वृक्ष जिस बीज से उत्पन्न होता है, अपने उत्कर्ष में उसकी ओर ही धावित होता है। शिशु की उमंगें परिपक्व मानवता की ओर उमड़ा करती हैं। प्रत्येक जीवित वस्तु अपने स्वरूप को ही फिर उच्चतर रूप में प्राप्त करना चाहती है। इसी का नाम उत्कर्ष है, जो जीवन का सहज स्वभाव है।
मानव स्तर पर ही उद्देश्य सज्ञान रूप धारण कर लेता है। मन अपने आपे से बाहर निकलकर प्रकृति के अध्ययन में जब श्रृंखला, व्यवस्था, नियम, उद्देश्य और सौंदर्य की खोज करता है तो वस्तुतः वह अपने को ही प्रकृति में उसी प्रकार से पाना चाहता है- देखना चाहता है जैसे आँख स्वयं को दर्पण में। सच पूछा जाय तो प्रकृति आत्म-दर्शन के लिए एक विराट् दर्पण ही तो है।
जीवन एक क्रमागत गति है। उत्तरोत्तर विकास तथा नूतन प्रकाश की प्राप्ति हेतु वह सतत् प्रयत्नशील रहता है। यह इच्छा आदिम भी है और अन्तिम भी। इसका स्वभाव लगातार आगे बढ़ना एवं ऊपर उठना है। पीछे को लौटना, आत्म केन्द्रित होना और विकास की सम्भावनाओं को निरस्त करना इसकी प्रकृति के अनुकूल नहीं।
शैलसुता भगवती पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए निर्जन वन में घोर एकान्त में तप किया। स्वजनों ने बहुत समझाया कि सर्प, वृश्चिक और भूत-प्रेतों को साथ रखने वाले शरीर पर भस्म मलने वाले अवधूत भगवान भूत भावन के साथ रहकर क्या सुख मिलेगा? विशाल साम्राज्य के उत्तराधिकारी युवराज तुम्हारा वरण करने के लिए तैयार हैं। हठ छोड़ो और सुखद गार्हस्थ्य जीवन का वरण करो।
परन्तु पार्वती अपने संकल्प पर अडिग ही रहीं और निरन्तर तप-तितिक्षा का अनुष्ठान करती रहीं। घोर तप से उन्होंने अपनी सुकुमार काया को तृणवत् जीर्ण बना लिया। तप साधन में अनेक व्यवधान हुए परन्तु वे अविचल निष्ठा से शिव की आराधना में लगी रही।
अन्ततः उनकी अचल निष्ठा और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और पार्वती ने उन्हें पति रूप में पाने की कामना की। आशुतोष शंकर ने प्रसन्न होकर उन्हें यही वर दिया। जानते थे वे कि पार्वती और कोई नहीं पूर्व जन्म की उनकी अर्द्धांगिनी ही है, जिसने अपने पति का अपमान होते देखकर पिता के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था और यज्ञ विध्वंस कर दिया था। सो उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने के लिए भगवान शंकर को कोई आपत्तिजनक बात प्रतीत नहीं हुई।
पत्नी रूप में स्वीकार करने के बाद भगवान शंकर अन्तर्धान हो गए। अपनी तपस्या सफल हुई देखकर पार्वती प्रसन्न मन पर्णकुटी के बाहर एक शिला पर बैठी थीं। तभी उन्हें एक बालक का रुदन स्वर सुनाई दिया। बालक आर्त स्वर में पुकार रहा था, हाय! हाय!! मुझे बचाओ। मुझे ग्राह ने पकड़ लिया है।’
बालक का आर्तनाद सुनकर पार्वती दौड़ी गईं। सरोवर तट पर जाकर उन्होंने देखा एक सुन्दर बालक की टाँग मुँह में दबाए ग्राह उसे जल में खींच रहा है। बालक ने पार्वती को देखा तो वह फिर चीखा, ‘मुझे बचाओ देवि! यह ग्राह मुझे अभी ही चबा जायेगा। मैं अपने माता-पिता का एकमात्र पुत्र हूँ।’
बालक का आर्त स्वर सुनकर पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने ग्राह से निवेदन किया ‘महाराज! बालक बड़ा दीन है। इसे छोड़ दीजिए।’
ग्राह ने कहा, देवी! मेरा नियम है कि दिवस की अपराह्न बेला में जो मेरे पास आएगा या मुझे दिखाई देगा उसे ही मैं अपना आहार बनाऊँगा। विधाता ने इस बालक को मेरे पास इसी समय भेजा है इसलिए यह मेरा आहार है।
उत्तर देते समय ग्राह के बंधन कुछ ढीले हो गए और बालक उससे छूटकर पार्वती के पास आ खड़ा हुआ तथा उनके आँचल से लिपट गया। भय के कारण वह थर-थर काँप रहा था।
‘मैं आपसे इस बालक का प्राणदान माँगती हूँ ग्राहराज! आप इसके बदले में जो चाहें मुझसे प्राप्त करे लें।’
ग्राह ने कहा, मैंने सुना है कि ‘आपने ही हिमालय की चोटी पर तप कर भगवान शंकर को प्रसन्न किया है।’
‘आपने ठीक सुना है ग्राह देव! आप चाहें तो मैं उस तप का सम्पूर्ण बल आपको दे सकती हूँ’ पार्वती ने प्रस्ताव किया।
‘तो ठीक है देवी, आपने जो उत्तम तप किया है वही मुझे अर्पण कर दीजिए। मैं इसे छोड़ दूँगा।’
पार्वती ने संकल्प लिया और जल छोड़ा।
इतना करते ही ग्राह का शरीर तप के तेज से चमक उठा। वह एक मानवाकृति में बदल गया और बोला देवी! आपने यह क्या किया? कितना कष्ट सहकर आपने तप किया था और किस महान् उद्देश्य से किया था। ऐसे महान तप का त्याग कर कहीं आप अदूरदर्शिता तो नहीं कर रही हैं?”
‘नहीं देव!’ पार्वती ने कहा ‘‘प्राण देकर भी इस दीन बालक की बचाना मेरा कर्तव्य था। तप तो मैं फिर भी कर लूँगी परन्तु यह बालक फिर कहाँ से आता? मैंने सब कुछ सोचकर ही बालक को बचाया है।’’
यह कहकर पार्वती बालक को लेकर वहाँ से चली गईं। वे पुनः तप का विचारकर पर्णकुटी में संकल्प करने जा रही थी कि भगवान शंकर प्रकट हुए और बोले, ‘नहीं देवि! तुम्हें फिर से तप करने की आवश्यकता नहीं। तुमने जिस करुणा और त्याग का परिचय दिया। उसका पुण्य फल किये गए तप से हजार गुना अधिक है। जाओ, अब तुम पितृगृह जाओ।’
शास्त्रों में सप्त लोक, सप्त ऋषि, सप्त देवियाँ, सप्त नगरी, सप्त रंग, सूर्य की सप्त किरणें, सप्त घोड़ों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। उपरोक्त सात समूह वस्तुतः चेतना की सात परतें सात आयाम हैं जिनका अलंकारिक वर्णन इन रूपों में किया गया है। उनकी चमत्कारी सामर्थ्य की गाथाओं से सारा पुराण इतिहास भरा पड़ा है। जो जितनी परतों को जान लेता, उन पर अधिकार कर लेता है, वह उसी अनुपात में शक्ति सम्पन्न बन जाता है। समस्त जड़-चेतन इन्हीं सात आयामों के भीतर गतिशील हैं। दृश्य-अदृश्य समस्त सत्ताओं का अस्तित्व इन सात आयामों के भीतर है। पदार्थ एवं चेतना का दृश्य एवं अदृश्य स्वरूप इन आयामों के ऊपर निर्भर रहता है।
ब्रह्म विद्या में सात आयामों की चर्चा अक्सर की जाती है। यही सात लोक गायत्री मंत्र के साथ प्राणायाम करते समय सात व्याहृतियों का उच्चारण किया जाता है। भूः, भुवः, स्वः, तपः, जन, महः, सत्यम्। ये सात व्याहृतियां सात लोकों की परिचायक हैं। इनकी चर्चा इस संदर्भ में होती है कि प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए ही हमें अगले आयामों में पदार्पण करना चाहिए। तीन लोक भौतिक हैं- भूः, भुवः, एवं स्वः। इन्हें धरती, पाताल और आकाश भी कहते हैं। भौतिकी इसी सीमा में अपनी हलचलें जारी रखती हैं। अगले चार लोक सूक्ष्म हैं। चौथा भौतिकी और आत्मिक का मध्यवर्ती क्षेत्र है। पांचवां, छठा, सातवाँ लोक विशुद्ध चेतनात्मक हैं। इन्हें पदार्थ सत्ता से ऊपर माना गया है। इसे और भी अच्छी प्रकार समझना हो तो भूः, भुवः, स्वः को सामान्य जगत, तपः को चमत्कारिक सूक्ष्म जगत एवं जनः, महः, सत्यम् को देवलोक कह सकते हैं। मनुष्य सामान्य जगत में रहते हैं, सिद्ध पुरुषों का कार्यक्षेत्र सूक्ष्म जगत है। देवता उस देवलोक में रहते हैं जिनकी संरचना जनः महः सत्यम् तत्वों के आधार पर हुई है।
समझा जाता है कि सातों लोक ग्रह नक्षत्रों की तरफ वस्तु विशेष हैं और उनका स्थान कहाँ सुनिश्चित है। वस्तुतः ऐसा है नहीं। ये लोक अपने ही जगत की गहरी परत हैं। उनमें क्रमशः प्रवेश करते चलने पर चक्रव्यूह को बेधन करते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। इस प्रगति क्रम में सशक्तता बढ़ती चलती है और अंतिम चरण पर पहुँचा हुआ मनुष्य सर्व समर्थ बन जाता है। इसी को आत्मा की परमात्मा में परिणति कह सकते हैं। यह सात लोक ही सात ऋषि हैं। इन्हीं में पहुँचे हुए देवात्मा एक से एक बढ़-चढ़कर उच्चस्तरीय सिद्धियां प्राप्त कराते हैं।
सामान्यतया तीन आयाम तक ही हमारा बोध क्षेत्र है। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई अथवा गहराई के अंतर्गत समस्त पदार्थ सत्ता का अस्तित्व है। इन्द्रियों की बनावट भी कुछ ऐसी है कि वह मात्र तीन आयामों का अनुभव कर पाती है- लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई (या गहराई)। जो भी पदार्थ स्थूल नेत्रों को दृष्टिगोचर होते हैं, उनके यही तीन परिमाण हैं। चतुर्थ आयाम की ऊहापोह वैज्ञानिक क्षेत्रों में चल रही है, काल, दिक् के रूप में पाश्चात्य दार्शनिकों एवं पृर्वात्त दर्शन के मनीषियों द्वारा वर्णित यह आयाम अनेक रहस्य अपने अंदर छिपाये आइन्स्टीन से लेकर नार्लीकट व अब्दुस्सलाम तक कई वैज्ञानिकों को शोध हेतु आकर्षित करता रहा है। दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्थ आयाम में पहुँचने पर हमारी पूर्व स्थापित धारणाओं एवं जानकारियों में आमूल-चूल परिवर्तन होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। संभव है कि जो दूरी हमें दो-चार हजार मील की मालूम पड़ती है कि चतुर्दिक जगत में पहुँचने पर कुछ गज रह जाय। चौथे आयाम में पहुँचकर प्राणी के कुछ पल में अमेरिका व ब्रिटेन पहुँचकर भारत वापस लौट आने की पूरी-पूरी सम्भावना है भारतीय ऋषियों, योगियों के विषय में ऐसे अनेकों प्रामाणिक प्रसंग समय-समय पर सामने आते रहे हैं। उनका अदृश्य हो जाना, कुछ पलों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना सम्भवतः चतुर्थ आयाम में पहुँचकर ही सम्भव हो सका होगा। जिस चतुर्थ आयाम की बात अभी कल्पना वैज्ञानिक जगत में की जा रही है। उसकी जानकारी हमारे ऋषियों को पूर्वकाल से है।
चतुर्थ आयाम का बोध होते ही हमारे सामने ज्ञान का एक अनन्त क्षेत्र खुल सकता है। तब यह संसार भिन्न रूप में दिखायी पड़ने लगता है। उन मान्यताओं को जिन्हें हम सत्य यथार्थ मानते हैं सम्भव है भ्रान्ति मात्र लगने लगें। आइन्स्टीन की कल्पना के अनुसार काल को भूत, वर्तमान, भविष्य की सीमाओं से नहीं बाँधा जा सकता। ‘हाइजन वर्ग’ जैसे वैज्ञानिक ने सिद्ध किया कि ‘काल’ भूत से वर्तमान एवं भविष्य की ओर ही नहीं भविष्य से भूतकाल की ओर भी चलता है।
जब अतीत की ओर लौटना असंभव हो जायेगा तो हमारी मान्यताएं अस्त-व्यस्त हो जायेंगी। तब रामकृष्ण, बुद्ध, विवेकानन्द, गाँधी को उसी प्रकार देखा जा सकेगा जैसे सामने जीवित खड़े हों। जीवन, मरण की मान्यताएं तब उलट जायेंगी। पांचवां, छठा एवं सातवाँ आयाम पदार्थ सत्ता से परे है। ये आयाम विशुद्धतः चेतना से संबंधित है। भौतिकी की पकड़ यहाँ तक नहीं है। भौतिक यंत्रों एवं इन्द्रियों की सीमा से बाहर है।
पांचवां आयाम, विचार जगत से संबंधित है। विचारों की महत्ता एवं उनकी चमत्कारी शक्ति से हर कोई परिचित है। मनुष्य जैसा भी है विचारों की प्रतिक्रिया मात्र है। शारीरिक हलचलें उनकी प्रेरणा से ही होती हैं। विचारों के माध्यम से वस्तुओं के स्वरूप की कल्पना की जाती है। विचार जगत में उठने वाली तरंगें वातावरण एवं मनुष्यों को प्रभावित करती हैं तथा अपने अनुरूप लोगों को चलने के लिए बाध्य करती हैं। महामानव ऋषि, महर्षि, अवतार अपने सशक्त विचारों का संप्रेषण, सूक्ष्म अंतरिक्ष में करते रहते हैं। इस आधार पर वे असंख्य मनुष्यों की मनःस्थिति एवं परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं। जन-प्रवाह उन विचारों के अनुकूल चलने के लिए विवश होता है। पंचम आयाम की रहस्यमय शक्ति को जानने एवं उसको करतलगत कर सदुपयोग करने से ही बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक क्रान्तियाँ संभव हो सकी हैं। कन्दरा में बैठे ऋषि एक स्थान पर बैठकर अपने विचारों को पंचम आयाम में प्रफुलित करते रहते हैं तथा अभीष्ट परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं।
छठा आयाम भावना जगत है। कहते हैं कि इस लोक में मात्र देवता निवास करते हैं। इस अलंकारिक वर्णन में एक तथ्य छिपा है कि भावों में ही देवता निवास करते हैं अर्थात् भाव सम्पन्न व्यक्ति देव तुल्य हैं। भावना की शक्ति असीम है। इसके आधार पर पत्थर में भगवान पैदा हो जाते हैं। व्यक्तित्व का समूचा कलेवर अंतरंग की आस्था से ही विनिर्मित होता है। विचारणा तथा क्रिया-कलाप तो आँतरिक मान्यताओं से ही अभिप्रेरित होते हैं। इसे ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जीवन चेतना को जोड़ने और उससे लाभ उठाने का सशक्त माध्यम कहा जा सकता है। आत्मा का परमात्मा से मिलन कितना आनंददायक होता है- इसके अनुमान भौतिक मनःस्थिति द्वारा लगा सकना संभव नहीं है। तत्वज्ञानी उसी आनन्द की मस्ती में डूबे रहते हैं तथा जन-मानस को उसे प्राप्त करते की प्रेरणा देते रहते हैं।
तुलसीदास जड़-चेतन सबमें परमात्म सत्ता का अनुभव करते हुए लिखते हैं- ‘सियाराम मय सब जग जारी’। “ईशावास्य मिदं सर्वं यित्किंचित जगत्याम जगत”। इशावाशोउपनिषद् तथा रामायण के इस उदाहरण से अद्वैत स्थिति का वर्णन किया गया है। सप्तम आयाम की यही स्थिति है। इसमें पहुंचने पर जड़-चेतन में विभेद नहीं दिखता। सर्वत्र एक ही सत्ता दृष्टिगोचर होती है। शिव शक्ति का, ब्रह्म-प्रकृति का, जड़-चेतन का, जीव-ब्रह्म की एकरूपता सातवें आयाम में दिखायी पड़ने लगती है। इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। इसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता। सातवें आयाम का ही वर्णन सप्तम लोक के रूप में किया गया है।
सप्त लोक, सप्त आयाम, चेतना की सात परतें एक के भीतर एक छिपी हुई है। इनमें विभेद स्वरूप मात्र है। जिस प्रकार पोले स्थान में हवा भरी रहती है। हवा में आक्सीजन तथा आक्सीजन में प्राण- सभी एक के भीतर एक परतें हैं, उसी प्रकार चेतना की सात परतें एक के भीतर एक विद्यमान हैं। प्याज के भीतर रस तथा रस के भीतर गंध एवं स्वाद होता है। स्थूल प्याज की अपेक्षा सूक्ष्म रस में प्याज की सारी विशेषता छिपी रहती है। एक वस्तु के भीतर कई परतें भरी रहती हैं। मनुष्य के भीतर हृदय है। हृदय में नसें तथा नसों में रक्त का प्रवाह चलता रहता है। रक्त, रक्तकणों से मिलकर बना है, रक्त के रक्तकण अनेकानेक कोशिकाओं तक पहुँचकर उन्हें ओषजन के रूप में प्राण देते हैं। कोशिकायें अरबों की संख्या में हैं, जिनमें स्वयं के अपने-अपने नाभिक हैं। इसमें डी. एन. ए. रहता है जो जीवन का मूल आधार है।
इसी प्रकार एक लोक के भीतर सात लोक, सात आयाम विद्यमान हैं। तीन आयामों से युक्त पदार्थ जगत की विशेषताओं से सभी परिचित हैं। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म पदार्थ से चेतना की शक्ति अनेक गुना अधिक है। आइन्स्टीन के चतुर्थ आयाम की कल्पना मात्र से वैज्ञानिकों के हाथ में एक बहुत बड़ी शक्ति मिलने की आशा बन चली है। लेजर किरणों से ‘होलोग्राफी’ के आधार पर त्रिमितीय सिनेमाओं का निर्माण कई देशों में हो चुका है। जहाँ पर्दे पर मनुष्य, मोटर, गाड़ी, शेर, हाथी, यथार्थवत् चलते दिखायी देते हैं। अनभ्यस्त व्यक्तियों को प्रायः यथार्थ होने का भ्रम हो जाता है। त्रिआयामिक चित्रों की यह विशेषता है। इसके पश्चात् चतुर्थ पंचम, षष्टम, सप्तम आयाम कितना विलक्षण एवं शक्ति सम्पन्न हो सकता है, इसकी आज तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
भौतिकी की पहुँच जहाँ तक है, वहीं तक की उपलब्धियाँ आदमी को चमत्कृत कर देती हैं। मानवी बुद्धि की विलक्षणता और उसकी अन्वेषण क्षमता को इसका श्रेय दिया जाता है। परन्तु वास्तविकता यहीं तक सीमित नहीं है। जब योग साधना रूपी अध्यात्म उपचारों का आश्रय लिया जाता है, शास्त्रों में वर्णित वैज्ञानिक पद्धति से अपने जीवन को परिष्कृत समुन्नत बनाकर प्रतीति या प्रपंच जगत से ऊपर पहुँचने की स्थिति बनायी जाती है, तो जिस लीला जगत का दर्शन होता है, उसकी शब्दों में अभिव्यक्ति संभव नहीं। यह सब अपने ही अंदर है, इस वास्तविकता को भूलकर व्यक्ति सामान्यतया अपने को त्रिआयामीय जगत एवं इन्द्रिय सम्वेदनों तक ही स्वयं को सीमित कर लेता है। वस्तुस्थिति तक पहुँचे बिना ही सन्तुष्टि सामान्य जीवन क्रम वालों के लिए है। देवपुरुष महामानव इससे ऊँचा उठते हैं व स्वयं तो धन्य बनते ही हैं, दूसरों को भी कृतकृत्य करते हैं।
सात लोकों का अस्तित्व अपने इर्द-गिर्द एवं भीतर बाहर भरा पड़ा है। उसमें से इन्द्रियों एवं यंत्र उपकरणों से तो मात्र तीन को ही अनुभव किया जा सकता है। चौथे लोक में यदि प्रवेश संभव हो सके तो इन्हीं इन्द्रियों और इन्हीं यंत्र उपकरणों से ऐसा कुछ देखा समझा जा सकेगा जिसे आज की तुलना में अकल्पनीय और अप्रत्याशित एवं अद्भुत ही कहा जायेगा। तब गीता के अनुसार “आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेन्.........” की स्थिति सामने होगी। यह चौथा आयाम चेतना जगत और भौतिक जगत का घुला-मिला स्वरूप है। इसे ‘तप’ लोक कहा गया है। तपस्वी इसमें अभी भी प्रवेश पाते और अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न सिद्ध पुरुष कहलाते हैं।
इसके ऊपर के जनः महः और सत्य लोक विशुद्ध चेतनात्मक है। उनमें प्रवेश पाने वाला देवलोक में विचरण करता है, दैवी शक्तियों से सम्पन्न होता है और उस तरह की मनःस्थिति एवं परिस्थिति में होता है जिसे पूर्ण पुरुष, जीवन मुक्त, परमहंस एवं देवात्मा जैसे शब्दों में सामान्य जनों द्वारा तो कहा सुना ही जा सकता है।
वैज्ञानिक अन्वेषण जैसे-जैसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ रहा है, यह तथ्य सप्रमाण पुष्ट हो रहा है कि सूक्ष्म की सामर्थ्य स्थूल की तुलना में कई गुना अधिक है। अब दृश्य की तुलना में अदृश्य की शक्ति को ढूंढ़ने, करतलगत एवं प्रयोग करने की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान अधिक केन्द्रित है। कभी बड़े विशालकाय अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण को शक्ति संचय का केन्द्र माना जाता था। कालान्तर में यह मान्यता बदली और परमाणु जैसे नगण्य सूक्ष्म घटक प्रचण्ड शक्ति के स्त्रोत के रूप में ढूंढ़ निकाले गये। पदार्थ का क्षुद्र घटक जब इतना भयंकर-संहारक हो सकता है तो उनकी सामर्थ्य को ही क्यों न संचित करने की कोशिश की जाय। व्यर्थ में विशालकाय अस्त्रों के बनाने का झंझट क्यों मोल लिया जाय? यह विचार धारा प्रत्येक देश के राजनायकों, शासन का दायित्व संभालने वालों के मन में उठती जा रही है।
ध्वंस ही नहीं सृजन की दिशा में भी सूक्ष्म की सत्ता ढूंढ़ने-सामर्थ्य को नियोजित करने का सत्प्रयास चल पड़ा है। फलतः आशातीत सफलता भी मिली है। चिकित्सा जगत में प्रचलित अनेकों पद्धतियां एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथी बीमारियों के निदान में एक सीमा के ही सफल हो रही है। गंभीर एवं असाध्य समझी जाने वाली बीमारियों में इनकी पहुँच नहीं के बराबर है। शरीर के सूक्ष्मतम संस्थानों तक पहुँचकर उपचार कर पाना इनके द्वारा संभव नहीं रहा। बीमारियों के उपचार के लिए नई पद्धति ढूंढ़ी गई है- रेडियो विकिरण चिकित्सा की। चिकित्सा जगत में विगत वर्षों की महानतम उपलब्धियों में से इसे एक कहा जा सकता है। इसके लिए रेडियो समस्थानिकों (आयसोरोप्त) का प्रयोग किया जाता है। रोगी के निदान एवं उपचार में रेडियो सक्रिय अनुसारक (ट्रेसर) विशेष रूप से सफल सिद्ध हुए हैं।
हायपर थापराडिज्म, पालीसायथेभिया, कैंसर जैसे साध्य रोगों में भी यह चिकित्सा पद्धति कारगर सिद्ध हुई है। विश्व भर में रेडियो समस्थानिकों से युक्त औषधियों का प्रयोग होने लगा है। गोलियों अथवा इन्जेक्शनों को रेडियो विकिरण से युक्त कर रोगी के रोगग्रस्त भाग में प्रविष्ट कराकर कैंसर जैसी बीमारियों पर भी नियंत्रण पाने में सफलता मिली है।
लगभग 50 से भी अधिक ऐसी रेडियो औषधियों की खोज हो रही है जो विभिन्न रोगों के उपचार के लिए उपयोगी है। इनमें आयोडीन- 131, फास्फोरस- 31, क्रोमियम 51, स्वर्ण- 198, सोडियम- 28, पोटेशियम- 42 तथा लौह- 56 विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस प्रकार की औषधियों का निर्माण भारत में भी भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र ट्राम्वे, बम्बई में होने लगा है।
हृदय विकार, थायराइड ग्रन्थि की-अव्यवस्था को आयोडीन चिकित्सा द्वारा जाना और ठीक किया जा सकता है। रक्त विकारों का ज्ञान एवं उपचार सोडियम 24 के द्वारा संभव है। अनेकों विटामिनों को रेडियो कोबाल्ट, रेडियो आयोडीन आदि से अंकित कर रोगी को देने से रोगों के आदि हुई क्रियाओं का अध्ययन बाह्य संयमों द्वारा तथा यकृत, वृक्क, पित्ताशय और मस्तिष्क ग्रन्थियों के गुप्त रोगों का उपचार किया जा सकता है। कैंसर जैसे रोग के उपचार में कोबाल्ट-60 विकिरण द्वारा कैंसर कोशिकाओं को जलाने में विशेष सहयोग मिला है। इसके प्रयोग के लिए रेडियम सुइयों का प्रयोग किया जाता था, किन्तु अब नलियों का प्रयोग अधिक लाभकारी माना गया है।
रेडियो विकिरण चिकित्सा में पूरी सतर्कता रखनी होती है ताकि विकिरण का प्रभाव स्वस्थ अंगों के ऊपर न हो। कोबाल्ट-60, इस्पात या जस्ते के कैप्सूल में इस प्रकार रखा जाता है कि विकिरण एक निश्चित दिशा में कैप्सूल में बने मार्ग से ही बाहर निकले ताकि कैंसर ग्रस्त भाग पर ही उसका प्रभाव डाला जा सके। गहरे ट्यूमर के इलाज के लिए इन इकाइयों में व्यवस्था यह रहती है कि विकिरण स्त्रोत को इस प्रकार घुमाया जा सके कि उसका विकिरण प्रभाव ट्यूमर पर ही केन्द्रित रहे।
पदार्थ सत्ता की सूक्ष्म सामर्थ्य रेडियो विकिरण का प्रयोग करने से चिकित्सा जगत में चमत्कारी परिणाम निकले हैं। जड़ की तुलना में मानवी चेतना कहीं अधिक सामर्थ्यवान, रहस्यमय है। काया में सन्निहित प्राण की असाधारण महिमा गायी गई है। प्राण को जीवन का केन्द्र माना गया है। पुरातन ऋषियों ने इसकी सत्ता एवं महत्ता को न केवल अनुभव किया वरन् इस तथ्य का प्रतिपादन भी किया कि कायिक स्वास्थ्य एवं मानसिक संतुलन का आधार प्राण है। प्राण की न्यूनता अथवा अधिकता ही, रोग अथवा आरोग्य का कारण है। बहु प्रचलित वर्तमान अनेकों चिकित्सा प्रणालियों की तरह पुरातन काल में प्राण चिकित्सा का प्रचलन था। सबल प्राण सम्पन्न व्यक्ति- रोगी असमर्थ को, अपने प्राणों से अनुप्राणित करके आरोग्य एवं स्वास्थ्य प्रदान करते थे।
भारत ही नहीं अन्य देशों में भी प्राण-चिकित्सा से लोग परिचित थे। रोगी के रोगग्रस्त अंगों पर प्राण संपन्न चिकित्सक अपने हाथों को फेरता था। इतिहास में उसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं। मिश्र के प्राचीन शिलालेख चित्रों में रोगियों के पेट पर एक हाथ तथा पीठ पर दूसरा हाथ रखे हुए चिकित्सक दर्शाए गये हैं। वहाँ के साहित्य में भी प्राण चिकित्सा का उल्लेख मिलता है। कि संत पैट्रिक ने आयरलैंड के एक अंधे के आँख पर हाथ रखकर उसे नेत्र-ज्योति दी थी। संत वर्नाड के विषय में भी कहा जाता है कि उन्होंने एक दिन में ही 10 अंधों और 12 अपाहिजों को अच्छा कर दिया था। ईसाई धर्मग्रन्थ के पन्ने ऐसी अनेकों घटनाओं से भरे पड़े हैं। हिन्दू-मुस्लिम, धर्म-ग्रंथों, पुराणों में तो ऐसे असंख्यों उदाहरण मिलते हैं। पिछली कुछ सदियों के इतिहास में प्राण-चिकित्सा के अनेकों ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
सत्रहवीं सदी में लंदन के लेन्हर्ट नामक एक माली को अंगुलियों से छूकर रोग विमुक्त करने में अद्भुत ख्याति मिली। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ से सिलिपिया के रिचर नामक चौकीदार ने हजारों रोगियों को अपने स्पर्श मात्र से आरोग्य प्रदान करने में सफलता पायी। प्राचीन यूनानी वैद्य प्राण-चिकित्सा के लिए प्रख्यात रहे हैं।
इस्कुलेपियस नामक एवं ‘यूरोपीय’ रुग्ण अवयवों पर श्वास छोड़कर और अपनी हाथों की थपकियां देकर रोगों की चिकित्सा करने में पारंगत था। इंग्लैंड के ड्इड नामक पादरी को इस क्षेत्र में असाधारण सफलता मिली। अनेकों विद्वानों ने अपने साहित्यों में उसकी चमत्कारी शक्ति का उल्लेख किया है। स्काटलैंड के ‘मैक्सवेल’ नामक विद्वान ने प्राण-चिकित्सा प्रशिक्षण के लिए केन्द्र खोल रखा था। वह विश्वव्यापी, प्राण तत्व में विश्वास करता था।
महामनीषी हिपेक्रेट को प्राणतत्व के प्रति असाधारण श्रद्धा थी। वे लिखते हैं कि ‘‘शरीर आत्मा की शक्ति में संचालित एवं नियंत्रित होता है तो उनकी प्रचण्ड शक्ति से रोगों का निवारण भी हो सकता है। प्राचीन काल के वैद्य, अपनी आत्म शक्ति से रोगों का अनुभव कर लेते थे। वे निदान एवं उपचार में रोगी के अंदर प्राण का संचार करते थे। पिछले दिनों ‘मेस्मर’ ने चिकित्सा जगत में चमत्कारी सफलता प्राप्त करने के उपरांत विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों का ध्यान प्राण-तत्व की ओर आकर्षित किया है।
पदार्थ की रेडियो विकिरण क्षमता रोगों के उपचार में इतनी समर्थ एवं सफल हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि प्राण शक्ति द्वारा रोगी को रोग मुक्त न किया जा सके। आवश्यकता इस सूक्ष्म सामर्थ्य को समझने की है। मनोवैज्ञानिक उपचारों में इसका एक छोटा प्रयोग आरम्भ हो चुका है किन्तु बड़ा भाग अब भी अविज्ञात बना हुआ है। सूक्ष्म की सामर्थ्य विज्ञान जगत में इन दिनों चर्चा की विषय बनी हुई है। प्राण तत्व को उभारने के लिए साधना विज्ञान का आश्रय लिया जा सके तो रोगोपचार ही नहीं कितनी ही सूक्ष्म शक्तियों को करतलगत किया जा सकता है और असाधारण क्षमता सम्पन्न बना जा सकता है।
‘सत्य’ का अनुसंधान नवजात शिशु पृथ्वी पर आते ही आरम्भ कर देता है। पग रखते ही वह संसार की जिज्ञासा भरे नेत्रों से देखता है। अपनी मूक भाषा में वह पूछता है, यह संसार क्या है? मैं कौन हूँ? भाषा ज्ञान होने, बोलने योग्य होने पर वह माता-पिता से प्रश्नों की झड़ी लगा देता है। अमुक वस्तु क्या है- क्यों है, कैसी है जैसे प्रश्नों का समाधान चाहता है। सीमित बुद्धि असीम तथ्यों को एक ही समय में जान लेना चाहती है। यह प्रचण्ड जिज्ञासा अन्तरंग में सत्यानुसंधान की प्रबल इच्छा का ही परिचायक है। जो शिशु को संसार की प्रत्येक वस्तु को जानने के लिए प्रेरित करती है। इसकी आपूर्ति के लिए परमात्मा ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ साधन बुद्धि दी है जो अन्याय प्राणियों को दुर्लभ है। बुद्धि ने सत्य को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान की रचना की। इतिहास, भूगोल, भौतिक विज्ञान, रसायन शास्त्र, जीवन-विज्ञान, अर्थशास्त्र, नीति-शास्त्र, गणित शास्त्र की रचना कर डाली। यह बौद्धिक प्रयास आँतरिक जिज्ञासा का ही प्रतिफल है जिसके कारण ज्ञान-विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ संभव हो सकी हैं। सुख-सुविधाओं से लेकर वैज्ञानिक आविष्कार तक बुद्धि बल के ही चमत्कार हैं। सभ्यता एवं संस्कृति मानवी विचारणा के ही परिणाम हैं। सृष्टि के मूल रहस्यों को जानने की अभिप्रेरणा द्वारा जीवात्मा अपने सत्य स्वरूप की झाँकी परोक्ष रूप में कराती है।
बुद्धि के अतिरिक्त मनुष्य को दूसरी विशेषता ‘नैतिक’ भावना के रूप में मिली है। वह शिव है। शिव अर्थात् श्रेष्ठ कल्याण। जीव-जन्तु भले-बुरे का भेद नहीं कर पाते। उनकी क्रियाएं प्रकृति प्रेरित हुआ करती हैं। खाने-पीने, बच्चे पैदा करने में नीति-मर्यादाओं का वे पालन नहीं करते। मनुष्य को यह विशेषता जन्मजात मिली है। शिक्षित हो अथवा अशिक्षित अच्छे-बुरे का ज्ञान सबको होता है। असभ्य, बर्बर एवं जंगली जातियों में भी नैतिक भावना होती है। भले ही वह न्यून, अपरिष्कृत रूप में हो, पर वे नैतिकता से सर्वथा रहित नहीं हो सकते। जंगली असभ्य समझे जाने वाले व्यक्ति भी सामाजिक नियमों एवं नीति-मर्यादाओं का पालन करते हैं। बच्चे को जन्म के साथ प्राप्त पारिवारिक स्नेह-सहयोग एवं सामाजिक सहयोग मानवी उदात्त भावना का ही प्रतिफल है। जो बच्चे को श्रेष्ठ-चरित्रवान एवं उदात्त अन्तःकरण सम्पन्न बनने की प्रेरणा देती है। स्नेह भावना से अभिपूरित संरक्षित एवं अनुकूल परिस्थितियाँ परमात्मा ने जन्म के साथ ही प्रदान की हैं। जो शिवत्व की ओर बढ़ने की परोक्ष प्रेरणा देती है। बाह्य कल्याणकारी परिस्थितियाँ अंतःसत्ता के शिवत्व स्वरूप का बोध कराने के लिए ही विनिर्मित की गई हैं।
मनुष्य को तीसरी विशेषता परमात्मा द्वारा मिली है, सुन्दरम्- सौंदर्य बोध की क्षमता। यह प्रकृति कितनी आकर्षक एवं सौंदर्य युक्त है, इनका आभास अन्य जीव-जन्तुओं को नहीं मिल पाता। मनुष्य स्वभाव से ही सौंदर्य प्रिय है। प्रातः उदीयमान स्वर्णिम सूर्य, मोती जैसे बिखरे नभ के तारे, ग्रह, नक्षत्र, चाँदनी बिखेरता चन्द्रमा, कलकल नाद करती नदियाँ, खिलते पुष्प, खिल-खिलाते बच्चे, अगाध समुद्र, विराट् पहाड़, अनन्त अंतरिक्ष मनुष्य को एक अनिवर्चनीय आनन्द में डूबो देते हैं। मनुष्य की सौंदर्य प्रियता ने कला, नृत्य, वादन, गायन की रचना कर डाली। वस्तुतः अन्तःस्वरूप ही बाह्य सौंदर्य प्रियता के रूप में प्रकट होता है। जीवात्मा सुन्दर है। जहाँ कही भी सौंदर्य दिखायी पड़ता है। वह अन्तःप्रकाश की ही अभिव्यक्ति है। सौंदर्य बोध की क्षमता परमात्मा द्वारा अन्तरंग में निवास करने वाली सत्ता के स्वरूप को समझने के लिए दी गई है।
सत्यम् शिवं और सुन्दरम् से युक्त करके परमात्मा ने मनुष्य को पृथ्वी पर भेजा। लक्ष्य था इन विशेषताओं से युक्त मनुष्य कल्याणकारी मार्ग पर चलते हुए जीवन उद्देश्यपूर्णता को प्राप्त करे? पिण्ड में समायी आत्मा और ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्मा का दर्शन करे। पर मनुष्य अपने लक्ष्य को भूल गया। परिवर्तनशील वस्तु एवं जगत को ही स्थायी एवं वास्तविक मान बैठा। सत्यानुसन्धान पदार्थों को जुटाने, उन्हें उधेड़ने, पता लगाने में सिमट कर रह गया। भौतिक ज्ञान और विज्ञान ही शोध का लक्ष्य बनकर रह गया। प्रबल जिज्ञासा अन्तरंग को समझने के लिए अभिप्रेरित थी। आत्मा एवं परमात्मा का साक्षात्कार उसे अभीष्ट था, पर भटकाव के कारण स्थूल जगत ही एकमेव लक्ष्य बनकर रह गया। बहिर्मुखी दृष्टि ने अज्ञानवश अन्तःप्रेरणा की उपेक्षा कर दी। जिसे सत्य माना जाता है उसे प्राप्त करने की कामना भी रहती है। पदार्थ सत्ता को ही जब यथार्थ मान लिया गया तो उसे अधिक से अधिक मात्रा में संग्रहित करने की होड़ चलना स्वाभाविक भी है, पदार्थ शक्ति को एकत्रित करने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी। सुख-साधनों से लेकर शक्ति संग्रह की स्पर्धा ने अनेकों प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया। प्रकृति के सीमित साधनों से असीम इच्छाओं की पूर्ति संभव न हो सकी। अधिक पाने- उपभोग करने की प्रवृत्ति ने संघर्ष को जन्म दिया। ईर्ष्या, वैमनस्य, द्वेष, लोभ जैसी संकीर्ण प्रवृत्तियाँ भौतिकवादी दृष्टिकोण के ही परिणाम हैं। उनकी क्षण-भंगुरता नश्वरता को समझा गया होता तो इतनी समस्याएं उत्पन्न नहीं होतीं। चेतना की समर्थता, सत्यता का बोध रहा होता, सत्य के साक्षात्कार की प्रबल जिज्ञासा बाह्य जगत में उलझकर न रह जाती। वह अन्तर्मुखी होकर अपने शाश्वत स्वरूप का दर्शन करती। पिण्ड एवं ब्रह्माण्ड में समायी चेतना के दिव्य स्वरूप को दिग्दर्शन एवं उससे मिलने वाले अनुदानों का रसास्वादन करती। जो बुद्धि अन्तर्मुखी होकर प्रज्ञा का रूप ले सकती और दिव्य दृष्टि सम्पन्न बन सकती थी- वह भी जड़ वस्तुओं के उपयोग का साधन बनकर रह गई। सत्य की प्रबल जिज्ञासा और उसे जानने की श्रेष्ठ साधन बुद्धि का सदुपयोग न हो सका। मनुष्य का इसे सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि ईश्वर प्रदत्त इस विशिष्ट साधन का सदुपयोग न हो सका और वह अपने स्वरूप को जानने से वंचित रह गया।
दुरुपयोग नैतिक भावना का भी हुआ। बुद्धि ने जब जड़-पदार्थों को ही सत्य माना तो उसे उनको प्राप्त एवं उपयोग करने में ही कल्याण दिखायी पड़ा। अपनेपन की परिधि संकीर्ण होने से शरीर से जुड़े परिवार के सदस्यों को पालन-पोषण कर देने, जैसे-वैसे सुख-साधन जुटा देने में ही नैतिक भावना के इति श्री मान ली गई। शिवत्व की भावना परिवार को विकसित कर देने मात्र तक ही सिमट गई। जो विस्तृत होकर समष्टिगत बनकर अजस्र आनन्द का स्त्रोत बन सकती है वह क्षणिक मोह से जुड़ी मानसिक तुष्टि बनकर रह गई। यह आत्म प्रवंचना और नैतिक पराभव का ही परिचायक है।
उपयोग सौंदर्य बोध की क्षमता का भी न हो सका। जब सत्य पदार्थ सत्ता को पाया गया, कल्याण उसके संग्रह एवं उपभोग में देखा गया तो फिर उसके रंग-बिरंगे आकर्षणों में आकृष्ट होना स्वाभाविक और शरीरगत इन्द्रियों एवं पदार्थगत साधनों के क्षणिक रंग रूप को ही स्थायी समझा गया। सौंदर्य की उपलब्धि है- स्थायी आनन्द। भ्रमवश बाह्य आकर्षणों में आनन्द ढूंढ़ा जाने लगा। पत्नी, बच्चो में, भौतिक साधनों के उपभोग में आनन्द प्राप्त करने की परम्परा चल पड़ी है। मृग मरीचिका के समान बाह्य अस्थायी सौंदर्य के पीछे मनुष्य दौड़ता रहा। अन्तः की अतृप्ति वैसी ही बनी रही।
जीवात्मा सत्य है- शिव है और सुन्दरता से युक्त भी। उसी की शक्ति एवं प्रकाश की छाया से बहिर्जगत यथार्थ लगता है। सुखानुभूति उसकी ही एक तरंग है। सौंदर्य उसकी अभिव्यक्ति है। अन्तः सौंदर्य ही बाह्य जगत में प्रतिबिंबित होता है। उसकी सौंदर्य किरणें विश्व ब्रह्माण्ड में अन्तः से निकलकर प्रस्फुटित होती दिखायी देती हैं। सत्य और शिव से, सुन्दरता से युक्त जीवात्मा की प्रतिच्छाया मात्र से यह संसार इतना यथार्थ, सुन्दर एवं आनन्ददायक लगता है। फिर उसका शाश्वत स्वरूप कितना सुन्दर, चिरन्तन आनन्द देने वाला होगा इस कल्पना मात्र से मन एक अनिवर्चनीय आनन्द से पुलकित हो उठता है।
सरलता एक ऐसा गुण है कि व्यक्ति में कोई और गुण हो अथवा नहीं हो, केवल वह सरल चित्त ही हो, तो उसमें अन्य गुण उसी प्रकार विकसित होने लगते हैं जिस प्रकार कि वर्षा ऋतु में पेड़-पौधे बिना सिंचाई के ही बढ़ने और फलने-फूलने लगते हैं। सरल चित्त व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को सभी अहंकारों, अभिमानों और गर्व गरूरों से मुक्तकर उसे एक स्वच्छ शीतल भवन की तरह बनाने लगता है, जिसमें सभी दिशाओं से पवित्रता की सुगन्धि आती है और वहाँ के वातावरण को सुरभित कर जाती है। सरलता का निश्छलता से यही आशय है कि व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा और वैभव का अहंकार न करे तथा स्वयं को एक साधारण मनुष्य मानकर जीवन व्यतीत करे। आखिर कोई व्यक्ति मनुष्य के अतिरिक्त और होता भी क्या है?
पोपपाल ने गिरजा घर बनवाने की योजना तैयार की और उसे कार्य रूप में परिणित करने का उत्तरदायित्व सौंपा इटली के महान शिल्पकार माइकेल एंजेलो को। एंजेलो के नाम की उन दिनों इटली भर में धूम थी। एक दिन वे गिरजाघर से काम कर के लौट रहे थे। शाम का समय हो चुका था और घर जल्दी पहुँचने के लिए उनके कदम भी जल्दी-जल्दी उठने लगे थे। रास्ते में उन्होंने एक बच्चे को राह रोककर खड़ा हुआ देखा। उसने कहा, ‘यदि आप जल्दी में न हों तो मैं एक निवेदन करूं?’
एंजेलो ने बड़े ही स्नेह के साथ उसे अपनी बात कहने के लिए कहा, तो वह लड़का बोला, ‘सुना है आप बहुत बड़े कलाकार हैं। अतः मेरी इस कापी पर देवदूत का एक अच्छा चित्र बना दीजिए।’
एंजेलो थके हुए थे और उन्हें अपनी ख्याति का भी भान था। चाहते तो उस बच्चे को वहीं टरका कर घर जा सकते थे, परन्तु उन्होंने बच्चे का मन तोड़ना उचित नहीं समझा और वह महान कलाकार बच्चे द्वारा दी गई कापी तथा पेंसिल लेकर बैठ गया तथा बड़े मनोयोग से देवदूत का चित्र बनाने लगा। चित्र जब बनकर तैयार हो गया तो उसे बच्चे को देते हुए एंजेलो ने पूछा, ‘‘कहो! मेरे दोस्त चित्र पसंद आया?”
बहुत अच्छा है, ‘कहकर उस बालक ने एंजेलो का मुँह चूम लिया। एंजेलो उसी सहज भाव से वापस अपने रास्ते पर चल दिए। ऐसी सरलता कम ही लोगों में देखने को मिलती है। जिन लोगों को भी थोड़ी बहुत प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा मिल जाती है वे अपने आपको किसी दूसरे ही लोक का आदमी या देवदूत समझने लगते हैं। जबकि योग्यता और प्रतिभा अपने साथ सरलता, सहजता के गुण नैसर्गिक रूप से साथ लेकर आती है।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद उन दिनों काँग्रेस अध्यक्ष थे। स्वतन्त्रता आँदोलन उस समय गति पकड़ चुका था और यह वे दिन थे जब काँग्रेस अध्यक्ष की प्रतिष्ठा वायसराय से कम नहीं होती थी। घटना सन् 1935 की है। राजेन्द्र बाबू वर्षा की फुहारों में भीगते हुए ‘लीडर’ अखबार के कार्यालय में पहुँचे और चपरासी को अपना कार्ड दिया। सम्पादक सी. आई. चिंतामणि उस समय कुछ लिखने में व्यस्त थे। चपरासी ने वह कार्ड चुपचाप उनकी मेज पर रख दिया और बाहर आकर सीधे-सादे ग्रामीण से दिखने वाले राजेन्द्र बाबू से इंतजार करने के लिए कह दिया।
राजेन्द्र बाबू ने देखा कि पास ही कुछ चपरासी आग ताप रहे थे। वे स्वयं भी वर्षा में भीग चुके थे, उन्होंने सोचा क्यों न समय का सदुपयोग कर लिया जाय और पानी में भीगे कपड़ों को सुखाकर ठण्ड भगा ली जाय। यह सोचकर वे चुपचाप आग के पास जा बैठ गए। भीतर चिंतामणि जी ने जब अपना लेख पूरा कर लिया तो मेज पर पड़े कार्ड को देखा। कार्ड देखते ही वे चौंके। उन्होंने तुरन्त घण्टी बजाई और चपरासी को भीतर बुलाकर पूछा कि ‘यह कार्ड देने वाले सज्जन कहाँ हैं?’
चपरासी ने उन्हें बताया कि वे बाहर ही इंतजार कर रहे हैं। चिंतामणिजी अपनी कुर्सी छोड़कर भागे दौड़े। आसपास देखा तो कहीं भी राजेन्द्र बाबू का पता नहीं था। एक बार सब ओर ध्यान से निगाह दौड़ाने पर उन्होंने बाबूजी को चपरासियों के बीच बैठा देख लिया। वे बड़े मजे से वहाँ गप्पें लड़ा रहे थे और कपड़े भी सुखा रहे थे। चिंतामणिजी वही दौड़े आये बोले, “आपको व्यर्थ कष्ट हुआ। चपरासी आपको शायद पहचानता नहीं है। नया-नया ही आया है। आपने अपना परिचय क्यों नहीं दिया?’’
इसके लिए चिंतामणिजी जब राजेन्द्र बाबू से क्षमा माँगने लगे तो उन्होंने ऐसे कहा जैसे कुछ हुआ ही न हो, ‘कपड़े सुखाना भी तो जरूरी काम था। इतनी देर में यह काम निबट गया। आप व्यर्थ ही परेशान हो रहे हैं।’
साधारण बातों पर ध्यान न देना, उन्हें अनावश्यक महत्व न देना तथा अनजाने में हुई भूलों या त्रुटियों से क्षुब्ध अथवा आवेशग्रस्त न होना भी सरलता का एक रूप है। सरलता को भली प्रकार अपने स्वभाव में सम्मिलित करने वाले व्यक्ति अपनी शक्तियों का सही उपयोग कर पाते हैं और दूसरों की गलती से होने वाली हानि को भी व्यर्थ महत्व नहीं देते। एक बार चीन के भूतपूर्व राष्ट्रपति डा. सनयात सेन ने रात भर जागकर किसी आवश्यक मसविदे का प्रारूप तैयार कराया। उनकी तथा उनके सहयोगी की पूरी रात आंखों में कटी तब कहीं जाकर काम पूरा हो सका। प्रारूप तैयार हो जाने के बाद ही डा. सेन करीब रात को चार बजे के लगभग सोने के लिए गए। उनके जाने के बाद सहायक की जरा-सी असावधानी के कारण मेज पर रखा लैंप लुढ़क गया और घंटों की कराई मेहनत पर पानी फिर गया। कागजों में आग लग गई थी और इतनी देर तक किया हुआ परिश्रम बेकार चला गया था।
बेचारे सहायक की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। भय के कारण वह काँपने लगा और जब डा. सेन सोकर उठे तो घटना सुनाते-सुनाते उसकी आंखों से आँसू बह निकले। इस नुकसान से उन्हें दुःख तो बहुत हुआ परन्तु वे जानते थे कि दुःखी होने से क्या बनेगा? इसलिए वे अपने सहायक से बहुत ही शान्त, सहज और मधुर स्वर में बोले, ‘‘कोई बात नहीं। तुम भी थके हुए थे, ऐसे में असावधानी हो जाना स्वाभाविक है। चलो कागज निकालो और हम तुम दोनों बैठकर फिर से प्रारूप तैयार कर लेते हैं। इसमें घबराने की क्या बात है।” इतना कह कर डा. सेन पुनः अपने सहायक को साथ लेकर काम करने की टेबल पर बैठ गए।
नयी प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए सरल और सहृदय व्यक्ति स्वयमेव अपने को पृष्ठभूमि में कर लेते हैं और नये लोगों को बढ़ावा देते हैं। उन्हें यह गुमान नहीं होता कि हम बड़े, वरिष्ठ और अनुभवी हैं इसलिए हमें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। बल्कि वे अपने सरल स्वभाव से प्रेरित होकर इस दृष्टि से सोचते हैं कि नये व्यक्तियों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
इंग्लैण्ड की प्रसिद्ध कला संबंधी संस्था रॉयल अकादमी ने एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। इसके लिए चित्र छाँटकर लगाये जाने लगे। सब चित्रों को यथास्थान लगा देने के बाद किसी नये कलाकार का बनाया एक चित्र बचा रहा। इस चित्र को कमेटी के सदस्यों ने पसंद तो कर लिया था, पर समस्या यह थी कि उसे लगाया कहाँ जाय क्योंकि सब स्थान भर चुके थे और चित्र लगाने के लिए कोई स्थान खाली नहीं था। विवश होकर सदस्य इस चित्र को अस्वीकृत करने ही वाले थे कि सुप्रसिद्ध चित्रकार टर्नर ने उठकर कहा, ‘मैं अपने एक चित्र को हटा कर इस चित्र को स्थान देने के लिए तैयार हूँ।’ और उन्होंने चित्र हटा लिया।
सदस्यों ने कहा कि आपके किसी भी चित्र से यह चित्र बढ़िया नहीं है, परन्तु टर्नर यही कहते रहे कि नये लोगों को स्थान अवश्य मिलना चाहिए ताकि वे प्रोत्साहन पा सकें और आगे चलकर कला की तन्मयता व निष्ठा के साथ सेवा कर सकें।
सरलता का सीधा-सा अर्थ है- निरभिमानिता। अपने कुछ होने का अहंकार ही व्यक्ति को उसके गौरव से वंचित करता है तथा अपने आपकी दृष्टि में स्वयं को पदच्युत करता है। और कुछ नहीं केवल जीवन में सरलता का ही समावेश कर लिया जाय तो उसके पीछे अनेकों गुण अपने आप चले आते हैं।
बड़प्पन, वैभव एवं सुविधा साधनों को सौभाग्य का चिह्न माना जाता है। साथ ही सादगी एवं सज्जनता को भी सराहा जाता है। ये मान्यताएं अपने स्थान पर पूर्णतया सही एवं स्वीकारने योग्य हैं। इतने पर भी एक और भी तथ्य जानने मानने योग्य शेष रह जाता है कि प्रतिकूलता का हर किसी को पग-पग पर सामना करना पड़ता है। उससे निपटने के लिए आवश्यक कौशल, साहस एवं साधन जुटाने की भी आवश्यकता है। उसके बिना आक्रमणकारी शक्तियों की सत्ता हर किसी को चुनौती देंगी और जो संघर्ष कर सकने की क्षमता सिद्ध न कर सकेगा उसे मरोड़कर रख देगी।
सज्जनता का महत्व और मूल्य घटाए बिना हर किसी को यह समझकर चलना होगा कि जीवन निरापद नहीं है। उसकी संरचना ऐसी नहीं है जिसे चैन की वंशी बजाते हुए बिताया जा सकेगा। उसमें अगणित प्रतिकूलताओं का जमघट भी जुड़ा हुआ है। यह इसलिए है कि पराक्रम, कौशल, चातुर्य एवं प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता में घटोत्तरी न होने पाये। इनकी उपयोगिता भी सज्जनता एवं सम्पन्नता से किसी प्रकार कम नहीं है। प्रतियोगिता जीतने वाले पुरस्कृत होते हैं और जो हारते हैं उन्हें घाटे में रहना पड़ता है। इस सृष्टि नियम में कठोरता, क्रूरता भले ही हो पर अधिक उपयुक्त का चुनाव करने वाली वरिष्ठता भी तो इसी आधार पर निभ सकती है।
इस कटु सत्य का एक उदाहरण है प्राणि जगत के आरम्भिक उत्पत्ति वाले दिनों में विशालकाय सरीसृपों, महागजों और दूसरे प्राणियों का अस्तित्व समाप्त हो जाना। वे थे तो विशालकाय साथ ही निर्वाह सुविधा की दृष्टि से सौभाग्यशाली भी। उन्हें खाद्य पदार्थों की कमी न थी। फिर भी प्रतिद्वन्द्वी आक्रान्ताओं से जूझने का पराक्रम उत्पन्न न कर सकने के कारण वे अपना अस्तित्व बनाए न रह सके और जीवन संघर्ष में हार जाने के कारण समर्थ होते हुए भी असमर्थों की तरह इस धरती से तिरोहित हो गए।
यदि 70 करोड़ वर्ष पहले इस दुनिया में विचरण करने वाले भीमकाय डायनासौर का वंशानुक्रम इस समय इस पृथ्वी पर रहता तो मनुष्य नामधारी प्राणी कहाँ मारे-सारे फिरते? यह कल्पना करना भी कठिन है। इस पृथ्वी पर 10 करोड़ वर्ष से अधिक समय तक डाइनासौरों का आधिपत्य जमाए रहना और उनका फिर विलुप्त हो जाना भले ही किसी भी नियम के अंतर्गत सही क्यों न हो, आम आदमी की तो समझ में नहीं आता।
यह निश्चित रूप से पता नहीं है कि सर्वप्रथम किसी डाइनासौर की ठठरी प्राप्त हुईं। वैज्ञानिकों के मतानुसार सबसे पहले सन् 1818 में, कनैक्टीकट घाटी में एनकीसौर की हड्डियाँ पाई गईं। पहले इन हड्डियों का विवरण, उन्हें मानव जाति से संबंधित मानकर ‘अमेरिकन जनरल ऑफ साइंस’ में सन् 1820 में प्रकाशित किया गया। इस एनकीसौर का कंकाल येल विश्व विश्वविद्यालय के पी बॉडी अजायबघर में है।
क्रिटेशस युग में शाकाहारी होते हुए भी डाइनासौर इतने विशालकाय हो गए कि हम तो केवल उनके आकार की कल्पना ही कर सकते हैं। ब्रोटोसॉरस डाइनासौर ने इस युग के डाइनासौरों का प्रतिनिधित्व किया। देखने में यह ब्रोटोसॉरस विशालकाय पर्वत जैसा प्रतीत होता था। उसके स्थूल शरीर की तुलना में आज का हाथी का आकार, खरगोश के आकार जैसा प्रतीत होता है। इसके शरीर की लम्बाई 70 से 75 फुट तक और वजन 40 टन से कही अधिक होता था। यह भीमकाय प्राणी स्वभाव से सीधा-सादा तथा अपना अधिकांश समय वनस्पति आदि चरने में लगाता था। इसके छोटे-छोटे नोंकदार दाँत होते थे। यह केवल छोटी-मोटी हरी वनस्पति से अपना पेट भरता था। कल्पना कीजिए यदि वह आज के जमाने में होता तो आवश्यक ही भूखा मर जाता। पृथ्वी पर विचरण करने वाले वनस्पति जीवी प्राणियों में यही सबसे विशालतम तथा अहिंसक और नेक प्राणी रहा है।
दूसरे प्रकार के माँसाहारी डाइनासौरों में टाइरेनोसॉरस नामक प्रमुख है। इस विशालकाय प्राणी का जन्म प्रकृति के इतिहास में घोर हिंसक और महाविनाशकारी जन्तु के रूप में माना जाता है। यह 40 टन वजनी शाकाहारी डाइनासौर जैसे विशालकाय प्राणी को भी मारकर खाने में सक्षम था। यह तो अब केवल कल्पना का ही विषय हो सकता है कि इतने भीमकाय प्राणी को पकड़ने के लिए और मारने के लिए कितनी अतुल शक्ति की आवश्यकता होगी? ऐसी अद्भुत शक्ति थी टाइरेनोसॉरस में कि आधुनिक रेल का शक्तिशाली इंजन भी इसे ढकेल और ढो पाने में कदाचित टें बोल जाता। इसका मुख्य भोजन ब्रोटोसॉरस तथा इसके संबंधियों का भक्षण ही था। इसके शरीर की लम्बाई लगभग 50 फुट और ऊंचाई 24 फुट थी। बीसवीं शताब्दी का सबसे लम्बा पुरुष भी इसके घुटनों के नीचे ही मुश्किल से पहुँच सकता था। इसके अगले पैर बहुत ही छोटे, परन्तु पिछले पैर तो अत्यधिक दानवी और शक्तिशाली थे। इसका सिर बहुत बड़ा, मुखड़ा पिचका हुआ और इसके पिचके हुए मुँह में ऊपर नीचे दंत पत्तियों में छः इंच लम्बे पैने चाकू जैसे भयानक दाँत लगे थे। यह अपने पिछले पैरों पर खड़ा होकर चलता था और इसकी दुम पीछे की ओर घिसटती रहती थी। इनका मनपसंद भोजन ‘ट्राइसेरेटोप्स’ था जो स्वयं ही 20 फुट लम्बा और 8-10 फुट ऊँचा होता था। ट्राइसेरेटोप्स के आगे की ओर गैंडे की तरफ तीन सींग होते थे जो कदाचित् ‘टाइरेनोसॉरस ‘जैसे विशालकाय जन्तु से लड़ने और स्वयं की रक्षा के लिए शायद प्रकृति ने दयापूर्वक इसके मस्तक पर जड़ दिये थे। इसकी गर्दन के ऊपर गैंडे के जिस्म पर लटकती एक मोटे चमड़े जैसी लम्बी झालर थी जो शायद ढाल का काम करती थी। इस झालर वाली ढाल की थपकी मात्र से आजकल के सबलतम घोड़े का तो कचूमर निश्चय ही निकल जाता। इतनी दानवी शक्ति का था यह। किसी भाले या तीक्ष्ण हथियार का तो कहना ही क्या, आजकल की ‘थ्री नाट थ्री’ भी इसका बाल-बाँका नहीं कर सकती थी। इसकी चाल इतनी तेज, भद्दी और बेडौल थी कि इसकी लम्बी-लम्बी टांगों का एक डग ही लगभग 100 गज दूरी तय कर लेता था। प्रकृति ने शायद इसे सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर रखा था। किन्तु इस बेचारे की टाइरेनोसॉरस के आगे एक न चली। घोर हिंसक और महाविनाशकारी टाइरेनोसॉरस की तरह ये भूखे तथा रक्त पिपासु जन्तु भी एकदम झपटकर जीवों का संहार किया करते थे।
जुरासिक युग में स्टीगोसॉरस नामक डाइनासौर प्रमुख था। इसके शरीर की लम्बाई लगभग 30 फुट और वजन 10 टन के लगभग था, लेकिन कहा जाता है, इसके दिमाग का भार केवल 70 ग्राम (ढाई औंस) था। इसका सिर बहुत छोटा था और इसके स्थूलकाय शरीर पर समानान्तर पंक्तियों में हड्डीदार झालर लगी होती थी, जो कदाचित् टाइरेनोसॉरस नामक भीमकाय व विनाशकारी प्राणी से रक्षार्थ प्रकृति ने इसे प्रदान की थी। जुरासिक युग के आगे स्टीगोसॉरस के जीवित होने के प्रमाण नहीं मिलते।
इतने समर्थ और सुविधा सम्पन्न प्राणी का अपने अस्तित्व से हाथ धो बैठना हर विचारशील के लिए एक चेतावनी है। उसे सम्पदा मात्र एवं सौभाग्य मानकर संतुष्ट नहीं ही बैठना चाहिए। जागरूकता और प्रतिरोध की क्षमता को भी इतना विकसित करना चाहिए ताकि आक्रान्ताओं और प्रतिद्वन्द्वियों से आत्म-रक्षा कर सकना संभव हो सके। इस दिशा में पिछड़ जाने से मात्र डाइनासौर ही नष्ट नहीं हुए अपितु, उसी स्तर के अन्य विशालकाय महागज और सरीसृप भी अतीत की स्मृति मात्र बनकर रह गए। असावधानी बरतने वाले अन्यान्यों को भी ऐसी ही कठिनाई का सामना करना पड़ता है। प्रस्तुत उदाहरणों से इस तथ्य को अधिक अच्छी तरह समझा और समझाया जा सकता है।
यदि हम अपने चारों ओर ध्यानपूर्वक देखें तथा विचार करें कि सूर्य कैसे प्रतिदिन नियमित रूप से उदय और अस्त होता है, चन्द्रमा एवं अन्य ग्रह नक्षत्र कैसे अपनी कक्षा में ही घूमते रहते हैं, प्रकृति अपना काम नियमित रूप से कैसे करती है, तो समझ में आ जायेगा कि इसका नियन्ता भी अवश्य होना चाहिए। जॉन ग्लेन को पहली बार जब ब्रह्माण्ड की विशालता का ज्ञान हुआ तो इसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने विश्वास पूर्वक अपने विज्ञानी साथियों से कहा- ‘‘इतना बड़ा ब्रह्माण्ड बनाने वाला कोई ईश्वर ही होना चाहिए। भले ही आज उसके स्वरूप एवं क्रिया-कलापों को पूरी तरफ समझ सकना संभव न हो सके।”
ब्रह्माण्ड की विशालता जानने के लिए पहले हमें प्रकाश वर्ष जान लेना चाहिए। प्रकाश 1,86,000 मील प्रति सेकेंड की गति से चलता है जो पृथ्वी के प्रायः 7 चक्र के बराबर होता है। यदि किसी प्रकाश किरण को सीधी दिशा में छोड़ा जाय तो एक वर्ष में उसके द्वारा तय की गई 6 मिलियन मील (58,65,69,60,00,000) की अकल्पनीय दूरी को एक प्रकाश वर्ष कहा जाता है।
अब, हमारा ब्रह्माण्ड कितना बड़ा है इसकी कल्पना करें। हमारी आकाश गंगा का व्यास करीब 100, 000 प्रकाश वर्ष है। आकाश गंगा के केन्द्र से करीब 30, 000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर सूर्य अपनी कक्षा में प्रति 200 मिलियन वर्षों में एक चक्कर लगाता रहता है, जबकि आकाश गंगा स्वयं भी घूमती रहती है। सौर परिवार के बाहर इस ब्रह्माण्ड की विशालता की कल्पना करना असंभव है।
ब्रह्माण्ड में केवल हमारी आकाश गंगा ही नहीं है अपितु इसके अतिरिक्त भी लाखों-करोड़ों आकाश गंगाएं अनन्त अंतरिक्ष में अत्यंत भयंकर गति से दौड़ रही हैं। दूरबीन के सहारे हम अपने चारों और फैले इस विशाल ब्रह्माण्ड को मात्र 2 मिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी तक ही देख सकते हैं। इसी से पता चलता है कि हमारा ब्रह्माण्ड कितना बड़ा होना चाहिए।
अब तक की खोजों के आधार पर पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु को ही माना गया है। परमाणु की संरचना का पर्यवेक्षण करने पर हमारे सौर मण्डल तथा ब्रह्माण्ड के साथ उसका अद्भुत साम्य पाया गया, क्योंकि परमाणु के अंतराल में काम करने वाले इलेक्ट्रोन आदि घटक भी अपनी धुरी पर अपनी कक्षा में ग्रह-नक्षत्रों की भाँति ही नियमित रूप से घूमते रहते हैं।
मूर्धन्य विज्ञानी कार्ल सेगन का कहना है कि यह सब एक योजनाबद्ध रूप में हुआ था। अंतरिक्ष का यह सुनियोजन एक बड़ी चीज है जो बतलाती है कि ईश्वर नाम की कोई शक्ति है अवश्य। जिसने इस सबों को परिक्रमा पथ में छोड़ दिया है और उनको एक सुसंतुलित नियंत्रण में रखे रहती है।
प्रकारान्तर में यही आस्तिकता है। सूर्य और चन्द्रमा की गतिशीलता को, तारकों और पदार्थ घटकों को अपने स्वरूप, उद्देश्य एवं अनुशासन में निरत देखकर यह विश्वास होना ही चाहिए कि यह सब अनगढ़ रूप से स्वेच्छापूर्वक नहीं हो रहा है।
न केवल ब्रह्माण्डीय विस्तार, पदार्थ का स्वरूप एवं प्राणियों का स्वभाव, निर्वाह एक सुनियोजित व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है। वरन् जीवन को विकसित एवं व्यवस्थित रखने के भी कुछ सिद्धांत हैं। उन्हें अपनाने पर व्यक्ति सुखी रहता और समुन्नत, सुसंस्कृत बनता है। यही है वह निर्धारण एवं अनुशासन जिसे तत्त्वदर्शन के रूप में समझा और नीति मर्यादा के रूप में विज्ञजनों द्वारा अपनाया जाता है। संक्षेप में यही आस्तिकता है। इसकी अति, अवज्ञा, उच्छृंखलता बरतने पर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।
मोटी दृष्टि से देखने पर धर्म कोई ऐसी मान्यता प्रतीत होती है जो देवी-देवताओं को रिझाने या परलोक में स्वर्ग मुक्ति आदि की उपलब्धियाँ प्राप्त करने से संबंधित है। किसी को धार्मिक, धर्म प्रेमी कहा जाता हो तो समझा जायेगा कि यह व्यक्ति पूजा पाठों, कथा-पुराण जैसे क्रिया-कलापों में निमग्न रहता होगा और सामान्य उत्तरदायित्वों के प्रति उपेक्षा दिखाता होगा। धर्म चर्चा का प्रसंग जहाँ चल रहा हो, समझना चाहिए वहाँ पर लोक का या कथा-पुराणों का ऊहा-पोह हो रहा होगा।
साधारण मनुष्य की समझ में प्रस्तुत धार्मिकता की उपयोगिता नहीं आती। वह उससे नाक-भी सिकोड़ता है। कारण कि उसे इन तथाकथित धर्म प्रेमियों के चिंतन, चरित्र एवं व्यक्तित्व में ऐसी कोई बात दृष्टिगोचर नहीं होती, जिसके आधार पर उनकी किसी भौतिक या आत्मिक प्रगति का पता चलता हो और न उनकी गतिविधियाँ यही सिद्ध करती हैं कि उस चिंतन को अपनाये रहकर वे भविष्य में अपना या अपने संबद्ध व्यक्तियों का कोई भला कर सकेंगे।
धर्म के प्रति अवज्ञा बरते जाने का एक कारण यह भी है कि बहुत समय से धर्म शब्द सम्प्रदायवाद के मत-मतान्तरवाद के लिए प्रयुक्त होता रहा है। प्रथा-परम्पराओं को सम्प्रदाय कहते हैं। इनमें कुछ उचित होती हैं कुछ अनुचित, कुछ उपयोगी, कुछ अनुपयोगी। समय के बदलाव के साथ-साथ कितने ही प्रचलन अनावश्यक हो जाते हैं। सामान्य विवेक बुद्धि के अनुसार उन्हें सुधारा और बदला जाना चाहिए। टूट-फूट की मरम्मत होती रहती है। उसी प्रकार एक समय की उपयुक्तता दूसरे समय अनुपयुक्त हो जाती है। विवेकशील उनमें सामयिक सुधार परिवर्तन करते रहते हैं किन्तु कट्टरवादी धार्मिकता पिछले प्रचलनों को ही पूर्वजों की धरोहर और धर्म मर्यादा मानकर अपनाये रहने के लिए हठ करती है। इस हठवाद में औचित्य का विरोध और अनुचित का समर्थन भी भरा रहता है। ऐसी दशा में विवेक की दृष्टि में धार्मिकता अहितकर सिद्ध होती है और उसके प्रति बुद्धिवादी समाज में उपेक्षा एवं अवज्ञा की वृत्ति पाई जाती है।
धर्म के नाम पर मात्र अपने को ही सही और अन्य सबों को गलत मानने की अहमन्यता पनपती है। हमारे धर्म में सभी दीक्षित हो जायें, यह अत्युत्साह कभी-कभी धर्मोन्माद के रूप में परिणित होता देखा गया है। धर्म परिवर्तन करने के लिए ‘कत्लेआम’ हुए हैं और रक्त की नदियाँ बही हैं। प्रलोभन देकर बहका-फुसलाकर दबाव देकर धर्म परिवर्तन की घटनाएं आये दिन सुनने में आती रहती हैं। सामान्य बुद्धि सोचती है कि जब धर्म के प्रति अत्युत्साह बरतने वालों का यह हाल है तो फिर उसे अपनाने से सर्वसाधारण का क्या हित साधन हो सकता है? धर्मोपदेशकों ने- धर्म ध्वजियों ने जिस प्रकार भ्रान्तियाँ फैलाने और भोले लोगों को ठगने का धन्धा अपना रखा है उससे भी धर्म का गौरव किसी विचारशील व्यक्ति की दृष्टि से बढ़ता नहीं है और न उस ओर किसी प्रकार का आकर्षण पैदा होता है। यही कारण है कि मरने के उपरांत किसी सुखद लोक की कल्पना से कुछ वयोवृद्ध लोग धर्म चर्चा करते देखे गये हैं। कार्य व्यस्त लोग कहते हैं इन बातों के लिए हमें फुरसत कहाँ? इसका अर्थ यह हुआ कि निठल्ले लोगों के लिए ही धर्म प्रसंग उपयुक्त हो सकता है।
संक्षेप में आज यही है धर्म के संबंध में जनसाधारण की मान्यता। जिसकी उपयोगिता समझ में न आने से सहज ही उस ओर अरुचि होती है। जो उसमें बहुत रस लेते हैं वे या तो धर्म व्यवसाई माने जाते हैं या फिर उन्हें भूला भटका माना जाता है।
धर्म जिसे मानव जीवन का प्राण कहा जाता है उसकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई? शास्त्र का प्रतिपादन रहा है कि “जो धर्म की रक्षा करता है उसकी रक्षा होती है और जो धर्म को मारता है वह बेमौत मरता है।” ऐसा महत्वपूर्ण आधार उपेक्षित इसलिए हो गया कि उसका वास्तविक स्वरूप एक प्रकार से ओझल ही हो गया और उस स्थान को धर्म विडम्बना ने हथिया लिया। मूलतः धार्मिकता, कर्तव्य परायणता जो वैयक्तिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों को मानवी आदर्शवादिता के आधार पर पूरा करने की प्रेरणा देती है, ऐसी कर्तव्य परायणता जिसके प्रकाश में मनुष्य का चिन्तन और चरित्र दिन-दिन परिष्कृत होता चलता है।
धार्मिकता को दूसरे शब्दों में शालीनता कहा जा सकता है। इसे अपनाने पर व्यक्तित्व का हर पक्ष उदात्त बनता है। अपनी और पराई अवांछनियता पर अंकुश लगाने से जिससे शौर्य उदारता हो और जिसकी प्रेरणा से मनुष्य सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न करता हो वह धार्मिकता सर्वत्र सराही गई है। सदा सर्वदा उसकी उपयोगिता समझी गई है। उसे व्यक्ति और समाज के लिए हर दृष्टि से हितकर माना गया है। उसी के सहारे प्रगति एवं सुख शान्ति के चिरस्थायी आधार खड़े होते हैं। जब धर्म की अपेक्षा होने लगती है तो व्यक्ति पतन के गर्त में गिरता है और समाज का ढाँचा चरमराने लगता है। वह असन्तुलन देर तक बना रहे तो महाविनाश की घड़ी इस या उस मार्ग से सामने आ खड़ी होती है। ऐसे विषम समय जब कभी आते हैं तो सृष्टा की सन्तुलन शक्ति अवतरण धारण करती है। ऐसा प्रवाह उत्पन्न करती है जिससे असन्तुलन को सन्तुलन में बदला जा सके। अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते रहने की ईश्वरीय प्रतिज्ञा के पीछे यह कारण है कि अधार्मिकता बढ़ने से कहीं संसार के सामने सर्वनाश का संकट न आ खड़ा हो।
धर्म के प्रति दृढ़ रहने के लिए शास्त्रों ने अत्यधिक बल दिया है। आप्त वचनों में जन-साधारण से सही अनुरोध किया गया है कि जीवन को धर्म निष्ठा के साथ पूरी तरह जुड़ा रखा जाय। धर्मकृत्यों और धर्मानुष्ठानों का उद्देश्य एक ही है कि उस क्रिया-कलाप को अपनाये रहने से मनुष्य की धर्म प्रवृत्ति जागरूक बनी रहे। उस प्रेरणा से व्यक्ति सत्कर्म परायण बने, संमार्ग पर चले और अपने तथा दूसरों के लिए हर दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हो। धर्म धारणा के प्रति आकर्षण एवं उत्साह उत्पन्न करने से पूर्व आवश्यक है कि सर्वसाधारण को उसका वास्तविक स्वरूप एवं परिणाम समझा जाय। यदि धर्म का तथ्य ठीक प्रकार समझा जा सके तो उसे उतना ही उपयोगी समझा जा सकेगा जितना कि विज्ञान को समझा जाता है। मनुष्य की भौतिक आवश्यकताएं विज्ञान के सहारे पूरी होती हैं और भावनात्मक आन्तरिक समस्याओं का समाधान धर्म तत्व की सहायता से होता है। शरीर की तरह ही यदि आत्मा का भी महत्व समझा जा सके- शरीर पोषण की तरह यदि आत्मा की आवश्यकता पूरी करने को भी महत्व दिया जा सके तो फिर धर्म का स्वरूप जानने की ही नहीं, उसे अपनाने की फलश्रुतियाँ भी समझी जा सकेंगी। ऐसी दशा में आज जो धर्म के प्रति अश्रद्धा है वह उलटेगी और सर्वत्र धर्म परायणता पर बल दिया जाने लगेगा।
एक बार कुछ तपस्वी एक वट वृक्ष के नीचे बैठे यह विचारने लगे कि तप के फलस्वरूप क्या वरदान माँगा जाय?
एक ने कहा- ‘‘विपुल अन्न माँगना चाहिए ताकि जीवन आनन्द से कटे।” दूसरे ने कहा- ‘‘बल माँगा जाय, क्योंकि बल बिना कैसे अन्न उपजाया जा सकेगा?” तीसरा बोला- ‘‘बुद्धि क्यों न माँगे? बुद्धि बिना बल भी किस काम का?” चौथे ने कहा- ‘‘शान्ति माँगनी चाहिए। अन्यथा अशान्त की बुद्धि भी कुण्ठित हो जाती है।”
विवाद लम्बा हो गया, पर किसी निर्णय पर न पहुँच सके। तब वट वृक्ष ने कहा- ‘‘उलझन में समय नष्ट करने की अपेक्षा आप अपनी-अपनी अभिरुचि का वरदान माँग लें तो भी क्या बुरा है?’’
वैज्ञानिक क्षेत्र में एक नये तकनीक का विकास हुआ है जिसे ‘बायोनिक्स’ कहते हैं। इस पद्धति में हजारों शोध कर्ता प्रकृति का अध्ययन गहराई से करने में लगे हैं। बायोनिक्स में प्रकृति के सभी जीव-जन्तुओं का अध्ययन उनकी शारीरिक विशेषताओं का गूढ़ पर्यवेक्षण इसलिए किया जाता है कि उनके आधार पर नये प्रयोग परीक्षण किए जा सकें। इस क्षेत्र में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि जीव-जन्तुओं के क्रिया-कलापों में इंजीनियरिंग के महत्वपूर्ण सिद्धांत छिपे हैं। उनको समझा और अपनाया जा सके तो भौतिक क्षेत्र में मानव अब की अपेक्षा कई गुना आगे बढ़ सकता है।
शोध कर्ताओं का मत है कि मनुष्य ने मौलिक रूप से कुछ नहीं किया है। प्रकृति की नकल उतार कर प्रेरणा ग्रहण कर ही वह विकास की वर्तमान अवधि तक पहुँच सका है। बायोनिक्स के अध्ययन में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति संसार की सबसे कुशल प्रशिक्षक है। समय-समय पर वह मूक रूप से मनुष्य को पाठ पढ़ाती रहती है। उसकी प्रेरणा एवं प्रशिक्षण को सही रूप से जीवन में उतारा जा सके तो सर्वांगीण प्रगति का आधार बन सकता है।
अब तक की प्रगति की समीक्षा करने पर यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है कि इंजीनियरिंग क्षेत्र में जितना विकास हुआ है- वह प्रकृति के जीव-जन्तुओं की नकल मात्र है। मेढ़क की आँखों की संरचना एवं देखने की पद्धति पर आधारित अनेकों यन्त्रों का निर्माण हो चुका है। मेढ़क की यह विशेषता है कि वह जीवित कीटकों का ही भक्षण करता है। जीभ की परिधि में आने वाले कीटकों को ही उसकी आँखें देख सकती हैं। नीचे पड़े हुए मृत जन्तुओं पर प्रायः उसकी दृष्टि नहीं पड़ती है। एक प्रयोग में ‘जान्स होप’ और ‘हयूमर जोन’ नामक कीट शास्त्रियों ने मृतक मक्खियों का ढेर मेढ़क के पास लगा दिया। मक्खियों में गति न होने के कारण मेढ़क की आँखें उन्हें नहीं देख सकीं। उनकी आँखों की बनावट ऐसी होती है कि वे गतिशील वस्तुओं को ही देख पाती हैं तथा उन्हीं का सन्देश भी मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। मेढ़क की आँख की संरचना एवं क्रिया-पद्धति के आधार पर मिलिट्री में मैप रीडिंग के लिए आँख बनाने में सफलता मिली है। अमेरिका की हवाई-सुरक्षा पद्धति जैसे ‘आटोमेटिक ग्राउन्ड इनवारन्मेट’ (ए.जी.ई) कहते हैं- ऐसे ही ‘राडार’ का प्रयोग किया जाता है। जिस प्रकार मेंढक की आंखें मात्र अपने दुश्मनों, एवं आहार को ही देखती हैं, उसी प्रकार ए. जी. ई. राडार भी कार्य करता है। सामान्यतया कई वस्तुएं आकाश में एक साथ दिखाई पड़ती हैं। बादल छोटी उल्काएं, पक्षी, हवाई जहाज आदि भी दिखाई पड़ने के कारण असुविधा बराबर बनी रहती थी। उड़ने वाले यान अपने हैं या दुश्मन के इस निर्धारण में पर्याप्त समय लग जाता है। इस असुविधा का हल निकल आया है- ए. जी. ई. राडार द्वारा। मेंढक की आँख के समान यह राडार मात्र दुश्मन के यानों का ही अंकन करता है। हवाई दुर्घटनाओं को रोकने एवं यानों के आवागमन पर समुचित निगरानी बनाये रखने के लिए भी मेढ़क की नेत्र पद्धति पर आधारित एयर ट्रैफिक रेडार स्कोप का निर्माण हुआ है।
रैटिल स्नेक एक विशेष प्रकार का सर्प होता है। वह अधिक गरम रक्त वाले जन्तुओं का ही शिकार करता है। तापमान जानने के लिए उसके मस्तिष्क पर एक विशेष सम्वेदनशील यन्त्र होता है जो एक डिग्री के हजारवें हिस्से तक का अन्तर माप सकता है। इस यन्त्र द्वारा वह ‘इन्फ्रारेड’ किरणों को भी ग्रहण कर सकता है। वैज्ञानिकों ने इसके अध्ययन से प्रेरणा लेकर ‘ऐन्टी एयर क्राफ्ट साइड विन्डर मिसाइल’ और मेगा-सटेलाइट का निर्माण किया है। इन यन्त्रों से सूक्ष्मतम ताप नापने की आवश्यकता पड़ती है। आज की विकसित इन्फ्रारेड सेन्सिंग पद्धति भी इन्हीं सिद्धांतों को आधार पर कार्य करती है। इन्फ्रारेड सेन्सिंग पद्धति द्वारा संसार के किसी भी कोने से छोड़े गये राकेट के विषय में कुछ ही क्षणों में पता लगाया जा सकता है। ‘कोनिकल चैम्बरविंग’ के निर्माण को देखकर मानवी मस्तिष्क की सराहना करने को मन करता है, पर इसके निर्माण की प्रेरणा भी पक्षियों से मिली है। आकाश में तेज गति से उड़ने वाले समुद्री पक्षियों के पंखों की संरचना को देखकर जहाजों में स्थिरता देने के लिए उक्त ‘विंग’ का निर्माण सम्भव हो सका है।
सामान्य से लेकर असामान्य भौतिक विज्ञान की उपलब्धियाँ प्रकृति प्रेरणाओं द्वारा ही प्राप्त हो सकी है। ‘बायोनिक्स’ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि एलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में हुई है। अमेरिका के एअर वार्न इन्स्ट्रूमेन्ट लैबोरेटरी ने एक ऐसी कृत्रिम आँख बनायी है जो सामान्य कोशिकाओं से कैन्सर कोशिकाओं को पृथक दर्शाती है। उक्त सूक्ष्म दर्शक यन्त्र की प्रेरणा मानवी आँख से मिली है। लिंकन लैबोरेटरी एवं जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी ने एक ऐसे यन्त्र का निर्माण किया है जो मानवी आँख की क्रिया-पद्धति का अनुसरण करती तथा गतिशील वस्तुओं की वास्तविक दूरी का बोध करा सकती है।
कम्प्यूटर के निर्माण पर वैज्ञानिकों गर्व है, पर एक सामान्य कीड़ा कहीं उससे अधिक सक्षम एवं सक्रिय है। उड़ती हुई मक्खी को पकड़ने में शिकारी कीड़े को एक सेकेंड का बीसवाँ भाग लगता है। जो कि किसी भी कम्प्यूटर की क्रिया पद्धति से कही अधिक सशक्त है। “डा. बैरन मैकुबोला” इस कम्प्यूटर प्रणाली के मूर्धन्य वैज्ञानिक हैं। उनका कहना है कि “कम्प्यूटर जटिल मन्द बुद्धि वाले पशु होते हैं, उनमें सबसे पिछड़ी हुई चींटी जितनी भी मानसिक क्षमता नहीं होती है। जो कार्य चींटियाँ कर सकती हैं, वह शक्तिशाली कम्प्यूटर द्वारा भी संभव नहीं है।
मछली के फेफड़ों का अध्ययन किया जा रहा है कि उसमें ऐसी कौन-सी विशेषता है जिसके द्वारा पानी में रहते हुए भी ऑक्सीजन ग्रहण करती तथा कार्बनडाइआक्साइड छोड़ती है। इससे पनडुब्बियों के और परिष्कृत उपयोग में मदद मिलेगी। डाल्फिन मछली के मुँह के निकट एक विशेष प्रकार की इलास्टिक त्वचा होती है जिससे वह 90 प्रतिशत मुँह से खिंचाव को कमकर सकती है। यू. एस. रबर कम्पनी जहाजों एवं पनडुब्बियों के उपयोग के लिए डाल्फिन मछली से प्रेरणा लेकर ‘प्लाएबिल रबर स्किन’ के निर्माण में संलग्न है।
बायोनिक्स की शोध में विश्व के हजारों जीवशास्त्री, भौतिकविद्, रसायन शास्त्री, इलेक्ट्रानिक्स के विशेषज्ञ, इंजीनियर, गणितज्ञ लगे हुए हैं। वे जीवों की बायोलॉजिकल संरचनाओं के रहस्योद्घाटन करके भौतिक क्षेत्र में नवीन प्रयोग परीक्षणों में जुटे हैं। भौतिक प्रगति में प्रकृति प्रेरणाएं असामान्य रूप से सहायक सिद्ध हुई हैं। बुद्धिमान मनुष्य ने जीवों से भरपूर लाभ उठाया है और आगे भी उठायेगा।
पर प्रकृति प्रेरणाओं का एक और भी पक्ष है, जिसका अनुसरण कही अधिक आवश्यक है- जीव जन्तुओं का प्राकृतिक जीवन क्रम। सहजता, सरलता, उमंग, उत्साह से भरी दिनचर्या। कृत्रिमता से दूर हटकर स्वास्थ्य, प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता से भरे जीवन के लिए मनुष्य को भी पशु-पशुओं की प्राकृतिक दिनचर्या से प्रेरणा लेनी होगी। न केवल जीव-जन्तुओं वरन् प्रकृति का प्रत्येक घटक मनुष्य को प्रेरणा देने में समर्थ है। स्वास्थ्य ही नहीं, मानवी एकता, समता, शुचिता, सहकार एवं सौहार्द्र को विकसित करने के लिए भी प्रकृति का अध्ययन करना होगा। सृष्टि की सुव्यवस्था एवं सन्तुलन प्रत्येक अणु, परमाणु के परस्पर सहकार सहयोग पर ही आधारित है। मानवी एकता एवं आत्मीयता का आधार भी यही है। मनुष्य ने प्रकृति की नकल द्वारा यांत्रिकीय प्रगति की है। शान्ति और संतोष से भरे, स्नेह आत्मीयता सौहार्द्र से, स्निग्धता, प्रसन्नता से ओत-प्रोत जीवन की प्राप्ति के लिए भी प्रकृति के परस्पर के सहकार सहयोग की प्रेरणाओं को भी अपनाना होगा। बायोनिक्स की उपलब्धियों का सही उपयोग वह तभी कर पायेगा।
सदियों से आसमान के सितारे देखते हुए मनुष्य यह सोचता आया है कि ऊँचे आकाश में टिमटिमाते असंख्य तारे क्या हमारी पृथ्वी जैसे ही वास्तविक हैं? क्या उनमें यहाँ की तरह विकसित सभ्यता हो सकती है?
आज के रेडियो टेलिस्कोप द्वारा मनुष्य की जानकारी इतनी बढ़ी है कि टिमटिमाने वाले असंख्य तारे सूर्य से भी बड़े हैं। इनमें अनेकों तारों के विभिन्न गुच्छक हैं जिन्हें निहारिकाएं कहते हैं। ऐसी अनेकों निहारिकाएं मिलकर आकाश गंगा-सा सफेद पट्ट बनाती हैं। अनेकों आकाश गंगाएं ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि ब्रह्माण्ड में (अर्थात् 10 से 10 को 24 बार गुणा करने पर प्राप्त गुणनफल की संख्या) के तारे सूर्य की तरह हैं। इतनी जानकारी होने के बावजूद भी यह जानकारी अभी तक नहीं मिल सकी है कि हमारी पृथ्वी जैसा ग्रह भी किसी सौर मण्डल में है जहाँ मानवीय बुद्धि जैसा विकास हुआ हो।
अन्तरिक्षीय अनुसंधानों से पता चला है कि औसतन प्रत्येक 1 लाख खगोलीय पिण्डों में से कम से कम एक पिण्ड पर पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ हवा, बादल आदि का होना संभव है। इस हिसाब से तकनीकी सभ्यता वाले हमारे जैसे अनेकों खगोलीय पिण्ड ब्रह्माण्ड में होने चाहिए। दूसरा अनुमान यह है कि जिस निहारिका में हमारी पृथ्वी आती है, इससे बहुत पुरानी निहारिकाएं ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं। वहाँ पर यहाँ से अधिक विकसित सभ्यता होने की सम्भावना है। इस मान्यता के अनुसार 1971 में रूस और अमेरिका ने मिलकर एक संस्था का गठन किया, जिसे “सोवियत अमेरिकन काँग्रेस ऑन एक्स्ट्रा टेरिस्टेरियस लाइफ” के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यह संस्था अमेरिका के ‘ब्यूराकन’ प्रदेश में गठित हुई।
इस संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अपनी आकाश गंगा में ही पृथ्वी जैसी विकसित सभ्यता 1 लाख आकाशीय पिण्डों में होने की सम्भावना है। इस संभावना की बात तय होने पर वैज्ञानिकों में यह जानकारी प्राप्त करने की उत्सुकता हुई कि वहाँ के लोग कैसे रहते होंगे आदि। आकाशीय पिण्डों की अतिदूरी को ध्यान में रखते हुए संचार माध्यम केवल “रेडियो सिगनल” ही हो सकते हैं। ऐसा निश्चय होने के उपरांत खगोल विद्या-विदों एवं अन्य वैज्ञानिकों ने सेटी (एस. ई. टी. ई. -सर्च फार एक्स्ट्रा, टेरिस्टेरियल इन्टेलीजेन्स) नामक संस्था गठित की। कई वर्षों से आकाश में ‘रेडियो सिगनल’ भेजे जा रहे हैं और प्रत्येक आकाशीय पिण्ड की रेडियो एक्टीविटी मालूम करके उनका नक्शा बनाया जा रहा है। इस कार्य की जटिलता के बारे में सेटी के पायोनियर (अग्रगामी) डा. फ्रैन्क डी. ड्रेक कहते हैं- “यह कार्य उस सुई को ढूंढ़ने के समान है जो विशाल घास के ढेर में खो गई है।”
रूस ने 1970 व 1972 में क्रमशः वीनस-6 और वीनस-8 नामक यानों को ‘शुक्र’ ग्रह पर भेजकर पता लगाया कि शुक्र के चारों ओर कार्बनडाइ-आक्साइड का बड़ा घना वायुमंडल है जहाँ पृथ्वी जैसी जीवाणुओं की कल्पना सम्भव नहीं।
मंगल ग्रह पर पृथ्वी की भाँति के जीवन की जानकारी अभी नहीं मिल सकी है। फिर भी प्राप्त जानकारियों के अनुसार मंगल का पृथ्वी से काफी साम्य है। उसका दिन पृथ्वी ग्रह की तरफ ही लगभग 24 घण्टे का होता है। वहाँ वायुमंडल भी है। हवाएं, ऋतु परिवर्तन, आँधी-तूफान, तुषार आदि होते हैं। मंगल-ग्रह की विषुवत् रेखा का तापक्रम लगभग 15 डिग्री सेल्सियस तथा ध्रुवों पर- 93 डिग्री सेल्सियस रहता है। वहाँ के ध्रुवों पर पानी की वर्षा नहीं वरन् सूखी बर्फ (ठोस कार्बनडाइ-आक्साइड) पाई गई है।
प्राप्त सूचनाओं से पता चला है कि मंगल भी पृथ्वी की भाँति पूर्व में आग का गर्म गोला था। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि मंगल पर पानी बर्फ या भाप के रूप में ही तल पर हो सकता है तथा दो मीटर तक पूरे ग्रह पर जमे पाले के नीचे तरल रूप में प्राप्य है।
पायनियर-10 यान द्वारा बृहस्पति ग्रह के बारे में लगभग 20 अरब तथ्यांश और 500 रंगीन चित्र प्राप्त किए गए हैं। यह यान मार्च 1972 में छोड़ा गया था। तथ्यों से ज्ञात हुआ है कि सौ-मण्डल का सूर्य के बाहर का लगभग 2 तिहाई द्रव्य इस विशाल ग्रह में समाया हुआ है। इस ग्रह के 12 उपग्रह (चन्द्रमा) है।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी अपोलो यानों की श्रृंखला द्वारा 1972 में लगभग 1 दर्जन अन्तरिक्ष यात्रियों को चन्द्रमा पर उतार दिया था। यह तो निश्चित ही हो गया है कि चन्द्रमा पर वायुमण्डल का अभाव है और वहाँ के वातावरण में किसी प्रकार के जीवाणु नहीं हैं।
बृहस्पति ग्रह के संबंध में कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि वहाँ के वायुमंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, मेथेन, अमोनिया तथा जल आदि सभी के ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो जीवन तत्वों के उत्पन्न करने में सहायक हैं तथा जिन तत्वों के द्वारा प्रयोगशालाओं में जीवन की ईंटें समझी जाने वाली ‘अमीनो एसिड’ सफलतापूर्वक बनाये जा चूके हैं। 1975 में वहाँ जल के होने की पुष्टि हो चुकी है।
बृहस्पति ग्रह के कई उपग्रहों में भी वायुमण्डल होने का अनुमान किया जाता है। यह ग्रह पृथ्वी की अपेक्षा 8500 गुना प्रकाशमान दिखाई देता है।
आज भी रूस अमेरिका के कितने ही ऐसे उपग्रह आकाश में घूम रहे हैं जिनमें बड़े-बड़े रेडियो टेलिस्कोप भी एवं कम्प्यूटर आदि लगे हुए हैं जिससे आशा की जा रही है कि निकट भविष्य में अन्यत्र मानवीय सभ्यता के संकेत मिल सकेंगे। लेकिन कुछ समय पूर्व रूस के कुछ ज्योतिर्विदों ने घोषणा की है कि उत्तरी आकाश का कई दशकों से गहन अवलोकन करने पर भी कहीं मानवीय सभ्यता होने की सम्भावना के संकेत नहीं मिले हैं और कहा है- ‘इसके पीछे समय खराब करना बुद्धिमानी नहीं है।’
इस घोषणा एवं कथन से वैज्ञानिकों के इस दिशा में उत्साहपूर्वक किये जाने वाले प्रयास कुछ ढीले पड़ गए। परन्तु दूसरी ओर अमेरिका के ज्योतिर्विज्ञानी आशावादी दृष्टिकोण वाले हैं। उनका कहना है कि ‘सेटी के कार्य को तीव्रतर किया जाय और इसके लिए अमेरिकन सरकार से अधिक ग्रांट की माँग की है। डा. फ्रैंक डी. ड्रेक ने ‘वेस्ट वर्जीनिया’ की ‘ग्रीन बैंक’ वेधशाला से हमारे निकटतम सूर्य जैसे दो तारों ‘रप्सिलोन एरिडिनी’ और ‘ताओ सिटी’ का डेढ़ सौ घंटों तक गहन निरीक्षण किया। उनका कहना है कि अन्यत्र मानवीय संस्कृति मिलने की अभी भी सम्भावना है। अभी तक वैज्ञानिकों ने ऐसे 1000 तारों का अध्ययन किया है और उन पर आशा केन्द्रित की है।
मनुष्य के इस एकाकीपन का कब समाधान निकलेगा और अन्य लोकों में बसने वाले मनुष्य देह धारियों से कब संपर्क जुड़ेगा? कब सृष्टि के पुरातन सभ्यताओं को चर्म चक्षुओं से देखने का अवसर मिलेगा? इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। ब्रह्माण्ड का विस्तार असीम है और मनुष्य का साधन पराक्रम इतना सीमित है कि बिन्दु के लिए सिन्धु की थाह पा सकना कठिन प्रतीत होता है। इस प्रयास में इतना समय भी लग सकता है जिसमें पीढ़ियों की परिस्थितियाँ कहीं से कहीं चली जायें और इसकी आवश्यकता ही प्रतीत न हो कि अन्य ग्रह नक्षत्रों पर जीवन होने न होने की बात को महत्व मिले और परिश्रम लगे।
अध्यात्म क्षेत्र में इस एकाकीपन को दूर करने और अविज्ञात जीवन लोकों को ढूंढ़ निकालने का सरल एवं सुनिश्चित मार्ग मौजूद है। सब प्राणियों को अपनी ही आत्मा में समाया हुआ समझा जाय। समस्त जड़ चेतन विश्व वैभव में चेतना की ज्योति जलती हुई अनुभव की जाय। प्रत्यक्ष का अपना स्थान एवं महत्व है किन्तु भावना एवं श्रद्धा संवेदना की सामर्थ्य भी नगण्य नहीं है। उसके सहारे पाषाण में भगवान का दर्शन ही नहीं, अनुभव भी हो सकता है। मानवी गरिमा और उसकी सरस संवेदनाओं की ही विशिष्टता है। इसी आधार पर उसकी वरिष्ठता विकसित हुई है।
आत्म सत्ता को सर्वव्यापी समझा जाय तो जड़ पदार्थ भी सचेतनों की तरफ ही आत्मीय एवं श्रद्धास्पद बन सकते हैं। पवित्र नदी, पर्वतों, सरोवरों और तीर्थों की विशिष्टता मानवी भाव श्रद्धा पर ही अवलम्बित है। पुण्य-परलोक का समग्र ढांचा इस भाव संवेदना पर ही अवलम्बित है। यदि अन्य प्राणियों को आत्मवत् माना जा सके और अपनी दुनिया में बरते हुए उपेक्षित जन समुदाय के साथ सघन आत्मीयता का भाव-बन्धन बाँधा जा सके तो प्रतीत होगा कि इसी धरती पर अनेकानेक लोक-लोकान्तरों में निवास करने वाले प्राणियों के साथ संबंध ही नहीं जुड़ा, वरन् उनके साथ मैत्री भी सघन हो गई।
अपनी ही दुनिया में बरतने वाले अपरिचित, उपेक्षित जैसे जन-समुदाय के साथ आत्म भाव जोड़ लेना इतना उत्साहवर्धक और आनन्ददायक हो सकता है कि जितना कि अपरिचित लोकवासियों का परिचय उपलब्ध होने पर भी संभव नहीं है। अन्य लोकों की सभ्यतायें खोजने की अपेक्षा यदि मानवी देव संस्कृति के पुनर्जीवित करने में लगा जा सके तो प्रतीत होगा कि उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सफलता हस्तगत हो गई जो अन्य लोकों के निवासियों का पता लगाने के साथ जुड़ी है।
“पुत्रवधू को सास बात-बात में टोकती रहती थी। कभी कहती झाडू ठीक से नहीं लगाती, बर्तन साफ करने नहीं आते, कपड़े धोने नहीं आते, तो कभी उसकी पढ़ाई-लिखाई और माँ-बाप को खरी खोटी सुनाती। यों बहु सुशील थी, काम भी खूब करती थी, पर सा उसकी कभी भी प्रशंसा न करती थी। वे तो बस आलोचना ही किया करती थी।
आठ-दस महीने तक तो बहू सास की बातें चुपचाप सुनती रही। पर फिर उसने भी जवाब देना प्रारम्भ कर दिया। अब घर में आये दिन खूब चख-चख होती। दोनों एक दूसरे को जली कटी सुनातीं। घर में और लोगों का रहना भी दूभर हो गया। एक दिन माँ के कहने से पति ने भी बहू की खूब पिटाई की। घर के सभी सदस्य बहू को ही बुराई देने लगे। बहू ने सोचा- ऐसे जीवन से तो मरना ही अच्छा और वह आत्महत्या के विचार से घर से निकल पड़ी।
जैसे ही बहू कुंए में कूदने वाली थी, पीछे से किसी ने आकर उसे पकड़ लिया। उसने मुड़कर देखा तो सामने एक संन्यासी खड़े थे। ‘आत्म-हत्या करना पाप है।’ -वे कह रहे थे।
बहू सिसक-सिसक कर रोते हुए उन्हें अपने जीवन की व्यथा सुनाने लगी। महात्मा ने ध्यान से उसकी बात सुनी। फिर वस्त्र के छोर से कपड़ा फाड़ा, उसे बटा और मन्त्र पढ़कर बहू को देते हुए बोले- ‘लो यह मंत्रित डोरा है। जब तक सास कुछ बोले, इसे अपने दांतों के बीच में दबाये रखना। तुम्हारे घर की कलह समाप्त हो जायेगी।’
घर लौट कर बहू ने यही उपाय अपनाया। जब भी सास बोला करती, वह मुँह में डोरा दबा लेती। मुँह में डोरा दबाने के कारण बहू कुछ बोल भी न पाती थी। अकेले सास बोलते-बोलते ऊब जाती और हार कर फिर चुप हो जाती।
इस प्रकार कुछ दिन बाद सास को यह बात समझ में आ गयी कि दोष मेरा ही है। उस दिन से उसने बात-बात में बहू की गलतियाँ ढूढंना छोड़ दिया। इसके बाद परिवार का वातावरण भी सुख-शान्तिमय हो गया, घर की सारी क्लेश दूर हो गयी।
एक दिन जब वही संन्यासी मिले तो बहू ने बड़ी प्रसन्नता से उन्हें सारी बात बतायी। संन्यासी मुस्कराते हुए बोले- ‘‘बेटी, चमत्कार डोरे ने नहीं, तुम्हारी सहनशीलता ने दिखाया है। दांतों में डोरा दबाने के कारण तुम कुछ भी बोल नहीं पाती थीं। तुम्हारे चुप रहने से कलह भी नहीं बढ़ती थी। स्वयं में सहनशक्ति हो तो दूसरे को भी सन्मार्ग पर लाया जा सकता है।”
सुख और दुःख जीवन के दो अविच्छिन्न अंग हैं, जो भिन्न-भिन्न रूपों में आ-आकर मनुष्य की परीक्षा लेते हैं, उसे अपनी कसौटी पर कसते हैं। हर किसी के जीवन में असफलता, असंतोष और आघात के क्षण आते हैं। विवेकवान उनका अधिक मूल्यांकन नहीं करते और उनकी उपेक्षा कर परिष्कृत मनःस्थिति का परिचय देते हैं। पर अधिकांश की मनःस्थिति ऐसी नहीं होती और दुःखद घटनायें उनके मन को आन्दोलित कर देती है। ऐसा व्यक्ति अपनी दुर्दशा का सारा दोष परिस्थितियों के मत्थे ही मढ़ देता है। दुःख, प्रतिकूलताऐं, असफलताऐं जब ऐसे व्यक्ति की जीवन में आते हैं तो वही अपना सन्तुलन खो बैठता है। दूसरी ओर इन्हीं परिस्थितियों से मनस्वी पुरुषार्थ और उद्यमशीलता की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। इतिहास के पृष्ठों पर अंकित कई महामानवों के जीवन-चरित्र इस एक ही तथ्य का प्रतिपादन करते आये हैं कि ऊर्ध्वगमन का-व्यक्तित्व के परिष्कार का-महापुरुष बनने का मार्ग दुःख, अभाव और प्रतिकूलताओं की पगडण्डियों से ही गुजरता है।
मानव मन बड़ा सम्वेदनशील है। वह जहाँ प्रकृति के सौंदर्य को देखकर प्रसन्न हो उठता है वहीं साँसारिक क्लेशों से विक्षुब्ध भी हो जाता है तथा सोचता है कि सृष्टा की इस अनुपम कृति में दुःखों का प्रादुर्भाव कहाँ से हो गया? अनेकों व्यक्ति इसका समाधान अपनी बुद्धि के अनुसार जन्म-जन्मान्तरों से संबंध जोड़ते हुए प्रस्तुत करते हैं। प्रचलित मान्यताएं भी यही हैं कि पूर्वजन्मों के संचित सुकर्म-दुष्कर्म ही बाद के जीवन में सुख-दुख की परिस्थितियों का सृजन करते हैं। भाव-अभाव, साँसारिक सुख-दुःख एवं उपलब्धियों कमियों के विषय में यह तथ्य पूर्णतः सत्य है।
पौराणिक मान्यता है कि कर्मफल देने वाले देवता के यहाँ भाग्य की पुस्तक में सभी मनुष्यों के कर्म लिखे जाते हैं। इसी से स्वर्ग-नरक का निर्धारण होता है। परन्तु इससे भी अधिक मान्यता इस सिद्धांत की है जिसके अनुसार प्रत्येक कर्म का फल किसी न किसी प्रकार का संचित संस्कार बनता है और मनुष्य का भावी जीवन उसी संस्कार के अनुरूप होता है। समाज में अगणित पापी सुखी जीवन व्यतीत करते दिखते हैं तो कई धर्मात्मा कष्ट सहते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। कर्मों की यह श्रृंखला यदि यहीं समाप्त हो गयी होती तो बड़ा अन्याय होता। इसीलिए पुनर्जन्म और कर्मफल का अन्योन्याश्रय संबंध माना गया है। इसी संसार में सुख और दुःख की अनुभूति ही नरक और स्वर्ग है। जो मनुष्य को अपने कर्मानुसार सृष्टि की नियम-व्यवस्था के अधीन प्राप्त होते हैं।
सृष्टि के जिन तत्वों से भौतिक शरीर का संबंध है, उसी के साथ दुःख के तत्व सुख के साथ ही आ जुड़े हैं। वस्तुतः अपूर्णता का दूसरा नाम ही दुःख है। सृष्टि तो अपूर्ण है। अपूर्ण सृष्टि ने जो यह पार्थिव काया गढ़ी है वह तो अपूर्ण रहेगी ही। पूर्णता का समावेश तो चेतना को विकसित करने से होता है।
अपूर्णता के ही कारण संसार चंचल एवं मायामय दृष्टिगत होता है। अपूर्णता के ही कारण मानव समुदाय क्रियाशील है पूर्णता तो परिणति है। अपूर्णता न हो तो पूर्णता का प्रकाश कैसे फैलेगा? उपनिषद् में कहा गया है- जो कुछ प्रकाशित है, वह ब्रह्म का ही अमृत-आनन्दरूप है। जगत् की इस चंचलता, अपूर्णता में ही शाँति है, भिन्नता में ही प्रेम है। इसलिए कहा गया है “रसो वै सः” वह जो रस स्वरूप है- अपूर्ण को प्रतिक्षण परिपूर्ण किये रहता है-इसीलिए वह रस है। यदि संसार में प्रेम-शान्ति न होती तो यह आकर्षण विहीन होता। किन्तु इसमें विद्यमान आकर्षण एवं सरसता एक परिपूर्ण सत्ता की ही परिचायक है। परमात्मा की आकृति जो भी है, आनन्द स्वरूप ही है। इसी कारण यह जगत अपूर्ण होते हुए भी मिथ्या नहीं है। रूप की अपूर्णता, शब्द की वेदना और घ्राण की व्याकुलता उस अनिर्वचनीय आनन्द को पाने की प्रेरणा मात्र है। जो कुछ है, वह केवल है ही नहीं, अपितु, वह हमारे चित्त को चेतना से और हमारी आत्मा को सत्य से समाहित कर रहा है। यह ज्ञान हो जाना ही अपने आपको पूर्ण बना लेना है।
अपूर्णता स्वरूप एवं साधनों की नहीं वरन् अंतरात्मा के प्रकाश की है। अपूर्णता का नित्य सहचर सुख-दुःख का युग्म नहीं, आनन्द है। दुःख भी आनन्द “अमृतरूपममृतम्” है। दिव्य प्रकाश की ओर बढ़ने तथा प्राप्त करने के बाद ही सुख-दुःख, मृत्यु-अमृत में विभेद समाप्त हो जाता है। उसी अनुभूति की अभिव्यक्ति करते हुए- उपनिषदकार कह उठता है-
“यस्यच्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम्”।
अर्थात्- ‘‘अमृत जिसकी छाया है, मृत्यु भी उसी की छाया है। उसे छोड़ फिर किस देवता की आराधना करें।”
सत्यान्वेषण की प्रवृत्ति दुखानुभूतिजन्य है। समस्त मनुष्यों के अन्तःकरण में यही अनुभूति गंभीर रूप से विद्यमान होने से मनुष्य दुःख की ही पूजा करता आया है, आराम की नहीं। महापुरुषों के उज्ज्वल इतिहास साक्षी हैं कि उनका विकास, व्यक्तित्व का परिष्कार एवं उत्थान दुःखों के बीच ही हुआ है। उसमें पलकर-बढ़कर ही वे दृढ़ता-महानता जैसे गुण उपार्जित कर सके, जिससे समाज को नयी दिशा मिली। सदुद्देश्य के लिये दुःख की सहज स्वीकृति ही साधना है। वही तपस्या भी है। तप का कष्ट यों दुःख जैसा प्रतीत होता है किन्तु उसमें असमर्थ की आंखों से टपकने वाली कातरता नहीं है। यह तो रुद्र तेज से उदीप्त आलोक है, ताप है, गति है, प्राण है, जिसने अनादिकाल से मानव के जीवन प्रवाह को गतिमान रखा है। यह दुःख मानव की दुर्बलता या असफलता का परिचायक नहीं है वरन् विकास का आधार है। यह दुःख ही मनुष्य को नूतन सृजन के लिये, पुरुषार्थ करने के लिये प्रेरित करता है। यह कर्म प्रेरक दुःख ही मानव समाज में चक्रपथ में घूमकर नवसृजन की परिस्थितियों का निर्माण करता है।
जिस प्रकार ईंटों को मजबूती देने के लिए अग्नि में पकाया जाता है, तप रूपी ताप में पककर मानव दृढ़ एवं साहसी बनता है। दुःख अभिशाप नहीं, वरदान है। आत्मा की पूर्णता मनुष्य त्याग से, दान से एवं तपस्या के द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य ने जो कुछ निर्माण किया है, तप से ही किया है। समस्या तब आ खड़ी होती है जब उद्देश्यपूर्ण कष्ट से मनुष्य असंतुलित हो जाता है। निवारणार्थ प्रयत्न करने एवं पुरुषार्थ करने के स्थान पर वह निराश होकर निषेधात्मक मार्ग अपनाता है। वस्तुतः मानव उत्थान का अब तक का इतिहास यही बताता है कि दुःखों की मंजिल से गुजर कर ही मनुष्य वर्तमान की सम्पन्न स्थिति तक पहुँच सका है। प्रतिकूलताओं की चुनौती को मानव ने स्वीकार किया, मछली की तरह धारा को उल्टी चीरते हुए, प्रवाह बदलते हुए वह अभीष्ट परिस्थितियों का सृजन करते हुए वर्तमान विकसित स्थित तक पहुँच सका है।
एक कृषक तपती धूप में अपना पसीना बहाता है, उसकी स्वेद बूंदें अन्न के दानों के रूप में सामने आती हैं। श्रमिक दिन-रात श्रम करता है तो समाज को सुख-साधन मिलते हैं। विद्यार्थी वर्तमान के आराम को तिलांजलि देकर अध्ययन में निरत होता है तो उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करता है। माँ अपने रक्तमाँस के अंश-अंश से गर्भ के शिशु को अभिसिंचित करती रहती है तो नवजात शिशु के रूप में नयी इकाई का सृजन करती है। दुःख ही वस्तुतः सुख की पृष्ठभूमि है। यही वह समर भूमि है, जिस पर लड़कर जीत का श्रेय लिया जाता है। मानव इतिहास में जितना भी शौर्य-बलिदान है, वह दुःख के सिंहासन पर ही प्रतिष्ठित है। मातृ स्नेह दुःखों के बीच से ही प्रस्फुटित होता है। पातिव्रत्य का मूल्य भी दुःख से ही चुकाया जाता है। दुःख की वेदना जब अपनी अपूर्णता को लेकर उत्पन्न होती है तो स्वयमेव जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का आधार बनती है। समाज में व्याप्त पाप-तापों के प्रति अंदर से उठी आकुलता ही सामाजिक उत्थान की प्रेरणा देती है। इतिहास का सृजन दुःख की परिस्थितियों से ही हुआ है। इतिहास की सभी शौर्य और बलिदान की घटनाओं के पीछे दुःख की ही पृष्ठभूमि है। महाभारत एवं रामायण के पात्रों के जीवन चरित्र पूरे समय तक दुःख से ही परिपूर्ण रहे हैं। मनुष्य के लिए दुःख के अभाव के बराबर और कोई अभाव नहीं हो सकता है।
दुःख यदि जीवन से अलग कर दिया जाये तो मनुष्य जीवन की चेतनता-गतिशीलता-समाप्त हो जायेगी, सृजन रुक जायेगा एवं विकास की समस्त संभावनाएं बन्द हो जायेंगी। उपनिषदकार कहता है-
“सतपोऽतप्यत सतपस्तप्त्वा सर्वत्र सृजत यदिदं किंच।” उसने तप किया, कष्ट सहा तब ही यह सृष्टि बनी। तप ही दुःख रूप में जगत में विद्यमान है। नवीन सृजन की वेदना माँ जानती है। तप का ताप मनुष्य के अन्तःकरण में नये-नये रूप में नये प्रकाशों को अवतरित करता है। यह तपस्या आनन्द का ही एक अंग है। इसीलिए ऋषि कहता है कि आनन्द के सिवा, सृष्टि के इतने बड़े दुःख को कौन वहन कर सकता है। “कोह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।” देशभक्त देश के लिए जब प्राण त्यागता है तो उसके लिए वह वेदना नहीं, परम आनन्द है। ज्ञानी की ज्ञान प्राप्ति, प्रेमी की प्रिय-साधना, भक्त का ईष्ट मिलन इसी तरफ की साधना है।
ईसाई धर्म कहता है कि ईश्वर ने ही मानव के घर जन्म लेकर वेदना का भार वहन किया था। सारा जीवन वह दुःख का ताज अपने सिर पर पहने रहा। स्नेह द्वारा इस दुःख को अपना बनाकर स्वयं ईश्वर भी इस दुःख के संगम में मनुष्य के साथ आ मिले हैं। दुःख की परिणति ईश्वर ने मुक्ति एवं आनन्द की स्थिति में कर दी। इस मर्म को लेकर ही एक सच्चा ईसाई अपना जीवनयापन करता है।
भारतीय साधक इसी कारण कह उठता है कि- हे परमात्मा, दुःख, भय, मृत्यु- ‘भयानां भयं-भीषण भीषणानां’ भी तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम ही युग-युग से असत्य को सत्य में, अन्धकार को प्रकाश में, मृत्यु से अमृत में उद्धार कर रहे हो। यह उद्धार का पथ आराम का नहीं, परम दुःख का है। मनुष्य अन्तरात्मा से प्रार्थना करता है। “आविराविम एधि” हे आवि! तुम मेरे आगे आविर्भूत होओ। प्रकाश की उपलब्धि इतनी सहजता से नहीं हो सकती। अन्धकार को तिरोहित करके ही प्रकाश परिपूर्णतः दिखायी पड़ता है। हे आवि! मनुष्य के ज्ञान में, कर्म में तथा समाज में तुम्हारा आविर्भाव इसी प्रकार हो। हे रुद्र! तुम्हारी ओर से हमारी रक्षा भय से नहीं, विपत्ति से नहीं, मृत्यु से न होकर जड़ता से है, व्यर्थता से है, अप्रकाश से हो।
आंतरिक वेदना का यह स्वरूप जब ईश्वर प्राप्ति के लिये जगता है, तो प्राप्ति का आधार बनता है, अपूर्णता का पूर्णता में, मृत्यु का अमृत में एवं मरण का अमरता में परिवर्तित होने का कारण बनता है।
दरिद्रता हमें भिक्षुक न बनाकर दुर्गम पथ का पथिक बनाये। दुःख हमारी कमजोरी का कारण नहीं, शक्ति का और मुक्ति का कारण हो। यही प्रार्थना ऋषि उस परम पिता से करता है। अशक्त के प्रति अनुग्रह एवं भीरु के प्रति दया कभी उसका परित्राण नहीं कर सकती। दया याचना ही दुर्गति है, अवमानना है अतः हे प्रभो वह दया तुम्हारी दया नहीं है। हम व्यथा से विगलित न हों, दुःख की वेदना को झेलकर अपन मनोबल बढ़ा सकें- अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ सकें, मुक्ति ओर आनन्द का पथ-प्रशस्त कर सकें, इसी के लिये शास्त्रकार कहता है- ‘‘आविरावीर्म एधि” हे परमात्मन् मुझे प्रसन्नता प्रदान करो।
-यदि धन के लिए परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है तो भी स्वास्थ्य के लिए परिश्रम किया जाय।
-परिश्रम ही स्वस्थ जीवन का मूल मन्त्र है।
-जुगनू जब बैठा होता है तब नहीं चमकता। उसी प्रकार जब मनुष्य आलसी-अकर्मण्य हो जाता है तो उसकी बुद्धि का दीपक बुझ जाता है।
मरणोत्तर जीवन के संबंध में विभिन्न धर्मों की विभिन्न मान्यताएं हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों ने भी मरने के बाद परलोक के संबंध में कितने ही प्रकार से प्रकाश डाला है। वे लोग, जो पुनर्जन्म के संबंध में विश्वास नहीं करते, यह मानते हैं कि मरने के बाद मनुष्य का अस्तित्व नष्ट नहीं हो जाता। उसका अस्तित्व किसी न किसी रूप में विद्यमान रहता है। पुनर्जन्म में आस्था रखने वाले मत-मतान्तर भी यह मानते हैं कि मरने के बाद किसी भी व्यक्ति या प्राणी का तुरन्त जन्म नहीं हो जाता। पुनर्जन्म के जो मामले प्रकाश में आए हैं, जिन व्यक्तियों ने अपने पिछले जन्मों के संबंध में प्रामाणिक जानकारी दी है, उनके विवरणों से भी यह बात स्पष्ट होती है कि मरने और पुनः जन्म धारण करने के बीच की अवधि में कुछ अंतर रहता है।
प्रश्न यह उठता है मरने और पुनः जन्म लेने के बीच की अवधि में जीवात्मा क्या करता है? इस अवधि में वह कहाँ रहता है? इन प्रश्नों के उत्तर तरह-तरह से दिये जाते हैं। परलोक के संबंध में जानकारी रखने और अन्वेषण करने वाले व्यक्तियों ने इस विषय में विभिन्न परीक्षण और प्रयोग कर यह जाना है कि इस अवधि में प्राणी को अशरीरी अवस्था में अपना अस्तित्व बनाये रखना होता है। भारतीय धर्मशास्त्रों ने इस स्थिति वाली अस्तित्व धारी जीवात्मा को ही प्रेतयोनि का नाम दिया है। मरने के बाद पुनः जन्म धारण करने के बीच की अवधि में प्रत्येक जीवात्मा को यह योनि धारण करनी पड़ती है।
जीवन-मुक्त आत्माओं की बात दूसरी है। वे किसी नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के बाद अपने लोक में वापस लौट जाती हैं। उन्हें वस्तुओं, घटनाओं, स्मृतियों और व्यक्तियों का न तो मोह होता है तथा उनकी छाप उनके मन पर होती है, परन्तु सामान्य आत्माओं की बात भिन्न है। वे अपनी अतृप्त कामनाओं, सम्वेदनाओं, तृष्णाओं और रागद्वेष मूलक वासनाओं की प्रतिक्रियाओं से उद्विग्न होती हैं। परिणाम स्वरूप मरने के बाद भी उन पर जीवन के समय की स्मृतियाँ छाई रहती हैं और वे अपनी अभिलाषाओं की पूति के लिए ताना-बाना बुनती रहती हैं। इस तरह की आत्माएं दो स्तर की होती हैं, एक तो वे जो दूसरी को डराती दबाती हैं तथा उनके माध्यम से अपनी अभिलाषाएं पूरी करती हैं।
दूसरे स्तर की आत्माएं इनसे भिन्न होती हैं। वे मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती तो है, किन्तु अपने उच्च स्वभाव तथा संस्कार के कारण दूसरों की यथासम्भव सहायता करती हैं। उनका संबंध सूक्ष्म जगत से होता है, इसलिए उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती हैं और जिनसे उनका संबंध होता है, वे उनकी कई प्रकार की सहायता करती हैं। इस स्तर की प्रेतात्माओं से देव स्तर की सहायता प्राप्त की जा सकती है।
इस तरह के कई उदाहरण हैं, जिनमें प्रसिद्ध व्यक्तियों ने इन देव स्तर की प्रेतात्माओं का सहयोग प्राप्त किया तथा उनसे लाभ उठाया। महायोगी अरविन्द के संबंध में विख्यात है कि वे जब अलीपुर जेल में थे तब दो सप्ताह तक लगातार विवेकानन्द की आत्मा ने उनसे संपर्क किया था। स्वयं अरविन्द ने लिखा है, “जेल में मुझे दो सप्ताह तक कई बार विवेकानन्द की आत्मा उद्बोधित करती रही और मुझे उनकी उपस्थिति का भान होता रहा। उनके उद्बोधन ने मुझे आध्यात्मिक अनुभूति के एक विशेष महत्वपूर्ण पक्ष के विषय में बताया।
सन् 1901 में अरविन्द प्रेतात्माओं से संपर्क का अभ्यास किया करते थे। इस अभ्यास में एकबार रामकृष्ण परमहंस की आत्मा ने भी अरविन्द को कुछ महत्वपूर्ण साधनात्मक निर्देश दिए थे। श्री अरविन्द जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे, उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार जब वे अपनी गाड़ी में कैंप रोड से शहर की ओर जा रहे थे तब आमबाग के पास उन्हें लगा कि जैसे कोई दुर्घटना होने को हो। उस समय उन्होंने स्पष्ट देखा कि दुर्घटना को बचाने की बात मन में आते ही एक ज्योति पुरुष ऐसे प्रकट हुआ, मानो वह वहाँ पहले से विद्यमान था और उसने एक क्षण में ही स्थिति को अपने हाथ में लेकर सम्हाल लिया।
अरविन्द आश्रम की श्री माँ को बचपन से ही इस प्रकार दिव्य आत्माओं द्वारा सहयोग तथा मार्ग-दर्शन प्राप्त होता रहता था। भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित श्री अरविन्द के जीवन चरित के श्री माँ प्रकरण में इस प्रकार की घटनाओं का विवरण देते हुए लिखा गया है, “वे (श्री माँ) जब छोटी-सी बालिका थीं, तब उन्हें बराबर भान होता रहता था कि उनके पीछे कोई अति मानवी शक्ति है जो जब-तब उनके शरीर में प्रवेश कर जाती है और तब वे बड़े-बड़े अलौकिक कार्य किया करती है।” इस प्रकरण में उस दिव्य शक्ति द्वारा श्री माँ के कई काम सम्पन्न करने की अनेक घटनाएं वर्णित हैं। निश्चित ही इस स्तर का सहयोग मुक्त आत्माएं करती हैं। यद्यपि वे सहायता के लिए बाध्य नहीं हैं, फिर भी वे स्वेच्छा से करुणावश आध्यात्मिक मार्ग के पथिकों सच्चे जिज्ञासुओं की सहायता के लिए सक्रिय होती हैं।
थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवटस्की को चार वर्ष की आयु में ही देव आत्माओं का सहयोग सान्निध्य प्राप्त होने लगा था। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बातें बता दिया बरती थीं जिन्हें कर पाना किन्हीं विशेषज्ञों के लिए ही सम्भव था। परिवार के लोग तो उन्हें विक्षिप्त समझने लगे पर जब उनके हाथ देवात्माओं के प्रत्यक्ष संपर्क के प्रमाण मिलने, देखे जाने लगे तो उन्हें यह तथ्य स्वीकार करना पड़ा। एक बार वे अपने संबंधियों से मिलने के लिए रूस गईं। वहाँ उनके भाई के कानों तक भी यह चर्चा पहुँची कि उनकी बहन का संपर्क किन्हीं दिव्य आत्माओं से है। जब इस विषय पर चर्चा चली तो उसने इतना ही कहा कि ‘मात्र बहिन होने के कारण मैं तुम्हारी बातों पर विश्वास नहीं कर सकता, कोई प्रमाण दो।’
मैडम ने अपने भाई को एक हल्की-सी मेज उठाकर लाने के लिए कहा, वह ले आया। अब उन्होंने फिर कहा कि इसे जहाँ से उठाकर लाए हो, वहाँ वापस ले जाकर रख आओ। भाई ने मेज को उठाने की कोशिश की पर मेज इतनी भारी हो गई कि पूरा जोर लगाने के बाद भी नहीं उठ सकी। घर के अन्य लोगों ने भी मिलकर मेज उठाने की कोशिश की, परन्तु कोई सफलता नहीं मिली। जब सब लोग थक हार गए तो मैडम ने अपने सहयोगी प्रेतों से कहा कि वे हट जाएं। तत्क्षण मेज पूर्ववत् हलकी हो गई। मैडम ब्लैवटस्की के कथनानुसार उनके अदृश्य सहयोगियों की एक पूरी मण्डली थी, जिसमें सात प्रेत थे। ये प्रेत समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श दिया करते थे और मुक्त हस्त से उनकी सहायता किया करते थे।
यह तो हुई लोगों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए सहयोग देने वाले दिव्य प्रेतों की बात। ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें दयालु प्रेतात्माओं ने लोगों के लौकिक जीवन में सहायता पहुँचाई और उनके उत्कर्ष में योगदान दिया। इस तरह का एक प्रसंग अमेरिका के एक दरिद्र व्यक्ति आर्थर एडवर्ड के संबंध में विख्यात है। उसने 40 डालर प्रति मास पर कुलीगिरी की, छोटी-सी नौकरी से अपना जीवन आरम्भ किया था। पन्द्रह वर्ष की आयु में उस पर कुछ प्रेत मेहरबान हो गए और उन्होंने आर्थर को नौकरी छोड़कर अपने बताए अनुसार काम करने का परामर्श दिया, साथ ही यह भी कहा कि हम तुम्हें बड़ा आदमी बनाएंगे। आर्थर के पास न तो तो ज्ञान था, न अनुभव और न ही व्यावसायिक बुद्धि। फिर भी उसने प्रेतों के परामर्श से रेलमार्ग बनाए, अपनी नहरें खोदीं तथा एक बन्दरगाह के निर्माण का भी काम हाथ में लिया। ये योजनाएं, जो प्रेतों के परामर्श से बनाई गई थीं। जादुई ढंग से सफल हुईं और वह कुछ ही वर्षों में अरबपति बन गया।
डा. लीज ने इंग्लैण्ड के राजघराने में प्रेतात्माओं की अनुभूतियों का संकलन तीन पुस्तकों में किया है। इन पुस्तकों में एक घटना जार्ज पंचम से संबंधित है। उस समय वही राज्यकार्य सम्हालते थे। दुर्योगवश उन्हीं दिनों जार्ज की बहन लुईस विधवा हो गई। लुईस को अपने पति ड्यूक ऑफ फिक से बहुत प्रेम था। उसके मरने के बाद भी स्नेह में कोई अंतर नहीं आया, अस्तु दिवंगत आत्मा भी अपनी पत्नी से संपर्क बनाये रही ड्यूक की आत्मा ने लुईस को कई बार कठिनाई के समय इस प्रकार सहायता पहुँचाई थी, जिन्हें भी इस संबंध में ज्ञात हुआ वे चकित हुए और हर किसी ने सच्चे प्रेम की अमरता पर विश्वास किया। इसी प्रकार एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी एलेग्जेण्ड्रा भी प्रेतात्माओं पर अधिक विश्वास करती थी। एक बार उन्हें किसी सहयोगी आत्मा ने पहले से ही आगाह कर दिया था कि सम्राट एडवर्ड अब कुछ ही दिन जीवित रह सकेंगे। महारानी विंडसर पैलेस में रह रही थीं। प्रेतात्मा की इस चेतावनी के कुछ ही क्षणों बाद सम्राट के अस्वस्थ होने का समाचार मिला। वह एडवर्ड के पास पहुँची और कुछ समय बाद ही सम्राट का देहावसान हो गया।
अदृश्य और उदार आत्माएं स्थूल सहायता भी पहुँचाती हैं। द्वितीय महायुद्ध के समय मोन्स की लड़ाई में ब्रिटिश सेना जर्मनों द्वारा बुरी तरह पिट गई। केवल 500 सैनिक बचे थे। जर्मनों की संख्या 10 हजार थी। वे इन पाँच सौ सैनिकों का भी काम तमाम कर देना चाहते थे। सभी ब्रिटिश सैनिक बुरी तरह घिर गए थे। तभी एक ब्रिटिश सेनाधिकारी को स्वर्गीय सेना नायक सेंटजार्ज का स्मरण आया। उसने अपने साथियों को इस महान सेना नायक का स्मरण कराया और भावना पूर्वक उनका स्मरण करने के लिए कहा। सभी सैनिकों ने तन्मयभाव से स्मरण किया, उसी समय एक बिजली सी कौंधी। पाँच सौ सैनिकों के पीछे हजारों श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों की आभा दृष्टिगोचर हुई और कुछ ही क्षणों बाद रणभूमि में सभी जर्मन सैनिक मृत पड़े थे। न गोला बारूद छूटा, न किसी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग किया गया। फिर भी आश्चर्य था कि शत्रु जर्मन कैसे मर गए?
स्काटलैंड के राजा जोस चतुर्थ को उन्हीं का कोई पूर्वज जो प्रेतयोनि में था, बार-बार दिखाई देता था। इंग्लैण्ड पर आक्रमण करते समय वह रक्तपात न करने के लिए समझाता, पर जेम्स ने कभी उसकी बात नहीं मानी। एकबार प्रेत ने उसे चेतावनी दी कि अब तुम्हारे हित के लिए कहता हूं। तुम युद्ध में मत जाओ। यदि गए तो जीवित नहीं लौट सकोगे। इस चेतावनी को सुनने के बावजूद भी जेम्स नहीं माना। वह युद्ध में गया और मारा गया। फ्राँस के सम्राट हेनरी चतुर्थ को भी इसी प्रकार एक प्रेतात्मा ने एक षड़यंत्र में मारे जाने की चेतावनी देते हुए बताया था कि वह चाहे तो बच सकता है। प्रेतात्मा ने यह चेतावनी उस समय दी थी जब हेनरी घूमने के लिए गया था। घूमकर लौटने के बाद उसने यह बात दरबारियों को बताई तो दरबारियों ने इसे दिवास्वप्न कहा। हेनरी ने भी कोई खास महत्व नहीं दिया। बात आई गई हो गई किन्तु कुछ ही समय बाद सचमुच एक षड्यन्त्र में प्रेतात्मा के संकेतानुसार हेनरी की हत्या कर दी गई।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को तो प्रेतात्माओं पर इतना विश्वास था कि वे अक्सर एक प्रेत विद्या विशारद कुमारी नैटिकोलबर्म को ह्वाइट हाउस में बुलाया करते थे और उसके माध्यम से प्रेतात्माओं से संपर्क कर महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। गृह युद्ध के दिनों में तो प्रेतात्माओं जैसी उनकी विश्वस्त सलाहकार हो गई थी। उनकी मदद से लिंकन को उपद्रवियों के ऐसे-ऐसे रहस्यों का पता लगा जिन्हें जासूसों द्वारा प्राप्त करना सम्भव ही नहीं था।
ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि प्रेत बुरे और दुष्ट ही होते हैं। उनमें भी भले-बुरे व्यक्तियों की तरह भले-बुरे स्वभाव वाले चरित्र होते हैं। आखिर मनुष्य ही तो मर कर प्रेत बनते हैं। मरने के बाद भी वे अपना स्वभाव कहाँ छोड़ पाते हैं? उसी स्वभाव के वशीभूत होकर भली आत्माएं सत्पात्रों की सहायता किया करती हैं।
प्रबल पुरुषार्थ द्वारा जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त की जा सकती है तथा अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को असाधारण रूप से बढ़ाया, विकसित किया जा सकता है। बहुत बार लगता है कि किये जा रहे प्रयत्न निरर्थक जा रहे हैं, उनसे कोई लाभ नहीं मिल रहा है। सम्भव है किन्हीं कारणों से अपने प्रयत्नों का समुचित लाभ न मिल पाता हो, परन्तु उस प्रयत्न के बदले अंतर्निहित प्रतिभा तथा योग्यता में जो निखार आता है, वह जन्म-जन्मान्तरों तक संचित पूँजी के रूप में विद्यमान रहता है, उसे न कोई छीन सकता है न ही उसमें हिस्सा बंटा सकता है। प्रमाण हैं वे असंख्य महापुरुष जिन्होंने छोटी उम्र में ही ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए जो बड़ी उम्र के व्यक्तियों के लिए असम्भव नहीं तो दुःसाध्य तो कहे ही जा सकते हैं।
प्रश्न उठता है कि छोटी उम्र में ऐसी महान सफलताएं अर्जित कर पाना किस प्रकार सम्भव हुआ, तो उत्तर में न तो सौभाग्य या वरदान कहा जा सकता है न ईश्वर प्रदत्त विशेष सुविधा। ईश्वर सबको समान अवसर देता है, किसी को अधिक सुविधाएं दे और किसी को कम तो उस पर पक्षपात करने का दोष आता है। ईश्वर न अन्यायी है न पक्षपाती। प्रमाद मनुष्य स्वयं ही करता है और अपनी अंतर्निहित क्षमताओं को जगाने के संबंध में उपेक्षा बरतता है।
प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा मांजी तथा खरादी गई विशेषताएं मनुष्य के लिए बैंक में फिक्स डिपॉजिट की तरह संचित और अभिवर्धित होती रहती हैं। कभी उनके पकने से पूर्व ही मृत्यु हो जाए तो भी वे चक्रवृद्धि ब्याज सहित अगले जन्म में मिल जाती हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे किसी नगर में रहते हुए वहाँ के बैंक में जमा कराया पैसा दूसरे शहर में चले जाने पर भी मिल जाता है।
राजनीति, विद्वत्ता, कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे अगणित महापुरुष हुए हैं जिन्होंने छोटी उम्र में ही अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और इतिहास में अपना स्थान बनाया। उदाहरण के लिए सम्राट अशोक ने 22 वर्ष की आयु में ही राज सिंहासन सम्हाला था। यह आयु राजकाज चलाने की तो क्या, व्यापार व्यवसाय करने तक की नहीं होती। किन्तु अशोक ने न केवल राज्य-व्यवस्था का सुचारु संचालन किया बल्कि मौर्यवंश की डगमगाती धरोहर को फिर से संवारने का सफल प्रयत्न किया। उसने इतिहास प्रसिद्ध कलिंग की लड़ाई 37 वर्ष की आयु में लड़ी और विजय प्राप्त की। यह बात अलग है कि उसके बाद अशोक ने युद्ध न करने की कसम खा ली थी।
सिकन्दर महान 20 वर्ष की आयु में ही मकदूनिया के सिंहासन पर आसीन हुआ और सिंहासन पर बैठते ही उसने विश्व विजय का स्वप्न देखा और इस अभियान पर निकल पड़ा। एशिया के पश्चिमी देशों मिश्र, ईरान, हिंदुकुंश, अन्दक, नाइसा आदि राज्यों पर विजय प्राप्त करता हुआ वह दस वर्ष की अवधि में ही ओहिंद के समीप सिंधु नदी पार करके तक्षशिला की सीमा पर आ खड़ा हुआ था।
सम्राट अकबर का जब राज्याभिषेक हुआ तब उसकी आयु मात्र 13 वर्ष 4 महीने की थी। उसे नाम मात्र का सम्राट बनाकर बैरम खां ने जब अपनी शक्ति बढ़ाना आरंभ किया और वह अकबर के स्थान पर अब्दुल कासिम को सिंहासन पर बिठाने का षड़यंत्र रचने लगा तो सन् 1560 में, अकबर ने उसे पदच्युत कर मात्र 18 वर्ष की आयु में शासन सत्ता की बागडोर पूरी तरह अपने हाथ में ले ली।
छत्रपति शिवाजी ने 19 वर्ष की आयु में ही तोरण के पहाड़ी दुर्ग पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया था और दो वर्ष बाद पुरन्दर के किले को भी जीत लिया। इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह ने भी 19 वर्ष की आयु में ही लाहौर पर विजय प्राप्त की थी।
फ्रांस का लुई चौदहवाँ यद्यपि 4 वर्ष की आयु में ही राजगद्दी पर बैठा था, किन्तु राज्य शासन का वास्तविक कर्ता-धर्ता उसका मंत्री मेजिरा ही था। फिर भी 22 वर्ष की आयु में उसने शासनतन्त्र पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया। उल्लेखनीय है कि यूरोप के इतिहास में लुई चौदहवें जितनी लम्बी अवधि तक किसी भी राजा ने राज्य नहीं किया।
रूस का पीटर महान 17 वर्ष की आयु में राजगद्दी पर बैठा। उसने अपने देश का पिछड़ापन दूर करने के लिए जितने प्रयास किये, सम्भवतः रूस के किसी भी शासक ने उतने कार्यक्रम नहीं चलाए। आज भी रूस के इतिहास में पीटर को पीटर महान कहकर उल्लेखित किया जाता है।
नैपोलियन बोनापार्ट 24 वर्ष की आयु में ही फ्राँसीसी सेना में जनरल बन गया था और तीन वर्ष बाद ही उसने इटली की सेना की बागडोर भी सम्हाल ली। यद्यपि इस बीच वह विरोधियों द्वारा सताया और दबाया भी गया। यहाँ तक कि उसे जेल में भी डाल दिया गया किन्तु तीन वर्ष जैसी छोटी-सी अवधि में पतन के बाद एकदम इतनी शीघ्रता से उठ खड़े होने के उदाहरण इतिहास में अन्यत्र कही नहीं मिला।
राजनीति के क्षेत्र में तो फिर भी कहा जा सकता है कि इसमें सफलता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है तथा जिसे जब अवसर मिलता है, वह शिखर पर पहुँच जाता है परन्तु विद्वत्ता के क्षेत्र में तो ऐसा नहीं है। इसके लिए तो दीर्घावधि तक विद्याभ्यास करना होता है और फिर केवल विद्वत्ता तक की ही बात सीमित हो तो भी नजर अन्दाज किया जा सकता है। विद्वत्ता के साथ पूरे सामाजिक क्षेत्र में एक हवा पैदा कर देने की सामर्थ्य क्षमता और सफलता को क्या कहेंगे? आद्य शंकराचार्य ने 15 वर्ष की आयु में ही समस्त धर्मशास्त्रों, वेद-वेदांगों का अध्ययन कर डाला था और 16 वें वर्ष में संन्यास लेकर देश भ्रमण के लिए निकल पड़े थे। 32 वर्ष की आयु में पहुँचने तक तो उन्होंने विशाल साहित्य का निर्माण कर डाला था, चार धामों में चार आश्रमों की स्थापना कर ली थी और देश भर के विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया था।
संत ज्ञानेश्वर ने 21 वर्ष की आयु में ही समाधि ले ली थी। इसके पूर्व वे महाराष्ट्र में ज्ञान और भक्ति की ऐसी गंगा प्रवाहित कर चुके थे, जिसकी धारा आज भी बह रही है। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने गीता पर अपनी सुप्रसिद्ध टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिख डाली थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘अमृतानुभव’ तथा ‘योगवाशिष्ठ’ जैसे ग्रन्थों का भी प्रणयन किया।
स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म का परिचय जिस प्रभावशाली ढंग से देकर 7000 श्रोताओं सहित वहाँ उपस्थित अन्य वक्ताओं को भी चमत्कृत कर दिया था, उस समय उनकी आयु मात्र 30 वर्ष की थी। सम्मेलन में जितने भी प्रतिनिधि उपस्थित थे, उनके बेटे, पोतों की आयु विवेकानन्द के बराबर थी। इसके पूर्व उन्होंने 23 वर्ष की आयु से लेकर सन् 1893 में धर्म सम्मेलन में भाग लेने तक लगभग पूरे भारत का भ्रमण कर लिया था। परिव्राजक के रूप में वे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मैसूर, मद्रास, केरल, हैदराबाद आदि प्रांतों की यात्रा कर वहाँ के विद्वानों को अपनी प्रतिभा से प्रभावित कर चुके थे।
कहा जा सकता है कि ये महापुरुष तो कोई अवतारी आत्मा या सिद्ध संत रहे हैं। इनके लिए ऐसे चमत्कार प्रस्तुत कर पाना कोई कठिन काम नहीं है। किन्तु ऐसे कलाकार, साहित्यकार और वैज्ञानिक भी हुए हैं जिनके संबंध में यह बात किसी भी तरह लागू नहीं होती। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि कीट्स 26 वर्ष की अवस्था में ही स्वर्गवासी हो गए थे किन्तु तब तक वे अपनी रची कविताओं के कारण अमर हो चुके थे। विक्टर ह्यूगो 14 साल की आयु तक 3000 से भी अधिक कविताएं लिख चुके थे। महाकवि गेटे ने 10 वर्ष की आयु में पहला नाटक लिखा था और 15 वर्ष की अवस्था में उनकी प्रसिद्ध रचना ‘थाड्स इन द डिस्टेट आव जीसस क्राइस्ट इन टू हेल’ प्रकाशित हुई थी।
प्रसिद्ध बंगला कवियित्री तोरुदत्त अपनी अंग्रेजी कविताओं के लिए 18 वर्ष की आयु में ही विदेशों तक विख्यात हो गई थी। भारत कोकिला श्रीमती सरोजिनी नायडू ने 13 वर्ष की अवस्था में तेरह सौ पंक्तियों की एक अंग्रेजी कविता लिखी थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 14 वर्ष की आयु में ही शेक्सपीयर के अंग्रेजी नाटक मैकबैथ का बंगला अनुवाद किया था। वे अपनी कविताओं के लिए 20 वर्ष की आयु में ही प्रसिद्ध हो चुके थे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र 23 वर्ष के होने तक हिन्दी साहित्य को कई प्रसिद्ध रचनाएं भेंट कर चुके थे। मुंशी प्रेमचंद्र ने 30 वर्ष की आयु में ही कहानीकार के रूप में अपना स्थान बना लिया था।
कला के क्षेत्र में भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएं हुई हैं जिन्होंने अल्पायु में ही अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। माइकेल एंजिलो ने 17 वर्ष की उम्र में ‘सेण्टर का युद्ध’ नामक प्रतिमा बनाई। 26 वर्ष के होने तक तो वे मूर्तिकार के रूप में विख्यात हो चुके थे।
लुडविग फान विथोफेन का प्रथम संगीत ग्रन्थ जब प्रकाशित हुआ तब उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी। जब वे 23 वर्ष के हुए तब तो संगीत क्षेत्र में मूर्धन्य स्थिति प्राप्त कर चुके थे। संगीतज्ञ मोत्सार्ट ने 8 वर्ष की आयु में अपना पहला संगीत प्रोग्राम दिया और दो वर्ष के भीतर ही उन्होंने यूरोपीय देशों के कई नगरों में अपने कार्यक्रमों की धूम मचा दी।
छोटी उम्र में ही कई वैज्ञानिकों ने भी महत्वपूर्ण आविष्कार किए हैं। एली ह्विटवी ने 28 वर्ष की आयु में कपास ओटाने की मशीन का आविष्कार किया। सैम्युअल कोल्ट ने 16 वर्ष की उम्र में रिवाल्वर का लकड़ी का मॉडल बनाया और बाद में उसे धातु का बनाकर 21 वर्ष की आयु में पहली बार रिवाल्वर से गोली चलाई।
चार्ल्स मार्टिन हाल ने 23 वर्ष की अवस्था में ही विद्युत संश्लेषण द्वारा एल्युमीनियम के उत्पादन की नई विधि पेटेण्ट कराई। जेम्सवाट ने जब भाप के इंजन की कल्पना की तब उनकी आयु 25 वर्ष थी और इस कल्पना को मूर्त रूप देने में उन्हें कुछ ही वर्ष लगे। एलेग्जेण्डर गुरहम वेल ने 20 वर्ष की आयु में टेलीफोन बनाने का प्रयास शुरू किया था, जिसमें उन्हें सफलता मिली। यह आविष्कार पेटेण्ट कराते समय उनकी आयु 26 वर्ष थी।
ब्लेन पास्कल ने 19 वर्ष की अवस्था में नये ज्यामितीय सिद्धांत खोजे और कुछ ही समय के उपरांत एडिंग मशीन का आविष्कार कर डाला। सिगमंड फ्रायड ने जब मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपने क्राँतिकारी सिद्धांत प्रमाणों सहित प्रतिपादित किए तो उनकी आयु 29 वर्ष थी। चार्ल्स डार्विन भी 27 वर्ष की आयु में विकासवाद के सिद्धांतों की खोज कर चुके थे। विज्ञान जगत में क्राँति ला देने वाले सापेक्षतावाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के जनक आइन्स्टीन ने 26 वर्ष की आयु में ही अपने दर्शन का प्रणयन कर दिया था।
राजनीति, विद्वत्ता, साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से छोटी उम्र में ही चमत्कृत कर देने वाली इन विभूतियों में से कई तो ऐसी हैं जिनकी स्थिति अत्यन्त साधारण रही थी। फिर भी उन्होंने अनूठी सफलताएं अर्जित कीं। इन सफलताओं का कारण जन्मजात प्रतिभा भी कहा जा सकता है किन्तु प्रतिभा किसी को भी पक्षपात पूर्ण ढंग से नहीं मिलती। जन्म से ही कोई बालक मेधावी दिखाई देते हैं तो इसका कारण पिछले जन्मों में उनके द्वारा किया गया प्रयत्न पुरुषार्थ ही है जिनका समुचित परिणाम उन्हें नहीं मिल सका। उस समय उन्हें जो परिणाम या अवसर मिलने चाहिए थे। वह इस जन्म में बचपन में ही अनुकूल परिस्थितियों के रूप में प्राप्त होते हैं।
भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि कोई भी शुभ कर्म करने वाला व्यक्ति न तो दुर्गति को प्राप्त होता है तथा न ही उसे अपने पुण्य कर्मों का फल बिना मिले रहता है। पूर्व जन्म के संस्कार को प्राप्त करते हुए उनके प्रभाव से वह अनायास ही अभीष्ट दिशा में अग्रसर होता है। जन्मजात मेधावी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति अपने पूर्वजन्म के संस्कारों का उपार्जन का ही लाभ उठाते हैं। इसलिए असफलता के भय से न विचलित होना चाहिए तथा न ही निराश।
विचारों की शक्ति अकूत है। संसार पर शासन मनुष्य नहीं विचार करते हैं। -स्मिथ
परमात्मा ने मनुष्य को इस संसार में उन विभूतियों से विभूषित कर भेजा है, जो अन्य प्राणियों को प्राप्त नहीं हैं। उन विभूतियों का उपयोग कर ही वही आदिम काल की जंगली पिछली स्थिति से विकसित होकर आधुनिकतम सुविधा साधनों का विकास कर सका है। निश्चित ही सभ्यता और संस्कृति के विकास में थोड़े बहुत गिने-चुने प्रतिभाशाली व्यक्तियों का योगदान रहा है। अधिकांश व्यक्ति तो सामान्य क्रम से ढर्रे का जीवन ही व्यतीत करते रहे हैं। उन्हें अपने भीतर निहित शक्तियों और सम्भावनाओं पर विश्वास ही नहीं होता और वे दीन-हीन जीवन जीते रहते हैं। कई लोगों की मान्यता रहती है कि सफलता किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों को ही प्राप्त होती है तथा उन्हें जन्म से ही अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं, जिनमें आगे बढ़ने के अवसर अनायास ही प्रस्तुत होते रहते हैं।
इस तथ्य को भूल जाना चाहिए कि अनुकूल परिस्थितियाँ और आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने वाली पृष्ठभूमि किन्हीं गिने चुने लोगों को ही प्राप्त होती है, जबकि अधिकांश व्यक्तियों को अपना मार्ग स्वयं खोजना पड़ता है और स्वयं के बलबूते पर ही प्रगति पर अग्रसर होना पड़ता है।
प्रस्तुत सफलता या प्रगति न अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर करती है और न उपयुक्त अवसरों पर। सफलता बहुत कुछ व्यक्ति के अपने आत्म-विश्वास और उस आधार पर संचित किये गए आत्मबल पर ही निर्भर करती है। यदि अपने भीतर, अपने शक्तियों के प्रति विश्वास कूट-कूट कर भरा हो तो कदाचित ही किसी को असफलताओं का मुँह देखना पड़े। असफलताओं का सामना तभी करना पड़ता है जब सामर्थ्य और साधनों का विचार न करते हुए ऐसे कदम उठा लिए जाते हैं जो विचारशीलता और विवेक की दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहे जा सकते। इसके अतिरिक्त आत्मविश्वास का अभाव भी असफलता का एक कारण है। आत्मविश्वास का अर्थ अनियन्त्रित भावुकता नहीं है, वरन् वह उस दूरदर्शिता का नाम है जिसके साथ संकल्प और साहस भी जुड़ा रहता है। ऐसे आत्मविश्वासी जो भी काम करते हैं, उनमें न तो ढील-पोल होती है और न ही अनुत्तरदायित्व। इस स्तर के आत्मविश्वास को लेकर जो भी कार्य किये जाते हैं, उनमें पूरा मनोयोग, तन्मयता, तत्परता तथा परिश्रम का समावेश रहता है।
इस नीति को अपना कर कई व्यक्ति प्रतिकूलताओं में भी आशातीत प्रगति कर चुके हैं। अमेरिका के प्रसिद्ध राष्ट्रपति स्वर्गीय अब्राहम लिंकन का नाम ऐसे व्यक्तियों में अग्रणी तौर पर लिया जा सकता है, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में रहते हुए भी सफलता के शिखरों का स्पर्श किया। उनका पालन-पोषण उनकी सौतेली माँ ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच रहते हुए उसने अपने बेटे को ऐसी प्रेरणाएं दीं और उसके अन्तःकरण में ऐसे बीज बोये जिनके अंकुर लिंकन की शिक्षा और समझ को ही नहीं उसकी आत्मा को भी ऊँचा उठाते चले गए। उनमें पढ़ने और ज्ञान प्राप्त करने का ऐसा भाव उत्पन्न हुआ कि वे पुस्तकें प्राप्त करने के लिए मीलों पैदल चल कर जाते और अपने मित्रों से पुस्तकें माँगकर लाते। पढ़ने के बाद उसी प्रकार पुस्तक को वापस करने के लिए वापस जाते।
लक्ष्य के प्रति निष्ठा, लग्न और तन्मयतापूर्वक आत्मविश्वास के साथ अपने काम में लगे रह कर प्रगति करते हुए लिंकन न केवल अमेरिका के राष्ट्रपति बने, बल्कि उनकी गणना विश्व के महामानवों में की जाने लगी। इस बीच उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा, पर क्या मजाल कि उन्होंने अपने मन को छोटा किया हो। एक बार लिंकन से किसी ने उनकी उन्नति का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि जन्मदात्री न होते हुए भी जिससे मेरी निर्मात्री होने का कार्य पूरा किया, मैं अपनी उस माँ का हाथों बनाया गया एक खिलौना मात्र हूं।
ईसाई धर्म के प्रचारकों में पादरी इवाइटा मूडी का नाम उल्लेखनीय है। उनकी पत्नी बहुत कम पढ़ी-लिखी थी, पर वह चाहती थी कि मेरा पति पादरी बने और मूड़ी तो एकदम अनपढ़ थे, सो कम पढ़ी-लिखी श्रीमती मूड़ी ने अपने अनपढ़ पति को ही थोड़ा बहुत पढ़ना लिखना सिखाया और उनमें धर्म प्रचार के प्रति लगन पैदा की। थोड़ा बहुत पढ़ लिखने और धर्म प्रचार के प्रति उत्साह उत्पन्न कर देने के बाद मूड़ी स्वयं अभीष्ट कार्य में प्रवृत्त हुए और रुचिपूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगे। अन्ततः पत्नी की प्रेरणा, प्रयत्न और प्रोत्साहन ने मूड़ी में इतना प्रचण्ड आत्म-विश्वास जागृत कर दिया कि उन्होंने उसके बल पर ईसाई जगत में असाधारण ख्याति तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की।
अब तक जितने भी वैज्ञानिक आविष्कार हुए हैं उनमें जिस वैज्ञानिक ने सबसे अधिक आविष्कार किये हैं उनका नाम है- टामस अल्वा एडीसन। विज्ञान के माध्यम से मनुष्य जाति को अपने अनुदानों से उपकृत करने वाले एडीसन बचपन में अति मंदबुद्धि बालक थे। स्कूल में भरती कराये जाने पर कुछ दिनों बाद अध्यापक ने एडीसन के माता-पिता को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि आपके बच्चे का दिमाग पढ़ने-लिखने में जरा भी नहीं चलता है और इसलिए यह कभी पढ़ लिखकर योग्य नहीं हो सकेगा। बेहतर होगा कि आप इसे स्कूल से हटा लें, क्योंकि इसका प्रभाव अन्य बच्चों पर भी पड़ सकता है।
यह पत्र पढ़कर माता-पिता की आंखें भर आईं और एडीसन को स्कूल से हटा लिया। किन्तु माँ ने उसे ढाँढस बंधाते हुए कहा, कोई बात नहीं बेटा स्कूल में तुम पढ़ नहीं सकते। लेकिन तुम मंद बुद्धि नहीं हो। मैं स्वयं तुम्हें पढ़ाऊंगी। और माँ स्वयं अपने बेटे को पढ़ाने लगी। इस शिक्षण के साथ ही उन्होंने बालक एडीसन में ऐसे संस्कार भी बोये जिनके परिणाम स्वरूप उनकी प्रतिभा का अवरुद्ध स्त्रोत खुल गया और उसके जो परिणाम आये वे सबके सामने हैं। सर्वविदित है कि एडीसन की गणना विश्व के सर्वाधिक मूर्धन्य वैज्ञानिकों में सबसे पहले की जाती है।
अस्पताल की एक साधारण-सी नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल के पास न साधन थे न सुविधाएं, पर उनके मन में रोगियों और दुर्घटनाग्रस्त लोगों के प्रति अपार वेदना का समाधान करने और घायलों, विपत्ति के मारे लोगों की सहायता सुश्रूषा करने के लिए उन्होंने रेडक्रास सोसायटी की योजना बनाई और संस्था के उद्देश्य तथा स्वरूप को लेकर बड़े-बड़े लोगों के पास गईं। नाइटिंगेल की स्थिति, सामर्थ्य और कार्य की गरिमा में इतना भारी अंतर देखते हुए लोगों ने उन्हें यही परामर्श दिया कि इस तरह की हवाई कल्पनाएं करना व्यर्थ है। अच्छा हो आप अपनी नौकरी ही ठीक−ठाक ढंग से करें और इसी में अपनी भावनाओं का संतोष खोजें। कइयों ने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से भी निरुत्साहित किया परन्तु नाइटिंगेल हताश नहीं हुई। कहीं से भी कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम आरम्भ कर दिया और संस्था जब धीरे-धीरे विकसित होने लगी तो, वही लोग जिन्होंने नाइटिंगेल को आरम्भ में निरुत्साहित किया था, सहयोग की भावना लेकर आगे आए। यह लक्ष्य के प्रति निष्ठा और तन्मयतापूर्वक समन्वय का ही परिणाम है कि फ्लोरेंस नाइटिंगेल द्वारा स्थापित रेडक्रास सोसायटी तथा उनका मिशन देशकाल की सीमाओं को लाँघकर विश्व भर में फैली हुई है और सार्वभौम बन गई है।
ऐसे हजारों उदाहरण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि सफलता या असफलता परिस्थितियों पर नहीं, स्वयं अपने ऊपर निर्भर करती है। संकल्पशील और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति जब काम करने के लिए कमर कसकर खड़े हो जाते हैं तो उनके एक नहीं हजार हाथ हो जाते हैं। वह अपनी संकल्पशक्ति से अनुकूल परिस्थितियों तथा वस्तुओं को आकर्षित कर लेता है। इस चुम्बकीय आकर्षण शक्ति का स्त्रोत आत्मविश्वास है। अपने पर, अपनी सामर्थ्य पर यदि विश्वास किया जाय तो अगणित कठिनाइयों और अभावों के रहते भी व्यक्ति अपनी क्षमता और सामर्थ्य के बल पर उपयुक्त दिशा में बढ़ता चलता है, प्रगति कर लेता है।
शरीर स्वतन्त्र रूप से कुछ भी नहीं करता। वह तो एक यन्त्र मात्र है, जिसका संचालन मन रूपी यान्त्रिक करता है। भारतीय मनीषियों ने इसे एक रथ बताया है और मन को सारथी कहा है। सारथी रथ की उचित देखभाल नहीं करेगा तो उसका टूटना-फूटना स्वाभाविक है। मन भी यदि कुमार्गगामी, कुसंस्कारी है तो उसका प्रभाव शरीर के रोगाक्राँत होने के रूप में लक्षित होता है। अब तक समझा जाता था कि रोग बीमारियों का कारण मनुष्य के शरीर में ही कहीं विद्यमान है। उन्हीं का उपचार किया जाता था, किन्तु चिकित्सा विज्ञान क्रमशः इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि बीमारियाँ शरीर में उत्पन्न नहीं होती बल्कि मन से उपजती हैं।
तीन सौ से भी अधिक रोगियों का अध्ययन कर डा. जेम्स चार्ल्स ने एक कर्नल के बेटे का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटी-मोटी बीमारियाँ ही नहीं रक्तचाप, यक्ष्मा, कैंसर तथा हृदय रोग जैसी भयावह बीमारियाँ भी मानसिक कारणों से उत्पन्न होती हैं। उन्होंने रक्तचाप के एक मरीज का विचित्र केस सुलझाया। यह रोग आमतौर पर बड़ी उम्र में होता है, परन्तु उनके पास जो मरीज लाया गया था वह 21 वर्ष का युवक था। पिता मिलिट्री में कर्नल थे। अच्छा खासा सम्पन्न परिवार था। किसी बात की कमी नहीं, किसी तरह की चिन्ता नहीं। स्वास्थ्यप्रद भोजन, माता-पिता का भरपूर लाड़-प्यार और हर तरह के साधन सुविधाएं फिर यह रोग क्यों उत्पन्न हुआ?
कारणों को कुरेदते हुए डा. जेम्स चार्ल्स ने उसकी पिछली जिन्दगी में झांका। बीमारी की जड़ें उस समय पड़ी थीं जब लड़के ने अपने पिता की जेब से दस रुपए का एक नोट निकाला और सिनेमा देख आया। कर्नल के पास वैसे ही पैसों की कमी नहीं थी। बेफिक्र और पैसे वाले कर्नल साहब को यह भी पता नहीं रहता था कि उनकी जेब में कितने पैसे हैं? सो ध्यान नहीं गया एकबार पैसे निकाल लेने पर जब उसकी कोई प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई तो लड़के ने समझ लिया पिताजी बावले हैं, उन्हें कुछ पता नहीं चलता और फिर जो सिलसिला चल पड़ा तो ऐसा चला कि लड़का बड़ी रकमों पर हाथ साफ करने लगा। कुसंगति में पड़कर वह शराब भी पीने लगा और दूसरी गंदी बातों में भी पैसा खर्च करने लगा।
दूसरे लोगों से अपने बेटे की हरकतों के बारे में जब कर्नल साहब को पता चला तो उन्होंने लड़के को बुरी तरह डाँटा। गंदा नाला एक बार बह निकलता है तो दुर्गन्ध भी अभ्यास में आ जाती है और वह स्वाभाविक लगने लगती है। फिर यदि उस नाले को एकाएक रोक दिया जाए तो दुर्गन्ध एक ही स्थान पर यकायक तीव्र हो उठती है। ऐसा ही हुआ। कर्नल साहब ने एकाएक ब्रेक लगाया जो लड़के के मानसिक कुसंस्कार एक स्थान पर रुककर मानसिक निराशा और आतंक के रूप में सड़ने लगे। उसे हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई। काफी इलाज कराया गया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अन्त में उसे जेम्स चार्ल्स के पास ले जाया गया जो अपनी मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति के लिए काफी प्रसिद्ध थे। डा. जेम्स ने सहानुभूति पूर्वक लड़के का इलाज किया तथा उससे पिछली सारी बातें उगल वाईं। उसके मन से भय और आतंक के काँटे बिने तब कही जाकर वह पूरी तरह स्वस्थ हो सका।
डा. जेम्स ने अपनी पुस्तक ‘हाउन टू गेट फिजिकल एण्ड मेण्टल हेल्थ’ में लिखा है कि ‘‘अधिकांश बल्कि लगभग सभी रोगों की जड़ शरीर में नहीं मन में होती है। संताप, कष्ट, आकस्मिक विपत्ति, अप्रत्याशित दुर्घटनाओं के कारण तो सैकड़ों लोग असमय में ही दम तोड़ देते हैं, परन्तु कई मनोविकार धीरे-धीरे अपना प्रभाव उत्पन्न करते हैं तथा मनुष्य को रुग्ण बनाते हैं। दीर्घकाल के संताप से रक्त संचार मंद पड़ जाता है, चेहरा पीला, त्वचा शुष्क और आंखें गंदली हो जाती हैं।’’
इसी सिद्धांत की पुष्टि करते हुए डा. अल्स्टन ने कहा है, ‘‘यह शरीर का साधारण नियम है कि आमोद प्रमोद, आशा, प्रेम और स्वास्थ्य एवं सुख की कामना शरीर को सुदृढ़ तथा पुष्ट बनाती है तथा उसे भरपूर स्वास्थ्य प्रदान करती है। वहीं यह भी एक तथ्य है कि भय, उदासीनता, ईर्ष्या, घृणा, निराशा, अविश्वास और अन्य मनोविकार शरीर के क्रिया-व्यापार को भी रुग्ण बनाते हैं।’’
एल्मा ममेरियन का कथन है कि “मनःक्षेत्र में जमा हुआ कोई विचार जब बहुत अधिक क्षुब्धता उत्पन्न करता है तब उसकी प्रतिक्रिया कम ज्यादा रूप में शरीर पर भी प्रकट होती है। कई बार तो यह प्रभाव इतना अधिक होता है कि मृत्यु तक हो जाती है।” मेअल्से का कथन है कि क्षोभ के कारण शारीरिक पोषण में निश्चित रूप से रुकावट या व्यतिक्रम आता है। इसके कारण रक्त-वाहिनी नलियाँ असामान्य रूप से फैलती और सिकुड़ती हैं।
अफ्रीका में रहने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य परीक्षण करते समय पाया गया है कि सामान्यतः वे स्वस्थ रहते हैं उन्हें कभी कभार ही कोई रोग होता है। देखा गया है कि अफ्रीकी लोग तभी बीमार होते हैं जब या तो वे क्रोधित होते हैं अथवा किसी विपत्ति के कारण भयभीत हो जाते हैं। सर रिचर्डसन ने प्रमेह रोग पर अनुसंधान करते हुए पाया है कि कई बार प्रमेह रोग नहीं होता है, फिर भी उसी जैसी वेदना, पीड़ा और लक्षण उभर आते हैं। परीक्षण करने पर उस स्थिति में यद्यपि प्रमेह के कोई कारण नहीं दिखाई देते किन्तु रोग की पीड़ा वैसी ही होती है। इसका कारण उन्होंने अचानक किसी मानसिक आघात का पहुँचना पाया है।
बहुत अधिक चिन्ता करने या किसी चिन्ता में घुलते रहने के कारण त्वचा संबंधी रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। डा. जार्ज पेगेट के अनुसार फोड़े-फुन्सियाँ रक्त विकार की अपेक्षा चिन्ता और तनाव के कारण ही अधिक होती हैं और रक्त विकार भी प्रायः मानसिक कारणों से ही उत्पन्न होता है। पेगेट ने अपनी पुस्तक “द हैण्ड बुक ऑफ साइकोथैरेपी” में लिखा है बहुत से लोगों को, जो त्वचा संबंधी रोगों से पीड़ित हैं, देखने के बाद और उनका परीक्षण करने पर मुझे विश्वास हो गया है कि इनका प्रमुख कारण बहुत अधिक और लम्बे समय तक चिन्ता करना ही रहा है। इसी पुस्तक में डा. मुर्चिसन के प्रयोगों को उद्धृत करते हुए जार्ज पेगेट ने लिखा है कि फेफड़े संबंधी रोगों का प्रमुख कारण लम्बे समय तक किसी मानसिक आघात को सहते रहना है। इतना ही नहीं पथरी और वक्षस्थल के कैंसर जैसे रोगों का कारण भी दिन-रात चिन्ता से घुलते रहना है।
डा. रिचर्डसन ने लिखा है कि बेमन से लगातार मानसिक श्रम करते रहने के कारण चमड़ी पर खरोंच तथा अन्य त्वचा संबंधी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। उनके अनुसार क्रोध, आवेश और उत्तेजना के समय अथवा निराशा और हताशा की मनःस्थिति में शरीर के भीतर विषैले रसायन उत्पन्न हो जाते हैं।
इन शारीरिक रोगों के अतिरिक्त कई बीमारियाँ तो मानसिक ही होती हैं। उन्हें मनोरोग ही कहा जाता है। यद्यपि इन मनोरोगों के लक्षण शरीर पर भी प्रकट होते हैं, परन्तु मुख्यतः इनका प्रत्यक्ष संबंध मन से ही होता है। हताशा रहने तथा अकारण किसी बात को लेकर भयभीत होने की दो बीमारियाँ जिन्हें मनःशास्त्री डिप्रेशन तथा फोबिया कहते हैं। आधुनिक सभ्यता की देन कही जा सकती है। इस तरह के रोगी सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों के प्रतिकूल गाँव की-सी भावना रखते हैं। बात-बात में चिढ़ जाना या उबल उठना तथा इस प्रकार चिड़चिड़ा जाने गरम होने के बाद अचानक रोने लगने के प्रमुख लक्षण इन रोगियों में देखे जा सकते हैं।
इस तरह के रोगियों के लिए मनोविज्ञान चिकित्सा, रिक्रियेशनल अथवा एक्यूप्रेशनल थैरेपी आदि प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। रोगी की मानसिक प्रसन्नता और स्थिरता के लिए उसे किस प्रकार के वातावरण में रखा जाए? कैसे बातचीत की जाए? क्या सुझाव और परामर्श दिये जांय आदि बातों का ध्यान रखा जाता है। इन सबके पूर्व उससे पिछले जीवन की सारी गुप्त और प्रकट बातों को बता देने के लिए कह दिया जाता है। कारण कि अनेकों प्रयोगों और प्रमाणों के द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि रोगों की जड़ें मनुष्य के मन में जमे हुए कुसंस्कार ही होते हैं।
रोगी के रोग का सम्पूर्ण उपचार करने के लिए अब चिकित्सा विज्ञानी उसके व्याधि लक्षणों की अपेक्षा उसके स्वभाव, आदतों, कार्यों चिन्ताओं का पर्यवेक्षण करने पर अधिक जोर देने लगे हैं। जहाँ तक छोटी-मोटी भूलों कारण रोग उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है वहाँ निष्कासन प्रयोग अधिक सफल और प्रभावशाली सिद्ध हुआ है, किन्तु अपराध मनोवृत्ति के और उन संस्कारों को जिन्हें रोगी स्वयं नहीं पहचानता उन्हें मनोवैज्ञानिक कैसे ठीक कर सकता है? उसके लिए प्राचीनकाल में भारतीय मनीषियों ने कृच्छ चान्द्रायण जैसे तपश्चर्या प्रधान व्रतों का निर्धारण किया था। मनोवैज्ञानिक भी अब इस विधि की कारगर प्रभावशीलता को एक स्वर से स्वीकार करने लगे हैं। कृच्छ चान्द्रायण में जब शरीर में अन्न ही नहीं पहुँचता तो तात्कालिक बुरे विचार शिथिल पड़ जाते हैं और अंतर्मन में दबे हुए जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार स्वप्नों के रूप में, अनायास विचारों के रूप में निकल कर साफ होने लगते हैं।
इस पद्धति की वैज्ञानिकता का परीक्षण करने से पूर्व प्रचलित मनोचिकित्सा पद्धति सिद्धांततः सही सिद्ध होने पर भी व्यावहारिक दृष्टि से कुसंस्कारों को ओर भी उकसाने वाली तथा मन में नई उत्तेजनाएं भरने वाली सिद्ध हो रही थी। हिस्टीरिया के मामले में विशेषतः ऐसा ही होता है, जिसे भूत-प्रेत का प्रकोप भी कहा जाता है। वह वस्तुतः किसी ऐसे व्यक्ति की मानसिक चेतना होती है जिसके साथ रोगी ने कभी छल किया हो, कपट किया हो, हत्या या ऐसा ही कोई बुरा कृत्य किया हो जिससे शरीर के नष्ट हो जाने पर भी पीड़ित व्यक्ति की चेतना में उससे प्रतिशोध लेने की बात दबी रह जाती है। चेतना का वही संघात, भले ही पीड़ित व्यक्ति जीवित हो अथवा मृतक प्रेत पीड़ा जैसे लक्षण उत्पन्न करता है।
साइकोसोमैटिक रोग प्रत्यक्ष शारीरिक होते हैं, किन्तु उनकी जड़ मानसिक विकारों में हो होती है। मस्तिष्क का विचार संस्थान उस नाड़ी जाल को प्रभावित करता है जो शरीर में गूँथा पड़ा है। अच्छे विचारों के उमड़ने से शरीर में स्वास्थ्यवर्धक और आरोग्यवर्धक रस उत्पन्न होते हैं जो रक्त में मिलकर स्वास्थ्य पोषक तत्व उत्पन्न करते हैं। उसी प्रकार खराब विचार विष उत्पन्न करते हैं अतएव यह बात निर्विवाद सत्य है कि आज की बढ़ती हुई बीमारियों का इलाज औषधियाँ नहीं विचार और चिन्तन प्रक्रिया में संशोधन ही है। दूषित विचार मानसिक परेशानी के रूप में उत्पन्न होते हैं तथा अल्सर, कैंसर, टी.बी. जैसे भयंकर रोगों के रूप में फूट पड़ते हैं। कई बार तो कई जन्मों के संस्कार इस बुरी तरह पीछा करते हैं कि उन्हें समझ पाना ही कठिन होता है। उन सबका एक ही उपचार है कि मनुष्य व्यवहार, आचरण और कर्तव्य में सच्चाई का परित्याग न करे।
स्वस्थ रहने के लिए उच्चस्तरीय स्वार्थ साधन की आवश्यकता और महत्ता को विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है। कार्ल रोजर में ‘सेल्फ एक्यु अलाइजेशन नामक ग्रन्थ में लिखा है कि स्वार्थ और परोपकार यों एक-दूसरे के विरोधी सिद्धांत प्रतीत होते हैं, परन्तु व्यवहारतः उनमें कहीं भी कोई विरोध नहीं है। जो दूसरों का जितना हित साधन करता है, औरों की भलाई के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करता है वह उतना ही अपने उच्च स्वार्थ की पूर्ति कर लेता है।
रूस के प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डा. स्तीव शेंकमान ने लिखा है कि सभी प्रकार के कुविचारों से दूर रहना प्रसन्न रहने का सबसे उत्तम उपाय है। उन्होंने ‘निरोग रहने के छः उपाय’ पुस्तक में लिखे हैं कि अधिक से अधिक प्रसन्न रहने का प्रयत्न कीजिए। यदि आपकी परेशानियाँ इतनी अधिक बढ़ गई हैं और चिन्ताओं का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है कि आप उसे और अधिक सह नहीं सकते तो किसी उपयुक्त व्यक्ति के सामने अपनी परेशानियाँ उड़ेलकर उसकी सहानुभूति प्राप्त कीजिए तथा प्रसन्न होने का प्रयास कीजिए। किसी को अपना हमराज भी बनाया जा सकता है और वह हमराज कोई भी हो सकता है, आपकी पत्नी, माता, पिता, दोस्त आदि कोई भी। जिसे आप उपयुक्त समझते हैं उसके सामने अपनी परेशानियाँ जी खोलकर उड़ेल दीजिए ताकि आप स्वस्थ और प्रसन्न रह सकें।
प्रसन्न रहना सब रोगों की एक दवा है और प्रसन्न रहने के लिए आवश्यक है अपना जीवन निष्कलुष बनाया जाए। निष्कलुष, निष्पाप, निर्दोष और पवित्र जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति ही सभी परिस्थितियों में प्रसन्न रह सकता है और यह तो सिद्ध हो ही चुका है कि मनोविकारों से बचे रहकर, प्रसन्नचित्त मनःस्थिति ही सुदृढ़ स्वास्थ्य का सुदृढ़ आहार है।
जिस पृथ्वी में हम जन्मे हैं, पल रहे हैं और मरण के उपरान्त जिसकी धूलि में मिलने वाले हैं उसके संबंध में भी अपनी जानकारी नगण्य जितनी ही होती है। अन्न, जल इस धरती की ही देन है। खनिज और ईंधन जैसी साधन सामग्री जीवन की आधारभूत आवश्यकताएं पूरी करती हैं। इतने पर भी उसकी गरिमा और विशिष्टता से हम सब अपरिचित जैसे ही बने रहते हैं।
2000 वर्ष से ऊपर हुए इराटस्थनीज नामक एक यूनानी विद्वान् ने सर्वप्रथम पृथ्वी के परिमाण की गणना की थी। उसकी गणना के अनुसार पृथ्वी की परिधि की लम्बाई 3000 मील आँकी गई थी। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों ने लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी तल को कई बार नाप डाला है। उनके अनुसार पृथ्वी की परिधि की लम्बाई लगभग 25,000 मील (ध्रुवों पर 24,860 तथा विषवत् रेखा पर 24,902 मील) है।
पृथ्वी के दोनों चपटे सिरे ध्रुव कहलाते हैं। ऊपर का सिरा उत्तरी ध्रुव तथा नीचे का सिरा दक्षिणी ध्रुव है। ध्रुवों के बीच पृथ्वी के व्यास की लम्बाई 7,899 मील है। मध्य में उसकी लपेट पर पूर्व पश्चिम का व्यास 7,926 मील के लगभग है। सम्पूर्ण धरातल का क्षेत्रफल 19,70,00000 वर्ग मील है। धरती का दो तिहाई भाग जल मग्न रहता है और शेष स्थल भाग है।
पृथ्वी के आकार और आधार के संबंध में विविध प्रकार के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कुछ का मत है कि यह खोखली है तो कुछ इसे बिल्कुल ठोस मानते हैं।
मार्शल गार्डनर नामक एक प्रसिद्ध भू-विज्ञानवेत्ता के मतानुसार पृथ्वी खोखली है। इसकी ऊपरी परत (छिलका) 800 मील मोटा है। इसके भीतर भी एक सूर्य विद्यमान है जो उसे गर्मी देता रहा है। रसायनविद् अरीनिउस के अनुसार धरती धातु का बना हुआ एक बड़ा भारी गोला है। इस गोले के गर्भ में तीव्र आँच से उत्तप्त पदार्थ वायव्य रूप में भरा पड़ा है। उनकी कल्पना ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोट पर आधारित है। उनका कहना है कि गुरुत्वाकर्षण से खिंचकर सोना, चाँदी, प्लेटिनम आदि धातुएं पृथ्वी के अत्यन्त गहरे भागों में जमा हो गयी हैं। फारसी सभ्यता वालों की मान्यता है कि कारूं अपने खजाने के साथ धरती में धंस गया था और आज भी धंसता जा रहा है। वह कारूं का खजाना सम्भवतः यही है। इस अतुल धनराशि के चतुर्दिक वायव्य रूप में लोहे की बहुत बड़ी पर्त है। पृथ्वी का लगभग आधा पिण्ड लोहे का है। वायव्य लोहे के इस अग्नि-मण्डल का व्यास 6000 मील के लगभग है। इसके 600 मील ऊपर तक चट्टानों का वायव्य स्तर है। इसके 160 मील ऊपर तक धधकती आँच से तपे हुए सफेद पिघले पत्थर की पर्त है। इन सबसे ऊपर लगभग 100 मील मोटी वह पर्त है जिस पर हम जी रहे हैं। आधुनिक वैज्ञानिक भी अरीनिउस के इस सिद्धांत को अपने मत का आधार मानते हैं।
सम्पत्ति धरती का उत्पादन है। लक्ष्मी इसी को कहते हैं। वह धरती की बेटी है। अब तक उसमें जो खोदा उगाया गया उसी को मिल बाँटकर संपदा की तरह उपयोग करते और उन सुविधा साधनों के बल पर मोद मनाते हैं। हर वर्ष उसका उत्पादन उतना अधिक है कि न केवल मनुष्यों का वरन् अन्य समस्त प्राणियों का गुजारा भी इसी के बलबूते चलता है। प्रकारान्तर से प्राणियों के शरीर भी धरती के ही रासायनिक पदार्थों से बने हैं। मिट्टी से वनस्पति उगती है उसी के विभिन्न स्वरूप शाकाहारी एवं माँसाहारियों को निर्वाह सामग्री प्रदान करते हैं। खनिज, वृक्ष, वनस्पति, प्राणिज पदार्थ जल आदि का वार्षिक उत्पादन कितना है। धरती अपने पुत्रों को कितनी सम्पदा प्रदान करती है इसका लेखा-जोखा रखना कठिन है। मनुष्य की जानकारी में विश्व की जो सम्पदा है उससे भी अधिक वह है जो पर्वतों, वनों, जलाशयों तथा अविज्ञात भू-प्रदेशों में बिखरी पड़ी है।
यह ज्ञात वैभव की बात हुई। धरती के भीतर जो खनिज भरे पड़े हैं उस अविज्ञात का विस्तार सहस्रों गुना अधिक है।
इतनी सम्पत्ति की स्वामिनी धरती पर निवास करते हुए भी-उसके पुत्र कहलाते हुए भी-अपनी माता के वैभव से लाभान्वित नहीं हो पाते। इतना ही नहीं उसकी जानकारी तक नहीं है। मात्र उस पर चलने-फिरने जितनी उपयोगिता ही ध्यान में रहती है। गहराई तक सोचना सम्भव हुआ होता तो प्रतीत होता है कि अपने ही पैरों के तले तथा इर्द-गिर्द कितना वैभव बिखरा पड़ा है।
चर्चा इसलिए की जाती है कि धरती के समान्तर ही हमारी काय सत्ता भी है। धरती जड़ है और काया चेतना। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की गरिमा कितनी अधिक होती है यह सभी जानते हैं। मानवी काय-सत्ता में सन्निहित सम्पदा चेतन स्तर की होने के कारण उसका मूल्य एवं महत्व और भी अधिक है। इसे यदि ठीक प्रकार जाना जा सके और उसे खोदने उगाने का प्रबंध बन पड़े तो समझना चाहिए कि हर मनुष्य की अपनी निजी सत्ता धरती से अधिक मूल्य की सिद्ध हो सकती है। धरातल के वैभव से अपरिचित एवं असंबद्ध लोग जिस प्रकार दुःखी, दरिद्र पाये जाते हैं उसी प्रकार जीवन के वैभव का स्वरूप एवं उपयोग न जानने के कारण भी हममें से अधिकाँश को दीन-दयनीय स्थिति में पड़े रहना पड़ता है।
धरातल पर पृथ्वी के केन्द्र से हम 4000 मील की ऊंचाई पर हैं। यदि किसी तरह हम आसमान में 4000 मील की ऊंचाई तक पहुँच जांय, तो पहले की अपेक्षा पृथ्वी के केन्द्र से हमारी दूरी दुगुनी हो जायेगी। अतः हमारा वजन भी पहले से चार गुना कम हो जायेगा। यदि जमीन पर हमारा वजन 1 मन 20 सेर है, तो 4000 मील ऊपर आकाश में हमारा वजन 25 सेर ही होगा। क्योंकि पृथ्वी से दूर हटने पर उसकी आकर्षण शक्ति कम होती जाती है। गुरुत्वाकर्षण इसी के वर्ग के अनुपात में घटता है।
नर पशुओं जैसे हेय स्तर का जीवनक्रम अस्वीकृत करके यदि उत्कृष्ट दृष्टिकोण एवं आदर्श व्यवहार अपनाया जा सके तो उस ऊंचाई पर पहुँचने के बाद मनुष्य अपने आपको नितान्त हलका-फुलका प्रसन्न उल्लासित अनुभव कर सकता है। बंधन मुक्ति एवं प्रचण्ड शक्ति इसी स्तर पर पहुंचने पर उपलब्ध होती है।
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का मुद्दतों तक तो किसी को पता ही न चला। न्यूटन ने सर्वप्रथम उसके अस्तित्व की बात सोची और जाँच परख करने के बाद लोगों को बताया। उस समय तक किसी को अनुमान भी न था कि हमारे इर्द-गिर्द इस रूप में सामर्थ्य का प्रचण्ड भण्डार भरा पड़ा है और उससे हम अनजाने ही अत्यधिक प्रभावित होते हैं।
धरती का गुरुत्वाकर्षण सौर मण्डल से लेकर ब्रह्माण्ड तक को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करता है और आदान-प्रदान के अनेकानेक आधार खड़े करता है। उदाहरण के लिए धरती उपग्रह अपना चन्द्रमा इसी आकर्षण शक्ति से अधर में टंगा और अनवरत परिभ्रमण करता है।
नारंगी की तरह पृथ्वी ध्रुवों पर चिपटी है। अतः विषुवत् रेखा पर स्थित स्थान ध्रुवों की अपेक्षा उसके केन्द्र से अधिक दूर है। अतएव पृथ्वी की आकर्षण शक्ति ध्रुवों पर ज्यादा और विषुवत् रेखा पर कम होती है। इसके अलावा पृथ्वी की काल्पनिक धुरी भी ध्रुवों से होकर गुजरती है। अतः विषुवत् रेखा पर के स्थान ध्रुवों की अपेक्षा अधिक तीव्रता से घूमते हैं और यहाँ आकर्षण शक्ति कम हो जाती है। विषुवत् रेखा की परिधि लगभग 25000 मील है। अतः 24 घण्टे में विषुवत् रेखा पर स्थित स्थानों को लगभग 25000 मील का रास्ता तय करना पड़ता है जबकि ध्रुव के निकट के स्थानों की कम ही दूरी तय करनी पड़ती है। विषुवत् रेखा पर के स्थानों की गति लगभग 1000 मील प्रति घण्टा है। अतः विषुवत् रेखा के समीप के पदार्थों में ध्रुवों की अपेक्षा बाहर की ओर खिंचाव (सेन्ट्रीफूगल फोर्स) अधिक पैदा होता है। इस कारण भी इन पदार्थों पर काम करने वाली पृथ्वी की आकर्षण शक्ति कम पड़ जाती है।
पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा 2,287 मील प्रति घण्टे की दर से परिक्रमा कर रहा है। गणितज्ञों ने हिसाब लगाया है कि यदि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति संयोगवश गुप्त हो जाए तो पूर्ववत् चन्द्रमा से पृथ्वी की परिक्रमा कराने के लिए चन्द्रमा को पृथ्वी से 370 मील चौड़े लोहे के डण्डे द्वारा बाँधना होगा।
यह आकर्षण शक्ति मात्र पृथ्वी और चन्द्रमा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी आकाशीय पिंडों व पदार्थों की वह शक्ति मौजूद है। इस सर्वव्यापी आकर्षण शक्ति की गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
मोटे तौर से इतना समझा जाता है कि भारी चीजों को ऊपर से नीचे घसीट लेने की क्षमता का नाम ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। पर बात उतनी छोटी है नहीं। धरती का ‘मैग्नेट’ इस प्रचण्ड सामर्थ्य से इतना सुसम्पन्न है कि उस पर करोड़ों बिजली घर निछावर किये जा सकते हैं। इस सामर्थ्य का मनुष्य की इच्छानुसार यदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयोग हो सके तो समझना चाहिए कि दरिद्रता एवं अशक्तता से इस धरती के निवासी को कष्ट सहन न करना पड़ेगा।
सुविख्यात विज्ञान लेखक- ‘‘आर्थर क्लार्क” ने भविष्य कथन किया है कि सन् 2050 तक मनुष्य गुरुत्वाकर्षण-शक्ति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तब वह प्रकाश की गति से ब्रह्माण्ड में अन्तर्ग्रही यात्राएं कर सकेगा।
अमेरिका में सौर-ऊर्जा के ऊपर अनुसन्धान बहुत जोरों से चल रहे हैं, पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊर्जा बटोरने वाली सौर-ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा उत्पादन पद्धति से ऊर्जा संकट के समाधान का विशेष हल नहीं मिल पायेगा। कुछ वैज्ञानिक लोगों का ध्यान गुरुत्वाकर्षण की ब्रह्माण्ड-व्यापी शक्ति का उपयोग करने की ओर गया है उनका कहना है कि जैसे चुम्बक में आकर्षण एवं प्रतिकर्षण दोनों ही प्रकार की शक्ति होती हैं, वैसा ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के संबंध में भी होना चाहिये। चन्द्रमा का वजन 73 करोड़ 40 लाख खरब टन है, यदि इसकी घूर्णन शक्ति का 1 करोड़वां भाग भी किसी तरीके से मिल सके तो संसार की 1 वर्ष की ऊर्जा की समस्या हल हो जायेगी। वास्तव में जिस शक्ति के बल पर ब्रह्माण्ड टिका हुआ है, यदि उन गुरुत्वाकर्षण शक्ति के उपयोग का रहस्य ज्ञात हो सके तब तो मनुष्य के लिए विस्मयकारी उपलब्धि होगी।
यह प्रतिपादन भौतिकी के वैज्ञानिकों का है। आत्मिकी के विज्ञानी यह कहते हैं कि व्यक्ति में प्रतिभासित ब्रह्म सत्ता के गुरुता गरिमा का आभास अनुभव किया जा सके और उसे आत्मसात् करने की साधना की जा सके तो तुच्छ-सा दिखने वाला मनुष्य असीम सामर्थ्य का भाण्डागार बन सकता है।
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण अद्भुत है साथ ही काया की रहस्यमयी चेतन क्षमता भी उतनी ही विचित्र है। ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की तनिक-सी झाँकी हमें अपने सूर्य केन्द्र में सौर मण्डल में परिलक्षित होती है। उसका समग्र स्वरूप तो कल्पनातीत है, ब्रह्म चेतना का वैभव और भी अधिक है। उसके सहारे समस्त ब्रह्माण्ड गतिशील है। उस सत्ता के साथ आदान-प्रदान का द्वार खोलने वाले आत्मविज्ञान के धनी जब ब्रह्म संबंध स्थापित करने में सफल होते हैं तो उनकी तद्रूप स्थिति में कल्पनातीत सामर्थ्य से भरी पूरी दिखाई पड़ती है। ईंधन और आग के संयोग से दोनों की एकाग्रता प्रत्यक्ष है। आत्मा की साधनात्मक घनिष्टता अपनाकर परमात्मा बनती और वैसी ही अभिप्रेत होती है।
माया बन्धनों से छूटना ही मुक्ति है। मुक्ति अर्थात् दृष्टिकोण का परिष्कार, तत्व का यथार्थ दर्शन एवं वस्तुस्थिति के अनुरूप यानी विचार पद्धति और कार्य प्रणाली को सही कर लेना। माया बंधन दृष्टिकोण की निकृष्ट स्थिति का और माया मुक्ति परिष्कृत दृष्टिकोण का बोधक है। भगवत् माया तो परा-अपरा प्रकृति के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड में आदिकाल से व्याप्त है। उससे छुटकारे का प्रश्न नहीं। माया की शरण अर्थात् माता की गोद। इसमें अहिर्निश सुख ही सुख है। माँ गायत्री की अचल छाया में असीम सुख-शाँति प्राप्त कर सकते हैं।
माँ भगवती कहती हैं।
“युष्मानहं नर्त्तयामि काष्ठ पुत्तलिकोपमाम्। तां मां सर्वात्किकां यूयं विस्मृत्य विजगर्वतः॥ अहंकारा वृतात्मानो मोहमाप्ता दुरन्तकम्। अनुग्रहं ततः कर्त्तुं युष्मद्देश दनुत्तमम्॥ निःसृतं सहसा तेजो मदीयं यक्षनित्यपि। अनः परं सर्वं भावैर्हित्या गर्व तु देहजम्। मामेव शरणं यात सच्चिदानंद रुपिणीम्॥
अर्थात्- मैं आप सबके हृदयान्तश्चारिणी होकर आपको काठ की पुतली की तरह नचाती हूँ। अपने अहंकार से अभिभूत होकर सभी निज गर्व से भूलकर दुर्दान्त को, मोह को प्राप्त होते हैं। उस समय आपके कार्यों की सिद्धि के लिए अनुग्रह करके आविर्भूत होकर तेजःस्वरूप में मैं अवस्थित होती हूं। इसलिये अब आप लोग सर्व से देह के गर्व को त्याग कर सच्चिदानन्द रूपिणी मुझ में ही शरण लीजिये, आपका सर्वत्र शुभ होगा।
माया और मोह परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। जहाँ माया होगी, वहाँ मोह होगा, समझना चाहिये कि मोह, माया का ही प्रभाव है। वस्तुतः समस्त प्रकृति वैभव ही माया है और माया से प्रेरित मनुष्यों से देवताओं तक चैतन्य प्राणधारियों की और दृश्य पदार्थों की गतिविधियों तक में एक माया को ही ओत-प्रोत समझना चाहिये। वस्तुतः अध्यात्म का मर्म यही है कि शक्ति और माया का सही स्वरूप लिया जाये। अज्ञान के अंधकार से जब साधक प्रकाश की ओर बढ़ता है तो उसे तत्व ज्ञान होने लगता है। आद्यशक्ति गायत्री ही समस्त सृष्टि की जननी है। लिंग भेद में पड़ने की आवश्यकता नहीं। वह उससे भी परे एक परमशक्ति, महत् सत्ता है।
अथर्ववेद के दसवें सूक्त में उल्लेख आता है कि गायत्री को जानने वाले साधको ने अमृतत्व की प्राप्ति की है-
‘यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं, त्रेष्ठुभाद्वा, त्रैष्ठुभं निरतक्षत। यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य, इत्तद्विदुस्ते अमृतत्वमानुशः॥1॥
गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण, साम त्रेष्ठुभेन वाकम्। वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाक्षरेण, मिमते सप्तवाणीः॥2॥
अर्थात्- गायत्री से संबंधित जो गायत्र पद है अथवा त्रैष्टुप् पद मिलता है अथवा जगती द्वारा जो पद जगती में लक्षित है, जिन साधकों ने उसी को जाना है, उन्होंने अमृतत्व को प्राप्त किया है।
अर्थात्- गायत्री, के साथ प्रत्येक ऋचा को पढ़ा जाता है एवं ऋचा के साथ साम गाया जाता है। त्रिष्टुप के साथ वाक् और वाक् से द्विपदा-चतुष्पदा अक्षर सहित सात छन्दमय सब वेद के अनुवाक् पढ़े जाते हैं। अर्थात् चारों वेद जो सात छन्दों में छंदबद्ध हैं, गायत्री और त्रिष्टुप के आधार पर स्थित हैं।
तैत्तरीयोपनिषद् में भी उल्लेख है-
“गायत्रं प्रातः सवनं त्रैष्ठुभं माध्यं दिनं सवनं जागतं तृतीयं सवनम्॥ (तै.सं. 2, 2, 9, 5-6)
अर्थात्- गायत्री से प्रातः सवन, त्रिष्टुप् से माध्य दिन सवन और जगती से सायं सवन करने वालों को जिस पद की प्राप्ति कही गई है वह ब्रह्म पद ही अमर पद है।
सामान्यतया इतना ही समझा जाता है कि सूर्य से गर्मी और रोशनी मिलती है। यों यह दोनों भी जीवन निर्वाह और सृष्टि व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं, पर तथ्यों पर गंभीरता से विचार करने से प्रतीत होता है कि सूर्य की सत्ता ही जीवन सम्पदा का रूप धारण करती है। रोग निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन में निरन्तर काम आने वाली ‘जीवनी शक्ति’ शरीर का अपना उपार्जन नहीं वरन् सूर्य का दिया हुआ अनुदान है। इसे प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम सूर्य ऊर्जा के निकट संपर्क में रहें। उससे बचने फिरने से तरावट की सुविधा भले ही मिल सके, पर उस सामर्थ्य की कमी होती जायेगी, जो स्वास्थ्य रक्षा एवं दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक है।
इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन की सम्भावना नहीं है। सूर्य किरणें सभी प्राणियों के साथ मानव जीवन को प्रत्यक्षतः प्रभावित करती हैं, पृथ्वी के सभी पेड़-पौधे, जीव-जन्तुओं एवं मनुष्यों का जीवन सूर्य पर ही अवलम्बित है। सभी खाद्यान्नों की उत्पत्ति सौर ऊर्जा से ही होती है। पौधा अपने हरे रंग से सूर्य की शक्ति को शोषित करता है। जड़ों द्वारा जल, हवा से कार्बन डाई आक्साइड सूर्य शक्ति के माध्यम से पौधे अपने हरे रंग (क्लोरोफिल) से एक संयुक्त पदार्थ बना लेते हैं, जिन्हें कार्बोहाइड्रेट कहते हैं। पौधों को पोषण इन्हीं से मिलता है। इन कार्बोहाइड्रेट में वसा, स्टार्च एवं शक्कर होते हैं। वनस्पति शास्त्र में इसी क्रिया को (पौधों में भोजन निर्माण की प्रक्रिया ) (फोटोसिन्थेसिस) प्रकाश संश्लेषण के नाम से जाना जाता है।
पेड़-पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्रिया से उनका भोजन बनता है। मनुष्य का आहार वनस्पति है, दूध गाय-भैंस से प्राप्त होता है लेकिन वे भी उसे वनस्पतियाँ खाकर ही बना सकते हैं अर्थात् प्रकारान्तर से भी खाद्य-पदार्थ सूर्य किरणों से ही उपलब्ध माने जा सकते हैं।
सूर्य-रश्मियों के अदृश्य भाग में इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट किरणें और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी को गर्म रखने, जैव रासायनिक क्रियाओं को तीव्र करने का कार्य इन्फ्रारेड किरणों से होता है। अल्ट्रावायलेट किरणों से हमारे शरीर में विटामिन ‘डी’ का निर्माण होता है। मात्र इसी विटामिन का मानव शरीर में निर्माण होता है। यह कैल्शियम, फास्फोरस आदि के खनिज लवणों को उपयोगी बनाने का कार्य शरीर में करता है। इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट किरणों को कृत्रिम रूप से पैदा करके रोगों के उपचार में पर्याप्त प्रयोग होने लगा है। सूर्य-किरणों का प्रत्यक्ष रूप से उपयोग अन्य कृत्रिम उपायों से प्राप्त लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा रहता है।
फ्रांस के एक वैज्ञानिक डा. हापकिन्स का कहना है कि “मानव-शरीर एक ऐसा पुष्प है जिसे सूर्य के प्रकाश की सबसे अधिक आवश्यकता है।” वहाँ कुछ व्यक्तियों पर प्रयोग करके देखा गया उनको हल्के सफेद वस्त्र पहनाकर सूर्य के प्रकाश में रखा गया। फिर उन्हीं को उतने ही समय के लिए बिना वस्त्रों के सूर्य किरणों के संपर्क में रखा गया। निष्कर्ष यह निकला वस्त्र सहित रहने की अपेक्षा बिना वस्त्रों के रहने पर वजन में वृद्धि अधिक पाई गयी। कार्य करने की क्षमता भी अधिक देखी गई तथा स्वास्थ्य भी अपेक्षाकृत अच्छा पाया गया और नींद भी अच्छी आयी।
जर्मनी के प्रसिद्ध डॉक्टर लुईकुनी ने कई रोगों के उपचार के लिए सूर्य-किरणों का उपयोग सफलतापूर्वक किया। सूर्य में रोगों को नष्ट करने तथा प्राणी मात्र को स्वास्थ्य एवं नवजीवन प्रदान करने की अपूर्व प्राकृतिक शक्ति है। प्राचीनकाल से ही वैदिक संध्या त्रिकाल करने की पद्धति सूर्य की इसी लाभकारी शक्ति का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए बनाई गयी थी। ऋषि मुनियों के आश्रम, गुरुकुल आदि ऐसे ही स्थान पर होते थे जहाँ सूर्य प्रकाश खुली वायु एवं निर्मल आकाश और पवित्र वातावरण रहता था।
विगत महायुद्ध के समय डा. सोरेल ने घायल सिपाहियों के उपचार के लिए सूर्य किरणों का उपयोग किया। पहले तो उन्होंने केवल घावों पर सूर्य रश्मियों का प्रयोग किया, बाद में पूरे शरीर पर प्रयोग करके देखा तो अपेक्षाकृत अधिक लाभ हुआ।
सूर्य के प्रकाश को दृश्य एवं अदृश्य दो प्रमुख भागों से मिलकर बना माना जाता है। अदृश्य भाग में पराबैगनी (अल्ट्रावायलेट) किरणें होती हैं तथा दूसरे प्रकार की इन्फ्रारेड किरणें भी होती हैं। इनका शरीर पर चमत्कारी प्रभाव पड़ता है। इन्फ्रारेड किरणें शरीर को गर्म करती हैं तथा अल्ट्रावायलेट किरणें लाल रक्त कणों की वृद्धि करती हैं। उनमें हिमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ने से ही यह वृद्धि होती है।
सूर्य की रश्मियों में रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता है। सूर्य-चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि सभी प्रकार के रोगों में सूर्य की किरणों से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। भूख न लगना, डिसेन्ट्री, खाँसी, फोड़ा-फुँसी, कालन्दा पुराना, नेत्र रोग, मानसिक असन्तुलन आदि सब में सूर्य की किरणों की लाभदायक शक्ति का उपयोग हो सकता है। कैल्शियम की कमी एवं विटामिन ‘डी’ की अल्पता में तो सूर्य रश्मियों का उपभोग लाभप्रद है ही।
डा. स्किली का कहना है कि रोगों से छुटकारा पाने, स्वस्थ होने के लिए रवि-रश्मियों का विधिवत् उपयोग किया जाय। प्रातः धूप में बैठकर सरसों के तेल की मालिश शारीरिक कान्ति वृद्धि के लिए अतीव उपयोगी है। फेफड़ों के टी.बी. रोग एवं अन्यान्य बुखार संबंधी रोगों में धूप सीधे शरीर पर न पड़ने पाये बल्कि कपड़े या काँच से छनकर उपयोग किया जाय। इसके अतिरिक्त सूर्य-किरणों के प्रयोग के समय निम्नलिखित सावधानियाँ अपनायी जायें-
शीत प्रधान देशों में जब धुन्ध और बदली नहीं रहती और स्वच्छ प्रकाश धरती पर आता है तो लोग सूर्य सेवन के लिए आतुर हो उठते हैं। शरीर को निर्वस्त्र करके उस पर खुली किरणें देर तक पड़ने देते हैं। मात्र जननेन्द्रिय और शिर को हरे पत्तों से ढके रहते हैं। उन देशों में सूर्य सेवन को अलभ्य अवसर मानकर उसका लाभ आतुरता पूर्वक उठाने के लिए अनेक विधि-विधान बनाये गये हैं, पर भारत जैसे देशों में तो वह सहज सुलभ है इसलिए यहाँ मध्याह्न की तेज धूप से बचने एवं प्रातःकाल की स्वर्णिम रश्मियों को अधिक हितकारक मानने का जो प्रचलन है उसी को पर्याप्त माना जा सकता है।
दोपहर की कड़ी धूप से बचना एक बात है और उसे बचने में शान समझना दूसरी। अमीरी के चोचलों में एक यह भी है कि गर्मी से बचा जाय और ठंडक में रहा जाय। ऐसे लोगों के शरीर में विषाणु पलने लगते हैं और ऋतु प्रभाव से लेकर अन्यान्य प्रतिकूलताओं का सामना करने की सामर्थ्य घट जाती है। उन्हें उन पोषणों से भी वंचित रहना पड़ता है जो अन्तरिक्ष में बिना मूल्य बरसते हैं, किन्तु कीमती टॉनिकों से भी अधिक गुणकारी होते हैं। इनसे बचने का अर्थ है प्रकृति प्रदत्त उन बहुमूल्य अनुदानों को अस्वीकृत करना जो शरीर और मन को सुदृढ़ बनाये रहने के लिए आवश्यक हैं, सूर्य सान्निध्य में जीवनयापन करना शक्ति संवर्धन और रोग निवारण दोनों ही दृष्टियों से एक दैवी वरदान है। इससे बचते रहने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए।
“ये सन्तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मान्ते महाबलाः। धर्म्म पंथानमारूढ़ास्तानु पास्व पृच्छ च॥
‘‘धर्म मार्ग पर चलने में यदि कोई शंका, सन्देह उत्पन्न हो तो वेदाभ्यासी, महात्मा, संतोषी शक्ति सम्पन्न जिनका जीवन ही धर्माचरण पर आधारित है उनका आश्रय और मार्गदर्शन प्राप्त कर धर्म में प्रवृत्त हों।”
प्राचीन काल में शरीर को एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला मानकर उसमें चेतना क्षेत्र को परिष्कृत करने वाले अनेकानेक प्रयोग किये जाते थे। ऋषि इसी अन्वेषण प्रक्रिया में निरत रहते थे। इसके लिए उन्हें शान्त-एकान्त वातावरण की आवश्यकता पड़ती थी। साथ ही आहार-विहार में कई तरह के परिवर्तन करके काय प्रयोगशाला की परिस्थिति ऐसी बनानी पड़ती थी, जिसमें अभीष्ट अन्वेषण सरलतापूर्वक सम्पन्न हो सके। जन-संपर्क से चिन्तन एवं अन्वेषण में विघ्न पड़ता है। यह तथ्य आज भी प्राचीनकाल की तरह ही यथावत् बना हुआ है।
पुरातन योगी अपना रहन-सहन भी ऐसा रखते थे, जिसमें सुदूर एकान्त में रहते हुए भी निर्वाहक्रम चलता रहे। मृग चर्म, भोज पत्र आदि के वस्त्र, सहज उपलब्ध घास-फूँस के झोपड़ों, लौकी जैसे कड़ी छिलकों के कमण्डलु पात्र, शीत तथा हिंस्र पशुओं से रक्षा के लिए अग्नि धूनी, वस्त्रों के अभाव में शरीर पर भस्म पोतना, स्वयं उगाये या सहज पाये कन्द शाकों का आहार, हजामत की सुविधा न रहने से केश वर्धन, स्त्री बच्चों का उत्तरदायित्व बढ़ने से एकाग्रता में अवरोध जैसे तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उन दिनों जो प्रक्रिया शोधकर्ताओं द्वारा अपनाई जाती थी। उसका अनुकरण करना सर्वसाधारण के लिए उन दिनों भी आवश्यक नहीं थी। राजाजनक जैसे अनेक ब्रह्मवेत्ता सामान्य जीवनयापन करते और योगाभ्यास के उच्चस्तरीय प्रयोगों में निरत रहते थे। अन्वेषी वैज्ञानिकों को शोध काल में अपनी काया का प्रयोगशाला बनाने के निमित्त जो असाधारण प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, उसे आज के सामान्य अभ्यासी भी अपनाये इसकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है। शोध विज्ञानियों की परिस्थिति दूसरी होती है और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करते रहने वाले कारीगरों की दूसरी।
भगवान शंकर योगेश्वर कहे जाते हैं वे सद्गृहस्थ थे। पत्नी और बच्चों समेत रहते थे। योगिराज कृष्ण का जीवन भी पारिवारिक था। वशिष्ठ के सौ पुत्र होने की कथा प्रख्यात है। सप्त ऋषियों में से सभी गृहस्थ थे और पत्नियों समेत अपनी गतिविधियाँ सुसंचालित रखते थे। विवाहित या अविवाहित रहना सामान्य जीवन में भी स्वेच्छा पर निर्भर रहता है। योग प्रयोगों के अभ्यास भी इस संबंध में अपनी सुविधा या इच्छा से निर्णय कर सकते हैं। ऐसा कोई बंधन है कि योगाभ्यासी अविवाहित ही रहें और जो गृहस्थ हैं वे अपने परिवार का परित्याग ही कर दें। भगवान बुद्ध जैसे कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें आपत्तिकालीन आवश्यकता की संज्ञा दी जा सकती है। ऐसे तो राष्ट्र रक्षा के लिए सैनिक भी बिना घर परिवार की चिन्ता किये सर्वस्व बलिदान का साहस लेकर युद्ध मोर्चे पर जाते हैं। न तो हर सैनिक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने बाल-बच्चों से मुँह मोड़ ले और न हर योगाभ्यासी के लिए यह अनिवार्य है कि गृह-त्यागी बैरागी होकर रहे।
मध्यकाल में विशेषतया बौद्धकाल में, गृह त्यागी भिक्षुजनों का प्रवाह उत्पन्न हुआ था। विश्व परिष्कार के लिए उस समय उस प्रकार की सेना भरती करनी पड़ती थी जो सुदूर देशों में जाकर धर्मचक्र के प्रवर्तन में निश्चिंततापूर्वक संलग्न रहें। उस स्तर के लोगों के लिए इन दिनों भी वैसे ही अनुकरण की आवश्यकता है किंतु जिन्हें मानसोपचार एवं व्यक्तित्व के समान सम्वर्धन के लिए योगाभ्यास करता है उनके लिए उस अनुसरण की आवश्यकता नहीं जो किन्हीं विशेष परिस्थितियों में किन्हीं विशेष व्यक्तियों द्वारा विशेष उद्देश्यों के लिए अपनाया गया था।
आज योगाभ्यास के पूर्ण निर्धारित विधि-विधानों से लाभ उठाने भर की आवश्यकता है। ऐसी दशा में शोधकर्ताओं की तरह काया की प्रयोगशाला बनाने की बात सर्वसाधारण के सोचने की नहीं है। फिर भी भ्रान्तियाँ तो भ्रान्तियाँ ही हैं वे मान्यता बन जाती हैं जो जड़ जमा लेती हैं। आज कोई अभिभावक अपने बच्चो को योग संबंधी पुस्तकें पढ़ते या इस प्रकृति के लोगों के साथ मिलते-जुलते देखता है तो नाराजी व्यक्त करता और रोकता है। माता अपनी सन्तान को, पत्नियाँ अपने पतियों को योग चर्चा में रस लेते सहन नहीं करतीं। इसका कारण है-तथाकथित योगियों का आर्थिक परावलम्बन उत्तरदायित्वों से पलायन- अकर्मण्य समयक्षेप तथा अनुपयोगी असामाजिक जीवनक्रम। स्वभावतः ऐसी हेय स्थिति उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया के प्रति जनसाधारण में तिरस्कार उभारना ही चाहिए। उसे अपनाने में असहमति रहनी ही चाहिए।
इतने पर भी वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। बदली छा जाने पर सूर्य कुछ डूबा हुआ प्रतीत तो होता है, पर तथ्यतः वह कुहासे से ढका भर होता है। बदली हटते ही वह अपने वास्तविक रूप में बिना किसी कठिनाई के प्रकाशवान हो उठता है। योग विज्ञान के संबंध में भी ऐसी ही बात है। वह पदार्थ विज्ञान की तरह ही अध्यात्म विज्ञान भी है। एक प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करता है दूसरा पुरुष से, चेतन से संबंधित तथ्यों को प्रकाश में लाता है। अध्यात्म विज्ञान के दो पक्ष हैं- (1) तत्व-दर्शन (2) योगाभ्यास। तत्व दर्शन की विवेचना ब्रह्म विद्या के अंतर्गत की गई है। इससे दृष्टिकोण का परिष्कार होता है। मान्यता, भावना, आकाँक्षा, सम्वेदना एवं विचारणा को उच्चस्तरीय बनाने में ब्रह्म विद्या के तत्व दर्शन की भूमिका ही काम करती है। संक्षेप में इसे व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का उपचार कह सकते हैं। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन यह चार अवलम्बन ब्रह्म विद्या को हृदयंगम कराते हैं। उपनिषदों का यही विषय है।
अध्यात्म विज्ञान की दूसरी धारा है- योगाभ्यास। जिसे साधना विधान एवं तप उपचार भी कहते हैं। ब्रह्म विद्या भोजन है तो योगाभ्यास व्यायाम। स्वास्थ्य संवर्धन की प्रक्रिया अनुशासनपरक है। चिकित्सा उपचार में घुसी हुई विषाक्तता से निपटने की विधि व्यवस्था है। एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी दोनों आत्म-निर्भर है। दोनों की अपनी स्वतन्त्र विधि-व्यवस्था है।
यहां चर्चा योगाभ्यास की हो रही थी। इसे प्रधान रूप से मानसोपचार कह सकते हैं, यों उसमें शारीरिक अंग अवयवों को उपयुक्त कृत्यों में लगाकर आरोग्य सम्वर्धन की व्यवस्था भी बनाई जाती है। आसन प्राणायाम, बेध, मुद्रा आदि उपचार इसी प्रकार के हैं। प्रत्यक्षतः वे दिखते तो व्यायाम स्तर के हैं, पर तथ्यतः उनमें भी कुछ रहस्य भरी विशेषताएं सन्निहित रहती हैं। मनःशास्त्र के उच्चस्तरीय सिद्धांतों का समावेश तो योग साधना की प्रत्येक छोटी-बड़ी प्रक्रिया में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यों योग की मूल धारा मनःशास्त्र से संबंधित है और उस क्षेत्र की विकृतियों का निराकरण करने के उद्देश्य से ही विकसित हुई है, तो भी उसमें शारीरिक व्याधियों से छुटकारा दिलाने वाले कतिपय प्रयोग उपचार भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार योग को एक समग्र चिकित्सा शास्त्र भी कहा जा सकता है।
मानसिक आधियों और शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए शरीर शास्त्रियों ने पिछले दिनों कितनी ही चिकित्सा पद्धतियों का विकास किया है। इनमें से ऐलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद यूनानी जैसी कई पद्धतियां प्रख्यात हैं। इन सबमें एक कमी समान रूप से है कि उनकी पहुंच शारीरिक कष्टों के शमन तक ही सीमित होकर रह जाती है। आरोग्य संवर्धन के लिए आहार-विहार के कई निर्धारण सामने आये हैं। कई प्रकार की अंग साधनाएं इस प्रयोजन के लिए निकली हैं। काया-कल्प जैसे नामों से कई प्रकार के ऐसे दावे प्रस्तुत किये गये हैं जिसमें दुर्बल काया को बलिष्ठ कर दिखाने की बात कही गई है। कसौटी पर इन दावों में से अधिकाँश खोटे निकले हैं। मात्र व्याधि निवारण के क्षेत्र में शल्य क्रिया विष दमन, प्रसुप्तीकरण के कुछ प्रयोग ही तात्कालिक राहत दिला सकने में प्रभावी सिद्ध हुए हैं। शेष उपचार तो अन्धे के हाथों बटेर पड़ने की तरह तीर-तुक्का भर हैं। यदि ऐसा न होता तो सुयोग चिकित्सक हर रोगी को निरोग बना देते। सम्पन्न व्यक्ति महंगे चिकित्सक और औषधों के सहारे रुग्णता से सहज छुटकारा पा लेते। किन्तु ऐसी सफलता दावे के साथ प्रस्तुत कर सकने वाले कहीं कोई दृष्टिगोचर नहीं होते। यही कारण है कि मरीज एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे चिकित्सक का दरवाजा खटखटाते और बहुत-सा धन तथा समय गंवाने पर भी निराश खाली हाथ लौटते हैं।
यहाँ शरीर को ही सब कुछ मानने और उसमें लगे पदार्थों के सहारे हेरा-फेरी करने वाली चिकित्सा पद्धतियों पर दृष्टिपात किया गया है। प्रतिपादन का विषय किसी खण्डन में उलझना नहीं, वरन् यह है कि समग्र आरोग्य के लिए मनःतत्वों को आधार माना जाय और उसी के सहारे मानसिक तथा शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पाने की बात सोची जाय। यह इसलिए कहा जा रहा है कि चेतना स्वतन्त्र ही नहीं समर्थ भी है। उसी के नियन्त्रण में पाँच तत्वों से बने काय कलेवर का सारा ढाँचा गतिशील रहता है। मस्तिष्क को शरीर का अवयव मानने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती किन्तु मनःतत्व और मस्तिष्क को एक मान बैठना गलत है।
चेतना का काया पर आधिपत्य है। उसके विलग होते ही अच्छी-खासी काया सड़ने लगती है। मस्तिष्क को चेतना का प्रधान उपकरण माना जा सकता है, पर यह मानना गलत है कि मस्तिष्क ही चेतना का आदि और अंत है। भौतिक शास्त्र मानवी सत्ता को पंच भौतिक मान्यता है इसलिए उसके आरोग्य संबंधी प्रतिपादन एवं उपचार भी उसी स्तर के हैं। अध्यात्म शास्त्र ने जीव सत्ता को चेतना प्रधान माना है, साथ ही इसी क्षेत्र की विकृतियों की शारीरिक तथा मस्तिष्कीय व्याधियों का करण माना है। ऐसी दशा में योगाभ्यास के आधार पर अपनाया गया मानसोपचार ठीक उसी प्रकार तर्क संगत बैठता है। जैसा कि शरीर शक्तियों द्वारा प्रस्तुत औषधोपचार।
बात यहाँ आकर अड़ती है कि मानवी सत्ता को पदार्थजन्य मानकर उसकी शारीरिक और मानसिक व्यथाओं को दूर करने में रासायनिक हेर-फेर करने वाली उपचार पद्धति को पर्याप्त माना जाय? अथवा जीवन चेतना का अधिकार स्वीकार करते हुए मानसोपचार पद्धति को प्रमुखता दी जाय?
अच्छा तो यही होता कि योगाभ्यास की मानसोपचार पद्धति को शारीरिक और मानसिक व्यथाओं में प्राचीन काल की तरह प्रयोग किया जाता और दुहरा लाभ उठाया जाता, पर यदि ऐसा इन दिनों संभव न हो सके तो शारीरिक कष्टों में औषधि चिकित्सा और मनोरोग में योग चिकित्सा का उपचार तो हर दृष्टि से उपयुक्त हो सकता है। इन दिनों औषधि के लिए लोकमानस में गहरा अंधविश्वासी आग्रह है। दूसरी ओर योग चिकित्सा भी परिष्कृत रूप में विकसित नहीं हो पायी है। इसलिए इस मध्यान्तर अवधि में काम चलाऊ तरीका यही अपनाया जा सकता है कि शरीरगत व्यथाओं को शरीर शास्त्री सम्भालें और मनोरोगों के क्षेत्र में मानसोपचार पद्धति अपनाकर योगाभ्यास द्वारा सम्भालने का प्रयत्न किया जाय।
वर्तमान परिस्थितियों में योगाभ्यास को मानसोपचार के रूप में लिया जाय और उसे क्षेत्र में विकसित किया जाय तो इतने भर से इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो सकता है, जो सिद्धि चमत्कार ढूंढ़ने, स्वर्ग मुक्ति की उड़ाने उड़ने तथा देवी-देवताओं को वशवर्ती करने जैसी प्रचलित मान्यताओं के सही सिद्ध न होने पर भी विश्व मानव के लिए अतीव उपयोगी सिद्ध हो सके। योगाभ्यास का मानसोपचार पक्ष इतना वास्तविक और इतना महत्वपूर्ण है कि उसे अपनाकर उस अभाव की पूर्ति हो सकती है, जिसे कर सकने में आज का चिकित्सा विज्ञान असफल रह रहा है। मनोविकारों का शमन, मनःशक्तियों का जागरण, मनोबल का संवर्धन मानवी प्रगति और सुख-शान्ति का महत्वपूर्ण अंग है। इस प्रयोजन में निस्संदेह योगाभ्यास के मानसोपचार पक्ष की महत्ती भूमिका हो सकती है।
“केवल एक ही कर्तव्य है और एक ही सुरक्षित मार्ग है और वह है ठीक होने का प्रयत्न करना और जो कुछ तुम ठीक समझते हो उसे करने या कहने में भय न करना।’’ -चर्चिल
फूँस की झोपड़ियों के बीच बनी आलीशान कोठी में रहता था गाँव का जमींदार। उस कोठी में कदाचित किसी नीग्रो परिवार को सेवा टहल या चाकरी का अवसर मिल जाता तो उसे वे अपना सौभाग्य समझते थे। यद्यपि अन्तरंग कक्षों में इन चाकरों का प्रवेश वर्जित था, फिर कोठी के जिन भागों में चाकर नीग्रो प्रवेश करते थे और वहाँ के बारे में अपने अन्य साथियों को बताते थे तो साथियों के मन में ईर्ष्या होने लगती थी।
उस जमींदार का नाम था विल्सन। विल्सन परिवार के कपड़े धोने और कोठी की सफाई करने का काम पैट्सी नामक एक नीग्रो महिला के जिम्मे था। वह जब अपने काम में लगी रहती थी तो बच्चो को कोठी के बाहर ही छोड़ दिया करती थी। वे छोटे-छोटे बच्चे बाहर ही खेला करते थे और कभी-कभी कोठी की ओर निहारते हुए उसके अंदर की कल्पनाएं करते रहते थे। एक बार ही घटना है पैट्सी अपने काम से निबटने के बाद कोठी के रास्ते से अन्दर गई। उसके साथ उसकी बेटी ‘मेरी जीना’ भी थी। मेरी ने जब अपनी माँ को अन्दर जाते देखा तो स्वाभाविक ही उसके मन में भी भीतर जाने की इच्छा हुई।
पैट्सी ने जब देखा कि मेरी भी उसके पीछे अन्दर आ रही है तो वह डपटकर बोली- ‘बाहर ही रह, साहब नाराज होंगे।’
बेचारी मेरी ठिठक कर खड़ी रह गई।
उसने देखा कि माँ अन्दर चली गई है और नजरों से ओझल हो गई है तो वह धीरे से खिसकी और दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो अन्दर झाँकने लगी।
उसे सामने वाले कमरे में सुनहरी बालों वाली दो गोरी लड़कियां खेलती दिखाई दीं। मेरी के दरवाजे पर आने और अन्दर झाँकने के कारण हुई आहट से उन लड़कियों का ध्यान भी आकृष्ट हुआ। उन लड़कियों में से एक ने पूछा- ‘हमारे साथ खेलोगी?’
मेरी को जैसे निमन्त्रण मिल गया। वह बोल उठी- ‘हाँ, खेलूँगी। आप खिलाएंगी तो जरूर खेलूँगी।’
‘अन्दर आओगी?’ उसी लड़की ने मेरी के समीप आते हुए पूछा तो मेरी ने फिर कहा, हाँ! हाँ!! जरूर आऊँगी।
‘तो फिर खड़ी क्यों हो? आ क्यों नहीं जाती अन्दर? उसी लड़की ने कहा।
फुदकती हुई मेरी अंदर चली गई। भीतर की साज सज्जा देखकर एक बार तो लगी कि वह कल्पना लोक के किसी स्वर्ग में पहुँच गई है। जब वह आंखें फाड़-फाड़ कर चारों और देख रही थी तो उसकी नजर मेज पर रखी हुई एक रंगीन और खूबसूरत पुस्तक पर पड़ी। आज तक उसने इतनी सुन्दर और ऐसी कोई चीज नहीं देखी थी। वह उस मेज के पास जाकर खड़ी हो गई और उस किताब को छूकर देखने का लोभ संवरण न कर सकी।
‘ऐ...............वहाँ खड़ी हुई क्या कर रही हो’, उन दोनों लड़कियों में से एक ने कहा जो उसकी प्रत्येक गतिविधि को बड़े गौर से देख रही थी, -क्या किताब चुराने का इरादा है?
‘पर चुराकर करोगी भी क्या?’ कुछ क्षण रुककर वे फिर बोली, ‘तुम्हें पढ़ना तो आता नहीं’ और वे खिल-खिलाकर हंस पड़ीं।
इस फटकार और व्यंग की मार से क्षण भर पहले उभरी प्रफुल्लता चट से उड़ गई। घटना छोटी-सी थी पर मेरी के मन में गहरी चोट कर गई। वह घर आकर खूब रोई। इसके बाद नन्हीं मेरी ने असम्भव परिस्थितियों में रहते हुए वह कर दिखाया जो उस समय कल्पना में भी नहीं आ सकता था। उसने स्वयं शिक्षा प्राप्त की और अपने समाज में शिक्षा का ऐसा प्रचार किया कि आज मेरी जीना की गणना अमेरिका की प्रख्यात समाज सेवी महिलाओं में की जाती है।
अखण्ड-ज्योति परिजन रुचिकर साहित्य पढ़ने की दृष्टि से ही इस देव परिवार में सम्मिलित नहीं हुए हैं, उनके पीछे उनके पूर्व संचित संस्कारों का तथा दैवी अपेक्षाओं का एक भारी भरकम दबाव भी है, जिसके कारण वे मात्र साधक न रहकर सूत्र संचालकों के घनिष्ठ एवं अन्यान्य बनते चले आये हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि समय-समय पर जो अनुरोध किये गये उनकी पूर्ति समर्थता असमर्थता का विचार किये बिना भावभरी भूमिका के साथ सदा सर्वदा होती रही है।
युग संधि के पावन पर्व पर इन्हीं घनिष्ठ अन्तरंगों से यह अनुरोध एवं आग्रह किया जा रहा है कि वे पवन पुत्र की तरह प्रज्ञा पुत्र की भूमिका निभायें और नव सृजन के आह्वान में कारगर हाथ बंटायें। भले ही इसमें उन्हें कुछ कठिनाइयाँ, असुविधाओं का सामना ही क्यों न करना पड़े।
पवन पुत्र हनुमान को दो काम सौंपे गये थे। एक सीता को खोजना, लंका दमन का उपाय सोचना और दूसरा राम दल में सम्मिलित होने योग्य वानरों का देव समुदाय गठित एवं प्रशिक्षित करना। इन दोनों ही कार्यों के लिए उन्हें ढूंढ़ खोज का असीम परिश्रम करना पड़ा। अन्तः सफलता तो दोनों ही कार्यों में मिली, क्योंकि वे सदुद्देश्यपूर्ण ‘राम-काज’ थे। इतने पर भी उन्हें उसके लिए पूछताछ के लिए- संपर्क साधने के लिए- असंख्य मनुष्यों और प्राणियों से संपर्क साधना पड़ा। वे दोनों काम ऐसे थे ही नहीं कि घर बैठे निजी पराक्रम के सहारे सम्पन्न हो जाते। दोनों कार्यों के लिए जिनमें से पूछा गया हो उन्होंने अनुकूल उत्तर दिया हो ऐसी बात नहीं थी। कुछेक ही काम के सिद्ध हुए शेष तो ऐसे ही अंगूठा दिखाते, मुँह पिचकाते और उपेक्षा व्यक्त करते रहे। अटूट श्रद्धा और प्रबल पुरुषार्थ संजोये रखकर पवन पुत्र ने लम्बी और कष्टसाध्य खोज का अपना उत्तरदायित्व पूरा कर लिया। साथ ही वह “रामकाज” भी पूरा हो गया जिसमें असुरता का उन्मूलन और देवत्व का सम्वर्धन लक्ष्य था।
ठीक वैसा ही एक पुण्य प्रयोजन युग संधि की पावन बेला में ‘प्रज्ञा परिवार’ के सम्मुख प्रस्तुत हुआ है। उनके सामने भी दो चुनौतियाँ हैं कि संस्कृति की सीता का शालीनता भरी सद्भावना का पता लगायें कि वे किस कोंतर में छिपा दी गई हैं। पता लगाने के उपरान्त ही वहाँ तक पहुँचना और परित्राण का प्रयास करना सम्भव हो सकता है।
युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पवन पुत्र के प्रयास पुरुषार्थ से मिलती-जुलती एक छोटी योजना इन्हीं दिनों बनाई गई है और उसे क्रियान्वित करने वालों को वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों के नाम से वरण करने का निश्चय किया गया है। प्रज्ञा पुत्रों को अगले दिनों युग शिल्पियों जैसे आवश्यक अन्य कार्यों को भी करने की आशा रखी जायेगी, पर प्रथम चरण इतना छोटा रखा गया है कि उसे कर सकना हर स्थिति के भावनाशील के लिए सरल एवं सम्भव हो सके।
हर स्थान में- हर शिक्षित को घर बैठे, बिना मूल्य- नियमित रूप से युग साहित्य पढ़ाते रहने की अभिनव योजना इन्हीं दिनों बनी है और उसे क्रियान्वित करने की अपेक्षा उन सभी प्रज्ञा परिजनों से की गई है जो युग संधि के ऐतिहासिक अवसर की गरिमा एवं आवश्यकता को समझते हुए उसकी पूर्ति में कुछ न कुछ अनुदान प्रस्तुत करने की मनःस्थिति से दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे परिजनों से आग्रह भरा अनुरोध किया गया है कि वे उस सामयिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ न कुछ करने का साहस जुटायें। निजी काम-काज में बिना किसी प्रकार का व्यतिरेक उत्पन्न किये यह कर्म सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है। आवश्यकता इतनी भर है कि समय के आह्वान को-युग धर्म को तनिक गंभीरतापूर्वक समझा जाय और उसकी पूर्ति के लिए सक्रिय योगदान का पुण्य पुरुषार्थ अपनाया जाय।
इन्हीं दिनों युग साहित्य की छोटी-छोटी पुस्तिकाएं इसी निमित्त छपनी आरम्भ हुई हैं। साथ ही प्रज्ञा अभियान प्रतियों का भी प्रादुर्भाव हुआ है। इन दोनों में इस स्तर की प्राण ऊर्जा का समावेश किया गया है कि जो उन्हें पढ़े, वह युग चेतना से अनुप्राणित हुए बिना न रहे। इस आलोक को जन-जन तक पहुँचाने की जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों को- प्रज्ञा पुत्रों को सौंपी जा रही है और अपेक्षा की जा रही है कि समय की आपत्तिकालीन माँग को पूरा करने के लिए वे थोड़ा-सा अनुष्ठान प्रस्तुत करते रहने की उदारता अपनायेंगे।
इसके लिए न्यूनतम एक दो घण्ट का समय देते रहने से भी काम चल सकता है। यों हर प्रज्ञा पुत्र को छः घण्टे का समय देने का भार उठाना चाहिए, पर यदि वह एकाकी न बन पड़े तो प्रभाव क्षेत्र के अन्य स्वजन सहयोगियों को मिलाकर भी इतने समय की पूर्ति कराई जा सकती है। इसी प्रकार इस योजना को क्रियान्वित करने वाले प्रत्येक घटक को दस रुपया मासिक की राशि का भी प्रबन्ध करना होगा। भले ही वह अपने पास से दिया जाय या अन्य साथियों से मिले-जुले रूप में एकत्रित किया जाय। इस समयदान और अंशदान के संयुक्त रूप को प्रज्ञा अनुदान कहा जायेगा और उसके आधार पर उस स्वप्न को साकार किया जायेगा, जिसमें उज्ज्वल भविष्य के आवरण की सुखद सम्भावना संजोई और सुनिश्चित योजना बनाई गई है।
इस योजना के अंतर्गत प्रज्ञा पुत्र को अपने प्रभाव क्षेत्र में इस प्रकार का शिक्षित वर्ग के साथ संपर्क साधना होगा जो विचारशील एवं भावनाशील प्रकृति का भी हो। इन लोगों को युग साहित्य एवं उसके पठन-पाठन से उत्पन्न सत्परिणामों से परिचित कराना होगा। साथ ही ऐसा प्रबन्ध भी करना होगा कि उनके पास बिना बुलाये प्रतिदिन एक नई पुस्तिका देने एवं पिछले दिन वाली को वापिस लाने का सिलसिला नियमित रूप से चलता रहे। इसके अतिरिक्त ‘प्रज्ञा अभियान मासिक पत्रिका’ भी बारी-बारी इन सबको पढ़ने के लिए मिलती रहनी चाहिए। इस प्रकार उन्हें नियमित रूप से उच्चस्तरीय प्राण प्रेरणा से अनुप्राणित युगान्तरीय चेतना के आलोक का लाभ नियमित रूप से बिना कुछ खर्च किये-घर बैठे मिलने लगेगा। कहना न होगा कि इस साहित्य में मनुष्य के वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक जीवन के स्पर्श करने वाली प्रायः सभी गुत्थियों का उच्चस्तरीय समाधान प्रस्तुत किया गया है और वह ऐसा है जिसे व्यावहारिक सरल होने के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की अवांछनियताओं से विरत करके आदर्शवादिता एवं प्रगतिशीलता के साथ जोड़ देने में हर दृष्टि से समर्थ माना जा सकता है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से चिन्तन और चरित्र में जो उपयोगी परिवर्तन हो सकता है उसका प्रत्यक्ष परिचय इस स्वाध्याय के फलस्वरूप कुछ ही समय में दृष्टिगोचर होने लगेगा।
प्रस्तुत साहित्य के प्रभाव से भी बड़ी बात है इस बहाने विचारशील लोगों का पाठक के बहाने नियमित रूप से संपर्क साधना, उनके साथ स्नेह सूत्र जोड़ना और इस आधार पर उत्पन्न हुई घनिष्ठता की शालीनता एवं प्रगतिशीलता की दिशा में प्रेरणा देने हेतु प्रयुक्त करना। साहित्य और सत्संग का यह दुहरा सुयोग परोक्ष प्रभाव डालता है और पाठक को आत्म निर्माण एवं समाज निर्माण के लिए कुछ करने के लिए उमंगें उकसाता है। नियमित रूप से सींचने से पौधों की वृद्धि होती है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को ऐसा ही सुयोग मिले तो वे भी समुन्नत हुए बिना न रहेंगे।
युग साहित्य का प्रकाशन इन्हीं दिनों युग निर्माण योजना मथुरा द्वारा आरम्भ किया गया है। ‘प्रज्ञा अभियान’ मासिक पत्रिका का-पच्चीस पैसे मूल्य की 360 पुस्तिकाओं का वार्षिक प्रकाशन अभी-अभी आरम्भ हुआ है। पत्रिका विगत जनवरी से छप रही है और उसमें व्यक्ति परिवार और समाज निर्माण के- नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्रान्ति के निर्धारणों और प्रयोगों को जीवनचर्या में उतारने का भावभरा मार्ग-दर्शन चल पड़ा है। इस प्रकार अप्रैल, अगस्त और दिसम्बर से 120, 120, 120 पुस्तिकाओं की तीन किश्तें छापकर वर्ष में 360 पुस्तिकाएं प्रस्तुत की जा रही हैं। 360 की संख्या इसलिए रखी गई है कि उन्हें वर्ष के 360 दिनों तक- 360 व्यक्तित्व तक समुदाय को पढ़ाने का उद्देश्य भली प्रकार पूरा होता रहे। एक से लेकर दूसरे को देते रहने पर यह चक्र भली प्रकार चलता रह सकता है।
360 पुस्तिकाओं का मूल्य 90 रुपये और प्रज्ञा अभियान की पाँच प्रतियाँ मंगाने का मूल्य 30 रुपये होता है। कुल मिलकर यह वार्षिक राशि 120 रुपये होती है। मासिक दस रुपया। 360 व्यक्तियों को पढ़ाने वापिस लेने की प्रक्रिया में हर दिन प्रायः चार घण्ट लगने चाहिए और महीने में व्यय राशि दस रुपये की आवश्यकता पड़नी चाहिए। हर दिन दस पैसा और एक घण्टा ज्ञान-यज्ञ के लिए लगते रहने की शर्त प्रज्ञा परिवार के सदस्यों को पूरा करनी पड़ती है। इनमें से तीन को एकत्रित करके भी यह प्रक्रिया चल सकती है। अन्यथा वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों से आशा की गई है कि महीने में एक दिन की आजीविका का अंशदान करेंगे जो न्यूनतम दस रुपया तो होगा ही। इसी प्रकार के अपने समयदान में भी वृद्धि करेंगे और कई अन्य मित्रों का समय अपने साथ जोड़कर छः घण्टे संपर्क के लिए निकालने का उद्देश्य पूरा कर सकेंगे और भावनात्मक नव निर्माण की प्रक्रिया सहज ही चल पड़ेगी और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने का दिन आने तक जारी रहेगी।
समयदान में यह अड़चन दिखती है कि चार घण्टे समय हर दिन कैसे लगाया जाय। इसके कई विकल्प हैं। कई साथियों को मिलाकर मुहल्ले और समय बाँटते हुए इस प्रयोजन को पूरा किया जाय। चार घण्टे का कोई बैठा ठाला इस कार्य के लिए वेतन पर रख लिया जाय और उसका खर्च मिलजुल कर ज्ञान घटों से अथवा अंशदान बढ़ाकर पूरा किया जाय। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके संपर्क में कुछ लोग ऐसे ही नियमित रूप में आते रहते हैं। दफ्तर कारखाने के कर्मचारी- स्कूलों के विद्यार्थी, प्रायः नित्य ही अपने बड़ों के संपर्क में रहते हैं और वे उस कार्य में हाथ बंटा सकते हैं। स्कूली छात्र, स्वयं इस योजना से लाभ उठायें और अपने अभिभावकों भाई, बहिनों के लिए साहित्य पहुँचाने वापिस लाने का कार्य पूरा करते रहें। इसी प्रकार डाकखाना, बैंक, चिकित्सा, खरीद फरोस्त आदि के कारण आये दिन संपर्क में आने वाले लोग इस योजना को पूरा करने में संपर्क माध्यम बन सकते हैं और सूत्र संचालक प्रज्ञापुत्र का हाथ बंटा सकते हैं।
युग साहित्य की प्रकाशन योजना में हर वर्ष 360 पुस्तिकाओं के प्रकाशन की बात इसीलिए रखी गई है कि हर दिन 360 दिनों तक 360 व्यक्तियों में उन्हें पढ़ाया जाता रहे। किन्तु यदि इतने व्यक्तियों से संपर्क सधता नहीं तो जितने से भी सध सके उतने को ही क्रियान्वित किया जाना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का व्रत भंग नहीं है। 100 व्यक्तियों से संपर्क साधना तो एक दो घण्टे बाहर निकलने से ही सम्भव हो सकता है। सभ्य परिवारों में प्रायः चार पाँच व्यक्ति ऐसे अवश्य होते हैं जिनकी आयु और बुद्धि इस सरल साहित्य को पढ़ने समझने योग्य हो। ऐसे-ऐसे 20 परिवारों से संपर्क साधने पर सौ का लक्ष्य पूरा हो जाता है। कई व्यक्ति पैसा दे सकते हैं समय नहीं। वे अर्थ व्यवस्था स्वयं जुटाते हैं और काम दूसरों से कराते रहें तो भी परस्पर सहयोग से वह गाड़ी चलती रह सकती है और वर्तमान एक लाख प्रज्ञा परिजन एक करोड़ की युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित करने का आलोक वितरण का कार्य भली प्रकार करते रह सकते हैं। इतने विस्तृत क्षेत्र में उतने व्यापक प्रकाश वितरण के फलस्वरूप असंख्यों का दृष्टिकोण बदलेगा और उत्कृष्ट चिंतन के साथ-साथ आदर्श कर्तृत्व के भी अभ्यस्त बनेंगे। साथ ही उनमें से अधिकाँश नव-सृजन की प्रक्रिया में हाथ बंटाते दृष्टिगोचर होंगे।
यह ढर्रा चल पढ़े तो दूसरी प्रक्रिया है- इस प्रज्ञा परिवार में से जो निखरते उभरते दिखें उनके जन्मदिन मनाने की। यह ऐसी उत्साहवर्धक प्रक्रिया है जिसे जिनने देखा है वे जानते हैं कि किसी परिवार में प्रवेश पाने उसे युग चेतना के साथ जोड़ने का और अत्यन्त आकर्षण, सरल प्रमादी एवं अत्यन्त सस्ता उपक्रम है। उसके कर्म काण्ड की चर्चा यहाँ नहीं की जा रही। उसकी अलग पुस्तिका है जिन्हें उत्साह होगा वे सरलतापूर्वक उसे सीख लेंगे और उस क्षेत्र में इस प्रक्रिया को अपने संपर्क क्षेत्र में सरलतापूर्वक आरम्भ कर सकेंगे। जिनका जन्म दिन मनता है उन्हें हीरो बनने, सद्भाव आशीर्वाद पाने का अवसर तो मिलता ही है साथ ही एक बुराई छोड़ने और एक अच्छाई ग्रहण करने का हर साल नया संकल्प भी लेना पड़ता है। इस सुधार प्रक्रिया से संबद्ध व्यक्ति को ऊँचा उठने का अवसर मिलता है साथ ही यह उत्साह एक से दूसरे तक पहुँचकर सुधार प्रक्रिया को बढ़ाता है।
प्रज्ञा पुत्रों का जन-जागरण के लिए अपना कार्यक्षेत्र बनाना पड़ता है। उसमें प्रज्ञा पत्रिका एवं युग साहित्य पढ़ाते रहने का- जिनके यहाँ सम्भव एवं उपयुक्त हो उनके यहाँ जन्म दिवसोत्सव मनाकर परिवार निर्माण की प्रक्रिया को नये ढंग एवं नये उत्साह से आगे बढ़ाने का उत्साहवर्धक उत्तरदायित्व सम्भालना पड़ता है। इससे आगे कदम बढ़ सके तो अगला चरण और उठता है कि स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से इस संपर्क सूत्र में बंधे लोगों के घरों में और भी अधिक प्रभावी प्रक्रिया अपनाया जा सकता है। जिनने युग निर्माण योजना के स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से प्रकाश चित्र दिखाने के साथ-साथ उनका विवरण बताने की भावभरी प्रक्रिया को देखा है वे जानते हैं कि यह पद्धति व्यापक फिल्मी प्रभाव की तुलना में किसी प्रकार भी कम प्रभावी नहीं बैठती। सस्तेपन और सरलता के कारण नाक भौं सिकोड़ना हो तो बात दूसरी है अन्यथा यह ‘चरखा फिल्म’ गाँधी जी के खादी प्रसार की तरफ ही विचार क्राँति के क्षत्र में अत्यन्त कारगर मानी जा सकती है। लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का ऐसा अच्छा समन्वय अब तक कदाचित् ही कहीं किया गया है। इस माध्यम से नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति का- व्यक्ति परिवार और समाज के नव-निर्माण का वह प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो सकता है जो युग सृजन कर्ताओं ने लक्ष्य बनाना है।
इसी प्रकार का एक उदाहरण टैप रिकार्डर भी है जिसके माध्यम से शान्तिकुँज की प्राणवान प्रेरणा एवं गीत संवेदनाएं घर-घर जन-जन तक पहुँचाने का प्रयोजन पूरा हो सकता है। जन्म-दिवसोत्सवों पर गुरुदेव, माताजी के-देव कन्याओं के संदेश घर बैठे सुनने का अलभ्य अवसर इस टैप रिकार्डर यन्त्र के माध्यम से हर किसी को मिल सकता है। हर वर्ग के लिए उसकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इन्हीं दिनों अगणित टैप संदेश विनिर्मित किये जा रहे हैं। इस योजना को भी युग साहित्य के समतुल्य ही आंका जा सकता है। स्लाइड प्रोजेक्टर और टैप रिकार्डर के माध्यमों से शिक्षितों की तरह ही अशिक्षित भी लाभ उठा सकते हैं। इन दोनों यन्त्रों के साथ-साथ तीसरा एक और उपकरण आवश्यक हो जाता है और वह है- लाउडस्पीकर। इसके बिना संदेशों को अधिक लोगों तक पहुँचाना सम्भव नहीं होता। इन तीनों यन्त्रों की लागत प्रायः दो हजार हो जाती है। वह पूँजी एक बार ही लगानी पड़ती है। बाद में तो स्लाइड, टैप एवं बैटरी मरम्मत आदि का थोड़ा-सा ही नगण्य-सा चालू खर्च ही करना होता है। जिन उत्साहों एवं प्रतिभाशाली प्रज्ञा पुत्रों ने एक सुनिश्चित क्षेत्र में युग साहित्य पढ़ाने जन्म दिन मनाने आदि का साहस किया है वे कुछ ही दिन उपरान्त यदि चाहे तो इन्हें 360 व्यक्तियों में से कुछ से या थोड़ा-थोड़ा सभी से लेकर इस दो हजार वाली पूँजी को भी जुटा सकते हैं। यों यह समूची योजना ही पूँजीपरक है। चालू खर्च नहीं कह सकते। युग साहित्य, स्लाइड प्रोजेक्टर, टैप रिकार्डर, लाउडस्पीकर आदि सभी खरीदें ऐसी हैं जिन्हें संचित राशि ही कहा जा सकता है और जब चाहे तब बेचा जा सकता है।
प्रज्ञापुत्र योजना के अंतर्गत आरम्भिक और क्रमिक कदम क्या उठने हैं इसका वह अध्याय ऊपर बता दिया गया जिसे इसी वर्ष क्रियान्वित कर डालने की आवश्यकता है। इतना बन पड़े तो आशा की जा सकती है कि 360 के संपर्क क्षेत्र में 180 अवश्य ही ऐसे निकलेंगे जो आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण के प्रयोजनों में भावभरी भूमिका निभाते हुए दृष्टिगोचर होने लगें।
अगले दिनों प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत अत्यधिक महत्वपूर्ण कदम उठाने हैं। उदाहरण के लिए प्रौढ़ शिक्षा स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सम्वर्धन, वृक्षारोपण, कुरीति उन्मूलन जैसे सुधारात्मक एवं रचनात्मक कार्य ऐसे हैं जिन्हें मात्र सरकार के कन्धों पर छोड़कर निश्चिन्त नहीं हुआ जा सकता। इसके लिए असंख्यों सृजन शिल्पियों का श्रमदान, मनोयोग एवं अंशदान अपेक्षित होगा। इसे जुटाने में प्रज्ञापुत्रों को सौंपी गई वह योजना नींव भरने की तरह ठोस एवं कारगर सिद्ध हो सकती है।
उपरोक्त सुविस्तृत एवं परिपूर्ण प्रज्ञापुत्र योजना को देखकर किसी को असमंजस में पड़ने की भारी, कठिन जटिल अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है। वह तीन खंडों में विभक्त है। उसमें से जो जितने खण्ड पूरे कर सकें करें और शेष न बन पड़े तो उन्हें फिर कभी के लिए छोड़ दें। प्रथम खण्ड ऐसा है जिसमें दो घण्टे समय और दस रुपया मासिक का प्रबन्ध कर लेने संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण का काम भली प्रकार चलता रह सकता है। यह इतना सरल है कि इसे घर बैठे रहने वाले वयोवृद्ध एवं थोड़ी फुरसत पाने वाली महिलाएं तक बड़ी आसानी से करती रह सकती हैं। अध्यापक-अध्यापिकाओं के लिए तो यह सब इतना सरल है कि उन्हें दो घण्टा समय भी अलग से निकालने की आवश्यकता नहीं वे अपने अध्यापन कार्य के साथ-साथ मात्र थोड़ी दिलचस्पी लेने भर से चल सकता है। यह प्रथम चरण सभी प्रज्ञापुत्रों के लिए अनिवार्य स्तर का माना गया है।
शेष दो ऐसे हैं जो सुविधानुसार फिर कभी करने के लिए छोड़े भी जा सकते हैं। स्लाइड प्रोजेक्टर और लाउडस्पीकर लेने की लागत प्रायः एक हजार रुपये आती है। यह दूसरा खण्ड है। तीसरा खण्ड टैप रिकार्डर का है, उसमें भी प्रायः एक हजार की ही लागत आती है। प्रथम खण्ड में दो घण्टे नित्य स्वयं लगाने और साथियों का सहयोग लेने से काम चल सकता है। अगले दो खण्ड क्रियान्वित करने हों उनमें भी एक-एक दो-दो घण्टे समय लगाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसकी पूर्ति करना अपने लिए कठिन हो तो उसमें दूसरों से सहायता ली जा सकती है। वस्तुतः दूसरों को उत्तेजित करने और काम करने की स्थिति तक घसीट ले चलने की प्रक्रिया ही इस योजना का सार तत्व है। थोड़े से प्रज्ञापुत्र इतना बड़ा काम कैसे कर सकेंगे, जो तुरन्त करने के लिए सामने पड़ा है। उसके लिए असंख्यों से संपर्क साधना उन्हें व्यक्तिगत परामर्श अनुरोध से आगे बढ़ाना और अन्ततः ऐसे लोग ढूंढ़ निकालना जो अनेकानेक सृजन प्रयोजनों में हाथ बंटा सकें। यह है प्रज्ञा पुत्र योजना का आरम्भ, मध्य और अन्त। इसमें अपना रोल तो होना ही चाहिए, पर ध्यान यह भी रखा जाना है कि सुविस्तृत प्रयोजन के लिए असंख्यों का समर्थन एवं सहयोग उपलब्ध करना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर प्रज्ञापुत्रों के कदम आरम्भ में छोटे उठेंगे और क्रमशः अधिकाधिक भारी भरकम बनते चले जायेंगे।
उपरोक्त योजना प्रचारपकर है, इस मंथन को नवनीत निकालने के समतुल्य कहा जा सकता है। असली काम तो तब होगा जब प्रौढ़ शिक्षा से लेकर चरित्र निर्माण, समाज-सुधार एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से अनेकानेक काम हाथ में लिये जायेंगे और उन्हें योजनाबद्ध रूप से पूरा कर दिखाया जायेगा।
अखण्ड-ज्योति, परिजनों में से प्रत्येक को शान्तिकुँज की आत्मा और भावभरा अनुरोध इन पंक्तियों में लपेट कर भेजती है। वे इस युग संधि के पुनीत प्रभात पर्व पर मूक दर्शक बनकर न रहें। प्रज्ञा-पुत्र योजना में सम्मिलित हों और उस सुयोग को हाथ से न जाने दें जो प्रायः युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर ही हजारों लाखों वर्ष बाद कभी-कभी ही आते हैं। जिनने उन्हें पहचाना और साहस जुटाकर अग्रगामी कदम उठाया वे पवन पुत्र की तरह स्वयं कृतकृत्य हुए और असंख्यों के लिए प्रेरणा पुँज बनकर रहे। जिनका इस संदर्भ में उत्साह उभरे- अन्तःकरण उमंगे वे शान्ति कुँज हरिद्वार से संपर्क साधें और आगामी कदमों का परिस्थिति के अनुरूप निर्धारण कर लें।
प्रज्ञा-पुत्रों के प्रज्ञा संस्कार शांतिकुंज में आरंभ किये जा रहे हैं। उन्हें धर्मदंड- एक विशेष मैडल, प्रमाण-पत्र, पीत यज्ञोपवीत दिया जायेगा और विशेष अध्यात्म उपचारों से सामर्थ्य संपन्न किया जा रहा है। इस वरिष्ठता और घनिष्ठता से लाभान्वित होने वाले प्रज्ञा-पुत्र अपनी दूरदर्शिता को चिरकाल तक स्वयं सराहते रहेंगे ऐसा विश्वास है।
(माया वर्मा)
तुम बनो गुम्बद महल के। नींव का पत्थर बनूँ मैं॥
चाहते हैं सब मधुर संगीत से जीवन सजाना। दूसरों का श्रम लगा जिसमें-वही फल-फूल खाना॥
सिद्धियाँ, तुमको मुबारक। साधना का स्वर बनूँ मैं। नींव का पत्थर बनूँ मैं॥
है चलन जग का-हँसी में साथ मिलता है सभी का। कौन सुनता है यहाँ पर मूक आहें-दर्द जी का॥
हर खुशी तुमको मुबारक। नयन का निर्झर बनूँ मैं। नींव का पत्थर बनूँ मैं॥
देखते रहते यहाँ सब, होंठ सूखे-आँख गीली। नम न हो पाती कभी भी कुण्ठ की चटकन हठीली॥
तुम बनो ठण्डक बरफ की। जल भरी गागर बनूँ मैं। नींव का पत्थर बनूँ मैं॥
*समाप्त*