अध्यात्म तत्वज्ञान और साधना विधान को उसके वास्तविक स्वरूप में पू. गुरुदेव ने समझाने और अपनाने का प्रयत्न किया है। फलतः उन्होंने उसका समुचित प्रतिफल भी प्राप्त किया है। ‘साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त अक्षरशः सही है, इस तथ्य की प्रामाणिकता पू. गुरुदेव की उपलब्धियों को जांचने-परखने पर किसी को भी सहज विश्वास हो सकता है।
उनकी ओजस्वी काया, मनस्वी मनीषा, तेजस्वी अन्तरात्मा को जितना निकट से जाँचा खा जाय उसमें उतनी ही गहराई और यथार्थता अनुभव की जा सकती है। आत्म कल्याण और लोक-मंगल के दोनों ही प्रयोजन उनने सही अर्थों में पूर्ण किये हैं। उनकी नाव में बैठकर कितनों ने उबरने, उठने और उछलने के अनुदान प्राप्त किए हैं। यह चर्चा न तो इन पंक्तियों में सम्भव है, न आवश्यक। स्मरण मात्र इतना दिलाया जा रहा है कि सही तथ्यों का- सही रूप से- सही प्रयोग किया जाय तो उसके परिणाम भी अन्य क्षेत्र की तरह अध्यात्म क्षेत्र में भी उत्साहवर्धक ही होते हैं। गुरुदेव की सिद्धियों को देखकर साधना विज्ञान और उसके प्रयोग उपचार पर सही अर्थों में विश्वास होता है। इन दिनों अध्यात्म विद्या के प्रति सन्देह और अविश्वास बढ़ता जा रहा है, निराशा का वातावरण बन रहा है, उसका कारण वह असफलता ही है जो आरम्भ तो बहुत उत्साहपूर्वक की गई किन्तु अंत में पूरी न हो सकी। इस असमंजस को दूर करने के लिए अखण्ड-ज्योति में लगातार अध्यात्म का सैद्धांतिक एवं प्रयोगात्मक “रहस्योद्घाटन” प्रतिपादन प्रकाशित होने जा रहे हैं। यह लेख माला दिसंबर 81 अंक से आरम्भ हो रही है और प्रायः एक साल तक चलेगी। इस प्रतिपादन को उनके अध्यात्म क्षेत्र के निजी अनुभवों का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है।
गत मास ऐसा सोचा गया था कि इस रहस्योद्घाटन को सीमित लोगों तक ही रखा जाय पर पत्राचार विद्यालय के रूप में इसकी जानकारी कुछ गिने चूने लोगों को ही दी जाय। सूचना छपते सभी प्रज्ञा परिजन उसे जानने और पत्राचार विद्यालय का लाभ लेने के लिये आतुर हो उठे। अस्तु सीमा बन्धन वाला विचार छोड़ना पड़ा और निश्चय किया गया कि जो कहना-बताना है उसे सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया जाय। लाभ तो उससे मनस्वी और श्रद्धालु ही प्राप्त कर सकेंगे किन्तु जो उपयोगी है उसे जानना तो सभी को चाहिए। अस्तु अखण्ड-ज्योति में वह रहस्योद्घाटन छपना आरम्भ हो गया है और जब तक प्रसंग पूरा न हो जाय जब तक चलता ही रहेगा।
कहना न होगा कि यह प्रतिपादन अलभ्य होगा। श्रद्धा क्षेत्र की गूढ़ प्रतिष्ठापनाओं को तर्क, तथ्य, प्रमाण, विज्ञान और अनुभव के आधार पर प्रतिपादित करने का उपक्रम मात्र पू. गुरुदेव की विशेषता है। पुरातन और नवीन का समन्वय करने में वे सिद्धहस्त हैं। उनकी इस विलक्षणता से संसार भर की मनीषा आश्चर्यचकित है। दिसम्बर 81 से लेकर सन् 82 तक के अंकों को अध्यात्म “अनुभूति शिक्षा साधना” का पत्राचार पाठ्यक्रम माना जा सकता है। सभी पाठकों से प्रत्येक अंक दो बार पढ़ने और आवश्यक तथ्यों को डायरी में नोट करते रहने के लिये कहा गया है। जब पाठ्य सामग्री की पूर्णाहुति होगी तो पाठकों से कुछ प्रश्न पूछे जायेंगे। उत्तरों के आधार पर उन्हें चित परामर्श दिये जायेंगे। साथ ही जिनकी जानकारी परिपक्व मानी जायेगी उन्हें अंतरंग साधकों में पंजीकृत कर लिया जायेगा।
परिजनों से आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि वे इस वर्ष ‘अखण्ड-ज्योति’ के नये सदस्य मात्र पत्रिका को परिपुष्ट करने-प्रज्ञा अभियान को अग्रगामी बनाने-बसन्त पर्व की श्रद्धांजलि चढ़ाने के लिये ही नहीं वरन् इस दृष्टि से भी बढ़ायें कि उस विलक्षण पाठ्य सामग्री का लाभ उनके सभी प्रियजनों को मिल सके। स्मरण रखने योग्य रखने योग्य तथ्य यह है कि ये अंक कुछ ही समय में मिलने दुर्लभ हो जायेंगे। माँगकर पढ़ लेना बात दूसरी है, पर इन्हें स्थायी निधि के रूप में सुरक्षित रख सकना उन्हीं के लिये सम्भव हो सकेगा जो स्थायी ग्राहकों के रूप में उन्हें उपलब्ध कर सकेंगे। पढ़कर रद्दी की जाने जैसी यह सामग्री नहीं है वरन् ऐसी है जिसे हीरे-मोतियों की तरह सम्भालकर रखा जाना चाहिए और अगली विचारशील पीढ़ी के लिए बहुमूल्य उत्तराधिकार की तरह छोड़कर चला जाना चाहिए।
प्रयत्न यह होना चाहिए कि सन् 82 की अखण्ड-ज्योति के सदस्य उन सभी को बना लिया जाय जो अपने निकटवर्ती स्वजन, सम्बन्धी, मित्र एवं प्रमुख क्षेत्र के विचारशील व्यक्ति हों। पत्रिका के चन्दे को राशि इतनी बड़ी या इतनी असह्य नहीं है जो इतनी बहुमूल्य सामग्री के बदले में जुटाई न जा सके। प्रश्न पैसे का नहीं, समझने समझाने का है। यथार्थ जानकारी के अभाव में बहुमूल्य वस्तुएँ भी उपेक्षा में पड़ी रहती हैं। सन् 82 की अखंड-ज्योति के संबंध में भी ऐसा ही हो सकता है। अस्तु परिचय कराने, उत्साह बढ़ाने एवं आग्रह करने में कमी नहीं रखी जानी चाहिए। जिनका पू. गुरुदेव की गरिमा और उपलब्धियों पर श्रद्धा विश्वास हो, उन सभी का कर्त्तव्य है कि सन् 82 की अखण्ड-ज्योति में छपने वाले उनके निष्कर्षों, विश्वासों एवं अनुभवों का सार अपने प्रभाव क्षेत्र के हर भावनाशील तक पहुँचाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न करें। इन्हीं दिनों एकाकी या टोली बनाकर निकल पड़ा जाय तो एक ही दिन में दस सदस्य अपने प्रभाव क्षेत्र में ही बनाये जा सकते हैं। यह एक-दो दिन का प्रयास परिश्रम काम में कुछ हर्ज करता हो तो भी उसे सहन करना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिये कि प्रतिपादन की उपयोगिता एवं अलभ्यता को देखते हुए उसे सभी स्वजनों के गले मढ़ दिया जाय। भले ही वे महत्व न समझ पाने के कारण आनाकानी करने या उपेक्षा ही दिखाते क्यों न हों?
प्रत्येक परिजन से इस बार यही अपेक्षा की गई है कि वे ये पंक्तियाँ पढ़ने के उपरान्त अपने संपर्क क्षेत्र के विज्ञजनों की सूची बनायेंगे और उन्हें सन् 82 की पत्रिका का सदस्य बनाकर ही रहेंगे। चुनाव में खड़े होने पर बोट प्राप्ति के लिये जो उपाय सोचे जा सकते हैं वैसी ही रीति-नीति अपनाकर आग्रहपूर्वक ढेरों नये सदस्य बनाये जा सकते हैं।
इन्हीं दिनों एक विशेष विषम परिस्थिति में भी समाधान हमें ही हल करना है। इस एक वर्ष की अवधि में कागज का मूल्य प्रायः चालीस प्रतिशत बढ़ा है। साथ ही छपाई, स्याही आदि की मुद्रण प्रक्रिया में प्रायः उतनी ही बढ़ोत्तरी हुई है। इस विवशता में प्रायः सभी पत्रिकाओं ने लागत वृद्धि के अनुपात में अपनी मूल्य वृद्धि कर दी है। अखण्ड-ज्योति तो पहले ही कठिनाई से अपनी लागत पूरी कर पा रही थी। अब चालीस प्रतिशत वृद्धि का भार उसके लिये किसी भी प्रकार सहन नहीं हो सकता। पृष्ठ घटा देने या चन्दा बढ़ा देने के अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प नहीं। पृष्ठ घटाने में अगले वर्ष की अलभ्य सामग्री में कटौती करनी पड़ती और पत्रिका का स्तर तथा महत्व गिराना पड़ता। ऐसी दशा में थोड़ा-सा चन्दा बढ़ा देने की बात विवशतापूर्वक स्वीकार करनी पड़ रही है। परिजन जब महंगाई की हर चोट को किसी न किसी प्रकार सहन कर ही रहे हैं तो इसे भी करेंगे ही। अपने अमृतोपम आहार को वे छोड़ भी तो नहीं सकेंगे।
सन् 82 से अखण्ड-ज्योति का चन्दा बारह के स्थान पर पन्द्रह रुपया होगा। चालीस प्रतिशत महंगाई का भार पड़ने पर भी चंदे में वृद्धि मात्र पच्चीस प्रतिशत ही की गई है। इसमें भी यह निश्चय किया गया है कि पत्रिका के कलेवर में वृद्धि कर दी जाय। उससे कम में स्तर व गुणवत्ता बनाये रखने की बात बनेगी भी नहीं। पृष्ठ संख्या बढ़ाना इसलिये भी आवश्यक हो गया है कि अगले वर्ष जो सारगर्भित रहस्योद्घाटन होना है, उसके निमित्त पत्रिका का आकार भी बढ़ाना चाहिए।
पाठक अभी से नोट कर लें कि सन् 82 का चन्दा बारह के स्थान पर पन्द्रह रुपये वार्षिक होगा, सभी सदस्यों को यह राशि भेजनी तथा नये सदस्यों से वसूल करनी है।
सर्वविदित है कि अध्यात्म साधनाओं के सफल होने में विधि-विधान की कमी से देवता को अप्रसन्नता नहीं वरन् एकमात्र बाधा साधक के संचित कषाय-कल्मषों की भरमार है। इस जन्म के तथा पूर्व जन्म के संचित पाप कर्म अपना दण्ड प्रकट करना चाहते हैं। साधना से उस कर्मफल व्यवस्था का परिमार्जन हो सकता है। इसलिए संचित दुष्कर्म ही चित्त की चंचलता, अश्रद्धा, अन्यमनस्कता व्यतिरेक, आदि अनेक तरह की अड़चनें उत्पन्न करके ऐसी स्थिति बना देते हैं जिससे साधनायें निष्फल होती रहें।
आत्मिक प्रगति की इस सबसे भारी एवं प्रमुख चट्टान को हटाने को हटाने के लिए पापों का प्रायश्चित्त करने की तपश्चर्या करनी पड़ती है। इसी ऊर्जा से कुसंस्कार जलते हैं, भ्रम जंजाल भागते हैं, बन्धन कटते हैं। प्रगति के अवरुद्ध कपाट इसी आधार पर खुलते हैं। देवपूजा की मनुहार बाद की बात है। सर्वप्रथम आत्म-शोधन के लिए तप साधना का साहस सँजोना पड़ता है। इसके फलस्वरूप ही भौतिक सिद्धियाँ, आत्मिक ऋद्धियाँ एवं दैवी विभूतियों से लाभान्वित होने की आशा की जानी चाहिए।
चान्द्रायण को मनोरोग चिकित्सा का अध्यात्म विज्ञान के अनुसार कारगर उपचार माना गया है। उसमें प्रायश्चित्त के लिये तितीक्षा, कष्ट सहन का विधान तो है ही, इसके अतिरिक्त मनःक्षेत्र के परिवर्तन की भूमिका निभाने वाली ध्यान धारणाओं का, बन्ध मुद्राओं का भी साथ-साथ अभ्यास कराया जाता है। आत्मिक परिष्कार के लिए सवा लक्ष गायत्री अनुष्ठान, स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन मनन जैसे कई व्रत नियम हैं। भविष्य निर्धारण के लिये परामर्श- पिछली भूलों में खोदी गई खाई को पाटने वाली क्षति पूर्ति- का भी इसी साधना क्रम में अविच्छिन्न समावेश है। इन अभ्यासों को योग साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।
मनोरोग चिकित्सा के प्रचलित उपायों में से सभी उथले हैं। उनकी पहुँच अन्तराल की गहन परतों तक, आस्था के क्षेत्र तक प्रवेश नहीं कर पाती। फलतः वे वैसा प्रभाव दिखा नहीं पाते जैसा कि अभीष्ट है। इस कमी को चान्द्रायण की अध्यात्म चिकित्सा ही पूरी करती है और उसका सीधा प्रभाव अन्तःकरण के आस्था क्षेत्र तक पहुँचने के कारण मन, बुद्धि और चित्त के स्तर में अभीष्ट परिवर्तन सम्भव हो जाता है। यह असामान्य उपलब्धि है, जिसे किये गए श्रम और उठाये गए कष्ट की तुलना में अत्यधिक महत्वपूर्ण ही कहा जा सकता है।
यह शारीरिक और मानसिक परिशोधन की बात हुई। इसे समग्र आध्यात्मिक प्रगति का आधा भाग कहना चाहिए। शेष आधा वह रह जाता है जिसमें ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी बनने के लिए शारीरिक, मानसिक आत्मिक स्तर की प्रखरता का अभिनव अर्जन, उपार्जन करना पढ़ता है। रोग निवारण की चिकित्सा ही पर्याप्त नहीं, बल वृद्धि के लिए ऐसे उपाय अतिरिक्त रूप से अपनाने पड़ते हैं जिनसे दुर्बलता हटाने और समर्थता बढ़ाने का उद्देश्य पूरा हो सके। चान्द्रायण साधना में आधा पक्ष परिशोधन का, आधा परिवर्धन का है, अतः उससे अस्पताल का ही नहीं अखाड़े का भी लाभ मिलता है।
संचित दुष्कर्म हो अनेकों शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग, पारिवारिक विग्रह, आर्थिक संकट, सामाजिक विद्रोह एवं परिस्थितियों की प्रतिकूलता उत्पन्न करते हैं। जब तक यह कंटक निकलते नहीं तब तक चुभन से पीछा नहीं छूटता। रक्त-शोधन बिना फोड़े, फुन्सी, दाद, चकत्ते कैसे मिटें? नाली की सड़न हटाये बिना मच्छरों, कृमि-कीटकों, विषाणुओं से छुटकारा कैसे मिले? स्नान, दर्शन या छुटपुट मनुहार उपचार से पाप नहीं छूटते, उनका एकमात्र उपाय प्रायश्चित्त है। उसी को प्रकारान्तर से तपश्चर्या कहते हैं। सोने की तरह मनुष्य भी तपने पर ही निखरता है। प्रसुप्त आत्मिक शक्तियों को उभारने में तप साधना से बच निकलने का कोई “शॉटकट” नहीं है।
कुसंस्कारों का निराकरण और विभूतियों का उन्नयन जैसे उभयपक्षीय प्रयोजन जिन तप-तपश्चर्याओं से सधते हैं, उनमें सर्वसुलभ, सर्वविदित साधना चान्द्रायण व्रत की है। यह पूर्णिमा से से पूर्णिमा तक एक महीने में पूरी होती है। इसमें आधा भोजन घटा देने का अर्ध उपवास तो अपनाना ही पड़ता है, साथ ही सवा लक्ष गायत्री पुरश्चरण भी करना होता है। इसके अतिरिक्त, साथ-साथ ऐसी अन्यान्य साधनायें भी चलती रहती हैं जो साधक की स्थिति को देखते हुए सामयिक संकटों के निवारण एवं भविष्य के अनुकूलन को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती हैं।
प्रज्ञा परिजनों को साधनारत बनाने और अपनी प्रखरता उभारने के लिए इन दिनों कुछ विशेष प्रेरणायें दी जा रही हैं। शांतिकुंज को गायत्री तीर्थ के रूप में इसीलिए परिवर्तित किया गया है कि भविष्य में यहाँ साधना का कार्यक्रम एवं वातावरण ही बना रहे। आत्मशक्ति का उद्भव अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसी के सहारे व्यक्ति तथा विश्व के भाग्य निर्माण का उपचार बन पड़ेगा।
शान्तिकुंज, गायत्री तीर्थ में अब हर भारतीय महीने में, चान्द्रायण व्रत का एक महीने वाला साधना क्रम चला करेगा। इसी का छोटा संस्करण कम समय निकल सकने वालों के लिए दस-दस दिन की साधनाओं का बनाया गया है। वह अँग्रेजी महीनों की तारीखों से चला करेगा। हर महीने 1 से 10 तक, 11 से 20 तक, 21 से 30 तक दस दिवसीय लघु चान्द्रायण एवं लघु अनुष्ठान 24 हजार जप के चला करेंगे। एक महीने का, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सवा लक्ष जप वाला पूर्ण चान्द्रायण माना जायेगा। इतने पर भी दोनों में अनुशासन, आधार एवं कार्यक्रम एक जैसे ही चला करेंगे।
इस संदर्भ में एक बात अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं स्मरण रखने योग्य है कि उच्चस्तरीय साधना के लिए वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना के लिए वातावरण, साधना विधान तथा मार्गदर्शन भी उच्चस्तरीय ही होना चाहिए। यदि घर के कुसंस्कारी वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना बन पड़ती तो किसी को भी घर की सुविधा छोड़कर उपयुक्त स्थान की तलाश करने की आवश्यकता न पड़ती। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अयोध्या छोड़कर हिमालय नहीं ही जाते। विश्वामित्र राज पाट छोड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में क्यों जाते? पूजा पाठ तो घर पर भी चलता रह सकता था।
प्रज्ञा परिवार के साधकों के पूर्ण या संक्षिप्त चान्द्रायण तप के लिए गायत्री तीर्थ का वातावरण प्रयत्न पूर्वक तद्नुरूप बनाया गया है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, साधना के रंग में रंगा हुआ आश्रम तथा वातावरण इस योग्य बन गया है कि वहाँ रह कर की गई साधना से सिद्धि स्तर तक पहुँचने की आशा की जा सके। भोजन आधा कर देना ही पर्याप्त नहीं, आहार औषधि तुल्य सुसंस्कारी भी होना चाहिए। अब साधकों को प्रातः प्रायश्चित्त पंचगव्य औषधियों का क्वाथ (चाय), मध्याह्न, गौमूत्र परिशोधित हविष्यान्न की रोटी, दिव्य जड़ी बूटियों की चटनी तथा पकाने परोसने में सुसंस्कारों का समन्वय करने का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। इसे अध्यात्म उपचार की आहार चिकित्सा कहा जा सकता है।
हिमालय के आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र के द्वारा एवं पू. गुरुदेव, माताजी का सान्निध्य अनुदान। आश्रम में देव प्रतीकों के नित्य दर्शन। नैष्ठिकों का सहचरत्व। स्वाध्याय सत्संग का सुयोग आदि ऐसी विदित अविदित विशेषतायें हैं जिन्हें देखते हुए चान्द्रायण जैसी तपश्चर्या के लिए इससे उत्तम स्थान अन्यत्र खोजा जा सकना कठिन है। उपयुक्त वातावरण में ही उच्चस्तरीय साधनायें सफल होती हैं। इस रहस्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उत्तम है।
शांतिकुंज में स्थान कम और इच्छुकों की संख्या अधिक रहने के कारण सदा स्थान मिलने सम्बन्धी खींचतान रहती है। जिन्हें जिस महीनों आना हो, बहुत समय पहले ही स्थान सुरक्षित करा लें। चान्द्रायण सत्र कार्तिक पूर्णिमा 11 नवंबर से प्रारम्भ हो जायेंगे और लगातार चलते रहेंगे
भूमिखण्डों में उर्वरता तो अवश्य है, पर इतनी क्षमता नहीं कि समुद्र के साथ सीधा सम्बन्ध जोड़ सकें। उन्हें बादलों के अनुग्रह का लाभ उठाकर अपनी प्यास बुझानी पड़ती है। इस तृप्ति का लाभ खेतों को हरा-भरा बनाने तथा असंख्यों की क्षुधा-पिपासा शान्त होने के रूप में मिलता है।
जन-साधारण सभी स्तर के लोगों का एक सम्मिश्रित स्वरूप है। उनमें असंख्यों ऐसे भी हैं, जिनमें उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ प्रसुप्त स्थिति में पड़ी है। उन्हें यदि सदाशयता के साथ सघन सम्बन्ध बनाने का अवसर मिल सके तो वे घिसा पिटा जीवन न जीयें, अपने लिए और दूसरों के लिये कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकें। पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि न कुंआ प्यासे के पास पहुँचता है, न प्यासा कुएँ के पास। महानता प्रतिभाओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने को व्याकुल है। प्रतिभाएँ इच्छुक हों चाहे न हों, पर यह निश्चित है कि यदि उन्हें “सीप को स्वाति बूँद मिलने” जैसा सुयोग मिल सका होता, तो उनमें बहुमूल्य मोती उत्पन्न होते। सौभाग्य सराहा जाता। पर इस हठीले अवरोध का क्या किया जाय जो अपनी जगह चट्टान जैसा अड़ गया है।
दूरदर्शी वे हैं जो अवरोधों का समाधान निकालते हैं। ऐसे लोग भले ही श्रमरत रहें और बादलों की तरह घाटा उठायें, किन्तु उन्हें देवताओं जैसा श्रेय मिलता है। आसमान पर छाये रहते हैं। उन्मुक्त आकाश में विचरण करते हैं। सभी उनकी प्रतीक्षा करते और नजर गड़ाये रहते हैं। यदि उनने यह कठिन उत्तरदायित्व कन्धों पर न लिया होता तो न कहीं हरीतिमा के दर्शन होते न जलाशयों का अस्तित्व ही नजर आता। कर्त्तव्य सो कर्त्तव्य। उसे कोई पालकर देखे तो वह अवलम्बन कितना कितना रसीला है। बादलों को खाली होकर लौटने की प्रक्रिया में रस न आया होता तो निश्चय ही इस रूखे, नीरस लगने वाले काम को करने से उन्होंने कब का इन्कार कर दिया होता।
विद्या बिहार के दीक्षान्त समारोह में आचार्य रौहित्य कौशल नरेश तथा सुदूर प्रदेशों के सहस्रों जिज्ञासुओं के समक्ष समापन प्रवचन कर रहे थे। उनके श्रोताओं में उपस्थित थीं राजनर्तकी मधूलिका। विद्या विहार के निर्माण व संचालन का सारा दायित्व भी उसी ने ही तो सम्भाला था।
मधूलिका रूपवती ही नहीं- बुद्धिमती और सूक्ष्मदर्शी भी थी। उसका रूप-यौवन समय के क्रमानुसार उस स्तर तक जा पहुँचा था जिसे सर्वोपरि कहा जा सके। उसकी काया को मानों सृष्टा ने स्वयं ही गढ़ा था। कौशल नरेश उसके सौंदर्य पर इतने मुग्ध थे कि राज्यकोष की चाबियाँ उसके इशारों पर खुलती-बन्द होती थीं। यह सब बहिरंग पक्ष था। तथ्य कुछ और था।
मधूलिका एक कुलीन परिवार में जन्मी थी। उन दिनों छाये विलासिता के वातावरण-लोकमानस पर व्याप्त प्रमाद रूपी बादलों को हटाने के लिये बौद्ध-भिक्षुओं ने जो प्रक्रिया चलायी थी, धन के अभाव में कौशल देश में उस आन्दोलन में प्रखरता नहीं आ पा रही थी। मधूलिका ने अपना रूप-यौवन बेचक साधन जुटाने का-कौशल नरेश को अपने पाश में जकड़कर राज्यकोष को विद्या बिहारों के निर्माण में नियोजित करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। कौशल नरेश की आज प्रवचन में उपस्थिति भी मधूलिका के सौंदर्य के कारण थी, न कि आध्यात्मिक अभिरुचि के कारण।
मधूलिका को मांसलता बेचकर महाराज को मोहपाश में बाँध लेने वाली मायाविनी एवं राज्यकोष खाली करके अपना घर भरने वाली वेश्या भर समझा जाता था। देश भर में फैले विद्या बिहारों के निर्माण की पृष्ठ भूमि में छिपे उसके अनुदानों को आचार्य विशालाक्ष के अतिरिक्त कोई जानता भी नहीं था- यही वह चाहती भी थी। व्यक्तिगत क्षति सहकर समष्टि के कल्याण का सम्पादन करने में यदि उसे अपना शील भी होमना पड़े तो भी मानवता तो लाभान्वित होगी, अब तक यही उसकी धारणा थी।
आज तो आचार्य जो कर रहे थे, उसने इस सम्वेदनशील वीरांगना को हिला कर रख दिया। वे कह रहे थे “तथ्य ही महत्त्वपूर्ण है। उसी के आधार पर सत्य को जाना व पाया जा सकता है। तथ्य रहित सत्य मात्रा एक भ्रान्ति है। सत्य को पाने के लिये तथ्यों का सहारा लेना ही होगा।” उसके ऊपर यदि यही तथ्य लागू होता है कि “वह एक वैश्या है, मांसलता का विक्रय कर धन लूटने वाली हेय नारी है तो यही सत्य भी होना चाहिये। इतना विचार करते-करते प्रवचन में ही वह सुबक पड़ी और उठकर शयन कक्ष में जाकर लेट गयी। जहाँ प्रवचन के अमृतवचन औरों को शान्ति दे रहे थे वहाँ मधूलिका को वे मर्मबेधी तीरों के समान शूल से लग रहे थे।
विद्या बिहार के संचालक आचार्य विशालाक्ष भी वहीं बैठे थे। उन्होंने मधूलिका को दुःखी मन से अन्दर जाते देखा तो वे सब कुछ समझ गये। प्रवचन के उपरान्त वे मधूलिका के कक्ष में पहुँचे। उनकी आँखों से व्यक्त हो रहे वात्सल्य भाव को देखते ही मधूलिका स्वयं को रोक नहीं पायी। वह उनके चरणों में लोट गयी और फफकते हुए कहने लगी ‘आचार्य!’ आप तो सब जानते हैं- क्या वही सत्य है- क्या मैं हेय और पतित हूँ- यही तथ्य है। यदि ऐसा है तो मुझे स्वयं को समाप्त कर देना चाहिये।”
अपनी सहज करुणासिक्त वाणी में उन्होंने मधूलिका के मस्तक पर स्नेह भरे हाथ फिराये और कहा- ‘भद्रे! सत्य और तथ्य का एकीकरण तथ्य को ऊँचा उठाकर ही किया जा सकता है। सत्य को तथ्य के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता। तुम्हारा लक्ष्य महान था- कार्य विधि कुछ भी रही हो। तुम्हारी अतृप्त आकुलता का समाधान संघ के इसी महामन्त्र में है- संघं शरणम् गच्छामि, बुद्धं शरणम् गच्छामि, धर्मं शरणम् गच्छामि।” उनकी यही गुनगुनाहट मधूलिका का भी गुरु मंत्र बन गयी।
प्रेम और मोह में एक को काया और दूसरे को छाया कहा जा सकता है। दोनों में वही अन्तर होता है जो काया और छाया में है। शरीर में जीवन होता है छाया निष्प्राण होती है। छाया को देखकर वास्तविकता का भ्रम तो हो सकता है, पर उससे काया का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता।
प्रेम का आरम्भ किसी व्यक्ति से हो तो सकता है पर उस पर सीमित नहीं रह सकता। यदि सीमित यह जाता और कुछ पाने की कामना करता है तो वह मोह बन जाता है। प्रेम में पाने की नहीं देने की उमंग रहती है। प्रेमी की प्रसन्नता और हित कामना जुड़ी रहती है। मोह आदान-प्रदान की अपेक्षा और उपभोग की कामना करता है। प्रेम वस्तुओं से जुड़कर सदुपयोग की, व्यक्तियों से जुड़कर उनके कल्याण की और समस्त विश्व से जुड़कर परमार्थ की बात सोचता है। मोह में व्यक्ति, पदार्थ और संसार से किसी न किसी प्रकार का स्वार्थ जुड़ा रहता है। जिसके प्रति मोह होता है उसे अपनी इच्छानुसार चलाने की ललक रहती है। इसमें व्यवधान होने पर खीज, झुँझलाहट और असन्तोष का उद्वेग उमड़ता है। प्रेम इस तरह की कोई कामना नहीं करता। प्रेमी के हित चिन्त और उसके प्रति अपने कर्त्तव्यों की पूर्ति में ही सन्तोष अनुभव करता है।
प्रेम का अंकुरण परिवार से आरम्भ होता है और विकसित, पल्लवित, पुष्पित होते हुए उसकी शाखाएँ, प्रशाखाएं, समस्त समाज में फैल जाती हैं। परिवार प्रेम साधना की एक पाठशाला है। पत्नी द्वारा बच्चों के लिए अपने सुखों की बलि दी जाती है। उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति में जो कष्ट उठाया जाता है उसमें सन्तोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है किन्तु जब अपने सगे सम्बन्धियों की प्रसन्नता के लिए उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रहता और आदर्शों की बलि दे दी जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता, मोह बन जाता है। जो स्वयं तथा जुड़े हुए व्यक्तियों के लिए हानिकारक होता है।
प्रेम गंगा की भाँति वह पवित्र जल है जिसे जहाँ छिड़का जाय वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श रहित प्यार को ही मोह कहते हैं। मोह में अपने प्रियपात्र को ऊँचे उठाने की क्षमता नहीं होती। अवाँछनीयता से मोह समझौता कर सकता है-प्रेम नहीं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, शालीनता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुणों का भरपूर समावेश प्रेम में होता है। प्रेमी जिससे प्रेम करता है उसमें इन्हीं गुणों की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है। मोह इन विशेषताओं से रहित होता है।
भाव-संवेदनाओं के उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पण को प्रेम कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता होती है कि यह सीमाबद्ध नहीं हो सकता। क्रमशः विस्तृत होता जाता है। सूर्य पूर्व से उदय तो होता है किन्तु उसका प्रकाश समस्त दिशाओं में फैल जाता है। बादल समुद्र से निकलते तो हैं, पर उसी क्षेत्र में नहीं बरसते-सर्वत्र अपना अनुदान बिखेरते हैं। उत्कट प्रेम की भी यही विशेषता होनी चाहिए। उसका आरम्भ सगे सम्बन्धियों, मित्रों से तो हो पर उतने तक ही सीमित न रहे वरन् समाज, राष्ट्र और विश्व की सीमाओं में विकसित होना चाहिए- देश, धर्म, संस्कृति और मानव-जाति की सेवा साधना में निरत होना चाहिए।
जीवन के सुन्दरतम रूप की कुछ अभिव्यक्ति हो सकती है तो वह प्रेम में ही है। इसको निकाल दिया जाय तो मनुष्य जीवन में कोई विशेषता रह नहीं जाती। शुष्क, नीरस हृदय मरघट के पिशाच की भाँति जलता और सदा अतृप्त, उद्विग्न और अशान्त बना रहता है। ऐसा जीवन स्वयं के लिए भारभूत और समाज के लिए अभिशाप सिद्ध होता है। प्रेम संसार की वह ज्योति है जिसका प्रकाश पाकर हर व्यक्ति अपने अन्तरंग के कषाय-कल्मषों को दूर करता और हृदय को पवित्र, निर्मल बनाता है। विश्व की यह सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति है।
अन्तःकरण से उठने वाली प्रेम की लपटें शरीर, मन, बुद्धि और अन्तःकरण की शक्तियों का उद्दीपन कर उन्हें ऊपर उठाती हैं और दिव्य आनन्द की रसानुभूति कराती हैं। निष्काम प्रेम में वह शक्ति है जो प्रवाह बनकर फूटती है और हजारों लाखों लोगों के जीवन में आनन्द का स्त्रोत बनकर उमड़ पड़ती है। वह हजारों के अन्तःकरणों को धोकर निर्मल बना देती है। मोह में न तो विस्तार की गुँजाइश होती है। और न ही किसी को प्रभावित करने की क्षमता ही। वह विशुद्ध रूप से भौतिक धरातल पर टिका होता है और भौतिक आधारों के डगमगाते ही असन्तोष और निराशा उत्पन्न करता है।
प्रेम की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति ईश्वर प्रेम के रूप में होती है। ‘भक्ति’ इसी का नाम है। अपनी भाव संवेदनाओं को परमात्मा के समक्ष समर्पित कर देना-भक्ति है। परमात्मा विश्वात्मा का पर्याय है। वह व्यक्ति नहीं शक्ति है। विश्वात्मा उसकी अभिव्यक्ति है। भक्ति का अर्थ है अपनी भाव संवेदनाओं की विश्वात्मा अर्थात् समस्त जड़-चेतन में घुला-मिला देना। समस्त संसार को परमात्मा का स्वरूप मानकर उसकी आराधना करना। उसमें सत्यम्, शिवम्, सुन्दम् का दर्शन करते हुए अपनी समस्त शक्तियों को विश्वकल्याण के लिए नियोजित रखना।
भक्ति शब्द संस्कृत के ‘भज्’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है ‘भज सेवायाम्’। जो भक्ति के स्वरूप को और भी स्पष्ट करता है। ईश्वर भक्त को यही करना होता है। देव प्रतिमा के समक्ष वह अपनी भाव संवेदनाओं के विस्तार का ही अभ्यास करता है। भक्त की सफलता की कसौटी भी यही है कि उसने अपने आपे का कितना अधिक विस्तार किया।
ईश्वर के प्रति घनिष्ठता और समर्पण साधक को क्षुद्र से महान, लघु से विभु, नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बनाने में समर्थ है। भक्ति जब जीवन में उतरती है तो अन्तःकरण में अनायास ही उत्कृष्ट आस्थाएँ और उदात्त भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। प्रेम की यह पराकाष्ठा है। इस स्थिति में अन्तरात्मा से आनन्द की निर्झरिणी बहती है जिसमें अवगाहन कर साधक सर्वत्र अपनी ही आत्मा-सत्ता की अनुभूति करता है।
‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ -वेदान्त में वर्णित अद्वैत की यही स्थिति है जिसमें सर्वत्र अपनी ही सत्ता क्रीड़ा-कल्लोल करती दिखाई देती है। इस चरम स्थिति की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। यहाँ तक पहुँचने के लिए मनुष्य को मोह रूपी छाया को छोड़ना और प्रेम की जीवंत काया को पकड़ना होगा, आत्म-विस्तार के लिए सतत् प्रयत्नशील रहना होगा।
महर्षि दयानन्द ने किसी व्यक्ति को निःसंकोच प्रश्न पूछने की स्वीकृति दी और उसने पूछा- “कभी ऐसा भी समय आया है आपके जीवन में जब आपने काम पीड़ा अनुभव की हो?” स्वामी जी ने उत्तर दिया- “आज तक मेरे मन में कभी ऐसा विकार नहीं आया। मेरे विचार कभी काम से प्रभावित ही नहीं हुए तो वह शरीर में प्रविष्ट कैसे होते।”
“स्वप्न में भी नहीं?”
“जब कामुक विचारों को शरीर में प्रवेश करने का अवसर ही नहीं मिला तो वे क्रीड़ा कहाँ करते। कुविचार ही तो विकारों के जनक होते हैं। जब कुविचार नहीं तो विकार भी नहीं।”
मनुष्य में जहाँ शारीरिक-मानसिक स्तर की अनेकों विशेषताऐं हैं, वहीं उसकी वरिष्ठता इस आधार पर भी है कि उसमें ‘अन्तरात्मा’ कहा जाने वाला एक विशेष तत्व पाया जाता है। उसमें उत्कृष्टता का समर्थन और निकृष्टता का विरोध करने की ऐसी क्षमता है, जो अन्य किसी प्राणी में नहीं पायी जाती। जीव-जन्तुओं में उनकी इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति के निमित्त ही कई प्रकार की प्रेरणाएं उठती हैं। इसमें उन्हें नीति-अनीति से कोई मतलब नहीं रहता। उदारता नाम की वस्तु मात्र मादाओं में उस सीमा या समय तक पाई जाती है, जब तक कि उनकी सन्तानें असमर्थ रहतीं या स्वावलम्बी नहीं बनतीं। इस अवधि के समाप्त होने पर उनका ममत्व समाप्त हो जाता है। यौन कार्य के समय भी नर-मादा में कुछ आकर्षण या सहयोग जैसा सौजन्य उभरता है। आवश्यकता पूर्ण होने पर वह भी आमतौर से विस्मृत होते देखा गया है। जोड़ा मिल कर देर तक साथ-साथ रहने वाले तो कुछेक पक्षी ही पाये गये हैं।
मनुष्यों में यह स्नेह-सौजन्य, औचित्य, न्याय एवं उदार सद्भावना से भरे गुण पाये जाते हैं। यह किसी स्वार्थ या लाभ से प्रेरित होकर नहीं वरन् अन्तराल की गहरी परतों से उद्भूत होता और इतना प्रखर रहता है कि आदर्शवादिता के निमित्त कष्ट सहने या घाटा उठाने के लिए भी तत्परता बरती जा सके। यही अन्तरात्मा है, जो सत्कर्म करने पर भीतर ही भीतर प्रसन्न होती, गर्व-सन्तोष प्रकट करती हुई देखी जाती है। अनीति अपनाते समय अंतर्द्वंद्व विक्षुब्ध होता है और आत्म-प्रताड़ना की पीड़ा अपने आप ही सहमी पड़ती है। भर्त्सना, प्रताड़ना का भय न हो तो भी दुष्कर्म करते समय भीतर ही भीतर जी काटता-कचोटता है। यही अन्तरात्मा है। उसका प्रोत्साहन यह रहता है कि आदर्शवादिता अपनाई जाय और दूसरों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये जांयें।
तर्क या अर्थ विज्ञान की दृष्टि से अन्तरात्मा की पुकारें, घाटा देने वाली और झंझट में फँसाने वाली होती हैं। इतने पर भी कुछ ऐसी उमंगें उठती हैं, जिनके कारण मनुष्य उस कष्ट को तप, सेवा, पुण्य परमार्थ कह कर उत्साहपूर्वक सहन-वहन कर लेता है। जबकि पशु प्रवृत्ति में ऐसी उदारता अपनाने की कोई गुंजाइश नहीं है। यदि है भी तो इतनी उथली और क्षणिक जिसके कारण वे कोई इस प्रकार का महत्वपूर्ण कदम नहीं उठा सकते। दूसरी ओर मनुष्य है जो इसी अन्तःप्रेरणा से अनुप्राणित होकर त्याग-बलिदान भरे उच्चस्तरीय उदाहरण प्रस्तुत करता और न्याय रक्षा के लिए निजी स्वार्थ न होने पर भी कष्ट झेलने का साहस करता देखा गया है। अन्तरात्मा ही मनुष्य में विराजमान परमात्मा का प्रतीक प्रतिनिधि माना गया है।
प्रसिद्ध दार्शनिक ‘इमेनुअल कान्ट’ महोदय ने नैतिकता का आधार अन्तः अनुभूति को माना है, जिसे उन्होंने ‘कैटेगोरिकल इम्पेरेटिव’ अर्थात् ‘अनिवार्य आज्ञा’ नाम की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति को उसकी अन्तरात्मा से प्राप्त होती है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दी क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन’ में लिखा है कि मनुष्य की बुद्धि एवं तार्किक विचार सांसारिक कार्यों को समझने के साधन हैं। आत्मा, परमात्मा या अन्य दार्शनिक समस्याओं का समाधान बुद्धि की सीमाओं से परे है।
कान्ट महोदय के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में सदाचरण के लिए तार्किक विचारों से नहीं, वरन् उसके अन्तस्तल से प्रेरणा मिलती है। त्याग, बलिदान के लिए भाव-सम्वेदनाएँ अन्दर से उछलती हैं। मानव-स्वभाव दो प्रकार के तत्वों से विनिर्मित है- एक स्वार्थ प्रधान रागात्मक- दूसरा विवेक परक जो व्यक्ति को परमार्थी बनाता है। स्वार्थ प्रधान रागात्मक वृत्ति तो मनुष्य को विषय-भोगों की ओर ले जाती है और विवेकात्मक तत्व न्याय प्रियता एवं आत्म-विकास की ओर अग्रसर करता है। वस्तुतः अन्तरात्मा की ‘अनिवार्य-आज्ञा’ अथवा ‘विवेक’ ही मनुष्य की नैतिक उन्नति करता है।
विवेकशीलता के आधार पर ही नैतिक नियमों का निर्धारण कर सकना सम्भव होता है। नैतिक नियमों के पालन से, आन्तरिक-सन्तोष की उपलब्धि होती है। मनुष्य को आध्यात्मिक उपलब्धियाँ विवेक या अंतरात्मा की आवाज के अनुकूल आचरण करने से मिलती है। जब व्यक्ति किसी बाहरी सत्ता के दबाव या प्रलोभन से कोई कार्य करता है तो वह अपने नैतिक स्तर से गिर जाता है। यहाँ तक कि यदि अन्तरात्मा की पुकार किसी राजनैतिक सत्ता या नियम के विरुद्ध उठती है तो उन नियमों का प्रतिकार करना ही नैतिकता है, जैसे कि गाँधी जी आदि सत्याग्रहियों ने किया था।
कान्ट महोदय ने उच्च उद्देश्य या हेतु से किये गये कार्यों को नैतिक बताया है। कार्यों के परिणाम से नैतिकता का मापदण्ड नहीं किया जाना चाहिए यदि कार्य उच्च उद्देश्यों से प्रेरित है तो नैतिक और निम्न हेतु से प्रेरित कार्य निम्न है। भौतिक सुखवादी लोग किसी कार्य के परिणाम को देखकर नैतिकता का मापदण्ड करते हैं वस्तुतः नैतिकता का सम्बन्ध कार्यों के हेतु से है।
किसी भी कार्य के भीतरी एवं बाहरी दो परिणाम होते हैं। आन्तरिक परिणाम चित्त का परिष्कार और बाह्य परिणाम घटना के रूप में आता है। आन्तरिक परिणाम मनुष्य के नियन्त्रण में है, परन्तु बाह्य उसके वश में नहीं, वह प्रकृति की परिस्थितियों पर निर्भर है। इसीलिए कान्ट महोदय ने नैतिकता का आधार कार्यों का बाहरी परिणाम नहीं प्रत्युत आन्तरिक परिणाम माना है। उनका कहना है कि प्रत्येक शुभ एवं उच्च हेतु शुभ आन्तरिक परिणाम ही देता है, जबकि उसका बाहरी परिणाम अच्छा या बुरा भी हो सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक अशुभ या निम्न हेतु का आन्तरिक परिणाम अशुभ ही होता है। उसका बाहरी परिणाम अच्छा या अशुभ दोनों हो सकते हैं।
अस्तु! कास्ट महोदय के अनुसार व्यक्ति के नैतिक उत्थान के लिए उसके कार्यों के हेतु पवित्र व शुद्ध हों। उच्च उद्देश्यों के निमित्त किये गये कार्य ही अन्ततः मनुष्य को महामानव (सुपरमैन) बनने की ओर अग्रसर करते हैं।
मार्टिनो के अनुसार- “जीवन को उत्कृष्ट बनाने, श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न बनाने के लिए सहज प्रेम या निःस्वार्थ प्रेम भाव एक प्रधान कारक है। सहज प्रेम दूसरे व्यक्तियों के प्रति आत्म भावना से उभरता है। आत्मीयता के भावों से अभिप्रेरित निःस्वार्थ प्रेम के विविध रूप हैं। मातृभाव, समाज भाव एवं करुणा उदारता इस सहज प्रेम से ही उद्भूत सद्गुण हैं, जो सामान्य व्यक्ति को महामानव बनने में अमूल्य योगदान प्रस्तुत करते हैं।”
सहज आत्मीयता के भावों से मनुष्य में ऐसी सत्प्रवृत्तियाँ उभरती हैं जो अपने सुख की परवाह न करके दूसरों के हितों को ध्यान में रखकर आचरण करने की प्रेरणा देती रहती हैं। सहज निःस्वार्थ प्रेम से मानव में उन स्थायी भावों का प्रादुर्भाव हो जाता है जो उच्च आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर चलने के लिए प्रेरणा और उत्साह देते रहते हैं। ये तीन प्रकार के स्थायी भाव ज्ञान प्रधान, भाव प्रधान और क्रिया प्रधान हैं, जो मनुष्य को सत्यान्वेषण, सौन्दर्यानुभूति और शिवत्व-परोपकार में प्रवृत्त करते हैं। विद्या, कला और धर्म के प्रति अभिरुचि एवं प्रेम भी मानव के चारित्रिक विकास के लिए आवश्यक है। मनुष्य में ये अभिरुचियाँ सहज या निःस्वार्थ प्रेम-भावना से उद्भूत होती हैं और मनुष्य के भीतर देवत्व के उदय में बहुत कुछ सहयोग करती हैं।
कान्ट ने मानव को महामानव बनाने में नैतिक नियमों का पालन अनिवार्य माना है। उनके अनुसार नैतिक नियमों में तीन प्रकार की विशेषताएँ हैं- (1) स्वतन्त्र इच्छा शक्ति जो अन्तरात्मा की आवाज पर निर्भर है (2) सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सबके द्वारा आचरण में लाने योग्य व्यापक दशन एवं (3) मानव-मात्र के हित का लक्ष्य।
कान्ट ने मानव-जीवन का भौतिक आदर्श कठोर तप-त्यागमय बताया है। वासनाओं, तृष्णाओं एवं आकांक्षाओं के अभाव को ही उन्होंने विवेक युक्त कहा है। इच्छाओं से राग-द्वेष का होना स्वाभाविक है, जो विवेक के प्रतिकूल है। उनके अनुसार विवेक वैयक्तिक नहीं वरन् व्यापक वस्तु है। सभी के विवेक द्वारा लिये गये नैतिक निर्णय समान होते हैं। कान्ट महोदय ने कहा है कि मनुष्य की अन्तरात्मा भूल कभी नहीं करती, नैतिक भूल का कारण अन्तः की आवाज की अवहेलना होती है। उन्होंने भूल करने वाली अंतरात्मा को मात्र कल्पना भर कहा है।
कान्ट के कथनानुसार नैतिकता के औचित्य का निर्णय करने का कार्य अंतःअनुभूति-अन्तःप्रेरणा ही करती है। यह अन्तर की ध्वनि एक व्यापक वस्तु-ईश्वर की आवाज है, जो देश-काल से परे है। किसी संकट की स्थिति में भिन्न-भिन्न देशों के लोगों के नैतिक-निर्णयों में समानता होती है। नैतिकता के आधार पर ही मानव समाज की एकता सार्थक एवं शक्य है।
व्यक्ति की अन्तरात्मा सदैव यही प्रेरणा देती है कि वह मात्र अपने हित के लिए नहीं वरन् मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करे। उसके अनुसार वही आचरण नैतिक है, जो सब लोगों के लिए सब समय में उचित हो ईसा, सुकरात, बुद्ध, गान्धी, विवेकानंद एवं अन्य भारतीय ऋषियों ने इसी को सर्वोत्तम नैतिक नियम बताया सभी की अंतःअनुभूति या अन्तरात्मा की आवाज व्यापक की ओर ले जाती है। महानता का सच्चा पथ भी यही है। ‘महाजनो येन गतः स पन्थः’ इसी के लिए प्रयुक्त किया गया है।
मनुष्य का विवेक जब जागृत होता है, तब वह अपना एक निश्चित नैतिक ध्येय नियत करता है। उसके विचारों में परिपक्वता आने लगती है। विचारों में प्रौढ़ता आने से वह उचित-अनुचित, नीति-अनीति, सत्-असत्, धर्म-अधर्म आदि का निर्णय कर सकने में सक्षम हो जाता है। कुछ नीतिविदों का कहना है कि मनुष्य की तार्किक बुद्धि की प्रवीणता के अनुपात में ही उसका विवेक जागृत होता है जो अपने कर्त्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय कर लक्ष्य को प्राप्त करने की चेष्टा करता है। जिस अनुपात में व्यक्ति का विवेक जागृत होता जाता है, उसी अनुपात में उसका चरित्र विकसित होता जाता है। वह अपनी विवेक शक्ति से प्रारम्भ में भले ही साँसारिक वस्तुओं, विषय-सुखों को उपलब्ध की चेष्टा करे, परन्तु शीघ्र ही उनकी निस्सारता समझकर सबसे महत्वपूर्ण वस्तु- आत्म-सन्तोष, आध्यात्मिक पूर्णता की ओर उन्मुख हो जाता है। वह फिर समस्त समस्याओं का समाधान अपने अन्दर से ढूंढ़ निकालता है और आन्तरिक पूर्णता उपलब्ध करने का प्रयास करता है।
नीति-शास्त्रियों ने तर्क-शक्ति व विवेक-शक्ति के द्वारा लक्ष्य निर्धारण कर उस पथ पर चल पड़ने को ‘लक्ष्यवाद’ के नाम से सम्बोधित किया है। यह लक्ष्यवाद-मनुष्य का विवेक उसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की ओर प्रेरित करता है। वह वैयक्तिक सुखों से सुखी नहीं होता वरन् समस्त मानव जाति को सुखी देखना चाहता है और उसके लिए प्रयास करता है। विवेकवान मानव के जीवन का लक्ष्य मात्र वैयक्तिक पूर्णतया नहीं, वरन् सभी की पूर्णता प्राप्त करने का रहता है। वे किसी व्यक्ति, विशेष की पूर्णता को सच्ची पूर्णता नहीं मानते। ऐसे ही व्यक्ति को ‘पूर्ण मानव’ की संज्ञा दी जा सकती है और उस विवेकपूर्ण मार्ग का अवलम्बन ही मनुष्य को परिपूर्ण मानव बना सकता है।
विवेकः संयमां ज्ञानं सत्यं शौचं दया क्षमा। मद्यात प्रलीयते सर्वं तृण्यां वहिन कणादिव॥ -योग शास्त्र
घास का ढेर जिस तरह मात्र आग की चिनगारी से भस्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य का विवेक, संयम, ज्ञान, सत्य, शुद्धि, दया, क्षमा आदि सद्गुणों की सम्पत्ति शराब पीने से नष्ट हो जाती है।
आस्तिकता के दो अपरिहार्य अंग हैं- आशा और प्रसन्नता। ईश्वर की सत्ता पर विश्वास रखने वाला सदा आशा का दीपक जलाए रखता है। निराशा की अँधेरी रात्रि से वह हमेशा दूर रहता है। वह यह मानकर चलता है कि प्रकृति के अनुदान, मानव शरीर एवं सहयोगी समाज देकर ईश्वर ने उस पर बड़ा उपकार किया है। जब उसने इतना किया है, तो भविष्य में भी सदा हमारा ध्यान रखेगा। ईश्वर महान् है, तो उसकी कृति भी महान ही होगी। यही सोचकर एक आस्तिक व्यक्ति सदा प्रसन्न भाव बनाए रखता है।
अपनी महान् सम्भावनाओं पर अटूट विश्वास ही सच्ची आस्तिकता है। स्वामी विवेकानन्द ने आत्मविश्वास की इस मानव प्रवृत्ति को ही सच्ची आस्तिकता का द्योतक बताया है। ‘अरस्तू’ के अनुसार-नास्तिकता व निराशा पर्यायवाची है। जिसने उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी, मान लेना चाहिए कि उसका ईश्वर पर से विश्वास हट गया।
पर मनुष्य छोटे-मोटे अवरोधों- मामूली प्रतिकूलताओं से ही क्षणमात्र में विचलित होकर अपनी नास्तिकता का परिचय देने लगता है। वह भूल जाता है कि सदैव एक रस और अनुकूल परिस्थितियाँ हमें स्थगनशील बनाती और उन्नति तथा विकास के द्वारों को अवरुद्ध कर देती हैं। जिस तरह दिन एवं रात्रि का होना दैनिक जीवन में समस्वरता बनाए रखता है, उसी तरह परिस्थितियों की अनुकूलता-प्रतिकूलता भी मानवी पुरुषार्थ को चुनौती देकर उसे विकार-ऊर्ध्वगमन के लिए प्रेरित करती है। अतः आने वाली परिस्थितियों को आशा भरी दृष्टि से देखना और जो गुजर गया उससे खिन्न व अप्रसन्न न होना ही श्रेयस्कर है।
ईश्वर विश्वास का अर्थ है- ईश्वरीय क्रिया-कलाप के पीछे छिपे सौंदर्य की अनुभूति। ईश्वर की इच्छा के अनुरूप हम अपनी इच्छा को मोड़ लें, यही ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है। इस समर्पण में व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात गौण हो जाती है और मनुष्य अपने को प्रतिपल किसी महान शक्ति की छत्रछाया में सुरक्षित-अनुप्राणित अनुभव करने लगता है।
इस शक्ति को कोई ईश्वर निष्ठा का बल कहता है, कोई अध्यात्म बल एव कोई आत्मबल। इस बल की सतत् अनुभूति करने वाला ईश्वर भक्त हर स्थिति में प्रसन्न रहता है। वह अपने आस-पास की वस्तुओं से व्यर्थ का मोह नहीं जोड़ता। अपितु उपलब्ध पदार्थों के श्रेष्ठतम सदुपयोग की युक्ति ही खोजता है। क्षणिक परिवर्तन उसे उद्वेलित नहीं करते, क्योंकि उसके पीछे काम करने वाली ईश्वरीय इच्छा उसे सहज शिरोधार्य होती है।
सच्ची आस्तिकता का व्यक्ति के जीवन में समावेश देखना हो, तो सघन आशावादिता और सतत् मुस्कान युक्त प्रसन्नता के रूप में उसकी परख करना चाहिए। इन्हीं दोनों के सहारे सूक्ष्म अभौतिक उपलब्धियों से व्यक्तियों का जीवन सरस, सरल, आनन्दमय हो जाता है। अभाव, हानि एवं वियोग की अप्रिय परिस्थितियाँ उसके समक्ष आती रहती हैं। किन्तु ऐसा व्यक्ति अपने परिष्कृत दृष्टिकोण के कारण इन साँसारिक परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होता। हल्की-फुल्की जिन्दगी जीता हुआ वह बदली परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेता है। वह कभी रोता खीझता नहीं है। आस्तिकता-ईश्वरीय व्यवस्था के प्रति अटूट निष्ठा उसे उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित आश्वासन देती रहती है।
विपन्न परिस्थितियों में मनुष्य कोई समर्थ सहारा चाहता है और वह सत्ता ईश्वर की ही हो सकती है। जिसके अवलम्बन से आशा का संचार होता है। प्रेरणा एवं शक्ति मिलती है। जब भी निराशा के बादल हमारे चारों ओर मँडराने लगते हैं एवं हम अपने को असहाय अनुभव करते हैं, ऐसे अवसरों पर ही ईश्वर हमें शक्ति एवं प्रेरणा देता है।
मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति के विकास काल से ही मनुष्य का एक ऐसी सर्व नियामक सत्ता के बारे में विश्वास रहा है जो इस विश्व ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। मनुष्य चाहे, संसार के किसी कोने में निवास करता रहा हो, वह सदैव यह अनुभव करता आया है कि कोई एक ऐसी दिव्य शक्ति है, जिसकी सामर्थ्य मानव एवं मानवी भौतिक शक्तियों से कहीं अधिक है। पृथ्वी के विभिन्न भूखण्डों पर निवास करने वाले मनुष्य समूहों ने उस शक्ति को विभिन्न नामों से सम्बोधित किया। ईश्वर, अल्लाह, खुदा, गाॅड, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वनियंता, सर्वज्ञ आदि विविध नामों से उसी शक्ति का बोध होता है। विभिन्न धर्मों में उस परम-सत्ता की प्राप्ति को ही मानव जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है। परमसत्ता की प्राप्ति अर्थात् उस ईश्वर या दिव्य शक्ति की अनुभूति के विभिन्न मार्गों को ही विविध धर्मों के नाम से जाना जाता है। उसके बाह्य स्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में भिन्नता भले ही हो पर ईश्वर के एक दिव्य सत्ता के अस्तित्व को सबने स्वीकार किया है।
अर्जुन को समझाते हुए भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है- ‘‘जो लोग श्रद्धापूर्वक जाने-अनजाने में किसी भी देव-सत्ता की पूजा, उपासना करते हैं वे वस्तुतः उस एक परम तत्व की ही पूजा अर्चना करते हैं। मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों का अवलंबन लेते हुए अन्ततः उसी परमात्म तत्व का साक्षात्कार करते हैं।”
ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मन्त्र में कहा गया है- “ईशावास्यामिदं सर्व यत्किन्व जगत्यां जगत।”
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से सब ओर से आच्छादित है। पूरे विश्व में वही समाया हुआ है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् से भी महान् है- अणोरणीय महतो महीयान्” -में इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।
चीन के प्रसिद्ध सन्त “लाओप्स” ने “ताओ-ते-किंग” में लिखा है- “उस अनन्त को जान लेना ही वास्तविक ज्ञान है।”
जैन ग्रंथों में ईश्वर के बारे में कहा गया है- उसे नमस्कार है, जो अनेक में एक है तथा जो एक एवं अनेक में परे भी है।”
पारसी मत के अनुसार ईश्वर एक है, उसे अहूरमज्दा के नाम से सम्बोधित किया जाता है, जिसका अमर्त्य है- ‘ज्ञानेश्वर सर्वशक्तिमान परमात्मा।’ पारसी ग्रन्थ की गाथा में वर्णन है- “उस ईश्वर के अतिरिक्त मैं और किसी को नहीं जानता हूँ।”
मिश्र निवासियों की मान्यता ईश्वर के सम्बन्ध में इस प्रकार है- जीवन की सृष्टि करने वाला वह अनन्त एवं सर्वव्यापी है, उसे आंखों से देखा नहीं जा सकता, वही एक है निराकार है।
आस्ट्रेलिया के रहने वालों की ईश्वर सम्बन्धी धारणा में एक सार्वकालिक एवं दिव्य लोकवासी प्राणी की मान्यता को स्थान मिला है, जिसे वे परम पिता कहकर पूजा भक्ति करते हैं। असीरियन लोगों की भी ऐसी ही ईश्वर सम्बन्धी मान्यता है।
यहूदियों को भी हजरत मूसा ने एक ईश्वर की पूजा करने का उपदेश दिया था। इस्लाम धर्म में ईश्वर को अल्लाह या खुदा कहा जाता है, कयामत अर्थात् महाप्रलय में केवल वही रह जाता है। कुरान में एक जगह कहा गया है- “वही प्रारम्भ में था, वही अन्त में रहेगा। सबका प्रारम्भ उसी से है, और सबका अन्त भी उसी में होता है। वह प्रकट भी है, और गुप्त भी। वह सर्वज्ञाता-सब कुछ जानने वाला है। उसका अनन्त ज्ञान सब चीजों को घेरे हुए है। सब में वही समाया है।”
इसी से मिलता-जुलता वर्णन बाइबिल में मिलता है। इसमें ईश्वर की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘मैं ही सबका आदि हूँ और सबका अन्त मैं ही हूँ। मेरे अलावा अन्य कोई नहीं है। मैं ही वह प्रकाश हूँ जो हर एक को प्रकाशित करता हूँ। मेरे बिना कोई भी प्राणी हलचल नहीं कर सकता।”
चीन के प्रसिद्ध नाओ धर्म के प्रणेता लाओत्से ने कहा है- मनुष्य उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकता-वह अवर्णनीय है। उसका कोई नाम नहीं है। जो उसे अपनी भाषा के शब्दों में जानते हैं, वे उसे नहीं जानते। वह शब्दों की पकड़ से बाहर, व्याख्या के परे है। वह एकमेव सत्य है, न तो उसका आरम्भ है, और न अन्त। सबकी उत्पत्ति का कारण वह है, उसकी उत्पत्ति किसी से नहीं होती। वह जन्म-मरण के बंधन से परे है।”
बुद्ध ने यद्यपि स्वयं ईश्वर के अस्तित्व और विवेचन को टाल दिया था फिर भी अनेक बौद्ध ग्रंथों से ऐसा लगता है कि वे किसी ऐसी दिव्य शक्ति में विश्वास रखते थे। बौद्ध, धर्म के ग्रन्थ “मसंग” एवं “माध्यमिका कारिका” में पहेली बुझौवल की तरह उल्लेख मिलता है। “वह न नहीं है और न है, न वह इस तरह है और न किसी तरह, वह न जन्मता है न वर्धित ही होता है, और न मृत्यु को प्राप्त होता है। वह कोई एक वस्तु नहीं है, न उसका अस्तित्व है और न ही उसका अस्तित्व नहीं है। न वह दोनों से पृथक है, वह विचित्र रहस्य है, वही सत्य है।”
एक सूफी संत ने कहा है- “फकत तफावन है नाम ही का--दरअसल सब एक ही है।’’
केवल नाम का ही अन्तर है, वास्तव में सब एक ही है। जिस प्रकार जो पानी की लहर में है वही बुलबुले में भी है।”
जरथुस्त्र की एक गाथा में कहा गया है- “मजदओ सखारे मैरस्तो” अर्थात् उस एक अल्लाह की ही इबादत करनी चाहिए।
शेखसादी ने ‘मामुकीमा’ में लिखा है- “जिसके रहने का कोई स्थान नहीं, फिर भी वह सब जगह विद्यमान है”-यह देखकर आश्चर्य होता है।
उपनिषद् में लिखा है- ‘‘ब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है। उसी की ज्योति से सब प्रकाशित है।”
इंजील कहती है- “उस अदृश्य सत्ता के अन्दर ही सब मौजूद है। उसी से सब हरकत करते हैं।”
चीनी धर्मग्रन्थ “शीकिंग” का सूत्र है- वह ईश्वर सर्वत्र छाया हुआ है, जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप पर उसकी दृष्टि है। योग वशिष्ठ में स्पष्ट उल्लेख है-
“सर्वस्य एवं जनस्य अस्य विष्णुर अभ्यंतरे स्थित। तम् परित्यज्य ये यान्ति बहिर विष्णुम् नराधमाः॥”
“ईश्वर सबके अन्तःकरण में विद्यमान है। उस अन्तःअवस्थित ईश्वर को छोड़कर जो उसे बाहर ढूँढ़ने का प्रयत्न करते हैं, वे अधम हैं।”
रामायणकार ने व्यापक, अखण्ड, अनन्ता अखिल अमोघशक्ति भगवंता॥” सूत्र में उस सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान शक्ति की ओर ही संकेत किया है। उपनिषदों में जिसे- “एकम् एवं अद्वितीयम्” अर्थात् ईश्वर एक और अद्वितीय है। ऋषियों ने उसे ‘नेति-नेति’ कहकर गाया है।
विविध धर्म ग्रन्थों में जिस प्रकार एक सर्वव्यापक दिव्य शक्ति की अवधारणा है, उसी प्रकार आज के मूर्धन्य वैज्ञानिक भी किसी ब्रह्माण्डव्यापी विचारशील सत्ता को ही मानते हैं, जो इस विश्व ब्रह्माण्ड का नियमन करती है। वैज्ञानिकों की “कॉस्मिक एनर्जी” की परिकल्पना विभिन्न धर्मों की ईश्वर-मान्यता जैसी ही है। संसार की विविधता एवं विचित्रता में निहित उस एकता को समझा जा सके, जिसे वेदान्त “एकोहम् द्वितीयो नास्ति” के उद्घोष में व्यक्त करता है, तो धर्म, मत, सम्प्रदायों के समस्त विग्रहों का अन्त हो जाय।
“नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकांतमनश्नतः, न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन। युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु, युक्तस्वप्नाबोध्स्य योगो भवति दुःखहा॥ (गीता 3।16।17)
ज्यादा खाने वाला या भूखा रहने वाला, बहुत सोने वाला बहुत जागने वाला इस योग को सिद्ध नहीं कर सकता। जिसके आहार, बिहार, निद्रा, कर्म, आदि सब व्यवहार सम्यक रूप से हैं, ऐसे पुरुष को योग की सिद्धि होती है।
मनः शास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि व्यक्तित्व की उत्कृष्टता- निकृष्टता का केन्द्र बिन्दु उसके अंतराल का स्तर ही है। मनःसंस्थान की इस सबसे गहरी-अन्तिम परत को ‘सुपर चेतन’ कहा गया है। सुपर इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। उसे यदि अपने वास्तविक स्वरूप में रहने दिया जाय- अवांछनियताओं के घेरे में जकड़ा न जाय तो वहाँ से अनायास ही ऊँचे उठने- ऊंचे बढ़ने की ऐसी प्रेरणाएँ मिलेंगी जिन्हें आदर्शवादी या उच्चस्तरीय ही देखा जा सके। प्रकारान्तर से ‘सुपर चेतन’ को ‘ईश्वर’ के समतुल्य ही माना जा सकता है। वेदान्त दर्शन में ‘अयमात्मा ब्रह्म’-‘प्रज्ञानं ब्रह्म’-‘चिदानन्दोहम्’-‘शिवोऽहम्’ ‘तत्वमसि’- आदि सूत्रों में जिस आत्मा को परमतत्व परमात्मा माना है वह परिष्कृत अन्तःकरण ही है। उसी को विज्ञान की भाषा में सुपर चेतन कहते हैं।
इसी परत को विकसित करने के लिए भक्ति योग का आश्रय लिया जाता है। कर्मयोग में शरीर, ज्ञान योग में मस्तिष्क और भक्तियोग में अन्तःकरण की साधना की जाती है। अन्तःकरण को ब्रह्मा- मनःसंस्थान को विष्णु और काय कलेवर को रुद्र की उपमा दी गई है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव हैं जिनके वरदान अभिशाप पर उत्थान-पतन की सारी सम्भावनाएँ अवलम्बित हैं।
मनोविज्ञानी मनःसंस्थान को अत्यधिक महत्व देते हैं और उसे अचेतन से भी कहीं अधिक उच्चस्तरीय मानते हैं। कार्य-कौशल से लोक-व्यवहार बनता है। बुद्धि वैभव से उपयुक्त निर्णय होते हैं। किन्तु अन्तःकरण तो समूचे व्यक्तित्व का ही अधिष्ठाता है। उसकी परिष्कृत स्थिति ही सामान्य स्थिति के मनुष्य को महामानव, ऋषि, देवात्मा, देवदूत स्तर तक पहुँचाने में समर्थ होती है। अपने ही भीतर विद्यमान इस देवलोक का माहात्म्य अध्यात्मवेत्ता सदा से ही बताते और उसकी अनुकम्पा उपलब्ध करके जीवन लाभ लेने वाले विभिन्न प्रतिपादनों द्वारा समझाते रहे हैं। सिद्धान्त और प्रयोग दोनों ही इन प्रयोजनों के लिए उनने गढ़े-परखे और प्रचलित किये हैं।
मनोविज्ञानी, नीति शास्त्री, तत्व-विज्ञानी, समाजशास्त्री, भौतिकवादी सभी इस मिले-जुले निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि पतन पराभव से छूटने और वरिष्ठता, उत्कृष्टता, उपलब्ध करने के लिए ‘सुपर चेतन’ की उच्चस्तरीय परतें खोजी, कुरेदी जानी चाहिए। ‘पैरा साइकोलॉजी-मैटाफिजिक्स’ आदि माध्यमों से पिछले दिनों अचेतन की महत्ता बखानी जाती रही है और उसे जगाने उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोगों की चर्चा होती रही है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, विचार संचालन, प्राण प्रत्यावर्तन, भविष्य ज्ञान जैसे कितने ही कला-कौशल इस संदर्भ में खोजे और परखे गये हैं। इस दिशा में प्रयास चालू रखते हुए भी मूर्धन्य स्तर के मनीषी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अचेतन में भी असंख्य गुनी उच्चस्तरीय सम्भावनाओं से भरे-पूरे सुपर-चेतन को नये सिरे से समझा-खोजा और उसके अभ्युदय का अभिनव प्रयास किया जाय। वे मानने लगे हैं कि उस क्षेत्र की उपलब्धियां व्यक्ति और समाज में उच्चस्तरीय परम्पराओं का समावेश और नये युग का नया सूत्रपात कर सकने में समर्थ हो सकती हैं।
‘एमिली मारकाल्ट’ ने अपनी “साइकोलॉजी आफ इन्ट्यूशन” नामक पुस्तक में अन्तःकरण की चर्चा करते हुए कहा है- “यह शरीर एवं व्यक्तित्व की चेतना का अति सूक्ष्म एवं उच्चस्तरीय भाग है। ज्ञानेन्द्रियों और तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं उनसे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण समाधान उच्च चेतन मन ही सहायता से मिल सकता है। इस तन्त्र को उजागर कार लेने का अर्थ है एक ऐसे देवता का साथ पा लेना जो उपयोगी सलाह ही नहीं देता, महत्वपूर्ण सहायता भी करता है।
‘हम्फ्री’ अपनी पुस्तक ‘‘वेस्टर्न ए प्रोच टू मैन” में कहते हैं कि बुद्धि वैभव के माध्यम से अब तक संसार की जो सेवा हुई है उसकी तुलना में उच्च चेतन की सहायता से थोड़े से लोगों ने जो कार्य किया है उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। एक महामानव हजार प्रवक्ताओं से बढ़कर होता है। इसी प्रकार एक महा मनस्वी के द्वारा बनाया गया वातावरण हजारों अधिकारियों तथा अध्यापकों की तुलना में अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। मनीषियों का कर्त्तव्य है कि जिस प्रकार प्रकृति के रहस्यों की खोज कर सुविधा सम्पन्नता वृद्धि की गयी है उसी प्रकार वे अन्तराल की उत्कृष्टता को खोजने, बढ़ाने तथा लाभान्वित होने के लिए जन साधारण का पथ-प्रशस्त करें।
“जुँग” कहते हैं कि मात्र अचेतन ही सब कुछ नहीं है वरन् इससे भी आगे की परत “उच्च चेतन” का भी अलग अस्तित्व है। आदर्शवादी प्रेरणाएँ एवं उमंगें वहीं से उठती हैं। अचेतन तो अभ्यस्त आदतों का संग्रह समुच्चय भर है। वे बुद्धि एवं साहसिकता से भी अग्रणी संकल्प शक्ति का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि व्यक्तित्व को विनिर्मित करने में मनुष्य के विश्वासों का ही प्रमुख योगदान रहता है।
‘एडलर’ के मतानुसार- अचेतन की सुदृढ़ता देखते हुए उसके सुधार संदर्भ में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। स्वसंचित संकल्प, आत्म-विश्वास और आदर्शों के प्रति आस्थावान बनने से उन मूल प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन कर सकना सम्भव है जिन्हें चिर संचित, दुराग्रही, एवं अपरिवर्तनशील माना जाता है।
विलियम मैकडूगल कहते हैं- अचेतन से भी ऊँची परत ‘अति चेतन’ या ‘उच्च चेतन’ की अभी जानकारी भर मिली है। अगले दिनों उसे अधिक अच्छी तरह जाना समझा जा सकेगा और यह कहा जायेगा कि सामान्य जीवन-क्रम का सूत्र संचालन करने वाले अचेतन की कुँजी इस ‘अति चेतन’ के पास ही है। अगले दिनों जब उच्च चेतन का स्वरूप और उपयोग ठीक प्रकार समझा जा सकेगा तब व्यक्तित्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के सम्बन्ध में वैसी कठिनाई न रहेगी जैसी आज है।
प्लूटो लिखते हैं “जब हमारा शुद्धीकृत “स्व” से साक्षात्कार होता है तब हमें अपने स्वरूप का- अपने त्रिआयामीय विस्तार का भान होता है। इस स्थिति में आने पर व्यक्ति परमतत्व से एकरूप हो जाता है एवं उसे किसी प्रकार के मार्ग दर्शन, हाथ पकड़कर राह दिखाने वाले की आवश्यकता नहीं पड़ती।
‘फ्रीडरिक नीत्से’ ने घोषणा की थी कि “स्वयं से परे हटकर स्वयं को देखना ही वस्तुतः सही ज्ञान की प्राप्ति है।” क्या यह सम्भव है? क्या हम स्वयं को अपने शरीर चिन्तन की परिधि से निकाल बाहर कर सकते हैं। जो शान्त चुपचाप खड़ा हो हमारी हर गतिविधि, हर परिस्थिति का अवलोकन करता रहे। वस्तुतः यह हमारे भीतर है- जिसे हम ‘सुपर माइंड’ कहते हैं जो एक लाइट हाउस की तरह दूर-दूर अपनी घुमावदार किरणें (रिवाल्विंग बीम) छोड़ता रहता है। हिमखंडों, तूफानों से जहाजों को बचाता है, पर स्वयं शान्त बिना विचलित हुए खड़ा रहता है।
दार्शनिक ‘हेनरी बर्सो’ का कथन है- ‘समय की जटिलताओं को न सुविधा संवर्धन से सुलझाया जाय और न दाँव पेच से। प्रवीण बुद्धि कौशल ही पतन पराभव का निराकरण कर सकेगा। प्रस्तुत जटिलताओं और विभीषिकाओं का समाधान पाने के लिये उस ‘महाप्रज्ञा’ के जगाने की आवश्यकता है जो अन्तःकरण की गहराई में बसती है और ईश्वरीय प्रेरणाओं से मनुष्य को अवगत कराती है।
“मार्टिन ट्रिनबी’ ने लिखा है- विचार बुद्धि की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो पर वह रहेगी अपर्याप्त ही। चेतना की पूर्णता का केन्द्र-मस्तिष्क नहीं अन्तःकरण है। अब तक प्रकृति को खोजा और पाया- दोहा गया है। अब परमात्मा की खोज और उसको पाने की बारी है। ऐसा संपर्क सधने के लिए एकमात्र स्थान मानवी अन्तःकरण है। सहृदयता इसी केन्द्र में बसती है।
हेनरी गाल्डर ने अपने ग्रन्थ- ‘‘एवोल्यूशन एण्ड मैन्सल्पेस इन नेचर” में लिखा है “विकास की दिशा में किये जा रहे प्रयास में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि मनुष्य के हृदय की विशालता एवं गहराई को भी बढ़ाया आय। वस्तुओं का लाभ जिसे उठाना है। उसकी अन्तः चेतना यदि निष्कृष्टता परायण रही तो सम्पदा का दुरुपयोग ही होगा। सम्पदा कितनी ही क्यों न बढ़े पर यह ध्यान तो रहे कि उपभोक्ता की गरिमा ही साधनों का सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकती है।”
‘पियरे टेल चार्डिन’ अपनी पुस्तक ‘दि फिनोमेना आफ मैन’ में लिखते हैं- विग्रहों को सहकार में- खीज को मुस्कान में बदलने का एक ही तरीका है कि मनुष्य के वर्तमान चिन्तन और रुझान में भारी परिवर्तन किया जाय। यह महान कार्य सामान्य प्रयासों से सम्भव नहीं उसके लिए अन्तःकरण को टटोलने और उसमें ईश्वर प्रदत्त महानता को उभारने की आवश्यकता पड़ेगी। परिस्थितियों से जुड़ी हुई विभिन्नता का परिशोधन सहृदयता उगाने एवं जगाने से ही सम्भव हो सकता है। सभी प्रख्यात भौतिकविद् मनीषी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि कब सहृदयता उभारने के लिए मानवी अन्तःकरण में नई तैयारी के साथ नई कृषि की जानी चाहिए। इस क्षेत्र की उपार्जित फसल से ही मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक भूख बुझेगी।
“मैन द अननौन” और ‘रिफलेक्शन आफ लाइफ’ के नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक अलेक्सिस कैरेल ने कई स्थानों पर इस एक ही बात को दुहराया है कि प्रकृति दोहन से भी बढ़ा क्षेत्र अन्तःकरण की गरिमा उभारने का है। उस उपेक्षित क्षेत्र को नये सिरे से समझा एवं समुन्नत बनाया जाना चाहिए। मनुष्य के उच्च चेतन का विकास होने पर ही समस्याओं के समाधान और अभ्युदय का आधार खड़ा हो सकेगा। विश्व मनीषा को अपना ध्यान एक ही केन्द्र पर एकत्रित करना चाहिए कि मनुष्य को सहृदय बनाने के लिए उसकी प्रस्तुत अन्तःचेतना की किस प्रकार जागृत किया जाय।
असंख्य प्रतिपादनों में से कुछ की झाँकी ऊपर की पंक्तियों में करने के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्ति और समाज को वर्तमान से उबारने और उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचाने के लिए मानवी अन्तरात्मा को समझा और जगाया जाना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार सामान्य जीवन में निर्वाह के साधन जुटाना।
एक दुबला-पतला बालक लकड़ियाँ काट रहा था। परिश्रम और पसीने से उसकी देह लतपथ थी, किन्तु वह बड़ी तल्लीनता से अपने काम में जुटा रहा। फिर उठा खाना पकाया। घर की झाडू लगाने से लेकर पानी ढोने तक का काम उसने अपने हाथों किया था फिर उसे दिन ढलते ही नींद आना स्वाभाविक था।
किन्तु जीवन में सफलता की इच्छा रखने वाले व्यक्ति आराम नहीं श्रम से, आलस्य नहीं उद्योग से प्रेम करते हैं। ऐसा लगता है कि इस बच्चे ने भी यह निश्चय कर लिया था कि उसे बड़ा आदमी बनना है इसलिए अभी वह चारपाई पर नहीं गया। उसने दीपक जलाया और पढ़ने बैठ गया।
एक दिन ब्लैक स्टोन की एक पुस्तक पढ़ने की इच्छा हुई। वह प्रत्येक बड़े लेखक के आदर्शों को अपनाता था इसलिए गुण-संचय की उसे धुत हो गई थी। पर वह पुस्तक मिलती कैसे? वहाँ से चार मील दूर एक लाइब्रेरी में पुस्तक मिल सकती थी। “चार मील कौन जाये” थका देने वाली कुत्सा बच्चे के जीवन में न थी वह तो तुरन्त चल पड़ा। लौटते समय रास्ते में ही पुस्तक पढ़ डाली। दुबारा घर पढ़कर लौटा दी।
सतत् कर्मरत रहने वाला यह छोटा-सा बच्चा आप न जानते होंगे- एक दिन अमेरिका का राष्ट्रपति बना और अब्राहम लिंकन के नाम से विख्यात हुआ।
मनुष्य का अस्तित्व दृश्य रूप में दिखाई देता है। अदृश्य से दृश्य बनने की अवधि में उसे कितने प्रबल-पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। इसे बहुत कम लोग जानते हैं। उन दिनों उसकी आकाँक्षा और प्रगतिशीलता देखते ही बनती है। इस प्रयास के अनुरूप ही उसे प्रकृति या परमात्मा से भी पूरी-पूरी सहायता मिलती है।
शुक्राणु की मूल सत्ता इतनी छोटी होती है कि आलपिन की नोंक पर उसके हजारों भाई बैठ सकें। उस स्थिति में उसे मात्र शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से ही देखा जा सकता है। रति काल की सुखद सम्वेदना एवं क्रीड़ा चेष्टा का सरसता में कई तथ्य मिले होते हैं। आकाँक्षा की प्रबलता से ही उत्तेजना उत्पन्न होती है। नर-मादा की सघन सहायता से ही वह कृत्य सफल होता है। इन घड़ियों के पुरुषार्थ में शरीर की अद्भुत हलचल एवं मनोयोग की प्रबलता ही रसानुभूति का अवसर देती है और यौन कर्म सफल होता है। इन तथ्यों का समावेश जितना कम होता है उसी अनुपात में यौन-कर्म या तो बन ही नहीं पड़ता अथवा नीरस भार रूप बलात्कार जैसा हेय-निष्फल बनकर रह जाता है।
रतिक्रिया के उपरोक्त तीनों तथ्य चिरकाल से प्रसुप्त स्थिति में पड़े शुक्राणु पर अपनी छाप छोड़ते हैं और उन प्रेरणाओं से अनुप्राणित होकर मानवी सत्ता के समान स्वरूप को उपलब्ध करने के लिए वह आतुर हो उठता है। यह आतुरता उसे इतनी सक्रियता प्रदान करती है कि उसका अनुपात प्रजनन के उपरान्त फिर कभी देखने को नहीं मिलता।
प्रगति एकाकी प्रयत्नों से सम्भव नहीं उसके लिए सहकार की अनिवार्य आवश्यकता है। सहयोग का आरम्भ एक से दो इसके उपरान्त अनेकानेक में विकसित होने के रूप में चलता है। शुक्राणु दौड़ लगाता और मादा के डिम्बाणु को खोजता है। जो खोजता है उसे मिलता भी है। आंखें न होते हुए भी, टटोलने के अवयवों का विकास न होते हुए भी आकांक्षा उस सघन जंजाल में से अभीष्ट को ढूंढ़ निकालती है और सहकार की वह उच्च स्थिति प्राप्त कर लेती है जिसे ‘एकात्म’ ‘अद्वैत’ कहते हैं। एक का समर्पण ही दूसरों को तदनुरूप बनने के लिए सहमत करता है। शुक्राणु का डिम्बाणु को खोज निकालना और उसके साथ सघन आत्मीयता स्थापित करके एकात्मता की चरम सीमा तक जा पहुँचना वह प्रथम पुरुषार्थ है, जिससे प्रगति का द्वार खुलता है।
एक महीने के भीतर ही बीजाणु अपने मूल आकार से विस्तार में पाँच सौ गुना और वजन में 8000 गुना बढ़ जाता है। एक से दो-दो से चार-चार से आठ का क्रम बनाती हुई लाखों कोशाएँ बनकर तैयार हो जाती हैं ताकि उनके सहारे विभिन्न अवयवों का ढाँचा खड़ा हो सके। कोशिकाओं का विकास सीमाबद्ध है। वे मात्र अपने ही वर्ग की कोशिकाओं को जन्म दे सकती हैं। आंतों की कोशिकाएँ मात्र आंतों और गुर्दे की मात्र गुर्दों का गठन कर सकती हैं किन्तु बीजाणु मूलतः एक कोशिका भर होते हुए भी इस विशिष्टता से युक्त रहता है कि वह अनेकानेक अवयवों में काम आने वाले विभिन्न स्तर की कोशिकाओं का निर्माण कर सके। इस प्रकार बीज कोष को उस सृष्टिकर्ता प्रजापति के समतुल्य माना जा सकता है, जिसने सृष्टि के आरम्भ में अनेक आकृति-प्रकृति के प्राणियों तथा पदार्थों की संरचना की।
भ्रूण का विस्तार एक महीने की अवधि में एक इंच के दसवें भाग जितना हो चुकता है। इतनी छोटी स्थिति में भी उसका सिर, धड़ और पूँछ देखी जा सकती है। दूसरे महीने में यह विस्तार छः गुना और वजन पचास गुना हो चुका होता है। इस स्थिति में उसके हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, आंतें आदि अपने अस्तित्व का परिचय देने लगते हैं। इस अवधि में उनकी विकास प्रक्रिया आश्चर्यजनक पाई जाती है। अनगढ़ आँतों को ही लें। वे समर्थ बनने के लिए इतनी अधिक उभरती दिखाई पड़ती हैं कि पूर्ण मनुष्य के आँत-संस्थान की तुलना में उस समय की हलचल को हजारों गुना अधिक गतिवान कहा जा सके। ऐसी ही तेज प्रक्रिया अन्य अवयवों में भी चल पड़ती है।
अवयवों का विकास अपने ढंग से चलता रहता है। उसका क्रम इतना द्रुतगामी होता है कि यदि वही जन्म के उपरान्त भी बना रहे तो मानवी काया किसी विशाल पर्वत से विस्तार और वजन में कम न रहे। पर इसी समय उसके सामने एक दूसरी समस्या आ जाती है, बन्धन-मुक्ति की। भ्रूण को इसकी तैयारी भी करनी पड़ती है। फलतः वह विस्तार की तुलना में साहसिकता संजोने के नये उपक्रम को अपनाता और आकाँक्षा को दूसरे केन्द्र पर नियोजित करता देखा जाता है।
गर्भस्थ शिशु माता की काया के साथ असाधारण रूप से जुड़ा जकड़ा होता है। पर जीव को यह परावलम्बन क्यों कि स्वीकार हो? वह इस स्थिति में कब तक जकड़ा रहे। उसे अपने उत्तरदायित्व भी तो सम्भालने हैं। किसी पर भार बन कर कब तक लदे रहा जाय। चार महीने पूरे होते-होते भ्रूण की यह इच्छा प्रबल होने लगती है कि देर तक किसी पर भार बनकर नहीं रहना चाहिए। अपने निजी पुरुषार्थ की प्रखरता का परिचय देना चाहिए। इसके लिए उसके सामने सबसे प्रमुख कार्य यह होता है कि जन्म लेने के समय की कठिनाई को पार करने के लिए अपने में समुचित पराक्रम अर्जित कर ले। बन्धन मुक्ति में उसके सामने कई कठिनाइयाँ होती हैं, एक तो गर्भाशय की भीतरी स्थिति में माता के साथ जोड़ने-जकड़ने वाले अनेक तन्त्र तन्तु, दूसरे प्रसव के साथ बाहर निकलने के लिए अत्यन्त छोटे मार्ग का अवरोध। प्रकृति ने भ्रूण की रक्षा के लिए उसे कपाट बन्द प्रयोगशाला में विकसित होते रहने की व्यवस्था की है। इतना बन पड़ने के बाद तो वह स्थिति बन्धन रूप हो जाती है। भव-बन्धन से मुक्ति पाने की आकाँक्षा को चरितार्थ करने के लिए प्रारम्भिक चुनौती उसी अवधि में सामने आती है और उसकी पूर्ति की जिम्मेदारी भ्रूण के स्वयं के कन्धे पर आती है। बड़े पराक्रमों की पूर्व तैयारी करनी होती है।
बच्चा पेट में हिलता-डुलता है। शरीर तानता, अंगड़ाई लेता और हाथ-पैर फैलाता है। इन सब हलचलों को माता इस तरह अनुभव करती है, मानों कोई जीवित पंक्षी पेट में बैठा हुआ पंख फड़फड़ा रहा हो। स्थिति को देखते हुए उसका प्रयास भी किसी प्रबल पराक्रम का परिचय देने से कम नहीं माना जा सकता। आगे चलकर उसे चक्रव्यूह में फँसे हुए अभिमन्यु की तरह बाहर निकलने का मोर्चा जो जीतना है। स्थिति और समस्या को देखते हुए उसके समाधान में भ्रूण की चेष्टा को किसी इतिहास प्रसिद्ध सेनानायक के महायुद्ध जीतने जैसी ही कहा जा सकता है।
प्रसव काल की उथल-पुथल, हलचल कितनी प्रचण्ड एवं क्रान्तिकारी होती है। इसे प्रत्यक्षदर्शी एवं भुक्तभोगी ही जानते हैं। युद्धकाल जैसे मर्मान्तक कष्ट, चीर-फाड़ एवं रक्तचाप के दृश्य देख कर दिन दहलने लगता है, पर इस बन्धन मुक्ति में इससे कम स्तर का दुस्साहस करने एवं जोखिम उठाये बिना काम भी तो नहीं चलता। इस प्रयास में माता का सहयोग तो कम ही होता है, अधिकाँश भूमिका बालक को स्वयं ही निभानी पड़ती है। सभी जानते हैं कि यदि भ्रूण दुर्बल हो और बाहर निकलने का प्रबल पुरुषार्थ न करे या कम करे तो उसकी परिणति माता और भ्रूण दोनों के लिए ही प्राणघातक सिद्ध हो सकती है। ऐसी स्थिति में शल्य क्रिया की विशेष सहायता ही उन दोनों की जीवन सुरक्षा कर सकती है।
भ्रूणकाल में जीवधारी को समग्र जीवन प्राप्त करने के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कितने प्रकार के- कितने अधिक- किस स्तर के प्रयास करने पड़ते हैं, इसका लेखा-जोखा लेने पर आश्चर्यचकित दर्शक इतना ही कह सकता है कि यदि उतनी तत्परता जन्म के उपरान्त भी बरती जा सके तो मनुष्य दूसरा भगवान या शैतान बन सकने में समर्थ हो सकता है।
एक समय के वीर्यपात में प्रायः तीन करोड़ शुक्राणुओं का क्षरण होता है। इन सबकी इच्छा एक ही होती है और सभी अपने-अपने स्तर पर पुरुषार्थ भी करते हैं, पर इस प्रतियोगिता में जो सर्वोच्च पराक्रम करता है वही डर्बी के लाटरी वाले विजयी घोड़े की तरह से सफल एवं कृत-कृत्य होता है। प्रगति के लिए हर किसी को प्रतियोगिता से सम्मिलित होना और अपनी समर्थता का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ता है।
भ्रूण का विकासक्रम इतनी तेजी से होता है कि इन हर नौ महीने में हर तीन मिनट बाद उसकी शकल बदलती रहती है। उसकी काया का कलेवर इतनी तेजी से बदलता है कि इन परिस्थितियों को एक-दूसरे से बहुत कुछ भिन्न कहा जा सकता है। गर्भावस्था की पूरी अवधि में प्रायः दो करोड़ बयालीस लाल सेकेंड होते हैं। इन्हें तीन में विभाजित कर देने पर वह गणना अस्सी लाख से भी ऊपर निकल आती है। धार्मिक मान्यता भी है कि जीव को चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त मनुष्य जन्म मिलता है।
जड़ परमाणुओं में 27 लाख किलो कैलोरी ऊर्जा मानी गई है। उसके विस्फोट से उत्पन्न क्षमता का उपयोग इन दिनों विकास और विनाश के मूर्धन्य प्रयोजनों में किया जा रहा है। यदि चेतन परमाणुओं से भरे-पूरे मनुष्य कलेवर में सन्निहित समर्थता का सही एवं परिपूर्ण उपयोग सम्भव हो सके तो उसके सम्बन्ध में कही जाने वाली यह उक्ति अक्षरशः सही सिद्ध हो सकती है कि मनुष्य ईश्वर का ज्येष्ठ एवं वरिष्ठ राजकुमार है।
जन्म लेने के उपरान्त भी शिशु को सम्भ्रान्त मनुष्य के स्तर तक पहुँचने में कम पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता। जन्म लेते ही बालक हाँफता है, साँस लेता है। यह क्रिया सुनाई तो रोने-चिल्लाने के रूप में पड़ती है, पर वह वस्तुतः होती है अंग-अवयवों में इतनी क्षमता उभार देने जितनी जो खुले वातावरण में जीवित रहने के लिए आवश्यक है। अनभ्यस्त परिस्थितियों में रहने के लिये न्यूनतम क्षमताओं को उपयुक्त मात्रा तक पहुँचाने में जिस प्रयास की आवश्यकता है वह जन्मजात शिशु द्वारा किये जाने वाले चित्र-विचित्र एवं अनवरत गतिविधियों में ध्यानपूर्वक देखा समझा जा सकता है। जन्म के समय बालक एक प्रकार से अपंग की स्थिति में होता है। हृदय आरंभ में बहुत ही धीरे धड़कता है। फिर गति पकड़ने में तो उसे काफी देर लगती है और कठिनाई होती है। मुख में लाल ग्रंथियां तो होती हैं। पर उनमें स्राव नहीं होता। आँखों में अश्रु ग्रन्थियाँ तो होती हैं, पर रोते समय उनमें से टपकती एक बूँद भी नहीं। आंखें प्रकाश और अन्धकार का भेद भर समझती हैं, पर उनके कोष्टक ऐसे नहीं होते कि दृश्य का कोई सही फोकस बन सके और उस आधार पर कुछ अनुभूतियाँ बना सकें। उस अभावग्रस्त स्थिति में भी उसकी प्रगति अभिलाषा इतनी अदम्य होती है कि अपने निजी पराक्रम से अपनी क्षमताओं को अधिकाधिक विकसित करता हुआ समर्थ मनुष्य की स्थिति तक जा पहुँचता है। बच्चा जन्म से लेकर पाँच वर्ष तक जितना कुछ सीख लेता है उसे उसकी नगण्य सामर्थ्य एवं अनगढ़ साधनों को देखते हुए आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है। जिस क्रम में पाँच वर्ष में बहुमुखी ज्ञान सम्पादन होता है यदि उसी क्रम से आगे भी चलता रहे तो कोई मनुष्य संसार भर में फैले हुए समस्त ज्ञान-विज्ञान का अधिष्ठाता बन सकता है।
जीवन के आरम्भ काल में सृष्टा द्वारा अपनी व्यवस्था प्रकृति द्वारा जो पाठ पढ़ाये जाते हैं वे इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें स्मरण रखे और अपनाये रहने पर जीवन लक्ष्य की सरलतापूर्वक पूर्ति हो सकती है। सृष्टा ने जीव सत्ता में उत्कृष्टता काय-कलेवर की विलक्षणता, साधनों की असामान्य सुविधा के अद्भुत अनुदान दिये हैं। उन्हें देखते हुए निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचना कुछ भी कठिन नहीं है।
आरम्भिक दिनों में सीखे गए पाठों और उपलब्ध हुए परिणामों को कौन कितना याद रखता है और कितना भुला देता है- यही है वह रहस्य जिनके आधार पर मनुष्य को अपनी स्वतन्त्र प्रगति करने अथवा अवनति के गर्त में गिरने का अवसर मिलता है।
मनुष्य जितना सत्य के निकट पहुँचता जाता है उतना ही उसे संतोष होता और समाधान मिलता है। अन्यथा भ्रम जंजालों की भटकन में मनःस्थिति संदिग्ध, शंकित एवं असमंजस भरी ही रहती है। अस्तु सदा से यह चाहा जाता रहा है कि सत्य की समीपता का आनन्द मिले और वस्तुस्थिति को समझते हुए तद्नुरूप निर्धारण किया और कदम उठाया जाता रहे। इस संदर्भ में विज्ञान ने मनुष्य की भारी सेवा-सहायता की है। उसने दार्शनिक एवं काल्पनिक मान्यताओं से पीछा छुड़ाकर प्रत्यक्षवाद की एवं तर्क, तथ्य प्रमाण की कई कसौटियों पर कसने के उपरान्त यथार्थता को सर्वसाधारण के सामने रखा है। फलतः उसकी साख बढ़ी है। जो उसके द्वारा प्रतिपादित किया गया उसे प्रामाणिक ठहराया गया। इसी कारण अपने युग को बुद्धिवादी, तर्कवादी, प्रत्यक्षवादी कहा जाता है। पुरातन काल की अगणित, अनगढ़ मान्यताओं को अवास्तविक ठहराने से लेकर वस्तुस्थिति से अवगत कराने और यथार्थता के सहारे मार्ग निर्धारण करने में विज्ञान ने मनुष्य की जो सहायता की है उसके लिए वह अनन्त काल तक कृतज्ञ रहेगा।
पुरातन काल में शास्त्र लेख एवं आप्त वचन ही सत्य के प्रतिपादन में पर्याप्त माने जाते रहे हैं। कभी वह स्थिति सही भी थी। उन दिनों प्रतिपादन कर्ता महामनीषी ही होते थे। अपनी शोध, पवित्रता एवं प्रखरता के कारण वे वही कहते जो उनकी दृष्टि से सही होता था। किन्तु यह स्थिति देर तक नहीं रही। अप्रामाणिक एवं निहित स्वार्थों ने भी मनीषा का जामा पहना तो असमाधान कारक भ्रम जँजाल ही बढ़ता गया कसौटियों पर वे कथन जैसे-जैसे अवास्तविक सिद्ध होते चले गये, वैसे-वैसे अश्रद्धा बढ़ी और अमान्य ठहराने की प्रखरता उभरी। आज बौद्धिक जगत में ऐसी ही असमंजस एवं विद्रोह भरी स्थिति का वातावरण छाया हुआ है। अपने युग को अनास्था युग कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। यह अनास्था यदि दार्शनिक परिधि में रहती तो कोई हर्ज नहीं था। पर जब वह नीति, सदाचार, सद्भाव एवं कर्त्तव्य उत्तरदायित्व जैसे शाश्वत सत्यों पर भी आक्रमण करने लगी है तो उसकी परिणति विषैली विभीषिकाओं के रूप में सामने आ रही है। यह चिन्ता जनक है। होना यह चाहिए था कि विज्ञान अपनी प्रखरता एवं प्रामाणिकता के आधार पर मात्र भ्रान्तियों मर्यादाओं की परिपुष्टि करता जो मानवी गरिमा एवं प्रगति की आधार शिला एवं अद्यावधि प्रगति में धुरी जैसी भूमिका निभाती रही हैं। किन्तु यह विवेक सन्तुलन रहा नहीं। प्रगतिशीलता के अत्युत्साह ने ऐसा दुधारा चलाया जो मात्र भ्रान्तियों के उन्मूलन तक सीमित नहीं रहा वरन् उन पैरों पर भी चोट मारने लगा जिन पर कि प्रयोक्ता का अपना अस्तित्व ही खड़ा था।
अपने समय की एक चिन्ताजनक बात यह है कि प्रत्यक्षवाद ने उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्शवादी आचरण की प्रेरणा देने वाली अध्यात्मवादी आस्थाओं को अवास्तविक ठहराना, उन्हें निरर्थक कहना आरम्भ कर दिया है। फलतः विज्ञान समर्थित प्रत्यक्षवाद से प्रभावित लोकमानस ने उसे सहज स्वीकार करना आरम्भ कर दिया है। इन दिनों नैतिक मूल्यों का बेतरह ह्रास हो रहा है। उससे अर्थतन्त्र में विकृति, सामाजिक अव्यवस्था, शासकीय भ्रष्टता, दरिद्रता, अशिक्षा जैसे अनेकों अभिशाप जुड़ चले हैं। पर उन क्षेत्रों में जो भी अवांछनियता अपनाई जाती है, वह अपने पक्ष का खुला समर्थन नहीं करती, कुकृत्यों पर पर्दा डाले रहती है और कम से कम प्रदर्शन एवं कथन में तो नीतिगत मान्यताओं का ही समर्थन करती है। वैयक्तिक प्रत्यक्षवाद की स्थिति इससे भिन्न है, वह नीति दर्शन की आधारभूत मान्यताओं पर ही कुठाराघात करता है- ऐसी दशा में जन-मानस में यदि “ऋणं कृत्वा सुरां पिवैत” का औचित्य पनपे तो इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है।
ईश्वर, आत्मा, कर्मफल, पुनर्जन्म जैसी मान्यताएँ कुल मिलाकर मनुष्य को नीति समर्थक एवं उदार बनने की प्रेरणा देती हैं। यदि उनका उच्छेदन कर दिया जाय और कहा जाय कि “मनुष्य मात्र चलता फिरता पेड़ है, मरण के उपरान्त उसका कोई अस्तित्व शेष नहीं रहता। स्वसंचालित अणुओं का संयोग वियोग ही मनुष्य जीवन है।’’ तो फिर समझना चाहिए कि प्रकारान्तर से उन सभी मान्यताओं का खंडन हो गया जो मनुष्य को संयमी, सदाचारी, कर्त्तव्य परायण, उदार एवं सदाशयता के समर्थन में कष्ट तक उठाने की, उदारता बरतकर प्रसन्न होने की प्रेरणा देती हैं। कहना न होगा कि आदर्शों से रहित- निरंकुश मानवी बुद्धि के लिए तब उद्धत स्वार्थ साधन के लिए पूरा द्वार खुल जायेगा। ऐसी दशा में जंगल का कानून ही चलेगा। तब बड़ी मछली छोटी को निगलेगी। बड़ा पेड़ समीपवर्ती पौधों की खुराक खींचने में कोई संकोच न करेगा। “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का, “सर्वाइवल आफ दी फिटेस्ट” का सिद्धान्त सही और स्वाभाविक ठहराये जाने पर मानवी सभ्यता की कैसी दुर्दशा हो सकती है, मनुष्य की बुद्धि उन मान्यताओं को अपनाकर किस सीमा तक अनाचरण पर उतर सकती है- इसकी आज तो एक झाँकी भर मिल रही है। वह दिन दूर नहीं जब इस अभिनव प्रतिपादन के परिपूर्ण रूप होने पर हिम-युग एवं खण्ड प्रलय से भी अधिक भयानक स्थिति उत्पन्न होगी। आज तो लुक-छिपकर अनाचरण बरते जाते हैं किन्तु अगले दिनों नृशंस स्वेच्छाचारी शासकों की तरह सर्वत्र कत्लेआम मचाते दृष्टिगोचर होंगे। अन्तःकरण की पुकार से लेकर मानवी गरिमा तक के उन आदर्शों के लिए कहीं कोई स्थान रह नहीं जायेगा जिनके कारण “बन्दर की औलाद” कहाये जाने वाले मनुष्य ने विश्व का मुकुटमणि बनने की स्थिति तक पहुँचने में प्रगति की है।
यह सब पारस्परिक सहयोग और उदार अनुदान की नीति अपनाने से ही सम्भव हुआ है। सामाजिक सभ्यता और वैयक्तिक संस्कृति का प्रादुर्भाव तथा उत्थान इन्हीं उत्कृष्टता की- पक्षधर आस्थाओं के सहारे सम्भव हुआ है। यदि यह आधार नष्ट हो गया तो हमें फिर आदिम युग की ओर वापिस लौटना होगा। शायद वह भी न बन पड़े क्योंकि बुद्धि कौशल के रहते आदर्शहीन व्यक्ति मात्र पिशाच ही बन सकते हैं। पशुता के स्तर तक उतर कर संतोष कर लेने के लिए भी उन्हें सहमत न किया जा सकेगा। इस सम्भावना की आँशिक झाँकी आज भी हो रही है। अनास्था युग के बाल्यकाल में जब स्वार्थपरता का विस्तार निष्ठुरता से लेकर आततायी प्रवृत्तियों के रूप में बेतरह विकसित हो रहा है तो फिर जब प्रौढ़ता आयेगी तो हर व्यक्ति अपने समीपवर्तियों की गर्दनें नापता हुआ दूरवर्तियों का सफाया करेगा। फलतः सृष्टि विकास के समय उपजे अनगढ़ महागजों, महासरीसृपों, महाव्याघ्रों की तरह अभावों और आक्रमणों की आग में जल कर समाप्त होना पड़ेगा।
सम्भावना काल्पनिक नहीं है। अपने युग में संपत्ति, शिक्षा, सुविधा और शक्ति की पूर्वकाल की तुलना में भारी वृद्धि हुई है। फिर भी सदाशयता, दूरदर्शिता और उदारता के तत्व घट जाने से मनुष्य अपेक्षाकृत हर क्षेत्र में पिछड़ा है। स्वास्थ्य, सन्तुलन, सन्तोष, सहकार के क्षेत्रों में निरन्तर गिरावट हुई है और पारिवारिक सामाजिक जीवन क्रमशः अधिक असन्तोषजनक होता चला गया है। हर ओर खिजाने वाली परिस्थितियाँ दृष्टिगोचर होने पर मनुष्य अपने को असहाय, एकाकी, चक्रव्यूह में फँसा हुआ एवं निराश, उद्विग्न अनुभव करता है। यही है वह वास्तविकता जिसका सामना हर धनी, दरिद्र, शिक्षित, अशिक्षित को समान रूप से करना पड़ रहा है। हर किसी को वर्तमान की उद्विग्नता और भविष्य की आशंका बेतरह डराने लगी है। व्यापक तनाव इसी महाव्याधि का नाम है। इससे जर्जरता एवं खिन्नता बढ़ती ही चली जा रही है। रक्तचाप, मधुमेह, अपच, अनिद्रा, अर्ध-विक्षिप्तता, जैसे अनेकानेक शारीरिक, मानसिक, रोगों की बाढ़ इसी अस्त-व्यस्तता की परिणति है, जो बढ़ती हुई अनास्था ने मनुष्य को आदर्श विहीन बनाकर उत्पन्न की है। यह प्रवाह अभी मंथर गति से बहा है। अगले दिनों उसमें तूफानी उभार आने की पूरी-पूरी सम्भावना है। तब क्या स्थिति होगी इसकी सम्भावना दार्शनिक बर्टेंड रसेल के शब्दों में “सामूहिक आत्म-हत्या” के रूप में निरूपित की जा सकती है।
विज्ञान को अपने युग का वरदान कहने में इसलिए किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि उसने भ्रान्तियों से निकालकर सत्य की समीपता तक पहुँचाने में दार्शनिक क्षेत्र की असाधारण सेवा की है। इतना ही नहीं उसने प्रकृति के अन्तराल को मथकर अनेकानेक सुविधा साधन प्रदान करने में भी भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य योगदान किया है। इसके लिए समूची मानवता उसकी ऋणी भी है। इतने पर भी अमृत के साथ मिले हुए विष को कैसे निगला जाय जिसने आदर्शवादी मूल्यों को अमान्य ठहराने वाले प्रत्यक्षवादी तक प्रस्तुत किये और प्रगति की समूची आधारशिला को ही झकझोर कर रख दिया।
कोसने से काम चलने वाला नहीं। दोषारोपण मात्र से कभी किसी गुत्थी का हल नहीं निकला। प्रत्यक्षवाद के वृक्ष का आश्रय लेकर पनपी और चोटी तक चढ़ गई विष बेल को अलग करने में ही लाभ है। यह कठिन कार्य अध्यात्मवाद की उन मान्यताओं को उभारने से ही सम्भव हो सकता है जो न केवल प्रगतिशीलता की जन्मदात्री आदर्शवादिता का समर्थन करती है वरन् उन्हें हर कसौटी पर प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए भी तत्पर है। इस चुनौती को स्वीकार करना विज्ञान का काम है। उसे लोक मान्यता मिली है इसीलिए वही इन दिनों स्वभावतः वरिष्ठ भी है।
ऐसी दशा में उसका कर्त्तव्य है कि प्रति पक्ष की चुनौती स्वीकार करे और यह देखे कि आदर्शवादी आस्थाएँ प्रत्यक्षवाद की कसौटियों पर कहाँ तक खरी सिद्ध होती हैं। साथ ही अध्यात्म को भी समझना होगा कि अब उसकी सुरक्षा, शास्त्र कथन एवं आप्त वचन की गुदड़ी ओढ़कर होती रहने वाली नहीं है। उसे युग मान्यता प्राप्त प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर अपनी प्रामाणिकता खरी सिद्ध करने के लिए तत्पर होना होगा। “साँच को आँच नहीं” का सिद्धान्त यदि सही है तो फिर कोई कारण नहीं कि उन उत्कृष्टतावादी आस्थाओं को तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं उदाहरणों का ऐसा समर्थन न मिल सके जो प्रत्यक्षवाद का भी आधारभूत अवलम्बन है।
निस्संदेह मध्यकाल में धर्म, व्यवहार एवं अध्यात्म दर्शन के क्षेत्र में भ्रान्तियों एवं विकृतियों का कूड़ा-करकट इतना अधिक बढ़ गया था कि तथ्य की तुलना में छद्म का भार कहीं अधिक विशालकाय दीखने लगा। अध्यात्म और विज्ञान की जाँच-पड़ताल का एक नया लाभ यह होगा कि तत्व दर्शन पर चढ़ी हुई मलीनताएं दूर होंगी और उसे खरे सोने की तरह हर दुकान पर स्वागत भरा सम्मान मिलेगा। फिर कोई उसे न तो उपेक्षित कर सकेगा और न तिरस्कृत। वरन् मनीषा का हर घटक उसे उसी तरह स्वीकार- शिरोधार्य करेगा जिस तरह कि विज्ञान के सिद्धान्त एवं प्रयोगों की प्रसन्नता पूर्वक अपनाया जाता है।
निराशा एक गहरी और अँधेरी घाटी के समान है। इसकी गहराई का कोई अन्त नहीं। जो व्यक्ति इस घाटी में गिरने से अपने को रोक नहीं पाते वे एक ऐसी अन्तहीन स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ से वापस आ सकना सम्भव नहीं हो पाता। मृत्यु के मुख के समान निराशा की वह अँधेरी घाटी उस अभागे का सम्पूर्ण अस्तित्व निगल कर उसे नष्ट कर देती है। निराशा की घाटी में फँसा व्यक्ति अन्धकार के प्रभाव से इतना कायर हो जाता है कि स्वयं अपने को एक अज्ञात छाया के समान देखता हुआ भयभीत होने लगता है। उस भयानक घाटी में गूँजता हुआ उसका कातर स्वर उसे ही घेरकर प्रेतों का अट्टहास जैसा सुनाई पड़ता है।
ऐ मनुष्य! यदि तू अपना कल्याण चाहता है तो निराशा की इस घाटी के पास मत जा। अपने पर नियन्त्रण रख, सद्विचारों का सहारा ले और साहस के साथ मार्ग में आई इस घाटी को यदि उलाँघ न सके तो बुद्धिमानी से उससे बच कर निकल जा। तेरी जय होगी। -स्वामी रामतीर्थ
प्राणि चेतना की भाँति ही पदार्थ सत्ता भी प्रगति के लक्ष्य को समान रूप से अपना कर चल रही है। जड़ हो या चेतन, पदार्थ हो या प्राणी- प्रगति पथ पर अग्रसर हुए बिना किसी को भी चैन नहीं। वर्तमान में मिलकर रहने के लिए कोई सहमत नहीं। आदिम काल से लेकर अब तक की लम्बी मंजिल पूरी करते समय उसे पराक्रम का अभ्यास और उपलब्धियों का रसास्वादन करते रहने का जो अनुभव मिला है वह असाधारण रूप से मधुर एवं आकर्षक है। उसे छोड़ने के लिए दोनों में से कोई भी किसी भी मूल्य पर सहमत नहीं हो सकता। समूचा प्राणि जगत और सुव्यवस्थित पदार्थ वैभव समान रूप से बस एक ही निश्चय किये हुए है- एक ही मार्ग अपनाये हुए है कि उन्हें अग्रगमन के उपहार एवं आनन्द का परित्याग नहीं ही करना है।
यहाँ पदार्थ की प्रकृति पर दृष्टिपात करना है और यह देखना है कि क्या वह भी सचेतन की तरह प्रगति के लिए समान रूप से आकुल-व्याकुल है? और क्या उसका पराक्रम भी आगे बढ़ने अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने, अधिक सुविस्तृत बनने में संलग्न है। जड़ पदार्थ में इच्छा का अभाव और हलचलों का बाहुल्य माना जाता है, पर गम्भीरता से विचार करने पर प्रतीत होता है कि उसकी हलचल भी उद्देश्यपूर्ण है। अनगढ़ निष्प्रयोजन नहीं।
पदार्थ चल रहा है- यह स्पष्ट है, पर क्यों चल रहा है? किस दशा में चल रहा है कि उसके सामने भी प्रगति का -विस्तार का -पराक्रम के प्रकटीकरण का और अपूर्णता को पार करते हुए चरम पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य ही प्रेरणा स्रोत बनकर रह रहा है।
डाका अ ब्रह्माण्रम्भ कब और किस क्रम से हुआ- इसके सम्बन्ध में अनेक मत हैं, पर जिस प्रतिपादन पर प्रायः आज सहमति हो चली है वह यह है कि आरम्भ में थोड़ा-सा सघन द्रव्यमान ‘(मास)’ था। उसके अन्तराल में में किसी अविज्ञात कारण से विस्फोट हुआ और उसकी धज्जियाँ उड़ गईं। असंख्य टुकड़े हुए- वे जिधर तिधर छितर गये। इस छितराव ने एक नई दिशा अपनाई। टुकड़ों में से अधिकाँश अपनी धुरी पर लट्टू की तरह घूमने लगे और साथ ही घुड़दौड़ की तरह आगे की ओर भी भागने लगे। चूँकि यह समस्त सृष्टि रचना गोलाकार है फलतः गति भी गोलाकार ही अग्रगामी रह सकती है। अनवरत घुड़दौड़ को अन्ततः गोलाकार बनना पड़ा और किसी लक्ष्य तक पहुँच कर प्रयास को इतिश्री कर देने की अपेक्षा अनन्तकाल तक अनवरत घुड़दौड़ जारी रखने का एक सुनिश्चित मार्ग मिल गया।
द्रव्यमान के छितरे हुए टुकड़ों ने न केवल बाह्यजगत में- ब्रह्माण्ड के प्राँगण में अपनी घुड़दौड़ को जारी रखा वरन् आत्म सत्ता की निजी परिधि में भी इसी नीति को अपनाया। वे अपनी-अपनी धुरियों पर भी घूमने लगे। इस प्रकार वैयक्तिक और सामूहिक दोनों ही क्षेत्रों में उनने अपने प्रयास-पुरुषार्थ को अग्रगमन के लक्ष्य में नियोजित किये रहने का मार्ग चुना और अनुशासन अपनाया।
विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार सृष्टि का आरम्भिक द्रव्यमान एक सघन बादल के रूप में था। उस स्थिति में उसका घनत्व 10-12 किलोग्राम प्रति क्यूविक मीटर आँका गया है। इस सघन बादल को खगोलवेत्ता ‘प्रोटो गैलेक्सी’ के नाम से पुकारते हैं। आरम्भ में वह बादल ऐसे ही अनगढ़ था। विस्फोट होने के बाद उस केन्द्र में तथा टुकड़ों में एक नई क्षमता उद्भूत हुई। उसे गुरुत्वाकर्षण के नाम से जाना जाता है। विस्फोट के बाद टुकड़े निहारिका बन गये और छोटे ग्रह तारकों के रूप में अपने छोटे-छोटे कलेवरों को सुगठित बना सकने में सफल हो गये। निहारिकाएं अभी भी उतनी सुव्यवस्थित नहीं हो सकी हैं।
ब्रह्माण्ड फूल रहा है। उसके अन्तराल में अवस्थित निहारिकाएं तथा तारा मण्डल क्रमशः एक-दूसरे से दूर हटते जा रहे हैं। इस हटने का तात्पर्य पीछे की और लौटना नहीं, आगे की ओर बढ़ना है।
तारों की दूरी का अनुमान इन दिनों इस आधार पर लगाया जाता है कि उनका प्रकाश धरती तक पहुँचने में कितना समय लगता है। प्रकाश की गति एक सेकेण्ड में एक लाख छियासी हजार मील है। इस गति से चलते रहने पर एक वर्ष में जितनी दूरी पार होती है उसे एक प्रकाश वर्ष कहते हैं। पृथ्वी से कौन तारा कितनी दूर पर है इसकी गणना इसी आधार पर की जाती है कि उसका प्रकाश धरती तक आने में कितना समय लगा। समय और दूरी का सिद्धान्त इसी आधार पर विनिर्मित हुआ है। उदाहरण के लिए सूर्य के प्रकाश को धरती तक आने में प्रायः सवा आठ मिनट लगते हैं। इस आधार पर उसकी मध्यवर्ती दूरी का निर्धारण 9 करोड़ 8 लाख मील की दूरी का हुआ है। इसी प्रकार अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की दूरी मापी जाती है।
ग्रह-तारकों का प्रकाश वर्तमान में जितना नापा गया है उतना भविष्य में न रहेगा। अन्तर बढ़ जायेगा। समय अधिक लगने का अर्थ है दूरी का बढ़ना। खगोल निरीक्षकों के अनुसार यह मध्यवर्ती दूरियाँ हजारों मील प्रति सेकेंड के हिसाब से बढ़ रही हैं। इतना ही नहीं एक और भी विचित्र बात यह है कि न केवल दूरी बदलती है वरन् उस घुड़दौड़ की तीव्रता भी बढ़ जाती है और उसकी चाल में क्रमशः अभिवृद्धि सामान्य नहीं असामान्य है, अर्थात् उसकी तीव्रता में जो अनुपातिक वृद्धि हो रही है वह है एक सेकेण्ड में पचास किलोमीटर। इसका अर्थ यह हुआ कि मध्यवर्ती दूरी का निरन्तर विस्तार तो हो ही रहा है, उस विस्तार की गति में भी आश्चर्यजनक तीव्रता आती चली जाती है। यह क्रम इसी प्रकार चलता रहने पर यह निश्चित है कि न केवल पृथ्वी और तारकों की मध्यवर्ती दूरी वरन् उन सब का फासला भी बढ़ता-फैलता ही चला जायेगा। यह बात किसी एक-दो पिण्डों के बारे में नहीं वरन् सभी प्रस्तुत ग्रह-नक्षत्रों पर लागू होती है। वे सभी एक-दूसरे के निकट आने की नीति नहीं अपना रहे वरन् धीर-धीरे अधिक दूर हटने की नीति अपनाये हुए हैं। कुल मिला कर इसका तात्पर्य-निष्कर्ष निकलता है-समूचे ब्रह्माण्ड में फुलाव-विस्तार की प्रक्रिया।
समूचा ब्रह्माण्ड प्रति सेकेंड साढ़े पाँच सौ किलोमीटर की गति से फूलता-फैलता चला जा रहा है। भूत कालीन स्थिति की अपेक्षा वर्तमान काल में ग्रह-तारकों की मध्यवर्ती दूरी बढ़ी है और भविष्य में उसके और भी बढ़ते जाने की प्रक्रिया को देखते हुए शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ब्रह्माण्ड का अभी विकास-बचपन चल रहा है। उसे परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव करने, वृद्ध होने तथा पुनर्जन्म का चोला बदलने में अभी अकल्पनीय देरी है। यह समूचा प्रतिपादन इन दिनों ‘हथल सिद्धांत’ के नाम से विख्यात है।
अपना सूर्य जिस निहारिका का परिभ्रमण कर रहा है उसका नाम ‘मन्दाकिनी’ और व्यास प्रायः चार लाख प्रकाश वर्ष है। सूर्य इन दिनों दो लाख किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से चल रहा है। अपनी निहारिका का एक पूरा चक्कर लगाने में उसे 24 करोड़ प्रकाश वर्ष लगते हैं। अनुमान है कि अपने सूर्य को अपनी निहारिका का दस परिक्रमा लगाते-लगाते बुढ़ापा आ जायेगा और एक-दो परिक्रमा और कर लेने के उपरान्त उसका मरण हो जायेगा। अपनी निहारिका अब तक दस हजार तारा गुच्छकों के जन्म दे चुकी। प्रत्येक तारा गुच्छक में कम से-कम एक सौ सूर्य हैं। इस प्रकार इसके पुत्र सूर्यों की संख्या दस लाख को पार कर गई। जिस प्रकार अपने सूर्य के दो ग्रह और 32 उपग्रह हैं। उसी प्रकार इन दस लाख सूर्यों के भी बाल-बच्चे होंगे। यह सारा परिवार बेटे- तारा गुच्छकों- पोते सूर्यों- परपोते ग्रह पिण्ड और उनके भी पुत्र गण उपग्रहों समेत अरबों की संख्या में सदस्यों का बन चुका है। इतने पर भी अपनी निहारिका की न तो जवानी समाप्त हुई है और न उसके प्रजनन कृत्य में कोई कमी आई है। उसके अपने निजी पुत्र तारा गुच्छक अभी और जन्मेंगे। वे उसके पेट में कुलबुला रहे हैं और भ्रूण की तरफ पक रहे हैं। समयानुसार प्रसव होते रहेंगे और यह परिवार अभी अकल्पनीय काल तक इसी प्रकार बढ़ता रहेगा।
ऊपर की पंक्तियों में मात्र अपनी एक निहारिका की चर्चा हुई है। उसकी सदस्य संख्या और विस्तार परिधि की समग्र कल्पना कर सकना ही मानवी मस्तिष्क जैसे तुच्छ घटकों के लिए कठिन है, फिर ऐसी-ऐसी जो अन्य सहस्रों निहारिकाएं और भी हैं। उन सबके अपने-अपने परिवार और विस्तार मिला लेने पर ब्रह्माण्ड विस्तार की परिकल्पना और भी अधिक कठिन हो जाती है। यहाँ इतना भर बताया जा रहा है कि सृष्टि के आदि का मूल द्रव्य किस प्रकार प्रगति की आकाँक्षा से प्रेरित होकर अग्रगमन के लिए निकल पड़ा और उसका गतिमान किस प्रकार निरन्तर बढ़ता ही चला आया है।
ब्रह्माण्ड भी कभी बूढ़ा होगा और मरेगा भी। पर साथ ही परम्परा को देखते हुए यह भी निश्चय है कि वह महाप्रलय-महाविश्राम की अवधि लम्बी न होगी। फैला हुआ ब्रह्माण्ड जब मरेगा तो अपने विस्तार को समेट कर आरम्भ काल की तरह इकट्ठा हो जायेगा और नींद पूरी होते ही फिर विस्फोट-विस्तार की विगत एवं अभ्यस्त परम्परा को उसी प्रकार फिर चालू कर देगा, जिस प्रकार मनुष्य नींद लेने के बाद नये दिन से फिर पुराना ढर्रा अपनाता है अथवा नया जन्म लेकर पूर्व जन्म की पुनरावृत्ति करता है।
राजा सर्वमित्र को मदिरा के बिना चैन न था। राजमहल हो या राजदरबार किसी भी स्थान पर सुरापान करने में उसे संकोच न था। अपने साथ-साथ वह दूसरों को भी पिलाता था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दिनों में राजकार्य ठप्प होने लगा। अधिकारी प्रजा को सताने लगे। प्रजा दुःखी रहने लगी। जब राजा ही आचारहीन हो तो प्रजा की बात सुने भी कौन?
एक ब्राह्मण से प्रजा का यह दुःख न देखा गया। उसने राजा की इस आदत को छुड़ाने का संकल्प लिया। एक दिन राजा की सवारी जा रही थी तो उन्होंने देखा कि राजपथ पर भीड़ लगी हुई है। कारण पूछने पर पता लगा कि कोई व्यक्ति मदिरा बेच रहा है। राजा ने सोचा कि देखें उस व्यक्ति की मदिरा में कौन-सी ऐसी विशेषता है जिसके कारण इतने व्यक्ति इकट्ठे हो गये हैं। राजा ने उसके पास अपना रथ रुकाने का आदेश दिया। राजा ने निकट आने पर ब्राह्मण की आवाज सुनी- “जिसे पतन के गर्त में जाना है वह इस मदिरा को अवश्य लें। इसे पीते ही अपना होश खो बैठोगे, नाली में मुँह दोगे, कीचड़ मुँह पर लपेटोगे, कुत्ते मुँह में पेशाब करेंगे। इसे पीकर स्त्री अपने पति को पीटेगी। धनवान् गरीब हो जायेंगे, पैसे-पैसे के लिये दूसरे का मुँह देखेंगे। इसे पीकर अपना काम भूल जाओगे और बौराते फिरोगे।”
राजा ने ब्राह्मण की बात सुनकर पूछा- ‘आप तो इसके अवगुण निरन्तर बताये जा रहे हैं। इस तरह कौन मदिरा खरीदेगा।’
ब्राह्मण बोला- ‘राजन् जब वस्तु में अवगुण ही हैं तो मैं गुण कहाँ से बताऊँ। मैं स्पष्टवादी हूँ, जो सच है वही कहूँगा।’ ‘पर इस तरह तो तुम्हारी तनिक भी बिक्री न होगी।’ राजा ने कहा।
‘सामान्य प्रजा नहीं खरीदेगी, पर प्रशासक और अधिकारीगण तो खरीदेंगे जिससे इसे पीकर वे प्रजा पर और भी अत्याचार कर सकें।’
पल भर में राजा के सम्मुख अपने राज्य का सारा चित्र स्पष्ट हो गया। वह ब्राह्मण के चरणों पर गिरते हुए बोला- ‘महाराज! आपने मुझे पतन के रास्ते से बचा लिया है। आपकी बातें सुनकर मेरी आँखें खुल गयी हैं। आज से मैं पाप की इस जड़ को छूऊँगा भी नहीं।
‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो।’ मुस्कराते हुए ब्राह्मण देवता ने आशीर्वाद दिया। उनका प्रयोजन पूरा हो चुका था।
अपने सौर मण्डल का केन्द्र सूर्य को माना जाता है। अंतर्ग्रही ही अनुदान पृथ्वी पर सूर्य के माध्यम से ही बरसते हैं, ऐसा विश्वास सदियों से बना हुआ है। आदिकाल से ही सूर्य को जीवन का अधिष्ठाता माना जाता रहा है। सूर्य किरणों से प्रकाश और गर्मी ही नहीं प्राण और जीवन भी सतत् प्रवाहित होता रहता है, जिसे जीव-जन्तु, वृक्ष, वनस्पति प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप ग्रहण करते हैं। थोड़े समय के लिए भी सूर्य अपने अनुदानों की वर्षा बन्द कर दे तो पृथ्वी पर दिखाई पड़ने वाली जीवन की हलचल को समाप्त होते देर न लगेगी।
पृथ्वी की परिस्थितियों, वातावरण, मौसम, वृक्ष वनस्पतियों और प्राणी समुदाय की शारीरिक मानसिक स्थिति पर सूर्य की गति और उसमें समय-समय पर होते रहने वाले परिवर्तनों का असाधारण प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों एवं खगोलविदों की नवीनतम खोज के अनुसार सौर कलंकों (सूर्य धब्बों), का सीधा प्रभाव अन्तर्ग्रही सन्तुलन एवं मानव शरीर और मन पर पड़ता है। जब भी सूर्य धब्बों में वृद्धि होती है प्रकृति में असन्तुलन बढ़ जाता है। जिसकी परिणति प्राकृतिक विक्षोभों और विस्फोटक घटनाक्रमों के रूप में होती है।
अमेरिका के ‘ट्री रिसर्ज सेन्टर’ के निर्देशक प्रो. डगलस ने लम्बे समय तक वृक्ष के तनों पर पड़ने वाले प्रतिवर्ष बर्तुलों का अध्ययन किया। उनका कहना है कि “वृक्ष के बर्तुलों में भूतकाल की घटनाओं का इतिहास अंकित है। टेप रिकार्डर की भाँति वृक्ष सौर मण्डल के परिवर्तनों एवं अन्तर्ग्रही प्रभावों को ग्रहण करते हैं। ‘डगलस के अनुसार एक निश्चित अवधि के बाद घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है। हर ग्यारहवें वर्ष वृक्षों में पड़ने वाले रिंग अन्य वर्षों की तुलना में बड़े होते हैं। इन वर्षों में सूर्य के ये धब्बे सर्वाधिक देखे जाते हैं। सूर्य पर आणविक गतिविधियाँ सबसे अधिक होती हैं। खगोलवेत्ताओं का मत है कि हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य में सक्रियता बढ़ जाने से आणविक विस्फोट होता है जिसके कारण सूर्य से रेडियो विकिरण अधिक होता है। प्रो. डगलस का कहना है कि इन वर्षों में रेडियो विकिरण से अपनी सुरक्षा के लिए वृक्ष अपने तनों में मोटा रिंग बनाते हैं।
मौसम एक समय में विश्व के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न पाया जाता है। एक स्थान पर ठंड है तो उसी समय दूसरे स्थान पर गर्मी। प्रो. डगलस ने इस मान्यता के विपरीत एक नये तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर सूर्य के कारण भी एक विशिष्ट प्रकार का मौसम चलता है जिसे हम नहीं पकड़ पाते किन्तु वृक्ष पकड़ लेते हैं। प्रति ग्यारहवें वर्ष सूर्य धब्बों की वृद्धि से होने वाले परिवर्तनों को वृक्षों के सम्वेदनशील तन्तु पकड़ने में सक्षम होते हैं। ग्यारह वर्षीय चक्रों की भाँति ही एक नब्बे वर्षीय चक्र का भी पता लगा है। ‘इजिप्ट’ के ‘तस्मान’ नामक एक विद्वान ने नील नदी का चार हजार वर्ष का इतिहास लिखा है। चार हजार वर्ष पूर्व वहाँ के लोगों में यह विश्वास प्रचलित था कि नील नदी के पानी के साथ सूर्य की गतिविधियों का घना सम्बन्ध है। चार हजार वर्ष पूर्व वहाँ के सम्राट ने अपने देश के विद्वानों को आदेश दे रखा था कि नील नदी में घटने-बढ़ने वाले जल स्तर का पूरा-पूरा विवरण रिकार्ड करें। तब से लेकर अब तक नील नदी के पानी का रिकार्ड निरन्तर अंकित किया जाता रहा। इसका पूरा विवरण मिश्र के राष्ट्रीय रिकार्ड में क्रमबद्ध रूप से रखा गया है। उस इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि प्रत्येक 90 वर्षों बाद सूर्य कलंकों में असामान्य रूप से वृद्धि होने से सूर्य में भयंकर विस्फोट होता है। विद्युत चुम्बकीय तूफान चलते हैं। रेडियो विकिरण बढ़ जाता है। पृथ्वी पर भयंकर भूचाल आते हैं। इन वर्षों में नील-नदी का जल स्तर या तो असाधारण रूप से बढ़ जाता है अथवा घट जाता है। इस घटना की पुनरावृत्ति हर 90 वर्षों के बाद होती है। वहाँ के विद्वानों का कहना है कि “90 वर्षों की अवधि सन् 1982 से पूरी होने वाली है। यह वर्ष विशेष उथल-पुथल का होगा।’’
माउण्ट विल्सन वेधशाला द्वारा पिछली दशाब्दी में जो सूर्य कलंकों के चित्र लिए गये उससे एक नई जानकारी मिली कि कई सूर्य कलंक पृथ्वी के आकार से 20 या 24 गुना तक बड़े थे। ये पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर गति करते पाये। जब-जब इनकी संख्या में वृद्धि हुई है, तूफान और भू चुम्बकीय आँधियाँ अधिक आते हैं। वैज्ञानिक ‘जॉन एडी’ का कथन है कि सूर्य कलंकों में क्रमिक परिवर्तन धरती के मौसम परिवर्तन का कारण बनते हैं। ग्लेशियर्स का बनना, पहाड़ों पर अधिक बर्फ का जमना आदि घटनाएँ सौर कलंकों से जुड़ी हुई हैं। डा. एडी के अनुसार गत 50 वर्षों में न केवल सूर्य धब्बों में वृद्धि हुई है वरन् हर ग्यारह वर्ष पर उभरने वाले इन धब्बों की संख्या और आकार में (एक हजार से लेकर दस हजार किलोमीटर लम्बी) भी वृद्धि हुई है। इस अभिवृद्धि से प्रकृति प्रकोपों में भी उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी हुई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य कलंक के 11 वर्षीय और 90 वर्षीय चक्र के साथ महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित होती हैं। पिछले एक दशक से तो सुर्य धब्बों की संख्या में निरन्तर अभिवृद्धि होती चली जा रही है। साथ ही युद्धों, प्रकृति विक्षोभों और विभीषिकाओं की संख्या भी बढ़ती जा रही है। पिछले दशक के जिन वर्षों में सूर्य धब्बे अधिक देखे गये उन वर्षों में भयंकर हिंसात्मक घटनाएँ’ युद्ध, बाढ़, सूखा, विश्व के मूर्धन्य महापुरुषों की दुःखद परिस्थितियों में मृत्यु आदि की घटनाएँ अधिक हुईं। जिन वर्षों में सूर्य धब्बे सबसे कम देखे गये उसमें विश्व शान्ति एवं स्थिरता बनी रही। पिछले दशक का अध्ययन इसी तथ्य पर प्रकाश डालता है।
सन् 1968 में सूर्य धब्बों की सक्रियता बढ़ने लगी। उसी वर्ष भारत, पाक युद्ध आरम्भ हो गया। विश्व शान्ति प्रयासों के प्रबल समर्थक ‘मार्टिन लूथर किंग’ की हत्या रंगभेद के कारण कर दी गई। सोवियत रूस ने चेकोस्लाविया के बड़े भाग पर आधिपत्य कर लिया।
1969 में भी सूर्य धब्बे अधिक देखे गये। उस वर्ष फ्रांस के सिक्के फ्रैंक का अवमूल्यन 12 प्रतिशत से भी अधिक हो गया। फ्राँस के प्रमुख चार्ल्स डीगल की मृत्यु हो गई। मिश्र के गमाल अब्दुल नासर की मृत्यु से देश पर बज्रपात हो गया। पूर्वी पाकिस्तान (आज बंगला देश) में भयंकर चक्रवात आये जिसमें दस लाख से भी अधिक व्यक्ति अकाल मृत्यु के गर्भ में समा गये।
सन् 1971 में सूर्य धब्बे कम देखे गये। इस वर्ष नये बंगलादेश का उदय हुआ। सन् 1972 में भी सौर कलंकों में कभी रही। फलतः विश्व शान्ति के लिए अनेकों प्रकार के प्रयास किये गये। अमेरिका राष्ट्रपति ने मैक्सिको की यात्रा इसी प्रयोजन के लिए की। पाकिस्तानी तानाशाह भुट्टो ने बंगला देश के राजनेता मुजीबुर्रहमान को लम्बी कैद के बाद बिना किसी शर्त के मुक्त कर दिया। वर्ष 1973, 1974 और 1975 में भी सूर्य धब्बे कम दिखाई पड़े। फलतः विश्व की स्थिति उतनी तनावपूर्ण न रही। सन् 1975 में भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार समझौता हुआ। ईराक और ईरान ने सीमान्त प्रदेशों के झगड़ों को सुलझाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए। मोजम्बिक देश पुर्तगालियों की 500 वर्ष की दासता से मुक्त हुआ। अमेरिका और रूस के अन्तरिक्ष यात्रियों ने अन्तरिक्ष में परस्पर यान परिवर्तन करके आपसी सौहार्द्र का परिचय दिया। इजराइल ने मिश्र से समझौता करके माउंट सिनाई से अपनी सेना वापिस बुला ली। यह शान्तियुक्त परिस्थितियाँ 1977 तक बनी रही।
सन् 1977 के बाद पुनः तीव्रगति से सूर्य धब्बों में वृद्धि होने लगी। इसी वर्ष ईरान में भयंकर भूकम्प आया। हजारों व्यक्ति उसकी चपेट में आकर मारे गये। पाकिस्तान में गृह युद्ध छिड़ने से भयंकर रक्तपात हुआ। सत्ता की बागडोर जनरल जिया ने संभाली, भुट्टो की गिरफ्तारी हुई। बंगला देश के एक विद्रोह में मुजीबुर्रहमान की परिवार सहित हत्या कर दी गई। अन्य पाँच सौ व्यक्ति भी मारे गये।
सन् 1978 की घटनाएँ और भी अधिक तबाही उत्पन्न करने वाली हुईं। भयंकर बाढ़ से यमुना का पानी अब तक के सभी रिकार्डों को तोड़कर दिल्ली को तबाह कर गया। जनशक्ति और धन शक्ति की भारी क्षति हुई। पश्चिम बंगाल में भी भयंकर बाढ़ आई। भारत में यह वर्ष भारी राजनैतिक उथल-पुथल कर रहा। अफगानिस्तान बोलीविया, मौरीटेनिया, कांमोरोद्वीप समूह, दक्षिणी यमन आदि देशों में युद्ध छिड़े। पोपपाल-6 की मृत्यु हो गयी। उनके स्थान पर नियुक्त दूसरे पोप की भी मृत्यु मात्र 20 दिनों बाद ही हो गई। ग्वाना द्वीप समूह में धार्मिक अन्ध-विश्वास के कारण 900 से भी अधिक व्यक्तियों ने सामूहिक आत्म-हत्या कर ली। इजराइल की प्रथम महिला प्रधानमंत्री गोल्डामेयर की मृत्यु हो जाने से इजराइल और मिश्र के बीच समझौता न हो सका। सन् 1979 में सूर्य धब्बे और अधिक संख्या में देखे गये। ईरान में स्थित अमेरिकी दूतावास पर संकट छा गया। ईरानियों ने अमेरिकियों को बन्धक बना लिया। फलतः दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता ही गया। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर भी इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा। रूस ने अफगानिस्तान में अपना सैनिक अड्डा जमा लिया। ईरान और ईराक के बीच समझौता टूट गया और सीमान्त झगड़े प्रारम्भ हो गये। ईरान के शाह को राजगद्दी से हटा दिया गया। देश में क्रान्ति हुई जिसमें असंख्यों व्यक्ति मारे गये। भारत में नये रोग ‘ब्रेन फीवर’ (मस्तिष्कीय ज्वर) से हजारों व्यक्तियों की मृत्यु हुई। विभिन्न वस्तुओं के भावों में तीव्र वृद्धि हुई।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य कलंकों में हर वर्ष निरन्तर वृद्धि हो रही है। फलतः प्रकृति विक्षोभ और आपसी तनाव बढ़ते जा रहे हैं। सन् 1980 का वर्ष भी अशांतिमय ही रहा। अमेरिका और ईरान के बीच जिस झगड़े का सूत्रपात 1979 में हुआ वह और भी तीव्र हो गया। रूस की अफगानिस्तान में सैनिक गतिविधियाँ और भी तेज हो गईं। भारत के उत्तरी पूर्वी प्रदेश आसाम में ‘विदेशियों’ के मामले को लेकर अशान्ति बढ़ने लगी। चीन, बंगला देश, पाकिस्तान के विभिन्न स्थानों पर भूकम्प के तेज झटके आये जिसमें हजारों की संख्या में लोग मरे।
ऐसी सम्भावना है कि सन् 1982 तक सूर्य कलंकों में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। 1981 का आरम्भ ही प्रकृति विक्षोभों में हुआ है। विश्व के विभिन्न भागों में मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन रिकार्ड किया गया है। कितने ही स्थानों पर भूकम्प के झटके महसूस किये गये। ईरान और ईराक के बीच बढ़ते हुए तनाव ने अन्ततः युद्ध का रूप ग्रहण कर लिया। अभी भी दोनों के बीच युद्ध जारी है। ईरान में आये भूकम्प से- हजारों व्यक्ति कुछ ही मिनटों में मृत्यु की गोद में जा पहुँचे। बंगला देश में हुए सैनिक विद्रोह में राष्ट्रपति जियाऊर्ररहमान की हत्या कर दी गई। 5 जून 1981 को बिहार के मानसी नामक स्थान के निकट उफनती बागमती नदी में समस्तीपुर वनमरवी यात्री गाड़ी के सात डिब्बों के गिरने से तीन हजार से अधिक व्यक्तियों की जाने गईं।
‘इजिप्ट’ के रिकार्ड के अनुसार सूर्य का ग्यारह और नब्बे वर्षीय चक्र सन् 1982 में पूरा हो रहा है। सूर्य कलंकों में इस वर्ष सर्वाधिक वृद्धि होगी। फलतः मनुष्य जाति को सबसे अधिक प्रकृति प्रकोपों और विभीषिकाओं का सामना करना होगा। शीतयुद्ध तो चल ही रहा है। अगले दिनों विश्वयुद्ध छिड़ने की भी संभावना है।
अन्तर्ग्रही ही असन्तुलन क्यों उत्पन्न होते हैं? ब्रह्माण्ड के सभी जड़-चेतन घटकों का आपसी तारतम्य किस तरह का है? प्रकृति विक्षोभों और अन्तर्ग्रही असन्तुलनों की रोकथाम करना क्या सम्भव है? आदि प्रश्नों का उत्तर उपलब्ध भौतिक जानकारियों के आधार पर नहीं मिलता। इसके लिए प्राचीन ज्योतिष विज्ञान और साधना विज्ञान में खोज-बीन, अध्ययन, अन्वेषण की आवश्यकता होगी। नवीन जानकारियों के साथ-साथ इस प्रयास में असन्तुलनों को दूर करने, प्रकृति विक्षोभों से रोकथाम और सन्तुलन बनाये रखने के महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगने की पूरी-पूरी सम्भावना विद्यमान है।
वैशाली महानगरी आज दुल्हन की भाँति सजी थी। सर्वत्र हर्ष उल्लास का वातावरण था। राज्य महोत्सव मनाने के लिए यह सब तैयारियाँ हुई थीं। बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी महोत्सव में भाग लेने के लिए राजमहल के समीप प्राँगण में एकत्रित हुए थे। राज्य नर्तकी का नृत्य आरम्भ हुआ। नृत्य की मस्ती में धीरे-धीरे राजा और प्रजा सभी डूबते जा रहे थे।
अचानक महल में लगे विशाल घण्टे की आवाज ने सबका ध्यान तोड़ा। पर यह क्या? घण्टा तो निरन्तर ही बजता जा रहा था। राज परम्परा के अनुसार घण्टे का निरन्तर बजना आने वाले संकट का परिचायक था जिसका अर्थ होता था कि शत्रु ने राज्य पर आक्रमण कर दिया है। नृत्य अपने-आप थम गया ओर देखते ही देखते युद्ध की रणभेरी वातावरण में गूँजने लगी। पर शत्रु की विशाल सेना और पूर्व तैयारी न होने से वैशाली के सैनिकों के पैर उखड़ने लगे। राजा को बन्दी बना लिया गया। शत्रु सेना वैशाली नगर पर कहर ढाहती निरन्तर आगे बढ़ रही थी। लूट-पाट एवं बाल-वृद्धि, नर-नारियों ही हत्या से वातावरण चीत्कार कर उठा।
नगर नायक ‘महायायन’ कभी-अपनी शूरवीरता के लिए विख्यात था। पर आज तो वह भी अपने को असमर्थ पा रहा था। वृद्धावस्था के कारण उसका अपना शरीर भी साथ नहीं दे रहा था। तो क्या हमारी आँखों के सामने ही यह अत्याचार होता रहेगा? नहीं ऐसा नहीं हो सकता, यह सोचकर वृद्ध नायक चल पड़ा शत्रु सेनाध्यक्ष से मिलने।
रास्ता रोके खड़े वृद्ध को शत्रु सेनाध्यक्ष ने हटने का आदेश दिया। ‘महायायन’ की आंखें दृढ़ता से चमक उठी। उसने कहा ‘आगे बढ़ने के लिए तुम्हें मेरी लाश से गुजरना होगा- मेरे सामने तुम बाल-वृद्ध, नर-नारियों पर अत्याचार नहीं कर सकते। शत्रु सेना नायक को वृद्ध जानकर दया आ गई। उसने कहा “रास्ता छोड़ो। हम तुम और तुम्हारे परिवार की सुरक्षा का वचन देते हैं। महायायन को लगा जैसे किसी ने उसके स्वाभिमान पर थप्पड़ मार दिया हो।” उसने कहा ‘मुझे अपने जीवन का लोभ नहीं है। यदि तुम्हें दया दिखानी ही है तो इन मासूमों पर अत्याचार बन्द करो।’
शत्रु सेना नायक को जाने क्या सूझी उसने ‘महायायन’ के समक्ष एक विचित्र शर्त रखी। “तुम जितनी देर सामने बह रही नदी में डूबे रहोगे हमारी सेना लूट-पात एवं हत्या बन्द रखेगी।” शर्त स्वीकार कर अविलम्ब वृद्ध महायायन नदी में कूद पड़ा। वचनबद्ध शत्रु सेना नायक ने सेना को तब तक के लिए लूटपाट एवं संहार बन्द रखने को कहा जब तक कि वृद्ध का सिर पानी के बाहर न दिखायी पड़े। विशाल सेना, सेनाध्यक्ष के नेतृत्व में महायायन के बाहर निकलने की प्रतीक्षा बेचैनी से कर रही थी। प्रातः से दोपहर हुई और फिर शाम होने को आई पर वृद्ध महायायन पानी में डूबा और डूबा ही रहा। सेना नायक को आश्चर्य हुआ। उसने गोताखोरों को वृद्ध का पता लगाने को कहा। लम्बी खोज-बीन के बाद नदी की गहराई में महायायन का मृत शरीर चट्टान से लिपटा पाया गया। उसने दोनों हाथों से चट्टान को मजबूती से पकड़े ही दम तोड़ दिया था।
इस अनुपम त्याग एवं बलिदान को देखकर शत्रु सेनानायक का हृदय भी द्रवित हो उठा। आँखों से अश्रु धारा बह चली। मानवता के इस वृद्ध पुजारी के समक्ष अपनी हार स्वीकारते हुए उसने सैनिकों को लूट की वस्तुओं को वापिस देने तथा अपने राज्य की ओर वापिस लौटने का आदेश दे दिया।
पृथ्वी के अतिरिक्त इस अन्तरिक्ष में अनेकानेक ग्रह-उपग्रहों, निहारिकाओं, आकाश-गंगाओं के अस्तित्व के सम्बन्ध में सभी जानते हैं। यह पदार्थ पिंडों की बात हुई। इसके अतिरिक्त एक और मान्यता भी प्रचलित है- लोक-लोकान्तरों के संबंध में। मान्यता है कि धरती पर रहने वाले जीवधारियों की तरह निकृष्ट एवं उत्कृष्ट स्तर के प्राणी कहीं अन्यत्र भी रहते हैं। उन निवास स्थानों को ‘लोक’ कहा जाता है। धरती, आसमान, पाताल के तीन लोक भी सर्वविदित हैं। इन्हें ऊपर, नीचे और मध्यवर्ती स्थान स्पेस भी कहा जा सकता है। ऊपर स्वर्ग अर्थात् श्रेष्ठ स्तर के देव जीव धारी। नीचे नरक अर्थात् निकृष्ट स्तर के दैत्य जीवधारी। धरती तो मनुष्य की है ही। इन तीन वर्गों में विभाजित समुन्नत जीवधारियों के निवास स्थान का ऊहापोह पौराणिक परम्परा में इसी प्रकार होता रहा है। पशु-पक्षी, कृमि-कीटक वर्ग के प्राणी इसके अतिरिक्त हैं।
तीन लोकों की तरह सात लोकों की भी चर्चा है। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् के नाम से सात लोकों का वर्णन किया जाता रहा है। उनके अधिष्ठाता सप्तऋषि माने जाते हैं। इस्लाम धर्म में भी सात आसमान हैं। ईसाई, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि धर्मों में भी प्रकारान्तर से ऐसे लोक-लोकान्तरों की मान्यता है जहाँ-वहाँ के स्थायी प्राणी तो बसते ही हैं, मनुष्य लोक के प्राणी भी भले-बुरे कर्मों का फल पाने के लिए वहाँ जाते और बसते रहते हैं।
देखना यह है कि क्या ग्रह-नक्षत्रों की तरह इस ब्रह्माण्ड में कहीं लोक-लोकान्तरों का भी अस्तित्व है? और यदि है तो उसके अस्तित्व एवं क्रिया-कलाप का स्वरूप क्या हो सकता है? क्या मरने के बाद ही प्राणी वहाँ पहुँचते हैं अथवा जीवित अवस्था में भी वहाँ का आवागमन हो सकता है? पुराणों में देवर्षि नारद के बार-बार विष्णुलोक में सशरीर आते-जाते रहने की चर्चा है। अर्जुन, दशरथ देवताओं के आमन्त्रण पर उनकी सहायता करने देवलोक में गये थे। मेनका स्वर्ग लोक से धरती पर आयी थी और विश्वामित्र के साथ रहकर एक कन्या को जन्म देने के उपरान्त वापिस चली गई थी। इसी प्रकार समय-समय पर अन्य देवताओं के धरती पर आने और मनुष्यों की सहायता करने के प्रसंगों से धर्मों का कथा-साहित्य भरा पड़ा है। देखना यह है कि इसमें कुछ तथ्य भी है या ऐसे ही यह कथा-कल्पनाओं की उपन्यास उपाख्यान जैसी मनगढ़न्त भर है।
थियोसोफी ने मनुष्य शरीर में विद्यमान सात सूक्ष्म परतों को सात लोक कहा है। उस मान्यता के अनुसार यह ब्रह्माण्डव्यापी आयाम भी होने चाहिए। लम्बाई, चौड़ाई, गहराई के तीन आयाम सर्वविदित हैं। इसके अतिरिक्त ‘होलोग्राफी’ जैसे आविष्कारों से अब चतुर्थ, आयाम भी सिद्ध हो चुका है। आइन्स्टीन के अनुसार टाइम, स्पेस और कांजेशन भी तीन अन्य आयाम हैं। अध्यात्मवेत्ता इसी ब्रह्माण्ड में लोकों की संगति स्थूल, सूक्ष्म, कारण की तरह अधिक व्यापक एवं अधिक सूक्ष्म स्तर की उन परिस्थितियों को लोक कहते हैं। जिनमें चेतन सत्ता को भी अपना अस्तित्व बनाये रहने तथा काम करने, अनुभूति लेने का अवसर मिलता है। आकाश में वायुमण्डल की, तरंगों की, ऊर्जा की परतें उपलब्ध होती हैं। लोकों की भी चेतना-जगत की ऐसी ही परतें होना चाहिए। इस प्रकार की अनेकों संगतियाँ लोक सत्ता के समर्थक बुद्धिजीवी अपने-अपने ढंग से बिठाते रहते हैं।
देखना यह है कि विज्ञान के आधार पर लोक-लोकांतरों की परम्परागत मान्यता के साथ संगति खाने वाली कोई तुक बैठती है या नहीं? इस संदर्भ में उड़न-तश्तरियों की बात बहुचर्चित है। आसमान से जमीन पर आने वाले किन्हीं यानों की, उनसे उतर कर कुछ हलचल करने वाले प्राणियों की आश्चर्यजनक और कौतूहलवर्धक अनेकानेक घटनाएँ पिछले दिनों चर्चा का विषय रही हैं। उपलब्ध प्रमाणों में सार देखकर अमेरिका सरकार ने इस सम्बन्ध में एक उच्चस्तरीय जाँच आयेगा भी बिठाया था। घटनाओं को उसने तथ्यपूर्ण तो माना पर यह निष्कर्ष अनिर्णीत ही छोड़ दिया गया कि वे घटनाएँ किस प्रकार घटीं। विज्ञान की कसौटी पर जो कारण सही सिद्ध हो सकते थे वे मिल नहीं सके और अध्यात्म मान्यता के आधार पर जिस प्रकार की संगति बैठ सकती थी उसे अपनाया नहीं गया। अस्तु समय-समय पर दृश्यमान होती रहने वाली उड़न-तश्तरियों और उनकी समझदार प्राणियों जैसी गतिविधियों का अस्तित्व अभी भी रहस्यमय बना हुआ है।
विज्ञान ने इन्हीं दिनों कुछ नये आधार ऐसे पाये हैं जिनके आधार पर आकाशस्थ पदार्थ पिंडों की ही तरह ऐसे अदृश्य लोकों के सम्बन्ध में पता चलता है। जिसमें मनुष्य जैसे प्राणियों के निवास की सम्भावना का आधार बनता है। वहाँ से आवागमन का मार्ग भी धरती पर हो सकता है। इस संदर्भ में भी कुछ ठोस तथ्य सामने आये हैं और वे ऐसे हैं, जिन्हें ऐसे ही मजाक में नहीं उड़ाया जा सकता।
इस प्रसंग में पृथ्वी पर एक “ब्लैकहोल” के अस्तित्व का होना, कभी रहस्य भर था, पर अब यह माना जाने लगा है कि प्रकृति के अगणित कौतूहलों में से एक यह भी है। भयावह होते हुए भी उसकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह सामने है।
पिछले दिनों वारमूडा त्रिकोण के क्षेत्र में ऐसी अगणित घटनाएँ घटी हैं जिसमें अनेकों जलयान, वायु-यान अपने यात्रियों समेत अदृश्य हो गए। डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका के आधार पर अत्यधिक श्रम साध्य एवं व्यय साध्य खोजें की गईं, पर ऐसा कोई पता न चला जिससे यह जाना जाता कि वे सब कहाँ समा गये। इस रहस्य पर से लम्बे अनुसंधानों के उपरान्त यह पता चला है कि उस क्षेत्र में अनन्त ब्रह्माण्ड के साथ जुड़ा हुआ- पुच्छल तारे के स्तर का कोई “ब्लैक होल” है। ब्लैक होल अर्थात् ऐसा पोला भँवर जो दिखाई तो नहीं देता पर अपने क्षेत्र से गुजरने वालों को ऐसे ही निगल जाता है। जैसे कि लंका वाली सुरसा किसी भी नभचर को अपने स्थान पर बैठे-बैठे खींचती और निगलती रहती थी।
इस संदर्भ में अधिक विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए पिछले दिनों घटी कुछ घटनाओं का विवरण जान लेने की आवश्यकता पड़ेगी जो कुछ समय रहस्यमय रहने के उपरान्त अब एक गम्भीर अन्तरिक्षीय शोध का विषय बन गयी है।
30 जनवरी 1945 को लन्दन में ‘स्टार-टाइगर’ नामक हवाई जहाज ‘किंगस्टन’ जा रहा था। वारमूडा हवाई अड्डे पर उसे ईंधन लेना था। जहाज में 25 यात्री और 6 कर्मचारी थे। हवाई जहाज के कैप्टन ‘ब्रियन मैकमिलन’ थे जो द्वितीय विश्वयुद्ध में ‘रॉयल एयर फोर्स’ में 3000 घंटों से अधिक उड़ान किए हुए थे।
वारमूडा से पहले के हवाई अड्डे ‘एजोर्स’ पर आँधी-तूफान के संकेत मिलने पर कैप्टन ने वहीं ईंधन की सभी टंकियों को पूरी तरह भर लिया जिससे रास्ते में आँधी द्वारा भटक जाने पर भी ईंधन की कमी न हो।
रात्रि 12 बजे से 3:15 बजे के बीच इस हवाई जहाज ने वारमूडा हवाई अड्डे से रेडियो संपर्क किया। हवाई जहाज से वारमूडा की दूरी के अनुसार कंट्रोल टावर ने बताया कि वारमूडा पहुंचने का समय 3:56 ए.एम. की बजाय 5:00 ए.एम. होगा। यह विलम्ब विपरीत तेज हवा के द्वारा हवाई जहाज को घसीटे जाने के कारण होने की सम्भावना थी। इसके तुरन्त बाद वह हवाई जहाज गायब हो गया।
इस दुर्घटना के बाद इंग्लैण्ड की ‘ब्रिटिश मिनिस्ट्री ऑफ सिविल एविएशन’ ने ‘कोर्ट ऑफ इनवेस्टीगेशन’ नियुक्त किया। इसके प्रमुख मि. लारेन्स कुशे ने कहा- ‘आज तक जाँच-पड़ताल के लिए दी गई समस्याओं में यह समस्या सर्वाधिक जटिल एवं रहस्यमय है।’ उन्होंने आगे कहा- ‘‘स्टार-टाइगर हवाई जहाज गायब होने का रहस्य सर्वदा के लिए रहस्य ही रहेगा।”
ब्रिटिश मिनिस्ट्री द्वारा इस घटना के कारणों की खोज के लिए कुछ उठा न रखा गया। फिर भी किसी प्रकार की कोई जानकारी न मिल सकी। ‘कोर्ट ऑफ इन्वेस्टीगेशन’ ने निम्न विभिन्न पक्षों पर जाँच कराई-
(1) यान्त्रिक संरचना की कमियाँ
(2) मौसम सम्बन्धी विपत्तियाँ
(3) ऊँचाई की भूलें
(4) इंजनों की असफलता
इस हवाई जहाज में 1760 हार्सपावर के चार इंजन लगे थे। चार में से किन्हीं दो इंजनों के द्वारा वह अच्छी तरह उड़ान कर सकता था। इंजन में कोई कमी होने पर खतरे के संकेत मिलने की स्वसंचालित व्यवस्था थी।
इसके अतिरिक्त आग लगना, रेडियो फेल्योर, हवाई जहाज पर नियन्त्रण न होना और ईन्धन की कमी (परिस्थितियों को देखते हुए) जैसी कोई सम्भावना नहीं थी।
कोर्ट ने यह भी बताया कि वायुमण्डल में उस समय कोई ऐसा गम्भीर परिवर्तन नहीं हुआ न कोई विद्युतीय तूफान था। इस घटना के तुरन्त बाद 48 घन्टों तक इतना तीव्र आँधी-तूफान चलता रहा कि उसकी हवाई-शोध को स्थगित कर देना पड़ा। ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि उस समय पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति में अति तीव्र परिवर्तन हुआ होगा। अन्य आयामों के बारे में भी विचार किया जा सकता है।
इस घटना के लगभग एक वर्ष बाद 17 जनवरी 1949 को ‘स्टार-टाइगर’, ‘कासिस्टर प्लेन’, ‘स्टार एरियल’, ‘किण्डली-फील्ड’ वारमूडा हवाई अड्डे से 8:41 ए.एम. पर किंगस्टन के लिए रवाना हुआ। उड़ान शुरू करने के 1 घण्टे बाद हवाई जहाज के पायलेट कैप्टन जे. मैक्फी की ओर से रेडियो संकेत मिले कि वह अपने रास्ते पर ठीक प्रकार चला जा रहा है। उसके तुरन्त बाद उससे संदेश मिलना बन्द हो गए और वह अदृश्य हो गया।
इसकी जाँच के लिए समुद्री एवं हवाई बेड़ों का सशस्त्र जहाजी दस्ता पाँच दिन तक लगा रहा। फिर भी उसका कोई अवशेष चिन्ह न मिला ‘स्टार-एरियल’ की दुर्घटना का करण अभी तक अज्ञात है।
यह इसी शताब्दी की घटनाएँ हैं जिन्होंने वैज्ञानिकों के मामले को गम्भीर समझने, अधिक खोज-बीन करने और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए बाधित किया है। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में भी ऐसी ही अनेकों ज्ञात-अविज्ञात घटनाएँ होती रही हैं जिनका करण समझ में न आने पर उन्हें दैवी दुर्विपाक मान लिया गया और रहस्य कहकर किसी प्रकार मन समझा लिया गया। ऐसी घटनाओं में से कुछ इस प्रकार हैं।
सन् 1800 ई. की 20 अगस्त को ‘यू.एस.एस. पिकरिंग’ नामक जलयान जो ‘न्यू कैसिल’ से ग्वाडेलोय जा रहा था, गायब हो गया जिसमें 90 जहाज के कर्मचारी थे।
अगस्त 1800 में दूसरा जहाज जिसका नाम था यू.एस.एस. इन्सर्जेण्ट 340 यात्रियों सहित वारमूडा त्रिकोण में लापता हो गया।
इसी प्रकार अक्टूबर 1814 में ‘यू.एस.एस. वास्व’ नामक जलयान जिसमें 140 कर्मचारी थे वारमूडा में गायब हो गया।
सन् 1840 में ‘रौसेली’ नामक मालवाहक जलयान में से सबके सब कर्मचारी गायब हो गये। केवल कुछ क्षुधा पीड़ित बिल्लियाँ और कनारी चिड़ियों के कुछ पिंजड़े रह गए। बहुमूल्य सामान सब ज्यों का त्यों पड़ा रहा। “रौसेली” नामक जहाज को बचाने के लिए “नासो” नामक जहाज से बाँधकर खींचा गया तो दोनों का कहीं नामो निशान भी न रहा।
अप्रैल 1974 में एक 54 फीट लम्बी ‘साबा बैंक’ नामक नाव कैरिबियन समुद्र में परिभ्रमण के लिए जा रही थी (जो सुरक्षा के आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित थी) नासो और मियामी के बीच अदृश्य हो गयी। उसका आज तक कोई पता न चला।
सारा समुद्र तट ‘कोस्ट-गार्ड’ की ओर से खोज डाला गया। यात्रियों के सम्बन्धियों ने नाव की जानकारी देने वाले को इनाम की मोटी रकम घोषित की। इसके बावजूद भी कोई नहीं मिली।
जनवरी 1921 में गन्धक ले जाने वाला ‘हेविट’ नामक जहाजी बेड़ा ‘सेबिन पास टेक्सास’ से रवाना हुआ लेकिन अपनी मंजिल बोसृन तक कभी न पहुँच सका। मात्र उसका अन्तिम सन्देश फ्लोरिडा के ‘जुपिटर’ नामक टापू के पास एक दूसरे जहाज पर सुना गया। 1921 के प्रथम तीन महीनों में ही ऐसे 10 भारी जहाज इस वारमूडा ट्रैंगिल में ही गायब हो गए।
जुलाई 1973 में इसी स्थान के समीप 63 लम्बी मछली पकड़ने की याँत्रिक बोट साफ मौसम में भी गायब हो गयीं। नाव किंगस्टन से जमैका की 80 मील की समुद्री यात्रा पर थी। उसमें 40 आदमी थे। उसका कुछ पता न चला केवल टूटे-फूटे टुकड़े पाये गए।
फरवरी 1972 में एक 572 फुट का ‘बी.ए. फाग’ नामक टैंकर मैक्सिको की खाड़ी की यात्रा पर जा रहा था। ‘गाल्वेस्टन’ के दक्षिण में कहीं गायब हो गया। नियत समय पर न पहुँच पाने के कारण उसकी खोजबीन करने पर मात्र पोत का भग्नावशेष और उसमें बुरी तरह फँसकर मरे कर्मचारियों के शव हाथ लगे।
यह सब कहाँ समा गये? इसका उत्तर विज्ञान ने अन्तरिक्ष में ऐसे ‘ब्लैक होलों’ का अस्तित्व खोज कर दिया है जो मात्र अदृश्य आकाशीय भँवर ही नहीं वरन् लोक-लोकान्तर तक जाने वाली गुप्त सुरंगों का काम भी देते हैं।
आजाद हिन्द फौज के संगठन के लिए सुभाषचन्द्र बोस एक बार बैंकाक भी गये। वहाँ पर्याप्त मात्रा में रहने वाले प्रवासी भारतीयों ने उनका भव्य स्वागत किया। एक विशाल सभा में नेताजी ने परतन्त्र भारत की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए भारत भूमि की स्वतन्त्रता के लिए प्रवासी भारतीयों को प्रेरित किया। नेताजी का एक-एक शब्द इतना मार्मिक था कि उसने वहाँ भारतीयों को कुछ करने की प्रेरणा से उद्देलित कर दिया। असंख्य प्रवासी भारतीयों ने भारतभूमि को स्वतंत्र कराने का दृढ़ संकल्प लिया।
नेताजी का उद्देश्य यहीं पूरा नहीं हो जाता था। उन्हें आजाद हिन्द फौज के संगठन के लिए धन की भी सख्त जरूरत थी। धन के अभाव में सेना के लिए अस्त्र-शस्त्र खरीदने में बाधा हो रही थी। परन्तु नेताजी समझ नहीं पा रहे थे कि इस बात को कैसे कहें?
कुछ महिलाओं ने नेताजी के इस संकोच को समझ लिया। उन्होंने मंच पर आकर अपने आभूषण दान देने प्रारम्भ कर दिये। चार-छह महिलाओं ने भावभीने स्वरों में अपनी यह श्रद्धांजलि अर्पित की फिर तो एक भव्य वातावरण ही बन गया। महिलाओं में यह होड़-सी लग गयी कि कौन पहले आकर अपने आभूषण दे। यहाँ तक कि बैंकाक की महिलाओं ने भी अपने गहने देने प्रारम्भ कर दिये।
यह देखकर नेताजी भावाभिभूत हो गये। यह वहीं मंच था जहाँ कुछ दिनों पूर्व रासबिहारी बोस को बड़ा प्रयास करने के बाद भी एक हजार पौंड की राशि कठिनाई से हो प्राप्त हुई थी। नेताजी ने रूंधे हुए कण्ठ से बोले- ‘पुत्र कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं हो सकती। मुझे यहाँ निराश, दुःखी और लाचार देखकर सैकड़ों रूपों में मेरी माँ मेरी लाज छिपाने के लिए यहाँ भी आ गयी। माँ के दो हाथों से ही मैंने अभी तक दुलार पाया था किन्तु आज तो माँ का ऐसा प्रेम मुझ पर उमड़ा है कि हजार हाथों से मेरी माँ मुझे दुलारते मेरा रूप संवारने के लिए आ गयी है। भारत देश की आजादी के दर्शन मेरे भाग्य में बदे हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। किन्तु आजादी के इस अभियान में मुझे माँ की महिमा के दर्शन हो गये, मैं सचमुच कृतार्थ हो गया।’ मातृ रूप की इस महिमा को सुनकर वहाँ उपस्थित प्रत्येक श्रोता की आँखें श्रद्धा से सजल हो उठीं।
दृश्य और प्रत्यक्ष शक्तियों के अलावा संसार में कई अदृश्य व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालने वाली शक्तियाँ भी हैं। उनमें से कई व्यक्ति या समाज की हितैषी होती हैं तथा कई को विघ्न उत्पन्न करने में ही रस आता है। इन शक्तियों को अदृश्य आत्माएँ कहा जाय अथवा मनुष्य का प्रारब्ध, यह प्रश्न अपनी जगह है परन्तु जब ये मनुष्य के हित में काम करती हैं तो वे बड़े-बड़े संकटों से उबार लेती हैं।
न्यूयार्क में रहने वाली महिला श्रीमती कैथलीन मेककोइन के जीवन में कई अवसर ऐसे आये जब वह आसन्न संकटों से किन्हीं प्रेरणाओं, संकेतों और सहायताओं के बल पर बच गयीं। श्रीमती कैथलीन यों एक साधारण महिला की तरह दिखाई देती हैं, उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि यह कोई अलौकिक शक्ति के संरक्षण में रहने वाली महिला हैं, पर कैथलीन के साथ जो घटनाएँ घटीं, वे इस तथ्य को गलत भी नहीं बतातीं।
कैथलीन जब नौ वर्ष की थीं तब एक बार पाठशाला के सैकड़ों विद्यार्थियों के साथ हडसन नदी की सैर करने गयीं। नदी के बीच स्टीमर में आग लग गयी। बच्चे चीखने लगे और हंगामा मच गया। कैथलीन को तभी लकड़ी का एक तख्ता नजर आया और वह तख्ते को अपने सीने से चिपकाकर नदी में कूद गयीं। थोड़ी देर में कुछ नाविकों ने, जो किश्ती खेते हुए उधर आये थे कैथलीन को बचा लिया बाकी सभी बच्चे जल गये।
इसके दो ही साल बाद की घटना है। कैथलीन एक मिनी बस में सफर कर रही थीं। अचानक बस का टायर फट गया और बस लुढ़कती हुई एक खड्ड में जा गिरी। कैथलीन बिल्कुल नहीं घबराई। वह खिड़की का शीशा तोड़कर बाहर कूद पड़ीं। बस में आग लग गयी और कैथलीन के अलावा बाकी सभी लोग जलकर मर गये। इसी प्रकार सन् 1954 में कैथलीन हवाई जहाज से अमरीका जा रही थीं कि जहाज में कुछ खराबी पैदा हो गयी। जहाज के चालक ने जहाज को नीचे उतारना चाहा, लेकिन उतरते ही जहाज में आग लग गयी और सारे यात्री जलकर मर गये। केवल कैथलीन बुरी तरह जलने के बाद भी जिंदा बच गयीं।
इसके पाँच वर्ष बाद 5 जनवरी 1959 को कैथलीन रेल में यात्रा कर रही थीं। वह रेल के आखिरी डिब्बे में बैठी थीं। डिब्बे में दस-बारह यात्री थे। रात का समय था और कैथलीन ऊँच रही थीं। अचानक उनकी आँख खुली। आँख खुलने के दो मिनट बाद ही जोर का धमाका हुआ। पीछे से आने वाली गाड़ी का इंजन कैथलीन के डिब्बे से टकरा गया था। डिब्बा चकनाचूर हो गया, उसके सभी यात्री मर गये पर कैथलीन फिर भी बच गयीं।
सन् 1963 में कैथलीन जार्जिया के एक छोटे से होटल में छुट्टियां मना रही थीं। एक दिन पहाड़ से कोई 80 मन का पत्थर लुढ़कता हुआ होटल की इमारत पर आ गिरा। वह पत्थर होटल के जिस भाग पार गिरा था उसमें बैठे हुए पाँच व्यक्ति उसी समय मर गये। कैथलीन भी वहीं बैठी थीं, पर इधर पत्थर का गिरना हुआ था कि उधर कुछ ही क्षण पूर्व कैथलीन उस भाग से निकल रही थीं। एक बार जब वह घर वापस आ रही थीं उसकी कार का एक्सिडेंट हो गया जिसमें कार ड्राइवर मर गया तथा उसमें बैठे सात अन्य व्यक्ति बुरी तरह घायल हो गये परन्तु कैथलीन को खरोंच तक नहीं आयी थी।
सन् 68 में कैथलीन अपनी कुछ सहेलियों के साथ एक दावत में गयीं। इस दावत में जो भोजन परोसा गया था वह विषाक्त हो गया था अतः जिन व्यक्तियों ने दावत खायी वे सभी मर गये किन्तु कैथलीन पर उस विषाक्त भोजन का कुछ भी असर नहीं हुआ। इस काण्ड की जाँच हुई और पता चला कि कैथलीन भी उस दावत में सम्मिलित हुई थीं। उसके आमाशय की जाँच की गयी। डॉक्टर यह जानकर हैरान हुए कि उसके पेट में भी वही भोजन है फिर वह बच कैसे गयीं?
श्रीमती कैथलीन के साथ घटी ये घटनाएँ, आने वाले आकस्मिक संकट और आकस्मिक सुरक्षा प्रबन्ध का कोई विश्लेषण नहीं किया जा सकता। इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि कई बार अदृश्य शक्तियाँ किन्हीं कारणों से मनुष्य को बड़े-बड़े खतरों से भी बचा ले जाती हैं। यह उनका उपकार ही कहा जाना चाहिए। यों भी कहा जा सकता है कि मारने वालों से बचाने वाला बड़ा और समर्थ होता है। लेकिन यह प्रश्न तो फिर भी अपने स्थान पर ही है कि इन दुर्घटनाओं में अदृश्य शक्तियाँ कैथलीन की ही रक्षा क्यों करती रहीं?
पिछले दिनों स्विट्जरलैण्ड की एक 68 वर्षीय महिला अपने पति के साथ कार में जा रही थी। रास्ते में कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। दुर्घटना कोई गम्भीर नहीं थी परन्तु उसके कारण महिला गूँगी हो गयी। पति ने कितना ही उपचार कराया, कोई लाभ नहीं हुआ। वर्षों तक वह गूँगी ही बनी रही। आधुनिकतम उपचार आदि सबका सहारा लिया गया। परन्तु सभी व्यर्थ सिद्ध हुए। एक दिन पति-पत्नी दोनों अपने मकान की छत पर बैठे थे, तभी आकाश में नीचे को मंडराते हुए एक जेट यान उधर से गुजरा। जेट जब उस मकान की छत से गुजर रहा था तो जेटयान ने एक धड़ाके के साथ गति बढ़ाई। उस धड़ाके ने प्रत्येक व्यक्ति को चौंका दिया। पर साथ ही उस गूँगी महिला के मुख से ‘हे भगवान’ शब्द निकला और उस गूँगी वृद्धा को फिर वाणी मिल गयी।
बाईस वर्षीया जीन हेजीज बचपन से ही बहरी हो गयी थीं। वह बोल तो सकती थीं परन्तु किसी दुर्घटना में श्रवण शक्ति जाती रहने के कारण वह दूसरे क्या कह रहे हैं, जरा भी सुन नहीं पाती थीं। वह फोम बनाने के एक कारखाने में काम किया करती थीं। इसे वर्षों हो गये थे काम करते हुए, इस दौरान उसे कई बार छींकें भी आयीं, खाँसी भी उठी और सर्दी जुकाम भी हुआ। परन्तु एक दिन जब वह अपने दफ्तर में काम कर रही थी तो उसे जोर की छींक आयी। छींक के कारण उसकी आँखों से आँसू निकल आये। परन्तु तभी उसे वर्षों बाद अचानक अपनी साँस लेने की आवाज सुनाई दी और अपने आस-पास काम कर रहे मित्रों और सहेलियों की बातचीत भी।
इसके बाद तो उसे जैसे छींकों का दौरा ही पड़ गया और प्रत्येक छींक उसकी श्रवण शक्ति को सतेज बनाती जा रही थी। छींकों का दौरा जब समाप्त हुआ तो वह भली-भाँति सुन सकती थी, इससे पूर्व बचपन में जब वह किसी दुर्घटना में बहरी हो गयी थी, अभिभावकों ने उसका बहुत इलाज कराया परन्तु उसका बहरापन नहीं गया तो नहीं ही गया। डॉक्टरों का कहना था कि बहरेपन को दूर तभी किया जा सकता है जबकि उसके कान का आपरेशन किया जाय। इस चीर-फाड़ को जोखिम पूर्ण बताया जा रहा था और फिर भी इस बात की पूरी सम्भावना नहीं थी कि सफलता मिल ही जायेगी। इस लिए माता-पिता ने उसका आपरेशन नहीं ही कराया और एक दिन यह समस्या बिना किसी हस्तक्षेप के सुलझ गयी।
जिस प्रकार अविज्ञात कारण से कभी-कभी मनुष्य पर अप्रत्याशित विपत्तियाँ टूट पड़ती हैं और प्रत्यक्ष कोई कारण न होने पर भी दुर्घटना स्तर का संकट सहन करना पड़ता है। उसी प्रकार कभी-कभी विपत्तियों से उबरने वाली ऐसी अदृश्य सहायताएँ भी अनायास ही मिलती देखी गई हैं जिसकी न कभी कोई आशा थी न सम्भावना।
इन घटनाक्रमों के पीछे सन्निहित अविज्ञात कारणों को आमतौर से प्रारब्ध, संयोग आदि कहकर किसी प्रकार समाधान कर लिया जाता है, फिर भी आस्तिक व्यक्ति इन विपत्तियों को अपना कर्मफल और सुविधा, सफलताओं को ईश्वर का अनुग्रह मानते हैं। इस संदर्भ में परोक्षवादी किन्हीं अदृश्य आत्माओं का भी हाथ देखते हैं जो पूर्वकाल के घटनाओं को ध्यान में रखकर प्रतिशोध लेती और कष्ट पहुँचाती हैं। साथ ही उच्चस्तरीय आत्माएँ अपने सम्बद्ध आत्मीय जनों को समय-समय पर अपनी सामर्थ्यानुसार लाभान्वित भी करती रहती हैं। जो कुछ भी हो अन्ततः अपने सत्कर्म-दुष्कर्म ही सामान्य घटनाक्रमों की भाँति अप्रत्याशित घटनाओं की पृष्ठभूमि बनाते हैं एवं यह मायावी संसार रचते हैं।
सृष्टि जितनी सुन्दर है उतनी ही विलक्षण भी। इसके छोटे से छोटे घटक अपने अन्दर इतने रहस्य छिपाये हुये हैं जिन्हें देखकर मानवी मस्तिष्क हतप्रभ रह जाता है। विज्ञान ने अपनी आरम्भिक स्थिति में कभी दावा किया था कि उसने सब कुछ जान लिया है। यह उसके स्थूल पर्यवेक्षण का परिणाम था। गहराई में स्थूल से सूक्ष्म की ओर उतरने पर यह ज्ञात हुआ कि जितना देखा और समझा गया था वह तो जानकारियों का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र था। बड़ा भाग तो अब भी अविज्ञात एवं रहस्यमय बना हुआ है।
विराट् सृष्टि में अन्य भागों को छोड़ भी दिया जाय तो भी जिस भू-भाग पर मनुष्य निवास करता और विज्ञ होने का दावा भरता है। उसके ही रहस्य इतने विस्मित करने वाले हैं, जिन्हें देखकर वैज्ञानिक बुद्धि का दर्प चकना चूर हो जाता है और अपनी अल्पज्ञता का भान होता है। इन्हीं में से एक है कनाडा का मौनेक्टन क्षेत्र जो अब भी वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली बना हुआ है। सन् 1802 की बात है। कनाडा के ‘न्यूब्रन्सविक’ शहर का एक किसान अपने तांगे को मौनेक्टन की ओर ले जा रहा था। एक साधारण-सी ढाल पर अपने घोड़े की नाल ठीक करने के लिये रुका। घोड़े को खोलकर उसने अलग किया और तांगे को ढाल पर लुढ़कने से बचाने के लिये पहिये के नीचे ढेले लगा दिये और घोड़े को एक पेड़ की छाया में ले गया। उसी समय एक विचित्र बात घटित हुई। किसान का ताँगा ढेला लगा होने से ढलान की ओर तो नहीं लुढ़का परन्तु चढ़ाई की ओर स्वतः चढ़ने लगा। धीरे-धीरे वह गति पकड़ने लगा। विवश होकर किसान को ताँगा रोकने के लिये उसके ‘शाफ्ट’ (धुरे) मोड़ने पड़े।
इस पहाड़ी पर ताँगे को ऊपर की ओर लुढ़कने की घटना सुनकर हजारों लोग उसे देखने गये। वहाँ एक विशेष स्थान पर प्रत्येक ताँगा, गेंद गोल पत्थर आदि पहाड़ी पर ऊपर की ओर लुढ़कने लगते हैं। आजकल यह पहाड़ी एक बहुत बड़ा मनोरंजन पर्यटन स्थल बनी हुई है। वहाँ सड़क पर एक बोर्ड भी लगा है। जिस पर लिखा है- ‘‘मोटर चालक यहाँ से पहाड़ी के ऊपर जाने के लिये इंजन बन्द कर दें, ब्रेक खुले छोड़ दें और पीछे की ओर झुक कर बैठ जायें।”
इस रहस्यमय पहाड़ी की पूरी वैज्ञानिक छानबीन की गयी है। इसका चुम्बकीय शक्ति से भी कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि अचुम्बकीय पदार्थों लकड़ी, रबड़ प्लास्टिक आदि से बनी गोल वस्तुयें भी पहाड़ी पर ऊपर की ओर लुढ़कनी शुरू हो जाती है। अनेकों परीक्षणों के पश्चात भी इस रहस्य का पता नहीं लग सका है कि आखिर गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन क्यों होता है।
ज्वालामुखी के विस्फोटों से सम्बन्धित वैज्ञानिक भविष्य-वाणियाँ अभी तक शत प्रतिशत सत्य नहीं हो सकी हैं। किन्तु जावा के ज्वालामुखी पर्वत पेगरेज के ऊपर लगभग 10 हजार फीट की ऊँची चोटी पर रॉयल काडस्लिप नामक पौधा होता है। इस पौधे पर कभी-कभी ही पुष्प दिखायी पड़ता है। किन्तु यह अशुभ सूचक पुष्प जब भी खिलेगा तो पेगरेज में ज्वालामुखी का विस्फोट अनिवार्य रूप से होता है। स्थानीय लोग जब भी इस फूल को देखते हैं तो अपना स्थान छोड़कर दूरस्थ सुरक्षित स्थानों में पहुँच जाते हैं। एक निश्चित समय में विस्फोट होने के बाद लोग फिर से अपना घर बसाते हैं।
ज्वालामुखी का उस पौधे से क्या संबंध है। पुष्प का खिलना और ज्वालामुखी का फटना एक साथ होने में कोई भी वैज्ञानिक कारण नजर नहीं आता। क्या कोई चेतन सत्ता पुष्प के माध्यम से मानवी सुरक्षा के लिये संकेत देती है अथवा उस पौधे में ही ऐसी कोई भविष्य की घटनाओं को जानने को ऐसा कोई संग्रहीतन्त्र है। अनेकों प्रयोग परीक्षणों के बाद भी चह रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है। यह नगण्य पौधा कईबार ज्वालामुखी के विस्फोटों से रक्षा करता आ रहा है। उस क्षेत्र के निवासी यह मानते हैं कि कोई दैवीय शक्ति पुष्प के माध्यम से ज्वालामुखी के विस्फोटों से रक्षा करती है। पौधे के प्रति उनकी उतनी ही श्रद्धा है, जितनी कि किसी देवी अथवा देवता के प्रति।
अरबसागर में स्थित ‘वार्सा कल्मीज’ नामक द्वीप वैज्ञानिकों के लिये रहस्यमय बना हुआ है। उस क्षेत्र में ‘कजाक’ नामक भाषा बोली जाती है। कजाक भाषा में वार्सा कल्मीज का अर्थ होता है- “जाओ और कभी वापस मत लौटो।” प्रकृति ने इस क्षेत्र में ऐसा ही क्रूर मजाक किया है। 180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस द्वीप में बादल तो बराबर छाये रहते हैं, पर पानी कभी नहीं बरसता। द्वीप के चारों ओर वर्षा तो होती है, पर उस क्षेत्र में आज तक पानी के दर्शन नहीं हुये। इससे देखने पर निरंतर पानी बरसने का भ्रम होता है। यह भ्रम बादलों के छाये रहने के कारण होता है। कुछ व्यक्तियों ने उस स्थान पर जाने व बसने का दुस्साहस किया पर वे पानी के अभाव में जीवित न रह सके। बादलों के छाये रहने तथा पानी न बरसने का कोई कारण न ढूँढ़ा जा सका।
अमेरिका के ‘एमेको ऑयल रिसर्च डिपार्टमेन्ट’ में आग लगने का कोई कारण न होने पर भी तेल के बड़े-बड़े टैंकर क्यों जल गये? उक्त संस्था के वैज्ञानिकों की परिकल्पना है कि किसी विशेष परिस्थिति में “बॉल ऑफ लाइट’ आती है और आग लगा देती है। वैज्ञानिकों ने इसे ‘फेज ऑक्ड लूप ऑफ इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडियेशन’ कहा है।
वारमूडा के त्रिकोण में जहाज पर कर्मचारी यात्रियों के गायब होने का एक अन्य कारण बताते हुये वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य का दहन स्वतः हो जाता है और जलने के बाद थोड़ी-सी ‘ब्लू ग्रेएश’ बच जाती है। पेन्सिलवानिया विश्वविद्यालय के फिजिकल एंथ्रोपोलॉजी के प्रो. डा. विल्टन एम. कागमैन का अनुमान है कि मानव शरीर को जलाने के लिए 3000 डिग्री फारेनहाइट से अधिक तापमान 12 घंटे के लिये आवश्यक है। फिर भी कुछ हड्डियाँ अवशेष रह जाती हैं। जबकि वहाँ पूर्ण दहन कुछ सेकेंडों में हो जाता है। उस स्थान पर ऐसी ही घटाना घटी उस सम्बन्ध में वे कोई प्रमाण नहीं दे सके।
यह तो इस भू-भाग के उन रहस्यमय स्थानों का छोटा-सा चित्रण है जो अपनी विलक्षणताओं के कारण मानवी बुद्धि को हतप्रभ कर रहे हैं। विराट् सृष्टि अपने अन्दर असीम रहस्यों को समेटे हुये है। उनको जान सकना तो दूर रहा अभी तो सृष्टि के विस्तार की जानकारी भी मनुष्य को ठीक-ठीक नहीं है। स्थूल की तुलना में सूक्ष्म जगत तो और भी व्यापक और विलक्षण है जिसकी परिकल्पना कर सकना तक मनुष्य बुद्धि के लिये सम्भव नहीं है।
बुद्धि न तो सर्वज्ञ है और न ही सर्व समर्थ। उसकी उपयोगिता इतनी भर है कि अपनी क्षमता का सदुपयोग इस संसार को सुन्दर एवं समुन्नत बनाने के लिये करे। मानवी गरिमा इसी में निहित है।
यूनानी फौजें आगे बढ़ती आ रही थीं। रोम की जनता और यहाँ तक कि सेना भी यूनानी फौजों से घबरा उठी। अधिकाँश व्यक्तियों के मन में यही बात थी कि अब यूनानी सेना हमारे देश पर अधिकार जमा लेगी। रोम के सेनापति सीजर ने लोगों के मन की इस भावना को जाना तो उनका माथा ठनक उठा। उन्होंने सोचा जब अभी से ये ऐसा सोच रहे हैं तो युद्ध में फिर क्या कर पायेंगे?
सीजर ने रात में ही पूरे देश में यह इश्तिहार लगवा दिये- ‘हमने अपना मनोबल खो दिया है इसलिये यूनानी फौजें हमें भयभीत कर रही हैं। कायरता छोड़ो। अपनी शक्ति को पहचानो। वीरतापूर्वक लड़ो। जीत तुम्हारी ही होगी।’
इन पंक्तियों ने हारी-थकी जनता को नया उत्साह दिया। सैनिकों में भी नया उत्साह व्याप्त हो गया। वे पूरी शक्ति से युद्ध क्षेत्र में लड़े और विजयी हुए।
कथा सरित्सागर में एक रोचक कथा आती है- “चांडाल कुल में जन्मी एक कन्या को अपने कुलवंश से घृणा हो गई। युवावस्था में प्रवेश करते ही उसने निश्चय किया कि वह सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति से विवाह करेगी, अन्यथा आजीवन कौमार्य व्रत निभायेगी। इस महत्वाकाँक्षा से अभिप्रेरित होकर वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की खोज में निकल पड़ी। एक नगर में उसने एक बड़ा जुलूस जाते देखा। स्वर्ण अलंकारों ये सुसज्जित हाथी पर राजा बैठा था। पीछे-पीछे हजारों की संख्या में सैनिक पैदल एवं घोड़े पर सवार राजा का अनुगमन कर रहे थे। कुछ युवतियाँ चँवर ढुला रही थीं। यह सोचकर कि सबसे बड़ा व्यक्ति यही हो सकता है कन्या प्रफुल्लित हो उठी और पीछे-पीछे चल पड़ी। राजा से विवाह करने का उसने निर्णय लिया। मार्ग में एक संन्यासी गुजरा। राजा की दृष्टि जैसे ही संन्यासी पर पड़ी वह हाथी से उतर पड़ा और उसके चरणों में नमन किया। कन्या सोचने लगी कि राजा से बड़ा तो संन्यासी है। मुझे विवाह संन्यासी से करना चाहिए। राजा को छोड़कर वह संन्यासी के पीछे चलने लगी। आबादी से दूर जंगल में स्थित संन्यासी एक मन्दिर में पहुँचा। देवमूर्ति को प्रणाम करके वह ध्यानस्थ हो गया। किंकर्तव्यविमूढ़ बनी वह अपने निर्णय पर पश्चात्ताप करने लगी। मूर्ति को बड़ा जानकर उससे विवाह की आकाँक्षा लिए वह वहीं बैठ गयी। कुछ समय बाद मन्दिर में एक कुत्ता आया, अपनी सहज प्रकृति के अनुसार उसने मूर्ति के ऊपर ही मूत्र त्याग किया। महत्वाकांक्षी कन्या पुनः पश्चाताप करने लगी। कुत्ता जैसे ही मन्दिर से निकला, विवाह के योग्य वाँछित पात्र जानकर वह उसके पीछे चल पड़ी। चलते-चलते कुत्ता एक चाँडाल बस्ती में जा पहुँचा और एक झोंपड़ी के समक्ष जाकर भौंकने लगा। आवाज सुनकर एक युवक बाहर निकला। कुत्ते ने युवक को जैसे ही देखा उसके पैरों में लौटकर पाँव को चाटने लेगा। अपनी ही बस्ती और अपनी ही बिरादरी में उपयुक्त और श्रेष्ठ विवाह योग्य पुरुष को देखकर वह अपने आप को धिक्कारती रही। युवक के समक्ष कन्या ने विवाह प्रस्ताव रखा। सुशील एवं रूपवती जानकर उसने विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और दोनों गृहस्थ जीवन के बंधन में बँध गये।”
कथा सामान्य होते हुए भी असामान्य प्रेरणा देती तथा मानवी प्रवृत्ति का बोध कराती है। उद्धत भौतिक महत्वाकाँक्षाएँ मनुष्य को इसी प्रकार परेशान करती हैं। बड़ा बनने- बड़प्पन पाने की इच्छा से प्रेरित होकर मनुष्य अपने सहज क्रम और उपलब्ध परिस्थितियों को छोड़कर जीवन पर्यन्त बन्दरों के समान उछलकूद करना-मचक-मचक करता रहता है। “दूर के ढोल सुहावने” जैसी मनोवृत्ति के कारण उपयुक्त, अनुपयुक्त भले-बुरे के बीच अन्तर करते नहीं बनता। वर्तमान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और उपलब्ध परिस्थितियाँ स्वयं के विकास के लिए सर्वोत्तम साधन है। इस तथ्य से अवगत न होने के कारण ही भटकाव बना रहता है जो है उससे लाभ उठाने की नीति अपनाकर उपलब्धियों का सदुपयोग करते नहीं बनता, और जो नहीं है उसे प्राप्त करने की आकाँक्षा मन में बनी रहती है। फलतः मनुष्य सदा असन्तुष्ट अशान्त ही बना रहता है।
विश्लेषण करने पर पता चलता है कि महत्वाकांक्षा का तो कोई ओर-छोर नहीं। उनकी न कोई सीमा है न मर्यादा, अतएव उनकी आपूर्ति भी असम्भव हैं बलवान बनने, बुद्धिमान होने, सम्पत्ति एकत्रित करने, श्रेय सम्मान पाने जैसी कितनी ही इच्छाएँ ऐसी हैं जिनका कहीं अन्त नहीं है। मनुष्य कितना भी प्रयत्न क्यों न करे शेर और हाथी जैसा शक्तिशाली नहीं बन सकता।
एक महत्वाकाँक्षा किसी प्रकार पूरी भी हो जाय तो भी इतने मात्र से सन्तुष्टि नहीं मिल जाती। एक के पूरी होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। बुद्धिमान में धनवान बनने, धनवान में प्रतिष्ठा पाने, बलवान में धन संग्रह करने की इच्छा देखी जाती है। यह इस बात का परिचायक है कि भौतिक महत्वाकाँक्षाओं का अन्त नहीं और न ही उनकी आपूर्ति सम्भव है। पूर्ति का अभाव असन्तोष एवं अशांति को जन्म देता है। फलतः अनेकानेक प्रकार के सामाजिक विग्रह प्रतिस्पर्धा स्वरूप खड़े होते हैं।
उपरोक्त विवेचना से यह शंका हो सकती है कि धनवान, बुद्धिमान, बलवान बनने की आकाँक्षा अनुचित हैं। पर बात ऐसी नहीं है। जो आकाँक्षाएँ व्यक्तिगत स्वार्थ से अभिप्रेरित होती हैं, वह बुरी हैं। संकीर्णता की परिधि से बाहर निकलकर स्वार्थपरता के धरातल से ऊपर उठकर जब वे परमार्थ को लोक-कल्याण का माध्यम बन जाती हैं तो उनकी सराहना की जाती है। मूलतः न तो धन का संग्रह बुरा है, न ही ज्ञान का अर्जन। शक्ति सामर्थ्य भी अपने में महत्वपूर्ण है, पर जब इनका लक्ष्य उद्धत प्रदर्शन और अपने अहंकार को पोषण देना होता है तो ये भर्त्सना के पात्र बनते हैं। आलोचना उस मनोवृत्ति की होती है। जो मनुष्य को नीति अनीति कुछ भी अपनाने को बाध्य करती है।
महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अहंकारी होता है, साथ ही निष्ठुर भी। अपनी भौतिक कामनाओं की पूर्ति के लिए वह कुछ भी कर सकता है। इतिहास के पन्ने इसकी गवाही देते हैं। हिटलर, मुसोलिनी, नैपोलियन, सिकन्दर, इनकी विश्व विजय की महत्वाकाँक्षा ने कितना नर संहार किया यह सभी जानते हैं। युद्धों के इतिहास इनकी ही परिणति है। अधिकाँश संघर्षों का कारण महत्वाकांक्षाएं ही होती हैं। जो प्रतिस्पर्धा अहंता, ईर्ष्या, और द्वेष को जन्म देती है, अन्तर्राष्ट्रीय तनावों में उसकी प्रधान भूमिका होती है।
अतएव इनसे अपने को बचाये रखना आवश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए प्रयत्न किए जाएँ, पर उसका उद्देश्य व्यक्तिगत अहंता को परिपोषण देना अथवा उद्धतता प्रदर्शन ने होकर समाज को लाभान्वित करना हो।
शक्ति सम्पन्न बनना भी अच्छा है, पर दूसरों को खाने, गिराने और अपना स्वार्थ साधने जैसी मनोवृत्ति उसमें न हो, अर्जित सामर्थ्य से दूसरों को सहयोग पहुँचाना हो। यही बात धन संग्रह के संदर्भ में भी लागू होती है। ईमानदारी और श्रमपूर्वक धन कमाया जाय, संग्रह किया जाय। पर उस संग्रह का लक्ष्य स्वयं उपभोग तक सीमित न रहे। अन्यों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। महान बनने- बढ़-चढ़कर त्याग बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत करने जैसी आकाँक्षा उठे तो ही वह महत्वाकाँक्षा व्यक्ति स्वयं एवं समाज के कल्याण का कारण बनती है।
समाज में ऐसे कितने ही अपंग व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने समाज पर आश्रित न होकर आत्म-विश्वास और पुरुषार्थ के बलबूते पर अपने परिवार का भरण-पोषण और समाज के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया है। उन्हीं में से स्टेगमान भी एक हैं।
स्टेगमान अल्पायु में ही पक्षाघात के शिकार हो गए थे। कुछ बड़े होकर उनने कला विद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ उन्होंने मुख में कूँची दबाकर चित्र बनाना आरम्भ कर दिया। उनकी मान्यता थी कि कोई कलाकार हाथ से चित्र नहीं बनाता वरन् हृदय की गहराई से निकली हुई भावना ही कागज पर अपने वास्तविक रूप से साकार होती है। उन्होंने अपने प्रयत्नों द्वारा यह सिद्धकर दिया कि कोई भी व्यक्ति हाथों के अभाव में कलाकार बनने से वंचित नहीं रह सकता। आवश्यकता है स्वयं में प्रतिभा और दृढ़ संकल्प की। चित्रकारी के बाद स्टेगमान ने मूर्तिकला का अभ्यास किया और मुख तथा पैर की सहायता से बड़े सुन्दर चित्र बनाने शुरू कर दिए। इंग्लैंड के इस कलाकार ने लाइसतेन्सतीन में मुख और पैर से मूर्तियाँ बनाने वालों का एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के रूप में संघ स्थापित किया। उस असहाय बालक का बचपन का स्वप्न धन और यश को पाकर आज पूर्ण रूप से साकार हो रहा है।
“हेडफील्ड” प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक के रूप में प्रख्यात है। जीवन को सुखा, समुन्नत, आनन्दमय, शान्ति एवं सन्तोष युक्त बनाने के लिए उन्होंने तीन अमूल्य सूत्र बताये हैं जो हर व्यक्ति के लिए हर परिस्थितियों में उपयोगी हैं। जिसे जीवन दर्शन के तीन सारभूत सिद्धान्त समझे जा सकते हैं। अपनी ‘साइकोलॉजी एण्ड मॉरल्स’ पुस्तक में उन्होंने तीन सूत्रों का उल्लेख इस प्रकार किया है- (1) अपने आपको जानो (2) अपने आपको स्वीकार करो (3) अपने आप में रहो।
अपने को जानने का अर्थ है- अपनी सत्ता से सुपरिचित होना। सामान्यतया परिचय का क्षेत्र भौतिक जगत शरीर, इन्द्रियाँ एवं ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं। प्रत्यक्ष शरीर दीखता है। इसलिए समझा जाता है कि शरीर ही सब कुछ है और अपनी सत्ता भी शरीर ही तक है। अस्तु शरीर को ही सब कुछ मानने एवं बोध का क्षेत्र इन्द्रियों तक ही सीमित रह जाने के कारण उनकी सीमित शक्ति का लाभ मिल पाता। अधिकाँश व्यक्तियों का जीवन क्रम इस मान्यता के ईद-गिर्द ही घूमता एवं लुढ़कता रहता है। फलतः खाने, कमाने एवं प्रजनन सीमा के सीमित दायरे से निकलते नहीं बनता। न कुछ विशिष्ट करते बनता और न ही विशिष्ट सोचते।
अपनी वास्तविक सामर्थ्य शरीर की क्षमता की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है। आत्म-सत्ता शक्ति की पुँज है। इन्द्रियों की क्षमताएँ तो उसकी कुछ तरंगें मात्र हैं। असली सामर्थ्य का केन्द्र तो आत्मा है, इस बोध के न होने से ही मनुष्य अपने को दीन-हीन, गया-गुजरा, असमर्थ, असहाय महसूस करता और किसी तरह जीवन के दिन पूरे करता है। इसके विपरीत अपनी भीतरी सामर्थ्य का बोध होते ही बाध्य जीवनक्रम एवं परिस्थितियों में भारी हेर-फेर हो जाता है। तब उसे अनुभव होता है कि आत्मा के भीतर प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है। आत्म-विश्वास के उदय होते ही मनुष्य बाध्य परिस्थितियों को उतना महत्व नहीं देता जितना कि मनुष्य के भीतर समाहित विशेषताओं को।
“हेडफील्ड” का कहना है कि “जीवन में अधिकाँश व्यक्ति इसलिए असफल रहते हैं कि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता अपनी शक्ति से अपरिचित होते हैं। अस्तु उससे लाभ उठाते भी नहीं बनता। फलतः कुछ विशेष नहीं कर पाते जबकि ऐतिहासिक सफलताएँ आत्म-विश्वासियों को मिलती हैं। असफलताओं का रोना रोने वाले निराशा के गर्त में डूबे व्यक्तियों के लिए हेडफील्ड के ये स्वर्णित वाक्य सारगर्भित एवं अति उपयोगी है। “निराशा एवं अवसाद से निकलकर अपने भीतर झाँको। देखो, तुम्हारे अन्दर शक्ति का स्त्रोत छिपा पड़ा है।”
हेडफील्ड का दूसरा सिद्धान्त है- “अपने आपको स्वीकार करो।” इसे आत्म-बोध का द्वितीय चरण समझा जा सकता है जो कर्मयोग की प्रेरणा देता है। अपने को जानता ही पर्याप्त नहीं है वरन् यह भी आवश्यक है कि मनुष्य जीवन का जो कुछ भी अनुदान मिला है उसे परमात्मा का वरदान मानकर सहर्ष स्वीकार किया जाय। अर्थात् प्राप्त अनुदानों का सदुपयोग किया जाय। अपने को दीनहीन मानने की तुलना में यह समझा जाय कि हम संसार के महत्वपूर्ण घटक हैं तथा हमारा जन्म पेट-प्रजनन जैसे निकृष्ट प्रयोजन के लिए नहीं- किसी महान उद्देश्य के लिए हुआ है। विश्ववसुधा अंचल फैलाए- हमारे सहयोग की अपेक्षा कर रही है।
यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को हर तरह की क्षमता प्राप्त हो। शरीर-बल, बुद्धि-बल, भाव-बल, सम्पत्ति में से किसी भी तरह की सामर्थ्य क्यों न हो, सभी अपने में महत्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं। यह सोचना निराधार है कि अमुक तरह की योग्यता होती अथवा साधन उपलब्ध होते तो महत्वपूर्ण कार्य किया जाता। जिस भी तरह की क्षमता-साधन प्राप्त हैं उनके ही सदुपयोग द्वारा बहुत कुछ किया जा सकता है। यह तथ्य हृदयंगम किया जाना चाहिए कि महान कार्य योग्यता प्रतिभा के बलबूते नहीं उच्चस्तरीय आदर्श एवं सिद्धान्त निष्ठा द्वारा सम्पादित किए जाते हैं। योग्यता प्रतिभा का योगदान तो होता है पर तभी जबकि वे उत्कृष्टता के पक्षधर बनें। अस्तु योग्यता संवर्धन के लिए प्रयत्न किए जाने चाहिए। पर इतने पर भी यदि किसी विशेष तरह की योग्यता अर्जित न हो सकी तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि वह प्राप्त होती तभी महत्वपूर्ण कार्य कर सकते थे। जो प्राप्त है उस क्षमता का ही नियोजन यदि ठीक प्रकार बन पड़े तो आत्म-निर्माण एवं लोक-कल्याण की दिशा में इतना कुछ किया जाता सकता है जितना कि विपुल साधनों के रहते भी नहीं किया जा सकता। अतएव आवश्यकता इस बात की है अनुपलब्ध साधनों अथवा योग्यताओं के कारण निराश न हुआ जाय। जो उपलब्ध है उसका अधिक से अधिक सदुपयोग किया जाय। महामानवों के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर यह पता चलता है कि अधिकाँशतः विपन्न परिस्थितियों में जन्मे एवं पले। योग्यता एवं प्रतिभा की दृष्टि से भी उनसे असंख्यों आगे थे। किन्तु सबको पीछे छोड़ते हुए वे आगे निकलकर महानता के उच्च शिखर पर जा पहुँचे। विचार करने पर इसका एक ही कारण नजर आता है कि उन्होंने अपने समय, श्रम एवं मनोयोग का पूरी तत्परता के साथ उपयोग किया। इसके विपरीत साधनों एवं योग्यताओं से सम्पन्न होते हुए भी उनका सदुपयोग न बन पाने के कारण कितने ही व्यक्ति सामान्य जीवनचर्या से आगे नहीं बढ़ पाते।
सुखी सन्तुष्ट आनन्द युक्त जीवन के लिए हेडफील्ड का तीसरा सन्देश है “अपने आप में सन्तुष्ट रहो”। प्रसन्नता, अप्रसन्नता का केन्द्र सामान्यतया बाह्य परिस्थितियों एवं व्यक्तियों को बनाया जाता है। परिस्थितियों तथा व्यक्तियों में परिवर्तन होते रहते हैं। उनके प्रभाव सुखप्रद अथवा दुःखप्रद दोनों ही तरह के हो सकते हैं। उनके भले-बुरे प्रभाव पड़ने पर भी स्वाभाविक है। दृष्टिकोण बहिर्मुखी होने से मनुष्य को असन्तोष ही हाथ लगता है। उपलब्धियाँ हासिल करने के लिए प्रयत्नशील रहा जाय, यह ठीक है। पर अनावश्यक ललक-लिप्सा तो हर दृष्टि से हानिकारक है, व्यक्ति एवं वस्तुओं के प्रति भी आसक्ति इस सीमा तक न जोड़ी जाय कि उनके न रहने अथवा प्रतिकूल हो जाने पर निराशा एवं असन्तोष की मनःस्थिति से गुजरना पड़े। अस्तु प्रसन्नता का केन्द्र बिन्दु अपनी अन्तरात्मा को माना ही श्रेयस्कर एवं सहायक है।
जीवन दर्शन के ये तीन सिद्धान्त अपने में महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ छिपाये हुए हैं। जिनका अवलम्बन लेकर किन्हीं भी परिस्थितियों में अपनी मनःस्थिति सुदृढ़ बनाये रखना सम्भव है। मन को शान्त, प्रसन्न चित्त रखने एवं विकास के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए ये सूत्र हर किसी के लिए उपयोगी एवं लाभप्रद सिद्ध हो सकते हैं।
परमहंस रामानुजाचार्य एक बार अपने कुछ ब्राह्मण शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे। स्नान करने के बाद उनकी दृष्टि दूर खड़े दो अछूतों पर पड़ी जो उनके दर्शन के लिए खड़े थे और श्रद्धापूर्वक उन्हें निहार रहे थे। रामानुजाचार्य ने तुरन्त उन्हें बुलाया और उनके कंधों का सहारा लेकर चल पड़े।
यह देखकर ब्राह्मण शिष्य बड़े क्रोधित हुए। वे बोले- ‘स्नान के बाद शूद्रों का स्पर्श! फिर स्नान से लाभ भी क्या हुआ?’
रामानुजाचार्य मुस्करा पड़े और बोले- ‘वत्स! स्नान से तो शरीर का शुद्धि हो गयी। पर मन पर अछूतों के प्रति घृणा का जो मैल जमा है वह भी तो दूर करना है। यह तुम्हारा भ्रम है कि शूद्र कुल में जन्म लेने से कोई शुद्र होता है। व्यक्ति अपने सत्कर्मों से महान् बनता है और दुष्कर्मों से शूद्र बनता है। अतएव इनके प्रति घृणा का भाव रखना पाप है।’
जीवन को यदि मोटी दृष्टि से देखा जाए तो वह एक ऐसा खिलवाड़ जान पड़ता जिससे ज्यों-त्यों करके काटा जाता है। निर्वाह की व्यवस्थाएँ जुटाने एवं प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेने में ही माथापच्ची करते-करते समय पूरा हो जाता है। चारों ओर अभाव एवं संकट ही नजर आते हैं। नीरस-निरर्थक जीवन जीते हुए- अपने दुर्भाग्य का रोना रोते हुये- व्यक्ति अपना समय समाप्त कर मौत के मुँह में चला जाता है। साधारण जीवन की यही एक छोटी-सी झाँकी है जो विपरीत परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी इसे गया-बीता बना देती है।
इससे ऊपर की स्थिति वह है जैसे असामान्य जीवन कहते हैं। सफल, समर्थ और समुन्नत स्तर को प्राप्त व्यक्ति साधारण मनुष्यों को सौभाग्यशाली प्रतीत होते हैं, वैसी स्थिति प्राप्त करने को उनका मन भी ललचाता है। पिछड़े और समुन्नत मनुष्य समूहों के मध्य यह अन्तर देखने से आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्य प्राणियों की स्थिति का इतना ऊँचा-नीचा होने का, इस असमानता का क्या कारण हो सकता है। सृष्टा का पक्षपात- अविवेकपूर्ण व्यवहार भी इसे नहीं कह सकते। यदि वहाँ व्यतिक्रम रहा होता तो यह अव्यवस्था प्रकृति के हर घटक में उच्छृंखलता के रूप में दृष्टिगोचर होती।
मानव-मानव के बीच पाये जाने वाले इस अन्तर का जब कारण ढूंढ़ते हैं तो एक यह तथ्य हाथ लगता है कि जीवन की उथली परतों तक ही जिनका वास्ता रहा है, उन्हें हमेशा छिलका ही हाथ लगा है। जिन्होंने गहराई में प्रवेश किया है, वे बहुमूल्य रत्न पा सकने में सफल हुए हैं। गहराई में उतरने को ही अध्यात्म की भाषा में ‘साधना’ कहते हैं। साधना किसकी? इसका उत्तर है उस देवता की जो मानव जीवन के रूप में हर व्यक्ति को सहज रूप में मिला है। इस कल्पवृक्ष की जो जितनी साधना कर लेता है, वह उतना ही समर्थ-सफल एवं ऊँचे स्तर का बनता चला जाता है। इसकी गरिमा न समझ पाना, ‘स्व’ का बोध न होने से परावलम्बी स्वभाव का होना ही वस्तुतः वह अभिशाप है जो कई व्यक्तियों को गई-बीती, नर-पशु जैसी, स्थिति में रहने को विवश कर देता है। सृष्टा ने बीज रूप में वैभव का भाण्डागार अपनी इसी मानवी काया में सँजोकर रखा है। भूल इतनी ही होती है कि न इसे खोजा जाता है, न काम में लाने का बात ही बनती है। जब इस भूल के परिमार्जन के प्रयास चल पड़ते हैं तो इसे ‘आत्म ज्ञान’ कहते हैं। यदि जागृति जब सक्रिय होकर महानता की दिशा में मोड़ लेने लगती है तो इसे आत्मोत्कर्ष की साधना कहा जाता है।
जीवन प्रत्यक्ष देवता है। उसकी साधना कर सकने वाले सुनिश्चित रूप से भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ उपलब्ध करते हैं। दूसरे भ्रमग्रस्त तो कल्पित देवी देवताओं के सामने नाक रगड़ते, मनुहार करते, दाँत निपोरते और अन्ततः निराश होकर खीजते अनास्था व्यक्ति करते देखे जाते हैं। विवेकवानों को वास्तविकता ही वरण करनी चाहिये भले ही वह कठोर या कष्टसाध्य ही क्यों न हो। नियति की व्यवस्था एक सुसंचालित सत्ता के हाथ में है। उसे किसी आतुर लालची की इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। प्रतिभा अर्जित किये बिना बहुमूल्य सफलताएँ यदि ऐसे ही पूजा-पाठ जैसे ‘शार्टकटों’ में मिल जाया करें तो फिर संसार में एक भी मनुष्य व्यक्तित्व उभारने- उत्कृष्टता अपनाने का कष्टसाध्य मार्ग अपनाने का साहस न करेगा। अपना आपा ही सब कुछ है। यदि इसे साथ लिया, इसकी उपासना कर ली तो सब कुछ पाया जा सकता है- इस तथ्य को जितनी गहराई से समझा जा सके- उत्तम है। जो इस सनातन सत्य को जितना जल्दी अंगीकार कर सके, उन्हें उतना ही बड़भागी माना जायेगा। मनुष्य जनम से जुड़े हुये अनेकानेक उपहारों से लाभान्वित हो सकने का अवसर मात्र ऐसे ही लोगों को मिलता रहा है। भविष्य में भी उन्हीं के लिये सुनिश्चित रहेगा।
देवता भीतर से उगते हैं। सामने तो वे खड़े भर दीखते हैं। मनःस्थिति अदृश्य है, आँतरिक है। परिस्थिति उसकी दृश्यमान परिणति है। विषाक्तता रक्त में रहती है। व्रण-अर्बुद के रूप वह फूटती भर है। पेड़ के पल्लव, फल-फूल ऊपर आसमान से नहीं टपकते, वे दृष्टि से ओझल रहने वाली जड़ों द्वारा भूमि से रस रूप में खींचे जाते हैं। विभूतियाँ अन्तर में से निकलती हैं। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि कुपात्रता के रहते किसी दैवी शक्ति ने मात्र पूजा पत्री से प्रसन्न होकर किसी के साथ पक्षपात किया हो और योग्यता से अधिक अनुपात में अनुग्रह उड़ेल दिया हो।
मनुष्य की संरचना कुछ ऐसी विशिष्ट है कि वह आत्म-सम्पदा के सहारे सजातीय परिस्थितियों एवं व्यक्तित्वों को अनायास ही अपने निकट जमा कर लेता है। पेड़ अपनी आकर्षण शक्ति से बादलों को खींचते हैं और बरसने के लिये विवश कर देते हैं। खदानें अपने सजातीय कणों को दूर-दूर तक आमंत्रण भेजती हैं और उन्हें अपने निकट खींच बुलाती हैं। यह चुम्बकत्व है जो जहाँ जितना अधिक होगा, सजातियों को उसी स्तर का आह्वान-निमन्त्रण मिलेगा। फलतः वे तेज गति से दौड़कर उससे आ मिलते हैं। खिलते फूल का चुम्बकत्व मधुमक्खियों, तितलियों और भौरों को आमंत्रण देता है। खिलते-उभार की ओर अग्रसर यौवन से अनेकों आंखें आकर्षित होती हैं। प्रतिभा अनेकों को प्रशंसक एवं अनुयायी बनाती है। यह चुम्बकत्व का चमत्कार है। ठीक इसी प्रकार साधक का चुम्बकत्व दैवी शक्तियों को अदृश्य रूप में आमंत्रित करता है और उन्हें अनुग्रह बरसाने के लिये सहमत विवश करता है।
जीव का छोटा अन्तराल लगभग उतना ही समर्थ है जितना ब्रह्म का विराट् विस्तार। जानकारों को पता होता है कि पेड़ तो मात्र कलेवर है, उसकी शोभा-समर्थता का स्त्रोत को अदृश्य जड़ों में ही पूर्णतया सन्निहित है। सौर मण्डल की समस्त प्रक्रिया सूक्ष्म रूप में नन्हें से परमाणु में यथावत् गतिशील रहती है। वृक्ष का विशालकाय ढाँचा छोटे से बीज में सुनिश्चित रूप में विद्यमान रहता है। ठीक इसी प्रकार मानवी काया के जर्रे-जर्रे में विराट् विश्वात्मा की झाँकी मिलती है। हर कण कितना सामर्थ्यवान है, असीम सम्भावनाओँ से भरपूर है- यह जानकर आश्चर्य होता है। पर विडम्बना यह है कि इसी आत्म गरिमा से- असंख्य व्यक्ति अनभिज्ञ होते हैं। इसी कारण गयी-बीती जिन्दगी जीते हुये इस अनमोल रत्न को कौड़ी के मोल तक में बेचने की तैयार रहते हैं।
इस स्थिति में मुक्ति पाकर- मानवी गरिमा का बोधकर- एवं इसकी समुचित सुनियोजित व्यवस्था बनाकर- चलने वाला व्यक्ति सामान्य से असामान्य की स्थिति में जा पहुँचता है। परावलम्बन से आत्मावलम्बन की ओर चिंतन को चलने लगना इसी प्रगति का चिन्ह है। हर काम में बाहर से सहारा, दैवी अनुकम्पा चाहने वाला व्यक्ति जब ‘स्व’ परायण होकर अपने ‘सुपर चेतन’ को जगाने का पुरुषार्थ आरम्भ करता है तो उसका महामानव बनने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है। सिद्धान्त सब मिलाकर एक ही है कि व्यक्ति स्वयं को जाने- अपनी प्रसुप्त क्षमता को जगाये एवं आत्म परिष्कार की- व्यक्तित्व निर्माण की- प्रक्रिया से अपनी जीवन साधना आरम्भ करे। हर दृष्टि से फलितार्थ इसी तथ्य के रूप में निकल कर आता है कि जिसने व्यक्तित्व के विकास की- अन्तः की सामर्थ्यों को जगाने- विकसित करने की- साधना कर ली, वही ‘सिद्ध पुरुष’ बन गया।
अभी मानवी मस्तिष्क की जितनी भी जानकारी वैज्ञानिकों को है- वह मात्र उसका 10 प्रतिशत भाग है। इसी सक्रिय भाग की विद्युत का मापन कर मस्तिष्क रूपी कम्प्यूटर को विलक्षण माना जा चुका है। प्रसुप्त जो है, वह कितना सामर्थ्यवान होगा, उसकी तो मात्र कल्पना ही की जा सकती है। गुणसूत्रों की बनावट व क्रिया-कलापों के विषय में जो भी कुछ जाना जा सका है, विलक्षण है। जीव-कोष- उसकी संरचना, प्रक्रियाएँ डी.एन.ए- आर.एन.ए. इनकी जब गौरव गाथा पढ़ते हैं तो आश्चर्यचकित रह जाते हैं। परमाणु के नाभिक की असीम सम्भावनाओं की तरह शरीर का हर जर्रा अपरिमित विशेषताओं से भरा हुआ है। इन्हीं काय-घटकों के माध्यम से व्यक्तियों ने ऐसे-ऐसे असम्भव काम कर दिखाये हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य से दांतों तले अंगुली दबानी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति जो प्रारंभ में घटिया स्तर के थे ‘स्व’ की गरिमा को बोध होने से- आगे कुछ से कुछ बन गये। यह दुस्साहस- असम्भव को कर दिखाने की ललक जहाँ से उठती है- वह मूल स्त्रोत अपना अन्तःकरण ही है। जहाँ से वे हिलोरें सतत् उठती रहती हैं जो जीवात्मा को उठने, जागने और ध्येय तक पहुँचने के लिये गतिशील होने को प्रेरित करती हैं। इसे ही अन्तरात्मा की पुकार, भगवान की आवाज, ‘कन्सायन्स’ या ‘जमीर’ नाम से अलंकृत किया जाता है। इसे सुनकर जो अपने पराक्रम को सही मोड़ दे देता है, वही महानता का पथ पा लेता है।
शरीर की दृष्टि से बली दुस्साहसियों की यहाँ चर्चा नहीं हो रही है। जीवट के धनी, मनःस्थिति से परिस्थिति को बदलने वाले, अपने अन्तः की साधना से अपना नया संसार बनाने वाले- ऐसे नर पुंगव इतिहास में अनेकों हुये हैं। महात्मा गाँधी शरीर की दृष्टि में तो क्षीण-दुर्बल थे। मात्र 16 पौंड की काया, पर प्रचण्ड मनोबल के धनी इस महामानव ने अपनी जीवन साधना से भारत का नव-निर्माण कर दिखाया। अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर एवं जार्ज वाशिंगटन भी ऐसे ही सामान्य व्यक्तियों में से थे। जीवनोद्देश्य को पहचान कर जब उन्होंने अपनी दिशा को मोड़ा तो ऐसे चले कि फिर पलटकर नहीं देखा। सारी प्रतिकूलताओं से अकेले ही मोर्चा लेने की यह सामर्थ्य उनके भीतर से ही तो उपजी।
वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, समाज सेवियों को जो यश-सम्मान मिलता है- वह उनकी प्रतिभा साधना मनोयोग पूर्वक श्रम से अर्जित उपलब्धियों के कारण। इसके लिये उन्हें दैवी मनुहार नहीं करनी पड़ी। अपने अन्दर उन्होंने स्वयं को टटोला- एक विपुल रत्नराशि का भण्डार पाया तथा स्वयं को उसके सदुपयोग की ओर नियोजित कर दिया। हंफ्री, डेवी, एलेग्जेंडर फ्लेमिंग, मैडम क्यूरी, एडीसन, आइन्स्टीन, कार्ल मार्क्स, सी.वी. रमन, जगदीश चन्द्र वसु, बाबा साहब आमरे, बाबा राघवदास जैसे कुछ उदाहरण ऐसे व्यक्तियों के हैं जिन्होंने वास्तविक अर्थों में जीवन देवता की साधना की।
इस प्रकार प्रसुप्त शक्तियों के जगने-उभरने-उफनने पर उसी तरह की प्रवाहधारा बहने लगती है जैसी कि यमुना, नर्मदा जैसी नदियाँ कुंडों से निकलकर भूतल पर प्रवाहित होती हैं। इतना होने पर ब्रह्म की दिव्य शक्तियाँ साधक पर अंतरिक्ष से घटाओं की तरह बरसती हैं। यह दोनों ही सौभाग्य हर किसी के लिये सहज सुलभ हैं। स्वयं हो इस योग्य बनाकर इस संसार में कुछ भी पाया जा सकता है। सामान्य स्थिति में तो सब कुछ अनगढ़-सा, बेढंगा-सा बना रहता है। जीवन देव की साधना अन्तरंग और बहिरंग दोनों पक्षों को स्वस्थ समुन्नत बनाती है। झाड़ियों के स्थान पर उद्यान लगाना- वन्य पशुओं को पालतू बनाना- अनगढ़ को सुगढ़ में बदल डालना- ही संस्कृति है। इसी का चमत्कार इस दृश्य जगत में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। अपने आपे को सद्गुणी की संपदा से लदा कल्पवृक्ष बना लेना- यही साधना का उद्देश्य है। यही वह तत्त्वदर्शन है जो एक नितान्त सामान्य जीवन जीने वाले को मात्र एक ही मोड़ मिलते ही असामान्य बना देता है।
आतताई शासक की यातनाएँ व विपरीत परिस्थितियाँ मनुष्य को शारीरिक त्रास दे सकती हैं, उसके भौतिक सुख सुविधाओं को प्रतिबन्धित कर सकती हैं, उसकी स्वतन्त्रता को छीन सकती हैं, पर उसके साहस व नैतिक बल को नष्ट नहीं कर सकतीं।
यदि मनुष्य में नैतिक बल व साहस बना रहे तो बड़ी से बड़ी आपदाओं में भी उसे अपना भविष्य सुनहरा ही दिखता है।
- डेल कारनेगी
मनुष्य का या सिद्ध पुरुषों का सबसे बड़ा चमत्कार है उनका ‘आत्मबल’। यही उन्हें अपनी उस प्रसुप्त सामर्थ्य को बोध कराता है जिसके कारण वे कठिन से कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आदर्शों तथा दृढ़ सिद्धान्तों पर टिके रहते हैं। यही चमत्कारी क्षमता सामान्य से राजकुमार सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध, एक गड़रिये के बेटे को ईसा, साधारण से साधु को समर्थ रामदास, वासना में लिप्त कामुक व्यक्ति को तुलसीदास, एक पुजारी को रामकृष्ण परमहंस, एक डाकू को सन्त बाल्मीकि एवं एक अध्यापक को महायोगी अरविन्द बनाती है। सामान्य परिस्थितियों से ऊपर उठकर महान मानवों- देवपुरुषों की पंक्ति में जा बैठना क्या कम चमत्कार है। लोगों ने तो बाजीगरी के करतबों को ही चमत्कार मान रखा है। वस्तुतः जिन्होंने आध्यात्मिक सम्पदा कमाई है, उन्हें इस तरह का चमत्कार प्रदर्शन करने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। सम्पन्न व्यक्ति अपने धन को सुरक्षित रखते हैं- उसे हर किसी को बताते नहीं फिरते। यह तो दिखाने वाले का ओछापन और उत्सुक बाल-बुद्धि वालों का बचकानापन है जो इस भौंड़े प्रदर्शन को ही मुख्य मान बैठते हैं। जीवन की गरिमा को जिन्होंने समझा है उन्होंने दत्तचित्त हो उसकी साधना की है व प्रत्युत्तर में अनगिनत बहुमूल्य मणिमुक्तक पाये हैं। इससे वे स्वयं लाभान्वित हुये व अनेकों को लाभ पहुँचाया है।
जीवन देवता की आराधना ही वस्तुतः साधना है। इस तथ्य की अपनाने वाला ही तत्त्वदर्शी- यथार्थवादी है। दूसरे तो भटकने-भटकाने वाले भर हैं। ‘सत्य’ को ही नारायण कहा गया है। सत्य की प्रथम किरण का दर्शन इसी रूप में होता है कि सफलता, सम्पदा एवं प्रसन्नता के आधार जहाँ-तहाँ ढूंढ़ने के लिये कस्तूरी हिरन जैसी थकाने वाली भ्रान्ति भगदड़ बन्द की जाय। मृग-मरीचिका के पीछे न दौड़ा जाय। कुछ महत्वपूर्ण प्राप्त करना यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो इतना और भी मान लेना चाहिये कि इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये जीवन देवता की आराधना के अतिरिक्त और कहीं आश्रय नहीं मिल सकेगा। अनुग्रह आपत्तिकालीन उदार अनुदान भर है। वह नियम नहीं बन सकता। न ही सदा-सर्वदा कार्यान्वित ही हो सकता है। मूल्य चुकाना और अभीष्ट को खरीदना यही व्यावहारिकता है। इसी का प्रचलन अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा।
सामान्य से असामान्य बनना अत्यन्त सरल होते हुये भी अधिकांश से नहीं बन पड़ता। इसका मूल कारण एक ही है- ‘आत्म विस्मृति’। हनुमान को अपनी सामर्थ्य का बोध रहा होता तो जाम्बवन्त के उपदेश की उन्हें आवश्यकता नहीं पड़ती। राम का आदेश पाते ही वे चल पड़ते। जैसे ही सागर किनारे साधारण से बानर हनुमान को अपनी आत्मा गरिमा का बोध हुआ- वे एक छलाँग में असम्भव पुरुषार्थ कर सकने में सफल हो गये। अंगारों पर रखी राख अग्नि की तीव्रता को छुपाये रहती है। जैसे ही उसे हटाया जाता है- वह अपने मूलरूप में देदीप्यमान-तापयुक्त हो उठती है। सूर्य पर बादल छाये हों तो कुछ देर के लिये वातावरण में ठण्डक छा जाती है। बादलों के छँटते ही सूर्य का प्रकाश व गर्मी उस क्षेत्र के हर भाग तक पहुँचने लगता है। अपना आपा भी ऐसा ही प्रकाशवान, जाज्वल्यमान है। मात्र कषाय-कल्मषों ने, विस्मृति की माया ने, जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों ने अपनी इस आभा को ढ़क रखा है। यदि इस मायाजाल का आवरण हटाया जा सके तो असामान्य स्थिति में पहुँच सकना सम्भव है।
इस स्थिति को और भी स्पष्ट समझना हो तो ‘सामान्य’ प्रवाह में बहने वालों को और ‘असामान्य’ उत्कृष्टता के पक्षधर, अपने मनुष्य जन्म की गरिमा को समझने वाले- स्वतन्त्र एवं साहसिक निर्धारण करने वालों को कहा जा सकता है। जिस आत्मज्ञान की शास्त्रकारों ने भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये कहा है- “आत्मा वा अरे ज्ञातव्यः और जिसके फलस्वरूप लौकिक और पारलौकिक सम्पदाओं के अजस्र वरदान बरसने का विश्वास दिलाया है, वह वस्तुतः जीवन संपदा का महत्व, मूल्य, स्वरूप एवं सदुपयोग समझ सकना भर है। ब्रह्मविद्या के गम्भीर तत्वज्ञान में आत्मदर्शन को ईश्वर प्राप्ति के समतुल्य बताया गया है। इस रहस्यवाद को यदि सरल शब्दों में समझना हो तो बोलचाल की भाषा में इतना कह देने से भी काम चल सकता है कि “अपनी अर्थात् जीवन की गरिमा को समझा जाय और उस कल्पवृक्ष की निष्ठापूर्वक साधना की जाय।” इतना समझा, स्वीकार जा सके तो समझना चाहिये कि आत्म-विज्ञान की वर्णमाला याद हो गयी। अन्यथा बिना अक्षर ज्ञान सीखे स्नातक बनने का दिवास्वप्न देखने वालों को रोक कौन सकता है?
जीवन साधन में वस्तुतः मानवी गरिमा के प्रति श्रद्धान्वित होने और उसे अपनाने के लिये संकल्पवान निष्ठा परिपक्व करने के दो निर्धारण करने पड़ते हैं। इन दो तथ्यों पर जितनी गंभीरतापूर्वक विचार किया जायेगा, उतना ही यह रहस्य प्रकट होता जायेगा कि प्रगति और दुर्गति का कारण क्या है? अन्तरंग की निकृष्टता को लोगों की आंखों से छिपा कर भी रखा जा सकता है, पर उस सड़ांध से वह लपकन तो उठती ही रहेगी जो मवाद भरे फोड़े के भीतर से उठती है, और खाने-सोने से लेकर सामाजिक परिकर और परिवार हो हैरान करती है। कुसंस्कारिता की गहरी जड़ें अवांछनीय आकाँक्षाओं और अनैतिक मान्यताओं में होती हैं। इसके जब अंकुर फूटते हैं तो आलस्य से लेकर दुर्व्यसनों तक के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं और भी परिपक्व होते हैं तो भ्रष्टता ओर दुष्टता के रूप में अपनी उद्दण्डता का परिचय देते हैं। इन्हें रोका उखाड़ा कैसे जाय? कैसे आत्मा पर छाये इन मलीनता के आवरणों से मुक्ति पायी जाय? इसके लिये किसी वरदान अनुदान के ऊपर अवलम्बित नहीं रहना चाहिये। वरन् उस आधार को अपनाना चाहिये, जिसके बन जाने पर अनुदान बिना याचना के ही बरसने लगते हैं। नदियाँ गहरी होती हैं, फलतः उनमें पहाड़ों से लेकर खेतों तक का पानी अपने आप दौड़ते-दौड़ते पहुँचता है। सही रास्ता यही है- सही नीति यही है।
इसके लिये व्यवहारतः क्या करना होगा? इसका उत्तर एक ही है। अपनी संचित कुसंस्कारिता से पीछा छुड़ाया जाय और लोकप्रवाह में बहने से इन्कार कर दिया जाय। संकल्प एक ही रहे कि प्रवाह में बहना नहीं है, मात्र औचित्य ही स्वीकारना है। अनौचित्य की प्रेरणा भले ही स्वजन सम्बन्धियों द्वारा दी जा रही हो अथवा समूचे वातावरण से वैसा प्रोत्साहन मिल रहा हो। अपना निर्णय स्वतन्त्र एवं आदर्शवादी होना चाहिये। अपने से- अपनी आदतों से- अपने को प्रभावित करने वाले व्यक्तियों से- वातावरण से लड़ पड़ने का साहस उभरे तो कृष्ण का अर्जुन बनने का अवसर मिले।
कर्त्तव्य कहता है कि पुराने ढर्रे तो तोड़ो, उससे लड़ो और अवाँछनीय को हटाओ। पर अर्जुन को मोह उस पुराने, चिर अभ्यस्त, चिर परिचित ढर्रे को छोड़ने-तोड़ने का साहस नहीं कर पाता और सोचता है जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दिया जाय। कर्तव्यपालन यदि इतना ही झंझटों से भरा है- आत्म जागरण का यदि इतना महंगा मूल्य चुकाना पड़ता है तो उसे छोड़ ही क्यों न दिया जाय। ऐसे महाभारत में जब मोहग्रस्त अर्जुन गांडीव नीचे रखकर बैठ जाता है, तब भगवान अनेकों तर्क-तथ्यों के माध्यम से उसे समझाते हैं। वे कहते है कि “चिर परिचित गतिविधियाँ ढर्रे में रहने के कारण स्वजनों-सम्बन्धियों की तरह अति निकटवर्ती, प्रिय बन गई है। इन्हें हटाया जाना अत्यावश्यक है। इन्हीं ने आत्म-गरिमा से अर्जुन रूपी मनुष्य को विस्मृत बना दिया है। साधना समर में अपने ही अज्ञान असुर से ही तो लड़ना पड़ता है। कर्त्तव्य, धर्म व संघर्ष साथ-साथ जुड़े हैं। अतएव हे अर्जुन! चिरपरिचितों का- चिर सहचरों का मोह छोड़ और वह कर जिससे श्रेयस् की साधना सम्पन्न होती है।”
आत्म-गरिमा को भूले हर व्यक्ति को अपना बल संचय की साधना करते समय अर्जुन की तरह ही अग्नि परीक्षा में से गुजरना होता है। विवेक भूमिका में जागृत आत्मा यदि अपने कषाय-कल्मषों को ही न मिटा सकी तो उसके जागरण का आखिर प्रयोजन ही क्या रहा? जिसके पास आत्म भूमिका में जागृत हुआ जीवन युक्त नर-नारायण है। उसके लिये संसार में कुछ भी असम्भव नहीं है। अध्यात्म के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने व ऋद्धि-सिद्धियाँ हस्तगत करने के लिये आत्म-जागृति ही प्रथम शर्त है।
साधना विधान में दो प्रकार की समाधियों का वर्णन आता है। मूर्च्छित एवं जागृत। प्रथम तो मनोवैज्ञानिक प्रयोग है व किसी-किसी के लिये ही सम्भव है। पर जागृत समाधि सर्वसुलभ है। इस समाधि का अर्थ है- बौद्धिक और भावनात्मक प्रवाहों का सन्तुलित ओर विवेकयुक्त बना लेना। सुसंस्कृत चिन्तन पद्धति जब हाथ लग जाती है तो समस्याओं का स्वरूप और समाधान उपलब्ध हो जाता है। ऐसी स्थिति में जो गहरी आत्म-तुष्टि और अनवरत प्रफुल्लता बनी रहती है, उसी का नाम समाधि है। आत्म स्वरूप का, आत्मिक गरिमा का जब अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आत्म साक्षात्कार की, ईश्वरीय अनुदान प्राप्ति की स्थिति आगयी।
यह तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने आपको ईश्वर का राजकुमार मानकर तद्नुरूप अपने क्रिया-कलापों का निर्धारण करे। हर प्रतिष्ठित कलाकार-मूर्तिकार अपनी कला-कृतियों में गरिमा का ध्यान रखता है। यदि वह भौंड़ी या भद्दी होती है, तो उस कृति का ही तिरस्कार, उपहास नहीं होता वरन् उसके सृजेता-कलाकार का भी गौरव गिरता है। मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है। इसे बनाने-तराशने में उसने अपनी कलाकारिता को चरम सीमा पर पहुंचा दिया है। शरीर के एक-एक कलपुर्जे की रचना और कार्यशैली पर विचार करते हैं तो विदित होता है कि सारे वैज्ञानिक एक साथ बैठ जायें तो भी किसी एक अकेले अवयव की सही प्रतिकृति नहीं बना सकते। मानवी बुद्धि को एक क्यारी में उगे पुष्पों की फसल कह सकते हैं। शारीरिक और बौद्धिक क्षमता के अतिरिक्त एक भावना क्षेत्र भी इस ईश्वरीय कृति की एक विशेषता है जो मानवी अन्तःकरण में उत्कृष्टता के सारतत्त्व के रूप में विद्यमान है। ईश्वर का अरमान तो पूरा हो गया। अब मनुष्य का कर्त्तव्य आरम्भ होता है कि उस कर्तृत्व को कलुषित और कलंकित न करे। सृष्टा की गरिमा को गिरने न दें और उन अरमानों को चोट न पहुँचाये जिन्हें लेकर सृष्टा ने इतनी तीव्र आकाँक्षा की और सृजन का कष्ट उठाया।
मानवी सम्भावनाएँ असीम हैं। मानव गया-गुजरा उस स्थिति में है- जब वह अपनी सामर्थ्य को पहचानने और उसका उपयोग करने में उपेक्षा बरते। वह महान और असाधारण उस स्थिति में है जब वह अपनी गरिमा का समझे और असीम क्षमता पर विश्वास रखे। जितना असीम यह परमात्मा है, उतना ही महान उसका पुत्र है। महर्षि व्यास महाभारत में कहते हैं- ‘‘मैं एक रहस्य की बात बताता हूँ कि इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ और नहीं। इसी तथ्य को वैज्ञानिक मनीषी सर जूलियन हक्सले ने अपने शब्दों में कहा- ‘‘मानव में विकास की अनन्त सम्भावनाएँ हैं। आत्मबोध से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया उसे परमसत्ता के समीप ले जाती है। यही आध्यात्मिक विकासवाद है।”
नैपोलियन के सैनिक शत्रु के घातक प्रहारों के सामने टिक नहीं पा रहे थे। उपसेनापति ने विचार किया कि पीछे हटा जाय अन्यथा पराजय का मुँह देखना पड़ेगा। अपने प्रस्ताव की ओर नैपोलियन का ध्यान आकृष्ट करने के लिये उसने उनके सामने कई किस्म की सिगरेटें प्रस्तुत कीं। युद्धस्थल की ओर दृष्टि जमाये ही उन्होंने सर्वश्रेष्ठ सिगरेट उठा ली। उसने उप-सेनापति की ओर देखा तक नहीं। उपसेनापति उत्साहित होकर बिना कुछ कहे, वहाँ से चल दिये। उसने सोचा कि जो ऐसी विषम परिस्थिति में भी इतनी स्थिरता इतना धैर्य रख सकता है कि घटिया और बढ़िया के विवेक को नहीं भूलता, ऐसे व्यक्ति की विजय अवश्यंभावी है। सचमुच अन्त में जीत नैपोलियन की ही हुई।
हवा में उठने वाले साइक्लोन में प्रचण्ड सामर्थ्य होती है। चपेट में आयी भारी वस्तुएँ भी तिनके के समान फेंक दी जाती हैं। तूफान को रोक सकने एवं अप्रभावित बने रहने से किसी प्रकार का गतिरोध सफल नहीं हो पाता। नदियों में पड़ने वाले भंवर नावों को उछाल देते हैं। कितनी बार तो भँवर में फँसने के उपरान्त उनका नामो-निशान नहीं मिलता। चक्र में, गोलाई में, एक निश्चित गति में घूमने पर प्रचण्ड ऊर्जा का उत्पादन होता है। जिसकी सीमा क्षेत्र में आकर सामान्य वस्तुओं की भी सामर्थ्य बढ़ जाती है। इस सिद्धान्त का उपयोग कर विज्ञान ने एक से बढ़कर एक शक्तिशाली यंत्रों का निर्माण किया है। ट्रान्सफारमर इसी सिद्धान्त पर काम करता है। डी.सी. करेंट का उत्पादन इसी प्रकार होता है। परमाणु की प्रचण्ड शक्ति का कारण है- केन्द्र के चारों ओर एक निश्चित गति में इलेक्ट्रान का घूमना।
मानव शरीर में भी ऐसे सात शक्ति स्त्रोत हैं जिन योग ग्रंथों में चक्र कहा गया है। शरीर के ये छोटे-मोटे पावर स्टेशन हैं। शक्ति उत्पादन केन्द्र हैं। शास्त्रों में सात लोकों का वर्णन आता है। भूः, भुवः, स्वः, महः तपः जनः और सत्यम्। सातों लोकों को एक से बढ़कर अद्भुत एवं सामर्थ्यवान चित्रित किया गया है। सप्त लोकों में देवताओं के निवास करने का उल्लेख भी मिलता है। इन अलंकृत वर्णनों में शरीरस्थ सात केन्द्रों का ही चित्रण किया गया है। सप्त लोक शरीर में स्थित सात चक्र ही हैं। गायत्री की उच्चस्तरीय साधनाओं कुण्डलिनी जागरण जैसी प्रक्रियाओं में इन चक्रों का वेधन-छेदन किया जाता है। सामान्यतया ये सुषुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। उनकी असीम सामर्थ्य का लाभ मनुष्य को नहीं मिल पाता। अशक्त एवं अभावग्रस्त बने रहने का यही कारण है। घर में सम्पत्ति गढ़ी पड़ी है। उसकी जानकारी न हो तो मनुष्य उस सम्पदा के उपयोग से वंचित रहता है। मानवी शरीर में भी ऐसे ही सात चेतन स्त्रोत हैं जो प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न हैं।
शरीर को भू-लोक समझा जा सकता है। जो सात दीपों में बँटा हुआ है। पृथ्वी के संतुलन का केन्द्र बिन्दु उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव है। मानवी सत्ता में भी दो ध्रुव हैं। मस्तिष्क स्थित सहस्रार चक्र को उत्तरी तथा लिंग एवं गुदा के मध्य अवस्थित मूलाधार को दक्षिणी ध्रुव समझा जा सकता है। कुण्डलिनी साधना से शक्ति जागरण की प्रक्रिया जिस मार्ग से सम्पन्न होती है उसे सुषुम्ना कहते हैं। चक्र इसी पर अवस्थित होते हैं। आत्मोत्कर्ष की प्रक्रिया इसी मार्ग से सम्पन्न होती है। शास्त्रों में इसीलिए इसे देवयान मार्ग कहा गया है।
जीव मूलाधार में मूर्छित पड़ा रहता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह के बन्धनों में जकड़े जीव को अपनी गरिमा का बोध नहीं रहता। वासना एवं तृष्णा एवं अहंता के कारण चेतना का उन्नयन सम्भव नहीं हो पाता। कुण्डलिनी साधना के माध्यम से जीव की प्रसुप्ति को जागृति में बदला जाता है। उन्नयन, उत्कर्ष का अर्थ है- जीव को मूर्छा-वासना, तृष्णा एवं अहंता के अन्धकार से निकालकर स्वर्ग एवं मुक्ति के पथ पर बढ़ाना। देवयान मार्ग सुषुम्ना से उत्कर्ष का लक्ष्य पूरा किया जाता है। कुण्डलिनी जागरण का लक्ष्य है अधोगति में पड़ी जीवसत्ता को ऊर्ध्वगति प्रदान करना।
चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा गया है कि उनके अन्तराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं। उन्हें परमात्मा ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता-पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले। कुपात्र-आरोग्य, सन्तान को पिता अपनी सम्पत्ति नहीं हस्तान्तरित करता। करे भी तो उसका दुरुपयोग ही होगा। सन्तान दुर्व्यसनों में ही उस सम्पदा का दुरुपयोग करेगी। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु छिपाकर रखी गई है। बहुमूल्य धातुओं की खदानें पृथ्वी पर यों ही बिखरी नहीं होतीं, जमीन की गहराई में दबी रहती हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी होती है। मोती प्राप्त करने के लिए समुद्र की गहराई में उतरना होता है। बहुमूल्य वस्तुओं के साथ अवरोध इसलिए जुड़ा है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों का वैभव मिल सके। मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया जिनकी विशेष आवश्यकता भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए रहती है।
चक्र जागरण, चक्र वेधन से विकृतियों का निराकरण एवं सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन होता है। चक्रों की स्थिति एवं जागरण की उपलब्धि की विस्तृत व्याख्या योगग्रंथों में की गई है। शारदा तिलक ग्रन्थ के टीकाकार ने ‘आत्म-विवेक’ नामक ग्रन्थ का उल्लेख किया है जिसमें चक्रों की स्थिति एवं उनके जागरण से मिलने वाले अनुदानों का विस्तृत वर्णन है। इस पुस्तक में उल्लेख निम्न प्रकार हैं।
(1) गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ियों वाला आधार चक्र मूलाधार चक्र है। वहाँ वीरता और आनन्द भाव का निवास है। (2) स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है उसकी छः पंखुड़ियां हैं। इसके जागृत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गुणों का नाश होता है। (3) नाभि में दश दल वाला मणिपूर चक्र है। इसके प्रसुप्त करने पर ईर्ष्या, तृष्णा, भय, घृणा, लोभ, मोह आदि विकार मन में जमे रहते हैं। (4) हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बारह पंखुड़ियों वाला है। इसकी प्रसुप्ति में लिप्सा, कपट, चिन्ता, अविवेक, दंभ, अहंकार जैसे मनोविकारों का जन्म होता है। अनाहत के जागरण पर इन विकृतियों का निराकरण हो जाता है। (5) विशुद्ध चक्र कण्ठ में अवस्थिति होता है। सरस्वती का निवास स्थान यही है। यह सोलह पंखुड़ियों वाला है। सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ यहाँ विद्यमान हैं। (6) भूमध्य में आज्ञाचक्र है। ॐ, हूँ, फर, विषद, स्वधा, स्वाहा, अमृत, सप्त स्वर आदि का यही निवास है। आज्ञाचक्र की जागृति से यह समस्त शक्तियाँ जग जाती हैं।
चक्रों के जागरण का प्रभाव मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव पर असामान्य रूप से पड़ता है। स्वाधिष्ठान की जागृति से साधक अपने अन्दर नवशक्ति संचार का अनुभव करता है। उत्साह एवं स्फूर्ति शरीर में सदा बनी रहती है। मणिपूर चक्र के जागरण से साहस एवं उत्साह बढ़ता है। मनुष्य संकल्पवान एवं पराक्रमी बनता है। मनोविकार घटने लगते तथा सत्प्रयोजनों के परमार्थ में रस और आनन्द आने लगता है। अनाहत चक्र की महिमा ईसाई घरों में भी विशेष रूप से गाई गयी है। ईसाई धर्म के योगी हृदय स्थान पर गुलाब के फूल की भावना करते और उसे प्रभु ईसा के प्रतीक ‘आइचिन’ कनक कमल मानते हैं। भारतीय योग ग्रंथों में उसे भाव संस्थान कहा गया है। कलात्मक उमंगें यहीं से उठती हैं। संवेदनाओं का मर्मस्थल यही है। विवेकशीलता का प्रादुर्भाव अनाहत चक्र से होता है। विशुद्ध चक्र की विशेषता है- बहिरंग स्वच्छता एवं अन्तरंग की पवित्रता। अचेतन की विशिष्ट क्षमताएँ प्रसुप्त रूप में विद्यमान रहती हैं। इसे अतीन्द्रिय सामर्थ्य का आधार माना जा सकता है। विशुद्ध चक्र चित्त को प्रभावित करता है। नादयोग से दिव्य श्रवण जैसी परोक्षानुभूतियाँ इसी माध्यम से होती हैं। सहस्रार को ब्रह्माण्डीय चेतना का रिसिविंग सेन्टर माना जा सकता है। यह शक्ति संचय में एरियल की भूमिका सम्पन्न करता है। मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार को ब्रह्मलोक कहा गया है।
सभी चक्र सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर स्थित हैं। सविता के प्राणानुसन्धान प्रक्रिया द्वारा इन चक्रों को जगाया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण की प्राण प्रक्रिया द्वारा उनका बेधन किया जाता है। उच्चस्तरीय साधना का यह अवलम्बन लिया जा सके- चक्रों को जगाया जा सके तो वायु में उठने वाले साइक्लोन और नदियों में पड़ने वाले भँवर से भी अधिक सामर्थ्यवान सिद्ध हो सकते हैं। जागृत सात चक्र सात देवों के रूप में मनुष्य को इतना अनुदान दे सकने में सक्षम हैं जिनको प्राप्तकर असामान्य शक्ति सम्पन्न बना जा सकता है। मनुष्य भौतिक एवं आत्मिक दोनों ही दृष्टियों से सम्पन्न बन जाता है।
भ्रान्तियाँ हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होती हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र की क्यों न हों? मान्यताओं एवं विश्वासों के रूप में कितनी ही बातें ऐसी हैं जो मनुष्य के चिन्तन एवं स्वभाव का अंग बनी हुई हैं। तथ्यों के आधार पर समीक्षा करने पर जिनकी न तो उपयोगिता जान पड़ती है और न ही महत्ता। पर लम्बे समय से मन-मस्तिष्क में उपयोगी होने जैसी मान्यता के रूप में बने रहने के कारण वे स्वभाव का अनिवार्य अंग-सा बन गयी हैं, जिन्हें न निकालते बनता है और न ही छोड़ते।
भ्रान्तियों में एक है-खानपान सम्बन्धी, जिसका मनुष्य के स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि मनुष्य शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए नमक आवश्यक है। पोषक आहारों के समान ही इसे भी भोजन का अनिवार्य एवं उपयोगी तत्व माना गया। जबकि तथ्य इसके विपरीत है। नवीन वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि ‘नमक’ शरीर के लिए अनुपयोगी ही नहीं हानिकारक भी है। इसे साधारण धीमे विष की संज्ञा दी गई है तथा स्वास्थ्य संवर्धन में एक अवरोधक तत्व माना गया है।
पिछले दिनों मोनेक्को के मांटे कार्लो नामक स्थान में चिकित्सा विशेषज्ञों की एक गोष्ठी हुई। विषय था मनुष्य के गिरते हुए स्वास्थ्य का स्थायी उपचार ढूँढ़ना तथा उन कारणों का पता लगाना जो आरोग्य के लिए घातक हैं। गोष्ठी के उपरान्त विशेषज्ञों ने जो निष्कर्ष निकाले वे महत्वपूर्ण हैं। सबने एक स्वर से स्वीकार किया कि कृत्रिम नमक हर दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। खाद्य-पदार्थों में प्राकृतिक रूप से मौजूद नमक ही मनुष्य शरीर के लिए अनुकूल है। शरीर को जितने नमक की आवश्यकता है उतने की व्यवस्था प्रकृति ने खाद्य-पदार्थों, साग-सब्जियों एवं फलों के रूप में प्रचुर मात्रा में कर दी है। जिह्वा के स्वाद की आपूर्ति के अतिरिक्त ऐसा कोई औचित्य नजर नहीं आता जिसके लिए अलग से कृत्रिम नमक ग्रहण किया जाय। गोष्ठी की प्रकाशित रिपोर्ट में यह कहा गया कि नमक का शरीर के रक्त चाप से गहरा सम्बन्ध है। निम्न और उच्च रक्तचाप जैसे रोगों को बढ़ावा देने में नमक की असाधारण भूमिका है। प्राकृतिक खाद्य स्त्रोतों में भी उन वस्तुओं को अधिक पौष्टिक शरीर के लिए लाभ कर माना गया जिनमें नमक की मात्रा सबसे कम हो। इस दृष्टि से माँ के दूध को वैज्ञानिकों ने सर्वोच्च ठहराया। शाक-सब्जियों और माँस-मछलियों में किसमें नमक की मात्रा अधिक है, इस आधार पर माँस, मछली-अण्डे में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण इन्हें शरीर के लिए अनुपयुक्त एवं हानिकारक बताया गया है।
संक्रामक रोगों की तरह रक्तचाप की बीमारी भी बढ़ती जा रही है। विकसित और सम्पन्न राष्ट्रों में तो सर्वाधिक संख्या रक्तचाप से पीड़ित रोगियों की है। चिकित्सा विज्ञान की शोधों ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि कृत्रिम नमक रक्तचाप रोगों का एक प्रधान कारण है। सर्वविदित है कि उच्च रक्तचाप के चिकित्सक भोजन में रोगी को नमक का निषेध कर देते हैं। निदान में इससे विशेष योगदान मिलता है। प्रकारान्तर से यह इस बात का संकेत देता है कि यदि आरम्भ से ही कृत्रिम नमक को ग्रहण करने से बचा जाये तो भविष्य में रक्तचाप जैसे रोग की सम्भावना नहीं होगी।
पिछले, जंगली एवं आदिवासी क्षेत्रों के पर्यवेक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि उनमें कितनी ही जातियाँ ऐसी हैं जो आधुनिक सभ्यता से सर्वथा दूर हैं। उनके खान-पान में नमक का बिल्कुल ही स्थान नहीं है। फलतः वे स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सबसे आगे हैं। पख्तूनों व अफगानी कबाइलीयों का रहन-सहन अब भी आदिम युग जैसा है। वे प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त नमक का सेवन नहीं करते।
भोजन सम्बन्धी दूसरी भ्रान्ति है- खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता के सम्बन्ध में। मान्यता यह है कि जिन खाद्यान्नों में प्रोटीन की- वसा की मात्रा जितनी अधिक हो-उसका ही अधिकाधिक सेवन करने से शरीर की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संवर्धन का उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। नवीन तथ्य यह उभर कर सामने आया है कि खाद्यान्नों का स्वास्थ्य संवर्धन का गुण इस बात पर नहीं आधारित है कि उनमें ‘कैलोरी’ की-प्रोटीन की कितनी मात्रा विद्यमान है वरन् इस पर अवलंबित है कि वह कितना शीघ्र पच जाता है और वह जीव प्रकृति के कितना अनुकूल है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद दिल्ली में डा. आर.एन. चक्रवर्ती की देख-रेख में बन्दरों पर प्रयोग किया गया। विषय था- हृदय रोगों एवं रक्तचाप के कारणों का अध्ययन करना। प्रयोग की अवधि में बन्दरों को अधिक प्रोटीन एवं वसायुक्त भोजन दिया गया जो उनके पाचन संस्थान की प्रकृति के प्रतिकूल था। फलतः कुछ दिनों बाद बन्दरों की ‘महाधमनी’ तथा ‘कोरोनरी धमनी’ में वसा का जमाव होने लगा- तथा वे हृदय रोग से पीड़ित हो गये। जब पुनः उन्हें उनकी प्रकृति के अनुकूल कम कैलोरी युक्त भोजन दिया गया तो हृदय की धमनियों को ठीक होने में सहयोग मिला। डा. चक्रवर्ती के ही निर्देशन में चण्डीगढ़ में भी इसी प्रकार के प्रयोग हुए। 124 बन्दरों की परीक्षा की गई। अनुसंधान दल ने कुछ बन्दरों को एक वर्ष तक अधिक वसायुक्त भोजन पर रखा। फलस्वरूप उन्हें दिल के दौरे पड़ने लगे। कई में उक्त रक्तचाप का अवलोकन किया गया। कितने बन्दर ‘थ्रोम्बोसिस’ (रक्त का थक्का जम जाना) रोग से ग्रसित पाये गये।
माँसाहार में दलील यह दी जाती है कि उसमें प्रोटीन की- ‘‘कैलोरी” की मात्रा अधिक होती है। उपरोक्त प्रयोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रोटीन अथवा अधिक कैलोरीयुक्त भोजन का स्वास्थ्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। शरीर की प्रकृति के अनुकूल, खाद्यान्न ही स्वास्थ्य सम्वर्धन में सहायक सिद्ध होते हैं। मनुष्य का पाचन संस्थान माँसाहार के सर्वथा प्रतिकूल है। माँसाहारी जीवों के दांतों एवं आँतों की बनावट ही अलग ढंग से होती है जिनकी मनुष्य शरीर एवं प्रकृति क साथ थोड़ी भी समता नहीं है। माँस मछली अण्डे में विद्यमान गरिष्ठ प्रोटीन, वसा की मात्रा को पचा सकने में मानवी पाचन संस्थान असमर्थ है। बढ़ते हुए हृदय रोगों का एक और कारण है- मनुष्य का अपने सहज स्वाभाविक सुपाच्य शाकाहार प्रवृत्ति से अलग हटकर माँसाहार का सेवन करना।
प्रकृति के सान्निध्य में रहने वाले नन्हें जीव-जन्तु उछलते-कूदते एवं मचलते रहते हैं। सदा स्वस्थ एवं निरोग बने रहते हैं। वे यदा-कदा ही बीमार पड़ते हैं। पड़ते भी हैं तो संयम आदि द्वारा स्वतः ही अपने को ठीक कर लेते हैं। उन्हें हृदय रोग शायद ही कभी होता हो। नमक जिसे मनुष्य आवश्यक मानता है, वे अलग से कभी नहीं लेते। प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से विद्यमान नमक ही उनके स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखता है। एक मनुष्य ही है जो स्वाद के नाम पर तरह-तरह के बहाने बनाता है। कभी स्वास्थ्य रक्षा का आवश्यक तत्व मानकर नमक का सेवन करता है तो कभी प्रोटीन एवं अधिक कैलोरी के नामपर अभक्ष्य माँस को ठूँसकर पेट को कब्र बनाता है। फलतः अनेकानेक बीमारियों से भी वही ग्रसित होता है। जबकि बुद्धि एवं साधनों की दृष्टि से असमर्थ मनुष्येत्तर जीव स्वस्थ बने रहते और हंसते-फुदकते हुए जीवन का वास्तविक आनन्द उठाते हैं।
खान-पान की इस भ्रान्ति को मन और मस्तिष्क से हटाया जाना आवश्यक है। शरीर के लिए नमक न तो आवश्यक है और न ही उपयोगी। स्वाद एवं अभ्यास का अंग बन जाने के कारण इसके बिना काम नहीं चलता अन्यथा पोषण की दृष्टि से उसमें ऐसी कोई विशेषता नहीं है जिसके बिना काम न चले। जितनी थोड़ी आवश्यकता है भी, वह प्राकृतिक स्त्रोतों में सन्तुलित रूप से घुला मिला है और शरीर रक्षा का उद्देश्य पूरा करता है। इसके लिए अलग से नमक लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आहार में इस मान्यता को भी बदलना होगा कि अधिक प्रोटीन युक्त भोजन शरीर के लिए लाभकारी है। स्वास्थ्य पौष्टिक तत्वों पर नहीं इस बात पर अवलम्बित है कि भोजन में ग्रहण किए जाने वाले पदार्थ कितने शीघ्र एवं सुविधा से पच जाते हैं। इस दृष्टि से शाक-सब्जियों को हरे एवं ताजे फलों को सर्वोपरि ठहराया गया है। इन तथ्यों से प्रभावित होकर अब पाश्चात्य जगत में भी शाकाहार का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। वहाँ के नागरिक माँसाहार की हानियों को समझने लगे हैं। इंग्लैंड में तो एक ‘वेजीटेरियन सोसायटी’ की स्थापना हुई है जो प्रचार द्वारा लोगों को प्रकृति प्रदत्त सुविधा से उपलब्ध होने वाले सुपाच्य खाद्यान्नों, शाकों एवं फलों की महत्ता बताती तथा माँसाहार की हानियों से अवगत कराती है। इस सत्प्रयास का आशातीत प्रभाव पड़ता है। हजारों व्यक्तियों ने माँसाहार छोड़ा व शाकाहार को अपनाया है। वहाँ इसे स्वास्थ्य क्रान्ति के रूप में मान्यता मिली है। नमक का अन्धाधुन्ध उपयोग भी ऐसा ही अवाँछनीय प्रचलन है, जिसे आज नहीं तो कल छोड़ना ही पड़ेगा।
विनोबाजी के साथ-साथ बहुधा कोई सम्बन्धी या मित्र बालक भी उनके घर में रहा करता था। उस बालक को भी घर में विनोबा ही सुविधायें मिला करती थीं। भोजन आदि भी साथ-साथ समान स्तर का मिलता था। कभी-कभी घरों में बासी भोजन बचा रहना भी स्वाभाविक है। उनकी माता भोजन फेंके जाने के विरुद्ध थीं अस्तु वह भोजन मिल-जुलकर थोड़ा-थोड़ा खा लिया जाता था। ऐसे अवसर पर माता विनोबा को बासी भोजन देकर दूसरे को ताजा खिलाने का प्रयास करती थीं। विनोबा को इस पर कोई आंतरिक विरोध नहीं था, सहज सद्भावना का शिक्षण उन्हें प्रारंभ से मिला था। किन्तु परिहास में एक दिन उन्होंने माँ से कहा- “माँ, आपके मन में अभी भेद है।” माँ प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देख उठी। विनोबा ने कहा- “हाँ देखो न, आप मुझे बासी भोजन देती हैं तथा अमुक साथी को ताजा।”
माँ की उदारता को पक्षपात की संज्ञा देकर विनोबा ने परिहास किया था। किन्तु माता ने उसे दूसरे ढंग से लिया। बोली- तू ठीक कहता है। मानवीय दुर्बलताएं मुझमें भी हैं तू मुझे अपना बेटा दीखता है तथा अभ्यागत अतिथि। इसे ईश्वर रूप अतिथि मानकर सहज ही मेरे द्वारा यह पक्षपात का व्यवहार हो जाता है। तुझे बेटा मानने के कारण तेरे प्रति अनेक प्रकार का स्नेह मन में उठता है। जब तुझे भी सामान्य दृष्टि से देख सकूँगी तब पक्षपात की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।”
विनोबा को प्रसन्नता हुई। माता का एक और उज्ज्वल पक्ष उनके सामने आया था। समाज के सन्तुलन तथा आध्यात्मिकता की पकड़ का महत्वपूर्ण सूत्र उन्हें मिल गया था। लोग सन्तुष्टि के प्रयास में असन्तुष्ट होते क्यों दिखाई दिया करते हैं। इसका कारण वह खोजा करते थे। आज उन्हें उसका एक विशिष्ट पक्षी दीखा। पक्षपात मनुष्य के अन्तःकरण को सहन नहीं होता। व्यक्ति अभाव स्वीकार कर लेता है, पक्षपात नहीं। अपने को पक्षपात से मुक्त अनुभव करने वाला अन्तःकरण ही सन्तोष का अनुभव करता है। विनोबा ने माता की शिक्षा गाँठ में बाँध ली।
आहार-बिहार का विपर्याय शक्ति के उपार्जन एवं उपयोग की मध्यवर्ती श्रृंखला को गड़बड़ा देती है। आमदनी कम और खर्च अधिक होने पर जिस प्रकार ऋणी, दरिद्र एवं दिवालिया बनना पड़ता है। उसी प्रकार उपयुक्त आहार बिहार के बिना मनुष्य दुर्बल एवं तनाव ग्रस्त होता जाता है। ऐसे व्यक्ति ऋतु प्रभाव से लेकर विषाणुओं के आक्रमण के छोटे-छोटे दबाव भी सहन नहीं कर पाते और आयेदिन रुग्णता ग्रस्त होते हैं। मानसिक असन्तुलन एक तीसरा कारण है जो आहार-बिहार के व्यक्तिक्रम से भी अधिक घातक सिद्ध होता है। दुश्चिनताएँ कहीं न कहीं से- कोई न कोई बहाना लेकर आक्रमण करती हैं और शरीर पर नियन्त्रण करने वाला मनःसंस्थान पद क्षुब्ध होकर अपना कार्य ठीक तरह कर पाने में असमर्थ होता है। ड्राइवर असन्तुलित हो तो वाहन की दुर्गति होना निश्चित है। बढ़ती हुई आधि-व्याधियों के कारणों में यों दरिद्रता, अशिक्षा, परिस्थिति आदि कारणों की भी गणना हो सकती है, पर वास्तविकता इतनी ही है कि जीवन क्रम की दृष्टिकोण की अस्त-व्यस्तता ही मनुष्य को स्वास्थ्यगत तथा व्यवहारगत संकटों के गर्त में धकेलती है।
पिटने पद दर्द होना स्वाभाविक है। शरीर और मस्तिष्क की पिटाई जीवन क्रम में बरता गया अनाचार करता है। फलतः कई प्रकार के दर्द, दाह, शोध, अवरोध ताप जैसे लक्षण जिस-तिस अवयव में उभरते रहते हैं। होना यह चाहिए था कि मूल कारणों को खोजा और उन्हें हटाया जाय, पर उतने झंझट में कौन पड़े, यह सोचकर ऐसे उपाय अपनाये जाते हैं। जो तत्काल कुछ राहत दिखा दें, पीछे भले ही उनसे दुहरी हानि उठानी पड़े। शामक औषधियों का प्रचलन इसी आधार पर आरम्भ हुआ है। उनकी खपत जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखने से पता चलता है कि रुग्णता के अनेकानेक लक्षण मनुष्य को किस प्रकार त्रस्त कर रहे हैं।
दर्द नाशक औषधियों की इन दिनों भरमार है। यह एक प्रकार के नशीले रासायनिक पदार्थ हैं जो अनुभूति को शिथिल भर कर देते हैं। ज्ञान तन्तुओं की स्थिति अर्ध निद्रित जैसी हो जाती है और वे रुग्णता से उत्पन्न त्रास का सही विवरण व्यक्त करने की अपनी क्षमता खो बैठते हैं। यही है शामक औषधियों का जादुई चमत्कार जिससे बाल-बुद्धि बेतरह आकर्षित होती चली जा रही है। ‘तनाव’ अपने समय का बढ़ता हुआ ऐसा अभिशाप है, जिससे प्रतीत होता है कि शारीरिक ही नहीं मानसिक आरोग्य भी अब बेतरह गिरता चला जा रहा है। शामकों का बढ़ता उपयोग सभ्यता का अनुदान और पीड़ा पर विजय समझा जाता है पर वस्तुतः स्थिति ठीक उल्टी है। संकट का समाधान न करके उसे छिपा भर देना अन्ततः विपत्ति के बढ़ते रहने और समय पर विस्फोट बनकर उभरने की अदूरदर्शिता भर है।
वेलियम, काम्पोज, लिब्रियम, मिल्टाउन आदि बड़े लोगों की दैनिक आवश्यकता बन गई है। एस्प्रो, नोबलजीन आदि के प्रयोग में अब डाक्टरों का परामर्श भी आवश्यक नहीं समझा जाता। नशे और नाश मिश्रित दवाइयाँ पान, सुपाड़ी की तरह व्यवहृत होने लगी हैं। तात्कालिक लाभ यह दीखता है कि मस्तिष्क सुन्न होने जैसी स्थिति में जा रहा है। दर्द तथा तनाव घट गया। नशे की नींद, अनिद्रा से भी महंगी पड़ती है, इसे बहुत कम लोग जानते हैं।
आपत्तिकालीन परिस्थितियों में औषधियों का उपयोग हो सकता है, पर उस प्रयोग को स्वास्थ्य सुधार का विकल्प न बनने दिया जाय। दुर्बलता घेरने लगे तो टॉनिक ढूंढ़ने की अपेक्षा, आहार-बिहार के असन्तुलन को ठीक करने का ध्यान जाना चाहिए। इसी प्रकार रुग्णता बढ़ने पर पीड़ित अवयवों को विश्राम देने और जीवनी शक्ति के अभिवर्धन का मार्ग अपनाना ही श्रेयस्कर है। विपर्याय को सुधार लेने पर मारक औषधियों की आवश्यकता पड़ती है और शामक ढूंढ़नी पड़ती हैं। यह स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार की जादुई उपचार अन्ततः जीवनी शक्ति के भण्डार को बुरी तरह नष्ट करते हैं। और मनुष्य को ऐसे कष्ट साध्य रुग्णता में जकड़ कर रख देते हैं, जिससे पीछा छुड़ाना एक प्रकार से अशक्य ही बन जाता है।
पत्राचार विद्यालय की प्रक्रिया में परिवर्तन
गत अंक में दो महत्वपूर्ण विषयों पर पत्राचार विद्यालय आरम्भ करने की सूचना छपी थी। प्रसन्नता की बात है कि उसे आशातीत समर्थन मिला है और देखते-देखते हजारों आवेदन-पत्र एकत्रित हो गये हैं।
प्रज्ञा परिजनों का युग संधि की अति महत्वपूर्ण बेला में ऐसे अनुदान मिलने चाहिये थे जिनके सहारे वे अपने व्यक्तित्व को निखार सके- परिवार को समुन्नत सुसंस्कृत बना सके साथ ही इस ऐतिहासिक बेला में ऐसे कदम बढ़ा सके जिनसे आत्म-सन्तोष-लोक सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की त्रिविधि उपलब्धियाँ अर्जित हो सकें। अब गायत्री तीर्थ में इस प्रयोजन के लिए साधना सत्र लगाये जाया करेंगे। इन्हें दस वर्ष पूर्व के प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों के समतुल्य समझा करेगा। प्रशिक्षण बहुत कुछ हो चुका है। जो शेष है उसे पत्रिकाओं के माध्यम से तथा पत्राचार से करने की बात सोची गई। समय कम-स्थान कम-और इच्छुक अधिक और आवश्यकता तात्कालिक एवं महान। इन सभी विसंगतियों का हल ऐसा ही सोचा गया था जैसा कि अंक में छप चुका है।
अनुमान था कि यह क्रम धीमे-धीमे चलेगा और वर्तमान सहयोगियों और साधनों के सहारे उसे क्रमबद्ध रूप से चलाया जाता रहेगा। पर उमड़ते उत्साह के अनुरूप व्यवस्था न बन पाने के कारण अब दूसरे प्रकार के उपाय अपनाने के लिए विवश होना पड़ा है। पत्राचार विद्यालय में सम्मिलित होने वाले छात्रों का प्रशिक्षण संख्या अत्यधिक हो जाने से सम्भव नहीं हो पा रहा है। जल्दबाजी में प्रशिक्षणों का स्तर गिरा देना और ऐसी ही बेगार भुगतान न तो अपने स्वभाव में है न परम्परा के अनुकूल। सभी आत्मीय- सभी भावनाशील- सभी जिज्ञासु-किसे मना करें, किसे स्वीकारें। सामने प्रस्तुत सभी को हाथ में लें तो सामर्थ्य से बाहर। धीमा क्रम चलाया जाय तो महीनों वर्षों लम्बी पंक्ति लगने और प्रतीक्षा में उत्साह टूटने का भय। इन सभी असमंजसों ने नया मार्ग खोजने के लिए विवश किया और मंथन के उपरांत वह निकल भी आया।
इस संदर्भ में अब नई नीति यह है कि प्रज्ञा परिजनों के लिए आन्दोलन के सूत्र संचालन से सम्बन्धित एक विशेषांक ‘प्रज्ञा अभियान’ पत्रिका का निकाला जा रहा है। अब अक्टूबर, नवम्बर का संयुक्तांक है। दो अंकों में जितने पृष्ठ छपने चाहिए थे उससे अधिक हैं। सुरक्षित रखा जा सके इस दृष्टि से उसका साइज अखण्ड ज्योति जैसा बनाया गया है। सभी ग्राहकों को तो वह मिलेगा ही। एक प्रति एक रुपये में अलग से भी खरीदी जा सकेगी।
प्रज्ञा परिजनों के लिए मिशन से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ उसी में एकत्रित कर दी गई हैं। अब तक मिशन में उद्देश्य, स्वरूप, कार्यक्रम एवं भविष्य के सम्बन्ध में समय-समय पर विचार एवं निर्धारण छापे बताये जाते रहे हैं। पर वे एक स्थान पर एकत्रित न रहने के कारण क्रमबद्ध एवं सुनिश्चित श्रृंखला में पिरोये हुए नहीं हैं। फलतः परिजनों को निजी समाधान करने तथा संपर्क क्षेत्र में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देने में कठिनाई उत्पन्न होती है। इस विशेषांक में समग्र सामग्री रहने के कारण वह सारी कठिनाई दूर हो जाती है।
पत्राचार विद्यालय के प्रज्ञा परिजन वर्ग के लिए इस संयुक्तांक को ही पाठ्य-क्रम बना दिया गया है। प्रज्ञा संस्थानों के ट्रष्टियों, संचालकों, वरिष्ठ प्रज्ञा-पुत्रों, परिव्राजकों, शाखा संचालकों के लिए इसका अध्ययन अध्यवसाय एक प्रकार से अनिवार्य ही माना जाना चाहिए। उसे वे सभी पढ़ें और संपर्क क्षेत्र में इसे अधिकाधिक लोगों को पढ़ायें। समझा जाना चाहिए इस प्रयोजन के लिए जो पृथक्-पृथक वरिष्ठ पाठ्य-क्रम भेजे जाने वाले थे उनकी पूर्ति इस अंक को पढ़ने से हो गई।
अब परीक्षा की- उत्तर कापियों की जाँच-पड़ताल की-जो भूले हैं उनके समाधान का और उत्तीर्णों को मान्यता प्राप्त प्रज्ञा-पुत्र का प्रमाण-पत्र देना शेष रह जाता है। इसके लिए वह किया गया है कि उपरोक्त विशेषांक के अन्तिम दो पृष्ठों में प्रश्न-पत्र छाप दिया गया है। वे सभी प्रश्न पाठकों को निजी धारणा के सम्बन्ध में होने से खुले रूप में छप जाने या बन्द लिफाफे में भेजने से कोई अंतर नहीं पड़ता। चूँकि उत्तर निजी मान्यताओं से मनःस्थिति एवं परिस्थिति से सम्बन्धित है। इसलिए उनके प्रकट हो जाने पर भी किसी प्रकार का हर्ज होने वाला नहीं है।
उत्तर आने पर कापियों की जाँच-पड़ताल की जायगी। इसके अवलोकन पर जो परामर्श देना उपयुक्त लगेगा वह भेजा जायेगा साथ ही उत्तीर्ण होने पर प्रमाण-पत्र भी पहुँचा दिया जायेगा। प्रज्ञापुत्र पंजीकृत तो पहले ही हो चुके हैं अब उनको इस आधार पर जांच पड़ताल करने पर मान्यता भी दे दी जायगी। ‘मान्यता’ पंजीकरण के अधूरेपन के परिपुष्टि होने पर है।
पत्राचार विद्यालय से दूसरा वर्ग आत्मिक प्रगति की विशिष्ट शिक्षा का रखा गया था। उस अभिरुचि के लोगों के लिए प्रज्ञापुत्र वर्ग से भिन्न प्रकार का पाठ्यक्रम रखा गया था। अब उसे भी बारह बार बारह लिफाफों में भेजने की अपेक्षा यह उचित समझा गया है कि अखंड-ज्योति में पाठ्यक्रम की तरह छाप दिया जाय। और उसे आवेदन भेजने ने भेजने वाले सभी के लिए सुलभ कर दिया जायेगा। पाठ्य-सामग्री अभिनव, अत्यन्त महत्वपूर्ण सारगर्भित एवं उपलब्धियों से भरी-पूरी है। बहुत सिकोड़ने पर भी उसका विस्तार काफी हो जाता है। इसलिए उसे तीन अंकों में छापने का निश्चय किया गया। दिसम्बर, जनवरी, फरवरी की अखण्ड-ज्योति के तीनों अंक अब इसी पाठ्य-सामग्री से भरे-पूरे छपेंगे। दिसम्बर अंक से व्यक्ति के अन्तराल में छिपी हुई रहस्यमय क्षमताओं की जानकारी रहेगी। जनवरी में ब्रह्माण्डगत उन अदृश्य प्रवाहों का परिचय होगा जिनसे तनिक-सा संपर्क सध जाने पर मनुष्य कुछ से कुछ हो सकता है। फरवरी अंक में उन साधना उपचारों का दिग्दर्शन रहेगा जिसके सहारे आत्मा को परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़ने ओर महत्वपूर्ण आदान-प्रदान करने में सफलता मिल सकती है। तीनों अंकों को मिलाकर अध्यात्म शिक्षा का एक समूचा पाठ्यक्रम बन जाता है। यदि इनमें भी समूचा प्रतिपादन आ सका तो मार्च अंक की बात भी सोची जा सकती है। कहना न होगा कि इस प्रस्तुतीकरण की विशिष्टता और उस आधार पर परिजनों को कुछ विशेष लाभ ले सकने की सम्भावना का ध्यान रखते हुए ही पत्राचार विद्यालय का नया झंझट सिर पर उठाया गया था। अब उस रहस्यमयी जानकारी को अखण्ड-ज्योति के अंकों में छाप कर सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाया जा रहा है।
कल्मष कुसंस्कारों के परिशोधन एवं प्रसुप्त आत्म-शक्तियों के जागरण में चान्द्रायण साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है। शान्तिकुंज के नव निर्मित गायत्री तीर्थ में यह सत्र इसी कार्तिक पूर्णिमा-11 नवम्बर से प्रारम्भ होंगे और भविष्य में निरन्तर चलते रहेंगे। यह दो प्रकार के होंगे (1) एक महीने के जो पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सवा लक्ष गायत्री अनुष्ठान सहित (2) दस-दस दिन के लघुचान्द्रायण 24 हजार अनुष्ठान सहित। हर महीने 1 से 10, 11 से 20 और 21 से 30 तक। सभी परिजनों को परामर्श है कि जिन्हें जब आना हो शीघ्र आवेदन पत्र भेजकर अपना स्थान सुरक्षित करालें।
यह पाठ्यक्रम किसे कितना रुचा और किसने उससे क्या लाभ उठाने के संबंध में सोचा तथा क्या कदम उठाया इसकी जाँच पड़ताल भी परीक्षा पद्धति से होगी। पाठ्य सामग्री अखण्ड-ज्योति के जिस अंक में पूर्ण होगी, उसी में दो का एक प्रश्न पत्र छाप दिया जायेगा और उत्तर कापियाँ आने पर परामर्श के अतिरिक्त मान्यता प्राप्त साधकों से उन्हें पंजीकृत कर लिया जायेगा। ताकि आदान-प्रदान एवं मार्गदर्शन का सिलसिला उस वर्ग की स्थिति जमा लेने पर सरलतापूर्वक चलाया जाता रहे।
समझा जाना चाहिए कि सितम्बर अंक प्रकाशित पत्राचार विद्यालय का अब परिवर्तित रूप उपरोक्त अंकों को पाठ्यक्रम बनाकर प्रशिक्षण देने का हो गया है। प्रज्ञा पुत्रों के लिए प्रज्ञा अभियान पत्रिका का अक्टूबर, नवम्बर का संयुक्ताँक उस आवश्यकता की पूर्ति कर देगा। आत्मप्रगति का मार्गदर्शन- दिसम्बर, जनवरी, फरवरी के अंकों में मिलेगा। आवश्यक हुआ तो मार्च में भी वह पाठ्य सामग्री छप सकती है। इन अंकों को भी पाठ्यक्रम माना जायेगा और जिन्हें अपना विश्लेषण पर्यवेक्षण कराना हो वे अन्तिम अंक में छपे प्रश्न पत्र की उत्तर कापी भेजकर आवश्यक परामर्श प्राप्त करते रहने का पथ-प्रशस्त कर सकते हैं। पंजीकरण का प्रमाण पत्र उन्हें भी भेजा जायेगा।
सितम्बर अंक में पत्राचार विद्यालय के छात्रों के लिए बारह लिफाफों में से प्रत्येक पर पचास पैसे का टिकट और पचास पैसे की मुद्रित सामग्री का खर्च देने की बात कही गई थी। बारह लिफाफों के लिए बारह रुपये का वजन पड़ता था। उसे परिजनों ने प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया है और कितनों ने ही बारह-बारह रुपये के मनीआर्डर भेज दिये हैं। किन्तु परिवर्तित व्यवस्था के अनुसार अब किसी अतिरिक्त खर्च की व्यवस्था नहीं रही। जो प्रश्न पत्रों के उत्तर भेजेंगे उन्हें परामर्श, निष्कर्ष, प्रमाण पत्र देने का जो खर्च पड़ेगा उसे मिशन ही उठा लेगा। इस प्रकार अब किसी शिक्षार्थी पर किसी अतिरिक्त व्यय भार पड़ने की बात नहीं रही।
जिनके बारह रुपये आ चुके हैं वे उसे वापस मंगा सकते हैं या अखण्ड-ज्योति के अगले वर्ष के चन्दे में जमा कर सकते हैं। भेजने वालों की जैसी मर्जी होगी तुरन्त वैसा ही प्रबन्ध कर दिया जायेगा।
यह सामयिक व्यवस्था क्रम जान लेने के अतिरिक्त समस्त परिजनों को यह बात नोट करनी चाहिए कि यह पत्राचार प्रक्रिया इन दिनों नितान्त आवश्यक हो गई है। प्रस्तुत पाठ्य सामग्री एवं प्रेरणा ऐसी है जिसकी उपेक्षा करने वाले समय निकल जाने पर यही कहते रहेंगे कि उनने भूल की। बिना किसी खर्च के इस आदान-प्रदान का लाभ उठाया ही जाना चाहिए। वस्तुतः इस पर मिशन और उसमें सम्बद्ध आत्मीय जनों के बीच इस आधार पर एक नई श्रृंखला आरम्भ होती है। और जिज्ञासा तथा पात्रता का अधिक विवरण मिलने पर वह सिलसिला चल पड़ता है जिसे अन्तरंग स्तर का आदान-प्रदान कहा जा सके।
(मंगल विजय)
नहीं अध्यात्म है झूठा, मगर समझे नहीं है हम। इसी कारण, जहाँ पर थे, वहाँ पर भी नहीं हैं हम॥
हजारों साल हैं बीते, मगर हम बढ़ नहीं पाये। पकड़ ली एक ही सीढ़ी, वहाँ से चढ़ नहीं पाये॥ हुई यह भूल, साधन को स्वयं ही साध्य हम समझे। भुलाना इष्ट को हमने, नहीं आराध्य हम समझे॥ हमारी-इष्ट की दूरी, इसी कारण हुई कब कम॥
लुभाती ही रहीं विधियाँ, विधा को जान पाये कब। हमारी आत्मा की हम क्षुधा अनुमान पाये कब॥ रहे आडम्बरों में ही उलझते, तथ्य कब जाना। प्रतीकों में छुपी जो प्रेरणा, उसका न पहिचाना॥ भुलाता ही रहा अध्यात्म को, आडम्बरों का भ्रम॥
उलझकर कर्मकाण्डी में, नहीं सद्कर्म अपनाये। मिलन की साधना हम साध्य के प्रति कर नहीं पाये॥ बिठाना जिस हृदय में था परमप्रिय साध्य को अपने। वहाँ पर कामनाओं के संजोते ही रहे सपने॥ परमप्रिय किस तरह आते न टूटा साधना का क्रम॥
उलझकर रह गया मनोहर खिलौनों में हमारा मन। न रुच पाया उसे चिर साधनामय तप भरा जीवन॥ अनूठी शक्तियाँ उपहार में मिलती कहाँ से फिर। अमर आनन्द-अमृतबेल तब फलती कहाँ से फिर॥ निरन्तर साधना से ही मिली है सम्पदा-अनुपम॥
कमी हम साधनामय, सात्विक जीवन बिताते थे। तभी तप-त्याग के बल पर “जगत गुरु” हम कहाते थे॥ उसी सामर्थ्य को हमने स्वयं बदनाम कर डाला॥ क्रियाओं मात्र को अध्यात्म का उपनाम कर डाला॥ न चल पाया हमारी आत्म-शोधन-साधना का क्रम॥
अगर आदर्श का अनुरूप जीवन जी लिया होता। अगर सदाचरण संजीवनी को पी लिया होता॥ प्रकट होती हमारी शक्तियाँ दिव्यत्व पा जाते। मुखर होती मनुज-गरिमा जिधर से भी निकल जाते॥ सहज उपलब्धियाँ देता हमारा सात्विक तप-श्रम॥
*समाप्त*