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प्रज्ञायोग और अध्यात्म विज्ञान की क्रमबद्ध शिक्षा

गत अंक में ‘प्रज्ञा अभियान और अध्यात्म विज्ञान’ सम्बन्धी क्रमबद्ध शिक्षा पत्राचार विद्यालय के रूप में देने की सूचना छपी थी। प्रसन्नता की बात है कि उस योजना का असाधारण स्वागत हुआ तथा कुछ ही समय में हजारों आवेदन-पत्र आ गये।

इस उत्साह को दृष्टिगत रख यह नया निर्णय हुआ है कि अखण्ड-ज्योति के अगले अंक उसी पाठ्य-सामग्री के छापे जायें जो पत्राचार के माध्यम से पाठ्यक्रम के रूप में भेजी जाती थी। इससे सभी पाठकों को समान रूप से इस बहुमूल्य सामग्री का लाभ मिल सकेगा। संक्षिप्त पाठ्यक्रम तो चार अंकों में पूरा हो जाएगा। पर यदि वह परिजनों को रुचिकर लगा तो सन् 82 के पूरे वर्ष इसी क्रमबद्ध शिक्षा को जारी रखा जायेगा। साधना सम्बन्धी गूढ़ दर्शन व क्रियापरक मार्गदर्शन तब आगामी चार अंकों के अतिरिक्त भी विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया जाता रहेगा।

अब नये आवेदन-पत्र न भेजे जायें। जिनने डाक खर्च भेजा है, वे उसे वापस मँगालें या उसे पत्रिका के अगले वर्ष में चन्दे में जमा करालें। पाठ्य सामग्री पूरी होने पर जो चाहेंगे, उनकी परीक्षा व्यवस्था, संशोधन, उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण का निर्धारण कर दिया जायेगा।


प्रज्ञायोग अध्यात्म विज्ञान


विज्ञान से भी अधिक उपयोगी अध्यात्म

इस विश्व-ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक की संरचना में दो तथ्य अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष। प्रत्यक्ष वह जो इन्द्रियगम्य है। परोक्ष जिसे इन्द्रियातीत कहा जा सकता है। इंद्रियातीत अर्थात् बुद्धिगम्य। प्रत्यक्ष को ज्ञान कहते हैं और परोक्ष को विज्ञान। इन्हीं दो पक्षों को अध्यात्म की भाषा में स्थूल एवं सूक्ष्म भी कहा जाता है।

हर घटक की प्रत्यक्ष क्षमता एवं उपयोगिता स्वल्प है। उसका वर्चस्व परोक्ष में छिपा है। समग्र क्षमता एवं उपयोगिता समझने पर ही समुचित लाभ उठाया जाना सम्भव है अन्यथा इस दुनिया में सर्वत्र मिट्टी बिखरी पड़ी है। पानी के गड्ढे और पेड़-पौधे भर दृष्टि-गोचर होते हैं। चाबीदार खिलौनों की तरह कुछ जीवधारी चित्र-विचित्र हलचलें करते दिखाई पड़ते हैं। इतने भर से सन्तोष होता और काम चलता होता तो मनुष्य भी अन्य प्राणियों की भाँति अपने निर्वाह की आवश्यकता जुटाने भर तक सीमाबद्ध रहा होता। प्रस्तुत प्रगति की न आकाँक्षा उठती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है।

जमीन पर बिखरी धूलि की कोई कीमत नहीं। पर उसके छोटे से परमाणु की परोक्ष शक्ति की जो जानकारी रहस्य का पर्दा उठने पर मिलती है उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। आकाश नीले शामियाने जैसा दिखता है, पर इस प्रत्यक्ष से आगे बढ़कर जब इन्द्रियातीत रहस्यों का पता चलता रहता है कि उस पोल में उससे भी अधिक सम्पदा भरी पड़ती है जितनी कि इस धरती पर इन्द्रियों के सहारे बिखरी हुई लगती है। यह रहस्य लोक ही है जिसे इन्द्रियातीत या बुद्धिगम्य कहते हैं। परोक्ष भी प्रत्यक्ष के साथ ही गुंथा हुआ है, पर उसे जानने, पकड़ने और करतलगत करने के लिए इन्द्रियों की क्षमता से काम नहीं चलता उसके लिए बुद्धि क्षेत्र की प्रखरता उभार कर उसके सहारे गहराई में प्रवेश करने और मोती ढूँढ़ निकालने का पुरुषार्थ करना पड़ता है। प्रत्यक्ष जानकारी को ज्ञान और परोक्ष के रहस्योद्घाटन को विज्ञान कहते हैं। ज्ञान सब प्राणियों को समान मिला है। विज्ञान मनुष्य की अपनी उपलब्धि है।

प्रत्यक्ष की क्षमता नगण्य है। परोक्ष में सामर्थ्य के असीम भाण्डागार भरे पड़े हैं। जमीन पर उगी घास प्रत्यक्षतः हरे-भरे कालीन जैसी दीखती है और छूने में ठंडी कोमल भर लगती है, पर विश्लेषण करने पर उनमें से कितनी ही अमृतोपम जड़ी-बूटियां सिद्ध होती हैं। उनमें पाये जाने वाले रसायनों का विश्लेषण करने पर जो उपयोगिता हाथ लगती है, उसके अनुसार उस घास का महत्व असंख्य गुना अधिक बढ़ जाता है। खनिज पदार्थ अपने प्रकृत रूप में भारी मिट्टी जैसे होते हैं। उनमें तनिक से रंग-भेद का अन्तर पाया जाता है, किन्तु विश्लेषण करने पर उनमें से एक लोहा दूसरा सोना सिद्ध होता है। यह परोक्ष के विश्लेषण की उपलब्धि है।

विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में इन दिनों तक इतनी सामर्थ्य प्रदान कर दी है कि उसे पौराणिक महादैत्यों के समतुल्य मानने में कोई अत्युक्ति नहीं। पाँचों देवता उसकी सेवा में नियुक्त हैं। अग्नि देव खाना पकाते हैं। वरुण देव नल में विराजमान आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं। पवन पंखा झलते हैं। अनन्त (आकाश) रेडियो सुनाते हैं। धरती अपनी उदर दारी को छिपी हुई सम्पदा की तिजोरी खोल-खोल कर उसका वैभव बढ़ाती चली जाती है। प्राचीनकाल के पौराणिक महादैत्यों ने भी इसी प्रकार देवताओं को वशवर्ती करके उनके माध्यम से विपुल वैभव और वर्चस्व उपलब्ध किया था।

अब तक जो मिला है वह आदि मानव को आश्चर्यचकित कर सकता है। भविष्य में जो मिलने वाला है उसे भी इतना ही महत्वपूर्ण और रहस्यमय समझा जा सकता है कि आज का मनुष्य हजार वर्ष बाद फिर लौटकर इस धरती पर आये तो देखे कि वह सन् 81 के युग को करोड़ों मील पीछे छोड़कर किसी देव मानवों के लोक में आ पहुँचा। यह पदार्थ विज्ञान की देन है। विज्ञान अर्थात् परोक्ष। परोक्ष अर्थात् इंद्रिय शक्ति से परे बुद्धिगम्य। पदार्थ की प्रकृति सत्ता और मनुष्य की विज्ञासाजन्य तत्परता समन्वय का चमत्कार ही है जिसके कारण हम इस समूचे ब्रह्माण्ड को कदाचित सर्वश्रेष्ठ लोक में निवास करने का गौरव पा रहे और आनन्द ले रहे हैं। विज्ञान ही है जिसके कारण यह कूड़े कचरे जैसा यह भूलोक अपने सौर-मण्डल के साथियों को पीछे छोड़कर नन्दन बन जैसा सुरम्य लग रहा है और स्वर्ग जैसा सम्पदाओं से भर गया है।

पदार्थ जगत के साथ विज्ञान की प्रखरता जुड़ जाने से जो सम्पदा हस्तगत हुई है, होने वाली है उस पर हम भी प्रसन्न हैं, गौरवान्वित और भविष्य में इस से भी अधिक पाने की अपेक्षा लगाये बैठे हैं। इस प्रकार विज्ञान को जितना सराहा जाय उतना ही कम है। उसे देवादि देव न कहा, दैत्यादि दैत्य तो कहा ही जा सकता है। दैत्य शक्ति को कहते हैं और देव सम्पदावानों को। इसलिए विज्ञान को देव न कहकर दैत्य नाम देना ही ठीक है।

अब सृष्टि संरचना के दूसरे पक्ष का प्रसंग आता है। वह है- चेतना। चेतना प्राणियों में पाई जाती है। इसलिए उसे प्राण भी कहते हैं। प्राण होने से प्राणी कहे गये या प्राणियों की आधार भूत सत्ता होने के कारण उस चेतना को प्राण कहा गया। इस विवाद में न पड़कर इतना मान लेने से ही काम चल जायेगा कि प्राणियों की काया देखने में जैसी भी लगती हो, करने को जो कुछ भी करती हो, पर यह उनका निर्वाह पक्ष भर है। उनकी रहस्यमय क्षमता इन्द्रियातीत है परोक्ष- बुद्धिगम्य। मनुष्य की सामान्य हलचलें उसी सीमा तक सीमित हैं जिसके सहारे वह अपना निर्वाह करता है। निर्वाह क्षेत्र में ही आजीविका और परिवार को जोड़ा जा सकता है। अन्य प्राणियों के पेट प्रजनन की सीमा छोटी है। मनुष्य जीवन में उन्हीं दो आवश्यकताओं ने थोड़ा विस्तार करके आजीविका एवं परिवार क्षेत्र तक विस्तार कर लिया है। व्यक्तिगत विशेषता देखनी हो तो उसकी वाणी, भाषा, सज्जा, शिल्प, कला आदि की गणना हो सकती है। इन्द्रिय लिप्सा की प्रबलता उसे और कुछ प्रपंच रचने सरंजाम जुटाने को वाँछित करती रहती है। इसके अतिरिक्त मूर्धन्य समझे जाने वाले मनुष्य का भी क्या विवेचन विश्लेषण किया जाय? औरों की तरह वह भी खाता, सोता और साँसें पूरी करके मौत के मुँह में चला जाता है। सामान्यता मनुष्य की व्याख्या और क्या की जाय? उसकी विशेषता और क्या बताई जाय? इन्द्रियगम्य उसका प्रत्यक्ष स्वरूप इतना ही तो है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की प्रत्यक्ष विशेषता इतनी ही आँकी जा सकती है कि उसकी चतुरता एवं सम्पन्नता की दृष्टि से कुछ अधिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। जहाँ वह इतना आगे है वह ह्वेल की तरह आकार में, हाथी की तरह भार वहन में, घोड़े की तरह दौड़ने में, कुत्ते की तरह सूंघने में, बन्दर की तरह उछलने में, पक्षी की तरह उड़ने में असमर्थ भी होता है। उसकी गणना थलचरों में है। जलचर नभचर तो अपने-अपने क्षेत्रों में उससे कहीं आगे हैं। जीवाणुओं, कृमि-कीटकों की उपेक्षित दुनिया भी कम विचित्रताओं से भरी-पूरी नहीं है। मनुष्य उनकी समता किस बूते पर करेगा? हम मनुष्य मिल जुलकर आपस में एक-दूसरे की प्रशंसा करके ‘अहो रूप, अहो ध्वनि’ की डोग हांक लेते और उतने भर से मोद मना लेते हैं तो बात दूसरी हुई।

मनुष्य की वास्तविक विशेषता प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष है। वह चतुरता और सम्पन्नता से बहुत आगे की वस्तु है। मानवी परोक्ष को- अध्यात्म कहते हैं। यह वह उद्गम स्रोत है जहां से उसे सर्वतोमुखी प्रगति के लिए आधारभूत सामर्थ्य उपलब्ध होती है। असली व्यक्तित्व, हाड़मांस की टोकरी में नहीं है वरन् उस लचीली तिजोरी में भरा हुआ बहुमूल्य रत्न भंडार है। इतना बहुमूल्य जिसकी तुलना में इस वसुधा पर बिखरी हुई समूची संपदा भी कम पड़ती है। यदि मानवी बुद्धिमत्ता प्रकाश में न आई तो इस धरती का यह स्वरूप ही न निरखता और उसकी रहस्यमयी क्षमता से अविज्ञात के पर्दे मे ही छिपी पड़ी रहती जैसे कि अन्य ग्रहों में उपेक्षित पड़ी हुई है। सृष्टि में क्या है- क्या नहीं, इस असीम, अनन्त और अचिन्त्य को कौन जाने? जो प्रकाश में, उपयोग में आया वही तो सब कुछ बना और गौरवान्वित हुआ। इस दृष्टि से न केवल प्रकृति वैभव का वरन् परब्रह्म तक का सृजेता न सही उद्घाटन कर्ता तो मनुष्य ही ठहरता है। कान के समतुल्य किसी खंदक में पड़े हीरे का अपना महत्व कुछ भी क्यों न हो, श्रेय तो उस जौहरी को ही मिलेगा जिसने उसे ढूंढ़ निकालने से लेकर खरादने और आभूषण का रूप देन की कला दिखाई। इस प्रकार सृष्टि का- सृष्टा का- उद्घाटन कर्ता होने का श्रेयाधिकारी यदि मनुष्य को ठहराया जाय तो इसे अतिरंजित नहीं कहा जाना चाहिए।

पदार्थ शक्ति की संभावनाओं का अनुमान लगाते-लगाते वैज्ञानिक पसीने-पसीने हो जाते हैं। दूसरे पक्ष चेतन की प्रत्येक तरंग का मूल्यांकन किया जा सके तो उसकी भूत कालीन उपलब्धियों और भावी संभावनाओं को देखते हुए वे चेतना क्षेत्र को सूक्ष्मदर्शियों को और भी अधिक आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। मनुष्य जो न्यूनाधिक मात्रा में अपने तथाकथित वानर पूर्वजों से कुछ ही बात में विशिष्ट प्रतीत होता है जिन विभूतियों से भरा-पूरा है वे उसके काय संरचना एवं मस्तिष्कीय विशेषता तक सीमित नहीं है वरन् अंतराल की गहन परतों में छिपी पड़ी है। व्यक्तित्व की परिभाषा शोभा, सज्जा, संपदा एवं चतुरता के रूप में नहीं हो सकती। इनके सहारे तो वह मात्र सुविधा सामग्री एवं इन्द्रियजन्य प्रसन्नता ही प्राप्त कर सकता है। जिस आधार पर वह मात्र बनता है वे तत्व तो उसके अंतःकरण की गहन गुफा में प्रसुप्त जैसी ही पड़ी होती है।

महर्षि व्यास का कथन है- ‘‘मैं एक अद्भुत रहस्य का उद्घाटन करता हूं कि इस विश्व में मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।’’ इस रहस्य को प्रकट करते हुए वे बताना चाहते थे कि चेतना का उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व करने वाली क्षमता मनुष्य के अंतराल में छिपी पड़ी है। उन्हें समझने उभारने और प्रयोग में लाने की विद्या का नाम अध्यात्म है। प्रकृति परगत अणु सत्ता और तरंग सत्ता की खोज एवं उपलब्धि को विज्ञान कहते हैं और चेतना की भावनात्मक विभूतियों के रहस्योद्घाटन एवं उपार्जन उपयोग को अध्यात्म।

विज्ञान के स्वरूप एवं प्रयोग क्रमबद्ध होने से उसकी महत्ता सर्व साधारण के सम्मुख है, किन्तु अध्यात्म के सुनियोजित न किये जाने के कारण वह अनगढ़ अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ा रहा। इतना ही नहीं भ्रांति प्रतिगामिता और निहित स्वार्थों की कुचेष्टा का संयुक्त आक्रमण होने से वह उपयोगी सिद्ध होने के स्थान पर विकृत स्थिति में पहुंच जाने के कारण अवास्तविक उपहासास्पद एवं दयनीय भी बन गया। आज उसकी वही दुर्गति है। इतने पर भी तथ्य अपने स्थान पर जहां के तहां ही रहेंगे। बदली छा जाने से सूर्य और चन्द्रमा ढक जाते हैं फिर भी प्रखरता के कारण उनका अस्तित्व यथावत् बना रहता है और बदली हटते ही वे पूर्ववत् फिर चमकने लगते हैं। विज्ञान की तरह अध्यात्म भी एक तथ्य है। विज्ञान ने प्रकृतिगत सम्पदा और समर्थता को मनुष्य के हाथ सौंपा है। अध्यात्म में वह क्षमता विद्यमान है कि चेतना के परोक्ष स्वरूप को प्रकाश में लाये और उसके वर्चस्व से शोधकर्ता साधक को समर्थ बनाये। साथ ही उसकी विशिष्टता से समूचा समुदाय लाभ उठाये।

मनुष्य समुदाय की शरीर संरचना में कोई बड़ा अन्तर नहीं। कुछ अपंग अपवादों को छोड़कर मनःसंस्थान भी एक जैसा है। साधनों में न्यूनाधिकता हो सकती है, पर परिस्थितियाँ सभी के लिए एक जैसी हैं। इतने पर भी किसी को पतित पराजित, दीन-दुर्बल, दुखी-दरिद्र देखा जाता है। कोई चैन के दिन गुजारते हैं, किन्तु किन्हीं-किन्हीं की वरिष्ठता ऐसी होती है कि उसके सहारे वे न केवल प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचते हैं- न केवल असाधारण सफलताएँ पाते हैं वरन् अपनी प्रतिभा प्रखरता से असंख्यों का मार्गदर्शन करते हैं, अपने क्षेत्र एवं समय के वातावरण को प्रभावित परिवर्तित करने की भूमिका निभाते हैं। इन तीनों प्रकार के मनुष्यों में क्या अन्तर है इसकी गहराई में उतर कर जाँच-पड़ताल करने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि साधन, सहयोग, परिस्थिति इन भिन्नताओं में कारण या बाधक उतनी नहीं रही है जितनी कि इन वर्गों की अपनी-अपनी मनःस्थिति। यही है वह उद्गम केन्द्र जो अन्तराल में सन्निहित रहने पर भी बाह्य जगत की परिस्थितियों को प्रभावित करता है और उपयुक्त सहयोगी तथा साधन अपने चुम्बकत्व के सहारे खींच बुलाता है। यही है उत्थान-पतन का रहस्य। श्रेय या दोष किसी को भी दिया जाता रहे, तथ्य इतना ही है कि मनुष्य स्वयं ही अपने उत्थान-पतन का कारण होता है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इन तथ्यों को जितनी बार दुहराया जा सके, जितनी गहराई तक हृदयंगम किया जा सके उतना ही उत्तम है।

वस्तु का स्वरूप देखने से ही काम नहीं चलता, उसकी विशेषताओं को समझना, उभारना एवं प्रयोग में लाना भी आवश्यक होता है। चेतना वस्तु नहीं शक्ति है। इसलिए उसके रहस्यों को जानने तथा प्रयोग करने में और भी अधिक सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। ईंट-पत्थरों को इधर से उधर हटाया, पटका जा सकता है, किन्तु आग या बिजली की उलट-पुलट करने में अधिक जानकारी तथा सतर्कता की आवश्यकता होती है। पदार्थ को अनुपयुक्त रीति में प्रयोग करने में जितनी हानि है उससे कहीं अधिक बिजली जैसी शक्तियों के संबंध में अनजान या प्रमादग्रस्त रहने से होती है। मनुष्य के पास उसकी चेतना का अस्तित्व ही सर्वोपरि सम्पदा है। यह ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती हुई काय-कलेवर में विद्यमान है। इस वैभव के सम्बन्ध में अभीष्ट जानकारी एवं प्रयोग प्रक्रिया से मनुष्य को अवगत होना ही चाहिए। इसी को ब्रह्म विद्या- अध्यात्म विद्या आदि के रूप में तत्वदर्शियों ने विवेचन, निरूपण, निर्धारण किया है। इससे अनजान रहना या विकृत, मान्यताएँ अपनाये रहना प्रत्येक सचेतन के लिए उतना ही हानिकारक है जितना कि कपड़े में आग छिपाये फिरना या अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना।

शस्त्र, पैट्रोल, बारूद, बिजली आदि शक्तिशाली पदार्थों का प्रयोग करने एवं सुरक्षा रखने में हर कोई समुचित ध्यान रखता है। चेतना महाशक्ति है। वह अपने अन्तराल में विद्यमान है। हर स्तर के शाप वरदान देने की आज सामर्थ्य उसमें विद्यमान है। देवता अपमानित असन्तुष्ट होने पर शाप देते, अनिष्ट करते हैं। प्रसन्न होने पर वरदान देते, ऋद्धि-सिद्धियाँ बरसाते और निहाल कर देते हैं।

चेतना को ही आत्म देव कहते हैं। जीवनचर्या के साथ उसी प्रकार गुथा है जिस प्रकार कि जीव कोषों, अंग अवयवों एवं रस धातुओं के साथ। रक्त मांस की गतिविधियों में चेतना की शक्ति ही काम करती है। प्राण निकल जाने पर समूची काया निश्चेष्ट हो जाती है, और देखते-देखते सड़ने लगती है। ठीक इसी प्रकार जीवन की अन्तरंग एवं बहिरंग गतिविधियों पर चेतना का प्रभाव रहता है। चिन्तन एवं चरित्र के रूप में उसी का अनुशासन चलता है। कहना न होगा कि अन्तराल की गहन गुफा में विद्यमान यह सचेतन किन्तु अदृश्य व्यक्तित्व ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है। तिरष्कृत, विकृत, अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित किये जाने पर उसी के शाप उभरते हैं और मनुष्य को दुःखी, दरिद्र, पतित, पराजित बनाकर दयनीय स्थिति में पटक देते हैं। उसी सत्ता को सम्मानित, सुसंस्कृत, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने पर विभूतियाँ अन्तराल से उभरती हैं उन्हीं के सम्बन्ध में यह समझा जाता है कि वे किसी अदृश्य लोक से, दैवी शक्ति द्वारा सौभाग्य या वरदान की तरह अनुग्रह पूर्वक दी गई है।

आत्म साधना का नाम अध्यात्म है। चेतना को किस प्रकार मल आवरण, विक्षोभों से बचाया जाय? किस प्रकार उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय? किस प्रकार उसे बलिष्ठ प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय? इसी विद्या का नाम ‘अध्यात्म’ है। वह विज्ञान से कनिष्ठ नहीं वरिष्ठ है। विज्ञान ने मनुष्य को अगणित सुविधा साधन दिये हैं। किन्तु यदि पदार्थ की ही तरह चेतन की भी शोध और साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य इसी जीवन में देवताओं जैसा अन्तराल प्राप्त न कर सके। कोई कारण नहीं कि वह सामान्य परिस्थितियाँ और सीमित साधनों के सहारे भी स्वर्गीय वातावरण में रहने का आनन्द न ले सके।

अध्यात्म को सही रूप में समझाने के लिए अखण्ड-ज्योति विगत 44 वर्षों से प्रयत्न कर रही है। समय-समय पर उसके बिखरे प्रतिपादन पाठकों को उपलब्ध होते रहे हैं। अब इन अंकों में यह प्रयत्न किया जा रहा है कि रहस्यमय तत्वज्ञान एवं चेतना विज्ञान की जानकारी अगले दिनों क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत की जाय। अगले अंकों की पाठ्य-सामग्री इसी स्तर की होगी।


मानवी काया आत्मविज्ञान की बहुमूल्य प्रयोगशाला

संसार में अब तक मनुष्य कृत जितने भी यन्त्र उपकरण बने हैं उन सब की तुलना में सृष्टा की अनुपम संरचना ‘मानवी काया’ हर दृष्टि से अत्यधिक अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। इसका एक-एक कण इतनी विशेषताओं से युक्त है कि उसकी गरिमा बखानने- यश गाथा गाने का कभी अन्त नहीं हो सकता। कर्म कौशल और बुद्धि वैभव में अपनी विशिष्टता सिद्ध करने वाले असंख्यों व्यक्ति समय-समय पर होते रहते हैं, उनकी सूझ-बूझ, साहसिकता एवं तत्परता देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसी प्रकार जिस सृजनकर्ता के इस कलेवर के हर घटक को जितनी क्षमताओं से भर दिया है उसे देखकर उसकी कलाकारिता को देखकर दंग रह जाना पड़ता है। विज्ञान के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में काम आने वाले कम्प्यूटर- अणु विखण्डक अन्तरिक्षीय संप्रेषण सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, उप इन सब में प्रयुक्त हुए समन्वित कौशल की तुलना में मानवी काय कलेवर की संरचना हर दृष्टि से अनुपम है। शरीर का प्रत्येक अवयव असाधारण रूप से लचीला-तालमेल बिठाकर चलने वाला सहनशील एवं सक्षम है कि उसे अपने ढंग का अनोखा ही कह सकते हैं। मस्तिष्कीय विशेषताएँ तो और भी अधिक अनिर्वचनीय हैं। लोक व्यवहार में चतुर प्रतिभाशाली लोगों की बुद्धिमत्ता, योग्यता उन्हें कहाँ से कहाँ उठा ले जाती है। असंख्यों को अपने प्रभाव में बहाती और वातावरण को आश्चर्यजनक परिवर्तन प्रस्तुत करती है। इतने पर भी मनःशास्त्रियों के अनुसार तीक्ष्ण से तीक्ष्ण बुद्धि वाले की विशिष्टता समूची मस्तिष्कीय क्षमता का मात्र सात प्रतिशत ही होता है। मस्तिष्कीय संरचना एवं विशेषताओं के बारे में जो खोजा गया है उसे अधिक से अधिक तेरह प्रतिशत कहा जा सकता है। इससे आगे के रहस्य अभी पर्दे के पीछे छिपे पड़े हैं। प्रकृति के भंडार से अभी बहुत कुछ खोजना बाकी है इसी प्रकार मस्तिष्क के रहस्यों, कौशलों एवं शक्ति स्त्रोतों के सम्बन्ध में भी अभी अटकलें ही लगाई जा सकी हैं। समझा यह जाता है कि पदार्थ जगत की मूर्धन्य संरचना मनुष्य की काया है और ब्रह्माण्डीय चेतना के परोक्ष वैभव का प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिनिधि मानवी मस्तिष्क है। इससे श्रेष्ठ और अगणित स्तर की संभावनाओं से भरे-पूरे यन्त्र उपकरण बनाने में मनुष्य कदाचित सदा ही असमर्थ रहेगा। अणु और विभु के मध्यान्तर की कोई सीमा नहीं। इसी प्रकार मनुष्य और परब्रह्म के वर्चस्व और कर्त्तव्य को भी समकक्ष होने का अवसर संभवतः कभी भी नहीं आ सकेगा।

यह चर्चा इसलिए की जा रही है कि भौतिकी की तरह जब आत्मिकी की खोज और प्रक्रिया में बहुमूल्य यन्त्रों वाली प्रयोगशाला की आवश्यकता पड़ेगी तो वह कहाँ से जुटाई जायगी? प्रसन्नता की बात है कि इस प्रयोजन की आवश्यकता उपयोगिता हर व्यक्ति के लिए अनुभव करते हुए एक समूचा संयन्त्र उसके सुपुर्द कर दिया है। समूचा संयन्त्र और उसके विभिन्न अवयवों के माध्यम से वे सभी प्रयोग पराक्रम सम्भव हो सकते हैं जो अध्यात्म ऊर्जा उत्पन्न करने से लेकर उसे अभीष्ट प्रयोजनों में कार्यान्वित किये जाने हैं। इसके लिए कहीं अन्यत्र से कोई स्थापना करने, साधन जुटाने की किसी को भी आवश्यकता नहीं है। इसी यन्त्र में थोड़ी फेर बदल करके- थोड़ा सधा, समझाकर इस योग्य बनाया जा सकता है कि उसमें आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक सभी प्रयत्न उतने दायरे में ही सम्पन्न होते रहें।

उदाहरण के लिए प्रेत विद्या में काम आ सकने योग्य यदि कायिक प्रयोगशाला में ढालना हो तो उसके लिए अपने आहार-बिहार, रहन-सहन, चिन्तन, कृत्य, व्यवहार रुझान इस प्रकार का बनाना पड़ेगा, जिससे वह उपयुक्त प्रयोजन में ठीक तरह काम दे सकने योग्य बन सके। प्रेत आह्वान उतना कठिन नहीं है जितना कि उसके लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण। यदि शरीर और मन का स्तर तद्नुकूल बना लिया गया तो समझना चाहिए कि तीन चौथाई मंजिल पार हो गई। अघोरी या पालिक प्रेत-सिद्ध अपने प्रयोग का आरम्भ यहीं से करते हैं। कि उनकी काय सत्ता प्रेतों के लिए आकर्षक अनुकूल एवं अनुरूप बन सके। साधना अपने आपे की करनी पड़ती है। जिस स्तर की सफलता पानी है उसी प्रकार का सरंजाम जुटाना पड़ता है। वातावरण ढूंढ़ना पड़ता है और मन का रुझान तथा दिनचर्या का निर्धारण तद्नुरूप करना पड़ता है। पहलवान, कलाकार, वैज्ञानिक, फौजी स्तर से विशिष्ट उद्देश्य वाले व्यक्ति अपने ही गोरख धन्धे में उलझे रहते हैं। मन और शरीर को उन्हीं कार्यों में जोते रहते हैं। महत्वपूर्ण सफलताओं का मार्ग भी यही है।

‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त का रहस्य उतना ही है कि साधक अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को इस प्रकार की बनाता है जिससे उसका व्यक्तित्व शक्तिशाली चुम्बक की तरह अभीष्ट सफलता को अपनी ओर खींच घसीट लाने में समर्थ हो सके। इस संसार में हर पदार्थ या हर जीव अपने लिए जहाँ भी अनुकूलता, सुविधा देखता है उसी ओर खिंचता दौड़ता चला जाता है। फूलों के उद्यान में ये तितलियाँ, भौंरे, मधुमक्खियाँ न जाने कहाँ से पता लगाते, रास्ता नापते, बिना बुलाये दौड़ते चले आते हैं। मरी लाश को पड़ी देखकर आसमान से चील, कौए उतरते ओर जमघट लगाते देखे गये हैं। कुत्ते और सियार भी न जाने कहाँ से आकर उसी लाश पर चढ़ दौड़ते हैं। नाले नदी में, नदी समुद्र में पहुँचने के लिए स्वयं दौड़ लगाते हैं क्योंकि उन्हें वहाँ अपने लिए अनुकूल आश्रय दिखता है। शराब की दुकानों पर नशेबाज जमे रहते हैं और जुआ घरों में जुआरी, साधू संतों की भी जमातें जुड़तीं और सत्संग चलते हैं। कुचक्री तक अपने गिरोह बनाते ओर षड़यंत्र रचते रहते हैं। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण आकाश से न जाने क्या-क्या पकड़ता घसीटता रहता है। बादलों को बरसने के लिए विवश करने से लेकर उसकी परत पर जमते रहने वाले पदार्थ यह बताते हैं कि वे स्वेच्छापूर्वक यहाँ नहीं आये वरन् उन्हें किसी ने खींचा घसीटा है।

साधना के पीछे यही सिद्धान्त काम करता है। उच्चस्तरीय दैवी शक्तियों का किसी व्यक्ति विशेष की ओर अकर्षित करना- अनुग्रह बरसाना, सहयोग देना, अनुकूल होना केवल एक बात पर निर्भर है कि उनके स्तर की अनुकूलता उत्पन्न हुई या नहीं।

मनुष्य की संरचना एवं समर्थता महान है। तो भी वह पूर्ण नहीं है। जीवनचर्या में पग-पग पर उसे दूसरों की सहायता लेकर काम चलाना पड़ता है। अन्न, वस्त्र, पुस्तक, कलम, माचिस, लैम्प जैसी छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति में वह स्वावलम्बी नहीं है। आत्मिक प्रगति के लिए तो उच्चस्तरीय सहयोग की यह अपेक्षा और भी अधिक रहती है। स्वाध्याय, सत्संग में गुरुजनों का अनुग्रह चाहिए अदृश्य लोक की देव शक्तियाँ भी उस उत्थान में अपना भावभरा सहयोग प्रस्तुत करती हैं। ब्रह्म चेतना की अनुकूलता एवं अनुकम्पा आवश्यक होती है। वह ऊपर से बरसती है या भीतर से उछलती है यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह निर्धारण कि ऊँचा उठने के लिए कोई न कोई सहारा चाहिए भले ही वह नीचे से उचक्का कर दिया गया हो या ऊपर से खींचकर। साधना से सिद्धि प्राप्त करने में जो जिन विभूतियों का सहयोग मिलता है वे निश्चय ही सामान्य स्तर की होती हैं।

साधना अर्थात् जीवन साधना। जीवन साधना अर्थात् आदतों, मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं को साध लेना। वैसा जैसा कि घोड़े बैल आदि को सधाकर अनगढ़ आदतों से विरत किया और उपयोगी कार्यों में लगने के लिए अभ्यस्त किया जाता है। शेर, हाथी, रीछ, बन्दर, साँप भी प्रकृतितः मनुष्य के सहयोगी कहाँ होते हैं। उन्हें नरम-नरम करके सरकस तमाशों में ऐसे कौतूहल दिखाने में प्रवीण कर लिया जाता है जो आश्चर्यचकित करते और उनकी मूल प्रकृति के सर्वथा विपरीत होते हैं। पेड़-पौधों में कलम लगना, उन्हें काट छाँटकर नयनाभिराम बनाना एक प्रकार से माली की साधना ही कही जायगी। आदिकाल की ऊबड़-खाबड़ धरती और आज की समतल उपजाऊ स्थिति के बीच आश्चर्यजनक अन्तर देखकर यही कहा जायेगा कि धरती को मनुष्य के लिए अधिक उपयोगी बनने के लिए प्रयत्न पूर्वक सधाया गया है। अन्न, फल, शाक, जूट, कपास आदि खाद्य स्वभावतः इस प्रकार नहीं उगते थे और वैसे नहीं होते थे जैसे कि आज हैं। वनस्पतियों को सुव्यवस्थित बनाने में मनुष्य को लम्बी अवधि से साधना करनी और करानी पड़ रही है। वही सब कुछ मनुष्य को अपने आपे की साधना में भी करना पड़ता है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते हुए- विकास क्रम को एक के बाद दूसरी सीढ़ी पार करते हुए- मनुष्य आगे उठता ऊँचा चढ़ता तो आया है किन्तु अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि सभ्य संसार का सुसंस्कृत नागरिक कहला सके। ऐसी दशा में उसे बौना, कुबड़ा, पिछड़ा, उथला बनकर रहना पड़ रहा है। मानवी गरिमा के उपयुक्त उसका व्यक्तित्व ढले इसके लिए वैसा ही प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी जैसी कि कुशल माली, मदारी अपने-अपने यजमानों से निपटते हैं और उन्हें बलपूर्वक इच्छित स्थिति में बदलने के लिए साधते हैं।

जन्म-जन्मान्तरों की संग्रहित पशु प्रवृत्तियाँ बड़ी हठीली होती हैं। समझाने बुझाने पर भी किसी न किसी बहाने अपना ढर्रा अपनाये रहने के लिए रास्ता बना लेती हैं। इनसे निपटना-अनगढ़ को सुगढ़ बनाना इतना महत्वपूर्ण कार्य है कि उसके कष्टसाध्य होते हुए भी करने के लिए दूरदर्शिता को भरसक प्रयत्न करना पड़ता है। वह कदम ऐसा है जो हर प्रगतिशील के अनिवार्यतः उठाना ही चाहिए।

लौकिक जीवन में सफल सम्मानित रहने के लिए ही नहीं व्यक्तित्व को वजनदार-बहुमूल्य बनाने के लिए जीवन साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यों अनगढ़ लोग भी अपनी कुसंस्कारिता बनाये रहकर, अनैतिक तारकों से कुछ न कुछ कमा ही लेते हैं किन्तु स्मरणीय यह है कि वे बड़े आदमी कहलाने पर भी आत्म-संतोष, लोक-सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की तीनों ही विभूतियों से वंचित रहते हैं। अनीति उपार्जन एवं उद्धत उपभोग उनके लिए आत्म-प्रताड़ना से लेकर आधि-व्याधि लेकर भर्त्सना और ईश्वरीय दण्डों से आयेदिन पीड़ित ही होते रहते हैं। इस प्रकार दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने वाला होते हुए भी वह वैभव अन्ततः बहुत महंगा पड़ता है और सिकन्दर, रावण, हिरण्यकश्यप आदि की तरह उस पर पश्चाताप ही करना पड़ता है।

जीवन देवता की-गौरवशाली व्यक्तित्व की-साधना करने से-मनुष्य को इसी हाड़-माँस की काया में रहते हुए देव स्तर का बन सकने का सुयोग मिलता है। परीक्षा अच्छे नम्बर लाने के अतिरिक्त प्रामाणिकता सिद्ध करना और तद्नुरूप पद पाना कठिन है। महामानवों, सिद्ध पुरुषों, ऋषियों, देवदूतों की बिरादरी का हर सदस्य उसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरान्त गौरव भरी विशिष्टता उपलब्ध करता रहा है।


आत्म-सत्ता का अस्तित्व और वैभव

पदार्थ और प्राण का- जड़ और चेतन का- समन्वय ही काया का अस्तित्व बनाये हुए हैं। वे दोनों पृथक् होते हुए भी परस्पर इतने अधिक गुँथे हुए हैं कि एक के बिना दूसरे की गति नहीं। प्राण निकलते ही शरीर न केवल निश्चेष्ट हो जाता है वरन् स्वयमेव सड़ने में जुड़ पड़ता है और अपना अस्तित्व समाप्त कर लेने के लिए अन्त्येष्टि कर्म में अपनी रही बची विशेषता होम देता है। यह तो हुई प्राण के अभाव में शरीर की दुर्गति। दूसरा पक्ष भी ऐसा ही है। प्राण-सत्ता आकाश में वायुभूत होकर भले ही घुमड़ती रहे, पर दृश्य जगत में अपने अस्तित्व का परिचय देना या किसी प्रकार का अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव नहीं होता। प्राण के बिना शरीर का और शरीर के बिना प्राण का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं रह जाता। इस तथ्य को देखते हुए दोनों के मध्यवर्ती सम्बन्ध सूत्र को समझा जा सकता है।

स्थूल और सूक्ष्म का- जड़ और चेतन का- यह समन्वय इसी ब्रह्माण्ड में व्यापक रूप से विद्यमान है। पदार्थ की सब छोटी इकाई तरंगें हैं। इन कम्पनों के अन्तराल में चेतना का अस्तित्व और अंकुश ढूँढ़ निकाला गया है। उसकी सूझ-बूझ भरी गतिविधियाँ ‘इकालॉजी’ विज्ञान के आधार पर सृष्टि सन्तुलन के रूप में पग-पग पर अपना कार्य करती हुई देखी जा सकती है। ऐसे और भी अगणित प्रमाण हैं जिसमें पदार्थ जगत के साथ एक अत्यन्त शक्तिशाली, रहस्यमय एवं वरिष्ठ चेतना जगत गुथा हुआ देखा जा सकता है। पदार्थ में जिस प्रकार ऊर्जा और गति का अस्तित्व है उसी प्रकार प्राण में भावना एवं विचारणा का अनेक रूपों में अपने चित्र-विचित्र कृत्य करते हुए देखा जा सकता है।

पदार्थ का स्वरूप और व्यवहार समझने पर स्थूल जगत में मनुष्य अपने विभिन्न प्रयोजन पूरे करता रहता है। किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जीवात्मा स्वयं सचेतन होते हुए भी- चेतना जगत में अपनी मूल सत्ता को अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए भी उस विधा से अपरिचित ही बना रहता है जो उसकी अपनी निजी सत्ता के उत्थान-पतन की जिम्मेदार है। शरीर पदार्थ है अस्तु उसकी सुविधा पदार्थ पर निर्भर समझी जा सकती है। अभीष्ट उपलब्धियों के लिए काम सत्ता की भौतिकी विद्या की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना उसका काम नहीं चलता, निर्वाह कठिन हो जाता है। ऐसी दशा में भौतिकी का महत्व समझा जाना और उसका उपयोग करना उचित ही है। किन्तु समझा यह भी जाना चाहिए कि जीवन की समस्त आवश्यकताएँ भौतिकी द्वारा पदार्थ को उपलब्ध कर लेने से ही तो पूरी नहीं हो जाती। चेतना का अपना भी कुछ स्वरूप, उद्देश्य, कार्यक्रम, बल-वैभव है। उस सम्बन्ध में अनाड़ी बने रहने पर मात्र शरीर यात्रा ही चलती रहेगी। चेतना की अपनी निजी सामर्थ्य एक प्रकार से सोई ही पड़ी रहेगी उसका निर्वाहरत पक्ष ही जागृत रहेगा। जिसे समग्र चेतना का कठिनाई से शतांश ही कहा जा सकता है। शेष अंश प्रसुप्त उपेक्षित या अनगढ़ स्थिति में पड़ा रहे तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।

अध्यात्मिक शास्त्र में पग-पग पर एक उद्बोधन निर्देशन पूरा जोर देकर दिया जाता है कि ‘अपने को जानो, उसे उठाओ।’ ‘आत्मानं विद्धि’- ‘आत्मावादे ज्ञातव्य’ जैसे सूत्र संकेतों का आत्म क्षेत्र में प्रवेशार्थी को ध्यान पूर्वक मनन-चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस अश्वतरु के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना- प्रख्यात हुआ और कृत्य-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।”

सामान्यतया का कथन कबीर की ‘उलटा मासी’ और बच्चों की कौतुक पहेली’ जैसी लगती है। क्योंकि अपने को कौन नहीं जानता। हर कोई अपना नाम, पता, वंश, धर्म, आयु, व्यवसाय, वैभव, ज्ञान पद, पराक्रम, कौशल आदि पूछते ही बता सकता है। फिर अपने को न जानने की क्या बात रह गई? शरीर से आत्मा के पृथक होने की उसे अजर अमर मानने जैसी कोई बात ही तो उस प्रसंग को भी स्वाध्याय सत्संग में हजारों बार पढ़ा सुना गया होता है फिर ‘न जानने’ जैसी क्या बात रह गई जिसके लिए ‘आत्म-बोध’ की बात को इस तरह सिर पर उठाया जाय और उसमें सफल होने पर सामान्य से असामान्य बन जाने का माहात्म्य सुनाया जाता रहे?

बात की गम्भीरता को समझा जाना चाहिए। हम अपने सम्बन्ध में मात्र उतना ही जानते हैं जितना शरीर निर्वाह, परिपोषण या समाज व्यवहार के लिए दैनिक जीवन में काम आता है। कुशलता पदार्थ सम्बन्ध तक सीमित है कहा जा चुका है। कि यह चेतना पक्ष समग्र चेतना का कठिनाई से शताँश होगा। इसके अतिरिक्त जो आत्म-वैभव शेष रह जाता है उसी से अनजान रहने की बात का बार-बार स्मरण कराया जाता है और कहा जाता है कि जिसके शताँश से जीवनचर्या का इतना बड़ा सरंजाम ढोया ढकेला जाता है उसके शेषाँश को भी महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए। उसे उपेक्षा के गर्त से निकाला जाना चाहिए और ऐसा अवसर देना चाहिए कि समान चेतना को अपने क्षेत्र की वे सभी प्रवीणताएँ प्राप्त हो सकें जिनके सहारे मनुष्य वस्तुतः नर पशु जैसे भव बन्धनों से निकलकर ब्रह्म चेतना के स्वच्छन्द आकाश में विचरता है। और वैसा दिव्य अनुभव करता है जिसे स्वर्ग लोक में निवास या जीवन मुक्ति जैसा हाथों हाथ रसास्वादन किया जा सके।

उथली साँस लेने वालों के फेफड़ों का एक छोटा भाग काम से आता है और शेष ही निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसी क्षेत्र में क्या आटे के विषाणु पलते और प्राण संकट उत्पन्न करते हैं। चेतना का निष्क्रिय पक्ष यदि स्तरीय सक्रियता में संलग्न न होगा तो उस अँधेरी कोठरी में ऐसे तत्व पलेंगे जो पतन पराभव के गर्त में व्यक्तित्व को गिराते रहे और सडाँद उत्पन्न करके उस क्षेत्र को दुर्गंध से भरते रहे।

व्यक्ति चेतना का कार्यक्षेत्र उससे कहीं अधिक व्यापक है जितना कि परिवार, समाज के छोटे दायरों में- बहिरंग जीवन में प्रयुक्त होता है। हाड़-माँस के स्थूल की अपनी हस्ती और क्षमता है। किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण और अदृश्य शरीर आत्मा की उपलब्ध है और वे यदि सजग सक्रिय हो सके तो ‘काय शरीर’ की तुलना अत्यधिक महत्व के काम कर सकते हैं। स्थूल शरीर बोझिल होने के कारण धीमे चलता और जल्दी थकता है, पर सूक्ष्म शरीर का भार न होने से वह प्रकाश से भी अधिक गति के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच सकता है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, जैसी अनेकों आश्चर्यजनक घटनाओं के उदाहरण सामने आते रहते हैं। भूत प्रेतों के अस्तित्व सिद्ध करने वाले प्रमाण मिलते रहते हैं। जीवित रहते हुए तन्त्र योगी अपनी ही एक अदृश्य प्रति कृति छाया पुरुष के रूप में गढ़ लेते हैं और उससे बिना चेतन की देव मानव जैसे सहायक सेवक का काम लेते हैं। यह सूक्ष्म शरीर के ही चमत्कार है। कितने ही स्वप्न अक्षरशः सत्य निकलते हैं और कइयों से महत्वपूर्ण संकेत रहते हैं। जागृत अवस्था में भी कई बार ऐसे दिवा स्वप्न देखे गये हैं जो किसी सामयिक घटनाक्रम की जानकारी देने वाले सिद्ध हुए।

अंतर्मुखी होकर अंतर्जगत का अवलोकन और उसका परिष्कृतीकरण के लिए योगाभ्यास में कई प्रकार की ध्यान धारणाएँ कराई जाती हैं। षट्चक्र, पंचकोश, तीन ग्रन्थियाँ, इड़ा, पिंगला सुषुम्ना- उनकी सहायक नाड़ियां किस स्तर की हैं और उनकी प्रसुप्त स्थिति दूर हो जाने पर क्या कुछ उपलब्ध हो सकता है इसका सुविस्तृत वर्णन हठयोग-कुण्डलिनी जागरण आदि विद्याओं के अंतर्गत सुना समझा जाता रहा है। यह कार्यक्षेत्र वैभव एवं अदृश्य विकृति भण्डार सूक्ष्म शरीर की परिधि में ही आता है। स्थूल शरीर के अवयव तो सर्वविदित हैं। उसकी संरचना में चक्र कोश आदि का कहीं कोई स्थान नहीं है। चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, शरीर सत्ता का अभीष्ट परिवर्तन, अचेतन मन की लगाम हाथ में आने पर मानसिक चेतना का इच्छित उपयोग जैसे कितने ही ऐसे काम हैं जिन्हें सूक्ष्म शरीर को समर्थ बनाने के उपरान्त सहज ही सम्पन्न किया जा सकता है। इन्द्रिय शक्ति से कहीं अधिक प्रखरता सम्पन्न मनुष्य की अतीन्द्रिय सामर्थ्य है। इसे कैसे जगाया बढ़ाया जाय? यह सारा प्रकरण सूक्ष्म शरीर में सम्बन्धित है।

कारण शरीर इन सूक्ष्म से भी अधिक उत्कृष्ट और अधिक रहस्यमय है। जिस प्रकार स्थूल शरीर आधा प्रकृति का और आधा प्राण चेतना के समन्वय से बना है। उसी प्रकार कारण शरीर आधा मानवी चेतना और आधा देव चेतना के समन्वय से बना है। अन्तःकरण की सूक्ष्म परतें इसी क्षेत्र में हैं। यह जग पड़े तो भीतर से ही देव शक्तियों का उदय हो सकता है। अध्यात्म शास्त्र में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय पंचकोशों को प्रख्यात पंच देवों का प्रतीक प्रतिनिधि बताया गया है। इसी शरीर में समस्त लोक, देव ऋषि, तीर्थ सन्निहित माने गये हैं। बहुमूल्य रत्न भण्डारों का खजाना इसी में गढ़ा हुआ बताया गया है। अन्तःकरण ही व्यक्तित्व का मूलभूत स्वरूप है। उसकी स्थिति जैसी भी भली-बुरी होती है उसी के अनुरूप चिन्तन, चरित्र, सहयोग, वातावरण बनता है और इस प्रकार अपनी ही गढ़ी हुई दुनिया में मनुष्य अपने ढंग का निर्वाह करता है। अन्तःकरण की प्रेरणा से मन बुद्धि को काम करना पड़ता है। मन के निर्देशन पर काया काम करती है। संक्षेप में बाह्य जीवन का जैसा भी स्वरूप है उसे अन्तःकरण का प्रतीक प्रतिबिम्ब ही समझा जाना चाहिए। यह अन्तराल ही कारण शरीर है। देव सान्निध्य इसी मिलन कक्ष में शक्य होता है। इष्टदेव का दर्शन- ईश्वर मिलन, स्वर्गानुभूति मुक्ति आनन्द, विभूति वैभव, सिद्धि चमत्कार आदि की जो उत्साह भरी चर्चा अध्यात्म प्रसंगों में होती रहती है उसका कारण शरीर स्थिति के रूप में भी विवेचन किया जा सकता है।

स्थूल शरीर की क्षमता प्रखरता के आधार पर मिलने वाली प्रसन्नता, सम्पदा, सफलता जिन्हें प्राप्त है उन्हें उतना और भी जानना चाहिए कि स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण शरीर की सामर्थ्य से उत्तरोत्तर वृद्धि ही होती चली जा रही है। निरोग, परिपुष्ट, स्फूर्तिवान, सुन्दर, सुडौल शरीर के सहारे जो कुछ हो सकता है, उनसे अत्यधिक अनुपात में समुन्नत सूक्ष्म शरीर और सुसंस्कृत कारण शरीर के माध्यम से उपलब्ध किया जा सकता है। कारण शरीर की भावना को सूक्ष्म शरीर की विचारणा को और स्थूल शरीर की क्रियाशीलता का केन्द्र माना गया है। इन्हें परिष्कृत करने के लिए क्रमशः भक्ति योग की- ज्ञान योग की- कर्मयोग की साधना की जाती है। उनकी प्रखरता मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी एवं ओजस्वी बनाती है। अध्यात्म क्षेत्र की साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती है।


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गुण, कर्म, स्वभाव का प्रवाह बहुत कुछ अचेतन द्वारा अपनाये गये अभ्यासों पर निर्भर रहते हैं। मनोविकार भी इसी क्षेत्र में चलते हैं। नवीन शोधों के अनुसार शरीरगत और मनोगत आधि-व्याधियों की जड़ें मनोविकारों में पाई गई हैं। आरोग्य शास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि रोगों में आहार-बिहार के व्यतिक्रम करने विषाणुओं के आक्रमण की, ऋतु प्रभाव की तथा विशेष परिस्थितियों की जितनी भूमिका होती है उन सबसे कही अधिक प्रभाव मनःसंस्थानों में चलने वाली उथल-पुथल का पड़ता है।


आत्म-सत्ता में ईश्वर का अवतरण

तिलस्मों से भरी मानवी काया जिन रहस्यमयी विलक्षणताओं, सहकार व्यवस्थाओं से युक्त है, उसे देखकर सृष्टा की कलाकारिता के प्रति सहज ही नतमस्तक हो जाना पड़ता है। इतना असाधारण शरीर पाकर भी यदि मनुष्य उसे साँसारिक खिलवाड़ में नष्ट कर दे तो उसे चन्दन का वन सूखी लकड़ियों के भाव बचे देने वाले मूर्ख लकड़हारे की तरह की समझा जायेगा। बुद्धिमत्ता इसी में है कि इस महान उपहार के पीछे अभिव्यक्त विधाता की आकाँक्षा को पहचान कर उसको पूरा किया जाय। जिस किसी ने थोड़ा भी उस पर चिन्तन मनन किया है, अपने अन्दर विपुल रत्न राशि का भण्डार पाया है, जिसे प्रयुक्त कर वे स्वयं धन्य बने और सहस्रों को कृतार्थ कर गये।

इसी प्रकार जिज्ञासा के रूप में परमात्मा का एक और दिव्य अनुदान प्रत्येक मनुष्य को मिला हुआ है। यही प्रवृत्ति भावी विकास का आधार बनती है। जिन्होंने भी शाश्वत सत्य की खोज में अंतःजिज्ञासा को- आत्मगरिमा के बोध की ओर मोड़ा, अपने जीवन को सार्थक बना लिया। सृष्टि के रहस्यों की खोज जिस प्रकार मानवी जिज्ञासा की ही परिणति है, सभी आविष्कारों का मूल उद्गम केन्द्र वही है, उसी प्रकार अंतर्जगत के लीला रहस्यों -अपरिमित सामर्थ्यों की कुँजी भी यही है। बुद्ध, ईसा, विवेकानंद, दयानन्द, गाँधी, सुकरात सभी ने शाश्वत सत्य के दर्शन को स्व परायण होकर लक्ष्य बनाया, फलस्वरूप वे लक्ष्य प्राप्ति में सफल भी रहे।

बहिरंग जगत पर जब एक दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि अधिकाँश व्यक्ति ऐसे हैं जो अभावग्रस्त, पिछड़ी स्थिति में जी रहे हैं, कुछ ऐसे हैं जो न दुःखी हैं न सुखी। किसी प्रकार यन्त्रवत् जी रहे हैं। कुछ ऐसे हैं जिनकी प्रतिभा चमकती है। वे ऊँचा सोचते हैं और ऊँचा करते हैं। अपनी साहसिकता के बल पर वे जहाँ भी चलते हैं, सफलताएँ उनके पीछे-पीछे चलती हैं। शरीर की दृष्टि से भिन्नता न होने पर भी देखे जाने वाले इस अन्तर का एक मात्र कारण चेतना की स्थिति में भिन्नता का होना है। यदि पतित व यान्त्रिक स्थिति वाले व्यक्तियों ने भी समुन्नतों की तरह चेतना को सुसंस्कृत बनाने के प्रयास किये होते तो निश्चय ही वहाँ भी प्रगतिशीलता दृष्टिगोचर होती। इस तमिस्रा को निरस्त कर आत्म-जागरण का प्रयास किया गया होता तो स्थिति कुछ और ही होती।

परन्तु यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है। केवल आत्म-जागृति ही पर्याप्त नहीं है, उसे सही मोड़ दिया जाना भी अत्यावश्यक है। दुस्साहस तो डाकुओं में भी होता है और असम्भव को सम्भव कर दिखाने वाले पुरुषार्थियों में भी। यदि साहस को सही दिशा मिल जाये-आत्म चेतना ऊर्ध्वमुखी हो जाये, यह चेतना सत्साहस में बदल जाये, तो उसकी परिणति विधेयात्मक हो सकती है। इसी कारण मात्र शरीर की बलिष्ठता व पराक्रम का होना ही यथेष्ट नहीं है- लक्ष्य विशेष का उससे जुड़ा होना भी उतना ही जरूरी है। एक लक्ष्य के निर्धारित होने पर तथा चेतना के परिष्कृत होने पर मानव को वह पात्रता मिल जाती है कि वह व्यष्टि चेतना को समष्टि चेतना से जोड़कर अजस्र अनुदान पा सके। भौतिक योग्यता बढ़ने पर पारिश्रमिक और पद की वृद्धि होती है। आत्मिक क्षमता बढ़ने पर ब्रह्माण्डीय चेतना के समुद्र से व्यक्ति चेतना को बहुमूल्य उपहार मिलने का क्रम चल पड़ता है। छोटे बैंक यदि रिजर्व बैंक से जुड़े हैं तो आवश्यकतानुसार अपनी क्षमता- जमा पूँजी के आधार पर भारी आदान-प्रदान का लाभ उठा सकते हैं। इसी प्रकार यदि व्यक्ति की आँतरिक सामर्थ्य जाग सके तो उसे संव्याप्त ब्रह्मतत्त्व से ऐसे अनुदान मिल सकते हैं जो उसके स्तर को असंख्य गुना सुसम्पन्न बना सकें।

आत्म साधना का अर्थ है- व्यक्ति चेतना के स्तर को इतना परिष्कृत करना कि उस पर ब्रह्म चेतना के अनुग्रह का अवतरण सहज सम्भव हो सके। आत्म-सत्ता का चुम्बकत्व इस अनुदान को सहज आकर्षित कर सकता है, पहले इसकी महत्ता को जानें तो सही। सूक्ष्म जगत की विभूतियों को पकड़ने हेतु जिस सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, वह अपने आपको जाने बिना सम्भव नहीं। बिजली घर की बिजली, हमारे घर के बल्बों में उछल कर नहीं चली आती। इसके लिए सम्बन्ध जोड़ने वाले मध्यवर्ती तार बिछाने पड़ते हैं। ब्रह्माण्डीय चेतना से सम्बन्ध जोड़ने के लिये आदान-प्रदान के जो सूत्र जोड़े जाते हैं उसके लिये ‘आत्मा’ रूपी ‘सबस्टेशन’ को बड़े ‘पावर हाउस’ से जुड़ सकने योग्य भी बनाया जाता है। इससे कम में आत्मिक उपलब्धियों की सिद्धि सम्भव नहीं।

इस मार्ग पर बढ़ने के लिये साँसारिक उत्तरदायित्व के निर्वाह की उपेक्षा नहीं करनी पड़ती। उसे करते हुये भी आत्मिक प्रगति की जा सकती है। कठिनाई एक ही है कि अपनी दृष्टि में हम मात्र शरीर हैं। इसी कारण अपनी इच्छा, क्रिया, विचारणा भी उस तक ही सीमित रखते हैं। जबकि सोचा यह जाना चाहिये कि शारी में आत्मा का भी अस्तित्व है। प्रगति का अवसर आत्मा को भी मिलना चाहिये। बाह्य सुविधाओं की तरह यदि आन्तरिक गरिमा का महत्व समझा जा सके तो निश्चित रूप से मनुष्य को आत्मिक प्रगति की उपयोगिता समझ में आयेगी।

आज मानकर यह चला जा रहा है कि शरीर एवं मन तक ही हमारी सत्ता सीमित है। हमें इन्हीं के लिये सुख साधनों को जुटाने में निरत रहना है। इसी उपहासास्पद अज्ञान का नाम ‘माया’ है। वस्तुतः जड़ पंच तत्वों से बने इस कलेवर का मूल्य नगण्य है। बुढ़ापा, बीमारी और मौत उसे पानी के बुलबुले की तरह गला देती है। वस्त्रों की तरह वह जल्दी-जल्दी फटता और जीर्ण होता रहता है। ऐसे कलेवर की सुसज्जा ही लक्ष्य बन जाय एवं आत्मोत्कर्ष के उद्देश्य को विस्मृत कर दिया जाय तो यह बुद्धिमान कहे जाने वाले मनुष्य की सबसे बड़ी अबुद्धिमत्ता ही होगी। लगभग समस्त मानव समाज आज इसी आत्म प्रवंचना में मूर्छित पड़ा है।

‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को हृदयंगम करने के पूर्व यह यह समझना होगा कि आत्म-सत्ता का जीवन का, प्रयोजन क्या है। दूरदर्शिता का तकाजा है कि हम शरीर और मन रूपी उपकरणों का प्रयोग जानें और उन्हीं प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके लिये प्राणिजगत का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर- सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है। वह श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। आत्मा को उसी स्तर का होना चाहिये, जिसका कि परमात्मा है। परमेश्वर ने मनुष्य को अपना युवराज चुना ही इसीलिये है कि वह सृष्टि को और सुन्दर, सुसज्जित बना सकें। उसका चिन्तन और कर्त्तृत्व इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिये। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम। इसी को अपनाकर- जीवन में उतारकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।

वस्तुतः आत्मावलम्बी व्यक्ति विवेकयुक्त दूरदर्शिता को ही अपना सम्बल बनाते हैं। उनका मार्गदर्शक उनका अपना अन्तःकरण होता है। ओछे लोग जिसे लाभ समझते हैं, वह यदि विवेक की कसौटी पर हानि सिद्ध होता है तो भी एकाकी निर्णय ले ‘स्व परायण व्यक्ति’ सत्पथ पर अकेले ही चल पड़ते हैं। भले ही उन्मादियों की भीड़ उनका उपहास, असहयोग या विरोध करती रहे वह अपना भाग्य स्वयं निर्मित कर वहाँ जा पहुँचते हैं जहाँ के लिये उनकी आत्मा का अवतरण इस धरती पर हुआ है।

आत्मबल का अर्थ है ईश्वरीय बल। इसका अर्थ हुआ परमेश्वर की परिधि में आने वाली समस्त शक्तियों और वस्तुओं पर आधिपत्य। आत्मबल उपार्जित व्यक्ति ही शक्ति का अवतार कहा जाता है। मनोगत दुर्भावनाएँ और शरीरगत दृष्प्रवृत्तियों का जो जितना परिशोधन करता चला जाता है, उसी अनुपात से उसका आत्म तेज निखरता चला जाता है। इससे उस तेजस्वी आत्मा का ही नहीं- समस्त संसार का भी कल्याण होता है।

आत्मबल अभिवृद्धि का दूसरा चिन्ह वहाँ देखा जाता है जहाँ व्यक्ति मोहान्ध जन समूह के परामर्शों को उपेक्षा के गर्त में पटकता हुआ आदर्शवादी रीति-नीति अपनाने एकाकी चल पड़ता है। उत्कृष्टता का वरण करने के लिये ललचाते भर रहने वालों में सम्मिलित न होकर वह स्वयं को ऊँचा उठाया है। वह कर गुजरता है, जिसे करने के लिये उसका अंतरात्मा उसे सतत कहता-पुकारता रहता है व जिन कृत्यों के कारण उसे इतिहास में सदैव याद रखा जाता है।

मनुष्य राजकुमार है और ईश्वर उसका परम पिता। इन दोनों के बीच जो दूरी बनी है वह अज्ञानान्धकार के कायिक कलेवर के कारण है। इस सम्बन्ध विच्छेद को मिटाकर दोनों का मिलन करा देना ही ‘साधना’ है। साधना का प्रयोजन है मनुष्य को उसकी गरिमा का बोध कराना एवं कुत्साओं और कुण्ठाओं की उन जंजीरों को काट डालना जो जीव और ईश्वर के मिलन में बाधा बनकर खड़ी हैं। तपश्चर्याएँ, तितिक्षाएँ, योग-साधनाएँ, प्रायश्चित्त, उपासना इसी उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसमें जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों का निराकरण किया जाता है एवं देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ-प्रशस्त होता है। इस सब दिव्य सामर्थ्यों से युक्त परमसत्ता बीज रूप में मनुष्य में विद्यमान है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं। वे हट जायें तो मनुष्य में अनायास ही ईश्वर की झाँकी हो सकती है। वह अपने आपको लघु से महान, आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण के रूप में विकसित हुआ प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है। ऋषि-सिद्धियों की बात तो गौण है। जो उस सत्ता के साथ अपना सम्बन्ध बना सका, उसे न अपने लिये कुछ अभाव असन्तोष रहता है, न वह दूसरों को मुक्त हस्त से लुटाने में असमर्थ ही रहता है।

अन्तरात्मा की विशेषता यही देव तत्व है। यह जिसका जग जाता है- वह दैत्य पक्ष के तर्कों को निरस्त कर देवत्व की ओर बढ़ता चला जाता है। ऐसा व्यक्ति कभी सो नहीं सकता। उसकी माँग, पुकार बढ़ती चली जायेगी। अन्तः में घुसे दानव के साथ उसका मल्लयुद्ध तीव्र ही होता चला जायेगा।

मनुष्य के लिये यही श्रेष्ठ है कि वह अपनी विस्मृत गरिमा को जाने, ईश्वर को अपने अन्तःकरण के आँगन में क्रीड़ा कल्लोल करने का अवसर दे। सूर्य प्रकाश लिये हमारे द्वार पर खड़ा है- हम अपने दरवाजे व खिड़कियाँ भर खोल दें। ईश्वर से जुड़ने की- देवत्व अभिवर्धन की-यही पहली अनिवार्य शर्त है। देवमानव जैसी जीवन-नीति के निर्धारण एवं कार्यान्वयन हेतु सत्साहस एवं उत्साह जब उभरने लगे तो इस उमंग भरे उभार को ही व्यक्तिगत जीवन में ईश्वर का अवतरण कहा जाता है।

इसी तथ्य को गीताकार ने स्पष्ट करते हुए कहा है- ‘‘उद्धरेदात्मनात्मानं” अपना उद्धार आप करो। अपनी प्रगति का पथ स्वयं प्रशस्त करो। जो माँगना है अपने जीवन देवता से माँगो। बाहर दीखने वाली हर वस्तु का उद्गम केन्द्र अपना ही अंतरंग है। आत्मदेव की साधना ही जीवन देवता की उपासना है।


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परमात्मा तत्व में जिन विभूतियों के भण्डार भरे पड़े हैं, क्या उन्हें जीवात्मा में पाया देखा जा सकता है। यदि वस्तुतः प्रसुप्त स्थिति में अध्यात्म वैभव की विपुल सम्भावनाएँ मनुष्य में विद्यमान है तो उन्हें प्रकट रूप से देखा दिखाया जा सकता है? आत्मिकी का उत्तरदायित्व है कि वह अपने को दुर्दशाग्रस्त दलदल में से उबरे और प्राचीन काल की तरह अपने वर्चस्व का परिचय दें।


अदृश्य जगत की संपर्क साधना

जिस प्रकार मनुष्य चेतना और पदार्थ सम्पदा का समन्वित पिण्ड है। ठीक उसी प्रकार यह ब्रह्माण्ड भी विराट् पुरुष का सुविस्तृत शरीर है। उसमें भी स्तर के अनुरूप असीम पदार्थ और अनन्त चेतन भरा पड़ा है। दोनों की मिली भगत से यह सृष्टि व्यवस्था चल रही है। उत्पादन, परिपोषण और परिवर्तन की त्रिविधि कार्य पद्धति अपनाये हुए सृष्टा का यह स्थूल शरीर पदार्थ समुच्चय अपने हिस्से का काम पूरा करने में निरत है। सृष्टा का सूक्ष्म शरीर वह है जिसमें स्थूल जगत की प्रत्यक्ष घटनाओं के लिए उत्तरदायी अदृश्य क्रिया प्रक्रिया बनती बिगड़ती रहती है। उसे परोक्ष वातावरण भी कह सकते हैं। इसी के अनुरूप संसार की अनेकानेक परिस्थितियाँ बनती और घटनाएँ घटित होती रहती हैं। सूक्ष्म जगत में भूत और भविष्य के सभी प्रवाह विद्यमान हैं जिन्हें समझ सकने पर इस अविज्ञात की जानकारी मिल सकती है कि भूतकाल में क्या घटित हुआ था और भविष्य में क्या होने जा रहा है?

वर्षा, आँधी, तूफान, हिमपात, मौसम आदि की पूर्व जानकारी लक्षणों को देखते हुए अनुमान की पकड़ में आ जाती है। इसी प्रकार अदृश्य जगत में चल रही सचेतन हलचलों को देखते हुए भविष्य की सम्भावनाओं का, भूतकाल की घटनाओं का और वर्तमान की परिस्थितियों का पूर्वाभास प्राप्त किया जा सकता है। सामान्यतः मनुष्य की समझ अपने क्रिया-कलाप का निर्धारण करने में ही काम आती है। उसे परिस्थितियों की पृष्ठभूमि तथा सम्भावना के सम्बन्ध में कोई बात अलग से जानकारी नहीं होती। सूक्ष्म जगत से संपर्क साध सकना यदि सम्भव हो सके तो अन्धेरी गलियों में भटकते रहने की अपेक्षा सुनिश्चित प्रकाश का अवलम्बन मिल सकता है। यह स्थिति जिन्हें भी प्राप्त होगी वे सम्भावनाओं को समझते हुए स्वयं उपयुक्त कदम उठावेंगे और दूसरों को अवसर के अनुरूप सतर्क रहने का मार्ग दर्शन करेंगे।

अदृश्य जगत अपने आपका एक परिपूर्ण संस्कार है। मनुष्यों की अपनी दुनिया, समाज व्यवस्था, रीति-नीति एवं जीवनचर्या है। इसी प्रकार जलचरों की, कृमि कीटकों की, वन्य पशुओं की, पक्षियों की, धूलि में पाये जाने वाले जीवाणुओं की, वायरस बैक्टीरियाओं की अपनी-अपनी दुनिया है। उनकी समस्याएँ, सुविधाएं, आवश्यकताएँ, कठिनाइयाँ, इच्छाएँ, मनुष्यों की दुनिया में सर्वथा भिन्न ही समझी जा सकती है। पड़ौस में रहते हुए भी यह अनोखे संसार एक दूसरे की परिस्थितियों से प्रायः अपरिचित ही रहते हैं। पालतू पशुओं, पक्षियों और मनुष्यों के बीच उदर पोषण जितना ही सम्बन्ध रहता है शेष का तो किसी से किसी प्रकार का आदान-प्रदान भी नहीं चलता और न कोई एक दूसरे के लिए विशेष सहयोगी ही सिद्ध होता है।

ठीक इसी प्रकार अदृश्य लोक में सूक्ष्म जीवधारियों की एक अनोखी दुनिया है। शरीर छोड़ने के उपरान्त नया जन्म मिलने की स्थिति आने तक मनुष्यों को इसी क्षेत्र में रहना पड़ता है। भूत प्रेतों की, देवी देवताओं की-लोक-लोकांतरों की-स्वर्ग नरक की चर्चा प्रायः होती ही रहती है। ऐसे प्रमाण उदाहरण आये दिन मिलते रहते हैं जिनसे दिवंगत आत्माओं से सूक्ष्म शरीर धारण किये हुए दिन गुजारने और यदा-कदा मनुष्यों के साथ सहयोग या विग्रह करने की जानकारियां मिलती हैं। मनुष्यों की तरह ही उनकी भी एक दुनिया है। चूँकि वे सभी मनुष्य शरीर को छोड़कर ही उस क्षेत्र में पहुँचे हैं इसलिए स्वभावतः इस संसार के साथ संपर्क साधने की इच्छा होती होगी। कठिनाई एक ही है कि जीवित या दिवंगत आत्माओं में से किसी को भी यह अनुभव नहीं है कि पारस्परिक संपर्क साधना और आदान-प्रदान का सिलसिला चलाना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। प्रयत्न में सफलता न मिलने पर कई प्रेतात्माएँ अनगढ़ उपाय करती हैं मूलतः मनुष्य इस अनुभूति से भयभीत एवं आतंकित होते हैं। जब कि उनमें से कितने ही प्रियजनों के साथ स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग का सिलसिला चल सकता है। एक देश दूसरे देश की- एक समाज दूसरे समाज की- एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के स्नेह सहयोग में बँध जाने पर उपयोगी परिणाम उपलब्ध करते हैं फिर कोई कारण नहीं कि कुछ समय पूर्व के अपने ही जैसे मनुष्यों की इसलिए उपेक्षा करे कि शरीर खो बैठे और सूक्ष्म शरीर में- अन्तरिक्ष में निवास कर रहे हैं। आत्मिकी में वह सामर्थ्य है कि वह इन दोनों लोगों के बीच भावनात्मक एवं क्रियात्मक सहयोग का द्वार खोल सके।

क्रुद्ध, विक्षुब्ध, रुग्ण, व्यथित पीड़ितों को सहकार देने वाली उदार मानवी करुणा विपन्न स्थिति में पड़े हुए प्रेतात्माओं की- विशेषतया सहायता की आशा अपेक्षा करने वाले दिवंगत सम्बन्धियों की सहायता करना तो सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है। दूसरों को हानि पहुँचाने में निरत क्रुद्ध आत्माओं को सांत्वना देकर उनके आक्रोश प्रतिरोध से कष्ट उठाने वालों को राहत दिलाई जा सकती है। प्रेत क्रुद्ध असंतुष्ट दुर्गतिग्रस्त आत्माओं को कहते हैं और पितर वे हैं जो श्रेष्ठ समुन्नत जीवन जीते रहे हैं। वे जीवन काल की तरह मरणोत्तर स्थिति में पहुंचने की तरह किसी के आने- किसी को सहायता पहुँचाने और परिस्थितियाँ अच्छी बनाने में योगदान करना चाहते हैं। ऐसी आत्माओं की सहायता से कितनों ने ही कितने ही प्रकार के महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त किये हैं। यह प्रकरण ऐसा है जिसे आत्मिकी के आधार पर अधिक अच्छी तरह- अधिक व्यापक एवं योजनाबद्ध प्रयोजनों के लिए खोला जा सकता है। निश्चय ही इस प्रक्रिया में दोनों ही पक्षों को लाभ मिलेगा और सन्तोष होगा।

अदृश्य जगत के सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं के साथ सम्बन्ध साधने- आदान-प्रदान का द्वार खोलने से मनुष्य का अपना दायरा और कार्यक्षेत्र बढ़ेगा। आधार रहित संपर्क ही डरावने परिणाम प्रस्तुत करते हैं- अन्यथा साँप, शेर, रीछ, बन्दर तक पालतू बनने पर दोनों पक्षों के लिए ही उसका सत्परिणाम मिलता है। अदृश्य आत्माएँ किसी आचार संहिता के आधार पर मनुष्य जगत के साथ संपर्क सधे तो दो लोकों के बीच महत्वपूर्ण प्रत्यावर्तन चल पड़ेगा और मृतकों एवं जागृतों के बीच नाम मात्र का अन्तर रह जायेगा। विगत के अनुभवों का लाभ उठाने से मनुष्य और पुराने स्नेह संपर्क के जीवित रहने पर दिवंगत आत्माएँ अपने-अपने लिए एक उत्साहवर्धक आधार बनने की प्रसन्नता अनुभव करेंगे। प्राचीन काल में मृतकों और जीवितों के बीच ऐसा ही उपयोगी प्रत्यावर्तन चलता था। श्राद्ध परम्परा में इस प्रक्रिया के बीजांकुर मौजूद हैं।

ब्रह्माण्डीय चेतना- समष्टि प्राण-परब्रह्म का विशाल भण्डार इस निखिल विस्तार के कण-कण में संव्याप्त है। उसमें से हर मनुष्य इतना ही अंश प्राप्त कर सकता है जितनी कि उसकी अवधारण क्षमता है। समझा जा सकता है कि हर मनुष्य में पन्द्रह वाट का बल्ब लगा है यदि उसे हटाकर सौ वाट का लगा दिया जाय तो उसी अनुपात में उसे करेंट मिलने लगेगा। प्लग के माध्यम से जिस भी यन्त्र को भेजा जाता है वह चल पड़ता है। करेंट बनाने वाले तार और उपकरण का सिलसिला टूट जाने पर गतिशीलता एवं उपयोगिता समाप्त हो जाती है। ठीक इसी प्रकार विश्व चेतना- विराट् ब्रह्म के साथ संपर्क जुड़ने पर सामान्य स्तर के मनुष्य भी असामान्य बनते देखे गये हैं। महापुरुष तो व्यवहार जीवन में परब्रह्म की पवित्रता, प्रखरता, उदारता, के माध्यम से अपने जीन क्रम में प्रतिष्ठित करते और अपनी क्षमता असाधारण रूप से बढ़ा लेते हैं। यह चेतन अचेतन का पक्ष हुआ। इसमें ऊँची भूमिका ऋषि कल्प योगी तपस्वियों के हैं। वे अपना उच्च चेतन अन्तःकरण परिष्कृत करते-करते इस स्तर तक पहुँचा देते हैं जिसमें परब्रह्म का तेजस् अधिक मात्रा में अवतरित हो सके। इस मार्ग पर चलते हुए मनुष्य में देवत्व का उदय सम्भव हो जाता है। तपस्वी ऋषि और मनस्वी मुनि मनुष्य शरीर में रहते हुए भी अपनी विशिष्टता इतनी बढ़ा लेते हैं कि उन्हें धरती के देवता-भूसुर-कहने में कोई अत्युक्ति न रहे।

वर्षा सर्वत्र एक जैसी होने पर भी छोटे गड्ढे में थोड़ा और बड़े तालाब सरोवर में उनकी गहराई चौड़ाई के अनुरूप अधिक पानी जमा होता है। इसमें वर्षा का अनुग्रह नहीं गड्ढे की पात्रता का चमत्कार है। परब्रह्म का अनुग्रह हर किसी को समान रूप से उपलब्ध है। न उसका किसी से राग है न द्वेष। न उस पर प्रशंसा का प्रभाव पड़ता है न निंदा का। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह उसकी व्यवस्था चलती है। अनुशासन का पालन करने ओर उच्छृंखलता बरतने वाले उसी तरह दण्ड पुरस्कार पाते रहते हैं जिस प्रकार आग या बिजली का सदुपयोग, दुरुपयोग करने वालों के समाने आता रहता है। अन्तःकरण को परिष्कृत करके परब्रह्म का अधिक अनुपात अपने में धारण करना और उसके बल पर अपनी विशिष्टता विकसित कर सकना किस प्रकार शक्य हो सकता है, यह आत्मिकी का विषय है। जो उसे जानते अपनाते हैं वे उसका सत्परिणाम भी हाथों हाथ उपलब्ध करते हैं।

पेड़ों की आकर्षण शक्ति बादलों को बरसने के लिए विवश करती है। आँख की पुतली सही होने पर प्रकाश का और कान की झिल्ली ठीक रहने पर ध्वनि का लाभ मिलता है। सदाशयता को उलटकर सद्भावना, सहायता और प्रशंसा मिलती है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति द्वारा अन्तःक्षेत्र की पवित्रता प्रखरता बढ़ाने के प्रयत्न उसे एक ऐसा चुम्बकीय पिण्ड बना देते हैं जिससे वह दृश्य जगत में सद्भावना तथा अदृश्य जगत में दिव्य अनुकम्पा अभीष्ट परिणाम में उपलब्ध करता रहे। आत्मोत्कर्ष ही साधना का एकमात्र प्रयोजन है।

प्रकृति को खोजने के लिए जिस स्तर के पुरुषार्थ हुए हैं उसी निष्ठा और तत्परता के साथ अब मानवी सत्ता के अन्तराल में सन्निहित विशिष्टताओं को खोजने, उगाने और कुशलतापूर्वक प्रयत्न करने का मार्ग प्राप्त किया जाना चाहिए। ब्रह्माण्डव्यापी पदार्थ सत्ता का वैभव आश्चर्यजनक है। उसी में से पृथ्वी अपने काम का मसाला उत्तरी ध्रुव के मुख माध्यम से खींचती और चूसने के बाद जो ठूँठ बचती है उस कूड़े-करकट को दक्षिणी ध्रुव के छिद्र से अन्तरिक्ष में धकेलती रहती है। इसी रीति नीति के सहारे पृथ्वी अपनी दरिद्रता को घटाती और सम्पन्नता को बढ़ाती रहती है। अब इसी स्तर के एक चिर पुरातन चिर नवीन क्षेत्र में प्रवेश करने की आवश्यकता है। समष्टि मानव का चेतनात्मक समुच्चय अपने ढंग का एक भूलोक है। उसकी दरिद्रता मिटाने के लिए विराट् ब्रह्म का द्वार खटखटाया जा सकता है और समष्टिगत उच्च चेतन को विकसित कर उसे उतना ही क्षमता सम्पन्न बनाया जा सकता है जितना कि धरती का उत्तरी ध्रुव। पृथ्वी अंतर्ग्रही क्षमताओं को खींचने और सोखने के कारण ही इतनी समृद्ध बनी है। यही विशेषता समष्टि मन को अध्यात्म परायण बनाकर चेतना जगत के लिए भी उपलब्ध हो सकती है। अभावों की पूर्ति मानवी प्रयत्नों से न हो सके, उतना उच्चस्तरीय उपार्जन बन पड़े तो विराट् चेतन से वैसा सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

दृश्य लोक कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो- अदृश्य लोक की विशिष्टता के साथ उसकी तुलना नहीं हो सकती। सम्पदा की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता किन्तु उत्कृष्टता का भी तो कोई मूल्य है। दृश्य जगत का पुरुषार्थ आवश्यक होते हुए भी पर्याप्त नहीं है। एकाकी पूर्णता तभी पूरी हो सकेगी जब चेतनात्मक विभूतियों का उपार्जन, संचय एव अभिवर्धन बन पड़े।

यह समूचा क्षेत्र आत्मिकी का है। उसे उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए और न ऐसी अस्त-व्यस्त स्थिति में रहते दिया जाना चाहिए जिसमें कि वह इन दिनों पड़ी हुई है।


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इस दृश्यमान एवं अदृश्य जगत के सूत्र संचालन में अपनी प्रमुख भूमिका सम्पादित कर रही है। यह समस्त संसार इसी से प्रभावित है। जड़ पदार्थ उसी के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचते हैं। जीवधारी उसी द्वारा दी हुई अन्तःप्रेरणा, विवेक बुद्धि एवं कार्य क्षमता के सहारे अपना निर्वाह क्रम चलाते हैं।


ब्रह्म सम्बन्ध जोड़ने का आरम्भिक उपचार

व्यक्ति की अपनी योग्यता और तत्परता कितनी ही क्यों न हो उसे साधनों और अनुकूलताओं की भी अपेक्षा रहती है। एकाकी प्रयत्न पुरुषार्थ अभीष्ट सफलता उपलब्ध करा नहीं पाता। योद्धा कैसा ही स्वस्थ शूरवीर क्यों न हो हथियार के बिना मोर्चे पर अपना पराक्रम दिखाने और विजय श्रीवरण करने में किस प्रकार सफल हो सकेगा? परिस्थितियाँ प्रतिकूल चल पड़े- आँधी तूफान उठ खड़ा हो, मूसलाधार वर्षा होने लगे तो योद्धा की वीरता ओर रणनीति क्या काम करे? न केवल योद्धा के लिए वरन् हर क्षेत्र के पराक्रमी प्रगतिशील के लिए यही बात लागू होती है। कुशल किसान भी बिना हल बैल और खाद बीज के फसल उगाने में कहाँ सफल हो सकता है? वर्षा न हो, तुषार, पात, टिड्डी कीड़े, आदि का सामना करना पड़े तो बेचारा क्या करे? व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, आन्दोलन आदि के बारे में भी यही बात है। पराक्रम की प्रमुखता ओर महत्ता कितनी ही क्यों न हो, साधनों और परिस्थितियों की अनुकूलता की सफलता असफलता में जो पृष्ठभूमि रहती है उससे इनकार नहीं किया जा सकता।

आत्मिकी की उपलब्धियाँ हस्तगत करने के लिए साधक का वह पुरुषार्थ आवश्यक है, जिसमें वह आत्म सत्ता को इस योग्य बनाये कि दिव्य शक्तियों को उसमें से उभारना एवं धारण कर सकना शक्य हो सके। साधना के माध्यम से यही करना होता है। राजयोग की अष्टांग साधना में पाँच यम और पाँच नियम प्रथम चरण माने गये हैं। वे न बन पड़ें तो प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि प्रयोगों का कोई तुक नहीं रह जाता। वर्णमाला, गिनती का आरम्भिक अक्षर ज्ञान न होने पर भी जो गणित और विज्ञान में एम.ए. करने की बात सोचता है वह भूल करता है। एक-एक सीढ़ी पार करते हुए ही तो क्रमशः छत पर चढ़ सकना सम्भव होता है।

साधना एक पराक्रम है, जिसके लिए प्राथमिक तैयारी योग्यता वृद्धि के रूप में करनी पड़ती है। पीछे साधनों के माध्यम से पुरुषार्थ प्रकट करने की बात बनती है। आत्म विज्ञान के अभिनव प्रयोगों में साधनारत व्यक्तियों को आत्म-सत्ता की प्रयोगशाला के सभी यन्त्र उपकरण सही स्थिति में रखने होंगे। शरीरगत इन्द्रिय शक्ति और मनोगत भाव शक्ति को संयम तथा श्रद्धा स्वीकार करने के लिए साधना पड़ता है। इस तैयारी के साथ-साथ ही यह प्रयास करना पड़ता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परब्रह्म चेतना के साथ अपने सूत्र सम्बन्धों को किस प्रकार घनिष्ठ किया जाय। घर में लगे बल्ब और पंखे तभी चलते हैं जब तारों की सही फिटिंग होने पर बिजली घर के जेनरेटरों से उनका सम्बन्ध सही रूप में जुड़ जाय। जलते तो बल्ब ही हैं, घूमते तो पंखे ही हैं पर जो मात्र दृश्य को ही सब कुछ नहीं समझते, आधारभूत कारण को भी तलाश करते हैं, उन्हें समझना होता है कि तारों में चलने वाला विद्युत प्रवाह ही इन उपकरणों को गतिशील रख रहा है। ब्रह्माण्डीय चेतना- ब्रह्म सत्ता के साथ हर साधक का आत्म तन्त्र जुड़ना चाहिए। हर खेत को सूरज की गर्मी और आकाश से नमी मिलनी चाहिए। हर व्यक्ति को जमीन से खाद्य और अन्तरिक्ष से प्राण वायु मिलनी चाहिए। जिस प्रकार गर्भावस्था में भ्रूण माता में के अनुदानों से बढ़ता पनपता है, उसी प्रकार साधक को भी विशेष उपलब्धियों के लिए विराट् को ब्रह्म चेतना का अवलम्बन लेना पड़ता है आत्मा और परमात्मा के मिलन का तात्पर्य यही है कि दोनों के बीच आदान-प्रदान का सिलसिला चल पड़े। धरती की सम्पदा सूर्य की अनुकम्पा पर निर्भर है। मनुष्य को उच्चस्तरीय सामर्थ्य एवं प्रगति के लिए परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ने और अनुग्रह उपलब्ध करने का प्रयास भी करना पड़ता है। आत्म संशोधन की बात तो इससे पहली है ही। यात्रा तो दोनों कदम उठाते हुए ही पूर्ण होती है। एक कदम आत्मशोधन और दूसरा ब्रह्म सम्बन्ध समझा जाता चाहिए। आत्मिक प्रगति की गाड़ी यह दोनों पहिये सही होने पर ही आगे बढ़ती है।

दोनों के बीच सघन सम्बन्ध बनाने के लिए साधना को मध्यवर्ती सूत्र माना जा सकता है। भ्रूण की नाभि से जुड़ा हुआ नाल तन्तु उसे माता के साथ जोड़ता है। बिजली घर और बल्ब के बीच तारों की फिटिंग संबंध जोड़ती है। दो पहियों के मध्य धुरी की भूमिका रहती है। जनता और सरकार का मध्य सूत्र अफसरों से जुड़ता है। कठपुतली और बाजीगर के बीच चलने वाली हलचलों में पतले धागे काम करते हैं। आत्मा और परमात्मा का विवाह कराने में- दोनों का हाथ एक-दूसरे के हाथ में मजबूती के साथ थामने में जो विवाहोपचार होता है प्रकारान्तर से उसकी तुलना साधना से ही जा सकती है।

साधना के लिए मन और शरीर दोनों को साधना पड़ता है। मानसिक परिष्कार के लिए ‘योग’ और शारीरिक प्रखरता उभारने के लिए ‘तप’ का आश्रय लेना पड़ता है। योग और तप की परिधि में अनेकों प्रकार के अभ्यासों और अनुशासनों का विधि-विधान है। इसमें से कौन किसे अपनाये यह व्यक्ति विशेष की स्थिति का अतिरिक्त विश्लेषण करके ही यह तालमेल बैठता है कि किस मनःस्थिति में किस साधना को परिस्थिति को हृदयंगम करना और व्यवहार में उतारना बन पड़ेगा। सबके लिए एक जैसे निर्धारण नहीं हो सकते। एक कक्षा के बच्चों को तो एक पाठ्यक्रम का अभ्यास कराया जा सकता है, पर एक रोग के हर रोगी को एक जैसी चिकित्सा एवं परिचर्या नहीं बताई जा सकती है। उसमें रोग इतिहास, रोग का कारण एवं रोगी की वर्तमान स्थिति का निदान विश्लेषण करना होता है। इसके उपरान्त ही कुशल चिकित्सक उपचार का निर्धारण करते हैं। इसी प्रकार साधना के मोटे नियम तो हर साधक के लिए एक जैसे हो सकते हैं, पर व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुरूप विशेष परामर्श की- विशेष मार्गदर्शन की- विशेष देखभाल की जरूरत पड़ती है।

अपनी स्थिति को आप समझ सकना कठिन है। इसलिए रोगी होने पर अच्छे डॉक्टर भी दूसरे डॉक्टर बुलाते और उनके परामर्श अनुशासन में अपना इलाज चलाते हैं। साधना क्षेत्र में भी यही नीति अपनानी होती है। न केवल स्थिति के अनुरूप साधना विशेष का चयन करना होता है वरन् उस निर्धारण के लिए अनुभवी मार्ग-दर्शन का परामर्श अनुशासन भी उपलब्ध करना होता है। साधना क्षेत्र में ‘गुरु’ वरण की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। इसका प्रयोजन अपने उपचार के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहयोग जुटाने जैसा है। छात्रों को अध्यापक की भी जरूरत पड़ती है। बाजार से पुस्तकें खरीद कर बिना किसी से पूछताछ किये अपने आप उत्तीर्ण होते रहना कठिन है। बच्चा अपने आप वर्णमाला और गिनती को पढ़ना-लिखना, बिना किसी सहयोग के किस प्रकार आरम्भ करे? संगीत शिल्प आदि में कोई एकाकी मात्र अपने ही प्रयास से कैसे प्रवीण बने? भौतिक क्षेत्रों की तरह आत्मिक क्षेत्र में भी ऐसे उच्चस्तरीय मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है, जिसे न केवल विश्लेषण निर्धारण में प्रवीणता प्राप्त हो, वरन् उस मार्ग पर लम्बी यात्रा करने के उपरान्त जिसने अनुभव भी सम्पादित किया हो।

अल्प प्राण महाप्राण से जुड़ने के लिए उपयुक्त मार्ग-दर्शक चाहिए ही। यह कार्य चिन्ह पूजा के लिए गुरु बनाने या शिष्य बनने की लकीर पीटने से सम्पन्न नहीं होता, दोनों के बीच ग्रहण कर सकने की श्रद्धा और दे सकने की उदार क्षमता का समुचित अनुपात भी रहना चाहिए। स्कूली बच्चों और अध्यापकों के बीच मात्र बताने, समझने का सम्बन्ध रहने पर भी काम चलता रहता है, किन्तु आत्मिक क्षेत्र में उतने भर से काम चलता रहता है, किंतु आत्मिक क्षेत्र में उतने भर से काम नहीं चलता क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र के ‘गुरु’ को न मात्र विश्लेषण निर्धारण में डॉक्टर जैसी ड्यूटी पूरी करने भर से छुटकारा नहीं मिलता वरन् उनके मध्य अभिभावकों और बाल-गोपालों के बीच चलने वाला आदान-प्रदान भी अनिवार्य होता है। सामान्य व्यवहार में अध्यापक पढ़ाते और अभिभावक खर्च उठाते हैं। आध्यात्मिक गुरु को यह दोनों ही कार्य साथ-साथ करने होते हैं और इस महत्वपूर्ण अनुकम्पा उपलब्धि के लिए शिष्य को ऐसी मृदुल स्थिति में रखना पड़ता है जिससे वात्सल्य अनायास ही टपकने लगे। गाय बछड़े को- माता बच्चे को स्वेच्छापूर्वक पयपान कराती है इससे पूर्व यह स्थिति बन चुकी होती है कि माता का दुलार उसके अन्तराल में अनायास ही हुलसने लगे। पेट से उत्पन्न हुए बच्चे के सम्बन्ध में अनुदान की प्रेरणा तो प्रकृति प्रदत्त होती है, पर शिष्य को निजी सन्तान की तरह अनुभव कराने के लिए अपनी भाव श्रद्धा को प्रयत्नपूर्वक परिपक्व करना होता है।

समझा जाना चाहिए कि भक्त का भगवान को अपने समीप खींच बुलाने में भक्ति भावना ही एक मात्र आकर्षण चुम्बकत्व है। भौतिक क्षेत्र में शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता का जो महत्व है वही आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा का है। उपासना उपचारों में कर्मकाण्ड परक विधि-विधान पूरे करने भर से काम नहीं चलता। उसके लिए तद्नुरूप श्रद्धा भी उभरनी चाहिए। अन्यथा कर्मकाण्ड अनुष्ठान मात्र श्रम उपचार भर रह जायेंगे और उनका उतना ही प्रतिफल मिलेगा जितना कि उस स्तर के ‘परिश्रम’ का मिलना चाहिए। चमत्कार तो तब उत्पन्न होते हैं जब साधना विधि के साथ सघन श्रद्धा का भी समावेश होता है। इसलिए अध्यात्मिक क्षेत्र के सर्वोपरि-सर्वसमर्थ-श्रद्धा शास्त्र को अधिकाधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता पड़ती है। इसका प्रारम्भिक अभ्यास कैसे हो? इसलिए गुरुतत्त्व को एकलव्य की तरह अपने निजी प्रयत्न से समर्थ बनाना पड़ता है। यही है ‘गुरु दीक्षा’ और ‘गुरु दक्षिणा’ की परस्पर संबद्ध प्रक्रिया। शिष्य को गुरु पर सघन श्रद्धा का आरोपण करना होता है और गुरु शिष्य पर अपना अनुदान भरा वात्सल्य बखेरता है। दोनों एक-दूसरे के सहयोगी रहते हुए- हित साधना करते हुए- अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करते एवं श्रेय सम्पादित करने में सफल होते हैं। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व वाले गुरु के माध्यम से श्रद्धा को अधिक पैनी बना लेने वाले साधक उस चुम्बकत्व को परब्रह्म के निमित्त नियोजित करते हैं तो उसमें भी वैसी ही उपलब्धियाँ अर्जित कर सकते हैं जैसी कि शरीरधारी गुरु की अनुकम्पा प्राप्त की जा सकी।

भव्य भवन बनाने से पूर्व उसके नक्शे या मॉडल बनाने पड़ते हैं। मोर्चे पर लड़ने से पूर्व सैनिकों को छावनी में नकली लड़ाई लड़नी पड़ती है। लड़कियाँ गुड्डे-गुड़ियों का- चूल्हे चक्की का खेल खेलकर भावी गृहस्थ संचालन की पूर्ण शिक्षा आरम्भ करती हैं। ब्रह्माण्डीय चेतना के- परब्रह्म के साथ किस आधार पर तादात्म्य जोड़ा जाय, इसका एकमात्र उत्तर ‘श्रद्धा विश्वास’ है। श्रद्धा अर्थात् अनन्य आत्मीयता। विश्वास अर्थात् निर्देश अनुशासन का निष्ठापूर्वक परिपालन। यह दोनों शब्द हवाई नहीं हैं। कह देने या सुन लेने से कुछ बनता नहीं। अन्तराल को उत्कृष्टता के साथ अनन्य आत्मीयता स्थापित करने के लिए न केवल सहमत करना वरन् उसका अनुभव अभ्यास भी करना कठिन है। इसे आरम्भ में निराकार के लिए प्रयुक्त करना तो और भी दुस्तर हो जाता है। इसके लिए प्रत्यक्ष अभ्यास के लिए गुरु वरण की आवश्यकता पड़ती है। दैवी अनुशासन अपनाये बिना व्यक्तित्व का इस स्तर का बनना सम्भव नहीं जिस पर ईश्वरीय अनुकम्पाएँ बरसें। कुसंस्कारिता को छाती से चिपकाये हुए पूजा उपचार के माध्यम से देवताओं की जेब काटने का कुचक्र रचने वाले आमतौर से निराश ही रहते हैं। अनुशासन की तपश्चर्या ही उस पात्रता को परिपक्व करती है जिसके आधार पर विश्व चेतना के भाण्डागार से कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकें। यह आदर्शवादी अनुशासन आरम्भिक साधकों को दैवी क्षेत्र से सीधे मिल सकें, ऐसा शक्य नहीं। इसलिए उसके लिए किसी मध्यवर्ती, प्रत्यक्ष मार्गदर्शक एवं नियन्त्रण की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि ब्रह्म सम्बन्ध का श्रीगणेश गुरु सम्बन्ध बनाने के रूप में करना पड़ता है। आत्मिक प्रगति की यही सनातन परम्परा है।


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यदि तुम अविच्छिन्न रूप से आत्म-चिन्तन नहीं कर सकते तो कम से कम दिन में एक बार तो किया करो, प्रातः काल अथवा रात्रि में। प्रातः काल अपना ध्येय निश्चित कर लो और सोते समय अपनी परीक्षा कर लो तुमने क्या किया है, मन, वचन और कर्म से तुमने कैसा व्यवहार किया है।

-विवेकानन्द


साधना के लिए उपयुक्त साधनों की आवश्यकता

साधना के लिए जिस प्रकार आहार-विहार में अधिकाधिक सात्विकता का समावेश रखने की आवश्यकता है उसी प्रकार उसके लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध किया जाना चाहिए। वातावरण से तात्पर्य है उद्देश्य के अनुरूप स्थान एवं संपर्क सान्निध्य। इन दोनों का सुयोग न बन पड़ने पर विक्षेपों के घटाटोप जमते रहते हैं और प्रयत्न को अग्रगामी न होने देने वाले अवरोध पग-पग पर आ खड़े होते हैं। इसलिए शान्तिदायक स्थान और उसी तरह के लोगों का सामीप्य भी आवश्यक हो जाता है।

घर में पूर्वाभ्यास के संचित संस्कार मन पर जमे रहते हैं और वे अपने अभ्यस्त स्वरूप का परिचय निरन्तर देते रहते हैं। इसी प्रकार जिन लोगों के साथ उथले स्तर पर मेलजोल रहा है और उचित अनुचित व्यवहार चलते रहे हैं। वहीं रहते हुए पूर्वाभ्यासों की प्रभाव प्रक्रिया से बच निकलना कठिन होता है। इसलिए यदि वस्तुतः किसी ठोस परिणाम वाली साधना अभीष्ट हो तो उसके लिए अनुकूल वातावरण की तलाश भी करनी चाहिए। घर रहकर पुराने ढर्रे के- सामान्य घटिया मनोभूमि वाले लोगों के बीच निर्वाह करते हुए यह कठिन है कि दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली महत्वपूर्ण साधना बन पड़े। यों नित्य कर्म की तरह ही भगवान का नाम कहीं भी, किसी भी स्थिति में लिख जा सकता है। पर ध्यान में तो यह बात रहनी ही चाहिए कि मनोभूमि में सन्तुलन रखने एवं विक्षोभ उत्पन्न करने के वातावरण का असाधारण योगदान रहता है। उसकी अनुकूलता प्रतिकूलता अपना भला-बूरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती।

सम्भव हो तो इसके लिए वैसे स्थान में रहने की बात सोचनी चाहिए जैसे कि प्राचीन काल में तीर्थ नाम से प्रख्यात थे। वहाँ प्राकृतिक शोभा शान्ति भी थी। सान्निध्य रहन-सहन, प्रचलन, प्रशिक्षण की दृष्टि से भी अनुकूलता रहती थी। साथ ही परामर्श मार्गदर्शन का उपयुक्त सत्संग भी मिलता रहता था। सभी जानते हैं कि कठिन रोगों के इलाज के लिए अस्पताल में इसलिए भर्ती होना पड़ता है कि वहाँ कुशल चिकित्सक एवं उपचार साधन हर घड़ी उपलब्ध रहते हैं। स्वास्थ्य लाभ के लिए उपयुक्त जलवायु वाले सेनेटोरियमों उपचार ग्रहों में स्थान पाने की चेष्टा की जाती है क्योंकि चिकित्सा सामान्य होते हुए भी वातावरण की विशिष्टता रोग निवारण एवं स्वास्थ्य सम्पादन में विशेष सहायता करती है। साधना की यदि आत्मिकी क्षेत्र को कायाकल्प चिकित्सा माना जाय तो उसके लिए अस्पताल में-सेनेटोरियमों में भर्ती होने जैसा सुयोग्य वहाँ मिल सकता है जहाँ के वातावरण में आध्यात्मिकता का सहज समावेश विद्यमान है। जिनके पास समय या सुविधा नहीं है वे घर में थोड़ा हटकर उपयुक्त वातावरण ढूंढ़े कम से कम इतना तो करें ही एकान्त कक्ष न होने की दशा में खुली छत पर जा बैठने या पास-पड़ोस में ही कोई पार्क, उद्यान, मन्दिर, जलाशय तट जैसा स्थान खोजने का प्रयत्न करें। न मिल सके तो ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ की नीति अपनाकर घर में भी यथा सम्भव अधिक स्वच्छता एवं निस्तब्धता बनाये रखने की चेष्टा करें। यह बात भुलाये जाने योग्य नहीं है कि साधना के लिए उपयुक्त वातावरण का सुनिश्चित महत्व रहता है।

उच्चस्तरीय साधना की दृष्टि से हिमालय की छाया और गंगा की गोद का असाधारण महत्व माना गया है। सप्त ऋषियों से लेकर मध्यवर्ती योगी तपस्वियों की सफल साधनाएँ प्रायः इसी क्षेत्र में सम्पन्न होती रही हैं। भगवान राम और उनके तीनों भाई, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होते ही आत्म-साधना के लिए अयोध्या छोड़कर हिमालय पहुंचे थे। वशिष्ठ गुफा के थोड़े-थोड़े फासले पर चारों ने अपनी-अपनी एकान्त कुटियाएँ बनाई थीं। राम देव प्रयाग में, लक्ष्मण लक्ष्मण झूला में, भरत ऋषिकेश में और शत्रुघ्न मुनि की रेती में जा बसे थे। अयोध्या में उन्हें स्थान की कमी नहीं थी, पर स्थान एवं व्यक्ति परिवार के साथ जो सूक्ष्म सम्बन्ध जुड़े होते हैं वे चित्त शोधन की प्रक्रिया में अन्त तक बाधक ही बने रहते हैं। इसलिए स्थान परिवर्तन की उपयोगिता ऐसे दिव्य प्रयोजन की कितनी अधिक होती है उसे सहज ही समझा जा सकता है।

भगवान कृष्ण ने युवावस्था में तप साधना बद्रीनाथ में की थी और वृद्धावस्था में वे समुद्र तट पर द्वारिका चले गये थे। जन्म स्थान एवं क्रीड़ा क्षेत्र मथुरा वृन्दावन इसके लिए उन्हें रुचा नहीं था। पढ़ने के लिए भी वे उज्जैन संदीपन ऋषि के आश्रम में ही रहे थे। घर में ट्यूशन लगाने या पड़ोस के स्कूल में पढ़ने से उन्हें यह बात बनती दिखाई नहीं पड़ी जो उच्चस्तरीय संस्कार सम्पादन के लिए गुरुकुलों का आश्रम लेने से ही सम्भव होती है। राम और लक्ष्मण की शिक्षा भी माता-पिता के लाड़-प्यार और सुविधा भरे राजमहल में रहकर सम्पन्न नहीं हुई थी उन्हें विश्वामित्र के आश्रम में आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश पाना और निवास करना पड़ा था। इसी कारण कृष्ण मथुरा या गोकुल में नहीं उज्जैन संदीपन ऋषि के आश्रम में पूरी किशोरावस्था तक पड़े थे।

हिमालय के हृदय क्षेत्र का इतिहास पढ़ने से प्रतीत होता है कि भारत के अधिकांश अध्यात्मिक विज्ञानी इसी क्षेत्र में लम्बे समय तक रहकर अपनी-अपनी साधनाएँ करते रहे हैं। समस्त ऋषियों की गुफा, कन्दराएँ इसी क्षेत्र में पाई गई हैं। पाण्डवों की तरह अन्यान्य महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी साधना एवं प्रायश्चित्त प्रक्रिया के लिए इसी क्षेत्र में डेरा डालते हैं। गंगाजल, गंगा तट साधना की अवधि में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है। प्रसिद्ध है कि जब गंगा लेकर भागीरथ आगे-आगे चल रहे थे तो मांग में हरिद्वार के निकट सप्त ऋषि अपनी सात कुँजों में तप करते पाये गये। गंगा ने उन्हें हटाया नहीं वरन् स्वयं ही सात भागों में विभक्त होकर उनके साधना स्थलों को यथावत् रहने दिया। यह स्थान अभी सप्ती सरोवर के नाम से प्रख्यात है। शान्तिकुँज, ब्रह्मवर्चस् और गायत्री तीर्थ उसी दृष्टि से इस क्षेत्र में बनाये गये हैं कि पूर्ण संचित संस्कारों को इस भूमि से विशेष प्रभाव जुड़ा रहने के कारण साधकों की सफलता सरल होती रहे।

प्राचीन काल के ऐतिहासिक घटनाक्रमों में- उच्चस्तरीय व्यक्तियों में अपने ढंग की विशेष ऊर्जा होती है। जो उन व्यक्तियों के या घटनाओं के न रहने पर भी चिरकाल तक अपनी विशिष्टता से उस स्थान एवं क्षेत्र को प्रभावित किये रहती है। उन स्थानों के संपर्क में आने वाले भी उससे प्रभावित होते हैं। कसाईखाने, शराब गृह, चकले, जुआरियों अड्डे, श्मशान आदि जहाँ रहे होते हैं वे स्थान उन दुष्ट कर्मियों के न होने पर भी उन स्थानों पर अपनी काली छाया डाले रहते हैं और वहाँ रहने या अपने जाने वालों को उन दुष्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए उत्तेजित करते रहते हैं। यह बात श्रेष्ठ कृत्यों या व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी है। गुरुकुल, आरण्यक, तपोवन, ऋषि आश्रम, जहाँ किसी समय रहे थे उन स्थानों में वह पुरातन वातावरण अभी भी अपने प्रभाव का परिचय देता हुआ मिल सकता है। तीर्थ स्थान ऐसे ही ऐतिहासिक स्थानों को कहते हैं जहाँ प्राकृतिक वातावरण, पवित्र जलाशय जैसी शान्तिदायक स्थिति रहने के कारण भूतकाल के अध्यात्मवादी प्रयत्नों की श्रृंखला जुड़ी रही है। ऐसे स्थानों में सम्पन्न हुए सत्प्रयत्न चिरकाल तक अपना प्रभाव बनाये रहते हैं और उसके संपर्क में आने पर सामान्यजन अधिक लाभ उठाते हैं। इन तीर्थों का वातावरण धूर्त अनाचारियों ने भावुक धर्म प्रेमियों का शोषण करते रहने के कारण बुरी तरह बिगाड़ दिया है। जनसंख्या बढ़ने, व्यवसायिक क्षेत्र एवं पर्यटन केन्द्र बनने से वह पुरातन उत्कृष्टता नहीं रही तो भी पुरातन ऊर्जा इतनी प्रचण्ड है कि अवाँछनीयता बढ़ जाने पर भी विशेषताएँ अभी भी अन्यत्र की तुलना में कहीं अधिक पाई जा सकती हैं। साधना के लिए ऐसे ही स्थान चुने जा सके तो सामान्य स्थानों की तुलना में अधिक सफलता मिलने की सम्भावना रहती है।

साधक का आहार अपने आप में एक साधना है। आरोग्य क्षीण होने पर आयुर्विज्ञान के निष्णात उन्हें दूध-कल्प, छाछ-कल्प, आम्र-कल्प आदि आहार विशेष पर रखकर शरीर शोधन कृत्य करते हैं। इसी प्रकार खाद्य पदार्थों के अन्तराल में रहने वाली चेतना शक्ति को ध्यान में रखते हुए साधकों को आहार में कुछ विशिष्ट वस्तुओं का समावेश करके उन्हें पकाने का विशेष उपक्रम बनाकर ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिसमें वह आहार ही एक प्रकार के आध्यात्मिक काय-कल्प का आधार बन सके। यज्ञीय धान्यों में तिल, जौ, चावल की प्रमुखता है। इन्हें हविष्यान्न भी कहते हैं। इन पर अवलम्बित रहकर भी एक प्रकार के साधना का लाभ उठाया जा सकता है। अस्वाद व्रत, शाकाहार, फलाहार, एक समय का भोजन, दो वस्तुओं पर निर्भर रहना जैसे कितने ही उपवास तप के छोटे-बड़े प्रयोजन हैं, उनमें से साधक की स्थिति के अनुरूप निर्धारण किये जाते हैं। किस ईंधन से पकाया जाय, पकाने और परोसने वाले के संस्कार कैसे होंगे यह सब बातें भी साधक की आत्म-सत्ता को प्रभावित करती हैं।

जहाँ जैसे लोगों का बाहुल्य होता है वहाँ का प्रत्यक्ष और परोक्ष माहौल भी वैसा ही बन जाता है। व्यक्ति विशेष की विद्युत शक्ति दूसरों को प्रभावित करती है। समर्थ व्यक्ति अपने से कमजोरों पर छाप छोड़ते हैं। यह मानवी विद्युत के चमत्कार संगति के प्रभाव बनकर सर्वत्र अपनी क्षमता का परिचय देते पाये जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रचण्ड प्राण ऊर्जा सम्पन्न व्यक्तियों के निकट रहकर उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ तथा सामर्थ्यें अनायास ही पाते रहने का सुयोग प्राप्त किया जा सकता है। तीर्थों की एक बड़ी विशेषता यह थी कि वहाँ निवास करने वाली प्रतिभाएँ परामर्श शिक्षण से ही नहीं अपनी प्रचण्ड ऊर्जा से भी संपर्क में आने वालों को महत्वपूर्ण अनुदान अनायास ही हस्तान्तरित करती रहती थीं। इन दिनों भी उन उपलब्धियों का सर्वथा अभाव नहीं हुआ है। तलाश करने पर ऐसे उत्कृष्टता भरे स्थान एवं वातावरण अभी भी उपलब्ध हो सकते हैं जिनके सहारे साधना को अपेक्षाकृत अधिक सरलता से सफल बनाया जा सके।

इस प्रकरण में साधनों, व्यक्तियों, स्थानों, उपकरणों का उल्लेख किया गया है जो साधना को समर्थ बनाने में काम आ सकते हैं। आवश्यक नहीं कि वे वैसे ही हों जैसा कि उन्हें होना चाहिए। इस अभाव की पूर्ति अपनी सघन श्रद्धा को आरोपित करके भी की जा सकती है। एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य और मीरा ने पत्थर के कृष्ण बनाये और सर्व समर्थ बने थे। स्वतः समर्थ सहायक मिल कसे तो प्राथमिकता उन्हें ही देनी चाहिए यदि न मिलें तो अपनी श्रद्धा का आरोपण करके भी उन्हें प्रभावोत्पादक बनाया जा सकता है, विश्वास के आधार पर झाड़ी से भूत बन सकता है तो कोई कारण नहीं कि सामान्य साधन उपकरणों एवं व्यक्तियों को भी इस योग्य बनाया जा सकता है कि वे अपने वास्तविक मूल्य की तुलना में विशिष्ट साधक के लिए विशिष्ट चमत्कार प्रस्तुत कर सके।

इस प्रकार स्वाध्याय, सत्संग, मनन-चिन्तन के माध्यम से चिन्तन प्रक्रिया एवं भाव संवेदना के क्षेत्र में निकृष्टता के निराकरण एवं उत्कृष्टता के संस्थापन, अभिवर्धन की प्रक्रिया सहज गति से चलती रहती है। इस आधार पर बनायी गयी स्वनिर्मित चेतना को प्रभावित करने वाला विचार वातावरण उत्कृष्टता संवर्धन में ऐसा चमत्कार दिखता है मानो वह किसी अन्य लोक से, समर्थ देवता या सिद्ध पुरुष द्वारा वरदान की तरह दिया गया है।


Quotation

जिस मनुष्य ने जैसा कर्म किया है वह उसके पीछे लगा रहता है। यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजी के साथ उसके पीछे जाता है। जब वह सोता है तो उसका कर्मफल भी उसके साथ ही सो जाता है। जब वह खड़ा होता है तो वह भी पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है तो उसके पीछे-पीछे वह भी चलने लगता है। इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता। सदा छाया के समान पीछे लगा रहता है।

-उपनिषद्


सामान्य जीवन में असामान्य स्तर की तपश्चर्या

साधना का महत्वपूर्ण पक्ष है- तपश्चर्या। तप का अर्थ है तपाना। भूमि से निकले मिट्टी मिले लोहे को भट्टी में पकाकर शुद्ध किया जाता है। तब उसकी स्थिति औजार, उपकरण बनाने जैसी बनती है। अन्य धातुओं का शोधन भी अग्नि संस्कार से ही होता है। पकाई हुई ईंटें ही चिरस्थायी बनती हैं। पानी से भाप बनता और उससे रेलगाड़ी जैसा विशाल तन्त्र चल पड़ना यह सिद्ध करता है कि तपाने से उत्पन्न की गई गर्मी क्या-क्या चमत्कार उत्पन्न करती है। जिधर भी दृष्टि पसार कर देखते हैं, समस्त हलचलें, सामर्थ्यें ऊर्जा के माध्यम से उभरती दीखती हैं। उनके बिना न अन्न पकता है न अण्डा फूटता है। शरीर हो या कारखाना सभी को ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ईंधन जुटाना पड़ता है। व्यक्ति की सामर्थ्य भी तपश्चर्या के आधार पर ही उभरती है। भौतिक जगत में समस्त शारीरिक, मानसिक प्राणि प्रदत्त एवं यन्त्र चालित, पुरुषार्थ अपने-अपने क्षेत्र के ‘तप’ कहे जा सकते हैं उन्हें शक्ति का पर्यायवाचक माना जा सकता है। शक्ति ही सफलता की जननी है यह खुला रहस्य हर किसी को विदित है। जो इतना जानते हैं उन्हें यह तथ्य भी जानना चाहिए कि शक्ति किसी पर बिजली की तरह आसमानों से नहीं टूटती वरन् वह प्रयत्नपूर्वक उपार्जित अर्जित करनी पड़ती है।

अभ्यस्त चिन्तन प्रवाह में संचित निकृष्टता भरी रहती है। परिचितों का आग्रह और प्रचलनों का दबाव भी उसी दिशा में घसीटता है ऐसी दिशा में अपनी चेतना को अपने बलबूते ही उछालने का प्रयत्न करना होता है। इसके लिए आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्मसुधार के सुनिश्चित एवं कारगर कदम उठाने के लिए संकल्प युक्त व्रतशील रीति-नीति अपनानी और दूरदर्शी योजना बनानी पड़ती है। इस प्रयोजन के चार उपचार काम में आते हैं (1) स्वाध्याय (2) सत्संग (3) चिन्तन (4) मनन। यह चारों ही उद्देश्यपूर्ण एवं सुनियोजित होने चाहिए। अपने चिन्तन ने जिस स्तर की निकृष्टताएँ दृष्टिगोचर हों उसके लिए उसी स्तर का प्रतिपक्ष ढूँढ़ा जाना चाहिए और अनौचित्य की टक्कर में औचित्य का पक्ष मजबूत बनाकर खड़ा कर देना चाहिए। लोहे को लोहे से काटा जाता है। काँटे से काँटा निकलता है। ‘विष एवं विषमौषधम्’ ‘शठे शाठयं समाचरेत्’ घूंसे का जवाब लात के रूप में देने की बात साधना समर में ही समग्र रूप से प्रयुक्त होती है। गीता रहस्य का असली महाभारत यही है जो अन्तराल के धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जाता है। भगवान इसी संग्राम के लिए अर्जुन को प्रोत्साहित करते हैं और युद्ध तथा योग की परस्पर संगति बिठाते हैं।

‘तप’ शरीरगत होता है। उस आधार पर अनगढ़ आदतों को मोड़ने-मरोड़ने और गुण, कर्म, स्वभाव की सुसंस्कारिता को स्वीकारने के लिए ही नहीं अभ्यास में उतारने का प्रबल प्रयत्न किया जाता है। आमतौर से क्षमताएँ अस्त-व्यस्त, विश्रृंखलित रहती हैं। उनका अपव्यय या दुरुपयोग होता रहता है। इस बिखराव को रोका जा सके और उस संचित शक्ति स्त्रोतों की उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए लाया जा सके तो इस बचत का लक्ष्य पूर्ति के लिए चमत्कारी उपयोग हो सकता है। और मनुष्य अपनी निजी सामर्थ्य के बलबूते ही इतनी प्रगति कर सकता है मानो किसी आकाश, पाताल के देव-दानव ने उस पर आश्चर्यजनक क्षमता का भण्डार उड़ेल दिया हो। तप से शक्ति के अजस्र स्त्रोत हाथ लगने के आप्तवचन एवं शास्त्र प्रतिपादन इसी प्रकार साकार होते हैं।

‘तप’ को व्यावहारिक जीवन में “संकल्प निष्ठ संयम” भी कहा जाता है। अपनी ही विचारणा एवं क्रियाशीलता को बिखरने से रोकना और सत्प्रयोजनों में जुट पड़ना सम्भव हो सके तो इतने भर आश्चर्यजनक विभूतियाँ देखते-देखते करतलगत होने लगती हैं। बन्दूक की नली से चली हुई बारूद गोली को निशाना बेधने की शक्ति देती है। आतिशी शीशे द्वारा केन्द्रित की गई दो इंच घेरे की सूर्य किरणें अग्निकाण्ड खड़ा कर देने में समर्थ होती हैं। भाप को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से रेल चल पड़ती है। फायर ब्रिगेड के छोटे मुँह वाले पाइप से निकली हुई धारा कितनी तेज होती है। यह बिखराव को रोककर एक केन्द्र पर नियोजित करने के ही चमत्कार हैं। अर्जुन इसी विशेषता के कारण मत्स्य वेध और स्वयंवर विजय में सफल हुआ था। तपश्चर्या में जीवन के विविध-विधि बिखरावों को रोकर उद्देश्यपूर्ण प्रयोजन में ही उन्हें नियोजित करने का कौशल सीखना पड़ता है।

(1) इन्द्रिय संयम (2) समय संयम (3) अर्थ संयम (4) विचार संयम यह चार तप साधन ऐसे हैं जिन्हें अपनाने वाले प्रयत्नों के अनुरूप सत्परिणाम हाथों हाथ उपलब्ध करते चलते हैं।

इन्द्रियों में जिह्वा और जननेन्द्रिय मुख्य हैं। जीभ की उच्छृंखलता से चटोरापन पनपता और पेट पर अनावश्यक भार लदने के कारण अनेकानेक आकृति-प्रकृति के रोगों का आक्रमण होता है। जिह्वा का दूसरा कार्य है- सम्भाषण। इस क्षेत्र की भी अनेकों कुसंस्कारिताएँ हैं। कटुवचन, छल, पतन-पराभव, आवेश, अहंकार तिरस्कार जैसे अनेक दुर्गुण वाणी के हैं। इन्हें सुधारा और वचन शैली में मधुरता, नम्रता एवं सौजन्य का समावेश किया जा सकेगा तो विरानों को अपना बनाने में देर नहीं लगती।

परिष्कृत जिह्वा का उपयोग जप, पाठ, कीर्तन, परामर्श, प्रवचन आदि किये जाने पर उसे आश्चर्यजनक प्रतिफल होते हैं। मन्त्रों के चमत्कार साधक की परिष्कृत वाणी पर बहुत कुछ निर्भर करते हैं। शाप, वरदान देने में भी ऐसी ही साधना द्वारा सुसंस्कृत बनाई गई वाणी ही सम्पन्न करती है। ऐसी जिह्वा सरस्वती कहलाती है और उसके कथन अमोघ सिद्ध होते हैं। शब्द बेधी बाण की तरह उसका प्रभाव होता है।

जिह्वा क्षेत्र की साधना में मात्र स्वाद जीतना ही नहीं- आहार को औषधि बुद्धि से सेवन करना ही नहीं, अभक्ष्य-भक्षण से बचना भी एक प्रक्रिया है। अभक्ष्य मात्र मद्य, माँस, मसाले उत्तेजना को ही नहीं कहते वह सब भी अभक्ष्य हैं जो अनीति से अथवा बिना परिश्रम किये पाया गया है। अन्न से मन बनता है। मन क्षेत्र का परिष्कार ही आत्मिक प्रगति का मूल आधार है। अस्तु मन की शुद्धि के लिए अन्न की शुद्धि पर विशेष रूप से ध्यान देना पड़ता है। सात्विक ही नहीं न्याय और श्रम द्वारा उपार्जित सुसंस्कारी हाथों द्वारा विनिर्मित भोजन भी जिह्वा इन्द्रिय की साधना में सम्मिलित है।

इसी प्रकार ब्रह्मचर्य भी इन्द्रिय निग्रह का महत्वपूर्ण अंग है। उसे न केवल शरीर से वरन् मन की कामुकता में रुचि लेने से भी विरत करना पड़ता है। तभी समग्र ब्रह्मचर्य की साधना सधती है। अस्वाद, उपवास, मौन एवं ब्रह्मचर्य की साधना इन्द्रिय संयम में प्रधान है। अन्य इन्द्रियों का भी इसी प्रकार संयम बरता और तपश्चर्या का एक चरण पूरा किया जाता है।

इन्द्रिय संयम की तरह ही अर्थ संयम आवश्यक है। मितव्ययी व्यावहारिक जीवन में अपव्ययजन्य दुर्व्यसनों से बचे रहते हैं। न चिन्तातुर रहते हैं न ऋणी बनते हैं और न लोभ वश कुकर्म करने के लिए ललचाते हैं। सादा जीवन उच्च विचार के दोनों पक्ष एक-दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से सम्बन्ध हैं। मितव्ययी कम में गुजारा कर लेता है फलतः समय, श्रम, चिन्तन और साधनों की बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर पुण्यफल एवं सुख सन्तोष अर्जित करता है। अधिक कमाने की छूट है, किन्तु अध्यात्म प्रेमी को औसत नागरिक के स्तर का निर्वाह क्रम अपनाना पड़ता है और बचत की सत्प्रवृत्ति संवर्धन की धर्म धारणा में लगाना पड़ता है। यह नीति व्यक्ति के लिए भी श्रेयस्कर है और समाज कल्याण में भी सहायक। अपव्यय के बदले ही असंख्यों दोष-दुर्गुण खरीदे जाते हैं, यदि मितव्ययिता की नीति अपनाली जाय तो फिर वासना, तृष्णा, ललक, लिप्सा, उद्धत प्रदर्शन जैसे दुष्प्रवृत्तियों से भी सहज ही बचा जा सकेगा। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए साधना प्रयोजनों में अर्थ संयम की व्रतशील तपश्चर्या में सम्मिलित रखा गया है।

‘समय संयम’ का तात्पर्य है कि एक-एक क्षण की जीवन सम्पदा की छोटी-छोटी किन्तु अति महत्वपूर्ण इकाइयां समझना और उनके एक घटक को अति सतर्कता पूर्वक खर्च होने देना। इसके लिए ऐसी दिनचर्या बनानी पड़ती है जिसमें समय के अपव्यय की कहीं कोई गुंजाइश न हो। इस नीति के अपनाते ही आलस्य छोड़ना पड़ता है और हर घड़ी व्यस्ततापूर्वक श्रमशील रहना पड़ता है। शरीर की तरह मन का खाली रहना भी अनेकानेक दोष-दुर्गुणों को जन्म देता है। इसलिए निर्धारित कामों को पूरे मनोयोग के साथ करना, उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर परिपूर्ण कुशलता का समावेश करना आवश्यक होता है।

जीवन की अवधि उतनी ही मानी जानी चाहिए जितना कि उससे महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न किया गया। आलस्य या उथले कामों में समय गुजारना तो जीवन का उतना अंश बर्बाद कर डालने के बराबर ही समझा जा सकता है।

व्यावहारिक तप साधना का चौथा सोपान है- विचार संयम। मस्तिष्क का स्वभाव खाली रहने का नहीं। उसमें स्वभावतः हर घड़ी कल्पनाएँ उठतीं उभरती रहती हैं। निर्धारित दिशाधारा न होने पर वे जिधर-तिधर आवारा जानवरों की तरह भटकती रहती हैं। चंचल मन इस उस डाली पर व्यर्थ ही उचकने-मचकने वाले बन्दर की तरह बेसिर पैर की उड़ाने उड़ता रहा है। अनगढ़ अनियन्त्रित स्थिति में वे कामुकता, छिद्रान्वेषण, मनमोदक गढ़ने एवं गिराने बिगाड़ने में निम्न स्तरीय जाल-जंजाल बुनता रहता है। समझा जाना चाहिए कि कल्पनाओं में भी सामर्थ्य होती है और वे मनःसंस्थान को, जीवन-क्रम को अपने स्तर का बनाने के लिए परोक्ष किन्तु कारगर प्रयास करती, प्रभाव छोड़ती रहती हैं। कुकल्पनाओं से दुर्बुद्धि उपजने और दुष्कर्म बन पड़ने का द्वार खुलता चला जायेगा। बेसिर पैर की उड़ानें मात्र चिन्तन शक्ति का अपव्यय ही नहीं करतीं प्रकारान्तर से दुष्परिणाम भी उत्पन्न करती हैं।

महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी विचार सम्पदा को भी धन-दौलत की तरह बहुमूल्य मानते रहे हैं और उसे अस्त-व्यस्त न होने देकर सतर्कतापूर्वक सत्प्रयोजनों में- लक्ष्य निर्धारणों में नियोजित रखे रहे हैं। सामान्य बुद्धि सामान्य परिस्थिति वाले व्यक्ति भी रुचिकर विषयों में प्रवीण पारंगत होते देखे गये हैं। उसका एकमात्र कारण यही है कि उनने अपनी चिन्तन सम्पदा को भटकने बिखरने नहीं दिया और अभीष्ट प्रसंगों में ही जोड़े दबोचे रखा। मुनि, मनीषी, वैज्ञानिक, कलाकार अपनी प्रवीणता का एक ही कारण बताते हैं कि उनने विचारों को उच्छृंखल नहीं बनने दिया वरन् प्रिय प्रसंग में रुचि लेने एवं निरत रहने के लिए ठोक पीट कर विवश कर दिया।

आत्मिक प्रगति के लिए जिस स्तर की प्रयोगशाला आत्मसत्ता चाहिए। उसमें इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम की चारों तप साधनाएँ ऐसी हैं जिनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता। साथ ही यह भी है कि इनमें से किसी एक के सहारे लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव भी नहीं हो सकता। कमरे की चार दीवारों की तरह पलंग के चार पायों की तरह साधक स्तर की आत्म सत्ता विनिर्मित करने के लिए आत्मिक प्रगति के लिए उपरोक्त चार तप साधनाओं का समान रूप से नियोजन आवश्यक है। इन्हें चार वेदों का सार निर्देश कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।


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यही जीवन का सच्चा सुख है- ऐसे उद्देश्य में जिसे तुम स्वयं ही महान् समझते हो, काम आ जाना, इसके पहले कि तुम घूरे पर रद्दी की तरह उठा कर फेंक दिये जाओ, काम करते-करते पूर्ण रूप से घिस जाना। प्रकृति की एक शक्ति बन जाना कहीं अच्छा है, बजाय इसके कि तुम रोग और आपत्तियों की एक ज्वर पीड़ित, स्वार्थ पूरित, क्षुद्र पीड़ा बने हुये रोते फिरो कि दुनिया तुमको सुखी बनाने की ओर कुछ ध्यान नहीं देती।

-जार्ज बर्नार्ड शा


आत्मिकी विभूतिवान बनाने वाली विद्या

चिन्तन को एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया गया है और कहा गया है कि उसे डाइनामाइट अणु विखण्डन-रेडियो विकिरण से भी अधिक शक्तिशाली चेतन क्षमता माना जाना चाहिए। प्रतिपादनकर्त्ताओं का कहना है कि विचार क्षेत्र के उतार-चढ़ाव ही व्यावहारिक जीवन में उत्थान-पतन की सम्भावनाएँ खड़ी करते हैं। ताप, प्रकाश, शब्द की ध्वनि तरंगों की तरह वे विचारों को भी एक दिव्य ऊर्जा मानते हैं और उसके प्रवाह को ईथर में संव्याप्त सूक्ष्म ध्वनि तरंगों की तरह न केवल चिरस्थायी वरन् प्रचंड शक्तिशाली भी मानते हैं।

यह शक्ति अपने उत्पादनकर्त्ता को भी प्रभावित करती है। जिसको लक्ष्य रखकर छोड़ी जाती है उस पर भी निशाना साधती है और पीछे अपने प्रभाव से समूचे वातावरण को अनन्त काल तक प्रभावित किये रहती है। अनगढ़ विचार करते तो सभी हैं और ऊर्जा को अस्त-व्यस्त ढंग से कई बार तो अनिष्टकर रीति से अभिचार, अभिशाप एवं साँप की फुसकार की तरह वातावरण को विषाक्त करने के लिए भी बिखेरते रहते हैं। जो हो विचार शक्ति को व्यष्टि और समष्टि के उत्थान पतन में असाधारण भूमिका का होना सुनिश्चित तथ्य है। उस महती क्षमता का सही उपयोग क्या और कैसे हो सकता है? उसे अवाँछनीयता के कुचक्र में पड़कर सर्वनाश करने से कैसे बचाया जा सकता है, इस सुविस्तृत समस्या का समाधान आत्म-विज्ञान के निर्धारणों द्वारा हो सकता है।

जिन्हें इस विचार-विद्या की जानकारी नहीं वे उसे महत्ती उपलब्धि को कौड़ी मोल गँवाते, पछताते अवाँछनीय ढंग में प्रयुक्त करके दुष्परिणामों से सिर धुनते देखे गये हैं। ऐसे ही प्रसंगों को देखकर इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि आत्म-चेतना से सम्पन्न मनुष्य को अपने उस अदृश्य किन्तु महत्ती शक्ति का सदुपयोग करके उन लाभों को उठाना चाहिए जिसे दूरदर्शी मनस्वी उठाते और अपने को, अपने संपर्क क्षेत्र को कृत-कृत्य करते रहे हैं।

आत्मिकी का क्षेत्र प्रयोजन विचार विभा का- प्रवृत्तियों का-सुसंस्कारिता का-उभार सदुपयोग करके सामान्य जीवन को सुखी समुन्नत बनाने तक ही सीमित नहीं है किन्तु उससे भी दो कदम आगे बढ़कर उन रहस्यमय परतों में प्रवेश करना भी है जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमता कहा जाता और ऋषि-सिद्धियों के रूप में चमत्कारी वर्णित किया जाता है।

मनःसंस्थान के विशेषज्ञों का कथन है कि मस्तिष्कीय चेतना एक समूचा जादूगर-भानमती का पिटारा है। उसकी रहस्यमय परतों का मात्र तेरह प्रतिशत अभी तक जाना जा सका है। इस तेरह प्रतिशत में से मात्र सात प्रतिशत ऐसा है जो औसत आदमी के प्रयोग में आता है। विशिष्ट व्यक्ति तो इससे कुछ अधिक भाग प्रयुक्त कर पाते हैं। निर्वाह तथा लोक-व्यवहार में इतना ही भाग काम में आता है। इससे आगे के रहस्यमय संस्थान वे हैं जिन्हें मनःशास्त्री अचेतन, अति चेतन, सुपर चेतन आदि कहते हैं। कुछ समय पहले तक रोगों के अनेकानेक कारण ढूंढ़े और समझे जाते थे, अब नवीनतम शोधें यह कहती हैं कि मस्तिष्क में चलने वाली उथल-पुथल स्नायु तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्युतीय प्रभावों को विभिन्न अवयवों में भेजती और रुग्णता के कारण खड़े करती हैं। निकट भविष्य में रक्त-माँस की जाँच-पड़ताल करने की अपेक्षा मनःक्षेत्र में बैठी हुई कुत्साओं कुण्ठाओं को समझने और उनका समाधान करके आरोग्य लाभ का सुनिश्चित आधार अपनाया जाया करेगा। रोगों से मुक्ति दिलाने में अब औषधि उपचार की अपेक्षा मानसिक पर्यवेक्षण और निराकरण पर ध्यान केन्द्रित किया जाया करेगा। प्राचीन काल में भी प्रायश्चित उपचार का कारगर प्रचलन था। अगले दिनों उसी प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जाना है। विश्वास किया जाता है कि मानसिक परिशोधन से आधि व्याधियों के निराकरण का ठोस आधार हस्तगत हो जाएगा।

मानसिक परिष्कार के लिए जिस चिकित्सा की आवश्यकता है उसका निदान, पथ्य, उपचार सब कुछ अध्यात्म विज्ञान के द्वारा मान्यता प्राप्त सिद्धान्तों पर निर्भर है। आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की समस्या अब तक किसी भी चिकित्सा पद्धति द्वारा सुलझी नहीं है। एक भी रोग की ऐसी कोई चिकित्सा नहीं ढूँढ़ी जा सकी जो अच्छा करने का विश्वासपूर्वक दावा करती है। अन्धेरे में डेला फेंकने की बात ही चिकित्सकों के हाथ में है और उस भटकाव में रोगी को जिस-तिस के दरवाजे नाक रगड़नी और जेब कटानी पड़ती है। चिकित्सकों की संख्या और औषधियों के नित नये लेबल बटते रहने पर भी जन स्वास्थ्य का संरक्षण संभव नहीं दिखता, उलटे नित नये रोगों का बाहुल्य पहले की अपेक्षा और भी अधिक द्रुतगति से बढ़ता चला जा रहा है। समाधान की आशा किरण एक ही है कि अध्यात्म विज्ञान का पुनर्निर्धारण जन-जन की आरोग्य रक्षा करने और रुग्णता के भयावह आक्रमण से मुक्ति दिलाने में समर्थ हो सकेगा। कुत्साओं और कुण्ठाओं से छुटकारा दिलाने वाली आत्मिकी ही अगले दिनों जन स्वास्थ्य की सुरक्षा वाली चुनौती स्वीकार करेगी और संरक्षण की गारण्टी देगी।

यह अनैतिक प्रसंग हुआ। इससे अगली परत है उच्च चेतन। इसे अन्तराल का गहनतम स्तर कह सकते हैं। चिन्तन और चरित्र की दृष्टि से पवित्र-प्रतिभा और वरिष्ठता की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की हाँडी उच्च चेतन के चूल्हे पर ही पकती है। महामानव, सिद्ध पुरुष, ऋषि-मनीषी, महाप्रज्ञ और देवदूत स्तर की प्रतिभाएँ इसी महासागर में मणि मुक्तकों की तरह भरी पाई जाती हैं। चमत्कारी ऋषि सिद्धियों की चर्चा विवेचना से इतिहास पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। आध्यात्मिक समर्थता वाले सिद्ध पुरुषों के शाप वरदान फलित होते देखे गये हैं। अतीन्द्रिय क्षमताओं को कभी देवी देवताओं की अनुकम्पा, भूत-प्रेतों की सहायता तथा जादू विद्या जैसी कोई अविज्ञात कारणों से उत्पन्न हुई चमत्कारी घटना समझा जाता रहा है। प्रत्यक्ष देखी गई विलक्षण सामर्थ्यों का कोई कारण समझ में न आने से भूतकाल में ऐसी ही मान्यताएं चलती रही हैं और इन विशेषताओं से युक्त मनुष्य को किसी अदृश्य शक्ति का वाहन समझा जाता रहा है, पर अब यथार्थता के निकट आने जाने पर यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विभूतियाँ किसी से उपहार अनुदान या कृपा अनुकम्पा की तरह पाई या झपटी गई नहीं होती, वरन् यह अन्तराल के उच्च चेतन से उगी उछली होती हैं। पेड़ पर लदे हुए फूलों या फलों की कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि वे ऊपर चाँद सितारों द्वारा टपकाये गये होंगे, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं यह दृश्यमान वृक्ष वैभव वस्तुतः उसकी जड़ों द्वारा सुविस्तृत भूमि में फैलकर बूँद-बूँद करके खींचा गया होता है। विभूतियों को फल-फूल की तरह सुशोभित देखकर ऊपर से बरसने वाली बात सोचने की अपेक्षा इसी निष्कर्ष पर पहुँचना उपयुक्त है कि वह भीतर से उपार्जित किये गये हैं। अन्तराल का क्षेत्र इतना उपजाऊ है कि इसमें तनिक-सा प्रयत्न करने पर बहुमूल्य फसलें उगाई जा सकती हैं। उसमें हीरे-मोती तक बोये उगाये जा सकते हैं।

इन्द्रिय शक्ति के आधार पर सुविधाएँ कमाने और प्रसन्नता पाने का अवसर मिलता है। भौतिकी इन्द्रिय शक्ति का ही चमत्कार है। पदार्थ तो अनादि काल से अपनी विशेषताएँ भीतर दबाये बैठा था। पर उसको रहस्यमय विशेषताएँ तभी प्रकट हुईं और काम में आई जब मनुष्य की प्रतिभा ने इन्द्रिय शक्ति के माध्यम से उन्हें खोजा, कुरेदा और करतलगत करने का प्रयत्न किया। यहाँ इन्द्रिय शक्ति में मस्तिष्कीय क्षमता को भी सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि उसे भी ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। प्रकृति एवं पदार्थ में ही मूलतः भौतिक शक्तियों का भाण्डागार है फिर भी यह मानना पड़ेगा कि उनका वर्तमान स्वरूप एवं उपयोग मनुष्य की प्रतिभा एवं इन्द्रिय शक्ति के माध्यम से प्रकट हुई पुरुषार्थ परायणता का ही प्रतिफल है। इस पर श्रेय देने का प्रसंग आने पर भौतिकी के क्षेत्र में उपलब्ध हुए चमत्कारों को मानवी प्रतिभा की ही जय माला पहनानी पड़ती है।

भौतिकी की तुलना में आत्मिकी का क्षेत्र और भी अधिक उच्चस्तरीय विभूतियों से भरा-पूरा है। परमात्मा जो कर सकता है वह जीवात्मा तुरन्त कर भले ही न सके, पर तत्वतः उन विशेषताओं के अवसर मिलते ही प्रकटीकरण की सम्भावना तो रहती है और वह समय-समय पर इसका परिचय भी देती रहती है महामानवों, सिद्ध पुरुषों, ऋषियों, देवदूतों की अद्भुत क्षमताएँ समय-समय पर प्रकट होती देखी गई हैं। इन्हें ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं। सिद्धियाँ अर्थात् आत्मिकी के आधार पर भौतिकी के क्षेत्र में उगाई पाई गई सम्पदाएँ सफलताएँ। ऋद्धियाँ अर्थात् आत्म-विज्ञान के माध्यम से अन्तराल को परिष्कृत बलिष्ठ बनाकर असाधारण व्यक्तित्व को परिचय देने वाली विभूतियाँ।

शरीरगत क्षमता को इन्द्रिय शक्ति कहते हैं। मस्तिष्क सहित शरीर जो कुछ पुरुषार्थ उपार्जन कर सकता है वह सब उसी क्षेत्र में आता है। भौतिकी के उपार्जन उत्पादन का माध्यम यही है। इससे ऊपर की परत चेतना क्षेत्र की रहस्यमयी परतों की है। चेतना द्वारा सभ्यता एवं व्यवहार कुशलता के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं और साधनों का बाहुल्य बढ़ने से अपने को वैभवशाली एवं प्रतिभाशाली बनने का अवसर मिलता है। अचेतन को परिष्कृत करने पर व्यक्तित्व को सुसंस्कारी बनाया जाता है और सर्व साधारण की तुलना में भारी भरकम सिद्ध होने, संपर्क क्षेत्र एवं वातावरण को प्रभावित करने की प्रखरता उपलब्ध होती है। इन दो क्षेत्रों का अधिकाँश सम्बन्ध भौतिक जगत से- प्राणियों पदार्थों से है। इसलिए चेतना के यह दोनों ही पक्ष बाह्य जगत से संबंधित माने जाते हैं। उन क्षेत्रों में उपलब्ध हुई सफलताएँ सिद्धि स्तर की कही जाती हैं। उच्च चेतन भौतिकी के साथ बहुत पतले धागे से जुड़ा है। वस्तुतः उसकी घनिष्ठता परमात्म सत्ता के साथ है, इसलिए आदान-प्रदान भी उसी क्षेत्र के होते हैं। इस संदर्भ में इन्द्रिय शक्ति कम काम करती है उसमें अतीन्द्रिय क्षमता का ही प्रमुख उपयोग होता है।

अतीन्द्रिय क्षमता अर्थात् उच्च चेतन की वह विशेषता जो परब्रह्म की समष्टि चेतना के साथ जुड़ती और अदृश्य जगत में प्रवेश करने की- उस क्षेत्र में चल रही जानकारियों की- विशिष्टता प्राप्त करती है। इतना ही नहीं उस क्षेत्र के कुशल इंजीनियरों की तरह बहुत कुछ उलट-पुलट करने की सामर्थ्य भी अर्जित करती है। आत्मिकी के इस पक्ष को अतीन्द्रिय क्षमता के नाम से जाना जा सकता है।

इन दिनों, दूर दर्शन, दूर श्रवण, भविष्य कथन, विचार संचालन, प्राण प्रहार, सम्मोहन, मानवी विद्युत उपचार जैसे कितने ही ऐसे प्रसंगों की चर्चा होती रहती है जिनमें मनुष्य में पाई जाने वाली इन्द्रियातीत सामर्थ्य का प्रमाण परिचय प्राप्त होता है। यह आकर्षक विषय है। इन्द्रिय शक्ति के सहारे प्रकृति क्षेत्र की भौतिकी की उपलब्धियाँ हस्तगत की गई हैं। इन्द्रियातीत सामर्थ्य के आधार पर चेतन क्षेत्र की आत्मिकी विभूतियों के उपार्जन का द्वार खुल सकता है। स्पष्ट है कि जब मात्र भौतिकी के बल पर मनुष्य इतना समर्थ सम्पन्न बन सका है तो आत्मिकी में गति होने पर जो सूक्ष्म जगत की चेतना परक-परब्रह्म सत्ता से सम्बन्धित- सामर्थ्यों के साथ संबंध जुड़ेगा तो अब की अपेक्षा मनुष्य कितना अधिक सुविकसित, समुन्नत, परिष्कृत, विशिष्ट, वरिष्ठ होगा इसकी आज तो कल्पना ही की जा सकती है। पौराणिक काल के ऋषि मनीषियों, देवात्माओं की चर्चा भर की जाती रहती है। आत्मिकी के क्षेत्र में यदि भौतिकी जैसी मंथन चल पड़े तो ऐसे अभिनव सूत्र हाथ लग सकेंगे जिनके सहारे मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव हो सके।


Quotation

शास्त्र पढ़कर भी लोग मूर्ख होते हैं, किंतु जो उसके अनुसार आचरण करता है वस्तुतः वहीं विद्वान है। रोगियों के लिये भली-भांति सोचकर निश्चित की हुई औषधि नाम उच्चारण करने मात्र से (बिना खिलाये) किसी को निरोग नहीं कर सकती।

-हितोपदेश


मणि मुक्तकों से भरा चेतन शक्ति का भाण्डागार- मानव मन

सामर्थ्य का असीम भण्डार हमारे चारों ओर बिखरा पड़ा है। जड़ परमाणु का लघुतम घटक परमाणु अपने में कितनी प्रचण्ड ऊर्जा छिपाये हुए है, इसका परिचय उसके विस्फोट का लेखा-जोखा लेने पर किसी महादैत्य जैसा लगता है। परमाणु में छिपे बैठे न्यूट्रान, इलेक्ट्रान, प्रोटान एवं उसमें भी समाये न्यूट्रीनो जैसे सूक्ष्मतम कण कितने सामर्थ्यवान होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक इंच की परिधि में ऐसे अरबों-खरबों महादैत्य सटे बैठे होते हैं। समूचे भूमण्डल पर वे कितने होंगे और उन सब की संयुक्त शक्ति कितनी प्रचण्ड होगी, इसका अनुमान लगाना मानवी मस्तिष्क के लिये सम्भव नहीं।

चेतना का संसार और भी अद्भुत है। जीवकोष-बीजकोष अपने में एक अनोखा लीला जगत संजोये बैठे हैं। उनकी सामर्थ्य काया को गतिशील रहने में तनिक-सा सहयोग करते जितनी ही अनुभव में आती है, पर यदि उनकी निजी सत्ता और विस्तार क्षमता का परिचय प्राप्त किया जाय तो प्रतीत होता है कि सुई की नोंक पर सहस्त्रों की संख्या में बैठ सकने जैसे छोटे आकार के इन चेतना घटकों में से प्रत्येक की दुनिया कितनी अद्भुत, रहस्यमय एवं रोमाँचकारी है। फिर एक शरीर में कितने बीजकोष व जीवकोष होते हैं--कोटि-कोटि मानवों में वे कितने होंगे? सृष्टि में मनुष्यों के अतिरिक्त प्राणियों की जातियों और उनमें से प्रत्येक की संख्या की गणना नहीं हो सकती। अगणित जीवकोषों से भरे इस जीव जगत की विशेषताओं को देखते हुए उसे देवोपम मानने में कोई अत्युक्ति नहीं। तैंतीस कोटि देवताओं के प्रतिपादन को कभी असंगत माना जाता था, पर अब तथ्यों के प्रकाश में आने पर जब प्रत्येक घटक-जीवकोष मान्यता प्राप्त देवताओं से भी अधिक विभूति सम्पन्न सिद्ध हो रहा है तो उन्हें असीम, अनन्त, अचिन्त्य, कल्पनातीत ही कहा जा सकता है।

जड़-जगत के परमाणुओं को महादैत्य और चेतन जगत के जीवकोषों को महादेव कहा जा सकता है। उनके बीच जो सहयोग चल रहा है उसे समुद्र मन्थन की उपमा दी जा सकती है। साथ ही अदृश्य क्षेत्र में उनकी जो विग्रह प्रक्रिया चल रही है उसे अनादि काल से अनन्त काल तक चलने वाले देवासुर संग्राम के समतुल्य ठहराया जा सकता है। इस संयोग वियोग की पेण्डुलम क्षमता जितनी प्रकार की--जिस-जिस स्तर की शक्ति सामर्थ्य उपजाती--बिखेरती है उसका तनिक-सा आभास मिलने पर हतप्रभ होना पड़ता है। और उस ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ से रोमाँचित होकर उसी प्रकार नेत्र बन्द करके नमन करना पड़ता है जैसा कि विराट् दर्शन से भयाक्रान्त हुए अर्जुन को करना पड़ा था।

जड़-जगत से चेतन और चेतन से जड़-जगत की शक्ति सत्ता की तुलना नहीं हो सकती। दोनों ही अपने आप में परिपूर्ण एवं महान हैं। इस विश्व ब्रह्माण्ड में पराप्रकृति और परब्रह्म की आँख-मिचौनी जितनी सुन्दर लगती है उतनी ही हतप्रभ कर देने वाला भी है।

इसी विभूतियों से भरे-पूरे संसार में हम सब अपने जीवन संकट घसीटते हैं। जीवित तो सभी हैं और इसके लिये जितनी सुविधा सामग्री चाहिये, उतनी किसी प्रकार जुट भी जाती है। इतने पर भी मनःस्थिति और परिस्थिति को देखते हुए प्रतीत यही होता है कि इन जीवितों में से कई अभावग्रस्त, दरिद्र, पतित, पीड़ितों, असहाय, असमर्थ जैसी स्थिति में रह रहे हैं। दरिद्रता और आशंका से कईयों को उद्विग्न देखा जा सकता है। उल्लास से उछलते हुए- हंसता-हंसाता- समर्थ सम्पन्न जीवन जीने वाले कठिनाई से ही कहीं कोई बिरले मिलेंगे।

व्यक्ति के भीतर और बाहर सामर्थ्य का असीम भण्डार, सुविधा साधनों से भरा-पूरा अनन्त वैभव जब इस समूचे ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है और उसी के बीचों-बीच मनुष्य निवास-निर्वाह कर रहा है तो यह कैसी विडम्बना है कि अप्रसन्नता की मनःस्थिति घिरी रहे और दैन्य-दारिद्रय से- पतन-पराभव से घिरी परिस्थितियों में गुजारा करना पड़े। ईश्वर के युवराज को अपने पिता के इस नन्दन वन जैसे सुरम्य उद्यान में आनन्द और उल्लास से भरे-पूरे दिन बिताना चाहिए थे, तब क्यों उसे शोक-संतापों से युक्त जीवन जीना होता है? विपत्तियों और समस्याओं का पग-पग पर सामना करना पड़ता है?

गुत्थी का कारण और निवारण ढूंढ़ने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मनुष्य है तो चेतन। किन्तु उसे चेतना की सुरक्षा एवं प्रगति की वैसी जानकारी नहीं, जैसी होनी चाहिए। वस्तु उपलब्ध तो हो पर उसका उपयोग विदित न हो तो दुरुपयोग ही बन पड़ेगा। दुरुपयोग का दुष्परिणाम होता ही है। वहीं हो भी रहा है साधनों की न पहले कमी थी, न अब है। इतने पर भी सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि चेतन शक्ति, जो पिण्ड व ब्रह्माण्ड में समायी है, के उत्पादन वितरण एवं उपयोग की प्रक्रिया को जाना न जायेगा। इस प्रक्रिया को ही ‘साधना’ कहते हैं जो पदार्थ के सदुपयोग से आरम्भ होते हुये- चेतना के परिष्कार एवं व्यष्टि तथा समष्टि चेतन शक्ति में परस्पर आदान-प्रदान के क्रम के बनने तक सतत् क्रियाशील रहती है। यही है वह मूलभूत तत्व-दर्शन जिसकी जानकारी के अभाव में आत्म विस्मृति बनी रहती है एवं सामान्य अथवा निम्न स्तर का जीवन जीते हुए अधिकांश व्यक्तियों द्वारा जैसे-जैसे जीवन यात्रा, पूरी कर ली जाती है।

अपने अन्दर क्या छिपा पड़ा है- यह जानने का प्रयास करने पर बहुमूल्य मणि-मुक्तकों से भरा चेतनशक्ति का भाण्डागार दिखाई देने लगता है। बाहर से सामान्य व एक से ही दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति कैसे असम्भव कर दिखाते हैं एवं ऋद्धि-सिद्धियों से सम्पन्न बन जाते हैं- इसका मूल कारण खोजते हैं तो एक ही तथ्य हाथ लगता है- उन्होंने अपने अन्दर छिपे ‘महान’ तत्व को पहचाना, साधना द्वारा उसे जगाया एवं स्वयं को ऊंचा उठाया। ऋषि, देवदूत, महामानव स्तर तक पहुँचने में उन्हें आत्म-परिष्कार-व्यक्तित्व निर्माण की जीवन साधना से लेकर अपने सुपरचेतन को जगाने की साधना करनी पड़ी और उन्होंने वह सब कुछ पा लिया, जिसे मानव के लक्ष्य की चिरन्तन व्यास एवं समय की तत्कालीन आवश्यकता कह सकते हैं।

कैसा है यह विराट्-विलक्षण जो अपने ही भीतर समाया है और हम स्वयं ही उससे अनजान बने हुए हैं। जानकारी होने पर- इस भाण्डागार के सदुपयोग की व्यवस्था बनायी जाने पर पिण्ड के चेतन पक्ष को ऊंचा उठाया जा सकना एवं ब्राह्मी चेतना के विराट् समुद्र से उसका सम्बन्ध जोड़ पाना सम्भव है।

योग वशिष्ठ में उपदेश देते हुए महर्षि वशिष्ठ भगवान राम से कहते हैं-

“रम्येय देह नगरी राम सर्व गुणान्विता। अज्ञस्येय मनन्तानां दुःखाना कोशमालिका। अस्यत्विय मनन्तानां सुखानां कोशमालिका॥”

अर्थात्- हे राम! यह देह नगरी बड़ी सुरम्य और गुण सम्पन्न है। यह ज्ञानियों के लिए सुखद और अज्ञानियों के लिए दुख देने वाली है।

कुछ वर्षों पूर्व बम्बई के एक विद्वान श्री बी. जे. रेले. ने एक पुस्तक लिखी थी- ‘‘दी वैदिक गॉड्स एज फिगर्स ऑफ बायोलॉजी।” इस पुस्तक में उन्होंने सिद्ध किया था कि वेदों में वर्णित आदित्य, वरुण, अग्नि, मरुत मित्र, अश्नि, वरुण आदि मस्तिष्क के स्थान विशेष में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ हैं, जिन्हें जागृत करके अद्वितीय क्षमता सम्पन्न एवं विशिष्ट बना जा सकता है। डॉ. नाडगिर एवं एडगर जे. टामस ने संयुक्त रूप में पुस्तक की भूमिका लिखते हुए कहा है कि वैदिक ऋषियों के इस शरीर शास्त्र सम्बन्धी गहन ज्ञान पर आश्चर्य होता है। उस साधन हीन समय में कैसे उन्होंने इतनी जानकारियाँ प्राप्त की होंगी, यह शोध का विषय है।

मस्तिष्कीय संरचना पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि यह एक माँस पिण्ड नहीं है वरन् जीवन्त विद्युत भण्डार है। उसमें चल रही हलचलें ठीक वैसी ही हैं जैसी किसी शक्तिशाली बिजलीघर की होती हैं। जितने हमारी आकाश गंगा में तारे हैं- करीब उतने ही (एक खरब से भी अधिक) न्यूरान्स (स्नायुकोष) मस्तिष्क में हैं। इन तंत्रिकाओं को आपस में जोड़ने वाले तन्तु और उनके इन्सुलेशन खोपड़ी में खचाखच भरे हैं। एक तन्त्रिका कोशिका का व्यास एक सेंटीमीटर के हजारवें भाग से भी कम है और उसका वजन एक औंस के साठ अरबवें भाग से अधिक नहीं है। तन्त्रिका तन्तुओं से होकर बिजली के जो इम्पल्स दौड़ते हैं वही ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आवश्यक सूचनाएं उस केन्द्र तक पहुँचाते हैं। इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध सूचनाओं और विचारों की हलचलें हर क्षण सोते-जागते मस्तिष्क को इतना अधिक व्यस्त रखती हैं कि इन्हें इलेक्ट्रो एनसेफेलोग्राम (ई. ई. जी.) द्वारा विद्युतीय तूफान की तरह देखा जा सकता है।

मानव निर्मित सर्वोत्तम कम्प्यूटर में अधिक से अधिक दस लाख इकाइयाँ होती हैं और प्रत्येक इकाई के पाँच-छः से अधिक संपर्क सूत्र नहीं होते। किन्तु मस्तिष्क की अरबों कोशिकाएं और उनमें से प्रत्येक के लाखों लाख संपर्क सूत्र और उनके भीतर प्रवाहित न्यूरोट्राँसमीटर की भिन्नता वैज्ञानिकों को इसी निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन अद्भुत शक्तियों को समाहित करने वाले कम्प्यूटर को बनाने लायक सामर्थ्य मानव में नहीं है। यदि सैद्धान्तिक स्तर पर एक ढाँचा भी ऐसा खड़ा करने का प्रयास किया जाय तो वह इतना बड़ा होगा कि उसके लिए यह पृथ्वी भी छोटी पड़ेगी।

मस्तिष्क रूपी इस चेतन शक्ति भण्डार के न्यूरान समूहों में से यदि एक को भी किसी प्रविधि द्वारा सजग-सचेत किया जा सके तो दस अरब न्यूरान्स दस अरब डायनोमों का काम कर सकते हैं। उस गर्मी-प्रकाश एवं विद्युत क्षमता का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। इसी कारण वैज्ञानिक कहते हैं कि अभी वे मस्तिष्क के कुछ सत्रह प्रतिशत भाग को जान पाये हैं एवं शेष 83 प्रतिशत के बारे में उन्हें कुछ जानकारी नहीं है। इस सत्रह प्रतिशत में से भी दैनन्दिन जीवन में मात्र सात प्रतिशत विद्युत-क्षमता उपयोग में आ पाती है-शेष का या तो प्रयोग ही नहीं हो पाता या प्रयासों के अभाव में वह व्यर्थ ही नष्ट हो जाती है।

जिस मस्तिष्क रूपी संसार में इस पृथ्वी पर बसे मनुष्यों से भी कई गुनी अधिक स्नायुकोशों की आबादी बसी हुई है, उसकी सामर्थ्य कितनी विलक्षण है, इसका अनुमान इन व्यक्तियों की उपलब्धियों को देखकर लगाया जा सकता है जिन्होंने अपने प्रतिभा के बलबूते वैज्ञानिकों को भी आश्चर्यचकित किया है।

कैपटाउन में एक इंजीनियर वानवाण्डे निवास करते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि समय उनकी इच्छा के अनुसार चलता है। उनका दिमाग उन्हीं निर्देशों का पालन करता है जो वे स्वयं को देते हैं। वे सोने जा रहे हों और आप कहें ‘महोदय! अभी आठ बजे हैं, आप ठीक बारह बजकर सात मिनट उनसठ सेकेंड पर उठें।’ एक सेकेंड का भी अन्तर किये बिना वे उसी समय जग जाते हैं। इसका रहस्य बताते हुए वे कहते हैं- “मैंने अपने मस्तिष्क को इस प्रकार साधा है कि अचेतन-चेतन दोनों ही स्थिति में मैं अपने क्रिया-कलाप नियन्त्रित कर सकता हूँ।”

लार्डमैकाले ने इंग्लैण्ड का इतिहास आठ जिल्दों में लिखा। इसके लिये उन्हें किसी संदर्भ पुस्तक की आवश्यकता नहीं पड़ी। लोग उन्हें चलता-फिरता पुस्तकालय कहते थे। उन्हें सैकड़ों घटनाएं, तिथियाँ, व्यक्तियों के नाम जबानी याद थे। इसी प्रकार ब्रिटिश संग्रहालय के अधीक्षक रिचर्डगार्नेट अपनी स्मरण शक्ति- सैकड़ों संदर्भों व अनेकों भाषाओं को कण्ठस्थ रखने के कारण विश्व-विख्यात हैं। इन्हें अपने पुस्तकालय की सहस्त्रों पुस्तकों के नाम एवं रखने का स्थान तक याद थे।

एक बार फ्रांस की अदालत में एक मुकदमा पेश हुआ जिसमें प्रस्तुत साक्षियों व कानूनी तथ्यों के कारण अपराधी के बचने की कोई आशा न थी। एकमात्र आशा की किरण थी- राजा के क्षमादान परन्तु राजा 5 दिनों के लिये बाहर थे। अपराधी के एटार्नी प्रख्यात विधिवेत्ता लुई बर्नार्ड ने अपराधी के पक्ष में तर्क देना आरम्भ किये और जूरी के समक्ष वह 120 घण्टे तक - अर्थात् पाँच दिन पाँच रात तक बराबर बोलता रहा। इस अवधि में उसने कानून शास्त्र के दुनिया भर के पन्ने जबानी अदालत के सामने रखकर अपनी आश्चर्यजनक बौद्धिक क्षमता का सिक्का जमा दिया। इसी बीच राजा आ गये- अपराधी को राजा के समक्ष प्रस्तुत होने का अवसर मिला और तदुपरान्त क्षमादान भी।

‘गणित की जादूगरनी’ कही जाने वाली भारतीय महिला शकुन्तला देवी अपनी अद्वितीय मानसिक शक्ति के कारण विश्वभर में जानी जाती है। जितनी तेजी से वे गणित की गुत्थियों का हल निकाल हैं, उस शीघ्रता से कम्प्यूटर भी काम नहीं कर पाता। अपनी मनःशक्ति के बारे में उनकी मान्यता है कि “यह केन्द्रित मन की मात्र छोटी-सी शक्ति का नमूना भर है। यदि समग्र मनःसामर्थ्य को सुनियोजन किया जा सके तो इससे भी विलक्षण उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।”

उपरोक्त उदाहरण पिण्ड के एक घटक मस्तिष्क की सामर्थ्य की एक छोटी-सी झाँकी भर देते हैं। चेतन जगत से प्रत्यक्ष जुड़े इस माँसपिण्ड को भानुमती का पिटारा कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। मस्तिष्क में भरे एक खरब से भी अधिक स्नायुकोशों को अद्भुत विशेषताओं से सम्पन्न महादेव कहा जा सकता है। इनमें संचित स्मृतियाँ माइक्रोफिल्म की भाँति सुरक्षित रहती हैं और उत्तेजित किये जाने पर वे उभर कर आती हैं। डॉ. पेनफील्ड एवं डॉ. डेलगार्डो के इस विषय में मनुष्यों व पशुओं पर प्रयोग पहले ही ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। उनसे ज्ञात होता है कि मस्तिष्क का टेम्पोरल कार्टेम्स, पेराइटललोब व लिम्बिक सिस्टम इतना रहस्यमय-तिलिस्मों से भरा हुआ है कि इस विषय में किये गये अनेकानेक प्रयोगों ने वैज्ञानिकों को अपनी अज्ञानता का बोध तो कराया ही है, एक अद्भुत रोमांचकारी लीला जगत भी दिखाता है जो इस पिण्ड से विद्यमान है।

काया की सूक्ष्म संरचना का वर्णन करते हुए ऋषि-गणों ने एक ऐसे विद्युत प्रवाह के मस्तिष्क में अवस्थित होने की कल्पना की है जो मस्तिष्क के अनेकानेक महत्वपूर्ण केन्द्रों स्नायुकोशों की परतों तथा स्नायु-रसायन सन्देश वाहकों के रसस्रावों की उत्तेजित करता है। मस्तिष्क में स्थित इस फव्वारे को वाँछित केन्द्रों तक भेजकर उन्हें उत्तेजित कर प्रसुप्त को जगाया जा सकना सम्भव है, इसे अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। सम्भवतः इसी तथ्य को उपनिषदकार ने इस तरह अभिव्यक्त किया है।

“तस्य सर्वेषु लोकेष कामचारो भवति।” -छांदोग्य

अर्थात्- सहस्रार को प्राप्त कर लेने वाला योगी सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान का अधिष्ठाता बन जाता है, सर्व समर्थ हो जाता है।

विपुल सम्पदा से भरे-पूरे इस पिण्ड में बहुत कुछ भरा पड़ा है। ‘साधना से सिद्धि’ के समस्त उदाहरण इसी एक तथ्य की साक्षी हैं कि साधकों ने इसी चेतन घटक को सामर्थ्यवान बनाया और बदले में ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ पायीं। यह सिद्धान्त सदा से ही शाश्वत रहा है और आगे भी जब भी किसी को इस मार्ग पर चलना होगा- इसी को अपना आधार बनाना होगा।


जोजेफ हार्ड उफन (kahani)

जोजेफ हार्ड उफन अपने कार्यालय में 9 सचिवों को एक साथ बिठाकर 9 भाषाओं में 9 विभिन्न विषयों पर नोट्स एक साथ लिखाते थे। म्यूनिस (प. जर्मनी) की राष्ट्रीय लाइब्रेरी का यह संचालक अपनी इस मस्तिष्कीय क्षमता के कारण विश्वविख्यात है। बाइबिल उन्हें कण्ठस्थ थी। कहीं से भी पन्ना खोलकर पूछने पर वे उसके आगे का अंश धड़ल्ले से बोलते चले जाते थे। अपनी लाइब्रेरी में रखीं 1 करोड़ से भी अधिक पुस्तकों के संदर्भ में पूछने पर बिना पुस्तक देखे वे सैकड़ों संदर्भ नोट कराते चले जाते थे। अपनी इस क्षमता में पर आश्चर्य व्यक्त किये जाने पर उनकी एक ही टिप्पणी होती थी- ‘‘यह कोई असम्भव कार्य नहीं है। मैंने तो साधारण मनुष्य के नाते अपने मस्तिष्क के एक थोड़े से अंश का सदुपयोग भर किया है।”


मनो यस्य वशे तस्य भवेर्त्सवं जगद्वशे

बिखराव के कारण सौर ऊर्जा का अधिकांश भाग यों ही बेकार चला जाता है। उसकी थोड़ी मात्रा ही प्राणधारी तथा वृक्ष वनस्पति अपनी आवश्यकता के अनुसार ग्रहण कर पाते हैं। एक बिन्दु पर सूर्य की कुछ किरणों को केन्द्रित किया जा सके तो उससे दावानल जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि बिखराव को समेटा और सूर्य की प्रचण्ड ऊर्जा को कैद किया जा सके तो मात्र उसकी एक दिन की शक्ति से सम्पूर्ण विश्व की वर्षों की ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति होती रह सकती है।

शरीर की स्थूल इन्द्रियों की तुलना में मन की सामर्थ्य कई गुनी अधिक है। मनःशक्ति की तुलना सौर ऊर्जा से की जा सकती है। जिस प्रकार फैले होने व सतत् नष्ट होते रहने के कारण सूर्य शक्ति से विशेष लाभ उठाते नहीं बनता। गर्मी, ताप जैसे सामान्य प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। उसी तरह मन से निस्सृत होने वाली इच्छाएं, आकाँक्षाएं दैनिक जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति मात्र कर पाती हैं। मन की चंचलता के कारण वे कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखा पातीं। अन्यथा उनमें वह सामर्थ्य है कि एक दिशा लक्ष्य विशेष पर अपने बिखराव को रोककर केन्द्रित किया जा सके तो चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं। मनोबल, संकल्प बल की चर्चा की जाती है। यह और कुछ नहीं निग्रहित मन की ही शक्ति है जो सामान्य से लेकर असामान्य प्रयोजन सम्पन्न कर सकने में सक्षम है। संकल्प बल द्वारा जड़ एवं चेतन को न केवल प्रभावित किया जा सकता है, उनमें आवश्यक हेर-फेर भी किया जा सकता है।

हारे थके टूटे निराश मनःस्थिति वाले अधिकाँश व्यक्ति मनोबल संकल्पबल की दृष्टि से कमजोर होते हैं। शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधियों से भी ऐसे ही व्यक्ति अधिकतर घिरे रहते हैं। छोटी-मोटी बीमारियों में भी वे अधिक पीड़ा-कष्ट की अनुभूति करते हैं जबकि इच्छा शक्ति के धनी कठिन और असाध्य रोगों में भी हंसते-मुस्कराते रहते और दृढ़ मनोबल के सहारे शीघ्र ही अच्छे होते देखे जाते हैं। इच्छा शक्ति दृढ़ हो तो दीर्घ, स्वस्थ जीवन ही नहीं, चिर यौवन का लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है तथा कुछ समय के लिए तो अधिक आयु के साथ प्रकट होने वाले प्रौढ़ता के चिन्हों को भी एक किनारे छोड़ा जा सकता है प्रस्तुत है ये घटना जो यह बताती है कि संकल्प बल के सहारे रोग निवारण ही नहीं आयु को भी आगे ढकेलना सम्भव है।

डॉ. वैनेट द्वारा लिखित “ओल्ड एज, इट्स काज एण्ड प्रीवेन्शन” में एक घटना का उल्लेख इस प्रकार है। 19 वर्षीया एक फ्रांसीसी युवती का एक अमेरिकन युवक से विवाह होना निश्चित हुआ। युवक निर्धन था। इसलिए उसने यह तय किया कि पहले अमेरिका जाकर धनोपार्जन करेगा और फिर लौटकर शादी करेगा। तीन वर्ष तक वह परिश्रम करता रहा। इस अवधि में उसने पर्याप्त धन एकत्रित कर लिया, पर दुर्भाग्यवश एक मुकदमे में उसे पन्द्रह वर्ष की सजा हो गई। पन्द्रह वर्ष बाद वह फ्रांस वापिस लौटा तो यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसकी मंगेतर का स्वास्थ्य और सौंदर्य पूर्ववत् था। 34 वर्ष की आयु में भी वह 19 वर्ष की युवती लगती थी। विवाहोपरान्त उसने एक दिन पत्नी से उसके सौंदर्य का राज पूछा। युवती ने बताया कि वह नित्य प्रातः एक बड़े शीशे के सामने खड़ी होकर अपने चेहरे को देखकर मन ही मन यह अनुभव करती थी कि आज बिल्कुल वैसी ही हूं जैसी कि कल थी प्रचण्ड इच्छा शक्ति के कारण ही वह अपने यौवन को 34 वर्ष की आयु में भी अक्षुण्ण बनाये रखने में सक्षम हुई।

फिनलैंड की एक युवती के गर्भाशय में कैंसर हो गया। डॉक्टरों ने रोग को असाध्य घोषित करते हुए उसे कुछ दिनों का मेहमान बताया, इस युवती से पड़ौसी युवक गौनर मेंटन को गहरी सहानुभूति थी। उसने युवती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। निराशा के घोर अन्धकार में भटकती युवती को जैसे जीने के लिए प्रकाश रूपी सम्बल मिल गया हो। विवाह सम्पन्न हुआ। अनुकूल सहचर पाकर जैसे वह अपना रोग ही भूल गई। जो सदा बिस्तर पर लेटी रहती थी, अब सदा चलती-फिरती, हंसती-हंसाती नजर आती थी। एक वर्ष बाद उसे एक पुत्र हुआ। डॉक्टरों ने परीक्षा करने पर पाया कि युवती में कैन्सर रोग का नामो-निशान नहीं था। बच्चा भी पूर्ण स्वस्थ और निरोग था। चिकित्सकों ने इस घटना को मनोबल का चमत्कार माना।

मनःशक्ति का एक पक्ष एकाग्रता का है। इसका अभ्यास बन जाने पर असंभव समझे जाने वाले काम भी सम्भव हो सकते हैं। थोड़ी देर के लिए किसी विषय विशेष पर ध्यान को केन्द्रित कर अपने शारीरिक कष्टों को भी भुलाया जा सकता है। लोकमान्य तिलक के जीवन की एक बहुचर्चित घटना इसी तथ्य का बोध कराती है। मवाद भर जाने के कारण लोकमान्य तिलक के अंगूठे का आपरेशन होना था। डॉक्टर क्लोरोफार्म लेकर पहुँचे ताकि उसे सुँघाकर आपरेशन किया जा सके। तिलक ने कहा- ‘बेहोश करने की आवश्यकता नहीं है। मुझे एक प्रति ‘गीता’ की लाकर दे दो।’ जितनी देर आपरेशन चलता रहा तिलक गीता पढ़ने में तल्लीन रहे। उन्हें कष्ट की थोड़ी भी अनुभूति नहीं हुई। इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने चिकित्सकों को बताया कि कष्टों की अनुभूति शरीर को नहीं मन को होती है। मन यदि किसी अन्य विषय पर केन्द्रित हो तो शरीर के कष्टों को पूर्णतया भुलाया जा सकता है।

मन की सामर्थ्य का असामान्य पक्ष वह है जिसके द्वारा वस्तुओं एवं व्यक्तियों को प्रभावित किया जाता है। निग्रहित मन की शक्ति ही प्रचण्ड संकल्प बल के रूप में प्रकट होती है। जिसके द्वारा एक स्थान पर बैठकर दूरवर्ती व्यक्तियों को प्रभावित करना तथा जड़ वस्तुओं में भी हलचल उत्पन्न कर सकना सम्भव है। ऐसी सामर्थ्य से सम्पन्न कितने ही व्यक्तियों के समाचार समय-समय पर प्रकाशित होते हैं।

रूसी महिला ‘रोजा मिखाइलोवा’ अपनी इच्छा शक्ति से जड़ वस्तुओं में हलचल पैदा करने के कितने ही प्रदर्शन कर चुकी हैं। पत्रकारों के समक्ष एक बार उन्होंने दूर मेज रखी डबल रोटी को निर्निमेष दृष्टि से देखा और जैसे ही मुख खोला डबलरोटी अपने आप मेज पर से उठी मिखाइलोवा के मुँह में जा पहुँची। इस तरह के अनेकों प्रदर्शनों द्वारा वे लोगों को आश्चर्यचकित करती रही हैं।

‘बिटवीन टू वर्ल्डस्’ में डॉ. नैन्डोर ने ऐसे शक्ति सम्पन्न कितने ही व्यक्तियों का उल्लेख किया है। डॉ. वैन्शनोई भी उन्हीं में से एक हैं। बिना स्पर्श किए वे वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर खिसका देते हैं। उनकी इस विलक्षण सामर्थ्य की परीक्षा वैज्ञानिकों एवं पत्रकारों द्वारा ली जा चुकी है। डॉ. फोडोर ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि एक बार प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जुँग अपने मित्र मनोविज्ञानी डॉ. फ्रायड से मिलने गये। चर्चा संकल्प बल पर चल पड़ी। फ्रायड ने जुँग की इस बात को मानने से इन्कार कर दिया कि इच्छा शक्ति द्वारा जड़ वस्तुओं को भी प्रभावित किया जा सकता है। जुँग एक स्थान पर बैठ गये तथा उन्होंने अपनी प्रचण्ड संकल्प शक्ति का प्रयोग किया। ऐसा लगा कि कमरे की सभी वस्तुएं काँपने लगी हों, मेज पर रखी पुस्तकें कमरे की छत पर उछल कर जा चिपकीं। फ्रायड को अपना मत बदलना पड़ा। इसे उन्होंने न केवल स्वीकार किया वरन् इसका अपने ग्रन्थों में उल्लेख भी किया।

अमेरिका का यूरी गैलर नामक व्यक्ति अपनी विलक्षण शक्ति के लिए काफी दिनों तक चर्चा का विषय बना रहा। इच्छा शक्ति द्वारा वह दूर रखे चम्मच, लोहे की छड़ों को तोड़-मरोड़ देने का प्रदर्शन विशाल जन समूह के समक्ष अनेकों बार कर चुका है।

ब्रिटिश काल में सर जौन बुडरफ कलकत्ता हाइकोर्ट के चीफ मजिस्ट्रेट थे। एक संस्मरण में उन्होंने लिखा है कि एक बार वे ताजमहल के संगमरमर के फर्श पर बैठे थे। साथ में उनके एक भारतीय मित्र भी थे। बातचीत के प्रसंग में संकल्प शक्ति की चर्चा चल पड़ी। बुडरफ को इस पर विश्वास न था, मित्र से उन्होंने संकल्प शक्ति का प्रमाण देने को कहा। उनके भारतीय मित्र ने कहा कि एक छोटा प्रमाण तो मैं भी दे सकता हूँ। सामने जो लोग बैठे हैं उनमें से आप जिसे कहें, उसे उठा दूँ और वापिस जहाँ कहें वहाँ बिठा दूँ। वुडरफ ने उन व्यक्तियों में से एक को चुना और यह भी बता दिया कि उसे किस स्थान पर बैठाना है। मित्र ने अपनी शक्ति का प्रयोग किया। फलस्वरूप वह व्यक्ति अकारण उठा और वुडरफ द्वारा बताये गये स्थान पर जा बैठा। इस घटना का उल्लेख वुडरफ ने अपनी एक पुस्तक में विस्तृत रूप से किया है।

भारतीय योग विद्या में रुचि रखने वाले प्रसिद्ध फ्राँस के विद्वान ‘लुई जकालियट’ ने अपनी पुस्तक में गोविन्द स्वामी नामक एक भारतीय योगी का उल्लेख किया है जो अपनी इच्छा शक्ति से जल के भरे घड़े को हवा में ऊपर उठा देता था। मिनटों तक घड़ा अधर में लटका रहता था।

निग्रहित मन की सामर्थ्य और चमत्कारों की घटनाओं से तो भारतीय धर्मग्रन्थों के पुराण एवं इतिहास भरे पड़े हैं। इसे एक सूत्र रूप में इस रूप- में योग वशिष्ठ में कहा गया है-

“मनोहि जगतां कर्तृमनोहि पुरुषः स्मृतः।” 3।9।14

अर्थात्- ‘मन ही जगत का कारण और स्मृतियों वर्णित पुरुष है।’

‘एलेक्जेंडर राल्फ’ ने द पावर ऑफ माइन्ड नामक पुस्तक में विभिन्न प्रमाण देते हुए लिखा है कि एकाग्रता के अभ्यास द्वारा मानव मन शरीर के बाहर स्थित सजीव एवं निर्जीव पदार्थों पर भी इच्छानुसार प्रभाव डाल सकता है। उनका कहना है कि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा स्थूल जगत पर नियन्त्रण सम्भव है।

पदार्थ शक्ति कितनी सामर्थ्यवान हो सकती है इसे आइन्स्टीन के ऊर्जा समीकरण द्वारा समझा जा सकता है। ऊर्जा समीकरण के अनुसार एक ग्राम पदार्थ को यदि पूर्णतया शक्ति में बदला जा सके तो उससे प्रकाश की गति x प्रकाश की गति अर्थात् (30 अरब x 30 अरब) अर्ग ऊर्जा उत्पन्न होगी जो लगभग 214 खरब 30 अरब कैलोरी ऊष्मा के समतुल्य होगी। एक कैलोरी ऊष्मा का तात्पर्य है एक ग्राम पानी का ताप एक डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ाने में प्रयुक्त ऊष्मा की मात्रा। उपरोक्त ऊष्मा का अर्थ हुआ कि एक ग्राम के भौतिक दृव्य में ही इतनी ऊर्जा सन्निहित है कि उससे 2 लाख 14 हजार 3 सौ टन शून्य डिग्री सेंटीग्रेड वाले पानी को सौ डिग्री सेंटीग्रेड तक खौलाया जा सकता है। एक पौण्ड पदार्थ की शक्ति उतनी होगी जितनी 14 लाख टन कोयला जलाने से उत्पन्न होगी। अभी तक वैज्ञानिक इस तरह की कोई तकनीक विकसित नहीं कर सके हैं जिससे पदार्थ को पूर्णतः शक्ति में बदला और उस शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग किया जा सके। भौतिक विज्ञानियों के अनुसार एक पौण्ड पदार्थ को पूर्णतया ऊर्जा में बदलकर उपयोग करना सम्भव हो सके, तो मात्र उतने से पूरे अमेरिका को एक माह तक विद्युत सप्लाई की जा सकती है।

यह तो पदार्थ की सामर्थ्य हुई। उसका नगण्य घटक परमाणु की शक्ति तो और भी प्रचण्ड है जिसकी चर्चा इन दिनों सर्वत्र है। जड़ परमाणुओं की तुलना में मन की सामर्थ्य कई गुनी अधिक है। उसे भी परमाणु की शक्ति को उभारने जैसी प्रक्रिया अपनायी जा सके तो वह चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। इसके लिए साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है। मनोनिग्रह एवं एकाग्रता का दुहरा अभ्यास इच्छा शक्ति- संकल्प शक्ति को दृढ़ बनाने के लिए करना पड़ता है। ध्यान के विभिन्न साधना उपचार इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। अलग-अलग मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग ध्यान उपचार बताए जाते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाकर कोई भी अपने मन को इतना समर्थ और सशक्त बना सकता है ताकि उससे सामान्य से लेकर असामान्य प्रयोजन पूरा कर सके।


अन्तर्निहित विभूतियों का प्रत्यक्षीकरण

उमड़ती घुमड़ती घटाएं वर्षा होने की पूर्व सूचना दे जाती हैं। आँधी-तूफान आने के पहले वातावरण में एक अजीब-सा सन्नाटा छा जाता है। संव्याप्त विचित्र नीरवता को देखकर आने वाले तूफान का सहज ही बोध हो जाता है। मनुष्येत्तर किन्हीं जीव-जन्तुओं को ज्वालामुखी फटने, भूकंप आने जैसे प्रकृति प्रकोपों की जानकारी पूर्व ही मिल जाती है। ऐसे समय में वे अपनी स्वाभाविक प्रकृति के प्रतिकूल विचित्र आचरण करते देखे जाते हैं। मौसम में होने वाले हेर-फेर जैसी घटनाओं की पूर्व सूचना हर किसी को सहज ही मिल जाती है।

प्रकृति की ही नहीं संसार में घटने वाली प्रत्येक घटना का सूक्ष्म स्वरूप बहुत समय पूर्व ही तैयार हो जाता है तथा सूक्ष्म जगत में भी बना रहता है। क्रिया में उतरने के पूर्व मन-मस्तिष्क में उस घटना का सूक्ष्म स्वरूप विचारों के रूप में बनता है। विचारों के पढ़ने की क्षमता हो तो यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्त भविष्य में किस प्रकार का आचरण करने वाला है। इसी तरह इन्द्रियातीत सूक्ष्म जगत से तारतम्य स्थापित कर सकना सम्भव हो तो भविष्य में घटने वाली प्रत्येक घटना का पूर्वज्ञान प्राप्त कर सकना सम्भव है।

मनुष्य के भीतर वह क्षमता विद्यमान है जिसके द्वारा वह भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जान सकता है। प्रसुप्त स्थिति में वह सामर्थ्य सभी के भीतर दबी पड़ी है। जागरण के लिए साधना पुरुषार्थ किया जा सके- अन्तरंग को जगाने- सामर्थ्य को कुरेदने, उभारने, उछालने का साहस संजोया जा सके तो मनुष्य दिव्य दृष्टि सम्पन्न बन सकता है। किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में यह क्षमता अनायास प्रकट होती दिखाई पड़ती है। अपनी दिव्य दृष्टि के बलबूते वे भविष्य के विषय में कितने ही उद्घोष करते देखे जाते हैं। अपने समय पर जब वे शत-प्रतिशत सही उतरती हैं तो हर व्यक्ति को आश्चर्य होता है। अनायास प्रकट होने वाले भविष्य दर्शन की सामर्थ्य भी पूर्व जन्मों की साधना-पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती है। दिव्य दृष्टि सम्पन्न ऐसे कितने ही व्यक्तियों का परिचय समय-समय पर मिलता रहता है।

इंग्लैंड की केसी नामक बालिका को पूर्वज्ञान की विलक्षण सामर्थ्य बचपन से ही प्राप्त थी। शेफील्ड निवासी श्री डेनिस होम्स की लड़की केसी में बचपन से ही पूर्वाभास अदृश्य दर्शन की क्षमता के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे थे। एक बार वह अपने माता-पिता के साथ छुट्टियाँ बिताने ‘यारमुथ’ नामक स्थान पर जा रही थी। आगे मार्ग में पड़ने वाले दृश्यों, स्थानों का वर्णन केसी इस प्रकार करती जाती थी जैसे उसके पहले के देखे हुए हैं। होम दंपत्ति को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि केसी की बताई गई बातें शत-प्रतिशत सही उतर रही थीं। एक दिन केसी शेफील्ड की प्रमुख सड़क पर स्थिति कब्रिस्तान में माता-पिता के साथ अपने दादा की कब्र पर फूल चढ़ाने गयी। अचानक वह बोली ‘यहीं मेरे दोस्त डेविड की भी कब्र है। पता लगाने पर मालूम हुआ कि बगल में ही डेविड नाम के एक लड़के की कब्र थी जो तीन वर्ष पूर्व युवावस्था में मरा था। दो वर्षीय बच्ची केसी स्थानीय व्यक्तियों के लिए रहस्य की विषय बनी हुई है।

अप्रैल 1975 की वियतनाम युद्ध के दौरान अनाथ हुए बच्चों को अमेरिका लाया जा रहा था। केसी टीवी पर समाचार सुन रही थी। उसी समय वह बोल पड़ी- बच्चे जहाज दुर्घटना में मारे जावेंगे। दो दिन बाद समाचार प्रकाशित हुआ कि जहाज के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से वियतनाम से अमेरिका आ रहे सभी बच्चे मारे गये। भविष्य बोध की उसकी विलक्षण सामर्थ्य की परीक्षा अनेकों बार की जा चुकी है और प्रामाणिक सिद्ध हुई है।

इंग्लैण्ड के ही ‘सेम बैंजोन’ नामक व्यक्त को बचपन से ही पूर्वाभास, अदृश्य दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त है। सात वर्ष की आयु में एक दिन वह फूट-फूटकर रोने लगा। माँ के पूछने पर उसने बताया कि “एक ट्राम दुर्घटना होने वाली है जिसमें पिताजी गम्भीर रूप से घायल होंगे।” माँ ने ‘बकवास’ मानकर उसे डाँटकर चुप कर दिया, पर दूसरे ही दिन उसके पिता एक ट्राम दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए। कितनी ही घटनाओं के पूर्वाभास उसे समय-समय पर होते रहे हैं जो उसके बताये गये समय पर सही सिद्ध हुए हैं। एक बार पड़ौसी के यहाँ एक पेण्टर पुताई का काम कर रहा था। दूसरे दिन प्रातः काल अपने अधूरे छोड़े काम को पूरा करने के लिए वह जैसे ही आया, उसे देखते ही ‘सेम’ ने कहा आज इसके जीवन का अन्तिम दिन है। सचमुच ही दोपहर के समय सीढ़ियों पर शरीर का सन्तुलन डगमगा जाने से वह नीचे गिर पड़ा और थोड़ी ही देर बाद मर गया।

हालैण्ड यूरेड यूनीवर्सिटी से पैरासाइकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष श्री विलियम तेनहाफ, दिव्य दर्शन क्षमता के लिए प्रख्यात हैं। अनेकों बार वैज्ञानिकों के समक्ष अपनी इस दिव्य सामर्थ्य का परिचय भी दे चुके हैं। उनका कहना है कि अदृश्य दर्शन की क्षमता हर मनुष्य में विद्यमान है, पर वह सोयी पड़ी है। समय-समय पर आस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैण्ड आदि पड़ौसी देशों के लोग उनके पास भविष्य की जानकारी प्राप्त करने के लिए जाते रहते हैं।

एक बार वैज्ञानिकों की एक टोली उनके पास पहुँची। परीक्षा के लिए उन्होंने ‘क्रोयसेत’ से पूछा कि यूट्रैक्ट यूनीवर्सिटी के, लेक्चर हाल में आज संध्या होने वाले उद्बोधन में कुर्सी नम्बर 9 पर कौन बैठेगा, उसके बारे में विस्तार से बतायें। क्रोयसेत ने उस पर आकर बैठने वाली महिला का नाम, पता, हुलिया तथा उससे सम्बन्धित घटनाक्रमों को सही-सही बताकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। निर्धारित समय पर आकर बैठने वाली महिला से पूछे जाने पर उसने क्रोयसेत द्वारा बतायी गई सभी बातों की पुष्टि की- खोये व्यक्तियों, वस्तुओं एवं अपराधों के पता लगाने में पुलिस विभाग समय-समय से क्रोयसेत से सहयोग प्राप्त करता है।

‘स्वीडेन’ के ‘इमेनुअल’ नामक व्यक्ति को अचानक यह पूर्वाभास हुआ कि सैकड़ों मील दूर के एक शहर में भयंकर अग्निकाण्ड होने वाला है। अपने एक पत्रकार मित्र से उसने इसका से उल्लेख किया जो आरम्भ में उसने मन का बहम मानकर टाल दिया, किन्तु दूसरे ही दिन पता लगा कि ‘इमेनुअल’ द्वारा बताये गये समय पर उस नगर में भीषण आग लगी। इस तरह के पूर्वाभास इमेनुअल को अक्सर होते रहते हैं। उसके इर्द-गिर्द भविष्य जानने वालों का जमघट सदा लगा रहता है, पर वह उन्हीं विषयों पर चर्चा करता है जो मनुष्य जाति के सामूहिक भविष्य से सम्बन्धित हो।

प्रसिद्ध कवि गेटे ने अपनी आत्म-कथा में स्वानुभूति की एक घटना का उल्लेख किया है। एक बार वह अपने निवास स्थान पर था तो उसे अनायास तीव्र अनुभूति हुई कि वहाँ से हजारों मील दूर सिसली में एक भयंकर भूकम्प आने वाला है। यह बात उसने अपने मित्रों को बतायी उस समय तो किसी को विश्वास न हुआ कि बिना किसी आधार के इतनी दूर की बात इस प्रकार कैसे मालूम हो सकती है। पर कुछ ही दिन बाद यह समाचार मिला कि सिसली में तेज भूकम्प आया जिसमें अनेकों व्यक्तियों की जाने गयीं। भूकम्प आने का दिन वही था जो गेटे ने अपने मित्रों को बताया था। मित्रों को यह जानकर आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

न्यूयार्क की महिला डोरोथी एलिसन की गणना भी ऐसे ही अंतर्दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों में की जाती है। चार्ल्स ईगल नामक व्यक्ति का ‘एलिसन’ के पास पहुँचा। उसे देखते ही डोरोथी बोल पड़ी ‘तुम्हारी अठारह वर्षीय लड़की गुम हो गई है। तुम्हारे यहाँ आने का प्रयोजन उसका पता लगाना है।’ ईगल ने सिर हिलाकर मूक रूप से स्वीकार किया कि डोरोथी जो कह रही है वह सच है। ‘एलिसन कुछ देर ध्यान मग्न रही फिर कुछ क्षणों बाद बोली- चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं- तुम्हारी लड़की सुरक्षित है। वह लाल रंग के एक मकान में एक युवक के साथ अपनी स्वेच्छा से रही रही है। मकान का नम्बर 106, 186 या 168 होना चाहिए। मकान कहाँ है इसकी जानकारी बाद में दूँगी।’

कुछ दिनों बाद चार्ल्स दुबारा डोरोथी के पास पहुँचा। आते ही डोरोथी ने कहा कि “तुम्हें मैनहट्टन नामक स्थान पर चलना होगा लड़की इन दिनों वहीं है।” उक्त स्थान पर पहुँचने पर डोरोथी ने कार को एक गली में मोड़ने का संकेत किया। मोड़ से थोड़ा आगे बढ़ते ही एक लाल दरवाजे का मकान था जिसका नम्बर था 186। मकान के भीतर तलाशी लेने पर जमीन के नीचे बने एक कमरे में वह पायी गयी। लड़की ने बताया कि वह स्वेच्छा से युवक के साथ आयी है तथा उससे शादी करने वाली है।

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू के घर एक वृद्ध अंग्रेज महिला रहती थी। एक दिन मुहम्मद अली जिन्ना अपनी पारसी पत्नी के साथ उनके घर पहुँचे। वृद्ध महिला बड़े गौर से जिन्ना दंपत्ति को देखती रही। दोनों के चले जाने पर उन्होंने सरोजिनी नायडू को बताया कि “जिन्ना की पत्नी तीन वर्ष बाद आत्म-हत्या कर लेगी और जिन्ना बादशाह बनेगा।” तीन वर्ष पूर्व भारत पाकिस्तान विभाजन की चर्चा भी नहीं थी। ठीक तीन वर्ष बाद पाकिस्तान बना। जिन्ना अध्यक्ष बने और उनका पत्नी ने आत्म-हत्या कर ली। वृद्ध अंग्रेज महिला की विलक्षण सामर्थ्य का उल्लेख स्वयं सरोजिनी नायडू ने किया था। तत्कालीन अनेकों पत्रों में इस घटना का वर्णन विस्तार पूर्वक छापा था।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर शहर के ब्रह्मनान मुहल्ला के सामान्य परिवार की एक ग्यारह वर्षीय बालिका ‘सुधा’ 27 जनवरी 1948 का प्रातः उठते ही बोली- ‘बापू को किसी ने गोली मार दी है। माता-पिता ने उसे उस समय तो डांटकर चुप कर दिया। पर ठीक तीन दिन बाद 30 जनवरी 1948 की संध्या को जब प्रार्थना के समय गोली मार कर हत्या कर दी गई तो माता-पिता के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

सन् 1965 में भारत पाक समझौते के सम्बन्ध में लाल बहादुर शास्त्री ताशकन्द में पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खाँ ओर रूस के प्रधानमंत्री कोसिजिन से वार्ता करने के लिए पहुँचे। भारत के एक छात्र उदय कुमार वर्मा उन दिनों वहीं अध्ययन कर रहे थे। उनके पड़ोस में रहने वाली एक सोवियत छात्रा उनसे आकर कहने लगी मुझे शास्त्री जी के दर्शन अवश्य करा दीजिए वरना फिर कभी उनके दर्शन नहीं होंगे। कारण पूछने पर बालिका ने बताया कि उसे ऐसा बोध हो रहा है कि शास्त्री जी अब जीवित नहीं रहेंगे। उसके बारम्बार आग्रह किये जाने पर उदय कुमार ने उसे शास्त्री जी के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दर्शन के लिए पहुँचा दिया। उसी रात 9 जनवरी 1966 को शास्त्री जी का निधन हो गया जिसकी खबर दूसरे दिन सारे विश्व में फैल गयी।

अंतर्दृष्टि सम्पन्न कितने ही भारतीय योगियों, ऋषियों का उल्लेख मिलता है जो एक स्थान पर बैठे-बैठे विश्व की समस्त हलचलों एवं भावी घटनाक्रमों का पता लगा लेते थे। महाभारत में वर्णन आता है कि अन्धे धृष्टराज को संजय ने अपनी दिव्य-दृष्टि से उनके निकट बैठकर कुरुक्षेत्र की समस्त घटनाओं का वर्णन इस प्रकार किया था जैसे सामने प्रत्यक्ष देख रहे हों। ऐसी क्षमता सम्पन्न असंख्यों ऋषियों का उल्लेख भारतीय धर्म ग्रन्थों में मिलता है। इसका उल्लेख करते हुए ऋषि ‘योग तत्वोपनिषद’ में लिखते हैं-

यथा वा चित्त सामर्थ्य जायते योगिनो ध्रुवम्। दूरश्रुतिर्दूरदृष्टि अणाद् दूरागमस्तथा। वाक् सिद्धिः कामरुपत्व महश्यकरणी तथा॥

अर्थात्- ‘‘जैसे-जैसे चित्त की सामर्थ्य बढ़ती है, वैसे ही दूरश्रवण, दूरदर्शन, वाक् सिद्धि, कामना पूर्ति आदि अनेकों विलक्षण दिव्य सिद्धियाँ मिलती चली जाती हैं।”

पूर्वाभास की ये घटनाएं विलक्षण मानवी सामर्थ्य का परिचय देती हैं। भारतीय अध्यात्म वेत्ताओं ने मस्तक पर दोनों भौहों के बीच अवस्थित आज्ञाचक्र का दिव्य दृष्टि का केन्द्र माना है। तत्ववेत्ताओं का कहना है कि हर मनुष्य में वह क्षमता मौजूद है कि वह भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों ही कालों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। दिव्य दृष्टि द्वारा दूरवर्ती तथा सूक्ष्म जगत में चल रहे घटनाओं के सूक्ष्म प्रवाह की जानकारी प्राप्त करना शक्य है। पर यह सामर्थ्य प्रसुप्तावस्था में दबी पड़ी है। जागरण के लिए साधना-पुरुषार्थ किया जा सके तो त्रिकालदर्शी बन सकना हर किसी के लिए सम्भव है।


ऋद्धि-सिद्धियों का रहस्योद्घाटन अपने ही अंतराल में

मण्डन मिश्र और आद्य शंकराचार्य के बीच होने वाले शास्त्रार्थ में जब मण्डन मिश्र हारने लगे तो उनकी पत्नी विदुषी भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। कामशास्त्र के विषय में अनेकों गूढ़ प्रश्नों के उत्तर देने में शंकराचार्य असमर्थ सिद्ध हुए। उन्होंने उत्तर के लिए समय की माँग की। कहा जाता है कि काम कला का अनुभव प्राप्त करने के लिए उन्होंने अपनी आत्मा को राजा सुधन्वा के शरीर में प्रविष्ट कराया और कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। तत्पश्चात वापस अपने शरीर में आकर उन्होंने विदुषी भारती के प्रश्नों का उतर दिया। परकाया प्रवेश की यह घटना पिण्ड की सामर्थ्य के उस चेतन पक्ष का परिचय देती है, जिसे रहस्यमय विभूतियों से सम्पन्न माना गया है।

‘नाथ सम्प्रदाय’ के आदि गुरु मुनिराज ‘मछन्दरनाथ’ के विषय में भी कहा जाता है कि उन्हें परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। सूक्ष्म शरीर से वे अपनी इच्छानुसार गमनागमन विभिन्न शरीरों में करते थे। एकबार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर एक मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया था। “महाभारत के शान्ति पर्व” में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक न था। ‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया।

‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है। जो प्रकारान्तर से जीवात्मा की अकूत सामर्थ्य और शरीरान्तर उसकी स्वतंत्र सत्ता का ही प्रतिपादन करती है। सत, रज, तम से बने संसार और पंच भौतिक शरीर से जुड़े आकर्षणों में अत्यधिक लिप्त होने के कारण अपनी मूल सत्ता, जो समस्त शारीरिक एवं मानसिक हलचलों का केन्द्र है, का बोध नहीं हो पाता। बाह्याकर्षणों के आवरणों को चीरकर निकल सकना सम्भव हो सके तो प्रतीत होगा कि अपनी ही आत्म सत्ता में ऋद्धि-सिद्धियों का ऐसा विलक्षण भण्डार छुपा पड़ा है। जिसे जानकर समष्टि चेतन सत्ता से सम्बन्ध जोड़ सकना तथा विभूति सम्पन्न-सामर्थ्यवान बन सकना सम्भव है। इसी तथ्य को ऋषि ने इस प्रकार कहा है-

करामलकवद्विश्वं तेन योगी प्रपश्यन्ति। दूरतो दर्शनं दूरश्रवणं चापि जायते॥ भूतं भव्यं भविष्यं च वेत्ति सर्वकारणम्। ध्यान मात्रेण सर्वेषां भूतानां च मनोगतम्॥

अर्थात्- ‘‘योगी को अदृश्य जगत दृश्यवत् दिखता है। उसे दूरदर्शन-दूरश्रवण की विभूतियाँ उपलब्ध होती हैं। ध्यान मात्र से योगी भूत, भविष्य, वर्तमान तथा प्राणियों के मनोगत भाव जान लेता है।’’

अदृश्य जगत को जान लेना- उसमें सूक्ष्म शरीर द्वारा प्रवेश कर विचरण कर सकना सम्भव है। परकाया प्रवेश की घटनाएं उसी तथ्य पर प्रकाश डालती हैं। शरीर से परे जीवात्मा के स्वतंत्र अस्तित्व का जहाँ इनसे परिचय मिलता है वहीं उसकी विलक्षण सामर्थ्य का भी वे बोध कराती है।

‘रिसर्चेज आफ अनकान्शस माइन्ड इन ट्वेन्टीयथ सेंचुरी’ पुस्तक के लेखक हैं- दो अमेरिकी परामनोवैज्ञानिक। शरीर से परे जीवात्मा की स्वतंत्र सत्ता, मरणोपरांत उसके अस्तित्व के प्रमाण सम्बन्धित अनेकों घटनाओं का उल्लेख उस पुस्तक में है। उनमें से कुछ घटनाएं इस प्रकार हैं-

एक अमेरिकी बर्तन विक्रेता घर से टहलने निकला पर वापिस घर नहीं लौटा। दो वर्षों तक उसका कुछ भी पता न चला। इसके बाद वह अचानक एक दिन अपने घर पहुँचा। घर वालों के पूछने पर कि इतने दिन वह कहाँ रहा, कुछ भी उतर न दे सका। खोजबीन आरम्भ हुई। लम्बी ढूंढ़-खोज के उपरान्त यह मालूम हुआ कि सैंकड़ों मील दूर एक नगर में वह मशीन मरम्मत आदि का काम करता रहा। जहाँ वह काम करता था। वहीं दो वर्षों पूर्व एक कारीगर काम करता था जिसकी एक दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु हो गई। उसी के स्थान पर वह काम करता रहा। अपना नाम भी वही बताता था जो कारीगर का था। न केवल नाम बल्कि उसका आचरण, व्यवहार भी कारीगर जैसा ही था। उसे दुकान से सम्बन्धित व्यक्तियों का पूरा विवरण कारीगर जैसा ही याद था। दो वर्षों बाद एक अचानक उसे अनुभव हुआ कि वह कारीगर नहीं कसेरा है तथा इस व्यवसाय एवं स्थान से पूर्णतया अपरिचित है। यह स्मरण होते ही वह घर वापिस आ गया तथा पहले की भाँति अपना व्यवसाय करने लगा।

‘रोड्स नगर का एक कर्मचारी ऐसेलबर्न बैंक से दस हजार का चैक भुनाकर निकला पर घर न जाकर कहीं और चला गया। घर वालों ने गायब होने की रिपोर्ट पुलिस विभाग में लिखायी। खोजबीन करने पर वह एक दूसरे नगर में चीनी का व्यवसाय करता पाया गया। अपने को वह ‘कार्टर’ कहता था जबकि उसका पुराना नाम ‘राबर्ट केल्सन’ था। घर वालों ने जाकर उसे वापिस चलने के लिए आग्रह किया, पर उसने उन्हें पहचानने से भी इन्कार कर दिया। एक वर्ष तक वह इस व्यवसाय में लगा रहा। अचानक एक दिन उसे वास्तविकता का बोध हुआ कि वह कार्टर नहीं राबर्ट है तथा उसे घर वापिस जाना चाहिए। व्यापार समेटकर वह घर पहुँचा। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि उसी नगर में कार्टर नामक एक प्रसिद्ध चीनी व्यवसायी था जो कुछ ही माह पूर्व मरा था। उसका व्यवहार केल्सन जैसा ही था।

इंग्लैण्ड के एक पादरी मोटर दुर्घटना में बेहोश ही गये। उन्हें अस्पताल लाया गया। उपचार से वे होश में तो आ गये, पर उनके व्यवहार में विचित्र परिवर्तन दिखायी पड़ा। वे बच्चे जैसा आचरण करने लगे तथा अपना नाम मिल्टन बताते थे। पता लगाने पर मालूम हुआ कि उसी मुहल्ले का एक बच्चा जिसका नाम मिल्टन था कुछ ही दिनों पूर्व मरा था। उसके व्यवहार, आदतों तथा पादरी के व्यवहार में कोई अन्तर नहीं पाया गया।” कुछ माह बाद वे अपनी असली व्यक्तित्व में लौट आये।

परामनोविज्ञान पर शोध करने वाले घटनाओं के संकलनकर्ता इन लेखकों ने अपने शोध निष्कर्ष में कहा कि अपनी अतृप्त आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अदृश्य आत्मायें कभी-कभी सशरीर व्यक्तियों को अपना माध्यम बनाती हैं। प्रायः ऐसे व्यक्ति उनका शिकार बनते हैं जो कमजोर मनोभूमि के होते हैं। इन पर सरलता से नियंत्रण प्राप्त करना तथा अपनी इच्छानुवर्ती काम करा लेना अदृश्य अतृप्त आत्माओं के लिए सुगम पड़ता है। कभी कभी ऐसी घटनाएं भी प्रकाश में आती हैं जिसमें एक व्यक्ति के मरणोपरान्त तुरन्त उसके शरीर पर दूसरी आत्मा ने स्थायी रूप से अपना आधिपत्य जमा लिया हो। रूस के यूराप्रान्त में मोरवर्न नगर में इब्राहीन चारको नामक एक धनी यहूदी रहता था। एक बार वह गम्भीर रूप से बीमार पड़ा। कुछ दिनों बाद हृदय की धड़कन बन्द होने पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसे दफनाने की तैयारी चल रही थी। इतने में उसकी चेतना पुनः वापिस लौटी और वह उठ बैठा। पर अब उसकी स्थिति बिल्कुल ही भिन्न थी। उसने अपने ही कुटुम्ब के सदस्यों को पहचानने से इन्कार कर दिया। वह अपनी मूल भाषा हिब्रू न बोलकर ‘लैटिन’ में बात करने लगा। उसने अपने को ब्रिटिश कोलम्बिया (अ.उ. अमेरिका) का एक चिकित्सक बताया। नाम था इब्राहिम इरहम। खोजबीन की गई तो मालूम हुआ कि ‘न्यूवेस्ट मिनिस्टर’ में इब्राहिम इरहम नामक एक चिकित्सक की मृत्यु कुछ दिनों पूर्व हुई है। उसकी पत्नी एवं बच्चे भी हैं। कोलम्बिया के समाचार पत्रों में “इब्राहिम चारको के शरीर में इब्राहीन इरहम की आत्मा का प्रवेश” शीर्षक से इस सम्बन्ध में विस्तृत समाचार छपा। इब्राहिम चारको के शरीर में प्रविष्ट इब्राहिम इरहम की आत्मा ने अपनी पत्नी से मिलकर परिचय दिया। पहले तो पत्नी को विश्वास नहीं हुआ पर उसने ऐसे रहस्यों का उद्घाटन किया जो मात्र इरहम और उसकी पत्नी की जानकारी तक सीमित थे साथ ही उसका स्वभाव भी बिल्कुल इरहम जैसा ही था। फलस्वरूप पत्नी को मानना पड़ा कि इब्राहिम चारको के शरीर में उसके पति की आत्मा ही है।

इसी से मिलती-जुलती एक घटना प्रथम विश्व युद्ध की है। दो अमेरिकी सैनिक युद्ध के एक मोर्चे पर घायल हो गये नाम थे- डान और बॉब। डान की मृत्यु हो गई पर उपचार के बाद ‘बॉब’ ठीक हो गया। पर शरीर से बॉब होते हुए भी उसकी मूल प्रकृति बॉब जैसी नहीं थी। ठीक होते ही वह अपने को ‘डान’ कहने लगा। युद्ध समाप्त होने पर वह अपने घर न जाकर डान के घर पहुँचा। डान के परिवार के सदस्यों से उसने अपना परिचय डान के रूप में दिया। आकृति की भिन्नता के कारण परिवार वालों ने पहले तो उसे पागल समझा किन्तु उसने डान के जीवन की अनेकों प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख किया। उसकी आदत, अभिरुचियां भी ठीक डान जैसी थीं। इसी बीच घर वालों को सूचना मिली कि डान की युद्ध मोर्चे पर गोली लगने से मृत्यु हो गई। अन्ततः सबको यह मानना पड़ा कि बॉब के शरीर में डान की आत्मा ने प्रवेश कर अपना आधिपत्य जमा लिया है।” एक अन्य घटना स्पेन की है। एकबार हाला और मितगोल नामक की दो लड़कियां अपने अभिभावकों के साथ बस से वापिस घर लौट रही थीं। मार्ग में बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। अनेकों व्यक्ति मारे गये। दोनों लड़कियाँ भी बुरी तरह घायल हो गईं। मितगोल की कुछ घंटों बाद मृत्यु हो गई। हाला इसके कुछ समय बाद होश में आयी। पर अब वह शरीर से ‘हाला’ होते हुए भी हाला न थी। मितगोल एवं हाला दोनों के अभिभावक घटनास्थल पर मौजूद थे। हाला के पिता ने उससे घर चलने को कहा पर उसने उनके साथ जाने से इन्कार कर दिया। उसने बताया कि वह हाला नहीं मितगोल है। वह मितगोल के पिता के पास पहुँची तथा घर चलने के लिए आग्रह करने लगी। हाला के पिता ने समझा शायद दुर्घटना से उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया हो। वे उसे जबरन घर ले गये, पर वह किसी भी घर के सदस्य को पहचान न सकी और निरन्तर यह रटती रही कि वह हाला नहीं मितगोल है। हाला को लेकर उसके अभिभावक मितगोल के घर पहुँचे। तुरन्त ही वह मितगोल की माँ को देखते ही जा लिपटी और फूट-फूट कर रोने लगी। मितगोल के पिता उसके दुर्घटनाग्रस्त शरीर को स्वयं दफना चुके थे, पर हाला का स्वभाव शत-प्रतिशत मितगोल जैसा ही था। मितगोल से सम्बन्धित अनेकों पूर्व जीवन की घटनाओं का उसने सही-सही वर्णन कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

जीवात्मा द्वारा शरीर रूपांतरण कार्य घटनाएं भौतिकवाद की इस मान्यता का खण्डन करती है कि वृक्ष वनस्पतियों की भाँति मनुष्य भी एक चलता-फिरता पौधा है। जड़-पिंडों की तरह एक दिन नष्ट हो जाता है। आदि और अन्त, जीवन और मरण से परे अपनी स्वतंत्र सत्ता का बोध कराने के लिए ही सम्भवतः आत्म सत्ता इन विलक्षण घटनाओं के रूप में अपना परिचय देती है।

प्रसुप्ति से निकला और आत्म-जागरण, आत्म-बोध, की दिशा में बढ़ा जा सके तो प्रतीत होगा कि अपने ही अन्तराल में शक्ति का अकूत भण्डार छिपा पड़ा है। ऋद्धि-सिद्धियाँ अपनी ही अन्तः गुहा में विद्यमान है। मानवी पुरुषार्थ भौतिक उपलब्धियों के इर्द-गिर्द ही प्रायः घूमता रहता है। फलतः उतना ही मिल पाता है जितना मात्र जीवन-निर्वाह के लिए पंच भौतिक शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यक है। समुद्र के बाहर इर्द-गिर्द चक्कर काटने वाले मात्र सीपी-घोंघे ही प्राप्त कर पाते हैं? अथाह समुद्र की गहराई में डुबकी लगाने वाले साहसी ही अमूल्य मोती प्राप्त करते हैं।

बहिरंग की तुलना में अन्तरंग जगत असंख्य गुना अधिक सम्पन्न है। उसे कुरेदा, उभारा और उछाला जा सके तो मनुष्य इसी जीवन में असीम शक्ति का स्वामी बन सकता है। जीवन-मुक्ति का आनन्द ले सकता है। आत्म-शक्ति के जागरण और आत्म-साक्षात्कार की दिव्य उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए अन्तरंग जगत की आत्म साधना का अवलम्बन लेना आवश्यक है।


साधना क्षेत्र में प्रवेश और उसकी पृष्ठभूमि

आत्म शोधन और आत्म विकास की विसर्जन ग्रहण प्रक्रिया अपनाने के माध्यम में एक महत्वपूर्ण कार्य आया है- प्रायश्चित विधान का। पूर्व संचित अथवा कुछ ही समय पूर्व किये गये दुष्कर्मों के कषाय-कल्मष अन्तःकरण पर एक तमसाच्छन्न परत की तरह कुसंस्कार बनकर जम जाते हैं। उनकी प्रतिक्रिया आत्मोत्कर्ष के प्रयत्नों को असफल बनाने में भारी अवरोध बनकर अड़ी रहती है और येन−केन प्रकारेण ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है, जिससे दुष्कर्मों का दण्ड टलने न पाये और प्रगतिशील सौभाग्य का अवसर हस्तगत होने न पाये। मन की उच्चाटन साधना में अरुचि, अस्वस्थता, परिस्थितियों की प्रतिकूलता जैसे कितने ही व्यवधान साधना के दिनों इसलिए आते हैं कि यदि इस मार्ग में सफलता मिलने लगी तो फिर दण्ड भुगतने का अवसर कैसे मिलेगा? साधना से जो नये सुसंस्कारों की हरियाली उगाई जाती है, उन्हें कुसंस्कारों के वन्य पशु झुण्ड बना कर आते और देखते-देखते चर जाते हैं। सभी जानते हैं मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता, पथरीली जमीन में उद्यान नहीं लगता। दुष्कर्मों के घटा टोप विकृत हुई मनोभूमि ऐसी हठीली होती है कि उस साधना के माध्यम से सुसंस्कारों का रंग चढ़ाना या उपवन लगाना बन ही नहीं पड़ता। सारे प्रयास निष्फल जाते रहते हैं।

इस अवरोध को हटाने के लिए अध्यात्म विज्ञानी पूर्वकृत पापों का प्रायश्चित्त साधना विधान का अविच्छिन्न अंग मानते हैं। इसे भूमि शोधन कहा जाता है। कायाकल्प चिकित्सा में सर्वप्रथम नाड़ी शोधन कराया जाता है। आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने वालों को सर्वप्रथम यही करना होता है। ईश्वरीय दण्ड या समाज दण्ड पाने से पूर्व अपने दुष्कृत्यों का स्वयं ही दण्ड भुगत लेना- अपनी कुसंस्कारी मनोभूमि को अपने ही हाथों खुदाई, गुड़ाई करके उर्वर बनाने का कार्य प्रायश्चित कहा जाता है।

दूसरों ने समाज को जो क्षति पहुँचाई है, उसकी भरपाई करने के लिए सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन करना- उसके लिए अपने समय साधनों को लगाकर खोदी गई खाई को पाट देना आवश्यक है। तप तितीक्षा के अमुक उपचार अपनाकर शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कठिनाई का स्वेच्छापूर्वक वरण करना यही है प्रायश्चित्त की प्रक्रिया। इसके लिए मार्गदर्शक के सम्मुख अपने स्मृति पटल पर जितने भी शरीर से या मन से किये गये पाप कर्मों को स्मरण हो उन सभी को विस्तार पूर्वक कहना पड़ता है। इसे निष्कासन तप कहते हैं। दुराव की गांठें खोल देने, संचित विषाक्तता को उगल देने से मन में तुरन्त हलकापन आता है। (1) पूर्व कृत्यों पर दुःख मनाना। (2) भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा करना, (3) जो किया है उसके लिए तप, तितीक्षा के रूप में दण्ड भुगतना और (4) खोदी गई खाई को पाटने के लिए लोकोपयोगी सत्कर्म करना इन चार उपचारों से प्रायश्चित्त की पूर्ण प्रक्रिया सम्पन्न होती है। यह सब एकाकी स्वयं ही निर्धारण नहीं कर लेना चाहिए। वरन् विश्वस्त, अनुभवी, उदार और मनीषी स्तर के किसी विशिष्ट महामानव के- मानसोपचार के तत्वावधान में किया जाना चाहिए। इन प्रसंगों में कई प्रकार के व्रत, उपवास, तीर्थ सेवन, दान-पुण्य आदि के कष्ट साध्य कृत्य करने की आवश्यकता पड़ती है। प्रायश्चित्त से हलके किये गये मन पर साधना की फसल भली प्रकार उगती और अपने निर्धारित प्रतिफल उत्पन्न करती है।

अन्तराल के परिमार्जन एवं उन्नयन में जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है उसे महाप्रज्ञा की अभ्यर्थना कहा जाता है। इसी का दूसरा नाम गायत्री उपासना है। निखिल ब्रह्माण्ड में जिस महाप्राण का भण्डार भरा पड़ा है। उसे अभीष्ट परिणाम में ग्रहण धारण करने की आवश्यकता पड़ती है यह कार्य अनुभवी तपस्वियों द्वारा निर्धारित गायत्री उपासना की पुण्य प्रक्रिया अपनाने से सम्भव हो जाता है। इस संदर्भ में जप, ध्यान और प्राणायाम की तीन पद्धतियाँ काम में लानी पड़ती हैं। किस को किस प्रयोजन के लिए इन दिनों में से किसे, किस परिणाम में, किस क्रम से अपनानी चाहिए, इसका निर्धारण अनुभवी मार्गदर्शक साधक की मनःस्थिति का पर्यवेक्षण गम्भीरतापूर्वक करने के उपरान्त ही निश्चित करते हैं। सबके लिए एक जैसा विधान तो नित्य कर्म के रूप में ही प्रयुक्त होता है। साधना का नित्य कर्म, हर दिन आक्रमण करने वाले कुसंस्कारों का-वातावरण के प्रभाव का निरस्त करने के लिए किया जाता है। नित्य का स्नान, कपड़े धोना, मंजन करना, कमरे में झाड़ू लगाना, बर्तन मलना आदि जिस तरह हर दिन का सफाई कृत्य माना जाता है इसी तरह मनःक्षेत्र पर मलीनता की परतें न जमने देने के लिए उपासनात्मक नित्य कर्म भी करने होते हैं। विशिष्ट साधना इसके अतिरिक्त है। आत्मोन्नति के लिए उसी की अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है।

गायत्री जप की कई विधियाँ हैं। उसमें कभी-कभी कुछ अतिरिक्त बीजांकुर भी सम्मिलित करने पड़ते हैं। ध्यान में नाभिचक्र, हृदय चक्र और आज्ञाचक्र को त्रिविध शक्तियों का उद्गम केन्द्र कहा गया है। नाभि चक्र में प्राण की प्रखरता भरी पड़ी है जिसे कुण्डलिनी कहते हैं। हृदयचक्र में परम तत्व के साथ एकात्म करने वाली जोड़ने वाली सत्ता निवास करती है, जिसे भक्ति एवं तल्लीनता कहते हैं। आज्ञा चक्र के माध्यम से दिव्यज्ञान की-अतीन्द्रिय क्षमताओं की- दूरदर्शिता विवेकशीलता एवं दिव्य दृष्टि की गंगोत्री प्रवाहित होती है। शाप वरदान देने वाले तन्तु इसी केन्द्र में केन्द्रीभूत हैं। त्रिपदा गायत्री इन्हीं तीन दिव्य धाराओं से विनिर्मित होती और त्रिवेणी कहलाती है। जप के साथ-साथ ध्यान करने के अनेकों निर्धारण हैं जिनमें उपरोक्त तीन चक्रों के उन्नयन को ग्रन्थि भेद कहते हैं। जीव और ब्रह्म के मध्य भेदभाव-अलगाव रखने वाले जो तीन अवरोध हैं, उन्हें तीन क्षेत्रों में ध्यान ऊर्जा का प्रयोग अभिचार करके प्रसुप्ति को जागृति में बदला जाता है।

प्रकाशवान छवि माध्यम के द्वारा किये गये ध्यान ‘बिन्दु योग’ के नाम से- सूक्ष्म कर्मेन्द्रिय के माध्यम से दिव्य ध्वनियों का आभास देने वाली प्रक्रिया का ‘नादयोग’ के नाम से जाना जाता है। तीसरा ‘लययोग’ है। जिसमें तादात्म्य भाव-विभोर, आनन्द मग्न होने की समाधि साधना की जाती है। सहस्रार से सम्बन्धित खेचरी मुद्रा का यही स्वरूप है। शाम्भवी मुद्रा मूलाधार को प्रभावित करती है। हृदयचक्र में ज्योति मुद्रा का- अमृत कलश का ध्यान किया जाता है। यह सभी प्रयोग गायत्री उपासना के अंतर्गत आते हैं और साधक को सतोगुण प्रधान, रजोगुण प्रधान, तमोगुण प्रधान प्रकृति का पता चलने के उपरान्त निर्धारित किये जाते हैं। नित्य क्रम की साधना तो थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ सभी के लिए एक जैसी है, किन्तु विशेष साधनाएं उसी प्रकार की है जैसा की पहलवानी को अखाड़े का आश्रम लेकर उस्तादी के देख-रेख में विशेष प्रकार की कसरतों के माध्यम से करनी पड़ती है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने के लिए यही प्रक्रिया अपनाना पड़ती है। इस स्तर तक पहुँचने के लिए मात्र टहलने जैसी हलकी-फुलकी कसरतों से काम नहीं चलता।

जीवात्मा के तीन शरीर हैं स्थूल, सूक्ष्म, कारण। इन तीनों को परिष्कृत करने के लिए क्रमशः हठयोग की, राजयोग की और लययोग की साधना करनी होती है। उनके अनेकों उपभेद और सम्मिश्रक है। औषधि विज्ञान की तरह साधना विज्ञान का भी एक स्वतंत्र शास्त्र है। चिकित्सा उपचार में रोगियों की स्थिति का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसी प्रकार श्रेयार्थियों के लिए भी अनुभवी मार्गदर्शक अमुक साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित होने वाली त्रिविध शक्तिधाराएं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के नाम से जानी जाती हैं। किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तीन राजमार्ग कहते हैं। भूलोक इड़ा से भुवः लोक पिंगला से और स्वःलोक सुषुम्ना से सम्बन्धित माना गया है। इन तीनों का समान स्वरूप त्रिपदा गायत्री के रूप में बनता है।

गायत्री मन्त्र प्रधान है। उसमें शब्द शक्ति का अवलंबन लेकर तीन शरीरों में सन्निहित तीन शक्ति स्त्रोतों के साथ सम्बन्ध बनाया जाता है। निखिल ब्रह्माण्ड को तीन लोकों के रूप में विभाजित किया गया है। इनके साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिये शब्द शक्ति का आश्रय लिया जा सकता है। मंत्रयोग समस्त उपचार शब्द शक्ति पर आधारित है। विज्ञान के छात्र जानते हैं कि ऊर्जा के अनेक विभाजनों में ताप, ध्वनि और प्रकाश की तरंगों को प्रमुखता दी गई है। इन तीन को रूपांतर विभिन्न स्तर के परमाणुओं और जीवकाशा में होता रहता है। पदार्थ जगत में पाँच तत्वों का और चेतन जगत में पाँच प्राणों का आधिपत्य है। इन दोनों ही क्षेत्रों में गतिविधियाँ जिस ऊर्जा के बलवत् चलती रहती है, उनमें से एक अति महत्वपूर्ण है- ध्वनि। इसी का अध्यात्म तत्व-ज्ञानी ‘ॐ कार’ के रूप में अधिग्रहण करते हैं। ॐकार से भूर्भुवः स्वः तीन व्याहृति और इनमें से प्रत्येक के तीन-तीन शब्द निस्सृत होने पर नो शब्दावली, चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का महामन्त्र बन जाता है। सामान्यतया इसे हंसवाहिनी, आदिशक्ति के रूप में- सविता के मार्ग ब्रह्मवर्चस में तथा महाप्रज्ञा की ध्यान-धारणा में- अपनाया और हृदयंगम किया जाता है। इतने पर भी यह मानकर चलना चाहिए कि गायत्री का तत्वज्ञान और प्रयोग विधान जिस धारा में प्रवाहित होता है, कि वह ब्रह्म विद्या शब्द परक है। मन्त्र योग का रहस्य यही है उसकी समस्त विधि व्यवस्था, शब्द शास्त्र के अंतर्गत समझी समझाई जा सकती है।

आत्मा और परमात्मा के बीच सम्बन्ध बनाने के लिए साधनात्मक प्रयोजनों में शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। जप, स्तवन, कथा, मंत्रोच्चार, पाठ, कीर्तन, प्रवचन, आशीर्वाद, अभिचार आदि में शब्द का ही किसी न किसी रूप में प्रयोग होता है। नादयोग के माध्यम से ईश्वरीय सन्देश सुनने एवं अदृश्य जगत में चल रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने की बात बनती है। विज्ञान ने प्रकृति के अन्तराल से ऐसी ध्वनी तरंगें-ढूँढ़ निकाली हैं जो अब तक के समस्त आविष्कारों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान शक्ति स्त्रोत उपलब्ध हुआ है। चेतना जगत तथा पदार्थ जगत के दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय अनुकूलताएं उत्पन्न करने तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए शब्द शक्ति का जो विशेष विनियोग उपचार किया जाता है उसी को मन्त्र कहते हैं। आज यन्त्रों की धूम है। उनकी उपयोगिता तथा समर्थता का परिचय सभी को है। भूतकाल में ठीक इसी तरह मन्त्र शक्ति का प्रयोग होता है और उसकी प्रभाव शक्ति आज के अति महत्वपूर्ण यन्त्रों की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं थी।

मन्त्र विद्या को- उच्चस्तरीय शब्द विज्ञान कह सकते हैं। मन्त्रों के अक्षरों का गठन गुँथन आत्म विज्ञान के पारंगतों ने इस प्रकार किया है कि उनसे साधक का काया में सन्निहित अनेक रहस्य भरे शक्ति संस्थानों का उभार अभिवर्धन होता चला जाता है। गायत्री महाविद्या की उच्चस्तरीय रहस्यमय शब्द शक्ति का ऐसा समावेश है, जिसका सिद्धान्त एवं प्रयोग करने वाला सिद्ध पुरुष स्तर की चमत्कारी सिद्धियों का परिचय दे सकता है।


Quotation

मनुष्य बुद्धि के, परिस्थितियों के, प्रलोभन के, माया जाल में फंसे भले ही आत्म चेतना को उस रोक को न माने, लाख पशुता करे, वह चेतना अपना काम करती रहती है। तभी तो बुरे होकर भी प्रशंसा हम भलाई की ही करते हैं, दुष्ट होकर भी विजय हम सज्जनता की ही चाहते हैं। इस प्रकार हमारे ऊपर पशुता का लाख अंधेरा छा जाये, हमारे अन्तर में देवत्व का प्रकाश ही रहता है। यही संस्कृति का दीपक है। इसी दीपक के प्रकाश की वाणी है। ‘नहि मानषात श्रेष्ठतरं हि किंचित’ मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। सभा में चार आदमियों में बैठकर जो आदमी भला लगे, जिसका व्यवहार अच्छा हो। वही सभ्य कहलाता है।

-भारतीय संस्कृति


साधना में सफलता के लिए दो अनिवार्य अवलम्बन

साधना से सिद्धि का सिद्धान्त अध्यात्म क्षेत्र में सर्वमान्य है। शास्त्रकारों, आप्त पुरुषों, महा-मनीषियों, तपस्वी, साधकों ने एक स्वर से इस तथ्य को मान्यता दी है कि मानवी सत्ता में दैवी विभूतियों का अजस्र भाण्डागार भरा पड़ा है। उसे जगाने के लिए साधना परक पुरुषार्थ किया जा सके तो अविज्ञात, प्रसुप्त को प्रत्यक्ष होने का अवसर मिल सकता है।

अप्रत्यक्ष के प्रकटीकरण को लक्ष्य रखकर किये गये प्रयासों को साधना कहते हैं। उसके दो प्रयोजन हैं एक अन्तराल की प्रसुप्त विभूतियों का जागरण दूसरी अनन्त ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह-अवतरण। यह दोनों प्रयोजन देखने में भिन्न प्रतीत होते हैं किन्तु वस्तुतः हैं अविच्छिन्न एक दूसरे के पूरक।

बीज में वृक्ष बनने की समर्थता सन्निहित है, पर वह अनायास ही प्रकट नहीं होती उसके लिए उपर्युक्त भूमि में बोने खाद पानी का प्रबन्ध करना पड़ता है। इतना बन पड़ने पर अंकुर उत्पन्न होता है। यह आत्म-जागरण का प्रयास हुआ। बीज जमीन से खुराक खींचने लगता है, यह उसका अपना पुरुषार्थ है। आत्म साधना इसी को कहते हैं कि बीज अंकुरित हो, जड़ पकड़े जमीन से खुराक खाने और पत्तों के द्वारा हवा में साँस खींचने लगे।

ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह है बाहरी सहायता उपलब्ध करना। पौधा हवा से साँस खींचता है। यह हवा उसकी अपनी कमाई नहीं है। वह तो पहले से ही मौजूद है। पत्तों के साँस लेने में सक्षम होते ही वह अभिष्ट मात्रा में मिलने लगती है। सभी जानते हैं कि पेड़ों की चुम्बकीय शक्ति बादलों को बरसने के लिए बाध्य करती है। सभी जानते हैं कि हरे-भरे फूले-फले वृक्ष को देखकर उसे जी भरकर निहारने, छाया, सुगन्ध, शोभा का- फल-फूलों का लाभ लेने के लिए कीट-पतंग, पशु-पक्षी, मनुष्य सभी उनके समीप दौड़ते हैं। वह बाहरी अनुग्रह हुआ। पौधे की तरह जब आत्म-सत्ता अन्तःसाधना से अपनी प्रसुप्त गरिमा को प्रकट करते हैं तो लोक-लोकान्तरों से दिव्य वरदान भी बादलों की तरह बरसने लगते हैं। सत्प्रवृत्तियों से प्रसन्न होकर देवता आकाश से फूल बरसाते हैं। इस मान्यता में इसी रहस्य का उद्घाटन है कि साधना के फलस्वरूप भीतर के उभार और ऊपर के अनुग्रह का दुहरा लाभ मिलता है।

देवता पूजा से प्रसन्न होकर मनोकामनाएं पूर्व करने और वैभव बरसाने लगते हैं इस भ्रम जंजाल से प्रत्येक यथार्थ प्रेमी को अपना पीछा छुड़ा लेना चाहिए। दैवी शक्तियाँ इतनी ओछी नहीं हैं कि मनुष्य उन्हें बाग् जाल में फंसा सके और छुटपुट पूजा उपचारों से अपने भक्त होने का विश्वास दिला सके। जादू की छड़ी घुमाने से उत्पन्न होने वाले चमत्कारों की तरह जो तरह-तरह के जाल बुनते रहते हैं उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। कोई देवता कबूतर की तरह जाल में नहीं फंसता। कोई देवी मछली की तरह आटे की गोली नहीं निगलती। कोई मंत्र अलाद्दीन का जादुई चिराग नहीं है। अध्यात्म विज्ञान का एक ही मान्यता प्राप्त सिद्धान्त है- साधना से सिद्धि। जिनने कुछ महत्वपूर्ण पाया है उनने इसी तथ्य को हृदयंगम किया है और पात्रता विकसित करने वाले साधनात्मक पुरुषार्थ के सहारे अपनी यथार्थता को बढ़ाया है।

साधनात्मक प्रयोग, उपचार, क्रिया-कृत्य आरम्भ करने के साथ-साथ सर्वप्रथम एक समस्या का समाधान करना होता है कि प्रगति पथ के अवरोधों को कैसे हटाया जाय? अवरुद्ध द्वार कैसे खोला जाय? आत्मिक प्रगति में- सिद्धियों की उपलब्धि से सबमें प्रमुख बाधक अपने कुसंस्कार ही होते हैं। दृश्यमान दुष्कर्म अपना विस्तार समेट कर अदृश्य संस्कारों का रूप बनकर अचेतन की गहरी परतों में जा घूमते हैं और वहीं से अनेक प्रकार के संकटों का सृजन करते रहते हैं। आग जहाँ रखी जाती है, वहीं जलाना आरम्भ कर देती है। तेजाब का स्वभाव ही गलाना है वह जहाँ भी रखा जायेगा सामर्थ्यानुसार अपने प्रभाव का परिचय देता रहेगा। अन्तःक्षेत्र में प्रतिष्ठित दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति का समन्वय कुसंस्कार है। यही है जो न साधना को सिद्ध होने देता है और न उस निमित्त श्रद्धा जमने, मन लगने तथा गम्भीर प्रयत्न करने देता है। उथले प्रयत्नों का गहरा प्रतिफल कैसे मिले? कुसंस्कार ही हैं जो यमदूतों की तरह पग-पग पर त्रास देते हैं। व्यक्तित्व को हेय बनाते हैं। रुग्णता एवं उद्विग्नता के अभिशाप थोपते हैं। संपर्क क्षेत्र से असहयोग, विग्रह, विद्वेष का वातावरण बनाते हैं। सर्वविदित है कि दुर्गुणी भीतर से जलता और बाहर से मिटता है।

नरक लोक में यमदूतों द्वारा दिये जाने वाले त्रासों का वर्णन कथा पुराणों में सुनने को मिलता रहता है। कषाय-कल्मषों से आच्छादित अन्तःकरण ही नरक है। अपने ही दुर्गुण दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। अपनी ही दुर्बुद्धि अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहकर कुमार्ग पर धकेलती है। दुष्प्रवृत्तियां ही उलटकर विपत्तियों की तरह बरसती हैं। यमदूत और कुछ नहीं अपने ही कुसंस्कारों द्वारा उत्पन्न किये गये भूत-प्रेत हैं। जो क्रिया की प्रतिक्रिया का परिचय देते हैं और अनाचारों को तोड़ मरोड़ कर रख देते हैं। नरक और यम-त्रास मनुष्य की आत्म-सत्ता में ही सृष्टा ने सुनियोजित रीति से गुँथ दिये हैं।

साधना की प्रगति में सर्वप्रथम इसी मोर्चे पर जूझना पड़ता है। साधना को संग्राम कहा गया है। यही अर्जुन का महाभारत है। उसे लड़े बिना कोई चारा नहीं। कृष्ण का आग्रह इसी निमित्त था। जब तैयार हो गया तो वह उसका रथ चलाने, घोड़े हाँकने, रास्ता बताने और विजय दिलाने के लिए वचनबद्ध हो गये। साधना यहीं से आरंभ होती है। साधक को अन्तराल के धर्म क्षेत्र में और व्यवहार के कर्म क्षेत्र में उच्च उद्देश्यों के लिए अग्रगामी होना पड़ता है। गाण्डीव उठाने और “करिष्ये वचनं तव” का संकल्प करने के उपरान्त ही सामान्य-सा पाण्डु पुत्र भगवान का अनन्य सहचर महान अर्जुन बनता है। यही है साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि।

भीतरी प्रगति और बाहरी उपलब्धि के लिए साधना मार्ग पर अग्रसर होना होता है। यह मंजिल अपने ही पैरों चलकर पूरी करनी पड़ती है। मार्ग में सहायक सहयोगी भी मिलते हैं और लक्ष्य तक पहुँचने पर अभीष्ट उपहार उपलब्ध होते हैं किन्तु ऐसा नहीं होता कि अपने पैरों को कष्ट देने से बचा लिया जाय और किसी दूसरे के कन्धे पर बैठकर यह यात्रा पूरी करली जाय। दैवी शक्तियों के वरदान अनुदान प्राप्त होने की परम्परा तो है, पर वह लाभ विजेताओं को मिलता है। छात्रवृत्ति या उपाधि उत्तीर्ण छात्रों को मिलती है। शिक्षा आरम्भ करने से पूर्व ही यह दोनों अनुदान हस्तगत हो सकें ऐसा देखा सुना नहीं गया। साधना का साहस करने से पूर्व सिद्ध पुरुषों के अनुदान, आशीर्वाद अथवा देव सत्ताओं को सिद्धि वरदान मिलने लगें, ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है।

आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए भी इसी प्रकार दो कदम उठाते हुए बढ़ना होता है जैसा कि आये दिन सभी चला करते हैं। पैर दो हैं। चलने वाले इन्हीं को लेफ्ट राइट करते हुए आगे बढ़ते हैं। अध्यात्म क्षेत्र में लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो कदम बढ़ाने पड़ते हैं उनमें से एक का नाम है- परिशोधन। दूसरे का नाम- परिष्कार। परिशोधन अर्थात् संचित कषाय-कल्मषों का कुसंस्कारों का- दुष्कर्मों के प्रारब्ध संचय का निराकरण। परिष्कार अर्थात् श्रेष्ठता का जागरण अभिवर्धन। सुसंस्कारिता का जीवन क्रम में अधिकाधिक समावेश। यह दो उपक्रम ही वे दो कदम हैं जिन्हें बढ़ाते हुए आत्मिक क्षेत्र की सफलता सम्भव होती है।

यही राजमार्ग सब के लिए है। इसमें पगडण्डी वाला शॉटकट ढूँढ़ना व्यर्थ है। चुटकी बजाते जो ऋद्धि-सिद्धियों की बात सोचते हैं, कुछ ओछे-तिरछे उपचारों के सहारे भौतिक सफलताओं की तुलना में असंख्य गुनी अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक सफलता का सपना देखते हैं- वे यथार्थ से कोसों दूर हैं। मनमोहक खाने वाले- स्वप्नदर्शी व्यर्थ ही मृग तृष्णाओं में भटकते रहते हैं। बड़ी उपलब्धियों का बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। हर साधक को सिद्धावस्था तक पहुँचने के लिए आत्म-शोधन और आत्म-परिष्कार के अवलम्बन अनिवार्य रूप से अपनाने होते हैं।

परिशोधन को तपश्चर्या कहते हैं और परिष्कार को योग साधना। तप की गर्मी से कुसंस्कार जलते हैं और प्रसुप्त जगते उभरते हैं। योग से परब्रह्म के साथ एकात्म स्थापित करने का अवसर मिलता है। बल्ब तब प्रकाशवान होता है जब तारों के माध्यम से वह बिजली के उत्पादन केन्द्र के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। परमात्मा बिजली घर है और आत्मा बल्ब। दो तार मिलने पर ही करेंट चालू होता है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने से ही साधक में दिव्य चेतना की विभूतियाँ बढ़ने का प्रमाण परिचय मिलने लगता है। योग अर्थात् आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली भावनात्मक प्रक्रिया। तप, अर्थात् कुसंस्कारों दुष्कर्मों का दहन- प्रायश्चित। तप अर्थात् उस आन्तरिक ऊर्जा का उद्भव जिसके सहारे सत्प्रयोजन का पराक्रम जगे और उत्कृष्टता के अवधारण का साहस उभरे।

कपड़ा रंगने से पहले उसे भली प्रकार धोना पड़ता है। बीज बोने से पूर्व भूमि तैयार करनी होती है। कारतूस चलाने का समय तब आता है जब अच्छी बन्दूक हाथ लग जाती है। पूजा से पूर्व स्नान करने, धुले वस्त्र पहनने, बुहारी लगाने की आवश्यकता होती है। भोजन करने से पूर्व हाथ धोते हैं। इन्जेक्शन लगाने से पूर्व सुई को गरम पानी में उबालते हैं। इन उदाहरणों में परिशोधन की प्राथमिकता है। यही बात आत्मिक प्रगति के सम्बन्ध में भी है। ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने से पूर्व उस दिव्य अवतरण के लिए अन्तःकरण को बुहारने, धोने लीपने, पोतने की आवश्यकता पड़ती है। अवतरण बाद में होता है। दिवाली आने से पूर्व ही लक्ष्मी पूजन के लिए घरों की रंगाई पुताई होती है। दूल्हा बरात लेकर आये उससे पूर्व भी ऐसी ही सफाई सजावट होती है। दैवी अनुकम्पा जीवन में उतरे इससे पूर्व उसे भी कुसंस्कारों से युक्त करना पड़ता है। तपश्चर्या की प्राथमिकता है। योग साधना का कदम इससे आगे का है। राजयोग में यम, नियम पालने की मनोभूमि बनने पर ध्यान धारणा के अगले कदम उठते हैं।

उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म-शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित्त विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली, वज्रोली, कपाल भाँति की क्रियाएं करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम, नियमों के रूप में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका, चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारा जाय और पिछले जमा हुए कूड़े-करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के काया-कल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल शोधन किया जाता है तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्म-शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।

परिशोधन प्रयोजन के लिए तपश्चर्याओं के अनेकानेक विधि-विधान हैं। उन सबसे सर्व सुलभ एवं अनेक दृष्टियों से सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली साधना चान्द्रायण व्रत की है। उसे आध्यात्मिक कायाकल्प कहा जाता है। कायाकल्प चिकित्सा से शरीर में भरे हुए मल विकारों की पूरी तरह सफाई की जाती है। तथा ऐसे उपचार अपनाये जाते हैं जिससे नये रक्त का नाडियों में संचार होने लगे। पाचन तंत्र नई स्फूर्ति के साथ काम करने लगे। माँस-पेशियाँ फिर से कड़ी हो जांय और नाड़ियों में प्राण प्रवाह नयी चेतना के साथ बह निकले। चान्द्रायण तपश्चर्या को भी इसी स्तर की माना है। उसका मुख्य प्रयोजन परिशोधन होते हुए ही लगे हाथों परिष्कार का दुहरा सिलसिला भी चल पड़ता है।


परिशोधन के लिए चान्द्रायण प्रायश्चित्त

अध्यात्म साधना में अपने आपे को ईश्वर के रंग में रंगना होता है। तभी दानों का वर्ण एक जैसा बनता है। इसके लिए सर्वप्रथम धुलाई करनी पड़ती है। कपड़े को बिना धोये रंगा जाय तो काम न चलेगा। वह तेल, कीचड़ में डूबा हो तो रंगने के लिए किया गया परिश्रम भी व्यर्थ चला जाएगा। रंगाई को साधना और धुलाई को प्रायश्चित्त तप कहते हैं।

मैले कुचैले गंदे कपड़े जिन्हें किसी का मन देखने छूने पहनने का नहीं करता उसे शुद्ध आकर्षक और पहनने योग्य स्थिति में बदल लेना धोबी का काम है। हेय स्थिति को श्रेय में बदल देने का चमत्कार धोबी का हाथ ही कर दिखाता है। यह कार्य प्रायश्चित्त प्रक्रिया का है वह मनुष्यों की गिरी गन्दी जीवन स्थिति का कायाकल्प जैसा परिवर्तन करती है और देखते-देखते उच्च भूमिका में पहुँचा देती है।

धोबी कपड़े को गरम पानी डालता है, उसका मैल फुलाता है, साबुन से गन्दगी को काटता है। पीटता है। धोता है। सुखाता है। इसके बाद कलफ लगा कर लोहा कर देता है। इतने क्रिया-कलाप में होकर गुजर होने पर गन्दा पुराना मैला कपड़ा- नये से भी अधिक आकर्षक बन जाता है। प्रायश्चित्त में ठीक यह सब करना होता है।

अपनी गुण, कर्म, स्वभाव की मलीनताओं को समझना- इस जीवन में किये हुए पापों को स्मरण करना- उनके लिए दुःखी होना और यह सब छोड़ने के लिए प्रबल तड़पन का उत्पन्न होना यही गरम पानी में कपड़े को डालना है।

दबे हुए छिपे हुए मैल को फुलाकर स्पष्ट कर देना। अपनी जो बुराइयां- भूलें, पाप कृतियाँ छिपाकर रखी थीं, उन्हें प्रकट कर देना। मन में, दुराव की कोई गाँठ न रखना, भीतर बाहर से एक सा हो जाना यह मैल का फुलाना है। आज की स्थिति में सर्व साधारण के सम्मुख अपने दुश्चरित्र प्रकट कर सकने का साहस न होता हो तो कम से कम एक शोधक- मार्ग दर्शक के सम्मुख तो सब कुछ कह ही देना चाहिए पाप का प्रकटीकरण पाप को हलका करता है और चित्त पर से भारीपन का बोझ उतारता है।

साबुन लगाना भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करना है। प्रायश्चित्त की सार्थकता तभी है जब पिछली गतिविधियों को बदल कर श्रेयता के पथ पर चलने का निश्चय हो। यह निश्चय ही साबुन है। स्थूल साबुन ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जिसे इसे योग्य समझा जाय, जिसके सामने पाप प्रकट किये जायें और जिसके परामर्श से प्रायश्चित्त विधान का निश्चय किया जाय।

लकड़ी से पिटाई पानी में धुलाई प्रायश्चित्त की तपश्चर्या है। जिसे पिछली भूलों के दण्ड स्वरूप स्वेच्छा पूर्वक किया जाता है। शारीरिक और मानसिक सुविधाओं से कुछ समय के लिए अपने को वंचित कर देना, यही तप कहलाता है। किस कर्म के लिए किस स्थिति के व्यक्ति को क्या तपश्चर्या करनी चाहिए, यह विषय बहुत ही सूक्ष्म है। इसका निर्णय किसी तत्वज्ञानी से ही कराना चाहिए। अलग स्थिति के व्यक्तियों के लिए एक ही दुष्कर्म की गरिमा भारी हलकी होती है, दण्ड के लिए भी शारीरिक मानसिक स्थिति का ध्यान रखना पड़ता है। यह निर्णय स्वयं नहीं करना चाहिए वरन् किसी तत्व ज्ञानी से ही कराना चाहिए।

कलफ लगाना, लोहा करना यह है कि जो क्षति समाज को पहुँचाई है उसकी पूर्ति के लिए दान, त्याग, ऐसा कार्य या अपनी जैसी स्थिति हो उसके अनुसार पुण्य परमार्थ के कार्य करने चाहिए। इससे उस ऋण से मुक्ति मिलती है जो अनीति द्वारा अपहरण करके अपने शिर पर एकत्रित किया था। जो कभी न कभी ब्याज समेत चुकाना ही पड़ता। अच्छा यही है कि उसे ईमानदारी और स्वेच्छापूर्वक इसी जन्म में चुका दिया जाये, कलफ लगाना यही है।

लोहा करने का अर्थ है भावी जीवन की रीति-नीति का व्यवस्थापूर्वक निर्धारण। इसमें सोचने का ढंग दृष्टिकोण बदलना और कार्य पद्धति का हेर-फेर यह दोनों ही बातें सम्मिलित हैं। शरीर की क्रियायें बदले, मन न बदले तो भी काम नहीं चलेगा और मन बदल जाय शरीर वही हेय काम करता रहे तो भी वह विडम्बना ही है। दोनों की परिवर्तित स्थिति भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करती है और जिस पर चलने के लिए सुदृढ़ निश्चय किया जाता है उसी की सार्थकता है। प्रायश्चित्त का आरम्भ जीवन शोधन की तड़प से आरम्भ होता है। मध्य में शोधनात्मक क्रिया-कृत्य करना पड़ता है और अन्त में भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने के रूप में उसकी पूर्णाहुति करनी पड़ती है। सर्वांगीण प्रायश्चित्त की यही समग्र प्रक्रिया है।

दुष्कर्मों से अपने अन्तःकरण को- विचार संस्थान को तथा काय कर्मों को जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों से भर दिया गया था उसी साहस और प्रयास के साथ इन तीनों संस्थानों के परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार की प्रक्रिया को प्रायश्चित्त कहा गया है। पाप कर्मों से समाज को क्षति पहुँचती है। सामान्य मर्यादा प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है। लोक परम्पराएं नष्ट होती हैं। अनेकों को कुमार्ग पर चलने के लिए अनुकरण का उत्साह मिलता है। जिन्हें क्षति पहुँची है वे विलाप करते हैं और उससे वातावरण विक्षुब्ध होकर सार्वजनिक सुख-शान्ति के लिए संकट उत्पन्न करता है। ऐसे-ऐसे अन्य अनेकों कारण हैं जिन्हें देखते हुए समझा जा सकता है कि जिसे पाप कर्म द्वारा क्षति पहुँचाई गई अकेले उसी की हानि नहीं हुई प्रकारान्तर से सारे समाज को क्षति पहुँची है। विराट् ब्रह्म को- विश्व मानव को ही परमात्मा कहा गया है। यह एक प्रकार से सीधा परमात्मा पर आक्रमण करना, उसे आघात पहुँचाना और रुष्ट करना हुआ। अपराध भले ही व्यक्ति या समाज के प्रति किये गये हों उनका आघात सीधे ईश्वर के शरीर पर पड़ता है और उसे तिलमिलाने वाले कभी सुखी नहीं रहते।

इस जन्म के विदित और स्मृत पापों से लेकर जन्म-जन्मान्तरों तक के पापों का निराकरण आवश्यक है। उन्हें निकालना और निरस्त करना आवश्यक है। विष खा जाने की गलती का परिमार्जन इसी प्रकार हो सकता है कि पेट और आँतों की धुलाई करके वमन विरेचन आदि द्वारा उसे जल्दी से जल्दी निकाल बाहर किया जाय। प्राण संकट उसी उपाय से टल सकता है। प्रायश्चित्त ही परिशोधन का एक मात्र उपाय है।

साधना विज्ञान में भी शारीरिक, मानसिक मलीनताओं के निष्कासन पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद में विकार-ग्रस्त शरीरों के मलशोधन की प्रक्रिया के उपरान्त चिकित्सा का समुचित प्रतिफल मिलने की बात कही गई है। हठयोग नेति, धोति, वस्ति, न्योलि, बज्रोली, कपाल, भाति आदि क्रियाओं द्वारा मलशोधन करते हैं। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, स्वेदन, नस्य आदि शोधन कर्म करके संचित मलों का निष्कासन किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में यही कार्य उपवास एवं ऐनिमा के द्वारा किया जाता है। राजयोग में यम, नियमों का विधान है। कुण्डलिनी योग में नाड़ी शोधन की अनिवार्यता है। यों उसका बाह्य विधान प्राणायामों की विशेष प्रक्रिया पर आधारित है, पर उसका मूल उद्देश्य शारीरिक और मानसिक क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों का निराकरण ही है।

लोहे को काटने के लिए लोहा- विष को मारने के लिए विष- काँटे को निकालने के लिए काँटा प्रयुक्त करना पड़ता है। दुष्कर्मों के संचय को सत्कर्मों से निरस्त किया जाता है। आग में गरम करने से धातुओं की शुद्धि होती है। रसायन बनाने के लिए अग्नि संस्कार की विधि प्रयुक्त होती है। तपाने से ईंटों से लेकर मृतिका पात्र तक मजबूत होते हैं। पानी गरम करने से शक्तिशाली भाप बनती है। तपश्चर्या की आग में संचित दुष्कर्मों और कुसंस्कारों का परिशोधन होता है। स्वेच्छापूर्वक दण्ड स्वीकार करने की शालीनता अपना लेने से पकड़ जाने पर दण्ड पाने की अपेक्षा मनुष्य को अधिक बुद्धिमानी है। इससे खोई हुई प्रतिष्ठा को फिर से पाया जा सकता है। भूल को स्वीकार करने और सुधारने वाले व्यक्ति दया के पात्र समझे जाते हैं। उलट पड़ने से सुधार होता भी द्रुतगति से है। वाल्मीकि, अशोक, अंगुलिमाल, अजामिल, बिल्व मंगल आदि जब उलट गये तो उनका कुकर्मों में प्रयुक्त होने वाला दुस्साहस सत्साहस में बदल गया और वे ध्वंस की अपेक्षा सृजन की भूमिका सम्पन्न करने लगे। प्रायश्चित्त इसी स्तर का प्रयोग है।

प्रायश्चित्त विधानों के अगणित उल्लेख कथा पुराणों में भरे पड़े हैं। शंख लिखित दो भाई थे। एक ने दूसरे के बगीचे से बिन पूछे फल खा लिए। यह चोरी हुई। उसने राजा के पास जाकर आग्रहपूर्वक दण्ड व्यवस्था कराई और उसे भुगता। बिल्व मंगल ने कुदृष्टि रखने वाली आंखों को ही नष्ट कर लिया था, इस पर वे सूरदास बने। सती ने शिवजी का आदेश न माना और वे बिना बुलाये पिता गृह चली गईं। भूल समझ में आने पर उनने आत्म-हत्या करली। धृतराष्ट्र और गान्धारी ने अपनी यह भूल स्वीकार की कि उनने अपने पुत्रों को अनीति से रोकने में आवश्यक कड़ाई नहीं बरती और महाभारत का महाविनाश उत्पन्न हो गया। दोनों ने प्रायश्चित्त तप करने की ठानी और वे मरण पर्यन्त वनवास में रहकर तपश्चर्या करते रहे। कुन्ती ने भी अपनी भूलें स्वीकार कीं और वे भी धृतराष्ट्र गान्धारी की सेवा करने तथा अपना तप करने के लिए उन्हीं के साथ वन चली गईं। भूलें मात्र कौरवों की ही नहीं उसमें जुआ खेलने और पत्नी को दाव पर लगाने जैसे अनेक दोष पाण्डवों के थे, अस्तु उन्हें हिमालय में शीत से गल कर प्राण त्यागने का प्रायश्चित्त विधान अपनाना पड़ा।

भीष्म शरशैय्या पर पड़े थे। मृत्यु सामने थी। उनने प्रयत्न किया कि मृत्यु टल जाय और वे उसी कष्टकर स्थिति को देर तक सहन करें ताकि अनीति समर्थन के पाप का प्रायश्चित्त सम्भव हो सके। वाल्मीकि पहले डाकू थे पीछे ईश्वर भक्ति के मार्ग पर चले। इस परिवर्तन बेला उनने पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए तप साधना को आवश्यक समझा। वर्णन है कि वे अविचल साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने घर बना लिया। ब्रह्मा जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। वाल्मीकि संस्कृत में दीमक को कहते हैं। ऐसी ही कथा सुकन्या की है। उसने महर्षि च्यवन के तप संलग्न शरीर पर जमी हुई मिट्टी को मात्र टीला समझा और उसमें से चमकती आंखों को कोई अद्भुत वस्तु। जानने की दृष्टि से आँख वाले छेदों में लकड़ी डाली तो आंखें फूट गई और रक्त बहने लगा। सुकन्या को जब इस अनर्थ का पता लगा कि उसकी भूल से कितनी बड़ी दुर्घटना हो गई, इसका अनुमान लगाया तो निश्चय किया कि वह उनकी सेवा आजीवन करेगी और अपनी आँखों का ही नहीं पूरे शरीर का लाभ उन्हें देगी। आग्रहपूर्वक सुकन्या च्यवन ऋषि की पत्नी बनी और उसके इस प्रायश्चित्त से न केवल च्यवन को आरोग्य प्राप्त हुआ वरन् सुकन्या का यश भी अमर हो गया।

अंगुलिमाल ने चोरी, डाके से मुँह मोड़कर बुद्ध की शरणागति प्राप्त की। साथ ही प्रायश्चित्त रूप दुष्कृत्यों से कमाया धन धर्म प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। अम्बपाली भी इसी राह पर चली। भक्ति मार्ग पर चलने का निश्चय करने के साथ ही उसने न केवल वेश्यावृत्ति छोड़ी वरन् उस आधार पर कमाई हुई विपुल सम्पदा भी बौद्ध बिहारों के लिए दान करदी। ऐसा ही प्रसंग पिंगला वेश्या का है। उसने भी भक्ति मार्ग अपनाने के साथ-साथ जीवन परिवर्तन की वास्तविकता सिद्ध करने के रूप में प्रायश्चित्त किया था और अपना उपार्जन सत्कर्म में लगाया था। सम्राट अशोक ने भी यही किया था। उन्हें ‘चण्ड’ कहा जाता था। चण्ड अर्थात् क्रोधी। उनने अपने यौवन काल में अनेकों क्रूर-कर्म किये थे। जब मुड़े बदले तो उन्होंने साधु की तरह निर्वाह रीति अपनाई और अपनी समस्त राज्य सम्पदा बौद्ध-धर्म के प्रचार कार्य में लगादी।

इतने कठोर प्रायश्चित तो इन दिनों नहीं बन सकते। फिर बने भी तो आत्म त्रास की वैसी उपयोगिता अब नहीं मानी जाती जैसी कि पूर्वकाल में मानी जाती थी। चान्द्रायण व्रत में जहाँ पापों के प्रायश्चित्त की प्रमुखता है वहाँ आरोग्य लाभ, स्वास्थ्य सन्तुलन, दृष्टिकोण का परिवर्तन, भविष्य निर्धारण एवं आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त होने जैसे अनेकों अतिरिक्त लाभ भी हैं। इसलिए उच्चस्तरीय साधना मार्ग पर चलने वालों को चान्द्रायण साधना के लिए परामर्श दिया जाता है।


हठीले कुसंस्कारों का निराकरण चान्द्रायण से

दूध, शाक, फल आदि बहुत देर तक स्थिर नहीं रखे जा सकते इसलिए अधिक मात्रा में होने पर उन्हें बेचकर रुपया बना लेते हैं। यह रुपया सुरक्षित रहता है। आवश्यकतानुसार उसके बदले दूध, शाक, फल अथवा दूसरी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। इसी प्रकार दुष्कर्म घटनाक्रम के रूप में विस्तृत एवं सामयिक होने के कारण उन्हें पीछे अपना प्रभाव प्रकट करने के लिए अन्ततः चेतना ‘संस्कारों’ के रूप में सुरक्षित रख लेती हैं। यह संस्कार ही व्यक्तित्व का मूलभूत आधार होते हैं। इन्हीं के आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टताएं पूर्व संचित पूँजी के रूप में साथ रहती हैं। यों सामयिक कमाई भी इसमें जुड़ती-रहती और संचित संस्कार सम्पदा के प्रभाव को न्यूनाधिक करती रहती है।

मनुष्य जीवन की प्रमुख समस्याओं के कारण बाह्य परिस्थितियों में ढूँढ़ने की प्रचलित परम्परा को अपूर्ण ठहराया और अमान्य किया जा रहा है। व्यक्तित्व के अन्तराल में जमी हुई हठीली संस्कार सम्पदा ही कठ-पुतली की तरह मनुष्य को तरह-तरह के नाच-नचाने और क्रीड़ा-कौतुक करने के लिए विवश करती रहती है। इतना ही नहीं वह परिस्थितियाँ भी इतनी जटिल उत्पन्न कर देती है जो टाले नहीं टलती। कारण कि उनकी जड़ अचेतन की गहन परतों में होती है। जड़ न कटे तो टहनी-तोड़ने से भी वृक्ष के अस्तित्व पर क्या असर पड़ने वाला है।

इन दिनों शारीरिक रोगों की अभिवृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी होती जा रही है। चिकित्सकों, चिकित्सालयों एवं नित नई औषधियों में आंधी-तूफान की तरह बढ़ोतरी हो रही है। इतने पर भी उसके नियन्त्रण के कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होते। इस असमंजस का समाधान एक ही है कि मनःक्षेत्र में घुसती पनपती उन कुत्साओं-कुण्ठाओं का पर्यवेक्षण निराकरण किया जाय जो न केवल शारीरिक रोगों, मानसिक उद्वेगों के लिए जिम्मेदार हैं वरन् व्यावहारिक जीवन में भी बने अनेकानेक विग्रह संकट आयेदिन खड़े करती रहती हैं। मनःस्थिति परिस्थिति के लिए उत्तरदायी है। इस तथ्य को समझ लेने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव हो सकेगा कि संकटों का आत्यान्तिक समाधान क्या हो सकता है?

मनोविज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि शारीरिक रोगों का प्रमुख कारण मनःक्षेत्र में जमे हुए हठीले सुसंस्कार प्रधान कारण होते हैं। हठीले इस अर्थ में कि उन्हें धारण किये हुए व्यक्ति यह भली-भांति समझता है कि उसने अनुपयुक्तताएं अपना रखी हैं और उन्हें छोड़ ही देना चाहिए। इतने पर भी वे स्वभाव के साथ बुरी तरह गुंथ गई आदतों के रूप में इस प्रकार परिपक्व बन गई होती हैं कि उन्हें हटाने के सामान्य उपायों से कोई ठोस परिणाम निकलता दिखाई नहीं पड़ता। समझदारी का तकाजा एक ओर-आदतों का हठीलापन दूसरी ओर-इन दोनों की तुलना की जाय तो कुसंस्कारों का हठीला पन ही भारी पड़ता है।

सभी जानते हैं कि मनुष्य ही है जो मानसिक असन्तुलन उत्पन्न करता और उनके विक्षोभों के फल स्वरूप शरीर के विभिन्न अवयवों की सामान्य कार्य पद्धति में अवरोध उत्पन्न करता है। फलतः बीमारियाँ उसे आ घेरती हैं।

रोगों की जड़ शरीर में हो तो कायचिकित्सा में सहज सुधार होना चाहिए। पोषण की पूर्ति आहार से होनी चाहिए और विषाणुओं को औषधि के आधार पर हटाने में सफलता मिलनी चाहिए। किन्तु देखा जाता है जीर्ण रोगियों की काया में रोग इस बुरी तरह रम जाते हैं कि उपचारों की पूरी-पूरी व्यवस्था करने पर भी हटने का नाम नहीं लेते। एक के बाद दूसरे चिकित्सक और नुस्खे बदलते रहने पर भी रुग्णता से पीछा नहीं छूटता। इलाज के दबाव में बीमारियाँ रंग-रूप बदलती रहती हैं पर जड़ें न कटने से टूटे हुए फिर से नई कोपलों की तरह उगते रहते हैं। जड़ों को खुराक मिलती रहे तो टहनियाँ तोड़ने से भी पेड़ सूखता नहीं है।

रोगों के दो वर्ग हैं एक आधि, दूसरा व्याधि। ‘व्याधि’ शारीरिक रोगों को और ‘आधि’ मानसिक रोगों को कहते हैं। ज्वर, खाँसी, दमा, दर्द, अपच, मधुमेह, रक्तचाप आदि को शारीरिक रोगों में गिना जाता है और उन्माद, सनक, मूर्खता, विस्मृति, विसंगतियाँ, उलझनों आदि की मानसिक रोगों में गणना होती है। मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा पागलखाने के डॉक्टर करते हैं और मनःचिकित्सक पूछताछ करके अन्तरंग में सभी कुंठाओं को उगलवाने और सत्परामर्श देने के उपायों का सहारा लेते हैं। शरीर विज्ञानी औषधि उपचार, शल्य उपचार आदि के द्वारा करते हैं। इनमें आँशिक सफलता भी मिलती है, पर प्रयत्न फिर भी अधूरा ही रह जाता है और वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा अभीष्ट है। इस अधूरेपन को दूर करने के लिए मन की उस गहराई तक जाना होगा जहाँ से कि शरीर और मन को प्रभावित करने वाले प्रवाहों को उभारने और काम करने की प्रेरणा मिलती है। कुएं में जो पानी भरा दिखता है वह उसकी तली में जल फेंकने वाले स्त्रोतों से आता है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय अस्त-व्यस्तताएं चेतना की मूल प्रवृत्ति के मर्मस्थल में से उभरती हैं। इस परत को आस्था केन्द्र कहते हैं। मनुष्य के गहन अन्तराल में कुछ आस्थाएं जनी होती हैं। व्यक्तित्व का मूल स्त्रोत उन्हीं में सन्निहित रहता है।

अन्तःकरण की आस्थाएं ही हैं जो मनुष्य को ऊपर उठने एवं नीचा गिरने की प्रेरणा देती हैं। उसी की प्रतिक्रिया व्यक्तित्व को समुन्नत एवं पतित बनाकर रख देती हैं। इसी आन्तरिक उत्थान-पतन के आधार पर मनुष्य स्वर्गीय एवं नारकीय दृष्टिकोण विनिर्मित करता है और तदनुसार अनेक प्रकार के शारीरिक-मानसिक कष्टों को सहन करना पड़ता है। इतना ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्र भी ऐसी विषम परिस्थितियों से मर जाते हैं जिनमें रहने वाला अपने को पग-पग पर असफल, उपेक्षित, तिरस्कृत, दरिद्र एवं दुर्भाग्यग्रस्त अनुभव करता है।

डा. ब्राउन, डा. पीले, मैगडूगल, हेडफील्ड और डॉ. चार्ल्स जुंग आदि अनेक प्रसिद्ध मनोविज्ञान शास्त्रियों ने यह माना है कि फोड़े-फुन्सी से लेकर टी.बी. और कैन्सर तक की बीमारियों के पीछे कोई न कोई दूषित संस्कार ही कारण होते हैं। मनुष्य बाहर से ईश्वर परायण, सत्यभाषी, मधुर व्यवहार करने वाला दिखाई देता है, पर सच बात यह होती है कि उसके अंतर्मन में नैतिकता को जब दबाकर दिखाने के लिए कुछ किया जाता है तो उसका मन भीतर ही भीतर अंतर्द्वंद्व करता है, जिस अंतर्द्वंद्व के फलस्वरूप ही उसमें रोग पैदा होते हैं। कई बार यह संस्कार बहुत पुराने हो जाते हैं, तब बीमारी फूटती है, पर यह निश्चित है कि बीमारियाँ का पदार्पण बाहर से नहीं, व्यक्ति के मन से होता है।

इस कथन की पुष्टि में मैकडोनल्ड अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहते हैं- अमेरिका के बीमारों में आधे ऐसे होते हैं जिनमें ईर्ष्या, द्वेष, स्पर्धा, क्रोध, धोखेबाजी आदि भाव प्रभुत्व जमाये होते हैं। जो इस प्रकार मानसिक रोगी होते हैं वे अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण नहीं कर सकते, उनका व्यक्तित्व अस्त-व्यस्त हो जाता है, उसी से वे उल्टे काम करते और बीमारियों को बढ़ाते हैं। आगे दुश्चिन्ता की व्याख्या करते हुए मैकडोनल्ड लिखते हैं- “मानसिक चिन्ताओं द्वारा रक्त के अन्दर ‘एड्रेनलीना’ नामक हार्मोन की अधिकता हो जाती है, उसी से श्वास फूलना, कंपन, चक्कर, आना बेचैनी, दिल धड़कना, पसीना आना और दुःस्वप्न बनते हैं। दौरे और बड़ी बीमारियाँ भी किसी न किसी मानसिक ग्रन्थि के ही परिणाम होते हैं, जिसे डॉक्टर नहीं जानता पर आधि-व्याधियाँ होती मन का ही कुचक्र हैं।

इस सम्बन्ध में भारतीय मत बहुत स्पष्ट है। यहाँ जीवन को इतनी गहराई से देखा गया है कि आधि-व्याधियों के मानसिक कारण पाप-ताप के संस्कार रूप में स्पष्ट झलकने लगते हैं। योग वशिष्ठ में कहा गया है-

चित्ते विधुरते देहः संक्षोभमनयात्यलम्॥ -6।1।81।30

चित्त में गड़बड़ होने से शरीर में गड़बड़ होती है।

इदं प्राप्तमिद नेति जाड्याद्वा घनमोहदाः। आधयः सम्प्रवर्तन्त वर्षांसु मिहिका इवं॥ -6।1।81।16

अंतर्द्वंद्व और अज्ञान से खोह में डालने वाले मानसिक रोग पैदा होते हैं, उनसे फिर शारीरिक रोग इस तरह पैदा हो जाते हैं जैसे बरसात के दिनों में मेंढक अनायास दिखाई देने लगते हैं।

दुष्काल व्यवहारेण दुष्क्रिया स्फुरणन च। दुर्जना संगदोषेण दुर्भावोद्भावनेन च॥ क्षीणत्वाद्वा प्रपूर्णत्वान्नडोनां रन्ध्रसन्ततो। प्राणे विधुरतां याते काये तु विकलोकृत॥ -6।1।81।18,19

दौस्थित्यकारणं दोषाद् व्याधिद हे प्रवर्तते।

अनुचित समय पर अनुचित काम करने से, बुरे लोगों के पास बैठने से, मनुष्य मन में पाप और बुरी भावनाओं को स्थान देने लगता है। ऐसा होने पर नाड़ियां अपनी सामान्य कार्य प्रणाली बन्द कर देती हैं। कुछ नाड़ियों की शक्ति नष्ट हो जाती है, कुछ अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं, जिससे प्राण का प्रवाह उलटा-पुलटा हो जाता है। प्राण संचार में गतिरोध उत्पन्न होने पर ही शरीर की( स्थिति बिगड़ती और उसमें तरह-तरह के रोग पैदा हो जाते हैं।

आगे चलकर योग वशिष्ठ में इस प्रसंग को और भी अच्छी तरह खुलासा किया गया है।

संक्षोभात्साम्युत्सर्ज्य वहन्ति प्राणवायवः॥ असमं वहति प्राणे नाड्योयांति विसंस्थितिम्॥ कुजोर्णत्वमजीर्णत्वमतिमति जीर्णत्वमेव वा। दोषा येव प्रपात्यन्नं प्राणसंचारदुष्क्रमात्॥ कश्चिन्नाड्यः प्रपूर्णत्वं यांतिकाश्चिच्चरिक्तताम् तथान्नानि नयत्यन्तः प्राणवातः स्वमाश्रयम्। यान्मन्ननि निरोधेन तिष्ठन्त्यन्तः शरीरके॥ तान्येव व्याधितां यान्ति परिणामस्वभावतः। एवमाघेर्भवेद् व्याधिस्तस्याभावाच्च नश्यति॥ -6।1।81।32 से 38 तक

अर्थात्- चित्त में उत्पन्न हुए विकास से ही शरीर में दोष पैदा होते हैं। शरीर में क्षोभ या दोष उत्पन्न होने से प्राणों के प्रसार में विषमता आती है और प्राणों की गति में विकार होने से नाड़ियों के परस्पर सम्बन्ध में खराबी आ जाती है। कुछ नाड़ियों की शक्ति का तो स्राव हो जाता है और कुछ में जमाव हो जाता है।

प्राणों की गति में खराबी से अन्न अच्छी तरह नहीं पचता है। प्राणों के सूक्ष्म यन्त्रों में अन्न के स्थूल कण पहुँच जाते हैं और जमा होकर सड़ने लगते हैं। उसी से रोग उत्पन्न होते हैं, इस प्रकार आधि (मानसिक रोग) से ही व्याधि (शारीरिक रोग) उत्पन्न होते हैं। उन्हें ठीक करने के लिए मनुष्य को औषधि की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी यह कि मनुष्य अपने बुरे स्वभाव और मनोविकारों को ठीक कर ले।

साधारणतया समझाने-बुझाने की पद्धति ही सुधार-परिवर्तन के लिए काम में लाई जाती है, पर देखा यह गया है कि भीतरी परतों पर जमे हुए कुसंस्कार इतने गहरे होते हैं उन पर समझाने-बुझाने का प्रभाव बहुत ही थोड़ा पड़ता है। देखा जाता है कि नशेबाजी जैसी आदतों से ग्रसित व्यक्ति दूसरे अन्य समझदारों की तरह ही उस बुरी आदत की हानि स्वीकार करते हैं। दुखी भी रहते हैं और छोड़ना भी चाहते हैं, पर उस आन्तरिक साहस का अभाव ही रहता है जिसकी चोट से उस अभ्यस्त कुसंस्कारिता को निरस्त किया जा सके। इस विवशता से कैसे छूटा जाय? इसका उपयुक्त उपाय सूझ ही नहीं पड़ता। लगता रहता है कि कोई दैवी दुर्भाग्य ऐसा पीछे पड़ा है जो विपत्ति से उबरने का कोई आधार ही खड़ा नहीं होने देता। पग-पग पर अवरोध ही खड़े करता और संकट पटकता भी वही दिखता है। यह दुर्भाग्य और कोई नहीं, अपने अन्तरंग पर छाये हुए कषाय-कल्मष कुसंस्कार ही हैं, जो अभ्यास और स्वभाव का अंग बन जाने के कारण छुड़ाये नहीं छूटते और पटक-पटक कर मारते हैं। नरक के यमदूतों जैसा त्रास देते हैं। इस विपन्नता को उलटने का समर्थ उपचार आन्तरिक परिशोध ही है। इस अन्तस् के कायाकल्प के लिए जितने भी उपाय खोजे गए हैं उनमें तत्वदर्शियों ने अपने अनुभवों के आधार पर चान्द्रायण तपश्चर्या को सर्वसुलभ अत्यन्त प्रभावशाली पाया है।

कुकृत्यों की रोकथाम, शासकीय एवं सामाजिक नियन्त्रण के आधार पर बहुत कुछ काबू में रखी जा सकती है। मानसिक दुश्चिन्तन को दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे घटाया या हटाया जा सकता है। पर इतने से भी कुछ काम चलने वाला नहीं है क्योंकि प्रेरणाओं का उद्गम स्त्रोत तो अन्तःकरण में उठने वाली दुर्भावना, आदर्शों के प्रति अनास्थाएँ ही होती हैं। प्रत्यक्ष और परोक्ष में उसी की चित्र-विचित्र भूमिकाएँ अनेकानेक कुकर्मों एवं दुर्घटनाओं के रूप में सामने आती रहती हैं। वास्तविक उपचार इसी क्षेत्र का होना चाहिए।

शरीर की रुग्णता, मन की उद्विग्नता, आर्थिक दरिद्रता, व्यक्तित्व का पिछड़ापन, पारिवारिक मनोमालिन्य सम्पर्क क्षेत्र का विग्रह, साथियों की अवमानना जैसे संकटों के कारण तो सामयिक भी होते हैं और उनके लिए दोषी कइयों को ठहराया जा सकता है किन्तु वास्तविकता तलाश करने पर प्रतीत होता है कि यह समस्त संकट एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वे एक ही भानमती के पिटारे से निकले हैं। विषवृक्ष की जड़ कटनी चाहिए। पत्ते तोड़ने, टहनी मरोड़ने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। न चिकित्सक के काबू में रोग आने वाले हैं और न उपदेश, मनोवैज्ञानिक मानसिक विक्षोभों का समाधान कर सकते हैं। क्योंकि जिस उद्गम स्त्रोत से निकलते हैं वहाँ उभार उफनता ही रहा तो बाहरी रोकथाम से क्या बनेगा। वह छेद रोकते-रोकते दूसरा फूट पड़ेगा। मेंड़ बंधने और टूटने रहने का सिलसिला तब तक चलता ही रहेगा जब तक कि उफान उत्पन्न करने वाला स्त्रोत बन्द नहीं हो जाता है।

शरीर और मन के रोगों की रोकथाम के लिए कई प्रकार के उपचार उपकरण एवं विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकते हैं। किन्तु अन्तःकरण की गहराई में पहुँचकर वहाँ कुछ उलट-पुलट करनी हो तो फिर अध्यात्म चिन्तन एवं साधनात्मक उपचार ही एकमात्र अवलंबन बनकर रह जाते हैं। योग भावना को उत्कृष्टता के साथ जोड़ता है और तप कुसंस्कारिता को गलाकर सुसंस्कारिता में ढालने वाली भट्टी का प्रयोजन पूर्ण करता है।

इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति जिन साधना उपचारों से सकती है उनमें चान्द्रायण सर्वोपरि है। उसकी निर्धारित कार्य पद्धति का प्रभाव आरोग्य रक्षा, मनोरोग चिकित्सा के रूप में ही नहीं एक कदम आगे बढ़कर अन्तराल की गहरी परतों में जमी हुई कुसंस्कारिता को उखाड़ फेंकने की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। एकांगी साधनाएँ तो कितनी ही प्रचलित हैं पर जिनमें परिशोधन ओर प्रगति परिष्कार के दोनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं, जो एक होते हुए भी अनेक प्रयोजन सिद्ध कर सके, ऐसी अध्यात्म चिकित्सा चान्द्रायण साधना के अतिरिक्त दूसरी परिलक्षित नहीं होती।


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मिशन की तीन पत्रिकाएं

युग निर्माण मिशन की तीन हिन्दी मासिक पत्रिकाएँ हैं। तीनों का अपने-अपने क्षेत्र में महत्व है।

(1) अखण्ड-ज्योति- में अध्यात्म तत्व ज्ञान के उच्चस्तरीय प्रसंग रहते हैं।

(2) युग निर्माण योजना- में मिशन की योजना कार्यपद्धति एवं प्रतिक्रिया प्रस्तुत की जाती है। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण की गतिविधियाँ किसी प्रकार अग्रगामी बनायी जाँय यह मार्गदर्शन उसी के माध्यम से होता है।

(3) प्रज्ञा अभियान- मासिक को सृजन शिल्पी- जागृत आत्माओं की मार्गदर्शिका कहना चाहिए। प्रज्ञा परिजनों को किस ढाँचे में स्वयं ढलना तथा दूसरों को ढालना है, उसकी व्यावहारिक रूप-रेखा, प्रेरणा एवं रीति-नीति इसी के माध्यम से समझाई जाती है।

अखण्ड-ज्योति का चन्दा 15), युग निर्माण योजना का 10) तथा प्रज्ञा अभियान का 6) है। परिजन तीनों का महत्व समझें। तीनों को पढ़कर ही मिशन का समग्र स्वरूप समझा जा सकता है। उन्हें मँगाने और पढ़ने में समान रुचि ली जाय और उनके सदस्य बनने, बनाने में समान रूप से उत्साह दिखाया जाय।


चान्द्रायण काल की पुरश्चरण साधना

चान्द्रायण अवधि में उपवास, भूमि शयन, शरीर सेवा में स्वावलम्बन जैसी कई तप-तितिक्षाएं करनी पड़ती हैं। साथ ही इन्हीं दिनों सवा लक्ष गायत्री पुरश्चरण करना होता है। पुरश्चरण के विधि-विधान गायत्री महाविज्ञान में विस्तारपूर्वक लिखे जा चुके हैं। उनका विस्तार विवरण इन थोड़ी पंक्तियों में सम्भव नहीं। फिर वे कई प्रकार के भी हैं। उनमें से किस प्रक्रिया के साथ उसे सम्पन्न किया जाय यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति का विवेचन विश्लेषण करने के उपरान्त ही निर्धारण किया जाता है। अनुष्ठान के सामान्य नियम तो सर्वविदित हैं ही किंतु चान्द्रायण काल का साधना विशेष उद्देश्य से की जाती है और उच्चस्तरीय भी होती है। इसलिए उसका अन्तिम स्वरूप निर्धारित करने के लिए साधक के साथ विचार-विनिमय आवश्यक होता है।

सामान्यतया इतना जान लेने से काम चल सकता है कि चान्द्रायण साधक को हर दिनों 42 माला जप करके एक महीने में सवालक्ष अनुष्ठान पूरा करना होता है। इसमें प्रायः चार घण्टे लगते हैं जो दो या तीन बार में भी पूरे किये जा सकते हैं। प्रयत्न यह होता है कि भोजन से पूर्व अधिकांश संख्या पूरी हो सके।

जप जिह्वा से होता है अस्तु वह शारीरिक श्रम प्रधान है। माला की गणना भी शरीर से ही होती है। साधना में मन को भी काम देना होता है। उसे एकाग्र होने के लिए साधना पड़ता है। यह कार्य ध्यान धारणा को जप के साथ लेकर चलने से ही सम्पन्न होता है। इससे एकाग्रता का सहज अभ्यास होता है और मन भागने की जो आम शिकायत रहती है उसका समाधान होने लगता है। एकाग्रता की शक्ति का अध्यात्म शास्त्र में अत्यधिक महत्व बताया गया है। यह उपलब्धि ध्यान धारणा की है। मात्र जप भर कने में तो जिह्वा का उपयोग होता है और उसे परिष्कृत करने का लाभ मिलता है। सम्बन्धित चक्र उपत्यिकाओं के जागरण में भी सहायता मिलती है, पर एकाग्रता का लाभ नहीं मिल पाता। मन की चंचलता बनी ही रहती है। इसका एक ही उपाय है मंत्राराधन के साथ-साथ ध्यान धारणा जोड़े रहना। मनःमस्तिष्क को काम मिलता रहे तो वह अनावश्यक उछल-कूद में क्यों दौड़े? जप के साथ ध्यान धारणा चलती रहे तो उस अवधि में एकाग्रता का लाभ भी मिलता रहेगा, साथ में मनःसंस्थान को हेय प्रयोजनों में निरत रहने के स्थान पर उच्चस्तरीय तथ्यों के साथ तादात्म्य होने का अभ्यास भी बढ़ता रहेगा।

आद्य शक्ति, ऋतम्भरा, महाप्रज्ञा गायत्री ही है। उसे ब्रह्म विद्या भी कहा गया है। वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता के रूप में उसकी शक्ति, सामर्थ्य और प्रेरणाओं से सभी अवगत हैं। गायत्री महाशक्ति की सवालक्ष पुरश्चरण जैसी उच्चस्तरीय साधना को विधिवत् किया जा सके तो उसके प्रतिफल वैसे ही हो सकते हैं जैसे कि सप्त ऋषियों को प्राप्त हुए थे। गायत्री के ऋषि विश्वामित्र ने नई दुनिया बसाने- नया जमाना लाने की हरिश्चन्द्र के सहयोग से एक विश्व योजना बनाई थी। यह बल एवं साधन उन्हें आद्य शक्ति की आराधना से ही प्राप्त हुआ था। विश्वामित्र ने अपनी तप सम्पदा राम लक्ष्मण को बला अतिबला विद्या के नाम से प्रदान की थी। यह गायत्री और सावित्री के ही दो उपनाम हैं। इन्हीं के बल पर वे असुर विनाश और धर्म राज्य संस्थापन के उभय प्रयोजनों में सफल हुए थे। चौबीस अवतार गायत्री के चौबीस अक्षरों के रहस्यों को ही प्रकट करते हैं। दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं के नाम से गायत्री के चौबीस अक्षरों की ही गरिमा का विवेचन किया गया है।

गायत्री को असीम शक्ति की अनुकम्पा प्राचीनकाल के देवमानवों को कृतकृत्य करती रही है। अभी भी ऐसे व्यक्तित्व जीवित हैं जिनकी क्षमता असंख्यों को उठाने, बढ़ाने, उबारने, संभालने में चमत्कार प्रस्तुत करती है।

गायत्री साधना में मन्त्र विद्या के साथ जुड़े हुए अन्यान्य उपक्रमों को जोड़े देने से वह ब्राह्मी शक्ति के रूप में प्रकट होती है। अग्नि की सामर्थ्य तो सर्वविदित है, पर उसे प्रज्वलित देखने में सूखे ईंधन की आवश्यकता तो रहेगी ही। साधक की तत्परता, तन्मयता ईंधन का काम देती है। शरीर से तप करना होता है और मन को इष्ट में समर्पित किये रहना होता है। यही ध्यान धारणा है। इस ध्यान धारणा के बहिर्मुखी एवं अंतर्मुखी दोनों ही पक्षों का संक्षिप्त विवेचन इन पंक्तियों में किया जा रहा है। चान्द्रायण काल की प्रज्ञा योग साधना के क्रमिक विस्तार अगले साधकों में प्रकाशित होते रहेंगे।

ध्यान एक प्रकार का दिव्य दर्शन है। उसके साकार निराकार दोनों पक्ष हैं। गायत्री माता को साकार और सविता देव में अरुणोदय स्वरूप से तादात्म्य को निराकार ध्यान करते हैं। यह दो ध्यान बहिर्मुखी हैं। इनमें बाहर से भीतर के प्रवेश के लिए आकर्षण किया जाता है। गायत्री माता का अमृतोपम पयपान अथवा सविता देव का ऊर्जा अनुदान- यह दोनों ही बाहर से भीतर प्रवेश करने वाले आधार हैं।

माता का दूध पीकर जिस प्रकार बालक प्रसन्न पुष्ट होता है उसी प्रकार साधक को प्रज्ञापुत्र होने और सीता के लव-कुश, शकुन्तला के भरत, गंगा के भीष्म, कुन्ती के अर्जुन, अंजनी के हनुमान बनने की मान्यता परिपुष्ट करनी होती है। यह आस्था जितनी प्रगाढ़ होती है उसी के अनुरूप न केवल भावनात्मक अनुभूति वरन् उपलब्धियों की प्रतीति भी होती है।

सविता का ध्यान सर्वभौम है। नेत्र बन्द करके प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य का ध्यान। उसकी सुनहरी किरणों का साधक के कण-कण में प्रवेश। उस प्रवेश से स्थूल शरीर में निष्ठा, सूक्ष्म शरीर में प्रज्ञा और कारण शरीर में श्रद्धा का उद्भव। आलोक से समूची आत्मसत्ता प्रकाशवान। ऊर्जा से काया का कण-कण अनुप्राणित। अपने स्वरूप की प्रकाश-पुँज, अग्नि-पिण्ड जैसी अनुभूति। उस अनुदान से पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि। इसे निराकार ध्यान भी कहा जाता है। मानवी छवि का समावेश न होने से सूर्य के साकार होते हुए भी उसका ध्यान निराकार गिना जाता है। वह सर्वभौम एवं सार्वजनीन भी है।

भीतर से बाहर उभरने वाले- अंतर्मुखी ध्यानों में आज्ञा चक्र, हृदय चक्र और मूलाधार चक्र के जागरण को प्रमुखता दी जाती है। यों हठयोग के अंतर्गत छः चक्रों का वर्णन है। किन्तु प्रज्ञा योग में त्रिपदा गायत्री के तीन केन्द्रों को ज्योतिर्मय बनाने से काम चल जाता है।

आज्ञा चक्र को तृतीय नेत्र कहते हैं। इसके आलोक में मस्तिष्कीय क्षेत्र में सन्निहित मन, बुद्धि और चित्त को उत्कृष्टता की दिशा में उभारा जाता है। मन के संकल्प, बुद्धि के निर्धारण एवं चित्त के विश्वास सजग होते हैं और अधोगामी प्रवाह को उलटकर ऊर्ध्वगमन के लिए सहमत होते हैं तो तीनों का स्तर कहीं से कहीं पहुँचने लगता है। दूरदर्शी विवेकशीलता उभरती है तो व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप तथा भावी कार्यक्रम में भारी परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होती है। साथ ही यह भी अन्तःप्रेरणा के आधार पर सूझता है कि उस उत्क्रांति के लिए किस प्रकार क्या किया जाना चाहिए। अतीन्द्रिय क्षमताओं का केन्द्र भी आज्ञाचक्र है। अदृश्य दर्शन, दूर श्रवण, भविष्य कथन, विचार संचालन, प्राण प्रत्यावर्तन, आकर्षण, विकर्षण जैसी सिद्धियों का भण्डार आज्ञाचक्र ही है। इस तीसरे नेत्र में जब ज्योति का अवतरण होता है तो अदृश्य जगत में प्रवेश करके बहुत कुछ जानने, देखने, कुरेदने और उखाड़ने समेटने को मिल जाता है जो साधारणतया अविज्ञात ही बना रहता है। शिवजी का, दुर्गा का तृतीय नेत्र किस प्रकार समय-समय पर आग उबलता रहा है उसे कथा-पुराणों का पठन श्रवण करने वाले ही जानते हैं। किन्तु आज्ञा चक्र के ज्योतिर्मय होते-होते सामान्य साधक भी यह अनुभव करने लगते हैं कि उन्हें कुछ विशेष सूझ-बूझ उपलब्ध हो रही है। ऐसी विशेष, जैसी आमतौर से सर्वसाधारण को उपलब्ध नहीं ही होती।

हृदय चक्र को ब्रह्म चक्र या सूर्य चक्र भी कहते हैं। यह दोनों पसलियों के मध्य है। योगीजन आत्मा-साक्षात्कार यहीं करते हैं। ईश्वर की प्रकाश ज्योति भी यहीं प्रकट होती है। जिस अंगुष्ठ मात्र ब्रह्म ज्योति का स्वरूप एवं महात्म्य उपनिषदों में स्थान-स्थान पर वर्णन किया गया है उसका निवास इसी केन्द्र में है। यह बुझा हुआ दीपक जब जलता है तो तथाकथित ‘अलादीन के चिराग’ जैसा बहुत कुछ अद्भुत दीखने लगता है। अर्जुन को जिस ज्ञान चक्षु के खुलने पर विराट् ब्रह्म क दर्शन हुए थे वह आज्ञा चक्र का नहीं हृदय चक्र का प्रसंग है।

यहाँ हृदय शब्द का अर्थ रक्त संचार में प्रयुक्त होने वाला पम्प नहीं समझना चाहिए वरन् उस अन्तःकरण का, अन्तरात्मा का केन्द्र समझना चाहिए जिसमें सहृदयता भरी रहती है। सहृदयता का अर्थ है- भाव संवेदना, कोमलता, करुणा, पवित्रता, श्रद्धा, आत्मीयता, उदारता। यह मस्तिष्कीय सामर्थ्य से सर्वथा भिन्न एवं नितान्त उच्चस्तरीय दिव्य क्षमता है। जिसे देवत्व की प्रतीक, प्रतिनिधि, जन्मदात्री, अधिष्ठात्री कहा जा सकता है। मान्यताएँ, आस्थाएँ, आकाँक्षाएँ इसी केन्द्र में निवास करती हैं। आत्मा और परमात्मा के मिलन की सुहाग शय्या इसी अन्तःपुर में बिछी हुई बताई गई है। व्यक्तित्व की जड़ें इसी क्षेत्र में गहराई तक घुसी होती हैं। प्रेरणाओं का उद्गम यही है। इसके जागरण से आध्यात्मिक क्षेत्र की उन विभूतियों को हस्तगत करने का अवसर मिलता है जिन्हें ऋद्धियों के नाम से जाना जाता है।

तीसरा चक्र है मूलाधार। इसे नाभि चक्र, प्राण चक्र, प्रसुप्त सर्प कुण्डलिनी केन्द्र भी कहते हैं। इसके स्थान निर्धारण में मलमूत्र छिद्रों के मध्य केन्द्र की चर्चा होती रहती है। वस्तुतः सुषुम्ना का अन्तिम सिरा उस स्थान से काफी ऊँचा पड़ता है और वह लगभग नाभि की सीध में जा पहुँचता है। मूलाधार का ध्यान करने में जननेन्द्रिय का बार-बार स्मरण आने से कामोत्तेजना उत्पन्न होती है और ऊर्ध्वगमन में अवरोध व्यतिरेक उत्पन्न होता है। इसलिए वहाँ तक पहुँचने के लिए नीचे से ऊपर चलने की अपेक्षा बगल के दरवाजे से प्रवेश करना अधिक उत्तम है। यहाँ मूलाधार और नाभिचक्र की एकता का दिग्दर्शन कराया जा रहा है। प्रज्ञा योग में मूलाधार को नाभिचक्र अथवा प्राणचक्र के नाम से पुकारा जाता है।

कुण्डलिनी, षट्चक्र, मेरुदण्ड, महासर्प, सहस्रार की चर्चा आकर्षक प्रतिपादनों एवं विवरणों के साथ कही सुनी जाती है। उस समूचे प्रसंग को नाभिचक्र से सम्बन्धित समझा जाना चाहिए। इस विज्ञान को प्राण विज्ञान कहना चाहिए। प्राण को जीवन्त ऊर्जा माना गया है। संक्षेप में इसे प्रतिभा कह सकते हैं। साहस, पराक्रम, जीवट, उल्लास, उमंग जैसी सचेतन विद्युत धाराएँ इसी केन्द्र से उभरती उफनती रहती हैं। बलिष्ठता, समर्थता, प्रखरता जैसी विशेषताएँ इसी उद्गम का द्वारा खोल देने पर उमँगने, उछलने लगती हैं। इसी का उथला-सा परिचय कामुकता की सरसता और प्राणवान प्रजनन की क्षमता में देखा जा सकता है। दाम्पत्य जीवन और सुप्रजनन की सफलता से इस केन्द्र का सीधा सम्बन्ध है।

औषधि विज्ञान की तरह साधना विज्ञान का भी एक स्वतन्त्र शास्त्र है। चिकित्सा उपचार में रोगियों की स्थिति का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसी प्रकार श्रेयार्थियों के लिये भी अनुभवी मार्गदर्शन अमुक साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित त्रिविध शक्ति धाराओं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में से किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है, वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तन राजमार्ग कहते हैं। भूलोक इड़ा से, भुवः लोक पिंगला से और स्व लोक सुषुम्ना से सम्बन्धित माना गया है। इन तीनों का समग्र स्वरूप त्रिपदा गायत्री के रूप में बनता है।

गायत्री मन्त्र प्रधान है ‘उसमें शब्द शक्ति का अवलम्बन लेकर तीन शरीरों में सन्निहित तीन शक्ति स्त्रोतों के साथ सम्बन्ध बनाया जाता है। मन्त्र योग के समस्त उपचार शब्द शक्ति पर आधारित हैं जिसमें निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त तीनों लोकों व पिण्ड के सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों के मध्य गठबन्धन की प्रक्रिया सम्पादित होती है। विज्ञान के छात्र जानते हैं कि ऊर्जा के अनेक विभाजनों में ताप, ध्वनि और प्रकाश की तरंगों को प्रमुखता दी गयी है। इन तीनों का रूपांतरण विभिन्न स्तर के परमाणुओं और जीवकोषों में होता रहता है। पदार्थ जगत में पाँच तत्वों को और चेतन जगत में पाँच प्राणों का अधिपत्य है। इन दोनों ही क्षेत्रों में गतिविधियाँ जिस ऊर्जा के बलबूते चलती रहती हैं- उनमें से एक अति महत्वपूर्ण है- ‘ध्वनि’। इसी को अध्यात्म तत्वज्ञानी ॐकार के रूप में अधिग्रहण करते हैं। ॐकार से भूः, भुवः, स्वः तीन व्याहृतियाँ और इनमें से प्रत्येक से तीन-तीन शब्द निस्सृत होने पर नौ शब्द वाली- चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का महामन्त्र बन जाता है। सामान्यतया इसे हंसवाहिनी, आदिशक्ति के रूप में- सविता के भर्ग ‘ब्रह्मवर्चस्’ में तथा महाप्रज्ञा की ध्यान धारणा में अपनाया और हृदयंगम किया जाता है। इतने पर भी यह मानकर चलना चाहिए कि गायत्री का तत्वज्ञान और प्रयोग विधान जिस धारा से प्रभावित होता है वह ब्रह्म विद्या ‘शब्द’ परक है। मन्त्रयोग का रहस्य यही है। उसकी समस्त विधि व्यवस्था ‘शब्द शास्त्र’ के अंतर्गत समझी समझाई जा सकती है।

आत्मा और परमात्मा के बीच सम्बन्ध बनाने के लिए साधनात्मक प्रयोजनों में शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। जप, स्तवन कथा, मन्त्रोपचार, पाठ-कीर्तन, प्रवचन, आशीर्वाद, अभिचार आदि में शब्द का ही किसी न किसी रूप में प्रयोग होता है। नादयोग के माध्यम से ईश्वरीय सन्देश सुनने एवं अदृश्य जगत में चल रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने की बात बनती है। विज्ञान ने प्रकृति के अन्तराल से ऐसी ध्वनि तरंगें ढूंढ़ निकाली हैं जो अब तक के समस्त आविष्कारों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान शक्ति स्त्रोत उपलब्ध हुआ है। चेतना जगत तथा पदार्थ जगत के दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय अनुकूलताएं उत्पन्न करने तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए शब्द शक्ति का जो विशेष विनियोग उपचार किया जाता है, उसी को मन कहते हैं। आज यन्त्रों की धूम है। उनकी उपयोगिता तथा समर्थता का परिचय सभी को है। भूतकाल में ठीक इसी तरह मन्त्र शक्ति का प्रयोग होता रहा है और उसकी प्रभाव शक्ति आज के अति महत्वपूर्ण यन्त्रों की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं थी।

मन्त्र विद्या को- उच्चस्तरीय शब्द-विज्ञान कह सकते हैं। मन्त्रों के अक्षरों का गठन-गुँथन आत्म-विज्ञान के पारंगतों ने इस प्रकार किया है कि उनसे साधक की काया में सन्निहित अनेक रहस्य भरे शक्ति संस्थानों का उभार-अभिवर्धन होता चला जाता है। गायत्री महाविद्या में उस उच्चस्तरीय रहस्यमय शक्ति का ऐसा समावेश है जिसका सिद्धान्त एवं प्रयोग करने वाला सिद्ध पुरुष स्तर की चमत्कारी सिद्धियों का परिचय दे सकता है।

मन्त्र विद्या द्वारा शब्द के माध्यम से उत्पन्न की गई ऊर्जा इतनी प्रचण्ड होती है कि उसके चमत्कार असामान्य स्तर के होते हैं। इस संदर्भ में शाप, वरदानों का लम्बा इतिहास पढ़कर तथ्यों को जाना जा सकता है। मन्त्र साधना द्वारा निजी जीवन के भौतिक एवं आत्मिक पक्षों में असाधारण प्रगति सम्भव हो सकती है। इतना ही नहीं, दूसरों का भी उस माध्यम से हित साधन हो सकता है। नियति के रहस्यों को भी उस आधार पर जाना जा सकता है और आवश्यकतानुसार विश्व-प्रवाह का अदृश्य वातावरण में हेर-फेर कर सकना भी सम्भव हो सकता है।

गायत्री मन्त्र एक शब्द गुच्छक है। उसका प्रयोग जप, उच्चारण के माध्यम से विशिष्ट प्रयोजनों के लिए होता है। इसी कारण जप के साथ-साथ ध्यान आवश्यक माना गया है ताकि शरीर की तत्परता और मन की तन्मयता का दुहरा अभ्यास होता रहे। एकाग्रता सम्पादन का उपाय भी यही है। मन भागता हो तो उसे बार-बार पकड़कर निर्धारित धारणा में नियोजित करते रहना चाहिए। वन्य पशु की तरह मन को साधना भी कष्टसाध्य, श्रम साध्य एवं समय साध्य है। उसमें विलम्ब लगता हो, सफलताक्रम धीमा हो तो भी हताश होने की आवश्यकता नहीं। धैर्य पूर्वक प्रयास जारी रखने से आज नहीं तो कल सफलता मिलकर ही रहती है। उपरोक्त तीनों अंतर्मुखी ध्यानों में से कोई किया जाय या दो बहिर्मुखी ध्यानों में से अपनाया जाय। इसका निर्धारण मनोभूमि की गम्भीर पर्यवेक्षण से ही निश्चित किया जा सकता है। उपरोक्त पाँचों ध्यानों में से चान्द्रायण पुरश्चरण में चुनना एक ही पड़ता है।


अपनों से अपनी बात

अध्यात्म-दर्शन एवं प्रयोग का अभिनव प्रस्तुतीकरण

आहार, वस्त्र, व्यायाम, चिकित्सा, शिक्षा, भाषा आदि उपयोगी साधनों के भी इतने प्रकार और भेद-उपभेद हैं कि उन सभी को कोई एक साथ अपनाने में समर्थ नहीं हो सकता। अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुरूप उनमें से किसी एक का चयन करना पड़ता है। इस चयन में ऐसे ही मन की मौज कारण नहीं होती वरन् कुछ आधार ऐसे होते हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए उपयोगी चुनाव करना पड़ता है। यह चुनाव देश, काल और पात्र की भिन्नता के कारण कई बार ऐसा होता है जिसमें अन्य स्थानों की अपेक्षा सर्वथा भिन्नता देखी जा सकती है। शीत प्रधान देशों- उष्ण कटिबंध के क्षेत्रों में आहार-बिहार की भी विषमता रहती है। ठण्डक के दिनों और गर्मियों में कपड़े, निवास एवं दिनचर्या निर्धारण में स्पष्ट अन्तर रहता है।

बालकों और प्रौढ़ की पसन्दगी और आवश्यकता में समानता कहाँ होती है। अब से एक लाख वर्ष पूर्व जो भाषा, पोशाक, मान्यता, उपकरण, प्रचलन पाये जाते थे, उनकी तुलना में अब की स्थिति में जमीन आसमान जैसा अन्तर आ गया। व्यवहार-शिष्टाचार में जो अन्तर पड़ा है। वह देखते ही बनता है। विज्ञान की अनेकों शाखा-उपशाखाएँ भूतकाल में जिन मान्यताओं को अपनाकर चलती थी, अब उनमें भारी परिवर्तन हो चुका है। कभी मनुष्य का पेट इतना बलिष्ठ था कि कच्चा अन्न ही नहीं, माँस भी हजम कर जाने में कठिनाई नहीं होती थी, पर अब व्यवहार, वातावरण और अभ्यास में, जलवायु में, शरीरों के स्तर में जो अन्तर आया है उसे देखते हुए पिछले अभ्यासों को दुहराना अति कठिन है।

अध्यात्म क्षेत्र के स्नातक तत्व- सिद्धान्त सुनिश्चित होते हुए भी उनके प्रतिपादन और प्रयोग पहले जैसी स्थिति में नहीं हैं। कभी सूर्य चलता था और पृथ्वी स्थिर थी। चन्द्रमा पूर्ण ग्रह था पर अब ज्योतिष के वे पुरातन सिद्धान्त अमान्य ठहरा दिए गए हैं। इसी प्रकार प्रगतिक्रम पर चलते-चलते, परिस्थितियों के बदलते-बदलते हर क्षेत्र में ऐसी उत्क्रांति उभरी है कि पुरातन का समुचित सम्मान करते हुए भी आज की स्थिति के अनुरूप सोचने और कदम बढ़ाने की आवश्यकता अपरिहार्य हो गई है। अब न तो दिग्विजय के लिए अश्वमेध के घोड़े निकलते हैं और न स्वयम्बरों के सरंजाम जुटते हैं। पार्वती की तरह जलवायु पर लम्बे समय तक निर्वाह करते हुए तप साधना कर सकना भी अब सम्भव नहीं रहा। माचिस के प्रचलन ने लौह चुम्बक की रगड़ से आग उत्पन्न करने की प्रथा को अब एक प्रकार से निरस्त ही कर दिया है।

लोक व्यवहार, भौतिक विज्ञान, प्रथा-प्रचलन, आहार-बिहार के स्तर में समयानुसार क्रमिक एवं क्रांतिकारी परिवर्तन होते रहे हैं। शासन पद्धतियों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है। अनेकानेक तत्त्वदर्शन कभी अपने-अपने क्षेत्रों पर एकाधिकार जमाए हुए थे, किन्तु अब सोचने की पद्धति में भारी अन्तर हुआ है। धर्मों और दर्शनों को तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाने लगा है। तर्क और तथ्य की कसौटी पर हर बात को जांचा-परखा जा रहा है। यहां तक कि ईश्वर को भी अपना अस्तित्व सिद्ध करने के लिए ललकारा जाने लगा है। प्रत्यक्ष और परीक्षण की परख अब इतनी स्वाभाविक बन गई है, इतनी आवश्यक लगने लगी है कि उसे निषिद्ध ठहराने में किसी का साहस न तो आगे बढ़ता है और न दो कदम चलने के उपरान्त टिक ही पाता है।

तर्क और तथ्य के आधार पर किन्हीं प्रतिपादनों को अंगीकार करने की विज्ञान बुद्धि ने अब अपनी स्थिति सर्वमान्य जैसी बनाली है। अध्यात्म कभी शास्त्र-प्रतिपादन एवं आप्त वचन के सहारे अपनी स्थिति बनाये रहा होगा और श्रद्धा ही उसकी आधारशिला रही होगी, किन्तु अब उसे विज्ञान रूप में अपनी यथार्थता एवं प्रखरता सिद्ध करनी है। इसके बिना न तो उसकी उपयोगिता समझी जा सकती है, न लोग हृदयंगम करेंगे, न व्यवहार में उतारेंगे फलस्वरूप एक असमंजस भरी स्थिति ही बनी रहेगी। आज विज्ञान के प्रति सभी आश्वस्त भी हैं और उसका उपयोग करने में खर्चीली कष्ट साध्य प्रक्रिया भी अपनाते हैं, किन्तु अध्यात्म के निमित्त किसी को थोड़ा भी कष्ट सहना, जोखिम उठाना स्वीकार नहीं। बहाने के रूप में कहा कुछ जाता रहे, पर तथ्य एक ही है- अध्यात्म की क्षमता एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में अविश्वास। कारण कि न तो वे प्रतिपादन, तर्क, तथ्य, प्रमाण की कसौटी पर खरे सिद्ध होते हैं और न उनकी उपयोगिता सिद्ध करने वाले कोई उदाहरण सामने आते हैं। ऐसी दशा में इन दिनों का प्रत्यक्षवादी लोकमानस क्यों इन्हें स्वीकार शिरोधार्य करे? यदि वैसा न बन पड़े तो उस अतः प्रभावी विज्ञान से लाभान्वित न हो पाने का दुर्भाग्य मनुष्य के सिर से कैसे टले?

इन विसंगतियों की संगति बिठाने, गुत्थियों को सुलझाने का एक ही उपाय है कि अध्यात्म तत्वज्ञान को तर्क और तथ्य की कसौटी पर खरा सिद्ध करके हृदयंगम हो सकने योग्य बनाया जाय। इसी प्रकार उनके प्रयोग-प्रतिपादनों को इस स्थिति में लाया जाय कि उन्हें अपना सकना विशिष्ट व्यक्तियों का कष्ट साध्य-दुस्साहस मात्र न बना रहे वरन् उस तक सर्वसाधारण की पहुंच हो सके। यह अध्यात्म की गरिमा को अक्षुण्ण रखने का प्रतिष्ठा-प्रश्न नहीं वरन् मनुष्य-समुदाय की प्रगति- शान्ति का आधारभूत कारण है। जिस प्रकार पदार्थ-सत्ता और उसके स्वरूप-प्रयोग की विधि व्यवस्था से अवगत अभ्यस्त होने के कारण ही सुविधा-साधनों का संवर्धन हो सका है। ठीक उसी प्रकार अध्यात्म विज्ञान के आधार पर चेतना शक्ति को प्रखर-परिष्कृत बनाकर व्यक्तित्व सम्पन्न बनने का लाभ उठाया जा सकता है। कहना न होगा कि पदार्थ की सामर्थ्य एवं उपयोगिता जितनी है उसकी तुलना में आत्मिक क्षमता का प्रभाव परिणाम कम नहीं, वरन् अधिक ही है।

प्राचीनकाल में अध्यात्म को विभिन्न क्षेत्रों में जिस प्रकार कहा अपनाया जाता रहा है अब उन सभी का यथावत् हृदयंगम कर सकना सम्भव नहीं रहा। तुलनात्मक अध्ययन, तर्क तथ्य, प्रत्यक्ष एवं वैज्ञानिक प्रयोग प्रतिपादन की शैली अपनाकर ही मानवी गरिमा को उभारने वाले अध्यात्म को सर्वमान्य एवं सर्वोपयोगी बनाया जा सकता है। भौतिक उपलब्धियाँ आवश्यक तो हैं, पर पर्याप्त नहीं। आत्मिक विभूतियों के बिना मनुष्य उत्कृष्टता सम्पन्न न हो सकेगा। अंतःकरण में निकृष्टता भरी रहे तो साधनों का बाहुल्य आत्मघात एवं व्यापक विनाश का आधार ही बन सकता है। उपलब्धियों का अर्जन-उपार्जन श्रेयस्कर सिद्ध हो सके इसके लिए सदुपयोग सिखाने वाली सद्बुद्धि ऋतम्भरा की आवश्यकता है। यह अध्यात्म की ही उपलब्धि है। इसके बिना वैभव, चातुर्य, पराक्रम, चकाचौंध भर उत्पन्न कर सकेगा, उससे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध न होगा। आत्मबल सर्वोपरि है। उसके बिना व्यक्ति और समाज की विशिष्टता उभरती ही नहीं।

प्रकृति के गर्भ में रहस्यमयी शक्तियों और सम्पदाओं के भण्डार भरे-पड़े हैं। उनमें से बहुत कुछ मनुष्य ने ढूंढ़-कुरेद लिया है और बहुत कुछ अगले दिनों पाना शेष है। इससे भी बढ़ी-चढ़ी ब्रह्म तत्व की विशिष्टता है। चेतना का अजस्र भण्डार इस ब्रह्मांड में संव्याप्त है। उसकी बीज सत्ता हर चेतन घटक में- जीवात्मा में विद्यमान है। इस प्रसुप्ति को जगाया जा सके और अविज्ञात को खोजा जा सके तो आत्मा का स्तर परमात्मा जैसा बन सकता है। जीव को ब्रह्म और नर को नारायण बनने का सुयोग-सौभाग्य मिल सकता है।

इतना महत्वपूर्ण प्रसंग- विश्व का सर्वोत्तम विज्ञान आज जैसी हेय, उपेक्षित, तिरष्कृत एवं दुर्गतिग्रस्त स्थिति में बना रहे, इसे अपने समय और संसार का भारी दुर्भाग्य कहना चाहिए। इस क्षेत्र में अनेकों प्रतिभाओं के होते हुए भी असमंजस इस बात का है कि अध्यात्म बल दर्शन को अन्य विज्ञानों की तरह तर्क संगत, तथ्य सम्मत न बनाया जा सका और उसे अन्य विज्ञानों की तरह लोकमान्यता प्राप्त कर सकने का अवसर न मिला। हर विज्ञान का स्वरूप स्पष्ट और प्रयोग सुनिश्चित है, फिर अध्यात्म को विज्ञान जैसी मान्यता क्यों न मिले? उसके प्रयोग सर्वसाधारण के गले क्यों न उतरे? जब व्यायामशाला में कष्टसाध्य अभ्यास करके लोग पहलवान बनने का साहस कर सकते हैं, चौदह वर्ष खर्चीली पढ़ाई पढ़कर स्नातकोत्तर पदवी पा सकते हैं तो अध्यात्म प्रयोगों की उपेक्षा क्यों होती है? जबकि उसके लाभ अन्य सभी व्यवसायों की तुलना में कही अधिक ऊंचे स्तर के हैं।

इन सभी विसंगतियों का समाधान एक ही उपाय अपनाने से हो सकता है कि अध्यात्म के प्रयोग-प्रतिपादनों को तर्क, तथ्य, प्रमाण की प्रत्यक्षवादी पद्धति के अनुसार जन-साधारण को समझने-समझाने का अवसर मिले तो कोई कारण नहीं कि इतनी उपयोगी, इतनी श्रेयस्कर एवं इतनी उच्चस्तरीय विधि का लाभ लोग न उठायें। यदि सुविधा और सुनिश्चित प्रयोग सामने रखे जा सकें तो कोई कारण नहीं कि आये दिन परीक्षण का खतरा उठाने वाली मानवी साहसिकता अध्यात्म की विभूतियों को करतलगत करने, उनसे लाभान्वित होने का प्रयत्न न करे। संव्याप्त उपेक्षा, आशंका एवं अश्रद्धा के वातावरण ने जहां इस महान विज्ञान को अन्यान्य निर्धारणों की तुलना में तिरस्कृत रखा है वहां उस लाभ से वंचित रहकर समूची मानव जाति को दुरूह-दुर्भाग्य भी सहन करना पड़ रहा है। मानवी भविष्य को अंधकारमय बनाने वाली विपत्तियों का घटाटोप उड़ेलने वाले जहां अनेक अन्य कारण भी हैं वहां सबसे वजनदार और भयानक कारण है अध्यात्म तत्व-दर्शन के संबंध में छाया हुआ सघन अंधकार अज्ञान- उसके स्थानापन्न भ्रम-जंजाल का वर्चस्व। यदि इस एक व्यवधान को मानवी चिंतन से हटाया जा सके तो सौभाग्य का वह सूर्योदय फिर प्रकट हो सकता है, जो चिरकाल तक अपने आकाश में आलोकवान रहा और समस्त संसार को सौभाग्यशाली वरदान देता रहा। आज तो अध्यात्म के प्रतिपादन और प्रयोग दोनों ही भ्रम-जंजाल की कीचड़ में बेतरह फंसे हुए हैं और अभिनंदनीय रहने के स्थान पर अवमानना सहन कर रहे हैं।

अखण्ड-ज्योति के परिजनों का सौभाग्य है कि वे अध्यात्म तत्वज्ञान और प्रयोग-उपचार का न केवल दर्शन वरन् अभ्यास भी इस रूप में जान सकेंगे जिसे तथ्यों की हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सके। यह प्रतिपादन दिसंबर 81 से प्रारंभ होकर दिसंबर 82 तक तेरह अंकों में प्रकाशित होते रहेंगे। यह कतरनों का संकलन-संपादन नहीं है वरन् 72 वर्ष की आयुष्य तक निरंतर चलते रहे अध्ययन, अध्यवसाय, चिंतन, मनन और समुद्र मंथन जैसे प्रयास का प्रतिफल है। स्वेच्छाचारी कल्पनाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं के आधार पर इन्हें गढ़ा नहीं गया है और न किसी अंध श्रद्धा से सम्मोहित होकर उन्हें सच्चाई मान बैठने जैसे भ्रम-जंजाल की इन पर छाया है। जो कहा जा रहा है जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए अनास्थावानों को भी विवश होना पड़े। विज्ञान के अनुसंधानों को प्रयोगशाला में परीक्षित-प्रमाणित किया जाता है। इसके उपरांत ही उपलब्धियों की घोषणा की जाती है। इस घोषणा को कसौटियों पर कसे जाने से आविष्कर्ताओं को प्रसन्नता ही होती है, नाराजी नहीं। अगले दिनों अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर जो छपने वाला है उसे इसी स्तर का समझा जाय। इस गंभीर प्रसंग को इस रूप में इससे पूर्व कहीं प्रतिपादित किया गया हो- ऐसा स्मरण नहीं आता। अस्तु इसे अभूतपूर्व कहने में भी कोई अत्युक्ति नहीं है।

पत्राचार विद्यालय के रूप में सीमित श्रद्धावानों के सम्मुख ही इस प्रकटीकरण का विचार था। पर अब अधिक उपयुक्त यही समझा गया कि जो कहना है उसे चौराहे पर खड़े होकर कहा जाय और इस प्रतिपादन से सर्वसाधारण को अवगत होने दिया जाय, भले ही उसे अपनाने वाले थोड़े ही क्यों न निकलें।

‘परिजनों से दो अनुरोध हैं कि वे दिसंबर 81 से दिसंबर 82 तक’ के अंकों को सुरक्षित रखें। इन्हें अन्यों को पढ़ने तो दें, पर अस्त-व्यस्त न होने दें। यह अपने ढंग की अलभ्य सामग्री होगी। ऐसी, जिसे अपने प्रियजनों को एक महान प्रसंग से परिचित होने के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

इस संदर्भ में एक और भी अनुरोध है कि यदि समय मिले और उत्साह उभरे तो अपने प्रभाव क्षेत्र में विज्ञजनों को अगले वर्ष के लिए अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने के लिए भी कुछ दिन दौड़धूप कर ली जाय। आरंभ में यह कहते हुए अनख या संकोच लग सकता है, पर जिन्हें सदस्य बनाया गया है उनकी प्रतिक्रिया कुछ समय उपरांत जानी जायेगी तो वे यही कहते पाये जायेंगे कि चंदा वसूल कर हानि नहीं पहुंचायी गई वरन् उन्हें अप्रत्याशित लाभ से लाभान्वित किया गया है।


यज्ञमय कर दो दयामय

(डा. हरगोविंद सिंह )


यज्ञमय कर दो दयामय (kavita)

मानवी जीवन हमारा यज्ञमय कर दो, दयामय। सृष्टि को सुरभित करें हम, शक्ति वह भर दो दयामय॥

विश्व यह सारा बना दें एक पावन यज्ञशाला, ज्ञान-दीपक का यहां पर हो सदा अभिनव उजाला, यज्ञकुंडों से सजे हों ये सभी भूखण्ड सुन्दर, संगठन की शक्ति-ज्वाला हो प्रकट इनमें प्रखरतर,

भावना मंगल-कलश-सी शांत सुखकर दो, दयामय। सृष्टि को सुरभित करें हम, शक्ति वह भर दो दयामय॥

आचमन में धो सकें हम, सब कलुष तन-मन-वचन के, अंग सब इस देह के हों उपकरण दैनिक हवन के, देवताओं को करें सत्कर्म की आहुति समर्पित, सौम्यता की शर्करा हो, नेह का निर्मल नवल घृत,

हो वसोधारा न खंडित, भाव उर्वर दो, दयामय। सृष्टि को सुरभित करें हम, शक्ति वह भर दो दयामय॥

लक्ष्य अपना पूर्ण करलें, अंत पूर्णाहुति वही हो, मंत्र हों सिद्धांत जिनमें त्याग की ध्वनि रम रही हो, आरती ऐसी करें परमार्थ हो जगमग जगत में, शंख-सी गूंजे विजय की साधना नित पुण्य-पथ में,

युग नया रच दें, यही संकल्प दृढ़ कर दो, दयामय। सृष्टि को सुरभित करें हम, शक्ति वह भर दो दयामय॥

*समाप्त*