ज्ञान की महत्ता कर्म के साथ ही

ज्ञान का अपना महत्व है, पर उसे हजम करने के लिये कर्म चाहिए। अन्यथा वह अपच ही उत्पन्न करेगा। “सबसे भले मूढ मति जिनहिं न व्यापहिं जगद् गति” की उक्ति में इसीलिये सार्थकता है कि अनजान पशुवत् शिश्नोदर परायण रहकर अपना निर्वाह सुख चैन पूर्वक कर लेते हैं। किन्तु ज्ञानवानों का अन्तःकरण और विवेक जागृत होने पर अपनी क्षुधा प्रकट क रता है और उसकी पूर्ति न बन पड़ने पर आत्म-प्रताड़ना के रूप में कुहराम मचाता है। इसे ही ज्ञानदण्ड कहते हैं। जैसे धन का सदुपयोग और संरक्षण न बन पड़े तो वह अनेकों संकट उत्पन्न करता है और दरिद्र से भी अधिक विपन्न स्थिति में ला पटकता है। वही बात ज्ञान सम्पदा के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यदि उसे कर्म के रूप में परिणत होने का अवसर न मिले तो संग्रहकर्ता को हैरान करके रख देता है।

मात्र ज्ञान संचय तो एक प्रकार का व्यसन है। बुद्धि विलास इसे ही कहते हैं। उसे कतई निन्दनीय तो नहीं ठहराया जा सकता, पर सार्थकता तभी मानी जाती है जब उसकी कर्म में परिणति हो। यदि वैसा न बन पड़े तो ज्ञान और कर्म की विसंगति उलटा अर्न्तद्वन्द खड़ा करती है। नीतिकार ने ठीक ही कहा है-यस्तु मूढतमं लोके यस्तु बुद्धि परंगता। उभौ तौ सुख मश्नुते मान्यैवमितरोजनाः॥” अर्थात् संसार में दो ही सुखी रहते हैं। एक या तो ‘मूढ़तम’ दूसरे “पारंगत बुद्धि वाले।” शेष तो सभी दुःखी देखे जाते हैं। मूढ तम, वे जो पेट प्रजनन से ऊपर की बात कभी नहीं सोचने। पारंगत बुद्धि वाले वे, जो कर्म में बुद्धि को परिणत करके विचार सम्पदा के आधार पर मिलने वाली ऋद्धि-सिद्धियों को उपलब्ध करके पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचने हैं ऐसे ही व्यक्ति श्रेय-सम्मान पाते हैं। समाज इन्हीं को अपना मार्ग दर्शक मानता है। हम में से सभी को इस श्रेणी में पहुँचने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए।


सभी प्रज्ञा परिजन इन प्रश्नों क उत्तर दें

जून की अखण्ड-ज्योति और जुलाई, अगस्त के प्रज्ञा अभियान अंक में परिजनों को कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण परामर्श दिये गये हैं। उन्हें सामान्यतया यथासमय पढ़ लिया गया होगा। यह पंक्तियाँ पढ़ने के उपरान्त उन अंकों को एक बार नई दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि उन परामर्शों में से किस के लिए क्या किस प्रकार, किस हद तक कर सकना सम्भव हो सकता है।

इस संदर्भ में निम्नलिखित सात प्रश्न सभी परिजनों से पूछे जा रहे हैं।

(1)जून की अखण्ड-ज्योति में जिस आत्म परिष्कार और परिवार परिष्कार की सप्तसूत्री योजना का उल्लेख है उसे पूरा या उसका कोई अंश कार्यान्वित करने की बात सोची गई है क्या? यदि सोची गई तो उसके लिए कुछ संकल्प उठा और कार्यक्रम बना क्या? यदि बना तो उस संदर्भ में अब तक क्या प्रगति हुई?

(2) प्रज्ञा अभियान जुलाई-अगस्त अंक में कर्मनिष्ठ परिजनों को युग सृजेताओं की किसी संसद में सम्मिलित होने के लिए कहा गया है। अपना मन उनमें से किसी में सम्मिलित होने का हुआ क्या? यदि हुआ तो उसके लिए हरिद्वार सूचना भिजवा दी क्या? यदि अभी नहीं भिजवाई तो कब तक भिजवा रहें है?

(3)इस वर्ष ‘खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है’ इस तथ्य को जन-जन के मन-मन में उतारना है। दीवारों पर इस उद्घोष को लिखना है। विवाह योग्य लड़के-लड़कियों से इस कलंक को न ओढ़ने के संकल्प कराने हैं। विचारशील अभिभावकों से बच्चों की खर्चीली शादियाँ न करने की प्रतिज्ञाएँ करानी हैं। जहाँ वैसा हो रहा हो वहाँ सम्मिलित न होने का असहयोग तो होना ही चाहिए। इस आन्दोलन का चरम सीमा तक आगे बढ़ाने और बिना खर्च की शादियों का सुयोग बिठाने की तत्परता हम में से प्रत्येक को बरतनी चाहिए।

(4)इस वर्ष का दूसरा विशेष कार्य है-हरीतिमा विकृति एवं विषमता को देखते हुए वातावरण का भयानकता से सुरक्षा एवं हरीतिमा के प्रति भाव चेतना जगाने की दृष्टि से यह आन्दोलन छोटा दीखने पर भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके लिए अपने प्रभाव क्षेत्र में पूरे उत्साह के साथ टोली बनाकर-घर-घर जाकर प्रयत्न किया जाय।

साथ ही घरेलू शाक वाटिका, पुष्प वाटिका लगाने के लिए आन्दोलन उठाया जाय। आँगनवाड़ी, छत बाड़ी' छप्पर बाड़ी, हर घर में शाक और फूलों से लदा दिखाई पड़े यह कार्य हमें हजारी किसान जैसी तत्परता के साथ करना और कराना चाहिए।

(5) साधना विहीन हम में से कोई न रहे। प्रज्ञा योग को छोटी किन्तु सुनिश्चित साधना में थोड़ा-सा समय हर दिन लगाते रहने के लिए प्रत्येक प्रज्ञा परिजन का कहा गया है। वे नियमित रूप से उसे प्रारम्भ करे और जहाँ श्रद्धा के बीजांकुर दीखे वहाँ कार्यान्वित करायें। इस सम्बन्ध में क्या कदम उठे?

(6) हर शिक्षित को बिना मूल्य घर बैठे युग साहित्य पहुँचाने वापिस लेने के झोला पुस्तकालय, ज्ञान रथ रह जागृत क्षेत्र में नियमित रूप से चल पड़े । स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से युगान्तरीय चेतना के प्रतिपादन हर शिक्षित अशिक्षित को हृदयंगम करने का अवसर मिले। यह स्वाध्याय और सत्संग के दो कारगर उपाय लोकमानस को परिष्कृत करने की दृष्टि से अवश्य माने जाएँ और उनके लिए किसी न किसी प्रकार कुछ न कुछ प्रयत्न किया ही जाय। यह प्रयत्न वैयक्तिक या सामूहिक रूप से किस प्रकार अग्रगामी बन सकेंगे इसकी अपनी तैयारी क्या चली?

(7) नव सृजन के लिए हममें से प्रत्येक का कुछ न कुछ समयदान-अंशदान नित्य नियमित रूप से निकले। निर्वाह प्रयासों में यह उदारता भी इन दिनों सम्मिलित रहे। इस संदर्भ में अपना संकल्प क्या हुआ?

इन सातों प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक परिजन से व्यक्ति


संसार सापेक्ष, मात्र आत्मा निरपेक्ष!

संसार का स्वरूप सापेक्ष तथ्यों पर अवलम्बित है। दृश्य जगत जिस सत्ता के कारण सत्य प्रतीत होता है− वह निरपेक्ष है। वही सत्य एवं संसार का भूल कारण है। इस तथ्य से अवगत न होने के कारण ही परिवर्तनशील संसार का स्वरूप यथार्थ लगता है। जबकि महती चेतना से निस्सृत होने वाली चेतन तरंगें ही इसका सृजन करती हैं। वे स्वयं तो अदृश्य रहती है किन्तु संसार का स्वरूप गढ़ती हैं। परिवर्तनों का कारण भी वही है। वस्तुतः सृष्टि में चल रहे चेतन प्रवाह पर ही प्रत्यक्ष जगत का स्वरूप टिका है। अस्तित्व उस चेतना का ही है जो जड़ वस्तुओं में भी शक्ति के रूप में विद्यमान उन्हें गतिशील करती तथा स्वयं परिवर्तनों से अप्रभावित रहती है।

जगत को मिथ्या एवं भ्रम कहे जाने का कारण यही है। मिथ्या इस अर्थ में कि जिसका अस्तित्व है, वह दिखायी नहीं पड़ता। वह स्वरूप से परे है। जबकि संसार का स्वरूप मिथ्या होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होता है। वेदान्त दर्शन में इस रहस्य को ही “ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या” कहा गया है।

आइन्स्टीन का सापेक्षवाद भी भौतिक आधारों पर इस तथ्य का ही प्रतिपादन करता है। प्रत्यक्ष एवं पदार्थवादी मान्यताओं को ही सही मानने के दुराग्रह को इस नवीन अवधारणा ने न केवल तोड़ा वरन् प्रचलित भौतिक प्रतिपादनों पर नये सिरे से सोचने को बाध्य किया। सापेक्षवाद के भौतिकी प्रतिपादन ने वैज्ञानिकों को जड़वादी मान्यताओं से ऊपर उठकर सोचने पर विवश किया है। वस्तुतः आइन्स्टीन का सापेक्षवाद चिर पुरातन सिद्धांत “ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या” का चिर नवीनीकरण है। यह विज्ञान कलेवर में आध्यात्मिक तथ्यों का ही प्रतिपादन है। जिसने विज्ञान को स्थूल से बढ़कर सूक्ष्म जगत्-सूक्ष्म रहस्यों पर सोचने को विवश किया है।

दर्शन के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड विचारों का प्रवाह मात्र है। दृश्य जगत तो मन के विचारों एवं कल्पनाओं का प्रतिबिम्ब मात्र है। प्रकृति की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, वरन वह ब्रह्म की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। वेदान्त दर्शन के अनुसार निरपेक्ष ब्रह्म मन-बुद्धि देश काल निमित्त आदि के अन्तर्गत आकर सापेक्ष ब्रह्माण्ड में परिवर्तित हो गया। यह संसार उसकी स्फुरणा के कारण ही अस्तित्वपूर्ण लगता है। स्वरूप का बोध मन को होता है। मन एक क्रिया शक्ति के रूप में अपनी कल्पनाओं के अनुसार सृष्टि का स्वरूप गढ़ लेता है। शास्त्रों में वर्णन है कि परमाणु से लेकर विशाल ब्रह्माण्ड सबसे ही मनःशक्ति व्याप्त है। प्रतिपादन में तथ्य यह है कि संसार का स्वरूप मन की कल्पनाओं पर अवलम्बित है। मान्यताओं का आभार बदल देने अथवा विचारों में परिवर्तन होने से बाह्य जगत भी परिवर्तित दिखायी पड़ता है। तथ्य तो यह है कि संसार का समष्टिगत स्वरूप स्थिर है।

मानसिक विचारों की शृंखला एवं उसकी परिवर्तनशीलता के कारण ही संसार भी परिवर्तनशील लगता हैं। मन की चंचलता को रोका जा सके, उसे एकाग्र किया जा सके तो यथार्थता का बोध हो सकना सम्भव है। योग शास्त्र मन को अन्तर्मुखी तथा आत्मा में विलीन करने का निर्देश देते हैं। मन की चंचलता को आन्तरिक प्रक्रिया द्वारा ही रोका जा सकता है विचारों से रहित होने पर ही वह सृष्टि के पीछे चल रहे चेतन व्यापार की प्रक्रिया को समझ सकने में समर्थ हो सकता है। इस स्थिति में पता चलता है कि अस्तित्वपूर्ण लगने वाला यह संसार मात्र चेतन तरंगों के कारण ही वास्तविक लगता है। मन को वशीभूत कि हुए योगी इस तथ्य से परिचित होते हैं। अनुभूतियों के आधार पर वे चेतना की स्फुरणाओं को ही स्थूल के पीछे क्रीड़ा करते देखते हैं।

मानसिक सन्तुलन पर ही हर प्रकार की मान्यताएँ उत्पन्न होती तथा अपने अनुरूप दृश्य जगत का स्वरूप गढ़ती हैं। ये सभी सापेक्ष कल्पनाओं पर आधारित की जाने वाली परिभाषाएँ समय, दिशा एवं देश की मान्यताएँ सापेक्ष तथ्यों पर टिकी हुई हैं। आइन्स्टीन ने सापेक्षवाद में इसका ही उल्लेख किया है। उन्होंने प्रकृति में प्रकाश की में अपरिवर्तनशील रहती है। प्रकाश की निरपेक्ष गति को आधार मानने पर भौतिक जगत की समस्त मान्यताएँ ही उलट जाती हैं। इसको एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। सापेक्षवाद के अनुसार प्रकाश की गति पर समय सिकुड़ जाता है। फलस्वरूप भूत, भविष्य एवं वर्तमान का जो अन्तर समय पर आधारित है, समाप्त हो जाता है। इस नियम के अनुसार यदि एक व्यक्ति प्रकाश की गति से चलने वाले किसी यान से यात्रा करे तो वह वर्तमान से भविष्य की ओर छलाँग लगा सकता हैं क्योंकि समय उसने लिये शून्य है। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी प्रकार प्रकाश की गति प्राप्त हो जाय अथवा प्रकाश की गति से चलने वाले यान में यात्रा सम्भव हो सके तो सम्भव है कि मानव भविष्य के गर्भ में जाकर होने वाली घटनाओं, परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

योगियों, सिद्ध पुरुषों में यह विशेषता होती है। वे भविष्य की घटनाओं से परिचित होते हैं। सम्भव हैं वर्तमान से भविष्य में जाने एवं घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर लेने में चेतना के प्रकाश की गति से चलने की प्रक्रिया ही कार्य करती हो। भौतिकी के सापेक्षवाद का सिद्धान्त अब तो प्रायोगिक धरातल पर भी खरा उतर गया है। चेतना के माध्यम से ऋषियों ने आइन्स्टीन के प्रकाश की गति से चलने वाले यान की कल्पना को बहुत समय पूर्व ही प्रयोग स्तर पर उतारा था। चेतना को प्रकाश की तीव्र गति देकर भविष्यकाल में पहुँचना और तथ्यों का पता लगा लेना भारतीय योगियों को न केवल मालूम था, वरन् समय-समय पर उन्होंने इस विज्ञान का उपयोग भी किया। पुष्पक विमान का पौराणिक उल्लेख भी मिलता है। देवताओं का कुछ ही क्षणों में एक लोक से दूसरे लोक में पहुँचाने की बात मात्र कपोल-कल्पना नहीं वरन् विज्ञान की चरम प्रगति का परिचायक है। जो यह बताता है कि उस काल में चेतन विज्ञान कितना आगे था। वर्तमान में भी कितने ही सन्त, महात्मा, योगी इस विद्या के द्वारा ही भविष्य की प्रामाणिक भविष्यवाणी करते देखे जाते हैं।

सापेक्षवाद के अनुसार प्रकाश की गति से चलने वाले काल्पनिक यान की गति किसी प्रकार की बढ़ जाय तो समय उल्टी दिशा में चलने लगेगा। अर्थात् समय की गति भविष्य से वर्तमान तथा वर्तमान से भूत की ओर हो।

कल्पना करें तो बचपन किशोरावस्था अथवा वृद्धावस्था प्रकाश की गति पर निर्भर होंगे। तो एक ही दिन में बचपन जवानी एवं वृद्धावस्था का रसास्वादन कर सकना सम्भव हो जायेगा। यह स्थिति आत्मा की अमरता एवं शाश्वतता की पुष्टि करेगी। व्यावहारिकता के धरातल पर भौतिकी द्वारा उतार सकना अभी तो मात्र एक कल्पना है। किन्तु आत्मिकी ने बहुत समय पूर्ण से ही यह सम्भव कर दिखाया है। पुराणों में च्यवन ऋषि तथा अन्यान्य ऋषियों के अनेकों प्रसंग कायाकल्प के मिलते हैं। यह प्रमाण आत्मविद्या की समर्थता का ही प्रतिपादन करत हैं। निस्सन्देह वैज्ञानिक समीक्षा करने पर यही तथ्य हाथ लगता है कि जरा-स्थिति से युवावस्था प्राप्त करने में चेतन प्रक्रिया ही रही होगी। जिसके द्वारा शरीर के कोशों को प्रकाश की गति से भी अधिक गति दे दी गई हो और वे उनकी वृद्धि भूतकाल की ओर लौट पड़ी हो। प्रयोग स्तर वर्तमान में सम्भव यह भले ही न हो सका है किन्तु पौराणिक घटनाएँ यह बताती हैं कि आइन्स्टीन की कल्पना उस समय साकार की गई थी। अब भी कितने ही योगियों का अस्तित्व हिमालय पर मिलता है जो कई सौ वर्षों की आयु के होते हुए भी युवा दीखते हैं। ये उदाहरण चेतना की असीम शक्ति का ही प्रतिपादन करते हैं।

विवेचनाओं से स्पष्ट है कि भूत, वर्तमान एवं भविष्य की अवधारण गति के सापेक्ष है। गति (प्रकाश) को आधार मान लेने पर काल की मान्यता भी बदल जाती हैं। मान्यताओं एवं अनुभूतियों को केन्द्र बिन्दु मन है। इसी धरातल पर दृश्य जगत का स्वरूप विनिर्मित होता है। आइन्स्टीन का कहना है कि “ वस्तु जगत में मनुष्य का अनुभव घटनाक्रमों के रूप में मन में अवस्थित होता है। मानवी चेतना इन घटनाक्रमों के प्रभाव क्षेत्र से परे है।”

मन की सापेक्ष मान्यताएँ ही ‘निरपेक्ष’ कारण सत्ता को जानने में गतिरोध पैदा करती हैं। यही कारण है संसार का वास्तविक स्वरूप ‘अनजान बना रहता है। चेतना में मानसिक चेष्टाओं के समाहित हो जाने पर मन की कल्पनाओं पर विनिर्मित होने वाले घटनाक्रम भी रु क जाते हैं। स्थूल स्वरूप लुप्त हो जाता है। यहाँ तक कि शरीर की विकास प्रक्रिया भी थम जाती है। ऐसी स्थिति में पहुँचे योगी शारीरिक क्रियाओं पर निर्भर न करके शुद्ध चेतना में रमण करते हैं। योग सूत्रों में इस अवस्था को ही ‘समाधि’ से सम्बोधित किया गया है। समाधि द्वारा हजारों वर्ष तक जीवित रहने के पीछे तथ्य यह निहित है कि शरीर के कोशों को हलचल एवं वृद्धि रु क जाती है। ऐसे दीर्घ जीवी योगियों का साक्षात्कार किन्हीं-किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्ति को हिमालय यात्रा में होता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं—

मन एव मनुष्याणाँ कारणं बंध मोक्षयोः।”

बन्धन इन अर्थों में कि— जब तक वह बाह्य जगत में चलायमान रहता है तब तक स्थूल को ही सत्य मान कर उनसे बँधा रहता है। मुक्ति की स्थिति मन के आत्मा में लय से होती है। यही कारण है कि शास्त्र मन को एकाग्र एवं आत्मा में विलीन करने का निर्देश देते हैं । इन निर्देशनों के पीछे रहस्य यह है कि चेतना में मन के लय होने से उठने वाले संकल्प विकल्प लुप्त हो जाते हैं। प्रतीत होने वाला जगत का मिथ्या स्वरूप भी इन संकल्पों से ही वास्तविक लगता है। मानसिक व्यापारों से रहित होने पर संसार के यथार्थ स्वरूप का बोध होता है। उसमें हलचल करती-प्रेरणा भरती चेतना की अनुभूति होने लगती है। यही निर्विकल्प स्थिति है। अमरत्व इसी का अलंकारिक स्वरूप है

आइन्स्टीन का सापेक्षवाद भी इस तथ्य की पुष्टि करता है। प्रकाशीय गति पर समय के सिकुड़ जाने शारीरिक से चेष्टाएँ शिथिल पड़ जाती है। कोषों द्वारा संचित ऊर्जा का अपव्यय रु क जाने से मनुष्य मनचाही आयु तक जिन्दा रह सकता है। सिद्धान्तों की दृष्टि भौतिकी सापेक्षवाद और आत्मिकी चेतन विज्ञान विशेष समता है। अन्तर मात्र यह है कि चेतन विज्ञान की विशेष समता है। अन्तर मात्र यह है कि चेतन विज्ञान से अलौकिक घटनाओं के आधार पर इसके प्रमाण दिये हैं। जबकि भौतिक विज्ञान असमर्थ रहा है। दीर्घ योगियों के प्रमाण इस बात की पुष्टि तथा प्रेरित करता है कि यदि अवलम्बन चेतन विज्ञान का लिया जाय आइन्स्टीन का सिद्धान्त प्रयोग स्तर पर लाया सकता है।

सापेक्ष मान्यताओं पर आधारित यह विश्व मानसिक व्यापारों का प्रतिफल है। जो सतत परिवर्तनशील है जहाँ परिवर्तन है-वहाँ स्थापित नहीं। जिस सत्ता के कारण संसार का स्वरूप वास्तविक लगता है व चेतन है। पिण्ड में आत्मा तथा ब्रह्माण्ड में वही परमात्मा नाम से जानी जाती है। उसकी चेतन तरंगें ही पदार्थ को गढ़ती तथा विनष्ट करती हैं, किन्तु स्वयं अप्रभावित बनी रहती है। संसार को समझने के लिए मन से ऊपर उठकर संकल्प-विकल्पों से रहित होकर चेतन विज्ञान का ही अवलम्बन लेना होगा। सापेक्ष आधा द्वारा विनिर्मित दृश्य जगत में कार्य कर रही निरपेक्ष सम्भव है। आत्म-विज्ञान का आश्रय ही दृश्य जगत रहस्यों का उद्घाटन कर सकने में समर्थ होगा। इस अनुभूति के बिना तो असमंजस बना रहेगा।


Quotation

सींस जहा सरीरस्स जहा मूलं दुमस्स य। सव्वस्स साहुधम्मस्स तहा झाणं विधीयते-इयिभासियाइं 22।13

आत्मशोधन की साधना में ध्यान का ऐसा ही प्रमुख स्थान है जैसे शरीर में मस्तिष्क तथा वृक्ष में उसकी जड़ का।


यह उत्तरदायित्व आत्की वहन करें!

अध्यात्म विज्ञान के साथ एक आश्चर्य चकित करने वाली सम्भावना जुड़ी हुई है। वह है-अचेतन मनःक्षेत्र की प्रसुप्त पड़ी हुई दिव्य क्षमताओं को जगाना एवं सक्रिय बनाना। इस संदर्भ में भौतिक विज्ञानी भी कुछ कुरेदबीन करते रहे हैं और जो उनके हाथ लगा है उसे देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि-व्यक्ति में विज्ञान पराक्रमजन्य क्षमताओं की तुलना में कहीं अधिक उच्चस्तरीय प्रभावी एवं समर्थताओं से भरी पूरी सत्ता विद्यमान है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, भविष्य कथन, विचार संचालन जैसे अगणित प्रयोग परीक्षण-परा मनोविज्ञान-मेटाफिजिक्स विज्ञान के आधार पर हुए है और उस आधार पर इस तथ्य की परिपूर्ण पुष्टि हो चुकी है कि मानवी अन्तराल में दिव्य क्षमताओं का अजस्र भण्डार छिपा पड़ा हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता एलेक्सिस कैरेल ने अपनी ‘मैन दि अननोन’ पुस्तक में अगणित तथ्य प्रमाण प्रस्तुत करते हुये यह सिद्ध किया है कि सामान्य जीवन में चेतना की सामर्थ्य का मात्र सात प्रतिशत ही प्रयुक्त होता है। जो उपयोग में आता है वह हल्का उथला एवं इतना है जिससे अन्य प्राणियों की तरह निर्वाह क्रम चलता रहे। जो विभूतियाँ अन्तराल में प्रसुप्त स्थिति में पड़ी हैं उन्हें जाना और जगाया जा सके तो निस्सन्देह मानवी अस्तित्व को उतना सूक्ष्म पाया जा सकता है कि वह अपनी कायिक एवं मानसिक प्रयोगशाला के सहारे भौतिक जगत की उन सभी समर्थताओं एवं सम्पदाओं को उपलब्ध कर सके जिन्हें विज्ञानी बहुमूल्य उपकरणों के सहारे हस्तगत करते हैं।

यहाँ जानने योग्य एक बात और भी हे कि जिस तरह परमाणु में सन्निहित असीम शक्ति विश्वव्यापी पदार्थ प्रकृति का एक अंश मात्र है उसी प्रकार व्यक्ति चेतना भी विश्व चेतना की एक अंश है। परमाणु की सामर्थ्य उसका निजी वैभव नहीं है, वरन् विराट् विश्व की शक्ति समुद्र की एक लहर बूँद भर है। उसी प्रकार चेतना की अपनी स्वतन्त्र हस्ती कुछ भी नहीं है। वह विश्व चेतना में ही अपनी पात्रता एवं आवश्यकता के अनुरूप सामर्थ्य अर्जित करती रहती है। इस चेतना लोक का अपना अस्तित्व है। अदृश्य सूक्ष्म जगत में प्रकृति की ऐसी अविज्ञात शक्तियों का आभास मिल चुका है जो विदित एवं उपलब्ध वैभव की तुलना में असंख्यों गुना अधिक है। ठीक इसी प्रकार चेतना के दिव्य लोक का अपना अस्तित्व है और उसमें इस स्तर का वैभव भरा पड़ा है जिसकी परब्रह्म की विश्व चेतना के रूप में तत्व दर्शन द्वारा चर्चा की जाती रही है।

इस दिव्य लोक का निरूपण पुरानी भाषा में परमेश्वर, देव-परिकर ऋद्धि-सिद्धि-स्वर्ग मुक्ति आदि के रूप में किया जाता रहा है। उसके लिए योग, तप, जप, ध्यान, पूजा, पुरश्चरण आदि की प्रक्रिया अपनाई जाती रही है और ऐतिहासिक साक्षियों के आधार पर यह सुखद परिणित भी उपलब्ध होती रही है जिन्हें देखते हुए इन प्रयोग परीक्षणों की परिपूर्ण सार्थकता सिद्ध की जा सके।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए-मध्यकाल में सर्वत्र अन्धकार युग फैला और विकृतियों एवं अवांछनीयता का बोलबाला रहा। राजनीति से लेकर अर्थ तक उठाये हुए है तब धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में ही यह आशा कैसे की जाय कि वह छद्म, सनक एवं निहित स्वार्थों की पकड़ से बचा रहेगा। पिछले दिनों यही स्थिति रही है और आज भी वैसी ही है। ऐसी दशा में अध्यात्म कास तत्व दर्शन ही नहीं, प्रयोग, उपचार भी बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। जो बना है उसे एक प्रकार से छिलका छूँछ, खिलौना, नमूना भर कह सकते हैं। प्रत्यक्ष है जो कुछ इन दिनों अध्यात्म के नाम पर माना अपनाया जाता है वह न केवल अधूरा है, वरन् भ्रान्तियों एवं विकृतियों की भी उसमें बुरी तरह घुस पैठ है। फार्मूले गलत होने पर श्रम भी निरर्थक ही जाता है। ऐसा ही इन दिनों भी हो रहा है। उपासनात्मक उपचार करने वाले जब प्रतिफलों के सम्बन्ध में निराश होते हैं तो एक प्रकार से नास्तिक ही बनते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि एक अत्यन्त उच्चस्तरीय एवं महान सम्भावनाओं से भरे-पूरे विज्ञान को उपहासास्पद बनना-तिरस्कृत होना पड़ता हैं। इस स्थिति से भारी हानि यह हो रह है कि उन असाधारण उपलब्धियों से व्यक्ति ओर समाज को वंचित रहना पड़ रहा है जो समस्त मानवी समुदाय को आन्तरिक उत्कृष्टता एवं बहिरंग सुसम्पन्नता से भरापूरा रख सकती थी।

सृष्टि के इतिहास में कई बार खण्ड प्रलय होती रही है। हिमयुग आये हैं और उनमें भयानक विनाश के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान के अनेक उपार्जनो को भी एक प्रकार से विस्मृत किया है। इतने पर भी स्रष्टा का वह अनुदान मनुष्य को मिलता ही रहा है कि आनुवांशिकी के आधार पर पूर्वजों के संचित ज्ञान की हल्की-फुल्की ज्योति जलाये रह सके और समयानुसार उसे पुनर्जीवित कर सकने में सफल हो सके। खण्ड प्रलयों के इतिहास से अवगत मनीषी बताते हैं कि विभीषिकाओं के युग कितने ही विनाशकारी एवं लम्बे क्यों न रहे हों, वे जब समाप्त हुए हैं तो मनुष्य ने देर सबेर में उसे किसी न किसी प्रकार एक या दूसरे रूप में पुनः उपलब्ध कर लिया है। अध्यात्म विज्ञान के यथार्थवादी पुरातन स्वरूप के मध्यकाल के अन्धकार युग में विलुप्त या विकृत हो जाने की स्थिति को भी हिम प्रलय जैसी दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना की तरह ही समझा जा सकता है। इतने पर भी निराश होने का कोई कारण नहीं। आनुवांशिकी का आश्वासन है कि जो खोया है उसे नये सिरे से प्रबल पुरुषार्थ में जुट पड़ने पर पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

भौतिक शक्तियों के चमत्कारों से हम सभी परिचित हैं। लेसर किरणों की-ऐन्टी मैटर-ऐन्टी यूनीवर्स आदि की चर्चा दाँतों तले उँगली दबाकर की जाती रहती है। अब इसी स्तर की एक और उपलब्धि करतलगत हो सकने की बात बन रही है जिसके आधार पर अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभार कर मनुष्य को न केवल चरित्र, व्यवहार, वैभव की दृष्टि से वरन् अन्तःशक्ति के साथ जुड़ी हुई विलक्षण ऋद्धि-सिद्धियों की दृष्टि से भी सुसम्पन्न बनाया जा सके। इस सम्भावना को देवयुग का पुनर्जीवन अथवा धरती पर स्वर्ग के अवतरण वाला सतयुग कहा जा सकेगा।

आज जो उपेक्षा, असहयोग विज्ञान और अध्यात्म के मध्य दिखाई पड़ता है, उसे मिटाकर, विग्रह की वृत्ति को हटाकर सहयोग भरा रीति-नीति की प्रतिष्ठापना कर समुद्र मन्थन जैसे सत्परिणाम पा सकना पुनः इसी धरती पर सम्भव है। दैनन्दिन जीवन में सहकार के परस्पर विरोधी परिणामों के प्रतिफल आये दिन सामने आते रहते हैं पर जब विज्ञान व अध्यात्म परस्पर मिलेंगे तो उनका सहयोग अनूठा ही होगा। सभी जानते हैं कि ठण्डे व गरम तार मिलकर बिजली का प्रवाह बनाते हैं। जब दो विध्वंसकारी रचनात्मक शक्तियाँ एक ही उद्देश्य हेतु नियोजित होंगी तो उनके सम्मिलित प्रयासों की फलश्रुति अपनी इस धरती को सुन्दर और अधिक सुव्यवस्थित व सुसंस्कृत बनाने के रूप में ही निकलेगी, इसमें कोई संदेह नहीं। यह एक स्वप्न नहीं वास्तविकता है। आग-पानी के मिलने से भाप बनने तथा उसके रचनात्मक कार्यों में लगने पर कमाल दिखाने जैसी परिणति विज्ञान-अध्यात्म सहयोग की होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। अनेकानेक प्रमाण-तथ्य बताते हैं कि इस परिकल्पना को साकार रूप देने पर कितने सुन्दर परिणाम निकल सकते हैं।

मरणोत्तर जीवन का जब अस्तित्व सिद्ध होने ही जा रहा है तो फिर उस कड़ी को भी जोड़ना ही पड़ेगा जिसके अनुसार पितरों की दुनिया का जीव जगत के साथ आदान-प्रदान चल पड़े। ऐसा सम्भव हो गया तो समझना चाहिये कि एक ओर अपनी जैसी ही नई दुनिया के साथ रिश्ता जुड़ गया। इसमें दोनों ही लोकों के निवासियों का सुखी समुन्नत होना और एक दूसरे की महत्वपूर्ण सहायता का सकना सम्भव हो सकता है।

व्यक्ति के हिस्से में थोड़ी-सी समर्थता आई है किन्तु वह जिस विराट् शक्ति भण्डार से-परब्रह्म से जुड़ा है-उसकी सामर्थ्य का कोई अन्त नहीं । कम ताकत का बल्ब धीमी रोशनी देता है, पर यदि उसी स्थान पर बड़ी ताकत का बड़ा बल्ब लगा दिया जाय तो उसी बिजली फिटिंग से अनेक गुना प्रकाश उत्पन्न हो सकता है। बिजली की लाइन में उतनी सामर्थ्य रहती है कि छोटे उपकरणों के स्थान पर बड़े लगा देने पर अधिक ऊर्जा पाई और अधिक सुविधा उठाई जाय। परब्रह्म सत्ता के साथ आमतौर से आत्मा का सीमित एवं सामान्य सम्बन्ध ही रहता है, पर यदि व्यक्ति को अधिक परिष्कृत बनाया जा सके तो वह अदृश्य जगत की महान दैवी शक्तियों से भरपूर लाभ उठा सकता है और उस आधार पर अपनी सफलताओं में चार चाँद लगा सकता है।

अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय से व्यक्ति के अन्तराल को परिष्कृत करके आज की तुलना में उसे अनेक गुना समर्थ एवं श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। उसी प्रकार विश्व चेतना की असीम सम्भावनाओं में उसे इतना कुछ आकर्षित किया जा सकता है जिससे मनुष्य के स्तर, स्वरूप एवं वर्चस् में काया-कल्प जैसा सुखद सत्परिणाम उत्पन्न हो सके। ऐसी ही उपलब्धियों को प्राचीन काल में दैवी वरदानों के नाम से पुकारा जाता था। आज भी इस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होते रहने की सम्भावना पूर्ववत् ही बनी हुई है।

अन्तरिक्ष में पदार्थ सम्पदा उससे कहीं अधिक भरी पड़ी है जितनी कि जल और थल में, तरल एवं ठोस रूप में पाई जाती है। जिस प्रकार जल और थल का वैभव मनुष्य के काम आता है उसी प्रकार अन्तरिक्ष में भरीपूरी वही सम्पदा फिर से ठोस एवं द्रव के रूप में परिणत करके धरती की सम्पदा में असंख्य गुनी वृद्धि हो सकती है।

यज्ञ प्रक्रिया प्राचीन काल में शारीरिक, मानसिक दुर्बलता और रुग्णता के निवारण में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती रही है। इसके अतिरिक्त उस माध्यम से वातावरण का परिशोधन एवं प्राणपर्जन्यों का अभिवर्षण भी सम्भव होता रहा है। इसमें व्यक्ति और समाज की स्वस्थता, समृद्धि एवं प्रगति की कितनी ही संभावनाएँ बढ़ती हैं। इस उपेक्षित एवं अस्त-व्यस्त यज्ञ प्रक्रिया को यदि फिर से नये परीक्षणों के साथ एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया का रूप दिया जा सके तो उसकी परिणति समस्त संसार पर दैवी वरदान बरस पड़ने के समान ही सौभाग्य भरी सिद्ध होगी।

प्रकृति को भौतिक समझकर उसकी पदार्थ सत्ता पर ही अब तक की माथा पच्ची होती रही है। अब उस ब्रह्माण्ड में चेतना का समुद्र भरा पूरा अनुभव किया जा सके और उसी क्षेत्र के मणि मुक्तक ढूँढ़ने में लग पड़ा जाय तो विश्व वैभव में निश्चय ही आश्चर्यजनक प्रगति हो सकती हे।

अपनी पृथ्वी इस विशाल ब्रह्माण्ड परिवार का एक छोटा-सा घटक है। उसे जो भी प्रत्यक्ष परोक्ष वैभव मिला हुआ है वह ब्रह्माण्डीय सम्पदा का एक अंग है। पृथ्वी उत्तरी ध्रुव के माध्यम से उसमें से उपयोगी अंश खींचती और जो अनुपयोगी है उसे दक्षिणी ध्रुव से बाहर फेंक देती है। यह प्रकृतिगत आकर्षण, विकर्षण मानवी चेतना के एकाकी एवं संयुक्त चुम्बकत्वों द्वारा सामयिक आवश्यकता के अनुरूप खींचा एवं रोका जा सकता है। अर्न्तगही कारणों से पृथ्वी पर अनेकों विपत्तियाँ आती हैं। इन्हें रोकने एवं अनुकूलताओं को बढ़ाने के लिए चेतनात्मक प्रयोग उपचार हो सकते हैं। इस क्षमता को भी पूर्व काल की तरह इन दिनों अध्यात्म एवं विज्ञान के सिद्धान्तों का समन्वय करके सहज ही उपलब्ध किया जा सकता है।


Quotation

सर्वनाशे समुत्पन्ने र्ह्यध त्यजति पण्डितः। अर्द्धेन कुरुते कार्य सर्वनाशों हि दुस्तरः॥

अर्थात्-सर्वनाश होने का अवसर आ जाय तो बुद्धिमान पुरुष उसमें से आधा भाग स्वयं ही त्याग दिया करते है। ऐसे समय में ऐसा सभी का करना चाहिए क्योंकि अवशिष्ट आधे से कार्य किया जा सकता है। सबका नाश तो बड़ा दुस्तर है क्योंकि फिर कुछ भी साधन ही नहीं रहता है।


अनेकता से एकता की ओर महायात्रा

संसार की विचित्रता विभिन्नता में भी एक विशेषता यह दिखायी देती है कि समस्त जड़-चेतन में एक ही चेतना कार्य कर रही है। उसकी चेतन तरंगें ही स्थूल जगत का सृजन करती पेड़-पौधों वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं का उत्पादन करती है सृष्टि की विविध संरचनाओं में स्वरूप की भिन्नता होते हुए भी उनके कारण सत्ता की पूर्ण एकता है। यह ‘एकत्व’ ही संसार की आदि कारण सत्ता है। उसी को विविध धर्म सम्प्रदायों में अनेकों नामों से सम्बोधित किया गया है। उससे मिलने, प्राप्त करने को ही जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।

समस्त संसार उससे ही उत्पन्न होता उसी में लय हो जाता है। जाने-अनजाने सभी प्राणी उस ‘एकत्व’ के उद्गम स्थल की और बढ़े चले जा रहे हैं। नहीं जिस प्रकार अनेकों चक्राकार पथों से होते हुए एक महासमुद्र में मिलने के लिए दौड़ती हुई चली जाती हैं। तथा मिलने के उपरान्त ही विश्राम पाती है। उसी प्रकार सभी प्राणी अपना गन्तव्य स्थान न जानते हुए भी परमात्मा की और बढ़ते चले जा रहे हैं। मानव चित्त अनेकानेक आकर्षणों में उस ‘एक’ का अनुसन्धान करता है। कभी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है कभी साँसारिक विक्षोभों से टकराकर पीछे हटता है। पुनः नयी शक्ति नयी प्रेरणा के साथ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होता है।

‘एकत्व’ की प्राप्ति, एकत्व की अनुभूति एकत्व का दर्शन ही जीवन का लक्ष्य है। यही परम सत्य है वही सबमें समाया हुआ है, सबका आदि कारण है। इस सत्य को जानते हुए ही श्रुति कहती है—

“वृक्ष इव स्तब्धों दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं-पूर्ण-पुरुषेण सर्वम्।”

अर्थात्-वृक्ष की भाँति आकाश में शान्ति भाव से जो विराजमान् है वह एक है। उसी परम पुरुष में, परिपूर्ण परमात्मा में समस्त जगत परिपूर्ण है।

यथा सौम्य वयाँसि वासोवृक्ष सम्प्रतिष्ठन्तो। एवं हवै तत् सर्व पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते-उपनिषद्

अर्थात्-हे सौम्य! पक्षी गण जैसे वास-वृक्ष में आकर स्थिर होते हैं, उसी प्रकार यह समस्त संसार परमात्मा में प्रतिष्ठित होता है।

वह एक चेतना ही सबमें समायी हुई क्रिया-कल्लोल करती विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। अपनी चेतन तरंगों का प्रकृति में आरोहण करके सृष्टि का निर्माण करती हैं। भासित होने वाली संसार की अनेकता-खण्डता में एकता-अखण्डता का दर्शन करना ही तत्व ज्ञान है। तत्व ज्ञानियों ने इस रहस्य को जाना, अनुभव किया तत्पश्चात् कहा—

“एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्।”

अर्थात्-सृष्टि की विचित्रता एवे विभिन्नता में भी अपरिमेय ध्रुव की एकता देखनी होगी।

“एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेषभूतपाल। एष सेतुर्विधरण एवाँ लोकानामसम्मेदाय॥

अर्थात्-यह एक ही सबका ईश्वर है। समस्त जीवों का अधिपति एवं पालन कर्ता है। एक आधार बनकर लोक को धारण करता तथा ध्वंस से रक्षा करता है।” वह एक परमात्मा सबसे अधिक प्रिय है।

तदेतत् प्रेयः पुत्राय प्रेयोविन्तात्। प्रेमोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा॥

अर्थात्-वह एक परमात्मा सबके अन्दर है। वह पुत्र प्रिय, वित्त से प्रिय तथा सबसे अधिक प्रिय है।

संसार में दुःख-क्लेशों की कमी नहीं है। आघात-प्रतिघातों की सीमा नहीं है। सुख-दुःख-विछोह-मिलन हानि लाभ से सारा संसार विक्षुब्ध हो रहा है। किन्तु इस संग्राम में भी शान्ति रूप में वह परमात्मा विद्यमान है। यही कारण है कि इतने आघातों के बाद भी संसार ध्वंस नहीं होता। भाई-भाई-मित्र-शत्रु जितना आपसी संघर्ष से आन्दोलित होते हैं। उत्साही स्वतः एकत्व भाव से जुड़ते चले जाते हैं। पाप-तापों के बीच में भी कल्याणकारी मंगलमयी भावना सबमें विद्यमान है। संसार में कितनी अशान्ति, कितना असमंजस है फिर भी देखते हैं कि मांगलिक आदर्श संसार में चिरकाल से विद्यमान है। वही कारण है कि मानवी संस्कृति एवं सभ्यता का अस्तित्व अब तक बना हुआ है अन्यथा यह संसार आपसी संघर्षों के कारण बहुत पहले ही नष्ट हो गया होता। मांगलिक आदर्श, कल्याणकारी भावों का प्रणेता वही परमात्मा है जो सबके अन्तःकरण को प्रेरित, आन्दोलित करता रहता है तथा एकत्व के भाव का सृजन करता है।

पर्वत्र एक परमात्मा विद्यमान है। संसार मंगलमय है। सभी उस ‘एक’ से गुँथे हैं। सैद्धान्तिक रूप से यह सत्य स्वीकार तो सभी करते हैं किन्तु आपसी संघर्षों, दुःख-क्लेशों पाप-संतापों को देखकर यह प्रश्न उठता है कि इन सबका कारण क्या है? मंगलमय संसार अमंगलकारी कैसे हो गया। एकता-अनेकता में, अखण्डता, खण्डता में कैसे परिवर्तित हो गयी। तथ्यों की गहराई में जाने पर पता लगता है कि जीवन को खण्डित करके देखना ही सारी समस्याओं-दुःख-क्लेशों पाप संतापों का कारण है। अपना आपा ही जब सबमें प्रकाशित है तो फिर अपने पराये का भेद कहाँ? भेद तो सही दृष्टिकोण के अभाव के कारण दीख पड़ता है।

समस्त क्षुद्रताओं की, विखण्डता की संकीर्णता का उस ‘एकत्व’ में जोड़ सके तो सम्पूर्ण पाप-तापों से परिमाण पाना सम्भव है। अपनी हृदय की भावनाओं, चिन्तन एवं कर्म चेष्टाओं को उस ‘एक’ में घुला दे तो किसी प्रकार की बाधा हमें अधीर नहीं बना सकती, कोई विघ्न निराश नहीं कर सकता है। किसी मनुष्य से क्षोभ उत्पन्न नहीं हो सकता। जब अपना स्वरूप ही सबमें है तो कौन मित्र तथा कौन शत्रु है। शक्ति का अहंकार, बुद्धि का दम्भ एवं ऐश्वर्य का गर्व इस भावना के उदय होते ही स्वतः नष्ट हो जाएगा । मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली पृथकता की प्रवृत्ति का अन्त होते ही देवोपम मनःस्थिति स्वर्णिम परिस्थिति का वर्णन होने लगेगा।

इस स्थिति में स्वभावतः सभी कार्यों में धैर्य एवं शान्ति का समावेश होने लगता है। चंचलता एवं उद्विग्नता समाप्त हो जाती है। समस्त वृत्तियों में सौंदर्य और मंगल उद्भासित हो उठता है। संसार की समस्त वेदनाएँ माधुर्य से ओत-प्रोत दीखने लगती हैं। विखण्डता की दृष्टि की समस्त दुःखों का कारण है।

“मृत्योः स मृत्यु माप्नोतिय इह नानेव पश्यति।”

अर्थात्-मृत्यु से वह मृत्यु को प्राप्त करता है जो संसार को विखण्ड करके देखता है।”

खण्डता में कुरुपता है-सौंदर्य है एक में। खण्डता में चंचलता है-शान्ति है एक में। खण्डता में विरोध है-मंगल है एक में। खण्डता में मृत्यु है-अमृतत्व है एक में। उस एक को विच्छिन्न करके देखने से हम असंख्यों प्रकार के आधारों ने विच्छिन्न करके देखने से हम असंख्यों प्रकार के आघातों से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते। खण्डता से संकीर्णता पनपती एवं बढ़ती है। फलस्वरूप वह अहं के पोषण में ही केन्द्रीभूत हो जाती है। खण्ड शरीर के परिपोषण में लगी क्षमता अखण्ड चेतना को नहीं देख पाती। व्यक्ति गत संग्रह उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ती है तथा परस्पर इस प्रतियोगिता की भावना से ईर्ष्या उत्पन्न होती है जो सभी झगड़ों की जड़ है। विखण्डता की यह भावना अखण्ड चेतना के दर्शन से मनुष्य को सदा दूर रखती, जिसके कारण साधनों, वस्तुओं के प्रति मोह जीवन के अन्तिम दिनों तक बना रहता है। परिणाम यह होता है उस ‘एक’ परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त होने वाले आनन्द से सदा वंचित रह जाते हैं।

मनुष्य और मनुष्य के बीच पनपने वाले विभेद क्रम ही समस्त विग्रहों का मूल है। यदि एकता की-आत्मीयता की भावना विकसित हो-सब अपने दिखायी पड़े-सबसे एकता की सूत्र-शृंखला बँधी दिखायी पड़े तो व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त होने में देर न लगे। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना ही आध्यात्मिक समाजवाद है। उसी के प्रखर रहने पर भूतकाल स्वर्णिम युग बनकर रहा। उज्ज्वल भविष्य के लिए भी उसी एकता एवं आत्मीयता के तत्व दर्शन को सुविस्तृत करना होगा। आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण का यह एक ही उपाय है।


यह सृष्टि किस कुशल कारीगर द्वारा बनाई गई है

अकस्मात् तो दुर्घटनाएँ हुआ करती हैं, सृजन नहीं। सुव्यवस्था एवं सन्तुलन का होना इस बात का परिचायक है कि जिसे बनाना और नियन्त्रण करने वाली कोई बुद्धिमान एवं समर्थ सत्ता हैं। यह विराट् अद्भुत और सुव्यवस्थित सृष्टि अपने आप बनकर तैयार हो गई। स्वसंचालित है, यह प्रतिपादन बुद्धि के पल्ले नहीं पड़ता। संयोगवश अपने आप न तो मकान बनकर तैयार हो जाता हैं और न ही मोटर आदि। जिन मशीनों, कम्प्यूटर आदि यन्त्रों को आटोमेटिक कहा जाता है उन पर भी नियन्त्रण रखना होता है। संयोगवश अपने आप धूल के कणों को एकत्रित होकर ईंटों में परिवर्तित होते, एक के ऊपर एक सजकर मकान में बदलते किसने देखा है? मोटर में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न यन्त्र एकत्रित होकर स्वयमेव मोटर में परिवर्तित हो गये हों, और गतिशील बन गये हों ऐसा उल्लेख संसार भर में कहीं नहीं मिलता। कोई इंजिन, कल, कारखाना किसी आटोमेटिक प्रक्रिया द्वारा स्वतः चलता एवं बन्द होता रहे, ऐसा सम्भव नहीं है। इनके सुसंचालन के लिए सदा नियन्त्रण बनाये रखना होता है।

वह समय अब पीछे छूटता जा रहा है जब विज्ञान अपनी बाल बुद्धि के सहारे यह कहता था कि सृष्टि अपने आप बनकर तैयार हो गई और आटोमेटिक प्रक्रिया द्वारा गतिशील हैं। संसार के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने अपनी सूक्ष्म खोजों के उपरान्त यह घोषणा की है कि “सृष्टि रचना एक संयोग नहीं बुद्धि का चरम आविष्कार है” उसका सुसंचालन कोई अदृश्य किन्तु सर्व समर्थ मस्तिष्क कर रहा है। खोजने पर उस समर्थ सत्ता के अनेकों प्रमाण हमारे चारों ओर बिखरे मिल जायेंगे।

डा.ए. क्रेसी मोरिसन इन्हीं मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक हैं जिन्होंने किसी सृष्टि संचालक सत्ता पर विश्वास करने के अनेकों कारण बताये हैं। ‘क्रेसी’ न्यूयार्क विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

डा. क्रैसी का कहना है कि “गणित शास्त्र के नियमों से यह प्रामाणित होता है कि “इस संसार का नक्शा किसी कुशल तथा बुद्धिमान इञ्जीनियर द्वारा खींचा गया है। विश्व की रचना निष्प्रयोजन नहीं प्रयोजन युक्त है। इसका प्रमाण है जीव जगत के लिए पृथ्वी पर अनुकूल वातावरण का होना। उनका कथन है कि “पृथ्वी अपनी धुरी पर एक हजार मील प्रति घण्टे की रफ्तार से घूमती है यदि उसकी गति सौ मील प्रति घण्टा हो जाय तो दिन ओर रात अब की तुलना में दस गुने लम्बे हो जायेंगे । दिन के समय सूर्य की गर्मी इतनी अधिक होगी कि पृथ्वी की समस्त वनस्पतियाँ जल कारण अधिकाँश जीव मर जायेंगे ।

“चन्द्रमा की दूरी पृथ्वी से दो लाख बत्तीस हजार मील है। यदि उसकी दूरी मात्र पचास हजार मील होती तो सागरों में भयंकर ज्वार उठते। फलस्वरूप समस्त महाद्वीप जल मग्न हो जाते। सूर्य जीवन का स्त्रोत है। उसका सतही मापक्रम बाहर डिग्री फारेनहाइट है। सूर्य से पृथ्वी की दूरी एवं प्राप्त होने वाला ताप का सामंजस्य जीवन के अनुकूल है। यदि सूर्य का ताप घटकर आधा अवशेष रह जाय तो पृथ्वी के सभी प्राणी जम जायेंगे। तापक्रम आधा ओर बढ़ जाय तो सब जलभुन कर समाप्त हो जायेंगे। पृथ्वी 23 डिग्री के कोण पर झुकी है। इस कारण अनुकूल ऋतुएँ मिलती है। यह झुकाव न होता तो समुद्री भाप उत्तर से दक्षिण तक फैल जाती और सर्वत्र बर्फ के महाद्वीप बन जाते। वायु में आक्सीजन एवं कार्बन डाई आक्साइड गैस के सन्तुलन में सागरों की गहराई का हाथ है। यदि सागर अधिक गहरे होते तो इन गैसों के अभाव में वनस्पतियों का अस्तित्व नहीं बचता। अन्तरिक्ष वायु सुरक्षा कवच पतला अथवा हल्का होता तो अगणित उल्काएँ नित्य ही जलती हुई पृथ्वी से आ टकराती और समस्त भू-सम्पदा को भस्मीभूत कर देतीं। हर दृष्टि से पृथ्वी पर अनुकूल सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित वातावरण का होना इस बात का प्रमाण है कि कुशल हाथों से किसी समर्थ सत्ता ने इस सृष्टि की रचना की है। संचालन एवं नियन्त्रण की बागडोर भी उसी के हाथों में हैं।

डा.क्रेसी का कहना है कि सर्वत्र वह सत्ता शक्ति के रूप में क्रियाशील है। जीवन उसका ही स्वरूप है। भार, लम्बाई, चौड़ाई अथवा ऊँचाई से रहित होते हुए भी जीवन शक्ति से ओत-प्रोत है। वृक्ष की बढ़ती हुई जड़ में वह चट्टान को भी तोड़ देता है। जीवन एक मूर्ति का है जो सभी जीवित तत्वों को आकृतियाँ प्रदान करता है। मनुष्य और मनुष्येत्तर प्राणी नन्हें जीव जन्तु उसी क विभिन्न कला कृतियाँ हैं। जीवन एक चित्रकार है जो वृक्ष वनस्पतियों को एक सुनिश्चित रूप देता, पुष्पों में रंग भरता, अपने सुरभि से उन्हें सुरभित करता। वह एक संगीतकार है जिसका संगीत चिड़ियों के माध्यम से गुँजित होता है। वह एक रसायन तत्त्वज्ञ है जो फलों में, अन्नों एवं सब्जियों में विविध प्रकार का स्वाद भरता है।

क्षुद्र प्रोटोप्लाज्म अपने अन्दर जीवन की असीम संभावनाएँ छिपाये हुए है। वृक्ष वनस्पतियों से लेकर क्षुद्र जीव जन्तु मनुष्य तक पशु पक्षी और मनुष्य तक इसी नगण्य द्रव से अपना स्वरूप प्राप्त करते हैं। क्षुद्र और महान सभी प्राणी इससे ही जीवन ग्रहण करते हैं। एक जैसा, दीखते हुए भी यह जीव द्रव्य के लिए जीव जगत में विविध रूपों को भरता, वृक्ष, वनस्पतियों जीव-जन्तुओं को एक निश्चित आकृति प्रदान करता है।

परमात्मा पर विश्वास करने और श्रद्धा रखने को तीसरा प्रमुख कारण है। जीव जगत की अद्भुत संरचना। प्रत्येक प्राणी को सृष्टा ने उसकी आवश्यकता के अनुरूप ऐसी विशेषताएँ दे रखी हैं जिससे वह जीवनयापन कर सके और वाली कठिनाइयों से अपनी सुरक्षा कर सके। वैज्ञानिकों भाषा में इस विशेषता को ‘सहज ज्ञान’ कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इस सम्बन्ध में अनेकों प्रयोग किए हैं। ‘सालमन’ नामक एक विशेष प्रकार की मछली को उसके जन्म स्थान ने दूर समुद्र में ले जाकर छोड़ दिया जाय तो कुछ समय बाद वह पुनः नदी समुद्र से जुड़ी नदियों के सहारे अपने मूल स्थान पर वापस लौट आती है। निश्चित स्थान पर पहुँचने में उससे कभी भूल नहीं होती।

‘ईल’ नामक मछली के भीतर यह विशेषता ओर भी अधिक मात्रा में पायी जाती है। यही जीवन पर्यन्त प्रवासी जिन्दगी व्यतीत करती है। किन्तु निर्धारित समय पर अपने दायित्वों को पूरे कर अण्डे देती है जहाँ कि टिड्डी का सुरक्षित माँस रखा होता है। अण्डे से निकलने वाले बच्चों को ताजा माँस खाने के लिए अपने निकट ही मिल जाता है। यदि ‘वास्प’ टिड्डे को अचेत न करके पूर्णतया मार दे तो कुछ ही समय बाद टिड्डे का माँस विषाक्त हो जायेगा ओर इस योग्य नहीं बचेगा कि उसे अण्डे से निकलने वाले खा सकें यह सहज ज्ञान की प्रकृति प्रदत्त विशेषता इस बात का परिचय देती है कि कोई समर्थ सत्ता न समझ-बूझकर उनकी रचना की है और जीवनयापन के लिए आवश्यक विशेषताएँ प्रदान की हैं।

इसी प्रकार असंख्यों मनुष्येत्तर जीव अपने सहज ज्ञाने के कारण ढर्रे का जीवन व्यतीत करते। खाने-पीने-और प्रजनन तक उनकी चेष्टाएँ सीमित रहती हैं। जबकि मनुष्य को विचारणा की बौद्धिक शक्ति अतिरिक्त रूप से मिली है। इसी का अवलम्बन लेकर मनुष्य विकास की वर्तमान स्थिति तक पहुँच सका है।

प्रत्येक जीव के लिए समुचित आहार की पूर्व व्यवस्था का होना भी इस बात का प्रमाण है कि किसी अदृश्य सत्ता ने प्रत्येक जीव की आवश्यकता के अनुरूप ऐसी सुविधाएँ दे रखी हैं जिससे वह भली-भाँति अपना भरण-पोषण कर सके। माँ के गर्भ में पलने वाले असहाय अबोध शिशु तक को पोषण अपने आप प्राप्त होता रहता है। शाकाहारी और माँसाहारी जीव प्रकृति सम्पदा से अपने-अपने अनुरूप आहार प्राप्त करते रहते हैं। नभचर, जलचर ओर पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीव-जन्तुओं को उनके अनुरूप भोजन प्राप्त हो जाता है।

प्रकृति के कार्य भी यह प्रमाण देते हैं कि सृष्टि की रचना किसी दूरदर्शी सत्ता ने की है। वह मात्र रचना ही नहीं करती वरन् समय-समय पर नियमन ओर सन्तुलन का दायित्व भी सम्हालती है। उपयोगी के अभिवर्धन और अनुपयोगी के काट-छाँट की प्रक्रिया की सृष्टा द्वारा प्रकृति में चलती दिखायी पड़ती हैं। बहुत समय पूर्व आस्ट्रेलिया के विभिन्न स्थानों पर बाड़ लगाने के लिए नागफनी के पौधे लगाये गये। ये पौधे व्यापक क्षेत्र में फैल गये। स्थिति यहाँ तक जा पहुँची कि वहाँ के निवासियों के लिए कृषि करना भी कठिन हो गया। फसलों को ये पौधे नष्ट कर देते और अपना आधिपत्य जमा लेते। आस्ट्रेलिया के नागरिकों के समक्ष जीवन-संकट उपस्थित हो गया। जीव वैज्ञानिकों ने अपने गहन अध्ययन के उपरान्त एक ऐसे कीड़े की खोज की जो मात्र नागफनी के पौधों को खाता था। एक कीड़े को लाकर उस क्षेत्र में छोड़ दिया गया। ये कीड़े भी द्रुतगति से बढ़ने लगे। कुछ ही समय में कीड़ों ने नागफनी पर विजय प्राप्त कर ली किन्तु साथ ही इनका विस्तार भी अपने आप रुक गया।

रोकथाम एवं सन्तुलन की यह व्यवस्था सर्वत्र कार्य करती दिखाई पड़ती है। जिन कीड़ों की सन्तानोत्पादन की क्षमता जितनी अधिक है वे उतनी ही शीघ्र समाप्त भी हो जाते हैं। उनके विस्तार एवं अभिवृद्घि पर प्रकृति भी हो जाते हैं। उनके विस्तार एवं अभिवृद्घि पर प्रकृति का नियन्त्रण न हो तो कुछ ही समय में समस्त भू-मण्डल पर वे छा जायेंगे किन्तु ऐसा कभी नहीं होता। प्रकृति की कठोर नियमन व्यवस्था उनके विस्तार को रोकती है।

नियामक सत्ता के ऐसे अनेकों प्रमाण हमारे चारों ओर बिखेर पड़े हैं, जिनके द्वारा उसके अस्तित्व का सहज की अनुमान लगाया जा सकता है। प्रत्यक्ष दिखाई तो स्थूल वस्तुएँ पड़ती है-शक्तियाँ नहीं। परमात्मा एक शक्ति है कोई व्यक्ति अथवा वस्तु नहीं। बिजली ऊष्मा, गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकत्व जैसी शक्तियाँ प्रत्यक्ष कहाँ दिखाई पढ़ता हैं? उनकी प्रतिक्रियाओं द्वारा उनका प्रमाण मिलता है। दिखाई न पड़ने मात्र से कोई इनके अस्तित्व से इंकार नहीं करता। परमात्मा भी शक्ति के रूप में सर्वत्र क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा है। सृष्टि की सुव्यवस्था ओर सुसंचालन-उसी सत्ता का अकाट्य प्रमाण है।


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प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्व विचक्षणाः समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात्॥

आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः यत्प्रत्क्षानुमानाभ्याँ श्रेयोऽसावनुविन्दते-महायोग विज्ञान

अनेक विवेकवान व्यक्ति जो तत्त्वज्ञान से परिचित हैं अपने आत्म पुरुषार्थ से ही अपना उद्धार कर लेते हैं। आत्मा ही आत्मा का गुरु है। प्रत्यक्ष ओर अनुमान के आधार पर विचारशील लोग अपना कल्याण आप कर लेते हैं।

आत्मा वारेच श्रोतव्या मंतव्य इति यच्छुतिः। पा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी ॥ 32॥ —शिव संहिता1।32

आत्मा को सुनो-आत्मा का मनन करो। इस श्रुति के अनुसार प्रयत्नपूर्वक उस आत्मा की ही सेवा करनी । वह बंधनों से छुड़ाती है।


गणितीय नियमों में बँधे हम सब

संसार एक सुनिश्चित और व्यवस्थित क्रम से चल रहा है। यद्यपि इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक ग्रह नक्षत्र से लेकर कीट पतंगों तक सब कुछ गतिशील है। सब चलते हैं, कुछ भी स्थित नहीं रहता और सब की गति अलग-अलग है परन्तु सब इतने व्यवस्थित ढंग से गतिशील हैं कि कोई किसी की व्यवस्था में व्यतिक्रम नहीं पहुँचाता। उदाहरण के लिए अपने सौर मण्डल को ही लिया जाए। पृथ्वी समेत इस परिवार में नौ ग्रह हैं इनमें कुछ सूरज के सबसे पास हैं और यम [प्लूटो] सबसे दूर। यह आकार में सबसे छोटे हैं फिर भी दोनों की स्थिति एकदम भिन्न हैं। बुध सूरज के पास रहने से गरमी में झुलसता रहता हैं तो प्लूटो सरदी के मारे जमा रहता है।

नवग्रह अपनी-अपनी कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा बड़े अनुशासित ढंग से करते रहते हैं। यदि उनमें से कोई भी ग्रह अपनी कक्षा छोड़कर थोड़ा भी इधर-उधर जाए तो उसके अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 9 करोड़ 30 लाख मील है। यदि पृथ्वी अपनी कक्षा से हट कर जरा भी सूर्य की और खिसक तो न केवल वहाँ का मौसम भयानक रूप से गर्म हो उठे बल्कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर जमी हुई बर्फ पिघल कर जल प्रलय का दृश्य उपस्थित कर दे। इसी प्रकार यदि पृथ्वी अपनी कक्षा छोड़कर सूर्य से जरा-सी दूरी पर खिसक जाए तो यहाँ इतनी शीत पड़ने लगे कि समुद्र और नदी नालों सहित पृथ्वी का सम्पूर्ण जल भण्डार जमकर बर्फ हो जाए और जीना भी दूभर होने लगे।

पृथ्वी की तरह अन्यान्य ग्रह भी अपनी समान दूरी पर रहते हुए इस सौर परिवार के अनुशासित सदस्य बनकर जी रहे हैं। इसी आधार पर प्राचीन काल में मनीषियों ने ज्योतिष विद्या की शोध की थी और ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन कर वे निष्कर्ष प्राप्त किए थे जो आज भी सत्य हैं। इतना ही नहीं उन्होंने गहन अन्वेषणों और अनुसंधानों के आधार पर यह भी देखा और जाना था कि ग्रह नक्षत्र ही नहीं मनुष्य और अन्य प्राणियों का जीवनक्रम भी एक गणितीय नियम के अनुसार चलता है। इन नियमों की शोध भी कर ली गई थी परन्तु कालान्तर में वह विद्या लुप्त हो गई तथा ज्योतिष के नाम पर जीविका कमाने, लोगों को ठगने वालों का ही वर्ग बढ़ने और फलने फूलने लगा।

ऐसी बात नहीं है कि ज्योतिर्विज्ञान कोई कपोल कल्पना और कोरी गप्पबाजी हो। जब निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस विद्या का उपयोग किया जाने लगा तो स्वाभाविक ही इस विद्या का दुरुपयोग हुआ, सचाई को छिपाया गया ओर लाभ को महत्व देने के कारण झूठे नियम सिद्धान्त गढ़े गए। इतने पर भी यह विद्या पूरी तरह लुप्त नहीं हुई हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य ज्योतिषी कीरो ने अपनी पुस्तक ‘बुक आफ नेबर्स’ में अपनी भारत यात्रा का वर्णन करते हुए यह लिखा है कि जब मैं भारत यात्रा के लिए गया तो मुझे कुछ ऐसे ब्राह्मणों के सान्निध्य में रहने का सुअवसर मिला जो प्रकृति के बहुत से गूढ़ रहस्यों का अपने हृदय में छिपाये हुए थे। उन्होंने कृपा करके मुझे ऐसी कई बातों का ज्ञान कराया। उनमें से एक तो यह थी कि अंकों का मनुष्य जीवन पर असाधारण प्रभाव पड़ता हैं। कहा जा सकता है मानवीय जीवन की घटनाएँ एक सुनिश्चित गणितीय नियमों के अनुसार घटती हैं।

कीरो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नौ वर्षों का एक चक्र आता हैं और प्रति नवें वर्ष उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटना घटती है। उन्होंने अपनी पुस्तक में कई उदाहरणों से यह सिद्ध किया हे। इतिहास की घटनाएँ भी कई बार इस चमत्कारिक अन्तर से घटती है कि उनमें भी अंकों की एक लयबद्धता देखी जा सकती हैं। सन् 1215 में जन्मे फाँस के सन्त लुई एक महान क्राँति दृष्टा थे। उनके ठीक 539 वर्ष बाद सम् 1754 में फाँस के सम्राट लुई सोलहवें का जन्म हुआ। दोनों के जीवन क्रम में इतनी समानता थी कि कई लोग लुई 16 वें को सेण्ट लुई का अवतार मानते हैं। सेण्ट लुई के जन्म के 10 वर्ष बाद उनकी बहन इसाबले का जन्म हुआ। सम्राट लुई की बहन भी उनसे 10 वर्ष छोटी थी और उसका नाम भी इसाबले से मिलता-जुलता ही था इलिजाबेथ। दोनों के पिताओ की मृत्यु उनकी आयु के 12 वें वर्ष में हुई। 15 वर्ष की आयु में सेण्ट लुई बीमार पड़े ओर सम्राट लुई भी इसी अवस्था में उसी रोग के शिकार हुए। दोनों का विवाह 17वें वर्ष में हुआ।

सेण्ट लुई 29 वें वर्ष में सन् 1243 में इंग्लैण्ड के बादशाह हेनरी तृतीय से युद्ध के बाद सन्धि वार्ता की और इसके 539 वर्ष बाद लुई 16 वें ने भी 29 वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड के बादशाह जार्ज तृतीय से युद्ध के बाद सन्धि की। सन् 1249 में पूर्वी देश का एक राजकुमार सेण्ट लुई से ईसाई बनने के लिए मिला। सम्राट लुई के पास भी 1749 में एक राजकुमार ने अपना राजदूत इसी आशय से भेजा। 35 वर्ष की आयु में सन्त लुई अपना क्रान्तिकारी विचारों के कारण बन्दी बनाए गए ओर इसी आयु में सम्राट लुई को भी बन्दी बनना पड़ा। इसी आयु में 1250 में सेण्ट लुई को सन्त पद से सत्ता से टाये गए। 36 वर्ष की आयु में सन्त लुई ने ट्रिस्टन की स्थापना की व क्रान्ति का उद्घोष किया तो सम्राट लुई ने भी 36 वें वर्ष में वैस्टिन के पतन के साथ क्रान्ति का शुभारम्भ किया उसी वर्ष सेण्ट लुई ने जैकब की स्थापना की थी और 539 वर्ष बाद सम्राट लुई ने भी।

सन् 1256 में सेण्ट लुई की माँ इसाबेल का स्वर्गवास हुआ। 539 वर्ष बाद उसी प्रकार सम्राट लुई की माँ ने भी 1792 में देह त्याग किया। 39वें वर्ष में सेण्ट लुई अवकाश ग्रहण कर जैकोबिन बने। सम्राट लुई का जीवन भी 539 वर्ष बाद 1793 में जैकोबियनों के हाथों हुआ। इस प्रकार दोनों के जीवन की घटनाओं में अद्भुत साम्य है। सभी घटनाएँ 539 वर्ष अन्तर से हुई।

इसी प्रकार लिंकन और कैनेडी के जीवन में अद्भुत साम्य हैं। लिंकन व कैनेडी दोनों गहरी धार्मिक भावनाओं वाले थे वे दोनों ही बाइबिल के प्रेमी पाठक थे। दोनों विश्व शान्ति के उपासक थे। 40 वर्ष की आयु में दोनों ने राष्ट्रपति बनना चाहा। दोनों ने नीग्रो स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर प्रयत्न किये। लिंकन के चार बच्चे थे उनमें से दो मर गए, शेष दो से उन्हें गहरा प्यार था। कैनेडी के भी चार बच्चे हुए उनमें से दो का निधन हो गया शेष दो से उन्हें भी अगाध स्नेह था।

लिंकन और कैनेडी के जीवन क्रम में प्रायः 100 वर्षा का अन्तर पाया जाता है। लिंकन 1860 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने और कैनेडी 1960 में लिंकन तीन वर्ष तक ही अमेरिका के राष्ट्रपति रह सके ओर 1863 में उनकी हत्या कर दी गई कैनेडी की हत्या भी इसके 100 वर्ष बाद 1963 में हुई। दोनों ही अपना शासनकाल पूरा न कर सके। दोनों गोली से मारे गए ओर एक ही दिन-शुक्रवार को लिंकन की मृत्यु के बाद उनका पद सम्हाला उपराष्ट्रपति जान्सन ने जो दक्षिण अमेरिका के थे, कैनेडी की मृत्यु के बाद भी इस जिम्मेदारी को सम्हालने वाले उपराष्ट्रपति का नाम भी जान्सन ही था।

लिंकन की धर्मपत्नी बहुत फैशन प्रिय ओर फिजूल खर्च करने वाली थी कैनेडी की पत्नी भी विलासिता प्रिय थी। लिंकन के प्राणों की सर्वाधिक चिन्ता कैनेडी नामक अधिकारी को रहती थी ओर कैनेडी की सुरक्षा के लिए उनका निजी सचिव लिंकन सर्वाधिक सतर्क रहता था।

इसके अतिरिक्त अमेरिका के हर पाँचवें चुनाव में चुना जाने वाला राष्ट्रपति अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है, यह भी एक विचित्र बात है। सन् 1840 से 1960 तक हर बीसवें साल चुनाव में जीते हुए राष्ट्रपति को अपना कार्यकाल पूरा किये बिना ही अकाल मृत्यु का पात्र बनना पड़ा है। 1840 का चुनाव विलियम हेनरी हैसिसन जीते थे जो पद ग्रहण करने के एक माह बाद ही निमोनिया से मर गए । 1860 में राष्ट्रपति चुने गए अब्राहम लिंकन की हत्या हो गई। 20 वर्ष बाद 1880 में जब गारफील्ड अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो कुछ ही महीनों बाद उन्हें भी मार डाला गया। 1900 में मैक्किनली अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे और वे अपना पद सम्हालने के छह महीने बाद ही हत्यारे की गोली का शिकार हुए। 1920 में राष्ट्रपति बने हार्डिग पद ग्रहण के ढाई वर्ष बाद ही काल कवलित हो गए। 1940 में वे चौथी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने फ्रेंकलिन रुजवेल्ट की भी एक महीने बाद अकाल मृत्यु हो गई। सन् 1960 में राष्ट्रपति पद का चुनाव कैनेडी ने जीता था, पर वे भी अपना कार्यकाल पुरा कहाँ कर पाए?

भारतीय इतिहास में प्रति नवें दसवें वर्ष महत्वपूर्ण घटनाएँ घटती रहीं। अधिक दूर न जाएँ , प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय से ही देखें तो प्रति नवें दसवें वर्ष यहाँ ऐतिहासिक परिवर्तन होते रहे हैं। पहला स्वतन्त्रता संग्राम 1857 में लड़ा गया दूसरे 9 वर्ष बाद 1866 में उड़ीसा में भयंकर दुर्भिक्ष जिसमें एक ही वर्ष के भीतर 10 लाख व्यक्ति मारे। यह दुर्भिक्ष लगातार फैलता गया और 68−69 तक राजपूताना तथा बुन्देलखण्ड तक पहुँच गया।

सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई। जिसने भारतीय संस्कृति को एक नई दिशा व नया आधार प्रदान किया तथा पराधीन राष्ट्र ने आत्म-गौरव की भावना उत्पन्न की। सन् 1884 में ए.ओ. ह्यूम ने देश की युवा शक्ति को ललकारते हुए ‘इण्डियन नेशनल यूनियन' के स्थापना की जो अगले वर्ष इण्डियन नेशनल काँग्रेस के रूप में विकसित हुई।

सन् 1892 में काँग्रेस अधिवेशन में पहली बार सरकार की कटु आलोचना की गई। इस अधिवेशन के अध्यक्ष गोपालकृष्ण गोखले थे। सन् 1902 में बंगाल के भीतर वह राजनीतिक चेतना जागृत हुई जिसे तोड़ने के लिए लार्ड कर्जन बंगला का कदम उठाया और उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि 1905 तक विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी के प्रचार का कार्यक्रम तीव्रगति से चल पड़ा। 1911 में क्रान्तिकारी गतिविधियाँ उग्रतर हो गई और अंग्रेजी शासन का तख्ता उलटने के लिए आवेगपूर्ण कदम उठाए जाने लगे।

सन् 1920 में कलकत्ता के विशेष काँग्रेस अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन की रूपरेखा बनाई गई और जोर-शोर से यह आन्दोलन आरम्भ किया। इसके 9 वर्ष बाद 1929 में काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वतन्त्रता का झण्डा फहराते हुए कहा, “काँग्रेस के संविधान की प्रथम धारा में स्वराज्य शब्द अभिप्राय पूर्ण स्वतन्त्रता से है।” सन् 1938 में बिहार संयुक्त प्रान्त और मद्रास आदि स्थानों पर व्यापक साम्प्रदायिक दंगे हुए। सन् 1947 में भारत को स्वतन्त्रता मिलने तथा देश-विभाजन होने की घटनाएँ तो सर्वविदित ही हैं।

इसके नौ वर्ष बाद 1956 में चीन सरकार ने पहली बार वह नक्शा प्रकाशित किया जिसमें भारत के सीमा क्षेत्रों को अपने देश का भूभाग बताया गया। यही सन् 62 की चीन भारत की लड़ाई के बीज पड़े। 1950 के नौ वर्ष बाद 1956 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया और 62 के बाद नौ वर्ष के अन्तराल से ही सन् 1971 में पुनः भारत पाक संघर्ष हुआ।

व्यक्तियों के जीवन क्रम में तो ऐसी कई संगतियाँ मिल जाएगी जिनसे सिद्ध होता है कि मनुष्य का जीवन क्रम और इतिहास किन्हीं गणितीय नियमों के आधार पर चलता है। इन नियमों को समझा जा सके तो इस तथ्य की पुष्टि में पर्याप्त आधार मिल जाते हैं कि सारा संसार एक नियम व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। व्यक्ति हो या समाज, देश या विश्व, ग्रह नक्षत्र हों या ब्रह्माण्ड न केवल मर्यादा नियमों का वरन् समय मर्यादाओं से भी बँधे हुए हैं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य भाग्य के हाथ की कठपुतली है, बल्कि उसे इस व्यवस्था को समझना चाहिए तथा उस व्यवस्था की नियामक सत्ता के निर्देशों आदेशों का पालन करना चाहिए।


मनुष्य की सर्वोपरि विशिष्टता दूरदर्शी विवेकशीलता

दैनिक जीवनचर्या में पहले निश्चय, पीछे काम की नीति अपनाई जाती है। किस खेत में क्या बोना है पहले यह निर्धारण किया जाता है बाद में उसकी क्रिया आरम्भ होती है। फैक्टरी किसकी लगानी? शिक्षा किस स्तर की पानी? यात्रा कहाँ की करनी? जैसे छोटे-छोटे प्रसंगों पर उपयोगिता अनुपयोगिता के पक्ष विपक्ष में आवश्यक चिन्तन मन्थन कर लिया जाता है इसके उपरान्त ही सरंजाम जुटाये कर लिया है इसके उपरान्त ही सरंजाम जुटाये ओर कदम उठाये जाते हैं। हाट बाज़ार में खरीद के लिए जाने वाले पहले लिस्ट बनाते हैं। समझदार आदमी आय-व्यय का बजट बनाते और अर्थ सन्तुलन बिठाते हैं। मूढ़ मति ओर बाल-बुद्धि लोगों के अतिरिक्त हर छोटे-बड़े कामों में पूर्व निर्धारण की नीति अपनाई जाती है। बी. गिसेलीन ने ‘दि क्रिएटिव प्राँसेस’ को इस यथार्थवादी दृष्टिकोण को महत्व देते हुए कहा हैं—

“भावुकता को कलात्मक संवेदना के रूप में तो सराहा जा सकता है, पर तथ्य तक पहुँचने और सम्बद्ध प्रसंग पर सही निर्णय करने में तो उसे एक अवरोध ही माना जाएगा । वस्तुस्थिति सदा वैसी ही नहीं होती जैसी कि घटना का तात्कालिक स्वरूप देखने से प्रतीत होती है। उसके पीछे ऐसे कारण भी हो सकते हैं जो दण्ड का भी औचित्य सिद्ध करें ओर उदार सहायता को भी अवांछनीय ठहराये। औचित्य एक बात हे और भावुकता दूसरी।”

भावुकों को तनिक से कष्ट में विचलित ओर तनिक से व्यवधान में चिन्तातुर होते देखा गया हैं। इस प्रकार की बाल-बुद्धि न तो सही निष्कर्ष पर पहुँचाती है ओर न समयानुरुप उपाय अपनाने में कोई सहायता देती है। सच तो यह है कि हड़बड़ी में ऐसे कदम उठ जाते हैं जो विपत्ति को ओर भी अधिक बढ़ा दें। शोकाकुल आवेशग्रस्त एवं आतुर लोभ लिप्सा से ग्रस्त व्यक्ति भावुकता के कारण अस्त-व्यस्त हुई मनःस्थिति में कुछ सोचते या करते हैं वह समस्या के समाधान में सहायक न होकर उसे उलटी और उलझा देते हैं।

वस्तुस्थिति को समझने-अवरोधों से निपटने तथा प्रगति के लिए पथ प्रशस्त करने में यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है। ऊँची उड़ाने उड़ाने की अपेक्षा यह देखना आवश्यक है कि आज की अपनी परिस्थिति, योग्यता कितना कुछ कर सकने में समर्थ हो सकती है। आज जो सम्भव है वही तथ्य है। भविष्य में जब जैसी स्थिति आये तब वैसा सोचने या उपाय बरतने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है। पर वर्तमान को तो तथ्यों के अनुरूप ही समझना चाहिए और इस समय जो कर सकना सम्भव है उतना ही कदम उठाना चाहिए और उतने में ही सन्तोष करना चाहिए। जो मनःस्थिति और परिस्थिति कास तालमेल नहीं बिठा पाते और विसंगतियों से भरे निर्णय करते हैं उन्हें भावोन्माद से ग्रसित समझा जाता है ऐसे लोग अवास्तविकता के चंगुल में फँसकर गलत सोचते गलत कदम उठाते ओर गलत परिणाम पर पहुँचते हैं।

प्रगतिशीलता का यथार्थवादिता से सघन सम्बन्ध हैं। वे दूसरों की सहायता पर अवलम्बित योजनाएँ नहीं बनाते वरन् अपनी स्थिति को समझकर आरम्भ उतना ही करते हैं जितना अपने बलबूते सम्भव है। आत्म-विश्वास बढ़ाया जाना चाहिए और क्षमता संवर्धन में कुछ उठा न रखना चाहिए ताकि अगले दिनों अधिक बड़े काम करना सम्भव हो सके, पर आज को तो यथार्थता के साथ ही जुड़ा रहने देना चाहिए। भावुकता के वशीभूत होकर ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जैसा कि अदूरदर्शी आवेशग्रस्त किया करते हैं।

भविष्य अनिश्चित और अविज्ञात हैं। उसे ईश्वर ने जान-बूझकर गोपनीय रखा हे ताकि प्रगति के लिए पुरुषार्थ करने का अवसर मिलता रहे।

निराशावादी एक ऐसा भविष्य वक्ता है जो तथ्यों और सम्भावनाओं से सर्वथा अपरिचित होते हुए भी ऐसे निष्कर्ष निकालता है जो न केवल अवास्तविक वरन् हानिकारक भी है।

अगला समय कैसा आने वाला है इसे कौन जानता है? बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी ऐसा दावा नहीं करते कि वह जो सोचते या करते हैं वे लाभदायक या सफल ही होकर रहेंगे। इतने पर भी वे प्रयत्नरत रहते हैं और भविष्य अनिश्चित होते हुए भी उज्ज्वल संभावनाओं की आशा लगाये रहते हैं। यह आशा ही उनका उत्साह एवं साहस बनाये रहने से समर्थ होती हैं। सफलता प्राप्त करने वालों ने अपनी मनःस्थिति को सदा ऐसी ही बनाये रखा है जिसमें उज्ज्वल भविष्य का सपना दीखता और विश्वास बढ़ता रहे।

निराशावादी भी एक अजीब प्राणी है जो पहले से ही असफलता की बात सोचता ओर अन्धकार भरे भविष्य का पूर्ण निर्धारण करना हे। ऐसा अनुमान उसने किस आधार पर लगाया यह ढूँढ़ निकालना कठिन हैं। हो सकता है कि कुछ कारण ऐसे भी हैं जो निराश जैसी झलक दिखाते हो पर उसके अतिरिक्त ऐसे कारण या आधार भी तो हो सकते हैं जो दूसरे प्रकार के परिणाम उत्पन्न करे और अप्रत्याशित सफलताओं के अवसर ला खड़े करें। जब सपना ही गढ़ना है तो निराश का क्यों गढ़े? जब अनिश्चित को ही निश्चित मानना हो, विपत्ति की सम्भावना क्यों मान बैठा जाय? सम्पत्ति ओर सफलता की आशा लगाने में क्या हर्ज हैं।

अनिश्चित को भयावह मान बैठने में सबसे बड़ी हानि यह है कि दुर्दिन आने से पूर्व ही चिरकाल तक डरावनी मनःस्थिति का दुःख उठाते रहने और साहस गँवाते रहने की दुहरी हानि उठानी पड़ती है। जबकि आशावादी सपने देखने पर समय आने तक तक उत्साह भरी मनःस्थिति बनी रहती है और आशा भरी उमंगें अधिक पुरुषार्थ करने ओर अधिक सफलता पाने का आधार बनाती रहती है।

कितनी ही बार संभावनाएँ अप्रत्याशित रूप से उल्टी देखी गई हैं। निराशा की बात सोचने वाले भी कई बार चमत्कारी अवसर प्राप्त करते ओर उन्हें दैवी अनुग्रह या भाग्य का चमत्कार कहकर मोद मनाते देख गये है। ऐसी दशा में निराशा भरी मान्यताएँ बना लेना एक प्रकार से ऐसा दुस्साहस है जो विधाता से प्रतिद्वंद्विता करता है। जब विधाता ने भी अपने भाग्य का निर्माण स्वतः करने की छूट मनुष्य को दे रखी है तो फिर ऐसा भविष्य वक्ता बनाने से क्या लाभ जिसका सृजन उत्पादन मात्र भयावह ही भयावह होता रहता है।

आर.डैवी ने “डैपलपमेन्ट आफ ह्यूमन विहेवियर” में लिखा है-जब व्यक्ति सामाजिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगता है और अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करता है तब उसकी सामाजिक अभिरुचियों का समुचित विकास होता है। उसमें सामाजिक भावना पैदा होती है, वह अपने साथियों के प्रति सहानुभूति रखता है और उसकी सामाजिक चेतना जागृत हो जाती है। व्यक्ति में सामाजिक अभिरुचि जन्मजात होती है। जिस प्रकार व्यक्ति श्रेष्ठता एवं पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है उसी प्रकार वह अपनी जीवन शैली को विकसित करने के लिए अपनी सुषुप्त सामाजिक अभिरुचियों को जागृत करता है। सामाजिक अभिरुचियों को जागरूक एवं सक्रिय बनाने के लिए यह आवश्यक हे कि व्यक्ति सामाजिक जीवन में भाग ले और यथाशक्ति सामाजिक कार्य में लगा रहे। सामाजिकता सम्बन्धी सभी गुणों के बीज व्यक्ति में निहित होते हैं। वे अनुकूल पर्यावरण पाकर प्रस्फुटित हो उठते हैं।”

आर.डेवी. ने अपने ग्रन्थ ‘डेवलपमेन्ट आफ ह्यूमन विहेवियर’ में विकास को आत्म विस्तार के रूप में प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं-सुपर व्यक्तित्व के प्रेरणा केन्द्र सामूहिक चेतना के पूर्ण विकसित स्वरूप को ‘ग्राहम्’ सामाजिक वृत्ति [सोशल सेन्स] कहते हैं। उनका कहना है कि जिस भी समाज में यह ‘सोशल सेन्स’ जितना अधिक विकसित होगा, वहाँ के व्यक्ति उतने ही श्रेष्ठ एवं महानता से युक्त होंगे। अनेकानेक मानवी समस्याओं को सुलझाने एवं मनुष्य को देवोपम बनाने के लिए इस ‘सामाजिक वृत्ति ‘ का होना परमावश्यक है।”

“उत्कृष्ट व्यक्तित्व उसे कहते हैं जिसमें व्यक्ति की सम्पूर्ण निहित शक्तियों का सर्वांगीण विकास हो चुका हो। स्पष्ट है इन शक्ति यों के विकास में मानव की शक्ति लालसा एवं सामूहिक चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति आवश्यक है। दोनों के सामंजस्य से बना हुआ व्यक्ति त्व ही श्रेष्ठ कहा जाता है।

विकास का एक अर्थ विस्तार भी है। नैतिक क्षेत्र में तो यही व्याख्या अधिक उपयुक्त पड़ती है। सीमित ‘स्व’ ही वस्तुतः तुच्छ है। विकसित वर्ग में उसे हेय समझा जाता है। बौने अपनी बिरादरी में भले ही बढ़-चढ़कर बातें करें। तगड़े पहलवानों के समीप जाकर कुचले और उपहास के भाजन पायें जायेंगे। जीवन क्रम में क्षुद्रता वह है जिसमें व्यक्ति अपने निजी लाभ की ही बात सोचता है और स्वार्थपरता की दुनिया में ही खोया रहता है। विकसित व्यक्ति तत्वों का ‘स्व’ अन्य जनों को भी अपनी परिधि में लपेट लेता है और अपने सुख-दुःख की तरह ही दूसरों की प्रगति अवगति में भी प्रसन्नता खिन्नता की अनुभूति करने लगता है। ऐसा व्यक्ति समूह को अपना ही अंग विस्तार परिवार मानकर उनका पिछड़ापन दूर करने के लिए भी वैसा ही प्रयास करता है जैसा कि अपनी दरिद्रता, रुग्णता अथवा कठिनाई के निवारण में किया जाता है।

यह सामूहिक चेतना बढ़ते-बढ़ते विश्व परिवार के रूप में विकसित होती है और मनुष्य सब को अपना— अपने को सबका— मानने लगता है। जहाँ भी यह प्रवृति पनप रही होगी वहाँ सहज ऐसे सद्गुणों— ऐसे सत्प्रयोजनों का बाहुल्य पाया जाएगा जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में विकासवान बनाते हैं।

सुप्रसिद्ध यूनानी महात्मा सुकरात ने कहा है-ज्ञान ही सद्गुण है।” उनके अनुसार व्यक्ति बुराइयों एवं व्यसनों में इसलिए पड़ जाता है कि उसे जानकारी नहीं होनी— और अन्य विकल्प नहीं सूझ पड़ते जिनसे वह शुभ आचरण की ओर प्रवृत्त हो। यदि व्यक्तियों को बचपन से ही नैतिक कर्तव्यों के प्रति सुशिक्षित किया जाय, उन्हें आध्यात्मिकता के विचारों का पोषण मिले तो वे कुमार्ग पर कदापि कदम न बढ़ायें।

महात्मा सुकरात की दिनचर्या इस प्रकार की थी कि वे सदैव उत्कृष्ट विचारों में ही निमग्न रहते। यूनान के अनेकों नवयुवकों से घिरे रहते उनका पथ-प्रदर्शन किया करते थे। रास्ते में चलते-फिरते भी वे उनसे गम्भीर चर्चा करते एवं जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव व प्रेरणा देते रहते । सुकरात का जीवन क्रम उनके सिद्धान्तों के अनुरूप ही था। अनेक विचारशील युवकों ने उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होकर अपना अर्थ प्रधान दृष्टिकोण बदल डाला उनमें प्लेटो [अफलातून] महाशय का नाम प्रमुख है।

अन्य विवेकवानों ने भी मनुष्य के भले-बुरे कार्यों के लिए ‘ज्ञान’ को एक प्रमुख कारक माना है। अपनी जानकारी के अनुसार ही मनुष्य क्रियाओं में प्रवृत्त होता है। जिसके बारे में ज्ञान नहीं होता उसके सम्बन्ध में तो साधारण मनुष्य कल्पना कर सकने में तक अपने को अक्षम पाता है। इन्द्रियजन्य सुखों के अतिरिक्त उसकी न जानकारी होती है न अधिक जानने की उत्सुकता होती है। व्यक्ति को जब इन्द्रियजन्य भोगों के मिथ्यात्व का ज्ञान हो जाता है तो वह उनकी ओर नहीं दौड़ता। ‘स्व’ का बोध होते ही मनुष्य नैतिक-आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त करने की चेष्टा प्रारम्भ कर देता है। उसे इसके लिए सर्वप्रथम ज्ञान-संवर्धन न करना होता है। मानव से महामानव बनने का एक सोपान ‘ज्ञान’ की अभिवृद्घि करना है।


भगन्द का फोड़ा (kahani)

पेट में भगन्द का फोड़ा हो गया। वैद्यों न सलाह दी कि आपको विश्राम करना चाहिए, पर जगद्गुरु शंकराचार्य ने उस घोर कष्ट में भी अपनी साधना, ज्ञानार्जन के तप और लोक सेवा के मार्ग को छोड़ा नहीं उन्होंने उसी अवस्था में उत्तर से दक्षिण पूर्ण से पश्चिम तक सारे भारत वर्ष में धर्म का प्रसार कर देश को एक साँस्कृतिक सूत्र में बाँधा। उनकी यह निष्ठा देखकर राजा मान्धाता ने उनको हर आवश्यक सहायता दी। 32 वर्ष की आयु में ही उन्होंने इतना काम कर दिखाया जो कोई पूरे दो जन्म में भी न कर पाता!


व्यक्ति तत्व विकास के कुछ नये पुराने तरीके

आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य की चेतना का महत्व तो समझा है पर उसे खोपड़ी में भरे हुए लिवलिबे पदार्थ तक सीमित माना है। ऐसी दशा में चेतना विकास के लिए उनके प्रयत्न इसी परिधि तक सीमित रहे हैं कि किस प्रकार इस क्षेत्र की हलचलों में हेर-फेर किया जा सके।

मस्तिष्कीय क्षमता को ही व्यक्तित्व का विकास समझने वाले वैज्ञानिकों ने इन दिनों इस संदर्भ में कई दृष्टियों से विचार किया और कई उपाय सोचे हैं। वे यह भी मानते हैं कि परिवार एवं समाज के वातावरण का मनुष्य के चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।

इसके अतिरिक्त उनका विशेष ध्यान इस बात पर है कि ‘ब्रेन वाशिंग‘ के कोई कारगर उपाय ढूँढ़ निकाले जाय । इस संदर्भ में कम्युनिस्ट देश सबसे आगे हैं। उन्होंने अपने विरोधियों का सफाया करके सिर दर्द से छुटकारा पाने के उपायों में अत्यधिक उत्साह दिखाया है, वहाँ हलका-फुल्का यह प्रयोग भी किया है कि प्रतिपक्षी मान्यता वालों पर ऐसे मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाएँ ताकि वे अपनी पूर्व मान्यता को छोड़कर नये निर्देशों को हृदयंगम करने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत हो जाय । इस प्रयास में समझाने-बुझाने अभीष्ट वातावरण में रहने, भय प्रताड़ना से आतंकित करने, विवशता को बोध कराने लालच दिखाने जैसे उपायों के सहारे असहमत को सहमत बनाने का प्रयत्न किया जाय। यही ‘ब्रेन वाशिंग‘ की प्रक्रिया है जो उन देशों में उत्साहपूर्वक चली और एक सीमा तक सफल भी हुई है। परिस्थितियाँ मनुष्य के स्वभाव, रुझान एवं निर्धारण को बदलने के लिए बाधित करती रही हैं।

परिस्थितियों से प्रभावित करने वाले तरीकों में लोक शिक्षण का एक सौम्य एवं सर्वविदित तरीका है। शिक्षा में स्कूली पाठ्यक्रम के साथ जुड़ी हुई दिशाधारा तो प्रमुख है ही। इसके अतिरिक्त सर्वसाधारण द्वारा पढ़ा जाने वाला साहित्य भी ऐसा है जो यदि उद्देश्यपूर्ण हो तो अपने पाठकों को प्रभावित किये बिना नहीं रहता । मनोरंजन एवं जानकारियाँ बढ़ाने के उद्देश्य से लिखा गया साहित्य हर दिशा में बहुत छपता और बहुत पढ़ा जाता है। समाचार पत्र और विचार प्रधान पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन विक्रय ऐ अच्छा खासा उद्योग है। कथा साहित्य एवं उपन्यास संसार भर में बहुत पढ़े जाते हैं। भिन्न-भिन्न विषयों की गम्भीर जानकारियाँ देने वाला समीक्षा प्रधान साहित्य भी विचारशील लोगों की बौद्धिक भूख बुझाता है। धर्म, अध्यात्म दर्शन, विवरण तथ्यों को लेकर कितने ही छोटे-बड़े ग्रन्थ छपते रहते हैं। संगीत अभिनय, नाटक आदि दृश्य एवं श्रव्य प्रधान साधन भी एक प्रकार से साहित्य की ही आवश्यकता पूर्ण करते हैं। रेडियो, टेलीविजन के सरकारी तन्त्र भी प्रकारान्तर से लोक मानस को प्रभावित करने की भूमिका निभाते हैं। साहित्यकार, कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, गायक, वक्ता मिलजुल कर लोकमानस का निर्माण ही करते हैं, यह दूसरी बात है कि विचारणा को प्रभावित करने वाली यह साहित्य शक्ति किस दिशा में प्रवाहित होती हैं और क्या परिणाम उत्पन्न करती है। हर हालत में उसकी बौद्धिक चेतना को प्रभावित करने वाली क्षमता को बिना किसी अनुनय के स्वीकार करना ही होगा।

आम तौर से यह साहित्य तन्त्र इन दिनों मात्र विनोद और जानकारी बढ़ाने भर के काम आता है। यदि इसे दिशाबद्ध किया जा सके तो लोक मानस को दिशा विशेष में ढालने के लिए भी कारगर उपाय की तरह काम आ सकता है। इसका प्रयोग कम्युनिस्ट देशों में तत्परतापूर्वक हुआ है। इस समूची ज्ञान क्षमता को उन्होंने निमन्त्रण से लेकर इस प्रकार ढाला है कि उसके परिपक्व और अपरिपक्व दोनों ही स्तर के लोग इस मान्यता को सर्वोपरि र्स्वय सत्य की तरह माने अपनाने के लिए अनायास ही बाधित होते चले जाय । रूस, चीन और उनके प्रभाव क्षेत्र वाले देशों में सामान्य नागरिकों की मानसिक स्थिति ऐसी ही है जिसे सम्मोहक ग्रस्त कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इससे पूर्व द्वितीय महायुद्ध से पूर्व ऐसी ही स्थिति जर्मनी, इटली आदि में तत्कालीन अधिनायकवादी शासन तन्त्र ने उत्पन्न की थी। नाज़ीवाद का पक्षधर लोक मानस बनाने में हिटलर, मुसोलिनी आदि ने अपने देशों के समूचे बौद्धिक तन्त्र को जुटा दिया था।

इन दिनों जन-तन्त्र के नाम पर मनुष्य क मौलिक अधिकारों को दुहाई देकर कुछ भी लिखा छापा जा रहा है और उससे जन साधारण की मानसिक स्थिति विचित्र एवं विकृत बनाई जा रही है। फिर भी वह आशा रखी जा सकती है कि यदि कभी मूर्धन्य लोगों न साहित्य और कला को अस्त-व्यस्त दिशाविहीन न होने देने का बात सोची और प्रयत्नपूर्वक उसे निकृष्टता के समर्थन से विरत बनाकर सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में लगाया तो निश्चय ही देव मानस ढालने, देवमानव निर्मित करने में आशा जनक सफलता मिलेगी।

नये युग की आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ व्यक्ति तप वाले जन समुदाय ढालने में मनीषियों का निश्चित मत है कि परिवारों की आचार-संहिता-कार्य पद्धति, विधि-व्यवस्था परम्परा एवं रीति-नीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने की आवश्यकता है। आज परिवारों क अपनाने, बढ़ाने एवं चलाने में बुरी तरह स्वेच्छाचार घुस पड़ा है। कुटुम्ब के निर्वाह साधन जुटाने और सदस्यों की फरमाइश पूरी करने में ही समय तथा साधन चुक जाते हैं जो उसे परिवार के बौद्धिक एवं चलाने में चारित्रिक विकास की असाधारण भूमिका निभा सकते थे। सभी जानते हैं कि परिवारों की प्रयोगशाला में ही गुण, कर्म स्वभाव का ढाँचा गढ़ा जाता है। उस तन्त्र को उद्देश्य पूर्ण आदर्श समर्थक बनाकर ही यह आशा की जा सकती है कि विश्व के समुदाय को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर किया जा सकेगा।

मनुष्य को अधिक समर्थ, समुन्नत बनाने के टेड़े-तिरछे एवं शार्टकट उपास ढूँढ़ने वालों न रसायनों का प्रयोग करने तथा विद्युत प्रवाहों से प्रभावित करने के तरीके ढूँढ़े हैं और उन्हें छोटे जानवरों पर प्रयोग करके यह पाया है कि यह प्रयोग मनुष्यों की अभीष्ट स्तर का बनाने में भी कारगर ही सकते हैं।

उदाहरणार्थ अठारहवीं शताब्दी के अन्त में पेनफील्ड ने ‘ब्रेन सेर्ण्टस’ को जानने के लिये जो प्रयोग आरम्भ किये, उनकी शृंखला अभी चल ही रही है। मस्तिष्कीय विज्ञानी कहते हैं कि स्थूल मस्तिष्क के दो भाग होते हैं− एक पुराना एनीमल ब्रेन( पाशविक संचित कुसंस्कारों एवं अन्तः प्रवृत्तियों से युक्त ) एवं दूसरा ऊँचे स्तर का नया मस्तिष्क जो मात्र मनुष्यों को ही मिला है स्त्र पहले में दर्द, भय, भूख, यौन-इच्छा थकान, आक्रमण आदि के केन्द्र होते हैं जो मुख्यतः जीवन को बनाये रखने एवं नस्ल को जीवित रखने के लिए जरूरी है। जो दूसरा नया मस्तिष्क है उसमें और भी अधिक विकसित प्रिफष्टल लोब होते हैं जिनका कार्यक्षेत्र विशुद्धतः बौद्धिक है। तर्क बुद्धि, सिविक सेन्स, आपसी व्यवहार, योजनाबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण आदि यही निश्चित किये जाते हैं। भावनात्मक आवेगों पर नियंत्रण यहीं से होता है।

उदाहरणार्थ प्रयोगशाला में विद्युतीय इलेक्ट्रोडों के माध्यम से बिल्ली की मानसिक स्थिति ऐसी बना दी गई कि वह चूहे पर आक्रमण का स्वभाव भूलकर उनसे डरने लगी। खरगोश और शेर की कुश्ती करा दी गई तो शेर दुम दबाकर एक कोने में जा बैठा और खरगोश ने इस प्रकार हमला बोला मानों उसे अपनी बहादुरी जीत का पूरा पक्का विश्वास हो। आमतौर से पशु अपने सजातियों से ही यौन सम्बन्ध स्थापित करते हैं, पर इलेक्ट्रोडों से प्रभावित जीवों ने अन्य जाति वालों के साथ यौन सम्बन्ध स्वीकारने में उत्साह दिखाया। इसी प्रकार वे अपने अभ्यस्त आहार को छोड़कर अन्य प्रकार का आहार अपनाने लगे। अधिक नींद लाने या बिना सोये ही बहुत समय तक स्वेच्छापूर्वक कार्यरत रहने में भी सफलता मिल गई।

विद्युतीय उपचारों के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के प्रयोग भी पिछले दिनों चलते रहे हैं। इनमें से एक है प्राण प्रहार-हिप्नोटिज्म दूसरा है रासायनिक उपचार। मस्तिष्क को एक सीमा तक इन दोनों साधनों से प्रभावित करने में सफलता बहुत दिनों से मिलती आ रही है। अब उन साधनों को नये ढंग से नये प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने की बात सोची गई है। हिप्नोटिज्म से प्रभावित व्यक्ति अपनी स्वाभाविक मनःस्थिति को भूल जाते और प्रयोक्ता के सन्देशों को शिरोधार्य करते हुए वैसा ही सोचते, वैसा ही करते हैं। शराब, भाँग, गाँजा, अफीम आदि का नशा करने के बाद मस्तिष्क की स्थिति असामान्य हो जाती है और मनुष्य कुछ का कुछ कहने करने लगता है। अपने ऊपर से अपना नियन्त्रण हट जाने और रसायनों का प्रभाव प्रमुख बनने की बात को यदि अचेतन के परिवर्तन में प्रयुक्त किया जाय तो सफलता कहाँ तक मिल सकती है, इसकी जाँच-पड़ताल इन दिनों चल रही है।

जड़ी-बूटियों के प्रभाव से वृद्धावस्था को नव यौवन में बदल देने की प्रक्रिया प्राचीन काल में काया-कल्प के नाम से प्रयुक्त होती थी। वयोवृद्ध च्यवन ऋषि की अश्विनी कुमारों ने ऐसे ही प्रयोग के आधार पर नवयौवन प्रदान करने की कथा है। ययाति को उसके पुत्र का प्रत्यारोपण करके जराजीर्ण स्थिति से नव यौवन दिया क्या था। अमृत के संबन्ध में ऐसी ही मान्यता है। चिकित्सक अपनी औषधियों के सम्बन्ध में ऐसे ही दावे करते रहते हैं। शोध का यह भी एक विषय है कि काया सचेतन की तरह अचेतन को प्रभावित करने का भी कोई रासायनिक उपचार खोजा जाय। ब्राह्मी, सर्पगंधा, शंखपुष्पी जैसी बूटियों का मस्तिष्कीय उपचार में अभी कारगर प्रयोग होता है। इस दिशा में अभी और आगे बढ़ने की गुँजाइश है।

रसायनों के प्रभाव से मस्तिष्क को उत्तेजित अति सामर्थ्यवान एवं दब्बू, भयभीत भी बनाया जा सकता है। इन रसायनों में सिरोटोनिक, नार एड्रिनेलिन एवं डोपमीन प्रमुख हैं। मस्तिष्कीय जैवरासायनिक प्रतिक्रियाओं में इनकी प्रमुख भूमिका है। पिछले दिनों केलिफोर्निया के डा. स्नाइडर ने एनकेफेलिन नामक रस स्रावों की मस्तिष्क में उपस्थिति बतायी है। इन्हें कृत्रिम विधि (ओषधियाँ, हिप्नोसिस, बायोफीड बैक, इलेक्ट्रोड उत्तेजन) से प्रभावित कर व्यक्ति को मानसिक दृष्टि से अति सामर्थ्यवान बनाया जा सकना सम्भव है।

मानवी चेतना को प्रभावित करने वाले उपरोक्त उपचारों में से कुछ पुराने और कुछ नये हैं। इनका प्रयोग चलता रहा है और चलेगा किन्तु परिणामों को देखते हुए इतना ही निष्कर्ष निकलता है और इतना ही विश्वास होता है कि थोपे गये उपचार कुछ समय तक अपना प्रभाव दिखा कर अन्धड़ चक्रवातों की तरह अपनी जादुई कारगुजारी समाप्त करके विस्मृति के गर्त में चले जाते हैं। पानी के बबूले का आयुष्य ही कितना होता है। चिरस्थायी उपाय उपचार ढूँढ़ने हों तो मानवी सत्ता के आधारभूत केन्द्र स्थल अन्तःकरण की गहराई तक प्रवेश करके वहाँ कुछ उथल-पुथल उत्पन्न करने का चिरस्थायी प्रयास करना होगा। इसके लिए ब्रह्म विद्या पर आधारित तत्व दर्शन को हृदयंगम करके और तप साधना की सहायता से संचित संस्कारों को उखाड़ने ढालने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।


Quotation

नास्ति ध्यानं बिना ज्ञानं नास्ति ध्यानमयोगिनः। ध्या नं ज्ञानञ्च यस्यास्ति तीर्ण स्तेन भवार्णवः॥

ज्ञानं प्रसन्नमेकाग्रमशेषोपाधिवर्जितम्। योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिंनस्त्वेव सिद्धयति-महायोग विज्ञान

ध्यान बिना ज्ञान नहीं होता। न ध्यान बिना योग सधता है। ध्यान और ज्ञान दोनों के सहारे भवसागर पार किया जाता है। ज्ञान और एकाग्रता से उपाधि वर्जित मन प्रसन्न रहता है और योग साधना से सिद्धि मिलती है।


सूर्य की सामर्थ्य समझें और लाभ उठाये

सूर्य देखने में सुदूर आकाश में अवस्थिति एक ऐसा ग्रह पिण्ड दिखाई पड़ता है जिससे दिन के समय गर्मी और रोशनी प्राप्त होता है कि धरती का सारा वैभव हो-सूर्य का अनुदान है और उसी की अनुकम्पा से वनस्पतियों तथा प्राणियों का जीवन क्रम चल रहा है।

देखने में थाली के बराबर आकार का यह अपना सूर्य इतना विशाल और इतनी अनन्त शक्ति का भाण्डागार हो सकता है-इस पर सहसा विश्वास नहीं होता। फिर भी वास्तविकता तो अपने स्थान पर रहेगी ही। जिस सूर्य के सहारे हमारी धरती का सारा जीवन क्रम चल रहा है उसका स्वरूप समझते समझाते मस्तिष्क चकराने लगता है।

आकाश के विभिन्न पिण्डों में सूर्य का अपना अलग ही अस्तित्व है। चन्द्रमा तारे यदि मिट भी जाय तो हमारे लिए कोई विशेष खतरे की बात नहीं है। पर सूर्य का एक घण्टे के लिए भी अलग रहना प्राण संकट उत्पन्न कर सकता है। सूर्य हमारे लिए कितना उपयोगी है इसका हम अनुमान इस आधार पर लगा सकते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि यदि आज सूर्य मिट जाये तो तीन दिन के भीतर ही पृथ्वी के चर-अचर सभी जीवों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। तथा सूर्य के समाप्त होने के दो दिन के भीतर ही वायुमण्डल की कुल जल वाष्प ठण्डी होकर पानी या बर्फ के यप में गिर पड़ेगी। उस बर्फ की भीषण सर्दी से कोई प्राणी बच न सकेगा।

सूर्य की प्रचण्ड शक्ति को प्राचीन काल में दैवी शक्ति मानकर अपनी उपासना का एक महत्वपूर्ण अंग समझा जाता था। सूर्य की हर गतिविधियों को एक दैवी व्यवस्था के रूप में ही प्रतिपादित किया गया। उसका नियत समय दिशा में ही उदय होना तथा अस्त होना, ऋतु परिवर्तन की निर्धारित प्रक्रिया आदि का रहस्य हजारों वर्षों तक लोगों के दिमाग में ठीक-ठीक नहीं बैठ पाया था। हमारे पूर्वज इन सारी प्रक्रियाओं को एक दैवी अनुग्रह मानते थे और यह प्रतिपादन देते थे कि नित्य एक नया सूर्य उदय होता है तथा सायं को वह समुद्र में समा जाता है। कालान्तर में ज्यों-ज्यों आदमी का बुद्धि विकास हुआ त्यों-त्यों यह तथ्य सामने आया कि सूर्य एक ग्रह है और उसकी क्षमता अन्य सभी ग्रहों से सर्वोपरि है। अब आधुनिक विज्ञान ने तो सूर्य के विषय में ढेरों जानकारियाँ हासिल कर लीं है।

वैज्ञानिकों ने पता लगाया हे कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी सवा नौ करोड़ मील है। इस दूरी का अनुमान हम इस आधार पर लगा सकते हैं कि यदि एक आदमी बैठकर 200 अंक तक प्रति मिनट की रफ्तार से गिनती गिने तो सवा नौ करोड़ गिनने में उसे ग्यारह महीने लगेंगे। शर्त यह है कि वह अन्य कोई काम न करे, न सोए, न खाये, न पिये, दिन रात गिनता ही रहे।

एक अन्य वैज्ञानिक ने इस दूरी की कल्पना इस प्रकार की है कि यदि हमारे हाथ इतने लम्बे हो जाय कि हम सूर्य को छू सकें और सूर्य की गर्मी हमारी अंगुलियों पर लगते ही अपने स्नायु तन्तुओं को उसकी सूचना मस्तिष्क तक उसी रफ्तार से पहुँचानी पड़े जिस रफ्तार से वे पहुँचाते हैं तो इस कार्य में कुल 160 वर्ष का समय लगेगा। अर्थात् 160 वर्ष बाद अंगुली जलने की सूचना मस्तिष्क को मिल सकेगी। इसी प्रकार वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सूर्य पर कोई घोर शब्द हो और वह ध्वनि उसी वेग से चले जिस वेग से धरती पर चलती है तो उसे पृथ्वी तक आने में 14 वर्ष लगेंगे।

सूर्य का डील भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं है। इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों ने कुछ महत्वपूर्ण आँकड़े इकट्ठे किये हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का 109 गुना है और इसलिए उसका घन फल पृथ्वी की अपेक्षा 109&109&109 गुना है। तेरह लाख पृथ्वियों को एक में मिला दिया जाय तब कहीं सूर्य के बराबर गोला बन सकेगा। पर सूर्य की घनता पृथ्वी से बहुत कम है। यदि पृथ्वी की ही नाप का पानी का गोला लें तो पृथ्वी उससे साढ़े पाँच गुना भारी होगी। जबकि सूर्य अपनी घनता के बराबर पानी के गोले से मात्र सवा गुना भारी है।

सूर्य कितना गर्म है यह अनुमान लगाना कल्पना से परे है। फिर भी वैज्ञानिकों ने जो जानकारियाँ हासिल की हैं उस आधार पर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि पृथ्वी के दो वर्ग गज जमीन पर सूर्य की जितनी ऊर्जा आती है उसकी शक्ति एक ‘अश्व शक्ति ‘ के बराबर होती है। इस ऊर्जा को यदि उपयोग में लाने का कोई सुगम तरीका हाथ लग सके तो इंजन केवल सौर ऊर्जा से ही चलाये जा सकते हैं।

इन्हीं बातों के आधार पर वैज्ञानिकों ने बताया है कि सूर्य का ताप 60000 से.ग्रे. होगा। 100 से 0ग्रे. पर पानी खौलने लगता है। 3000 से. ग्रे. तक ताप मानव निर्मित विद्युत मशीनें पैदा कर सकती हैं।

गणना से पता चलता है कि सूर्य की सतह के प्रत्येक वर्ग इंच से 54 अश्व बल की शक्ति निकलती है। अँगूठी के नग के बराबर सूर्य की सतह से लगभग 3 अरब बल की शक्ति रात दिन बराबर निकला करती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 300000 मोमबत्ती की रोशनी सूर्य के प्रत्येक वर्ग इंच से बराबर निकलती रहती है। पर हम सूर्य की आकर्षण शक्ति का अनुमान लगा सकते हैं।

माउण्ट विल्सन वेधशालाऐं के शोध कर्ताओं ने कहा है कि सूर्य के पृष्ठ भाग पर उसकी आकर्षण शक्ति पृथ्वी के पृष्ठ भाग की वर्तमान आकर्षण शक्ति की अपेक्षा 28 गुनी अधिक है। इस प्रकार जो पत्थर पृथ्वी पर 1 सेर का जान पड़ता है वह सूर्य पर 28 सेर का होगा। 32 उपग्रहों को लेकर आकाश में स्थित मंदाकिनी निहारिका में निरन्तर गतिशील है। सूर्य मन्दाकिनी विश्व के केन्द्र से 30 हजार प्रकाश वर्ष दूर। 108000 कि. मी. प्रति घण्टा वेग से सूर्य अपने सौर मण्डल को लेकर मन्दाकिनी विश्व का परिभ्रमण करता है। इसका एक चक्कर काटने में सूर्य को 22 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। सूर्य की आयु यदि 7 अरब वर्ष मानी जाये तो अपने जन्म के बाद सूर्य ने मन्दाकिनी विश्व के 30 चक्कर काटे माने जायेंगे। मन्दाकिनी विश्व का व्यास 1 लाख प्रकाश वर्ष है। इसका मध्य भाग मोटाई लिये हुए है। इसके मध्यभाग की मोटाई 15 हजार प्रकाश वर्ष हैं । सूर्य जैसे 100 अरब तारे मन्दाकिनी विश्व में विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त इतने ही तारे बन सके इतने ‘तारा बादल’ [रन्टेलर मास ] है।

बुध सूर्य से सबसे नजदीक का ग्रह है। सूर्य से इसकी दूरी 5 करोड़ 79 लाख कि. मी. है। सूर्य की परिक्रमा 88 दिन में करता है। इसके बाद शुक्र जो 10 करोड़ 82 लाख कि.मी. सूर्य से दूर है। जिसे सूर्य परिक्रमा में 225 दिन लगते हैं। पृथ्वी की दूरी 14 करोड़ 96 लाख कि.मी. है। एक परिक्रमा 365 दिन में होती है। पृथ्वी के बाद मंगल है जिसकी दूरी 22 करोड़ 79 लाख कि.मी. है परिभ्रमण में 687 दिन लगते हैं। इसके बाद गुरु है जो 77 करोड़ 83 लाख कि. मी. दूर है जिसका एक वर्ष 4 हजार 333 दिन का है। शनि की दूरी 142 करोड़ 70 लाख कि.मी. है परिभ्रमण 10 हजार 759 दिन में करता है। शनि के बाद यूरेनस (यम) है। जिसकी दूरी 286 करोड़ 96 लाख कि.मी. है। 60 हजार 160 दिन में एक परिभ्रमण करता है। सबसे दूर प्लेटो है इसकी दूरी 490 करोड़ 2 लाख कि. मी है। परिभ्रमण वर्ष 90470 दिन का है।

बुध और शुक्र के उपग्रह नहीं है। जैसे चन्द्र में कलाएँ होती हैं वैसे बुध और शुक्र में भी कलाएँ हैं। इनके वर्ष और दिन एक बराबर होते हैं क्योंकि ये दोनों अपनी धुरी पर नहीं घूमते। पृथ्वी का एक उपग्रह है जिसे चन्द्र कहते हैं। मंगल के दो, गुरु के 14, शनि के 9, यूरेनस के 4, नेप्च्यून के 2 उपग्रह हैं। इसके अतिरिक्त 200 से अधिक छोटे उपग्रह पाये गये हैं। जिनका व्यास 1 से लेकर हजार कि.मी. तक है।

सविता देवता की महा महिमा को यदि समझा जा सके तो हम सूर्य सान्निध्य से उसकी महान सामर्थ्य का भौतिक और आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए असाधारण लाभ उठा सकते हैं और प्रस्तुत कठिनाइयों में से असंख्यों से अनायास ही बच सकते हैं।


रोगोपचार में ज्योतिर्विज्ञान का योगदान

प्राचीन काल में ज्योतिर्विज्ञान का प्रयोग विविध प्रयोजनों के लिए किया जाता था। आज जैसे भौतिक विज्ञान का विकास न होते हुए भी वह इतना सक्षम था कि उसका अवलम्बन लेकर कितने ही महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किए जाते थे। अंतर्दृष्टि ऋषि इस तथ्य से भली-भाँति अवगत थे कि पृथ्वी पर सम्पदाओं का एक बड़ा भाग दूसरे ग्रहों एवं नक्षत्रों से प्राप्त होता है कब, किस प्रकार के अनुदान उनसे पृथ्वी पर बरसते हैं इससे वे भली प्रकार परिचित थे। उसी के अनुरूप वर्तमान और भावी गतिविधियों का निर्धारण किया जाता था वे जानते थे कि एकाकी मानवी पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है। पुरुषार्थ के साथ परिस्थितियाँ अनुकूल हों तभी सफलता मिलती है।

अन्तर्ग्रही हेर-फेर से पृथ्वी के वातावरण, मनुष्य, जीव-जन्तु एवं वृक्ष-वनस्पतियों का क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी जानकारी होने से तदनुरूप सुरक्षा-व्यवस्था बनाने और दैनन्दिन क्रिया-कलापों में आवश्यक परिवर्तन की बात सोची जाती थी। ग्रहों की गति एवं स्थिति नक्षत्रों के योग का कब और किस प्रकार का प्रभाव पृथ्वी के मौसम पर पड़ेगा, इस जानकारी के आधार पर ही निश्चित प्रकार के बीज बोने का निर्धारण किया जाता था।

ज्योतिर्विज्ञान का सर्वाधिक योगदान था-मानवी स्वास्थ्य सन्तुलन में। आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली किसी समय में हर तरह की बीमारियों के उपचार में सक्षम थी। आज जैसे ‘असाध्य’ नाम के कोई रोग नहीं थे। न केवल रोग निवारण और स्वास्थ्य संवर्द्धन वरन् वृद्धावस्था में भी यौवन प्राप्त करने के कायाकल्प जैसे उपचारों का उल्लेख आयुर्वेद में मिलता है। कितने ही व्यक्ति यों के प्रमाण भी मिलते हैं जिन्होंने काया-कल्प के माध्यम से युवकों जैसी शक्ति पायी। आयुर्वेद की चिकित्सा प्रणाली, निदान, उपचार की विधियाँ आज भी प्रचलित हैं। सम्बन्धित महत्वपूर्ण ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं, पर कायाकल्प और असाध्य रोगों का उपचार तो दूर रहा सामान्य रोगों के उन्मूलन में भी सफलता नहीं मिल पाती।

रोगोपचार की वनस्पतियाँ भी अविज्ञात और अनुपलब्ध नहीं है। न ही इस विषय पर ग्रन्थों का अभाव है। फिर क्या कारण है कि रोगोपचार में आशातीत सफलता न ही मिल पाती। गहराई से अध्ययन करने पर एक ही तथ्य उभर कर सामने आता है कि आयुर्वेद शास्त्र के साथ ज्योतिर्विज्ञान घुला मिला था। आयुर्वेद की सफलता का श्रेय वस्तुतः ज्योति विद्या को ही था। जो कालान्तर में विलुप्त होती गई। फलस्वरूप यह चिकित्सा प्रणाली उतनी सक्षम न रही जितनी कि प्राचीन काल में थी।

आयुर्वेद के मूर्धन्य विद्वानों में चरक, सुश्रुत बाणभट्ट का नाम आता है। ये सभी न केवल चिकित्सा शास्त्र के वरन् ज्योतिर्विज्ञान के भी मर्मज्ञ थे, किम्वदन्ती है कि ‘चरक’ वनस्पतियों के संग्रह के लिए वनों एवं पहाड़ों पर जाते थे तो जड़ी-बूटियाँ स्वतः अपनी विशेषताओं और गुणों की बता देती थीं। साथ ही उन्हें किस वातावरण में और कब लगाने से क्या विशेषताएँ पैदा होती है और किस तरह के मनोभूमि एवं रोग वाले व्यक्ति को लाभ पहुँचाती हैं, की जानकारी भी दे देती थीं। कथानक की सत्यता और असत्यता पर न जाकर सन्निहित तथ्यों पर ध्यान दें तो पता चलता है-रोग निवारण में मात्र औषधि का ही योगदान नहीं होता। उसे किस वातावरण में कब और किन ग्रह-नक्षत्रों के योग की स्थिति में उगायें जाने से क्या प्रभाव पड़ता है, यह जानना भी आवश्यक है। उपचार की सफलता इस तथ्य के ऊपर ही निर्भर करती है।

मानवी स्वास्थ्य अन्तर्ग्रही गतिविधियों एवं है। रोगों की उत्पत्ति और उपचार में शारीरिक और मानसिक स्थिति में अन्तर्ग्रही परिस्थितियों का भी योगदान होता है, अब यह विश्व के मूर्धन्य चिकित्सा शास्त्री अनुभव करने लगे हैं। डा. एडसन ने अपने अनेकों प्रयोगों के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला है कि रक्त स्राव की 82 प्रतिशत घटनाएँ चाँद के प्रथम और तीसरे सप्ताहों में घटित होती हैं। ‘प्रो. रिविस्ज’ का मत है कि मानव शरीर में विद्युतीय शक्ति की अधिकता पूर्णमासी की चौदहवीं रात को होती है। ये विद्युतीय परिवर्तन की चौदहवीं रात को होती है। ये विद्युतीय परिवर्तन मनुष्य की मनःस्थिति और स्वभाव को विक्षुब्ध बनाते हैं। डा. ‘वेकर’ के अनुसार मानसिक विक्षिप्तता के कारण इन्हीं दिनों अपराध की घटनाओं में भी वृद्धि होती है।

स्वीडन के प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री सावन्ते आर. हैन्थस ने अपनी खोजों के आधार पर घोषणा की है कि स्त्रियों में मासिक धर्म चन्द मास की विशेष तिथियों में ही प्रकट होता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ औगिनो और नोस का कहना है कि गर्भाधान के लिए सर्वश्रेष्ठ समय-समय मासिक धर्म के क्रमशः चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ दिन अधिक उपयुक्त होता है।

जिन रहस्यों का उद्घाटन आज के चिकित्सा शास्त्री कर रहे हैं, उससे भारतीय ज्योतिर्विद् बहुत पहले ही परिचित थे। जातक पारिजात नामक ज्योतिष ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है कि मासिक धर्म के आरम्भ के बाद चौदहवीं, पन्द्रहवीं और सोलहवीं रातों में गर्भाधान की सम्भावना सर्वाधिक रहती है। ‘आचार्य वाराह मिहिर’ का एक सूत्र इस प्रकार है—

कुजेन्दुहेतुः प्रतिमास मार्यवं। गतेतु पोऽर्षमनुष्ठा धी दितौ॥

अर्थात्-किसी भी स्त्री में मासिक धर्म उस समय आरम्भ होता है जब कि चन्द्रमा उसकी जन्म कुण्डली के एक निश्चित स्थान में प्रविष्ट करता है।

इस बात के अब पर्याप्त प्रमाण मिलने लगे हैं कि सौर कलंक के समय सूर्य के एक विशिष्ट प्रकार का रेडिएशन होता है जो भू चुम्बकीय क्षेत्र और पृथ्वी के वातावरण में असन्तुलन उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में विविध रोगों की उत्पत्ति होती है।

प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक ‘निकोलससिउज’ का मत है कि सूर्य कलंकों में वृद्धि होने से मानव रक्त में पाये जाने वाले रक्षात्मक श्वेत कणों में कमी आ जाती है। फलतः रुग्ण होने की सम्भावना बढ़ जाती है।”

प्राचीन ज्योतिर्विद्या में न केवल रोगों की उत्पत्ति के कारणों का वर्णन है वरन् निदान और उपचार पर भी प्रकाश डाला गया है। भैषिजीय ज्योतिर्विद्या में रोग निदान का विस्तृत उल्लेख किया है। उसमें मात्र औषधि उपचार का ही नहीं अन्तर्ग्रही परिवर्तनों के साथ खान, पान में किस तरह का हेर-फेर करना तथा उपवास एवं मन्त्र चिकित्सा का प्रयोग अपनाना चाहिए, का भी छुटपुट वर्णन मिलता है। ‘अरिष्ट योग‘ में बताया गया है।

कि रोगी की क्षय हुई शक्ति को और नष्ट हो गई कोशिकाओं को-मन्त्र चिकित्सा द्वारा पुनः प्राप्त कर सकता है।

ज्योतिर्विद्या के चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित विविध पक्षों को नये सिरे से अध्ययन पर्यवेक्षण की आवश्यकता है। रोगों की उत्पत्ति में प्रत्यक्ष स्थूल कारणों को महत्व दिया जाता और स्थूल उपचारों की बात सोची जाती है। अदृश्य किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ग्रह-नक्षत्रों के ज्ञान को भी चिकित्सा अनुसंधान की कड़ी में जोड़ा जा सके तो रोगों के कारण और निवारण के कितने ही चमत्कारी सूत्र हाथ लग सकते हैं, जिनसे अपरिचित बने रहने से रोगोपचार में चिकित्सक अपने को अक्षम पाते हैं। निदान और उपचार के ऐसे अनेकों रहस्य इस अनुसंधान प्रक्रिया से खुलने की सम्भावना है। परिवर्तनों से असाधारण रूप से प्रभावित होता है, इस तथ्य पर प्रकाश डालने वाले कितने ही सूत्रों का उल्लेख आयुर्वेद शास्त्र में मिलता है। ज्योतिष सूत्र के अनुसार ‘अष्टमी व्याधिनाथिनी” अर्थात् अष्टमी जो चन्द्रमा का आठवाँ दिन होता है सम्पूर्ण व्याधियों का अन्त करने वाला दिन है अर्थात् इस दिन जो भी औषधि ली जायेगी विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगी। अष्टमी को सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे 90 अंश पर स्थिति होते हैं इसलिए दोनों ही पृथ्वी के सभी द्रवों के प्रति अपना आकर्षण कम कर देते हैं। मानव शरीर में विद्यमान रक्त और जल में भी सूर्य और चन्द्र के अतिरिक्त आकर्षण कम हो जाने से इस अवधि में दी गई दवाएँ अधिक प्रभावकारी सिद्ध होती हैं।

“भैषजिक ज्योतिष के अनुसार अनेकों बीमारियाँ विशेषतः चर्मरोग, पागलपन, मिरगी, मानसिक, विक्षिप्तता शुक्ल पक्ष में उग्र होती हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र को इसकी कोई जानकारी नहीं है कि ऐसा क्यों होता है? ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शुक्ल पक्ष में सूर्य और चन्द्रमा आकाश में एक-दूसरे के अधिक निकट होते हैं। ये दोनों ही पृथ्वी के वायुमण्डल में सुव्याप्त गैस कणों को अधिक आकर्षित करते हैं। जिसका प्रभाव मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य के ऊपर पड़ता है। प्रायः ऐसा देखा गया है कि चतुर्दशी को जब सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से 160 औंस का कोण बनाते हैं-बीमारियाँ अधिक उग्र हो जाती हैं। भावनात्मक उद्वेग भी इन्हीं दिनों चरम बिन्दु पर होता है।

आयुर्वेद के प्रसिद्ध त्रिदोष सिद्धान्त भी अपने में ज्योतिषशास्त्र के कितने ही सूक्ष्म रहस्यों को समाहित किये हुए हैं। वात, पित्त और कफ़ का विश्लेषण करने पर महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगते हैं जिन्हें समझा जा सके तो अनेकों रोगों के उपचार में सहयोग मिल सकता है। ‘वात’ शब्द की उत्पत्ति व्युत्पत्ति ‘वा’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है-यति “वा गतिगंधन यो रिति धातुः।” पित्त शब्द का उद्गम ‘तप’ से हुआ है। ‘तप’ अर्थात् ‘तपसं तामे पित्तम।’ अर्थात् उत्क्रान्तता, उत्तेजना और शक्ति का परिचायक। कफ़-श्लेष्मा से अभिप्रायः है-मिलना-आकर्षण करना।

“श्लिष आलिंगनेः”। टीकाकर ‘चक्रपाणि’ ने इन तीनों की व्याख्या सारगर्भित रूप में की है। उनके अनुसार वात गति का, पित्त शक्ति और कफ़ आकर्षण का प्रतीक है। अस्तु मात्र इतना ही जानना पर्याप्त नहीं है कि ये तीन शरीर का मात्र तीन रासायनिक प्रकृतियाँ हैं वरन् इनकी सूक्ष्म विशेषताओं को जानना भी आवश्यक है।

आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत का मत है। कि जिस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा और वायु की शक्तियाँ संसार को गतिशील करने के लिए आवश्यक हैं उसी तरह वात, पित्त और कफ़ का सन्तुलन शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य के लिए भी अनिवार्य है। उन तीनों प्रकृतियों पर ग्रहों की स्थिति, गति और परिवर्तनों का समय-समय पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह जानना भी महत्वपूर्ण है। रोग का निदान और उपचार भली-भाँति तभी सम्भव है।

ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार तारा पुँज के तीन समुदाय हैं जिनका सम्बन्ध आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धान्त से है। वे तीनों वात-पित्त कफ़ की स्थिति को भी समय-समय पर प्रभावित करते हैं। इसी तरह ग्रहों का प्रभाव भी तीनों ही धातुओं पर पड़ता है। उदाहरणार्थ सूर्य अधिकांशतः पित्त पर तथा चन्द्रमा वात पर असर डालता है। चन्द्रकार की स्थिति और सूर्य की गतिविधि भी दोनों ही तत्वों में उतार-चढ़ाव लाते हैं। ज्योतिष शास्त्र का मत है कि चन्द्रमा मन को, सूर्य आत्मा को, बुध चेतन तन्तुओं को अपनी स्थिति से प्रभावित करते हैं। जिन जातकों में सूर्य और चन्द्रमा आग्नेय राशियों के नक्षत्र में होते हैं ऐसी स्थिति में शुष्क, गर्म और तेज धूप वाली जलवायु में रहने वाले व्यक्ति यों के चेतना तन्तुओं में विशिष्ट प्रकार की विकृतियों आ जाती हैं जिनके कारणों से आज के चिकित्सा शास्त्री न तो अपरिचित होते हैं, फलस्वरूप उनको निदान और उपचार में सफलता नहीं मिल पाती।

शरीर विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के जिन गूढ़ रहस्यों पर ज्योतिर्विज्ञान के सिद्धान्त प्रकाश डालते रहे हैं उनके विषय में विश्व में ढूँढ़ खोज आरम्भ हो गई।


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नमस्यो देवान्नतु हत विधेस्तेऽिवशगा। विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियति कमैकफरादः॥

फवं कर्मायत्तं किममरगणैः किं च विधिना॥ नमस्तत्कर्मेंभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभववि।93॥

देवताओं को हम प्रणाम करते हैं, पर वह तो ब्रह्मा के अधीन हैं, और ब्रह्मा भी हमको पूर्व कर्मानुसार फल देते हैं, इसलिए फल और ब्रह्मा दोनों ही के कर्माधीन हैं। इस कारण हम कर्म ही को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिस पर कि ब्रह्मा का भी वश नहीं चलता।

- भर्तृहरि


मृत्यु उतनी भयानक नहीं जितनी सोचते हैं।

पुराने कपड़े उतार कर नये कपड़े पहनने में किसी को क्या कष्ट होता है? यह प्रश्न ही हास्यास्पद लगता है लगभग इसी तरह का प्रश्न मृत्यु के सम्बन्ध में पूछा जाय तो उसका उत्तर गम्भीरता से ही दिया जाता है। कारण कि लोगों की मान्यता है, मृत्यु एक दुःखदायी, कष्टप्रद और दारुण वेदना देने वाली प्रक्रिया है। मृत्यु कष्टप्रद और दुःखदायी प्रक्रिया लगती तो है परन्तु वास्तव में वह है नहीं। बचपन से किशोरावस्था में, कैशोर्य से यौवन में और यौवन से प्रौढ़ परिपक्व स्थिति में विकसित होने तक जो आनन्द और उल्लास अनुभव होता है या कोई विशेष परिवर्तन होता दिखाई नहीं देता, इसलिए इस विकास की स्थिति में किसी को कष्ट अनुभव नहीं होता। मृत्यु इसलिए कष्टप्रद अनुभव होती या प्रतीत होती है कि मरने वाला व्यक्ति दारुण वेदना भोग रहा है कि उसके साथ ही ऐहिक जीवन क अन्त हो जाता है और जिसके जीवन का अन्त हो जाता है वह लौटकर बता नहीं सकता कि उसे कैसा अनुभव हुआ?

मृत्यु के सम्बन्ध में अज्ञान ही मनुष्य को उसके प्रति तरह-तरह की धारणाओं को जन्म देती है। मृत्यु वास्तव में है क्या? यह घटना घटते समय लोगों को कैसा अनुभव होता है? वैज्ञानिकों के लिए यह भी शोध का एक विषय रहा है। इसके लिए कई वैज्ञानिकों ने उन व्यक्ति यों के अनुभव एकत्रित किये हैं जो मरने के बाद जीवित हो उठे या डाक्टरों ने जिन्हें मृत घोषित कर दिया था, परन्तु वास्तव में वे जीवित थे और पुनः स्वस्थ होकर सामान्य जीवनक्रम व्यतीत करने लगे।

इस तरह का अनुसन्धान करने वालों में अमेरिकी वैज्ञानिक डा. कुवलर रास का नाम अग्रणी है। उन्होंने तीन सौ भी अधिक व्यक्ति यों से भेंट की। ये सभी लोग ऐसे थे जो मरने के बाद पुनः जीवित हो उठे थे। इन व्यक्ति यों ने अपने अनुभव जिस रूप में व्यक्त किए उनसे सिद्ध होता है कि मृत्यु कोई दुःखदायी घटना नहीं है। मरने के पूर्व तक लगता अवश्य है कि कोई बहुत बड़ी यन्त्रणादायी घटना घटने जा रही है किन्तु वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। एक महिला ने जो अचानक बीमार पड़ गई थी, और इसी बीमारी में वह मृत्यु तक पहुँच गई थी, अपना अनुभव बताते हुए कहा, “अचानक बीमार पड़ जाने के बाद मुझे लगने लगा कि मैं मरने ही वाली हूँ। अस्पताल में मेरे साथ जो मरीज थे, उनके सभी रोग मेरे ऊपर इकट्ठे हुए जा रहे हैं और मैं किसी की सहायता चाहती थी, जो मुझे इस मानसिक यंत्रणा से निकाल सके या इससे छुटकारा दिला सके। मैं सहायता के लिए किसी को पुकारना चाहती ही थी कि मुझे किसी का शाँत गम्भीर और उत्साह बढ़ाने वाला स्वर सुनाई दिया, जो कह रहा था, साहस करो। आगे बढ़ो।

जैसे ही मैंने साहस बटोरा मेरा सारा दर्द दूर हो गया। तभी मेरे सामने एक प्रकाशपूर्ण आकृति आई। उसके साथ उसी जैसा आलोक लिए कमल का फूल दिखाई दिया। मुझे अनुभव हुआ कि मेरा साँस रोग और रोग की पीड़ा तिरोहित हो गए हैं। उस समय मुझे भी अपना पूरा शरीर प्रकाश पुँज सा दिखाई दे रहा था कि मैं बहुत हल्की हो गई हूँ। उस समय बिस्तर पर पड़े अपने शरीर को अच्छी तरह देख सकती थी। थोड़ी देर बाद मैं अपने शरीर में वापस आ गई। मेरी चेतना जब वापस लौटी तो सम्बन्धियों से मुझे ज्ञात हुआ कि चिकित्सकों ने मुझे मृत घोषित कर दिया था।

एक और महिला ने मृत्यु का अनुभव इस प्रकार बताया, “बीमारी की हालत में अचानक मेरी हृदय गति रुक गई। तब मेरे चिकित्सक ने अपने एक सहयोगी डाँक्टर से कहा, “डाँक्टर यह तो मर गई। मैं कहना चाहती थी कि मैं मरी नहीं हूँ परन्तु चाह कर भी मेरे होंठ खुल नहीं रहे थे। डाँक्टरों ने आदेश दिया कि मेरे शव को अस्पताल के वार्ड से बाहर निकाला जाए। मैं यह सब देख और सुन रही थी परन्तु कुछ कह नहीं सकता थी।” जिन लोगों की अचानक या किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, उन्हें कैसा अनुभव होता है? इस सम्बन्ध में भी रोचक और दिलचस्प बातें जानने को मिली। एक व्यक्ति ने, जिसकी मृत्यु सिर में चोट लगने से हो गई थी तथा जो मरने के बाद पुनः जीवित हो उठा था, कहा-थोड़ी देर के लिए मेरा सारा दर्द दूर हो गया और मेरी पीड़ा पूरी तरह समाप्त हो गई। मैं बड़े ही सुख का अनुभव कर रहा था। अचानक एक झटका-सा लगा और मुझे अपने शरीर में कष्ट अनुभव होने लगा।” एक महिला, जिसकी मृत्यु अत्यधिक ‘रक्त स्राव’ के कारण हो गई थी, ने पुनः जीवित होने के बाद बताया-मैं अत्यन्त मधुर और दिव्य संगीत सुन रही थी और मेरा सारा दुःख दूर हो गया था।” कुछ लोगों को तो मृत्यु में इतना अधिक आनन्द को अनुभव होता है कि उनके अनुसार जीवन में वे इतने अधिक आनन्दित कभी नहीं हुए। घटना लन्दन की अलर्सगेट स्ट्रीट की है। वहाँ के एक मकान में आग लग गई और फायर बिग्रेड के कर्मचारी आग बुझाने के काम में लगे। इन कर्मचारियों में जेम्स बर्टन नाम का एक कर्मचारी भी था। आग के बीच में घुसकर जब वह आग बुझाने का प्रयास कर रहा था एक जलता हुआ शहतीर उसके ऊपर आ गिरा। वह आठ घण्टे तक उस मलबे के नीचे दबा रहा। निकाले जाने के बाद लम्बे समय तक चिकित्सा करने पर वह ठीक हुआ। उसने अपना अनुभव बताते हुए कहा, एक क्षण के लिए मुझे अपनी पत्नी की याद अवश्य आई थी, लेकिन उसके बाद मैं किसी अज्ञात दिशा में आने वाली मधुर संगीत लहरियों को सुनते-सुनते जैसे खो सा गया। मैं अपने शरीर को चाहकर भी हिला-डुला नहीं सकता था लेकिन मैं सोच जरूर सकता था और अनुभव भी करता था। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे मैं फूलों की सेज पर सोया हुआ होऊँ तथा स्वर्ग में रह रहा हूँ।’

स्विट्जरलैंड के श्री हरमन एक बार काउण्ट सेंट बरनार्ड पर बर्फ के तूफान में भटक गए। खोज-बीन करने पर वे बेहोश अवस्था में मिलें, जाँच करने पर उनमें जीवन का कोई चिन्ह नहीं पाया गया। लगा कि उनकी मृत्यु हो गई है बड़े प्रयत्नों के बाद जब वे ठीक हो सके तो होश में आने पर उन्होंने बताया कि आगे कदम तलाश में भटकते हुए वे इतने थक गए थे कि आगे कदम नहीं बढ़ रहे थे। फिर भी जिजीविषा उन्हें आगे धकेले जा रही थी। इसी तरह आगे बढ़ते-बढ़ते वे एक स्थान पर थककर चूर होकर गिर गए, फिर उन्हें होश नहीं रहा कि क्या हुआ? लेकिन उस स्थिति में वे भी वे अपने आपको सचेत और संवेदन क्षमता से परिपूर्ण अनुभव कर रहे थे तथा उन्हें बेहद आनन्द की अनुभूति हो रही थी। इस आनन्दमय स्थिति से बाहर आते समय उन्हें अवश्य कष्ट का अनुभव हुआ। डाँक्टरों के अनुसार वे बर्फ में गिर जाने के काफी समय पूर्व मर चुके थे।

अर्नाल्ड सिग्रोट और उसके चार मित्रों ने, जिनमें दो प्रेस रिपोर्टर थे तथा दो फोटोग्राफर, आल्पस पर्वत की चोटी पर चढ़ने का निश्चय किया। चोटी दो हजार फुट से अधिक ऊँची थी और उसके नीचे बहुत गहरा तथा सकरा खड्ड था। इस अभियान में अर्नाल्ड सिग्रेट सबसे आगे चल रहे थे। थक जाने पर थोड़ा सुस्ताने के लिए वे एक चोटी के किनारे बैठ गए, लेकिन दुर्भाग्यवश वह हिस्सा उनका वजन सह नहीं पाया और टूट कर गिर पड़ा, अर्नाल्ड भी उस टुकड़े के साथ नीचे लुढ़कने लगे।

जब उन्हें खड्ड से बाहर निकाला गया तो वे अर्ध मृतक की-सी स्थिति में थे। जीवन के कुछ ही चिन्ह शेष थे, इसलिए उन्हें बचाने की भरसक चेष्टा की गई और उपचार सफल रहा। वे बच गए या कि मृत्यु के मुख में प्रवेश कर वापस लौट आए। चिकित्सा के उपरान्त ठीक होने पर उन्होंने अपना रोमांचक अनुभव इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘मेरा मस्तिष्क बड़ी तेजी से काम कर रहा था। समय का मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं रहा, गया था और रह-रहकर मुझे अपने पत्नी बच्चों का ख्याल आ रहा था। इसके बाद मुझे अपनी शरीर का कोई आभास नहीं रहा। मैं उसे लुढ़कते छिलते और उसमें से खून को रिसते हुए ऐसे ही अनुभव कर रहा था जैसे मैं किसी दूसरे व्यक्ति का शरीर लुढ़कता हुआ देख रहा हूँ।

‘मेरे साथी मुझे खोजते हुए आए। उनका अनुमान था कि मैं निश्चित रूप से मर चुका हूँ। उन्होंने मेरे शरीर को एक गर्म बिछावन पर लिटा दिया। मैं धीरे-धीरे साँस ले रहा था। साँस लेना भी कुछ देर के बाद बन्द हो गया और मेरे शरीर में जीवन का कोई चिन्ह शेष नहीं रहा परन्तु मैं होश में था और आनन्द में था। मेरे एक परिचित डाँक्टर ने मेरे जीवन के प्रति निराशा व्यक्त की। मैं अपने परिवार के लोगों को रोते हुए देख रहा था। मैं चाहता था कि उन्हें बताऊँ कि मैं कितना आनन्दित हूँ और उनके चीखने रोने से दुःखी हो रहा हूँ। उन्हें चुप कराने और रोने से मना करने के लिए मैंने चीख-चीखकर कहना चाहा किन्तु मेरी आवाज शायद उनके कानों तक नहीं पहुँच पा रही थी। फिर मैंने चीख-चीखकर कहना चाहा किन्तु मेरी आवाज शायद उनके कानों तक नहीं पहुँच पर रही थी। फिर मैंने सोचा कि मैं अपने इस शरीर में प्रवेश कर जाऊँ तो ये लोग प्रसन्न होंगे। इतनी इच्छा करने मात्र से मैं वापस अपने शरीर में प्रविष्ट हो गया। हालाँकि उस समय मुझे अपने शरीर पर लगी चोटों तथा आये घावों की पीड़ा अनुभव होने लगी थी परन्तु मैं प्रसन्न था कि वे लोग सन्तुष्ट है।”

‘फ्रण्टियर्स आफ द आफ्टर लाइफ’ के लेखकर और प्रकाशक एल्फ्रेड ए. नैफा ने एक दुर्घटना में मरने के बाद पुनः जीवित हो उठने वाले व्यक्तियों के अनुभव संकलित करते हुए एक व्यक्ति का अनुभव इस प्रकार लिखा है, “मैं एक मूर्च्छा के बाद जागा। मैंने देखा कि मेरा शरीर अलग-थलग पड़ा हुआ है। भौचक्का-सा खड़ा होकर मैं देख रहा था और जब मैंने नीचे की ओर देखा तो पाया कि मेरा शरीर लड़ाई में मारे गए और लोगों के साथ पड़ा हुआ है। मुझे लड़ाई की बात याद आ गई तथा यह भी याद आ गया कि मैं युद्ध में ही गोली लगने के कारण मारा गया हूँ। मैंने कब शरीर छोड़ा इसका मुझे जरा भी स्मरण नहीं था परन्तु मृत्यु मेरे लिये एक आनन्ददायक और पीड़ा रहित घटना थी।”

‘सायकिकल फिनोयिन,एण्ड दि बार’ पुस्तक के लेखक डाँ. हायर वार्ड केरिगंटन ने ऐसा ही अनुभव लिखते हुए बताया, “मैं अचानक अपने शरीर से बाहर फेंक दिया गया था। मैंने कोई पीड़ा अनुभव नहीं की।” अब तक संकलित विवरणों में जो मरने के बाद पुनः जीवित हो उठे व्यक्तियों से पूछकर संकलित किए गए हैं यही सिद्ध होता है कि मृत्यु के सम्बन्ध में अज्ञान। यदि मृत्यु के वास्तविक स्वरूप को समझा जा सके और भारतीय मनीषियों के इस प्रतिपादन को हृदयंगम किया जा सके कि मृत्यु वस्त्र परिवर्तन की भाँति ही देह परिवर्तन मात्र है तो निश्चित ही लोगों की चिन्ताएँ तथा निराशाएँ दूर हो सकती हैं।


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मा भवाज्ञो भव ज्ञन्त्वं जहि संसार भावनाम्। अनात्यमन्यात्मभावेन किमज्ञ इव रोदिषि॥

कस्तवाँय जड़ो मूको देहो माँसमयोऽशुचिः। मदर्थ सुखदुःखाध्यामवशः परिभूयसे॥

अहो नु चित्रं यत् सत्यं ब्रह्म त्तद्विस्मृतं नृणाम्। तिष्ठतस्तव कार्येषु माऽस्तु रागानुर जनम्-महोपनिषद् 4, 128, 129, 130

अर्थात्-अज्ञानी न बनो, नाशवान् पदार्थों के लिए इतने उद्विग्न मत होओ, उनके लिए मत बिलखो यह जड़ देह तुम्हारा कोई स्थिर सम्बन्धी नहीं है। यह तो माँस का पिण्ड भर है। घोर अपवित्र है तुम इसके लिए इतने बेचैन क्यों हो? परम सत्य की भूल के इस देह जाल में जकड़े हुए क्यों तड़पते हो?


तृष्णा-वासना मरने के बाद भी दुःख देती है

मरने के साथ ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता, जीव-चेतना का अस्तित्व शरीर का अन्त होने के बाद भी बना रहता है, इस तथ्य को अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। मरने के बाद पुनर्जन्म मिलता है, इसके भी ढेरों ढेर प्रमाण मिलते हैं। जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र में बँधे जीवात्मा को ही आवागमन के चक्र में फँसा आत्मा कहा जाता है। इसके विपरीत वे व्यक्ति जो जीवन काल में ही अपनी तृष्णाओं और वासनाओं से मुक्त हो जाते हैं, जीवनमुक्त कहलाते है। उन्हें जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं फँसना पड़ता है, भारतीय दर्शन की मान्यता है कि तृष्णाएँ वासनाएँ ही पुनर्जन्म का कारण है।

मृत्यु के बाद पुनः जन्म लेने की अवधि के बीच जीवात्मा को कुछ समय विश्राम के लिए कि लिए मिलता है। आमतौर पर इस अवधि में आत्माएँ जीवनकाल में लिये गए श्रम की थकान उतरती है और गहरी निद्रा में सोई पड़ी रहती है, जिस प्रकार दिन भर काम करने के बाद रात्रि में सो लेने से प्रातःकाल ताजगी आती है और उठ कर नई शक्ति के साथ नये सिरे से उत्साहपूर्ण मनःस्थिति में काम करना सम्भव हो जाता है। उसी प्रकार इस मध्यवर्ती विश्राम के बाद मृतात्मा नया जन्म धारण करके नये सिरे से, पुनर्जन्म धारण करती है और अपने क्रिया-कलाप आरम्भ करती है। इस मध्यवर्ती काल को ही प्रेत योनि कहा गया है।

देखा गया है कि दिन में कोई भारी चिन्ता परेशान किये होती है रात को नींद नहीं आती है और नींद आती भी है तो रह-रहकर उचट जाती है, उसी प्रकार मरने के बाद सुषुप्तावस्था या प्रेत योनि में पड़े जीव को विश्राम नहीं मिल पाता। जीवनकाल में वह जिन उदद्न वासनाओं और तृष्णाओं से पीड़ित रहता है, उन्हें पूरा करने के लिए वह प्रेत योनि में भी परेशान रहता है तथा तरह-तरह से अपनी कामनाओं एवं वासनाओं की तृप्ति के लिए प्रयत्न करता रहता है। अतृप्त वासनाओं और तृष्णाओं को लेकर मरने वाले व्यक्ति यों की आत्माएँ अपनी इच्छा पूर्ति के लिए जीवित व्यक्ति यों को सन्देश देती है, उनके शरीर पर अधिकार कर अपनी कामनाएँ पूरी करती है तथा वासनाओं का आवेग जिस स्तर का होता है, उसी के अनुरूप मन्द या तीव्र हलचलें करती है।

लन्दन की श्रीमती भार्गा विलियास को अप्रैल 1976 में एक मृत आत्मा का सन्देश प्राप्त हुआ। उस आत्मा का उद्देश्य केवल अपने अस्तित्व का परिचय देना ही था। आत्मा राबर्ट यंग नामक एक डाँक्टर की थी एक समुद्री जहाज में डाँक्टर था। यंग की आत्मा ने विलियास को बताया कि वह अर्डेट नामक युद्ध पोत में सवार था उसके साथ 40 सैनिक भी थे। पोत कैम्पटाउन की लड़ाई में काम कर रहा था और एक दुर्घटना में सागर की अतल गहराइयों में डूब गया था। श्रीमती विलियास ने इस तथ्य की वास्तविकता को परखना चाहा और इसके लिए ब्रिटेन के प्रतिरक्षा विभाग से संपर्क किया। पुरानी फाइलें उलटी गई और सन्देश की प्रामाणिकता सिद्ध हो गई कि वास्तव में राबर्ट यंग एक सर्जन के तौर पर कैम्पट डाउन के युद्ध में भाग लेने वाले जहाज पर गया था, जिसमें 40 सैनिकों सहित उसकी मृत्यु हो गई थी।

श्रीमती विलियास को दूसरा सन्देश एक कोयला खनिज की आत्मा का मिला। इस खनिज का नाम था एडवर्ड रोड्स, उसकी मृत्यु सन् 1970 में यार्क शायर की एक कोयला खान में काम करते समय हो गई थी। मृत्यु के बाद उसके शव को यार्क शायर के स्वेश नामक स्थान पर दफना दिया गया था। रोड्स का कहना था कि उसका शव ठीक से नहीं दफनाया गया है, जब वह दफनाया जा रहा था तो उसके लिए प्रार्थना नहीं की गई। उल्लेखनीय है रोड्स बहुत ही धर्म श्रद्धालु व्यक्ति था वह किसी भी दिन प्रार्थना में नागा नहीं करता था और हर सप्ताह रविवार को नियमित रूप से गिरजे में जाया करता था। पहले तो विलियस ने घटना की यथार्थता जानना चाही और इसके लिए ‘राष्ट्रीय कोयला बोर्ड से संपर्क किया। वहाँ से घटना की सत्यता का पता लग गया इसके बाद विलियस ने रोड्स के परिवार वालों से संपर्क स्थापित किया था तथा आवश्यक धर्मानुष्ठान कराये।

यह तो शान्त आत्माओं के विवरण हैं, जो अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए दूसरों से विनम्र अनुरोध करती है। कुछ ऐसी आत्माएँ होती है जो उद्दाम वासनाएँ लिए होती है और उनकी तृप्ति के लिए दूसरों को पीड़ित करने में भी नहीं हिचकिचाती। पिछले दिनों लखनऊ में एक युवक की प्रेतात्मा द्वारा एक परिवार को बुरी तरह पीड़ित किये जाने का समाचार प्रकाश में आया था। युवक का नाम था प्रमोद। युवावस्था में वह अपनी सहपाठी छात्रा बीना के प्रति बुरी तरह आसक्त हो गया था। डडडड उसकी ओर आकर्षित हुई थी। फिल्मी ढंग से दोनों का कथित प्रेम परवान चढ़ने लगा और दोनों ने साथ-साथ मरने की कसमें खाई। घर वालों को जब इसका पता चला तो दोनों पर प्रति बन्ध लगा दिया। अवसर पाकर दोनों भाग निकले किन्तु रास्ते में ही बीना की मृत्यु हो गई। इससे प्रमोद को इतना सदमा पहुँचा कि उसने भी आत्म-हत्या कर ली। जिस स्थान पर दोनों छुपकर मिला करते थे वहाँ आज भी चीखें सुनाई देती है। कुछ समय तक उन्होंने अपने परिवार वालों को तंग किया किन्तु बाद में शान्त हो गए। किन्तु अभी भी उनकी चीखें और अट्टहास उसी खण्डहर में गूँज रहे है जहाँ प्रमोद और बीना मिला करते थे।

कुछ समय पहले इंग्लैण्ड के विख्यात कप्तान डेविड के ऊपर प्रेतात्मा के प्रकोप तथा उससे छुटकारे की घटना का समाचार ब्रिटेन के प्रायः सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है। डेविड की गणना उस देश के मूर्धन्य सेनाध्यक्षों में की जाती थी। अचानक न जाने क्या कि वे विक्षिप्तों की-सी हरकतें करने लगे। उनका विक्षिप्त हो जाना और हर घड़ी प्रेत की छाया को अपने आस-पास मंडराते देखना एक असाधारण कौतूहल की बात थी।

चिकित्सकों ने तरह-तरह के परीक्षण किये, यहाँ तक कि किसी मनोरोग की सम्भावना दृष्टिगत रखते हुए भी बारीकी से उनका निरीक्षण किया गया लेकिन कुछ पता नहीं चला। न कोई शारीरिक रोग पकड़ में आया न ही मानसिक रोग। रोग कोई हो तो पकड़ में आए भी सही। कोई रोग था ही नहीं तो कहाँ से पकड़ में आता। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि इतना साहसी, निडर और निर्भीक पराक्रमी यह सेनाध्यक्ष इस कदर क्यों भयभीत रहता है? धीरे-धीरे वे मरणासन्न स्थिति में पहुँचने लगे।

डेविड की पत्नी को आशंका हुई कि कहीं यह प्रेत प्रकोप तो नहीं। वह एक प्रेत विद्यावान् बुढ़िया को बुलाकर लाई। बुढ़िया आँख बन्द करके ध्यान करती रही और ध्यान से उठने पर उसने वह चीनी कोट मंगाया जो डेविड को अत्यधिक प्रिय था। उस कोट के अस्तर में समाप्त प्राय खून के दाग लगे हुए थे, जिन्हें सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता था। बुढ़िया के कहने पर डाँक्टरों ने उन दागो की जाँच की और पाया कि वे वास्तव में खून के ही दाग हैं। इस कोट का इतिहास बताते हुए बुढ़िया ने कहा कि एक व्यक्ति की हत्या इसी कोट को पहने हुई थी। उस व्यक्ति को भी यह कोट बहुत प्रिय था मरने के बाद भी इसी कारण उस व्यक्ति की छाया इसी कोट के साथ रहती है, वह आत्मा किसी दूसरे व्यक्ति के कब्जे में यह कोट नहीं देख सकती। जब तक कोट घर में रहेगा, तब तक उस आत्मा का आतंक भी बना रहेगा। बुढ़िया के परामर्श के अनुसार उस कोट को बाहर फेंक दिया गया, और डेविड को उसी क्षण प्रेत के आतंक से मुक्ति मिल गई।

किसी घर के भुतहा होने की भी कई घटनाएँ आए दिनों प्रकाश में आती रहती है। कोई आवश्यक नहीं कि भुतहे कहे जाने वाले सभी मकानों या स्थानों में भूतों का डेरा होता है, मुश्किल से सौ में से एकाध घटनाएँ ही सच होती है और उन स्थानों या घरों के भुतहा होने का कारण मात्र उसमें पहले रह रहे व्यक्ति यों का इन स्थानों के प्रति आत्यंतिक लगाव ही है। अब से कोई 35-40 वर्ष पहले कानपुर के विरहना रोड, नया गंज इलाके एक मकान के सम्बन्ध में विख्यात था कि वह डडडड है। उस मकान में नये-नये आकार रहने लगे। हलवाई ने मकान को नया रूप देने के विचार से तुड़वाया और पहले की अपेक्षा अधिक स्थान घेर कर नया मकान बनवाया । जैसे ही नये बने मकान में उस परिवार ने रहना आरम्भ किया , वैसे ही परिवार का मुखिया प्रेत पीड़ितों की सी हरकतें करने लगा। कई डाँक्टर आए, रोगी को देखा परखा, दवा दारु की किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अन्त में एक तान्त्रिक की शरण ली गई तो प्रेतात्मा ने प्रत्यक्ष होकर कहा कि “यह मेरा मकान है। मैंने इस व्यक्ति के साथ हमदर्दी बरती और उसे फटेहाल स्थिति से उबारा किन्तु इसने मेरे साथ ही धोखा दिया। मैं इस मकान में पचासों साल से रहता हूँ। यह मकान मेरा है और किसी तंग नहीं करता। इसने मेरी अवज्ञा और उपेक्षा की इसीलिए इसे किये का दण्ड मिल रहा है।’

बिजनोर जिले के धामपुर परगने में एक गाँव है बसन्तपुर मरावली। यहाँ के निवासी रात में अक्सर गाँव के बाहर एक प्रेतात्मा को देखते हैं जिसके सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह आज भी अपनी प्रेयसी की तलाश में भटक रहा है। भूत घटना 40 वर्ष की बताई जाती है। उस समय यहाँ एक ठाकुर कुवरंसिह नामक जमींदार रहता था, उसके तीन बेटे और एक बेटी थी। लड़की गाँव के ही एक युवक हरीसिहं की और आकर्षित हो गई और उसके प्रेम पाश में बँध गई। हरीसिंह अपने परिवार में अकेला था, माँ बचपन में ही गुजर गई थी और बाप-बेटे को पाल-पोसकर इस दुनिया से चलता बना था।

हरीसिंह और ठाकुर की बेटी चोरी छिपे मिलने लगे। आखिर यह चोरी छिपे का खेल कब तक चलता। एक दिन पता चल ही गया और ठाकुर ने अपने दोनों बेटों की सहायता से तालाब के किनारे एकान्त पाकर उसकी हत्या कर दी। ठाकुर की लड़की की जब यह पता चला तो वह पागल-सी हो गई और विक्षिप्तों की तरह रहने लगी। ठाकुर ने बहुत इलाज कराया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अन्त में उसने अपनी सारी जमीन जायदाद बेच दी और गाँव छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चला गया। इस घटना के साक्षी व्यक्ति आज भी जिन्दा हैं और उनमें से जिन लोगों ने वह प्रेतात्मा देखी है, उनका कहना है कि, उसकी आकृति हरीसिंह से हूबहू मिलती-जुलती है।

मरने के साथ ही शरीर का अन्त नहीं हो जाता, यह सत्य है। मृत्यु केवल स्थूल शरीर को ही नष्ट कर पाती है, सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व फिर भी बना रहता है। मृत्यु के बाद जन्म लेने तक की अवधि विश्राम के लिए है किन्तु जो व्यक्ति किन्हीं पदार्थों, स्थानों या व्यक्तियों में आसक्त रहते हैं उन्हें मरने के बाद भी चैन नहीं मिलता । ठीक उसी प्रकार, जैसे अति लोभी, लालची, लिप्सावान या चिंतित, दुःखी, व्यग्र, उद्विग्न व्यक्ति को रात में ठीक से नींद नहीं आती। वह रात में भी करवटें बदलता जागता रहता है। अनिद्रा का यह रोग मानसिक सन्तुलन को पूरा तरह डगमगा देता है। बहुत दिनों तक ठीक से न सो पाने के कारण जिस प्रकार लोग कई मनोव्याधियों के शिकार हो जाते है और उन्मत्तों जैसी हरकतें करने लगते हैं। उसी प्रकार अतृप्त वासनाएँ लेकर मरने वाले व्यक्ति मरण काल के बाद निश्चित विश्राम की अवधि भी चैन से नहीं बिता पाते। उन्हें पागल प्रेतों की-सी स्थिति में देखा जा सकता है, जो खुद भी चैन से नहीं रहते तथा औरों को भी चैन से नहीं रहने देते।


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धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम। शीलमला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्रं संशय॥ महाभारत शान्ति 124।62

अर्थात्-भगवती लक्ष्मी प्रह्लाद से कहती है-हे प्राज्ञ धर्म का, सत्य का, सदाचार का, बल का, तथा स्वयं मेरा भी मूल शील में ही है-इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।


क्रुद् प्रकृति एवं असन्तुलित पर्यावरण से एक व्यापक उथल-पुथल सम्भावित

प्रस्तुत समय कुछ ऐसा चल रहा है जिसे संधिकाल कहा जा सकता है। जितने अप्रत्याशित परिवर्तन गत दिनों देखे गए, गत एक सदी में भी नहीं घटित हुए। यों तो बीसवीं सदी का प्रारम्भ ही महाशक्तियों के मध्य टकराव के हुआ था। प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध ने सारी विश्व वसुधा की काया ही पलट दी। अनगिनत व्यक्ति मारे गए एवं कई हमेशा के लिए अपंग हो गए। आणविक विभीषिका का प्रलयंकारी दृश्य पहली बार विश्व मानस ने देखा व सबका दिल दहल गया। द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने में इस विस्फोट की प्रधान भूमिका रही। लगता था-अब शान्ति रहेगी तथा सब मिल-जुलकर धरती पर स्वर्गीय वातावरण लाने का एक जुट हो प्रयास करेंगे । परन्तु परिस्थितियों के मोड़ मनचाहे थोड़े ही होते है। विधि ने सृष्टि सन्तुलन विनाश सृजन का जो गतिचक्र बनाया है, वह एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पर्यावरण में इन दिनों घटित हो रहे अप्रत्याशित परिवर्तन कुछ ऐसा संकेत दे रहे हैं कि भावी समय सामान्य नहीं है। वैज्ञानिक, अन्तरिक्ष विज्ञानी,ब्रह्माण्ड जीवशास्त्री, भौतिकविद् एक स्वर से कह रहे हैं कि पृथ्वी एक विशिष्ट परिवर्तन काल से गुजर रही है, जिसके दोनों ही पहलू है-असन्तुलित पर्यावरण एवं तद्जन्य विभीषिकाएँ तथा इनका निवारण एक समग्र समर्थ सामूहिक प्रयासों की शृंखला के माध्यम से है।

पिछले दिनों नवग्रह योग की काफी चर्चा “जुपिटर इफेक्ट” पर परस्पर विरोधी मत दिए गए। नौ ग्रहों की एक ही सीध में आ जाने-इस युतिचक्र के कारण कितनी विभीषिकाएँ उत्पन्न हो सकती है, इस पर ग्रन्थ लिख दिए गए। तीन वैज्ञानिकों द्वारा लिखित इसी नाम से एक पुस्तक पर काफी विवाद उठ खड़ा हुआ और अन्त में निराश हो दोने ने अपने को इस मसले से अलग कर लिया। एक वैज्ञानिक डा.ग्रिबिन अपनी बात पर अड़े रहे। उनका कहना था कि “इसके प्रभाव तुरन्त नहीं, दूरगामी होंगे। सारे विश्व का मौसम बदलेगा। कहीं-भूकम्प फूट पड़ेंगे तो कहीं अकाल व महामारी का दौर आरम्भ होगा। विनाशकारी बाढ़ों से कहीं-कहीं जल प्रलय का खतरा है। ग्लेशियरों की स्थिति पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा तथा हो सकता है कि पृथ्वी का बहुसंख्य भाग हिम से ढँक जाय।” मार्च की नवग्रह-युति लीला का प्रसंग समाप्त हुआ तथा सभी ने कहना आरम्भ कर दिया कि अष्टग्रही योग की तरह मात्र मानव जाति है। दूसरी ओर गत 3 माह में घटित कुछ परिवर्तनों को दृष्टिगत रख विश्लेषणकर्त्ता कहते हैं। कि ‘जुपिटर इफेक्ट’ से प्रलय तो नहीं हुई परन्तु पर्यावरण बहुत तेजी से बदला है वे डा. ग्रिबिन द्वारा कही गयी बातें सत्य हुई है। आगे भी अन्तरिक्षीय उपग्रहों के मापन यही बताते हैं कि विभीषिकाओ का दौर जारी रहने वाला है।

यदि हम थोड़ी पीछे की ओर दृष्टि डालें व पर्यावरण सम्बन्धी समाचारों का एक विहंगावलोकन करें तो कुछ विस्मयकारी अपवाद रूप घटनाक्रम दृष्टिगोचर होते हैं। इस वर्ष मई माह में जहाँ भारत जैसे देश में भयंकर गर्मी पड़नी चाहिए थी, वहाँ तीन चौथाई भूभाग में अप्रत्याशित मौसम देखा गया। अधिकाँश स्थानों पर गर्मी में उग्रता नहीं थी। जहाँ शीत ऋतु लम्बी खिंची तथा हिमाचल, हिमालय के निचले इलाकों में मार्च अप्रैल तक हिमपात होता रहा, वहाँ सारे उत्तर भारत में कभी वर्षा, कभी ओले, कभी झंझावात तथा कभी तेज हवा के साथ आँधी तूफान का दौर चलता रहा। पिछले दो सौ वर्षों में अप्रैल में इतनी वर्षा नहीं हुई, न ही हिमपात, जितना 1982 की अप्रैल में हुआ है।

प्रकृति जिस मदमस्त हाथी की तरह क्रुद्ध हो अब दौड़ी चली जा रही है, इसका पूर्वाभास मई-जून में ही हो गया था जब मौसम विशेषज्ञों ने समय ने पूर्व मानसून, अतिवृष्टि तथा अधिक समय तक वर्षा ऋतु केिखंचने (नवम्बर तक )की संभावना बताई है। अपने अन्तरिक्षीय उपग्रहों से लिए गए चित्रों व गत 70 वर्ष के आँकड़ों के आधार पर मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल डा. पी .के. दास ने आने वाले समय को और भी अधिक भयावह सम्भावनाओं से पूर्ण बताया है। उनका कहना है कि “1979 में मानसून की भारत में पूर्ण विफलता , 1980 में गर्मी में यूरोप व अमेरिका में हिमपात तथा 1981−82 में ओलों की वर्षा से फसल को सारे विश्व भर में हानि पहुँचने के घटनाक्रमों को एक दुर्घटना मात्र कहकर नहीं टाला जा सकता है। पृथ्वी का अपनी धुरी पर गति का क्रम व उसकी ग्रहों से तथा अन्तरिक्षीय किरणों से प्रभावित होने की स्थिति अब बदलती जा रही है। वातावरण में संव्याप्त धूलिकणों की मात्रा, कार्बनडाय आक्साइड ओजोन की परतों पर जमाव तथा ज्वालामुखी विस्फोटों की शृंखला से पर्यावरण सन्तुलन बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पृथ्वी का विकिरण सन्तुलन इससे अव्यवस्थित हुआ है तथा ओजोनोस्फीयर-आयनोस्फीयर की परतों में ‘गैप्स’ आ जाने से अन्तरिक्षीय किरणों-घातक विकिरणों के पृथ्वी पर आने की संभावनाएँ बढ़ गयी हैं। एक आँकड़ा देते हुए वे बताते हैं कि उत्तरी भारत पर किए गए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि प्रति वर्ग मील क्षेत्र में पाँच टन घातक प्रदूषण कारक तत्व पाए गए हैं। यदि इसकी मात्रा कम की जा सके तो मौसम को अनुकूल बनाया जा सकता है।

इन दिनों आकाश में पश्चिम दिशा में नित्य रात्रि को नौ बजे तक रक्त लालिमा दिखाई देती है। ऊषा के पूर्व भी इसी प्रकार सारा आकाश विचित्र प्रकार से रक्त रंजित-सा हो उठता है। इसका विश्लेषण व्यक्ति यों ने अपने-अपने ढंग से किया है। ज्योतिषियों ने ऐतिहासिक प्राच्य घटना चक्र गोष्ठी में इसका हवाला देते हुए कहा है कि इससे पूर्व रामायण काल में लंका दहन के समय भी ऐसी ही लालिमा दिखाई दी थी। इस प्रकार यह एक युगान्तरकारी घटना-व्यापक विनाश की सूचक है। इसी घटना का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए प्रसिद्ध एस्टोफिजिसिन्ट बताते हैं कि गत दो मासो में पृथ्वी के विभिन्न भागों में चार स्थानों पर ज्वालामुखी फटने से तेजाब का एक विशालकाय बादल वायुमण्डल में पहुँच गया है। मैक्सिको , इण्डोनेशिया, ईरान व कनाडा के शतकों से असुप्त पड़े इन ज्वालामुखियों में हुए भीषण विस्फोटों से निकली राख तथा सल्फ्यूरिक एसिड (गन्धक का तेजाब) पृथ्वी से 26 किलोमीटर ऊपर एक विशाल बादल के रूप में फैल गया है तथा इससे जापान, एशिया, यूरोप व हवाई द्वीप−समूह के एक बहुत बड़े हिस्से में सूर्य का प्रकाश पहुँचने में बाधा पहुँच रही है। एक करोड़ टन राख व तेजाब धरती के वातावरण को किस प्रकार प्रभावित करेगा, इस पर वैज्ञानिकों का कथन है कि यह सारे विश्व के मौसम को बदल सकने में, भयंकर बाढ़ें तथा महामारियाँ लाने में सहायक हो सकता है। ऐसा ही सन् 1815 में हुआ था, जब इण्डोनेशिया के तम्बोरा ज्वालामुखी से 12 हजार लोग मारे गए थे तथा अमेरिका के न्यू इंग्लैण्ड क्षेत्र में गर्मी में ठण्ड जैसा मौसम देखा गया व लन्दन की टेम्स नदी बर्फ से ढँक गयी थी।

अभी दृश्यमान आकाश लालिमा को ज्वालामुखी विस्फोटों से जोड़ते हुए वैज्ञानिक बताते हैं कि सौर किरण के तेजाबी बादल, जो मीलों चौड़ा तथा दो किलोमीटर मोटा है, से गुजरने से आकाश का ऐसा दिखाई पड़ना स्वाभाविक है तथा यह प्रकृति का एक स्वाभाविक सहज घटनाक्रम है। इससे कहीं-कहीं अम्ल वर्षा हो सकती है जो कि पहले भी कई बार हुई है। जेम्स पोलाँक जो ‘नासा’ के एमीस रिसर्च फाउण्डेशन के अध्यक्ष हैं, कहते हैं कि ऐसा ही बादल वर्ष 4 अप्रैल को दक्षिण-पूर्व मेक्सिको के सिन्कोनल वाल्केनो में विस्फोट के फलस्वरूप बना था तथा कई दिनों तक पृथ्वी की परिधि में चक्कर काटता रहा। भारतीय महाद्वीप, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उत्तरी अमेरिका में अप्रत्याशित मौसम परिवर्तन के लिए इसे उत्तरदायी माना जा सकता है।

ढाई सौ ग्राम भार के ओले, ठण्डी मई, आकाश लालिमा तथा भयंकर मानसून की चर्चा के बाद अब कुछ और वैज्ञानिक अध्ययनों पर भी दृष्टि डालना जरूरी है। सूर्य की एक सौवीं सतह को घेरे हुए सौर कलंकों की एक शृंखला पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने अपने दूरदर्शी यन्त्रों से देखी है। एरिजोना की कीटपिक आँब्जर्वेटरी ने गत फरवरी-मार्च में एक सर्पिल आकार का धब्बा सौर सतह पर देखा जिसका व्यास अपनी पृथ्वी के व्यास से लगभग 6 गुना अधिक था। अन्तरिक्ष भौतिकी के जानकारों को अभिमत है कि ऐसे धब्बे जब भी दिखाई पड़ते हैं, उनकी संख्या व क्षेत्रफल अधिक होता है तब सूर्य सतह से गर्म-गर्म ऊँची लपटें उठने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं जो पृथ्वी के वातावरण को व्यापक रूप में प्रभावित करती हैं, मौसम बदलती है तथा एक लम्बे समय तक यह असन्तुलन बना ही रहता है।

वैज्ञानिक अपने-अपने मन्तव्य देते रह सकते हैं पर घटनाक्रम किसी स्पष्टीकरण के अनुसार नहीं चलते। वे तो एक सुनिश्चित विधि-व्यवस्थानुसार घटने वाले परिवर्तन हैं। यदि इन सभी को तथ्यों की कसौटी पर कसा जाय तो ज्ञात होता है कि ज्योतिर्विज्ञान-अन्तरिक्ष विज्ञान के निर्धारणों के अनुकूल ही सब कुछ घट रहा है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि सौर मण्डल से जो अदृश्य विकिरण प्रवाहित होते हैं, उन्हें अति संवेदनशील जीव निश्चित रूप से ग्रहण करते हैं। नवजात शिशु के व्यक्ति त्व निर्माण में उस प्रभाव की भूमिका को झुठलाया नहीं जा सकता। मौसम, तूफान,

ज्वार-भाटा विकिरण जैसे प्रभाव अन्तरिक्ष विद्या के अंतर्गत आते हैं। ग्रहों का गतिचक्र किस प्रकार वातावरण को प्रभावित करता है, इसका आधुनिकतम स्वरुप ‘सेटेलाइट्स’ है जो विश्व के किसी भी भू-भाग में तूफान की सम्भावना का पूर्वानुमान लगाकर सचेत कर देते हैं। यह एक अन्ध विश्वास नहीं, उच्चस्तरीय विज्ञान है जिस पर सारी ‘एस्ट्रोफिजिक्स’ टिकी हुई है। फिर क्या कारण है कि ज्योतिर्विज्ञान व अन्तरिक्ष विज्ञान का परस्पर तालमेल नहीं बैठ पाता। एक ने सूक्ष्म जगत पर तथा दूसरे ने पर्यावरण-मौसम पर अपना मन्तव्य प्रकट किया तो यह भी एक सत्य है कि सूक्ष्म प्रभाव तथा पर्यावरण असन्तुलन परस्पर सम्बद्ध है।

वर्तमान में भी जो कुछ भयावह दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे मात्र अपवाद न माना जाय। प्रत्यक्ष जो है सो है, किन्तु जो अप्रत्यक्ष को देख और समझ सकते हैं वे जानते हैं कि स्थिति और भी जटिल है कुछ विपत्तियाँ ऐसी होती हैं कि प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती, पर धीरे-धीरे विनाश-लीला मचाती रहती हैं व समय परिपाक में अपने भयंकर रूप में फूट पड़ती हैं। युग सन्धि ऐसे ही अवसरों को कहते हैं जब असन्तुलन अपनी उच्चतम स्थिति में होता है तथा सन्तुलन की विधि-व्यवस्था भी बनने लगती है। इन दिनों विनाश और सृजन के मध्य भयावह संघर्ष है। ध्वंस ने तो यह नीति अपनायी है कि मानवी दुर्बुद्धि से लेकर पर्यावरण असन्तुलन तक जितना सम्भव हो सके, अपनी मनमर्जी की जाय। रात जब आती है तो अन्धकार घना हो जाता है। मरने वाले की साँस तेजी से चलती है। युग प्रत्यावर्तन के इस समय में विनाश विभीषिकाएँ यही लीला सन्दोह रच रही हैं।


Quotation

सृजन दूसरा पक्ष है। ध्वंस प्रत्यक्ष है तो सृजन परोक्ष। परोक्ष के गर्भ में पल रही सृजन की गतिविधियों की जानकारी समय से पूर्व देना तो उचित नहीं। पर इसमें आपत्तिकाल के स्वरूप को समझकर अपनी भूमिका का निर्धारण कर लेना भी एक युग धर्म है। ज्योतिर्विद्-भविष्य वेक्त क्या कहते हैं, उस उलझन में पड़ने के बजाये यह देखा जाय कि प्रत्यक्ष में क्या घट रहा है और परोक्ष में उसे निरस्त करने की जो प्रक्रिया चल रही है, सामूहिक पुरुषार्थ द्वारा उसे कैसे समर्थ बनाया जाय। यह प्रसंग मात्र वाग विलास बनकर, रहस्य रोमांच की चर्चा बनकर न रह जाय। वैयक्तिक नहीं, समष्टिगत प्रयास की ही अब प्रधानता है। मौसम की विभीषिका यदि वास देगी तो सारे समूह को, किसी व्यक्ति , जाति, प्रान्त यों राष्ट्र विशेष को नहीं। ऐसी विषम बेला में असन्तुलन को और न बढ़ाने तथा सन्तुलन में नियोजित प्रयासों को और अधिक प्रखर बनाने की आवश्यकता है। विनाश की कगार पर खड़ा संसार तथा क्रुद्ध मदमस्त प्रकृति की हमसे कुछ यही अपेक्षा भी है।


अविज्ञान की विज्ञान जगत को चुनौती

प्रकृति का प्रत्येक घटक महत्वपूर्ण है और अपने में अनेकों प्रकार की संभावनाएँ समाहित किये हुए है। घटनाएँ विलक्षण, आश्चर्यजनक और रहस्यमय इसलिए प्रतीत होती हैं कि अनेक वे कारण एवं नियम नहीं मालूम होते जो उन्हें एक सुनिश्चित स्वरूप प्रदान करते हैं। प्राचीन काल से लेकर अब तक मनुष्य को प्रकृति की कितनी रहस्यमय घटनाओं का ज्ञान हुआ। जिन्हें कभी आश्चर्य और चमत्कार के रूप में देखा जाता था वे आज सहज जानकारी के विषय बने हुए हैं। आदिकाल में आग का ज्ञान नहीं था। किसी तरह कहीं जंगलों आदि में आग लग जाती थी तो आदिम कालीन मनुष्य यह मानता था कि यह किसी देवी या देवता के प्रकोप का प्रतिफल है। कालान्तर में अग्नि उत्पन्न करने का विज्ञान मालूम हुआ, तो मानवी सभ्यता के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण शक्ति हाथ लग गयी।

बिजली की शक्ति प्रकृति के गर्भ में ही विद्यमान थी पर उसे करतलगत करने की विद्या हजारों-लाखों वर्ष तक अविज्ञात रही। फलतः उससे कुछ लाभ उठाते नहीं बन पड़ा। जैसे ही जिज्ञासु वैज्ञानिकों ने प्रकृति की परतों को पढ़ने एवं विद्युत शक्ति के नियमों को ढूँढ़ निकालने का प्रयत्न किया तो विकास शृंखला में एक और ऐतिहासिक कड़ी जुड़ गयी। बिजली ने दुनिया का काया ही पलट कर रख दिया। अन्धकार की गहरी तमिस्रा में डूबी रात्रि अत्यन्त डरावनी लगती थी। अब रात और दिन में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा। रात्रि का आगमन होते ही डर के मारे आदिम मानव गुफाओं में जा घुसता था, विद्युत का आविष्कार होते ही वह भय जाता रहा। अब तो रात्रि में काम की दृष्टि से यातायात, कल-कारखानों आदि में हलचल बनी रहती है। आदिम मानव यदि किसी तरह आज की विकसित दुनिया में पहुँच जाय तो उसे यहाँ सब कुछ जादू और चमत्कार जैसा प्रतीत होगा। नाभिकीय शक्ति पैरों से रौंदे जाने वाले नगण्य से परमाणु कणों में आदि काल से ही विद्यमान है। पर किसी को कहाँ जानकारी थी कि पदार्थ का सूक्ष्मतम कण भी इतना अधिक सामर्थ्यवान हो सकता है। पर जैसे ही परमाणु शक्ति का हस्तगत करने के वैज्ञानिक नियमों का पता चला एक नये युग की शुरुआत हो गयी। ऐसे युग की जिसने मनुष्य जाति को पहली बार सर्वाधिक भयभीत किया तथा यह सोचने को बाध्य किया कि प्रकृति की शक्तियों का उपयोग यदि सृजन के लिए नहीं किया गया वे मनुष्य जाति को ही एक दिन भस्मीभूत करके रख देंगी। एटामिक पावर के आधार पर अब संसार के वैज्ञानिक बड़े-बड़े सपने देख रहे हैं सृजन और ध्वंस दोनों की बातें सोच रहे हैं। सम्भावना यह की जा रही है कि अगले दिनों ऊर्जा की समस्त आवश्यकताएँ नाभिकीय स्रोत से पूरी की जायेगी। आज भी जो जातियाँ पिछड़ी और अविकसित अवस्था में हैं उनके लिए परमाणु शक्ति एक अविज्ञात आश्चर्य बनी हुई है।

विपुल प्रकृति की प्रत्येक परत महत्वपूर्ण है। प्रायः उसके मोटे रहस्य आसानी से पकड़ में आ जाते हैं, पर सूक्ष्म रहस्यों को समझने तथा सूक्ष्म शक्तियों को प्राप्त करने के लिए कठिन पुरुषार्थ करना पड़ता है। समुद्र का खारा पानी विपुल परिमाण में उपलब्ध रहता है। पर यदि मोती प्राप्त करना हो तो गोताखोर जैसा दुस्साहस जुटाना और पुरुषार्थ करना पड़ता है। पृथ्वी के गर्भ से खनिज, लोहा, तेल आदि के स्रोतों का पता लगाने के लिए उतना अधिक पुरुषार्थ नहीं करना पड़ा है जितना कि परमाणु शक्ति के आविष्कार के लिए करना पड़ा। कितने ही वैज्ञानिकों को शोध कार्यों में खपना पड़ा। तब कहीं जाकर वे सूत्र ज्ञात हुए जो परमाणु के विखण्डित तथा उत्सर्जित शक्ति के सुनियोजन के कारण बने।

अभी तक प्रकृति के बारे में जितना ज्ञात हुआ उसकी अपेक्षा अविज्ञात का क्षेत्र कई गुना अधिक है। जिन


रहस्यमयी काया का नये सिरे से अनुसंधान हो

सभी मनुष्यों की काय संरचना एक जैसी है। अस्थियाँ, जोड़, नस-नाड़ियाँ बाहरी और भीतर अवयवों का स्वरूप एवं गठन एक जैसा है। क्रिया-कलापों में भी समानता ही रहती है। साँस लेने से लेकर यात्रा करने तक की गति में नगण्य-सा अन्तर पाया जाता है। इतने पर भी आये दिन ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि संरचना में न सही, क्षमता में असाधारण अन्तर पाया जाता है। जो कार्य सर्व साधारण के लिए अकल्पनीय, अप्रत्याशित, असम्भव है उसी को दूसरा व्यक्ति ऐसी सरलतापूर्वक कर दिखाता है मानो किसी सहज स्वाभाविक क्रिया का ही सामान्य प्रदर्शन किया जा रहा हो।

यह अन्तर जादुई नहीं है। न उनके पीछे कोई वरदान चमत्कार की-भूत-प्रेत की-करामात काम कर रही होती है। होता इतना भर ही है कि प्रसुप्त क्षमताओं को जान-बूझकर जागृत किया गया अथवा वह संयोग वश अविज्ञात कारणों से सम्पन्न हो गया। असम्भव को सम्भव बनाने में निमित्त कारण क्या थे? इसकी खोज-बीन करने से पूर्व हमें इस स्थापन के सम्बन्ध में विश्वास करना चाहिए कि मानवी काया में अगणित असामान्य क्षमताएँ बीज रूप से विद्यमान हैं। सृष्टा ने उसे अपना समस्त क्रिया कौशल समेट कर बनाया है। साथ ही एक काम और भी किया है कि अपनी रहस्यमयी दिव्य क्षमताओं का सार संक्षेप इसी काय-कलेवर में इस प्रकार समाविष्ट कर दिया है कि ह सर्वसाधारण के दैनिक प्रयोगों में भले ही परिलक्षित न हो पर जागृति का आधार बनने पर वह प्रकट होने लगे।

चमत्कार उसे कहते हैं जो साधारण प्रचलन में काम न आये। यदा-कदा ही दृष्टिगोचर हो। उस प्रकटीकरण का कार्य कारण विदित न हो। वस्तुतः रहस्य ही चमत्कार है। अविज्ञात का प्रकटीकरण हो जाने पर अचम्भा भी समाप्त हो जाता है। रेल, मोटर, वायुयान, बिजली, रेडियो, टेलीविजन आदि आविष्कारों का एक दो शताब्दी पहले कहीं अता-पता न था। जब वे दीख पड़े तो लोग दाँत तले उँगली दबाकर रह गये और भूत की करतूत मानते रहे। किन्तु कुछ समय बाद उन आविष्कारों के कार्य कारण का पता चला, उपकरण बने और प्रचलन व्यापक हुआ तो वह स्थिति न रही, जिसमें जादू, चमत्कार कहकर किसी प्रकार मन को बहकाया जाता था।

प्रकृति के अपने रहस्य हैं जिनमें से अभी बहुत थोड़े ही विदित हुए हैं। जितने जाने जा चुके उनकी तुलना में उनका अनुपात असंख्य गुना बड़ा है जिनकी सत्ता का विश्वास तो हो गया है किन्तु यह पता नहीं चल सका कि उनके साथ सम्बन्ध स्थापित करने का मार्ग कहाँ होकर जाता है और कितना लम्बा है। पदार्थ विज्ञान के मूर्धन्यवेत्ता यही कहते हैं कि प्रकृति के विशाल भण्डार से जो जाना जा सका-जो पाया जा सका-वह नगण्य है। जो जानना शेष है वह इतना अधिक है कि तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर अब तक ही उपलब्धियाँ बच्चों के झुनझुने जैसी लगती हैं जबकि प्रकृति का भाण्डागार हिमालय जितना सुविस्तृत है।

चर्चा काय संरचना के संदर्भ में चल रही होगी। उसकी क्षुद्रता तो यह है कि तनिक-सी प्रतिकूलताएँ सामने आते ही दुर्बलता, रुग्णता के चंगुल में जा फँसती हैं और न केवल अपंग असमर्थ जैसी असहाय बन जाती है वरन् ऐसी पीड़ाएँ सहने के लिए भी बाधित होती है जिनकी तुलना में मरण अधिक शान्तिदायक प्रतीत होता है। एक ओर इतनी दुर्बलता, इतनी अनभिज्ञता कि चिकित्सा उपचार के सारे प्रयत्न निष्फल चले जाते हैं और नित्य कर्म तक के लिए परावलम्बी बनकर रहना पड़े। यह नगण्यता वाला पक्ष है। दूसरा वाला पक्ष ऐसा है, जिसे देखते हुए यह कहने मानने में कोई अत्युक्ति प्रतीत नहीं होती कि मानवी कार्य पिण्ड-समूचे चेतन और चेतन ब्रह्माण्ड की अनुकृति है। इसमें बीज रूप में वह सब कुछ विद्यमान है जो सृष्टा के इस विशाल सृजन में जहाँ-तहाँ परिलक्षित होता है। सौर-मण्डल का विस्तार आश्चर्यजनक है। किन्तु यदि पदार्थ की लघुतम इकाई समझे जाने वाले परमाणु का विश्लेषण किया जाय, तो प्रतीत होगा कि उसमें समूचे सौर-मण्डल की संरचना, गतिशीलता और विधि-व्यवस्था यथावत् विद्यमान है। चिनगारी में दावानल की सभी संभावनाएँ विद्यमान रहती हैं। सिन्धु के रहस्यों का आभास बिन्दु का विश्लेषण करते हुए भी जाना जा सकता है। ब्रह्माण्ड में चेतन और अचेतन स्तर का जो वैभव है उसका आभास पाने और दर्शन करने के लिए काय-कलेवर में सन्निहित रहस्यमयी विशेषताओं का पर्यवेक्षण किया जा सकता है। इस प्रयास में पिण्ड के साथ ब्रह्माण्ड की तुलना करने पर तनिक सी अत्युक्ति नहीं दीखती, वरन् संगति भली प्रकार बैठ जाती है।

काया कितनी समर्थ हो सकती है इसके अनेकानेक उदाहरण, घटनाक्रमों की साक्षी देने वाले प्रमाण इतिहास में विद्यमान हैं। इन पर अविश्वास हो तो अपने समय में भी ऐसे उदाहरण ढूँढ़े जा सकते हैं। वर्तमान की घटनाएँ उपेक्षित पड़ी रहती हैं। साधारणतया वे भूत की करतूत या जादू तिलस्म समझकर कौतूहल भर का विषय बनी रहती हैं। जब उन्हें कोई प्रामाणिक व्यक्ति खोजते हैं और विज्ञ समाज की जानकारी देते हैं तब कहीं यह प्रतीत होता है कि कहीं प्रकृति के रहस्यों की बिजली कौंध रही है। जब तक चर्चा फैलती, खोज की व्यवस्था बनती है तब तक उन चमत्कारी व्यक्ति यों या घटनाओं का अवसान काल आ धमकता है। समय बीत जाने पर उन रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण इतिहास बनकर रह जाता है। होना यह चाहिए कि ऐसे रहस्यों का परिचय मिलते ही कोई समर्थ तन्त्र उनके कारण खोजने के लिए गहराई तक उतर सकने वाले उपायों का अवलम्बन करे और भविष्य में प्रकृति के अधिक रहस्य उपलब्ध करने का द्वार खोले। पर ऐसा होता नहीं। विज्ञान का ध्यान इन दिनों सुविधा साधनों के-युद्ध विनाश के उपकरण ढूँढ़ने के प्रयत्नों में केन्द्रीभूत है। यदि यह दबाव घट सके और प्रकृति की गरिमा समझने के लक्ष्य मानकर शान्त चित्त से जुट सके तो मानवी ज्ञान-गरिमा और उच्चस्तरीय क्षमता में असाधारण अभिवृद्घि हो सकती है।

यहाँ सुविस्तृत पदार्थ जगत के बहुमुखी आधारों की चर्चा न करके मात्र काय कलेवर में सन्निहित विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला जा रहा है और उन प्रमाणों को प्रस्तुत किया जा रहा है जिनके आधार पर शरीर में सन्निहित असाधारण स्तर की क्षमताओं पर प्रकाश पड़ सके। कमाने खाने भर के तुच्छ से काम में लगी रहने वाली, और ज्यों-त्यों करके मौत के दिन पूरे करने वाली काया, कितनी समर्थ हो सकती है इसकी जानकारी उन अद्भुत उदाहरणों से मिलती है जो यदा-कदा ही जहाँ तहाँ पाये जाते हैं। इतने पर भी वे यह साक्षी देने के लिए पर्याप्त हैं कि काया उतनी तुच्छ नहीं है, जितनी कि आमतौर से समझी जाती है। उसके अन्तराल में महान सम्भावनाओं का विपुल भण्डार भरा पड़ा है।

यहाँ इस तथ्य को भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि यहाँ अपवाद काम की कोई चीज नहीं। जादू चमत्कार के लिए कहीं कोई गुँजाइश नहीं। प्रकृति का विधान व्यापक है। उसमें से जितना अनुभव अभ्यास में है वही विश्वस्त और पर्याप्त प्रतीत होता है। जो आये दिन अभ्यास में नहीं आता वही चमत्कार है। यह लोक मान्यता हुई। इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। तथ्य अपनी जगह पर सुनिश्चित है। लोक मान्यताएँ आय दिन बनती बिगड़ती रहती हैं, पर तथ्य जहाँ के तहाँ रहते हैं। प्रकृति के अगणित नियम ऐसे हैं जो मनुष्य की प्रस्तुत जानकारी से आगे के हैं। उन्हीं के संयोग मिलते बिगड़ते रहने पर ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जो मोटी दृष्टि से अपवाद, आश्चर्य या चमत्कार कही समझी जा सकें।

भूकम्प, तूफान, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, ऋतु विपर्यय, दैवी प्रकोप, वज्रपात जैसे अद्भुत घटनाक्रम कभी सामने आते हैं तो लगता है कि प्रकृति में कोई चूक हो रही है। कोई देवी देवता अपना रोष आक्रोश प्रकट कर रहा है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। ज्वालामुखी मनमौजी ढंग से नहीं फट पड़ते, उल्कापात किसी उमंग की परिणति नहीं है, अतिवृष्टि को दैवी प्रकोप नहीं कहना चाहिए वरन् ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं के पीछे भी किन्हीं अविज्ञात नियमों की शृंखला जुड़ी समझी जानी चाहिए जो इन घटनाक्रमों के लिए उत्तरदायी है। सृष्टि अनिश्चित नियमों के आधार पर चल रहीं है। पर वे सभी नियम मनुष्य की जानकारी में बँध नहीं सके। उनमें से असंख्य अभी भी पकड़ के बाहर हैं। उन्हें जैसे-जैसे जाना जा सकेगा वैसे ही यह विश्वास हो चलेगा कि जो यहाँ घटित हो रहा है वह किसी सुनिश्चित नियम प्रक्रिया के अंतर्गत ही आता है, भले ही अभी उसे समझ पाने का सुयोग हाथ नहीं लग पाया।

कभी-कभी चित्र विचित्र प्रकृति की सन्तानें मनुष्यों या अन्य प्राणियों के पेट में प्रसव होती देखी गई हैं। यह विज्ञान क्रम के विरुद्ध है इतने पर भी यह नहीं कहा जाता है कि भ्रूण विज्ञान के आधारभूत सिद्धान्तों में ऐसी विचित्रताओं के लिए गुँजाइश नहीं है। गर्भ प्रणाली में कारणवश हेर-फेर होने पर वे नियम अपना काम करने लगते हैं जो सामान्यतया प्रकट नहीं होते। इतने पर भी किसी विचित्र आकृति वाले प्रजनन को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति के अनन्त नियम निर्धारणों का यहाँ उल्लंघन हुआ। सृष्टि व्यवस्था में किसी उच्छृंखलता की तनिक भी गुंजाइश नहीं है। उसमें कभी राई रत्ती भी व्यतिक्रम हुआ तो समझना चाहिए वर्तमान सृष्टि व्यवस्था का-प्रकृति प्रक्रिया का-अन्त हो गया। प्रलय आ पहुँची और किसी अन्य प्रकार की प्रकृति के बनने का कोई अद्भुत समय आ गया। किन्तु जब तक अपनी दुनिया अपने सामने है तब तक यही मानकर चलना होगा कि यह व्यतिक्रम, अपवाद जैसी गुँजाइश कहीं भी नहीं है। यह दूसरी बात है कि उन रहस्यों के आधारभूत कारणों से अपरिचित रहने के कारण अप्रत्याशित घटनाओं की प्रकृति का व्यतिक्रम या दैवी प्रकोप कहकर मन को समझाने, बहकाने का प्रयत्न करें। हमें यही मानकर चलना होगा कि सृष्टिक्रम सुनिश्चित और सुव्यवस्थित है। जो घटना एक जगह घटित हुई वह दूसरी जगह भी उसी रूप में घटित हो सकती है। जो अवसर संयोगवश आ धमके, उन्हें तथ्यों की जानकारी होने पर मानवी प्रयत्नों से भी सम्भव करके दिखाया जा सकता है।

मानवी काया द्वारा यदा-कदा अद्भुत सामर्थ्य का प्रकटीकरण होता है। उन्हें कौतुक कौतूहल में नहीं उड़ा दिया जाना चाहिए कि इस प्रकार का नियम विधान इस सृष्टि में मौजूद है। उसे जाना और प्रयोग में लाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि आज की आश्चर्यजनक घटना कल स्वाभाविक क्रम में सम्मिलित न हो सके। मनुष्य द्वारा किये जा सकने वाले स्वेच्छा प्रयोग की परिधि में न आ सके। बालक आश्चर्य करते रहें-इसमें बड़ों को क्या लेना देना? उन्हें तो उस आश्चर्य के आधारभूत कारण को समझ सकने योग्य गहरी डुबकी लगानी चाहिए और प्रयत्न यह करना चाहिए कि उन अविज्ञात रहस्यों को जाना जाय जिसके कारण ऐसे असामान्य घटनाक्रम उपस्थित होते हैं। यदि वे अनुपयुक्त हैं तो भावी सम्भावना में उन्हें न जुड़ने देने का प्रयत्न किया जाय। यदि वे उपयुक्त हैं तो यह प्रयास किया जाय कि उस प्रकार की विशिष्टता उपलब्ध करने, कराने के लिए हमें क्या प्रयत्न करने होंगे, क्या साधन जुटाने होंगे।

विज्ञान अनुसंधान की परम्परा यही रही है कि किसी विचित्रता का आभास मिला तो उसके कारण ढूँढ़ने के लिए एकनिष्ठ तन्मयता के साथ जुटा गया। सफलता असफलता के-आशा निराशा के ज्वार-भाटों में गिरते उभरते वे प्रयत्न समयानुसार फलित हुए और आभास के आधार पर लगाये गये अनुमान का रहस्य जानने में कृत कार्य बन गया। हर वैज्ञानिक अन्वेषणों का यही इतिहास रहा है और आगे भी रहेगा। ऐसी दशा में भावी शोध प्रक्रिया में एक नया विषय और सम्मिलित करने की गुँजाइश है कि मानवी कार्य काया में समय-समय पर प्रकट होने वाली विलक्षणताओं-विचित्रताओं का रहस्य ढूँढ़ निकाला जाय। ज्ञान की अनन्त पिपासा लेकर जन्मे मनुष्य ने आदिम काल से लेकर अब तक लम्बी मंजिल पार की है। भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों में ऐसी अगणित विभूतियाँ उपलब्ध की हैं जिन पर सोचने की अभी तो अपने को फुरसत नहीं, किन्तु एक क्षण के लिए आदिम काल में पहुँचने की कल्पना करके उस समय को कठिन परिस्थितियों और आज की स्वर्गोपम सुविधाओं को तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि लम्बे अतीत में आविष्कार अनुसंधान के क्षेत्र में कितनी कुछ सफलता हस्तगत की जा चुकी।

जो अतीत से लेकर अब तक की प्रगति यात्रा में ही सका, वह उपक्रम अब से लेकर भविष्य में भी चलता रहेगा। जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं हो सकती। शोध प्रयत्नों को कभी विराम नहीं लग सकता । लगा तो समझा यह जाना चाहिए कि वर्तमान के साथ अवरुद्ध होने की जड़ता जकड़ गई, उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना समाप्त हो गई। ऐसा न तो हो सकता है और न होना चाहिए। ज्ञान अनुसंधान के भावों प्रयत्नों में एक महत्वपूर्ण कड़ी यह जुड़नी चाहिए कि मानवी काया कितनी समर्थ है। उस समर्थता का रहस्य खोजा जाय और यह प्रयत्न किया जाय कि मनुष्य यदि संयोगवश घटित होने वाली घटनाओं को सरल स्वाभाविक क्रम में सम्मिलित कर सके तो वह कितना सुखी और समर्थ हो सकता है। पदार्थ की खोज में काय-कलेवर का अनुसंधान भी सम्मिलित रहना चाहिए। न केवल पदार्थों की उपयोगिता तथा उनकी इच्छानुरूप प्रयोग की प्रक्रिया जानना चाहिए वरन् हमें कार्य क्षेत्र में भी आगे बढ़ना चाहिए और इस प्रयास से निरत होना चाहिए कि आज जिस काय कलेवर को तुच्छ असहाय माना जाता है। वह भविष्य में समर्थता की अभिवृद्घि करते हुए उस स्तर तक पहुँच सके जिसे अब तक देव दानव की विशेषता भर माना जाता रहा है।


जीवकोषों और जीवाणुओं के पहियों पर लुढ़कता जीवन संकट

जिस प्रकार इस सुविस्तृत दृश्य जगत में मनुष्य सहित अनेकानेक प्राणी निर्वाह करते हैं उसी प्रकार काया को एक समूचा विश्व-ब्रह्माण्ड माना जाए तो उसमें सूक्ष्मीजीवीकोश घटकों का सुविस्तृत प्राणि समुदाय अपने ढंग का निर्वाह करते और निर्धारित क्रिया कलाप में संलग्न रहते पाया जाएगा ।

शरीर एक दीखता भर है पर अनेकानेक घटकों का समुच्चय है। चट्टान एक दीखती भर है वस्तुतः उसके अन्तराल में अगणित अणु परमाणुओं का समुच्चय गठित एवं सक्रिय देखा जा सकता है। वही बात शरीर के सम्बन्ध में भी है। आँखों से— हाथ-पाँव आँख, कान, हृदय, गुर्दे आदि बाहरी और भीतरी अवयव ही अनुभव में आते हैं किन्तु वास्तविकता इससे आगे है। असंख्य जीव कोशों से मिलकर काया के अवयवों का गठन हुआ है। वे कोश अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने ढंग की आकृति प्रकृति बनाये रहते हुए भी− अपनी −अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी समूची काया की समृद्धि सुरक्षा में समान रूप से भाग लेते और मिलजुलकर काम करते हैं। जीव कोशों की अपनी दुनियाँ है और ऐसी हैं जिसे समझने पर आश्चर्य का पारावार नहीं रहता ।

मास्को के जीव वैज्ञानिक प्रो. तारासोव ने यह देखकर ही बताया था कि मनुष्य शरीर का प्रत्येक सेल एक टिमटिमाते हुए दीपक की तरह है, कुल शरीर ब्रह्माण्ड के नक्षत्रों की तरह− तो यह सुक्ष्मतम चेतना ही उसमें जीवन है।

मानव शरीर की आधारभूत इकाई है− जीवकोश (बाँयोलाजीकल सेल) शरीर में साठ अरब के लगभग कोशिकाएँ हैं। प्रत्येक कोश हजारों पावर स्टेशन, परिवहन संस्थान एवं संचार संस्थानों की मिली जुली व्यवस्था के रूप में एक सुसंचालित बड़ा शरीर है।

वैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे परमाणुओं− कोशिका सदस्यों [सेल्स] से बना है, वह टूटती रहती हैं और नये स्वस्थ कोशों का निर्माण करती रहती है। जैसे सर्प की त्वचा के कोश कुछ दिन में अलग होकर एक झिल्ली (केंचुल) के रूप में अलग हो जाते हैं, मनुष्य की त्वचा के कोश भी 5 दिन में नये बदल जाते हैं। 80 दिन में सारे शरीर की त्वचा बिलकुल नई हो जाती है, पुरानी का पता नहीं चलता कि सड़-गलकर कहाँ चली गई।

डा. केनिथ रोंसले ने अनेक सूक्ष्म प्रयोगों के बाद बताया कि मनुष्य के कोशों [ सेल्स] को नितान्त स्वस्थ रखना सम्भव हो, उनमें किसी प्रकार की गड़बड़ी न आये तो गुर्दे 200 वर्ष, हृदय 300 वर्ष तक जीवित रखे जा सकते हैं। इसके बाद उन्हें बदला भी जा सकता है। हृदय प्रतिरोपण के कई प्रयोग तो बहुत ही अधिक सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त चमड़ी, फेफड़े और हड्डियों को तो क्रमशः 1000,1500 और 4000 वर्षों तक भी जीवित रखा जा सकता है।

जीवविज्ञान में हुई आधुनिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि प्रौढ़ावस्था के मनुष्य शरीर में प्रायः 600 खरब कोशिकाएँ होती हैं। इनमें से प्रति सेकेण्ड लगभग 5 करोड़ नष्ट होती रहती है और उतनी ही नई उत्पन्न होती रहती है।

जीवकोष का विभाजन होकर एक से दो में परिवर्तित हो जाना भी एक मूलभूत कोशीय प्रक्रिया है। “दिन कन्सेप्ट आफ किटिकल सेल मास” थ्योरी के अनुसार प्रत्येक कोश का विभाजन उसके अन्तरंग से सम्बन्ध रखता है। कोश के एक से दो होने की प्रेरणा बाहर से नहीं आती। वह कोश के अन्दर से ही उपजती है। जब कोश का भार किसी निश्चित भार से अधिक हो जाता है तो वह दो में विभक्त हो जाता है। कोश को विभाजित होनी चाहिए, ऐसी कोई सूचना बाहर से नहीं आती।

यह प्रक्रिया उन वैदिक मान्यता से बिलकुल मेल खाती है− जिसमें कहा गया है कि जीव का उद्भव एक अन्तःस्फुरणा से हुआ। यदि जीवन मात्र रसायनों पर आधारित होता तो अधिक रसायन मिलने पर कोश, अवश्य एक से दो में विभाजित हो जाता।

मनुष्य शरीर की समस्त 60−70 खरब कोशिकाओं को यदि खींचकर लम्बाई में बढ़ाया जाय तो वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के विस्तार के बराबर अर्थात् अब तक की खोज के अनुसार (186,000 & 60 & 60 & 24 & 365 & 50,00,00,000) मील लम्बाई का फीता होगा। इतने लम्बे फीते में प्रत्येक कोश में 1 अरब अक्षरों के हिसाब से उपरोक्त संख्या में इसका गुणा करने से जो संख्या बनेगी, उतने अक्षरों की और उन अक्षरों से बने शब्दों की स्मृति मनुष्य रख सकता है। ऐसा मनुष्य लगभग सर्वज्ञ ही हो सकता है। भारतीय योग दर्शन में यह बताया जाता है कि योगसिद्ध व्यक्ति संसार में जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ होगा और जो हो गया है, वह सब कुछ जानते हैं। इस तथ्य को स्थूल घटनाओं के आधार पर 5 फीट 6 इंच लम्बे 120 पौण्ड भार के शरीर में जो कुछ है आश्चर्य नहीं, बीज और संस्कार रूप में वह सब एक जीवकोष में विद्यमान रहता है। शरीर शास्त्रियों का मत है कि कोश स्थित गुण सूत्र (क्रोमोसोम) और संस्कार सूत्र (जीन्स) में वे सबके सब शारीरिक और मानसिक लक्षण एवं विशेषताएँ विद्यमान रहती हैं, जो आगे चलकर मनुष्य शरीर में, परिपक्व होने वाली होती हैं।

कोशिकाओं की आन्तरिक संरचना में एक महत्वपूर्ण आधार हैं− माइटोकाण्ड्रिया। इसे दूसरे शब्दों में कोशिका का पावर हाउस-विद्युत भण्डार कर सकते हैं। भोजन, रक्त , माँस अस्थि आदि से आगे बढ़ते-बढ़ते अन्ततः इसी संस्थान में जाकर ऊर्जा का रूप होता है। यह ऊर्जा ही कोशिकाओं को सक्रिय रखती है और उनकी सामूहिक सक्रियता जीवन संचालक के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस ऊर्जा को लघुतम प्राणाँश कह सकते हैं। काय-कलेवर में इसका एकत्रीकरण महाप्राण कहलाता है और उसी की ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना विश्व-प्राण या विराट् प्राण के नाम से जानी जाती है।

जीव कोशों का एक भाग वह है जो प्रजनन की प्रक्रिया पूर्ण करता है। इन्हीं के समन्वय से शुक्राणु डिम्बाणु बनते हैं और परस्पर मिल कर भ्रूण का रूप धारण करते हैं।

शुक्राणु और डिम्बाणु जब दोनों मिलते हैं तो दोनों की पूर्व सत्ता− पूर्व स्थिति पूर्णतया समाप्त हो जाता है। मिलने से पूर्व उन दोनों का अपना-अपना स्परुप, कलेवर था, पर निषंचन के बाद उस पूर्व स्थिति का पूर्णतया समापन हो जाता है। दोनों की एक सम्मिलित स्वतन्त्र स्थिति बनती है। दो मिलकर सदा के लिए अविच्छिन्न रुप से एक हो जाते हैं। इससे पूर्व शुक्राणु को डिम्बाणु तक पहुँचने में इतनी लम्बी यात्रा करनी पड़ती है जिसे एक मनुष्य द्वारा पूरी पृथ्वी की यात्रा करने जितना माना जा सकता है।

भ्रूण कमल आरम्भ में बाल की नोंक के बराबर होता है किन्तु वह एक महीने के भीतर ही इतनी प्रगति करता है क आकार में 50 गुना और वजन में 8 हजार गुना बढ़ जाता है।

दूसरे महीने में उसका क्रम बढ़ता ही चला जाता है। पहले महीने की तुलना में उसकी लम्बाई छः गुनी और वजन पाँच सौ गुना बढ़ता है। ज्ञानेन्द्रियों के निशान रीढ़ की हड्डी, अस्थियों का ढाँचा, तंत्रिकाओं का जाल इसी अवधि में विनिर्मित होने आरम्भ हो जाते हैं।

मानव शरीर की इस अभेद्यता-सुरक्षा संस्थान के शरीर विज्ञानी पाँच आधार बताते हैं—

शरीर की विभिन्न सतहों पर विद्यमान ‘जीवाणु फ्लोरा।’

त्वचा व श्लेष्मा झिल्लियों (म्यूकस मेम्ब्रेन्स) का यांत्रिक रासायनिक एवं जैविकी अवरोध।

रक्त तथा ऊतकों में पायी जाने वाली जीवाणु पक्षियों की विशाल सेना।

जीवाणु संक्रमण की स्थिति में शरीर में होने वाली सहज प्रतिक्रियाएँ।

विशिष्ट जीवाणुनाशक उपाय-ह्य मरल एवं कोशों के माध्यम से होने वाली इम्यून सिस्टम (प्रति रोधी संस्थान ) की प्रबल प्रक्रियायें।

ये पाँचों ही उपाय ऐसे हैं जिनके कारण शरीर को एक अभेद्य-पूर्ण सुरक्षित दुर्ग की संज्ञा दी जा सकती है। स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को कुछ नहीं करना है, मात्र इस संस्थान को सामर्थ्यवान् बनाये रहना है।

जीवित प्राणियों में जीवाणु सबसे छोटा होता है। इसका आकार 1।2400 इंच से भी कम होता है। इसकी प्रजनन दर काफी है। कुछ ही सेकेण्डों में वे अपने ही जैसे हजारों जीवाणु पैदा कर सकते हैं। एक जीवाणु में दस मिनट के अन्दर ही प्रजनन क्षमता आ जाती है और 22 घण्टे में वह एक लाख 70 करोड़ जीवाणु पैदा कर डालता है। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता। अणुवीक्षण यन्त्र के सहारे ही इन्हें 800 से 2000 गुना अभिवर्द्धन में देखा जाना सम्भव है। यह जीवाणु भी जीव की सूक्ष्म तम स्थिति नहीं वरन् कोई बीच का रोग उत्पन्न करने और वस्तुओं के गुण बदलने वाली जाति हैं। जीवधारी के सूक्ष्मतम जीव द्रव्य की लघुता का तो अभी कोई अनुमान नहीं नहीं किया जा सका।

विश्व के और प्राणी तो गर्भाधान से बच्चे पैदा करते हैं, पर यह सूक्ष्म जीवाणु अमीबा जैसे स्वयं ही नई सृष्टि पैदा करने की स्थिति में होते हैं, उससे पता चलता है कि केन्द्रक या दिखाई देने वाले नाभिक के भीतर कोई ऐसी विलक्षण शक्ति है, जो या तो अक्षय शक्ति का भण्डार या विश्व-चेतना का मूल है, सृष्टि में जो भी स्पन्दन और स्फुरण हैं, सब उसी की इच्छानुसार होता रहता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर लगभग 70 खरब कोशिकाओं का एक विराट् जगत है, प्रत्येक कोश के अन्दर 46−46 गुणसूत्र विद्यमान हैं।

प्रत्येक स्त्री-पुरुष में 2घात 23 अर्थात् 8388608 जनन कोशिकाओं बनाने की क्षमता है, इनमें से कोई भी शुक्राणु गर्भाधान की क्रिया में भाग ले सकता है। स्त्री के 23 में से कोई या पुरुष के 23 में से कोई अर्थात् प्रत्येक जीवकोष के अन्दर 2घात 46 तरह के बच्चे पैदा करने की क्षमता है। यह तो केवल 46 गुणसूत्रों का हिसाब है। प्रत्येक गुणसूत्र 10 हजार जीन्स से बने होते हैं इस तरह 2 घात 46 और उसके गुणनफल से जो संख्या आये उसके 10000 घात इतने प्रकार का प्राणिजगत् एक मनुष्य के भीतर भरा हुआ हैं। जबकि सारी पृथ्वी की जनसंख्या ही कुल 2 घात 23 और 2 घात 23 के बीच में है। यदि सूक्ष्म का अन्त केवल जीन है तो ही एक मनुष्य के अन्दर सारी सृष्टि विद्यमान् माननी चाहिये, यदि जीन्स की भी कोई इकाई निकल आई तब तो वैज्ञानिक एक यह देखेंगे कि शुक्र, शनि, बुध, मंगल सहित 50 करोड़ प्रकाश वर्षों और 10 करोड़ निहारिकाओं वाला विराट् ब्रह्माण्ड मनुष्य के भीतर ही विराजमान् है।

जीव कोशों और जीवाणुओं का तालमेल किस प्रकार बैठता है और वे कि प्रकार अन्योऽन्याश्रित कहकर सहयोगपूर्वक शरीर मात्रा की सुव्यवस्था में जुटे रहते हैं यह देखने से प्रतीत होता है कि स्थिरता सुरक्षा और प्रगति के लिए पारस्परिक सहयोग कितना आवश्यक है। जिस आधार पर शरीर की भीतरी यात्रा व्यवस्था चल रही है उसी को बहिरंग जगत मैं-बाह्य जीवन में प्रमुख करके हम और समृद्धि और प्रगति के मार्ग पर चल सकते हैं, सुखी रह सकते हैं।


VigyapanSuchana

यदि जीवाणु या अन्य कणों की मात्रा अत्यन्त अधिक हो इस सामान्य क्रिया को शरीर अन्य सामयिक तरीकों से बढ़ा देता है, इनमें से छींकना तथा खाँसना प्रमुख है। इन दोनों क्रियाओं द्वारा श्वास अत्यन्त वेग से बाहर फेंका जाता है, जिससे जीवाणु या विजातीय कणों युक्त धूल अन्दर प्रवेश न कर पाए। कितने वेग से शरीर इस बाह्य आक्रमण का विरोध करता है-इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि खाँसी के समय बाहर निकलने वाली हवा की गति, ध्वनि की गति 360 मीटर प्रति सेकेण्ड के लगभग होती है।


विचित्रता से भरी यह मानवी काया

मानवी काया एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है। सृष्टा की विनिर्मित एक ऐसी प्रयोगशाला जिसमें एक से बढ़कर एक-बहुमूल्य-अद्भुत और अनोखे यन्त्र हैं। पिण्ड और ब्रह्माण्ड के अनेकानेक सूक्ष्म रहस्यों को जानने में ये यन्त्र महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकते हैं। मनुष्य उपलब्ध शरीरगत एवं मनोगत सामर्थ्य का अधिकाँश भाग प्रायः खाने, पीने, सोने,और श्रम करने जैसे सीमित प्रयोजनों में खर्च कर देता है। उसे यह अनुमान भी नहीं रहता है कि प्राप्त शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का नियोजन पिण्ड शारीरिक एवं ब्रह्माण्ड के सूक्ष्मत्तर रहस्यों को जानकर अनेकों प्रकार की उपलब्धियाँ करतलगत कर सकता है। ऐसी सामर्थ्य उपार्जित कर सकता है जो सामान्यतः अन्य प्रकार के भौतिक प्रयत्नों से सम्भव नहीं है।

पदार्थ के नाभिक में प्रचण्ड शक्ति का भण्डार आदिकाल से ही विद्यमान है। पर जब तक उसकी जानकारी नहीं थी, पदार्थ सत्ता का मोटा उपयोग ही हो पाता था। विपुल शक्ति का स्त्रोत मौजूद होते हुए भी उससे कुछ विशेष लाभ उठाते लम्बे समय तक नहीं बन पड़ा । कारण था उन नियमों से अपरिचित होना जो नाभिकीय शक्ति को अर्जित करने के कारण थे। जैसे ही वे सूत्र हाथ लगे कि परमाणु शक्ति को कैसे कुरेदा और कैसे उपयोग में लाया जाय तो युग ने एक महान करवट ली। मनुष्य ज्योति ने शक्ति के क्षेत्र में डायनामाइट युग से परमाणु युग में छलाँग लगायी और अब परमाणु शक्ति के आधार पर बड़े-बड़े सपने देखे जा रहे हैं।

ठीक इसी प्रकार की अनेकानेक असंख्यों संभावनाएँ प्रकृति के गर्भ और मानवी पिण्ड में मौजूद हैं जो अविज्ञात हैं। मनुष्य की काया स्वयं में एक विलक्षण संरचना है। शरीर शास्त्रियों को अभी सामान्य स्थूल जानकारी मिल सकी हैं। परमाणु नाभिक की तरह शरीर में भी ऊर्जा का प्रचण्ड भण्डार भरा पड़ा है। उसे किस तरह जगाया और उपयोग में लाया जाय विज्ञान इससे अभी अपरिचित है। प्रकृति कभी-कभी विलक्षण घटनाओं के सहारे इस तथ्य का बोध कराती है कि मानवी काया में इतनी प्रचण्ड विद्युत भरी पड़ी है कि यदि वह फूट पड़े तो शरीर को ही भस्मीभूत कर सकती है। ऐसी रहस्यमय घटनाओं के उदाहरण आये दिन मिलते रहते हैं।

काउडर स्पोर्ट, पेन्सिलवानिया में डाँन,ई. गास्नेल मीटर रीडिंग का काम करता था। इसी क्षेत्र में एक वृद्ध फिजिशियन डा. जान इर्विन वेन्टले रहते थे। वृद्ध होते हुए भी वे पूर्णतया स्वस्थ थे। 5 दिस.1966 को नित्य की तरह डान गास्नेल मीटर रीडिंग के लिए निकला। डा. जान डर्विन वेन्टले के दरवाजे पर उसने दस्तक दी। प्रत्युत्तर न मिलने पर उसने आवाज लगायी फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला। वह मकान के ही एक पाइप के सहारे ऊपर के कमरे में पहुँचा। कारण यह था कि ऊपर कमरे की ओर से एक विचित्र प्रकार की जलने की गन्ध आ रही थी। कमरे में पहुँचकर देखा तो वहाँ से हल्का नीला धुँआ उठ रहा था। कमरे की सतह पर राख की ढेर पड़ी हुई थी। अन्दर कमरे का दृश्य अत्यन्त वीभत्स था। डा. वेन्टले का दाहिना पैर जूते सहित मात्र अधजली स्थिति में पड़ा था। अवशेष शरीर के सभी अंग जलकर राख हो गये थे। विशेषज्ञों न भली−भाँति घटना का अध्ययन किया और अन्ततः स्वतः जलने की संज्ञा दी। ऐसा कोई सुराग नहीं मिला जो किसी अन्य प्रकार से आग लगने की पुष्टि कर सके। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि कमरे से निकलने वाली दुर्गन्ध माँस के जलने जैसी न होकर मीठी महक से युक्त थी।

इसी तरह की एक घटना जुलाई 1951 के एक दिन प्रातः सेन्द पीटर्स वर्ग फ्लोरिडा में घटी। ‘मेरीरिजर’ नामक एक अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट महिला अपनी कुर्सी पर ही बैठे-बैठे जल गयी। इस कायिका दहन की विशेषता यह थी कि भयंकर अग्नि शरीर से निकली-उसे जलाती रही पर मात्र एक मीटर के घेरे तक ही सीमित रही। ‘मेरी’ का 80 किलो वजनी शरीर पूर्णतया भस्मीभूत होकर चार किलो राख में परिवर्तित हो गया। वेन्टले की भाँति उसका भी एक पैर अध जला उस घेरे में बच गया था। खोपड़ी सिकुड़ कर सन्तरे के आकार में बदल गयाी थी।

अवशेषों की जाँच के लिए पेन्सिलनवानिया स्कूल आफ मेडिसीन के फिजिकल एन्थोपोलाजी के प्रोफेसर डा. ‘विल्टन क्रोगमैन के पास भेजा गया तो खोपड़ी की आकृति को देखकर वे आश्चार्य चकित रह गये। वह एक ख्याति प्राप्त फरेंसिक वैज्ञानिक थे तथा वर्षों का अनुभव था। जब तक की घटनाओं में ऐसी कोई घटना उनके पास नहीं आयी थी कि जलने के उपरान्त खोपड़ी सिकुड़ कर छोटी हो गयी हो। क्योंकि विज्ञान के नियमानुसार जलने के बाद खोपड़ी को या तो फूल जाना चाहिए अथवा टुकड़े-टुकड़े हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस विचित्र अग्निकाण्ड में खोपड़ी का सिकुड़कर छोटा हो जाना निस्सन्देह एक आश्चर्य जनक बात है। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने यह बताया कि बारह घण्टे तक लगातार तीन हजार डिग्री फारेनहाइट तापक्रम पर रहने पर भी शरीर की सम्पूर्ण हड्डियाँ भस्मसात् हो गयी हों ऐसा अब तक देखा-सुना नहीं गया था। पर यह घटना अपने में सबसे विलक्षण है जिसकी यथार्थता पर बिलकुल ही सन्देह करने की गुँजाइश नहीं है।”

पेरिस 1851 में घटी एक घटना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। ग्रेट मिस्ट्रीज पुस्तक जिसके लेखक हैं इलेनार दान जान्डट तथा ‘राय स्टेमन’ पुस्तक में वर्णित घटना के अनुसार एक व्यक्ति में अपने एक मित्र से शर्त लगायी कि वह जलती मोमबत्ती को निगल सकता है। सत्यता को परखने के लिए दूसरे मित्र ने उसकी ओर तुरन्त एक जलती मोमबत्ती बढ़ा दी। जैसे ही उस व्यक्ति ने निगलने के लिए मोमबत्ती को अपने मुँह की ओर बढ़ाया वह जोर से ही चिल्लाया। मोमबत्ती की लौ से उसके होठों पर नीली लौ दीखने लगी। आधे घण्टे के भीतर ही पूरे शरीर में आग फैल गयी और कुछ ही समय में उसने शरीर के अंगों, माँस पेशियों, त्वचा एवं हड्डियों को जलाकर राख कर दिया।

नैशविल यूनिवर्सिटी के गणित विभाग के प्रो. जेम्स हैमिल्टन ने आपबीती एक घटना का उल्लेख किया है 1835 में वे उक्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि “एकाएक मुझे अपने बायें पैर के निचले हिस्से मे तीव्र जलन महसूस हुई। झुककर उस भाग को देखा तो स्तम्भित रह गया। जलन वाले भाग से लगभग दस से. मी. लम्बी लौ निकल रही थी। यह लौ ठीक उसी प्रकार की थी जैसी कि लाइटर आदि जलाने से निकलती है। पर कुछ ही क्षणों बाद वह अपने आप बुझ गयी। आग किन किरणों से लगी और बुझ गयी यह रहस्य आज भी हमारे लिए अविज्ञात है।”

फ्रान्सिस हिचिंग की पुस्तक दी वर्ल्ड एटलस आफ मिस्ट्रीज में सन् 1938 का एक अमेरिकी घटना का उल्लेख है कि गर्मी के मौसम में एक दिन नारफाक ब्राड्स नामक स्थान पर नौका विहार कर रही एक महिला के शरीर से अग्नि की लपटें फूट पड़ीं। साथ में उसके पति और बच्चे भी थे। पानी से आग बुझाने का प्रयास किया गया। पर उस भभकती अग्नि पर काबू नहीं पाया जा सका। वह मेरी कारपेन्टर के शरीर को भस्मीभूत करके अपने आप बुझ गयी।

‘स्पान्टेनियस ह्मन कम्बस्टन की घटनाओं की शृंखला में बिहार के भागलपुर जिले की दो वर्षों पूर्व सूर्यग्रहण के अवसर पर घटी एक घटना का उल्लेख यहाँ करना समीचीन होगा। एक युवक अपने घर के आँगन में मौन बैठा था। बारम्बार घरवालों के पूछने पर उसने बताया कि आज उसके कथन की ओर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर तक वह सूर्य की ओर मुँह किये ताकता रहा। अचानक उसके शरीर से अग्नि की नीली ज्वालाएँ फूटने लगीं। घर के सदस्यों ने शरीर पर पानी फेंका तथा कम्बल से ढक दिया था पर शरीर उस तीव्र ज्वाला में बुरी तरह झुलस गया। आग तो बुझ गयी पर उसे बचाया न जा सका। अस्पताल में पहुँचने पर उसने दम तोड़ दिया।

शरीर शास्त्रियों क मत है कि शरीर की कोशिकाओं का तापक्रम अकस्मात् इतना अधिक बढ़ जाय, ऐसा जीव विज्ञान के अनुसार असम्भव है। आग का स्वतः उत्पन्न हो जाना भी एक अविश्वसनीय घटना है। पर उपरोक्त प्रामाणिक घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं कि मानवी काया में ऊर्जा का प्रचण्ड सागर भरा पड़ा है। शरीर विज्ञान के अब तक ज्ञात नियमों के आधार पर शरीर में अचानक आग लग जाने तथा उसके भस्मसात् हो जाने के कारणों की अब तक व्याख्या विवेचना नहीं हो सकी है। वे सूत्र भी पकड़ में नहीं आ सके जिनके कारण शरीर का तापक्रम तीन हजार डिग्री फारेनहाइट तक अचानक बढ़ गया। पर मात्र कारण न समझ में आने से तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता घटनाओं की विवेचना वैज्ञानिक आधार पर कर सकने के अभाव में उनकी सत्यता को झुठला दिया जाय, यह सम्भव नहीं है।

शरीर विज्ञान अभी अपनी बाल्यावस्था में है स्थूल काया के विषय में उसे मात्र उथली जानकारियाँ ही प्राप्त हो सकी है। अविज्ञात का क्षेत्र कई गुना अधिक है रहस्यों की पिटारी मानवी काया में शक्ति के कितने ही ऐसे सूक्ष्म स्रोत मौजूद हैं जिनसे शरीर शास्त्री पूर्णतया अपरिचित है। उदाहरणार्थ शरीर में स्वतः आग फूट पड़ने की घटनाओं का उल्लेख किया जा चुका है। यह तो एक उदाहरण मात्र है। सूक्ष्म कायिक क्षेत्र में ऐसी असंख्यों संभावनाएँ विद्यमान है जो प्रसुप्तावस्था में हैं। अपरिचित होने के कारण उन सूक्ष्म शक्ति स्रोतों का मनुष्य कुछ उपयोग नहीं कर पाता। पेट और प्रजनन के इर्द-गिर्द ही वह जीवन पर्यन्त चक्कर काटता-अपने धर्म, सामर्थ्य का अधिकाँश भाग नियोजित रखता है। शरीर की सूक्ष्मत्तर शक्ति यों को जानने और उन्हें जागृत करने के लिए वह साँसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने जैसा ही पुरुषार्थ कर सकने का साहस जुटा सके तो उसकी स्थिति आज की तुलना में सर्वथा भिन्न बेहतर हो सकती है। संसार की प्रयोगशालाओं में कितने ही प्रकार के प्रयोग परीक्षण चलते रहते हैं। एक प्रयोगशाला प्रकृति द्वारा मनुष्य को भी दी गयी है जो अपने में परिपूर्ण अमूल्य यन्त्रों से सुसज्जित है। प्रकृति पिण्ड की विलक्षण घटनाओं के माध्यम से यह सन्देश देती है कि इस अन्तर्गत की प्रयोगशाला में भी प्रयोग परीक्षण किया जाय। शरीर की जो प्रचण्ड ऊर्जा जो किन्हीं अविज्ञात व्यतिरेक से काया को जलाकर राख कर सकती है, उसे शरीर में प्रदीप्त करने तथा नियन्त्रण करके सुनियोजन द्वारा सदुपयोग करने की विद्या का ज्ञान हो सके तो उसके सहारे कितने ही महत्वपूर्ण कार्य हो सकते हैं।


ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के दस प्रयोग प्रयोजन

विज्ञान और बुद्धिवाद का पिछली शताब्दियों में असाधारण रूप से विस्तार हुआ है। तर्क को मान्यता मिली है और कुछ स्वीकार करने से पूर्व तथ्य, प्रमाण और उदाहरण की माँग की जाती है। उस प्रवाह को अब रोका नहीं जा सकता। अगली पीढ़ी तार्किकों की होगी। उनका समाधान तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किये बिना हो नहीं सकेगा। इस सामयिक यथार्थता को समझा जाना चाहिए।

अध्यात्म एक तर्क सम्मत विज्ञान है। उसके आधार पर चेतना का परिशोधन, परिष्कार एवं उत्कर्ष सम्भव होता है। शरीर सुविधा के लिये जिस प्रकार साधन सम्पदा चाहिए उसी प्रकार व्यक्ति त्व को महामानव स्तर तक विकसित करने के लिए उच्चस्तरीय आस्थाओं की आवश्यकताओं पड़ती है। आस्थाएँ तत्त्वदर्शन पर निर्भर है। उन्हीं को प्रेरणा से बुद्धि तन्त्र एवं श्रम तन्द्ध काम करता है। जीवन का स्वरूप इन्हीं के समन्वय से बनता है। वैभव से सुविधाएँ बढ़ती हैं तो आस्थाओं से अन्तराल विभूतिवान् बनता है। इसी कारण दूरदर्शी मनीषियों ने मनुष्य के लिये सम्पत्ति उपार्जन की तरह आत्म परिष्कार के लिये भी प्रयत्नरत रहना आवश्यक माना है। वैभव का उपार्जन उपभोग करने में तो भौतिकी की सहायता लेनी पड़ती है और चेतना को विभूतिवान् बनाने के लिये आत्मिकी की। दोनों का निर्वाह करना व समान महत्व दिया जाना आवश्यक है।

आत्मविज्ञान पिछले दिनों श्रद्धा पर अवलम्बित रहा है। श्रद्धा भी एक विज्ञान है। किसी निश्चय पर पहुँचने में जितना तर्क प्रमाण का योगदान है, उतना ही प्रयोजन श्रद्धा के अवलम्बन से सध जाता है। उसकी सामर्थ्य निश्चित रूप से इतनी है कि अपने प्रतिपादन को सत्य की तरह श्रद्धालु के मस्तिष्क में उतार सके। इसीलिये प्राचीनकाल में यह सरल समझा गया कि लोग श्रद्धा अपनाये, आप्त निर्धारणों पर विश्वास करें और तद्नुरूप अपनी दिशाधारा का निर्धारण करें, आज को स्थिति भिन्न है। अध्यात्म तत्त्वज्ञान के प्रति अनास्था इस कारण बढ़ती जाती है कि श्रद्धा को मान्यता नहीं दी जा रही, और तत्सम्बन्धी प्रतिपादनों को तर्क, प्रमाण के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा रहा।

संकट टालना हो तो प्रवाह उलटना पड़ेगा। इसके लिये आवश्यकता है कि जनमानस की उत्कृष्टता अपनाये रहने वाली अध्यात्म आस्था को मरणासन्न स्थिति से उबारा जाय। मात्र श्रद्धा का अवलम्बन पर्याप्त न माना जाय, तर्क, तथ्य-प्रमाण को भी समन्वित रखा जाय। अर्थ यह हुआ कि अध्यात्म को यदि जीवित एवं प्रखर रहना है तो फिर उसे विज्ञान की कसौटी पर खरा सिद्ध होने की अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा। इसके बिना आज का उपहास कल तिरस्कार बनेगा और अन्ततः विद्रोह रूप धारण कर सभ्यता को मटियामेट कर देगा। स्थिति की गम्भीरता समझी जानी चाहिए और समय रहते आस्था संकट के भँवर में फँसी हुई उत्कृष्टता की पक्षधर अध्यात्म संस्कृति की प्राण रक्षा की जानी चाहिए।

समय की माँग भूतकाल में भी पूरी होकर रही है। अब फिर इस संदर्भ में पूरी होने जा रही है कि अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय हो। श्रद्धा और तर्क एक-दूसरे को काटे नहीं, वरन् सुदृढ़ और परिपुष्ट बनायें। ऐसा सम्भव है, क्योंकि विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही सत्य के समर्थक हैं। गलतफहमी दूर होने पर जब यथार्थता सामने आयेगी तो दोनों में से कोई भी उसे अस्वीकार नहीं करेगा। ऐसा सुयोग सौभाग्य तो निश्चिंततः वर्तमान विभीषिकाओं में से अधिकाँश को निरस्त कर सकने में समर्थ होगा। जो शेष रहेगा उसे विवेक युक्त सहयोगी पुरुषार्थ के सहारे सहज ही सम्पन्न कर लिया जायेगा।

अध्यात्म-विज्ञान का समन्वय कैसे-किस प्रकार सम्भव हो, इस अनुसन्धान को प्रज्ञा अभियान ने अपने महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में सम्मिलित किया है और इसे पूरा कर दिखाने का भार अपने कन्धों पर उठाया है। इसी प्रक्रिया का नाम ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान है। ‘ब्रह्म’ अर्थात् अध्यात्म। ‘वर्चस्’ अर्थात् विज्ञान। दोनों के मिलन की सम्भावना मनीषा के अन्तराल को गदगद कर देती हैं। कार्य चल पड़ा है और विश्वास है कि लक्ष्य तक पहुँच कर ही रुके गा।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का प्रयास है कि अध्यात्म तत्त्वदर्शन के महत्वपूर्ण प्रतिपादनों को प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर कसे जाने योग्य बनाया जाय और हर अविश्वासी को कहा जाय कि वह प्रतिपादन की जाँच-पड़ताल करे और यथार्थता को बिना हठवादिता के स्वीकार करें अध्यात्म के प्रमुख सिद्धान्तों को तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास चल रहा है कि ऋषि न तो दिग्भ्रान्त थे, न स्वार्थ प्रेरित दुराग्रही। उनके अगणित अध्यात्म प्रतिपादनों में से दस प्रमुखो को ब्रह्मवर्चस् ने अपने प्रथम प्रयास में अनुसंधान हेतु चुना है। शेष असंख्यों में से प्रत्येक, चरण में से दस-दस को हाथ में लिया और उनकी यथार्थता को विज्ञान एवं दर्शन की हर कसौटी पर कसा और निष्कर्षों को पाठकों के समक्ष प्रकट किया जाता रहेगा। अभी जो परीक्षण हाथ में लिये गए हैं, वे इस प्रकार हैं—

(1)मनःस्थिति से परिस्थिति का निर्माण

लोक मान्यता इससे ठीक उल्टी है। लोग परिस्थिति को प्रमुख मानते हैं और सभी समस्याओं के लिये उन्हें सुधारने का भरपूर प्रयास करते हैं। वे या तो निरर्थक चले जाते हैं, या फिर परिस्थिति बदलने पर भी मनः-स्थिति यथावत् बनी रहती है। एक के सुधरते ही अन्य कारण आ धमकते हैं व चाहा गया सुयोग बन ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह सिद्ध किया जाना है कि मनः-स्थिति यथावत् बनी रहती है। एक के सुधरते ही अन्य कारण आ धमकते हैं व चाहा गया सुयोग बन ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह सिद्ध किया जाना है कि मनः-स्थिति का शरीर, मस्तिष्क, व्यवहार, संपर्क, प्रयास तथा स्वभाव सभी पर प्रभाव पड़ता है। अपना दृष्टिकोण व व्यवहार का स्तर सुधर जाने पर संपर्क क्षेत्र का सहयोग अनायास ही आकर्षित होता है और अभीष्ट सफलताओं का द्वार सरलतापूर्वक खुल जाता है। यहाँ तक कि इसका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर आश्चर्यजनक प्रभाव होता है।

(2) विचार-क्रान्ति

जन मान्यता यह है कि स्वार्थी व्यक्ति नफे में रहता है और उदार परमार्थी घाटे में। इसी कारण लोग अपने मतलब से मतलब रखते व सरकारी प्रयासों से बचते हैं। स्वार्थान्धता चतुरता मानी जाती है और परमार्थ परायण लोकसेवियों को मूर्ख ठहराया जाता है। ब्रह्मवर्चस् शोध द्वारा यह विचार क्रान्ति की जानी है कि आत्म विस्तार एवं उदार व्यवहार से किस प्रकार व्यक्तित्व विशिष्ट बनता है, लोक सम्मान-आत्म सन्तोष व दैवी अनुग्रह किस प्रकार मिलता चला जाता है। महामानवों के अगणित उदाहरण इसी को सिद्ध करने के लिए दिये जाने हैं कि उदार आत्मीयता बरतने में तो तात्कालिक घाटा उठाना पड़ता है, वह बीज बोने की तरह ऐसा है जिसे तनिक क्षति उठाकर आम्रवृक्ष उगाने जैसा समझा जा सकता है।

(3) आस्तिकता का सशक्त समर्थन

आस्तिकता को वास्तविक तथा नास्तिकता को अवास्तविक सिद्ध करने के अनेकों प्रमाण इसीलिये प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि सर्वशक्तिमान नियन्ता की कर्मफल व्यवस्था पर लोग विश्वास रखें। देर में फल मिलने के कारण विश्वास न खोये । दुष्कृतों वाले मनोविकारों से किस प्रकार शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य क्षीण होता है और व्यक्तित्व का स्तर गिरने पर लोक भर्त्सना से कितनी क्षति पहुँचती है, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हाथों-हाथ दिये जा सकते हैं।

(4)प्रसुप्त का जागरण

व्यक्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप सीमित है, प्रकट क्षमताएँ भी नगण्य है। गहराई में उतरें तो प्रतीत होता है कि बीज रूप में उसके अन्तराल में वह सब कुछ विद्यमान है जो सृष्टा में पाया जाता है। दावानल की सारी विशेषताएँ चिनगारी में, वृक्ष की बीज में सन्निहित होती हैं। प्रश्न केवल प्रसुप्त को जगाने भर का है। ब्रह्मवर्चस् शोध प्रयासों द्वारा यह सिद्ध किया जा रहा है कि यदि उच्चस्तरीय साधना प्रयत्नों द्वारा मूर्च्छना से व्यक्ति को जगाया जा सके तो वह अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देव मानव बन सकता है।

(5) अदृश्य जगत से संपर्क

इन्द्रियाँ जड़-जगत को ही जानती हैं अनुभव करती हैं। इसके अन्तराल में एक अदृश्य जगत है। उसी की प्रेरणा से यह दृश्य जगत विभिन्न प्रकार की उत्साहपूर्वक गतिविधियों में निरत रहता है। यदि दोनों का सम्बन्ध टूट जाय तो फिर सौर-मण्डल के अन्य ग्रहों जैसी निस्तब्ध स्थिति अपने भू-मण्डल की भी बन जायगी। मानवी चेतना का अदृश्य जगत से सम्बन्ध प्रायः नहीं के बराबर है। यदि आत्मा का कौशल उस जगत से भी जुड़ सके तो उस क्षेत्र में भी ऐसी ही शक्तियाँ तथा सम्पदाएँ हस्तगत हो सकती हैं जैसा कि संसार में अनेकों को अनेक प्रकार की सम्पदाएँ उपलब्ध होती हैं। अदृश्य जगत का स्वरूप, वैभव, वर्चस्व, प्रयोग, उपयोग किस प्रकार सम्भव हो और उस पहुँच से व्यक्ति कितना समर्थ सम्पन्न हो सकता है इस प्रक्रिया को खोज निकालना ब्रह्मवर्चस् का एक अनुसंधान क्रम है।

(6) काया का अनुसंधान

मानवी सत्ता एक समग्र प्रयोगशाला है। तप साधना द्वारा इसके उपकरणों को परिष्कृत तथा योग द्वारा जड़ को चेतनामय बनाया जाता है। परिष्कृत व जड़ चेतन समन्वय की परिणति से जा परिचित हैं वे जानते हैं कि अन्तराल में से किन विभूतियों को उभारा-विकसित किया जा सकता है। सिद्ध पुरुष इसी मार्ग पर चलकर ऋद्धि-सिद्धियाँ अर्जित करते हैं। यह अवरुद्ध मार्ग किस प्रकार खुले। षट्चक्र, सहस्रार, कुण्डलिनी, उपत्यिकाओं से सम्बन्ध किस उपाय से जुड़े, यह प्रस्तुत अनुसंधान का विषय है।

(7) चेतना जगत की विभूतियों का प्रतिपादन

संसार में धन, बल, कौशल ये तीन शक्तियाँ ही जानी जाती हैं। चेतना जगत में विशिष्ट स्तर के तीन वैभव हैं। श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा। श्रद्धा अर्थात् आस्था, विश्वास, आत्मबल। प्रज्ञा अर्थात् विवेकशीलता, दूरदर्शिता। निष्ठा अर्थात् कर्मनिष्ठा, पराक्रम, साहस। लोग सम्पदा को तो जानते हैं, पर आत्मिक विभूतियों की गरिमा से अपरिचित ही बने रहते हैं। जनमानस इनका महत्ता पहचाने, पाने को ललचाने, ऐसे प्रतिपादन प्रस्तुत किये जाने का प्रयास किया जाता है।

(8)विश्वास की शक्ति

भौतिक सामर्थ्य के बदले सुविधा, सम्पदा कमाई जाती है लेकिन वास्तविक सामर्थ्य तो आत्मबल एवं आत्मानुशासन है जो साहसिक संकल्पों के रूप में प्रकट होता है। विश्वासों के आधार पर मनोबल व आत्मबल किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है। ऐसा विभूति सम्पन्न व्यक्ति किस प्रकार कृतकृत्य होता है इन तथ्यों को प्रत्यक्षवादी प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा रहा है।

(9) प्रकृति से संपर्क

प्रकृति में अन्तराल में अद्भुत क्षमताएँ छिपी पड़ी हैं। ब्रह्म विज्ञान नाम से प्रख्यात यह क्षेत्र सुविधाएँ ही नहीं-प्रगति तथा प्रसन्नता का उद्गम केन्द्र है। इस ब्रह्म विज्ञान को कैसे जाना जाय तथा उससे संपर्क स्थापित करे ब्रह्माण्ड-व्यापी अदृश्य शक्तियों को कैसे अपनी अधिकार परिधि में लिया जाय, यह शोध प्रयास का अंग है।

(10)पदार्थ की कारण शक्ति से अनुदान प्राप्ति

पदार्थ की स्थूल सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। सूक्ष्म शक्ति किन्हीं विरलों पर ही प्रकट होती है। इसमें भी अधिक गहरे उतरने पर पदार्थ की कारण शक्ति का पता चलता है और उसके अन्तराल में छिपी चेतनात्मक विशेषता से संपर्क बनता है। मन्त्र विज्ञान और यज्ञ विज्ञान पदार्थ की कारण शक्ति को उभारने की ही प्रक्रियाएँ हैं। शब्द को अभिमन्त्रित करके उसे अस्त्र-शस्त्र की तरह शाप, वरदान, की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। यज्ञ विज्ञान में समिधाएँ, शाकल्य, भस्म, जल आदि पदार्थों को संजीवनी बूटी स्तर का बनाया जाता है व शरीरगत, मनोगत व्याधियाँ मिटायी जाती हैं। पर्यावरण सन्तुलन इसी आधार पर सम्भव बनाया जाता है। इस लुप्त विज्ञान को पुनर्जीवित करने का शोध कार्य भी इस क्रम में लिया गया है।

पदार्थ की स्थूल सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। सूक्ष्म शक्ति किन्हीं विरलों पर ही प्रकट होती है। इसमें भी अधिक गहरे उतरने पर पदार्थ की कारण शक्ति का पता चलता है और उसके अन्तराल में छिपी चेतनात्मक विशेषता से संपर्क बनता है। मन्त्र विज्ञान और यज्ञ विज्ञान पदार्थ की कारण शक्ति को उभारने की ही प्रक्रियाएँ हैं। शब्द को अभिमन्त्रित करके उसे अस्त्र-शस्त्र की तरह शाप, वरदान, की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। यज्ञ विज्ञान में समिधाएँ, शाकल्य, भस्म, जल आदि पदार्थों को संजीवनी बूटी स्तर का बनाया जाता है व शरीरगत, मनोगत व्याधियाँ मिटायी जाती हैं। पर्यावरण सन्तुलन इसी आधार पर सम्भव बनाया जाता है। इस लुप्त विज्ञान को पुनर्जीवित करने का शोध कार्य भी इस क्रम में लिया गया है।


इस वर्ष के दो अत्यन्त सरल किन्तु अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम

इस वर्ष के नव सृजन कार्यक्रमों में दो ऐसे हैं जिन्हें हममें से प्रत्येक को हाथ में लेना चाहिए और इस सरल उपचारों को अपनाकर अपने को नव सृजन में भागीदार बनना चाहिए। अधर्म नाश की दृष्टि से खर्चीली शादियों में अपव्यय एवं दहेज का प्रचलन निरस्त किया जाना चाहिए और धर्म स्थापना की दृष्टि से हरीतिमा संवर्द्धन का कार्य हाथ में लेना चाहिए।

इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि ‘खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है।’ इस कुप्रथा ने हमें नैतिक दृष्टि से खोखला बना दिया है और सामाजिक शालीनता की कमर तोड़कर रख दी है। हर गृहस्थ को अपने पसीने की गाढ़ी कमाई का प्रायः एक तिहाई भाग बच्चों को पेट काटकर पारिवारिक प्रगति का द्वार रोक कर इस कुरीति पिशाचिनी के लिए बलि चढ़ना पड़ता है। लाखों सुयोग्य लड़कियों को कुमारी रहना पड़ता है। या अयोग्यों के गले बँधना पड़ता है। लाखों गृहस्थ अपनी खुशहाली को मटियामेट करके बर्बाद होते और दर-दर की ठोकरें खाते हैं। एक दिन फुलझड़ी का तमाशा देखने दिखाने में दोनों ही पक्ष बर्बाद हो जाते हैं। आये दिन नव बहुओं की हत्या और आत्म-हत्या रोकने का यही तरीका है कि खर्चीली शादियों को अपराधों की दुष्प्रवृत्ति में गिना जाय और उनसे अपने समाज को मुक्ति दिलाने के लिए प्राण्-पण से प्रयत्न किया जाय।

विवाह योग्य लड़की लड़के प्रतिज्ञा करें कि वे खर्चीली शादियों के माध्यम से विवाह बन्धन में न बँधेगे, भले ही उन्हें आजीवन ही रहना पड़े। विचारशील अभिभावकों के कम कम लड़के के बारे में तो यह प्रतिज्ञा करनी ही चाहिए कि वे अपने घर, परिवार और प्रभाव क्षेत्र के लड़कों की शादी तो बिना दहेज और खर्च प्रदर्शन के ही करेंगे। इस वर्ष यह प्रतिज्ञा आन्दोलन चलना ही चाहिए। प्रतिज्ञा पत्रों को शान्ति कुञ्ज भेजा जाना चाहिए। जिन लड़कों की शादियाँ इस प्रकार सम्भव हों उनका नाम, आयु आदि जानकारियाँ भी भेजना चाहिए ताकि लड़ी वालों को उस आधार पर सुयोग्य लड़के प्राप्त करने में सुविधा हो। पहले लड़के वालों को करनी होगी क्योंकि कलंक उन्हीं के सिर पर बँधता है। इसके अतिरिक्त हममें से प्रत्येक को यह प्रतिज्ञा भी करनी चाहिए। कि खर्चीली और दहेज वाली शादियों में सम्मिलित नहीं होंगे, भले ही वे अपने सगे कुटुम्बियों-सम्बन्धियों के ही क्यों न हों। इससे चर्चा फैलती है और वातावरण बनता है।

इन दिनों बढ़ते वायु प्रदूषण और कुपोषण के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य-संकट खड़ा हो गया है। पेड़ कटते जा रहे हैं, नये लगते नहीं। फलस्वरूप भूमि क्षरण वर्षा का असन्तुलन, इमारती तथा जलाऊ लकड़ी की कमी जैसी अनेकानेक कठिनाइयाँ खड़ी हो रही हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हर व्यक्ति अपने निवास या प्रभाव दी जमीन पर किसी न किसी प्रकार हरीतिमा बोये-उगायें “बच्चे पैदा न करें, पेड़ उगायें।” वह नारा हर दीवार पर लिखा जाय और इस आवश्यकता से जन-जन को अवगत कराया जाय। अपनी या पराई भूमि पर पेड़ उगाने में हमें हजारी किसान का अनुकरण करना चाहिए जिसने हजारी बाग जिले में हजार आम्र उद्यान लगाये, लगवाये थे तुलसी का बिरवा हर आँगन में लगे। इस थावले को ‘वनस्पति भगवान’ का देवालय माना जाय। जल अर्घ्य, अगरबत्ती परिक्रमा से इस देवता की घर-घर में पूजा हो। तुलसी एक अमोघ औषधि है। अनुरूप ीोद से वह सभी रोगों के उपचार में काम आ सकती है। इस दिशा में हम सब पूरा ध्यान दें। और घरों में तुलसी लगाने के लिए बीज, पौध बाँटने का अभियान चलाये । इसी प्रकार कुपोषण निवारण के लिए घरेलू शाक वाटिका लगाई जाय। आँगन बाड़ी, छत बाड़ी, छप्पर बाड़ी में शाक एवं फल उगायें जा सकते हैं।

हममें से कौन खर्चीली शादियों के विरुद्ध जूझने और हरीतिमा बढ़ाने की दृष्टि से इन दिनों क्या कर रहा है और अगले दिनों क्या करने की सोच रहा है, इसका विवरण जानने की प्रतीक्षा शान्ति-कुँज हरिद्वार के सूत्र संचालक बड़ी उत्सुकतापूर्वक कर रहे हैं।


जीवन कला


जीवन कला (kavita)

पास उसके ही सुखद-जीवन बिताने की कला है॥

जो किया करता उपेक्षा खंदकों वाली घुटन की। ओ नहीं परवाह करता, जो कसौटी की तपन की॥

र्स्वण बन संसार में वह धैर्यशाली ही ढला है। पास उसके ही सुखद जीवन बिताने की कला है॥

जो किया करता सतत् संघर्ष, पथ की उलझनों से। और भरता माँग जीवन की, अपेक्षित साधनों से॥

दर्प बाधा-विघ्न का उस आदमी ने ही दला है। पास उसके ही सुखद जीवन बिताने की कला है॥

हर सफलता के लिए व्यवधान आते राह में है। जोत उनको मिले आनन्द ऐसी चाह में हैं।

साहसी के मार्ग का हर विघ्न भय खाकर टला है। पास उसके ही सुखद जीवन बिताने की कला है॥

यों सुकृत कर जिन्दगी को जो मनुज सुन्दर बनाते। वे विवेकी और पुरुषार्थी सदा सम्मान पाते॥

आँधियों से जो लड़ा-दीपक सुबह तक वह जला है। पास उसके ही सुखद जीवन बिताने की कला है॥

यों करो कुछ और सबकी जिन्दगी सुन्दर बनाओ। प्यार की मृदु गन्ध वाले फूल उपवन में खिलाओ॥

जो जिया ऐसे, सही ढंग से वही समझो-पला है। पास उसके ही सुखद जीवन बिताने की कला है॥

—माया वर्मा रेणुका

*समाप्त*