युग धर्म की अवहेलना महँगी पड़ेगी

मानवी भविष्य के उज्ज्वल या अन्धकारमय होने की यह विषम बेला है। इसे आपत्ति कालीन स्थिति समझा जाना चाहिए। बाढ़, अग्निकाण्ड, भूकम्प, महामारी, युद्ध, दुर्घटना जैसी विषम परिस्थितियों में समीपवर्ती व्यक्ति किसी न किसी रूप में योगदान देता है। प्रसुप्तों की बात दूसरी है।

जिन्हें युग परिवर्तन का आभास हो, जिन्हें अपने भीतर नर-पशुओं से कुछ ऊँचे स्तर का आभास होता हो, उन्हें पेट और प्रजनन की क्षुद्र प्राणियों जैसी निर्वाह प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें कुछ समय की माँग, युग की पुकार, कर्तव्यों की चुनौती एवं महाप्रज्ञा की प्रचण्ड प्रेरणा को सुनने, समझने और तद्नुरूप ढलने, बदलने का प्रयत्न करना चाहिए। अन्तरात्मा पर गहन तमिस्रा और सघन प्रसुप्ति का साम्राज्य हो तो बात दूसरी है अन्यथा इस युग सन्धि की परिवर्तन बेला में युग धर्म से विमुख रह नहीं सकता। लोभ और मोह की सीमित आवश्यकता समझी जा सकती है। और उसकी पूर्ति भी चलते-फिरते हो सकती है, पर उन्हीं हथकड़ी, बेड़ियों में बँधकर अपंग बन जाना अशोभनीय है। विशेषतया ऐसी विषम बेला में जैसी कि महाभारत काल में अर्जुन जैसों के सम्मुख प्रस्तुत थी।

निर्वाह और परिवार की समस्याओं का समाधान करते हुए भी हर भावनाशील युग चेतना में किसी न किसी प्रकार निश्चित रूप से सहयोगी बन सकता है। गिलहरी और शबरी जैसे अंशदान तो विषम परिस्थिति वालों के लिए भी सम्भव हैं। यह जी चुराने और आँख बचाने का समय है नहीं। इन दिनों अपनाया गया ‘कार्दन्य’ चिरकाल तक पीड़ा और प्रताड़ना का कारण बना रहेगा, इस अहित को भी वे समझें तो हर घड़ी, हर बात में लाभ ही लाभ की बात सोचते रहते हैं।


सर्वाधिक महत्वपूर्ण-वर्तमान

प्रसिद्ध साहित्यकार टालस्टाय ने ‘तीन प्रश्न’ नामक एक कहानी लिखी है। कहानी का साराँश इस प्रकार है- किसी समय एक राजा था। उसके मन में तीन प्रश्न उठे। (1) सबसे महत्वपूर्ण कार्य कौनसा है? (2) परामर्श लेने के लिये सबसे अधिक महत्व का व्यक्ति कौन है? (3) निश्चित कार्य को आरम्भ करने का सबसे महत्व पूर्ण कौन-सा समय है? इसका उत्तर जानने के लिए राजा ने सभासदों की बैठक बुलायी पर किसी का उत्तर सन्तोषजनक न रहा। राज्य मन्त्री का परामर्श मानकर वह सुदूर जंगल की कुटिया में रहने वाले साधु की कुटिया में रहने वाले साधु से जिज्ञासा-समाधान के लिए चल पड़ा। साधु की कुटिया के निकट पहुँचने पर उसने साथ में सुरक्षा के लिए आये गुप्तचरों एवं सैनिकों को जंगल में ही छोड़कर साधु से अकेले मिलने का निश्चय किया।

संन्यासी को खेत में कुदाल चलाते देख वह चुपचाप खड़ा होकर देखने लगा। कुछ देर बाद जब साधु ने दृष्टि उठायी तो राजा से आने का कारण पूछा। राजा ने तीनों प्रश्नों को उसके समक्ष रखा तथा उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। साधु ने संकेत द्वारा राजा को निकट बुलाया और अपनी कुदाल दे दी। राजा ने कुदाल लेकर खेत जोतना आरम्भ किया। संध्या होने को आयी। इतने में एक व्यक्ति साधु की कुटिया की और दौड़ता हुआ आया और भूमि पर गिर पड़ा। उसके कपड़े रक्त से लथ-पथ थे। पेट से रक्त की धार निकल रही थी। दोनों ने मिलकर उसकी मलहम-पट्टी की। घायल व्यक्ति सो गया।

प्रातः काल राजा ने घायल व्यक्ति को क्षमा याचना करते पाया। यह देखकर राजा विस्मय में पड़ गया। आगन्तुक ने अपना परिचय दिया “मैं किसी समय आपका घोर शत्रु था। आपने मेरे भाई को फाँसी दे दी थी। तभी से बदला लेने का अवसर ढूंढ़ रहा हूँ। मुझे मालूम था कि वेशभूषा में आप साधु के पास आये हैं। मार डालने की इच्छा से मैं झाड़ी में छुप गया। किन्तु इसी बीच आपके गुप्तचरों ने मुझे देखकर पहचान लिया तथा घातक हथियार से हमला कर दिया।” शत्रु होते हुये भी आपने हमारे प्राणों की रक्षा की। हमारा द्वेष-भाव समाप्त हो गया। मैं आपके चरणों का सेवक हूँ। मुझे चाहे तो दण्ड दें अथवा क्षमा करें।

घायल व्यक्ति की बातें सुनकर राजा स्तब्ध रह गया। अप्रत्याशित ईश्वरीय सहयोग मानकर वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देने लगा। साधु ने मुस्कुराते हुये कहा राजन्! क्या अब भी आपको प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलें? राजा को मौन देखकर उसने अपनी बात आगे बढ़ायी और कहा कि कार्यों द्वारा आपके प्रश्नों का उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। सबसे महत्व का काम वह है जो सामने है, सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वह है जो हमारे पास है और सबसे महत्व का समय अभी है। यदि आप आकर मुझ पर सहानुभूति न दिखाते तथा तुरन्त चले जाते तो आज आपकी जीवन रक्षा सम्भव न हो पाती। अतएव महत्वपूर्ण व्यक्ति मैं था जिसे सहायता अपेक्षित थी। दूसरा महत्वपूर्ण कार्य आगन्तुक की रक्षा थी। महत्वपूर्ण समय भी वही था जिसके सदुपयोग से शत्रु भी मित्र में बदल गया। राजा के तीनों प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर मिल गया।

कहानी के तीनों प्रश्नों के उत्तर में महत्वपूर्ण प्रेरणाएं समाहित हैं। महत्वपूर्ण कार्य, महत्वपूर्ण व्यक्ति एवं महत्वपूर्ण समय की कल्पना अधिकाँश व्यक्ति करते हैं तथा भविष्य की और दृष्टि गढ़ाये रहते हैं। जबकि सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्तमान है। जिसमें विद्यमान व्यक्ति प्रस्तुत कार्य एवं समय का सदुपयोग कर लिया जाये तो उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएं बन सकती हैं। प्रस्तुत कार्य को पूरे मनोयोग से करना वर्तमान समय एवं संबंधित व्यक्तियों का सदुपयोग ही सर्वांगीण प्रगति का मूल मन्त्र है।


समस्त जड़-चेतन पर उच्चस्तरीय सत्ता का अनुशासन

दार्शनिक स्पिनोज कहते थे- तथ्यों तक पहुँचने के लिए तर्क ही एकमात्र आधार नहीं है। उसके अतिरिक्त भी अन्य माध्यम हैं जिनके आधार पर मनुष्य की गरिमा टिकी हुई है। अन्तः प्रेरणाओं और आत्मानुभूतियों की सत्ता ऐसी ही है जो आमतौर से तर्कों का समर्थन नहीं करती अथवा जिनका समर्थन तर्क से नहीं किया जा सकता।

मनुष्य और मनुष्य के बीच पाई जाने वाली उदार आत्मीयता, मैत्री, सहानुभूति एवं सेवा सहकारिता को एक सीमा तक ही तर्क संगत ठहराया जा सकता है। उस सीमा तक जहाँ आदान-प्रदान में लाभदायक परिणाम की आशा अपेक्षा की जाती है। जहाँ इस कसौटी पर मैत्री खोटी सिद्ध होती है वहाँ तर्क तुरन्त पीछे हटने या उपेक्षा बरतने का सुझाव देता है। तर्क बुद्धि पर निर्धारित है और बुद्धि भौतिक स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करती है। दीन-दुखियों की सेवा, सहायता करने में जो समय, श्रम एवं मनोयोग लगता है उसे तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता। भावनाएं तर्क से ऊपर हैं उन्हीं के दबाव से परमार्थ की बात सोची जा सकती है और उसे चरितार्थ करने की हिम्मत जुटाई जा सकती है।

जिस तर्क के आधार पर बूढ़े बैल को कसाई के हाथ बेचकर चारे की, जगह की बचत की जाती है उसी आधार पर घर के वयोवृद्धों को मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। यदि वे जीवित हैं और अशक्त होते हुये भी सेवा, सम्मान का लाभ लेते हैं तो यह तर्क का अनुग्रह नहीं भावनाओं की अनुकम्पा है।

दार्शनिक किर्केगार्ड कहते थे- तर्क से न आत्मा सिद्ध होती है और न परमात्मा का अस्तित्व प्रमाणित किया जा सकता है इतने पर भी उन्हें अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अन्तराल की गहराई में जमी हुई आस्थाएं उनकी सत्ता को सदा स्वीकार करती हैं। गलत काम करने पर भीतर से कोई प्रेरणा ऐसी उठती है कि लाभ दिखते हुये भी उसे नहीं किया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में तर्क से कोई सहायता नहीं मिल सकती। स्वार्थ के लिए अन्य प्राणी बिना उचित-अनुचित के झंझट में पड़े, कुछ भी कहते रहते हैं तो मनुष्य ही उसका अपवाद क्यों होना चाहिए? उसी को गलत कामों के करते हुए अंतर्द्वंद्व क्यों उठाना चाहिए? इससे प्रतीत होता है कि भाव सम्वेदनाओं की अपनी सत्ता है और वे तर्क संगत न होते हुये भी अपना काम करती और प्रभाव दिखाती हैं।

बच्चों को पालने में कष्ट उठाने और उन्हें दुलार देने का तर्क संगत कोई आधार नहीं। जिनसे प्रतिदान न मिले उनकी क्यों सेवा, सहायता की जाय? प्रेम के बदले प्रेम की बात तो समझी जा सकती है, पर जिस नवजात शिशु में अभी भावना का विकास तक नहीं हुआ है, उससे प्रतिदान की आशा कैसे रखी जाय? बड़ी होने पर लड़कियां ससुराल चली जाती हैं और लड़कों में से भी अधिकाँश घाटे के सौदे सिद्ध होते हैं। यह सब कुछ जानते हुए अभिभावकों द्वारा विशेषतया माता द्वारा उन्हें जो उदार स्नेह सहयोग मिलता है, उसके पीछे कोई बुद्धि संगत तर्क प्रस्तुत कर सकना कठिन है।

विवाह के पक्ष में पुरुषों के पास तर्क हो सकते हैं। उन्हें पत्नी से कई प्रकार के लाभ सस्ते मोल में मिलते हैं। किन्तु पत्नी को तो हर दृष्टि से घाटा ही घाटा है। उसे देना अधिक पड़ता है और मिलता कम है। ऐसी दशा में वह क्यों विवाह बंधन स्वीकार करे? यही बात गर्भ धारण के सम्बन्ध में भी है। प्रजनन कर्म में नारी को हर दृष्टि से घाटा ही घाटा है। फिर वह उसे क्यों स्वीकार करे? यहाँ तर्क मौन हो जाता है और भावनाएं अपनी सामर्थ्य का परिचय देती हैं। दाम्पत्य जीवन अपनाने और गर्भधारण करने में नारी को उत्साह ही रहता है और संतोष भी। जबकि तर्क की दृष्टि से उसे इन दोनों ही जिम्मेदारियों से बचकर चैन में रहना चाहिए।

देशभक्ति, परमार्थ, धर्म, धारणा, तपश्चर्या, संयम, दान, सेवा जैसे उत्कृष्ट आदर्शों का समर्थन तर्क नहीं भावनाओं द्वारा ही होता है। त्याग, बलिदान की उमंगें तर्क संगत नहीं ठहरतीं। उन्हें उस मार्ग पर बुद्धिवादी नहीं भावनाशील ही बढ़ाते हैं। दूरदर्शिता अपनाने वाला विवेक तर्कों को तोड़ता है। उसे उदात्त आस्था और भाव श्रद्धा का ही समर्थन मिलता है। यह समर्थन कभी-कभी इतना प्रबल होता है कि सदुद्देश्यों के लिए कई बार लोग बड़े-से-बड़े यहाँ तक कि सर्वस्वदान, पूर्णाहुति तक देते पाये जाते हैं। इस प्रकार की साहसिकता में तर्क तो प्रायः असहमत ही रहते हैं।

अरस्तु अपने शिष्यों से कहा करते थे- “तुम देख सकते हो कि सज्जनों की तुलना में दुष्ट नफे में रहते और मौज उड़ाते हैं। इतने पर भी सज्जनता मरती नहीं। लोग घाटे में रहकर भी उसे अपनाये रहते हैं। ऐसा क्यों? इसका उत्तर एक ही है आत्मा के प्रतिपादन इतने प्रबल होते हैं कि तर्कों और प्रमाणों को अस्वीकृत करते हुए भी घाटा सहने पर आरूढ़ बने रहे। यह मनुष्य की उन आस्थाओं का प्रभाव है जिन्हें आत्मा का आधार भूत गुण कह सकते हैं।

कान्ट ने आत्मा की अमरता का एक प्रमाण यह प्रस्तुत किया है कि- ‘‘लोग मरते समय तक अपना प्रयास पुरुषार्थ नहीं छोड़ते। जबकि जीवन का अन्त समय देखकर उन्हें बचे हुए समय में मौज के दिन गुजारने तथा झंझटों से दूर रहने की बात सोचनी चाहिए थी। होता इसके ठीक विपरीत है, अन्तिम दिनों आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कामों को अधिक तत्परता से करने और जल्दी निपटाने की बात ध्यान में बनी रहती है। इसका कारण अन्तःकरण की वह आस्था है जिसमें उसे जीवन-क्रम भविष्य में भी चलते रहने का अटूट विश्वास होता है। यदि मरण के साथ अन्त निश्चित होता तो लोग निराश पाये जाते और संग्रह के स्थान पर बर्बादी की बात सोचते।’’

“क्रिटिक आव प्रेक्टिकल रीजन” के अनुसार विश्व का प्रत्येक घटक सुनियोजित ढंग से बना है। उसके पीछे पूर्ण परसंगतियाँ हैं और अस्तित्व की रक्षा से लेकर प्रगति करने एवं अनुपयुक्त परिस्थितियाँ आने पर तद्नुरूप ढलने, बदलने की समस्त सम्भावनाएं विद्यमान हैं। हर चीज सुन्दर डिजाइन और उपयुक्त साधन सामग्री से बनी है। ऐसा न तो अपने आप हो सकता है और न अपने आप अनगढ़ रूप से संयोगवश वैसा हो सकता है। जड़ पदार्थ भावना या बुद्धियुक्त है या नहीं इस संबंध में असमंजस हो सकता है, पर इसमें सन्देह नहीं कि उन्हें बनाया विवेकवान, दूरदर्शी एवं अपने विषय की प्रवीण पारंगत सत्ता ने ही है। भले ही उसका नाम ईश्वर रखा जाय अथवा कुछ और।

कान्ट के ‘क्रिटिक आव जजमेन्ट’ ग्रन्थ में अपनाई गई दार्शनिकता ने सिद्ध किया है कि तर्क से जो बातें सिद्ध न हो सके उन्हें अप्रामाणिक मान बैठना भूल है। तर्क मनुष्य की बौद्धिक क्षमता के अनुसार बढ़ती और बदलती चली आई है। प्रगति पथ पर चलते हुए मनुष्य ने अपनी मान्यताओं और दलीलों में आश्चर्यजनक परिवर्तन किये हैं। जो बातें कभी नितान्त सत्य समझी जाती थीं उन्हीं को पीछे नये तथ्यों ने अमान्य ठहरा दिया। इसका कारण यह था कि जिन प्रमाणों को आधार मानकर तर्क ने अपनी दिशा अपनाई थी वे जब नये प्रतिपादनों ने अमान्य ठहरा दिये तो तार्किकों को भी मैदान छोड़कर भागना और नया रास्ता अपनाना पड़ा। ऐसी दशा में तर्कों और उसके समर्थक तथ्यों पर भी उतना ही संदेह करने की गुंजाइश है जितना कि ईश्वर और आत्मा के संबंध में किया जाता है।

ह्वाइट हेड ने लिखा है- यदि कल्पना के आधार पर चेतन को जड़ ठहराया जा रहा है तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि उसी आधार पर जड़ में चेतन को ओत-प्रोत माना जाय। जब हर पदार्थ के अन्तराल और बाह्य क्षेत्र से सुनियोजित हलचलें चल रही हैं और उनमें से प्रत्येक घटक को एक कठोर अनुशासन के अंतर्गत अपना निर्वाह करना पड़ रहा है तो इस चेतना की सत्ता मानने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए।

धर्म का आधार तर्क नहीं नैतिकता है। नैतिकता आत्मा की मूलभूत प्रकृति है। उसे सिद्ध करने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं। सच तो यह है कि तर्कों को इस आधार पर मान्यता मिलेगी कि वे नीति समर्थक हैं या नहीं। चोरी या छल करने में कितनी ही दलीलें क्यों न दी जाय। समर्थ लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कितने ही हतप्रभ करने वाले कारण क्यों न प्रस्तुत करते रहें, वे मान्यता प्राप्त न कर सकेंगे। अनाचारी लोग अपनी गतिविधियों का औचित्य बताने के लिए बहुत कुछ कहते रहते हैं। फिर भी उन्हें सुनने और कहने वाले उस प्रतिपादन को ‘तर्क के लिए तर्क’ मानते और अस्वीकृत करते रहते हैं।

माता और पुत्री से विवाह उन समाजों में भी प्रचलित नहीं है जिन्हें नितान्त अनगढ़ और आदिम सभ्यता के अनुचर कहा जाता है। नीति मर्यादाओं को काटने के लिए इतने तर्क दिये जा सकते हैं कि पूरे सामाजिक ढांचे और सभ्यता प्रचलन को अस्वीकृत किया जा सके। अनास्थावादियों का अपना सम्प्रदाय है। फिर भी उनमें कुछ न कुछ मर्यादाएं बनी ही रहती हैं। कोई चाहे तो यह पूछ सकता है कि जब पूर्व प्रचलन अस्वीकृत किये गये तो नये नियमों को क्यों अपनाया गया? बात फिर घूम फिर कर वहाँ आ जाती है जहाँ उपयोगिता और आवश्यकता से भी बढ़ कर नैतिकता के कुछ आदर्शवादी नियमों को मान्यता देनी पड़ती है। यही है कि तर्क की तुलना में नीति की वरिष्ठता। जिसे सहज ही झुठलाया नहीं जा सकता।

स्पिनोजा का वह प्रतिपादन सारगर्भित है जिसमें वे कहते हैं कि- जो कुछ भी दृष्टव्य और अनुभव गम्य है उसमें से प्रत्येक इकाई अपने आप में एक एवं समग्र है। इतना ही नहीं वह किसी समर्थ केन्द्र के साथ बंधी है। बंधी का तात्पर्य है कि सामर्थ्य पाना और अनुशासन मानना। वृहदाकार ग्रह पिण्डों से लेकर अणु-परमाणुओं तक में यही क्रम समान रूप से चलता है। प्राणियों की काया भी इसी नियम के अंतर्गत जीवन-यापन करती है। अपने इस प्रतिपादन के पक्ष में स्पिनोजा अनेकानेक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं इस पूर्णता, सूत्रबद्धता, सुव्यवस्था का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उससे कहीं कोई भी बचा हुआ नहीं है। इस अनुशासन को ईश्वर न सही कुछ और कहा जाय, पर वह है अवश्य।

वर्कले ने एक जगह कहा है- दर्शन और विज्ञान सिर्फ इतना कहते हैं कि ईश्वर और आत्मा को सिद्ध करने के लिए हमारे पास उपयुक्त प्रमाणों का अभाव है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे अमान्य ठहरा दिया गया या कोई तार्किक विरोध खड़ा किया गया है। विरोध करने जैसा किसी तार्किक या विज्ञानी के पास कुछ भी नहीं है। ऐसी दशा में यह भी कहा जा सकता है कि- ‘तार्किक दृष्टि से जो असम्भव नहीं है, उसकी सत्ता हो सकती है। यह केवल असमंजस का प्रकटीकरण है। अस्वीकरण या विरोध नहीं।

विकासवाद की मान्यता है कि- ‘भौतिकी में जो वस्तु ‘क्रिया-शक्ति है’ वही जीवित प्राणियों में भावनात्मक प्रबलता। वही अपने-अपने क्षेत्रों में क्रमिक विकास की लम्बी मंजिल पर चलते हुए आज की स्थिति तक पहुँची है।’

इसी प्रतिपादन की दूसरी तरह भी व्याख्या हो सकती है कि किसी विकासशील प्रेरणा ने पदार्थों और प्राणियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा और परिस्थितियाँ प्रदान की हैं। विकासवाद के वर्तमान प्रतिपादनों को प्रचलित नास्तिकतावादी व्याख्या ही मान्यता प्राप्त करे यह आवश्यक नहीं।

अब उस तथ्य को अधिक अच्छी तरह समझा और स्वीकारा जा रहा है जिसके अनुसार इस सृष्टि के समस्त परिकर परस्पर सघन बनकर रह रहे हैं और सुसम्बद्ध रूप से पूरक बने हुए हैं। ‘इकालॉजी’ अन्वेषण से सृष्टि के हर क्षेत्र में पारस्परिक तारतम्य और तालमेल पाया गया है। इस विश्व ब्रह्मांड के सभी घटक अपने सजातियों के साथ तो आदान-प्रदान रखते ही हैं। विजातियों के साथ भी लेने देने का क्रम चलाते और अस्तित्व रक्षा से लेकर विश्व व्यवस्था में योगदान करते हैं।

तर्क से आत्मा, परमात्मा, नीतिसत्ता और उत्कृष्टता का कहाँ तक समर्थन होता है इसमें अभी भी असमंजस है, पर अब यह प्रतिपादन असंदिग्ध बनता जा रहा है कि तर्क और तथ्यों से भी ऊपर एक उच्चस्तरीय विधान एवं अनुशासन की सत्ता है। उस सत्ता में ही हम सब सूत्र में पिरोई हुई माला की तरह एकीभूत हो रहे हैं।


दृश्य संसार के भीतर अदृश्य संसार

जो कुछ दिखाई देता है या प्रत्यक्ष अनुभव होता है, जगत का अस्तित्व वहीं तक सीमित नहीं है। यों बहुत सी वस्तुएं ऐसी भी हैं जो प्रत्यक्ष चर्म-चक्षुओं से नहीं दिखाई देती, उसका कारण उनका दूर स्थित होना है। उदाहरण के लिए दिल्ली में बैठे व्यक्ति के लिए, बहुत दूर की बात तो जाने दें, दूसरा मुहल्ला भी एक तरह से अदृश्य है। आँखों की देखने की क्षमता थोड़ी-सी है और उनसे बहुत थोड़ी दूर तक देखा जा सकता है। बीच में यदि कोई आवरण आ जाएं तो उसे भी वेध कर देख पाना असम्भव हो जाता है। अनुभव भी अपने आस-पास के कुछ फीट के घेरे के वातावरण का ही होता है। उसके आगे क्या हो रहा है? यह जान पाना और अनुभव करना ज्ञानेन्द्रियों के बस की बात नहीं। परन्तु उनका भी अस्तित्व है और उन्हें भी स्थूल में गिना जा सकता है।

सौर-जगत में अनेकों ग्रह हैं। नभ-मण्डल में लाखों तारे और नक्षत्र हैं। ब्रह्मांड का अमित विस्तार है। इस विस्तार को स्थूल अस्तित्व में गिना जा सकता है। उन तक पहुँचना सम्भव नहीं हो सका है किन्तु कभी सम्भव हो भी सकता है। उस स्थूल जगत के अलावा एक ऐसा सूक्ष्म जगत भी है जिसका अस्तित्व अपने आस-पास ही है और उसे न चर्मचक्षुओं से देखा जा सकता है, न ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव किया जा सकता है। कदाचित कोई ऐसा वैज्ञानिक उपकरण विकसित हो सके, जिसके द्वारा इस सूक्ष्म जगत को देखा जा सके, तो प्रतीत होगा कि अपने शरीर से ही कितनी ही ऐसी सूक्ष्म सत्ताएं चिपटी हुई हैं, जिन्हें देखकर दंग रह जाना पड़ता है। यह जानकर विस्मय विमुग्ध हो जाना पड़ता है कि कदाचित ये अदृश्य सूक्ष्म सत्ताएं सूक्ष्म और दृश्य होतीं तो क्या अपने स्थान से एक इंच भी हटना या हिलना-ढुलना सम्भव हो पाता?

स्थूल और दृश्य जगत के अलावा इसी जगत में ऐसी सूक्ष्म और अदृश्य सत्ताएं भी हैं जो मनुष्य की अपेक्षा काफी बलवान और सामर्थ्यवान हैं। ये सत्ताएं कभी अपने अस्तित्व का परिचय बड़े ही विचित्र ढंग से देती हैं और जब इस तरह की घटनाएं प्रकाश में आती हैं तो उन्हें चमत्कार कहने के अलावा कोई मान्यता बनाना सम्भव नहीं होता।

घटना सन् 1975 की है। लन्दन निवासी श्री एलन और श्रीमती क्रिस्टीन गर्मियों की छुट्टी में उत्तरी ध्रुव की यात्रा करने के लिए निकले उस समय दोनों रूस की सीमा से सटे हुए लैपलैण्ड नामक स्थान से गुजर रहे थे। दोनों बातें करते हुए चल रहे थे। अचानक क्रिस्टीन ने अनुभव किया कि उसका साथी एलन अभी अभी ही जैसे गायब हो गया है। क्योंकि एलन की बात के उत्तर में उसने जो कुछ कहा था उसके बाद उत्तर मिलना तो दूर रहा उसकी पदचाप तक सुनाई देना बंद हो गई। यह सब इतना आकस्मिक हुआ था कि क्रिस्टीन कुछ समझ नहीं पाई थी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो दूर तक भी कहीं एलन दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे उसे जमीन निगल गई हो, ऐसी ही घटना थी यह। ऐसी घटना पहले कभी कहीं देखने-सुनने में नहीं आई थी इसलिए यह विश्वास बंधते नहीं बनता था कि एलन गायब हो गया है।

श्रीमती क्रिस्टीन ने अपने पति को आसपास इधर-उधर बहुत ढूंढ़ा, तलाशा परन्तु वह कहीं हो तो मिले। उसका कहीं अता-पता नहीं चल रहा था। अपनी खोजबीन का कोई परिणाम न निकलते देखकर क्रिस्टीन ने स्थानीय लोगों की मदद ली। उस क्षेत्र में बसने वाले फिनिश जाति के लोगों ने भी एलन को ढूंढ़ने के लिए काफी श्रम किया, परन्तु कोई परिणाम नहीं निकला। खोजी कुत्तों की सहायता भी ली गई परन्तु खोजी कुत्ते उस स्थान पर आकर रुक जाते, जहाँ से एलन गायब हुआ था। रूसी सेना का एक कैम्प भी पास ही था। यह आश्चर्यजनक घटना सुनकर फौजी अधिकारियों ने श्रीमती क्रिस्टीन से सहानुभूति व्यक्त की और विशेषज्ञों की सहायता से एलन की खोज की परन्तु उन्हें भी कोई सफलता नहीं मिली। अन्त में निराश होकर श्रीमती क्रिस्टीना अपना अभियान अधूरा छोड़कर वापस लन्दन आ गई। एलन का आज तक कोई पता नहीं चला है।

ऐसी ही घटना मनीला के माध्यमिक स्कूल में पढ़ रहे बारह वर्षीय छात्र कार्बोलिया बलोजा के साथ घटी। सितम्बर 1951 में वह अपने सहपाठियों के साथ खेल रहा था कि अचानक वह गायब हो गया। उसके सहपाठी हैरान रह गए कि देखते ही देखते कार्बोलिया कहाँ चला गया? फिर जिस रहस्यमय विचित्र ढंग से वह गायब हुआ था, इसी प्रकार वह वापस प्रकट भी हो गया। इसके बाद तो ऐसा सिलसिला चला कि वह प्रायः कक्षा में बैठे-बैठे ही गायब होने लगा। कई बार वह गायब होता और फिर प्रकट हो जाता। इस संबंध में पूछे जाने पर कार्बोलिया ने बताया कि उसे प्रायः ऐसा अनुभव होता है कि परी जैसी कोई सुन्दर लड़की उसे अपने पास बुला रही है। वह सहज आकर्षण वश उसके समीप जाने की इच्छा से आगे बढ़ने की कोशिश करता है कि यकायक हलका हो जाता है और हवा में उड़ जाता है। उसे नहीं मालूम कि वह गायब हो जाता है परन्तु जिस समय वह अन्य सहपाठियों और कुटुम्बी-जनों को गायब हुआ प्रतीत होता है, उस समय वह परी जैसी लड़की के साथ खेल रहा होता है।

मनीला के जियोरा स्कूल का यह छात्र कई बार गायब हुआ। एक बार तो वह दो दिन तक गायब रहा। पुलिस में रिपोर्ट कराई गई और पुलिस इस मामले की छानबीन करने लगी। लेकिन उसके हाथ भी कुछ नहीं लगा। अन्त में पुलिस हार-थक कर रह गई। विवश पिता ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया परन्तु कार्बोलिया को वहाँ से गायब होने में भी कोई परेशानी नहीं हुई।

अन्त में घटनाओं को किन्हीं शैतानी शक्तियों का चक्कर मानकर कार्बोलिया के पिता ने चर्च के पादरी से अपना दुखड़ा रोया, पादरी ने कार्बोलिया को इस शैतानी चक्कर से छुड़ाने के लिए प्रार्थना की और जब कहीं जाकर उसका गायब होना बन्द हुआ।

अमेरिका के टेनेसी राज्य में गालारिन नामक स्थान पर डेविंग लैंग के साथ भी इसी प्रकार गायब होने की घटना घटी। यह 23 सितम्बर 1808 की बात है। डेविड अपने क्षेत्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति था, लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखते थे और उसका दबदबा भी मानते थे क्योंकि वह जमींदार था। उस शाम वह अपने दो मित्रों के साथ घूमने के लिए निकला और घूमते समय ही रास्ते में अचानक गायब हो गया। ऐसा भी नहीं था कि वह अपने मित्रों की दृष्टि बचाकर कहीं छुप गया हो अथवा किसी ने उसका अपहरण कर लिया हो। क्योंकि जिस समय वह अंतर्ध्यान हुआ उस समय वह अपने मित्रों से बात कर रहा था और उसकी बात अधूरी ही थी कि वह अंतर्ध्यान हो गया। मित्रों ने वहाँ खोज की परन्तु डेविड का कहीं भी पता नहीं चला। मित्रों ने घरवालों को इसकी सूचना दी, पुलिस में भी रिपोर्ट की गई। हर तरह से खोजबीन हुई परन्तु डेविड का कहीं भी पता नहीं चला। जिस स्थान पर वह गायब हुआ, वहाँ कोई गड्ढा अथवा झाड़ी भी नहीं थी, जिसमें कि वह छुप जाता। उस स्थान के आस-पास वाले क्षेत्र सहिता नगर का कोना-कोना छान मारा किन्तु डेविड का पता नहीं चलना था और नहीं ही चला।

डेविड कोई साधारण व्यक्ति तो थे नहीं, प्रतिष्ठित जमींदार थे, अतः उनकी खोज के लिए पत्रकारों से लेकर जासूसों तक ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। सरकार ने इस घटना की जाँच के लिए एक आयोग ही नियुक्त कर दिया। इस आयोग ने वहाँ से निवासियों से कई तरह के प्रश्न पूछे, इस क्षेत्र की जानकारियाँ एकत्रित की, मिट्टी, पानी और घास आदि का परीक्षण किया गया। देखा गया कि पहले भी कभी कोई इस तरह की घटना घटी थी क्या? लेकिन इस तरह की कोई घटना पहले कभी न घटी थी, इसका कोई प्रमाण तो क्या विवरण भी नहीं मिला। हर तरह से जाँच-पड़ताल करने पर आयोग के अध्यक्ष, जो एक भूतपूर्व न्यायाधीश थे, ने लिखा, यह एक अविश्वसनीय सत्य घटना है। जिसका समाधान बहुत खोजने पर भी नहीं मिल पाया।

सन् 1920 में लंदन के युवा साँसद पिक्टर ग्रेसर एक दुकान से निकल रहे थे कि लोगों के देखते ही देखते गायब हो गए। उनकी खोज की गई, प्रेतविद्या के जानकार लोगों की भी सहायता ली गई, परन्तु पिक्टर ग्रेसर का कहीं भी पता नहीं चला, न कोई सूत्र हाथ लगा, जिसके आधार पर इस संबंध में निश्चयपूर्वक कुछ कहा जा सके।

13 जुलाई 1950 को पोलैंड निवासी पादरी वोनिस्की अपने किसी मित्र से मिलने के लिए घर से निकले। वे सौ कदम भी नहीं जा पाए होंगे कि अचानक अंतर्ध्यान हो गये। वोनिस्की बहुत प्रतिष्ठित और लोक-प्रिय पादरी थे। उनके गायब होने की घटना पर बड़ा तहलका मचा। पुलिस ने भी जी-तोड़ कोशिश कर डाली परन्तु उनका कहीं भी पता नहीं चला कि वे कहाँ गए?

व्यक्तियों के इस प्रकार चलते-फिरते या देखते ही देखते गायब हो जाने की असंख्य घटनाएं हैं। इस संदर्भ में वारमूडा के रहस्यमय त्रिकोण की चर्चा अप्रासाँगिक नहीं होगी, जिसे शैतान के त्रिकोण के नाम से जाना और संबोधित किया जाता है। वारमूडा से फ्लोरिडा तक, फ्लोरिडा से सटगामो और सटगामो से वारमूडा तक एक ऐसी सीमा रेखा बनती है, जो रेखा गणित के त्रिकोण की तरह आकृति बनाती है। इस क्षेत्र में कोई भी विमान या जहाज पहुँच जाता है तो उसका फिर पता नहीं चलता। वह गायब ही हो जाता है। वहाँ से किसी प्रकार लौटकर आ सके कुछ लोगों का कहना है कि उस क्षेत्र में दिशा सूचक यंत्र सहित वे सभी उपकरण काम करना बंद कर देते हैं, जिनके माध्यम से बाहरी जगत के साथ संपर्क रखा जा सके। अब तक कई एक जहाज तथा विमान इस शैतानी त्रिकोण की चपेट में आकर लुप्त हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे नष्ट हो जाते हों। क्योंकि नष्ट होने या कोई दुर्घटना घटने की स्थिति में उन जहाजों या विमानों के कुछ तो अवशेष प्राप्त होते। कोई तो ऐसा चिन्ह मिलता कि कहा जा सके ये यान दुर्घटना ग्रस्त होकर नष्ट हो गये हैं। किन्तु ऐसे कोई चिन्ह नहीं मिले, न ही उन यानों के अवशेष ही प्राप्त हो सके।

इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि परिचित और प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाले संसार के भीतर ही कुछ ऐसी अदृश्य सत्ताएं भी हैं जिन्हें अभी तक जाना-पहचाना नहीं जा सका है। सूक्ष्म होने के कारण ये किन्हीं यंत्रों की पकड़ में भी नहीं आती। ये अदृश्य और सूक्ष्म सत्ताएं अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी। इन्हें अदृश्य लोक या अदृश्य दुनिया भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार मानवीय सत्ता या अन्य प्राणियों के तीन शरीर हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। उसी प्रकार प्रत्यक्ष जगत के भीतर भी स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत की तीन पर्तों को भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है। देखते ही देखते गायब हो जाने वाली घटना सूक्ष्म परत की ही गतिविधि है। स्थूल-जगत के रहस्य ही अभी पूरी तरह नहीं जाने जा सके हैं, तो सूक्ष्म जगत की कौन कहे? परन्तु यह निर्विवाद है कि संसार, जो अपने आसपास ही दिखाई देता है, वह उतना ही नहीं है जितना कि दिखाई देता या अनुभव होता है। उसके अस्तित्व की अनेकों गहरी परतें हैं। कदाचित उन्हें जाना जा सके और उपयोग में लाने की सामर्थ्य अर्जित की जा सके तो मनुष्य की शक्ति सामर्थ्य अनन्त गुना बढ़ और विकसित हो सकती है, जिसकी कल्पना करना सम्भव नहीं है।


दीपक का स्नेह (kahani)

दीपक का स्नेह समाप्त हो गया। रुई की बाती चहुँ ओर धीमा-धीमा प्रकाश छोड़ रही थी। अन्तिम लौ तीव्रता से चमकी और शून्य में विलीन हो गया।

बुझते दीपक के सम्मुख एक प्रश्न था- बंधु अभी तक तो तुम मन्द-मन्द जल रहे थे और अब एक साथ अपनी तीव्रतम लौ से वातावरण को आलोकित कर बुझ गये ऐसा क्यों?

दीपक ने धूम्र की वक्र रेखा बनाते हुए कहा- ‘अन्तिम समय भी मेरा प्रयास यह था कि सम्पूर्ण शक्ति लगाकर इतना प्रकाश फैला दूँ कि यदि अंधकार से कोई जीव भटक रहा हो तो उसे मार्ग दिखाई दे जाए।’


परिष्कृत अंतरंग चेतना की उपलब्धियाँ

दृश्यमान जगत की अदृश्य, रहस्यमयी परतों को यदि समझा जा सके और उनसे संपर्क स्थापित किया जा सके तो निश्चय ही वे विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं जिनके आधार पर अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि का जीवन जिया जा सकता है और इस जीवन को सफल बनाया जा सकता है। भौतिक विज्ञान स्थूल जगत में बिखरी हुई शक्ति को देखकर ही चकित है और यह नहीं समझ पा रहा है कि उसका उपयोग किस प्रकार किया जाए? सामान्य के भीतर जो असामान्य छिपा पड़ा है, उसमें से बहुत कुछ को अब भली-भाँति समझा जाने लगा है। उदाहरण के लिए सूर्य को ही लें। वह गर्मी और रोशनी देने वाला, रोज उगने और डूबने वाला अग्नि पिण्ड मात्र है, परन्तु गम्भीरता पूर्वक उसका विश्लेषण अध्ययन करने पर यही पता चलता है कि वह शक्ति का असीम भांडागार है।

सूर्य के मध्य भाग में जितनी गर्मी भरी पड़ी है उसके दो लाखवें हिस्से से ही प्रकृति के विकास और विनाश का संतुलन क्रम चलता है। शेष भांडागार किस प्रयोजन के लिए सुरक्षित है? इसका कोई पता नहीं है। यह भी समझा जा सकता है कि वह शक्ति किसी आपत्तिकाल के समय प्रयुक्त करने के लिए सुरक्षित हो या यों भी कहा जा सकता है कि परमात्मा ने वह शक्ति सूर्य के सुरक्षित कोष में इसलिए जमा करा रखी हो कि कोई उपयुक्त पात्र आए और किसी ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति के लिए शक्ति की आवश्यकता अनुभव करे तो उसे इतनी शक्ति उपलब्ध हो सके कि ध्वंस और निर्माण का कार्य सुभीते के साथ चल सके।

प्रकृति में उपलब्ध शक्ति भंडार की तुलना में मानव उपार्जित समस्त साधन इतने स्वल्प हैं कि वे समुद्र की तुलना में एक-बूँद के बराबर भी नहीं ठहरते। मनुष्य का अपना शरीर भी कुछ कम विचित्र या विलक्षण नहीं है। पूरा शरीर जिन छोटी-छोटी कोशिकाओं से मिलकर बना है, यदि उन्हें खींचकर लम्बाई में बढ़ाया जाए और फैलाया जाए तो वह समूचे ब्रह्मांड के विस्तार जितना लम्बा होगा। इतने लंबे फीते में यदि अक्षरों को अंकित किया जाए तो वह स्मृति कोष इतना विपुल होगा कि उसे भरने के लिए उपलब्ध जानकारियाँ एक अंश भी नहीं भर सकेंगी। ऐसा मनुष्य सर्वज्ञ ही कहा जा सकता है। योग विद्या के जानकार यह जानते हैं कि योग सिद्ध व्यक्ति के लिये संसार में जो कुछ हो रहा है, जो कुछ होगा, और जो हो गया है वह सब कुछ जान लेना सम्भव है। इस तथ्य को स्थूल विवरणों के आधार पर साढ़े पाँच फीट लंबे और करीब सवा सौ पौंड वजनी शरीर में जो कुछ है उसे आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है।

शरीर शास्त्रियों का मत है कि शरीर में विद्यमान खरबों कोषों में से प्रत्येक में उस शरीर की शारीरिक तथा मानसिक विशेषताएं विद्यमान रहती हैं। ये विशेषताएं आगे चलकर मनुष्य शरीर में परिपक्व होने वाली होती हैं। बच्चे की आकृति-प्रकृति का सारा ढ़ाँचा इन नगण्य से घटकों में छिपा रहता है। शरीर के संबंध में सबसे निकटवर्ती विचित्रताओं में सबसे अधिक विलक्षण है मस्तिष्क की टोकरी में रखा हुआ, सूक्ष्म शक्तियों और दिव्य क्षमताओं का भण्डार। लेकिन कठिनाई यह है कि जिस प्रकार अपनी ही आँखों को स्वयं सीधे देख पाना कठिन है और अपने ही भीतर चल रही रक्त की हलचलों को जान पाना दुरूह है उसी प्रकार मस्तिष्क को समझना कठिन है। उससे भी ज्यादा कठिन मानसिक चेतना पर नियंत्रण कर पाना है। यदि वैसा सम्भव हो सके तो शक्ति का लगभग उतना ही बड़ा स्त्रोत हाथ लग सकता है जितना कि बाह्य जगत में दिखाई देने वाले सूर्य में निहित है। पुस्तकीय शिक्षा, विचार विनिमय, दृश्य चिन्तन आदि के सहारे जो ज्ञानवृद्धि होती है उससे मस्तिष्क का बहुत छोटा अंश ही विकसित हो पाता है। इसके सहारे उपार्जन, लोक व्यवहार तथा निर्वाह के सामान्य प्रयोजन ही पूरे होते हैं। शक्ति का स्त्रोत तो अचेतन है और उसे प्रभावित कर सकना ही कठिन है। यदि उसे प्रभावित किया जा सके, अचेतन तक पहुँच पाना संभव हो जाए और उसे अभिष्ट दिशा में बदला जा सके तो व्यक्तित्व का स्वरूप ही बदल सकता है। तब सामान्य को असामान्य के रूप में विकसित हुआ देखा जा सकता है।

अचेतन को प्रभावित करने की दिशा में भी कितने ही वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं और उनमें सफलताएं भी मिल रही हैं। अमेरिका के प्रसिद्ध चिकित्सक और मनःशास्त्री डा. डेलगाडो ने इस संबंध में कई सफल प्रयोग किये हैं और उन प्रयोगों में से कुछ का प्रदर्शन भी किया है। एक प्रदर्शन में उन्होंने एक बन्दर को केला खाने के लिए दिया। जब वह केला खा रहा था, तब डा. डेलगाडो ने ‘इलेक्ट्रो ए.सी.फैलोग्राफ’ के द्वारा बंदर के मस्तिष्क को संदेश दिया कि केला खाने की अपेक्षा तो भूखे रहना ज्यादा अच्छा है। यह संदेश ग्रहण करने पर बंदर ने केला फेंक दिया। इलेक्ट्रो ए.सी.फैलोग्राफ एक ऐसा यंत्र है जिसमें विभिन्न क्रियाओं के समय मस्तिष्क में उठने वाली भाव-तंरगों को अंकित कर लिया जाता है। इस यंत्र द्वारा मस्तिष्क में अभीष्ट प्रकार की भाव-तरंगों को विद्युत यंत्र द्वारा तीव्र कर देते हैं तो मस्तिष्क के शेष सब भाग दब जाते हैं और वह एक ही भाव तीव्र हो उठने से मस्तिष्क केवल वही काम करने लगता है।

इस तथ्य को डा. डेलगाडो ने एक खतरनाक प्रयोग करके सिद्ध कर दिखाया। इस प्रयोग का उन्होंने सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शन को देखने के लिए हजारों लोग एकत्र हुए। सिर पर इलेक्ट्रॉड जड़े हुए दो खूँखार साँड लाये गये। यह एक प्रकार का एरियल था जो रेडियो ट्रान्समीटर द्वारा छोड़ी गई तरंगों को पकड़ लेता था। जब दोनों साँड मैदान में आये तब उनका खूँखारपन देखते ही बनता था, लगता था दोनों डेलगाडो का कचूमर ही निकाल देंगे। लेकिन दोनों साँड जैसे ही डेलगाडो के पास पहुँचे, उन्होंने अपने यंत्र द्वारा शाँति की भाव तरंगें प्रेषित कीं। इन तरंगों के प्रेषण के साथ ही साँड अपनी आक्रामक मुद्रा को फुसकारते हुए ऐसे शाँत भाव से खड़े हो गए, जैसे दो बकरियाँ खड़ी हों। उल्लेखनीय है कि जानवर मनुष्यों की भाषा भले ही न समझें किन्तु भावों की भाषा तो समझते ही हैं। यदि प्रयत्न किया जाए तो मनुष्य अपनी भावशक्ति को इस सीमा तक बढ़ा सकता है कि उसके द्वारा सिंह और गाय को एक साथ रखने की उक्ति चरितार्थ की जा सकती है।

यह मस्तिष्क की ही शक्ति है। टेक्सास विश्व विद्यालय के राबर्ट थाम्पसन और जोंस मैक कौनेल वैज्ञानिकों ने प्लेनोरिया नामक जीव पर परीक्षण करके यह सिद्ध किया है कि विद्युत उपकरणों की सहायता से मस्तिष्कीय क्षमता को घटाया और बढ़ाया जा सकता है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डा. एलन जेकवसन ने प्रशिक्षित चूहों के मस्तिष्क में से आर.एन.ए. नामक रसायन निकाल कर अनाड़ी चूहों के मस्तिष्क में पहुँचाया तो वे भी प्रशिक्षित चूहों की तरह व्यवहार करने लगे। मस्तिष्क को प्रभावित करने और उसे इच्छित दिशा में मोड़ने के लिये किये जा रहे प्रयासों की प्रगति जिस चरण में पहुँच गई है, उसे देखते हुए मिशिगन विश्वविद्यालय अमेरिका के वैज्ञानिक डा. ओटो शिमल ने घोषणा की है कि अब हमारे हाथ में मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करने की शक्ति आ गई है, पर आशा की जानी चाहिए कि उसका प्रयोग केवल अच्छाई के लिए ही होगा। लेकिन साथ ही इस खतरे को भी ध्यान में रखना होगा, इस शक्ति का प्रयोग कहीं निजी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति एवं साम्राज्यवादी विस्तार के लिए भी किया जा सकता है। यदि ऐसा किया गया तो यह आविष्कार संसार का सबसे विघातक अस्त्र सिद्ध होगा। उल्लेखनीय है कि डा. ओरो स्वयं भी इस दिशा में प्रयोगरत हैं।

विद्युत शक्ति या अन्य उपकरणों का सहारा लेकर मस्तिष्कीय क्षमता को विकसित करने या उसे प्रभावित करने की अपेक्षा योग साधन का मार्ग निरापद है। योग का उद्देश्य बिना वैज्ञानिक उपकरणों के अन्तःचेतना को अभीष्ट स्तर पर परिवर्तित और विकसित करना है। यह इसलिए उपयुक्त है कि हर व्यक्ति अपनी चेतना का परिष्कार होने पर उसी दिशा में अपनी क्षमता को विकसित करना चाहेगा जिससे कि उपलब्ध क्षमता को अपने और दूसरों के कल्याण में लगाया जा सके। इसके विपरीत वैज्ञानिक साधनों द्वारा दूसरों के मस्तिष्कों को प्रभावित करने का आधार अपना लिया गया तो जन-साधारण को किसी महत्वाकाँक्षी सत्ताधारी की इच्छा के अनुरूप ढलना पड़ेगा और आत्मोत्कर्ष से वंचित रहकर किन्हीं औरों के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह जाना पड़ेगा।

विलक्षणताओं की दृष्टि से देखा जाए तो छोटे-छोटे जीव-जन्तु भी असाधारण सूक्ष्म चेतना से सम्पन्न पाये जाते हैं। वैरियन कीड़े की घ्राण शक्ति सबसे तीव्र मानी जाती है। वह मीलों दूर के मुर्दा मांस का पता लगा लेता है और उड़ता फुदकता हुआ वहाँ तक पहुँच जाता है। समुद्र में हल्के ज्वार-भाटे पचास मिनट के अंतर से आते हैं। केकड़े भी इसी क्रम से अपना रंग बदलते रहते हैं। कीड़ों के कान नहीं होते, यह काम वे अगली टाँगों के जोड़ों में रहने वाली ध्वनि ग्रहण शक्ति द्वारा पूरा कर सकते हैं। तितलियों के पंखों में श्रवण शक्ति पाई जाती है। झींगुर आदि जो आवाज करते हैं वह उनके मुँह से नहीं बल्कि टाँगों की रगड़ से उत्पन्न होती है। कीड़ों की अपनी विशेषता है। उनके फेफड़े नहीं होते पर वे साँस लेते हैं। उनके कान नहीं होते पर वे सुन सकते हैं। नाक न होने पर भी वे सूँघने में समर्थ होते हैं। रगफर्ड जाति का कीड़ा सीधा माँ के द्वारा ही जन्मता है। बाप का कोई योगदान उसके जन्म लेने में नहीं होता। क्वाँरी एफिड अपने बलबूते पर बच्चे जनने लगती है। नेस, सलासौमिना, आईस्टर, स्नेल (घोंघा) फ्रेस वाटर मसल आदि कृमियों में भी यही विशेषता होती है।

इस प्रकार प्रकृति ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को कोई न कोई विलक्षणता बाँट रखी है। मनुष्य में इन सभी विलक्षणताओं का समुच्चय बीज रूप में विद्यमान है जिन्हें आत्मचेतना के विकास द्वारा जागृत किया जा सकता है। इस विकास के लिए सर्वप्रथम आँतरिक उत्कृष्टता का विकास आवश्यक है। इस आवश्यकता को पूरा करने के बाद भले ही ये विलक्षणताएं विकसित न हों, परंतु हर घड़ी आनन्द की स्थिति बनी रहती है। इसके अतिरिक्त अचेतन की क्षमता इतनी प्रखर हो उठती है कि उसके सहारे देव जीवन जी पाना सम्भव हो पाता है और दूसरों को सुखी समुन्नत बनाकर असीम आत्म-संतोष देने वाला श्रेय प्राप्त किया जा सकता है।


क्षुद्र बन गया (kahani)

“तब में क्षुद्र बन गया। जब मैंने लोगों की मिथ्या चापलूसी करके अपना लाभ कमाने की बात सोची- जबकि दुर्बलों के सामने दर्प दिखाता हुआ उनके साथ अपनी प्रतिस्पर्धा करते हुए अहंकार से इठलाया- जबकि मैंने कठिन कर्तव्य की तुलना में सस्ते सुखोपभोग की पगडंडी पर कदम रखा- जबकि अपराध करने के बाद पाप पक्ष समर्थन किया- जबकि कुरूपता से तो घृणा करता रहा, पर यह भूल गया कि घृणा की प्रतिच्छाया ही कुरूपता है- जबकि दूसरों के मुँह निकलने वाली प्रशंसा को सुनकर अपने कर्तृत्व को अच्छा मान बैठा।

मेरी क्षुद्रता को इन मान्यताओं ने चक्रवृद्धि ब्याज की तरह अत्यधिक बढ़ा दिया। तो भी मैं अनुभव करता रहा कि बड़ा बन रहा हूँ और आगे बढ़ रहा हूँ।’’ - खलील जिब्रान


सफलता और प्रगति की मूल शर्त

किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति में असफलता मिलने के कई कारण हो सकते हैं। परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साधनों का अभाव, साथियों द्वारा असहयोग या उनका प्रतिरोध, कोई भी कारण प्रगति में अवरोध खड़े कर सकता है। ये सभी कारण बाहरी हैं। इन कारणों के उपस्थित होने पर न निराश होने की आवश्यकता है और न ही हताश होने की। बाह्य कारणों और अवरोधों को हटाया जा सकता है। मार्ग में पड़े पत्थर को लाँघकर या चट्टान पर चढ़कर आगे बढ़ा जा सकता है। नहीं बढ़ा जा सकता है तो एक ही कारण है व्यक्तित्व की दुर्बलता। मन में यदि थोड़ा साहस हो तो इन अवरोधों को पार किया जा सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने और उन्हें अनुकूल बनाने की सामर्थ्य मनुष्य के भीतर विद्यमान है। साधनों का अभाव भी दूर किया जा सकता है और नये साधन जुटाये जा सकते हैं। साथियों के प्रतिरोध को सहयोग में परिणत करना कोई कठिन काम नहीं है, पर अपना व्यक्तित्व ही दुर्बल हो तो क्या किया जा सकता है? सिवा इन अवरोधों का रोना रोते रहने के।

प्रगति पथ में आने वाले अवरोधों और सफलता प्राप्त करने की दिशा में उत्पन्न होने वाली बाधाओं को दूर करने का एक ही उपाय है- आत्मविश्वास! आत्मविश्वास की गंगोत्री से ही शक्ति धारा निकलती है और प्रचण्ड पुरुषार्थ की गंगा बहती है। इस गंगा में स्नान कर ही तमाम सफल व्यक्तियों ने अपनी दुर्बलताओं के पाप धोए हैं तथा सफलता के पुण्य आनन्द को प्राप्त कर सके हैं।

आत्मविश्वास का अर्थ है अपने आप के प्रति आस्था यह निष्ठा कि मनुष्य अनन्त सम्भावनाओं के बीज अपने भीतर लेकर जन्मा है। यह आस्था और निष्ठा ही श्रम, साहस तथा प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण करती है।

स्मरण रखा जाना चाहिए कि आत्मविश्वास का अर्थ बिना पंखों के आसमान पर उड़ने का नाम नहीं है। उसके साथ अपनी सामर्थ्य भी तौलनी पड़ती है। अपने अनुभवों, योग्यताओं और साधनों का मूल्याँकन करना पड़ता है। इस समीक्षा के साथ यह निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि वर्तमान परिस्थितियों में किस सीमा तक कितना साहस किया जा सकता है? और कितनी ऊंची छलाँग लगाई जा सकती है? यदि निष्कर्ष उतनी ऊंची छलाँग लगाने की अनुमति नहीं देते हों तो फिर वैसी सामर्थ्य जुटानी होती है, उपयुक्त परिस्थितियों का निर्माण करना होता है और आवश्यक साधन जुटाने होते हैं।

यदि ऐसा नहीं किया गया और वस्तु-स्थिति की उपेक्षा की गई तथा केवल हवाई महल चुनते रहा गया तो शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना पड़ता है। शेखचिल्ली की कहानी बहुश्रुत है जिसमें एक मजदूर ने तेल ढोने की मजदूरी से मिलने वाले पैसों से मुर्गी, बकरी, भैंस खरीदकर मालदार बनने, अमीर औरत से शादी करने, बच्चा होने और बच्चे को झिड़की लगाने का सपना देखा था और बच्चे को झिड़की देने के आवेश में घड़ा फोड़ बैठा था तथा रंगीन सपना गंवाकर मालिक द्वारा दुत्कारा, धमकाया और निकाल दिया गया था।

बहुत से लोग इस तरह के सपने देखते हैं। कुछ आत्मविश्वास की कोरी प्रवंचना लेकर इन्हें साकार करने के लिए भी प्रयत्न करते हैं किन्तु इस उपक्रम में वस्तु-स्थिति की उपेक्षा करने के कारण अन्ततः हाथ मलते रह जाते हैं। अस्तु अपने आपके प्रति, अपनी शक्तियों के प्रति विश्वास रखने के साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि जिन कारणों से प्रगति पथ अवरुद्ध बना हुआ है, दूसरों का सहयोग नहीं मिल रहा है, अवरोध सामने आ रहे हैं वे क्या हैं तथा उन कारणों को किस प्रकार दूर किया जा सकता है? स्वाभाविक ही वे कारण अपनी दुर्बलताओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकते। अतः उन दुर्बलताओं को दूर करते हुए आत्मविश्वास पूर्वक प्रगति प्रयास करना चाहिए। सफलता की, आगे बढ़ने की यही मूलभूत शर्त है।


नियति द्वारा प्रस्तुत मानवीय सत्ता की विलक्षणताओं का परिचय

परमात्मा ने मनुष्य को अनन्त क्षमताओं और अजस्र सम्भावनाओं से पूरित कर इस पृथ्वी पर भेजा है। वह चाहे तो साधना और अभ्यास द्वारा इन क्षमताओं को जागृत कर अपूर्व शक्ति का स्वामी बना सकता है। किन्तु अधिकाँश मनुष्य शिश्नोदर परायण जीवन तक ही अपनी गतिविधियाँ सीमित रखते हैं और पेट तथा प्रजनन का सामान जुटाते-जुटाते ही इस संसार से कूचकर जाते हैं। अधिकाँश लोगों की कल्पना में यह बात आती ही नहीं है कि जिन्हें वे सिद्धियाँ और चमत्कार कहते हैं वे किसी व्यक्ति विशेष को दिये गये उपहार नहीं हैं, अपितु उनके बीज उनमें स्वयं ही निहित हैं। आवश्यकता केवल उन्हें सींचने और खाद पानी देकर अंकुरित भर करने की है।

इस तथ्य को न समझ पाने के कारण लोग ऐसे व्यक्तियों को किसी दूसरे लोक का प्राणी समझते हैं जो साधना और अभ्यास द्वारा अपनी किन्हीं विशेष शक्तियों को जागृत कर लेते हैं। परमात्मा ने ऐसी शक्तियाँ किसी भी मनुष्य को पक्षपात से प्रेरित होकर नहीं दी हैं वरन् उसने अपने सभी पुत्रों को बिना किसी भेदभाव के इन सम्भावनाओं से पूरित बनाया है।

समय-समय पर किन्हीं व्यक्तियों में इस तरह की विशेषताएं अनायास ही प्रकट हो जाती हैं। उन्हें पूर्व जन्मों का संस्कार भी कह सकते हैं और प्रकृति द्वारा इस बात का परिचय प्रमाण भी, कि उसके परिकर में रहने वाले सभी मनुष्यों को अतिमानव बनने की सम्भावनाएं वरदान के रूप में प्राप्त हैं। यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि उन संभावनाओं को साकार करता है अथवा नहीं। इस तरह के कुछ प्रसंग इस प्रकार हैं।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर शहर के मुहल्ला ब्रह्मनान में एक साधारण परिवार में जन्मी ग्यारह वर्षीय लड़की सुधा ने 27 जनवरी 1948 को सुबह उठते ही अपने माता-पिता से कहा कि महात्मा गाँधी को किसी ने प्रार्थना के समय गोली मार दी। सुधा घर में सबसे छोटी थी और माता-पिता का उस पर कुछ स्नेह भी विशेष था इसलिये कोई उसे कुछ कहता नहीं था। लेकिन जब उसने बिना किसी प्रसंग वश घरवालों से यह बात कही तो वे हैरान भी हुए और उन्होंने सुधा को डाँटा-डपटा भी। सुधा डाँट खाकर चुप हो गई। लेकिन ठीक, तीन दिन बाद 30 जनवरी 1948 की संध्या को रेडियो से लोगों ने महात्मा गाँधी की हत्या का समाचार सुना। समाचार का विवरण बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि सुधा ने बताया था। सुधा को तीन दिन पहले ही महात्मा गाँधी की हत्या का पूर्वाभास कैसे हो गया? इस संबंध में सुधा कुछ नहीं बता सकी, उसके माता-पिता द्वारा कुछ बताने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

सन् 1959 में लखनऊ के एक प्रतिष्ठित परिवार में स्वप्नों के माध्यम से पूर्वाभास की घटना घटी। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. डी.एन. मजूमदार एन्थ्रोपोलॉजी विभाग के अध्यक्ष थे। उनकी पुत्री भी कलकत्ता विश्वविद्यालय में लेक्चरार थी। एक दिन रात को दस बजे डा. मजूमदार के फोन की घण्टी घनघना उठी। टेलीफोन आपरेटर ने बताया कि आप अपनी बेटी से कलकत्ता से बात कीजिए। सहसा डा. मजूमदार के माथे पर चिन्ता की रेखाएं खिंच गई। ऐसी तो कोई पृष्ठभूमि बनी नहीं थी जिसमें इतनी रात को बेटी का फोन करना स्वाभाविक लगे। डा. मजूमदार ने पूछा, “क्या बात है बेटी? तुम ठीक तो हो न?”

‘ठीक हूँ पापा!’ बेटी ने कहा, ‘आप बताइए कैसे हैं? घर में सब लोग ठीक तो हैं न?’ डा. मजूमदार को समझ नहीं आ रहा था कि अकारण इतनी रात को उनकी बेटी घर परिवार की कुशलता के बारे में चिन्तित क्यों हो उठी है? उन्होंने कहा- ‘सब ठीक है बेटी?’ इधर ऐसी कोई बात तो हुई नहीं है कि तुम्हें इतनी रात को परेशान होना पड़े। बताओ क्या बात है? ‘कुछ नहीं पापा’, उनकी लड़की ने कलकत्ता से कहा, ‘दरअसल मैंने अभी-अभी एक बहुत बुरा सपना देखा है इसलिए चिन्ता से आकुल हो उठी। मन में तरह-तरह की कल्पनाएं उठने लगीं। इत्मीनान करने के लिए ट्रंक किया था’ डा. मजूमदार हंसे और अपनी बेटी के बताए कारण पर लाड़ से बोले- ‘‘कोई बात नहीं है बेटी, सब ठीक है। तुम आराम से सो जाओ। अरे पगली सपनों को लेकर कहीं इस कदर परेशान हुआ जाता है।” टेलीफोन कट गया। इसके कुछ ही देर बाद डा. मजूमदार अपना काम खतम कर सोने के लिए बैड-रूम में पहुँचे। कपड़े बदल कर वे पलंग पर लेटे ही थे कि उनकी छाती में तेज दर्द शुरू हुआ और कुछ मिनटों में हृदय गति रुक जाने से उनका देहान्त हो गया। कलकत्ता में मजूमदार की बेटी द्वारा देखा गया सपना एकदम सही उतरा था। उसके द्वारा फोन किये जाने के कोई दो घण्टे बाद ही लखनऊ से उसे फोन पर खबर दी गई कि पापा का अचानक देहान्त हो गया है।

स्वप्नों के माध्यम से भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास कैसे हो जाता है? यह अब वैज्ञानिकों के लिए खोज का विषय बन गया है। इस संबंध में भारतीय मनीषियों की मान्यताएं बहुत स्पष्ट हैं। उनके अनुसार भूत, भविष्य और वर्तमान की घटनाएं सूक्ष्म जगत में पहले से विचरण करती रहती हैं और बहुत बाद तक बनी रहती है। कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो घटनाएं घट रही हैं उनकी पूर्वभूमिका सूक्ष्म जगत में बहुत पहले ही विनिर्मित हो चुकी थी और भविष्य में जो घटनाएं घटने वाली हैं उनकी पृष्ठभूमि वर्तमान में बन चुकी है। भारतीय दर्शन के अनुसार जो व्यक्ति सूक्ष्म जगत से जागृत अवस्था में ही संपर्क करने की क्षमता रखता है वह भूत, वर्तमान और भविष्य की बातों को सरलता से जान सकता है। लेकिन यह क्षमता सभी में नहीं होती। हाँ, स्वप्नावस्था में अवश्य ही लोग सूक्ष्म के अधिक निकट तक पहुँच जाते हैं और बहुतों को भावी का ज्ञान हो जाता है।

भविष्य का पूर्वाभास स्वप्न में प्राप्त करने की एक घटना शास्त्रीजी की मृत्यु के समय रूस में घटी है। इस घटना की चर्चा देश-विदेश के समाचार पत्रों ने भी की थी। सन् 1965-66 में भारत पाक समझौते के समय स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खाँ, रूस के प्रधानमंत्री कोसीगिन की मध्यस्थता में बातचीत करने के लिए ताशकन्द में एकत्र हुए थे। उन दिनों एक भारतीय छात्र उदय कुमार वर्मा ताशकन्द में अध्ययनरत थे। एक दिन उक्त छात्र के पड़ोस में रहने वाली एक सोवियत छात्रा उसके पास आई और बोली, ‘आप हमें आज शास्त्रीजी के दर्शन अवश्य करादें, वरना फिर कभी उनके दर्शन नहीं होंगे।

छात्र अपनी सहपाठी छात्रा के आखिरी शब्दों को सुनकर बहुत हैरान हुआ। उदय कुमार ने पूछा कि ऐसी क्या बात है? तो छात्रा ने कहा कि “मैंने आज रात एक दुःस्वप्न देखा है कि शास्त्रीजी हमारे बीच नहीं रहे हैं। खैर! उदय कुमार ने सोवियत छात्रा को शास्त्रीजी के कार्यक्रम तक पहुँचा दिया और उसकी लालसा पूरी करा दी। उसी रात उदय कुमार ने खुद भी स्वप्न देखा कि शास्त्रीजी को बिदा करने जब वह हवाई अड्डे पर पहुँचता है तो वहाँ खबर लगती है कि शास्त्रीजी का स्वर्गवास हो गया है और लोग उनके शव को विदा करने आए हैं। यह स्वप्न इतना स्पष्ट था कि उदय कुमार की नींद टूट गई और अगले दिन जब वह उसी सोवियत छात्रा से मिले तो उलाहना-सा देते हुए कहा, ‘तुम्हारी बातों का मेरे मन पर इतना बुरा असर पड़ा है कि रात को मैंने भी वैसा ही बुरा स्वप्न देखा है। यह 10 जनवरी 66 की सुबह की बात है और उसी रात को शास्त्रीजी का देहान्त हो गया। 11 जनवरी को प्रातः वह छात्र जब अन्य भारतीय और सोवियत छात्रों के साथ शास्त्रीजी को काबुल प्रस्थान के लिए विदा करने जाने लगे तब यह जानकर स्तब्ध रह गया कि सचमुच शास्त्रीजी का स्वर्गवास हो गया है।

प्रत्यक्ष अनुभवों तथा वैज्ञानिक शोधों के आधार पर अभी तक सपनों की रंगीन और कौतूहलपूर्ण दुनिया के संबंध में जो जानकारी मिल पाई है, वह अत्यन्त रोचक ज्ञानवर्धक और बहुत ही उपयोगी है। उन निष्कर्षों से पता चलता है कि सपने न केवल भविष्यवाणी करते हैं बल्कि ऐसी सच्चाइयों को भी सामने लाते हैं जो प्रायः अविज्ञात ही होती हैं और जिन्हें जानने का कोई सूत्र भी नहीं होता। इस तरह के कई स्वप्न प्रसंगों का विवरण मिलता है जिनमें सपनों के द्वारा मिले संकेतों की मदद से अपराधियों को पकड़ा जा सका और उन्हें दिलाई जा सकी।

इस तरह की घटनाओं में आयरलैंड की एक घटना सर्वाधिक चर्चित है। वहाँ तिपेरारी नगर में रहने वाले एक व्यापारी युवक हिकी ने न्यूफाउलैण्ड से अपने मित्रों को सूचित किया कि वह शीघ्र ही तिपेरारी पहुँच रहा है। हिकी तिपेरारी पहुँच रहा है। हिकी पेरारी से न्यूफाउलैंड व्यापार के सिलसिले में आया था और उसने वहाँ काफी पैसा कमाया था। हिकी ने जिस तारीख को वापस पहुँचने की सूचना दी थी, उस तारीख को वह नहीं पहुँचा। उस तारीख को बीते भी एक सप्ताह बीत गया तो मित्रों ने पुलिस में रिपोर्ट की। पुलिस ने हिकी की खोज बीन शुरू की। इस सिलसिले में रोजर्स नामक एक सराय मालिक के पास पहुँच गया जहाँ हिकी ठहरा था। रोजर्स ने बताया कि हिकी के हुलिये का एक युवक कुछ दिन पहले एक साथी के साथ जलपान के लिए आया था और उसके बहुत रोकने पर भी नहीं रुका था। पुलिस के यह पूछने पर कि वह उन दोनों को क्यों रोकना चाहता था? रोजर्स ने एक विचित्र कारण बताया कि उनके आने के कुछ समय पहले मेरी पत्नी ने स्वप्न में उन दोनों युवकों को जलपान के लिए सराय में आते देखा था और देखा था कि वे दोनों जलपान के बाद चले गये हैं। रास्ते में एक युवक ने दूसरे की हत्या कर दी और उसकी लाश को झाड़ी में छिपा दिया। रोजर्स की पत्नी ने बताया कि मैं वह स्थान बता सकती हूँ जहाँ युवक को छिपाया गया था।

रोजर्स के इस बयान के आधार पर पुलिस ने हिकी के साथी को खोजना आरम्भ कर दिया। कुछ दिन बाद पुलिस ने काउफील्ड नामक उस युवक को एक गिरजाघर में पकड़ा। काउफील्ड वहाँ वेश बदल कर एक पादरी के सहायक के रूप में काम कर रहा था। किसी को भी विश्वास न हुआ कि देखने में इतना भोला-भाला और सीधा लगने वाला लड़का निर्मम हत्यारा भी हो सकता है। अदालत में काउफील्ड ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा- ‘‘कि सराय में रोजर्स की पत्नी को अपनी और घूरते हुये देखकर मैंने हिकी का हत्या करने का इरादा बदल दिया था लेकिन बाद में जैसे ही एकान्त मिला, मुझ पर शैतान सवार हो गया और मैंने उसके ही चाकू से उसका गला काट दिया।” काउफील्ड को इस हत्या के अपराध में फाँसी की सजा मिली।

इस तरह के अनेकों उदाहरण और प्रमाण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य वही नहीं है, जो कुछ वह प्रतीत होता है और उसकी शक्ति वहीं तक सीमित नहीं है जितनी कि वह दिखाई देती है।

प्रश्न उठता है कि मनुष्य की विराट् सत्ता जब अपने को प्रकट करने के लिए आकुल-व्याकुल है तो जिन्हें अतीन्द्रिय स्तर की क्षमताएं अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं उनकी संख्या कुछेक तक ही सीमित क्यों है? क्यों नहीं सभी मनुष्यों में वह प्रकट होती है? इसका कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता, पर इतना सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर के विराट् और महान की झाँकी कभी न कभी मिलती अवश्य है। कई बार बिना किसी आधार या ठोस कारण के हुए बिना भी किये गये पूर्वानुमान आश्चर्यजनक रूप से सही सिद्ध होते हैं। ध्यानपूर्वक अपने अतीत के अनुभवों का विश्लेषण किया जाए तो इस तरह की कुछेक घटनाएं सभी लोगों के जीवन में मिल जायेंगी। होता यही है कि इस तरह के अनुभवों या अनुमानों को सामान्य दिनचर्या का ही अंग मानकर उपेक्षा कर दी जाती है और अपने भीतर की अनन्त सम्भावनाओं का परिचय होते-होते रह जाता है।

भारतीय तत्व चिन्तकों ने प्रत्येक मनुष्य को इस तरह की संभावनाओं से पूरित बताया है। क्योंकि उनकी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति, व्यक्ति ही नहीं प्रत्येक प्राणी परमात्मा का अंश है और उसमें परमात्मा की कल्पित की गई समस्त विशेषताएं बीज रूप में विद्यमान हैं।


विराट् जगत में मनुष्य की हस्ती ही क्या है?

व्यक्ति अपने संबंध में न जाने किन-किन भ्रान्तियों और अतिरंजित मान्यताओं की कल्पना किये रहता है। इस तरह की मान्यताओं और धारणाओं के पीछे अपने आपको सर्वश्रेष्ठ, सबसे सही, सबसे प्रामाणिक और सबसे ऊंचा मानने का मिथ्याभिमान ही है। कोई व्यक्ति अपने संबंध में क्या धारणाएं रखता है और उनके संदर्भ में दूसरों से क्या अपेक्षा रखता है? यही उसे सुखी अथवा दुखी बनाता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपने को सर्वाधिक योग्य समझता है तो स्वाभाविक ही उसकी यह आकाँक्षा रहती है कि दूसरे लोग उसकी योग्यता का लोहा मानें और उसे सम्मान दें। अपनी योग्यता और क्षमता का गुमान अथवा मिथ्याभिमान कुछ अधिक ही अपेक्षाएं करने लगता है और जब वे अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो दुखी, क्लान्त तथा उदास होता है।

इस तरह की मनःस्थिति को बड़े-चढ़े अहं के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता। अहंकार का एक रूप यह भी है कि व्यक्ति परिस्थितियों और संसार के घटना-क्रमों में अपने को केन्द्र मानकर उनकी समीक्षा करता है। कोई घटना या परिस्थिति मन को खिन्न करने वाली है तो यह संसार नर्क, नीच और निकृष्ट है तथा अनुकूल है तो स्वर्ग, श्रेष्ठ और महान है। वस्तुतः ऐसा कुछ नहीं होता। परिस्थितियाँ, जिन्हें प्रवाह कहा जा सकता है और जो अपने ढंग से बनती व बहती हैं किसी व्यक्ति विशेष को दृष्टिगत रखते हुए नहीं चलती। व्यक्ति का अपनी दृष्टि में कितना ही मूल्य क्यों न हो, पर विराट् जगत को देखते हुए उसका अस्तित्व समुद्र में एक बूँद के बराबर भी नहीं है।

इस पृथ्वी पर ही, जिस पर हम निवास करते हैं, हमारे जैसे चार अरब दूसरे लोग भी रहते हैं। मनुष्यों के अतिरिक्त छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़ों से लेकर विशालकाय प्राणियों की संख्या तो गिनी ही नहीं जा सकती। इतने विराट् प्राणी परिवार और उसके असंख्य सदस्यों में एक व्यक्ति या एक घटक का क्या अस्तित्व हो सकता है और क्या महत्व? ऐसा नहीं है कि कोई भी व्यक्ति नितान्त मूल्यहीन और महत्वहीन है। लेकिन अपना मूल्याँकन समग्र जगत को दृष्टिगत रखते हुए करना चाहिए और उसी के अनुरूप परिस्थितियों की समीक्षा करनी चाहिए। यदि इतना किया जा सके तो इस संसार में सुखी रहने के असंख्य आधार हैं।

इस विराट् जगत के नियम और रहस्य समझ पाना अभी तक किसी के लिए सम्भव नहीं। इसलिए उन्हें अपने अनुकूल बनाने या स्वयं को उनके अनुरूप ढालने की बात ही नहीं सोची जा सकती। रास्ता एक ही है कि उपलब्ध परिस्थितियों में संतुष्ट रहा जाय तथा उन्नति के लिए शक्ति भर प्रयास किया जाय। अपने संबंध में बनाई गई धारणाओं और मान्यताओं में कितनी सच्चाई है, यह इस जगत् के विराट् स्वरूप को देखने, समझने के बाद स्पष्ट हो जाना चाहिए। जब इस विराट् जगत के वास्तविक स्वरूप को ही अभी नहीं समझा जा सका तो किस आधार पर उसमें अपना स्थान एवं अस्तित्व अपनी कल्पना के अनुरूप महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। इस विराट् जगत के संबंध में अब तक जो जानकारियाँ प्राप्त की जा सकी हैं, यद्यपि वे पूर्ण नहीं हैं फिर भी वे बहुत चमत्कारी, आश्चर्यजनक और अद्भुत हैं। उदाहरण के लिए जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, वही कम रहस्यों और चमत्कारों से भरी हुई नहीं है।

आदिकाल से मनुष्य पृथ्वी के रहस्यों को जानने के लिए प्रयत्न करता रहा है। उसने अपने इन प्रयत्नों में काफी सफलता भी प्राप्त की है फिर भी समुद्र की अथाह सम्पदा उसकी रहस्यमय गहराइयों के साथ अज्ञात, अगम्य बनी हुई है। समुद्र तो पूरी पृथ्वी के तीन चौथाई हिस्से में फैला हुआ है। एक चौथाई पृथ्वी पर जहाँ आबादी और वृक्ष, वनस्पतियाँ हैं, वही अभी पूरी तरह मनुष्य के जानने में नहीं आई है। पृथ्वी ऊपर से जिस तरह की दिखाई देती है, अन्दर वैसी नहीं है। इसकी ऊपरी परत लगभग 40 मील मोटी है जिसमें मिट्टी, पत्थर, कोयला तथा अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ हैं। इस परत के नीचे भूरस नामक एक तरल परत है, जिस पर ऊपरी परत तैरती रहती है। यह पर्त पिघली हुई गरम चट्टानों की है। स्मरणीय है पृथ्वी आरंभ में सूर्य के समान आग का तपता हुआ गोला थी। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि कालान्तर में यह धीरे-धीरे ठण्डी होती गई और इसकी ऊपरी परत ठोस बनती गई। अभी ऊपरी परत ही जम कर कड़ी हो सकी है जो करीब 40 मील मोटी है। इसके नीचे आज भी गरम पिघली हुई तरल चट्टानें हैं। उससे भी नीचे वाला 700 मील मोटा भाग शिलावरण कहलाता है जिसके नीचे लोहे और पत्थर की मिलीजुली परतें हैं जो लगभग ग्यारह सौ मील मोटी हैं। पृथ्वी के ठीक मध्य में 43 सौ मील मोटा भू-गर्भ है, इसमें अनेक धातुएं पिघली हुई अवस्था में है। अभी इन परतों तक पहुँच पाना मनुष्य के लिए संभव नहीं हो सका है।

पृथ्वी के गोलाकार रूप को चादर की तरह फैलाया जाय तो वह 19 करोड़ 70 लाख वर्गमील स्थान घेरेगी अर्थात् पृथ्वी का क्षेत्रफल 1970 लाख वर्गमील है। इसमें 530 लाख वर्गमील जमीन और 1310 लाख वर्गमील समुद्र है। शेष भाग में झीलें और टापू हैं। पृथ्वी का ध्रुवीय व्यास 79 हजार मील तथा विषुवत् वृत्तीय व्यास 7927 वर्गमील है। इसकी परिधि 25 हजार मील है और वजन 660 खरब करोड़ टन है। अकेले पृथ्वी के संदर्भ में ही मनुष्य अपने अस्तित्व और अस्मिता का मूल्य आँके तो इतनी विशाल पृथ्वी पर उसका अस्तित्व कितना बड़ा सिद्ध हो सकता है? यह तो केवल पृथ्वी की ही बात हुई। पृथ्वी के वायुमण्डल से बाहर निकल कर खोज करने पर सर्वप्रथम चन्द्रमा के दर्शन होते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी से करीब 240 हजार मील दूर स्थित है। इसका व्यास 2160 मील है। यद्यपि वहाँ जीवन का अस्तित्व तो नहीं है फिर भी पृथ्वी पर से दिखाई पड़ने वाले आकाश के विभिन्न तारकों में वह सबसे सुँदर दिखाई देता है।

अपने सौर-मण्डल के, सूर्य परिवार के ज्ञात सदस्यों की संख्या नौ है। पृथ्वी उनमें से एक है। इस तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि हमारी पृथ्वी के समान आकाश में और भी पृथ्वियाँ हैं, जिन्हें ग्रह कहते हैं। इन ग्रहों में बुध सूरज के सबसे पास है और यम सबसे दूर। यम आकार में अन्य सब ग्रहों से छोटा है। बुध और यम दोनों की स्थिति एक दूसरे से सर्वथा उलटी है। बुध सबसे ज्यादा गर्म है तो यम सबसे अधिक छोटा।

पृथ्वी का निकटतम ग्रह शुक्र है। यह हमारी धरती के पड़ौस में कुल 2 करोड़ 60 लाख मील दूर है। इतनी दूरी के बीच में अन्य कोई ग्रह नहीं आता इसलिए उसे ही अपना पड़ौसी ग्रह कहना पड़ेगा। पृथ्वी पर तो एक फर्लांग, एक मील को आठवें भाग की दूरी भी किसी घर को दूरवर्ती और अपरिचित बना देती है, परंतु अनन्त ब्रह्मांड के विस्तार को देखते हुए यह दूरी दो कदम दूर स्थित घर से भी कम कही जायेगी। इस ग्रह का व्यास 7700 मील माना गया है। पृथ्वी से सूर्य की यात्रा करने पर यही ग्रह सबसे समीप पड़ता है। चूँकि यह पृथ्वी की अपेक्षा सूर्य के अधिक निकट है इस कारण वहाँ का वातावरण भी पृथ्वी से गर्म है। इतना गर्म कि पृथ्वी का कोई प्राणी वहाँ जाय तो जल कर भस्म हो जाय। इतनी गर्मी में वहाँ जीवन के अस्तित्व, की कोई सम्भावना नहीं समझी जाती।

मंगल, शुक्र के बाद समीप पड़ने वाला ग्रह है। यह पृथ्वी से सूर्य की उलटी दिशा में यात्रा करने पर आता है अर्थात् मंगल पृथ्वी की अपेक्षा सूर्य से अधिक दूर है। सूर्य से इसकी दूरी 13 से 15 करोड़ मील है। यह पृथ्वी की अपेक्षा काफी ठण्डा है। इसका व्यास करीब 4225 मील है। अपने सौर परिवार में यदि सबसे बड़ा और वजनदार सदस्य है तो वह है- बृहस्पति। यह शेष आठों ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक भारी है। पृथ्वी से यह करीब 325 गुना वजनदार है तथा व्यास करीब ग्यारह गुना। इस ग्रह के चार उपग्रह हैं या कहा जा सकता है कि बृहस्पति के आकाश में चार चन्द्रमा उगते और चमकते हैं।

शनि सूर्य से 88 करोड़ 64 लाख मील दूर है करीब 29 वर्षों में सूर्य का एक चक्कर करता है। सुँदरता की दृष्टि से इसे सौर परिवार का सर्वाधिक सुँदर ग्रह कहा जा सकता है। शनि के बाद वारुणि अथवा यूरेनस आता है जो सूर्य से 178 करोड़ मील दूर स्थित है। इसका व्यास 32 हजार मील है। डेढ़ सौ वर्ष पहले तक तो वैज्ञानिकों को इसका अता-पता ही नहीं था। यह सूर्य की परिक्रमा 84 वर्षों में करता है। कहा जा सकता है कि वहाँ का एक वर्ष पृथ्वी के 84 वर्षों के बराबर होता है। यदि मनुष्य की आयु वारुणि के समयमान से समझना चाहें तो वारुणि पर रहने की दशा में आदमी जन्म लेने के वर्ष भर बाद ही बूढ़ा होकर मर जाता है। इस ग्रह के पाँच चन्द्रमा हैं। वारुणि के बाद वैज्ञानिकों को वरुण ग्रह दिखाई दिया जो सूर्य से 279 करोड़ मील दूर है। वहाँ यदि मनुष्य को जीना पड़े तो शायद छह महीने में ही वह बूढ़ा होकर मर जाय, क्योंकि पृथ्वी के मान से वह 165 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा लगाता है अर्थात् पृथ्वी के 165 वर्ष बराबर होते हैं वरुण के एक वर्ष के। वरुण के बाद अंतिम ज्ञात ग्रह वरुण है, जिसका पता सन् 1931 में लगा। अनुमानतः इसका व्यास 4000 मील है और यह तीन सौ वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करता है।

ऐसा नहीं है कि अपने इस सौर परिवार के केवल 9 सदस्य ही हों, हो सकता है और भी कोई ग्रह हों जिनका अभी तक पता नहीं चला हो। लेकिन यदि ग्रहों की संख्या मात्र नौ ही मानी जाय तो भी सूर्य के कुनबे में ग्रहों के अलावा अनेकानेक धूमकेतु हैं। जो ग्रहों के साथ-साथ में धूमकेतु भी सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। इन धूमकेतुओं में से कुछ तो पाँच वर्ष में ही सूर्य की परिक्रमा कर लेते हैं और कुछ को सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं। इन पुच्छल तारों के अलावा अन्तरिक्ष में कई छोटी-छोटी उल्काएं भी घूमती रहती हैं। कई बार ये उल्काएं किसी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आ जाती हैं और उनके धरातल पर जा गिरती हैं। इसे उल्कापात कहते हैं।

यह विराट् जगत, ब्रह्मांड इतना विस्तृत है कि इसके दो घटकों के बीच की दूरी नाप पाना सरल काम नहीं है, क्योंकि विभिन्न ग्रहों या सितारों के बीच इतनी दूरी होती है कि उसे संख्या में व्यक्त कर पाना अति दुष्कर है। इसलिए अन्तरिक्ष में दूरी मापने के लिए सरल तरीका अपनाया गया है और वह है प्रकाश वर्ष। प्रकाश एक सेकेंड 186 हजार मील चलता है। एक वर्ष में इस गति से प्रकाश जितनी दूरी तय करता है उस दूरी को एक प्रकाश वर्ष कहते हैं। दूसरे शब्दों में एक प्रकाश वर्ष करीब 5880 अरब मील के बराबर होता है। कोई ग्रह या तारा इतनी दूर पर स्थित है तो उसकी दूरी व्यक्त करने के लिए कहा जायेगा कि वह पृथ्वी से एक प्रकाश वर्ष दूर है।

ऐसा भी नहीं है कि आकाश में दिखाई देने वाले सभी तारे दो-चार या दस-पाँच प्रकाश वर्ष दूर हों। इनमें से कई तो सैकड़ों, हजारों और लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं। बहुत से तारे तो लाखों वर्ष पूर्व नष्ट हो चुके पर उनका प्रकाश अभी भी पृथ्वी पर दिखाई देता है।

अब अनुमान लगाया जा सकता है कि ब्रह्मांड कितना विराट् और विस्तृत है? अपना यह सौर मण्डल आकाश गंगा का एक नगण्य-सा घटक है। अपनी इस आकाश गंगा में लगभग एक खरब सूर्य हैं, जिनके पृथ्वी जैसे असंख्य ग्रह और उपग्रह इन सूर्यों अथवा तारों में से कई तो अपने सूर्य से अनेक गुना बड़े हैं। उदाहरण के लिए व्याध तारा सूर्य से 21 गुना बड़ा है। ज्येष्ठा नामक तारे में अपनी पृथ्वी के बराबर 700 खरब पृथ्वियाँ समा सकती हैं।

यह ब्रह्मांड कितना बड़ा और कितना फैला हुआ है? इसका ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यह सच है कि सारा ब्रह्मांड एक निश्चित नियम के अनुसार चला रहा है। उसके क्रिया−व्यापार की अपनी मर्यादाएं हैं। उन मर्यादाओं के आगे, उस विराट् के आगे मनुष्य की क्या बिसात? वह तो हाथी के सामने चींटी के बराबर की हस्ती भी नहीं रखता। स्थूल अर्थों में यही सच है कि मनुष्य इस सृष्टि का नगण्य, नगण्य भी नहीं, न कुछ हस्ती वाला घटक है। उसके अहं का आधार मिथ्या ही नहीं अपने आपके साथ प्रवंचनापूर्ण भी है।


आदर्शों की पराकाष्ठा भारतीय संस्कृति का गौरव

आदर्शवादिता की बातें करना और व्यवहार में उन आदर्शों से ठीक विपरीत आचरण करना जितना निन्द्य और गर्हित है सम्भवतः उतना बुरा अनैतिक कर्मों में प्रवृत्त होना भी नहीं है। क्योंकि इस प्रकार का आचरण अनीतिपूर्ण तो होता ही है, उनसे सिद्धाँतों की बातें कह कर उसे ढकने दबाने की एक और अनैतिकता स्वभाव में समाविष्ट हो जाती है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, ‘तुम आदर्शों की बात करो और उन्हें अपने अव्यवहार में न उतारो तो तुमसे चोर, डाकू और लुटेरे अच्छे, जिनमें कम से कम कथनी और करनी का अंतर तो नहीं होता।’

दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रवंचनापूर्ण स्थिति बहुत सघनता के साथ पाई जाती है। उदाहरण के लिए दहेज को ही लिया जाए। प्रत्येक व्यक्ति दहेज प्रथा की बुराइयां गिनाते नहीं थकता, और पानी पी पीकर इस कुरीति को कोसता है। इस विषय पर किसी से भी अपने विचार व्यक्त करने के लिए कहा जाए वह इसका अंत अनिवार्य रूपेण चाहता प्रतीत होता है। लेकिन अधिकाँश व्यक्ति जब अवसर आता है तब मजबूरी के नाम पराये, घर के, अन्य किन्हीं संबंधियों का दबाव बताकर अपने लिए बचाव का रास्ता खोज लेते हैं और दहेज के लिए मुँह फाड़ने लगते हैं। इस दोहरी रीति-नीति को जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में भी स्पष्टतया देखा जा सकता है। ईमानदारी, परिश्रम, लगन, दायित्वनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, उदारता आदि गुणों या आदर्शों की हर कोई सराहना करता है तथा उनका पालन आवश्यक बताता है किन्तु जब बात उनके पालन पर आती है तो लोग बगलें झाँकने लगते हैं।

आदर्शों के प्रति यह दोहरी और दोगली दृष्टि न हमारी संस्कृति का अंग रही है और न ही संस्कृति के प्रणेताओं में कहीं इस तरह का छल देखने में आया है। बल्कि इस तरह के हजारों उदाहरण हमारे साँस्कृतिक इतिहास में भरे पड़े है जिनमें लोगों ने आदर्शवादिता का पराकाष्ठा के स्तर पर, पालन किया। आदर्शों के लिए हमारे मनीषियों ने एक अनूठा शब्द खोजा है- जीवन मूल्य। आदर्शों को जीवन मूल्य कहा गया है- अर्थात् जीवन का मूल्य देकर भी जिन पर दृढ़ रहा जाना चाहिए। मनुष्य को सबसे बढ़कर जीवन ही प्रिय है। संसार की समस्त सम्पदाओं की तुलना में वह जीवन को ही प्रधानता देता है। मनीषियों ने जीवन के ऊपर भी आदर्शों को प्रधानता दी है। यह विस्मय विमुग्ध कर देने वाली बात है कि जिस जीवन की तुलना में सब कुछ तुच्छ है, वह जीवन आदर्शों के लिए बलि चढ़ाना श्लाघनीय समझा गया है।

आदर्शों की यह पराकाष्ठा ही हमारी संस्कृति की विशेषता रही है। भारतीय संस्कृति के इतिहास का पन्ना-पन्ना इस प्रकार के उदाहरणों से भरा पड़ा है। जिन लोगों ने इन आदर्शों के लिए अपने जीवन को भी दाँव पर चढ़ा दिया उन्हें मनीषियों ने अवतार कहकर संबोधित किया एवं सराहा और पूजा है। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए भगवान राम द्वारा राजमहल में उपलब्ध होने वाली सुविधाओं का त्याग कर जंगल में वनवासी बनकर रहने लगे का उदाहरण विख्यात है। लक्ष्मण ने अपने भाई के प्रति कर्तव्य-पालन के लिए तमाम सुख सुविधाओं को छोड़ दिया। भ्रातृ प्रेम का इतना अनूठा उदाहरण संसार के किन्हीं अन्य देशों में मिलना दुर्लभ है। भरत द्वारा राज्य को धरोहर मानकर सम्हालने तथा स्वयं तापस वेशधारण कर जीवन व्यतीत करने का उदाहरण भी अपने ही जातीय इतिहास में मिलता है।

सत्य के लिए अपना सारा जीवन, राजपाट आदि सब सुख सुविधाएं छोड़कर श्मशान में बिक जाने का हरिश्चन्द्र जैसा उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। महारथी कर्ण और राजा बलि द्वारा दान धर्म की पराकाष्ठा को स्पर्श कर लेने का गौरवपूर्ण अध्याय भी अपने ही इतिहास में जुड़ा हुआ है। कर्ण जानते थे कि कवच-कुण्डल देने से वे मर सकते हैं, उनके लिए जीवन संकट उपस्थित हो सकता है, परन्तु इन्द्र जब उनके सामने याचक बनकर उपस्थित होते हैं, और इन्द्र ही क्यों कोई भी क्यों न हो? उनके लिए न करते नहीं बनता। कर्ण के पिता सूर्य जब इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करते हुए अपने पुत्र को सचेत करने और व्यवहारिक बनने का उपदेश देते हैं तो कर्ण यही कहते हैं कि मैं व्यवहारिकता का ही निर्वाह कर रहा हूँ। थोड़ी चीज देकर अधिक प्राप्त करना लाभदायक सौदा ही कहा जायेगा। यह नश्वर शरीर तो एक न एक दिन नष्ट होना ही है। आज होना है या कल होना है इससे क्या अंतर पड़ता है। मैं इसके बदले अमर कीर्ति प्राप्त कर रहा हूँ तो इसमें घाटे की क्या बात है?

नियम और अनुशासन की मर्यादा तोड़ने पर राजा हंसध्वज ने अपने पुत्र को भी दण्डित करने से नहीं बख्शा। जब देश रक्षा के लिए हर युवक को युद्ध में जाने का निर्देश दिया और सभी युवा व्यक्ति रणांगण में पहुँच गये तो उन्हें पता चला कि राजकुमार सुधन्वा इस अनुशासन मर्यादा का उल्लंघन कर अपनी नवविवाहित पत्नी के साथ प्रणय-लीला में उलझे हुए हैं। राजपुत्र होने के साथ-साथ सुधन्वा नव-विवाहित भी थे। हंसध्वज चाहते तो पुत्र को क्षमा कर सकते थे, परन्तु कर्तव्य सो कर्तव्य। नियम सो नियम। राजाज्ञा का उल्लंघन करने वालों को जो दण्ड दिया जाना घोषित किया गया था, वही दण्ड उन्होंने अपने पुत्र को भी दिया। अनुशासन तोड़ने वालों के लिए गरम तेल में डाल देने का दण्ड निर्धारित था, सो सुधन्वा को भी यही दण्ड दिया गया।

शरणागत की रक्षा करना भारतीय धर्म और संस्कृति का गौरव रहा है और इस गौरव को इतिहास पुरुषों ने बड़े से बड़ा त्याग कर भी स्थापित किया है। राजा शिवि ने अपनी शरण में आये पक्षी की रक्षा के लिए उसका शिकार कर रहे बाज को अपनी जाँघ का माँस खिला कर अद्भुत शरणागत वत्सलता के साथ-साथ उदार साहसिकता का भी परिचय दिया। मयूरध्वज ने अपने पुत्र का माँस खिला कर अभ्यागत की इच्छा पूरी की। इस तरह के प्रसंगों में वैचित्र्य के साथ-साथ अस्वाभाविकता भी है, परंतु जिन्होंने मृत्यु के आरपार देखा है उनके लिए इनमें कुछ भी विचित्र या अस्वाभाविक नहीं है। आदर्शों की पराकाष्ठा तक पहुँचने के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वह व्यवहारिक है। जब जीवन क्षण भंगुर है और एक न एक दिन मर ही जाना है, शरीर को मिटना ही है तो क्यों न आदर्शों के लिए मरा जाए? नियतिगत या स्वाभाविक मृत्यु की अपेक्षा किसी सिद्धाँत के लिए, आदर्श के लिए मरना अधिक स्तुत्य है।

मृत्यु का रहस्य समझने वालों के लिए उत्सर्ग उसी प्रकार है जिस प्रकार सामान्य व्यक्ति लाखों रुपयों का पुरस्कार प्राप्त करने की आशा में एक दो रुपये का लॉटरी टिकट खरीद लेता है। लाटरी के टिकट खरीदने पर लखपति बनने की सम्भावना तो फिर भी नगण्य सी रहती है, किन्तु आदर्शों के लिए उत्सर्ग करने वाला व्यक्ति अपने प्राप्तव्य के संबंध में शत प्रतिशत निश्चिन्त रह सकता है। जिन लोगों ने आदर्शों के लिए उत्सर्ग किया उनकी दृष्टि में यद्यपि मरने के बाद किसी प्रकार का श्रेय कामना नहीं रही, फिर भी उनके लिए श्रेय सुरक्षित है। श्रेय नहीं भी मिले तो भी किसी उद्देश्य के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाली बात से मिला आत्मसंतोष कहीं नहीं जाता।

आदर्शों की पराकाष्ठा अपनी संस्कृति की धरोहर है। यदि इस पराकाष्ठा पर नहीं पहुँचा जा सके तो भी कम से कम कथनी और करनी में साम्य तो रखा ही जा सकता है। हम भी इसी ऋषि परम्परा के अनुगामी हैं, उन नर वीरों की संतानें हैं, यह ध्यान में रखते हुए आदर्शों की प्रवंचना से तो बचा ही जाना चाहिए। इस छलना से बचकर ही अपनी संस्कृति के प्रति गौरवभाव जागृत और जीवन्त रखा जा सकता है।


बुद्धि की प्रखरता ही नहीं, भावनाओं की उदात्तता भी

आप्त वचन एवं धर्म ग्रन्थ मनुष्य को श्रेष्ठ अथवा धार्मिक नहीं बना सकते। वे मात्र श्रेष्ठ विचार करने का आधार प्रस्तुत कर सकते हैं। विचारों को दिशा देने में उनके महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। बुद्धि की प्रखरता प्रतिभा के विकास एवं भौतिक प्रगति में योगदान देती है। वह तर्क कर सकती है। भौतिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकती है, किन्तु वह आधार नहीं दे सकती है, जिसको अपनाकर मनुष्य मानवोचित्त गुणों से संपन्न होगा। श्रेष्ठता को अपना सकना तथा महानता के पथ पर बढ़ चलना जिसके द्वारा संभव हो पाता है वह है- भावभरा उदात्त चिन्तन। जो अन्तरंग के आस्था क्षेत्र में उत्पन्न होता है। महानता की और बढ़ने का साहस जुटा सकना तो उदात्त भावनाओं द्वारा संभव है।

बुद्धि की अपनी उपयोगिता है। मनुष्य की योग्यता, प्रतिभा विकसित होती है। भौतिक प्रगति के आधार प्रस्तुत होता है। अब तक के विकासक्रम में भौतिक समृद्धि ने असाधारण भूमिका निभाई है। इस तथ्य के साथ एक सत्य यह भी जुड़ा है कि बुद्धि ने यदि विकास का मार्ग प्रशस्त किया है तो भावनाओं ने उस विकास के अस्तित्व को कायम रखा है। यदि मनुष्य सम्वेदन शून्य रहता तो आज की विकसित सभ्यता कभी की लुप्त हो गई होती। आन्तरिक भाव-सम्वेदनाओं ने ही मानव जाति को एकता के सूत्र में बाँधा है। परस्पर सहयोग करना सिखाया। एक-दूसरे के दुख दर्द में हिस्सा बंटाने एवं सहयोग के लिए प्रेरणा दी, मानव-मानव के बीच, प्राणिमात्र के बीच जो एकता एवं सहयोग की प्रवृत्ति दिखायी पड़ती है उसका कारण उदात्त भाव सम्वेदना का अस्तित्व ही है।

यही वह अवलम्बन है जिसके द्वारा सम्पूर्ण संसार को एकता के सूत्र में बाँधा जा सकता है। मनुष्य को शालीनता अपनाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। इसके अभाव में तो बुद्धि संकीर्ण, स्वार्थी बनकर अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती तथा सामाजिक जीवन के विग्रहों का कारण बनती है। हृदय की विशालता के साथ जुड़कर ही बुद्धि की प्रखरता व्यक्तिगत उत्थान एवं सामाजिक विकास का कारण बन सकती है। एकाँगी बुद्धि कितनी भी प्रखर क्यों न हो भावनाओं के अभाव में अन्ततः समस्याओं को ही जन्म देगी। अन्तःकरण की महानता के मर्म को जानते हुए ही संसार के सभी धर्म सम्प्रदाय, धर्मशास्त्र हृदय की पवित्रता पर जोर देते हैं। उपासना साधना का विशाल कलेवर अन्तरंग को ही परिष्कृत करने तथा सम्वेदनाओं को विकसित करने के लिए खड़ा किया गया है।

महानता के पथ पर अग्रसर होकर समाज के लिए मानव जाति के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकना अन्तःकरण की विशालता द्वारा ही सम्भव बन पाता है। महापुरुष, सन्त-महात्मा अन्तरंग की इस महानता के कारण ही समाज के लिए कुछ कर सकने में समर्थ हो सके हैं। उनकी भावनाएं मानव मात्र के हृदय के साथ जुड़कर ही उनके साथ एकाकार बन सकीं। वे ही दुख क्लेशों को अनुभव कर सकीं। उनकी यह अनुभूति ही ठोस रचनात्मक कार्य करने की आधारशिला बनी। मनुष्य के अन्तरंग में प्रवेश कर उनकी आस्थाओं को छू सकना तथा गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन करने के लिए बाध्य कर सकना विशाल अन्तःकरण द्वारा ही सम्भव है। बुद्धि की पहुँच विचारों तक है। क्षणिक प्रभाव उत्पन्न करने तथा वैचारिक स्तर पर गुत्थियों का समाधान प्रस्तुत करने का आधार तो विचार ही हो सकते हैं किन्तु जिनसे मनुष्य श्रेष्ठता अपनाता तथा अपनी गतिविधियों को महानता की ओर मोड़ सकने में समर्थ होता है, वह बुद्धि से नहीं बन पड़ता है। यह तो उदात्त भावनाओं द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

देखा यह गया है कि उपयोगी विचार तथा अन्यान्य उपचार भी मनुष्य को बदल सकने में समर्थ नहीं हो सके हैं, जबकि भाव-सम्पन्न व्यक्तियों ने अपने अन्तरंग की महानता के कारण अत्याचारी, दुर्गुणी पातकी व्यक्तियों को न केवल प्रभावित किया वरन् उनके क्रिया कलाप में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। अंगुलिमाल, रत्नाकर का हृदय परिवर्तन सर्वविदित है। उनमें विचारों का नहीं भावनाओं की शक्ति ही प्रधान थी। ढूंढ़ा जाय तो इतिहास में ऐसे असंख्यों उदाहरण मिल जायेंगे, जिनमें अनेकों व्यक्तियों ने महामानवों के सान्निध्य में आकर अपने में परिवर्तन किया। यह उनके परिष्कृत अन्तःकरण का ही प्रभाव था। जिसके प्रभाव क्षेत्र में आकर अत्याचारी, दुराचारी भी संत महात्मा बनते गये। मनुष्य को मानवोचित्त गुणों से सुसज्जित करने तथा परस्पर एक-दूसरे के प्रति स्नेह-सौहार्द बनाये रखने में कोई भी विचार पद्धति इतनी उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकती। सम्वेदनाओं द्वारा ही मनुष्य को उभारा जा सकता है जिससे वह श्रेष्ठता अपनाकर सही अर्थों में मानव बन सके।

संसार भर में प्रचलित सभी आध्यात्मिक साधनाओं का एक मात्र लक्ष्य है- हृदय को पवित्र बनाना। धर्म-ग्रन्थों का एकमात्र उद्बोधन है- जीवन को उत्कृष्ट करना। यह महानता हृदय की विशालता द्वारा ही सम्भव है। “बाइबिल’ में वर्णन है धन्य हैं वे लोग जिनके हृदय पवित्र हैं क्योंकि परमात्मा को पाने के सच्चे अधिकारी वही हैं।’’

बुद्धि की प्रखरता के साथ एक दुर्बलता यह जुड़ी है कि वह तात्कालिक लाभ देखती तथा महानता, श्रेष्ठता के कष्टमय जीवन को अपनाने से रोकती है। तर्क से परे होकर महानता की और बढ़ सकना तो अन्तःकरण की महानता द्वारा ही सम्भव है। पवित्र अन्तःकरण ईश्वरीय सत्ता को प्रतिबिम्बित करने का सर्वश्रेष्ठ दर्पण है। परमात्मा का प्रकाश उसी में अवतरित होता है। उस प्रकाश के कारण ही संसार के सत्यासत्य को देख सकना तथा अनुभव कर सकना सम्भव हो सकता है।

बुद्धि जीवनयापन के लिए साधन एकत्रित कर सकती है, गुत्थियों को सुलझा सकती है, किन्तु जीवन की उच्चतम भूमिका में नहीं पहुंचा सकती। चेतना की उच्चस्तरीय परतों तक पहुँच सकना तो हृदय की महानता द्वारा ही सम्भव है। बुद्धि प्रधान किन्तु हृदय शून्य व्यक्ति भौतिक जीवन में कितना भी सफल क्यों न हो किंतु भाव सागर की चेतन परतों तक पहुँच सकने में वह असमर्थ होता है। जबकि बुद्धि में अल्प किन्तु भाव-प्रधान व्यक्ति अपनी इस विशेषता के कारण ईश्वरीय सान्निध्य एवं उससे मिलने वाले दिव्य-लाभों का अधिकारी बन जाता है। संत महामानवों के जीवन चरित्र इस बात के साक्षी हैं। अपनी भाव-सम्पदा को पत्थरों में आरोपित करके उनमें भगवान को अवतरित करने के लिए बाध्य किया। उत्कृष्ट भाव श्रद्धा ही भगवान को भी भक्त के पास आने के लिए बाध्य करती है। भगवान भक्त के आधीन होते हैं- इस उक्ति में भावनाओं की शक्ति का रहस्य ही छिपा है, भगवान के स्वभाव का नहीं।

जो शक्ति भगवान को प्रभावित कर सहयोग करने के लिए बाध्य कर सकती है। वह मानव मात्र को भी प्रभावित कर सकती है। मानवता को एक सूत्र में बाँध सकती है। पिछले दिनों भूल यह हुई कि हृदय की महानता को उभारने के स्थान पर बुद्धि को प्रखर बनाने में अधिक जोर दिया गया। बुद्धि की प्रखरता की उपयोगिता सही दिशा में तभी सम्भव हो सकती है जबकि उसके साथ हृदय की विशालता जुड़ी हो। किन्तु ऐसा नहीं हो सका। प्रयत्न बुद्धि को प्रखर बनाने के लिए ही हुआ। उसमें सफलता भी मिली। फलस्वरूप भौतिक उपलब्धियाँ भी प्राप्त हुई।

बुद्धि के एकाँगी विकास से बौद्धिक परिकल्पनाओं की प्राप्ति भले ही हो जाय, मनुष्य को महान् बना सकना सम्भव नहीं है। बुद्धि की प्रखरता के साथ हृदय की महानता को विकसित करने के लिए भी प्रयत्न करना होगा। तभी मनुष्य मानवोचित्त गुणों से सम्पन्न बनकर व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के लिए सही अर्थों में उपयोगी बन सकता है। अन्तरंग की महानता ही मनुष्य की गरिमा को चिरस्थायी बनाये रखने रख सकती है।


इच्छित नींद अपने निजी प्रयत्न से

‘साइकोलॉजी टूडे’ में एम॰ मिटलेर ने एक निद्रा के रोगी की घटना प्रकाशित की थी। उस व्यक्ति ने ऐसी धारणा बना रखी थी कि लेटने के 1 घण्टे बाद उसको नींद आती है और वह 5 घंटे से भी कम सो पाता है। इसके कारण वह दिन भर थकान अनुभव करता था। जब ई.ई.जी. द्वारा उसकी जाँच की गई तो यह पाया गया कि बिस्तर पर लेटने के 10 मिनट बाद ही सो जाता और सात घण्टे से कुछ अधिक ही सोया रहता। उसके तनाव और चिन्ता एवं भ्रम दूर कर देने भर से उसका मिथ्या रोग दूर हो गया। वह वास्तव में कम नींद का रोगी न था। उसने स्वयं ही ऐसा सोच रखा था कि उसे कम नींद आती है।

सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग 75 प्रतिशत से अधिक लोग नींद संबंधी शिकायतों को लेकर डाक्टरों के पास पहुँचते हैं। लोग स्वाभाविक निद्रा को भूलते जा रहे हैं, नशीली दवाइयों गोलियों के सहारे सोने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार की दवाइयां संसार में प्रति वर्ष लाखों टन बनती हैं। मनुष्य जब नींद की दवा का आदी हो जाता है तो दवा का प्रभाव भी कम हो जाता है। वह तनावों से ग्रस्त हो जाता है। विश्राम न मिल पाने से तनाव की स्थिति में विषाक्त पदार्थ एवं हारमोन्स उत्पन्न हो जाते हैं। फलतः मनुष्य को अनिद्रा रोग का सामना करना पड़ता है।

निद्रा संबंधी रोग प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-

(1) इन्सोमेनिया- इस प्रकार के रोग में व्यक्ति को कुछ नींद तो आती है, परन्तु उसे अल्पकालीन निद्रा का पता नहीं रहता।

(2) डायसोमेनिया- नींद की अवस्था में दाँत किट-किटाना, बड़बड़ाना, चल पड़ना, चीखना, पेशाब कर देना आदि इस रोग के लक्षण हैं इसका कारण ‘रैपिड आई मूवमेन्ट’ की अनुपस्थिति बताया जाता है।

(3) नार्कोलेप्सी- इसमें अत्यधिक नींद आती है अथवा नींद का दौरा पड़ता है।

नींद संबंधी अधिकतर रोग मनोशारीरिक होते हैं। निरन्तर मानसिक तनाव एवं अशाँति के परिणाम स्वरूप अनिद्रा रोग की उत्पत्ति होती है। अधिकाँश रोगियों का मात्र भ्रम होता है कि उन्हें नींद नहीं आती और थका-थका अनुभव करते हैं। इसे ही अनिद्रा भ्रम कहा जाता है।

शरीर विज्ञानियों का कथन है कि स्वस्थ रहने के लिए विश्राम का एक महत्वपूर्ण माध्यम है निद्रा। प्रत्येक व्यक्ति को नींद की आवश्यकता अलग-अलग होती है। कई व्यक्ति तीन-चार घण्टे की नींद में ही पूर्ण विश्राम ले लेते हैं। बहुत से लोग आठ-दस घण्टे सोने पर भी पर्याप्त विश्राम नहीं ले पाते। निद्रा का समय व्यक्ति विशेष को अपनी आवश्यकतानुसार दिनचर्या में समाविष्ट करना चाहिए। प्रातःकाल सूर्योदय से दो-तीन घण्टे पूर्व तक निद्रा पूरी हो जाय, समय का निर्धारण इस प्रकार किया जाय। प्रातः जल्दी उठना और रात्रि को जल्दी सो जाना उत्तम स्वास्थ्य एवं स्वस्थ मस्तिष्क के लिए सर्वोत्तम माना गया है। महापुरुष, विचारक, लेखक मनीषी और योगी प्रातः तीन-चार बजे उठ जाते हैं और पूरे दिन स्फूर्तिवान, प्रसन्नचित्त एवं सक्रिय रहते हैं। सूर्योदय से दो-तीन घण्टे पूर्व का समय ब्रह्ममुहूर्त कहा गया है। यह समय आध्यात्मिक साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ होता है। अन्तरिक्षीय ब्रह्मांड की आध्यात्मिक एवं वैचारिक शक्तियाँ पृथ्वी के निवासियों को इस समय विशिष्ट अनुदान देती हैं। हिमालय के योगी अपनी श्रेष्ठ एवं सशक्त विचार और प्राणशक्ति को जन-कल्याण के लिये सम्प्रेषित करते हैं। ब्रह्ममुहूर्त के समय को सात्विक भाव विचार एवं कर्मों में एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि आलस्य प्रमाद वश प्रातः जल्दी न उठा गया तो फिर बाद में तो और भी सुस्ती-उदासी आती है। दिव्य प्राणशक्ति प्रवाह के तुरन्त पश्चात् तमस् आता है। यह एक आध्यात्मिक तथ्य है।

निद्रा की एक विशेष अवस्था में शरीर को सबसे अधिक विश्राम मिलता है। वह पूर्णतः निष्क्रिय सा रहता है। माँसपेशियाँ पूरी शिथिल हो जाती हैं। इस अवस्था को वैज्ञानिक भाषा में ‘रैपिड आई मूवमेन्ट’ कहते हैं। इस स्थिति में ई. ई. जी. द्वारा मस्तिष्कीय तरंगों का अंकन जाग्रत अवस्था की तरह होता है। योगनिद्रा के अभ्यास से ऐसी अवस्था से प्राप्त कर पूर्ण विश्राम का लाभ हर व्यक्ति उठा सकता है। योगनिद्रा के अभ्यास से तनाव से उत्पन्न प्राण संबंधी असंतुलन दूर होता है। अंतःस्रावी ग्रन्थियों में संतुलन होता है परिणामस्वरूप मानसिक विश्राम मिलता है।

सूर्योदय के समय के आसपास पीनियल ग्लैन्ड से सेरॉटानिन नामक हारमोन का स्राव सर्वाधिक मात्रा में होता है। दिवास्वप्न का कारण इस स्राव को ही माना जाता है। सेरॉटानिन से संबंधित एक अन्य मेलॉटानिन नामक हारमोन भी पीनियल ग्रन्थि से स्रवित होता है। यह हारमोन काम प्रवृत्तियों के नियंत्रण का काम करता है। यह देखा गया है कि मेलॉटानिन हारमोन सुबह लगभग चार बजे तक तो काम शक्ति का नियंत्रण रखता है बाद में दैनिक कार्यों को करने के लिए प्राणशक्ति को प्रवाहित होने देता है। रात में पीनियल ग्रन्थि की विशेष सक्रियता से पिट्यूटरी ग्रन्थि से ‘एड्रिनो कॉर्टिको ट्राफिक’ हारमोन संदेशवाहक की तरह एड्रीनल ग्रन्थि को उत्तेजित करता है। उस समय एड्रीनल से ‘कार्टिकोस्टेरॉइड’ हारमोन स्रवित होकर पूरे शरीर को शक्ति से भर देता है। उद्वेगों का प्रभाव शांत हो जाता है। एड्रीनल से ‘कार्टिकोस्टेरॉइड’ का स्राव प्रातः चार बजे के लगभग सबसे अधिक तीव्रता से होता है। अध्यात्मवेत्ता ऋषियों ने, सूक्ष्मदर्शियों ने इसी कारण प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से पूर्ण स्फूर्ति के साथ दिनचर्या प्रारम्भ करने का नियम बनाया। जीवनचर्या को सन्तुलित बनाने के लिए, मानसिक, आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रातः ब्रह्ममुहूर्त की उपासना साधना सर्वोत्तम मानी गयी है।

औषधि विज्ञान शारीरिक व मानसिक तनाव से मुक्ति पाने हेतु जहाँ औषधियों का उपयोग बताता है यहीं पर मनोविज्ञान के चिकित्सक एक प्रकार के शिथिलीकरण के रूप में ‘आटोजेनिक न्यूट्रलाइजेशन’ अथवा ‘सिस्टेमेटिक डिजेन्सीटीजेशन’ पद्धति इनमें मरीज को विश्राम की दशा में धीरे-धीरे अपनी गलतियाँ व अपराध मानसिक रूप से स्वीकार करने को कहा जाता है। भयभीत वातावरण का भी दृश्यावलोकन मानसिक चिन्तन के रूप में कराया जाता है। यह सभी एक प्रकार की शिथिलीकरण प्रक्रिया ही है। योगाभ्यासों में जो शिथिलीकरण का अभ्यास कराया जाता है उसका मूल उद्देश्य शारीरिक व मानसिक तथा भावनात्मक तनावों से मुक्ति पाना ही है। शिथिलीकरण द्वारा रक्तचाप व हाइयोथेल्मस जैसी नर्वस सिस्टम की क्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया जाता है। इसी प्रकार हृदय रोगी का एक बार इलाज करने के उपरांत पुनः दौरा न पड़े इससे बचने के लिए शिथिलीकरण बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है। डाक्टरों द्वारा आटोजेनिक प्रशिक्षण भी इसी लाभ के लिए दिया जाता है यह भी एक प्रकार का योगाभ्यास ही है। हृदय रोग का मुख्य कारण मानसिक तनाव व चिन्ताएं हैं जबकि इन तनावों की मुक्ति का मार्ग शिथिलीकरण है।

शारीरिक शिथिलीकरण से माँसपेशियों का तनाव दूर होता है। जिससे उसकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति सुबह से शाम तक बिना विश्राम किए लगातार काम करता रहे तो प्रतीत तो ऐसा होगा कि वह कार्य पूरा कर रहा है, किन्तु यदि उसकी कार्य क्षमता को आँका जाय तो वह घटती ही प्रतीत होगी। इसके विपरीत यदि वही व्यक्ति मध्याह्न काल में विश्राम लेकर कार्य करना पुनः शुरू करे तो नई ताजगी के साथ वह पहले की अपेक्षा ज्यादा कार्य कर सकेगा। योग शास्त्रानुसार शिथिलीकरण अथवा योगनिद्रा के द्वारा प्राणशक्ति का संचय होता है। शिथिलीकरण द्वारा एडिनोसिन ट्राइफास्फेट (ए.टी.पी.) को शक्ति प्राप्त होती है। इसी ए.टी.पी. को हम प्राण शक्ति कह सकते हैं। शिथिलीकरण का ए.टी.पी पर प्रभाव जैव रसायन विज्ञानी भी मानते हैं।

ई.ई.जी. द्वारा परीक्षण करने पर पाया गया कि शिथिलीकरण की दशा में अल्फा तरंगों का प्रभाव बढ़ जाता है जब कि तनावपूर्ण स्थिति में वीटा तरंगों की बहुतायत होती है। अस्तु इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि योग निद्रा अथवा शिथिलीकरण की सरल एवं प्रभावशाली प्रक्रिया के द्वारा आजकल बढ़ रहे बरसाती मेंढकों के समान रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

ऋषियों, मुनियों के अलावा अनेकों महापुरुष ऐसे हुए हैं जो या तो सोते नहीं थे या बहुत ही कम सोकर काम चला लेते थे। लक्ष्मण जी के संबंध में कहा जाता है कि वह 12 वर्ष तक सोये ही नहीं थे। गाँधीजी भी कई-कई दिनों तक लगातार जगते रहते थे। निःसन्देह शरीर को विश्राम की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु योग निद्रा के द्वारा चन्द मिनटों में यह आवश्यकता पूरी की जा सकती है और तरोताजा हुआ जा सकता है।

जर्मन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोहान वालगेंग वान योयथे ने योग निद्रा का उपयोग अपनी प्रतिभा को विकसित करने में किया था। फ्रान्ज एन्टोन मेस्मेर ने (1734 से 1815) तक योगनिद्रा के माध्यम से अनेकों रोगियों को ठीक किया था, 1815 ई. में जोसेफ फिलिप्स ने लिखा था कि “योग निद्रा में रोगी उन्मुनी मुद्रा में चला जाता है और उस समय दिए गए निर्देशों को ग्रहण करता है, तथा बिना जगे ही सही उत्तर देता है और एक निश्चित समय पर तरोताजा होकर उठ जाता है। 1831 ई. में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में मेस्मेर ने लिखा था कि “इस प्रयोग से अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाती है, स्नायविक दुर्बलता दूर होती है। स्मरण शक्ति तीक्ष्ण होती है, आशावादी दृष्टिकोण बढ़ता है। कल्पना शक्ति बढ़ती है तथा अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”

फ्राँस का तानाशाह नैपोलियन घोड़े पर बैठे-बैठे ही 15-20 मिनट में अपनी नींद पूरी कर लेता था, और चौबीसों घंटे लगातार युद्ध संचालन करता रहता था।

सल्वाडोर डेली नामक प्रसिद्ध चित्रकार ने योग निद्रा में इतनी प्रवीणता प्राप्त कर ली थी कि कुछ सेकेंडों के अन्दर ही अपनी नींद पूरी कर लेता था। उसके संबंध में कहा जाता है कि वह हाथ में किसी धातु का टुकड़ा ले लेता था और उस धातु के हाथ से जमीन पर गिरने तक के समय में उसकी नींद पूरी हो जाती थी।

औद्योगिक नगरों एवं कालोनियों में बसे व्यक्ति अत्यन्त व्यस्त जीवन-क्रम बिताते देखे जाते हैं। उनके चारों और के वातावरण में कोलाहल भरा रहता है। शोर के कारण तनाव से ग्रसित रहते हैं। काम के समय के अतिरिक्त समय विभिन्न चिन्ताओं, उद्विग्नताओं, घर परिवार की देखभाल में बीतता है। मानसिक स्थायित्व न हो पाने से नींद भी ठीक से नहीं आती। विश्राम की आवश्यकता पूरी न हो पाने से व्यक्ति अनेकों शारीरिक मनोशारीरिक व्याधियों से घिर जाता है। दवाइयों का अत्यधिक प्रयोग लाभकारी न होकर हानिकर सिद्ध होता है। सुख साधन, सुविधाओं की दृष्टि से भौतिक प्रगति बड़ी तीव्र गति से बढ़ी है। आत्मिक प्रगति की न्यूनता से अनेकानेक समस्यायें और उलझनें भी बढ़ी हैं। मनोरंजन के साधनों से तनाव में वृद्धि हो जाती है। न तो पर्याप्त शारीरिक व मानसिक श्रम कर पाते और न नींद के समय उचित एवं पर्याप्त विश्राम मिल पाता है।

यौगिक विश्राम एवं योगाभ्यास से शरीर व मन में शक्ति व स्फूर्ति का संचार होता है। योगाभ्यास की नियमितता से शरीर के अंदर सूक्ष्म परिवर्तन होने लगते हैं। आदतों में परिष्कार हो जाता है। तनाव, चिन्ता व्यग्रता आदि मानसिक विकारों से छुटकारा मिलता चला जाता है। विश्राम एवं सजगता से मन व शरीर पर नियंत्रण बढ़ता है और व्यक्ति का जीवन उत्कृष्ट एवं परिष्कृत होता जाता है। योग की विश्राम की सरल विधियों का अभ्यास अत्यधिक कार्य व्यस्तता में भी किया जा सकता है। यहाँ तक कि कार्य के मध्य में भी विश्राम की प्राप्ति कर नव-स्फूर्ति और शक्ति अनुभव की जा सकती है।

कार्य को भार न समझकर उसे सहज, सरल एवं रसानुभूति के भाव से किया जाय तो तनाव, चिन्ता, व्यग्रता से बिना प्रयास के ही मुक्त रहा जा सकता है। कार्य को ही साधना मानकर किया जाय, प्रतिफल की आशा किये बिना मनोयोगपूर्वक कर्म करने से कार्य-क्षमता, कुशलता आदि में अभिवृद्धि होती है। कार्य करते समय अंतर्मौन, श्वास के प्रति जागरूकता द्वारा ध्यान की अवस्था का विकास हो जाने पर अपने अनुभवों के प्रति सचेत रखकर स्फूर्ति को निरन्तर रखा जा सकता है।

कार्य करते समय थकान अनुभव होने पर विश्राम प्राप्ति एवं शक्ति-ग्रहण करने के लिए कुछ क्षण कार्य बंद कर निम्न सरल प्रक्रियायें अपनायी जा सकती हैं-

खूब गहरी साँस लेते हुए उदर भाग तक को पूरा भरते हुए दोनों हाथों को ऊपर की और तान दें। कन्धों एवं भुजाओं की पेशियों पर खिंचाव पड़े। साँस लेते समय प्राण-शक्ति प्रवाह को भीतर प्रविष्ट हो ऐसी संचय होने की भावना करें तथा श्वास छोड़ने के समय यह चिन्तन करें कि तनाव, निराशाएं रोग चिन्ताएं एवं समस्याएं दूर हो रही हैं। भरपूर उदर श्वसन और श्वास-प्रश्वास के प्रति सजग रहने से शाँति एवं शिथिलता की अनुभूति होती है। शरीर व मन को पर्याप्त विश्राम मिलता है। इसका अभ्यास कोई भी व्यक्ति कहीं भी कर सकता है। अभ्यास के बाद शक्ति, स्वास्थ्य की अनुभूति होने लगती है।

‘सोना, विश्राम करना एक कला है।’ साधारणतः स्वस्थ मनुष्य को छः घण्टे की नींद पर्याप्त होती है। योगनिद्रा शरीर व मन को पूर्ण विश्राम की स्थिति में पहुँचाती है। इसके अभ्यास से शरीर, मन व भावनाओं के तनाव मिट जाते हैं। विश्राम एवं नींद के लिए तनाव रहित होना चाहिए। योगनिद्रा के द्वारा व्यक्ति चेतना की गहराई में प्रवेश कर नवीन शक्ति एवं आनन्द पाता है। यह सोने और जागने की मध्यावस्था कही जा सकती है। शरीर पूर्ण विश्राम पाता है, मन जागरूक रहता है। उस स्थिति में मन का संबंध अचेतन एवं अर्ध-चेतन सा हो जाता है एवं तनावों से मुक्ति, विश्राम की अनुभूति होती है।

योग निद्रा की विधि अति सरल है। इसे हर स्थिति का व्यक्ति सुविधानुसार किसी भी समय कर सकता है। फिर भी प्रातःकाल का समय नियमित अभ्यास के लिए उपयुक्त माना गया है। खुली हवा रोशनी वाले स्थान, हर योग साधना के लिए आवश्यक माने गये हैं। घुटन, सीलन, सड़न जहाँ रहती है वहाँ के अनुपयुक्त वातावरण में साधना का वह लाभ नहीं मिल पाता जो अभीष्ट है। खाली पेट यह साधना अधिक सफल होती है। यदि भोजन कर लिया हो तो एक दो घण्टे ठहर कर ही यह प्रयोग करना चाहिए।

अभ्यास इस प्रकार है- समतल भूमि पर कम्बल बिछा कर चित्त लेट जाइये। हाथ और पैरों को सीधा रखे। आंखें बंद कर ली जाय।

ध्यान किया जाय कि शरीर का प्रत्येक अंग शिथिल एवं निर्जीव हो रहा है। मन ही मन यह धारणा की जाय कि एक-एक करके सब अवयव निःचेष्ट होते चले जा रहे हैं। निद्रावस्था में शरीर में जो शिथिलता छाई रहती है, प्रायः वैसी ही स्थिति अंग-प्रत्यंगों की हो चली।

शरीर के साथ-साथ मन के शिथिल होने की भी धारणा करनी चाहिए। निद्रा में मन की भाग दौड़ बंद हो जाती है। वह थक कर अपने को सब ओर से समेट लेता है और निद्रा की गोद में अचेत होकर गिर पड़ता है। न कोई चिन्ता रहती है और न इच्छा न किसी से राग रहता है न द्वेष। इसी स्थिति में स्वाभाविक नींद आती है। योग निद्रा के अवसर पर भी शरीर और मन को उसी स्थिति में पहुँचाने का संकल्पपूर्वक प्रयत्न करना पड़ता है।

योग निद्रा को श्वसन या शिथिलीकरण मुद्रा भी कहते हैं। श्वसन का तात्पर्य है मुर्दे जैसी स्थिति। शिथिलीकरण अर्थात् निःचेष्ट एवं निर्जीव जैसी शिथिलता उत्पन्न करना। अभ्यासपूर्वक यह स्थिति उत्पन्न की जा सकती है और जब चाहे तब नींद का आनन्द लिया जा सकता है। स्वाभाविक नींद का तो अपना महत्व है, पर इस योग निद्रा में संकल्प का समावेश रहने से उसकी ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है जो शरीर को नींद का और मन को शाँति संतुलन का दुहरा लाभ उत्पन्न कर सकने में समर्थ है।


पुस्तकों की उपेक्षा मत कीजिए

पुस्तकों के संबंध में लोगों की धारणा प्रायः बहुत ही निराशाजनक और उपेक्षापूर्ण-सी होती है। वे समझते हैं कि इनकी जीवन में कोई उपयोगिता नहीं होती। इसीलिए साधारण जन पुस्तकों के प्रति कोई रुचि नहीं दर्शाते। थोड़े बहुत लोग जो पुस्तकें खरीदते और पढ़ते हैं वे भी मात्र मनोरंजन के लिए। इसीलिए बाजार में मनोरंजन करने वाली, समय-काटु पुस्तकें बहुतायत से उपलब्ध हैं। जबकि पुस्तकों का उद्देश्य मनुष्य के जीवन को दिशा देना तथा समाज के नव-निर्माण की, मनुष्यता के उत्थान की प्रेरणा देना है। साहित्य की कसौटी निर्धारित करते हुए मुंशी प्रेमचंद्र ने लिखा है, “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो तथा जो हममें गति संघर्ष और बेचैनी पैदा करे। हमें सुलाए नहीं बल्कि जगाए और जगाकर, उठने, उठकर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करे।’’

संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके निर्माण में उत्कृष्ट पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। रूसी भाषा के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मैक्सिस गोर्की ने अपने निबंध पुस्तक ‘मेरी मार्ग-दर्शिका’ में लिखा है, “जब मैं तरुण था तब मैं बालजक और डिकेंस की लिखी पुस्तकें बड़े चाव से पढ़ता था। इन पुस्तकों के द्वारा मेरा परिचय उन लोगों से हुआ जिनकी दुख-सुख की समस्याएं हमसे भिन्न है। मेरे चारों ओर जो लोग रहते थे, वे निम्न स्तर का जीवन बिताते थे। इन्हीं लोगों के बीच मेरा जीवन संघर्ष आरम्भ हुआ। बालजक और डिकेंस के ग्रन्थ पढ़ने के बाद मेरे भीतर आकाँक्षा जागृत हुई कि मैं उठ पड़ूं और संघर्ष करूं। मुझे एकदम चकित कर देने वाली कृति थी बालक की “लापोद शौग्रिना”। इसमें एक महाजन के घर का वर्णन है। लगभग दो दर्जन व्यक्ति एक साथ बोलते हैं और शोर मचाते हैं। पुस्तक में उन सबका इतना सजीव चित्रण है कि मैं उनकी बात को न केवल सुनता ही था, बल्कि वे सब मुझे दिखाई देते थे। उनकी आंखें, उनकी मुस्कुराहट, भंगिमाएं आदि सब कुछ, जबकि बालजक ने उनकी शक्लों का कोई वर्णन नहीं किया था। इस पुस्तक से मुझे बड़ी प्रेरणा मिली।

गोर्की ने इन पंक्तियों में पुस्तकों के माध्यम से सजीव प्रेरणाएं मिलने की बात तो लिखी है, यह भी बताया है कि पुस्तकें किस प्रकार पढ़ी जानी चाहिए? अर्थात् पुस्तकें पढ़ते समय उनमें इतना तन्मय डूब जाना चाहिए कि कथ्य अपने आप बोलने लगे। गोर्की ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके निर्माण में पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पुस्तकों का महत्व दर्शाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार ‘रामप्रताप त्रिपाठी’ ने लिखा है, “पुस्तकें जागृत देवता हैं। उनकी सेवा करके तत्काल वरदान प्राप्त किया जा सकता है। लोकमान्य तिलक कहा करते थे कि, “पुराने कपड़े पहन कर नई पुस्तकें खरीदा कीजिए।’ महात्मा गाँधी ने पुस्तकों का महत्व दर्शाते हुए लिखा है, ‘अच्छी पुस्तकों के पास होने से भले मित्रों के साथ रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं पुस्तकों का अध्ययन करता गया मुझे उनकी खूबियाँ उतनी ही अधिक मालूम होती गई।”

गीता, रामायण, बाइबिल और कुरान का लाखों लोग नित्य पाठ करते हैं, उनसे जीवन के लिए उपयोगी प्रेरणाएं प्राप्त करते हैं। जान रस्किन बाइबिल के एक प्रसंग से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि उसके निहित सिद्धाँत विशेष के आधार पर उन्होंने एक पुस्तक लिख डाली ‘अन टू द लास्ट’ महात्मा गाँधी ने इसी पुस्तक से सर्वोदय की प्रेरणा प्राप्त की थी। ‘अन टू द लास्ट’ पुस्तक ने अर्थशास्त्र के प्रचलित घिसे-पिटे नियमों को ऐसा झिंझोड़ दिया कि उनमें परिवर्तन करना ही पड़ा। इसके पहले आमतौर पर अर्थशास्त्री यह दलील देते थे कि अगर निरक्षर श्रमिकों को आवश्यकता से अधिक वेतन दिया जाये तो या वो शराब पी जायेंगे अथवा बुरे काम करेंगे क्योंकि उनका आचार, व्यवहार, सुसंस्कृत नहीं होता। रस्किन ने अपनी पुस्तक के माध्यम से सवाल उठाया था कि उन्हें असंस्कृत रखने के लिए जिम्मेदार कौन है? इस प्रश्न के साथ उन्होंने तथाकथित सुसंस्कृत लोगों की भ्रान्त धारणाओं को झखझोरा और उन्हें अनुभव कराया कि निरक्षर तथा निम्न वर्ग के लोगों के प्रति उनका व्यवहार न केवल अमानवीय है वरन् नृशंस और पाशविक भी है।

टालस्टाय की पुस्तक ‘किंगडम आफ गार्ड’ ने भी महात्मा गाँधी को प्रभावित किया और इन दोनों पुस्तकों से उन्हें ऐसी प्रेरणाएं मिली कि वे आजीवन शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ते रहे। गाँधीजी से प्रेरणा लेकर ही अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जीवन भर रंगभेद नीति के विरुद्ध संघर्षरत रहे।

महात्मा गाँधी के संबंध में सर्वविदित है कि उन्होंने बचपन में सत्यवादी हरिश्चन्द्र नाटक पढ़ कर ही जीवन भर सत्य बोलने तथा सत्य का पक्ष लेने का संकल्प लिया था। गीता, रामायण पढ़कर उनके मन में अन्याय के विरुद्ध लड़ने की आकाँक्षा उमंग जागी थी और आजीवन वे अपने संकल्प पर दृढ़ रहे। योगी अरविन्द कहा करते थे कि जब-जब भी मेरे सामने कोई मानसिक या आध्यात्मिक उलझन आती है तब-तब मैं भगवद्गीता की शरण लेता हूँ और उसका कोई न कोई श्लोक मेरी समस्याओं का समाधान सुझा देता है। लोकमान्य तिलक द्वारा लिखे गये गीता रहस्य ग्रन्थ से सैकड़ों व्यक्तियों ने प्रेरणा प्राप्त की थी और स्वतन्त्रता आँदोलन में कूद पड़े थे। इतना ही नहीं हंसते-हंसते फाँसी के फन्दे पर चढ़ गये थे।

डा. अर्नाल्ड की पुस्तक ‘लाइट ऑफ एशिया’ ने पं. नेहरू को इतना प्रभावित किया था कि वे उनके व्यक्तित्व पर जीवन भर बुद्ध धर्म के सिद्धान्तों का प्रभाव पड़ा। उल्लेखनीय है ‘लाइट आफ एशिया’ पुस्तक में भगवान बुद्ध का ही जीवन चरित्र लिखा गया है।

व्यक्तियों के निर्माण में ही नहीं समाज के निर्माण में भी पुस्तकों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। अब से 300 वर्ष पूर्व प्लेटो द्वारा लिखित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ ने फ्राँसीसी राज्य क्रान्ति के बाद विश्व को एक ऐसी दिशा दी कि आज समूचा संसार प्रजाताँत्रिक शासन प्रणाली अपनाये हुये है। यद्यपि कई देशों में अधिनायकवादी, तानाशाही और एक तन्त्र पद्धति का शासन भी है, परन्तु वे भी अपने आपको प्रजातान्त्रिक कहलाना ही पसंद करते हैं।

प्रशिया में जन्मे मार्क्स ने लंदन में फटेहाल स्थिति में रहते हुए ‘कैपिटल’ पुस्तक लिखी। उसमें प्रतिपादित सिद्धान्तों को सर्वप्रथम कार्यान्वित किया लेनिन में और रूस में साम्यवाद आया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जब प्रथम बार समाजवाद में समता की बात सुनी तो उस पर खुशी प्रकट करते हुए उन्होंने इसे एक कल्पना और स्वप्न ही बताया। यह उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों की बात है। सन् 1930 के प्रारम्भ में जब वे रूस गये तो वहाँ की समाज व्यवस्था से वे इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने लिखा, इस देश की यात्रा किये बिना मेरी जीवन यात्रा ही अधूरी रह जाती। वहाँ की समाज व्यवस्था से प्रभावित होकर उन्होंने बंगला भाषा में एक रचना लिखी ‘द सेट चिट्ठी’। जैसे ही इसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ तो अंग्रेजी सरकार ने इसे तुरन्त जब्त कर लिया।

इस प्रकार ढेरों पुस्तकें हैं जिन्होंने व्यक्ति और समाज को प्रभावित किया। व्यक्ति को प्रभावित कर जहाँ इन पुस्तकों ने साधारण मनुष्य से महामानव स्तर का बना दिया, वहाँ सामाजिक उत्थान की दिशा में भी आधार स्तम्भ सिद्ध हुई हैं।

संसार के सर्वश्रेष्ठ तत्व विचार शक्ति को जिसे ज्ञान भी कहा जा सकता है, प्राप्त करने और प्रगति की दिशा में अग्रसर होने का एक ही उपाय है स्वाध्याय। इसीलिए शास्त्रकारों ने ‘स्वाध्याय या प्रमदतिव्यय’ तथा ‘अहरह स्वाध्याय में ध्येतव्य’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो और दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।

स्वाध्याय से तात्पर्य विचारपूर्ण साहित्य के नित्य अध्ययन से है। हमें ऐसा साहित्य निरन्तर पढ़ते रहना चाहिए जिससे अपनी विचार और विवेक शक्ति जागृत हो। जिन लोगों को पढ़ने की बिल्कुल भी आदत नहीं है उन्हें भी पुस्तकों का महत्व समझकर उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन का क्रम आरम्भ करना चाहिए।


योगाभ्यास मानसिक प्रगति का बहुमूल्य माध्यम

आधुनिक विज्ञान इस जगत को पदार्थ सत्ता भर मानता है। चेतना को पदार्थ का ही एक गुण कहता है। इस मान्यता का आधार मानवी सत्ता का स्वरूप शरीर मात्र रह जाता है। वे मन का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं मानते। अतएव उसकी व्याधियों को भी शरीर के अंतर्गत ही गिनते हैं और ऐसी कठिनाइयों के लिए मस्तिष्क अवयव में किसी विकृति का अनुमान लगाकर उसी के स्थानीय उपचार का प्रयास करते हैं। इस प्रयास में कितनी सफलता मिली यह कहना कठिन है।

मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले रसायनों में प्रायः सुन्न या उत्तेजित करने की क्षमता पाई जाती है। इससे किसी मनोरोग से ग्रसित व्यक्ति को संज्ञा शून्य या अनुभूतियों से शिथिल बनाकर ऐसी स्थिति में ले जाया जाता है जिसमें उसे व्यथा की अनुभूति न हो। यह सामयिक उपाय हुआ। उपचार नहीं। उपचार तब होता जब रोग के मूल कारण को समझा जाता और उद्गम स्थान को उलट-पुलट करना सम्भव होता। यदि शरीर ही सब कुछ माना जाय और मनोरोगों के लिए मस्तिष्क अवयव के किसी स्थान पर कोई गड़बड़ी होना माना जाय तो फिर उसका एक ही उपाय है कि मस्तिष्कीय संरचना और उसकी क्रिया पद्धति का समग्र ज्ञान उपलब्ध किया जाय। साथ ही ऐसा उपाय भी खोजा जाय जिससे निशाना ठीक जगह पर लगे।

मस्तिष्क एक समुद्र है। उसकी विशालता और विचित्रता ऐसी है जिसे थोड़ी गहराई में उतर कर देखने से बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। वहाँ के अत्यन्त सूक्ष्म घटक अपनी रहस्यमयी विशेषताओं को भी सीमित नहीं रखते वरन् एक दूसरे के साथ गुंथते, उलझते ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिसका विश्लेषण अत्यधिक कठिन हो जाता है और यह खोज निकालना सम्भव नहीं रहता कि किस मनोरोग का उद्गम केन्द्र किन घटकों में निर्धारित किया जाय और उन्हें प्रभावित करने के लिए किस उपाय का अवलम्बन किया जाय।

औषधियों का प्रभाव पाचन तंत्र एवं रक्त संस्थान के माध्यम से होता है और वह प्रायः किसी स्थान विशेष तक सीमित न रहकर समस्त शरीर पर समान प्रभाव उत्पन्न करता है। यह बात दूसरी है कि कोई स्थान उससे अधिक प्रभावित हो, कोई कम। शरीर के रक्त, माँस प्रधान अवयवों में तो किसी प्रकार यह उपाय काम दे जाता है, पर मस्तिष्कीय विचित्र संरचना को देखते हुए यह निर्णय करना सम्भव नहीं होता कि मस्तिष्क के किन घटकों को किस मनोरोग के लिए दोषी ठहराया जाय और उसे सुधारने के लिए किस उपाय का अवलम्बन लिया जाय। ऐसी दशा में औषधि उपचार का जो थोड़ा बहुत प्रभाव शरीर के अन्य अवयवों पर होता है वह भी मस्तिष्कीय संरचना की जटिलता को देखते हुए सम्भव नहीं हो पाता। शल्य क्रिया इस क्षेत्र की और भी जटिल है। चमड़ी की परत चीरकर माँस पेशियों का कतर व्यौंत कर लेना एक बात है और मस्तिष्क के ऊपर चढ़े हुए अस्थि कवच को वेधकर भीतर अन्धकूप में निशाना लगाना दूसरी। अन्धकूप इसलिए कहा गया है कि वहाँ दाँत, जीभ, कण्ठ, होठ की तरह अपना-अपना स्थान एवं कार्य निर्धारित नहीं है वरन् सब कुछ नितान्त उलझा हुआ है। वहाँ घटकों के परस्पर गुंथे होने की जटिलता को देखते हुए यह निर्णय करना सम्भव नहीं रहता कि पेचेदगी की जिम्मेदारी किस केन्द्र को सौंपी जाय। ऐसी दशा में अंधेरे में ढेला फेंकना युक्ति संगत नहीं रह जाता। मस्तिष्कीय शल्य क्रिया में अभी तक अर्बुदों को काट निकालने जैसे प्रत्यक्ष प्रयोजनों में ही एक सीमा तक सफल होती रही है। व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले मनोविकारों, सनकों, मूढ़ताओं को प्रभावित करने वाले मानसिक रोग शरीर शास्त्रियों की पकड़ से बाहर ही बने हुए हैं। यहाँ तक कि अपस्मार जैसे प्रत्यक्ष लक्षणों वाली व्यथा तक की रोकथाम सम्भव नहीं हो पाती।

मस्तिष्कीय विद्या का यथासम्भव विस्तार हुआ है और क्षेत्र की खोजों में एक सीमा तक सफलता भी मिली है। पर समस्या को देखते हुए इस उपलब्धि को समुद्र तट पर बैठे हुए बालक द्वारा सीप घोंघे बीनने जैसा ही नगण्य है। उतने भर से मनोरोगों के निराकरण में सफलता मिलना तो दूर वैसी सम्भावना तक नहीं दिखती और आशा तक नहीं बंधती। लंका के निकट समुद्र पर पुल बाँधे जाने की कथा कम से कम पुराणों में तो मौजूद है। मस्तिष्कीय संरचना के रहस्य तिलस्म को देखते हुए उसका स्वरूप एवं क्रिया-कलाप तक समझना कठिन हो रहा है। ऐसी दशा में उपचार की बात कैसे सोची जाय। पागलखानों में अनियन्त्रित विक्षिप्तों को ही प्रवेश मिलता है। उनका उपचार भी होता है, पर सफलता का दावा इतना ही किया जा सकता है कि उपद्रव से बचने के लिए बंदीगृह जैसी स्थिति बन गई। उनमें से उपचार कितनों पर किस सीमा तक सफल हुआ इसका निष्कर्ष देखने पर निराशा ही हाथ लगती है।

इस निराशा की गम्भीरता को समझ जाना चाहिए। मस्तिष्कीय चीर-फाड़, सूची वेधन या औषधि उपचार से फैले हुए मनोविकारों के समाधान का प्रयास करने वाले अपनी सफलता के लिए स्वयं आश्वस्त नहीं हैं। विश्वास और उत्साह के अभाव में गम्भीर प्रयत्न भी तो नहीं बन पड़ते। अब तक की शोधें, भटकने जैसे ही परिणाम सामने लाई हैं। अन्य अवयवों की तरह मस्तिष्कीय संरचना एवं क्रिया पद्धति न तो प्रत्यक्ष है न सरल। जटिलता की गहराई में प्रवेश करने वालों को कुछ हाथ लगाना तो दूर अधिकाधिक पेचीदारियाँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। बुद्धि और साधनों की ससीमता इस क्षेत्र में अधिक आगे बढ़ने के लिए उत्साह तक उत्पन्न नहीं होने देती। इतना बन पड़े तभी तो प्रयत्न आगे बढ़े।

शरीर रोग प्रत्यक्ष पकड़ में आते हैं और पीड़ित स्थान की उखाड़-पछाड़ भी किसी कदर सम्भव हो जाती है, अस्तु शरीर विज्ञानियों का चिकित्सा अन्वेषण एवं निर्धारण में उत्साह बना हुआ है और प्रयास चल रहा है किन्तु मानसिक रोगों के संबंध में वैसी स्थिति नहीं है। एक तो वे अप्रत्यक्ष होने के कारण ऐसे ही पकड़ में नहीं आते दूसरे उन्हें भाग्य दोष मान बैठने के अतिरिक्त कोई कारगर उपाय भी सामने नहीं है।

सच तो यह है कि शरीर रोगों की तुलना में मनोरोगों का क्षेत्र अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा है और उनके कारण हानि भी अपेक्षाकृत अधिक उठानी पड़ती है। गणना विक्षिप्तों की ही सम्भव है। उन्मादियों को ही मनोरोग ग्रसित माना जाता है और उन्हीं पर दृष्टि जाती है। यह संख्या भी चौंकाने वाली है। फैले हुए भयंकर रोगों में उन्माद को भी प्रमुख स्थान प्राप्त है। अन्य रोगों के रोगी प्रायः स्वयं ही कष्ट उठाते हैं। दूसरों पर तो परिचर्या एवं चिकित्सा का ही भार डालते हैं किन्तु उन्मादियों के संबंध में ऐसी बात नहीं है वे साथियों के सदा आशंका, भय, चिन्ता एवं विपत्ति के विषय बने रहते हैं। इस स्थिति में उनके रहते दूसरे लोग भी विशेषतया कुटुम्बी लोग अपना साधारण काम-काज भी निश्चिंततापूर्वक कर नहीं पाते। सभी जानते हैं कि उन्मादी अपने लिए और दूसरों के लिए एक समस्या बनकर रहते हैं।

उन्मादियों को बंदीगृह में डालने जैसा खर्चीला उपाय भी सोचा जा सकता है, पर उन अर्ध विक्षिप्तों के लिए क्या किया जाय जो प्रत्यक्षतः तो भले चंगे दिखते हैं, पर अपनी विचित्र सनकों एवं हरकतों से स्वयं हैरान रहते और दूसरों को हैरान करते रहते हैं। ऐसे लोगों को न चैन मिलता न उत्साह रहता है। खीजते और खिजाते रहने वाले व्यक्ति प्रगति पथ तनिक भी आगे बढ़ नहीं पाते। जिनके साथ वे जुड़ गये हैं वे किसी प्रकार उनका भार वहन तो करते हैं, पर साथी होने का न लाभ ले पाते हैं न आनन्द। ऐसे अनगढ़ व्यक्तित्वों को आर्थिक दृष्टि से दरिद्र और सामाजिक दृष्टि से पिछड़े लोगों से भी गया-गुजरा समझा जाता है। निर्धन लोग भी हंसते-हंसाते, चैन, संतोष की हल्की-फुल्की जिंदगी जी लेते हैं, पर इन अभागे सनकियों के भाग्य में तो इतना भी नहीं होता। शिक्षा और सम्पन्नता रहते हुए भी यह सनकी लोग उपलब्धियों के आनन्द से वंचित ही बने रहते हैं।

दरिद्रता, रुग्णता और अशिक्षा के अभिशापों को सभी समझते हैं और दूर करने के लिए यथासम्भव प्रयत्न भी चलते हैं। पर इन तीनों के संयुक्त दुष्परिणाम जितने हो सकते हैं उसमें भी अधिक उन मनोरोगों से होते हैं जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर न होते हुए भी भीतर ही भीतर घुन की तरह सब कुछ खोखला करते रहते हैं। वैयक्तिक प्रगति और सामाजिक समृद्धि की दृष्टि से यह मानसिक पिछड़ापन किसी भयंकर संकट से कम कष्टप्रद नहीं है। प्रत्यक्ष चर्म चक्षुओं से न दिख पड़ने के कारण मानसिक रुग्णता की उपेक्षा तो होती रहती है, पर उसकी हानियों से बच सकना सम्भव नहीं। मानसिक पिछड़ेपन के रहते सच्चे अर्थों में पिछड़ापन माना जाना चाहिए। इसी अंतर के कारण तो मनुष्य एवं अन्य प्राणियों के बीच स्तरीय विभाजन रेखा खिंची है। अन्यथा कितने ही प्राणी अपेक्षाकृत कहीं अधिक समर्थ पाये जाते हैं। मानसिक रुग्णता प्रकारान्तर से व्यक्तित्व की दुर्बलता ही मानी जायेगी और उसके रहते कोई व्यक्ति या समाज समुन्नत कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। भले ही वह साधनों की दृष्टि से कितना ही समृद्ध क्यों न हो।

बढ़ते हुए मनोविकारों को प्रस्तुत संकटों में सबसे बड़ा माना जाना चाहिए। इस दृष्टि से पिछड़े लोगों का समुदाय गणना में कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसका वैभव कितना ही बड़ा क्यों न हो? वस्तुतः उसे दरिद्र, निर्बल एवं अभिशप्त ही माना जायेगा। जो लोग स्वयं अपने लिए भारभूत हो रहे हैं वे समाज को समुन्नत बनाने में क्या योगदान दे सकते हैं?

मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता का इस प्रगति युग में भी बढ़ते जाना वस्तुतः गम्भीर चिन्ता का विषय है। उससे भी अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि इसे समस्या के रूप में नहीं समझा गया और उसके समाधान के लिए गम्भीरतापूर्वक विचार तक नहीं किया गया। उपाय तो इसके बाद ही निकल सकता है।

प्रश्न यह है कि इसका समाधान कोई है भी या नहीं? इसके उत्तर में दोनों बातें कहीं जा सकती हैं। ‘हाँ भी और नहीं भी। ‘नहीं’ इस अर्थों में मन को शरीर का अंग मान लेने पर काम उपचार के अंतर्गत मानसिक पिछड़ेपन को दूर कर सकना सम्भव नहीं है। जैसा कि एक के बाद एक वैज्ञानिक निष्कर्षों से प्रकट होता चला जा रहा है। ‘हाँ’-इस अर्थ में कि मन को चेतना का प्रतिनिधि माना जाय। शरीर का अंग नहीं, वरन् उसका स्वतन्त्र सूत्र संचालक। इतनी पृष्ठभूमि बन जाने पर मनोविश्लेषण और उपचार विधान का मार्ग नितान्त सरल हो जाता है और उन उपाय अवलम्बनों का प्रयोग हो सकता है, जिनका चिरकाल तक परीक्षण होता रहा है।

‘योग विज्ञान’ वह विज्ञान है- जो मानवी काया में विद्यमान चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व है और उसे उसी स्तर के उपचारों से प्रभावित परिष्कृत करने के लिए साधना विधान की उपयोगिता स्वीकार करता है। योग शब्द इन दिनों डरावना इसलिए बन गया है कि उसके प्रयोक्ता असामान्य और असामाजिक जीवन-क्रम अपना कर चलते दिखते हैं। सामान्य बुद्धि सोचती है इस पद्धति को अपनाने पर तो लोकप्रवाह से कट कर अलग-थलग रहना पड़ेगा और सहज जीवनचर्या से विरत होना पड़ेगा। इस शर्त पर ‘योगी’ बनना किसी को स्वीकार नहीं। यही कारण है योग की चर्चा तो आकर्षक लगती है, पर उस मार्ग पर चलने की हिम्मत पड़ना तो दूर इच्छा तक नहीं होती। यही कारण है कि योगाभ्यास जन-जीवन से दूर हटता चला गया और इस महान विज्ञान के लाभ से जन-साधारण को वंचित रहना पड़ा। तथ्यों को समझा या समझाया जा सके तो शरीर पोषण एवं उपचार को जिस प्रकार आवश्यक समझा जाता है। उसी प्रकार मानसोपचार जैसी महान उपलब्धि के लिए योगाभ्यास के लिए जन-जीवन में उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है। वस्तुतः ‘योग’ ऐसा मानसोपचार भर है जो शरीर और अन्तःकरण की सिद्धियाँ भी मानसिक आरोग्य के साथ-साथ ही उत्पन्न करता चलता है।


गायत्री मंत्र की प्रचण्ड सामर्थ्य

योग वशिष्ठ में मन्त्र शक्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

यथाविरेक कुर्वन्ति हरीतम्य स्वभाढ़तः। भावनावशतः कार्य तथा परलवादयः॥ 6।1।81।39

अर्थात्- हे राम! जिस प्रकार हर खाने से पाचन संस्थान में तीव्र गति होती है और दस्त लग जाते हैं, उसी प्रकार दृढ़ और समर्थ भावना से मन्त्रों के अक्षर शरीरों को तीव्रगति से प्रभावित करते हैं।

रामायणकार ने “मन्त्र परम लघु जासुवस विधि हरिहर सुर सर्व” बताया। इन आख्यानों के पीछे नितान्त विज्ञान सम्मत प्रक्रिया कार्य करती है। केवल मात्र कल्पना या विश्वास नहीं। 1967 की कादम्बिनी के पेज 18 में श्री गोविन्द शास्त्री ने एक ऐसे मन्त्रज्ञ का विवरण दिया है जो काँसे की थाली में हाथ रखवाकर मन्त्र बोलता था। धीरे-धीरे थाली में भरा पानी पीला पड़ता गया और रोगी रोग मुक्त हो गया। गाँवों में आज भी सर्प और बिच्छू के इलाज मन्त्र शक्ति से होते हैं और वह आधुनिक चिकित्सा से कहीं अधिक कारगर सिद्ध होते हैं।

मन्त्रों में सन्निहित यह शक्ति वस्तुतः शब्द की पराशक्ति का ही चमत्कार है। इसमें अतिशयोक्ति जैसी कोई बात नहीं। मंत्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध, लयबद्ध, तालबद्ध और वृत्ताकार एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्द विन्यास का तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। रस्सी से पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों और घुमाया जाय तो उसके दो परिणाम होंगे, एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दिखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदलकर, गतिशील चक्र के रूप में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाय तो उसकी जान ले सकता है। यदि इसी तरह उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जायेगा। मंत्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस, एक स्वर, एक लय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें-सीधी या साधारण नहीं रह जातीं। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अन्तरंग पिण्ड में तथा बहिरंग ब्रह्मांड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मंत्र का चमत्कार कहा जा सकता है।

शब्द या ध्वनि की शक्ति को एक दूसरे प्रकार से भी समझा जा सकता है। किसी बच्चे ने कभी शेर न देखा हो, न ही उसकी प्रकृति से परिचित हो तो भी उसे कहीं शेर की दहाड़ सुनाई पड़ जाये तो वह काँप उठेगा। इसी तरह कोयल की कूक सुनते ही लोग मुस्कराने लगते हैं। यह तो शब्द का अन्तरंग कलेवर पड़ने वाला अत्यन्त स्थूल प्रभाव मात्र है, पर जिस तरह दही को निरन्तर आलोडित करने से उसमें से मक्खन निकलना सम्भव हो जाता है उसी प्रकार यदि कर्णातीत ध्वनि तीव्र भावावेग के साथ गुँजित की जाय तो वह शरीरस्थ चक्रों, ग्रन्थियों, गुच्छकों और उपलिकाओं से एक ऐसी “संवहन” शक्ति पैदा करती है जो किसी रोगी को अच्छा कर सकती है, किसी को अपने मनोनुकूल बना सकती है, मारण, मोहन उच्चाटन आदि प्रयोग भी उस शक्ति से किये जा सकते हैं। कृत्या और घात उसी शक्ति का तान्त्रिक भाग है। गायत्री मंत्र जैसे परम कल्याणकारी मंत्र में उस तरह की बातों की उपेक्षा की गई है। किन्तु दूसरी तरह के वाममार्गी उनका खुलकर उपयोग करते हैं। भले ही उन्हें उनके लिए अनिष्ट क्यों न भुगतने पड़ें।

गायत्री मंत्र शब्द की रचना विलक्षणता ही उसके सर्वोपरि होने का आधार है। इसी अनुसंधान पर राजर्षि विश्वामित्र को अविलम्ब ब्रह्मर्षि पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। समझने वाली बात है कि राजर्षि की सामर्थ्य की तुलना राजाओं-महाराजाओं से की जाती है तो ब्रह्मर्षि की शक्ति की तुलना-ब्रह्म से की जाती है। जिसका अर्थ यह हो सकता है कि वह सृष्टि के स्वामी संचालक और नियन्त्रक की क्षमताओं से ओत-प्रोत होता है।

मंत्र में इतनी शक्ति हो सकती है यह आश्चर्य का विषय हो सकता है अयथार्थ नहीं। भारतीय मंत्र विद्या में शब्दों की जिस ‘संवहन शक्ति’ का उपयोग किया जाता है उसका एक छोटा-सा रूप पराध्वनि (अल्ट्रा साउण्ड) के रूप में भौतिक शास्त्रियों ने भी जान लिया है और उसके विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय उपयोग होने लगे हैं। इसे चिकित्सा जगत में क्राँति की संज्ञा दी गई है।

“एचीव्स आफ फिजीकल एण्ड रिहैबिलेशन” पत्रिका में एक घटना का विवरण दिया है जिसमें एक महिला की उंगलियों को इस तरह लकवा मार गया था कि वह उंगलियों में थोड़ी भी हरकत नहीं कर सकती थी किन्तु जब उसकी उंगलियों पर पराध्वनि चिकित्सा का प्रयोग किया गया तो उंगलियाँ पूरी तरह ठीक हो गईं और वह जूतों के फीते तक बाँधने में समर्थ हो गई।

“सालपेट्री हॉस्पीटल” पेरिस में ऐसे 27 लाइलाज रोगियों को इस कर्णातीत ध्वनि शक्ति से ठीक किया गया। माउण्ट सिनाई हॉस्पीटल न्यूयार्क में एक ऐसा आगे से जला व्यक्ति आया जिसकी उंगलियाँ जलकर पिघल गई थीं। उन्हें काट देने के अतिरिक्त कोई उपाय शेष नहीं रहा था उस समय “अल्ट्रा साउण्ड’’ ध्वनि का प्रयोग किया गया और वह व्यक्ति पूरी तरह अच्छा हो गया। अल्ट्रा साउण्ड ध्वनि और मंत्र शक्ति में इतना ही अंतर है कि मंत्र की ध्वनि को चक्रों की विद्युत शक्ति रोग की कठिन स्थिति में भी वेध जाने योग्य बनाती है जबकि “टान्स्डयूरूर” यंत्र में कर्णातीत ध्वनि को विद्युत शक्ति यह सामर्थ्य प्रदान करती है। इस यंत्र द्वारा सामान्यतः 20 हजार साइकिल प्रति सेकेंड 80 लाख और एक करोड़ साइकिल प्रति सेकेंड तक बढ़ा दिया जाता है।

ध्वनि का वह क्षेत्र तो बहुत स्वल्प है जो हमारे कानों की पकड़ में आता है और जिसे हम सुन सकते हैं। जिन ध्वनियों के कंपन प्रति सेकेंड 20 से लेकर 20 हजार तक होते हैं उन्हें ही मनुष्य के कान आसानी से सुन सकते हैं। किन्तु ध्यान कंपन तो इससे बहुत कम और बहुत अधिक सामर्थ्य के भी होते हैं। उन्हें अनसुनी ध्वनियाँ कहा जाता है। इससे उनकी सामर्थ्य में कमी नहीं होती वरन् सच तो यह है कि यह कर्णातीत- अनसुनी ध्वनियाँ और भी अधिक सामर्थ्यवान होती हैं। ‘सुपर सोनिक रेडियो मीटर’ की सहायता से अंतरिक्ष में संव्याप्त अगणित ध्वनि प्रवाहों को सुना जाना जा सकता है। मंत्र साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।

विज्ञान ने श्रवणातीत ध्वनियों को एक अति प्रभावोत्पादक शक्ति माना है और उनसे अनेक प्रकार के महत्वपूर्ण काम लेने की व्यवस्था बनाई है। इन दिनों वस्तुओं की सही मोटाई, गहराई नापने में- धातुओं के गुण, दोष परखने में इनका प्रयोग होता है। कार्बन ब्लैक का उत्पादन, वस्त्रों की धुलाई, रासायनिक सम्मिश्रण वस्तुओं की कुटाई, पिसाई, गीली वस्तुओं को सुखाना, धातुओं की ढलाई, प्लास्टिक धागों का निर्माण जैसे अनेकों उद्योग ध्वनि तरंगों की सामर्थ्य का उपयोग करके चल रहे हैं। अयोवा स्टेट कालेज, अल्ट्रा सोनिक कारपोरेशन, बी. एफ. गुडविच कंपनी आदि कितने ही व्यापार संस्थानों ने ऐसे यंत्र बनाये हैं जिनमें श्रवणातीत ध्वनियों की सामर्थ्य का उपयोग होता है और उससे महत्वपूर्ण लाभ कमाये जाते हैं।

ध्वनियों को आकाश से पकड़ कर उन्हें ऊर्जा के रूप में परिणत करने की तैयारियाँ भी बड़े जोरों से हो रही हैं। उन्हें ताप, प्रकाश, चुम्बक एवं बिजली के रूप में परिणत किया जा सकेगा और इस आधार पर ईंधन का एक सस्ता और सुविस्तृत स्त्रोत हाथ में में आ जायेगा। कान के माध्यम से मस्तिष्क में ध्वनियाँ पहुँचती हैं और हमें शब्द श्रवण का लाभ मिलता है। जिनके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, उन बहरे लोगों को दृष्टि मार्ग से ध्वनि-तरंगों को मस्तिष्क तक पहुँचाने और सुनने का लाभ देने के लिए चल रहे प्रयोग सफल होने के निकट पहुँचते जा रहे हैं। इसी प्रकार गूँगे, बहरे, अंधे व्यक्ति भी अपनी आवश्यकता अन्य छिद्रों के सहारे पूरी कर लिया करेंगे। राडार जैसे यंत्र अभी भी ध्वनि प्रवाह को पकड़ कर ही बहुमूल्य जानकारियाँ संग्रह करते हैं।

मंत्रों में भी ध्वनि शक्ति का ही स्वरूप कार्य करता है जिसके उपयोग की विधि आप्त महर्षियों ने अपने ढंग से खोजी थी। मंत्र शक्ति की इतनी महत्ता होते हुए भी सभी लोग उसके द्वारा वह सामर्थ्य नहीं जुटा पाते। यह प्रश्न अक्सर उठा करता है और मंत्र शक्ति में संदेह का कारण बना रहता है। उसका कारण और कुछ नहीं अन्तःकरण का गहरा और उथला होना ही है। मंत्र में सन्निहित भावनाओं को प्रखर बनाने के लिए जिस परिष्कृत और समर्थ व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। वह न जुट पाने से मंत्र अपना सामान्य प्रभाव ही अभिव्यक्त करके रहे जाता है। उससे विशेष कुछ लाभ मिलता नहीं। व्यक्तित्व को ऊंचा उठाने का कार्य वाणी की सत्यनिष्ठा, सरलता और मधुरता से प्रारम्भ होता है और जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप में छा जाता है। जिस तरह मैले शीशे पर पड़ने वाली प्रकाश की किरणें अपना कोई प्रभाव नहीं दिखा पातीं, उसी तरह मलिन अन्तःकरण में पड़ने वाले मंत्र का प्रकाश केवल मात्र उसी सफाई में ही लगा रहेगा, यदि व्यक्ति की जीवन दिशा अपने दोष, दुर्गुणों को ढूंढ़ निकालने और उनके स्थान पर सद्गुणों की प्रतिष्ठा की हुई हो तब तो इस परिमार्जन का भी महत्व है और उस स्थिति में मंत्र जप का प्रभाव अविलम्ब ही सही देखने को मिल जाता है, पर यदि आहार-विहार, रहन-सहन, वाणी-व्यवहार द्वारा अन्तःकरण को मल विक्षेप से लादते रह गया हो तो कितना ही अच्छा और अधिक मंत्र जप भी कोई प्रभाव परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा।

गायत्री महामंत्र के जप से उत्पन्न पराध्वनि सारे वातावरण के परमाणुओं को कंपा देने की शक्ति से ओत-प्रोत है। इस महामंत्र की अपार शक्ति का कोई भी लाभ उठा सकता है शर्त एक ही है कि वह उन शिक्षाओं पर, उस आचरण पर भी चले जिसका इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में संकेत है। उन आदर्शों पर चले बिना उल्लेखनीय सफलता के द्वारा अवरुद्ध ही पड़े रहेंगे।


गहरी श्वास से चिर यौवन दीर्घ जीवन

मनुष्य ही नहीं मनुष्येत्तर प्राणियों का जीवन भी जिस प्रमुख क्रिया पर निर्भर करता है वह है श्वसन प्रक्रिया। साँस के साथ ही जीवन का आरम्भ होता है और जीवन का समापन भी साँस बंद होने के साथ ही हो जाता है। साँस को जीवन का चिह्न कहा जा सकता है। साँस के साथ-साथ जीवन के लिए यह भी आवश्यक है कि साँस ठीक प्रकार से ली जाए। स्वास्थ्य रक्षा के लिए सही तरीके से श्वास लेना उससे भी ज्यादा आवश्यक है जितना कि पौष्टिक भोजन और स्वच्छ पानी।

अन्य प्राणी तो नैसर्गिक ढंग से साँस लेते हैं। यह विडम्बना मनुष्य के साथ ही जुड़ी हुई है कि उसने अपने रहन-सहन के अन्यान्य तौर तरीकों के समान श्वास लेने की प्रक्रिया को भी बिगाड़ लिया है और उसका ढंग गलत कर लिया है। जीवन का आधार प्राण धुरी ही जब लड़खड़ाई हुई हो तो स्वास्थ्य और पुष्टि किस आधार पर बनी रह सकती है? अच्छे स्वास्थ्य के लिए सही ढंग से श्वास लेना कितना आवश्यक है, इसके लिए श्री थामस वोंस ने 48 वर्षों तक वैज्ञानिक अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि चिर-यौवन के लिए सही श्वसन अत्यन्त आवश्यक है। वस्त्रों के बारे में उदासीनता, अतीत की अधिक चर्चा, भुलक्कड़पन, हंसने की प्रवृत्ति का अभाव, गरदन का आगे की ओर झुकना, कदमों की दृढ़ता का ह्रास, वजन बढ़ना इत्यादि चिह्न बुढ़ापा आने के संकेत है। लेकिन असमय बुढ़ापे के चिन्ह दिखने का कारण यह है कि श्वसन-क्रिया की ओर जागरूक रूप से ध्यान नहीं दिया गया।

करीब अस्सी वर्ष की अवस्था में पहुँच जाने के बाद भी थामस वोंस का शरीर यौवन युक्त है। आँखों की कमजोरी और स्नायविक तनाव से वे सर्वथा मुक्त हैं। अपने लंबे अनुभव के आधार पर वे श्वसन संबंधी निम्न व्यायाम प्रतिदिन करने की सलाह देते हैं-

“पहले आराम से पीठ के बल दाहिनी ओर थोड़े झुकाव के साथ लेट जाइये। मध्यपट से दो हल्की साँसें लीजिये। साँस को तीन सेकेंड तक रोकिये, फिर धीरे-धीरे बाहर निकालिये। साँस निकालते समय ध्यान कीजिये कि आप साँस को नीचे की ओर फेंक रहे हैं।

साँस निकालते समय अपने पूरे शरीर पर ध्यान केन्द्रित कीजिए और कल्पना कीजिए कि आपका शरीर बेतरह भारी होता जा रहा है। श्वास खींचने में जितना समय आप लगाते हैं उसका चौगुना समय निकालते समय लगाइये। श्वास निकालते समय यह कल्पना कीजिये कि अपने अति वजन के कारण आपका शरीर बिछावन में धंसा जा रहा है। इस श्वसन क्रिया और शिथिलीकरण में दो मिनट का समय लगाइये। परन्तु इस प्रक्रिया के साथ-साथ यह भावना करते रहें कि आपका शरीर नवीन प्राण से अनुप्राणित हो रहा है। इस व्यायाम की दस बारह आवृत्तियाँ करके गहरी नींद में सो जाइये।

प्रतिदिन जब आप टहलने जांय तो लगभग आधे घण्टे नाक से सरलतापूर्वक श्वास खींचें और बलपूर्वक मुँह से अधिकाधिक श्वास निकालें। इस तरह से आपके रक्त कोष तथा मस्तिष्क को अधिक से अधिक ऑक्सीजन की उपलब्धि तथा अवाँछित जलीय तथा गैसीय कूड़े का निष्कासन होगा।

इस प्रकार अपने श्वास-प्रश्वास के ढंग को सुधार कर कोई भी व्यक्ति दीर्घकाल तक स्वस्थ और युवक बना रह सकता है।


आहार और उसकी पोषक शक्ति

कहा जाता है कि महर्षि चरक अपनी संरचना और शिक्षा का समुचित विस्तार कर चुके तो उन्हें यह जानने की सूझी कि उनके प्रतिपादन का रहस्य कितनों ने समझा इसका पता लगाया जाय।

उपरोक्त प्रयोजन के लिए महर्षि ने एक कपोत का रूप बनाया और उस क्षेत्र में पहुँचे, जहाँ चिकित्सकों की भरमार थी।

पक्षी रूपधारी चरक ने अपनी भाषा में चिकित्सकों से एक मार्मिक प्रश्न पूछा- ‘को रुक्’ अर्थात् कौन रोगी होता है? यह पूछने से उनका मन्तव्य यह था कि जो मूल कारण को जानता होगा वही उसकी रोकथाम के उपाय सोचेगा। चिकित्सा उपचार भी उसी का सफल होगा। अन्यथा औषधि मात्र से अस्वस्थता का स्थायी निराकरण कहाँ सम्भव है?

कपोत चरक ने बारी-बारी सभी से चिकित्सकों के सम्मुख वही प्रश्न दुहराया ‘कोऽरुक्’ अर्थात् रोगी कौन बनता है? निरोग कैसे होता है?

प्रश्न के उत्तर में सभी ने अपनी मान्यता व्यक्त की। रोग मुक्त होने के निमित्त सभी उपचार बताते चले गये किसी ने भी यह न बताया कि रोगी पड़ने का अवसर ही न आवे, अथवा जो रुग्ण हो गया है, उसे सहज ही उससे छुटकारा पाने का अवसर मिल जाय।

उत्तर सभी के शास्त्र सम्मत थे, पर उनमें सार सिद्धान्त का समावेश न रहने से उन्हें संतोष नहीं हुआ। और वे खिन्न मन से उदास होकर एक कोने में जा बैठे। सोचने लगे या तो मुझे पक्षी समझकर उपेक्षित किया गया है। अथवा इन लोगों का अनुभव गंभीर नहीं है।

उधर से महर्षि वागभट्ट निकले। उनसे भी कपोत ने वही प्रश्न पूछा। उसने कपोत रूपी चरक को पहचान लिया और नत-मस्तक होकर उन्हीं की भाषा में प्रत्युत्तर देते हुए तीन प्रतिपादन प्रस्तुत किये।

“मित भुक्”- अर्थात् भूख से कम खाना।

“हित भुक्”- अर्थात् सात्विक खाना।

“ऋत भुक्”- अर्थात् न्यायोपार्जित खाना।

जो इन तीन बातों का ध्यान रखेंगे, उन्हें बीमार पड़ने का अवसर ही न आवेगा। ऐसी दशा में बिना चिकित्सा के ही स्वास्थ्य ठीक बना रहेगा।

इन दिनों स्वास्थ्यकर आहार के संदर्भ में अमुक रसायनों के बाहुल्य को संतुलित आहार कहा जाता है और अमुक की कमी रहने पर कुपोषण की शिकायत होने की बात कही जाती है। इन दिनों कुपोषण दूर करने के लिए खाद्य संतुलन पर बहुत महत्व दिया जा रहा है और यह सोचा जा रहा है कि किस प्रकार आहार का रासायनिक स्तर बढ़ाया जाय। यह प्रयत्न सामान्यतया ही है। रासायनिक उत्कृष्टता की बात का महत्व मिलना ही चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पकाने की प्रक्रिया एवं खाने की पद्धति में तो कहीं कोई त्रुटि नहीं रह रही है। इस संदर्भ में बरती गई लापरवाही ऐसी है जिसके कारण बहुमूल्य पौष्टिक पदार्थ भी तथाकथित कुपोषण वाले आहार से भी गये बीते बन जाते हैं।

कुपोषण वाले पदार्थों के कारण शारीरिक विकास में जो कमी रह जाती है तथा मानसिक विकास में अवरोध उत्पन्न होता है, उसकी जानकारी सर्वविदित है। अब इस क्षेत्र में चल रहे अनुसंधानों ने एक नया मोड़ लिया है कि जिनको पर्याप्त मात्रा में पुष्टाई मिलती है वे कुपोषण ग्रस्तों से भी गई गुजरी स्थिति में क्यों पड़े रहते हैं? उन्हें वे लाभ क्यों नहीं मिलते जो खाद्य रसायनों का गुणगान करते हुए आमतौर से बताये जाते हैं।

इस असमंजस का समाधान ढूँढ़ने के लिए स्वास्थ्य विज्ञान में संलग्न कितने ही शोध संस्थान अपने-अपने ढंग से काम कर रहे हैं। इंडियन कौंसिल आफ मेडीकल रिसर्च- इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मेडीकल साइन्स- नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूड्रीसन- पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल एजुकेशन एण्ड रिसर्च जैसी भारत की शोध संस्थाएं न केवल देश की आर्थिक परिस्थितियाँ अधिक उपयोगी खाद्यान्नों की सिफारिशें कर रही हैं वरन् यह भी सोच रही हैं कि उपयोगी स्तर का आहार ग्रहण करने पर भी असंख्यों को क्यों उसका लाभ नहीं मिलता है? यह समस्या उन सभी लोगों की है जो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और बौद्धिक दृष्टि से सुशिक्षित होते हुए शारीरिक दृष्टि से दुर्बल और रुग्ण बने रहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि आहार का संतुलित होना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उसके पकाये और खाये जाने का तरीका भी अपना विशिष्ट महत्व रखता है। इस संदर्भ में बरती गई असावधानी भी आहार का स्तर मूल्यवान होते हुए भी उसके प्रभाव परिणाम से वंचित रहना पड़ता है।

तेज आग पर देर तक पकाने से भी सभी खाद्य पदार्थ अपनी मौलिक विशेषताओं का अधिकाँश भाग गंवा बैठते हैं। चिकनाई में तलने-भूनने से रही बची उपयोगिता भी नष्ट हो जाती है। मसाले की भरमार से वह आहार न रहकर नशा रहित मादक द्रव्य बन जाता है और उत्तेजना ही नहीं विषाक्तता भी उत्पन्न करता है।

खाने के संबंध में बरती जाने वाली भूलें और भी दुर्भाग्यपूर्ण हैं। कम चबाये जल्दी-जल्दी में निगलते जाना, आहार को मुख में सम्मिलित होने वाले पाचक रसों से वंचित रखना है। जायकेदार चीजें स्वभावतः भूख से अधिक मात्रा में उदरस्थ होती रहती हैं। एक बार का किया हुआ आहार पचने से पहले ही उस पर नई खेप की बात लद जाती है। यही है अपच का प्रधान कारण। पेट में बिना पचा आहार सड़ता है। सड़न से उत्पन्न विषैली गैसें शरीर के विभिन्न अवयवों में पहुँच कर वहाँ चित्र-विचित्र की बीमारियों का सृजन करती हैं। इन गलतियों के रहते पौष्टिक भोजन भी कुपोषण के कारण अखाद्य ठहराये जाने वाले आहार से भी गया बीता बन जाता है।

आवश्यक नहीं कि गरीब लोगों को कीमती खाद्य सामग्री खरीदने के लिए दबाया और उनकी परिस्थिति का उपहास उड़ाया जाय। अच्छा यह है कि हरे शाक-भाजी बिना पकाये या कम पकाये खाने की आदत डाली जाय और उनमें पाये जाने वाले बहुमूल्य क्षार एवं खनिजों को पोषण में सम्मिलित होने का अवसर दिया जाय। सूखे अन्नों को अंकुरित करके तथा धीमी आग पर उबाल कर खाने का तरीका भी ऐसा है, जिससे मोटे अनाज मेवे जैसा गुण देने लगते हैं।

प्राकृतिक खाद्य-पदार्थों में अंकुरित आहार सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। अंकुरित होते समय बीजों में पायी जाने वाली प्रोटीन, विटामिन, एन्जाइम एवं मिनरल (खनिज लवण) की वृद्धि असाधारण रूप से होती है। अंकुरण के समय अन्न की जीवनी शक्ति विकासोन्मुख एवं अधिक सक्रिय होती है। उस स्थिति में एन्जाइम की मात्रा बीजों में अत्यधिक बढ़ जाती है जो शरीरगत चयापचय क्रिया को अधिक अच्छी तरह सम्पन्न कर रक्त-संचार व पाचन तंत्र को विशेष शक्ति प्रदान करते हैं।

तेज आग पर उबाल देने या भून देने से बीजों की अंकुरण क्षमता नष्ट प्रायः हो जाती है और जीवनी शक्ति भी बहुत मात्रा में कम हो जाती है। अंकुरित आहार कम मात्रा में ग्रहण किए जाने पर भी पोषण की आवश्यकता पूरी हो जाती है। अंकुरित करने के लिए कोई भी अनाज या बीज प्रयोग किया जा सकता है। उनमें परिवर्तन भी करते रहना चाहिए। सामान्यतया अंकुरण के लिए गेहूँ, चना, मूँग, मूँगफली, मटर, सोयाबीन आदि प्रयुक्त किये जाते हैं।

अंकुरित किए गये अन्न एवं बीजों में प्रोटीन की प्रचुरता हो जाती है। साथ ही जटिल एवं गरिष्ठ प्रोटीन का रूपांतरण सरल प्रोटीन अमीनो एसिड में हो जाता है। बीजों का अंकुरण के पश्चात् श्लेष्मा कारक एवं गैस उत्पन्न करने का दोष बहुत ही न्यून रह जाता है। अंकुरण के तीन-चार दिन बाद गेहूँ में विटामिन ‘सी’ की मात्रा तो 300 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसी प्रकार विटामिन बी काम्प्लेक्स की मात्रा भी अंकुरण की प्रक्रिया में कई गुना बढ़ जाती है।

अंकुरण की सरल विधि से सस्ता व सहज ही पौष्टिक भोजन हर किसी को उपलब्ध हो सकता है। इससे प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन एवं तत्व मिल जाते हैं, कुपोषण की समस्या का सहज समाधान इससे हो सकता है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अंकुरित आहार सस्ता, संतुलित व पूर्ण आहार है।

आहार के निर्धारण में अब एक और तत्व सामने आया है जिसे खाद्य की जीवनी शक्ति एवं प्राण ऊर्जा कहा गया है। यह रासायनिक संरचना से भिन्न है। अब तक प्रोटीन, स्टार्च, लवण, खनिज आदि रसायनों का संतुलन ही खाद्य का स्तर गिना जाता रहा है, अब उन पदार्थों में पाई जाने वाली प्राण चेतना का अन्वेषण वर्गीकरण भी चल पड़ा है और उस सूक्ष्म प्रभाव के आधार पर उपयोगिता एवं समर्थता का प्रतिपादन होने लगा है। भारतीय अध्यात्म विज्ञान की सूक्ष्मदर्शी सदा से पदार्थों की सात्विक, राजस, तामस प्रभृति की चर्चा करते रहते हैं। यह सब क्या है? उसकी व्याख्या पिछले दिनों तो नहीं हो सकी थी, पर अब इस नई खोज से पता लगता है कि पाये जाने वाले रसायनों से भी अधिक महत्वपूर्ण पदार्थों की प्राण ऊर्जा होती है।

प्राण शक्ति या सूक्ष्म शक्ति जिसे विज्ञान की भाषा में ‘वायोप्लाज्मा’ कहते हैं, सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में विद्यमान है, परंतु चेतन तत्वों विशेषतः जीव-जन्तु मनुष्य एवं पेड़-पौधों से अधिक सक्रिय रहती है। सन् 1968 में रूस के कुछ प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के एक संगठन ने अपने अनुसंधान कार्य का प्रकाशन कराया जिसमें उन्होंने लिखा था कि ‘‘समस्त चेतन प्राणियों, पौधों, मनुष्यों एवं जानवरों में एक स्थूल शरीर होता है, और एक सूक्ष्म शरीर। सूक्ष्म शरीर में ही प्राणशक्ति रहती है।’’

अमेरिका के येल यूनीवर्सिटी के डा. वर्र एवं नार्थाप ने दो वृक्षों के बीच एक सेन्सिटिव वोल्टमीटर जोड़कर निःसृत होने वाली प्राण शक्ति का मापन व अंकन का सफल प्रयोग किया। इस शोध कार्य में उन्हें कई वर्ष तक अथक परिश्रम करना पड़ा।

पौधों में प्राणशक्ति के निरंतर प्रवाह के संबंध में ‘क्रिस्टोफर बर्ड’ एवं ‘पीटर टॉम्किन्स’ ने अपनी ‘‘दी सीक्रेट लाइफ ऑफ प्लांट’’ पुस्तक में लिखा है कि पौधे भी अन्य जीवों एवं मनुष्य की तरह प्राण शक्ति के स्तर से प्रभावित होते हैं। पौधों की प्राणशक्ति मनुष्यों और जीव-जन्तुओं को प्रभावित करती है। जैव रसायन विशेषज्ञ ‘डा. एरन फ्रीड फेफर’ ने पशु, मनुष्य व पौधों की सूक्ष्म प्राणिक शक्ति का परीक्षण किया। उन्होंने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि प्राकृतिक भोज्य-पदार्थों में प्राण शक्ति का स्पंदन अधिक सशक्त होता है। शारीरिक आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक भोजन में पाये जाने वाले विटामिन, खनिज, लवण उपयुक्त वह पर्याप्त हैं। कृत्रिम खाद्य-पदार्थों में प्राण शक्ति की मात्रा न्यून होने से उनका जैविक महत्व बहुत कम होता है।

फांस के इंजीनियर ‘आंद्रेसिमेन्टन’ ने खाद्य-पदार्थों में निहित प्राण शक्ति को मापने का कार्य एक प्रकार का दोलन-यंत्र बनाकर किया। उनकी शोध से पता चला है कि अन्न, ताजे फल, हरी साग-सब्जियों आदि में प्राण शक्ति की अधिकता होती है। मांस में पाई जाने वाली प्राण-शक्ति न्यून एवं घटिया होती है, पकाने पर तो लगभग प्राण-शक्ति से रहित ही हो जाता है। सिमेन्टन महोदय के अनुसार भोजन पकाने की रासायनिक विधियों एवं सुरक्षित रखने की रासायनिक प्रक्रियायें हानिकारक हैं। उन्होंने अपने शोध प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखने, जीवनी शक्ति से भरपूर रखने के लिए अनाज, फल, साग-सब्जी जैसे उच्च शक्ति सम्पन्न खाद्य-पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए।

सात्विक आहार की विशेषता को अभी तक अनुभव नहीं किया जा रहा था। अब उस रहस्य की परतें खुल रही हैं और मांस जैसे तामस तथा स्निग्धता की भरमार वाले राजस पदार्थों की तुलना वह खाद्य कहीं अधिक लाभदायक हैं जिन्हें सतोगुण माना गया है। वे शरीर ही नहीं मन का भी परिपोषण और अभ्युदय करते हैं।

महर्षि वागभट्ट का वह उत्तर जो उन्होंने कपोत चरक को दिया था। अब विज्ञान की कसौटी पर अक्षरशः खरा उतरता जा रहा है। आरोग्य रक्षा और समर्थ शरीर बनाये रहने का यही उपयुक्त मार्ग भी है।


सफलता का आयु से क्या सम्बन्ध?

प्रगति की आकाँक्षा किसे नहीं होती? प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थिति से असंतुष्ट रहता है और उससे आगे बढ़कर उन्नत स्थिति को प्राप्त करना चाहता है। बहुत से इसके लिए प्रयास भी करते हैं और अनेकों सफल भी होते हैं। किन्तु अधिकाँश व्यक्ति वह प्राप्त नहीं कर पाते, जो प्राप्त करना चाहते हैं। कारण संकल्प का अभाव, प्रयत्नों में प्रखरता की कमी और तत्परता का न होना। बहुत से व्यक्ति युवावस्था में बड़े जोश-खरोश के साथ अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं, किन्तु थोड़े से प्रयत्न करने के बाद ही निराश हो जाते हैं। बहुतों की स्थिति ऐसी होती है, प्रयत्न और संघर्ष करते-करते युवावस्था बीत जाती है और वे अपने आपको वृद्ध समझकर हार थककर बैठ जाते हैं।

वृद्धावस्था क्या सचमुच जीवन की संध्या बेला है? इस प्रश्न का का उत्तर उनके लिए “हाँ” में ही होता है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। बहुत से व्यक्तियों ने जिसे वृद्धावस्था कहते हैं, इस उम्र तक सामान्य जीवन बिताया और उसके बाद उनमें प्रगति के लिए ऐसी उदात्त आकाँक्षा उत्पन्न हुई कि उसके बाद अपने प्रखर प्रयत्नों से उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान श्रीपाद दामोद सातवलेकर 60 वर्ष की आयु तक एक पाठशाला में ड्राईंग पढ़ाते थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और संस्कृत भाषा के क्षेत्र में इतना काम किया कि देखने वाले दंग रह गये। वेदों का शुद्ध पाठ तैयार करने से लेकर भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील स्वरूप प्रतिपादित करने तक के क्षेत्र में उन्होंने इतनी सफलता अर्जित की कि आज भी जहाँ संस्कृत के संबंध में कहीं कोई मतभेद उठता है तो उसके समाधान और निराकरण के लिए सातवलेकर के ग्रन्थों को ही आधार माना जाता है।

महात्मा गाँधी ने 45 वर्ष की अवस्था तक सामान्य जीवन जिया और इसके बाद वे एक क्रान्तिकारी संत के स्वरूप में उभरकर सामने आये। दादा भाई नौरोजी ने 50 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया तथा 60 वर्ष की आयु में बम्बई काउंसिल के सदस्य चुने गए। 61 वर्ष की अवस्था में वे काँग्रेस के सभापति बने। गोपालकृष्ण गोखले ने 40 वर्ष की आयु में ‘भारत सेवक समाज’ की स्थापना की थी। लोकमान्य तिलक ने यद्यपि 33 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया था किन्तु उनकी गतिविधियाँ 1905 में ही अधिक सक्रिय हुई, तब उनकी आयु 50 वर्ष थी। उसी समय उन्होंने गरम दल की स्थापना की थी।

टोमरूल लीग बनाते समय श्रीमती एनीबीसेण्ट की आयु 70 वर्ष की थी। उन्होंने 40 वर्ष की आयु के बाद ही सार्वजनिक क्षेत्र में पदार्पण किया था। इसी प्रकार 45 वर्ष की आयु के बाद राजनीतिक जीवन में प्रवेश करने वाले पं. मोतीलाल नेहरू 58 वर्ष की आयु में कांग्रेस के सभापति बने। डा. राजेन्द्र प्रसाद का प्रखर और सक्रिय जीवन 41 वर्ष की आयु के बाद ही आरम्भ हुआ।

यह तो खैर राजनैतिक जीवन से संबंधित उदाहरण हैं और सामान्यतः समझा जाता है कि राजनीति बूढ़ों का खेल है। इस क्षेत्र में व्यक्ति युवावस्था से प्रवेश करे, तभी वृद्धावस्था तक पहुँचने तक सफलता मिलती है, ऐसी धारणा है। किन्तु और क्षेत्रों में भी ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि प्रगति या सफलता का आयु से कोई संबंध नहीं है। वह किसी भी उम्र में पाई जा सकती है और वृद्धावस्था में अपने क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने वालों के तो ढेरों उदाहरण हैं। यूनानी नाटककार सोफोप्लीज ने 90 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिखा था। यद्यपि उन्होंने इसके पहले भी कई रचनाएं लिखी थी, पर जिन रचनाओं ने उन्हें साहित्यिक जगत में प्रतिष्ठित किया वे सभी अस्सी वर्ष की आयु के बाद लिखी गई थी। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि मिल्टन 44 की आयु में अंधे हो गये थे। अंधे होने के बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित किया और 50 वर्ष की आयु में अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखी। 62 वर्ष की आयु में उनकी एक और प्रसिद्ध कृति ‘‘पैराडाइज रीगेण्ड’’ प्रकाशित हुई। जर्मन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्ध कृति “फास्ट” 80 वर्ष की आयु में लिखी थी। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों से अग्रणी था, उन्होंने दर्शन के क्षेत्र में 60 वर्ष की अवस्था में ही प्रवेश किया था।

जार्ज बर्नार्ड शॉ 93 वर्ष की आयु तक इतना अधिक लिखते थे कि वे स्वयं 40 वर्ष की आयु में भी इतना नहीं लिख पाते थे। दार्शनिक वैनदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से दस घण्टे काम करते थे। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। जिनकी चर्चा विश्व साहित्य में होती है। बट्रैग्ड रसेल को 78 वर्ष की आयु में उस कृति पर पुरस्कार मिला जो उन्होंने 77 वर्ष की अवस्था में पूरी की थी। माटिस मैटर लिंक का देहान्त 88 वर्ष की आयु में हुआ। जिन दिनों वे मरे, उसके कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने अपनी अंतिम पुस्तक पूरी की थी। इस पुस्तक का नाम था ‘द एवार्ट ऑफ सेतु आल’ यह पुस्तक उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना समझी जाती है।

ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध अखबार ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लार्ड वीवनवर्क 80 वर्ष की अवस्था में भी दफ्तर में जमकर बैठते और काम करते थे। दार्शनिक काण्ट को 74 वर्ष की अवस्था में उनकी एक रचना के आधार पर दर्शन के क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली। 70 वर्ष की आयु के बाद चार वर्षों में उन्होंने ‘एंथ्रोपोलॉजी’ ‘मेटाफिजिक्स आफ ईथिक्स’ और ‘स्ट्राइफ आफ फैक्लटीज’ यह तीन पुस्तकें लिखी थीं, जिनने उन्हें दार्शनिक जगत में प्रतिष्ठित किया। टैनीसन ने अपना प्रख्यात ग्रन्थ ‘क्रासिंग द बार’ 83 वर्ष की आयु में पूरा किया। होब्स ने 88 वर्ष की आयु में ‘इलियड’ अनुवाद प्रकाशित कराया था। चित्रकार टीटान ने विश्व प्रसिद्ध कलाकृति ‘बैटल आफ लिमाँटो’ 98 वर्ष की आयु में पूरी की।

इंग्लैंड का इतिहास जिसने पढ़ा है, वे ग्लैडस्टन के नाम से अवश्य ही परिचित होंगे। ग्लैडस्टन ने 50 वर्ष की आयु में ब्रिटेन की राजनीति में प्रवेश किया और 70 वर्ष की आयु में राज्य का उत्तरदायित्व सम्भाला। आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ‘होमर’ पर उन्होंने जो भाषण दिया वह अत्यन्त शोधपूर्ण माना जाता है। वह जब प्रधानमंत्री बने तब उनकी आयु 79 वर्ष थी। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘ओडेसी आफ हाटस’ नामक ग्रन्थ की रचना की। वृद्धावस्था में भी वे चैन से नहीं बैठे रहे।

ग्लैडस्टन की तरह ही जार्जलायड भी ब्रिटेन के मूर्धन्य राजनेता रहे हैं। 75 वर्ष की आयु में भी उनकी कार्यक्षमता नौजवानों जैसी थी। चर्चिल ने दूसरे विश्व युद्ध में जब ब्रिटेन का प्रधान मन्त्रित्व सम्हाला तो उनकी आयु 80 वर्ष थी। जनरल मेक आर्थर 73 वर्ष की आयु में भी वैसे ही सक्रिय थे, जैसा 45 वर्ष की आयु में उल्लेखनीय है कि उन्होंने 45 वर्ष की आयु में ही सैनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण कमान सम्हाली थी।

आठवीं जर्मन सेना का सेनापतित्व जब पालशन हिण्डैन वर्ग को सौंपा गया था, तब उनकी आयु 67 वर्ष की थी। 78 वर्ष की आयु में वे पार्लियामेंट के अध्यक्ष चुने गए। नौ वर्ष तक उन्होंने यह दायित्व कुशलतापूर्वक सम्हाला और 87 वर्ष की अवस्था में स्वर्गवासी हुए। हैनरी फिलिप मिटेन जब फ्राँस के प्रधानमंत्री बने तब वे 84 वर्ष के थे। उसी देश की नेशनल असेम्बली के अध्यक्ष स्टवर्ड हैरियो 71 वर्ष की आयु में उस पद के लिए चुने गये। 84 वर्ष की आयु में जब उनका स्वर्गवास हुआ, तब तक वे उस पर के कर्तव्यों को बड़ी कुशलतापूर्वक निभाते रहे। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति सिगमन 80 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह क्रियाशील रहे।

कहा जा चुका है कि सफलता और कार्यक्षमता का आयु से कोई संबंध नहीं है। उत्साह, लगन और संकल्प बना रहे तो किसी भी आयु या स्थिति में युवा रहा जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदास 50 वर्ष की आयु के बाद रामचरित मानस लिखना आरम्भ किया था और दो वर्ष की अवधि में उसे समाप्त कर विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण देन देकर विश्व को उपकृत किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 90 वर्ष की आयु में अपना एक उपन्यास पूरा किया था।

यौवन अथवा सक्रियता का आयु विशेष से संबंध नहीं है। वह वृद्धावस्था में भी अक्षुण्ण रह सकता है तो बचपन में भी प्रतिभा बनकर फूट सकता है। कई बार यह सक्रियता अथवा क्षमता बचपन में ही आश्चर्यजनक रूप से विकसित होती देखी गई है। इसे सौभाग्य कहें अथवा पूर्वजन्मों के संचित संस्कार। परंतु संसार में ऐसी कई विभूतियाँ हुई हैं, जिन्होंने खेलने खाने की उम्र में ही अद्वितीय उपलब्धियाँ अर्जित कर दिखाई। मुगल सम्राट अकबर 14 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा था और 18 वर्ष की आयु में उसने बैरम खाँ को हटाकर स्वतंत्र रूप से कार्य भार सम्हाला था। सम्राट अशोक जब सिंहासनारूढ़ हुए थे तो उनकी आयु मात्र 20 वर्ष थी। छत्रपति शिवाजी ने मात्र 19 वर्ष की आयु में तोरण का किला जीता था। इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह ने भी 19 वर्ष की आयु में ही लाहौर पर विजय प्राप्त की थी। विश्व विजय के अभियान पर निकलते समय सिकन्दर की आयु मात्र 20 वर्ष थी। जूलियस सीजर ने भी 24 वर्ष की आयु में एक भयंकर डाकू गिरोह को गिरफ्तार किया था।

प्रसिद्ध साहित्यकार विक्टर ह्यूगो ने 14 साल की अवस्था तक तीन हजार से भी अधिक कविताएं लिख डाली थी। महाकवि गेटे ने 10 साल की उम्र में अपना पहला नाटक लिखा था। संत ज्ञानेश्वर ने गीता पर अपनी टीका ज्ञानेश्वरी 15 वर्ष की आयु में लिख डाली थी। सिगमंड फ्रायड ने 19 वर्ष की आयु में ही मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपना क्रान्तिकारी सिद्धान्त प्रतिपादित किया था।

प्रसिद्ध कवि गेटे ने 14 वर्ष की आयु में ही अपनी प्रसिद्ध रचना ‘थाडस इन द डिस्टेटो आव जीसस क्राइस्ट इन टू हेल’ पुस्तक लिखी और ख्याति अर्जित की। रूसी कवि पुश्किन ने 10 वर्ष की आयु में ही फ्रेंच भाषा में एक कविता और एक नाटक तैयार कर लिया था।

वैज्ञानिक क्षेत्र में कितनी ही ऐसी प्रतिभाएं हुई हैं जिन्होंने छोटी उम्र में ही बड़े आविष्कार किए। एली ह्विटवी ने 28 वर्ष की आयु कपास ओटाने की मशीन का आविष्कार किया। चार्ल्स मार्टिन हाल ने 23 वर्ष की अवस्था में विद्युत संश्लेषण द्वारा एल्युमीनियम तैयार करने की नई विधि पेटेण्ट कराई। सैम्युअल कोल्ट ने 26 वर्ष की आयु में ही रिवाल्वर का मॉडल तैयार किया, जिसे बाद में धातु का बनाकर 21 वर्ष की आयु में रिवाल्वर का आविष्कार कर दिया। एलेग्जेण्डर ग्राह्मवेल ने 20 वर्ष में टेलीफोन आविष्कार के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिया तथा 29 वर्ष की आयु में ही सफल टेलीफोन यंत्र का आविष्कार कर उसे पेटेण्ट करा लिया। वायुयान के आविष्कारक ‘विल्वट राइट’ और ‘आल्वर राइट’ बीस और तीस वर्ष की आयु के बीच ही वायुयान बनाकर उसको उड़ाने का परीक्षण करने लगे थे। शक्ति चालित वायुयान उड़ाकर जब उन्होंने पूरे संसार को आश्चर्यचकित कर दिया था तब आर्विल की आयु 32 वर्ष बिरबल की उम्र 36 वर्ष थी। बिजली का मतदान यंत्र पेटेण्ट कराने वाले वैज्ञानिक ‘कोलवर्ट’ की आयु मात्र 21 वर्ष थी। लोगों ने जब इस किशोर को देखा तो दंग रह गये।

वृद्धावस्था में युवकों की सी सक्रियता बरतने वाले और अल्पायु में ही प्रौढ़ परिपक्वता का परिचय देने वाले इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि सफलता अथवा प्रतिभा के विकास का आयु से कोई संबंध नहीं। आयु न तो कार्यक्षमता को मंद बनाती है और न ही उसे उत्तेजित करती है। कार्यक्षमता या सफलता का आधार है सुव्यवस्थित योजना, प्रखर बुद्धि और सघन प्रयास। इस आधार पर किसी भी आयु में सफल हुआ जा सकता है, प्रगति की जा सकती है।


निर्बलता एक अक्षम्य अपराध

नीति शास्त्र में कहा गया है- ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ अर्थात्- बलवान ही संसार के सुखों का उपभोग कर सकते है, निर्बल नहीं। इस तथ्य के प्रतिपादन से बलहीनों को हताशा और क्षोभ होना स्वाभाविक है परन्तु प्रकृति ने निर्बलता को कोई रोग, विवशता या दयनीय स्थिति नहीं माना है। मनीषियों ने निर्बलता को एक पाप कहा है, जिसका दण्ड सभी क्षेत्रों में भुगतना पड़ता है। प्रकृति के कण-कण से जब शक्ति अर्जित करने की प्रेरणा मिलती है और शक्ति संचय की सुविधाएं सर्वत्र उपलब्ध हैं तो आलस्य और अकर्मण्यता में पड़कर निर्बल क्यों रहा जाय? निर्बलता कोई स्थिति नहीं है, बल्कि वह आलस्य और अकर्मण्यता की ही परिणति है। यही कारण है कि निर्बलता चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक मनुष्य किसी भी दृष्टि से निर्बल हो तो उसे संबंधित क्षेत्र में प्रत्येक प्रयत्न का विपरीत परिणाम भुगतना पड़ता है।

निर्बल व्यक्ति अपने प्राकृतिक और जन्मसिद्ध अधिकारों से भी समुचित लाभ नहीं उठा पाता। प्रकृति की व्यवस्था का उस पर विपरीत प्रभाव ही पड़ता है और जो नियम या व्यवस्थाएं बलवानों के लिए लाभ पहुंचा सकती हैं, वे व्यवस्थाएं उसके लिए हानिकर सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए स्वास्थ्य खराब हो तो सामान्य आहार भी नहीं पचता। स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन कमजोर व्यक्ति को अरुचि कर लगता है। ऐसे व्यक्ति के लिए गीत वाद्य, मनोरंजन, सुख-सुविधाएं धन-दौलत सब कुछ व्यर्थ है। यहाँ तक कि वह चैन की नींद भी नहीं सो पाता। सर्वविदित है कि स्वास्थ्य खराब होने का कारण निर्बलता ही तो होती है। बलवान और पुष्ट शरीर में रोगाणु और स्वास्थ्य को नष्ट करने वाले विजातीय द्रव्य एक क्षण के लिए भी नहीं रहते। उनके प्रविष्ट करते ही मनुष्य की जीवनी शक्ति उसे नष्टकर डालती है। निर्बल व्यक्ति के लिए ऐसा कहाँ सम्भव हो पाता है?

यही बात बौद्धिक दृष्टि से निर्बल व्यक्तियों पर भी लागू होती है। संसार में जो भी श्रेष्ठ और सुँदर है उसका रस साहित्य में संचित है। मधुरता, प्रेम और सौंदर्यानुभूति सब कुछ का बोध और अनुभव साहित्य के माध्यम से ही होता है। दुर्भाग्य से कोई व्यक्ति यदि बौद्धिक निर्बलता का शिकार हो तो उसके लिए संसार के अतुल ज्ञान और आनन्द के भण्डार का कोई मूल्य ही नहीं है। अंधे व्यक्ति सुनकर और बहरे व्यक्ति पढ़कर साहित्य का लाभ उठा लेते हैं, किन्तु मंदबुद्धि लोग तो समर्थ और स्वस्थ रहते हुए भी उस रस माधुरी से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार मानसिक निर्बलता के कारण व्यक्ति प्रकृति द्वारा प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों और कष्ट कठिनाइयों में मनोबल सम्पन्न व्यक्ति आगे बढ़ते हैं, ऊंचे उठते हैं। इसके विपरीत मानसिक रूप से निर्बल व्यक्ति उन परिस्थितियों में निराश और किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं।

आत्मिक दृष्टि से निर्बल व्यक्तियों के लिए आध्यात्मिक क्षेत्र में किसी प्रकार की प्रगति कर पाना कहाँ सम्भव रहता है? उनके लिए तो वह आनन्द और वह शाँति दुर्लभ ही नहीं असह्य और अप्राप्य भी है, जिसे आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति प्राप्त कर जीवन को सफल बना लेते हैं।

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्रकृति की सभी शक्तियाँ मनुष्य के हित में ही काम करती हैं। आध्यात्मिक भाषा में इन्हीं शक्तियों को देवता कहा है। वेदों में सूर्य, चन्द्र, वरुण, पवन, अग्नि, इन्द्र आदि अनेक देवताओं का उल्लेख है। सर्वविदित है कि ये देवता प्रकृति की ही विभिन्न शक्तियाँ हैं। जल, वायु, ऊष्मा, खुला आकाश जैसी शक्तियाँ कभी किसी को हानि नहीं पहुँचातीं। किन्तु निर्बलों के लिए वे भी घातक बन जाती हैं। कहा भी गया है “देवोऽपि दुर्बलः घातकः” देवता भी दुर्बल के लिए घातक हैं। लोग अपनी असावधानी, आलस्य या प्रमादवश जीवन की सर्वोपरि आवश्यकताओं की और कोई ध्यान नहीं दे पाते। उनकी अपनी कमजोरी ही पोषक शक्तियों का विपरीत प्रभाव ग्रहण करती है।

‘‘देवोऽपि दुर्बलः घातकः” वाली उक्ति इस तथ्य से भी प्रमाणित होती है कि बलवानों के लिए सहायक सिद्ध होने वाले तत्व निर्बलों के लिए घातक बन जाते हैं। ऋतुओं का प्रभाव ही लें। सर्दियों में स्वस्थ व्यक्ति अपना स्वास्थ्य बनाते और शक्ति बढ़ाते हैं। यह ऋतु स्वास्थ्य और बलवर्धक तथा सक्रियता बढ़ाने वाली कही गई है। निरोग व्यक्ति इस ऋतु में अपना आरोग्यवर्धन करते हैं। परन्तु कमजोरों के लिए यही सर्दी, जुकाम, निमोनिया और गठिया जैसे रोगों का कारण बन जाती है। इस ऋतु में कमजोर लोग इन विकारों के शिकार हो जाते हैं तथा अपनी परेशानियों की शिकायत करने लगते हैं। स्वस्थ व्यक्ति इस ऋतु में प्रातःकाल की सुहानी धूप में प्रकृति से जीवनी शक्ति प्राप्त करता है जबकि कमजोर व्यक्ति को इन दिनों घर के भीतर बैठकर आग तापनी पड़ती है।

स्वास्थ्य और शाँति ही नहीं सम्मान और प्रतिष्ठा भी शक्तिशाली लोगों को ही मिलती है। कमजोर और क्षीणमना लोगों को हर कोई क्रूर दृष्टि से देखता है। शेर को उसके बल और स्फूर्ति के कारण ही जंगल का राजा कहा गया है। वन्य जन्तु तो उससे डरते ही हैं, मनुष्य भी सिंह का कम सम्मान नहीं करता। सामान्यतया सिंह को पराक्रम और शक्ति का प्रतीक समझा जाता है। उसे राज चिन्ह के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। इसके विपरीत निर्बल बकरी और खरगोश जंगली जानवरों से लेकर मनुष्य और देवता तक घबरा जाते हैं। उन्हें हर घड़ी अपने प्राण का भय बना रहता है। छोटे-छोटे पेड़ पौधे जो वर्षा ऋतु में उगते हैं किन्तु बसन्त ऋतु में सूख जाते हैं। जबकि उसी बसंत में बड़े वृक्ष लहलहाने लगते हैं, उनमें नई कोपलें फूटने लगती हैं।

अशक्त और निर्बल का अस्तित्व हर स्थान और हर स्थिति में असुरक्षित ही रहता है। उनके विकास में कोई भी सहयोगी नहीं बनता, ईश्वर तक भी उनकी घात लगाए बैठा रहता है। मृत्यु ऐसे ही तत्वों पर तो अपना कालपाश प्रथम फेंकती है। उत्तम की रक्षा, प्रकृति के विकास का सिद्धान्त है, उसका नियम है। इसलिए उसकी व्यवस्था में निर्बल और अशक्त लोगों को कदम-कदम पर खतरे तथा हानियाँ उठानी पड़ती हैं।

सफल सुरक्षित और सुखी जीवन के लिए बल सम्वर्धन की आवश्यकता स्वीकार की जानी चाहिए। इसी तथ्य की ओर युवकों का ध्यान आकर्षित करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर लिखा है। सर्वप्रथम आपको बलवान बनना पड़ेगा। शक्ति सम्वर्धन ही उन्नति का एकमात्र मार्ग है। इसी प्रकार परमात्मा और आत्मा के अधिक निकट पहुँचा जा सकता है। कोई भी उपदेश हो, व्यक्तिगत या सार्वजनिक शक्ति और सामर्थ्य के द्वारा ही तो प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी क्षेत्र में अनायास सफलता नहीं मिलती। उसके लिए तो निरन्तर प्रयत्न करते हुए अपनी शक्तियों को विकसित करना होता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सभी वस्तुएं और उपलब्धियाँ स्वयं सिद्ध होती हैं। लेकिन यह भी सच है कि उनको प्राप्त करने के लिए पात्रता और सुरक्षित रखने के लिए शक्ति का विकास आवश्यक है। इस पात्रता का विकास अनवरत श्रम साधना द्वारा ही किया जा सकता है। संसार में ज्ञान का अभाव नहीं है, अभाव है उस बौद्धिक सामर्थ्य का जिसके कारण हम उसे प्राप्त करने में अक्षम हैं। शिक्षा साधना द्वारा उस क्षमता का विकास करना होता है। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए पात्रता और शक्ति के विकास का यही नियम लागू होता है। इसीलिए निर्बलता को एक अपराध, एक पाप कहा गया है, जो पथभ्रष्ट करता और विपत्तियों के गर्त में धकेल देता है। प्रकृति के विधान में निर्बलता का कठोर दण्ड लिखा गया है। यदि उसे दूर नहीं किया गया तो दण्ड भाजन बनना ही पड़ेगा।


मानसिक असन्तुलन, स्वास्थ्य संकट का मूल कारण

अमेरिका के मनःशास्त्री डा. जान ए. शिण्डलर ने अपनी पुस्तक “रुग्णता की गहराई” में लिखा है- “आहार विहार की अनियमितता से जितने रोग होते हैं उसकी तुलना में मानसिक असंतुलन के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों की संख्या कहीं अधिक है।”

शरीर की संरचना ऐसी है कि वह बाहरी हमलों, टूट-फूटों और प्रतिकूलताओं से जूझती और छुट-पुट गड़बड़ियों का मुकाबला करती रहे सके। अन्य प्राणियों को भी प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता है और आघातों को सहने तथा कष्टकर स्थिति से होकर गुजरने के लिए विवश होना पड़ता है। इतने पर भी उनके शरीर गड़बड़ाते नहीं, पटरी बिठा लेते हैं और टूट-फूट को सम्भाल कर अपनी गाड़ी चलाते रहते हैं। चोटें तो लगती हैं, पर उनमें से किसी को बीमारियों के चंगुल में फंसकर कराहते रहने की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

मनुष्य ही है जो मानसिक असंतुलन उत्पन्न करता और उनके विक्षोभों के फलस्वरूप शरीर के विभिन्न अवयवों को सामान्य कार्य पद्धति में अवरोध उत्पन्न करता है। फलतः बीमारियाँ उसे आ घेरती हैं।

शरीर यात्रा में रक्त संचार का कितना ही महत्व क्यों न हो वस्तुतः उसका नियंत्रण केन्द्र मस्तिष्क में रहता है। हृदय पोषण देता है यही सही है, पर उसमें प्रोत्साहन एवं नियमन की क्षमता नहीं है, यह कार्य मस्तिष्क का है। उसी के ज्ञान तन्तु मेरुदण्ड के माध्यम से समस्त शरीर में फैलते हैं और निर्देश देकर सारे काम कराते हैं। मस्तिष्क में नींद आने लगे तो अन्य अंग सहज ही शिथिल होते चले जाते हैं। आकुंचन-प्रकुँचन, निमेष, उन्मेष, श्वास-प्रश्वास जैसी क्रियाएं अचेतन मन-संस्थान के इशारे पर ही चलती हैं। जीवनी शक्ति भोजन से नहीं वरन् साहसिकता और प्रसन्नता के आधार पर मिलती और पनपती है। यदि इस केन्द्र में गड़बड़ी चले तो उसका प्रभाव शरीर के विभिन्न अवयवों पर पड़े बिना रह नहीं सकता।

रोगों की जड़ शरीर में हो तो काय चिकित्सा में सहज सुधार होना चाहिए। पोषण की पूर्ति आहार से होनी चाहिए और विषाणुओं को औषधि के आधार पर हटाने में सफलता मिलनी चाहिए। किन्तु देखा जाता है कि जीर्ण रोगियों की काया में रोग बुरी तरह रम जाते हैं कि उपचारों की पूरी-पूरी व्यवस्था करने पर भी हटने का नाम नहीं लेते। एक के बाद दूसरे चिकित्सक और नुस्खे बदलते रहने पर भी रुग्णता से पीछा नहीं छूटता। इलाज के दबाव में बीमारियाँ रंग रूप बदलती रहती हैं, पर जड़ें न कटने से टूटे हुए फिर नई कोपलों की तरह उगते रहते हैं। जड़ों को खुराक मिलती रहे तो टहनियाँ तोड़ने से भी पेड़ सूखता नहीं है।

शरीर और मनःशास्त्र के मूर्धन्य विशेषज्ञ डा. हेन्स सीली ने अपने अस्पताल के प्रायः तीन हजार रोगियों को कई प्रकार से जाँच पड़ताल की और वे इस नतीजे पर पहुँचे कि पुराने रोगियों में से अधिकाँश की व्यथा मनःक्षेत्र की विकृतियों से संबंधित थी। दवादारू के प्रयोग उन पर कारगर नहीं हुए। किन्तु जब मानसोपचार आरम्भ किया गया और उनके चिन्तन क्षेत्र में घुसी हुई अनुपयुक्त मान्यताएं एवं विचारणाएं हटाई गईं तो वे बिना दवादारू के ही अच्छे होने लगे और खोया हुआ स्वास्थ्य पुनः वापिस प्राप्त कर सके।

सत्ताईस साल के प्रयोगों के उपराँत डा. सीली का निष्कर्ष यह है कि गर्दन एवं कमर दर्द के रोगियों में से 75 प्रतिशत, थकान, तनाव और सिर-दर्द वालों में से 80 प्रतिशत, उदर रोगियों में 70 प्रतिशत, गाँठों की जकड़न बालों में 64 प्रतिशत और रक्तचाप हृदय रोगियों में 30 प्रतिशत मानसिक असंतुलन के कारण इन व्यथाओं में फंसे और मूल स्थिति यथावत बने रहने के कारण अनेकों चिकित्साएं परिवर्तित करते रहने पर भी अस्वस्थ ही बने रहे। व्यथा से छुटकारा तब मिला जब वे अपनी मान्यताओं और असंतुलनों से छूटने के उपाय अपनाने पर सहमत हुए।

जर्मनी की मनोविज्ञान शोध परिषद् ने सम्पन्न और निर्धन परिवार के एक-एक सौ बच्चे स्वास्थ्य परीक्षण के लिए चुने। पाया गया कि सुविधा एवं असुविधा के कारण उनके स्वास्थ्य में कोई अंतर नहीं पड़ा। बढ़िया और घटिया भोजन के रहते हुए भी उनके बीच स्वास्थ्य संबंधी कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। किन्तु जब दूसरे सौ-सौ बच्चों इस दृष्टि से जाँचा गया कि पारिवारिक परिस्थितियों का उन पर क्या असर पड़ता है तो तथ्य बिल्कुल दूसरे ही सामने आये। मालूम पड़ा कि जिनके परिवार में तनाव, मन-मुटाव, असंतोष, विग्रह रहता था बच्चे न केवल दुर्बल पाये गये वरन् बीमारियों तथा बुरी आदतों के भी शिकार बने हुए थे। इसके विपरीत जिन घरों में स्नेह, सौजन्य और सहयोग का वातावरण था वे न केवल शारीरिक दृष्टि से सुदृढ़ वरन् मानसिक दृष्टि से भी कुशल पाये गये।

अब यह तथ्य क्रमशः अधिक उजागर होता जा रहा है कि शरीर मात्र रासायनिक पदार्थों का ढ़ाँचा नहीं है वरन् उसकी दृढ़ता एवं क्षमता पर मनःस्थिति का भारी प्रवाह रहता है। आहार-विहार का कितना ही महत्व क्यों न हो, पर मानसिक संतुलन के बिना सुविधाओं और अनुकूलताओं के रहते हुए सुदृढ़ आरोग्य प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं। इस निष्कर्ष पर पहुँचने के उपराँत अब चिकित्सा क्षेत्र के मूर्धन्य यह सोचने लगे हैं कि मानवी स्वास्थ्य की समस्याओं का स्थायी समाधान उसके चिन्तन में हल्कापन लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। जो मनोविकारों से दबे हुए हैं उन्हें उनसे छुड़ाने की प्रक्रिया को चिकित्सा विज्ञान में सम्मिलित करना चाहिए।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक चिकित्सक रेबेका ने अनेकों रोगियों की चिकित्सा के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला कि बेहद अहंकार की भावना से शरीर के कई अंग कठोर हो जाते हैं और व्यर्थ अहंकारी जीवन जीने तथा असली रूप छिपाने से हृदय कठोर हो जाता है और मूत्राशय में पथरी रोग पनपता देखा गया।

घृणा, ईर्ष्या, क्लेश-कलह के भावों से भीतर नसों में रस या रक्त प्रवाह मंद हो जाता है। इन्हीं महिला चिकित्सक का मत है कि निरशंक, प्रसन्नता और निर्भय भावना शरीर के भीतरी अंगों में तेल मालिश का काम करती है।

देखा गया है कि मन के उतार-चढ़ावों का प्रभाव शरीर पर तत्काल पड़ता है। क्रोध आने से चेहरा लाल पड़ जाता है- रक्त संचार की गति बढ़ जाती है, शरीर काँपने लगता है। इसके विपरीत शोक के समय चेहरा पीला पड़ जाता है आदमी चिन्तित व बेहाल हो जाता है। बार-बार क्रोधित या आवेशित होने से आमाशय, पक्वाशय, संचार, तिल्ली, जिगर, रक्तवाहिनियों आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जबकि भय व शोक के समय रक्तवाहिनियां संकुचित हो जाती हैं। रक्त प्रवाह धीमा पड़ जाता है। जिससे नाना प्रकार की बीमारियाँ धर पकड़ती हैं।

भले या बुरे विचार अपना प्रभाव धीरे-धीरे मनुष्य की मनःस्थिति पर छोड़ते-छोड़ते स्थायी रूप धारण कर लेते हैं जिससे उनके ही अनुरूप मन का स्थायी निर्माण होता है। सद्विचारों से जहाँ शारीरिक, मानसिक कार्यक्षमता की वृद्धि होती है उसके विपरीत कुविचारों का दुष्परिणाम यह होता है कि रक्तचाप, मधुमेह, अपच, नपुँसकता आदि के रोग प्रकट होने लगते हैं। इस वर्ग के रोगों को मानस रोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

स्वास्थ्य समस्या का वास्तविक समाधान खोजने वाले रोगियों, विचारकों एवं चिकित्सकों को इस तथ्य को समझना होगा कि आरोग्य का स्थिर रहना एवं गड़बड़ाना अधिकतर मानसिक संतुलन पर निर्भर रहता है। अवाँछनीय चिन्तन से बचकर हल्की-फुल्की जिंदगी जीने की नीति पसंद की जा सके तो जागृत दिखने वाली स्वास्थ्य समस्या को सरलतापूर्वक सुलझाया जा सकता है।


श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता

विचार दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य आदतों से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन् कई बार तो उसे वे अपने अनुरूप करा लेने के लिए विवश तक कर देती हैं भले ही परिस्थितियाँ अनुकूल न हो। नशेबाजी जैसी आदतें इसका उदाहरण हैं। स्वास्थ्य, पैसा, यश आदि की हानियों को समझते हुए भी नशे के आदी मनुष्य नशा करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। छोड़ने की बात सोचते हुए भी वे वैसा कर नहीं पाते। कारण कि विचारों की तुलना में आदतों की सामर्थ्य अत्यधिक होती है। अनुपयोगी होते हुए भी वे कई बार इतनी प्रबल होती हैं कि पूरा करने के अतिरिक्त और कोई चारा दिखाई नहीं पड़ता। भले या बुरे जीवन क्रम में जितना योगदान आदतों का होता है उतना और किसी का नहीं।

आदतें, आसमान से नहीं उतरतीं। विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लम्बा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाती है और उसे अपनाये रहने में जितना समय बीतता जाता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। वह परिपक्वता कालान्तर में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों। सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवन क्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।

आदतें बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। यह आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती हैं। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं।

बुरी आदतें अक्सर दूसरों की देखा-देखी या सम्बद्ध वातावरण के कारण क्रियान्वित होती और स्वभाव का अंग बनती चली जाती हैं। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर लुढ़कने का है। इन दिनों लोक प्रवाह भी अवांछनियता का पक्षधर ही बन गया है। दोस्ती गाँठने वाले चमकदार व्यक्तियों में से अधिकाँश की आदतें घटिया स्तर की होती हैं। उनके प्रभाव संपर्क से भी वैसा ही अनुकरण चल पड़ता है। इस प्रकार अनायास ही मनुष्य बुरी आदतों का शिकार बनता जाता है। यही है वह चंगुल जिसमें जकड़े हुए लोग हेय जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।

जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोड़ा या बदला भी जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास यदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनियताओं से जूझने के तो अनेक उपाय हैं, पर आन्तरिक दुर्बलताओं से एकबारगी गुंथ जाना और उन्हें पछाड़ कर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फंसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन होने पर उसका दोष जिस-तिस पर मढ़ते रहते हैं। किन्तु वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए- सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए- सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हों उन्हें छोड़ने, बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए। स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।

अनगढ़ स्थिति में आमतौर से सभी मनुष्य कुसंस्कारी होते हैं। जीव ने क्रमिक विकास के लम्बे रास्ते पर चलते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। महत्वाकाँक्षा ने अधिक उत्तम परिस्थिति प्राप्त करने के लिए तद्नुरूप मनःस्थिति बनाई है। सदुद्देश्य के लिए किये गये प्रयत्नों में नियति भी सहायक होती है और ईश्वर की अनुकम्पा भी। अस्तु जीवधारी को उच्च स्तरीय स्थिति तक पहुँचने की अभिलाषा उसे वहाँ ले आई जहाँ सृष्टि का मुकुट-मणि मनुष्य कहलाने का गर्व-गौरव उपलब्धि हो सके।

इतने पर भी अनेकों में कुसंस्कारों का अभ्यास अभी भी बना हुआ है जो निम्न योनियों की विषम परिस्थितियों में भले ही स्वाभाविक रहे हैं, पर आज उन्हें अपनाये रहने में हानि ही हानि है।

मानवी प्रगति के मार्ग में अत्यन्त छोटी किन्तु अत्यन्त भयानक बाधा है- अनियमितता की आदत। आमतौर से लोग अस्त-व्यस्त पाये जाते हैं। हवा के झोंकों के साथ उड़ते रहने वाले पत्तों की तरह कभी इधर कभी उधर कुदकते-फुदकते रहते हैं। निश्चित दिशा न होने से परिश्रम और समय बेतरह बर्बाद होता रहता है। धीमी चाल से चलने की स्वल्प क्षमता रखते हुए भी सतत् प्रयत्न से कछुए ने बाजी जीती थी और बेतरतीब उछलने-भटकने वाला खरगोश अधिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी पराजित घोषित किया गया। सामर्थ्य का जितना महत्व है उससे अधिक महत्ता इस बात की है कि जो कुछ उपलब्ध है उसी को योजनाबद्ध रूप से, नियत क्रम व्यवस्था अपनाकर, सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाय। जो ऐसा कर पाते हैं वे ही क्रमिक विकास के राजमार्ग पर चलते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचते हैं। जो इस ओर ध्यान नहीं देते उन्हें योग्यता एवं सुविधा के रहते हुए भी पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े रहना पड़ता है। जबकि सुनियोजित जीवनचर्या बन सकने वाले एक के बाद दूसरी पीढ़ी पर चढ़ते हुए वहाँ पहुँचते हैं जहाँ साथियों के साथ तुलना करने पर प्रतीत होती है कि कदाचित किसी देव दानव ने ही ऐसा चमत्कार प्रस्तुत किया हो, पर वास्तविकता इतनी ही है कि प्रगतिशील ने नियमितता अपनाई। अपने समय, श्रम और चिन्तन को एक दिशा विशेष में संकल्पपूर्वक नियोजित रखा। इसके विपरीत दुर्भाग्य का पश्चाताप उन्हें सहन करना पड़ता है, जो लम्बी योजना बनाकर उस पर निश्चयपूर्वक चलते रहना तो दूर अपनी दिनचर्या बनाने तक की आवश्यकता नहीं समझते और बहुमूल्य समय को ऐसे ही आलस्य प्रमाद की अस्त-व्यस्तता में गंवाते रहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्य और क्रम बनाकर चलने वाली चींटी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है जब कि प्रमादी गरुड़ ऐसे ही जहाँ-तहाँ पंख फड़फड़ाता और बीट करता दिन गुजारता है।

अच्छी आदतों में सर्वप्रथम गिनने योग्य है- नियमितता। समय और कार्य की संगति बिठाकर योजनाबद्ध दिनचर्या बनाने और उस पर आरुढ़ रहने का नाम नियमितता है। उसके बन पड़ते ही चिन्तन को विचार करने के लिए एक दिशा मिलती है। व्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर चलने से शरीर को उसमें संलग्न रहने की इच्छा रहती तथा प्रवीणता मिलती है। फलतः सूझबूझ के साथ निश्चित किया गया कार्यक्रम सरलता और सफलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है।

पराक्रमों में सबसे अधिक महत्व का वह है जिसमें अपनी अनगढ़ आदतों को सुधारने का श्रेय पाया जा सके। बाहरी संघर्षों से जूझने और कठिनाइयों को हटाने से दूसरे लोग भी सहायता कर सकते हैं और परिस्थिति वश भी श्रेय मिल सकता है किन्तु अनुपयुक्त आदतों को बदलना मात्र अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर ही रहता है इसलिए उसे प्रबल पराक्रम की संज्ञा दी गई है और ऐसे लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा गया है।

छोड़ने, बदलने, सुधारने, निखारने योग्य आदतें अनेकों हैं, पर उनमें प्रथम और प्रमुख है- नियमितता। अर्थात् समय, श्रम और चिन्तन को किसी सुनिश्चित दशा में निरन्तर गतिशील रखना।


हंसोड़ स्वभाव -एक दैवी वरदान

मानवी सद्गुणों में प्रसन्न रहना मूर्धन्य है। इससे चित्त हलका रहता है और प्रतिकूलताओं के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव से सहज ही बचाव होता रहता है। उत्तरदायित्वों को पूरी तरह निबाहते हुए भी चिन्तन का स्तर इतना परिष्कृत होना चाहिए कि परिस्थितियों को अनावश्यक महत्व न दिया जाय, जो तिल का ताड बनाते हैं। सामान्य सी प्रतिकूलता देखकर चिन्तित, भयभीत, निराश होने लगते हैं उन्हें वास्तविक कठिनाई से कई गुना कष्ट उठाना पड़ता है। मनःस्थिति को यदि सन्तुलित और हल्की-फुल्की रखा जा सके तो फिर जीवन में आते-जाते रहने वाले प्रिय एवं अप्रिय प्रसंग इतना दबाव नहीं डाल सकते कि प्रसन्नता और सरलता से रहित भारभूत जीवन जीने के लिए विवश होना पड़े।

यों सामान्यतया सफलता में और असफलता में प्रसन्नता होती है और असफलता एवं प्रतिकूलता में अप्रसन्नता का सहज उभार आता है। किन्तु साथ ही इतना भी है कि वह चमक बिजली कोंधने की तरह क्षणिक होती है और घटना क्रम पुराना होते ही अभ्यस्त आदत चरितार्थ होने लगती है। जिनका स्वभाव खीजने का है वह सफलता का आनन्द तक नहीं उठा पाते, कुछ ही घड़ियां बीतने पर मुँह लटकाये दिखने लगते हैं। इसके विपरीत जिनने अपने दृष्टिकोण में प्रसन्नता ढूंढ़ते रहने की कलाकारिता का समन्वय किया है वे कठिनाइयों के बीच भी अपनी विनोदी वृत्ति के कारण मुस्कराने से लेकर खिल-खिलाने तक के अवसर खोज लेते हैं।

हंसने-हंसाने की आदत एक दैवी वरदान है। जिसे वह मिला हो उसे बड़भागी ही माना जाना चाहिए। उदार लोग दूसरों को कुछ उपहार देकर उनका दुख हरते और आनन्द बंटाते देखे गये हैं। यह कार्य निर्धन व्यक्ति भी सरलतापूर्वक कर सकते हैं। अपनी हंसी का उपहार सहज ही दूसरों तक जा पहुँचता है उनके मन का बोझ हलका करने में इतनी सहायता करता है जितना मुफ्त में अन्न, वस्त्र बाँटने वाले भी नहीं कर सकते। मानसिक स्वास्थ्य का मूल्य शारीरिक आरोग्य से भी बढ़कर है। प्रसन्न रहना अमीरों के वैभव से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

हास्य को विद्वान स्टैनिसलार ने आत्मा का गुण कहा है। उनका कथन कितना उपयुक्त है- ‘‘अच्छा हास्य आत्मा का हास्य है, उदासीनता उसके लिए विष है” आत्मा के परिष्कार, मनःसंतुलन एवं स्वस्थ रहने के लिए हास्य निःसंदेह बहुत ही महत्वपूर्ण है।

दार्शनिक जे. गिल्वर्ट ओकले ने आदमी के लिए हंसना अनिवार्य बताया है। न हंसने एवं न मुस्कराने वाला व्यक्ति वस्तुतः रोगी होता है। उत्तम शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के लिए हंसना भोजन की तरह ही आवश्यक है। मार्शियल ने कहा है- “आप यदि बुद्धिमान हैं तो हंसिये। एक छोटी से छोटी खुशी मनुष्य के बड़े से बड़े दुख को भी ढ़क लेती है।”

अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार ड्राइडन का कथन है कि “हंसना एक बहुत ही अच्छी विशेषता है चाहे उसका कारण कुछ भी हो।”

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से तो जी खोलकर हंसना स्वयं में एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्यप्रद टॉनिक है और हंसते रहने वाले- प्रसन्न चित्त रहने वाले- व्यक्तियों का शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

‘ह्यू फलैण्ड ने खूब खिल-खिलाकर हंसना पाचन के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यायाम बतलाया है। ‘डेनी’ का कहना है कि “मनुष्य के पास देने के लिए बहुत कुछ है। हंसी के फूल और प्रेम का सागर इन दोनों की कोई कीमत नहीं लगती। स्वयं खिलो और और अन्यों को खिलाते चलो।”

चित्त की प्रसन्नता के संबंध में गीता के अध्याय दो के 65 वें श्लोक में कहा गया है-

“प्रसादे सर्व दुखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसौ ह्याशुबुद्धि पर्यवतिष्ठते॥’’

अर्थात्- “चित्त प्रसन्न रहने से सब दुखों की निवृत्ति हो जाती है- उनकी हानि हो जाती है। जिसको आन्तरिक प्रसन्नता चित्त की प्रफुल्लता, उल्लास प्राप्त हो जाता है उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है”। मानसिक संतुलन, स्थिरता, समस्वरता बनाये रखने के लिए मन की प्रसन्नता आवश्यक है।

गाँधीजी ने प्रसन्नता एवं हंसी के संबंध में लिखा है- ‘‘हंसी मन की गांठें खोल देती है- हमारे मन की ही नहीं सभी के मन की। हंसी हृदय की ऐसी पवित्र उमंग भरी गंगा है जो सबको शीतलता प्रदान करती है। भीतर का विषाद और अवसाद हंसी के तेज झोंकों से रुई के कतरों की भाँति नष्ट हो जाता है।’’

खिल-खिलाकर हंसने की आदत से शरीर निरोग रहता है। हंसने से फेफड़े मजबूत होते हैं। रक्तसंचार ठीक होता है। मन के विकार हंसने से दूर होते हैं। श्री केरीबोर ने तो हंसी व उल्लास को यौवन की संज्ञा दी है उनका कथन है- ‘‘हास्य यौवन का श्रृंगार है। जो व्यक्ति यौवन का श्रृंगार नहीं कर सकता उसके पास यौवन कैसे टिक सकता है? हंसने का प्रफुल्ल रहने का स्वभाव बनाइये, यौवन सदा आपके साथ रहेगा।”

जार्ज बर्नार्डशॉ ने एक जगह कहा है- ‘‘हंसी की सुँदर भूमि पर जवानी के पुष्प खिलते हैं और जीवन को सुगंध से भर देते हैं। जवानी को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए आप खूब जी खोलकर हंसा कीजिए।’’

अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियां सभी के जीवन में आती हैं। ऐसा किसी महापुरुष के जीवन में भी कभी नहीं हुआ कि सदैव उनको अनुकूलताएं, सुविधाएं ही मिली हों। वास्तविकता तो यह है कि महामानवों को अत्यधिक प्रतिकूल विकट स्थिति का सामना करना पड़ा है। उसी से उनकी प्रतिभा निखरी है। भयंकर प्रतिकूलता की स्थिति में भी वे हंसते-हंसते उनका सामना करते हुए आगे बढ़े हैं।

आज मनोविज्ञान की आधुनिकता शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुक्त रूप से हंसना शारीरिक स्वास्थ्य के लिए तो आवश्यक है ही मानसिक स्वास्थ्य एवं मनःसंतुलन के लिए भी वह उतना ही आवश्यक है। जीवन में रोग, चिन्ता, उद्वेगों तथा तनावों से मुक्त रहकर आनन्दित रहने के लिए संतोष वृति का होना जरूरी है। अधिकाँश रोगों एवं दुखों का मुख्य कारण अधिकतर लोगों में असंतोष का होना है। इस असंतोष की आग से बचने का रास्ता है- जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण और उसे हास्य एवं प्रफुल्लतापूर्वक खेल मानकर चलने वाली मनःस्थिति। स्वास्थ्य की कुंजी प्रफुल्ल जीवनचर्या में ही निहित है।

आध्यात्मिक जीवन पथ पर चलने वाले साधकों को विनोदी एवं प्रफुल्ल प्रकृति का होना प्रथम चरण है। प्रत्येक बात में हास्य-विनोद का एक पहलू होता है। यह एक दैवी गुण है जो आस-पास के लोगों तक को प्रफुल्लता से आनन्दित कर देता है। रोग उत्पन्न होने पर मनुष्य कभी अपने भूत, कभी भविष्य के बारे में विश्लेषण करने लगता है। बेसिर पैर की कुकल्पनाएं करने लगता है और चिन्ताओं को अपने मस्तिष्क में डेरा डालने के लिए आमंत्रित कर लेता है। परिणाम यह होता है कि निश्चिन्त, उन्मुक्त जीवन स्वप्न बनकर रह जाता है। सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाय तो चिन्ताएं अस्तित्वहीन होती हैं और चिन्ता एक भयानक मनोरोग है जो अन्यान्य अनेकों शारीरिक, मानसिक कष्टों को भी ले आता है। इससे मुक्त होने का उपचार एक ही है कि परिस्थितियों के दूसरे पक्ष को देखना जो हास-परिहास से परिपूर्ण है। पर्यवेक्षण करने पर पता लगेगा कि जिन्हें बहुत बड़े अवरोध के रूप में कल्पित कर लिया गया वे मात्र छोटे-मोटे कंकड़-पत्थर थे और ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है। महत्वहीन बातों को बहुत महत्व दे दिया गया, जिनका न कोई आधार रहा होता और न उद्गम।

तथ्य को समझा जाय तो किसी भी परिस्थिति में आशावादी दृष्टिकोण, संतोष वृति एवं उत्साह को अपनाते हुए प्रसन्न और प्रफुल्ल रहा जा सकता है। विपरीत परिस्थितियों में ही तो मानसिक समस्वरता बनाये रखने में चित्त की प्रसन्नता की कसौटी है। अनुकूल परिस्थितियों में तो सभी मोद मनाते रहते हैं। मन की प्रफुल्लता से जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है, रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ती है।

कैलीफोर्निया की एक अमीर महिला सिम्पसन बहुत समय तक चिन्तित एवं उद्विग्न रहने के परिणाम स्वरूप अनिद्रा रोग से ग्रसित हो गयी। उसका जीवन उसे असह्य लगने लगा था। उसको एक मनोचिकित्सक ने भारी फीस वसूल करने के उपराँत एक रामबाण उपचार बताया कि वह दिन में कम से कम तीन बार खूब खिलखिलाकर हंसा करें। चिकित्सक के निर्देशानुसार उसने बिना किसी कारण कई बार खिलखिलाना शुरू कर दिया। केवल इसी से कुछ ही दिनों में उसे ठीक प्रकार से नींद आने लगी और स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक लाभ हुआ।

प्रसन्नता प्रकृति की दी हुई सबसे महत्वपूर्ण पुष्टाई है। शारीरिक स्वस्थता एवं मानसिक उत्साह बढ़ाने में यह अचूक उपचार है।

“सैटर डेरिब्यू” के सम्पादक नार्मन कजिन्स ने अपने गंभीर लकवे से ग्रस्त शरीर को हास्य एवं जिजीविषा के सहारे नियंत्रित करने में सफलता पाई। कजिन्स महोदय ने मात्र विटामिन ‘सी’ के कुछ इन्जेक्शन भर दवा के नाम पर लिए थे। उनका कथन है- ‘‘औषधि विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहा है और औषधियों के सहयोगियों में हास्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।” वस्तुतः मुक्त कण्ठ से हंसना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी है।


स्वास्थ्य साधन के लिए, उपवास का उपयोग

शरीर में सामान्य विकार उत्पन्न होते ही रहते हैं। मशीनें चलती हैं तो उनके कलपुर्जे घिसते हैं और उनमें खराबी आती है। शरीर भी अनेक विजातीय तत्वों के संपर्क में आकर किसी न किसी विकार में ग्रस्त होता रहता है। यह न अस्वाभाविक है तथा न ही आश्चर्यजनक। शरीर में स्वाभाविक रीति से विकार उत्पन्न होते हैं तो प्रकृति ने उनके निष्कासन की भी व्यवस्था कर दी है। वह व्यवस्था स्वयमेव चलती रहती है।

फिर भी कभी कोई विकार ज्यादा मात्रा में उत्पन्न जो जाते हैं तो उनके लिए उपचार की आवश्यकता पड़ती है। प्रश्न यह है कि उपचार किस प्रकार किया जाए? प्रचलित उपचार तो दवाओं और औषधियों का ही है लेकिन चिकित्सा विज्ञानी अब औषधोपचार से लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक अनुभव कर रहे हैं।

शिकागो के ‘इन्टर नेशनल कालेज आफ ड्रगलेस फिजिक्स’ के अधिकाँश प्राध्यापक डाक्टर थे, उन्होंने दवाओं की अनुपयोगिता को अच्छी तरह समझ लिया था। वहीं के एक छात्र ‘स्टेनली लीफ’ ने स्वास्थ्य और रोग की वास्तविकता को समझ कर रोगों को दूर करने के लिए उपवास एवं प्राकृतिक चिकित्सा का ही आश्रय लिया।

‘स्टेनली लीफ’ असाध्य एवं कठिन रोगों का उपचार उपवास के द्वारा किया करते थे। बर्लिन की श्रीमती स्मिथ को पेट की भयानक बीमारी थी डाक्टरों ने अपनी असमर्थता प्रकट की दी, परन्तु स्टेनली लीफ ने उन्हें 39 दिनों का उपवास कराकर ठीक कर दिया।

उनके एक भाई अफ्रीका में रहते थे, उनके पैर में विषाक्त फोड़ा हो गया था। डाक्टरों से आपरेशन के अतिरिक्त और कोई उपचार नहीं बन पड़ रहा था। स्टेनली लीफ ने उन्हें उपवास कराया। एक सप्ताह में आश्चर्यजनक लाभ हुआ। डाक्टर जो आपरेशन का परामर्श दे रहे थे- ‘‘जादू का-सा चमत्कार कहने लगे।”

मैनचेस्टर के मिस्टर प्रोविस को भयंकर रक्ताल्पता की बीमारी से स्टेनली लीफ 30 दिनों का उपवास कराकर ठीक कर दिया। यह समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुआ। बहुत से लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रक्त की कमी की बीमारी उपवास से कैसे ठीक हो गयी। परन्तु श्रीमती फिशर ने इस बात को पुष्टि की कि वे इस घटना को भली प्रकार व्यक्तिगत रूप से जानती हैं।

एक “मिस मैककार्ड” नामक नर्स को ‘एलीफैन्टाइसिस’ भयानक चर्म रोग हो गया था। डाक्टरों ने उसे असाध्य घोषित कर दिया, परंतु स्टेनली लीफ ने उनको 155 दिन का लम्बा उपवास कराया जिसके उपराँत वह एकदम स्वस्थ हो गयीं।

इसी प्रकार बेलफास्ट की मिस जैकसन को उन्होंने अल्पकालीन उपवास कराके ठीक कर दिया। मिस जैकसन को प्रायः मूर्छा आ जाती थी। उपवास से वस्तुतः रोगों का समूल नाश हो जाता है। उचित प्रकार से किये गए उपवास से भयंकर एवं असाध्य रोग दूर होते देखे गये हैं।

28 दिसम्बर 1963 केंस्टेट्समैन में एक रूसी डाक्टर के उपवास द्वारा रोग मुक्त होने का विवरण छपा था। उनके शरीर के जोड़ों में कड़ापन एवं दर्द था वह चल फिर भी नहीं सकते थे। डा. ब्लादीमीर लेकोवसेव ने अपने को रोगों से मुक्त करने के लिए अन्ततः उपवास का आश्रय लिया। उन्होंने पैंतालीस दिन के दीर्घकालीन उपवास से अपने शरीर को स्वस्थ एवं रोग से छुटकारा पाने में सफलता प्राप्त की।

उपवास अपने आप में एक विज्ञान है। इसका उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? और मानवीय स्वास्थ्य के लिए उपयोग की क्या सम्भावनाएं हैं? इस संबंध में तेजी से अनुसंधान जारी है।


महान् परिवर्तन की वेला, अति सन्निकट

“जिन परिवर्तनों को हम आज संसार में देख रहे हैं, वे अपने आदर्श और अभिप्राय में बौद्धिक, नैतिक और भौतिक है। आध्यात्मिक क्रान्ति अपने समय की प्रतीक्षा कर रही है और इस बीच अपनी लहरें जहाँ-जहाँ उछाल रही है, जब तक यह आ नहीं जाती तब तक अन्य सबका मर्म भी समझ में नहीं आ सकता- तब तक वर्तमान स्थिति की सभी व्याख्याएं तथा मनुष्य की भवितव्यता विषयक भविष्यवाणियाँ निरर्थक हैं क्योंकि इस क्राँति की प्रकृति, शक्ति और क्रिया ही हमारी मानवता का आगामी युग चक्र निर्धारित करेगी।’’

“भारत को अब भविष्य की दृष्टि में रखकर कर्म करना चाहिए। उसे नेतृत्व करना है अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण वह विश्व रंग-मंच पर सर्वोच्च स्थान प्राप्त करेगा। मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि वह समय सन्निकट है। पूरब से उठने वाली आध्यात्मिक क्रान्ति अपनी स्वर्णिम किरणों के साथ समस्त विश्व में छा जायेगी।’’

उपरोक्त कथन है योगिराज अरविन्द के जो उन्होंने भारत के भविष्य के संबंध में चर्चा करते हुए कहा था। ‘उत्तर योगी’ पुस्तक में उल्लेखित योगीराज की भविष्यवाणियों से उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं की झाँकी मिलती है। सर्वविदित है कि स्वतन्त्रता संग्राम में प्रत्यक्ष भूमिका युवा क्रान्तिकारियों एवं स्वतन्त्र सेनानियों की थी। गाँधी, पटेल, नेहरू, तिलक, सुभाष, भगतसिंह, बिस्मिल जैसे महापुरुषों की प्रत्यक्ष भूमिका थी। पर सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि वातावरण को बनाने, गरम करने तथा त्याग बलिदान की सूक्ष्म किन्तु सशक्त प्रेरणाएं भरने की भूमिका रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण एवं योगीराज अरविन्द जैसी सत्ताएं सम्पादित कर रही थीं। आध्यात्मिक क्रान्ति की छुट-पुट लहरें उन दिनों (योगीराज अरविन्द के शब्दों में) दिखायी पड़ी थीं। जिन्होंने अपनी प्राण शक्ति से वातावरण को गरम किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि बुद्धि एवं शक्ति की दृष्टि से सामान्य बच्चे भी असामान्य भूमिका निभा गये। योगीराज की सम्भावनाओं के अनुसार आध्यात्मिक क्रान्ति का समय स्वरूप अपनी समस्त किरणों के साथ प्रकट होने वाला है। वह समय अति निकट है।

एफ. सी. हैपोल्ड अपने समय के प्रसिद्ध भविष्य वक्ता थे। सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न होने के कारण उनकी विश्व के भविष्य के संबंध में की गई भविष्यवाणियाँ समय-समय पर सच निकली हैं। हैपोल्ड ने एक पुस्तक लिखी है ‘रिलीजियस फेथ एण्ड ट्रवण्थ्यिथ सेंचुरी’ जिसमें उन्होंने लिखा है कि “आधुनिक परिस्थितियों के विश्लेषण से यह मालूम होता है कि हम उस क्रान्तिकारी आध्यात्मिक मानसिक विकास के उस दौर से गुजर रहे हैं, जिसमें शक्ति की एक प्रचण्ड धारा मानव उत्थान के लिए अवतरित हो रही है। ऐसे दौर इतिहास में पहले भी आ चुके हैं। उसकी पुनरावृत्ति शीघ्र होने वाली है। अगले दिनों मानवी चेतना में प्रज्ञा का अवतरण होगा।’’

पाश्चात्य भविष्यविदों में भी कई ऐसे हैं जो भविष्य की उज्ज्वल सम्भावनाओं से आश्वस्त हैं किन्तु वे परिस्थितियाँ सहज ही नहीं उपलब्ध होंगी। इस बीच मनुष्य जाति को कठिन संघर्षों एवं प्रकृति विक्षोभों के बीच होकर गुजरना होगा।

अगस्त 1980 नवनीत अंक में प्रकाशित एक लेख में, फ्राँसीसी भविष्य वक्ता ‘रेने ड्यूमा’ और ‘वरनार्ड रोजियर’ ने सम्भावना व्यक्त की है कि- “बढ़ती जनसंख्या से उत्पन्न भुखमरी, प्रकृति प्रकोपों, बाढ़, भूकम्प एवं आँतरिक संघर्षों के फलस्वरूप भयंकर क्षति होने की सम्भावना है। सन् 1982 तक सभ्यता का एक बड़ा भाग प्रकृति विक्षोभों से नष्ट हो जायेगा। तत्पश्चात् एक ऐसी संस्कृति उदय होगी जो वर्तमान ढर्रे से सर्वथा अलग होगी।” इसी लेख में अन्य भविष्य वक्ताओं की भविष्यवाणियों का भी उल्लेख है। मेडीटेशन एण्ड लाइफ सेन्टर हालीवुड अमेरिका के अध्यक्ष योगी डब्ल्यू एस. फाँसलकर ने 1982 में नौ ग्रहों का सूर्य के एक ओर जमा होने की एक विलक्षण घटना माना है। उनका कहना है कि अंतर्ग्रही ही असंतुलन से प्रकृति का संतुलन बिगड़ेगा। प्रकृति प्रकोपों का प्रभाव व्यापक क्षेत्र में पड़ेगा। इस अवधि में विश्व युद्ध छिड़ने की भी सम्भावना है।

‘फांसलकर’ ने जहाँ इन विभीषिकाओं का वर्णन किया है वहीं इसकी ओर ‘सन् 1988 के बाद एक सर्वथा नयी संस्कृति के पुनरोदय की घोषणा की है। इस नयी सभ्यता में रहने वाले मनुष्य प्रकृति के अज्ञात रहस्यमय शक्तियों एवं मानव अंतर्निहित क्षमताओं का उद्घाटन करेंगे। यह सभ्यता वर्तमान की तुलना में अधिक समुन्नत एवं सुसंस्कृत होगी।

20 अगस्त 1980 दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित शेपीरो नामक पाश्चात्य भविष्य वक्ता के अनुसार “मार्च 1981 के उपराँत विश्व में धर्म के प्रति असाधारण रुचि बढ़ेगी। आदर्श एवं त्याग की सत्परम्पराएं पुनः वापस आयेगी। 1982 के पश्चात् सम्पूर्ण विश्व में एक परिवर्तन की लहर उठेगी जो वैचारिक होगी। भारत अपनी प्राचीन गरिमा को पुनः प्राप्त करेगा। उसकी आध्यात्मिक विचारधारा सम्पूर्ण विश्व में छा जायेगी।”

साँस्कृतिक पुनरोदय की उद्घोष पूर्व एवं पश्चिम के भविष्य वक्ताओं ने एक साथ किया है। नेतृत्व भारत करेगा, इस तथ्य को प्राचीन एवं नवीन सभी भविष्यविदों ने एक मत से स्वीकार किया है। नेतृत्त्व का स्वरूप क्या होगा। उसकी पहचान क्या होगी, उस संबंध में योगीराज अरविन्द से पूछे जाने पर उन्होंने उत्तर दिया था कि “निकट भविष्य में जो लोग भारत का नेतृत्त्व करेंगे वे कर्तव्य परायण उदार, हृदय सम्पन्न तथा बहुमुखी प्रतिभा वाले होंगे। हमारा विश्वास है कि इस बार जो अवतार पुनरोद्धार के लिए आयेगा वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी होगा। वह न केवल धर्म गुरु होगा बल्कि राजनेता महान शिक्षक, समाज का पुनरुद्धारक, सहकारी उद्योग का नायक, विचारक एवं वैज्ञानिक होगा। उसमें कवि, मनीषी और कलाकार की आत्मा होगी। वह संसार को मार्ग दिखाने और नया रूप देने के लिए भावी भारतीय जाति का संक्षिप्त रूप और महान निर्देशन होगा। वह प्रजा शक्ति का पुँज होगा।’’

सम्पूर्ण विश्व इन दिनों एक ऐसे संक्रान्ति काल से होकर गुजर रहा है जिसमें परिवर्तन अवश्यम्भावी है। जो सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न हैं वे जानते हैं कि साँस्कृतिक पुनरोदय की ठीक यही घड़ी है। यह संध्या बेला है- जिसमें अवांछनियता की तमिस्रा छटेगी, प्रज्ञा का आलोक अपनी स्वर्णिम किरणों के साथ फैलेगा। इन दिनों प्रज्ञावतार की शक्ति धाराएं भावनाशील अन्तःकरणों में छा रही तथा उन्हें संकीर्णता के जाल-जंजाल से बाहर निकलकर त्याग एवं बलिदान के अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने को प्रेरित कर रही है। प्रज्ञावतार इन दिनों अपनी भूमिका इसी प्रकार संपादित कर रहा है। जो समझदार हैं- भावनाशील हैं वे प्रज्ञावतरण में ही संसार का उज्ज्वल भविष्य देखते हैं। इन दिनों वहीं हो रहा है। जिसका उद्घोष योगीराज अरविन्द ने किया था, जिसकी सम्भावना पाश्चात्य भविष्यविद् करते हैं। साँस्कृतिक पुनरोदय का स्वर्णिम आभा को इन दिनों विचार क्रान्ति के रूप में देखा जा सकता है।


Quotation

“गर्मी आई और धरती के जलबिन्दु भाप बनकर आकाश में उड़ गये। उनने अपने को बादल के रूप में पाया और इतराने लगे कि हम धरती वालों से बहुत ऊपर हैं।

सर्दी आई उसने बादलों को ओस और कुहरे के रूप में बदल कर धूलि में छितराने के लिए विवश कर दिया। जल बिन्दुओं की समझ में यथार्थता आई। बड़प्पन उनका नहीं सर्दी और गर्मी का था।’’


पिरामिडों में अंकित सन् 2000 की दुनिया

“सब लोग ऊंटों की सवारी नहीं करेंगे, हवा से भी अधिक तेज गति से चलने और आकाश में उड़ने में सक्षम हो जायेंगे, मौसम पर काबू कर लेंगे और दुनिया में जन्नत (स्वर्ग) की सी सहूलियतें तथा ऐशो आराम के सामान नसीब हो सकेंगे, तब एक ऐसी लड़ाई लड़ी जाएगी जिसमें दुनिया के अधिकाँश लोग मारे जायेंगे। उस लड़ाई के समय कुदरत में भी कुछ ऐसे फेर बदल होने लगेंगे जिनके मारे सारा संसार दोजख में बदल जाएगा।”

यह भविष्यवाणी अंकित है कि मिश्र की राजधानी से 9 मील की दूरी पर बने पिरामिडों पर ये भविष्यवाणियाँ प्रतीकात्मक भाषा में लिखी गई हैं, जिन्हें पढ़ पाने में थोड़े ही विद्वान सफल हो सके हैं, पर जिनने सफलता प्राप्त की है, उन्होंने इन प्रतीकों की जो व्याख्या की है वे अब तक अधिकाँश सही सिद्ध हुई हैं। इसलिए यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि विश्व युद्ध, महामारी, अकाल आदि का संकेत देने वाली उपरोक्त भविष्यवाणियाँ गलत सिद्ध होंगी।

मिश्र दुनिया का बहुत प्राचीन देश है। वहाँ की सभ्यता अति प्राचीन सभ्यताओं में मानी जाती है। यद्यपि मिश्र की सभ्यता और संस्कृति के अब अवशेष ही बचे हैं, परंतु जो अवशेष बचे हैं उनसे सिद्ध होता है कि अब से तीन चार हजार साल पहले तक वहाँ के लोग काफी उन्नत जीवन व्यतीत करते थे। उस समय वहाँ का कला-कौशल भी बहुत उन्नत था। इसका परिचय देने वाले पिरामिड इस बात के साक्षी हैं। मिश्र को यों पिरामिडों का देश कहा जाता है, परन्तु काहिरा से पूर्व की और स्थित तीन पिरामिडों का समूह संसार के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। बाकी छह आश्चर्य हैं बेबीलोन के झूलते बगीचे, चीन की दीवार, ताजमहल, पीसा का बुर्ज, ओलम्पिया में जूपिटर की विशाल मूर्ति तथा सेण्ट पीटर का गिरजाघर।

काहिरा के पास बने इन पिरामिडों के संबंध में समझा जाता है कि ये अब से 5500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व तक की अवधि में बनाये गये। यहाँ पर बड़े-बड़े पत्थरों को एक पर एक चिन कर सीढ़ियों जैसा बनाया गया है। नीचे का भाग बहुत बड़ा है और वे ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर उठते गये हैं त्यों-त्यों पतले होते गए हैं। इनका निर्माण देखकर वास्तुशिल्प और भवन निर्माण कला के विशेषज्ञों को आज भी दंग रह जाना पड़ता है। पत्थर की चट्टानों से बने इन स्मारकों का निर्माण किस प्रकार किया गया होगा, यह जानना तो दूर रहा, इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।

इनके निर्माण में प्रयुक्त किये गये अधिकाँश पत्थर बारह फुट से अधिक ऊंचे हैं। उनकी सतह भी इतनी ही लंबी और चौड़ी है। बारह फुट ऊंचे और बारह फुट लंबे-चौड़े ये पत्थर किस प्रकार इतनी ऊंचाई तक चढ़ाये गये होंगे यह समझ पाना कठिन है। आधुनिक टेक्नोलॉजी और विकसित भवन निर्माण के यंत्र उपकरणों का सहारा लेकर भी पिरामिडों में लगे पत्थरों के एक कोने जितने वाले डाट पत्थर को भी पिरामिडों जितनी ऊंचाई तक ले जाना कठिन है फिर पूरे पत्थर को तो इतनी ऊंचाई तक ले जाने की बात सोची भी नहीं जा सकती।

उल्लेखनीय है कि पिरामिडों का निर्माण या तो मिश्र के राजाओं की स्मृति सुरक्षित करने के लिए किया गया है अथवा वे किन्हीं धार्मिक स्थलों के रूप में बनाये गये हैं। इनमें जो सबसे बड़ा स्तूप हैं वह राजा च्योप्प की कब्र पर बनाया गया है। इसके निचले भाग ने 13 एकड़ जमीन घेर रखी है और लगभग 13 लाख पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े लगे हुए हैं। कहा जा चुका है कि अधिकांश पत्थर 1500 घनफुट से भी अधिक आकार वाले हैं और उनका वजन ढाई टन से भी अधिक है। इतने भारी और इतने बड़े पत्थरों को बीसियों फुट ऊंचाई तक कैसे पहुँचाया गया होगा, यही एक आश्चर्य का विषय है। उल्लेखनीय है इन पिरामिडों में सबसे बड़ा पिरामिड 450 फीट ऊंचा तथा सबसे छोटा 140 फुट ऊंचा है।

आश्चर्य यहीं तक सीमित नहीं रह जाता। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि पिरामिडों के निर्माण में प्रयुक्त पत्थर बड़ी सफाई के साथ काटे और तराशे गये हैं और इतनी मजबूती से उन्हें एक के ऊपर एक जमाया गया है कि उनके बीच में बाल बराबर भी जगह नहीं है। मिश्र एक रेगिस्तानी इलाका है। इसलिए वहाँ पानी आदि के साधन जुटाना और वह भी इतने बड़े निर्माणों के लिए, कल्पनातीत विषय ही है। अस्तु इनके बारे में यही अनुमान लगाया जाता है कि इनमें निर्माण में पानी आदि का उपयोग सम्भवतः नहीं ही किया गया होगा।

इनकी बाह्य और आँतरिक रचना को देखते पर इस बात का अनुमान लगा पाना कठिन है कि इनके निर्माण में कितने प्रशिक्षित और दक्ष, अनुभवी शिल्पियों का योगदान रहा होगा। इनकी एक विशेषता यह भी है कि इनमें प्रयुक्त पत्थरों का माप पिरामिडों के भीतरी कक्ष और उन तक पहुँचने का मार्ग इतना छोटा है कि कोई भी व्यक्ति इनके पीछे विद्यमान रहस्य का अनुमान नहीं लगा सकता। सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक यहूदी विज्ञान ने इन पिरामिडों के रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए सिद्ध किया है कि इनका निर्माण बहुद्देशीय प्रयोजनों से किया गया है। इनमें से एक तो तत्कालीन आविष्कारों और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों का अंकन था। इन स्मारकों में उस समय की विभिन्न कलाओं, गणित और ज्यामितीय अन्वेषणों तथा नक्षत्र विज्ञान की विविध उपलब्धियों का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है।

जोसेफस के अनुसार बड़े पिरामिडों में नक्षत्र विज्ञान संबंधी बहुत-सी बातों, सिद्धान्तों का विवरण मिलता है। इनमें नक्षत्रों से संबंधित विभिन्न चक्रों में बीती घटनाओं अर्थात् इतिहास के अतिरिक्त आने वाली घटनाओं का विवरण भी अंकित है। इन पिरामिडों के संबंध में यह तथ्य बहुत ही विस्मयकारी है कि ये मिश्र देश की बीचों बीच तो स्थित है ही पृथ्वी के भी बीचों बीच स्थित है तथा उनकी स्थिति से यह बात प्रमाणित होती है कि इनके निर्माणकर्ताओं को उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की स्थिति के संबंध में भी पता था। उनकी स्थिति और सूर्य की गतिविधियों के बीच एक सुनिश्चित संबंध तो है ही, उन पर जो भविष्यवाणियाँ अंकित की गई हैं, उनका आधार ध्रुवतारे की स्थिति है। जोसेफस के अनुसार इनके निर्माण का उद्देश्य न तो किसी की स्मृति में किया गया है तथा न ही राजा महाराजाओं के शव को सुरक्षित रखने के लिए किया गया है। ये उद्देश्य तो गौण है, इनका मूल उद्देश्य एक ऐसे निर्माण को खड़ा करना रहा है जो भविष्य में आने वाली घटनाओं के संबंध में लोगों को संकेत देता रहे।

किन्तु ये भविष्यवाणियाँ जिस प्रकार अंकित की गई हैं, वे न तो किसी भाषा में लिखी गई हैं और न ही चित्रों के रूप में बनाई गई हैं। यदि कोई भाषा में लिखी भी गई है तो उसके जानकार इस समय तो पृथ्वी पर कम से कम नहीं ही हैं। खगोल शास्त्रियों का मत है कि यह भाषा कुछ सार्वभौम सिद्धान्तों पर आधारित है जो पृथ्वी तथा ब्रह्मांड के गणितीय और ज्यामितीय नियमों से संबंध रखते हैं। इस पद्धति का इस्तेमाल इस उद्देश्य से किया गया था कि भविष्य में जो भी कोई इन नियमों को जान और समझ सकेगा, वह इन नियमों के आधार पर इन पहेलियों को सुलझा लेगा तथा आने वाले कल की घटनाओं और सम्भावनाओं के संबंध में संसार को सचेत कर सकेगा।

सर फिलण्डर्स पैत्री ने लंबे समय तक पिरामिडों के इन प्रतीकों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि पृथ्वी के मध्य भाग में स्थित ये पिरामिड मापन, ज्यामिती तथा खगोल विज्ञान के अनेकों मूलभूत सिद्धान्तों को उद्घाटित करते हैं। इन विशालकाय निर्माणों के भीतरी कक्षों और भागों के संबंध में यह एक रोचक तथ्य है कि ये परस्पर तो संबंधित है ही, पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों से भी इनका संबंध स्थापित करने में सक्षम स्थान है।

पिरामिडों में अंकित भविष्यवाणियों को अब से 50 वर्ष पूर्व पढ़ा जाने लगा था और उनमें प्रयुक्त भाषा को मापन इकाई नाम दिया गया था। जिन लोगों ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किये हैं, उनमें डेविड डेविडसन का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। डेविडसन एक मेधावी खगोल शास्त्री और इंजीनियर थे। उन्होंने 25 वर्षों तक पिरामिडों के क्षेत्र में इन निर्माणों के संबंध में खोज की और अपने निष्कर्षों को तथ्य तथा प्रमाणों सहित ‘द ग्रेट पिरामिड- इट्स डिवाइन मैसेज’ पुस्तक में लिखे। इस ग्रन्थ में पिरामिडों से संबंधित अनेक दुर्लभ चित्रों के साथ 97 ऐतिहासिक पुरातत्वीय और खगोल विज्ञान संबंधी तालिकाएं भी दी गई हैं जो पिरामिडों में अंकित भविष्यवाणियों का सार्थक दिशाबोध कराती हैं। डेविडसन के अनुसार पिरामिडों के मापनों के आधार पर पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी, पृथ्वी की सतह और उसके परिक्रमा पथ में आने वाले परिवर्तनों का अध्ययन भी किया जा सकता है।

डेविडसन के अतिरिक्त ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञानी जॉन ग्रीव्ज, सर जॉन मार्शल, लंदन के प्रमुख गणितज्ञ जॉन टेलट तथा एच. स्पेन्सर लुई आदि ने पिरामिडों की रहस्यमय प्रतीकात्मक भाषा पढ़ने में सफलता प्राप्त की है। डेविडसन ने तो सन् 1924 में ही अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट पिरामिड इट्स डिवाइन मैसेज’ में लिखा था कि इनमें पृथ्वी के जन्मकाल से लेकर अब तक की तथा आगे के हजारों वर्षों की घटनाएं तथा भविष्यवाणियाँ अंकित हैं। आरम्भ में जिन भविष्यवाणियों का उल्लेख मिलता है उनमें पृथ्वी के जन्म, बाढ़, भूकम्प, महामारियों और युद्धों की घटनाएं हैं जो इतिहास का विषय है। इनमें महान सम्राटों और योद्धाओं का उल्लेख तो है ही युद्धों तथा धार्मिक क्रान्तियों और विश्व के महान संतों का भी वर्णन है।

अब से पाँच हजार वर्ष पूर्व पिरामिड का निर्माण करने वालों ने ईसा से करीब 1500 वर्ष पूर्व से इजराइलवासियों के मिश्र से निकाले जाने की तिथि लिख दी थी। उल्लेखनीय है इनका निर्माण उक्त घटना से भी 3500 वर्ष पूर्व हुआ था। इसके बाद सिकन्दर के उदय, ईसामसीह के जन्म तथा उनके क्रूस पर चढ़ाये जाने की घटना भी पिरामिड की दीवारों पर अंकित है।

सन् 569 में मोहम्मद साहब के जन्म तथा 632 में उनके देहाँत, तेरहवीं शताब्दी में चंगेज-खाँ के उदय, 1280 में बारूद के आविष्कार, 18 वीं-19 वीं शताब्दी नैपोलियन के उदय, वाटरलू की लड़ाई तथा नेपोलियन की पराजय और मृत्यु, सन् 1833 में तुर्की के स्वतन्त्र होने, 1854, 56 में रूस और टर्की के बीच क्राइमन की लड़ाई आदि के संबंध में भी स्पष्ट भविष्य संकेत दिये गये हैं।

पिरामिडों की भाषा पढ़े जाने से पूर्व ईसा के जन्म तथा कार्यकाल के संबंध में भारी मतभेद था। विशेषज्ञों ने ईसा के जन्म की विभिन्न तिथियाँ निर्धारित कर रखी थीं, जो 1 अक्टूबर से 23 मार्च तक है। परन्तु पिरामिडों की जब अन्य भविष्यवाणियाँ या ऐतिहासिक घटनाएं सही निकलीं तो विशेषज्ञों ने इस संबंध में भी पिरामिडों की सूचनाओं को प्रामाणिक मान लिया, जिसके अनुसार ईसा की जन्म तिथि 4 अप्रैल सिद्ध होती है। इसी प्रकार एक कक्ष में ईसा के साढ़े तैंतीस वर्ष जीवित रहने का संकेत मिलता है। पूरी तरह सही गणना के अनुसार ईसा को 5 अप्रैल सन् 30 के दिन क्रूस पर चढ़ाया गया।

कहा जा चुका है कि पिरामिडों में उनके निर्माण पूर्व से लेकर अब तक के इतिहास और आगे की भविष्यवाणियाँ अंकित हैं। उन सबका संकलन किया जाए तो एक विशालकाय ग्रंथ तैयार हो सकता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पिरामिडों में पृथ्वी के जन्म से लेकर समाप्त होने तक का इतिहास या भविष्यवाणियाँ अंकित हैं। आज उन सबका उल्लेख नहीं किया जा सकता। इस शताब्दी में सही सिद्ध हुईं भविष्यवाणियों का उल्लेख कर ही संतोष करना पड़ेगा, जो मुख्य-मुख्य इस प्रकार हैं। जो भविष्यवाणियाँ सही सिद्ध हो चुकी हैं। वे इस प्रकार हैं-

(1) सन् 1909 में रूस और यूरोप के प्रमुख देशों के बीच हुई महत्वपूर्ण संधि।

(2) सन् 1911 में चीन की क्रान्ति तथा अगले वर्ष वहाँ प्रजातंत्र की स्थापना।

(3) सन् 1913 में जब बालकन प्रदेश की स्थिति का तनावपूर्ण बनना तथा यूरोप में मंदी और असुरक्षा का वातावरण बनना।

(4) सन् 1914 में ब्रिटेन द्वारा जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा।

(5) सन् 1917 में अमेरिका द्वारा भी प्रथम विश्वयुद्ध में कूद पड़ने की घोषणा।

(6) सन् 1918 में विश्व युद्ध का अंत।

(7) सन् 1918 में सोवियत गणतंत्र का जन्म तथा दूसरे वर्ष पूर्व रूस में क्रान्ति।

यह वे प्रमुख घटनाएं हैं जो डेविडसन ने बीसवीं शताब्दी के संबंध में पिरामिडों पर अंकित भविष्यवाणियों को पढ़कर बताई थीं। चूँकि उन्होंने अपनी पुस्तक सन् 1924 में लिखी थी। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि इन्हें ऐतिहासिक कालक्रम देखकर लिख दिया गया होगा। परन्तु 1924 से अब तक 56-57 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस अवधि के लिए जो भविष्यवाणियाँ की गई थीं वे शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुई हैं इसलिये यह मानने का कोई कारण ही नहीं हैं कि यह सब तीर-तुक्का है अथवा इतिहास देखकर लिख दिये गए विवरण हैं। सन् 1924 के बाद डेविडसन ने अपनी पुस्तक में जिन प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया था और जो सही सिद्ध हुईं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

(1) सन् 1929 में विश्वव्यापी आर्थिक संकट, मंदी का दौर आना तथा उससे दुनिया के सभी देशों का प्रभावित होना।

(2) सन् 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता पर संपूर्ण अधिकार कर लेना।

(3) सन् 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत और 1945 में अंत, विश्व युद्ध के परिणाम स्वरूप जर्मनी का दो टुकड़ों में विभाजन।

(4) सन् 1947 में भारत द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति तथा भारत का दो टुकड़ों में बंट जाना।

(5) सन् 1947 में इजराइल की स्थापना। यहूदियों का पुनर्स्थापन।

(6) सन् 1960 में अफ्रीका 16 देशों का स्वतंत्र होना।

(7) सन् 1965 में अमेरिका द्वारा वियतनाम पर हमला। पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध।

(8) सन् 1969 में पहली बार मनुष्य द्वारा चन्द्रमा पर पहुँचना।

(9) सन् 1971 में भारत से अलग हुए पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बंट जाना तथा स्वतंत्र बंगला देश का उदय।

(10) चीन में भयंकर भूकम्प।

(11) सन् 1980 में ईराक और ईरान के बीच घमासान लड़ाई।

इसके बाद की भविष्यवाणियाँ अभी सही सिद्ध होना शेष हैं जिनके अनुसार ‘‘सन् 1982 से सन् 2000 तक विश्व-व्यापी हलचलें होंगी। मौसम आश्चर्यजनक रूप से बदलेंगे तथा प्राकृतिक उत्पातों में भी बढ़ोत्तरी होगी। इसी अवधि में तृतीय विश्व युद्ध की सम्भावना भी है, जिसमें दुनिया के लगभग सभी देश भाग लेंगे तथा भयानक शस्त्राणों का प्रयोग किया जाएगा। इन शस्त्रों के प्रयोग से एक बारगी तो समूची मनुष्य जाति के ही नष्ट हो जाने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। फिर भी कुछ लोग बचेंगे और नये युग का सूत्रपात होगा।’ पिरामिडों में इस नये युग का जमाना रुहानी (आध्यात्मिक युग) नाम दिया गया है। इस युग का नेतृत्व एक ऐसे आध्यात्मिक व्यक्तित्व द्वारा किया जाएगा जो जीवन भर इस नवयुग का ढ़ाँचा तैयार करने तथा पृष्ठभूमि बनाने में लगा रहा है। इतने व्यापक परिवर्तन सन् 1999 तक हो जाने निश्चित बताये गए हैं।’’

पिरामिडों पर अंकित सभी भविष्यवाणियाँ अब तक सही सिद्ध हुई हैं। देखना यह है कि सन् 2000 में नये युग का निर्माण करने में किन अध्यात्मवादियों को श्रेय मिलता है और कौन उस समय की सुखद परिस्थितियों का लाभ उठा सकेंगे।


शान्ति और प्रगति के लिए साधन शुद्धि आवश्यक

गाँधीजी ने विश्व शाँति के लिए कुछ मूल सूत्र बताये। (1) साधनों की शुद्धता (2) मानव मात्र में भ्रातृत्व की भावना का विकास (3) जीवन में नैतिकता का समावेश (4) आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा (5) भौतिक जगत से ऊपर किसी महत् शक्ति में विश्वास।

बापू ने कहा था व्यक्ति और समाज को सभ्य और सुशिष्ट बनाने के लिए अन्य बातों के साथ ये भी आवश्यक है कि जीवनयापन के लिए जिन वस्तुओं का उपयोग हो रहा है उनका उपार्जन किस तरह से हुआ, नैतिक अथवा अनैतिक तरीके से। साध्य चाहे जितना श्रेष्ठ हो पर यह निश्चित है कि साधन की अशुद्धता साध्य को भी नष्ट कर डालती है। विश्व शान्ति के लिए शान्तिपूर्ण साधनों का ही प्रयोग करना होगा। शास्त्र के बल पर स्थायी शान्ति कदापि नहीं पायी जा सकती, जब कोई व्यक्ति या राष्ट्र दमन एवं शस्त्रास्त्रों का प्रयोग करता और पाशविक शक्ति के आधार पर विजय की आशा करता है तो विरोधी पक्ष की पाशविक प्रवृत्तियां भी प्रबल हो जाती है। हिंसा प्रतिहिंसा की श्रृंखला-सी बन जाती है। भ्रष्ट तरीके अन्ततः भ्रष्ट परिणाम ही उत्पन्न करते हैं।

विश्व शान्ति का महत्वपूर्ण आधार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना है। विश्व बन्धुत्व भावना वेदान्त दर्शन पर आधारित है। जब सबमें एक ही चैतन्य सत्ता विद्यमान है तब आपस में द्वेष एवं घृणा के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। सूर्य की असंख्य किरणों के, समुद्र की अनेक लहरों के रूप में हमारा अस्तित्व है। समूह से पृथक जीवनयापन सम्भव नहीं। व्यक्ति समाज से जुड़ा है, समाज राष्ट्र से और राष्ट्र विश्व से। पारस्परिक सहयोग के बिना सबका अस्तित्व खतरे में है। भाव क्षेत्र के विस्तार एवं परस्पर स्नेह, सहयोग, भावना के उदय से ही विश्व राष्ट्र की कल्पना साकार हो सकती है।

मनुष्य की वर्तमान दुर्दशा का मूल कारण आर्थिक, राजनीतिक या भौतिक ही नहीं वरन् हृदयगत संकीर्णता है। कोई व्यक्ति या राष्ट्र मात्र भौतिक साधनों के सहारे ऊंचा नहीं उठ सकता। उसके साथ ही उन मानवीय मूल्यों को भी महत्व देना एवं अवलम्बन लेना होगा जिसके द्वारा स्थायी प्रगति एवं शान्ति का पथ-प्रशस्त होता है।

सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक जीवन में एकरूपता लाने के लिए नैतिकता का अवलम्बन लेना आवश्यक है। नैतिकता का अभाव ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विषमता को जन्म देना है। विश्व में बढ़ती हुई महारक शक्ति का अन्त भी नैतिकता के जागरण से ही सम्भव है। आज के संकट का वास्तविक कारण मानव अन्तःकरण में नैतिकता का अभाव ही है। लोग कहते कुछ और करते कुछ हैं। फलतः विग्रह उपजते और संकट खड़े होते हैं।

आर्थिक और राजनीतिक प्रगति के साथ नैतिक उत्थान भी अनिवार्य है। यदि इन दोनों में से किसी को प्राथमिकता देनी हो तो मानवीय अन्तःकरण में नैतिकता के उदय को अधिक महत्व देना होगा।

महान विचारक रिचर्ड बी. ग्रेग ने एक पत्र में गाँधी जी को लिखा था- “इतिहास साक्षी है कि युद्ध द्वारा मानवता पर विजय नहीं पायी जा सकती। क्रूरता पूर्ण प्रयास हर बार असफल ही रहे। यहाँ तक कि प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ और विश्व के प्रसिद्ध विचारक भी शुद्ध विभीषिका के भयंकर परिणामों पर अधिकार नहीं कर सकते।” अब तक अनेक बार सुरक्षा परिषदों का संगठन हुआ किन्तु शुद्ध विभीषिका का रूप और भी विकराल होता गया। यह असंदिग्ध है कि कूटनीतिक दाव-पेंचों से शान्ति सम्भव नहीं। जब तक मानवीय अन्तःकरण में सद्भावों का अभाव रहेगा, व्यक्तिगत जीवन से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय जीवन के क्रिया-कलापों में सदाशयता एवं सुस्मिरता का दर्शन न हो सकेगा एवं नैतिक निर्धारणों- उपाय उपचारों का ही अवलम्बन लेना होगा।


संवेदित मानव

(मंगल विजय)


संवेदित मानव (kavita)

छटपटा उठा कोई जब घायल होकर, हमने ममहित होकर अश्रु बहाये। जब-जब अनीति, अन्याय बढ़ें इस भू पर, तब-तब हमने ही गीत क्रान्ति के गाये॥1॥

हम कोमल कोंपल से ज्यादा कोमल हैं। हम स्नेह और सम्वेदन के शतदल हैं। भावों का सागर लहराता है हम में। भावनाशील हैं, स्नेह स्नात विह्वल हैं। जिन घावों को सबने देखा नफरत से, वे घाव हमीं ने अधरों से सहलाये॥2॥

अन्याय चुनौती देने जब-जब आया, जब-जब अनीतियों ने निज शीश उठाया। हमने अनीति, अन्यायों से टक्कर ली, पर उनके सन्मुख सिर को नहीं झुकाया। उनको समझाया शास्त्र, शस्त्र दोनों से, जब-जब जिसको जैसे भी समझा पाये॥3॥

हममें मानव का हृदय धड़कता रहता। गौतम का करुणा भाव छलकता रहता। सिंहों के शावक से भी खेले हैं हम, पौरुष अजमाने प्राण पुलकता रहता। इतिहास हमारी करुणा का साक्षी है, हमने ही पौरुष के इतिहास बनाये॥4॥

*समाप्त*