्थिति भी है जिसे चेतना, आत्मा, अन्तःकरण या जीवन का उत्स कहा जा सकता है। उस चेतना के विकास हेतु यदि समुचित कदम न उठाये गये तो बाह्य जीवन में कितने ही सुविधा साधन क्यों न बढ़ाये जांय मनुष्य अतृप्त और खिन्न ही रहेगा। नदी जहाँ से निकल कर बहती है, यदि वहीं कोई विकृति है तो नदी का जल सागर पर्यन्त दूषित ही रहेगा, मार्ग में उसकी शुद्धि, के लिये चाहें जितने ही प्रयास क्यों न किये जांय। गंगा का पानी सागर तक इसलिये निर्मल है कि हिमालय के जिस क्षेत्र से वह निकलती है, वहीं प्रकृति उसे उपचारित संस्कारित कर देती है और फलस्वरूप उसका प्रवाह इतना प्रभावपूर्ण रहता है। कि मार्ग में अनेक नदी नाले मिलने पर भी गंगाजल की निर्मलता अक्षुण्ण रहती है।

बाह्य-जगत को ही सब-कुछ मान लेना, जड़-तत्वों से बने शरीर को ही सर्वस्व समझ लेना और स्थूल जगत के अतिरिक्त किसी सूक्ष्म सत्ता का अस्तित्व स्वीकार न करना जड़वाद का ही समर्थन है और जड़वाद चेतन सत्ता के लिये जड़ता की स्थितियाँ उत्पन्न कर जीवन को जड़ ही बनाता है। यह अपने युग का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इन दिनों चेतना के अस्तित्व को झुठलाने की प्रवृत्ति ही प्रधान है। कोई आवश्यक नहीं है कि तर्कों, विचारों और प्रतिपादनों से ही चेतना के अस्तित्व को झुठलाया जाय। मौखिक रूप से उसके अस्तित्व को स्वीकारते हुये भी चेतना के विकास की कोई व्यवस्था न करना, उसके लिए प्रयास न करना भी चेतना के अस्तित्व को नकारना है। जिस चेतना ने जड़ पदार्थों को साज संभालकर सुँदर एवं उपयोगी बनाया, जिस चेतना ने अपनी सूक्ष्म बुद्धि से प्रकृति के अनेकानेक रहस्यों का पता लगाया और उनसे लाभान्वित होने की स्थिति उपलब्ध कराई उसी चेतना के अस्तित्व को विस्मृत किया जाने लगे तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसा कि मित्र परिचितों से मिलने के लिये जाते समय उसके मकान की दीवारों को ही देखकर, उन्हीं से बात कर चले आना और मित्र परिचितों से मिले बिना ही इतने मात्र से मिलन का उद्देश्य पूरा हो गया समझना।

यह ठीक है कि हम इस शरीर के माध्यम से ही चेतना का अस्तित्व अनुभव करते हैं किन्तु वह उतने तक ही सीमित नहीं है। सही बात तो यह है कि शरीर के बिना भी उसका अस्तित्व बना रह सकता है, जबकि शरीर का अस्तित्व उसके बिना बने रहने का कोई उपाय नहीं है। प्रश्न उठता है इस चेतना को कैसे समझा जाय? प्रकृति के सूक्ष्म स्वरूप को तो यंत्र, उपकरणों के माध्यम से समझा जा सकता है, उनके माध्यम से जड़ पदार्थों का भी विश्लेषण किया जा सकता है किन्तु चेतना को परखने के लिये अभी तक कोई यंत्र उपकरण नहीं बन सका है, न ही निकट भविष्य में उसके बन सकने की कोई संभावना है। क्योंकि भौतिक उपकरण अपने सहधर्मी भौतिक पदार्थों को ही पहचान और पकड़ सकते हैं। शरीर और उनकी अनुभूतियां भी तत्वों से बने परमाणु परक पदार्थों के आधार पर ही कुछ निष्कर्ष निकालती तथा रस लेती हैं। मशीन भी धातुओं से ही बनती और विद्युत या भाप जैसी भौतिक ऊर्जाओं से चलती है। ऐसी दशा में उनका परख क्षेत्र स्थूल या सूक्ष्म दृश्य अथवा अदृश्य जड़-जगत तक ही सीमाबद्ध रहता है। चेतना को समझने का कोई यंत्र बन सका तो वह चेतना ही होगा क्योंकि उसे केवल वही अनुभव कर सकती है।

आत्मा और परमात्मा को प्रयोगशालाओं में अब तक इसी कारण सिद्ध नहीं किया जा सका है कि ये अभौतिक हैं जबकि प्रयोगशालाओं के सभी यंत्र, उपकरण भौतिक ही हैं और इसी कारण वैज्ञानिकों ने इन दोनों की सत्ता को अस्वीकार कर दिया। वे शरीर को चलता-फिरता पौधा मात्र मानते हैं और उसकी चेतना को मस्तिष्कीय हलचल मात्र मानते हैं। मस्तिष्क तो शरीर का ही अंग है। इसलिए वे आत्मा की परिभाषा शरीर तक ही सीमित रखते हैं और मृत्यु के साथ ही आत्म की समाप्ति की बात भी कहते हैं। परमात्मा के संबंध में भी उनकी इसी प्रकार की मान्यता है। प्रकृति व्यवस्था को वे स्वसंचालित मानते हैं। सृष्टि में चल रही विभिन्न व्यवस्थाओं को वे अपने आप अपने ढर्रे या धुरी पर घूमती हुई बताते हैं और इसमें किसी ईश्वर का नियंत्रण या हस्तक्षेप होने की बात सिरे से इन्कार करते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधानों के प्रचलित ढर्रे को अपनाते हुये चेतना के अस्तित्व को प्रमाणित करने में कठिनाई यह है कि विज्ञान जगत प्रत्यक्ष भौतिक प्रयोग परीक्षणों को ही सब कुछ मान बैठता है और प्रयोगशाला की सिद्धि को ही प्रामाणिक मानता है जबकि तर्क और तथ्य यह कहते हैं कि इस विश्व के रहस्यों को, विशेषतया चेतना संबंधी सत्य को जानने के लिये प्रयोगशालाओं तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता। सही बात तो यह है कि प्रयोगशालाओं में भौतिक उपकरणों से चेतना का अस्तित्व सिद्ध किया भी नहीं जा सकता और कदाचित करा भी लिया गया तो वह चेतना नहीं होगी, क्योंकि जो चेतन है, अभौतिक है, वह जड़ भौतिक की पकड़ में कहाँ से आयेगी? और आ गई तो चेतना तो कहाँ रही? हवा को मुट्ठी में बाँध लेने की तरह ही चेतना को प्रयोगशालाओं में सिद्ध कर पाना असंभव है। हवा को मुट्ठी में बंद कर लेना भले ही संभव हो जाय, पर जड़ यंत्रों से चेतन सत्ता की पहचान, पकड़ कदापि संभव नहीं है। क्यों कि दोनों एक ही अस्तित्व के अंग होते हुये भी क्षेत्र की दृष्टि से भिन्न हैं। आँखों से जिस प्रकार सुना नहीं जा सकता और कानों से जिस प्रकार देख पाना असंभव है उसी प्रकार जड़ यंत्रों के माध्यम से चेतना को पहचान पाना कठिन है।

इतने पर भी चेतना के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले पर्याप्त कारण हैं, जो उसके लक्षणों में परिलक्षित होते हैं। बुखार का कोई आकार-प्रकार, स्वरूप या स्वाद नहीं होता, केवल उसके लक्षण ही अनुभव किये जाते हैं और उसी आधार पर बुखार की पहचान की जाती है। इसी प्रकार चेतना को सिद्ध करने का कोई उपाय न होने पर भी उसके अनेकों लक्षण और असंख्यों प्रमाण हैं जो चेतना के अस्तित्व को पहचानने की दृष्टि प्रदान करते हैं। मरने के बाद भी जीव चेतना का अस्तित्व बना रहता है, इस तथ्य की पुष्टि में प्रेतात्माओं की हलचलें तथा पुनर्जन्म की ऐसी घटनायें प्रस्तुत की जा सकती हैं जो प्रामाणिक व्यक्तियों के अनुभव में आई हैं तथा अनेकों अधिकारी मर्मज्ञों ने उनका विश्लेषण किया है। पुनर्जन्म के ऐसे अगणित प्रमाण मिले हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि पिछले जन्म में इस व्यक्ति की चेतना अमुक परिवार का सदस्य थी। ऐसे व्यक्तियों ने अपने पिछले जन्म के विवरण इस प्रकार खोलकर बता दिये मानो वही व्यक्ति सामने आ गया है। किसी ने सिखा पढ़ाकर पुनर्जन्म की स्मृति का कौतूहल तो नहीं खड़ा कर दिया, इस आशंका की काट उन प्रमाणों से मिलती है। जिनमें बालकों ने अपने पिछले जन्म के संबंधियों को पहचाना और उनका नाम लेकर पुकारा है। इसी प्रकार उनने ऐसी घटनायें सुनाईं जो नितान्त व्यक्तिगत थीं और परिवार में भी एकाध व्यक्तियों को छोड़कर किसी को मालूम नहीं थी। इस तरह की घटनाओं में जमीन में गढ़ा हुआ धन बताकर उसे निकलवाना पुनर्जन्म का सशक्त और ठोस प्रमाण हो सकता है। प्रेतात्माओं के अस्तित्व और पुनर्जन्म के सिद्धान्तों को यदि प्रयोगशाला में सिद्ध होने वाले तथ्यों की तुलना में माना जा सके तो फिर आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व में सन्देह की कोई गुँजाइश नहीं रह जाती।

‘द ह्यूमन परसनैलिटी एण्ड इट्स सटवाइबल आफ बॉडीली डैथ’ नामक पुस्तक में ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं, जो शरीर से पृथक आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करते हैं। कई उदाहरण तो एक व्यक्ति के शरीर में दूसरे व्यक्ति की आत्मा द्वारा आधिपत्य करने तथा फिर उसे गुम कर देने के हैं। साथ ही संगीत, गणित ललितकलाओं आदि में अद्भुत क्षमता व प्रवीणता वाले बच्चों के उदाहरण भी हैं, जिनका असाधारण ज्ञान पूर्वजन्म की संचित सामग्री ही सिद्ध होता है।

प्रयोगशालाओं में सिद्ध न होने पर भी कई वैज्ञानिकों ने चेतना के अस्तित्व को अनुभव किया है तथा उसकी व्याख्या करने की चेष्टा की है, भौतिकी के आचार्य राबर्ट मायर ने ऊर्जा के दर्शन पर जा खोजें की हैं, वे बताती हैं कि उसकी अधिकाधिक सूक्ष्म स्थिति में जो तत्व शेष रह जाता है, उसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है। यह उच्च स्तर पर एक रस और सर्वव्यापी स्थिति में भी गतिशील बनी रहती है।

सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी जे.बीज.राइन ने मानवी मनःचेतना को पराजागतिक और पराभौतिक की संज्ञा दी है। वे उसका स्वरूप विद्युतीय एवं चुम्बकीय स्तर की ऐसी इकाई के रूप में मानते हैं जो मरने के बाद भी अपनी सत्ता बनाये रहता है। उसमें इसके प्रबल संकल्प भी जुड़े रहते हैं जिनके सहारे पुराने स्तर की तथा नये प्रकार की किसी आकृति का सृजन और धारण किया जा सके। उनकी दृष्टि में यह व्यक्ति चेतना दृश्य अथवा अदृश्य स्थिति में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रहने में पूर्णतया समर्थ है।

सापेक्षवाद के प्रणेता सुप्रसिद्ध आइंस्टीन ने सृष्टि के मूल में चेतना को ही सक्रिय माना था और यह भी कहा था कि यंत्रों तथा उपकरणों के माध्यम से उसे प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सकता यदि यंत्रों और उपकरणों से चेतना जैसा कोई अस्तित्व सिद्ध कर भी लिया गया तो वह चेतना नहीं होगा। नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक शास्त्री पियरे दि कोन्ते ने आत्मा को विश्वात्मा से संबंधित बताया है तथा इसी आधार पर उसे अमर सिद्ध किया है क्योंकि विश्व चेतना अमर है और आत्मा उसी का घटक, एक छोटा-सा अंशमात्र है।

भारतीय दर्शन और संस्कृति आदिकाल आत्मा की अखण्डता और अनश्वरता के प्रति आस्थावान है। अणुमात्र होकर भी वह सम्पूर्ण शरीर पर आधिपत्य रखता है। मनीषियों ने इसी तत्त्वदर्शन के आधार पर भौतिक जीवन को समृद्ध, सम्पन्न तथा उन्नत बनाते हुये आत्मिक विकास करते रहने का मार्गदर्शक किया था और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक विधियों उपायों का दिग्दर्शन किया था।

वे उपाय और विधियाँ आज भी प्रभावपूर्ण हैं तथा उनके परिणाम देखे, प्राप्त किये व अनुभव किये जा सकते हैं। दुर्भाग्य से इन दिनों जीवन की अंतरंग मूल सत्ता को वाद-विवाद का विषय बनाकर उलझा दिया गया है अथवा उसे वाणी विलास का विषय मात्र मान लिया गया है। इसके विकास की ओर कम ही ध्यान दिया जा रहा है। परिणाम सामने है, समग्र, सुख-सुविधाएं और समृद्धि, साधन के उपकरण उपलब्ध रहते हुए भी मनुष्य असंतुष्ट खिन्न उदास और दुखी-सा है।

सर्वांगपूर्ण योग साधना का प्रयोजन अपनी आत्मिक चेतना का विकास करने के साथ-साथ भौतिक जीवन को सुदृढ़ और सुविकसित बनाना भी है। इससे दानों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। योग्य साधन के क्षेत्र में जितनी ही सफलता मिलती जाती है मनुष्य उतनी ही मात्रा में उस वैभव को हस्तगत करता और उस पर आधिपत्य जमाता चलता है, जिसके प्रभाव को हम जड़ चेतन में अपने चारों ओर बिखरा हुआ अनुभव करते हैं। भौतिक जीवन तक ही अपने आपको सीमाबद्ध रखने के कारण मनुष्य दलील और दरिद्र होता जाता है, पर आत्मिक चेतना को यदि विकसित किया जा सके तो विराट् चेतना के साथ जुड़कर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती।


निष्काम की कामना

सभी भाँति समझाने, डराने, धमकाने से लेकर प्रलोभन देने तक के उपाय अपना लेने के बाद भी प्रह्लाद ने भगवद्भक्ति का आश्रय नहीं छोड़ा तो हिरण्यकश्यप क्रोधाविष्ट होकर बोला, ‘रे दुष्ट! इस कुल में विष्णु का नाम लेने वाला कोई नहीं हुआ है और तुम ईश्वर-ईश्वर की रट लगाकर कुल मर्यादा भंग किये जा रहे हो। यह अक्षम्य अपराध है।’

‘श्रेष्ठ कर्म करने कुल मर्यादा नहीं टूटती तात! प्रह्लाद ने शान्त गम्भीर वाणी में अपने पिता को समझाना चाहा, उन्हें कभी भी कोई भी नमन करे उनसे कुल का गौरव ही बढ़ता है।’

उन्मत्त हिरण्यकश्यप की क्रोधाग्नि में प्रह्लाद के इन वचनों ने घी का काम किया और वह गरजता हुआ प्रह्लाद की और दौड़ा, मेरी सीख को न समझकर मुझे ही उपदेश देने वाले दुष्ट! तू ऐसे नहीं मानेगा। तुझ जैसे कुल कलंकी का तो कुल में न होना ही अच्छा।

और हिरण्यकश्यप प्रह्लाद को मारने के लिये झपटा। आवेश में संतुलन न रह सका और जो घूँसा प्रह्लाद पर वार करने के लिये उठा था वह उसे खम्भे पर पड़ा जिसके सहारे प्रह्लाद खड़ा था। खम्भा टूट गया और उसी खम्भे से प्रकट हुए नरसिंह भगवान, आधा नर और और आधा सिंह का रूप धरण किए। उन्होंने हिरण्यकश्यप को पकड़ कर अपने तीक्ष्ण नखों से उसका पेट फाड़ डाला दैत्यगज हिरण्यकश्यप ने अनुचर अपने प्राण बचाकर भागे।

उस समय भगवान नरसिंह को रौद्र रूप देखकर उपस्थित देवगण तक काँप उठे। सबने अलग-अलग स्तुति की परन्तु किसी का कोई परिणाम नहीं हुआ। देवगण सोचने लगे कि यदि प्रभु का क्रोध शांत नहीं हुआ तो अनर्थ हो जायेगा। उन्होंने भगवती लक्ष्मी को भेजा किन्तु लक्ष्मी जी भी वह विकराल रूप देख कर भयभीत हो लोट आईं। अन्त में ब्रह्माजी ने प्रह्लाद से कहा, ‘बेटा तुम्हीं समीप जाकर उनका क्रोध शाँत करो।

प्रह्लाद सहज भाव से प्रभु के सम्मुख गये और दंडवत् प्रणिपात करके उनके सामने लेट गये। भगवान नरसिंह ने अपने भक्त को सामने प्रणिपात देखकर कहा, वत्स! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो वही वरदान माँग लो।

‘प्रभु! मेरी क्या इच्छा हो सकती है?’ प्रह्लाद ने कहा- ‘मुझे कुछ नहीं चाहिये।’

‘नहीं प्रह्लाद कुछ भी माँग लो’ भगवान ने कहा- ‘मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ।’

‘भगवन्! मुझे कुछ नहीं चाहिये। जो सेवक कुछ पाने की आशा से अपने स्वामी की सेवा करता है, वह तो सेवक ही नहीं है। आप तो पर उदार हैं, मेरे स्वामी हैं और मैं आपका आश्रित अनुचर। यदि आप कुछ देना चाहते हैं तो यही वरदान दें कि मेरे मन में कभी कोई कामना ही उत्पन्न न हो।’

एवमस्तु, भगवान ने कहा और पुनः आग्रह किया फिर भी प्रह्लाद कुछ तो अपने लिये माँग लो।

प्रह्लाद ने सोचा प्रभु जब बार-बार मुझसे माँगने के लिये कह रहे हैं तो अवश्य ही मेरे मन में कोई कामना है। बहुत सोच-विचार करने मनःमन्थन करने के बाद भी जब उन्हें लगा कि कुछ भी पाने की आकाँक्षा नहीं है तो वह बोले ‘नाथ! मेरे पिता ने आपकी बहुत निन्दा की है और आस्तिक जनों को बहुत कष्ट दिया है। वे घोर पातकी रहे हैं। मैं यही चाहता हूँ कि वे इन पापों से छूटकर पवित्र हो जांय।’

भगवान नरसिंह ने प्रह्लाद को गदगद होकर कण्ठ से लगा लिया और उसकी सराहना करते हुये कहा- ‘धन्य हो बेटा तुम, जिसके मन में यह कामना है कि अपने को कष्ट देने वाले की भी दुर्गति न हो।’


दीप्तिमान आत्म सूर्य की विलक्षण सामर्थ्य

भारतीय मनीषियों ने आत्मा की तुलना सूर्य की है और जीवात्मा का स्वरूप प्रकाश बिन्दु के रूप में वर्णित किया है। निराकार साधना में आज्ञाचक्र के स्थान पर भृकुटि मध्य केन्द्र में सूर्य सदृश तेजस्वी प्रकाश का ध्यान किया जाता है। उच्चस्तरीय आध्यात्म साधनाओं में, ज्योति अवतरण में प्राणाकर्षण प्राणायाम में सूर्य के समान तेजस्वी प्रकाश का ध्यान किया जाता है। सूर्य हमारे जीव जगत का केन्द्र है। सौर परिवार अपने इसी अभिभावक के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं। अणु की संरचना भी इसी प्रकार की है कि उसकी तुलना सौर परिवार से की जा सकती है। अणु का नाभिक एक छोटा सूर्य है। दोनों की रीति-नीति एवं क्रिया पद्धति एक समान है। जीव और ब्रह्म की सत्ता भी इसी प्रकार समझी जा सकी है।

सूर्य देखने में ही छोटा लगता है अन्यथा वह है बहुत बड़ा। धरती पर खड़े होकर देखें तो दिन में सूर्य और रात में चन्द्रमा दोनों ही लगभग एक सी गोलाई के लगते हैं, पर दोनों के आकार-प्रकार और स्वरूप में बहुत अंतर है। चन्द्रमा का व्यास 2160 मील है जबकि सूर्य का घेरा 8,64,000 मील का है। इस व्यास वाले सूर्य के इर्द-गिर्द भी उसकी कई परिधियाँ हैं। दुर्बीन से देखने पर सूर्य के इर्द-गिर्द पीले, गुलाबी रंगों का एक वलय-सा दिखाई पड़ता है। 10-15 हजार किलोमीटर की इस पट्टी को सूर्य का वर्ण मण्डल क्रोमोस्फियर कहते हैं। लगभग 10,000 डिग्री तापमान के इस क्षेत्र में प्रायः नुकीली ज्वालायें उछलती हैं तथा उनकी ऊँचाई 10,000 किलोमीटर तक उभरती देखी गई है।

मानवीय चेतना का अस्तित्व और महत्व भी सूर्य के समान ही असीम है। उसका वास्तविक विस्तार विश्व ब्रह्माण्ड के ही समकक्ष है। व्यक्ति का कायकलेवर सीमित हो सकता है, पर उसका प्रभाव परिणाम असीम क्षेत्र को आच्छादित करता है। संपर्क में आने वाले प्राणी तथा पदार्थ तो प्रखर व्यक्तित्व की ऊर्जा से प्रभावित होते हैं, उसकी संकल्प शक्ति एवं विचारधारा आकाश में प्रवाहित होकर असीम क्षेत्र पर अपना प्रभाव डालती है।

अपनी पृथ्वी तक सूर्य के प्रकाश की थोड़ी-सी ही किरणें आ पाती हैं इसलिये हमें सूर्य के प्रकाश का बहुत छोटा अंश ही दिखाई व समझ पड़ता है। सूर्य प्रकाश की बहुत अधिक मात्रा तो अन्य दिशाओं में ही प्रवाहित होती रहती है। मनुष्य को भी परमात्मा का स्वल्प सामर्थ्य वाला अंश ही प्राप्त हुआ है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि परमात्म सूर्य के प्रकाश का न्यूनतम अंश ही मनुष्य को, अपने भूलोक को प्राप्त हुआ है। उसकी समग्र सत्ता जो असीम ब्रह्माण्ड में बिखरी पड़ी है, इतनी अधिक है कि उसे ठीक प्रकार सोच समझ पाना तो दूर रहा, उसका अनुमान लगा पाना भी अपने छोटे से मस्तिष्क के लिये असंभव ही है। इतने पर भी अपनी सत्ता को तो जाना समझा ही जा सकता है। अपने आत्म स्वरूप का यदि बोध हो सके तो प्रतीत होगा कि परम चेतना की एक छोटी किरण होते हुये भी मानवी चेतना कितनी प्रचण्ड है। इस प्रचण्डता का स्वरूप और उपयोग यदि समझा जा सके तो पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नारायण बनने की सम्भावना मूर्तिमान होकर सामने आ सकती है।

महासूर्य और ध्रुवसूर्य की परिक्रमा करते हुये सौर मण्डल सहित अपना सूर्य 4,32,000 वर्ष बाद उसी स्थान पर लौट कर आ जाता है। इतने पुराने समय की ग्रह गणना यदि किसी के पास हो तो दूसरी आवृत्ति में भी वह ज्यों की त्यों ही मिलेगी। उसमें जरा भी अन्तर नहीं होगा। वर्ष गणना का अभी पूर्णतया सही हिसाब नहीं बैठ सका है। इसी कारण वर्ष और दिन की संगति पूरी तरह ठीक न बैठने पर कोई सर्वांगपूर्ण पंचांग नहीं बन सका है। उसमें जो अन्तर पड़ता है उसे सुधारने और सही-सही गणना करने के लिये ही बार-बार घट-बढ़ करनी पड़ती है। फिर भी वह कमी पूरी नहीं होती और नये सिरे से उसकी गणना ग्रहों की स्थिति देखकर सही करनी पड़ती है। सही हिसाब 4,32,000 वर्ष बाद ही बैठता है। इसीलिए प्राचीन मनीषियों ने इतनी अवधि का एक युग माना है।

स्थूल दृष्टि से सूर्य चन्द्रमा एवं तारक आदि बहुत छोटे दिखते हैं, परन्तु उनका यथार्थ स्वरूप एवं विस्तार विदित होने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। सम्पूर्ण सूर्य तो दूर रहा उस पर उठती रहने वाली ज्वालाओं ही अपने आप में एक आश्चर्य है। पिछले दिनों एक विशिष्ट सूर्य ज्वाला देखी गई थी। यह दस बारह मिनट में ही लगभग तीन लाख मील तक फैल गई और उसके कारण सूर्य की दीप्ति तीस गुनी अधिक हो गई।

13 दिसम्बर 1972 को भी ऐसा ही एक विस्फोट हुआ था जिसमें सूर्य के पृष्ठ भाग में प्रभामण्डल से भीम काय बादल निकलते हुये दिखाई दिये। यह विस्फोट पृथ्वी के सम्पूर्ण विस्तार की अपेक्षा 20 से 40 गुना तक बढ़ता था और उसकी गति प्रति सेकेंड 960 किलोमीटर थी। सूर्य में ऐसी ज्वालायें उठती रहती हैं और ऐसे विस्फोट भी होते रहते हैं। सन् 1940 में तो ऐसी ज्वालायें 40 बार उठती देखी गई थीं। खगोलविदों का मत है कि सूर्य के आलोक का जो क्षेत्र है, वह भी निश्चित और नियमित नहीं है। जब ज्वालायें उठती हैं तो वह बढ़ कर 100 गुना तक विस्तृत हो जाती हैं। सूर्य का वर्णमंडल एक प्रकाश क्षेत्र ही नहीं चुम्बक क्षेत्र भी है। उसी में तो वह अपने सौर परिवार के ग्रहों को बाँधे जकड़े है। सौर परिवार के दूरवर्ती प्लेटो आदि ग्रहों तक उसका अत्यन्त थोड़ा-सा प्रकाश पहुंचता है। पृथ्वी पर तो उसका एक बटा दस लाखवां हिस्सा ही पहुँचता है। जबकि प्लेटो सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर है। वहाँ सूर्य का कितना प्रकाश पहुँच पाता होगा? फिर भी उसका चुम्बकत्व प्लेटो पर भी काम करता है और अपनी परिधि के ग्रह पिण्डों को जकड़े रहता है।

सूर्य प्रकाश का एक बटा दस लाखवां हिस्सा ही पृथ्वी तक पहुँच पाता है। शेष तो दूसरी दिशाओं में बिखर जाता है। इसका अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है कि सूर्य का किरीट (कोरोना) कितना विस्तृत और कितना प्रभावी है। इसे जानने के लिये कांशेनोग्राफ नामक यंत्र कुछ ही समय पूर्व विनिर्मित हुआ है। वह अथाह सूर्य सागर की थाह लेने का प्रयास कर रहा है।

सूर्य और पृथ्वी के संबंध में और भी रोचक तथ्य पिछले दिनों प्रकाश में आये हैं। खगोलविदों के अनुसार सूर्य भी निरन्तर फैलता और फूलता जा रहा है। सूर्य की तरह ही पृथ्वी का क्षेत्रफल भी निरन्तर बढ़ता हुआ अंकित किया गया है। लन्दन के न्यूकैसेल्स विश्वविद्यालय में भौतिक विभाग के अध्यक्ष प्रो. के.एम. क्रोर ने अपने शेष प्रबन्ध में यह सिद्ध किया है कि पृथ्वी रहस्यमय ढंग से गुब्बारे की तरह फूलती जा रही है। जब वह बनी थी तब उसका जो आदि रूप था, उसकी अपेक्षा वह अब तक लगभग दुगनी फूल चुकी है और भविष्य में भी उसका यह फुलाव क्रमशः तीव्र ही होता जाने वाला है।

परमात्मा तो सूर्य की तुलना में असीम और अगणित गुना शक्ति सम्पन्न है। जब सूर्य को सत्ता और महत्ता को ही नहीं समझा जा सकता, तो परमात्मा की चर्चा किस आधार पर की जा सकती है? आत्म सूर्य को भी यदि ठीक तरह समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि भौतिक ऊर्जा तथा प्रभा बखेरने वाला सूर्य जितना बड़ा और जितना सशक्त है, आत्मा की सीमा और गरिमा उससे किसी भी प्रकार कम नहीं है। आत्मा जब अपने स्वरूप में अवस्थित होकर शक्ति किरणें बिखेरता है और बड़े कदम उठाता है तो उसका स्वरूप देखते ही बनता है। महामानव, ऋषि, देवदूत और अवतारी आत्माएं इसी स्थिति की होती हैं। उनकी क्षमता और सामर्थ्य लगती तो अवश्य विचित्र है, पर वह मूलतः हर मनुष्य में समान रूप से होती है। प्रयत्नपूर्वक उसे जो भी चाहे जितनी भी मात्रा में विकसित कर सकता है।


ब्रह्मसत्ता की तीन मूल शक्तियाँ- त्रिदेव

निर्गुण, निराकार, अचिंत्य, सृष्टा, दृष्टा, साक्षी, नियन्ता, ब्रह्म सत्ता, एक अखण्ड अविभाज्य अविवेच्य है। सृष्टि सृजन उस ब्रह्म सत्ता के संकल्प की चमत्कारिक परिणति है। ब्रह्म की पारमार्थिक सत्ता निर्विकार है, किन्तु सृष्टि व्यवहार में प्रयुक्त उसकी सगुण सत्ता या व्यावहारिक सत्ता सृष्टि व्यापार के संचालन में सक्रिय रहती है। सम्पूर्ण विश्व में ओत-प्रोत यह सत्ता त्रिगुणात्मिका प्रकृति को निरन्तर क्रियाशील रखती है। इस व्यावहारिक सत्ता या सगुण सत्ता की तीन मूल शक्तियों को ही त्रिदेव कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन्हीं तीन दिव्य मूल शक्तियों की संज्ञाएं हैं।

ब्रह्म सूत्र में कहा है- त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च। (ब्र.सू. 1-4-6)

अर्थात्- सम्पूर्ण सृष्टि में तीन शक्तियों का ही उपन्यास यानी व्याप्ति एवं विस्तार है तथा इन्हीं की विवेचना है। त्रिगुणमयी प्रकृति में इन्हीं की चेतना प्रतिबिंबित है। सांख्य सूत्र में त्रिगुण प्रकृति के बारे में यह स्पष्ट किया गया है, कि इन तीनों ही गुणों या क्रिया-शक्तियों में साधर्म्य अथवा साम्य यह है कि ये तीनों ही सूक्ष्म हैं। उन सूक्ष्म क्रियाशक्तियों को चेतना का प्रकाश त्रिदेव सत्ताओं से ही मिलता है। साँख्य दर्शन इन क्रिया शक्तियों को जड़ प्रकृति की ही शक्ति मानता है। देववाद में इन्हें चेतन शक्तियाँ कहा जाता है। यह भेद दोनों में अवश्य है, किन्तु तीन मूल शक्तियों की विद्यमानता के बारे में दोनों में मतैक्य है। वेदान्त-दर्शन के अनुसार मूल प्रकृति स्वयं में निश्चेतन है, अतः प्रकृति के क्रियाकलापों में चेतना की विद्यमानता ब्रह्म की व्यावहारिक सत्ता के ही कारण है। इसे ही ब्रह्म की विराट्लीला योग माया आदि कहा गया है।

भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने विश्व की रचना-प्रक्रिया से लेकर नीति, सदाचार की प्रेरणा-प्रक्रिया तक को समझाने के लिये देव प्रतीकों की संरचना की है। अनन्त सत्य की अभिव्यक्तियों को इन पुराण-प्रतीकों द्वारा अभिव्यंजित किया गया है।

सत्यान्वेषी को देव प्रतीकों सन्निहित तत्वज्ञान को ही प्रधानता देनी चाहिए। जैसा कि जर्मन विद्वान हेनरिरव जीमर कने अपने ग्रन्थ “मिथ्स एण्ड सिम्बॉल्स इन इंडियन आर्ट एण्ड सिविलाइजेशन” में कहा है, “विष्णु, रुद्र, शिव, ब्रह्मा आदि विविध पौराणिक प्रतीक युगों के अनुभूत जीवन तथ्यों तथा सत्य की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।’’ अतः हमें उन मूलभूत तथ्यों तथा सत्य को ही समझना चाहिए, तभी पूर्ववत मनीषियों के तत्वज्ञान का लाभ उठाना संभव है।

प्रकृति के मूल में जो चेतन सत्ता है, उसकी क्रियात्मक शक्ति त्रिविध है- प्रकाशन, प्रवर्तन एवं नियमन। ये तीन शक्तियाँ सृष्टि के अणु-अणु, कण-कण में मात्रा-भेद एवं स्तर-भेद से परिव्याप्त है।

प्रकृति शब्द का व्युत्पत्यात्मक अर्थ यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाली जो शक्ति है, वह प्रकृति है। “प्रकरोतीति प्रकृतिः।” आधुनिक भौतिक की भाषा में इसे “कॉस्मिक एनर्जी” या “क्रिएटेवि पोटेन्सी” कह सकते हैं। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और उससे उत्पन्न होने वाले समस्त तत्वों में ये तीनों ही गुण पाये जाते हैं। भौतिकजगत एवं मनोजगत दोनों में ही ये तीनों गुण विद्यमान रहते हैं।

सम्पूर्ण प्रकृति में जो चेतना-शक्ति विद्यमान है, वही ब्रह्म की सगुण सत्ता है। उसकी त्रिविध अभिव्यक्तियाँ ही त्रिदेव हैं। इस सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं जो इन त्रिदेवों के नियंत्रण से परे हो। क्योंकि सृष्टि मात्र वस्तुतः इन्हीं तीन दिव्यशक्तियों की लीला है। सृष्टि इनकी ही प्रजा है। ये सृष्टि के प्रजापति हैं।

‘प्रजा’ शब्द के भी भिन्न-भिन्न प्रयोग हैं। प्रारम्भिक प्रयोग में ‘प्रजा’ शब्द महत्तत्व आदि मूल सृष्टि कार्यों यानी ऊर्जा-तंरगों के लिए ही किया गया है- “प्रकर्षेण व्यक्त रूपेण जायन्ते, आविर्भवन्ति इति प्रजाः महदादयो विकाराः” अर्थात् आद्या प्रकृति में प्रकर्ष के द्वारा जो महत्तत्व आदि विकट व्यक्त हुये, आविर्भूत हुये, वे ही ‘प्रजा’ हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में त्रिगुणात्मिका प्रकृति से इसी प्रारम्भिक प्रजा के प्रथमतः रचे जाने का संकेत है-

‘‘अजामेकां लोहित शुक्ल कृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। अजो ह्येको जुषमारगेऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः॥’’ (श्वे. 4।5)

अर्थात्- त्रिगुणात्मिका अनादि प्रकृति जो शुक्ल लोहित कृष्णवर्णी यानी सत्व-रज-तमोमयी है। वह अपने ही सदृश त्रिगुणमय अनेक प्रजाओं यानी महत्तत्व आदि से प्रारम्भ कर प्रभूत भूत-समुदायों तक को जन्म देती है। आसक्त जीव उन्हीं में लिप्त भोग भोगता रहता है, दूसरा जो अज चैतन्य पुरुष है, वह उससे दूर ही रहता है, उस भुक्तभोगी प्रकृति के वैविध्य में वह बंधता नहीं।

इस प्रकार प्रकृति अपनी ऊर्जा-तरंगों के विविध परिमाण युक्त परिणामों को नाना-नाम रूपों में व्यक्त करती है।

वे सभी क्रियाऐं त्रिगुणात्मिका हैं। बाह्य जगत में भी और अंतर्जगत में भी तीन भावसत्ताएं त्रिविध क्रिया शीलताएं ही मूलतः विद्यमान हैं- ये हैं- प्रकाशशील सत्व, क्रियाशील रज और स्थितिशील तम। विशुद्ध सत्व ही ब्रह्मा हैं, विशुद्ध रज शक्ति ही विष्णु हैं और विशुद्ध तम शक्ति ही शिव हैं। तीनों गुण इन्हीं तीन दिव्यसत्ताओं की क्रियाएं हैं।

तीनों ही गुण क्रमशः प्रकाशन, प्रवर्तन एवं नियमन करते हैं। जैसे कि सांख्यकारिका की 12 वीं कारिका में कहा गया है-

‘‘प्रीत्य प्रीतिविषादात्मका प्रकाश प्रवृत्ति नियमाथी। अन्योन्याभिभवाश्रय जनन् मिथुन वृत्तयश्च गुणम्।’’

अर्थात्- ये तीनों गुण क्रमशः प्रीति परक या सुखात्मक, अप्रीति परक या दुःखात्मक और मोहात्मक या विषदात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं। इनके कार्य हैं प्रकाशन, संचालन और नियंत्रण। साथ ही ये एक दूसरे के अभिभावक उत्पादक एवं सहचारी होते हैं। इसीलिये ये तीनों देवाधिपति कहलाते हैं। तीनों में कोई बड़ा या छोटा नहीं। क्योंकि तीनों ही एक दूसरे के अभिभावक हैं, सहकारी हैं और परस्पर उत्पादक भी हैं। प्रकृति के सम्पूर्ण कार्य व्यापार इनकी उपस्थिति में ही सम्भव है।

श्री अरविन्द ने इन तीन गुणों को ‘‘प्रकृति के कार्य व्यापार के तीन अनिवार्य प्रकार’’ ( थ्री एसेन्शियल मोड्स ऑव एक्शन ऑव नेचर) कहा है। इनकी न्यूटन के ‘गति के तीन नियमों’ (थ्री लॉज ऑफ मोशन) से भी तुलना की जा सकती है। न्यूटन ने गति की तीनों विधाओं को क्रमशः ‘इनशिंया’, ‘एक्सीलियरेशन’ तथा ‘रिएक्शन’ नाम दिया था। आधुनिक भौतिकी में इन्हें (1) ‘इनर्जी’ या ‘मास’, (2) ‘मूमेन्टम’ तथा (3) ‘स्ट्रेस’ कहा जाता है।

भौतिक जगत में सत्व गुण गतिशील वस्तुओं को उनकी सहज अवस्था में प्रकाशित करता है। रज गुण क्रिया या प्रवृत्ति उत्पन्न करता है। वृद्धि क्षय, विनाश, आदि परिणाम इसी कारण होते हैं। तमस् गति क्रिया का निरोध अथवा नियमन करता है। ये तीनों ही गुण एक ही क्रिया-शक्ति के व्यापारों के तीन विशिष्ट प्रकार मात्र हैं। ये कभी भी पृथक-पृथक नहीं रहते। एक समय में एक गुण प्रधानतया कार्य करता है, शेष दो उस कार्य में सहायता करते हैं। इसीलिए इन्हें एक दूसरे का अभिभावकत्व करने वाला और परस्पर मिथुन-भाव या युग्म भाव से रहन वाला कहा गया है।

इनकी सर्वव्यापकता का संकेत करते हुये सांख्याचार्य कहते हैं-

‘‘ऊर्ध्व सत्व विशालस्तमोविशालश्च मूलतः सर्गः। मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तंब पर्यन्तः॥’’ (सांख्यकारिका 54)

अर्थात्- ब्रह्मा से लेकर तृणादि पर्यन्त जो सृष्टि है वह सब त्रिगुणात्मक है। उसके उर्ध्व स्तर में सत्व-प्राधान्य रहता है। और निम्न स्तर में या सर्गमूल में तम-प्राधान्य रहता है। बीच में रज प्राधान्य होता है।

यही क्रमशः सृष्टि का आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक स्तर है। मात्रा-भेद एवं गुण-भेद से सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में ये तीनों गुण या तीनों स्तर विद्यमान हैं।

वृक्ष में जो बाढ़ हो रही है, वह रजस् का परिणाम है। यदि मात्र यही व्यापार जारी रहे, तो पेड़ बढ़ता ही चला जाय, इसीलिए सत्व उस बाढ़ में संतुलन लाता है तथा तमस् इस वृद्धि क्रम को सिद्ध करता है। सत्व न रहे, तो तमस् वृक्ष की बाढ़ को रोक ही दे। सत्व इस निरोध का परिहार करता है ये तीनों ही व्यापार वृक्ष में अति तीव्रता से निरंतर होते रहते हैं, इसीलिये सामान्यतः वे अलग-अलग दृष्टव्य नहीं हो पाते। इसी प्रकार वृक्ष ज्ञान का उदाहरण लें-

वृक्ष का बोधांश ही प्रकाश है। जिस क्रिया विशेष द्वारा यह बोध उत्पन्न हुआ वह इस ज्ञान में संलग्न क्रिया है और जो शक्ति अवस्था उद्रिक्त होकर ज्ञान स्वरूप होती है, वही धृति या स्थिति है।

यह अंतर्जगत का उदाहरण हुआ। क्योंकि ज्ञान तो अंतर्जगत की ही प्रक्रिया है।

बाह्य जगत में भी सर्वत्र यही स्थिति देखी जाती है। अट्रैक्शन या आकर्षण, रिपल्सन या विकर्षण और उदासीनता यानी न्यूट्रल प्रवृत्तियां सर्वत्र एक दूसरे में गुंथी देखी जाती है। वैज्ञानिक शब्दावली में इन्हें ही पॉजेटिव, निगेटिव और न्यूट्रल ना दिया जा सकता है। परमाणु को ही लें, तो उसके केन्द्र यानी नाभिक में न्यूट्रान और प्रोटान रहते हैं, जो क्रमशः तमस् और सत्व गुण सम्पन्न कहे जा सकते हैं। न्यूट्रान की स्थिति शक्ति न्यूट्रल होती है। प्रोटीन धनावेशी (पॉजेटिव) विद्युत से सम्पन्न होता है। इलेक्ट्रान ऋणावेशी (निगेटिव) विद्युत या रजोगुण से सम्पन्न होते हैं और नाभिक के चारों और द्रुतगति से घूमते रहते हैं।

परमाणु से महत्तत्व तक समस्त समस्त सृष्टि प्रजाएं त्रिगुणात्मक हैं। बोध से लेकर गति तक प्रत्येक व्यापार में प्रकाश, क्रिया और स्थिति की विविध शक्तियां आधार रूप में विद्यमान रहती हैं।

पदार्थ जगत की ही तरह अनुभूति-जगत में भी तीनों ही शक्तियाँ साथ-साथ क्रियाशील रहती हैं।

अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेंद्रिय एवं प्राण- इन सब करणों में जो बोध उपलब्ध होता है वह प्रकाश है। जो गति मिलती है और परिवर्तन मिलता है, वह क्रिया है तथा जो ‘स्टोर्ड एनर्जी’ की दशा है वही स्थिति है।

वस्तुतः प्रकाश, क्रिया एवं स्थिति के अतिरिक्त बहिर्जगत तथा अंतर्जगत का अन्य कोई तत्व ज्ञेय नहीं है।

बाहरी जगत का ज्ञान शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध द्वारा ही होता है। इसमें उदाहरणार्थ शब्द में जो बोध है, वह प्रकाश है, उस बोध का कारण क्रिया है और उस क्रिया का कारण शक्ति है। चित में भी प्रख्या, प्रवृत्ति और धृति रूप तीन गुण ही देखे जाते हैं।

इस प्रकार अंतर्जगत हो या बहिर्जगत, सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही मूल चैतन्य-सत्ता की त्रिविध शक्तियाँ सर्वत्र विद्यमान पायी जाती हैं। ये ही सर्वव्यापक, सब की आधारभूत त्रिदेव सत्ताएं हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संज्ञा भारतीय तत्व वेत्ताओं ने दी है। इन तीनों शक्तियों के स्वरूप के समझना और उनसे लाभ उठाकर अपने समग्र उत्कर्ष की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ना ही त्रिदेवों की उपासना तथा उनसे महत्वपूर्ण वरदानों, अनुदानों की उपलब्धि की यथार्थ प्रक्रिया है।


Quotation

बहता हुआ दरिया आस-पास की धरती को सींचता चला जाता है, संत जहाँ प्रकट हो जाते वहीं शक्ति का साम्राज्य स्थापित हो जाता है।


जन सहयोग की सम्पदा

एक बार श्रावस्ती नगरी में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। अपनी समृद्धि के लिये प्रख्यात आध्यात्मिक प्रेरणा का यह केन्द्र उजाड़ जैसा लग रहा था। अनावृष्टि एवं अतिवृष्टि की दोहरी मार से सर्वत्र हाहाकार मच गया। सूखे ने क्षेत्र की अधिकांश फसल नष्ट कर दी थी। जो बची थी उसे बाढ़ बहा ले गयी। भूख से व्याकुल नर-नारियों, बाल, वृद्धों का मरण निकट दिख रहा था।

भगवान बुद्ध उन दिनों नगर में निवास कर रहे थे। स्थिति को असह्य जानकर उन्होंने नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक सभा बुलायी। दूसरे दिन सभी व्यक्ति उपस्थित हुये।

तथागत ने संक्षेप में परिस्थिति की विकटता समाई और उपस्थित लोगों से पूछा- “आप में से कौन है जो क्षुधार्त जन समुदाय की प्राण रक्षा का उत्तरदायित्व वहन कर सके।”

सभा मण्डप में निस्तब्धता छाई रही सभी निराश मुद्रा में सिर झुकाये मौन बैठे थे। स्थिति स्पष्ट थी। किसी का साहस लग नहीं रहा था। तथागत ने अब सामान्य जनों की अपेक्षा समर्थ सम्पन्न लोगों पर दृष्टि दौड़ाई और एक-एक करके पूछना आरम्भ किया कि क्या इस विषम स्थिति में वे कुछ कर सकते हैं?

सेठ रत्नाकर अर्थात् रत्नों का खजाना के नाम से जाना जाता था। पर यह क्या? आत तो वह भी हताश दिखाई पड़ रहा था। महाप्रज्ञ की स्थिर निगाहों ने उसे बोलने पर बाध्य किया। निराश स्वर में वह बोला- “भगवन्!” इस दुर्भिक्ष में हम अपने को असमर्थ पा रहे हैं। हमारा कोष समाप्त होता जा रहा है।

निगाहें आगे बढ़ी। राज्य के सबसे साहसी योद्धा जयसेन पर रुकीं। जयसेन ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी थी। उसने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी थी। पर आज तो साहसी योद्धा का भी सिर झुका हुआ था। हताश स्वर में उसने कहा- ‘आचार्य श्रेष्ठ!’ मैं तो अपने शरीर का रक्त देने तक को तैयार हूं, पर इस विप्लव में अन्न की इतनी व्यवस्था कर सकना हम से सम्भव नहीं है।

‘धर्म पाल’ जो अपनी दान वीरता के लिये प्रख्यात था, उसकी वाणी में भी निराशा की स्पष्ट छाप थी। भगवान बुद्ध चिन्ता विमग्न हो उठे। इस नीरवता को तोड़ा एक किशोर भिक्षुणी ने। आगे बढ़कर उसने भगवान बुद्ध की चरा रज माथे पर लगायी और कहा- “देव! क्षुधा पीड़ितों को अनाज बाँटने का उत्तरदायित्व मैं लेती हूँ। मुझे आशीर्वाद दें कि इसका निर्वाह कर सकूँ।’’

एक सामान्य भिक्षुणी के इस दुस्साहस को देखकर सभाविद् आवाक् रह गये।

तथागत को सभाजनों के मन की बात समझते देर न लगी। अनजान बनते हुये उन्होंने बालिका से पूछा- “भद्रे! तू कठिन दायित्व किस प्रकार पूरा करेगी?” बालिका के सौम्य स्वर गूँज उठे। “देव” जिनके पास अनाज के भण्डार हैं उनसे मैं भिक्षा मागूंगी। प्रत्येक से एक मुट्ठी अन्न के लिये याचना करूंगी। जो भिक्षा द्वारा अन्न संग्रहित होगा इससे भूखों की क्षुधा मिटाऊंगी।”

तथागत के नेत्र सजल हो उठे। सभा में आशा का संचार हुआ है। ‘‘एक नगण्य-सी लड़की इतना साहस जुटा सकती है तो हमारी स्थिति तो कहीं अधिक अच्छी है। हर व्यक्ति यह सोचने लगा” बालिका के साहस ने साहस को जगाया पुरुषार्थ से पुरुषार्थ को प्रेरणा मिली और त्याग की सद्भावभरी परम्परा चल पड़ी। दुर्भिक्ष से लोहा लेना जो कभी असम्भव जना पड़ता है अब संभव हो गया। हर व्यक्ति बढ़ चढ़कर अनुमान प्रस्तुत करने लगा। और दुर्भिक्ष पीड़ित में प्रत्येक की प्राण रक्षा सम्भव हो गई।


आत्म-विस्तार की प्रकृति प्रेरणा

प्रकृति ने अपने परिवार में भिन्न-भिन्न रुचि और प्रकृति के प्राणियों, जीव-जन्तुओं तथा वृक्ष-वनस्पतियों और जड़-पदार्थों को सम्मिलित किया है। ये सभी सदस्य एक नियम मर्यादा के अंतर्गत रहते हुये काम करते हैं, कहा जाना चाहिये कि प्रकृति ने कुछ नियम मर्यादाएं इस प्रकार निर्धारित की हैं, और सृष्टि संतुलन की दृष्टि से नितांत आवश्यक है, यह नियम केवल मनुष्यों के लिये ही नहीं वरन् अन्य प्राणियों के लिये भी बनाए गए हैं। यहाँ तक कि वृक्ष वनस्पतियों के लिये भी। और मनुष्य को छोड़ कर सभी कोई इन नियमों, मर्यादाओं का पालन करते हैं।

एक अकेला मनुष्य ही ऐसा है जो न जाने किस दर्प के वशीभूत होकर उनका उल्लंघन करता है तथा जब उसे इसका दण्ड मिलता है, तो रोता कलपता है। उदाहरण के लिये वृक्ष-वनस्पतियों को ही लिया जाय। जीवन क्रम सुविधा और साधन की दृष्टि से वे भले ही पिछड़े हों परन्तु नियमों के पालन में पूरी तरह तत्पर रहते हैं। मनुष्य में बुद्धि, धन, प्रतिभा और भावना आदि की सम्वेदनाएं ऐसी हैं जिन्हें उसके अस्तित्व का बीज कहा जाता है। इसी के आधार पर मनुष्य ऊँचा उठता और आगे बढ़ता है। बीज सड़ा गला हो तो उससे वंश वृद्धि न हो सकेगी। मनुष्य के गुण, कर्म स्वभाव की विभूतियाँ यदि स्वस्थ और समर्थ न हों तो कोई व्यक्ति प्रगति के पथ पर दूर तक अग्रसर नहीं हो सकेगा। ध्यानपूर्वक देखने से प्रतीत होगा कि मनुष्य की विभिन्न शारीरिक, मानसिक हलचलें इन बीत तत्वों को विकसित और परिष्कृत तथा पुष्ट करने से ही होती हैं। भौतिक और आत्मिक सम्पदाओं से अधिकाधिक मात्रा में संपन्न होने की अभिलाषा स्वाभाविक मानी जाती है। वह बनी रहती है और जाने अनजाने उसके लिये प्रयास भी चलते ही रहते हैं। वनस्पति जगत में भी यही प्रक्रिया अपने ढंग से चलती रहती, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि मनुष्यों में चलती है।

मनुष्य जीवन का लक्ष्य आत्म-विस्तार मान जाता है। अपना आपा बढ़े, व्यक्तित्व का विकास हो, आत्म-चेतना विकसित होकर सुदूर क्षेत्रों में फैले इसके लिये भाँति-भांति के प्रयास किये जाते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में विस्तार की यही प्रक्रिया आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ा कर सब में अपने को और अपने में सब को देखने वाला तत्व दर्शन हृदयंगम कराती है।

वनस्पति जगत में भी आत्म-विस्तार की यही बात लागू होती है। पौधे बढ़ते और विकसित होते हैं। अन्ततः उनकी प्रौढ़ता परिपक्व होकर फलवती होती है। तथा उन पर फल-फूल लगते हैं। यह फल-फूल मनुष्यों सहित अन्य प्राणियों के लिये आहार का काम देते हैं पर जहाँ तक वृक्ष के स्वयं के लिये इन फलों के उपयोग का प्रश्न है, वह उनकी बीत सत्ता को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिये उसे परिपुष्ट बनाने और सुविस्तृत बनाये रहने के उद्देश्य में ही सन्निहित देखी जा सकती है। वृक्ष परोपकार के लिये तो जीते ही हैं, फल फलवान बनते ही हैं, इसके अलावा उनके पीछे फलवान होकर अपनी सार्थकता सिद्ध होने का उद्देश्य भी रहता है।

फलों के भीतर गुदा भरा रहता है और गुदे के भीतर बीज होता हैं। गुदे में बीज एक ही स्थान पर इकट्ठे नहीं रहते वरन् दूर-दूर फासले पर होते हैं, इसी प्रकार पूरे वृक्ष पर न तो एक ही फल लगा होता है तथा न ही सभी फल एक ही स्थान पर लगे होते हैं। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था क्यों की? इस प्रश्न पर विचार करने से स्पष्ट होता है प्रगति के जो आधार प्रकृति ने मनुष्यों के लिये बनाये हैं, वैसे ही वृक्षों के लिये भी विनिर्मित किये गये हैं। गुदे का उद्देश्य है बीज को पोषण देना। गुदा बीज को पोषण देता है, उसे परिपुष्ट करता है और प्रौढ़ावस्था तक पहुँचता है। माता के गर्भ में जिस प्रकार भ्रूण पकता फलता है, उसी प्रकार फल के उदर में, बीच में बैठा हुआ बीज भी धीरे-धीरे पुष्ट और समर्थ होता चलता है।

एक वृक्ष में अनेकों फल लगते हैं और प्रत्येक फल में कई एक बीज होते हैं। यह सब इसलिए होता है कि उसकी सत्ता को अधिकाधिक विस्तार करने का अवसर मिले। वह सीमित दायरे में संकीर्णता की परिधि में आबद्ध रह कर ही अविकसित न रह जाय। मनुष्य को भी आत्म विस्तार के बिना न तो वास्तविक आत्म संतोष मिलता है तथा न ही उसे आत्म गौरव की अनुभूति होती है। जब मनुष्य को ही प्रकृति सीमित से असीम की ओर, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, क्षुद्रता से महानता की ओर निरंतर बढ़ते रहने, प्रत्यक्ष करने के लिये प्रेरित करती रहती है तो वृक्ष वनस्पतियों के साथ ही पक्षपात क्यों करें?

सर्वविदित है कि प्रत्येक बीज में एक पूर्ण वृक्ष परिपूर्ण रूप से विद्यमान रहता है। प्रत्येक बीज अपने आप में एक वृक्ष के रूप में विकास करने की संभावना लिये रहता है। बीज जब-जब परिपुष्ट हो जाता है तो उसका उद्देश्य रहता है, उसी जाति के नये वृक्ष उत्पन्न करना। इसके साथ ही यह आवश्यक हो जाता है कि वह परिपुष्ट होने के बाद केवल समीपवर्ती क्षेत्र तक ही सीमित न रहे वरन् क्षेत्र का सीमा बंधन लाँघ कर, सुदूर क्षेत्रों तक अपनी सत्ता को सुविस्तृत बनाए। गुदे के भीतर सभी बीजों का एक ही स्थान पर इकट्ठे न रहने, दूर-दूर होने का यही उद्देश्य है कि उन्हें सुविस्तृत परिधि में विस्तार करने का अवसर मिले। गुदे में यदि सभी बीज एक ही स्थान पर चिपके रहे होते तो वे एक ही स्थान पर गिर कट या तो वहीं उगते अथवा उनमें से बहुत से नष्ट हो जाते। क्योंकि उस स्थिति में सभी को पर्याप्त खुराक नहीं मिल पाती और वे एक दूसरे की खुराक छीनते झपटते तथा ऐसे ही सूख कर, मुरझा कर समाप्त हो जाते।

प्रकृति प्रेरणा वृक्षों से फलों के द्वारा यही सब कुछ कराती है। उनके फलने और फलों के पकने साथ-साथ उनमें वितरण की चेष्टा भी उत्साहपूर्वक चलती है। गुदे में बीजों की अलग-अलग स्थिति का एक उद्देश्य वितरण में सुविधा भी है। गुदा तो खाने के काम आ जाता है परन्तु बीज प्रायः कड़े होते हैं, इसलिये उन्हें फेंक दिया जाता है। गुदा समाप्त हो जाने पर भी बीजों का अस्तित्व बना रहता है। यदि उन्हें पीस कर नहीं खाया गया है तो चबाने पर भी उनमें से अधिकांश साबुत बच जाते हैं। पेट में पहुँच जाने पर भी वे प्रायः नहीं ही पचते हैं। मल विसर्जन के समय वे मल के साथ निकल कर इधर-उधर छितराते, धक्के खाते और बढ़ते रहते हैं।

गुदे में पके हुये बीज विकसित होकर सुदूर क्षेत्रों में फैल सकें, इसके लिये प्रकृति ने अनेकों प्रकार की व्यवस्थाएं की हैं। प्राणियों द्वारा उनका खाया जाना और मल विसर्जन के साथ-साथ उनका दूर-दूर पहुँचना तो प्रत्यक्ष ही है। कई बीज फेंक दिये जाते हैं। बीजों का व्यवसाय भी होता है। अनाज की तरह अन्य बीज भी खरीदे बेचे जाते हैं और इस प्रकार भी वे यहाँ से वहाँ यात्रा करते रहते हैं। यह तो प्रचलित व्यवस्था हुई प्रकृति भी इस दिशा में भारी सहयोग प्रदान करती है और तरह-तरह के साधन जुटाती है, जिससे उत्पन्न हुई बीज सम्पदा किसी एक स्थान पर सीमित होकर न रह जाए वरन् उसे सुदूर लोगों में वितरित होने का अवसर मिले।

वनस्पति जगत हल्के बीजों की कमी नहीं है। हवा असंख्य बीजों को अपने साथ उड़ा कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। हवा में उड़ कर कहीं भी पहुँच जाने वाले बीजों की संख्या अगणित है। कुनैन जिस सिमकोना पौधे से बनती है, उसके बीज इतने हल्के होते हैं कि एक औंस (लगभग 29 ग्राम) में 70 हजार तोले जा सकते हैं। आर्किडो के बीज भी तो इससे भी हल्के होते हैं और उनकी बनावट भी पक्षी के परों की तरह होती है। हल्केपन और बनावट दोनों विशेषताओं के कारण वे हवा के साथ आसानी से उड़ते चले जाते हैं और हवा उन्हें कहीं का कहीं ले जाकर फेंक देती है। आक के बीज में तो इतने अधिक कोमल और बारीक रेशे निकले होते हैं कि वह मंद वायु प्रवाह में भी कहीं से कहीं उड़कर पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार कुछ और बड़े भारी बीजों में सूर्यमुखी, डेडिलियोन, सीमा, बेलकुन, आक, सेसर, सरकण्डा आदि के बीज ऐसे हैं जो पैराशूट की तरह बने होते हैं तथा हवा का तनिक-सा सहारा पा कर लम्बी उड़ान लगते हैं। उन्हें नीचे उतरने और ऊपर चढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती।

ब्लड फ्लावर, करची, व्यूमोनशिया, चाटियम जैसे पौधों के बीज भी रेशेदार होते हैं, जिनके कारण उनकी आयु यात्रा बड़ी सरल बन जाती है। अरलू, पराल, सहजन, चीड़ के बीजों की बनावट भी पक्षियों के परों जैसी होती है। वे इच्छा से या स्वयं नहीं उड़ पाते पर हवा उन्हें उड़ा कर ले जाती है और कहीं का कहीं छोड़ देती है।

कुछ वृक्षों के तो फल ही उड़ाकू होते हैं। वे अपने बीज परिवार को साथ लेकर ही उड़ान पर निकल जाते हैं तथा क्षेत्र विस्तार कर लेते हैं, ऐसे उड़ने वाले फलों में होलोक, मधुलता जमीकन्द, होपियामेपल, फ्रेक्सीनस, डिपटीरोकामस, साल आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें से एथेलस की बनावट हवाई जहाज जैसी है। लगता है इसी फल को देख कर हवाई जहाज के डिजाइन की कल्पना की गई होगी। आँधियाँ जब चलती हैं, तब ये फल अपने बीजों के साथ उड़ जाते हैं और सुदूर स्थानों पर पहुँच जाते हैं, जड़ी बूटियाँ भी प्रायः इसी प्रकार हवा में उड़ती हुई जहाँ-तहाँ पहुँचती हैं।

इसके अतिरिक्त बहुत से बीज जानवरों के शरीर से चिपक कर अपनी यात्रा पूर्ण कर लेते हैं। पानी में उगने वाले बीजों को लहरें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं। ये बीज हल्के और हवा से भरे हुये स्पंज की तरह होते हैं। इस कारण वे लहरों पर आसानी से तैर लेते हैं। नदियों और समुद्रों के तटों पर उगे हुये पेड़, पौधे भी अपने बीज, जल की लहरों के माध्यम से ही जहाँ तहाँ पहुँचाते हैं।

कई फल ऐसे होते हैं जिनके छिलके बहुत कड़े होते हैं। पक जाने और सूख जाने पर भी वे बीजों को बाहर नहीं निकलने देते। इस स्थिति में बीज भीतर से विद्रोह जैसी प्रतिक्रिया करता है और छिलका एक विस्फोट की तरह फटता है। इस प्रक्रिया में बीज उछल कर बाहर निकल जाते हैं। गुल मेंहदी, बुडरेसिल, नाइट जेसमिन, कालमेध, अरण्ड, बज्रदंती, कंचनलता, पलान्स आदि फलों के बीज इसी प्रकार अपने फलों के आवरण से मुक्त होते हैं।

गिलहरी, चूहे, चींटियां और इसी तरह के कुछ जन्तु तथा कीड़े जहाँ-तहाँ पहुँच जाते हैं। इस संग्रह को वे बिलों में जमा करते हैं। फिर इन्हीं में से कुछ बीज अस्त-व्यस्त हो कर जहां-तहां पहुंच जाते हैं। पक्षियों के पैरों में चिपकी मिट्टी के साथ अथवा उनकी बीट के माध्यम से भी अनेक वनस्पतियाँ तथा वृक्ष लम्बी यात्रायें करते हुये पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच जाते हैं। कुछ बीज ऐसे होते हैं जो हवा, पानी, मनुष्य आदि की सहायता न पाने पर स्वयं ही अपनी प्रकृति प्रेरणा से आत्मविस्तार का रास्ता अपने बलबूते पर बनाते हैं। और जिस-तिस प्राणी के शरीर से चिपट कर कहीं के कहीं पहुँच जाते हैं। लटजीरा, गोखरू, बन-औखरा, चारेकांटा, बुइया ठीकरी, चित्रक आदि के फल अथवा बीज अपने कांटों के साथ पशु पक्षियों के शरीर एवं मनुष्यों के कपड़ों को पकड़ लेते हैं और उनके सहारे कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं।

इस प्रकार प्रकृति ने वृक्ष वनस्पतियों को अपना आपा विस्तृत करने की न केवल प्रेरणा दी है, वरन् उसके लिये आवश्यक साधन सुविधायें भी जुटाई हैं। मनुष्य के लिए भी उसका संदेश अपना आपा व्यापक बनाना है। व्यक्तिवाद की संकीर्ण स्वार्थपरता के निरस्त करके लोकहित की जन-कल्याण की सत्प्रवृत्तियों में अपनी विभूतियों को समर्पित करके ही मनुष्य अपना जीवन सफल और सार्थक बना सकता है।


Quotation

योद्धा वह नहीं जो औरों को मारता है। सच्चा योद्धा तो वह है जो अपनी बुराइयों को मार डालता है। -कार्लाइल


हिंसा पर साहस की विजय

दांए बांए, अगल बगल चारों और पुस्तकें फैली हुई थी। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने अध्ययन कक्ष में बैठे तन्मयता से साहित्य सृजन कर रहे थे। वे अपने काम में इतने तल्लीन थे कि कमरे के बाहर और कमरे के भीतर क्या हो रहा है? इसका तनिक भी भान नहीं था। चुपके से एक व्यक्ति ने उनके कक्ष में प्रवेश किया, रवीन्द्र बाबू को इसका भी पता नहीं चला।

उस व्यक्ति के चेहरे से भयावह हिंस्र भाव टपक रहा था। डरावने नंगे, चेहरे पर तनाव, हाथ में लपलपाता-सा लम्बा छुरा। वह चुपके से रवीन्द्र बाबू के सामने आ कर खड़ा हो गया और एक-एक शब्द को चबा-चबा कर बोलने के से ढंग से कहा, ‘अपने प्रभू का स्मरण कर लो। मैं तुम्हारी हत्या करने आया हूँ।’

विश्व कवि की तन्मयता ये शब्द सुन कर टूटी और उन्होंने उस व्यक्ति की ओर दृष्टि उठा कर देखा, ‘तुम मेरी हत्या करने आये हो?’ रवीन्द्र बाबू ने पूछा।

‘देखते नहीं हो। मेरे हाथ में यह छुरा। आज में तुम्हारी इहलीला समाप्त करने आया हूँ, उस व्यक्ति ने अपने हाथ में छुरा नचाते हुये कहा।

वह व्यक्ति रवीन्द्र बाबू के किसी विरोधी द्वारा उकसाने और लालच देने पर विश्व की इस महान विभूति का अन्त करने के लिये आया था ताकि सूरज अस्त हो जाए और जुगनुओं को चमकने का अवसर मिले।

रवींद्र बाबू ने उस की और देखा, जैसे पुस्तक का कोई पन्ना देख रहे हों। न मन में भय न मृत्यु का डर। बहुत ही मधुर स्वर में उन्होंने कहा, ‘तो ठीक है। परन्तु तुम जरा जल्दी आ गये। मुझे यह कविता पूरी कर लेने दो। तब तक आराम से बैठो।’

‘मूर्ख-नहीं मैं’, वह गुर्राया, ‘तब तक तुम्हारे सेवक इस बीच यहाँ एकाध चक्कर लगायेंगे ही और, तुम अपनी रक्षा के लिये कोई उपाय कर लोगे।’

हंसे रवीन्द्र बाबू! उनकी हंसी भी शांत और निश्चल थी। फिर रुककर उन्होंने कहा, ‘गलत समझे हो मित्र। इस समय सभी लोग सो चुके, आधी रात्रि बीतने जा रही है। जरा अनुमान तो लगाओ इस आधी रात में कौन मेरे पास आएगा।’

फिर उन्होंने कहा, तुम्हें मेरी हत्या के लिए भेजा गया है। मैं नहीं चाहता कि तुम असफल होकर लौटो। और मुझे मृत्यु का भी कोई भय नहीं हैं। परन्तु कठिनाई यह है कि इस समय मेरी यह रचना अधूरी पड़ी हुई है। इस समय तुम साक्षात काल बने हुये हो। तुम से इतना ही निवेदन करता हूँ कि थोड़ी देर प्रतीक्षा करो और रचना पूरी हो जाने दो।

विश्व कवि उसी प्रकार अकंपित धीर वाणी में कहते जा रहे थे परन्तु वह व्यक्ति समझ रहा था कि शायद रवीन्द्र बाबू, मृत्यु से डर रहे हैं। इसलिये वह कड़क कर बोला, ‘मेरे पास समय नहीं है। अभी और इसी क्षण मुझे अपना काम करना है। अतः अपनी कलम नीचे रख दो और मरने के लिए तैयार हो जाओ।’

रवीन्द्र बाबू अब भी शाँत और संयत थे। हत्या के उद्देश्य से आये आगन्तुक को इस प्रकार समझा रहे थे, जैसे कोई हठी बच्चे को समझा रहा हो और कोई जब बार-बार समझाने पर भी नहीं समझता है तो उसे जिस तरह डपट दिया जाता है। उसी प्रकार रवीन्द्र बाबू ने उसे डपटा, ‘चुप चाप बैठ जाओ। मुझे अपना काम करने दो।’

धक्क रह गया हत्या के उद्देश्य से आया गुण्डा। रवीन्द्र बाबू इतना कह कर चुप चाप अपने काम में लग गए। उनके इन शब्दों और मृत्यु की और से भी लापरवाह, बेखबर रहते हुए अपने काम को प्राथमिकता देने वाले साहस ने हत्यारे को परास्त कर दिया।

वह कुछ ही क्षणों तक वहाँ ठहर सका था। बोला, ‘क्षमा कीजिए गुरुदेव! मैं आज एक जघन्य अपराध से बच गया। कहीं हाथ उठ जाता तो एक देव पुरुष से भारत ही नहीं समूचा विश्व शून्य हो जाता।’

और वह जिस तरह आया था, उसी तरह चला गया।


मरणोत्तर जीवन के लिए चुनाव की स्वतंत्रता

पदार्थ के सूक्ष्म से सूक्ष्म कण और विराट् से विराट् अस्तित्व ब्रह्मांड के संबंध में बहुत कुछ जान लेने के बाद भी मृत्यु और मृत्यु के बाद वाले जीवन के संबंध में मनुष्य बहुत कम जान पाया है और वह जानना नगण्य के बराबर है। जो कुछ जाना जा सका है वह भी इतना अधिक है कि उसके आधार पर मृत्यु तथा मरणोत्तर जीवन के संबंध में बहुत कुछ कहा जा सकता है। प्राचीन काल में भारतीय मनीषियों ने मृत्यु तथा मरणोत्तर जीवन के संबंध में जो तथ्य निरूपित कर दिये थे, वे आज भी वैज्ञानिक अनुसंधानों से पुष्ट ही होते हैं।

मरणोत्तर जीवन के संबंध में वैज्ञानिक ढंग से अन्वेषण करने वालों में बार्थर लाडार्ट, ग्रेस रोशर, ऐन्थेनी वोर्गिया, एफन हैस्लोप आदि वैज्ञानिकों के नाम प्रमुख हैं। बार्थर लाडार्ट तथा उनके अन्य सहयोगी वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान प्रयोगों के बाद यह प्रतिपादित किया है कि मनुष्य ही नहीं प्रत्येक प्राणी का अस्तित्व शरीर, मन और आत्मा इन तीनों से मिल कर बना होता है। मृत्यु में केवल शरीर ही नष्ट होता है, मन तथा आत्मा नहीं और यह भी कि मृत्यु मात्र आत्मा को शरीर से पृथक करने वाली प्रक्रिया भर का नाम है। आत्मा के देह-त्याग के बाद केवल शरीर ही नष्ट होता है, मनुष्य प्राणी का अशरीरी अस्तित्व फिर भी बचा रहता है।

मृत्यु के बाद मानवी चेतना किस रूप में विद्यमान रहती है? इस विषय में विभिन्न अनुसंधानकर्ताओं ने अनेक तरह से खोज बीन की है। इस खोज बीन में दिवंगत आत्माओं से संपर्क स्थापित करने से लेकर मरने के बाद पुनः जीवित हो उठे व्यक्तियों से पूछ-ताछ तक के विभिन्न प्रकरण सम्मिलित हैं। “पोस्ट-मार्टम जनरल” पुस्तक की लेखिका ‘मिसेज जेन शेरवुड’ ने अपनी पुस्तक में एक ऐसे व्यक्ति के जीवन-क्रम तथा मरणोपरांत उसकी दिवंगत आत्मा द्वारा दिये गये विवरणों को संकलित किया है, जो अपने जीवनकाल में बड़ा दुस्साहसी था। उस व्यक्ति का नाम था स्काट। स्काट को तीव्रगति से मोटर गाड़ी चलाने, पहाड़ों पर चढ़ने, गहरी और तेज प्रवाह वाली नदियों में तैरने का बहुत शौक था। उसकी मृत्यु भी मोटर साइकिल दुर्घटना में हुई थी, जब वह बहुत तेजी से गाड़ी चला रहा था।

जेन शेरवुड ने प्रेत विद्या विशारदों के साथ प्रेतात्माओं का आह्वान किया तो स्काट की आत्मा ने बताया कि- ‘‘दुर्घटना के तुरन्त बाद क्या हुआ? इस का मुझे कोई अनुभव नहीं हुआ। मैंने अपने आपको एक ऐसी दुनिया में पाया जहाँ न प्रकाश था न अंधेरा। कुछ समय के लिये मैंने अपने आपको सचेत पाया, परन्तु फिर अचेत सा हो गया। कब बेहोशी टूटी? कुछ पता नहीं। जब निद्रा टूटी तो व्यक्तित्व का आभास धीरे-धीरे तीव्र हुआ और मैंने अपने आपको एक ऐसी अजीब दुनिया में पाया, जहाँ मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं था। परन्तु वहाँ मेरी आवाज मुझे स्पष्ट तौर पर सुनाई देती थी। मैंने उस समय कई आवाजें लगाई, परन्तु कहीं से कोई उतर नहीं मिला। धीरे-धीरे वातावरण में कुछ परिवर्तन आना आरम्भ हुआ और कुछ प्रकाश-सा दिखाई देने लगा। ऐसा लगता था मानो हेमन्त ऋतु का मौसम है और मेरे पास पर्याप्त वस्त्र नहीं हैं, फिर भी मुझे ठण्ड का तनिक भी आभास न हुआ।’’

स्काट की आत्मा ने बताया कि जो कुछ भी और जैसा कुछ भी अनुभव होता था उसका कारण और उन परिस्थितियों के लिये मैं स्वयं जिम्मेदार था। इसी प्रकार लंदन की एक और प्रेतविद् महिला ग्रेस रोशर को गोर्डन नामक व्यक्ति की आत्मा ने अपने अनुभव सुनाये। ग्रेस रोशर ने अपने अनुभव ‘वियोण्ड दी होराइजन’ पुस्तक में लिखे हैं। इस पुस्तक में उन्होंने गोर्डन आत्मा से हुये साक्षात्कार का विवरण इस प्रकार लिखा है, “सितम्बर की संध्या को जबकि साढ़े तीन बजे थे मैं टेबल पर बैठी कुछ पत्र लिख रही थी। मैंने एक पत्र समाप्त कर दिया था और लिफाफे पर पता लिख चुकी थी। मैंने एक हाथ में पैन पकड़ रखा था और उसका सिरा पैड पर टिका हुआ था मुझे तब एक आवाज सुनाई दी, ‘अपने हाथ को वहीं पर रहने दो और फिर क्या होता है?, मैंने तब देखा कि मेरा पैन बिना मेरे द्वारा हाथ हिलाए स्वयं हिल रहा है। मुझे कुछ ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे अन्दर किसी स्वतंत्र बिजली शक्ति ने हरकत पैदा कर दी है। धीरे-धीरे कागज पर शब्द उभर आए, ‘स्नेह सहित मैं गोर्डन’ ये शब्द से में मिले हुये थे और बहुत छोटे थे।’’

मेरे मन में फिर यह प्रश्न उठा कि यह कौन लिख रहा है? गोर्डन है या मैं स्वयं ही लिख रही हूँ? इन प्रश्नों के मन में उठते ही तुरन्त पैन ने लिखना आरम्भ कर दिया, ‘मैं गोर्डन, गोर्डन’। संभवतः नाम इसलिए आ गया था कि मैं संतुष्ट हो जाऊं कि लेखक गोर्डन ही है। क्योंकि ये सारी बातें मेरे पूर्व अनुभव से बाहर की थीं और मेरी संभावनाओं से परे थीं। इसलिए इस संबंध में मैंने कुछ कहना उचित नहीं समझा। गोर्डन से मेरे संबंध बड़े घनिष्ठ थे। उसका देहावसान हो चुका था। इस घटना से मैंने जाना कि वह मुझसे संपर्क रखना चाहता है। क्यों न मैं उसे अपने आपको व्यक्त करने का मौका दूँ? यह विचार करके मैं कागज का पैड और पैन लेकर बैठ गई। तुरन्त एक क्षण में गोर्डन लिखना आरम्भ कर दिया। उसने लिखा, ‘मैं तुमको कुछ लिखना चाहता हूँ, मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है।’

इसके बाद गोर्डन की आत्मा ने जो कुछ लिखा, वह सब उसी ढंग का था, जैसी कि जीवन काल में उसकी मान्यताएं और आकांक्षाएं थीं तथा वह ग्रेस रोशर से प्रायः उन मान्यताओं या आकाँक्षाओं के संबंध में बातें करता रहता था।

‘मोर, एबाउट लाइफ वन द वर्ल्ड अनसीन’ के लेखक ऐन्थेनी वोर्गिया ने एक आत्मा से पूछा था कि ‘क्या परलोक में नरक जैसा कोई स्थान भी है?’ इस प्रश्न के उतर में संपर्क में आने वाली आत्मा ने बताया, ‘विभिन्न धर्मों ने नरक की जैसी रूपरेखा खींची है, ऐसा कोई स्थान परलोक में नहीं है परन्तु परलोक में ऐसी कुछ बस्तियाँ अवश्य हैं जहाँ पहुँचने पर लोगों का मन आक्लांत हो जाता है और वहाँ एक प्रकार की घुटन अनुभव होने लगती है। उन स्थानों की सीमा नहीं है तथा न ही उन्हें किन्हीं परिभाषाओं में बाँधा जा सकता है। उन स्थानों में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह छूट मिली हुई है कि वे जब चाहें इस दुःखद वातावरण से किसी भी समय छुटकारा प्राप्त कर लें किन्तु वे अपने नीच विचारों के कारण अपना नरक स्वयं बनाये रखते हैं। कभी-कभी ऐसे आदमियों को ऊपर उठाने में बड़ा परिश्रम करना पड़ता है।

लेखक से जिस आत्मा ने संपर्क किया, वह आत्मा जीवित अवस्था में भी वोर्गिया से परिचित थी। वोर्गिया ने कहा कि ठीक इसी प्रकार की धारणाएँ और दृष्टिकोण, वह व्यक्ति बैन्सन जीवन काल में भी व्यक्त किया करता था। बैन्सन की मृत्यु 43 वर्ष की आयु में हुई थी। उसकी आत्मा ने कहा कि यहाँ आयु का कोई बंधन नहीं है। कोई व्यक्ति वृद्धावस्था में भी मरता है तो भी उसकी स्थिति जवानों जैसी ही होती है। उसे यहाँ बूढ़ा नहीं होना पड़ता। बैन्सन अपने जीवनकाल में भी कहा करता था कि बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो शरीर की नियति है, आत्मा का जन्म नहीं होता है इसलिए वह कभी भी बचा नहीं रहती और न कभी वह मरती है। इसलिये वृद्धावस्था का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ईसाई धर्म से भिन्न प्रकार की धारणाएं उस व्यक्ति की थीं, इसलिये मरणोपरांत भी उसका सूक्ष्म शरीर इसी प्रकार की अनुभूतियाँ करता रहा।

मृत्यु के समय अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह के अनुभव होते हैं। ‘इन द डान बियाण्ड ऑफ’ के लेखक रेवरेण्ड सीडेट्रन टोमस ने अपनी पुस्तक में एक व्यक्ति को मृत्यु के समय हुए अनुभवों को इन शब्दों में व्यक्त किया है, ‘मेरा हृदय बैठा जा रहा था। दिन का प्रकाश जैसे समाप्त हो रहा था। पहले एक अंधकार की दुनिया आई जिसमें सिर घूमता-सा लगता था। फिर वायुमंडल में कुछ उजाला दिखाई दिया। मुझे अपने उन बच्चों की आवाजें सुनाई दे रही थीं जो मुझसे पहले चल बसे थे। एक अर्ध मूर्छा की अवस्था के बाद मुझे अब साफ सुनाई दे रहा था। मेरे लड़के, मरे भाई तथा अनेक संबंधी जो मुझसे पहले मर चुके थे, मेरे पास ही उपस्थित थे।’’

इसी पुस्तक में एक अन्य दिवंगत आत्मा के अनुभव टोमस ने उसी के शब्दों में इस प्रकार लिखे हैं, ‘मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे में आस-पास की दुनिया से ऊपर उठ रहा हूँ उस समय मेरे चारों तरफ बहुत से इष्ट मित्र थे और मरे स्वर्गवासी माता-पिता भी मौजूद थे। मुझे किसी विशेष परिवर्तन की अनुभूति नहीं हुई और मुझे तुरन्त निद्रा ने आ घेरा। मैं तीन चार दिन तक सोता रहा। मैंने फिर अनुभव किया कि मैं पृथ्वी से किसी दूरस्थ स्थान पर हूँ। चारों तरफ का वातावरण सुँदर और प्रकाशमय था।

एडवर्ड सी रेण्डेल ने एक दिवंगत व्यक्ति की आत्मा के मृत्यु अनुभव को अपनी पुस्तक ‘फ्रण्टियर ऑफ द ऑफ्टर लाइफ’ में इस प्रकार लिखा है, ‘‘मरने के बाद मैंने अपने चारों ओर उन व्यक्तियों को मौजूद पाया जो मुझसे पहले ही मर चुके थे। पहले पहल मैंने अपन आपको ऊपर उठते हुए देखा और फिर धीरे-धीरे नीचे आ गया। एक शरीर बिस्तरे पर पड़ा था और दूसरा मैं जो खड़ा था। मेरी तमाम शारीरिक वेदनाएं समाप्त हो गई थीं। जो मुझे लेने आए थे, उन्होंने मुझसे चलने को कहा। उस समय एक विचार आया कि क्या यह स्वप्न तो नहीं है? परन्तु जो आत्माएं मुझे लेने आई थीं उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं मर चुका हूँ।”

कुछ व्यक्तियों को मरने के समय सुरंग में से गुजरने का अनुभव होता है, कुछ को प्रकाश दिखाई देता है और कुछ गहन रात्रि का-सा निविड़ अंधकार अनुभव करते हैं। ‘व्हेयर द टू वर्ल्डस् मीट’ पुस्तक के लेखक ‘आर्थर फिंडले’ ने लिखा है- मरणासन्न व्यक्ति को अपने पिछले जीवन की सारी घटनाएं क्रमानुसार दिखाई देती हैं। यह सब तब होता है, जब वह शरीर छोड़ता है। ‘साइकित ब्रिज’ की लेखिका श्रीमती जेन शेरवुड ने भी इसी मत को दोहराते हुये कहा है कि, “मृत्यु के समय तमाम जीवन की फिल्म, विचारों की भीड़ भाग रही होती है। उल्लेखनीय है इस पुस्तक की लेखिका ने मरणोपरांत प्रेत अवस्था में एक माध्यम से लिखवाया था।

अब तक इस संबंध में हुए अनुसंधान और शोध निष्कर्षों से यही प्रमाणित होता है कि मृत्यु के समय मनुष्य की वैसी ही मनःस्थिति रहती है जैसी कि उसके जीवनकाल में होती है। यों भी कहा जा सकता है कि जीवन भर के संस्कार, अनुभव, धारणाएं तथा दृष्टिकोण मिलकर ही पारलौकिक जीवन का स्वरूप निर्धारण करते हैं? भगवान श्रीकृष्ण ने इस शाश्वत सत्य का उद्घाटन हजारों वर्ष करते हुए कहा है-

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते क्लेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोर्बुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥ (भगवद् गीता 8/6, 7)

अर्थात्- हे कुँती पुत्र अर्जुन, अंतिम समय जिस जिस भाव का स्मरण करते हुये मनुष्य शरीर को छोड़ता है, सर्वदा उसी भाव के आश्रित हो कर उसी भाव को प्राप्त करता है। इसीलिए सभी कालों में मुझे (ईश्वर को) ही स्मरण करते हुये (जीवन) संग्राम में लड़ो। मुझ में ही मन और बुद्धि को अर्पित करो तभी तुम निस्संदेह मुझे प्राप्त होंगे।

मरने के बाद नया जीवन मिलता है, उस जीवन में क्या संभावनाएं उपलब्ध हो सकती हैं, इसकी आधारशिला भी इसी जीवन में निर्धारित हो जाती है। अस्तु, परलोक को सुखमय बनाने के लिए भी इस जीवन को इतना आनंदित, शुद्ध और पवित्र बनाना आवश्यक है कि मरने के बाद वैसी ही परिस्थितियां प्राप्त हो सकें।


प्रेतात्माओं का अस्तित्व काल्पनिक नहीं

दिन भर जागते हुए, कठिन परिश्रम के बाद मनुष्य जब सोता है तो उसे विश्राम मिलता है। इस निद्रा काल में तरह-तरह के स्वप्न आते रहते हैं। सूक्ष्म शरीर का सचेतन मस्तिष्क सो जाता है या निष्क्रिय पड़ जाता है और अचेतन का ही जीव सत्ता पर अधिपत्य रहता है। अचेतन में जैसे भले बुरे संस्कार दबे पड़े रहते हैं, वे उभर कर आते हैं। मरणोत्तर जीवन, मृत्यु के बाद पुनः जन्म लेने के बीच की अवधि भी इसी प्रकार जीवात्मा का विश्रांति काल है। उस अवधि में जिसने जीवन का अधिकाँश भाग दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों में गुजारा है, उसे उसकी प्रतिक्रिया ही भयावह दृश्यावली के रूप में दिखाई देगी। इसी अनुभूति का नाम नरक है। जिन्होंने श्रेष्ठ जीवन जिया है, उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व अपनाते हुए जिंदगी का अधिकांश समय बिताया है उनके अचेतन में दिव्य संस्कार जगे रहते हैं और वे उसके मरणोत्तर निद्राकाल में दिव्य स्वप्न बनकर उभरते हैं। उस सुखद स्वप्न श्रृंखला को ही स्वर्ग कहते हैं।

मरने के बाद, शरीर को छोड़ने के उपरांत जिन्हें गहरी निद्रा नहीं आती, बेचैनी बनी रहती है, उन्हें प्रेत स्तर के समय गुजारना पड़ता है। मरने के बाद स्थूल शरीर का तो अंत हो जाता है किन्तु सूक्ष्म शरीर यथावत बना रहता है। प्राणी अपने आपको लगभग उसी स्थिति में, उसी कायकलेवर में अनुभव करता है, जिसमें वह जीवित अवस्था में था। अन्तर मात्र इतना ही होता है कि इन्द्रियों के स्पर्श से जो प्रत्यक्ष स्पर्श का सुख मिल सकता था, वह नहीं मिलता। सूक्ष्म इंद्रियां तरह-तरह के स्वादों अनुभव तो कर सकती हैं, परंतु वे पदार्थों का उपभोग नहीं कर सकतीं, जैसा कि स्थूल शरीर रहने पर किया जा सकता है। संसार के पदार्थों एवं व्यक्तियों को वह देखता तो है परन्तु स्वयं वायुभूत होने के कारण किस को दिखाई नहीं देता। पैर या पंख न होने पर भी वह चल और उड़ सकता है। दूसरों के शरीर तथा मस्तिष्क में अपना प्रवेश कर सकता है और उसे अपने अस्तित्व का आभास आवेश या अनुभव के रूप में दे सकता है। वह बातचीत वाणी या भाषा के द्वारा तो नहीं कर सकता, पर किन्हीं व्यक्तियों या पदार्थों के माध्यम से अपनी बात प्रकट कर सकता है।

प्रेत अवस्था में जीवित स्थिति की अपेक्षा कुछ कमियाँ आ जाती हैं किन्तु उसके साथ ही कुछ विशेषतायें बढ़ भी जाती हैं। इन सब बातों का प्रमाण प्रेतों के अस्तित्व अथवा उनके क्रिया-कलापों के आधारों से मिलता है, जिनकी यथार्थता तथ्यों की कसौटी पर कसे जाने से सर्वथा सत्य सिद्ध हुई है। अब तक प्रेतों के अस्तित्व को मात्र अंध-विश्वास समझा जाता था किन्तु ऐसी कई घटनाएं और अनुभव प्रामाणिक व्यक्तियों के साथ घटे जिनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

घटना 1956 की है। अमेरिका के राष्ट्रपति जिमि कार्टर सपरिवार जॉर्जिया के एक पुराने मकान में रहने लगे थे। वह मकान पुराने ढंग का था और चारों ओर लम्बे वृक्ष लगे हुए थे। कहा जाता है कि उस मकान का निर्माण सौ वर्ष पहले 1850 में हुआ था। जिमि कार्टर सन 1956 से 1960 तक इस मकान में रहे। एक रात्रि उन्होंने मकान के एक कमरे में किसी की चीख सुनी। कौन चीखा? क्यों चीखा था? यह जानने के लिये कार्टर और उनकी पत्नी ने घर का कोना-कोना छान मारा परन्तु कहीं कुछ नहीं मिला। कुछ दिनों बाद उस मकान में और भी किरायेदार आए। एक दिन एक किरायेदार के कमरे में मध्य रात्रि में उसका बिस्तर ही गायब हो गया। वह तो सोया का सोया ही रहा किन्तु उसके नीचे का बिस्तर इस तरह गायब हो गया जैसे उसने बिस्तर बिछाया ही न हो। यह देख कर सब आश्चर्य चकित रह गये। यदि कोई चोर आया भी था तो वह बिस्तर कैसे ले गया? और बिस्तर ही क्यों ले गया? जबकि अन्य कीमती सामान छुए तक नहीं गए थे।

उसी मकान में सन् 1950 से इनेज लेस्टर ने एक राज को अनुभव किया कि जैसे कोई दरवाजा खटखटा रहा है। उसने दरवाजा खोला तो उसने किसी की पदचाप सुनी। एक दिन रोजलीन ने मकान के बरामदे में सफेद कपड़े पहने किसी स्त्री को को देखा। एक बार उसके हाथों में जला हुआ लालटेन भी दिखाई दिया, फिर कुछ ही क्षणों में वह स्त्री लालटेन सहित देखते ही देखते ऐसे गायब हो गई, जैसे उसे जमीन ने निगल लिया हो। जिमि कार्टर ने अपने मित्रों से एक बार चर्चा के दौरान बताया कि वे अभी तक नहीं जान सके कि इन घटनाओं का क्या कारण था?

इस तरह की हजारों घटनाएं हैं। जिनके कारणों की तह में जाने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इस सृष्टि में दृश्य पदार्थों और अस्तित्वों के अतिरिक्त अदृश्य सत्ताएँ भी हैं। घटना सन् 1971 की है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद और लेखक डा. रोज दो कटी हुई खोपड़ियों का अध्ययन कर रहे थे, जो एक पुराने खंडहर की खुदाई करते समय मिली थीं। जब वे इन खोपड़ियों को लेकर प्रयोगशाला में लौट रहे थे तो उन्होंने रात्रि को करीब दो बजे अचानक ठण्ड बढ़ गई है, ऐसा अनुभव किया। उस समय डा. रोज सो रहे थे। ठण्ड बढ़ जाने के कारण उनकी नींद खुल गई और उन्होंने अपने आसपास एक छाया मंडराती हुई देखी। उस छाया को उन्होंने बिस्तर से उठ कर देखना चाहा तो पाया कि वह बाहर निकल गई है। डा. रोज ने उसका पीछा किया तो वह छाया कारीडोर को पार करती हुई बाहर निकल गई। जब तक उनके पास वे कटी हुई खोपड़ियां रहीं, तब तक उन्होंने छाया को अपने आसपास मंडराते देखा। जब उन्होंने खोपड़ियों का अच्छी तरह विश्लेषण कर लिया और उसे वापस विश्वविद्यालय के पुरातत्व संग्रहालय में पहुँचा दिया तब छाया का दिखाई देना स्वतः बन्द हो गया।

प्रेत होते हैं। उनके अस्तित्व और क्रिया-कलापों का विश्लेषण करने के लिये पश्चिमी देशों में अनेक वैज्ञानिकों ने प्रयास किए हैं। इनमें सर ओलिवर लाज का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। वे ब्रिटेन के माने हुए वैज्ञानिक रहे हैं। उन्हें कई विश्व विद्यालयों की मूर्धन्य डिग्रियां तथा स्वर्ण पदक प्राप्त थे। ईथर तत्व का प्रकाश से क्या संबंध है, इस विषय में उनकी खोज प्रामाणिक मानी जाती है। उन्होंने विज्ञान के लिये आत्मा के अस्तित्व को भी एक अन्वेषण का आवश्यक पक्ष माना था और स्वयं भी इस संबंध में महत्वपूर्ण कार्य किया था। इसके लिये उन्होंने ‘साइकिक रिसर्च सोसायटी’ की स्थापना की और उसे बहुमूल्य योगदान देकर अभीष्ट प्रयोजन के लिये अधिक काम कर सकने योग्य बनाया। उन्होंने अपनी प्रतिभाशाली शोध दृष्टि का उपयोग करके न केवल आत्मा का अस्तित्व और मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता प्रमाणित करने वाले तथ्य जुटाए, वरन् स्वयं भी इस स्थिति में पहुँचे कि मृतात्माओं का साक्षात्कार किया जा सका।

सर ओलिवर लाज का प्रथम पुत्र रेमण्ड पहले विश्व युद्ध में मारा गया था। मृतात्मा के साथ संपर्क बनाने और उसके माध्यम से अनेकों ऐसी अविज्ञात जानकारियाँ प्राप्त करने में वे सफल हुए जो परखने पर पूरी तरह सिद्ध हुईं। उनके एक समकालीन वैज्ञानिक सर विलियम कुक्स ने अपने प्रेतात्माओं संबंधी निष्कर्षों का विवरण ‘रिसर्च इनटू फैनोमियम आफ स्प्रिचुअलिज्म’ में प्रकाशित कराया है। इस पुस्तक में सर ओलिवर लाज के शोध कार्यों का सविस्तार वर्णन है।

विश्वविख्यात ‘लाइट’ पत्रिका के सम्पादक जार्ज लेथम ने अपने पत्र में एक लम्बी लेख माला ‘मैं परलोकवादी क्यों हूँ’ शीर्षक से कई अंकों में प्रकाशित हुई है। उनका पुत्र जौन भी फैलडर्स के मोर्चे पर युद्ध में मारा गया था। तोप के गोले ने उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े उड़ा दिये थे, फिर भी उसकी आत्मा बनी रही और अपने पिता की आत्मा के साथ संपर्क बनाये रही। लेथम ने लिखा है, ‘मेरा पुत्र जौन स्वर्गीय माना जाता है पर मेरे लिए वह अभी भी उसी प्रकार जीवित है जैसे वह किसी अन्य नगर में रहते हुए पत्र, फोन के माध्यमों से संदेशों का आदान-प्रदान करता हो? उन्होंने अपनी मान्यताओं को भावावेश अथवा भ्रम जैसा न समझ लिया जाए, इसके लिए ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिनके आधार पर संदेह करने वालों को भी इस संदर्भ में प्रामाणिक जानकारियाँ प्राप्त करने और तथ्यों तक पहुँचने में सहायता मिल सके।

विलियम काम्स और सर ओलिवर लाज की तरह ही विज्ञान के क्षेत्र में अन्य मूर्धन्य विद्वान भी मरणोत्तर जीवन और आत्मा के अस्तित्व पर अन्वेषण कर रहे हैं। इनमें से डा. ए. रसल वालेस और सर विलियम वारेट का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है, जिन्होंने आत्मा के अस्तित्व को किन्हीं किंवदंतियों अथवा पूर्व प्रचलित मान्यताओं के आधार पर नहीं वरन् ठोस प्रमाणों के आधार पर ही स्वीकार और प्रतिपादित किया है।

इन विद्वानों द्वारा जिन घटनाओं का विश्लेषण किया गया, उनमें स्काटलैंड का एक विवरण बहुत ही रोचक और विस्मयजनक है। वहाँ सेण्ट कुर्री नामक गाँव में जन्मे डेनियल डगलस होम को किसी प्रेतात्मा ने अपना माध्यम बना लिया था और वह उसके द्वारा विभिन्न संदेश देती रहती थी। डगलस का जन्म बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। चौदह वर्ष की आयु में वह तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त रह कर दिन काटने लगा। इसी बीच उसे यह अनुभव होता रहा कि कोई प्रेतात्मा उसके साथ संबंध बनाती है और तरह-तरह के संकेत उसके माध्यम से पहुँचाती है। डरते-डरते उसने वे संदेश अपने घर वालों और पड़ोसियों को बताए। ये संदेश या पूर्व सूचनाएं जब सही निकलीं तो उनका विश्वास बढ़ता गया और उससे समस्याएं पूछ कर समाधान जानने वालों की संख्या बढ़ती गई।

एक दिन डगलस की चाची ने मेज पर भोजन की प्लेटें सजाई हुई थी। वह किसी काम से बाहर गई हुई थीं और डगलस भीतर था। अचानक प्लेटों के आपस में टकराने की आवाज आई। चाची ने भीतर आकर देखा तो प्लेटें टूटी हुई थीं। उसने इसे डगलस की ही हरकत माना और उसे डाँटने फटकारने लगी। बेचारा डगलस यही कहता रहा कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है। तभी चाची ने दूसरी घटना यह देखी कि टूटे हुये टुकड़े अपने आप इकट्ठे होकर एक कोने में जमा हो रहे हैं। समेटने वाला कोई दिखाई नहीं पड़ता था। अब तो चाची को यह विश्वास हो गया कि इस घटना से डगलस का कोई संबंध नहीं है और यह उसी प्रेतात्मा की हरकत है जो डगलस से संबंधित है।

डगलस को प्रेत पीड़ित जानकर उसकी चिकित्सा के लिये डा. काम्स के पास ले जाया गया। जो एक अच्छे चिकित्सक होने के साथ प्रेतविद्या में रुचि रखते थे। उन्होंने डगलस का उपचार तो किया ही, उसकी आत्मिक शक्ति बढ़ाने का भी उपक्रम किया ताकि वह परलोक की आत्माओं से अधिक अच्छा संबंध बनाने में समर्थ हो सके। इस साधना से उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली। उसे प्रेतात्माओं का प्रामाणिक संदेशवाहक माना जाने लगा। इस संदर्भ में ब्रिटेन के कई उच्चकोटि के वैज्ञानिक उससे अपना समाधान करने के लिए मिलने आने लगे और संतुष्ट होकर लौटे। इन ख्यातिनामा लोगों में ईवनिंग पोस्ट के सम्पादक विलियम कुलेन ब्रामेट, प्रसिद्ध उपन्यासकार विलियम थेकर, विख्यात रसायन विज्ञानी सर क्रुम्स जैसे मूर्धन्य लोगों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

यहाँ प्रेत चर्चा का प्रसंग चलाने का उद्देश्य यही है कि मरने के साथ ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता। जीवात्मा का अस्तित्व तब भी रहता है। उपरोक्त घटनाओं का संबंध जिनसे है, वे सभी ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जाता है और न ही इन घटनाओं पर किंवदन्तियों अथवा दन्तकथाओं का आरोप लगाया जा सकता है। सामान्य घटनाएं तो आये दिन प्रकाश में आती रहती हैं, जिनसे प्रेत जीवन का अस्तित्व सिद्ध होता है और यह विश्वास सहज ही सुदृढ़ होता है कि मरने और पुनर्जन्म के बीच कुछ समय ऐसा होता है जिससे प्रेत जीवन का अस्तित्व सिद्ध होता है और यह विश्वास सहज ही सुदृढ़ होता है कि मरने और पुनर्जन्म के बीच कुछ समय ऐसा होता है जिसमें सबको तो नहीं किन्तु कुछ को प्रेतस्तर की स्थिति में अवश्य रहना पड़ता है। पुनर्जन्म की तरह प्रेतात्माओं के अस्तित्व भी जीवात्मा की अमरता के तथ्य को सिद्ध करते हैं, और इससे स्पष्ट है कि मृत्यु के बाद भी जीव सत्ता का अस्तित्व बना रहता है।


गतिशीलता विश्व व्यवस्था की चिरन्तर नीति

सृष्टि में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। सब गतिशील हैं। जड़ चेतन सभी गतिवान हैं। जिन्हें हम स्थिर और जड़ मानते हैं, उनके भीतर भी स्थिरता नहीं है। विद्यमान अणु और परमाणु एक निर्धारित कक्षा एवं गति वेग परिभ्रमण कर रहे हैं। चन्द्रमा पृथ्वी की और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। सूर्य अपने सौर मण्डल के सदस्यों सहित महासूर्य अतिसूर्य की परिक्रमा करने दौड़ा चला जा रहा है। इस क्रम का अन्त नहीं है। लगती है तो पृथ्वी भी स्थिर ही है, पर वस्तुतः वह प्रचण्ड वेग से अपनी की कक्षा पर सूर्य के चारों ओर घूम रही है।

स्थिरता भीतर भी नहीं है। शरीर के भीतरी अवयव एक स्वसंचालित प्रक्रिया द्वारा अपने-अपने कार्यों में मुस्तैदी से जुटे हैं। हृदय का आकुँचन प्रकुँचन सदा चलता रहता है। रक्त नलिकाओं में रक्त का प्रवाह सदा जारी है। पाचन तंत्र खाद्य पदार्थों को पचाने ऊर्जा में परिवर्तित करने में लगा रहता है। इसमें थोड़ा भी व्यतिक्रम होने पर विभिन्न प्रकार की विकृतियाँ रोगों के रूप में उठ खड़ी होती हैं। फेफड़े अपना कार्य करते हैं श्वास तंत्र अपना। बाहर से देखने पर तो सब शान्त एवं स्थिर मालूम पड़ता है, पर जीव शास्त्री जानते हैं कि भीतरी अवयव यदि विश्राम करने लगें, अपना काम करना बन्द कर दें तो शरीर को जीवित रखना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जायेगा।

स्थिरता जड़ समझी जाने वाली वस्तुओं में भी नहीं हैं। वस्तुओं के परमाणु के भीतर प्रचण्ड वेग से हलचल हो रही हैं। इलेक्ट्रान, प्रोटान आदि कण केन्द्रक के भीतर बाहर तीव्रगति से निश्चित कक्षा में दौड़े चले जा रहे हैं। उनमें से एक भी बागी होकर अपना काम बन्द कर दे तो पदार्थ सत्ता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय। पिण्ड हो या ब्रह्मांड, जड़ हो चेतन हलचल सबमें हो रही है। गतिमान सभी हैं।

गति ही जीवन और अगति ही मृत्यु है। सृष्टि में सुसंचालन, सुव्यवस्था एवं अस्तित्व बने रहने के लिये गति आवश्यक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी ही नहीं उसे पिण्ड-टुकड़े भी चल रहे हैं। वे अनेकों बार पृथ्वी से अलग हुए, अनेकों बार जुड़े। सात महाद्वीपों में पृथ्वी का विभाजित होना टुकड़ों के गतिशील होने का ही परिचायक है। नवीन शोधों के अनुसार ये महाद्वीप भी अपने स्थानों से खिसक रहे तथा स्थान बदल रहे हैं। पृथ्वी के विभिन्न भू-भागों की गति का अध्ययन करने वाले विज्ञान की इस शाखा का नाम ग्लोबल-प्लेट टेक्टोनिक्स है। यह भी पता लगा है कि पृथ्वी पूर्णतया ठोस नहीं है। इसके केन्द्र में अतिशय गाढ़ा तरल पदार्थ है। जिसकी सतह पर 65 कि.मी. से 95 कि.मी. तक की मोटी परत के दस टुकड़े तैरते रहते हैं। इस शाखा में अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि 20 करोड़ वर्ष पहले ये दसों टुकड़े आपसे में मिले हुए थे तथा एक ही महाद्वीप था। गति के कारण कालान्तर में सात द्वीप में विभाजित हो गया। यह महाद्वीप भी स्थिर नहीं है। 1 से.मी. से लेकर 15 से.मी. तक प्रति वर्ष ये विभिन्न दिशाओं में खिसकते जा रहे हैं। यूरोप और उतरी अमेरिका एक दूसरे से प्रतिवर्ष 2.5 से.मी. दूर होते जा रहे हैं। प्रतिवर्ष अनेकों स्थानों पर आने वाले भूकम्पों का एक कारण यह भी बताया जाता है कि कभी-कभी तैरती हुई पृथ्वी की दो पर्तें आपस में टकरा जाती हैं। फलस्वरूप हलचल होती तथा घर्षण के कारण कई बार लावा निकलता तथा नये पहाड़ तक बन जाते हैं।

अमेरिका की ईस्ट ऐंजिलिया यूनीवर्सिटी भू-गर्भ वैज्ञानिक एफ.गे.बिने एवं कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी के डी.एच. मैथ्यू ने 1963 में अपने अनुसंधानों के उपरान्त घोषणा की, कि पृथ्वी के ध्रुव खिसक कर अपना स्थान बदलते जा रहे हैं। पिछली बार ध्रुवों को स्थान बदले 7 लाख वर्ष हो गए। इस तथ्य की जानकारी समुद्र की तलहटी की मिट्टी की रेडियो एक्टीविटी द्वारा मिली है। अमेरिका में तो पांच संस्थान इस अनुसंधान कार्य में लगे हैं। जिनमें स्क्रिप्स इन्स्टीट्यूशन ऑफ ओसिनोग्राफी प्रमुख है। शोध कार्य के लिए संस्था ने एक विशेष प्रकार का ग्लैमर चैलेन्जर नामक जहाज का निर्माण किया है। इस जहाज द्वारा पिछले कुछ वर्षा में समुद्र की तलहटी में 300 से भी अधिक छिद्र मिले हैं। छिद्रों की गहराई एक हजार मीटर से अधिक है। इनके भीतर से निकाली गई मिट्टी 16 करोड़ वर्ष पुरानी बतायी जाती है।

प्रसिद्ध भूगर्भ वेत्ता ‘रावर्टजीन’ और जॉन होल्डलन का कहना है कि 20 करोड़ वर्ष पूर्व जापान उत्तरी ध्रुव के पास था और भारत दक्षिणी ध्रुव के पास। सर्वप्रथम आस्ट्रेलिया और भारत का दक्षिणी भाग दक्षिणी ध्रुव से अलग हुए और क्रमशः खिसकते हुए आज की स्थिति में आ गये। यह प्रक्रिया 18 करोड़ वर्ष पूर्व आरम्भ हुई। जिसमें सर्वाधिक यात्रा भारत के भू भाग ने 8800 मील की तय की है।

इन वैज्ञानिकों का कहना है कि निकट भविष्य में उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका पश्चिम की ओर बढ़ेंगे तथा पनामा और मध्य अमेरिका उतर की ओर। पृथ्वी के भीतरी खण्डों को खिसकने, गति करने के कारण हिमालय पर्वत और ऊँचा उठेगा तथा भारत का भू-भाग पूर्व की ओर बढ़ेगा। आस्ट्रेलिया उत्तर की ओर बढ़ता हुआ एशिया के भू-भाग से मिल जायेगा। भूमध्य सागर पर नये द्वीप उभरने की संभावना भी की जा रही है। ऐसी स्थिति में जैसे जैसे अफ्रिका और यूरोप निकट आते जायेंगे भूमध्य सागर का अस्तित्व क्रमशः मिटता जायेगा।

गति एवं परिवर्तन का यह क्रम पिण्ड एवं ब्रह्मांड में सर्वत्र ही चल रहा है। कितने ही जीव नित्य पैदा होते और कितने ही मरते हैं। कितने ही पदार्थ विखण्डित होते और कितने ही जुड़ते हैं। परिवर्तन की यह श्रृंखला पृथ्वी ही नहीं सारी सृष्टि में चलती रहती है। तारों, ग्रहों-उपग्रहों में भी कितने ही अपना स्थान बदलते रहते, टूट कर नष्ट-भ्रष्ट होते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि उन सभी की जानकारी मनुष्य को हो। अभी तो कितने ही ग्रह नक्षत्रों के विषय में जानकारी तक नहीं मिल पायी है। उनके स्वरूप एवं होने वाले परिवर्तनों की जानकारी तो दूर की बात है। भौतिक यंत्रों की पकड़ में आने वाली संरचनाओं की ग्रह-नक्षत्रों की ही जानकारी वैज्ञानिकों को मिल सकी है। गति एवं परिवर्तन की स्वसंचालित प्रक्रिया में बनी इस सृष्टि की अनेकों गतिविधियाँ अब भी रहस्यमय बनी हैं।

गति एवं परिवर्तन सृष्टि की अनिवार्य प्रक्रिया है जिसके चक्र में सभी जड़ चेतन बंधे हैं। परिवर्तन की इस प्रक्रिया को अन्य जीव सहर्ष स्वीकार करते तथा उसके अनुरूप अपनी गतिविधियों का तालमेल बिठाते हैं। मनुष्य ही है जो सदा अनुकूल परिस्थितियों में ही बना रहना चाहता तथा प्रतिकूल में समायोजन नहीं कर पाता। सृष्टि की इस अनिवार्य प्रक्रिया एवं तथ्य को स्वीकार करना ही विवेक संगत है। तटस्थता, स्थिरता तो मृत्यु का परिचायक है, परिवर्तनशीलता जीवन का। कालचक्र में बंधी इस परिवर्तन प्रक्रिया को स्वीकार करने, उसके अनुरूप अपनी गतिविधियों का निर्धारण करने से ही संतुष्ट बना रहा जा सकता है।


Quotation

‘‘योंऽतः सुखोंऽतरारामस्तथांतर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्म निर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥’’ (गीता 5।24)

जिसे आत्मस्वरूप में ही सुख होता है, जो आत्म स्वरूप में ही क्रीड़ा करता है, जिसकी आत्म स्वरूप में ही दृष्टि है, वह व्यक्ति ब्रह्म से एक रूप होता हुआ ब्रह्म में ही लीन हो जाता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है।


समर्थता गरिमा में व्यक्त होती है।

आमतौर पर समझा जाता है कि जो अपनी शक्ति, पद, वैभव, प्रतिष्ठा का प्रदर्शन जितना अधिक बढ़-चढ़कर कर सकता है, वही व्यक्ति बड़ा होता है। पद, प्रतिष्ठा और वैभव का प्रदर्शन समीपवर्ती लोगों में थोड़ी देर के लिए भले ही बड़प्पन की धाक जमा दे, परन्तु महानता इससे सर्वथा भिन्न बात है। तथाकथित, बड़प्पन और महानता में यह अन्तर है कि एक में व्यक्ति अपने मिथ्या अहंकार का प्रदर्शन कर क्षुद्रता का ही परिचय देता है, जबकि दूसरे में व्यक्ति अपने गौरव का ध्यान रखते हुए अपनी विभूतियों का सत्प्रयोजन के लिए ही उपयोग करता है और जहाँ कहीं क्षुद्रता से सामना करना पड़ता है वहाँ भी आवेश में न आकर शान्त और गम्भीर ही बना रहता है।

सर वाल्टर रेले अपने समय के प्रख्यात योद्धा थे। तलवारबाजी में उनका कोई मुकाबला नहीं रखता था और इसके लिये उन्हें ब्रिटेन की महारानी एलिजावेथ ने विशेष पदक देकर सम्मानित किया था। बात उस जमाने की है जब इंग्लैंड में कई लोग तलवार बाँध कर घूमा करते थे और तलवारबाजी उच्च वर्ग के लोगों का वैसा ही प्रिय मनोरंजन था, जैसा कि बादशाहों में मुर्गे लड़ाना या भैंसे लड़ाना। एक दिन किसी नौसिखिया युवक ने सर वाल्टर रेले को तलवारबाजी के लिए चुनौती दी और द्वन्द्व युद्ध के लिए ललकारा।

किसी के द्वारा युद्ध के लिये ललकारे जाने पर चुप रह जाना उन दिनों कायरता की ही निशानी समझा जाता था। सर वाल्टर रेले जानते थे कि युद्ध हुआ तो यह युवक बेमौत मार जाएगा। इसलिये उन्होंने लड़ने से इन्कार कर दिया। इस पर युवक ने उन्हें वाल्टर रेले को कायर बताते हुये उनके मुँह पर थूक दिया।

वाल्टर रेले प्रसिद्ध योद्धा और तलवार चलाने में निपुण व्यक्ति के लिए यह घोर अपमान की बात थी। कई लोगों ने यह घटना देखी थी, परन्तु रेले शान्त ही रहे और उन्होंने युवक द्वारा थूके गये पीक को अपने चेहरे पर से पोंछते हुए कहा, ‘‘नौजवान में अपने मुँह पर जिस आसनी से रूमाल फिरा कर तुम्हारा थूक पोंछ सकता हूँ कदाचित उतनी ही आसनी से तुम्हारी छाती में लगे हुए तलवार के घाव को पोंछ सकता अथवा बिना कारण ही नर हत्या के पास बचने का कोई उपाय होता तो मैं अभी तुम्हारे साथ तलवार की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो जाता।”

वहाँ उपस्थित व्यक्तियों ने वाल्टर रेले को इस अपमान के बाद भी इतना शान्त संतुलित देखकर न केवल आश्चर्य व्यक्त किया बल्कि उनकी महानता के सामने नत मस्तक भी हुए और उस युवक की उद्दण्डता के लिए उसे धिक्कारा। इस सारे घटना-क्रम का प्रभाव युवक पर यह हुआ कि वह वाल्टर रेले से वहीं क्षमा माँगने लगा।

शक्तिवान होने का अर्थ यह नहीं है कि अपने से कम शक्तिशालियों का उत्पीड़न किया जाय अथवा जहाँ-तहाँ उसका प्रदर्शन कर अपने व्यक्तित्व को हल्का और ओछा बनाया जाए। शक्ति परमात्मा की देन है, विभूति है और उसका उपयोग केवल अवांछनियता के उन्मूलन या दमन के लिये ही किया जाना चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति इस तथ्य को भली भाँति समझते हैं और वहीं अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं जहाँ उसकी उपरोक्त प्रयोजन के लिए आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा वे इतने धीर, गम्भीर बने रहते हैं कि किसी को उनके विभूतिवान होने का पता ही नहीं चलता।

महाराजा रणजीत सिंह तो खरे विख्यात इतिहास पुरुष हैं। सर्वविदित है कि वे अपने समय के अद्वितीय योद्धा थे और उन्होंने अपने बलबूते पर स्वाधीन राष्ट्र के निर्माण का लक्ष्य भी एक सीमा तक प्राप्त कर लिया था। इतने पर भी उन्हें अपने योद्धा होने, अजेय सम्राट बनने का गर्व छू तक नहीं गया था। एक बार वे अपनी सेना सहित युद्ध के लिए जा रहे थे। रास्ते में एक बगीचा पड़ता था जिसके चारों और ऊँची दीवार थी। उस दीवार के कारण बाहर का व्यक्ति भीतर के चौकीदारों या मजदूरों को नहीं देख सकता था और न ही भीतर का कोई व्यक्ति राह चलते लोगों को। महाराजा की सवारी जब उस बाग के पास गुजरी तो एक पत्थर उनके सिर पर आकर लगा और उससे खून बहने लगा।

सिपाहियों ने यह देखा तो वे तुरन्त दीवार फाँद कर बाग के भीतर गए और उन लड़कों को पकड़ लाये जो बगीचे में आम पेड़ों पर पत्थर मार-मार कर आम गिरा रहे थे। लड़के इस डर से थर-थर काँप रहे थे कि उन्हें दण्ड दिया जायेगा। सहमे हुए खड़े बालकों को महाराज रणजीत सिंह ने पुचकारा और उन्हें कुछ खाने-पीने का समान देकर, विदा कर दिया। सीख के तौर पर उन्होंने इतना ही कहा, ‘बेटो! देख भाल कर काम किया करो।’ और कोई होता तो निश्चित ही उन लड़कों को दण्ड देता, परन्तु महाराज रणजीत सिंह यह कह कर चुप रह गए कि जब निर्जीव वृक्ष पत्थर की चोट खा कर भी बदले आम डाल देता है तो मैं तो आखिर मनुष्य हूँ। यदि इन बालकों को दण्ड देता तब तो मैं वृक्षों से भी गया गुजरा हो जाता।

समर्थ गुरु रामदास अपने शिष्यों के साथ शिवाजी के पास जा रहे थे। रास्ते में एक ईख का खेत पड़ता था। कुछ शिष्यों ने गन्ने तोड़ कर चूस लिए। खेत के मालिक को गन्ने तोड़े जाने की बात पता चली तो वह दौड़ा आया शिष्य तो खेत मालिक को आता देखकर भाग गये, एक गुरु रामदास ही वहाँ खड़े रहे। मालिक ने सोचा इसी गौसांई ने मरे खेत के गन्ने तुड़वाये हैं। उसने समर्थ गुरु को डण्डों से पीटा और वहाँ से भगा दिया।

अपने अन्तःकरण में धरती के समान क्षमा भाव रखने वाले समर्थ गुरु ने इस पर चूँ तक नहीं की और शिवाजी के पास चले गये। शिवाजी को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने खेत के मालिक को गिरफ्तार कर बुलवाया और अपने गुरु के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘गुरु जी इसे क्या दण्ड दूँ।’

समर्थ गुरु ने कहा, ‘काहे बेचारे को परेशान करते हो। सारा दोष तो मेरा है।’ सब कोई जानते थे कि इतने बड़े राज्य के स्वामी शिवाजी के गुरु क्यों किसी किसान के खेत को नुकसान पहुँचाएंगे? बात जहाँ की तहाँ दबी रही और किसान को छोड़ दिया। समर्थ गुरु की इस महानता पर किसान ने द्रवीभूत हुए बिना नहीं रहा, उसने उनके चरणों में गिर कर क्षमा माँगी। सन्त हृदय समर्थ रामदास ने उसे उठा कर अपनी छाती से लगा लिया।

कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब लोग दूसरों द्वारा की जाने वाली निन्दा की चुगली कर उनके मन में अपना स्थान बनाना चाहते हैं। उदार और साधु पुरुषों के मन पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता बल्कि वे अपनी निर्वैरता से सामने वाले को भी सुधार कर सही राह पर ला देते हैं। घटना महात्मा गाँधी से संबंधित है। उनके प्रति अपार श्रद्धा रखने वाला एक युवक एक दिन उनके पास आया और बोला, ‘मौलाना मोहम्मद अली कहा करते हैं कि गाँधी जी की अपेक्षा तो एक दुराचारी से दुराचारी मुसलमान भी श्रेष्ठ है। गाँधी जी ने कहा, ‘ऐसा तो नहीं सुना, पर इतना अवश्य है कि मौलाना अपने धर्म के प्रति अटूट हैं अतः श्रेष्ठ हैं।’

एक बार गाँधी जी के पास एक उच्छृंखल व्यक्ति आया और उसने उन पर व्यंग्य कसते हुये कहा, ‘आपको जब कन्याकुमारी के मंदिर में नहीं घुसने दिया गया, आपको वहाँ जाने से रोक दिया गया तो आप क्यों नहीं अन्दर गये? आप तो संसार की ज्योति हैं? आखिर उन्होंने आपको क्यों रोका?’

गाँधी जी ने कहा, ‘समर्थ व्यक्तियों का बड़प्पन उनकी उदारता, क्षमा और सहिष्णुता में झलकता है उसके प्रदर्शन या ढिंढोरा पीटने में नहीं। जो लोग अपनी साधारण-सी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते नहीं अघाते वे बालक से क्षुद्र ही हैं। उन बरसाती नालों की तरह जो थोड़ा-सा पानी गिरने पर ही उफन आते हैं। जबकि सागर हमेशा अपनी सीमाओं में शान्त और सीमित रहता है।


स्वास्थ्य का आधार आहार नहीं मस्तिष्क

सामान्यतः समझा जाता है कि शरीर का पोषण और विकास पेट में पहुँचने वाले आहार से होता है। पेट में आहार पहुँचता है और वहाँ उसका पाचन होकर रस रक्त आदि का निर्माण होता है। जो शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों में पहुँच कर, उन्हें शक्ति प्रदान करते हैं। उस शक्ति से विभिन्न अंग अवयव काम करने योग्य ऊर्जा प्राप्त सकते हैं। इसीलिए स्वच्छ, पौष्टिक और सन्तुलित भोजन की आवश्यकता एक स्वर से बताई, समझाई व स्वीकार की जाती है।

शरीर स्वस्थ रहे इसके लिए निश्चित ही पौष्टिक भोजन का होना आवश्यक है, किन्तु उससे भी अधिक है मानसिक स्थिति का संतुलित और शुचितर होना। भोजन से शक्ति मिलती है और शक्ति से स्वास्थ्य, किन्तु भोजन को पचाने में जो शक्ति खर्च होती है वह कहाँ से आती है? भोजन को पचाने की शक्ति ही नहीं शरीर के अन्यान्य अंग-अवयवों को भी समुचित ढंग से सक्रिय और सुव्यवस्थित रखने के लिए आवश्यक शक्ति का स्त्रोत भी मस्तिष्क ही है। मस्तिष्क यदि अशान्त है तो कितना ही अच्छा और पौष्टिक भोजन क्यों न किया जाए? इससे कोई विशेष लाभ नहीं होता। इसके विपरीत जब मानसिक स्थिति शांत और संतुलित हो तो रूखा-सूखा भोजन खाकर भी स्वस्थ रहा जा सकता है। आदिवासियों और जंगलों में कन्दमूल खाकर अपना जीवन व्यतीत करने वालों लोगों को कहाँ संतुलित और पौष्टिक भोजन मिल पाता है? फिर भी वे शहरी और सम्पन्न व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ देखे जा सकते हैं। इसका कुल कारण इतना ही है कि वे शहरी लोगों की अपेक्षा कम अशान्त और उद्वेलित मनःस्थिति का शिकार बनते हैं।

यदि भोजन से ही शक्ति मिलने की बात में कुछ वजन होता, तो प्रश्न उठता है कि काम के बाद आराम की आवश्यकता क्यों पड़ती है। जैसे ही थकान चढ़ती वैसे ही कुछ खा पीकर काम चला लिया जाता। किन्तु सोना हर स्थिति में आवश्यक और उपयोगी होता है, क्योंकि इससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। रात भर सोने के बाद सुबह जागने पर प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको इतना तरोताजा अनुभव करता है कि वह पूर्ववत् श्रम कर सके और कठोर दिनचर्या का पालन कर सके।

मस्तिष्क को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह जिसमें मन और बुद्धि काम करती है। सोचने, विचारने तथा समझने की क्षमता इसी भाग में रहती है। दूसरा भाग वह है जिसमें की आदतें संग्रहित रहती हैं और वहाँ से शरीर के क्रिया-कलापों का निर्धारण किया जाता है। शरीर की नाड़ियों में रक्त बहता है, हृदय धड़कता है, फेफड़े श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं, मांस पेशियां सिकुड़ती और फैलती हैं, पलकें झपकती, खुलती हैं, सोने जागने का, खाने पीने और मलमूत्र त्यागने का क्रम अपने ढर्रे पर अपने आप स्वसंचालित ढंग से चलता रहता है। यह सब अनायास ही नहीं होता। इसके पीछे निरन्तर सक्रिय मन की वह शक्ति काम करती रहती है, जिसे अचेतन मस्तिष्क कहते हैं। शरीर के यंत्र अवयव अपना-अपना काम करते रहने योग्य कलपुर्जों से बने हैं, पर उनमें अपने आप संचालित रहने की क्षमता नहीं होती। यह शक्ति उन्हें मस्तिष्क के इसी अचेतन भाग से मिलती रहती है।

मस्तिष्कीय क्रिया-कलाप छोटी-छोटी कोशिकाओं के माध्यम से चलता रहता है। इन्हें नर्बसैल्स या तंत्रिका कोशिकाएं कहते हैं। उनकी संख्या लगभग दस अरब होती है। इन्हें आपस में जोड़ने वाले नर्व फाइवर (तंत्रिका तंतु) और उनके इन्सुलेशन खोपड़ी के भीतर खचाखच भरे रहते हैं। एक तंत्रिका कोशिका का व्यास एक इंच के हजारवें भाग से भी कम होता है और उसका वजन एक औंस के साठ अरबवें भाग के करीब होता है। तंत्रिका तंतुओं से होकर जो विद्युत धारा दौड़ती है वही ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आवश्यक सूचनाएं उस केन्द्र तक पहुँचाते हैं। तंत्रिका कोषाणु एक सफेद धागे युक्त तन्तु होता है, यह तन्तु अन्यान्य न्यूट्रानों से जुड़ रहता है। इस प्रकार पूरा मस्तिष्क इन परस्पर जुड़े हुए धागों का एक बुना हुआ तन्तु जाल है। इन्हीं सूत्रों से वे परस्पर संबद्ध रहते हैं और अपने कार्यों तथा उत्तरदायित्वों का परस्पर मिल जुलकर निर्वाह करते हैं।

चाहे हम सो रहे हों अथवा जग रहे हों, हर समय लगभग 1400 ग्राम भारी मस्तिष्क, मेरुदण्ड एवं लगभग दस अरब तंत्रिकाओं द्वारा देह की समस्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन होता रहता है। अस्तु यह नहीं समझना चाहिए कि भोजन से शक्ति प्राप्त होती है। शक्ति का उद्गम केन्द्र तो मस्तिष्क है जो पूरे शरीर में अपना एक जाल बिछाये हुए है और उस जाल के माध्यम से शरीर को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क से निकल कर नासिका, कान, नेत्र, मुँह और त्वचा तक पहुँचने वाली तंत्रिकाएं उन्हें सक्रिय रहने के लिये शक्ति ही प्रदान नहीं करतीं बल्कि उन्हें आदेश और निर्देश भी प्रदान करती हैं। यदि किसी भी अंग से इनका संबंध विच्छेद हो जाय तो वह अंग पाचन संस्थान से पर्याप्त रस रक्त मिलते रहने के उपरान्त भी कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाता।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि मस्तिष्क ही देखता है आँखें नहीं, मस्तिष्क ही सुनता है कान नहीं और मस्तिष्क ही स्पर्श आदि का अनुभव करता है त्वचा नहीं। संक्षेप में यदि मस्तिष्क का शरीर में महत्व की दृष्टि से कोई स्थान निर्धारित करना हो तो उसे शरीर राज्य का सम्राट कहा जा सकता है तथा वही कर्ता-भर्ता और भोक्ता भी। क्योंकि उसके बिना शरीर का कोई भी क्रिया-कलाप सम्पन्न होना संभव ही नहीं है।

जीव शास्त्रियों ने अपने प्रयोगों और अनुसंधानों से जो निष्कर्ष निकाले हैं वे और भी विस्मय विमुग्धकारक हैं। डा. जेम्स फील्ड ने अपने दीर्घकाल के प्रयोगों और अन्वेषणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि यदि हम बिना भूख के, थके हुए मस्तिष्क के समय भोजन करते हैं तो उस भोजन से शरीर को शक्ति मिलने के स्थान पर विपरीत प्रभाव ही होता है क्योंकि तब थका हुआ मस्तिष्क पाचन संस्थान को सुसंचालित रखने की स्थिति में नहीं रहता। इसके अलावा उन्होंने यह निष्कर्ष भी प्रतिपादित किया कि रोगी लम्बे समय तक बिना भोजन के रह सकता है क्योंकि मस्तिष्क को भोजन की आवश्यकता नहीं होती। उसका पोषण आहार से कम विचारों से अधिक होता है। यदि अच्छे विचार मस्तिष्क में आते रहें तो मानसिक संतुलन बना रहता है और वह मनःसंस्थान अधिक कुशलता के साथ कार्य करता रह सकता है।

भूख के कारण रोग उत्पन्न होने की संभावना को नकारते हुए डा. जेम्स फील्ड ने कहा है कि ‘भूख के कारण रोगों का सामना करना पड़ता है,’ यह सोचना गलत है। सही बात तो यह है कि अधिकाँश रोग भोजन के कारण ही होते हैं। क्योंकि तब मस्तिष्क की शक्ति अन्य क्रियाओं के साथ भोजन को पचाने में जितना योगदान दे सकती है उतना नहीं दे पाती। अतः यह तथ्य भली भांति सम लेना चाहिए कि शरीर में शक्ति का स्त्रोत भोजन नहीं मस्तिष्क है और शक्ति सम्पन्न, स्वस्थ तथा पुष्ट शरीर के लिए भोजन से अधिक मानसिक स्थिति का संतुलित होना अधिक आवश्यक है।

यहाँ भोजन की व्यर्थता नहीं बताई जा रही। कहा इतना भर जा रहा है कि आहार से शक्ति नहीं मिलती वह तो बेचारा मस्तिष्क के निर्देशों के अनुसार शरीर में होने वाली टूट-फूट के लिये मरम्मत का सरंजाम भर है। शक्ति स्वास्थ्य और सौंदर्य का उद्गम केन्द्र तो मस्तिष्क है और वह तभी ठीक ढंग से कार्य करता रह सकता है, जबकि शान्त, अनुद्विग्न और आवेश रहित जीवन व्यतीत करते हुए मनःस्थिति को संतुलित रखा जाए।


असंतुलन और विक्षेप, सर्वथा अहितकर

घटकों के रूप में मनुष्य जाति अलग-अलग दिखायी पड़ती हुई भी परस्पर एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है। सोचा यह जाता है कि भले-बुरे चिंतन एवं गतिविधियों का प्रभाव मात्र अपने ऊपर से ही पड़ता है। जबकि तथ्य और ही है। ‘‘अपने मतलब से मतलब और अपने काम से काम’’ की उक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ की सिद्धि के लिए भले ही एक सीमा तक सही उतरे पर इस प्रवृत्ति का दूरगामी परिणाम समस्त समाज पर पड़ता है और हर दृष्टि से अहितकर ही होता है। संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिये प्रतिस्पर्धा चलती तथा अधिकांश व्यक्ति अपने सामाजिक एवं नैतिक दायित्वों की अपेक्षा करने लगते हैं। इन दूरवर्ती परिणामों से अवगत पुरातन ऋषियों ने सदा ही मान गरिमा के प्रतिकूल निकृष्ट बनाने वाले तत्वों की भर्त्सना की है। चिंतन को ऊर्ध्वगामी बनाने, गतिविधियों को महान प्रयोजनों में नियोजित करने की प्रेरणा दी है।

व्यक्ति समष्टिगत चेतना का अंश है। तालाब में फेंके जाने वाले पत्थर से तरंगें उठतीं तथा दूर-दूर फैल जाती हैं। उसका प्रभाव फेंके गये स्थान तक ही सीमित नहीं रहता, वरन् सम्पूर्ण तालाब पर पड़ता है। प्रकृति समष्टिगत चेतना का विराट् स्वरूप मनुष्य है। अंशी होने एवं विराट् चेतना से अविच्छिन्न रूप से जुड़े होने के कारण उसकी प्रत्येक हलचल का प्रभाव समष्टि पर पड़ना स्वाभाविक है। भले-बुरे विचार एवं कर्म व्यक्ति को ही नहीं समाज को भी प्रभावित करते हैं।

ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ग्रह नक्षत्रों के आपसी संतुलन एवं सहयोग पर ही सृष्टि गतिशील है। विग्रह असहयोग अथवा असंतुलन अनेकानेक प्रकृति विक्षोभों के रूप में परिलक्षित होता है। बगावत पर उतारू ग्रह-नक्षत्र स्वयं तो नष्ट भ्रष्ट होते ही है। सृष्टि के अन्य घटकों को भी चैन से बैठने नहीं देते। उनका दूरगामी तथा भयंकर प्रभाव अन्य स्थानों पर पड़ते देखा गया है। असंतुलन से उत्पन्न होने वाली तरंगों के कारण अनेकों प्रकार की दुर्घटनाएं तक हो जाती हैं।

कुछ दिनों पूर्व अटलांटिक महासागर के पूर्वीय क्षेत्र के गल्फ स्ट्रीम में एक माल वाहक जहाज समुद्री तूफान के कारण अचानक गायब हो गया। इस प्रकार के समुद्री तूफानों को नाविक ‘फ्रिकसी’ कहते हैं। अथक प्रयत्नों के बाद भी जहाज का कोई सुराग नहीं मिल सका। फ्रिकसी की चपेट से किसी प्रकार बचे नाविकों का कहना है कि इन अवसरों पर इतना समय भी नहीं मिलता कि रेडियो संकेत भेजा जा सके। न ही लाइफ वोट उतारने का अवसर मिल पाता। इन दुर्घटनाओं से विरले ही बच पाते हैं। स्काटलैंड के जार्ज ग्रस्ट 24 वर्ष की आयु से लेकर 37 वर्ष तक आयु तक निरन्तर माल वाहक जहाज के कप्तान रहे। अपने समुद्री जीवन के अनुभवों से संबंधित इन्होंने अनेकों पुस्तकें भी लिखी हैं। इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि ‘‘उस दिन मैं जहाज का दिशा नियंत्रक सम्भाले हुए था। अपनी ड्यूटी बदलने ही वाला था, अचानक कुछ ही दूरी पर एक पहाड़ जैसी तरंग दिखायी पड़ी। सामने तरंग की ऊंचाई 100 फुट से भी अधिक रही होगी। गति एक्सप्रेस गाड़ी के समान थी। इस आकस्मिक विभीषिका में साहस रख पाना मुश्किल पड़ रहा था। हमारे सहयोगी ने टेलीग्राफिक संदेश जहाज में बैठे अन्य यात्रियों को खतरे की सूचना देने का परामर्श दिया। किन्तु यह सोचकर कि गहन अंधकार में यात्री अपना संतुलन न खो बैठें, इसलिये सूचना प्रसारित करने का इरादा बदल दिया।

दूसरे ही क्षण भीमकाय तरंगों से जहाज को 75 फीट से भी अधिक ऊँचाई पर उछाल दिया। उठती गिरती तरंगों में अनिश्चित भविष्य की ओर डोल रही जीवन-मृत्यु के बीच हम झूलने लगे। जहाज के भीतर पानी भर गया। अब खतरे की घंटी बजाना आवश्यक था। आत्म-रक्षा के लिए यात्रियों की भाग दौड़ आरम्भ हुई। लाइफ बोट में किसी प्रकार कुछ यात्री सवार हो सके। तरंगों के प्रचण्ड वेग के कारण लाइफ बोट पर नियंत्रण पाना असंभव था। लहरों में थपेड़ों के संयोगवश किसी प्रकार बोट किनारे आ लगी। इसे ईश्वरीय अनुकम्पा ही मानते हैं कि उस भयंकर तूफान से हम सब निकल सके।

सन् 1882 में मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वेलफोर स्टेवोर ने घोषणा की कि वायुमंडल में परिवर्तन के कारण पृथ्वी की ऊँचाई अंतरिक्ष से आने वाली विद्युत धाराएँ हैं। अन्याय ग्रहों, सूर्य आदि से विकिरण की प्रक्रिया तो लगातार चलती रहती है। उनमें विक्षेप आने पर असंतुलन उत्पन्न होता तथा प्रभाव दूरवर्ती ग्रहों पर भी पड़ता है। समुद्री ज्वार, भूकम्प जैसी घटना में इन अन्तरिक्षीय विद्युत तरंगों का भारी योगदान है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्रों में स्कन्द ज्वार (स्प्रिंग टाइड) तब आते हैं जब पृथ्वी पर सूर्य और चन्द्रमा दोनों का गुरुत्वाकर्षण बल बराबर होता है। जब सूर्य और चंद्रमा विपरीत दिशा में होते हैं तो ऊँचाई घट जाती है। गुरुत्वाकर्षण में परिवर्तन का प्रभाव वातावरण तक ही सीमित नहीं रहता, वरन् समस्त जीवधारियों पर भी पड़ता है। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों के अनुसार सौर सक्रियता के वर्षों में पृथ्वी के गुरुत्व बल में असाधारण परिवर्तन होता है। इसका प्रभाव मनुष्य की मनःस्थिति पर भी पड़ता है। विश्व में हुए अब तक अधिकांश बड़े युद्धों में यह तथ्य उद्घाटित हुआ है कि जिन वर्षों में सूर्य पर धब्बे अधिक दिखायी पड़े उसी अवधि में उनका सूत्रपात हुआ। सौर धब्बे प्राणियों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं यह प्रक्रिया तो अब तक अविज्ञात है, किन्तु इस तथ्य को अब एक मत से स्वीकार किया जा रहा है कि प्राणियों की मनःस्थिति इन परिवर्तनों से बुरी तरह प्रभावित होती तथा विक्षुब्ध बनती है।

धब्बे क्यों और कैसे उत्पन्न होते हैं। इस संबंध में सुनिश्चित जानकारी नहीं मिल पायी है। किन्तु ऐसा अनुमान किया जाता है कि सौर मण्डल में बाँधे गुथे ग्रह नक्षत्रों के असंतुलन का परिणाम है। जो भावी विभीषिकाओं की ओर संकेत करते हैं।

मानवी व्यक्तित्व भी श्रेष्ठ-शालीन एवं उपयोगी तभी बना रह सकता हैं जब वह समाज के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा रहे। परस्पर के सहयोग आदान-प्रदान की संतुलित रीति-नीति बनी रहे। पृथ्वी का संतुलन एवं उसका अस्तित्व उसके एकांगी प्रयास पर नहीं निर्भर है। दिखायी तो वह स्वावलम्बी पड़ती है, पर अंतर्ग्रही ही बंधनों में जकड़ी हुई है। अन्य ग्रहों से मिलने वाले अनुदानों तथा विक्षोभों का प्रभाव उसके ऊपर पड़ता है। उसी प्रकार मनुष्य भी समग्र समाज का एक अभिन्न घटक है। वह सारे समाज के सुख-दुःख का भागीदार है। समाज के प्रभावों से वह स्वयं भी नहीं बचा रह सकता। अंतर्ग्रही ही असंतुलनों का सुधार पाना परिवर्तित कर सकना तो मनुष्य के बलबूते अधिक संभव नहीं है, पर अपनी गतिविधियाँ ऐसी रख सकता है जिससे समाज एवं अदृश्य जगत में असंतुलन एवं विग्रह उत्पन्न न हो। अन्तर्ग्रही ही असंतुलन धरातल और प्राणि समुदाय को अस्त-व्यस्त और संव्यस्त करते हैं, उनके उदाहरण प्रकृति प्रकोपों के रूप में मिलते रहते हैं। सूक्ष्मदर्शी इसी प्रत्यक्ष में एक कड़ी और जोड़ते रहे हैं कि यदि मानवी चिन्तन में निकृष्टता और आचरण में भ्रष्टता बढ़ गई तो उसका परिणाम दृश्य संकटों और विग्रहों के रूप में तो होगा ही इससे अदृश्य अंतरिक्ष में भी ऐसी विभीषिकाएं उत्पन्न होंगी जो समस्त संसार के लिए दुःखद हों। साथ ही उन उद्धत लोगों को भी विनाश के गर्त में ले डूबें।


उचित से अधिक आकाँक्षा मत कीजिए

न जाने किस कारण लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो गया है कि ईमानदारी और नीतिनिष्ठा अपनाकर घाटा और नुकसान ही हाथ लगता है। सम्भवतः इसका कारण यह है कि लोग बेईमानी अपना कर छल-बल से, धूर्तता और चालाकी द्वारा जल्दी-जल्दी धन बटोरते देखे जाते हैं। तेजी से बढ़ती सम्पन्नता देखकर देखने वालों के मन में भी वैसा ही वैभव अर्जित करने की आकाँक्षा उत्पन्न होती है। वे देखते हैं कि वैभव सम्पन्न लोगों का रौब और दबदबा रहता है। किन्तु ऐसा सोचते समय वे यह भूल जाते हैं कि बेईमानी और चालाकी से अर्जित किये गये वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार ही होता है, जो थोड़ी-सी हवा बहने पर ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा दिखावा, छलावा मात्र होती है। क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य कर देते हैं, परन्तु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता।

इसके विपरीत ईमानदारी और मेहनत से काम करने वाले, नैतिक मूल्यों को अपनाकर नीतिनिष्ठ जीवन व्यतीत करने वाले भले ही धीमी गति से प्रगति करते हों परन्तु उनकी प्रगति ठोस होती है तथा उनका सुयश देश काल की सीमाओं को लांघकर विश्वव्यापी और अमर हो जाता है, अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशॉ को कौन नहीं जानता। उन्होंने अपना जीवन प्रोपर्टी डीलर के यहाँ उसके कार्यालय में क्लर्क की नौकरी से आरम्भ किया था।

प्रोपर्टी डीलर और भी कोई काम करता था यथा मकानों को किराये पर उठाना, बीमा एजेन्सी चलाना आदि। उसके यहाँ शॉ का काम था मकानों तथा अन्य स्थानों के किराये वसूल करना, बीमे की किश्तें उगाना, टैक्सों की वसूली और अदायगी करना। ये काम करते समय उन्हें बड़ी-बड़ी रकमों का लेन-देन करना पड़ता था और बड़े-बड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों से संपर्क करना पड़ता था। स्वभाव से बर्नार्डशॉ इतने विनम्र थे कि किसी के साथ सख्ती या जोर जबर्दस्ती नहीं कर पाते थे। और लोग थे कि उनकी परवाह ही नहीं करते।

इन कारणों से वे अपने काम में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। यद्यपि उनके मालिक को इससे कोई शिकायत नहीं थी, परन्तु स्वयं बर्नार्डशॉ को अपने काम से संतोष नहीं था। एक दिन उन्होंने अपने मालिक को सूचित करते हुए पत्र लिखा, जिसे त्याग पत्र की ही संज्ञा दी जा सकती है कि, ‘महोदय मैं आपको सूचित कर देना चाहता हूँ कि इस महीने बाद मैं आपके यहाँ काम नहीं कर सकूंगा। कारण यह है कि जितना वेतन आप मुझे देते हैं मैं उतना काम कर नहीं पाता।’

मालिक तो उनके काम से बहुत संतुष्ट था। वह उनके स्वभाव से बहुत प्रसन्न भी था कि उनके बारे में कभी किसी देनदार ने कोई शिकायत नहीं की। उसने बर्नार्डशॉ को बहुत समझाया परन्तु शॉ को यह उचित लग ही नहीं रहा था कि, जितना वेतन वे लेते हैं इतना काम भी वे नहीं कर पाये।

अमेरिका के विख्यात लेखक हेनरी मिलर ने भी ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया था। उन दिनों मिलर ने साहित्य सेवा के क्षेत्र में नया-नया ही प्रवेश किया था। सन् 1919 में भारत के विश्वविख्यात इंजीनियर श्री विश्वेश्वरैया अमेरिका गए। वहाँ उन्होंने अपनी पत्रिका के लिए मिलर से एक लेख लिखने को कहा। पारिश्रमिक तय हुआ दस डॉलर। मिलर ने दूसरे दिन लेख तैयार कर दे देने की बात कही। जब वह लेख तैयार कर लाये तो विश्वेश्वरैया उसे पढ़कर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने लेखक को दो डॉलर और अधिक देते हुए कहा, लेख बहुत अच्छा बन पड़ा है। मैंने जिस स्तर की आशा की लेख उससे अच्छा लिखा गया है अतः इसका यही मूल्य उचित है।

मिलर ने इस पेशकश से इंकार करते हुए कहा, ‘‘लेकिन श्रीमान जी मैंने तो अच्छे से अच्छे लेख का ही पारिश्रमिक ठहराया था। यह अधिक है और अपने श्रम से अधिक मूल्य लेना नैतिकता के विरुद्ध है।’’

श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर उस में संतोष करना व्यक्ति को नीतिनिष्ठ तो बनाता ही है परिश्रमी भी बनाता है। क्योंकि तब किन्हीं की विवशताओं या परिस्थितियों का लाभ उठाने की बात दृष्टि में नहीं रहती। यह नियम निष्ठा अपना लेने पर व्यक्ति का पुरुषार्थ प्रखर होता जाता है। विख्यात विचारक लेखक ऐकिल हॉफर के पिता की जब मृत्यु हुई तो उनकी आयु मात्र 18 वर्ष थी। पिता ने इतना लाड़-प्यार दिया था कि उन्होंने उपार्जन के लिए क्या करना चाहिए? इसका कोई अनुभव ही प्राप्त नहीं किया था। परन्तु उन्होंने हॉफर के मन में परिश्रम की रोटी ही खाने की बात की दी थी। सो वे कहीं मेहनत मजदूरी कर ही अपना जीवनयापन करना चाहते थे और इस क्षेत्र में अनुभव की दृष्टि से वे एकदम कोरे थे।

पिता की मृत्यु के बाद वे अनाथ, निराश्रित और बेकार हो गए। यहाँ वहाँ काम प्राप्त करने के लिए भटकने लगे। भूख से आंतें कुलबुलाने लगीं। एक होटल के सामने इस विचार से खड़े थे कि उसके मालिक से काम देने के लिये निवेदन कर सके, पर मालिक ग्राहकों में व्यस्त था अतः वह हॉफर की ओर बीच-बीच में एकाध दृष्टि से देख लेता था। बहुत देर से खड़े देखकर उसने अनुमान लगाया कि यह शायद कोई भिखारी है और भूखा भी है। होटल मालिक ने उन्हें बुलाकर पूछा, ‘भूख लगी है बेटे!’

‘भूख तो लगी है’, युवक ने निःसंकोच भाव से कहा। होटल के मालिक के बिना कुछ कहे एक प्लेट में भोजन रखा और हॉफर की ओर बढ़ाकर कहा, ‘लो भोजन कर लो।’

‘परन्तु मैं ऐसे नहीं खाऊंगा।’

‘तो कैसे खाओगे?’ होटल के मालिक ने विस्मित हो कर पूछा।

‘मैं भूखा तो हूँ, परन्तु काम करके ही रोटी खाना चाहता हूँ। मुफ्त में नहीं’, हॉफर ने कहा, मालिक उनकी यह बात सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ और श्रम के प्रति निष्ठा तथा स्वाभिमान को समझते हुए अपने यहाँ बर्तन साफ करने के काम पर लगा दिया। इसी श्रमशीलता के बल पर हॉफर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए ख्यातिलब्ध लेखक बन सके।

उन्हीं दिनों हॉफर ने इतनी अधिक मेहनत और लगन से काम करना शुरू किया कि मालिक को लगा वह दो व्यक्तियों के बराबर काम कर रहे हैं। मालिक ने उनके वेतन में कुछ बढ़ोतरी करना चाहा और कहा कि, ‘मैं तुम्हारे काम से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जी जान से मेहनत करते हो और अपने काम को भी अच्छी तरह समझते हो। इसलिये मैं तुम्हारा वेतन बढ़ा रहा हूँ।’

हॉफर ने कहा, ‘यदि मेरे अन्य सभी साथियों का वेतन बढ़ाया जा रहा है तो ही मेरा भी वेतन बढ़ाइए। अन्यथा काम तो मुझे मेहनत और लगन से ही करना चाहिए। बताइये क्या आप मुझ से कामचोरी की आशा करते हैं?’

मालिक हॉफर की यह बात सुनकर दंग रह गया। उसने कहा, ‘मैंने आज तक तुम जैसा लड़का नहीं देखा था। तुम तो मेरे बेटे से भी अधिक मेरी दुकान की चिन्ता करते हो। कुछ पढ़े लिखे हो?’

हॉफर ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में बताया तो मालिक ने उनकी श्रमशीलता को सम्मानित करते हुए उनकी पदोन्नति कर दी और उन पर दूसरी जिम्मेदारियां सौंप दीं।

ईमानदारी और श्रमशीलता का यह भी अर्थ है कि अपने श्रम के उचित मूल्य से अधिक की आकाँक्षा अपेक्षा न की जाय। यह निष्ठा यदि विकसित कर ली जाय तो व्यक्ति प्रगति के उच्च सोपान पर चढ़ता चला जाता है। और जो लोग बेईमानी, कामचोरी, दूसरों की मजबूरी से ही लाभ उठाने की बात सोचते हैं, वे आर्थिक दृष्टि से थोड़े बहुत सम्पन्न भले ही बन जांय, इससे अधिक और आगे प्रगति नहीं कर सकते।


आध्यात्मिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर

आधी शताब्दी से भी अधिक वर्षों तक जिस देश के नागरिकों को यह समझाया जा रहा है कि धर्म अफीम की गोली है और दुनिया में ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है। साम्यवादी शासन प्रणाली अपनाए हुए देश रूस में इन दिनों एक महिला की चर्चा बहुत आम है। नाम है उसका जूना दपिताश्वलि। जूना के संबंध में विख्यात है कि वह बिना किसी औषधि और उपचार के लोगों को जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति दिला कर स्वस्थ बना देती है। 73 वर्षीय इस अविवाहित महिला से जब पूछा गया कि वह किस प्रकार बिना दवा उपचार के रोगियों को ठीक कर देती है? तो उसका उतर था, ‘कुछ नहीं केवल ईश्वर विश्वास। केवल ईश्वर के प्रति विश्वास रखकर ही मैं रोगी के लिए स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हूँ। मेरा विश्वास फलित होता है और रोगी ठीक हो जाता है।’

पिछले दिनों जूना के संबंध में कई सोवियत पत्र-पत्रिकाओं में उसकी इस चमत्कारी क्षमता के संबंध में विस्तृत विवरण प्रकाशित हुआ और यहाँ तक कि सोवियत नेता लियोनिद ब्रेजनेव ने भी पिछले दिनों अस्वस्थ होने पर इस महिला की चमत्कारी क्षमता से स्वास्थ्य लाभ किया। जहाँ भी वह जाती है लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार अधिकारी और प्रतिष्ठित व्यक्ति जो किन्हीं रोगों से त्रस्त होते हैं उसके इर्द-गिर्द भीड़ लगाए इकट्ठे हो जाते हैं, उसकी इस विशेष क्षमता से लाभ उठाकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए।

जूना इन दिनों इतनी अधिक व्यस्त है कि महीनों पहले उसके पास उपचार के लिए मरीज अपने नाम भेज देते हैं ताकि उनका क्रम आने पर वे इलाज करवा सकें। रूस के अधिकारी, साम्यवादी नेता जो वहाँ की जनता को हमेशा से यह समझा रहे हैं कि इस दुनिया में चमत्कार या दैवी कृपा जैसी बातों का कोई आधार नहीं है, अब जूना की इन क्षमताओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं। एक सोवियत पत्रिका में छपे जूना के परिचय में कहा गया है कि उसने अल्सर के एक पुराने रोगी को कुल पन्द्रह मिनट में ठीक कर दिया। एक क्रानिक सिर दर्द के मरीज को उसकी आँखों पर अंगुलियां घुमाकर रोग मुक्त करा दिया। वह मरीज को देखकर ही बता देती है कि उसका उपचार किया जा सकता है अथवा नहीं और यदि उपचार किया जा सकता है तो कितने समय में वह ठीक हो जाएगा।

साम्यवादी व्यवस्था में इस तरह की मान्यताओं का कोई स्थान या महत्व न होने पर भी जूना किस आधार पर इस बात का जीता जागता प्रमाण बन सकी है कि स्थूल कलेवर से हटकर भी मनुष्य का कोई सूक्ष्म कलेवर है जो स्थूल की अपेक्षा अधिक समर्थ और शक्तिशाली है। इसे ईश्वर विश्वास का प्रतिफल कहा जाए अथवा चमत्कार। यह निश्चित है कि जूना उस स्तर की सिद्ध महिला है, जो प्रकृति को अपना नियंत्रण स्थापित कर इच्छित दिशा में अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर सकती है। योग विद्या के जानकार जानते हैं कि योग साधनाओं के परिणाम स्वरूप मनुष्य में ऐसी अनेक विशिष्ट क्षमताएं उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें चमत्कार ही कहा जा सकता है। योगदर्शन सहित अन्याय योग ग्रन्थों में इस प्रकार की कई सिद्धियों और चमत्कारी क्षमताओं का उल्लेख आता है जो साधारण मनुष्य को महामानव और अति मानव बना देती है।

जूना पहले एक रैस्टोरेंट में ग्राहकों को भोजन कराने काम करती थी। यह काम करते हुए ही उसे विलिस में एक ईसाई भिक्षुणी मिली और उसने जूना को कुछ साधनाएं सिखाईं। भिक्षुणी का संपर्क पाकर जूना के संस्कार जाग उठे और वह अपना काम मुस्तैदी से करते हुए भी बताई गईं साधना के लिए समय निकालने लगी। धीरे-धीरे उसकी साधना के सत्परिणाम सामने आने लगे और उसने अपने में यह अद्भुत क्षमता जागृत होती हुई अनुभव की। कुछ लोगों पर उसने प्रयोग भी किये जिसके आशाजनक परिणाम निकले। बस, उसने आध्यात्मिक चिकित्सा को ही अपने जीवन का मिशन बना लिया और प्राण-प्रण से इसी काम में जुट गई। उसी का परिणाम है कि जूना पहले जिस रेस्तरा में काम करती थी, उसी शहर में एक विशेष क्लिनिक खोलने की व्यवस्था की जा रही है ताकि वह अपना काम अधिक व्यवस्थित ढंग से कर सके और उसकी इस चमत्कारी क्षमता अधिकाधिक लोग लाभ उठा सकें। जहाँ तक उसकी प्रामाणिकता का प्रश्न है, रूस के वे मूर्धन्य नेता भी जूना की इस असाधारण प्रतिभा का लोहा मानने लगे हैं, जो इस तरह की बातों का मखौल उड़ाया करते थे। जूना अभी भी अपने लिए कुछ नहीं चाहती उसका इतना ही कहना है कि, ‘‘लोग न तो बुरे हैं और न अच्छे केवल अस्वस्थ हैं या स्वस्थ।’’

इस तरह की दृष्टि का विकास आत्मिक चेतना के उच्चस्तरीय विकास का ही परिचायक है। भारतीय दर्शन तृष्णा-वासना, लोभ-मोह, अहंता-ममता को विकार ही माना है और विकार रोग ही उत्पन्न करते हैं। रोगी भर्त्सना या निन्दा का नहीं करुणा तथा सेवा का पात्र इसलिये इन विकारों के निष्कासन में किसी को स्वयं उसे ही लगाया जाय अथवा खुद ही प्रयत्न किये जांय, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।

भारतीय दर्शन किसी को भी गर्हित या निंदित नहीं मानता। गर्हित और निंदित है तो विकार है, उन्हें ही किया जाना चाहिए। यही कारण है कि नारद ने रत्नाकर डाकू के मल विकारों का शोधन कर उसे डाकू से सन्त बना दिया, भगवान बुद्ध ने दुर्दान्त दस्यु अंगुलिमाल को अहिंसा की दीक्षा दी। ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं जिन्होंने किसी शरीर को ही स्वस्थ और स्वच्छ नहीं बनाया, बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी परिष्कृत कर नराधम से नर रत्न बना दिया।

जहाँ तक आस्था या आत्मिक शक्ति के बल पर किसी स्वस्थ कर देने का प्रश्न है भारत में ऐसे अनेकों संत महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपनी सहज करुणावश असंख्य जनों को लाभान्वित किया। स्वामी योगानन्द परमहंस ने अपनी आत्म-कथा ‘आटोबॉय ग्राफी आफ ए योगी’ में अपने गुरु तथा उनके गुरु का इन क्षमताओं से संबंधित कई घटनाओं का विवरण दिया है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है, “आश्रम में अपने प्रारम्भिक निवास के समय मैंने एक दिन देखा कि श्री युक्तेश्वर जी मेरी ओर तीक्ष्ण दृष्टि से देख रहे हैं। उन्होंने कहा- ‘मुकुन्द तुम बहुत दुर्बल हो।’

‘उनके इस कथन ने मन के एक अति कोमल स्थान को छू दिया। अपनी धँसी हुई आंखें और क्षीण काया मुझे स्वयं नहीं भाती थी। मेरे कमरे में टांड़ पर टॉनिक की शीशियाँ रखी रहती थीं और मैं उनका बराबर सेवन करता था, परन्तु किसी से कोई लाभ नहीं होता। मैं दुखित होकर अपने आपसे पूछने लगता ऐसा अस्वस्थ शरीर लेकर जीने से क्या लाभ है? मैं कुछ सोच ही रहा था कि मेरे गुरु ने कहा- ‘औषधियों की कोई सीमा नहीं है। दिव्य संजीवनी प्राणशक्ति की कोई सीमा नहीं है। उसमें विश्वास रखो तुम स्वस्थ और मजबूत बन जाओगे।’

गुरुदेव के वचनों से मुझे तुरन्त विश्वास हो गया कि मैं उनमें निहित सत्य का अपने जीवन में सफल प्रयोग कर सकता हूँ। इसके पहले अन्य किसी भी चिकित्सक ने मेरे मन में इतना विश्वास पैदा नहीं किया था। दिन प्रतिदिन मेरे स्वास्थ्य और शक्ति में वृद्धि होने लगी। दो सप्ताह में ही मेरे शरीर का वजन इतना बढ़ गया कि पहले अथक प्रयासों से भी उतना कभी नहीं बढ़ा था। मेरे पेट की गड़बड़ियां सदा के लिए दूर हो गईं। उसके बाद तो अनेक बार गुरुदेव की दैवी शक्ति के द्वारा बहुत सारे लोगों को मधुमेह, मिरगी, यक्ष्मा या पक्षाघात आदि कठिन और असाध्य समझे जाने वाले रोगों से मुक्त होते हुए देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।

रूस में ही नहीं अन्य यूरोपीय देशों में भी इस प्रकार की चिकित्सा विधि पर खोज की जाने लगी है। पश्चिमी देशों में तो कई व्यक्ति इस विधि का इतनी क्षमता के साथ उपयोग करते हैं कि रोगी देखते चंगा हो जाता है। डॉक्टर जिस रोग को दुस्साध्य बता देता है, उस रोग का सामान्य-सा उपचार इस तरह की चिकित्सा विधि जानने वाले करते हैं। कभी रुग्ण अंग पर हाथ फेर कर कभी आँखों में आंखें डालकर कुछ निर्देश देकर तो कभी प्रार्थना द्वारा और कभी अभिमंत्रित जल पिलाकर इस पद्धति से उपचार किये जाते हैं। सुविधा के लिए लोगों ने इस पद्धति के विभिन्न नाम रख लिए हैं। दैवी चिकित्सा, फेथ हीलींग, थिरैप्टिक टच आदि नाम इस विद्या के प्रयोक्ता अपनाई जाने वाली पद्धति के लिए करते हैं।

इस पद्धति से किस प्रकार का लाभ होता है? रोग का सही निदान होता है अथवा नहीं? रोगी को सचमुच आराम पहुँचता है या नहीं? आदि कई प्रश्न चिकित्सा विज्ञानियों के लिये खोज के विषय बने हुए हैं। स्वयं उस पद्धति का उपयोग करने वाले नहीं जानते कि उनके उपचारात्मक प्रयास किस प्रकार रोगी को लाभ पहुँचाते हैं? परन्तु लाभ पहुँचता है। इस चिकित्सा विज्ञान की जितनी प्रामाणिक और सुसंगत व्याख्या भारतीय मनीषियों ने की है, उतनी संभवतः दुनिया के किसी भी देश में नहीं हो सकी है। भारतीय दर्शन शरीर को गौण और प्राण को मुख्य मानता है। प्राण ऊर्जा ही शरीर को स्वस्थ रखने में समर्थ होती है। न केवल शरीर को वरन् मस्तिष्क, स्वभाव, आचरण, व्यवहार और चरित्र का स्वास्थ्य भी प्राण ऊर्जा पर अवलम्बित है। भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि परिष्कृत और प्रखर प्राण-ऊर्जा का प्रवाह व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ रखने में समर्थ होता है। उसका स्वरूप या स्तर जब गिरता है तो व्यक्ति का शारीरिक मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य भी लड़खड़ाने लगता है। तब प्राण ऊर्जा सम्पन्न व्यक्ति अपनी प्राणशक्ति का प्रक्षेपण कर रुग्ण व्यक्ति को स्वस्थ बना देता है।

न्यूयार्क विश्वविद्यालय की एक नर्स डोलोरिस क्रेगर ने भी इस प्रकार प्रभावी आध्यात्मिक चिकित्सा में सफलता प्राप्त ही है तथा नाम यश कमाया है। क्रेगर ने यह विद्या उसी विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर एन. अंडेल से सीखी थी। अमेरिका में इन दिनों आध्यात्मिक चिकित्सा पर बड़ी तेजी से काम हो रहा है और किस प्रकार रोगी को जल्दी से जल्दी ठीक किया जा सके, इसके उपाय ढूंढ़े जा रहे हैं। इन शोधकर्ताओं में ब्राइस बौण्ड, कैथरीन कुलपैन, एम वालिस, मारिया जेनिस, गैरी कूवर, ज्वेल बर्ली आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

इस चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिकता को अभी पूरी तरह परखा नहीं जा सका है। पर जो लोग इसे विवादास्पद बताते हैं, वे भी इतना तो स्वीकार करते ही हैं कि फेथ हीलर्स के उपचार से ठीक हुए रोगी वास्तव में स्वस्थ हो गए हैं। उनमें रोग के कोई लक्षण नहीं पाए गए, जो उपचार से पहले विद्यमान थे। जब रोगी ठीक नहीं होता है तो विवाद का क्या आधार रह जाता है? इसके उत्तर में यही कहना पड़ता है कि अभी इस दिशा में वैज्ञानिक शोध, परीक्षण, निरीक्षण या प्रयोग अंतिम स्थिति में नहीं पहुँचे हैं। संशयात्मक स्थिति है। आध्यात्मिक चिकित्सा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है तो ऐसा भी नहीं है कि निराधार सिद्ध हो गई।

इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता शरीर विज्ञानी डा. चार्ल्स राबर्ट रिशे का यह कथन उल्लेखनीय है कि, आध्यात्मिक चिकित्सा को अभी तक विज्ञान के रूप में मान्यता नहीं मिली है। किन्तु शीघ्र ही विज्ञान उसे स्वीकार कर लेगा। हम अपने शरीर और मस्तिष्क द्वारा जो अनुभव करते हैं या परीक्षण और अनुभव के जो साधन हमारे पास उपलब्ध हैं वे पर्याप्त नहीं हैं। इसीलिए अभी हम इस प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाने वाली विद्या को विज्ञान के रूप में मान्यता नहीं दे पा रहे हैं। कोई सत्य दुर्लभ है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका कोई अस्तित्व नहीं। यदि किसी विद्या का अध्ययन कठिन है तो क्या उसे केवल इसलिए जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि उसका अध्ययन कठिन हैं।

आध्यात्मिक चिकित्सा को विज्ञान आज नहीं तो कल मान्यता देगा। उसके जो प्रत्यक्ष प्रमाण या लाभ दिखाई दे रहे हैं, विज्ञान उन्हें तो नहीं नकार रहा है। यह बात अलग है कि वह अभी उसे प्रयोगशाला में वैज्ञानिक कसौटियों कर कस रहा है।


आत्म-शक्ति अभिवर्धन का श्रेष्ठतम उपाय- गायत्री

सम्पूर्ण विश्व मूलतः दो ही शक्तियों का क्रिया व्यापार है, एक चेतन, दूसरी जड़। जड़ दिखाई पड़ने वाले पदार्थ दिखने भर में ही जड़ प्रतीत होते हैं। अन्यथा उनमें भी अद्भुत क्रियाशीलता विद्यमान है। उदाहरण के लिए पदार्थ को ही लें। पदार्थ जड़ दिखाई देता है, पर उसका सबसे छोटा घटक परमाणु अपने आप में अद्भुत क्रियाशील लिए रहता है। पदार्थ चर्मचक्षुओं स्थिर संबंध दिखाई पड़ता है, लेकिन जब सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से उसकी अंतरंग स्थिति को देखा जाता है तो प्रतीत होता है कि उसके भीतर कितनी प्रचण्ड शक्ति विद्यमान है और कितनी द्रुतगामी हलचलें उसमें काम कर रही हैं। वैज्ञानिक जानते हैं कि पदार्थ का यह सबसे छोटा घटक परमाणु अपने भीतर कितनी भयंकर क्षमता दबाये हुए है और वह क्षमता कितनी सक्रिय हलचलें उत्पन्न कर रही है?

पदार्थ सभी जड़ और स्थिर समझे जाते हैं, रेत, पर्वत, तालाब आदि सभी मोटी दृष्टि स्थिर लगते हैं, परन्तु उनमें सृजन, अभिवर्धन और विघटन का जो क्रम अनवरत रूप से चलता रहता है, उसे गम्भीरतापूर्वक देखने से प्रतीत होता है कि जीवधारी जिस प्रकार अपने विभिन्न प्रयोजनों में निरन्तर कुछ न कुछ सोचते, करते रहते हैं, उसी प्रकार पदार्थ की दृश्य और अदृश्य गतिशीलता भी इस संसार के हलचल युक्त बनाये हुए है। अपनी पृथ्वी से लेकर असंख्य ग्रह-नक्षत्रों तक सभी ब्रह्माण्डीय पिण्ड द्रुतगति से अपनी धुरी और कक्षा पर भ्रमण कर रहे हैं और अपनी आकर्षण शक्ति के द्वारा एक दूसरे के साथ जकड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, उनके अन्तः क्षेत्र में चित्र-विचित्र गतिविधियाँ अत्यन्त तीव्रगति से चलती रहती हैं। पदार्थ के साथ यह सक्रियता अविच्छिन्न रूप से जुड़े होने के कारण ही उनका अस्तित्व बना हुआ है।

पदार्थ की संरचना उसकी प्रचण्ड क्रियाशीलता के साथ जुड़ी हुई है। इसी के कारण वस्तुएं स्वयमेव उपजती और बदलती रहती हैं। पदार्थ की इस क्रियाशीलता को ही अपरा प्रकृति कहा गया है। परमाणु की तरह ही दूसरा घटक है- जीवाणु। जीवाणु का शरीर कलेवर तो रासायनिक पदार्थों से ही बना है, पर उसकी अन्तः चेतना मौलिक है और वह अपने प्रभाव से कलेवर को तथा समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती रहती है। इसे ही चेतना कहते हैं।

चेतना के दो गुण हैं, एक इच्छा एवं आस्था तथा दूसरी विवेचना एवं विचारणा। इच्छा को भाव और विचारणा को बुद्धि कहते हैं। एक को अन्तरात्मा तथा दूसरी को मस्तिष्क भी कहा जा सकता है। मस्तिष्क जो सोचता है उसके मूल में आकाँक्षा, आस्था, विवेचना एवं विचारणा की सम्मिलित प्रेरणा ही काम करती है। इस जीव चेतना को पराप्रकृति कहा जाता है।

अपरा प्रकृति का सबसे छोटा घटक परमाणु है इसका संयुक्त रूप ब्रह्माणु अथवा ब्रह्माण्ड है। व्यष्टि और समष्टि के नाम से भी इसे जाना जाता है। जीवाणु की चेतनसत्ता आत्मा कहलाती है और उसकी समष्टि विश्वात्मा अथवा परमात्मा। ब्रह्माण्ड में भरी क्रियाशीलता से परमाणु प्रभावित होता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि परमाणुओं की संयुक्त चेतना ब्रह्माण्ड व्यापी हलचलों का निर्माण करती है। इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में इसी तथ्य को परमात्मा द्वारा आत्मा को अनुदान मिलने अथवा आत्माओं की संयुक्त चेतना के रूप में परमात्मा के विनिर्मित होने की बात किसी भी तरह से कही जा सकती है।

जड़ जगत के, पदार्थ तत्व के मूल घटक परमाणु का गहनतम विश्लेषण करने पर जाना गया है कि वह मूलतः ऋण और घन विद्युत प्रवाहों के मिलने से उत्पन्न होने वाली हलचल मात्र है। परिस्थितियों के अनुसार वह हलचल ही दृश्य रूप धारण करती और पदार्थ के रूप में दृश्य होती चली जाती है। इसी प्रकार जीवात्मा भी यों स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर धारण किये, अनेक प्रकार के साधन उपकरण सम्हाले दिखता है। उसकी अपनी अहंता और इच्छा भी है किन्तु मूलतः वह व्यापक चेतना का ही एक स्फुल्लिंग मात्र है। उसे विभिन्न प्रकार की क्षमताएं विश्वात्मा के महा समुद्र से ही मिलती हैं। मछली का शरीर, आहार, निर्वाह सब कुछ जलाशय पर ही अवलम्बित है, इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म पर आश्रित है। इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त उस चेतना मानसरोवर को गायत्री कह सकते हैं, जो प्राणियों में संवेदना और पदार्थों में सृजन परिवर्तन करने वाली क्रियाशीलता बन कर काम करती है। इसे ब्रह्म चेतना से ही उद्भूत माना गया है। ज्ञान से कर्म बना और दृश्य ने अपना कलेवर धारण किया। इस प्रकार यह विश्व मूलतः अद्वैत होते हुए भी द्वैत बन गया। ब्रह्म से प्रकृति बनी बौर फिर वे दोनों मिल जुलकर सृष्टि का इतना विकास कर सके, जैसा कि हमें दृष्टिगोचर होता है। इसी तथ्य को पुराणों में अनेकों अलंकारिक कक्ष उपाख्यानों के रूप में बताया गया है।

शास्त्र पुराणों में उल्लेख आता है कि ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ थीं, एक गायत्री और दूसरी सावित्री। इसमें यही संकेत छुपा हुआ है कि ब्रह्म की दो क्षमताएं हैं एक परा प्रकृति चेतन सत्ता और दूसरी अपरा प्रकृति अर्थात् पदार्थ सत्ता। एक का धर्म ज्ञान है तो दूसरी का कर्म। एक अदृश्य है तो दूसरी दृश्य। एक सजीव है, तो दूसरी निर्जीव। इतने पर भी दोनों का उद्गम स्त्रोत एक ही है। हिमालय के अन्तराल में से गंगा और यमुना दोनों ही धाराएं निकलती हैं। इसी प्रकार ब्रह्म से परा और अपरा प्रकृति का उद्भव हुआ है।

गायत्री को मूलतः ब्राह्मी शक्ति कह सकते हैं। समुद्र ही असंख्य लहरें पृथक दिखती हैं और उनकी आकृति प्रकृति में भी भिन्नता रहती है। इतने पर भी समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल ही इन लहरों का सृजन करने का मूलकारण है। गायत्री महा शक्ति के चेतन और जड़ विभाजन तो आरम्भिक हैं, आगे चलकर गंगा और यमुना में उठने वाली अनेकों लहरें, धराएं तथा भंवर आदि के रूप में उत्पन्न होने वाली हलचलों की तरह उस ब्राह्मी शक्ति की भी अनेकानेक धाराएं हैं। इन्हें विभिन्न नाम दिये गये हैं। गायत्री के अनेकों नाम रूप हैं। गायत्री सहस्रनाम में उसके एक हजार नाम गिनाये गए हैं। इन्हें उस महान शक्ति सागर की लहरें तरंगें कह सकते हैं। सहस्रनाम से तात्पर्य उस ब्राह्मी शक्ति के प्रकारों को अमुक गणना में सीमा बद्ध कर देना नहीं है वरन् उसका तात्पर्य है असंख्य। सहस्रनाम तो अगणित असंख्य की ओर इंगित मात्र है।

इस महा शक्ति के स्वरूप, क्रिया-कलाप एवं उपयोग को शास्त्रों में अनेक उदाहरणों के साथ ही बताया गया है। कहीं तो उस शक्ति ने स्वयं ही अपने स्वरूप का परिचय दिया है और कहीं देवताओं ने अथवा ऋषियों ने स्तवन के रूप में उसके स्वरूप का गुणगान सहित वर्णन किया है। इन वर्णनों के आधार पर यह जाना जा सकता है कि गायत्री शक्ति तत्व इस संसार में कहाँ, किस प्रकार कार्य कर रही है?

कहा गया है-

गायत्री पददेवतेति गहिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी।

अर्थात्- यह गायत्री सबसे परा श्रेष्ठ देवता है, ऐसा कहा गया है। यह चित् स्वरूप वाली गायत्री साक्षात् ब्रह्म है।

गायत्री तुपरं तत्वं गायत्री परमागतिः। -वृहद् पारासर 5।4

गायत्री ही परम तत्व है। गायत्री ही परमगति है।

सैषा चतुष्पदा षडविद्या गायत्री तदेतह्याभ्यनूत्तम। तावानस्य महिमा ततो ज्याया श्च पूरुषाः। पादोऽस्य सर्व भूतानी त्रिपाऽस्यामृतं दीविति। -छांदोग्य 3।12।5

अर्थात्- यह गायत्री चार पाद वाली और छः भेदों वाली है। इस गायत्री की अविच्छिन्न महिमा है। यह तीन पद वाला परम पुरुष अमृत और प्रकाश रूप बन कर आत्मा में स्थित हो। इसका एक पद सन्तोष विश्व है।

गायत्री की चेतनात्मक धारा सद्बुद्धि के, ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में काम करती है और जहाँ उसका निवास होता है, वहाँ ब्राह्मणत्व एवं देवत्व का अनुदान बरसता चला जाता है, साथ ही आत्मबल के साथ जुड़ी हुई दिव्य विभूतियाँ भी उस व्यक्ति में बढ़ती चली जाती हैं। इस तथ्य का उल्लेख शास्त्रों में इस प्रकार हुआ है।

सर्वदा स्फुरिस सर्वछदि वासयासे। नमस्ते परारूपे नमस्ते पश्यन्ती रूपे नमस्ते, मध्यमा रूपे नमस्ते बैखरी रूपे सर्व तत्वात्मिके सर्व विद्याऽऽत्मिके। सर्व क्त्यात्मिके सर्वदेवात्मिके वशिष्ठेय मुनि नाऽऽराधाधिते विश्वामित्रेण मुनिनोप संव्यमाने नमस्ते नमस्ते। -असिमालिकोपनिषद

अर्थात्- हे महा शक्ति तुम सर्वत्र विद्यमान हो, सर्वत्र स्फुरण करती हो, सभी हृदयों में तुम्हारा निवास है। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और बैखरी वाणियाँ तुम्हारे ही रूप हैं। तुम तत्व रूपिणी हो, सर्व विद्यमान हो, समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हो, सब देवताओं की आराध्य हो, वशिष्ठ और विश्वमित्र ऋषियों ने तुम्हारी ही उपासना करके सिद्ध पाई है। तुम्हें बार-बार नमस्कार है।

ऋग्वेद में कहा गया है-

गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्यन्त्यर्क मर्किण। ब्रह्मणस्त्वा शतक्रता उदवंशपिवमेपिरे॥ ऋग्वेद 1/10/1

हे माता गायत्री, मन्त्रवेत्ता तेरा ही गुणगान करते हैं। गायत्री मंत्र द्वारा यजन करने वाले कर्मयोगी याजक यज्ञ याग द्वारा तुम्हारी ही अर्चना करते हैं। विद्वान तुम्हारे नाम की ही यश-पताका को लिए फिरते हैं।

यह दृश्य जगत पदार्थमय है। इसमें जो सौंदर्य, वैभव, उपभोग सुख दिखाई पड़ता है वह ब्रह्म की अपरा प्रकृति का ही अनुदान है यह सब गायत्रीमय है। सुविधा की दृष्टि से इसे सावित्री नाम दे दिया गया है ताकि पदार्थ जगत में उसके चमत्कारों को समझने में सुविधा रहे। गायत्री की इस स्थूल धारा सावित्री को जो जितनी मात्रा में धारण करता है, वह भौतिक क्षेत्र में उतना ही समृद्ध सम्पन्न बनता जाता है। इस विश्व में बिखरी हुई सीमा सम्पन्नता को उसी महा शक्ति का इन्द्रियों में अनुभव किया जा सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं। शास्त्रों में उसकी अनेक प्रकार से चर्चा की गई है। कहीं उसके विराट् रूप का विवेचन किया गया है तो कहीं उसके शक्ति रूप की विभिन्न तरह से चर्चा की गई है। पर इतना स्पष्ट है कि वह स्थूल और सूक्ष्म, जड़ और चेतन अपरा और परा प्रकृति में संव्याप्त चेतना शक्ति ही है।

शक्तिवान के साथ शक्ति का जुड़ा होना निश्चित और असंदिग्ध है। गायत्री ब्रह्म और शक्ति का ही समन्वय युग्म है। प्रत्येक शक्तिवान की सामर्थ्य को उसी संव्याप्त क्षमता का स्वरूप कहा जा सकता है। इसे कई स्थानों पर पति-पत्नी के उदाहरणों सहित भी चित्रित किया गया है। समर्थों की सामर्थ्य के रूप में, विशिष्टों की विशेषताओं के रूप में इस महाशक्ति के दर्शन स्थान-स्थान पर किये गए हैं।

मंत्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञान रूपिणी। ज्ञानानां चिंतातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी।

अर्थात्- यह महाशक्ति मंत्रों में मातृ का रूप, शब्दों में ज्ञानरूप, ज्ञानियों में चिंतयातीत और शून्यवादियों में शून्य रूप है।

गायत्री का मूल स्वरूप शक्ति है। यह स्पष्ट है कि संसार में जितने भी अभाव और कष्ट हैं, जितनी भी आधि-व्याधियां हैं उन सबका कारण शक्ति का अभाव ही है और सभी शक्तियों का उद्गम आत्मशक्ति है। आत्मशक्ति के अभाव में मनुष्य की विचारणा निकृष्ट बनती है और प्रतिभा के अभाव में सुख साधनों से वंचित रहना पड़ता है। अस्तु, शक्ति संचय के प्रयत्न निरन्तर करने चाहिए। भौतिक समर्थता किस प्रकार प्राप्त होती है, इसे सब जानते हैं, पर आत्मिक तेजस्विता किस प्रकार पाई जा सकती है इसका मार्गदर्शन अध्यात्म विज्ञान ही कर सकता है। इस दृष्टि से गायत्री उपासना आत्म-शक्ति अभिवर्धन का सरल और श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जीते हैं।


गायत्री सिद्धि के मूल भूत आधार

यात्रा दो पैरों के सहारे करनी पड़ती है। और गाड़ी दो पहियों के सहारे पर लुढ़कती है। सामान्य प्रगति के लिए श्रम और मनोयोग के संयुक्त समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए गायत्री उपासना और गायत्री साधना ये दोनों माध्यम अपनाने पड़ते हैं। इससे बच निकलने और सरल पगडंडियाँ ढूंढ़ निकालने के प्रयासों में सिवा आत्म-प्रवंचना के और कुछ हाथ नहीं लगता। सस्ते मोल से ईश्वर की प्राप्ति करा देने से लेकर कुण्डलिनी जगा देने तक के प्रलोभन देने वालों की कमी नहीं है। किन्तु स्पष्ट है कि उस प्रवंचना में भ्रम जंजाल के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। हमें अपनी रोटी आप खानी और पचानी पड़ती है। आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गायत्री उपासना और साधना के दोनों पैरों के सहारे चलना पड़ता है।

कोई भी किसान खेत में बीज डालने से पूर्व पहले उसे पानी से भर कर उसकी अच्छी तर जुताई करता है। कूड़ा-करकट निकालता है, खाद डालता है तब भूमि इस योग्य हो पाती है कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनाएं सुनिश्चित होती हैं। उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है उसके फलने-फूलने की आशा तभी की जा सकती है जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाय जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है- मनोभूमि को शुद्ध किए बिना डाला गया उपासना का बीज झाड़ झंकार, बाढ़ में पड़े बीज की तरह होगा जो या तो स्वयं सड़-गलकर नष्ट हो जाता है या जिसे चिड़िया, चूहे और जंगली जीव चुन ले जाते हैं।

जितना महत्व उपासना का है उतना ही साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमारक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर करने की आवश्यकता पड़ती है। यही तत्परता साधना है।

उपासना और साधना के समन्वित उपक्रम को योग भी कहा जा सकता है। योग का सामान्य अर्थ होता है जोड़ना। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने की प्रक्रिया योग कहलाती है। इसमें उपासना और साधना दोनों का समान महत्व है। योग साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। इस तथ्य को ध्यान में रख कर चला जाय तभी लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतना के परिष्कार का प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रियाकृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा। उपासनात्मक क्रियाकृत्यों में जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।

लक्ष्य विहीन साधना मनोरंजक भटकाव ही कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्यों को योगाभ्यास के आधार साधन मानना ही पर्याप्त है। उन कृत्यों को ही जादुई मान बैठना और उनकी प्रवीणता मिल जाने मात्र से लक्ष्य पूरा हो जाना मान लिया जाएगा तो यह विशुद्ध भ्रान्ति ही सिद्ध होगी। एक व्यक्ति दूसरे तक अपने मनोभाव पहुँचाने के लिए कागज कलम का प्रयोग करता है। यह उपकरण निश्चय ही बड़े महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना विचारों का आदान-प्रदान करने में बड़ी कठिनाई पड़ेगी। फिर भी यह मात्र कागज कलम से पत्राचार का उद्देश्य पूरा नहीं होता। उसमें भावों की अभिव्यक्ति का तथ्य जुड़ा ही रहना चाहिए। यदि ऐसे ही कागज पर कलम घिसते रहा जाय और कुछ भी टेड़ी-सीधी लकीरें बनाई जाती रहें तो उससे पत्र-व्यवहार द्वारा विचारों के आदान-प्रदान का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। लेखन क्रिया के साथ भावों की अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक है। योगाभ्यास में प्रयुक्त होने वाले उपचारों में मात्र शारीरिक, मानसिक हलचलों को ही सब कुछ मानकर संतुष्ट नहीं हो बैठना चाहिए। उत्कट प्रयत्न यह होना चाहिए कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ देने पर उपयुक्त भाव चेतना उत्पन्न की जा सके। महत्व तो इस ‘भाव उभार’ का ही है। वह उभरेगा तो गाड़ी आगे चलेगी अन्यथा तथाकथित योगाभ्यासों की हलचलें कुछ समय तक श्रम-साधना में जितनी कुछ जैसी कुछ अनुभूति दे सकती हैं, उसे देकर समाप्त हो जायेंगी। भाव-विहीन साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके, आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा, इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी।

यह मानकर चलना भी गलत है कि भजन करने मात्र से पाप कट जायेंगे और ईश्वर प्रसन्न हो जायेगा। अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अथवा कुमार्गगामिता से बचाने की आवश्यकता नहीं है। इसी भ्रमपूर्ण मान्यता के कारण लोग अध्यात्म के लाभों से वंचित रहते हैं। यह भ्रम दूर हटना चाहिए और भारतीय अध्यात्म का तत्वज्ञान एवं ऋषि अनुभवों को यही निष्कर्ष अपनाना चाहिए कि उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं तथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस प्रकार अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ होना ही उचित है।

गायत्री उपासक का जीवन क्रम उत्कृष्ट आदर्शवादी एवं परिष्कृत होना ही चाहिए। नशा पीने पर मस्ती आनी ही चाहिए। भक्ति का प्रभाव सज्जनता और प्रगतिशीलता के रूप में दिखना ही चाहिए। इसलिए गायत्री का वरदान प्राप्त करने की पात्रता उत्पन्न करने के लिए उपासना के साथ साधना का उपक्रम भी अनिवार्य रूप से जोड़े रखना चाहिए अर्थात् उसमें आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए। उपासना और साधना का अलग अस्तित्व है, यह सोचना गलत है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना भी अनुचित है। अस्तु, गायत्री की भावात्मक, क्रियाकाण्ड परक पूजा की जानी चाहिए। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें तथा उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित रखते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ सकते हैं तथा उसमें पूर्णता प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।


कुण्डलिनी का ज्योति दर्शन

साधना एकांगी नहीं समग्र, समन्वित और उभयपक्षीय होनी चाहिए तथा सफलता का योग बनता है। इसके लिए ज्ञान और शक्ति की समन्वित साधना होनी चाहिए। आद्य शंकराचार्य ने वेदान्त परक ज्ञानयोग का ही मुख्य रूप से प्रतिपादन किया है, लेकिन उनके स्वयं के जीवन में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ी, सो उसके लिए कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी। शंकराचार्य ने अपने कुण्डलिनी अनुभव ‘सौंदर्य लहरी’ नाम ग्रन्थ में किये हैं, जो अपने विषय का अनूठा धर्म ग्रन्थ है।

वस्तुतः समग्र अध्यात्म का स्वरूप ही समन्वयात्मक है। उसमें परा और अपरा प्रकृति के ज्ञान और कर्म के समन्वय की व्यवस्था है। जीवाग्नि का काम बीज और ब्रह्माग्नि का ज्ञानबीज दोनों को आध्यात्म अलंकार में नर-नारी जैसे संयोग, सम्भोग के रूप में रज और वीर्य के रूप में चित्रित करते हुए यही कहा गया है कि इनका मिलन ही सफलताओं का स्त्रोत है। कुण्डलिनी तत्वज्ञान एवं साधना विज्ञान की समन्वयात्मक साधना विधा में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता और सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुंडलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता दोनों के ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों क्षेत्रों में उसमें असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।

शिव और शक्ति दोनों का ही अध्यात्म शास्त्र में अग्नि के रूप में उल्लेख है। यह अग्नि चूल्हे में जलने वाली आग नहीं वरन् जीवन अग्नि ही समझी जानी चाहिए। नीचे की अग्नि जीवाग्नि को चन्द्राग्नि कहते हैं। चन्द्रमा में जो ज्योति दिखाई देती है, वस्तुतः वह सूर्य का ही प्रतिबिम्ब है। मस्तिष्क में अव्यवस्थित शिव रूप सूर्याग्नि ही प्रकारान्तर से कुण्डलिनी की अग्नि बन कर चमकती है। इसी को सोम और अमृत का नाम भी दिया जाता है। नाम रूप जो भी हो शिव और शक्ति को- कुण्डलिनी और ब्रह्मरन्ध्र को अग्नि के अलंकार से संबोधित करते हुए उसका संकेत जीवन अग्नि के इन दो शक्ति स्त्रोतों, ध्रुवों और सूर्य, चन्द्र युग्मों से हुई है। साधना ग्रन्थों में इसकी चर्चा इस प्रकार मिलती है।

तस्य सर्व्वजगन्मूर्त्तिः शक्तिर्मायेति विश्रुता। स कालाग्निर्हरो देवो गीयते वेदवादिभिः॥ -कूर्म पुराण

वे शिव कालाग्नि रूप हैं ऐसा वेदवादियों ने कहा है। उनकी शक्ति-काल विश्वमूर्ति है।

तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वाचिर्विश्वतोमुखः। तस्य मध्ये वह्निंशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता। तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थित॥ -चतुर्वेदोपनिषद् 5

उसके बीच प्रचण्ड अग्नि की ज्वालायें चारों ओर धधकती हैं। उन लपटों के मध्य एक अग्नि शिखा- अणु शक्ति है। उसी के बीच परमात्मा की स्थिति है।

ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्। दृंष्ट्राकरालंदुर्द्धर्षं जटामंडलमण्डितम्॥ -कूर्म पुराण

ज्वालाओं की सहस्रों ही मालाओं से समन्वित तथा सैकड़ों कालानल के समान था। कराल दृष्टाओं से युक्त, अत्यन्त दुर्धर्ष एवं जटाओं के मण्डल से मण्डित स्वरूप था।

योग कालेन न मरुता साग्निना बोधिता सती। स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपा महोज्ज्वला॥ -त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद् 64

योग साधना से प्राण प्रयोग द्वारा, प्रज्वलित अग्नि के समान इस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है। तथेति स होवाच-

आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिरावृत्तभंगिमंडलाकारं तत्र मूलकंदे शक्तिः पावकाकार ध्यायेत् तत्रैव कामरूप पीठं र्वकामप्रदं भवति इत्याधारचक्रम्॥

तृतीय नाभिचक्रं पंचावर्तं सर्पकुटिलाकारं तन्मध्यं कुंडलिनी बालार्ककोटिप्रभां तटित्सनिभां ध्यायेत् सामर्थ्यशक्तिः सर्वसिद्धिप्रदा भवति मणि- पूरकचक्रम्॥ -सौभाग्य लक्ष्युपनिषद् 3।1-3

उनने कहा- मूलाधार में योनि के आकार का तीन घेरे वाला ब्रह्म चक्र है। वहाँ सुप्त सर्पिणी की तरह कुंडलिनी शक्ति का निवास है। जब तक वह जागृत न हो तब तक उस स्थान पर प्रचण्ड अग्नि की धधकती हुई ज्वाला का ध्यान करें।

प्रातः काल के अरुण सूर्य की तरह आभावती बिजली की तरह चमकती हुई, इस कुंडलिनी को ध्यान द्वारा जागृत करते हैं। जागृत होने पर यह अनंत सामर्थ्यवान बना देती है और समस्त सिद्धियां प्रदान करती है।

जातां तदानीं सुरसिद्धसंघा दृष्टवा भयाद्दुद्रु वुरग्निकल्पाम्। कालीं गरालंकृतकालकंठीमुपेंद्रपद्मोद्भ गशक्रमुख्याः॥ -लिंग पुराण

महाविष से समलंकृत कण्ठ वाली अग्नि के सदृश स्वरूप वाली उस अवतीर्ण भगवती काली को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र समस्त देवगण भय से भगाने लगे थे।

महायोग विज्ञान में लिखा है कि मूलाधार चक्र में आत्म-ज्योति अग्नि रूप दिखती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र में वह प्रवाल अंकुर-सी प्रतीत होती है। मणिपूर में विद्युत जैसी चमकती है। नाभि चक्र में बिजली जैसी चमकती है। हृदय कमल में वह लिंग आकृति की प्रतीत होती है। कण्ठ चक्र में वह श्वेत वर्ण, तालु चक्र में शून्याकार एक रस अनुभव में आती है। भू चक्र में अंगूठे के प्रमाण में जलती हुई दीप शिखा जैसी भासती है। आज्ञाचक्र धूम शिखा जैसी और सहस्रार चक्र में चमकते हुए परशु जैसी दिखती है।

यह सभी ज्योतियाँ एक ही हैं। सभी में आत्म-ज्योति है। सभी परम आनन्ददायिनी हैं। विधा शक्ति कुँडलिनी की क्रीड़ा से एक ही अग्नि की अनेक चिनगारियों की तरह यह अनेक तरह की प्रतीत होती है। कहा गया है-

अपाने चोर्ध्वगे याते संप्राप्ते वह्निमंडले। ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हत्ता॥ ततो यातौ वह्नयपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम्। तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा॥ तेन कुंडलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते। दन्डाहतभुजंगीव निश्वस्य ऋतुतां व्रजेत्॥ -योग कुंडल्युपनिषद् 1।43,44,45

उस अग्नि मण्डल में जब अपान प्राण जाकर मिलता है तो अग्नि की लपटें और तीव्र हो जाती हैं। उस अग्नि से गरम होने पर सोई हुई कुंडलिनी जागती है और लाठी से छेड़ने पर सर्पिणी जिस प्रकार फुसकार कर उठती है वैसे ही यह कुंडलिनी भी जागृत होती है।

प्राणस्थानं ततो वह्नि प्राणापानौ च सत्वरम्। मिलित्वा कुंडलीं यति प्रसुप्ता कुंडलाकृति॥ तेनाग्निना च सतप्ता पवनेनैव चालिता। प्रसाय स्वशरीरं तु सुषुम्नाबदनान्तरे॥ -योग कुंडल्युपनिषद् 1।65,66

अग्नि स्थान में प्राण के पहुँचने से उष्णता से संतप्त कुंडलिनी अपनी कुंडली छोड़कर सीधी हो जाती है। और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है।

चित्रों में शिव को जमीन पर लेटा हुआ और शक्ति को उनकी छाती पर खड़ा हुआ चित्रित किया जाता है। वह कुंडलिनी जागरण के अवसर पर मूलाधार स्थिति प्राणाग्नि का सुषुप्ति अवस्था त्याग कर ब्रह्मरंध्र शिव संस्थान में जा पहुँचना और सहस्र कमल स्थिति सोम अमृत के मूलाधार की ओर स्त्रवति होने की साधना विज्ञान सम्मत प्रक्रिया का ही दिग्दर्शन है। दस देवियों के चित्रों में विपरीत रति उल्लेख हैं। उस समागम में शिव को नीचे और शक्ति को ऊपर बताया जाता है। जागृत अवस्था में कुँडलिनी की समर्थता और प्रमुखता का जीवन के हर क्षेत्र में छा जाना- यह इस चित्रण का संकेत है। वृहज्जावालोपनिषद् में इसकी चर्चा इस प्रकार है-

अग्नीषोमात्मकं विश्वमित्याग्निराचक्षते। सोम शक्त्यामतमय शक्तिकरी तनः॥ अमृतं यत्प्रतिष्ठा सा तेजो विद्याकला स्वयम्। स्थूलसूक्ष्मेषु भूतेषु स एव रसतेजसि (सी)॥ वैद्युदादिमयं तेजो मधुरादिमयो रसः। तेजो रसविभेदैस्तु वृत्तमेतच्चराचम्॥ अग्नेरमृतनिष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते। अतएव हविः क्लृप्तग्नीषोमात्मक जगत्॥ अग्ने (अग्नि) रूर्ध्वं भवत्येषा (ष) यावत्सौम्यं परामृतम्। यावदग्न्यात्मकं सौम्यममृतं विसृजत्यधः॥ अतएव हि कालाग्निरधस्ताच्छाक्रिर्धर्वगा। यावदादहनश्चीर्ध्वमघस्तात्पवनं भवेत्॥ -वृहज्जावलोपनिषद् ब्राह्मण 2

अग्नि और सोम इन दोनों के संयोग से यह जगत बना है। सोम में अमृत शक्ति भरी है। अग्नि में विद्या और कला का निवास है। सोम और अग्नि का तेज सब प्राणियों में विद्यमान है।

अग्नि जब ऊपर आती है तब सोम को ग्रहण करती है। तब सोम अग्नि के रूप में परिवर्तित होकर नीचे की ओर चलता है। इस प्रकार रुद्र नीचे हैं और शक्ति ऊपर।

ज्ञान शक्ति को शिव और क्रिया शक्ति को कुंडलिनी कहते हैं। इन दोनों का समन्वय सम्मिलन जब जीवन-अग्नि को प्रदीप्त ज्वालाओं की तरह आलोकित होता है तो मन मलीन, असफल और अस्त-व्यस्त जीवन-क्रम एक अभिनव उत्कर्ष और उल्लास की परिस्थितियों से भर जाता है। उस ज्वलंत शक्ति से अप्रभावित व्यक्ति का कोई भी दृश्य-अदृश्य काम शेष नहीं रहता। समस्त विश्व में संव्याप्त इस महा अग्नि का कुंडलिनी साधना द्वारा एक अंश जब व्यक्तिगत जीवन में उपलब्ध कर लिया जाता है तो प्रगति की अनेक सम्भावना अप्रत्याशित रूप से सामने आ उपस्थित होती है- इसी अनुभव के आधार पर साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों के कुंडलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-

शक्ति कुंडलिनोति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा। ज्ञात्वे थं त तुुनकर्विशन्ति जननागर्भेऽर्भकत्वंनराः॥ -शक्ति तंत्र

कुंडलिनी महाशक्ति के प्रयत्न से ही संसार का सारा व्यापार चल रहा है। जो इस तथ्य को जान लेता है वह शोक-संताप भरे बंधनों में नहीं बंधा रहता।

कूजंती कुलकुंडली च मधुरं मत्तालिमालास्फुटं, वाचः कोमलकाव्यवंधरचनाभेदातिभेदक्रमैः। श्वासोच्छ्वासविभंजनेन जगतां जीवो यया धार्यते। सा मूलांबुजगह्वरे विलसति प्रोद्दामदीप्त्यावलिः॥ -षट्चक्र निरुपणम् 12

कुंडलिनी शक्ति के जागृत होने पर वाणी में मधुरता आ जाती है। काव्य, कला और साहित्य से प्रगति होती है। यह मूलाधार चक्र में दीप शिखा जैसी चन्द्र ज्योति जैसी प्रकाशित है।, प्राण वायु द्वारा यह धारण की जाती है।

मूलाधारे आत्मशक्तिः कुंडलिनी परदेवता। शायिता भुजगाकारा सार्द्धत्रय बलयान्विता॥ यावत्सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा। ज्ञानं न जायते तावत् कोटिमोगविधेरपि॥ आधार शक्ति निद्रायां विश्वं भवति निद्रया। तस्यां शक्तिप्रबोधेन त्रैलोक्यं प्रति बुध्यते॥ -महायोग विज्ञान

आत्मशक्ति कुंडलिनी मूलाधार चक्र में साढ़े तीन कुंडलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। जब तक वह सोती रहती है तब तक जीव पशुवत् बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी यह आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है। पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है।


परिव्राजक का वचन

पीत चीवर ओढ़े, भिक्षापात्र लिए एक मुंडित मस्तक भिक्षु शांत भाव में नगर में आ रहा था। तपः तेज से उद्दीप्त मुख-मंडल, परमार्थ पथ पर आरुढ़ होने का दृढ़ संकल्प और स्वस्थ, पुष्ट, बलिष्ठ देह का स्वामी भिक्षु उपगुप्त निर्विकार भाव से अपने पथ पर चला जा रहा था, उद्देश्य था- भिक्षाटन। काषाय धारी उपगुप्त का सात्विक सौंदर्य इतना अप्रतिम था कि वातायन में बैठी नगर वधू वासवदत्ता ने उसे देखा तो देखती ही रह गई और भिक्षु उपगुप्त ने मार्ग पर से अपनी दृष्टि उठाकर उस विशाल अट्टालिका की ओर देख तक नहीं।

वासवदत्ता, मथुरा की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति, नगर के धनीमानी प्रतिष्ठित जनों से लेकर राजपुरुष तक जिसकी चाटुकारी किया करते थे और जिसके राजभवन से भव्यप्रसाद की देहरी पर चक्कर काटा करते थे, वह नर्तकी भिक्षु उपगुप्त के दैवी सौंदर्य को देखकर उन्मत्त सी हो गई। दो क्षण तो ठिठकी देखती रह गई ऐसा अद्भुत तेज, ऐसा सौम्य मुख और फिर जितनी शीघ्रता उससे हो सकी, उतनी शीघ्रता से वह दौड़ी गई, उपगुप्त के पीछे। कुछ समीप पहुँचने पर वासवदत्ता ने उसे पुकारा, ‘भन्ते!’

भिक्षु आकर पूर्ववत् मस्तक झुकाये आकर खड़ा हो गया और अपना भिक्षापात्र वासवदत्ता के सम्मुख बढ़ा दिया।

‘आप ऊपर पधारें, नर्तकी सलज्ज भाव से बोली।’ और उपगुप्त के प्रासाद में प्रवेश करने के बाद यथोचित सत्कार करते हुये अपना मंतव्य कह उठी, ‘यह मेरा भवन मेरी सब संपत्ति और स्वयं मैं अब आपकी हूँ। मुझे आप स्वीकार करें।

नर्तकी के शब्द काँप रहे थे। उसकी वाणी में प्रणय याचना थी और शरीर कामावेग से तप्त रतिमय हो रहा था।

उपगुप्त ने दृष्टि उठाकर वासवदत्ता की ओर बेधक दृष्टि से देखा, ‘मैं फिर तुम्हारे पास आऊँगा।’

‘कब?’ वासवदत्ता को लगा उपगुप्त ने उसे स्वीकार कर लिया है। कौतूहल वश वह पूछ बैठी।

‘समय आने पर’ भिक्षु ने कहा और आगे बढ़ गया, उसी शांत और निर्विकार भाव से। वह जब तक दिखाई देता रहा, वासवदत्ता द्वार पर खड़ी उसी की ओर देखती रही।

और उपगुप्त उसके बाद कभी उस मार्ग पर नहीं दिखाई दिया। वासवदत्ता ने उसे खोजने के लिये अपने अनुचर भी भेजे परन्तु उसका कहीं पता न चला। कुछ काल तक वासवदत्ता इस स्मृतिदंश से व्यथित रही। समय की औषधि ने उसका उपचार किया और धीरे-धीरे स्मृति विस्मार हो गई। सब कुछ सामान्य गति से चलने लगा।

इस घटना के कई वर्षों उपरान्त। यमुना तट पर एक स्त्री भूमि पर पड़ी थी। अत्यन्त मलिन वासना और जीर्ण काय। देह पर घाव हो गये थे, जिनसे पीव और रक्त की सड़ांध आ रही थी। उस ओर से निकलते समय लोग अपना मुख दूसरी ओर कर लेते थे। वही लोग जो कभी इस स्त्री के रूप यौवन पर लोभी भंवरे बनकर प्रासाद में मंडराया करते थे, उसे भूल चुके थे। वह भव्य प्रासाद, वह अतुल वैभव और वह रूप यौवन सब नष्ट हो चुका था। भयंकर यौन रोगों से त्रस्त वासवदत्ता का सब कुछ नष्ट हो गया था और वह इस रूप में अपने जीवन की शेष घड़िया गिन रही थी।

सहसा एक भिक्षु उधर से निकला और उस दुर्दशाग्रस्त नारी के समीप जाकर खड़ा हो गया। उसने पुकारा, ‘वासवदत्ता! मैं आ गया हूँ।’

“कोन” ‘वासवदत्ता ने बड़े कष्ट से भिक्षु की ओर देखने का प्रयत्न किया। वह उसे पहचाने की चेष्टा कर रही थी।’

‘भिक्षु उपगुप्त,’ भिक्षु वहीं बैठ गया और यमुना से अपने कमण्डलु में जल लाकर वासवदत्ता के घाव धोने लगा।

‘बहुत विलम्ब से आए उपगुप्त,’ वासवदत्ता ने कराहते हुये कहा। उसे वर्षों पूर्व की वह घटना स्मरण हो आई।

‘क्यों?,’ उपगुप्त ने पूर्ववत् परिचर्या निरत रहते हुए पूछा।

‘‘अब मेरे पास क्या है? मेरा यौवन, सौंदर्य, धन आदि सभी कुछ तो नष्ट हो गया। अब मैं तुम्हारे योग्य कहाँ रही?’’

‘मेरे आने का समय तो यही है भद्रे! मैं उपयुक्त समय पर आया हूँ। इसी समय तुम्हें मेरी आवश्यकता थी,’ भिक्षु ने कहा और परिचर्या में व्यस्त हो गया। औषध उपचार और दीर्घकाल तक सुश्रूषा करने के उपरान्त वासवदत्ता स्वस्थ हो गई और उपगुप्त ने एक विनष्टप्राय नारी को धर्म मार्ग अलौकिक करने योग्य बनाया।


नाद योग और शब्द ब्रह्म की साधना

योग शास्त्र का लक्ष्य है ब्रह्माण्ड-व्यापी मूल सत्ता से जुड़ना। उस परम एकत्व की अविराम अनुभूति। इस अनुभूति को विकसित करने की अनेकों विधियाँ हैं, अनेकों पद्धतियाँ हैं। कोई भी विधि उस लक्ष्य तक पहुँचने की एक मात्र विधि नहीं है।

विश्व में जितने भी पदार्थ हैं सभी के मूल में एक ही तत्व अंतर्निहित है। मूल रूप में यह चेतन-ऊर्जा अव्याख्येय है। इस अव्याख्येय चेतना-ऊर्जा का विविध रूपों में रूपांतरण होता रहता है तथा हो सकता है। योग-साधना की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं में इस चेतना-ऊर्जा की किसी धारा विशेष को लेकर विस्तृत ढांचा खड़ा किया गया है।

योग शास्त्र के इन अनेकानेक साधना-विधानों में एक महत्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से या शीशी वाली कार्क से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि-आधार से विलग किया जाता है, और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अंतःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेंद्रिय का, उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता ही है। पर वह श्रवण वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिये है। कर्णेंद्रिय और अंतःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते हैं। यह संयुक्त प्रयास जिस सूक्ष्म ध्वनि-प्रवाह में नियोजित किया जाता है, वह है तो अभिन्न ही। क्योंकि पिण्ड ब्रह्माण्ड का अभिन्न अंश है। किन्तु ध्यान के संकल्प भेद तथा चेष्टा भेद से कोई साधक अनन्त अतीन्द्रिय जगत की सूक्ष्म ध्वनियों के श्रवण का अभ्यास आरम्भ करता है, कोई अन्य अपनी ही अंतर्ध्वनि के श्रवण का।

अपने ही सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में सन्निहित श्रवण शक्ति को यदि विकसित किया जा सके तो अन्तरिक्ष में निरन्तर प्रवाहित होने वाली उन ध्वनियों को भी सुना जा सकता है जो चमड़े से बने कानों की पकड़ से बाहर हैं। सूक्ष्म जगत की हलचलों का आभास इन ध्वनियों के आधार पर हो सकता है। भिन्न अभ्यास पद्धति द्वारा यदि प्रारम्भ में उन सूक्ष्म ध्वनि प्रवाहों को सुनने की शक्ति अर्जित की जाती है, तो वही सामर्थ्य आगे चलकर सूक्ष्म एवं कारा शरीर में गूँजने वाली ध्वनियों की भी जानकारी पीने का माध्यम बन जाती है। इस प्रकार यह मात्र आरंभिक भेद है।

नाद संकेत वे सूत्र हैं जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति स्त्रोतों के साथ हमारे आदान-प्रदान सम्भव हो सकते हैं। टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलैस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्ती व्यक्तियों के साथ अनुभूतियों का आदान-प्रदान करते हैं? उसी प्रकार नाद-साधना के सहारे ब्रह्मांडीय चेतना से संपर्क स्थापित कर उससे चेतनात्मक आदान-प्रदान किया जाता है। साधना की आरम्भिक क्रिया द्विविध है- बाह्य और अंतरंग। बैठना दोनों में एक ही तरह से होता है। अन्तर मात्र ग्रहण व प्रेषण का होता हैं बाह्य-नाद को भी ब्रह्मनाद का श्रवण कहा जाता है।

नादयोग की साधना विधि का उल्लेख शिवपुराण में इस प्रकार है-

सुश्वासेन सुशय्यायां योगं पुंजीत योगवित्। दीपं विनांधकारे त प्रजाः सुप्तेषु धारयेत्॥ तर्जन्या विहितौ कर्णौ पीडयित्वा मुहूर्त्तकम्, तस्मात्संश्रूयते शब्द स्तुदंवहि समुभ्दवः॥ न श्रृणोति यदा श्रृंचन्योगाम्यासेन देविके। तस्मादुत्पद्यते शब्दा मृत्युजित्सप्तभिर्दिनैः॥

अर्थात्- लोगों के सो जाने पर थोड़ी रात्रि बीत जाने पर घोर अंधकार में- अच्छे आसन पर सौम्य श्वांसें लेता हुआ योगी नादयोग की साधना करें। तर्जनी उँगलियों से कानों के छेद बन्द रखें और अग्नि तत्व प्रेरित सूक्ष्म शब्दों को श्रवण करें। जब तक शब्द सुनाई न पड़े तब तक अभ्यास जारी रखें। प्रायः अभ्यास सातवें दिन से शब्द सुनाई पड़ता है।

नाद-योग के द्वारा सुनी जाने वाली ये दिव्य ध्वनियाँ अनन्त अन्तरिक्ष में बिना किसी प्रकृतिगत हलचल का आश्रय लिये स्वयमेव विनिःसृत होती रहती है। ये चेतन हैं, दिव्य हैं, अलौकिक, अभौतिक और अतींद्रिय हैं। इसीलिए इन्हें देव वाणी भी कहते हैं। उन्हें नादयोग के माध्यम से हमारा चेतन अन्तःकरण सुन सकता है। श्रवण का सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से है। अस्तु, सूक्ष्म एवं चेतन श्रवण भी शब्द-संस्थान के इसी प्रतिनिधि केन्द्र का सहारा लेकर सुना जाता है। इस तथ्य को समझने पर ही नाद-साधना में वास्तविक प्रगति संभव है।

नाद संकेत वे सूत्र हैं जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति-स्त्रोतों के साथ सूक्ष्म संपर्क संभव है। सूक्ष्मता को न समझा गया तो फिर स्थूल जगत की ही ध्वनियाँ सुनाई पड़ेंगी। उनसे भी कुछ भौतिक लाभ संभव है। किन्तु अध्यात्म का क्षेत्र सूक्ष्मता का ही है।

नाद योग के अभ्यास से आत्मचेतना को परिष्कृत ओर सूक्ष्म शरीर की कर्णेंद्रिय तन्मात्रा शब्द को परिष्कृत किया जाता है। इस आधार पर अदृश्य एवं अविज्ञात से संपर्क साधा जाता है और अतींद्रिय सामर्थ्य विकसित होती है।

नाद साधना के क्रमिक अभ्यास पर प्रकाश डालते हुये कहा गया है-

श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान्। वर्धमाने तथाभ्यासे यते सूक्ष्मातिसूक्ष्मतः॥ आदौ जलधि जामूतभेरी निर्झर सम्भवः। मधे मर्दल शब्दाभो घटाकालह जस्तथा॥ अंते तु किंकणीवंश वीणा भ्रमर निःस्वनः। इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते सूक्ष्म सूक्ष्मतः॥ महति श्रूयमाणे तु महाभेर्यादिकध्वनौ। तत्र सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत्॥ धनुमृत्युज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने। रममाणमपि क्षिपृं मनोनान्यत्र चालयेत्॥

अर्थात्- जब पहले पहल यह अभ्यास किया जाता है, तो यह नाद कई तरह का होता है और बड़े जोर-जोर से सुनाई देता है, परन्तु अभ्यास बढ़ जाने पर वह नाद धीमे से धीमा होता जाता है। शुरू में इस नाद की ध्वनि समुद्र, बादल, झरना, भेरी तरह होती है, परन्तु बाद में भ्रमर, वीणा-सी तथा किंकिणी की तरह मधुर होती है। इस तरह से वह ध्वनि धीमी से धीमी होती हुई कई तरह की सुनायी देती है। भेरी आदि की ध्वनि सुनने पर उसमें धीमे से धीमे नाद का विचार करना चाहिए। साधक को चाहिए कि वह धीमे से घने और घने से धीमे नाद में जाय और मन को इधर उधर न भटकने दे।

ॐकार की स्वर लहरियों को सुनने की नादयोग साधना कई दृष्टियों से बड़ी महत्वपूर्ण है। प्रथम तो दिव्य संगीत के सुनने में इतना आनंद आता है, जितना किसी मधुर वाद्य या गायन को सुनने में नहीं आता। दूसरे इस नाद श्रवण से मानसिक तंतुओं का प्रस्फुटन होता है। सर्प जब संगीत सुनता है, तो उसकी नाड़ियों में एक विद्युत-लहर प्रवाहित हो उठता है। मृग का मस्तिष्क मधुर संगीत सुनकर इतना उत्साहित हो जाता है कि उसे तन बदन का होश नहीं रहता। यूरोप में गायें दुहते समय मधुर बाजे बजाये जाते हैं जिससे उनका स्नायु समूह उत्तेजित होकर अधिक मात्रा में दूध उत्पन्न करता है। ये संगीत सूक्ष्म मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। अनाहत नाद का प्रभाव कारण शरीर पर पड़ता है। प्रणव-नाद का दिव्य संगीत सुनकर मानव अंतःकरण में भी ऐसी स्फुरण होती है, जिसके कारण अनेक गुप्त आंतरिक शक्तियाँ विकसित होती हैं। उनके द्वारा भौतिक और आत्मिक दोनों ही दिशाओं में प्रगति होती है।

नादयोग में कितने प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं। प्रायः परिचित ध्वनियाँ ही सुनाई पड़ती हैं। सूक्ष्मदर्शी साधक उनके पीछे उच्च संकेतों की विवेक बुद्धि के द्वारा सहज संगीत बिठा सकते हैं। कोयल की कूक, मुर्गे की बाग, मयूर की पीक, सिंह की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ शब्द सुनाई पड़ें तो उनमें इन प्राणियों के उच्चारण समय की मनःस्थिति की कल्पना करते हुए अपने लिए प्रेरक संकेतों का ताल-मेल बिठाया जा सकता है। कई बार रुदन, क्रंदन, हर्षोल्लास, अट्टहास जैसी ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। उसे अपनी अंतरात्मा का संतोष-असंतोष समझना चाहिए। कुमार्गगामी गतिविधियों से असंतोष और सत्प्रवृत्तियों से संतोष स्पष्ट है। आत्म-निरीक्षण करते हुए आत्मा को समय-समय पर अपनी भली-बुरी गतिविधियों पर संतोष-असंतोष प्रकट करने के अवसर आते हैं। इन्हीं की प्रतिध्वनि हर्ष, क्षोभ व्यक्त करने वाले स्वरों में सुनाई पड़ती रहती है। किस ध्वनि के पीछे क्या संकेत, संदेश, तथ्य हो सकता है, उसे नाद योगी की सहज बुद्धि ही समयानुसार निर्णय करती चलती है। दिव्य ध्वनियों में किसी न किसी स्तर की उच्च प्रेरणाएं होती हैं और इन ऊपर की पंक्तियों में सर्प को बीन सुनाई पड़ने का उल्लेख करते हुए उनके अभिप्राय का संकेत किया गया है। इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार की ध्वनियाँ नाद-योग के साधकों को सुनाई पड़ती हैं। इनकी संगति इस प्रकार बिठाई जा सकती है। भगवती सरस्वती अपनी वीणा झंकृत करते हुए ऋतम्भरा प्रज्ञा और अनासक्त भूमा के मृदुल मनोरम तारों को झनझना रही है, और अपनी अंतःचेतना में वही दिव्य तत्व उभर रहे हैं।

इन विविध ध्वनियों के जो अभिप्राय संकेत अंतःकरण में उभरें, उन्हें ही पर्याप्त समझना चाहिए। उनकी बहुत रहस्य भरी व्याख्याओं के लिए सिर खपाने के बजाय, यह ध्यान में रखा जाय कि इन सब का प्रयोजन एक ही रहता है कि हमें आज की स्थिति से ऊपर उठकर उच्च भूमिका के लिए द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिए तथा साहस भरा कदम उठाना चाहिए।

नाद-साधना की इन क्रमिक प्रक्रियाओं के अभ्यास की चरम सार्थकता उस मूल ॐकार ध्वनि से पूर्ण तादात्म्य में है, जो सृष्टि मात्र के क्रिया-व्यापार का हेतु है। जो सृष्टि की समस्त शक्तिधाराओं का, ऊर्जा-प्रवाहों का केन्द्र एवं स्रोत है। व्यष्टि-सत्ता को समष्टि-केन्द्र से जोड़ने में समर्थ नाद-साधना के सभी अभ्यासों का लक्ष्य उसी एक परम तत्व की अनुभूति है, जिसे भारतीय मनीषियों ने प्रणव ध्वनि, उद्गीथ, अनाहत ब्रह्मनाद आदि कहकर पुकारा है।


अग्निहोत्र अर्थात् प्राणोद्दीपन

यज्ञ को भारतीय धर्म और संस्कृति का पिता कहा गया है। अग्निहोत्र जो प्रधानतः यज्ञ का अग्निपरक क्रिया-कलाप है, परम पवित्र, श्रेष्ठतम कर्मों में गिना जाता है। इससे वायु शुद्ध, रोग निवृत्ति, आत्मबल वृद्धि, प्राणवर्षा, वातावरण में सत् तत्व प्रवाह की वृद्धि जैसे अनेकों लाभ भी हैं। पर यह यज्ञ का मात्र एक स्थूल रूप है। जिस ज्वलन्त अग्नि को हवन-कुंड में स्थापित कर पूजा जाता है, वह एक प्रतीकात्मक प्रक्रिया ही समझी जानी चाहिये।

अग्नि भगवान के स्थूल रूप की स्तुति हेतु मंत्रों, श्रद्धायुक्त कर्मकांडों तथा दिव्य गुणों से युक्त वनौषधियों की आहुति दी जाती है। सूक्ष्म पूजन अग्निरूपी तेजस्विता को अन्तःकरण में धारण करने से ही होता है। इन्हीं गुणों को आत्मसात करने से मनुष्य अग्नि रूप बन जाता है। अग्नि भगवान से प्रार्थना ही जाती है-

ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेद स्तेन इध्मस्व वर्धस्य च इद्धयवर्धय। -आश्वलायन गृह्य सूत्र

“है अग्नि देव! आप प्रदीप्त होओ और हमें भी प्रदीप्त करो। जो गुण आपके अंदर हैं, वे ही हम धारण करें ऐसी सामर्थ्य दो।”

अग्नि का, यज्ञकुण्ड का सूक्ष्म दिव्य रूप मानवी पिण्ड में वैश्वानर के रूप में विद्यमान है। उसका केन्द्र है मूलाधार स्थित कुंडलिनी शक्ति। यही अग्नि संपर्क शरीर के अंदर प्राणरूप में प्रवाहित होकर जीवन का संचार करता है। इस दिव्य ज्योति की आभा अंतःकरण में सदा जाज्वल्यमान रहती है। इस दिव्य अग्नि की साधना, अर्चना को ही अग्नि पूजा, यज्ञ-प्रक्रिया का आध्यात्मिक स्वरूप कहते हैं।

बाहर प्रज्वलित अग्नि (यज्ञ रूप में) तथा अन्तः में प्रतिष्ठित दिव्य-ज्योति के रूप में शरीर की सूक्ष्म संरचना से उसका संबंध शास्त्रकार इस सूत्र में प्रतिपादित करता है-

‘‘अविदन्ते अनिहितं यदासीन यज्ञस्य धाम परमं गुहायत्।’’ -ऋग्वेद

यज्ञ का वास्तविक स्थान हृदय रूपी गुफा में है। वह अत्यन्त गुप्त है। परन्तु ज्ञानी सत्पुरुष उसे प्राप्त कर लेते हैं।

ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित सहस्रार चक्र को ब्रह्माण्ड अग्नि कहा गया है। इसे ही सोम की उपमा भी दी गयी है। चन्द्रमा की चर्चा इसके रूप में करके यह बताया जाता है कि यहाँ शाँति और शीतलता का अमृत भरा पड़ा है। इसे शिव कहते हैं एवं कुंडलिनी को शक्ति। कुंडलिनी रूपी अग्नि मानवी काया में निरन्तर विद्यमान रहती है, पर जब तक सोमरूपी अमृत घृत का इस अग्नि में हवन नहीं किया जाता, तब तक वह जागृत नहीं होती- तथा यज्ञ का उद्देश्य पूरा नहीं होता। आत्मा रूपी अग्नि और सोमरूपी ब्रह्म का परस्पर समन्वय, एक-दूसरे में लय ही आत्म यज्ञ है। शिव रूपी सोम तथा शक्ति रूपी अग्नि की संयोग प्रक्रिया ही, कुंडलिनी जागरण की साधना है। अग्निहोत्र प्रक्रिया के पीछे इसी सूक्ष्म दर्शन का संकेत मिलता है। मनुष्य की महत्ता के विस्तार के सारे आयाम यज्ञ दर्शन में सन्निहित हैं।

शास्त्रकार कहते हैं-

द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। आर्द्रचैवशुष्कं च यद्रार्द्र तत् सौम्यं यच्छुष्कं तदाग्नेयम्॥ -शतपथ.

यह संसार दो पदार्थों से मिलकर बना है। अग्नि और सोम। इसके अतिरिक्त तीसरा कुछ नहीं।

यह अग्नि जब सूक्ष्म रूप में शरीर के प्राणकोषों की जैवविद्युत, मन की विचार तरंगों तथा आत्मा की सूक्ष्मतम सत्ता को प्रभावित करती है तो उन्हें अपने जैसा ही प्रकाशवान, देदीप्यमान बना लेती है। मनुष्य जीवन में नया प्रकाश पाता है। उसे घने अंधेरे में भी सत्पथ दिखाई देने लगता है।

शरीर-व्यापी अग्नि, विश्वव्यापी महाअग्नि का ही एक स्फुल्लिंग है। ब्रह्माग्नि, देवाग्नि और प्राणाग्नि। ये चेतना के तीन स्तर हैं। ब्रह्माग्नि वह महत् तत्व है जो जड़-चेतन सबमें सर्वव्याप्त है। देवाग्नि का केन्द्र सविता है एवं प्राणाग्नि का उद्भव अन्न अर्थात् समस्त वनस्पति जगत से होता है। यज्ञाग्नि में भी इन तीनों अग्नियों का प्रतीक लिया जाता है- दक्षिणाग्नि गार्हपत्याग्नि, आह्मनीयाग्नि। विश्व का आधारभूत सर्वव्यापक ब्रह्म प्राणिजगत की उत्कृष्टता- देवशक्ति तथा शरीरधारियों में विद्यमान हलचल- जीवात्मा का ये तीन अग्नियाँ क्रमशः प्रतिनिधित्व करती हैं।

जीव को ईश्वर का अंश माना जाता है। इस लघु घटक में उस महान के सारे तत्व विद्यमान हैं। इस ब्रह्माग्नि-आत्माग्नि की प्रार्थना उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ पा लेता है जो इस विश्व के राजकुमार के रूप में उसके लिये अभीष्ट है। इन्हीं तथ्यों के संकेत शास्त्रकार इस तरह देते हैं।

अग्निऋषिः पवमानः पंचजन्यः पुरोहितः तमीमहे महागयम्। -ऋग्वेद

यह अग्नि- ऋषि है। पवित्र करने वाली है। पंचकोशों का मार्गदर्शन है। इस महाप्राण की हम शरण में जाते हैं।

अग्ने विवस्वदुष सश्चित्रं राधो अमत्यी। आ दाशुषे जातवेदो वहात्वमद्या देवां उषर्बुधः॥ -ऋग्वेद

हे अग्नि! मेरे जीवन की ऊषा बनकर प्रकटो। अज्ञान के अंधकार का दूर करो। ऐसा आत्मबल प्रदान करो जिसे देवों का अनुग्रह खिंचा चला आये।

अग्नि से प्रार्थना कर ऋषि अपने अन्दर उदात्त भावनाऐं, साहस, उत्थान की प्रेरणा, पवित्रता, प्रतिभा आदि गुणों को विकसित करने की अभ्यर्थना करता है। जैसे-जैसे अन्दर यह अग्नि प्रखर होती जाती है, वैसे-वैसे उसका स्तर और पद बढ़ता जाता है। यह उन्नति ऋषि राजर्षि, ब्रह्मर्षि, देवर्षि के रूप में होती है। ब्रह्माग्नि के ये ही चार स्तर हैं जो पदार्थों और जीवों के उनकी पात्रता के अनुपात में मिलते हैं। ऋग्वेद इन स्वरूपों का वर्णन इस प्रकार करता है-

त्वग्ने वरुणो जायसे यत्। त्वं मित्रों भवसि यत्समिद्धः। त्वे विश्वे स्रहसस्पुत्र देवा स्त्वनिन्द्रो दाशुषे भर्त्याय॥

इस अग्नि के चार स्वरूप हैं। वह जब उत्पन्न होती है तो वरुण कहलाती है। जब प्रदीप्त होती है, तब उसे मित्र कहते हैं, जब प्रचण्ड होती है तब विश्वेदेवा तथा अन्त में इन्द्र बनकर होता के लिये पर ऐश्वर्य प्रदान करती है।

अग्नि का शिक्षण तथा प्रेरणा हमें अग्निहोत्र के रूप में सतत् मिलता रहता है। यज्ञ के प्रधान देवता अग्नि के मुख में हवन सामग्री डालते समय परमात्मा की निकटता अनुभव की जाती है। एवं उन विशेषताओं का स्मरण किया जाता है जिन्हें जीवन में उतारने का शिक्षण अग्नि देवता से मिलता है। यह शिक्षण है उष्णता का- अपने विचारों तथा कार्यों में तेजस्विता के समावेश का- अपनी विशेषताओं से अपने निकटवर्तियों को सद्गुणी बना लेने का- जीवन की नश्वरता को समझते हुए जीवन को उत्कृष्ट बनाने का। अग्नि की ज्वाला सदा ऊपर की ओर चलती है वह हम ऊर्ध्वगामी दृष्टिकोण ऊंचे चिंतन की ओर प्रेरित करती है। अग्नि में डाली गई वस्तुएं सूक्ष्मतम घटकों में परिवर्तित होकर विस्तृत हो जाती हैं। उदारता, अपरिग्रह, स्वार्थ नहीं परमार्थ का सतत् शिक्षण देती हुई हव्य वस्तुएं वायुभूत हो जाती हैं।

जिस तरह अग्नि यज्ञ-कुंड में प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानाग्नि अन्तःकरण में, तपाग्नि इन्द्रियों में तथा कर्मग्नि देह में प्रज्वलित रहनी चाहिये, यही यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप है। अपनी संकीर्णता, अहंता, स्वार्थपरता को जो इस दिव्य अग्नि में होम देता है, वह बदले में इतना प्राप्त करता है, जिससे नर को नारायण की पदवी मिल सके। यज्ञ कर्म के पीछे निहित इन शिक्षाओं को समर्थन- हृदयंगम किया जाना चाहिए। इस चिन्तन के अभाव में केवल स्थूल लाभ मात्र ही प्राप्त किये जा सकते हैं।


महाकाल का गतिचक्र और अनुशासन

समयानुसार हर काम को नियत नियमित रूप से करना- यह ऐसा अनुशासन है जिसे पालन करने से ही प्राणियों की जीवनचर्या व्यवस्थित रूप में चलती है। जो इसमें व्यतिरेक करते हैं, प्रकृति के शासन में अराजकता उत्पन्न करने की घृष्टता करते हैं, वह अपराधियों की तरह दण्डित होते रहते हैं।

ग्रह-नक्षत्रों की अपनी गति, दिशा, परिधि और विधि-व्यवस्था है। जब तक वह निर्धारण ठीक चलता है उनका अस्तित्व बना रहता है। जैसे ही पदार्थ जगत का कोई घटक अथवा प्राणी जगत का जीवधारी व्यतिरेक क करने की घृष्टता करता है वैसे ही उसे अनुशासन हीनता का दण्ड भुगतना पड़ता है।

इन अनुशासनों में समय का परिपालन एक ऐसा अंकुश है जिसे स्वीकारने में ही खैर है। नियमितता का अर्थ है हर काम को यथा समय बिना किसी आलस्य, प्रमाद अपनाये सम्पन्न करना। इसी आधार पर समस्त सृष्टि का क्रम चल रहा है। प्रकृति ने इस परिपालन के लिए हर किसी को एक ऐसी घड़ी दी है जिसके सहारे उसे न केवल समय का सही-सही ज्ञान होता रहे, वरन् ठीक समय पर ठीक काम करने की प्रेरणा भी उठती रहे।

जीवधारी इसी आधार पर अपनी सुनियोजित जीवनचर्या चलाते हैं। हर प्राणी की काया भी अपने नित्यकर्म एवं प्रवाह निर्धारण में इसी प्रकाश का अवलम्बन किये करती है। उसकी स्थिरता एवं प्रगति का यही प्रधान आधार होता है। व्यतिक्रम जहाँ भी- जिस अनुपात में भी प्रस्तुत होता है, वहाँ उसी परिमाण में विग्रह एवं संकट सामने आ खड़ा होता है। काल चक्र का अनुगमन नियमितता का परिपालन किसी प्रकार इस समूची सृष्टि व्यवस्था के अन्तराल में चल रहा है और प्राणि वर्ग किसी प्रकार उस अनुबन्ध का शिरोधार्य करके चल रहा है। यह दृष्टव्य है।

घड़ियां तो आपने कई प्रकार की सुनी होंगी। बहुत से लोग धूप और तारों की स्थिति देखकर समय का अंदाजा लगाते हैं। ठीक है मनुष्य के पास बुद्धि है, वह सोच सकता है। आजकल तो बिना घड़ी के आपका काम ही नहीं चल सकता, समय का ठीक-ठीक हिसाब रखने के लिए मनुष्य घड़ियों का निर्माण और उसमें सुधार करता रहा है। आज उसके पास ऐसी घड़ियां हैं जो लाखों साल में भी एकाध सेकेंड से अधिक की गलती नहीं करतीं, परन्तु पेड़, पौधे और अन्य जीवधारी कैसे समय का हिसाब रखते हैं और उन्हें यह कैसे पता लगता है कि अब दिन का कौन-सा समय है इसका उतर जानने के लिए बहुत से जैव वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं।

यह सर्वविदित है कि कुछ जीवधारी राज की अपेक्षा दिन में अधिक क्रियाशील होते हैं। सत्य तो यह है कि संभवतः ऐसा कोई भी पौधा अथवा जीवधारी नहीं होगा जिसके जीवन का कार्यक्रम एकदम घड़ी की सुइयों के समान न होता हो।

समझा जाता है कि जीवित पदार्थों की प्रतिदिन के कार्यक्रम की लयबद्धता वातावरण के सीधे जीवाणुओं पर प्रभाव डालने के कारण होती होगी। एक मान्यता यह भी है कि तापक्रम अधिकांश जैविक प्रक्रियाओं की गति को प्रभावित करता है। यह सोचना असंगत नहीं होगा कि दिन और रात्रि के चक्र भी जीवाणुओं की क्रियाशीलता में विविधता लाते हैं।

बात इतने तक ही सीमित नहीं है कि गहन अनुसंधान इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि जीवाणुओं, पशु तथा पौधों में निश्चित रूप में एक जैविक घड़ी पायी जाती है। जैविक घड़ी कुछ इस प्रकार की वस्तु है जो जीवधारियों तथा पौधों में निहित होती है। इस घड़ी द्वारा जीव-जन्तु अपने वातावरण के तालबद्ध परिवर्तन को पूर्वाभासित कर लेते हैं तथा उसी के अनुसार अपने को ढाल लेते हैं।

यह बात तो हम अपने अनुभव से भी जानते हैं कि समय की गतिविधि का ज्ञान आन्तरिक संवेदना से ही जाना जाता है, न कि सुई वाली घड़ी से। समयानुसार ही शरीर की क्रियात्मक विधियों में परिवर्तन होते हैं। हमारी नाड़ी की गति गुर्दों की क्रिया, शरीर का तापक्रम यह सब एक दैनिक लयबद्धता दर्शित करती है। यह लयबद्धता किसी भी तरह से हमारे वातावरण के परिवर्तन की सहज क्रिया नहीं है।

जैविक घड़ियों का अध्ययन निम्न जाति के जन्तुओं में अधिक सरलता से किया जा सकता है, यह अनुसंधान इन दिनों संसार की कई प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है।

फल मक्खी अपना जीवन एक सूडी के रूप में प्रारम्भ में करती है इसके उपरान्त कोष विकसित होता है, तदुपरान्त पूर्ण फल मक्खी बन जाती है, सामान्यतः मधुमक्खियाँ कोष से पूर्ण मक्खी प्रातः काल में बनती है।

वास्तव में यह है भी आवश्यक, क्योंकि नवजात फल मक्खी का बाह्य चर्म बहुत ही मुलायम होता है। जिससे पानी जल्दी ही वाष्पित होकर उड़ सकता है और बाह्य चर्म बड़ी ही जल्दी कठोर हो जाता है। पर यदि फल मक्खी दोपहर में जन्म ले तो उसके बाह्य चर्म कठोर होने से पहले ही पानी में उड़ जायेगा क्योंकि दोपहर के समय नमी कम और गर्मी ज्यादा होती है, इसके अलावा हवा में नमी की कमी के कारण उसके पंख भी भली प्रकार से नहीं फैल पायेंगे। अतः कोष प्रातःकाल जो औसतन दिन का सबसे आंद्र एवं ठण्डा समय होता है कि समय परिपक्व होकर निकलते हैं। यह यथासमय उत्पत्ति जैविक घड़ी द्वारा ही संचालित होती है।

यह तो जैविक घड़ी का एक ही उदाहरण है, परन्तु अन्य सभी प्रमाण एक ही निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं। व्यवहारिक रूप से सभी मुख्य समूहों के जीवाणुओं में यह जैविक घड़ियाँ किसी न किसी रूप में पाई जाती हैं। और सभी प्रकार की क्रियाओं का नियंत्रण करती हैं। इस भू-मण्डल पर जिन जीवित जन्तुओं का विकास होता है तथा उनके प्रत्युत्तर में वे अपने जीवन क्रम को वातावरण के अनुरूप ढालने में प्रयत्नशील होते हैं। अगर वे इस प्रकार न करें तो वातावरण उनको विषम परिस्थितियों में ढालकर झकझोर दे और तोड़-मोड़ कर रख दे।

द केस फोर एस्ट्रालॉजी में अनेकों वैज्ञानिक उद्धरण पृथ्वी के वातावरण, जीवों, वृक्ष, वनस्पतियों पर ग्रह-नक्षत्रों के पड़ने के दिए हुए हैं। प्राणी जीवन की एक घड़ी होती है। जिससे वायोलॉजिकल कहते हैं। इस घड़ी का सूर्य चन्द्रमा आदि ग्रहों के प्रभाव होने का पता चलता है। वैज्ञानिक ए. ब्राउन ने सिद्ध किया है कि मटर के दाने, आलू चूहे, केकड़े, सीपियाँ सभी की भीतरी घड़िया सूरज और चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती हैं। इन प्रभावों का रोशनी से कोई संबंध नहीं है। यदि इन जीवों को अंधेरे में बंद कर दें तब भी सूर्य और चन्द्र की गति के अनुसार उनका क्रम चलता रहेगा। पड़वा के चाँद में गतिविधि सर्वाधिक शिथिल और पूर्णिमा के चाँद में सबसे अधिक सक्रिय होती है। ब्राउन ने समुद्र से हजारों मील दूर अंधेरे में रखकर दिखाया कि वहाँ भी चन्द्रमा की स्थिति के अनुरूप ही सीपियाँ खुलती बंद होती हैं।

फ्रीवर्ग यूनिवर्सिटी के डा. ई. एफ.आर. ने वर्वलर नामक से छोटे पक्षी का अध्ययन किया। ये पक्षी ग्रीष्म ऋतु के अंत में दक्षिण दिशा से होते हुए यूरोप से अफ्रीका की यात्रा करते हैं। एक रात में सौ-सौ मील की यात्रा करते हैं। बसंत में उत्तर की ओर यात्रा करते तथा वहीं अंडे देते एवं सेते हैं। अगले ग्रीष्म में बच्चों सहित शीतकाल अफ्रीका में बिताने के लिए निकल पड़ते हैं। डा. सौर ने कुछ अंडों को ध्वनि निरोधी कक्षा में सेकर उनसे निकले बच्चों को वहीं एक कमरे में बन्द रखा तथा आहार देते रहे। पूरे वर्ष उन्हें गर्मी उसी प्रकार मिलती रही जैसे कि वे अफ्रीका में रह रहे हों किन्तु जैसे ही हेमन्त ऋतु आयी, कमरे में बंद पक्षी बेचैन हो उठे, बाहर निकलने के लिए फड़फड़ाने लगे। उनकी विचित्र गतिविधियाँ तब जाकर रुकीं जब वे अफ्रीका पहुँच गए। पुनः बसंत आने पर पुनः वापस लौटने के लिए पक्षी बेचैन हो उठे। यह बात का प्रतीक है कि पक्षियों में मौसम एवं स्थान की जानकारी बाह्य वातावरण से नहीं उनकी अंतःसंरचना के आधार पर प्राप्त होती है।

उत्तरी ध्रुव में पैदा होने वाले ‘टर्न’ पक्षी भी छः हफ्ते के होते ही 11000 मील की यात्रा पूरी करके दक्षिणी ध्रुव पर पहुँच जाते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में जब दिन छोटे होने लगते हैं तो पुनः वापिस उत्तरी ध्रुव पर पहुँच जाते हैं। साइबेरिया से भी हजारों पक्षी भारत जाड़े में आते हैं।

प्रवासी पक्षी विशाल भूखण्डों, पर्वतों एवं सागरों के ऊपर उड़ते हुए बिना किसी दिशासूचक यंत्र मानचित्र या पथ-प्रदर्शक की सहायता से अपनी यात्रा करते हैं। कुछ पक्षी केवल दिन में, कुछ केवल रात्रि में और बहुत से दोनों समय यात्रा करते हैं।

फलडरक्रैव नामक केकड़ा जो अपने पंजे वायलिन की तरह उठाए रहते हैं। प्रत्येक सुबह सूरज निकलते ही केकड़े की त्वचा श्यामल होने लगती है। दोपहर तक त्वचा काली हो जाती है, शाम होते ही त्वचा का रंग उड़ने लगता है। बंद अंधेरे कमरे में भी रखा गया तो देखा गया कि बिना सूर्य की रोशनी के प्रभाव के भी उसी प्रकार के परिवर्तन होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सूर्य की गति को जानने का कोई विशिष्ट यंत्र इन छोटे जीवधारियों में होता है। जो धूप, छांव या अन्य किसी मनुष्य द्वारा निर्मित घड़ी की बिना सहायता के ही अपना नियमित क्रिया-कलाप विधिवत यथासमय चलाते रहते हैं।

करोड़ों वर्षों से प्राणियों की जीवन संचार प्रक्रिया एक क्रमबद्ध, तालबद्ध, विधि-व्यवस्था के साथ जुड़ी चली आ रही है और नियति के अनुशासन का विधिवत् पालन करते हुए अपना निर्वाह क्रम बनाये रख रही है। यह अनुशासन धरती की चुम्बक शक्ति का है या सूर्य की ताप ऊर्जा का अथवा प्राणियों की स्वतंत्र चेतना का? यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। हो सकता है इस व्यवस्था में उपरोक्त तीनों ही तथ्यों का समन्वय समावेश हो।

कालचक्र के अंतर्गत इस सृष्टि का संचालन एवं नियमन करने वाली अदृश्य शक्ति को ‘महा काल’ कहा गया है। उसकी इच्छा और व्यवस्था यही है कि हर किसी को मर्यादा में चलना चाहिए और समय संबंधी नियमितता का सतर्कतापूर्वक परिपालन करना चाहिए। समय के प्रत्येक क्षण को जीवन सम्पदा का अति महत्वपूर्ण घटक मानने और उसकी एक-एक घड़ी का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने वाले ही काल जनी बने हैं। सफलताओं ने उन्हीं के चरण चूमे हैं। नियति के अजस्र अनुदान पाने के अधिकारी भी वे रहे हैं। समय के साथ खिलवाड़ करने वाले ही पतनोन्मुख परिस्थितियों में पड़े रहते हैं, और वे ही हाथ मलते, सिर धुनते देखे जाते हैं।


Quotation

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्। ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते एतद्वैतत्॥

जो इस जीवन देने वाले, कर्म फल देने वाले और कठोर शासन करने वाले परमेश्वर को अपने निकट देखता है, सो घृणित गतिविधियाँ नहीं अपनाता।


अपनों से अपनी बात- वरिष्ठ परिजन ‘प्रज्ञापुत्र’ की भूमिका निबाहें

‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों को ‘प्रज्ञा परिजन’ कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। वे लम्बी अवधि से जिसे माता का दूध पीते रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया सीता पुत्र लव-कुश, शकुन्तला पुत्र भरत, गंगा पुत्र भीष्म, अंजनी पुत्र हनुमान जैसी ही होनी चाहिए। कामधेनु गौ का दूध पीकर स्वर्गलोक के निवासी देवत्व से परिपूर्ण होते हैं। अपना और अपनी पयस्विनी का गौरव बढ़ाते हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ को कामधेनु तो नहीं कहा जा सकता और न वह सीता, शकुन्तला, गंगा, अंजनी की श्रेणी में खड़ी होती है, फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उसका पयपान करने वाले शिवाजी, नैपोलियन, विनोबा स्तर के अवश्य हो सकते हैं। माता के दूध की समय-समय पर बोलचाल के मुहावरों में चुनौती दी जाती रही है। वह निरर्थक नहीं है। ‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रस्तुत प्रेरणाओं को सम्बद्ध व्यक्ति किसी समर्थ पयस्विनी से कम नहीं मानते, आँकते रहे हैं। इस मान्यता में बहुत कुछ तथ्य भी है।

‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के प्रज्ञापरिजनों को युग संधि के पावन पर्व पर कुछ विशेष उत्तरदायित्व वहन करने के लिए कहा जायेगा तो वे उसे भी उसी श्रद्धा भावना के साथ शिरोधार्य करेंगे जैसा कि पिछले दिनों समय-समय पर किये गये अनुरोधों का उत्साहपूर्वक परिपालन किया गया है। अनिवार्य व्यस्तता रहने पर कईयों की परिस्थिति सामूहिक प्रयासों में सम्मिलित हो सकने जैसी नहीं होती। फिर भी भावनाशीलों के लिए यह तनिक भी कठिन नहीं है कि वे सामान्य जीवन के निर्धारित कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ युग धर्म के निर्वाह के निमित्त भी यथासंभव कुछ करते रहें। व्यसनों की पूर्ति के लिए लोग घोर व्यस्तता रहते हुए भी किसी न किसी प्रकार समय निकालते और पैसा खर्च करते देखे जाते हैं। यदि युग धर्म के निर्वाह को भी एक व्यसन की तरह अपनाया जा सके तो निश्चय ही परिस्थितियों के प्रतिकूल रहते हुए भी हर व्यक्ति कुछ न कुछ करते रहने की सुविधा उत्पन्न कर सकता है।

इन दिनों ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में से जो प्राणवान हैं उनसे एक अनुरोध किया जा रहा है कि वे अपने संपर्क क्षेत्र में युगान्तरीय चेतना का आलोक पहुँचाने का प्रयास करें। यह आरम्भ में ही कुछ अटपटा और अनख जैसा लगेगा पर थोड़े ही समय तक अपनाये रहने पर प्रतीत होगा कि वह कितना सरस, कितना सरल और कितना अधिक श्रेयस्कर है। ‘प्रज्ञापुत्र योजना’ की गत अंक में चर्चा हो चुकी है। नव प्रकाशित ‘प्रज्ञा अभियान’ पत्रिका की छः प्रतियाँ मंगाना और उसकी हर प्रति को 4 विचारशीलों तक पढ़ाने, पहुँचाने का उपक्रम अपनाकर एक छोटी स्वाध्याय मण्डली चलाई जा सकती है। नव प्रकाशित ‘प्रज्ञा अभियान’ मासिक ‘युग-निर्माण योजना’ मथुरा के तत्वावधान में इसी वर्ष से प्रकाशित होना आरम्भ हुआ है। उसका वार्षिक मूल्य लागत से भी कहीं कम छः रुपया मात्र रखा गया है। दस पैसा नित्य ज्ञानघट में जमा करने युग निर्माण सदस्यता शर्त जो अपनाये हुए हैं, वे इस राशि को एक वर्ष का पेशगी 36 रुपये भेज कर छः प्रतियाँ मंगाने और उन्हें अपने संपर्क क्षेत्र में 14 को पढ़ाते रहने का क्रम अत्यन्त सरलतापूर्वक कर सकते हैं। यह स्वाध्याय मण्डली गठित कर सकने में जो सफल हो गये, समझना चाहिए उनने पहला मोर्चा फतह कर लिया। इस मंडली को भावात्मक नव-निर्माण की आत्म-कल्याण एवं लोक-कल्याण की गति विधियाँ अपनाने का अवसर मिलेगा। साथ ही वे अपने संपर्क क्षेत्र में युग आलोक को सुविस्तृत करने में भी योगदान देने लगेंगे।

इस वर्ष से पच्चीस पैसा मूल्य वाले युग साहित्य का अभिनव प्रकाशन आरंभ हुआ है। 360 पुस्तिकाएं छापी जा रही हैं। उन्हें हर शिक्षित तक बिना मूल्य घर बैठे निर्मित रूप से पहुँचाने वापिस लेने का उपक्रम चलाने की योजना है। हर दिन एक नई पुस्तिका 360 व्यक्तियों तक पहुँचाने का सिलसिला एक सैट मंगा लेने पर चलता रहता है। एक से दूसरे को दूसरे से तीसरे को तीसरे से चौथे को देने का क्रम बिना किसी कठिनाई के चलाया जा सकता है। एक वर्ष में 360 पुस्तकें छपेंगी। इनकी लागत 90 रुपये बैठती है। यह प्रकाशन तीन किश्तों में होगा। अप्रैल में, अगस्त में, दिसम्बर में। हर किस्त में 120 पुस्तिकाएं छपेंगी जो 30 रुपये की होंगी। कमीशन तो इस लागत से भी कम मूल्य वाले प्रकाशन पर किसी को नहीं दिया जा सकता। पर 30 रुपये का साहित्य लेने पर डाकखर्च या रेलवे खर्च संस्था अपनी ओर से लगा देगी। यह साहित्य इस वर्ष हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती में छापा जा रहा है, अगले वर्ष मराठी बंगला तथा उड़िया में प्रकाशित होने लगेगा। तीसरे वर्ष दक्षिण भारत की तीन भाषाओं में इस प्रकाशन योजना है, प्रयत्न यह होगा कि विश्व की अन्य भाषाओं में भी वहाँ की आवश्यकताओं के अनुरूप युग साहित्य प्रकाशित करने का सिलसिला चल पड़े।

लेखन और प्रकाशन के लिए कितने मनोयोग, श्रम व साधनों की आवश्यकता पड़ती है। इसे उस तंत्र के निकट संपर्क में रहने वाले ही जानते हैं। इसे जुटाने की जिम्मेदारी अभियान के सूत्र संचालकों के कंधों पर आ गई। परिजनों को इसकी भागीदारी अपने क्षेत्र के शिक्षितों को पढ़ाने के रिपु में लेनी है। प्रथम संपर्क में जिन 24 को प्रज्ञा अभियान पढ़ाने के माध्यम से निकटवर्ती सुरुचि सम्पन्न बनाया गया था। उनमें से जो रस लेने लगे उनकी सहायता से 360 व्यक्तियों तक युग साहित्य पहुँचाने, वापिस लेने की योजना बिना किसी कठिनाई के चल सकती है। उनमें से हरेक को अपने निकट संपर्क के लोगों को इसे पढ़ाते रहने का काम सौंपा जा सकता है। संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसका वास्ता दस-बीस शिक्षितों से न पड़ता हो। अन्य बातों के अतिरिक्त युग-साहित्य देने वापिस लेने की प्रक्रिया भी चलती रह सकती है। अच्छा तो यह होता कि घरों पर जाकर देने और वापिस लेने की बात बनती। कोई इसके लिए नियमित समय देता। अवैतनिक सेवा साधक न मिलते तो कुछ घण्टे का पारिश्रमिक देकर यह कार्य कराया जाता। पर इतना न बन पड़े तो मिल-जुलकर भी यह कार्य सम्पन्न होता रहे, ऐसी व्यवस्था बन सकती है।

‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रिय परिजनों की संख्या लाखों में है। उनमें से मात्र 24 हजार से तो इस नये उत्तरदायित्व को वहन करने की आशा अपेक्षा की ही जा सकती है। अपने विशालकाय भाव सम्पन्न परिवार में इतने लोगों की उदारता एवं सेवा साधना इस ऐतिहासिक अवसर पर उपलब्ध होने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह अग्रणी समुदाय अपने साथी सहचरों की सहायता से 360 किश्तों तक नियमित रूप से हर दिन युग साहित्य पहुँचाने का प्रबन्ध कर सके तो पाठकों की संख्या आठ करोड़ चार लाख होती है। यह संख्या देश के अधिकांश शिक्षितों तक अपना आलोक पहुँचा सकेगी। इतने लोग नियमित रूप से इस प्रेरणा प्रवाह के साथ जुड़ सकें तो ऊर्जा उतने तक ही सीमित न रहेगी वरन् सूर्य किरणों की तरह क्रमशः व्यापक बनेगी। एक से दूसरे ते उछलती हुई समुद्र की लहरों की तरह विशाल क्षेत्रों में अपने अस्तित्व का परिचय देगी। अशिक्षित भी इस प्रेरणा प्रवाह से वंचित न रहेंगे।

विचार-क्रान्ति की सामर्थ्य का अभी लोगों को परिचय नहीं है और न उस अविज्ञात पर विश्वास ही है। पर जब कभी तथ्यों को समझने और उसका प्रभाव देखने का अवसर मिलेगा तो विदित होगा कि पतनोन्मुखी दुष्प्रवृत्तियों के भाव प्रवाह में भी अपनी सामर्थ्य है। पतन ही नहीं उत्थान भी सशक्त होता है। देव और दानवों की तरह दोनों ही अवसर मिलने पर अपना चमत्कार दिखाते हैं। प्रस्तुत विनाशकारी विभीषिकाओं के मूल में मानवी दुश्चिंतन की ही प्रधान भूमिका है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री होती है। चिंतन की सामर्थ्य संसार की सर्वोपरि शक्ति समझी जा सकती है। उत्थान और पतन की समूची भूमिका विचार चेतना का प्रवाह ही सम्पन्न करता रहता है। वर्तमान संकट के मूल में दुर्बुद्धि का ही कृत्य झाँकता है। उसे उबारने के लिए सद्विचार एवं भावना को ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा करना होगा। उन्हीं के पराक्रम से विनाश एवं विघटन को निरस्त किया जा सकेगा। साहित्य एवं कला के विभिन्न पक्षों ने मनुष्य को अवांछनियता की गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रवृत्त किया है। यह क्रिया का मूल चिंतन है, दर्शन का स्तर ही व्यक्ति एवं समाज को पतन के गर्त में गिराता और उत्थान के उच्च शिखर पर पहुँचाता रहा है।

यों आंखों से देखने और मोटी बुद्धि से समझने में घटनाओं परिस्थितियों वस्तुओं एवं व्यक्तियों के श्रेय अपयश दिया जाता है और उन्हें ही सुधारने बदलने का उपक्रम चलता रहता है। इतने पर भी देखा यह गया है कि जहाँ तक दुष्प्रवृत्तियों का संबंध है वह प्रत्यक्ष कारणों से कम और मान्यता एवं भावना क्षेत्र से ही अधिक उद्भूत होती हैं। जड़े यों दिखती तो नहीं पर विशालकाय वृक्ष के उत्थान पतन में उन्हीं की भूमिका प्रमुख होती है। ठीक यही बात प्रत्यक्ष परिस्थितियों के संबंध में है, उन्हें लोक-चिंतन की जनमानस के स्तर की परिणति ही कहा जा सकता है। इस तथ्य को समझा जा सके तो किसी विचारशील को यह मानने में आपत्ति न होगी कि वातावरण की उपयुक्तता एवं परिस्थितियों की अनुकूलता उत्पन्न करने के लिए लोक-मानस में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समुचित समावेश करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। प्रज्ञा-अभियान के अंतर्गत युग परिवर्तन के प्रयास का श्रीगणेश इसी प्रक्रिया से आरम्भ किया जा रहा है।

प्रज्ञा परिजनों को इन पृष्ठों में जो कार्य सौंपा जा रहा है। उसे उज्ज्वल भविष्य का भव्य भवन बनाने के निमित्त किया गया प्रत्यक्ष छोटा किन्तु महान संभावनाओं से भरा पूरा शिलान्यास कहा जा सकता है। इस क्षेत्र में से बना लेना लगता भले ही कठिन हो पर वस्तुतः है नितांत सरल। चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार वोट प्राप्त करने के लिए अपरिचित लोगों से भी संबंध जोड़ते हैं। उनसे घनिष्ठता व्यक्त करते एवं वोट देने लिए भाव भरा आग्रह करते देखे जाते हैं। वहीं उपक्रम यदि विचार-क्रान्ति को व्यापक बनाने के लिए अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त स्वाध्याय मंडली का गठन न हो सके। यह कथन समय से पहले की बात होगी कि जब यह ढर्रा चल पड़ेगा तो उसी प्रज्ञा परिवार में से ऐसे व्यक्तित्व उभरेंगे जिनके कर्तृत्व पर पर सर्वत्र गर्व गौरव व्यक्त किया जाता दृष्टिगोचर हो सके।

‘अखण्ड-ज्योति’ के सुविस्तृत प्रज्ञा परिवार में से मात्र 24000 प्रज्ञा पुत्र आगे आ सके तो इतने भर का अग्रगमन देश के विचारशीलों को उन भावनाओं से अनुप्राणित कर सकता है जो सर्वतोमुखी प्रगति के लिए उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए आवश्यक हैं।

प्रवासी भारतीय प्रायः 3 करोड़ हैं उनसे भी यह आशा अपेक्षा रखी जा सकती है कि जहाँ वे बसते हैं उन देशों में नवोदय की श्रद्धा ऊर्जा से उन प्रदेशों को भी ज्योतिर्मय बनाने में हाथ बंटायेंगे और अपने-अपने संपर्क क्षेत्रों में धर्म तंत्र के माध्यम से भावनात्मक नव-निर्माण की प्रक्रिया विश्व-व्यापी बनाने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निबाहेंगे। इस दिशा में इन दिनों कारगर उपाय अपनाये गये हैं। शांतिकुँज में प्रवासी कक्ष की स्थापना, उनकी स्थिति में फिट बैठने वाला साहित्य उन देशों में लम्बी अवधि तक रह सकने वाले कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण, पत्राचार द्वारा संगठन, मार्ग-दर्शन, प्रचारकों का आवागमन जैसे कितने ही ऐसे नये कदम उठाये जा रहे हैं। जिनसे प्रवासी भारतीय भी इस देश में रहने वालों की तरह ही देव-संस्कृति न केवल निष्ठावान अनुयायी बने रहे वरन् बनाने में एक मध्यवर्ती की तरह अपना समुचित रोल प्रस्तुत कर सकें।

प्रज्ञा संस्थानों की कार्य पद्धति सामूहिक है। उसमें सामूहिक प्रयत्नों को अपनाये बिना गुजारा नहीं। किन्तु प्रज्ञा-पुत्र योजना में एक प्रतिभा भी वही काम एकाकी कार्यक्रम अपनाकर छोटे रूप में कर सकती है। जो सामूहिक प्रयत्नों से विनिर्मित प्रज्ञा संस्थान बड़े रूप में करते हैं। अब किसी को भी यह शिकायत करने का अवसर नहीं है कि हमारे यहाँ संगठित सुयोग न बन पड़ने से प्रज्ञा-संस्थान न बन सका और आलोक वितरण की प्रक्रिया को कार्यान्वित न किया जा सका। अब एक व्यक्ति के लिए भी यह अवसर उपलब्ध है कि अपने आपको एक छोटी प्रज्ञापीठ चरणपीठ के रूप में विकसित करे। वह सारा कार्य एकाकी कर दिखाये, जिसके लिए इन धर्म संस्थानों की स्थापना हेतु पिछले दिनों भाव भरा प्रयत्न किया गया है और इन दिनों उसे जारी रख जा रहा है।

थोड़े से समयदान, श्रमदान बढ़ा देने और भावना में उभार ला देने भर से उपरोक्त प्रक्रिया सहज की अग्रगामी हो सकती है। इस योजना का आर्थिक पक्ष भी ऐसा है जिसे कोई एक व्यक्ति आसानी से स्वयं वहन कर सकता है। इस प्रकार कुल मासिक का यों तो इसे मिल-जुलकर भी संग्रह किया जा सकता है, पर वास्तविकता यह है कि जिसकी भावना उभरेगी वह इस राशि को जेब से खर्च करने में तनिक भी कठिनाई अनुभव न करेगा। दस पैसा रोज ज्ञानघट में जमा कराना और एक घण्टा समय देना युग-निर्माण परिवार के सक्रिय सदस्य बनने की न्यूनतम शर्त है। भावना और प्रखरता बढ़ने के साथ-साथ अंशदान भी बढ़ना चाहिए। प्राणवान परिजनों में से अधिकाँश अब महीने में एक दिन की आजीविका देने लगे हैं। उनका अंशदान प्रायः इसी अनुपात से चल रहा है। मासिक का अर्थ है जो तीन सौ रुपया मासिक कमाता है उसे भी देना चाहिए। इतनी भर उदारता बरतने से प्रज्ञा-पुत्र योजना के बजट की पूर्ति भली प्रकार होती रह सकती है। कृपणों के लिए तो एक नी कौड़ी भी परमार्थ के लिए खर्च करना पहाड़ उठाने जैसा भारी है। किन्तु भावनाशील तो इतना बजट अपनी रोटी में से एक कम करके भी भली प्रकार पूर करते रह सकते हैं।

प्रज्ञा पुत्रों की आरम्भिक योजना में 24 से 360 को युग साहित्य पढ़ाना और उनमें से जो प्रतिभावान हैं उनके जन्म-दिन मनाने भर की प्रक्रिया सीमित रखी गयी है। पर जैसे ही थोड़ा और अधिक उत्साह, अभ्यास बढ़ेगा, जैसा ही उन्हें एक और बड़ा कदम उठाना होगा। स्लाइड प्रोजेक्टर टेपरिकार्डर और लाउडस्पीकर की त्रिमूर्ति की व्यवस्था। इसमें प्रायः डेढ़ दो हजार रुपये तक का खर्च आता है। इसे जुटाने में उसी भावना को अपनाया जा सकता है। जिससे कि प्रज्ञा संस्थानों में एक प्रतिमा का खर्च सरलतापूर्वक जुटा लिया जाता है। यह राशि भी एक प्रतिमा जितनी ही है। संग्रह से या कुछेक उदारजनों के सहयोग से इतने पैसे की व्यवस्था हो सकती है। यह त्रिमूर्ति देव प्रतिमा घर-घर पहुंचाकर युगान्तरीय चेतना को विस्तृत करके अपनी उपयोगिता उससे भी अधिक सिद्ध कर सकती है। जितनी कि देवालयों में स्थापित प्रतिमाओं के माध्यम से श्रद्धा सम्वर्धन का उद्देश्य पूरा होता है इतनी राशि कोई प्रज्ञा-पुत्र चाहे तो अपने निजी साधनों को ही बेच-बेचकर या उधार लेकर चुकाते रहने जैसा कोई उपाय अपनाकर भी व्यवस्था बना सकता है। उनके लिए तो इतना खर्च कर देना एक मजाक जितना है। जिन्हें भगवान ने खता, पीता बनाया है। ‘‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में भी भावनाशीलों को अग्रिम पंक्ति में खड़े होने और प्रज्ञा-पुत्र योजना को अपनाकर अपने संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण की नई जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। युग संधि के इस पावन पर्व पर उन्हें इतना साहस दिखाने में आना-कानी नहीं करनी चाहिए।


विशिष्ट विभूतिवान इन कार्यों में सहयोग दें

‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में से कितने ही ऐसे भी हैं जिन्हें विशिष्ट, वरिष्ठ, प्रतिभाशाली एवं विभूतिवान कहा जा सकता है। उनसे इन दिनों अतिरिक्त रूप से आग्रह किया गया है कि वे अपनी विभूतियों को इन दिनों युग-सृजन की दिशा में भी मोड़ने का प्रयत्न करें और जितना संभव हो उतना अनुदान-अंशदान इस पुण्य प्रयोजन के लिए प्रस्तुत करने का साहस जुटायें।

इस वर्ग के लोगों के लिए कुछ काम इस प्रकार छोड़े गये हैं- (1) युग साहित्य भारत की प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं में प्रकाशित किया जाना है। अब 24 पैसा मूल्य की 360 पुस्तिकाएं हर वर्ष लिखी और छापी जाया करेंगी। प्रज्ञा-पुत्र योजना के अंतर्गत उन्हें जन-जन तक पहुँचाया जाया करेगा। यह साहित्य मूलतः हिन्दी में लिखा जायेगा। बाद में उसका अनुवाद अन्य भाषाओं में छपा करेगा। आरम्भ में यह अनुवाद उत्तर की भाषाओं में किया जा रहा है। बाद में उसे दक्षिण भारत की भाषाओं में छापा जायेगा। इसी वर्ष अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, भाषाओं में अनुवाद कराने तथा छापने का काम हाथ में लिया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से जिनका उपरोक्त भाषाओं पर अच्छा अधिकार हो, जो हिन्दी भी अच्छी तरह से समझते हों और स्तर का अनुवाद कर सकते हों, वे अपनी सेवायें इस कार्य के लिये प्रस्तुत करें।

(2) लोक रंजन और लोक मंगल का समन्वय करके कला मंच का अब जन-जागरण के निमित्त लगाने की एक नई योजना हाथ में ली जा रही है। इसके अंतर्गत सुगम संगीत के प्रशिक्षण की क्षेत्रीय भाषाओं में प्रेरणाप्रद गीत लिखाने छापने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जायेगी। एक्शन सांग, बेले एकाकी जैसे नृत्य, अभिनय लिखे और प्रदर्शित किये जायेंगे। इसके लिये छोटी-छोटी नाट्य-मंडलियां गठित होंगी और वे अपने-अपने क्षेत्र में काम करेंगी। संगीत सम्मेलन, कविता सम्मेलन, भाषण-प्रतियोगिता जैसे आयोजनों का योजनाबद्ध विस्तार किया जायेगा। इस संदर्भ में जिसकी गति हो उन्हें अपना सहयोग देकर इस योजना को अग्रगामी एवं सफल बनाने में सहायता करनी चाहिए।

(3) प्रज्ञापीठें बड़ी संख्या में बन रही हैं। उन सब के वार्षिकोत्सव होंगे। उनका स्वरूप क्षेत्रीय मेलों जैसा करने का विचार है। प्रवचन सुनने में थोड़े से लोगों की ही रुचि होती है, किन्तु मेले में सभी वर्गों के लोग बड़ी संख्या में पहुँचते हैं। उन सबको मनोरंजन, खरीद बेच के अतिरिक्त विचारोत्तेजक वातावरण भी मिल सके, इसके लिये प्रचार प्रदर्शन के कुछ मनोरंजक उपकरणों का प्रयोग किया जाना है। चित्र प्रदर्शनी कठपुतली, नाटक, चलते-फिरते सिनेमा जैसे कितने ही माध्यम इसके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। एक छोटे मेले के लिये एक ट्रक भरकर सामान इधर से उधर लाया ले जाया जाता रहे तो उतने भर से एक छोटे मेले की पूर्ति हो सकती है। इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए अनुभवी अभ्यस्त तथा साधन जुटा सकने में समर्थ लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है।

(4) स्लाइड प्रोजेक्टर, नाटकों के पर्दे, चित्र-प्रदर्शनी, स्टेन्सिल लिखने काटने आदि के लिए नये-नये चित्र बनाने की आवश्यकता पड़ती रहेगी। इसके लिये जिनके हाथ साफ हों, ऐसे चित्रकारों का सहयोग इन्हीं दिनों अपेक्षित है।

(5) एक वर्ष के लिये नव-सृजन के निमित्त समय दान की याचना सभी विचारशील से की गई है। जिनकी उपार्जन की जिम्मेदारी पूरी हो चुकी, या लदी नहीं है वे इन दिनों एक वर्ष का समय प्रज्ञा संस्थानों के संचालन था केन्द्र की बहुमुखी प्रवृत्तियों में सहयोग देने के लिये देने की कृपा करें। उससे उनका व्यक्तित्व निखरेगा और युग धर्म का परमार्थ निर्वाह भी बन पड़ेगा। इस प्रयोजन में लगने पर खाली समय को अभिशाप के स्थान पर वरदान में परिणित किया जा सकता है।

(6) पिछले दिनों कितने ही सज्जनों ने अपने नाम वानप्रस्थों में, परिव्राजकों में, समयदानियों में पंजीकृत कराये हैं। उन सबसे अनुरोध है कि उस वचन का इन दिनों पालन करें। और सन् 81 में जितना अधिक समय दे सकना संभव हो सके उसका तारतम्य बिठाकर अपने निश्चय की सूचना केन्द्र को भेजें।

(7) युग संधि के द्वितीय वर्ष में जिन बहुमुखी प्रवृत्तियों को हाथ में लिया जा रहा है। उनके लिये पूँजी जुटाने की भार कठिनाई सामने है। जिनके लिये संभव हो वे अनुदान एवं उधार के रूप में हाथ बंटाने की उदारता बरतें। बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं का शिक्षण एवं निर्वाह इन दिनों पैसे की माँग करता है, अपने स्थान पर इन कार्यकर्ताओं के लिये साधन प्रस्तुत करके भी स्वयं कुछ करने जैसा पुण्य अर्जित किया जा सकता है।


अगर हम समय पर जाग पाये

(लाखन सिंह भदौरिया)


अगर हम समय पर जाग पाये (kavita)

अगर हम समय से नहीं जाग पाये, किरन क्या कहेगी, गगन क्या कहेगा।

नये सूर्य की रोशनी रो उठेगी, अगर प्रातः अंगड़ाइयों में बिताई। सबेरा कहाँ फिर सबेरा रहेगा, अगर प्रातः, जमुहाइयों में बिताई॥

धरा की उदासी नहीं तोड़ पाये, कली क्या हँसेगी, सुमन क्या हँसेगा?

हुई बात क्या जो किरन अनमनी है, उगे सूर्य का आचरण रोशनी है। छुआ प्राण की पाँखुरी को प्रभा ने, अभी गन्ध वह, बंदिनी क्यों बनी है?

सराबोर होकर नहीं साँस गाये, नयी ज्योति का आगमन क्या कहेगा?

वृथा रोशनी ने, सबेरा उतारा, वृथा चेतना ने, सजाया संवारा। कि दीवार-दीवार में प्राण, बन्दी- रहा छटपटाता, हमारा-तुम्हारा।

नहीं पीर को प्यार का बल मिलेगा, व्यथा क्या कहेगी, रुदन क्या कहेगा?

जागो प्राण के, पंछियो गीत गाओ। धरा की उदासी, प्रभाती बनाओ। किरण प्राण की नाचती आ रही है- नयी भैरवी के नये स्वर जगाओ।

नहीं गीत ने प्रीति के प्राण फूँके- महा भाव का आचरण क्या कहेगा?

*समाप्त*