दुनिया में जितने धर्म, सम्प्रदाय, देवता और भगवानों के प्रकार हैं उन्हें कुछ दिन मौन हो जाना चाहिए और एक नई उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है, मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिरशान्ति, विश्व-मैत्री और ‘‘सर्वे भवंतु सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।
हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
-स्वामी विवेकानन्द
महर्षि पिप्पलाद शैशव काल में ही अपनी माता सुवर्मा से अपने पिता महर्षि दधीचि के दे त्याग की गाथा सुना करते थे। वे सुनते, देवराज इन्द्र और देवताओं की प्रार्थना स्वीकार करके महर्षि दधीचि ने देह त्याग किया। उनकी अस्थियाँ लेकर विश्वकर्मा ने वज्र बनाया और उस वज्र से असुरों का संहार किया, उसी वज्र के प्रयोग से अजेय प्राय वृत्तासुर को इन्द्र मार पाने में समर्थ हुए तथा उन्हें स्वर्ग पर अपना अधिकार पुनः प्राप्त करने में सफलता मिली।
यह वृत्तान्त सुन-सुनकर पिप्पलाद का मन देवताओं के प्रति घृणा से भर गया। वे सोचते, देवता कितने स्वार्थी हैं? अपने स्वार्थ के लिए ही उन्होंने मेरे पिता से अस्थियाँ तक माँग लीं। देवगण कितने निर्लज्ज हैं? अपने स्वार्थ के लिए उन्हें मेरे पिता से उनकी अस्थियाँ माँगने में भी लज्जा नहीं आई। स्वार्थी व्यक्ति निर्लज्ज हो ही जाता है।
दीर्घकाल तक इस प्रकार का चिन्तन चलते रहने के कारण उनके अन्तस् में देवताओं के प्रति घृणा घनीभूत हो गई और घृणा के साथ देवगणों के प्रति आक्रोश, रोष भी उत्पन्न हुआ। उन्होंने संकल्प किया कि तप के द्वारा भगवान आशुतोष को प्रसन्न कर मैं उनसे देवताओं को ही नष्ट करने का वरदान मागूँगा।
इस संकल्प के साथ उन्होंने पवित्र नदी गौमती के तट पर बैठ कर तपस्या आरम्भ कर दी। शीत, उष्ण, क्षुधा, तृषा और अनेक प्रकार के तितिक्षा व्रतों का पालन करने से पिप्पलाद का शरीर तृणवत् कृश हो गया। उनकी तपश्चर्या से प्रसन्न हो कर भगवान आशुतोष प्रकट हुए और बोले-वत्स! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। वर माँगो।
‘प्रलयंकर’ प्रभू से पिप्पलाद ने कहा, ‘यदि आप मुझ पर प्रसन्न ही हैं तो अपना रुद्र स्वरूप धारण कर समस्त देवगणों को नष्ट कर डालिए।’
भगवान आशुतोष ने कहा, ‘वत्स! मेरा रुद्र स्वरूप केवल देवताओं को ही भस्म नहीं करेगा। उससे तो सारा जगत नष्ट हो जायेगा। तुम पुनः विचार करो।’
पिप्पलाद ने अपने हृदय में विरूपाक्ष त्रिशूल कपालमाली और ‘अहि’ भूषण धारण किये भगवान शंकर के रुद्र स्वरूप का दर्शन किया। उस ज्वालामय, अति तेज, प्रचण्ड अग्नि के समान दाहकारक विनाश के अधिष्ठाता स्वरूप का अन्तःकरण में प्रादुर्भाव होते ही पिप्पलाद ने अनुभव किया कि व्यापक विनाश का आह्वान करते ही उनका स्वयं का रोम-रोम जला जा रहा है। उन्हें लगा कि वे कुछ ही क्षणों में चेतना हीन हो जाएंगे।
आर्तस्वर में पिप्पलाद ने भगवान शंकर को पुकारा और आँखें खोल दीं। अन्तःकरण में दिखाई देने वाली प्रचण्ड मूर्ति अदृश्य हो गई थी भगवान चन्द्र मंगलेश्वर अपने सौम्य स्वरूप में सम्मुख खड़े थे। पिप्पलाद ने कहा, ‘यह क्या भगवन्? यहाँ तो मैं स्वयं ही दग्ध हुआ जा रहा हूँ।’
‘तुमने ठीक अनुभव किया वत्स! सारा संसार जब नष्ट होगा तो तुम कैसे बच सकोगे?’ भगवान आशुतोष ने कहा, ‘विनाश का आरम्भ किसी एक ही स्थल से आरम्भ होता है किन्तु वहीं तक सीमित नहीं रहता। वहाँ से प्रारम्भ होकर वह व्यापक बनता जाता है और यह भी नियम है कि वह वहीं से प्रारम्भ होता है जहाँ से उसका आह्वान किया जाता है। तुम्हारे हाथ के देवता इन्द्र हैं, नेत्र के सूर्य, नासिका के अश्विनीकुमार और मन के चन्द्रमा, इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय तथा अंग के अधि-देवता हैं। उन अधिदेवताओं को नष्ट करने पर शरीर कैसे रहेगा? बेटा! इसे समझो कि किसी का भी अमंगल चाहने पर स्वयं पहले अपना अमंगल होता है।
इसके बाद भगवान शंकर ने उन्हें दधीचि के त्याग की गौरव गाथा सुनाई। जिसे सुनकर पिप्पलाद के जीवन की दिशा धारा बदल गई और वे विश्व मंगल के लिए तप करने लगे।
आज के वैज्ञानिकों की यह मान्यता है कि विश्व की मूल सत्ता अज्ञेय है और यह दुनिया ऐसी अज्ञेय अव्याख्येय, अविश्लेष्य ‘अपरीक्ष्य तरंगों का संघात है, जिनके बारे में हमारी जानकारी सीमित है। वैज्ञानिकों के अनुसार यथार्थ जगत क्या है? वह रंगरहित, ध्वनिरहित, अव्याख्येय “कास्मास” है। प्रतीकों का एक विशाल कंकाल मनुष्य खड़ा करता है, और उनके ही प्रक्षेपण को यथार्थ जगत नाम दे देता है।
‘गाइड टू फिलासफी’ के लेखक दार्शनिक जोड़ के अनुसार- ‘‘मैटर’ दिक् तथा काल में, स्पेस एण्ड टाइम में विस्तृत एक रस्सी की ऐंठन की तरह है। वह एक इलेक्ट्रॉनी कुकुरमुत्ता है। अनन्त सम्भावनाओं की एक तरंगावली है, जो कुछ नहीं जैसी है। पदार्थ वस्तुतः दिक्−काल में घट रही घटनाओं की एक व्यवस्था है, जिसकी विशेषताएँ मात्र गणितीय प्रतीकों में संकेतित की जा सकती हैं।”
इसीलिए तो महान गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता सर जेम्स जीन्स ने कहा है- ‘‘यह जगत महान यंत्र नहीं, महान ‘विचार’ ही है, ऐसा अब लगता है। सापेक्षतावाद, निरंतरता, न्यूनतम अवकाश, वक्र, आकाश यानी कर्ब्ड स्पेस, संभावना-तरंगें, अनिश्चितता आदि वैज्ञानिक अवधारणाएं वस्तुतः मन की सृष्टि अधिक है। मन और पदार्थ का पुराना द्वंद्व हो चला है।’’
भौतिकी के समस्त प्रेक्षण एवं अन्वेषण दिक्-काल की टाइम एण्ड स्पेस की ही सीमारेखा के भीतर संभव है और ये टाइम और ‘स्पेस’ क्या है? भौतिकविद् वाट्सन के शब्दों में ‘‘टाइम एण्ड स्पेस एण्ड मेनी अदर क्वान्टिटीज सच एज नंबर, वेलॉसिटी, पोजीशन, टेंपरेचर एट्सेट्रा आरनॉट थिंग्ज’’ अर्थात् ‘काल, दिक् और दूसरे परिणाम जैसे संख्या, वेग, स्थिति, तापमान आदि वस्तुएं।डडडडड डडडडड डड डड डड।
कार्वेथ रीड ने अपनी किताब ‘लॉजिक डिडक्टिव एण्ड इंडक्टिव’ में कहा है- ‘‘वी हेव कांसेप्ट्स रिप्रजेन्टिंग नाथिंग, व्हिच हेव परहेप्स बीन जनरेटेड बाय द मिअर फोर्स आफ ग्रामेटिकल निगेशन।’’
अर्थात् हमारे पास ऐसी अवधारणाएं जो वस्तुतः किसी भी वस्तु सत्ता की प्रतीक-प्रतिनिधि नहीं है, जो संभवत गणितीय निषेधों की शक्ति से निष्पन्न हुई हैं।
डा. डब्लू कार ने कहा है- ‘टाइम’ और ‘स्पेस’ न तो ‘कंटेनर’ हैं, न ही ‘कंटेन्ट’ वे तो मात्र ‘वेरिएन्ट’ हैं। इसी बात को मिन्कोवस्की ने अधिक स्पष्टता से कहा है- दिक् तथा काल की स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वे मात्र छायाएं हैं।
आज ‘सापेक्षता’ का सिद्धांत विज्ञान में सर्वाधिक प्रतिष्ठित है। उसके अनुसार सब परिदृश्यमान एवं अनुभूयमान जागतिक सत्य मात्र आपेक्षिक सत्य है। आकार, गति आदि के अवस्था- भेद से बाह्य वस्तु का ज्ञान प्रत्येक दर्शक के निकट भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है और हो सकता है। तत्व जो सबके लिए सत्य होना चाहिए। इसका निरूपण कैसे हो?
स्पष्ट है कि इस स्थिति में पहुंचकर जब मूर्धन्य विज्ञान-मनीषियों की ही वाणी लड़खड़ाने लगती है और वे गोल-गोल पहेलियां जैसी बुझाने लगते हैं, तब साधारण अध्येता तो इन सबका कोई अर्थ ही नहीं समझ सकता।
भौतिक-विज्ञान की सत्यशोधन की क्षमता सीमित है। एक स्तर तक सूक्ष्म-सूक्ष्मतर प्रेरणा करते चले जाने के बाद वह यह बताने लगता है कि इससे आगे की सूक्ष्मता की पकड़ वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा सम्भव नहीं। समस्त विज्ञान-अन्वेषण वस्तुतः ज्योति-साधना कहा जा सकता है। विचारों की ज्योति की सीमा आपे नहीं है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड पेज छूटा हुआ है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
क्षिकता सिद्धान्त एवं अनुभूति तक है। विचार भी उपकरण ही हैं। द्रव्य-उपकरणों की ज्योति प्रकाशन-सीमा सूक्ष्मतम तरंगों या रश्मियों तक है। दोनों ही प्रकार की सत्यानुभूतियाँ मानवी-चेतना में सन्निहित ज्योति द्वारा अनुभव-गम्य हैं, जिन्हें 1. गणितीय-ज्योति या विज्ञान-ज्योति एवं 2. विचार-ज्योति कहा जाता सकता है। किन्तु परम सत्य तो ज्योतियों की भी ज्योति है। उसे किस ज्योति द्वारा जाना जाय? समस्त ज्ञान विज्ञाता कौने होते हैं। किंतु स्वयं विज्ञाता, को किसके द्वारा जाना जाय? अणु और महत्, सूक्ष्म और वृहत् दोनों ही दिशाओं में मानवीय ज्ञान सीमित है, जबकि परम सत्य की दोनों में से किसी ओर सीमा नहीं। श्वेताश्वतर उपनिषद् (3।20) के अनुसार वह ‘अणोरणीयान्महतो महीयान्’ है-
“न तत्र सूर्यो भाति, न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽममग्निः।’’
(श्वेता. उप. 6।14)
अर्थात्- वहाँ ने सूर्य प्रकाश की पहुँच है न चन्द्र और तारोँ की न विद्युत की, तब अग्नि या मानवीय सामर्थ्य की उत्पादित ज्योति रश्मि उस तक कैसे पहुँचेगी?
वृहदारण्यक उपनिषद् में जनक याज्ञवल्क्य से पूछते हैं- हे याज्ञवल्क्य, आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि और वाक् के भी परे मनुष्य किस ज्योति से ज्योतित रहता है?
याज्ञवल्क्य ने कहा है-
“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते, कर्मकुरुतो बिपल्येतीति।’’ (वृह. उ. 4।3।6)
अर्थात्- आत्मा ही वह ज्योति है, उसी के द्वारा व्यक्ति स्थित होता, गतिशील रहता, क्रियाशील रहता एवं वापस लौट जाता है।
यह आत्मा कौन है?
“योग्यं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः रुत्रः से समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति, ध्यायतीब, लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्राति मृत्यो रूपाणि।’’ (वृहदा. 4।3।7)
अर्थात्- यह जो प्राणों में बुद्धि वृत्तियों के भीत रहने वाला विज्ञानमय ज्योतिः स्वरूप पुरुष है, वह समान रूप से लोक-परलोक में संचार में समर्थ है। वही मानो चिन्तन एवं चेष्टा करता है। वही लोक का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी वह अतिक्रमण करता है।
मुण्डकोपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि वह आत्मा ज्योतियों की भी ज्योति है-
“तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥” (मुण्डकोप. 2।2।9)
अर्थात्- वह शुभ ज्योतियों की भी ज्योति ही आत्मवेत्ताओं द्वारा जानने योग्य है।
वह ज्योति ही शेष समस्त बोध की, प्रकाश की, विज्ञाता है। उसे किस विज्ञान से जानें-
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात्।” (वृह. उप. 2।4।14)
अर्थात्- भला उस विज्ञाता को किसके द्वारा जाना जाय?
भौतिकी की साधनभूत ज्योति उस ज्योतियों की ज्योति चेतना को जानने में असमर्थ है। कोई भी अन्य ज्योति उसका दर्शन नहीं करा सकती। तपः शुद्ध चेतना में वह ज्योति स्वतः ही प्रकट होती है। यों, वह विद्यमान तो सदैव है। किन्तु जब तक बुद्धि तत्व की क्रियाओं को ही आत्मानुभूति समझा जाता है, तब तक वह अप्रकट ही रहता है। बुद्धितत्त्व को उस मूल चेतना से ही जोड़ देने पर, उसके समझ समर्पण कर देने पर, उससे पूर्ण तादात्म्य स्थापित करने पर ही वह चेतना बुद्धि को अपने आलोक से प्रकाशित कर देती है, स्वयं को प्रकट कर देती है। यह स्थिति सहसा नहीं आती। उस हेतु निरन्तर साधना करनी होती है। उसी साधना का नाम योग-साधना है। उचित उपाय करने से ही परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है।
भारतीय दर्शन के प्रणेता ऋषियों ने मानव जीवन में जिज्ञासा के अन्यतम महत्त्व को जाना पहचाना तथा प्रत्येक श्रेयार्थी को जिज्ञासु का सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने की प्रेरणा दी-
“नान्योवरतुल्य एतस्य कश्चित्।” (कठ.- 1।22)
- ‘‘सत्य की प्राप्ति में जिज्ञासा से श्रेष्ठ अन्य कोई सहायक नहीं।”
मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मैं भविष्य में भी रहूँगा या नहीं? प्राणी दुःखी क्यों है? सच्चा सुख क्या है? इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला ज्ञान विश्वसनीय है या नहीं? कर्मों का फल मिलता है या नहीं? इस जन्म से पूर्व मेरा अस्तित्व था या नहीं इत्यादि असंख्य प्रश्नों की जिज्ञासा न केवल संसार के दुःखों से पीड़ित प्राणी को ही झकझोरती है, अपितु कई बार सब प्रकार से सुखी मनुष्यों के मन में भी ये प्रश्न उथल-पुथल मचा देते हैं। यह जिज्ञासा दिव्य अग्नि के समान है जिसमें तपने पर मनुष्य का हृदय सत्य के अवतरण का पुण्य तीर्थ बन जाता है।
जिस समय मनुष्य के मन में इन विचारों का चक्र चलता है उस समय उसे समस्त साँसारिक सुख विषवत् प्रतीत होने लगते हैं। राजमहलों के वैभव-विलास में सुकुमारता से पले राजकुमार सिद्धार्थ, महाराजा भर्तृहरि और महावीर जैसे असंख्यों की जीवन-गाथाएं इतिहास के पृष्ठों में बिखरी पड़ी हैं। विचारों का यह झंझावात ही सच्ची जिज्ञासा है जिससे दर्शन का जन्म होता है।
जिज्ञासु के लिए दर्शन का अर्थ मात्र बौद्धिक कला बाजियाँ खाने से नहीं है। वह कमरे के भीतर बंद होकर कुर्सी पर बैठा हुआ अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं समझता। आंग्ल भाषा में दर्शन के लिए प्रयुक्त होने वाला फिलासफी शब्द यूनानी भाषा के ‘फिलो’ और ‘सोफिया’ के मिलने से बना है जिसका अर्थ होता है- ज्ञान का प्रेम। यहाँ ज्ञान का तात्पर्य बुद्धिकृत मीमाँसा से है। तत्संबंधी रुचि ही ‘फिलासफी’ है। इसके विपरीत भारतीय शब्द दर्शन का तात्पर्य ‘देखने’ से है जिसका अर्थ है- तत्व का साक्षात्कार करना। ज्ञान के जिस विवेचन में सत्य या तत्व को स्वयं न देखा जाय उसे ‘दर्शन’ कहना युक्ति संगत नहीं प्रतीत होता है। अतः वही तत्व सत्य है, जिसके संबंध में हम यह कह सकें कि हमने उसका साक्षात्कार किया है, यह हमारे अनुभव का विषय है अर्थात् यह हमारा ‘दर्शन’ है।
बिना सच्ची जिज्ञासा के तत्त्वज्ञान की उधेड़-बुन बुद्धि का कौतूहल मात्र बनकर रह जाती है। आर्ष साहित्य में जिज्ञासा वृत्ति का सर्वोत्तम उदाहरण नचिकेता है। नचिकेता शब्द यथार्थ जिज्ञासु का सूचक है और यह जिज्ञासा वृत्ति मनुष्य में प्रायः मृत्यु (यम) के सन्निकट होने अर्थात् मृत्यु का भय उपस्थित होने पर जाग उठती है।
मृत्यु के नाटक को नजदीक से देखते हैं तब ‘कस्त्वम् कोऽहम्’ वे प्रश्न हमें सच्चे और आवश्यक जान पड़ते हैं। नचिकेता की जिज्ञासा का उदय भी यम के सान्निध्य में ही होता है। नचिकेता (न+चिकेतस्) शब्द का अर्थ ही यह है कि जिनके अंदर जानने की इच्छा हो, परन्तु जो जानता न हो।
भगवान् बुद्ध अपने उपदेशों में बहुत जोर देकर कहा करते थे कि- ‘‘मैं जिस मार्ग का पथिक हूँ, मैंने उसे स्वयं देख लिया है।” जब तक किसी उपदेष्टा या ज्ञानी की ऐसी विश्वस्त स्थिति ने हो तब तक वह मानव जीवन के लिए असंदिग्ध या महत्त्वपूर्ण तत्त्व का व्याख्यान नहीं कर सकता।
“यास्काचार्य ने लिखा-
ऋषिर्दर्शनात्- (निरुक्त-2।11)
अर्थात् ‘ऋषि’ शब्द का अर्थ है द्रष्टा या देखने वाला। शुष्क ऊहापोह करने वाला तार्किक भारतीय अर्थ में ‘दार्शनिक’ की पदवी का अधिकारी नहीं बनता। दार्शनिक बनने के लिए ‘दर्शन’ होना चाहिए दूसरे शब्दों में दार्शनिक में ऋषित्व का होना आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने आपको ज्ञान का अधिकारी कहता है, उससे पूर्व उसमें यह कहने की सामर्थ्य होना जरूरी है कि ‘‘मैंने ऐसा देखा है।’’ यजुर्वेद की परिभाषा के अनुसार सच्चा ‘एवं मया श्रुत’ (ऐसा मैंने सुना) नहीं बल्कि आत्म-विश्वास के साथ कहता हूँ-
“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं मसतः परस्तात्।”
अर्थात्- मैं उस परमसत्ता को जानता हूँ जो आदित्य के सदृश भास्वर और तुम से परे है।
दर्शन का अर्थ है- ‘आत्मानुभव।’ दूसरों के दर्शन के आधार पर सच्ची तृप्ति संभव नहीं है। तार्किक प्रश्नात्मक-जिज्ञासा का अर्थ श्रद्धा का अभाव नहीं है। इसके विपरीत जिज्ञासा का अभाव अश्रद्धा है। जिज्ञास्य विषय को अपने अध्यवसाय की क्षमता से अनुभव का विषय बना लेना श्रद्धा का लक्षण है।
दार्शनिक काण्ट ने कहा है- “नीतिमय जीवन का प्रारम्भ होने के लिए विचार क्रम में परिवर्तन तथा आचार का ग्रहण आवश्यक है।” जिज्ञासा उत्पन्न हो जाने पर यदि जीवन-क्रम में परिवर्तन नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति वास्तविकता के साथ अपना सीधा संबंध जोड़ना नहीं चाहता है।
संदेह या प्रश्नों को परास्त करने की शक्ति ही जिज्ञासु की श्रद्धा है। सत्य को जानने के लिए मात्र प्रश्नों या तर्कों का उदय ही पर्याप्त नहीं है। गीता के अनुसार इसके लिए योगयुक्त एकनिष्ठ अभ्यास की भी आवश्यकता है- ‘‘अभ्यास योग युक्तेन चेतसा नान्यगामिना।”
‘ज्ञान’ का सामान्य अर्थ जानकारी है। भौतिक पदार्थों एवं परिस्थितियों की एवं प्रयोग विधियों की जानकारी में ही लोक-व्यवहार में ज्ञान कहा जाता है किन्तु आत्म-विज्ञान में उसे आत्मसत्ता की स्थिति एवं परिणिति के संबंध में आवश्यक अनुभव कराने वाली अनुभूति को ‘ज्ञान’ कहा गया है। इसी की उपलब्धि मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। अपने संबंध में भ्रान्तियां बनी रहने पर लोक-व्यवहार एवं पदार्थों का उपार्जन उपयोग सभी गलत हो जाता है और सुख संवर्धन के लिए किया गया पुरुषार्थ उलटा संकट भरे जाल-जंजालों में फंसाता जाता है। शांति एवं प्रगति का सही मार्ग उसी को मिल सकता है जो आत्म चेतना और लोक-व्यवस्था के मध्यवर्ती अंतर को, जोड़ने वाली सूत्र श्रृंखला को भली प्रकार समझ लेता है। उसी जानकारी को शास्त्र में ‘आत्म-ज्ञान’ कहा गया है। यह आत्म-ज्ञान ही वह अमृत है जिसे पाने के उपरान्त और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
‘छान्दोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है प्राचीन काल में दो पुरुष थे एक का नाम विरोचन था। दूसरे का इन्द्र। दोनों के मन में यह प्रश्न उठा कि मैं कौन हूँ? शिष्य भाव से जिज्ञासु की भाँति दोनों हाथ में समिधाएं लिए प्रजापति के पास पहुंचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने प्रश्न किया आचार्य श्रेष्ठ हमें बताइये कि हम कौन हैं?’
प्रजापति ने उत्तर देने के पूर्व उनकी योग्यता की परीक्षा लेना उचित समझा। उन्होंने कहा थाली में पानी भर लो और उसमें अपना मुख देखो अपने आपका साक्षात्कार कर लोगे उत्तम वस्त्र धारण करके दोनों ने जल में अपनी आकृति देखी। विरोचन अपना सौंदर्य देखकर प्रसन्न हो उठा और कहने लगा। मैं कितना सुंदर हूँ। वह अपने सभी साथियों से कहने लगा, हमने ‘मैं’ का पता लगा लिया है। अपने शरीर को ही ‘मैं’ समझ कर वह उसे ही पुष्ट करने एवं संवारने में लग गया।
किन्तु इन्द्र दूरदर्शी थे। उसने सोचा यदि वस्त्र, आभूषण एवं शरीर ही मेरा स्वरूप है तो इसका अर्थ यह है कि उनके मैले होने, जरा-जीर्ण पड़ने पर मेरी भी वैसी ही स्थिति हो जायेगी। निश्चित ही यह मेरा स्वरूप नहीं हो सकता। वह कहने लगा, ‘नाहमाम भोग्य पश्यामि’ अर्थात् मैं तो उसमें कुछ भी कल्याण नहीं देखता।
इन्द्र की आशंका उचित थी। जिन आकर्षक वस्त्रों द्वारा हम शरीर को सजाते-संवारते हैं वह मैला होता है और फटता भी है। किन्तु ‘मैं’ का भाव तो सदा एक जैसा बना रहता है। संबोधन किये जाने वाले स्थूल अवयव का स्वरूप बदल जाता है।
बचपन में भी मैं का संबोधन किया जाता था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था में भी। शरीर तो परिवर्तित होता जाता था किन्तु ‘मैं’ सदा एक जैसा बना रहता है। स्पष्ट है नित्य परिवर्तनशील यह शरीर ‘मैं’ नहीं हो सकता है। ‘मैं’ का भाव शाश्वत, अपरिवर्तनशील होना इस बात का प्रमाण है कि उसे कोई शाश्वत अविनाशी एवं परिवर्तन रहित सत्ता होनी चाहिए।
‘मैं’ की सत्ता का शरीर से अलग होना अन्य प्रमाणों से भी स्पष्ट हो जाता है। उंगली कटने, बीमार पड़ जाने पर सामान्यतया यह कहा जाता है कि मेरी उंगली कट गई या मेरा शरीर रोगग्रस्त हो गया। कोई भी यह नहीं कहता कि मैं कट गया। यह इस बात का परिचायक है कि मैं की सत्ता शरीर नहीं है।
उपनिषद् के इस संवाद संदेह का निष्कर्ष यह है कि आत्मसत्ता को शरीर से पृथक और स्वतन्त्र मानकर चला जाय। अपना हित साधन आत्मकल्याण एवं आत्मोत्कर्ष की समस्याओं एवं उपलब्धियों के साथ जोड़ा जाय। इस स्तर का दृष्टिकोण न अपनाया जाय जैसा कि पेट और प्रजनन तक अपनी आकांक्षा तथा चेष्टा को सीमाबद्ध रखने वाले नर पशु अपनाते देखे जाते हैं। वासना और तृष्णा- लाभ और मोह के भव-बंधन उन्हीं को बाँधते हैं जो अपने को शरीर मानकर चलते हैं और उसी के साथ जुड़े हुए परिकर के साथ बाल-क्रीड़ा करते रहते हैं। इस स्तर से ऊंचे उठ कर जीवन सम्पदा का महत्त्व एवं सदुपयोग को समझते हुए परम लक्ष्य की दिशा में चल पड़ने की प्रेरणा आत्मज्ञान पर अवलम्बित है। इसी प्रेरणा को ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं ब्रह्मविद्या गायत्री कहते हैं।
व्यक्ति के तीन चित्र हैं- 1. लोग उसे किस रूप में समझते हैं 2. दूसरे वह किस रूप में जीता है 3. तीसरे वह किस रूप में अपने आपको प्रस्तुत करता है। तीनों चित्रों में से पहला मान्यता का, दूसरा यथार्थ का और तीसरा अयथार्थ का है।
राजा भोज की राज्य सभा जुड़ी हुई थी। बड़े-बड़े विद्वान अपने-अपने आसनों पर विराजमान थे। उसी समय एक भद्र-सा पुरुष आभूषणों से विभूषित राज सभा में उपस्थित हुआ। राजा भोज सिंहासन से उठे। अभिवादन किया और सम्मान दे ऊंचे आसन पर बिठाया। उसी समय एक दूसरा व्यक्ति फटे, पुराने, कपड़े पहिने हुए सभी में आया। राजा ने उसकी और कोई ध्यान नहीं दिया और एक किनारे में बैठ गया।
विद्वानों के वक्तव्य हुए, चर्चा परिचर्चा चलने लगी। फटे कपड़े पहने हुआ व्यक्ति प्रभावशाली वक्ता एवं विद्वान था। सभा विसर्जन होने पर राजा स्वयं उसके साथ दरवाजे तक विदा करने के लिए गया और उसे विविध प्रकार के वस्त्राभूषणों से सम्मानित किया। जाते समय जो व्यक्ति वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर आया था उसकी ओर राजा ने ध्यान तक नहीं दिया।
इतने में एक विदूषक घूँघट लगाये रूपसी जैसे आवरण पहन कर दरबार में दाखिल हुआ और फरियाद सुनने की प्रार्थना करने लगा। आरम्भ में सभी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ, पर पीछे जब वास्तविकता का पता चला तो सभी दरबारी उस छद्म पर ठहाका भर कर हंस पड़े और बहुरूपिये को कुछ दे दिला कर भगा दिया।
उपस्थित विद्वानों ने तीन प्रकार के लोगों के प्रति तीन तरह का व्यवहार करने और आरम्भ में प्रदर्शित किये रुख को बदल देने का कारण पूछा तो उनने कहा- प्रथम व्यवहार में प्रारम्भिक परिचय, दूसरे में व्यथार्थ निरूपण और तीसरे में भ्रम निवारण के तथ्यों ने काम किया और प्रारम्भिक मान्यता को बदल दिया।
शिक्षा, सम्पदा, बुद्धिमत्ता, समर्थता और वैज्ञानिक उपलब्धियों की दृष्टि से सुसम्पन्न समझे जाने वाले अपने युग का प्रवाह क्रम यही रहा तो यह प्रगतिशीलता अगले दिनों आदिम युग के पिछड़ेपन से भी महंगी पड़ेगी।
प्रकृति के आँगन में रहने और पलने वाले सभी प्राणियों की स्वतन्त्र सत्ता दिखाई देती और प्रतीत होती है। यहाँ तक कि एक परिवार में रहने वाले मनुष्य भी अपनी-अपनी जिन्दगी जीते हैं, आपस में थोड़े बहुत काम चलाऊ घनिष्ठ संबंध रखते हैं और शेष जीवन स्वतन्त्र रूप से व्यतीत करते हैं परन्तु ऐसा है नहीं। जड़-चेतन सभी विराट् चेतना के अभिन्न अंग हैं और एक नियति चक्र में बंधे एक-दूसरे पर इस निर्भर हैं कि उनमें से प्रत्येक ने केवल एक दूसरे से प्रभावित होता है वरन् दूसरों को प्रभावित भी करता है। यों इस प्रभाव को वातावरण का प्रभाव भी कहा जाता है। युद्ध के दिनों में जिन देशों के बीच युद्ध होता है, वहाँ के नागरिकों में ऐसा जोश उत्पन्न होता है कि शान्तिकाल में वह कहीं नहीं दिखाई देता। उन दिनों देशवासी अपनी व्यक्तिगत या सामुदायिक समस्याओं को भूल कर राष्ट्रीय एकता के ऐसे भावना प्रवाह में बहने लगते हैं कि वैसी एकता अन्य अवसरों पर कदाचित ही देखने में आती है। दंगों, हिंसात्मक घटनाओं और अन्य विपदाओं के समय आतंक की व्यापक भावना फैल जाती है। कहने को इसे सामूहिक मनोवैज्ञानिक भी कहा जाता सकता है, परन्तु पिछले दिनों हुए वैज्ञानिक प्रयोगों और अध्ययनों से यह निष्कर्ष सामने आया है कि न केवल मनुष्य ही इस तरह सामूहिक स्थितियों से प्रभावित होता बल्कि जीव जन्तु भी प्रभावित होते हैं और मात्र बाह्य घटनाएं ही प्राणियों को प्रभावित नहीं करती वरन् प्रकृति जगत में, ब्रह्मांड के किसी भी घटक में होने वाले परिवर्तनों से प्राणिमात्र प्रभावित होते हैं।
जिन्हें हम अज्ञ या अल्पज्ञ समझते हैं, वे छोटे-छोटे जीव-जन्तु तक साधारण से प्रकृति परिवर्तनों से प्रभावित होते हैं और उन्हें पहचानते हैं। इन जन्तुओं को पहचानने की क्षमता या संवेदनशीलता किस प्रकार काम करती है। यह जानने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जीव वेत्ता डा. जैनट हार्कर ने तिलचट्टों पर कुछ प्रयोग किये। तिलचट्टे रात के अंधेरे में ही अपनी दिनचर्या आरम्भ करते हैं और सूरज अस्त हो जाने के बाद ही अपने घरों से निकलते हैं। सूर्य अस्त हो जाने और अंधेरा घिर आने का संकेत देने वाला केन्द्र इनके सिर में होता है। इस तथ्य को जाँचने के लिए डा. हार्कर ने एक तिलचट्टे का सिर काट दिया और धड़ से अलग कर दिया। इस स्थिति में तिलचट्टे को निश्चित ही मर जाना चाहिए था, परन्तु आश्चर्य की बात थी कि वह जीवित था। उस सिरकटे तिलचट्टे की पीठ पर एक पैर कटा तिलचट्टा बाँधा गया, जिसका सिर सही सलामत था और उन दोनों के शरीर में छेद कर दोनों की काया को एक नली द्वारा जोड़ दिया गया, जिससे ऊपर वाले तिलचट्टे का रक्त नीचे वाले, सिरकटे तिलचट्टे के शरीर में जाने लगा।
ऐसा इसलिए किया गया था ताकि पता लगाया जा सके कि क्या सूरज डूबने और अंधेरा होने का संबंध परिचय केवल मस्तिष्कीय केन्द्र को ही मिलता है अथवा शरीर के अन्य अंग अवयव भी इस तरह की सूचना देते या परिवर्तनों को पहचानते हैं। एक आश्चर्य तो यही था कि तिलचट्टा जीवित था, दूसरा आश्चर्य यह था कि सिर कटे हुए तिलचट्टे को भी सूरज डूबने पर पता चल गया कि सूरज अस्त हो चुका है और वह अपनी दैनिक दिनचर्या की तरह घोषणा करने के लिए कस-मसाने लगा।
ऐसा कैसे संभव हुआ? यह जानने के लिए किए गए अनुसंधानों से पता चला कि तिलचट्टे के सिर में एक विशेष प्रकार का हारमोन होता है जो उसे इस बात की सूचना देता है कि सूरज अस्त हो गया है। आगे के शोध प्रयोग जारी रखते हुए श्रीमती हार्कर ने तिलचट्टे को दो समूहों में बाँट दिया। एक समूह के तिलचट्टे को तो सामान्य परिस्थितियों में रखा गया, किन्तु दूसरे समूह के तिलचट्टों को दिन भर कृत्रिम अंधकार पैदा कर तथा रात्रि में कृत्रिम रोशनी के बीच रखा गया। देखने में आया कि उससे तिलचट्टों के क्रिया-कलापों में यह अंतर आया है कि वे कृत्रिम रोशनी को दिन समझ कर रात में भी दिन की तरह रहते थे तथा दिन में पैदा किये गए कृत्रिम अंधकार में रात की तरह हरकतें करने लगते। इन तिलचट्टों के सिर की वे गुच्छिकाएं निकालकर सामान्य तिलचट्टों के सिर में फिट कर दी गईं। उनके सिर की सामान्य गुच्छिका संकेत देती कि दिन है तो भ्रम में रखे गए तिलचट्टों की गुच्छिका रात का संकेत देती। इस व्यतिक्रम को सामान्य तिलचट्टे अधिक न सह पाए और थोड़े ही दिनों में मर गए।
इन प्रयोगों के आधार पर डा. जैनर ने प्रतिपादित किया है कि प्रकृति के किसी भी कार्य में हस्तक्षेप करना संकटों को आमन्त्रण देना है। प्रकृति ने सभी प्राणियों को नियति चक्र पहचानने और उनके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करने की सुविधा दे रखी है। उनमें कोई हस्तक्षेप करता है या व्यवधान आता है तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से अनिष्ट कर होता है।
प्रकृति परिवर्तनों का बोध मस्तिष्क वाले अर्थात् तन्त्रिका संस्थान युत शरीर रचना प्राणियों को ही होता है और तन्त्रिका विहीनों को नहीं होता हो सो ऐसी बात भी नहीं है। पृथ्वी पर विद्यमान सबसे लघुकाय प्राणियों एवं कोशीय जीवों तक को इसका पता चल जाता है। ‘यूग्लीना’ नामक एक कोशीय जीव जिसे अमीबा का तरह न वनस्पति वर्ग में रखा जा सकता है और न ही जन्तु वर्ग पर प्रयोग करने में। यही तथ्य सामने आया है यूग्लीना की एक कोशीय काया में भरा द्रव्य सूरज की धूप से ऊर्जाकर्षित कर अपना काम चलाता है। ऊर्जा को खींचते समय उसकी एक अति सूक्ष्म चाबुक जैसी पूँछ जिसे कशामिका कहा जाता है, इधर-उधर घूमती है। दिन में वह सूरज से ऊर्जा प्राप्त करता है और रात्रि में अपने आसपास के अन्य एक कोशीय जीवों को अपना आहार बनाता है।
यूग्लीना की कशामिका प्रकाश के प्रति अति संवेदी होती है। जैसे ही प्रकाश होता है यह एक सेकेंड में बारह बार फड़कती है और सूर्यास्त होते ही निष्क्रिय हो जाती है। सूर्य प्रकाश हो पहचानने की अद्भुत क्षमता इस जीव में होती है। आँखों में न दिखाई देने वाले इस नन्हें से जीव को जब कृत्रिम रोशनी में रखा गया तो उसमें कोई हलचल नहीं हुई और जब दिन के समय अंधेरे में रखा गया तो कशामिका उसी प्रकार घूमने फड़कने लगी जैसे कि वह सूर्य प्रकाश के समय फड़कती थी।
एक बटा दस इंच के लगभग आकार वाली वोल्वोक्स वनस्पति समुद्र में होती है। इसमें भी यूग्लीना की तरह कशामिकाएं या पूँछ होती है लेकिन यह शैवाल अपनी पूछों से दूसरा ही काम लेता है, वह है समुद्र में तैरने का। इन कशामिकाओं को दाएं-बाएं फेंककर वह पानी में तैरता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. डी. पालमर इनका अध्ययन कर रहे थे तो अचानक उनके दिमाग में यह बात आई कि क्या इन पर पृथ्वी के चुम्बकीय बलों का कोई प्रभाव होता है? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए उन्होंने कुछ वोल्वाक्सों को परीक्षण के लिए चुना। उनमें से एक तिहाई को तो सामान्य स्थिति में रखा गया और एक तिहाई को उत्तर दक्षिण दिशा में झूलती हुई चुम्बकीय छड़ के नीचे रखा गया। शेष एक-तिहाई को ऐसी छड़ के सामने रखा गया जो पूर्व पश्चिम दिशा में झूल रही थी। इस छड़ का चुम्बकीय बल पृथ्वी के चुम्बकीय बल से तीस गुना अधिक था। जिन वोल्वाक्सों को पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बराबर वाली छड़ के नीचे रखा गया था वे तो सामान्य क्रम में उसी दिशा में मुड़े परन्तु जिन्हें प्रतिकूल दिशा में रखी गई चुम्बकीय छड़ के नीचे रखा गया था उनमें आधे भी उस छड़ की दिशा में नहीं गये थे। इस तरह के अनेक प्रयोगों द्वारा पालमर ने यह निष्कर्ष निकाला कि ये छोटे-छोटे जीव-जन्तु न केवल पृथ्वी की चुम्बकीय क्षमता से प्रभावित होते हैं बल्कि उन्हें पहचानते भी हैं।
प्रकृति नियमों का पालन सूक्ष्म जीवों से लेकर बड़े जन्तु और वनस्पति तक बड़ी कड़ाई के साथ पालन करते हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि जीव-जन्तु और वृक्ष वनस्पति तक प्रकृति के सामान्य से सामान्य नियमों से प्रभावित होते हैं। डा. फ्रेंक ब्राउन ने पिछले बत्तीस वर्षों से इन दिशा में गहन शोध अध्ययन किया है और पाया है कि प्रकृति परिवार का प्रत्येक सदस्य एक नियति चक्र में बंधा अपने क्रिया-कलाप सम्पन्न करता है।
सूरजमुखी का फूल तो सूरज की ओर ताकना, निहारता ही रहता है। कीचड़ में पैदा होने और पलने वाला एक घोंघा ‘नासारिअम ओब्सोलिश’ भी सूर्य के साथ-साथ चलता है। डा. ब्राउन ने इंग्लैण्ड के समुद्री तट पर कोई 34000 घोंघों का अध्ययन निरीक्षण किया तथा पाया कि ये घोंघे सुबह से शाम तक पूर्व से पश्चिम की ओर ही अपनी गति दिशा रखते हैं। उन्हें ऐसी स्थिति में भी रखा गया जहाँ कि उन्हें सूर्य के उगने और दिन दोपहर में आकाश के बीचों बीच आने तथा बाद में पश्चिम दिशा में ढलने का पता ही नहीं चले। इस प्रकार की व्यवस्था द्वारा उत्पन्न किये गए अवरोध से वे अप्रभावित ही रहे। रात में जब कभी उन्हें चलना होता है तो वे चन्द्रमा से प्रभावित होकर उसी दिशा में बढ़ते हैं। अमावस्या के दिन तो वे एक तरह से छुट्टी ही मनाते हैं।
ग्रुनिअन नामक एक समुद्री मछली तो पूरी तरह चन्द्रमा के साथ अपनी जीवनचर्या व्यतीत करती है। पूर्णिमा के दिन जब समुद्र में ज्वार आता है या पानी की लहरें अपेक्षाकृत अधिक दूरी तक जमीन पर पहुँचती हैं तो ये मछलियाँ उन लहरों के साथ अपने अण्डे लेकर तट पर आतीं तथा बालू पर छोड़ जाती हैं। अटलाँटिक महासागर में पाई जाने वाली सीपियाँ केवल पूर्णमासी के दि नहीं अपना मुँह खोलती हैं। कहीं ऐसा समुद्र में उठने वाले ज्वार के प्रभाव से तो नहीं होता? यह सोच कर डा. ब्राउन ने कुछ सीपियाँ प्रयोगशाला में टब के भीतर पानी भर कर उनमें रखीं। वहाँ भी उन्होंने पूर्णमासी के दिन ही अपना मुँह खोला जबकि टब में ज्वार आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था।
सूर्य और चन्द्रमा के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर डा. एडसन एण्ड्रूज ने कहा है कि मनुष्य भले ही अपने आपको स्वतन्त्र समझे परन्तु उनका शरीर जिन पंचतत्त्वों से बना है वे पंचतत्त्व ब्रह्मांडीय हलचलों में प्रभावित होते हैं तथा उनका असर मनुष्य के जीवन पर भी पड़ता है। पृथ्वी और मनुष्य शरीर की संरचना में साम्य दर्शाते हुए उन्होंने लिखा है कि हमारी नसों में बहने वाला रक्त समुद्री जल से अद्भुत साम्य रखता है और जब पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार उठता है तो हमारी शिराओं में भी ज्वार उठने लगता है। उन्होंने डाक्टरों को सलाह भी दी है कि वे जहाँ तक संभव हो पूर्णिमा के दिन कोई आपरेशन न किया करें क्योंकि उस दिन अधिक रक्त बहने की संभावना रहती है। स्वयं अपने संबंध में उन्होंने लिखा है कि भले ही मुझे कोई अंधविश्वासी क्यों न समझे? पर मैं केवल अमावस्या की रात या दिन को ही आपरेशन के लिए चुनता हूं। यदि कोई आपरेशन कुछ समय के लिए भी स्थगित नहीं किया जा सकता तो ही उसे बिना यह विचार किये करना चाहिए अन्यथा अमावस का दिन आपरेशन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है।
मनुष्य शरीर और समुद्र आदि तो दूर की बात रही अब तो एक प्याली में भरे हुए पानी पर भी चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल को मापा जाने लगा है। चन्द्रमा और वर्षा के पारस्परिक संबंधों को लेकर भी वैज्ञानिक विचित्र निष्कर्षों पर पहुँचे हैं। उनके अनुसार पूर्णिमा के समय तक अर्थात् शुक्लपक्ष में बादलों पर ब्रह्मांडीय धूल की अधिक वर्षा होनी है और उन दिनों कृष्ण पक्ष की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
इस प्रकार अनेक प्रतिपादनों और प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया जाने लगा है कि समूचा विश्वब्रह्मांड एक व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। सबके लिए एक से नियम हैं, एक सा नियति चक्र है और सभी अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार उनमें प्रभावित होते हैं। यह अंतर्संबंध अनायास ही इस अध्यात्म मान्यता की पुष्टि कर देता है कि समूचा विश्व-ब्रह्मांड एक ही विराट् चेतना का अंग है और भिन्न-भिन्न दिखाई देने वाले घटक केवल उस अग्नि के अलग-अलग स्फुल्लिंग मात्र हैं।
अनगढ़ मनुष्य को सुगढ़ एवं नर पशु को नर-नारायण बना देने की क्षमता अगर किसी में है तो वह मन में है। उत्थान और पतन इसी पर निर्भर करता है। वह शक्तियों का पुंज है। महामानवों के गढ़ने एवं नर-पिशाचों को पैदा करने की सामर्थ्य मन में है। उसी ने ईसा, बुद्ध, कृष्ण को भगवान बनाया। अधोगामी होकर रावण, कंस, सिकन्दर, नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी पैदा किए। इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाएं मन के ही उत्थान पतन की कहानियाँ हैं।
विचारणा उसकी अभिव्यक्ति है। यों तो उथले अस्त-व्यस्त विचार मन में उठते रहते और कुछ विशेष महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते। सूर्य की बिखरी किरणों के समान पीने-खाने के सामान्य प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। पर वे भी निग्रहित दिशा विशेष में नियोजित होकर असाधारण सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं। आतिशी शीशे पर केन्द्रित सूर्य किरणों की ध्वंसकारी सामर्थ्य के समान चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं। बिखराव कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं करने देता और उससे मन की शक्तियाँ ही नष्ट होती रहती हैं। एकाग्रता के अभाव में प्रचण्ड शक्ति का स्त्रोत होते हुए भी उसकी क्षमताओं का लाभ नहीं मिल पाता। वैज्ञानिक, कवि, कलाकार, साहित्यकार, विचारक, मनीषी मन की एकाग्रता की ही परिणति है। मन जब ऊर्ध्वगामी बनता है तो मनुष्य महात्मा, सन्त, देवात्मा बनता है। निम्नगामी होने पर नर से नरपशु और नर-पिशाच बन जाता है।
संकल्प विकल्प पर ही उत्थान पतन का क्रम निर्भर करता है। संकल्प की असीम सामर्थ्य को जानते हुए ही शास्त्रों में अनेकों स्थान पर उसकी स्तुति की गई है। शिवत्व से युक्त संकल्प की कामना की गई है। ऋषियों ने प्रार्थना की है ‘मन का संकल्प शिव हो, रौद्र न हो विधायक ही विनाशक न हो। कल्याण का सृष्टा हो-विनाश का रचयिता नहीं। रचनात्मक श्रेष्ठ कार्यों की सत्प्रेरणाएं शिवत्व से भरे-पूरे संकल्प ही जागरूक रहते।
शास्त्रों में मन की दो प्रकार की शक्तियों का उल्लेख मिलता है। नयन और नियमन। एक मंत्र में वर्णन है।
“सुषारधिर खानिव यन्मनुष्यान, नेनीयतेऽभीर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मेमनः, शिव संकल्प मस्तु॥’’
मंत्र में सारथी की उपमा मन से तथा इन्द्रियों की घोड़े से दी गई है। ‘अश्व’ तथा ‘बागी’ शब्द घोड़े के लिए ही प्रयुक्त होता है। किन्तु इन दोनों में भी अंतर है। अश्व उस घोड़े को कहते हैं जो धीरे-धीरे दौड़ता है। ‘बागी’ तीव्र गति से चलने वाले घोड़े को कहते हैं। यदि उसे रोका न जाय तो दुर्घटना कर बैठेगा। सुयोग्य सारथी प्रथम प्रकार के घोड़े को चाबुक मार कर सही मार्ग पर आगे बढ़ने को बाध्य करता है। किन्तु बागी को सदा लगाम खींचकर गलत मार्ग पर जाने से रोकता है। एक को ‘नयन’ करता ‘दूसरे पर नियमन’। मन में भी दोनों ही प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं। शिथिलता को सक्रियता में बदलना तथा उद्धत आचरण से बचाये रखने से ही मन समर्थ बनता है।
शरीर एवं इन्द्रियाँ तो आयु के साथ क्षीण हो जाते हैं। पर मन आयु के बंधनों से परे होता तथा सदा युवा बना रहता है। वह कभी बूढ़ा नहीं होता। उसकी गति से तीव्र चलने वाली किसी भी वस्तु का अब तक पता नहीं लग सका है। उसकी शक्ति जिस भी दिशा में बढ़ जाय क्रान्ति ला सकती है। ‘गीता’ कहती है ‘योमच्छ्रद्धः स एवं सः’ मनुष्य श्रद्धा का पुंज है। संकल्प का खजाना है। संकल्पों में शिवत्व का समावेश है। इसकी प्रार्थना बार-बार की गई है।
इच्छा शक्ति के अनेकानेक चमत्कार देखने को मिलते हैं। यह मानसिक शुद्धि, पवित्रता एवं एकाग्रता पर आधारित है। जिसका मन जितना पवित्र और शुद्ध होगा उसके संकल्प उतने ही बलवान एवं प्रभावशाली होंगे। संत महात्माओं के शाप, वरदान की चमत्कारी घटनाएं उनकी मन की पवित्रता एवं एकाग्रता के ही परिणाम हैं। इस तथ्य से सारे विश्व के सभी धर्म शास्त्रों ने मन को पवित्र बनाने पर जोर दिया है।
बिखराव से कमजोरी आती है। मन की अधिकाँश शक्ति लोभ, मोह के भौतिक आकर्षणों में यों ही नष्ट होती रहती है और क्रमशः क्षीण पड़ती जाती है। मन के बिखराव से चंचलता को रोकने के लिए दृढ अवलम्बन की आवश्यकता पड़ती है। उसकी चंचलता तो विषयों के साथ जुड़कर और भी बढ़ जाती है। एकाग्रता का लक्ष्य पूरा हो सकना तो दूर की बात है।
ऋषियों ने इस तथ्य को समझा। मन को नियन्त्रित, दृढ एवं एकाग्र बनाने पर जोर दिया। साधनात्मक उपचारों का प्रतिपादन किया। उपासना को सर्वश्रेष्ठ अवलम्बन माना। जो एकाग्रता का एकाकी लक्ष्य ही नहीं सही दिशा में नियोजन का उद्देश्य भी पूरा करता है। मन उस परम सत्ता से जुड़कर ही टिका रह सकता तथा दृढ बन सकता है। एकाग्रता प्राप्ति के अन्यान्य माध्यम भी हो सकते हैं। सतत् अभ्यास से संकल्प शक्ति भी विकसित हो सकती है। पर उसका नियोजन श्रेष्ठ उद्देश्यों के सृजन के लिए होगा यह आवश्यक नहीं। संकल्प के, मनोबल के धनी नेपोलियन, हिटलर भी थे। पर वे इस शक्ति का सदुपयोग न कर सके। ध्वंस पर उतारू हुए और इतिहास में अपने कुकृत्यों का काला पन्ना जोड़ कर गये। इसलिए मनोबल की वृद्धि ही नहीं सही दिशा में उसका नियोजन भी उतना ही आवश्यक है।
सृजनात्मक प्रयत्न तो आदर्शवादी सिद्धान्तों के अवलम्बन से ही बन पड़ते हैं। इसी कारण उपनिषद् के ऋषि मन की एकाग्रता मनोबल की अभिवृद्धि ही नहीं उसके शिवतत्त्व से युक्त होने की भी कामना-प्रार्थना करते हैं। वे इस तथ्य से अवगत थे कि एकाग्रता का लक्ष्य पूरा हो गया तो भी यदि सृजन में उसका सदुपयोग न हुआ- ध्वंस पर उतारू हुआ तो संकट खड़ा हो जायेगा।
महत्त्वपूर्ण पक्ष विचारों का भी है। जो मन में ही उठते रहते हैं और अपने अनुरूप प्रभाव डालते हैं। उन पर नियन्त्रण नियोजन भी उतना ही आवश्यक है जितना कि एकाग्रता के लिए प्रयत्न। स्वतन्त्र अनियन्त्रित छोड़ देने पर तरह-तरह की विकृतियाँ खड़े करते और मन को कमजोर बनाते हैं। प्रसिद्ध संत ‘इमर्सन’ ने कहा है- ‘विचारों को स्वतन्त्रता दीजिए- वे कामनाओं का रूप धारण कर लेंगे, कामनाओं को स्वतन्त्र मार्ग दीजिए- कार्य में परिणित हो जायेंगे। यदि वे निकृष्ट हुए तो पठन के कारण होंगे।’ मन में उठने वाले अनेकानेक विचारों में से अनुपयोगी की काट-छांट एवं बहिष्कार की व्यवस्था भी बनानी चाहिए। अन्यथा वे घास-पात के समान उगेंगे और मन की उर्वरा शक्ति का अवशोषण करके फलेंगे, फलेंगे। तथा मनुष्य के अधःपतन के कारण बनेंगे। उनकी निरन्तर काट-छाँट करते रहना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सद्विचारणा का बीजारोपण एवं उन्हें परिपक्व बनाने के लिए प्रयास।
‘मन असीम सामर्थ्यों का स्त्रोत है। संकल्प शक्ति विचार शक्ति की अनेकानेक सम्पदाएं उसके अंदर छिपी पड़ी हैं। इन्हें जगाने सही दिशा में नियोजित करने का प्रयास किया जा सके तो मनुष्य असीम शक्तियों का स्वामी बन सकता है। विचारक, संत, ऋषि, देवात्मा हो सकता है। भौतिक समृद्धियों भी इसी पर अवलम्बित हैं।‘
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मुत्युमपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकारं तदासां पाप्मनो विन्यद्धात् तस्मान्न जनमिया- न्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति। वृ. उप. 1।3।10
प्राण देवता ने इंद्रियों के पापों को दिगंत तक पहुँचाकर विनष्ट कर दिया। क्योंकि वह पाप ही इंद्रियों के मरण का कारण था। इन कल्मषों को इस निश्चय के साथ भगाया कि पुनः न लौट सकें।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर अपने एक मित्र के साथ बंगाल के कालना गाँव जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक मजदूर सा दिखाई देने वाला व्यक्ति पड़ा हुआ दिखा। उसकी भारी गठरी एक ओर लटकी पड़ी थी तथा उसके कपड़ों से भी बदबू आ रही थी। रास्ते में अन्य लोग भी चल रहे थे, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हुए मुँह फेर-फेरकर निकलते जा रहे थे। कोई-कोई व्यक्ति उसकी रुग्ण काया की वीभत्सता देखकर घृणा से नाक भौं सिकोड़ता और थूक भी देता था।
मजदूर की दशा यह थी कि वह लगभग बेहोश की सी स्थिति में था। भूख के कारण उसमें उठने की भी सामर्थ्य नहीं थी। विद्यासागर जी ने जब उसे इस दशा में पड़ा देखा तो वे उसके पास गये, उसे सहारा देकर उठाया तथा खाने-पीने की भी व्यवस्था की। खा-पीकर जब मजदूर कुछ चैतन्य हुआ तो उन्होंने मजदूर को अपनी पीठ पर उठाया। उसकी गठरी विद्यासागर जी के मित्र ने उठाई और उसे लेकर कालना गाँव पहुँचे जहाँ मजदूर की चिकित्सा कराई और उसके चलने-फिरने योग्य होने तक उसकी देखभाल करते रहे।
सहृदयता मनुष्यत्व का प्रधान लक्षण है और महानता की पहली निशानी। ऐसे व्यक्ति सब में एक ही परमात्मा का निवास होने का सिद्धान्त तर्कों और तथ्यों के आधार पर प्रतिपादित करते हों अथवा नहीं, परन्तु अपने आचरण और व्यवहार द्वारा अवश्य सिद्ध करते हैं कि उन्होंने मनुष्य मात्र में बसने वाले परमात्मा को न केवल पहचाना है बल्कि उसे अपनाया और इस सिद्धान्त को अपने जीवन क्रम में उतारा भी था।
उदार और सहृदयता के कारण महापुरुषों के रूप में पहचाने जाने वाले व्यक्तियों का जब भी प्रसंग आता है तो महाकवि निराला का नाम उनमें चमक कर उभर उठता है। पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी, निराला यद्यपि हिन्दी साहित्य के इतिहास प्रवर्तक कवि हैं, परन्तु उन्हें उनकी सहृदयता, उदारता और करुणा के कारण देवता के रूप में उल्लेखित किया जाता है। उन्होंने अपने पास की सारी संपदा और समूचे साधन दीन-दुखियों के लिए बांट दिये थे तथा स्वयं अकिंचन होकर रहते थे। यही नहीं जब भी कभी उनके पास कहीं और से और भी कुछ मिलता तो वे उसे भी अपने पास रखने की अपेक्षा दूसरे जरूरतमंद व्यक्तियों को बांट देते थे।
एक बार की बात है। जेठ की तपती दुपहरी में वे अपने घर में विश्राम कर रहे थे। किसी काम से बाहर निकले तो देखा एक वृद्ध क्षीणकाय और दुबला-पतला आदमी जिसके शरीर में अस्थियां मात्र ही थीं, सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर उठाये चला जा रहा था। उसका शरीर तो जवाब दे ही रहा था ऊपर से सूरज की गर्म किरणें और नीचे से जलती हुई धरती, वातावरण ही ऐसा था कि उसमें चलना तो क्या खड़े रह पाना भी कठिन था और तिस पर फटे, पुराने कपड़े तथा नंगे पैर। निराला की दृष्टि उस वृद्ध पर पड़ी तो वे अपना काम भूल गये और तुरंत वृद्ध के पास जा पहुंचे। उन्होंने वृद्ध को कुछ कहा तथा उसके सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर उतार कर उसे अपने घर के भीतर ले आए। उनके लिए कुछ दिनों पहले ही कुछ मित्रों ने जूते और वस्त्र आदि खरीदे थे। निराला ने सारा सामान लाकर उस वृद्ध व्यक्ति के सामने रख दिए और आग्रहपूर्वक कहा, ‘इन्हें पहन लो।’
वह वृद्ध व्यक्ति यह सब देखकर हकपका गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे, क्या न करे? न कोई जान-पहचान, न कोई परिचय। अपरिचित ही यह सब क्यों किया जा रहा है? वह बड़ी मुश्किल से साहब जुटा कर बोला, ‘बिना कुछ जान-पहचान के यह सब ........।’
वह वृद्ध अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाया था कि निराला बीच में ही उसकी बात काटते हुए बोले, ‘अच्छी तरह जानता हूं बाबा तुम्हें! तुम मेरे करोड़ों भाइयों में से एक हो।’ इतना कहकर वे स्वयं अपने हाथ से उस वृद्ध को जूते पहनाने लगे।
सहृदय और उदार व्यक्तियों का अंतःकरण कष्ट पीड़ितों तथा अभावग्रस्तों को देखकर वैसे ही पसीज उठता है जैसे आग में जलने वाली लकड़ी या ईंधन की व्यथा से मोम। उनके लिए न कोई अपना होता है न पराया। यहाँ तक कि वे बैर-भाव रखने वाले व्यक्तियों को भी कष्ट कठिनाई में पड़ा देखकर उनकी सहायता के लिए तत्परतापूर्वक आगे आते हैं।
अंग्रेजी साहित्य के उपन्यास जगत में जो स्थान हेनरी जेम्स को प्राप्त है, वह शायद ही अन्य किसी उपन्यासकार को मिल सका हो। उनकी कृतियाँ पाकर आज भी बड़े चाव से पढ़ते हैं और उसका प्रभाव ग्रहण करते हैं। अपने जीवन काल में ही उन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली थी और उस समय उनसे ईर्ष्या-द्वेष रखने वालों की कमी नहीं थी। यहाँ तक उनका पड़ोसी तक उन्हें कानी आँख से देखता था। बात-बात पर वह उनसे झगड़ उठता, कुछ न बोलने पर इधर-उधर की बातें लेकर उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगता। एक दिन उस पड़ोसी की पत्नी बुरी तरह बीमार पड़ी। पीड़ा के मारे वह बुरी तरह छटपटा और चिल्ला रही थी। पड़ोसी को सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे और क्या न करे? तभी उसने देखा कि हेनरी जेम्स उसके मकान में प्रवेश कर रहे थे।
उस व्यक्ति ने जेम्स को देखा तो विस्मित रह गया। वह बोला, ‘जेम्स तुम! और यहाँ?’
हाँ! क्यों मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था। देखो मैंने तुम्हारी पत्नी के लिए डॉक्टर को बुलवाया है। वह आता ही होगा।
परन्तु मुझे आशा नहीं थी कि तुम इस वक्त में मेरे काम आओगे। क्योंकि मैं तुम्हें हमेशा दुश्मन की तरह देखता रहा और इसी कारण सोचता था, तुमसे किसी प्रकार की मदद के लिए कहना व्यर्थ है।
सहृदयता अथवा करुणा अहित चिन्तन करने वालों को भी अपना बना देती है। सौमनस्यता उत्पन्न करने के लिए किये गये हजारों प्रयास वह परिणाम उत्पन्न नहीं कर पाते जो करुणा उत्पन्न करती है। सब में अपने ही समान आत्मा देखने और प्राणिमात्र का दुःख-दर्द समझने वाले व्यक्ति अपने लाभ के लिए भी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचा सकते। घटना सन् 1940 की है। उन दिनों महात्मा बाँधी के आश्रम सेवा ग्राम में परचुरे शास्त्री नामक एक विद्वान भी रहते थे जो कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। बापू स्वयं उनका उपचार किया करते थे। वे उनकी मालिश किया करते, घावों को धोते और दवाई लगाते।
एक दिन जब बापू शास्त्री जी की मालिश कर रहे थे आश्रम के ही एक कार्यकर्ता पंडित सुंदरलाल भी वहीं उपस्थित थे। उन्होंने गाँधी जी से कहा, बापू! कोढ़ की तो एक अचूक औषधि है। कोई जीवित काला नाग पकड़ कर मंगवाये और कोरी मिट्टी की हांडी में बंद कर उसे उपलों की आग पर इतना तपाये कि नाग जल कर भस्म हो जाए। उस भस्म को यदि शहद के साथ रोगी को खिलाया जाए तो कुष्ठ कुछ ही दिनों में दूर हो सकता है।
महात्मा गाँधी इस उपाय के संबंध में कुछ कहें इसके पहले ही शास्त्री जी ने कहा, ‘बेचारे निर्दोष साँप ने क्या बिगाड़ा है? जो उसको जला कर अपना रोग ठीक किया जाए। इससे तो मेरा स्वयं का मरना ही ठीक है क्योंकि हो सकता है पूर्व जन्म के किसी पाप के कारण मुझे यह रोग लगा हो।’
हिंसा या हानि पहुँचाना ही तो सहृदय व्यक्तियों के लिए असंभव होता है वे स्वयं घाटे में रह कर भी किसी को हानि सहने से बचाने के लिए सचेष्ट रहते हैं। हेनरी थोरो अमेरिका के सुप्रसिद्ध विचारक और अद्वितीय चिन्तक माने जाते हैं। विश्व विख्यात इस विचारक के ही एक निबंध से महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आँदोलन की प्रेरणा ली थी।
इस तरह के ढेरों प्रसंग हैं जो सिद्ध करते हैं कि दुनिया में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं उन्होंने सहृदयता, त्याग, उदारता और करुणा केवल पर ही लोगों के हृदय में स्थान बनाया है।
किसी को कष्ट पहुँचाने से, किसी को उत्पीड़ित करने से विद्वेष के भाव उत्पन्न होते हैं। उत्पीड़ित के मन में प्रतिशोध की भावना जन्मती है और वह अपने से ताकतवर प्रतिपक्षी को अवसर पाकर नीचे पटकने, किये गये उत्पीड़न का बदला लेने के लिए प्रयत्न करता है। जीते जी तो विद्वेष का खतरा बना ही रहता है कि जिसका उत्पीड़न किया गया है वह कब उलट कर वार कर दे? किन्तु मरने के बाद भी इस प्रतिक्रिया की संभावना बनी रहती है। ऐसे कई उदाहरण देखे गए हैं जिनमें किन्हीं व्यक्तियों ने किन्हीं लोगों की हत्या कर दी और निश्चित हो गए कि अब उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। परन्तु कुछ ही समय बाद देखने में आया कि जिन्हें मरा हुआ समझ लिया गया था, वे वास्तव में मरे नहीं हैं बल्कि उनकी आत्मा प्रतिशोध लेने के लिए भटक रही है और उन्होंने अपने उत्पीड़नकर्ता से बदला चुका ही लिया।
रूस की साम्यवादी क्राँति के समय एक जागीरदार परिवार की मृत्यु उन्हीं व्यक्तियों के प्रेतों द्वारा हुई, जिन्हें उसने तड़पा-तड़पा कर मारा था। क्रान्ति के बाद काउण्ट इवान ‘सेण्टपीटर्स’ वर्ग से अपनी पत्नी अन्ना और दो बच्चों के साथ घर छोड़ कर भाग गया। पाँच व्यक्तियों की इस टोली इवान का विश्वस्त और वफादार नौकर भी था। जारशाधे के जमाने में इवान के अत्याचारों की कहानी सारे करेलिया प्रदेश में फैली हुई थी। कुछ समय तो ये लोग नोवगोरोद के प्राचीन नगर में छिप रहे और फिर नेवा नदी के तटीय वन प्रदेश में अपने रहने का स्थान तलाशते रहे।
घूमते-घूमते उन्होंने एक पुरानी झोंपड़ी में शरण ली। बूढ़ा मल्लाह आसपास कहीं कुछ खाने-पीने का समान तलाश करने के लिए निकल गया। रात हो गई। पति-पत्नी अपने बच्चों के साथ रात्रि विश्राम के लिए लेट गए। रोशनी के लिए उन्होंने कंदीलें जला ली थीं। तभी हवा का एक झोंका आया और कंदीलें बुझ गईं। दुबारा कंदील जलाई तो उन्होंने देखा कि आठ इस लोमड़ियां उन्हें घेरे खड़ी हैं। घेरा बनाकर उन्होंने इवान और अन्ना के चारों ओर कई चक्कर लगाये तथा अचानक लुप्त हो गईं। इससे दोनों घबरा गए। वातावरण इतना भयावह था कि दोनों की घिग्घी बंध गई।
जब बूढ़ा मल्लाह झोंपड़ी में वापस आया तो उसने अपने मालिक और मालकिन को अचेत पाया। वातावरण में घुली हुई भयानकता उसे भी व्याप रही थी। मल्लाह ने कंदील जलाकर देखा तो रेन्डियर की खाल ओढ़े एक विकराल साया कमरे में डोलता हुआ दिखाई दिया। बूढ़ा मल्लाह भयभीत होकर प्रार्थना करने लगा। वह समझ गया था कि इस झोंपड़ी में भूतों का डेरा है। तभी उस साये ने गरजदार आवाज में कहा, ‘‘प्रिय मल्लाह! तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इवान और अन्ना के पापों का घड़ा भर गया है। इनने हजारों निरपराध निरीह व्यक्तियों को जान से मारा है, बच्चों और औरतों को सताया है। और उसकी पत्नी, यह अन्ना.... यह तो जिन्दा चुड़ैल है। इसने अपने कई प्रेमियों, यहाँ तक कि अपने बाप और भाई को भी इवान के सिपाहियों से मरवाया है, कारण कुछ नहीं, केवल इसलिए कि यह अपने कुकृत्यों पर परदा डाले रही और स्वयं बेखटके ऐश करती रही।’’
अन्ना जागीरदार इवान की चौथी पत्नी थी। वह करेलिया में स्थित किजी के एक गिरजाघर में पली थी। काउण्ट इवान एक बार उस चर्च में प्रार्थना के लिए गया था। वहाँ से लौटते समय उसकी दृष्टि अन्ना पर पड़ गई और अपने प्रभाव तथा पैसे के बल पर उसे अपने महल में ले आया था। इवान के महल में विलासी जीवन जीते हुए उसे बुरी आदतें पड़ गई थीं। कई नवयुवकों को उसने अपने प्रेम पाश में फंसाया और अपनी भोग तृष्णा पूरी करने के बाद उनकी हत्या करा दी।
बूढ़े नौकर ने अपने मालिक और अन्ना के होश में आने की प्रतीक्षा की। रात के तीसरे प्रहर में उसकी आँखों के सामने लाल प्रकाश का गोला जगमगाने लगा। उस लाल गोले के चकाचौंध कर देने वाले प्रकाश में उसने देखा कि रेन्डियर की कई कच्ची खालें जमीन पर बिखरी हुई हिल रही थीं। कभी उनमें से घोड़ों की हिनहिनाहट सुनाई देती तो कभी भालुओं की गुर्राहट और फिर कभी लोमड़ियों की दर्दनाक चीखें। तभी झोंपड़ी के एक ओर की दीवार हहराकर गिर पड़ी। इससे जो शोर हुआ उसने इवान और अन्ना दोनों को जगा दिया, दोनों घबरा कर उठ बैठे। उन्होंने देखा कि उनके आसपास रेन्डियर की खालें बिखरी पड़ी हैं। जैसे ही उनकी दृष्टि इन बिखरी खालों पर पड़ी, वैसे ही उनमें से खिल-खिलाने की आवाज आई इवान और अन्ना घबराकर एक-दूसरे से चिपट गए। तभी गिरी हुई दीवार के पत्थरों पर से सूमरधारी सील मछलियों की सी आकृतियाँ कूदीं।
अब इन लोगों के पास भागने के अलावा कोई उपाय नहीं था। सबने जल्दी-जल्दी सामान बटोरा और नेवा नदी के किनारे पहुंचे। वहाँ उन्होंने तट पर बंधी नौकाएं खोलीं और उनमें सवार हो गए। वे नदी पार कर ही रहे थे कि अचानक न जाने कहाँ से लाल रंग की लोमड़ियां प्रकट हुईं और व अन्ना के ऊपर झपटीं तथा वह डर के मारे नदी में कूद गईं जहाँ सूमरधारी सील मछलियों ने देखते ही देखते उसे अपना ग्रास बना लिया।
अपनी प्रिय पत्नी का यह करुण अंत देखकर इवान विक्षिप्त सा हो उठा। नाव कुछ ही आगे बढ़ी होगी कि उसके साथ भी वही घटना घटी। अलबत्ता इन खालधारी प्रेतात्माओं ने बूढ़े मल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ा। उनके बच्चों को भी कोई परेशानी नहीं हुई। उन्हें बूढ़े मल्लाह ने ही पाल पोस कर बड़ा किया तथा पढ़ाया लिखाया।
ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें ‘मृतात्माओं ने, जिनकी मृत्यु स्वाभाविक समझी गई थी या जिनकी हत्या का सुराग नहीं मिल सका था। अपने कातिलों को पकड़वाया। साउथ वेल्स में एक धनी किसान जेम्स फिशर ने अपने मित्र के बेटे जार्ज वारेल को अपना उत्तराधिकारी बनाया। जार्ज वारेल ऐयाशी और विलासी प्रकृति का आदमी था। जल्दी ही सम्पत्ति हथिया लेने की इच्छा से उसने फिशर को अधिक शराब पिलाकर उसकी हत्या कर डाली। हत्या इतनी सफाई से की गई थी कि उसके पीछे हत्या का कोई सूत्र नहीं छूटा था। यहाँ तक कि उसकी लाश का भी पता नहीं चला था।
जून 1826 की घटना है। जेम्स पार्ले नामक एक किसान जो फिशर के मकान के पास ही रहता था, एक दिन उनके मकान के सामने से गुजर रहा था। उसने फिशर का भूत देखा जो उसी के मकान से एक कमरे की ओर इंगित कर रहा था। उस समय तो पार्ले डर कर भाग गया किन्तु यह आकृति बार-बार दिखाई दी। दूसरे दिन जब वह दुबारा उधर से गुजर रहा था तो पुनः वही आकृति दिखाई दी। उस दिन भी वह डर कर भाग गया। तीसरे दिन, चौथे दिन, पांचवें दिन कई दिनों तक यह क्रम जारी रहा। वह आकृति ऐसी कोई हरकत नहीं करती थी, जिससे उससे डराने का कोई इरादा व्यक्त होता हो। वह केवल एक कोठे की ओर इंगित करती थी। एक दिन जब पार्ले अपने मित्रों के साथ इस घटना की चर्चा कर रहा था तो उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को देने की सलाह दी। पुलिस को सूचना दी गई और उस कोठे की खुदाई कराई गई, जिधर वह प्रेतात्मा इंगित करती थी। खुदाई में फिशर की वैसी ही विकृत लाश मिली जैसी की पार्ले को उसकी आकृति दिखाई देती थी। यही नहीं ऐसे सूत्र भी मिले जिनके आधार पर हत्या के सुराग मिलते थे और उन सूत्रों के अनुसार जार्ज वारेल हत्या का दोषी सिद्ध हुआ। वारेल ने अपना अपराध स्वीकार किया और उसे इस हत्या के अपराध में फाँसी की सजा भी मिली।
इसी तरह की एक घटना एडिनवरा की है। वहाँ के एक मोहल्ले में एक मकान भुतहा मकान के नाम से प्रसिद्ध था। जो भी कोई व्यक्ति उस मकान में आकर ठहरता उसे एक महिला का प्रेत दिखाई पड़ता था और वह व्यक्ति या परिवार उससे डरकर या घबरा कर भाग खड़ा होता था। हालांकि उस महिला का प्रेत किसी को तंग नहीं करता था, पर प्रेत सो प्रेत उसका भय लोगों के दिमाग पर छाते ही हर कोई अपना रास्ता नापता था।
एक बार इस मकान में इंस्पेक्टर डिक्सन किराये पर आए। एक रात वे अखबार पढ़कर सोने जा ही रहे थे कि हवा का एक सर्द झोंका इतनी तेजी से कमरे में आया कि खिड़की के दरवाजे तथा पर्दे जमीन पर गिर पड़े, और फायर प्लेस में जलती हुई आग अपने आप बुझ गई। उन्होंने उठकर पुनः दरवाजा बंद किया तथा विस्तर की ओर बढ़े तभी द्वार पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो सामने एक तीखे नाक नक्शे वाली युवती खड़ी हुई थी। प्रश्नवाचक दृष्टि से डिक्सन ने उसे देखा तो युवती बोली, ‘क्या मैं अंदर आ सकती हूँ असमंजस की स्थिति में पड़े डिक्सन ने उसे अंदर आने दिया।’
वह युवती वास्तव में उस मकान में पहले रहने वाली एक लड़की का प्रेत थी, जिसकी हत्या कर दी गई थी। नाम था उसका मिसजूरी, ‘उस ने बताया, दरअसल आप पुलिस इंस्पेक्टर हैं, इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि आप मेरी सहायता करेंगे। जिस बंगले में आप रह रहे हैं, पन्द्रह वर्ष पहले यह बंगला मेरा ही बंगला था। यहाँ मैं अपने बूढ़े पिता के साथ रह रही थी। माँ तो बचपन में ही मुझे संसार में अकेला छोड़ कर जा चुकी थी, यहाँ मैं अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। मेरे पिता ने ही मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया और पढ़ाया लिखाया। बड़े होने के कुछ दिन बाद ही मेरे पिता की मृत्यु हो गई। मैं बिलकुल असहाय हो गई। गुजारे का प्रबंध करने के लिए मैंने इस बंगले को किराये पर उठाया। पहला किरायेदार बाप जैसा ही पुलिस अफसर था। उससे मेरी घनिष्ठता बड़ी कि हम दोनों शादी करने के लिए राजी हो गए और हम दोनों में पति-पत्नी के संबंध स्थापित हो गए। मैंने अपनी सारी जिम्मेदारियाँ उस अफसर पर छोड़ दीं। कुछ दिनों बाद जब मैं गर्भवती हो गई और मैंने उससे अपनी स्थिति स्पष्ट कर कानून की निगाह में पति-पत्नी बन जाने के लिए कहा तो वह इंकार कर गया। दबाव देने पर उसने मेरी हत्या करा दी।
इतना कह कर जूरी की प्रेतात्मा चुप हो गई। कुछ देर बाद वह बोली आप उस अपराधी को गिरफ्तार कर सजा दिलवाई। जानती हूँ कि आप प्रमाण कहाँ से जुटायेंगे? इसी असमंजस में हो। मैं सारे प्रमाण उपलब्ध करा दूँगी। जब तक अपराधी को सजा नहीं मिल जाती, तब तक मेरी आत्मा इसी प्रकार भटकती रहेगी और इस बंगले में आने वाले किसी व्यक्ति को चैन से नहीं रहने देगी। आप अच्छी तरह विचार कर निश्चय कीजिए। मैं कल इसी समय आऊंगी।
इसके बाद उस युवती का रूप एकदम से बदला। उसका चेहरा पूरी तरह विकृत हो गया। अब वहाँ कोई भी सुँदर युवती नहीं थी, बल्कि थी एक चुड़ैल जैसी आकृति जो ऊपर से नीचे तक एक सफेद लबादा ओढ़े थी और जिसमें से केवल आँख की जगह गड्ढे से दिखाई दे रहे थे। कुछ देर बाद वह आकृति विलुप्त हो गई।
दूसरे दिन पुनः जब जूरी की आत्मा आई तो डिक्सन ने 15 वर्ष पहले हुए इस हत्याकांड का पता लगाने का निश्चय कर लिया था। जूरी की आत्मा ने उसका इस प्रकार मार्गदर्शन किया, जिस प्रकार कोई प्रत्यक्षदर्शी व्यक्ति कर रहा हो। जूरी की लाश के अवशेष बरामद किये गए। उसके हत्यारे प्रेमी को तलाश किया गया, उसे गिरफ्तार किया गया और उसे सजा मिली। इसके बाद जूरी की आत्मा ने इंस्पेक्टर डिक्सन को धन्यवाद ज्ञापन करते हुए, उसे अनेकों उपहार दिए।
इस तरह की सैकड़ों घटनाएं मिलती हैं, जिनमें कुकर्मी निर्बलों को सताते हुए यह सोचते हैं कि यह हमारा क्या बिगाड़ लेंगे? परन्तु प्रतिशोध की भावना इतनी उग्र होती है जो मरने के बाद भी सूक्ष्म शरीर द्वारा अपना बदला चुका कर ही रहती है। यदि ऐसा नहीं होता है तो प्रकृति उसे कोई न कोई दण्ड देती ही है।
पहाड़ की चोटी पर, जिसके दूसरी ओर गहरी खाई या बड़ा खड्ड है, उस पर कोई मनुष्य बैठा है, नशे में डूबा हुआ। ऐसा व्यक्ति कब नशे के झोंके में आकर या हवा का हल्का-सा झोंका लगने पर खाई या खड्ड में गिर पड़ेगा? कुछ नहीं कहा जा सकता। कोई एक व्यक्ति ऐसे कगार पर बैठा हो तो उसे किसी तरह समझा बुझाकर उतारा भी जा सकता है, उसे इस संकट से उबारा भी जा सकता है, किन्तु पूरी मनुष्यता पर ऐसा संकट विद्यमान हो तो स्थिति अवश्य चिन्तनीय और शोचनीय हो जाती है। इस समय परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों के पास करीब 50 हजार एटम बम हैं। हाइड्रोजन बम और वैसे ही अन्य संहारक अस्त्रों का भण्डार तो इस गणना से अलग ही है। इतने परमाणु अस्त्र पृथ्वी के पूरे जीवन को सात बार नष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। यद्यपि एक बार विनाश के बाद दुबारा उनके उपयोग की आवश्यकता तो नहीं ही होगी फिर भी यह स्थिति कितनी भयावह है कि उपलब्ध शस्त्रास्त्र सात बार पृथ्वी पर से जीवन को नष्ट कर सकते हैं।
परमाणु शस्त्रों के रख-रखाव और देखभाल के लिए भारी इन्तजाम किया जाता है। उनका उपयोग किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं हो सकता। अन्यथा कभी भी कोई भी व्यक्ति अपनी सनक का शिकार होकर कब संसार को परमाणु शस्त्रों से तबाह कर दे, इसका क्या ठिकाना? परमाणु बमों का सामयिक प्रयोजनों के लिए दूसरे विश्व युद्ध में पहली बार उपयोग किया गया। इसके बाद अब तक कभी किसी युद्ध में इन शस्त्रों के उपयोग की आवश्यकता नहीं हुई, या इनका प्रयोग नहीं किया गया। किन्तु द्वितीय महायुद्ध के बाद संसार के लगभग सभी देशों में परमाणु अस्त्र जमा करने की होड़-सी मच गई है और इन अस्त्रों का भण्डार करने के साथ-साथ परमाणु अस्त्रों के उपयोग की तकनीक भी विकसित हुई है।
6 और 9 अगस्त 1945 को क्रमशः नागासाकी तथा हिरोशिमा पर अणुबम गिराये गए। उससे जो विनाश हुआ, उसका विवरण आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। भविष्य में होने वाले युद्धों में इन अस्त्रों का उपयोग न होने देने के लिए कई संधियां हुई हैं, अन्तर्राष्ट्रीय समझौते हुए हैं और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने सदस्य देशों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। परमाणु अस्त्रों के प्रसार पर रोक लगाने के लिए भी अनेक स्तर पर प्रयास हुए हैं किन्तु जो राष्ट्र परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं वे अपनी शक्ति दिनोंदिन बढ़ाते जा रहे हैं तथा परमाणु युद्ध को रोकने के तमाम उपायों के बावजूद भी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि अगले दिनों यदि कोई बड़ी लड़ाई हुई तो इन अस्त्रों का उपयोग नहीं हो सकेगा।
बड़ी लड़ाई की बात तो दूर रही, इन शस्त्रास्त्रों का जिस प्रकार रख-रखाव किया जाता है और जिस ढंग से उन पर नियन्त्रण किया जाता है वह तरीका ही इतना पेचीदा है कि किसी भी क्षण, बिना कोई युद्ध की घोषणा हुए कब कौन-सा देश, किस पर परमाणु बमों से हमला कर देगा? यह कुछ भी निश्चित नहीं है। पिछले 6 जून 1980 के दिन इसी प्रकार की एक यान्त्रिक भूल से अमेरिका द्वारा अपने प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी देश रूस पर परमाणु हथियारों से हमला होते-होते रहा।
एक कम्प्यूटर की साधारण सी गलती के कारण इस दिन विश्व भयंकरतम परमाणु युद्ध से होने वाले विनाश का शिकार होते-होते रहा। हुआ इतना भर था कि कम्प्यूटर में आई एक साधारण सी गड़बड़ी के कारण अमेरिकी सैन्य विभाग के उच्च अधिकारियों को यह गलत सूचना मिल गई थी कि रूस ने अमेरिका पर अपने अंतर महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र छोड़ दिये हैं बस फिर क्या था? एयर कमाण्ड के सीनियर कण्ट्रोलर ने वह बटन दबा दिया जो परमाणु हमले की सूचना मिलते ही हर क्षण बचाव और प्रत्याक्रमण के लिए तैयार रहता है। यह सूचना मिलते ही आकाश में विचरते बमवर्षक विमान अपने गन्तव्य की ओर उड़ने लगे। प्रक्षेपास्त्र अड्डों पर यह सूचना पहुँचते ही सैन्य अधिकारी अपना कर्त्तव्य पालन करने के लिए अपनी सीटों पर जा बैठे। परमाणु शक्ति से चलने वाली पनडुब्बियों को भी बेतार यंत्रों द्वारा संदेश दिया गया। यह सब तीन मिनटों में हो गया। सौभाग्य से कुछ ही क्षणों में पता चल गया कि कम्प्यूटर के एक साधारण से पुर्जे में आई खराबी के कारण यह गलत सूचना मिली है, अन्यथा ऐसी कोई बात नहीं है। तब कहीं जाकर परमाणु हमले की कार्यवाही रोकी गई और सारी तैयारियां, आदेश तथा निर्देश वापस लिये गये।
फर्ज कीजिए समय रहते यह गलती पकड़ में नहीं आती तो क्या होता? इस समय हम आप सब में से शायद ही कोई यह पंक्त्तियाँ लिखने और पढ़ने के लिए जीवित रहता। अमेरिका द्वारा प्रक्षेपास्त्रों से रूस पर गलत सूचना के आधार पर ही सही, हमला किया जाता तो क्या रूस उस हमले के उत्तर में प्रत्याक्रमण नहीं करता। वह गलती भी पकड़ में नहीं आती क्योंकि कम्प्यूटर ने सैन्य विभाग के तीन अलग-अलग केंद्रों पर थोड़े से अंतर के साथ एक सी ही जानकारी दी थी। अमेरिका में ये तीन केन्द्र अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं। नोराड, स्ट्रेटेजिक एयर कमाण्ड तथा नेशनल मिलिट्री कमाण्ड सेण्टर के प्रमुख नियन्त्रकों के पास कम्प्यूटर की यह सूचना मिली तो उन्होंने एक दूसरे से संपर्क साधा और पाया कि तीनों स्थानों पर प्राप्त हुई सूचनाओं में थोड़ा सा अंतर है। इस थोड़े से अंतर का स्पष्टीकरण करने और आश्वस्त होने के लिए दुबारा जाँच पड़ताल की गई, तब कहीं पता लगा कि कम्प्यूटर में छोटी-सी खराबी के कारण गलत सूचना दी है। इस सारी प्रक्रिया में तीन मिनट से भी कम समय लगा और उन तीन मिनटों में पूरे विश्व पर विनाश के बादल घटा टोप होकर मंडरा उठे थे।
द्वितीय महायुद्ध में नागासाकी और हिरोशिमा पर अणुबम गिराने के लिए विमानों का उपयोग किया गया था, किन्तु अब ऐसी आवश्यकता नहीं है। विमानों से बम गन्तव्य स्थान पर ले जाने और वहाँ फेंकना काफी जोखिम का काम है इसलिए अणुबम फेंकने के लिए प्रक्षेपास्त्रों का उपयोग करने की विधि ढूँढ़ निकाली गई है। ये प्रक्षेपास्त्र विमानों पर भी फिट किये जा सकते हैं, जिससे एक निश्चित दूरी पर पहुँच कर वहीं से अणुबम दागे जा सकें। इसके अतिरिक्त पनडुब्बियों में भी प्रक्षेपास्त्र फिट किये जाने लगे हैं। इसके कई लाभ हैं। एक तो दुश्मन देश के निकट समुद्र में पहुँच कर कुछ ही सेकेंडों के भीतर अणु अस्त्रों की मार की जा सकती है दूसरे ऐसे प्रक्षेपास्त्रों को नष्ट कर पाना भी कठिन है।
परमाणु अस्त्रों के प्रक्षेपण के लिए जमीन से जमीन पर मार करने वाले भूमिगत अड्डे भी बनाए गए हैं जहाँ अंतर महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों को फिटकर दिया जाता है, इन भूमिगत अड्डों की सुरक्षा के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है ताकि शत्रु यदि आकस्मिक आक्रमण करें तो बचाव किया जा सके। यद्यपि इन अड्डों को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है फिर भी कभी किसी को पता चल जाए तो ऐसी व्यवस्था की गई है कि आकस्मिक आक्रमण के समय उन्हें भूमिगत भागों से ही स्थानान्तरित किया जा सके। इसके लिए जमीन के भीतर ही भीतर सुरंगों का जाल बिछाया गया है।
इसके अतिरिक्त हर क्षण जासूसी उपग्रहों की निगाह से बचने तथा निगाह में आ जाने पर सुरक्षा करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित सैन्य अधिकारी नियुक्ति रहते हैं। ऐसी बात नहीं है कि युद्ध न होने की स्थिति में ये अधिकारी निष्क्रिय बैठे रहते हों। उन्हें हर घड़ी और हर क्षण सजग रहना है। इसके लिए समय-समय पर, बिना कोई पूर्व सूचना दिए उन्हें चेतावनी स्वरूप झूठे हमले कर यह परखा जाता है कि अधिकारी अपने काम में कितने मुस्तैद हैं।
यहीं आकर यह आशंका प्रबल होती है कि इन अधिकारियों को अपना पूरा समय फालतू बैठकर ही बिताना पड़ता है। न उन्हें बाहरी लोगों से मिलने की सुविधा रहती है तथा न ही मनोरंजन और मन बहलाव का अवकाश। ऐसे एकाकी जीवन से ऊबकर उनका मानसिक संतुलन कभी भी बिगड़ सकता है, या उन्हें कभी भी कैसी भी सनक सवार हो सकती है। इस स्थिति में मैं अपरिमित शक्ति का स्वामी हूँ। यह विचार इन लोगों को विचलित कर सकता है और उनकी जरा सी भी सनक पृथ्वी पर तबाही तथा बर्बादी करने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
इस तरह की सनक या किसी भी राष्ट्र के उच्च अधिकारियों, जिम्मेदार नेताओं की इच्छा पर कभी भी तबाही मच सकती है। इन सैनिक अड्डों की व्यवस्था और तैयारियाँ इतनी चुस्त दुरुस्त हैं कि उन पर नियन्त्रण करने वाला हर अधिकारी उस क्षण का इंतजार कर रहा होता है जबकि उन्हें अपना काम करना है। लगता है इन अधिकारियों की नियुक्ति ही इसीलिए की जाती है कि किसी भी क्षण उन्हें अणु अस्त्रों से दुनिया में तबाही मचा देने के लिए हर घड़ी तैयार रहना है।
रूस और अमेरिका इन दिनों विश्व की दो प्रमुख महाशक्तियाँ हैं। अन्य छोटे-बड़े राष्ट्र इन्हीं दो देशों में से किसी के न किसी के पक्ष में हैं। यह भी कहा जा सकता है कि सारा संसार रूसी खेमे और अमेरिकी खेमे इन दो गुटों में बंटा हुआ। यदि कभी भी किसी भी देश में अणु अस्त्रों के उपयोग की पहल की और प्रतिपक्षी देश के महत्त्वपूर्ण ठिकानों पर हमला बोल दिया तो प्रत्याक्रमण की संभावना सुनिश्चित है।
परमाणु युद्ध की संभावनाओं को इस आधार पर नकारा जाता है कि इससे आक्रामक राष्ट्र भी नहीं बचेगा। युद्ध की संभावनाएं बहुत क्षीण हैं, फिर क्यों इतने विकास की इतनी तैयारियाँ की जा रही हैं? इसका उत्तर यह दिया जाता है कि ताकि परमाणु शक्ति सम्पन्न देश इस प्रकार का युद्ध छेड़ने की पहल न करे अर्थात् एक दूसरों से डरते दबते रहें।
किन्तु 6 जून 80 की घटना यह सिद्ध करती है कि वास्तव में यह व्यूह रचना एक दूसरे को रोकने, दबा कर रखने और उससे धमकाने के लिए भी की गई हो तो भी छोटी-सी गलती इस तरह की विनाश लीला का सूत्रपात कर सकती है। शत्रु देश के आक्रमण की सूचना मिलने और प्रत्याक्रमण करने का निर्णय लेने में कुछ ही सेकेंड का समय किसी भी देश के लिए मात देने वाला सिद्ध हो सकता है। उस स्थिति में कहीं भी, कोई भी गलती परमाणु युद्ध का सूत्रपात करने के लिए पर्याप्त सिद्ध होगी और उस स्थिति में परमाणु युद्ध निश्चित है।
प्रक्षेपास्त्र और आधुनिकतम मशीनों द्वारा अणुबम फेंकने की व्यवस्था जिन दिनों थी उन दिनों आज की व्यवस्था के समान गलतियाँ होने की संभावना बहुत कम, करीब-करीब नहीं के बराबर थी। किन्तु इन दिनों जिस तरह की व्यवस्था है, उसको यह खतरा हमेशा बना हुआ है और जैसे-जैसे इस तरह की व्यवस्थाएं बनती जायेंगी खतरा और बढ़ेगा ही। यद्यपि इस तरह की व्यवस्था सुरक्षा के लिए ही की जाती है किन्तु उनसे सुरक्षा का प्रयोजन कितना पूरा होता है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है, पिछले एक वर्ष में इस प्रकार की तीन गलतियाँ हो चुकी हैं। इस प्रकार की व्यवस्था बनाई तो सुरक्षा के नाम पर जाती है, परन्तु वास्तव में उनका उद्देश्य शत्रु देश की टोह लेना और किसी भी तरह की आक्रामक गतिविधि का प्रत्युत्तर तुरन्त देना होता है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यही रहता है कि किस जगह से दुश्मन देश ने प्रक्षेपास्त्र छोड़े हैं? उनकी कितनी संख्या है? कब छोड़े हैं? आदि बातों का तत्क्षण पता चलाया जा सके। क्योंकि इस प्रकार के आक्रमणों में समय का अत्यधिक महत्त्व होता है इसलिए ये व्यवस्थाएं करने वाले राष्ट्र निर्णय लेने और प्रत्याक्रमण करने में एक क्षण के लिए भी चूकना नहीं चाहते।
आगे कब किस समय कोई यान्त्रिक गड़बड़ी परमाणु युद्ध की शुरुआत कर दे? इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुल मिला कर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि सारी दुनिया परमाणु पर्वत की उस चोटी पर बैठी हुई है, जहाँ कभी भी कोई यान्त्रिक गड़बड़ी का झोंका उसे विनाश के गर्त में झोंक सकता है।
पश्चिमी देशों में इन दिनों विनाश की भावी संभावनाओं और विभीषिकाओं की सबसे अधिक चर्चा है। मानवकृत उत्पात, युद्ध, अशान्ति और उपद्रव तो अगले दिनों बढ़ने वाले हैं ही, विश्व के मूर्धन्य विचारक इन दिनों जीवन के हर क्षेत्र में नैतिक मूल्यों के ह्रास का दुष्परिणाम इस रूप में प्रस्तुत होने वाला बताते हैं। प्रकृति विज्ञानियों का भी कहना है कि इन दिनों प्रकृति बहुत विक्षुब्ध हो रही है। कारण जो भी हो परन्तु प्रकृति का विक्षोभ, प्रकोप बनकर अगले दिनों मानव ही नहीं प्राणी जगत् के अस्तित्व पर गंभीर चुनौतियों भरे संकट के रूप में टूटेगा।
अभी पृथ्वी सहित नौ ग्रहों के सूर्य की एक सीध में आने वाली सौर घटना की चर्चा गरम ही थी कि वैज्ञानिक ढंग से भविष्यवाणी करने वाले प्रसिद्ध भविष्यवक्ता एडिथ लिटिलटन ने 1982 में प्रकृति विक्षोभों के कारण संभावित विनाशलीला की भविष्यवाणी कर इस ‘जूपिटर इफेक्ट’ के परिणामों के और नये आधार पर तथा प्रमाण प्रदान किये हैं। उनके अनुसार 1982 के आस-पास भूकम्पों के अलावा बाढ़, चक्रवात, तूफान, बवंडर, अति दृष्टि जैसी अनेक प्राकृतिक विपदाएं इस रूप में टूटने वाली हैं कि प्रलय का-सा दृश्य उपस्थित हो जाएगा। लिटिलटन के अनुसार इस विनाश के बाद जो लोग बच सकेंगे वे एक नई सभ्यता के जन्मदाता होंगे और संसार में उसके बाद सुख, शान्ति तथा स्नेह सौहार्द का स्वर्गिक वातावरण विनिर्मित होगा।
प्रकृति अपनी गोदी में अनेक प्राणियों का अनेक तरह से पोषण करती है तो उनकी उच्छृंखलता से कुपित होकर उन्हें कई तरह से दण्डित भी करती है। अगले दिनों मनुष्य को उसकी उच्छृंखलता का जो दण्ड मिलने वाला है, उसमें सर्व प्रमुख है- भूकम्प। यों भूकम्प कोई नई बात नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी में प्रति वर्ष 14,00,000 कम्पन होते हैं। यों तो पृथ्वी हर क्षण काँपती रहती है। सोये हुए व्यक्ति का सीना जिस प्रकार साँस लेते समय उठता-बैठता है, लगभग उसी प्रकार का कंपन पृथ्वी पर भी होता रहता है। उसे पृथ्वी का साँस लेना कहा जा सकता है परन्तु ये 14 लाख कम्पन कमोबेश बहुत हल्के भूकम्प ही होते हैं, जिन्हें रिचर-स्केल से भी नहीं मापा जा सकता। रिचर-स्केल की पकड़ में आने वाले भूकम्पों की संख्या 6000 है जो 1 डिग्री से भी कम होते हैं। एक डिग्री रिचर स्केल की वह सबसे छोटी इकाई है जो भूकम्प मापती है। अर्थात् सिप्लोग्राफ नामक यंत्र द्वारा अनुभव किये जाने वाले ये भूकम्प नहीं कहे जा सकते। रिचर-स्केल की पकड़ में आने वाले डिग्री में मापे जा सकने योग्य भूकम्पों की संख्या 1000 है। इनसे थोड़ी बहुत हानि पहुँचती है।
इन एक हजार भूकम्पों में से भी 120 ऐसे होते हैं जिनसे कुछ ज्यादा क्षति पहुँचती है। 20 भूकम्प शहरी आबादियों को ध्वंस कर देते हैं। गत सितम्बर 80 मैं अनजीरिया के अल असनाम शहर में आया भूकम्प इस वर्ष का सबसे भयंकर भूकम्प था जिसमें हजारों व्यक्ति मारे गये और लाखों बेघर बार हो गये। इस प्रकार का भूकम्प प्रति दूसरे या तीसरे वर्ष आता है, जिससे महाविनाश होता हैं प्रायः यह भूकम्प समुद्री क्षेत्रों या पृथ्वी के ऐसे स्थानों पर अधिक आता है जहाँ बहुत कम जान-माल को क्षति पहुँचती है क्योंकि ऐसे स्थानों पर प्रायः मनुष्य नहीं रहते हैं।
पृथ्वी के निर्माण स अब तक करोड़ों भूकम्प आये हैं। अगले दिनों सूर्य के एक सीध में नौ ग्रहों के एक ओर इकट्ठे हो जाने की घटना, संभवतः अब तक के इतिहास में अपने ढंग की एकमात्र ऐसी घटना है, जो अन्य सौर घटनाओं के साथ घट रही है। यथापूर्ण सूर्य ग्रहण सौर कलंकों की अभिवृद्धि का चरम वर्ष, चन्द्र ग्रहण, धूमकेतु का उदय आदि आदि। इन सब घटनाओं का प्रभाव पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को असामान्य रूप से प्रभावित करेगा। इसलिए ऐसे भूकम्पों के आने की संभावना व्यक्त की जा रही है, जो अब तक कभी नहीं आये होंगे।
आने वाले भूकम्पों की विध्वंसकता का अनुमान लगाने के लिए अब तक आए उन भूकम्पों का विवरण जान लेना उपयुक्त रहेगा, जिनने सर्वाधिक विनाश किया है और जहाँ वे आए हैं वहाँ प्रलय का-सा दृश्य उपस्थित किया है। प्राकृतिक विपदाओं में यदि सबसे अधिक विनाशकारी और सर्वाधिक हानि पहुँचाने वाली विपत्ति यदि कोई है तो वह भूकम्प ही है। किन्हीं भी प्राकृतिक विपत्तियों ने उतनी हानि नहीं पहुँचाई न उतना विनाश किया जितना कि भूकम्पों के कारण हुआ है। भूकम्प क्यों आते हैं? उनके रोकथाम का क्या उपाय है? आदि बातें जानने के लिए वर्षों से प्रयास किये जा रहे हैं परन्तु अभी तक भूकम्प के किसी एक निश्चित कारण का पता नहीं चला है। जब कारण का ही पता नहीं चला है तो उनकी रोकथाम का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अधिक से अधिक इतना संभव है कि भूकम्प आने के कुछ क्षणों पहले पता चल जाए कि धरती काँपने वाली है। परन्तु वह पता इतने थोड़े से समय पहले चल पाता है कि बचाव के, जहाँ भूकम्प आने वाला है वहाँ से जान-माल हटा कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने के लिए कोई समय नहीं मिल पाता। इस स्थिति में भूकम्प की संभावना का पता लग जाना और नहीं लगना बराबर ही है।
पृथ्वी पर कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ प्रायः भूकम्प आते रहते हैं। इनमें जापान द्वीप समूह, चीन, एण्डीज पर्वत-माला, पूर्वी अनातोलिया तथा अमेरिका का पश्चिमी तट प्रमुख है। वैसे भूकम्प को किसी सीमा विशेष में बाँध पाना संभव नहीं है। वह कभी भी और कहीं भी आ सकता है। फिर भी उक्त क्षेत्रों में भूकम्प की संभावना और स्थानों की अपेक्षा अधिक रहती है।
अगले दिनों (जूपिटर इफेक्ट नवग्रहों के प्रभाव) से आने वाले भूकम्प अब तक आए सभी भूकम्पों का रिकार्ड तोड़ देंगे। उनकी विभीषिका का अनुमान लगाने के लिए अब तक आये भूकम्पों की विभीषिका को आधार बनाया जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष 15000 व्यक्ति भूकम्पों के कारण मृत्यु का ग्रास बनते हैं। धन सम्पत्ति की होने वाली क्षति का अनुमान लगाना तो लगभग असंभव है। सन् 1960 में मोरक्को, ईरान तथा चिली में भूकम्पों के कारण 17000 लोग मर गये थे और करीब 5 अरब रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हुई थी।
जुलाई 1976 में चीन के तंगशान इलाके में आया भूकम्प इस शताब्दी का सबसे भयंकर भूकम्प माना जाता है। उस भूकम्प में अकेले तंगशान नगर में 8 लाख व्यक्ति मारे गए थे जबकि इस नगर की जनसंख्या कुल 10 लाख है। जो लोग बच सके थे वे भी कोई पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे। उनमें से भी अधिकाँश को शारीरिक क्षति पहुँची। किसी का हाथ टूट गया, किसी का पैर टूट गया। किसी की आंखें फूट गईं तो कोई इमारतों के ढह जाने से गिरने वाले मलवे की चोट के कारण अपना चेहरा ही विकृत कर बैठा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भूकम्प आने के पूर्व इस क्षेत्र के ऊपर आकाश में एक तेज चौंधिया देने वाला प्रकाश फैल गया था। इस प्रकाश को 200 मील दूर रहने वाले उन लोगों ने भी देखा, जहाँ भूकम्प नहीं आया था। कुछ सेकेंडों तक थरथरा उठी धरती के कारण होने वाला धमाका इतना जोर का था कि कई एकड़ क्षेत्र में लगी हुई फसल अपनी सतह के साथ उखड़ कर इस प्रकार दूर जा गिरी जैसे किसी ने दूध पर से मलाई उतार कर दूसरे बरतन में बिछा दी हो। तंगशान नगर इस भूकम्प का केन्द्र था और वहाँ के नगर के बीचों बीच की जमीन फट गई तथा बहुत चौड़ी और मीलों लम्बी दरार बन गई। इस दरार में लाखों मनुष्य, मकान, इमारतें, सड़कें और सड़कों पर चलते हुए लोग समा गये। भूकम्प के धक्के से राह चलते, बैठे और सोये, लेटे हुए लोग भी कई फुट ऊंचे उड़ गये। इस स्थिति में पेड़ों का उखड़ कर दूर जा गिरना तो स्वाभाविक था। रेल की पटरियाँ और जमीन के भीतर लगाये गये पाइप भी इस प्रकार मुड़-तुड़ गए जैसे किसी ने धागे को गुड़ी-मुड़ी करके लपेट दिया हो।
सितम्बर 1923 में जापान के तोकियो याकोहाया क्षेत्र में भी ऐसा विनाशकारी भूकम्प आया था कि पूरे क्षेत्र की जमीन एक दिशा में इस प्रकार झुक गई जैसे किसी ने तराश दिया हो। इस भूकम्प में 5 लाख मकान गिर गए थे और करीब 12 लाख व्यक्ति मारे गए थे। निकटवर्ती संगामी खाड़ी में 36 फुट चौड़ी दरार उत्पन्न हो गई तथा आबादी वाले क्षेत्रों में ऐसी भयंकर आग लगी कि उस क्षेत्र में तीन दिन तक मकान, इमारतें और वृक्ष, वनस्पति धू-धू करके जलते रहे, इसके तीन वर्ष पहले चीन और तिब्बत की सीमा पर स्थित कन्सू क्षेत्र में भी ऐसा ही भूकम्प आया था, जिसमें कुछ ही सेकेंडों के भीतर लगभग 2 लाख व्यक्ति मारे गए। इसी क्षेत्र में दिसम्बर 1932 में आए भूकम्प की विनाशलीला देखने वाले कई लोग तो अभी भी जीवित हैं जिसमें करीब 70,000 व्यक्ति मारे गए थे।
सन् 1908 में इटली के मोसीना नगर में आए भूकम्प से करीब 1 लाख व्यक्ति तो मरे ही, पूरा का पूरा शहर इस तरह बर्बाद हो गया कि अब उसका कहीं भी नाम-निशान नहीं है। इस भूकम्प के झटके इटली के कुछ अन्य नगरों में भी महसूस किए गए थे और उन क्षेत्रों में भी करीब 50 हजार लोग मर गए थे। दक्षिण अमेरिका के पेरू क्षेत्र में तो मई 1970 में भूकम्प के साथ-साथ भारी वर्षा भी हुई। बर्फ की चट्टानें पर्वत शिखरों से टूट-टूट कर इमारतों और लोगों को पीसती हुई आगे निकल गईं। इसी तरह का एक विचित्र भूकम्प जून 1692 में जमैका के समुद्र तटीय इलाकों में आया था। उस समय समुद्र की लहरें उफनते हुए पानी की तरह बढ़ी और शहर के भीतर तक घुस आईं। पोर्टरायल बंदरगाह पर मरम्मत के लिए खड़ा एक जहाज पानी के इस तेज बहाव में बहता हुआ नगर के भीतर तक चला गया और मकानों, इमारतों सहित सैकड़ों लोगों को पीसता हुआ नगर के दूसरे छोर पर जा टिका, जन-धन की इस क्षति के साथ वहाँ की भौगोलिक संरचना में भी कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ कि शहर का दो तिहाई हिस्सा सागर बन गया। वहाँ की जमीन पर समुद्र की लहरें कई फीट ऊंचाई तक लहराने लगीं। दो-ढाई सौ वर्ष बाद तक उस नगर की इमारतों का ऊपरी भाग समुद्री क्षेत्र में पानी की सतह के ऊपर दिखाई देता रहा यह विनाश कुछ ही मिनटों में हो गया।
ऐसा ही एक भूकम्प सन् 1755 में पुर्तगाल के लिस्वन क्षेत्र में आया जिसके पहले ही झटके में शहर के 85 प्रतिशत मकान धराशाई हो गए तथा हजारों लोग मारे गए। चालीस मिनट बाद भूकम्प का दूसरा झटका आया और उसने बाकी के मकानों को भी ध्वस्त कर दिया। मकानों और इमारतों के मलवे में आग लग गई। यह आग किन्हीं मानवी प्रयत्नों से नहीं बुझी बल्कि उस समय बुझी जब तीसरे झटके के साथ ही समुद्र की लहरें 16 से 20 फीट की ऊंचाई पर लहराती हुईं नगर में घुस पड़ीं। इस भूकम्प के कारण 13 लाख वर्ग मील क्षेत्र प्रभावित हुआ। मोरक्को, स्पेन तथा वेस्टइंडीज में भी उसी तरह का विनाश दृश्य उपस्थित हुआ। वही झटके और उसके बाद समुद्री लहरों का वही उत्पात। स्पेन में तो 60 फीट ऊंचाई तक समुद्र उफनने लगा।
पृथ्वी के जन्म से लेकर अब तक हजारों विनाशकारी भूकम्प आये हैं। इन भूकम्पों ने न केवल नगरों को वरन् विभिन्न देशों की सभ्यताओं को भी नष्ट किया, जिनका अब अता-पता भी नहीं चलता। इन भूकम्पों की भयावहता का चित्रण करते हुए वैज्ञानिक इसी परिप्रेक्ष्य में कहते है कि सन् 1982 में आने वाले भूकम्पों की श्रृंखला पता नहीं किन नगरों, देशों और क्षेत्रों को तबाह कर देगी। भूकम्पों के अलावा अन्य रूपों में होने वाला विनाश नर्तन संसार की अधिकाँश आबादी को नष्ट करके रख देगा। वैज्ञानिकों के अतिरिक्त भविष्यदर्शी, अन्तर्द्रष्टा भी यही बात कहते हैं। इस विनाश का कारण प्राकृतिक परिवर्तन तो है ही। आस्तिकजनों के अनुसार उद्दण्ड मनुष्य की उच्छृंखलता सीमा से अधिक बढ़ जाने के कारण यह प्रकृति का दण्ड विधान भी है।
“बीसवीं शताब्दी की अन्तिम दो दशाब्दियां विश्व के लिए भयंकर रूप से अशान्तिकारक होंगी। इतनी अशान्ति और उपद्रव विश्व इतिहास में आज तक कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। अब तक के तमाम उपद्रवों और प्राकृतिक विपदाओं को सन् 1980 से लेकर सन् 2000 के बीच होने वाले उपद्रव तथा प्राकृतिक विपदाएं मात कर देंगी। इन दिनों मानवकृत उत्पातों के साथ-साथ दैवी प्रकोप तथा प्राकृतिक विपत्तियां भी विश्व को संत्रस्त रखेंगी। 1980 के बाद विश्वयुद्ध की पूरी संभावना बनी है जो निश्चित रूप से 1985 के पहले ही प्रारम्भ हो जाएगा। इस युद्ध में इतना व्यापक संहार होगा कि अब तक के इतिहास में जितने भी युद्ध हुए हैं और उनमें जितना विनाश हुआ है वह सब मिलाकर तीसरे विश्व-युद्ध की तुलना में कम ही बैठेगा।”
यह शब्द हैं इस शताब्दी के महानतम भविष्यवक्ता और अंतर्द्रष्टा पीटर हटफौस के, जिन्हें भविष्यदर्शन की क्षमता ईश्वरीय वरदान के रूप में प्राप्त हुई है। उन्होंने इस विनाश के बाद एक नई मानव सभ्यता के विकास की भविष्यवाणी भी की है। उनकी भविष्यवाणी से मिलता-जुलता ही भविष्य कथन है, फ्राँस के रेने ड्यूमा और बर्नार्ड रोजियार। उल्लेखनीय है कि न रेने ड्यूमा कोई ज्योतिषी या भविष्यवक्ता हैं और न ही बर्नार्ड रोजियार, बल्कि दोनों ही विश्व विख्यात वैज्ञानिक हैं और उन्होंने कहा है, ‘‘शीघ्र ही वह समय आने वाला है, जब वर्तमान मानव सभ्यता का अंत हो जाएगा और एक नई विश्व-व्यवस्था जन्म लेगी। यह अंत या तो तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या और भुखमरी के कारण होगा अथवा पृथ्वी सहित और मण्डल के नौ ग्रहों के एक सीध में सूर्य के एक ओर एक पंक्ति में आ जाने से धरती पर आने वाले भूकम्पों के कारण। जो भी हो सन् 1982 से लेकर सन् 2000. तक यह भयावह कल्पना साकार होकर रहेगी। इस विनाश का सिलसिला 1980 के बाद ही आरम्भ हो जाएगा।’’
दो वैज्ञानिकों और एक भविष्यवक्ता द्वारा की गई एक समान भविष्यवाणी केवल इन्हीं व्यक्तियों ने नहीं की है बल्कि संसार के अन्य व्यक्तियों ने भी, जो अपने क्षेत्र की मूर्धन्य प्रतिभाएं मानी जाती हैं। इन संभावनाओं पर सहमति की मोहर लगाई है ब्रिटेन की विज्ञान पत्रिका साइंस के सम्पादक जॉन ग्रिविन तथा नासा अंतरिक्ष केन्द्र के निर्देशक स्टीफन प्लंगमेन द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘जूपिटर इफेक्ट’ तो इन दिनों खासी चर्चा का विषय रही है, जिसमें सौर मण्डल के नौ ग्रहों के एक सीध में आ जाने से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के प्रभावित होने और परिणाम स्वरूप भूकम्प, ज्वालामुखियों के विस्फोट तथा ऋतुओं में आश्चर्यजनक, अप्रत्याशित किन्तु भयंकर परिवर्तन होने की संभावनाओं पर सप्रमाण, वैज्ञानिक ढंग से प्रकाश डाला गया है।
वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगते हैं कि पृथ्वी का जीवन अन्य ग्रहों की स्थिति से प्रभावित होता है। इसी सिद्धान्त के आधार पर भारत में ज्योतिष विद्या का जन्म हुआ था और नक्षत्रों के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया था कि पृथ्वी पर जीवन के साथ जो कुछ भी घटता है, वह नक्षत्रों से सीधे रूप में प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए सूर्य पर प्रति 11 वे वर्ष उत्पन्न होने वाले धब्बों को ही लिया जाए। इन धब्बों का अध्ययन कर वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं के संबंध में यह संगति पाई है कि युद्ध, महामारी और प्राकृतिक उत्पातों का इन सौर कलंकों से संबंध है।
प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक चिजोवस्की ने पिछले 400 वर्षों में जितनी भी महामारियाँ फैली उन सबका अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि ये सौर कलंक उत्पन्न होने के तीन वर्ष बाद पूरी गति से उभरती हैं और प्रति ग्यारहवें वर्ष इनका उभार तीव्र होता है। संयोग से इस बार सौर-कलंकों का वर्ष भी 1982 है। इस वर्ष सूर्य पर पड़ने वाले धब्बों की संख्या चरम सीमा पर होगी। उनमें और अधिक वृद्धि इसलिए भी हो सकती है कि इन्हीं दिनों सूर्य के एक ओर एक सीध में नौ ग्रह इकट्ठे होंगे। सूर्य उन ग्रहों की गति और स्थिति को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि स्वयं भी उनसे प्रभावित होता है। इसलिए इस वर्ष सौर-कलंक पिछले कलंक वर्षों की अपेक्षा अधिक तीव्र होंगे तथा उनका परिणाम भी अधिक भयावह होगा।
सौर कलंकों का वर्ष सन् 1980-81 का मध्यवर्ती समय आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार दो अधिकतम सूर्य कलंकों की संख्या के बीच औसतन 11 वर्ष 40 दिन के करीब का अंतर रहता है। यों सूर्य कलंकों की संख्या नियमित रूप से घटती-बढ़ती है, परन्तु उनके समूहों की अधिकतम संख्या इसी अंतर के बाद चरम स्थिति में पहुँचती है और जिस वर्ष सूर्य कलंक अधिकतम संख्या में होते हैं उस वर्ष को ‘सूर्य कलंक का परम वर्ष’ कहा जाता है। इन दिनों पुनः सूर्य कलंक का चक्र अपनी चरम स्थिति की ओर अग्रसर है। सन् 80-81 इनके बढ़ने, आरम्भ होने के वर्ष हैं और सम्भवतः सन् 83 तक ये कलंक बढ़ते रहेंगे।
सर्वविदित है कि सूर्य जलती हुई गैसों का एक धधकता हुआ वायु पिंड है। जिस प्रकार तेज प्रवाह से बहती हुई नदियों में पानी के भंवर पड़ते हैं, उसी प्रकार सूर्य के गरम द्रव्य में भी भंवर पड़ते हैं। ये भंवर ही सूर्य कलंक के रूप में दिखाई देते हैं। सामान्यतः ये धब्बे बनते बिगड़ते और घटते-बढ़ते हैं, परन्तु इनकी संख्या प्रति ग्यारहवें वर्ष सर्वाधिक हो जाती है और पृथ्वी ही नहीं अन्यान्य ग्रहों को भी प्रभावित करती है।
सर्वप्रथम इन सौर-कलंकों को गैलीलियो ने सन् 1610 में देखा और इनकी प्रतिक्रियाओं का प्रतिपादन किया। तब से लेकर अब तक वैज्ञानिक नित, निरन्तर इन सौर कलंकों का अध्ययन करते आ रहे हैं और हर बार ताजी जानकारियां हासिल करते हैं। अलेक्जेन्डर मारशेक ने अपनी पुस्तक ‘अर्थ एण्ड होराइजन’ में लिखा है कि जब-जब भी इस प्रकार सौर कलंकों की संख्या अपनी चरम स्थिति में होती है तो पृथ्वी पर जलवायु तथा मौसम में कई गड़बड़ियां उत्पन्न हो जाती हैं। कहीं बहुत अधिक वर्षा होती है तो कहीं बिल्कुल कम या एक बूँद भी पानी नहीं बरसता, आँधी तूफानों का वेग बढ़ जाता है। इसी प्रकार गर्मी और शीत भी बढ़ जाती है।
इसके अतिरिक्त इन दिनों भीषण भू-चुम्बकीय उत्पात भी होते हैं अर्थात् भूकम्प, भू-स्खलन, ज्वालामुखियों के विस्फोट आदि होते हैं। इतना ही नहीं मेरु प्रकाश की असामान्य चमक भी इन दिनों देखने में आती है अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी दोनों ध्रुवों की जलवायु इन दिनों असाधारण रूप से बदल जाती है।
खगोलविदों के अनुसार ये कलंक सूर्य सतह पर होने वाले विस्फोटों के कारण उत्पन्न होते हैं। 24 फरवरी 1952 को सूर्य की सतह पर हुए एक असामान्य विस्फोट का अध्ययन किया गया था और उसके बाद देखा गया कि पराबैगनी किरणों की एक विराट् सेना पृथ्वी की ओर चल पड़ी है। इन किरणों के आक्रमण की वजह से ग्रीनलैंड, कनाडा, अटलाँटिक तथा वर्लिन में दो सप्ताह तक तूफानों का गतिचक्र तेजी से घूमता रहा। सन् 1955 में अमरीकी वैज्ञानिक डा. वाल्टर तथा डा. राबर्टस ने भी एक सामान्य विस्फोट का अध्ययन किया और लिखा कि इस विस्फोट के तेरहवें दिन ऋतु परिवर्तन का क्रम सामान्य से असामान्य हो गया। कुछ समय तक रेडियो प्रसारणों में व्यवधान उत्पन्न होता रहा, तेज वर्षा, अंधड़ और तूफान आने लगे तथा कई दिनों तक छोटी प्रलय के से दृश्य उपस्थित होते रहे।
सूर्य की सतह पर होने वाले विस्फोटों के कारण जो धब्बे बनते हैं, उनके बनने से प्रक्रिया में उत्पन्न हुआ रेडियो विकिरण तेज गति से पृथ्वी की ओर दौड़ पड़ता है। निश्चित ही यह अन्य ग्रहों को भी लक्ष्य करता होगा, पर उस संबंध में अभी कोई अध्ययन नहीं किया गया है। पृथ्वी के आयन मण्डल को बेधता हुआ यह विकिरण धरती के गर्भ में मीलों तक प्रवेश कर जाता है और उसकी चुम्बकीय व्यवस्था से छेड़छाड़ करता है। इसके अतिरिक्त सूर्यकलंकों के आसपास वाले क्षेत्रों से भी कई प्रकार के कण धीमे एवं तेज गति से निकलते हैं। जो पृथ्वी के साथ छेड़छाड़ करते हैं। नौ-ग्रहों का संयोग और सौर-कलंकों का वर्ष, दोनों मिलकर पृथ्वी को कितना और किस रूप में प्रभावित करेंगे, कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।
डाक्टर वुडाय ने लम्बे समय तक अनुसंधान और प्रयोगों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है कि अमावस्या तथा पूर्णिमा के समीपवर्ती दिन स्वास्थ्य को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। उन्होंने अपने अनुसंधान प्रयोगों के दौरान यह पाया कि इन दिनों मृगी, कामुकता, उन्माद और पागलपन जैसे रोग आश्चर्यजनक ढंग से उभरते हैं तथा इन्हीं दिनों समुद्र में ज्वार-भाटे, भूकम्प आदि विशेष रूप से आते हैं। ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आरनाल्ड और डा. केलिस्को ने भी अपने प्रयोग अनुसंधानों के आधार पर यह प्रामाणित किया है कि परिवर्तनशील अवस्थाओं मानव जीवन और वनस्पतियों पर विशेष प्रभाव पड़ता है।
स्वीडिश वैज्ञानिक सेवन्ती अर्हेनियस ने 25000 निरीक्षण प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है कि चन्द्रमा की स्थिति जन-जीवन, वायुमण्डल और स्त्रियों के मासिक धर्म को प्रभावित करते हैं। सूर्य और चन्द्र की स्थिति ही नहीं धूमकेतुओं का उदय भी पृथ्वी पर कई उत्पातों को जन्म देने का कारण माना जाता है। ऐसा क्यों होता है? वैज्ञानिकों के पास इसका कोई स्तर नहीं है, परन्तु वे इतना तो स्वीकार करते हैं कि जब-जब धूमकेतु उदित होते हैं या आकाश में दिखाई देते हैं, तब-तब भूकम्प, बाढ़, अनावृष्टि तथा ज्वालामुखियों के विस्फोट जैसी घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक होने लगती हैं।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉन हेनरी नेल्सन ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी अपने सौर परिवार के अन्य ग्रहों से, विशेषतः शुक्र, गुरु, शनि और मंगल पर होने वाले कम्पनों से प्रभावित होती है। जॉन हेनरी के अनुसार इन ग्रहों की विशिष्ट स्थितियाँ पृथ्वी पर चुम्बकीय तूफानों की श्रृंखला उत्पन्न कर देती हैं और मानवी चेतना को भी कुछ इस प्रकार प्रभावित करती है कि वह अनेकानेक कार्यों में अनजाने और अनचाहे ही प्रभावित होता है।
अगले दिनों सौर परिवार में जो विशिष्ट घटनाएं घटने जा रही हैं यथा सौर-कलंकों की अभिवृद्धि ग्रहण, सूर्य के एक-सीध में नौ-ग्रहों का इकट्ठा होना, ये घटनाएं पृथ्वी के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करेंगी। यह तो हुए भावी संभावनाओं के वैज्ञानिक कारण। सूक्ष्मदर्शी और ईश्वर विश्वासी जानते हैं कि अनीति, अन्याय और अधर्म बढ़ जाने पर सृष्टि संतुलन स्थापित करने के लिए परमात्मा कुछ ऐसी व्यवस्था करता है जिसमें अवाँछनीय तत्वों का सफाया हो जाए तथा वाँछनीय और उपयोगी तत्वों का ही अस्तित्व बचा रहे। हालीवुड के मेडीटेशन एण्ड लाइफ सेंटर के अध्यक्ष डब्ल्यू. एस. फांसले ने इन्हीं घड़ियों के संबंध में कहा है कि 1982 में होने वाली इस चमत्कारिक घटना के परिणाम स्वरूप पृथ्वी के वातावरण में विभीषिका उत्पन्न करने वाले परिवर्तन प्रस्तुत होंगे। चुम्बकीय क्षेत्रों में परिवर्तन आएगा और वायुमण्डल में उत्पन्न होने वाले असन्तुलन के कारण विश्व के अनेक स्थानों में विनाशकारी भूकम्प आयेंगे जिनके कारण अपार जन सम्पत्ति का नाश होगा। ऐसा भीषण युद्ध भी संभव है जिसमें परमाणीय अस्त्रों का खुलकर प्रयोग होगा और उसके दूरगामी परिणाम होंगे, जो दो तिहाई आबादी को नष्ट करने का कारण बन सकती है। इस विनाशलीला के पश्चात् जो लोग शेष रह जायेंगे, वे प्रकृति के अज्ञात रहस्यों का पता लगा कर एक उन्नत सभ्यता का विकास करेंगे।
सभी क्षेत्रों के मूर्धन्य प्रभृति विद्वान इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं कि मनुष्य का अस्तित्व इस समय एक निर्णायक संक्रमण बेला से गुजर रहा है। और आने वाले संकट नई सभ्यता के जन्म की प्रसव वेदना है।
सृष्टि के परिवार के प्रत्येक सदस्य का जीवन अस्तित्व चाहे जड़ हो या चेतन, वह उत्पत्ति, विकास और विनाश के तीन चक्रों में घूमता है। इसी आधार पर भारतीय मनीषियों ने सृष्टि के निर्माण या उत्पत्ति विकास और विनाश का युग दर्शन विकसित किया है। कोई भी वस्तु उत्पन्न होती है, उत्पन्न होकर विकसित होती है और विकास की प्रक्रिया से गुजरते हुए एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है जब उसके नष्ट होने में ही सृष्टि की सुव्यवस्था स्थिर रहती है, तब उसके मरण का दौर आता है।
जीव-जन्तुओं, वृक्ष-वनस्पतियों और जड़ पदार्थों में भी जन्म, विकास और मरण की प्रक्रिया पूरी होती है। इस चक्र को विराट् जगत में भी प्रत्यक्ष होते देखा जा सकता है, संसार में जब सत्प्रवृत्तियां बढ़ती हैं तो चतुर्दिक शाँति, सुव्यवस्था और प्रगति की स्थिति दृष्टिगोचर होती है। जब दुष्प्रवृत्तियां, अव्यवस्था तथा अवाँछनीय गतिविधियाँ बढ़ती हैं तो मनीषियों और तत्त्वदर्शियों के अनुसार चली आ रही व्यवस्था जराजीर्ण हो जाती है तथा नियन्ता विनाश का आयोजन करता है। खेत में फसल उगाते समय जिस प्रकार किसान अनावश्यक खर-पतवार को खोद खोदकर अलग कर देता है उसी प्रकार नियन्ता सृष्टि की सुव्यवस्था स्थिर करने के लिए व्यापक विनाश का आयोजन करता है। प्राचीन धर्म शास्त्रों ने इस प्रक्रिया को ही युग संधि की संक्रमण वेला कहा है। एक नये युग का जन्म होने के लिए प्रसव पीड़ा की भाँति, रुग्ण अंगों को काटकर अलग करते समय होने वाले कष्ट की भाँति संक्रमण बेला के ये दिन बहुत ही कष्टकर होते हैं।
जीर्ण पुरातन के मरण और स्वस्थ नूतन के जन्म की घड़ियां इन्हीं दिनों आ रही हैं। प्राचीन भारतीय धर्मग्रथों, संसार के भविष्यवक्ताओं, ज्योतिषियों और वैज्ञानिकों तक ने अगले दिनों व्यापक विनाश की सम्भावनाएं व्यक्त की हैं। इन सम्भावनाओं के संबंध में न केवल भारतीय धर्मग्रन्थ स्पष्ट प्रकाश डालते हैं वरन् अन्य धर्मों के प्राचीन ग्रंथ भी सुस्पष्ट हैं कि आगामी वर्ष अपने भीतर भीषण विनाश की संभावना लेकर आ रहे हैं।
ईसाइयों के धर्म ग्रंथ बाइबिल में तो हजारों वर्ष पूर्व आज की स्थितियों का इतना स्पष्ट उल्लेख कर दिया है कि जैसे किसी ने इन घटनाओं को अपनी आँखों से देखा हो। उदाहरण के लिए हर क्षेत्र में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका व्यक्त की जा रही है। यह महायुद्ध किस प्रकार लड़ा जायेगा? और इसमें किन-किन शस्त्रों का उपयोग किया जायेगा? इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह विज्ञान दिनों दिन इतना अधिक विकसित होता जा रहा है कि इस विश्व युद्ध के संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता कि इसमें किन शस्त्रों का किस प्रकार उपयोग किया जाएगा? इस संदर्भ में विश्व विख्यात वैज्ञानिक और दार्शनिक आइंस्टीन का वह प्रसंग उल्लेखनीय है जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा था, ‘तीसरे विश्व युद्ध के संबंध में आपका क्या विचार है? वह किस प्रकार लड़ा जाएगा? उसमें किन-किन शस्त्रों का उपयोग किये जाने की संभावना है।’
इस प्रश्न के उत्तर में आइंस्टीन ने कहा था कि तीसरे विश्व युद्ध के संबंध में तो कुछ नहीं कहा जा सकता। पर इसके बाद यदि कोई युद्ध लड़ा गया तो वह निश्चित रूप से ईंट, पत्थरों से लड़ा जायेगा। तीसरे विश्व युद्ध की विभीषिका के संबंध में वैज्ञानिक भी स्पष्ट रूप से कुछ बता पाने में असमर्थ हैं। किन्तु इसके संबंध में इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अब तक मनुष्य जाति के इतिहास में जितने भी युद्ध लड़े गये, उन सबमें कुल इतना विनाश नहीं हुआ होगा जितना कि आगामी विश्व युद्ध में संभावित है। इस संबंध में महाविनाश के बाद एक नई सभ्यता के विकास सकी सुनिश्चित संभावना व्यक्त करते हुए बाइबिल के “नया नियम” (न्यू टेस्टामेण्ट) में थिस्सुलुनीकियों- एक में कहा गया है, ‘जिस प्रकार रात को चोर आता है उसी प्रकार प्रभु का वह दिन आयेगा। तब लोग कहेंगे कि कुशल है और कुछ भय नहीं है तब उन पर एकाएक विनाश आ पड़ेगा उसी प्रकार जैसा कि गर्भवती (आसन्न प्रसवा) स्त्री, प्रसव करना शुरू हो जाती है। उस होने वाले विनाश से किसी भी प्रकार नहीं बचा जा सकेगा (अध्याय 5।2,3)
बाइबिल में तृतीय विश्व युद्ध को आर्मेगैडन नाम दिया गया है। बाइबिल की पुरानी ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ में महात्मा जॉन ने इस युद्ध के संबंध में विस्तार से लिखा है। दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिकी जनरल डगलस मैकार्शर ने कहा था, ‘दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ। विनाश का एक दौर पूरा हुआ। इसके बाद यदि हमने अधिक उत्कृष्ट और न्यायपूर्वक प्रणाली नहीं अपनाई तो आर्मेगैडन हमारे द्वारा पर खड़ा दस्तक दे रहा है।’
महात्मा जॉन, जिन्होंने बाइबिल में तीसरे महायुद्ध की भविष्यवाणी की है, ने महायुद्ध के अतिरिक्त और कई संभावनाओं की ओर इंगित किया है जो युद्ध के साथ प्राकृतिक विपदाओं के रूप में उत्पन्न होंगी तथा विनाश की विभीषिकाओं को और भयंकर बनायेगी। रेवेलेशन अध्याय में महात्मा जॉन ने लिखा है, ‘‘ईश्वरीय दूत ने दूसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से दूसरा जानवर निकला। लाल रंग का घोड़ा था और उस पर जो बैठा था उसे इस बात की ताकत दी गई थी कि वह दुनिया की शाँति को नष्ट कर दे और लोग एक दूसरे को मारने लग जांय। जब उसने तीसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से तीसरा जानवर निकला। यह काले रंग का घोड़ा था और जो सवार उस पर बैठा था उसके हाथ में एक तराजू थी। मैंने एक आवाज सुनी कि एक पैमाना गेहूँ एक सिक्के का मिलेगा और तीन पैमाना जौ का दाम एक सिक्का होगा।’’
इन पंक्तियों में अराजकता, महंगाई और दुर्भिक्ष का वर्णन किया गया है। महात्मा जॉन ने अकाल के संबंध में लिखा है, लोगों के चेहरे अकाल के कारण काले कोयलों की तरह पड़ जायेंगे तथा वे रोटियों के लिए मारे-मारे फिरेंगे। उनकी खाल लटक कर हड्डियों से अलग हो जायेगी। जो लोग तलवार से मारे जायेंगे वे इन भूख से मरने वालों की अपेक्षा सुख से रहेंगे। जब उसने चौथी मुहर को खोला तो उसमें से चौथा जानवर निकला। वह एक पीले रंग का घोड़ा था और उस पर मृत्यु का देवता बैठा था। इस देवता को यह ताकत दी गई थी कि वह युद्ध, महामारी, अकाल आदि के द्वारा असंख्य लोगों का अंत कर दे।
महात्मा जॉन ने रेवेलेशन अध्याय 11 में बताया है कि यह महायुद्ध सात वर्षों का होगा। उन्होंने पूरे युद्ध को दो काल खण्डों में बाँटा है। पहला काल खण्ड साढ़े तीन वर्ष का है ओर उत्तरार्ध भी 42 महीने अर्थात् साढ़े तीन वर्ष का है। युद्ध कब होगा इस संबंध में तो कोई निश्चित समय नहीं दिया गया है, परन्तु कुछ संकेत ऐसे अवश्य दिये हैं, जिनसे युद्ध का समय निश्चित किया जा सकता है।
सर्वविदित है कि ईसा को यहूदियों के राज्य में ही सूली पर लटकाया गया था। यहूदियों के पतन की भविष्यवाणी करते हुए बाइबिल (न्यू टेस्टामेण्ट) में कहा गया है, “जब तुम यरुशलम को सेनाओं से घिरा हुआ देखो तो जान लेना कि उसका उजड़ जाना निकट है। तब जो यहूदियों में होंगे वे पहाड़ों पर भाग जायेंगे और यरुशलम के भीतर हों वे बाहर निकल जायेंगे और जो गाँवों में होंगे वे वापस उनमें नहीं जायेंगे। क्योंकि यह परिवर्तन के ऐसे दिन होंगे जिनमें लिखी हुई सारी बातें पूरी होंगी। उन दिनों में जो महिलायें गर्भवती होंगी और जिनके दूध पीते बच्चे होंगे उनके लिए बड़ा कष्टकर समय होगा क्योंकि इन लोगों पर बड़ी आपत्ति होगी। वे तलवार के कौर हो जायेंगे और सब देशों के लोग उन्हें बंधुआ बनाकर ले जायेंगे और जब तक अन्य जातियों का समय पूरा नहीं होगा तब तक यरुशलम अन्य जातियों से रौंदा जायेगा। (लूक 21।20-24)
इसके बद यहूदियों को उनके राज्य में वापस आने और बसने की भविष्यवाणी की गई है। उल्लेखनीय है कि दूसरा महायुद्ध समाप्त होने पर 24 मई 1948 को यहूदी वापस अपनी पितृभूमि में बस सके थे और इसराइल के रूप में उनका नया राष्ट्र अस्तित्व में आया। बाइबिल के आधार पर युग परिवर्तन की भविष्यवाणी करने वालों के लिए यह घटना अत्यन्त महत्वपूर्ण और नवयुग आगमन की समय सूचक रही है। यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र तो स्थापित हो गया परन्तु उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान यरुशलम अभी तक निर्विवाद रूप से उनके अधीन नहीं था। बाइबिल के आधार पर तृतीय विश्व युद्ध, आर्मेगैडन की भविष्यवाणी करने वाले विद्वानों में हाल लिंडर्स का प्रमुख स्थान है। उनके अनुसार आर्मेगैडन से पूर्व तीन बातें होना अनिवार्य हैं। पहली तो फलिस्तिन में यहूदी राष्ट्र की स्थापना, दूसरी यरुशलम पर यहूदियों का निर्बाध अधिकार तथा तीसरी यरुशलम में यहूदियों के प्राचीन स्थान पर ही उपासना गृह का निर्माण। इन बातों में से पहली बात तो 14 मई 1948 को पूरी हो गई। दूसरी बात यरुशलम पर निर्बाध अधिकार से लगभग पूरी हो ही चुकी है। जुलाई 1980 में इसराइल की संसद ने अविभाजित यरुशलम को अपने देश की स्थाई राजधानी बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
प्राचीन स्थल पर उपासना गृह निर्माण की बात पूरी होना अभी शेष है। डेनियल के अनुसार पुराने स्थान पर प्राचीन मंदिर का निर्माण नवयुग आगमन के साढ़े तीन वर्ष पूर्व संभव होगा जबकि पूरा संक्रमण काल या आर्मेगैडन सात वर्ष की अवधि वाला है। इस युद्ध के संबंध में कहा गया है, ‘उस समय सूरज, चाँद और तारों में चिन्ह दिखाई देंगे। पृथ्वी पर देश-देश के लोगों पर तरह-तरह के संकट आयेंगे। संसार पर आने वाली विपत्तियों के कारण लोग इतने भयभीत होंगे कि उनके जी में जी न रहेगा क्योंकि तब आकाश की शक्तियाँ हिलाई जायेंगी। (लूक 21।25-26)
नवयुग आगमन के पूर्व होने वाले युद्ध तथा विनाश की सम्भावनाओं पर एक अन्य इंजील में कहा गया है, “जब वह (ईसा) पहाड़ पर बैठा था तब चेलों ने उसके पास आकर कहा, हमसे फिर ये बातें कब होगी। तेरे आने और जगत के अंत (युग की समाप्ति) का क्या चिन्ह होगा? तब यीशु ने कहा, सावधान रहो। कोई तुम्हें न मरमाने पाये। .....तुम लड़ाइयों और लड़ाईयों की चर्चा सुनोगे। इनका होना अवश्य है, पर उस समय जगत का अंत न होगा। ये सब बातें पीड़ाओं का आरंभ होगी। (मैथ्यू 24।3,4,6) उस समय ऐसा भारी क्लेश होगा, जैसा जगत के आरम्भ से अब तक न तो कभी हुआ है और न कभी आगे होगा। (21)। उन दिनों सूर्य अंधियारा हो जायेगा और चाँद का प्रकाश जाता रहेगा तथा आकाश से तारे गिरते हुये दिखाई देंगे। आकाश की शक्तियाँ हिलाई जाएगी। (29)।
ईसाई विद्वानों ने इन संकेतों को आकाश में ग्रहों की विशिष्ट स्थिति बताया है। इन दिनों सूर्य और चन्द्र के पूर्ण ग्रहण के साथ ज्योतिष गणना के अनुसार ग्रहों की विशिष्ट युतियाँ भी हैं। फरवरी 1980 में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण के समान ही सन् 82 में पूर्ण ग्रहण की संभावना है। इसके अतिरिक्त उन दिनों सूर्य के एक और एक सीध में नौ ग्रहों का आ जाना भी अपने आप में एक अद्भुत और अपूर्व घटना है। यद्यपि इस तरह की खगोलीय घटनाएं या संयोग सैकड़ों वर्ष के अंतर से पहले भी घटते रहे हैं किन्तु उन घटनाओं की बाइबिल में दिये गये संयोगों से कोई संगति नहीं बैठेगी। उस समय न तो यहूदियों के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हुई थी और न ही यरुशलम पर उनका अधिकार। इस भविष्यवाणी के साथ आर्मेगैडन अर्थात् तीसरे विश्व युद्ध उसमें महाविनाश और महाविनाश के बाद नवयुग के आगमन बताये गये चिन्ह इन्हीं दिनों की परिस्थितियों से संगति बैठती है।
महात्मा जॉन ने सन् 90 में ये भविष्यवाणी की थी, जिनके अनुसार इन दिनों प्रलय की-सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है और उसके बाद स्वर्णिम युग का शुभ प्रभात उदित होना है। ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ को जकरिया इंजील में अध्याय में 12 से 14 तक भविष्य कथन किया गया है उसका अर्थ निकालते हुए हाल लिंडर्स ने कहा है, ‘उस समय सभी राष्ट्र यरुशलम को घेर लेंगे और उस पर आक्रमण करेंगे। यरुशलम के बाहर और भीतर तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में भयंकर युद्ध होगा। ईसा यहूदियों को अपने मसीहा होने का बोध करायेंगे और तब वे ईसा को, नवयुग का सूत्रपात करने वाले को पहचान सकेंगे।’
सन् 637 तक युद्ध और संघर्ष के विभिन्न दौरों से गुजरने के बाद यरुशलम का पतन हुआ था। बाइबिल के अनुसार यहूदियों के पतन का कारण यह था कि वे ईश्वरीय विधान पर विश्वास नहीं करते थे। ईश्वर की सत्ता और उसके नियम विधान पर विश्वास लाने तथा उस पर अमल करने के बाद ही यहूदियों का उत्थान संभव होना बताया गया है। हाल लिंडर्स के अनुसार बाइबिल में वर्णित, भविष्य कथन किसी मत संप्रदाय विशेष के अनुयायियों से संबंधित नहीं हैं बल्कि पूरी मानव जाति का भावी इतिहास इस रूप में लिखा गया है।
सर्वविदित है कि इस समय पूरी मनुष्य जाति आस्था संकट की भयावह दैन से गुजर रही है। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का जिस प्रकार ह्रास हो रहा है, उसे भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार घोर कलिकाल ही कहा जा सकता है। महाभारत, मनुस्मृति, हरिवंश पुराण, लिंग पुराण, श्रीमद्भागवत आदि भारतीय धर्म ग्रंथों में युग परिवर्तन और स्वर्णिम युग के आगमन के जो लक्षण दिये गये हैं उन्हें देखते हुए भी इन्हीं दिनों युग परिवर्तन होना है।
ऋतुएं जब बदलती हैं तब मौसम से लेकर व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक में भारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। युग परिवर्तन के समय भी इसी प्रकार परिवर्तन होता है। जिनमें ध्वंस और सृजन दोनों पक्ष चरितार्थ हुए देखे जा सकते हैं। प्राचीन धर्म ग्रंथों से लेकर वैज्ञानिकों, राजनेताओं, दिव्यदर्शियों सभी के अनुसार यही वह समय है जब विनाश की विभीषिका सम्मुख प्रस्तुत होने तथा उसके बाद एक नये युग का सूत्रपात होने वाला है। तृतीय विश्व युद्ध की संभावना तो हर क्षेत्रों में व्यक्त की जा रही है। आधुनिक सभ्यता के अधुनातन आधुनिकतम विकसित यंत्रों और मशीनों के कारण जो प्रकृति विक्षोभ उत्पन्न हो रहे हैं, उनके आधार पर भी अगले दिन अपने गर्भ में भयंकर विनाश को लिये हुए आ रहे हैं।
इस तरह की परिवर्तन प्रक्रिया एवं जगत्नियंता परमात्मा द्वारा ही आयोजित होती है। अपनी सीमित परिधि में रहकर सोचने से ये विभीषिकाएं चाहे जितनी भयावह लगें परन्तु जो ईश्वरीय सत्ता की कल्याणकारी व्यवस्था को जानते, समझते व उसमें विश्वास रखते हैं वे मानते हैं कि यह आयोजन असंतुलन के कारण उत्पन्न होने वाले सर्वभक्षी विध्वंस को रोकने और असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए ही होता है। उस विभीषिका की तुलना में तीसरे महायुद्ध, महामारी, अकाल, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि प्राकृतिक विपदाओं की विनाश विभीषिका से कम ही भयावह होती है। प्राचीन धर्मग्रथों में जहाँ इस विनाश की भविष्यवाणियाँ की गई हैं, वहीं आस्तिकजनों, ईश्वर विश्वासी और धर्म श्रद्धालुजनों को आसन्न संकट की घड़ियों में निश्चिन्त रहने का आश्वासन भी दिया गया है। यद्यपि इस परिवर्तन प्रक्रिया में कष्ट उन्हें भी होना है, परन्तु नये युग का स्वर्गिक सुख भी वही सौभाग्यशाली उठा सकेंगे।
“निरन्तर देते रहने वाला ही सदैव पाता भी रहता है। न देने वाला तो अपने आपको सड़ा कर स्वयं तो गंदा होकर समाप्त होता ही है साथ ही अपनी दुर्गन्धि से दूसरों को भी अप्रसन्न कर असुविधाजनक स्थिति में डालता है।’’ - कन्फ्यूशंस
गायत्री उपासक नियमित रूप से, नियमपूर्वक, श्रद्धा-विश्वास सहित जैसे-जैसे साधना प्रक्रिया चलाने लगता है, उसकी साधना में क्रमबद्धता और पूर्णता आने लगती है वैसे-वैसे साधना की दिव्य-ज्योति अधिकाधिक प्रकाशित होती चलती है और अन्तरात्मा की ग्राह्य शक्ति बढ़ती चलती है। रेडियो यंत्र के भीतर बल्ब लगे होते हैं, बिजली का संचार होने से वे जलने लगते हैं। प्रकाश होते ही यंत्र की ध्वनि पकड़ने वाला भाग जागृत हो जाता है और ईथर तत्व में भ्रमण करती हुई सूक्ष्म शब्द तरंगों को पकड़ने लगता है, इसी क्रिया को ‘रेडियो बजाना’ कहते हैं। साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य-ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जागृत हो जाती है और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार साधक का अन्तःकरण रेडियो का उदाहरण बन जाता है और उसके द्वारा सूक्ष्म जगत की बड़ी-बड़ी रहस्यमय बातों का प्रकटीकरण होने लगता है।
गायत्री संहिता में इस प्रकार की अनेकों सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, पर उसके साथ ही यह भी बताया गया है कि गायत्री की इन दिव्य शक्तियों का अवतरण उसी अन्तःकरण में होता है जो परिष्कृत, स्वच्छ और निर्मल बन जाता है। विमान हर कहीं नहीं उतर सकते उन्हें उतारने के लिये उपयुक्त एयरपोर्ट- हवाई अड्डे चाहिए। गायत्री की दिव्य शक्तियाँ भी उपयुक्त परिष्कृत और निर्मल व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्तियों में होती हैं। इस तथ्य को गायत्री संहिता में इस प्रकार व्यक्त किया गया है-
वाह्यं चाभ्यन्तरं त्वस्य नित्यं सन्मार्गगामिनः। उन्नतैरुभयं द्वारा यात्युन्मुक्तकपाटताम्॥19॥
सर्वदा सन्मार्ग पर चलने वाले इस व्यक्ति के बाह्य और भीतरी दोनों उन्नति के द्वार खुल जाते हैं।
अतः स्वस्थेन चित्तेन श्रद्धया निष्ठया तथा। कर्त्तव्याविरतं काले गायत्र्या समुपासना॥20॥
श्रद्धा से, निष्ठा से तथा स्वस्थ चित्त से प्रतिदिन गायत्री की उपासना करनी चाहिए।
अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कारित और चरित्र को परिष्कृत बनाने वाले व्यक्ति को गायत्री महाशक्ति मातृवत् संरक्षण प्रदान करती है। जिस प्रकार दयालु, समर्थ और बुद्धियुक्त माता प्रेम से अपने बालक का कल्याण ही करती है, उसी प्रकार भक्तों पर स्नेह रखने वाली गायत्री अपने भक्तों का सदैव कल्याण ही करती है-
दयालुः शक्तिः सम्पन्ना माता बुद्धिमती यथा। कल्याण करुते ह्यैव प्रेम्णा बालस्य चात्मनः॥21॥
तथैव माता लोकनां गायत्री भक्तवत्सला। विदधाति हितं नित्यं भक्तानां ध्रुवमात्मनः॥।22॥
गायत्री साधकों की मनोभूमि इतनी निर्मल हो जाती है कि उसमें फिर सदिच्छाएं ही उत्पन्न होती हैं। साधक के अन्तःकरण में उत्पन्न हुईं सदिच्छाएं और साधक का अपना साधन बल उन इच्छाओं की पूर्ति में आश्चर्यजनक रूप से सहायक सिद्ध होता है-
गायत्र्युपासकस्वान्ते सत्कामा उद्भवन्ति हि। तत्पूर्तयेऽभिजायन्ते सहज साधनान्यपि॥17॥
निश्चय ही गायत्री के उपासक के हृदय में सदिच्छाएं पैदा होती हैं। उनकी पूर्ति के लिए सहज में साधन भी मिल जाते हैं।
त्रुटयः सर्वथा दोषा विघ्ना यान्ति यदान्तताम्। मानवो निर्भयं याति पूर्णोन्नति पथं तथा॥18॥
जब सर्व प्रकार के दोष, भूलें और विघ्न विनाश को प्राप्त हो जाते हैं तब मनुष्य निर्भय होकर पूर्ण उन्नति के मार्ग पर चलता है।
उच्च संस्कारों से अपनी मनोभूमि को सुसंस्कृत करने वाले साधक यद्यपि कोई गंभीर या अनैतिक भूलें नहीं करते। फिर भी मानवीय दुर्बलताओं के कारण उनसे यत्किंचित् त्रुटियाँ हो भी जाती हैं तो उनका वैसा दुष्परिणाम नहीं होता। गायत्री संहिता में कहा गया है-
कुर्वन्नाति त्रुटीर्लोके बालको मातरं प्रति। यथा भवति कश्चिन्न तस्या अप्रीतिभाजनः॥23॥
कुर्वन्नपि त्रुटीर्भवतः क्वचित् गायत्र्युपासने। न तथा फलमाप्नोति विपरीतं कदाचनः॥24॥
जिस प्रकार संसार में माता के प्रति भूलें करता हुआ भी कोई बालक उस माता का शत्रु नहीं होता, उसी प्रकार गायत्री की उपासना करने में भूल करने पर कोई भक्त कभी भी विपरीत फल को नहीं प्राप्त होता।
साधना करते-करते जब साधक का हृदय दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण हो जाता है तो सूक्ष्म दैवी शक्ति जो व्यष्टि अन्तरात्मा और समष्टि परमात्मा में समान रूप से व्याप्त है, उस पवित्र हृदय पटल पर अपना कार्य आरम्भ कर देती है और साधक में कई दिव्य शक्तियों का जागरण होने लगता है।
धारयन् हृदि गायत्री साधको धौतकिल्विषः। शक्तिरनुभवत्युग्राः स्वमिन्ने वात्मलौकिकाः॥89॥
पाप रहित साधक हृदय में गायत्री को धारण करता हुआ अपनी आत्मा में अलौकिक तीव्र शक्तियों का अनुभव करता है।
एतादृश्यस्तस्य वार्ता भासन्तेऽल्प्रयासतः। यास्तु साधारणो लोको ज्ञातुमर्हति नैव हि॥90॥
उसको थोड़े ही प्रयास से ऐसी-ऐसी बातें विदित हो जाती हैं, जिन बातों को सामान्य लोग जानने को समर्थ नहीं होते।
एतादृश्यस्तु जायन्ते ता मनस्यनुभूतयः। यादृश्यो न हि दृश्यन्ते मानवेष कदाचनः॥91॥
उसके मन में इस प्रकार के अनुभव होते हैं, जैसे अनुभव साधारण मनुष्यों में कभी भी नहीं देखते जाते।
इन शक्तियों का जागरण मंत्र शक्ति का ही चमत्कार कहा जाना चाहिए। मंत्रों में शक्ति कहाँ से आती और कैसे उत्पन्न होती है यह एक अलग विषय है। यहाँ इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि मंत्रों में प्रयुक्त किये गये शब्द शरीर के विभिन्न अंगों पर अपना प्रभाव उत्पन्न करते हैं और उन्हें सक्रिय सचेतन बनाते हैं। गायत्री संहिता में कहा गया है कि इस मंत्र के अक्षरों का गुंथन इस प्रकार हुआ है कि उसके कारण समस्त गुह्य ग्रन्थियाँ जागृत हो जाती हैं। इनका महत्त्व बताते हुए कहा गया है-
जागृता ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः साध च मानसे। दिव्यशक्तिसमुद्भूति क्षिप्रं कुर्वन्त्यसंशयम्॥26॥
जागृत हुई ये सूक्ष्म यौगिक ग्रंथियाँ साधक के मन में निःसंदेह शीघ्र ही दिव्य शक्तियों को पैदा कर देती हैं।
जनयन्ति कृते पुंसामेता वै दिव्यशक्तयः। विविधान् वै परिणामान् भव्यान् मंगलपूरितान्॥27॥
ये दिव्य शक्तियाँ मनुष्यों के लिये नाना प्रकार के मंगलमय परिणामों को उत्पन्न करती हैं।
परन्तु साधक को इन शक्तियों के उपयोग में सावधान रहने के लिए कहा गया है। शक्तियों का संचय और उनका सदुपयोग ही उपलब्धियों को सार्थक बनाता है अन्यथा अर्जित की गई शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट होती हैं।
तदनुष्ठान-काले तु स्वशक्तिं नियमेज्जनः। निम्नकर्मसु ताः धीमान् न व्ययेद्धि कदाचनः॥72॥
मनुष्य को चाहिए कि वह गायत्री साधना से प्राप्त हुई अपनी शक्ति को संचित रखे। बुद्धिमान मनुष्य कभी उन शक्तियों को छोटे कार्यों में खर्च नहीं करते।
नैवानावश्यकं कार्यमात्मोद्धार स्थितेन च। आत्मशक्तेस्तु प्राप्तायाः यत्र-तत्र प्रदर्शनम्॥73॥
आत्मोद्धार के अभिलाषी मनुष्य को प्राप्त हुई अपनी शक्ति का जहाँ-तहाँ अनावश्यक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
शक्तियों का संचय करने और उपयोगी प्रयोजनों में ही उन्हें नियोजित करने के साथ-साथ साधक को यह भी ध्यान में रखना पड़ता है कि वह इन शक्तियों को निजी प्रयोजनों के लिए उपयोग में न लावे। उसे अपने गन्तव्य लक्ष्य को स्मरण रखना चाहिए और उसकी प्राप्ति तक बड़ी से बड़ी सिद्धियों के भी उपयोग की ललक से बचना चाहिए।
गायत्री को भारतीय संस्कृति की माता और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। यज्ञ की परम पवित्र श्रेष्ठ सत्कर्मों में गणना होती है और गायत्री का सद्विचारणा, सद्भावना की अधिष्ठात्री ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में उल्लेख किया जाता है। यज्ञ की श्रेष्ठ सत्कर्मों में गणना करने के अतिरिक्त उससे वायु शुद्धि, रोग निवृत्ति, मनोबल की वृद्धि, प्राण वर्षा, वातावरण में सत्तत्व प्रवाह आदि अनेकों लाभ गिनाये जाते है।
जिस ज्वलन्त अग्नि का हवन कुण्डों में पूजन किया जाता है उसे प्रतीकात्मक प्रक्रिया ही समझना चाहिए। यह मानवी पिण्ड में वैश्वानर के रूप में विद्यमान है, उसका केन्द्र मूलाधार स्थित कुण्डलिनी शक्ति है। यही अग्नि शरीर में प्राण रूप से संव्याप्त होकर जीवन का संचार करती है। अग्नि पूजा का आध्यात्मिक स्वरूप इसी दिव्य अग्नि की साधना अर्चना कहा जा सकता है।
सृष्टि का कण-कण अद्भुत और अपार शक्ति से सम्पन्न है। यह ब्रह्मांड शक्ति का विराट् रूप है तो अणु उसकी इकाई। लेकिन अणु भी अनेक खण्डों में बंटा हुआ है और अपने आप में अपरिमित शक्ति समाहित किये हुये है। वह अपने इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रान आदि सहयोगियों के साथ अपना सामूहिक क्रिया-कलाप चला रहा है। इलेक्ट्रान सिद्धान्त के अनुसार अणु भी एक छोटे आकार का ब्रह्मांड है। जिसकी तुलना बड़े रूप में सौर मण्डल से की जा सकती है। इस परमाणु पद्धति (ऐटमिक सिस्टम) के केन्द्र से धनात्मक बिजली (पाजेटिव इलेक्ट्रिसिटी) चार्ज होती रहती है। जिसमें चारों तरफ ऋणात्मक बादल समूह की शक्ति मिलती रहती है। इसे ‘इलेक्ट्रान रिवाल्व’ कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भी एक धनात्मक चार्ज केन्द्र में स्थिर रहता है और ऋणात्मक चार्ज उस केन्द्र के चारों और गतिशील रहते हैं। जो बात अणु के ऊपर लागू होती है वही सारे ब्रह्मांड और समष्टि पद्धति पर भी लागू होती है। विश्व पद्धति के सारे ग्रह नक्षत्र सूर्य के चारों और चक्कर लगाते हैं और यह पूर्ण सौर मण्डल किसी दूसरे महाकेन्द्र का चक्कर काटता होगा। अंत में सारे असंख्य सौर मण्डल किसी एक महा-महान स्थिर केन्द्र का चक्कर काट रहे होंगे। वही समस्त ब ब्रह्मांडों का केन्द्र ब्रह्म बिंदु इस सारे महा प्रसार को बाँधे हुए है और अनुशासन में रख रहा है। इसी प्रकार इस समस्त शरीर के समस्त जीव कोषों को एक केन्द्र बिंदु साधे संभाले हुए है। उसे महाप्राण कह सकते हैं। इस महाप्राण के दो ध्रुव हैं- 1. एना वोलिक 2. केटा वोलिक। इन्हें आध्यात्मिक भाषा में सहस्रार चक्र और मूलाधार चक्र कह सकते हैं। इसी के आधार पर हमारी गतिशीलता और चेतना टिकी हुई है। इन दोनों को उपासनात्मक प्रयोजन के लिए शिव और शक्ति भी कहा जाता है। इन दोनों का समन्वय जिस सूत्र द्वारा होता है उसे ही कुण्डलिनी समझना चाहिए।
महाप्राण का एक नाम दिव्य अग्नि भी है ब्रह्म अग्नि को पूरे ब्रह्मांड में संव्याप्त शक्ति ऊर्जा का प्रतीक भी बताया गया है। ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रार चक्र को ब्रह्माग्नि कहा गया है। कहीं-कहीं इसी की चन्द्रमा के रूप में भी चर्चा है। सूर्य या चन्द्र दोनों ही प्रकाश के प्रतीक हैं। दोनों ही ऊर्जा प्रदान करते हैं। सूर्य इसलिए कहते हैं कि इसमें प्रचण्ड ऊर्जा विद्यमान है। चन्द्र इसलिये कहते है कि उसमें शाँति और शीलता का अमृत भरा है। इसे शिव कहते हैं और कुण्डलिनी को शक्ति। कुण्डलिनी साधना को इसीलिए शिव शक्ति की संयोग प्रक्रिया कहा गया है।
पौराणिक भाषा में जिस तत्व को शिव और शक्ति कहते हैं, उसी को वैदिक भाषा में सोम और अग्नि कहते हैं। शिव का दूसरा नाम सोम और शक्ति का ही दूसरा नाम अग्नि है। आगम और निगम दोनों ही शास्त्रपक्ष इसी प्रकार का प्रतिपादन करते हैं। यज्ञ का सूक्ष्म स्वरूप कुण्डलिनी अग्नि और सोम रूपी ब्रह्म का समन्वय, लय, समर्पण ही आत्म यज्ञ है। उसी में मानवी महत्ता का विस्तार एवं जीवन लक्ष्य की पूर्ति सन्निहित है। मानवी काया में स्थित कुण्डलिनी रूपी अग्नि और ब्रह्मरंध्र अवस्थित सोम का वर्णन शास्त्रकारों ने इस प्रकार किया है-
द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। आर्द्रचैव शुष्कं च यदार्द्रं तत् सौम्यं यच्छुष्कं तदाग्नेयम्। -शतपथ
यह संसार दो पदार्थों से मिलकर बना है 1. अग्नि, 2. सोम। इनके अतिरिक्त तीसरा कुछ नहीं है।
अग्निर्वा अहः सोमोरास्थि यदन्तरेण तद् विष्णु। श. प. 3।4।4।15
अग्नि और सोम के मिलन को विष्णु कहते हैं।
इमौ तै पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्यां रक्षांस्यपहंस्यग्ने। ताभ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः। यजु. 18।52
हे अग्नि! तेरे दोनों पंख फड़फड़ाते हैं। उनसे पाप और तम का हनन होता है। इन्हीं पंखों के सहारे हम उस पुण्य लोक तक पहुँचते हैं जहाँ पूर्ववर्ती ऋषि पहुँचे थे।
इन्दुर्दक्षः श्येन ऋतावा हिरण्य पक्षः शकुनो भुरण्युः। महान्तसधस्ये ध्रुव आ निषतो नम ते अस्तु मा मा हिंसी। -यजु. 18।53
हे अग्नि! तू सोम रस से परिपूर्ण है। तू दक्ष है। तू ही ऋत युक्त है। तेरे अमृत सिक्त पंख हैं। तू शक्तिशाली है। पोषक है। तू मस्तिष्क में ध्रुव केन्द्र बनकर विराजमान है। तुझे नमस्कार। तू हमें जलाना मत।
अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्। अथर्व 9।7।1
तुम्हारे ललाट में वह अग्नि उत्पन्न हो जो शिव रूप बनकर काम विकृतियों को भस्म कर सके।
पुरुषो यज्ञः। पुरुषसंमितो यज्ञः। शत. 3।1।4।23
मनुष्य ही यज्ञ है। यज्ञ का स्वरूप मनुष्य पर निर्भर होता है।
एक एवाग्निबहुधा समिद्धः।
उस एक ही अग्नि में अनेक प्रकार से हवन किया जाता है।
शिरोवा एतद् यज्ञस्य यदातिथ्यम्। -तैतरेय ब्रा. 3।6
इस यज्ञ का आतिथ्य स्थल सिर है।
सोम एवं शिव को प्रकरण विशेष से इन्द्र भी कहा गया है। यह इन्द्र और अग्नि संयोग का तात्पर्य भी वही है-
ता हि मध्यम्भराणाणामिन्द्राग्नी अधिक्षितः। ता उ कबित्वना कवी पृच्छयमाना सखीयते संधीतमश्नुतं नरा नभन्तामन्येके समे॥ ऋ. 8।40।3
यह इन्द्र और अग्नि संघर्ष बनकर साथ-साथ निवास करते हैं। यह दोनों ही भावुकता भरे कवि हैं। यह सखा बन कर कर्म में प्रवृत्त होते हैं।
या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उपद्य भिः। इन्द्राग्न्योरनुव्रतमुहाना यन्ति सिन्धावो यान्त्सीं बन्धादमुंचतां नभन्तामन्यके समे। ऋ. 8।40।8
इंद्र और अग्नि दोनों शुभ्र वर्ण हैं। यह दीप्ति बनकर नीचे से ऊपर को चढ़ते हैं। इनके प्रताप से ही शक्ति नदियाँ गतिशील हैं। द्युलोक में पहुँचकर फिर नीचे को चलते हैं। उन्हें यह दोनों ही असीम बनाते हैं।
शरीर व्यापी अग्नि- विश्व व्यापी महाअग्नि का ही एक स्फुल्लिंग है। इसलिए उसे ब्रह्म का अंश ही कहा जाता है। जीव को ईश्वर का अंश ही कहा जाता है। इस ब्रह्माग्नि- आत्माग्नि की प्रार्थना, उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो इस विश्व में पाने योग्य है। इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है-
अयमग्नि ब्रह्म। यजु. 17।14
ब्रह्म ह्यग्निः। शतपथ 1।5।1।11
अग्नियो ब्राह्मणः। ता. ब्रा. 15।4।8 तैत. 2।7।3।1
ब्रह्म ह्यग्नि स्तस्मादाह ब्राह्मणेति। शतपथ. 1।4।2।8
मनुष्य शरीर में विद्यमान यह आत्मा रूपी अग्नि ब्रह्म ही है।
येन ऋषयस्तपसा सत्रमायन्निन्धाना अग्निं स्वराभरन्तः। तस्मिन्नहं निदधे नाके अग्निं यमाहुर्मनवस्तीर्णवर्हिषम्। यजु. 15।49
इस आंतरिक अग्नि को ऋषि लोग अपने तप बल से प्रदीप्त करते हैं और उसे स्वर्गलोक तक पहुँचाकर मस्तिष्क को प्रकाश से भरते हैं। यही दिव्य अग्नि है।
अग्निः पूर्वेभि ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत। स देवां एह वक्षति॥ ऋ. 1।1।2
प्राचीन और अर्वाचीन सभी ऋषि अग्नि का आश्रय लेते हैं क्योंकि वही देवताओं को धारण करती है।
अग्निऋषिः पवमानः पांचजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्। ऋ. 9।66।20
यह अग्नि- ऋषि है। पवित्र करने वाली है। पंच कोशों का मार्ग दर्शक है। इस महाप्राण की हम शरण जाते हैं।
तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्यमतीं जातवेदः। यया राधः पिन्वसि विश्ववार पृथुश्रवो दाशुषे-मर्त्याय। ऋ. 9।5।8
हे अग्नि, हमारे भीतर वे उदात्त आकाँक्षाएं पैदा करो जिनसे प्रभावित होकर तुम प्रसन्न होते हो और कीर्ति एवं सिद्धियाँ प्रदान करते हो।
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहात्वमद्या देवां उषर्बुधः॥ ऋ. 1।44।1
हे अग्नि मेरे जीवन की ऊषा बनकर प्रकटो। अज्ञान के अंधकार को दूर करो। ऐसा आत्मबल प्रदान करो जिससे देवों का अनुग्रह खिंचा चला आवे।
त्वदग्ने काव्यास्त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायंते राध्यानि। त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्थाध्रिये दाशुषे मर्त्याय॥ ऋ. 4।11।3
हे अग्नि! आप सत्य को धारण करने वाले उदार व्यक्ति के अन्तःकरण में कवित्व जैसी करुणा भर देती हो। तुम्हारी ऊष्मा से ही साहसी लोग सिद्धियाँ और सफलताएं प्राप्त करते हैं।
इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन्, भर्गो यशः सहः ओजो क्यो वलम्। त्रयस्त्रिंशद्यानि च वीर्याणि, तान्यग्निः प्र ददातु मे॥ अथर्व. 19।30।1
मुझे अग्नि द्वारा क्या कुछ नहीं मिल रहा? प्रकाश, तेज, यश, प्रभाव, पराक्रम और बल- सभी मेरे अंदर आ रहे हैं। मुझ पर अग्नि की कृपा बनी रहे और मुझे तैंतीस प्रकार के सभी वीर्य प्राप्त होते रहें।
अग्नेऽभ्यावर्तिन्नभि मा निवर्तस्वायुषा वर्चसा प्रजया धनेन सन्या मेधया रय्या पोषेण। यजु. 12।7
हे अग्नि तू आयु, वर्चस, प्रजा, धन, दान, मेधा, रयि, पुष्ट बन कर अपना अनुग्रह हमें प्रदान करें।
यह आत्माग्नि जैसे-जैसे प्रखर होती जाती है, वैसे-वैसे ही उसका स्तर और पद बढ़ता जाता है। चार वर्ण चार आश्रम क्रमिक प्रगति के आधार पर ही विकसित होते हैं। यह उन्नति, ऋषि, राजर्षि, ब्रह्मर्षि, देवर्षि के रूप में होती है। देव वर्ग में गणना करते समय इसी को वरुण, मित्र, विश्वेदेवा और इन्द्र के नाम से पुकारते हैं। ब्रह्म अग्नि के भी चार स्तर हैं जो पदार्थों, जीवों और व्यक्तियों को उनकी पात्रता के अनुरूप उपलब्ध होते रहते हैं। अपनी स्वार्थपरता, अहंता, संकीर्णता एवं पशुता को जो व्यक्ति इस दिव्य अग्नि में होम देता है, वह इतना कुछ उपलब्ध कर लेता है नर से नारायण बन जाता है। कुण्डलिनी साधना व्यक्तिक चेतना को ब्रह्मांड चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया है। उसी के संसर्ग संपर्क से उस दिव्य अग्नि का अभिवर्धन होता है जिसे साधना की सफलता और सिद्धि कहा जाता है।
मन की तीन प्रकार की अतींद्रिय क्षमताएं बतायी गयी हैं। प्रथम वह पदार्थों के रहस्यमय स्वरूप की जानकारी प्राप्त कर सकता है। द्वितीय चर्मचक्षुओं से परे दूरवर्ती स्थानों की जानकारी प्राप्त कर सकता है। तृतीय इसके अंदर भूत और भविष्य को जानने की क्षमता भी विद्यमान है। प्रत्येक मनुष्य के मन के अंदर ये तीनों क्षमताएं सुषुप्तावस्था में विद्यमान हैं। न्यूनाधिक रूप से इसकी जानकारी समय-समय पर आकस्मिक अनुभूतियों अथवा स्वप्नों के माध्यम से मिलती रहती हैं। मन की इन सभी क्षमताओं को कौन कितने अनुपात में विकसित कर सकता है यह प्रत्येक मनुष्य के अपने स्तर एवं प्रयास पर निर्भर करता है।
सामान्य मनुष्य की मनःशक्ति का क्षेत्र बहुत सीमित होता है। उसके मन की ये तीनों क्षमताएं संकीर्ण व उथली होती हैं। पर जैसे-जैसे मानसिक क्षमता बढ़ती जाती है-अन्तरंग जगत विकसित होता जाता है-वैसे-वैसे मन की सामर्थ्य भी बढ़ती है।
मनुष्य के स्वयं के अंदर ही ऐसी विलक्षण क्षमता विद्यमान है जिसे सर्वसाधारण नहीं जान पाते और वे मन की क्षमता को अन्य प्राणियों की तरह उदरपूर्ति और वंश वृद्धि में प्रयुक्त करते हुए जीवन गंवा देते हैं। इसके विपरीत ऋषि, ज्ञानी, योगी अंतरंग जगत में प्रसुप्त पड़ी हुई क्षमताओं को जगाकर स्वयं तो प्रखर और तेजस्वी जीवन जीते हैं तथा जन सामान्य को भी इससे लाभान्वित करते हैं। वे अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार पर स्थान और काल की दूरी को कुछ ही क्षणों में पार कर लेते हैं। काल की सीमा पारकर भूत और भविष्य का ज्ञान प्राप्तकर लेते हैं। यजुर्वेद में भी मन की इस सामर्थ्य का वर्णन इस प्रकार आता है- ‘‘ओऽम् येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीताममृतेन सर्वम्॥’’ -यजु.
‘‘जिस अमृत रूप मन ने इन संपूर्ण भूत, वर्तमान और भविष्य को सब प्रकार से चारों और से ग्रहण किया हुआ है।’’ अर्थात् सुसंस्कृत और सुनियोजित मन भौतिक एवं आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों का उत्पादक क्षेत्र होता है।
मन पर जन्म जन्मान्तरों के संस्कार जमे रहते हैं। पूर्व जन्मों में साधा हुआ मन अगले जन्मों में भी उन्हीं क्षमताओं से परिपूर्ण होता है। यही कारण है कि कई बच्चों में जन्म से ही विलक्षणताएं पायी जाती हैं जो कुछ भी बौद्धिक क्षमता और आँतरिक प्रखरता प्राप्त है जरूरी नहीं कि वे इसी जन्म की हों। यहाँ न केवल पुनर्जन्म की ही बात कही जा रही वरन् यह भी सुनिश्चित है कि पूर्व संस्कारों के प्रतिफल अगले जीवन में देखे जा सकते हैं। मन को निकृष्ट बनाना या उत्कृष्ट बनाना यह हर व्यक्ति पर निर्भर करता है। उसी के अनुरूप वह जीवन में आँतरिक और बाह्य दोनों उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है।
मन जागृत अवस्था में जिस प्रकार इन्द्रिय सामर्थ्य से कई गुना अधिक काम कर दिखाता है उससे भी अधिक विलक्षण, चमत्कारपूर्ण कार्य निद्रितावस्था में कर सकता है। जागृतावस्था में इन्द्रियों के माध्यम से मन का संबंध बाह्य जगत से होता है। निद्रा की स्थिति में इन्द्रिय क्षमता का कोई उपयोग नहीं होता फिर भी मन ऐसी दौड़ लगाता है कि स्थान और काल की दूरी का कोई महत्व नहीं रहता। यहाँ तक कि इस सृष्टि में ऐसी कोई सीमा रेखा नहीं जहाँ मन की पहुँच न हो। यजुर्वेद 34-9 में भी मन की इस सामर्थ्य का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
“वह कौनसा वन है? वह कौनसा वृक्ष है जिससे इस पृथ्वी का निर्माण हुआ है। हे मनीषियों इस प्रश्न का उत्तर अपने ‘मन’ से ही पूछो।” वही इस धरती को वर्तमान स्वरूप देने का श्रेयाधिकारी है।
मन की शक्ति अपरिमित है। जिसका कोई ओर-छोर नहीं। सृष्टि के आरम्भकाल से लेकर जन्म-जन्मांतरों के अनुभव जिस पर अंकित होते आये हैं। उन्हीं पूर्व संस्कारों के आधार पर भावी सम्भावनाओं को भी सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। विगत जन्मों के सभी भले-बुरे संस्कार मन पर अंकित होते हैं लेकिन वे याद नहीं रहते, इसका कारण यह है कि मन वर्तमान परिस्थितियों में ही उलझता रहता है। मन स्थूल जगत से इतना अधिक संबद्ध होता है कि रात-दिन में ऐसा कोई क्षण शेष नहीं रहता जिसमें वाह्य जगत से सम्बन्ध विच्छेद हो जाये। स्थूल जगत के प्रभाव से ही वह हर क्षण प्रभावित रहता है और इस दृश्य जगत को ही सब कुछ मान बैठता है। सूक्ष्म की ओर उसका ध्यान जाता ही नहीं। अपने अन्तस् में झाँकने का अवसर उसे मिलता ही नहीं।
योगियों को विगत जन्मों की कई बातें याद रहती हैं। इसका कारण यह है कि उनका बाह्य जगत से सम्बन्ध उस सीमा तक ही होता है जितना कि उचित है। उनकी संसार में स्थिति “पद्मपत्रमिवाम्भज्ञा” जल में कमल की भाँति होती है। मन पर उनका पूरा नियन्त्रण होता है वे मन को स्थूल जगत में लिप्त होने का अवसर ही नहीं देते। बाह्य प्रभाव उनके मन पर अंकित नहीं हो पाते। अंतर्जगत में वह विचरण करता उसकी गहराई में प्रवेश करता और मनःसमुद्र से ऐसे अमूल्य रत्न खोज लाता है कि सामान्य बुद्धि जिस पर आश्चर्य किये बिना नहीं रहती।
महर्षि पातंजलि ने योग-दर्शन में इसी रहस्य की चर्चा की है-
“संस्कार साक्षात्कारकणणात् पूर्वजातिज्ञानम्”
अर्थात् संस्कारों से साक्षात्कार होने पर पूर्व जन्मों का ज्ञान हो जाता है।
स्पष्ट है, मन पड़े हुए संस्कार कभी विनष्ट नहीं होते। अपनी सामर्थ्य के अनुरूप मनुष्य उन्हें पुनः जागृत कर सकता है। स्वप्नावस्था इनके प्रकटीकरण का एक सरल माध्यम है। योगी मनीषी तो जागृत अवस्था में भी पूर्वस्मृतियों का लाभ उठा सकते हैं किन्तु सामान्य मनुष्यों को स्वप्नों के माध्यम से ही इसकी अनुभूति होती है। योगी का मन पर इतना नियन्त्रण होता है कि वह इच्छानुसार मनःशक्ति को नियोजित कर सकता है, पूर्व संस्कारों को जागृत कर सकता है। विचित्र स्वरूप प्रकट करते हैं। स्वप्नों में ही निरर्थक उछल-कूद मचाते रहने वाला व्यक्ति स्वयं इसका महत्व समझ नहीं पाता, मात्र आश्चर्यान्वित होता रहता है। यदि मन को थोड़ा भी साध लिया जाये तो ये स्वप्न भी हमारे लिए बहुत उपयोगी बन सकते हैं। अन्तस्तल की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण का आधार बन सकते हैं।
ग्रन्थों में तो यहाँ तक कहा गया है कि मनुष्य अपनी मनःशक्ति को विकसित करके अन्य प्राणियों की भाषा, स्वभाव, कार्य आदि का भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है, क्योंकि इस जीवन से पूर्व मनुष्य प्रायः सभी प्राणियों की योनि में जन्म ले चुका होता है। इतना ही नहीं अंतर्मुखी होकर सम्पूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान भी प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि जीव कभी न कभी सारे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है और उसकी मनः चेतना में उस जानकारी का बहुत कुछ पूर्व ज्ञान बना होता है।
मन की तीन अवस्थाएं होती हैं- 1. स्वप्नावस्था 2. जागृतावस्था 3. सुषुप्तावस्था। जागृत और सुषुप्तावस्था के बीच की अवस्था स्वप्न की होती है। वृहदाण्यकोपनिषद में इसका उदाहरण इस प्रकार दिया गया है कि जिस प्रकार एक बड़ा मगरमच्छ नदी के एक तट से दूसरे तट की ओर आता जाता है उसी प्रकार मनुष्य भी स्वप्नावस्था में पड़ा हुआ नदी के दोनों किनारों की तरह जागृत और सुषुप्ति के सिरों का स्पर्श करता रहता है। जीवन रूपी प्रवाह के जागृत और सुषुप्ति दो किनारे हैं। स्वप्नावस्था को मध्य धारा कहा जा सकता है। इस दृष्टि से भी स्वप्नावस्था का महत्व असामान्य है।
सामान्यतः स्वप्न में दो क्रियाएं होती हैं। एक तो बुद्धि व इन्द्रियों का बाह्य जगत् से सम्बन्ध विच्छेद होना तथा दूसरा मन का अंतर्जगत् में विचरण करना। स्वप्न व मन की एक विशेष अवस्था है जिसमें ये दोनों क्रियाएं अनिवार्य रूप से होती हैं। मन की अनेकों क्रियाओं में स्वप्न भी एक महत्वपूर्ण क्रिया है।
एक तो स्वप्न प्राकृतिक होते हैं, दूसरे प्रयत्नपूर्वक उत्पादित। दिवास्वप्न-कल्पनाओं के साथ तन्मय हो जाने पर दिखाई पड़ते हैं। अचेतन को तांत्रिक करके भी हिप्नोटिज्म पद्धति से स्वप्निल स्थिति उत्पन्न ही जा सकती है। किन्तु उच्चस्तरीय मनःसाधना में यह कार्य ध्यान धारणा द्वारा एकाग्रता उत्पन्न करके भी किया जा सकता है। समाधि इस विज्ञान की चरम परिणित है। उसमें जो दिव्य-दर्शन होता है उसे सत्य का साक्षात्कार एवं ईश्वर सान्निध्य स्तर का समझा जा सकता है। उस स्थिति में विराट् ब्रह्मांड के सभी रहस्य अपने आप प्रकट होने लगते हैं। चेतना जगत की ब्रह्म सत्ता अपना अन्तराल उस स्थिति में साधक के सामने खोलकर रख देती है। कहने वाले तो इस स्थिति को भी एक विशेष प्रकार का स्वप्न ही कहते, समझते देखे गये हैं।
तत्त्वदर्शियों के मन के दो भेद बताये हैं। एक समष्टिगत मन और दूसरा व्यष्टिगत मन। ब्रह्म का मन समष्टिगत है और समस्त प्राणियों का मन व्यष्टिगत। ब्रह्म के मन के आधार पर ही सृष्टि के सम्पूर्ण क्रियाकलाप निर्धारित होते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति भी ब्रह्म की इच्छा से हुई। ऋग्वेद में कहा गया है-
“कामास्तदग्ते समबर्तताधि मनसोरेतः प्रथमं यदासीत्”
जब सृष्टि बनने लगी तो सबसे पहले काम की उत्पत्ति हुई। यह काम मन का रेतस् अर्थात् वीर्य है।
ब्रह्म ही सृष्टि का निर्माता नियन्ता है। समर्पण सृष्टि ब्रह्म की इच्छा से उत्पन्न हुई। सृष्टि की गतिशीलता ब्रह्म के मन द्वारा ही संचालित है। ब्रह्म के इस समष्टिगत मन से ही व्यष्टिगत मन की उत्पत्ति हुई है। समुद्र की असंख्य लहरों के समान, सूर्य की अनेकानेक किरणों के समान ही समष्टिगत मन और व्यष्टिगत मन एक दूसरे के जुड़े हुए हैं। ब्रह्म के मन का अंश ही व्यष्टिगत मन है। जो सामर्थ्य समष्टिगत मन में है वही व्यष्टिगत मन में भी बीज रूप में विद्यमान है।
सामान्यजनों का मन भ्रान्तियों के जाल-जंजाल में उलझा हुआ और लिप्साओं में भटकता हुआ देखा जाता है। अवास्तविक और अनुपयोगी उड़ाने उड़ने में ही प्रायः उसकी क्षमता नष्ट होती रहती है। यह अनगढ़ मनः स्थिति है। यदि उसे सुधारा बदला जा सके और निग्रहित एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके तो निश्चय ही साधा हुआ मन कल्प वृक्ष की तरह सब कुछ प्रदान करने वाला और परम लक्ष्य अमृतत्व की प्राप्ति तक पहुँच सकने में सहायक हो सकता है।
-युग साहित्य का छः भाषाओं में प्रकाशन-
देश के सभी शिक्षितों तक प्रज्ञा अभियान का आलोक पहुँचाने के लिए हर दिन युग साहित्य की एक पुस्तिका छापने- हर व्यक्ति को दैनिक स्वाध्याय के लिए उसे बिना मूल्य घर बैठे-नित्य रूप से पहुँचाने की योजना बनी है। इसे ‘प्रज्ञा पुत्रों’ द्वारा तत्काल चालू किया जा रहा है।
युग साहित्य की पच्चीस पैसे वाली पुस्तिकाएं छपेंगी। सस्तेपन, सुन्दरता और उत्कृष्टता की दृष्टि से इसे प्रकाशन क्षेत्र का एक कीर्तिमान कहा जा सकेगा। इस साहित्य को इस वर्ष हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, उड़िया, बंगला इन पाँच अन्य भाषाओं में भी छापा जा रहा है। देश और विश्व की अन्य भाषाओं के क्षेत्र में भी इसी प्रकार क्रमशः बढ़ा जायेगा।
इस वर्ष जिन भाषाओं में यह प्रकाशन होगा उनके अच्छे अनुवाद की आवश्यकता पड़ेगी। परिजनों में से जो इसके लिए अपनी योग्यता को उपयुक्त समझते हैं वे इस अनुवाद कार्य में भी सहायता करने का अनुग्रह करें। सहयोग देने वाले शान्तिकुंज हरिद्वार के पते पर पत्र-व्यवहार कर लें।
युग अर्थात् समष्टिगत वातावरण। काल गणना में मास सप्ताह की तरह समय का गणित विभाजन करना हो तो बात दूसरी है अन्यथा भले-बुरे समय के संदर्भ में यदि युग की चर्चा अभीष्ट हो तो समष्टि चेतना की दिशाधारा के साथ ही उसका सम्बन्ध जोड़ना पड़ेगा।
सत युग की श्रेष्ठता का ग्रहों के परिभ्रमण पर निर्भर काल-गणना का कोई सम्बन्ध नहीं है। सतयुग की श्रेष्ठता काल-प्रवाह के बीच-बीच में भी अनेक बार उभरती रहती है। रामराज्य त्रेता में और परीक्षित राज्य द्वापर में गिना जाता है तो उन दिनों सतयुगी वातावरण ने प्राणियों और परिस्थितियों को उत्साहवर्धक अनुदान दिये थे।
फिर भी यदि काल-गणना के अनुरूप कलियुग, सतयुग का विवेचन करना है और कलियुग को बुरे समय का प्रतीक मानने का हठ हो तो भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि युग बदलने का समय आ गया। कलयुग अब विदा हो रहा है और उसके स्थान पर ऐसा समय आ रहा है जिसे सतयुग कहा जा सके।
मनुस्मृति, लिंग पुराण तथा भागवत में दी गई गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रामण काल है। प्राचीन ग्रन्थों में हमारे इतिहास को पाँच कल्पों में बांटा गया है। (1) महत् कल्प-1 लाख 98 सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक। (2) हिरण्य गर्भ कल्प 85800 विक्रम पूर्व से 61900 पूर्व तक (3) ब्राह्म कल्प 61800 विक्रम पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक (4) पाद्म कल्प 37800 विक्रम पूर्व से 13800 वर्ष पूर्व तक (5) वाराह कल्प 13800 वर्ष विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर अब तक चल रहा है।
अब तक वाराह कल्प के स्वायंभुव मनु, स्वारोचिष मनु, उत्तम मनु, तामस मनु, रैवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतर्दशा चल रही है। कल्कि पुराण में वाराह कल्प में सावर्णि मनु के दक्ष, ब्रह्म, और इन्द्र सावर्णियों के मन्वन्तर बीत जाने तक ‘कल्कि’ अवतार होने तथा धरती में कलियुग की संध्या समाप्त होकर सतयुग आरम्भ होने का उल्लेख आता है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रम सम्वत् आरम्भ होने के 4730 वर्ष पूर्व हुआ था। इन्द्र सावर्णियों के मन्वन्तर के बाद ही कल्कि के प्राकट्य और कल्कि सम्वत् प्रचलित होने की बात लिखी है, कलि के जन्म से प्रारम्भ होता है और वि. सं. 1970 के आस पास तक पाया जाता है।
कलियुग सम्वत् की जानकारी के लिए राजा पुलकेशिन ने विद्वान ज्योतिषियों से गणना कराई थी। दक्षिण भारत के ‘इहोल’ नामक स्थान पर प्राप्त हुए शिला लेख में जो उल्लेख आता है उससे यही सिद्ध होता है कि बौद्ध प्रभाव को निरस्त करने वाले कल्कि का प्राकट्य इन दिनों होना चाहिए। भारत के ‘पुरातन इतिहास शोध संस्थान’ मथुरा के शोधकर्ताओं ने इसी तथ्य की पुष्टि की है और ज्योतिष के आधार पर यह सिद्ध किया है इस समय ब्राह्मरात्र का तमोमय संधिकाल है। कुछ पंडितों की मान्यता है कि युग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होता है। इस हिसाब से तो नया युग आने में 3 लाख 24 हजार वर्ष की देरी है। लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। शास्त्रीय प्रतिपादन की गवेषणाओं, तथ्यों और ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणों के संदर्भ में देखते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि ये प्रतिपादन भ्रामक ही हैं।
4 लाख 32 हजार वर्ष के एक युग की कल्पना सूर्य के वृहद चक्र से की गई है। सूर्य जितने समय में अपने ब्रह्मांड की पूरी परिक्रमा कर लेता है, उसी अवधि को इस प्रकार चार बड़े भागों में बाँट कर, उसके चार युग बनाने और प्रत्येक युग की अवधि लाखों वर्ष की बतला कर प्रचलित युग गणना के साथ तालमेल बैठाने के लिए छोटे युगों को अंतर्दशा की संज्ञा दी गई है। इसी से लोगों को समझाने में भ्रम हुआ अन्यथा कई शास्त्रों में युग गणना के सम्बन्ध में स्पष्ट बताया गया है।
मनुस्मृति में युगों की अवधि के सम्बन्ध में कहा गया है-
ब्राह्मस्यतु क्षपाहस्य यत्प्राणं समासतः। एक कशो युगानान्तु क्रमशस्तन्निबोधतः॥ चत्वार्या हु सहस्त्राणि वर्षाणान्तु कृतयुग। तस्यतावत् शती संध्या संध्याशश्च तथा विधः॥ इतरेषु सं संध्येषु स संध्याशेषु च त्रिषु। एकोपायेन वर्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च॥ अध्या. 1।67-70
अर्थात्- ब्रह्माजी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश होने में जो युग माने जाते हैं, वह इस प्रकार हैं- 4 हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात् 4 सौ वर्ष की पूर्व संध्या तथा 400 सौ की उत्तर संध्या कुल 4800 वर्ष का सतयुग। इसी प्रकार 3600 वर्ष का त्रेता, 2400 वर्ष का द्वापर और कलियुग 1200 वर्ष की आयु का होता है।
हरिवंश पुराण, लिंग पुराण तथा श्रीमद्भागवत की युग गणनाएँ भी ठीक मनुस्मृति की गणना से मिलती हैं।
चत्वारि सहस्त्राणि मानुषाणि शिलासन। आयुः कृतयुगेविद्धि प्रजानानि हसु व्रत॥ ततः कृतयुगे तस्मिन संध्याश्चेगते तुवै। पादावशिष्यो भवति युगधर्म्म सुसुव्रत। चतृर्भागै कहनिन्तु त्रेतायुग मनुतमम्॥ कृतार्द्धम् द्वापरम् विद्धितदर्द्धम् तिष्यमुच्यते। त्रिशती द्विशती संध्या तथाचैक शतीमुने। सध्यांश कथिताऽप्येवं कल्पेष्वेवं युगे युगे॥ -लिंग पुराण
अर्थात्- सतयुग चार हजार मानवी वर्षों का होता है। त्रेतायुग तीन हजार वर्ष का होता है। द्वापर युग दो हजार वर्ष का होता है। सतयुग की संध्या चार सौ वर्ष की होती है और संध्यांश भी चार सौ वर्षों का होता है। इस प्रकार सतयुग कुल मिलाकर चार हजार आठ सौ वर्षों का होता है। त्रेता कुल मिलाकर तीन हजार छह सौ वर्षों का होता है। द्वापर युग दो हजार चार सौ वर्षों का तथा कलियुग एक हजार दो सौ वर्षों का होता है।
हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में भी इसी प्रकार का युगानुमान बताया गया है।
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पतिः। एक राशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदाकृतम्॥ -महाभारत वन पर्व 190
अर्थात्- हे अर्जुन! उस समय जब चन्द्रमा सूर्य पुष्प नक्षत्र तथा बृहस्पति एक राशि में समान अंशों में हो जायेंगे तब फिर नये युग की परिस्थितियाँ तेजी से प्रादुर्भूत होंगी।
इन समस्त गणना आधारों को देखते हुए वह समय ठीक इन्हीं दिनों है जिसमें युग बदलना चाहिए। अनय को निरस्त करने और सृजन को समुन्नत बनाने वाली दिव्य शक्तियों का प्रबल पुरुषार्थ इस युग सन्धि में प्रकट होगा। जो सन् 80 से 2000 तक बीस वर्षों की है।
ऊर्जा की अन्यान्य शक्तिधाराओं में चुम्बक का अपना स्थान है। उसके द्वारा पदार्थ और प्राणी किस प्रकार प्रभावित होते हैं, इसकी जानकारी मनुष्य की ज्ञान सम्पदा में अभी इतना स्थान प्राप्त नहीं कर सकी है, जितना कि उसे करना चाहिए था। साधारणतया लौह चुम्बक का खेल साँप न्यौले की लड़ाई की तरह एक कौतुक-कौतूहल के रूप में देखा जाता है।
बहुत हुआ तो याँत्रिक तकनीकी में उसका जब-तब जहाँ-तहाँ उपयोग होता है। ग्रह-नक्षत्र परस्पर चुम्बकत्व से बंध हैं। मनुष्य शरीर में स्नायुसंस्थान में बहने वाले विद्युत प्रवाह में चुम्बकत्व की मात्रा रहती है। इतना तो बहुत हल्की-फुल्की जानकारी की तरह माना जाता रहा है। फिर भी इस ओर कम ही ध्यान गया है कि भौतिक एवं प्राणि स्तर के चुम्बकत्व का अधिक महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए किस प्रकार कितनी मात्रा में उपयोग सम्भव हो सकता है।
नवीनतम शोध निष्कर्षों ने यह प्रकाश दिया है कि शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों की निवृत्ति में भी चुम्बक उपचार का सफल उपयोग हो सकता है। स्वस्थता सम्वर्धन एवं रुग्णता निराकरण के अन्य उपचार जितना काम करते हैं, उससे कहीं अधिक उपयोग चुम्बकत्व का हो सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य प्राणियों को तथा वनस्पतियों को भी उससे प्रभावित तथा लाभान्वित करने का भी उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।
एक बार कुछ गड़रिये चट्टान पर बैठकर भोजन कर रहे थे। जब वे चलने लगे तो देखा उनकी लाठियाँ चट्टान से चिपक गई थीं। घबराहट के कारण उनके मुँह से चीख निकल गई। ‘भूत-भूत’ कहकर वे भागे। झाड़फूंक करने वाला ओझा आया। बाद में एक सयाने ने अक्ल लगायी और पता चला कि चट्टान में चुम्बक है और उसने लाठियों में लगे लोहे को चिपका रखा है।
चुम्बक के बारे में जबसे इसकी खोज हुई है- कई कहानियाँ प्रचलित हैं। जैवचुम्बकत्व से संबंधित खोजें काफी दिलचस्प परिणाम हमारे समक्ष रख चुकी हैं। उनमें एक और अध्याय जुड़ता है- चुम्बकीय चिकित्सा या मैग्नेटथेरेपी के रूप में।
किसी व्यक्ति को देखकर अपनापन-सा महसूस होना, उसकी ओर आकर्षित हो जाना एवं किसी की सूरत देखते ही डर या घृणा का अनुभव होना मनोवैज्ञानिकों व जैव वैज्ञानिकों के लिये उलझन का विषय रहा है। रूसी वैज्ञानिकों ने जैव-चुम्बकत्व से संबंधित कुछ दिलचस्प निष्कर्ष अभी पिछले दिनों प्रकाशित किये हैं, जिनसे इस विषय पर प्रकाश पड़ता हैं।
प्रोफेसर वी.वी.येफिमोव का कहना है कि इस सारी क्रिया का कारण जीवजगत में, जिसमें वनस्पतियाँ भी शामिल हैं एक प्रकार के चुम्बकत्व का होना है। उनके अनुसार पक्षियों का एक पंक्ति या फिर अलग-अलग प्रकार से उड़ना। उत्तर की तरफ बोये जाने वाले बीजों में अन्य दिशाओं की अपेक्षा कम समय में अंकुर फूटना आदि पृथ्वी तथा जीव वनस्पतियों के चुम्बकीय तत्वों के कारण हैं।
वैज्ञानिक इस बात को मानने लगे हैं कि भू-चुम्बकीय क्षेत्र जीव कोशिका की जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं व जैव तरंगों में परिवर्तन कर देता है तथा अनेक पशुओं के स्नायविक तंत्र को प्रभावित कर देता है।
माइकेल फैराडे ने वर्षों पहले कहा था कि सभी पदार्थों में चुम्बकीयता की क्षमता हो सकती है। लेकिन इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग पदार्थों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। लेकिन अभी हाल ही तक चुम्बक की जीव-जगत में उपस्थिति को किसी ने स्वीकार नहीं किया था। डच वैज्ञानिक मैग्नस ने कुत्ते पर परीक्षण कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि अनुमस्तिष्क के आसपास कुछ ऐसी कोशिकायें अवश्य हैं, जिनसे चुम्बक नियंत्रण होता है। कुत्ते के अनुमस्तिष्क को निकालने के बाद यह देखा गया कि जब उसके शरीर पर उंगली रखी गयी तब अंगुली को कुत्ते के शरीर से उठाने में कठिनाई हुई।
यदि यह बात सही है कि शरीर और वनस्पतियों में कोई न कोई चुम्बकीय तत्व अवश्य होता है तो आगे चल कर मनुष्य के जीवन में बहुत से क्रान्तिकारी परिवर्तन होंगे, जिनमें से एक चुम्बक की सहायता से मनन तथा चिन्तन को प्रभावित करना भी होगा। चुम्बक से चिकित्सा की बातें अभी तक विज्ञान की कसौटी पर कसी नहीं गई हैं, लेकिन इस दिशा में वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं। विज्ञान सतत् रूप से यह सिद्ध करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है कि चुम्बक जीवन में भलाई के लिये परिवर्तन करेगा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर के किसी भी अंग में दर्द, जोड़ों की जकड़न, दाँत के दर्द, विशेष कर आधा सीसी के दर्द को चुम्बक की सहायता से ठीक किया जा सकता है। काफी हद तक यह मोटापा दूर करने की मदद कर सकता है। इन दिनों अमेरिका, रूस, जापान, कनाडा, भारत आदि अनेक देशों में चुम्बकीय चिकित्सा तेजी से लोकप्रिय होती जा रही है।
आज विज्ञान का पुट मिल जाने की वजह से यह पद्धति नई भले ही लगती हो, लेकिन ऐसे प्रामाणिक उद्धरण वेदों में भी मिलते हैं कि लोगों को इस चिकित्सा पद्धति की जानकारी थी। अथर्ववेद में रेत द्वारा रक्तस्राव रोकने एवं पत्थर द्वारा स्त्री रोगों के उपचार का वर्णन आता है। चुम्बक में भी रेत, बेरियम और आयरन आक्साइड होता है। यही तीनों मिलकर चुम्बक में मानव शरीर की चिकित्सा के गुण उत्पन्न करते हैं। मिस्र की सुँदरी क्लियोपेट्रा के बारे में प्रसिद्ध है कि वह अपनी सुंदरता बनाये रखने के लिए माथे पर छोटा चुम्बक लगाये रखती थी।
सोलहवीं शताब्दी में भी स्विस चिकित्सक फिलिपस पेरासेल्सस ने चुम्बक की महत्ता की ओर संकेत किया था। उसका कहना था कि चुम्बक मानव शरीर के बाहरी एवं भीतरी दोनों तरह के रोगों का उपचार करने में सक्षम है। इस सिद्धान्त को मेस्सर ने बहुत प्रचारित किया। स्विट्जरलैंड के डा. फैंस ऐंटन मेस्सर ने भीषण सरदर्द से परेशान एक महिला फ्रेंज ऑस्टरलीन का चुम्बक से इलाज कर एक आश्चर्यजनक उदाहरण प्रस्तुत किया। बाद में डा. मेस्सर ने इसी चुम्बकीय प्रभाव के सिद्धान्त पर उंगलियों से वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करने की क्रिया आरम्भ की जो मैस्मरेज्म के नाम से विख्यात हुई। उन्हीं के समकालीन डा. सेम्युएल हैनीमेन ने भी चुम्बक के प्रभावों को स्वीकार कर इस चिकित्सा विधि की महत्ता प्रतिपादित की।
माइकल फैराडे द्वारा बताये गये जैविक चुम्बक के सिद्धान्त पर विश्व के अनेक देशों के वैज्ञानिकों ने अनुसंधान किये व तदनंतर वर्तमान आधुनिक चुम्बक चिकित्सा पद्धति का आरम्भ हुआ।
चुम्बक की तंरगों का मानव शरीर पर प्रभाव पड़ता है। यदि किसी शक्तिशाली पर हथेली पर रखें और फिर हाथ पर आलपिन रखें तो चुम्बकीय प्रभाव की वजह से वह खड़ी रहेगी। विज्ञान यह भी सिद्ध कर चुका है कि पृथ्वी एक विशाल चुम्बक है। इसी तरह सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह भी अपने चुम्बकीय गुणों द्वारा मानव शरीर को प्रभावित करते हैं। पृथ्वी के दो ध्रुव चुम्बक के उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव हैं। मानव शरीर को यदि उत्तर की ओर सिर और दक्षिण की और पैर करके लिटा दिया जाये तो उसका सिर और पैर उत्तर-दक्षिण ध्रुव माने जा सकते हैं। उसके शरीर में उत्तर तथा दक्षिण ध्रुवों के चुम्बकीय प्रभावों का संतुलन कायम हो जाता है। स्वस्थ शरीर में लगातार चुम्बकीय संतुलन होने से शरीर के विभिन्न रोग हो सकते हैं इसलिये शास्त्रीय मान्यता यही है कि लगातार इस स्थिति में कभी नहीं सोना चाहिये।
सामान्यतः शरीर को जैवचुम्बकत्व विज्ञान के अनुसार दो भागों में बाँटा जा सकता है। कमर से ऊपर का भाग उत्तर ध्रुव का क्षेत्र तथा नीचे का दक्षिण ध्रुव का क्षेत्र और लम्बवत स्थिति में दांया भाग उत्तर ध्रुव का क्षेत्र तथा बांया भाग दक्षिण ध्रुव का क्षेत्र माना जाता है। आज विश्व के सभी वैज्ञानिक इस बात से सहमत हो गये हैं कि मानव शरीर पर चुम्बक का बहुत तीव्र प्रभाव पड़ता है और इसके सही उपयोगों द्वारा अनेक रोगों का उपचार किया जा सकता है।
मानव शरीर में रक्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। रक्त में होने वाले परिवर्तन ही हमें रोगी या निरोगी बनाते हैं। हमारे शरीर पर जब चुम्बक तरंगों का प्रभाव पड़ता है तो इससे रक्तवाहिनी नलियों से हल्की-सी विद्युत तरंग उत्पन्न होती है। इससे रक्त प्रवाह तेज होता है, आयन की मात्रा उसमें बढ़ जाती है, और यह आयनयुक्त रक्त पूरे शरीर में अपना प्रवाह ले जाता है। इससे लाल रक्तकणों की संख्या काफी बढ़ी जाती है और सफेद रक्तकणों के साथ संतुलन बिगड़े बिना रक्त प्रवाह की प्रक्रिया अच्छी हो जाती है।
बायोमैग्नेटिक थेरेपी के अनुसार शरीर की सभी कोशिकाओं में जैविक विद्युत प्रवाहित होती है। पोटेशियम और सोडियम आयन सभी कोशिकाओं में धनात्मक और ऋणात्मक आयन में पृथक हो जाते हैं। चुम्बक का प्रभाव इन दोनों आयनों का संतुलन बैठाना है। चुम्बक का उत्तर ध्रुव चोट से होने वाले रक्तस्राव को कम करता है। जले हुए भाग पर जलन कम करना व अति अम्लता को रोकना भी उत्तर ध्रुव का काम है।
कैल्शियम की अधिकता को कम करने में, रक्त-धमनियों में जमे कोलेस्टेरॉल की पर्तों को कम करने में एवं नाडियों एवं पुठ्ठों के दर्द को कम करने में यह सहायक होता है तथा सूजन आदि कम कर देता है।
चिकित्सा प्रयोजन के लिए, पदार्थों की चुंबक शक्ति का उपयोग किस तरह हो सकता है? इन संदर्भ में शोध कार्य का जो सिलसिला इन दिनों चला है, उसमें सफलता मिलती जायेगी, उतना ही दुर्बलता और रुग्णता से छुटकारा पाने का एक सस्ता एवं प्रभावी सूत्र मनुष्य को हस्तगत हो जायेगा।
उच्चस्तरीय वर्ग के जीवन्त चुम्बकत्व मनुष्य के अपने शरीर में विद्यमान हैं और उसे प्रयत्नपूर्वक अधिक समर्थ बनाया जा सकता है। तत्त्वदर्शी इस प्रवाह को ‘प्राण’ करते रहे हैं और उसकी न्यूनाधिकता को मनुष्य की आन्तरिक समर्थता का आधार बताते रहे हैं। साहस और संकल्प के, पराक्रम और पुरुषार्थ के रूप में उसी के द्वारा कई प्रकार की असाधारण उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। सौंदर्य एवं प्रतिभा का आकर्षण इसी क्षमता पर निर्भर है। ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी कहे जाने वाले व्यक्ति वस्तुतः प्राणवान ही होते हैं, उनकी प्राण प्रखरता ही अनेकों विशिष्टताओं एवं विभूतियों के रूप में परिलक्षित होती है।
प्राण संवर्धन के लिए प्राणायाम जैसे व्यायाम उपचार एवं अनुष्ठान, तप-साधना जैसे अध्यात्म योगाभ्यासों का अवलम्बन किया जाता रहा है, पर उसे उतना महत्व नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। व्यक्तित्व में प्राण ऊर्जा का चुम्बकत्व इतनी मात्रा में भरा जा सकता है जिसे मनुष्य अपने को हर दृष्टि से अधिक प्रभावशाली बना सके, अधिक पुरुषार्थ कर सके, एवं अधिक सहयोग संपादित कर सके, अधिक सफलता सम्पादित करने में समर्थ हो सके।
कुसंग और सत्संग का जो चमत्कारी परिणाम देखा जाता है, उसमें विचार विनियम, परामर्श, अनुकरण जैसे सामान्य कारण उतने प्रभावी नहीं होते जितना कि व्यक्ति विशेष का चुम्बकत्व। उसकी उत्कृष्टता, निकृष्टता का समीपवर्ती लोगों पर भले-बुरे अनुदान उड़ेल देना भी संभव होता है। चिकित्सा-प्रयोजनों में चुम्बकत्व की सामर्थ्य का उपयोग होने लगे तो यह अच्छी परम्परा चलेगी। इससे भी बड़ी बात इस संदर्भ में यह हो सकती है कि वैयक्तिक चुम्बकत्व का महत्व समझा जाय, प्राण साधना द्वारा उसे क्षमता को बढ़ाया जाय और ऐसे उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग किया जाये जिससे न केवल रुग्णता का निवारण संभव हो वरन् उत्कृष्टता का समग्र संवर्धन भी इस माध्यम से संभव हो सके।
मनुष्य का निर्माण करते समय परमात्मा ने उसमें इतनी सम्भावनाएं भर दी हैं कि उनकी कोई सीमा नहीं है। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से अध्ययन और विश्लेषण करने पर भी यह नहीं जाना जा सका है कि मनुष्य के विकास की अन्तिम सीमा क्या है? इतना ही कहा जा सकता है कि ईश्वर के संबंध में, उसकी शक्तियों और विशेषताओं को लेकर जो कल्पनाएं की जाती हैं वे सभी मनुष्य में बीज रूप से विद्यमान हैं। वह चाहे तो इन शक्तियों को बड़े मजे से विकसित कर सकता है और सृष्टि की प्रत्येक कृति में जो चमत्कार दिख पड़ता है, उसी प्रकार वह अपने व्यक्तित्व एवं कर्त्तव्य को बढ़ चढ़ कर सराहनीय, अभिनंदनीय तथा अनुकरणीय बना सकता है। ऋषि, योगी, तपस्वी और महामानव इसी चमत्कारी स्तर के हुए हैं। उनका जीवन क्रम इतनी उच्चकोटि का रहा है कि वे सामान्य मनुष्यों की तुलना में बहुत उच्चकोटि के कहे जा सकते हैं।
मानव जाति को उन्होंने अपने अनुदानों से जिस प्रकार उपकृत किया उसका स्मरण कर, उनके सामने श्रद्धा से नतमस्तक ही होना पड़ता है। जिन परिस्थितियों में रहते हुए उन्होंने उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अपनाये रखा उसे एक चमत्कार ही कहा जा सकता है। परन्तु आजकल चमत्कारों की दूसरी ही परिभाषा की जाती है। इस शब्द का और ही अर्थ लगाया जाता है, जिसकी न आवश्यकता है और न उपयोगिता।
मनुष्य का या सिद्ध, सन्तों का सबसे बड़ा चमत्कार है उनका आत्मबल, जो उन्हें कठिन से कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों तथा सिद्धांतों पर दृढ़ बनाये रहता है। यही चमत्कारी क्षमता, जिसे आत्मबल कहा जा सकता है। सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध, एक छोटे से राज्य के राजकुमार को महावीर, गड़रिये के बेटे को ईसा, सामान्य साधु को समर्थ रामदास, वासना में लिप्त कामुक व्यक्ति को तुलसीदास, एक पुजारी को रामकृष्ण परमहंस, घर से भागे हुए नवयुवक को ऋषि दयानंद, साधारण वकील को विश्व-वंद्य महात्मा गाँधी, एक अध्यापक को महायोगी अरविन्द बनाता है। सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए ऊपर उठ कर महामानवों की और देवपुरुषों की पंक्ति में जा विराजना क्या कम बड़ा चमत्कार है? किन्तु लोगों की चमत्कारी की परिभाषा ही भिन्न है और वे बाजीगर के से करतबों को चमत्कार मान बैठते हैं, जिससे न किसी को लाभ मिलता है न किसी को कोई प्रेरणा या प्रकाश। इस तरह के करतब जादूगर भी बता सकते हैं, परन्तु लोग उन्हें बाजीगर कहते हैं, तथा वही करतब कोई धर्मध्वजी साधु वेशधारी व्यक्ति बताता है तो उसे सिद्ध पुरुष, चमत्कारी महामानव कहने लगते हैं और उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
यदि जरा भी समझ और विवेक से काम लिया जाए तो आसानी से समझा जा सकता है कि उस तरह का चमत्कार बताने की किसे फुरसत है? और उसका क्या उद्देश्य हो सकता है? जिनमें आत्मबल होता है, वे उसका भौंड़ा प्रदर्शन नहीं करते। उन्हें न लौंग-इलाइची हवा में से निकाल कर उछालते रहने की फुरसत है तथा न ही बालों में से बालू निकाल कर दिखाने की जरूरत है कि आओ देखो, मेरे पास कितनी ऋद्धि-सिद्धि है? सम्पन्न व्यक्ति अपने धन को सुरक्षित रखते हैं तथा उसे मजबूत तिजोरियों में बंद कर किसी को बताते नहीं। पूछने पर चुप हो जाते हैं या टाल जाते हैं। कारण स्पष्ट है कि बहुमूल्य उपलब्धियाँ यदि खुली पड़ी रहें तो उनके चोरी होने, खोजाने का पूरा खतरा रहता है। वास्तव में जिन्होंने कोई आध्यात्मिक सम्पदा कमाई है, उन्हें इस तरह का चमत्कार प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं है।
ऐसी बात नहीं है कि वे चमत्कारों का प्रदर्शन करने में असमर्थ होते हैं। आत्मबल संपन्न व्यक्ति किसी भी असंभव काम को संभव कर दिखाता है। सृष्टा के सृष्टि नियमों को नियन्त्रित करने की उसमें सामर्थ्य होती है। परन्तु वह अपनी सामर्थ्य का दुरुपयोग नहीं करता। जहाँ कहीं आवश्यकता होती है वहाँ केवल दूसरों के कल्याण और लोकमंगल के लिए ही वह अपनी शक्तियों का उपयोग करता है। इसलिए जहाँ अलौकिक चमत्कारों का विज्ञापन और प्रदर्शन किया जा रहा हो, वहाँ समझना चाहिए कि खतरा है। ऐसे प्रसंगों में हाथ की सफाई-चालाकी के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता जो इस तरह के चमत्कारों से प्रभावित होकर तथाकथित अलौकिक महापुरुषों के फेर में पड़ेगा उसे अन्ततः पछताने के सिवा कुछ भी हाथ न लगेगा। अक्सर ठग और धूर्त किस्म के लोग ही इस तरह के चमत्कारी वेश बना कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए भोले, सीधे और नासमझ लोगों को ठगते रहते हैं।
इस तथाकथित अलौकिक चमत्कारी सिद्धि सम्पन्न समझे जाने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा तो बाजीगर ही अधिक ईमानदार होते हैं। वे संत बाबाओं की तरह किसी को अपने चंगुल में तो नहीं फंसाते, न उनकी तरह के अनैतिक प्रतिपादन करते हैं। प्रदर्शन के समय वे स्पष्ट रूप से अपनी चतुरता, कलाकारिता और हाथ की सफाई होने की बात कह देते हैं और इन प्रदर्शनों का उद्देश्य लोगों का मनोरंजन कर अपना गुजारा करना बता देते हैं। लोग भी जादूगरों के संबंध में यही धारणा बना कर काम चला लेते हैं कि यह मनोरंजक व्यवसाय है किन्तु तथाकथित अलौकिक बाबाओं के दावों से तो वे इतना प्रभावित होते हैं कि उनके आज्ञा इच्छानुवर्ती दास बन जाते हैं।
कहना नहीं होगा कि इस तरह के दावे और साधु बाबाओं द्वारा किये जाने वाले चमत्कारी प्रदर्शन लोगों को अन्धविश्वासी ही बनाते हैं। बहुतों के मन में वैसी सिद्धियों प्राप्त करने की ललक भी उत्पन्न होती है और इस ललक के कारण वे वास्तविक अध्यात्म से हजारों मील दूर हट जाते हैं। इस संबंध में यह स्पष्ट जान लेना चाहिए कि अध्यात्म का चमत्कारों से कोई संबंध नहीं। अध्यात्म की चमत्कारी उपलब्धि कुछ होती है तो वह केवल आत्मबल ही है। इस बढ़े हुए आत्मबल के कारण कई व्यक्तियों में अतीन्द्रिय शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं। उनका विकास साधक की मनःस्थिति और प्रकृति में वैसा परिष्कार आने पर ही होता है, जब वह उसकी निष्ठा इनके उपयोग और प्रयोग की सीमाएं जान लेती हैं तथा उन मर्यादाओं के प्रति दृढ़ हो जाती हैं। फिर वह व्यक्ति सामान्य नहीं रह जाता उसकी चेतना उच्चस्तरीय कक्षा में पहुँच जाती है, जो अपने आत्मबल का, सिद्धियों का उपयोग केवल महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए ही कर पाते हैं।
कभी-कभी किन्हीं साधनों में साधना करते हुए भी कुछ विशेष क्षमताएं जागृत हो जाती हैं। मनीषियों ने उन क्षमताओं को कौतूहल वश प्रयोग में लाने के लिए कड़ाई के साथ मना किया है। भगवान बुद्ध के संबंध में प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने एक शिष्य का स्वर्ण कमंडल तुड़वाकर नदी में फिंकवा दिया था, जो उसने अपनी अतीन्द्रिय क्षमता से लोगों को चमत्कृत करने के लिए प्राप्त किया था। इस से भगवान बुद्ध ने बड़ा रोष व्यक्त किया था और अपने सभी शिष्यों को एकत्रित करके यह प्रतिबंध लगा दिया था कि उनमें से कभी कोई आलौलिक चमत्कार न दिखाए। तान्त्रिक साधनाएं कर जल पर चलने की सिद्धि प्राप्त करने वाले एक अन्य योगी को उन्होंने यह कह कर निरुत्साहित किया था कि यह छोटी सी सफलता प्राप्त करने के लिए बारह वर्ष तक व्यर्थ श्रम किया। नदी पार करने के लिए तो मल्लाह को कुछ पैसे दे कर नाव में बैठना ही पर्याप्त है।
आध्यात्मिक साधनाओं से साधक की आत्म चेतना परिष्कृत होती है और उसमें कई विलक्षणताएं उत्पन्न हो जाती हैं परन्तु ऋषि मुनियों ने इन विलक्षणताओं पर गर्व करने से तो मना किया ही है, इनकी उपेक्षा का भी निर्देश किया है। योग साधना के परिणाम स्वरूप प्राप्त होने वाली सिद्धियों का उल्लेख करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा “ते समधाबुपसर्गा ....” (योग दर्शन 3।37) अर्थात् ये सिद्धियाँ यदि प्राप्त हों तो साधन को इनका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इससे साधना में विघ्न उत्पन्न होता है। सिद्धियों के आकर्षण में उलझ कर व्यक्ति अपने लक्ष्य को भूल जाता है तथा आत्मोद्धार के लिए प्रयत्न करना छोड़ देता है।
यही कारण है कि आत्मोद्धार के लिए साधना कर परमहंस स्थिति में पहुँचे जाने वाले महापुरुषों ने इस तरह की क्षमताओं का परिचय देने से सदैव इन्कार ही किया है। इस युग के महान संत और परम सिद्ध संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के संबंध में विख्यात है, कि किसी व्यक्ति ने उनके पास जा कर पूछा था, ‘‘यदि आपने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है और ईश्वर का सिद्ध होना मानते हैं तो ऐसा कोई प्रमाण दीजिये जिससे उसके अस्तित्व का पता लगे।’’ प्रश्नकर्ता ने सहज जिज्ञासा के भाव से यह पूछा था। इसलिए रामकृष्ण ने उसका समाधान करते हुए कहा था कि इससे बड़ा चमत्कार क्या हो सकता है कि ‘‘इतना विराट् और विशाल जगत सुव्यवस्थित रीति से चल रहा है। चाँद है, सूरज है, तारे हैं, मैं हूँ, तुम हो, पशु पक्षी हैं, कीड़े-मकोड़े हैं यह कोई कम बड़ा चमत्कार है?’’ रामकृष्ण के पास स्वयं कई अलौकिक सिद्धियाँ थीं। चाहते तो वे कोई भी चमत्कार बताकर प्रश्नकर्ता को चमत्कृत और प्रभावित कर सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि वे जानते थे कि ऐसे प्रदर्शन प्रश्नकर्ता के मन में आत्मोत्कर्ष की आकांक्षा उत्पन्न करने के स्थान पर इन सिद्धियों को प्राप्त करने की ललक उत्पन्न करेगा और वह साधन मार्ग से विचलित हो जायेगा।
अलौकिक शक्तियाँ हैं, उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। उनको प्राप्त करने को सुसंगत विज्ञान है परन्तु व्यक्ति और समाज का कल्याण करने वाले अध्यात्म से उनका कोई संबंध नहीं है। न ही उनकी कोई उपयोगिता है। इसलिए ईश्वरीय विधान के अनुसार उन्हें अविज्ञात एवं रहस्य के आवरण में छिपा रहने दिया जाए, यह उचित है। परमात्मा ने मनुष्य की सहज क्षमताओं को जान बूझ कर उतना ही सीमित रखा है जिससे कि जीवन क्रम सामान्य ढंग से चलता रहे। कल्पना कीजिए अतीन्द्रिय क्षमताएं उपलब्ध होती तो मनुष्य का क्या हाल होता? पूर्वाभास हर किसी को होने लगे तो स्वाभाविक ही मृत्यु का समय सब को मालूम हो जाएगा और वह काफी समय पहले से ही उदास, खिन्न भयभीत और छुब्ध रहने लगेगा। अतीन्द्रिय दर्शन या श्रवण की शक्ति सहज उपलब्ध होती तो किसी भी व्यक्ति के लिए अपना निजी जीवन निज तक सीमित रखना ही संभव नहीं होता। सब दूसरों की व्यक्तिगत बातों को जानते और कान लगाते कि कौन क्या मंत्रणा कर रहा है? इस जानकारी के आधार पर वह दूसरों के हितों पर कुठाराघात करने की चेष्टा भी करता और सभी लोग ऐसा करने लगते तो सृष्टि व्यवस्था का क्या स्वरूप बनता?
परमात्मा ने इन्हीं कारणों से मनुष्य को उतनी ही इन्द्रिय क्षमता दी है कि उसका अपना निजी जीवन भी सरलतापूर्वक चलता रहे और सृष्टिक्रम में भी कोई व्यवधान न आये। इससे न्यूनाधिक देने में मनुष्य का लाभ कम और हानि ही अधिक होती। इसीलिए अतीन्द्रिय क्षमताएं सर्वसुलभ नहीं है और न ही उनकी आवश्यकता है। जो जितना आवश्यक है वह उतना ही सुलभ है। हवा, पानी, आहार, वस्त्र, निवास आदि आवश्यकताएं क्रमशः कम अनिवार्य होती गई है इसलिए इनकी सरल सुलभता भी क्रमशः जटिल और श्रम साध्य होती चली गई है।
अस्तु न तो सिद्धियों के लिए लालायित होने और उन्हें प्राप्त करने के लिए ललक उठने की आवश्यकता है तथा न ही किन्हीं में वैसी शक्तियाँ देख कर प्रभावित होनी चाहिए। इस तथ्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिए और गाँठ बाँध लेना चाहिए कि चमत्कारों का अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। अध्यात्म की सबसे बड़ी चमत्कारी सिद्धि आत्मबल है जो व्यक्ति के उत्कर्ष में तो सहायक है ही, उसके बल पर वह असंख्य व्यक्तियों के लिए भी प्रकाश व प्रेरणाएं प्रदान कर सकता है। उस सिद्धि को प्राप्त करने और उसी क्षमता का अधिकाधिक अभिवर्धन करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
चिकित्सा शास्त्र के अनुसार मनुष्य की रुग्णता और बलिष्ठता का कारण उसके शरीर में होने वाला रासायनिक परिवर्तन है। शरीर विज्ञानी शरीर को मानते भी एक रासायनिक पिंड हैं। मल परीक्षा, मूर्त परीक्षा, रक्त परीक्षा आदि के द्वारा यही देखा जाता है कि शरीर के भीतर कौन से रसायन घट या बढ़ रहे हैं। उनका कारण क्या है? कारण में निदान क्या है तथा उनका उपचार किस प्रकार किया जा सकता है? औषधियाँ क्या है? विशुद्ध रूप से औषधियाँ रसायन ही हैं जो शरीर के भीतर घटने बढ़ने वाले रसायनों को संतुलित करने के लिए दी जाती हैं और उनके माध्यम से विभिन्न प्रकार के खनिज, क्षार, विटामिन आदि पदार्थ पहुँचाये जाते हैं। ईंट चूने से बने मकान में आई टूट-फूट की मरम्मत के लिए ईंट चूने का ही प्रयोग किया जाता है। शरीर को जब एक रासायनिक पिंड मान लिया गया है तो उसमें होने वाली टूट-फूट और उत्पन्न गड़बड़ियों का निराकरण भी तो रसायनों के माध्यम से ही संभव है। चिकित्सा शास्त्र विशुद्ध रूप से इसी आधार पर खड़ा है।
यह कोई गलत भी नहीं है कि शरीर को एक रासायनिक पिंड कहा जाता है। मुख की लार से लेकर पाचन संस्थान में स्रवित होने वाले रसों और हारमोनों तक विविध स्राव रासायनिक स्राव ही उत्पन्न करते हैं। स्नायु संस्थान, तंत्रिका जाल और कोशिका समूह में जहाँ विद्युत धराएं अपना काम करती हैं वहाँ रासायनिक प्रक्रियाएं भी चलती रहती हैं। अन्न को रक्त के रूप में और रक्त को माँस मज्जा के रूप में बदलने का काम यही रासायनिक पद्धति करती है, जिसके आधार पर जीवन क्रम में अन्यान्य सभी क्रिया-कलाप निर्भर करते हैं, श्वास के माध्यम से ऑक्सीजन का शरीर में प्रवेश, रक्त में उसका घुलना और ऊर्जा उत्पन्न करना रासायनिक प्रक्रिया नहीं तो और क्या है? इसलिए रसायनों के माध्यम से शरीर स्वास्थ्य की साज, सम्हाल और गड़बड़ियों का सुधार किसी भी दृष्टि से गलत नहीं कहा जा सकता। वह उचित और संगत ही है।
अध्यात्म शास्त्र भी मानवी चेतना को परिष्कृत करने के लिए रसायनों का प्रयोग करता है। उसकी मान्यता है कि वस्तुओं में स्थूल, सूक्ष्म और कारण यह तीन शक्तियाँ होती हैं। अन्न का स्थूल, स्वरूप रक्त माँस बनाता है। उसके सूक्ष्म रूप से मस्तिष्क एवं विचार बनते हैं और अन्न के कारण शक्ति भावनाओं का निर्माण करती है। यदि सड़ा गला, बासी-खुसी और मैला कुचैला अन्न आहार के रूप में लिया जाएगा तो उससे पोषण मिलना तो दूर रहा उलटे रोग और गड़बड़ियां ही उत्पन्न होंगी। अनीति पूर्वक कमाया हुआ और दुष्ट मनुष्यों के हाथों बना, परोसा अन्न मस्तिष्क में दुर्बुद्धि ही उत्पन्न करेगा। यदि आहार को प्रसाद भावना से पकाया और औषधि भावना से ग्रहण किया गया होगा, बनाने और खिलाने वाले की स्नेहशील सद्भावनाओं का उसमें समन्वय होगा तो उससे न केवल खाने वाले का अंतःकरण विकसित होगा वरन् उसकी भावनाओं में भी उच्चस्तरीय विस्तार होगा। आहार केवल स्थूल दृष्टि से पौष्टिक एवं स्वस्थ ही नहीं होना चाहिए वरन् उसके पीछे न्यायानुकूल उपार्जन और सद्भावनाओं के समन्वय का तारतम्य भी जुड़ा होना चाहिए। तभी वह अन्न मनुष्य के तीनों आवरणों का समुचित पोषण कर सकेगा और उस आधार पर शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वांगीण विकास का अवसर प्राप्त हो सकेगा।
भारतीय मनीषियों ने आहार शुद्धि, पर प्रथम जोर इसीलिए दिया है कि उसके साथ जुड़े हुए तत्व शरीर भूमिका से आगे बढ़ कर मनःक्षेत्र को प्रभावित करते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि नित्य स्नान, अन्न-पान द्वारा सब स्थानों को शुद्ध रखना चाहिए क्योंकि इनके शुद्ध होने पर ही चित्त की शुद्धि होती है और आरोग्यता प्राप्त होकर पुरुषार्थ बढ़ता है। ‘वर्जयेन्मधु मांस च’ तथा ‘बुद्धि लुब्धति यद् द्रव्यं मदकारी तदुच्यते’ आदि सूक्तियों द्वारा मद्य माँस का निषेध और बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थों को मदकारी बताने के पीछे यही प्रयोजन है कि उनका प्रभाव शरीर पर तो सो पड़ता है तो पड़ता है उससे भी अधिक अंतरंग स्थिति प्रभावित होती है।
शरीर से आगे बढ़ कर मनःक्षेत्र का आहार किस प्रकार प्रभावित करता है, इसका प्रमाण वे वस्तुएं देती हैं जिन्हें नशीली कहा जाता है। नशा पदार्थ का सूक्ष्म गुण है। वह रक्त माँस पर तो प्रभाव डालता ही है साथ ही मस्तिष्क को, मन बुद्धि-चित्त अहंकार को भी प्रभावित करता है। नशे का प्रभाव होते ही मस्तिष्क पर से नियन्त्रण हट जाता है और वह कुछ का कुछ सोचने-समझने तथा कुछ का कुछ देखने समझने लगता है। इतना ही नहीं धीरे-धीरे उस नशेबाजी का प्रभाव सेवनकर्त्ता के गुण, कर्म, स्वभाव पर पड़ता चला जाता है और उसका चरित्र, दृष्टिकोण, स्वभाव आदि का स्तर निरन्तर गिरता चला जाता है। यह तथ्य बताते हैं कि आहार का प्रभाव केवल शरीर तक ही सीमित नहीं है, यह केवल भूख मिटाने, स्वाद देने और रक्तमाँस बनाने की स्थूल शारीरिक क्रिया तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके सूक्ष्म प्रभाव मस्तिष्क के साथ-साथ अंतःकरण को भी प्रभावित करते हैं।
आत्म-विद्या के ज्ञाता सदा से यह कहते आए हैं कि आत्मोन्नति की साधनात्मक प्रक्रिया में आहार शुद्धि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कई पदार्थों के संबंध में जो साधकों के लिए वर्जित हैं, कुछ समय पहले तक सीमित जानकारी थी। समझा जाता था कि नशीले पदार्थों का गुण खुमारी मस्ती तक ही सीमित है। इसलिए लोग थकान मिटाने गम गलत करने के लिए उनका सेवन करते थे। भांग, गांजा, चरस, अफीम, शराब जैसे नशीले पदार्थ इसी प्रयोजन के लिए पिए जाते थे, पर अब उनमें अन्य अनेक विशेषताएं नवीनताएं पाई गई हैं और देखा गया है कि वे ऐसी अनुभूतियाँ कराते हैं जो सामान्य चिन्तन से अलग बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती है। कुछ रसायन ऐसे हैं जो मस्तिष्कीय कणों को वर्तमान परिस्थिति एवं उपस्थिति से सर्वथा भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ सामने उपस्थित करते हैं, मस्तिष्कीय कणों की चिंतनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का भी संबंध नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से किसी न किसी रूप में जोड़े तो भी रहते थे पर अभी नये प्रकाश में आए इन नशीले पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट जाता है और आँखें वह देखने लगती हैं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न होता है।
यों आहार के रासायनिक तत्त्वों का विश्लेषण बहुत पहले से होता रहा है। खाद्य पदार्थों में कौन-सा तत्त्व कितनी मात्रा में होना चाहिए? इस संबंध में ढेरों पुस्तकें लिखी गई हैं और सैकड़ों तालिकाएं प्रकाशित हुई हैं। जहाँ तक माँस रक्त और बलिष्ठ देह का प्रश्न है वहाँ तक वे तालिकाएं उपयुक्त भी हैं किन्तु शरीर केवल माँसपिंड ही तो नहीं है, उसमें बौद्धिक और भाव चेतनाएं भी मिलती हैं। आहार में उनके सुपोषण का समावेश भी होना चाहिए।
इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्राचीन काल में भारतीय मनीषियों ने सादा, सरल और सुपाच्य भोजन ही प्रयोज्य बताते हुए आहार की सात्विकता पर अधिक जोर दिया था, न कि शरीर की माँसलता बढ़ाने वाले भोजन पर। कहा जा चुका है कि आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में आहार शुद्धि का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उस ओर ध्यान न दिया जाए और प्राणायाम, प्रत्याहार, नेति, धोति आदि आगे के क्रिया-कलाप में उलझा जाए तो वह समय पूर्व की बात की है। अक्षर ज्ञान सीखे बिना किसी बच्चे से कोई पुस्तक पढ़ने के लिए कहा जाना जितना नासमझी का काम है उतनी ही नासमझी आहार शुद्धि के बिना आत्मिक प्रगति की अपेक्षा रखने में है। आहार में मस्तिष्क और हृदय को, बुद्धि और भावनाओं को सात्विकता तथा शुद्धि की दिशा में अग्रगामी बनाने वाले तत्त्वों का समावेश न किया जा सके तो वह भूखे पेट फुटबाल खेलने जैसा ही उपहासास्पद होगा। आज आत्मिक प्रगति के लिए आहार शुद्धि पर पूरा-पूरा ध्यान देना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। इस अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति किये बिना आत्मिक प्रगति की दिशा में एक कदम भी चल पाना संभव नहीं है।
मानव-शरीर को परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट कृति कहा गया है। यहाँ तक कि उसे पंच-तत्वों से निर्मित परमात्मा का निवास स्थान माना जाता है। इसीलिए इसे देव-मन्दिर भी कहा गया है। परमात्मा के निवास गृह देह रूपी देव मन्दिर को पवित्रता, निर्मलता और शोभा सुषमा-सौंदर्य से भरा रहना चाहिए। ईश्वर के इस दुर्लभ, अनोखे एवं सुँदर देह रूपी उपहार की उपेक्षा-अवहेलना तिरस्कार करके उसे रोगी, शक्तिहीन एवं कुरूप बनाना महान पाप अर्जित करना है। इसको सुन्दर, स्वस्थ और रोग मुक्त रखना ही सर्वोपरि कर्त्तव्य है।
“शरीमाद्यम् खलुधर्मसाधनम्” यह शरीर ही धर्मादि को प्राप्त करने का साधन है। कोई भी भौतिक अथवा आध्यात्मिक उपलब्धि बिना स्वस्थ एवं नीरोग-सशक्त, शरीर के संभव नहीं। इस संसार में जीवन का आधार यह शरीर ही है।
इस देव-मन्दिर देह की जब इतनी महत्ता शास्त्रों में प्रतिपादित की गई, तो प्रश्न उठता है कि इसे निरोग स्वस्थ एवं सशक्त कैसे रखा जाय? यह तो सभी जानते हैं कि इस मानव देह का निर्माण अवनि, अम्बु, अनल, अनिल और आकाश के पंच तत्त्वों से हुआ है। शरीर में यदि इन तत्त्वों का संतुलन साम्य बना रहे तो उसमें निरोगता एवं सशक्तता बनी रहती है और उनमें असन्तुलन, विकृति अथवा कुपित हो जाने के कारण रोगों की उत्पत्ति हो जाती है। ये पंच तत्त्व प्राकृतिक हैं। इनके असन्तुलन, न्यूनता अधिकता से उत्पन्न रुग्णता, दुर्बलता आदि को प्रकृति के सामीप्य-सान्निध्य में रहकर ही दूर किया जा सकता है। जीवन को भौतिक कृत्रिमता से अधिकाधिक दूर रखकर रोगमुक्त, शक्तियुक्त रखना पंच तत्त्वों की साधना-प्राकृतिक जीवन से संभव है।
मनुष्य प्रकृति विरोधों का आचरण करके अपनी भूल, प्रमाद या अज्ञानवश रोगों को आमन्त्रित कर लेता है और अपने इस पंचतत्त्व के कलेवर का उपचार तीव्र एवं विषैली औषधियों से इन्जेक्शनों या शल्य क्रिया से करता है जिसके दूरगामी परिणाम हानिप्रद ही होते हैं। यद्यपि क्षणिक राहत इन उपायों से जान पड़ती है। कालान्तर में अन्य जीर्ण-असाध्य व्याधियां प्रकट हो जाती हैं जो शरीर का अन्त करके ही छोड़ती हैं। प्रकृति माता बड़ी उदार है। जब भी मानव अपने को प्रकृति के आँचल में छोड़ पंच-तत्त्वों का उपचार प्रारम्भ करता है वह करुणा-मयी अपना वरद्हस्त उनके सिर पर रखकर स्वास्थ्य, निरोगता एवं सशक्तता का अनुदान-वरदान देना प्रारम्भ कर देती है। उसकी अनन्त अनुकम्पा से मनुष्य देह-रूपी देव मन्दिर रोग युक्त, शक्तियुक्त हो जाता है। अस्तु अधिक से अधिक प्राकृतिक आहार-विहार के अनुरूप जीवनचर्या बनाकर, तद्नुरूप पालन कर इस देह को स्वस्थ और सशक्त रखा जाय और देव-मन्दिर की सार्थकता को पूर्ण किया जाय।
जहाँ तक मृत्यु का प्रश्न है संसार का कोई प्राणी इससे बचा नहीं है। जिसने जन्म लिया है उसे निश्चित रूप से मरना है। शास्त्रकारों ने मृत्यु को सुखद नींद और दिव्यलोक कहा है। अथर्ववेद में कहा गया है-
“अयं लोकः प्रियतमो देवानाम पराजितः। यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जज्ञिषे। सच त्वाऽनुह्वयामसि मा पुरा जरसो मृथाः॥ (अ. 5। 30। 27)
अर्थात्- ‘‘यह देवताओं का प्यारा लोक है। यहाँ पराजय का क्या काम? तुम सोचते हो कि तुम मौत के प्रति संकल्पित किये हुए हो। बात ऐसी नहीं है, हम तुम्हें वापिस बुलाते, बुढ़ापे से पहले कभी मरने की न सोचो।”
वस्तुतः मृत्यु से कोई बचा नहीं, वह तो अवश्यंभावी है। जन्म मृत्यु का चक्र निरंतर गतिशील है। जहां जन्म है वहां मृत्यु भी एक न एक दिन अवश्य होती है परन्तु मौत को उत्कृष्ट विचारों की शक्ति एवं सद्भाव सम्पन्न मनःस्थिति द्वारा आनन्ददायक अवश्य बनाया जा सकता है। उससे संघर्ष करते हुए आगे को टाला जा सकता है। वेदों में इसी तथ्य का उद्घोष किया गया है-
“वर्च प्रा धेहि में तन्वांऽसह ओजोवयं बलम्। इन्द्रियाय त्वा कर्मणे वीर्याय प्रतिगृहणामि शत शारदाय॥ (अ. 19। 37। 2)
अर्थात्- मेरे शरीर में तेज, शक्ति, ओज, पराक्रम पौरुष सदा बना रहे। मैं सौ वर्षों तक अपनी समस्त इन्द्रियों से कम करता हूं।
मानव-जीवन की सार्थकता इसी में है कि मनुष्य अपने जीवन पर्यन्त पूर्ण स्वस्थ, पुरुषार्थी, शक्तिवान एवं वीर्यवान बना रहे।
रूस के एक ‘मखमूद इवाजोव’ नामक किसान 158 वर्ष के हुए हैं। उनके कार्य, स्वास्थ्य एवं सक्रियता की बड़ी सराहना की गई। सोवियत सरकार ने उन्हें “ऑनर ऑफ रेड बैनर ऑफ लेबर” से 1947 ई. में विभूषित किया था।
रूस में ओसेतिया निवासी एक महिला ‘तिपो आब्जीव’ ने दीर्घायु का विशेष रिकार्ड स्थापित कर दिया। सन् 58 में एक सौ अस्सी वर्ष की लम्बी आयु में देहान्त हुआ था। उनका कथन है कि लम्बी आयु में देहान्त हुआ था। उनका कथन है कि मात्र मन को सन्तुलित एवं शांत रखकर जीवन यापन करने से शरीर रूपी यंत्र बड़े लम्बे समय तक काम करता रह सकता है।
अथर्ववेद के शब्दों ने दीर्घ जीवन के रहस्यों का उद्घाटन कर दिया है-
“अनुहृतः पुनरेहि विदवानुदयनं पथः। आरोहणमाक्रमणं जीवतो जीवतोऽयनम्॥’’ (अ. 5। 30। 9)
अर्थात्- हे मनुष्यों! तुम मृत्यु की ओर क्यों जा रहे हो? मैं तुम्हें जीवन, उल्लास, यौवन, उत्साह की ओर बुला रहा हूँ, वापिस आओ।”
अथर्ववेद के इन शब्दों में जीवन के प्रगति उत्साह और उमंग भरी प्रेरणा दी गई है। अहितकर एवं निराशापूर्ण निषेधात्मक चिन्तन मौत से अधिक कष्ट कारक होता है। जीवन का सच्चा मार्ग उत्कृष्ट विचारों एवं आदेश कर्त्तव्यों से ही मनुष्य जान पाता है।
मृत्यु निश्चित है और स्वाभाविक है। वह प्रकृति की ही एक व्यवस्था या प्रक्रिया है। उससे बचा नहीं जा सकता, किन्तु रोगी बीमारी अप्राकृतिक है और उसके कारण अकाल मृत्यु के मुख में पहुँचना भी अप्राकृतिक है। दीर्घायुष्य प्राप्त करना सामान्यतः हर किसी के लिए संभव है। आवश्यक इतना भर है कि प्राकृतिक नियमों का पालन किया जाए।
भारत सरकार के जन-गणना विभाग से पता चला है कि भारतवर्ष में इस समय सौ वर्ष की आयु वाले मनुष्यों की संख्या 50,000 से अधिक है। महाराष्ट्र प्रदेश में शतायु व्यक्तियों की संख्या अन्य प्रान्तों से अधिक है।
3 सितम्बर 1964 को इलाहाबाद रोटरी क्लब में मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के डाक्टर वी.एल. अग्रवाल ने अपने भाषण में लोगों को सौ वर्ष तक नीरोग एवं स्वस्थ जीवन जीने का नुस्खा बताया है। उन्होंने अपना अनेकों वर्षों का चिकित्सीय अनुभव एवं अनुसंधानों का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘नियमित व्यायाम करने वाला, संतुलित आहार क्रम अपनाने वाला, चित्त को स्थिर एवं शाँत रखने वाला तथा धूम्रपान न करने वाला व्यक्ति सौ वर्षों तक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखते हुए आनंदपूर्वक जीवन जी सकता है।’
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राकृतिक जीवन जीते हुए सादा स्वच्छ और सरल जीवनक्रम अपनाते हुए आसानी से शतायु हुआ जा सकता है तथा स्वस्थ और जवान रहा जा सकता है।
बसन्ती नये वर्ष के अभिनव निर्धारण
बसन्त युग निर्माण अभियान का वर्षारम्भ है। इस अवसर पर योजना के आरम्भ से ही अगले वर्ष के लिए निर्धारण किये और अग्रगामी बनाये जाते हैं। इस बार के निर्धारणों में वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों की एक विशिष्ट बिरादरी को समूचे देव परिवार में से मथ कर नवनीत की तरह ऊपर उभारा गया है और उनसे कहा गया है कि अपने योगदान को काम चलाऊ न रहने देकर दूसरों के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय बनाने का साहस जुटाएं। उन्हें प्रज्ञा अभियान का आलोक व्यापक बनाने की एक अतिरिक्त जिम्मेदारी इन्हीं दिनों सौंपी गई है और कहा गया है कि अपने समयदान, अंशदान का अनुपात पहले की अपेक्षा बढ़ाने की चेष्टा करें।
बच्चा बढ़ता है तो उसके भोजन, वस्त्र का अनुपात भी बढ़ता है। उसे अभिभावक ही जुटाते हैं। मिशन का बालक आश्चर्यजनक गति से बढ़ रहा है तद्नुसार उसकी आवश्यकताएं भी अनेक गुनी हुईं और नई-नई फरमाइशें लेकर सामने आई हैं। इसकी पूर्ति यों हर युग-शिल्पी को करनी चाहिए, पर जिनकी अन्तरात्मा में जीवन उछलता है उन्हें अपनी अन्तःप्रेरणा के अनुरूप साहसिकता का परिचय भी देना होगा।
इन दिनों का शौर्य पराक्रम तोप, तलवार चलाने के रूप में नहीं- सृजन प्रयोजनों के लिए प्राण-पण से जुट जाने के रूप में प्रस्तुत करना होगा। समय की माँगें अपने-अपने ढंग की होती हैं और उनकी पूर्ति के लिए सदा एक जैसे उपाय उपचार नहीं अपनाये जाते। इन दिनों का त्याग, बलिदान, पुण्य, परमार्थ एवं तप साधन इस एक ही दिशा में नियोजित होना है कि प्रज्ञा आलोक से व्यापक क्षेत्र को प्रकाशवान बनाने के लिए सूर्य, चन्द्र की तरह घर-घर पहुँचने और द्वार-द्वार पर भटकने वाला अलख जगाया जाय। बादलों को भी यहीं करना पड़ता है। हवा भी जन-जन से संपर्क साधती और बिना माँगे ही उसे प्राण वायु की जीवन सम्पदा से निहाल करती है। प्रज्ञापुत्रों को इसी मार्ग पर चल पड़ने के लिए- इन दिनों विशेष उत्साह दिखाने के लिए कहा गया है।
प्रज्ञापुत्र उन्हें कहा जा रहा है जो अपने ज्ञानघट की राशि से नव-प्रकाशित प्रज्ञा अभियान पत्रिका की छः प्रतियाँ मंगा कर मिशन के पूर्व परिणित चौबीस परिजनों को उसे हर महीने नियमित रूप से पढ़ाने वापिस लेने का उत्तरदायित्व उठायेंगे। इस प्रकार इस परिकर से मिशन की अभिनव प्रेरणाओं और प्रवृत्तियों से परिचित होने का अवसर मिलेगा। साथ ही प्रज्ञापुत्रों के व्यक्तिगत संपर्क से उनकी सक्रियता का- सृजन प्रयोजनों में रस लेने एवं योगदान देने का सिलसिला भी आगे बढ़ेगा। प्रज्ञापुत्रों का यह प्रथम चरण हुआ। दूसरा चरण यह है कि वे इन चौबीस में से तीन ऐसे विकसित करें जो मिशन की जीवन्त सदस्य बन कर एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य का अनुदान प्रस्तुत करते रहने की नियमितता बरतें। इन तीन ज्ञानघटों की राशि से युग साहित्य की 360 नव प्रकाशित पुस्तिकाएं मंगाई जा सकेंगी और एक दिन में एक के हिसाब से 360 व्यक्तियों को नियमित रूप से घर बैठे यह अभिनव स्वाध्याय साधन पहुँचाया जाता रहेगा।
इस प्रकार हर प्रज्ञापुत्र का एक चलता-फिरता प्रज्ञा विद्यालय चलेगा, जिसमें 24 पुराने और 360 नये छात्र होंगे। हृदय समस्त नस-नाडियों को बड़ी-बड़ी धमनियों के माध्यम से रक्त पहुँचाता है। ठीक इसी प्रकार मिशन के हृदय की भूमिका निभाने वाले यह प्रज्ञापुत्र अपनी श्रद्धा और लगन के सहारे अपने संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण एवं उमंग उन्नयन के लिए निरन्तर प्रयासरत रहेंगे।
कहना न होगा कि यह छोटी-सी प्रक्रिया अगले वर्ष मिशन का विस्तार 24 गुना करके सच्चे अर्थों में प्रज्ञावतार की प्रथम मोर्चे पर महत्त्वपूर्ण सफलता प्रदान करेगी। जो परिचित होंगे व प्रभावित हुए बिना न रहेंगे। यों वे प्रभावित होंगे और उनका पुरुषार्थ जगेगा। पुरुषार्थ का सृजन प्रयोजन में नियोजन हो सका तो संजोये गये सपनों के साकार होने में किसी प्रकार का सन्देह रह नहीं जायेगा।
प्रस्तुत बसंत पर्व का यह अभिनव निर्धारण है। गत वर्षों में प्रज्ञा पीठें इतनी बड़ी संख्या में बन गई हैं कि अब उन्हें सर्वांगपूर्ण एवं निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुव्यवस्थित बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। नये निर्माणों के लिए उतना जोर नहीं दिया जा रहा है जितना कि बन चुके प्रज्ञा संस्थानों को नियोजित करने पर। भवन निर्माण के उपरान्त 1. कार्यकर्ताओं की नियुक्ति 2. कार्य क्षेत्र के हर शिक्षित तक नियमित रूप से युग साहित्य पहुँचाने का प्रबंध 3. जन्म दिवसोत्सवों के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के घर में परिवार प्रशिक्षण के भाव भरे आयोजन 4. प्रज्ञा संस्थानों में दैनिक प्रशिक्षण का प्रबंध 5. आवश्यक व्यय व्यवस्था के लिए ज्ञानघटों की बड़ी संख्या में स्थापना।
यह पाँचों कार्य जहाँ सम्पन्न हो सकें समझा जाना चाहिए कि व प्रज्ञा संस्थान अपनी स्थापना का मूलभूत प्रयोजन पूरा करने लगा। इस चेतना से रहित कहीं कोई प्रज्ञा संस्थान रहने न पाये, इन दिनों इसी तथ्य पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। इन निर्माणों की इमारतें भले ही छोटी हों, पर उनमें सृजनात्मक प्रयोजनों की प्राण चेतना उछलती, उफनती ही दृष्टिगोचर होनी चाहिए। इस वर्ष इसी तथ्य पर पूरा ध्यान दिया जायेगा।
विनिर्मित प्रज्ञा संस्थानों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने और सेवा साधना द्वारा जन सहयोग अर्जित करने के लिए जुटा दिया गया है। आशा की गई है जो बन गये हैं- जो बन रहे हैं- जो बनने वाले हैं वे प्रतिमा पूजन भर तक सीमित रहने वाले वर्तमान देवालयों से सर्वथा भिन्न होंगे और सिद्ध करेंगे कि धर्म तंत्र को पुनर्जीवित करने से जन-मानस को किस प्रकार सत्प्रवृत्तियों में नियोजित किया जा सकता है। उस निर्धारण में नव-निर्मित प्रज्ञा संस्थान कितनी बड़ी भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं।
प्रज्ञापुत्रों को अग्रिम मोर्चे पर खड़े करना और प्रज्ञा संस्थानों को निर्धारित क्रिया-प्रक्रिया में सुव्यवस्थापूर्वक जुटा देना, यह दो कार्यक्रम प्रस्तुत बसंत पर्व से प्रमुखता देकर हाथ में लिये गये हैं और सुविस्तृत प्रज्ञा परिवार की चेतना एवं क्षमता से यह दो कार्य अधिकाधिक उत्साह एवं उत्तरदायित्व के साथ सम्पन्न करने के लिए कहा गया है। हर प्राणवान परिजन से पूछा जा रहा है कि इन दो प्रयोजनों के लिए उनके क्षेत्र में क्या हो रहा है और वे व्यक्तिगत रूप से इन दो कार्यों को सुसम्पन्न बनाने के लिए क्या कर रहे हैं? जो नहीं कर रहे उन्हें तत्काल छोटे-बड़े कदम उठाने और शबरी गिलहरी से- केवट, जामवन्त से पीछे न रहने के लिए झकझोरा गया है। इन दिनों की अन्यमनस्कता को लज्जाजनक समझने- व्यस्तता तंगी का बहाना न बनाने के लिए विशेष रूप से आग्रह किया गया है। जो कुछ कर रहे हैं उन्हें पहले की अपेक्षा अनुदान का अनुपात बढ़ाने के लिए कहा गया है। जीवन्त और जागृतों से अपेक्षा की गई है कि वे शिथिलता छोड़ें युग धर्म को समझें और अपनी तत्परता में कई गुनी बढ़ोतरी करने की बात सोचें। युग सन्धि का दूसरा वर्ष- परिपोषण वर्ष है- मिशन का बालक जब तेजी से बढ़ ही रहा है तो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी परिवार के समर्थ सदस्यों को ही करनी पड़ेगी।
प्रकृति की प्रेरणा से सभी सजीव वृक्षों में पल्लव फूटते और पुष्प खिलते हैं। नियति की प्रेरणा से प्राणवान प्रज्ञा परिजनों की तत्परता में अभिनव कोंपलें फूटतीं और कलियाँ खिलती सर्वत्र देखी जा सकेगी।
यह कार्यक्षेत्र की चर्चा हुई। दूसरा पक्ष है- सूत्र संचालन केन्द्र। शान्ति-कुँज, ब्रह्मवर्चस्-गायत्री नगर। इस त्रिवेणी संगम के कन्धे पर अनेकानेक उत्तरदायित्व हैं। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय से प्रस्तुत किये गये प्रतिपादन प्रत्यक्षवाद-बुद्धिवाद एवं भौतिकवाद का ऐसा विकल्प प्रस्तुत कर सकेगा, जिससे लोकमानस को भटकाव से, जंजाल से छूटने और उज्ज्वल भविष्य के राजमार्ग पर चल पड़ने का द्वार खुल सके। यज्ञोपैथी अगले दिनों मनुष्य जाति को शारीरिक और मानसिक आधि-व्याधियों से छुटकारा दिला सकी तो समझना चाहिए कि लोक निर्माण के अब तक के प्रयासों में एक शानदार अध्यात्म और जुड़ गया।
मिशन के उद्घोषित दोनों प्रयोजन किस प्रकार सम्पन्न हो सकेंगे। उसकी सम्भावनाएं किस प्रकार बन रही हैं, इसकी अविज्ञात जानकारियाँ सर्वसाधारण को कराने के लिए अगले दिनों अखण्ड-ज्योति के कई अंक लगातार प्रकाशित होंगे, जिनमें (1) मनुष्य में देवत्व के उदय (2) धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कार्यपद्धति का अदृश्य एवं अविज्ञात सम्भावनाओं का रहस्योद्घाटन किया जायेगा। किया जाना चाहिए से अब समाधान नहीं होता। क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है? उसकी अदृश्य पृष्ठभूमि में सर्वसाधारण को परिचित कराने वाले यह अंक ऐसे होंगे जिसे तथ्यों के एक स्थान पर प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से अभूत पूर्व कहा जा सकेगा।
हरिद्वार केन्द्र को प्राणवान युग शिल्पियों की, महामानवों की उत्पादन प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया गया है। गायत्री नगर का निर्माण समय की इसी महत्ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए किया गया है। उसे युग चेतना में अरुणोदय का प्रमाण परिचय देने वाला ‘उदयांचल’ कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति व होगी।
युग सन्धि के इन बीस वर्षों में होने वाली उथल-पुथल को दिशा देने और नियन्त्रित रखने की दृष्टि से ऐसी प्राणवान प्रतिभाओं की आवश्यकता बड़ी संख्या में पड़ेगी जो अपने कर्तव्य ही नहीं, व्यक्तित्व की प्रखरता का भी परिचय दे सकें। इस आवश्यकता की पूर्ति प्रज्ञावतार की वास्तविक सेवा सहायता है। सामान्य सृजन प्रयोजनों में विविध पदार्थों और उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। युग सृजन की प्रमुख प्रक्रिया लोकमानस के भावनात्मक नव निर्माण पर आधारित है। इसके लिए जड़-पदार्थों एवं यान्त्रिक उपकरणों की नहीं जाज्वल्यमान व्यक्तियों का प्रयोग उपयोग होगा। अभीष्ट परिवर्तन की प्रमुख भूमिका अतीत में प्रस्तुत हुए युग परिवर्तनों की तरह इस बार भी महामानवों को ही सम्पन्न करनी होगी। इन दिनों इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए जागृत आत्माओं का ध्यान पूरी तरह केन्द्रित होना चाहिए।
कहा जाता रहा है कि गायत्री नगर का निर्माण उच्चस्तरीय प्रतिभाओं को ढालने वाले कारखाने की तरह किया है। भूतकाल में भी इसी प्रयोजन के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय बनाये और चलाये गये थे। इससे पूर्व उपर्युक्त केन्द्रों में ऋषियों ने गुरुकुलों एवं आरण्यकों की व्यापक व्यवस्था की थी। तीर्थ शब्द ऐसे ही प्रशिक्षण केन्द्रों के लिए प्रयुक्त होता था जिसमें हर स्तर का भावनाशील अपने को अपेक्षाकृत अधिक सुसंस्कृत बनाने वाली साधना का अभ्यास कर सके। प्राणवान वातावरण की प्रेरणा से अनुप्राणित हो सके।
देश में ऐसे तीर्थों की कमी नहीं थी। उनके निर्माण में मान्धाता जैसे उदारमना अपनी थैलियां खोलते रहते थे। उनके संचालन में ऋषियों की सुविस्तृत बिरादरी अपनी समग्र चेतना को नियोजित किये रहती थी। यही था रहस्य भरा निर्धारण जिसने इस भूमि के 33 कोटि नागरिकों को देव मानव का सम्मान प्रदान किया और इस भूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ की गरिमा से विश्व भर में गौरवान्वित किया। महामानव ही इस विश्व वसुधा की वास्तविक सम्पदा है। प्रगति और समृद्धि का- सद्भावना और सहकारिता का- शान्ति और सुव्यवस्था का वातावरण बनाने का उत्तरदायित्व सदा से ऐसे ही विभूतियाँ उठाती रही हैं। आज ही विषम बेला में समुद्र मंथन जैसी अभूत पूर्व उथल-पुथल में उन्हीं को ढाला, उगाया जाना है। महाकाल की योजना को सुसम्पन्न बनाने में उन्हीं का पराक्रम अग्रिम पंक्ति में खड़ा दृष्टिगोचर होगा।
गायत्री नगर का काम चलाऊ निर्माण उतना हो गया है कि विनिर्मित सीमित स्थान के अनुपात से उन प्रयोजनों का शुभारम्भ किया जा सके जिसके लिए इसे बनाने का संकल्प उठा और एक सीमा तक पूरा हुआ। अब इस वर्ष से इससे वे तीनों ही प्रशिक्षण प्रक्रियाएं विधिवत् आरम्भ की जा रही हैं जिन्हें लक्ष्य रखकर इस निर्माण में डाला गया था।
स्थान सीमित और सुविस्तृत प्रज्ञा परिवार के भावनाशील शिक्षार्थियों की संख्या विस्तार अत्यधिक होने से पाठ्यक्रम छोटे स्वल्पकालीन रखने की व्यवस्था ही बन पड़ी। स्थान अधिक होता तो शिक्षार्थी अधिक संख्या में भी लिये जा सकते थे और उनका पाठ्यक्रम कुछ अधिक समय का बढ़ाया जा सकता था ताकि उसे अधिक समग्र और समर्थ और विस्तृत होने के कारण अधिकाधिक लाभ मिलता, पर प्रस्तुत परिस्थितियों से अभी वैसा सम्भव नहीं है। इतने निर्माण के लिए साधन जुटाना ही कितना कठिन पड़ा है इसे देखते हुए फिलहाल गायत्री नगर में स्थान विस्तार एवं भवन निर्माता की सम्भावना कम ही दिखती है। बड़े आधार बनने पर बड़ा विस्तार भविष्य में होता रहेगा। अभी तो जो सामने है उसी से काम चलाने और तद्नुरूप व्यवस्था बनाने की बात सोची गई है।
जुलाई 81 से तीन प्रशिक्षण वर्ग आरम्भ किये जा रहे हैं। (1) महिलाओं और वयस्क कन्याओं के लिए दो-दो महीने के सत्र (2) पुरुषों और वयस्क बालकों के लिए दो-दो महीने के सत्र। यह दोनों ही दो अलग-अलग इमारतों में चलेंगे। यह दोनों ही स्तर के सत्र वर्ष में पाँच बार होते रहेंगे। (1) जुलाई अगस्त (2) सितम्बर अक्टूबर (3) नवम्बर, दिसम्बर (4) जनवरी, फरवरी (5) मार्च, अप्रैल। इस प्रकार दस महीने में पाँच सत्र सम्पन्न हो जाया करेंगे।
मई, जून में एक-एक सप्ताह के आठ सत्र चलेंगे दोनों महीनों में चार-चार सत्र होंगे। (1) 1 से 6 (2) 7 से 13 (3) 15 से 20 (4) 22 से 27। इन्हें परिवार प्रशिक्षण तीर्थयात्रा पर्यटन एवं परामर्श सत्र कहा जा सकता है। अत्यन्त व्यस्त लोग जिन्हें परिस्थिति वश घर से बाहर जाने का अक्सर अवकाश नहीं मिलता उनके लिए इनकी विशेष उपयोगिता है। गर्मी के दिनों में स्कूलों की-कचहरियों की लम्बी छुट्टियाँ रहती हैं। किसान खेती बाड़ी से निवृत्त हो जाते हैं। उन दिनों परिभ्रमण की बात सभी को सूझती है। साथ में तीर्थयात्रा और उपयोगी सान्निध्य, शिक्षण मिल सके तो फिर सोना सुहागा ही कहना चाहिए।
इस वर्ष गर्मी के दिनों गुरुदेव को आधे से अधिक समय प्रज्ञा पीठों के उद्घाटन प्रवास में रहना पड़ेगा। तो भी ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि उनकी अनुपस्थिति में भी यह सत्र विधिवत चलते रहें।
उपरोक्त तीनों ही सत्रों में प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त मनीषियों का प्रबन्ध किया गया है। हर कार्य गुरुदेव ही करें यह बात अब भविष्य में सम्भव न हो सकेगी। उनकी अनुपस्थिति से भी महाकाल के हाथों सूत्र-संचालन उसी प्रकार बना रहेगा जैसा कि अब तक बना रहा है। इस तथ्य को प्रामाणित करने के लिए वे मथुरा छोड़कर हरिद्वार आये थे और सिद्ध किया था कि इस संचालन में व्यक्ति नहीं शक्ति का उत्तरदायित्व है। सर्वविदित है कि गायत्री तपोभूमि और युग निर्माण योजना का कार्य इन दस वर्षों में गुरुदेव के वहाँ न रहने पर भी अनेक गुना अधिक बढ़ा है। हरिद्वार छोड़ कर वे अब गंगोत्री की तैयारी कर रहे हैं। भूमि मिल गई है और आश्रम शक्ति पीठ तो नहीं, पर वे अपने निवास का प्रबन्ध वहाँ कर रहे हैं। समय-समय पर आते जाते तो रहेंगे, पर क्रमशः व्यवस्थाएं सभी अन्य सुयोग्य हाथों में हस्तान्तरित होती चली जायेंगी। इतने पर भी यह निश्चित है कि कहीं किसी कार्यक्रम में तनिक भी व्यतिरेक उत्पन्न न होगा।
उपरोक्त तीन स्तर के प्रशिक्षण सत्रों में वे जब भी हरिद्वार रहेंगे, अपनी उपस्थिति से शिक्षार्थियों को लाभान्वित करते रहेंगे। पर यदि वे नहीं रहें तो भी किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं। इस मिशन को सूत्र संचालक शक्ति की उपस्थिति प्रेरणा एवं उदार सहायता का लाभ उसी प्रकार मिलता रहेगा जिस प्रकार गुरुदेव का शरीर यहाँ रहने पर मिलता है। अगले दिनों यह अनुभूति और भी अच्छी तरह उपलब्ध होगी कि प्रज्ञा अभियान उनके विभिन्न तन्त्रों की कोई व्यक्ति नहीं चलाता वरन् उसके पीछे किसी प्रचण्ड चेतना का अदृश्य सूत्र-संचालन काम करता है। यहाँ यह चर्चा इसलिए करनी पड़ी है कि उपरोक्त तीनों में गुरुदेव की कम उपस्थिति से किसी को निराश होने की आवश्यकता न पड़े।
उपरोक्त तीनों सत्रों का अधिक स्पष्टीकरण इस प्रकार है-
(1) गत सात वर्षों से एक वर्षीय पाठ्य-क्रम वाले कन्या प्रशिक्षण सत्र चलते रहे हैं। वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में अत्यधिक सफल रहे हैं। जो लड़कियाँ इस वातावरण में रहकर गई हैं उनमें अपनी सुसंस्कारिता, कुशलता एवं श्रमशीलता का परिचय देकर समूचे संपर्क क्षेत्र को प्रभावित किया। पितृगृह में प्राण प्रिय बनीं। ससुराल में गृहलक्ष्मी सिद्ध हुईं। व्यक्तिगत जीवन में सर्वत्र सहयोग और सम्मान से प्रमुदित रहीं। इन उपलब्धियों को देखकर हर किसी का मन यह चला कि हम भी अपनी लड़की शान्ति-कुँज भेजें। भले ही उसकी स्कूली पढ़ाई में हर्ज होता रहे। ऐसी लड़कियों के विवाह में अभिभावकों को असाधारण सुविधा मिली। शान्ति कुँज की शिक्षण लड़कियाँ देवकन्या कही जाने लगीं और उनके विवाह सुसम्पन्न परिवारों में बिना किसी देन-दहेज की माँग के होते रहे। धनवती, रूपवती एके कोने में बैठी रहीं और गुणवती के नाते शान्ति कुँज की प्रशिक्षित लड़कियों की माँग हर जगह होती रही। उन्हें प्राप्त करने के लिए असंख्यों ललचाते रहे। क्योंकि वे स्थान कम पड़ने के कारण प्रायः दो सौ की संख्या में ही निकल पातीं।
उसी एक वर्षीय कन्या प्रशिक्षण पाठ्य-क्रम को अब दो महीने का कर दिया गया है। संगीत और उद्योग जितना एक वर्ष में पढ़ाया जाता था उसे अब संक्षिप्त कर दिया गया है। इसी प्रकार अन्य पाठ्य-क्रमों का जितना सार भाग था उसे यथावत् रखते हुए विस्तार में कटौती की गई और सार संक्षेप की तरह उसे गागर में सागर भरने के समतुल्य बना दिया गया है।
उसी पाठ्यक्रम को अब प्रौढ़ महिलाओं के लिए भी खोल दिया गया है। पहले महिलाओं का अलग और कन्याओं का अलग पाठ्य-क्रम था अब दोनों ही एक कर दिये गये हैं। दोनों का उद्देश्य परिवार निर्माण की रथ चक्र जैसी उस महान प्रक्रिया को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करना है जिस पर व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के दोनों पहिये घूमते और अग्रगामी बनते हैं। सुसंस्कारी नारी क्या कुछ कर सकती है उसे भली प्रकार समझने और ठीक तरह निभाने के लिए जो जानना और अभ्यास में उतारना आवश्यक है वह सभी इस दो माह के महिला प्रशिक्षण में सम्मिलित करा दिया गया है। शिक्षा आठवीं कक्षा स्तर की, आयु 13 से 40 तक की हो, शारीरिक मानसिक अस्वस्थता न हो, स्वभाव आलसी, झगड़ालू, अस्त-व्यस्त, चोर जैसा न हो तो इन कक्षाओं में प्रवेश पाया जा सकता है।
(2) पुरुषों के तथा वयस्क बालकों के लिए जिन दो-दो महीने के सत्रों की व्यवस्था की गई है, उनमें जीवन जीने की कला प्रमुख और धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण प्रक्रिया गौण है। व्यक्ति को किस प्रकार गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से सुसंस्कृत एवं परिष्कृत होने के लिए अग्रसर होना चाहिए। दृष्टिकोण में दूरदर्शिता, व्यवहार में सज्जनता, कर्तृत्व में प्रखरता, स्वभाव में उदारता का समावेश होने से ही व्यक्तित्व का वजन बढ़ता है। ऐसे लोग ही प्रचुर परिमाण में सहयोग सम्मान पाते और जिस काम में हाथ डालते उसमें सफल होते हैं। इसे पुरातन शब्दावली में अध्यात्म विद्या एवं संजीवनी विद्या कहा जाता था। आज की भाषा में उसे व्यक्तित्व का परिष्कार एवं जीवन में कलाकारिता का समावेश कह सकते हैं। यह उपलब्धि किस प्रकार करतलगत हो, इसके सभी दर्शन सूत्र एवं अभ्यास इस दो माह की प्रशिक्षण प्रक्रिया में सम्मिलित कर दिये गये। योग को कर्म कौशल कहा गया है। संक्षेप में इसे व्यावहारिक जीवन विज्ञान भी कहा जा सकता है। यही है इस दो माह के प्रशिक्षण की पृष्ठ भूमि एवं कार्य पद्धति।
क्या विषय किस प्रकार पढ़ाये जायेंगे, इसका विस्तृत विवेचन इन पंक्तियों में शक्य नहीं तो भी यह समझा जा सकता है कि जिनने पाठ्यक्रम बनाया है उनकी सूक्ष्म दृष्टि असंदिग्ध है। उन पर विश्वास किया जा सकता है और समझा जा सकता है जो पढ़ाया जाता होगा, जिस प्रकार पढ़ाया जाता होगा, उसमें अनावश्यक जंजाल का एक कण भी न होकर सब कुछ इस प्रकार संजोया गया होगा कि शिक्षार्थी इस संगम में स्नान करने के उपरान्त कायाकल्प जैसी स्थिति लेकर वापिस लौटे।
नव-सृजन के लिए धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण का निर्धारण प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत चल रहा है। इसमें गायन, प्रवचन, भाषण सम्भाषण, समारोह, धार्मिक आयोजन, पौरोहित्य, कर्मकाण्ड के अनेक पक्षों का समावेश है। इन सभी को इस प्रकार इस दो महीने की प्रशिक्षण प्रक्रिया में संजोया गया है कि अगले दिनों शिक्षार्थी को लोक नेतृत्व की भूमिका निभाने में कठिनाई अनुभव न हो।
इस अवधि में शिक्षार्थी की स्थिति के अनुरूप ऐसी साधनाएं भी कराई जाती रहेंगी जो आत्मबल के अभिवर्धन में, आतिथेय क्षमताएं उभारने में, कुसंस्कारों के निराकरण में, प्रखरता प्रतिभा संवर्धन में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के प्रतिफल ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के के रूप में परिणित होते हैं। यह योगाभ्यास एवं तप साधन का ही एक छोटा रूप है जिसे हर शिक्षार्थी के लिए एक प्रकार से अनिवार्य ही कर दिया गया है।
जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हल्के हो चुके, जो लड़के पढ़ तो चुके पर काम से नहीं लगे, उनके पास समय की कमी नहीं रहती। ऐसे लोग इन सत्रों में सम्मिलित होकर अपने खाली समय का श्रेष्ठतम उपयोग कर सकते हैं। यों व्यस्त व्यक्ति भी प्रयत्न करें तो किसी प्रकार इतना समय निकाल ही सकते हैं। 18 से 50 आयु तक के मैट्रिक स्तर की शिक्षा वाले प्रवेश पा सकेंगे। शारीरिक, मानसिक निरोगता, स्वभाव में विनय अनुशासन, स्वच्छता, स्फूर्ति जैसे सज्जनोचित गुणों का रहना आवश्यक है।
(3) ग्रीष्म ऋतु में एक-एक सप्ताह के सत्रों में बच्चों समेत आने की छूट है। इन छोटे सत्रों में समीपवर्ती तीर्थों के पर्यटन की सुविधापूर्ण और ज्ञानवर्धक यात्रा का प्रबन्ध रहेगा। साथ ही बालकों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत संस्कार भी इस जीवन्त तीर्थ स्थान में कराये जा सकेंगे। मन्त्र दीक्षा, गुरु दीक्षा भी इच्छुकों को इसी अवसर पर मिल सकती है। दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध तर्पण की सुविधा भी इस क्षेत्र में की गई है। बच्चों समेत आने की सुविधा मात्र इन्हीं सत्रों में है। महिलाओं और पुरुषों के दो-दो महीने वाले सत्रों में बच्चे साथ लाने का निषेध है।
प्रस्तुत कठिनाई से निपटने, गुत्थियों को सुलझाने, प्रगति के लिये अनुदान प्रोत्साहन पाने की दृष्टि से यह थोड़ा समय भी शिक्षार्थियों के लिए समाधानकारक हो सकता है। अध्यात्म का व्यवहार में समावेश, व्यक्ति, परिवार और समाज का नव-निर्माण, जैसे अनेक विषयों पर जैसा समाधानकारक प्रतिपादन, परामर्श यहाँ उपलब्ध होता है वैसा अन्यत्र कदाचित ही कहीं होता हो। इतने थोड़े समय में तीर्थयात्रा का प्राचीनकाल जैसा लाभ एवं आनन्द परिभ्रमण मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं परमस्पर्श जैसा सत्संग उपलब्ध करने की दृष्टि से इन सत्रों को अपने ढंग का अनोखा ही कहा जा सकता है। गर्मी के दिनों में जबकि हरिद्वार की धर्मशालाओं तक में सुई रखने को जगह नहीं मिलती और छोटे कमरों का भी उनमें होटलों जितना किराया देना पड़ता है तब गायत्री नगर के सुविधाजनक, प्राकृतिक पवित्र नितान्त सस्ते एवं उच्चस्तरीय वातावरण में पहुँचने और समय क्षेप करने का जितना भी अवसर मिले उसे एक असाधारण सौभाग्य ही समझा जाना चाहिए। मई, जून के दो महीने इस सुयोग के लिए निश्चित करके प्रज्ञा परिवार के परिजनों के लिए एक अभूत पूर्व एवं असाधारण सुयोग का सृजन किया गया है। तीर्थों के प्रति वहाँ की विषैली विकृतियों ने जो अश्रद्धा उत्पन्न की है उसका सहज परिमार्जन शान्तिकुँज गायत्री नगर में पहुँचने पर हो जाता है। सप्तऋषियों की तपस्थली जाह्नवी की सात धाराओं वाली क्रीड़ा भूमि पर बसे हुए गायत्री नगर, ब्रह्मवर्चस और शान्ति-कुँज की गतिविधियों को देखते भर रहने से पूरा समय कट जाता है। अन्यत्र जाने की इच्छा तक नहीं होती। यहाँ का वातावरण ही इतना कुछ प्रदान कर देता है। यहाँ का वातावरण ही इतना कुछ प्रदान कर देता है जितना बहुत समय तक कष्टसाध्य प्रयत्न करते रहने पर भी कदाचित ही किसी को कभी उपलब्ध हो सके।
उपरोक्त सभी सत्रों में आवेदन पत्र भेजकर पूर्व स्वीकृति प्राप्त करनी पड़ती है। स्थान सीमित और आगन्तुकों का दबाव अत्यधिक रहने से यही एक उपाय सुविधाजनक रह जाता है कि समय रहते अपना स्थान सुरक्षित करा लिया जाय। रेलगाड़ियों में स्लीपर पर बैठने की सीट रिजर्व कराने की जिस प्रकार से ही दौड़ धूप करनी पड़ती है, ठीक उसी प्रकार उपरोक्त तीनों प्रकार के सत्रों में से किसी में भी प्रवेश पाने के लिए आवेदन पत्र भेजना पड़ता है। स्वीकृति न मिलने पर भी स्थान पाने की आशा से चल पड़ने वालों को प्रायः निराश ही रहना पड़ता है।
भोजन व्यय सभी शिक्षार्थियों को स्वयं उठाना पड़ता है। हाथ से भोजन बनाने की भी सुविधा है और जो चाहें भोजनालय से अपनी रुचि की खाद्य वस्तुएं खरीद भी सकते हैं।
तीनों सत्रों में किसी में भी आने वालों को निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखते हुए आवेदन पत्र भेजना चाहिए।
1. आवेदनकर्ता का पूरा नाम पता 2. आयु 3. शिक्षा 4.व्यवसाय 5. जन्म जाति 6. युग निर्माण के मिशन के साथ यदि पूर्व संबंध रहा हो तो उसका उल्लेख 7. शारीरिक, मानसिक, स्वास्थ्य सही होने का सुनिश्चित आश्वासन 8. आश्रम का अनुशासन पालन एवं सज्जनोचित व्यवहार की प्रतिभा 9. आने में कोई अतिरिक्त उद्देश्य हो तो उसका उल्लेख 10. पिछली जीवनचर्या एवं भविष्य की इच्छा योजना।
छोटे बच्चों को छोड़कर हर वयस्क शिक्षार्थी का आवेदन पत्र अलग-अलग और उसी के हाथ का लिखा होना चाहिए। एक ही सत्र में इतनी संख्या में व्यक्ति आयेंगे। ऐसा लिख देने भर से किसी को भी स्वीकृति नहीं दी जाती। हर व्यक्ति के स्तर पर अलग से विचार करने के उपरान्त ही आने की स्वीकृति दिये जाने का नियम है। देर से आवेदन भेजने वालों को प्रायः इच्छित तारीखें नहीं मिल पातीं, इसलिए यह भी लिख देना चाहिए कि अभीप्सित सत्र भर गया हो तो अन्य किस सत्र के लिए स्वीकृति भेजी जाय।
कन्याओं या महिलाओं के आवेदन पत्र के साथ उनके अभिभावकों की एक अलग स्वीकृति नत्थी रहनी चाहिए। जिसमें छात्रा के साथ अभिभावक का रिश्ता तथा इच्छा से भेजने की बात का उल्लेख रहना चाहिए।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उपरोक्त तीनों सत्रों के संबंध में तथा प्रज्ञापुत्रों के सोचे गये उत्तरदायित्व के निर्वाह में जिनकी रुचि हो वे शान्ति-कुँज हरिद्वार के पते पर जवाबी पत्र सहित, पत्र-व्यवहार कर लें।
अन्तिम अनुदान-सत्र
शान्ति कुंज के शीतकालीन अनुदान सत्र फरवरी माह में समाप्त हो जायेंगे। अब चैत्र की नवरात्रि में नौ दिन का एक सत्र इस प्रयोजन के लिए लगेगा। इसके बाद नैष्ठिक उपासकों के यह सत्र कब लगेंगे- कहा नहीं जा सकता। युग सन्धि पुरश्चरण के जो भागीदार शीतकालीन सत्रों में न आ सके हों वे चैत्र नवरात्रि सत्र में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें।
(मंगल विजय)
प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करते चलें रात दिन। जिस किसी से सहज प्यार होता जिसे, वह कहीं और अपना लगाता न मन॥1॥
नम मुँह से रटें, मन भटकता रहे, राम की भक्ति की वास्तविक विधि नहीं। ये जुबानी जमा खर्च करते वही, पास जिनके सहज भावना-निधि नहीं॥ राम के भक्त की बस परख है यही, राम के काम बिन चैन आता न क्षण। प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करते चलें रात दिन॥2॥
भक्त बजरंग को प्यार था वास्तविक, रात दिन राम के काम में जुट गये। पूँछ में लग गई आग तो क्या हुआ, इष्ट के काम में डट गये, डट गये॥ प्यार जिससे किया वीर बजरंग ने, बस उसी का किया कर्म से कीर्तन। प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करते चलें रात दिन॥3॥
पुण्य ही मानते थे जटायु जिसे, वे कि करते रहे बस उसी काम को। बिन कहे राम के काम में जुट गये, देख पाये नहीं थे अभी राम को॥ पाप से जूझते पंख भी कट गये, पर हटाये नहीं पुण्य पथ से चरण। प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करते चलें रात दिन॥4॥
वह जरा सी गिलहरी भरी भाव से, बिन कहे राम के काम पर डट गई। कर्म के कण उंडेला करी सिंधु में, भावना भव्य निर्माण में जुट गई॥ क्या पता नाम उसने जपा या नहीं, जा टिके किन्तु खुद राम जी के नयन। प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करने चलें रात दिन॥5॥
राम को तो जुबानी जमा खर्च से प्यार बिल्कुल नहीं, प्यार है कर्म से। इसलिये सिर्फ बातें बनायें न हम, हो विमुख राम के काम ‘युग धर्म’ से॥ स्वर्ग के इस धरा पर सृजन के लिये, देववत् हों हमारे सभी आचरण। प्यार है यदि हमें राम के नाम से, राम के काम करते चलें रात दिन॥6॥
*समाप्त*