विकसित व्यक्तित्व की एक ही पहचान है- उच्च चरित्र। चरित्र क्या है- सद्गुणों का समुच्चय। सद्गुणों के सत्परिणामों से भी सभी परिचित हैं। फिर उन्हें प्रयोग-व्यवहार में लाने में क्या कठिनाई पड़ती है? और क्यों उसका समाधान नहीं निकलता। इसका एक शब्द में दिया जाने वाला उत्तर है- व्यक्ति का ‘स्व’ केंद्रित होना। अपने आपको छोटे दायरे में बाँध लेने वाले संपर्क क्षेत्र पर अपने आचरण की प्रतिक्रिया पर ध्यान नहीं देते और मात्र अपनी ही प्रसन्नता-सुविधा की बात सोचते रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए नीति नियमों की कथा गाथा भर सुगम पड़ती है। वे संकीर्ण स्वार्थपरता को मजबूती से पकड़े रहते हैं जो अपने को सुहाती है, भले ही उसमें दूसरों का कितना ही अहित क्यों न होता हो?
सद्गुण-सामाजिक दृष्टिकोण के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। ‘स्व’ को सुविस्तृत बना लेने पर ही यह अनुभूति होती है कि हम किसी विराट् के छोटे अंग हैं। अपना स्वार्थ- सार्वजनीन स्वार्थ परमार्थ के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा होता है। शरीर के समूचे ढाँचे के सक्षम रहने पर ही उसके अंग विशेष का हित है। अन्यथा उस अकेले के परिपुष्ट रहने पर भी अन्यों के कष्ट ग्रस्त रहते किसी भलाई की संभावना नहीं है। ऐसा सोचने वाले समष्टि को हानि पहुँचाकर निजी स्वार्थ साधन की बात नहीं सोचते। यही वह केन्द्र बिन्दु है जहाँ से अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का आविर्भाव व परिपोषण होता चला जाता है।
विचारों का अपना महत्व है और कार्यों का अपना। पर वे दोनों ही सामयिक और अस्थिर हैं। समयानुसार वे बादलों की तरह उछलते और गरज बरस कर समाप्त हो जाते हैं। इतने पर भी उन दोनों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हुई प्रतिक्रिया देर तक बनी रहती है। बादल बरस जाने का समय समाप्त हो जाने पर भी खेत में नमी बनी रहती है और देर तक अपने प्रभाव को बनाये रहती है। आवाज अन्तरिक्ष में गूँजती है, पर उसके कम्पन कुछ समय तक वातावरण में बने रहते हैं। इसी प्रकार जिन विचारों का कार्य रूप में परिणित होने का अवसर मिलता है, वे कर्ता के ऊपर एक देर तक ठहरने वाली छाप छोड़ जाते हैं। इसी को आदत कहते हैं। अध्यात्म की भाषा में इन्हें ही ‘संस्कार’ कहा जाता है। ये ‘संस्कार’ अपना प्रभाव सहज समाप्त नहीं करते अपितु मनःक्षेत्र में जड़ जमाकर बैठ जाते हैं। इसे ही ‘स्वभाव’ कहते हैं।
आदतें मनःक्षेत्र की संचित सम्पदा हैं। उनके सहारे जीवन का ढर्रा अपनी पटरी पर थोड़े से सहारे-इशारों भर से लुढ़कने लगता है। लट्टू एक बार घुमा देने पर देर तक अपनी धुरी पर घूमता रहता है। आदतों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे आरंभ में तो प्रयत्न-पूर्वक ही विनिर्मित होती हैं किन्तु पक जाने पर अपना ऐसा प्रभाव दिखाती हैं, मानो मनुष्य को उन्हीं के नियंत्रण में वशीभूत होकर रहना पड़ेगा। धीरे-धीरे वे अपने शिकंजे में इस प्रकार मनुष्य को कस लेती हैं कि उसे उनसे छट निकलने का मार्ग ही नहीं सूझ पड़ता। विवश असहाय-सा वह ढर्रे वाले प्रवाह में बहने लगता है।
‘नशेबाजी’ इसका अच्छा उदाहरण है। आदत पड़ जाने पर उसका टूटना कितना कठिन हो जाता है इसे सभी जानते हैं। अन्य दुर्व्यसनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उचक्के, उठाईगीरे बिना जरूरत के भी वैसी हरकतें करते रहते हैं। गाली बकने की आदत पड़ जाने पर अनजाने ही वह शब्दावली मुँह से मौके बेमौके निकलती रहती हैं।
अच्छी आदतें स्वभाव का अंग बन सकें तो समझना चाहिये कि प्रगति-पथ पर चल पड़ने और लक्ष्य तक पहुँचने की समस्या का आधा भाग हल हो गया। इसके विपरीत यदि उस प्रकार का ढर्रा न चला, स्वभाव न बना तो आदर्शवादी थोपाथापी पुरानी विकृत आदतों के टकराव में हार मानती और दुम दबाकर भागती दृष्टिगोचर होगी। स्वाध्याय और सत्संग से कई अच्छे निष्कर्ष निकलते हैं। सन्मार्ग पर चल पड़ने का सत्परिणाम भी समझ में आता है। कुछ करने की उमंग भी उठती है किंतु व्यवहार में कुछ वैसा बन नहीं पड़ता। पथ कठिन जान पड़ता है। सुविधा के सामान्य ढर्रे से विपरीत यह आदर्शवादी मार्ग रुचिकर लगते हुए भी अपनाते नहीं बन पड़ता। यदि कुछ शुभारम्भ किया भी तो अजीब-सा लगता है। संकोच होता है और उस नवीन निर्धारण का गले उतरना कठिन हो जाता है। इस असमंजस का एक ही कारण है पुरानी आदतों की प्रबलता। इसी कारण उबरने के मन्सूबे तेज हवा में उड़ने वाले तिनकों की तरह इधर-उधर बिखर जाते हैं और मनुष्य अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों के सहारे पतन के गर्त में निरन्तर अधिक गहरा उतरता चला जाता है।
बुरी आदतों का अभ्यस्त होना सरल है क्योंकि उनका प्रचलन सर्वत्र पाया जाता है और अनुकरण करने के लिए वातावरण पहले से ही बना मिलता है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति किसी भी वस्तु को ऊपर से नीचे खींचती रहती है किन्तु कुछ भी उछालना हो तो उसके लिए अतिरिक्त शक्ति साधन जुटाने होंगे। इसी प्रकार अच्छी आदतें डालती हों तो उसके लिए उच्चस्तरीय विचारों को लगातार मनःक्षेत्र में प्रवेश कराते रहने, उत्कृष्टता की दिशा में चलते रहने के लिए निर्धारित कार्यक्रम बनाते एवं संकल्पपूर्वक क्रियान्वित करने होते हैं। इतना बन पड़ने पर ही सुसंस्कारों की वह पूँजी जमा होती है, जिसके सहारे सराहनीय प्रगति का सरंजाम जुट सके।
चिन्तन में संव्याप्त अनेकानेक भ्रान्तियों में से एक है- दर्शन सम्बन्धी भ्रान्तियाँ। किसी भी देश एवं समाज की सर्वांगीण प्रगति इसी बात पर निर्भर करती है कि प्रचलित दर्शन व्यक्ति एवं समाज के विकास में कितना सहायक है। भारतीय दर्शन को विश्व दर्शनों में जो सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है, वह अकारण नहीं है। वेदान्त एवं उपनिषदों में मानव ही नहीं समस्त प्राणि-मात्र के लिए जो उदात्त भाव मिलता वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रकृति, जीव, ब्रह्म, सृष्टि आदि का गूढ़ वर्णन एवं उनके आपसी सम्बन्धों का विवेचन, विश्लेषण इतना सुन्दर विश्व के किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं मिलता। ज्ञान एवं उदात्त भावों के इस सागर में डुबकी लगाने के बाद मैक्समूलर जैसे विद्वान के उद्गार इस प्रकार फट पड़े “विश्व जब कभी भी अंतरतम शान्ति एवं सन्तोष की खोज करेगा, उसे भारतीय दर्शन का ही अनुशीलन करना होगा।” यह दार्शनिक चिन्तन की ही विशेषता थी। जिसके अध्ययन ने ‘दारा शिकोक’ जैसे मुसलमान को मदमस्त-दिव्य आनन्द से सराबोर कर दिया।
विश्व दर्शनों में अग्रणी वेदान्त एवं उपनिषद् के सिद्धान्त सनातन, सार्वभौम एवं चिरन्तन हैं। मनुष्य के लौकिक एवं इहलौकिक-भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के सारे आधार उनमें विद्यमान हैं। इतने पर भी उनकी उपयोगिता एवं सार्थकता तभी है जब कि समाहित तथ्यों को ठीक प्रकार समझा एवं अपनाया जाय। अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही उठानी होगी।
ऋषियों की यह विशेषता रही है कि उन्होंने जो कुछ भी सत्य का उद्घाटन किया वह सूत्र रूपों में आबद्ध कर दिया है। अधिक व्याख्या एवं विवेचना की उन दिनों आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी। सत्य बुद्धि द्वारा नहीं, साधना प्रयासों द्वारा अनुभव किया जाता था। फलतः भटकाव की भ्रान्ति की सम्भावना नहीं रहती थी।
बौद्धिक विकास के साथ उन दार्शनिक सूत्रों की व्याख्या-विवेचना की आवश्यकता पड़ी। इस प्रयास में भ्राँतियों का भी समावेश हुआ। उदाहरणार्थ- ‘‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या।” अर्थात् ब्रह्म सत्य है और समस्त संसार मिथ्या है- माया है। सिद्धान्त की दृष्टि से यह सत्य है, किन्तु पिछले दिनों इसे समझने में भारी भूल हुई है। ऋषि इस तथ्य से परिचित थे कि परिवर्तनशील संसार एवं सम्बन्धित वस्तुओं का जो स्वरूप दिखायी पड़ता है वह वास्तविक नहीं है। अस्तु, उनके प्रति आसक्ति का न होना ही श्रेयस्कर है। वस्तुनिष्ठ आकर्षणों को समाप्त कने की दृष्टि से उन्होंने उक्त सिद्धान्त का प्रतिपादन किया न कि संसार को मिथ्या मानकर उसके अस्तित्व को ही अस्वीकार करने के लिए।
भौतिक शरीर चेतना की शक्ति से गतिशील है किन्तु इस सत्य के साथ यह तथ्य भी अनिवार्य रूप से जुड़ हुआ है कि चेतना का परिचय इस शरीर द्वारा ही मिलता है। ज्ञातव्य है कि शरीर अपने लिए पोषण एवं विकास के लिए साधन इस संसार से ही प्राप्त करता है। अतएव साधन एवं उनके स्त्रोत जगत की महत्ता, उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। तार्किक दृष्टि से भी यह बात गले नहीं उतरती। यदि यह संसार मनुष्य के लिए निरुपयोगी है, तो व्यर्थ में परमात्मा ने उसके रचने में इतना झंझट क्यों मोल लिया। यह सर्वमान्य तथ्य है कि साधनों के अभाव में जीवन लक्ष्य को प्राप्त करना तो दूर रहा जीवित रह पाना भी सम्भव न हो सकेगा। विरक्त संन्यासी हो अथवा गृहस्थ, बाल हो या वृद्ध, नर हो या नारी हर किसी को न्यूनतम निर्वाह के लिए साधन चाहिए। कन्दराओं, गुफाओं अथवा हिमालय के शिखरों पर कठोर साधना में रत साधकों को भी प्रकृति के भण्डार से जीवित रहने के लिए कुछ न कुछ भोज्य पदार्थ के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। अस्तु, यह निर्विवाद सिद्ध होता है, हर व्यक्ति को निर्वाह के लिए न्यूनतम साधन चाहिए।
ब्रह्म सत्य है इसकी अनुभूति तब तक नहीं हो सकती जब साधक विषय-वासनाओं में लिप्त है। अभ्यास के लिए- विषय वासनाओं के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने के लिए “ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या” के सिद्धान्त को मानकर चलना होता है। किन्तु अभ्यास के उपरान्त “सर्व खिल्विदं ब्रह्म” को ही व्यावहारिक एवं तात्विक दृष्टि से उपयोगी मानना पड़ता है। वह परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है- जड़ चेतन सबमें समाया हुआ है। जड़-चेतन ही हलचल उसी से अभिप्रेरित हैं। अतएव दृश्य जगत की भी परमात्मा का स्थूल स्वरूप मानकर- सत्कर्मों में निरत रहकर उसे अधिकाधिक सुन्दर बनाना भी प्रकारान्तर से उस ब्रह्म की ही उपासना, अभ्यर्थना है। इस राजमार्ग द्वारा परमात्मा की अनुभूति कहीं अधिक सुगम है।
“जगत मिथ्या है” यह धारण व्यक्ति एवं समाज दोनों ही के लिए अहितकर है। शरीर मिथ्या-जगत मिथ्या-सभी वस्तुएं मिथ्या। निस्सन्देह यह मान्यता व्यवहार में जड़ता को जन्म देगी। इस विश्वास के आधार पर कर्मों से विरत होकर परमात्मा की खोज करना, ब्रह्म की अनुभूति करना सम्भव नहीं है। जीवन का अस्तित्व कर्म पर टिका हुआ है। कर्म के बिना तो एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता। संन्यास परम्परा में कर्मों से निवृत्त होने का विधान है। जिसका लक्ष्य है कि अब तक जो आसक्ति बनी हुई थी उसे ताड़ दिया जाय जो कुछ भी किया जाये समस्त विश्व के कल्याण को दृष्टि में रखकर। न कि कर्म करना ही छोड़ दिया जाय। यदि प्रयोजन यह रहा होता तो शंकराचार्य, विवेकानन्द, दयानन्द जैसे मूर्धन्य संन्यासी जीवन पर्यन्त सत्कर्मों में निरत न रहते अपितु वे किसी कन्दरा में बैठकर ब्रह्म का अवगाहन चिन्तन-मनन कर रहे होते। उनके जीवन चरित्र का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि संन्यास लेने के बाद तो उनके कर्मों में और अधिक प्रखरता एवं गति आयी। अपनी अल्पायु में वे मानव जाति के लिए इतना कर गये जितना कि कोई भी व्यक्ति अपने दीर्घ जीवन में भी नहीं कर पाता।
जीवन मुक्त भी लोक-मंगल के लिए सत्कर्मों में निरत रहते हैं। उनका एक-एक क्षण श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित रहता है। निस्सन्देह संसार को माया मानकर कर्म को त्याग बैठना एक प्रकार का पलायनवाद है जो विरक्ति का नहीं जड़ता का परिचायक है। जिसके रहते साधना मार्ग पर एक कदम भी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं। पूर्णता- ईश्वर प्राप्ति की बात तो बहुत दूर की है। कर्मवाद का समर्थन हमारे धर्म ग्रन्थों में पग-पग पर मिलता है। “ईशावास्योपनिषद्” का सन्देश है-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं सभाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
अर्थात्- “श्रेष्ठ कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा रखनी चाहिए। ऐसा करते रहने से मनुष्य कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।”
जब सृष्टि के संचालन, सुनियोजन जैसे गुरुत्तर कार्य में ईश्वर तक को निरन्तर कर्म में रत रहना पड़ता है तो मनुष्य को कर्म से विरत रहना अविवेकपूर्ण है। यह संसार ईश्वर की कृति है, जिसको गढ़ने में उसने अपनी समस्त कलाकारिता उड़ेल दी है। उसका सौंदर्य प्रकृति में झाँकता दिखायी पड़ता है। अंतर्दृष्टि से देखा जाय तो वह हर वस्तु में रमण करता, हलचल भरता दिखायी पड़ सकता है। उसके सौंदर्य का दर्शन करना एवं इस संसार को और भी अधिक सुरम्य सुन्दर बनाने में संलग्न रहना ही ‘निष्काम कर्मयोग है।’ यह बन पड़ा तो इसी दृश्य संसार में रहते हुए कर्म करते हुए भी उस परमात्मा का दर्शन कर सकना सम्भव है।
निष्काम भाव से किया हुआ कर्म न तो आत्मा को बांधता है और नहीं उसे मलीन करता है। ऐसी स्थिति में जब कर्म का वास्तविक क्षेत्र जीवन मुक्ति का माध्यम यह दृश्य संसार है तो उसे मिथ्या चलना अविवेकपूर्ण है। अस्तु, ब्रह्म सत्य है तो उस तक पहुँचने के लिए जगत को भी सत्य मानना होगा।
भौतिक जगत की कई शक्तियाँ ऐसी हैं जिन्हें प्रत्यक्ष नेत्रों द्वारा नहीं देखा जा सकता। विद्युत शक्ति स्वयं अदृश्य रहती है। आँखों से न दिखते हुए भी उसके अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। बल्ब में प्रकाश फैलाती- पंखे से हवा बिखेरती- हीटर में गर्मी देती तथा विशालकाय मशीनों, कारखानों को चलाने के लिए ऊर्जा देती, सतत् वह अपनी सत्ता परिचय देती है। चुम्बकीय शक्ति दिखायी नहीं पड़ती, पर प्रचण्ड आकर्षण शक्ति उसकी सत्ता का बोध कराती है। प्रकाश, ऊर्जा, गर्मी, विद्युत शक्ति के गुण हैं, उसकी प्रतिक्रियाएं हैं-मूल स्वरूप नहीं। मूल स्वरूप तो अभी तक परमाणु की सत्ता की भाँति विवादास्पद बना हुआ है। गुणों का बोध ज्ञानेन्द्रियों द्वारा होता है। नेत्रों में ज्योति न होने पर न तो प्रकाश दिखाई पड़ सकता है और न ही पंखे का चलना दृष्टिगोचर हो सकता है। आँख के साथ शरीर की त्वचा भी अपनी सम्वेदन क्षमता गँवा बैठे तो जिन्होंने कभी विद्युत शक्ति की सामर्थ्य नहीं देखी है उनके लिए बिजली की सत्ता का अस्तित्व संदिग्ध ही बना रहेगा। यही बात चुम्बक के साथ लागू होती है।
पृथ्वी का गुरुत्व बल प्रत्यक्ष कहाँ दिखता है? वस्तुओं के नीचे गिरने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उसमें को ऐसी आकर्षण शक्ति है जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। यही वह प्रमाण है जिसके आधार पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति की उपस्थिति को स्वीकारना पड़ता है। ऐसी कितनी ही शक्तियाँ हैं जो नेत्रों से नहीं दिखाई पड़तीं किन्तु, उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। फूल में सुगन्ध होती है यह सर्वविदित है। गन्ध को नेत्र कहाँ देख पाते हैं। घ्राणेन्द्रियों द्वारा गन्ध की मात्र अनुभूति होती है। उनमें सौंदर्य होता है जो हर किसी को मुग्ध करता है। सौंदर्य की होने वाली अनुभूति को किस रूप में प्रत्यक्ष दिखाया जा सकता है? फूल की सुगन्ध एवं सौंदर्य की अनुभूति- घ्राण शक्ति एवं नेत्र ज्योति से रहित व्यक्ति नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्तियों के उसकी विशेषता से इन्कार करने पर भी तथ्य अप ने स्थान पर यथावत् बना रहता है।
खाद्य पदार्थों के गुण धर्म उनके भीतर सन्निहित होते हैं। उनके स्वाद को देखा नहीं, स्वादेन्द्रिय के ठीक रहने पर मात्र अनुभव किया जा सकता है। जिनकी जिह्वा जन्म से ही रोग ग्रस्त हो- स्वाद का अनुभव नहीं कर पाती हो उनके लिए यह आश्चर्य, अविश्वास एवं कौतूहल का विषय बना रहेगा कि वस्तुओं में स्वाद भी होता है। जिह्वा से ही अनुभूति होते हुए भी स्वाद के मूल स्वरूप का दर्शन कर सकना सर्वथा असम्भव है। गन्ध का वास्तविक रूप कैसा होता है, यह दृष्टिगम्य नहीं अनुभूति गम्य है।
विविध प्रकार की भौतिक शक्तियों का परिचय उनके गुण-धर्मों, विशेषताओं के आधार पर मिलता है और यह भी तभी सम्भव है जब ज्ञानेन्द्रियाँ उनकी विशेषताओं सम्वेदनाओं को ग्रहण कर पाने में सक्षम हों। इतने पर भी उनके मूल स्वरूप का दर्शन कर पाना न तो अब तक सम्भव हुआ है और न ही निकट भविष्य में सम्भावना ही है क्योंकि शक्ति का कोई स्वरूप नहीं होता। लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई रूपी प्रत्यक्ष मापदण्ड की सीमा में वस्तुऐं आती हैं, शक्तियाँ नहीं। इस तथ्य को कोई भी विज्ञ, विचारशील, तार्किक अथवा वैज्ञानिक भी मानने से इन्कार नहीं कर सकता।
परमात्मा वस्तु अथवा व्यक्ति नहीं जो इन स्थूल नेत्रों से देखा जा सके। वह एक सर्वव्यापक शक्ति है जो जड़-चेतन सभी में समायी हुई है। उसी की प्रेरणा से सभी चेतन प्राणी गतिशील हैं। सृष्टि के प्रत्येक घटक में सुव्यवस्था, नियम एवं सुसंचालन का होना इस बात का प्रमाण है कि किसी सर्वसमर्थ अदृश्य हाथों में इसकी बागडोर है। यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाय तो लघु परमाणु से लेकर विशाल ब्रह्मांड तक में उसी की सत्ता क्रीड़ा कल्लोल कर रही है। सामान्य कृतियों के लिए भी कितना अधिक श्रम, पुरुषार्थ एवं बुद्धि का नियोजन करना पड़ता है। छोटे-बड़े यन्त्रों का निर्माण एवं सुसंचालन अपने आप नहीं हो जाता। सर्वविदित है कि मनुष्य को कितना अधिक नियन्त्रण रखना पड़ता है तब कहीं जाकर यन्त्र अभीष्ट प्रयोजन पुरा कर पाता है। यह तो मनुष्य द्वारा विनिर्मित सामान्य कृतियों की बात हुई। विशाल सृष्टि अपने आप बन कर तैयार हो गई और स्वसंचालित है यह बात भी बुद्धि के पल्ले नहीं पड़ती।
कहा जा चुका है कि प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर न होना किसी शक्ति के न होने का प्रमाण नहीं है। परोक्ष आधारों अथवा अनुभूतियों द्वारा भी कितनी ही शक्तियों का प्रमाण मिलता है। मनुष्य भी एक चेतन एवं सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। उसकी चेतना भी इन स्थूल नेत्रों से कहाँ दिखाई पड़ती है, किन्तु उसकी हलचलें अंग-प्रत्यंग दिखायी पड़ती हैं। मानवी सत्ता को परमात्मा की सर्वोत्तम एवं विलक्षण कृति माना जा सकता है एवं कृति का निर्माण नियामक सत्ता को माने बिना सम्भव नहीं है।
हमारा अस्तित्व है, यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि कोई आदि कारण सत्ता भी है। जीवन है तो जीवन का स्त्रोत भी है। यदि चेतना है तो चेतना का आदि स्थल भी है। शक्ति है तो शक्ति का उद्गम स्त्रोत का होना भी सुनिश्चित है। जो सबका कारण, जीवन शक्ति, ज्ञान आनन्द का आदि स्त्रोत है वही परमात्मा है। उसी को विभिन्न धर्मानुयायी अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। शैव जो लोग उसे शिव कहकर पूजते हैं। वेदान्ती उसी को ब्रह्म कहते हैं। बौद्ध बुद्ध और जैन धर्मावलम्बी उसी को ‘अरहन्त’ और मीमांसक ‘कर्म’ के रूप में देखते हैं। उपनिषदों के अनुयायी उसे शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव का मानते हैं तो कपिल के समर्थक आदि विद्वान सिद्ध के रूप में। पाशुपत मत के उसे निर्लिप्त स्वतन्त्र शक्ति रूप से पूजते हैं तो वैष्णव लोग पुरुषोत्तम के स्वरूप में। ‘याज्ञिक’ यज्ञ पुरुष के रूप में मानकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तो सौगत लोग सर्वज्ञ के रूप में, न्यायिक मतावलम्बी सर्वगुण सम्पन्न ईश्वर के रूप में, चार्वाक के अनुयायी व्यवहार सिद्ध के रूप में तथा कलाकार विश्वकर्मा के रूप में उसी का पूजन-अर्चन करते हैं। वह परम सत्ता में सर्वत्र विद्यमान है। कोई उसे तप कहता है तो कोई ज्ञान, कोई प्रकृति तो कोई शक्ति। वह व्यापक दृष्टा से जगत के सभी घटकों को प्रत्यक्ष कर रहा है- स्वरूप दे रहा है उसे ही अध्यात्म की भाषा में ईश्वर कहते हैं। वैज्ञानिक उसे ही एक अदृश्य, अविज्ञात शक्ति के रूप में स्वीकारते हैं।
अपनी सत्ता को मानने और अपने हो आदि कारण को न मानने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता। उत्तर दिया जा सकता है कि वह अनुभूति में नहीं आता। भौतिक शक्तियों के विषय में जाना जा चुका है कि वे तभी अनुभूति में आती हैं जब अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक हों। परमात्मा भी तभी अनुभूति के धरातल पर उतरता है जब कि उनको धारण करने वाला अन्तःकरण पवित्र एवं उदात्त भावना से सुसम्पन्न हो। इसी के माध्यम से उसे जाना जा सकता है। अस्तु भावनाओं का परिष्कार एवं अन्तःकरण का विस्तार ही उस पर परम सत्ता के साक्षात्कार का एक मात्र माध्यम है। जप, तप, साधना उपचार के अनेकानेक उपचार उसी प्रयोजन को पूरा करने के लिये किये जाते हैं।
जो इसी दिशा में प्रवृत्त हुए, उन्होंने ने केवल उसे जाना, वरन् उसके दिव्य आलिंगन को अनुभव किया। सन्त, महात्मा, ऋषि, महर्षियों के ज्वलन्त इतिहास इसी बात के प्रमाण हैं। उनके जीवन की पवित्रता, सरसता, व्यक्तित्व की महानता, शक्ति एवं ज्ञान की विलक्षणता जन सामान्य को अभी तक प्रेरणा देती रहती हैं।
जिस प्रकार भौतिक ऊर्जा अदृश्य होते हुए भी पंखे की गति, बल्ब में प्रकाश, हीटर में ताप जैसे विविध रूपों में हलचल करती दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार वह परमसत्ता पवित्र हृदय से पुकारने पर भावनाओं के अनुरूप कभी स्नेहमयी माँ बनकर तो कभी पिता अथवा सखा बनकर- कभी रक्षक के रूप में तो कभी विलक्षण शक्ति के रूप में प्रकट होकर अपनी सत्ता का आभास कराती एवं अनुदान बरसाती है।
ज्ञान का अस्तित्व ज्ञाता की सत्ता के भीतर ही होता है। हम जो कुछ जितनी दूर तक देख-सुन सकते हैं, या कल्पना कर सकते हैं, वह सब आत्म-सत्ता का ही क्षेत्र होता है। आत्मेत्तर का अनुभव असम्भव है। अतः सम्पूर्ण अनुभव आत्म तत्व की ही बहुरंगी झाँकियाँ हैं। आत्म-चेतना का जैसा स्तर एवं स्वरूप होता है, उसके ही अनुसार दृश्य, श्रव्य, स्पृश्य जगत का अनुभव होता रहता है।
इसका यह अर्थ नहीं कि जगत की स्वयं में कोई सत्ता नहीं। वह निश्चित ही है। जो लोग यह कहते हैं कि जगत की कोई सत्ता ही नहीं है, उन्हें फिर आत्मसत्ता को भी अस्वीकार करना चाहिए, क्योंकि आत्मसत्ता ही तो जगत का अनुभव करती है। जगत की सत्ता को अस्वीकार करना ऐसा ही है, जैसे नित्य रात्रि को स्वप्न देखने वाला व्यक्ति यह कहे कि स्वप्न की कहीं कोई सत्ता ही नहीं है। बिना सत्ता के अनुभूति असम्भव है। हाँ, यह जरूर है कि आत्म-चेतना के स्तर के अनुसार, अनुभूति का स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। एक बच्चे के लिए स्वप्न भी उतना ही यथार्थ है जितना जागृति के अनुभव। सामान्य वयस्क व्यक्ति स्वप्न के यथार्थ से, दिन के या जागृति-काल के यथार्थ को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। मनोवैज्ञानिक स्वप्नों को भी यथार्थ का ही अंग मानते हैं। इस अन्तर को समझते हुए वे स्वप्न की अनुभूतियों का इस प्रकार लाभ उठा लेते हैं कि वह जागृति काल के यथार्थ को संवारने, संतुलित बनाने में सहायक बन जाती हैं। स्वप्न-प्रतीकों, स्वप्न संकेतों की भाषा एवं अर्थ समझकर, वे उस उस प्रकाश में अपने जागृत समय के आचरण में वाँछित हेर-फेर कर लेते हैं। इसी प्रकार जागृति-काल की दिनचर्या से संशोधन-परिवर्धन करने पर स्वप्नों के स्वरूप में भी परिवर्तन आ सकता है, यह भी वे जानते हैं और ऐसा ही करते हैं। एक गंभीर मनोवैज्ञानिक के लिए जागृति एवं स्वप्न, दोनों की ही अनुभूतियाँ अपने-अपने ढंग से यथार्थ ही हैं।
आत्म-वैज्ञानिक, तत्वज्ञ, दार्शनिक इस यथार्थ जगत को भी स्वप्न ही मानते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि यथार्थ जगत की जो अनुभूति व्यष्टि-चेतना की सामान्य स्थिति में होती है, वह दृष्टा की चेतना के स्वरूप पर ही आधारित है उससे भिन्न नहीं। अपने निरपेक्ष स्वरूप में जगत मात्र ‘सत्’ का- विराट सत्ता का अंग है। किन्तु प्रत्येक प्राणी को उसकी सापेक्ष अनुभूति ही होती है और यह सापेक्ष अनुभूति वस्तुतः स्वप्न तुल्य यथार्थ ही होती है। आधुनिकतम वैज्ञानिक अन्वेषण भी इसी निष्कर्ष तक आ पहुंचे हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों का यह सर्वमान्य निष्कर्ष है कि आकर्षक रंगों की, सम्मोहक सौंदर्य की चित्ताकर्षक ध्वनियों की, परिव्याप्त प्रकाश की, तापमयी ऊष्मा की, सुहाने संगीत की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। वे तरंगों और गतियों के भिन्न-भिन्न क्रमों के समुच्चय मात्र हैं। ऊष्मा क्या है? वातावरण की तरंगों का संघात। प्रकाश एवं वर्ण? ये ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम’ में विभिन्न ‘फ्रीक्वेंसी’ तथा ‘वेवलेन्थ’ के अलग-अलग ‘सेट’ ही तो हैं, और क्या? प्रत्येक रंग प्रकाश खंड में कुछ निश्चित ‘फ्रीक्वेंसी’ तथा ‘वेवलेन्थ’ की तरंगों का परिणाम है। प्रख्यात वैज्ञानिक एडिंगटन के अनुसार- “तरंग है यथार्थ और जो रंग हम देखते हैं, वह हमारी दिमागी बुनावट है।” इस प्रकार जगत का यथार्थ निरपेक्ष रूप में मात्र “है” (अस्ति) किन्तु वस्तु सत्य के रूप में हम जो भी अनुभव करते हैं, वह हमारा ही ‘आत्म-परक सृजन’ है। हमारी जो अनुभूति क्षमताएँ हैं, उनके अपने ढाँचे और स्तर के ही अनुसार हमें वस्तु सत्य का अनुभव होता है।
तनिक हम कल्पना करें कि यदि विश्व का कोई भी चेतन प्राणी पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से एक की भी शक्ति से समर्थ न होता यानी किसी में भी देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्शानुभव करने और स्वाद ले सकने की ऐन्द्रिक क्षमताएँ नहीं होतीं तब यह शेष संसार रहता तो ऐसा ही, किन्तु इसकी विविध रूपाकृतियों, विविध गंधों का, नाना स्वादों का, ध्वनियों एवं संगीत का क्या अनुभव होता और क्या प्रमाण होता? वस्तु-सत्ता तो तब भी होती, किन्तु अनुभूतियों का वर्तमान स्वरूप तब कदापि कहीं होता ही नहीं।
हम वस्तु-सत्य को जब भी देखते या उसका अनुभव करते हैं, उसमें हमारे अपने संस्कार, आपने पूर्व संचित संवेदन और उनको क्षमता-विशेष, झुकाव-विशेष का भी प्रभाव घुला-मिला रहता है। क्योंकि हम चेतन दर्शक, चेतन भोक्ता हैं।
कैमरे को देखने की क्रिया और चेतन प्राणी के देखने की क्रिया में भेद चेतना की उपस्थिति से ही होता है। नेत्र से भी किसी प्रकाशित वस्तु को उस वस्तु से विकीर्ण प्रकाश की किरणों के द्वारा ही देखा जाता है। वे ही प्रकाश-किरणें पुतलियों में प्रविष्ट होती हैं और नेत्रवीक्ष उसके द्वारा नेत्र पटल पर उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। किन्तु इससे आगे की क्रिया कैमरे की क्रिया से बिल्कुल भिन्न है। नेत्र पटल पर उभरे प्रतिबिम्बों का प्रभाव संवेदन-नाड़ियाँ मस्तिष्क तक ले जाती हैं, वहाँ संचित बोध-अनुभवों के आधार पर वस्तु के स्वरूप के अनुभव के साथ ही, उसके प्रति संवेदनात्मक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न होती है। सुन्दर, प्रीतिकर दृश्यों से प्रसन्नता-उल्लास की, अरुचिकर दृश्यों से जुगुप्सा-अप्रसन्नता-कष्ट की, सामान्य अनुभव से सर्वथा भिन्न दृश्यों से विस्मय की और आत्म-सत्ता के द्वारा अपने लिए अनुकूल मानी गई परिस्थितियों को क्षति पहुँचा सकने का संकेत देने वाले या उनकी स्मृति उभारने वाले दृश्यों से भय की अनुभूतियाँ होती हैं। इन अनुभूतियों के समय मस्तिष्क की कोशिकाओं में या मज्जागत पदार्थ में किस तरह के कम्पन होते हैं इसका यदि भौतिकी या रसायनशाला की दृष्टि से अध्ययन-विश्लेषण कर भी लिया जाय तो भी उस विश्लेषणात्मक अध्ययन की तुलना उस समय की वास्तविक मानसिक अनुभूति से पूरी तरह नहीं की जा सकती। भौतिक-रासायनिक परिवर्तनों के अध्ययन से यथार्थ मानसिक अनुभूतियों का संकेत मात्र ही हो सकता है। वह अध्ययन वास्तविक अनुभूति के समतुल्य कभी भी नहीं हो सकता। इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की जो अनुभूति है, वह मूलतः व्यक्ति-चेतना की स्वतः की क्रिया-विशेष है। वस्तु सत्ता की निरपेक्ष अनुभूति चेतन व्यक्ति को नहीं हो पाती।
आज इस तथ्य को वैज्ञानिक भी स्वीकार कर रहे हैं। पदार्थ की सत्ता की खोज में आगे बढ़ते-बढ़ते वैज्ञानिक सृष्टि के मूलकणों से भी आगे बढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वे प्राथमिक कण भी विद्युत तंरगों के संघात मात्र हैं और आगे बढ़ने पर नतीजा यह निकला कि ये विद्युत-तरंगें भी अज्ञात, अवर्ण्य, अविवेच्य तरंग समूहों का अंश मात्र हैं और उनका मूल रूप जानना भौतिक उपकरणों से सम्भव नहीं। क्योंकि उन उपकरणों और उनके संचालक नियमों की हम जो गणना एवं विधि-व्यवस्था बनाते हैं वह अंततः हमारी ही मानसिक संरचना का परिणाम है। जिसे हम प्रकृति की कार्यविधि समझते हैं, वह प्रकृति के क्रिया-कलापों की हमारी अपनी मानसिक संकल्पनाओं के आधार पर व्याख्या भर है। हमारा सम्पूर्ण अवलोकन-विश्लेषण और परीक्षण हमारी अवधारणाओं पर आधारित रहता है। उसे स्वप्नवत् ही सत्य माना जा सकता है।
सामान्य दिनचर्या के अनुभवों-संवेदनों से मन पर जो प्रभाव पड़ते रहते हैं, उनके संस्कार एवं तज्जन्य वासनाएँ संचित होती रहती हैं। उसी आधार पर सुषुप्तावस्था में मन-मस्तिष्क स्वप्न की सृष्टि करता है। चेतन और अचेतन मस्तिष्क के अनुभवों से भिन्न स्वप्न-सृष्टि असंभव है। उसी प्रकार जन्म-जन्मांतरों से संचित संस्कारों एवं तदनुरूप आत्म-चेतना के स्वरूप के अनुसार ही हम जगत का बोध प्राणी को होता रहता है। इसलिए इस जागतिक बोध की, उसके विविध नाम-वर्ण, दृश्य, स्पृश्य, स्वाद, गंध शब्द आदि के अनुभव-संघातों की स्वप्न से तुलना पूर्णतः वास्तविक है। सुषुप्ति काल में उदित वासना के अनुसार स्वप्न होता है। भिन्न-भिन्न वासनाएँ भिन्न-भिन्न स्वप्नों को बोध कराती हैं। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न वासनाओं की उदितावस्था में इस नाम-रूपात्मक सृष्टि की भिन्न-भिन्न अनुभूतियों का स्वरूप बनता-बिगड़ता रहता है। एक मनःअवस्था में जो दृश्य मधुर, शीतल, आकर्षक, संगति योग्य, हितावह, सुन्दर प्रतीत होते हैं, दूसरी मनःअवस्था में वे ही दोष-पूर्ण, विकृत परित्यज्य, हानिकर प्रतीत होते देखे जाते हैं। कभी जो अनुभव नितान्त सत्य प्रतीत होता है, बाद में कभी वही पूरी तरह भ्रान्त ज्ञात होता है।
वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ भी हमारे अपने अनुभव संघातों के सहारे ही निर्धारित की जाती हैं। वैज्ञानिक विश्लेषण और प्रयोग की पद्धतियाँ एवं नियम-सूत्र वैज्ञानिकों के चेतन-अचेतन मस्तिष्क के अनुभवों द्वारा ही निर्धारित होते हैं। इसीलिए वे परिवर्तित भी होते रहते हैं। आज जो वैज्ञानिक निष्पत्ति, निभ्रान्त सिद्ध होती है, कल वही भ्रान्त सिद्ध हो जाती हैं।
ज्ञान चाहे भौतिक वस्तुओं का हो, चाहे देह का, चाहे मन का, वह सदैव ज्ञाता की चेतना के स्वरूप एवं स्तर पर निर्भर करता है। ज्ञाता की सत्ता से बाहर ज्ञान का अस्तित्व नहीं होता। वस्तु-सत्ता भले ही ज्ञाता की सत्ता से बाहर हो, किन्तु उसका जो ज्ञान होगा, वह ज्ञाता की सत्ता के ही भीतर उत्पन्न प्रतिक्रिया होगा। इसी प्रकार स्वयं की देह का अनुभव भी दृष्टा के अनुभव से स्वरूप पर आधारित होता है। प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों-उपकरणों से सज्जित-सक्रिय एक वैज्ञानिक जब देह को देखने-जानने को उद्यत होता है तो उसे देह असंख्य जीवाणुओं से भरी जीव-कोशिकाओं का संघात और प्राण-विद्युत तथा शरीर-विद्युत की त्वरित हलचलों का विचित्र क्रीड़ांगन प्रतीत होगा।
जबकि अपने या दूसरे की चमड़ी के सौंदर्य पर मुग्ध रागी को उस देह में जाने कितना माधुर्य, उसकी चेष्टाओं में सम्मोहन भाव और रहस्यमय आकर्षण भरा दिखता है। वैज्ञानिक के लिए प्रयोगशाला का सत्य जितना वास्तविक है, मुग्ध व्यक्ति के लिए अपना मुग्धताभाव भी उतना ही वास्तविक है। मूर्ति-पूजा से विरक्त व्यक्ति के लिए प्रतिमा वस्तुतः निष्प्राण, पाषाण खंड मात्र है, तो किसी सच्चे भक्त के लिए वही प्रतिमा वस्तुतः दिव्य प्रेरणाओं और गहन अनुभूतियों का जीवन्त स्त्रोत है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्ति-चेतना के स्तर एवं स्वरूप के अनुसार ही इस दृश्य जगत (जो स्पृश्य जगत एवं श्रव्य जगत भी है) के अनुभव होते हैं। आत्म-सत्ता ही अनुभूति का आधारभूत तत्व है।
इस तथ्य को समझ लेने पर श्रेष्ठ जीवन-दर्शन की, उत्कृष्ट दृष्टिकोण की महत्ता स्पष्ट हो जाती है। निकृष्ट दृष्टिकोण अपनाने पर, अंतःकरण में घटियापन भर लेने पर चारों तरफ घटिया स्वरूप ही दृष्टिगत होगा। वस्तुतः यह संसार आत्मसत्ता का ही प्रतिबिम्ब है। आत्मसत्ता का स्तर ही चारों ओर प्रतिबिंब होता है, वस्तु-जगत में हर व्यक्ति आत्मसत्ता को आरोपित करता है। घटिया दृष्टिकोण वाला इसी आरोपण के कारण चारों ओर घटियापन का ही अनुभव करता है। संत कबीर ने इसलिए इस संसार को दर्पणों की गुफा कहा था, अर्थात् ऐसी गुफा, जिसमें चारों ओर दर्पण ही दर्पण हों और उसमें हर व्यक्ति को सभी तरफ अपना ही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़े। इसी तथ्य को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था-
“दर्पण केरा गुफा में, श्वनहा पइठा धाय। देखि के प्रतिमा आपनी, भूंकि-भूंकि मरि जाय॥”
अर्थात्- मनुष्य उस कुत्ते के समान है, जो दर्पण गुफा में सहसा दौड़कर घुस जाय और चतुर्दिक अपनी ही प्रतिमाएँ देख-देखकर भौंक-भौंककर दम तोड़ दे।
यह मनुष्य की यथार्थ स्थिति है। अपनी ही आत्मा-सत्ता के प्रतिबिम्ब को देख-देखकर मनुष्य विचलित विक्षुब्ध-व्यग्र होता रहता है और जीवन में क्षण भर को भी सच्ची, शान्ति, संतोष एवं तृप्ति का अनुभव नहीं कर पाता। अध्यात्म-दर्शन का प्रयोजन इस तथ्य को सामने लाकर प्रत्येक मनुष्य को अपना स्वयं का स्तर उत्कृष्ट बनाने की, अपना दृष्टिकोण उन्नत, श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देना है। उसी के द्वारा मनुष्य की उत्कृष्टता, पवित्रता और प्रकाश के अनुभव एवं दर्शन हो सकते हैं तथा आनन्द, उल्लास की स्थायी अनुभूति हो सकती है।
सूर्यास्त का समय था। संध्या के रूप में सूर्य देवता अपने दिन भर के कार्यक्रम का पटाक्षेप कर जाने की तैयारी कर रहे थे। प्राकृतिक सुषमा से भरे-पूरे उस उपवन एवं पहाड़ी का सौंदर्य संध्या बेला में देखते ही बनता था। चिड़ियां चहचहा रही थीं। वृक्षों पर स्थित अपने घोंसलों को लौटते हुए सभी पक्षी प्रसन्न मुद्रा में सूर्योदय से अब तक के अपने साथियों से विदा ले रहे थे। ऐसी ही बेला में एक राजकुमार घूमता हुआ घाटी में जा पहुँचा। स्थान सुनसान था। धीरे-धीरे रात्रि की कालिमा अपनी चादर फैलाने लगी थी। हवा चलने लगी और उसके झोंकों से पेड़-पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनाई देने लगी। राजकुमार को लगा पहाड़ी में कोई छिपा है। कुछ कदम वह पीछे हटा तो ध्वनि और भी तेज हो गयी। उसने ईधन-उधर देखा। भय से वह चीख उठा- ‘‘कौन है?” वैसी ही प्रतिध्वनि घाटी के अन्तराल में गूँज उठी- ‘‘कौन है?’’
यह सुनते ही उसका भय और भी बढ़ गया। हृदय की गति तीव्र हो गयी। माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा उठीं। हाथ-पैर काँपने लगे। कुछ हिम्मत जुटाकर- भर्राई आवाज से वह फिर बोला- “कायर! कहाँ छिपा है? हिम्मत है तो सामने आ।’’ प्रतिध्वनि उतनी ही तेजी से कुछ क्षणों बाद गूँज उठी।
बची-खुची हिम्मत को खो राजकुमार वहीं मूर्च्छित हो गिर पड़ा। आचार्य प्रवर आश्रम से और भी साथियों को लेकर राजकुमार को खोजने निकल पड़े थे। प्रकाश की हल्की आभा में भी उन्हें राजकुमार को ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई। सिर गोदी में लेकर उन्होंने उस पर जल छिड़का। होश में आते ही राजकुमार से सारी बातें बताईं। आचार्य प्रतिध्वनि के रहस्य को समझ गये। उन्होंने अपने शिष्य से कहा- “जैसा में कहूँ, अब वैसा ही पुकारना”। राजकुमार ने आचार्य के निर्देशानुसार आवाज लगाई- ‘‘मेरे मित्र! इधर आओ।” राजकुमार को प्रत्युत्तर भी उसी रूप में मिला।
वास्तव में यह सिद्धान्त जीवन-व्यापार के हर क्षेत्र में लागू होता है। क्रिया की प्रतिक्रिया का यह नियम शाश्वत है। इसे सर्वत्र देखा जा सकता है। संसार में प्रतिदान, प्रतिच्छाया, प्रतिध्वनि, प्रतिक्रिया, प्रतिफल का हर स्थान पर अपना प्रभाव है। गुम्बज की तरह इसमें जैसी भी ध्वनि टकरायेगी, वैसी ही प्रतिध्वनि उत्पन्न होगी। स्वच्छ दर्पण में वही प्रतिबिम्ब उभरेगा जैसी आकृति है। “जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा।” का सिद्धान्त शाश्वत है। तथागत ने भी यही वचन अपने शिष्यों से कहे थे-
“हन्ता लभत्ति हन्तारं, जेतारं लभते जयं”।
अर्थात्- “मारने वाले को, मारने वाला और जीतने वाले को जीतने वाला मिल जाता है। “ऐज यू सो, सो यू रीप” का सिद्धान्त सर्वविदित है।
भले और बुरे विचारों का असाधारण प्रभाव दूसरे पक्ष पर भी पड़ता है। जैसा भाव अन्तः से उसके प्रति रखा जाता है, वह बाहर भले ही प्रकट न हो, अन्त शत्रुता के रूप में ही होता है। स्नेह, आत्मीयता और सद्भावना के सहारे किसी भी व्यक्ति को अपना बनाया जा सकता है। जिन-जिन व्यक्तियों को इतिहास के प्रगति क्रम में जन सहयोग मिला है, उसके मूल में उनके प्रति सद्भावना ही मूल कारण रही है।
दूसरों के सद्-व्यवहार एवं सद्भाव की अपेक्षा करने के पूर्व यह तथ्य भली-भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि अपना आचरण ही संसार में प्रतिध्वनित होकर तद्नुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। अस्तु, अपेक्षा यदि दूसरों का सद्भाव, सहयोग अर्जित करने की है तो सर्वप्रथम इसका आरम्भ स्वयं से ही करना चाहिए। यह क्रम चल पड़ने पर दूसरे भी वैसा ही अनुकरण करते हैं तथा उसकी परिणति सहयोग, सहकार, सद्व्यवहार से भरी-पूरी सद्भाव भरी परिस्थितियों के रूप में होती है।
सृष्टि में संघर्ष का नहीं, सहयोग का अस्तित्व है। संघर्ष से तो अराजकता, अव्यवस्था फैलती और विकसित जातियाँ भी पतन में गर्त में मिल जाती हैं। सतत् लड़ने मरने पर उतारू जातियाँ आपस में ही भिड़कर समाप्त हो जाती हैं। इस तथ्य को प्राणी जगत के पिछले इतिहास के विकास एवं अवसान की घटनाओं के अध्ययन से भली-भाँति समझा जा सकता है। मनुष्येत्तर जीवों की कितनी ही बलिष्ठ एवं समर्थ जातियाँ केवल उस कारण लुप्त हो गईं कि उनमें मरने-मारने की हिंसात्मक प्रवृत्ति अधिक थी। उन्होंने आपस में ही लड़कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लिया। पूर्वकाल में शक्ति एवं सामर्थ्य की दृष्टि से एक से बढ़कर एक जीव थे। पर उनके आपसी संघर्ष ने उन्हें जीवित नहीं रहने दिया, ‘डायनासौर’ विशालकाय जीव था। ‘डिप्लोडोकस’ नब्बे फीट लम्बा था। ‘ब्रेकियोसोरस’ का वजन पचास टन था तथा ऊंचाई बीस फीट थी जो लगभग मकान के दूसरी मंजिल तक ऊंचा दिखाई पड़ता था। टायनोसौरस के शरीर की लम्बाई बीस फीट तथा दाँत की 3 फीट थी।
ये सभी ‘सरीसृप समूह’ के नाम से विख्यात थे तथा सारे भूमण्डल पर छाये हुए थे। इनमें से कुछ पानी में, कुछ पृथ्वी पर तथा कुछ आकाश में भी उड़ने वाले भी जीव थे। शक्ति की दृष्टि से ये महादानव थे। किन्तु आपसी संघर्ष के कारण लुप्त होते चले गये। कुछ तो परिस्थितियों में परिवर्तन होने के करण अपना सामंजस्य बिठा पाने में असमर्थ रहे। इसका प्रधान कारण परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं आपसी सहयोग का अभाव था। एक तो वातावरण की प्रतिकूलता-दूसरे संघर्ष की प्रकृति-दोनों के सम्मिलित प्रहार ने उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। विकासवादी एक मात्र इसका कारण परिस्थितियों को बताते हैं पर इसे पूर्णतया सही नहीं माना जा सकता है।
वैज्ञानिक शोध इस बात की प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जीवों में विषम से विषम स्थिति में सामंजस्य स्थापित करने की अद्भुत सामर्थ्य विद्यमान है। स्पष्ट है कि आपसी सहयोग रहा होता तो विषमताओं में भी अपना अस्तित्व सुरक्षित रखा जा सकता था। किन्तु ऐसा सम्भव न हो सका। जबकि शक्ति सामर्थ्य की दृष्टि से नगण्य जीव आपसी सहयोग के कारण जीवित बने रहे। मनुष्य का स्वरूप भूत में जो भी रहा हो पर यह तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसमें आपसी सहयोग-सहकार की प्रवृत्ति थी उसी कारण उसने अपना अस्तित्व बनाए रखा। अपनी इस विशेषता के कारण वह न केवल समूह रूप में सुरक्षित रहा वरन् प्रगति के सोपानों पर क्रमशः चढ़ता गया। तर्कशील इस प्रगति को बुद्धि एवं विचारशीलता की परिणति कह कर सन्तोष कर सकते हैं, पर तथ्य यह है कि सहयोग एवं सहकार रूपी विचारशीलता ने ही उसे वर्तमान स्थिति तक पहुँचाया है।
अन्य जीवों की तरह मनुष्य ने भी संघर्ष को ही महत्व दिया होता तो वह भी आपस में लड़-मरकर समाप्त हो गया होता। विकासवाद के जनक ‘डार्विन’ ने जीवन के लिए संघर्ष का जो सिद्धान्त दिया, उसका अर्थ संकुचित रूप में लिया गया। इस सिद्धान्त की समग्रता भी तभी बनती है जब उसे स्थूल संघर्षों के अर्थ में नहीं जीवन संघर्ष एवं विकास के लिए सतत् प्रयास के रूप में लिया जाय। संघर्ष का व्यापक अर्थ यह है कि “विभिन्न प्राणी एवं मनुष्य मजबूत एवं समर्थ बनें। यह तथ्य स्थूल कम सूक्ष्म अधिक है। तात्पर्य व्यक्ति से नहीं परिस्थिति से है।”
डार्विन ने स्वयं भी यह सिद्धान्त स्वीकार किया है कि “प्राणियों का अस्तित्व परस्पर एक-दूसरे के ऊपर निर्भर है।” व्याख्याकारों ने इसका अर्थ संघर्ष के रूप में लिया तथा कहा कि अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शक्तिशाली जीव असमर्थों को समाप्त कर देते हैं। परिस्थितियों की महत्ता प्रतिपादित करने की दृष्टि से सम्भव है। ‘डार्विन’ ने भी इस सिद्धान्त को संकुचित अर्थों में प्रयुक्त किया हो, पर वह एक पक्षीय एवं एकांगी है। उसे शाश्वत सिद्धान्त के रूप में तो तभी स्वीकारा जा सकता है जबकि वह सर्वत्र शाश्वत सत्य के रूप में लागू होता हो।
जीवन संघर्ष का अर्थ आपसी टकराव से नहीं था। इसी पुष्टि स्वयं डार्विन ने “मनुष्य का अवतरण” नामक पुस्तक में की है। वे लिखते हैं कि “विकास के क्रम में असंख्य प्राणि समूहों में पृथक-पृथक प्राणियों का आपसी संघर्ष मिट जाता है- संघर्ष का स्थान सहयोग ले लेता है और इसके फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है। इस विकास से ही उन प्राणियों का अस्तित्व बने रहने के लिए अत्यन्त अनुकूल अवस्था पैदा होती है।” ‘सरवाइवल आफ दी फिटेस्ट’ की व्याख्या करते हुए डार्विन इस पुस्तक में स्वयं कहते हैं कि “ऐसे समुदायों में योग्यतम वे नहीं कहे जाते जो सबसे अधिक बलवान या चालाक है। वरन् समर्थ वे हैं जो अपने समाज के हित के लिए- निर्बल एवं बलवान सभी की शक्ति को इस तरह संगठित करना जानते हों कि वे एक दूसरे के पोषक हों। जिन समुदायों में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्राणियों की अधिकता होगी, वे ही सबसे अधिक उन्नत होंगे और फूले-फलेंगे।” वर्तमान में सर्वाधिक विकसित एवं प्रगतिशील समाज के विशद अध्ययन से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि उनके परस्पर स्नेह-सहयोग एवं सहकार की भावना ने ही उन्हें उस स्तर तक बढ़ाया है।” अविकसित, पिछड़ी, असभ्य जातियों का गहराई से अध्ययन करने पर एक ही तथ्य हाथ लगता है कि पिछड़ेपन का एक मात्र कारण है- आपसी सहयोग, स्नेह एवं सहकार का अभाव।
जो पशु अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं, उसका कारण भी उनकी सहयोग भावना है। रूसो का कहना है कि “प्रकृति में प्रेम, शान्ति और सहयोग कूट-कूटकर भरा है। पशुओं को इन प्रवृत्तियों से रहित समझने वाले व्यक्तियों को जंगलों का पर्यवेक्षण करना चाहिए। उनकी यह विचारधारा निर्मूल सिद्ध होगी कि पशुओं में सामाजिकता का अभाव है।” डार्विन के सिद्धान्त की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या रूसी प्रोफेसर ‘केसलर’ ने की है। उन्होंने माना है कि “सहयोग प्रकृति का नियम और विकास का मूल अंग है।’’ जनवरी 1880 में अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व रूसी प्रकृतिवादियों के समक्ष उन्होंने अपने ये विचार व्यक्त किए थे।
जीवन संघर्ष के सिद्धान्त का दुरुपयोग होते देखकर ‘केसलर’ ने उसका वास्तविक स्वरूप जन-सामान्य के समक्ष रखना अपना कर्तव्य समझा। उनका कहना था कि “प्राणी शास्त्र और मनुष्य सम्बन्धी अन्य दूसरे शास्त्र सदा उस नियम पर जोर देते हैं, जिसे वे अपनी भाषा में जीवन संघर्ष का निष्ठुर नियम कहते हैं। किन्तु ऐसे व्यक्ति एक-दूसरे नियम के अस्तित्व को भूल जाते हैं, जिसे हर पारस्परिक सहयोग का नियम कह सकते हैं। प्रो. केसलर ने बताया कि “किस प्रकार वन्य प्राणी भी परस्पर सहयोग की भावना से समूहों में रहते बच्चे पैदा करते तथा उनके लिए व्यवस्था जुटाते हैं। एक साथ रहने पर वे अपने साथियों को सहयोग भी करते हैं।”
अपने भाषण के अन्त में प्रो. ‘केसलर’ ने कहा कि “मैं जीवन संघर्ष के अस्तित्व से इन्कार नहीं करता। किन्तु मेरा कहना यह है कि पारस्परिक संघर्ष द्वारा नहीं बल्कि सहयोग द्वारा प्राणी संसार एवं मनुष्य जाति का विकास सम्भव हुआ है। प्राणियों की दो प्रमुख आवश्यकताएँ हैं। एक तो भोजन प्राप्त करना, दूसरा अपनी जाति की वृद्धि करना। इसमें पहली आवश्यकता संघर्ष को जन्म देती है जबकि दूसरी परस्पर सहयोग के लिए प्रेरित करती है। किन्तु मेरा विश्वास है कि विकास के लिए दूसरी कही अधिक महत्वपूर्ण एवं शाश्वत है।
प्रो. ‘केसलर’ के विचारों का उल्लेख रूप से प्रसिद्ध विचारक ‘प्रिंस क्रोपाटकिन’ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में किया है। जीवन संघर्ष की तथाकथित व्याख्या पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते है कि “मैं अपने मित्र प्राणि विशेषज्ञ ‘पोलियाकोफ’ के साथ साइबेरिया के घने जंगलों में गया। डार्विन के सिद्धान्त का हम दोनों पर नया-नया असर था। हम दोनों यह आशा लगाये बैठे थे कि हमें एक ही जाति के प्राणियों में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा देखने को मिलेगी किन्तु वहाँ इसका कोई नामोनिशान नहीं था”
जीवन में संघर्ष की स्थिति आती है इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता किन्तु वह सृष्टि के सिद्धान्त का रूप नहीं ले सकता। हिंसक जीवों से लेकर चोर-डाकुओं, आताताइयों से सामना करने के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ता है। यह उचित है और आवश्यक भी। पर यह अपवाद है। आपत्तिकालीन परिस्थितियों में ही इसका अवलम्बन लिया जाता है। संघर्ष जीवन का ‘दर्शन’ नहीं बन सकता। यदि होगा भी तो अन्तः दुष्प्रवृत्तियों के लिए। अपनी दृष्प्रवृत्तियों से तो मनुष्य को सतत् लड़ना होता है। परिस्थितियों के अनुकूलन के लिए अथक प्रयत्न करना होता है। चाहें तो इसी को जीवन संघर्ष की संज्ञा दी जा सकती है। किन्तु यही जब बाह्य जीवन में अपने सजातियों के प्रति प्रकट होने लगेगा तो भारी संकट उत्पन्न हो जायेगा। उस स्थिति की कल्पना करें कि संघर्ष को जीवन का सिद्धान्त मानकर हर व्यक्ति अपनाने लगे तो कैसी स्थिति होगी। निश्चित ही ‘‘जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली” उक्ति चरितार्थ होगी। ‘मत्स्य न्याय’ की यह परम्परा मनुष्य को पाषाण युग के आदमखोर मनुष्य के तुल्य बना देगी और कुछ दिनों में सभ्यता लड़-मरकर समाप्त जो जायेगी।
पारिवारिक जीवन में यह परम्परा चल पड़े तो स्नेह-आत्मीयता के पावन सूत्रों में बंधे रिश्तों को टूटते देर न लगेगी। जो शारीरिक दृष्टि से बलवान होगा, वह कमजोरों पर अपना स्वार्थ साधने के लिए अनेकों प्रकार के अत्याचार करेगा। ‘संघर्ष’ के जीवन दर्शन बन जाने पर कौन माँ निरीह बच्चों का, कौन पिता अनाथ सदस्यों का पालन-पोषण करेंगे? बच्चे की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने वाली माँ क्यों कर यह उदात्त त्याग करेगी? बच्चों के हितों के लिए अपने सुखों पर लात-मारने वाला पिता कभी भी त्याग-बलिदान से भरा कष्ट साध्य जीवन स्वीकार न करेगा। क्रूरता मानवी भाव-सम्वेदनाओं की- सेवा, दया, करुणा की प्रवृत्तियों को रौंदती हुई चली जायेगी। स्थूल परिप्रेक्ष्य में जीवन संघर्ष को सृष्टि का अनिवार्य नियम मान लेने पर तो हृदय विदारक स्थिति की प्रस्तुत होगी।
समाज की प्रगति एवं सुव्यवस्था आपसी सहयोग एवं सहकार पर टिकी हुई है। संघर्ष यदि सफलता का आधार बन जाये तो सामाजिक व्यवस्था को विश्रृंखलित होते देर न लगेगी। अनीति, अत्याचार से, शरीर बल से हर व्यक्ति अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करेगा। नैतिक पुरुषार्थ की कोई महत्ता न होगी। फलतः प्रगतिशील मानव समाज की भी वही दुर्दशा होगी जो विलुप्त जीवों एवं आदिम जातियों की हुई। स्पष्ट है कि अस्तित्व संघर्ष का नहीं सहयोग का है- सहकार का है। मनुष्य जाति को सभ्यता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए जीवन-दर्शन के रूप में सहयोग एवं सहकार को स्वीकार करना होगा न कि संघर्ष को। जीवों के विकास एवं अवसान के तथ्यों के पर्यवेक्षण से भी यह तथ्य स्पष्ट होता है कि जिनमें यह प्रवृत्ति जितनी अधिक रही वह उतना ही आगे बढ़ते गये और प्रगति के उच्चतम सोपानों पर चढ़ते गये। सहयोग एवं सहकारिता रूपी उत्कृष्ट जीवन दर्शन को विचारशील मनुष्य जाति को अपनाना ही होगा। तभी वह अपना अस्तित्व अक्षुण्ण बनाये रख सकती है।
एक बार महात्मा गाँधी अपने निकटतम अनुयायी आनन्दस्वामी के साथ किसी धनिक के यहाँ ठहरे। वहाँ आनन्दस्वामी की उस धनिक के रसोइये से किसी बात पर लड़ाई हो गयी और बातचीत के दौरान आनन्दस्वामी ने रसोइये को चांटा मार दिया।
गाँधी जी ने जब यह सुना तो बोले- ‘यदि बराबर वाले किसी व्यक्ति के साथ यह बात होती तो तुम उसे चांटा न लगाते। तुमने रसोइये को नौकर समझा, अपने से छोटा समझा। इसलिए ऐसा व्यवहार किया। तुम्हें अभी तुरन्त जाकर उससे क्षमा माँगनी चाहिए।’
आनन्दस्वामी क्षमा माँगने को तैयार न हुए तो तुरन्त गाँधी जी ने अपना निर्णय सुना दिया- ‘यदि तुम अन्याय करते हो तो मेरे साथ नहीं रह सकते।’
और आनन्दस्वामी को रसोइये से क्षमा माँगनी पड़ी।
भारतीय दर्शन के अनुसार यह संसार घटनाओं की एक अंतहीन न श्रृंखला है, एक अनवरत प्रवाह है। हर क्षण परिवर्तनशील है। जिसे हर स्थिर देखते हैं वस्तुतः उसके भीतर भी प्रचण्ड हलचल हो रही है। निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। संसार में दृश्यमान प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है। संसार एवं जगत शब्दों का प्रयोग दुनिया की असारता एवं अस्थिरता को प्रकट करने के लिए किया जाता है। इनके शब्दार्थ ये सही ध्वनि निकलती है।
संसार एक स्वप्न है। स्वप्न की अवधारणा संसार में प्रवाहित चेतना की गति से नहीं है बल्कि उस स्वरूप से है जो सतत् परिवर्तनशील है। जगत के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान पूर्व में बनाई गई मान्यताओं पर आधारित है, जो सापेक्ष सिद्धान्तों पर अवलम्बित है। मान्यताओं की प्रतिक्रिया स्वरूप ही वस्तुओं का विविध रूप एवं गुण प्रतीत होता है। मान्यताओं का आधार बदल दिया जाय तो वस्तुओं के स्वरूप एवं गुणों में भारी अन्तर दिखाई पड़ने लगता है।
नये तथ्यों के रहस्योद्घाटन से मान्यताओं में सतत् परिवर्तन होता रहता है। पदार्थ सत्ता को ही लें तो मालूम होगा कि उसके स्वरूप के विषय में समय-समय पर कितनी तरह की व्याख्याएँ हुई हैं। पदार्थ सत्ता की व्याख्या करते हुए विज्ञान ने परमाणुओं की कल्पना की। परमाणु का विश्लेषण करने पर प्रोटान, न्यूट्रान, इलेक्ट्रान, पॉजीट्रान जैसे कणों का अस्तित्व उभर कर सामने आया। कणों की यह मान्यता भी नवीन अनुसंधानों द्वारा ध्वस्त हुई। यह कहा गया है कि सृष्टि में मात्र ऊर्जा संव्याप्त है। ऊर्जा तरंगों के उतार-चढ़ाव से ही जगत का स्थूल स्वरूप भासित होता है। आइन्स्टीन जैसे विश्व विख्यात वैज्ञानिक ने कहा कि शक्ति की यह अवधारणा भी अन्तिम नहीं है। वस्तुतः शक्ति के मूल में चेतना का प्रवाह प्रवाहित हो रहा है। यह चेतना ही ऊर्जा कणों में परिवर्तित होती है। ऊर्जा कण इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रान जैसे कणों में बदल जाते हैं। इन कणों का समूह परमाणुओं का समुच्चय पदार्थ सत्ता के रूप में परिलक्षित होता है। स्पष्ट है कि स्थूल जगत के स्वरूप के विषय में बनाई गई मान्यताएँ अथवा प्राप्त जानकारियाँ पूर्ण हैं। पदार्थों के मूल में कार्य करने वाली चेतना ही मात्र सत्य है।
पदार्थ ही नहीं संसार के प्रति हमारी मान्यताएँ सापेक्षता सिद्धान्त पर अवलम्बित हैं। दिशा का नाम लेते ही उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम दिशा का बोध होता है। धरातल को आधार मानकर ही दिशा की कल्पना की जाती है। धरातल की कल्पना भी अनेकों बिन्दुओं की आपेक्षिक स्थिति पर निर्भर करती है। अनन्त अन्तरिक्ष में अपने को एक बिन्दु माना जाय तथा धरातल नाम की किसी वस्तु की पूर्व मान्यता न बनायी जाय तो उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम किसी भी दिशा का निर्धारण कर सकना असम्भव होगा। एक रोचक कल्पना की जाय कि पृथ्वी का गोला स्वयं आकाश मंडल में घूमता हुआ दिशाओं की खोज करना चाहे तो उसके लिए दिशाओं का पता लगा सकना कैसे सम्भव होगा? अभिप्राय यह है कि दिशाओं का पता लगाना तभी सम्भव है जब अनन्त बिन्दुओं से बने धरातल को आधार माना जाय।
काल द्वारा एक निश्चित समय का बोध होता है। किन्तु ‘समय’ की सीमा में काल को नहीं बाँधा जा सकता है। ‘काल’ अनन्त है। अपनी मान्यता के अनुरूप उसे हम ‘समय’ की एक निश्चित सीमा में बाँधने का प्रयत्न करते हैं। सृष्टि अनेकों बार रची गई, नष्ट हुई। किन्तु काल का कभी अन्त नहीं हुआ। पृथ्वी पर चौबीस घण्टों का एक दिन-रात होता है। किन्तु आदि काल में स्थिति कुछ और ही थी। भू-गर्भ शास्त्रियों का मत है कि जब तक धरती ठण्डी नहीं हुई थी, आग्नेय दशा में थी तब तक पृथ्वी के विभिन्न भागों में दो घण्टे का ही दिन-रात होता था।
सूर्य के उदय अस्त होने से रात-दिन का ज्ञान होता है उसकी गति को आधार मानकर समय-काल की गणना करते हैं। किन्तु यदि आधार सूर्य को न मानकर अन्य ग्रहों को माना जाय तो काल की बनाई गई हमारी मान्यताओं में भारी अन्तर आयेगा। ‘शनि’ को आधार मानने पर हमारा एक वर्ष होगा तीस वर्ष के। इसी प्रकार बृहस्पति को प्रमाण मानें तो पृथ्वी का एक वर्ष बारह सौर वर्षों के बराबर होगा। काल की गणना सूर्य की गति सापेक्ष की जाती है। सापेक्षता का आधार बदल देने पर काल की अवधारण भी बदल जाती है।
वरुण ग्रह अपने सूर्य मण्डल के अंतर्गत ही आता है। ज्योतिर्विदों का कहना है कि वरुण ग्रह का एक वर्ष हमारे 180 वर्ष के बराबर है। यदि वहाँ जीवन की कल्पना की जाय तो वहाँ कर छः माह का बच्चा पृथ्वी लोक के नब्बे वर्ष के वृद्ध के बराबर होगा। वरुण लोक के सौ वर्ष के वृद्ध की आयु पृथ्वी लोक की गणना के अनुसार 18 हजार वर्ष होगी। वाल्मीकिय रामायण में प्रसंग आता है कि यज्ञ की रक्षा के लिए विश्वामित्र राजा दशरथ के पास राम लक्ष्मण को लेने पहुँचे। पुत्रों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए राजा दशरथ ने कहा- ‘‘हे कौशिक! साठ हजार वर्ष का मैं जब हो गया तब ये पुत्र उत्पन्न हुए (षष्ठि वर्ष सहस्त्राणि जातस्य मम कौशिक)। पृथ्वी लोक के काल में मान से साठ हजार वर्ष बहुत होते हैं। वरुण के मान से सवा तीन सौ वर्ष से कुछ अधिक होंगे। यदि किसी अन्य तारे को आधार माना जाये तो साठ हजार वर्ष वहाँ के तीस या चालीस वर्ष के बराबर हो सकते हैं। सम्भव है काल की गणना रामायण काल में किसी अन्य ग्रह के सापेक्ष हो।
यह विश्व अनन्त है। ऐसे पिण्ड भी सृष्टि में हो सकते हैं जिनके वर्ष का मान हमारी अपेक्षा इतना बड़ा हो कि हमारा एक कल्प उस पिण्ड के एक दिन सामान हो। ऐसी स्थिति में वह पिण्ड हमारे सत्यलोक या ब्रह्म लोक के तुल्य होगा। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस में सृष्टि की विविधता की ओर देखकर ही कहा था, ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’। इस कथन में सृष्टि की विचित्रता एवं अनन्तता का ही रहस्योद्घाटन किया गया है।
भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल की मान्यताएं भी सापेक्ष हैं। घटना जो आज हमें घटित होती दिखाई पड़ रही हैं, सम्भव है किसी अन्य स्थान पर भूतकाल में घटित हो चुकी हो अथवा किसी को भविष्य में दिखाई पड़े।
आकाश मण्डल में एक नया पिण्ड दिखायी पड़ता है। जिसे आश्चर्यचकित होकर देखा जाता है। गणना द्वारा जब पता लगाते हैं तो मालूम पड़ता है कि तारे का अस्तित्व जो हमें दिखाई पड़ता है उसका उद्भव बहुत पहले हो चुका था। वर्तमान में तो उसका अस्तित्व भी नहीं है। इसको एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। एक तारे की परिकल्पना की जाय, जो दस प्रकाश वर्ष दूरी पर है। प्रकाश की गति एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड है। अर्थात् तारे की पृथ्वी से दूरी होगी- एक लाख छियासी हजार×साठ×साठ×चौबीस×तीन सौ पैंसठ = पाँच खरब पैंसठ अरब उनहत्तर करोड़ मील। इस प्रकार उक्त तारे से चलने वाला प्रकाश निरन्तर चलता रहे तो इतने वर्ष बाद पृथ्वी पर पहुँचता है और तब कहीं हमें दिखायी देता है। तथ्यों द्वारा पता चलता है कि प्रकाश हमें दिखायी देने के बहुत समय पूर्व ही तारे का अस्तित्व का परिचय पृथ्वी लोक पर देता रहा। यह कैसी भ्रमपूर्ण स्थिति है कि जब तारे का अस्तित्व था तब दिखायी नहीं पड़ा और जब वह अस्तित्व में नहीं है तब दृष्टिगोचर होता है।
जिस प्रकार तारे में उद्भव की जानकारी हमको सैकड़ों, हजारों वर्ष बाद मिलती है उसी प्रकार सम्भव है कि पृथ्वी पर घटित हो रही घटनाओं की जानकारी अन्य ग्रहों पर रहने वाले जीवों को हजारों वर्ष बाद मिले। भूतकाल में पृथ्वी पर हुए महाभारत के दृश्य वर्तमान में वहाँ पर उसी प्रकाश दिखायी पड़ रहे हों। जैसे युद्ध अभी हो रहा हो। युद्ध में कुहराम मचाती पाण्डव, कौरवों की सेना को देख सकना उस ग्रह पर असम्भव नहीं। यदि उन ग्रहों पर किसी ऐसे यान द्वारा जाया जाय तो कुछ क्षणों में पहुँचा दे तो गीता का तत्वज्ञान भगवान कृष्ण के मुख से उसी प्रकार सुना जा सकता है जैसे वे सामने ही खड़े हों। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स हाइजेन वर्ग का कहना है कि काल भूत से भविष्य की ओर ही नहीं भविष्य से वर्तमान और भूत की ओर भी प्रवाहित है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भूत, वर्तमान और भविष्य की अवधारणा हमारी चेतना के आन्तरिक भाव हैं। उसकी बाह्य सत्ता कुछ भी नहीं है।
हमारी पूर्व की बनायी गई मान्यताएं ही विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती हैं। सापेक्ष की मान्यताएँ वास्तविक नहीं है। अन्धेरे में झाड़ी भूत बनकर दिखायी पड़ती है। आदमी विक्षिप्त बन जाता तथा उसे बुखार चढ़ आता है, मन की कल्पना भूत के रूप में दिखायी पड़ती तथा विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती हैं।
एक ही वस्तु अपनी मान्यता के अनुसार विविध रूपों में दिखायी पड़ती है। पत्थर की मूर्ति एक उपासक की साधना का आधार बनती है। अपनी श्रद्धा को आरोपित करते हुए उस मूर्ति में ही भगवान का दर्शन कर लेता है। दूसरा व्यक्ति उसे तराशने वाले कलाकार की कला के रूप में देखता है। दार्शनिक उसे भावों की अभिव्यक्ति के एक साधन के रूप में देखता है। मनोवैज्ञानिक उसे एकाग्रता का साधन मानता है। एक ही मूर्ति आन्तरिक मान्यताओं के कारण भिन्न-भिन्न रूपों में दिखायी पड़ती है।
एक समय में ही एक व्यक्ति स्त्री का पति, एक बहन का भाई, लड़के का पिता, अन्य व्यक्ति का मित्र तथा दूसरे का शत्रु के रूप में देखा जाता है। एक खूँखार जीव के समक्ष यह सारे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। शेर उसे मात्र अपना प्रिय शिकार समझता है। वास्तविकता यह है कि वह मात्र एक मनुष्य है। अपनी मान्यता के अनुरूप ही लोग उसे विभिन्न रूपों में देखते तथा मानते हैं। थोड़ी और गहराई में जाने का प्रयत्न करें तो स्पष्ट होता है कि स्थूल मानव शरीर भी कितना अवास्तविक है। शरीर के भीतर प्रवाहित चेतना ही सत्य है, स्थूल कलेवर तो चेतना की प्रेरणा एवं शक्ति से गतिशील है।
भौतिक संसार बनता-बिगड़ता रहता है। अपनी बनायी गई मान्यता के अनुरूप ही संसार का विविध स्वरूप लोग मानते एवं देखते हैं। जबकि वास्तविक स्वरूप कुछ और ही है। पदार्थों के स्वरूप से सामान्यतया लोग प्रभावित होते देखे जाते हैं। पदार्थों को सुख-दुख का हेतु मानना अविवेक पूर्ण है। सतत् परिवर्तनशील पदार्थों का स्वरूप अवास्तविक है। वास्तविकता का पता लगाने के लिए चेतना के उस सागर में ही डुबकी लगाना होगा, जिसकी तरंगें स्थूल जगत् का निर्माण करती तथा विविध रूपों में दिखायी पड़ती हैं।
एक न्यायाधीश था, वह बड़ा भक्त था, एक बार एक चोर उसके न्यायालय में लाया गया। पूछने पर कहने लगा, “जज साहब आप जैसे साधु वृत्ति के व्यक्ति के सामने उपस्थित हो मुझे बड़ा आनन्द आ रहा है। मैंने चोरी कोई अपने वश होकर नहीं की। मुझे ऐसी प्रभु प्रेरणा ही हुई कि चोरी करूं, अतः मैंने चोरी की। मेरे हाथों का दोष नहीं।’’
चोर का तर्क सुन कचहरी वाले विस्मित से रह गए व सोचने लगे कि- देखें ऐसे में न्यायाधीश अब कैसा दृष्टिकोण अपनाते हैं।
परन्तु न्यायाधीश पक्के निकले उन्होंने फैसला सुनाया, चोर का कथन पूर्णतः मान्य है जिसे भगवान् ने उसे चोरी करने की प्रेरणा की उसी भगवान की प्रेरणा से मैं इस चोर को दण्ड देता हूँ।
पिछले दिनों जीवन-दर्शन पर नई दृष्टि से विचार करने वाले मनीषियों ने कुछ ऐसे तथ्य भी ढूंढ़े और प्रतिपादन किये हैं जो देखने में तर्कपूर्ण एवं आकर्षक प्रतीत होते हैं, इतने पर भी उनकी परिणति प्रतिक्रिया ऐसी प्रतीत नहीं होती जिसे लोकोपयोगी कहा जा सके।
ऐसे प्रतिपादनों में जॉन स्टुअर्ट मिल का बहुचर्चित ‘उपयोगितावाद’ भी एक है। जिसके अंतर्गत कहा गया है- जो उपयोगी है उसे चुना और संभाला जाय। साथ ही यह भी जोड़ा गया है कि जो निरुपयोगी है उसे नष्ट होने दिया जाय या त्याग कर दिया जाय। इस मान्यता में दुर्बलों पर दया करने को निरर्थक ही नहीं हानिकारक भी बताया गया। बेकार का कूड़ा-कचरा बढ़ने से सुन्दरता और व्यवस्था पर आघात पहुँचने- संसार को समुन्नत बनाने में अवरोध पड़ने- का तर्क देकर वे कहते हैं कि उपयोगी को ही चुना, पोसा जाय।
इस तर्क में वे प्रकृति के व्यवस्थाक्रम को साक्षी रूप में प्रस्तुत करते हैं। बड़ा पेड़ अपने समीपवर्ती पौधों की खुराक खा जाता है। स्वयं बढ़ता है नीचे उगने वालों को सुखा देता है। बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। हिंस्र पशु, छोटे-मोटे जानवरों को उदरस्थ करते रहते हैं। मनुष्यों में भी प्रचलन चलता तो बहुत दिन से रहा है, पर उसे ऐसा खुला समर्थन नहीं मिला जैसा कि उपयोगितावाद को एक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करके उसे लोक मान्यता के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए इन दिनों किया गया है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ -जैसी उक्तियों में मत्स्य न्याय का समर्थन किया गया है और जंगल के कानून को मनुष्यों के लिए भी उपयुक्त बताया गया है।
ऐसे अन्य प्रतिपादनों में नीत्से जैसे अन्य दार्शनिकों का भी समर्थन मिला है और उन्होंने और भी जोर देकर इस बात को ऐसे तर्क तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है कि समर्थों की मदांधता को उससे नया साहस मिला है। वे अपने कृत्यों का अब दार्शनिक स्तर पर भी समर्थन करने लगे हैं। पिछले दिनों नाजीवाद का जर्मन दर्शन क्या कहर ढा चुका है यह सर्वविदित है। प्रत्यक्ष कारण उसका जो भी रहा है, परोक्ष रूप से उसे “वरिष्ठों को ही जीवित रहने का अधिकार” का दार्शनिक समर्थन भी मिला है। फलतः उद्दण्डता ने मनमानी करने के लिए इसे एक नये और पैने हथियार के रूप में प्रयुक्त किया है। लोक-मान्यता उसी प्रवाह में बहने लगी तो खतरा यह है कि मध्यकालीन डाकुओं, सामन्तों और पिण्डारियों का जमाना अब दैत्य दानव के रूप में नहीं एक उपयोगिता एवं आवश्यकता का जामा पहनकर दुर्बलों के उत्पीड़न, विनाश का एक नया संकट खड़ा करेगा।
जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने प्रतिपादित उपयोगितावाद की व्याख्या करते हुए उसका आधार बड़े सभ्य और भले शब्दों में अधिक लोगों का अधिक सुख बताया है।
इस प्रतिपादन पर दृष्टि डालते ही कई प्रश्न उठते हैं। यह निर्णय कैसे किया जाय कि अमुक बात से अधिक लोगों को सुख प्राप्त होगा? लोगों की इच्छाएं अनेक प्रकार ही होती हैं और वे बदलती भी रहती हैं। भूखा आदमी रोटी को सर्वोपरि सुख मानता है और पेट भर जाने पर विलासिता और स्वच्छंद आचरण को। इस दृष्टि से देखा जाय तो दूसरे को नीचा दिखाने और उसके अधिकार छीनने में भी बहुतों को सुख मिलना है। इसके लिए आवश्यक होगा कि सुख की व्याख्या की जाय।
विचार करने पर हम उन्हीं शाश्वत सिद्धान्तों पर पहुँच जायेंगे सबों का सुख सन्निहित है। इसके विपरीत ‘अधिक संख्या का सिद्धान्त’ के भीतर अनौचित्य ही नहीं संघर्ष भी छिपा हुआ है साथ ही उसमें स्थायित्व भी नहीं है, अतः उसे मूल्याँकन का शाश्वत आधार नहीं बनाया जा सकता है।
यह सही है कि जीवन में अस्थायी मूल्यों की भी आवश्यकता होती है किन्तु वे सापेक्ष हैं। उनका रुख स्थायी मूल्यों की ओर होना चाहिए। अर्थात् यदि सामाजिक जीवन में हिंसा या दण्ड की आवश्यकता पड़ती है तो उसका भी लक्ष्य अहिंसा या सर्व कल्याण होना चाहिए।
भौतिकतावादी दार्शनिकों का कथन है कि न्याय अथवा कानून का आधार ‘उपयोगिता’ है। उदाहरण के रूप में, यदि दो व्यक्तियों में झगड़ा है तो यह देखना चाहिए कि हमारे लिए कौन-सा अधिक उपयोगी है और उसी के पक्ष में निर्णय देना चाहिए। प्रायः समर्थ सत्ताधारियों की मनोवृत्ति इसी प्रकार की होती है। उनकी दृष्टि में स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे वर्ग का दमन या उसकी सुविधाओं में कटौती करने में कोई हानि नहीं है। उपनिवेशवादी भी इसी मनोवृत्ति से काम लेते हैं। वे यह मानते हैं कि शासक वर्ग की सुविधाओं के लिए शासितों का शोषण करने में कोई हानि नहीं है और वे उसी प्रकार के कानून भी बनाते रहते हैं। अमेरिका में नीग्रो जाति को अधिकार प्राप्त नहीं हैं, जो गोरी जाति को प्राप्त हैं। अफ्रीका के अनेक देशों में वहाँ के मूल निवासी अफ्रीकी भी नागरिक अधिकारों से वंचित हैं। शासकों की दृष्टि में यह अन्याय नहीं है।
इस सिद्धान्त में दो दोष हैं। पहला यह है कि मानव और मानव में परस्पर विषमता स्वीकार की गई है, जो आपने आप में अन्याय है। जब तक एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अपने से हीन समझाता रहेगा तक तक एक को दूसरे से भय बना रहेगा।
वाल्मीकि रामायण का कथन है- ‘भयं भीताद्धि जायते’ अर्थात् जो हमसे डरा हुआ है, हमें सदा उसी का डर रहता है। शोषक को शोषित से सदैव भय बना रहता है। इससे मुक्ति पाने के लिए वह अधिकाधिक शोषण करता है और कठोर उपायों को काम में लाने लगता है। एक ओर शस्त्रास्त्र एवं हिंसक साधनों को बढ़ाता जाता है और दूसरी ओर शोषित को बन्धनों में जकड़ता चला जाता है।
उपयोगितावाद में सबसे बड़ा दोष यह है कि इसका कोई निश्चयात्मक आधार नहीं है। भिन्न-भिन्न वर्गों के स्वार्थ आपस में टकराते रहते हैं। प्रत्येक वर्ग न्याय की व्याख्या अपनी स्वार्थ-सिद्धि को लक्ष्य में रखकर करने लगता है। परिणाम-स्वरूप न्याय अपने आप में संघर्षों का कारण बन जाता है। पूँजीपति और मजदूरों में तथा अन्य प्रकार से ये संघर्ष विश्व के अभिशाप बने हुए हैं।
एक बात और है। प्रत्येक व्यक्ति में महत्वाकांक्षाएं होती हैं और वह अन्य व्यक्तियों पर राजनीतिक, सामाजिक तथा अन्य प्रकार का प्रभाव स्थापित करना चाहता है। अपनी-अपनी महत्वाकाँक्षाओं को लेकर व्यक्तियों में संघर्ष चलते रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को पराजित करना चाहता है। ऐसी स्थिति में उपयोगितावाद का क्या अर्थ होगा? प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ को लक्ष्य में रखकर उसका भिन्न-भिन्न अर्थ करेगा। जब महात्मा गाँधी ने हरिजन आन्दोलन प्रारम्भ किया तो अन्य वर्णों के बहुत से व्यक्तियों ने प्रश्न खड़ा किया कि हरिजन दूसरों के बराबर हो गए तो कचरा कौन उठायेगा, टट्टियों की सफाई कौन करेगा? चारों ओर गन्दगी फैल जायेगी और रोग बढ़ने लगेंगे। इंग्लैण्ड में जब छोटे बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई तो एक भद्र महिला ने न्यायालय में पहुंचकर शिकायत की कि उसका नौकर स्कूल जाने लगा है। परिणाम स्वरूप चिमनी साफ नहीं होती और रसोई घर में गन्दगी फैल रही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अधिकार प्राप्त वर्ग उपयोगितावाद की व्याख्या अपने स्वार्थों को लक्ष्य में रखकर करता है। अतः उसे न्याय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
उपयोगिता या लाभ को न्याय का आधार मान लेने पर कर्तव्य या उत्तरदायित्व की रक्षा नहीं हो सकती। बहुत से कार्य ऐसे हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष लाभ न होने पर भी करना आवश्यक होता है। उदाहरण के रूप में वृद्ध तथा रोगियों की सेवा, कष्ट पीड़ितों की सुश्रूषा इत्यादि।
उपयोगितावाद में प्रत्येक मनुष्य इस बात को सोचकर चलता है कि उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य किसी स्वार्थ को सिद्ध करता है या नहीं। ऐसी स्थिति में पुत्र कह सकता है कि वृद्ध माता-पिता की सेवा करना मेरा कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि उनके जीवित रहने में कोई लाभ दृष्टिगोचर नहीं होता।
यूनान की एक प्राचीन घटना है- सिसरो नाम का दार्शनिक गड्ढे में गिर पड़ा। वह उपयोगिता का समर्थक था। सिसरो का एक शिष्य उसी रास्ते से निकला और गुरु को गड्ढे में पड़ा देखकर सोचने लगा इन्हें बाहर निकालने से कोई निश्चित लाभ होगा या नहीं? वह दो घण्टे तक खड़ा-खड़ा सोचता रहा। अन्त में इस निर्णय पर पहुँचा- यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें निश्चित रूप से लाभ ही होगा। यदि यह मर जाते हैं तो किसी नये अध्यापक को काम मिलेगा और उसके परिवार का पोषण होगा जबकि गड्ढे में गिरने वाले की मृत्यु से एक का ही हर्ज होगा। यह सोचकर वह गुरु जी को गड्ढे में छोड़कर चला गया। यह घटना उपयोगितावाद के नग्न चित्र को उपस्थित करती है।
सृष्टि क्रम में ‘उपयोगी का चुनाव’ का भी एक सिद्धान्त प्रचलित तो है, पर उसका तात्पर्य इतना ही है कि समर्थता प्राप्त करने की हर किसी की प्रवृत्ति बढ़े। सभी समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनें। उसका अर्थ यदि दुर्बल दमन का निकाला जाने लगा- जैसा कि उपयोगितावाद के नाम पर इन दिनों निकाला जा रहा है तो उससे महाविनाश की ही पृष्ठभूमि बनेगी। जो समर्थ होंगे उनमें से जो अधिक समर्थ होगा वह अन्य छोटों को उदरस्थ करता चला जायेगा। इस प्रकार एक-दूसरे के पेट में घुसते-घुसते अन्त में कोई एक ही बचा रहेगा। उदरस्थ करने के लिए कोई अन्य न बचने पर वह भी जीवित न रहेगा। नियति की कराल दाढ़ों में पिस जाने से बच न सकेगा। समय रहते इस भ्रान्त दर्शन के जाल-जंजाल से बच निकलने में ही भलाई है।
एक बार एक गृहस्थ कबीरदास के पास सत्संग के लिए गया। वह व्यक्ति अपने दाम्पत्य जीवन से असन्तुष्ट था। स्वागत शिष्टाचार के बाद गृहस्थ ने पूछा- भगवन्! सुखी दाम्पत्य जीवन का रहस्य क्या है?
कबीर उस व्यक्ति की निराश मुख-मुद्रा को देखकर समझ गये कि उसकी धर्मपत्नी से पटती नहीं। कबीर यह कह रह कि- “अभी समझाता हूँ” घर के भीतर चले गये।
थोड़ी देर में घर में सूत लेकर लौटे और उस व्यक्ति के सामने बैठकर उसे सुलझाने लगे। दो मिनट बाद अपनी पत्नी को आवाज लगाकर कहा, यहाँ बड़ा अन्धेरा है सूत नहीं सुलझता दीपक तो रख जाओ। उनकी पत्नी दीपक जलाकर लाईं और चुपचाप रखकर चली गईं।
उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ कि क्या कबीर जी अन्धे हो गये हैं जो सूरत के प्रकाश में भी इन्हें अन्धेरा लगता है। इनकी पत्नी भी कैसी हैं जो बिना प्रतिवाद किये दीपक जलाकर रख गईं। इसी बीच उनकी स्त्री दो गिलासों में दूध लेकर आईं, एक उस आदमी के सामने रख दिया दूसरा कबीर को दे दिया। दोनों दूध पीने लगे। थोड़ी देर में स्त्री फिर आई और कबीर से पूछने लगी दूध में मीठा तो कम नहीं है। कबीर बोले नहीं, बहुत मीठा है, इसके बाद वे उसी भाव से दूध पी गये। वह आदमी फिर हैरान हुआ कि उसमें मीठा तो था भी नहीं गलती से चीनी की जगह नमक डाल दिया गया था।
आदमी बहुत झल्लाया, बोला- महाराज मेरे प्रश्न का उत्तर न दे सकें तो चलूं? कबीर बोले, भाई समझा तो दिया और क्या सुनना चाहते हो? विस्तार से सुनना चाहते हो, तो? देखो सुखी परिवार के लिए आवश्यक है कि सदस्यों को अपने अनुकूलन बनाओ और स्वयं भी परिवार के अनुकूल बनो। पत्नी और सन्तति को सुशील और आज्ञाकारी बना सको और स्वयं भी जीवन में हर जगह स्नेह और क्षमता का दान दे सको, तभी गृहस्थ जीवन सफल हो सकता है। वह व्यक्ति सारी बात समझ गया और खुशी-खुशी घर लौट आया।
ऐसा अनुमान किया जाता है कि ब्रह्माण्ड में लगभग एक अरब आकाश गंगाएं हैं। एक आकाश गंगा से सौ अरब तारे हैं। सूर्य भी एक बृहत् तारा है तथा पृथ्वी एक ग्रह। पृथ्वी के अतिरिक्त आठ ग्रह- बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो हैं। सूर्य के चारों ओर से नौ ग्रह अपनी अण्डाकार कक्षा में परिक्रमा करते रहते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी का ही एक उपग्रह है। बृहस्पति के तेरह, शनि के दस, यूरेनस के पाँच, मंगल एवं नेपच्यून के दो-दो उपग्रहों की जानकारी अब तक मिली है। बुध एवं शुक्र ग्रहों के उपग्रहों के होने की कोई जानकारी नहीं मिल पायी है।
जिस आकाश गंगा की पृथ्वी अंग है, अनुमानतः उसका व्यास है एक लाख प्रकाश वर्ष तथा मोटाई दस हजार प्रकाश वर्ष। ऐसी एक अरब आकाश गंगाएं ब्रह्माण्ड में अनुमानतः अभी हैं। अपनी आकाश गंगा के तारों, ग्रहों व उपग्रहों की भी अभी तक मात्र अल्प जानकारी प्राप्त हो सकी है। अनंत ब्रह्माण्ड तक तो मस्तिष्क की कल्पना भी पहुँच सकने में स्वयं को असमर्थ पाती है। पृथ्वी के विषय में भी पूर्व के अनेकानेक मत अब असत्य सिद्ध होते जा रहे हैं। ऐसी अनेकानेक नयी शोधें अब इस क्षेत्र में हो रही हैं जो बताती हैं कि पृथ्वी के विषय में भी जो जाना समझा गया था, वह मात्र कल्पना ही थी। दो अमेरिकी खगोल शास्त्री डा. रिचर्ड और जार्ज स्मिथ एवं उनके सहयोगी शोधकर्ता लारेंस वर्कले लेव के मार्क कोरेश्टाइन के अनुसार हमारी पृथ्वी लगभग बीस लाख किलोमीटर प्रति घण्टे की भयंकर गति से वासुकि तारामण्डल की ओर दौड़ती चली जा रही है। अति सम्वेदनशील रेडियो उपकरणों द्वारा पृथ्वी वायुमण्डल से 19,800 मीटर की ऊंचाई पर किये गये परीक्षणों से यह जानकारी मिली है। इन अनुसंधानों से यह समझा जा रहा है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक फल या पौधे के खिलने की तरह हुई न कि अग्निपिंड के विस्फोट से, जैसा कि माना जाता था एवं नियन्त्रित तथा पूर्णतया समान गति से उसका विस्तार होता चला गया। यह घटना 15 अरब वर्ष पूर्व हुई मानी है।
ब्रह्माण्ड में तारकों- सौर मण्डलों की क्रिया-प्रक्रिया अपने ढंग से प्रवाहित हो रही है और ग्रह-नक्षत्रों का परिवार अपने सामान्यक्रम से चल रहा है। इतने पर भी जहाँ-तहाँ ऐसी पहेलियाँ और विसंगतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं जिनका समाधान ढूंढ़ पाने में मानवी बुद्धि किंकर्तव्य विमूढ़ रह जाती है।
इस अनन्त अंतरिक्ष में जहाँ-तहाँ ऐसे चक्रवात या भ्रमर हैं जो अपनी प्रचण्ड शक्ति के कारण महादैत्य कहे जाते हैं। उनकी पकड़ और चपेट में जो भी दृश्य-अदृश्य साकार-निराकार फंस जाता है उसे वे अपने उदर में निगल लेते हैं और यह पता नहीं चलने देते कि जो उनका खाया वह पचने के लिए कहाँ चला गया? इन भँवरों को विज्ञान की भाषा में ‘ब्लैक होल’ कहते हैं।
ब्लैक होल का अर्थ है- काला छेद। अन्तरिक्ष में वे जहाँ कहीं होते हैं, वहाँ सघन अन्धकार छाया रहता है। सघन भी इतना कि उस क्षेत्र पर पड़ने वाली प्रकाश किरणें तक उसी गर्त में चली जाती हैं और उसका दर्शन कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं हो पता। होल इसलिए कि उसमें मात्र पोल ही पोल भरी पड़ी है। पोल भी इतनी जिसमें कोई भी दृश्य या अदृश्य पदार्थ बिना किसी अवरोध खिंचता-घुसता चला जाता है। इस प्रवेश की गति इतनी अधिक होती है कि उसकी तुलना में प्रकाश की गति भी स्वल्प ठहराई जा सके।
अपनी पृथ्वी पर वारमूडा के निकट कई बार कितने ही जलयान एवं वायुयान इस भँवर में फंसकर अपना अस्तित्व गंवा बैठे हैं। पकड़े जाते समय तो कुछ क्षण के लिए चीखे, चिल्लाये किन्तु बाद में उनका इस प्रकार लोप हो गया मानो उनका कभी कोई अस्तित्व था ही नहीं। ढूंढ़े पर कोई निशान या प्रमाण ऐसे न मिले जिससे घटनाक्रम का या उसके निमित्त कारण का कुछ तो पता चल सके। इस क्षेत्र में होती रही दुर्घटनाओं का विवरण बड़ा रोमांचकारी है। इसी प्रकार के काले छेद इस ब्रह्माण्ड में अन्यत्र हैं भी। पृथ्वी वालों को भी उनका आभास जब-तब मिलता रहता है।
इनकी विभीषिका अत्यधिक रोमाँचकारी है। वे छोटे भी होते हैं और बड़े भी। छोटे ब्लैक होल सपोलों की तरह थोड़े से क्षेत्र में अपना फन फैलाये रहते हैं और जो उधर से गुजरता है उसे लपक लेते हैं। किन्तु बड़े ब्लैक होल ऐसे ही हैं जो अपनी समूची पृथ्वी को ही देखते-देखते निगल सकते हैं।
सुव्यवस्थित सृष्टि प्रवाह में अव्यवस्थित ब्लैक होल किस कारण उत्पन्न होता हैं और वे किस क्रम से अपना क्रिया-कलाप चलाते हैं इसकी खोजबीन अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने की है। उससे समग्र जानकारी तो प्राप्त नहीं हो सकी, पर जो कुछ पता चला है वह भी कम रहस्यमय और कम रोमाँचकारी नहीं है।
नेशनल एरोनॉटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने ‘उहुरु’ नामक एक कृत्रिम उपग्रह को गत दिसम्बर 1970 में इटली के एयरो स्पेस रिसर्च सेण्टर से अन्तरिक्ष में छोड़ा। इसका उद्देश्य “ब्लैक होल” की स्थिति का पता लगाना था। ऐसे 200 तारा स्त्रोतों का पता इस उपग्रह ने लगाया जो एक्स-रे उत्सर्जित करते हैं। इनमें प्रमुख-प्रमुख हैं- सैतोरस एक्स-3, सिग्नस एक्स-1, हरक्यूलिस एक्स-1, सिग्नस एक्स-3। वैज्ञानिकों का ध्यान इस स्त्रोतों में सिग्नस एक्स-1 की ओर अधिक आकर्षित हुआ। अध्ययन द्वारा इसमें वे सारी लक्षण पाये गये हैं जो ‘ब्लैक होल’ पर पाये जाते हैं। सिग्नस एक्स-1 की दूरी पृथ्वी से लगभग 8000 प्रकाश वर्ष (75 लाख अरब किलोमीटर) के लगभग है। गैस मण्डल में जो ब्लैक होल पाये जाते हैं, उनकी सारी विशेषताऐं इसमें है। गुरुत्वाकर्षण बल की तीव्रता के कारण यह भी प्रत्येक वस्तु पर हावी होकर उसे अपनी ओर खींच लेता है।
“ब्लैक होल” की स्थिति का पता लगाना भी एक विकट समस्या है। प्रकाश की किरण को प्रकाश स्त्रोत से यदि भेजा जाय तो ब्लैक होल प्रकाश को तुरन्त पकड़ लेगा हमें मात्र एक काला छिद्र दिखाई देगा।
आइन्स्टीन के अनुसार प्रकाश किरणों में भी द्रव्यमान होता है। यदि यह सिद्धान्त सही है तो ब्लैक होल के धरातल से ऊपर फेंकी गई प्रकाश की किरण तीव्र गुरुत्वाकर्षण के कारण पीछे खींच ली जायेगी। उसी प्रकार जिस तरह यह पृथ्वी ऊपर फेंकी गई गेंद को खींच लेती है। ब्लैक होल की तेज गुरुत्वाकर्षण का कारण यह है कि विज्ञान के सिद्धांतानुसार जो वस्तु जितनी सघन होगी, उसका आकर्षण बल उतना ही प्रबल होगा। ब्लैक होल का घनत्व अधिक होने के कारण उसका गुरुत्वाकर्षण अत्यधिक है और वह अपनी पकड़ में आने वाले प्रत्येक पदार्थ को सहज ही अपनी ओर खींच लेता है।
प्रसिद्ध तारा भौतिक शास्त्री श्री के.एस. थ्रोन और श्री नीविकोव का ब्लैक होल की उत्पत्ति के विषय में कहना है कि “विकासक्रम की अन्तिम अवस्था में तारे यदि 1.2 सौर द्रव्यमान बढ़ जाते हैं तो वह वृहत् तारे की तरह उन्हें फट जाना चाहिए। फटने से दो चीजें तारे छोड़ सकते हैं एक विस्तीर्ण गैस का बादल था दूसरा अवशेष तारा। यदि शेष तारे का भार 2 सौर द्रव्यमान से कम है तो वह एक न्यूट्रान तारे, जिसका कि घनत्व नाभिक के स्तर का होता है, में बदल जाता है तथा यदि इससे अधिक है तो वह एक ब्लैक होल में परिवर्तित हो जायेगा।”
ब्लैक होल की उत्पत्ति और भयानक शक्ति के सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकले हैं वे मानव जगत में प्रयुक्त होने वाले सिद्धान्तों और प्रचलनों से ही मिलते-जुलते हैं। जो भारी होता है वह अपेक्षाकृत हलकों को अपनी ओर खींचता है। जो हलका पड़ता है वह दूसरों के प्रभाव से प्रभावित होकर उनका अनुकरण करने लगता है। इस तथ्य को अधिक अच्छी तरह समझा जा सके तो स्वयं अधिक भारी भरकम बनाने और अपने प्रभाव क्षेत्र में अधिकों की सेवा कर सकने की प्रेरणा मिलती है। साथ ही यह सतर्कता अपनाने का भी अवसर मिलता है कि किसी का समर्थता, प्रतिभा से प्रभावित होकर कुछ ऐसा न करने लगे कि जो अनुचित अनुपयुक्त हो। ब्लैक होल ब्रह्माण्ड में भी है और मानव समाज में भी। प्रभाव शक्ति की जितनी उपयोगिता है उतनी ही भयंकरता भी इस तथ्य को ध्यान में रखकर चलना और आत्म-रक्षा का उपाय समय रहते करना चाहिए।
प्रकृति प्रवाह से कहीं छिद्र रह जाने के कारण भी इन ब्लैक होल की उत्पत्ति मानी गई है। छिद्र कहीं भी नहीं रहने दिये जांय। कपड़े में छोटा-सा छिद्र होता है उसे समय पर न सिया जाय तो सारे कपड़े को ही निरर्थक कर देगा। घड़े में छोटा-सा छिद्र हो जाने पर पानी भी बह जाता है। और आस-पास की जमीन भी गीली होती है। बाँधों में एकाध चूहों का छेद होता है और वह बढ़कर बाँध में दरार डालने-तोड़ने और उसके कारण बड़े क्षेत्र को जलमय करने की हानि पहुँचाता है। इसलिए समय रहते हर छिद्र को बन्द करना चाहिए। हम छिद्रान्वेषी न बनें पर उनके कारण होने वाली हानि से बेखबर भी न रहें और जहाँ पोल पट्टी दिखाई पड़ती हो वहां उसे नंगा भले ही न करें पर उसे बन्द तो किया ही जाना चाहिए।
ब्लैक होल अपनी भयानक शक्ति और उससे होने वाली हानि एवं अव्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। साथ ही यह भी बताते हैं कि वैयक्तिक जीवन एवं समाज व्यवस्था में यदि कहीं ब्लैक होल हो उनके खतरे को समझें और बन्द करने का प्रयत्न करें।
जंगल में वट के दो वृक्ष पास-पास लगे हुए थे। एक था खूब फैला-फूला हुआ और दूसरा था दुबला-पतला। मोटा वृक्ष बड़ा अहंकारी था। एक दिन वह दुबले वृक्ष से बोला- ‘भाई हम दोनों एक दिन ही उत्पन्न हुए और एक-सी जलवायु में पले। परन्तु तुम कितने दुबले पतले हो। न तुमने पृथ्वी से पर्याप्त रस ग्रहण किया, न मेघों से खूब जल लिया। सहमे, सिकुड़े से तुम खड़े रहते हो। मुझे देखो में आकाश में सिर उठाकर तन कर खड़ा हूँ।’
छोटा वृक्ष विनम्रता पूर्वक बोला- ‘मित्र, जंगल में अनेकों वृक्ष हैं। उन सभी को अपने पोषण की सामग्री चाहिए। यदि पृथ्वी का सारा रस में ही ले लूँगा, मेघों के जल का बहुत-सा अंश मैं ही ले लूँगा, सबसे अधिक वायु का उपयोग में ही करूंगा तो अन्य बेचारे क्या करेंगे। यही कारण कि मैं पृथ्वी से, वायु से, मेघों से थोड़ा अंश ही सोच विचार कर लेता हूँ। इससे मैं भले ही दुबला रह गया हूँ, पर मेरे और भाई तो जीवित हैं, स्वस्थ हैं, इसकी मुझे प्रसन्नता है।’
‘ओह तुम्हारा तो दृष्टिकोण ही विचित्र है।’ बड़े वट ने अहंकार में फूलकर कहा।
बड़ा वट धीरे-धीरे बढ़ता ही गया। पृथ्वी, सूर्य, वायु सभी से वह अधिकाधिक भाग लेने की चेष्टा करता। कुछ दिनों में वह इतना बड़ा हो गया कि आसमान ही छूने लगा। अब उसे अपनी शक्ति का अभिमान भी इतना हो गया कि किसी को कुछ समझता ही न था।
एक दिन बड़ी जोर का तूफान आया। छोटा वृक्ष सिर झुका कर खड़ा हो गया, परन्तु बड़ा वट अभिमान से तना खड़ा रहा। कुछ घंटों बाद जंगल के सारे पेड़ों ने पाया कि बड़ा वट जड़ से जमीन पर उखड़ा हुआ पड़ा था जबकि छोटा वाला आनन्द से वायु में झूम रहा था।
‘अहंकारी कभी सुख नहीं पता’ पीपल का पेड़ बोला।
‘दूसरों का भी हिस्सा छीनने वाले दुष्ट का नष्ट हो जाना ही अच्छा है’ नीम का पेड़ बोला। बबूल के पेड़ ने उसकी हां में हां मिलाते हुए कहा- ‘जो दूसरों के कुछ काम न आ पाये उसका जीना भी कोई महत्व नहीं रखता। उसका जीतना और मारना दोनों एक जैसे हैं।’
अपनी इस धरती की असमर्थता एवं संपदा को पर्यवेक्षकों ने अनेक दृष्टियों से देखा और अनेक कसौटियों पर परखा है। उन निष्कर्षों में एक यह भी है कि धरती एक विशालकाय चुम्बक है। उसकी संरचना भर रासायनिक पदार्थों से हुई है। हलचलों के मूल में उसकी चुम्बकीय क्षमताएँ ही विभिन्न स्तर की हलचलें करतीं और एक से एक बढ़े-चढ़े चमत्कार प्रस्तुत करती हैं।
अणु शक्ति में परमाणु का नाभिक ही ऊर्जा-भण्डार माना जाता है। यह संचय धरती के प्रचण्ड चुंबकत्व का ही एक घटक है। जीवाणुओं के भीतर जो सचेतन क्षमता काम करती है उसे भी संव्याप्त चेतना का अंशधारी कहा गया है। यह समर्थता और चेतना दोनों ही उस चुंबकत्व की दो गंगा-जमुना धाराऐं हैं जिनके संयोग से धरती का वातावरण, सौंदर्य, वैभव और उल्लास से भरा पूरा बना रहता है।
लन्दन विश्वविद्यालय के किंग्स कालेज के प्रो. जॉन टेलर और फ्रांसिस हिचिंग ने मिलकर एक पुस्तक लिखी है- “अर्थ मैजिक”। उसमें उन्होंने सिद्ध किया है कि धरती पर दृष्टिगोचर होने वाली अगणित हलचलें जादू, चमत्कार जैसी प्रतीत होती हैं। उनके मूल में पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति ही काम करती है। यह यदि घटने-बढ़ने लगे तो उसके परिणाम प्रस्तुत व्यवस्था में असन्तुलन उत्पन्न करेंगे और भयावह परिणाम उत्पन्न होंगे।
वैज्ञानिक शोध संस्था ‘नासा’ के अंतर्गत चलने वाले अनुसंधान केंद्रों ने प्रामाणित किया है कि धरती पर कारणवश होने वाले चुम्बकीय परिवर्तन ही सृष्टि के इतिहास क्रम में अनोखे और अप्रत्याशित अध्याय जोड़ते रहे हैं। भविष्य में यदि कभी कोई असाधारण उथल-पुथल होगी तमो उसका मूलभूत कारण एक ही होगा- धरती में चुम्बकीय प्रवाही में उथल-पुथल, उलट-पलट।
समग्र पृथ्वी तो एक विशाल चुम्बक है ही किन्तु उसका उभार क्षेत्र विशेष में न्यूनाधिक भी पाया जाता है। इसका प्रभाव उन स्थानों के पदार्थों और प्राणियों पर पड़ता है। उनकी आकृति और प्रकृति में जो अन्तर पाया जाता है। उसमें अन्य कारण उतने प्रबल नहीं होते जितने कि स्थान-स्थान पर पाये जाने वाले चुम्बकत्व के दबते-उभरते प्रवाह। इस दृष्टि से वे विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न क्षेत्रों की उपयोगिता सिद्ध करते हैं। जो कार्य एक स्थान पर नहीं हो सकता या कठिन पड़ता है वह दूसरे उपयुक्त स्थान पर स्वल्प प्रयास से ही सरलता पूर्वक सम्पन्न हो सकता है।
पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति क्षेत्र विशेष के आधार पर ध्रुव प्रदेशों में सबसे अधिक पाई जाती है और ‘रिओडी-जानीरो’ क्षेत्र में न्यूनतम आँकी गई है। विलक्षणता एक और भी है कि यह सदा किसी स्थान पर एक जैसी नहीं रहती, उसमें कारणवश परिवर्तन होता रहता है।
पिछले दिनों वारमूडा त्रिकोण क्षेत्र में अनेकों अद्भुत घटनाएं घटी हैं। उस क्षेत्र से गुजरने वाले जलयान एवं वायुयान इस प्रकार अदृश्य हुए हैं कि बहुत खोजने पर भी उनका कुछ भी अता-पता न मिल सका। विज्ञजनों का कहना है कि उस क्षेत्र में चुंबकीय विलक्षणता ही ऐसे उपद्रवों के लिए उत्तरदायी है। इस दृष्टि से वह क्षेत्र सर्वथा अनोखा और विलक्षण है। वहाँ चित्र-विचित्र प्रकार के चुंबकीय भँवर पड़ते रहते हैं।
प्रसिद्ध डच भूगर्भ शास्त्री प्रो. सोल्को डब्ल्यू. ट्राम्प ने ‘साइकिकल फिजिक्स’ पुस्तक में विभिन्न प्रयोग परीक्षण करके यह लिखा है कि पृथ्वी अगणित विशेषताओं और धाराओं से भरे-पूरे चुम्बकत्व से भरी-पूरी है। वैज्ञानिक उपलब्धियों में प्रकारान्तर से इसी क्षमता के स्त्रोतों का खोजा और प्रयोग में लाया गया है। इसका समर्थन ‘फ्रेंच एटामिक एनर्जी कमीशन’ के सदस्य ‘इकोले नारमल और अमेरिका के सुरक्षा-विभाग एवं अर्कन्सास विश्वविद्यालय के ‘डा. जाबोज हारवलिक’ ने भी किया है। डा. जाबोज ‘अमेरिकन सोसायटी ऑफ डाउसर्स’ के प्रमुख हैं।
अमेरिका के ‘सिविल ऐवियेशन बोर्ड’ की ‘ऐक्सीडेन्ट इन्वेस्टीगेशन रिपोर्ट’ में बताया गया है कि वारमूडा क्षेत्र में जाने वाले हवाई या जल जहाज के चालकों को कभी-कभी- दुर्घटना का पूर्वाभास हो जाता है। डा. जाबोज हारवलिक ने अनुसंधान करके पता लगाया है कि इस स्थान विशेष से गुजरने पर मस्तिष्क की ‘पीनियल ग्रन्थि’ पर चुम्बकीय परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है। इस परिवर्तन से ‘सीरोटोनिन’ नामक हारमोन पैदा होता है। जो मानसिक विक्षिप्तता पैदा कर देता है।
वारमूडा क्षेत्र अटलाँटिक महासागर के मध्य आता है। ‘एडगर केयसी’ नामक प्रसिद्ध व्यक्ति, जो ‘स्लीपिंग प्राफेट के नाम से जाने जाते हैं का कहना है- ईसा से 50,000 वर्ष पूर्व अटलाँटिक महासागर में एक बड़ा भूखण्ड था जहाँ पर ‘अटलाँटियन’ सभ्यता का विकास हुआ था। उस सभ्यता ने तकनीकी साधन जैसे- टेलीविजन, एक्स-रे, लेसर बीम और ऐन्टीग्रेविटी यन्त्र आदि का विकास कर लिया था लेकिन इन साधनों का दुरुपयोग करके अपना विनाश कर लिया। यह विनाश ईसा से 28,000 वर्ष पूर्व हुआ था। इस सभ्यता के बचे हुए लोगों ने ‘मय’ और ‘मिश्र’ संस्कृति का विकास किया। मिश्र में जैसे विशालकाय पिरामिड बने हैं उसी प्रकार के विशालकाय पिरामिडों के अवशेष वारमूडा क्षेत्र में पाये जाते हैं। मिश्र के ‘चोलुला’ नामक पिरामिड में लगे पत्थरों का आयतन 3,88,20,000 घन गज है।
सन् 1940 ई॰ में एडगर केयसी ने भविष्य कथन किया था कि भूकम्प के माध्यम से अटलांटिक महासागर में पुरानी सभ्यता के द्वीप समूह 1968 में ऊपर आने लगेंगे। 1968 में बहुत से गोताखोर, मछली पकड़ने वालों ने छिछले पानी में दीवारें, सड़कें और प्लेट फार्म देखे। यह भविष्य कथन बिल्कुल सच निकला।
एडगर केयसी के अनुसार ‘अटलांटिक’ सभ्यता का विस्तार ‘सरगोसा’ समुद्र से ‘एजोर्स’ तक है। रूस के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री डा. मेरिया क्लिनोवा ने ‘एकेडेमी ऑफ साइन्स ऑफ यू. एस. एस. आर.’ की ओर से प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया है कि इन चट्टानों के साथ किसी पुरातन सुविकसित सभ्यता का इतिहास जुड़ा हुआ है।
‘केयसी’ के अनुसार इस सभ्यता के लोगों ने सूर्य शक्ति का नियंत्रण करके आधुनिक लेसर किरणों जैसे ‘जादुई आग के पत्थर’ बना लिये थे। इनसे निकलने वाली किरणें आँखों से देखी नहीं जा सकती थीं परन्तु उनकी प्रतिक्रिया पत्थरों पर होती थी। पत्थरों से ऐसी शक्ति निकलती थी जो जमीन पर चलने वाले वाहन पानी के ऊपर व भीतर तथा हवा में चलने वाले वाहनों पर भी अपना प्रभाव डाल सकती थी।
केयसी के कथनानुसार अटलाँटियन सभ्यता के लोग ‘ऐन्टीमैटर’ के हथियार प्रयोग करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि वे लोग सूर्य शक्ति से ऐसी ऊर्जा पैदा कर सकते थे जो परमाणु का विखण्डन कर सकती और उसी के दुरुपयोग से वह सभ्यता विनष्ट हो गई। केयसी के कथन का समर्थन लन्दन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘पैट्रिक स्मिथ’ ने भी किया है जो पिरामिड चित्र लिपि के अच्छे ज्ञाता हैं। स्मिथ के अनुसार अटलाँटिक सभ्यता के उत्तराधिकारियों ने मैक्सिको, पेरू और मिश्र में पिरामिड बनाए हैं। इन पिरामिडों की बनावट में पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता, अनन्तता आदि सिद्धान्तों को शिल्पाकार दिया गया है। उन्हें ज्योतिर्विज्ञान का गहरा ज्ञान था- ऐसा पिरामिडों से पता चला है। ‘चीजेन ईजा’ नामक पिरामिड में पत्थरों की ऐसी रचना बनाई गई है कि सूर्य की किरणें सर्पाकार मार्ग से पिरामिड के मूल में बने सर्प के मुख जैसी आकृति में पहुँचती हैं। वर्ष में दो बार सूर्य की किरणें बसन्त और शरद् ऋतु में इस पिरामिड के सर्पाकार मार्ग में चढ़ती उतरती देखी जाती हैं।
मिश्र के ‘चेफ्रैन’ नामक विशाल पिरामिड में किसी गुप्त रहस्य का उद्घाटन करने के लिए ‘यू. एस. ए.’ और ‘यूनाइटेड अरब रिपब्लिक’ संयुक्त प्रयास कर रहे हैं। प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार विजेता डा. लुइस अल्वेरिज और एजिप्ट के प्रसिद्ध डा. अमर गोनेड इस पर शोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिरामिडों की रचना ऐसी है कि विज्ञान एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के कोई सिद्धान्त काम नहीं आ रहे हैं। उसमें कोई ऐसा रहस्य छिपा है जो इन दिनों की विदित वैज्ञानिक नियमों की व्याख्या के परे है। घटना परक तथ्यों से पता चलता है कि पिरामिड बनाने वाले इस सिद्धान्त से परिचित थे कि पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है।
वैज्ञानिकों की मान्यता है कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के क्षेत्र का कोई सूत्र इन पिरामिडों की रचना में छिपा है। ये पिरामिड बिल्कुल ठीक उसी स्थान पर बने हैं जो धरती का केन्द्र है। प्रत्येक पिरामिड की सतहें समबाहु त्रिभुजाकार हैं। सदियों से प्रेतों का आह्वान करने वाले और देवताओं का आह्वान करने वाले कर्मकाण्डी समबाहु त्रिभुजों का उपयोग करते देखे जाते हैं। आज के प्रसिद्ध ‘आकल्टिस्ट’ फास्ट, एलीस्टर, क्राडली आदि की मान्यता है कि इन त्रिभुजों की परिधि कभी अन्य लोकवासियों को बुलाने का माध्यम रही होगी।
इन दिनों पृथ्वी की वायु, जल स्थिति, उर्वरता, खनिज सम्पदा एवं शक्ति का औद्योगिक तथा वैज्ञानिक प्रयोजनों के निमित्त व्यतिरेक किया जा रहा है। फलतः इन सभी क्षेत्रों में प्रदूषण, विकिरण बढ़ रहा है। इस बढ़ती विषाक्तता से उत्पन्न होने वाले भावी संकट से सभी चिंतित हैं। इस चिन्ता में सूक्ष्मदर्शी वैज्ञानिकों ने एक कड़ी और जोड़ी है कि पृथ्वी के सुव्यवस्थित चुम्बकत्व के साथ खिलवाड़ न की जाय। यह तथ्य बहुत समय पूर्व ही माना जा चुका है कि यदि पृथ्वी की सही धुरी का पता लगाया और उस पर कस कर एक घूंसा लगाया जा सके तो इतने भर से परिभ्रमण पथ में भारी अन्तर हो सकता है और उसकी समूची परिस्थितियों में भारी अन्तर ही नहीं महाविनाश का संकट भी उत्पन्न हो सकता है। चुम्बकत्व की निश्चित दिशाधारा में व्यतिरेक उत्पन्न होने के परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं इसे उपरोक्त निर्धारण से भली प्रकार माना जा सकता है।
वृत्रासुर, हिरण्याक्ष, सहस्त्रार्जुन, रावण, कुम्भकरण जैसे अनेक वैज्ञानिक बने। सब प्रकृति से छेड़खानी करने पर अपने और असंख्यों के लिए विपत्ति खड़ी कर चुके हैं। पिरामिड काल से पूर्व की मय-सभ्यता भी उसी उद्धत आचरण से विनाश के गर्त में गई। इन दिनों उन्हीं प्रयोगों की पुनरावृत्ति चल रही है। इसका परिणाम क्या हो सकता है उसे अनुभव करके देखने की अपेक्षा यह अच्छा है कि पूर्ववर्ती इतिहास से कुछ सीखा और विनाश में कूदने से बचाया जाय। इन दिनों प्रकृति पर अधिकार करने की वैज्ञानिक महत्वाकाँक्षाएं धरती के चुम्बकत्व को डगमगा सकती हैं और ऐसे भविष्य की विभीषिका उत्पन्न कर सकती हैं जिससे उबरना कदाचित फिर कभी भी सम्भव न हो सके।
एक दिन किसी की जेब से निकल कर एक सोने का सिक्का गन्दे चिथड़े के पास जाकर गिर पड़ा, चिथड़े को देखकर सिक्का बोला- ओ गन्दे चिथड़े! जरा दूर हट जा, देखता नहीं में सोने का सिक्का हूँ जिसे पाने के लिए रंक के लेकर नृप तक दिन रात यत्न करते रहते हैं। यह बात चिथड़े को बहुत अखरी किन्तु कर ही क्या सकता था।
कुछ दिन बाद चिथड़े बीनने वाले ने चिथड़े को उठा लिया और साफ सुथरा करके कागज के कारखाने में बेच दिया, उससे जो कागज तैयार हुआ वह दस स्वर्ण मुद्राओं के बराबर मूल्य का आँका गया।
एक दिन एक कागज का खरीददार आया और दस स्वर्ण मुद्रायें देकर वह कागज खरीद रहा था। उस दिन सिक्कों में एक वह सिक्का भी था, जिसकी बात चिथड़े से हुई थी। उसने उसी सोने के सिक्के को पहचान कर बोला- “भैया, उस दिन तो तुम मुझे दुत्कार रहे थे किन्तु आज मैं तुमसे अधिक कीमत का बन गया हूँ तुम जैसे लोग दूसरों की निरर्थक निन्दा करते रहते हैं और जब वे बड़े हो जाते हैं तो उनकी पूजा करने दौड़ पड़ते हैं।
सत्कर्मों एवं दुष्कर्मों का प्रभाव न केवल मनुष्य के ऊपर पड़ता है, वरन् वस्तुओं एवं समीपवर्ती वातावरण पर भी पड़ता है। कर्मों के सूक्ष्म संस्कार वातावरण में बने रहते और संपर्क में अनेक वाले व्यक्तियों पर असाधारण प्रभाव देखे गये हैं। चिन्तन एवं कृत्य किस प्रकार स्थान एवं वातावरण पर असर डालते हैं, इसकी परीक्षा की जा सकती है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में जाते अथवा निकट से होकर गुजरने पर मन को विशेष शान्ति मिलती है। बाजार, मेला, भीड़-भाड़ के कोलाहल में पहुँचने पर मन उद्विग्नता एवं अशान्ति से भर उठता है। कसाई खाने में पहुंचने पर हृदय उद्वेलित हो उठता है। घृणा उत्पन्न होती है। शीघ्रता से उस स्थान से निकल चलें, ऐसा मन करता है। नदी सरोवर के निकट बैठने पर मन प्रसन्नता से भर उठता है। तीर्थ स्थानों पर जाने से मन में श्रेष्ठ कार्यों-परमार्थ के प्रति उमंग उठने लगती है। यह उन स्थानों में विद्यमान ऋषियों के तप के फलस्वरूप सूक्ष्म संस्कारों की ही प्रतिक्रिया है जो वातावरण में अदृश्य रूप से मौजूद रहते तथा समीप में आने वालों को सत्कार्यों की ओर प्रेरित करते रहते हैं।
संत, महात्मा, महापुरुष जहाँ रहते हैं वह स्थान भी प्रेरणा का केन्द्र बिन्दु बनता है। उनकी वस्तु श्रद्धा की पात्र बनती तथा जीवित व्यक्तियों जैसी ही सूक्ष्म प्रेरणा एवं प्रकाश देने में समर्थ होती है। सद्विचारों एवं सत्कर्मों से संस्कारित वस्तुएँ अदृश्य प्रभाव डालती हैं तथा कल्याणकारी सिद्ध होती हैं। यह सत्पुरुषों के सत्कर्मों एवं सद्विचारों की ही परिणति है जो उस वातावरण पर सुसंस्कारों के रूप में छाई रहती तथा अदृश्य प्रेरणाएं प्रेषित करती रहती हैं। फलतः अनेकों व्यक्ति लाभान्वित होते हैं।
दुष्कर्मों का प्रभाव भी कालान्तर तक बना रहता है। वातावरण में विक्षोभकारी तत्व अधिक रहते हैं। वस्तुएँ अभिशप्त होती तथा संकट का करण बनती हैं। शास्त्रों की मान्यता है कि श्रेष्ठ आत्माएं अपने भौतिक जीवन के उपरान्त भी समीपवर्ती वातावरण में उपस्थित होकर प्रेरणा एवं प्रकाश देती रहती हैं। दुरात्माएं जीवनकाल में न तो स्वयं सन्तुष्ट रहती हैं, न ही दूसरों को शान्त बैठने देती हैं। मरणोपरान्त भी वह उसी प्रकार संकट उत्पन्न करती हैं जिस प्रकार जीवित बने रहकर। इसे वातावरण का प्रभाव माना जाय अथवा श्रेष्ठ या दुष्ट मृतात्माओं का आशीर्वाद-प्रकोप। इस विवादास्पद चर्चा में न भी उलझा जाय तो भी एक तथ्य सभी को मान्य है कि उक्त वातावरण में भले-बुरे कृत्यों का प्रभाव निरन्तर बना रहता है। सत्कर्मों का समर्थन एवं दुष्कर्मों से विरत रहने की आप्त प्रेरणाओं में, यही रहस्य सन्निहित है।
दुष्कर्मों के फलस्वरूप अभिशिप्त बनी वस्तुएं एवं सम्पदाएं किस प्रकार विक्षोभ उत्पन्न करतीं तथा संकट का कारण बनती हैं, इसका प्रमाण समय-समय पर मिलता है। ब्रिटिश म्यूजियम में रखी एक ममी अपने साथ ऐसी कहानी जोड़े हुए है। सन 1864 में अरब देश की एक खुदाई में उपरोक्त दुर्भाग्यशाली ममी मिली। आकर्षण से प्रभावित होकर ‘बाब सिसरों’ नामक एक पूंजीपति ने उसे खरीद लिया। दो माह के भीतर उसे व्यापार में इतना बड़ा घाटा हुआ कि वह अपने को सन्तुलित न रख सका। हृदय की धड़कन रुक जाने से वह मर गया। ममी की देख-रेख करने वाले दो नौकर भी बिना किसी रोग के बिस्तर पर सोये हुए मृत पाये गये। पूँजीपति का एक मात्र लड़का एक ट्रक दुर्घटना में घायल हो गया। उसके दोनों पैर काटने पड़े। अभिशिप्त जानकर घर वालों ने बिना कोई मूल्य लिए ममी को एक फोटोग्राफर को दे दिया। फोटोग्राफर जे. एस. सैम्सन ने अधिक कीमत प्राप्त करने के उद्देश्य से ममी का फोटो लेना चाहा जिससे विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए दे सकें। फोटो को साफ करने पर वह यह देखकर विस्मित रह गया कि उसमें मिश्र की अधेड़ महिला का स्पष्ट चित्र आ गया है। चित्र लेने के दूसरे दिन ही वह पागल हो गया तथा कुछ ही दिनों में मर गया। उसकी पत्नी ने परेशान होकर लन्दन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम को ‘ममी’ को वापस सौंप दिया। ‘ममी’ को म्यूजियम में पहुँचाने वाले दो मजदूरों में से एक तो एक सप्ताह के भीतर मर गया, दूसरा कार दुर्घटना में हाथ पैर गवाँ बैठा।
म्यूजियम में पहुँचने के बाद भी अभिशिप्त ममी का प्रकोप कम नहीं हुआ। शहर की मशहूर फोटोग्राफर कम्पनी मैसर्स डब्ल्यू. ए. मैनसल ने इस ममी का चित्र लेने का प्रयास किया। उक्त कम्पनी मालिक का लड़का फोटोग्राफर को लेकर ममी का निरीक्षण करने आया। निरिक्षण के उपरान्त वापिस लौटते समय कार दुर्घटना में उसका एक हाथ टूट गया। इधर फोटोग्राफर का लड़का घर में खिड़की के पास बैठा था। इतने में खिड़की में लगा काँच अपने आप निकलकर उसके ऊपर गिर पड़ा। फलस्वरूप वह बुरी तरह घायल हो गया। फोटोग्राफर इन संकेतों को न समझ सका। दूसरे दिन म्यूजियम से उक्त ताबूत का चित्र खींचकर वह लौट ही रहा था कि कहीं दूर से एक काँच का टुकड़ा उसकी नाक में आकर टकराया। उसकी नाक कट गई। उक्त संकटों को देखकर म्यूजियम अधिकारियों ने उसका चित्र लेना ही वर्जित कर दिया।
इन घटनाओं को देखकर म्यूजियम के अधिकारियों ने ‘ममी’ के इतिहास का पता लगाने का कार्य पुरातत्व वेत्ताओं को सौंपा। पर्यवेक्षण करने पर मालूम हुआ कि ताबूत मिश्र की एक ऐसी महिला का है जो अथाह सम्पत्ति की मालकिन थी। अनैतिक कार्यों द्वारा उसने यह संपत्ति एकत्रित कर ली थी। जीवन के अन्तिम दिनों में कुछ व्यक्तियों ने उसके साथ षड़यंत्र करके संपत्ति को हड़प ली। वह विक्षिप्तावस्था में मरी। विशिष्ट सूत्रों द्वारा जानकारी मिली की वह ताबूत पहले भी अनेकों व्यक्तियों की मृत्यु का कारण बन चुका है। उसकी आत्मा निरन्तर ताबूत के साथ बनी रही। जो भी उसे छूटा अथवा छेड़छाड़ करने का प्रयत्न करता उसके कोप का भाजन होता।
ब्रिटेन के ही एक अपराधी के घर से एक ऐसा चित्र बरामद हुआ जो बिल्ली का था तथा नीले पेपर पर काले चाक से बनाया हुआ था। ध्यान से देखने पर इस अस्पष्ट चित्र में खूँख्वार जानवर की आँखें चमकती दिखाई पड़ती थीं। सर्वप्रथम वन विभाग के एक अधिकारी ने उसे प्राप्त किया। उसे अपने शयन कक्ष में उसने लगाया। अभी कुछ ही दिन बीते होंगे कि वन अधिकारी ने आत्म-हत्या हर ली। चित्र आकर्षक था, पर उसे दुर्भाग्यशाली जानकर पत्नी ने काउंट अलेक्जेन्डर नामक व्यक्ति के हाथों बेच दिया। जिसे उसने अपने ड्रेसिंग रूप में सजाया। काउंट अलेक्जेन्डर जब भी ध्यान से चित्र को देखता उसे दो हिंसात्मक आंखें घूरती दिखाई पड़तीं। एक दिन विक्षिप्तावस्था में उसने स्वयं को गोली मार ली।
तीसरा शिकार बना काउंट अलेक्जेन्डर के चित्र का युवा लड़का। दुर्लभ वस्तुओं को एकत्रित करने का शौक होने के कारण उस चित्र को वह अपने घर ले आया। चित्र को एक दिन वह ध्यान से देख रहा था। अचानक डरने लगा कि किसी व्यक्ति की खूनी आँखें उसे घूर रही हैं। असन्तुलन की स्थिति में उसने भी आत्महत्या कर ली। चौथा शिकार उस युवक का एक रिश्तेदार बना, जो कुशल चित्रकार था। चित्र की पेंटिंग बनाने के लिए वह उसे अपने घर ले आया। दूसरे दिन प्रातःकाल वह बिस्तर पर मरा पाया गया। इसके साथ ही वह रहस्यमय चित्र भी गायब हो गया।
जिस अपराधी के घर से उक्त चित्र बरामद हुआ उसकी विस्तृत जानकारी एकत्रित करने पर कई रोचक तथ्य सामने आए हैं इन्टेलीजेन्स डिपार्टमेन्ट के विवरण में वर्णन था कि वह रहस्यमय चित्र एक अपराधी गिरोह का कोई संकेत था। जिस घर से प्राप्त हुआ उसका मालिक उक्त गिरोह का सरदार था। वह चित्र उसे अत्यधिक प्रिय था तथा सदा अपने पास रखता था। उसके ऊपर अनेकों हत्याओं एवं अपराधों का आरोप दर्ज था।
ऐसी ही एक अभिशप्त प्रतिमा एटलाँटिक महासागर से प्राप्त हुई जिसने अब तक अनेकों व्यक्तियों की जानें ले ली हैं। इटली का एक जहाज द्वितीय विश्व युद्ध के समय उक्त सागर से होकर जा रहा था। नाविकों ने सागर की तंरगों के साथ कोई वस्तु बहती हुई देखी। जाल डालकर खींचने पर वह काठ की एक आदमकद युवती की प्रतिमा निकली। प्रतिमा के जहाज पर आते ही नाविक एवं यात्री चारों ओर एकत्रित होकर देखने लगे। नारी सौंदर्य की इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति उस काष्ट मूर्ति में हुई थी कि सभी मंत्रमुग्ध बने देखते रहे। प्रतिमा की लड़की की चौकी पर नाम अंकित था ‘एटलांश’। प्रतिमा पर आसक्त दो नाविक अपना सन्तुलन गंवा बैठे। उन्होंने अथाह समुद्र में छलांग लगा दी। नाव के कप्तान ने इस आकस्मिक घटना के फलस्वरूप प्रतिमा को केबिन में मजबूत ताले के भीतर बन्द कर दिया। इटली बन्दरगाह पर पहुँच कर जहाज के कप्तान ने प्रतिमा को निकटवर्ती अजायबघर को सौंप दिया। प्रतिमा में आकर्षण इतना अधिक था कि वहाँ भी दर्शकों की भीड़ जमा हो गयी। कितने ही व्यक्ति को देखकर पागल हो गये। जर्मन सेना के एक लेफ्टीनेन्ट ने 13 अक्टूबर 1944 को प्रतिमा के समक्ष सीने में गोली मार कर आत्म-हत्या कर ली। एक अन्य व्यक्ति ने भी इसी प्रकार गोली मार ली। अजायबघर के अधिकारियों ने यह स्थिति देखकर विचार किया कि उस प्रतिमा को हटा देना चाहिए। पर दुर्लभ एवं अनोखी कलाकृति होने के कारण उसे हटाया न जा सका। हाँ, अधिकारियों ने उसके प्रदर्शन पर रोक अवश्य लगा दी। प्रतिमा के कलाकार का नाम पता तो नहीं मालूम हो सका पर ऐसा अनुमान लगाया गया कि प्रतिमा किसी द्वीप के राजकुमारी की है। जो अपने समय की अद्वितीय सुन्दरी थी एवं यौवनकाल में ही राजकीय दुष्चक्रों के कारण उसकी मृत्यु हो गयी थी।
सत्कर्म और दुष्कर्म अपने-अपने अनुरूप प्रभाव डालते हैं। व्यक्ति ही नहीं वातावरण और वस्तुएं भी प्रभावित होती हैं। मरणोपरांत भी दुरात्माएं उन वस्तुओं के इर्द-गिर्द मंडराया करती हैं। वस्तुएं अभिशप्त बनती हैं तथा समीप आने वाले व्यक्तियों अथवा प्रयोगकर्ताओं पर प्रहार करती हैं। उपरोक्त घटनाएं इसी तथ्य की पुष्टि करती है। दुराचारी स्वयं विक्षिप्त बना जीवन पर्यन्त अपने कुकृत्यों की आग में जलता रहता है और मरणोपरान्त भी विक्षोभ उत्पन्न करता है। जिसका परिचय इस प्रकार की घटनाओं के रूप में मिलता है। सत्कर्म की परिणति इस जीवन में सुख-समृद्धि, शान्ति और सन्तोष के रूप में होती है। लोकोत्तर जीवन भी शान्ति और सन्तोष से भरा होता है। अपने जीवनकाल में तथा उसके बाद असंख्यों व्यक्ति प्रेरणा प्रकाश ग्रहण करते हैं, जबकि अनाचारी, दुराचारी जीवित रहते हुए तो विक्षोभ उत्पन्न करते ही हैं। मरने के बाद भी शान्त नहीं बैठते और संकट उत्पन्न करते देखे जाते हैं। उनके प्रभाव से वस्तुएं तक अभिशप्त हो जाता हैं तथा उपरोक्त प्रकार के संकट खड़े करती देखी जाती हैं।
एक बार भगवान् महावीर कहीं जा रहे थे। सहसा एक चाण्डाल भागता-भागता कहीं से आया और महावीर के चरणों पर गिरने लगा। तभी सहसा रास्ते पर चलते मनुष्य चिल्ला उठे “अरे हरिकेशी! तुम भगवान को कहीं छू न देना।
भगवान् महावीर ने आश्चर्य से पूछा- ‘क्यों?’
‘यह चाण्डाल है भगवन्! इसके छू देने से आप अपवित्र हो जायेंगे।’ भीड़ में से एक व्यक्ति बोला।
यह सुनकर भगवान महावीर मुस्कराये। वे स्वयं आगे बढ़कर हरिकेशी चाण्डाल के पास गये और उसे उठाकर अपने गले से लगा लिया।
इसके बाद भगवान् महावीर आश्चर्यचकित भीड़ से बोले- ‘जन्म से कोई व्यक्ति न ब्राह्मण है, न चाण्डाल। जो बुरे कार्य करता है वही चाण्डाल है। जो अच्छे कार्य करता है वही ब्राह्मण है। चाण्डाल हो या ब्राह्मण सभी में एक आत्मा है फिर किससे कैसी घृणा करें?
मनुष्य के अतिरिक्त संसार में कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसे कल की दुःखद अनुभूतियाँ स्मृति में उभर कर पीड़ित करती हों और वह आने वाले कल की चिन्ता में घुलता हो। अतीत की स्मृतियाँ और अनागत की कल्पना केवल मनुष्य के मस्तिष्क में ही उपजती है। अन्य किसी प्राणी के मन में न बीते का स्मरण होता है और न आने वालों का अनुमान। इसका कारण मनुष्य की विचारशीलता की कही जा सकती है। विचारशीलता से उद्भूत दूरदर्शिता ही भविष्य की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में उत्सुक बनाती है।
इस उत्सुकता का समाधान करने के लिए मनुष्य ने अनेक तरह के चिन्तन किया और यह जानने की जीतोड़ कोशिश की कि कल क्या होगा? इस तरह के प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप ही फलित ज्योतिष का जन्म हुआ। ज्योतिष यों एक विज्ञान है, जिसमें ग्रह-नक्षत्रों और अन्तरिक्ष की गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। इसे विज्ञान भी कहा जाता है क्योंकि इसके अपने सुनिश्चित सिद्धान्त हैं जो लम्बे समय तक किये गये पर्यवेक्षण, निरीक्षण और प्रयोगों के आधार पर स्थिर किये गए हैं। फलित ज्योतिष में भी ग्रह-नक्षत्रों की गतियों को आधार मानकर भविष्य की सम्भावनाओं का अध्ययन किया जाता है।
फलित ज्योतिष के विवेचन में ज्योतिर्विज्ञान के सिद्धान्तों को आधार मान कर यह विश्लेषण किया जाता है कि किस ग्रह का किस पर कब, क्या प्रभाव पड़ेगा? ज्योतिष को वेदान्त दर्शन से जोड़ने वाले विज्ञजनों का कथन है कि सारा ब्रह्मांड एक व्यापक विराट् शरीर है और इसके प्रत्येक घटक एक-दूसरे से प्रभावित हैं। प्रत्येक घटक एक-दूसरे से घनिष्ठ संपर्क सूत्रों से सम्बन्धित हैं तथा उनमें एक विशिष्ट अंतर्संबंध है। इसलिए एक स्थान पर होने वाली घटनाएं दूसरे स्थान को प्रभावित करती हैं।
स्थूल दृष्टि से ग्रह-नक्षत्र पृथ्वी से लाखों करोड़ों मील दूर हैं, पर तात्विक दृष्टि से उसके एक प्राण होने में कोई मतभेद नहीं किया जाता। जैसे आँख और पैर की अंगुलियों में पाँच साड़े पांच फीट का अन्तर है। इतनी दूरी है- पर रक्त प्रवाह, चेतना, परस्पर सम्बन्ध और एक शरीर से जुड़े होने के कारण उनकी एक रूपता में कोई अन्तर नहीं आता है। अनन्तः वे एक हैं। तथा यह भी कि पैर की अंगुली में चोट लगे तो आँख से आँसू आ जाते हैं, पीड़ा को सहने की सामर्थ्य जुटाने के लिए दांत अपने आप भिंच जाते हैं और हाथ वहाँ सहलाने लगते हैं। आशय यह है कि शरीर के एक प्रदेश पैर के साथ बीती घटना की प्रतिक्रिया आँख पर भी होती है। हालाँकि दोनों दूर-दूर हैं। फलित ज्योतिष के आधार पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति देखकर व्यक्ति विशेष के भविष्य की घोषणा करने का यही एक मोटा आधार है।
इसके और भी सूक्ष्म सिद्धान्त हैं। लेकिन फलित ज्योतिष का अनुसंधान इसलिए नहीं किया गया कि मनुष्य उसके द्वारा अपनी भविष्य की स्थिति को जानकर चिन्तित होता रहे। जिस होनहार को पुरुषार्थ और संघर्षों द्वारा टाला जा सकता है- उसकी भीषणता वाला पक्ष सोच-सोच कर वह स्थिति पहले ही पैदा करली जाय। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध पाश्चात्य ज्योतिषी नोएल जेक्विन का मत उल्लेखनीय है। उनसे किसी ने एक बार पूछा- “यूरोपीय देशों का कभी विश्व भर पर अधिकार रहा है और अपने शौर्य, साहस, बल और बुद्धिमत्ता के कारण उन्होंने विश्व के लगभग सभी स्थानों से सम्पदा का दोहन किया है। क्या आप ज्योतिष का प्रचार कर अब यूरोपीय जनता के पौरुष को मार्फिया देकर सुला देना चाहते हैं।’’
नोएल जेक्विन ने उत्तर दिया था कि- “ज्योतिष की गवेषणा का अर्थ- पुरुषार्थ छोड़कर अपनी प्रगति को अवरुद्ध कर लेना नहीं है। बल्कि मैं तो यह मानता हूँ कि यदि भविष्य में आने वाली कठिनाइयों और विपत्तियाँ को जान लिया जाय तो उनसे अभी ही निबटने का प्रबन्ध किया जा सकता है। यदि हमें सुदूर मंजिल पर पहुँचना और हम मंजिल की ओर चल पड़े हैं तथा हमें मार्ग में आने वाले नदी नालों का ज्ञान है, अन्य कठिनाइयों तथा बाधाओं की जानकारी है तो उनसे पार होने का भी प्रबन्ध कर सकते हैं।”
जेक्विन का यह उत्तर उन भाग्यवादियों के लिए बड़ा प्रेरक हो सकता है, तो सितारे खराब होने की कल्पना कर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं या बुरे ग्रह तथा शनि की अंतर्दशा देखकर अपने प्रयत्नों को बोथरे हल समझ लेते हैं, जिनसे साधना की जमीन पर सफलता के बीज नहीं बोये जा सकते। खेती करते समय किसान जमीन की कठोरता अथवा कोमलता नहीं देखता, वह हल जोतता है और जमीन फाड़ता है। यदि एक बार में जमीन की मिट्टी भुरभुरी नहीं होती तो दुबारा वैसा ही प्रयत्न करता है। लेकिन सफलता के लिए अभीष्ट प्रयत्न करने में मनुष्य यह सोचकर क्या हार जाता है कि उसके ग्रह खराब हैं।
वस्तुतः जब कभी फलित ज्योतिष की खोज की गयी थी वह समय निश्चित रूप से इसके बाद का था जबकि मनुष्य ने अपनी आत्मा की अनन्त सामर्थ्य का पता चला लिया था। पहली बात तो यह है कि आत्मा की इस अनन्त सामर्थ्य के सामने ग्रह-नक्षत्रों का कोई बस ही नहीं चलता। वे इतने बलवान नहीं हैं ईश्वर पुत्र मनुष्य के सामने अड़े ही रहें, उसके प्रयत्न व पुरुषार्थ के सामने घुटने न टेक दें। जिस समय फलित ज्योतिष पर विज्ञान की एक धारा समझकर अनुसंधान किया गया होगा- उस समय सत्य शोधकों के सामने यही लक्ष्य रहा था कि भावी जीवन में सम्भावित आपदाओं का पता चल जाय। ताकि उनको दूर करने की तैयारी पहले से ही की जा सके। उदाहरण के लिए हमें मालूम हो कि अमुक मार्ग में जंगली जानवरों का डर है और जाना अनिवार्य है तो इस ज्ञान के आधार पर हम उनसे सुरक्षा का प्रबन्ध कर चलते हैं। जमीन के मार्ग छोड़े जा सकते हैं, पर जीवन यात्रा का पथ ऐसा है कि जिस पर चलना ही पड़ता है। परिस्थितियाँ में कौतूहलवश ही ‘आगे क्या होगा’ यह जानने की कोई संगति नहीं बैठती। संगति बैठती है तो इतनी भर कि सम्भावित विपदाओं से निबटने का प्रबन्ध कर कदम उठाये जांय।
वैज्ञानिक आधार पर हस्त रेखाओं की हुई गवेषणाएं इस सिद्धान्त की ओर अधिक पुष्टि होती है। मनोवैज्ञानिक समझते हैं कि मनुष्य की मानसिक संरचना जिस प्रकार की होती है, उसी के अनुसार मनुष्य के हाथ की रेखायें भी बनती बिगड़ती हैं। लेकिन जिन लोगों ने हस्तरेखाओं के आधार पर भविष्य-कथन के प्रयत्न किये हैं वे भी आश्चर्यजनक रूप से इस सिद्धान्त को समर्थन देते हैं। सेण्ट जारमन, विलियम, बेनहन आदि पश्चिमी भविष्य वक्ताओं ने तो इस विषय पर काफी अनुसंधान किया और पाया कि भविष्य को बदला जा सकता है। कीरो के सम्बन्ध में तो भारतीय पाठक अनभिज्ञ नहीं हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ सत्यता पर आधारित-सी लगती थी और कीरो किसी भी व्यक्ति को लेकर कोई भविष्यवाणी करते थे तो उस व्यक्ति की हस्तरेखाओं को देखकर।
जिस व्यक्ति ने हस्तरेखाओं के आधार पर अपने संपर्क में आये हजारों व्यक्तियों का भविष्य कथन दिया। उसका, कीरो का स्वयं का मत है- हस्त रेखाओं से केवल भविष्य की संभावनाओं का पता चलता है। यह मस्तिष्क और शरीर की विभिन्न प्रवृत्तियों के संचालन की दिशा बताती है। इसलिए निश्चिंततापूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि मनुष्य के सम्बन्ध पूर्ण निर्धारित या पूर्व निश्चित कुछ नहीं है। उसकी सम्भावनाएं बहुत कुछ उसके संकल्पों पर निर्भर करती हैं वस्तुतः मनुष्य के संकल्प ही इतनी सामर्थ्य से सम्पन्न होते हैं कि अपार सम्भावनाएं क्षण मात्र में असम्भव हो जाती हैं और घोर निराशा में भी जुगनू की चमक हथेली पर सूरज उगा देने की समर्थता रखता है। चमत्कार संकल्प बल का ही है।
कुल मिलाकर मनुष्य के लिए ही यह सम्भव है कि वह अपने पुरुषार्थ से अपने भविष्य का स्वयं निर्धारण और निर्माण कर सकता है। भाग्य के भरोसे बैठे रहना नीतिविदों ने कायरता कहा है और उद्योगी पुरुषों के लिए सफलता प्राप्त कर पाना सम्भव बताया है। एक हस्त रेखा विशेषज्ञ ने स्वयं पुरुषार्थ की महत्ता को स्वीकार करने और उसे भाग्य से बलवान बताते हुए लिखा है कि “जीवन आपके सामने है। प्रत्येक क्षण खुली किताब के समान आपके सामने खुला पड़ा है। आप प्रत्येक क्षण का सही-सही उपयोग करें और काल देवता की प्रत्येक धड़कन को अपने अनुरूप बनाते चलें। आप देखेंगे कि आपकी रेखाएं बदल रही हैं और सफलता के हाथों जयमाला पहनने के लिए उत्साहपूर्वक व्यग्रता से बढ़ रही है।’’
हस्तरेखा विज्ञान के क्षेत्र मौलिक गवेषणाओं के लिए सुप्रसिद्ध विद्वान डब्ल्यू. जी. बेनहम का कथन है कि ‘‘हथेली की रेखाएं परिवर्तनशील हैं। क्योंकि मनुष्य एक चेतन प्राणी है और वह अपनी भावनाओं तथा संकल्पों द्वारा अपना भाग्य स्वयं चुनता है। इसीलिए कुछ विद्वान मानते हैं कि सात वर्ष में हथेली की रेखाओं में पूर्णतः परिवर्तन आ जाता है, पर मेरा अनुभव यह है कि हाथ की रेखायें पल-प्रतिफल बदलती रहती हैं। और कुछ महीनों ही नहीं कुछ दिनों में भी रेखाओं में परिवर्तन किया जा सकता है।’’
ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर हो अथवा हस्तरेखाओं के माध्यम से भविष्य कथन की निश्चित सम्भावना को संदिग्ध बताते हुए बेनहम ने आगे लिखा है कि, ‘मनुष्य की चेतना प्रवाहमान है इसलिए उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। समुद्र के सम्बन्ध में तो कहा जा सकता है कि उसमें कब ज्वार आएगा लेकिन नदी को बाढ़ के सम्बन्ध में पूर्ण घोषणा करना कठिन ही नहीं असम्भव-सा है। किसी नगर में प्रतिदिन मरने वाले व्यक्तियों का रिकार्ड देखकर यह तो कहा जा सकता है कि एक दिन में कितने व्यक्ति मरते हैं और कल कितने मरेंगे। इसी प्रकार घण्टों मिनटों का औसत भी निकाला जा सकता है, परन्तु व्यक्ति विशेष के सम्बन्ध में इस प्रकार की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि मरने वाले व्यक्तियों में एक यह भी होगा।
निर्धारित भाग्य कुछ होता भी हो तो भी उसकी सम्भावना मनुष्य की सम्वेदना एवं उसकी अंतःशक्ति पर अधिक अवलम्बित होती है। इस सम्बन्ध में बंगला के एक साहित्यकार ने बहुत ही रोचक आख्यान लिखा है। उस आख्यान के अनुसार विधाता ने सृष्टि का निर्माण करते समय यह परम्परा अपना ली थी कि जिस प्राणी को पृथ्वी पर भेजा जाए उसका भाग्य भविष्य उसे पहले ही बता दिया जाय। यह परम्परा लम्बे समय तक चली। एक समय ऐसे व्यक्ति को पृथ्वी पर भेजना निश्चित किया गया जो विधाता का घोर विरोधी था। वह प्रायः लड़ता-झगड़ता रहता था। विधाता ने दण्ड स्वरूप उसके भविष्य में दुःख ही दुःख लिख दिए। वह उस व्यक्ति के दुःखद जीवन का भविष्य लेख पढ़ ही रहे थे कि सुनते-सुनते ही वह व्यक्ति पृथ्वी पर आने से पहले स्वर्ग में ही मर गया। कहते हैं तब से विधाता ने भविष्य पढ़ना बन्द कर दिया और उसके बाद मनुष्य अब तक भवितव्य को जानने के लिए बार-बार प्रयत्न करता रहता है तथा असफल होता है।
खैर! यह तो कहानी है, परन्तु इसमें यह सत्य तो निहित ही है कि भविष्य को जानना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य ही है। भविष्य कथन की विशेषता किन्हीं विशेष, व्यक्तियों में हो भी सकती है। लेकिन उसका जानना आवश्यक नहीं है। विशेषतः इस क्षेत्र में व्यावसायिक भावना के प्रवेश से मनुष्य को अविवेकी और मूढ़ बनाने का चक्र ही चलता दिखाई देता है।
किसी को भाग्यवादी ही बने रहना है तो यह अधिक व्यावहारिक है कि मनुष्य अपने भविष्य के प्रति आशाजनक दृष्टिकोण रखे। कठिनाइयां आई तो उनसे कुछ सीखने को मिलेगा, सफलतायें मिली तो प्रयत्न आगे बढ़ेंगे- यह रीति-नीति अपनाने पर न बुरे ग्रहों के प्रभाव का भय सतायेगा और न ही अनिष्ट की आशंका सालेगी। भविष्य के प्रति आशापूर्ण आस्था रखने का एक लाभ यह भी है कि उससे मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों को प्रेरणा मिलेगी, वे जागेंगी और अमंगलकारी ग्रह यदि हुई भी सही- यद्यपि वे है नहीं, तो व्यक्ति का कुछ बिगाड़ न सकेंगे।
अभी तक समझा जाता था कि किसी वस्तु को देखने के लिए दो ही वस्तुएं आवश्यक हैं एक प्रकाश और दूसरी आँख। प्रकाश जब आँखों से टकराता है तो आँखों का ताँत्रिक तंत्र एक विशेष प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया का आयोजना कर सारी सूचनाऐं मस्तिष्क को भेजता है और दृश्य दिखाई देता है। यह विज्ञान की मान्यता थी। अब विज्ञान भी भारतीय दर्शन की इस मान्यता को स्वीकार करने लगा है कि प्रकाश और आँखों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण घटक है- मन। मन एक तीसरी और उपरोक्त दोनों से महत्वपूर्ण वस्तु है जो प्रकाश और आँखों के क्रिया-कलाप को अनुभव करता है तथा नई तरह की योजनाएं बनाता है, आदेश देता है और अनुभूति का संयोजन कर दूसरे अवयवों में विभक्त करता है।
सीधी-सी बात है जिसे हर कोई जान और अनुभव कर सकता है कि प्रकाश और आँख के रहते भी वह सब कुछ नहीं दिखाई देता है जो सामने प्रस्तुत रहता है। दिखाई पड़ने वाली वस्तु का दृश्य अनुभव तभी होता है जब मन का ध्यान उस ओर रहता है अन्यथा सैकड़ों दृश्य अपने आस-पास घटते रहते हैं, उनमें से प्रत्येक को न कोई देखता है और देखता भी है तो उसे अनदेखा कर न देता है। पुस्तक पढ़ते समय आंखों के सामने पूरा पृष्ठ रहता है। आँख पर पूरे पृष्ठ की छाया पड़ती है परन्तु मस्तिष्क तक वही अक्षर, वही पंक्तियाँ पहुँचती हैं जिन्हें पढ़ा जा रहा होता है अर्थात् जिन पर मन केन्द्रित रहता है। वही दृश्य दिखाई देते हैं, जिन तक मानसिक चेतना, मन की एकाग्रता केन्द्रित हो। कहते का आशय यह कि यदि मानसिक चेतना का प्रकाश न हो तो प्रकाश और आँखों के होते हुए भी देखना सम्भव नहीं है।
मानसिक चेतना को जागृत किया जा सके, उसे सशक्त तथा प्रखर बनाया जा सके तो वह सब कुछ भी देखा और जाना जा सकता है जो आँखों से देख पाना सम्भव नहीं होता या जिन्हें देखने में आंखें समर्थ नहीं होती। दूसरे शब्दों में इसे यों भी कहा जा सकता है कि दो स्थूल नेत्रों और दृष्टिवर्धन के अद्यावधि आविष्कारों की सम्मिलित उपलब्धियों से भी अधिक समर्थ और अधिक सक्षम एक तीसरा नेत्र मनुष्य के पास है। इस यन्त्र को न कहीं खरीदना पड़ता है और नहीं इसके संचालन की शिक्षा लेनी पड़ती है। योगशास्त्रियों ने आज्ञाचक्र भी कहा है और इसका स्थान भू-मध्य भाग बताया है। तीसरा नेत्र खोलने या आज्ञाचक्र जागृत करने के लिए विभिन्न साधना अनुष्ठानों का विधान है। उन्हें निष्ठापूर्वक सम्पन्न करते हुए वह अन्तर्ज्योति विकसित की जा सकती है जिसके माध्यम से लोक-लोकान्तरों की, भू-गर्भ की पंच भौतिक परिस्थितियों को देखा और समझा जा सके।
इतना ही नहीं इस नेत्र में वह शक्ति भी है कि जीवित प्राणियों की मनःस्थिति, भावना, कल्पना, योजना, इच्छा, आस्था एवं प्रकृति को भी समझा जा सके। यों सामान्य नेत्र भी अपने आप में अद्भुत हैं। उसकी संरचना भी इतनी विलक्षण है कि उसे देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। जिनमें प्रकाश दर्शन की रहस्यमय परतें सन्निहित हैं, मस्तिष्क के उन संस्थानों का विवेचन कर पाना भी विरलों के लिए ही सम्भव है और समझ पाना तो और भी कठिन है।
यहाँ चर्चा इन दोनों नेत्रों से भिन्न और उनसे भी विलक्षण तृतीय नेत्र की की जा रही है। मस्तिष्क के अग्र भाग में जकड़े हुए दो नेत्र तो सभी को दिखते हैं लेकिन उनके मध्यवर्ती अन्तराल में जो तीसरा नेत्र है उसका परिचय और अनुभव योगीजनों को ही मिल पाता है। दोनों भौंहों के मध्य भाग में जो बाल रहित स्थान है, उसे भृकुटि कहते हैं। उसके नीचे अस्थि आवरण के बाद एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि आती है। इसे आज्ञाचक्र का स्थान कहते हैं। स्मरण रहे यह ग्रन्थि आज्ञाचक्र नहीं है। जैसे शरीर आत्मा नहीं है। शरीर में रहते हुए भी आत्मा-चेतना का जिस प्रकार शरीर से भिन्न अस्तित्व है उसी प्रकार इस ग्रन्थि में होते हुए भी आज्ञाचक्र भिन्न बात है। इसका अस्तित्व माँस-मज्जा से बनी यह ग्रन्थि नहीं है अपितु वह तो सूक्ष्म अस्तित्व रखती है। फिर भी शरीर शास्त्र की दृष्टि से इस ग्रन्थि का कार्य और प्रयोजन अभी तक पूरी तरह नहीं समझा जा सका है। आत्म-विद्या के अन्वेषी ज्ञाता इसके महत्व और कार्य की विशेषता को बहुत पहले से जानते हैं।
इसे दिव्य दृष्टि का केन्द्र भी कहते हैं। दिव्य दृष्टि यहीं से निसृत होती है। भूमध्य भाग में अवस्थित इस तृतीय नेत्र के कई प्रमाण अब तक मिल चुके हैं। यों तो पुराण ग्रंथों में शिव और पार्वती के प्रसंगों में भी इस तृतीय नेत्र का उल्लेख आता है। कथा के अनुसार शंकर भगवान इसी नेत्र को खोलकर उसमें से निकलने वाली अग्नि द्वारा कामदेव को भस्म किया था। संजय ने महाभारत के सारे दृश्य इसी के माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र को सुनाये। चित्रलेखा क्षरा प्रद्युम्न के प्रति उसे बिना देखे आकर्षित होना तथा उसके साथ प्रणय सम्बन्ध का संकल्प लेना इसी दिव्य दर्शन का ही परिणाम था। ये तो खैर पौराणिक घटनाएं हुईं, लोग इनकी विश्वसनीयता पर सन्देह भी कर सकते हैं। पर ऐसे ढेरों प्रसंग हैं जिनसे इस तृतीय नेत्र के अस्तित्व तथा उसकी क्षमता का परिचय मिलता है।
कुछ दिनों पहले रूस से प्रकाशित होने वाले वहाँ के प्रसिद्ध समाचार पत्र इजवेस्तिया में एक समाचार प्रकाशित हुआ था। जिसके अनुसार निझनी तागिल नामक स्थान पर रहने वाली ‘रोजा’ नामक युवती पंक्तियों पर उंगली चलाकर मामूली प्रेस में छपी पुस्तकें पढ़ लेती है। दुनिया के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने इस युवती के प्रमाण सहित फोटो और विवरण प्रकाशित किये हैं। आश्चर्य तो यह है कि वह पुस्तकों में बने हुए किसी भी फोटो को बिना देखे, अंगुलियों से छूकर ही बता देती है कि यह फोटो किसका है। यदि वह चित्रित व्यक्ति के बारे में नहीं जानती है तो उसकी आकृति का वर्णन कर देती है कि यह अमूक तरह का व्यक्ति है, मूँछ दाढ़ी वाला है कि बिना दाढ़ी मूँछ का, ऐसे कान हैं, और अमुक पोशाक पहने हुए है।
फोटो कोई भी क्यों न हो, किसी भी व्यक्ति की हो, जानवर की, वस्तु की, इमारत की या किसी प्राकृतिक दृश्यावली की ‘रोजा’ उसके बारे में केवल छूकर ही बता देती है। यह कैसे सम्भव है? कहीं कोई धोखा या फ्राड तो नहीं है? वैज्ञानिकों ने यह जाँच करने के लिए रोजा की आँखों पर पट्टियां बाँधकर तथा उसके चेहरे को गले तक मास्क से ढक दिया, फिर भी रोजा ने अक्षरों को पहचान लिया और फोटो के विवरण भी बता दिये। इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रकाश में से ‘इन्फ्रारेड किरणें’ निकाला हुआ प्रकाश छपे हुए कागज पर डाला। रोजा ने उस कागज को भी पढ़ लिया। हाँ, यह जरूर हुआ कि रोजा इस स्थिति में आकृतियां नहीं पहचान पायी। लेकिन वैज्ञानिकों ने यह मान लिया कि आंखें ही नहीं, शरीर के अन्य अंगों में भी दृष्टि तत्व हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह असामान्य स्थिति है और हम कह नहीं सकते कि शरीर में ऐसे तत्व और कहीं हैं या नहीं अथवा उन्हें विकसित किया जा सकता है अथवा नहीं? उन्होंने यह निश्चय भी व्यक्त किया कि प्रकाश को ग्रहण करने वाले तत्व अंगुलियों में कैसे आ गये? यह जानने के लिए बाकायदा अनुसंधान एवं प्रयोग किया जायेंगे।
यदि इस तथ्य को खोज निकाला गया तो ध्यान द्वारा प्रकाश कणों को आकर्षित करने तथा शरीर में अतींद्रिय ज्ञान की क्षमता उत्पन्न करने वाली भारतीय योग प्रणाली पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रामाणित हो जायेगी। रोजा के समान ही मिस्टीक प्रो. फोष्टान ने एक अन्धे फ्राँसीसी व्यक्ति का उल्लेख किया। वह व्यक्ति उंगलियों से छूकर ऐसा विवरण बताया करता था जो साधारणतः आँखों के बिना नहीं बताया जा सकता। कनाडा की एक अन्धी लड़की कहानियों के माध्यम से ऐसा चमत्कार प्रदर्शन करने में सक्षम थी। फ्राँस के प्रसिद्ध कवि जूल्स रोमेन्स उन दिनों परोक्ष दृष्टि विज्ञान में बड़ी दिलचस्पी थी। उन्होंने अपने साहित्यिक कार्यों के साथ-साथ इन विषयों में शोध की थी और बताया था अगणित नेत्र विद्यमान हैं जो स्पर्श संवेदना के द्वारा निकटवर्ती वस्तु के बारे में निरन्तर जानकारी संग्रहित करते रहते हैं। आँखों की तरह ये छोटे नेत्र वस्तुओं की आकृति भले ही स्पष्ट रूप से न जान सकें, पर उनकी प्रकृति के संबंध में नेत्र गोलकों की भाँति ही ज्ञान प्राप्त करते हैं।
भूमिगत अदृश्य वस्तुओं को देखने, भू-गर्भ में छिपी जलधार और अन्य वस्तुओं का पता लगाने वाले व्यक्तियों के समाचार आये दिन प्रकाशित होते रहते हैं। उस विद्या को रेण्डोमेन्सी कहते हैं। रेण्डोमेन्सी विज्ञान के द्वारा जमीन में दबे खनिज, रसायन, तेल आदि वस्तुओं का पता लगाया जा सकता है। केवल जल की तलाश करने वाली विद्या ‘वाटर डाउनिंग’ में तो कई लोग पारंगत हैं। आयरलैण्ड के विकलो पहाड़ी क्षेत्र में मीलों दूर तक कहीं पानी का नामोनिशान नहीं था। जमीन भी बहुत कड़ी और पथरीली थी। प्रो. वेनेट जो वाटर डाउनिंग में पारंगत थे, ने खदान विशेषज्ञों के आग्रह पर अपनी इस क्षमता का सफल उपयोग किया। वे कई घण्टों तक उसे क्षेत्र में घूमते रहे और अपने ढंग से उस स्थान पर परीक्षण करते रहे। अन्ततः वे एक स्थान पर रुके और कहा कि यहाँ केवल चौदह फुट गहराई पर एक अच्छा जल स्त्रोत है। खुदाई प्रारम्भ हुई और प्रो. वेनेट का कथन बिलकुल सच निकला। चौदह फुट तक खुदाई करने पर वहाँ पानी की एक जोरदार धारा उबल पड़ी।
पिछले दिनों गुजरात के चन्द्रवदन मेहता का नाम पत्र-पत्रिकाओं में काफी लोकप्रिय हुआ है। श्री मेहता ने बम्बई में अनेक प्रतिष्ठानों के आस-पास पानी का पता लगाकर इंजीनियरों को चकित कर दिया। कुछ समय पूर्व ब्लिट्ज ने फल्टण (महाराष्ट्र) के दानी नामक एक सज्जन का विवरण प्रकाशित किया था जो अब तक दस हजार स्थानों पर भूमि में छिपे जल का पता लगा चुका है। वे अपनी इस विशेषता के कारण इतने प्रसिद्ध हो चुके हैं कि लोग उन्हें ‘पानी महाराज’ के नाम से पुकारते हैं। उनकी सेवाओं का लाभ न केवल भारत सरकार वरन् इटली, जर्मनी, एवं चेकोस्लोवाकिया देशों की सरकारें भी उठा चुकी हैं।
यह सब सूक्ष्म शरीर की दिव्य दृष्टि, आज्ञाचक्र का ही चमत्कार है। इसकी मर्यादा और क्षमता बहुत बढ़ी-चढ़ी है। उसे समझने, विकसित करने और प्रयोग में लाने की क्षमता योगाभ्यास से ही उपलब्ध होती है। उपरोक्त व्यक्तियों के उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि आँखों से ही सब कुछ नहीं देखा जा सकता। आँखों के अतिरिक्त दूसरे अंगों, इन्द्रियातीत अवयवों में भी देखने समझने की क्षमता विद्यमान है। मस्तिष्क नेत्र गोलकों का फोटोग्राफी कैमरे जैसा प्रयोग करता है और पदार्थों के जो चित्र आँखों की पुतलियों के लैंस से खींचता है, वे मस्तिष्क में जमा होते हैं। इनकी प्रतिक्रिया के आधार पर मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु जो निष्कर्ष निकालते हैं, उसी का नाम दर्शन है। आँख इसके लिए उपयुक्त माध्यम है।
समस्त विश्व में विद्यमान प्रत्येक पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत किरणें संजोये हुए है। कम्पन लहरियों के माध्यम से वे पदार्थ अपना प्रवाह निखिल विश्व में फैलाते रहते हैं। ईथर तत्व के द्वारा वे किरणें, लहरियाँ दूर-दूर तक जा पहुंचती हैं। यदि उन्हें ठीक तरह से पकड़ा जा सके तो जो दृश्य बहुत दूर अवस्थित है, जो घटनाएं सुदूर क्षेत्रों में घटित हो रही हैं उन्हें भी निकटवर्ती वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है। इन दृश्य किरणों को पकड़ने के लिए नेत्र उपयुक्त हैं, यह बात ठीक है। समीपवर्ती दृश्य नेत्रों के माध्यम से ही देखे जा सकते हैं और दूरवर्ती या अदृश्य दर्शन के लिए तृतीय नेत्र को- आज्ञाचक्र को प्रयुक्त किया जा सकता है। अपने भीतर की प्रकाश सत्ता को यदि योगाभ्यास द्वारा विकसित किया जा सके, तृतीय नेत्र को जागृत किया जा सके तो उसे भी बाहरी पदार्थों को बिना आँखों के भी देखा जा सकता है। भौतिक विज्ञान में टेलीविजन प्रक्रिया के द्वारा अन्यत्र का घटनाक्रम किसी अन्य स्थान पर यथावत् देखा जा सकता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यन्त्र हमारे आज्ञाचक्र में मौजूद हैं और उसके सहारे वह सब कुछ देखा जा सकता है जो कहीं भी घटित हो रहा है अथवा घटित हो चुका है। इस शक्ति को अधिक विकसित कर लेने पर भविष्य की झाँकी भी उसी प्रकार मिल सकती है जिस प्रकार कि यन्त्रों द्वारा निकट भविष्य में आने वाले आंधी तूफान या मौसम बदलने सम्बन्धी जानकारी मिलती है।
मनुष्य शरीर अपने आप में परमात्मा की कलाकारिता एवं विलक्षणता का घोतक है। इतनी सुविकसित टेक्नोलॉजी वाली मशीन बना पाना तो दूर, इसी बनावट को विस्तार एवं कार्य विधि को समझ पाना भी सम्भव नहीं हो पाया है। साढ़े पाँच फुट लम्बे, औसतन साठ किलोग्राम वजनी मानव शरीर का एक-एक अवयव विलक्षणता से भरा हुआ है।
अपनी सारी विचित्रताओं के बावजूद अनेकानेक जीव जो इस सृष्टि पर पाये जाते हैं, मानव शरीर की बराबरी नहीं कर पाते। जो एक अन्तर इन दो कोटियों में स्पष्ट है, वह है इस काया के सिरमौर, केन्द्र बिन्दु मस्तिष्क का सक्रिय, समर्थ संवेदनशील एवं असीम सम्भावनाओं से भरा पूरा होना। देखने, नापने एवं मापने में छोटा-सा प्रतीत हो रहा यह मस्तिष्क रहस्यमयी क्षमताओं से सम्पन्न है। यही वह पॉवर स्टेशन है जिसके बन्द हो जाने से सारे शरीर रूपी कारखाने की गतिविधियाँ तुरंत ठप्प हो जाती हैं।
जितने हमारी आकाश गंगा में तारे हैं, करीब उतने ही (1 खरब) न्यूरान्स (स्नायु कोष) मस्तिष्क में हैं। पिछले दिनों जिस एक तथ्य ने सर्वाधिक ध्यान वैज्ञानिकों का आकर्षित किया है, वह है इन स्नायुओं को परस्पर जोड़ने वाले संधि स्थलों (सिनेप्सों) पर स्रवित होने वाले द्रव्य पदार्थ ‘न्यूरोट्रांसमीटर्स।’ आज वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह प्रामाणिक किया जा रहा है कि स्नायु तन्त्रों की संचार प्रणाली इन रासायनिक तत्वों पर आधारित है। मानवीय बौद्धिक क्षमता को इन रसायनों को प्रभावित कर बढ़ाया जा सकता है। दर्द एवं दुःख जिनसे सारा मानव समुदाय आज त्रस्त है, उससे राहत दिलाना भी इन रसायनों के माध्यम से सम्भव है। जिस आनन्द की तलाश में भटकता मनुष्य स्वयं को अफीम, अल. एस. डी., अल्कोहल के नशे में डुबा देता है, वह आधुनिक विज्ञान के अनुसार अन्दर से ही मस्तिष्कीय परतों को विकसित कर, रसायनों का स्राव उत्तेजित कर प्राप्त किया जा सकता है।
जिन संभावनाओं का वर्णन आज का स्नायु वैज्ञानिक कर रहा है, वे आध्यात्म विज्ञान की स्थापनाओं के चिर पुरातनकाल में वर्णित की जाती रही हैं। वे भी यही मानते थे कि मस्तिष्क शरीर रूपी यन्त्र को चेतन संचालक केन्द्र है। इसकी प्रसुप्त क्षमताओं को विकसित कर ही वह सामर्थ्य अर्जित की जा सकती है जो इन्द्रियातीत है। काया की सूक्ष्म संरचना का हवाला देते हुए ऋषिगणों ने सहस्रार के रूप में एक ऐसे विद्युतप्रवाह के मस्तिष्क में अवस्थित होने की कल्पना की है जो मस्तिष्क के अनगिनत महत्वपूर्ण केन्द्रों, स्नायुकोशों की परतों तथा स्नायु-रसायन संदेशवाहकों के स्रावों को उत्तेजित करता है। जो भी साधक इस सूक्ष्म तथ्य को जानकर सोये को जगा देता है वह अनगिनत विभूतियों का स्वामी बन जाता है। असंयमी आनन्द की प्राप्ति, संवेदनात्मक अनुभूति, उदारता मिश्रित करुणा की उत्पत्ति इसी विद्युत्केन्द्र की जागृति की प्रत्यक्ष उपलब्धियाँ हैं।
आज का वैज्ञानिक शैशवावस्था से निकलकर वयस्क नियति में आ पहुँचा है। धीरे-धीरे वे रहस्य खुलते जा रहे हैं जो विज्ञान के लिए अंधेरे के गर्त में छिपे पड़े थे। मस्तिष्क को एक पेचीदा कम्प्यूटर ठहराया जाना भी उन्हें अब अति सरलीकरण लगने लगा है। भावनाओं, संवेदनाओं एवं विचार शक्ति जैसी विशेषताओं का सम्बन्ध अब न्यूरोकेमीकल ट्रांसमीटर्स से जोड़ा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि अब अपनी इच्छा से भावनाओं पर नियन्त्रण, उसका नियमन एवं बौद्धिक क्षमता का विस्तरण संभव है।
मस्तिष्क इस माने में एक बिल्कुल ही निराला अवयव है कि इसमें सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। सिनेप्सों के स्थान पर रासायनिक संदेशवाहकों के माध्यम से यह कार्य सम्पादित होता है। तीस विभिन्न प्रकार के पदार्थ मस्तिष्क में ट्रांसमीटर की भूमिका अदा करते हैं। ये पेप्टाइड्स कहलाते हैं एवं इधर-उधर बिखरे रहने के बजाय कुछ विशिष्ट केंद्रों में इनकी सघनता अधिक रहती है। डा. डोनाल्ड जेन्डन जो कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के फार्माकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं, बताते हैं कि इन रसायनों की मात्रा इतनी न्यूनतम होती है कि इसे ढूँढ़ पाना वैसा ही है, जैसा स्वीमिंगपूल में से चुटकी भर नमक को अलग करना।
सबसे महत्वपूर्ण पिछली एक दशाब्दी की खोज है- “एनकेफेलीन” नामक हारमोन्स। भावनाओं, उद्वेगों और मस्तिष्कीय नियंत्रण को विचलित करने वाले प्रवाहों पर काम करने वाले इन हारमोन्स को मस्तिष्क स्वयं बनाता है। जब वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि अफीम दर्द की अनुभूति को दबाने के लिये मस्तिष्क के किस भाग पर काम करती है तो उन्होंने मध्य मस्तिष्क के भावनाओं से सम्बन्धित भाग में कुछ ऐसी व्यवस्था पायी, मानो वे अफीम के रसायनों से संयोग हेतु ही बनी हों। असली मुद्दा यह था कि आखिर प्रकृति ने मस्तिष्क के कोषों में अफीम से संयोग करने की विशिष्ट व्यवस्था क्यों बनायी। तब वैज्ञानिक द्वय जॉन ह्यूजेज एवं ट्रांस कोस्टर लिक्स (स्काटलैण्ड) ने अफीम से मिलती-जुलती रासायनिक संरचना वाले, पीड़ा नाशक एवं आनन्द की अनुभूति देने वाले ‘एनकेफेलीन’ हारमोन्स की खोज की एवं सारे वैज्ञानिक जगत को भावनाओं की इस केमीस्ट्री का स्वरूप बनाकर शोध का एक नया आयाम ही खोल दिया।
जॉन हापकिन्स मेडीकल स्कूल के सोलोमन स्नीडर के अनुसार मनोरोगों एवं तनावजन्य व्याधियों में ‘एनकेफेलीन’ की खोज में एक नयी दिशा मिली है। मनोवैज्ञानिक रूप से दबाव डालने वाली परिस्थितियों के विरुद्ध हम जिस प्रकार स्वयं को तैयार करते हैं, उसमें हमारे मनोबल को दृढ़ बनाने में, इस तनाव से मुक्ति दिलाने में “एनकेफेलीन” की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जो अपने इस आंतरिक स्राव का, अमृतकलश का सदुपयोग कर लेता है, वह इन बाह्य विभ्रमों से व्यथित न होकर हर परिस्थिति में आनन्द लेता है। इन “एनकेफेलीन एवं एण्डॉरफिन” रसों की सघनता मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के उन हिस्सों में अधिक होती है, जो प्रसन्नता एवं दर्द की अनुभूतियों से संबंधित होते हैं, भाव संवेदनाओं के लिये उत्तरदायी केन्द्र माने जाते हैं। वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि एक्युपंक्चर की चिर पुरातन चीनी पद्धति, मस्तिष्क का इलेक्ट्रोडों के माध्यम से उत्तेजन अथवा हिप्नोसिस या रोग निद्रा की क्रियायें एवं आधुनिकतम तनाव निवारक बायोफिडबैक पद्धति में एनकेफेलीन रूपी दर्द नाशक- अफीम जैसे रसायनों का मस्तिष्क में स्राव और उत्सर्जन ही एक प्रमुख क्रिया है।
वस्तुतः आनन्द जीवात्मा का लक्ष्य है। इसी की प्यास उसे सतत् रहती है। हिरन की नाभि में कस्तूरी होती है, पर वह आनन्द की खोज में मारा-मारा फिरता है। इसी प्रकार आनन्द का अक्षय भण्डार अंतःकरण की गहरी परतों में छिपाये मनुष्य उसे बाहरी साधनों में, सतत् ढूंढ़ता रहता है। विषयों में- साधनों में वह चिरस्थायी आनन्द न मिलने पर भटकाव, थकान, निराशा, अप्रसन्नता स्वाभाविक है। यह आनन्द मिलने की आशा जीवधारियों के जीवित बने रहने का एक प्रमुख कारण है।
“एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूताति मात्रामुपजीवन्ति।” बृहदारण्यक 4।3।32
“उल्लास, सन्तोष, तृप्ति, तुष्टि शान्ति के रूप में जिस दिव्य संवेदना की अनुभूति साधक को होती है, वही आनन्द है।” विज्ञान बताता है कि यह आनन्द का स्त्रोत अन्दर है। सूक्ष्म अध्यात्म एनाटॉमी भी इस स्त्रोत को आनन्दमय कोष की, अंतःकरण की गहरी परतों में छिपा बताती है।
न्यूरोकेमिकल्स, एनकेफेलीन एवं एण्डॉफिन खोजों ने वैज्ञानिकों को आँतरिक संरचना की जटिलता को समझने के कुछ नये आयाम दिये हैं। इन सब उपलब्धियों पर चिन्तन करने से निष्कर्ष यही निकलता है कि लौकिक क्षणिक सुखों में आनन्द की तलाश ही रोग, शोक, निराशा व तनाव को जन्म देती है। इसका साक्षात्कार यदि अपने अंतःकरण में किया जा सके, साधना द्वारा अन्तः की परतों को उत्तेजित किया जा सके तो आँतरिक प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है।
अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. आट्टो लोबी सत्रह वर्षों से यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि भ्रूणावस्था में शारीरिक तंतुओं की क्रियाविधि कैसी होती है? इस सम्बन्ध में आम धारणा यह थी कि शारीरिक तन्तु सूक्ष्म विद्योत्तन द्वारा स्नायुओं के उत्तेजना प्रदान करते हैं। लेकिन यह धारणा वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा सिद्ध नहीं की जा सकी थी। डा. लोबी का विचार था, यह उत्तेजना स्नायुओं में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के कारण होती है। लेकिन इसकी परीक्षा किस प्रकार की जाय? उसका कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। डा. लोबी इस उधेड़बुन में तेरह वर्ष से लगे हुए थे और प्रयोग पर प्रयोग किये जा रहे थे। न यह धारणा सही सिद्ध हो रही थी और न ही प्रयोगों से यह बात प्रामाणित हो रही थी कि यह धारणा गलत है।
सन् 1920 का ईस्टर मई आया, ईस्टर की पूर्व रात्रि को जब वे सोये तो उन्होंने एक स्वप्न देखा। स्वप्न बहुत विचित्र था और उनके प्रयोगों से ही सम्बन्धित था। जब उनकी नींद खुली और स्वप्न की याद आई तो उन्होंने सपने में देखे गये सभी तथ्यों को नोट कर लिया। नहाधोकर ताजादम होने के बाद उन्होंने नोट किये तथ्यों को देखा तो आश्चर्य में पड़ गये कि प्रयोग सम्बन्धी तथ्य उनके वैज्ञानिक अवधारणा से ही सम्बन्धित थे। जल्दी-जल्दी में उन्होंने स्वप्न से सम्बन्धित जो बातें नोट की थीं, उनमें से बहुत-सी बातें नोट करना भूल गये थे और बात अधूरी रह गयी थी। इसके बाद वे दोपहर तक उस स्वप्न के सम्बन्ध में ही विचार करते रहे।
दोपहर का भोजन करने के बाद जब वे सोये तो उन्होंने दुबारा वही स्वप्न देखा और अब की बार उन्हें वह सपना हूबहू याद रहा। इस बार उन्होंने जरा भी भूल नहीं की और स्वप्न को अक्षरशः नोट कर लिया। प्रयोगशाला में जाकर उन्होंने स्वप्न के आधार पर प्रयोग आरम्भ किया। यह प्रयोग एक मेंढक पर किया गया और प्रथम प्रयास में ही उनकी धारणा सत्य सिद्ध हुई। इसके बाद तो उन्होंने यह प्रयोग कई बार दोहराया और हर बार उनकी धारणा पुष्ट होती चली गयी। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसा नया अध्याय जुड़ा जिसने हृदय रोगियों के उपचार की एक नयी दिशा ही खोल दी। इस खोज के लिए उन्होंने सन् 1936 में जीव विज्ञान का नोबेल पुरस्कार भी मिला।
डा. लोबी का कहना था कि पुरस्कार का सारा श्रेय उनके अवचेतन मन को है जिसने स्वप्न के रूप में एक नयी सम्भावना को जन्म दिया। तो क्या स्वप्न सचमुच कभी-कभी अविज्ञात की अनुकम्पा के आधार बन जाते हैं? अब तक तो मनःशास्त्री यही मानते रहे थे कि स्वप्नों के माध्यम से मानव मन अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करता है। स्वप्न मन की अतृप्त वासनाओं और कामनाओं की पूर्ति मात्र का उपक्रम है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। लेकिन इस बात से हजारों प्रमाण हैं कि स्वप्न केवल मन का क्रीड़ा कल्लोल मात्र नहीं, वरन् उसके माध्यम से व्यक्ति पर अविज्ञात का अजस्र अनुदान भी बरसता रहता है। डा. लोबी के समान ही सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई एजासिज ने भी स्वप्न के आधार पर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज की। उन्होंने मछली के जीवाश्मों को पत्थर पर ढालने में सफलता, एक जीवाश्म की अनुकृति को स्वप्न में देखने के बाद ही पायी।
प्रसिद्ध गणितज्ञों ने स्वप्न में ही अनेक जटिल गणितीय समस्याओं का हल किया है। कुछ वर्ष पूर्व फ्राँस के गणितज्ञ हेनरी फौरा ने विश्व भर में फैले अपने कई सहयोगियों से पूछा कि आप गणित की जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए कौन-सी विधि अपनाते हैं, मनन चिन्तन की अथवा अपने साथियों से विचार विमर्श की? यह प्रश्न सतहत्तर गणितज्ञों से पूछा गया था। आश्चर्य है कि सतहत्तर मे से इक्यावन ने इसका उत्तर दिया था कि उन्हें अपने गणित सम्बन्धी प्रश्नों को समझाने में स्वप्न एवं अपने अचेतन से सहायता मिलती है।
महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक आइन्स्टीन से एक बार पूछा गया था कि आपकी सृजनात्मक प्रक्रिया का क्या रहस्य है? उत्तर में आइन्स्टीन का कहना था कि सोते समय स्वप्न में एक ऐसी स्थिति आती है जब बुद्धि एक लम्बी-सी छलांग लगाकर बोध के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाती है। संसार के अधिकाँश वैज्ञानिक आविष्कार इसी स्थिति में सम्भव हुए हैं। उनका विश्वास था कि गणित और विज्ञान की सहायता से यह सिद्ध किया जा सकता है कि यह जगत एक स्वप्न के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने पत्रिका ‘लाइफ’ के प्रतिनिधि को एक भेंटवार्ता में कहा था कि “पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ कौन यह कह सकता है कि हम जो एक वृक्ष देख रहे हैं वह सचमुच ही वृक्ष है? वह एक स्वप्न भी तो हो सकता है।
आइन्स्टीन का यह कथन भारतीय दर्शन की उस मान्यता के निकट ही है जिसमें इस जगत को स्वप्न बताया गया है और ब्रह्म मात्र ही सत्य बताया गया है। ईश्वर का ही परम अस्तित्व मानकर जगत को उसी की कल्पना का, संकल्प विकल्प की क्रीड़ा कल्लोल मानने वाले सिद्ध सन्तों को मनःस्थिति दृश्य और स्वप्न में कोई विशेष अन्तर नहीं करती।
स्वप्नों की भाषा क्या है? वह व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली भाषा से सर्वथा भिन्न है। व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली भाषा तो मनुष्य द्वारा अपनी सुविधा के लिए गढ़ी गयी है और वह बाह्य आदान-प्रदान तक ही सीमित रहती है। उसे चेतन मन द्वारा आविष्कृत या गढ़ी हुई भाषा कहा जा सकता है जबकि सपने अवचेतन की व्यवस्था में आते हैं। जागृत अवस्था में जो व्यवहार किया जाता है, जो क्रिया-कलाप सम्पन्न किये जाते हैं वे चेतन की व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं और सपने अवचेतन की व्यवस्था में आते हैं। अस्तु, सपने अवचेतन की भाषा में बोलते हैं और भाषा प्रतीकात्मक होती है।
यद्यपि प्रतीकात्मक भाषा को समझना कोई दुरूह नहीं है। उसके लिए आवश्यकता केवल पर्यवेक्षण, निरीक्षण और अभ्यास की है। इसके अभाव में स्वप्नों को समझ पाना सम्भव नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति के अपने संस्कार होते हैं, अपनी मान्यताएं होती हैं और अपनी भावनाएं होती हैं। अपनी कल्पनाओं और संस्कारों के अनुरूप ही मनुष्य का अवचेतन प्रतीक गढ़ता है। ये प्रतीक प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने अलग-अलग होते हैं। इसलिए इस संदर्भ में कोई सर्वमान्य और सब पर लागू होने वाला प्रतिपादन नहीं दिया जा सकता। इसके लिए स्वयं ही अपने आप को पढ़ना और अपने व्यक्तित्व को समझना आवश्यक है।
पिछले दिनों आयरलैण्ड के पुलिस विभाग ने एक हत्या का मामला सपने के माध्यम से ही सुलझाया और उस आधार पर हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया। रोम की एमीलिया नामक युवती ने वर्षों पूर्व सपने में देखा कि एक अज्ञात युवक व युवती मिलकर एक गैरेज में उसके व्यापारी पति की हत्या कर रहे हैं। यात्रा पर गये पति को निर्धारित समय पर लौटते न देखकर, तीन दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद एमीलिया ने पुलिस अधिकारियों को अपनी पति के समय पर न लौटने तथा अपने स्वप्न के बारे में बताया। पुलिस अधिकारियों ने सपने में दिखाई पड़ने वाले युवक और युवती का हुलिया नोट कर लिया तथा उनकी और एमीलिया के पति की खोज आरम्भ कर दी। कुछ समय बाद एमीलिया द्वारा दिये गये स्वप्न के संकेतों के आधार पर उसके पति की लाश खोज निकाली गयी तथा हत्यारे युवक तथा युवती को गिरफ्तार भी किया जा सका।
स्वप्नों को अब न तो मन की कल्पनाओं से बुना- ताना-बाना कहा जा सकता है और न ही अकारण कौतूहल तथा असमंजस में डालने वाली मृग-मरीचिका। बात वस्तुतः इतनी छोटी नहीं है। उनके पीछे यह तथ्य और रहस्य सुनिश्चित रूप से छिपा हुआ है कि हमारे सूक्ष्म जीवन तथा भगवान के सूक्ष्म जगत की स्थिति को स्वप्नों के झरोखों में बैठकर देख सकना सहज सम्भव है।
कितने ही व्यक्तियों में ऐसी जन्मजात प्रतिभाएं, विशेषताएं पाई जाती हैं जिनका उनकी परिस्थिति, वंश परम्परा अथवा प्रशिक्षण व्यवस्था के साथ कोई तारतम्य नहीं बैठता। इन विशेषताओं को पूर्वजन्मों की संचित सम्पदा मानने के अतिरिक्त और कोई समाधान निकलता ही नहीं।
संचित संस्कारों का अगले जन्मों में फलित होना, इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि तत्काल अभीष्ट सत्परिणाम न मिलने पर भी सत्प्रयोजनों को जारी रखा जाय और यह सोचा जाय कि मरने के दिन निकट आ गये अब अधिक पुरुषार्थ किस लिये करेंगे? जीवन अनवरत है। अब की कमाई, पूँजी, फिर कभी संचित सम्पदा की तरह काम आ सकती है। यह सोचकर मनुष्य को सदा सत्प्रयोजनों के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने में निरत ही रहना चाहिए।
गणित शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान पास्कल को रेखा-गणित के प्रति बचपन से ही विशेष रुचि थी। वह बचपन से ही भूमि पर रेखांकन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ बनाया करता। माता-पिता ने उसकी इस प्रवृत्ति को रोकने की भी कोशिश की। किन्तु लुक-छिपकर वह आकृतियां बनाकर उन्हें ध्यान से देखता तथा सोचता रहता था। बिना किसी पुस्तक एवं अध्यापक के उसने बारह वर्ष की आयु में ही तीस ‘साध्य’ बनाये। उनकी असामान्य प्रतिभा ने गणित शास्त्र के विद्वानों को भी अचम्भित कर दिया तथा यह सोचने को बाध्य किया कि इतनी कम आयु में बिना किसी पुस्तक एवं अध्ययन, शिक्षा के यह कैसे सम्भव हो सका?
प्रसिद्ध विद्वान ‘मायर्स’ ने अपनी पुस्तक ‘ह्यूमन परसनाल्टी’ में सिसली में जन्मे एक गड़रिये लड़के का उल्लेख किया है जिसकी बौद्धिक क्षमता असामान्य थी। दस वर्ष की अल्प आयु में ही उसने पेरिस के विद्वानों के एकेडेमी में अपनी हिसाब की शक्ति से सबको आश्चर्यचकित कर दिया। ‘एकेडेमी’ में उपस्थित गणित शास्त्र के विद्वानों में से एक ने उससे पूछा 3796416 का घनमूल क्या है? आधे मिनट में ही उसने उत्तर दिया, 153 जो बिल्कुल ही ठीक था। पुनः 282475279 का ‘दसवां’ मूल पूछने पर उसने ‘सात’ बताया? अन्यान्य पूछे गये गणित के प्रश्नों का उत्तर भी उसने सही देकर उपस्थित सभी विद्वानों को अचंभित किया। उक्त बालक का नाम वाइटो मैंजियामील था।
सुमेश चन्द्र दत्त नामक एक बालक भी इस सदी के तीसवें दशक में बड़ा लोकप्रिय हुआ। उसकी प्रतिभा असामान्य थी। ढाका का उक्त बालक 15 अंकों की राशि को 15 अंकों की राशियों से मौखिक गुणा कर सकता था। विकसित होकर यह क्षमता यहाँ तक जा पहुँची कि वह 100 अंकों की राशि का 100 अंकों की राशि से मौखिक गुणा कर सकता था। इस बच्चे की अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन पूरे विश्व में हुआ। अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उसने 60 अंकों का 60 अंकों के साथ गुणा मात्र 45 मिनट में करके दिया। गुणा करने में किसी भी प्रकार के कागज, पेन्सिल अथवा अन्य साधनों का प्रयोग नहीं किया गया। इन अंकों का गुणा कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने दो घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से खर्च करके दो सप्ताह में किया था। किन्तु उनका उत्तर सही न था। जबकि ‘सुमेश चन्द्र’ का मौखिक हल किया गया उत्तर सही था। गणित के अन्य प्रश्नों के हल में भी उसकी असामान्य बौद्धिक क्षमता का परिचय अमेरिका के विद्वानों को मिला। अमेरिका के अखबारों ने उसे ‘दिमागी जादूगर’ ‘विद्युत की तरह शीघ्र हिसाब करने वाला’ (लाइटिंग कैलकुलेटर) जैसी उपाधि दी।
उपरोक्त घटनाएं इस बात की प्रमाण हैं कि इन असाधारण योग्यताओं का कारण पैतृक संस्कार और परिस्थितियाँ नहीं हो सकतीं। इनमें से किसी के माता-पिता इन विशेषताओं से युक्त नहीं थे। परिस्थितियाँ भी इन क्षमताओं के विकास के प्रतिकूल ही थीं। जीव विज्ञान के आनुवंशिक नियमों के आधार पर इनकी व्याख्या नहीं हो सकती। पुनर्जन्म को मानने एवं संचित विशेषताओं के संस्कार के रूप में प्रकट होने के तथ्य पर ही इसका समाधान मिल सकना सम्भव है।
किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों के जीवन के मध्यकाल अथवा विशेष अवस्था में भी असामान्य परिवर्तन का होना पुनर्जन्म के सिद्धान्त को पुष्ट करता है। क्रूर एवं कठोर स्वभाव वाले व्यक्तियों में भी कभी-कभी आकस्मिक परिवर्तन देखे जाते हैं। इनका कारण परिस्थितियाँ नहीं वरन् पूर्व जन्मों के संस्कार होते हैं जो चेतना की अचेतन परतों में दबे पड़े रहते हैं। एक विशिष्ट अवस्था में वे प्रबल असामान्य परिवर्तनों के रूप में देखे जाते हैं। वाल्मीकि के जीवन चरित्र से सभी परिचित हैं। अत्याचारी एवं खूँखार डाकू पर एक संत के उपदेशों का इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उसके जीवन की दिशा धारा ही बदल गयी। इसका कारण सन्त के उपदेश ही नहीं वरन् वे संस्कार भी थे जो बीज रूप में वाल्मीकि की चेतना में छिपे पड़े थे। एक विशेष अवसर पर वे उभर कर सामने आ गये। उपदेशों ने तो मात्र उन संस्कारों को उभारने में योगदान दिया।
तुलसीदास, सूरदास का नाम सन्तों में उल्लेखनीय है। कामुकता की लिप्सा से निकलकर ईश्वरीय भक्ति की ओर मुड़ना एक आकस्मिक घटना नहीं, वरन् पूर्व संचित संस्कारों की प्रेरणा थी, जो विशेष परिस्थितियों में जग पड़ी। इस प्रकार परिवर्तन अनेकों व्यक्तियों के जीवन में हुए हैं। दुराचारी से सन्त में परिवर्तन की घटनाओं में बाह्य प्रेरणाओं की न्यून और प्रसुप्त आन्तरिक संस्कारों की प्रेरणा प्रधान कारण होती है।
कर्मफल की आध्यात्मिक अवधारण भी इसी पर अवलम्बित है। श्रेष्ठ कर्मों के संस्कार श्रेष्ठ, निकृष्ट के निकृष्ट होना सुनिश्चित है। ये अपना प्रभाव न केवल इस जीवन में दिखाते हैं, वरन् अगले जन्म में भी इनके संस्कार सूक्ष्म रूप में, सूक्ष्म शरीर के साथ बने रहते हैं। यही कारण है कि सभी धर्म सत्कर्मों की प्रेरणा देते हैं। आध्यात्मिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले तत्वदर्शियों ने कर्मों का चेतना पर पड़ने वाले सूक्ष्म प्रभाव एवं जन्म-जन्मान्तर तक उनके बने रहने के तथ्य को समझ कर ही कर्मफल की महत्ता पर जोर दिया है।
वाजिद अलीशाह के दरबार में उस्ताद मोदू खाँ नवाब का महत्वपूर्ण स्थान था। उनके जैसा तबला दूसरों कोई बजा ही न सकता था। उस्ताद मोदू खाँ के पास वैभव था, सर्वत्र उनकी प्रसिद्धि थी पर फिर भी उन्हें संतोष न था। योग्य शिष्य को अपनी समस्त विद्या देने के लिए उनकी आत्मा छटपटाती ही रहती है।
उस्ताद की खोज आखिर पूरी हुई। विद्या दान के लिए उन्हें एक योग्य पात्र मिल ही गया। पूरी तन्मयता से उसे उन्होंने तबला सिखाना प्रारम्भ कर दिया। उस्ताद के इस कार्य का उनके धर्मावलम्बियों ने बहुत अधिक विरोध किया क्योंकि जो पात्र चुना गया था वह हिन्दू था। परन्तु उस्ताद मोदू खाँ उन सबके विरोध के उपरान्त भी अपना कार्य करते रहे।
वर्षों कठोर परिश्रम कराने के बाद एक दिन शिष्य को उन्होंने दरबार में उपस्थित किया। उसकी कला ने सारे दरबार को विमुग्ध कर दिया और सभी ने मुक्तकण्ठ से उस्ताद और शिष्य दोनों की प्रशंसा की।
तब उस्ताद बोले- ‘अब कोई बताये कि मैंने इस हिन्दू बालक को तबला सिखाकर कौन-सा अपराध किया है। विद्यादान के लिए जाति नहीं, पात्रता देखी जाती है। योग्य पात्र के पास जाकर ही विद्या सफल होती है।’
देवालयों और तीर्थों का अन्तर गम्भीरता पूर्वक समझा जाना चाहिए। देवालय स्थानीय या समीपवर्ती क्षेत्र के लोगों में सत्प्रेरणाएं उभारने तथा सत्प्रवृत्तियाँ विकसित करने के भावनात्मक एवं पुरुषार्थपरक प्रयत्नों में कार्यरत रहते हैं। उनका दायरा इतने तक ही सीमित है। उनमें बसने के लिए उतने ही व्यक्ति पर्याप्त होते हैं जितने से स्थानीय गतिविधियाँ और निर्धारित क्षेत्र की संपर्क साधना का अलख जगाते रहना शक्य होता रहे। उनमें कार्यकर्ता भर रहते हैं। कभी कोई परिव्राजक प्रचारक आ पहुँचे तो उसके लिए निवास, भोजन का प्रबन्ध भी मिल सके।
प्रज्ञा संस्थाओं को आदर्श देवालय स्तर की स्थापना कहा जा सकता है। जन साधारण के साथ सामान्य स्तर का संपर्क स्थापित करने और जहाँ भी भूमि उपजाऊ दिखे वहाँ अधिक सतर्कतापूर्वक बीजारोपण करने की दृष्टि से यही उपयोगी भी है और पर्याप्त भी। सुविस्तृत धरातल पर बसे देश-देशान्तरों में विभिन्न स्तर के लोगों के साथ संपर्क साधने को प्रारम्भिक प्रक्रिया हल्की-फुल्की ही हो सकती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए देवालयों के निर्माण, निर्धारण एवं कार्यक्रम महामनीषियों ने बनाये, चलाये। वे अपने स्थान पर अपनी आवश्यकता पूर्ति की दृष्टि से आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हैं।
प्राचीनकाल में इसी दृष्टि से देवालय योजना का प्रचलन आरम्भ हुआ था। बहुत समय तक वह अपने ढर्रे पर ठीक प्रकार चला भी। अस्तु उनके निर्माण से लेकर उपासना गृह की तरह प्रयुक्त करने में जन-साधारण का उत्साह भी बहुत रहा। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मध्यकाल के अन्धकार युग में जहाँ सांस्कृतिक निर्धारणों का बेहिसाब अवमूल्यन हुआ वहां देवालय भी दुर्दशाग्रस्त हुए बिना न रहे।
तीर्थों का स्तर देवालयों की तुलना में कहीं अधिक वजनदार है। तीर्थ प्रकारान्तर से ऐसे परिष्कार एवं प्रशिक्षण केन्द्र हैं जिनमें न केवल स्वाध्याय, सत्संग की शिक्षा पद्धति वरन् योग तप की समन्वित साधना पद्धति भी जुड़ी हुई है। साधना का महत्व शिक्षण की तुलना में कहीं अधिक है। शिक्षण मात्र मस्तिष्क भर को प्रभावित करता है। उसे इतना सोचने भर का अवसर प्रदत्त करता है कि किस तर्क के आधार पर क्या सोचना उचित हो सकता है। इससे पूर्व मान्यताओं में अन्तर आने जितना प्रयोजन सध सकता है, किन्तु इतने भर से उन रुझानों, अभ्यासों एवं आदतों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता जो अनुपयुक्त होते हुए भी स्वभाव का अंग बनकर रह रही हैं और तर्क की दृष्टि से मात खाते हुए भी टस से मस होने का नाम नहीं लेतीं।
नशे के अभ्यस्त लोग कई बार उसे बुराई मानते और छोड़ने की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी अपनी लत से पिण्ड छुड़ाने में असमर्थ रहते हैं। यह अचेतन की अत्यन्त गहरी परतें हैं जिनमें उलट-पुलट करने के लिए उसी स्तर के प्रयत्न करने होते हैं। कहना न होगा कि वह प्रयास ‘साधना’ ही है जिसके अनेकानेक भेद उपचार अन्तराल की गहराई तक पहुँचने और उपयोगी फेर-बदल करने में समर्थ होते हैं। अतएव जहाँ तक व्यक्तित्व वाली आदतों को उच्चस्तरीय बनाने का सम्बन्ध है वहाँ साधना परक अभ्यास की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। साधना की शक्ति को सुर और असुर दोनों ही अपने-अपने विरुद्ध प्रयोजनों के लिए समान रूप से आवश्यक मानते और संकल्पपूर्वक अपनाते रहे हैं।
हर व्यक्ति की अपनी कुछ दुर्बलताएं हैं, उन्हीं के कारण असफलताएं एवं विपत्तियाँ सहनी पड़ती हैं। हर व्यक्ति की अपनी कुछ आन्तरिक आवश्यकताएं हैं। उनकी उपलब्धि हो सके तो व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनने में देर न लगे। कहना न होगा कि अन्तराल की गहरी परतों का स्पर्श करने में बौद्धिक दबाव बहुत छोटी सीमा तक ही सफल होता है। अन्तराल को प्रभावित, परिवर्तन करने के लिए अधिक भारी एवं पैने ध्यान की आवश्यकता पड़ती है और वह योगाभ्यास परक साधनाओं के माध्यम से ही सरल, सम्भव है।
तीर्थ साधना प्रधान होते हैं। उनमें शिक्षण का भी पुट रहता है ताकि साधना का रूखा समय पूरा होने के उपरांत शिक्षण का उपयोगी मनोरंजन भी साथ-साथ मिलता रहे। वस्तुतः स्वाध्याय, सत्संग जैसे प्रयोजन महत्वपूर्ण होते हुए भी बुद्धि संस्थान तक ही अपनी उछल-कूद करने के उपरान्त शान्त हो जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो आये दिन कथा-सत्संगों के वक्ता श्रोता अवश्य ही अपने व्यक्तित्वों को प्रखर बनाने में समर्थ हो गये होते, जब कि उन क्षेत्रों का प्रभाव, परिणाम दिखने पर एक प्रकार से निराशा ही हाथ लगती है।
तीर्थों की प्रकृति, शोभा, जलाशय भव्य देवालय, ऐतिहासिक प्रसंग की चारों ही विशेषताएं स्थान चयन करने वालों की सूझबूझ का परिचय देती है। इतने पर भी किसी को यह नहीं मान बैठना चाहिए कि मात्र प्रतिमाओं की दर्शन झाँकी करने अथवा नदी सरोवरों में स्नान भर कर लेने से उस पुण्यफल की प्राप्ति हो सकती है जिसका सुविस्तृत माहात्म्य धर्म शास्त्रों में विस्तारपूर्वक बताया गया है। दर्शन-स्नान से मनःक्षेत्र में धार्मिक स्तर के विचारों का उठाना, सम्बद्ध प्रसंगों की स्मृति से अतीत को समझने और उसके प्रति नतमस्तक होने जैसे छुटपुट लाभ ही मिल सकते हैं। उपयोगी जलवायु के स्थानों में अधिक समय पर आहार-विहार की श्रेष्ठता अपनाकर रहा जाय तो विश्रान्ति, बलवृद्धि जैसे लाभ से मिल सकते हैं किन्तु यह मान्यता सही नहीं कि उतने भर से आत्मोत्कर्ष की तथा उस पर आधारित कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती हैं। कारण के बिना कार्य की सिद्धि होती भी कहाँ है। जब पुण्य प्रदान करने वाला कोई उच्चस्तरीय प्रयास पुरुषार्थ बन ही नहीं पड़ा तो उच्चस्तरीय पुण्य फलों की प्राप्ति बिना मूल्य, बिना प्रयास के ही किस प्रकार मिल सकेगी। निश्चय ही तीर्थ यात्रा के नाम पर चलती रहने वाली आज की भगदड़ वाली भीड़ें पर्यटन विनोद के अतिरिक्त और किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं करतीं।
प्राचीनकाल में तीर्थ ऐसे साधना केंद्रों के रूप में स्थापित एवं विकसित किए गये थे जिनसे अन्तराल की गहरी परतों का उपचार, परिष्कार एवं उत्कर्ष संभव हो सके। इस प्रक्रिया को एक प्रकार से उपयोगी वातावरण में बने हुए साधन-सम्पन्न तथा मूर्धन्य चिकित्सकों से भरे-पूरे ‘सेनेटोरियमों’ की उपमा दी जा सकती है। अन्तर इतना ही है कि वे उपचार केन्द्र मात्र स्वास्थ्य लाभ भर दे सकते हैं। जबकि तीर्थों से न केवल चिन्तन को मोड़ने-मरोड़ने वाली स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्या चलती है वरन् मेजर आपरेशनों जैसी, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अन्तराल को, अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्रों को सुधारने संभालने का कार्य तीर्थों में होता रहा है। उसकी कुछ-कुछ तुलना वैज्ञानिक उपचारों से किये जाने वाले ‘ब्रेन वाशिंग’ से की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभारने वाले, व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बनाने वाले उपचार एवं अभ्यास केंद्रों के रूप में ही महा-मनीषियों ने तीर्थों की स्थापना की थी। अपने समय में वह पूर्ण या सफल भी रही।
उन दिनों गुरुकुलों में शारीरिक एवं मानसिक बलिष्ठता उत्पन्न करने वाली पढ़ाई ही नहीं होती थी वरन् छात्रों की समग्र दिनचर्या का निर्धारण इस प्रकार होता था, जिसमें उन्हें न केवल लोक-व्यवहार में काम आने वाली जानकारियाँ वरन् सद्व्यवहार एवं प्रखर पराक्रम करने में प्रयुक्त होने वाले दृष्टिकोण तथा स्वभाव का भी भली प्रकार अभ्यास होता चले।
उन दिनों आरण्यकों में ढलती आयु के सभी लोग आत्म-कल्याण और लोक-मंगल की उच्चस्तरीय पढ़ाई नये सिरे से पढ़ते थे जो गुरुकुलों से भिन्न होती थी। अनगढ़ छात्रों को लौकिक जीवन में प्रवेश करने और उस क्षेत्र की प्रवीणता प्राप्त करनी होती थी, किन्तु प्रौढ़, परिपक्व अपनी गृहस्थ भूमिका का भौतिक पक्ष या तो स्वयं पूरा कर लेते थे तथा समर्थ उत्तराधिकारियों के कन्धों पर छोड़कर स्वयं परमार्थ प्रयोजनों में निरत होते थे। इसमें उन्हें अपने निज का अन्तराल उछालने वाली तपश्चर्या करने वाली होती थी, पर जनमानस से उत्कृष्टता भरे रहने वाली परमार्थ परायणता का प्रशिक्षण भी प्राप्त करना होता था।
लोक-सेवा का स्थूल रूप तो सीधा सादा है। उनमें अन्न, वस्त्र, औषधि, शिक्षा आदि से असमर्थों की सहायता करने के लिए दान देने या संग्रह करने भी से काम चल जाता है, किंतु यदि मनुष्य को पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से छुड़ाना और उत्कृष्टता अपनाने के लिए शौर्य साहस दिखा सकने योग्य बनाना हो तो इसके लिए दूसरे स्तर का कार्य कौशल संजोना पड़ता है। वह भी इस आधार पर पृथक-पृथक प्रकार का होता है कि किस स्तर के व्यक्ति को कैसे लोगों के बीच रहकर किस प्रकार के सेवा प्रयोजनों में निरत होना है।
हाईस्कूल, कॉलेज स्तर की शिक्षा परीक्षा तो सामान्य ढर्रे की ही होती है, किन्तु किसी सेवा कार्य में नियुक्त होने का समय आने पर उस प्रयोजन की ट्रेनिंग अलग से प्राप्त करनी होती है। यही बात वानप्रस्थी आरण्यक साधना के संबंध में भी है। उसमें दुहरी तैयारी करनी होती है। निजी व्यक्तित्व उभारने वाली आत्मोत्कर्ष की साधना तथा अगले दिनों जिस स्तर की सेवा साधना अपनानी है उसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप कौशल तथा अनुभव प्राप्त करना। आरण्यक इसी दुहरी क्षमता को अर्जित करने की साहसिक साधना के लिए अभीष्ट वातावरण एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले प्राणवान केन्द्रों की भूमिका निभाते थे।
भौतिक क्षेत्र में समृद्धि एवं प्रगति चक्र को अग्रगामी वाली प्रतिभाएं गुरुकुल ढालते थे और आत्मिक क्षेत्र की प्रतिभाएं उत्पन्न करके वातावरण में शालीनता की चेतना भरे रहने वाली मनीषाएं उत्पन्न होती थीं। उन दिनों के उत्पादन केन्द्रों को आज के विशालकाय बिजली घरों के समतुल्य कहा जा सकता था। पावर स्टेशन दूर-दूर तक जनता को अनेकानेक घरेलू आवश्यकताएं पूरी करने से लेकर अपने क्षेत्र में औद्योगिक विकास का पथ-प्रशस्त करते हैं। इसी प्रकार प्राचीनकाल में तीर्थों द्वारा उत्पादित प्रतिभाएं भौतिक समृद्धि का, मनीषाएं व्यक्तित्वों की सर्वतोमुखी प्रगति का सरंजाम जुटाती रहती थीं। इससे उभयपक्षीय लोकमंगल का व्यापक आधार बनता और साधन सधता था।
यही थीं उपलब्धियाँ तीर्थ स्थानों की, जिनके कारण उनका माहात्म्य बखाना गया, श्रेय दिया गया और उस सान्निध्य को पारस के स्पर्श जैसा फलप्रद बताया गया। इसी आधार पर तीर्थों की यश गाथा, कीर्ति ध्वजा, गगनचुम्बी होती गई और लोक श्रद्धा उस पुण्य प्रयोजन के लिए इतनी अधिक भाव विभोर हुई कि क्रमशः तीर्थों का वैभव और आकर्षण बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक जा पहुंचा जहां उनके निमित्त अरबों-खरबों का धन एवं कोटि-कोटि मानवों का श्रम, समय उस प्रयोजन के लिए अभी भी निछावर होता रहता है।
आँखों से दिखता तो कलेवर ही है, पर उसमें जो सजीवता, उपयोगिता, सुन्दरता दिखती है वह परोक्षतः प्राण चेतना की ही होती है। प्राण न रहे तो सुन्दर होने पर भी काया क्षण भर में सड़ने-गलने लगती है और दुर्गंध भरी कुरूपता से समूचा दृश्य घिनौना बना देती है। कलेवर तो औजार या वाहन भर है, उसमें प्रखरता जीवनीशक्ति पर अवलम्बित रहती है। तीर्थों के सम्बन्ध से भी यही बात है जब वे प्राणवान थे तो न केवल भारत के श्रद्धावान वरन् संसार भर के तत्त्वदर्शी वहाँ के वातावरण से लाभ उठाने के लिए वर्षों की लम्बी कष्ट साध्य यात्राएं पार करके यहाँ आते थे। श्रम के अनुरूप उन्हें लाभ भी मिलता था क्योंकि उन दिनों इन धर्म स्थानों में प्राणवान होने के सभी चिन्ह मौजूद थे।
ऊपर की पंक्तियों में तीर्थ स्थानों में विनिर्मित गुरुकुलों एवं आरण्यकों की चर्चा हुई। यह उन लोगों के लिए थे जिनने या तो गृहस्थ में प्रवेश ही नहीं किया या उससे निवृत्त होने की सुविधा पाकर देर तक वहाँ ठहरते और लम्बे समय की साधना से कायाकल्प और परिवर्तन से लाभान्वित होकर वापिस लौटते थे। तीसरा वर्ग वह रह जाता है जिसे गृहस्थ एवं भौतिक प्रयोजनों में संलग्न कह सकते हैं। बहुसंख्यक जन-समुदाय इसी वर्ग का होता है। बहुमुखी क्रिया-कलापों में संलग्न होने के कारण समस्याऐं भी उन्हीं के सामने रहती हैं और चित्र-विचित्र व्यवधानों से लोहा भी उन्हीं को लेना पड़ता है। आकर्षक भी उन्हीं को लुभाते और विग्रह भी उन्हीं को सताते हैं। उत्थान-पतन की बहुमुखी परिस्थितियाँ भी उन्हीं के सामने आती हैं। हर्ष शोक के ज्वार-भाटे भी उस समुद्र जैसे जन-समुदाय में उभरते रहते हैं। सच तो यह है कि गुरुकुलों के छात्र भी शिक्षा के उपरान्त इसी वर्ग में समा जाते हैं। इसी प्रकार यह भी सच है कि आरण्यकों की वानप्रस्थी साधना भी इसी समुदाय की श्रेष्ठता, समर्थता बनाये रहने के लिए, वापिस लौटने पर सेवा रत होने के लिए संलग्न दिखती है। इसका अर्थ यह हुआ कि गृहस्थ की वह धड़ है जहाँ पाचन होता है रक्त बनता है। मस्तिष्क से लेकर अन्यान्य सभी अवयव वहाँ से अपनी खुराक पाते और तरह-तरह के पुरुषार्थ चमत्कार दिखाते हैं।
तीर्थों ने इस वर्ग के लिए भी द्वार खुले रखे हैं और उनके लिए विशेष स्तर के विशेष उपाय अवलम्बन बनाये रखे हैं। इन्हीं को तीर्थ सेवन के नाम से कहा बताया जाता रहा है। यह साधना स्वल्पकालीन ही हो सकती है। इन व्यस्तता के दिनों में तो उसकी अवधि एक महीने मानी जाय तो उतना ही अवकाश कठिनाई से ही निकल सकेगा। सामान्यता यह दस दिन का भी हो सकता है। प्राचीनकाल में वह समय अपेक्षाकृत अधिक ही रहता होगा क्योंकि उन दिनों न तो आवश्यकताएं इतनी बढ़ी-चढ़ी थीं और न उनकी पूर्ति में आज जैसी दिन-रात मारामारी करनी पड़ती थी। कृषि, पशु-पालन से आजीविका, उपार्जन संयुक्त कुटुम्ब के नर-नारी, जवान बाल-वृद्ध किसी प्रकार मिलजुल कर चला लेते थे, पर आज के गृहस्थ के सूत्र-संचालकों को निरंतर खटना खपना पड़ता है। देशी दशा में पूर्व काल की भाँति इस वर्ग को लंबा अवकाश मिलने और तीर्थ सेवन की दीर्घकालीन साधना करने का अवसर नहीं मिल सकता। फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि पूर्वकाल की भांति ही गृहस्थ वर्ग को अपने असन्तुलनों से जूझने और निर्धारणों को क्रियान्वित करने वाली सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए इस उपाय का अवलम्बन करके स्थिरता, प्रसन्नता एवं प्रखरता प्राप्त करने के लिए आवश्यकता तो है ही। सच तो यह है कि चक्रव्यूह में फंसे आज के जन समाज को इस प्रकार को अवलम्बन पूर्व काल की तुलना में और भी अधिक आवश्यक है।
लुप्त प्राय सड़ी गली तीर्थ प्रक्रिया के ध्वंसावशेष पर गायत्री तीर्थ का नया भवन खड़ा करने का जो निश्चय किया गया है, उसे इमारत की दृष्टि से नगण्य किन्तु स्थापना की दृष्टि से मूर्धन्य ही कहा जायेगा। कई बार स्थानीय समझी और छोटी लगने वाली स्थापनाएं भी दूरगामी परिणाम उत्पन्न करती देखी गयी हैं। पावर हाउस कुछ ही एकड़ जमीन घेरते हैं किन्तु उनसे घरेलू आवश्यकताओं से लेकर औद्योगिक विकास की सम्भावनाएं दूर-दूर तक उभरती हैं। ट्यूबवैल जरा-सी जगह घेरता है पर उससे हजारों एकड़ भूमि की फसल लहलहाती हैं। छोटी-सी नर्सरी हजारों उद्यानों के लिए पौधे तैयार करती है। सुई और माचिस जैसे छोटे उपकरण बनाने वाले कारखाने करोड़ों के काम आते हैं। शान्तिकुँज में इन्हीं दिनों जिस गायत्री तीर्थ की प्राण प्रतिष्ठा हुई है उसे प्रत्यक्षतः एक छोटी-सी वस्तु ही कहा समझा जा सकता है। किन्तु यथार्थता यह है कि उसमें प्राचीनकाल की तीर्थ परम्परा को पुनर्जीवित करने और स्थापना के सहारे समूचे वातावरण को नवजीवन प्रदान करने वाले तत्व मौजूद हैं। पौधे में अनेक फल उत्पन्न होते हैं, आशा की जानी चाहिए कि जिस गायत्री तीर्थ की इन्हीं दिनों प्रतिष्ठापना हुई है, कुछ दिनों में ऐसे-ऐसे अनेक तीर्थों की वंश वृद्धि करेगा, उसी प्रकार जैसे कि प्रज्ञा संस्थानों ने देखते-देखते मत्स्यावतार की तरह विस्तार कर लिया। कहना न होगा कि यह तीर्थ प्रक्रिया के पुनर्जीवन, अतीत के देवयुग की, स्वर्ण युग की वापसी का सुनिश्चित चिन्ह है। इसके दिव्य प्रतिफलों का आशा अपेक्षा अगले दिनों ही पूरी होते, हम सब इन्हीं आँखों से देख सकेंगे।
तीर्थ परम्परा के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्य जुड़े हुए हैं। उन्हें ध्यान में रखते हुए प्रयत्न यह होना चाहिए कि उस पुण्य प्रयोजन का किसी प्रकार उसी पुरातन परिपाटी के अनुरूप बनाया, बदला जाय जिसके कारण वह जन-सामान्य से लेकर मूर्धन्य महामानवों और ऋषि कल्प देवात्माओं के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होती रहे।
आज तो उन्हें पर्यटन केन्द्र के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। यदि उन्हें वैसा ही बनाना हो तो उसके दूसरे उपाय हैं। निवास के लिए वर्तमान धर्मशाला तथा होटल कम पड़ते हैं। भीड़ अधिक स्थान कम होने पर जो असुविधाएं होती हैं उनसे सभी परिचित हैं। जो लोग पर्यटन व्यवसाय से लाभ उठाते हैं उनका कर्त्तव्य है यात्रियों के लिए ठहरने की सुविधा बनाने के लिए उदारता बरतें। सरकार का भी काम है कि यात्री निवास बनाने वालों के लिए सुविधाएं प्रदान करें। यात्री गण प्रायः दान पुण्य के नाम पर कुछ न कुछ खर्च करते रहते हैं उन्हें चाहिए कि वह राशि निवास स्थल बनाने में खर्च करे। इसके अतिरिक्त उचित मूल्य का सही चीजें बेचने के लिए सहकारी संस्थाएं आगे आयें। और भोजन व्यवस्था से लेकर घर ले जाने वाले उपहारों तक वस्तुएं उपलब्ध करायें। गाइडों की नियुक्ति सरकारी या गैर सरकारी संस्थाएं करें और वे उचित पारिश्रमिक लेकर यात्रियों का मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध रहें। जलाशय हो तो काश्मीर की तरह विशेष प्रकार की नावों का- अन्यथा ऐसे वाहनों का प्रबन्ध हो तो नियत स्थानों को यथाक्रम दिखाते चलें। इसके अतिरिक्त मनोरंजन के अन्य औजार खड़े करें, जिससे यात्री को पर्यटन पर किये गये पैसे से मनोरंजन जैसा लाभ तो मिल सके।
तीर्थों में चलने वाले भिक्षा व्यवसाय को वर्तमान रूप से न रहने दिया जाय। असमर्थता या धर्माडम्बरों के नाम पर इन दिनों यात्री को अनुपयुक्त व्यक्तियों द्वारा जितना दबाया दबोचा जाता है उससे उन्हें दोहरी हानि उठानी पड़ती है। जेब को काटती है साथ ही कुपात्रों द्वारा इस प्रकार विवश किये लाने पर अश्रद्धा भी बढ़ती है। अन्य अपराध रोकने की तरह सरकार का ध्यान इस ओर जाना चाहिए और यदि पर्यटन व्यवसाय को वस्तुतः पनपना है तो पुलिस सुरक्षा के प्रबन्धों में यात्री को दबाने की धीगा-मुश्ती भी रोकना चाहिए। इसकी उपेक्षा होने पर सर्व आकर्षण घटने और अरुचि बढ़ने का व्यवधान बढ़ चलेगा। अधिक भीड़-भाड़ के आ जाने पर पानी, रोशनी और सफाई की अधिक व्यवस्था बनानी चाहिए भले ही उन पर पड़ने वाला खर्च लाभ उठाने वालों और यात्रियों पर टैक्स लगाकर भी वसूली किया जा सकता है।
प्रतिभाओं की संख्या सुसज्जा बढ़ा कर यात्रियों को आकर्षित करके और अधिक पैसा वसूल करने के स्थान पर ज्ञानवर्धक म्यूजियम स्तर की स्थापना की जाय। प्रेरणाप्रद अभिनय, संगीत जैसे कला मंचों की और विचारोत्तेजक प्रवचनों की विशेष व्यवस्था बनायी जा सकती है। आवश्यक नहीं कि बिना मूल्य दिखने और गिड़गिड़ाते हुए पैसा माँगने का क्रम चलता ही रहे इसके स्थान पर हर प्रयोजन के लिए टिकट लेकर जाने की प्रथा चल सकती है और उसे देते हुए यात्री अपेक्षाकृत अधिक सन्तुष्ट रह सकता है।
वर्तमान दयनीय दुर्दशा की अपेक्षा तीर्थों की सुव्यवस्थित पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना कहीं अधिक उपयुक्त है। किन्तु यह तो मनोरंजन पक्ष हुआ जो विनोद प्रयोजन भर की आवश्यकता पूर्णकर सकेगा। बात आगे की है। ध्यान उस तथ्य का भी रखना होगा जिनको दृष्टि से रखकर महा-मनीषियों ने इस पुण्य परम्परा को चलाया था। निर्माणकर्ताओं को उदारता उभारने से लेकर सर्व साधारण को वहाँ पहुँचने की लम्बी श्रृंखला जोड़ने में दूरदर्शी विज्ञजनों को क्या-क्या कहना- क्या-क्या लिखना और क्या-क्या पढ़ना और हृदयंगम कराना पड़ा होगा उसका पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि इस स्थापना के पीछे अवश्य ही कोई दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाला रहस्य छिपा रहा होगा। अन्यथा स्थान विशेष को ऐतिहासिक विशेषता एवं स्नान दर्शन जैसे सामान्य बातों का इतना महत्व माहात्म्य नहीं बताया जा सकता था कि कोटि-कोटि धर्मप्रेमी उसके लिए उतनी श्रद्धा संजोये- इतना समय गंवाये और अरबों-खरबों की उस राशि का अपव्यय करें जो सिंचाई जैसे प्रयोजनों में नियोजित किये जाने पर दानी को सच्चे अर्थों में फल प्रदान कर सकती है।
तीर्थों की स्थापना में साधना शिक्षा एवं मनीषियों के परामर्श से समस्याओं का समाधान एवं उत्कर्ष का निर्धारण प्रमुख करण रहा है। गुरुकुलों, आरण्यकों और निर्धारण सत्रों के रूप में व्यक्तित्वों के परिष्कार की प्रक्रिया इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लाभों को देखते हुए प्रयुक्त होने वाले श्रम, समय, धन की सार्थकता बिना, किसी ननुनच के स्वीकार किया जा सकता है। किन्तु बात इतने भर से ही समाप्त नहीं होती। वहाँ समय-समय पर होते रहने वाले पूर्व आयोजन एक प्रकार से बिना नियंत्रण के विशिष्ट स्तर के व्यक्तियों के लिए भाव भरे सम्मेलनों की तरह व्यवहृत होते थे। आज की तरह उन दिनों डुबकी मार, दर्शन झाँक, पैसा फेंक वाले भगदड़ के रूप में पर्व मनाये जाते थे वरन् उन दिनों अमुक स्तर की प्रतिभाएं अपने-अपने समय पर एकत्रित होकर प्रस्तुत समस्याओं के समाधान एवं निर्धारण खोजती थीं।
कुम्भ पर्व इसके उदाहरण हैं। हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक के कुम्भों को भी प्रकारांतर से दर्शन झाँकी में काम आने वाले ‘धामों’ के समतुल्य माना जाता है। धाम यात्रा में सर्वसाधारण को सदा आते जाते देखा जा सकता है किन्तु कुंभ पर साधु सम्मेलन की ऐसी व्यवस्था बनाते थे जिससे उनके प्रयासों में एकरूपता, एक दिशा का सामयिक समावेश सम्भव हो सके। उन दिनों वाहनों की कमी थी और साधुओं की परम्परा भी पैदल चलने की थी। कुम्भ सम्मेलन का लक्ष्य रखकर वे काफी समय पहले अपनी मण्डली समेत निकलते थे और टेढ़े तिरछे रास्ते आवागमन के बनाकर रास्ते में पड़ाव डालते हुए निर्धारित स्थान पर पहुंचते थे। इस यात्रा में पड़ावों को जन-जागृति के लिए किया गया योजनाबद्ध प्रयास समझा जा सकता है। पर्व स्थान पर विचार विनिमय के निमित्त सम्मेलन और जाने लौटने के मार्गों में प्राणवान लोक शिक्षक की परोक्ष प्रतिक्रिया इतनी महान होती थी कि विज्ञ जन साधु सम्मेलन के रूप में होने वाले कुंभ पर्वों से महत्व- सच्चे मन से स्वीकार करते थे। उदारमना इसमें सुविधा उत्पन्न करने के लिए अन्न क्षेत्र खोलने जैसे कितने ही दान पुण्य भी करते थे।
इसी प्रकार अन्य पर्वों पर अनेक वर्गों के लिए- अनेक स्थानों पर अनेक स्तर के सम्मेलन होते रहते थे। उनका स्थान और समय बार-बार बदलना नहीं पड़ता था। नियत समय पर नियत स्तर के व्यक्ति बिना बुलाये पहुंचते रहें इसके लिए तीर्थों के पर्व आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होते थे। आज तो विभिन्न सम्मेलनों के लिए प्रचार से लेकर अन्यान्य प्रकार के खर्चीले प्रबन्ध करने पड़ते हैं और स्थान बदलते रहने पर नये सिरे से नये ताने-बाने बुनने पड़ते हैं। किन्तु पूर्वकाल में ऐसी कठिनाई तनिक भी नहीं थी। अमुक वर्ग के लोग अपने समुदाय के लोगों में मिलने-जुलने भेंट परामर्श करने की ऐसी सुविधा प्राप्त करते थे जिसमें लाभ तो पूरा-पूरा मिल जाता था, पर विशेष रूप से अतिरिक्त खर्च कुछ भी नहीं करना पड़ता था।
सम्मेलनों-समारोहों की आवश्यकता, उपयोगिता सर्वविदित है। पर वह है बड़ी खर्चीली और झंझट भरी। किन्तु प्राचीन काल में यह सब कुछ अत्यन्त सरल था। किस वर्ग के लोगों को किस पर्व पर कब कहां पहुंचना है, इसके लिए एक सुनियोजित परम्परा चलती थी और उसके आधार पर सम्बद्ध लोगों का आदान-प्रदान का भरपूर लाभ मिलता था व्यापारिक प्रयोजनों के लिए अभी भी तीर्थ स्थानों पर वटेश्वर, गढ़ मुक्तेश्वर सोनपुर आदि विशालकाय मेले लगते हैं। इनमें से सोनपुर के सबसे बड़े पशु विक्रय मेले के रूप में हो रही है।
व्यापारिक मेले अभी भी अपने उद्देश्य को समझते और सफल होते हैं। उनकी योजनाएं तदनुसार ही बनती हैं, किन्तु धर्म सम्मेलनों का, धार्मिक समारोहों का क्रम सर्वथा अस्त-व्यस्त हो गया है। छोटे धर्मानुष्ठान तो स्थानीय भी हो सकते हैं पर यदि किन्हीं विशालकाय बड़े आयोजनों की आवश्यकता हो तो उसके लिए उपयुक्त साधन और निर्धारित समय की स्थायी व्यवस्था करनी पड़ेगी। यह कार्य तीर्थ पर्वों की यदि एक सुनियोजित श्रृंखला बन सके तो उससे अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोजनों की पूर्ति हो सकती है। उदाहरण के लिए वर-कन्याओं की खोज के लिए विभिन्न समुदाय के लोगों के मेले विभिन्न स्थानों पर नियत निर्धारित किये जा सकते हैं। बिहार के मथिल ब्राह्मण और मध्य प्रदेश के जैन लोग ऐसे कुछ मेले लगाते भी हैं। उनके कारण उन्हें एक ही स्थान पर प्रस्तुत माल में से अपनी मर्जी की चीज तलाश करने और सौदा पटाने का लाभ मिल सकता है।
इस दिशा में दो वर्ष पूर्व शाँतिकुँज से एक प्रयत्न किया भी किया गया था और वह प्रारम्भिक होने पर भी बहुत सफल रहा। विभिन्न जातियों के समाज-सुधार सम्मेलन अलग-अलग बुलाये गये थे और उनसे अन्धकुरीतियां छोड़ने के अतिरिक्त विशाल रूप से बिना खर्च के, बिना देन-दहेज की शादियाँ करने पर जोर दिया गया था। इस प्रकार से प्रायः एक हजार उपयुक्त जोड़े मिल गये और उनमें से अधिकाँश के विवाह शाँति-कुँज में ही बिना बारात, बिना लेन-देन, बिना खर्च के अत्यन्त उत्साह भरे वातावरण में सम्पन्न हो गये।
स्थान और सादगी की कमी से वह प्रयास आगे तो न बढ़ सका पर उपस्थित लोगों में से हर किसी ने इस प्रयास की आवश्यकता-उपयोगिता स्वीकार की और कहा कि ऐसे आयोजन हर क्षेत्र में पूरी तत्परता के साथ नियोजित किये जाने चाहिए। सिख सम्प्रदाय में ऐसी प्रथा है कि उस समुदाय की सभी शादियाँ उनके निर्धारित गुरुद्वारे में वर्ष में एक बार ही होती है। इससे किसी प्रकार का प्रदर्शन या अपव्यय नहीं होता। गरीब-अमीर कभी वर्ग के लोग समान रूप से सम्मान पाते और प्रयोजन पूर्ण करते रहते हैं। ऐसे ही प्रयत्न विभिन्न तीर्थों में सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयोजन करने की बात सोची और व्यवस्था बनाई जा सके तो उससे शादियों के अपव्यय जैसे अनेकों कुरीतियों का उन्मूलन करने में भारी सफलता मिल सकती है।
आवश्यक नहीं कि परम्परागत तीर्थों तक ही समस्त धार्मिक सम्मेलनों की बात सीमित रखी जाय। जनसंख्या एवं जीवन क्षेत्र के असंख्य प्रयोजनों में अप्रत्याशित वृद्धि होने के कारण सभी व्यवस्थाओं का विस्तार हो रहा है। बहुत दिन पहले थोड़े से स्कूल, अस्पताल, स्टेशन आदि थे। अब उनकी संख्या अत्यधिक बढ़ गई। तीर्थों का विस्तार भी इसी आधार पर होना चाहिए। मात्र जल, छाया, यातायात, स्थानीय सहयोग आदि को ध्यान में रखते हुए नये सिरे से नये युग के नये तीर्थ विनिर्मित किये जा सकते हैं। उनके पीछे कोई प्रेरणास्पद ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ हो तब तो और भी अच्छा, अन्यथा नये शुभारम्भ को भी एक अविस्मरणीय प्रेरणाप्रद घटना मानकर उसे तीर्थ जैसी मान्यता दी जा सकती है। अनेकों स्मारकों की स्थापना सम्बद्ध घटनाओं के उपरांत ही हुई है। चित्तौड़, जलियावाला बाग का स्मृतिस्तम्भ अनादि काल के बने हुए नहीं घटनाओं के उपरान्त ही बने हैं। संतों की समाधियां इसी रूप में है। धर्म संप्रदाय के स्थापन कर्ताओं के जन्म मरण अथवा विशिष्ट घटनाओं के सम्बद्ध स्थानों पर तीर्थ बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि युग निर्माण के प्रज्ञा अभियान के अति महत्वपूर्ण चरण जहाँ पड़ें, उस भूमि को पवित्र कृत्य न माना जा सके और उसे युग तीर्थ की संज्ञा न दी जा सके।
गायत्री तीर्थ का शुभारम्भ उपरोक्त परम्पराओं के पुनर्जीवित करने का उद्देश्य लेकर किया जा रहा है। स्थान सीमित रहने से उसका स्वरूप छोटा तो रहेगा, पर इस पौध को अन्यत्र लगाये जाने पर अनेक स्थानों पर सुरम्य तीर्थ उद्यानों के विकसित होने की पूरी-पूरी सम्भावना है।
षोडश संस्कारों का भारतीय धर्म परम्परा में अपना विशेष महत्व है। रसायनें बनाने में उनके कई बार अग्नि संस्कार किए जाते हैं। रस, भस्में इसी प्रकार बनती हैं। मनुष्य को सोलह बार संस्कारित करने की अति प्रभावी संस्कार प्रक्रिया से प्राचीन तत्त्वदर्शी भली प्रकार अवगत थे। अतएव उनने ऐसे निर्धारण किए कि संचित कुसंस्कारों को हटाकर उनके स्थान पर सुसंस्कारों की स्थापना करने की विशेष उपचार प्रक्रिया काम में लाई जाय। इन प्रयोजनों के लिए निर्धारित वेदमन्त्र, अग्निहोत्र, देवाह्वान, कर्मकाण्ड साथ-साथ प्रशिक्षण की समन्वित प्रक्रिया को संस्कार कृत्य कहते हैं। यह मात्र चिन्ह पूजा नहीं है। यदि उसे सही शास्त्रोक्त रीति से सम्पन्न किया जा सके तो उस व्यक्ति पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है जिसका कि संस्कार कराया गया।
भगवान मनु ने ब्राह्मणत्व संस्कारों की उपलब्धि बताया है। वे कहते हैं “जन्म से सभी शूद्र उत्पन्न होते हैं। संस्कार प्रक्रिया के आधार पर उनका दूसरा देव जन्म होता है।” आगे चलकर उनने ब्राह्मणत्व प्राप्त होने के संदर्भ में लिखा है- “यज्ञों और महायज्ञों में अनुप्राणित करने पर यह सामान्य शरीर ही ब्राह्मण बन जाता है।” इसी प्रकार के अनेकों कथनोपकथन अन्यान्य धर्मशास्त्रों में भरे पड़े हैं। उनका अभिप्राय यह है कि सुसंस्कारिता मात्र शिक्षण, सत्संग और वातावरण का ही प्रतिफल नहीं है। उसे संस्कार उपचार के अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय से बनी हुई निर्धारित विधि-व्यवस्था के द्वारा भी विकसित किया जा सकता है।
यह प्रतिपादन मात्र श्रद्धा पर निर्भर परम्परागत प्रथा प्रचलनों पर आधारित नहीं है। षोडश संस्कारों की पद्धति का अपना निजी आधार भी है। इन्जेक्शन से रक्त की में औषधि पहुँचाकर उसका चमत्कारी परिणाम देखा जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि मन्त्र विज्ञान और अग्निहोत्र विधान के समन्वय से बने आध्यात्मिक उपचार मनुष्य के स्तर में विकासोन्मुख परिवर्तन न ला सकें। अतीत में लम्बी अवधि तक इस प्रयोग परीक्षण को अनुभव प्रतिफल की कसौटी पर कसने के उपरान्त यह मान्यता बनी और परम्परा चली कि जन्म से लेकर मरण पर्यन्त देव समाज के प्रत्येक सदस्य को सोलह बार संस्कारित किया जाना चाहिए। वर्णाश्रम व्यवस्था की तरह ही षोडश संस्कारों की प्रथा भी भारतीय धर्म संस्कृति का अविच्छिन्न अंग है।
इन दिनों संस्कार उपचारों का स्वरूप एक प्रकार से लुप्त तिरोहित ही हो गया है। मुण्डन की घरेलू और विवाह की मंत्र परक प्रक्रिया ही देखने को मिलती है। बहुत हुआ तो किसी ने यज्ञोपवीत संस्कार करा लिया। इस उपेक्षा एवं विस्मृति के दो प्रमुख कारण हैं। एक यह कि उनका सही स्वरूप जानने बताने वाले पुरोहित रहे नहीं, जो हैं उनने इस प्रक्रिया को असाधारण रूप से महंगी खर्चीली बनाया और जिस-तिस प्रकार यजमानों का धर हरण करने पर ही ध्यान रखा। जिसकी उपयोगिता प्रतीत न हो, जिसे करने में अकारण बहुत सारा खर्च करना और झंझट उठाना पड़े, उसकी आमतौर से उपेक्षा ही की जाने वाली लगती है। संस्कार उपचार की अवहेलना इसी आधार पर होती चली गई।
प्रचलन न रहने, अनुयायी कम मिलने पर भी शाश्वत सत्य और तथ्य अपने स्थान पर बिना किसी समर्थन के भी सुदृढ़ बने रहते हैं। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदि शाश्वत तथ्य को कोई झुठला नहीं सकता। अनुयायियों का सर्वथा अभाव रहने पर किसी का यह साहस नहीं हो सकता कि इन मर्यादाओं की अनुपयुक्त ठहरा सके। अपनी विवशता बताकर बच निकलने वाले भी उन्हें अमान्य ठहराने निरर्थक सिद्ध करने का साहस नहीं कर सकते।
भारतीय संस्कृति के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई षोडश संस्कार परम्परा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनका प्रचलन भले ही कारणवश घट गया हो फिर भी जहाँ साँस्कृतिक मूल्यों, प्रतिपादनों, अनुबन्ध, अनुशासनों की चर्चा होगी वहाँ उस महान प्रक्रिया की गरिमा एवं उपयोगिता को झुठलाया न जा सकेगा।
भारतीय समुदाय सुसंस्कारिता की ओर अग्रसर होगा, उस समाज को देव समाज में विकसित होना है। उसके लिए जहाँ प्रज्ञा अभियान जैसे वातावरण में प्रखरता उत्पन्न करने वाली युगान्तरीय चेतना को जन-जन के मन में प्रवेश कराना है, वहाँ सुसंस्कारिता उत्पन्न करने की उस चिर परीक्षित प्रक्रिया को भी काम में लाना है जिसने अतीत को सतयुग स्तर का बनाने में असाधारण भूमिका निभाई।
प्रयत्न यह किया जा रहा है कि इस परिपाटी को पारिवारिक धर्मानुष्ठानों की तरह कार्यान्वित किया जाने लगे। परिवार गोष्ठियों के रूप में इस प्रक्रिया का प्रचलन फिर भूतकाल की तरह घर-घर में चल पड़ते। इस आधार पर धार्मिकता का वातावरण बनेगा और जन-जन का ध्यान सुसंस्कारिता सम्पादन की उपयोगिता समझाने एवं उस दिशा में प्रयत्नरत होने के लिए मुड़ेगा। दिखने में सामान्य होते हुए भी यह प्रक्रिया कालान्तर में अति महत्त्वपूर्ण सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
यों षोडश संस्कार कहीं भी हो सकते हैं और उन्हें निर्धारित विधि-विधान के आधार पर कोई भी विज्ञ व्यक्ति भली प्रकार करा सकता है। इतने पर भी उपयुक्त स्थान, वातावरण और उच्चस्तरीय पौरोहित्य की आवश्यकता सदा बनी ही रहेगी। वैसे अवसर जिन्हें मिल सकेंगे वे अधिक लाभान्वित भी होंगे और वैसा सुअवसर पाकर अपने को सौभाग्यशाली भी मानेंगे। कहना न होगा कि इस प्रयोजन के लिए तीर्थ स्थानों की विशेषता असंदिग्ध है।
अभी भी बच्चों के मुण्डन संस्कार प्रायः किसी तीर्थ में ही होते हैं। मृतकों के अस्थि प्रवाह एवं श्राद्धतर्पण के लिए तीर्थों में ही जाया जाता है। जो बात उपरोक्त दो संस्कारों के सम्बन्ध में लागू होती है। वस्तुतः उसे सोलहों के लिए समझा जा सकता है। गर्भवती का पुंसवन बच्चे का नामकरण, अन्न प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत यह सभी संस्कार ऐसे हैं जिन्हें किसी तीर्थ में सम्पन्न करने का अवसर मिले तो घर की अपेक्षा उसे अधिक श्रेयस्कर माना जाना चाहिए। कहना न होगा कि इस दृष्टि से भी गायत्री तीर्थ का स्थान मूर्धन्य है। हिमालय से निःसृत सप्त धाराओं का समागम, सप्तऋषियों की तपोभूमि, शिव पार्वती के प्रणय बन्धन एवं गणेश, कार्तिकेय की पुण्यभूमि हरिद्वार में अवस्थित गायत्री तीर्थ को अन्यों की अपेक्षा हर दृष्टि से वरिष्ठ समझा जा सकता है। युग क्राँति के अतिरिक्त उसे सुसंस्कारित सम्पादन जैसे पुण्य प्रयोजन एवं क्रिया-कृत्य की दृष्टि से भी अधिक उपयुक्त माना जा सकता है।
इस स्थान का दिव्य वातावरण ऐसा है जिसे साधना, स्वाध्याय, सत्संग की दृष्टि से वर्तमान समय में मूर्धन्य माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। कर्मकाण्ड की दृष्टि से शास्त्रीय विधि-व्यवस्था की समग्र जानकारी और विधि व्यवस्था का यहाँ समुचित प्रबन्ध है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात है गुरुदेव माताजी की उपस्थिति में उनके हाथों किये गये यह संस्कार कितने फलप्रद हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाने में किसी को संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। ऐसे संस्कार करने में बालकों को परिवार के बड़े-बूढ़ों के हाथ में थमाया, गोद में बिठाया जाता है। अपने विशाल परिवार के कुलपिता एवं कुलमाता की उपस्थिति में जिन्हें अपने बालकों के संस्कार कराने का अवसर मिलेगा, वे बड़भागी ही माने जायेंगे। ऐसे अवसरों पर मिले हुए आशीर्वाद बालकों के लिए भी उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना से भरे-पूरे होंगे।
गायत्री मंत्र की दीक्षा एवं यज्ञोपवीत संस्कार के लिए बचपन, जवानी, वृद्धावस्था का नर या नारी का कोई बन्धन नहीं। जिन्हें इनकी उपयोगिता समझा में आई और आवश्यकता अनुभव हुई हो वे भी गायत्री तीर्थ में आकर इन उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकते हैं। ढलती आयु में वानप्रस्थ लेने की धर्म परम्परा निभाने क लिए उस व्रतशीलता का दण्ड धारण यहीं किया जा सकता है। वानप्रस्थ सदा के लिए न लेना हो तो न्यूनतम एक साल के लिए लेने और उसे इच्छानुसार आगे बढ़ाते चलने का संकल्प भी गायत्री तीर्थ में आकर लेने से अधिक सफल हो सकता है।
आदर्श विवाहों के लिए भी गायत्री तीर्थ में व्यवस्था बनाई गई है। आदर्श विवाह से मतलब है- बिना बारात, बिना धूम-धाम, बिना लेन-देन का सतोगुणी विवाह बंधन। जिनके लिए इसमें उपयुक्तता पड़ती हो, वे अभिभावक, वर कन्याओं को लेकर आ सकते हैं और इस वातावरण में हुए पाणिग्रहण से गृहस्थ जीवन की सुख-शाँति का बीजारोपण कर सकते हैं।
पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का प्रबंध भी गायत्री तीर्थ में है। माता-पिता ही नहीं, पितृकुल और मातृकुल की ऊपरी पीढ़ियों के भी श्राद्ध तर्पण यहाँ होते रहेंगे।
इस प्रकार सभी संस्कारों के लिए गायत्री तीर्थ हर दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त स्थान है। जन्म-दिन मनाने और विवाह दिन मनाने के लिए यहाँ पहुँचा जा सकता है।
धर्मानुष्ठानों, षोडश संस्कारों एवं अन्य कृत्यों के प्रति अश्रद्धा इसलिए उभरी है कि उसके साथ पुरोहितों की गैर जानकारी, आधा-अधूरा कृत्य कराने की जल्द-बाजी तथा जिस-तिस बहाने अधिकाधिक पैसा झपट लेने की चालाकी घुल जाने से वे सभी कृत्य उपहासास्पद और अश्रद्धा उत्पन्न करने वाले बन गये। अब जबकि उन सभी आक्षेपों का पूरी तरह निराकरण हो गया तो किसी को कहीं उंगली उठाने की गुंजाइश ही नहीं रही। सर्वविदित है कि शाँति-कुंज के, गायत्री संस्थान के इतिहास में जेबकटी तो दूर, कभी प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से दान-दक्षिणा की याचना का प्रसंग ही नहीं आता। कोई कुछ स्वेच्छा अनुदान दे तो उसे रोका न जाय, मात्र इतना भर विधान है।
गायत्री परिवार विशालकाय है। उसके मूर्धन्य परिजनों को स्वयं ही अपने प्रेरणा स्त्रोत उद्गम केन्द्र के जुड़ने भर से सन्तोष नहीं करना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़ाकर करना यह भी चाहिए कि अपने परिवार का, सन्तानों का, मित्र पड़ौसियों का भी इस पावर स्टेशन के साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय। कहना न होगा कि इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए षोडश संस्कारों का प्रयोजन लेकर गायत्री तीर्थ में पहुँचने से बढ़कर और कोई उपयुक्त माध्यम हो नहीं सकता।
संस्कार प्रयोजनों के अतिरिक्त हरिद्वार, कनखल, ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला के चारों धामों की तीर्थ मज्जन करने का भी सुयोग साथ-साथ रखा गया है। ठहरने की, भोजन की, वाहनों की ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिसे अन्यत्र की तुलना में कहीं अधिक सस्ती कहा जा सकता है। यात्रा तीर्थाटन करना हो तो भी गायत्री तीर्थ से बढ़कर भावभरा और सुविधाजनक वातावरण मिल सकना दूसरी जगह कदाचित ही कहीं सम्भव हो सके।
तीर्थ यात्रा का एक अति महत्वपूर्ण प्रयोजन होता है- किये हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित। तीर्थ स्नान से पाप छूटते की जो मान्यता है उसमें मुख्यतः प्रायश्चित विधान ही आधारभूत कारण है। खाई खोदने का प्रायश्चित एक ही है उसे पाट देने के लिए उतना ही सद्भाव भरा पुरुषार्थ किया जाय जितना कि दुर्भाव लेकर खाई खोदी गई और उसमें गिरने वालों को पीड़ा पहुँचाई गई। इस संदर्भ में शास्त्रकारों ने ऐसे निर्धारण किये हैं कि दुष्कर्मों के दण्ड तपश्चर्या के कष्ट सहकर स्वयं ही भुगत लिये जांय। इतना बन पड़ने पर ही उन अवरोधों का अन्त होता है जो आत्मिक प्रगति के लिए किए गये प्रयासों को पग-पग पर असफल बनाते रहते हैं। रंगाई से पूर्व धुलाई करनी पड़ती है। शोधन के उपरान्त ही सफल होते हैं। पापों के प्रायश्चित की प्रक्रिया आत्मसाधना का सर्वप्रथम सोपान है। अन्यत्र उसे झुठलाया उपेक्षित किया जाता है किंतु गायत्री तीर्थ के साधना विधानों के हर साधन के लिए उसके अनुरूप प्रायश्चित तप का भी प्रावधान रहा गया है। इस प्रकार सुसंस्कारिता के सम्पादन में जो एक भारी व्यवधान अड़ा रहता है उसे भी यहाँ दूर कराने पर पूरा ध्यान रखा जाता है।
धन फलदायक नहीं होता और न नाम, यश फलदायक नहीं होता और न विद्या। प्रेम ही सर्वत्र फलदायक है, चरित्र ही कठिनाइयों की संगीन दीवारों को तोड़कर अपना रास्ता बना लेता है।
-स्वामी विवेकानन्द
गायत्री तीर्थ का शुभारंभ आश्विन नवरात्रि 29 सितम्बर से किया जा रहा है। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि तपश्चर्या के लिए दो प्रकार के कार्यक्रम रखे गये हैं। एक-एक महीने के दस-दस दिन के। इन दोनों का समय सदा एक जैसा ही निर्धारित रहेगा। एक महीने वाले पहली तारीख से तीस तक और दस दिन वाले 1 से 10 तक, 11 से 20 तक और 21 से 30 तक। यह समय भविष्य के लिए नियमित रूप से चलेगा। किन्तु प्रारम्भ में अपवाद यह हो गया है कि तारीख 1 अक्टूबर की अपेक्षा दोनों ही सत्र 29 से चलेंगे। आश्विन नवरात्रि का पुण्य पर्व आ जाने से यह दो दिन का आगे आरम्भ करने का व्यतिक्रम हो गया। उपयुक्त मुहूर्त का लोभ न छोड़ा जा सका और शुभारम्भ 29 सितम्बर से किया गया।
हर साधक को साधना स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि प्रक्रिया उसकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति जान लेने के उपरान्त पृथक-पृथक स्तर की बनाई और बताई जायेगी। रोगियों की स्थिति देखकर पृथक-पृथक प्रकार के उपचार किये जाते हैं। इसी प्रकार इन साधना उपचारों के सम्बन्ध में भी समझा जाना चाहिए। सभी साधकों को एक जैसी साधना बता देना अवैज्ञानिक एवं अनुपयुक्त होता है। दूसरे लोग ऐसी भूल करें या करायें पर गम्भीर पर्यवेक्षण करने वाले “सब धान बाईस पसेरी” नहीं कर सकते। सबको एक लाठी से नहीं हाँक सकते। इस सम्बन्ध में होम्योपैथी निदान प्रक्रिया की सराहना करनी पड़ती है। जिसमें एक ही नाम से प्रख्यात रोगों का लक्षण भेद से वर्गीकरण करना और तदुपरान्त औषधि निर्धारण के निश्चय पर पहुँचना पड़ता है। यही सिद्धान्त साधना के संदर्भ में भी लागू होता है। उसमें व्यक्ति विशेष के संग्रहित संस्कार, स्वभाव अभ्यास, रुझान का पता लगाना होता है। आज की परिस्थितियों का पर्यवेक्षण किया जाता है।
साथ ही यह भी जानना होता है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना किस आधार पर और किस दशा में की जानी चाहिए। इतना पर्यवेक्षण, विश्लेषण करने के उपरान्त ही किसी सूक्ष्मदर्शी अध्यात्म क्षेत्र के उपचारक के लिए यह संभव हो सकता है कि वह व्यक्ति के अनुरूप साधना का निर्धारण करे। दूसरे योग शिक्षकों की तरह सामूहिक कक्षाएं लगाना गायत्री-तीर्थ के साधनों के लिए सम्भव नहीं। उन्हें अलग-अलग कमरों में रखने की अपने निवास को एक विशेष वातावरण में युक्त करने की एक विशेष प्रकार का संसार बनाने के लिए प्रयत्न किया जाना है ताकि अपनी विशिष्ट साधना में हर साधना अपनी राह पर आप चलता रहे। न दूसरे साथियों से प्रभाव ग्रहण करे और न उस पर छोड़े।
साधना काल को प्रकारान्तर से काया-कल्प जैसा उपचार कह सकते हैं। आयुर्विज्ञानी जानते हैं कि इस उपचार में रोगी को उपचार के पूरे चालीस दिन का इससे भी लम्बी अवधि में एक पर्णकुटी में रहना पड़ता है। उसे बाहर निकलने का अवसर नहीं मिलता। उसी छोटी दुनिया में कैदी की तरह अपनी दिनचर्या गुजारनी पड़ती है। जेल को भी सुधार गृह कहते हैं। अस्पतालों में भी गम्भीर मरीजों को बाहर जाने की छूट नहीं मिलती। माता के पेट से जब बालक पकता है तो उसे भी नियत स्थान में ही गुजारा करना पड़ता है। अण्डे बच्चे भी घोंसले में ही कुलबुलाते रहते हैं। साधना का मजाक बनाना हो तो उस अवधि में बन्दर की तरह यहाँ-वहाँ, उचकते-मचकते फिरने जहाँ-तहाँ दर्शन झाँकी और सैर सपाटा करने से कोई क्यों टोकेगा और कोई क्यों रुकेगा। किन्तु तब बात की गम्भीरता के स्तर तक चला जाय तो साधना को विशुद्ध तपश्चर्या के रूप में समझा और समझाया जाना चाहिए और उस अवधि में स्थिर रहने की आवश्यकता, उपयोगिता हृदयंगम कराई जानी चाहिए। वैसा ही अनुबन्ध, अनुशासन गायत्री तीर्थ के साधकों को भी अपनाना होगा।
सर्वविदित है कि आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि जैसे योगाभ्यास करने में स्थिरता आधारभूत अनुबन्ध माना गया है। विशिष्ट साधक इसी प्रकार की जीवनचर्या अपनाते हैं। गुफा-सेवन का व्रत इसी दृष्टि से लिया जाता है। अरविन्द, रमण जैसे प्रख्यात और हिमालय की कन्दराओं में निवास करने वाले अविज्ञात योगी एक सीमित क्षेत्र में ही निवास करने का व्रत लेते और उसे दृढ़तापूर्वक निभाते हैं। परिव्राजकों, वानप्रस्थों, साधु, ब्राह्मणों की लोक-मंगल तीर्थयात्रा अलग बात है आत्म परिष्कार के लिए कायाकल्प जैसी उपचारपरक तपश्चर्या दूसरी। दोनों एक दूसरे की परक तो हैं, पर एक साथ दोनों नहीं हो सकतीं। तपश्चर्या काल प्रायः वैसा ही होना चाहिए जैसा कि त्रिवेणी संगम पर माघ मास में कल्प साधना के निमित्त अभी भी किया करते हैं। जहां साधना में सच्चाई है वहाँ अभी भी इस प्रकार के अनुबन्ध लगाते देखे जा सकते हैं। गुजरात में मोटा महाराज के सूरत और नडियाड आश्रमों में इसी प्रकार साधना काल में नियत कोठरी में ही कहने का नियम है।
गायत्री तीर्थ में उतना कड़ा प्रतिबन्ध सामान्य साधकों के लिए अभी नहीं लगाया गया है, पर इतनी कठोरता तो रहेगी कि वे गायत्री तीर्थ की लक्ष्मण-रेखा लाँघकर अन्यत्र न जायेंगे। वातावरण का रावण किसी की भी साधना-सीता को चुरा कर ले जा सकता है। ताँत्रिक श्मशान-साधना करते हैं और योगी को गुफा में सेवन करना पड़ता है, प्रज्ञा परिजनों को आत्म-परिष्कार के लिए जो करना है वह वजनदार होने के कारण उसके निमित्त तपश्चर्या भी उच्चस्तरीय ही करनी होगी। इसमें साधना काल तीर्थ के सीमित क्षेत्र में गुजारने की शर्त पहली है।
विधि, विधान कर्मकाण्ड साधना, उपचार, जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि का क्या-क्या करने होंगे और क्या-क्या चमत्कार दिखेंगे इस प्रसंग पर समय से पहले सोचने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। प्रगति किस क्रम से, किस दिशा में हो रही है- इसके लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की बहुमूल्य मशीनों द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति का पर्यवेक्षण किया जाना रहेगा। प्रगति होने, न होने की कसौटी किसी साधक के पास नहीं होती उसे तो जौहरी ही अपने विशिष्ट उपकरणों से जाँचते परखते हैं। साधकों को अपना काम बन्द करना होता है और उसमें उतावली न मचाकर चिकित्सक को अपना काम अपने ढंग से करने का अवसर प्रदान करना होता है। गायत्री तीर्थ के साधक भी इसी प्रकार का साधकोचित धैर्य साथ में लेकर आवेंगे ऐसी अपेक्षा की गई है।
इसके बाद शारीरिक गतिविधियाँ और मनःक्षेत्र के विचार नियमन की दिनचर्या का प्रश्न आता है। इस सम्बन्ध में कोई मनमर्जी न बरतेगा और प्रारम्भ में ही स्थिति के अनुसार निर्धारित होगा, पर यदि उसमें कुछ फेर-बदल करनी हो तो उसे मार्गदर्शक और साधक के परामर्श से ही किया जायेगा। मनमर्जी बरतने और चाहे जब चाहे जो करने लगने की आदत सामान्य जीवन में तो चलती रह सकती है। पर तपश्चर्या काल में तो इस स्वतंत्रता व उच्छृंखलता को भी गंवाना पड़ता है। समर्पित और अनुशासित मनःस्थिति न बन से तो फिर साधना समर में प्रवेश करने का साहस न करना ही श्रेयस्कर है।
गायत्री तीर्थ के साधकों को भाषण, प्रवचन सुनने का अवसर प्राप्त न हो सकेगा। वे एकान्त स्वाध्याय और मन चिन्तन की अंतर्मुखी ज्ञान साधना से काम चलायेंगे। जिज्ञासाएं न्यूनतम उभारेंगे, श्रद्धा की स्थापना में विशेष प्रकार का पराक्रम अपनायेंगे। समय-समय पर तीर्थ के सूत्र संचालक युग-ऋषि से विचार विनिमय का वही सामयिक समाधान का अवसर प्राप्त होता रहेगा। पर मानकर यहीं चलना चाहिए कि यहाँ सीखने सुनने के लिए नहीं धारणाओं को परिष्कृत परिपक्व करने के लिए जाया रहा है। इसमें सुनने-पूछने की कम और अन्तरंग को उभारने उछालने की आवश्यकता अधिक पड़ती है। वही रीति-नीति यहाँ के साधक अपनाकर चलेंगे।
साधना काल का तीसरा प्रयोग है- आहार। वह न केवल सात्विक, सीमित होना चाहिए वरन् संस्कारवान् भी रहना चाहिए। अन्न का मन पर प्रभाव पड़ने की बात को सभी जानते हैं। कुसंस्कारी आहार करते रहने पर किसी की भी उच्चस्तरीय साधना सफल नहीं हो सकती। इसलिये भोजन न केवल अपने हाथ बनाना होगा, वरन् उसके सम्बन्ध में जुड़ी हुई मान्यताओं, आदतों और स्वादों को भी बदलना होगा। स्वादेन्द्रिय का नियमन साधना क्षेत्र का प्रारम्भिक उपचार है। इस प्राइमरी स्कूल को पास करने के बाद ही माध्यमिक, उच्चस्तरीय एवं स्नातकीय कक्षाओं में प्रवेश पाने का अवसर मिलता है। अन्नमय कोष का ही परिशोधन न हो सका तो फिर प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के उच्चस्तरीय देव लोकों में प्रवेश पाने का अवसर कैसे मिलेगा?
प्रथम पुरुषार्थ तो स्वादजयी होने के रूप में ही करना होता है। इसके बाद अन्य इन्द्रियों के नियमन का काम हाथ में लेना पड़ता है। इन्द्रिय संयम, विचार संयम, समय संयम, अर्थ संयम के चारों ही क्षेत्रों में साधक को पुरुषार्थ दिखाना पड़ता है और सिद्ध पुरुष स्तर तक पहुंचने का अवसर मिलता है।
संचित पाप कर्मों का प्रायश्चित और कुसंस्कार के परिष्कार के निमित्त पुरातन ढर्रे को नये सिरे से उलटने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए कर्मकाण्ड, उपचार की छुटपुट लकीर पीटने भर से काम नहीं चलता वरन् कुसंस्कार प्रवाह को उलटने के लिए दुस्साहस स्तर के प्रयास करने पड़ते हैं। पतन सरल है उत्थान कठिन। उछालने में शक्ति लगानी पड़ती है, वायुयान हो या राकेट पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से जूझने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा खर्च करनी होती है। प्रवाह में हाथी बह जाते हैं, पर मछली उस धारा को चीरकर उलटी दिशा में चलने का दुस्साहस करती है। प्रायश्चित का तात्विक सिद्धान्त भी यही है, जिस कारण दुष्कर्म बनते हैं। उस कुत्सा के मूल केन्द्र पर कुल्हाड़ा चलाना ही प्रायश्चित है। कर्मकांड उपचार तो इस मनःस्थिति को प्राप्त करने में सहायक प्रयोग प्रयत्नों की तरह ही करने पड़ते हैं। उन्हीं को सब कुछ मान बैठने से बात नहीं बनती। मनःस्थिति न बदली तो उन दुष्कृत्यों का सिलसिला भविष्य में भी टूटने वाला नहीं है ऐसी दशा में आये दिन पाप और आये दिन प्रायश्चित की विडम्बना रचने और निराश होकर अंततः उसे भी छोड़ बैठने से कोई बात कहाँ बनेगी?
इन तथ्यों को दृष्टि में रखते हुये गायत्री तीर्थ के साधको की भूलों, आदतों और दुर्बलताओं को भी प्रकार परखा और तद्नुसार प्रायश्चित का तप कृत्य कराया जायेगा।
कहना न होगा कि आत्मिक प्रगति में प्रधान अवरोध संग्रहित कषाय-कल्मषों का ही होता है। उनका अम्बार लदा रहने पर पूजा उपचार के नाम पर चलने वाले कर्मकाण्डों का कोई विशेष प्रतिफल उपलब्ध होने की सम्भावना नहीं बनती।
गायत्री तीर्थ में एक महीने की, दस दिन की साधना के इच्छुकों को इसी प्रयोजन के लिये बने हुए आवेदन पत्र मंगाकर उसको भरना और स्वीकृति प्राप्त होने पर पहुँचना होगा। इन कक्षाओं में मनोकामनापूर्ण करने, चुटकी बजाते-जादू चमत्कार देखने, शारीरिक, मानसिक रोगों का इलाज करा लेने, आपत्ति से बचकर कुछ समय दिन काटने जैसी उथली मनःस्थिति के एक भी व्यक्ति को प्रवेश नहीं मिलेगा। क्योंकि उनकी आतुरता प्रकारान्तर से अर्ध-विक्षिप्तता उत्पन्न किये रहेगी और वे साधना का महत्व न समझकर किसी प्रकार अपना लौकिक मनोरथ पूरा करने का ताना-बाना बुनते रहने में निरत रहेंगे। फलतः मूल प्रयोजन की दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना उनके लिये सम्भव न हो सकेगा। ऐसी दशा में साधकों को ही नहीं, साधना विज्ञान को भी इसके आयोजकों को भी अपयश का भागी बनना पड़ेगा। इस कटु तथ्य को आरंभ से ही ध्यान में रखकर गायत्री तीर्थ के साधना उपक्रम की रूपरेखा बनाई गई है।
हर साधक को एक कमरे में रहने का नियम रहने के कारण प्रस्तुत स्थान बहुत सीमित रह जाता है। जिन्हें आश्विन नवरात्रि के शुभारम्भ पर्व पर प्रवेश पाना हो, उन्हें तुरन्त अगले किसी महीने के लिये आवेदन-पत्र भेज कर अभी से स्थान सुरक्षित करा लेना चाहिये।
(मंगल विजय)
सब ही नहीं जला करते हैं, दीपक को ही जलना होगा, सब ही नहीं चला करते हैं, चरणों को ही चलना होगा॥
अन्धकार से भरी निशा में, प्रायः सब ही रह लेते हैं। और निशा के अन्धकार को, प्रायः सब ही सह लेते हैं॥ कोई नहीं दिखाता साहस, अन्धकार से टकराने का। हर जन अभ्यासी होता है, अन्धकार में सो जाने का॥
दीपक में ही टीस उठा करती है-अन्धकार पीने की, दीपक जैसा दर्द हमें भी अपने उर में भरना होगा॥
कई मंजिलें रही अछूती, जहाँ न कोई पहुँच सका है। बड़े-बड़े मनसूबे वालों का साहस भी चुका, रुका है॥। कितने ही हैं ऐसे, जिनको मंजिल से कुछ नहीं वास्ता। मंजिल तक पहुंचाने वाला जिन्हें पता तक नहीं रास्ता॥
लेकिन चरणों की होती है राहों, से ही रिश्तेदारी, रहें नहीं मंजिलें कुआंरी, हमें चरण ही बनना होगा॥
आज मनुज के घर आँगन में अन्धकार है घोर-निशा है। मानवता भटकी-भटकी है, उसे न दिखती उचित दिशा है॥ समझौता कर लिया मनुज ने अन्धकार से और अगति से। कौन बचाये मानवता को ऐसे में बोलो दुर्गति से॥
दीपक की, चरणों की पीड़ा शेष रही हो जिन प्राणों में, तिल-तिल जलना होगा उनको, पथ की ठोकर सहना होगा॥
चलो! प्राण-दीपक में अपने, ज्ञान-यज्ञ की ज्योति जलावें। जन मानस के अन्धकार को, आओ! साहस कर पीजावें॥ साहस के चरणों की गति दें, जन-मंगल पथ पर बढ़ने की। हिम्मत दें- ठोकर सहने की, बाधाओं पर भी चढ़ने की॥
नव युग के आगमन-क्षणों में, नवयुग का स्वागत करने को, प्राणों की वर्त्तिका जलाकर, हमें आरती करना होगा॥
‘नव-युग’ का निर्माण आज तो सृजन सैनिकों को करना है। ‘युग-परिवर्तन’ के चरणों को, परिवर्तन पथ पर बढ़ना है॥ ‘ज्ञान-यज्ञ’ की लिये मशालें, लड़ना है अज्ञान तिमिर से। सद्-विचार का, सद्भावों का वातावरण बनायें फिर से॥
मनुजों के इस धरा-धाम पर करना होगा ‘स्वर्ग-अवतरण’, मनुजों में ‘देवत्व-उदय’ हित, सदाचार को बढ़ना होगा॥
*समाप्त*