इन दिनों धर्म क्षेत्र में घुसी विकृतियों और निरंकुश−शुष्क बुद्धिवाद के नाम पर पनपी भ्रान्तियों ने अश्रद्धा की भावनात्मक अराजकता उत्पन्न कर दी है। फलतः व्यक्ति क्रमशः नर कीटक बनता चला जा रहा है। अंधश्रद्धा ने भ्रान्तियों के जंजाल में मानवी चिन्तन को बुरी तरह उलझाया और कष्ट कारक भूल भुलैयों में भटकाया है। श्रद्धा दोहन हेतु अनगिनत आडम्बरधारी गुरु व स्वनाम धन्य भगवान धर्म क्षेत्र में अवतरित हो गये हैं। ऐसे धूर्त भोले भावुक लोगों को अन्ध श्रद्धा के रस्से में बाँध कर विकृत मान्यताओं के गड्ढे में ढकेलते हैं। संसार अन्ध−श्रद्धा की अन्धेर नगरी बन गया है व निहित स्वार्थों का व्यवसाय भली प्रकार चल रहा है। एक तरफ भीरुता है तो दूसरी और बौद्धिक कुटिलता। इस दलदल में जादू–टोना, देवी−देवता, भूत−पलीत, ज्योतिष, चमत्कार सिद्धि से लेकर सामाजिक कुरीतियों जैसी अनेकानेक विकृतियाँ धँसी पड़ी है। अश्रद्धा व अन्ध श्रद्धा दोनों ही मिलकर उस आस्था संकट का नाम देते हैं जो इन दिनों समस्त मानवता को अपने चंगुल में लिये हुये हैं। अश्रद्धा अर्थात् आदर्शवादिता की अवमानना। अन्ध श्रद्धा अर्थात् व्यक्ति, वस्तु, क्रिया विशेष या देव भूतों की विलक्षणता में बुरी तरह आसक्ति।
इस आस्था संकट का समाधान एक ही है–समग्र मानवता को प्रभावित करने वाली उच्चस्तरीय आस्थाओं की पुनर्स्थापना। यह कार्य अध्यात्म मंच द्वारा ही सम्भव है। उपासना, साधना, आराधना के तत्वदर्शन को सही स्वरूप में प्रस्तुत करके ही अगले दिनों प्रज्ञायुग की सम्भावनाओं को साकार किया जा सकेगा। इस प्रज्ञायुग में श्रद्धा तत्व को मानवी अन्तराल में प्रविष्ट प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। जो साधक जितना अधिक इस उपलब्धियों से सम्पन्न होगा, उसी अनुपात में उसे अपने दृष्टिकोण–स्वभाव–आचरण के स्तर को ऊँचा उठाने का सुवर्ण सौभाग्य प्राप्त होगा। इस सौभाग्य के सहारे ही व्यक्तित्व प्रखर बनता है व आत्मिक विभूतियों तथा भौतिक सफलताओं का पथ−प्रशस्त होता है। यह तथ्य भली−भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि आत्म−कल्याण का सौभाग्य वे ही प्राप्त करते हैं जो अश्रद्धा व अंधश्रद्धा दोनों से विमुख हो श्रद्धा तत्व को सच्चे अर्थों में अपने जीवन में उतारते हैं।
श्रद्धा–संयम, अनुशासन के माध्यम से शरीर को स्वास्थ्य व दीर्घ आयुष्य देती है। सद्विचारणा व सद्भावना से अभिपूरित श्रद्धा को अपनाने पर सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी ऋषि कल्प मेधायुक्त हो जाता है। चन्दन की तरह महकता और वातावरण को शीतल बनाता ऐसा व्यक्तित्व ही उपासना का सत्पात्र तथा भगवत् कृपा का श्रेयाधिकारी बन पाता है। साधना क्षेत्र में पग रखने वाले हर पथिक को यह जानना ही होगा कि चिन्तन की उपयुक्त दिशाधारा ही व्यवहार में उत्कृष्ट दिशाधारा में बदलती है और इसके परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आते हैं जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
आस्था संकट का निवारण–सद्भावनाओं का अभिवर्धन यदि सचमुच ही अभीष्ट है तो उसके लिए चिन्तन में ब्रह्मविद्या का तथा व्यवहार में आध्यात्म धारणा का आश्रय लेना होगा। अध्यात्म ही वह एक उपकरण है जिसकी पहुँच आत्म क्षेत्र तक है। धन, बल, बुद्धि का ही चमत्कार आज सर्वत्र दिखाई पड़ता है, पर फिर भी धनिक, बलिष्ठ, बुद्धिमान उच्च अन्तःकरण से रहित पाये जाते हैं–वहाँ मात्र मलीनता व कालिमा ही दिखाई देती है। विडम्बना यह है कि धर्म आध्यात्म के क्षेत्र में भी अनास्था ने व्यापक स्तर पर घुसपैठ कर ली है। यदि व्यक्ति का अन्तराल गुण, कर्म, स्वभाव न बदले तो अध्यात्म कहाँ रहा? ऐसे में प्रवचन, शिक्षण, कथा–कीर्तन स्तवन आस्था बढ़ाते नहीं घटाते ही हैं। आज का सबसे पुनीत पुरुषार्थ–युग कर्त्तव्य यही है कि धर्म−धारणा –श्रद्धा दर्शन– उपासना विज्ञान पर छाये छद्म एवं मलीन आवरण को मिटाया जाय व इनका बोधगम्य तथा सही स्वरूप जन−मानस के सम्मुख प्रस्तुत किया जाय। आर्ष स्तर की ऋषि प्रणीत धर्म चेतना का सच्चे अर्थों में आज उद्धार ही होना है। यदि ऐसा न हुआ तो बाह्योपचारों व अविश्वासों से ग्रस्त मूढ़ जन−मानस धीरे−धीरे नास्तिक होता चला जायेगा अथवा साधना विज्ञान का क्रमिक रूप में अवसान ही हो जायेगा।
इन उपासना दर्शन प्रधान प्रज्ञायोग विशेषाँकों का उद्देश्य यही है कि व्यक्ति को आस्थाओं के उन्नयन से धर्म−धारणा के सम्वर्धन की, विद्या की जानकारी करायी जाय। कर्मकाण्डों, उपासनात्मक विधि−विधानों, कथा–प्रसंगों तथा धर्मानुष्ठानों के बहिरंग स्वरूप को सीधी तरह समझने−समझाने में कठिनाई होती है। जब इन में सन्निहित प्रेरणाओं के भाव−भरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारों से भरे सत्परिणाम उत्पन्न होने की प्रतिक्रिया सामने आती है तो समझ में आता है कि यह निरर्थक-सी लगने वाली प्रक्रिया कितनी मर्मस्पर्शी, व्यक्तित्व का काया कल्प कर डालने वाली प्रभावोत्पादक विद्या है।
दैनिक उपासना द्वारा दिव्य−चेतना से घनिष्ठता बनाना, योगाभ्यास द्वारा प्रस्तुत शक्तियों को जगाना तथा तप साधना के माध्यम से अतिमानवी शक्तियों का उन्नयन तो साधना विज्ञान का एक अंग है ही। दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है सूक्ष्म वातावरण परिशोधन हेतु सामूहिक ध्यान धारणा की। जिस सन्धि बेला से विश्व मानस आज गुजर रहा है, ऐसे सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता और बढ़ जाती है। ऐसे प्रयोग सम्मिलित आत्मशक्ति को उभारने के लिये किये जाते हैं। नैष्ठिकता साधना−महापुरश्चरणों की इस प्रक्रिया में लाखों साधक अपनी संकल्प शक्ति एक साथ, एक समय विशेष में एक लक्ष्य की पूर्ति के लिये नियोजित करते हैं। अदृश्य जगत पर छाई विभीषिकाओं के निवारण व भावी विपत्तियों के परित्राण हेतु प्रज्ञा परिवार का यह ब्रह्मास्त्र युग विभीषिकाओं का तो निवारण करेगा ही, उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा भी बनायेगा। ध्यान−धारणा सम्बन्धी विवेचन मार्च अंक में विस्तार से किया गया है। उसे सभी साधक ध्यान से पढ़े व क्रियान्वित करें। प्रस्तुत अंक में साधना के अन्यान्य उच्चस्तरीय प्रयोगों की चर्चा की जा रही है जो आगे भी जारी रहेगी।
अनन्तपारं बहु वेदशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः। सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीर मिवाम्बुध्यात्॥
वेद व शास्त्र अपार हैं, मनुष्य की आयु थोड़ी है और उसमें अनेकों विघ्न भी उपस्थित होते रहते हैं। अतएव ‘नीर−क्षीर विवेकी’ हंस के समान व्यर्थ−विस्तार को त्याग कर उपयोगी सारतत्व को ही ग्रहण करना चाहिए।
प्रतीकोपासना एवं ध्यान धारणा को समझने के पूर्व आस्तिकता के उस स्वरूप को पहले आत्मसात् करना होगा जो स्तर के अनुरूप मनोभूमि बनाता है और हर साधक के लिये अलग−अलग निर्धारण करता है। इस पूर्व भूमिका के विभिन्न पक्षों की जानकारी लिए बिना ध्यान साधना की सीढ़ियाँ चढ़ना सम्भव नहीं हो पाता।
यह मानना ही होगा अपनी प्रारम्भिक आवश्यकताओं की पूर्ति योग्य सामर्थ्य हर जीवधारी में ईश्वरीय अनुदान के रूप में विद्यमान है। जैसा जिनका स्तर होता है, वैसी ही उसकी जरूरतें भी होती है। सभी ईश्वर के अंश होने के नाते अपने निर्वाह के सामान्य क्रम को पूरा करने योग्य अनुदान तो सतत् परमपिता से पाते ही रहते हैं। मात्र मनुष्य की ही यह विशेषता है कि वह इस निर्वाह क्रम से ऊँचा उठता है, प्रगति करता है तथा अपने चेतनात्मक पुरुषार्थ के बलबूते आत्मोत्थान का पथ−प्रशस्त करता है।
साधना−उपासना उसी पुरुषार्थ का नाम है जो मनुष्य को हर जीवधारी की तुलना में अतिरिक्त रूप से अनुदान रूप में सहज प्राप्त है, जिसे सम्पादित कर स्थूल रूप में भौतिक समृद्धि तथा थोड़ा और ऊँचे उठने पर सूक्ष्म स्वरूप में आत्मिक विभूतियों को करतलगत करना सबके लिये सम्भव है। मनुष्य−मनुष्य में जो अन्तर पाया जाता है वह इन तीनों स्तरों के कारण ही होता है। कुछ तो भौतिक व आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में पिछड़े होते हैं व अन्य प्राणियों से कुछ श्रेष्ठ तो क्या गतिविधियों के क्षेत्र में उनसे भी हेय होते हैं। दूसरा स्तर स्थूल साधना का है। व्यायाम, अध्ययन, अनुभव शिल्पकला, वाणिज्य जैसे विषयों में कुशलता अर्जित कर ऐसे व्यक्ति अपना लौकिक जीवन सफल बनाते हैं, वैभव को प्राप्त होते हैं।
सूक्ष्म साधना−उपासना वह स्तर है जिसमें मनुष्य और भी ऊँचा उठकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है– प्रसुप्त सामर्थ्यों को जगाता है। व्यक्ति अपनी आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाता है। इस सूक्ष्म उपासना को सम्पादित करने वाला अपना ही नहीं, अपने संपर्क क्षेत्र के अनेकानेक व्यक्तियों का हित कर जाता है।
पंचतत्वों की काया वाले मनुष्य के निर्वाह तथा प्रशिक्षण हेतु भौतिक उपादान ही काम में आने योग्य हैं। मस्तिष्क को सुविकसित तथा शरीर को बलिष्ठ बनाकर स्थूल साधना के माध्यम से भौतिक क्षेत्र में प्रगति करते हम नित्य अनेकों व्यक्तियों को देखते हैं। पर यह तो अध्यात्म का पहला चरण है। इससे अन्तरात्मा के उत्थान की बात नहीं बनती। वह लक्ष्य तो सूक्ष्म साधना उपासना से ही पूरा होता है भौतिक स्तर की स्थूल साधना जहाँ लोक−व्यवहार की एक सामान्य प्रक्रिया है वहाँ आत्मिक प्रगति की सूक्ष्म साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
परन्तु मुख्य उलझन तब आती है जब ईश्वर का स्वरूप समझने व उसके अनुरूप बनने के लिए प्रयास किये जाते हैं। महत् तत्व की अनेकानेक नाम दिये जाने के कारण प्रारम्भिक स्थिति के साधक की यह कठिनाई होना स्वाभाविक भी है। ध्यान प्रक्रिया सम्बन्धी सारे ऊहापोह इसी ताने बाने को लेकर चले हैं कि ईश्वर के तो विभिन्न रूप हैं, प्रतीक है। अपनी आत्मिक उन्नति के लिये उनमें से कौन-सा बुना जाय व ध्यान की प्रक्रिया क्या हो? इसी का समाधान करने के लिये मनीषियों–तत्व दृष्टाओं ने साधक की मनःस्थिति के अनुरूप की ध्यान प्रक्रिया का निर्धारण किया है।
मूर्ति अथवा प्रतीक पूजा तथा इष्ट के साकार ध्यान की दो विद्यालय स्तर की कक्षाएँ है। मूर्ति पूजा को प्राथमिक तथा इष्ट के ध्यान को माध्यमिक स्तर का कह सकते हैं। भक्ति भावना उत्पन्न करने, चेतना को चेतना के साथ घनिष्ठता के सूत्रों में बाँधने के लिये तथा निष्ठा की परिपक्वता के लिये कल्पित देव प्रतिमाओं को यथार्थ मानने की मनःस्थिति प्रतीक पूजा में बनायी जाती है। इष्ट का साकार ध्यान इससे उच्चस्तर की सूक्ष्म प्रतीक पूजा है जिसमें श्रद्धा, समीपता की वैसी ही भावना की जाती है जैसी की मूर्ति पूजा में स्थूल प्रतिमा की। यह एक प्रकार की मानस पूजा है एवं प्रारम्भिक अभ्यास तथा श्रद्धा−समर्पण के भाव परिपक्व करने के लिए आवश्यक मानी जाती है।
इन दोनों से आगे स्नातक स्तर की कक्षा आरम्भ होती है जिसे निराकार ध्यान साधना कह सकते हैं। भगवान की इसमें मनुष्य रूप में, देवी−देवता विशेष के रूप में कल्पना नहीं की जाती और न ही उसके स्वागत सत्कार का प्रबन्ध ही करना होता है। कर्मकाण्ड जिस उद्देश्य से बनाये गये है वे मात्र श्रद्धा भावना को परिपक्व करने के लिये ही हैं। संग्रहित श्रद्धा को परिपुष्ट करने के लिये इस उच्चस्तरीय कक्षा में पहुँचे साधक भी नित्य कर्म में प्रतीक पूजा को छोड़ते नहीं–सतत् अपनाये रहते हैं।
निराकार ध्यान में भगवान व्यक्ति नहीं, शक्ति बन जाता है। उसे किस रूप में अपने मानस पटल पर लाया जाय, संपर्क जोड़ा जाय–इस विद्या का ही अष्टाँग योग की ‘ध्यान’ नामक स्थिति विशेष में विवेचन किया जाता है। परब्रह्म, सृष्टा, भगवान, ईश्वर, परमात्मा आदि अनेकानेक नामों से उस महत् तत्व की विवेचना की जाती रही है। ब्राह्मी चेतना के इस विशाल सागर का स्वरूप इतना बड़ा है कि ‘ससीम’ बुद्धि वाले मानव के लिये उसकी जानकारी प्राप्त कर संपर्क जोड़ पाना सम्भव नहीं। “नेति−नेति” कहकर वेदान्त दर्शन में इसीलिये उसे अचिन्त्य, अनिर्वचनीय, अगम्य बताया गया है। फिर उसका ध्यान किया कैसे जाय? इसी का समाधान करते हुए मनीषी निर्देश देते हैं कि जीवसत्ता की अन्तरात्मा को स्पर्श करने वाले ब्राह्मी अंश को ही पहचाना व अपनाया जाय। यही उपास्य देव, इष्टदेव, परमेश्वर है। अनुग्रह–वरदान इसी से मिलते हैं। हलचलों से भरे महत् सागर की अनेकानेक तरंगों में से एक यह परमात्म सत्ता भी है जो मानवी काय−कलेवर में स्थिति को प्राप्त कर अनेकानेक साधकों ने चमत्कारी सफलताएँ पायी हैं। यह तथ्य इसी सत्य का उद्घाटन करता है कि देवताओं का स्वतन्त्र अस्तित्व बल एवं उपासनात्मक विधि−विधान नहीं साधक के व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तः की निश्छलता–पवित्रता एवं उपास्य अन्तराल के प्रति गहन श्रद्धा ही सारे चमत्कारों–आत्मिक सफलताओं के मूल कारण हैं। ध्यान साधना से इसी प्रयोजन को पूरा किया जाता है।
उपासना मूलतः भाव विज्ञान की उच्चस्तरीय स्थिति है जिसमें मनःस्थिति के अनुरूप साधक को अपना माध्यम चुनना होता है। सतत् परिष्कृति एवं प्रगति के सोपानों पर चढ़ते हुए साधक ऐसी स्थिति विशेष में जा पहुँचता है जहाँ उसे फिर किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रतीकोपासना, इष्ट के साकार ध्यान की प्राथमिक सीढ़ियों को पारकर वह जब निराकार ध्यान की स्थिति में पहुँचता है तो परम सत्ता को सम्वेदनाओं की श्रेष्ठता के रूप में अनुभव करता है। सद्भाव भरी स्थिर आतुरता ही ध्यान की पराकाष्ठा है। ईश्वर निराकार भी है, साकार भी। इस समग्र ब्रह्म का दर्शन ने तो सम्भव है, न आवश्यक, न ही उपयोगी। यदि इसका दर्शन करना ही हो तो ज्ञान और इच्छा शक्ति के रूप में उसे हर जीवधारी में संव्याप्त देखा जा सकता है और भी स्पष्ट–उत्कृष्टतम स्वरूप उसका ऋतम्भरा प्रज्ञा, निस्वार्थ आत्मीयता एवं कर्त्तव्य निष्ठा के रूप में विद्यमान है वहाँ उतने ही अधिक प्रखर परमेश्वर का–उसके अंश का दर्शन किया जा सकता है। अवतारों की कलाओं का अन्तर यही बताता है कि उन अवतारी आत्माओं में श्रेष्ठता की ऊर्जा कितनी ऊँची थी। जब साधक अपने अन्दर भी इस प्रकाश की मात्रा बढ़ते देखता है तो समझना चाहिए कि उतने अनुपात में वह परमेश्वर का अंश बन गया।
निराकार ईश्वर की प्रेरणाएँ अपने अन्दर किस मात्रा में प्रवेश कर रही हैं, इसका ‘मीटर’ एक ही है। अपने को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदार बनाने की आकाँक्षाओं का जागना और इसके लिये तीव्र आतुरता का विकसित होना। इस प्रेरणा के द्विमुखी प्रभाव साधक के अन्दर परिलक्षित होते हैं। एक दुष्प्रवृत्तियों से जूझने का सत्साहस, दूसरे उत्कृष्टता सम्वर्धन के लिये व्यग्रता का विकास। ईश्वर का अवतार जब भी मानवी काया में होता है–इन्हीं दो प्रयोजनों के लिये। व्यक्ति के अन्तः में इन दो हलचल−प्रवाहों को उभरते देखकर यह कहा जा सकता है कि इस साधक में ईश्वर अवतरण की प्रक्रिया चल रही है। संक्षेप में इसे कहना हो तो आदर्शवादी जीवन के लिये उठती हुई उत्कृष्ट अभिलाषा एवं प्रबल पुरुषार्थ परायणता के रूप में ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन इसे समझा जा सकता है।
आँखें जड़ तत्वों से बनी हैं। उनसे मात्र जड़ पदार्थों को ही देखा समझा जा सकता है। चेतना जड़ नहीं है। परमेश्वर के स्वरूप की इसी कारण कल्पना भर की जा सकती है। देखना नेत्रों का गुण है और अनुभव करना चेतना का। जीव, चूँकि ईश्वर का अंश है, इसलिये वह ईश्वरीय अनुभूति मात्र कर सकता है। इस अनुभूति के लिये ही ध्यान साधना का आश्रय लिया जाता है। मोटेतौर से विश्वास किसी बात पर तभी होता है जब उसे देखा या सुना गया हो। पंच कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से यही किया जाता है। ईश्वर दर्शन चाहे चर्मचक्षु से साकार उपासना के रूप में कल्पित किया जाय अथवा ज्ञान चक्षु के माध्यम से निराकार रूप में–उद्देश्य दोनों का एक ही है।
साकारोपासना के लिये प्रतीक मूर्ति को आधार बनाया जाता है तो निराकारवादी मत में ध्यान में प्रकाश ज्योति, सविता देवता इत्यादि का सहारा लेते हैं। पर यह स्पष्ट ध्यान रखा जाना चाहिए कि ध्यान विग्रह के लिये स्थापित ईश्वर प्रतीक के पीछे कोई चरित्र विशेष न जोड़ा जाय वरन् उसे सद्गुण सम्पन्न पूर्ण मानव का स्वरूप भर माना जाय। प्रतीकों की आकृति में अन्तर हो सकता है, पर अन्तिम स्वरूप तो सबका एक ही है। दैववाद सम्बन्धी सारी भ्रान्तियाँ मिटाकर यथार्थता को जानना चाहिए कि एक व्यापक ब्रह्म की विभिन्न देव शक्तियों को ही देव संज्ञा दी गयी है। उपासना का उच्च स्तरीय दर्शन है “विराट् स्वरूप” से साक्षात्कार। साकार व निराकार दोनों ही उपासना में आदर्शवादी उत्कृष्टता से सम्बन्ध दृढ़ बनाकर उस विराट् की ही साधना की जाती है।
जब साधक यह मानकर चलता है कि समस्त विश्व ब्रह्माण्ड ईश्वर की साकार प्रतिमा है तो अनायास ही लोक मंगल की, जनसेवा की, सारी जगती के हित की आकाँक्षा उभर कर आती है। अर्जुन ने ईश्वर दर्शन किये पर दिव्य चक्षु−ज्ञान नेत्रों से ही तथा विराट् ब्रह्माण्ड के रूप में। कौशल्या तथा काकभुशुंडि के राम के तथा यशोदा ने कृष्ण के दर्शन उनके साकार व्यक्ति स्वरूप में नहीं–विराट् के रूप में ही किये थे। इस समस्त विश्व को परमेश्वर की झाँकी मानने की प्रतिक्रिया यही होती है कि जड़−चेतन के प्रत्येक घटक के प्रति हमें उच्चस्तरीय मान्यता रखनी चाहिए और सदैव अपने व्यवहार में उदार आत्मीयता का समावेश करना चाहिए। विराट् ब्रह्म की उपासना करने वाला अपने को विश्व नागरिक मानता है और सृष्टि के इस उद्यान को और अधिक सुन्दर, सुविकसित बनाने का प्रयास करता है। उपासना का सच्चा स्वरूप, आस्तिकता की ‘विराट् दर्शन’ वाली मान्यता ही है। यदि इस आस्तिकता को अन्तरात्मा में स्थान मिल सके तो उपासना सार्थक हुई समझी जाती है। अनुशासन ही रस्सी से बँधा, देव मर्यादाओं का पालन करने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है और ऐसा व्यक्ति ही विराट् का दर्शन करने का सच्चा अधिकारी है। इस स्वरूप को भली−भाँति समझने वाला व्यर्थ के प्रपंच में न पड़ अध्यात्म पथ पर बढ़ चलता है तथा सामान्य ने असामान्य बन जाता है। ईश्वर अंश जीव को तद्रूप बनने के लिये उपासना के जिस तत्वदर्शन को आत्मसात् करना अति अनिवार्य है, उसी का विवेचन साधना विज्ञान के ज्ञाता करते रहे हैं।
आयुर्वेदीय कल्प का विवरण पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि वमन, विरेचन, स्वेदन, नस्य, धूम्रपान, स्नेहन आदि के माध्यम से संचित मलों को बाहर निष्कासित किया जाता है। इस शरीर शुद्धि, परिशोधन के उपरान्त शरीर गत मलीनताओं का भार हल्का होता है तथा नये उपचार की पृष्ठभूमि बनती है। यदि यह न किया गया तो उपचार का लाभ शरीर को मिलने के स्थान पर जलती आग में पड़े ईंधन की भस्म हाथ लगने के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ता नहीं। खाई पर कर ही पार जाया जा सकता है, अन्यथा सारे प्रयास पुरुषार्थ इस खन्दन को पार करने में लगी शक्ति के माध्यम से समाप्त हो जायेंगे।
ठीक यही सिद्धान्त आध्यात्मिक काया-कल्प पर भी लागू होता है। यह भी एक प्रकार की चेतनात्मक कायाकल्प चिकित्सा हैं। पंच तत्वों को काय-कलेवर में बैठा जीवन जिन मलीनताओं से, संचित मलों से आच्छादित है, उनसे छुटकारा पाये बिना उसे नवीन चोला पहनाया नहीं जा सकता। इस चिकित्सा उपचार में प्रारम्भ में दो काम करने होते हैं। एक तो अपनी चिन्ताओं, समस्याओं, कठिनाइयों, आकाँक्षाओं, अभिलाषाओं को विस्तारपूर्वक लिख कर मार्गदर्शक के सम्मुख प्रस्तुत कर देना होता है ताकि उन्हीं बातों को बताने, पूछने का ताना-बाना न बुनते रहकर जो कहना है, वह एक बार में ही कह लिया जाय। इससे भौतिक प्रयोजनों–साँसारिक गतिविधि प्रधान हलचलों से मन विरत होकर हल्का होता, अन्तर्मुखी बनता है। तब मूल उद्देश्य का तारतम्य बिठा पाना सम्भव हो पाता है।
दूसरी बात वह उगलनी होती है जिसमें अपने क्रियमाण दुष्कर्मों का उल्लेख होता है। पूर्व जन्म के संचित कर्मों की तो अपने को कोई जानकारी है भी नहीं। पर इस शरीर से इसी जन्म में जो दुष्कृत्य हुए हैं, उनका सही अर्थों में प्रायश्चित बिना वमन किये सम्भव नहीं। यही वे अवरोध हैं, जो साधना को सफल नहीं होने देते। न ही कष्ट कठिनाइयों से छूटने के लिये अपने प्रयासों को कारगर होने देते हैं।
यह एक सुविदित तथ्य है कि सृष्टा की कर्म व्यवस्था सुनिश्चित है। वह स्वसंचालित पद्धति से क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न करती रहती है। पाप कृत्यों से कुसंस्कार बढ़ते हैं। कुसंस्कारों से स्वभाव में उद्दण्डता आती है। उद्धत स्वभाव से आचरण बनते हैं। उनके फलस्वरूप भीतर से रोक शोक उभरते हैं और बाहर से असहयोग, तिरस्कार एवं रोष-उभरते की प्रताड़नाएँ बरसती रहती हैं। फलतः समस्याएँ उलझती, कठिनाइयाँ पनपती और विपत्तियाँ बरसती रहती हैं। यही है पाप कर्मों की स्वसंचालित दण्ड व्यवस्था जो अपने लिए स्वयं ही यमदूत उत्पन्न करती है और नशा पीकर नाली में गिरने, अभक्ष्य खाकर वमन करने, फाँसी लगाकर बेमौत मरने की तरह किये हुए दुष्कृत्यों का प्रकारान्तर से दण्ड प्रस्तुत करती रहती है। इस जंजाल की जकड़न में ऊँचा उठते और आगे बढ़ने की बात बुद्धिमत्ता है। आँख में पड़े हुए तिनके को और पैर में धँसे काँटे को निकाल फेंक देना ही विवेकशीलता का चिन्ह है। पके फोड़े का मवाद जितनी जल्दी निकल जाय, उतनी ही सुविधा रहेगी। संचित क्रियमापा पापों को लादे न रहकर उनका प्रायश्चित कर लेना भी एक आवश्यक कृत्य है। अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले इस भार को उतारते और हल्के-फुल्के प्रगति पथ पर अग्रसर होने की दूरदर्शिता अपनाते हैं।
इसके लिये आवश्यक है कि अपनी स्मृति के सभी दुष्कृत्यों को विस्तार पूर्वक घटनाक्रमों तथा उनके साथ जुड़ी हुई परिस्थितियों के साथ मौखिक या लिखित रूप से मार्गदर्शक की जानकारी में लाते हैं। आधार पर पाप कर्मों के भारी हल्के होने का और तद्नुरूप परिशोधन, प्रायश्चित की विधि−व्यवस्था का निर्धारण बन पड़ता है।
यही आध्यात्मिक वमन विरेचन है, जिससे मानसिक सफाई का कार्य सम्भव हो पाता है।अपनी ओर से बात पूरी कर लेने पर दूसरे पक्ष का ही काम शेष रह जाता है। क्या उपाय करना है। क्या हल निकलना है इसके लिये प्रतीक्षा भी की जा सकती है। अपना पक्ष प्रस्तुत कर देने के उपरान्त साधक की मनःस्थिति ऐसी बन जाती है कि कठोर तितिक्षा साधनाओं के मूलभूत उद्देश्य अन्तर्मुखी होकर आत्मशोधन से लेकर आत्म−साक्षात्कार तक की लम्बी प्रक्रिया में तन्मयता एवं तत्परतापूर्वक जुटा जा सके।
इस प्रकार की कठोर साधनाएँ घर से बाहर अन्यत्र जाकर किसी तीर्थ की पवित्र भूमि में, शहरी कोलाहल से दूर,मर्यादाओं की व्रतशीलता में अपने आपको बाँध कर ही सही रीति से सम्पन्न हो पाती हैं। अन्यथा उलझे वातावरण में, अनमने मन से−उद्विग्न चित्त से, खीजते खीजते किसी प्रकार निभ कर लेने से कोई भी साधना उपक्रम सही प्रकार निभ नहीं पाता। कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनमें चिकित्सक के लिखित परामर्श और घर पर दावा भर लेते रहने से ही काम चल जाता है। परन्तु कुछ असाध्य व्याधियाँ ऐसी होती हैं कि अस्पताल में ‘इनडोर चिकित्सा’ करनी ही पड़ती है। लिये आवश्यक उपकरण, साधन तथा हर योग्यता के डॉक्टर, सर्जन, सहायक, परिचारिकाएँ हर समय उपलब्ध नहीं हो सकते। ये सुविधाएँ मात्र अस्पतालों में ही होती हैं। अस्तु बड़े उद्देश्यों की पूर्ति के लिये तद्नुरूप ही व्यवस्था बनानी चाहिए। साधना स्थल की परिस्थिति एवं साधक की मनःस्थिति दोनों ही सुविधाएँ समुचित स्तर की रहने पर ही साँसारिक एवं आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्णता सधती है।
कल्पवास में जो अनुबन्ध साधक पर लगाया जाता है उसके मूल में उद्देश्य एक ही है कि साधकों की मानसिक परिधि भी मर्यादित सीमा मर्यादा में ही केंद्रित रहे। बन्दर की तरह इधर−उधर उछलकूद न मचाये। योगीराज अरविंद ने विशिष्ट तप पुरुषार्थ हेतु इसी प्रकार का कुटी प्रवेश किया था। निजी साधना के क्षेत्र में भी ऐसे कितने ही तपस्वी होते हैं जो जीवन को निर्धारित परिधि में ही केंद्रीभूत रखते हैं, न शरीर को इधर उधर मचकने भटकने देते हैं एवं न मन को आवारागर्दी में भटकने देते है। उच्चस्तरीय साधनाओं में यही नीति अपनानी चाहिए। साधक को अंतर्जगत में ही शरीर एवं मन को सीमाबद्ध कर गुफा प्रवेश की समाधि साधना जैसा स्तर अपनी साधनावधि में बनाकर उसे निष्ठापूर्वक निभाना चाहिए।
आत्मसाक्षात्कार −आत्मदर्शन −आत्मबोध आदि की अध्यात्म शास्त्रों में भावभरी चर्चा है। भगवान बुद्ध को जिस वट वृक्ष के नीचे आत्मबोध हुआ था, उसे बोधि वृक्ष नाम दिया गया− देव तुल्य पूजा गया। उसकी टहनियाँ काटकर संसार भर के बौद्ध धर्मानुयायी ले गये और अपने−अपने यहाँ उसकी स्थापना करके वैसी ही देवात्मा बोधि वृक्ष उगाये। यहाँ चर्चा वृक्ष विशेष की नहीं हो रही है वरन् कहा जा रहा है कि आत्मबोध आत्मदर्शन ही उच्चस्तरीय देव वरदान है। जिसे उसकी उपलब्धियां जिस अनुपात में ही गयी, समझना चाहिए कि वह उतना ही बड़ा श्रेयाधिकारी वन गया।
सभी देव मानवों की अन्तः स्थिति यही रही हैं कि उनने अपने को जाना−समझा है और आत्म गौरव को प्रमुखता देकर तदनुरूप जीवनचर्या का निर्धारण किया है। इतने भर से आगे की सारी बात बन जाती है। सही दिशा में प्रवाह चल पड़े तो अन्ततः उसकी समाप्ति समुद्र मिलन के रूप में ही होगी। जिन भव−बंधनों को समस्त संकटों का, पतन−पराभवों का आधारभूत कारण माना जाता है वे और कुछ नहीं, मात्र आत्म विस्मृति के रूप में−निकृष्ट दृष्टिकोण के रूप में अन्तराल चर चढ़े हुए कषाय−कल्मष भर हैं।
अपने आप को विस्मृत कर देने के उपरान्त तो मात्र भटकाव ही भटकाव शेष रह जाता है। कस्तूरी मृग की निराशा और मृग तृष्णा की थकान की कथा प्रसंगों में बार−बार चर्चा होती रहती है। सियारों के झुण्ड में पले सिंह−शावक का जल में परछाई देखकर आत्मबोध होने और पिछला स्वभाव तत्काल बदल देने वाले दृष्टान्त सभी ने सुने हैं। इन उदाहरणों में उपनिषद्कार का वही उद्बोधन झाँकता है जिसमें–”आत्मा काऽरे ज्ञातव्यं ” आदि की हंकार है। गीताकार ने भी इसी आशय का मन्तव्य देते हुए कहा है–”उद्धरेत् आत्मनात्मान।” यह आत्मदर्शन ही प्रकारान्तर से ईश्वरदर्शन है। इसी उपलब्धि को जीवन्मुक्ति कहा गया है। जीवनलक्ष्य का चरम बिन्दु यहीं पहुँचने पर समाप्त होता है।
‘आत्मदर्शन’ शब्द रहस्यवादिता के भ्रम−जंजाल में फँसकर कुछ ऐसा बन गया है मानों किसी जादूई दृश्य को देखने और आश्चर्य चकित रह जाने जैसी कौतुक भरी स्थिति परिस्थिति की चर्चा की जा रही हो। ऐसा प्रतीत होता है आत्मा कोई अद्भुत आकृति की अन्तरिक्षवासिनी देवी होगी जो बिजली कौंधने की तरह साधक को अपनी छवि दिखाकर–वरदानों का पिटारा उस पर उड़ेलकर फिर आकाश में विलुप्त हो जाती होगी। इन बाल कल्पनाओं के लिए तो कोई क्या कहे? पर जिन्हें तत्वदर्शन समझने का–ब्रह्मविद्या के प्रतिपादनों में प्रवेश करने का अवसर मिला है−जो बौद्धिक दृष्टि से परिपक्व माने जा सकते हैं, उन्हें इस तथ्य को समझने में कहीं कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए कि अदृश्य आत्मा का दृश्यमान स्वरूप ही ‘जीवन’ है। उसी को आत्मसत्ता के रूप में−व्यक्तित्व की समग्रता के रूप में देखा−समझा जा सकता है। निराकार आत्मा का सही साकार रूप जीवन द व ही है। आत्मदेव की तुलना वेदान्त ग्रन्थों में कल्प वृक्ष से की गयी है और कहा गया है कि उसकी आराधना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होकर रहती हैं। इसी आत्मदेव को ‘आयमात्मा ब्रह्म−सच्चिदानन्दोऽहम्’ कहकर उसी की उपासना करने का निर्देश दिया गया है। प्रज्ञानं ब्रह्म, “तत्वमसि, शिवोऽहम्” जैसे सूत्र संकेतों में इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि अपना परिष्कृत आपा ही सुविकसित, सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचने पर परब्रह्म की−परमात्मा की–भूमिका निभाने लगता है। नर−पिशाच, नर−पशु, नर−कीटक की स्थिति तो तभी तक रहती है जब तक अपने आपे का बोध नहीं होता।
दुनियादारी पर छाई रहने वाली दुर्बुद्धिजन्य दुर्गति से उबारने में वेदान्त की शिक्षा ही समर्थ नौका का काम देती है। तत्त्व−दर्शन को अपनाने से आत्मबोध उभरता है। अपनी स्थिति का सही ज्ञान होता है। लगता है कि अज्ञान आच्छादन से छुटकारा पाना ही परम पुरुषार्थ है। यही जीवन लक्ष्य भी है। आत्मबोध को अध्यात्म दर्शन में परम पुरुषार्थ कहा गया है। यही चरम सौभाग्य है। इसी एक साधन के सधने से असंख्यों विपत्तियों से छुटकारा मिलता है और समस्त सिद्धियों का द्वार खुलता है। ब्रह्मविद्या की उपनिषद् चर्चा में अनेकानेक तर्कों, तथ्यों व मार्ग−उपचारों के माध्यम से श्रेयार्थी को एक ही शिक्षा−एक ही प्रेरणा दी गयी है कि वह माया−बन्धनों से मुक्त होने का प्रयत्न करे। ‘माया’ अर्थात् अपने को शरीर मानने की, उसे ही वासना तृष्णा से पोसने की ललक−लिप्सा। इस नरक दलदल से उबरने−उछलने की साहसिकता, दूरदर्शिता उभारने के लिये ही कई प्रकार के योगाभ्यास–तप साधन किये जाते हैं। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन−मनन के चारों प्रयोग उपचार इसी एक आवश्यकता की पूर्ति में नियोजित किये जाते हैं।
वेदान्त चिन्तन का समुद्र−मन्थन साधना अवधि में चलते रहने पर जिस सर्वोपरि उपहार अनुदान की उपलब्धि होती है उसे ‘अमृत’ कहते हैं। अमृत अर्थात् आत्मबोध। आत्मबोध अर्थात् जीवन सम्पदा की उच्चस्तरीय ईश्वरीय अनुदान के रूप में मान्यता। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे बन पड़े इसी चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।
आत्मा एक चेतन तत्व है, जो अपने रहने के लिए उपयुक्त शरीर का आश्रय लेता है और एक देह से दूसरी देह में जाता रहता है। भौतिक शरीर आत्मा को धारण करने के लिए विवश होता है। –गेटे
साधना विज्ञान के क्रमिक सोपानों पर चढ़ते−चढ़ते जब थोड़ा और ऊपर बढ़ते हैं तो कुण्डलिनी योग का उच्चस्तरीय साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
योग के 84 प्रकार बताये गये हैं परन्तु महत्वपूर्ण व उच्चस्तरीय क्रम में गिने जाने योग्य तो मात्र बारह हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, ऋजुयोग, नादयोग, भक्ति योग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, स्वरयोग, मन्त्रयोग तथा तन्त्रयोग। इन्हें प्रकारांतर से कुण्डलिनी जागरण साधना का ही माध्यम माना जाता है। इस प्रकार महत्वपूर्ण साधनाओं का निचोड़ एक ही पद्धति में समाविष्ट है और यही उसकी विशेषता है।
तन्त्र और योग–इन दो रूपों में साधना के वट वृक्ष की दो प्रधान शाखाएँ हैं। एक वाममार्ग, आगम या भौतिक सिद्धियों का क्षेत्र कहलाता है तो दूसरा दक्षिण मार्ग, निगम या आत्मिक ऋद्धियों की विद्या है। तन्त्र पक्ष को मानने वाले कहते हैं कि शरीर और मन में अजस्र शक्ति का भाण्डागार छिपा पड़ा है। हठयोग प्रधान तीव्र स्तर के साधना कर्मकाण्डों से इस शक्तिस्रोत को कुरेदा, उभारा और विकसित किया जाता है। इससे साधक की भौतिक सामर्थ्य तो बढ़ती ही है, आत्मिक उत्थान का पथ भी प्रशस्त होता चला जाता है। इस मार्ग का श्रेयार्थी कर्मकाण्डों के माध्यम से ही शरीर और मन को साधने की चर्चा करते हैं।
दूसरा पक्ष सौम्य है। दक्षिण मार्ग या निगम पथ को मानने वाले भौतिक प्रगति को कम तथा आत्मिक प्रगति को प्रमुख मानते हैं। हठयोग के स्थान पर वे ध्यानयोग को प्रमुखता देते हैं तथा इसी शक्ति केन्द्र को विकसित कर अनन्त आनन्द तथा विभूतियों की प्राप्ति इससे होती बताते हैं। इन दोनों ही मार्गों का समन्वय−सन्तुलन जिस एक साधना पद्धति में है उसका नाम है कुण्डलिनी योग। जहाँ ब्रह्मविद्या के पथ पर चलकर लक्ष्य की ओर बढ़ने वालों के प्रसुप्त के जागरण का लक्ष्य इससे सधता है, वही तन्त्र विज्ञानियों द्वारा इच्छित भौतिक प्रगति की सम्भावनाएँ भी इससे पूरी होती हैं। दोनों पक्षों के समन्वय से बनी यह उच्चस्तरीय योग साधना अपने आप में पूर्ण व समग्र है। सर्वप्रथम साधकों को इस योग साधना पर तन्त्र की मोहर लगने के कारण फैली भ्रान्तियों को मिटाकर इसकी प्राथमिक जानकारी ले लेना अभीष्ट होगा।
योग साधना के तत्ववेत्ता बताते हैं कि शरीर अपने आप में अद्भुत−अपरिमित शक्ति का भण्डार है। नित्य ही यह ब्राह्मी अनुदान के माध्यम से शक्ति अवशोषित करता तथा उपार्जन योग्य प्राण शक्ति को पचा व संग्रहित कर शेष वातावरण में छोड़ देता है। उसकी शक्ति जिन प्रयोजनों में अनावश्यक अपव्यय होती रहती है उसे यदि बचा लिया जाय और उसे सही दिशा में नियोजित कर दिया जाय तो साधना का प्रयोजन पूरा हो जाता है व प्रसुप्त शक्तियों को उभारना सम्भव बन पड़ता है। शक्ति ग्रहण का माध्यम तो प्राणाकर्षण प्रक्रिया है जो स्थूल रूप से श्वास प्रक्रिया के माध्यम से, पाचन प्रक्रिया के माध्यम से तथा सूक्ष्म रूप से विचार तरंगों व सूक्ष्म प्राण प्रवाह के रूप में सतत् सम्पादित होती रहती हैं। शक्ति अपव्यय की जानकारी होना बहुत अनिवार्य है। मनीषी तीन मार्ग बताते हैं जहाँ से सर्वाधिक शक्ति −क्षरण होता है। प्रथम तो जीविका उपार्जन के अनेकानेक प्रयोजन जिनमें परिवार का संचालन, सुव्यवस्था, श्रम, नित्य कर्म, जन संपर्क आता है। दूसरा मार्ग जहाँ से शक्ति का सर्वाधिक अपव्यय होता है– मानवी मन है जतो पढ़ता है, सोचता है, अनेकानेक आवेगों को जन्म देता है। इन्द्रिय भोग से जो शक्ति क्षरण होता है उसका प्रेरणा स्रोत भी मन है। शोक-भय-तनाव-अहंता-तृष्णा-संशय-आवेश जैसे आवेग मस्तिष्क की ही देन हैं जो बहुसंख्यक व्यक्तियों के शक्ति भण्डार को खाली कर देते हैं। तीसरा अन्तिम अपव्यय छिद्र है–शरीर का स्वचालित (आटोनॉमिक) स्नायु संस्थान। अनचाहे–बिना हमारे नियन्त्रण के जो गतिविधियाँ शरीर में चलती हैं, रक्त संचार से लेकर रस स्रावों तथा आहार पाचन से लेकर विसर्जन प्रक्रिया तक के मूल में अचेतन मस्तिष्क की गतिविधियों का ही प्राधान्य होता है। ये प्रेरणाएँ इतनी तीव्र होती हैं कि इन पर नियन्त्रण अनसधे मन व साधारण काया वाले मनुष्य से सम्भव नहीं। चाहते हुए भी शरीर व मन पर नियन्त्रण बन नहीं पाता व संग्रहित शक्ति समाप्त होती चली जाती है।
शरीर, मस्तिष्क व नाड़ी संस्थान ये तीन जीवन शक्ति उत्सर्जन के केन्द्र हैं। अलग-अलग जीवधारियों में विशिष्ट अनुपात में इन तीनों से सतत् अधोगामी प्रवाह रहता है। मात्र मनुष्य को ही यह विशेषता प्राप्त है कि वह इन तीनों पर आँशिक–नियन्त्रण स्थापित कर इस संग्रहित ऊर्जा को विशिष्ट प्रयोजनों में लगा सकता है। पानी रोककर बाँध बना लेना ही काफी नहीं है। उसे ऊंचाई से नीचे गिराकर शक्तिशाली टर्बाइन्स उस प्रवाह से चलाये जाते हैं तो अक्षय विद्युत भण्डार उसी साधारण से जल से उफन पड़ता है। शक्तियों के प्रवाह को रोक लेने भर से काम नहीं चलता–उन्हें सुनियोजित करना होता है ताकि अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सके। कुण्डलिनी योग साधना द्वारा यही प्रक्रिया सम्पादित की जाती है। जहाँ तन्त्र मार्ग कहता है कि अचेतन मन–नाड़ी संस्थान पर नियन्त्रण कर महासर्पिणी कुण्डलिनी को जगाया जाय, वहीं दक्षिण मार्ग की मान्यता है कि अचेतन मन पर नियन्त्रण तो स्थूल शक्तियों का नियमन पंच भौतिक क्रिया−कलापों का सम्पादन भर है। इससे तो मात्र साँसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं। इससे जन्म लेने वाले चमत्कार कौतूहल भर दिखाते हैं, आत्मिक प्रगति की दिशा में सहायक नहीं होते।
दक्षिणमार्ग व वाममार्ग का सन्तुलन बिठाते हुए कुण्डलिनी योग प्रतिपादन करता है कि मौन, ब्रह्मचर्य, उपवास, विश्राम आदि से जहाँ शरीर शक्ति के व्यय को बचा सकते हैं, प्रत्याहार−धारणा−ध्यान, समाधि आदि के द्वारा मन के कारण होने वाले शक्ति क्षरण को रोका जा सकता है। उसी प्रकार अचेतन नाड़ी संस्थान को सुनियोजित कर इड़ा−पिंगला−सुषुम्ना के प्रवाह का नियमन कर कुण्डलिनी जागरण का प्रबल पुरुषार्थ सम्पादित किया जा सकता है। यही शक्ति का वास्तविक सुनियोजन है। जहाँ वाम मार्ग शरीर, मन की गतिविधियों को महत्व नहीं देता वहाँ कुण्डलिनी योग संयमजन्य सामर्थ्य को प्रसुप्त की जागृति में अचेतन को मोड़ देकर अधोगामी प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाने की सम्भावनाओं का उद्घाटन करता है।
इन सभी तथ्यों, प्रतिपादनों से स्पष्ट होता है कि जहाँ स्थूल शरीर की सामर्थ्य को हठयोग, तन्त्रयोग व क्रियायोग जैसे माध्यमों से प्रसुप्त भौतिक सामर्थ्यों को जगाया जाता है वहाँ दूसरी ओर कुण्डलिनी योग की साधना द्वारा आत्मिक प्रगति का साधन पूरा किया जाता है। बात भी सत्य है। आत्मिक प्रगति की उपेक्षा करके अर्जित की गयी भौतिक सामर्थ्य किस काम की? आत्मा ही वह स्रोत है जहाँ से आकांक्षाएं एवं उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ जन्म लेती हैं। जब तक इस अन्तःक्षेत्र में अन्धकार छाया रहेगा आत्मोन्नति की बात बनेगी नहीं। मनीषी इसी कारण समन्वित साधना पद्धति से रूप में कुण्डलिनी योग की साधना बताते हैं जिससे दोनों ही प्रयोजन भौतिक व आत्मिक सधते हैं और मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है।
यह तो कुण्डलिनी योग का भूमिका पक्ष हुआ तथा वह विवेचन जिससे यह जाना जा सके कि साधनाओं की भूल−भुलैया में कौन−सा पथ क्या है? जब कुण्डलिनी विज्ञान की विशद विवेचना की बात आती है तो का पहलू सामने आते हैं जिन पर प्रकाश पड़ना अनिवार्य है। सूक्ष्म रूप में अवस्थित इस शक्ति संस्थान का निवास, इसे जगाने की प्रक्रिया, परिणतियों–प्रतिक्रियाओं को समझ सकने योग्य विवेक−बुद्धि का विकास तथा जागरण के बाद अन्तिक लक्ष्य–कुछ ऐसे अध्याय हैं जिन पर क्रमशः विस्तृत विवेचन किया जाना है। साधकगण इसे पहले भी इस पत्रिका में पढ़ते रहे हैं, परन्तु इसके समग्र स्वरूप को बोधगम्य बनाया जा सके, यह प्रयास अब किया जा रहा है।
कुण्डलिनी योग की एनोटॉमी का जब जिक्र करते हैं तो यह तथ्य हृदयंगम किया जाना जरूरी है कि अध्यात्म शास्त्र में जहाँ भी शरीर विज्ञान का वर्णन आया हैं, वह विशुद्ध रूप से सूक्ष्म संरचना की विवेचना है। स्थूल काया में तो उसकी प्रतीक छाया ही देखी जा सकती है–उन्हें एक प्रकार का ‘सिम्बल’भर माना जा सकता है। शरीर विच्छेद कर यदि षट्चक्रों को ढूँढ़ने लगें तो यह प्रयास निराशाप्रद तथा हास्यास्पद होगा। सूक्ष्म विद्युत्प्रवाहों को – भंवर−चक्रवातों को इन चर्म चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता।स्थूल अंगों से तो मात्र उन सूक्ष्म शक्तियों की निकटता का आभास मात्र मिलता है।
मानवी काय सत्ता में दो ध्रुव प्रदेश हैं जैसे पृथ्वी पर उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव हैं। उत्तरी शक्ति केन्द्र मस्तिष्क के बीचों−बीच स्थित ब्रह्मरंध्र है तो दक्षिणी शक्ति केन्द्र जननेन्द्रिय मूल में स्थित मूलाधार। आध्यात्मिक संरचना की दृष्टि से इन दो ऊर्जा केन्द्रों का ही सर्वाधिक महत्व है। त्वचा, आंखें, वाणी, उँगलियाँ व जननेन्द्रियों का बाह्य स्वरूप वे अवयव विशेष हैं, जहाँ से शक्ति धाराएँ बाहर की ओर विस्सृत होती हैं व आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है। पृथ्वी पर जो प्राण रूपी जीवन है उसका मूल स्रोत है–ब्रह्मांड में संव्याप्त चेतन प्रवाह। पृथ्वी भी साँस लेती –अवशोषित करती व छोड़ती है। उत्तरी ध्रुव से जो भी आवश्यक है, ग्रहण कर लिया जाता है तथा अवशिष्ट दक्षिणी ध्रुव से होकर अन्तरिक्ष में वापस फेंक दिया जाता है। इसी कारण हिमाच्छादित इन ध्रुव प्रदेशों को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से तो इनकी महत्ता सर्वविदित है ही। यदि यहाँ थोड़ा−सा भी हेर−फेर होने लगे तो उसका प्रभाव मौसम की प्रतिकूलता के रूप में सारे पृथ्वी के वायुमण्डल पर होता है। ठीक इसी प्रकार मानवी काया के दोनों ध्रुव चेतना क्षेत्र में अपनी भूमिका सम्पादित करते हैं। इन दोनों ध्रुवों को मिलाने पर सुषुम्ना रूपी जो प्रवाह मेरुदण्ड क्षेत्र में बनता है–वह सारा स्वरूप मिलकर कुण्डलिनी शक्ति का सूक्ष्म ढाँचा बनाता है। कहा जाता है कि यह शक्ति प्रवाह सर्पिणी की तरह है जिसकी पूछे नीचे है व फन ऊपर। मल−मूत्र छिद्रों के मध्य अवस्थित क्षेत्र जिसे कूर्म या मूलाधार कहते हैं– एक विलक्षण प्रकार की आत्म तड़ित का निवास स्थान है। यह महासर्पिणी की पूँछ वाला क्षेत्र हुआ। दूसरा सिरा मस्तिष्क के मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र है जहाँ की बनावट इस प्रकार की है मानो एक विद्युत का फव्वारा छूट रहा हो अथवा एक केन्द्र के चारों ओर आरी के छोटे−छोटे दाँते हों। इसे सहस्रार कमल कहते हैं। इसे महासर्पिणी का फन वाला क्षेत्र कह सकते हैं। इन दोनों के बीच में जो सर्प की काया विद्यमान है वह सुषुम्ना प्रवाह है जो ‘स्पायनल कार्ड ‘ के अन्दर सूक्ष्म रूप में विद्यमान है तथा जिसके दोनों ओर इड़ा व पिंगला रूपी सतत् प्रवाह गतिमान हैं।
जब किसी फुलझड़ी को जलाया जाता है तो चिनगारियाँ उड़ने लगती हैं। इसी प्रकार दोनों ध्रुव केन्द्रों के मिलन से मूलाधार–सहस्रार के मिलन संयोग से एक दिव्यधारा प्रवाहित होती है जिसे कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं। समस्त सिद्धियों की बीज स्थली यह प्रवाह स्फुरित जागृत व गतिमान होने पर साधक को अतिसमर्थ बनाता चला जाता है। इस विद्युत की तुलना में सारे संसार के बिजली घर जो जड़ विद्युत उत्पन्न करते हैं, कहीं सानी नहीं रखते। शरीर का यह कुंडलिनी विद्युत्भण्डार जड़ और चेतन, भौतिक और आत्मिक दोनों प्रकार की शक्तियों का अलौकिक समन्वित स्वरूप है।
मूलाधार केन्द्र–शरीर के दक्षिणी ध्रुव प्रदेश को अग्नि स्वरूप माना गया है।कुण्डलिनी महाशक्ति का परिचय देते हुए कहा गया है कि वह अग्नि कुण्ड में सुप्त सर्पिणी की तरह पड़ी हुई है। दूसरी ओर उत्तरी ध्रुव सहस्रार चक्र को अमृत कलश कहते हैं। वहाँ से सतत् कलश कहते हैं। वहाँ से सतत् सोमरस प्रवाहित होने का उल्लेख मिलता है। इस अमृत स्राव का प्रवाह अधोमुखी है। यह कुण्डलिनी मूल तक जाता है। कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य है–प्रसुप्त घड़ी विष उगल रही– वासना की जलन में तड़प रही सर्पिणी को अमृत रस का पान कराना–उसके प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाना। इस अलंकारिक चित्रण के पीछे दर्शन यही है कि निरन्तर शक्ति अपव्यय के माध्यम से हम जिस प्रवाह को पतनोन्मुख बनाये रखते हैं–उसे योग साधना रूपी पुरुषार्थ से हम ऊपर भी उठा सकते हैं। अमृत रस अर्थात्–अक्षय आनन्द। आत्मिक रसानुभूति से बढ़कर कोई और आनन्द नहीं। जीव का प्रतीक स्वरूप है प्रसुप्त पड़ी मूलाधार अवस्थित कुण्डलिनी और इसका मिलन जब परमेश्वर रूपी सहस्रार से होता है तो अद्वैत मुक्ति की स्थिति आती है। जीव वासना की तपन में जलता रहता और शरीर−मन की दिव्य सम्पदा को विनष्ट करता रहता है। इस जलन का समाधान सोमरस पान से–आत्मिक रसास्वादन से–बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कृष्टता की दिव्यानुभूति से ही सम्भव है।
कुण्डलिनी के दो छोरों में मूलाधार के साथ ‘कन्द ‘ शब्द की चर्चा शास्त्रों में होती रहती है। स्थूल शरीर में इसका प्रतिनिधि है–सुषुम्ना का निचला सिरा ‘काँडा इक्वाइना’। ‘काँडा’ अर्थात् पुँछ, ‘इक्वाइना’ अर्थात् घोड़ा। मेरुदण्ड मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर अन्तिम कशक्का तक जाता है व वहाँ समाप्त होकर धागों−फ इबर−फि लामेण्ट्स का स्वरूप ले लेता है। इन नाड़ी तन्तुओं से ही वह विद्युत्प्रवाह निकलता है जो मूलाधार स्थित चक्र−संस्थान बनाता है। यही घोड़े की पूँछ के आकार का अवयव सूक्ष्म शरीर के ‘कन्द’ का प्रतिनिधिक कहा जाता है। एनोटॉमी विज्ञान की दृष्टि से यह मल−मूत्र छिद्रों का मध्य भाग है। मूलाधार का अर्थ जड़ सहायक−मूलभूत शक्ति आधार। चूँकि यह सूक्ष्म है इस कारण अदृश्य है। यही प्राण का उद्गम केन्द्र है। इसके शरीर रचना विज्ञान के विस्तार में जाने का तो अभी अवसर है भी नहीं। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि प्रोस्टेट,ग्लैण्ड, लम्बर−सेक्रल फ्लेक्सस (नाड़ी गुच्छक), जननेन्द्रिय अंग, सुषुम्ना का निचला हिस्सा (काँडा इक्वाइना) तथा वहाँ स्थित आटोनॉमिक गेन्गलियान मिलकर जो जटिल रचना बनाते हैं वह अपने आप में एक जेनरेटर हैं। यहीं से खुला छोड़ने पर जीवनी शक्ति का अपव्यय तथा निरोध करने पर शक्ति संचय, स्फुरण तथा जागरण की प्रक्रिया होती है जो विभिन्न ध्यान योग की साधनाओं के सम्पुट से ऊर्ध्वगमन में परिणति होती है।
जीवनी शक्ति, उमंगें, क्रिया शक्ति,उत्साह आदि का केन्द्रस्थल यही मूलाधार का कन्द कुण्ड है। यहाँ से जाज्वल्यमान ज्योति ऊपर उठती हुई स्वाधिष्ठान, मणिपरित, नाभिचक्र, हृदय कमल के अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, भ्रूचक्र, आज्ञा चक्र में विभिन्न रूपों में प्रस्फुटित होती– सहस्रार चक्र में पहुँचती है। यहाँ पर रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम (चेतना के लिये उत्तरदायी संस्थान) को उत्तेजित कर वह प्रसुप्त पड़े केन्द्रों को जगाती है तथा सिद्धियों व ऋद्धियों का द्वार खोलती है। योग कुण्डल्धुपनिषद्, शारदा तिलक, ज्ञानार्णत तन्त्र, कुनार्णव तन्त्र, घटचक्र निरूपण, तन्त्रसार, शिव संहिता जैसे कुण्डलिनी शक्ति के माहात्म्य व जागरणजन्य परिणतियों के वर्णन से भरे पड़े हैं।
कुण्डलिनी जागरण की साधना काम−बीज के प्रतीक मूलाधार और ज्ञान−बीज के प्रतीक सहस्रार के मिलन संयोग की दिव्य प्रक्रिया है। इस साधना में भौतिक व आत्मिक शक्तियों के स्वाभाविक पारस्परिक शिथिल सम्बन्धों को सघन बनाया जाता है। दानों के मध्य आदान−प्रदान की गति तीव्र बनायी जाती है। मेरुदण्ड रूपी महामार्ग के माध्यम से मही प्रयाण की ऊर्ध्वगमन की देवयान प्रक्रिया इसी साधना द्वारा सम्पादित की जाती है।
आत्मोत्कर्ष की साधना के अनेकानेक प्रसंगों में विज्ञान सम्मत प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान तथा सूक्ष्म अध्यात्म विद्या के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का इसमें अद्भुत समावेश है। उच्चस्तरीय साधना−पथ पर चलने वाले हर साधक को इसकी समुचित जानकारी होना चाहिये।
कुण्डलिनी महाशक्ति के भूमिका पक्ष के विवेचन में दो ध्रुवों की चर्चा हुई थी। उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव, सहस्रार तथा मूलाधार, शिव एवं शक्ति इन नामों से पुकारा जाता है। इन्हें परस्पर जोड़ने वाली शक्ति का नाम ही कुण्डलिनी है तो साढ़े तीन फेरे लिये महासर्पिणी के रूप में मेरुदण्ड क्षेत्र में परिभ्रमणशील है। नीचे से ऊपर मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा काम−बीज से ब्रह्मबीज की ओर महायात्रा कहलाती है जिस पर योगीजन चलते हुए अपने परम लक्ष्य तक पहुँचते हैं। जीव सत्ता मूलाधार स्थित जननेंद्रिय मूल में निवास करती है तो ब्रह्म सत्ता का निवास ब्रह्मलोक–ब्रह्मरंध्र–सहस्रार माना जाता है।
मेरुदण्ड रूपी राजमार्ग पर आत्मोत्कर्ष की,महायात्रा में कुछ विराम स्थान आते हैं जिन्हें ‘चक्र’ कहा जाता है। इन अनुदान केन्द्रों के अन्तराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं। साहसी–सुयोग्य–पुरुषार्थी योगी–ही इन विभूतियों को पा सकते हैं। ईश्वर ने इसीलिये इस वैभव को तिजोरी में बन्द करके रख छोड़ा है ताकि प्रौढ़ता–परिपक्वता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने– उपयोग करने का अवसर मिल सके। चक्रवेधन, परिष्कार, जागरण की चर्चा करने से पूर्व उनकी पृष्ठभूमि, सूक्ष्म संस्थान में स्थिति तथा प्रसुप्ति के कारणों आदि पर पहले प्रकाश डालना ही उचित होगा। भौतिक शक्तियों के प्रतीक दक्षिणी ध्रुव मूलाधार और आत्मिक शक्तियों के उद्गम केन्द्र सहस्रार के बीच जो चेतन कड़ी है उसे अध्यात्म की परिभाषा में सुषुम्ना संस्थान कहते हैं। इस शक्ति संस्थान के अन्तराल में प्रवाहित विद्युतधारा प्रवाह के साथ जो उच्चस्तरीय विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं उन्हें तत्वदर्शी भली−भाँति जानते हैं। यहाँ प्रचण्ड वेगवान विद्युतधाराएं बहती हैं जिनमें से एक ऋण है दूसरी धन। ऋण इड़ा है–धन पिंगला। दोनों जब भी परस्पर मिलती हैं– शक्तिधारा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है और इस मिलन प्रक्रिया को ही सुषुम्ना कहते हैं। ये स्थूल स्नायु नाड़ियाँ नहीं हैं। मात्र विद्युत्प्रवाहों का संकेत इनसे लिया जा सकता है। मेरुदण्ड का ‘डिसेक्शन’ कर उसमें इन्हें स्थूल रूप से देखा नहीं जा सकता। योगशास्त्र की यह विद्या पूर्णतः सूक्ष्म विद्युत विज्ञान के ढाँचे पर खड़ी है। दोनों ध्रुवों के बीच दौड़ने वाले शक्ति प्रवाह को इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का समन्वय कहा जा सकता है। अलंकारिक रूप में उन्हीं को गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन से बनने वाली त्रिवेणी की उपमा दी जाती है।
जिन नदियों में प्रवाह तीव्र होता है वहाँ भँवर पड़ते रहते हैं। इनमें अप्रतिम सामर्थ्य होती है। इनमें फँसकर नावें अपना सन्तुलन खो देती हैं और उलट भी जाती हैं। जब हवा तेज और गरम होती है तो चक्रवात उठते है। ‘टारनेडो’ नाम से प्रसिद्ध ये चक्रवात अतिशक्तिशाली वस्तुओं को भी हवा में उड़ा ले जा सकने की सामर्थ्य रखते हैं। ‘चक्र’ नाम शक्ति की संचरण प्रक्रिया के एक सुव्यवस्थित–सुनिश्चित क्रम को दिया गया है। विज्ञान में जहाँ भी चक्र (साइकिल्स) की चर्चा होती है उससे आशय विद्युत, ध्वनि, प्रकाश आदि ऊर्जा के विभिन्न स्वरूपों के शक्ति संचार क्रम से होता है। एक पूरी तरंग बनने का क्रम साइकिल (चक्र) कहलाता है। ये एक के बाद एक बनती चली जाती हैं व शक्ति क्रमिक रूप से प्रवाहित होती रहती है। ठीक इसी प्रकार सुषुम्ना संस्थान में प्रवाहित चित्शक्ति को अति प्रचण्ड विद्युतधारा माना गया है इसमें भी भँवर पड़ते है, जिन्हें शक्ति चक्र कहते हैं। जागृत कुण्डलिनी की अग्नि शिखा जैसे−जैसे अधिक तीव्र होती जाती है, ऊपर उठती है, और इन चक्रों को उष्ण कर–उनमें हलचल उत्पन्न कर उन्हें जागृत व सक्रिय बनाती चली जाती है। ऐसे चक्रों की संख्या योगशास्त्र के अनुसार छह हैं। इन्हें ‘षट्चक्र’ जैसे सुप्रसिद्ध नाम से जाना भी जाता है। वस्तुतः यह सात हैं। अन्तिम सहस्रार है। चूँकि वह ऊर्ध्वगमन की अन्तिम परिणति है व सबका अधिपति है, उसे गणना से अलग ही रखा गया है। संख्या की उलझन में फँसने की अपेक्षा इन सात शक्ति चक्रों –सात लोकों के प्रतीक, विराट् सत्ता से सम्बन्ध स्थापित कर सकने वाले मर्मस्थलों को हमें और विस्तार से समझना चाहिए।
सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर अनुभूति कर योगी–तत्वदर्शियों ने मेरुदण्ड के सुषुम्ना संस्थान में जिन छह चक्रों को माना है–वे हैं–मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र। अन्तिम है सहस्रार। इनमें से शरीर विज्ञान के आधार पर मूलाधार को पेल्विकसेक्रलप्लेक्ससस, मणिपूर को सोलर प्लेक्सस, अनाहत को कार्डियक प्लेक्सस, विशुद्धि चक्र को फैरेन्जियल प्लेक्सस, आज्ञाचक्र को पीनियल –पिचुचरी एक्सिस तथा सहस्रार को रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम रूपी थेलेमस से उत्सर्जित विद्युत फव्वारे के समकक्ष अब वैज्ञानिकों ने मान लिया है। वस्तुतः ये उनके समीपस्थ भर हैं–स्थूल रूप में विद्यमान प्लेक्सस के नाड़ी गुच्छक नहीं हैं। इस तथ्य को कुछ उदाहरणों से भली प्रकार समझा जा सकता है।
जहाँ पर्वतीय स्थलों पर भूगर्भ की जलधारा का प्रवाह फूट पड़ता है उसे झरना कहते हैं तथा वहाँ जल का प्रवाह तीव्र होता है। गंगोत्री ग्लेशियर से गोमुख से निकलकर आने वाली भागीरथी का प्रचण्ड प्रवाह देखते बनता हैं। इस प्रवाह से जो कोलाहल–उथल−पुथल मचती है। उसे सभी जानते हैं। चक्र संस्थानों को भी एक प्रकार से स्थान विशेष से झरना फटने की तरह माना जा सकता है। भूगर्भीय ताप ज्वालामुखी के लावा के रूप में फट पड़ता है। इसी प्रकार सुषुम्ना स्थित चक्रों से शक्ति का प्रस्फुटीकरण होता है। जहाँ−जहाँ समुद्र में तूफान आते हैं, तीव्र गति के ज्वार−भाटे व साइक्लोन्स आते रहते हैं वहाँ वैज्ञानिकों ने अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ से शक्ति दोहन कर उससे विद्युत उत्पादित करने में महत्व पूर्ण सफलता पायी है। भूमध्य सागर, कैस्पियन सी तथा हालैण्ड के समीपवर्ती समुद्री क्षेत्रों में तो ऊर्जा का इसे महत्वपूर्ण स्रोत बना लिया गया है। भौतिक क्षेत्र की ही भाँति आत्मिक क्षेत्र में भी योगीजन चक्र संस्थानों से उभरती−उफनती विद्युत का प्रयोग कर दैवी क्षमताएँ उपलब्ध करते हैं। यह तथ्य समझा जाना चाहिए कि ये सूक्ष्म ग्रन्थियाँ इन्द्रियों व उपकरणों की पहुँच से बाहर हैं। इन्हें जागृत अंतर्दृष्टि से ही दृष्टिगोचर किया, समझा व प्रयुक्त किया जा सकता है। इस पूरी विद्या की जानकारी उथली होने पर साधक को व्यर्थ भ्रम में डालती है। वैसी स्थिति न आने पाये व इस सूक्ष्म विद्या के प्रति अनास्था विकसित हो, व्यर्थ समय भी नष्ट हो व हाथ कुछ लग न आये, उनके लिये योगविज्ञान के इन उच्चस्तरीय आयामों की क्रमिक विस्तृत जानकारी अनिवार्य है।
वैसे योगवाशिष्ठ, योगचूड़ामणि, दैवी भागवत, शारदा तिलक, शांडिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोग संहिता, कुलार्णव तन्त्र, योगिनी तन्त्र, बिन्दूपरिषद्, रुद्रयामल तन्त्र आदि योग ग्रन्थों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर गम्भीर विवेचन हुआ है। पर वह ऐसा नहीं है कि साधारण साधक उसे समझ सकें और उस अनुभव के आधार पर सफलता प्राप्त कर सकें। इन ग्रन्थों में मार्गदर्शक को माध्यम बनाकर सूत्र संकेत भर दे दिये गये हैं व माहात्म्य बता दिया गया है। इसी कारण इसे जन−मानस के समझने योग्य बनाना व उत्सुक सुपात्र साधक को इस मार्ग की ओर प्रवृत्त करने हेतु समुचित मार्गदर्शन देने का एक महत् उत्तरदायित्व उन पर आ जाता है जिन्होंने अपने जीवन में इन साधनाओं को अपने ऊपर परीक्षित किया।
पौराणिक उपाख्यानों में पुरुषार्थ का प्रतीक और शक्ति का पुत्र कार्तिकेय स्कन्द को माना गया है। वैसे उन्हें शक्ति शक्ति की देवी पार्वती का पुत्र माना जाता है, पर शिव पुराण के अनुसार उन्हें छः कृतिकाओं ने पाला–अग्नि ने गर्भ में धारण किया। शिव का रेतस् अग्नि के रूप में स्फुरित हुआ तथा उसे वैश्वानर ने नारी शक्ति के रूप में ग्रहण कर अपने ही भीतर परिपक्व किया। इन कार्तिकेय स्कन्द के 6 मुखों। इसी से उन्होंने व्यवधानों में देव शक्तियों का परिवाण किया। स्कन्द अवतरण के इस आख्यान को वस्तुतः अलंकारिक बनाया गया है। वैश्वानर ‘अग्नि’ कन्द कुण्ड में प्रदीप्त कुण्डलिनी शक्ति का मूलाधार है। शिव रूपी सहस्रार के जागृत−प्रफुल्लित होने पर जो पराग−मकरन्द निर्झतिर हुआ–वह ’रेतस्’ है। छः कृतिकाओं ने जिन्होंने इसे परिपक्व किया–षटचक्रों के प्रतीक हैं। शिव−शक्ति, परमात्मा−जीव, पुरुष प्रकृति का यह समन्वय ही स्कन्द रूपी महापराक्रम के रूप में प्रकट हुआ।
सूक्ष्म शरीर में अवस्थित इन छः चक्रों के ऐसे ही पौराणिक वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में मिलते हैं। सार सबका यही है कि ये 6 केन्द्र छह ट्राँसफार्मर कहे जा सकते हैं। इनका कार्य है निखिल आकाश में संव्याप्त प्राणतत्व में से अभीष्ट मात्रा में प्राण ग्रहण कर व्यक्ति की मनस्विता को सुनियोजित रखना। ये स्वयं गतिशील रहते व मनुष्य के समग्र संस्थान को–ग्रन्थि−उपत्यिकाओं को–विद्युत्प्रवाह को भी गतिमान बनाये रखते हैं। इसकी अशक्तियाँ विकार ही व्यक्ति को आत्मिक–मानसिक दृष्टि से दुर्बल बना देते हैं भले ही बहिरंग में वह कितना ही बलिष्ठ क्यों ने हो? योगी इन चक्रों को न केवल जगाने–गतिमान रखने वरन् इनके माध्यम से कुण्डलिनी के विद्युत्प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाकर−भौतिक व आत्मिक विभूतियों को प्राप्त करने की विद्या बताते हैं। इनकी परिष्कृति से मनुष्य महात्मा, देवात्मा, परमात्मा के स्तर तक पहुँच सकता है ओर ऋद्धि−सिद्धियों से सम्पन्न बन आत्मकल्याण व लोक−कल्याण के द्विविध प्रयोजन पूरे करते रह सकता है। इसी शक्ति को भौतिक प्रयोजनों में लगाकर व्यक्ति प्रखर प्रतिभावान बन जाते, उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच जाते हैं। ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी ऐसे ही महापुरुष कहलाते हैं। इस सूक्ष्म संस्थान को आत्मिक प्रयोजनों में नियोजित करने की फलश्रुतियाँ अवर्णनीय है। चित् शक्ति को विकसित कर–सूक्ष्म पर छाई मूर्च्छना को जगाने की यह साधना आत्म−परिष्कार का ही प्रबल पुरुषार्थ है।
इनमें से प्रत्येक चक्र के क्या कार्य है? जागरण की क्या फलश्रुतियाँ है? इस पर विस्तार से प्रत्येक के विषय में आगे विवेचन किया गया है परन्तु ‘शारदा तिलक’ जैसे तन्त्र महाविद्या के अद्वितीय ग्रन्थ से उद्धृत एक विवरण यहाँ दिया जा रहा है जो समग्र रूप में षटचक्रों का निरूपण करता है। ग्रन्थकार लिखता है–
गुदलंगनतरे चक्रमाधारं तु चतुर्दलम्। परमः सहजस्तद्वदानन्दौ वीर पूर्वकः॥ योगानन्दश्च तस्य स्यादीशानादिदलेफलम्। स्वाधिष्ठानं लिग म्ले षटपत्रंचा क्रमस्यतु॥ पूर्वादिषु दलेष्वाहुः फलान्येतान्यनुक्रमात्। प्रश्रयः क्रूरता गर्वोनाशो म्च्छा ततः पमर्॥ अवज्ञा स्याद विश्वासो जीवस्य चरतोध्रुवम्। नाभौदशदलं चक्रं मणिपूरक संज्ञकम्॥ सुषुप्तिरत्र तृष्णा स्यादीर्ष्या पिशुनता तथा। लज्जा भयं घृ़णा मोहः कषायोऽथदिषादिता॥ हृदयेऽनाहतं चक्रं दलैर्द्वादशभिर्युतम्। लौल्यं प्रनाशः कपं वितर्कोप्यनुता पता॥ आशा प्रकाशशिचन्ताँ च समीहा ममत ततः। क्रमेण दम्भो कल्यं विवेकोऽहंक्व तिस्तथा॥ फलान्येतानि पूर्वादि दलसथ स्यात्मनो जगुः। कण्ठेऽस्ति भारतीस्थानंविशुद्धिःषोडशच्छदम्॥ तत्र प्रणव उद्गीथो हुँ फट् वषट् स्वथातथा। स्वाहा नमोऽमृतं सप्तस्वराः षड्जादयोविषम्। इति पूर्वादिपत्रस्थे फलान्यात्मनि षोडश।
अर्थात्–गुदा ओर लिंग के बीच चार पंखुड़ियों वाला आधारचक्र है। वहाँ वीरता और आनंद भाव का निवास है।
–इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है इसकी छः पंखुड़ियाँ हैं। इसके जागृत होने पर क्रूरता, गर्व आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गुणों का नाश होता है।
–नाभि में दश दल वाला मणिपूर चक्र है। ये प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय घृणा, मोह आदि कषय−कल्मष मन में जड़ जमाये पड़े रहते हैं।
–हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बार पंखुड़ियों वाला है। यह सोता रहे तो लिप्सा, छद्म कुतर्क, चिन्ता,मोह, दम्भ, अविवेक, अहंकार से भरा रहेगा। जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे।
–कण्ठ में विशुद्धि चक्र है, जो सरस्वती का स्थान है। यह सोलह पंखुड़ियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ−सोलह विभूतियाँ विद्यमान है।
–भ्रूमध्य में आज्ञाचक्र है। यहाँ ॐ (प्रणव) उद्गीथ,हुँ, फट, विषद्, स्वधा, अमृत,सप्त स्वर आदि का निवास है। इस आज्ञाचक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियाँ जाग पड़ती हैं।
षट्चक्र जागरण की फलश्रुतियाँ दिव्य हैं, नगण्य हैं। शास्त्रकारों ने इन संस्थानों के जागरण से मिलने वाली षट्सम्पत्तियों का वर्णन किया है जिन्हें ऋद्धियाँ या आत्मिक उपलब्धियाँ भी कहते हैं।
षट्सम्पत्ति हैं–शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा समाधान। शम का अर्थ है शान्ति। उद्वेगों का, तनावों का, सन्तापों का शमन। दम का अर्थ है इन्द्रियों को दमन करने की निरोध की सामर्थ्य का विकास। उपरति अर्थात्−दुष्टता से घृणा तथा जूझने का सत्साहस। तितिक्षा अर्थात्–कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करने की सामर्थ्य। श्रद्धा अर्थात्–सन्मार्ग में प्रगाढ़ निष्ठा, विश्वास और भावना का समन्वय। समाधान–अर्थात् सारे व्यामोह के बन्धनों, संशय−लिप्साओं से छुटकारा।
वस्तुतः चक्रों की जागृति मनुष्य के गुण,कर्म,स्वभाव को प्रभावित करती है। उसका चिन्तन उत्कृष्ट बनता है तथा कर्मों में आदर्शवादिता का समावेश होता है। मूलाधार की जागृति मनुष्य में उच्चस्तरीय आनन्द, शौर्य, और कर्मनिष्ठा की भावना विकसित करती है तो स्वाधिष्ठान के जागरण से मनुष्य अपने में नव शक्ति का संचार होते, बलिष्ठता बढ़ते, उत्साह और स्फूर्ति में क्रमिक अभिवृद्धि होते अनुभव करता है। मणिपूर के स्फुरित होने से संकल्पों में दृढ़ता व पराक्रम की भावना का विकास होता है। मानसिक विकास घटते चले जाते हैं व परमार्थ प्रयोजनों में रस आने लगता है।
अनाहतचक्र को योग विज्ञान में भाव संस्थान की उपमा दी गयी है। कलात्मक उमंगें–रसानुभूति और कोमल संवेदनाओं का उद्गम स्रोत यही है। आदर्शवादी विवेकशीलता, आत्मीयता विस्तार,उदार सहकारिता के तत्व इसी चक्र से उद्भूत होते हैं। कण्ठस्थित विशुद्धि चक्र का जागरण अन्तरंग को पवित्र–दोष−दुर्गुणों से विरत बनाता है। सारी अतीन्द्रिय क्षमताएँ यहीं से जन्म लेती है। चेतना की इस अति महत्वपूर्ण शक्ति पर नियन्त्रण एवं परिष्कार कर सकने की सामर्थ्य इस चक्र के जागरण की ही फलश्रुति है। दिव्य श्रवणातीत का श्रवण, दूरदर्शन, पदार्थ हस्तान्तरण, विचार संप्रेषण विशुद्धि चक्र के ही चमत्कार हैं।
आज्ञाचक्र सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कहा जा सकता हैं। सारे अचेतन का नियन्त्रण व सूक्ष्म जगत की गतिविधियों की मॉनीटरिंग इससे सम्भव है। सहस्रार मस्तिष्क के मध्य भाग में हैं। शरीर संरचना में साम्य की दृष्टि से इससे सबसे निकट है, थेलेमस से उठने वाला विद्युत का फव्वारा –’रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम।’ यहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उठता है। यह विद्युत सारे शरीर के सम्वेदना तन्तुओं से आने वाले प्रवाहों का सम्मिश्रित स्वरूप है और एक जालीनुमा अवयव के माध्यम से मस्तिष्क के एक−एक कोष्ठक तक जाकर उसे प्रभावित करती है। सहस्रों की संख्या में दौड़ती इन छोटी−छोटी चिनगारी तरंगों को ही सहस्रार की उपमा दी गयी है। ऐसा सशक्त राडार यन्त्र इस माध्यम से बनता है जो सारे ब्रह्मांड से संपर्क बना सकने व आदान−प्रदान की क्षमता अपने अन्दर रखता है। इसलिये इसे ब्रह्मरंध्र या ब्रह्मलोक भी कहते हैं। इसके माध्यम से बांये व दाहिने मस्तिष्क के उन प्रसुप्त केन्द्रों को जगाया, विकसित किया जा सकता है जिनमें असीम सामर्थ्य का भण्डार भरा पड़ा है, पर प्रसुप्ति के कारण जो मनुष्य को सामान्य बनाये हैं।
समग्र चक्र संस्थान को यदि जागृत नियन्त्रित किया जा सके तो आत्म जगत पर आधिपत्य स्थापित कर आदतों को मोड़ देना तथा अपने आपको बदल सकना सम्भव हैं। यह आत्म विजय ऋद्धि−सिद्धिदायक तो है ही; अपने ढंग की अद्भुत सफलता है। षटचक्रों के सम्बन्ध में आद्य शंकराचार्य ने लिखा है इस साधना में आत्मिक सफलताओं के साथ−साथ भौतिक सिद्धियाँ भी प्राप्त की जा सकती है। आठ प्रमुख सिद्धियाँ बताते हुए वे लिखते है–(1) जन्म सिद्धि–पूर्व जन्मों की स्थिति का सहज आभास, (2) शब्द ज्ञान सिद्धि–शब्दों के साथ जुड़ी भावनाओं का आभास,(3) शास्त्र सिद्धि–विस शास्त्र वचन को किस प्रकार प्रयुक्त करना–यह सूक्ष्म ज्ञान, (4) आधि दैविक ताप सहन शक्ति –दैवी प्रकोपों अथवा प्रारब्धजन्य विपदाओं को धैर्यपूर्वक सहन करना, (5) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति –काम, क्रोध, लोभ, मोहादि उद्वेगों पर कठोर नियन्त्रण, (6) आधि भौतिक ताप सहन शक्ति –सर्दी,गर्मी आदि शरीर कष्टों को शान्तिपूर्वक सह लेना व उद्विग्न न होना (7) विज्ञान शक्ति –सन्तुलित हँसमुख व्यक्तित्व–निश्छल अन्तःकरण, कर्त्तव्य निष्ठा, (8) विद्या शक्ति –अर्थात् आत्मा के स्वरूप व उद्देश्य पर विश्वास युक्त निष्ठा ईश्वर विश्वास, उदार आत्मीयता।
से वे सिद्धियाँ हैं जो व्यक्तित्व को सुरक्षित एवं सार्थक बनाती हैं। इन्हीं की महिमा शास्त्रकारों ने स्थान−स्थान पर गायी है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा जैसी अतिउच्चस्तरीय सिद्धियों तथा परकाया प्रवेश–ज्वलन−आकाश गमन−प्रकाश आवरण क्षय जैसी अलभ्य सिद्धियों की जानकारी देना न तो यहाँ अभीष्ट होगा और न ही विवेक सम्मत भी। ऐसे चमत्कार इन दिनों देखे नहीं जाते–जो दिखाने की बात करते हैं उनमें छद्म की मात्रा प्रधान होती है। ऐसी स्थिति में उन्हीं पक्षों पर चर्चा की जानी चाहिए जिनसे जन−साधारण यह जान सके कि चक्रवेधन जैसी योग साधनाओं का आश्रय लेकर सहज ही आत्मिक व भौतिक सामर्थ्यों को जगाया जा सकता है।
काय−कलेवर में अवस्थित षटचक्रों की क्षमता असीम है। वे जीवन व्यापार में घुसी हुई अवाँछनीयता को तोड़ मरोड़ देने में भी समर्थ हैं और साथ ही व्यक्ति चेतना को इतना ऊँचा उछाल देने की उनमें सामर्थ्य है जिससे उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा जा सके। ये चक्र यदि प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहें तो उनका होना न होना समान है, किन्तु यदि उन्हें जागृत एवं सक्रिय किया जा सके, इन शक्ति धाराओं का सदुपयोग हो सके तो जीवसत्ता भी ब्रह्म सत्ता के समान समर्थ–बलशाली बन सकती है। साधना क्षेत्र के पुरुषार्थी तत्वज्ञानी इन्हीं शक्ति स्रोतों को प्रचण्ड बनाने व उनसे स्वयं का उत्थान तथा विश्व−कल्याण का विविध प्रयोजन पूरा करते हैं।
विभिन्न प्रकार के आध्यात्मिक आसन, शक्तिचालिनी तथा अन्य मुद्राएं, बन्ध, अनुलोम−विलोम एवं अन्य प्राणायाम, तीन बीजों सहित महाप्रज्ञा गायत्री का जप एवं कुण्डलिनी ऊर्जा कंथन– उन्नयन के ध्यान आदि के माध्यम से इस साधना क्रम को क्रमिक अभ्यास रूप में उपयुक्त मार्गदर्शन में आरम्भ कर देना चाहिये। परन्तु प्राथमिकता उस तत्वदर्शन को देनी चाहिये जो षट्चक्र वान की पृष्ठभूमि बनाता है।
कुण्डलिनी महाशक्ति का विवेचन भगवान आद्य शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में आन्तरिक शक्तियों के अभिवर्धन के रूप में इस प्रकार काव्यात्मक ढंग से किया है।
अरालेः सवाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुहरुचिम्। दरस्मेरे यस्मिन्दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे, सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहरनचक्षुर्मधुलिहः॥
भावार्थ– बल खाती हुई कटि भ्रमरी जैसी चंचलता; अलकाबलि से आच्छादित मुख, कमल पुष्पों जैसा परिहास; स्फटिक जैसे दाँतों से युक्त है देवि, तेरी मुस्कराहट के समय निकलने वाली सुगन्ध से काम दहन करने वाले शिवजी भी भ्रमर की तरह उन्मत्त हो जाते हैं।
संकेत– मन को सिकोड़कर बैठे हुए, निष्क्रिय, निराश और नीरस लोग भी कुण्डलिनी की स्फुरणा प्राप्त करके इठलाते हुए, भ्रमरी जैसे सक्रिय अलकाबलि जैसे स्निग्ध, शोभित, बढ़ चलने वाले हंस मुख स्वभाव और अपनी वाणी से सर्वत्र सुगन्ध फैलाने वाले बन जाते हैं और निष्क्रिय लोगों को भी आशा और स्फूर्ति की उमंग से उन्मत्त कर देते हैं।
बहुधा यह देखने में आता है कि अपना घर−परिवार सब छोड़कर पूरा समय ईश्वराधना में लगाने वाले व्यक्ति साधना आरम्भ करने के बाद पूर्व से भी गई−गुजरी स्थिति को प्राप्त हुए−उनके अन्तरंग व बहिरंग में कहीं भी उपासना का चमत्कार दिखाई नहीं दिया। न उन्हें सुख मिला न शान्ति। स्वास्थ्य, यश, सम्मान, वैभव किसी भी दृष्टि से उन्हें ऊँचा उठा हुआ नहीं कहा जा सका, आत्मबल वृद्धि की बात तो बहुत दूर की है। इससे स्वाभाविकतः मन में असमंजस उठता है कि ऐसा क्यों होता है? प्रक्रिया वही–फिर अवलम्बन लेने वालों में से एक को लाभ व दूसरे को हानि क्यों? एक को सिद्धि मिलती है तो दूसरा और भी घटिया हो जाता है। जब जल हर किसी की तृष्णा को शान्त करता है, सूरज सबको गर्मी व प्रकाश देता है तो उपासन क्रम में फलित होने वाली प्रतिक्रियाएं अलग−अलग क्यों होती है?
इस ऊहापोह पर व्यापक विचार मन्थन करने के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि देवता, भगवान, मन्त्र या विधि−विधान में जितनी अलौकिकता दृष्टिगोचर होती है, उससे लाभ पा सकने की पात्रता साधक में होना नितान्त अनिवार्य है। मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना अपर्याप्त ही नहीं–ईश्वर के प्रति अनास्था बढ़ाना भी है। तेजधार की तलवार सिर काट सकती है, पर यह तथ्य भी अपनी जगह अटल है कि चलाने वाले का साहस, कौशल व शरीरबल भी पर्याप्त हो। बिजली तो हाईटेन्शन लाइनों में बराबर दौड़ती रहती है, परन्तु उस अपने घर लाने व उससे यन्त्र चला सकने के लिये आवश्यक व्यवस्था बीच में बना लेना भी जरूरी है। यन्त्र तो घर में हों व लाइन भी सामने से जा रही हो तो यह कल्पना करना ही उससे यन्त्र चल सकेंगे, बाल कौतुक ही कहा जायगा। घृत सेवन का लाभ वही उठा पाता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो। यदि अपच के निर्बल रोगी द्वारा इसमें जीवनी शक्ति बढ़ा सकने की बात विचारी गयी तो उल्टे जान के लाले पड़ जायेंगे। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का ठीक तरह उपयोग करते हैं। देव उपासना पर भी यही तथ्य पूर्णरूपेण लागू होता है। देवता की शक्ति व मन्त्रों के चमत्कार से वे ही लाभान्वित हो सकते हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से−विचार ओर आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। यह न करने पर तो उपासनात्मक विधि−विधानों में नष्ट किये समय व पुरुषार्थ के अभाव से साधक और भी गयी−गुजरी स्थिति में पहुँच जाता है। इसी लिये पहले आत्मोपासना और फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के श्रेयार्थियों को दी जाती है।
होता यह है कि लोग उतावली में मन्त्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। परन्तु इससे पूर्व उन्हें आत्मशोधन रूपी जिस प्राथमिक इन्टरव्यू का सामना करना होता है, उसकी आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते। फलतः असफलता ही हाथ लगती है और ऐसे लोग दैव को, कर्मकाण्डों को और यहाँ तक कि भगवान–देवी देवता को दोष देते देखे जाते हैं। बादल कितना ही जल बरसायें, जिसके पास जिस क्षमता का पात्र होगा, उसे उतना ही मिलेगा। औंधे मुँह रखा पात्र खाली ही रहेगा। वह परिस्थितियों को कितना ही दोष दे जब तक प्रयत्न करके सिर नहीं उठाता उसे अनुदान मिलने वाला नहीं। देवताओं से बरसने वाले दैवी अनुदानों को पाने के लिये भी इसी प्रकार पात्रता संवर्धन अत्यन्त आवश्यक है–इसके अभाव में निराशा ही हाथ लगती हैं।
भगवान बुद्ध प्रव्रज्या कर रहे थे। उसी अवधि में उनके पास एक धनिक आत्मज्ञान की प्राप्ति व मुक्ति की आकाँक्षा से उनके पास आया। दूसरे दिन उसके घर आकर ही उत्तर देने का आश्वासन भगवान ने उसे दिया। स्वयं तथागत पधार रहे हैं, यह सोचकर उसने मेवा युक्त खीर बनवायी। कमण्डल लिए बुद्ध अगले दिन उसके द्वार पहुंचे। धनिक ने कमण्डल आगे बढ़ते ही श्रद्धावनत हो खीर डालने के लिये हाथ बढ़ाया। पर सहसा उसका हाथ रुक गया। कमण्डल गोबर से भरा था। बोला–”देव! इसमें तो पहले से ही गोबर भरा है। इस अस्वच्छ पात्र में देने से तो खीर खाने योग्य रहेगी भी नहीं।” इतना कहकर उसने पात्र हाथ में लिया व उसे रगड़−रगड़ कर साफ किया व फिर उसमें प्रसाद डाला।
तथागत पूरा क्रम देखते रहे और बोल उठे–”वत्स! आत्मज्ञान प्राप्ति के लिये भी इसी तरह तुम्हें अपने आत्मा रूपी पात्र को साफ करना होगा– कषाय–कल्मषों का परिशोधन करना होगा। आत्मज्ञान जैसी महान उपलब्धि बिना पात्रता के विकास के प्राप्त नहीं होती।”
हर साधक यदि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से–आचरण और चिन्तन की दृष्टि से स्वयं को उत्कृष्टता से, सुसम्पन्न कर ले तो वे अपनी कषाय−कल्मषों की कालिमा मिटाकर अपने अन्तःकरण को शुद्ध, पवित्र व स्वच्छ बना सकते हैं। ऐसे निर्मल अन्तःकरण में भगवद् कृपा स्वतः बरसती है। ऐसे साधक मन्त्र,उपासना एवं तपश्चर्या का समुचित लाभ उठाते हैं और दैवी अनुग्रह के अधिकारी बनते हैं। आसुरी भूमिका पर कोई भौतिक सिद्धि मिल भी जाय तो अंततः वह घातक ही सिद्ध होगी। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, बाणासुर, हिरण्याक्ष जैसे कितनों को चमत्कारी सिद्धियों प्राप्त थीं, पर पात्रता न होने से उन्होंने उनका दुरुपयोग ही किया। अन्ततः स्वयं भी घाटे में रहे और जब तक जीवित रहे आतंक और अत्याचार फैलाते रहे। यह एक अनुभूत सत्य है व हमेशा रहेगा कि स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी उपासना उपचार का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
हमारी संस्कृति का पुरातन इतिहास देखने से पता चलता है कि कितने ही साधकों ओर तपस्वियों ने कठिन उपासनाएं करके अद्भुत विभूतियाँ−उपलब्धियाँ अर्जित की। वे स्वयं भी समर्थ बने तथा दूसरों को भी अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान, आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। मात्र भारतवर्ष नहीं− अन्यान्य धर्मों के महापुरुषों व पुराण साहित्य में वर्णित घटनाक्रमों का अवलोकन करने पर पता चलता है कि अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ दैवी सत्ता की कृपा के रूप में उन्हें प्राप्त हुई थी। सर्वसाधारण के लिये जो सम्भव नहीं हो पाता, वह उन्हें प्राप्त हो सका व वे साधारण स्थिति से ऊँचा उठकर महामानव, देव−पुरुष बन सकने में सफल हुए। साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि उन्हें जो सिद्धियाँ मिली−वे उनके साधना पुरुषार्थ के बलबूते−आत्मबल सम्पादन के आधार पर ही मिली, संयोगवश नहीं। भूल यह होती है कि सिद्धि बरसाने वाला पक्ष तो देखा जाता है, पर अपने को उस योग्य बना लेने की साधना की अवहेलना कर दी जाती है। यही अन्ततः निराशा का कारण बनती है। इनकी तुलना में वे कम से कम भौतिक दृष्टि से सुखी पाये जाते हैं जो श्रम−साधना व लौकिक पुरुषार्थ की उपेक्षा न कर सतत् लगे रहते हैं, भले ही उन्होंने उपासनात्मक कर्म−काण्डों को कभी अपनाया न हो।
उपासना करते हुए भी जो विपन्न और दुःखी बने रहते है, वे सच्चे उपासक नहीं। प्रभु के पास उनका जाना व याचना करना ठीक उसी प्रकार है जैसे कि कोई बच्चा मन्दिर की प्रार्थना में प्रसाद के लालच में शामिल होने जाता है। ऐसे लोलुप व्यक्ति न तो वह आनन्द पाते हैं, नहीं वे अनुदान जो प्रभु को सम्पूर्ण समर्पण करने पर स्वयमेव मिलते चले जाते हैं।
यदि यह उधेड़ बुन मन में बनी हो कि भगवान और देवता कहाँ होते हैं? किस स्थिति में होते हैं, उनकी शक्ति कितनी है व कैसे वे कृपा भक्त पर बरसाते हैं तो उनके लिये समाधान यही है कि वे उनकी सारी गतिविधियाँ असंख्यों जीवधारियों की–जड़−चेतन की बहुमुखी हलचलों को सम्भालने–सुव्यवस्थित करने में नियोजित रहती है। एक सुसंचालित नियम व्यवस्था की तरह भगवत् सत्ता का क्रिया व्यापार चलता रहता है। न तो वे व्यक्ति गत संपर्क में किसी के आ पाते हैं। न ही भावनाओं के उतार−चढ़ाव पर ध्यान दे पाते हैं। यदि वह सत्ता ऐसा करती भी है तो अपने प्रतिनिधि जीव सत्ता के माध्यम से जो उसी का एक अंश है, दिव्य सत्ता का प्राकट्य मानवी काया के जर्रे–जर्रे में चेतन प्रवाह के रूप में होता है तथा भावनाओं की उत्कृष्टता से प्रेरित सत्कार्यों उदार−परमार्थ परायणता व सद्चिन्तन के रूप में समाज संपर्क में प्रतिभासित होता है। वरदान मिलते है तो इसी दिव्य आत्म सत्ता के माध्यम से तथा शाप मिलते हैं तो आत्म−प्रताड़ना के रूप में इसी आत्मदेव से। इस मूलभूत तथ्य को समझना बहुत जरूरी है।
वस्तुतः अपने उपास्य से प्रतिनिष्ठा व श्रद्धा की प्रगाढ़ता ही देव अंश को समर्थ बनाती है, वरदान बरसाने पर विवश करती है। एक साधक की निष्ठा में गहराई व व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त सामर्थ्यवान बनता है और साधक की आश्चर्यजनक सहायता करता है। दूसरा साधक आत्मिक सम्पदा से रहित होने के कारण अपनी पूजा को भावना रहित बना देता है। विधिपूर्वक मन्त्र जप करते हुए भी वह समुचित लाभ नहीं उठा पाता।
एकलव्य ने अपनी निष्ठा−आस्था को अपने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति पर आरोपित कर उसे साकार बना लिया व धनुर्विद्या में निष्णात हो सका। रामकृष्ण परमहंस की काली आज भी विद्यमान है, पर वह पुजारी को वैसे भोजन नहीं कराती जैसे अपने भक्त रामकृष्ण परमहंस को कराया। इसी काली ने विवेकानन्द को आत्मशक्ति से सम्पन्न बनाकर महामानवों की पंक्ति में ला खड़ा किया। उसके बाद कितने ही व्यक्ति दक्षिणेश्वर की इस काली की मूर्ति के दर्शन कर चुके हैं–याचना कर चुके हैं, पर कोई नया विवेकानन्द बन नहीं पाया। दूसरे तान्त्रिक, अघोरी, कापालिक, ओझा उसी प्रकार की काली मूर्ति की उपासना कर छुटपुट उद्देश्यों की पूर्ति भर कर लेते हैं। विराट् महाकाली तो मात्र एक ही है। जहाँ रामकृष्ण के अन्तरंग में परिपोषित काली अंश की क्षमता उनके अनुरूप थी–अपनी प्रगाढ़ निष्ठा से वे तद्नुरूप हो गये थे, वहाँ ओझा, अघोरी लोगों की काली बहुत दुर्बल ओछे किस्म की होती है।
अर्जुन के कृष्ण सारथी बने, उसके सखा बने। वही मीरा तथा सूर के कृष्ण अलग थे। रासलीला करने वालों के–मन्दिर के पुजारियों के कृष्ण अलग है। आकृति और प्रतिमा तो एक हो सकती है, पर इष्ट को सामर्थ्य में असाधारण अन्तर होता है। यह अन्तर साधक के अन्तरंग पर निर्भर करता है। इस तथ्य की उपेक्षा करने वाले मात्र बाह्योपचारों तक सीमाबद्ध होकर रह जाते हैं। नास्तिकता इसी उपेक्षा की प्रतिक्रिया कही जा सकती है। एक ही मंत्र विधि−विधान को अपनाने वाले क्यों सफल−असफल होते हैं, इसमें विधि−विधान को–देवता एवं भाग्य को नहीं अपने अन्तः के इष्टदेव की प्रसन्नता रुष्टता को आधार मानना चाहिए। तथ्य यही है कि हमने अपनी साधना को अधूरा रखा, अपने इष्टदेव को इतना परिपुष्ट नहीं बनाया कि वे हमारी प्रार्थना के अनुरूप उठ खड़े हों और सुनने को तैयार हो जायें। हमने अपनी पुकार को द्रौपदी जैसा नहीं बनाया कि हमारे आर्तनाद को सुनकर कृष्ण दौड़े चले आयें और माया में भटके इस जीव का उद्धार करें।
यह मानकर चलना चाहिये कि उपासना जादूगरी नहीं है। हमारे देवता इतने ओछे नहीं है कि नगण्य से उपहारों पर रीझ जायें और मनचाहे वरदान ही देते चले जाये। इसके लिये हमें अपनी मनोभूमि व बाल स्तर से ऊँचा उठाना होगा। उपासना को एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान–एक विद्या की तरह मानकर चलना होगा जो नियमों से व सुनिश्चित उद्देश्यों को लेकर बनायी गयी है। सबसे पहला प्रयोग अपने मूर्च्छित आत्मदेव को समर्थ–बलवान बनाने के रूप में यदि हम करने लगे तो कोई कारण नहीं कि हमारे ऊपर देव अनुदान न बरसें। जिन्होंने ये लाभ अपने जीवन में पाया वे भी इसी पथ पर चले है। इसके लिए कोई ‘शार्टकट’ नहीं। हमें भी इसी मार्ग का अवलम्बन कर अध्यात्म पर बढ़ना होगा।
बीज में वृक्ष बनने की पूरी−पूरी सम्भावना विद्यमान रहती है। पर कुशल माली अथवा किसान का सहयोग न मिले तो उसके अंकुरित होने तथा विकसित होकर फल फूल देने योग्य बन चलने का सुअवसर नहीं मिल पाता। किसी प्रकार अपने पुरुषार्थ से हवा आदि के झोंके के सहारे वह कहीं भूमि में पड़ भी जाय तो भी उसका वह समग्र विकास नहीं हो पाता जो माली के सहयोग से हो सकता था। जो गरिमा उपयोगिता एवं उपादेयता सजे संवारे उद्यान में विकसित हुए पौधों एवं खेतों में लहलहाते पौधों को होती है वह झाड़−झंखाड़ों में किसी तरह प्रकृति के सहयोग से उग आये पुष्प एवं खाद्यान्न उत्पादन करने वाले पौधों की नहीं होती। विकसित होने की सभी विशेषताएँ अपने भीतर सन्निहित किये होने के बावजूद भी बीज को अभीष्ट सहयोग अपेक्षित होता है। वह मिलते ही बीज की सभी सम्भावना बनाएँ साकार होने लगती और पौधे के रूप में बदलते देरी नहीं लगती।
मनुष्य कितना भी समर्थ क्यों न हो वह एकाकी कुछ भी नहीं कर सकता। जन्मने से लेकर मरने तक उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सहयोग किसी न किसी रूप में मिलता रहता है। जन्म के समय शरीर की सुरक्षा पोषण एवं विकास की जिम्मेदारी माता−पिता न सँभालें तो उसे अपना अस्तित्व बनाये रखना भी कठिन होगा। हजारों वर्षों का संचित ज्ञान, विज्ञान एवं अनुभव उसे कुछ ही समय में मुफ्त में ही प्राप्त हो जाता है। लिपि बनाते भाषा गढ़ने विज्ञान का आविष्कार करने, अनेकानेक साधनों का निर्माण करने, साहित्य, कला, इतिहास भूगोल, कृषि जैसी अनेकानेक ज्ञान की विद्याओं का नये सिरे से मनुष्य को अकेले अनुसंधान करना पड़े तो उसे एक जीवन तो क्या हजारों जीवन समूची उपलब्धियों को करतलगत करने के लिए खपाने होंगे। पर यह सौभाग्य ही कहना चाहिए कि पूर्वजों का संचित ज्ञान और उन ज्ञान की धाराओं की व्याख्या−विवेचना करने वाले मनीषियों का सहयोग उसे अनायास ही प्राप्त है। इस सहयोग को पाकर कितने ही व्यक्ति भौतिक क्षेत्र में योग्य, प्रतिभाशाली, विद्वान बनते देखे जाते हैं।
कहा तो जाता है कि मनुष्य सर्वसमर्थ है, तथा अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ के सहारे बहुत कुछ कर सकता है। पर कब? जबकि उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सामाजिक सहकार मिलता रहे। मौलिक क्षमता, प्रतिभा का अपना महत्व तो है, पर वह उपयुक्त परिस्थितियाँ पाकर ही उभरती हैं। जन्म से कोई कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हों? ज्ञानवान, विद्वान बनने के लिए अध्यवसाय करना पड़ता और अध्ययन के लिए विज्ञजनों के संचित ज्ञान एवं अनुभव का लाभ लेना पड़ता है। इस तथ्य की उपेक्षा करके कोई अपने पुरुषार्थ का दम्भ भरने लगे और विकास के लिये सारे सरंजाम स्वयं जुटाने का नये सिरे से प्रयत्न करने लगे तो प्रगति क्रम में वह अत्यन्त पिछड़ जायेगा।
एकाकी पुस्तकीय ज्ञान भी पर्याप्त नहीं होता, न ही वह मनुष्य के व्यावहारिक जीवन का मार्गदर्शन करने में सक्षम है। मात्र पुस्तकों के अध्ययन से कोई डॉक्टर, इंजीनियर वैज्ञानिक नहीं बन सकता। ऐसा सम्भव रहा होता तो हर व्यक्ति बाजार में उपलब्ध सम्बद्ध विषयों में दक्षता और प्रवीणता प्राप्त कर लेता। पुस्तकें सर्वसुलभ होते हुए मात्र उनके अध्ययन के बलबूते कोई विशेषज्ञ कहाँ बन पाता है? आशय यह है कि पुस्तकों के साथ−साथ अध्यापक का मार्गदर्शन, शिक्षण आवश्यक ही नहीं अनिवार्य होता है। विशेष प्रकार का तकनीकी ज्ञान प्राप्त करने–कला, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों में विशेषता हासिल करने–के लिए अपने−अपने ढंग का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अपेक्षित होता है।
साधना क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। क्षेत्र की तुलना में आध्यात्मिक क्षेत्र कहीं अधिक अविज्ञात है और उतना ही रहस्यमय भी। भौतिक जगत एवं सम्बन्धित वस्तुएँ तो प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती हैं, पर अध्यात्म का क्षेत्र तो पूर्णतया परोक्ष है। प्रत्यक्ष की तुलना परोक्ष में भटकाव की अधिक गुँजाइश रहती है। इस भटकाव की सम्भावना इसलिए भी अधिक रहती है कि साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। सर्वप्रथम स्वयं पर विजय प्राप्त करनी पड़ती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का विश्लेषण कर लेना सबसे अधिक कठिन कार्य है। उनके परिमार्जन एवं विकास के लिए साधन−उपचार ढूँढ़ लेना तो और भी कठिन पड़ता है। उँगली पर गिने जाने वाले बिरले ही होते हैं जो एकाकी अपने बलबूते स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण कर लेने एवं आवश्यक सुधार आदि के उपक्रम में सफल हो जाते हैं। वे अपवाद हैं जो साधना क्षेत्र में अपने एकाकी पुरुषार्थ के सहारे बढ़ चलने और मंजिल तक पहुँच जाने में सफल होते हैं। उनकी सफलताओं में भी जन्म−जन्मान्तरों की साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं। पर अपवाद तो अपवाद ही हैं वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना क्षेत्र में प्रचण्ड पुरुषार्थी बुद्ध कभी−कभी प्रकट होते हैं जो बिना किसी की सहायता के ही आत्म−ज्योति को जला लेने में सफल हो जाते हैं। लगन एवं भक्ति भावना के धनी रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक का अवतरण कभी−कभी होता है जिनका अन्तःप्रकाश स्वतः उनके साधना का मार्गदर्शन करता है आत्म−तत्व का अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी−कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
यों तो साधना के विधि−विधानों, क्रियाओं एवं उनकी परिणतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन धर्मग्रन्थों योगशास्त्रों में मिलता है पर मात्र उन्हें पढ़कर साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों, धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। तो फिर साधना जैसे अविज्ञात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते है? कहना न होगा मार्गदर्शन का गुरुतर दायित्व समर्थ गुरु ही संभाल सकता है।
गुरु की महिमा का गुणगान शास्त्रकारों, मनीषियों, धर्मग्रन्थों सभी न एक स्वर में किया है। गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करने वाले ऋषियों ने उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मूर्धन्य देवताओं से भी बढ़कर परब्रह्म के रूप में अभिनन्दित किया है। सद्गुरु की प्राप्ति के संदर्भ में एक सन्त का कहना है कि–
यह तनु विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता ज्ञान॥
कबीरदास जी कहते हैं–
गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काको लागों पाय। बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दिये बताय॥
गुरु शिष्य का किस प्रकार निर्माण करता है इसका वर्णन करते हुए कबीरदास जी आगे कहते है–
‘गुरु कुम्हार सिस घट अहै, गढ़ि−गढ़ि काढै खोट। भीतर हाथ सहार दै, बाहर−बाहर चोट॥’
अर्थात्–”जिस तरह कुम्हार घड़ा बनाते समय मिट्टी को गढ़कर एक व्यवस्थित रूप देता है–उसी तरह गुरु भी शिष्य का कुपथ से हटाकर सुन्दर साँचे में ढाल देता है।”
सद्गुरु की महिमा गाते−गाते शास्त्रकार थकते नहीं। मनीषियों ने निरन्तर यही कहा है कि आत्मिक प्रगति के लिए गुरु की सहायता आवश्यक है। इसके बिना आत्म−कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। जिस गुरु तत्व की वन्दना−अभ्यर्थना शास्त्रकारों ने की है वह गुरु वस्तुतः मानवी अन्तःकरण है। निरन्तर सद्शिक्षण और उर्ध्वगमन का प्रकाश दे सकना इसी केन्द्र के लिए सम्भव है। अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहने, उसकी पुकार को अनसुनी करते रहने से आत्मा की आवाज मन्द पड़ जाती है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों की ही दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्म लिप्त पाया जाता है अन्यथा सजीव आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि कुमार्ग का अनुसरण कर सकना मनुष्य के लिए सम्भव ही नहीं होता। यह आत्मिक प्रखरता ही वस्तुतः वह तात्विक गुरु है जिसकी महिमा का गुणगान करते शास्त्र नहीं अघाते। गुरु दीक्षा का व्रत धारण इसीलिए किया जाता है कि हम अन्तरात्मा की प्रेरणा का अनुसरण करेंगे। ऐसा निश्चय करने वाला व्यक्ति मानवोचित चिन्तन और कर्त्तव्य से विरत नहीं हो सकता जैसे ही निकृष्ट चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में सचेत करता है। फलस्वरूप भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। रक्त के श्वेत कण शरीर में रोग विषाणुओं के प्रविष्ट करते ही उनसे लड़ने के लिए एकत्रित हो जाते तथा उन्हें बाहर खदेड़ने के लिए प्रबल संघर्ष करते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में अन्त करण यही भूमिका सम्पादित करता है। अनैतिक और निकृष्ट स्तर के विचार कभी भी उस मस्तिष्क में देर तक नहीं टिकने पाते जहाँ कि अन्तःकरण रूपी सद्गुरु सजग और तत्पर है। अन्तरात्मा के मूर्च्छित, अवसादग्रस्त होने पर ही दुर्विचारों को आधिपत्य जमाने तथा निकृष्टता अपनाने का अवसर मिलता है।
शास्त्रकारों ने सद्गुरु का वन्दन करते हुए उसे परमानन्ददायक परब्रह्म कहा है। यह अंतःकरण रूपी सद्गुरु का ही निरूपण है। गुरु को गोविन्द से भी बढ़ कर मानने की मान्यता अन्तरात्मा को परमात्मा का उपलब्धि आधार समझने के लिए ही प्रतिष्ठापित की गई है। निरन्तर परामर्श और अहिर्निशि साथ दे सकना अन्त सद्गुरु द्वारा ही सम्भव है। उसी की प्रखरता नियन्त्रण और अंकुश साधक हो भटकावों से बचाता है। अवाँछनीयताओं का डटकर प्रतिरोध कर सकना प्रखर अन्तरात्मा द्वारा ही सम्भव है।
पर इस अन्तःकरण रूपी सद्गुरु की भूमिका बाद में आरम्भ होती है। सामान्यतः कषाय−कल्मषों, मल−विक्षोभों के आवरण से अन्तःकरण ढका रहता है। फलतः उसकी प्रेरणा एवं प्रकाश साधक को नहीं मिल पाता है। शरीरधारी गुरु का वरण इसलिए आवश्यक हो जाता है। उसकी कृपा अनुकम्पा से ही अन्तःकरण का प्रकाश आलोकित होता है तथा आन्तरिक सद्गुरु भी अपनी भूमिका सम्पादित कर सकने में समर्थ बनता है। कहा जा चुका है कि बिरले ही हुए हैं जो आरम्भ से ही अपने एकाकी बलबूते अन्तःप्रेरणाओं के आधार पर साधना का कंटकाकीर्ण मार्ग पार करने और मंजिल तक जा पहुँचने में समर्थ हुए हैं अन्यथा अधिकाँश प्रत्यक्ष समर्थ शरीरधारी गुरु की ही सहायता, कृपा से लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो सके हैं।
वे बहुत सौभाग्यशाली हैं जिन्हें समर्थ गुरु का संरक्षण एवं मार्गदर्शन प्राप्त है। ऐसा गुरु–जो वशिष्ठ और विश्वामित्र की विशेषताओं से सम्पन्न हो, जिसने अपने प्रचण्ड तप द्वारा ईश्वरीय सत्ता का साक्षात्कार किया हो, जो बुद्ध की भाँति आत्मबल का धनी हो रामकृष्ण की तरह जिसके अन्तःकरण से भक्ति रस की धारा प्रस्फुटित होती हो, जो कृष्ण की भाँति योग विभूतियों से सुसम्पन्न हो सचमुच जिन्हें ऐसे समर्थ गुरु का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल गया समझना चाहिए कि जीवन लक्ष्य प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधना की आधी मंजिल पूरी हो गयी तथा उत्तरोत्तर गति से आगे बढ़ने का एक सशक्त आधार−अवलम्बन मिल गया।
जननी की भाँति अपने प्राणों का अंश पिलाते रहने तथा पग−पग पर प्रस्तुत होने वाली प्रत्यक्ष गुरु का जिनको सम्बल मिल गया, सचमुच ही उनके भाग्य ही सराहना करनी होगी।
आत्मिक उत्कर्ष के साधनों में उच्चस्तरीय प्रयोजनों की ओर बढ़ने के पूर्व कुछ प्रारम्भिक अभ्यासों को अनिवार्य माना जाता है। महर्षि पातंजलि ने इनमें यम, नियम के बाद आसन, मुद्रा, बंध, प्राणायाम को मुख्य महत्व दिया है। बहुसंख्य साधक दो अतियों में चलते हैं। या तो वे आसन, प्राणायाम को ही सब कुछ मान बैठे इनमें ही अपना समय नियोजित करते रहते हैं अथवा इन्हें जाने बिना सीधे कुण्डलिनी जगाने व उससे नीचे की कोई बात मन में कभी लाते ही नहीं। सबसे श्रेयस्कर मध्यम मार्ग है जिसमें आसन सिद्धि, प्राणायाम शुद्धि एवं मुद्रा−बन्ध प्रयोगों को न्यूनाधिक रूप में साधना विशेष के अनुरूप अपनाकर प्रगति पथ पर क्रमिक रूप में बढ़ जाती है।
आसन से तात्पर्य है–वह सारा स्थान–परिकर जहाँ पर उपासना की जा रही है। स्थान एवं वातावरण मन की एकाग्रता–तन्मयता में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जहाँ विशिष्ट साधना की बात आती है वहाँ तो सिद्ध पीठों–संस्कारित तप स्थलियों पर समय निकाल कर जाने व संकल्पित अनुष्ठान को पूरा करने की बात सोचना चाहिए। परन्तु साधारण स्थिति के साधक को अपने ही निवास स्थान में कोलाहल रहित सुसंस्कारित वातावरण तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण वे तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण व शरीर की स्थिति–ये दो मिलकर आसन को सर्वांगपूर्ण बनाते हैं। आसन समग्र शरीर का होता है। कमर सीधी, आँखें अधखुली– अधबन्द-सी, शान्त चित्त, स्थिर काया यह स्थिति ध्यान के लिये उपयुक्त आसन मानी जाती है। दोनों हाथ गोदी में हों, शरीर सुखासन की स्थिति में होते हुए भी सुस्थिर, सुव्यवस्थित हो।
आसन प्रक्रिया के विषय में जानने से पूर्व यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि अपना अन्तिम उद्देश्य क्या है? पैरों को मोड़ना व अन्य निर्धारित हलचलों द्वारा शरीर की सूक्ष्म संरचना को गतिशील बनाना भी आसन प्रक्रिया है जिसे आजकल ‘योगा’ नाम से जाना जाता व प्रचारित किया गया है। आरोग्य रक्षा की दृष्टि से इन सूक्ष्म, व्यायामों का महत्व असंदिग्ध है। परन्तु अध्यात्म प्रगति की दृष्टि से कुछ ही ऐसे विशिष्ट आसन हैं, जिसकी मनीषीगण सलाह देते हैं अथवा जिनके शास्त्र निर्धारण मिलते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि तनाव मुक्ति, जीवनी शक्ति वृद्धि व निरन्तर स्फूर्ति के लिये यदि नियमित रूप से विभिन्न प्रकार के आसन किये जाते रहें तो ध्यान योग प्रक्रिया में लाभ मिलता है। पर यह लाभ उसी प्रकार का है जो पात्रता प्रामाणित करने के लिये एक और अतिरिक्त सर्टीफिकेट पा लेना। मात्र कर लेना ही ध्यानयोग जैसी चरमोत्कर्ष की साधना में आगे बढ़ा देता है, यह सोचना भी नहीं चाहिए।
कई प्रकार के आसन योग ग्रन्थों में तथा योग चिकित्सकों द्वारा बताये जाते हैं, पर इनमें से 84 ही ऐसे हैं जिन्हें सूक्ष्म शारीरिक व्यायाम की दृष्टि से तो मार्गदर्शक के परामर्श एवं निर्देशानुसार मात्र तीन आसनों तक स्वयं को सीमित रखना चाहिए। सुखासन को तो महत्ता दी ही गयी है क्योंकि यह किसी भी साधना में निस्संकोच प्रयुक्त हो सकता है–इस सम्बन्ध में शास्त्रकारों ने कहा है–
येन केन प्रकारेण सुखं धैर्य च जायते यत्सुखासनभित्युक्त मशक्त स्तत्समाश्रयेत्॥ जाबालोपनिषद्
अर्थात्–”जिस प्रकार बैठने से शरीर को सुविधा हो, शान्ति में अड़चन न पड़े वही सुखासन कहलाता है। अशक्त साधकों के लिये तो ये ही श्रेयस्कर है, इन्हीं का आश्रय लेना चाहिए।”
शिव संहिता में सुखासन के अतिरिक्त चार अन्य आसनों को विशिष्ट व साधना प्रयोजनों में उल्लेखनीय माना है–सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन, स्वस्तिकासन।
इस योग ग्रन्थ में उल्लेख है–
चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानाँ विधानिच। तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्त नि बवीम्यहतम्॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनं चोग्रं च स्वस्तिकम्॥
इन में भी सिद्धासन व पद्मासन को विशिष्ट माना गया है। इसी कारण किसी प्रकार के भ्रम और अत्यधिक विस्तार में न जाकर सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन इन तीन को ही प्रमुख माना जाय व विभिन्न बन्ध तथा मुद्राओं का सम्पुट इनमें जोड़कर इस प्रारम्भिक प्रक्रिया को समग्र बनाया जाय।
योग दर्शन (पातंजल्कृत) के समाधिपाद में आसन को आठ योग के अंगों में तीसरे क्रम का प्रधान अंग माना गया है और व्याख्या की गयी है कि आसन का अभ्यास इसलिये आवश्यक है शरीर की रज रूपी चंचलता, अस्थिरता, तम रूपी आलस्य नष्ट होकर सात्विक प्रकाश तथा दिव्यता की उत्पत्ति होती है। अष्टाँग योग का यह बहिंसाधन है। इस आसन सिद्धि के बिना अगले उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरे नहीं हो पाते। आसन सिद्धि के विषय में महर्षि पातंजलि कहते हैं–
प्रयत्न शैथिल्यानन्त समापत्तिभ्यास्।
अर्थात्– ”प्रयत्न की शिथिलता और परमात्मा में मन लगाने से ‘आसन सिद्धि’ होती है।”
वस्तुतः शरीर की स्वाभाविक चेष्टा अर्थात् डाँवाडोल होना, काँपना आदि से उपरत होना ही प्रयत्न की शिथिलता है एवं शरीर को सीधा स्थिर करके सुखपूर्वक साधन की दृढ़ता से शरीर सम्बन्धी सब चेष्टाओं को छोड़कर अनन्त परमेश्वर के ध्यान में तद्रूप हो जाना ही ‘आसन सिद्धि’ है। ऐसी स्थिति आने पर साधक अपने को भूलकर– बहिरंग से विमुख होकर अधिक समय तक सुखपूर्वक बैठ सकता है।
इस सूत्र में ‘आनन्त समापत्ति’ जो शब्द आया है, उससे अर्थ यह है कि चित्त वृत्ति रूप से हर समय अनेकों परिच्छन्न पदार्थों की ओर स्वभावतः घूमता रहता है, फलतः अस्थिर बना रहता है। अपरिच्छन्न आकाशादि में जो अनन्तता है उसमें जब चित्त को एकाकार कर दिया जाता है तो वह निर्विषय होकर स्थिर हो जाता है। तब ही आसन सिद्ध हुआ माना जाना चाहिए।
वस्तुतः यही आसन प्रक्रिया का उद्देश्य है। इसे बार−बार समझा जाना चाहिए कि आसन चित्त−वृत्ति को एकाग्र करने के लिये है, न कि अंगों को मोड़−मरोड़कर बिखरने के लिये। इसी दृष्टि से योगी महर्षि पातंजलि आध्यात्मिक योग साधन की दृष्टि से सिद्धासन, सुखासन व पद्मासन की महिमा बताते हैं। अन्तिम परिणति तीनों की एक ही है–
“ततो द्वन्द्वानभिघात।” 48/समाधिपाद−2
अर्थात्–जब आसन की पूर्ण सिद्धि हो जाती है तब सर्दी, गर्मी, भूख−प्यास नहीं सताते और शरीर में सहन शक्ति का प्रादुर्भाव होने से ध्यान समाधि में विक्षेप नहीं होता।”
ध्यान धारणा के प्रयोगों में सुखासन को कुण्डलिनी जागरण प्रयोगों, षट्चक्र भेदन तथा अन्य उच्चस्तरीय साधनाओं के लिये विभिन्न मुद्रा−बन्ध आदि का आश्रय लेकर सिद्धासन एवं पद्मासन को प्रयुक्त किया जाता है।
सुखासन की तथा ध्यान−प्रक्रिया में इसके प्रयोग की चर्चा पहले ही की जा चुकी! सिद्धासन को लगातार नहीं, कुछ देर के लिये ही किया जाता है। तीनों में यही क्लिष्ट है। जितनी देर शक्ति चालिनी मुद्रा एवं सूर्यवेधन प्राणायाम के प्रयोग किये जाते हैं, उतनी देर इसे लगाना लाभदायक माना जाता है। प्राण वायु को संयमित करने तथा तीनों बंधों को सिद्ध करने के कारण ही इसे सिद्धासन कहते हैं, ऐसा हठयोग प्रदीपिका का मत है। इसके अभ्यास से योग निष्पत्ति शीघ्र ही होती है एवं यह सिद्धिदायक है, शिव संहिता यह बताती है।
सिद्धासन में कमर सीधी रखी जाती है एवं ध्यान मुद्रा में बैठकर बाँया पाँव इस प्रकार मोड़ते हैं कि उसकी ऐड़ी का ऊपरी भाग मल−मूत्र छिद्रों के मध्यवर्ती भाग को दबाये। यही दक्षिण ध्रुव अर्थात् मूलाधार चक्र का स्थान है। दाँये पैर को बांये के ऊपर रखकर पालथी जैसी स्थिति बनायी जाती है। इस स्थिति में दाहिने पैर की ऐड़ी नाभि से लगभग चार अंगुली नीचे उसी की सीध में आ जाती है। यह मेढू देश है अर्थात् नाभिचक्र का स्थान है। देह को सरल स्थिति में रखकर दोनों भौहों के मध्य देश में दृष्टि स्थिर कर निश्चल भाव से बैठने का नाम ही सिद्धासन है। इस प्रकार बैठने से पैरों पर दबाव पड़ता है और ज्यादा देर तक बैठे रहा नहीं जा सकता, इसलिये आवश्यकतानुसार पैर को बदलते रहना चाहिए। इसका प्रयोग प्रयोजन की मूलाधार चक्र को प्रभावित एवं उत्तेजित करना है
पद्मासन इससे सरल है। इसकी सामान्य प्रचलित विधि में पैरों पर पैर रखकर हाथ सुविधानुसार घुटनों पर अथवा गोद में रखकर बैठने का क्रम है। चिकित्सा के रूप में जब इसे किया जाता है तो पीछे से हाथ ले जाकर अंगूठे को पकड़ते हैं।
मूलबन्ध में प्राणायाम के साथ गुदा के छिद्रों को सिकोड़कर ऊपर खींचे रहते हैं। प्राण का अधोगमन रुकता है व ऊर्ध्वगमन की प्रक्रिया गतिशील होती है। इसे मूल बन्ध इसलिये कहते हैं कि यह मूल में स्थित प्रवाह का बन्धन करता है। मूलाधार चक्र के चारों ओर का आयोनिक क्षेत्र इससे विस्तृत व सक्रिय होता है, वहाँ अवस्थित स्नायु संस्थान में स्फुरणा आती है तथा सूक्ष्म रस स्रावों में वृद्धि होती है जो ध्यान प्रक्रिया में सहायक होते हैं तथा तनाव को मिटाते हैं। प्रयोगों द्वारा पाया गया है कि मूलबन्ध का सतत् प्रयोग ‘प्लाज्मा कार्टीसोल’ का स्तर कम करता है। यह इस बात का सूचक है कि तनाव की स्थिति का अन्त हो रहा है। वीर्य के अधोगामी प्रवाह को रोककर स्थिरता लाने में भी इससे सहायता मिलती है। सम्मिलित प्रतिफल यही होता है कि काया के दक्षिण ध्रुव में स्थित शक्ति −केन्द्रों की प्रसुप्ति जागृति में बदलती है तथा विद्युतप्रवाह नीचे से ऊपर की ओर गतिशील होने लगता है।
पेट में अवस्थित आँतों को ऊपर की ओर खींचने की क्रिया उड्डियान बन्ध कहलाती है। यह मूलबन्ध का उत्तरार्ध कहा जा सकता है क्योंकि इसमें भी अधोमुखी को ऊर्ध्वगामी प्रवाह की ओर नियोजित करने का प्रयास किया जाता है। स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने व विद्युतचुंबकीय प्रवाहों से वहाँ पर बैठे आटोनॉमिक संस्थान के नाड़ी गुच्छकों के उत्तेजित होने से सुषुम्ना का प्रसुप्त पड़ा द्वार खुलता है। शरीर में स्फूर्ति, जीवनी शक्ति में वृद्धि, आँतों में सक्रियता व अन्नमय कोष साधना के प्रारम्भिक अभ्यास पूरे होना इसके अतिरिक्त लाभ हैं। जालन्धर बन्ध अर्थात् मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ से लगाना व ध्यान को स्थिर करना। चित्त वृत्ति को शाँत कर मस्तिष्क को तनाव रहित व ध्यान योग्य बनाने में, विशुद्धि चक्र के जागरण में जालन्धर बन्ध सहायक होता है। इसे मुख्य रूप से प्राणायाम में कुम्भक के साथ प्रयोग करते हैं। जब तीनों बन्ध एक साथ प्रयुक्त करते हैं तो इसे महाबन्ध की स्थिति कहते हैं। यह सभी चक्रों को जागृत करने में सहायक होती है, मानसिक सक्रियता बढ़ाती है, अतीन्द्रिय क्षमताएँ जागृत करती है।
मुद्राओं का विस्तार तो यहाँ नहीं दिया जा रहा। परन्तु इनकी महत्ता ध्यान−धारणा के प्रयोगों में तथा कुण्डलिनी− प्राणयोगों में सहायक साधना उपक्रमों के रूप में समझी जानी चाहिए। इन्हें आसन, मुद्रा, प्राणायाम के साथ ही प्रयुक्त किया जाता है। खेचरी, मुद्रा मूलतः ध्यान योग की लययोग साधना है जिसमें क्रिया का कम व भाव पक्ष का अधिक महत्व है। शक्तिचालिनी मुद्रा के अंतर्गत मल−मूत्र संस्थान को संकुचित कर बार−बार ऊपर खींचा व फिर शिथिल किया जाता है। मूल−बन्ध के साथ प्रयुक्त होने पर यह मूलाधार−शक्ति क्षेत्र को जागृत करने में सहायक की भूमिका निभाती है। चेतन, उन्मनी, विपरीत करणी आदि मुद्राओं की चर्चा प्रस्तुत विवेचन के साथ समीचीन न होगी। शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास योग निद्रा–के साथ किया जाता है। इसे तथा खेचरी मुद्रा को पाठक अलग से इसी अंक में पढ़ सकेंगे। प्रस्तुत चर्चा में उद्धृत साधना प्रयोगों का मुख्य साधना उपचार के सहयोगी उपक्रमों के रूप में ही समझा जाय। साधक के आत्म−विश्वास को बढ़ाने तथा चित्त−वृत्ति निरोध के अभ्यास में, उच्चतर आयामों में प्रवेश की गति को और भी तीव्र बनाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इच्छा, भावना और संकल्प की विशेषताएँ जुड़ जाने से क्रियाओं का महत्व और प्रतिफल कई गुना अधिक बढ़ जाता है। सामान्य-सी दिखायी देने वाली क्रिया भी चमत्कारी फल देने वाली सिद्ध होती है जबकि उपरोक्त विशेषताओं के अभाव में पूरे किए गये क्रिया-कृत्यों का वह लाभ नहीं मिल पाता जैसी कि अपेक्षा की गयी थी। भावना और संकल्प का चमत्कार तो सर्वत्र देखा और अनुभव किया जा सकता है। एस-सी क्रियाएँ पूरी करते हुए भी दृष्टि से श्रम एक मजदूर भी करता है और एक पहलवान भी। पर एक अपना स्वास्थ्य गँवाता रहता है जबकि दूसरा बलिष्ठता एवं समर्थता का लाभ प्राप्त करता है। स्थूल दृष्टि इसे आहार आदि की अतिरिक्त विशेषता मानकर सन्तोष कर सकती है, पर बात ऐसी है नहीं, एक जैसा आहार दोनों के लिए जुटा दिया जाय तो भी मजदूर किसी प्रकार अपना स्वास्थ्य भले ही सन्तुलित रख ले, पहलवान की भाँति अतिरिक्त सामर्थ्य अर्जित कर लेने में समर्थ नहीं हो पाता।
इस अन्तर की खोजबीन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र क्रियाओं को पूरा कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसमें भावना और संकल्प का पुट नहीं जुड़ा तो अभीष्ट परिणाम निकलना संदिग्ध ही बना रहेगा। अपेक्षाकृत पहलवान से अधिक श्रम करते हुए भी मजदूर द्वारा सामर्थ्य अर्जित न कर पाने का एक ही कारण होता है कि उसकी क्रियाओं में संकल्प और भावना का समावेश नहीं होता। फलतः वह बलिष्ठ बनने को लाभ नहीं प्राप्त कर पाता। जबकि पहलवान की प्रत्येक क्रिया अपने लक्ष्य के लिए भावना एवं संकल्प से अनुप्राणित होती है। फलस्वरूप वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल रहता है।
साधनात्मक क्षेत्र में क्रियाओं से भी अधिक महत्व भावना, इच्छा और संकल्प का है। प्रायः देखा भी जाता है कि जैसे विधि−विधान साधना के पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है। जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने न होने के रूप में समझा जा सकता है। प्रत्येक साधनात्मक क्रिया−कृत्यों के साथ यही नियम लागू होता है।
प्राणायाम के चमत्कारी परिणामों का वर्णन योग ग्रन्थों में मिलता है। उसे अनेकों प्रकार की सिद्धियों का एक समर्थ माध्यम माना गया है। योगियों में विलक्षण सामर्थ्य विकसित हो जाने का वर्णन पढ़ा, सुना और देखा जाता है। यह संकल्प युक्त प्राणायाम की ही परिणति होती है। उनमें अनेकों प्रकार की शक्तियों प्राण के संचय करते रहने से विकसित हो जाती है। वे इस तथ्य से भलीभाँति परिचित होते हैं कि प्राण का विपुल भण्डार सर्वत्र भरा पड़ा है, पर जीवधारी मात्र उस भण्डार से जीवनयापन करने की आवश्यकता पूरी करने योग्य अल्प मात्रा ही उससे प्राप्त कर पाते है। जिस प्रकार बूँद−बूँद के मिलने से बड़ा भरता है उसी तरह योगी प्राणतत्व का संचय और अभिवर्धन करते रहते हैं तथा असाधारण शक्ति के स्वामी बन जाते हैं।
प्राण तत्व की प्रचुरता भौतिक सफलताओं का कारण बनती है और आध्यात्मिक प्रगति की भी। भौतिक जीवन में प्राणवान व्यक्ति का सर्वत्र वर्चस्व होता है। व्यक्तित्व की प्रभावोत्पादक क्षमता सहज ही अपने अनुयायियों, सहयोगियों एवं समर्थकों की संख्या बढ़ाती है। जीवन सम्पन्न ही संसार समर में विजय हासिल कर पाते तथा कुछ महत्वपूर्ण कहा जाने योग्य काम कर पाते है। मनोबल, संकल्पबल की दृढ़ता प्राण तत्व केक आधार पर ही बनती है जो हर प्रकार से भौतिक सफलताओं का आधार बनती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी प्राणवान ही सफल हो पाते तथा कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित कर पाते हैं। कुछ को यह सम्पदा जन्म−जन्मान्तरों की साधना के फलस्वरूप अनायास भी जन्मजात प्राप्त होती है, पर विशिष्ट साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राणसम्पन्न बन सकता है।
विविध प्रयोगों के लिए प्राणायाम की विभिन्न प्रक्रियाएँ निर्धारित की गयी हैं जिनमें से एक है प्राणाकर्षण प्राणायाम। कहा जा चुका है कि इच्छा,भावना एवं संकल्प का पुट जुड़ने से ही क्रियाएँ प्राणवान बनती तथा अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करती हैं। प्राणाकर्षण प्राणायाम की सफलता पूरी तरह संकल्प शक्ति की दृढ़ता के ऊपर निर्भर करती हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है–
प्राणायाम के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का ब्रह्ममुहूर्त का है। कारण यह है कि उस समय अन्तरिक्ष में प्राणतत्व की प्रवाह अत्यन्त तीव्र होता है तथा विशिष्ट प्रकार को चैतन्य धाराएँ सूक्ष्म केन्द्रों से समूचे ब्रह्मांड में प्रवाहित होती हैं। करने को तो कभी प्राणायाम किया जा सकता है, उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं हैं, पर प्रातःकाल जैसा लाभ अन्य समय में नहीं मिल पाता। अस्त प्राणायाम के लिए सबसे श्रेष्ठ समय प्रातःकाल को ही माना गया है।
प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सहज आसन में बैठें। दोनों हाथ घुटनों पर हों। मेरुदंड सीधा आँखें बन्द। ध्यान करें कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत−प्रोत प्राणतत्व हिलोरे ले रहा हैं। गरम भाप के, सूर्य के प्रकाश में चमकती हुई बादलों जैसी शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है ओर उस प्राण उफान के बीच हम निश्चिन्त, शान्त−चित्त, निर्विकार एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।
नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे−धीरे साँस−खींचना आरम्भ करें तथा भावना करें कि प्राणतत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता है उसी प्रकार अपने चारों और बिखरा हुआ प्राण प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रविष्ट हो रहा है ओर मस्तिष्क, छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता हैं। जब साँस पूरी खींच लें तो उसे भीतर रोकें और भावना करें कि–जो प्राण तत्व खींचा गया है, उसे हमारे भीतरी अंग−प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख लेती है उसी प्रकार हमारे अंग सूखी मिट्टी के समान है और जल रूपी इस खींचे हुए प्राण को सोखकर अपने अन्दर सदा के लिए धारण कर रहे हैं, साथ ही प्राणतत्व में सम्मिलित चेतना, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम जैसे अनेकों तत्व हमारे अंग, प्रत्यंग में स्थिर हो रहे हैं।
जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे−धीरे साँस बाहर निकाल दें। साथ में यह भावना करें कि प्राणवायु का सारतत्व हमारे अंग−प्रत्यंगों द्वारा खींच लिये जाने के बाद अब उसी प्रकार विकार युक्त वायु के माध्यम से बाहर निकाला जा रहा है, जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्सार दूर हटा दिया जाता है। शरीर, मन और मस्तिष्क में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले धुएँ के समान अनेक दूषणों को लेकर बाहर निकले रहे हैं।
पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर बाहर साँस रोके रहें अर्थात् बिना साँस के रहें और भावना करें कि अन्दर के जो दोष बाहर निकालें गये थे उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया हैं और बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़े जा रहे है।
यह प्राणाकर्षण की पूरी प्रक्रिया हुई। जिसे आरम्भिक चरण में पाँच की संख्या में आरम्भ करना चाहिए अर्थात् उपरोक्त प्रक्रिया पाँच बार दुहरायी जाय। हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया क्रमशः बढ़ाते हुए एक वर्ष की अवधि में आधे घण्टे समय तक पहुँचायी जा सकती हैं।
नाड़ी शोधन प्राणायाम से सूक्ष्म
आत्मिक प्रगति में मानसिक ही नहीं शारीरिक अवयवों की मलीनता एवं निष्क्रियता भी बाधक बनती है। स्थूल अंग−प्रत्यंगों के परिशोधन के लिए आसन, व्यायाम, बंध, मुद्रा के विविध यौगिक उपचारों का वर्णन योग ग्रन्थों में आता है। जो शरीर को स्वस्थ और निरोग रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सूक्ष्म शरीर नाड़ी −गुच्छकों से बना होता है। इन उपचारों की पहुँच उस तक नहीं होती। उसके परिष्कार के लिए प्राणायाम की विशिष्ट प्रक्रिया अपनानी पड़ती हैं। प्राण प्रक्रिया द्वारा नाड़ी शोधन होने से प्राण संचार की व्यवस्था ठीक बनती तथा मलीनताजन्य निष्क्रियता दूर होती है। फलतः आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता हैं। पर यह तथ्य सदा स्मरण रखा जाना चाहिए कि योग ग्रन्थों में प्रयुक्त किया गया नाड़ी शब्द शरीर शास्त्रियों द्वारा बताये गये नसों के लिए नहीं– नाड़ियों से संपर्क से चलने वाले प्राण प्रवाह के लिए उपयुक्त किया गया है।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार शारीरिक नाड़ी संस्थान में जब गड़बड़ी होती है तो रक्त संचार में बाधा पहुँचती है तथा कई प्रकार के व्यतिरेक उत्पन्न होते हैं। ऐंठे अकड़े नाड़ी तन्तु रक्त कास दबाव ठीक प्रकार न सह सकने के कारण दर्द से पीड़ित रहते हैं। संचार व्यवस्था में व्यतिरेक से शरीर के प्रत्येक अंग−प्रत्यंग को समुचित परिमाण में रक्त की मात्रा नहीं मिल पाती। फलतः वे भी अशक्तता की स्थिति में अपना काम भली−भांति पूरा नहीं कर पाते। शरीर की गन्दगी का–विजातीय तत्वों का−निष्कासन न हो तो भीतर ही भीतर विषाक्तता बढ़ती है तथा क्रमशः जीवनी शक्ति घटती है। विषाक्तता के बढ़ते तथा जीवनीशक्ति के घटने से ही विविध रोगों का आक्रमण होता है तथा मनुष्य दुर्बल और रुग्ण बनता चला जाता है। ठीक इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की विद्युत नाड़ियों उत्पन्न होने से भी ठीक ऐसी ही अव्यवस्था उत्पन्न होती है। इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि टेलीफोन अथवा बिजली के तारों में कहीं मध्यवर्ती अवरोध उत्पन्न हो जाने पर विद्युत प्रवाह रुकता तथा सप्लाई बन्द हो जाती है। सूक्ष्म नाड़ी मेंडल की अव्यवस्था का प्रभाव समूचे सूक्ष्म शरीर−प्राण शरीर के ऊपर पड़ता है। फलस्वरूप अनेकों प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक व्यतिरेक दिखायी पड़ते हैं जो साधक के साधना मार्ग के लिए चट्टान की भाँति अवरोधक सिद्ध होते हैं।
मन न लगने–जी उचटने–मन के चंचलमान होने जैसी कितनी ही शिकायतें अधिकाँश साधक करते रहते हैं। साधना सम्बन्धी विधि−विधानों का ठीक प्रकार पालन करते हुए भी व आगे नहीं बढ़ पाते। अध्यात्म विज्ञानियों ने इसका प्रमुख कारण बताया है–नाड़ियों के प्राण−संचार व्यवस्था की विकृति। अस्तु यह आवश्यक हो जाता है कि योगाभ्यास आरम्भ करते हुए सूक्ष्म नाड़ी संस्थान के परिशोधन कास प्रयत्न किया जाय। इसकी उपेक्षा करने से साधना के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ पाना तथा अभीष्ट लाभ उठा सकना कठिन पड़ता है। यह सच है कि मस्तिष्क में ध्यान धारण से, नादानुसंधान, प्राण सन्दोह, बाटक आदि से प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होती है, पर उपरोक्त गड़बड़ी से सूक्ष्म अवयवों में ऊर्जा का समुचित वितरण नहीं हो पाता। यह अवरोध सूक्ष्म शरीर को बलिष्ठ बनाने के उद्देश्य से किये गये प्रयत्नों को सफल नहीं होने देता, यही कारण है कि जिस प्रकार शारीरिक परिशोधन में रक्त −संचार प्रणाली को ठीक करने पर महत्व दिया जाता है–उसी तरह आत्मविकास की साधनात्मक पद्धतियों में सूक्ष्म नाड़ी संस्थान के परिशोधन को प्राथमिकता दी जाती है।
आत्मवेत्ताओं के अनुसार मेरुदण्ड में अवस्थित ‘ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम’ यद्यपि मस्तिष्क के साथ भी जुड़ा रहता है, पर उसकी मूलभूत गतिविधियाँ स्वसंचालित हैं। मस्तिष्क के साथ उसका सम्बन्ध होते हुए, भी घनिष्ठता एवं नियन्त्रण की स्थिति नगण्य है। शरीरगत महत्वपूर्ण गतिविधियाँ मेरुदण्ड से निकलकर सर्वत्र फैलने वाले स्नायु मण्डल से संचालित होती है। उनका संचालन सूत्र सुषुम्ना में अवस्थित है–मस्तिष्क में नहीं। इसलिए आत्मविज्ञान में मेरुदण्ड को भी एक तरह का मस्तिष्क मानना पड़ता है और उसे समाधान करना होता है। शरीर विज्ञानी सुषुम्ना को– मेरुदंड के भीतर दोनों और–नीचे से ऊपर तक समानान्तर चलने वाले स्नायु गुच्छकों की शृंखला मानते हैं। यह स्वसंचालित है। इसे अपना क्रिया−कलाप जारी रखने के लिए किसी बाह्य प्रेरणा की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस शृंखला का वाम पार्श्व इड़ा, दाहिना पार्श्व पिंगला ओर मध्यवर्ती समन्वित भाग सुषुम्ना कहा जाता है। ये तीनों ही परस्पर एक−दूसरे से घनिष्ठतापूर्वक सम्बद्ध हैं, पर उनके भीतर चलने वाले विद्युत प्रवाह के आरोह−अवरोह को देखते हुए उपरोक्त वर्गीकरण किया गया है।
यों तो योग ग्रन्थों में 72 हजार नाड़ियों का उल्लेख किया जाता है, पर उनमें से प्रमुख 14 ही मानी गयी हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं–(1) सुषुम्ना (2) इड़ा (3) पिंगला (4) गान्धारी (5) हस्त जिह्य (6) कुहू (7) सरस्वती (8) पूषा (9) शंखिनी (10) यशस्विनी (11) वारुणी (12) अलम्बुसा (13) विश्वोधरा (14)पयस्विनी (योग चूड़ामणिउपनिषद्)।
इनमें भी सर्वोपरि तीन हैं–(1) इड़ा (2) पिंगला (3) सुषुम्ना। इन्हें तीन शरीर का–तीन लोकों का–प्रतिनिधि बताया गया हैं। इसका नामकरण इस आधार पर किया गया है कि उनकी विशेषताएँ, कार्यपद्धति एवं दिशाधाराएं क्या−क्या हैं? उनकी सहायता से किन प्रयोजनों की पूर्ति तथा किन सफलताओं की प्राप्ति होती है? उल्लेख आता है कि समुद्र−मन्थन से 14 रत्न उपलब्ध हुए थे। इन 14 नाड़ियों को उसी स्तर के अनुदानों के लिए सूक्ष्म जगत से सम्बद्ध सूत्र का काम करने वाली विद्युत धाराएँ कहा जा सकता है। इन प्राण धाराओं को सूक्ष्म शरीर के साथ ही सूक्ष्म जगत में काम करने वाली चेतन धारा कहा जा सकता है।
शरीरस्थ सूक्ष्म केन्द्रीय नाड़ी मण्डल मस्तिष्क ओर मेरुदण्ड को मिलाकर बना है। इन दोनों को जोड़ने वाला एक वाल्व है जिसमें शरीर शास्त्र में मेदुला आब्लाँगेटा कहते हैं। इस संस्थान का श्वास−प्रश्वास की स्वसंचालित प्रक्रिया से सीधा सम्बन्ध है। मेरुदण्ड में पायी जाने वाली भूरी और सफेद मज्जा में भी वही तत्व पाये हैं जो मस्तिष्क में हैं। दोनों में ही ग्रे तथा व्हाइट मैटर पाये जाते हैं। इस पदार्थ का मेरुदण्ड से सम्बन्ध ठीक वसा ही है जैसा कि मस्तिष्क का क्रेनियल केविटी से। मस्तिष्क एवं मेरुदण्ड दोनों में ही सेरेव्रो स्पाइनल द्रव्य तैरते रहते हैं। मेरुदण्ड के पोले भाग से होकर ब्रह्म नाड़ी मूलाधार से लेकर सहस्रार तक पहुँचती है। विशेष महत्वपूर्ण भौतिक तथा चेतन तत्वों का सूक्ष्म प्राण−संचार इसी पोले भाग में होकर होता है।
सूक्ष्म नाड़ी मण्डल का संक्षिप्त वर्णन इसलिए करना यहाँ अभीष्ट था, ताकि उसकी उपयोगिता, उपादेयता एवं महत्ता को भलीभाँति समझा जा सके। उनसे समुचित लाभ उठा सकना तभी सम्भव है जबकि उनमें बहने वाला प्राण−प्रवाह सुव्यवस्थित बना रहे तथा जमी विकृतियों का परिशोधन हो सके। नाड़ियों की मलीनता के कारण आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं, ऐसा उल्लेख योग ग्रन्थों में मिलता हैं–
मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव मध्यमः। कर्थ स्यादुन्भनीभावः कार्यासिद्धिः कर्थभवेत्॥ –योग संघ्या
जब तक नाड़ी मल से व्याप्त है तब तक प्राण मध्यम अर्थात् सुषुम्ना मार्ग में नहीं चल सकता किन्तु मल शुद्धि होने पर ही वह सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करेगा और जब तक मल नाड़ियों में विद्यमान है तब तक उन्मनी भाव कहाँ? पुनः मोक्ष रूप कार्य की सिद्धि कैसे हो सकती है?
मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव गच्छति। प्राणायामः कथं सिद्धस्त तत्वज्ञानंकथं भवेत्॥ तस्मादादौ नाड़ी शुद्धि प्राणायाम ततोऽम्यसेत्। –महायोग विज्ञान
अर्थात्–मलों से भरी हुई नाड़ियों में प्राणवायु अवरुद्ध है। ऐसे अवरोधों की स्थिति में प्राणायाम कैसे सफल हो? इसलिए प्रथम नाड़ी शोधन करना चाहिए पीछे प्राणायाम।
शुद्धिमेति यदा सर्वनाड़ी चक्रं मलाकुलम्। तदैव जायते योगी प्राण संग्रहणे क्षमः॥ –गोरक्ष पद्धति
मलों से भरे हुए नाड़ी चक्रों की जब शुद्धि हो जाती है तो योगी प्राण संग्रह करने में समर्थ होता है।
प्राणायाम ततः कुर्यान्नित्यं सात्विकयाधिया। यथा सुषुम्ना नाड़ीस्था मलाःशुद्धि प्रयान्ति च॥ –हठयोग प्रदीपिका
अर्थात्–अतः सात्विक बुद्धि से नित्य प्रति प्राणायाम करना चाहिए जिससे सुषुम्नास्थित मल की शुद्धि होती जाय।
यदा तु नाड़ी शुद्धिः स्याद् योगिनस्तत्वदर्शिनः। तदा विध्वस्तदोषश्च भवेदाँरम्भ सम्भवः॥ –शिव संहिता
जब नाड़ी शुद्धि होगी तब दोष शुद्धि होगी। उसी स्थिति में योग का आरम्भ सम्भव है।
यदा तु नाड़ी शुद्धिस्या तथा चिन्हानिवाह्यतः॥ कायास्त कृशता कान्तिस्तदा जायते निश्चितम्॥ –हठयोग प्रदीपिका
नाड़ी शोधन प्राणायाम की संक्षिप्त विधि इस प्रकार है–
प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठें। पालथी मारकर सुखासन, पद्मासन अथवा सिद्धासन में अपने अभ्यास के अनुरूप बैठा जा सकता है। कमर सीधी हो तथा नेत्र अधखुले।
दाहिने नासिका छिद्र को बन्द रखें। बांए से साँस खींचे और धीरे−धीरे नाभिचक्र तक ले जाँय। ध्यान, करें कि नाभि स्थान में पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा के समानुपीतवर्ण शीतल प्रकाश विद्यमान है। खींचा हुआ साँस उसे स्पर्श कर रहा है।
जितने समय में साँस खींचा गया था उतने ही समय तक भीतर रोकें और ध्यान करते रहें कि नाभिचक्र में स्थित पूर्णचन्द्र के प्रकाश को खींचा हुआ श्वास स्पर्श करके उसे शीतल और प्रकाशवान बना रहा है।
जिस नथुने से खींचा था, उसी बाँए छिद्र से ही बाहर निकाले और ध्यान करें कि नाभिचक्र के चन्द्रमा को छूकर वापिस लौटने वाली प्रकाशवान एवं शीतल वायु इड़ा नाड़ी की छिद्र नलियों को शीतल एवं प्रकाशवान बनाती हुई वापिस लौट रही है। साँस छोड़ने की गति अत्यन्त धीमी हो। कुछ देर साँस बाहर रोकिए बिना श्वास के रहें। बांए से ही इस क्रिया को तीन बार दुहराएँ।
जिस प्रकार बांए नथुने से पूरक, कुम्भ व रेचक एवं बाह्य कुम्भक किया था, उसी प्रकार दाहिने नथुने से भी करें। नाभिचक्र में चन्द्रमा के स्थान पर इस बार सूर्य का ध्यान कीजिए तथा साँस छोड़ते समय भावना कीजिए कि नाभि स्थित सूर्य को छूकर वापिस लौटने वाली वायु श्वास नली के भीतर ऊष्णता और प्रकाश उत्पन्न करती हुई लौट रही है। बांए नासिका के छिद्र को बन्द रखकर दाहिने से भी क्रिया को तीन बार करें।
अब नासिका के दोनों छिद्र खोल दीजिए। दोनों से सहज क्रम में लम्बा श्वास खींचिए और थोड़ी देर भीतर रोककर तथा मुँह खोलकर साँस बाहर निकाल दीजिए। यह क्रिया मात्र एक बार ही करनी चाहिए।
इस तरह तीन बार बाँये नासिका छिद्र से साँस खीचते और छोड़ते हुए नाभिचक्र में चन्द्रमा का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से साँस खींचते−छोड़ते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश का ध्यान, एक बार दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से साँस निकालने की क्रिया, इन सबसे मिलकर एक पूर्ण नाड़ी शोधन प्राणायाम बनता है। आरम्भ तीन प्राणायाम से करना चाहिए, हर माह एक−एक क्रमशः बढ़ाते हुए सात माह में दस तक इसकी संख्या पहुँचायी जा सकती है।
शक्ति आयामों में विभिन्न शक्तियों की चर्चा की जाती है। पदार्थ की शक्ति, विद्युतशक्ति, चुम्बकीय शक्ति गुरुत्वाकर्षण शक्ति शारीरिक शक्ति आदि। शक्ति का एक और भी आयाम है जो इनकी तुलना में कहीं अधिक सूक्ष्म, पर अधिक सामर्थ्यवान् है। वह है प्राण की शक्ति। जीव चेतना में प्राण की एक सीमित मात्रा भरी हुई है, जिसके द्वारा वह जीवन का दैनिक व्यापार चलाता है। ब्रह्मांड में प्राण शक्ति प्रचुर परिमाण में संव्याप्त है। ब्रह्मांड एक ऐसा विराट् सागर है जिसमें प्राण तत्व हिलोरे ले रहा है। पिण्ड सत्ता−जीव सत्ता में समाहित प्राण तत्व को आत्माग्नि कहा जा सकता है और ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राण को ब्रह्माग्नि। आत्माग्नि लघु है– ब्रह्माग्नि विभु। एक बूँद है–दूसरा सागर। इस प्रकार मूलतः एक होते हुए भी विस्तार भेद के कारण उसके दो रूप बन गया। तालाब में जब वर्षा होती है वह विपुल जलराशि अपने गर्भ में भरकर परिपूर्ण हो जाती है। वर्षा का यह अनुदान मिलने पर तालाब सूखता और घटता जाता है। पानी में मलीनता भी बढ़ती है। इसलिए तालाब को स्वच्छ रखने के लिए नये वर्षा जल की आवश्यकता पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्माग्नि में ब्रह्माग्नि का अनुदान सतत् पहुँचते रहना आवश्यक है। जिस साधना प्रक्रिया द्वारा इस प्रयोजन की आपूर्ति होती है उसे प्राणायाम कहते है। प्राणायाम अर्थात् प्राण का आयाम जोड़ने की–प्राण तत्व सम्वर्धन की− ब्रह्म चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के तुल्य बन जाय।
योग शास्त्रों में व्यक्तिप्राण और ब्रह्मप्राण के एकरूपता के सम्बन्ध में इस प्रकार उल्लेख आता है–
प्राणावैद्विदेवत्याः एकमात्रागृह्यते। तस्मात् प्राणा एक नामान्ता द्विमात्र हूयन्ते तस्मात्प्राण द्वन्द्वम्! –ऐतरेयोप.2127
अर्थात्– प्राण एक है, पर वह दो देवताओं में−दो पात्रों में भरा हुआ है।
शरीर शास्त्र की दृष्टि से यों तो ‘डीप ब्रिदिंग‘ गहरी साँस लेने को आरोग्यवर्धक बनाया गया है। इससे फेफड़ों को अधिक आक्सीजन की मात्रा मिलती है जो स्वास्थ्य सन्तुलन एवं संवर्धन में सहायक सिद्ध होती है पर अध्यात्म विज्ञान में जिस प्राणायाम की चर्चा की जाती है वह शरीर शास्त्रियों की प्रचलित डीप−ब्रिदिंग से भिन्न होती है। गहरी साँस से अतिरिक्त आक्सीजन मिलने और स्वास्थ संवर्धन का मात्र शारीरिक स्थूल प्रयोजन पूरा होता है, पर यौगिक प्राणायामों में चैतन्य प्राण तत्व का महत्वपूर्ण लाभ साधक को मिलता है। उल्लेखनीय है कि आक्सीजन और प्राण तत्व एक नहीं हैं। वायु में–निखिल ब्रह्मांड में दूध में घी की भाँति प्राण नहीं है–प्राण का संवाहक है। प्राणायाम प्रक्रिया, में ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण के लहलहाते सागर में से अभीष्ट परिमाण में प्राणतत्व खींचकर आत्मप्राण तक पहुँचाया जाता है। इस प्रकार आन्तरिक प्राण सम्पदा की मात्रा क्रमशः बढ़ती जाती है जिससे भौतिक सफलताओं ओर आत्मिक विभूतियों का अवरुद्ध मार्ग खुलता है।
विविध प्रयोजनों के लिए प्राण प्रक्रिया के अनेकों भेद−उपभेद किए गये हैं। सम्बद्ध अनेकों प्रकार के प्राणायामों का वर्णन योग ग्रंथों में आता है। विविध−प्रयोगों के लिए विभिन्न प्रकार के प्राणायामों का अवलम्बन लिया जाता है। मानवी सत्ता में शक्ति का भाण्डागार बीज रूप में विद्यमान है, जिसे कुण्डलिनी महाशक्ति के रूप में जाना जाता है। परमाणु के नाभिक में प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है। पर वह दिखायी पड़ती और उपयोग में तभी आती है जब एक निश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाकर नाभिकीय विखण्डन कराया जाता है। यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है और खर्चीली भी। कुण्डलिनी महाशक्ति जिसे–सरपेन्टाइन पॉवर–वाइटल फोर्स आदि के नाम से जाना जाता है, हर मनुष्य में सुषुप्तावस्था में पड़ी रहती है। दबे हुए खजाने की भाँति उस शक्ति का मनुष्य लाभ नहीं उठा पाता। उस महाशक्ति की एक नगण्य चिनगारी काम उभार के रूप में दिखायी पड़ती तथा विपरीत लिंगों के प्रति आकर्षण पैदा करती, प्रजनन के लिए प्रेरणा देती है। शक्ति के भाण्डागार का सामान्य मनुष्य कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। प्राणायाम की विशिष्ट प्रक्रिया उस महाशक्ति के जागरण में विशेष सहयोग करती है। कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणशक्ति का प्रचण्ड आघात आवश्यक होता है। शरीर में विद्यमान प्राण की मात्रा इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर पाती। निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राण तत्व को आकर्षित करना तथा अपने भीतर भरता पड़ता है। सूर्यवेधन प्राणायाम इस प्रयोजन के लिए सर्वाधिक सहायक सिद्ध होता है। कुण्डलिनी जागरण की साधना में सूर्यवेधन स्तर के प्राणायाम की ही आवश्यकता पड़ती है।
प्राण के प्रहार से जीवाग्नि के–उद्दीपन, प्रज्ज्वलन का उल्लेख साधना ग्रन्थों में अनेकों स्थान पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राण ऊर्जा, जीवनी शक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्वों को ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है। सूर्यवेधन प्राणायाम द्वारा इड़ा−पिंगला के माध्यम से अन्तरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राण तत्व मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता हैं तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती हैं। अग्नि का उल्लेख शास्त्रों में मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा के लिए ही हुआ है–
आदेहम ध्याकट्यन्तमग्निस्थानमुदाहृदम। तत्र सिन्दर वर्णोऽग्निर्ज्वलनंदशपं च च॥ –बिशिखोएनिषद्
अर्थात्– कटि के निम्न भाग में अग्नि स्थापना वह सिंदूर के रंग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि की साधना करनी चाहिए।
तडिल्लेखा तन्ठीतपन शशि वैश्वानरमयी। तडिल्लता समरुचिर्बिद्यु ल्लेखेन भास्वती॥
अर्थात्– बिजली की बेल के समान, तपते हुए चंद्रमा के समान अग्निमयी वह शक्ति दृष्टिगोचर होती है।
नाभेस्तिर्यग धोर्घ्व कुण्डलिनी स्थानम्। अष्टप्रकृति रुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति। यथा वद्बाय संचारं जलान्नदीनि पंरितः स्कन्धपाश्वष निरुध्यैनं मुखेनैष समावेष्ट्य ब्रह्मरंध्र योगकालेऽपानेनाग्निना च स्फुरति॥ –शाण्डिल्योपनिषद्
अर्थात्–नाभि के नीचे कुण्डलिनी का निवास है। यह आठ प्रकृति वाली है। इसके आठ कुण्डल है। यह प्राण वायु को यथावत् करती है। अन्न ओर जल को व्यवस्थित करती है। मुख तथा ब्रह्मरंध्र की अग्नि को प्रकाशित करती है।
मूलाधारस्थ ब्रह्ययात्म तेजोमध्ये व्यस्थिता। जीवशक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकाश तैजसी॥ –रुद्र तन्त्र
अर्थात्–मूलाधार में निवास करने वाली आत्मतेजरूपी अग्नि जीव शक्ति जीव शक्ति हैं। प्राणरूपी आकाश में प्रकाशवान कुण्डलिनी ही है।
देहमध्ये ब्रह्म नाड़ी सुषम्ना सूर्य रुपिणी पूर्णचन्द्राभावर्तते। सातुमूलाधारादारभ्य ब्रह्यरन्ध्रगामिनी भवति। तन्मध्ये तटकोटिसमानकान्त्यः मृणाल सववत् सूक्ष्माड् गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्तिताँ। दृष्टा मनसैव नरः सर्वपापबिनाशद्ध रा युक्तोभवति। –अद्वैत तारकोपनिषद्
अर्थात्–देह में ब्रह्म नाड़ी सुषुम्ना परम प्रकाशवान है। वह मूलाधार से ब्रह्मरंध्र तक जाती है। उनके साथ सूक्ष्म तन्तु में जुड़ी अति ज्वलन्त कुंडलिनी शक्ति है। उसका भावनात्मक दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से और बन्धनों से छुटकारा पा जाता है। प्राण का मूलाधार स्थित जीवाग्नि का प्रहार तथा उद्दीपन यही है–सूर्यवेधन प्राणायाम का लक्ष्य सूर्यवेधन प्राणायाम की प्रक्रिया इस प्रकार है–
किसी शान्त एकान्त स्थान में प्रातःकाल अथवा सायंकाल की बेला में स्थिर चित्त होकर बैठना चाहिए। आसन सहज हो, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटने पर दोनों हाथ, यह प्राण मुद्रा कहलाती है। सूर्यवेधन प्राणायाम के लिए इसी मुद्रा में बैठना चाहिए।
दांए नासिका का छिद्र बन्द करके बांए से धीरे−धीरे श्वास खींचना चाहिए। भावना यह हो कि वायु के साथ प्राण ऊर्जा की प्रचुर मात्रा मिली हुई है। वह प्राण् ऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग से वाम के ऋण विद्युत प्रवाह इड़ा धारा द्वारा मूलाधार तक पहुँचाना–वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिनगारी को झकझोरना, थपथपाना, जागृत करना–यह सूर्यवेधन प्राणायाम का पूर्वार्ध है। उत्तरार्ध में प्राण को पिंगला (मेरुदण्ड के दक्षिण मार्ग के धन विद्युत प्रवाह) में से होकर वापिस लाया जाता है। जाते समय अन्तरिक्ष स्थित प्राण शीतल होता है−ऋण धारा भी शीतल मानी जाती है। इसीलिए इड़ा को−पूरक को– चंद्रवत् कहा जाता है। इड़ा को चन्द्र नाड़ी कहने से यही प्रयोजन है। लौटते समय अग्नि उद्दीपन–प्राण प्रहार की संघर्ष प्रक्रिया से ऊष्मा बढ़ती और प्राण में सम्मिलित होती है। लौटने का पिंगला मार्ग धन विद्युत का क्षेत्र होने से उष्ण माना गया है। दोनों ही कारणों से प्राण वायु उष्ण रहता है, इसलिये उसे सूर्य की उपमा दी गयी है। इड़ा चन्द्र और पिंगला सूर्य है। पूरक चन्द्र और रेचक सूर्य है योग ग्रन्थों में ऐसा ही वर्णन मिलता है।
साधना में क्रिया−कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुंचाने का संकल्प दृढ़ता पूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को–प्राणाग्नि को–अपने प्रचण्ड आघातों द्वारा जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापिस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित, आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
दूसरी बार इससे उलटे क्रम में अभ्यास करना पड़ता है अर्थात् दाहिने नथुने से प्राण को खींचना ओर बाँई ओर से लौटाना होता हैं। इस बार पिंगला से प्राण का प्रवेश कराना तथा इड़ा से लौटाना पड़ता है। मूलाधार पर प्राण प्रहार तथा प्राणोद्दीपन की भावना पूर्ववत् करनी पड़ती है। एक बार इड़ा से जाना−पिंगला से लौटना। दूसरी बार पिंगला से जाना इड़ा से लौटना यही है सूर्यवेधन प्राणायाम का संक्षिप्त विधि−विधान।
कहीं− कहीं यौगिक ग्रन्थों में सूर्यवेधन प्राणायाम को ही अनुलोम−विलोम उलटे को। एक बार सीधा, एक बार उलटा। फिर उलटा, फिर सीधा। यह सीध उलटा चक्र ही लोम विलोम कहलाता है। लोम−विलोम की पूरी प्रक्रिया से एक पूरा सूर्यवेधन प्राणायाम होता है।
सूर्यवेधन प्राणायाम का शास्त्रों में असाधारण महत्व बताया गया है। हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है।–
कपाल शोधनं वात दोषहनं कृमि दोषंतहृतम्। पुनः पुनरिदं कार्य, सूर्यवेधन मुन्ततम्॥
यह कपाल शोधन, वात रोग निवारण, कृमिदोष विनाशक है। इस सूर्यवेधन प्राणायाम को बार−बार करना चाहिए।
कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्राण ऊर्जा की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ती है। यह प्रयोजन सूर्यवेधन द्वारा पूरा होता है। प्राण ऊर्जा का अभिवर्धन साधक की भौतिक और आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है। सूर्यवेधन की प्रक्रिया सामान्य दीखते हुए भी असामान्य परिणाम प्रस्तुत करने वाली है।
आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार मानवी अन्तराल में उभयलिंग विद्यमान है। हर व्यक्ति अपने आप में आधार नर और आधा नारी है। इसी तथ्य को अलंकारिक रूप में अर्धनारीश्वर भगवान के रूप में चित्रित किया जाता है। कृष्णा और राधा को भी एक ऐसा ही समन्वित रूप चित्रों में दृष्टिगोचर होता है। पति−पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह सूक्ष्म तथ्यों का स्थूल अलंकारिक वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति भी भीतर उभयलिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसका रुझान उसी ओर होता है तथा चेष्टाएँ भी उसी स्तर की बन जाती हैं। कितने ही पुरुषों में भी नारियों जैसा स्वभाव पाया जाता है तथा कई नारियों की आकृति नारी की होते हुए भी प्रकृति पुरुष जैसी होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन हो सकता है जैसा कि समय−समय पर ऐसा परिवर्तन समाचार सुना जाता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुँसक जैसी स्थिति बन सकती है।
कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार को योनि और सहस्रार को लिंग कहा गया है। इन दोनों संयोग साधना को कामकला के रूप में निरूपित किया गया है। इसका वर्णन कतिपय स्थलों पर ऐसा प्रतीत होती है मानो यह कोई काम सेवन की चर्चा की जा रही है,पर बात ऐसी नहीं है। वर्णनों में काम क्रीड़ा एवं शृंगारिकता का काव्यमय वर्णन हो किया गया है, पर क्रिश्स प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। तन्त्र ग्रन्थों के उलटबांसियों की तरह ‘मैथुन’ को भी तन्त्र साधना में सम्मिलित किया गया है। यह वर्णन अलंकारिक है तथा सूक्ष्म रूप से दो मूल सत्ताओं के संयोग का संकेत देता है। शारीरिक रति कर्म से इसका सम्बन्ध किसी प्रकार नहीं जोड़ा जा सकता हैं।
कुण्डलिनी महाशक्ति मूलाधार में शिव लिंग के साथ प्रसुप्त सर्पिणी की भाँति पड़ी रहती है। जागरण के उपरान्त वह मलमूत्रों से युक्त निकृष्ट स्थान से उठाकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान पर जा विराजती है। छोटा-सा शिवलिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है तथा छोटे से कुण्ड को मानसरोवर का रूप धारण करने का सुअवसर मिल जाता है। मूलाधार स्थित प्रसुप्त सर्पिणी जागृत होकर शिवकंठ से जा लिपटती है तथा शेषनाग के पराक्रमी रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह कुण्डलिनी जागरण की परिणति है। सहस्रार को कल्पवृक्ष, स्वर्गलोक, अक्षय वट वृक्ष आदि के रूप में दिव्य वरदान देने वाला कहा गया है। यह सब उपमाएँ ब्रह्मरन्ध्र में निवास करने वाले ब्रह्म बीज के लिए प्रयुक्त की गयी हैं, जो अपनी अविकसित अवस्था में मात्र मन, बुद्धि के छोटे−मोटे प्रयोजनों को पूरा करता है पर जब जागरण की स्थिति में पहुँचता है तो दिव्य सामर्थ्य सम्पन्न बन जाता है।
आन्तरिक काम शक्ति को योग ग्रन्थों में महाशक्ति महाकाली के रूप में वर्णन किया गया है। एकाकी नर−नारी भौतिक जीवन में अस्त−व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभयपक्षीय विद्युत का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता ही दिखायी पड़ती है, इसे दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिए कुण्डलिनी साधना की जाती है। साधना विज्ञान में कुण्डलिनी साधना को ही अलंकारिक रूप में कामक्रीड़ा के शब्दों में व्यक्त किया गया है। योनि, लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि प्रयुक्त किया गये शब्दों में उसी अंतःशक्ति के जागरण की विधि−व्यवस्था सन्निहित है। सम्बन्धित उल्लेख अनेकों स्थानों पर आता है–
तत्र स्थितो महालिंग स्वयं भुः सर्वदा सुखी। अधोमुखः क्रियावाँक्ष्य काम बीजेन न चलितः॥ –कालीकुलामृत
वहाँ, ब्रह्मरन्ध्र में वही महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभू और सुख स्वरूप है। इसका मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम−बीज द्वारा चालित है।
आत्मसंस्थंशिवं त्यक्त्वा बहिः सथंयः समर्चयेत्। हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज् भ्रमते जीविताशया॥
आत्मलिंगार्चन कुर्यादनाल सयं दिने दिने। तस्यस्यात्सकला सिद्धिनाँत्र कार्याविचरण॥ – शिवसंहिता
अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर−बाहर पूजते फिरते हैं वे हाथ के भोजन को छोड़ की इधर−इधर से प्राप्त करने के लिए भटकने वाले लोगों में से हैं।
आलस्य त्यागकर आत्मलिंग– शिव की पूजा करें इसी से समस्त सफलताएँ मिलती हैं।
आधाराख्यों गुदास्थाने पंकजंच चतुर्दलम्। तन्मध्यों प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्ध वंदिता॥ –गौरक्षा पद्धति
गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल सिख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वन्दना समस्त सिद्ध जन करते हैं। यही पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामख्या पीठ कहलाती है।
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम्। तिस्मन दृष्टे महायोग यातायातात्र विन्दते॥ – गौरक्षा पद्धति
इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम ज्योति प्रकट होती है वही कालाग्नि रूप है। जब योगी ध्यान, धारण, समाधि द्वारा उक्त ज्योति देखने लगता है तब उसका जन्म−मरण नहीं होता अर्थात् जीवन मुक्त हो जाता है।
मूलाधार स्थित कुण्डलिनी रूपी योनि और सहस्राररूपी लिंग का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। दोनों जब एकाकार हो जाते हैं तो दिव्य आदान−प्रदान आरम्भ हो जाता है। आत्मबल समुन्नत होता चला जाता है। उनके सम्बन्ध विच्छेद होने पर मनुष्य दीन, हीन, दुर्बल, असहाय, असमर्थ एवं असफल जीवन जीता है। कुण्डलिनी रूपी योनि और सहस्रार रूपी लिंग का संयोग मनुष्य की आन्तरिक अपूर्णता को दूर करता तथा परिपूर्ण बनाता है। साधना का उद्देश्य यही है। इसी को शिव शक्ति का संयोग तथा आत्मा का परमात्मा से मिलन कहते हैं।
कुण्डलिनी शक्ति का एक भोंड़ा उभार कामुकता के रूप में देखा जाता है। सामान्यतया उसका उभार इन्द्रिय मनोरंजन बनकर समाप्त हो जाता है। जमीन पर फैले हुए पानी का भाप ऐसे ही उड़ती और बिखरती भटकती रहती है, पर यदि भोजन पकाने से लेकर रेल का इंजन चलाने जैसे असंख्यों उपयोगी काम लिये जा सकते हैं। काम शक्ति के उच्चस्तरीय सृजनात्मक प्रयोजन अनेकों हैं। कलात्मक गतिविधियों में−काव्य जैसी कल्पना सम्वेदनाओं में, दया, करुणा एवं उदार आत्मीयता को साकार बनाने वाली सेवा साधना में, एकाग्र तन्मयता से होने वाले शोध प्रयत्नों में तथा आध्यात्मिक क्षेत्र से उद्भूत श्रद्धाभक्ति में उसे नियोजित किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण में यही प्रक्रिया अपनायी जाती तथा कामबीज का ज्ञानबीज में उन्नयन किया जाता है।
काम की इच्छा एक आध्यात्मिक भूख है जिसे निरोध अथवा दमन द्वारा मिटाया नहीं जा सकता। ऐसा करने पर वह और भी उग्र होती है। बहते हुए पानी में प्रवाह को रोकने से वह धक्का मारने की नयी सामर्थ्य उत्पन्न करता है। बन्दूक की उड़ती हुई गोली को रोकने पर गहरा आघात पहुँचता है। कामशक्ति को बलपूर्वक रोकने से अनेकों प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक उपद्रव खड़े होते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान के प्रणेता फ्रायड से लेकर आधुनिक मनोविज्ञानियों तक सभी ने इस तथ्य का समर्थन, प्रतिपादन अपने−अपने ढंग से किया है तथा सृजनात्मक प्रयोजनों से उसे नियोजित करने का परामर्श दिया है। दमन की अपेक्षा आकाँक्षा एवं अभिरुचि का प्रवाह मोड़ने में विशेष कठिनाई नहीं उत्पन्न होती। ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक स्वरूप यही है कि कामबीज का उन्नयन किया जाय, ज्ञान बीज में परिवर्तित किया जाय।
प्रचलित मान्यता के अनुसार जननेन्द्रियों को काम−वासना एवं रति प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी माना जाता है, पर वैज्ञानिक गहन अन्वेषण से यह तथ्य सामने आता है कि नर−नारी के प्रजनन केंद्रों नाभि के सीध में पड़ता है। हैनरी आस्ले की पुस्तक नोट्स आन फिजियोलॉजी में वर्णन है कि नर−नारियों के प्रजनन अंगों की उत्तेजना का नियन्त्रण मेरु दण्ड का ‘लम्बर रीजन’ ( निचले क्षेत्र) में स्थित केन्द्रों से होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कामोत्तेजना के प्रकटीकरण का जननेन्द्रिय मात्र उपकरण है। उसका उद्गम तथा उद्भव केन्द्र सुषुम्ना संस्थान में होने से वह कुण्डलिनी की ही एक लहर सिद्ध होती है जिसका प्रवार जननेन्द्रिय की ओर से उच्च केन्द्रों की ओर मोड़ देने की प्रक्रिया ही कुण्डलिनी साधना में प्रयुक्त होती है।
काम का सामान्य अर्थ रतिकर्म समझा जाता है, पर परम प्रयोजनों में उसका अर्थ विनोद, उल्लास, आनन्द माना जाता है। यह उच्चस्तरीय रसानुभूति परस्पर दो परक तत्वों के मिलन द्वारा उत्पन्न होती है। प्राण तत्व और रयि के मिलने से सृष्टि के प्राणियों का उत्पादन होता है। प्रकृति पुरुष की तरह नर और नारी भी परस्पर पूरक भूमिका निभाते हैं। मानवी सत्ता में भी ऐसी दो पूरक सत्ताएँ काम करती हैं जिन्हें नर और नारी का प्रतिनिधि मानते हैं। नारी सत्ता मूलाधार स्थित कुण्डलिनी तथा पर तत्व सहस्रार स्थित परब्रह्म है। अथर्ववेद में कामकला के अवतरण से दोनों के संयोग की प्रार्थना की गयी है–
यास्ते शिवस्तन्वः काम भद्रायाभिः सत्यं भवति यद्वणीषे ताभिष्ट्वभस्माँ अभि संविशस्वान्मत्रपापीरपवेशया धियः।
है परमेश्वर तेरा काम रूप भी श्रेष्ठ और कल्याण कारक है। उसका चयन असत्य नहीं है। आप काम रूप से हमारे भीतर प्रवेश करें और पाप बुद्धि से छुड़ाकर हमें निष्पाप उल्लास की ओर ले चलें?
ऐसी स्पष्ट प्रार्थना ऋषि गण क्षुद्र इन्द्रिय काम सेवन के लिए नहीं कर सकते। यह कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्रार्थना की गयी है। आत्मिक काम सेवन की कुण्डलिनी जागरण है। शारीरिक काम सेवन की तुलना में आत्मिक काम सेवन असंख्यों गुना अधिक आनन्ददायक है। काम क्रीड़ा को विषयानन्द और आत्म रति को ब्रह्मानन्द कहा गया है। विषयानन्द की तुलना में ब्रह्मानंद का आनन्द और प्रतिफल कई गुना अधिक है। नर−नारी के शारीरिक संयोग से क्षणिक इन्द्रिय तृप्ति होती तथा सन्तानोपलब्धि होती है। आत्मिक संयोग प्रचण्ड आत्मबल और प्रज्ञा को उत्पन्न करता है। शिव पार्वती के विवाह का प्रतिफल दो पुत्रों के रूप में उपलब्ध हुआ। एक का नाम गणेश दूसरे का कार्तिकेय। गणेश को प्रज्ञा का देवता माना गया है तथा कार्तिकेय को शक्ति का। दुर्दान्त दस्तु असुरों को परास्त करने के लिए कार्तिकेय का अवतरण हुआ था। उनके प्रचण्ड पराक्रम ने संत्रस्त देव समाज का परित्राण किया। गणेश ने मनुष्य को सद्ज्ञान का अनुदान देकर उसे सृष्टि का मुकुट मणि बनाया। दोनों ब्रह्म कुमार शिव−शक्ति के समन्वय के प्रतिफल हैं। शक्ति कुण्डलिनी तथा शिव सहस्रार कहलाता है, दोनों का संयोग कुण्डलिनी जागरण के रूप में जाना जाता है। यह पुण्य प्रक्रिया सम्पन्न होने से अंतरंग ऋतम्भरा प्रज्ञा से और बहिरंग प्रखरता से भर जाता है। आत्मिक प्रगति का मार्ग उन्हीं दो के सहारे पूरा होता है।
अस्तु स्थूल काम सेवन से विरत होकर आत्म रति द्वारा उपरोक्त दिव्य उपलब्धियों को करतलगत कर सकना कुण्डलिनी साधना के माध्यम से सम्भव है। इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता पर अत्याधिक जोर दिया गया है तथा वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। भगवान शंकर द्वारा अपने तृतीय नेत्र−विवेक द्वारा स्थूल काम तत्व की भस्म कर देना और उसके सूक्ष्म शरीर को अजर−अमर बना देना। कामबीज का ज्ञानबीज में परिवर्तन का अलंकारिक वर्णन है। कुण्डलिनी साधना द्वारा उन्नयन की यह प्रक्रिया सम्पन्न कर लेना एक प्रबल आध्यात्मिक पुरुषार्थ माना जाता है।
क्रियाशीलता एवं विश्रान्ति परस्पर सम्बद्ध हैं।यों, सूक्ष्म अर्थ में तो विश्राँति भी एक प्रकार की क्रियाशीलता ही है। इसी अर्थ में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि व्यक्ति बिना क्रियाशील रहे एक क्षण भी नहीं रह सकता– “न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।” (3।5) किन्तु सामान्यतः श्रम एवं विश्राम परस्पर पूरक हैं। विश्राम एक भिन्न प्रकार का श्रम है और इसमें उन अंगों−उपकरणों को विश्राम मिल जाता है, जो पहले श्रम कर रहे होते हैं। इस प्रकार नये सिरे से श्रमशील हो सकने के लिए विश्रान्ति आवश्यक है। निद्रा ऐसी ही विश्राम प्रक्रिया है जिससे जागृति की स्थिति में क्रियाशील चेतन मन तथा अधिक क्रियाशील रहने वाली हाथ−पैर, नाक−कान, आँख−मुंह आदि इन्द्रियों को पूरी तरह अपनी ड्यूटी से छुट्टी मिल जाती है और स्वसंचालित संस्थानों के काम का बोझ भी बहुत हल्का पड़ जाता है। तभी यह सम्भव होता है कि नये सिरे से शक्ति का संचय हो सके और नई ताजगी के साथ पुनः कर्तव्यपालन में प्रवृत्त हुआ जा सके।
कार्याधिक्य अथवा प्राणशक्ति के क्षरण के आधिक्य के कारण, नींद के अतिरिक्त शेष समय में भी बीच−बीच में कुछ विश्राम आवश्यकता होता है। निद्रा की स्थिति में मानो शरीर अनन्त आकाश से अपने उपयोग हेतु प्राण−विद्युत की नयी बैटरी प्राप्त करता है। शिथिलीकरण प्रक्रिया की प्रयोग की बैटरी को ही पुनः ‘चार्ज’ करने की प्रक्रिया कहा जा सकता है। यह भी एक आवश्यक कार्य है। इसका अभ्यास करने पर पूरे दिन भर काम का उसी ताजगी और स्फूर्ति के साथ करते रहना सम्भव होता है जिस फुर्ती और तत्परता के साथ सुबह व्यक्ति काम में जुटता है। यह आवश्यक इसीलिए भी है कि सामान्यतः मनुष्य जाने−अनजाने अपनी प्राण शक्ति का बहुत सारा अंश तेजी से खर्च करते रहते हैं। उस कमी की पूर्ति नींद के पहले भी, बीच में कर ली जाय तो शरीर पर अधिक दबाव नहीं बढ़ पाता। साथ ही, रात में नींद का कुछ मात्रा भी उस स्थिति में पर्याप्त हो जाती है। इस प्रकार काम के लिए अधिक समय मिल जाता है और शिथिलीकरण में लगने वाला समय घाटे का सौदा नहीं रह जाता। शिथिलीकरण की यह प्रेरणा प्राणियों में वैसे भी नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होती है तथा विभिन्न पशु−पक्षी इस प्रक्रिया का लाभ उठाते देखे जाते हैं।
अभ्यासवश अनजाने ही होती रहने वाली व्यर्थ की शारीरिक गतियाँ मनुष्य को कमजोर बनाती हैं। वैसे शक्ति संचय एवं व्यय में सामंजस्य का होना जरूरी है। पर होता ऐसा नहीं है। सामान्यतया प्रत्येक व्यक्ति संचय की तुलना में जाने−अनजाने विभिन्न प्रकार की अनुपयोगी आदतों, क्रियाओं द्वारा व्यर्थ शक्ति नष्ट करते रहते तथा कमजोर एवं रुग्णता में भी इसका एक बड़ा भाग यों ही बेकार चला जाता है। शिथिलीकरण द्वारा इस अपव्यय को रोका जाता है और व्यय की पूर्ति की जाती है।
प्रकृति प्रदत्त शिथिलीकरण प्रक्रिया में अभ्यस्त जीवों में इसका सुन्दर उदाहरण देखा जा सकता है। बिल्ली विश्रामावस्था में निर्जीव पड़ी रहती है, तनाव एवं आवेश से रहित, वह स्थिर और गतिहीन पड़ी नजर आती है। पर तुरन्त हमला करना हो तो बिजली के झटके के समान झपटती है। पहले से आक्रमण के लिए उसकी माँसपेशियाँ तनी नहीं रहतीं। जरूरत पड़ने पर ताजा प्राण नस−नाड़ियों एवं माँसपेशियों में भेज दिया जाता है। यही कारण है कि विद्युत की गति से उसकी क्रियाएँ प्रकट होती हैं। आवश्यकता कार्यों के अतिरिक्त उसके प्राण का अपव्यय नहीं होने पाता। शेर, कुत्ते, साँप प्रभृति अन्य जीव−जन्तुओं में भी ये विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। बुद्धिमान कहा जाने वाला मनुष्य ही इसका अपवाद है जो बेकार की चेष्टाओं एवं मानसिक उद्वेगों में अपनी शक्ति का क्षरण करता रहता है।
विचारों का क्रिया में प्रकट होना और क्रियाओं द्वारा मन का प्रभावित होना एक सर्वविदित तथ्य है। इनमें से किसी भी तथ्य को नाकारा नहीं जा सकता। मन के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की विस्तृत व्याख्या मनोविज्ञान द्वारा की गई है। स्वास्थ्य पर मनःस्थिति के प्रभाव का प्रतिपादन मनोविज्ञान करता है। साथ ही शारीरिक स्थिति एवं उसकी विकृति का प्रभाव मनोजगत पर पड़ता है, यह दूसरा पक्ष भी उक्त तथ्य से जुड़ा हुआ है। शिथिलीकरण में इन दोनों तथ्यों को समान रूप से ध्यान में रखा जाता है।
शिथिलीकरण का प्रथम चरण है–”शरीर एवं मन को ढीला छोड़ देना।” इस अभ्यास में शरीर को सभी प्रकार के तनावों से रहित कर दिया जाय। चित लेटकर मन को सम्पूर्ण शरीर–सिर से लेकर पैर तक के प्रत्येक अंग, माँस−पेशियों नस−नाड़ियों में घुमाया जाय। यह अभ्यास जितने मनोयोग से किया जायेगी, उसी अनुपात में सफलता मिलेगी। मन को माँस−पेशियों में घुमाने पर मालूम होगा कि कहीं−कहीं की माँस−पेशियाँ अब भी तनी हुई हैं, उन्हें भी ढीला छोड़ दिया जाय।
अभ्यास की प्रगाढ़ता में अनुभव होता है कि शरीर के प्रत्येक अंग−प्रत्यंग विश्रामावस्था में पहुँच रहे हैं। कल्पना−चित्र बनाया जाय कि हमारा शरीर और इसके अवयव सीसा की तरह भारी है। मन में सीसे की भाँति भारी होने की भावना बारम्बार की जाय। इसके साथ ही दोनों भुजाओं को थोड़ा-सा उठाकर तनाव रहित किया जाय। उनमें प्रवाहित प्राण को खींचने का प्रयास करें, जिससे वे अपने भार से ही गिर पड़े। आरम्भ में यह विचित्र और कठिन लगता है क्योंकि माँसपेशियों में आकुँचन की आदत पड़ गयी है। जब भुजाओं पर अधिकार हो जाय तो पैरों पर भी यह प्रयोग किया जाय। पहले एक−एक पैर को अलग−अलग। तत्पश्चात् दोनों पैरों को एक साथ। तनिक-सा ऊपर उठाकर इनमें से भी प्राण खींचने एवं अपने ही भार से गिर जाने का प्रयोग करें। बीच−बीच में अभ्यास के साथ विश्राम करना भी आवश्यक है। इस क्रम को अब आगे भी बढ़ाया जाय। सिर को तनिक-सा उठाने एवं अपने ही भार से गिरने देने का अभ्यास, सिर को भी तनाव से रहित बनाता है।
भूमि अथवा चारपाई, चौकी पर पड़े−पड़े यह भावना की जाय कि शरीर का सारा भार भूमि अथवा चारपाई पर है। यह कुछ विचित्र-सा लग सकता है। कोई भी सोच सकता है कि शरीर का भार भूमि पर रहता ही है। पर बात ऐसी नहीं है। तनाव की स्थिति में हम स्वयं किसी न किसी माँसपेशी में अपने भार को वहन किए रहते हैं। पर इस स्थिति से अनभिज्ञ बने रहते हैं। वहन कर रही माँसपेशी का भार भी भूमि पर ही डालने से शरीर के तनाव रहित होने की बात बनती है।
सोते हुए बच्चे इसके सुन्दर उदाहरण हैं। उसका सम्पूर्ण भार बिस्तर पर होता है। भार कम होते हुए भी उसके दबाव के चिन्ह बिस्तर पर देखने से स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। यही स्थिति शिथिलीकरण अभ्यास में साधक को लानी चाहिए। शरीर के प्रत्येक अवयव,माँसपेशी, नस−नाड़ी के तनाव रहित होने, भार के भूमि पर पड़ने की भावना जितनी प्रगाढ़ होगी, शिथिलीकरण का उतना ही अधिक लाभ मिल सकेगा।
शिथिलीकरण का दूसरा चरण है– मन को विश्राम देना। शारीरिक विश्राम ही पर्याप्त नहीं है, मानसिक भी उतना ही आवश्यक है। इसमें मानसिक अभ्यास का समावेश करना भी जरूरी है। शरीर एवं मन के एक दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े होने एवं एक की स्थिति का दूसरे प्रभाव पड़ने के कारण ध्यान दोनों पर ही देना होगा।
अगला अभ्यास इस प्रकार है। अधलेटी स्थिति या सुखासन में शरीर की ढीला करके बैठा जाँय। बाहरी बातों, विषयों से मन को खींचे। ध्यान को बाहर से खींचकर अपनी अन्तरात्मा पर लगाया जाय। भाव यह रहे कि हम शरीर एवं मन से परे हैं। इन स्थूल आवरणों को छोड़ सकते हैं। पार्थिव शरीर से मन को हटाकर उसे अपने वास्तविक अहं भाव आत्मा पर एकाग्र किया जाय। कल्पना की जाय कि अपने चारों ओर जो सृष्टि है, उसमें करोड़ों सूर्य हैं जो अनेकों पृथ्वी एवं ग्रह−नक्षत्रों से हम घिरे हुए हैं। अनन्त देश एवं काल में मन के भाव फैलायें। चेतना को समस्त सृष्टि में फैला हुआ देखा जाय। अब अपनी पृथ्वी एवं स्वयं की स्थिति का मूल्याँकन किया जाय कि विराट् सृष्टि, महती चेतना के समक्ष अपना अस्तित्व कितना नगण्य एवं तुच्छ है। स्थूल से ऊपर उठकर अब आगे चेतना के क्षेत्र में प्रवेश किया जाय। हम उस महती अविनाशी सर्वव्यापक चेतना के समर्थ अंश हैं, अमर, अविनाशी एवं नित्य हैं। हमारे बिना सृष्टि पूर्ण नहीं हो सकती। वह चेतना हमारे अन्दर स्फुरण कर रही है। हृदय में महानगर की तरंगें लहलहा रही हैं। इस भावना की प्रगाढ़ता के उपरान्त जब शारीरिक धरातल पर आया जायेगा, तो अनुभव होगा कि शरीर एवं मन दिव्य शक्ति से ओत−प्रोत हैं।
शिथिलीकरण का यह दूसरा अभ्यास योग निद्रा के अभ्यास का आरम्भिक चरण है। योगनिद्रा अपने आप में एक पूरा योगाभ्यास है। यह अभ्यास जितना ही प्रगाढ़ एवं परिपूर्ण हो सकेगा, उतना ही अधिक लाभ प्राप्त होगा। पहला अभ्यास शरीर की थकान हरता है और शरीर की बैटरी को पुनः ‘चार्ज’ करता है। दूसरा अभ्यास नींद की भी आवश्यकता पूरी करता है और शरीर में नयी ही चेतना आकर्षण−धारण कराता है। यहाँ यह स्मरण कर लेना चाहिए कि निद्रा भी मात्र थकान मिटाने की प्रक्रिया नहीं है। अपितु उस स्थिति में अचेतन मस्तिष्क अन्तरिक्ष संव्याप्त विद्युत−प्रवाह से अपने लिए नयी विद्युतीय खुराक प्राप्त करता है। शिथिलीकरण का दूसरा अभ्यास भी इस प्रक्रिया को पूर्ण करता है और इस प्रकार वह चेतन मन को भी विश्रान्ति तथा नवीन स्फूर्ति प्रदान करता है। इस प्रकार शिथिलीकरण की उभय चरणों वाली प्रक्रिया शारीरिक−मानसिक विश्रान्ति एवं नई शक्ति के सम्पादन का उत्तम उपाय है।
नास्ति ध्यानं बिना ज्ञाँन नास्ति ध्यानमयोगिनः। ध्यानं ज्ञानं च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवाणव॥
ज्ञानं प्रसन्नमेकाँग्रशेषोपाधिविज्जतम्। योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्त्वेव सिद्धयति॥
प्रक्षीणाशेषपापानाँ ज्ञाने ध्याने भवेन्मतिः। पापोप्रहतबुद्धीनाँ तद्वाताँषि सुदुलभा॥
यथा वह्विर्महादीप्तः शुष्कमाद्रं च निर्दहेत्। तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात्॥ –शिव पुराण
ध्यान ही ज्ञान का मुख्य साधन है और योग के बिना ध्यान सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए योग द्वारा ध्यान का प्राप्त करना सर्वोपरि कर्त्तव्य है।जो ज्ञान और ध्यान दोनों को प्राप्त कर लेता है वह इस संसार चक्र से निश्चय ही मुक्त हो जाता है। जिनके पाप क्षीण हो जाते हैं उन्हीं की रुचि ज्ञान और ध्यान की ओर जाती है अन्यथा पापी लोगों को तो इस तरह को बातें भी अच्छी नहीं लगतीं। जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले सूखे सब पदार्थों को भस्म कर देती है उसी प्रकार ध्यान की अग्नि भी कर्मों को शीघ्र ही नष्ट कर देती है।
प्रगतिशील जीवन और उज्ज्वल भविष्य के लिए अभीष्ट मार्गदर्शन एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की सुविधा प्राचीनकाल के आरण्यक आश्रमों में थी। पर लगता है वह परम्परा मध्यकाल के अन्धकार युग में विलुप्त हो गई और आद्यावधि पुनर्जीवित न हो सकी। इस युग प्रभात को एक स्वर्णिम किरण ही कहना चाहिए कि उस वर्ष व्यवस्था का पुनर्जीवन सम्भव हो सका। आरम्भिक स्वरूप बीजाँकुर की तरह छोटा होने पर भी सन्निहित उद्देश्य और प्रयास की वरिष्ठता देखकर हर दूरदर्शी यह अनुमान लगा सकता है कि आज नहीं तो कल इस प्रयास के महान परिणाम उत्पन्न होंगे और समूचे विश्व समाज को मानवी गरिमा से अनुप्राणित करके रहेंगे।
नवयुग की तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए शान्ति कुँज में समय−समय पर विभिन्न प्रयोजनों के लिए छोटी−छोटी अवधि के सत्र लगते रहते हैं। इनमें आये दिन उलट−पुलट करनी पड़ती है। आज तो रसोई के चूल्हे पर ही तवा उतार कर पुल्टिस बनाने, नहाने का पानी गरम करने, कपड़े रंगने, साबुन बनाने आदि के बर्तन चढ़ाने पड़ते हैं। सत्रों का विषय परिवर्तन इसी विवशता में करना पड़ता है और कार्यक्रम इसी कारण प्रायः एक साल के ही बनाने, बदलने पड़ते हैं।
इस वर्ष तीन विशिष्ट सत्र शृंखलाएँ आरम्भ की जा रही हैं। ये एक साल तो विधिवत् चलेंगी ही सुविधा रही तो इन्हें स्थायित्व भी मिलेगा। जिन सत्रों का निर्धारण किया गया है वे इस प्रकार हैं– (1) उच्चस्तरीय अध्यात्म साधनाओं के लिये एक मास के कल्प साधना सत्र–एक जून गायत्री जयन्ती से। (2) युग शिल्पियों के एक−एक मास से सृजन सत्र– एक जून गायत्री जयन्ती से (3) तीर्थयात्रा, षोडश संस्कार एवं समस्या समाधान हेतु संगम सत्र–ये 5−5 दिन के होंगे व 1 मई से आरम्भ होंगे। तीनों की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है।
कल्प साधना-सत्र
पिछले दिनों शान्तिकुंज में एक मास के चान्द्रायण सत्र ब्रह्मवर्चस साधना सत्र चलते रहे हैं। उन्हीं का परिष्कृत रूप कल्प साधना सत्रों के रूप में विकसित हुआ है। अब वे पूर्णिमा से पूर्णिमा तक नहीं वरन् अंग्रेजी महीने की पहली तारीख से तीस तक चला करेंगे। इससे तिथियों की घट बढ़ में छुट्टी लेने में, रिजर्वेशन कराने में झँझट न पड़ा करेगा। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि पन्द्रह दिन आहार घटाने और पन्द्रह दिन बढ़ाने के स्थान पर पूरे महीने का एक ही उपवास निर्धारण कर दिया जायगा और वह पूरे महीने एक समान चलेगा। इसे कल्प चिकित्सा के समतुल्य समझा जा सकता है। दूध कल्प, छाछ कल्प, आम्र कल्प, खरबूजा कल्प, शाक कल्प, और न्यूनतम खिचड़ी कल्प तक के उपवासों की व्यवस्था रहेगी। साथ−साथ साधकों की शारीरिक,मानसिक स्थिति के अनुरूप चिकित्सा स्तर पर तुलसी कल्प, आँवला कल्प, ब्राह्मी कल्प, अश्वगन्धा कल्प इत्यादि जैसे उपचार भी जुड़े रहेंगे। तीसरा परिवर्तन यह हुआ है कि हर साधक के लिए एक महीने में सवा लक्ष अनुष्ठान अनिवार्य न रहेगा वरन् हरेक की विशेष स्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए पृथक−पृथक साधना क्रम निर्धारित किया जायगा।
आहार का साधना की सफलता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पिप्पलाद, कणाद की आहार साधना प्रसिद्ध है। स्वयं गुरु देव को जौ की रोटी छाछ पर चौबीस वर्ष रहकर चौबीस पुरश्चरण करने की बात सामने है। इसी प्रकार प्रस्तुत कल्प साधना सत्रों में साधना उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
सभी साधकों को साधना, स्वाध्याय,संयम, और सेवा के चारों उपक्रम किस प्रकार पूरे करने चाहिए। यह निर्धारण अब हर साधकों की विशेष स्थिति का पर्यवेक्षण करके पृथक पृथक ही किया जाया करेगा और उस उपक्रम का क्या प्रभाव हुआ इसकी जाँच पड़ताल ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की अनुसंधानशाला में निष्णात नृतत्व वेत्ताओं द्वारा नियमित की जाती रहेगी। जिन पापों का स्मरण हो उनके प्रायश्चित्त के सम्बन्ध में भी इन्हीं दिनों परामर्श दिया और सम्भव हो तो उसे कराया भी जायगा।
युग शिल्पी सत्र (सृजन सत्र)
यह भी एक − एक महीने के होंगे और अंग्रेजी महीने की पहली से लेकर तीस तक निरन्तर चलेंगे। प्रज्ञा संस्थानों में नियुक्त कार्यकर्त्ताओं के लिए तो यह प्रशिक्षण अनिवार्य है ही। साथ ही प्रज्ञा संस्थानों के संचालकों, प्रज्ञा पुत्रों, वानप्रस्थों परिव्राजकों एवं वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के लिए भी इनमें सम्मिलित होना आवश्यक हैं। भले ही वे पिछले दिनों कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
इस वर्ष प्रज्ञा संस्थानों का सामूहिक रूप से तथा वैसा सम्भव न हो वहाँ प्रज्ञा पुत्रों को सर्वत्र पंच सूची योजना हाथ में लेने पर अत्याधिक जोर दिया गया है। इस वर्ष दो और विशेष कार्यक्रम नये सिरे से बढ़े हैं(1) प्रज्ञा पुराण के आयोजन तथा उनके लिए कथा शैली, प्रवचन प्रक्रिया तथा सम्भाषण कुशलता की समुचित जानकारी साथ ही गुजराती भाषा में 1 मास का प्रज्ञा पुराण शिक्षण भी इन्हीं तारीखों से आरम्भ किया जा रहा है। गुजराती भाषा में प्रज्ञा पुराण का प्रथम खण्ड भी इन दिनों छप रहा है। (2) हर प्रज्ञा पीठ में घरेलू चिकित्सा की तरह जड़ी−बूटी उपचार का समावेश है। इन्हीं दिनों ऐसी बीस चुनी हुई जड़ी बूटीयों का निर्धारण हुआ है जिनके सहारे सामान्य रोगों का उपचार साधारण शिक्षित व्यक्ति भी भली प्रकार कर सके। इन जड़ी बूटियों का सभी संस्थान अपने−अपने यहाँ उगायेंगे ताकि खर्च से बचा जा सके। जब तक वैसी व्यवस्था न बने तब तक इन बूटियों को पिरो रूप में शान्ति कुँज से भी लागत मात्र पर प्राप्त किया जा सकेगा।
आसनों की अभिनव पद्धति शारीरिक रोगों के लिए और प्राणायामों के विशेष निर्धारण मानसिक रोगों के निवारण तथा दोनों ही क्षेत्रों की बलिष्ठता संवर्धन के लिए इन्हीं दोनों आविष्कृत हुए हैं। प्राथमिक सहायता, गृह परिचर्या का शिक्षण भी नाथ चलेगा। अगले दिनों स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर उपकरण सभी संस्थानों के पास होंगे। उनका सही प्रयोग एवं रख−रखाव भी प्रयोक्ताओं को आना चाहिए अन्यथा उन उपकरणों के बिगड़ जाने का भय रहेगा।
एक हजार जीवन दानियों की माँग की गई है। आशा है प्रज्ञा परिवार से ही उसकी पूर्ति होगी। इनमें से प्रत्येक को एक महीने के प्रशिक्षण में सम्मिलित होना पड़ेगा। इसके उपरान्त ही इस निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव होगा कि उनका जीवन दान उत्साह कारगर भी है या नहीं।
एक महीने की सामान्य शिक्षा में कल्प साधना वाले, युग सृजन वाले तथा जीवनदानी तीनों ही सम्मिलित रहेंगे और उनका प्रसंग भिन्न होने पर भी लक्ष्य एक रहने के कारण प्रशिक्षण में सभी को समान रूप सम्मिलित होना होगा। साधनाएँ भर पृथक−पृथक रहेंगी। सामूहिक शिक्षण का स्वरूप सभी के लिए एक जैसा है। उसमें सभी को समान रूप से सम्मिलित होने का अवसर मिलेगा।
अपने परिचय समेत आवेदन पत्र भेजना और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आना यह नियम पूर्ववत् ही हैं। भोजनालय की अब स्वतन्त्र व्यवस्था बना दी गई है। मासिक व्यय सौ रुपये आता है। सभी शिक्षार्थी अपना भोजन व्यय स्वयं वहन करेंगे। आवश्यक वस्त्र तथा खर्च सभी को साथ लेकर चलना चाहिए।
(3) पाँच दिवसीय संगम सत्र
इस वर्ष तक मई से ब्रह्मवर्चस् शान्ति−कुँज में होने वाले पाँच दिवसीय सत्रों का उन आत्मीय परिजनों के लिए बहुत महत्व है जो थोड़े समय के लिए पर्यटन का आनन्द, तीर्थ यात्रा का पुरातन षोडश संस्कारों की विशिष्ट फलदायक पद्धति का समुचित त्रिवेणी संगम जैसा लाभ उठाना चाहते हैं। यह तीनों ही प्रक्रियाएँ इन दिनों विकृत हो रही हैं। कुछ समय पुनीत स्थानों में रहकर वहाँ के प्राण प्रवाह, दिव्य सान्निध्य एवं उपयोगी साधना क्रम अपनाकर उसे आध्यात्मिकता का स्वल्पकालीन रसास्वादन किया जाता है। जो कभी अधिक समय तक उपलब्ध हो सके तो व्यक्ति को कृत−कृत्य बना दे। तीर्थों के इतिहास और पुण्य का विवरण सुनने के साथ यह भी जानना चाहिए जो माहात्म्य बताये गये हैं वे प्रतिमा दर्शन या नदी स्नान के नहीं वरन् वहाँ से मिलने वाली प्रेरणाओं के हैं। इन दिनों तीर्थों में ऊँची इमारतों वाले देवालयों में सजधज कर बैठी प्रतिमाएँ भर दिखती हैं। सेनेटोरियम में रहकर स्वास्थ्य लाभ पाने की तरह तीर्थ सेवन से आत्मिक प्रगति का पथ−प्रशस्त होने जैसा उपक्रम अब खोजने पर भी किसी तीर्थ में दीख नहीं पड़ता। न कोई वहाँ प्रायश्चित के लिए आता है, न प्रेरणा पाने के लिए, न साधना के लिए। लकीर पीटने की भगदड़ भर मची रहती है और उसके मात्र निहित स्वार्थों द्वारा भावुक धर्म प्रेमियों की जेबें काटने तथा उलटे उस्तरे से हजामत बनाने की विडंबना देखने के अतिरिक्त और कहीं कुछ हाथ नहीं लगता।
भारतीय संस्कृति में गर्भस्थ बालक से लेकर मरणोत्तर दे लोक में पहुँचने तक की अवधि में समय−समय पर षोडश संस्कार कराने की व्यवस्था है। इसमें प्रत्यक्ष प्रशिक्षण और परोक्ष प्रभाव एवं दिव्य परिणाम प्राप्त करने का सूक्ष्म तत्वों से भरा पूरा समावेश है। गर्भिणी का पुंसवन, बालकों का नामकरण, अन्न प्राशन,मुण्डन, विद्यारम्भ, वयस्कों का यज्ञोपवीत, विवाह अधेड़ों का वानप्रस्थ, मृतकों का श्रद्धा इन षोडश संस्कारों में प्रमुख हैं। यह आमतौर से कराये तो घरों पर ही जाते हैं, पर इस रहस्य से भी सभी अवगत हैं कि इन्हें यदि तीर्थों के पुण्य क्षेत्र में निष्णात कर्मकाण्डी विद्वानों किन्हीं ऋषि स्तर के सान्निध्य आशीर्वाद सहित कराया जा सके तो उनकी सार्थकता कहीं अधिक बढ़ जाती है। जिन्हें सुविधा है वे मुंडन संस्कार तो आमतौर से तीर्थों में जाकर ही कराते हैं। अन्य संस्कार भी यदि उपयुक्त तीर्थों में कराये जा सकें तो उनका शास्त्रोक्त प्रतिफल मिलने की आशा ही कहीं अधिक बढ़ जाती है। प्रज्ञा परिजनों को आमन्त्रित किया जा रहा है वे उपरोक्त तीनों प्रयोजनों का लाभ एक साथ उठाने के लिए इस अभिनव योजना से लाभ उठायें। इसी प्रयोजन के लिए आगामी एक मई से पाँच दिवसीय सत्रों की व्यवस्था की गई है। वे हर महीने पाँच की संख्या में निर्धारित तारीखों में हुआ करेंगे। 1 से 5, 7 से 11, 13 से 17, 19 से 23, तथा 25 से 29 के क्रम में शिविर चलते रहेंगे। बीच का दिन आने जाने का रहेगा।
पर्यटन के लिए हरिद्वार, कनखन, ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला के चार छोटे धामों में बिखरे हुए ज्ञात अज्ञात तीर्थों का दर्शन कराने का प्रबन्ध बस द्वारा किया गया है। यात्री प्रातःकालीन साधना, कोई संस्कार कराना हो तो उसका क्रिया−कृत्य तथा भोजन से निवृत्त होकर 9 से 10 बजे तक बस द्वारा चल पड़ेंगे। शाम को 4 से 5 तक लौट आवेंगे। सायंकाल नित्य कर्म भोजन कसे निवृत्त होकर रात्रि में कथा प्रवचन सुनेंगे और शान्ति पूर्वक नौ बजे तक शयन कक्ष में चले जाया करेंगे। सत्र पाँच दिन के हैं। बस तीर्थ यात्रा प्रबन्ध दो दिन का है। शेष दिनों में से एक दिन व्यक्ति गत समस्याओं के समाधान का भी है। तीसरे प्रहर अन्यत्र घूमना मनोरंजन करना हो तो उसकी छूट है। पाँचवे दिन 10 बज तक भोजन से निवृत्त होकर सभी विदा हो जायेंगे।
उपरोक्त प्रयोजनों के लिए आने वालों के लिए शान्तिकुँज, गायत्री नगर में एक सौ आगन्तुकों तक के ठहरने का स्थान बनाया गया है। जन्म दिन, विवाह दिन मनाने से लेकर उपरोक्त षोडश संस्कारों के लिए एक विशेष मण्डप बनाया गया है। यात्रा के लिए एक बस का प्रबन्ध किया गया है जिससे दो दिन में बारी−बारी से अभी शिविरार्थी अपनी यात्रा कर लिया करें। भोजनालय की विशेष व्यवस्था बनाई गई है, जहाँ बाजार की तुलना में अधिक स्वच्छ एवं सस्ता भोजन उपलब्ध हो सके। नामकरण से लेकर यज्ञोपवीत दीक्षा एवं पूर्वजों के श्राद्ध तक के सभी संस्कार कराने के लिए इस विधि के निष्णातों को काम सौंपा गया है। तीर्थ यात्रा बस में एक मार्गदर्शक साथ जाया करेगा जो हर पुण्य स्थान का इतिहास महत्व एवं प्रभाव की प्रामाणिक जानकारी कराया करेगा।
जन्म दिन का, विवाह दिन का आशीर्वाद लेने और पर्वों, त्यौहारों तथा जन्मदिवसोत्सव की तरह ही उसका वार्षिक धर्म कृत्य करने के लिए भी आया जा सकता है। विवाह के उपरान्त वर−वधू प्रायः आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शान्ति कुँज पहुँचते रहते हैं। यह परम्परा आगे भी जारी रहेगी। प्रज्ञा परिवार के उत्तराखण्ड तीर्थयात्री प्रायः शान्तिकुँज का आशीर्वाद प्राप्त करके तब आगे बढ़ते हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री को उत्तराखण्ड के ‘चार धाम’ कहा जाता है। इन दिनों उनके लिए कहीं पूरी कहीं आधी बस यात्रा का प्रबन्ध हो गया है और घोड़े रेडी, कंडी की भी सुविधा जहाँ−तहाँ है इतने पर भी प्राचीन काल का वह भय बना ही रहता है जिसमें दुर्घटना होने और बीमार पड़ने का भय हर उत्तराखण्ड यात्री को रहता था। अब वैसा कुछ है नहीं तो भी सुरक्षा एवं प्रयोजन की सफलता की अपेक्षा में कम से कम प्रज्ञा परिवार के लोग तो इस यात्रा पर बढ़ने से पूर्व शान्ति−कुँज का विधिवत् आशीर्वाद प्राप्त करके ही जाते हैं।
उपरोक्त सभी कारणों का समावेश रहने से अब शान्ति−कुँज उत्तराखण्ड का पाँचवाँ धाम बन गया है। इस क्षेत्र को ही समस्त भारत की तीर्थ परम्परा से परिचित व्यक्ति जब यहाँ आते हैं तो इसे प्राचीन काल की स्मृति दिलाने वाला जीवन्त तीर्थ कहते हैं।
ब्रह्मवर्चस में अध्यात्म और विज्ञान के अनुसंधान का दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रयोगशाला–गायत्री के चौबीस अक्षरों की चौबीस शक्ति प्रतिमायें–ग्रह नक्षत्रों की वेधशाला, हिमाच्छादित हिमालय को प्रत्यक्ष झाँकी कराने वाली शक्तिशाली दूरबीन, विलक्षण ब्रह्माण्ड की झाँकी कराने वाली एक आकर्षक प्रदर्शनी, आब्जर्वेटरी, जड़ी−बूटी उद्यान का अद्वितीय दर्शन परम पुनीत नित्य नौ कुण्डी यज्ञशाला में यज्ञ, नियमित गायत्री उपासना, दैनिक कथा−सत्संग, षोडश संस्कारों का प्रबन्ध, समस्त तीर्थों का एक ही स्थान पर दिव्य दर्शन, देवात्मा हिमालय और गंगावतरण शान्तिमय वातावरण, स्नेह सौजन्य और आतिथ्य से भरा पूरा सज्जनोचित व्यवहार, बालकों का गुरुकुल, गृहस्थों का तीर्थ सेवन और अधेड़ों का आरण्यक जहाँ एक साथ चलते हों ऐसा प्रशिक्षण देश विदेशों में धर्म−धारणा का आलोक उत्पन्न करने वाले लेखनी और वाणी के माध्यम से चलने वाले उच्चस्तरीय प्रयास इतनी विशेषता किसी एक स्थान पर देखने को मिल सके ऐसा कोई तीर्थ कदाचित ही किसी ने देखा हो। यही कारण है कि जो इस प्राणवान तीर्थ को एक बार देख जाता है उसकी स्मृति कभी नहीं भूलता और कभी कोई परिचित सम्बन्धी हरिद्वार यात्रा के लिए जाता है तो उसे वह इतना परामर्श अवश्य देता है कि शान्ति−कुँज ब्रह्मवर्चस् देखे बिना वापस न लौटें। प्रज्ञा पुरुष महाप्राण पू. गुरुदेव और अरुन्धती की जीवन्त प्रतिमा स्नेह सलिला माता जी का जाज्वल्यमान प्राण और प्रयास जिस संस्थान के कण−कण में ओत−प्रोत हो उसे सच्चे अर्थों में तीर्थ होना ही चाहिए। पाँच दिन के लिए यहाँ आने वाले तो अपनी यात्रा सार्थक मानते ही हैं, जो मात्र दर्शन के लिए पहुँचते हैं वे भी यह मानते हैं कि अभी भारत भूमि से तीर्थ परम्परा सर्वथा नष्ट नहीं हुई है।
चलते समय काफिला इतना लम्बा, किन्तु मंजिल तक पहुँचने का समय आने तक साथ में उँगलियों पर गिनने जितने। इसे असफलता कहा जाय? दुर्भाग्य? विधि की विडम्बना? अथवा उस मिट्टी को दोष दिया जाय जिससे यात्रियों की कतार तो गढ़ी थी, पर इतनी अनपढ़ की उसकी संरचना दो कदम चलते−चलते यातावरों की तरह भटकी और मृग तृष्णा की आकुलता में दिग्भ्रान्त होकर कहीं से कहीं चली गयी।
आत्म−सत्ता का वजन भारी, जिम्मेदारी बड़ी, सृष्टा की अपेक्षा ऊँची−समय की गरिमा अनुपम, इतना सब होते हुए भी यह क्षुद्रता कैसी जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर भव−बन्धन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है? या मकड़ी का जाला? कुछ ठीक से समझ में नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है, इस विषम बेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे हैं? उनके मुख क्यों सूख रहे हैं? पसीने क्यों छूट रहे हैं? सिद्धान्तवाद क्या कथा गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी कोई अवसर ही न आये? कृष्ण झुँझला पड़े थे। कथनी और करनी के मध्य इतना असाधारण व्यतिरेक उन्हें सहन नहीं हुआ और भौंहें तरेरते हुये बोले–”कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमे समुपस्थितम्” अभागे! इस विषम बेला में यह कृपणता तेरे मन−मस्तक पर किस प्रकार चढ़ बैठी? अन्तरिक्ष से आज का महाकाल युग के गाण्डीवधारियों से लगभग उसी भाषा में प्रश्न पूछता और उत्तर माँगता है।
मनुष्यों में एक श्रेणी नर पशुओं की है। उन्हें इन्द्रिय विलास, शरीर सज्जा और अहंता का परिपोषण करने वाली सुविधा सम्पदा चाहिए। दिखने में तो उनकी संरचना मनुष्य जैसी लगती है, पर वस्तुतः होते हैं वे जड़ कलेवर। “चलते−फिरते पेड़−पौधे इन्हीं को कहा जाता है। इन्हें सड़न, शीलन और घुटन चाहिए। जान−बूझकर या अनजाने वे इसी को चाहते और इसी को खरीदते हैं। विलास, संचय और अहंकार की खाई पाटने में जीवन भर अथक श्रम करते हैं, किन्तु हाथ में छाले, कमर में दर्द और मन में असन्तोष के अतिरिक्त इन्हें मिले भी क्या? कोल्हू के बैलों के भाग्य में जो लिखा है वही तो सामने रहेगा। मनुष्यों में से अधिकाँश को इसी बिरादरी का समझा जाना चाहिए। अन्धी भेड़ों का अनुकरण करते हुये वे एक के पीछे एक चलते हुये गहरे गर्त में गिरते और जिस−तिस पर दोषारोपण करते हुये खीजते−कलपते दिन बिताते हैं।
पीड़ा और पतन के गर्त में गिरी हुई या गिरने के लिए आतुर यह नर पामरों की मंडली निश्चय ही दया की पात्र है। इन्हें सान्त्वना मिलनी चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो राहत के साधन भी जुटने चाहिए। मानवी करुणा का यह तकाजा है कि दुखिहारा भले ही अपने पतनोन्मुख दृष्टिकोण और गर्हित क्रिया−कलाप को अपनाने से विपत्ति के जाल में जा घुसा हो। फिर भी भ्रमित तो भ्रमित ही है। उसे दुष्ट या भ्रष्ट कहना व्यर्थ है। ‘भटके हुये बालक’ शब्द का प्रयोग करना ही पर्याप्त है। इसी में चिन्तन की शालीनता है और पीड़ित के प्रति ममता। वह सेवा और सहायता का पात्र है उसे वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। जब तक वरिष्ठों में अन्तरात्मा जीवित रहेगी तब तक यह क्रम चलता भी रहेगा।
दुर्घटना और विपत्ति की घड़ियों में सेवा सहायता का पुकार होती है और वह जुटाई भी जाती है। पर यह तो आपत्तिकालीन समाधान हुआ। स्थायी की समस्या का समाधान कहाँ हुआ? दुर्घटना और विपत्ति की रोकथाम तो एक आवश्यकता है। माना कि आज की कराहें बड़ी मर्मभेदी है, माना कि उनका तात्कालिक उपचार होना चाहिए, पर यह भला नहीं जाना चाहिए कि कराहों की परिस्थिति उत्पन्न करने वाली विडम्बनाएँ भी जहाँ की तहाँ नहीं पड़ी रहने देनी चाहिए। परिवर्तन और सुधार उनका भी सोचा जाना चाहिए।
मनुष्यों का दूसरा वर्ग वरिष्ठों का है। वरिष्ठ वे जो अपनी समस्या का आप समाधान कर सके साथ ही बचे हुए पराक्रम का उपयोग दूसरों को उबारने में कर सके! महत्ता इन्हीं की है। नदी की प्रचण्ड धारा को चुनौती देने वाले मांझी न हों तो भयानक आपत्तिकाल सामने रहने पर भी लोग नदी किनारे खड़े असहाय अपंगों की तरह रोते−कलपते रहेंगे। पुरुषार्थ उस मांझी का है जिसकी माँस−पेशियाँ चप्पू को दोनों हाथों से पकड़ती हैं और नाव पर लदे हुओं को पार उतारने का विश्वास भरा अभयदान देती है। पार उतरने के लिए व्याकुल भीड़ की तुलना में एक माँझी वरिष्ठ हैं। भगवान किसी को सम्पन्नता भले ही न दे, पर यदि सच्ची अनुकम्पा बरसा सके तो उसे माँझी जैसी बलिष्ठता अवश्य प्रदान कर दे।
रोगियों की कहीं कमी नहीं। आवश्यकता कुशल चिकित्सक की हैं। ज्योति गँवाकर दिन में रात्रि जैसा अँधेरा अनुभव करने वालों की कमी नहीं। सराहनीय वे हैं जिन्हें निष्णात चिकित्सक कहा जाता है। वे अस्पताल में प्रातःकाल घुसते हैं और संध्याकाल तक आपरेशन की मेज पर योगी की तरह समाधिस्थ होकर शल्यक्रम चलाते रहते हैं। शल्यगृह से वापिस निकलने पर खोई ज्योति फिर पा लेने वाले सराहना करें या उपेक्षा, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। तथ्य वरिष्ठता के सौभाग्य का है, जिसे वह मिला वह सन्तोष के साथ जियेगा और शान्तिपूर्वक मरेगा। भगवान किसी को धन कुबेर भले ही न बनायें, पर उनकी करुणा बरसनी ही हो तो उस चिकित्सक की पदवी मिले जिसने असंख्यों को अन्धतमिस्रा से उबारा और आलोक की दुनिया में हाथ पकड़कर ला बिठाया।
अभागों की दुनिया अलग है और सौभाग्यवानों की अलग। अभागे जिस−तिस प्रकार लालच को पोषते, अविवेकी प्रजनन में निरत रहकर कमर तोड़ने वाला बोझ लादते, व्यामोह में तथाकथित अपनों को कुसंस्कारी बनाते, अपव्ययी असंयमी रहकर दुर्व्यसनों के शिकार बनते, अहंता के परिपोषण में आक्रमण करते और प्रत्याक्रमण सहते हुए समय बिताते हैं। यही है उनकी जीवन गाथा का सार संक्षेप। यह घिनौनी परिचर्या अपनाते तो असंख्यों हैं, पर उनमें से ऐसे कदाचित ही कोई हों जो पथ भ्रष्टता की कष्टदायक प्रतिक्रिया से बच सके। रोते−कलपते, खीजते खिजाते, डरते−डराते छेड़ते पिटते लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ रह गली चौराहे पर खड़े देखे जा सकते हैं। इन्हीं दुर्दशाग्रस्तों की भीड़ में जा घुसना समझदारी कहाँ है? भगवान किसी को उच्चशिक्षा से वंचित भले ही रखे पर इतनी समझ तो दें कि हित−अनहित में अन्तर करना आये। भले ही शूर−वीर योद्धा बनने का श्रेय किसी को न मिले पर इतनी सूझ−बूझ तो रहे कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है और उसे सार्थक बनाने के लिए भीड़ के साथ न चलने और अपना रास्ता आप चुनने जितना विवेक तो चाहिए ही। भगवान उससे वंचित किसी को भी न करे।
प्रगति का सही स्वाभाविक क्रम एक ही है नीचे से ऊपर उठना–पीछे से आगे बढ़ना। मनुष्य की प्रगति का यही एक ही क्रम है–कि वह कनिष्ठ न रहकर वरिष्ठ बनने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करे। यह स्मरण रखने योग्य है कि साधनों की दृष्टि से किसी की सफलता−असफलता का मूल्याँकन नहीं हो सकता। खजाने के घड़े पर सर्प बैठे रहते हैं। यक्ष−पिशाचों का भूमिगत सम्पदा पर अधिकार माना जाता है। दस्यु, दैत्य और अधिक बलिष्ठ होते हैं। धूर्तता में प्रवीण पारंगत जादूई करामात दिखाते हैं और मिट्टी से रुपया बना−बनाकर ढेर लगाते रहते है। वह भी कोई सफलताएँ हैं? यदि है तो उन्हें सराहा नहीं, धिक्कारा ही जायगा। आत्मप्रताड़ना और लोक भर्त्सना जिस सम्पदा−सफलता के साथ जुड़ी हुई हो उसे दरिद्रता, दुर्बलता, असफलता से भी गई−गुजरी समझा जाना चाहिए। जो इस रास्ते चल रहे हैं वे ऊँचे से नीचे गिरने वालों में समझ जायेंगे। यों हुई तो यह भी एक प्रकार की प्रगति ही। नीचे से ऊपर न उठे तो ऊपर से नीचे तो गिरे।
प्रगति का सही लेखा−जोखा लेना यदि किसी को आता हो तो उसका मापदण्ड एक ही है–दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश। चिन्तन और रुझान में आदर्शों के प्रति रसानुभूति। जहाँ इतना शुभारम्भ हुआ वहाँ जीवनचर्या का स्वरूप भी अनायास ही तद्नुरूप बनने ढलने लगेगा। चिन्तन और चरित्र के सम्मिश्रण से ही स्वभाव और संस्कार बनते हैं और वे ही जीवनक्रम में परिवर्तित होते है। यदि यह प्रवाह उत्कृष्टता की दिशा में व रहा होगा तो समझना चाहिए कि महामानव बनने−बनाने वाली परिस्थितियां अनायास हो बनती चली जायेंगी। इसके विपरीत यदि रुझान पर निकृष्टता चढ़ रही होगी, रुझान और चिन्तन पशु−प्रवृत्तियों में रम रहा होगा। तो स्वभावतः गतिविधियाँ उसी स्तर की बनेंगी। गतिविधियाँ हेय और परिणाम में श्रेय−लोग चाहते तो कुछ ऐसा ही है, पर विधि के विधान को उल्टा कैसे किया जाय। नीचे गिरने में निरत को ऊँचा उठा देने की असम्भव प्रक्रिया सम्भव कैसे बने?
यही है सार−संक्षेप, उस मनःस्थिति के विवेचन का वो मनुष्य का स्तर–व्यक्तित्व, साथ ही भविष्य गिराती−उठाती है। वरिष्ठों का प्रवाह वरिष्ठता की दिशा में ही होना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि पीड़ितों, दरिद्रों और दुखियारों की पंक्ति में आ खड़े होना, उनके लिए अशोभनीय है। ‘जो खड़े होने’ के तथ्य पर हर किसी का पूरा−पूरा ध्यान जाना चाहिए और अनुभव किया जाना चाहिए कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। न किसी पर दोषारोपण की आवश्यकता है न परिस्थितियों का रोना−रोने की। व्यक्ति के उत्थान−पतन की धुरी एक ही ध्रुव केन्द्र पर टिकी हुई है कि उसने अपने को किस ढाँचे ढाला और किस दिशाधारा में बहाया। इस निर्धारण में किसी दूसरे की साझेदारी नहीं। कदम अपने उठते हैं जिस भी भले−बुरे रास्ते पर चला जाय उस पर साथी सहयोगी तो मिलते ही रहते हैं। इस दुनिया में न भलाई की कमी है–न बुराई की। पसन्दगी अपनी–हिम्मत अपनी–सहायता दुनिया की। इस तथ्य को जो समझते−स्वीकार करते हैं, वस्तुतः वे ही यथार्थवादी हैं। दूसरे तो ऐसे ही हवा के झोंकों के साथ सूखे पत्ते की तरह जिस−तिस दिशा में लुढ़कते−उड़ते कहीं से चलकर कहीं जा पहुँचते हैं। ऐसे बेपैंदी के लोटों की कोई विवेचनकर्त्ता क्यों कुछ चर्चा करेगा।
व्यक्तित्व के उत्थान−पतन से सम्बन्धित कुछ शाश्वत तथ्यों की चर्चा यहाँ इसलिए करनी पड़ी है कि किसी महान प्रयोजन के लिए लम्बी यात्रा पर निकले काफिले के सदस्यों में भटकाव आ गया है–उसके कारण और निवारण का समाधान वे स्वयं खोज सकें। भटकने वाले भटकते ही रहते हैं उन्हें कोई क्या कहे? बच्चे अनगढ़ उछल−कूद में निरत रहते हैं उनकी ओर कोई अधिक ध्यान कहाँ देता है? पर जब बड़ी आयु वाले छोटे बच्चों जैसी हरकतें करने लगें तो देखने वाले हतप्रभ होकर रह जाते हैं और उन्माद की आशंका करते हुए चिन्ता में डुबते–अस्पताल तक दौड़ने की तैयारी करते हैं। अपना काफिला वरिष्ठों का है–विशिष्टों का और विशेषज्ञों का। उन्हें बचकानी बातें सोचते और नासमझों जैसी हरकतें करते देखा जायेगा तो स्वभावतः गहरी चिन्ता होगी। चिन्ता का कारण उनकी निजी अवमानना तक सीमित नहीं है, वरन् उसके साथ जुड़े हुए उन उत्तरदायित्वों का भी प्रश्न है जो इस आपत्तिकाल में जीवन−मरण बनकर मानवी अस्तित्व और भविष्य की गरदन पर नंगी तलवार की तरह लटके हुए हैं। वरिष्ठ गिरेंगे तो फिर बचेगा क्या? सूरज डूबेगा तो सघन तमिस्रा के और कहीं कुछ रहेगा क्या?
युग बदल रहा हैं। यह कहा और माना जाय तो उसके साथ इतना और जोड़ना होगा कि यह कार्य ‘वरिष्ठों’ की अपनी निजी दिशाधारा बदलने के साथ आरम्भ होगा। प्रतिभाएँ आगे बढ़ती हैं, तो ही अनुयायियों की कतार पीछे चलती है। पतन और उत्थान का इतिहास इस एक ही पटरी पर आगे बढ़त रहा है। प्रतिभाओं को दूसरे शब्दों में अन्धड़ कहते हैं। उनका वेग जिस दिशा में जिस तेजी से बढ़ता है उसी अनुपात से तिनकों पत्तों से लेकर−छप्परों और वृक्षों तक को उड़ते लुढ़कते देखा गया है। आज की पतनोन्मुख परिस्थितियों और विभीषिकाओं का श्रेय या दोष समय के मूर्धन्यों को ही दिया जायगा। भूतकाल में भी यही होता रहा है और भविष्य में भी यही शाश्वतक्रम चलेगा। गिरता उठता तो जमाना है, पर उनके लिए वास्तविक पाप−पुण्य का बोझ उस समय की अग्रगामी प्रतिभाओं के सिर पर लदता है। उनका अग्रगमन असंख्यों में प्राण फूँकना है। वे गिरते हैं, तो ओलों की तरह समूची फसल को सफाचट करके रख देते हैं। जो चुप बैठे रहते हैं वे न शांति प्रिय कहलाते हैं न निरपेक्ष न आसक्त। आड़े वक्त में मुँह छिपाने के लिए शांति का–भजन का– ब्रह्मज्ञान का लबादा ओढ़ने वाले अपना मन भले समझालें, आपत्तिकाल की यातनायें उन्हें कभी क्षमा नहीं कर सकती। दुर्घटना, महामारी, अग्निकाण्ड आक्रमण, उत्पीड़न से संत्रस्त हाहाकारी वातावरण में जो एकान्त साधना की बात सोचे उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाय, यह सोचने के बाद ही कदाचित कोई दूसरा शब्द मिल सके।
यह आपत्तिकाल है। इसमें आपने धर्म का ही पालन करना चाहिए। आपत्ति धर्म का तात्पर्य है सामान्य सुख सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अन्तरात्मा पुकारती है। आज किसी जागृत आत्मा को यह सोचने का अवकाश नहीं होना चाहिए कि उसके वैभव कैसे बढ़े, कुटुम्ब कैसे फैले? आज न पदवी धारी बनने की आवश्यकता है और न बढ़े आदमियों में गिने जाने के लिए चित्र−विचित्र उछल−कूद करने की। शान्ति का समय होता तो यह बाल–क्रीड़ाएँ भी किसी न किसी प्रकार दर−गुजर की जातीं। ओछे, बचकाने लोग यदि इन उथली हरकतों में उलझे रहते तो भी कोई बात नहीं थी, पर वरिष्ठों पर हेय स्तर का अवसाद चढ़ दौड़े तो इसे उनकी विशिष्टता पर लगा हुआ कलंक ग्रहण ही कहा जायगा।
प्रज्ञा परिवार को अन्य संगठनों, आन्दोलनों, सभा संस्थानों के समतुल्य नहीं मानना चाहिए। वह युग सृजन के निमित्त अग्रगामी मूर्धन्य लोगों को एक सुसंस्कारी परिकर−परिसर है। उसके सदस्यों को–प्रज्ञा परिजनों को–प्रस्तुत युग चुनौती स्वीकार करनी ही चाहिए। इस संदर्भ में किसी को भी परिस्थितियों की विषमता या अनुकूलता का बहाना नहीं गढ़ना चाहिए। व्यस्त से व्यस्त और दरिद्र से दरिद्र भी इस विषम बेला में इस प्रकार न सही तो उस प्रकार कोई न कोई ऐसी भूमिका निभा सकता है जिसे असंख्यों के लिए अनुकरणीय कहा जा सके। अमुक−अमुक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होने के उपरान्त निश्चिन्त होने और संन्यास धारण करके लोकमंगल में लगने के स्वप्न संसार में किसी को भी नहीं विचरना चाहिए। अगले साल हम से अमुक जीवित रहेगा ही इसकी गारन्टी नहीं। जो आज की परिस्थितियों में सम्भव है बात उतनी ही सोचनी और करनी चाहिए। भविष्य में दस लाख की लाटरी खुलने पर आधा धन सदावर्त में लुटाया जायगा यह शेख चिल्ली का सपना कोई और देखे तो देखे पर प्रज्ञा परिवार के सदस्यों को ऐसे स्वप्न लोक में उड़ने की आवश्यकता नहीं। उन्हें केवल एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती न जागृत आत्माओं को कान पकड़कर झकझोरा है उसके उत्तर में दाँत निपोरते हैं या सीना तानना है।
काफिला लम्बा है। चलना दूर है। पर रास्ते में साथियों को भटकते देखकर दर्द होता है। मंजिल तक पहुँचते−पहुँचते क्या उंगलियों पर गिनने लायक ही कुछ साथी रह जायेंगे, इस आशंका से इन दिनों सीना धड़कता और सिर चकराता रहता है।
मनुष्य जीवन में कभी कदाचित् ही ऐसे अवसर आते हैं जब उसे त्रिविधि सुयोगों का लाभ मिल सकें। (1) आत्म−कल्याण एवं पूर्णता की प्राप्ति (2) लोक सम्मान जन सहयोग, यशस्वी अमरता एवं आत्म−सन्तोष (3) दैवी अनुग्रह एवं आधार पर महामानव, ऋषि अग्रदूत देवात्मा जैसे उच्चस्तरीय अनुदान वरदान। जहाँ तक आत्मा की सम्बन्ध है उसके लिये यह तीन ही विभूतियाँ प्रमुख हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कि भौतिक जगत में बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता एवं सम्पदा को महत्वपूर्ण गिना जाता है। इच्छा रहते और प्रयत्न करने पर भी भौतिक क्षेत्र की सम्पत्तियाँ, सिद्धियाँ एवं आत्मिक क्षेत्र की विभूतियाँ बड़ी कठिनाई से यत्किंचित् मात्रा में ही हस्तगत होती हैं। अन्यथा लोग ऐसे ही असफलताओं का रोना रोते, दुर्भाग्य को कोसते, दिन बिताते रहते हैं। उन्हें भाग्यशाली ही कहना चाहिए जिन्हें उपरोक्त उपलब्धियों की कोई सन्तोषजनक मात्रा हस्तगत हो सके।
इतिहास की चाल भी विलक्षण है। कभी ऐसा समय आता है के तनिक से प्रयत्न में बड़े लाभ उठाने का अवसर लाटरी खुलने की तरह हाथ लगता है कभी ऐसा प्रवाह बहता है कि मानवीय प्रयत्नों का कोई मूल्य महत्व नहीं रह जाता और परिस्थितियों का तूफानी अन्धड़ सब कुछ उलट−पलट कर रख देता है। पराक्रमी, विचारशील और दूरदर्शी एक कोने पर खड़े रह जाते हैं और समय की अपनी अनगढ़ता ऐसी विचित्र होती है जिसमें ज्वारभाटे जैसे उफान मनुष्य की इच्छा और चेष्टा को ताक पर उठाकर रख देते हैं। जिन्होंने महायुद्धों हिमयुगों, महामारियों−−प्रकृति प्रकोपों, यादवी अन्त कलह का इतिहास पढ़ा है वे जानते हैं कि सर्व−समर्थ समझा जाने वाला मनुष्य कितना निरीह है इसके विपरीत जब अनुकूल अवसर आते हैं तो गढ़ा खजाना पाने वाले, लाटरी खुलने से लाभान्वित होने वाले, अमीरों की उत्तराधिकार में सम्पदा पाने वालों की तरह किस प्रकार बिना किसी योग्यता या प्रयत्नशीलता के अनायास ही वह सुयोग प्राप्त कर लेते हैं जो अनेकों को अपनी समूची प्रतिभा झोंक देने पर भी हस्तगत नहीं होते।
किसी को यदि काल ज्ञान की दूरदर्शिता मिली हो तो उसे यह समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि व्यक्तिगत भाग्योदय को तथा इतिहास−प्रवाह के अनुकूल होने की दृष्टि से यह समय ऐसा है जिसका लाभ उठाया जाना ही चाहिए। जो चूकेंगे वे पछतायेंगे। समय मनुष्य की इच्छा या चेष्टा की प्रतीक्षा नहीं करता। वह आता है और बिजली की तरह कौंध कर चला जाता है जो उसे पहचानते हैं उसे पकड़ने का प्रयत्न करते हैं। वे अपनी सूझ−बूझ की सराहते रहते हैं। दीर्घसूत्री प्रमादी सदा ही घाटे में रहते हैं, पर जिन्हें असाधारण समय को पहचानने तथा उसे पकड़ने, प्रयुक्त करने में भूल होती है वे अनन्त काल तक पछताते ही रहते हैं।
ऐसे अलभ्य अवसर प्रायः युग सन्धि बेला में ही आते हैं और परिवर्तन की सूत्र संचालन करने वाले अक्तार तन्त्र के साथ ही जुड़े हैं। रामावतार के समय रीछ, वानरों ने–गीध गिलहरियों ने–केवट भीलनी ने तनिक से पुरुषार्थ के बदले जो ऐतिहासिक यशस्विता कमाई वह अवसर निकल जाने पर उससे कहीं अधिक त्याग करने वालों को भी उपलब्ध नहीं हो सका। कृष्णावतार में पाण्डवों से लेकर सुदामा तक को, कुब्जा से लेकर राधा तक को तनिक से सहयोग के बदले जो लाभ मिले वे अविस्मरणीय ही रहेंगे। गोवर्द्धन उठाते समय लाठी लेकर आ खड़े होने वाले ग्वाल−बालों का इतना बड़ा पुरुषार्थ नहीं था जिसके लिए यह घटना अनन्त काल तक चित्रित होती रह सकें। गाँधी के साथियों में से कितने ही अविस्मरणीय रहेंगे। विनोबा से लेकर मीराबेन तक असंख्यों ऐसे हैं जिन्हें गाँधी जी से अलग करके देखा जाय तो वो उसकी तुलना में कहीं अधिक हल्के रह जाते हैं जितने कि आँके गये। बुद्ध और उनके साथी सहचरों को पृथक−पृथक करके देखा जाय तो उनके निर्धारित मूल्यों में जमीन आसमान जितना अन्तर दिखाई देगा। वेश्यावृत्ति छोड़कर साध्वी हो जाने में भी है तो प्रशंसा की बात, पर यदि आम्बपाली और बुद्ध के संयोग से उसे पृथक करके देखा जाय तो बात उतनी बड़ी नहीं रह जाती जितनी की बन पड़ी।
साधारण समय और विशेष समय में–साधारण व्यक्ति और विशेष व्यक्ति में एक विशिष्ट अन्तर होता है। साधारण की चाल धीमी होती है और विशिष्ट की तत्काल निर्णय करने से लेकर कदम उठाने तक की प्रक्रिया सम्पन्न करनी होती है। धीरे−धीरे सोचते विचारते–अनुकूल अवसर ढूँढ़ते–साथियों की सलाह मशविरा करने में ढेरों समय लग जाता है और जो उत्कृष्टता का पक्षधर उत्साह उठा था वह समय बीतते−बीतते ठण्डा ही नहीं समाप्त भी हो जाता है।
असंख्यों की आदर्शवादी योजनायें इसी प्रकार मटियामेट हुई हैं। इसके विपरीत असाधारण व्यक्ति समय को पहचानने में अपनी तीखी सूझ−बूझ का परिचय देते हैं। बिजली की तरह चमकते और तलवार की तरह टूट पड़ते हैं, असमंजस उनके आड़े नहीं आता। व्यापारी जैसा हानि लाभ का हिसाब लगाने और ब्याज बट्टे की फैलावट जोड़ने,घटाने को उन्हें फुरसत नहीं मिली। करना तो करना– न करना तो न करना– की नीति ही उदीयमान साहसियों को अपनानी पड़ी है। अवाँछनीय कृत्यों के लिये बार−बार सोचने समझने और मुहूर्त निकालने तक ठहराने का शास्त्रीय निर्देश है किन्तु तब किसी उच्चस्तरीय साहस का प्रश्न उपस्थित हो तो ईसा की वह उक्ति स्मरण कर लेना चाहिये, जिसमें वे कहते थे−” यदि देने का मन आये तो बांये हाथ की वस्तु उसी स्थिति में दे डाल। उसे दाहिने हाथ तक पहुँचाने का प्रयत्न न कर। ऐसा न हो कि इस थोड़ी-सी ही देर में शैतान बहका दे और तेरे देने के इरादे को बदल दे।”
इतिहास साक्षी है कि संसार के सभी महत्वपूर्ण इसी वज्र प्रहार जैसी भावभरी साहसिकता के साथ सम्पन्न हुए हैं। आगा–पीछा बहुत सोचने वाले व्यक्ति वाणिज्य क्षेत्र में सही हो सकते हैं, पर जहाँ तक आदर्शवादी पराक्रमों का सवाल है, वे कभी प्रेरणाप्रद इतिहास का सृजन कर सकने में समर्थ नहीं हुए है। उच्चस्तरीय भावनाएँ कभी−कभी दैवी प्रेरणा की तरह स्वांति बूँद बनकर बरसती हैं, किन्तु दुष्टता का दुर्भाग्य तो वायु प्रदूषण, कोलाहल और धुँध घुटन की तरह हर घड़ी सर्वत्र छाया रहता है। हर साँस के साथ घातक धूलिकण फेफड़ों में प्रवेश करते रहते हैं।
समूचा समाज और उसका मान्य प्रचलन बुरी तरह दुष्टता और भ्रष्टता से भरा पड़ा है। उसे वहन करते रहने और गले उतारने रहने की अभ्यास कुसंस्कारिता तभी उखड़ती है जब उसके विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया जाय। दुस्साहसी आदर्शवादियों में से प्रत्येक को प्रायः यही नीति अपनानी पड़ी है। मित्र संबंधियों का सहयोग समर्थन प्राप्त करके जो आदर्शवादी कदम उठाना चाहते हैं, वे बाल में से तेल निकालने वालों–आकाश कुसुम तोड़ने वालों की तरह अव्यावहारिक लोगों में से होते हैं और कल्पना−जल्पना के स्वप्न लोक में तैरने डुबकने का मनोविनोद करते रहते हैं मनोरथ सफल न होने की भविष्य वाणी कोई भी व्यवहार बुद्धि वाला आदमी छाती ठोंककर कर सकता है वास्तविकता यही कि साहसी लोगों ने आदर्शवादी निर्णय अपनी अन्तःप्रेरणा से किये हैं। ईमान और भगवान् का परामर्श लेने के अतिरिक्त किसी तीसरे से पूछताछ करने की ऐसे लोगों का आवश्यकता पड़ती ही नहीं।
दुनियादारों में भला कौन ऐसा हो सकता है जो तथाकथित हितैषी होने का दावा भी करे और आदर्शवादिता के साथ जुड़ी हुई असुविधा अंगीकार करने की सहमति भी प्रदान करे। इस मित्र मण्डली में ऐसे अवसरों पर उपहास, असहयोग, विरोध–विग्रह खड़ा करने की आशा करनी चाहिये। जब जन्म−जन्मान्तरों के साथी सहचर कुसंस्कार तक ऊँचा सोचते ही असंख्यों कुकल्पनायें खड़ी कर देते है और वैसा न करने के पक्ष असंख्यों कारण बताते हैं तो कारण नहीं कि सम्बन्धी लोग भी वैसी ही गति न अपनाये। जिस प्रकार कुसंस्कारों से जूझना पड़ता है ठीक उस प्रकार इन शुभ चिन्तकों से भी आँखें चुरानी पड़ती है। कर्त्तव्य और व्यामोह की लड़ाई में–कर्त्तव्य का जो पक्ष समर्थन कर सके उन्हीं के लिये यह सम्भव होता है कि प्रचलनों का व्यतिरेक करते हुए अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना कर सकने वाला कदम उठा सकें।
युग सन्धि में भयावह वर्तमान को गलाने और उज्ज्वल भविष्य को ढालने की महान् योजना प्रज्ञा पुरुष न अपने हाथों में ली है। वे उसे पूरा करने के लिये आवश्यक वातावरण बना रहे हैं और प्रेरणाएँ उभार रहे हैं। किन्तु निराकार होने के नाते इस पुण्य प्रयोजन का श्रेय एवं उत्तरदायित्व तो उन्हें भी शरीरधारी जागुन आत्माओं को ही सौंपना पड़ रहा है। यही भूत में भी होता रहा है। हनुमान, अंगद, नल−नील, जटायु, जामवन्त निजी स्तर पर नगण्य-सी सामर्थ्य वाले थे, पर जब वे राम−काज के लिए कटिबद्ध हो गये तो उस संकल्प के साथ ही उनकी सामर्थ्य में उभार आया और जैसे थे उसका तुलना में असंख्य गुनी सामर्थ्य से सम्पन्न हो गये। मिस्टर गाँधी का आरम्भिक जीवन तथा महात्मा गाँधी का देवोपम वर्चस् देखकर कोई भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि राम−काज में निरत होना जहाँ आरम्भिक असमंजसों से आच्छादित है वहाँ उसके अगले ही चरण इतने शानदार हैं जिनकी तुलना में आरम्भिक असमंजस एवं दुस्साहस के लिये किये गये कष्ट सहन को नगण्य ठहराया जा सके। हर क्षेत्र के महामानवों में से हर एक का विश्लेषण करते चला जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि वैयक्तिक योग्यता, सम्पन्नता एवं पारिवारिक स्तर की दृष्टि से गये−गुजरे होते हुये भी जब उनने आदर्शवादी साहसिकता अपनाई तो प्रामाणिकता का प्रारम्भिक परीक्षा देने में जो अड़चन आती है उसे पार करते ही वे आसमान चूमने वाली सफलता प्राप्त करने लगे और दसों दिशाओं से उन पर अजस्र सद्भाव−सहयोग बरसने लगा।
पिछले दिनों घटिया लोगों न घटिया पूजा उपक्रम अपनाया, उनके लिए न तो धर्म नाम की कोई चीज है और न ईमान−भगवान जैसी किसी चीज से किसी का कोई सरोकार है। सड़ी सुपाड़ी, घुने नारियल, अगरबत्ती, अक्षत चढ़ाकर चित्र−विचित्र मनोकामनायें पुरी कराने की ही सबको सनक सवार है। इस जंजाल को नमस्कार करते हुए ब्रह्म विद्या के तत्वज्ञानियों को इस शाश्वत तथ्य को हृदयंगम कर ही लेना चाहिए कि भौतिक सम्पदाओं की तुलना में आध्यात्मिक विभूतियों का प्रत्यक्ष एवं परीक्षा परिणाम हजारों गुना अधिक है। वह नकद धर्म है–’इस हाथ दे उस हाथ ले’ की पूरी और पक्की गुंजाइश उसमें है व्यक्तित्व को परिष्कृत करना इतना बड़ा लाभ है जिसके हुण्डी प्रत्यक्ष या परोक्ष दोनों क्षेत्रों में हाथोंहाथ भुनाई जा सकती है, पर इस बहुमूल्य सम्पदा को खरीदने के लिए उसका उचित मूल्य चुकाये बिना कोई गति नहीं। उत्कृष्ट चिन्तन–परिष्कृत चरित्र और लोक मंगल के लिए उदार अनुदान यह तीनों ही लक्ष्य ऐसे हैं जो मिलकर त्रिवेणी संगम की तरह तीर्थराज बनते हैं और अवगाहन करने वालों को तुरन्त काया−कल्प करने जैसा प्रतिफल प्रदान करते हैं।
इन दिनों ऐसे ही उदार चेताओं की अत्याधिक आवश्यकता है। महाकाल का युग निमन्त्रण उन्हीं के लिए उतरा है। युग सन्धि के इस पुण्य पर्व पर उन्हें आगे आना चाहिए। अन्तःप्रेरणा का अनुसरण करना चाहिए और मानवीय भविष्य का दो टू फैसला होने की इस निर्णायक बेला में युग पुरुषों जैसा रोज अदा करना चाहिए। इस उदार साहसिकता को अपनाने में जो कृपण जैसे असमंजस में हैं उन्हें झाडू से बुहार कर कूड़े–कर्कट के ढेर में ले जा पटकना चाहिए। युग धर्म के निर्वाह में समयदान, अंशदान की दुहरी आवश्यकतायें पूर्ण करनी होगी। उन्हें ऋषि रक्त से भरे गये घड़े की तरह हमें भी पहल करनी होगी ताकि युग संस्कृति की सीता का अभिनव सृजन हो सके। त्याग बलिदान की पुण्य परम्परा जागृत आत्माओं को अपने ही जीवन क्रम से आरम्भ करनी होगी। दूसरों से याचना करने से पहले यही न्यायानुकूल है कि पहले अपनी ही पोटली खाली की जाये, भले ही वह सुदामा के बगल में दबे हुए थोड़े से चावल ही क्यों न हों। युग सृजन में अगले दिनों हर व्यक्ति को संयमी एवं उदार बनना होगा। इसका शुभारम्भ जागृत आत्मायें अपने आप से करें तभी बात बनेगी ‘पर उपदेश कुशल’ अपनी अच्छी वक्तृता तो दे सकते हैं, पर उनका अनुकरण करने के लिए एक भी कदम आगे बढ़ने वाली नहीं है। युग सृजन का अभियान अत्यन्त व्यापक है। उसमें हर योग्यता के भावनाशील एवं चरित्रवान और कर्मनिष्ठा व्यक्ति की आवश्यकता है। शांतिकुंज में इन दिनों उन्हीं का आह्वान किया जा रहा है किसे क्या काम करना है इसे समाने पड़े कार्यों को देखकर किया जायगा। पहले से ही शर्त लगाना कि हम विदेश के दौरे पर जाना चाहते हैं– नितान्त उपहासास्पद है। हर आत्मज्ञानी को झाडू लगाने और टट्टी साफ करने जैसी छोटी प्रक्रिया अपनाने में वैसी ही प्रसन्नता अनुभव करनी होगी जितनी कि राजमुकुट पहनाकर उसे सिंहासन पर बिठाकर जुलूस बनाकर घुमाये जाने पर। ऐसे विनम्र और समर्पित व्यक्ति ही मिशन की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के काम आ सकते हैं। अपनी शर्तें लादने वाले तो भार ही बनेंगे और हैरानी तथा विग्रह ही खड़े करेंगे। उनके लिए आरम्भ से ही द्वार बन्द रखना उचित समझा गया है।
युग संधि के इस तीसरे वर्ष में न्यूनतम एक हजार कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिनकी मनःस्थिति और परिस्थिति उपयुक्त हो वे शान्ति कुँज से संपर्क साधें और विचार विनिमय कर लें। मनःस्थिति यह कि ब्राह्मणोचित निर्वाह की व्यवस्था बनाकर पूरे मन से युग निमन्त्रण में अपने को खपा देना है, परिस्थिति यह कि बहुत बड़े कुटुम्ब का इतना व्यय भार मिशन के कन्धों पर न लदे जिससे सेवा के लाभ से समाज को कहीं अधिक व्यय−भार वहन करना पड़े। यों अपने साधनों को लगाने से अतिरिक्त जो कमी पड़े उसकी पूर्ति मिशन की ओर से करने का प्रबन्ध किया जा रहा है। छोटा परिवार हो तो उसके निवास−निर्वाह प्रशिक्षण एवं बच्चों के बड़े होने पर उनके विवाह स्वावलंबन की एक सुविस्तृत और सुनिश्चित योजना बनाई गई है जिसके आधार पर कोई भी व्यक्ति पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निश्चित हो कर युग धर्म के परिपालन में अपनी भावभरी–अनुकरणीय– अभिनन्दनीय मूर्धन्य भूमिका निभा सकें। सड़े–गले सनकी आलसी−दुर्गुणी तो हर जगह से दुत्कारे जाते हैं और उनके स्वागत का यहाँ भी कोई प्रबन्ध नहीं है।
प्रज्ञा परिवार इन दिनों भी बहुत बड़ा है। उनकी संख्या लाखों को पार कर करोड़ों की सीमा को स्पर्श कर रही है इतने बड़े समुदाय में से एक हजार सुयोग्य एवं कर्मनिष्ठ व्यक्ति इन्हीं दिनों निकल सकें इसकी आवश्यकता अनुभव की गई है। योग्यता इतनी होनी चाहिये कि स्वयं भार न बनें, वरन् अपनी क्षमता से समाज को कुछ दे सकने की स्थिति में हों। भजन करने वाला−सिद्ध पुरुष बनने वाला–गुरु जी की सेवा करने वाला एक भी नहीं चाहिये। चाहिये। सिर्फ वे लोग जो पसीने की धारा बहा सकें। अनुशासन पाल सकें और अपने सद्गुणों से जहाँ भी रखे जाँय वहाँ वातावरण बना सकें। योग्यता न्यूनाधिक हो तो काम चल जायगा, पर सद्गुणों की कसौटी पर उन्हें खरा उतरना ही चाहिये।
ऐसे लोगों के लिये शान्ति−कुँज में निर्वाह से लेकर प्रशिक्षण तक की और आवश्यकता के अनुरूप काम देने की पूरी व्यवस्था है। जिनके ऊपर परिवार का भार नहीं है या न्यूनतम है, ऐसे नर−नारियों को प्राथमिकता दी जायेगी, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि जिनके परिवार हैं उन्हें लिया ही नहीं जायगा। वेतन तो किसी का कुछ नहीं पर निर्वाह के लिये ब्राह्मणोचित प्रबन्ध सभी का करने की बात सोची जा रही है। संग्रही पूँजी से कुछ काम चलाया जाय और कुछ काम चलाया जाय और कुछ मिशन से ले लिया जाय तो उस मिली−जुली व्यवस्था में प्रायः सभी भावनाशील कर्मनिष्ठों की ऐसी व्यवस्था बन सकती है जिसके आधार पर वे घर की घुटन भरी परेशानियों की तुलना में अपने को अपने परिवार को कहीं अधिक सुखी समुन्नत बना सकें।
युग सन्धि के इस तृतीय वर्ष में एक हजार सुयोग्य कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता अनुभव की गई है। उनके लिए यह माँग इस आशा से परिजनों के सामने प्रस्तुत की गई है कि इस परिकर में अभी भी अन्य सभी समुदायों की तुलना में जीवट का अंश कहीं अधिक परिमाण में विद्यमान है उसे गरम किया जा रहा है तो मलाई की तरह जहाँ भी विशिष्टता, वरिष्ठता होगी उछलकर ऊपर आ जायेगी और दूध के ऊपर तैरती दिखाई देगी।
महाराजा प्रियव्रत अपनी पचासवीं वर्षगाँठ पर राज−काज से संन्यास लेने तथा शेष को ईश्वर प्राप्ति के निमित्त कठोर साधनाओं में नियोजित करने का निश्चय कर चुके थे। वह घड़ी आयी। संन्यास दीक्षा सम्पन्न हुई। राज पुरोहित न संन्यास धर्म की गरिमा बतायी। राजकुमार आग्नीघ्र भी दीक्षा स्थली पर उपस्थित थे। जीवन को सर्वोच्च लक्ष्य है− ईश्वर प्राप्ति। इस उद्बोधन से राजकुमार के मन में हलचल मच गयी। ‘भोग−विलास’ से युक्त राजपाठ छोड़कर पिताश्री आत्मोत्थान का श्रेय मार्ग अपना रहे हैं। मुझे भी उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, आग्नीघ्र के मन में यह विचार आन्दोलित होने लगा।
विनीत स्वर में उन्होंने महाराज से निवेदन किया–”तात! सुख सम्पन्नता, राज्य वैभव का परित्याग करके आप जीवन−मुक्ति के लिए तप करने जा रहे हैं। फिर मेरे ही पैरों में राज्य वैभव का बन्धन क्यों डाल रहें हैं? मुझे भी अपना अनुगमन करने की आज्ञा दीजिए।” महाराजा प्रियव्रत एक कुशल शासक थे, पर सूक्ष्मदर्शी भी थे। उन्हें मालूम था कि वैराग्य के बीज राजकुमार में विद्यमान हैं पर वर्तमान दायित्वों की उपेक्षा करके एकाँगी साधना का अवलम्बन लेना हर दृष्टि से हानिकारक है। उन्होंने समझाया–” तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम अभी प्रजा की सेवा करते हुए अपनी वृत्तियों पर नियन्त्रण करो,योग और तप के लिए इन्द्रियों पर विजय पाना आवश्यक है। इसके अभाव में अपरिपक्व मनःस्थिति का साधक कभी भी साधना मार्ग से भटक सकता है। राज्य सुखों के बीच रहते हुए मैंने दीर्घकाल तक आत्म−संयम की साधना की है। इस वय में पहुँचने पर मैंने लोकोत्तर जीवन की साधना का साधना का निर्णय लिया है। तुम्हें भी गृहस्थ जीवन में कर्मयोगी की तरह रहते हुए आत्म−परिष्कार की साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
उस क्षण आग्नीघ्र सो चुप हरे, पितृदेव का प्रतिवाद करना उचित नहीं जान पड़ा, पर उनके जाते ही एक रात्रि चुपके से उठकर मन्दयाचल पर्वत पर तप करने चल पड़े। राज्य सिंहासन और नव विवाहिता पत्नी को छोड़कर मन में वैराग्य की भावना थी और तप के प्रति निष्ठा भी, पर वह अपरिपक्व थी। युवावस्था में इन्द्रियों का आवेश दमित हो गया। दमन में भटकाव की पूरी−पूरी गुँजाइश होती है। आग्नीघ्र ने उग्र तपश्चर्या आरंभ की। ईश्वर चिन्तन एवं ध्यान में एकाग्रता प्रगाढ़ होने लगी।
एक दिन मन्दायाचल पर्वत की सौंदर्यमयी छटा कुछ अधिक ही लुभावनी लग रही थी, सघन तरुवरों पर फैली स्वर्णलताओं की हरीतिमा प्रभा, कोयल की कूक, मयूरों का नृत्य, कलहंसों का कूंजन, कमल पुष्प का हास और सुवास बिखेरता सौरभ कुछ ऐसी मादकता पैदा कर रहे थे कि आग्नीघ्र की एकाग्रता भंग हो गयी। चित्त व्यग्र एवं चपल हो उठा। दमित इन्द्रियावेश आज दूने वेग से उभर उठा। नेत्र खोला तो सौंदर्य की प्रतिमूर्ति कामाभिसिक्त बनाने वाली कामिनी सामने खड़ी परिहास कर रही थी। योग और तप का लक्ष्य भूल गया। दमित काम वासना अपने पूरे वेग से भड़क उठी। मन्त्रमुग्ध बने आग्नीघ्र आसन से उठकर कामनी के पीछे चल पड़े, बालकों की तरह प्रलाप करते। आगे−आगे वह सौंदर्य की प्रतिमूर्ति जा रही थी और पीछे से आग्नीघ्र कातर स्वर में उसे पुकार रह थे।
थोड़ी ही दूरी पर जाकर वह विलुप्त हो गयी। सामने मुस्कराते हुए खड़े थे महात्मा प्रियव्रत राजकुमार के पिताश्री यह परीक्षा उन्हीं के द्वारा करायी गयी थी। उन्होंने समझाया “तात! गृहस्थ जीवन में रहते हुए तथा राज्य के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए आत्म परिष्कार की साधना करो। इसी से तुम्हें जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होगी।” राजकुमार को अपनी भूल ज्ञात हुई। तत्वदर्शी पिताश्री की आज्ञा शिरोधार्य करके वे कर्मयोग की साधना में जुट गये।
इस दुनिया में सभी दुखों का कारण है केवल अज्ञान।
इसमें पड़कर मनुज भूल जाता अपना कर्त्तव्य−विचार।
और मान लेता है जीवन के पथ पर वह अपनी हार॥
आगे बढ़ना होता है पर पीछे मुड़ते उसके पैर।
असफलता ही मिलती है,हो जाता जब विवेक से बैर॥
अपनी अमित शक्तियों को ही मनुज नहीं पाता पहचान।
इस दुनिया में सभी दुःखों का कारण है केवल अज्ञान॥
सबसे बड़ा शत्रु है यह ही मानव के अमूल्य मन का। है
व्यवधान मोक्ष का यह ही–कारण है भव−बंधन का॥
मन के राग−द्वेष पलते हैं, बस इसकी ही छाया में।
नीति−न्याय से विमुख हुआ मन, भ्रमता इसकी माया में॥
मोहग्रसित हो, धनुष फेंक देता अर्जुन−सा व्यक्ति महान।
इस दुनिया में सभी दुःखों का कारण है केवल अज्ञान॥
अज्ञान सहता विपदाएँ भोगा करता गहन अभाव।
आधि−व्याधियाँ करतीं रहतीं हृदयंतर में कितने घाव॥
रुक जाते हैं, प्रगति और उन्नति के उसके सारे मार्ग।
आश्रित रहता औरों पर औं कोसा करता अपना भाग॥
उसे श्रेय मिलता न कहीं भी, पग−पग पर सहता अपमान।
इस दुनिया में सभी दुःखों का कारण है केवल अज्ञान॥
अतः करो साधना ज्ञान की, इस जीवन का करो सुधार।
हों विवेक द्वारा संचालित जीवन के सारे व्यापार॥
अपनी प्रज्ञा को विकसाओ करें साधना मेधा की।
जला ज्ञान की ज्योति, करो अन्त्येष्टि बन्धु! हर बाधा की॥
जड़ता का बन्धन काटो जो बना मुक्ति पथ का व्यवधान।
इस दुनिया में सभी दुःखों का कारण है केवल अज्ञान॥
–माया वर्मा
*समाप्त*