लक्ष्य की दिशा में अनवरत यात्रा

सदुद्देश्य के लक्ष्य में यात्राक्रम अखण्ड ही रहना चाहिये। थकान अपने पर थोड़ा विश्राम कर लेने में हर्ज नहीं, पर दिशा धारा में परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

कितने ही अवरोध ऐसे हैं जो लुभाते, डराते और भटकाने में चूकते नहीं। वन्य प्रदेशों में पशुओं के झुण्ड निरुद्देश्य घूमते रहते हैं। उनके खुरों से पगडंडियाँ बन जाती हैं। लगता है कि राज मार्ग की अपेक्षा इन पर चलना सीधा पड़ेगा। कई पथिक इस लोभ से उन पर चल पड़ते हैं। परिणाम में कष्ट सहने, थकने और निराशा होने के अतिरिक्त और कुछ उपलब्ध नहीं होता।

अपूर्णता से पूर्णता की ओर का प्रयाण क्रम निर्धारित करना और उस पर अनवरत क्रम से चलने पर ही अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है। भटकन में शान्ति और क्लान्ति ही पल्ले पड़ती है। पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग एक ही है- महानता को दृढ़तापूर्वक पकड़े रहना। अविचल निष्ठा के साथ अनवरत क्रम से उस पर चलते रहना। अनुसरण वन्य पशुओं के द्वारा विनिर्मित पगडण्डियों का नहीं, वरन् उस राजमार्ग का होना चाहिए जो सुनिश्चित संकल्प लेकर आगे बढ़े और विश्वास को अविचल रखकर अनवरत क्रम से आगे बढ़े हैं। लक्ष्य तह पहुँचने का एक ही उपाय है सदुद्देश्यों की दिशा में अवरोधों को लाँघते हुए अपनी प्रयाण साधना को अखण्ड क्रम से जारी रखना।


उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच का भाव नहीं रखना चाहिये। आत्म-निर्भरता तो जीवनोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने का अद्भुत गुण मनुष्य में है। इसलिये अपने प्रत्येक कार्य की पूरी शक्ति से करना चाहिये। प्रत्येक कार्य ईश्वर का है, अतः उसे आत्म समर्पित भाव से करना चाहिये। कार्य में सद्भावना का प्रभाव उज्ज्वल चरित्र निर्माण के विकास के लिये होता है। कार्य करने का सौंदर्य, रुचिकर ढंग सफलता की निशानी है। कार्य की श्रेष्ठता में जीवन की श्रेष्ठता निहित है।

श्री रूजवैल्ट ने संकल्प किया था कि मैं ख्याति के खतरे में नहीं पड़ूंगा। हजारों प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी अडिग बने रहे। लिंकन ने वकील से जब झूठे पक्ष की ओर से वकालत करने को कहा, तब वह बोला- ‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता, जूरी से वार्तालाप के बीच मेरा मन मुझे धिक्कारेगा कि लिंकन तुम झूठे हो, झूठे हो।’’

नैथन स्ट्रांस से फर्म की सफलता का रहस्य पूछा गया, तो वह बोले- ‘‘यह परिणाम केवल ग्राहक के प्रति बरती गयी मेरी ईमानदारी है। मुझसे ग्राहक कभी अप्रसन्न होकर नहीं गया।’’ महानता के गुण अन्तःकरण में समावेश हो जाने पर सफलताएं कदम चूमती हैं।

आत्म-विश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन को सार्थकता प्रदान की जा सकती है। भाग्य का निर्माणक मनुष्य स्वयं है। ईश्वर निर्णयकर्ता और नियामक है। मनुष्य परिश्रम से चाहे तो अपने भाग्य की रेखाओं को बना सकता है- परिवर्तित कर सकता है। हैनरी स्ल्यूस्टर कहता है कि- ‘‘जिसे हम भाग्य की कृपा समझते हैं, वह और कुछ नहीं। वास्तव में हमारी सूझ-बूझ और कठिन परिश्रम का फल है।” विश्वास रखें परिश्रम और आत्म-विश्वास एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनों मिलकर के ही लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो पाते हैं। संकल्प करें-बाधाओं को हमेशा हँस-हँस स्वीकार करना है। डर कर मार्ग से हटाना नहीं है। लक्ष्य विहीन नहीं होना है। हमेशा गतिमान रहना है-गतिहीन नहीं होना है।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की लोकप्रियता और सफलता का कारण परिस्थितियों से समझौता है। विकट विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अपने विश्वास को प्रबल बनाते गये। आखिर वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।

परिश्रम और सफलता की आशा करते हुए हमें लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले दुष्परिणामों को भी सामान्य करने का साहस करना चाहिये। “सर्वश्रेष्ठ के लिये प्रयत्न कीजिये मगर निकृष्टतम के लिये तैयार रहिये।” अँग्रेजी की यह कहावत बड़ी सार्थक है। हैनरी फोर्ड से एक व्यक्ति ने उनकी सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने कहा, “सफलता का सबसे पहला रहस्य है, हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।’’

किसी को दोषी बताकर अपने को और निराश न करें। परिस्थितियों से समझौता करें और उन्हें अनुकूल बनायें। कुछ रास्ते बन्द हो जाने पर भी कुछ खुले रहते हैं। ऐसा नहीं है कि सारे रास्ते ही बन्द हो जायें। जब आप नयापन खोजेंगे तो आशा की नई किरण फूटने लगेगी। जीवन में प्रतिद्वन्द्व न जगायें, किसी से घृणा न करें, प्रेमपूर्ण व्यवहार रखें। हर्बर्ट स्वूप लिखता है, ‘सफलता का रहस्य तो मैं नहीं बता सकता, मगर असफलताओं का रहस्य जरूर बता सकता हूँ। वह है हर किसी को खुश करने की कोशिश।’ जीवन को आवश्यक कार्यों में व्यक्त रखें और अनावश्यक कार्यों में उलझकर व्यस्त रहने का रोना न रोये। आशावादी बनकर अपने जीवन और जन-जीवन की प्रेरणा श्रोत बनें।


विश्व का तात्विक स्वरूप जानने के लिए साधना की आवश्यकता

परिवर्तनशील सृष्टि में हर क्षण जीवन मृत्यु का संघात चल रहा है। सृजन में विनाश का क्रम अनिवार्य रूप से जुड़ा है। नये पौधे उगते हैं। जीव पैदा होते हैं, किन्तु देखते-देखते काल के गर्भ में समा जाते हैं। जीवन-मरण के इस चक्र को देखकर यह प्रश्न सदियों से मानव मन को आन्दोलित करता चला आ रहा है कि इन सबके पीछे सत्य क्या है?

जीवन क्या है? जड़ परमाणुओं का सम्मिश्रण मात्र या अन्य कुछ? विलास, वैभव एवं शक्ति के क्षणिक सुखों के प्रभाव के कारण उस प्रश्न को भले ही भुला दिया जाय, किन्तु उनका आवेश कम होते ही वह पुनः उठ खड़ा होता है। आदिकाल से ही मनुष्यों को सृष्टि प्रवाह के सत्य को जानने की आकाँक्षा रही है तथा जब तक इनका समाधान नहीं मिल जाता, बनी ही रहेगी। विज्ञान, मनोविज्ञान एवं दर्शन सभी अपने-अपने ढंग से इसका समाधान प्रस्तुत करते हैं।

प्रचलित मान्यताएँ तीन प्रकार की हैं?

(1) शून्यवादियों के अनुसार सब कुछ शून्य है।

(2) विज्ञान के अनुसार जीवन जड़ तत्वों का सम्मिश्रण मात्र है जो तत्वों के संगठन-विघटन के साथ उत्पन्न तथा विनष्ट होता है।

(3) दार्शनिकों के अनुसार जीवन का आधार भौतिक तत्व नहीं है। इससे परे उसकी सत्ता है। वह अविनाशी है।

विश्व के सभी वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, धर्मग्रंथों की मान्यताएँ इन तीनों के ही इर्द-गिर्द घूमती तथा अपने-अपने स्तर पर प्रतिपादन करती हैं।

शून्यवादियों का मत है कि संसार परिवर्तनशील है। हर क्षण प्रत्येक कण में परिवर्तन हो रहा है। कोई वस्तु स्थायी नहीं है। इस कारण किसी चीज का अस्तित्व नहीं है। सब शून्य है। भूत-भविष्य अस्तित्व रहित है, वर्तमान ही सत्य है। शून्यवाद की यह मान्यता विचारणीय है।

सापेक्षवाद के सिद्धान्त के अनुसार भूत, वर्तमान एवं भविष्य का अस्तित्व एक-दूसरे के सापेक्ष है। वर्तमान का स्वतन्त्र अस्तित्व सम्भव नहीं। “भूत एवं भविष्य को स्वीकार किये बिना ‘वर्तमान’ की कल्पना नहीं की जा सकती। वर्तमान को स्वीकार करने का अर्थ है परोक्ष रूप में भूत एवं भविष्य को स्वीकार करना। इनकी मान्यता उसी प्रकार है जैसे माता-पिता के अस्तित्व को अस्वीकार करके सन्तान के अस्तित्व को स्वीकार करना। शून्यवाद के मत का एक पक्ष यह है कि प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, किसी में स्थायित्व नहीं है, इस कारण सब भ्रम है शून्य है? परिवर्तन के कारण प्रत्येक वस्तु का स्वरूप हर क्षण बदल रहा है। यह सत्य है। किन्तु मात्र परिवर्तन होते रहने के कारण से ही प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व से इन्कार कर देना विवेक संगत नहीं है। यह मान्यता उसी प्रकार है जैसे यह कहा जाय कि एक बच्चे के शरीर में नित्य नये परिवर्तन हो रहे हैं। उसका स्वरूप एक-सा नहीं रहता। इसलिए बच्चे का अस्तित्व ही नहीं है। इस प्रकार का प्रतिपादन यदि कोई व्यक्ति करता है तो निश्चित ही उसको बुद्धिमान नहीं कहा जायेगा।

संसार को प्रतिभासित होने वाला स्वरूप मिथ्या है, इस सीमा तक तो बात ठीक भी है, किन्तु उनके पीछे चल रहे प्रवाह को ही इन्कार कर देना विवेक संगत नहीं है। प्रवाह ही जीवन है तो अनंत काल से प्रवाहित चला आ रहा है तथा अनन्त काल तक प्रवाहित होता रहेगा। पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तथा प्राणि जगत में उस चेतन-प्रवाह के अस्तित्व को इंकार कर दिया जाय तो भयंकर भूल होगी। शून्यता से गति असम्भव है। गति तो किसी चेतन कारण सत्ता से ही सम्भव है। जड़ वस्तुओं की हलचलों का जो कारण है वही चेतन प्राणियों के जीवन का आधार है। उसी को आध्यात्मिक भाषा में आत्मा कहा गया है। वह सबके परिवर्तन का, हलचलों का कारण है। उसकी प्रकाश किरणें ही वस्तुओं पर प्रतिबिंबित होकर उनके स्वरूप का आभास कराती है। सब परिवर्तनों का कारण होते हुए भी वह सदा अपरिवर्तित रहती है। शून्यवाद की मान्यता को यदि स्वीकार कर लिया जाय तो सृष्टि के कारणों की सन्तोषजनक व्याख्या सम्भव नहीं है।

वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सृष्टि की हलचलों का कारण परमाणुओं का परस्पर एवं संघात है। समस्त ब्रह्मांड में एक स्व-संचालित प्रक्रिया चल रही है। उनके अनुसार चेतना की उत्पत्ति भी जड़-परमाणुओं के परस्पर संगठन के कारण हुई है। आत्मा, मन जड़-शरीर के ही परिणाम हैं। शरीर के विनष्ट होते ही आत्मा का भी अस्तित्व नहीं रहता।

यदि जड़ परमाणुओं के संगठन एवं हलचल मात्र से शरीर का गठन हो जाता है, तो वह कौन-सी शक्ति है जो परमाणुओं में हलचल उत्पन्न करती तथा उनको परस्पर संगठित करके सुन्दर शरीर में रूपांतरित करती है। वह कौन-सी शक्ति है जो प्रकृति के कुछ परमाणुओं को लेकर एक प्रकार के शरीर तथा दूसरे से भिन्न प्रकार के शरीर बना देती है। विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं है। यह कहना कि आत्मा की शक्ति जीवन का कारण भौतिक तत्वों के परमाणुओं के विभिन्न संघातों का प्रतिफल है, अविवेक पूर्ण है। यदि यह सत्य है तो वैज्ञानिक उन तत्वों को जिनसे शरीर बना है, को लेकर जीव का निर्माण क्यों नहीं कर डालते।

अब तक की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ स्वयं साक्षी हैं कि प्रयोगशालाएँ एक क्षुद्र जीव का निर्माण नहीं कर सकीं। स्पष्ट है कि आत्मा जड़-परमाणुओं के परस्पर संघात का प्रतिफल नहीं वरन् एक स्वतन्त्र सत्ता है। जो शक्ति प्रकृति के तत्वों को लेकर सुन्दर शरीर के रूप में रूपांतरित करती तथा जो शरीर के अन्दर चेतना के रूप में रूपांतरित करती तथा जो शरीर के अंदर चेतना के रूप में व्यक्ति होती है, दोनों एक हैं। पिण्ड के अन्दर आत्मा तथा ब्रह्माण्ड में वह परमात्मा के रूप में क्रियाशील है। शारीरिक हलचलों का कारण होते हुए भी वह शरीर से परे है। शरीर के गठन, विगठन से उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। वह सदा एक रूप में बनी रहती है।

चेतना के अस्तित्व को इन्कार करने तथा जड़ वस्तुओं के साथ उसकी नश्वरता की मान्यता प्रतिपादित करने के स्थान पर यदि सत्य को जानने का प्रयास करें तो स्पष्ट होगा कि वस्तुतः जड़ का ही अपना अस्तित्व नहीं है। जिसे हम जड़ जगत कहते हैं। वह वस्तुतः शक्ति की एक अवस्था विशेष ही है।

उस अविनाशी तत्व को जो सदा एक रूप बना रहता है। दार्शनिकों ने आत्मा कहा है। जीवन का वही आधार है। जीवन-मृत्यु से वह रहित है। शरीर के अवयवों के नष्ट होने पर भी वह बना रहता है। उसका निश्चित रूप नहीं है। देश-काल की सीमाओं से वह परे है। शरीर उसका देश नहीं, आयु उसका काल नहीं। काल का आरम्भ तो मन से होता है देश भी मन के अंतर्गत है। मन से-अतीत देश काल के निमित्त से वह परे है। वह अनादिकाल से विद्यमान है तथा अनन्त काल तक बनी रहेगी। वह स्वयं अनन्त है। परिवर्तन असीम वस्तुओं में होता है। आत्मा में परिवर्तन असम्भव है।

यह मान्यता ही आस्तिकता है। जीवन की व्यापकता एवं आत्मा की अमरता ही सत्य है। इस सत्य का अनुसंधान एवं उसमें अनुभूति के लिए किया जाने वाला प्रयत्न साधना है। साधना के सोपान पर चढ़ते हुए ही जीवन-मृत्यु के संघात के पीछे चल रहे सृष्टि प्रवाह के सत्य को जाना एवं अनुभव किया जा सकता है।

सैद्धान्तिक समाधान दार्शनिक विवेचनाओं, द्वारा हो भी जाय तो भी मन को सन्तोष नहीं मिल सकता। सत्य को जानने एवं अनुभव करने के लिए साधना के प्रयोग-परीक्षणों से होकर ही गुजरना होगा। वास्तविक सत्य की अनुभूति तभी सम्भव है। यह दिव्य दृष्टि एवं सम्वेदन क्षमता आत्म परिष्कार के फलस्वरूप भीतर से उभरती और ऊपर से बरसती है। इसी के माध्यम से उस यथार्थ को जान सकना सम्भव होता है जो इस विश्व का तात्विक स्वरूप एवं आधारभूत कारण है।


पुष्पक विमान को बैलगाड़ी तो न बनाइये

मनुष्य शरीर अपने आप में एक परिपूर्ण मशीन है, जिसे विधाता ने बड़ी लगन से, मनोयोग से बनाया है। जब सारे जीव जगत पर हम दृष्टि दौड़ाते हैं तो यह निष्कर्ष निकलता है कि मानवी काया के निर्माण में प्रकृति ने जो बुद्धि कौशल खर्च किया, श्रम किया है, उतना किसी अन्य जीवधारी के लिए नहीं किया। यों तो प्राणियों की दुनिया में कमी नहीं है। आकार, अंगों की संरचना, प्रकृति के आधार पर अदृश्य जीवाणु से लेकर हाथी जैसे विशाल प्राणी तक करीब चौरासी लाख से भी अधिक प्रकार के जन्तु इस सृष्टि में हैं। एक से एक विचित्र आकृति, स्वभाव के प्राणी हैं। आक्टोपस भी यहाँ है एवं दरियाई घोड़ा भी। पर जब दृष्टि को विस्तार देते हैं तो पता चलता है कि प्रकृति ने मानवेत्तर जीवों को विलक्षण तो अवश्य बनाया है, पर उन्हें मनुष्य की तरह का ऐश्वर्य प्रदान नहीं किया। किसी तरह बेचारे अपनी तुच्छ इच्छाएँ पूरी करते हुए जीवनलीला को समाप्त करते हैं। उनका सारा जीवन आत्मरक्षा, क्षुधा तुष्टि एवं वंश विस्तार में ही खप जाता है।

योगवाशिष्ठ में जीवों की इसी स्थिति की ओर ग्रन्थकार संकेत करता है-

अनारतं प्रतिदिशं देशे-देशे जले स्थले। जायन्ते वा म्रियन्ते वा बुदबुदा इववारिणी॥

अर्थात्- जैसे जल के ऊपर बुलबुले उठते हैं और नष्ट होते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक देश और काल में अनन्त जीव उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं।

वस्तुतः आत्मज्ञान जैसी कोई भी वस्तु जीवों के लिए निरर्थक है। इसी कारण मानव शरीर के अन्दर जब उन असंख्य विशेषताओं की झाँकी देखने को मिलती है जो अन्य जीवों के शरीरों में पाई नहीं जाती, तो लगता है भगवान ने मनुष्य को वस्तुतः किसी विशिष्ट उद्देश्य से ही बनाया होगा।

विशिष्टता मानवी काया के रोम-रोम में छिपी पड़ी है। आत्मिक गरिमा पर चिन्तन बाद के लिए भी छोड़ दें और मात्र काय संरचना और विभिन्न अंगों की सुव्यवस्था सहकार पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दिखाई पड़ सकता है। लगता है यह रचनाकार का हँसी-मजाक अथवा मात्र संयोग नहीं है। बल्कि सब कुछ सोद्देश्य ही है।

मानव शरीर की आधारभूत इकाई है- जीवकोश (बायोलॉजीकल सेल)। शरीर में साठ अरब के लगभग कोशिकाएं हैं। प्रत्येक कोष हजारों पावर स्टेशन, परिवहन संस्थान एवं संचार संस्थान की मिली-जुली व्यवस्था के रूप में एक सुसंचालित बड़ा शहर है। यहाँ कच्चा माल आयातित होता है, नया माल तैयार किया जाता है तथा अवशिष्ट मल पदार्थों को निकाल फेंकने की गतिविधियाँ भी सम्पादित होती हैं। एक समर्थ अनुशासनपूर्ण प्रशासन की झाँकी इस इकाई के प्रतिफल के जीवन व्यापार में देखने को मिलती है।

जीवकोष कितने सूक्ष्म होते हैं, इसका यदि अनुमान लगाना चाहें तो इस तथ्य से लगा सकते हैं कि एक करोड़ सेल्स आराम से एक पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। इनके थोड़े बहुत स्थूल घटकों की झाँकी ही सूक्ष्मदर्शी यंत्र से हो सकती है। यदि और भी विस्तार से देखना हो तो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप का आश्रय लेना होगा जो दृश्य को लाखों गुना विस्तार दे देता है। कोष (सेल) की तुलना में सारे शरीर पर दृष्टिपात करें तो वह किसी सौर-मण्डल या ब्रह्माण्ड से कम विलक्षण ओर विराट् नहीं लगेगा।

मात्र आँख की ही बात करें जो ज्ञात होता है कि प्रकाश देखने में सहायता करने वाले रॉड सेल्स की संख्या 25 करोड़ है जिनमें 30 करोड़ से भी अधिक प्रकाश पकड़ने वाले सूक्ष्म रंगीन कण होते हैं। इन कणों की क्षमता का अनुमान इस बात से करना चाहिये कि 3 घंटे में दिखाई देने वाली फिल्म की लम्बाई यदि दस हजार मील से लम्बी हो यह आंखें 50 हजार मील प्रति दिन के दृश्य मस्तिष्क को भेज सकती हैं, यही नहीं उनमें से अनेकों दृश्यों को आजीवन स्मृति कणों में सुरक्षित भी रख सकती हैं।

एकोऽहं बहुस्यामी की झाँकी विराट् के इस लघु संस्करण में करनी हो तो एक कोष को देखा जा सकता है जिसे ओवम या डिम्ब कण कहते हैं। एक बार निषेचित होने पर यह अकेला कोष दो में बटे फिर चार में, इस तरह अनेकों में विभाजित होते चले जाते हैं जब तक कि दो अरब कोशिकाएं तैयार नहीं हो जातीं, इन समस्त कोशिकाओं व उनमें निहित गुण सूत्रों द्वारा ही एक नये जीवन का, नवजात शिशु का स्वरूप निर्धारित होता है।

हर जीवकोष में साइटोप्लाज्म जैसी एक बड़ी झील होती है जिसमें विभिन्न शक्ति केन्द्र तैरते रहते हैं। सतत् इसमें हलचल होती रहती है। माइटोकाण्ड्रिया, वैक्योल्स, एण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम गाल्गीबॉडिज जैसी महाशक्तियाँ इस झील में ही अवस्थित होती हैं। नाभिक (न्यूक्लियस) एवं उसके अन्दर की दुनिया अपने आप में एक पूरी सृष्टि है। माता-पिता से बच्चे में स्थानान्तरित होने वाली सूचनाओं के मूल में चमत्कारी शक्ति होती है, उसे डिसॉक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड (डी.एन.ए.) कहते हैं जो नाभिक में पाये जाने वाले गुण सूत्रों (क्रोमोसोम्स) का घटक होते हैं। इसे वास्तु, शिल्पज्ञ, डिजाइनर या आर्कीटेक्ट कह सकते हैं जो कोशीय अवयवों को यह बताता है कि कैसा व्यवहार करना, क्या बनाना, क्या स्वीकार करना व किसे नकार देना? पर बिल्डिंग काण्ट्रेक्टर की भूमिका आर.एन.ए. (राइबो न्यूक्लिक एसिड) निभाता है। सैकड़ों विभिन्न प्रकार के प्रोटीन घटकों के निर्माण का डिजाइन (ब्लू प्रिन्ट) डी.एन.ए. की केंचुली में छिपा होता है। यहाँ से एक तीसरा ही व्यक्ति मेसेन्जर आर.एन.ए. सन्देश लेकर जाता है। ए.आर.एन.ए. को निर्देश देता है। इन सन्देशों के अनुसार ही यथा निर्देश पैर की माँसपेशियों या हृदय की माँसपेशियों के कोष बनते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि आँख में बैठे रॉड सेल्स के डी.एन.ए. में भी वे सारी सूचनाएँ होती हैं जो नवजात शिशु के सर्वांगपूर्ण निर्माण के लिये जरूरी हैं। परन्तु डी.एन.ए. के इन सूचनाओं वाले भाग (टैम्पलेट्स) को प्रकृति ने बड़ी सावधानी से ब्लॉक कर रखा है। केवल वही भाग डी.एन.ए. का सक्रिय रहता है जहाँ से उसका सम्बन्ध है।

लगता है परमात्मा ने मानव शरीर को खूब मन से रुचि ले लेकर बनाया है। एक ही घटक पर उसने अपनी सारी कला झोंक दी है। बात जीवकोषों की ही चल रही है। यदि थोड़ा और सूक्ष्म दृष्टि से इसकी बाहरी परत हो देखें तो लगता है ऐसा जिम्मेदार, जागरूक चौकीदार और कहीं नहीं। यह झिल्ली मात्र 0.0000001 मिली मीटर मोटी होती है। अन्दर यह किसी भी अपरिचित को नहीं जाने देती। नमक, कार्बोनिक पदार्थ, जल विभिन्न खनिज एवं रसायन बिना सही निर्देश के, अपना कोर्डवर्ड इसे बताये अन्दर नहीं जा सकते। इन्हें अपने-पराये, आवश्यक व अनावश्यक की पहचान भी है। यह स्मृति इतनी तीक्ष्ण होती है कि कोई भी सजातीय कभी भी अवहेलना का शिकार नहीं होता। मान लीजिये यह गुण इनमें न हो एवं बाल बनाने के लिए उत्तरदायी गुण वाले तत्व आँख में प्रवेश कर जायें। नतीजा यह होगा कि आँख के अन्दर से बाल निकलने लगेंगे। आँख की पलकों से लीवर के कोष पैदा हो सकते हैं। पर यहाँ सब कुछ व्यवस्थित सन्तुलित है। कहीं कोई व्यक्तिक्रम नहीं है।

प्रति सेकेंड लाखों कोष मरते हैं- लाखों नये जन्म लेते हैं। यह तथ्य जीवन यात्रा के सतत प्रवाह को ही सत्यापित करता है। यदि चमड़ी के सेल्स प्रति दस घण्टों में नये होते रहते हैं जो दूसरी ओर अपवाद स्वरूप मस्तिष्क भी है जहाँ टूटे-फूटे सेल्स मरते रहते हैं, पर कभी नयों से बदले नहीं जाते।

जीवकोषों का पावर स्टेशन है माइटोकाण्ड्रिया। अति सूक्ष्म, आकार की ये इकाइयां ईंधन (शकर) को जलाकर ऊर्जा उत्पन्न करती हैं एवं अवशिष्ट राख को छोड़ देती हैं जो कार्बन डाइआक्साइड एवं पानी के रूप में होती है। इस जटिल रासायनिक प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप एडिनोसिन ट्राइ फास्फेट (ए.टी.पी.) उत्पन्न होता है जो कि सार्वभौम ऊर्जा स्त्रोत है। हर गतिविधि यहाँ तक कि पलक झपकाने, छाती के फूलने, हृदय धड़कने में ऊर्जा की आवश्यकता है। मस्तिष्क में निद्रा की स्थिति में भी ऊर्जा की आवश्यकता हो जाती है। स्वप्न बिना ए.टी.पी. के उत्सर्जित हुए नहीं देखे जा सकते। अपवाद रूप में केवल एक ही प्रकार के सेल्स ऐसे हैं, जिनमें यह व्यवस्था नहीं होती। शरीर में सतत घूम रहे 5 लाख की संख्या के ये रक्त के लाल कण परिव्राजक धर्म पूरी जिम्मेदारी से निभाते हैं। सम्भवतः इसी कारण प्रकृति ने स्वयं के उत्पादन के झंझटों से इन्हें छुट्टी दे रखी है।

जीवकोषों का यह समग्र संसार अपने आप में पूरी एक सृष्टि है, जिसके अनेकों ग्रहमंडल, निहारिकाएं हैं। आँतों के कोषों की अलग दुनिया है तो मस्तिष्क के न्यूरान्स की बिल्कुल ही अलग। इन सारी गतिविधियों पर विचार करते हैं जो अपने आपको बुद्धिमान समझने वाले मनुष्य से भी अधिक दूरदर्शी है, सूक्ष्म सामर्थ्यों से सम्पन्न है। वह ऐसे उपकरणों का निर्माण कर सकती है जो मानव चले तो अरबों वर्षों तक आधुनिक साधनों का उपयोग कर नहीं सकता।

हृदय एक पम्प के रूप में अविरल गति से सतत रक्त को प्रवाहमान बनाये रखता है। यही एकमात्र ऐसा शक्ति स्त्रोत है जो जीवन भर एक पल को भी विश्राम किये बिना काम करता रहता है। आराम इसके लिये हराम है। इसके बदले में यदि एक बढ़िया से बढ़िया यान्त्रिक पम्प लगा दिया जाय तो 24 घंटे में विश्राम न मिलने पर वह इतना गर्म हो जायेगा कि उसके जल उठने, कार्य प्रणाली में गतिरोध आने की शंका उत्पन्न हो जाती है। पर हृदय है जो 250 ग्राम का एक माँस पिण्ड होते हुए भी प्रतिदिन छियानवे हजार किलोमीटर लम्बी रक्त वाहिनियों में सतत रक्त को चलायमान रखता है। लाल भूरे रंग का यह अंग नाशपाती के आकार का होता है। चार चैम्बर होने के बावजूद भी इसके दो मुख्य भाग होते हैं जिनमें से प्रत्येक में 2 कक्ष परस्पर सहयोग के आधा पर बंटे होते हैं। एक हिस्सा रक्त को शुद्ध होने के लिये फेफड़ों में भेजता है एवं दूसरा हिस्सा शुद्ध होकर आये रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों को भेजता है। जितना रक्त यह दिन भर में पम्प करता है, उतना 28000 लीटर के एक टैंक को भरने के लिए काफी है। चालीस वर्ष की उम्र तक यह करीब 300000 टन रक्त को पम्प कर चुका होता है।

महिलाओं के गर्भाशय को छोड़कर और कोई भी माँसपेशी इतनी मजबूत नहीं है जितना हृदय। पर गर्भाशय मात्र प्रसव के समय सक्रिय होता है, जबकि हृदय दिन रात हर पल। विधाता ने कुछ देशी व्यवस्था की है कि हर धड़कनों के बीच हृदय को इतना विश्राम मिल जाये जो अगली धड़कन के लिये उसे ताजा कर दे। करीब 3/10 सेकेंड सिकुड़ने के बाद आधे सेकेंड का आराम हृदय करता है। जब मनुष्य सोता है तो बहुत सी कोशिकाओं में गतिविधियाँ शिथिल हो जाती हैं, ऐसे में अधिक मेहनत को अनुपयोगी समझते हुए हृदय अपनी गति 72 प्रति मिनट से घटाकर 55 प्रति मिनट कर देता है।

मोटापा हृदय के लिये बड़ा भारी सिरदर्द है। प्रतिकिलो बढ़ने वाली शरीर की चर्बी करीब सात सौ किलोमीटर की रक्तवाहिनी नलियों की संख्या बढ़ा देती है। औसतन साठ किलोग्राम के एक व्यक्ति की 7 किलोग्राम वजनी सात सौ हड्डियों, सवा बारह मीटर लम्बे पाचन संस्थान एवं अगणित कोषों को घेरे 14 लीटर के करीब स्थान को अपने प्रवाह द्वारा निरन्तर निर्मल बनाये रखना, इस आधे पौंड के जीवन्त अंग का ही कार्य है। इसकी क्षमता का अन्दाज इस एक तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि इसकी एक दिन की शक्ति द्वारा दस हजार किलोग्राम वजन एक मीटर की ऊँचाई तक बिना किसी कठिनाई के उठा सकते हैं और यदि मनुष्य की पूरी जिन्दगी के औसत सत्तर वर्ष मात्र के लिये जायें तो फिर 2 लाख टन रक्त को छियानवे हजार मीटर की ऊंचाई तक चढ़ाया जा सकता है।

जब हृदय संस्थान ही इतना अलौकिक है, तो फिर पम्प से उत्सर्जित द्रव्य को ले जाने वाला परिवहन संस्थान भी उससे कम नहीं है। यह एक ऐसी ट्राँसपोर्ट व्यवस्था है जिसका कार्यक्षेत्र है 1 लाख 20 हजार किलोमीटर लम्बा। 5॥ फुट लम्बी काया में इतना बड़ा जंजाल बिखरा पड़ा है जो छह सौ अरब सदस्यों तक अपना सन्देश पहुँचाता है। सारे विश्व की हवाई उड़ानों के परिपथ की कुल लम्बाई को जोड़ दिया जाये तो भी वह रक्तवाहिनी नलियों की कुल लम्बाई से कम ही होगा। कोशिकाओं द्वारा निकाली गयी गन्दगी विकार द्रव्यों को अपने साथ बहा ले जाना, उन्हें गुर्दे तथा फेफड़ों तक पहुँचा कर बाहर फेंकने में मदद करना तथा जीवन के लिये अति आवश्यक प्राणवायु प्रदान करना रक्त परिवहन संस्थान का ही कार्य है।

जितनी देर में हमारी पलक झपकती है उतनी देर में बारह लाख रक्त के लालकण अपनी एक सौ बीस दिन की यात्रा पूरी करके नष्ट हो जाते हैं। इतनी ही अवधि में अस्थिमज्जा उतने ही नये सेल्स बना देती है। खोपड़ी की चपटी हड्डियाँ एवं कशेरुकाऐं अपने जीवन काल में कुल आधा टन रक्त कण पैदा करती हैं। अपने छोटे से जीवन में से कण हृदय से लेकर विभिन्न संस्थानों की 75 हजार परिक्रमा कर लेते हैं।

जैसे एक डिलीवरी कान से लोडिंग अनलोडिंग की जाती है उसी प्रकार केपीलरी व सेल्स के संसर्ग बिन्दुओं पर ऑक्सीजन को अनलोड किया जाता है तथा कोशिकाओं के जलने से उत्पन्न कार्बनडाइ ऑक्साइड को लोड किया जाता है। हर कोशिका की माँगें एक जैसी नहीं हैं। कोई कोबाल्ट माँगता है, कोई हारमोन्स, कोई विटामिन्स तो कोई शकर। जब आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं तो केपीलरीज पूरी सीमा तक काम करने लगती है। सारी त्वचा लाल हो जाती है। जब मनुष्य सो जाता है, आवश्यकताऐं कम हो जाती हैं जो नब्बे प्रतिशत केपीलरीज बन्द हो जाती है।

जीवकोष, रक्त परिवहन संस्थान एवं हृदय का यह त्रिविध समन्वय तिलिस्मों से भरे शरीर की रहस्यमयी विलक्षणताओं का उद्घाटन करता है। यह तो मात्र एक ही समूह है। ऐसी न जाने कितनी सहकार व्यवस्थाऐं शरीर में विद्यमान हैं। हमारे धरती के जीवन को सुनियोजित करने में एक छोटा-सा ब्रह्माण्ड ही जुटा रहता है। वास्तव में पिण्ड ब्रह्माण्ड की ही अनुकृति है और वह मानवी काया में है। इस शरीर के भीतर चल रही विधि व्यवस्थाओं को ब्रह्माण्डीय क्रिया-प्रक्रिया का लघु संस्करण कह सकते हैं।

इतना असाधारण शरीर पाकर भी यदि मनुष्य उसे साँसारिक खिलवाड़ में नष्ट कर दे तो उसे चन्दन का वन सूखी लकड़ियों के भाव बेच देने वाले लकड़हारे और पुष्पक विमान को बैलगाड़ी समझ कर जोत देने वाले किसान की तरह मूर्ख ही समझा जायेगा। बुद्धिमता तो इसमें है कि हम इतने महान उपहार के पीछे अभिव्यक्त विधाता की आकाँक्षा को पहचानें और उसे पूरा करें।


अबूअली शफीक (kahani)

अबूअली शफीक इबादत तो बहुत करते, पर रोटी मजदूरी करके ही खाते थे। सन्त को इस तरह मजदूरी करते देखकर एक अमीर को दया आई और उसने बहुत साधन सामने रखकर कहा- लीजिए, इससे गुजारा कीजिए- मजदूरी करके अपनी हेठी मत कराइये।

अबूअली ने कहा- पाँच वजह ऐसी हैं जिनके कारण मैं आपका धन स्वीकार नहीं कर सकता- (1) आपका लालच उठ कर मेरे ऊपर आ लदेगा। (2) मेहनत न करने से मेरा शरीर और मन आलसी होकर अनेक बुराइयों से भर जायेगा। (3) चोर मेरे घर पर भी घात लगावेंगे। (4) आपका कर्ज मुझे कभी न कभी चुकाना पड़ेगा। (5) आपके अहसान से सदा सिर नीचा किये रहना पड़ेगा।


जड़-चेतन की गुत्थियों का समाधान

मानसिक घटनाक्रमों पर ही संसार का स्वरूप बनता है। इस तथ्य को भौतिक विज्ञान के मूर्धन्य वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने भी स्वीकार किया है। मन के व्यापार भी स्वतन्त्र नहीं हैं, वरन् वे भी चेतन की प्रेरणाओं पर ही उछलते-कूदते हैं? मनःक्षेत्र पर बनने बिगड़ने वाले दृश्य चेतन की ही स्फुरणाएं हैं। स्पष्ट है कि सृष्टि का मूल कारण चेतना है। जड़ पदार्थ भी अपना स्वरूप इससे ही प्राप्त करते हैं। पिण्ड में यह जीव चेतना और ब्रह्माण्ड में वही महती चेतना-परमात्मा के रूप में क्रियाशील है। वैज्ञानिक तथ्यों से भी स्पष्ट है कि जड़ से चेतन की नहीं वरन् चेतन से जड़ की उत्पत्ति हुई है।

उत्पत्ति एवं विकास की एक स्वयं में संचालित जड़ प्रक्रिया नहीं वरन् किसी अदृश्य सत्ता की व्यवस्थित एवं नियन्त्रित है। उपनिषद् में वर्णन आता है। ‘‘ईशावस्य मिंद सर्व सतकिंच जगत्यां जगत”-अजन्मा अविनाशी परमात्मा अपनी माया द्वारा जगत के रूप में प्रकट होता है। भगवत् गीता के अनुसार प्रकृति और पुरुष जो चर-अचर विश्व के कारण हैं अनादि हैं, इसलिए सृष्टि की कारण सत्ता भी अनादि है। “प्रकृति पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि।” गीता के अध्याय 4 में भगवान कृष्ण सृष्टि रचना के संदर्भ में वर्णन करते हैं कि “मैं अजन्मा अविनाशी एवं समस्त भक्तों का स्वामी हूँ। प्रकृति में अधिष्ठित होकर अपनी योग माया से जन्म धारण करता हूँ। स्पष्ट है कि अदृश्य चेतना ही दृश्य पिण्ड के रूप में प्रकट होती है।

पाश्चात्य वैज्ञानिकों में अर्बिन, स्पेन्सर आदि विकासवादियों ने मनुष्य को एक विकसित प्राणी के रूप में माना है। उनका कहना है कि विकास की प्रक्रिया प्रकृति में एक स्वसंचालित रीति से चल रही है। मनुष्य भी जीव शास्त्र के क्रमबद्ध विकास की एक सीढ़ी है। जिसका उद्गम स्त्रोत मैटर है। किसी अन्य कारण सत्ता को न मानकर वे कहते हैं कि जड़-तत्व स्वयं में एक आविष्कार है। उनके प्रतिपादनों में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि जड़ का भी आदि स्त्रोत कहाँ है। उसकी उत्पत्ति कैसे हुई?

डार्विन से लेकर अब तक के विकासवाद के प्रतिपादनों में अनेकों परिवर्तन आये हैं। कुछ वर्षों पूर्व डार्विन द्वारा प्रतिपादित जीव-उत्पत्ति सम्बन्धित सिद्धान्त की शताब्दी मनाने के लिए मूर्धन्य वैज्ञानिकों का दल न्यूयार्क में एकत्रित हुआ। सम्मेलन में ‘ज्यूलियन हक्सले’ ने विकासवादी दृष्टि (इवाल्यूशनरी विज्ञान) पर भाषण देते हुए कहा कि- ‘‘मानव की उत्क्रान्ति केवल जन्तु शास्त्र का भाग न होकर, मनोविकार का प्रकार है। वह साँस्कृतिक प्रक्रिया के अनुसार कार्य करती है। जिसमें स्वयं परिवर्तनशील एवं उत्पादनशील मानसिक गतिविधियों एवं उनके परिणाम निहित हैं। अपने प्रतिपादन में हक्सले ने आगे कहा कि “यह गतिविधियाँ विकसित होकर नवीन क्षमता युक्त ज्ञानमय कोष, कल्पना कोष एवं श्रद्धामय कोष का रूप धारण करती हैं। जो केवल पदार्थ विज्ञान एवं मनोविज्ञान सम्बन्धी संगठनों तक सीमित न होकर तत्वज्ञान के क्षेत्र में प्रविष्ट कराती है। सृष्टा के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है “अद्भुत प्राणी, मनुष्य एवं सृष्टि उस महाशक्ति की स्मृति प्रस्तुत करते हैं।

विकासवादी भी मैटर से चेतन की उत्पत्ति पर अब सन्देह व्यक्त करने लगे हैं। उनकी मान्यताएँ बदल रही हैं। मनोविज्ञान एवं विज्ञान के दोनों ही क्षेत्रों में यह स्वीकार किया जाने लगा है कि स्वयं में गतिमान अदृश्य कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण है चैतन्य एनर्जी से बढ़कर विचारशील क्वस्टा को जड़ तत्व का कारण माना गया है। ऊर्जा, शक्ति जिस भी रूप में स्वीकार किया जाय वही सृष्टि की आदि कारण सत्ता है। परमात्मा, गॉड, अल्लाह के नाम से विभिन्न धर्मों से उसको स्वीकार किया है।

विकासवाद की मान्यताओं में दोष यह रहा कि वह चेतन प्राणियों की उत्पत्ति का कारण मैटर को मानकर सन्तुष्ट हो गया। प्रयोग की कसौटी पर कसने के उपरान्त तथ्यों को स्वीकार करने वाले विज्ञान की यह मान्यता उपहासास्पद ही कही जायेगी। जड़-तत्वों के सम्मिश्रण से चेतन प्राणी की उत्पत्ति का प्रमाण अब तक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सका है। निस्सन्देह विकासवादी पूर्वाग्रहों की मान्यताओं से ग्रसित रहे हैं। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि कारण के बिना कार्य कैसे? सृष्टा के बिना सृष्टि कैसी? पर भारतीय ऋषियों ने सर्वप्रथम प्रश्न किया।

‘नासतो विद्यते भावों ना भावों विद्यते सतः।”

अर्थात्- असत् का अस्तित्व और सत-चेतन का अभाव नहीं हो सकता। असत से अभिप्राय उनका जड़ से था तथा सत का चेतन से।

ऋषियों का सुनिश्चित मत था कि जड़ से चेतन की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस तथ्य को जानने अनुभव करने के लिए उन्होंने प्रचण्ड साधना की। अनुभूतियों के आधार पर उद्घोष किया कि “सम्पूर्ण सृष्टि में एवं सर्व समर्थ चैतन्य सत्ता कार्य कर रही है। वही सृष्टि का आदि कारण है।

‘लेटर्स ऑफ अरविन्द’ में महर्षि का एक उद्धरण है- आत्म तत्व की मूलभूत चेतन तत्व है जिसका अस्तित्व है। यही गतिशील होकर सृष्टि की रचना करता है। सूक्ष्म एवं विराट् ब्रह्माण्ड मात्र उसकी ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

“विजडम ऑफ गान्धी” में महात्मा गान्धी का कथन इस प्रकार है- किसी अज्ञात शक्ति ने व्यक्ति किया है। उसे मैं इन स्थूल नेत्रों से देख नहीं पाता। पर हर क्षण अनुभव करता हूँ।

तथ्य तो यह है कि दृश्य जगत की मूल कारण चेतन सत्ता है। उसकी चेतन तरंगों से ही जीवधारियों की उत्पत्ति हुई। वही अंश रूप में जीवों में व्यक्त होती तथा समष्टि रूप में सृष्टि का संचालन करती है। जब की उत्पत्ति नहीं होती है। वह तो प्रकृति के नियमों जीवन-मरण के बन्धनों से परे अविनाशी है। वह जब स्थूल रूप में व्यक्त होती तो कहा जाता है कि अमुक प्राणी की उत्पत्ति हुई। व्यक्तिकरण में विशेष प्रकार की परिस्थितियों का योगदान तो होता है, पर उस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके ऊपर ही चेतना का अस्तित्व टिका है परिस्थितियों का मात्र इतना योगदान होता है कि वे चेतना के स्थूल कलेवर गढ़ने में सहयोगी होती हैं।

जड़-चेतन के सूक्ष्म विश्लेषण में भी मूल-तत्व के रूप में चेतना ही हाथ लगती है। इसकी पुष्टि विज्ञान की नवीनतम शोधों द्वारा भी हो चुकी है। परमाणु संरचना के क्वान्टम सिद्धान्त विचारशील ‘क्वान्टा’ की स्वीकृति उसमें विद्यमान चेतना की ही पुष्टि है। यह इस बात का प्रमाण है कि जड़-चेतना सबका उद्गम स्त्रोत चेतन है।


अब्राहम लिंकन दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर (kahani)

अब्राहम लिंकन दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर सुबह ही सुबह अपने जूतों पर पालिश कर रहें थे उनका एक मित्र आया। एक राष्ट्रपति को अपने जूते पर पालिश करते देखा तो उसे लगा जैसे उसकी आंखें धोखा खा रही हैं। आखिर उस पर न रहा गया तो बोला- लिंकन! यह क्या करते हो। तुम्हें अपने जूतों पर स्वयं पालिश करनी पड़ती है।

तो क्या तुम दूसरों के जूतों पर पालिश करते हो। कुछ देर के लिए कमरा कहकहों से गूँज उठा मित्र ने कहा- मैं तो जूतों पर पालिश स्वयं न करके दूसरों से करवा लेता हूँ।

मेरी समझ में दूसरों के जूतों पर पालिश करने से भी यह बुरी बात है कि अपने जूतों पर किसी मनुष्य से पालिश करवाई जाये। इतने छोटे-छोटे कार्यों के लिये हमें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए।

लिंकन की बात सुनकर मित्र के पास उत्तर के लिए अब शेष ही क्या रह गया था?


मरने वाला फिर भी जन्मेगा

वह भ्रम अब क्रमशः छटता जा रहा है जिसमें मरणोत्तर जीवन एवं पुनर्जन्म से इन्कार किया जाता था। ईसाई और मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार सृष्टि और प्रलय के मध्य मात्र एकबार जन्म होता है। दूसरे जन्म की बात प्रलय हो जाने के बाद ही सम्भव होती है। सृष्टि और प्रलय के मध्य अरबों वर्ष का अन्तर होना चाहिए। इतनी अवधि के बाद जन्म होना एक प्रकार से निराशाजनक ही माना जायेगा और यही कहा जायेगा कि अवसर जिसके हाथ से गया उसके हाथ से प्रायः सदा के लिए चला गया।

दूसरा वर्ग प्रत्यक्षवादियों का है जो आत्मा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते और कहते हैं, शरीर के साथ ही जीवन का आरम्भ होता है और उसकी समाप्ति के साथ उस सत्ता का सदा सर्वदा के लिए अन्त हो जाता है। उसकी दृष्टि में जीवन ही जीव है। जीवन की समाप्ति के साथ ही जीव का आत्यन्तिक अन्त है।

इन प्रतिपादनों को पुनर्जन्म की घटनाएँ चुनौती देती हैं और पूछती हैं कि पुनर्जन्म की स्मृति से सम्बन्धित जो प्रामाणिक घटनाएँ सामने आती रहती हैं फिर उनका कारण क्या है?

ऐसी घटनाएँ संसार भर में घटित होती पाई गई हैं जिसमें बच्चों ने अपने पूर्व जन्मों के विवरण न केवल सुनाये हैं वरन् उन अपरिचित स्थानों पर पहुँच कर वस्तुओं एवं व्यक्तियों को पहचाना तथा घटित हुई घटनाओं का ऐसा विवरण बताया है, जिसके सम्बन्ध में कुछ सम्बद्ध लोगों के अतिरिक्त अन्यों का कुछ पता ही नहीं हो सकता था। ऐसी दशा में सिखा-पढ़ा कर कुछ कहला लेने का सन्देह भी नहीं किया जा सकता।

ऐसी घटनाओं में से दो घटनाएँ इस प्रकार हैं- बिहार के दरभंगा जिले के बेहरा नामक स्थान के निवासी श्री ब्रजकिशोर वर्मा एक होम्योपैथी डॉक्टर थे। उनके यहाँ  एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम कुमकुम रखा गया। बचपन से ही वह अपनी दादी श्रीमती गंगावती वर्मा से अत्यधिक स्नेह रखती थी।

एक दिन दादी-अम्मा बच्चों को चिवडा परोस रही थी, तभी कुमकुम बोली- ‘‘दादी अम्मा! आप ही की तरह मैं भी अपने बच्चों को चिवडा परोसा करती थी। मैं सच कह रही हूँ, दादा अम्मा मेरा घर दरभंगा में ही उर्दू बाजार में है।’’

घर के लोग प्रारम्भ में उसकी बातों में काफी रस लेते थे। कुमकुम उनके हर प्रश्न का ऐसा उत्तर देती थी मानो सचमुच वह किसी सम्पन्न घर की पुरखिन हो। लेकिन कुछ ही दिनों में उसके माता-पिता उससे परेशान हो गए। वे समझ नहीं पाते थे कि इस साढ़े तीन-चार वर्ष की बच्ची को कैसे समझाया जाये।

एक दिन बेहरा में मेला लगा था। कुमकुम की माँ ने उस दिन सोने के लाकेट वाली चेन और नयी साड़ी पहनी। कुमकुम को भी नयी फ्राक पहनाई गयी। माँ के गले की चेन देखकर उसने कहा- ‘मेरी चेन तुम्हारी चेन से अधिक चमकीली थी। मैं भी गहने पहनूँगी। मैं अपनी तिजोरी से पैसा निकालूँगी और बहुओं से मिलने जाऊंगी।’ इस प्रकार से हठ करते हुए वह रोने लगी। वह अक्सर अपने पूर्वजन्म के बहू-बेटों से मिलने के लिए मचलने लगती थी।

आखिर डा. ब्रजकिशोर वर्मा ने दरभंगा राज के एक स्पेशल अफसर और अपने अन्तरंग मित्र पण्डित हरिश्चन्द्र मिश्र के सामने अपनी यह विषम समस्या रखी। उन्हें यह मामला अपनी पकड़ से बारह होता प्रतीत हो रहा था।

पंडित जी ने सोचा, हो न हो यह मामला पुनर्जन्म का हो। सो कुमकुम से स्वयं पूछने पर ज्ञात हुआ कि उसके उर्दू बाजार वाले घर के सामने एक शिवजी का मन्दिर था जहाँ वह नित्य-नियमित रूप से पूजा करने जाया करती थी। उसकी बहू ने जहर खिलाकर उसकी जान ले ली। उन लोगों के यह पूछने पर कि वे उसके घर को कैसे पहचानेंगे? उसने बताया कि मेरे घर के पीछे एक सिनेमा घर है।

डा. वर्मा कुमकुम की सूचना और पं. हरिश्चंद्र मिश्र की सहायता से कुमकुम के पूर्वजन्म के मकान को बिना किसी दिक्कत के खोजने में सफल हो गए। घर के मुखिया मिसरीलाल (कुमकुम के पूर्वजन्म का बडा बेटा) ने घर के बाजू में बने पोखर के बारे में बताया कि वह उसकी माँ के जीवन काल में ही तैयार किया गया था। पड़ौसियों ने यह भी बताया कि मिसरीलाल की माँ ने एक पूँछ कटा साँप भी पाल रखा था जिस वह बड़ी हिफाजत से रखती थी। वह एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी और बिना मन्दिर में भगवान शंकर की पूजा किये वह भोजन नहीं करती थी।

पारलौकिक विद्या के प्रसिद्ध विद्वान डा. इवान स्टीवेंसन ने कुमकुम के पूर्वजन्म के विवरणों का अध्ययन कर उसे सही पाया। उस समय वे पुनर्जन्म की सत्यता की जाँच के सिलसिले में विभिन्न देशों का भ्रमण करते हुए भारत आए थे। डा. स्टीवेंसन ने बताया कि मृत्यु के समय व्यक्ति की जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही अगला जन्म होता है।

उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी निवासी श्री लक्ष्मी नारायण मिश्र के एक पुत्री हुई। घर में उसे लोग मधु के नाम से पुकारते थे। लेकिन जब बालिका कुछ बड़ी हुई तो अपने को अक्सर हरिजन बतलाती और सुअर का मांस खाने की चर्चा भी बेहिचक करती थी।

एक दिन वह पिता के साथ रेलवे स्टेशन के करीब से गुजर रही थी। तभी सामने से आती हुई ट्रेन को देखकर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी। उसने अपने पिता से बताया कि इसी गाड़ी से कटकर में मर गई थी।

जब वह चार वर्ष की थी, उसने एक दिन अपने पिता के औषधालय में एक आदमी को देखकर मुंह फेर लिया और बताया कि यह मेरा जेठ है।

बाद में उसने बताया कि लालाराम हरिजन उसका पति था। शराब पीने की उसकी बुरी लत थी। रामनवमी के दिन उसने अपने पति से शराब छोड़ देने के लिए कहा। इस पर उसने अपनी पत्नी को झाड़ू से पीटकर लहू-लुहान कर दिया। आत्म ग्लानि और स्वाभिमान टूटने के दुःख में उसने रेल से कटकर आत्महत्या कर ली। साथ ही उसने अपने छिपाए हुए पैसे, बेटे-बेटियों का हुलिया आदि सारी बातें बतायी और बिना किसी मार्गदर्शन के अपने पूर्वजन्म के मकान में जाकर अपने उन सम्बन्धियों को भी पहचान लिया।

भारत आस्तिक देश है। हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता चिर पुरातन है। पर अन्य धर्मावलंबियों को विशेषतया प्रत्यक्षवादी नास्तिक समुदाय को यह विचारना पड़ेगा कि उनने जो अब तक मान रखा है वह सही नहीं है।

ऐसी घटनाएँ संसार भर से घटित होती रहती हैं। कुछ समय पूर्व तक उन्हें इसलिए छिपाया जाता था कि उससे उनकी मान्यताओं का खण्डन होता था। पर अब सत्यान्वेषी वर्ग ने जब यथार्थता खोज निकालने का निश्चय किया है तो पुनर्जन्म की भारत जैसी अनेकों घटनाएं देखने-सुनने को मिलने लगी हैं और मरणोत्तर जीवन को असंदिग्ध माना जाने लगा है।

यह प्राचीन मान्यताओं के खण्डन मण्डन का विषय नहीं है वरन् एक तथ्य का प्रतिपादन है जो सतत और चिरंतन जीवन का विश्वास दिलाता है और मरण के साथ आने वाली व्यथा एवं निराशा का अन्त करता है। आत्मोत्कर्ष के लिए अन्तिम समय तक पुरुषार्थ करने की अदम्य अभिलाषा उन्हीं की हो रह सकती है जो मरण की मात्र विराम समझें और अनवरत जीवन श्रृंखला पर विश्वास रखें। यह एक ऐसा लाभ है जिससे जीवन का स्तर और स्वरूप ऊँचा उठता है और प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए वृद्धावस्था में भी उत्साह कम नहीं होता।


Quotation

यदि तुम भगवान के साथ निष्कपट भाव से रहना चाहते हो तो विश्व में किसी के भी साथ कपट मत रखो क्योंकि विश्व में वह प्रभु ही तो व्याप्त है। -विवेकानन्द


अपना मूल्याँकन, आप कीजिये

एक साधारण परिवार में पल कर अपनी योग्यता, लगन व पुरुषार्थ के बल पर बैजापिनडिजरायली ब्रिटेन के पार्लियामेंट में सदस्य चुने गए, तो धनी परिवार से आये साँसद उन्हें बड़ी उपेक्षा से देखने लगे। न जाने क्यों पुराने सांसद उन्हें अपने पास तक नहीं फटकने देते। शायद इसलिए कि डिजरायली का वेष विन्यास अथवा रहन-सहन राजसी नहीं था। वे साधारण वस्त्र पहनते और गरीब लोगों की तरह रहते। अर्थ प्रधान दृष्टिकोण वाले लोग गरीब व्यक्ति का क्यों कर सम्मान करते? उलटे उनके साथी साँसद उनकी इतनी उपेक्षा करते कि जब व सदन में बोलने के लिए उठते थे तो उन्हें बोलने तक नहीं देते। लेकिन इन परिस्थितियों में भी डिजरायली का मनोबल नहीं डिगा। जब उनके भाषणों में व्यवधान उपस्थित किया जाता तो वे कहते, ‘आपको एक दिन मेरी बातें अवश्य सुननी पड़ेगी।’

यह डिजरायली नहीं उनका आत्मविश्वास बोल रहा था। उन्हें अपनी आन्तरिक शक्तियों पर पूरा विश्वास था। वे अपना उचित मूल्याँकन करना जानते थे। भविष्य के सम्बन्ध में उनके सामने एक सुनिश्चित योजना थी और उस योजना को भी दृढ़तापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए वे कृत संकल्प था। इसी का परिणाम था कि अपने प्रयत्न और परिश्रम के बल पर वे एक दिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गये। लोगों ने उनके प्रति, उनकी योग्यताओं के प्रति इतना विश्वास व्यक्त किया, उन्हें इतना ठीक-ठीक पहचाना कि वे ब्रिटेन के सफल तथा योग्यतम प्रधानमंत्री सिद्ध हुये। पहले जो लोग उनका उपहास किया करते थे वे ही उनके प्रशंसक बन गये और उनका गुणगान करने लगे।

यदि डिजरायली अपने साथियों द्वारा की जाने वाली उपेक्षा से, उनके द्वारा हुए उपहास से हतोत्साहित होकर चुपचाप बैठ जाते, तो संसार उन्हें उस रूप में नहीं जान पाता, जिस रूप में आज जानता है। उनकी सफलता का एक ही कारण है कि उन्होंने अपनी योग्यताओं को पहचाना, अपना मूल्याँकन किया और उसके बल पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गये। इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लाग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्याँकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्याँकन करता है, उससे अधिक सफलता उसे कदापि नहीं मिल पाली है, प्रत्येक व्यक्ति को, जो जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तथा आगे बढ़ने की आकाँक्षा रखते हैं उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं क बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएं भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकाँश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

जीवन में कई बार अनपेक्षित परिस्थितियाँ आती हैं, जिनके कारण अपने प्रति विश्वास डगमगाने लगता है और व्यक्ति उन परिस्थितियों में किंकर्तव्य विमूढ़ होकर उपलब्ध साधनों का उपयोग करने में संकोच करने लगता है अथवा यह सोचने लगता है कि वह इन साधनों के योग्य नहीं है। एक घटना नैपोलियन के सम्बन्ध में विख्यात है, उसका एक सैनिक अपने सेनापति के पास कोई महत्वपूर्ण सन्देश लेकर भेजा गया था। सन्देश इतना महत्वपूर्ण था कि जितना जल्दी हो सके उसे पहुँचाना और उसका उत्तर लेकर तुरन्त वापस आना आवश्यक था। सौंपे गये दायित्व को तत्परता से पूरा करने के लिए उस सैनिक ने अपना घोड़ा इतनी तेजी से दौड़ाया कि गंतव्य स्थल पर पहुँचते ही उसने दम तोड़ दिया।

नैपोलियन ने उसकी कर्तव्यनिष्ठा को सराहा तथा पत्र का उत्तर लेकर उसी शीघ्रता से जाने के लिए कहा लेकिन सैनिक का घोड़ा तो मर चुका था। नैपोलियन को यह मालूम था। सैनिक को असमंजस में देखकर वह बोला, यह लो मेरा घोड़ा और जल्दी से यह उत्तर ले जाओ।’ सैनिक भौंचक्का होकर अपने सेनापति की ओर देखने लगा। उसने कहा, ‘लेकिन श्रीमान्...........’ सैनिक ने यह दो शब्द ही कहे थे कि नैपोलियन बीच में टोकते हुए बोला, ‘मैं जानता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो? पर याद रखो कि दुनिया का कोई भी घोड़ा ऐसा नहीं है, जिसकी सवारी तुम न कर सको।

घटना छोटी-सी है, पर उन सभी लोगों के लिए लागू होती है जो स्वयं को किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए अयोग्य समझते हैं। दुनिया उस सिपाही जैसे असंख्य लोगों से भरी पड़ी है जो यह सोचते हैं कि अधिकांश सुख उनकी पहुँच से बाहर है। इस सम्बन्ध में एक विचारक का कथन है कि, ‘दुनिया के कई लोग अपने आपको उन सौभाग्यशाली लोगों से अलग समझते हैं जो महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर चुके हैं। ऐसा सोचना कितना हानिकारक है, इसका अनुमान सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऐसे विचार मात्र व्यक्ति को कई ऊँचाइयों पर पहुँचने से रोक देते हैं। अपने आपको बौना समझने वाला व्यक्ति देवता कैसे बन सकता है?”

इसमें कोई सन्देह नहीं कि कोई भी व्यक्ति केवल उतनी ही सफलताएँ प्राप्त कर सकता है या उतनी ही उपलब्धियाँ अर्जित कर सकता है, जितनी कि वह चाहता है, चाहने को तो लोग न जाने क्या-क्या चाहते, न जाने क्या-क्या आकाँक्षाएँ और इच्छाएँ रखते हैं, पर वैसा चाहना और बात है तथा उसका फलित होना और बात। लोग चाहते हैं कि उसके पास खूब सम्पत्ति जमा हो, पर सौ में से दस प्रतिशत भी सच्चे मन से यह नहीं चाहते कि वे सम्पन्न बनें। उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि वे संपन्न भी बन सकते हैं। पानी में डूबते समय जैसे तीव्र आकांक्षा होती है कि बच जाया जाये और डूबने वाला व्यक्ति हाथ-पैर मारने लगता है, अपने शरीर के दबाव और पानी की उछाल शक्ति में संतुलन बिठाने के लिए हड़बड़ाहट में ही सही प्रयत्न करने लगता है और फलस्वरूप तैरने लगता है। यही तीव्र आकाँक्षा का परिचय है। कोई व्यक्ति दरिद्रता से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे दरिद्रता में वैसी ही घुटन अनुभव करना चाहिए जैसी कि डूबने वाला व्यक्ति पानी में डूबते समय करता है, पर वैसी घुटन कहाँ अनुभव होती है?

आत्म-विश्वासी भाग्य को अपने पुरुषार्थ का दास समझता है तथा उसे अपना इच्छानुवर्ती बना लेता है। इसके लिए आवश्यकता केवल इस बात की है कि उचित मूल्याँकन किया जाए और आत्मविश्वास को सुदृढ़। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो वह निष्कर्ष अपनी प्रतिभा का स्पर्श पाते ही जीवन्त हो उठता है तथा व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को लाँघ सकता है। नैपोलियन को अपने विजय अभियान में जब आल्पस पर्वत पार करने का अवसर आया तो लोगों ने उसे बहुत समझाया कि आज तक आल्पस पर्वत कोई भी पार नहीं कर सका है और इस तरह की चेष्टा करने वाले को मौत के मुँह में जाना पड़ा है। उन व्यक्तियों को नैपोलियन ने यही उत्तर दिया था कि मुझे मौत के मुंह में जाना मंजूर है, पर आल्पस से हार मानना नहीं और इस निश्चय के सामने आल्पस को झुकना ही पड़ा।

स्मरण रखा जाना चाहिए और विश्वास किया जाना चाहिए कि इस संसार में मनुष्य के लिए न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न ही कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य है। अयोग्यता एक ही है और वह है अपने आपके प्रति अविश्वास। यदि अपना उचित मूल्याँकन किया जाये तो कोई भी बाधा मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।


सृष्टा का सृजन कितना सुन्दर कितना समग्र?

थलचर होने के नाते हम धरती की ऊपरी सतह पर पाये जाने वाले पदार्थों और प्राणियों के सम्बन्ध में ही थोड़ा बहुत जानते हैं। धरती की भीतरी परतों में पाई जाने वाली खनिज सम्पदा की भी खोजबीन की जाती है, इतने पर भी धरातल की थोड़ी नीची परतों में रहने वाली प्राणि-परिवार के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी मिल सकी है। सीधा सम्बन्ध जिनसे न हो उनके सम्बन्ध में उपेक्षा और अनभिज्ञता रहना स्वाभाविक भी है।

जलचरों की अपनी एक अनोखी दुनिया है। उसमें धरातल पर रहने वाले प्राणियों की तरह ही जलचर रहते हैं और अपने स्तर की साधन सुविधाएँ उसी क्षेत्र से प्राप्त करते हैं। उनकी संरचना भी ऐसी है कि उस क्षेत्र में निवास करने और आवश्यक सुविधा साधन उपलब्ध करने में किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव न करें।

जलचरों में मछली प्रधान है। उसकी विविधता देखकर भी आश्चर्य होता है फिर यदि अन्य जलचरों के बारे में अधिक जाना जा सके तो प्रतीत होगा कि प्राणि जगत उससे कहीं बड़ा है जितना कि हम देखते और जानते हैं।

विश्व की समग्र संरचना और उसमें पाये जाने वाले पदार्थों और प्राणियों की विविधता देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका सृजन कर्ता कितना कुशल, कितना कलाकार और कितना समर्थ हो सकता है।

समुद्र में पाये जाने वाले प्राणियों में स्पंज, मूँगा, बनाने वाले प्राणी, कीड़े, स्टारफिस-सीअरचिन, आक्टोपस, घोंघे, केकड़े, मछलियाँ बैक्टीरिया एवं डायटम पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त खतरनाक प्राणियों में व्हेल, मैनेटी, डोलमिन्स, समुद्री सर्प प्रमुख हैं। गहरे समुद्र में रहने वाले इन प्राणियों को पैलेजिक कहते हैं।

रीढ़ वाली मछलियों की अब तक 20,000 जातियाँ खोजी जा चुकी हैं। समुद्र में रहने वाली मछलियाँ समुद्री पानी के रंग के अनुरूप अपना रंग बदल लेती हैं। देखने में हरी या नीली दिखायी पड़ती हैं। उनके मुँह नुकीले होते हैं जिससे वे आसानी से तैर सकें। ईश्वर ने परिस्थितियों के अनुरूप सुरक्षा की कैसी व्यवस्था बनायी है इसे सहज ही इन समुद्री जीवों में देखा जा सकता है।

सील मछली 50 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है। ‘टयूना’ नामक मछली 9 मील प्रति घंटे की चाल से चलकर अपने 15 साल की उम्र में 10 लाख मील की यात्रा तय करती है। गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से बचने के लिए मछलियाँ निरन्तर तैरती रहती है। मछलियों की आँखों में पलकें नहीं होती हैं। यह एक रहस्य बना है कि मछलियाँ सोती है या नहीं। रात में मछलियाँ समुद्री सतह पर तैरती हैं किन्तु दिन में सूर्य की गर्मी से बचाव के लिए काफी गहराई में चली जाती है।

‘ईल’ मछली प्रत्येक वर्ष शरद ऋतु में यूरोप की नदियों को छोड़कर अटलाँटिक महासागर में लाखों की संख्या में आ जाती हैं। ये मछलियाँ ‘वारमूडा’ के निकट ‘सरगासो’ सागर में एकत्रित हो जाती हैं तथा यहीं अण्डे देकर मर जाती हैं। इन अण्डों से निकली मछलियाँ यूरोप के समुद्री किनारे के पास तीन साल तक घूमती रहती हैं तदुपरांत नदियों में चली जाती हैं।

शार्क के शरीर में हड्डियाँ नहीं पायी जातीं। हड्डियों की पूर्ति ‘कार्टिलेज’ करता है। शार्क मछली को चलती-फिरती ‘नासिका’ कहा जाता है। कठिन परिस्थितियों में भी शार्क जीवित रहती है। यह सबसे अधिक खतरनाक मछली है। सफेद शार्क से नाविकों को सदा खतरा बना रहता है। ‘लैमन शार्क’ एक प्रकार का द्रव निकालती है। यह द्रव आदमी के चमड़े को जला सकता है। अब तक कुल 25000 समुद्री जातियाँ मछलियों की पहचानी जा चुकी है।

सृष्टा ने बुद्धि, भाव-संवेदनाओं की दृष्टि से मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाया। अपनी इस विशेषताओं के कारण ही वह सृष्टि का मुकुट मणि कहलाता है। किन्तु अन्य प्राणियों में भी ऐसी विशेषताएँ दी हैं जिन्हें देखकर मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ होने का दम्भ टूट जाता है।

व्हेल समुद्र में रहने वाला एक भीमकाय जन्तु है। अथाह समुद्र में तैरते हुए यह एक छोटा द्वीप सा प्रतीत होता है। इसकी लम्बाई 100 फुट से लेकर 165 फुट तक पायी जाती है। एक साधारण व्हेल किसी दस मंजिली इमारती के बराबर होती है। 12 से लेकर 15 फुट तक मोटी व्हेल का वजन सामान्यतः 120 टन से 150 टन तक होता है। इस प्रकार लगभग हाथी से 20 गुना वजन इसका होता है।

एक व्यक्ति का हृदय हाथ की मुष्ठिका के बराबर होता है जबकि व्हेल का एक कार के बराबर होता है। व्हेल का हृदय 50 से 70 लीटर तक स्वच्छ रक्त पूरे शरीर में छोड़ना है। व्हेल के शरीर में 2.000 से 3500 हजार लीटर तक तेल पाया जाता है। एक व्हेल की औसत आयु 500 वर्ष होती है।

जन्म के दो वर्ष बाद से व्हेल शिशु प्रजनन के योग्य हो जाती है। एकबार में मादा एक या दो बच्चे देती है बच्चा जन्म के पूर्व 11 माह तक माँ के गर्भ में विकसित होता है। जन्म के समय शिशु का वजन लगभग 8 टन होता है। प्रतिघंटा 8 पौण्ड की दर से वजन में वृद्धि होती है। नवजात व्हेल शिशु की लम्बाई 27 फीट होती है। कुछ माह के बाद इसकी लम्बाई दूनी हो जाती है। एक शिशु 500 से लेकर 600 लीटर तक माँ का दूध पीता है।

व्हेल का सुरक्षा यन्त्र उसकी पूँछ है। एक लम्बी बस की आकार को यह पूँछ नाविकों को सदा भयभीत करती रहती है। पूँछ की फटकार चार पाँच मील के क्षेत्र में सुनायी पड़ती है। अच्छे से अच्छे, मजबूत जहाज इसकी टक्कर से बच नहीं पाते हैं उसका मुख एक बड़े प्रवेश द्वारा के समान दिखायी पड़ता है।

न्यूजीलैण्ड के कई द्वीपों के बीच में कई खतरनाक खाड़ियाँ हैं जहाँ बड़ी 2 नुकीली चट्टानें अभागे जहाजों का शिकार करती थीं, इन चट्टानों से टकराकर कई समुद्री जहाज नष्ट हो गये। अब से कोई 80 वर्ष पूर्व एक डालफिन मछली ने जहाजों के पथ-प्रदर्शन का काम शुरू कर दिया। वह शीघ्र ही मल्लाहों में लोकप्रिय हो गयी। मल्लाह डालफिन के पीछे 2 चलने लगे। एकबार दो समुद्री जहाज एक ही खतरनाक क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। डालफिन के लिये समस्या पैदा हो गई कि किसे बचाये? अपनी विवेक बुद्धि से उसने तीव्र गतिमान जहाज के पथ-प्रदर्शन का निर्णय लिया। उसे सुरक्षित क्षेत्र में पहुँचा कर डालफिन बिजली के तेजी से पलटी व चट्टानों से कुछ ही दूर दूसरे जहाज को टकराने से बचा लिया।

डालफिन को मछलियों से अधिक मनुष्य से प्यार है। न्यूजीलैण्ड के एक तट पर एक डालफिन मछली की प्रतिमा स्थापित है जो आपोजैक नामक मछली की स्मृति में निर्मित की गई है। वह तैराकों में बहुत लोकप्रिय थी। लोगों के साथ वाटरपोलो खेलती, नौसिखिये तैराकों को सहारा देकर बचाती व छोटे-2 बच्चों को पीठ पर सैर कराती थी। एक दिन वह एक तीव्र गतिमान नाव से टकराकर मर गई। प्रतिमा उसके मित्रों ने उसकी याद बनाये रखने के लिए स्थापित की है।

डालफिन समुद्र का अत्यन्त बुद्धिमान जीव है। इसका मस्तिष्क मानव मस्तिष्क से बड़ा है। मनुष्य में व उसमें इतना ही फर्क है कि उसके मानव जैसे हाथ-पैर नहीं हैं, बोलने की विशेषता उसमें नहीं है।

होनोलूलू के अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने एक अन्य डालफिन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया कि वह वायरलैस के सन्देश समझ लेती थी। उसके शरीर के साथ एक रिसीवर बाँध दिया गया था। जब केन्द्र से इसे कोई सन्देश भेजा जाता तो वह तत्काल उसका पालन करती थी।

डाल्फिन तीस विभिन्न आवाजें निकाल सकती है। मनुष्यों की तरह वह कहकहे लगा सकती है, स्त्रियों की तरह चीख सकती है व शिकार पकड़ने में सफल होने के बाद बिल्ली की तरह म्याऊँ कर सकती है।

कौटुम्बिकता एवं सामाजिकता इनका एक प्रमुख गुण है। यदि कोई मछली बीमार पड़ जाये तो बस्ती की सारी मछलियाँ उसका हाल पूछने आती हैं व शिकार लाकर देती हैं, जहाँ इसके लिये उन्हें भूखा न रहना पड़े।

जीवन में सम्प्रेषणशीलता का बड़ा महत्व है। इसी के माध्यम से पौधों से लेकर जीव तक अपनी किस्मों, मित्र या शत्रु की पहचान या उनके अस्तित्व का पता लगाते हैं। समुद्री जीवों के अनेकानेक रूपों या व्यवहारों की जानकारी होने पर हमें चकित रह जाना पड़ता है।

समुद्री इन रहस्यमय जीवों का विशद अध्ययन करने के बाद यह पता चला है कि एक लम्बी अवधि तक समुद्र में रहने के बाद प्रजनन के उद्देश्य से प्रेरित होकर ये अपनी पुरानी जगह वापस लौट आती हैं। विशाल समुद्र से नदी में वापस आना कठिन कार्य है परन्तु यह पता चला है कि कुछ रासायनिक तत्व उन्हें सही रास्ता ढूंढ़ने में काफी मदद करते हैं। यह प्रवास चर्या सहज ही हमें पक्षियों में होने वाले ‘माइग्रेशन’ प्रक्रिया का स्मरण दिला देती है। वैज्ञानिकों ने प्रवास में रहने वाली मछलियों की मानसिक लहरों का तुलनात्मक अध्ययन कर गन्ध के महत्व की जानकारी प्राप्त की है।

कुछ जाति की मछलियाँ आपस में आवश्यक सामाजिक सूचनाऐं देने के लिये रासायनिक विधि का प्रयोग करती हैं, इन मछलियों में अपनी जाति, मित्र तथा दुश्मन, कामभावना एवं दूसरों की स्थिति पहचानने की अजब शक्ति होती है।

जापान के लोग समुद्र की तली पर ‘सरगैसो’ नामक घास की खेती करते हैं, जिससे दवाइयां बनायी जाती हैं। इन लोगों को ‘आक्टोपस’ से सतर्क रहना पड़ता है क्योंकि इनका निवास समुद्र के तली में होता है। मादा आक्टोपस एक बार में 40000 से 50000 तक अण्डे देती है। अण्डों से बच्चे जन्मते ही सूर्य प्रकार की ओर भागते हैं।

आक्टोपस की 100 से अधिक जातियाँ पाई जाती हैं, सामान्य आक्टोपस 3 फुट से हुआ करते हैं कुछ इतने छोटे हैं जो उँगली के नाखुन पर बैठ सकते हैं। भूमध्य सागर में पाये जाने वाले ‘आक्टोपस’ के टेन्टेकिल्स साठ फुट तक होते हैं जबकि प्रशान्त महासागर में पाये जाने वाले आक्टोपस के 50 फुट लम्बे टेन्टेकिल्स पाये गये इससे सामान्यतः यह अनुमान है कि इसकी लम्बाई 110 फुट तक होती है।

‘मेरान स्टियर्क्स’ जो फ्लोरिडा के निकट ‘पाम बीच’ स्थित ‘मेरिन वायोलॉजिकल लैबोरेटरी’ के अध्यक्ष हैं, का कहना है कि मुझे आक्टोपस से दिलचस्पी इसलिए हुई कि उसमें गिरगिट की तरह रंग बदलने की क्षमता है और आंखें मनुष्य जैसी होती हैं तथा आश्चर्यजनक चतुरता होती है।

‘फ्रेडरिक ड्यूमा’ और जे. बाई. कास्टो. ने सागर जल में साहसों की कहानी ‘दी साइलेंट वर्ल्ड’ में लिखा है कि एक दिन मैंने एक छोटे आक्टोपस को पकड़ा, पकड़ते ही वह जेट विमान की गति से भागने लगा और लाल रंग की पिचकारी जैसी छोड़ी। इनकी एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि ये 1 इंच के आठवें हिस्से की जितनी कम जगह में से अपने शरीर को निकाल सकता है।

‘एडवर्ड रिकेटस और ‘जैक केतविन ने अपनी किताब ‘विटवीन पैसिपिक टाइड्स’ में लिखा है कि आक्टोपस की आंखें बिलकुल आदमी जैसी विकसित होती हैं तथा बिना रीढ़ के हड्डी वाले किसी भी प्राणी से बड़ा और अधिक कार्यक्षम मस्तिष्क होता है। मनुष्य जैसी पाँच ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति उसमें भी होती है और ‘टेन्टेकिल्स’ की शक्ति एवं नियन्त्रण क्षमता मनुष्य जैसी होती है तथा मैस्कुलर क्षमता तो बहुत बढ़ी-चढ़ी हुआ करती है।

धरती के प्राणियों के सम्बन्ध में हम कुछ जानते हैं। जलचरों की थोड़ी सी जानकारी भी मिलने लगी है। यह ज्ञान जितना ही बढ़ेगा और रहस्यों की गहराई में उतरने का जितना अवसर मिलेगा उसी अनुपात से सृष्टि और उसके सृष्टा की विचित्रताएँ समझते और उसके सौंदर्य को निहार कर पुलकित होते चले जायेंगे।


अट्ठाईस बरस बाद

उस समय दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। अमेरिका और जापान की सेनाएँ मोर्चों पर आमने-सामने डटी हुई थीं। जापान की सरकार ने अपने एक छोटे से टापू गुआम को बचाने के लिए 13 हजार सैनिक तैनात कर दिये थे और अमेरिका जल्दी से जल्दी इस टापू पर अपना अधिकार देखना चाहता था क्योंकि गुआम सैनिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण था। यहाँ से दुश्मन पर सीधे वार किया जा सकता था।

गुआम पर कब्जा बनाये रखने और उस पर अधिकार करने के लिए दोनों देशों की सेनाएं घमासान लड़ाई लड़ रही थीं। जब जापानी सैनिकों के हारने का मौका आया तो उन्होंने आत्म-समर्पण करने के स्थान पर लड़ते-लड़ते मर जाना श्रेयस्कर समझा। संख्या और साधन बल में अधिक शक्तिशाली होने के कारण अमेरिकी सैनिकों को जल्दी विजय मिल गई और गुआम का पतन हो गया। सैकड़ों जापानी सैनिक निर्णायक युद्ध की अन्तिम घड़ियों तक लड़ते रहने के बाद, कुछ बस न चलता देख जंगलों में भाग गये क्योंकि सामने रहते हुए उन्हें हथियार डालने पड़ते, समर्पण करना पड़ता, पर उन्हें यह किसी कीमत पर स्वीकार नहीं था।

सन् 1973 में इन्हीं सैनिकों में से सैनिक सार्जेण्ट शियोर्चा योकोई वापस लौटा, जिसे जापान ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया। योकोई अट्ठाईस वर्षों तक जंगल की खाक छानता हुआ, पेड़-पौधों को अपना साथी मानते हुए, प्रगति की दौड़ दौड़ रही दुनिया से बेखबर सभ्य संसार में लौटा था। उसके इस वनवास की कहानी बहुत ही रोमाँचकारी है। योकोई को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? और उसने इन सबको किस सहजता से स्वीकार किया। उसके मूल में है- आत्म सम्मान और राष्ट्रीय गौरव की अक्षुण्ण बनाये रखने की भावना। ‘टूट’ जायेंगे पर झुकेंगे नहीं, यह निष्ठा।

अट्ठाईस वर्षों तक जंगल में रहते हुए योकोई को यह पता ही नहीं चला कि दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया है। इस सम्बन्ध में वह क्या सोचता था? पत्रकारी ने योकोई से यह प्रश्न किया तो उसने बताया, मैंने यह सीखा था कि जीतेजी बन्दी बनने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है। गुआम की लड़ाई में आसन्न पराजय को देखते हुए सैकड़ों सैनिकों के साथ में भी जंगल में भाग गया। मेरे साथ आठ सैनिक और थे। हमें लगा कि सबका एक साथ रहना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए हम टोलियों में बँट गये। मेरी टोली में दो सैनिक और थे। हम तीनों टोलोफोफोखिर किले की आरे चले गये। यहीं पर हमें पता चला कि जापान हार गया है। अब तो नगर में जाने की सम्भावना और भी समाप्त हो गई।

अट्ठाईस वर्षों तक योकोई ने आदिम जीवन बिताया। उसके पास केवल एक कैंची थी, जिससे वह पेड़ों की शाखाएँ काटता और उनका उपयोग भोजन पकाने तथा छाया करने के लिए करता। कपड़े सीने के लिए उसने अपने बढ़े हुए नाखूनों का सुई के रूप में इस्तेमाल किया। रहने के लिए उसने जमीन में गुफा खोद ली और वह बिछौने के लिए पेड़ों की पत्तियों का उपयोग करता। भोजन के काम जंगली फल काम आते।

समय की जानकारी तो कैसे रखता? परन्तु महीने और वर्ष की गणना तो वह रखता ही था। पूर्णिमा का चाँद देखकर वह पेड़ के तने पर एक निशान बना देता। वह गुफा से बाहर बहुत कम निकलता था। प्रायः रात को ही वह बाहर भोजन की तलाश में आता था। कभी कभार बाहर आना उसे पुनः सभ्य संसार में ले आया।

एक बार टोलोफोको नहीं के किनारे घूम रहा था कि जो मछुआरों ने उसे देख लिया और सन्देह होने के कारण वे उसे पकड़ कर ले आये तथा पुलिस को सौंप दिया। वहाँ पूछताछ करने पर पता चला कि वह जापान की शाही सेना की 38 वीं इन्फैक्ट्री रेजीमेंट का सिपाही है। जापान की सरकार ने उसे करीब 350 सेन वेतन और सहायता के रूप में काफी रकम देने की घोषणा की है।


मनुष्य प्रकृति नियमों में सर्वथा आबद्ध नहीं

परमात्मा की कृति यह सृष्टि जितनी विराट् है उतनी ही विलक्षण भी। व्यवस्था, सौंदर्य, कलाकारिता, विलक्षणता जैसी विशेषताओं को केन्द्रीभूत होते प्रकृति में देखा जा सकता है। दृष्टि भाव सम्पन्न हो तो दृश्यमान प्रकृति में ही परमात्म शक्ति को क्रीड़ा कल्लोल करते देखा जा सकता है। इस दृष्टि के अभाव के कारण ही विज्ञान अपनी शोधों द्वारा प्रकृति के जड़ उपादानों का विश्लेषण तथा उसके रहस्यों को जानने का प्रयत्न करता है। व्यवस्था की दृष्टि से समस्त प्रकृति वैज्ञानिक नियमों में संचालित है। इस तथ्य से परिचित होने के कारण ही विज्ञान सब कुछ जानने का दम्भ भरता है। किन्तु कभी-कभी ऐसी घटनाएँ भी देखने को मिलती हैं जो समस्त प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक नियमों का उल्लंघन करते देखी जाती है। प्रकृति के नियमों को तोड़ती हुई विलक्षणताएँ उस अनन्त असीम सामर्थ्यों से युक्त सत्ता का बोध कराती यह बताती है कि उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। खोजने पर विज्ञान को उनमें ऐसा कोई कारण दृष्टिगोचर नहीं होता जिसके आधार पर उक्त विलक्षणताओं से जुड़े रहस्यों का बोध करा सके। ऐसी स्थिति में बुद्धि अपनी असमर्थता अनुभव करती तथा सृष्टा के सृष्टि कौतुक के विषय में सोचने को बाध्य करती है।

जीव विज्ञान शरीर की बनावट एवं उसकी विशेषताओं की व्याख्या आनुवांशिकता (हेरीडिटी) के आधार पर करता है। उक्त नियम के अनुसार माता-पिता के गुणसूत्र मिलकर ही शरीर की विविधताओं का निर्माण करते हैं। माता-पिता के गुण सूत्रों में जो भी प्रभावकारी हो जायेगा, सन्तति में उसी प्रकार की विशेषताएं दृष्टिगोचर होंगी। उदाहरणार्थ माता-पिता में एक गोरा तथा एक काला है। दोनों के संयोग से उत्पन्न होने वाले बच्चे का रंग गोरा, काला अथवा दोनों का मिला-जुला रंग हो सकता है। किन्तु आनुवांशिकता के नियमानुसार ऐसा सम्भव नहीं है कि शरीर के कुछ हिस्से काले हो तथा कुछ गोरे अथवा आधा भाग गोरा हो और आधा काला। दोनों के सम्मिलित गुण उत्पन्न होने वाली सन्तति में विद्यमान तो हो सकते हैं किन्तु उभर कर दो गुणों में से कोई एक ही आ सकता है। छिपे गुण सूत्र में विद्यमान विशेषताएं इस बच्चे से उत्पन्न होने वाली पीढ़ियों में आ सकती है। किन्तु एक साथ ही दो विरोधी प्रकार के गुण एक ही सन्तति में नहीं आ सकते। जीव विज्ञान के आनुवांशिकी नियमों के विशेषज्ञ इस तथ्य से परिचित हैं। किन्तु फ्राँस के ‘मोमिन्स नगर’ में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया जिसने समस्त आनुवांशिकी नियमों को चुनौती दी। ‘व्रासर्ड’ अभी वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का केन्द्रबिन्दु बना हुआ है। उसकी एक आँख भूरी तथा एक नीली है। जीवविज्ञानी इस विचित्रता का कोई कारण नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं।

अद्भुत सृष्टा के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। इसका परिचय कभी-कभी इस प्रकार मिलता है। इटली में 41 वर्षीय गिवनी गैलेन्ट नामक एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख मिलता है जिसका शरीर तो सामान्य था, किन्तु आंखें उल्लू की जैसी थीं। आँखों की बाहरी संरचना उल्लू जैसी दिखायी पड़ती थी। वह दिन में नहीं देख पाता था। रात्रि में स्पष्ट रूप से वह किसी वस्तु को देख सकता था। मूर्धन्य वैज्ञानिक भी उक्त विचित्रता का कोई वैज्ञानिक कारण न ढूँढ़ सके।

शरीर विज्ञान के नियमों को तोड़ती हुई फ्राँस के टुरकुइंग नगर में एक बच्ची ने जन्म लिया। उसके अन्य अंग तो सामान्य थे। किन्तु आँख एक थी और वह भी दोनों भौहों के मध्य। अकेली आंख से भी वह प्रत्येक वस्तु का भली-भाँति देख लेती थी। बच्ची का नाम था- ‘मशहूम्लेमेन्ट’। वह लम्बे समय तक जीवित रही तथा तीसरी आँख वाली लड़की के नाम से प्रख्यात हुई।

लन्दन में ‘एडवर्ड मार्डो’ नामक एक अँग्रेज अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसके दो चेहरे अन्य व्यक्तियों से अलग सहज ही उसका परिचय दे देते थे। सिर तो एक ही था। किन्तु मुँह, आंखें नाक दोनों ओर थे। पीछे स्थित आँख से वह अच्छी प्रकार देख सकता था। मुँह से अस्पष्ट भाषा में बोलता था। सामने का मुँह सामान्य था।

फ्राँस की ही फ्रेंकफोर्ट में जन्मी ‘ग्रेटल मेयर’ नामक महिला का नाम उल्लेखनीय है। उसकी दो जीभ थी। किन्तु न बोल सकने का दुःख उसे आजीवन बना रहा। अपनी दो जीभों के कारण वह बात-चीत कर पाने में असमर्थ थी। अमेरिका के ओहियो प्रान्त के विख्यात नगर ‘सिर्नासनारी’ में एक लड़की जिसका नाम था- ‘फैनी माइल्स’ उसके पंजों ने प्रकृति के बन्धनों में बँधने से इन्कार कर दिया। लड़की के पैर के पंजे असामान्य रूप से बढ़ने लगे। सन् 1805 में उनकी लम्बाई 2 फीट तक जा पहुँची। चिकित्सक अपने लम्ब प्रयत्न के बाद भी पंजों की असामान्य वृद्धि को रोकपाने में असफल रहे। यह वृद्धि 2 फीट पहुंच कर अपने आप रुक गई।

महाभारत में उल्लेख मिलता है कि कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से उसकी कौमार्य अवस्था में हुआ। शरीर विज्ञान के नियमानुसार पुरुष के बिना संसर्ग के यह असम्भव है। किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के समय ऐसी घटना का उल्लेख मिलता है जिसे देखकर उक्त पौराणिक घटना पर विश्वास करना पड़ता है। जर्मनी की 11 वर्षीय लड़की ऐमीमेटी जोन्स को हैम्वर्ग के एक अस्पताल में दाखिल किया गया। अपनी इस आयु में ही उसने साड़े सात पौंड वजन की एक स्वस्थ बच्ची हो जन्म दिया। वैज्ञानिकों के एक दल ने उक्त बच्ची पर गहन एवं विस्तृत शोध किया। उन्होंने घोषणा की कि बच्ची ऐमीमेटी जोन्स की शारीरिक बनावट असामान्य है। उसके लिए कौमार्यावस्था में बच्चे को जन्म देना निस्सन्देह जीवविज्ञान के इतिहास में अनोखी घटना है। स्थानीय पत्रिका संडे पिक्टोरियल में प्रकाशित उक्त घटना के रहस्य हो जान सकना विज्ञान के लिए अब तक सम्भव न हो सका।

ये विलक्षणताएँ किस सर्व समर्थ सत्ता का बोध करातीं तथा इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि मानवी सत्ता प्रकृति के नियमों में बँधी नहीं है। यह मनुष्य की कमजोरी है कि वह अपने को बन्धनों में बँधा असमर्थ अनुभव करता है। अन्यथा चेतना को किसी भी प्रकार के बन्धन, बाँधने में सफल नहीं हो सकते। इस तथ्य हो हृदयंगम कराने के लिए ही परमात्मा इन घटनाओं द्वारा मनुष्य को प्रेरणा देता तथा सोचने को बाध्य करता है कि स्थूल शरीर जब शरीर विज्ञान एवं प्रकृति के नियमों को तोड़ने में समर्थ हो सकता है तो मनुष्य के अन्तराल में विद्यमान चेतना क्योंकर बन्धनों में बँधी रह सकती है? स्पष्ट है कि साँसारिक आकर्षणों को स्वीकार कर उनमें लिप्त हो जाने से ही बन्धन प्रतीत होते हैं। अपनी असीम सामर्थ्यों से युक्त सत्ता असहाय, असमर्थ दिखती है।

मानवी काया एवं उसमें सन्निहित चेतना इतनी विलक्षण हो सकती है, तो उसका आदि स्त्रोत-सृजित कितना अलौकिक सामर्थ्यवान रहस्यों से युक्त होगा। इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। इन रहस्यों को जान सकने में विज्ञान के स्थूल नियम असमर्थ हैं। उसे समझने एवं अनुभव करने के लिए तो चेतन विज्ञान का ही अवलम्बन लेना होगा।


अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

इसके उत्तर में जिन्न ने कहा कि “तुम्हीं ने मुझे बुलाया है और तुम्हीं ने मुझे डराने के लिए जिम्मेदार किया है। इसके लिए तुम्हीं जिम्मेदार हो, क्योंकि तुम्हीं ने मुझे उत्पन्न किया है।” जापान के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए बताते हैं कि यह जिन्न लोगों के बुलाने पर अब भी आता है तथा उन्हें तरह-तरह से परेशान करता है। इस जिन्न का नाम भय है। कुल मिलाकर यह कि भय अपने ही मन की उपज है। कौन यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि व्यापार में घाटा हो सकता है, परीक्षा में फेल हुआ जा सकता है, नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं, काम धन्धा चौपट हो सकता है। बिना किसी के कहने पर व्यक्ति स्वयं ही तो इस तरह की बातें सोचता है। अन्यथा क्या यह नहीं सोचा जा सकता कि व्यापार में पहले की अपेक्षा अधिक लाभ होगा, नौकरी में तरक्की हो सकती है, परीक्षा में पहले की अपेक्षा अच्छे नम्बरों से पास हुआ जा सकता है। व्यक्ति इस तरह का शुभ और आशाप्रद चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है?

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों की विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है तो इसमें किसी और का दोष नहीं है, दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।

अशुभ चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी हैं। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।

भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है। अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

बहुधा नये कामों का आरम्भ करते समय एक किस्म का संकोच होने लगता है। कारण वही है- अशुभ आशंका। उस स्थिति में अशुभ आशंकाओं को अपने मन से झटक कर विचार किया जाना चाहिए। सफलता और असफलता दोनों ही सम्भावनाएँ खुली हुई हैं। फिर क्या जरूरी है कि असफल ही होना पड़ेगा। मन में आशा का यह अंकुर जमा लिया जाए तो असफलता भी पराजित नहीं कर पाती। उस स्थिति में भी व्यक्ति को यह सन्तोष रहता है कि असफलता कोई नये अनुभव दे गई है। इन अनुभवों से लाभ उठाते हुए आशावादी व्यक्ति दुबारा प्रयत्न करता रहता है और तब तक प्रयत्न करता रहता है, जब तक कि सफलता हस्तगत नहीं हो जाती।

असफलताओं और दुःखदाई घटनाओं को स्मृति पटल पर बार-बार लाने की अपेक्षा ऐसी घटनाओं का स्मरण करना चाहिए जो अपने आपके प्रति आस्था और विश्वास को जगाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सफलता के और असफलता के दोनों ही अवसर आते हैं, दोनों तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जो अच्छी और बुरी होती है। सुख-दुःख के क्षण सभी के जीवन में आते हैं। असफलताओं, कठिनाइयों और कष्टों को याद रखने तथा याद करने की अपेक्षा सफलताओं और सुखद क्षणों को याद करना आशा तथा उत्साह का जनक होता है। ये स्मृतियाँ व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं और जो व्यक्ति अपने आप में विश्वास रखता है, हर कठिनाई को सामना करने के लिए प्रस्तुत रहता है उसके लिए कैसा भय और कैसी निराशा?

भविष्य के प्रति आशंका, भय को आमंत्रण मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को कुँद बना देते हैं। अस्तु, जिन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा है उन्हें चाहिए कि वे अशुभ चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।


वर्तमान के आँगन में भूत और भविष्यत्

शेफील्ड (ब्रिटेन) के श्री डेनिस होम्स और श्रीमती ईर्टलन होम्स की 18 माह की बच्ची ने एक दिन दीवार की ओर सिर उठाकर देखा और कहा ‘मम्मी’ पिक्चर हॉल। इसके बाद घुटनों के बल आकर वह माँ की गोद में बैठ गयी। लेकिन कुछ ही समय बीता की अचानक उसी दीवारी से एक चौखटे वाली तस्वीर टूट कर जहाँ पहले केसी बैठी हुई थी ठीक वहीं आ गिरी।

इसके नौ महीने बाद होम्स परिवार छुट्टियाँ बिताने के लिए कार से ‘यारमुथ’ जा रहा था। केसी की यह पहली यात्रा थी। यारमुथ से आठ मील दूर पहले सड़क पर एक मोड़ है और जहाँ मोड़ पुरा होता है वहा 6-7 टूटी हुई पवन चक्कियाँ हैं, जो मोड़ पार करने पर ही दिखाई देती हैं। लेकिन मोड़ पुरा होने के पूर्व ही केसी बोल उठी ‘मम्मी, वहाँ पचन चक्कियाँ हैं।’ पत्नी और पति इस बात को सुनते ही अवाक् हो गये। लेकिन उन्होंने इसे निरा संयोग कर टाल दिया।

पर इस अस्वाभाविकता को कब तक मात्र संयोग समझा जाय। मार्च 1973 में एक दिन केसी की बुआ उसे शेफील्ड के सिटी रोड कब्रिस्तान में ले गयीं ताकि वहां वह अपने दादा की कब्र पर फूल चढ़ा सके। सहसा केसी बोल उठी- ‘मेरा दोस्त डेविड भी यहीं दफना है।’ आश्चर्यचकित होकर बुआ ने उसे दिखाने को कहा।

केसी उन्हें कब्रिस्तान के एक ढलवे कोने में ले गयी जहाँ एक पर लिखा था- डेविड सुपुत्र क्यारा और फ्रैंक। मृत्यु 1903 उम्र 18 मास।

केसी से उसके माता-पिता ने काफी पूछा कि उसे डेविड की कब्र का पता कैसे लगा? लेकिन वह बराबर एक संक्षिप्त उत्तर देती रही- ‘मुझे पता था’।

ऐसी क्षमताओं की कल्पना सिद्ध योगियों में जो की जा सकती है, पर नन्हें बालकों में इस तरह की अद्भुत क्षमताओं का प्राकट्य विस्मयकारी तथ्य जान पड़ता है। आत्मविद्या के ज्ञाताओं को इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं लगता। सृष्टि में जो भी कुछ पैदा होता है चाहे वह जीव-जन्तु पशु-पक्षी मनुष्य हो अथवा वृक्ष वनस्पति शैशव। युवा (प्रौढ़) तथा जरा-अवस्था का सामना सभी को करना पड़ता है। यह विज्ञान सफल प्रक्रिया साधना के क्षेत्र में भी कार्य करती है। साधनाएँ चाहे वह यम नियम प्राणायाम हों या मन्त्र जाप सोऽहम् खेचरी और मुद्रा बन्ध साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही मस्तिष्कीय न्यूरान के लिए विद्युत का काम करते हैं, उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।

जब तक साधना द्वारा उपार्जित प्राण पक न जायें तब तक साधक के दिन जोखिम भरे कसौटी के होते हैं उनके न पकने तक विषय, वासना और तृष्णा, अहंता के वनचरों द्वारा उदरस्थ कर लिये जाने की आशंका तो रहती ही है, कहीं कोई अनुभूति हो तो बाल बुद्धि उसे चमकाकर अपना अहंकार जताने की भूल करके उसे गवाँ सकती है। कदाचित साधना काल में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो लोकोत्तर जीवन में प्राण परिपाक क्रिया चलती रहती है वहीं इतर जन्मों की प्रतिभा के रूप में दिखाई देती है।

जब केसी 4 वर्ष की थी, एक दिन श्रीमती होम्स वर्ग-पहेलियाँ हल कर रही थीं। उन्होंने अपने पति से पूछा कि- ‘बी से प्रारम्भ होने वाला पाँच अक्षरों का वह कौन सा शब्द है जिसका अर्थ हवाई जहाज होता है? श्री होम्स तथा उनकी 15 वर्षीय पुत्री ‘जैकलीन’ इस प्रश्न का उत्तर न दे सके। तभी केसी कह उठी ‘ब्लिम्प’। शब्दकोश ढूंढ़ने पर बात सही निकली।

अगस्त 1974 के दूसरे सप्ताह में होम्स परिवार छुट्टी मनाने यारमुथ गया। एक बुधवार को समुद्र के किनारे टहलते हुए केसी कहने लगी ‘आज दादा जी उदास हैं। कोई बुरी घटना घटने वाली है। वह अपने पिता के एक पुराने सहकर्मी श्री ‘वेनराइट’ के बूढ़े पिता को दादाजी कहा करती थी। शनिवार को होम्स परिवार शेफील्ड लौटा। वहाँ उन्हें पता चला कि बुधवार को दादाजी के भाई की मृत्यु हो गई थी।

एक दिन श्रीमती होम्स रसोई घर में काम कर रही थी। तभी केसी वहाँ आयी और बोली- ‘कैसी हो टिच?’ श्रीमती होम्स ने पूछा कि मुझे इस नाम से पुकारने के लिए तुमसे किसने कहा? केसी ने जवाब देने के बदल पूछा- “नानाजी की कमर टेढ़ी थी और वे चपटी टोपी पहनते थे न?” वास्तव में केसी के नानाजी की कमर झुकी हुई थी। वे चपटी टोपी भी पहनते थे तथा केसी की माँ को प्यार से ‘टिच’ कहकर बुलाते थे। लेकिन वे तो केसी के जन्म से 4 वर्ष पूर्व ही मर चुके थे।

अप्रैल 1975 की बात है। वियतनाम युद्ध में अनाथ हुए बच्चों को हवाई जहाज द्वारा अमेरिका में बसाने के लिए लाया जा रहा था। टी.वी. में उसकी खबरें देखते समय केसी ने कहा- ‘बच्चे मर जायेंगे।’ माँ ने कहा ‘हाँ बच्चे भूखों मर रहे हैं।’ लेकिन केसी ने उनकी बात काटते हुए कहा- ‘नहीं जहाज जल रहा है, बच्चे मर रहे हैं।’ दो दिन बाद ही खबर आई कि एक जहाज के गिर जाने के कारण कई बच्चे मर गये।

दूरदर्शन, भविष्य दर्शन को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका में एक शोध कार्यक्रम बनाया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन और केन्द्रीय जासूसी संगठन ने इन शक्तियों से युक्त ‘द इंगोस्वान’ एवं ‘पेट प्राइस’ नामक दो व्यक्तियों का परीक्षण किया। यह कार्य स्टेन फोर्ड शोध-संस्थान की प्रयोगशाला में सम्पन्न हुआ। किसी प्रकार के सन्देह की गुंजाइश न रहे इसलिए हैराल्ड पुराफ और रसेल टार्ग नामक दो भौतिकविदों को भी नियुक्त किया गया। इंगोस्वान एवं पेट प्राइस एक स्थान पर बैठकर किसी भी दूरवर्ती स्थान में हो रहे क्रिया-कलाप, स्थान की विशेषताओं का वर्णन उसी प्रकार कर देते थे जैसे प्रत्यक्ष सामने देख रहे हों।

एक प्रयोग पेट प्राइस पर किया गया। वैज्ञानिकों ने पेट प्राइस से कहा कि वह वर्जीनिया के एक गुप्त सैनिक केन्द्र का पूरा विवरण प्रस्तुत करें। कुछ देर ध्यान मग्न के उपरान्त प्राइस ने जो विवरण प्रस्तुत किया उसे सुन कर वैज्ञानिक विस्मित रह गये। उसने इतनी छोटी-छोटी बातों का भी उल्लेख किया जिसकी जानकारी वहाँ रहने वाले अधिकारियों को भी नहीं रहती थी। प्राइस ने कहा कि उक्त सैनिक अड्डे के तलघट के आफिस में दो फाइलें रखी हैं जिनमें एक का नाम है ‘फ्लाइंग ट्रेप’ तथा दूसरी का ‘मिनर्वा’। तलघट के उत्तर की दीवार के साथ लगी अल्मारी पर लिखा है- ‘ऑपरेशन पुल’। उक्त स्थान का नाम प्राइस ने बताया ‘टेस्टाक या हेफार्क’ तलघट के मूर्धन्य अधिकारियों का नाम कर्नल ‘आर.जे. ह्वेमिल्स’, मेजर जनरल जार्जनेश और मेजर ‘जानकलहूम’ बताया। जिस तलघट का विवरण प्राइस ने प्रस्तुत किया वह एक गोपनीय प्रयोगशाला थी जहाँ से सोवियत उपग्रहों की निगरानी रखी जाती थी। विशिष्ट सूत्रों द्वारा मालूम करने पर सभी बातें सही पायी गईं। उपस्थित अधिकारियों ने कहा कि ‘प्राइस तथा स्वान’ कुशल जासूस का कार्य कर सकते हैं। उन्होंने इस कार्य के लिए बड़ी रकम देने का भी आग्रह किया किन्तु दोनों ने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि ईश्वर प्रस्तुत इस सामर्थ्य का हम दुरुपयोग नहीं कर सकते।

दूरदर्शन, भविष्यदर्शन अतीन्द्रिय सामर्थ्य का एक छोटा-सा पक्ष है। मानवी अन्तराल में प्रचण्ड सामर्थ्य भरी पड़ी है जो सुषुप्तावस्था में विद्यमान रहती है। परमात्मा द्वारा यह सभी को प्राप्त है। आध्यात्मिक पुरुषार्थों द्वारा उन्हें जगाया एवं उच्च स्तरीय कार्यों में प्रयुक्त किया जा सकता है। यह कठिन है, पर असाध्य नहीं। श्रम साध्य है, पर असम्भव नहीं। जितना समय, श्रम एवं मनोयोग भौतिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है, उतना ही आध्यात्मिक विभूतियों के लिए किया जा सके तो मनुष्य उन सामर्थ्यों को प्राप्त कर सकता है जिसे सामान्यतया सिद्ध एवं चमत्कार कहा जाता है। भूत-भविष्य दूरदर्शन ही नहीं अन्तरात्मा में परिस्थितियों एवं प्रकृति में हेर-फेर करने की सामर्थ्य भी मौजूद है। आध्यात्मिक पुरुषार्थों की महत्ता समझने एवं उपलब्धियों को करतलगत करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।


जीवन की सरसता, भाव संवेदनाओं पर निर्भर

सम्पदा, मेहनत और समझदारी का अपना-अपना महत्व है। इनके सहारे भौतिक सुविधा एवं प्रगति के आधार बनते हैं। इनके सहारे भौतिक सुविधा एवं प्रगति के आधार बनते हैं। किन्तु जीवन इतना ही सीमित नहीं है। उसकी गहरी परतों में भाव-सम्वेदना का इतना ऊंचा स्थान है कि उनकी तुलना में और किसी उपलब्धि को रखा नहीं जा सकता।

भाव-संवेदनाएं यों सुविधा सफलता मिलने पर प्रसन्नता स्तर की उभरती हैं और कष्ट, हानि या प्रतिकूलता की स्थिति में व्यथा के रूप में सामने आती हैं। मिलन में सुख और वियोग में दुःख प्रतीत होता है। इतने पर भी यह सभी अनुभूतियां मानसिक स्तर की एवं परिस्थितियों से सम्बन्धित होने के कारण कुछ ही समय ठहरती हैं। समय के साथ वे घटनाएँ बदलती एवं पिछली बनते ही महत्व हीन होने लगती हैं। ऐसी दशा में सुखद एवं दुःखद अनुभूतियाँ भी भीनी पड़ने लगती हैं। कुछ समय उपरान्त तो उनका महत्व ही चला जाता है, यहाँ तक कि वे विस्मृति के गर्त में गिरकर विलीन भी हो जाती हैं। स्वजनों के मरण वियोग में कभी मर्मान्तक व्यथा होती है और लगता है कि इस विछोह-जन्य कष्ट में जीवित रह सकना किस प्रकार सम्भव हो सकेगा। इतने पर भी समय के साथ वह व्यथा धुँधली होती जाती है, यहाँ तक कि मुद्दतों तक उनका स्मरण भी नहीं आता। यही बात विवाह, पुत्र जन्म, चुनाव जीत, बड़ा मुनाफा जैसे सुखद अवसरों के सम्बन्ध में भी है। उन क्षणों में तो वे हर्षातिरेक उत्पन्न करती हैं, पर समय बीतते-बीतते उनकी कोई छाप मन पर नहीं पड़ती। आवेश उतरते ही सब कुछ शान्त हो जाता है।

भौतिक कारणों से उत्पन्न होते रहने वाले भले-बुरे आदेशों को भाव-संवेदना नहीं कहा जा सकता है। वे तो लोक व्यवहार मात्र होते हैं। किन्तु अंतराल की गहराई में अवस्थित आस्थाएँ एवं अनुभूतियाँ यदि उत्कृष्टता पर अवलम्बित हों तो वे निरन्तर आनन्द देती रहेंगी। उनसे सन्तोष भी मिलेगा और उल्लास भी।

वस्तुओं एवं परिस्थितियों का उज्ज्वल पक्ष देखना और उसके सौंदर्य से पुलकित होना, मनुष्य शरीर में पाये जाने वाले देवत्व का लक्षण है। यह दिव्य दृष्टि हर किसी के भाग्य में नहीं, पर जिन्होंने उसे संस्कार वश अथवा प्रयत्नपूर्वक पाया है, वे हर परिस्थिति में सुखद सम्वेदनाओं का अनुभव करते और एक अनुपम सरसता का हर घड़ी रसास्वादन करते पाये जाते हैं।

प्रकृति का सौंदर्य देख सकने वाली आंखें यदि किसी को मिल सकें जो उसे आकाश के बादल और सितारे अँधेरे और उजाले, अरुणोदय और इन्द्र धनुष जैसे दृश्यों को देखकर जमीन पर से स्वर्ग देख सकने जैसा आनन्द मिलेगा। वृक्ष, वनस्पतियाँ, नदी और सरोवर, पहाड़ और झरने कितने सुन्दर होते हैं, इसे देखने के लिए कवि कलाकार और चित्रकार की आंखें चाहिए। धरती पर विचरते पशु-पक्षी कितने चित्र विचित्र के होते हैं और अपनी हलचलों से मन को कितना गुदगुदाते हैं। इसका अनुभव बाल सुलभ दृष्टि ही कर सकती है जो चलते, बोलते खिलौनों से खेलते हुए फूले नहीं समाते।

अपनी काया कितनी सुन्दर और कितनी मृदुल है उसे दर्पण में चेहरा निहार कर कोई भी देख सकता है। जीभ से स्वाद, आँखों से दृश्य, मुख से वाणी, कान से श्रवण आदि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से समय-समय पर तरह-तरह के रसास्वादन करते रहने के अवसर मिलते हैं। हाथ-पैरों के सहारे मनचाही चेष्टाएँ करने और सफलताएँ पाने का जो अवसर मिलता है वह अभ्यस्त ढर्रे के कारण सामान्य लगता है पर यदि तटस्थ होकर उसे देखा जाय तो उपलब्ध सौभाग्य को सराहते-सराहते मन न भरे।

परिवार को भाव-सम्वेदनाओं का स्वर सप्तक कहा जा सकता है, जिसमें से कितने मधुर स्वर निकलते हैं। वे जब लयबद्ध होकर बजते हैं तो लगता है उस स्वर लहरी से जीवन का कण-कण लहराने और लहलहाने लगा। वात्सल्य, मैत्री, श्रद्धा, कृतज्ञता, सहकारिता सुविधा, अपनत्व की कितनी ही अनुभूतियों का आनन्द इस छोटे से गुलदस्ते में मिलता है, इसे कोई पारिवारिकता की अनुभूति कर सकने वाला ही अनुभव कर सकता है। साधारण लोग तो सराय में रहने और किराया चुकाने वालों की तरह दिन गुजारते रहते हैं। आनन्द जब भीतर ही नहीं, तो बाहर कहाँ से दिखे।

बढ़ने, सुनने, सीखने, सिखाने, कमाने, खर्चने, जुटाने और सोने के अपने-अपने आनन्द हैं जो उपलब्धियों की सुन्दरता और सरसता का अनुभव कर सकें, मात्र उन्हीं को यह प्रतीत होता है कि जीवन कितना सुन्दर और कितना सुखद है। शेष तो ऐसे ही खीजते-खिजाते दिन काटते और रोते-कलपते विदा होते हैं।

दूसरों की परिस्थितियों और भावनाओं में अपने आपको पिरोकर उनके जैसी सम्वेदनाओं का रसास्वादन कर सकते हैं। दुःखी के साथ करुणा और सहानुभूति और उदार सेवा सहायता के रूप में आत्मीयता अनुभव करने पर एक प्रकार का आनन्द मिलता है और सुख योग्यता, तत्परता आर अनुकूलता के साथ तादात्म्य जोड़ते हुए अनुभव होता है, मानो हम स्वयं ही उस उपलब्धियों का आनंद ले रहे हैं। सिनेमा देखते समय पात्रों की स्थिति के अनुरूप कई व्यक्ति हँसते, रोते देखे गये हैं। उन घटनाक्रमों के साथ अपनत्व जोड़ लेने पर दर्शकों को असाधारण आनन्द आता है। खिलाड़ियों के पराक्रम भी उन्हीं को सुखद लगते हैं जो उस क्रीड़ा विनोद के साथ अपनत्व जोड़ सकें। अन्यथा उस उछलकूद में समय और श्रम गँवाने के अतिरिक्त और कुछ दिखता ही नहीं।

प्रतिभा एवं सम्पदा के आधार पर मनुष्य का मूल्याँकन होता है। वस्तुतः उसकी विशिष्टता उदार भाव सम्वेदनाओं के आधार पर आँकी जानी चाहिए। इसी आधार पर मनुष्य स्वयं उल्लसित रह सकता है और अपने उल्लास को साथियों, समीपवर्तियों पर बखेरता रह सकता है। फूल खिलते हैं तो सारा क्षेत्र महकता है और सुन्दरता से भरा पूरा दिखता है।

भावनाओं में आत्मीयता सर्वोपरि है। प्रेम इसी को कहते हैं। उदारता, सेवा और सहानुभूति का सम्मिश्रण रहने से आत्मीयता प्रेम बन जाती है। जिससे भी प्रेम किया जाता है वह सुन्दर और सुखद लगता है। साथ ही ऐसा व्यवहार भी बन पड़ता है जिससे प्रेम-पात्र को उपयोगी उत्कर्ष का अवसर मिलता रहे।

प्रेम ही एक मात्र ऐसी भाव-सम्वेदना है जिससे स्वजन सहचरों को नहीं प्रकृति के जीव-जन्तुओं, प्राणियों और वनस्पतियों तक को वश में किया जा सकता है। सुधारा, संवारा जा सकता है।

कैलीफोर्निया के विलक्षण सन्त श्री लूथर बरबैक अपना प्रेम साधना में इतने सिद्ध हस्त हो गये कि प्रकृति के कण-2 और अणु-2 से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उसकी आत्मीयता से प्रभावित होकर वनस्पति को भी गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा।

श्री लूथर बरबैक के बगीचे में जो भी वृक्ष हैं, पेड़-पौधे हैं उनसे वे पुत्रवत् आत्मीयता रखते थे। इससे उनके बगीचे में काँटे रहित गुलाब उगते हैं और दिन में कुमुदिनी खिलती है।

अखरोट के वृक्ष 32 वर्ष की अपेक्षा 17 वर्ष में अपनी सामान्य ऊँचाई से बड़े होकर अच्छे फल देने लगते हैं।

इनके बगीचे में ही बिना काँटे का सेहुड़ उगा हुआ है। जब कोई इनसे गुलाब या सेहुड़ अथवा किसी पौधे की कलम आदि लेने आता है तो वे बड़े प्यार से पौधों को बेटे की तरह समझाते कि तुम जहाँ भी रहोगे वहाँ ईश्वर का काम करोगे।

वृक्ष वनस्पतियों के कांटों का उनके क्रोध और असंतोष का संस्कार ही उनने माना है।


समृद्धि कोई दुर्लभ उपलब्धि नहीं

अपने दुःख अभाव और क्लेशों के लिए लोग प्रायः भाग्य को दोष देते हैं, परिस्थितियों को कारण बताते हैं और सोचते रहते हैं कि काश! ऐसा हो सका होता तो अच्छा रहता। यह चिन्तन ही हताश और निराश का द्योतक है। अन्यथा मनुष्य अपने आप में इतना सर्वांगपूर्ण है कि यदि वह ठीक ढंग से सोचना, समझना सीख जाए और समुचित रीति से प्रयत्न करने लगे तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों वह आगे बढ़ने और प्रगति करने की राह निकाल ही लेता है। कठिन में कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास, साहस, सूझ-बूझ और मनोबल न खोये तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों से हार न माननी पड़े।

अधिकाँश लोग अपनी आर्थिक स्थिति के कारण चिन्तित रहते हैं। अर्थाभाव के कारण हजारों, लाखों नहीं करोड़ों लोग दिन रात चिन्ता और निराशा के थपेड़ों में अपनी जीवन नैया खेने का प्रयास करते हैं। परन्तु जो लोग इन अंधड़ों में आशा और पुरुषार्थ की पतवार बाँध सके, उनके न केवल परिस्थितियों को परास्त कर दिखाया वरन् अपने ही समान अन्य व्यक्तियों के लिए भी अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। भले ही ऐसे व्यक्तियों की संख्या थोड़ी हो, पर है अवश्य और थोड़ी इसलिए है कि अधिकाँश व्यक्ति निर्धनता और धनाभाव के सामने इस प्रकार घुटने टेक देते हैं कि उन्हें कुछ करने की सूझ ही नहीं पड़ती।

जो अपना सन्तुलन बनाये रखते हैं, वे कोई न कोई ऐसा मार्ग अवश्य निकाल लेते हैं, जिससे कि समृद्धि चरण चेरी बन जाये। दुनिया में लगभग सभी लोग सुबह शाम चाय का व्यवहार करते हैं और चाय पीने वाले ‘लिप्टन की चाय’ से भी परिचित हैं। पर ऐसे लोग शायद कम ही हैं, जिन्हें यह मालूम हो कि लिप्टन कौन थे? क्या करते थे? इनका परिचय उनके ही शब्दों में इस प्रकार है- मैंने अपना जीवन एक स्टेशनरी की दुकान में काम करने वाले लड़के के रूप में आरम्भ किया। उस समय मुझे दस शिलिंग डालर रोज मिलते थे और इसी शुरुआत के बाद मैंने आगे बढ़ना आरम्भ किया तथा किफायतशारी के नियमों पर चल कर अपने व्यापार को संसार भर में फैला सका हूँ। जिन्दगी में फिजूल खर्चों से मुझे सख्त नफरत रही है। जो काम में खुद कर सकता था, उसे मैंने दूसरों पर कभी नहीं छोड़ा। जो काम दो डालर में हो सकता था, उसके लिए सवा दो डालर कभी खर्च नहीं किये और न मैंने किसी प्रकार की व्यर्थ की जरूरतों को अपने लिए बढ़ाया।

दस शिलिंग प्रति सप्ताह से अपना जीवन आरम्भ करने वाले रॉमस लिप्टन की आमदनी लाखों डालर प्रति सप्ताह तक बढ़ गई और इन दिनाँक संसार भर में उनकी कम्पनी के एजेंटों की संख्या दस हजार से भी अधिक है तथा उनका व्यापार विश्व के सभी देशों में फैला हुआ है। परिस्थितियाँ शायद ही कभी किसी के लिए सहायक बनती हैं। प्रायः तो लोग उनसे अपने विकास में बाधाएँ ही अनुभव करते हैं, पर ऐसे पुरुषार्थी व्यक्तित्व भी हैं जो उनमें से भी आगे बढ़ने की राज निकाल लेते हैं। डेविडसन राकफैलर ऐसे ही व्यक्तियों में से एक थे।

राकफैलर परिवार की गणना आज विश्व में समृद्धतम व्यक्तियों में की जाती है। किन्तु इस समृद्धि को अर्जन करने वाले डेविडसन राकफैलर को अपने प्रारम्भिक जीवन में अपना तथा अपनी माँ का पेट पालने के लिए एक पड़ौसी के मुर्गीखाने में सवा रुपये रोज पर काम करना पड़ा था। कभी वे खेतों में आलू खोदने जाते थे तो कभी कोई और मजदूरी करने। इस थोड़ी सी आमदनी में से भी उन्होंने कुछ न कुछ नियमित रूप से बचाने का नियम अपनाया तथा उसी बचत से अपना एक नया काम शुरू किया। पचास वर्ष की आयु तक पहुँचने पर उनकी गणना संसार के अरबपतियों में की जाने लगी थी। बचपन में फटे हाल स्थिति में प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचने की यात्रा का, सफलता का रहस्य बताते हुए उन्होंने एक अवसर पर कहा था, ‘मैं अपने पुरुषार्थ और विवेक पर विश्वास करता हूँ। आरम्भ से ही मैंने अपनी माँ के गुर को अपनी गाँठ से बाँध कर सदैव बचत का ध्यान रखा और प्रतिदिन, प्रतिमाह, प्रतिवर्ष कितनी बचत हुई इसका ध्यान रखता रहा।’

समृद्धि के लिए बचत ही नहीं मितव्ययिता भी अत्यंत आवश्यक है और उसके लिए व्यक्ति को आत्मसंयमी होना चाहिए। इस तथ्य को निरूपित करते हुए उन्होंने कहा है, मैं शराब, तम्बाकू, जुआ इत्यादि को महँगी और बेकार की वस्तुएँ मानता हूँ। मिथ्याडम्बरों से मुझे घृणा है। प्रदर्शन की आदत को मैं मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी समझता हूँ। मैंने कभी भूल कर शराब और तम्बाकू को हाथ नहीं लगाया और अरबों डालर का स्वामी हो जाने के बाद भी कभी किफायतशारी नहीं त्यागी। साधारण-सी वस्तुओं में भी ठगे जाने के लिए मैं कभी राजी नहीं हुआ।

प्रतिवर्ष विज्ञान, साहित्य आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवाएँ करने वालों को दिये जाने वाला नोबेल पुरस्कार संसार का सबसे बड़ा पुरस्कार है। नोबेल पुरस्कार से तो अधिकाँश व्यक्ति परिचित होंगे, पर उसके प्रवर्तक अल्फ्रेड नोबुल का जीवन वृत जिन्हें मालूम है, वे जानते हैं कि उनके पिता एक जहाज में एक केबिन ब्वॉच अर्थात् जहाज के यात्रियों को उनके लिए आवश्यक वस्तुएँ समय पर पहुँचाने वाला बेयरा थे। आगे चलकर उनकी रुचि विस्फोटक पदार्थों के अधिकार की ओर हुई तथा उसी में उन्होंने अपने प्राण गँवा दिये। अब बचे रहे अल्फ्रेड नोबुल और उनकी विधवा माँ, जिन्हें बड़े कष्टपूर्ण और अभावग्रस्त स्थिति में अपने दिन गुजारने पड़े।

अल्फ्रेड भी हमेशा किसी न किसी बीमारी के शिकार बने रहते थे। सदा रोगी रहने वाले अल्फ्रेड में प्रचण्ड मनोबल था और इस मनोबल के सहारे ही उन्होंने रोग बीमारियों की कभी कोई परवाह नहीं की तथा पुरुषार्थ और अध्यवसाय द्वारा इतनी सम्पत्ति अर्जित की कि उनकी गणना संसार के समृद्धतम व्यक्तियों में की जानी लगी। मरने तक उनके पास 20 लाख पौंड से भी अधिक की सम्पत्ति इकट्ठी हो चुकी थी, जिसके ब्याज से ही टैक्स आदि चुकाने के बाद छः लाख पौंड की विशुद्ध आय होती थी। अल्फ्रेड ने यह सारी सम्पत्ति प्रतिवर्ष ऐसे पाँच व्यक्तियों को पुरस्कृत करने के लिए दे दी जो मानवता की विशिष्ट सेवा में लगे हो। अब भी प्रतिवर्ष संसार के पाँच विभूतिवान व्यक्तियों को नोबेल पुरस्कार दिया जाता है। अभी पिछले वर्ष ही भारत में दीन−दुःखियों और अनाथ व्यक्तियों के लिए भारत में कई सेवाश्रम चलाने वाली मदर टेरेसा को यह पुरस्कार दिया गया। यह पुरस्कार परंपरा एक ओर जहाँ विभूतियों का सम्मान है, वहीं दूसरी ओर निर्धन तथा अभावग्रस्त व्यक्तियों के लिए ही नहीं, समृद्ध और सम्पन्न व्यक्तियों के लिए भी अल्फ्रेड नोबुल प्रेरणा के स्त्रोत और आदर्श बने हुए हैं।

जिन लोगों ने साधारण, अतिसाधारण स्थिति में उठ कर प्रगति की उल्लेखित सफलताएँ प्राप्त कीं उनमें एन्ड्रयू कार्नेगी का नाम भी उल्लेखनीय है न केवल उन्होंने उल्लेखनीय प्रगति की वरन् पिछड़े उपेक्षित और अविकसित लोगों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने डेढ़ अरब रुपयों का दान भी दिया। ऐन्ड्रयू के जीवनीकार ने उनके जीवन चरित्र में लिखा है, वे लोग गरीब थे। खाने के लिए अन्न और पहनने के लिए कपड़ों का जुगाड़ तो किसी प्रकार हो जाता था किन्तु हारी बीमारी में डॉक्टर या वैद्य को दिखा लेने की भी उनकी हैसियत नहीं थी। एन्ड्रयू कार्नेगी के पिता एक गरीब जुलाहे थे और कपड़े बुन-बुनकर जैसे-तैसे अपने परिवार का गुजारा चलाते थे। पहले वे लोग स्काटलैंड में रहते थे। पति की आय से निर्वाह ठीक प्रकार न चलते देखकर पत्नी ने एन्ड्रयू कार्नेगी की माता ने एक दुकान में जूते सीने और कपड़े धोने का काम करने लगी। इतने पर भी आर्थिक कठिनाइयाँ बनी रहतीं। एन्ड्रयू के पास कपड़ों का एक ही जोड़ा रहता था। जिसे माँ रात को सोने से पहले धोकर सुखाने के लिए रख देती।

इस तरह की अभावग्रस्त स्थिति में, जब कि निर्वाह का प्रश्न ही बहुत जटिल हो तो समुचित शिक्षा-दीक्षा का सवाल ही कहाँ उठता है? स्वाभाविक ही कार्नेगी को स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने का अधिक तो क्या, थोड़ा बहुत कहा जा सके ऐसा अवसर भी नहीं मिल सका। शीघ्र ही अपने निर्धन परिवार की सहायता के एन्ड्रयू को पीटर्स वर्ग के एक तारघर हरकारे की नौकरी करनी पड़ी, जिसमें उसे आये हुए टेलीग्रामों को बाँटने के लिए घर-घर जाना पड़ता था। यही कार्नेगी की महत्वाकाँक्षा जगी कि किसी प्रकार तारबाबू बना जाये और उन्होंने रात में देर तक जाग कर तार भेजने की कला का अभ्यास शुरू किया। एक दिन जिस टेलीग्राफ आफिस में वे नौकरी करते थे, वहाँ का तारबाबू छुट्टी पर गया हुआ था। कार्यालय में संयोगवश उस समय कोई नहीं था और वहाँ तार आया। कार्नेगी ने स्वयं वह सन्देश ले लिया और उसे पते पर पहुँचा दिया। अधिकारियों को कार्नेगी की इस कर्त्तव्य परायणता का पता चला तो उन्होंने कार्नेगी को पुरस्कृत करते हुए उनकी पदोन्नति कर दी। कर्तव्यनिष्ठा, कार्य तत्परता, परिश्रम और लगन के बल पर वे निरन्तर प्रगति करते रहे और जब वे युवावस्था से गुजर रहे थे तब उनकी आय सोलह हजार रुपये प्रतिमाह थी।

कार्नेगी ने केवल धन कमाया ही नहीं वरन् अर्जित सम्पदा का सर्वोत्तम उपयोग भी किया। वे सार्वजनिक सेवा कार्यों में पूरी रुचि लेते रहते थे। उन्होंने करीब डेढ़ अरब रुपये सार्वजनिक पुस्तकालयों शिक्षण संस्थाओं तथा अन्य लोकहित के कार्यों में दान दिये।

दुनिया के प्रायः सभी देशों में फोर्ड कम्पनी की बनी कारें उच्च धनाढ्य और शीर्ष सम्पन्न होने का प्रतीक समझी जाती हैं। बहुत ज्यादा धनवान लोग की इन कारों को खरीद कर अपने धनवान होने की धाक जमाते हैं। इस कम्पनी के अधिष्ठान, संचालन और पोषक हैनरीफोर्ड की प्रारम्भिक स्थिति बहुत ही साधारण थी। अब उस कम्पनी में प्रतिवर्ष लाखों कारें बनती हैं। जिस व्यक्ति द्वारा स्थापित संस्था का उत्पादन प्रतिष्ठा और उच्च समृद्धि का प्रतीक समझा जाता है, उसके सम्बन्ध में यह तथ्य किसी आश्चर्य से कम नहीं है कि वह एक साधारण किसान का बेटा था। हैनरीफोर्ड के पिता अपने निवास ग्राम में थोड़ी-सी जमीन पर खेती किया करते थे और जो पैदा होता उसी से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे। चूँकि आय अधिक नहीं थी, निर्वाह भी मुश्किल से होता था इसलिये फोर्ड को उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर न मिल सका।

इसलिए हैनरी को पास के एक कस्बे में एक मैकेनिक के पास भेज दिया गया। मशीनरी सम्बन्धी प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हैनरी ने एक मोटर का काम करने वाले संस्थान में नौकरी की। सूझ-बूझ, परिश्रम, लगन, आत्मविश्वास और प्रामाणिकता के बल पर हैनरी ने शीघ्र ही ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली कि कुछ सम्पन्न मित्रों की सहायता से सन् 1903 में फोर्ड मोटर कम्पनी की स्थापना की। आगे चलकर उन्होंने जहाज रानी के क्षेत्र में भी अच्छी सफलताएँ प्राप्त की।

हैनरी फोर्ड अपने जीवन काल में ही संसार के समृद्धतम व्यक्तियों में गिने जाने लगे थे, पर उस स्थिति में भी वे इतनी सादगी से रहते थे कि जब भी सादगी के महत्व की चर्चा होती है तो फोर्ड का उदाहरण अवश्य दिया जाता था। मितव्ययिता का गुण उनमें फूट-फूटकर भरा था, उसे कंजूसी की संज्ञा नहीं दी जाती। उनकी कम्पनी में करने वाले कर्मचारी अन्य अमेरिकी कम्पनियों के कर्मचारियों की अपेक्षा अधिक वेतन पाते हैं। फोर्ड ने जनहित के कार्यों में भी जी खोलकर दान दिया, पर अपने प्रति वे कठोर ही बने रहे।

इस प्रकार अभावग्रस्त दीन-हीन अवस्था से उठ कर समृद्धि और सम्पन्नता के शिखर तक पहुँचने वाले पुरुषार्थियों की संख्या कम नहीं है। कई तो ऐसे हैं जिनके पूर्व जीवन में सम्बन्ध में अधिक कुछ जाना नहीं जा सका। पुरुषार्थ और परिश्रम के द्वारा लक्ष्मी को प्रसन्न किया जा सकता है इसमें कोई सन्देह नहीं है और जब सम्पन्नता अर्जित कर ली जाये तो उसकी सार्थकता इसी बात में है कि उपलब्ध साधनों का अधिकतम उपयोग जनहित के- लोककल्याणकारी कार्यों में खर्च किया जाए।


अनायास समृद्ध होने की बात न सोचें

अनायास, बिना परिश्रम किये अपार धन प्राप्त करने की ललक कई लोगों में इस कदर उत्पन्न हो जाती है कि वे न जाने क्या-क्या हवाई कल्पनाएँ करते रहते हैं और रातों रात मालामाल बन जाने के स्वप्न देखते रहते हैं। धन जीवन निर्वाह के साधन जुटाने हेतु आवश्यक है, परन्तु कई लोगों के लिए यह निर्वाह जुटाने का आधार नहीं रह जाता, बल्कि साध्य ही बन जाता है। इस प्रलोभन में लोग नैतिक, अनैतिक, उचित, अनुचित और व्यावहारिक, अव्यावहारिक उपाय अपनाते देखे जाते हैं। जबकि तथ्य पर प्रमाणित करते हैं कि जिसने भी अनुचित ढंग से धन जुटाने के या बिना परिश्रम किये धनवान बनने के प्रयास किये हैं, उन्हें पीछे पछतावा ही हाथ लगा है। सही बात तो यह है कि वही धन फलता-फूलता है जो परिश्रम और ईमानदारी के साथ कमाया जाता है। उसी में स्थिरता और सत्परिणाम उत्पन्न करने की क्षमता होती है, लेकिन लोग रातों रात मालामाल बनने के फेर में व्यर्थ ही परेशान होते और घाटा उठाते हैं। इस तरह के दिवा स्वप्न देख-देखकर धन अर्जित करने के प्रयासों में सट्टा, जुआ, लॉटरी से लेकर गढ़े खजाने के लाभ तक शामिल किये जा सकते हैं।

अमेरिका में मिसीसिपी नदी के किनारे फैला हुआ होमोचिटों जंगल संसार के सर्वाधिक सुन्दर वनों में समझा जाता है। इस जंगल के एक हिस्से में एक छोटा सा गाँव ‘नैट चेज’ बसा हुआ है। इस गाँव से ही करीब 20 मील दूर पर रीडर डोव नामक एवं धनी सम्पन्न किसान का कृषि फार्म है। फार्म के उत्तरी भाग में मिसीसिपी नदी का एक दलदली डेल्टा है। डेल्टा पर खड़े होने से वहाँ एक बहुत चौड़ा छेद दिखाई देता है। बताया जाता है कि यह छेद दिनोंदिन क्रमशः चौड़ा ही होता चला आया है। इस छेद में कहा जाता है कि एक सात फुट चौड़ा और चार फुट ऊँचा घड़ा बहुमूल्य रत्न राशि और स्वर्ण खण्डों से भरा हुआ गड़ा है। वहाँ बसने वाले लोगों को प्रायः सभी को जानकारी है। इतनी बहुमूल्य रत्नराशि के बारे में जानकार किसका जी नहीं ललचाएगा? पर कहते हैं कि उसे प्राप्त करने के लिए अब तक जितने भी प्रयास हुए हैं, उनमें से एक भी सफल नहीं हो सका है। अभी तक यह सम्भव नहीं हो सका है कि उसे निकाल कर कोई अपने अधिकार में ले सके।

पिछले डेढ़ सौ वर्षों से उसे पाने के लिए अब तक जितने भी प्रयास हुए हैं, वे सबके सब असफल होते आये हैं। इसका कारण यह बताया जाता है, उस पर एक प्रेतात्मा डेरा जमाये बैठी हुई है और वह उसे निकालने के लिए किये गए सभी प्रयत्नों को असफल कर देती है। रीडर डोव के पूर्वज इस खजाने को प्राप्त करने के लिए न जाने कब से प्रयत्न करते आ रहे हैं। उन्होंने इस डेल्टा के पास एक मकान भी कृषि व्यवस्था की देखभाल के लिए बनाया था। पर कुछ ऐसी घटनाएँ घटी जिनके कारण रीडर डोव के पूर्वजों ने इस स्थान पर भूतों का अधिपत्य समझा और उसे छोड़ दिया। तब से वह स्थान ऐसा ही खाली पड़ा है। उस स्थान पर रहना तो दूर रहा, किसी को ठहरने की हिम्मत भी नहीं होती।

अनेक बार प्रयास करने और विफल होने के बाद खजाना निकालने के प्रयास एक प्रकार से छोड़ ही दिये गये थे। किन्तु रीडर डोव ने साहस कर पुनः इस खजाने को निकालने के प्रयास शुरू किये। इस काम में पूर्वजों द्वारा छोड़े गये नक्शे काफी सहायक सिद्ध हुए। उनके आधार पर रीडर डोव ने डेल्टा के उस देश में प्रवेश किया और अपने साथियों के साथ कीचड़ हटाने का काम शुरू किया। कीचड़ निकालने के प्रयास जैसे-जैसे किये जाते, वैसे-वैसे पैर कीचड़ में धँस जाते। परन्तु कीचड़ हटाने का काम जारी रखा। इसके लिए फावड़े चलाये ही जा रहे थे कि एक फावड़ा किसी धातु के बर्तन से टकराया और ठन्न की आवाज हुई। कीचड़ हटाकर देखा गया तो वहाँ लोहे का बना एक विशाल काय घड़ा सामने था। इस घड़े में रखे हीरे-पन्नों की चमक से डोव की आंखें चमक उठीं। घड़ा धातु के ढक्कन से बड़ी मजबूती के साथ बन्द किया हुआ था। उसे खोलना सम्भव नहीं था, अतः यही सोचा गया कि आसपास की कीचड़ हटाकर उसे उभारा जाए और प्रयत्नपूर्वक बाहर निकाला जाए।

घड़े को बाहर निकालने के लिए आसपास का कीचड़ हटाया जाना आवश्यक था। परन्तु जैसे ही आसपास का थोड़ा कीचड़ हटाया गया, घड़ा उतना ही नीचे कीचड़ में धँसने लगा। यहीं नहीं डोव स्वयं भी कीचड़ में फँसने लगा। धँसते-धँसते वह बहुत गहराई में धँस गया। अब तो डोव को खुद अपनी जान के लाले पड़ गए थे। लगातार छह घण्टे तक परिश्रम करने के बाद वह कीचड़ से बाहर निकल पाने में सफल हुआ, और इसके बाद घड़े को बाहर निकालने का विचार ही छोड़ देना पड़ा।

इस गढ़े हुए धन के सम्बन्ध में कहा जाता है कि यह कभी डाकुओं द्वारा लूट कर इकट्ठा किया और जमीन में गाड़ दिया गया था। किसी जमाने में नेटचेज और न्यू आलिशन्स के बीच एक पाँच सौ मील लम्बी सड़क थी और उस पर अच्छा व्यापार होता था। उसी क्षेत्र में कई डाकू दल सक्रिय थे और भारी लूटमार किया करते थे। इन्हीं डाकुओं के सरदार लैफिट, मैसिन, हार्प आदि में से किसी ने यह धन इकट्ठा कर इस सुरक्षित स्थान पर गाड़ दिया। तब वहाँ ऐसा दलदल नहीं था। पीछे नहीं का पानी रिसता रहा और दलदल बन गया। डाकू पकड़े और मारे गए तथा धन जहाँ का तहाँ गड़ा रह गया। रीवर डोव के पूर्वजों ने खजाने के सम्बन्ध में प्रचलित किंवदंती के आधार पर ही इस क्षेत्र को खरीद लिया और उनके समय से ही कितने ही इंजीनियर, ठेकेदार तथा दूसरे कुशलकर्मी समय-समय पर यह धन निकालने की योजना लेकर आते रहे।

निकाले जाने वाले खजाने के एक निश्चित प्रतिशत का भागीदार बनाने के लिखित इकरार नामे के आधार पर इन लोगों ने विशालकाय यन्त्रों बहुसंख्यक श्रमिकों तथा बाँस, बल्ली, रस्से आदि उपकरणों की सहायता से उसे निकालने का जी तोड़ प्रयत्न किया पर अन्ततः असफलता ही हाथ लगती। कितना ही परिश्रम किया जाता, पर घड़ा और गहरा धँसता जाता तथा खुदाई का क्षेत्र पहले की अपेक्षा और अधिक चौड़ा हो जाता। यह गोल्ड होल अमेरिकी बुद्धि, कौशल और तकनीकी पुरुषार्थ के लिए अभी भी एक चुनौती बना हुआ।

सन् 1939 में इस घड़े को निकालने के लिए सबसे बड़ा प्रयत्न हुआ। इसके लिए भारी बुलडोजर मशीनों से कीचड़ हटाने तथा बगल से रास्ता बनाने के उपाय करने के लिए इंजीनियरों की एक समिति बनाई गई और यह योजना बड़े उत्साह के साथ कार्यान्वित की गई। सामने रखा घड़ा निकालने वालों के पुरुषार्थ को चुनौती ही देता रहा और हर प्रयास विफल जाते रहे। क्रेन लगाकर जब घड़े की गरदन पकड़ कर बाहर निकालने का प्रयत्न किया तो अकस्मात् इतनी विकट वर्षा होने लगी कि बुलेक और स्टिक्लोन, जिनके नेतृत्व में यह योजना बनाई और क्रियान्वित की गई थी, रत्न राशियों से भरा घड़ा निकालने का विचार छोड़कर वापस लौट आए। इसके बाद भी अनेकों प्रयास किए गए, पर घड़ा है कि अपने स्थान से टस से मस नहीं होता।

कप्तान किड ने संगठित गिरोह ने समुद्री डावेजनी के कारण किसी समय अमेरिका में आतंक उत्पन्न कर दिया था। उन दिनों अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एकमात्र माध्यम जलयान ही होते थे। किड का गिरोह इस घात में रहता था कि कौन-सा जहाज, कितना धन लेकर किस बन्दरगाह से किस स्थान पर जा रहा है? उसके गिरोह में न केवल अच्छे तैराक थे, वरन् शस्त्र संचालन में कुशल और निशानेबाजी, गोलाबारी में पारंगत प्रवीण डाकू भी थे। लूट का माल गिरोह के सभी सदस्य बाँट-बूंट लेते थे। किड ने जीवन में जितने भी डाके डाले, उनसे उसके पास प्रचुर सम्पत्ति एकत्रित हो गई। सुरक्षा की दृष्टि से उसने लूटी गई धन सम्पत्ति को समुद्र तट के कई स्थानों पर लोहे के घड़ों और सन्दूकों में बन्द करके गाढ़ दिया। उसने अपने जीवनकाल में प्रचुर सम्पत्ति लूटी और बक्सों में बन्द करके अनेक स्थानों पर दबाया। प्रचुर सम्पत्ति लूटने के बाद भी वह उसका कुछ उपयोग नहीं कर सका। किड के साथियों के अनुमान के अनुसार वह खजाने एक सौ से अधिक स्थानों पर दबे होने चाहिए और उनमें प्रत्येक में करोड़ों की सम्पत्ति होनी चाहिए। ऐसे कुछ स्थानों में लांग आइलेड साउन्ड के फशर्स नामक स्थान बेस्ट पाइन्ट के पास हडसन डाई लेण्डस मनीहिल स्टोनी बुक ओल्ड लाइम बेइर्स फीर्ल्ड के आसपास न्यूजरसी, हुक आइलैण्ड केलीद्वीप, रोड आइलैण्ड मैसाचुसेट्स के विलिमगटन डेल्विन डेन, न्यू हैम्पशायर के एटेरीम क्षेत्र में, ब्रूथ व हावर्ट के आडलक हेरोन आइलैण्ड, शीप्स काट नहीं के किनारे वायके सेट, फार्मलैण्ड, ड्रस्टेन मिल्स के पास-पास मनीहोल्स, आइल आऊहाट केंमनी रोव, ओल्ड आत्चर्ड, पेनील्स काट क्षेत्र, कास्को वे में डियट आइल आदि क्षेत्रों में अरबों का माल दबा पड़ा बताया जाता है। जो आज तक न तो किसी के हाथ लगा है और भविष्य में किसी के हाथ लग सकेगा, इसकी भी कम सम्भावना है।

अनायास बिना परिश्रम किये बहुत सारा धन इकट्ठा करने के लिए भले ही डाकुओं जैसा अनैतिक अपराधिक गतिविधियाँ भले ही न अपनाते हैं, पर यह सोचने वालों की कमी नहीं है कि कहीं गढ़ा हुआ खजाना मिल जाए, लाटरी खुल जाए, बाप-दादों की कमाई के बल पर गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा प्राप्त हो सकें। स्वयं की क्षमता बढ़ाने और पुरुषार्थ में संलग्न होने के झंझट से बचकर समृद्धि की पगडंडियाँ ढूंढ़ने वालों को प्रायः असफलता ही मिलती है। ऐसी बात नहीं है कि इन आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए कोई परिश्रम न करना पड़ता हो। परिश्रम करना पड़ता, पूंजी भी लगानी पड़ती है और कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। परन्तु असफलता ही हाथ लगती है क्योंकि जो शस्त्र अपनाया जाता है। वही गलत होता है। कदाचित उतना ही प्रयत्न, उतना ही प्रयास स्वस्थ उत्पादन के लिए किया गया होता तो अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकता था। गढ़ा हुआ खजाना पाने की तरह ही जुआ, सट्टा, लॉटरी आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इन कामों में हजारों में से किसी को ही कुछ हाथ लगता होगा अन्यथा अधिकांश तो खजाना पाने के लिए लालायित रहने की तरह लार ही टपकाते रह जाते हैं। काश! न्याय और श्रम में अर्जित आमदनी में ही सन्तुष्ट रहना सीख लिया जाय तो थोड़ी कमाई में भी सुख-शाँति की प्रचुर मात्रा हर किसी को सहज ही मिल सकती है। जबकि बिना मेहनत किये कुछ पाने के लोभ में लोग कमाते कुछ नहीं गँवाते ही अधिक हैं। निराशा और खीज पल्ले पड़ती है सो अलग।


Quotation

-सभ्यता का प्रारम्भ कब से हुआ?

तब से जब मनुष्य ने पहलीबार जमीन को अर्थ पूर्ण दृष्टि से कुरेदा और उनमें बीज बोये।

-धर्म का उद्भव कहाँ से हुआ?

जब मनुष्य ने अपने बोये बीजों पर बादलों को जल बरसाते और सूरज को गरमी देते देखा।

-कला का जन्म कैसे हुआ?

जब बोये बीजों के फलित होने पर मनुष्य के मन में कृतज्ञता उपजी। जब उसने धरती, बादल और सूरज का भाव-विभोर होकर अभिवन्दन किया।

-दर्शन की उपज का क्या कारण था?

जब मनुष्य ने अपना उपार्जन आवश्यकता से अधिक मात्रा में खाया और अपच की पीड़ा को झुठलाने के लिए दिमाग को कसरत कराने की तरकीब ढूँढ़ निकाली।

-खलील जिब्रान


शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म की साधना

प्रकृति की प्रमुख शक्तियों में ताप, प्रकाश, विद्युत की भांति ही ‘शब्द’ की भी गणना होती है। ध्वनि टकराव से उत्पन्न होती है और ईथर तथा वायु के सहारे अपने अस्तित्व का परिचय देती है। सामान्यतः उसे किसी घटना की जानकारी देने वाली समझा जाता है और सर्वाधिक उपयोग शब्द गुच्छकों के माध्यम से वार्त्तालाप में किया जाता है। पर इतने ही छोटे क्षेत्र तक सीमित नहीं माना बैठना चाहिए। शब्द की अपनी सामर्थ्य है और उसका प्रभाव, क्षमता प्राणि जगत एवं पदार्थ जगत में समान रूप से देखी जा सकती है।

जो प्राणी किसी रूप में शब्दोच्चार कर सकते हैं वे अपनी इच्छा, आवश्यकता एवं स्थिति की जानकारी अपने सहयोगियों को इसी माध्यम से देते हैं। अपने सजातियों में उनका पारस्परिक आदान-प्रदान इसी आधार पर चलता है। इस व्यवहार में मनुष्य सर्वाधिक प्रवीण है। निजी अभिव्यक्तियों से लेकर परिवार व्यवस्था, व्यवसाय एवं समाज व्यवहार के सारे काम वार्त्तालाप के माध्यम से ही सम्भव होते हैं। विचारणाओं और भावनाओं की व्यापक अभिव्यक्ति में लेखनी की तुलना में वाणी का उपयोग हजारों गुना होता है। जो गूँगा, बहरा न अपनी कह सके दूसरे की न सुन सके तो उसे एक प्रकार से अपंग ही कहना चाहिए।

ध्वनि का उपयोग भावनाओं और परिस्थितियों के माध्यम से उतना अधिक होता है जितना अन्य किसी इन्द्रिय के माध्यम से सम्भव नहीं। नेत्रों को प्रमुख माना जाता है, पर वाणी की तुलना में उनकी उपयोगिता भी नगण्य ही रह जाती है। विरजानन्द जैसे विद्वान, सूरदास जैसे कवि के.सी.डे. जैसे गायक अन्ध समुदाय में हुए हैं किन्तु किसी मूक बधिर द्वारा कोई पुरुषार्थ प्रकट किया है ऐसा ‘केलर’ जैसा उदाहरण समस्त संसार खोज डालने पर भी युगों के मध्य एकाध ही मिलेगा। शिक्षा में शब्द शास्त्र की ही प्रमुखता है। लिपि और शब्दकोष के माध्यम से वह क्रमबद्ध लेखन की जो धारा बनती है उसे प्रकारान्तर से कथन के समतुल्य ही बना लिया जाता है। ज्ञान-विज्ञान का विस्तार इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। मानवी प्रगति के योगदान में सर्वोपरि उपयोग ध्वनि शक्ति के विभिन्न रूपों को ही ठहराता है।

इन दिनों ध्वनि के असन्तुलन एवं आघात से उत्पन्न होने वाली विकृतियों की चर्चा जोरों से चल रही है और उससे उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया पर विज्ञ समाज में चिन्ता व्यक्ति की जा रही है। कोलाहल इन दिनों एक समस्या बन कर रह रहा है और उससे उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभाव से बच सकने का उपाय गम्भीरतापूर्वक सोचा जा रहा है। बढ़ते हुए कोलाहल को किसी व्यापक महामारी की तरह ही शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिष्ट कर आँका गया है।

इंग्लैंड की आवाज विरोधी सभा में ब्रिटिश सैनिक सर्जन ‘ डान मेककेनसी’ ने अपने वक्तव्य में कहा था- विगत युद्ध में बहुत आदमी ध्वनि के प्रभाव से मरे हैं। विस्फोट की ध्वनि घातक होती है। वैज्ञानिक भविष्य में ध्वनि को युद्धों में मारक अस्त्र की भाँति उपयोग करने की सोच रहे हैं। केवल भीषण आवाज ही नहीं, धीमी आवाज भी निरन्तर होते रहने से बहुत से व्यक्तियों में स्नायुविक तनाव उत्पन्न कर देती है। वर्तमान में अमेरिका जैसे सभ्य देशों में मानसिक एवं पागलपन के रोगियों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। इसका एक मुख्य कारण ध्वनि का दुष्प्रभाव है।

अधिक आवाज वाले स्थानों, महानगरों में बसे, छापेखानों में छापने वाले, मोटर ड्राइवर आदि जो भी शोर वाले वातावरण में रहते, उनमें अधिकाधिक बहरेपन की बीमारी बढ़ती जा रही है। कर्कश आवाज से मनुष्य की ध्वनि ग्रहण करने की क्षमता कम होती जाती है। स्नायु संस्थान पर बुरा प्रभाव पड़ता है। तथा स्नायु परीक्षणों से मालूम हुआ है कि आवाज नींद में बाधा डालती है, स्नायुविक संस्थान में थकान उत्पन्न कर देती है एवं पाचन शक्ति की दुर्बल कर देती है।

वैज्ञानिकों ने ध्वनि को मापने की इकाई डैसीबेल (बेल का दशांश) मानी है जिसके अनुसार उपयोगी अनुपयोगी ध्वनियों का वर्गीकरण भी किया है। सुप्रसिद्ध डा. ई. लारेंस स्मिथ ने बताया है कि 60 डेसीबेल अथवा उससे अधिक ध्वनि का पाचन क्रिया पर निश्चित ही बुरा प्रभाव पड़ता है। सामान्य रूप से बात करने की ध्वनि 40 डेसीबेल के स्तर की होती है। कार्यालयों में एक-दूसरे की आवाज मिलाकर 50 डेसीबेल हो जाती है। साधारण शोरगुल वाले स्थानों में ध्वनि का स्तर 70 डेसीबेल तक पहुँच जाता है।

न्यूयार्क के मस्तिष्क विशेषज्ञ डा. फोस्टर कैनेडी ने प्रमाणित किया है कि तीव्र-तीक्ष्ण आवाज का मन पर बहुत भयंकर प्रभाव पड़ता है। उन्होंने देखा कि कागज की थैली को हवा भरने से फटने पर जो आवाज हुई उससे एक रोगी के मस्तिष्क का दबाव 1 सेकेंड तक सामान्य से चार गुना हो गया।

यह दबाव मस्तिष्क को मोफिन और नाइट्रो ग्लिसरीन नामक दबाव बढ़ाने वाले ड्रग्स की अपेक्षा भी अधिक था। उनका कहना है कि लगातार इस आवाज से आदमी की मृत्यु तक हो सकती है, पागल हो जाना सामान्य बात है।

ध्वनि की रचनात्मक उपयोगिता भी है। भाषण, परामर्श, शिक्षण, सत्संग आदि में शब्द के माध्यम से ज्ञान संवर्धन के प्रयत्न निरन्तर चलते रहते हैं। व्यवसाय जैसे पारस्परिक सहयोग पर आधारित अगणित क्रिया कलापों में शब्द संचार की ही प्रमुख भूमिका रहती है। प्रचार एवं विनोद के लिए नियोजित विभिन्न उपाय उपचारों में कथन-गायन का ही आश्रय लिया जाता है। संगीत और अभिनय कला का अधिक विस्तार होने और विज्ञान का सहयोग मिलने से सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन जैसे नये माध्यम निकले हैं इससे पूर्व यह कार्य छोटे-बड़े रंग-मंचों द्वारा सम्पन्न होता था। ज्ञान संवर्धन ही नहीं, विनोद और विविध-विधि उत्तेजनाओं के लिए भी शब्द शक्ति के भरपूर उपयोग मनुष्य ने किया है।

सामान्यतः संगीत को भाव संचरण एवं मनोविनोद के लिए प्रयुक्त किया जाता है, पर यह उसका उथला उपयोग है। गहराई में उतरने पर उसे एक स्वास्थ्य संरक्षण एवं मानसिक सन्तुलन के लिए उपयोगी शक्ति के रूप में कारगर सिद्ध होते देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इन दिनों छात्रों की प्रगति बढ़ाने के लिए संगीत का उपयोग एक महत्वपूर्ण पोषण एवं उत्तेजना की तरह ही बन पड़ता है। इस प्रकार ध्वनि शक्ति की एक शाखा संगीत की उपयोगिता में एक नई कड़ी और भी जुड़ जाती है। अब क्रमिक प्रगति में संगीत की शारीरिक एवं मानसिक चिकित्सा के लिए भी एक प्रभावी माध्यम की तरह प्रयुक्त किया जाने लगा है।

ऐसा बैकग्राउन्ड म्यूजिक तैयार करने का आर्डर दिया जिससे टाइपिंग में होने वाली अशुद्धियाँ कम हो सकें। ‘मुजाक’ कम्पनी ने जो बैकग्राउन्ड म्यूजिक बना कर दिया। उसको बजाने से टाइपिस्टों से होने वाली अशुद्धियों में 38.8 प्रतिशत कमी हुई।

हवाई-अड्डों पर उड़ान करने वाले यात्री जिनके मन प्रायः अशान्त होते हैं, उनके मन को शान्त करने के लिए बैकग्राउन्ड म्यूजिक बजाया जाता है।

बड़े शहरों लन्दन में ‘सुपर मार्केट’ में ऐसा बैकग्राउन्ड म्यूजिक बजाया गया जिससे बिक्री में 40 प्रतिशत वृद्धि पाई गई।

आजकल ‘बैकग्राउन्ड म्यूजिक’ तैयार करने वाली कम्पनियाँ ग्राहकों की इच्छानुसार ‘संगीत-तर्ज’ बना देते हैं जिससे वाँछित लाभ हो।

कुछ ही समय पूर्व की शोधों से ज्ञात हुआ है तीव्र एवं उत्तेजक संगीत से नाड़ी की गति 22 प्रतिशत तथा श्वासोच्छवास की गति 50 प्रतिशत बढ़ जाती है।

डाक्टर लोग हमारे शरीर में होने वाली क्रियाएँ जैसे हृदय की धड़कन, आँख की पलकों का खुलना बन्द होना, साँस का निरन्तर चलना आदि क्रमबद्ध प्रक्रियाओं को ‘बायोलॉजीकल-क्लाक’ कहते हैं अब यह निस्संदेह सिद्ध किया जा चुका है कि संगी की मन्द एवं तीव्रगति अनुलोमानुपात में इस ‘बायोलॉजीकल क्लाक’ को प्रभावित करती है।

ब्रिटेन की ‘संगीत-चिकित्सा सोसायटी’ की यह दावा है कि दमा से पीड़ित फेफड़ों पर ‘संगीतमय-ध्वनि’ से श्वास-प्रश्वास की गति सही तथा सक्रिय हो सकती है।

पश्चिम-जर्मनी के वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि पेट के फोड़ (स्टमक अल्सर) आपरेशन एवं दवाओं, की अपेक्षा संगीत से अधिक शीघ्रता से ठीक किये जा सकते हैं।

संगीत का सबसे अधिक सफल चिकित्सा उपयोग विभिन्न मानसिक रोगों में अस्वस्थ मन को शान्त करने में तथा बौद्धिक क्षमता प्रदान करने में पाया गया है।

संगीत चिकित्सा का मानसिक रोगों के क्षेत्र में उतना ही सफल योगदान है जितना ही सर्जरी एवं दवाओं का है, इसमें एक विशेषता यह भी है कि इससे अवाँछनीय ‘साइड इफेक्ट’ नहीं होते।

शस्त्र का उपयोग संरक्षण में भी होता है और आक्रमण में भी। चाकू से कलम भी बन सकती है और हत्याकांड भी हो सकता है। कोलाहल विस्फोट से उत्पन्न होने वाले प्रभाव की तरह संगीत का ऐसा उपयोग ही हो सकता है जो घातक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे। सपेरे, सर्पों को और बधिक हिरनों को पकड़ने में संगीत का उपयोग करते रहे हैं। युद्ध भेरियाँ सैनिकों को लड़ने मरने के लिए आतुर उत्तेजना देने में एक प्रकार की मदिरा जैसी सिद्ध होती रही हैं। अब ऐसे संगीत निकाले गये हैं जो मछुओं को जल क्षेत्र में बिखरी हुई मछलियों को एक स्थान पर एकत्रित करने और उन्हें सरलता पूर्वक पकड़ने में सहायता करते हैं।

वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे ध्वनि यन्त्र “रोडेटरेपे लैट” पर परीक्षण कर रहे हैं जिसकी ध्वनि सुनकर चूहों की भूख कुछ समय के लिए समाप्त हो जाती है और वे प्रजनन में अक्षम हो जाते हैं। कल्पना की गई है कि भारत में खाद्यान्न की 10 प्रतिशत उपज चूहे खत्म कर जाते हैं। अब इस इलेक्ट्रानिक बीन की सहायता से यह समस्या हल की जा सकेगी। इस यन्त्र में एक धातु की छड़ लगी हुई है जिसके हिलने से इलेक्ट्रोमेग्नेटिक लहरें उत्पन्न होती हैं जिसे सुनकर चूहे उत्तेजित हो जाते हैं और उनका व्यवहार असामान्य हो जाता है। अमेरिकी फर्म का दावा है कि इसका प्रभाव केवल चूहों पर ही होता है।

चूहों की भाँति अन्य प्राणियों के विनाश में भी इस प्रक्रिया का उपयोग हो सकता है। यहाँ तक कि शत्रु देशों के सैनिक एवं प्रजाजन बिना बारूद या गैस का सहारा लिए मारक ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करके भी रुग्ण, दुर्बल अथवा मृतक बनाये जा सकते हैं।

यहाँ सामर्थ्य भर की चर्चा हो रही है। विनाश तो चारों ओर से ऐसे ही बरस रहा है। बात तो सृजन और उत्थान की सोचनी है और यह ढूंढ़ना है कि ध्वनि शक्ति का उपयोग पक्ष किसी प्रकार हस्तगत हो सकता है। संगीत क्षेत्र में दीपक राग, और मेघ मल्हार जैसे प्रयोग हुए हैं। बुझे दीपक को जिस संगीत से जलाया जा सकता है वह बुझे मन में भी नव जीवन जगाने तथा सृजनात्मक उमंगें उठाने में भी समर्थ हो सकता है। जिस राग को सुनकर मेघ मालाएँ उमड़ और बरस सकती हैं वह प्रकृति की अन्य सामर्थ्यों का भी अनुकूलता बरसाने के लिए सहमत कर सकती है। अन्तरिक्ष में बहुत कुछ भरा पड़ा है उन अनुदानों से ही धरातल एवं प्राणि समुदाय को सुविकसित होने का अवसर मिला है। इस क्षेत्र में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने की असीम सम्भावनाएँ अभी भी विद्यमान हैं। यज्ञोपचार के साथ किये गये मन्त्रोच्चारण का प्रभाव अभीष्ट वर्षा के रूप में उपलब्ध होने का उल्लेख कथा-पुराणों में मिलता है। ध्वनि विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा मन्त्र विद्या की लुप्त कड़ियाँ यदि ढूंढ़ी जा सकें तो मन्त्र शक्ति को श्रद्धा परिधि में आगे बढ़ाकर एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

संगीत के माध्यम से स्नायविक दुर्बलता एवं मानसिक विकृति के निराकरण में उत्साहवर्धक सफलता मिल रही है। उपयोगी पशु-पक्षियों में अधिक प्रजनन कर सकने की समर्थता बढ़ाई गई है। दुधारू पशुओं ने अधिक दूध दिया है। पौधों को जल्दी बढ़ने और अधिक फसल देने में भी संगीत का उत्साहवर्धक प्रतिफल उत्पन्न हुआ है।

इन भौतिक प्रयोगों से आगे का वह क्षेत्र है जिसे प्राचीन काल में नादयोग कहते थे। उस विद्या को अपनाकर अध्यात्म क्षेत्र की रहस्यमय शक्तियों को जागृत किया जाता था और मानवी काया में छिपी दिव्य सामर्थ्यों से लाभान्वित हुआ जाता था। शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म ही साधना का उल्लेख योग शास्त्र के साधना प्रकरणों में विस्तारपूर्वक हुआ है।

संगीत और योग दोनों ही नाद विद्या के अंतर्गत आते हैं। योग अनाहत और संगीत आहत नाद है। नाद मन को एकाग्र करने का अच्छा साधन है। जब साधक का मन नाद पर एकाग्र हो जाता है तब वह बाहरी विषयों से मुक्त हो जाता है।

संगीत के स्वरों का सीधा सम्बन्ध सात चक्रों से है। संगीत के सात स्वर सा, रे, ग, म, प, ध, नि, संगीत के आधार माने जाते हैं। संगीत के साधक को इन साथ स्वरों के अभ्यास के बिना संगीत में प्रवीणता प्राप्त नहीं हो सकती। प्रत्येक स्वर का सम्बन्ध एक चक्र से है। जैसे मूलाधार का “सा” स्वाधिष्ठान का ‘रे’ मणिपूर का ‘ग’ अनाहत का ‘म’ विशुद्ध का ‘प’ आज्ञा को ‘ध’ सहस्त्राधार का ‘नि’ से है।

इन्हीं चक्रों के क्रम में स्वरों का अवरोह और आरोह होता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्त्राधार इसी के उल्टे क्रम में अवरोह होता है। साधारणतः स्वरों के लिए हृदय, कण्ठ और मूर्धन्य तीन को ही नाद उत्पत्ति का कारण मानते हैं। व्यवहार में सप्त स्वर इन्हीं तीन स्थानों से प्रकट होते दिखाई देते हैं।

संगीत में तन्मयता उत्पन्न करने की महान शक्ति का कारण ऋषियों ने इन्हीं चक्रों के जागरण में अनाहत नाद के माध्यम से जाना। उपासना में भी संगीत को हृदय की वाणी का नाम दिया है।

मूलाधार से सहस्रार तक प्रत्येक चक्र के माध्यम से आरोह अवरोह निरन्तर करते रहने पर कुण्डलिनी जागरण में सफलता मिल सकती है। जैसे-2 ध्यान में तल्लीनता बढ़ती है उसी तरह संगीत की तल्लीनता भी कुण्डलिनी जागरण के समीप साधक को ले पहुँचती है।

शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म की साधना आत्मिक क्षेत्र को और तालबद्ध लयबद्ध संगीत लहरों से भौतिक क्षेत्र को प्रभावित करने और उससे लाभान्वित होने के लिए विशाल कार्य क्षेत्र विद्यमान है। साधना के साहसी लोगों को इसमें प्रवेश करने लिए पदार्थ विज्ञानियों की तरह ही निष्ठापूर्वक प्रवेश करना चाहिए।


उनकी वाणी से टपक रही महत्वाकांक्षा (kahani)

आर्य! मैंने बज्रोली, कपाल भाँति, जालन्धर आदि सिद्ध कर लिए हैं भ्रसिका, भ्रामरी और उज्यायी प्राणायामों का अभ्यास भी मैंने कर लिया है आगे की साधना बताइये? पीवक ने भगवान बुद्ध ने संगर्व पूछा।

उनकी वाणी से टपक रही महत्वाकांक्षा की गंध तथागत से छिपी न रही। उन्होंने कहा तात! अभी इसी साधना का अभ्यास करो। नियम समय पर अगली साधना बता दी जायेगी।

पीवक वहाँ से चले तो आये पर उनको सन्तोष नहीं हुआ। वे जिस भिक्षु के पास जाते उसी से यही कहते- मैंने जो साधनायें सिद्ध कर ली न जाने क्यों तथागत उन्हीं को दोहराने की बात करते हैं इससे मेरा समय नष्ट होगा या नहीं?

एक दिन ज्ञात हुआ पीवक संधाराम परित्याग कर नगर की किसी रमणी के साथ भाग गया है- भिक्षुओं ने अत्यन्त आश्चर्यपूर्वक यह सूचना जाकर तथागत को दी तो उन्होंने हँसकर सहज स्वर में कहा- यह दोष उसका नहीं महत्वाकांक्षा का है, यह जहाँ रहेगी सर्वनाश ही करेगी फिर चाहे वह योगी यती और तपस्वी ही क्यों न हो?


प्राणाग्नि अणु शक्ति से भी बृहत्तर

मनुष्य का ही क्यों, सृष्टि के प्रत्येक कण का अस्तित्व सन्तुलन पर टिका है। वह सन्तुलन भंग होते ही अस्तित्व बिखरने लगता है।

प्रश्नोपनिषद् में कहा है-

“प्राणाग्नयएवास्भिन् ब्रह्मपुरे जागृति”।

अर्थात्- इस ब्रह्मपुरी यानी शरीर में प्राण ही कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है।

प्राण और प्राणाग्नि में वही अन्तर है, जो अंगारे और धधकती लपटों में होता है। जीवधारी मात्र को प्राणी कहते हैं। प्राण मूलतः संस्कृत शब्द है।

‘अन्’ (प्राणाने) धातु जीवन चेतना की द्योतक है। इसी ‘अन्’ धातु से ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘प्राण’ शब्द की व्युत्पत्ति होती है। इस अर्थ में प्राण जीवन सत्ता का, ‘एक्जिस्टेन्स’ का पर्याय है। जो है (दैट एक्जिस्टस) वह प्राण है। यही प्राण जड़ जगत में शक्ति-तरंगों के रूप में और चेतना जगत में विचारणा एवं सम्वेदना के रूप में संव्याप्त है।

जब यह प्राण विशेष प्रखरता के साथ सक्रिय होता है, जब उसकी इस प्रज्वलित सक्रियता, प्रखरता को प्राणाग्नि कहते हैं। इसे ही प्राणों की चमक कह सकते हैं। क्रिया क्षेत्र में यही प्राणाग्नि, ओजस्विता, शौर्य, पराक्रम साहसिकता के रूप में प्रकट होती है। यही बौद्धिक क्षेत्र में चिन्तन की प्रखरता, तेजस्विता, मनस्विता के रूप में सामने आती है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है-

“प्राणो वै यशो बलम्” अर्थात् प्राण ही यश और बल है। इसका भी यही तात्पर्य है कि प्राणों की सक्रियता ही बल के रूप में सामने आती है, वही चतुर्दिक यश, विस्तार का कारण बनती है।

प्राण रहा भी, पर यह प्रखर न रहा तो विशेष कार्य नहीं हो पाते। सघन गतिविधियां, विशिष्ट हलचलें, प्राणाग्नि द्वारा भी सम्भव होती हैं। मन्दप्राण तो जैसे-तैसे जीवन का संकट खींचता भर रहता है। उसमें आवेग गति, त्वरा प्राणाग्नि के ही कारण देखी जाती है।

यही प्राणाग्नि मन के संकल्प, बुद्धि, विवेक, चित्त की धारणाशक्ति और अहंता के रूप में सक्रिय है। संकल्प की प्रखरता, विवेक की जागरूकता, समर्थ धारणाशक्ति और “सुपरइगो”....... प्राणाग्नि के ही रूप हैं। शरीर में यही प्राणाग्नि प्राण-विद्युत के रूप में सक्रिय है। इस प्रकार प्राण जहाँ मात्र है यानी ‘एक्जिस्टेन्स’ भर है वहीं प्राणाग्नि शरीर की विद्युत और मन, बुद्धि की चेतन-ऊर्जा है। स्वामी विवेकानन्द ने इसे ही ‘लेटेन्ट लाइट” कहा है। ‘डिवाइन लाइट’ भी इसे ही कहा जाता है। प्राणों की यह चेतन-ऊर्जा ही व्यक्तित्व को आलोकित करती है। पुरुषार्थ शक्ति यही है। साहस और उत्साह इसी के प्रकाश हैं। संकल्पशक्ति, तत्परता और दृढ़ता के रूप में यह व्यक्तित्व को गतिशील रखती है। इसकी कमी से जीवन-उत्साह शिथिल हो जाता है, हताशा-अवसाद व्यक्ति को दबोचे रहते हैं।

प्राणाग्नि विकृत अनियन्त्रित हो उठने पर व्यक्ति को जिलाये रखने के स्थान पर उसे जलाकर राख कर देती है। प्राणाग्नि की विकृति या दिशाहीनता ही आवेश, उद्विग्नता, दर्पातिरेक, हठधर्मिता या कुटिलता, अधोगामिता के रूप में सामने आती है। दुराचरण, क्रोधावेग, कटुवचन, कलह-दुर्भाव प्राणाग्नि के दुरुपयोग का ही नाम है। जो शक्ति सदाचार-सत्प्रवृत्तियों में लगाई जा सकती है, जिससे बल, बुद्धि और यश-विस्तार हो सकता है।

शरीरस्थ प्राण-विद्युत को तो विज्ञान ने भी खोज निकाला है। 25 बोल्ट से 60 बोल्ट तक का विद्युत बल्ब जला सकने योग्य बिजली की मात्रा प्रत्येक शरीर में न्यूनाधिक अनुपात में पाई जाती है। हाथों, आँखों और हृदय क्षेत्र में इसकी सक्रियता कुछ अधिक सघन होती है। ट्राँजिस्टर के ‘नोव’ को हाथ की अँगुलियाँ छुआकर बजायें तो आवाज तेज हो उठती है। उँगलियाँ हटाने पर आवाज पहले जैसी हो जाती है। आँखों की विद्युत-शक्ति ही त्राटक साधना में पुंजीभूत कर उपयोगी बनाई जाती है। हिप्नोटिज्म में इसी विद्युत शक्ति को प्रखर और वशीभूत बनाना होता है।

शरीर विद्युत का असन्तुलन भी अनेक विग्रह खड़े कर देता है। सत्रहवीं सदी में एसेक्स की एक वृद्धा की प्राण-विद्युत सहसा धधक उठी और वह अपनी झोंपड़ी में झुलस कर जल मरी। ‘डेली टेलीग्राफ’ लन्दन ने एक बार एक ट्रक ड्राइवर के ट्रक के भीतर ही अपनी सीट पर जल जाने की खबर छापी थी। इसी प्रकार ‘रेनाल्ड न्यूज’ ने पश्चिमी लन्दन की एक खबर छापी कि एक व्यक्ति वहाँ सड़क से जा रहा था, तभी सहसा उसके भीतर से लपटें निकली और वह वहीं झुलस कर सिमट गया।

ओहियो की एक फैक्टरी का मालिक परेशान था। उसके यहाँ आठ बार आग लग चुकी थी। इस अग्निकांड का कारण ज्ञात नहीं हो पा रहा था। आखिर उसने वैज्ञानिक जासूसी का व्यवसाय करने वाले ब्रुकलिन के प्राध्यापक रोबिन बीच से मदद माँगी। प्रोफेसर बीच फैक्टरी पहुँचे। सभी कर्मचारियों को एक स्थान पर एकत्र किया गया। इलेक्ट्रोड और बोल्ट मीटर से जुड़ी एक धातु पट्टिका पर इनमें से हर एक को एक-एक कर चलाया गया। सभी उस पर चलकर जाते रहे। वोल्टमीटर की सुई औसत बिन्दुओं के बीच डोलती रही। तभी एक महिला-कर्मचारी का क्रम आया। उसने जैसे ही धातु पट्टिका पर पाँव रखा, वोल्टमीटर की संकेतक सुई उच्च बिन्दु पर जा टिकी। आग का कारण समझ में आ गया। इस महिला की भीतरी विद्युत-शक्ति की अधिकता ही इसका कारण थी। उसका विभाग बदल दिया गया और ऐसे ‘सेक्शन’ में भेज दिया गया, जहाँ आग पकड़ने वाली वस्तुएँ नहीं थी। फैक्टरी में आग लगने का सिलसिला समाप्त हो गया।

कुछ वर्षों पूर्व लन्दन में एक डिस्कोथिक में नाच रहे एक प्रेम-युगल का सारा आनन्द महाशोक में बदल गया। युवक के साथ थिरक रही सुनहरे बालों वाली युवती सहसा चीख पड़ी। लोग जहाँ के तहाँ रुक गये। सामने लड़की के सुनहरे केश आग की लपटों में लहरा रहे थे। लड़के ने आग बुझाने की कोशिश की, तो उसके हाथ जल गये और भी कई लोगों ने प्रयास किया तथा हाथ जला बैठे। कुछ क्षणों बाद वह उन्नीस वर्ष की युवती राख की ढेरी में बदल गई। यह प्राण विद्युत के विस्फोट का ही परिणाम था। इसके पहले चेम्सफोर्ड में ऐसी ही एक घटना 20 सितम्बर 1938 को घटित हुई थी और एक महिला देखते-देखते नीली लपटों में खो गई थी।

ह्विटले (इंग्लैंड) का नागरिक जोनहार्ट 31 मार्च 1908 को अपने घर में बहन के साथ बैठा था। सहसा उसकी बहन के शरीर से आग की लपटें निकलने लगीं। जोनहार्ट ने उसे कम्बल से लपेट दिया, तत्काल नीचे दौड़ कर पास ही रह रहे डाक्टर को बुला लाया। पर इसी बीच कम्बल, कुर्सी समेत बहन आग में स्वाहा हो चुकी थी।

मनुष्य के भीतर की आग के तेजी से धधक उठने की इन घटनाओं की पुष्टि वैज्ञानिक भी कर चुके हैं। यद्यपि वे अभी तक इसका समाधान कारक हल नहीं खोज सके हैं।

मनुष्य शरीर में स्थित प्राण-विद्युत के इन आकस्मिक विस्फोटों के कारणों का और उन्हें रोक सकने के उपायों का पता तो वैज्ञानिक ही लगा सकते हैं और वे लगा भी लेंगे। परन्तु ऐसे विस्फोट तो विरले ही होते हैं। वे मानव जाति की उतनी बड़ी समस्या नहीं हैं, जितनी कि भीतरी प्राणाग्नि के दुरुपयोग से उत्पन्न समस्याएँ।

शरीर, मन, बुद्धि अन्तःकरण में क्रियाशील इस प्राणाग्नि के दुरुपयोग से व्यक्ति ऊपर चर्चित आकस्मिक विस्फोटों की तरह पूरे तौर पर भले ही न जले, किन्तु भीतर ही भीतर वह दग्ध, क्षत-विक्षत होता रहता है। शरीर-शक्ति का दुरुपयोग, आहार-बिहार के नियमों की अवज्ञा, बहुमूल्य, जीवनी-शक्ति को काम-विकार की नालियों में बहाना- ये प्राणाग्नि के वे दुरुपयोग हैं, जिनसे व्यक्ति का बल छीजता और ओजस् घटता है। कटुवचन, पर निन्दा, असत्य-कथन, वाग्धल वाणी द्वारा प्राणाग्नि को गलत ढंग से खर्च करने के उदाहरण हैं। जिनसे व्यक्ति स्वयं भी जलता है, दूसरों को भी जलता है। दहकते अंगारों जैसे, तपी हुई छड़ जैसे, जलाने और दागे छोड़ने वाले शब्द बोलने वाले को भी उत्तप्त करते हैं और जिसके लिये कहे जाते हैं, उसे भी जलाते हैं। शरीर-शक्ति का अवाँछित उपयोग स्वयं का बल घटाता है और पास-पड़ौस में भी विकृति-विक्षोभ बढ़ाता है।

बड़े पैमाने पर स्पष्ट दिखाई दे सकने वाली हानियाँ तो शरीर की आग से जल उठने की घटनाओं जैसी ही विरल होती हैं। भीषण दुष्परिणाम तो कभी-कभी ही समाने आते हैं। किन्तु प्राणविद्युत से असन्तुलन से, उसके ‘लीक’ करने लगने से स्वयं को तथा संपर्क क्षेत्र के लोगों को तेज झटके लगने के वैसे उदाहरण नित्य ही देखे जा सकते हैं, जैसे लन्दन की ही किशोरी जेनीमार्गन के शरीर में विद्युत-शक्ति के ‘लीक’ होने पर देखे गये थे।

लन्दन के प्रसिद्ध स्नायु-चिकित्साविद् डा. जान ऐश क्राफ्ट ने मार्गन के बारे में सुनने पर उसकी जाँच करनी चाही। उन्होंने सुन रखा था कि इस लड़की की प्राण-विद्युत बहुत अधिक है और उसे छूने वाले को तेज झटका लगता है। वे पहुँचे और बड़ी गर्म जोशी से जेनी से हाथ मिलाया। पर परीक्षण और अनुभव का मौका उन्हें नहीं मिल सका। हाथ मिलाते ही उन्हें तेज झटका लगा। वे दूर फर्श पर गिरे और बेहोश हो गये। उपचार के बार होश आया। इस लड़की में यह स्थिति 1950 तक रही। तब तक उसके संपर्क में जो भी आया, उसे तेज झटके के साथ धराशायी होना पड़ा। यहाँ तक कि एक युवक जिसे जेनी खुद भी चाहती थी, उसे छूने के चक्कर में दूर जा गिरा और घायल हो गया। परिणामस्वरूप फिर कभी उसकी ओर लौटकर देखा तक नहीं।

ऐसी घटनाओं की जाँच करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर के ‘सेल्स’ के नाभिकों का आवरण थोड़ा ढीला हो जाने पर उसमें निहित शरीर विद्युत ‘लीक’ करने लगती है और तब वह अनियन्त्रित मात्रा में शरीर में दौड़ने लगती है। शरीर के कोशों की ऐसी ढील और विद्युत-शक्ति के ‘लीक’ होने की घटनाएँ भले यदा-कदा ही सामने आएं, पर जिनकी मन, बुद्धि, अंतःकरण में क्रियाशील प्राण-विद्युत निरन्तर ‘लीक’ होती रहती है, ऐसे ढीले-पोले व्यक्तित्वों की समाज में कभी नहीं, भरमार ही दिखाई पड़ती है। उनके संपर्क में जो भी आता है, वह उनके कटुवचनों, कुचालों, दुर्भावनाओं और दुर्व्यवहार के रूप में ‘लीक’ हो रही प्राण-विद्युत और झटकों से आहत हो जाता है।

दूसरों ओर जो लोग इस प्राण-विद्युत सदुपयोग करते हैं वे कोलरोडो के डब्ल्यू, पी. जोन्स की तरह स्वयं भी सुख-शान्ति पाते हैं, दूसरों को भी लाभ पहुँचाते हैं। जोन्स अपनी इसी विद्युत क्षमता से धरती पर नंगे चलकर भू-गर्भ की अनेक धातुओं के भण्डार की सही-सही जानकारी दे देते हैं। ऐसी क्षमताओं से सम्पन्न अनेक लोग आये दिन देखे जाते हैं और उनकी चारों ओर प्रसिद्धि फैलते देर नहीं लगती। उन्हें स्वयं भी इस परोपकार से प्रसन्नता होती है, दूसरों को भी वे उपयोगी एवं महत्वपूर्ण लगते हैं।

आन्तरिक क्षेत्र में क्रियाशील प्राण-शक्ति से सदुपयोग से मिलने वाले लाभ तो और भी कई गुना अधिक हैं। साहस, शौर्य, बौद्धिक प्रखरता, सत्संकल्प और सक्रियता सही दिशाधारा में नियोजित किये जाने पर प्रगति, उत्कर्ष, सफलता, सन्तोष और शान्ति के शतमुखी अनुदानों की वर्षा करती है। शांखायन-सूत्र में कहा गया है-

“प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्या’’

अर्थात्- प्राण रूप प्रज्ञा मैं हूं। इस प्राण-प्रज्ञा के द्वारा सत्संकल्प, सत्कर्म, सद्ज्ञान और सद्भाव के आधार पर जीवन के सदुद्देश्यों की प्राप्ति ही प्राणाग्नि का अभिवर्धन एवं सदुपयोग है।

जीवन में उत्कृष्टताओं की उपलब्धि इसी जीवन्त प्राण-शक्ति द्वारा होती है। इसे ही प्रतिभा कहा जाता है। जीवट, प्रखरता और जोखिम उठा सकने की साहसिकता, प्राणी की इसी लपट का परिणाम है। उसे सन्तुलित, नियन्त्रित एवं सही दिशाधारा में सुनियोजित करना ही जीवन की सार्थकता है।


बन्ध मुद्राओं का स्थूल तथा सूक्ष्म प्रभाव

हठयोग प्रदीपिका में दीर्घायु प्राप्त की जाने वाली नौ मुद्राओं का वर्णन किया गया है। जो निम्न हैं- (1) महामुद्रा (2) महाबन्ध (3) खेचरी (4) उड्डियान बन्ध (5) वज्रोली (6) शक्तिचालनी।

मुद्राओं के द्वारा मस्तिष्क के न्यूरोनल सर्किट या मस्तिष्क को जगाकर शक्ति को सहज सजग चेतना के स्तर तक लाया जा सकता है।

नलिका विहीन रासायनिक ग्रन्थियों को उत्तेजित कर या अन्य केन्द्रों को परिचालित कर शरीर के अनैच्छिक अवयवों को अधिकृत कर सकते हैं जिससे शरीर के समस्त अवयवों पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है।

मुद्राओं से मस्तिष्क में अल्फा तरंगें अधिक बनने लगती हैं। इन मुद्राओं को अधिक समय तक करने से ध्यानयोग या एकाग्रता की क्रिया बनती है जिससे हमारी बौद्धिक क्रियाएँ शान्त हो जाती हैं जिसके सतत् अभ्यास से कुंठा, हिस्टीरिया, निराशा, दुःख, चिन्ता आदि से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही मानसिक क्रियाओं और विचारों पर भी नियन्त्रण प्राप्त होता है।

योग साधना में वर्णित ‘बन्ध’ विधि में किसी प्रकार का बन्धन नहीं है जैसा कि शब्दार्थ से प्रतीत होता है। अपितु चक्रों के आयनोप्लाज्मिक क्षेत्रों को सक्रिय व विस्तृत करने की विधि है। बन्ध तीन होते हैं इनके अलग अभ्यास से विभिन्न चक्रों के आयनिक क्षेत्रों को जागृत करने में सहायता मिलती है किन्तु तीनों बन्धों का एक साथ अभ्यास करने से चौथा महाबन्ध हो जाता है जो सबसे ज्यादा प्रभावी व कारगर सिद्ध होता है।

इन बन्धों का चक्रों पर पड़ने वाले प्रभाव को समझाने के लिए हम सुषुम्ना के अगल-बगल इड़ा व पिंगला को थ्री डाइमेशन में घूमता हुआ एक विद्युत क्वापल मान सकते हैं। जब मूलबंध का अभ्यास किया जाता है तो उससे मूलाधार चक्र के चारों ओर का आयनिक क्षेत्र विस्तृत हो जाता है और उसकी सघनता समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार उड्डियान बन्ध के अभ्यास से मणिपुर चक्र के चारों ओर की सघनता नष्ट हो जाती है और उसके चारों ओर का आयनिक क्षेत्र विस्तृत होता जाता है। साथ ही जब मूलबन्ध के साथ उड्डियान बन्ध का अभ्यास किया जाता है तो मूलाधार से लेकर स्वाधिष्ठान चक्र के मध्य का आयनोप्लाज्मिक क्षेत्र विस्तृत हो जाता है।

तीसरा है जालन्धर बन्ध, जालन्धर बन्ध के अभ्यास से विशुद्धि चक्र के चारों ओर का आयनिक क्षेत्र अपनी सघनता छोड़ विस्तृत होता जाता है और इसकी तरंगों का प्रभाव ऊपर की ओर उठता हुआ आज्ञाचक्र व अनहत चक्र को प्रभावित करता है। जालन्धर बन्ध का अभ्यास उड्डियान बन्ध के साथ किये जाने से स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर आज्ञाचक्र तक का आयनोप्लाज्मिक क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। इसी प्रकार जब तीनों बन्धों अर्थात् मूलाधार, उड्डियान एवं जालन्धर बन्ध का एक साथ अभ्यास किया जाता है तो इसे महाबन्ध की स्थिति कहा जाता है। इसके अभ्यास से मूलाधार चक्र से लेकर आज्ञाचक्र व अनहत चक्र तक का आयनिक क्षेत्र अपनी सघनता त्याग कर विस्तार ग्रहण करता है जिससे प्राणशक्ति या प्राणऊर्जा विकसित होती है। सभी चक्रों को जागृत करने में सहायता मिलती है। इस प्रकार योगाभ्यास की इस प्रक्रिया से मानसिक सक्रियता बढ़ जाती है और अति मानवीय क्षमता प्राप्त करने में काफी सहायक सिद्ध होती है।

बन्ध और मुद्राएँ प्रत्यक्षतः शरीर के सामान्य अवयवों पर ही दबाव डालने लगते हैं, पर परोक्ष स्थिति का पता लगाने पर प्रतीत होता है कि उनकी प्रतिक्रिया अंतःस्रावी ग्रंथियों पर भी होती है।

यह दिन-दिन स्पष्ट होता जाता है कि हृदय, फेफड़ा, आमाशय, वृक्क आदि गतिविधियों का स्वास्थ्य पर जो प्रभाव पड़ता है उससे भी प्रतिक्रिया अंतःस्रावी ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों की होती है। उनकी तनिक भी न्यूनाधिकता अथवा व्यवस्था अस्त-व्यस्तता से शरीर ही नहीं मस्तिष्क भी कुछ से कुछ होने लगता है। अभी तक वह उपाय हस्तगत नहीं हुआ है जिन हारमोनों के उद्गम अथवा स्राव में अभीष्ट हेर-फेर किया जा सके। चिकित्सा विज्ञान को इस भारी कमी को बन्ध और मुद्राओं के माध्यम से ठीक करने का नया मार्ग मिला है। ऐसा नया जो चिर पुरातन भी है और जिसका प्रयोग भारतीय योग विज्ञानी चिरकाल से करते रहे हैं। उड्डियान बन्ध से थाइराइड का सन्तुलन ठीक करने में भारी सहायता मिलती है।

थायराइड ग्रन्थि शरीर में, गले में स्थित वह ग्रन्थि है जिसका यदि वजन किया जाय तो इसका भार 15 से 20 ग्राम होता है। इस ग्रन्थि में अनेक छिद्र होते हैं। जिनमें जीवनोपयोगी हारमोन्स जैसे थायरोक्सिन आदि रहते हैं। खाद्य-पदार्थों में पाया जाने वाला (आयोडीन तत्व) शरीर को भोजन द्वारा मिलता है और ग्रन्थि इस तत्व को भोजन से ले लेती है।

थायराइड ग्रन्थि परस्पर सम्बद्ध तथा अन्योन्याश्रित आठ इन्डोक्राइन ग्रन्थियों में से एक है इन इन्डोक्राइन ग्रन्थियों को कुण्डलिनी योग का अभ्यास करके स्वस्थ बना जा सकता है।

योग के द्वारा थायराइड ग्रन्थि को क्रियाशील बनाया है और इन्डोक्राइन ग्रन्थि प्रणाली तथा स्नायु-तन्त्र के साथ इसका सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।

सूक्ष्म शरीर विज्ञान में चक्र, ग्रन्थि, उपत्यिका आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्हें जागृत, समर्थ और प्रखर बनाने के लिए कितने ही प्रकार के अभ्यास किये जाते हैं। ध्यान धारणा के मानसिक प्रयोग भी उस प्रयोजन के लिए किये जाते हैं। इनमें सरल उपाय बन्ध मुद्राओं का है। आसन प्राणायाम की तरह बन्ध मुद्राओं का प्रभाव भी स्थूल शरीर की तरह ही सूक्ष्म शरीर पर भी पड़ता है। चक्रों के जागरण से कई अतीन्द्रिय क्षमताओं को विकसित होने के लाभों की चर्चा होती रहती है। उनके लिए प्रयुक्त होने वाले अन्याय उपचारों में बन्ध और मुद्राओं का भी स्थान है।

हमारे शरीर में सात मुख्य चक्र हैं। इनका स्थूल शरीर में भी प्रकटीकरण हुआ है उनमें से अधिकतर मेरुदण्ड में स्थित हैं और लगभग उन्हीं स्थानों पर हैं जहाँ अन्य इन्डोक्राइन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। इन्हीं स्थानों पर स्नायु जाल भी हैं और यहीं पर स्नायु एकत्र भी होते हैं। इस प्रकार स्नायुओं, ग्रंथियों और चक्रों के बीच एक सम्बन्ध है। चक्र ऊर्जा बिन्दु हैं। हमारे अस्तित्व के उच्चतम स्तरों से ऊर्जा इन्हीं बिन्दुओं से होती हुई शरीर में प्रवेश करती है, ऐसा लगता है कि शरीर के अन्दर स्थित ऊर्जा के विभिन्न स्तरों को किसी सुई-डोरे से खींच-खींचकर चक्र बिन्दुओं पर बाँध दिया गया हो।

इन्डोक्राइन ग्रन्थियाँ चक्र से सीधे सम्बन्धित है थायराइड ग्रन्थि उसी जगह है जहाँ विशुद्धि चक्र स्थित है। विशुद्धि का अर्थ है शुद्धिकरण। स्टैनफोर्ड विश्व-विद्यालय के विलियम ए-टिलर के अनुसार यदि हम ग्रन्थियों और चक्रों के सम्बन्धों को भली प्रकार समझ लें तो शरीर की शक्ति असीमित रूप से बढ़ाई जा सकती है। इन्डोक्राइन ग्रन्थियाँ और उनके पास स्थित चक्रों के जोड़े ब्रह्मांड की ऊर्जा खींचकर शरीर में भर देते हैं, जब शरीर की ऊर्जा प्रणालियाँ सन्तुलित होती हैं तभी शरीर शक्ति का अधिकतम उपयोग करता है। अन्यथा नहीं।

बन्धों के द्वारा शरीर के विशेष स्थानों पर रक्त प्रवाह एवं प्राण-संचार में रोक लगती है और नियन्त्रण होता है। विभिन्न शारीरिक अवयवों में प्राण एवं रक्त का प्रवाह संयत किया जा सकता है। साधना में प्रयुक्त होने वाले मुख्य बन्ध तीनों हैं- (1) मूलबन्ध (2) उड्डियान बन्ध (3) जालन्धर बन्ध।

पांडिचेरी के ‘जवाहरलाल इन्स्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडीकल एजुकेशन एण्ड रिसर्च’ के फिजियोलॉजी विभाग के डा. गोपाल, एम.बटमैन और एस. लक्ष्मण ने बन्धों का नाड़ी, हृदय एवं ब्लडप्रेशर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन प्रयोगों द्वारा किया।

उन्होंने 18 योगाभ्यासियों पर प्रयोग करके देखा कि प्राणायाम के साथ जब बंध लगाने की क्रिया की जाती है तो रक्त-वाहिनियों पर दबाव पड़ने से हृदय की धड़कन एवं रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) में कमी हो जाती है। साथ ही शरीर एवं मस्तिष्क को विश्राम देने में मदद मिलती है।

डा. गोपाल एवं उनके साथियों, सहयोगियों का कहना है कि बन्धों के प्रयोग से योगाभ्यास द्वारा ‘ब्लड प्रेशर’ का उपचार किया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया है कि रक्तचाप कि चिकित्सा के लिए जालंधर बन्ध का प्रयोग किया जाय तथा रक्तचाप साधारण अवस्था में आने पर मूलबंध और उड्डियान बन्ध का अभ्यास करना चाहिए। इनके अभ्यास से रक्तचाप को बढ़ने से रोका जा सकता है।

इन प्रयोगकर्ताओं के अनुसार मूलबन्ध और जालन्धर बंध साथ-साथ करने से रक्तचाप में राहत मिलती है। इस प्रकार के परीक्षणों की चर्चा उनने अपनी पुस्तक ‘बन्ध शरीर विज्ञान का अध्ययन’ में की है।

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार मूलबंध के अभ्यास से अपान व प्राण की एकता होती है। संचित मल, मूत्र का क्षय होता है तथा वृद्ध भी युवावस्था को प्राप्त होता है। मूलबंध के करने से अधोगामी अपान ऊर्ध्वगामी होकर जठराग्नि के मण्डल में पहुँचता है जिससे जठराग्नि की ज्वाला तीव्र होती है फिर अग्नि और अपान से ये दोनों ऊष्ण होकर ऊर्ध्वगति से प्राण में पहुँच जाते हैं जिसके समागम से जठराग्नि अत्यन्त प्रज्वलित हो जाती है।

बन्ध मुद्राओं का प्रभाव शरीर और मस्तिष्क पर क्यों होता है? इसकी जाँच-पड़ताल शरीर विज्ञानियों ने गम्भीरतापूर्वक की है। इस प्रयोजन के लिए मस्तिष्कीय तरंगों के अध्ययन के आधार पर वायोफीड नामक नवीन मशीन का आविष्कार हुआ है जिसके सहयोग से व्यक्ति मन और मस्तिष्क को अपनी इच्छानुसार शान्त कर विश्राम की अवस्था को प्राप्त कर सकता है। ‘लेंगली पोर्टर न्यूरोसाइकियाट्रिक इंस्टीट्यूट’ के जॉय कीमिया ने सिद्ध किया है कि जापानी झेन शिक्षक ध्यान अवस्था में साधारण अवस्था की अपेक्षा अधिक अल्फा तरंगों को दर्शाते हैं तथा वे अपनी इच्छानुसार कभी भी बन्द या आरम्भ कर सकते हैं। जॉय कीमिया का कथन है कि आनन्ददायक अनुभूति का कारण अल्फा तरंगों की उपरान्त स्थिति से अधीरता या व्यग्रता का शमन होता है।

इस समय फीडबैक का अधिकाधिक प्रचलन अमेरिका में है। यूरोप तथा अन्य औद्योगिक देश भी इसके लिए प्रयत्नशील हैं। लोगों की उत्सुकता इसलिए बढ़ रही है कि अल्फाबायोफीडबैक के प्रयोग से उन्हें उपविष टिकियों का प्रयोग बन्द कर देना पड़ेगा और वे अपनी मस्तिष्क की तरंगों पर व अनैच्छिक शारीरिक अवयवों पर चेतना के विभिन्न स्तरों पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे।

अपने मस्तिष्क की विद्युतीय तरंगों पर अधिकार प्राप्त कर लेने पर बीमारियों पर भी अधिकार प्राप्त कर सकते हैं।

शरीर के प्रति सजगता हमें अपने शरीर को चलाने में मदद करती है और गलत रास्ते में जाने से रोकती है। इस नियन्त्रण से ज्ञान संवर्धन होता है प्रतिभा का विकास होता है।


तलहटी में दो गाँव बसे थे (kahani)

एक ऊंचे पहाड़ की तलहटी में दो गाँव बसे थे। दोनों में यह स्पर्धा बनी रहती थी कि उस पर्वत की सबसे ऊँची जिस चोटी पर अब तक कोई नहीं पहुँच पाया वहाँ हम पहुँचे और बड़ाई पायें।

बहुत दिन तक असफल रहने के बाद एक गाँव के साहसी युवकों ने निश्चय किया कि कुछ भी क्यों न हो जाय, हम सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच कर रहेंगे। वे चढ़ते ही चले गये और गन्तव्य स्थान तक जा पहुँचे।

चोटी पर दो कौए पहले से ही बैठे थे। वहाँ इन अजनबी लोगों को पहुँचा देखकर छोटे कौए ने बड़े से पूछा- ‘दादाजी आखिर इन लोगों की अपनी सुन्दर बस्तियाँ छोड़ कर इतनी कष्ट साध्य यात्रा करते हुए आखिर किस कारण आना पड़ रहा है?’

बढ़े कौए ने कहा- ‘बच्चे, यह लोग हैं तो हमारे ही जैसे मन के, पर इन्हें पंख नहीं मिले हैं, इसी से यह बेचारे इतना कष्ट भुगत रहे हैं।’


आहार संयम और अन्नमय कोश का जागरण

मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति का प्रधान माध्यम मन है। उसे ही बन्धन एवं मोक्ष का कारण बताया गया है। मन की चंचलता एवं चिन्तन प्रवाह को सुनियोजित करने से ही साधना के मार्ग में प्रगति मिलती है। मन का स्तर योगी के आहार पर निर्भर है। यह जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा। अन्नमय कोष भी साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहारशास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है। भूख से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया आहार ग्रहण करने तथा उसे आत्मसात कर उसका निष्कासन होने तक व्यक्ति को प्रभावित करती है।

आधुनिक समाज में कैंसर, आर्थाइटिस, दमा, हृदयाधान से जोड़ा जाने लगा है। कुछ विशेषज्ञ तो यहाँ तक भी कहते हैं कि पाचन सम्बन्धी अनेक सामान्य असन्तुलन इन भयंकर रोगों के पूर्व संकेत हैं। राष्ट्र संघ की “पोषण एवं मानव की आवश्यकता” पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “इस शताब्दी के प्रारम्भ से ही संक्रामक रोग बढ़ते चले आ रहे हैं। इसका कारण है आहार में विद्यमान संघटकों में परिवर्तन। कार्बोहाइड्रेट, फल, साग-सब्जी तथा अन्न के स्थान पर अब वसा, शर्करा-स्टार्च ने जगह ले ली है। कैलोरी सम्बन्धी आवश्यकता पूरी करने वाली सारी सामग्री का साठ प्रतिशत इन्हीं पदार्थों से बना होता है। शरीर की जीवनी शक्ति बढ़ाने के बजाय ये सभी तथाकथित पोषक पदार्थ मनुष्य को पाचन सम्बन्धी रोगों तथा संक्रामक रोगों के जंजाल में डाल देते हैं। असामयिक मृत्यु के दस प्रमुख कारणों में से छह का सम्बन्ध आहार से है। कैंसर भी उसमें से एक है।”

नवीनतम वैज्ञानिक खोजों से यही स्पष्ट होता जा रहा है कि कैंसर का कारण, बचाव और उपचार में आहार का सर्व प्रमुख स्थान है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट अमेरिका के डा. गोरी के अनुसार पुरुषों में सभी प्रकार के कैंसर का साठ प्रतिशत तथा स्त्रियों में इकतालीस प्रतिशत सम्बन्ध आहार की अनियमितता से होता है। उपचार हेतु कितनी भी औषधियाँ खोज ली जायें, यदि आहार सम्बन्धी भ्रमों से मनुष्य ने जल्दी ही मुक्ति नहीं पायी तो सारे प्रयास निष्फल ही सिद्ध होंगे।

आहार से पहले बारी आती है भूख की। समय बेसमय भूख लगना वस्तुतः मनुष्य के भीतर की अपूर्णता या रिक्तता की घोतक है। भूख का सम्बन्ध मन एवं चेतना से है। भूख अच्छे स्वास्थ्य का एक चिन्ह है। यह मस्तिष्क के लिये एक संकेत है कि शरीर को अन्न की जरूरत है। इस भूख के तीन प्रकार हैं- क्षुधा, व्यथा तथा भूख की असह्यता। क्षुधा रुचिकर भोजन की इच्छा से सम्बन्धित है। व्यथा या कसक जैविक क्रमानुसार पेट में कुलबुलाहट उठने से सम्बन्धित है। तीसरी असह्य भूख है, अचेतन स्तर पर शरीर को जीवित बनाये रखने के लिये प्रकृति की माँग है। आत्म-सुरक्षा हेतु निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था है।

भूख के ये तीनों कारक मस्तिष्क को आवश्यक रस स्राव हेतु स्नायु संस्थान को सक्रिय करने के लिये संकेत देते हैं। शरीर के अन्दर ऐसी भी व्यवस्था है जो बताती है कि हमें कितना खाना चाहिए एवं कब खाना बन्द कर देना चाहिए। आन्तरिक सजगता का विकास यदि हुआ हो तो मनुष्य इन संकेतों के प्रति सम्वेदनशील हो जाता है एवं अपनी भूख की तीव्रता पर एक स्वाभाविक नियन्त्रण स्थापित कर लेता है। अति आहार के कारण होने वाली व्याधियों जैसे- मोटापा, अजीर्ण तथा पाचन सम्बन्धी रोगों का निवारण करने के लिये आत्म नियन्त्रण अत्यन्त आवश्यक है। वासनामय चित्र, आत्मकेन्द्रित दृष्टिकोण, अनुसार वृत्ति, सुख उपभोगों में लिप्सा ही सारे शारीरिक असंकलनों व मानसिक तनावों को जन्म देते हैं। भोग लालसा मन को इन सुखों के पीछे भागने को विवश करती है। जब व्यक्ति वासना से अभिभूत होकर अधिक खाता है तो रोग से ग्रस्त हो जाता है। इस प्राकृतिक नियम का दुरुपयोग व्यक्ति को निम्न अधोगामी प्रवृत्तियों में ही लिप्त रखता है। तथा अति आहार के लिये विवश करता है।

शरीर की सूक्ष्म एनाटामी के अनुसार स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध सुखानुभूति व काम-वासना से है। भोजन और सम्भोग इन स्वाभाविक वासनाओं की पूर्ति में ही सामान्य पशु लिप्त रहते हैं। कामवासना की स्वाभाविक पूर्ति में कोई अवरोध हो अथवा पूर्व सन्तुष्टि प्राप्त न हो तो अन्तःप्रवृत्ति के वशीभूत हुआ मनुष्य उसकी पूर्ति भोजन द्वारा करता है। ये चक्र संस्थान हमारे आटोनामिक नर्वस सिस्टम का एक भाग है। इन्हें सुनियोजित कर हम अपने अन्दर के जंगली पशु को साध सकते हैं। यह संस्थान आटोमेटिक है जो बिना किसी चेतन निर्देशन के अपना कार्य करता है। वैज्ञानिक वायोफीड बेक पद्धति द्वारा अन्तःनियन्त्रण व संयन्त्रों का प्रशिक्षण प्रयोग रूप में कर दिखाते हैं, इसी तरह पंचकोशों की साधना से आटोनामिक नर्वस सिस्टम को चैतन्य नियन्त्रण में रखने तथा भाव-सम्वेदनाओं की अतिरेकता के प्रभावों से बचाये रखने में सहायता मिलती है।

भूख के बाद बारी आती है आहार की। आहार की शुद्धता क्यों आवश्यक है, इस सम्बन्ध में शास्त्रकार निर्देश देते हैं-

अन्नमयं हि सोम्य मन। (छान्दोग्य)

हे सोम्य! यह मन अन्नमय है।

अन्नमशितं प्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्टो धातुस्तपुरोषं भवति यो मध्य मस्तन्मा स योगिष्टास्तन्मव। (छान्दोग्य)

जो अन्न खाया जाता है, वह तीनों भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल अंश मल, मध्यम अंश रस-रक्तमाँस तथा सूक्ष्म अंश मन बन जाता है।

आहार शुद्धया नृपते, चित्र शुद्धिश्च जायते। शुद्धे चित्रे प्रकशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम्॥ -देवी भागवत्

हे राजन! आहार शुद्धि होने पर चित्त की शुद्धि होती है। इस निर्मल चित्त से ही धर्म का प्रकाश होता है।

आहार स्वाद के लिये नहीं, औषधि रूप में लिया जाना चाहिए। उसकी अन्तःशक्ति को ध्यान में रखा जाय। यह जीवन है- जीवन का आधार है, यह समझते हुए उसकी स्वादिष्टता को नहीं सात्विकता को ही महत्व दिया जाना चाहिए। अभक्ष्य आहार उल्टा प्राणी को ही खा जाता है एवं विपत्ति का कारण बनता है। उपनिषद्कार इस वैज्ञानिक तथ्य को इस तरह व्यक्त करता है-

अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतति च भूतानि॥ -तैत्तिरीय

प्राणियों में अन्न की ही श्रेष्ठता है। इसलिए उसे सर्वोत्तम औषधि कहते हैं। अन्न से जीव जन्मते और बढ़ते हैं। जीवधारी अन्न को खाते हैं, पर वह अन्न जीवों को भी खा जाता है।

यह स्थिति तब आती है जब मनुष्य अभक्ष्य एवं अति पर उतर आता है। प्रसिद्ध अमेरिकन सिनेतारिका ग्लोरिया लिखती हैं कि “मुझे गर्भाशय का कैंसर बता दिया गया था। चिकित्सकों के अनुसार मेरी आयु मात्र 1 वर्ष थी यदि में शीघ्र ऑपरेशन द्वारा यूटेरस को न निकलवाती।” ग्लोरिया ने इस सर्जरी को अनावश्यक मान आहार विशेषज्ञ से राय लेकर अपने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन किया। जहाँ वह दिन में कई बार खाती थी एवं माँसाहार-चर्बी युक्त भोजन करती थी, वहाँ शाक सब्जी, अन्न ने व उपवासों के क्रम के स्थान ले लिया। ढ़ाई वर्ष बाद पुनः परीक्षण होने पर पाया गया कि उसका ट्यूमर पूर्णतः लुप्त हो गया था। योग, आहार व इच्छा शक्ति के आधार पर मनुष्य रोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, यह अब एक सुनिश्चित तथ्य है।

आहाराभक्ष्स निवृत्ता विशुद्धं हृदयं भवेत। आहार शुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः चित्ते शुद्धे क्रमाज ज्ञानं भिन्दयते ग्रन्थमः स्फुरम॥ -पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्

अभक्ष्य आहार त्याग देने से अन्तःकरण पवित्र होता है। चित्त की शुद्धि स्वयमेव होने लगती है। इस चित्त शुद्धि के आधार पर सद्ज्ञान का उदय होता है और अवरोधों की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं।

अन्नमय कोष की साधना में साधक को इन्हीं बातों का ध्यान रखना होता है। समग्र स्वास्थ्य का आधार सात्विक आहार है, इसी मूल-दर्शन को योगविज्ञान में केन्द्र बिन्दु माना गया है। साधक का आहार अनेक स्वादों का नहीं होना चाहिए। एक ही पदार्थ व एक ही स्वाद उत्तम है। गाँधी जी ने सप्त महाव्रत लेखमाला में प्रथम व्रत अस्वाद को माना है। उनके अनुसार यदि जितेन्द्रिय की प्रबलता पर अंकुश लगाया जा सके तो कामेंद्रियों पर सहज नियन्त्रण किया जा सकता है।

वस्तुतः पतन का आरम्भ जिह्वा के असंयम से ही आरम्भ होता है। जो व्यक्ति अपनी रसना को वश में कर लेता है, उसका चिन्तन कभी कामुकता में लीन नहीं हो सकता। किसी भी साधक, आत्मिक प्रगति के विद्यार्थी के लिये इसलिये इन प्राथमिक अभ्यासों को साधना में आवश्यक बताया गया है।

प्राचीनकाल में योगाभ्यासी ऋषियों का भोजन परम सात्विक होता था। महर्षि कणाद अन्न के दाने बीनकर गुजारा करते थे। पिप्पलाद का आहार था पीपल वृक्ष के फल। वैसी स्थिति आज कहीं पायी नहीं जा सकती, पर जितना कुछ सम्भव है, आहार की सात्विकता और व्यवस्था पर अधिकाधिक अंकुश रखना साधक की सफलता के लिये नितान्त जरूरी है।

अन्न के विषय में कहा गया है कि यह एक स्तर पर औषधि है, दूसरे पर तृप्ति और तीसरे पर विष। नारी एक स्तर पर माता, दूसरे पर बहिन या पुत्री तथा पर विषय वासना से भरी रमणी। एक ही वस्तु के तीन स्वरूप हैं। जिसने अन्न की सात्विक और सीमित मात्रा में ही उपयोगिता को समझा, वह न केवल शारीरिक दृष्टि से लाभ प्राप्त कर सका, अपितु चिन्तन तथा भावनाओं को उत्कृष्टता की ओर नियोजित कर स्वयं को आध्यात्मिक दृष्टि से भी ऊँचा उठा सका है।

उपनिषदकार कहता है-

एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्य मानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनोभवति। अपा सोम्य पीयमाननां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति। तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति॥ (छान्दोग्य)

हे सौम्य! इस प्रकार ही खाये गये अन्न का जो भी सूक्ष्म भाग होता है, वह ऊपर उठ जाता है एवं मन का तन्तु जाल बनाता है। ऐसे ही पिये जाते हुए जलों का जो सूक्ष्म अंश आता है, वह ऊपर निखर आता है एवं प्राणमय जीवन बनाता है। ऐसे ही खाये हुए तेज का जो सूक्ष्म अंश होता है वह ऊपर निखर आता है एवं वाणी बन जाता है।

ऋषिगणों की इतनी सूक्ष्म दृष्टि थी कि उन्होंने साधना के स्वरूप को बोधगम्य बनाने के लिए आहार के सभी आयामों को शरीर मन की संरचना के साथ सम्बन्धित कर प्रस्तुत किया।

दुश्चिन्तन ही समस्त व्याधियों का मूल है। यह मनुष्य को अपनी अन्तःवृत्तियों का दास बनने पर विवश कर देता है। अन्नमय कोष की साधना आहार सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण के परिष्कार की साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मिताहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।


परिवर्तन का आधार अन्तःकरण

वह सन् 1863 की एक ठंडी सुबह थी। पेरिस का एक कुख्यात अपराधी फ्रैन्कुइस जेल में अपने स्वजन सम्बन्धियों से अन्तिम बार मिल रहा था। न्यायालय ने उसे निष्कासन का दण्ड दिया था और तीन दिन के भीतर पेरिस छोड़ देने के लिए कहा था। फ्रैन्कुइस बचपन में बहुत मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न छात्र था। छात्र और अध्यापक सभी उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते थे किन्तु दुर्योग से वह बचपन में ही ऐसी कुसंगति में पड़ गया कि उसकी रुचि अपराधों की ओर खिच गई। जिस प्रतिभा के बल पर वह विश्व विद्यालय का गौरव बना था, वही प्रतिभा जब भटक गई तो वह बन गया। कुख्यात अपराधी। कुख्यात अपराधी ही नहीं अपराधियों का गुरु।

सुशिक्षित, फ्रैन्कुइस ने अपना अपराधी जीवन जेब-कटी से आरम्भ किया और फिर वह चोर बना। वह पेरिस की गन्दी बस्तियों में रात भर वैश्यालयों में पड़ा रहता और जब भी पैसों की जरूरत पड़ती तो कभी कहीं सेंध मरता या किसी सम्पन्न घर में जाकर मालिक को जगाता उससे तिजोरियों की चाबियाँ झपटता और मालमत्ता लेकर गायब हो जाता। जेबकटी और चोरी के बाद वह डाके भी डालने लगा। अपराधों के कीचड़ में वह इस कदर उलझ गया कि उसे लोगों के साथ मारपीट करने में बड़ा आनन्द आता था। वह अपने शिकार के साथ बुरी तरह मारपीट करता था।

लेकिन कानून के हाथों से कब तक कोई बचा रह सकता है। एक बार फ्रैन्कुइस पुलिस की गिरफ्त में ऐसा आया कि उसके सारे प्रयास ही विफल हो गए। न्यायालय ने उसे प्राणदण्ड दिया। अब तो उसके सारे हौंसले ही पस्त हो गये उसका दुस्साहसी मनोबल टूट कर बिखर गया।

उन दिनों फादर ग्युलैभी का पेरिस में अच्छा प्रभाव था। वे अपने आचरण, व्यक्तित्व और उपदेशों द्वारा लोगों को मानवता तथा नैतिकता की ओर अग्रसर होने के लिए प्रबल प्रेरणाएं देते थे। जब उन्हें फ्रैन्कुइस के प्राणदण्ड का समाचार मिला तो वे द्रवित हो उठे। वे सोचने लगे कि फ्रैन्कुइस को यदि एक बार सुधरने का मौका दिया जाए तो सम्भव है उसके जीवन की दिशा धारा ही बदल जाय। यह सोचकर उन्होंने फ्राँस सरकार से फ्रैन्कुइस के लिए क्षमा याचना की। सरकार ने फ्रैन्कुइस को क्षमा तो नहीं किया पर उसका प्राणदण्ड अवश्य निर्वासन में बदल दिया।

उस दिन फ्रैन्कुइस निर्वासन की, पेरिस से बाहर जा कर रहने की तैयारी कर रहा था। फादर ग्युलैभी उसके साथ उसे विदा करने के लिए ‘गेट आव जैक्यूस के बाहर तक गए। वहाँ से फ्रैन्कुइस एकाकी अकेला सबसे विदा लेकर अज्ञात स्थान की ओर चल पड़ा। न कोई लक्ष्य था और न मंजिल। रह-रह कर उसके मस्तिष्क में अतीत की स्मृतियाँ कौंध जाती थीं और हृदय चीत्कार कर उठता था।

एकान्त में जीवन व्यतीत करते हुए फ्रैन्कुइस को अपने प्रेमी जनों की स्मृतियाँ कौंध जातीं। फादर ग्युलैभी का प्रेमल चेहरा याद आ जाता, जिनके कारण उन्हें जीवनदान मिला। इन स्मृतियों में फ्रैन्कुइस के मर्मस्थल के न जाने किस प्रदेश को छू लिया कि उसके अन्तस् में क्रान्ति मच गई और उसने अपने विगत जीवन का अन्त कर एक नया ही जीवन आरम्भ करने का संकल्प किया। उसमें ऐसी संवेदनाएं जगी कि कभी लोगों पर निर्मम निर्भय आघात करने वाला, फ्रैन्कुइस अपनी पीड़ा पश्चाताप कविताओं में उड़ेलने लगा। उसकी कविताएँ और साहित्य इतना संवेदनशील बन पड़ा है कि अब उसकी गणना फ्राँस के श्रेष्ठ कवि और उच्चकोटि के साहित्यकारों में की जाती है।


अन्तर्ग्रही असन्तुलन की भावी विभीषिकाएँ

यह सच है कि अपने पुरुषार्थ के बलबूते मनुष्य बहुत कुछ कर सकता है, पर इसके साथ यह तथ्य भी अनिवार्य रूप से जुड़ा है कि मानवी पुरुषार्थ की एक सीमा है। सफलता-असफलता में उपलब्ध परिस्थितियों एवं अन्यों के सहयोग की भी आवश्यकता पड़ती है। जिस भू-भाग पर मनुष्य निवास करता एवं उसके अनेकानेक अनुदानों का लाभ उठाता है वह भी स्वतन्त्र एवं स्वावलम्बी नहीं है। पृथ्वी सम्पदा का एक बड़ा भाग अन्य ग्रहों की कृपा से प्राप्त होता है। सूर्य की अनुकम्पा से ही पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व बना हुआ है। जीव-जन्तु, पेड़-पौधें सूर्य ऊर्जा से ही जीवन धारण करते हैं। अजस्र अनुदान का यह क्रम रुक जाय तो पुरुषार्थी होते हुए भी मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। समस्त पशु-पक्षी, वनस्पति एवं मनुष्य जाति का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। भूलोक का अन्तर्ग्रही ही अनुदान उनके आपसी सन्तुलन पर निर्भर करता है। ग्रहों के आपसी असन्तुलन का प्रभाव पृथ्वी एवं इस पर निवास करने वाले जीव एवं वनस्पति जगत पर असाधारण रूप से पड़ता है। अतएव मानवी भविष्य एक सीमा तक अंतर्ग्रही सन्तुलन पर निर्भर करता है। ग्रहों की प्रकृति में आये विक्षोभ समस्त सौर मण्डल को प्रभावित करते हैं। प्राणि जगत की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति तो प्रभावित होती है, पृथ्वी का सन्तुलन एवं सम्पूर्ण पर्यावरण भी विक्षुब्ध हो उठता है। फलतः अनेकों प्रकार के प्रकृति प्रकोप दृष्टिगोचर होते हैं।

इस तथ्य की पुष्टि विज्ञान जगत में भी होने लगी है। ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाली वैज्ञानिक पत्रिका नेचर के सम्पादन एवं प्रसिद्ध खगोलवेत्ता जानग्रिबिन तथा नासा अन्तरिक्ष शोध संस्थान के वैज्ञानिक स्टीफन प्लगमेण्ट ने सम्मिलित रूप से “द जुपीटर एफेक्ट” नामक पुस्तक लिखी है। पुस्तक में सौर मण्डल के ग्रहों की स्थिति गति एवं पृथ्वी के वातावरण एवं जीव-जगत पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का वर्णन है। गणना के अनुसार इन खगोलवेत्ताओं ने घोषणा की है कि सन् 1982 में सौर मण्डल के नवों ग्रह सूर्य के एक ओर पंक्तिबद्ध होंगे, उस समय सूर्य की गति एवं स्थिति में असामान्य परिवर्तन होंगे। उसका प्रभाव पृथ्वी के वातावरण एवं मौसम पर पड़ेगा। पृथ्वी के परिक्रमा पथ में गतिरोध होने की सम्भावना है। फलतः विश्व के अनेकों स्थानों पर तीव्र भूकम्प आयेंगे। मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन होंगे। इस आकस्मिक असन्तुलन में मानव जाति सामंजस्य बिठा पाने में असमर्थ होगी। प्रतिकूल वातावरण अनेकों नये रोगों को जन्म देगा। भूकम्प, बाढ़, सूखा के त्रिविधा प्रहार से अपार जन-शक्ति एवं धन शक्ति नष्ट होगी।

ग्रिबिन एवं प्लेगमेण्ट के अनुसार नौग्रहों के एक सीधे में आने से पृथ्वी पर चुम्बकीय सक्रियता बढ़ जायेगी। साथ ही सूर्य में चुम्बकीय असन्तुलन से सौर ज्वाला की लपटें दिखाई पड़ सकती हैं। पृथ्वी का आयनोस्फियर बदल सकता है तथा अंतर्ग्रही संचार व्यवस्था में व्यतिक्रम उत्पन्न हो सकता है। पृथ्वी पर जलवायु का नियन्त्रण सूर्य द्वारा होता है। सूर्य में सर्वाधिक धब्बे उस समय दिखाई देंगे, जब नौ-ग्रह सूर्य के एक ओर पंक्तिबद्ध होंगे। इस अवधि में सूर्य शक्ति पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आने से नदियों एवं सागरों का पानी तेजी से भाप में बदलने लगता है। ध्रुवीय हिमखण्डों के पिघलने की गति बढ़ जाती है। सूर्य में उथल-पुथल से जीव-जन्तुओं के व्यवहार में भी असाधारण अन्तर आता है। मानसिक सन्तुलन बिगड़ने से दुर्घटनाएँ अधिक होतीं तथा युद्ध आदि की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

वैज्ञानिक पर्यवेक्षणों से इस तथ्य का उद्घाटन हुआ है कि जिन दीनों अन्तर्ग्रही असन्तुलन बढ़ता है, सूर्य में धब्बे अधिक दिखायी पड़ते हैं। फलतः प्रकृति प्रकोपों में भी वृद्धि होती है। भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, तूफान, महामारी जैसी घटनाएँ सूर्य कलंकों की अवधि में ही अधिक घटित होती हैं।

अमेरिका वैज्ञानिक एन्ड्रयू डगलस ने अपने शोध के उपरान्त निष्कर्ष निकाला कि सूर्य कलंकों तथा वृक्षों की वृद्धि में परस्पर घना सम्बन्ध है। ‘डगलस’ ने ‘सेक्वोडया’ नामक वृक्ष जिसकी आयु 3500 वर्ष से भी अधिक है, पर पिछले 1000 वर्षों के सूर्य कलंक चक्र एवं उसके प्रभाव का पता लगाया है। उनके अनुसार सूर्य की अधिकतम सक्रियता पिछले 30 वर्षों में सन् 1928, 1936, 1947, 1959, 1966 में रही है। इन्हीं वर्षों में सर्वाधिक प्रकृति विक्षोभ उत्पन्न हुए हैं। वर्ष 1966 में चीन, भारत, अफगानिस्तान, इटली, पाकिस्तान, बुल्गारिया, चेकोस्लाविया, पूर्वी जर्मनी, सोवियत संघ आदि देशों के अनेकों स्थानों पर भयंकर बाढ़ आयी एवं भूकम्प के झटके महसूस किये गये।

रूसी वैज्ञानिक चिजोवस्की ने पिछले 400 वर्षों में पड़े सूर्य-कलंकों का विशद अध्ययन किया। उनका कहना है कि महामारियों की लहर सूर्य कलंकों में तेजी आने के तीन वर्ष बाद आती है। इन कलंकों का मनुष्य स्वास्थ्य एवं पृथ्वी के वातावरण से सीधा सम्बन्ध है। नवीन वैज्ञानिक खोजों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर थायराइड, एड्रीनल, पिट्यूटरी आदि नलिका विहीन ग्रन्थियों का मनुष्य के विचारों, कल्पनाओं एवं भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है। सौर मण्डल के ग्रह मनुष्य के विचारों एवं भावनाओं को प्रभावित करते हैं, जिनके फलस्वरूप अन्तर्ग्रन्थियों पर भी प्रभाव पड़ता है।

सर्वविदित है कि तेज धूप में अधिक देर से बैठने पर उत्तेजना तथा चाँदनी रात में आह्लाद की अनुभूति होती है। यह सूर्य और चन्द की ग्रंथियों पर प्रतिक्रिया का ही परिणाम है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि अमावस्या एवं पूर्णिमा के दिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। पागलपन, विक्षिप्तता, कामुकता उत्तेजना जैसे मनोरोगों की बहुलता इन्हीं दिनों देखी जाती है। हत्या, आत्महत्या, जैसी घटनाएँ भी इस अवधि में अधिक होती हैं। प्रकृति प्रकोप भूकम्प आदि की घटनाएँ अधिकांशतः इस अवधि में ही घटित हुई हैं।

प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक जान हैनरी नेल्सन ने अन्तर्ग्रही प्रभावों का लम्बे समय तक अध्ययन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पृथ्वी के वातावरण एवं इस पर निवास करने वाले जीवों पर सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि, बृहस्पति एवं शुक्र आदि ग्रहों के प्रकम्पनों का निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। भौतिक विज्ञान के संवेदनात्मक सहकम्पन सिद्धान्तों का उल्लेख करते हुए नेल्सन कहते हैं कि “ग्रहों की विशिष्ट स्थिति पृथ्वी पर चुम्बकीय तूफान उत्पन्न करने के साथ-साथ मनुष्य के सूक्ष्म ज्ञान तन्तुओं को कंपित करते हैं। जिनके फलस्वरूप एक विशिष्ट प्रकार की उत्तेजक विचार श्रृंखला चल पड़ती है। फलतः मनुष्य में आक्रमण, हिंसा आदि की प्रेरणा उठती है। मस्तिष्क का सन्तुलन डगमगा जाता है। सूर्य कलंकों के समय यह असंतुलन और भी बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस समय नौ-ग्रह सूर्य के एक ओर एक सीधी रेखा में होंगे, उस समय मनुष्य जाति में मनोविक्षोभ चरम सीमा पर होगा। तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावना भी इसी आधार पर की जा रही है।


Quotation

जीवन को मैंने प्यार किया और उसने मुझे प्यार किया और उसने मुझे प्रतिदान से भर दिया। मैंने अपने भीतर प्यार की आग सुलगाई, उसके समीप जो भी आया गर्मी पाकर गया। प्रेम से आहत मेरा मन पहले टूटता और मरता सा दिखता था, पर अब वह जुड़ भी गया और जीवित भी है। मैं प्रेम में रोया और मेरे साथ हर कोई रो पड़ा।

मैंने घुटने टेक कर प्रेम के परमेश्वर से पूछा आप अपना रहस्य मुझ पर प्रकट क्यों नहीं कर देते? उसने मुस्कराते हुए मेरे कान में कहा- अपने आप से प्यार कर क्योंकि मैं प्रेम के रूप में तेरी सत्ता के साथ एकीभूत होकर रह रहा हूँ।

-इनायत


अगले दिनों विश्व का नेतृत्व भारत ही करेगा

सभी यह चाहते हैं कि परिस्थितियाँ सुख-शान्ति से भरी पूरी हों। धरती पर स्वर्ग का अवतरण, पुरातन कालीन वह कल्पना है जिसे साकार करने का सपना हर भावनाशील बुद्धिजीवी इन दिनों देख रहा है। सारे विश्व के समझदार कहे जाने वाले विज्ञजनों की निगाहें भविष्य पर टिकी हुई हैं। वे एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर रहे हैं, जिसमें युद्ध, पारस्परिक द्वेष, सम्प्रदाय-जन कलह एवं नैतिक मूल्यों के प्रति बढ़ती अनास्था को कोई स्थान न हो। तीसरी दुनिया के राष्ट्र तो अपनी वर्तमान की समस्याओं में इतने उलझे हैं कि उनके पास भविष्य के विषय में न सोचने का वक्त है, न सुविधाऐं। फिर भी छुट-पुट प्रयास व्यवस्था तन्त्र एवं धर्मतन्त्र दोनों ही मंचों से चलते रहे हैं। लेकिन पश्चिम जगत ने भविष्य के बारे में काफी कुछ सोचा है, योजनाएँ बनाई हैं एवं सन् 2000 की एक झाँकी देने का प्रयास किया है। इससे यह आभास होता है कि यदि प्रगति की वर्तमान तेज दौड़ यथावत रही तो भविष्य कैसा होगा? इस विज्ञान को जिसमें साँख्यकीय गणनाओं एवं उपलब्ध तथा सम्भावित आँकड़ों के आधार पर चिन्तन किया जाता है, फ्यूचरालॉजी (भविष्य विज्ञान) नाम दिया गया है, जो पिछले एक दशक मात्र की ही उत्पत्ति है। यूटोपिया एक इसी प्रकार की विद्या है जिसमें वैज्ञानिक कल्पनाएँ करते हैं जो उपलब्ध तथ्यों को मूल आधार बनाकर की जाती हैं।

सड़ा हुआ अन्न यदि सम्भाल कर रखा जाय तो विष का रूप ले लेता है। उपलब्ध सुख-सुविधा के साधन दुरुपयोग करने पर संकट का स्वरूप ले लेते हैं। समृद्धि तन्त्र, जिसमें खाद्य व्यवस्था, जनसंख्या एवं स्वास्थ्य, उत्पादन-उपभोग व्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा जैसी सार्वजनीन व्यवस्थाएँ सन्निहित हैं, एक इसी आधार पर टिका है जिसे प्लानिंग (योजना) कहा जाता है। यदि दूरदर्शितापूर्ण संवर्धन और सदुपयोग निर्वाह के साधनों का न किया गया तो ये ही साधन भस्मासुर का रूप धारण करके विश्व को नष्ट कर डालेंगे। भविष्यविद् इसीलिए समय-समय पर मिल बैठकर विचार करते हैं एवं स्वर्णिम युग लाने के सही उपाय आँकड़े के आधार पर सुझाते हैं।

पिछले दिनों तीन प्रख्यात अमेरिकी चिन्तक जिन्होंने इस विषय पर कई पुस्तकें लिखी हैं, परस्पर मिलकर बैठे एवं अपने अध्ययन, चिन्तन व अनुमान के आधार पर बताया कि विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। “दुनिया कहाँ जा रही है” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकी टेलीविजन संवाददाता केल्विन सेण्डर्स ने डा. मार्गरेटमीड (अब स्वर्गीय), हरमन कॉन एवं विलीयम टामसन से साक्षात्कार लिया। “स्पॉन” पत्रिका (अप्रैल 1979) में प्रकाशित इस विचार मंथन पर सारे विश्व के बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है। वस्तुतः अभी तक जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने अपना चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है। इन तीनों भविष्यविदों ने आशावादी दृष्टिकोण से कई पुस्तकें भी लिख हैं व बताया कि समृद्धि तन्त्र अपना रास्ता बदलने में पूरी तरह से समर्थ है। उसे सही चिन्तन देने वाले मनीषी भी विश्व में हैं जो तीसरी दुनिया जिसमें भारत भी शामिल है, उसे उदित होकर एक स्वर्णिम युग अगले बीस वर्षों में लाकर दिखायेंगे।

स्व. डा. मार्गरेटमीड ‘अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री’ को अध्यक्षा रही, नृतत्व विज्ञान पर उनका गहरा अध्ययन था एवं उन्होंने ‘कमिंग आफ एनएज’ ‘कल्चर एण्ड कमिटमेण्ट’, ‘ए स्टडी ऑफ जेनरेशन गैप’ नामक बेस्टसेलर पुस्तकें लिखीं। श्री हरमन कॉन ‘हडसन इंस्टीट्यूट’ के निदेशक हैं एवं ‘वर्ष 2000’ तथा ‘आगामी दो सौ साल’ नामक पुस्तकों से काफी ख्याति पा चुके हैं। भविष्य विज्ञान के तीसरे विशेषज्ञ विलियम दूरविन थामसन ने ‘एट दी एज ऑफ हिस्ट्री’, डार्कनेस एण्ड स्केटर्ड लाइफ एवं ‘ऐसेज ऑन फ्यूचर’ नामक पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने प्रमुख दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों तथा वैज्ञानिकों की एक मिली-जुली संस्था बनायी है जिसका उद्देश्य है आगामी भू-मण्डलीय संस्कृति का अध्ययन एवं सुनियोजित निर्धारण।

डा. मार्गरेटमीड के अनुसार यद्यपि आधुनिक जगत को संस्कृति, जाति लिंग, पीढ़ियों एवं धर्ममतों की विभिन्नताओं एवं उनमें बढ़ रहे तनावों का सामना करना पड़ रहा है तथापि विकेन्द्रीकृत औद्योगीकरण का एक स्वरूप एवं सार्वभौम विश्व संस्कृति का एक मंच अगले दिनों तीसरी दुनिया से उभर कर आने वाला है जो पाश्चात्य जगत का भी मार्गदर्शन करेगा। उनके अनुसार भविष्य कोई ऐसी चीज नहीं है जो अस्तित्व में न आ चुकी हो। वस्तुतः इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश कर जो पीढ़ी भविष्य का फैसला करेगी वह आज जन्म ले चुकी है। इसी कारण हमारी आज की योजनाओं, हमारे चिन्तन, व्यवस्था, सम्बन्धी सुझावों का एक सुनिश्चित प्रभाव इस पीढ़ी पर पड़ ही रहा है। इसे हम रोक नहीं सकते। अगली पीढ़ी अमेरिकी ग्लैमर की नकलची नहीं होगी अपितु वह इन दबावों तथा तनाव के मध्य से गुजर कर-तपकर विकेंद्रीकरण एवं प्राकृतिक जीवन-व्यवहार को की अपना आदर्श बनायेगी।

डा. हारमैन कान पिछले दिनों भारत की यात्रा कर चुके हैं। उनका कहना था कि “भारत के बीस प्रतिशत व्यक्ति आधुनिक खण्ड में हैं जो तेजी से प्रगति कर रहे हैं, चालीस प्रतिशत अर्ध आधुनिक खण्ड में हैं जहाँ रबर टायर युक्त बैलगाड़ियों प्रयुक्त होती हैं एवं कस्बों में छोटे-छोटे उद्योग हैं, शेष चालीस प्रतिशत प्रगति की दिशा में अग्रसर हैं। यह एक अच्छा लक्षण है। जब इस देश की तुलना औद्योगीकरण की दृष्टि से प्रगतिशील देशों से की जाती है तो निष्कर्ष यही निकलता है कि भारत जैसे अर्ध औद्योगीकृत राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल है। संसाधनों की उपलब्धि की अब चरमसीमा है। आज पश्चिमी देशों में तकनीकी ध्वंसकारी एवं आक्रामक होने की स्थिति में आ गयी है। वास्तव में आज दुनिया की आबादी को बड़ी तकनीक से बनायी गई ज्यादा तादाद में चीजों की जरूरत नहीं है, जरूरत है कि ज्यादा तादाद में व्यक्ति वस्तुओं का निर्माण करें ताकि अधिक से अधिक लोगों के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाये जा सकें। इस प्रकार के गाँधीवादी अर्थशास्त्र की वे वकालत करते हैं व कहते हैं “मेरे अपने हिसाब से आप (भारतीय) काफी अच्छी प्रगति कर रहे हैं।

हरमैन कान के अनुसार “तीसरी दुनिया का अर्थ विकसित एवं विकासशील देश) अपराध यह है कि वह अपनी समस्याओं के द्वारा चीजों को न देखकर पाश्चात्य जिन्दगी की लगभग नकल कर रहा है, उसके लिए पश्चिमी दुनिया के मूल्य ही उनके लिए सर्वोच्च मूल्य हैं। पर स्थिति बदलेगी। विश्व के 30 प्रतिशत गरीब क्षेत्रों में इतनी प्रगति हो जायेगी जो कि रोमन साम्राज्य के सर्वश्रेष्ठ काल के निवासियों की थी।”

डा. थामसन के अनुसार “अगले दिनों खाद्यान्नों एवं भौतिक साधनों की विपुलता पर नहीं, मानवी चेतना की सम्पूर्ण क्रान्ति पर एक विचार पूर्व से उठकर आयेगा। मानवी संस्कृति के विकास की दृष्टि से, आदेशों की दृष्टि से एवं सारे विश्व के लिए भूतकाल में रही उसकी भूमिका की दृष्टि से भारत ही विश्व संस्कृति का नेतृत्व करेगा।’’ “टायनबी” को उद्घृत करते हुए वे कहते हैं कि पश्चिम के भौतिकवाद का पूर्व के अध्यात्मवाद से साँस्कृतिक सामंजस्य एवं भविष्यवाणी है जो निश्चिततः सत्य होकर रहेगी। “पूर्व के अध्यात्मवादी, भौतिकता के समन्वित एक संस्कृति का विकास अगले दिनों इस प्रकार करेंगे जिससे समग्र विश्व संस्कृति का एक उत्कृष्टतम उदारवादी स्वरूप उभर कर आयेगा। इसे वे “पैथेगोरियन सिन्थेसिस” नाम से सम्बोधित करते हैं।

जिस प्रकार विज्ञान के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों में अभूतपूर्व क्रान्ति आयी है, कुछ उससे अधिक ही साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में परिवर्तन सम्भावित हैं, ऐसी कल्पना थामसन ने वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर की है।

अमेरिका में अर्थ विशेषज्ञों में प्रथम पंक्ति में गिने जाने वाले लिन्डन एच लारांच एवं अन्य अमेरिकी विशेषज्ञों का कम्प्यूटर अध्ययन में आधार पर यह अनुमान है कि वर्तमान औद्योगीकरण की व्यवस्था, आणविक ऊर्जा के सदुपयोग एवं तकनीकी ज्ञान की दृष्टि से प्रखर बुद्धि जीवियों की प्रचुरता के कारण भारत अगले 40 वर्षों में ‘सुपर पावर’ की श्रेणी में आ जायेगा और अमेरिका एवं रशिया से भी पहला उसका नाम होगा। प्रकारान्तर से यह श्री हरमनकॉन के कथन की ही पुष्टि है। इस कम्प्यूटर प्रोग्राम का नाम था” - 1980-2020 तक भारत का औद्योगीकरण पिछड़े देश से 40 वर्ष में विकसित देशों के रूप में रूपांतरण”। अगस्त 1980 के अन्तिम सप्ताह में पी.टी. आय को दी गयी एक भेंट में श्री लारांच ने भारत के भविष्य को उज्ज्वल बताया व कहा कि ‘अपनी साँस्कृतिक गरिमा एवं आध्यात्मिक परम्परा के कारण भारत सारे विश्व का नेतृत्व करने की स्थिति में आ चुका है। वर्तमान राजनैतिक एवं आर्थिक हलचलों से किसी को आशंकित नहीं होना चाहिए। (स्टेट्समेन 8 सितम्बर 1980)।

इसका मूल कारण स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि तकनीकी ज्ञान की दृष्टि से इस समय सर्वाधिक सम्पन्न भारतवर्ष है। यदि उसकी मूर्धन्य प्रतिभाएँ अपने कार्यक्षेत्र की परिधि को पूरे देश में फैला दें, ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध उत्पादन में समर्थ संसाधनों का उचित उपयोग कर लें तथा अनियोजित व्यवस्था से होने वाले अपव्यय को रोकने में सहायता देने लगे तो न केवल भारत प्रथम श्रेणी के राष्ट्र की गिनती में होगा वरन् वह सारे विश्व को दिशा दे सकने में समर्थ हो सकेगा।

ऐसा अनुमान है कि सन् 2020 में भारत को श्रमिकों की कुल संख्या 23 एवं 24 करोड़ के बीच होगी जो कि अमेरिका, रशिया, पूर्व एवं पश्चिम यूरोप की सम्मिलित श्रमिक से अधिक ही होगी। यदि उपलब्ध भूमि (उपजाऊ) का सत्तर प्रतिशत भी सिंचित कर दिया गया तो अन्न का उत्पादन एक खरब टन प्रति वर्ष के लगभग जा पहुँचेगा। यदि यह हो जाता है, तो भारत सारे विश्व को अन्न देने की स्थिति में होगा यह सारी कम्प्यूटर स्टडी एक आशावादी स्वरूप प्रस्तुत करती है। पर यह सब तभी सम्भव है जब उन सावधानियों पर भी ध्यान दिया जाये जिस पर इन अर्थशास्त्रियों ने मात्र इशारा किया है। वे हैं बढ़ती जनसंख्या पर समुचित नियन्त्रण, संसाधनों के दोहन के औचित्य-अनौचित्य पर विचारपूर्ण चिन्तन, एक बहुत बड़ी आबादी के लिए साक्षरता की व्यवस्था का निर्धारण एवं एक सुनियोजित तकनीकी बुद्धिजीवी समुदाय की क्षमता के उचित उपयोग की व्यवस्था का निर्माण।

मनुष्य गलती करता है। पर भूल सुधारना भी उसकी एक सहज प्रवृत्ति है। अगले दिनों भूल समझने व सुधारने का ही अभियान चलेगा। इस बात को भविष्यवेत्ता कह रहे हैं, ग्रहगणित वाले ज्योतिषी भी यही कर रहे हैं। वैज्ञानिक (फ्यूचरालॉजिस्ट) कह रहे हैं तथा कम्प्यूटर तक ऐसी सम्भावनाएँ दे रहा है। अगले दिनों भोगवादी, नास्तिकता की पक्षधर बुद्धिवादिता को उन दिग्गजों द्वारा नाकों चने चबाने को विवश किया जायेगा जो ऐसे ही विपत्ति के समय पर अवतरित होते रहे हैं।

आदर्शवादी तत्वज्ञान एवं सृजनात्मक युग प्रवाह को गति देने के लिए युग मनीषा को आगे आना ही होगा। चाहे इसे अध्यात्म आन्दोलन कहा जाये या पुनर्निर्माण आन्दोलन, विश्व संस्कृति की स्थापना करने के लिए ऐसी प्रक्रिया अवश्य ही क्रियान्वित होगी। यह एक सपना नहीं, विधाता की क्रमबद्ध सुनियोजित क्रिया-पद्धति है। इसे सम्पादित करने के लिये मानवी संस्कृति के उद्गम केन्द्र भारत को ही नेतृत्व करना होगा।


हजरत मुहम्मद साहब (kahani)

हजरत मुहम्मद साहब चिन्तन-मनन के लिए एक खजूर के पेड़ के नीचे बैठते थे। कुछ समय बाद उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा। तब उन्होंने उस खजूर को कटवा दिया।

लोगों में असमंजसपूर्वक इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि ‘कहीं ऐसा न हो कि लोग मेरे उपदेशों की अपेक्षा इस खजूर को ही पूजने लग जांय।


प्रत्यक्ष आचरण द्वारा साहसिकता का प्रशिक्षण

उन दिनों पंजाब का शासन-संचालन कर रहे थे पंजाब केसरी महाराजा रणजीतसिंह। पड़ौसी देश के कबायलियों ने राजधानी पेशावर पर आक्रमण की योजना बनाई और 1500 चुने हुए सैनिकों के साथ धावा बोल दिया।

उस सीमा-क्षेत्र में नियुक्त सैन्याधिकारी के साथ 150 सैनिक थे। अपने से दस गुनी सेना से टकराने का साहस उसे नहीं हुआ। अपने कर्त्तव्य पर अडिग रहने तथा कुशलतापूर्वक शत्रु का सामना करने के स्थान पर उसने मैदान छोड़ कर भाग खड़े होने को ही बुद्धिमत्ता मानी।

अपनी सेना के पलायन का समाचार सुनकर पंजाब केसरी को क्षोभ हुआ। अपने राज्य की प्रतिष्ठा तथा सुरक्षा दोनों को आघात पहुँचाने वाले इस अनुचित आचरण से वे विचलित तो हुए, किन्तु अपने वीर स्वभाव के अनुरूप उन्होंने सूझ-बूझ तथा धैर्य से काम लिया। सम्पूर्ण परिस्थितियों पर विचार कर उन्होंने सेनापति को दण्डित करने के स्थान पर उसे अपनी दुर्बलता को समझने और समाप्त करने की प्रेरणा देना उचित समझा। एक कुशल प्रशासक के नाते उन्हें रणक्षेत्र की स्थिति, अपनी सेना की क्षमता तथा उसके संचालन का कौशल सभी भली-भाँति ज्ञात था। सीमा पर नियुक्त सैन्य दल की संख्या से भी वे अवगत थे।

150 सैनिकों की संख्या को कम समझते हुए सीमा प्रहरी सैन्याधिकारी भाग खड़ा हुआ था। सो, महाराजा रणजीतसिंह ने भी 150 सैनिक ही साथ लिये और युद्ध स्थल पर जा पहुँचे।

अपनी रणनीति, युद्ध-कौशल तथा साहस भरे शौर्य एवं तेजस्वी नेतृत्व के कारण 150 सैनिकों के द्वारा ही महाराजा रणजीतसिंह उन पन्द्रह सौ कबायलियों की घेराबन्दी करने, उन्हें हताश एवं पराभूत करने में सफल हुए। निर्भीक तथा कुशल सेनापति के मार्गदर्शन में पंजाबी सैनिकों में उत्साह उमड़ चला था और अपने से दस गुनी सैना भी उन्हें भारी नहीं मालूम पड़ी। कबायलियों के छक्के छूट गये तथा वे अपनी जान बचाकर भागे। विजय-पताका फहराते हुए महाराजा वापिस आये।

अपने ऐसे अदम्य, साहस, शौर्य, उत्साह, धैर्य, सूझ-बूझ एवं कुशलता के कारण ही महाराजा रणजीतसिंह पंजाब-केसरी कहलाये थे। एक कुशल प्रशासक तथा वीर योद्धा तो वे थे ही, आत्मसंयम और विवेकपूर्ण सन्तुलन के भी वे धनी थे। कोई दर्पोद्धत राजा होता तो रणभूमि छोड़ने वाले सैन्य-अधिकारी को क्रुद्ध हो दण्डित करता। ऐसी स्थिति में अपमानित सेनापति अपनी कमी का तो विचार क्यों करता? मानवीय स्वभाव की दुर्बलता के कारण प्रतिशोध की भावना उसमें भड़क सकती थी। वह शत्रु-पक्ष से जा मिलता और युद्ध-क्षेत्र के तथा पंजाब की सेना के रहस्य उन्हें बता देता। दुरभिसन्धि रच डालता। तब शत्रु का मुकाबला करना और उसे पराभूत करना अधिक कठिन हो जाता। या फिर उस अधिकारी को दण्डित करने से सेना के एक हिस्से में भय, असन्तोष का भाव फैल सकता था।

यह सब न हो पाता तो भी दण्ड-व्यवस्था करने में लगने वाला समय, सीमा पर खड़े शत्रु का आगे बढ़ने, फैलने का अधिक मौका तो दे ही देता।

उतनी ही सेना लेकर शत्रु को पराभूत कर जब पंजाब-केसरी राजधानी लौटे तो सेनापति के हृदय में तब तक इस प्रत्यक्ष आचरण द्वारा साहसिकता का पाठ वैसे ही अंकित हो चुका था। महाराजा ने लज्जित करने के स्थान पर बुलाकर उसे समझाया तथा भविष्य में साहसपूर्वक कर्त्तव्य पथ पर अडिग रहने की सलाह दी।

सच्चे सद्भाव तथा स्वयं के आचरण से पुष्ट यह परामर्श उस सैन्याधिकारी के हृदय पर जीवन भर के लिए अंकित हो गया।


अपनों से अपनी बात - प्रज्ञा परिजनों को बढ़ते उत्तरदायित्व सम्भालने होंगे

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई- इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत 43 वर्षों की लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था। यह कहने में कोई अत्युक्ति या दर्पोक्ति नहीं है कि इस लम्बी अवधि में व्रतशील तीर्थयात्री की तरह उसने प्रयाण क्रम को बिना थके-बिना डरे डगमगाये-अनेकानेक विघ्न बाधाओं को झेला और गतिशीलता को अनवरत जारी रखा है।

भागीरथी प्रयत्नों ने अदृश्य और दूरवर्ती गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। इस गाथा का एक छोटा उदाहरण नव सृजन की प्रवृत्ति प्रेरणा को जन-जन के मन-मन तक उमँगते देखने से मिल सकता है। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। खदानें खोदने से मणिमुक्तक हाथ लगे हैं। उसी घटना क्रम का एक छोटा रूप यह है कि प्रज्ञा परिवार के परिजनों में से सहस्रों की संख्या लाँघ कर लाखों तक पहुँचने वाली सृजन शिल्पियों की विशालकाय चतुरंगिणी-भारत को महा भारत बनाने के दुहरे मोर्चे पर प्राण-पण से जूझती हुई दृष्टिगोचर हो रही है। अनौचित्य का उन्मूलन और सृजन का संवर्धन देखने में परस्पर विसंगत लगते हैं और एक साथ करने में कठिन असम्भव प्रतीत होते हैं, पर समय ने जब दुहरी और अनमेल जिम्मेदारी कन्धों पर रख ही दी तो उसे वहन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग भी नहीं रहता।

इतिहास में इस प्रकार का भार वहन करने वाले और भी कई हुए हैं। परशुराम को फरसा और फावड़ा चलाने में समान कौशल दिखाना पड़ा था। उन्होंने अनाचार को निरस्त करने की तरह ही खन्दकों को समतल बनाने और मरुक्षेत्रों में उद्यान लगाने में समान अभिरुचि और तत्परता दिखाई थी। द्रोणाचार्य की पीठ पर शस्त्र और छाती पर शास्त्र लदे रहे। उन्होंने सदाशयता को सींचने और दुष्टता को निरस्त करने के अनमेल प्रयासों की संगति बिठाई समन्वित नीति अपनाई थी। अखण्ड-ज्योति का प्रज्ञा परिवार प्रायः उसी मार्ग पर चलता और उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक जा पहुँचने के लिए समग्र साहस सँजोये हुए बढ़ता रहा है। प्रयास कितने बन पड़े और कितने सफल हुए इसका लेखा-जोखा रख सकना दूरवर्ती लोगों के लिए कठिन है। मूक साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अतिनिकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है। जो इस स्थिति में हैं वे जानते हैं कि विगत 43 वर्षों में धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित करने और जन मानस को उलटने की दिशा में कितनी उत्साहवर्धक सफलता मिलती चली गई है। यों, जो करने में पड़ा है उसकी तुलना में उपलब्धियों को नगण्य भी कहा जा सकता है।

छावनी बनाने से लेकर सैनिकों की भर्ती और शिक्षा का प्रबन्ध सामान्य समय में, स्थिर शान्ति काल में होना है। लड़ाई छिड़ जाने पर तो एक ही बात ध्यान में रहती है जो साधन मौजूद हैं उन्हीं के सहारे आक्रांता को धकेलने और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए जो संभव हो कर गुजरा जाय। विगत 43 वर्षों से अखण्ड-ज्योति ने कुंती की तरह अपना परिवार सृजा संजोया, पर अब तो समय के आह्वान पर उन सभी को कृष्ण के नेतृत्व में महाभारत की सृजन योजना में निछावर होने के लिए तिलक लगाना और विदा करना ही एक मार्ग है। सामान्य समय और आपत्ति काल का अंतर तो समाधान ही होता है। एक मैं सामान्य निर्धारण चलता रहता है, पर दूसरे अवसर पर अन्यत्र से सामर्थ्य समेट कर एक ही केंद्र पर नियोजित करनी होती है। आग बुझाने और दुर्घटना से निपटने को प्राथमिकता देनी होती है भले ही उस कारण नियमित क्रिया-कलापों में व्यतिरेक ही उत्पन्न क्यों न होता हो।

युग सन्धि के प्रस्तुत बीस वर्ष ऐसे हैं जिन्हें अभूतपूर्व- अनुपम एवं अद्भुत अप्रत्याशित कहा जा सकता है। इतिहास के खण्ड विनाश और खण्ड सृजन के घटनाक्रमों का ही उल्लेख मिलता है। समूची मनुष्य जाति के लिए एक ही समय जीवन-मरण का असमंजस उत्पन्न हुआ हो, ऐसा अवसर अब से पूर्व कभी भी नहीं आया। इतनी विकट समस्याएं और इतनी विघातक विभीषिकाएं एक साथ मनुष्य समुदाय के सम्मुख चुनौती बन कर एक साथ आई हों, ऐसा भूतकाल खोजने पर भी नहीं मिलता।

प्रभात काल की उदीयमान किरणें सर्वप्रथम पर्वतों के उच्च शिखर पर चमकती हैं। धरती पर तो वे बाद में उतरती हैं। सृष्टा की संतुलन योजना में व्यापक अनौचित्य को निरस्त करने और सत्प्रवृत्तियों को सींचने के उभयपक्षीय उपक्रम समान रूप से सम्मिलित हैं। प्रेरणाओं का परिवहन मनीषा करती रही है। ‘उमंगें पुरुषार्थ बनकर सामने आती हैं। व्यापक परिवर्तन की भूमिका निभाने में महामानवों को ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना होता है। इसी आदर्शवादी साहसिकता के कारण वे स्वयं धन्य बनते और अन्य असंख्यों को उबारने का श्रेय पाते हैं।’

सौभाग्यवान वे हैं जो इस श्रेय प्रतियोगिता में घुड़-दौड़ लगाते और बाजी जीतकर विजय श्री का वरण करते हैं। श्रेयाधिकारी बनने के लिए सर्वोत्तम अवसर युग सन्धियों का ही होता है। उसे पहचानने वाले और हाथ से न जाने देने वाले ही स्वनाम धन्य बने हैं। हनुमान, अंगद, नल-नील बनने का सौभाग्य हर सदाशयी सेवा भावी को नहीं मिल सकता है। अर्जुन और भीम से भी अधिक कुशल बलिष्ठ समय-समय पर होते रहे हैं, पर उपयुक्त समय पर उपयुक्त भूमिका निभाकर वे जिस प्रकार धन्य बने वैसा सौभाग्य अन्यान्यों को कहां मिल सका? धनिकों में अशोक, हर्षवर्धन, मांधाता, भामाशाह जितने सम्पन्न कभी कहीं न हुए हों ऐसी बात नहीं है। इन महान मानवों की गरिमा इतिहास के स्वर्णाक्षरों में इसलिए अंकित है कि उनने समय को पहचाना और उपयुक्त समय पर उपयुक्त कदम उठाने का साहस जुटाया। यों जराजीर्ण होने पर जीवित रहने अथवा मरने पर आंख मूंदते ही लाख करोड़ की संपदा उत्तराधिकारी दर्प पूर्वक हड़प लेने और उस उपलब्धि को अधिकार जताते हुए मूंछें ऐंठते हैं।

समय आलस प्रमाद में और वैभव दर्प विलास में गंवाने वालों की कमी नहीं। पर वे दूरदर्शी विरले ही होते हैं, जो निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकता जुटाने में थोड़ी-सी सामर्थ्य खर्च करने के उपरांत अपना पुरुषार्थ सत्प्रयोजनों में नियोजित करके अपना एवं असंख्यों का चिरस्थायी हित साधन करते हैं। दुर्व्यसनों और विग्रहों में- ललकों और तृष्णाओं में सामान्य जनों की जीवन-संपदा गलती-जलती रहती है। इस अपव्यय की फुलझड़ी जलाने में कई कौतूहल बनाते और बाल-विनोद जैसा मोड़ मनाते देखे जाते हैं, पर उन असामान्यों की संख्या नगण्य जितनी होती है। जो सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का महत्व समझते और उसका उपयोग महान प्रयोजनों में करने की दूरदर्शिता अपनाते हैं। ऐसे ही थोड़े लोग उस ऐतिहासिक अवसर को समझने और पकड़ने में समर्थ होते हैं जिसमें दैवी आह्वान उतरते और सम्पर्क में आने वालों के लिए अलभ्य वरदान जैसे सिद्ध होते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों की सौभाग्य भरी दूरदर्शिता देर-सबेर में कोटि-कोटि कंठों द्वारा इसलिए सराही जायेगी कि उनने अंधेरे में दीपक जलाने जैसा साहस दिखाकर अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता का परिचय दिया। साहस के धनी अनेकों होते हैं। उद्दण्ड आतंकवादी, दस्यु आततायी आये दिन दुस्साहस बरतते और दुष्टता करते देखे जाते हैं। यों इसे भी साहसिकता ही कहा जायेगा। लुटेरे और हत्यारे इसी स्तर के होते और दैत्य दानव कहलाते हैं। इन पर लोक-भर्त्सना और आत्म-प्रताड़ना ही बरसती है। समाज और शासन का दंड पाते और ईश्वरीय कोप का नरक सहते हैं। तात्कालिक सफलताएं जो उनके पल्ले पड़ती हैं, नरक जैसी घिनौनी और जहर जैसी विषैली सिद्ध होती हैं। ऐसे लाभ कुछ ही समय में नस-नस को बेधने वाले अभिशाप बनकर सामने आते हैं।

यहां चर्चा उस साहसिकता की हो रही है जो लोक-प्रवाह से अलग हटकर अपना रास्ता बनाती है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया-कलाप अपनाते की बात सामान्यजनों से नहीं बन पड़ती वे प्रचलन के प्रवाह में ही बहते रहते हैं और अधिकांश लोगों के अधिकांश जीवनक्रम में व्यवहृत होने वाले ढर्रे को अपनाने के अतिरिक्त और कुछ सोचते करते बन ही नहीं पड़ती। सच्चे अर्थों में शूरवीर वे हैं जिनने मानवी गरिमा को समझा और तदनुरूप स्वतंत्र चिंतन और स्वतंत्र कर्तृत्व अपना कर महामानवों जैसी वरिष्ठता का मार्ग अपनाया। ऐसे ही लोग प्रकाश स्तंभ ही तरह उफनते समुद्र में भी अपना सिर उठायें- अस्तित्व बनाये रहते हैं। उधर से निकलने वाले जलयानों में डूबने से बचा सकने वाला मार्ग-दर्शन कर सकना इन्हीं के भाग्य मे बदा होता है। मानवता ऐसे ही नर-रत्नों को जन्म देकर कृत-कृत्य होती है।

अखण्ड-ज्योति ने ऐसे ही मणि-मुक्तकों को जहां-तहां से ढूंढ़ा और हीरक हार की तरह उन्हें कलात्मक ढंग से गूंथ कर युग देवता की सौंदर्य सज्जा को बढ़ाया है। दूसरे शब्दों में उसे ऐसी पुष्प वाटिका की उपमा भी दी जा सकती है जिसमें एक से एक सुंदर सुरभित फूलों को खिलते-महकते देखकर दर्शकों का मन हुलसता है। इस खिली पीढ़ी का विशिष्ट सौभाग्य यही है कि उनका उपयोग वैश्या गृहों में नहीं देवमंदिरों में ही होता चला जा रहा है। आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से सामान्य होते हुए भी दृष्टिकोण, चरित्र एवं सृजन अभियान में योगदान की दृष्टि से अपने को असामान्य स्तर का सिद्ध किया है। इस प्रतिपादन मूल्यांकन की प्रामाणिकता यह है कि उस छोटे से समुदाय के प्रयास पराक्रम से युग निर्माण योजना बनी-बढ़ी और इस स्थिति तक पहुंची कि उसे असंतुलन को संतुलन में बदल सकने में समर्थ माना और विश्व मानव के भाग्य निर्धारण में उसका योगदान अद्भुत समझा जा रहा है। पिछले 43 वर्षों की दृढ़ता, गतिशीलता और सफलता को देखते हुए यह आशा बंध चली है कि प्रस्तुत विभीषिकाओं से जूझने और उज्ज्वल संभावना मूर्तिमान करने में उसकी सुनिश्चित भूमिका होगी।

युग सन्धि की बेला में प्रज्ञा अभियान को गतिशील करने के लिए उनके केन्द्र संस्थानों की स्थापना का उपक्रम पिछले वर्ष उत्साहपूर्वक चला है। छोटी बड़ी स्थापनाएं 2400 के लगभग बन पड़ी हैं। ऊपर से देखने में यह मझोले देवालय समझे जा सकते हैं, पर वस्तुतः इन्हें जन जागृति का केंद्र माना जाना चाहिए। देव प्रतिमा की स्थापना एवं पूजा परिचर्या का क्रम अन्य देवालयों जैसा होते हुए भी उनकी विशेषता यह है कि सृजन और सुधार की दस सूत्री योजना बना कर यह सभी संस्थान अपने-अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में निरंतर कार्यरत रहेंगे।

इन सभी संस्थानों में न्यूनतम दो कार्यकर्ता रहेंगे, एक स्थानीय प्रवृत्तियां चलाने के लिए दूसरा समीपवर्ती सात गांवों के कार्यक्षेत्र में घर-घर अलख जगाने- युग साहित्य पढ़ाने- युग चेतना पहुंचाने तथा जन्म दिवसोत्सव के माध्यम से परिवार संस्था में नव सृजन का वातावरण बनाने वाले आयोजन करते रहने के लिए। कार्यकर्ताओं का निर्वाह महिलाओं द्वारा स्थापित धर्म घटों के मुट्ठी फण्ड से तथा दस सूत्री कार्यक्रम चलाने के लिए पुरुषों द्वारा दस पैसा नित्य वाले ज्ञान घटों की राशि से चलते रहेंगे। बूंद-बूंद से घड़ा भरने वाली उक्ति के अनुसार जनमानस में युगान्तरीय चेतना के लिए श्रद्धा समर्थन उत्पन्न कर लेने के उपरांत प्रज्ञा संस्थानों की अर्थ-व्यवस्था को सुसंतुलित बने रहने के लिए आवश्यक किंतु बनने में कठिन देखते हुए भी क्रम सरल से सरलतम बनता चला जायेगा। जो कार्य धन कुबेर भी नहीं कर सकते, जिस भार को उठा सकना किसी सुसम्पन्न सरकार के लिए भी संभव नहीं हो सकता वे जन सहयोग के सहारे अनायास ही पूरे होते चले जायेंगे।

सभी प्रज्ञा संस्थानों में शिक्षा संवर्धन की, दो-दो घंटे की तीन कक्षाएं नियमित रूप से चलेंगी एक प्रौढ़ों के लिए- दूसरी महिलाओं के लिए- तीसरी बालकों के लिए। सायं काल स्वास्थ्य शिक्षण एवं खेलकूद, आसन, प्राणायाम। रात्रि में नव-सृजन का वातावरण बनाने वाली पौराणिक ऐतिहासिक कथा-गाथाएं। आरंभिक दिनों में यही कार्यक्रम सभी छोटे बड़े प्रज्ञा संस्थानों का है। जैसे ही उन्हें अधिक जन समर्थन और प्रत्यक्ष सहयोग मिलने लगेगा वैसे ही उन दस सूत्री कार्यक्रमों को स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप गतिशील किया जाता रहेगा। युग सन्धि के दूसरे वर्ष में जिन दस गतिविधियों को अग्रगामी बनाया जाना है उनमें से पांच सृजनात्मक हैं। पांच सुधारात्मक सृजनात्मकों में हैं- (1) शिक्षा विस्तार (2) स्वास्थ्य संवर्धन (3) स्वच्छता श्रमदान (4) गृह उद्योग (5) हरितमा विस्तार।

सुधारात्मकों में हैं- (1) नशा निवारण (2) शादियों में होने वाले अपव्यय का प्रतिरोध (3) हरामखोरी, कमजोरी का तिरष्कार (4) फिजूल खर्ची फैशन की रोकथाम (5) अवांछनियताओं का उन्मूलन।

लोक सेवियों की संख्या, साधनों की मात्रा परिस्थितियों की अनुकूलता के आधार पर कार्यक्रम भी बढ़ते जायेंगे। अभी दस हैं। अगले दिनों 20 होंगे। फिर वे क्रमशः 30, 40, 50, 60 होते हुए शत सूत्री योजना तक पहुंचेंगे और हर स्तर का व्यक्ति हर स्थिति में रहते हुए भी यह अनुभव करेगा कि वह इसे शत सूत्री योजना के कार्यक्रम में कुछ न कुछ योगदान दे सकता है। जन-जन को सृजन प्रयोजनों में लगाने से ही सुविस्तृत धरातल पर फैले हुए अनाचार अज्ञान से जूझना और सद्भाव सत्प्रयास को व्यवहार में उतारना संभव हो सकेगा।

युग सन्धि का प्रथम वर्ष बीजारोपण वर्ष था। उसमें प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना को बीज माना गया और उन स्थापनाओं पर जोर दिया गया। जहां इमारतें नहीं बन सकती थी वहां निजी घरों का एक कमरा प्राप्त करके उसी में प्रज्ञा मंदिर बनाने की योजना चलाई गई है। उसे सर्वत्र अत्यन्त उत्साहपूर्वक अपनाया गया है। प्रज्ञा पीठें प्रायः दो वर्ष 2400 बनी, पर यह प्रज्ञा मंदिर अगले तीन महीनों में ही प्रायः उतनी ही संख्या में और भी बनने जा रहे हैं। कुछ ही महीने की स्वल्प अवधि में इन पांच हजार निर्माणों को देखते हुए यह आशा बंधती है कि देश के 7 लाख गांवों के लिए हर सात गांव पीछे एक प्रज्ञा संस्थान का बनना और उनकी संख्या का एक लाख तक जा पहुंचना असंभव नहीं है- समय साध्य एवं श्रम साध्य भले ही हो।

युग सन्धि का दूसरा वर्ष ‘‘परिपोषण वर्ष’’ है। जो गत वर्ष बोया गया है वह अब अंकुरित हो चला। उसे सींचने की आवश्यकता पड़ रही है। गर्भस्थ बालक भ्रूण स्थिति में चुपचाप बैठा रहता है, पर प्रसव के उपरांत बाहर आते ही उसके लिए दूध, कपड़ा गरम पानी, सफाई सुरक्षा आदि के अनेकानेक साधक जुटाने पड़ते हैं। बीजारोपण वर्ष की स्थापनाएं अब अपना परिपोषण चाहती है अन्यथा सरकारी वृक्षारोपणों की तरह अपेक्षा के गर्त में गिर कर यह स्थापनाएं भी निष्क्रिय एवं उपहासास्पद बनती चली जायेंगी। जिन स्वप्नों को साकार करने के लिए इन प्रज्ञा केंद्रों की स्थापना की गई है उन्हें फूलता फलता बनाने के लिए मात्र खाद, पानी जैसे साधनों की ही नहीं कुशल किसानों और मालियों की भी जरूरत पड़ेगी। स्मरण रखने योग्य है कि पेड़-पौधों से लेकर- पालतू पशु-पक्षियों, बालकों, परिजनों को ही नहीं सत्प्रवृत्तियों को सींचने के लिए भी अभीष्ट साधनों के अतिरिक्त संयोजकों के समय मनोयोग एवं श्रम सीकरों की भी आवश्यकता पड़ती है। वस्तुतः सिंचाई का वास्तविक स्वरूप वही है। परिपोषण के लिए खाद, पानी से ही काम नहीं चलता। साधनों की तरह संरक्षकों को अपन समय सहयोग भी देना पड़ता है।

अखण्ड-ज्योति परिजनों ने सदा से प्रज्ञा परिजन की भूमिका निभाई है और नव सृजन के लिए नियमित रूप से योगदान दिया है। अब बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए उसमें अधिकाधिक अभिवृद्धि की आवश्यकता है। युग सन्धि पर्व का जागृत आत्माओं को विशेष रूप से यह आह्वान आमंत्रण है कि वे निर्वाह और परिवार के दो उत्तरदायित्वों में एक तीसरा ‘‘नव निर्माण’’ और सम्मिलित करें। नई संतान बढ़ने पर साधनों के विभाजनों में उस नये सदस्य का हक भी सम्मिलित कर लिया जाता है। जो है उसी में से मिल बांटकर नये सदस्य को भी हिस्सा दिया जाता है। जागृत आत्माओं को यही करना होगा। यदा-कदा दान पुण्य कर देने से काम नहीं चलेगा। समय और साधनों की संपदा को अब तीन हिस्सों में विभाजित करने- तीन मदों में बांटने की बात सोचनी चाहिए।

सृजन प्रयोजन के लिए असंख्यों, नये काम आगे आ रहे हैं। उनमें से प्रत्येक का विस्तार हो रहा है। इस बढ़ोतरी की एक ही मांग है- ‘युग शिल्पियों का अधिक अनुदान।’ इसकी पूर्ति प्रज्ञा परिजनों को स्वयं की करनी होगी। जनता से चंदा मांगने और समर्थकों से सहयोग अर्जित करने का औचित्य है। पर यह ध्यान में रखने योग्य है कि अपना उदाहरण प्रस्तुत करने से ही जन-साधारण में उदार सेवा साधना के लिए उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है। स्वयं पीछे रहा जाय और दूसरों से लंबी-चौड़ी आशा लगाई जाय तो उसमें सफलता कदाचित ही कभी- छोटी-सी मात्रा में मिल पाती है। आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न करने कि लिए तो श्रेय साधकों को स्वयं ही आगे बढ़ना होता है और अपना उदाहरण प्रस्तुत करके उन्हें भी सहयोग देने के लिए सहमत किया जाता है।

आठ घंटा उपार्जन के लिए- सात घंटा सोने- सुस्ताने के लिए- पांच घंटा नित्य कर्म और परिवार के लिए इस प्रकार बीस घंटे में उपार्जन एवं कुटुंब के उत्तरदायित्व भली प्रकार निभ सकते हैं। शेष चार घंटे युग संधि के बीस वर्षों में सृजन संवर्धन के लिए लगने चाहिए। इसी प्रकार घर के सदस्यों में एक ‘प्रज्ञा अभियान’ को सम्मिलित करके उसके हिस्से के साधन नव सृजन के लिए नियोजित होने चाहिए। उतना न बन पड़े तो महीने में एक दिन की आजीविका इस निमित्त लगाकर शेष से अर्थ संतुलन बिठाना चाहिए। जिन लोगों के पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके, वे वानप्रस्थ की धर्म परंपरा अपनायें। जिनके पास गुजारे के लिए मौजूद है वे दस दिनों अधिक कमाने की बात सोचने की अपेक्षा अर्जित से काम चलाने और अपना समय, समय की मांग पूरी करने में लगायें। जिनके छोटे गृहस्थ हैं और परिवार के अन्य सदस्य कुछ कमा सकते हैं उनके लिए उचित यही है कि जो कमी पड़ती हो उसे सृजन योजना से लेकर अपनी समर्थता का उपयोग उस पुण्य-प्रयोजन में लगने दें, जिस पर विनाश को निरस्त करने और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने की आशा केंद्रित हो रही है। युग धर्म का निर्वाह करने के लिए जागृत आत्माओं को यह कदम उठाने ही चाहिए, उठाने ही पड़ेंगे।


VigyapanSuchana

युग सन्धि पर्व पर प्रज्ञा परिजनों का क्या सोचना और क्या जानना-मानना चाहिए। इसका प्रतिपादन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। अब समय के प्रगति क्रम ने प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ नये कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपे हैं। उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण’ का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का, दोनों को परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय। उसे मंगाने, पढ़ने और पढ़ाने में उतना ही उत्साह अपनाया जाय जितना कि अब तक अखण्ड-ज्योति के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ‘पाक्षिक युग निर्माण’ गायत्री तपोभूमि मथुरा से निकलता है और उसका चंदा आठ रुपया वार्षिक है। जो परिजन उसके सदस्य न हों नये वर्ष जनवरी से ही उसे मंगाने लगें।


धर्म तंत्र की गरिमा

(मंगल विजय)


धर्म तंत्र की गरिमा (kavita)

धर्म तंत्र के स्वस्थ को सबल बनाओ रे! जन मानस को आडंबर में मत भटकाओ रे॥1॥

इसी राजपथ पर अतीत ने वह वैभव पाया। जिस वैभव से ‘‘जगत गुरु’’ यह भारत कहलाया॥ उस वैभव को स्वार्थ सिद्धि में नहीं गंवाओ रे! धर्म तंत्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे॥2॥

स्वार्थ सिद्धि की पगडंडी मत जोड़ो जनपथ से। मत बांधों भ्रम के पत्थर जन मंगल के रथ से॥ धर्म तंत्र की गति के पहिये मत अटकाओ रे! जन मानस को आडंबर में मत भटकाओ रे॥3॥

मुक्ति मिली है जन मानस को धर्म तंत्र से ही। मानवता उभरी संकट से इसी मंत्र से ही॥ धर्म धार कर सदाचार का पाठ पढ़ाओ रे! धर्म तंत्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे॥4॥

विकृतियों से, दुष्कृतियों से सबको मुक्ति मिले। जन मानस का तम हरने को ज्ञान-प्रदीप जले॥ धर्म तंत्र की गरिमा जग को फिर समझाओ रे! जन मानस को आडंबर में मत भटकाओ रे॥5॥

वसुधा है कुटुंब, मानव सब भाई-भाई हैं। इसके सुख-दुःख के समान सब उत्तरदायी हैं॥ मानव की वसुधा पर सब मिल स्वर्ग बसाओ रे! धर्म तंत्र के स्वस्थ-रूप को संबल बनाओ रे॥6॥

शील, सत्य, सौजन्य, स्नेह का सबही पाठ पढ़ें। समता, प्रगति, समृद्धि, शांति के पथ पर सभी बढ़ें॥ धर्म-ध्वजा को जीवन में, जग में, फहराओ रे! जन मानस को आडंबर में मत भटकाओ रे॥7॥

*समाप्त*