“जितनी विराट् सृष्टि है मानवीय अस्तित्व उतना ही निराट् नगण्य, तो भी उसके जीवनयापन के सभी साधनों का पहले से पहले संचयन”-जब इस तथ्य पर विचार करने लगता हूँ तो लगता है सृष्टि का आविर्भाव करुणा से हुआ है। करुणा अर्थात् किसी निरीह के लिये, व्यक्ति के लिये अंतःस्फूर्त भावोद्रेक, उसकी पीड़ा में सहयोगी बनने की भावना। यह प्रक्रिया वृक्ष, वनस्पति, जीव-जन्तुओं से लेकर सृष्टि के कण-कण में विद्यमान देखी जा सकती है।
दूसरी बार जब मैं किसी भटके को रास्ता दिखलाता हूँ, किसी पीड़ित के घावों पर मरहम लगता हूँ, अपनी सहायता से किसी को ऊपर और ऊपर उठता हुआ देखता हूँ तो हृदय से एक पुलक भरी सम्वेदना फूटती है और गले को रौंध देती है। उस समय यद्यपि आँखों में अश्रु उतर आते हैं, पर उस क्षण भर के बोध में सारे जीवन भर का आनन्द और शान्ति अवतरित हो उठे लगते हैं।
अनुभव करता हूँ कि भावनाओं की इस तरंग का विराट् की करुणा से कही न कहीं कोई सम्बन्ध है। इसी में हम परमात्मा को करुणा के रूप में उपासते हैं। अपने निरीह प्राणियों पर करुणा की दृष्टि रखकर ही उस करुणाकर का बोध हो पाया है और अब तो इसीलिये इसे पाने की अपेक्षा प्राणियों में करुणा खोजता-फिरता हूँ। वह जहाँ, भी जितनी देर के लिये उपलब्ध हो, ऐसा लगता है उतनी देर हम परमात्मा की गोद में रह आये।
-कान्ट
गायत्री तीर्थ का शुभारम्भ इसी वर्ष 29 सितंबर-अश्विन नवरात्रि के प्रथम दिन से हो रहा है। अभी एक-एक मास के और दस-दस दिन के दुहरे सत्र चलते रहने की व्यवस्था बनाई गयी है।
हर पहली तारीख से तीस तक मासिक साधना और एक से दस तक, ग्यारह से बीस तक और इक्कीस से तीस तक दस-दस दिवसीय साधना का समय निर्धारित रहेगा।
अपवाद केवल इसी बार है। अश्विन नवरात्रि 29 सितम्बर से आरम्भ होने के कारण, इस अवसर पर एक मास वाले तथा दस दिन वाले दोनों ही सत्र दो दिन पूर्व आरम्भ किये जा रहे हैं। जिन्हें आना हो आवेदन-पत्र पूर्व भेजकर पूर्व स्वीकृति प्राप्त करलें।
पुन्नाग अपराध का पर्याय बन चुका था। अश्रुतवन की शिलायें, वृक्ष, निर्झर और वनचर अब उसकी क्रूरता के साक्षी थे। उस पथ में भटका हुआ कोई भी यात्री सुरक्षित अपने घर पहुँचा हो, ऐसा आज तक किसी ने सुना नहीं था। बहुतेरे प्रयत्न करके भी राजदण्ड उसकी छाया तक के दर्शन नहीं कर पाया। प्राणियों को पीड़ित देखना ही मानो पुनन्नाग का इष्ट था। निरीहों का क्रन्दन, करुणा भरी पुकारें हृदय तो क्या उसके मन तक में प्रवेश नहीं पा सकी थीं। ऐसा लगता था विधाता ने उसकी रचना ही अपराध के लिये की हो।
किन्तु पुन्नाग जब अपनी पुत्री को देखता, न जाने क्यों उसका अपराध सिमट कर उसके मन में प्रवेश करने लगता। अपने पिता को समीप पाकर विपाशा की बांहें खिल जातीं, हृदय उल्लास से भर जाता। विपासा प्रश्न करती-तात! आपे मेरे लिये इतनी सम्पत्ति, वस्त्र, आभूषण कहाँ से लाते हैं। तो यह प्रश्न पुन्नाग के हृदय को झकझोर जाता। वह बात को ऐसे टाल जाता मानो पुत्री का अधिकारी भौतिक सम्पत्ति ही हो, भावनायें नहीं। और मातृ विहीन विपाशा सदैव अपने पिता के स्नेह के लिये ही तड़पती रहती। धीरे-धीरे उसे अपने पिता के कृत्यों का भी पता चल गया।
उस दिन विपाशा अकेली थी। मृग-शिशु मयंक उसे दिखाई नहीं दिया। खोजती हुई वह उपवन में पहुँची। मयंक ने छलाँग लगाते समय अपनी अगली टांग तोड़ ली थी। वह चल नहीं पा रहा था। दूसरा पैर उठाता तो शरीर का भार टूटी अस्थि पर पड़ता। मयंक दर्द से छटपटा उठता। विपाशा ने पहली बार पीड़ा देखी थी, उसे मालूम हो गया था कि उसके जन्मदाता अब तक सहस्रों आत्माओं को कैसी पीड़ा के गहन गह्वर में झोंक चुके हैं। मृग शिशु की पीड़ा में उसने अपना जन्म-जन्मान्तरों का प्रतिबिम्ब देखा। पैर की हड्डी टूटने से क्या होता है यह जानने के लिये नन्हीं विपाशा ने प्रस्तर खण्ड लिया और अपने पैर पर प्रहार किया। हड्डी टूटते ही विपाशा पीड़ा से छटपटाने लगी।
दर्शन के निष्णात की तरह विपाशा का ध्यान पुनः मृग शिशु पर गया। अब मयंक की पीड़ा का उसे आत्मीय बोध हो रहा था। आंखें तो अविरल बरसती जा रही थीं, पर ऐसी विश्रान्ति उसे सम्भवतः अपने पिता के स्नेह से भी न मिलती। मयंक ने यह सब देखा तो उस मानवेत्तर प्राणी की करुणा छलक उठी। बहुत देर तक विपाशा उसे पैर में अपना उत्तरीय बाँधती रही और मयंक उसे चाटता ही रहा-चाटता ही रहा। इसी स्थिति में कब शाम हो गई, कब दोनों बालक निद्रा की गोद में चले गये कुछ पता नहीं चला।
आज पुन्नाग अपनी पुत्री से मिलने आया है, पर सदैव की तरह उसके द्वार बन्द नहीं, खुले थे। पहले उसके पद्चाप सुनते ही विपाशा दौड़ी आती थी, पर आज पुन्नाग का मन दौड़ रहा था, पर विपाशा नहीं थी। पुन्नाग ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, विपाशा कहीं भी तो नहीं थी। वह उपवन की ओर भागा जहाँ उसने प्रकृति के दो जीवों को धरती माँ की गोद में एक साथ दुःख भरी विश्रांति में देखा। पुन्नाग ने पुकारा विपाशे! “तात” कहकर जैसे ही विपाश स्नेह वश उठी कि वहीं धराशायी हो गई। व्यथा से उसका सारा शरीर काँप उठा।
पुन्नाग का हृदय विदीर्ण हो उठा। उसे चीत्कार की विपाशे! तुम्हें यह क्या हुआ? विपाशा ने क्षीण स्वर में उत्तर दिया- “तात! मैं देखना चाहती थी कि जीवों को किस तरह की पीड़ा होती है, सुना है आप भी तो ऐसे ही लोगों को कष्ट दिया करते हैं- ‘‘इतना कहते-कहते विपाशा मूर्छित हो गई। मानवीय सम्वेदना कितनी मार्मिक होती है यह पुन्नाग को आज पता चला।
पुन्नाग का मर्म मचल उठा, उसने उस दिन से हिंसा न करने की सौगन्ध खाई। यही नहीं उसने शेष जीवन पीड़ित मानवेत्तर जीवों का उपचार करने में लगा दिया।
जड़ और चेतन के बीच अन्तर है कि क्षुद्रतम चेतन जीव भी स्वतंत्र रूप से सोच-विचार सकता है, निर्णय ले सकता है। जबकि जड़-शक्ति संपन्न होते हुए भी स्वतंत्र विचार करने में सर्वथा असमर्थ है। विशालकाय इंजन, हवाई जहाज और कम्प्यूटर तक मनुष्य द्वारा संचालित होते हैं। यन्त्र के कार्य प्राणियों की भाँति कभी नहीं हो सकते। जीवित प्राणियों में स्वाधीनता है, बुद्धि है- जबकि जड़ में इसका अभाव है। जड़ नियमों में आबद्ध है। चेतनबद्ध नहीं है। जिस स्वाधीनता के कारण जीव यन्त्र से भिन्न है उसी पूर्णभाव से पाने के लिए सारी चेष्टाएं चल रही हैं। प्राणी जगत की सम्पूर्ण क्रियाओं का एकमात्र लक्ष्य है-अधिकाधिक स्वतंत्र होना। इसी को आध्यात्मिक भाषा में ‘मुक्ति’ के लिए प्रयत्न कहा गया है।
पूर्णता की प्राप्ति अथवा ‘मुक्ति’ को जीवन लक्ष्य माना है। संसार भर में प्रचलित साधना उपक्रमों का एकमात्र लक्ष्य यही है। जीवन के सभी व्यापार जाने-अनजाने इसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। पराधीनता मानवी प्रकृति के विरुद्ध है। उसे तोड़ने के लिए मनुष्य हर संभव प्रयास करता है। बड़ी-बड़ी राजनैतिक क्रांतियां परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के हुई हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति का भाव इस बात का प्रमाण है कि मानवी अन्तराल में कोई ऐसी वस्तु है, जो बंधनों से निकलने के लिए व्याकुल है। अन्दर बैठी आत्मा ही मुक्त होने का भाव संप्रेषित करती रहती है। बाह्य जगत ये मुड़कर जब अंतःक्षेत्र में जड़ जमाकर बैठी हुई पशु प्रवृत्तियों के बन्धनों को तोड़ने का प्रयास किया जाता है तो यह प्रयास ही मुक्ति का आधार बनता है।
मुक्त होने का भाव मनुष्य में बीज रूप में विद्यमान है। उसकी पूर्ण उपलब्धि के बिना शान्ति एवं सन्तोष मिल सकना सम्भव नहीं। जन्म लेते ही नवजात शिशु रूदन आरम्भ करता है। साँसारिक बंधनों के प्रति जीवात्मा का प्रत्यक्ष विरोधी शिशु के रोने के रूप में प्रकट होता है। बचपन में पारिवारिक एवं सामाजिक बन्धनों का अंकुश उसे अच्छा नहीं लगता। युवावस्था में वह अपने को अधिक मुक्त अनुभव करता है। किन्तु स्थूल बन्धनों के ढीला होने पर भी आन्तरिक लोभ-मोह के बन्धन उसे व्यग्र बनाये रहते हैं। उनसे छुटकारा पाने के लिए अंतःप्रेरणाएं उभरती हैं। किन्तु स्वतन्त्रता के इस अंतःभाव का अभिप्राय वह वस्तुओं का स्वतन्त्र उपयोग करने में समझता है। यही भारी वैचारिक भूल होती है। वस्तुओं के स्वतन्त्र उपभोग तो मनुष्य को उनमें और भी आबद्ध करता जाता है। आन्तरिक भावों की प्रेरणा दब कर रह जाती है। परतंत्रता और भी अधिक बढ़ती जाती है। यही कारण है कि बाह्य स्वतंत्रता के होते हुए भी अन्तःप्रवृत्तियों की दासता के कारण आज मनुष्य अधिक पराधीन है। साधनों के उपभोग की आज जितनी अधिक छूट मिल रही है मनुष्य उतना ही व्यग्र होता जा रहा है। लोभ-मोह के बंधनों में स्वयं को जकड़ता जा रहा है। स्वतंत्रता का यह उपहासास्पद प्रयास मनुष्य को पराधीनता की ओर ले जा रहा है।
मनुष्य का आन्तरिक स्वभाव ही प्रकृति विद्रोही है। अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वह प्रकृति के नियमों का बन्धन स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि मनुष्य जैसे जैसे वस्तुओं के आकर्षण के आबद्ध होता जाता है, उसकी व्यग्रता उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि अपने अन्दर ऐसा कोई स्वतंत्र पुरुष विद्यमान है जिसे पराधीनता स्वीकार नहीं। जो लोभ-मोह के प्रकृति के बन्धनों से निकलने के लिए छटपटाता रहता है। इस अन्तःभाव को न समझकर सामान्यतया लोग स्थूल जगत में नीति नियमों को तोड़ने को ही स्वतंत्रता समझने की भूल कर बैठते हैं। जबकि यह प्रेरणा आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से निवृत्त होने के लिए होती है।
स्वतंत्र होने के स्थूल प्रयास विभिन्न प्रकार के संघर्षों के रूप में देखे जाते हैं तथा सामाजिक अव्यवस्था के कारण बनते हैं। यह प्रवृत्ति जब आन्तरिक प्रकृति के बन्धनों को तोड़ने के लिए सचेष्ट होती है तो मुक्ति, लक्ष्य प्राप्ति का आधार बनती है। महापुरुषों के उज्ज्वल इतिहास साक्षी हैं कि मुक्त होने के लिए सबने कठोर संघर्ष किये हैं। किन्तु यह संघर्ष बाह्य परिस्थितियों अथवा व्यक्तियों से नहीं, आन्तरिक प्रवृत्तियों से हुए हैं। बाह्य क्रिया-कलाप छुट-पुट संघर्ष भी आन्तरिक वृत्तियों के परिशोधन एवं उन पर विजय प्राप्त करने के निमित्त होते रहे हैं।
भूल यह होती है कि संचित कुसंस्कारों की प्रेरणाओं को अपनाने पर होने वाली हानि को न समझकर प्रकृति के बाह्य नियमों की अवहेलना करने, उसे तोड़ने को ही मुक्ति मान लिया जाता है। इस प्रयास का परिणाम यह होता है कि प्रकृति की जड़ता में मनुष्य और भी अधिक आबद्ध होता जाता है। संसार में चल रहे अधिकाँश स्वतंत्रता के प्रयास लगभग इसी स्तर के हैं। चाहें वह नैतिक हों, सामाजिक हों अथवा राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय।
स्वतंत्र होना सभी चाहते हैं। उसके लिए सही अथवा गलत प्रयास करते हुए सभी देखे जाते हैं। किन्तु यह मुक्ति प्रकृति के भीतर नहीं है। उसके भीतर तो केवल नियम है। जहाँ नियम है- वहाँ बन्धन है। इन स्थूल बन्धनों को बिना उचित अनुचित का विचार किये तोड़ने पर उतारू हो जाना मुक्ति प्रयास नहीं है। मुक्ति का लक्ष्य तो अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने पर ही सम्भव है।
स्थूल जगत में तो यह प्रयास समस्त जड़-चेतन में एक स्वसंचालित प्रक्रिया के रूप में चलता रहता है। पौधा जमीन की गहराई में जाते ही बन्धनों को तोड़ते हुए निकलता है। अंकुरित बीज सीमाबद्ध क्षेत्र में न रहकर अपने को विस्तृत करता है। यह भी मुक्ति का स्थूल प्रयास है। जो उसे विकसित करता तथा फल-फूल से लदे पौधों का स्वरूप प्रदान करता है। जीव-जन्तुओं में शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों में इस प्रकार का प्रयास निरन्तर चलता रहता है।
वासना-तृष्णा, लोभ-मोह की वृत्तियों मुक्त होना ही वास्तविक मुक्ति है। बाह्य प्रकृति के बन्धनों को तोड़ने में सफलता मिल भी जाये तो भी आन्तरिक प्रवृत्तियाँ पुनः उन बन्धनों में आबद्ध कर देगीं। साधना उपचारों का यही लक्ष्य होता है- आन्तरिक परिष्कार एवं प्रवृत्तियों पर नियंत्रण। जप-तप, अनुष्ठान की कठोर साधनाएं इसीलिए की जाती हैं। साधन के विशाल उपक्रम इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए ही बनाये गये हैं। सबका एकमात्र लक्ष्य है- अन्तःप्रकृति पर नियंत्रण।
मुक्ति के इस मूर्त स्वरूप को ही हम ईश्वर कहते हैं। जिसकी प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। उस आकाँक्षा को एक पल भी त्यागा नहीं जा सकता। जहाँ भी जीवन है वहीं मुक्ति का किसी न किसी रूप में प्रयास अनुसंधान चल रहा है। यह मुक्ति ईश्वर स्वरूप है। इसके द्वारा ही प्रकृति पर आधिपत्य प्राप्त किया जा सकता है। बाह्य प्रयत्नों की अपेक्षा आवश्यकता इस बात की है कि अपनी चेष्टाओं को अंतर्मुखी बनाया जाय। वासना-तृष्णा के मानसिक विकारों को दूर दिया जाय। इसके लिए समग्र साधना का अवलम्बन लेना होगा। साधन के द्वारा जैसे-जैसे साधक ईश्वरीय प्रकाश के निकट पहुँचता है, वैसे-वैसे उसके मन के विकास दूर होते जाते हैं। लोभ-मोह की अन्ध-तमिस्रा परमात्मा सत्ता के प्रकाश के आलोक से तिरोहित हो जाती है। उस स्थिति में साँसारिक आकर्षण साधक को प्रभावित नहीं कर पाते। ‘मुक्त पुरुष’ जो अन्तरात्मा में विद्यमान है, ईश्वरीय प्रकाश के अवतरित होते ही अपने स्वतंत्र स्वरूप में प्रकाशित होता है। इस स्थिति को ही ‘मुक्ति’ कहा गया है। जिसे प्राप्त कर और कुछ पाने की कामना नहीं रह जाती। मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति दोनों में शाब्दिक भिन्नता है वस्तुतः ये दोनों एक ही उत्कृष्ट मनोभूमि की परिचायक हैं।
न्यूटन, सेब के एक भाग में बैठे थे। इतने में हवा के झोंके से साथ पेड़ से एक सेब टूटकर नीचे गिरा। मन में यह बात उठी कि कोई वस्तुतः नीचे ही क्यों गिरती है। उत्पन्न जिज्ञासा ने नई दिशा में सोचने को बाध्य किया। फलस्वरूप इस तथ्य का उद्घाटन हुआ कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। ‘जेम्स वाट’ खौलते हुए पानी को देख रहे थे। अचानक एक विचार उनके मस्तिष्क में कौंध गया। पानी से निकलने वाली वाष्प ढक्कन को ऊपर धकेल रही थी। वाष्प में इतनी शक्ति हो सकती है, तो क्या इसका उपयोग अन्य कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता। इन विचारों ने ‘वाट’ को शोध के लिए बाध्य किया। शक्तिशाली भाप का इंजन जेम्सवाट के जिज्ञासा भरे प्रयत्नों की ही परिणति है। जॉन गिटनवर्ग हीरा खरीदने और काटने का व्यवसाय करता था। एक दिन उसने ठप्पों से छपे खेलने वाले ताश के पत्ते देखे जो देखने में भद्दे लगते थे। गिटनवर्ग ने सोचा कि क्या उनकी छपाई सुन्दर एवं अच्छी नहीं हो सकती? हाथ से बनाये गये लकड़ी के ठप्पों से उसने छपाई का कार्य प्रारम्भ किया। उसने सन्त क्रिस्टोफट का चित्र लकड़ी पर खोद कर ठप्पा तैयार किया। उससे तैयार होने वाला चित्र इतना आकर्षक एवं सजीव लगता था जिसे देखकर स्थानीय गिर्जाघर के पादरी ने सन्त जॉन की इतिहास पर हाथ से लिखी पुस्तकें उसे भेंट कीं। गिटनवर्ग ने सन्त जॉन की कथा 60 पृष्ठों में छाप कर तैयार की। जिसमें उसे अत्यधिक श्रम करना पड़ा। गिटनवर्ग द्वारा डाली गई छापेखानों की नींव ने सम्पूर्ण विश्व में छापने की कला का विकास किया। इस आविष्कार को एक शब्द में गिटनवर्ग की जिज्ञासा का ही परिणाम कहा जा सकता है। छापने के आधुनिकतम यन्त्रों के निर्माण में मौलिक प्रेरणा गिटनवर्ग की ही है।
‘लुई डेगुरे’ इंग्लैण्ड का एक चित्रकार था। एक दिन व शीशे के समक्ष खड़ा होकर अपना चेहरा देख रहा था। एकाएक उसके मस्तिष्क में विचार आया कि क्या बिना चित्र के बनाये वस्तुओं का चित्र खींचा जा सकता है? चित्रकारी छोड़कर वह इस दिशा में खोज के लिए जुट पड़ा। आरम्भिक अनेकों कठिनाइयों एवं असफलताओं के पश्चात् वह फोटो चित्रण तकनीक का विकसित करने में सफल हो गया। फोटोग्राफी की नवीनतम विकसित प्रणालियों में भी मौलिक सूझबूझ डेगुरे की ही है।
इंग्लैंड की विलियम फ्रीजग्रीने एक फोटोग्राफर था अपनी स्थिति पर उसे सन्तोष न था। नये आविष्कारों में उसे अभिरुचि थी। आन्तरिक जिज्ञासा ने उसे चल-चित्र की कल्पना दी। चिन्तन और प्रयास कल्पना को साकार रूप देने में लग गये। जिज्ञासा कल्पना तक सीमित नहीं रही वरन् क्रिया में परिणित हुई। चलचित्र का विकास हुआ। ‘फ्रीजग्रीने’ को चलचित्र का आविष्कारक माना जाता है। कालान्तर में चल-चित्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ। अब उसे विज्ञान के विलक्षण चमत्कार के रूप में देखा जाता है।
‘अलेक्जेन्डर ग्राह्म बेल’ पुस्तक के अवलोकन में खोया था। पुस्तक साँकेतिक प्रणाली द्वारा समाचार भेजे जाने पर आधारित थी। ‘ग्राह्म’ के मन में ऐसी संचार व्यवस्था के निर्माण की प्रेरणा उठी जिससे एक स्थान पर बैठा व्यक्ति दूरवर्ती व्यक्तियों से उसी प्रकार बात कर सके जैसे दो व्यक्ति आमने सामने करते हैं। ग्राह्म का चिन्तन एवं क्रिया-कलाप इसी खोजबीन में लगा रहा। अंततः उसे सफलता मिली। स्काटलैण्ड के बोस्टन नगर में पहली टेलीफोन संचार व्यवस्था बनाने में ग्राह्मबेल सफल हुआ। आज समर्पण विश्व में मनुष्य को एक दूसरे के निकट लाने में, संपर्क जोड़ने में यह व्यवस्था कितनी समर्थ सिद्ध हुई है, इस तथ्य से हर कोई भली-भांति परिचित है।
“हेनरी ग्रे” ने अपने शरीर पर ध्यान दिया तो उसे अपना हर अवयव अपने में विशिष्ट जान पड़ा। जिज्ञासा विचारों तक सीमित नहीं रही। सत्य की जानकारी प्राप्त करने वास्तविकता को जानने के लिए ‘ग्रे’ ने अनेकों मृत मानव शरीरों को चीर डाला। प्रत्येक अंग प्रत्यंग का बारीकी से अध्ययन किया। मात्र 32 वर्ष तक जीवित रहने वाले उस युवक ने ‘ह्यूमन एनाटमी’ के रूप में चिकित्सा जगत को जो दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता।
भौतिक आविष्कारों के इतिहासकार दृष्टिपात किया जाय तो एक ही तथ्य हाथ लगता है कि मानवी जिज्ञासा ही महत्वपूर्ण उपलब्धियों की आधार रही है। सृष्टि रहस्यमय है और उसके प्रत्येक घटक अपने में अनेकों विचित्रताऐं छिपाये हुए है। कौतूहल मानवी स्वभाव है और विकास का आधार भी। रहस्यों का उद्घाटन एवं महत्वपूर्ण उपलब्धियां इसी के बलबूते सम्भव हो सकी है। पाषाण युग के आदिम मानव ने जिज्ञासा भरे नेत्रों से प्रकृति को देखा और सतत् प्रयत्नों द्वारा नये-नये आविष्कारों को जन्म दिया। वह प्रगति के सोपानों पर चढ़ते हुए, पिछड़ेपन को कुचलते हुये सभ्यता की वर्तमान स्थिति तक जा पहुँचा है। जानने, समझने और कुछ अर्जित करने की जिज्ञासा न रही होती तो मनुष्य पाषाण युग की नर-वानर स्थिति में ही पड़ा रहता। अकर्मण्य बना पशु तुल्य ही जीवन व्यतीत करता। प्रकृति भण्डार से असीम सम्पदा न तो प्राप्त सकना सम्भव हो पाता, न ही वैज्ञानिक आविष्कारों का सूत्रपात।
कौतूहल पशुओं में भी होता है, पर वह जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं- आहार निद्रा और मैथुन जैसे प्रयोजनों तक ही सीमित रहता है। आविष्कारक बुद्धि उनमें नहीं होती। मनुष्य को इस परिधि में सीमित रहना नहीं रुचता। फलस्वरूप वह प्रकृति के रहस्यात्मक जगत में नित नयी छलाँग लगाने का प्रयास करता रहता है। उस उत्साह, लगन एवं जिज्ञासा की ही परिणति है कि वह पृथ्वी की सीमाओं को लाँघकर अन्तरिक्ष क्षेत्र में जा पहुँचा। उद्देश्य सदा उपलब्धियों को अर्जित करना नहीं रहा वरन् जिज्ञासा की सन्तुष्टि रही है। चन्द्रमा के धरातल पर पहुँचकर धूल एवं चट्टान के टुकड़े प्राप्त कर लेने से कोई विशिष्ट प्रयोजन नहीं हल हुआ। मात्र अन्तःजिज्ञासा को तृप्ति मिली।
जिज्ञासा के रूप में परमात्मा का दिव्य अनुदान प्रत्येक मनुष्य को मिला हुआ है। बच्चा पैदा होते ही प्रत्येक वस्तु को जिज्ञासा भरे नेत्रों से देखता है। अभिभावकों के समक्ष क्या एवं क्यों जैसे प्रश्नों की झड़ी लगा देता है। यही प्रवृत्ति उसके भावी विकास का आधार बनती है। तर्क बुद्धि के अभाव में बच्चों को मूढ़, मूर्ख समझा जाता है। वैज्ञानिकों का चिन्तन नये अनुसन्धानों में निरत रहता है। फलस्वरूप वे अनेकानेक उपलब्धियों से समाज को लाभान्वित करते हैं। मानवी जिज्ञासा की यह भौतिक परिणति हुई, जो एक सीमा तक आवश्यक है, उपयोगी भी। पर जीवनपर्यन्त बनी रहने वाली जिज्ञासा इस बात की परिचायक है कि वह बहिर्जगत की उधेड़-बुन द्वारा मात्र सन्तुष्ट नहीं हो सकती। वह तो सृष्टि के मूलभूत सत्य के साक्षात्कार द्वारा ही शान्त होगी।
जिन्होंने भी शाश्वत सत्य की खोज में अन्तःजिज्ञासा को मोड़ा, अपने जीवन को सार्थक बना लिया। शान्ति एवं सन्तोष का- प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता जैसी उपलब्धियों का लाभ उठाया। उनके जीवन में असंतोष नहीं रहा। अभावों में भी वे सन्तुष्ट रहे तथा समाज को प्रकरण एवं प्रकाश देते रहे। वह चाहे बुद्ध हों अथवा ईसा, विवेकानंद हों या दयानंद, गान्धी हों अथवा सुकरात- सबने ही उस परम सत्ता के-शाश्वत सत्य के दर्शन को लक्ष्य बनाया। उनकी जिज्ञासा वस्तुओं तक सीमित नहीं रही फलस्वरूप वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल रहे स्वयं शान्ति एवं सन्तुष्टि का आनन्द लिया और दूसरों को भी प्राप्त करने के लिये प्रेरित किया।
ईश्वर प्रदत्त जिज्ञासा रूपी दिव्य अनुदान मात्र भौतिक कौतूहलों में उलझा नहीं रहना चाहिए, वरन् जीवन लक्ष्य को समझने एवं प्राप्त करने में नियोजित होना चाहिए। अन्तःजिज्ञासा का समाधान तभी सम्भव है।
विज्ञान को विभिन्न शाखा प्रशाखाएँ गहन अध्ययन से इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँची हैं कि ‘विविधता में एकता’ ही सृष्टि का परम नियम है एवं समष्टि चेतना का ही अलग-अलग अंशों में वितरण सृष्टि के विभिन्न घटकों में हुआ है।
सृष्टा कोई ऐसा अतिमानव नहीं है जो प्रकृति के बाहर वास करता हो अथवा किसी विशिष्ट स्थान स्वर्ग में बैठा निर्देश देता रहता हो। वेदान्त दर्शन का कथन है कि जीव पुरुषार्थ के सिद्धान्त से बंधा है। अपने भाग्य का निर्माता वह आप है। अपना भविष्य वह स्वयं अपने हाथों निर्धारित करता है। ऐसे मत का प्रतिपादन करने वाला व्यक्ति अन्ध-विश्वासों में न बंधकर पुरुषार्थ द्वारा अपने विकास का पथ-प्रशस्त करता है। ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ का निर्माण करने वाला नहीं वरन् आदर्शों की साकार प्रतिमा ही परब्रह्म का स्वरूप है, वह ऐसा मानता है।
जिस परमात्मा की कल्पना आज का अध्यात्म करना चाहता है, वह साकार भी है, निराकार भी है व इन दोनों से परे भी है। यह परमात्मा स्पिनोजा के लिये मूलतत्व (सबस्टेंशिया) हो सकता है, हर्बर्ट स्पेंसर के लिए अज्ञान (अननोएबुल) हो सकता है, प्लोटो के लिये ईश्वर (गाॅड), इमर्सन के लिये पर-आत्मा (ओवर-सोल) तथा काण्ट के लिए “डिज एन सिच” हो सकता है। ऐसा परब्रह्म, सर्वव्यापक, सृष्टा नाम विशेष के बंधन में नहीं बंध सकता। उसकी परिभाषा, उद्बोधन चाहे जो भी हो ईश्वर, परमात्मा, परमपिता, सृष्टा वही रहेगा।
‘अनेकता में एकता’ के अध्यात्म सिद्धान्त का विज्ञान के साथ उसका पूरा तालमेल है। एक ही तत्व को जगत का सार- मूल केन्द्र वह मानता है। उसी में विकास, और विकास की कल्पना उसे ग्राह्य है, पर क्षण विशेष पर सृष्टि रचना उसे एक असंगत तथ्य लगता है। इस सिद्धान्त के आश्रय पर आत्माएं शाश्वत और सनातन जीवाणु हैं। ऐसी जीवाणु जो कारण और कार्य के सिद्धान्तों से परिचालित हैं। आत्मा अनश्वर है, अमर एवं स्वयंभू शक्ति का परिमित स्त्रोत है। जिस मूल केन्द्र बिन्दु से यह आत्मा जुड़ी है वह परमात्म शक्ति बुद्धि तथा पदार्थ दोनों ही रूपों में प्रतिभासित होती रहती है। जिस प्रकार बृहद् अग्नि राशि के सहस्र अग्निकण निकलते रहते हैं, उसी प्रकार परमात्मा से ही आत्मारूपी अग्निकण बहिर्गत हुए हैं। अद्वैत मान्यतानुसार प्रत्येक आत्मा अनंत ब्रह्म स्वरूप है। लाखों जलकणों पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़कर लाखों सूर्य के रूप में प्रतिभासित होता है। उसी प्रकार प्रत्येक आत्मा ब्रह्म के प्रतिबिंब के रूप में विद्यमान है।
भौतिक जगत की संरचना किसी क्षण विशेष में हो सकती है, परन्तु उस परम शक्ति, सार तत्व का कोई आदि नहीं है जो आत्मा के भौतिक स्वरूप को अनुप्राणित करती है। प्रत्येक आत्मा कर्मफल के सिद्धान्त से बंधी है और यही उस परमात्मा, परम सत्ता, ईश्वर का अनुशासन वाला पक्ष है। ईश्वर न पुरस्कृत करने वाला है, न दण्डित करने वाला। वह चेतना का अनन्त स्त्रोत है। कर्म-सिद्धान्त, सद्-असद् परिणामों के व्यापकता के रूप में भी उसकी एक छवि है।
एक स्थान ऐसा है, जहाँ पदार्थ विज्ञानी और अध्यात्मवादी एक ही निष्कर्ष पर जा पहुँचते हैं। आधुनिक विज्ञान कहता है कि जगत का मूल स्त्रोत एक है। वह जड़ और चेतन में समान रूप से विद्यमान है। जड़ में उसे हलचल के रूप में और चेतन में उसे इच्छा एवं बुद्धि के रूप में देखा जा सकता है।
आइन्स्टीन जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भी आत्मसत्ता (चेतना) को व्यापक एवं अविनाशी माना था। इसका प्रमाण एक वार्ता से मिलता है जिसमें उनसे एक मित्र ने उसकी रोगावस्था में पूछा था कि “क्या आपको मृत्यु से भय नहीं लगता? उत्तर में आइन्स्टीन ने कहा- ‘‘मैं समस्त चेतन सृष्टि से इतना अधिक तादात्म्य अनुभव करता हूँ कि उससे अलग अपनी सत्ता का मुझे भास भी नहीं होता। मेरे लिए यह बात अर्थहीन है कि एक व्यक्ति संसार में कब आता है और कब जाता है। आना-जाना तो चेतना की स्थूल एवं सूक्ष्म अभिव्यक्तियां मात्र हैं। चेतना का प्रवाह तो निरन्तर प्रवाहित है ऐसा मैं अनुभव करता हूँ।’’
स्पष्ट है कि आइन्स्टीन मनुष्य के भौतिक जीवन को चेतना से अलग नहीं वरन् उसका ही एक अभिन्न अंग मानते थे। मृत्यु को उन्होंने अन्त के रूप में नहीं वरन् चेतना के नवीनीकरण की एक प्रक्रिया भर माना है। अपनी अभूतपूर्व खोजों के उपरान्त भी आइन्स्टीन संतुष्ट न थे। जीवन के अन्तिम दिनों में वे अत्यधिक व्यस्त देखे गये। व्यस्तता का कारण था- वे समस्त भौतिक शक्तियों के मूल कारणों की खोज में थे। उनका विश्वास था कि चुम्बकीय, गुरुत्वीय नाभिकीय शक्ति का कुछ ठोस आधार होना चाहिए।
भौतिक की शोधों का चरम लक्ष्य है सृष्टि के मूल में रहस्यों का पता लगाना। शोधें सूक्ष्मतर स्तर पर उतर कर अब उस क्षेत्र में जा पहुँची हैं जहाँ से चेतना का क्षेत्र आरम्भ होता है। मूल रहस्यों का उद्घाटन इसीलिए सम्भव नहीं हो पा रहा है कि खोज की प्रक्रिया भौतिक ही बनी हुई है जबकि चेतना का क्षेत्र सर्वथा भिन्न है। उसे जानने समझने के लिए तो चेतना-विज्ञान का ही अवलम्बन लेना होगा। अपने भटकाव का अब भौतिकविद् भी स्वीकार करने लगे हैं।
सृष्टि के मूल रहस्यों को जानने के लिए भौतिक शास्त्री एलिजाबेथ, माइकेल मर्फी, फ्रिटजोफकाप्रा, डेविड फिन्सेल्टाइन ने मिलकर कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में लारेन्स वर्कले प्रयोगशाला की स्थापना की। वर्ष 1974 में इस लक्ष्य को आपूर्ति के लिए चालीस मूर्धन्य भौतिकविदों एवं प्राच्य धर्म दर्शन के विशेषज्ञों का एक संगठन बनाया गया। भौतिक विज्ञान के अब तक शोध निष्कर्षों के अध्ययन के उपरान्त अधिकांश वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि, ‘हमने सृष्टि रहस्यों को जानने में खोज आरम्भ हो की विशुद्ध विज्ञान से, पर आकर भटक गये दर्शन में”। ब्रह्मांडीय चेतना के शोधकर्ता प्रो. मर्फी ने कहा कि एक नये चिन्तन का प्रादुर्भाव हमारी शोध प्रक्रिया से हो रहा है। मान्यता अब अधिक पृष्ठ होती जा रही है कि अन्तरिक्ष ऊर्जा एवं पदार्थ वस्तुतः एक ही तत्व है। उनका उद्गम किसी एक से हुआ है।
प्रो. काप्रा. की नवीन पुस्तक इन दिनों पाश्चात्य जगत में अधिक प्रख्यात एवं लोकप्रिय हुई है। परा-भौतिकी की यह पुस्तक महत्वपूर्ण सृष्टि तथ्यों पर प्रकाश डालती है। “दि ताओ आफ फिजिक्स” नामक इस पुस्तक ने वैज्ञानिक चिंतन को नये आधार दिये हैं, लेखक ने अमेरिका से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध पत्रिका ‘सेटर्डेरिव्यू’ में लिखा है कि ‘प्रकृति के अन्वेषण एवं मूल रहस्यों को जाने के लिए तार्किक बुद्धि ही पर्याप्त नहीं है। अन्त प्रज्ञा (इन्ट्यूशन) का महत्व बुद्धि से कहीं अधिक है। अधिक सूक्ष्मतर अनुभूतियाँ बुद्धि के द्वारा नहीं, अंतःप्रज्ञा द्वारा होती हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र की असफलताओं का कारण स्पष्ट करते हुए प्रो. काप्रा ने कहा कि “अंतःप्रज्ञा की अपेक्षा, विज्ञान की असफलता का कारण रही है।”
विज्ञान का भटकाव दूर होने के दिन अब समीप हैं। सर्वव्यापी चेतना में संव्याप्त इस ब्रह्माण्ड को अगले दिनों उसी परब्रह्म की प्रतिमूर्ति के रूप में समझा जाने लगेगा जैसा कि वेदान्त का “सर्वं खिल्विदं ब्रह्म” के रूप में प्रतिपादन है।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्स कुरु पौरुषमात्म शक्तया यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्रदोषः॥
-सिंह के समान उद्योग करने वाले पुरुष को लक्ष्मी स्वयं प्राप्त होती है। भाग्य से सब कुछ प्राप्त होता है ऐसी बात कायर (अकर्मण्य) पुरुष कहा करते हैं। इसलिये भाग्य, विश्वास का त्याग कर अपनी पूर्ण शक्ति से पुरुषार्थ करना चाहिए। पूर्ण प्रयत्न करने पर भी कार्य सिद्धि न हो तो यह विचारना चाहिये कि हमारे यत्न में क्या दोष (त्रुटि) है और पुनः प्रयत्न करें।
धर्म को प्रतिभागी एवं अन्धविश्वासी कहना आज का फैशन है। तथाकथित बुद्धिवादी प्रगतिशीलता के जोश में धर्म को अफीम की गोली कहते और उसे प्रगति का अवरोध ठहराते पाये जाते हैं। पर यह बचकानी प्रवृत्ति मात्र है। गम्भीर चिन्तन से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मनुष्य के अन्तराल में आदर्शवादी आस्था बनाये रहना और नीति मर्यादा का पालन कराना धर्मधारणा के सहारे ही सम्भव हो सकता है। भौतिक लाभों को प्रधानता देकर चलने और सदाचरण के अनुबंधों को तोड़ देने से उपलब्ध सम्पदाएँ दुष्प्रवृत्तियों को ही बढ़ायेंगी और अन्ततः विनाश का कारण बनेंगी। वैभव पर धर्म का अंकुश रहने से ही शान्ति और व्यवस्था बनाये रह सकना सम्भव होगा।
भूतकाल के और आधुनिक काल के दूरदर्शी दार्शनिक इस सम्बन्ध में एक मत हैं कि धार्मिकता की भावना को नष्ट न होने दिया जाय और उसे जीवन्त रखने से ही व्यक्ति और समाज की सुव्यवस्था बनी रह सकेगी।
मूर्धन्य विचारकों से लेकर सामान्य बुद्धि को भी यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि सदाचरण और नीति नियमन का प्रयोजन मात्र शासकीय नियंत्रण में नहीं हो सकता। उसकी स्थापना अन्तःकरण के अन्तराल में उच्चस्तरीय आस्थाओं के रूप में होनी चाहिए। धर्म का वस्तुतः यही प्रयोजन है। परम्पराएँ तो सामयिक रीति-रिवाज भर हैं। उनमें विकृति आने पर सुधारने की छूट है, पर इतने भर से समूचे धर्म विज्ञान को अनुपयुक्त नहीं ठहराया जा सकता।
कार्ल जुँग का कहना है कि धर्म की सहायता से ही जीवन के अन्धकार को मिटाया जा सकता है। विकास का वास्तविक लक्ष्य धर्म धारणा से ही सम्भव हो सकता है।
प्रसिद्ध मनोचिकित्सा डा. क्लोसनर ने अपने रोगियों का धर्माचरण की प्रेरणा दी। अनेकों प्रयोगों के उपरान्त घोषणा की कि ‘‘धर्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि से शरीर एवं मन को स्वस्थ बनाने का सशक्त माध्यम है। संयम नीति-मर्यादाओं के पालन एवं उच्चस्तरीय आदर्शों के अपनाने से न स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है। फलस्वरूप उसका प्रभाव आरोग्य के रूप में दिखाई पड़ता है।” डा. क्लोसनर ओर कहते हैं कि चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी सफलता का प्रधान कारण धार्मिक भावना ही है।
शारीरिक, मानसिक विकास ही नहीं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति धर्म धारणा से ही सम्भव है। पूर्णता लक्ष्य है। उस ओर बढ़ना पूर्ण से संबंध जोड़ सकना धर्म-अवलम्बन द्वारा ही सम्भव है। पूर्णता प्राप्ति की सहज प्रवृत्ति मानव अन्तःकरण में विद्यमान है। इसके लिए वह प्रयत्न भी करता है। पर धार्मिक आधारों क अभाव में सफल नहीं हो पाता। इस लक्ष्य की प्राप्ति धर्म धारणा द्वारा ही सम्भव है। धर्म को मनुष्य के जीवन से अलग किया ही नहीं जा सकता।
धर्म जब जीवन में घुल-मिल जाता है- दैनंदिन जीवन की अनुभूति में उतरता है तो विषमता एवं अपने पराये का भेदभाव समाप्त हो जाता है। सर्वत्र अपनी ही सत्ता दिखाई पड़ती है। सम्प्रदाय एवं मजहब की दीवारें आपो-आप समाप्त हो जाती हैं और साधक मुस्लिम धर्म के प्रसिद्ध सन्त ‘इब्नानअली’ की तरह कह उठता है, मेरा हृदय इतना विशाल है कि इसमें मुसलमानों का काबा और कुरान भी, ईसाइयों का गिरजा और बाइबिल है तथा हिन्दुओं का मन्दिर एवं गीता है। मेरा धर्म और मजहब तो मात्र एक है- प्रेम” रामकृष्ण परमहंस ने भी धर्म को साम्प्रदायिकता से अलग हटकर ‘प्रेम’ के रूप में स्वीकार किया था।
परम लक्ष्य ही नहीं व्यावहारिक समस्याओं के समाधान एवं सामाजिक सुव्यवस्था की दृष्टि से भी धर्मावलंबन आवश्यक है। उसके बिना कर्त्तव्यों का बोध एवं उनका परिपालन सम्भव नहीं है। ‘वाल्टेयर’ लिखते हैं कि, “मनुष्य के लिए धर्म उतना ही आवश्यक है जितना कि श्वांस लेना। यदि धर्म नहीं है तो उसका आविष्कार करना होगा।”
वर्तमान समस्याओं पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि इनकी अभिवृद्धि में धर्म-भावना का अभाव ही प्रधान कारण है। ईश्वर का यदि भय रहा होता तो मनुष्य गिरावट का शिकार कभी नहीं होता। कर्मफल नीति-मर्यादाओं के प्रति आस्था रही होती तो इतनी अव्यवस्था नहीं दिखायी पड़ती। अनीति, अनाचार, दुराचार, अनास्था की ही फलश्रुति है। यदि मानव समाज का उत्थान करना है, पतन से बचाना, श्रेष्ठ एवं सद्गुणी बनना है तो धर्म का अवलम्बन लेना ही होगा। व्यक्तिगत मोक्ष, स्वर्ग, मुक्ति की माना न भी हो तो भी सामाजिक सुव्यवस्था एवं उन्नति की दृष्टि से भी धर्मा का आश्रय लेना उतना ही आवश्यक है। नीति-सदाचार चरित्रनिष्ठा के अभाव में न तो व्यक्तिगत उन्नति सम्भव है और न ही सामाजिक प्रगति। संसार में जितने भी राष्ट्र आगे बढ़े एवं समुन्नत हुए हैं, धार्मिक प्रवृत्तियाँ, नीति, सदाचार जैसी वृत्तियां ही प्रमुख कारण रही हैं। इसके बिना तो भौतिक उपलब्धियाँ भी मनुष्य जाति के लिए लाभप्रद नहीं हो सकतीं।
‘एल्डुअस हक्सले’ का कहना है कि भौतिक प्रगति अथवा विज्ञान की उपलब्धियों का लाभ मनुष्य तभी उठा सकेगा, जब उसके जीवन में धर्म का तत्व जगमगाने लगे। यह न हो तो प्रगति अभिशाप बनकर उलटा प्रहार करती है। पाश्चात्य राष्ट्र इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। प्रगति के क्षेत्र में अमेरिका अग्रणी है, पर अपराध जितने होते हैं उतने अन्य देशों में नहीं। परिवार एवं समाज विश्रृंखलित होते जा रहे हैं। भावात्मक रिश्ते टूटते जा रहे हैं। जन जीवन क्षुब्ध एवं अविश्वासों से भरा है। मनोरोगों की बहुलता है। यह मानसिकता, अशान्ति एवं असन्तोष का ही परिणाम है। क्योंकि सेवा, परमार्थ जैसी प्रवृत्तियों को अपनाने से जो आत्मिक सन्तोष मिल सकता था, वह उन्हें न मिल सका।
नैतिक मर्यादाओं का अंकुश न होने से विज्ञान भी उच्छृंखल बनता जा रहा है। उसकी उपलब्धियाँ विकास की ओर कम विनाश की ओर अधिक बढ़ रही हैं। मानव जाति अणु एवं परमाणु आयुधों के ढेर पर बैठी है, जिसमें कभी भी विस्फोट हो सकता है। तृतीय विश्व युद्ध की विभीषिका सामने है। उसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भावी संकटों को देखते हुये प्रसिद्ध विचारक ‘बट्रैन्ड रसैल’ का कहना है कि “यदि अणु युद्ध हुआ तो सारे संसार में चार या पाँच व्यक्तियों से अधिक नहीं बच सकेंगे। इस विभीषिका में धर्म धारणा ही मनुष्य का उद्धार कर सकती है।’’
बढ़ते मनोरोगों का कारण धर्म भावना का अभाव है। एक आँकड़े के अनुसार विश्व के 10 प्रतिशत व्यक्ति किसी न किसी मनोविकार-मनोरोगों से ग्रसित हैं। चिन्ता, भय, अन्धविश्वास, चिड़चिड़ापन, स्मृति भ्रम, सन्देह, तनाव, थकान, अस्त-व्यस्तता, अवसाद, अनिद्रा जैसे मानसिक रोग दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं, जो समाज की सुव्यवस्था-आपसी स्नेह सौहार्द की भावना को समाप्त करते जा रहे हैं। इनका उपचार धर्म अर्थात् नीतिमत्ता को अपनाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार हो नहीं सकता।
एक विचारक ने कहा है कि ‘विश्व संकट का समाधान धार्मिकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। धर्म धारणा से ही व्यक्तिगत जीवन में प्रसन्नता के स्त्रोत फूटेंगे तथा सामाजिक जीवन में हरियाली का प्रादुर्भाव होगा। वस्तुतः धर्म ही वह आधार है जो मनुष्य को पशु से अलग करता तथा सही अर्थों में मनुष्य बनाता है।
जीवन एक अभिनय है और मृत्यु उसकी पटाक्षेप। इस अभिनय को हमें इस प्रकार करना चाहिए कि दूसरों की प्रसन्नता बढ़े और अपनी प्रशंसा हो।
इन दिनों भौतिकता की जो भयंकर आग लगी है उसने न केवल साँसारिक, यथार्थ एवं सौंदर्य को नष्ट-भ्रष्ट नहीं नहीं, अपितु मानवी संवेदनाओं को भी मटियामेट कर दिया है। मनुष्य नित्य विकृति की ओर अग्रसर होता दिखाई पड़ता है। ऐसा लगता है कि उसका अन्दर से कोई आधार टूट गया है। कोई बहुत अनिवार्य जीवन शिरा जैसे नष्ट हो गया है। यह विकृति और विघटन मात्र व्यक्ति तक ही नहीं सीमित रहे हैं, इसके परिणाम समष्टि तक फैल गये हैं। परिवार से लेकर पृथ्वी की समग्र परिधि तक शुष्कता एवं हृदय की नीरसता से उत्पन्न बेसुरी प्रतिध्वनियाँ सुनाई दे रही हैं। एक तालाब में डाला गया पत्थर लहर वृत्तों को कूल किनारों तक फैला देता है। मानव चित्र में उठी विकृति की लहरें भी इसी तरह सारी मनुष्यता के अंतःस्थल को आन्दोलित करती हैं। मनुष्य एक व्यक्ति मात्र नहीं है। उसकी जड़ें समष्टि तक फैली हैं। इसीलिये उसमें उत्पन्न मानसिक अथवा आत्मिक विकृति व्यापक रूप से संक्रामक सिद्ध होती है।
इस शताब्दी का एक ही महारोग है- मनुष्य हृदय से प्रेम स्त्रोत का सूख जाना। हम सबके हृदय से सहज संवेदना एवं तरल करुणा आज न जाने कहाँ चली गयी है। हृदय इन मानवोचित गुण बिना मात्र धड़कन की यंत्रीकृत प्रक्रिया भर है। प्रेम के अभाव में व्यक्ति अपनी ही काया में स्वयं कैद है, जिसे मोह की, संकीर्णता की काया कहा जा सकता है।
किसी व्यक्ति एक संत से पूछा- ‘‘मनुष्य की भाषा में सबसे मूल्यवान शब्द कौन-सा है?” उनका उत्तर था- प्रेम। पूछने वाला चौंक पड़ा। उत्तर उसकी अपेक्षा के विपरित था। उसने सोचा था- आत्मा परमात्मा या इनसे सम्बन्धित कोई अन्य दार्शनिक शब्द उनके मुख से निकलेगा। वस्तुतः प्रेम ही प्रभु है। प्रेम ही संसार में एक अकेली अपार्थिव वस्तु है। यह अद्वितीय है। मनुष्य का सारा दर्शन, सारा काव्य, सारा धर्म एवं सारी संस्कृति इसी एक शब्द से अनुप्रेरित है। मानवीय जीवन में जो भी श्रेष्ठ और सुन्दर है, वह सब प्रेम से ही जन्म और जीवन पाता है।
प्रेम का अभाव सबसे बड़ी दरिद्रता है। जिसके भीतर प्रेम नहीं, वह दीन है। प्रेम इस बोध का परिणाम है कि मैं सर्वसत्ता से पृथक और अन्य नहीं हूँ। मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है। एक सूफी कथा है- किसी प्रेमी ने अपनी प्रेयसी के द्वार को खटखटाया। भीतर से पूछा गया-कौन है? प्रेमी ने उत्तर दिया- मैं हूँ। तुम्हारा प्रेमी। प्रत्युत्तर मिला- इस घर में दो को स्थान नहीं है। कुछ दिनों बाद प्रेमी पुनः उसी द्वार पर लौटा। इस बार “कौन है” के उत्तर में उसका जवाब था- ‘‘तू ही है” और वे बन्द द्वारा उसके लिये खुल गये। ईश्वर और जीव के सम्बन्ध ऐसे ही होते हैं।
प्रेम योग का साधक अपने अन्तरंग में भावात्मक और बहिरंग में क्रियात्मक प्रेमतत्व की दिव्य संवेदनाओं का परिचर देता है। जिसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति होती है, वह रस और कुछ नहीं प्रेम ही है। प्रेम के द्वार उसके लिये ही खुलते हैं जो अपने “मैं” को छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है।
प्रेम के तीन रूप हैं। निष्काम प्रेम, सकाम प्रेम तथा ज्ञानयुक्त प्रेम। सकाम प्रेम आसक्ति है। निष्काम प्रेम भक्ति है। ज्ञानयुक्त प्रेम तर्क पर आधारित है। अपनी-अपनी स्थिति अपने-अपने परिवेश के अनुरूप हर कोई योग के प्रकारों में से कोई एक चुन लेता है। ऐसे ही प्रकारों में से एक है- प्रेमयोग। अध्यात्म क्षेत्र में जब भी प्रेम शब्द आता है। उसका अर्थ ईश्वर के प्रति समर्पण ही होता है। इसमें ईश्वर की कृपा के बरसने की प्रतीक्षा नहीं की जाती। जिस तरह किसी गुम्बद के सामने बोला गया ध्वनि प्रवाह प्रतिध्वनित हो वापिस लौट आता है, उसी तरह प्रेम की प्रतिध्वनि सारे ब्रह्मांड में गुंजाकर अनेक गुनी होकर वापिस लौटती और अन्तरात्मा को भाव-विभोर कर देती है।
प्रेमयोग में समर्पण भाव की प्रधानता है। गीताकार ने इसका महत्व विस्तारपूर्वक बताया है। भगवान अर्जुन से कहते हैं- मुझ में अपना मन रख और मुझ में बुद्धि सौंप दे। तेरा कल्याण इतने मात्र से ही हो जायेगा। प्रेमतत्व का उभार अन्तःकरण से तब तक नहीं हो पाता, जब तक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को व्यक्ति ईश्वर को नहीं सौंप देते, इसे स्वार्थ का परमार्थ में, संकीर्णता का उदारता में एवं निकृष्टता का उत्कृष्टता में विसर्जन कह सकते हैं। भक्तियोग में इसी समर्पण शरणागति की प्रधानता है। वेदान्त में इसी अद्वैत एकत्व कहते हैं।
संसारी प्रेम में अपने प्रिय का एकाधिकार की चाह होती है। उसके प्रेम क्षेत्र में किसी अन्य का आना डाह का सृजन करता है। जबकि ईश्वर प्रेम में सर्वत्र प्रेम ही प्रेम उद्भासित होता है। तब अखिल विश्व में व्याप्त ब्राह्मी चेतना के तार स्व की चेतना से जुड़ जाते हैं। दूसरों का कष्ट एवं अभाव अपना लगने लगता है। करुणा एवं आत्मीयता का जब अन्तःकरण में प्रादुर्भाव होता है तो वह व्यक्ति को सन्तोष और शान्ति देता है। यही मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण है। इसी के सहारे आत्म-साक्षात्कार से लेकर प्रभु दर्शन तक की आध्यात्मिक उपलब्धियाँ मनुष्य को उपलब्ध होती हैं। ईश्वर प्रेम में स्थायित्व होता है। यहाँ भोगोपभोग का स्वार्थ गल जाना है और एक निष्काम भावना का प्रादुर्भाव होता है। इस भोग में पश्चाताप नहीं, वरन् एक उपलब्धि की अनुभूति है।
जो काम को ही प्रेम समझ लेते हैं, वे प्रेम से वंचित रह जाते हैं। काम प्रेम का आभास और भ्रम है। प्रेम जितना विकसित होता है, काम उतना ही विलीन होता है। प्रेम उस शक्ति का सृजनात्मक ऊर्ध्वीकरण है। प्रेम के ऐसे जीवन का ही नाम ब्रह्मचर्य है। काम से जिसे मुक्त होना है, उसे प्रेम को विकसित करना चाहिए।
प्रेम के अभाव से मनुष्य मात्र ‘अहंता’ तक आबद्ध होकर रह जाता है। वह ‘स्व’ केन्द्रित बनता है और ‘पर’ से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता। यह क्रमिक मृत्यु है। क्योंकि जीवन तो पारस्परिकता में है। जीवन तो स्नेह सम्बन्धों में है। मृदुल भाव संवेदनाओं सहज सहकारिता में है। जहाँ ‘स्व’ एवं ‘पर’ विलीन हो जाते हैं- वहीं प्रेम जन्म लेता है। वही सत्य है। वही प्रभु है। प्रेम अवर्णणीय है, बेजोड़, अविजित है, महान है। प्रेम शून्य जीवन के विषय में हैकिम्बे कहते हैं- ‘‘प्रेम खत्म हो जाता है तो जिन्दगी घिसटती रहती है।” सृष्टि प्रेम की उपज है, प्रेम ही उसका आधार है। प्रीति एक निर्मल भावना है और प्रतीति प्रगाढ़ विश्वास। विश्वास का यह धरातल भावना की उत्कृष्ट स्थिति है।
ईश प्रेम का कोई निर्धारित स्वरूप नहीं। अपने विश्वास के अनुसार कई पंथ विद्यमान हैं। तीन और पाँच मिलकर भी आठ होते हैं और दो ओर छह मिलकर भी आठ। सभी की दिशायें भिन्न हो सकती हैं- लक्ष्य एक ही है। अन्तर केवल साधन में है- साध्य में नहीं। सगुण भक्ति में ईश्वर अर्पण की तत्परता है तो निर्गुण में संयम की। सगुण प्रेममय एवं भावनामय है जबकि निर्गुण ज्ञानमय। किन्तु निर्गुण के अभाव में सगुण भी सदोष हो जाता है।
ईश-भक्ति की, प्रेम की ज्वाला सामान्यजनों में अनायास ही प्रज्ज्वलित नहीं हो पाती, उस स्थिति में कुछ साधन सुझाए गए हैं। यथा-नाम स्मरण, प्रार्थना, पूजा, विनयभाव, सेवा, स्नेह, प्रदर्शन समर्पण। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि इन सोपानों से सिद्धि प्राप्त होती है परन्तु प्रेम एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें पूर्ण समर्पण द्वारा उपर्युक्त साधनों के माध्यम से गुजरे बिना ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
भक्ति साधन वस्तुतः साध्य के प्रति साधक के अगाध प्रेम का ही एक उदात्त रूप है। देवर्षि नारद का कथन है- “सा त्वस्मिन परम प्रेमरूपा” रामकृष्ण परमहंस से किसी ने पूछा कि हम अपने भीतर भक्ति का कैसे विकास करें? उनका उत्तर था- “बालक के मन में माँ के लिये जितनी अनन्य निर्भरता होती है, वैसी ही निष्ठा हमारे अन्तराल में ईश्वर के लिये होनी चाहिए।” इसी समर्पण योग के सहारे रामकृष्ण एवं उनकी काली एकाकार हो गये थे। वे कहते थे- ‘‘माँ! तू मुझे अपनी भक्ति में सराबोर बना दे। मुझे ज्ञान और बुद्धि की जरूरत नहीं। मुझे तो केवल तेरी भक्ति की पिपासा है।
निष्काम प्रेम की पूर्णता इसी में है कि वह पाखण्ड न बने। पवित्र प्रेम की उपस्थिति में अभिन्नता, जलन, घृणा और अहंकार का लोप हो जाता है। प्रेम से बड़ा धर्म नहीं। प्रेम ही सत्य है। और सत्य ही ईश्वर है। प्रेम की साधना जिसने कर ली, उसने जीवन में सतत् उत्साह, उमंग, उल्लास, सक्रियता, सेवा और आनंद भर लिया है। पवित्र प्रेम में सराबोर अन्तःकरण ही सच्ची आस्तिकता का परिचायक है।
दूसरों की सहानुभूति, स्नेह, आत्मीयता पाने की स्वाभाविक आकाँक्षा मनुष्य मात्र में होती है। इसी की पूर्ति के लिए मनुष्य मैत्री करता, परिवार बसता है। मित्रों की सहजता, सुख-दुःख में हाथ बंटाने की प्रवृत्ति मिलने वाली सहानुभूति से उसे मानसिक एवं आत्मिक संतुष्टि मिलती है। परिवार बसाने, पत्नि, बच्चों को जाल-जंजाल मोल लेने के पीछे एक ही मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि निकटता के द्वारा अधिक से अधिक स्नेह, सहयोग, सहानुभूति अर्जित करना। बच्चों से मिलने वाले वात्सल्य की कीमत पर वह बड़े से बड़ा त्याग करने में भी नहीं हिचकता। निकटवर्ती आत्मीय व्यक्तियों को सहयोग करने पर भौतिक दृष्टि से तो घाटा ही घाटा दिखाई पड़ता है, पर इसके बदले में मिलने वाली आत्मीयता के लिए वह यह घाटा सहर्ष स्वीकार करता है। मित्रता में भौतिक वस्तुएँ नहीं, मित्रों का स्नेह ही मिलता है। उनके उन्मुक्त सान्निध्य से मिलने वाले अनिवर्चनीय आनन्द के लिए कीमती वस्तुएँ भी छोड़ दी जाती हैं। पार्टियां इसीलिए आयोजित की जाती हैं कि हितैषी मित्रों की सहानुभूति अधिक से अधिक अर्जित की जा सके।
मनुष्य एक चेतन प्राणी है। वह मात्र भौतिक वस्तुओं से संतुष्ट नहीं हो सकता। अन्तर्निहित चेतना को दूसरों का स्नेह-आत्मीयता पाने की आकाँक्षा होती है। पाने पर ही वह तुष्ट होती है। पूर्ति न होने पर खिन्न, अतृप्त बनी रहती है। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को जानकर ही परिवार बसाने, समाज गठित करने की योजना ऋषियों ने बनायी होगी। पारिवारिकता एवं सामाजिकता के जहां भौतिक लाभ हैं, वहीं इस आत्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति अपने आप होती रहती है। पर्व, त्यौहार, बड़े आयोजनों में समूह को एकत्रित करने के पीछे यही तथ्य निहित कि परस्पर एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता उभरे- सहानुभूति का आदान-प्रदान चले। सहृदयता एवं सेवा का भाव उमड़े।
सामान्यतया मान्यता यह है कि दूसरों की सेवा, परोपकार, परमार्थ भौतिक वस्तुओं द्वारा ही किये जा सकते हैं, पर यह एक सीमा तक सच है। वास्तविकता तो यह है कि सहृदयता, स्नेह-सहानुभूति से भरे-पूरे शब्द, आश्वासन दूसरों के लिए कही अधिक प्रेरणादायक एवं लाभप्रद सिद्ध होते हैं। जबकि इनके अभाव में उपेक्षा अन्यमनस्कता से किया गया सहयोग भी उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हो पता। उपयोगी बनने के लिए उसमें सहानुभूति का चमत्कारी प्रभाव पड़ते देखा गया है। मनोचिकित्सा का सम्पूर्ण काय-कलेवर इसी तथ्य पर अवलम्बित है। मानसिक रूप से विक्षुब्ध मनोरोगी भी स्नेह एवं सम्वेदना का अवलम्बन पाकर ठीक होते देखे गये हैं। मनोचिकित्सक अपनी सहानुभूति दर्शाकर, विश्वास अर्जित कर कठिन मनोरोगों की भी चिकित्सा करने में सफल होते हैं। आत्मीयता प्रकार रोगी के मन में आशा का संचार होने लगता है। असाध्य समझे जाने वाले मनोरोग भी कई बार ठीक होते देखे गये हैं। मनोचिकित्सा की सफलता में उपचार प्रक्रिया का कम, चिकित्सक के अन्तरंग से छलकने वाली सहृदयता का अधिक योगदान होता है, जिसका चमत्कारी प्रभाव रोगी के ऊपर पड़ता है।
सहृदयता स्वयं में एक बड़ी शक्ति है- समग्र उपचार पद्धति है। सन्त, महात्मा, ऋषि, देवदूत इसी के पुँज होते हैं। उनके हृदय के अन्तराल से निकलने वाली सहानुभूति की किरणें निकटवर्ती व्यक्तियों पर चमत्कारी प्रभाव डालती हैं। उनके आशीर्वाद- आश्वासन से कठिन रोग भी ठीक होते देखे गये हैं। आश्वासन पाकर रोगी का मनोबल बढ़ते जाता है। दुर्बल मनःस्थिति ही समस्त रोगों की जड़ है। जिसके रहते कोई भी उपचार पद्धति सफल नहीं होती। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य से अवगत सन्त, महात्मा रोगी के मनोबल को ही बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। उनके आश्वासन एवं आशीर्वाद के चमत्कारी प्रभाव के पीछे मनोबल का बढ़ना ही प्रमुख कारण होता है। जिससे रोगी भविष्य के प्रति आशान्वित हो जाता है।
सहानुभूति की आवश्यकता रोगी को ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति को होती है। मनुष्य की यह मौलिक आवश्यकता है जिसकी आपूर्ति वह चाहता है। नर-नारी, बच्चे, युवक, वृद्ध सभी को अपेक्षा होती है कि उनसे अन्य लोग सहानुभूति रखें। स्नेह, सम्मान दें। दुःखों में हिस्सा बंटायें। इसकी पूर्ति जहाँ जिनकी मात्रा में होती रहती है, वहाँ की परिस्थितियाँ भी उतनी ही श्रेष्ठ, स्नेह, सद्भाव से भरी-पूरी होती हैं। व्यक्ति की सहृदयता ही पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की शालीनता एवं सुव्यवस्था का मूल आधार है। सेवा, सहयोग के अधिकाधिक भावों से ही आत्मीयता का विस्तार होता है। सुख-साधनों की बहुलता भी, अपेक्षा के रहते मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकती। मनोरोगियों के पर्यवेक्षण अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि अधिकांश का जीवन अपेक्षित रहा। वाँछित सहानुभूति न मिल पाने के कारण वे छोटे-छोटे आघातों को भी सहन करने में असमर्थ रहे। प्रेरणाओं के अभाव में वे भविष्य के प्रति निराशावादी बन गये। सामने आयी प्रतिकूलताओं को चिरस्थायी मान लेने, किसी से सहयोग का आश्वासन न मिलने से वे अपना सन्तुलन खो देते हैं। जिससे सामने आये अवरोध जिनको थोड़े प्रयास से टाला जा सकता था, वे भी असम्भव बन जाते हैं।
सहृदयता मानवी गरिमा का मेरुदण्ड है। जिसका सम्बल पाकर ही व्यक्ति एवं समाज ऊंचे उठते, मानवी गुणों से भरे पूरे बनते हैं। इसका अभाव निष्ठुरता, कठोरता, असहिष्णुता जैसी प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होता है। पारिवारिक विग्रहों एवं सामाजिक विघटनों में परस्पर की आत्मीयता का अभाव एवं इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप पनपने वाली संकीर्ण स्वार्थपरता का ही प्रमुख योगदान होता है। चिन्ता, कुण्ठा, आत्महीनता, आवेश, उत्तेजना जैसे मनोरोगों में परिस्थितियों का कम अपेक्षा का अधिक योगदान होता है। स्नेह, आश्वासन के अभाव से निराशावादी चिंतन चलता तथा भविष्य अंधकारमय दिखायी पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य का एकमात्र आधार है- मनुष्य स्नेह एवं आनंद का अनुभव करे तथा अन्यों को भी अपने स्नेह आनंद में सहभागी बनाये। मूर्धन्य मनोविश्लेषक डा. ‘सिगमण्ड फ्रायड’ का कहना है कि “समस्त मानसिक विकृतियों का कारण स्नेह का अभाव है। स्नेह स्वीकार करने की तथा स्नेह देने की तत्परता मानसिक स्वास्थ्य का लक्षण है।” आदान-प्रदान का यह क्रम जिस भी परिवार अथवा समाज में जितना ही अधिक चलेगा वह उतना ही सभ्य एवं समुन्नत होगा। समस्याओं की अधिकता एवं परिस्थितियों की विकटता आज चरम सीमा पर है। मनुष्य के बीच सौहार्द्र के बन्धन टूटते जा रहे हैं। अविश्वास एवं निराशा का ही साम्राज्य दिखायी पड़ता है। स्वार्थपरता, संकीर्णता की प्रवृत्ति आग की तरह फैलती जा रही है। यह इस बात के प्रमाण हैं कि भाव-सम्वेदनाओं की दृष्टि से मनुष्य खोखला होता जा रहा है। मानवी गरिमा के टूटते हुए इस मेरुदण्ड को हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए। सहृदयता विकसित करने, उभारने, स्नेह, सहानुभूति बिखेरने के लिए हर सम्भव प्रयास करना चाहिए।
इन्द्रियों से मात्र स्थूल जगत का परिचय मिलता है। आँखों से दृश्य पदार्थ ही दिखाई पड़ते हैं। कान भी सीमित ध्वनियों को ही सुन पाते हैं। नाक की गंध-क्षमता सीमित है। जिह्वा भी समस्त रसों का आस्वादन करने में असमर्थ है। त्वचा हर चीज छू नहीं सकती। अनेकों पदार्थ वायु में उड़ते रहते हैं उनकी सत्ता विद्यमान है, किन्तु इन्द्रियों से उनकी जानकारी नहीं मिलती। इन्द्रियातीत पदार्थों की जानकारी सूक्ष्मदर्शी एवं दूरदर्शी यन्त्रों से होती है। छोटे जीवाणुओं की माइक्रोस्कोप की और दूरवर्ती दृश्यों को टैलिस्कोप की सहायता से जानकारी मिलती है। स्पष्ट है कि इन्द्रियजन्य ज्ञान ही जब कुछ नहीं है उससे बाहर की परिधि और भी बड़ी है। वैज्ञानिकों ने इस अविज्ञान को ज्ञान की सीमा में लाकर आश्चर्यजनक आविष्कारों में सफलता पाई है।
स्थूल जगत की भाँति ही एक सूक्ष्म जगत भी है और स्थूल शरीर की तरह की एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता भी इसी संसार में विद्यमान रहती है। उसे इन्द्रियों से तो नहीं देखा जा सकता, पर बुद्धि के सहारे उसके अस्तित्व का परिचय भली-भांति मिल जाता है। मरणोत्तर जीवन इस सूक्ष्म जगत में ही अपना गुजारा करता है। कर्म ही परिणित इसी हाँडी में पकती रहती है और समयानुसार खिचड़ी बनकर थाली में आती है। भविष्य वक्ता इस अदृश्य को देखकर ही भूत और भविष्य की जानकारी प्राप्त करते हैं। देव सत्ता का साम्राज्य इसी क्षेत्र पर है। प्रेत-पितरों का निवास एवं क्रीड़ा कलोल की लीला भूमि यही है।
अदृश्य वातावरण का दृश्य जगत पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका बहुत कुछ पता ऋतु विज्ञानी एवं अन्तरिक्ष के जानकार लगाते रहते हैं और वर्षा, तूफान आदि की सम्भावनाओं से सर्व साधारण को अवगत कराते रहते हैं।
व्यक्ति की सत्ता के साथ जुड़ा हुआ एक प्रति व्यक्ति रहता है इसका परिचय ‘तेजोवलय’ के रूप में देखा और ‘छाया पुरुष’ की चमत्कारी सामर्थ्य को देखकर लगाया जा सकता है।
स्थूल और सूक्ष्म के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध सूत्र को अधिक प्रत्यक्ष करने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने की चेष्टा योगी, तपस्वी करते रहते हैं। साधना द्वारा मनुष्य भीतरी और बाहरी जगत में विद्यमान सूक्ष्म शक्तियों के साथ संपर्क स्थापित करता है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ सभी में विद्यमान रहती हैं, पर उनकी सूक्ष्म सत्ता को अनुभव में लगाने था अभीष्ट प्रयोजन में प्रयुक्त करने की स्थिति साधना प्रयासों द्वारा ही सम्भव होती है। उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी देव शक्तियों के साथ सम्बन्ध जोड़ना और उन्हें अनुग्रह बरसाने के लिए सहायता करना इन साधन प्रयत्नों के सहारे सुलभ बनता है।
प्रकृति स्थूल है और ब्रह्म सूक्ष्म। एक इन्द्रियगम्य है, दूसरा इन्द्रियातीत। शरीर और जीव के सम्बन्ध में भी यही बात की जा सकती है। ज्ञान सूक्ष्म है और कम स्थूल। इस समस्त विस्तार पर दृष्टिपात करने से अदृश्य का अस्तित्व भी स्पष्ट हो जाता है। बुद्धि का भौंड़ापन ही अदृश्य की सत्ता को अस्वीकार करता है। प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना, बालकों जैसा दुराग्रह है।
अदृश्य भी हमारे लिए दृश्य की तरह ही उपयोगी है। व्यक्ति की निर्भरता मात्र पदार्थ सम्पदा पर ही नहीं है। वरन् पारस्परिक स्नेह सहयोग भी उसकी महत्ती आवश्यकता है। प्रचुर संपत्ति होते हुए भी सद्भाव सम्पादन किये बिना जीवन नीरस और कर्कश ही बना रहता है। पदार्थ सम्पदा की दृष्टि से धनवान व्यक्तियों की तुलना में मनस्वी, ओजस्वी, और तेजस्वी अधिक सामर्थ्यवान माने जाते हैं। श्रमिक की तुलना में विद्वान की गरिमा अधिक भरी होती है। यह दृश्य की तुलना में अदृश्य की गरिमा का ही प्रमाण है। विज्ञ व्यक्ति अदृश्य को न तो अस्वीकार करते हैं और न उसके प्रति उपेक्षा बरतते हैं। उनकी मान्यता इससे भी आगे की होती है। उन्हें सूक्ष्म के साथ श्रम करने से भी अधिक लाभदायक सूक्ष्म के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास लगता है। वैज्ञानिकों से लेकर योगियों तक की प्रयत्न परायणता अपने-अपने ढंग से अदृश्य क्षेत्र के अवगाहन में ही नियोजित रहती है।
अदृश्य की एक नई सत्ता का रहस्योद्घाटन अभी-अभी हुआ है। पता चला है कि पदार्थ की सबसे छोटी इकाई प्रतिद्वन्दिता में प्रति परमाणु की सत्ता भी विद्यमान है। प्रति पदार्थ- प्रति विश्व- का अस्तित्व अब न तो काल्पनिक रह गया है, न उपहासास्पद, न अप्रामाणिक। भौतिक विज्ञानी इस तथ्य को एक स्वर से स्वीकार कने लगे हैं कि दृश्य जगत का प्रतिद्वन्द्वी एवं पूरक एक अदृश्य जगत इसी विराट् के भीतर अपनी सत्ता जमाये बैठा है और अविज्ञात रूप से इस दुनिया को प्रभावित एवं नियंत्रण करता है। प्रकारान्तर से उन अध्यात्म मान्यता की स्वीकृति है जिससे स्थूल ही तुलना में सूक्ष्म को अधिक बलिष्ठ एवं सम्पन्न बताया गया है और उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले साधना प्रयासों पर बल दिया गया है।
यहाँ प्रति पदार्थ एवं प्रति विश्व के सम्बन्ध में उपलब्ध नवीनतम जानकारियों पर थोड़ा प्रकाश डालना उपयुक्त होगा। ताकि अदृश्य को उपहासास्पद कहने वाले लोग यह समझ सकें कि प्रत्यक्ष तो कलेवर भर है। समस्त विश्व वैभव का प्राण, अदृश्य जगत में सन्निहित है। इसी प्राण सत्ता को ‘प्रति पदार्थ’ एवं ‘प्रति विश्व’ समझा जा सकता है।
नवीन तथ्यों के अनुसार यह ज्ञात हुआ है कि प्रत्येक पदार्थ के साथ जुड़ा उससे कहीं अधिक सामर्थ्यवान छाया पुरुष-प्रति पदार्थ-अदृश्य जगत में क्रियाशील है। इसकी कल्पना बहुत समय पूर्व प्रसिद्ध गणितज्ञ पाल.ए. एम. डिरॉक ने की, जो कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय में गणित शास्त्र के प्रोफेसर थे। आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त का स्पष्ट स्वरूप वैज्ञानिक किस्नोडिंगर ने दिया। पदार्थ के ऊर्जा में रूपांतरित होने के सिद्धान्त से वैज्ञानिक डिरॉक को विशेष सहयोग मिला। इलेक्ट्रान के ऊर्जा दर्शाने वाले सूत्र से ‘डिरॉक’ की कल्पना को बल मिला। उन्होंने प्रतिपादित किया कि ऋण आवेशयुक्त इलेक्ट्रान के साथ ही धन आवेशयुक्त इलेक्ट्रानों का अस्तित्व परमाणु में विद्यमान होता है। उन्होंने इसका नाम प्रति इलेक्ट्रान (एण्टी इलेक्ट्रान) दिया। अपने प्रयासों द्वारा श्री डिरॉक की इस परिकल्पना की पुष्टि अमेरिका के प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री डा.कार्ल डी. एण्डरसन ने भी की। उन्होंने घोषणा की कि इलेक्ट्रान के साथ ही विपरीत आवेशयुक्त इलेक्ट्रानों का अस्तित्व भी परमाणु के भीतर ही विद्यमान है। उन्होंने इस नये कण का नाम ‘पाजीट्रान’ रखा। इस नवीन शोध के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला। तब से लेकर अब तक परमाणु में ही विद्यमान अनेकों प्रति कणों का अस्तित्व उभरकर सामने आया है। अमेरिका के वैज्ञानिक एमेलियो जी. सेगरे, ‘ओवेन चेम्बर लेन’ सी. वीगेन्द्र तथा पी. वाइपसीलेन्टिस के सामूहिक प्रयास से ऐण्टी प्रोटान एवं अटी न्यूट्रान कणों का पता लगा है। इन मूलभूत कणों के अतिरिक्त ऐण्टीन्यूट्रिनोस, ऐण्टीमेसान्स, एण्टी हाइपेरान्स जैसे कणों की भी खोज हुई है। पाकिस्तान के श्री अबदुस्लाम को पोजीट्रान के डिके न होने पर ही 1979 का नोबेल पुरस्कार मिला था।
भौतिकविद् के जानकार इस तथ्य से अवगत हैं कि प्रोटान्स, न्यूट्रान्स, न्यूट्रिनोस एवं मेसान्स से नाभिक बनता है। इलेक्ट्रान नाभिक के बाहर चक्कर लगाते हैं। इन सभी कणों के संयुक्त होने से परमाणु बनता तथा सुव्यवस्थित एवं टिकाऊ बना रहता है। प्रति कणों की खोज से, ऐण्टी प्रोटान्स, ऐण्टी न्यूट्रान्स एवं ऐण्टी मेसान्स, एण्टीके-मेसान्स के संयुक्त होने से ऐण्टी न्यूक्लियस की कल्पना की गई। इस कल्पना को साकार किया कोलम्बिया के भौतिक शास्त्र के डा. लियोन लेडरमेन ने। सन् 1935 में ऐण्टी न्यूक्लियस की संरचना करके ऐण्टीएटम का स्वरूप प्रदान किया गया। पदार्थ के साथ ‘प्रति पदार्थ’ के अस्तित्व को अब वैज्ञानिक जगत में निर्विवाद रूप से स्वीकारा जा रहा है।
प्रति पदार्थ के अस्तित्व में आने से वैज्ञानिकों ने नये सिरे से सोचना आरम्भ किया है। अब सोया यह जा रहा है कि ने केवल पदार्थ वरन् प्रत्येक संरचना का एक स्वतंत्र प्रतिरूप स्थूल सृष्टि में विद्यमान होना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार- ‘प्रति जगत’, ‘प्रति मानव’, ‘प्रीति जीव’, ‘प्रति वनस्पति’ भी जगत, मनुष्य जीव एवं वनस्पति के साथ संलग्न होना चाहिए। प्रो. डिरॉक के अनुसार सृष्टि में विद्यमान सभी कणों के साथ अदृश्य रूप में उनके प्रतिकण मौजूद हैं।
पदार्थों की प्रतिच्छाया के सामान प्रति पदार्थ भी पदार्थ के साथ ही बनते हैं। ऊर्जा रूपांतरित होकर प्रति पदार्थ एवं पदार्थ को जन्म देती है। यहां एक प्रश्न सहज ही उठता है कि पदार्थ तो दिखता है किंतु क्या कारण है कि प्रति पदार्थ दिखायी नहीं पड़ता। तथ्यों एवं प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि पदार्थ प्रति पदार्थ का विकर्षण करता है। इस विकर्षण के फलस्वरूप सभी प्रति पदार्थ एक ऐसे लोक में पहुँच जाते हैं, जिसे ‘प्रति विश्व’ के नाम से पुकार जा सकता है। सम्भव है कि वह एक विशेष स्थिति हो। जिसे आइंस्टीन ने दिक्-काल से परे ‘चतुर्थ आयाम’ के नाम से सम्बोधित किया है। जिसमें पहुँचकर पदार्थ का स्थूल स्वरूप लुप्त हो जाता हो। तथ्य चाहे जो भी हो यह तो स्पष्ट हो चुका है कि पदार्थ कि विश्व, मनुष्य तथा अन्यान्य प्रकृति की संरचनाओं के साथ उनके प्रति स्वरूप भी यहाँ विद्यमान हैं।
परस्पर विरोधी प्रकृति के कारण पदार्थ एवं प्रति पदार्थ के मिलने से भयंकर विस्फोट की सम्भावना की जाती है। कुछ वर्षों पूर्व रूस के साइबेरिया क्षेत्र में एक भयंकर विस्फोट हुआ। यह स्थान आर्कटिक क्षेत्र से 400 मी दूर ‘टान्गसेयूकी’ में स्थित है। एक अनुमान के अनुसार यह विस्फोट 30 मेगाटन हाइड्रोजन बम की सामर्थ्य के बराबर था। इसकी विध्वंसक शक्ति का अनुमान इसी से लगता है कि यह हिरोशिमा पर छोड़े गये परमाणु बम से 1500 गुना शक्तिशाली था। रसायन शास्त्र के प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं नोबेल पुरस्कार विजेता डा. विलिमर्ट एफ. लिर्ब्वा का कहना है कि उक्त विस्फोट पदार्थ के टकराने से हुआ। इन दोनों के विकर्षण से ही सन्तुलन बना रह सकता है। असन्तुलन के कारण किसी प्रकार यदि यह दोनों मिल जाते हैं तो ऐसी स्थिति में ही यह विस्फोट होता है। अंतरिक्ष में प्रवेश करते समय अब इस संकट की भी सम्भावना की जा सकती है कि कहीं हमारी स्पेस शटल एवं अन्तरिक्ष यात्रा प्रति विश्व में न प्रवेश कर जायें। यदि ऐसा हुआ और प्रति-विश्व पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो महा विनाश का, महा प्रलय का दृश्य उपस्थित हो जायेगा। प्रति जगत एवं जगत के बीच भयंकर युद्ध छिड़ जायेगा और देखते ही देखते सम्पूर्ण विश्व नष्ट हो जायेगा।
प्रति पदार्थ एवं प्रति विश्व का अस्तित्व स्पष्ट होने के उपरान्त एक बड़ी समस्या यह सामने आ गई है कि इस अदृश्य एवं अविज्ञात सत्ता के साथ छेड़खानी करने पर कहीं उलटी प्रतिक्रिया उपस्थित न होने लगे। पदार्थ और प्रति पदार्थ के असहयोग एवं विग्रह से असंख्यों समस्याएँ खड़ी हो सकतीं और विश्व के वर्तमान ढाँचे को पूर्णरूपेण बदल जाने से महाप्रलय जैसा संकट खड़ा हो सकता है। इसी आशंका, असमंजस में इस दिशा में शोध प्रयत्न की दिशा में कदम फूँक-फूँक कर धीरे-धी बढ़ाये जो रहे हैं।
अध्यात्म विज्ञान द्वारा अदृश्य जगत एवं अदृश्य सत्ता के साथ सम्बन्ध बनाने के बारे में भी यही बात है। उसमें दैवी सृजन और दानवी विध्वंस की दोनों सत्ताएँ विद्यमान हैं। अदृश्य पर-सूक्ष्म पर-अविश्वास कने के जो कारण पिछले दिनों उछाले जाते थे, वे अब धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। प्रति पदार्थ एक प्रति विश्व के अस्तित्व ने भौतिक विज्ञानियों को सूक्ष्म की सत्ता की पदार्थ तक ही नहीं चेतना तक में विद्यमान होने की बात स्वीकार करने के लिए विवश किया है। यह आध्यात्मिकी आत्मिकी की-भौतिकी की विजय यात्रा का श्रीगणेश मात्र है।
“फलासक्ति छोड़ो और काम करो” “आशा रहित होकर कर्म करो” “निष्काम होकर कर्म कर” यह गीता की वह ध्वनि है जो भुलायी नहीं जा सकती। जो कर्म छोड़ता है वह गिरता है। कर्म करते हुए भी जो उसका फल छोड़ता है वह चढ़ता है।
-महात्मा गाँधी
वह समय अब पीछे छूटता जा रहा है जब विज्ञान के द्वारा सच्चाई खोज निकालने की जोर-शोर से घोषणा की जाती थी और साथ ही यह भी कहा जाता था कि अध्यात्म की मान्यताएं काल्पनिक एवं निरर्थक हैं। पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। विज्ञान और बुद्धिवाद को अब अपने पूर्व प्रतिपादनों पर नये सिरे से विचार करना पड़ रहा है। अब बुद्धिवाद पर नीतिमत्ता और उत्कृष्टता का अनुशासन आवश्यक प्रतीत हो रहा है। तथ्य अब इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि संसार में सब कुछ जड़ ही नहीं है। पदार्थ पर अंकुश रखने वाली चेतन सत्ता का भी स्वतंत्र अस्तित्व है और उसका विश्व-व्यवस्था एवं प्राणि जगत पर सुनिश्चित अनुशासन है।
विज्ञान का जैसे-जैसे बचपन दूर हो रहा है और प्रौढ़ता, परिपक्वता की स्थिति आ रही है, वैसे-वैसे विज्ञजनों ने अध्यात्म सत्ता, शैली एवं उपयोगिता के संबंध में अपनी पुरानी मान्यताएं बदली हैं। साथ ही अध्यात्म ने भी हठधर्मी छोड़ी है।
परिवर्तित विचार-धारा का परिचय विश्व के मूर्धन्य महा-मनीषियों द्वारा इन्हीं दिनों व्यक्त किए गए उद्गारों से मिलता है। -प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऑलिवर लॉज का कथन है कि ‘‘मुझे विश्वास है, अब वह समय निकट आ गया है जबकि विज्ञान को नये क्षेत्रों में प्रवेश करना होगा। विज्ञान अब भौतिक जगत तक ही सीमित नहीं रहेगा। चेतन जगत भी अब वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।’’
प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स जीन्स ने लिखा है- ‘‘पहले यह मान्यता थी कि जड़-जगत ही चेतना की उत्पत्ति का आधार है। भौतिक तत्वों के समन्वय से ही मन की उत्पत्ति होती है। लेकिन अब यह माना जाने लगा है कि जड़ जगत के पीछे एक विराट चेतना काम कर रही है।’’ अपनी पुस्तक ‘दि न्यू साउण्ड बैक ऑफ साइंस’ में वे लिखते हैं- ‘‘उन्नीसवीं सदी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक जगत था लेकिन अब प्रतीत हो रहा है कि विज्ञान जड़ पदार्थों से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है।’’
प्रो. ए. एस. एडिंग्टन ने कहा है- ‘‘अब विज्ञान इस निर्णय पर पहुंचा है कि समस्त सृष्टि में एक अज्ञात शक्ति गतिमान है। अब विज्ञान का जड़ पदार्थों से लगाव समाप्त हो गया। चेतना, मन, आत्मा का अस्तित्व माना जाने लगा है। चेतन सत्ता की जड़ जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है।’’
प्रसिद्ध वैज्ञानिक हरवर्ट स्पेंसर ने कहा है- ‘‘जिस शक्ति को मैं बुद्धि से परे मानता हूं वह धर्म का खंडन नहीं करती अपितु उसे और अधिक बल पहुंचाती है।’’
सुविख्यात वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘‘सोशल एन्वाइसमेंट एण्ड मॉरल प्रोगेस’’ में स्पष्ट लिखा है- ‘‘मुझे विश्वास हैं, चेतना ही जड़ पदार्थों को गति प्रदान करती है।’’
बीसवीं सदी के महान विज्ञान वेत्ता अलबर्ट आइन्स्टीन ने कहा है- ‘‘मैं ईश्वर को मानता हूं। इस अविज्ञात सृष्टि के अद्भुत रहस्यों में ईश्वरीय शक्ति ही परिलक्षित होती है। अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन कर रहा है कि संपूर्ण सृष्टि का नियमन का अदृश्य चेतन सत्ता कर रही है।’’
जे. बी. एस. हैल्डेन ने लिखा है- ‘‘अविज्ञात सृष्टि के कुछ ही रहस्यों को हम जान पाये हैं। सृष्टि को हम एक निर्जीव मशीन मात्र समझ रहे थे, यह हमारी भूल थी। वास्तव में यह सृष्टि चेतन शक्ति से संबद्ध है। जड़ पदार्थों का संचालन यह चेतन शक्ति ही कर रही है।’’
आर्थर एच. कैम्पटन ने कहा है- ‘‘हमारे चिंतन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की संपूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।’’
भारतीय धर्म शास्त्रों में अहिंसा का बड़ा महत्व बताया गया है। इसका सामान्य-सा अर्थ है किसी की हिंसा न करना, निरपराध प्राणियों को न सताना और न ही किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाना। इस अर्थ के कारण बहुत से लोग भ्रम में पड़ जाते हैं कि जब किसी को किसी भी प्रकार न सताना और कष्ट न देना अहिंसा है तो अपराधियों और हिंसक प्राणियों के लिए निर्द्वन्द्व होने की सम्भावना खुल जाती है। वस्तुतः ऐसा है नहीं। किसी को कष्ट न पहुँचाने की रीति-नीति का अर्थ यह नहीं है कि अपराधियों और दूसरों को हानि पहुँचाने वालों को भी दण्डित नहीं किया जाय, उनके कृत्यों का प्रतिकार नहीं किया जाये। ऐसे कृत्यों का दमन करने के लिए बरती गई, दण्ड-नीति को मनीषियों ने वैदिकी हिंसा कहा है और घोषित किया है, “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।” वैदिकी हिंसा से तात्पर्य है विचार और विवेकपूर्वक अवांछनीय तत्वों का दमन।
इस युग के विश्वबन्धु राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अहिंसा का उपयोग कर ही विदेशियों के शासन से भारत को मुक्ति दिलाई थी। अहिंसा का अर्थ बताते हुए उन्होंने लिखा है, “अहिंसा वह स्थूल वस्तु नहीं है जो आज हमारी दृष्टि के सामने है। किसी को न मारना तो दूर कुविचार मात्र हिंसा है। मिथ्या भाषण हिंसा है। द्वेष हिंसा है। किसी का बुरा चाहना हिंसा हैं। जगत् के लिए जो आवश्यक वस्तु है, उस पर अनाधिकारपूर्वक, स्वार्थवश कब्जा रखना भी हिंसा है।’’
अहिंसा का सूक्ष्म अर्थ करते हुए भारतीय मनीषियों ने प्राणी मात्र में आत्मभाव रखना, उनमें अपनी ही आत्मा के दर्शन करना अहिंसा बताया है, परन्तु यह कहीं भी नहीं लिखा है कि आततायी, अनाचारी के अत्याचारों को भी सहन किया जाना भी अहिंसा है। महात्मा गाँधी ने स्वयं कई अवसरों पर अवांछनीय तत्वों का कड़ाई से सामना करने को अहिंसा बताया है। घटना उन दिनों की है जब गाँधीजी ने अहिंसक आन्दोलन के कई कार्यक्रम दिये गये थे और बताया था कि विदेशी शासन को अहिंसात्मक उपायों से किस प्रकार हटाया जाय? उन्हीं दिनों गुजरात विद्यापीठ की कुछ लड़कियां गाँधीजी के पास पहुंची। वहाँ उन्होंने किशोरीलाल भाई से कहा, ‘देखिये कुछ लड़के कभी-कभी छेड़खानी किया करते हैं। बताइये क्या करें? कैसे उनका प्रतिकार करें?’
निश्चय ही वे लड़कियां अहिंसात्मक प्रतिकार का उपाय पूछ रही थीं। किशोरीलाल भाई ने कहाँ, ‘तुम्हारे पैरों में चप्पलें हो होती ही हैं। क्यों न उन्हें निकाल कर लड़कों की उनसे पिटाई कर देती हो।’
यह उत्तर सुनकर लड़कियां आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने कहा, ‘यह तो हिंसा है। हम तो अहिंसात्मक उपाय जानने के लिए आई हैं।’ किशोरीलाल भाई बोले- ‘यदि तुम्हें इसमें शक हो तो या तुम्हारा समाधान न हुआ हो तो तुम खुद ही बापू से जाकर पूछ लो न।’
लड़कियां गाँधीजी के पास गईं और उन्होंने वही बातें दोहरा दी जो किशोरी भाई से हुई थीं। गाँधी जी ने इस पर कहा, बस! किशोरीलाल ने इतना ही कहा। मैं तो कहूँगा तुम सब लड़कियाँ एक जुट होकर उन लड़कों को रस्सी से बाँधकर वह पिटाई करो कि वे जीवन भर याद रखें। बताओ तो बलात्कारी के सामने क्या अहिंसात्मक उपाय हो सकता है? उनके अत्याचारों को सहन कर लेना अहिंसा नहीं कायरता है। उस समय तो यही उचित होगा कि जो ऐसा अत्याचार करना चाहे और जिसके प्रति अत्याचार किया जाए, उसके पास यदि छुरी हो तो वह छुरी भौंक दे। उस समय उस परिस्थिति में यही अहिंसा है।
गाँधीजी अहिंसा को कायरों का नहीं, वीरों का भूषण कहा करते थे। इसे उन्होंने वीरों का मार्ग बताया था। अहिंसात्मक प्रतिकार से उनका आशय था बिना किसी को कष्ट दिए ऐसा नैतिक दबाव उत्पन्न करना कि अत्याचारी को हार कर सही रास्ते पर आना पड़े। निश्चित ही इसके लिए बड़े साहस, सन्तुलन और धैर्य की आवश्यकता है। अहिंसा के शस्त्र से लड़े गए स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वतंत्रता सेनानी अपनी पीट पर लाठी, कोड़ों और बन्दूक के कुन्दों का वार सहते थे परन्तु आन्दोलनों से विरत नहीं होते थे।
घटना सन् 1923 की है। तब गुजरात के पंचमहाल एवं गोधरा जिले जिले में भीषण साम्प्रदायिक उपद्रव हुए। वहाँ के बहुसंख्यक वर्ग द्वारा पीड़ित हिंदू भागकर महात्मा गाँधी के पास पहुँचे और उन्होंने मुसलमानों के अत्याचारों की शिकायत उनसे की। बापू ने सारी बातें सहानुभूतिपूर्वक सुनी और पूछा- ‘‘तुम लोगों ने इसके मुकाबले में क्या किया?” आगन्तुकों में एक नेता जैसा व्यक्ति था। उसने कहा, ‘करते क्या? आपकी अहिंसा हमारे हाथ-पाँव सब बाँध रखे थे।’ अहिंसा का यह अर्थ सुनकर बापू क्षुब्ध मन से बोले, ‘सो तो ठीक है। लेकिन मेरी अहिंसा ने यह थोड़े ही कहा था कि तुम वहाँ से कायरों की तरह भाग कर अपनी बुज़दिली की रिपोर्ट देने के लिये मेरे पास आते। मेरी अहिंसा तो साहसपूर्वक मर-मिटने का सन्देश देती है। तममें यदि मर-मिटने का साहस नहीं था तो अपने मन के अनुसार उस स्थित का मुकाबला करना चाहिए था। तुमने मेरे मत को समझा नहीं और अपने मत पर चलने की हिम्मत नहीं की। अहिंसा कायरों की नहीं वीरों की है। जहाँ किसी तरह जान बचा लेने की भावना है या जहाँ खतरे से मुंह मोड़ने या भाग जाने की सम्भावना है वहाँ अहिंसा नहीं हो सकती। इससे तो मैं हिंसा को श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसमें भय, संकट या हमले का सीधा सामना किया जाता है।
दुष्टता या अवाँछनीय का दमन, प्रतिरोध, किसी भी प्रकार किया जाय, ऐसा ‘मन्यु’ अहिंसा के अंतर्गत ही आता है। शास्त्र से हो या शस्त्र से, दुष्टता का अवांछनियता का प्रतिकार कदापि हिंसा से नहीं हो सकता। उसकी गणना भी अहिंसा में ही होगी क्योंकि अवाँछनीय तत्वों का दमन करने से उनके कारण पीड़ित होने वाले लोगों को निश्चित ही इससे त्राण मिलेगा और अपेक्षाकृत अधिक लोगों को सुख चैन से हरने का अवसर मिलेगा, निरापद प्राणियों को अनावश्यक कष्ट न सहना पड़ेगा।
किसी भी प्रकार आततायी एवं अत्याचारी का दमन मनुष्यता के हित में ही है। और अहिंसा का का अर्थ ही है मनुष्य जाति का हित-अधिक से अधिक लोगों का कल्याण। इसके लिए अहिंसक स्वभाव के व्यक्ति दृढ़तापूर्वक उनके विषयों में दृढ़ रहते हैं जिनसे कि मनुष्य का हित सधता हो। प्रसिद्ध अणु वैज्ञानिक ‘नील्स बोहर’ ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि वे अपनी बौद्धिक सामर्थ्य का उपयोग केवल मानव जाति के कल्याण के लिए ही करेंगे उल्लेखनीय है कि नील्स बोहर ने ही सर्वप्रथम अणु की संरचना पर प्रकाश डाला और उसकी व्याख्या की थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर के नाजी सैनिक उन्हें पड़कर कर ले गये और अणुबम बनाने के लिए दबाव डालने लगे। बोहर अणु की विनाशकारी क्षमता से परिचित थे। वे जानते थे कि यदि अणुबम बना दिया गया तो उसके द्वारा भयंकर विनाश ही होगा। इसलिए उन्होंने नाजी अधिकारियों के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पहले तो उन्हें कई प्रलोभन दिये गए, पर मनुष्य कल्याण के लिए समर्पित यह मनीषी इन प्रलोभनों के आगे क्या झुक सकता था? प्रलोभनों को ठुकरा दिये जाने के बाद उन्हें तोड़ने के लिए यंत्रणाएं दी गईं। इससे भी वे विचलित नहीं हुए। एक उनकी जान ही नहीं ली और सब कुछ कर लिया गया। अनेकों बार उन्हें मृत्यु के द्वार पर ले जाया गया और वापस पीछे खींच लिया गया ताकि वे डरकर तैयार हो जायें। दृढ़व्रती नील्स बोहर न तो डरे और न ही अपनी प्रतिज्ञा से डिगे। किसी प्रकार भाग कर वे अमेरिका जा पहुँचे, जहाँ आजीवन मानवता की सेवा करते रहे। अहिंसा सही अर्थों में साहस का पर्याय है, शूरवीरों का भूषण है। आतंक एवं दमन का प्रतिकार भी अहिंसा में ही आता है। इस शब्द का दुरुपयोग न हो, न उसकी ओट में कोई अपनी कायरता छिपायें। इस आध्यात्मिक गुण की व्याख्या का आज की परिस्थितियों में सही रूप में, प्रस्तुतीकरण किया जाना जरूरी है।
प्रख्यात वैज्ञानिक “आइन्स्टीन” से किसी ने पूछा कि सत्य के स्वरूप के विषय में आपके क्या विचार हैं? आइन्स्टीन ने उत्तर दिया- ‘‘सत्य स्वरूपों से परे है-उसका कोई स्थायी रूप नहीं हो सकता-वह परिवर्तनशील तथा सापेक्ष है। अतएव जिन्हें सत्य की खोज करनी हो उन्हें सदा अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए। पूर्व मान्यताओं एवं विश्वासों से बंधे रहने का अर्थ होगा- उसी अनुपात में सत्य से दूर हटा जना।’’
सामान्यतया बुद्धि का यह स्वभाव है कि वह एक बार किसी तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद उसे शाश्वत मान बैठती है। परिवर्तन की उन संभावनाओं को मानने से इन्कार करती है जो आज कल्पित होते लगते हैं पर उनके साकार होने की पूरी-पूरी गुंजाइश है। इस दुराग्रहपूर्ण नीति के कारण ही कितनी ही महत्वपूर्ण जानकारियों से वंचित रहना पड़ता है। परिवर्तनों को स्वीकार न करने एवं तद्नुरूप सामंजस्य के अभाव के कारण अनेकों प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
परिवर्तन क्रम एक तथ्य है, जिसे स्वीकार करने से ही सत्य के अत्यधिक निकट पहुँच सकता सम्भव है। इसका एक प्रमाण है- पृथ्वी पर होते रहने वाले सतत् परिवर्तन। पृथ्वी अपने साथ परिवर्तनों की एक लम्बी एवं अविराम श्रृंखला जोड़े हुए है। जहां आज स्थल है वहाँ कभी अथाह समुद्र था। दिखाई पड़ने वाली विशालकाय पर्वत श्रृंखलाओं के स्थान पर कभी समतल भूमि थी। कनाडा के मानिटोवा प्रान्त में दो अरब तीस करोड़ वर्ष पूर्व की बनी चट्टानें प्राप्त हुई हैं। उस काल के नक्शे की कल्पना भी नहीं हो पाती। खोजियों का कहना है कि उस समय उधर एक महा खण्ड था जिसके अवशेष भारत के गोड़सान स्थान में भी मिले हैं। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका भारत का दक्षिण खण्ड और आस्ट्रेलिया परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए थे। अर्थात् इन द्वीपों का परस्पर अलग करने वाले एटलांटिक एवं हिन्द महासागरों का अस्तित्व उन दिनों नहीं था। एशिया का अधिकाँश भाग समुद्र में डूबा हुआ था। कालान्तर में समुद्र हट गया और भू-भाग उभरकर सामने आया।
प्राप्त शिला लेखों एवं पुस्तकों के आधार पर इतिहास वेत्ताओं ने गवेषणा की है कि पृथ्वी पर सामाजिक एवं राजनैतिक इतिहास का प्रारंभ 5 से 10 हजार वर्ष पूर्व हुआ था। जबकि पृथ्वी की परतों के नीचे प्राणियों एवं वनस्पतियों के भस्मीभूत अवशेषों (फॉसिल्स) से प्राप्त जानकारी के अनुसार पृथ्वी का इतिहास 52 करोड़ वर्ष पूर्व से प्रारंभ हुआ। हिमालय से प्राप्त वनस्पतियों एवं प्राणियों के अवशेष यह बताते हैं कि यह सारा प्रदेश पहले समुद्र में डूबा हुआ था अर्थात् आज जहाँ हिमालय के विशालकाय शिखर एवं चोटियाँ दिखाई पड़ रहे हैं, सम्भवतः वहाँ समुद्र रहा होगा। भू-गर्भ विशेषज्ञों का कहना है कि दो टापुओं को छोड़कर सम्पूर्ण यूरोप खंड समुद्र से आच्छादित था। एशिया का रूसी भू-भाग, इण्डोनेशिया, दक्षिण अरब, दक्षिण भरत का कुछ हिस्सा, आस्ट्रेलिया के पश्चिमी एवं पूर्वी किनारे को छोड़कर सम्पूर्ण यूरोप एशिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड समुद्र के तल में समाये थे। चीन का कुछ हिस्सा पूर्व साइबेरिया से होकर अमेरिका के पश्चिम भाग से जुड़ा था।
विशेषज्ञ पृथ्वी के भू-भाग पर होते रहने वाले परिवर्तनों के अनेक कारण बताते हैं। जैसे भूकम्पों, ज्वालामुखियों का आतंक, समुद्री उथल-पुथल आदि जल की जगह थल और थल के स्थान पर जल का नृत्य सतत् चलता रहा है। इस परिवर्तन क्रम में हिमयुगों की भी असाधारण भूमिका रही है। वैज्ञानिक का कहना है कि इस पृथ्वी पर चार बार हिमयुग आ चुका है। मानव जाति इस समय चौथे हिमयुग की निकटवर्ती अवधि में रह रही है। पिछले हिमयुगों में पृथ्वी के विभिन्न खण्ड बर्फ से ढके थे। बर्फ के पिघलने के उपरान्त जल के स्थान पर स्थल और स्थल के स्थान पर जल हो गया।
जल की जगह थल एवं थल की जगह जल की यह परिवर्तन श्रृंखला आगे भी चलती रहे तो कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। भू-गर्भ वेत्ताओं का कहना है कि चौथे हिमयुग को आरम्भ हुए दस लाख वर्ष बीते हैं, इस अवधि में अनेकों परिवर्तन हुए हैं। भू-भाग पर बर्फ के जमाव के कारण वर्षा का जो पानी बहकर समुद्रों में जाता है, उसमें गतिरोध होने के कारण समुद्र सूखते गये। ब्रिटेन यूरोप से अलग था किन्तु पिछले हिमयुग के कारण यूरोप से जुड़ गया। दो लाख वर्ष पूर्व भारत अरे लंका भी जमीन से इसी प्रकार परस्पर जुड़े थे। उन दिनों भारतवासी पैदल ही लंका की या करते थे। एशिया के साइबेरिया तथा अमेरिका के अलास्का के बीच समुद्र के सूख जाने के करण एशिया निवासी पशुओं को साथ लेकर अमेरिका में जा बसे। आज के अमेरिकी दो लाख वर्ष पूर्व के एशियावासियों के ही वंशज हैं, हिमयुग की अवधि में समुद्र सूखी धरती के रूप में थे। एशिया, चीन एवं कोरिया के मध्यम विद्यमान पीले समुद्र का अस्तित्व उन दिनों नहीं था। ईरान की खाड़ी नहीं थी। इण्डोनेशिया तथा फिलीपाइन्स के द्वीप एक दूसरे से जुड़े थे। यूगोस्वालिया और एड्रियाटिक के बीच का समुद्र सूख गया था। जिब्राल्टर का जल डभरु मध्य सूख जाने के कारण स्पेन जो यूरोप में स्थित है, से अफ्रीका के ‘मोरोको’ तक की पैदल यात्रा करना सुगम था। हिमयुग के अन्त में भू-भाग पर जमी बर्फ पिघल कर समुद्र की ओर बहने लगी। फलतः अनेकों द्वीप जो परस्पर एक दूसरे से जुड़े थे। कटकर अलग-अलग हो गये।
परिवर्तन का यह चक्र अब भी जारी है। पृथ्वी की ऊपरी सतह अभी भी अस्थिर है। पिछली सदी में कच्छ के रेगिस्तान क्षेत्र की कुछ जमीन उठकर ऊपर आ गई। उस स्थान पर पहले सिंधु की धारा का प्रवाह था। इन दिनों “अल्लाह का बाँध” नाम से वह स्थान प्रख्यात है। गुजरात का उससे लगा समुद्री किनारा भी अब समुद्र में डूबता जा रहा है।
भू-भाग पर होते रहने वाले ये परिवर्तन इस तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि यह सृष्टि की चलने वाली शाश्वत एवं अविराम प्रक्रिया है। हर घटक परिवर्तनशील है। जड़ ही नहीं चेतन प्राणियों के स्वरूप, क्रिया-कलाप एवं स्वभाव में सतत् अन्तर आता रहता है। जड़वादी विकास वादियों का कहना है कि मनुष्य का विकास ‘अमीबा’ नामक एक कोशीय जीव से हुआ। इस विकास क्रम में लाखों वर्ष लगे। तथ्य चाहे जो हो पर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य को अब तक परिवर्तनों की एक लम्बी श्रृंखला से होकर गुजरना पड़ा है। लम्बी अवधि में आदिमानव के न केवल स्वरूप में परिवर्तन आया वरन् दृष्टिकोण, विश्वास, स्वभाव एवं क्रिया-कलाप में भी भारी अन्तर देखा गया। जो कभी नर-पशु था वह सभ्य मान के रूप में सामने आया। संभव है अगले दिनों उसका देव मानव स्वरूप प्रस्तुत हो।
व्यक्तियों, वस्तुओं अथवा सृष्टि के सम्बन्ध में कोई भी बनायी गई मान्यता अपने में परिपूर्ण नहीं है। उनमें परिवर्तन की पूरी-पूरी गुंजाइश है। जड़-सृष्टि की तरह मनुष्य की विचारणा एवं क्रिया-कलापों में भी अन्तर आता रहता है जो व्यक्ति आज बुरा है, आवश्यक नहीं कि वह सदा वैसा ही बना रहे। जो जानकारियाँ प्राप्त हैं उनमें हेर-फेर की पूरी गुंजाइश है। विज्ञान का इतिहास भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है। अतएव सत्य तक पहुंचने के लिए सदा दृष्टि खुली रखनी चाहिए और परिवर्तनों को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार कने के लिए अपने को तैयार रखना चाहिए अन्यथा सत्य से हम दूर ही बने रहेंगे और पूर्वाग्रहों एवं मान्यताओं से इसी अनुपात में और भी अधिक जकड़ते चले जायेंगे।
मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात में है कि वह अपने चारों ओर शान्ति और प्रफुल्लता का आनन्दमय वातावरण उत्पन्न करे। यह कार्य वह तभी कर सकता है जब अपने दृष्टिकोण में उदारता एवं सज्जनता और कर्त्तव्य में पुरुषार्थ एवं सदाचार का समन्वय रखे।
-याज्ञवल्क्य
निकटवर्ती वस्तुएँ बड़ी एवं महत्वपूर्ण लगती हैं और दूरी का फासला बढ़ने पर बड़ी वस्तु भी नगण्य जैसी लगने लगती है। उदाहरण के रूप में अपने चारों ओर फैले हुये ब्रह्मांड पर दृष्टि डालने और उसकी सत्त का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अत्यधिक विशालता भी दूरस्थ होने के कारण छोटी-सी प्रतीत होने लगती है।
पृथ्वी के अतिनिकट होने के कारण छोटा-सा चन्द्रमा भी इतना महत्वपूर्ण लगता है कि उसे सूर्य के बाद दूसरे नम्बर पर ग्रह माना जाता है, जबकि वस्तुतः उस बेचारों का स्तर पृथ्वी के उपग्रह भर जितना है। खुली आँख से देखने पर विशालकाय तारे छोटे से लगते हैं और चन्द्रमा तुलनात्मक दृष्टि से उपहासास्पद आकार जितना होते हुए भी रात्रि में चमकने वाला सबसे बड़ा ग्रह पिण्ड प्रतीत होता है।
समस्त आकाशीय पिण्डों में चन्द्रमा हमारी सबसे सन्निकट है। आधुनिक विज्ञान और तकनीक के विकास से चन्द्रमा के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो चुकी है। पृथ्वी से इसकी औसत दूरी ढाई लाख मील से कुछ कम है। यदि 300 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से एक वायुयान शून्य में भी चल सकता हो तो हम एक माह में चन्द्रलोक तक पहुँच सकते हैं।
नाप में भी चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी की अपेक्षा अत्यन्त छोटा है। इसका व्यास लगभग 3160 मी है। चंद्रमा की तुलना यदि हम पृथ्वी से करें तो 49 चन्द्रमा मिलकर एक पृथ्वी बना पायेंगे। भार की दृष्टि से पृथ्वी चंद्रमा से 81 गुनी भारी है। अर्थात् यदि तराजू के एक पलड़े पर पृथ्वी रखी जाय तो दूसरे पलड़े पर 81 चंद्रमा रखने पर उनका कुल भार एक पृथ्वी के बराबर होगा। पृथ्वी और चन्द्रमा के पत्थरों में 5:3 का अनुपात है।
चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अत्यन्त कम है। पत्थरों के भार से यह अन्दाज मिलता है। ऊपर से गिरने वाली वस्तु पृथ्वी पर जिस गति से गिरती है- चन्द्रमा पर उसकी रफ्तार 6 गुनी कम हो जाएगी। इसी प्रकार पृथ्वी पर की 1 मन वजन वाली वस्तु चन्द्रमा पर पहुँचकर पौने सात सेर की रह जाएगी।
चन्द्रमा के सम्बन्ध में पूर्व संचित जानकारी और मान्यता से आधुनिक पर्यवेक्षण सर्वथा भिन्न है। वह निशानाथ एवं तारापति नहीं है जैसा कि मान्यता के अनुसार उसका यशोगान होता रहता है। सौर-मण्डल के अन्य ग्रह विशालता की दृष्टि से पृथ्वी की तुलना में अत्यधिक बड़े हैं किन्तु वे दूर होने के कारण नगण्य जितने प्रतीत होते हैं।
सत्य केवल वही नहीं है जो अब तक जाना जा चुका है अथवा जिसे हम जानते हैं। शक्तिशाली रेडियो, दूरबीनों के द्वारा दूरस्थ तारों के रेडियो सर्वेक्षण से उनके आकार, उत्पत्ति, विकास एवं विनाशचक्र में उनकी वर्तमान स्थिति तापक्रम गुरुत्वाकर्षण शक्ति आदि का पता चलता है। इन्हीं की सहायता से सौर-मण्डल के दसवें ग्रह का पता चला है। नवें ग्रह यम (प्लूटो)के आगे इस दसवें ग्रह का द्रव्य पृथ्वी से 300 गुना है और यह सूर्य के चारों ओर हमारे 511 वर्षों में एक परिक्रमा पूरी करता है। इस ग्रह की सबसे विचित्र विशेषता यह है कि इसकी सूर्य परिक्रमा की दिशा अन्य नो-ग्रहों के एकदम विपरीत है।
सौर-मण्डल की आधुनिकतम वैज्ञानिक खोजों से पता चला है कि समस्त ग्रहों में प्लूटो की दूरी सर्वाधिक है लेकिन नवीनतम अनुसंधानों के अनुसार नैप्च्यून को सबसे दूरस्थ समझा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लूटो और नैप्च्यून दोनों अपनी कक्षा बदलते रहते हैं। यह आगे दौड़ पीछे दौड़ की प्रक्रिया आगामी 20 वर्षों तक निरन्तर चलती रहेगी। इसके पश्चात् प्लूटो अपनी पूर्व स्थित पर आ जायेगा। इन दोनों ग्रहों की इस तरह की विलक्षण गतिविधियाँ जनवरी 1969 से मार्च 1999 तक अनवरत चलती रहेंगी। इसे अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने ब्रह्मांड की विलक्षणता का एक अद्भुत उदाहरण कहा है।
नैप्च्यून को सूर्य की अण्डाकार परिक्रमा करने में 164 वर्ष लगते हैं। ज्योतिर्विद् श्री लॉवेल ने भविष्यवाणी की थी के सूर्य से 4 अरब मील की दूरी पर नवाँ ग्रह भी हो सकता है जो सूर्य की परिक्रमा 284 वर्ष में पूरी करता है। इस अपूर्ण जानकारी को देकर सन् 1916 में लॉवेल तो दुनिया छोड़कर चले गये। इसके 14 वर्ष बाद अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक क्लाहब टॉमबफ ने प्लूटो नामक नवें ग्रह को ब्रह्मांड से खोज निकाला।
प्लूटो और सूर्य के मध्य दूरी 3,66,60,00000 मील है और 248 वर्ष में इसका परिक्रमा काल पूरा होता है। लेकिन इसका परिक्रमा पथ व्यवस्थित नजर नहीं आता।
इन दोनों नये ग्रहों के उपरान्त अब ऐसे अन्य और ग्रहों की संभावना अपने सौर-मण्डल में मानी जाने लगी है जो दूरी के कारण खुली आँखों से न दिखने पर भी विशालता के आधार पर काफी बड़े और महत्वपूर्ण हैं।
निखिल ब्रह्मांड की विशालता देखते हुए अपना सूर्य एक नन्हा-सा टिमटिमाता हुआ तारा भर है। ब्रह्मांड में असंख्यों संसार अज्ञात तथा अनखोजे अस्तित्व में हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे.बी.एस. हेल्डन ने इस कल्पनातीत ब्रह्मांड के बारे में कहा है- “ब्रह्मांड उतना ही विचित्र नहीं है जितनी हम कल्पना कर लेते हैं बल्कि उससे भी अति विचित्र है जितनी हम कल्पना कर सकते हैं।”
अमेरिकी खगोलदर्शी शैपले ने देखा कि आकाश-गंगा के रूप में दिखने वाले झुण्डों की पृथ्वी से दूरी 20,000 से 2,00,000 प्रकाश वर्ष (एक प्रकाश वर्ष- 1 लाख 86 हजार मील प्रति सेकेंड की चाल से 1 वर्ष में तय की गई दूरी) तक है। उसने यह भी पता लगाया कि ये झुंड एक विशाल घेरा बनाते हैं और उन्हें लकड़ी के तख्ते की तरह विभाजित करती हुई एक आकाश-गंगा गुजरती है। इस घेरे का केन्द्र आकाश-गंगा में है। यह केन्द्र सूर्य से 50,000 प्रकाश वर्ष दूर है। इस प्रकार शैपले ने यह सिद्ध किया कि सूर्य आकाश-गंगा के केन्द्र पर नहीं है जैसा कि हार्शेक्त और अन्य वैज्ञानिकों ने कहा था।
अंतरिक्ष में अनेक आकाश-गंगाएं मिलकर समूह बनाती हैं। इनको वैज्ञानिकों ने आकाश-गंगा श्रृंखलाएं कहा है। प्रत्येक श्रृंखला में हजारों आकाश-गंगाएँ रहती हैं। कोमाकखला एक ऐसा ही विशाल आकाश-गंगा समूह है जिसमें 11,000 आकाश गंगाएँ हैं। प्रत्येक आकाश गंगा के बीच करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी है।
निकटवर्ती चन्द्रमा की विशालता और ब्रह्मांड भर में बिखरे सूर्य तारकों की स्थिति तुच्छ जितनी दिखने का कारण एक ही है- निकटवर्ती को महत्व मिलना और दूरवर्ती के पल्ले अपेक्षा का बंधना। आंखें कुछ भी देखती हों, मस्तिष्क कुछ भी निर्धारण करता हो, पर तथ्य दूसरे ही हैं। सत्य को खोजने वाले इस रहस्य को जानते हैं कि निकटवर्ती और दूरवर्ती के महत्व और अस्तित्व के संबंध में किस प्रकार भ्रांतियां होती रहती हैं। उपरोक्त उदाहरण एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं कि जो निकटवर्ती है, दिख पड़ता है, सही हो- जरूरी नहीं है। वर्तमान में अतिनिकट होने से उसी के लाभ सर्वोपरि प्रतीत होते हैं, जबकि भविष्य दूरवर्ती होने के कारण उपेक्षित बना रहता है। स्वार्थ साधना का प्रतिफल तुरन्त मिलता है और परमार्थ की परिणति कालांतर में होती है। इसी भ्राँति में मनुष्य यह सोचने लगता है कि तात्कालिक स्वार्थ साधना में ही बुद्धिमता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी, उज्ज्वल भविष्य का महत्व समझने की यदि टैलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधन ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता और आकाश गंगा की लघुता मध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई भ्रांतियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसी प्रकार वर्तमान में उलझे रहकर संकीर्ण स्वार्थों को ही सब कुछ मान बैठना और परम लक्ष्य की ओर ध्यान न देना अपने ढंग ही अदूरदर्शिता ही है। इससे बच निकलने वाले ही सत्य तक पहुँचते और साधनों में सफल होते हैं।
संसार की विषमता बड़ी विलक्षण है। कोई धनवान है, कोई कंगाल। कोई सुन्दर है तो कोई कुरूप। शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ एवं कमजोर दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों का युग्म दिखाई पड़ता है। किसी को अनेकों प्रकार की बीमारियाँ घेरे हुए हैं, तो कोई सदा स्वस्थ, निरोग रहकर जीवन का वास्तविक आनंद उठाता है। किसी के साथ जन्मजात विकलांगता का, अंधे अथवा रुग्ण होने को अभिशाप जुड़ा हुआ है तो कोई जन्म से ही स्वास्थ्य एवं सौंदर्य को साथ लिए प्रकट होता है। कुछ बच्चे जन्म से ही असाधारण प्रतिभा के स्वामी होते हैं, और कुछ नितान्त बुद्धू। किन्हीं की बौद्धिक प्रखरता वयोवृद्धों को भी मात करती है, किन्हीं-किन्हीं पर प्रभावशाली प्रशिक्षण का भी प्रभाव नहीं पड़ता और वे गूढ़ ही बने रहते हैं।
कई बार एक प्रकार की परिस्थितियों में ही यह विषमता उभर कर सामने आती है। साधन एवं प्रशिक्षण एक जैसा मिलते हुए भी कुछ बच्चे विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न बन जाते हैं, जबकि उन्हीं परिस्थितियों में दूसरे सामान्य अथवा मूर्ख बने रहते हैं। यह भिन्नता प्रकृति गुण एवं स्वभाव में भी दृष्टिगोचर होती है। हर दृष्टि से अनुकूल वातावरण होते हुए भी कोई-कोई बच्चे उद्दण्ड, क्रूर एवं हिंसक प्रकृति के हो जाते हैं। इसके प्रतिकूल भी तथ्य देखे जाते हैं। पापी, क्रूरकर्मी अभिभावकों के संरक्षण में पले कोई-कोई बच्चे सौम्य, शालीन एवं सन्त प्रवृत्ति के भी पाये जाते हैं। जबकि उन्हीं के दूसरे सहोदर भई अभिभावकों के पदचिह्नों का अनुकरण करते हैं। सौम्यता, शिष्टता, शालीनता के संस्कारों से युक्त माता-पिता के बच्चों में से कुछ उद्दण्ड, क्रूर, क्रोधी एवं हिंसक संस्कारों से युक्त भी देखते जाते हैं।
इन विषमताओं एवं भिन्नताओं का प्रत्यक्ष कारण ढूंढ़ने पर कोई ऐसा आधार नहीं मिलता जो मानवी मस्तिष्क की संतुष्टि कर सके। वातावरण एवं आनुवांशिकी जैसे वैज्ञानिक आधारों पर भी उक्त विषमताओं का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में कर्मफल एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्त ही समाधानकारक सिद्ध होते हैं। वैचारिक दृष्टि से उनकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है। स्पष्ट है कि आनुवांशिकी गुणों के अतिरिक्त भी बच्चे के साथ कुछ ऐसी विशेषताएं जुड़ी होती हैं जो अधिक सूक्ष्म तथा सशक्त हैं। भारतीय संस्कृति में उन्हें ही सूक्ष्म संस्कार कहते हैं जो मरणोपरान्त भी जीवात्मा के साथ संलग्न रहते हैं तथा जन्म के साथ बच्चों में प्रकट होते हैं। जो उपयुक्त वातावरण में पोषण पाकर दृष्टिगोचर होते हैं। पातंजलि योग सूत्र में इस तथ्य का इस प्रकार रहस्योद्घाटन हुआ है-
‘‘क्लेशमूलः कर्मों शयो दृष्टादृष्ट जन्मवेदनीयः। सतिमूले तद्विपाको जात्यामुर्भोगाः॥’’
अर्थात्- ‘‘यदि पूर्व जन्म के कर्म अच्छे हैं तो उत्तम जाति, आयु और भोग प्राप्त होते हैं। जब मनुष्य शरीर त्याग करता है तब इस जन्म की विद्या, कर्म और पूर्व प्रज्ञा आत्मा के साथ जाती है और उसी ज्ञान और कर्म के अनुसार जन्म होता है यानी वैसे ही संस्कार जन्म के साथ प्रकट होते हैं।’’
पुनर्जन्म की पुष्टि वैज्ञानिक आधारों पर भी होती है। भौतिकी के पदार्थ के अविनाशिता के सिद्धान्तानुसार न तो पदार्थ की उत्पत्ति होती है और नहीं विनाश की। मात्र उसका रूपांतरण ही होता है। इस रूपांतरण की प्रक्रिया में ही नित्य नये दृश्य दिखाई पड़ते हैं। पदार्थों का रूपांतरण ही उनका पुनर्जन्म है। प्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक डा. रेना रुथ ने अपनी पुस्तक ‘‘रिइनकारनेशन एण्ड साइंस’’ में भौतिकविद् क्लीफार्ड स्वार्डस के सिद्धान्त का उल्लेख किया है कि पदार्थ एवं ऊर्जा दोनों ही परस्पर परिवर्तनशील हैं। ऊर्जा परिवर्तित हो सकती अदृश्य हो सकती है, पर नष्ट नहीं होती। उन्होंने डी.एन.ए. (डिऑक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड) को संस्कार वाहक माना है। उनकी मान्यता है कि ‘‘डी.एन.ए. संस्कारों के साथ ही अदृश्य जगत में मृत्युपरांत अदृश्य रूप में विद्यमान रहता है तथा जन्म के समय पुनः प्रकट होता है। अब तो पुनर्जन्म के सिद्धांतों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के लिए हमें सबएटामिक एन्टीयूनीवर्स जगत में प्रवेश करना होगा।’’
पदार्थों की तरह जीवात्मा भी शरीर का रूपांतरण करती है। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानिगृह्णाति नरोऽपिरोण। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यान्यानि संयाति नवानिदेही॥
अर्थात्- ‘‘जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर, दूसरे नये वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा भी पुराने शरीर को त्यागकर नयी देह धारण करता है। शरीर का नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता।’’
जन्मजात प्राप्त क्षमताएं एवं प्रतिभाएं इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि मनुष्य की अर्जित बौद्धिक विशेषताएँ इस जीवन तक ही नहीं रहतीं वरन् अलग जन्मों में भी बनी रहती हैं। विश्व भर में कितने ही बालक ऐसे हुए हैं जो अल्पायु में ही असामान्य प्रतिभा सम्पन्न देखे गये। आधुनिक ग्रामोफोन के आविष्कारक एवं विद्युत लैम्प के जन्मदाता अमेरिका निवासी टामस एल्वा एडीसन ने मात्र दस वर्ष की आयु में सियर, बर्टन एवं गिलन के महान ग्रन्थों एवं डिक्शनरी ऑफ साइंस का अध्ययन पूरा कर लिया। पन्द्रह वर्ष की आयु में वे एक स्थानीय पत्र के सम्पादक बने। सापेक्षवाद को जन्म देने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन के गणित के प्रश्नों की बौछार से सेकेन्डरी स्कूल के अध्यापक परेशान हो जाते थे तथा उत्तर देने में अपने को अक्षम पाते थे। 14 वर्ष की अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने भौतिक विज्ञान, बीजगणित, उच्च ज्यामिति जैसे विषयों में विशेषज्ञता प्राप्त कर ली।
माइकेल ग्रास्ट मिचिगन स्टेट यूनिवर्सिटी का प्रथम विद्यार्थी था जिसने मात्र 15 वर्ष की आयु में गणित जैसे क्लिष्ट विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। एल्मर स्पेरी ने दस वर्ष की आयु में मसाला पीसने की मशीन बनाई, पानी के चक्र का आविष्कार किया। रेल मार्ग पर चलने वाली तीन पहियों वाली पैडल की गाड़ी बनायी। ‘बोनेटेरेकी’ को दो वर्ष चार माह की आयु में 3500 शब्द याद थे एवं प्रसिद्ध कवियों की 100 कविताएँ कठस्थ थीं। उसका बौद्धिक स्तर (आई.क्यू.) 185 आँका गया। जो असाधारण प्रतिभा से भी 45 अधिक होता है। मास्को की इर्मासोखादभे नाम नौ वर्षीय बालिका अठारह भाषाओं के दो सौ गाने गाया करती थी। तीन वर्ष की आयु में ही उसने सभी प्रकार के संगीत में विशेषज्ञता अर्जित करली।
जर्मनी का जॉन फिलिप नामक दो वर्षीय बालक फ्रेंच, जर्मन और लैटिन भाषा धारा प्रवाह बोलता था। पांचवें वर्ष में उसने बाइबिल का ग्रीक भाषा में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया। छह वर्ष की आयु में वह बर्लिन की रॉयल एकेडेमी का सदय बना और पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। यह विश्व का पहला मेधावी बालक था जिसने इतनी कम आयु में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की हो। 19 वर्ष की अल्पायु में वह मर गया। जर्मनी का विलक्षण बालक ‘क्रिश्चियन फ्रेडरिक हीन केन’ जन्म के कुछ घंटों बाद ही बोलने लगा था। दो वर्ष की आयु में ही उसे बाइबिल के सभी प्रसंग याद हो गए। अमेरिकी बालक ‘विलियम जेम्स सिदिस’ दो वर्ष का था, तभी से पढ़-लिख सकता था। आठ वर्ष की उम्र में वह 6 विदेशी भाषाओं का जानकार था।
फ्रांस का जालुई कार्दियेक नामक बालक जन्म के तीसरे माह से ही वर्णमाला पढ़ने लगा था। तीन वर्ष की आयु में वह लैटिन भाषा पढ़ लेता था। फ्रेंच और अंग्रेजी भाषा का वह लैटिन अनुवाद भली-भांति कर लेता था। हीब्रू और ग्रीक भाषाओं पर भी उसका पूर्ण अधिकार था। सातवें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई। इंग्लैण्ड का विलियम हेनरी बेट्टी ग्यारह वर्ष की आयु में अभिनय के क्षेत्र में विख्यात हुआ। बचपन से ही वह शेक्सपीयर के ‘नाटक’ में हैमलेट की भूमिका बड़ी कुशलता से निभाता था। इस अल्पायु में एक बार वह लंदन के क्वेंट गार्डन के रंगमंच पर पहली बार अभिनय के लिए उतरा तो इतनी अधिक भीड़ हुई कि उसे हटाने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। उसे प्रत्येक अभिनय के लिए ग्यारह सौ रुपये प्राप्त होने लगे थे। मैकाले दो वर्ष की आयु में की पढ़ लिख सकता तथा बुजुर्गों जैसी बात करता था। आठवें वर्ष में उसने विश्व का इतिहास नामक पुस्तक लिखी।
प्रो. हार्वी फ्रिडमैन ने 10 वें वर्ष में इंजीनियरिंग में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। बिना मैट्रिक परीक्षा दिए ही उसने छट वर्ष की आयु में मैसाचुसेट्स इंजीनियरिंग कॉलेज में छह वर्षीय अभ्यास क्रम को पूरा कर लिया। जर्मनी का 9 वर्षीय बालक कार्लावट ने अपनी असाधारण प्रतिभा के कारण ‘हीलिपजिंग विश्व-विद्यालय’ में प्रवेश पाने में सफल हो गया। चौदह वर्ष की आयु में उसे पी.एच.डी. तथा सोलहवें वर्ष में ‘डॉक्टर ऑफ ला’ की उपाधि प्रदान की गई।
विदेशी में ही नहीं, भारत में भी अनेकों व्यक्ति पैदा हो चुके हैं जो बाल्यावस्था में ही विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न थे। शंकराचार्य ने सोलह वर्ष की आयु में भारत के सभी मूर्धन्य विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया। मुगल सम्राट अकबर ने तेरहवें वर्ष में ही राजगद्दी संभाली थी। वह एक कुशल प्रशासक सिद्ध हुआ। छत्रपति शिवाजी ने तेरह वर्ष की आयु में ही तोरण का किला जीत लिया। रविन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी पहली प्रसिद्ध पुस्तक 14 वें वर्ष में पूरी की थी। भारत की प्रथम महिला गवर्नर श्रीमती सरोजनी नायडू ने चौदह वर्ष की अल्पायु में चौदह सौ पंक्तियाँ की एक गम्भीर कविता की रचना की थी। श्रीनिवास रामानुज केवल 32 वर्ष जिये, पर संक्षिप्त अवधि में गणितज्ञ के रूप में उन्होंने विज्ञान जगत को उपलब्धियां दीं, वे आज गणित शास्त्र का मूल आधार बनी हुई हैं।
बिना किसी प्रशिक्षण, अध्ययन के बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न उपरोक्त व्यक्तियों के जीवन क्रम का अवलोकन करते हैं तो उनके असामान्य होने का प्रत्यक्ष कोई कारण हाथ नहीं लगता है। पुनर्जन्म के सिद्धान्त को जोड़ देने भीतर से गुत्थी सुलझ जाती है। कर्मों का फल इसी जीवन में मिले यह आवश्यक नहीं है। वह विशिष्ट प्रतिभा, योग्यता अथवा अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियां साथ लिए दूसरे जीवन में प्रकट होता है। प्रचलित भाषा में इसे ही ‘भाग्य’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। जन्म से ही प्राप्त अनुकूलताओं अथवा प्रतिकूलताओं का भी कोई प्रत्यक्ष कारण ढूंढ़ने पर नहीं मिलता है। इनकी व्याख्या कर्मफल एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्तों के आधार पर ही की जा सकती है। पुरुषार्थ के बलबूते अनुकूल परिस्थितियाँ, योग्यता, क्षमता अर्जित कर लेना सम्भव है। एक सीमा तक प्रारब्धों को भी बदला जा सकता है। वातावरण एवं आनुवाँशिकी का भी एक सीमा तक प्रभाव पड़ता है। इतने पर भी उपरोक्त प्रमाण पुनर्जन्म के सिद्धांतों को ही प्रतिपादन करते हैं।
भले-बुरे कर्मों का प्रभाव न केवल इस जीवन तक वरन् अगले जीवन में भी संस्कारों के रूप में भी परिलक्षित होता है। अर्जित योग्यता एवं प्रतिभा भी सूक्ष्म संस्कारों के रूप में दूसरों जन्म में भी बनी रहती है। वह न केवल इस जीवन में वरन् दूसरे जीवन में भी विकास अथवा पतन का कारण बनती है। वैचारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टियों से भी ज्ञान की महत्ता भली-भांति प्रमाणित है। इस तथ्य को समझने के पुनर्जन्म के सिद्धान्त न केवल सहायक हैं, वरन् सद्प्रेरणाएं देने में भी पूर्ण रूपेण सक्षम हैं।
“संयम से ही विकास होता है। वृक्ष की जड़ें पृथ्वी के साथ जकड़ी हुई हैं,” इसीलिए वह ऊंचा होकर फलों से शोभा पाता है। वृक्ष कहे कि यह जड़ों का बन्धन किसलिए? मुझे इन्हें तोड़कर स्वच्छंद ऊपर उठने दो, तो क्या ऐसा होने पर वृक्ष सुरक्षित रह सकेगा? यह पृथ्वी से जकड़ा हुआ है। इसीलिए ऊंचा उठ सका। सितार के तार बंधे होने के कारण ही दिव्य-संगीत सुना सकते हैं। यह सब संयम की महिमा है। संयम बिना सुसंस्कृति नहीं, विकास नहीं।”
-रवीन्द्रनाथ ठाकुर
स्थूल दृष्टि से देखा जाये तो मानवी काया पंच-कलेवरों से विनिर्मित ही प्रतीत होती है। जब थोड़ा और गहराई में चिन्तन किया जाता है, तो उसके कण-कण में संव्याप्त चेतना के भी दर्शन होते हैं। पर बात यहीं तक सीमित नहीं है। चेतना विश्व ब्रह्माण्ड के विस्तार जितनी असीम है। अदृश्य जगत के वास्तविक दृश्य चलचित्र को हम चेतना जगत में परिभ्रमण कर स्वप्नों के माध्यम से देख सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय मनीषी भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते रहे हैं।
स्वप्नों का अपना स्वतंत्र विज्ञान है। इस तथ्य पर वैज्ञानिकों ने अब ध्यान दिया है एवं परामनोविज्ञान की अनेकानेक शोधों का केन्द्र उन्होंने इसी विषय की बनाया है। परोक्ष रूप से विज्ञान भी अब सूक्ष्म जगत की सत्ता, उसकी अलौकिकता को महत्व देने लगा है। स्वप्न वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि कोई भी घटना अपने दृश्य रूप में आने से पूर्व अन्तरिक्ष जगत में विकसित होने लगती है। सूक्ष्म जगत में जो भी होने जा रहा है उसकी पृष्ठभूमि तैयार होने लगती है। मानवी अचेतन यदि थोड़ा भी परिष्कृत हो तो इन हलचलों को एवं परिणाम स्वरूप संभावित घटनाओं का पूर्वाभास कर भविष्यवाणी कर सकता है। यह तथ्य मन की अलौकिकता तथा पवित्र ,सात्विक, उच्चस्तरीय व्यक्तित्व की महता को उद्घाटित करता है। यदि रात्रि को आने वाले इन संदेशों का बुद्धिमतापूर्ण विश्लेषण किया जा सके तो दैनिक जीवन की अनेकानेक समस्याओं को सुलझाने की एक कुंजी हस्तगत हो सकती है। कार्लजुंग ने फ्रायडवादी मान्यताओं का खण्डन कर इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है कि स्वप्न दमित वासनाओं के काल्पनिक चित्र नहीं, वरन् जीवन की गहराइयों से भरे सूत्र हैं। ये मन का विनोद नहीं, वरन् भूत और वर्तमान की विवेचना तथा भवितव्य के संकेतों की एक माइक्रो फिल्म हैं।
प्रसिद्ध मनःचिकित्सक एवं स्वप्न अनुसंधानकर्त्री डा. ऐन फैराडे अपनी पुस्तक ‘ड्रीमपॉवर’ में स्वप्नों को थ्री स्टेज प्रोसेस बनाती हैं। उनके अनुसार जागृतावस्था की अपेक्षा स्वप्नावस्था में हमारा मस्तिष्क प्रायः अधिक चतुर, बुद्धिमान एवं निर्णायक बुद्धि से सम्पन्न होता है। नोबेल पुरस्कार विजेता-प्रसिद्ध फिजियोलाजिस्ट डा. ओटोलो का उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा है कि एक रात्रि डा. ओटोलो को स्वप्न आया कि वे प्रयोगशाला में अपनी परिकल्पना के अनुसार प्रयोग कर रहे हैं। अचानक उनकी आँख खुल गयी। उस समय रात्रि के दो बजे थे। तुरन्त उठकर वे प्रयोगशाला गए और स्वप्न के निर्देशानुसार उपकरण लगाकर प्रयोग आरम्भ किया। रात्रिभर कार्यरत रहने के बाद सवेरे जब वे प्रयोगशाला से निकले, प्रसन्नचित्त थे। उनका प्रयोग सफल रहा। इसी सिद्धान्त ‘केमीकल ट्रांसमीशन आफ नर्व इम्पल्स’ पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।
यही अनुभूति रसायनशास्त्री फ्रीडरिक कैकुले की भी है। बेन्जीन अणु की संरचना ज्ञात करने के लिए उनका अध्ययन अपनी चरम सीमा पर था। ऐसे ही व्यस्त दिनों में थके मांदे वे सो रहे थे कि उन्होंने स्वप्न में एक साँप को देखा जो अपनी पूँछ को मुँह में दबाकर गोलाकार हो गया था। बेन्जीन अणु की संरचना तब तक एक सीधी रेखा में ही बनाई जाती थी जो ठीक नहीं बैठती थी। इसी संकेत से डा. कैकुले ने बेंजीन की रिंग स्ट्रक्चर की परिकल्पना की घोषणा की जिसने कार्वनिक रसायन के क्षेत्र में एक क्रान्ति ला दी और आधुनिक रसायन विज्ञान की आधारशिला रखी।
स्वप्न द्वारा व्यक्ति के मन में छिपे भावों का रहस्योद्घाटन भी होता है। मन का अन्तर्द्वन्द्व स्वप्न के माध्यम से प्रकट होकर अपना हल ढूंढ़ता है। जो भी इन संकेतों को समक्ष लेता है, उसे मनोविकारों से छुट्टी मिल जाती है। साथ ही अपने व्यक्तित्व को समुन्नत परिष्कृत बनाने में सहायता मिलती है। डा. फैराडे स्वयं अपना उदाहरण देते हुए लिखती हैं कि “मैंने अपने स्वप्न में दो मकानों का दृश्य देखा। एक पहाड़ी पर आधुनिक मकान जो पूर्णतः शीशे का बना हुआ था तथा दूसरा समुद्र के किनारे बनी सुविधा सम्पन्न कुटिया। मुझे ऐसा संकेत मिला कि इनमें से किसी एक को मैं चुनूं।’’ विश्लेषण करने के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचीं कि यह स्वप्न उनके मन की इस द्विधा को ही व्यक्त कर रहा था कि आधुनिक शाही जीवन अपनाना चाहिये या प्राकृतिक समरसता सौंदर्ययुक्त जीवन। आधुनिक वैभवशाली जीवन तो शीशे जैसा जल्दी टूटने वाला भी हो सकता है। समुद्र तट के प्राकृतिक जीवन में समुद्र के ज्वार भाटों का खतरा है। वे इसी निष्कर्ष पर अंततः पहुँचीं कि दैनिक जीवन के व्यवधानों (ज्वार-भाटों) से टकराकर ही जीने वाला प्राकृतिक सादगीपूर्ण जीवन इन्हें अपनाना चाहिए।
स्वप्न आते तो सभी को हैं, पर लम्बे समय तक याद बहुत कम को रह पाते हैं। जिस स्वप्न का अर्थ न लगाया जा सके, डा. फैराडे के अनुसार वह बन्द लिफाफे जैसा है। हमारा अचेतन मन प्रत्येक रात्रि कुछ न कुछ संदेश लेकर आता है। हम प्रयास करें तो अपनी समस्याओं का उनमें हल पा सकते हैं, भावी जीवन की घटनाओं का पूर्वाभास पा सकते हैं एवं अपने जीवन को सुसंस्कृत समग्रतापूर्ण बनाने के सूत्र उनमें ढूंढ़ सकते हैं।
आखिर स्वप्न जीवन में क्यों जरूरी हैं? इस प्रश्न पर जब वैज्ञानिकों ने स्थूल दृष्टि से विचार किया तो वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वप्नमय निद्रा से यदि मानव को निरंतर जगाता रखा जाये तो वह शीघ्र पागल हो जावेगा। डा. क्लीटमैन ने इलेक्ट्रोन सेफेलोग्राफी द्वारा स्वप्न एवं निद्रा पर जो कार्य किया है, वह अब एक प्रामाणिक शोध प्रबन्ध माना जाता है। जब मनुष्य अर्ध-निद्रा से गहन निद्रा एवं फिर स्वप्नमय निद्रा की स्थिति में प्रवेश करता है तो उसकी मस्तिष्कीय विद्युत के परिवर्तन एवं आँख की गतिविधियाँ (रैपीड आई मूवमेण्ट्स) बाहर इसके संकेत दे देती हैं। रिकाडिंग करते वक्त यदि स्वप्नमय निद्रा में जाने के पहले ही व्यक्ति को जगा दिया जाये एवं ऐसा निरंतर किया जाता रहे तो शीघ्र ही वह चिड़चिड़ा, भ्रमित बुद्धि का एवं तनावग्रस्त हो जायेगा। यही स्थिति उसे पागलपन की ओर ले जा सकती है। ये प्रयोग इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि स्वप्नावस्था में ही मस्तिष्क अपना चेतनात्मक पोषण पाता है। अचेतन अवस्था जीवनी शक्ति का स्रोत है।
अक्सर एक ही स्वप्न, किसी को बार-बार दिखाई देता है। सी.जी. जुंग ने इसी आधार पर “यूनिवर्सल पैटर्न आव कलेक्टिव काशंसनेस” सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उनकी मान्यता है कि स्वप्नों में किसी घटना की प्रतीक रूप में दूसरी घटनाऐं इतनी बारीकी के साथ आती रहती हैं कि सारा स्वप्न एक क्रम से चलते हुए अन्त हो जाता है। स्वप्नों का हर पक्ष हमारी सूक्ष्म से सूक्ष्म भावनाओं को पूरी कुशलता से उद्घाटित करता है।
आत्मोद्देश्य को समझने और निजी प्रेरणा प्राप्त करने के लिए स्वप्नों से अधिक अनुभवी सहायक कोई नहीं हो सकता। हमारी समस्याओं का हल स्वप्नों में से मिल सकता है। इस प्रक्रिया को जुंग इन्द्रियातीत क्रिया की संज्ञा देते हुए कहते हैं कि इसमें स्वप्न दृष्टा स्वयं को भी कल्पना चित्र के रूप में उपस्थित देखता है। अचेतन में से उभर कर कल्पनात्मक निर्देश देने वाली मानवी मन की इस अलौकिक क्षमता ने मानसिक कुण्ठाओं के निवारण तनावजन्य व्याधियों का उपचार के कई नये आयाम वैज्ञानिकों के समक्ष खोलकर रख दिए हैं। निद्रा के समय मस्तिष्क के सिरोटोनिन- मेलेटोनिन नामक एन्जाइम्स का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि तनाव नाशक औषधियाँ ‘रेम’ निद्रा अर्थात् स्वप्नावस्था की अवधि में कमी लाती है, जिसके दूरगामी परिणाम मानसिक क्षमताओं में कमी, मनोविकारों के बाहुल्य एवं व्यक्तित्व के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव के रूप में निकलते हैं। इससे स्वप्नों की आवश्यकता, महत्ता एवं बहुप्रचारित तनावनाशक औषधियों के वे घातक दुष्परिणामों की एक संक्षिप्त झांकी मिलती है।
मानव मन जितना शुद्ध और पवित्र है, उसके स्वप्न उतने ही स्पष्ट, सुखद और भविष्य के गूढ़ रहस्यों की भी स्पष्ट ध्वनि देने वाले होते हैं। जब मनुष्य शारीरिक दबाव, रोग, अपवित्रता की दृष्टि में स्वप्न देखता है तो वे भयानक और दुखान्त होते हैं। इससे यह प्रामाणित होता है कि चिदाकाश अर्थात् मूल चेतना नितान्त शुद्ध और पवित्र है। उसी का एक घटक यह आत्मा भी है, जिसे अध्यात्म मान्यतानुसार उतना ही शुद्ध होना भी चाहिये। इस शुद्धावस्था की एक क्षणिक झलक ही जब जीवन में किसी महत्वपूर्ण भाग का दृश्य दिखा सकती है तो अपना सारा जीवन नितान्त शुद्ध और भौतिक कामनाओं की ओर से हटाकर अपने आगामी जीवन की घटनाओं का पूर्वाभास पाया जा सकता है। शैशवावस्था, में बालकों के मुँह से निकली पूर्वाभास की कई घटनायें उनको निष्कलंक पवित्रात्मा होने के कारण ही सत्य सिद्ध होती देखी गई हैं।
डा. क्लीटमैन के अनुसार अस्त-व्यस्त स्वप्नों के कारण प्रायः भोजन की गड़बड़ी होती है। उत्तेजक पदार्थों का सेवन शरीर की स्थूल प्रकृति को भी उद्वेलित कर देता है। इसीलिए स्वप्न साफ दिखाई नहीं देते क्योंकि चेतना धूमिल हो जाती है। जैसे-जैसे चेतना गहराई में उतरती जाती है, सार्थक स्वप्नों का क्रम चल पड़ता है।
कल्पना में डूबा मन जो भी दृश्य देखता है, उन्हें स्वप्नों की संज्ञा नहीं दी जा सकती। ये कपोल कल्पित झूठे स्वप्न मात्र कौतुक ही होते हैं। जब यही मन सूक्ष्म सत्ता की ओर अभिमुख होता है तो स्वप्नों के झरोखों से उसे अदृश्य, अतीत या आगत के सही सच्चे घटनाक्रम दिखाई देते हैं। मन जितना सूक्ष्मग्राही, परिष्कृत, सात्विक एवं संयमी होगा सपने उतने ही सच्चे होंगे।
जिस प्रकार यह स्थूल जीवन अनेक प्रकार की जटिलताओं से भरा पड़ा है। उसी तरह हमारा सूक्ष्म जीवन- सूक्ष्म शरीर अनेकों रहस्यों से ओत-प्रोत है। स्वप्न जगत ऐसा ही जटिल उलझनों से पूर्ण है- जैसा कि स्थूल जीवन। जीवन की समस्याओं से निपटने हेतु हमें संसार क्षेत्र में विचरण करना होता है। उसी तरह अंतर्जगत की गुत्थियों का हल हमें स्वप्नों की भूल-भुलैयों में प्रवेश कर जानना, समझना सम्भव है। स्वप्नों को त्रिकाल दर्शन की विद्या कह सकते हैं। भूत की स्मृतियाँ, वर्तमान की परिस्थितियाँ एवं भावी संभावनायें सभी स्वप्न विश्लेषण से जानी जा सकती हैं।
स्वप्नं आत्म-चेतना की आँशिक अनुभूति हैं जो यह प्रामाणित करती हैं कि जीवात्मा अपना विकास करके अतीन्द्रिय लोक को पा सकती है। आत्म साक्षात्कार का मार्ग और भी सरल बना सकती है।
विराट् चेतना सर्वदर्शी, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ है। उसी का एक अंश होने के नाते जीवात्मा भी यही गुण अपने अन्दर विकसित कर सकती है। डा. क्लीटमैन के अनुसार स्वप्न ही वह राजपथ है, जिस पर चलकर मनुष्य स्वयं को समग्र पूर्ण बना सकता है, मस्तिष्क को चेतना के पोषण द्वारा जीवनी शक्ति प्रदान कर व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकता है।
हजरत मुहम्मद के अनेक विरोधी थे। पर वे उन सबकी परवाह न कर निरन्तर अपना धर्म-प्रचार का कार्य करते रहते थे। विरोधी उन्हें इससे विरत करने के लिये तरह-तरह के प्रयास करते थे।
एक बार हजरत मुहम्मद अपने घर जा रहे थे तो उनके एक विरोधी ने ऊपर गन्दा कूड़ा-कचरा उनके सिर पर फेंक दिया। मुहम्मद साहब ने कोई विरोध नहीं किया और चुपचाप अपने रास्ते पर आगे बढ़ गये। अब उस व्यक्ति का यह नित्य का क्रम बन गया। जब भी हजरत मुहम्मद वहाँ से गुजरते, वह ऊपर से कूड़ा फेंक देता। अनेक दिनों तक ऐसा होता रहा। एक दिन सहसा इस क्रम का उल्लंघन हो गया। मुहम्मद साहब ने पड़ौसियों से पूछा ‘भाई वह व्यक्ति जो मुझ पर कूड़ा डालता था आज दिखाई नहीं दे रहा।’
पड़ौसियों ने बताया कि वह बहुत बीमार है। यह सुनते ही मुहम्मद साहब तुरन्त उसके घर गये, उसे दवा दिलवाई और कई दिनों तक उसकी सेवा सुश्रूषा करते रहे।
मुहम्मद साहब की इस उदारता और विशाल हृदयता ने विरोधी का मन जीत लिया। उसने उनके पैरों पर गिर कर अपने दुष्कर्मों के लिये क्षमा माँगी और धर्म-प्रचार में उनका सहायक बन गया।
आराम से रहना और मजे की जिन्दगी जीना ही आदमी का लक्ष्य बना हुआ है। बड़ा भी उसे ही समझा जाता है जिसे अपने शरीर से कम से कम श्रम करना पड़े। न जाने किन कारणों स यह धारणा बन गई है कि बिना श्रम किये, बिना कष्ट उठाये सुविधापूर्ण जीवन व्यतीत करना ही बड़प्पन की निशानी है। इसी धारणा या मान्यता के परिणाम स्वरूप लोग अधिक से अधिक शौक मौज से भरे दिन काटना चाहते हैं तथा विलासिता में निमग्न रहने के साधन ढूंढ़ते हैं। तथाकथित बड़े लोगों की आजकल यही प्रवृत्ति है। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए वे अधिक से अधिक धन और सुविधा साधन इकट्ठे करते रहते हैं। साधारणजन भी इन्हीं को अपना आदर्श मान कर अधिक से अधिक निष्क्रियता भरा जीवन जीने के लिए लालायित रहते हैं।
यह निष्क्रियता गरीब को और गरीब तथा सम्पन्न को और विलासी बनाती जाती है। जीवन स्फूर्ति के चिह्न उनमें से विलुप्त होते चले जाते हैं। छोटा और दरिद्र कहा जाने वाला वर्ग कुछ तो समाज व्यवस्था में आई विसंगतियों के कारण अपनी स्थिति से ऊपर नहीं उठ पाता और कुछ उत्साह तथा उमंगों की दरिद्रता के कारण दिन-दिन गिरना चला जाता है। इनमें भी आलस्य और प्रमाद प्रमुख कारण हैं, जो व्यक्ति को अकर्मण्य और निष्क्रिय बनाते हैं तथा इन कारणों से वह न अधिक कुछ कमाने की चेष्टा करता है न अधिक कुछ पाने का पुरुषार्थ। जब भूख विवश करती है, आवश्यकता अपरिहार्य बन जाती है तब वह कुछ करने को खड़ा होता है और उतना ही करता है जितना करने से केवल पेट का गड्ढा भर जाता है। इसके बाद उसे भी आलस्य, प्रमाद, व्यसन आदि की, गपशप, आरामतलबी और आवारागर्दी की सूझती है।
अपने आपके सम्बन्ध में बेखबर इस तरह के लोग जैसा गन्दा गलीज जीवन व्यतीत करते हैं उसे देख कर तरस ही आता है। इस समय को कदाचित वे किसी उपयोगी कार्य में ही लगा दें तो उससे जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में कुछ सहायता मिल सकती है। पिछड़ेपन का मुख्य कारण निर्धनता और अशिक्षा ही है पर सब से बड़ा करण है मानसिक बौनापन, जिसके रहते व्यक्ति विशेष कुछ करने के लिए उत्साहित नहीं होना। कहना नहीं होगा कि इसी व्यापक छूत की बीमारी के कारण हमारा देश पिछड़ेपन के घोर घने अन्धकार में डूबा पड़ा है।
प्रकृति ने मनुष्य को ही नहीं प्राणीमात्र को अनवरत सक्रिय रहने की प्रेरणा देते हुए सृजा है। आरामतलबी या आलसीपन ये दोनों ही वृत्तियां चेतन प्राणी की मूल प्रकृति के विपरीत हैं। यदि अंतःकरण को दुर्बुद्धि ने मूर्छित न कर दिया हो तो उससे सदैव सक्रिय पुरुषार्थ करने, साहसिकता का परिचय देने की शौर्य प्रवृत्ति उमड़ती रहेगी। पराक्रम और पुरुषार्थ से ही सच्चा आनन्द तथा सन्तोष मिलता है, इसे पक्षी भी अच्छी तरह जानते हैं तथा इस जानकारी को अपने जीवन क्रम में उतार कर तदनुकूल आचरण करते रहते हैं। उदाहरण के लिये पक्षियों में से कई ऐसे होते हैं जो बदलती ऋतुओं का आनन्द लेने के लिए लम्बी यात्राएँ करते हैं। इसके लिए उन्हें भारी श्रम करना पड़ता है और बड़ा जोखिम उठाना पड़ता है। इसके लिए मनोयोग भी कम नहीं जुटाना पड़ता है। यदि वे सोचने लगें कि बेकार झंझट में क्यों पड़ा जाए? चैन की जिन्दगी क्यों न गुजारी जाए? तो वे इस प्रकार की साहसिकता का परिचय देने से मिलने वाले आनन्द और अतिरिक्त प्रसन्नता का अनुभव कहाँ कर पाते?
इस तरह का आनन्द प्राप्त करने के लिए उनके भीतर से ऐसी उमंग उठती है कि वे उस उमंग को पूरा किये बिना नहीं रहते। पेट तो कहीं भी भरा जा सकता है और दिन भी काटे जा सकते हैं। किन्तु ऐसा जीना तो मृत जैसा जीना होता है। यह मरी हुई जिन्दगी है जिसे मनुष्य भले ही पसन्द करे, पशु-पक्षी से लेकर कीट-पतंग तक, जो प्रकृति प्रेरणा के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं कदापि इस तरह का जीवन पसंद नहीं करते।
कुछ पक्षी तो ऐसे होते हैं जो अपनी साहसिक यात्राओं से मनुष्य को भी मात कर देते हैं। संभवतः वे इस तरह की यात्राओं द्वारा मनुष्य को भी उत्साही परिश्रमी तथा साहसी और महत्वाकांक्षी बनने की प्रेरणाएँ देते हैं। उदाहरण के लिए सितम्बर के सप्ताह में भारत में ऐसे अनेक रंग बिरंगे पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो गर्मी और बरसात में यहाँ नहीं होते, ये पक्षी जर्मनी, साइबेरिया, चीन, तिब्बत तथा मध्य एशियाई देशों से हजारों मील दूर की यात्रा करके यहाँ आते हैं। इन पक्षियों में तिघाटी चैती, हंस, सुरखाव, लालसर, मुर्गावी, खंजन आदि प्रमुख हैं। विशेषज्ञों का कथन है कि इस तरह के करीब दो हजार प्रकार के पक्षी इन यात्राओं पर निकलते हैं। इसमें पैर के अँगूठे के बराबर ‘स्वेटपेनिकल’ जैसे पक्षी भी होते हैं तथा पच्चीस पौंड भारी आदम कद के सारस जैसे बड़े पक्षी भी होते हैं। इनमें से अधिकांश पक्षी उत्तरी ध्रुव के आसपास वाले इलाकों में रहने वाले होते हैं, आहार की सुविधा, ऋतु प्रभाव से बचाव और सैर सपाटे का आनन्द इन पक्षियों की यात्रा का उद्देश्य रहता है, आश्चर्य की बात तो यह है कि ये पक्षी अपनी यात्रा अवधि पूरी होने के बाद अपने स्थानों पर वापस लौट जाते हैं तथा जिन पेड़ों पर घोंसले बनाकर रह रहे होते हैं, वापस उन्हीं में जा बसते हैं। भारत में भी यहाँ वहाँ मारे-मारे नहीं फिरते, बल्कि यहाँ भी वे अपने नियत स्थानों पर आकर डेरा बनाते तथा रहते हैं और जब तक जीवित रहते हैं, उन्हीं क्षेत्रों में नियत स्थान पर निवास करते हैं।
इन पक्षियों की ऊँची उड़ानों और लम्बी यात्राओं का जो अध्ययन किया गया है, उनसे प्राप्त निष्कर्ष विस्मय विमुग्ध कर देते हैं। ‘ ‘बागटेल’ पक्षी 200 मील की यात्रा कर बम्बई के निकट एक मैदान में उतरता है और फिर वहाँ से विभिन्न स्थानों के लिए बिखर जाते हैं। ‘गोल्डन फ्लावर’ नामक पक्षी का मूल निवास अमेरिका है। पतझड़ आरम्भ होते ही वे भारत की ओर प्रयाण कर देते हैं तथा यहाँ विश्राम करते हैं। पतझड़ समाप्त होते ही वे वापस अपनी मातृभूमि की ओर उड़ चलते हैं आते समय वे समुद्री क्षेत्रों के ऊपर उड़ते हैं तथा वापस लौटते समय थल मार्ग अपनाते हैं, उनके घोंसले प्रायः अलास्का में होते हैं, वहीं वे अण्डे देते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में वे करीब ढाई हजार मील की यात्रा कर लेते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा लगभग 3000 मील है। वे इतनी लम्बी यात्रा कर करीब पृथ्वी की परिक्रमा ही लगा जाते हैं।
आर्कटिक टिटहरी इन सब घूमन्त पक्षियों में आगे है। वह उतरी ध्रुव के समीपवर्ती क्षेत्रों में रहती है तथा पतझड़ ऋतु में दक्षिणी ध्रुव पहुँच जाती है। बसन्त आते ही वह वापस उतरी ध्रुव लौट आती है। जर्मनी के बगुले चार महीने की अवधि में 4000 मील की यात्रा पूरी करते हैं। रूसी बतखें भी करीब 5000 मील का सफर कर लेते हैं। ये पक्षी औसतन 200 मील प्रतिदिन उड़ते हैं। सबसे अधिक उड़ान भरने वाला पक्षी हैटर्नस्टार जो प्रतिदिन लगभग 500 मील उड़ते हैं और वह भी 17 हजार फीट की ऊंचाई पर उसकी ऊँची उड़ान केवल समुद्री क्षेत्र पर ही कम होती है किन्तु फिर भी तीन हजार फुट ऊँचे तो तब भी वह उड़ते हैं।
इतनी खतरनाक जोखिम भरी और कष्ट साध्य उड़ान भरने के पीछे क्या कारण है? क्या इनके लिए ये उड़ानें भरना अनिवार्य है? सचमुच इनके बिना पक्षियों का कोई गुजारा नहीं? आदि प्रश्नों का उतर प्राप्त करने के लिए विशेषज्ञों ने कई तरह से अध्ययन किये हैं। यह एक विचारणीय पहलू है भी सही कि आखिर ऐसा क्या कारण है, जिसके लिए उन्हें जान जोखिम में डालने वाला यह अभियान चलाना पड़ता है? इस सम्बन्ध में अध्ययन करने पर विज्ञानियों ने पाया है कि बाह्य दृष्टि से उनके सामने ऐसी कोई बड़ी कठिनाई नहीं होती, जिसके करण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की, ऋतु प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे अन्य पक्षी भी तो इन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर इन सैलानी पक्षियों के लिए ही ऐसी कौन-सी मुसीबत पैदा हो जाती है कि उन्हें यात्रा का सरंजाम जुटाना पड़ता है?
इस प्रश्न का उतर देते हुए वैज्ञानिक बताते हैं कि उस समय, जब पक्षियों के यात्रा पर निकलने का समय आता है तब उनके भीतर कुछ विशेष रसों का स्राव होता है। यात्रा आरम्भ होने के पूर्व इन पक्षियों की वृक्क ग्रन्थियों में कुछ रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन अपने समय पर काम वासना के लिए बेचैनी उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार की बेचैनी उत्पन्न करने वाले रस उन दिनों स्रवित होने लगते हैं। इन बढ़े हुए रसों के कारण पक्षी लंबी यात्राओं के लिए बेचैन होने लगते हैं। इन निष्कर्षों को प्राप्त करने के लिए किये गए प्रयोगों के दौरान कुछ पक्षियों को पिंजड़े में बन्द रखकर भी देखा गया। जब यात्रा का समय आया तो पाया गया कि पिंजरे के भीतर रहते हुए भी पक्षी छट-पटाने लगते हैं। यात्रा के लिए उमंग उत्पन्न करने वाले हारमोन्स न केवल यात्रा की प्रेरणा उत्पन्न करते हैं बल्कि उसके लिए शरीर में आवश्यक साधन व्यवस्था भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित साधन न जुट सकने की क्षति पूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी, साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय और दिशा का ज्ञान तथा नियत स्थान की पहचान जैसी अनेक अद्भुत विशेषताएं इन पक्षियों की होती हैं।
‘वाइल्ड लाइफ रिसर्च इन्स्टीट्यूट’ के निर्देशक डा. जियाफ्रे मैथ्यूस के अनुसार इन पक्षियों के पास एक विशेष प्रकार की जैविक घड़ी होती है, जो समय आने पर अपना अलार्म बजा देती है। कनाडा के अल्वर्ट विश्व विद्यालय में किये गए प्रयोगों में भी इस जैविक घड़ी की बात पुष्ट होती है। इन पक्षियों में समय सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न करने लिए कुछ पक्षियों को पिंजरे में बन्द रखा। उन्होंने पिंजरे के सामने मोमबत्तियां जलाकर दिन लम्बे होने का भ्रम पैदा करने की चेष्टा की। शुरू में तो पक्षी कुछ क्षणों के लिए बहकावे में आ गए परन्तु कुछ ही क्षणों बाद वे शान्त हो गए। वस्तुस्थिति उनकी समझ में आ गई।
ऐसी ही जैविक घड़ी प्रकृति ने मनुष्य में भी स्थापित कर रखी है। इस घड़ी से जीव चेतना अपने आप ही समय-ज्ञान प्राप्त करती रहती है और नियत समय पर सोने, जागने, भोजन करने, अभ्यस्त नित्यकर्म निबटाने तथा सोचने-समझने की प्रेरणा देती रहती है। पक्षियों की काया में प्रकृति द्वारा की गई व्यवस्था के परिणाम स्वरूप ही उनके शरीर, मन और अंतर्मन इस प्रकार के समस्त साधन जुटाते रहते हैं, जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया पूरी होती रहती है और वे हजारों मील की यात्रा कर वापस अपने मूल-स्थान पर वापस लौट आते हैं। दिशा ज्ञान सम्बन्धी विशेषता का अध्ययन करने के लिए एक कृत्रिम अन्तरिक्ष ग्रह से इन पक्षियों का निरीक्षण किया गया तो पता चला कि तारों को स्थान बदलते रहने पर भी पक्षियों ने उसी दिशा में उड़ना जारी रखा, जिसमें वे उड़ते थे। इससे सिद्ध होता है कि लम्बी उड़ानें भरने तथा आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के लिए पक्षी आत्म-निर्भर हैं, इसके लिए उन्हें किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
कुल मिला कर प्रकृति ने इन पक्षियों को उड़ने तथा सक्रिय जीवन व्यतीत करने की भरपूर सुविधा तथा व्यवस्था दे रखी है। ऐसा नहीं होता कि कोई प्राणी आलसी और विलासी बन कर अपनी प्रतिभा को नष्ट करे। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुन्दर दृश्य देखें और वहाँ के ऋतु प्रभाव एवं आहार-बिहार और हर्षोल्लास का आनन्द उठाते हुए अपनी क्षमता तथा योग्यता को परिपुष्ट करें, मनुष्य के लिए भी उसका यही सन्देश है। किन्तु श्रेष्ठ होने का अहंकार पालकर उसने आरामतलबी की घातक प्रवृत्ति को पाल लिया है, जो हर दृष्टि से उसका अहित ही करती है।
कुण्डलिनी चिन्मयी, ज्ञान स्वरूपा एक शक्ति का नाम है जिसे योग सम्बन्धी शास्त्रों में साढ़े तीन कुण्डल डाले सर्पिणी के रूप में अलंकारिक ढंग से वर्णित किया गया है। इसके तीन कुण्डल-इच्छा, ज्ञान और क्रिया की तीन धारायें हैं। कुण्डलिनी को ज्ञान स्वरूपा होने के कारण सरस्वती भी कहा जाता है तो पश्यन्ती, मध्यमा, बैखरी प्राणियों के तीन पूरे एवं परा आधा कुंडल मिलाकर साढ़े तीन लपेट कहे जाते हैं। इसी प्रकार आत्मा की तीन अवस्थायें- जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति या विश्व, तेजस् प्राज्ञ तीन अवस्थायें, ॐकार की अकार,उकार, मकार तीन मात्राएं प्रकृति की शक्तियों को सत्, रज, तम तीन गुण वाली होने से इन्हें कुण्डलिनी के तीन कुण्डल कहा जाता है और सभी शक्तियों का उद्भव एवं विलीनीकरण परब्रह्म से होने के कारण उसको आधी मात्रा या आधा कुण्डल कहा जाता है- ऋग्वेद में कुण्डलिनी को साढ़े तीन शक्तियों वाले विष्णु के तेज के रूप में कहा गया है-
सप्तार्ध गर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि। ये धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परिभवन्ति विश्वतः॥ (ऋग्वेद मंत्र 1, अ. 22, सूक्त 164, मंत्र 36)
अर्थ- भुवन के व्यापक विष्णु का तेज, साढ़े तीन गर्भयुक्त शक्तियाँ सर्वतोदिशा विभिन्न धर्मों में स्थित हैं अर्थात् अनेक रूपों में अवस्थित है। जो बुद्धि की वृत्तियों और मन द्वारा ज्ञान प्राप्त मनुष्य हैं, वे सर्वत्र सबका पराभव करते हैं।
योग शिखोपनिषद में चिन्मयी कुण्डलिनी महाशक्ति को नमन करते हुए कहा गया है-
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रमण्डलात्। मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने॥ (योग शिखोपनिषद् 6,3)
अर्थ- सुषुम्ना, कुण्डलिनी, चन्द्रमण्डल से झरने वाली सुधा और मन की उन्मनी अवस्था, चिन्मयी महाशक्ति तुझको नमन करता हूँ।
भावनोपनिषद् में क्रिया-शक्ति को पीठ, ज्ञान शक्ति को कुण्डलिनी एवं इच्छा शक्ति का शरीर रूपी गृह की स्वामिनी महात्रिपुर सुन्दरी कहा गया है। इच्छा, ज्ञान, क्रिया ये तीन और आधा चिद्रूप ये साढ़े तीन कुण्डल उसके कहे जाते हैं।
मानव-देह की सर्वोत्कृष्टता उस चैतन्य शक्ति कारण ही है जो सब मनुष्यों में जन्म से कुण्डलिनी शक्ति के रूप में विद्यमान है।समष्टिगत प्राण को ही चितिशक्ति कहा जाता है। चिति शक्ति का व्यष्टि रूप कुंडलिनी कहा गया है। मनुष्य देह को यदि एक चेतन रेडियो यन्त्र के समान माना जाय तो समष्टिगत चेतन शक्ति को ट्रान्समीटर द्वारा प्रसारित विद्युत तंरगों का वैद्युत्मण्डल कहा जा सकता है।
देहस्थ कुण्डलिनी शक्ति जागृत होने पर व्यक्ति का समष्टिगत चेतना से सम्बन्ध जुड़ जाता है। कुण्डलिनी जागरण को आध्यात्मिक पथ का प्रवेश द्वार कहा जाता है। कठोपनिषद् में यमाचार्य नचिकेता को जिस आत्म-तत्व के बारे में बताते हैं, वह वस्तुतः कुण्डलिनी का विवेचन है-
या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत॥
अर्थात्- जो देवतामयी अदिति प्राण से उत्पन्न होती है, गुहा में प्रवेश करके स्थित हुई वह सब प्राणियों में व्यक्त होती है, वही आत्म- तत्व है।
योग के द्वारा चेतना के विकास से अपनी मनःस्थिति को बदलकर स्नायु संस्थान पर नियन्त्रण किया जा सकता है। योगाभ्यास, मुद्रा, बन्ध, प्राणायामादि का प्रत्यक्ष प्रभाव अंतःस्रावी ग्रन्थियों और स्नायु-संस्थान पर पड़ता है। व्यक्तिगत चेतना इससे विकसित होती है, परिष्कृत चेतना अपने प्रति स्वयं सजग होने लगती है। चेतना का यह परिवर्तन, परिष्कार प्रार्थना, जपादि अन्य अभ्यासों से भी शनैः शनैः होता है परन्तु कुण्डलिनी योग का श्रद्धापूर्वक अभ्यास उसमें शीघ्रता ला देता है। ध्यान की उच्चतम स्थिति- मन के अतिक्रमण की अवस्था में पहुँचने के लिए मन का नियंत्रण इस प्रकार सुगम हो जाता है।
कुण्डलिनी योग, शरीर-चेतना के विभिन्न केन्द्रों को जगाकर मन की शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया है। चेतना के विभिन्न केन्द्र मेरुदण्ड में अवस्थित शक्ति भँवर कहलाते हैं। एक-एक चक्र की शक्तियाँ जागृत होते जाने से चेतन-स्थिति में परिवर्तन-उन्नयन होता जाता है। प्रथम चक्र मूलाधार से लेकर छठवें आज्ञाचक्र तक जागृति होने पर चेतना के स्तर में अन्तर आता है, मन का विस्तार होता है। अन्त में अभ्यास करते-करते मन के अतिक्रमण की अवस्था अर्थात् कुण्डलिनी जागरण की अवस्था आ पहुँचती है और साधक अपने की विराट-चेतना में अनुभव करते हुए निहाल हो जाता है।
कुण्डलिनी को ज्ञान शक्ति, दैवी शक्ति, प्राण शक्ति का उद्गम या उच्च चेतना की कुंजी रूप शक्ति आदि कहा जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान के शब्दों में “अचेतन मन की प्रसुप्त शक्ति” को कुण्डलिनी कहा जा सकता है। इसे सर्प-शक्ति भी कहते हैं। हिन्दू इसे देवी या शक्ति नाम से सम्बोधित करते हैं। चीन में ‘ची-शक्ति’ जापान में ‘की-शक्ति एवं अफ्रीका में ‘नॐम’ इसी को कहते हैं। ईसाई सन्त तेरेसा ने भी कुण्डलिनी शक्ति के अनुभवों को लिखा है।
योगी लोग कुण्डलिनी शक्ति का मार्ग शरीरस्थ केन्द्र मूलाधार से सहस्रार तक मानते रहे हैं। रीढ़ की हड्डी (सुषुम्ना) में 6 केन्द्रों (चक्रों) को प्रमुख माना जाता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र ये 6 चक्र प्रमुख हैं। सप्तम सहस्रार को सभी चक्रों का नियंत्रक कहा जाता है। सप्तम सहस्रार को सभी चक्रों का नियंत्रक कहा जाता है। शरीर के बिन्दु, भूमध्य आदि अन्य चक्रों का कार्य प्रमुख षट्चक्रों में ही आ जाता है।
मूलाधार चक्र को कुण्डलिनी का स्थान कहा जाता है। इसकी स्थिति मल-मूत्र छिद्रों के मध्य गह्वर में होती है। इसका तत्व पृथ्वी है। दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र जननेन्द्रिय से ऊपर की सीध में है। इसका अधिष्ठाता जल तत्व है। तीसरा मणिपूर चक्र नाभि की सीध में पीछे अवस्थित माना जाता है। इसका तत्व अग्नि है, इसे अग्नि चक्र भी कहते हैं। चौथा अनाहत चक्र, हृदय के पीछे स्थित है। इसका अधिष्ठाता वायु तत्व है। पाँचवें आकाश तत्व के प्रतिनिधि विशुद्धि चक्र की स्थिति कंठ के पीछे है। छठा आज्ञाचक्र पीनियल ग्रन्थि पर अवस्थित माना जाता है, यहाँ सब तत्वों का समन्वय है। इसको गुरु चक्र भी कहते हैं। अन्तिम मस्तिष्क मध्य स्थित सहस्रार है जहाँ कुण्डलिनी का विश्व से मिलन होता है।
सुषुम्ना स्थित ये चक्र स्थूल रूप में नहीं हैं बल्कि सूक्ष्म शक्ति केन्द्र हैं। आधुनिक वैज्ञानिक इन चक्रों को असीमित शक्ति के भण्डार मानते हैं परन्तु इनके जागरण का उपाय उनके पास नहीं हैं ये आध्यात्मिक चक्र अनेकों रहस्यों को छिपाये हुए हैं। सामान्यतया वे निष्क्रिय-प्रसुप्त पड़े रहते हैं। आध्यात्मिक साधक इन असीम शक्ति चक्रों का उद्घाटन करना चाहता है। यह उद्घाटन कुण्डलिनी जागरण से होता है, साधक को उस समय अपनी शक्तियों का अनुभव होने लगता है।
अमेरिका के डा. ली सेनेला ने कुण्डलिनी शक्ति पर अनेक प्रयोग परीक्षण किये हैं उन्होंने अपनी पुस्तक “कुण्डलिनी साइकोसिस एण्ड ट्रान्सैडेन्स” में कुण्डलिनी जागरण की विधियों का भी उल्लेख किया। व्यक्ति का चरित्र-चिन्तन उत्कृष्ट एवं कर्तृत्व आदर्शवादी होते जाने पर उसकी अन्तःशक्तियों का विकास स्वयं होने लगता है।
कुण्डलिनी जागरण से व्यक्ति की चेतना का स्तर ऊँचा उठा है। यह सूक्ष्म प्रक्रिया है शरीर में स्थूल परिवर्तन नहीं होता। व्यक्तित्व में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। व्यक्ति की चेतना का विस्तार होने लगा है फिर वह संकीर्ण, स्वार्थी रह नहीं सकता। व्यक्तियों की जीवनधारा में महान परिवर्तन होकर वे निकृष्टता को छोड़ महानता की ओर इस कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से ही बढ़े हैं।
सामान्यतया यह समझा जाता है कि मानव शरीर जिस क्रम से चल रहा है ठीक वैसा ही है। भोजन, श्रम, शयन जैसे ढर्रे के कार्य प्रत्येक मनुष्य द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं। किन्तु इसकी सीमा इतनी ही नहीं है। यह शरीर जितना विलक्षण है उतनी ही इसकी संभावनाएं असीम हैं। इन विशेषताओं को पहले दैवी अनुग्रह समझा जाता रहा है किन्तु मानवी शरीर के कण-कण में विशेषताएँ भरी पड़ी हैं। ये विशेषताएं मनुष्य के अन्तराल में दबी हुई प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती हैं जिनका उपयोग मनुष्य सामान्य जीवन क्रम के लिए न तो कर पाता है न ही इनसे अवगत होता है। कभी-कभी किन्हीं व्यक्तियों में अनायास कुछ ऐसी विलक्षणताएं परिलक्षित होने लगती हैं तो उन पर आश्चर्य किया जाता है। पर वस्तुतः वह होता इतना है कि प्रसुप्त कारणवश जागृत होने का अवसर मिल गया। विशिष्टता उभर कर ऊपर आ गई।
कुछ वर्षों पूर्व समाचार पत्रों में पश्चिम जर्मनी की एक घटना प्रकाशित हुई थी। एक अधेड़ महिला ने विष खाकर आत्म-हत्या करने का प्रयास किया। डाक्टरों ने उसके शरीर के परीक्षण करने पर पाया कि उस महिला के यकृत ने कार्य करना बन्द कर दिया है तथा गुर्दे खराब हो गये हैं। हृदय की धड़कन में मात्र जीवन के कुछ चिन्ह दिखायी पड़ रहे थे। डा. लैम्फैल ने अनेकों उपचारों के बाद भी देखा कि रोगी की मूर्छा में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ रहा है। उन्होंने नया प्रयोग आरम्भ किया।
मरीज के प्रायः मृत शरीर को काँच के बर्तन में रखकर बर्फ से जमा दिया। बयालीस दिनों तक इस अवस्था में रखने के पश्चात् डा. लैम्फैल ने लाश को बाहर निकाला। धीरे-धीरे उसको गर्मी देने पर उन्होंने देखा कि मृत शरीर में हलचल हो रही है। इस प्रकार गर्मी देने का क्रम तीन दिनों तक चलता रहा। परिणाम स्वरूप वह महिला जीवित हो उठी। वैज्ञानिकों को सबसे आश्चर्य तब हुआ जब उन्होंने देखा कि कुछ दिनों के बाद वह महिला पहले की अपेक्षा अधिक स्वस्थ, युवती एवं सुन्दर दिखायी दे रही है। उसने एक युवक से दुबारा विवाह किया तथा वे अभी भी जीवित हैं।
मनुष्य शरीर के अन्दर जो थकावट पैदा होती है, उसे दूर करने के लिए विश्राम की आवश्यकता होती है। नींद के उपरान्त शरीर में स्फूर्ति, नवशक्ति का संचार होने लगता है। दिन भर की थकान दूर हो जाती है। इसका आभास सहज रूप में प्रत्येक व्यक्ति को होता है। उपवास में पाचन तंत्र को विश्राम दिए जाने पर वह अधिक शक्तिशाली बनता है। कोष्ठबद्धता, मलावरोध आदि विकृतियां दूर हो जाती हैं। शारीरिक कोशिकाओं को बाह्य विकृतियों से लड़ने की शक्ति विश्राम अवधि में मिलती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार मस्तिष्क की कोशिकाओं का पूर्ण विकास गहरी निद्रावस्था में ही होता है। हृदय रोग जैसी भयंकर बीमारी में दवाएँ उतनी प्रभावशाली सिद्ध नहीं होतीं जितनी कि विश्राम में। कुशल चिकित्सक हृदय रोग के मरीज को पूर्णतया विश्राम करने का सुझाव देते हैं। बाह्य बीमारियों की सुरक्षा दवाओं द्वारा सम्भव नहीं है। जीवनी शक्ति ही बीमारियों से रक्षा करती है। विश्राम अवधि में जीवनी शक्ति अधिक सशक्त बनती है।
लम्बे शीत विश्राम के फलस्वरूप शारीरिक कोशिकाएँ, जीवनी शक्ति का अपव्यय रुक जाने के कारण, अधिक सशक्त, समर्थ बनती हैं। पहाड़ों आदि बर्फ के क्षेत्र में रहने वाले रीछ, साँप, गिलहरियाँ जैसे प्राणी शीत के दिनों में गहरी नींद में सो जाते हैं था ठंड समाप्त होने के पश्चात पुनः सक्रिय हो उठते हैं। देखा यह गया है कि रीछ एवं सर्प दीर्घजीवी होते हैं।
यह सभी जानते हैं कि ठण्ड के दिनों में गर्मियों की अपेक्षा गहरी नींद आती है। स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। साधना की दृष्टि से भी ठण्डा वातावरण अनुकूल पड़ा है। हिमालय के वातावरण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन शास्त्रों में अनेकों स्थान पर मिलता है। स्वास्थ्य सम्वर्धन एवं साधनों में सफलता का दोहरा प्रयोजन इस दिव्य वातावरण में मिलता है। अनेक लोग, विशिष्ट साधनाओं के लिए इस कारण से ही हिमालय में जाते हैं। इस वातावरण में शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का अपव्यय रुक जाता है। मानसिक समाधि का प्रयोजन भी यही है। ऐसी अवस्था में भोजन आदि की आवश्यकता भी कम पड़ती है। आज भी हिमालय पर ऐसे संत महात्मा हैं जो बिना भोजन किये रहते हैं अथवा बहुत कम खाद्य-सामग्री पर अपना काम चलाते हैं। शीत समाधि द्वारा शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों के व्यय को रोककर अनेकों संत ऋषि कई सौ वर्षों से जीवित हैं। जिनका साक्षात्कार कभी-कभी किन्हीं को ही हिमालय क्षेत्र में हो पाता है। पूर्ववर्णित महिला के शरीर में विष का प्रभाव व्याप्त था। शीत-समाधि प्रक्रिया द्वारा बाह्य शारीरिक गतिविधियों को रोक दिया गया। शक्ति का व्यय होना रुक जाने से, इस शक्ति ने विष से लोहा लिया तथा विष को बाहर निकाल दिया। फलस्वरूप संचित जीवनी शक्ति के प्रभाव से उपरोक्त महिला का स्वास्थ्य पहले की तुलना में और भी अच्छा हो गया।
वैज्ञानिक इस तथ्य को अब स्वीकार करने लगे हैं कि शीत समाधि द्वारा शारीरिक कायाकल्प एवं दीर्घ-जीवन प्राप्त कर सकना पूर्णतया सम्भव है। नोबेल पुरस्कार विजेता “डा. ऐलेक्सिस कैरेल” ने पिछले दिनों यह घोषणा की कि ‘शीत’ की सहायता से मनुष्य की आयु में वृद्धि की जा सकती है। डा. कैरेल ने अपने प्रयोगों की सफलता के बाद कहा कि- ‘‘मनुष्य शरीर को यदि बर्फ में जमा दिया जाय तथा कुछ दिनों के बाद निकाला जाय तो उसके शारीरिक कोशिकाओं में उतनी ही शक्ति होगी जितनी एक स्वस्थ ‘बालक’ में।’’ इस प्रकार यदि 50 वर्ष के बाद मनुष्य की शीत विश्राम दिया जाय और प्रत्येक 50 वर्ष बाद यह क्रम चलता रहे तो मनुष्य हजारों वर्ष तक जीवित रह सकता है। डा. ‘लैंफैल’ कहते हैं कि “सृष्टि के सारे जीव युवा होने में जितना समय लगाते हैं, उससे पन्द्रह गुना समय प्रायः प्राणी की पूर्ण आयु मानी जाती है।” एक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं “कि गाय 2 वर्ष में जवान होती है तथा लगभग 30 वर्ष तक जीवित रहती है। मनुष्य को 25 वर्ष युवा होने में लगते हैं, इस प्रकार उसे लगभग 400 वर्ष से अधिक जीवित रहना चाहिए। इससे कम आयु में यदि मृत्यु होती है तो निश्चित ही जीवन क्रम में कोई भारी त्रुटि ही रही समझना चाहिये। इसका कारण उन्होंने स्पष्ट किया- शरीर को विश्राम न मिलना।
‘शीत समाधि’ के प्रयोग एवं सफलता से विज्ञान जगत को एक नया सूत्र हाथ लगा है। अन्य ग्रह-नक्षत्रों की खोज करने की होड़ वैज्ञानिक क्षेत्र में आज तेजी से चल रही है। किन्तु समस्या यह थी कि लाखों, करोड़ों ‘प्रकाश वर्ष’ की दूरी पर स्थित ग्रह उपग्रहों पर कैसे पहुँचा जाय। ज्ञातव्य है कि 1 लाख 86 हजार मील प्रति सेकेंड की गति से चलने वाला प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूरी तय करता है, उसे एक ‘प्रकाश वर्ष’ कहते हैं। प्रकाश की गति से चलने वाला यान यदि निरन्तर चलता रहे और यदि उस ग्रह की दूरी 1 लाख प्रकाश वर्ष है तो मनुष्य को वहाँ पहुँचने में एक लाख वर्ष लगेंगे। मनुष्य की अधिकतम आयु अब 100 वर्ष होती है। इस प्रकार यान में बैठा एक सौ बीस वर्षीय व्यक्ति प्रकाश दूरी तय करने के पूर्व ही रास्ते में मर जायेगा। किन्तु शीत समाधि द्वारा इस समस्या का भी अब समाधान निकल आया है।
सोचा यह गया है कि अन्य ग्रहों में भेजने के पूर्व ही अंतरिक्ष यान में मनुष्य शरीर को बर्फ में जमा दिया जायेगा था लाखों ‘प्रकाश वर्ष’ दूरी तय करने के बाद उसे पुनः गर्मी दिये जाने पर वह जीवित हो उठेगा। निःसन्देह यह मनुष्य जीवन की विशेषताओं का ही रहस्य है स्थूल ‘शीत समाधि’ में जब इतना चमत्कार है कि मनुष्य के शरीर को हजारों वर्षों क जीवित रखा जा सकता है, तो मन की समाधि से प्राप्त शक्ति एवं चमत्कारों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसकी शक्ति तो असीम है।
मानव शरीर जितना विलक्षण है उतनी ही अद्भुत हैं इसकी अचेतन मन की परतें। जिसका परिचय कभी-कभी विलक्षण, घटनाओं के रूप में जन-सामान्य की मिलता है। पश्चिम जर्मनी ‘के ब्रुन्सविक’ अस्पताल में एक बच्ची सात वर्षों से निरन्तर सो रही है। 12 वर्षीय ‘ओलिवर’ अगस्त 1974 की एक शाम को स्कूल से घर वापस आयी। उस दिन वह अपने को अधिक थका अनुभव कर रही थी। माँ से कहकर कि ‘‘उसे थकान लग रही है वह सोना चाहती है” सो गयी। दो वर्षों तक डाक्टरों ने उसे चेतन अवस्था में लाने के लिए अनेकों प्रयास किये, किन्तु वे सफल न हो सके। ओलीवर के माता-पिता नित्य अस्पताल पहुँचते हैं, उसे जगाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु निराशा ही हाथ लगती है। डाक्टरों का कहना है कि बच्ची गहरी नींद की स्थिति में है। उसके हृदय की धड़कन वैसे ही चल रही है जैसे एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय कार्य करता है। उनका विश्वास है कि बच्ची एक न एक दिन चेतन अवस्था में अवश्य वापस लौटेगी।
चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में यह एक आश्चर्यजनक घटना है। एक व्यक्ति को जीवित रहने के लिए खाद्यान्न की आवश्यकता होती है बिना कोई आहार ग्रहण किये चार वर्षों तक जीवित रहना, वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बना है। मनुष्य का शरीर आवश्यक पोषक तत्वों के अभाव में भी जीवित एवं स्वस्थ बना रह सकता है, इसका कारण क्या हो सकता है, जैसे विभिन्न प्रश्नों का समाधान दे पाने में वैज्ञानिक अपने को असमर्थ पा रहे हैं।
मानव शरीर की इन विशेषताओं को देखकर सहज ही श्रद्धा से उस सृजेता, कलाकार के प्रति नतमस्तक होना पड़ता है। चेतन मन की सामर्थ्य के फलस्वरूप जीवन की गतिविधियाँ संचालित होती रहती हैं। अचेतन तो इसकी तुलना में कई गुना अधिक समर्थ एवं विलक्षण है। बहिर्मुखी चेष्टायें यदि बन्द हों तो भी अचेतन प्रक्रिया सूक्ष्म जगत से वे सारे सरंजाम जुटा सकने में समर्थ है जो शरीर के पोषण के लिए आवश्यक है। जिस प्रकार ‘अचेतन’ सोने, जगने, चलने, श्वास लेने आदि गतिविधियों पर सहज रूप में नियन्त्रण किए रहता है उसी प्रकार शरीर की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर सकता है। अचेतन की सामर्थ्य को ‘साधना’ द्वारा जगाया जा सके तो वह इतना समर्थ है कि बिना किसी बाह्य साधनों के भी कार्य कर सकता है।
मानव शरीर की विलक्षणताएं इतनी अधिक हैं कि उसे देखकर भी वाणी उस सृजेता परमात्मा के गुणानुवाद करने में अपने को असमर्थ पाती है जिसने अद्भुत विशेषताओं से युक्त मानव शरीर का सृजन किया। एक ओर जहाँ उपरोक्त तरह की घटनाएँ देखने को मिली हैं, वही दूसरी ओर ऐसी विशेषताएँ भी किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में परिलक्षित होती हैं। जिन्होंने सारा जीवन बिना सोये व्यतीत किया और स्वस्थ बने रहे। एक साथ दो विरोधात्मक प्रवृत्तियों को केन्द्रीभूत होते तो मनुष्य के शरीर में ही देखा जा सकता है। इन्हें देखकर कहना पड़ा है कि मनुष्य शरीर प्राकृतिक नियमों से बंधा नहीं है।
शरीर शास्त्र के अनुसार ये सारी घटनाएं आश्चर्यजनक प्रतीत होती हैं किन्तु मनुष्य शरीर विलक्षणताओं का भण्डार है। पौराणिक घटनाओं एवं कथानकों को कभी सन्देह की दृष्टि से देखा जाता था। ‘अर्जुन’ को गुडाकेश- “निद्रा को जीतने वाला” कहा जाता है। ‘रामायण’ में भी प्रसंग आता है कि ‘रावण’ के पुत्र ‘मेघनाथ’ को वही मार सकता था जो ‘ब्रह्मचारी’ एवं निद्रा विजयी हो। लक्ष्मण जी ने भगवान राम के साथ वनवास की 14 वर्ष की अवधि जागते हुए व्यतीत की थीं। ‘मेघनाथ’ को मार सकने में ‘लक्ष्मण’ जी ही सफल हो सके थे।
इन घटनाओं को देखकर आश्चर्यचकित हुआ जा सकता है किन्तु मानवी क्षमता को देखते हुए यह घटनाएं सामान्य हैं। असाधारण हैं सूक्ष्म चेतना की परतें। यदि इनको साधना द्वारा उभारा, उछाला जा सके तो मनुष्य सिद्ध पुरुष चमत्कारी अलौकिक बन सकता है।
परब्रह्म की चेतना, प्रेरणा, सक्रियता एवं समर्थता को ‘गायत्री’ कहते हैं। अन्य समस्त देव शक्तियाँ उस परमशक्ति की किरणें ही हैं। उन सबका महत्व एवं अस्तित्व उस आद्य शक्ति के कारण ही है। उत्पादन, विकास एवं संहार की त्रिविध देवशक्तियाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के नाम से विख्यात हैं। पंचतत्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ, अन्तरिक्ष कहकर पुकारते हैं। इन्द्र, बृहस्पति, अश्विनी, विश्वेदेवा आदि सृष्टि के विभिन्न प्रयोजनों में लगी शक्तियाँ ही हैं। दिव्य होने के कारण तथा प्राणियों को उनका अनुदान सतत् मिलते रहने के कारण उन्हें देवता कहा जाता है- उनकी पूजा अर्चना की जाती है। परन्तु ये सभी देवतागण उस महत् तत्व के स्फुल्लिंग हैं जिसे अध्यात्म ‘गायत्री’ कहकर सम्बोधित करता है। जिस प्रकार जलते हुए अग्नि कुण्ड में से सतत् चिनगारियाँ निकली रहती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान शक्ति गायत्री की विभिन्न धाराएं अनेक देव शक्तियों के रूप में देखी जाती हैं।
गायत्री वेद मातास्ति साद्या शक्तिर्मना भुवि। जगतां जननीं चैव तामुपासेऽहमेवहि॥
अर्थात्- भगवान शंकर कहते हैं- गायत्री वेदमाता है। यही आद्यशक्ति कहलाती है। यही विश्व जननी है। मैं उसी की उपासना करता हूँ।
त्वयैतद् धार्यते विश्वं त्वयैत्सृज्यते जगत्। त्वयै तत्पाल्यते देवि त्वमत्सन्ते च सर्वदा॥ (सप्तशती)
अर्थात्- हे देवी! तुम्हीं इस विश्व की धारण करने वाली शक्ति हो, तुम्हीं इसकी सृष्टि करने वाली हो, तुम्हीं इसका पालन करने तथा सदैव इसका अन्त करने वाली भी हो।
या देवो सर्व भूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता।। (सप्तशती)
अर्थात्- वह देवी ही समस्त भूतों (प्राणियों) में विद्या के रूप में प्रतिष्ठित है।
ऐसी महाशक्ति की शरण में जाने का सन्देश समस्त प्राणियों को अध्यात्म ग्रन्थों से मिलता रहा है। शक्ति का सम्पादन, आत्म-बल सम्वर्धन ही समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मूल है। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही भोगों को भोगा जा सकता है। वे अशक्त हो जायें तो आकर्षक से आकर्षक सामग्री भी घृणास्पद लगने लगती है। नाड़ी संस्थान की सामर्थ्य यदि कम हो जाये तो शरीर के कार्य-कलाप ठीक तरह नहीं चल पाते। मानसिक शक्ति घटते ही मनुष्य विक्षिप्तों अथवा बुद्धिहीनों की शरण में आ जाता है। मित्रशक्ति एवं धनशक्ति भी इसी तरह जीवन में जरूरी है। परन्तु आत्म-शक्ति के समाप्त होते ही प्रगति यात्रा रुक जाती है। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्म-बल से रहित व्यक्ति के लिये असम्भव है। भौतिक जगत की पंचभूतों को प्रभाव करने वाली शक्तियों तथा अध्यात्म जगत की विचारणा एवं भावना की शक्तियों का मूल उद्गम वह महत्तत्व है, जिसे गायत्री नाम से सम्बोधित किया जाता है।
अचिंत्य निर्विकार परब्रह्म को जब विश्व रचना की क्रीड़ा करना अभीष्ट हुआ तो उनकी आकाँक्षा शक्ति के रूप में परिणित हो गयी।वही शक्ति जड़ और चेतन दो में विभक्त होकर परा-अपरा प्रकृति कहलाई। ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ के रूप में जब माया रूपी आवरण जीव चेतना पर छा गया तो ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ के रूप में उसे हटाने तथा ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ के रूप में जीव को सत्पथ पर अग्रसर करने के लिये गायत्री महाशक्ति का आविर्भाव हुआ। इस दृश्य जगत में जो कुछ भी विद्यमान है, वह उसी महाशक्ति का स्वरूप है। इस सृष्टि के निर्माण, विकास, विनाश क्रम तथा परिवर्तनों के उपक्रम के पीछे उसी महान शक्ति की सक्रियता है। ब्रह्म तो साक्षी दृष्टा है। उसका समस्त क्रिया-कलाप इस गायत्री महाशक्ति द्वारा ही परिचालित हो रहा है।
उपनिषदकार कहता है-
गायत्री वा इदं सर्व भूतं यदिदं किन्च। (छान्दोग्य)
अर्थात्- जो कुछ था और जो कुछ है अर्थात् यह समस्त विश्व गायत्री रूप है।
इस तथ्य की व्याख्या करते हुए भगवान शंकराचार्य लिखते हैं-
‘‘गायत्री द्वारेण चोच्यते ब्रह्म, ब्राह्मणः सर्व विशेष पर हितस्य नेनिनेतात्यादि विशेष प्रतिषेध-गम्यस्य दुर्बोधत्वात्।’’
अर्थात्- ‘‘जाति गुणादि समस्त विशेषों से रहित अर्थात् निर्विशेष होने के कारण ब्रह्म केवल विशेष सुख से ही सम्यग रूपेण जाना जाता है, अतः वह दुर्विज्ञेय है। उसी को सर्वसाधारण के लिये सुलभ करने को भगवती श्री गायत्री सविशेष ब्रह्म का उपदेश करती है।’’
भगवान की सामर्थ्य भगवान का अंग होते हुए भी उससे पृथक अस्तित्व में दृष्टिगोचर होती है। सूर्य की किरणें निकलती सूर्य में से ही हैं, पर वे गर्मी और रोशनी के रूप में अपने अस्तित्व का अलग परिचय देती हैं। उसी प्रकार ब्रह्म की सामर्थ्य, चेतना एवं सक्रियता उसी के कारण है, पर उसका पृथक अस्तित्व भी अनुभव भी किया जा सकता है। संसार में जो असीम विद्युत का भाण्डागार संव्याप्त है, वह मूलतः विश्वव्यापी उस अग्नितत्त्व की सत्ता के कारण ही है। हमारे शरीर का विद्युत संस्थान उसी मुख्य केंद्र से तारों के माध्यम से जुड़ा हुआ है। यही केन्द्र प्राणियों का तथा संसार की समस्त दृश्यमान हलचलों का प्रेरणा स्थल है। यदि यह शक्ति इस जगत को प्रभावित न करे तो यहाँ सब कुछ निष्क्रिय हो जाय।
शक्ति के बिना शिव भी शव बन जाता है। गायत्री विश्व का- जीवों का प्राण ही नहीं, ब्रह्म का भी प्राण है। कहा गया है-
शक्तिं बिना महेशानिसदऽहं शवरुपकः। शक्तियुक्तो महादेवि शिवोऽहम् सर्वकामदः॥
ब्रह्म का कथन है- “शक्ति के बिना, मैं सदा ही शव के समान अर्थात् प्राण रहित हूँ। जब शक्तियुक्त होता हूँ, तभी मैं सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला मंगल रूप हूं।
वर्तते सर्वभूतेषू शक्ति सर्वनात्मना नृपः। शव वच्छक्ति हीनस्तु प्राणी भवति सर्वदा॥ (देवी भागवत)
अर्थात्- हे राजन्! सम्पूर्ण भूतों में सर्वरूप में शक्ति ही विद्यमान है। शक्तिहीन प्राणी तो सदा शव की भाँति हो जाता है।
सर्वशक्ति परं ब्रह्म नित्यमापूर्ण व्ययम्। न तदस्ति न तस्मिन्यद्विद्यते विततात्मानि॥ (योगवाशिष्ठ)
अर्थात्- नित्य, सर्वथा पूर्ण, अव्यक्त, परम ब्रह्म सर्वशक्तिमय है। ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो उस विस्तृत रूप में न हो।
वस्तुतः इस समस्त जगत की आधारभूत प्रकृति शक्ति ही है। इस शक्ति के ही कारण जीवात्मा का ‘स्व’ बना रहता है। यदि किसी का तिरस्कार करना हो तो उसे रुद्रहीन या विष्णुहीन नहीं कहा जाता वरन् उसे ‘शक्तिहीन’ अशक्त, नपुंसक या निकम्मा कहकर ही तिरस्कृत किया जाता है। उस महाशक्ति के भांडागार से हम जितना असम्बद्ध रहते हैं, उतने ही दुर्बल होते जाते हैं। जितने-जितने उसके समीप पहुँचते हैं, सान्निध्य लाभ लेते हैं, उपासना करते हैं, उतना ही अपना लाभ होता है।
जीवनी शक्ति या प्राणाग्नि के शरीर में प्रतिभासित होने वाले अनेक रूप हैं। पाचन क्रिया से संलग्न जीवनी शक्ति को जठराग्नि, मस्तिष्क में काम करने वाली को मेधा, प्रजनन संस्थान में काम करने वाली को कामोत्तेजना एव मुखमण्डल पर चमकने वाली ऊर्जा को ओजस्विता कहते हैं। पर वस्तुतः वह है एक ही शक्ति। विभिन्न प्रयोजनों के कारण उनके नाम अलग-अलग हैं। देवशक्तियां भी इसी तरह सृष्टि के विभिन्न प्रयोजनों को पूरा करने के लिये विभिन्न रूप धरण किये हैं। तथ्य यही है कि वे एक ही महाशक्ति द्वारा प्रयुक्त होने वाले उपकरण मात्र हैं। इनका वही निर्माण करती है, प्रयोजन में लाती है एवं कार्य कर सकने की क्षमता प्रदान करती है, इसीलिये उसे देवजननी कहा गया है। ऐसी महासत्ता परम शक्तिमान व्यवस्था से संपर्क कर साधक वर्णनातीत आनन्द की अनुभूति करता है एवं भौतिक, आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में असीम लाभ प्राप्त करता है।
पिवन्ति नद्यः स्वयमेनाम्भः, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः, परोपकाराय सन्तां विभूतयः॥
-नदियों को किसी ने अपना जल स्वयं पीते नहीं देखा, वृक्ष कभी अपने फल आप नहीं खाते, वारिद अपनी ही वर्षा से उगाया अन्न नहीं ग्रहण करते। उसी प्रकार सन्त-सज्जनों की विभूतियाँ परोपकार में ही प्रयुक्त होती हैं। स्वार्थ में नहीं।
धर्म-कृत्यों में सबसे अधिक प्रख्यात एवं प्रचलित प्रक्रिया है- तीर्थयात्रा। श्रवणकुमार के अन्धे माता-पिता तक तीर्थयात्रा के लिए इतने बेचैन थे कि अभाव-जन्य परिस्थितियों में काँवर में कन्धे पर रखकर उनकी इच्छापूर्ति की व्यवस्था बनाई गई। ऐसी आकांक्षाएं प्रायः धर्मप्रेमियों में पाई जाती हैं। ईसाई, मुसलमान, बौद्ध आदि में भी तीर्थयात्रा की तैयारी उत्साहपूर्वक की जाती है। भारतीय धर्म में तो इसकी एक प्रकार से प्रमुखता है। अन्य समस्त धर्म-कृत्यों में जितना श्रम, समय, धन और भाव लगता है, उससे कहीं अधिक तीर्थ प्रयोजनों में संलग्न रहता है।
कहा जाता है कि ईसाई धर्म वाले संसार भर में अपने मजहब का प्रचार करने के लिए विपुल धनराशि खर्च करते हैं। फलतः उन्होंने संसार की एक तिहाई जनता को अपने धर्म में दीक्षित कर लेने की सफलता विगत हजार वर्षों से ही प्राप्त कर ली है। मध्य पूर्व के तेल देश भी इसी स्तर का खर्च ऐसी ही महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कर रहे हैं। इन दोनों की सम्मिलित राशि और हिन्दू धर्मानुयायियों द्वारा खर्च की जाने वाले धन एवं समय का लेखा-जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि अपने देश में तीर्थ यात्रा पर उनकी व्यवस्था, पूजा पर- जो खर्च होता है वह कहीं अधिक है।
देखना यह है कि यह मात्र प्रचलन भर है या इसके पीछे मनीषियों का निर्धारण प्रतिपादन उत्सोहक भी है। इस संदर्भ में ऋषियों ने अपनी प्रतिभा एवं आकांक्षा का पूरा-पूरा उपयोग किया है कि तीर्थों का महत्व जन-जन को समझाया जाय और उस पर पूरा उत्साह रखने के लिए कुछ कमी न रहने दी जाय। अठारह पुराणों और अठारह उप पुराणों में से प्रत्येक में विभिन्न तीर्थों के माहात्म्य महत्व, इतिहास और संदर्भ असाधारण रूप से बताये गये हैं। स्कंद पुराण को तो एक प्रकार से तीर्थ माहात्म्य वर्णन के लिए ही लिखा जैसा समझा जाता है। अन्य धर्म ग्रंथ भी प्रकारांतर से इस बात का प्रयत्न करते हैं कि धर्म श्रद्धा को तीर्थ यात्रा के साथ कहीं न कहीं- किसी प्रकार जोड़े रखा जाय।
आद्य शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार धर्मों की स्थापना कराई। मान्धाता ने अपना समस्त वैभव इसके लिए समर्पित कर दिया। अन्यान्य मत-मतांतरों के लोग भी यह प्रयत्न करते रहे हैं कि उनके स्मरणीय स्थानों का विकास विस्तार तीर्थ के रूप में हो और इसके लिए उन्हें आकर्षण केन्द्र बनाने एवं भव्यता उत्पन्न करने में कुछ उठा न रखा जाय। इस तथ्य के प्रमाण देश के हर क्षेत्र में बिखरे हुए देखे जा सकते हैं। इन निर्माणों की इमारतों में लगी राशि का यदि विवरण तैयार किया जाय तो प्रतीत होगा कि शिक्षा और चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जितनी इमारतें बनी हैं उसकी तुलना में बड़े तीर्थों और छोटे देवालय तीर्थों की लागत पूँजी कहीं अधिक है। उनके रख-रखाव, पूजा-अर्चा एवं उत्सव समारोहों में लगने वाली सामर्थ्य एवं सम्पदा को भी जोड़ा जा सके तो प्रतीत होगा कि वह राशि शिक्षा और चिकित्सा के चालू खर्च की तुलना में कम नहीं अधिक ही होती है।
यह उत्साह उसी प्रतिपादन एवं प्रोत्साहन का प्रतिफल है जो महा-मनीषियों ने इस संदर्भ में जमाया एवं उभारा है। यह सब किसलिए? यह प्रश्न भले ही उस समय के श्रद्धा प्रबलता ने न पूछा हो या आज का बुद्धिवादी युग तो यह पूछे बिना रह नहीं सकता कि इस खर्चीले निर्धारण के पीछे आखिर क्या उपयोगिता समझी समझाई गई। आज तीर्थों की जो स्थिति है उसे देखते हुए तो यह प्रश्न और भी अधिक प्रचण्ड होकर उभरता है वरन् आकृत आतुरता के साथ अपना समाधान भी माँगता है।
आज की तीर्थयात्रा के पक्ष में औचित्य कम और अनौचित्य अधिक उभर कर आता है। धर्माडम्बर ओढ़े हुए असंख्यों व्यक्ति भिक्षा व्यवसाय वहां इस प्रकार चलाते हैं जिसे नैतिक कहा जा सकता है न सामाजिक न धार्मिक। अपंग भिक्षुओं की संख्या तो वहाँ नगण्य जितनी होती है। दान पुण्य के नाम पर तीर्थ यात्रियों को उतना निचोड़ा जा है जितने में वे ‘चीं’ न बोलने लगें। इसके लिए जो तरीके अपनाये जाते हैं उन्हें देखकर तो उलटी अश्रद्धा उत्पन्न होती है। जिस भावना को लेकर तीर्थयात्री वहाँ पहुँचता है उसे इस पाखण्ड और छीन-झपट के वातावरण में प्रायः गंवा कर ही आता है। प्रत्यक्षतः से भले ही इस बात की चर्चा न करें। जिस धर्म-धारणा की तृप्ति के लिए यात्री पहुंचता है उसका कोई प्रमाण कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। प्रतिमा दर्शन या नदी सरोवर का स्नान करने से जिनकी तृप्ति हो जाती हो उन परमहंसों की बात दूसरी है। उन्हें शायद उपयोगिता अनुपयोगिता देखने पूछने की आवश्यकता नहीं भी प्रतीत होती हो। किन्तु सर्वसाधारण की मनःस्थिति तो वैसी होती नहीं। विशेषतया इस समय के बढ़ते हुए बुद्धिवाद को तो तर्क न करने, कारण न पूछने के लिए रोका तो नहीं जा सकता।
तीर्थयात्रा के पक्ष में एक समर्थन पर्यटन व्यवसाय को प्रोत्साहित करने की बात को लेकर अर्थ-शास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। वह एक हद तक सही भी है। मनोरंजनों में पर्यटन को सार्थक स्तर का कहा जा सकता है। इससे पैसा एक जेब से दूसरी में पहुँचता है। अनेकों को मजूरी करने तथा लाभ कमाने का अवसर मिलता है। सरकारें किराये भाड़े से लेकर प्रत्यक्ष परोक्ष तरीकों से टैक्स वसूल करती हैं। यह लाभ उनके पक्ष में जाते हैं जो तीर्थ यात्रियों से कमाते हैं। बात उनकी तो शेष ही रह गई जिन्हें पुण्यफल भी हाथ नहीं लगा और पर्यटन के साथ जुड़े हुए मनोरंजन का अवसर भी प्राप्त नहीं हुआ। मात्र धक्का-मुक्की-भगदड़-जेबकटी को ही तो विनोद नहीं कहते। ‘पिकनिक’ इस तरह के नहीं होती, जिस तरह के तीर्थयात्रियों के गले बँधती और पग-पग पर खीज उत्पन्न करती है।
पुण्य और पिकनिक में से एक भी यदि हाथ लग गया होता तो भी सन्तोष होता पर काल्पनिक आत्म-प्रवंचना से भी तो कुछ समाधान नहीं होता। मनुष्य हर छोटे-बड़े काम को करने से पूर्व विचार करता है कि किससे क्या लाभ हानि है? तीर्थयात्रा जैसे श्रमसाध्य कष्टसाध्य और व्यय साध्य कार्य करने वाले को भी कोई न कोई ठोस कारण एवं समाधान ऐसा मिलना चाहिए जिससे प्रयास की सार्थकता पर सन्तोष हो सके।
आज की स्थिति यह है कि यदि किसी को पिकनिक पर्यटन पर निकलना हो तो उसके लिए ऐसे स्थान चुनने चाहिए जहाँ उस स्तर का वातावरण हो। यदि पुण्य संचय की बात मन में हो तो भी ऐसे वातावरण की तलाश करनी चाहिए जहाँ अन्तःकरण में पुण्य प्रेरणाएं उमंगें और सुख-शान्ति भरे भविष्य का निर्माण करने वाला कार्य मिले। दोनों ही दृष्टियों से तीर्थों की वर्तमान स्थिति संतोषजनक नहीं है।इतने पर भी लोक-मान्यता परम्परा एवं उमड़ता प्रचलन ऐसा है। जिसे देखते हुए हर किसी की यह हिम्मत भी नहीं होती कि अन्य साथियों को घर से बाहर निकलने का आनंद लेने के लिए जाते देखकर अपना मन भर सके। घर की घुटन सदा कहीं बाहर जाने- चैन या आनन्द ढूंढ़ने के लिए अवसर तलाशती रहती है। यह सुयोग यदि तीर्थयात्रा के साथ जुड़ जाय तो क्या बुरा है। इसमें तीन सुविधाएं भी हैं। लोगों पर पुण्यात्मा होने की छाप छोड़ना- परिवार वालों का उस खर्च का विरोध करने का साहस न होना- मन को भी कुछ अच्छा करने जैसे ओछा उथला संतोष होना। इन दिनों की तीर्थयात्रा इसी ढर्रे पर लुढ़कती है। घर की घुटन और पैसे की सुविधा के कारण तीर्थ पर्यटन का प्रचलन दिन-दिन बढ़ता ही जा रहा है।
यह वर्तमान स्थिति का विडम्बना भरा एवं निराशाजनक पर्यवेक्षण भर हुआ। इससे उस मूल समस्या पर प्रकाश नहीं पड़ता, जिसके आधार पर महा-मनीषियों के मनों में तीर्थ स्थापना की सूझ उपजी और उसे उपयोगिता की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त यह पाया कि इस निर्धारण की मान्यता भर न रहने देकर उसे क्रियान्वित करने के लिए अपनी प्रतिभा को दाँव पर लगा दिया जाय।
भारतीय संस्कृति के धर्म एवं आध्यात्म पक्षों का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इन क्षेत्रों के दार्शनिक निर्धारण एवं कृत्य प्रचलन अत्यन्त दूरदर्शी चिन्तन एवं गुणावगुण परक मंथन से निकले हुए नवनीत हैं। उन्हें समुद्र तल में गहरी डुबकी लगाकर न ढूंढ़े गये मणि मुक्तकों के समतुल्य माना जा सकता है। इस स्तर के अनेकानेक निर्धारणों में तीर्थ सेवन की एक ऐसी प्रक्रिया का आविर्भाव किया गया जिसे समस्याओं के समाधान एवं समग्र अभ्युत्थान की दृष्टि से अतीव उपयोगी कहा जा सके।
निर्धारण का मूल स्वरूप है- तीर्थ सेवन। सेवन अर्थात् वहाँ रहकर नये वातावरण में साँस लेना और उपयोगी चेतना में अनुप्राणित होना। चूंकि तीर्थ स्नान घर से दूर ही होते थे और उस दूरी को पार करने के लिए ‘यात्रा’ किये बिना काम नहीं चल सका था। इसलिए उस प्रसंग को तीर्थ सेवन के स्थान पर ‘तीर्थ यात्रा’ अनायास ही कहा जाने लगा। तैयारी की दृष्टि से यात्रा का सरंजाम जुटाना ही प्रधान कार्यक्रम है। इस दृष्टि से यात्रा जन्म परिस्थितियों का सामना करने तथा आवश्यक साधन जुटाने के लिए जो दौड़-धूप करनी पड़ती थी उससे मस्तिष्क पर ‘यात्रा’ प्रकरण ही छाया रहता था, ऐसी दशा में तीर्थसेवन को तीर्थ यात्रा नाम मिल गया तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
शास्त्रों में इस प्रक्रिया का एकमात्र नाम है- तीर्थ सेवन। प्रकारान्तर से इसे ‘निकास’ कहा जा सकता है। इन दिनों जो भी इन प्रयोजन के लिए निकलते थे वे पर्याप्त समय तक अभीष्ट तीर्थ में निवास करते थे और उन लाभों को प्राप्त करते थे जो इस पुण्य प्रक्रिया के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। आज की तरह एक ही सांस में समूची धरती नाप डालने के लिए घुड़दौड़ पर निकल पड़ना सर्वथा उपहासास्पद माना जाता होगा और कदाचित ही कोई ऐसी मूर्खता करता होगा जैसी कि इन दिनों अपनाई जाती है। स्पेशल रेलें, बसें चारों धाम का और बीच-बीच में अन्य छोटे-बड़े सैकड़ों तीर्थों की यात्रा दो ढाई महीने में करा देती हैं। किराया भी एक दो हजार के लगभग ही बैठता है। इतनी जल्दी समस्त तीर्थों के पुण्य की लूट-खसोट करके यात्री इस प्रकार गर्व करते हुए वापिस लौटते हैं मानो देश-देशान्तरों में अश्व-मेध का घोड़ा घुमाकर चक्रवर्ती या दिग्विजयी बनकर वापिस लौटे हों।
देखा यह जाना चाहिए कि इन पुण्य लुटेरों ने किया क्या? जिससे आधार पर उन्हें यह सोचते बन पड़ा कि वे सीधे स्वर्गलोक तक पहुँचने की योजना में कहीं बीच में रुकने वाले नहीं हैं। क्या किया? इसमें तीन प्रसंग सामने आते हैं। एक देवालयों की प्रतिमाओं का दर्शन दूसरा नदी सरोवरों में स्नान जिस-तिस को दान दक्षिणा का उपक्रम। इन तीनों कृत्यों को यात्री पर क्या उच्च स्तरीय प्रतिक्रिया हुई? समाज का क्या हित साधन हुआ? धर्मधारणा के अभ्युत्थान का क्या फल मिला? यह तीन आधार भी ऐसे हैं जिनको देखते हुए स्वर्ग या अन्य प्रकार के सुखद परिणामों की आशा की जा सकती है। बहुत खोजने पर भी ऐसी कड़ी नहीं जुड़ती जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि इस तथाकथित पुण्य प्रयोजन की वैसी परिणति होगी जैसी कि माहात्म्य बताने वालों को समझाई है।
जिनका प्रतिमा दर्शन, स्नान तथा जिस-तिस को बिना उपयोगिता का तारतम्य बिठाने, दान-दक्षिणा देने पर ये लौकिक मनोकामनाओं की पूति और अत्यन्त सस्ती स्वर्ग मुक्ति होने की बाल कल्पना सुखद प्रतीत होते ही, उन मनमोदक खाते रहने वालों से तो कुछ कहना नहीं है। पर जो कार्य कारण की संगति मिलाते हैं और तर्क तथ्यों को मान्यता देते हैं उन्हें तो यह सोचना ही पड़ेगा कि इतने सस्ते मोल इतनी बड़ी वस्तुएं किस प्रकार मिल सकनी सम्भव हैं।
यहाँ यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि ऋषियों के तीर्थ निर्धारण का इन दिनों जो उथला अर्थ लगाया एवं मखोटा जैसा स्वरूप बनाया जा रहा है। उसमें ऊपर उठाकर वास्तविकता को समझने- तथ्यों को जानने अपनाने का अवसर मिल सके। वास्तविकता यह है कि तीर्थ सेवन एक मनोवैज्ञानिक भावनात्मक आत्म-परिष्कार एवं उज्ज्वल भविष्य निर्धारण की सुनिश्चित प्रक्रिया है। उसके साथ भूत के अनुभवों के लाभ उठाते हुए- सुखद संभावनाओं से भरा-पूरा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वर्तमान का परिष्कृतीकरण की एक सांगोपांग योजना जुड़ी हुई है। अनुपयुक्तता अपनाने के कारण उत्पन्न हुई विपत्तियों का- निर्वाह क्रम में प्रस्तुत अवरोधों का तथा भविष्य निर्धारण की दूरगामी योजनाओं का समन्वय इस प्रक्रिया में पूरी तरह समाविष्ट है। वर्तमान और भविष्य के सम्बन्ध में गम्भीर चिन्तन मनन- उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का परामर्श एवं सहयोग यह सभी पक्ष तीर्थ सेवन से साथ जुड़े रहने के कारण उसे उतनी महता एवं गरिमा प्रदान की गई।
प्राचीन काल में व्यावहारिक जीवन की भौतिक जानकारियों के लिए तो आजकल जैसे अर्थकारी शिक्षा देने वाले स्कूल भी अवश्य रहे होंगे। पर उन दिनों अधिक ध्यान व्यक्तित्वों को महान बनाने- नर में नारायण की कलम लगाने का उत्साह आवेश स्तर का छाया रहता था। उसी की पूर्ति के लिए अध्यात्म एवं धर्म को एक सुनियोजित दर्शन, विधान एवं प्रयोग की तरह प्रयुक्त किया जाता था। अतएव उस प्रशिक्षण एवं अभ्यास के लिए तदनुरूप उत्कृष्टता एवं व्यवस्था से भरे पूरे विद्यालय भी चलते थे। इनकी तीन श्रेणियाँ थीं (1) अविकसित किशोरों के लिए ‘गुरुकुल’ (2) गृहस्थों के लिए स्वल्पकालीन ‘तीर्थ सेवन’ (3) प्रौढ़ों एवं निवृत्तों के लिए ‘आरण्यक’। यह तीनों ही स्तर के विद्यालय मात्र मौखिक या बौद्धिक शिक्षण तक ही सीमित न थे वरन् व्यक्तित्वों को ढालने वाली उन साधनाओं से भी समन्वित रहते थे जो जीवन की दिशाधारा में- अन्तः करण की आस्था, अभिरुचि एवं आदतों में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सके।
तीर्थों का यही वास्तविक स्वरूप था। इन पुण्य प्रयोजनों की पूर्ति के लिए स्थान ऐसे चुने जाते थे जिनसे प्राकृतिक एवं निर्वाह साधनों की अनुकूलता के साथ-साथ कुछ ऐसा इतिहास भी जुड़ा हो जिसे प्रेरणाप्रद एवं भावनात्मक उत्कृष्टता उभारने वाला कहा जा सके। तीर्थों के स्थान निर्धारण में इन तथ्यों का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।
अब बात आती है प्रशिक्षण, परिवर्तन एवं तप साधन की। इसके लिए उपरोक्त तीनों स्तर के आश्रम बने हुए थे। उनमें निवास, भोजन का प्रबन्ध तो रहता ही था। साथ-साथ ऐसा प्रशिक्षण की परिपूर्ण व्यवस्था थी जिसमें आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय सत्संग एवं उच्चस्तरीय परामर्श के सहारे वर्तमान को समुन्नत बनाना संभव हो सके।
इन तीर्थों के संचालक ऋषि कल्प महा-मनीषी होते थे। इन महाप्राज्ञों में यह क्षमता होती थी कि विभिन्न स्तर के व्यक्तियों को उनके गले उतारने वाले- एक-एक कदम आगे बढ़ाने वाले परामर्श दे सके। तोता रटंत वाले प्रवचनकर्ता तो सभी भेड़ों को एक लाठी से हांकते हैं। रिकार्ड बजाने जैसे प्रवचन एक प्रकार का कला-कौशल है। मुनि मनीषी व्यक्ति का स्तर परखते एवं तदनुरूप परामर्श एवं आशीर्वाद परक अनुदान सहयोग प्रदान करते हैं। तीर्थों में यह सारी व्यवस्था थी। वहाँ ऋषि मुनि रहते थे। आश्रम अर्थात् प्रशिक्षण एवं साधना के समन्वित केन्द्र चलाते थे। किशोर, गृहस्थ एवं अधेड़ व्यक्ति अपने-अपने परिस्थितियों का नये सिरे से पर्यवेक्षण करने तथा प्रगति के लिए सार्थक समाधान ढूंढ़ने के लिए पहुँचते थे। इन पहुँचने वालों को तीर्थयात्री कहा तो जाता था पर वस्तुतः वे पहुँचते तीर्थ सेवन के लिए थे। यह ‘सेवन’ -कायाकल्प जैसी रसायन का सेवन करने से भी अधिक फलप्रद सिद्ध होता था। यही है वह प्रक्रिया जिससे जन-जन को लाभ पहुँचाने के लिए महा मनीषियों ने ‘तीर्थ’ निर्धारण में अपनी तत्वदर्शिता का प्रयोग किया था।
लोगों की मोटी बुद्धि और मोटी दृष्टि से मात्र साधनों का महत्व है, वे सुविधा चाहते और सज्जा-सम्पदा के आकर्षणों पर भागे-भागे फिरते हैं। जीवन इसी तृष्णा में- कस्तूरी हिरन की तरह अतृप्त रहते, निराशा में खीजते, दुःख दुर्भाग्य का रोना रोते, कोल्हू के बैल की जैसी उपेक्षा, अवज्ञा एवं थकान सहते हुए मौत के दिन पूरे करते हैं। इतने पर भी लोभ और मोह के निविड़ भव-बंधन न छूटते हैं और न टूटते, अपने बुने मकड़ी के जाले में ही लोग उलझते-सुलझते, रोते-कलपते किसी प्रकार समय गुजारते हैं। न वासना पूरी होती है न तृष्णा की आग बुझती है। पेट-प्रजनन की दुहाई देते-देते दम तोड़ने वाले- अपनी ललक लिप्सा में असंख्यों को पतन पराभव के गर्त में धकेलते रहे हैं।
आज की चतुरता और सफलता इसी कुचक्र में डूबती उबरती अपनी क्षुद्रता एवं अदूरदर्शिता का भर्त्सना भरा इतिहास ही पीछे वालों के लिए छोड़ जाती है किन्तु प्राचीनकाल में ऐसा न था। उस सतयुगी माहौल में सभी का ध्यान इस धारणा पर केन्द्रित था कि व्यक्तित्व में देवत्व का अनुपात बढ़ाने वाली प्रेरणा कहाँ पाई और वह प्रक्रिया किस प्रकार अपनाई जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति में तीर्थों के अतिरिक्त और कोई प्रभावशाली माध्यम था नहीं। अतएव विचारशील वर्ग का हर व्यक्ति इस प्रयत्न में रहता था की उसे तीर्थों का सान्निध्य किस प्रकार कितने अधिक समय तक उपलब्ध हो सके। बालकों को शिक्षा से भी अधिक दीक्षा की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षण ही नहीं वातावरण भी, वातावरण भी नहीं अभ्यास भी मनुष्य की सुसंस्कारिता बढ़ाने में आवश्यक होता है। तीर्थों में बने हुए गुरुकुल उस आवश्यकता को पूर्ण करते थे। फलतः छात्रों के उन आश्रमों का भरपूर लाभ मिलता रहता था। ढलती आयु का हर व्यक्ति वानप्रस्थ में प्रवेश करते हुए जीवन की सार्थकता अनुभव करता था और नये ढंग का- नये स्तर का- नया जीवन जीने के लिए आवश्यक प्रकाश प्राप्त करने के लिए तीर्थों में पहुँचता था। यह आरण्यक ही विश्व भर के लिए मुनि, मनीषी, ऋषि, तपस्वी स्तर की समस्याओं के समाधान की उच्चस्तरीय व्यवस्था बनाते थे। वानप्रस्थ अनुभव करते थे कि उनसे ढलती आयु में ही जीवन का सच्चा आनन्द लिया है। आरण्यक ऐसे ही नर-रत्नों की खदान थे।
तीर्थों में गुरुकुल आरण्यक ही नहीं गृहस्थों की उस आवश्यकता को भी पूर्ण करने वाले उन्हें पारिवारिकता विकसित करके तथा प्रयोगशाला में परिणत कर सकने में सक्षम भी बनाते थे। घर परिवार को यदि सुव्यवस्थित सुसंस्कृत बनाया जा सके तो निश्चित ही पूर्वकाल की तरह धरती पर बसे हुए छोटे-छोटे स्वर्ग बन सकते हैं।
गुरुकुल के छात्र और आरण्यकों के वानप्रस्थ लम्बे समय तक निवास करने आते थे और परिपक्व बनने के उपरान्त कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने के लिए विदाई लेते थे। किन्तु गृहस्थों की स्थिति इन दोनों में सर्वथा भिन्न होती है, वे आजीविका उपार्जन एवं परिवार व्यवस्था के अनेकानेक उत्तरदायित्वों को निभाते हुए लम्बे समय तक बाहर रहने की स्थित में नहीं होते। वे ऐसी तीर्थ प्रक्रिया का ही लाभ ले सकते हैं जो स्वल्प-कालीन हो।
प्राचीन काल में तीर्थ सेवन की प्रक्रिया इसी स्तर की थी। उसमें एक साथ कई उद्देश्यों का समावेश रहता था। बहुत समय तक एक ही स्थान पर रहते-रहते एक ही ढर्रे का जीवन जीते-जीते जो ऊब आती है उसे दूर करने के लिए कभी-कभी कुछ समय का पर्यटन भी मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक होता है। इसके लिए इन दिनों भी समीपवर्ती ‘पिकनिक’ और दूरवर्ती पर्यटन की व्यवस्था लोग अपने-अपने ढंग से करते रहते हैं। इस मनोरंजन के साथ ही यदि समाधान एवं अनुदान की उच्चस्तरीय व्यवस्था भी जुड़ सके तो समझना चाहिए कि स्वर्ण सुगन्ध जैसा सुयोग बन गया। तीर्थ स्थान इस आवश्यकता को पूर्ण करते थे।
खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः सम्पादित करने के लिए इन दिनों आम जलवायु के स्थान पर निवास करने- पूर्ण विश्राम लेने तथा सेने टोरियमों का उपचार पाने का खर्चीला प्रबन्ध बड़े लोग करते रहते हैं। सो भी वह प्रबन्ध शारीरिक स्वास्थ्य लाभ भर का हो पाता है। इससे भी वस्तु है- मानसिक स्वास्थ। वह इतना महत्वपूर्ण है जिस पर बलिष्ठता को भी निछावर किया जा सकता है, सेने टोरियमों में कहीं भी मानसिक स्वास्थ संवर्धन का प्रबन्ध नहीं है। बहुत हुआ तो कश्मीर जैसे स्थानों पर उथले मनोरंजनों में कुछ दिन मन बहलाया जा सकता है। लौटने पर वह विनोद नये किस्म की ललक उत्पन्न करता और आदतें बिगाड़ता है। तीर्थों की यह विशेषता थी कि जहाँ मानसिक तनाव दूर करने वातावरण बदलने एवं विश्रान्ति देने में समर्थ होते थे, वहाँ उनका दूसरा पूरक पक्ष यह होता था कि न केवल छिद्रों को भरे वरन् ऐसी स्थापनाएँ भी करे जो निकट भविष्य में चन्दन के वृक्ष बनकर स्वयं को धन्य बनाने और समीपवर्ती वातावरण को सुगन्ध से भर दें। मनोरोगों, मनोविकारों का उपचार करना एक बात है और मनःक्षेत्र में सुसंस्कारिता, उगाना और चन्दन वन की तरह सुरम्य बना देना दूसरी। तीर्थ सेवन के लिए आने वाले गृहस्थ इन दोनों ही प्रकार के मानसिक लाभ प्राप्त करते थे।
संसार में तीसरे स्तर का श्रद्धा संवर्धन अन्तराल का काया कल्प, संचित कुसंस्कारिता का निराकरण- दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश- अनगढ़ वर्तमान का सुखद भविष्य के साथ संयोजन। यह सभी प्रक्रियाएं शारीरिक मानसिक न होकर विशुद्ध आध्यात्मिक हैं। उस क्षेत्र को ‘कारण शरीर’ भी कहते हैं। चमत्कारी अतीन्द्रिय क्षमताएं इसी क्षेत्र में प्रसुप्त पड़ी रहती हैं। उन्हें साधन उपचारों से कुरेदा उभारा जा सके तो ऐसे प्रतिफल दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें मनुष्य में देवत्व के उदय की संज्ञा दी जा सके। कहना न होगा कि इस दिशा में प्रगति का मार्ग रोकने वाले वे पाप कर्म होते हैं जो पतन पराभव और संकट बनकर फलित होने वाले हैं। वे आध्यात्मिक आकाँक्षाओं को निरुत्साहित करते रहते हैं और साधना मार्ग को अवरुद्ध करने वाले तरह-तरह के विघ्न उपस्थित करते रहते हैं।
आध्यात्मिक साधनाओं में प्राथमिकता ‘प्रायश्चित्त तप’ की दी गई है। पूजा उपचार पर प्रारब्ध कर्मों का निराकरण नहीं होता, मात्र उनका नया निर्माण रुकता है। क्रियामाण कर्मों की लम्बी दण्ड श्रृंखला से बचने का एक मात्र उपाय उपचार है- ‘प्रायश्चित’। प्राचीन काल में लोग पापों का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थों में जाते थे। आज तो इतना भर समझा जाता है कि देव-दर्शन, जल-स्नान भर से पाप छूट जाते हैं, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। उसके लिए ऐसी तप साधनाएं करनी पड़ती हैं जो दुष्कर्मों की खाई को उसी स्तर के तप पुण्य से पूरी कर सकने में समर्थ हो सके। पापों के प्रतिफल इससे कम में नहीं छूटते। प्राचीनकाल में इस तथ्य को भली प्रकार समझा जाता था और क्रियामाण का निराकरण करने के लिए तीर्थों के उपयुक्त वातावरण में रोग के अनुरूप उपचार की नीति अपना कर प्रायश्चित्त तप का निर्धारण किया जाता था।
इन पंक्तियों में गुरुकुलों और आरण्यकों की उस व्यवस्था की चर्चा नहीं की जा रही है जिसमें लम्बे समय तक निवास तथा अभ्यास करने की आवश्यकता पड़ती है। चर्चा का विषय सामान्यजनों की ‘तीर्थ सेवन’ प्रक्रिया है जिसमें कम समय में अधिक प्रयोजनों की पूर्ति होती है। ‘तीर्थ सेवन’ के लाभों में एक रसता की ऊब से छुटकारा पाने और नवीनता का आनन्द लेने के मानवी स्वभाव की पूर्ति होती है। तीर्थ-क्षेत्र में फैले हुए अनेकानेक ऐतिहासिक पौराणिक स्थानों को देखकर उनकी प्रेरणाओं से लाभान्वित होने का अवसर मिलता है। यदि तीर्थ जीवन्त है। वहां की गतिविधियाँ तथा प्रेरणाएं प्राणवान हैं तो उस वातावरण का प्रभाव भी पड़ता है। यदि तीर्थ संचालक मनीषी, मुनि और तपस्वी ऋषि हैं तो उनके परामर्श, मार्गदर्शन एवं अनुदान वरदान का लाभ भी मिलता है। साथ ही इस अवधि में ऐसी साधनाएँ, तपश्चर्याएं करने का भी सुयोग बैठता है जो प्रायश्चित्त का तीर्थ उद्देश्य पूरा कर सके और आत्म-विकास की दृष्टि से फलप्रद सिद्ध हो सके। ऐसे-ऐसे और भी अनेकों प्रत्यक्ष परोक्ष लाभ हैं जो तीर्थ यात्री के लिए उस प्रकरण में लगाये गये श्रम, समय एवं धन की तुलना में असंख्य गुने लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। यह तथ्य प्राचीन काल में सर्वविदित थे। फलस्वरूप तीर्थयात्रा पर जाने वालों को, लौटकर आने वालों का भावभरा स्वागत होता था उस प्रयास को दूरदर्शितापूर्ण समझा और भूरि-भूरि सराहा जाता था।
यही हैं वे तथ्य जिन्हें ध्यान में रखते हुए तत्त्वदर्शी महा मनीषियों ने तीर्थ प्रक्रिया को जन्म दिया। उनके निर्माण में साधन संपन्नों को दबाया। धर्म क्षेत्र के मूर्धन्यों को तीर्थयात्रा करके लोक शिक्षण की उपयोगी मुहीम सम्भालने के लिए सहमत किया। साथ ही जन-साधारण को वहाँ पहुँचने को पुण्य फलदायक बताकर उकसाया। उनका जो विशाल विस्तार जो दिखता है वह उसी ऋषि चेतना का निर्धारण एवं प्रयास है। इनके पीछे काम करने वाली दृष्टि एवं योजना को जितना सराहा जाय उतना ही कम है।
प्रश्न यह उपस्थित होता है कि मूल निर्धारण और वर्तमान स्वरूप में क्या अन्तर है। स्थिति को देखते हुए उसे जमीन आसमान जितना भिन्न विपरीत कहा जा सकता है। कलेवर तो लगभग मिलते-जुलते हैं, पर अन्तर थोड़ा-सा ही है जितना जीवित और मृतक में होता है। प्राणान्त हो जाने पर भी काय-कलेवर की आकृति प्रायः पूर्ववत ही बनी रहती है, पर अन्तर यह बन जाता है कि जीवन के अभाव में वह काया से उस व्यक्ति की सत्ता का भान होता है। इतने पर भी उस लाश से किसी हलचल या उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।
सच तो यह है कि जीवन विहीन शरीर सड़ने, गलने लगता है। कृमि कीटकों से लेकर चील, कौए उसे कुतरने लगते हैं। साथ ही दुर्गंध भरा वीभत्स दृश्य उभारता चला जाता है। इस दयनीय दुर्दशा से उसे बचाने के लिए अग्नि, जल या भूमि को समर्पित करते हुए अन्त्येष्टि का उपक्रम बनाना पड़ता है। जो बात मृत शरीर के सम्बन्ध में लागू होती है वही संस्थानों के संबंध में भी कही जा सकती है। देवालय कभी जन जागृति के केन्द्र थे। अब उनकी प्राण चेतना समाप्त हो जाने से प्रतिमा पूजन भर शेष रह गया है। खंडहरों में जिस प्रकार चमगादड़ अठावील, उलूक, मकड़े, साँप, बिच्छू ही नहीं भूत-पलीत तक घर बनाने लगते हैं, ठीक उसी प्रकार उद्देश्यों का परित्याग करने वाले संस्थान भी दुर्दशा ग्रस्त होते चले जाते हैं। भले ही वे कोई संगठन हों, परिवार हों, देवालय हों अथवा तीर्थ हों।
यदि तीर्थों में ऋषि प्रणीत चेतना बनी रहती, योजना क्रियान्वित होती रहती तो निश्चय ही उनका वह स्वरूप भी कायम रहा होता जिसके सम्मुख सभी का मस्तक श्रद्धावनत होकर शत-शत नमन करता है। उस उपयोगिता से लाभान्वित होने वाले अपना प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित करके उस प्रक्रिया को अपनाने का उत्साह भरते थे। फलतः तीर्थयात्रियों की न केवल संख्या बढ़ती थी वरन् उनको प्रतिष्ठा भी होती थी। जहाँ तीर्थयात्री ठहरते वहाँ लोग निवास की धर्मशाला, अन्नक्षेत्र, जलाशय, उद्यान एवं सेवा सुश्रूषा का प्रबन्ध करके सुविधा बढ़ाने का भरपूर प्रयत्न करते थे। तीर्थ संचालकों उस व्यवस्था के चलाने में किसी प्रकार की कठिनाई न पड़ने पाये इसलिए उदारमना कुछ न कुछ दान-दक्षिणा प्रस्तुत करके अपनी भाव श्रद्धा को प्रकट पल्लवित भी करते थे।
पुरातन को मृतक समझ कर उसकी आत्मा का श्राद्ध तर्पण करने से काम नहीं चलेगा। अभी उसमें जीवन बाकी है और इतनी गुंजाइश मौजूद है कि पुनर्जीवन का जीर्णोद्धार का प्रयत्न किया जा सके। राख से ढका अंगार काला और ठंडा दिखता है पर, उसे कुरेदने तथा ईंधन जुटाने से लपटें उठते भी देर नहीं लगती। तीर्थ चेतना का निर्धारण एवं इतिहास इतना महान है कि थोड़े से प्रयास से उसका जीर्णोद्धार हो सकता है। युग मनीषियों का कर्तव्य है कि वे इस महान परम्परा को दलदल में फंसी दुर्दशा से उबारें और उसे प्राचीन काल के स्तर तक पहुँचाने का नये सिरे से प्रयास करें।
मानवी सत्ता के दो पक्ष हैं एक परोक्ष चेतना, दूसरा प्रत्यक्ष शरीर। चेतना का गुण है चिन्तन। शरीर का कर्तृत्व। इन दोनों को समुन्नत बनाते-बनाते पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचना यही है प्रगति का वास्तविक क्रम। इसकी पूर्ति के लिए तत्वदर्शियों ने दो महत्वपूर्ण विज्ञानों का निर्धारण किया है। चिन्तन की उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए अध्यात्म दर्शन और आचरण में शालीनता भर देने के लिए धर्म विधान। एक शब्द में इन्हीं दोनों का समन्वय ही आत्म-विद्या एवं ब्रह्म विद्या है। शास्त्रों की समग्र संरचना इसी एक प्रयोजन को विभिन्न तर्कों, तथ्यों एवं उदाहरणों के सहारे प्रस्तुत करते हुए हर वर्ग के हर पक्ष की उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ाने धकेलने के लिए हुई है।
चिन्तन के लिए धारणा और कर्तृत्व के लिए प्रेरणा आवश्यक है। धारण के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, मंथन की आवश्यकता पड़ती है। प्रेरणा के लिए जप, तप, भजन, पूजन, दान, पुण्य आदि अनेकों कर्मकांडों का आश्रय लेना पड़ता है। इन्हीं दोनों प्रयोजनों के लिए अध्यात्म का एक चिन्तनपरक और धर्म का क्रियापरक विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है। ऋषियों के इसी अनुदान ने नर-पशु को नर-नारायण स्तर तक विकसित कर सकने वाले अध्यात्म विज्ञान की संरचना की है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि उसे सुविधा सम्वर्धन वाले पदार्थ विज्ञान की तुलना में कुछ अधिक ही वजनदार कहा जा सकता है। वैभव की तुलना में आत्मबल की गरिमा भी तो स्पष्टतः अधिक है। दो कदम बढ़ाते हुए ही लम्बी मंजिल पूरी की जाती है। जीवन के प्रत्यक्ष और परोक्ष स्तरों को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाते हुए चरम लक्ष्य तक पहुँचने का उद्देश्य भी अध्यात्म और धर्म का अवलम्बन करने से ही पूर्ण होता है। महा मनीषियों ने इसी का पथ प्रशस्त करने के लिए अपनी बहुमूल्य संरचनाएँ प्रस्तुत की हैं और मनुष्य को सच्चे अर्थे में कृत-कृत होने का अवसर प्रदान किया है।
उत्कृष्ट चिन्तन और कर्तृत्व के प्रथम उद्देश्य अनेकानेक विधि-विधानों के सहारे सम्पन्न होते हैं, किन्तु ऋषि प्रणीत निर्धारणों में एक ऐसा भी है जिससे दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति एक साथ होती है और उसका लाभ हर स्तर का व्यक्ति अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप ले सकता है। उस निर्धारण का नाम है- तीर्थ सेवन। उसका वास्तविक स्वरूप उपयुक्त वातावरण में रहकर परिष्कार और अभ्युदय के लिए महत्वपूर्ण आधार उपचार का आश्रय लेना है।
तीर्थ सेवन के ध्वंसावशेष अभी भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाते हैं। माघ महीने में त्रिवेणी संगम पर कुछ लोग कल्पवास करते हैं। उन दिनों वे वहाँ अपनी एक पर्ण कुटी बनाकर रहते- हाथ से भोजन पकाते- संकल्प पूर्वक साधनारत रहते हैं। उस क्षेत्र में निकलकर कहीं बहार न जाने की मर्यादा को पालते और तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं। इसमें यदि क्रमबद्ध मार्गदर्शन भी जुड़ गया होता कार्यक्रम एक छत्र-छात्रा में नियंत्रण पूर्वक चलता तो प्राचीन काल के तीर्थ सेवन की एक झाँकी देखने का अवसर अभी भी मिल सकता था। मथुरा में वृज चौरासी कोस की यात्रा निकलती है। उसमें प्रायः ढाई महीने लगते हैं। इस बीच कई-कई पड़ावों पर कई-कई दिन यात्री लोग ठहरते हैं और उनके सामूहिक धर्मकृत्य चलते हैं। इस अवधि में उन सभी को संकल्पपूर्वक व्रतशील जीवनचर्या का परिपालन करना होता है। इस भ्रमणशील तीर्थ यात्रा की प्राचीन पद्धति को प्रमाण परिचय माना जा सकता है। यों उसमें भी उस उद्देश्य का समावेश होना चाहिए जो मात्र भक्ति ही नहीं ज्ञान और कर्म का आधार जोड़कर वर्तमान के परिष्कार और भविष्य के निर्धारण में सहायता कर सके।
तीर्थ प्रक्रिया का निर्धारण जिन दूरदर्शी महामानवों दारा किया गया उसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए भी उस पद्धति की अतीव उपयोगी एवं प्रेरणाप्रद मानते हुए भी- वह उत्तरदायित्व युग मनीषियों को ही वहन करना होगा की मूल प्रयोजन की अन्तरात्मा को जीवित रखा जा सके। मात्र लकीर पीटने की भेड़िया घसान में उलझ कर लोग परम्परा के नाम पर कुछ भी ऊट-पटांग करते अपनी शक्ति सामर्थ्यं का अपव्यय करते भटकते न रहें। आज की तीर्थ यात्रा कुछ ऐसी विडम्बनापूर्ण बन गई है कि उसमें दर्शन, स्नान एवं दान का उद्देश्य रहित सड़ा गला कलेवर ही शेष है।
तीर्थों का आधारभूत प्राचीन स्वरूप विलुप्त हो जाना- उनके स्थान पर अंधविश्वासों और निहित स्वार्थों का गठ बन्धन चल पड़ना, एक प्रकार से दुर्घटना जैसा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। जो सामर्थ्य व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण की सत्प्रवृत्तियों में लगानी चाहिए थी यदि ऐसा ही भ्रम जंजालों में भटकती रहे तो उस व्यापक अपव्यय को अवांछनियता का परिपोषक ही माना जायेगा। पुण्यफल की वह उपलब्धि किस प्रकार हो सकेगी जिसके लिए उतना दूरदर्शी निर्धारण किया और उसको प्रचलित करने में अपनी प्रतिभा को एक प्रकार से दांव पर लगाया था।
कोसते रहने से कभी किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो सकती। मन की भड़ास निकाल लेना एक बात है और उलटा को उलट कर सीधी कर देना दूसरी।पर्यवेक्षण- समीक्षण की आवश्यकता उतनी ही है जिसमें अवांछनियता के प्रति आक्रोश उभरे और उसे हटाकर उपयोगी स्थानापन्न करने का उत्साह उछले। बात तो काम करने से बनती है। युग निर्माण हो या देव संस्कृति का पुनर्जीवन सभी के लिए रचनात्मक कार्यों का शुभारम्भ और सम्वर्धन आवश्यक है। तीर्थ प्रक्रिया का जीर्णोद्धार भी इससे कम में सम्भव नहीं कि उसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप उपाय सोचा जाय। कुछ ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जाय जिसके सहारे उपयुक्तता का स्वरूप समझने एवं प्रभावी प्रतिफल देखने का जन-साधारण को अवसर मिल सके।
समस्या व्यापक है और उसका समाधान भी व्यापक ही होना चाहिए। पर व्यापकता का भी एक केन्द्र बिन्दु होता है। शिक्षा, चिकित्सा, पुलिस, संचार आदि को प्रक्रियाएं व्यापक रूप से फैली हुई हैं, पर उनको स्वस्थ एवं कार्यक्रम बनाने का काम तो किसी न किसी केन्द्र से होता है। महान परिवर्तन का विश्वव्यापी युगान्तरीय चेतना का सूत्र संचालन एवं विस्तार किसी एक केन्द्र में ही हो रहा है। तीर्थ प्रक्रिया का परिष्कार परिवर्तन करना हो तो उसके लिए भी कुछ योजनाबद्ध प्रयास करने होंगे।
कुछ समय पूर्व एक कदम देवालयों की जन-जागृति के केन्द्र बनाने के रूप में उठाया गया था। उनकी दुर्दशा पर आँसू बहाने या आक्रोश प्रस्तुत करने की तुलना में यह अधिक कारगर समझा गया कि एक आदर्श देवालय बनाकर जन-साधारण को यह सोचने, समझने का अवसर दिया गया कि जीवन्त और मृतक मन्दिरों के स्वरूप और परिणाम में क्या अन्तर होता है। इसके लिए मथुरा के गायत्री तपोभूमि देवालय की स्थापना की गई उसमें पूजा-अर्चा तो अन्यान्यों का तरह ही हुई, पर विशेषता उन कार्यक्रमों के जुड़े रहने से हुई जिनने समूचे वातावरण को ही उलट-पुलट कर रख दिया। लोगों को बहुत कुछ देखने समझने का अवसर मिला और वह मन्दिरों को कोसने की तुलना में हजारों गुना अधिक कारगर सिद्ध हुआ। देवालय परम्परा की सर्वत्र उपयोगिता समझी गई और दिन-दिन तिरोहित होती जाने वाली विचारशीलों की भी श्रद्धा वापस लौट आई।
दो वर्ष जैसी स्वल्प अवधि में 2400 प्रज्ञा मंदिरों का बन जाना, उसी एक स्थापना का प्रतिफल है जिसे गायत्री तपोभूमि के रूप में देखने परखने का असंख्यों को अवसर दिया गया था। अब यह प्रज्ञा देवालयों की संस्थापनाएं चौबीस सौ न रहकर चौबीस हजार बन पड़े तो श्रद्धा के प्रस्तुत उभार को देखते हुए किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इन देवालयों की भूमिका कुछ ही समय में जन जागृति केन्द्र के रूप में दृष्टिगोचर होने लगेगी तो पुराने मन्दिरों को भी अपने को बदल लेने पर उपेक्षित तिरस्कृत होने के दो रास्तों में से एक को चुनना पड़ेगा। परिवर्तन की दूरदर्शितापूर्ण पद्धति यही हो सकती थी। उसी को अपनाया और सफल बनाकर दिखाया गया है।
अब दूसरा प्रयोग तीर्थ स्थापना के रूप में किया जा रहा है। पद्धति वही अपनाई जा रही है जो देवालयों के पुनर्जीवन का लक्ष्य समान रखकर अपनाई गई। अच्छा होता पुराने तीर्थ ही अपने आपको बदल लेते। उनमें से न्यूनतम ऐसे हैं जिनकी साधन सम्पदा और प्रतिष्ठा एक आत्म विज्ञान का स्वतन्त्र विश्व विद्यालय चला सकने के लिए सर्वथा उपयुक्त एवं पर्याप्त है। धर्म के नाम पर आजीविका उपार्जित करने वाले 60 लाख तथाकथित साधु संन्यासी यदि आडम्बरों का लवादा उतारकर प्राचीन काल के संत ऋषियों की रीति-नीति अपना सके होते तो स्थिति कुछ दूसरी ही होती। सात लाख गाँव और साठ लाख ‘महात्मा’। हर गाँव पीछे साढ़े आठ महात्मा आते और अपने देश को प्राचीनकाल की तरह ‘देव समाज’ बना देने में कब के सफल हो गये होते। यदि नगर देवालयों की तीर्थों के साथ जुड़ी हुई लोक श्रद्धा एवं प्रचुर सम्पदा के सम्बन्ध में भी है। यदि वह सच्चे अर्थों में अध्यात्म एवं धर्म की सेवा में प्रयुक्त हो सकी होती तो भारतीय धर्म संस्कृति अपनी दार्शनिक सम्पदा के कारण कब की विश्व संस्कृति बन गई होती। ईसाई धर्म को जन्मे दो हजार वर्ष भी नहीं हुए कि उसने विश्व को एक तिहाई जनता एक सौ पचहत्तर करोड़ लोगों को अपने धर्म में दीक्षित कर लिये। इस्लाम की चौदहवीं सदी चल रही है इसमें वे 100 करोड़ से ऊपर हैं। एक हिन्दू धर्म है जो घटते-घटते मात्र 35 करोड़ जितना रह गया है उसमें भी सिख जैसे कुछ सम्प्रदाय अपने में हिन्दू धर्म से प्रथम मान रहे हैं। संख्या और स्तर की दृष्टि से भारतीय धर्म की ऐसी दुर्गति के अनेक कारणों में एक यह भी है कि यहाँ के तीर्थ देवालय और साधु ब्राह्मण एक प्रकार निष्प्राण ही नहीं हो गये वरन् सड़न से विषाक्तता भी उत्पन्न करते बढ़ते चले जा रहे हैं।
देर तक सोचते और ताने-बाने बुनते रहने के उपरान्त अब वह समय आ गया जबकि देवालयों की तरह ही तीर्थों का काया-कल्प करने के लिए उसके परिष्कृत स्वरूप की एक केन्द्रीय स्थापना की जाय। इस उद्देश्य के लिए सन् 51 की गायत्री जयन्ती के दिन यह पंक्तियां लिखी और घोषणा की जा रही हैं कि शान्ति-कुँज गायत्री नगर की इमारत में ही गायत्री तीर्थ का शुभारम्भ किया जा रहा है। गायत्री जयन्ती के दिन गायत्री तीर्थ की स्थापना मुहूर्त की दृष्टि से भी सर्वथा उपयुक्त पड़ती है। गायत्री नगर के स्थान पर गायत्री तीर्थ नाम भी अधिक भारी भरकम पड़ता है। एक संयोग और भी इस अवसर पर जुड़ गया है कि शान्ति-कुज की दशाब्दी भी ठीक इसी दिन आ पड़ती है। अब से ठीक दस वर्ष पूर्व इसी दिन मथुरा छोड़कर हरिद्वार के लिए मिशन के सूत्र संचालकों का स्थानान्तरण हुआ था। शान्तिकुँज की गतिविधियाँ विगत दस वर्षों में प्रशिक्षण परक रही हैं। यहां विभिन्न स्तर के सत्र चलते रहे हैं। अब उसमें वे सभी साधनाएं प्रक्रियाएं नये सिरे से जोड़ी जा रही हैं जो तीर्थ के प्राचीन स्वरूप के जीवन्त दर्शन करा सकने में समर्थ हो सके। इस स्थापना को अगले दिनों युगान्तरकारी महाप्रयत्नों में प्रज्ञा पीठ निर्माणों की तरह ही मूर्धन्य एव ऐतिहासिक माना जायेगा।
प्राचीनकाल में न केवल स्थानों, आश्रमों को ही तीर्थ कहते थे, पर साधु वर्ग के लोकसेवियों का एक दल भी ऐसा था जो परिभ्रमण करते हुए जहाँ-तहाँ रुक-रुककर वही कार्य सम्पन्न करता था जो तीर्थों का लक्ष्य एवं प्रयास है। ऐसे लोग अपनी योजना एवं कार्य विधि का परिचय देने के लिए नाम साथ गोत्र उपनाम की तरह ‘तीर्थ’ शब्द का उपयोग भी करते थे। साधु सम्प्रदाय में एक वर्ग तीर्थ कहलाता है उसे सभी जानते हैं। स्वामी रामतीर्थ का नाम इस संदर्भ में हर किसी की जवान पर है। अगले दिनों इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसे परिव्राजकों की एक सेना खड़ी की जायेगी, जो भगवान बुद्ध के धर्म प्रवर्तन में संलग्न परिव्राजकों के समतुल्य आंकी जा सके। ‘तीर्थ’ उपनाम दिये बिना ही कुछ प्राणवान ऐसे विनिर्मित किये जायेंगे जो विनिर्मित प्रज्ञा संस्थानों में से जहाँ कहीं सम्भव हो वहाँ उन्हें प्रज्ञा तीर्थों में विकसित कर सकें। गायत्री तीर्थ अभी तो एक ध्रुव केंद्र की तरह शान्तिकुँज गायत्री नगर में ही विकसित किया जा रहा है, भविष्य में उसका वैभव विस्तार उसी आधार पर उसी द्रुतगति से होगा जैसा कि प्रचलित तीर्थ की स्थापना किसी महती चेतना के तत्वावधान में बनी और व्यापक बनती बढ़ती चली आई।
शान्तिकुंज गायत्री नगर को गायत्री तीर्थ में परिणित करने की प्रक्रिया इस वर्ष दिनांक 12 जून को गायत्री जयन्ती महापर्व के दिन से ही चल पड़ी। उस दिन तीर्थ के कीर्ति स्तम्भ की स्थापना का समारोह हुआ। एक हजार से अधिक प्रज्ञापुत्रों ने उसका शिलान्यास भूमि पूजन किया। शान्ति-कुंज का बोर्ड हटाकर उसके स्थान पर जो ‘गायत्री-तीर्थ’ घोषणा पत्र लगाया जाना है, उस पर इन सभी ने पुष्पांजलि चढ़ाई। यह क्रम गायत्री जयंती के उपरान्त वाले जून मास में सम्पन्न हुए, अन्य सत्रों में भी चला। इस प्रकार प्रायः चार हजार प्रज्ञा परिजनों के हाथ से यह स्थापना उपचार शास्त्रीय विधि-विधान के साथ चलता रहा। इस अवसर पर उपस्थित लोगों को मौखिक रूप से और ‘अखण्ड-ज्योति’ ‘प्रज्ञा-अभियान’ के पाठकों को मुद्रित रूप से इस स्थापना की जानकारी पहुँचा दी गई है।
इमारत में कुछ सामान्य से हेर-फेर इस आधार पर जुलाई, अगस्त, सितम्बर के तीन महीनों में ही सम्पन्न कर लिए जाने हैं जिनसे उसका स्वरूप मात्र शिक्षण विद्यालय भर का न रहकर तीर्थों का दर्शनीय और साधनापरक भी बन सके। इस प्रकार की सुविधाएं विनिर्मित की जा रही हैं जो अब तक नहीं थीं। इस परिवर्तन एवं नवीन संस्थान में कई प्रकार के महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं। जो कार्य एक वर्ष में निपटना चाहिए था, उसे तीन महीने में निपटाने के लिए जो कुछ सम्भव था वह पूरी तत्परता के साथ करने के लिए समूची कार्य क्षमता एवं मुट्ठी की साधन-सामग्री को झोंक दिया गया है। आश्विन नवरात्रि से निर्धारित कार्य पद्धति विधिवत् चल पड़ेगी। इस बीच आवश्यक निर्माण पूरा हो चुकने की आशा है।
निर्माण में कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं-
(1) आरम्भिक प्रवचन हाल को अब देवात्मा हिमालय का मन्दिर बनाया जा रहा है। इसमें तीस फुट लम्बी छः फुट ऊंची चार फुट मोटी प्रतिमा स्थापित की जा रही है। जिस भाग को हिमालय का हृदय कहते हैं, वही प्राचीनकाल में धरती का स्वर्ग कहा जाता था। उसी में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री नाम से प्रख्यात हिमालय के चारों धाम आते हैं। इसके अतिरिक्त इसी में रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, उत्तरकाशी जैसे प्रमुख तीर्थ हैं। व्यास और गणेश द्वारा संयुक्त रूप से जहाँ महाभारत लिखा गया था, वह व्यास गुफा, पाण्डवों के सशरीर स्वर्ग प्रयाण वाला स्थल स्वर्गारोहण, देवताओं का स्वर्ण पर्वत सुमेरु, गंगा का मूल उद्गम शिवलिंग, नन्दनवन, गोमुख आदि उस क्षेत्र में आते हैं। जहां साधारण मनुष्यों की पहुंच नहीं हो पाती इसके अतिरिक्त सातों ऋषियों की तपोभूमियां भी उसी क्षेत्र में है। गंगा अकेले नहीं निकली, उसकी सात सहेलियाँ भी साथ ही निकलीं और कुछ-कुछ दूर पर जाकर देर-सबेर गले मिलती चली गईं। भागीरथी, जाह्नवी, मन्दाकिनी, अलकनंदा आदि सातों सहेलियों के दर्शन भी इसी प्रतिमा में हैं। उन सबका दिव्य-दर्शन इस देवात्मा हिमालय में एक ही स्थान पर किया जा सकेगा, यह अद्भुत एवं अनुपम प्रतिमा है। जिस प्रकार विराट् ब्रह्म के दिव्य दर्शन में समस्त ब्रह्माण्ड की, समस्त देवताओं की झांकी हो जाती है, उसी प्रकार इस ‘देवात्मा-हिमालय’ का दर्शन करने वाले तीर्थ यात्री उस समूचे क्षेत्र की प्रतिमा को अपनी पहुँच के एक ही स्थान पर देखकर नेत्रों को धन्य बना सकेंगे। राम-नाम के अक्षर लिखकर उसकी, परिक्रमा करने वाले गणेश ने जिस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्यफल प्राप्त कर लिया था, उसी प्रकार इस देव दर्शन को भी कुछ समय उपरान्त सरल उपाय से भाव श्रद्धा उभारने वाला माध्यम माना जाने लगेगा। इसका निर्माण कार्य तत्काल हाथ में ले लिया गया है।
(2) भारत भूमि में अवस्थित समस्त प्रमुख तीर्थों के, उनकी प्रतिमाओं के विशालकाय रंगीन चित्र बनाये जा रहे हैं। उन्हें सुसज्जित रूप से स्थापित करने वह अवसर उपस्थित किया जा रहा है कि आगन्तुकों को इस पुण्य तीर्थ में बने हुये सभी प्रमुख तीर्थों के भाव दर्शन सम्भव हो सकें। उन समस्त तीर्थों का इतिहास, उद्देश्य एवं प्रेरणा प्रकाश भी आगन्तुकों को मिल सकेगा, जिसे भीड़ में धक्के खाते फिरते रहने वाले यात्री कहीं भी उपलब्ध नहीं कर पाते।
(3) शांतिकुंज में स्थापित गायत्री मन्दिर के ठीक सामने एक साधना कक्ष बनाया जा रहा है, जिसमें चौबीस साधक एक साथ बैठकर अखण्ड जप की वह संयुक्त साधना चलाते रह सकेंगे जिससे इस गायत्री तीर्थ का समूचा वातावरण उच्चस्तरीय प्राण प्रेरणा से निरन्तर अनुप्राणित बना रह सके।
(4) गायत्री तीर्थ का समूचा उद्यान अब दिव्य औषधियों, अलभ्य जड़ी बूटियों से लहलहाया करेगा। रुद्राक्ष, श्वेत चन्दन, लाल चन्दन, अक्षय वट जैसे देववृक्ष और सोमवल्ली, संजीवनी, अरुन्धती, सर्पगन्धा, बला, अतिबला, मेधा, महामेधा जैसी अलभ्य जड़ी-बूटियाँ यहाँ प्रयत्नपूर्वक उगाई जा रही हैं। यज्ञोपैथी के अनुसंधान में इन सभी जड़ी-बूटियों का प्रयोग होता रहेगा। साथ ही कष्ट साध्य रोगी भी इस प्रत्यक्ष अमृत का लाभ उठाते रह सकेंगे।
(5) देश भर के प्रज्ञा संस्थानों में लगाने के लिये ऐसी बारह जड़ी-बूटियाँ ढूंढ़ी गई हैं जिनके द्वारा सरलतापूर्वक सामान्य रोगों का उपचार संभव हो सके। इन बारह जड़ी-बूटियों का एक विशेष कक्ष नर्सरी के रूप में विनिर्मित किया जा रहा है। इनकी पौध सभी प्रज्ञापीठों को यहाँ से उपलब्ध होती रहेगी। साथ ही उनके परिपोषण तथा उपचार की विधि-व्यवस्था भी सिखाई जायेगी। अभी यह व्यवस्था मात्र उन प्रज्ञापीठों के लिये सोची गई है जिनके पास अपनी भूमि है। पीछे इसे अन्य लोक सेवी संस्थाओं के लिये भी उपलब्ध किया जायेगा।
(6) प्रज्ञा अभियान की योजनाओं एवं गतिविधियों की झाँकी करने वाली एक चित्र प्रदर्शनी बनाई जा रही है जिससे मिशन के उद्देश्य, स्वरूप, कार्यक्रम एवं फलितार्थ सरलतापूर्वक समझें और अपनाये जा सकें। निरुपयोगी दर्शन, झाँकियों की तुलना में समय की मांग और उसके समाधान दर्शाने वाली यह चित्र कक्षा विचारशीलों को कही अधिक प्रेरणाप्रद एवं उपयोगी प्रतीत होगी।
(7) अपनी पृथ्वी समूचे ब्रह्माण्ड शरीर की एक छोटी इकाई है। जिसकी भली-बुरी स्थिति में अन्तरिक्षीय प्रवाहों का महत्वपूर्ण स्थान है। इन प्रवाहों की उपयोगी शक्तियाँ खींचने और अनुपयोगी रोकने की एक विशेष विद्या है जिसे दिव्यदर्शियों ने ज्योतिर्विज्ञान के नाम से जाना है। भूमि से, जलाशयों से, वायुमण्डल से जिस प्रकार बहुत कुछ पाया जाता है। उसी प्रकार अन्तरिक्ष की भी रहस्यमयी उपलब्धियों से मनुष्य का वैभव वर्चस्व अनेक गुना बढ़ सकता है। इस तथ्य को आप्तजन जानते थे पर अब तो वह सब कुछ एक प्रकार से विस्मृत जैसा होता चला जा रहा है।
गायत्री तीर्थ में ग्रह-नक्षत्रों की पुरातन स्तर की वेधशाला तो कुछ समय पहले ही बन चुकी थी। अब उसमें नवीनतम अन्तरिक्षदर्शी यन्त्र उपकरणों को भी जोड़ा जा रहा है। साथ ही अन्तरिक्ष की रहस्यमयी जानकारियां देने वाली प्रदर्शनी भी बनाई जा रही है, जिसके सहारे इस विज्ञान की उपयोगी जानकारी भी सर्वसाधारण को उपलब्ध हो सके। उसी विभाग के अंतर्गत अगले वर्ष से एक ऐसा पंचांग भी प्रकाशित करने की योजना है जिसमें प्रख्यात नवग्रहों के अतिरिक्त नई शोधों से प्राप्त सौर-मण्डल के तीन नये सदस्य नैप्च्यून, प्लूटो, यूरेनस को भी सम्मिलित करके उनका ग्रह गणित भी जोड़ा गया हो।
(8) नित्य यज्ञ वाली यज्ञशाला में अब अखण्ड अग्नि की स्थापना की गई है। साथ ही ऐसा प्रबन्ध किया गया है कि प्रज्ञा परिवार के परिजनों को अपने संस्कार कराने की व्यवस्था रह सके। बच्चों के नाम करण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत संस्कार यहाँ बिना किसी खर्च के पूर्ण शास्त्रोक्त रीति से होते रहेंगे। अपने विशालकाय परिवार के लड़के-लड़कियों की विवाह-शादी भी बिना दहेज या प्रदर्शन के परम सात्विक वातावरण में होते रहें, इसकी विशेष व्यवस्था बनाई जा रही है। अधेड़ों को वानप्रस्थ दिये जाया करेंगे। पूर्वजों के श्राद्धतर्पण भी यहां होते रहेंगे। इस प्रकार षोडश संस्कारों की सरल शास्त्री य परम्परा व्यवस्था का लाभ यहां सभी प्रज्ञा परिजनो को मिलता रहेगा।
(9) स्वभावतः उपरोक्त स्थापनाओं को देखने के लिये श्रद्धालु और बुद्धिवादी दोनों ही स्तर के लोग यहाँ पहुँचा करेंगे। उनके लिये बाजार से की अधिक सस्ते दाम पर शुद्ध, सात्विक स्तर की भोजन सामग्री उपलब्ध होती रहे, ऐसे भोजनालय का स्वतन्त्र प्रबन्ध किया गया है।
(10) गायत्री परिवार के प्रायःपच्चीस लाख सदस्य हैं और वे तथा उनके परिजन इन दिनों के प्रमुख तीर्थ उत्तराखण्ड को देखने आते रहते हैं। उन सभी के ठहरने के लिये धर्मशाला स्तर की व्यवस्था यहाँ नहीं हो सकेगी। परन्तु वे जब इधर आयेंगे तो निश्चित ही गायत्री तीर्थ के दर्शन करके जायेंगे ही।
उपरोक्त दस व्यवस्थाएं यहाँ ऐसी हैं जो गायत्री तीर्थ का आकर्षण बढ़ाती हैं और वहां पहुँचकर स्वल्प श्रम समय में अधिक प्रेरणा प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करती हैं। अभी देश में एक भी तीर्थ ऐसा नहीं है जहाँ यात्री बिना जेब कटाये, बिना धक्के खाये वापिस लौटता हो। अब कम से कम एक तो ऐसा मिलेगा जहाँ स्नेह, सम्मान, स्वागत, सहयोग का भावभरा वातावरण दिखे। कुछ जानने, सीखने को मिले। यह एक ऐसा प्रयास है जिसका अनुकरण देर-सबेर में अन्य तीर्थों को लोकमानस के दबाव से विवश होकर करना पड़ेगा।
शान्तिकुँज, गायत्री नगर की वर्तमान इमारतों में थोड़ा-बहुत हेर-फेर संवर्धन इस दृष्टि से किया जा रहा है कि वह अब तक के विद्यालय स्वरूप से भिन्न प्रकार का तीर्थ स्तर का दिखने लगे।
ब्रह्मवर्चस अपने ढंग का तीर्थ है। उसमें स्थापित गायत्री माता की चौबीस प्रतिमाएं कितनी भव्य और कितनी प्रेरणाप्रद हैं। इसे वे सभी जानते हैं जिनने उसे देखा है। अब वहाँ की शोभा, सज्जा एवं प्रभाव, प्रेरणा के लिये कुछ नये तथ्यों का समावेश किया जा रहा है।
अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय, यज्ञ चिकित्सा के माध्यम से शारीरिक, मानसिक रोगों के उपचार का अनुसंधान एक ऐसा प्रयोग है जिसके माध्यम से संव्याप्त दुर्बलता, रुग्णता एवं उद्विग्नता, विपन्नता का चिरस्थायी निराकरण सम्भव हो सके। अध्यात्म और विज्ञान के मध्य बनी हुई खाई को पाटने और दोनों के समन्वय से उज्ज्वल भविष्य की संरचना का आधार बनने की जो संभावना ब्रह्मवर्चसम् शोध संस्थान के माध्यम से बन रही है उसे अनुपम अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। इस प्रयोग एवं प्रयास को देखकर अध्यात्मवादी एवं बुद्धिवादी समान रूप से आशान्वित हैं।
कहना न होगा कि ब्रह्मवर्चस्, शान्तिकुँज, गायत्री नगर यह तीनों प्रयोगशालाएं एक ही गायत्री परिवार ट्रस्ट के अंतर्गत चलती हैं। इन सभी को वर्गीकरण की दृष्टि से उन पुराने नामों से भी जाना जाता रहेगा, पर वस्तुतः यह पूरा तन्त्र गायत्री तीर्थ ही बनने जा रहा है। अब तक के तीन नामों को शिर, धड़, हाथ-पैर की तरह तीन हिस्सों में बाँटा तो जाता रहेगा, पर वे सभी एक ही गायत्री तीर्थ शरीर के अवयवों के रूप में देखे जाने जाते रहेंगे। तीनों का संयुक्त प्रयास ही समग्र गायत्री तीर्थ की वर्गीकृत गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ होंगी।प्रयत्न यह भी किया जा रहा है कि दर्शकों को दो स्थानों पर बने हुए इन आश्रमों के मध्य की दूरी रहते हुये उन्हें देखने में किसी विशेष कठिनाई का सामना न करना पड़े। दोनों को देखकर ही समग्र जानकारी का लाभ ले सकेंगे।
ऊपर की पंक्तियों में तीर्थ के दर्शनीय एवं व्यवस्था परक पक्ष की चर्चा हुई है। इन कलेवर समझा जा सकता है। प्राण-प्रेरणा वह है जो यहाँ निवास करके साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विध तीर्थ सेवन के रूप में उपलब्ध की जानी है। उसकी विस्तृत चर्चा तो अगले अंक में पढ़ी जा सकेगी। पर संक्षेप में इतना जाना जा सकता है कि एक महीने का सत्र तीर्थ सेवन सत्र होगा एवं पांच दिन का सत्र तीर्थ यात्रा सत्र, यह बात स्मरण रखने योग्य है कि जो भी आवें, लिखित स्वीकृति के बिना न आवें। न ही अपना कोई परिजन ऐसा पत्र लेकर बिना पूर्व अनुमति के किसी को भेजें।
तीर्थ सेवन व्रत धारण करके तीर्थवास करने के लिये प्रज्ञा परिजन आते रहेंगे और उन सभी लाभों का रसास्वादन करते रहेंगे जो पूर्वकाल में तीर्थ सेवन करने वालों को हस्तगत होते रहते थे। इस अभिनव स्थापना को भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का अरुणोदय कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
(लाखन सिंह भदौरिया)
उठो चेतना के नये गीत गाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
अभी तम निगलते हुये दीप जागे, अभी आँख मलते हुये गीत जागे, अभी फूल खिलते हुये मीत जागे,
अभी भोर की गुनगुनी धूप लाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
अभी रात वाली उदासी भरी है। अभी प्यार की आँख, प्यासी भरी है, मनुजता देखी है, रूंवासी डरी है,
उठो प्राण फूंको, प्रभाती सुनाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
अभी आत्मघाती, पतन से लड़े हैं, समर आसुरी आचरण से लड़े हैं, अभी देव-परिवार, उजड़े पड़े हैं,
अभी दिव्यता को बसाओ, हँसाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
अभी क्रान्ति-अभियान जारी रहेगा, अभी शान्ति-संग्राम जारी रहेगा, अभी प्राण-अनुदान जारी रहेगा,
अभी ज्योति से विश्व को जगमगाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
अभी आदमी का परिष्कार होगा, अभी प्यार का दिव्य अवसर होगा, अभी विश्व ही, एक परिवार होगा,
जलाके दिये, आरती को सजाओ। न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥
*समाप्त*