विराट का वैभव अपने अन्तस् में

विभु अचिंतन्य है। विस्तार की कल्पना एवं आराधना कठिन है। किन्तु अणु के भीतर विद्यमान उस महती शक्ति सत्ता का सरल साक्षात्कार हो सकता है। बूँद में सरोवर की समस्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। चिनगारी में विश्व अग्नि तत्व की समस्त सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। बीज में वृक्ष और शुक्राणु में समूचा मनुष्य विराजता है। परब्रह्म की समग्र सत्ता का विराट−दर्शन किन्हीं बिरलों को ही होता है किन्तु उसका अभीष्ट दर्शन अपने अन्तराल में भी भली प्रकार किया जा सकता है। न केवल दर्शन वरन् सघन संपर्क और महत्वपूर्ण आदान−प्रदान का उपक्रम भी इस क्षेत्र में अधिक सरलता और सफलतापूर्वक बन पड़ता है।

सोऽहम्, शिवोऽहम्, तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म जैसे तत्वदर्शी प्रतिपादनों में उसी एकात्म अद्वैत का प्रतिपादन है। जिसे अपनाकर कोई भी अपने को सृष्टा का युवराज होने की वरिष्ठता से अवगत हो सकता है। सौर−मण्डल की समग्र सत्ता परमाणु के छोटे परिकर में सन्निहित है मानवी अन्तराल में सत्यं शिवं सुन्दरम् झाँकता है और सत् चित् आनन्द की अनेकानेक विभूतियों का दर्शन होता है।

अच्छा हो हम दिशाओं को महकाने वाली कस्तूरी को अपनी ही नाभि में केन्द्रीभूत देखें। अपने को समझें, कुरेदें, जगायें, उभारें और इस योग्य बनायें कि उस एक में ही पारस कल्पवृक्ष और अमृत की उपस्थिति का अनुभव पग−पग पर होने लगे। मानवी पराक्रम, विवेक की सार्थकता इसी क्षेत्र की प्रगति से परखी जाती है।


युग मनीषा ही नहीं युग साधना भी

पेड़ ऊपर से भी खुराक लेता है और नीचे से भी खींचता है। जड़ें जमीन में दूर−दूर तक फैलती है और वहाँ से खाद पानी समेट कर वृक्ष के अंग अवयवों तक पहुँचाती हैं पर बात पूरी इतने से ही नहीं हो जाती। ऊपर से सूरज की रोशनी, उपयुक्त हवा, मौसम की अनुकूलता आदि बहुमूल्य जीवन−तत्व बरसते हैं। दोनों ओर से अभीष्ट अनुदान प्राप्त करते रहने की सुविधा पाकर ही पेड़ पनपता और फलता−फूलता है। यदि इनमें से एक पक्ष भी कम पड़े तो फिर पेड़ का अस्तित्व ही संकट में पड़ेगा। प्रगति होने की बात तो दूर रही।

मनुष्य के सम्बन्ध में भी ठीक यही बात कही जा सकती है। उसे अन्तराल, मनःसंस्थान एवं अंग अवयवों के साथ जुड़ी हुई जीवनी शक्ति, प्राण विद्युत, रासायनिक विलक्षणता जैसी अगणित विशेषताओं के माध्यम से समुन्नत बनने का अवसर मिलता है। स्थूल शरीर की संरचना से भी बढ़कर सूक्ष्म शरीर की विशिष्टता है। तीसरा कारण शरीर तो अदृश्य जगत के साथ जुड़ा रहने के कारण और भी अद्भुत है। उसे दिव्यलोकवासी कहा जाता है। षट्चक्र, उपत्यिकाएँ, ग्रन्थियाँ, अतीन्द्रिय क्षमता केन्द्र आदि की आन्तरिक संरचना एवं विभूति भण्डार को देखते हुए मनुष्य उससे कहीं अधिक महान प्रतीत होता है जैसा कि उसके बहिरंग को देखने पर—बड़प्पन का मूल्याँकन करने पर−दृष्टिगोचर होता है। यह ईश्वर प्रदत्त भाण्डागार सुनियोजित रूप से अन्तराल भरा पूरा तो है, पर है प्रसुप्त स्थिति में। प्रयत्न करने पर ही उसे जगाया जा सकता है। बीज के भीतर समूचे वृक्ष की समग्र सत्ता सन्निहित होती है। शुक्राणु में एक परिपूर्ण व्यक्तित्व की सत्ता विद्यमान रहती है, पर अनायास ही बिना प्रयत्न के बीज से वृक्ष फूट पड़ता है और न शुक्राणु को तोड़कर कोई मनुष्य चहलकदमी करता है। प्रगति प्रयत्न साध्य है। इसी विधि विधान के सहारे बीज और शुक्राणु अपनी प्रसुप्त सत्ता को प्रकट करते हैं। मानवी अन्तराल के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है। उसका प्रकटीकरण श्रमसाध्य है। इसी प्रयास को साधना कहते हैं। यह जड़ से उपलब्ध होने वाला अदृश्य जीवन रंग है। पेड़ की तरह मनुष्य भी प्रधानतः इसी के सहारे ऊपर उठता, अंकुरित होता और फलता −फूलता है।

दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बाहर से जो बरसता, उपलब्ध, हस्तगत होता है, उसे नगण्य नहीं कहा जा सकता है। सभी जानते हैं शीत ऋतु में पौधे बढ़ना तो दूर उलटे पत्ते पीले पड़ने, झड़ने के कारण ठूँठ हो जाते हैं। गरम लू चलने पर भी वे झुलस जाते हैं। हरियाली बढ़ोत्तरी तभी होती है जब मौसम की अनुकूलता है। वर्षा होते ही उनकी शोभा सुषमा किस तरह उल्लसित होती है यह देखते ही बनता है। बसन्ती प्रवाह जिन दिनों बहता है उन दिनों तो ठूँठ हरियाते और फूलों से लदे हुए दूल्हा जैसे सज–धजकर बैठते हैं। इसके अतिरिक्त हवा वातावरण का भी योगदान होता है। प्रान्तों और क्षेत्रों की भिन्नता के कारण एक ही जाति के पेड़ पौधों—मनुष्य पशुओं में कितना अन्तर पाया जाता है यह सभी ने देखा है। बंगाली और पेशावरी की काया का अन्तर देखते ही बनता है। रायपुर और हरियाणा के बैलों में कितना अन्तर होता है इसे सभी जानते हैं। मैसूर का चन्दन महकता है वैसा राजस्थान में सम्भव नहीं, हिमालय के देवदारु आन्ध्र में उगाये जायें तो वे बढ़ेंगे नहीं, छोटे− छोटे ही बने रहेंगे। यह वातावरण का प्रभाव हुआ। मनुष्य भी इससे कम प्रभावित नहीं होता।

कहा जा चुका है कि शिक्षा, सान्निध्य, अभ्यास, परामर्श, अनुकरण आदि के माध्यम से बहुत कुछ सीखता है। सुसंस्कृत समुदाय और वनवासियों के स्तर में जो अन्तर पाया जाता है उसे वातावरणजन्य ही कहा जायगा। परिस्थितियाँ मनुष्य को कितनी बदलती बनाती है इसे सभी जानते हैं। सभ्यता और संस्कृति का सीधा सम्बन्ध निकटवर्ती परिस्थितियों से हैं। परिवार की पाठशाला में ही व्यक्तित्व की ढलाई का अधिकाँश काम पूरा हो जाता है। जो बाकी रहता है उसकी पूर्ति शिक्षा सान्निध्य, अनुभव, अभ्यास परामर्श आदि के माध्यम से होती है। वातावरण इसी को कहते हैं।

युग मनीषा को लोक मानस के परिष्कृत करने के लिए जिस गलाने ढालने वाली भट्टी को गरम करने के लिए कहा गया है उस विचारक्रान्ति का तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य को नये सिरे से सोचने के लिए समुचित विचार सामग्री प्रस्तुत की जाय। अभ्यास में से अवाँछनीयता को हटाने और स्वभाव में औचित्य की प्रतिष्ठापना करने के लिए क्या−क्या करना चाहिए, अक्टूबर अंक में इसी की चर्चा है। युग धर्म, ज्ञानयज्ञ, लोक शिक्षण आदि नामों से इसी का ऊहापोह हुआ है। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत अब तक क्या हो चुका है और अगले दिनों क्या होने जा रहा है, इस संदर्भ में इस अंक के अन्तिम लेखों में विवरण एवं आभास दिया गया है। यह महत्वपूर्ण पक्ष है। इस संदर्भ में वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों में राज्य सत्ता की इच्छा आवश्यकता के अनुरूप ‘ब्रेन वाशिंग‘ अभिनव पद्धति का आविष्कार हुआ है। बन्दी शत्रु सैनिकों को किस प्रकार अपना पथ समर्थक सहयोगी बनाया जा सकता है इसकी एक सुविस्तृत प्रक्रिया है।

अपने देशवासियों की मान्यता, आकाँक्षा विचारणा में किस प्रकार मनचाहा हेर−फेर किया जा सकता है। इसका प्रयोग किस प्रकार किया गया इसकी जानकारी तानाशाह और साम्यवादी देशों में हुए इस सम्बन्ध के प्रयासों को आश्चर्यचकित करने वाले जाल−जंजाल को पड़कर समझी जा सकती है। मनुष्य मूलतः सोरे दापन, स्वच्छ दर्पण और गीली मिट्टी की तरह माना जाता है और कहा जाता है कि उसे दबाव देकर एक से दूसरे साँचे में बदला जा सकता है। समस्त समस्याओं के एकमात्र निमित्त कारण आस्था संकट से जूझने के लिए नव युग मनीषियों को क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए इसकी रूप−रेखा बताते हुए तथ्यतः एक ही निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि सभी सम्भव उपायों से मानवी दृष्टिकोण स्वभाव एवं अभ्यास में दूरदर्शी विवेकशीलता एवं संयम सिक्त समाज निष्ठा का सभी सम्भव उपायों में समावेश करने का प्राणपण से प्रयत्न किया जाय।

यह प्रक्रिया कितनी ही महत्वपूर्ण, समय को देखते हुए कितनी ही आवश्यक अनिवार्य क्यों न हो पर साथ ही एक दूसरी बात भी ध्यान में रखनी है कि वह एकाँगी है। मात्र एक ही पक्ष का समाधान करती है। दूसरा पक्ष भी अपने स्थान पर कायम है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। कल न सही परसों उनका भी मर्म और महत्व समझना होगा और समग्र युग निर्माण के लिए−व्यक्ति निर्माण के लिए उसे भी कार्यान्वित करना होगा। यह पक्ष है अन्तराल की उच्चस्तरीय किन्तु प्रसुप्त क्षमताओं को जगाना। अतीन्द्रिय क्षमता के काम से इन दिनों परा−मनोविज्ञान के क्षेत्र में कौतूहलवर्धक चर्चाएँ चलती और योजनाएँ बनती रहती हैं। आकल्ट−मेटाफिजिक्स, आदि नामों से उसका कुछ स्वरूप निर्धारण भी हुआ हैं। पुरातन काल का साधता विज्ञान पूर्णतया इसी क्षेत्र का वैज्ञानिक प्रयोग है।

वस्तुतः मानवी व्यक्तित्व की मूलभूत सत्ता उसके गहन अन्तराल में निवास करती है। मनोविज्ञानी इसकी कुरेद बीन अचेतन, सुपर चेतन आदि में वर्गीकृत करते हैं और आशा करते हैं कि यदि इस मर्मस्थल की चाबी हाथ लग सके तो मानवी सत्ता को अब की अपेक्षा अगले दिनों सहस्रों गुनी अधिक समर्थ बनाया जा सकता है। अध्यात्मशास्त्री तो बहुत पहले से अनुभवजन्य सुनिश्चित घोषणा उच्चस्तर से करते रहे हैं कि—”मनुष्य से श्रेष्ठ समग्र इस संसार में और कुछ नहीं हैं।” यह प्रतिपादन काय कलेवर, बुद्धि चातुर्य या वैभव साधन को देखकर नहीं वरन् अन्त क्षेत्र की प्रसुप्त शक्तियों की विशिष्टता को लक्ष्य रख कर किया गया है।

बरगद जैसे विशालकाय दीर्घजीवी, वृक्षों की जड़ें—जमीन में प्रायः उतनी ही दूरी और गहराई में फैली होती हैं जितना कि उसका दृश्यमान कलेवर होता है। जिनकी जड़ें उथली होती हैं वे न तो बहुत ऊँचे उठने में ही समर्थ होते हैं और न अधिक समय तक जीवित ही रहते हैं। यह जड़ों की गहराई, मजबूती पर निर्भर है कि कोई पेड़ कितना बढ़ें, कितना फैले, फले−फूले और दीर्घजीवी रहे। वातावरण की अनुकूलता से उसकी प्रगति में सहायता तो मिलती है इतने पर भी जड़ों का महत्व कम नहीं आँका जा सकता है। जिस क्षेत्र में, जिस मौसम में गहरी जड़ों वाले पौधे प्रकृति अनुकूलता का लाभ लेकर समुन्नत परिपुष्ट देखे जाते हैं उसी से कमजोर छोटी जड़ों वाले किसी प्रकार दिन गुजारते और उकडू−झुकडू सिर झुकाए बैठे रहते हैं। यहाँ वातावरण की महत्ता, जड़ों की सुदृढ़ता से बढ़कर नहीं अपेक्षाकृत कम ही सिद्ध होती है।

विचार शक्ति का अपना महत्व है उसके सुसम्पन्न होने एवं सही मार्ग पर चलने के जितने भी लाभ गिनाये जाये कम हैं। इतने पर भी यह तथ्य यथावत् बना रहेगा कि व्यक्तित्व की अन्तर्निहित सत्ता का स्तर भी उच्चस्तरीय प्रेरणाओं को हजम और क्रियान्वित कर सकने में समर्थ होता है।

यहाँ मनुष्य के अन्तःक्षेत्र की चर्चा हो रही है और यह कहा जा रहा है कि मनुष्य का अन्तरंग प्रखर करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि बहिरंग का कलात्मक सुनियोजन करना। अन्तरंग को प्रखर करने से तात्पर्य है प्रसुप्त को जगाना। प्रसुप्त से तात्पर्य है—”ईश्वर प्रदत्त उन क्षमताओं का भाण्डागार जो सृष्टा ने उत्तराधिकार में अजल मात्रा में दिया है, किन्तु उसके विकसित होने की सम्भावना व्यक्ति में निजी प्रयत्नों पर पूरी तरह छोड़ दी है” यह प्रसुप्त का जागरण ही उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है। इस क्षेत्र की अद्भुत उपलब्धियों के सामने संसार भर में बिखरी सम्पन्नता भी हेठी पड़ती है।

सभ्यता व्यवहारगत शिष्टता से सम्बन्धित है। सुसंस्कारिता चिन्तन की उत्कृष्टता को कहा जाता है। इन दोनों से आगे चलकर—ऊँचा उठकर—अध्यात्म का विभूति क्षेत्र आता है। उसे खोदने, कुरेदने, बीनने बटोरने के लिए एक वरिष्ठ तन्त्र खड़ा करना पड़ता है जिसे एक शब्द में साधना कहा जा सकता है। साधना के अंतर्गत वे सभी प्रयास आते हैं जिनमें अन्तरंग के विशिष्ट शक्ति केन्द्रों को समझा, झकझोरा और सशक्त सक्रिय बनाया जाता है। इस दिशा में मिलने वाली सफलताएँ उच्चस्तरीय व्यक्तित्व की संरचना करती हैं। बुद्ध, गान्धी जैसे महामानव वस्तुतः व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिभा, और कुशलता की दृष्टि से उन्हीं अन्यान्यों की तरह सामान्य ही पाया गया है। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र में सुडौल, कुशल एवं सम्पन्न होना प्रशंसनीय माना जाता है उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र की वरिष्ठता ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी लोगों में उभरती उछलती पाई जाती है।

प्राचीन काल में अध्यात्म क्षेत्र की दो प्रतिभाएँ होती थीं एक को मुनि, दूसरी को ऋषि कहा जाता था। मुनि वे जो मनन चिन्तन को उभारते थे—स्वाध्याय सत्संग की योजना बनाते और जन−मानस के परिष्कार को ध्यान में रखते हुए लोक−शिक्षण में लगे रहते थे। ऋषि उन्हें कहा जाता था जो काय सत्ता को चेतना क्षेत्र की एक सर्व सम्पन्न प्रयोगशाला मानते थे और उसमें मूर्धन्य वैज्ञानिकों की तरह शोध अनुसन्धान—प्रयोग परीक्षण में लगे रहते थे। वे व्यक्तित्व की प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने के क्षेत्र में गहरी डुबकी लगाते और बहुमूल्य मणि मुक्तक बीन कर लाते थे। जबकि मुनियों का प्रयास दूरदर्शी विवेकशीलता—सभ्य सुसंस्कारिता को लोक प्रचलन में समाविष्ट किये रहने के प्रयत्नों में निरत रहना होता था। लेखनी और वाणी की शक्ति वे इसी निमित्त करते थे। शासन संरचना, कथा सत्संग, धर्मानुष्ठान, गुरुकुल, आरण्यक, तीर्थ परिभ्रमण जैसे अनेकों कार्यक्रम इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सम्पन्न होते थे। ऋषियों के उपक्रम में साधना प्रधान थी। वे योग और तप की परिधि में आने वाली अनेकानेक साधनाओं में निरत रहते और अपने सहचर अनुचरों को संलग्न रखते थे। सर्व साधारण को भी इसी प्रयोजन में लगाये रहते थे। मुनियों और ऋषियों के समन्वित प्रयास ही दो पहियों की भूमिका निभाते और प्रगति रथ को संयुक्त प्रयास से आगे बढ़ाते थे।

यही आज भी होना चाहिए। युग मनीषा को मुनि स्तर की भूमिका निभानी चाहिए युग साधना में−ऋषि प्रयोजन में निरत रहकर तपश्चर्या की शक्ति को सम्पन्नता की तुलना में वरिष्ठ सिद्ध करने के लिए अन्तःक्षेत्र के प्रचण्ड पुरुषार्थ अपनाने चाहिए। पेड़ का तना और कलेवर सुरम्य रहे इसके लिए वातावरण की उपयुक्तता जितनी आवश्यक मानी जाती है उसी प्रकार उसकी जड़े गहरी और सुदृढ़ समुन्नत हों इसकी साधन प्रक्रिया भी अग्रगामी रहनी चाहिए।

मोटी बुद्धि इस संसार को उतना ही मानती है जितना कि वह आँखों से दृष्टिगोचर होता है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आँखों से थोड़ी दूर का—निकटवर्ती सामने का ही दीखता है। पास ही जो पर्दे की आड़ में पैरों के नीचे−पीठ पीछे जो है उसे अति समीप एवं वस्तुतः विद्यमान होने पर भी देखा नहीं जा सकता। ऐसी दशा में सुविस्तृत संसार से इसलिए इन्कार करना कि वह आँख की पहुँच से बाहर है, उचित नहीं। अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी यही बात है वे और भी समीप का अनुभव करती हैं। कान, नाक तो कुछ दूरी से भी शब्द गन्ध का परिचय प्राप्त कर सकते हैं पर जिह्वा त्वचा तो छूने के उपराँत जानकारी प्राप्त करती हैं। ऐसी दशा में विश्व विस्तार के सम्बन्ध में इन्द्रिय शक्ति के सहारे जो प्रत्यक्ष है उसी को सब कुछ मान बैठना उचित नहीं। संसार जैसा भी कुछ है उसे समझने के लिए बुद्धि से काम लेना पड़ता है। तर्क, प्रमाण और अनुमान के सहारे ही अदृश्य को समझना पड़ता।

सच तो यह है कि दृश्य की तुलना में अदृश्य ने केवल व्यापक विस्तृत है वरन् महत्वपूर्ण एवं सशक्त भी है। हाथ−पैर दीखते है—हृदय मस्तिष्क नहीं जबकि अधिक सामर्थ्यवान एवं बहुमूल्य है। शरीर प्रत्यक्ष प्राण अप्रत्यक्ष पर मूल्य प्राण का ही अधिक है। पदार्थ मोटे रूप में ढेले जैसे लगते हैं, पर उनके परमाणुओं को पृथक किया जाय और उनके अन्तराल की ऊर्जा को जाँचा−परखा जाय तो प्रतीत होता है कि उनमें से प्रत्येक में अपरिमित सामर्थ्य भरी पड़ी है। अणु विस्फोट में परिमाण बताते है कि पदार्थ की यह सबसे छोटी इकाई विशालकाय सौर−मंडल का प्रतिनिधित्व करती है। न अणु दीखता है, न उसका मध्यवर्ती नाभिक। न दीखने का कारण उसकी क्षमता का महत्व घटता नहीं। प्यार और द्वेष का कोई स्वरूप नहीं। जब ठगी और वास्तविकता पहचानने में नहीं आती तो धर्मात्मा−दुरात्मा का भेद बाहरी कलेवर को उघाड़कर कैसे किया जाय?

सामान्य दृश्यमान के अन्तराल में विद्यमान अदृश्य विशिष्टता को ढूँढ़ निकालना और उसे क्षमता एवं सुविधा बढ़ाने के लिए प्रयुक्त करना यही है विज्ञान का कार्य क्षेत्र। इसी में अनादिकाल से अनुसंधान अन्वेषण होते और समय−समय पर बहुमूल्य सूत्र हाथ लगते रहे हैं। दो लकड़ियाँ रगड़कर जिस दिन आग की चिनगारी उत्पन्न की गई होगी और उसका विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग जाना गया होगा वह मानवी सौभाग्योदय का अत्यन्त शानदार दिन रहा होगा। आदिमकाल के नर−बानर और आज के सभ्य समुन्नत के बीच जो न भरने योग्य खाई दीखती है उसे पाटने में अग्नि आविष्कार का कितना बड़ा योगदान रहा होगा इसका अनुमान लगाने की इस जेब में माचिस भरे फिरने वाले माहौल में कौन आवश्यकता अनुभव करेगा। किन्तु तथ्य तो तथ्य ही है। अग्नि पर आधिपत्य होना प्रकृति विजय के प्रथम मोर्चे की सफलता थी। जिसने हौंसले बटाये और वदम वर्षा हुए वहाँ चले आये, जहाँ रेडियो, टेलीविजन, वायुयान अन्तरिक्षयान पनडुब्बी अणुशक्ति जैसी उपलब्धियाँ दैनिक प्रयोग में आने वाले चूल्हे चौके जैसी सामान्य लगती है।

प्रकृति का दृश्यमान बाह्य कलेवर तो अप्रकट रत्नराशि से भरा−पूरा सस्ते कपड़े से बना बटुआ है। अविकसित प्राणियों के निर्वाह हेतु जितना प्रकृति ने आवश्यक समझा है उतना ही सर्वसाधारण के लिए खुला रखा है। इसके आगे जो भी बहुमूल्य था वह सब तिजोरियों में छिपा दिया है। अनगढ़ों द्वारा किये जाने वाले दुरुपयोग के बचाव की दृष्टि से यह दुराव आवश्यक भी था। धरातल पर पड़ा−करवट, धूलि− मिट्टी, खर−पतवार पोखर−झरने, वन−पर्वत जैसे ऊबड़−खाबड़ पदार्थ ही दृष्टिगोचर होते हैं। बहुमूल्य तो नीचे हैं। खोदने पर बहुमूल्य खनिज पदार्थ हाथ लगते हैं। धातुएँ, तेल, कोयला जैसी सम्पदाएँ अदृश्य में प्रवेश करने पर मिलती हैं। मोती लहरों के ऊपर नहीं तैरते, उन्हें गहरी डुबकी लगाने वाले ही प्राप्त करते हैं।

यह सामान्य ज्ञान से सम्बन्धित दृश्य और अदृश्य का भेद विवरण है। इसके आगे रहस्य भरे दो क्षेत्र और हैं जिन्हें जितना कुरेदना बन पड़ता है उतना ही बुद्धि को हतप्रभ कर देने वाले तिलिस्म से पाला पड़ता है। आकाश नीली चादर का सुविस्तृत चन्दोला जैसा लगता है जिसमें कुछ झिलमिले और दो झाड़−फानूस टंगे हों। पर वस्तुतः वह उतना छोटा और सरल है नहीं। करोड़ों अरबों प्रकाश वर्ष की दूरी पर असंख्य निहारिकाओं सौर−मण्डलों, गैस, बादलों, ब्लैक होलों से भरा−पूरा यह ब्रह्माण्ड इतना लम्बा चौड़ा है। इतनी तीव्र गति से धावमान है कि उसकी समग्र कल्पना करने तक में बुद्धि थक कर बैठ जाती है। फिर उसमें जो भरा हुआ है, उसकी जटिलता और भयानकता का जैसे−जैसे परिचय मिलता है वैसे−वैसे दिल दहलने लगता है। इतने विनाशकारी ज्वाल माल के नीचे आखिर अपना भूलोक, उसका प्राणी समुदाय किस प्रकार जीवित ही नहीं बना रहा वरन् सुख−शान्ति की ओर भी बढ़ता रहा, यह देखकर आश्चर्य होता है। कोई मोटी−तगड़ी उल्का उससे टकरा कर इस पिण्ड की धज्जियाँ उड़ा सकती है। किसी ग्रह का औंधा− तिरछा विकिरण इस लोक के प्राणियों को देखते−देखते निष्प्राण कर सकता है। सौभाग्य ही कहना चाहिए कि अनेकानेक ग्रह पिण्डों की आये दिन जो दुर्गति होती रहती है वह इस अग्नि परिवार में दाँतों के बीच जीभ की तरह रहने वाले अपने इस समुदाय की नहीं हुई।

यह डरावना पक्ष हुआ। इस ब्रह्माण्ड में ऐसा भी कम नहीं भरा है जिसमें से कुछ चम्मच भर और मिल सके तो अब तक की उपलब्धियों की तुलना में मनुष्य देखते−देखते सहस्रों गुना अधिक सुखी समुन्नत, समृद्ध सशक्त बन सकता है। अब तक संचित वैभव प्रकृति की कुछेक परतें उघाड़ने पर ही उपलब्ध हुआ है। जो मिल सका वह नगण्य है। जो अनुपलब्ध है उस भाण्डागार का थोड़ा−सा विवरण भर प्राप्त होने पर मुँह में पानी भर ही आता है। मनुष्य डडडड नहीं है। उसकी जिज्ञासा, जीवट, और महत्वाकाँक्षा अभी भी घटी नहीं है आशा की जाती है कि यदि विज्ञान क्षेत्र को ऐसी ही उपलब्धियाँ मिलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब पौराणिक स्वर्ग लोक वाली सभी सुखद कल्पनाएँ, सम्पदाएँ, अपनी उस धरती पर बिखरी−बिखरी फिरेंगी।

ब्रह्माण्ड का छोटा प्रतीक प्रतिनिधि है—अपना काय पिण्ड। देखने में यह काया मल−मूत्र की गठरी—हाड़माँस की पिटारी और निगलने−उगलने, सोने−जागने, रोने−हँसने की एक चलती−फिरती मशीन भर मालूम पड़ती है। ऋतु प्रभाव के तनिक से दबाव पड़ने पर चीं−चीं बोलती है। जोर फट का एक हथोड़ा कहीं जमकर जा लगे तो काँच के टूटे गिलास की तरह कूड़े−करकट के ढेर में जा गिरती है। इसमें पाये जाने वाले पदार्थ यदि खण्ड−खण्ड करके बाजार में बेचे जाँय तो उनका मूल्य दस रुपये से भी कम हाथ लगेगा। प्रतिनगण्य से काय−कलेवर की सूक्ष्म संरचना और उसके अन्तराल में विद्यमान विभूति सम्पदा का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इस तुच्छ के कण−कण में चकित कर देने वाले महान् का भांडागार कूट−कूटकर भरा है। किसी अद्भुत कलाकार ने उसकी संरचना में अपना सारा कौशल निचोड़ कर रख दिया है।

दर−दर की ठोकरें खाते, रोते−रुलाते, दीन दयनीय, असहाय असमर्थों की इस दुनिया में कमी नहीं। इसमें परिस्थितियाँ भी कारण हो सकती हैं किन्तु जब उन्हीं परिस्थितियों में जन्मे−पले—अपने बलबूते का आकाश चूमने जितनी ऊँचाई पर जा पहुँचे दीखते हैं तो उस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि देखने में अवरोध परिस्थितियों का ही प्रतीत होता है। परन्तु तथ्यों को कुरेदने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनःस्थिति की खोट ही पतन और पराभव का प्रधान कारण है। मनःसंस्थान की संरचना प्रायः सभी की एक जैसी है—अन्तर एक ही है उसकी सामर्थ्य में प्रयोग की विधि−व्यवस्था से परिचित अभ्यस्त न होना। जिनने मनःसंस्थान का स्वरूप और सदुपयोग समझा व आत्मज्ञान के धनी कहलाये—सफल समर्थ बने और अपने क्षेत्र में सफल, सुयोग्य कहलाये। जिनकी गुण−गाथाएँ गाई जाती हैं, जिनका पराक्रम सराहा जाता है उनमें से अधिकाँश मुकद्दर के सिकन्दर नहीं, मनोबल सम्पन्न सुसंस्कारी व्यक्तित्व के ही धनी रहे हैं।

चेतन, अचेतन, सुपर चेतन−मन, बुद्धि, चित्त की चर्चा विवेचना, चेतना विज्ञान के मनीषी विस्तारपूर्वक करते रहते हैं और कहते हैं कि इस क्षेत्र में समाविष्ट तथ्यों को देखते हुए मनुष्य में दैत्य दानव स्तर की अनेकानेक क्षमता सम्भावनाओं का सुनिश्चित अस्तित्व आंका जा सकता है। वे इसके लिए भी प्रयत्नशील हैं कि किसी प्रकार इन सम्भावनाओं को साकार किया जा सके। अभी मस्तिष्कीय क्षमता भण्डार का मात्र सात प्रतिशत ही समझ और व्यवहार में आया है। शेष 93 प्रतिशत को भी यदि समझा, जगाया और कमा में लाया जा सके तो आज की तुलना में अगले दिनों मनुष्य की क्षमता और गरिमा सहस्रों गुनी अधिक बढ़ जायगी।

इसी संदर्भ में काय संरचना के स्थूल अवयवों की कार्य कुशलता की प्रशंसा से एक कदम और आगे बढ़कर जब उसकी सूक्ष्म रचना और उसके प्रत्येक घटक पर दृष्टि डालते हैं तो ब्रह्माण्ड में सर्वव्याप्त तिलम्भ की तरह उसी छोटी भानमती की पिटारी में भी एक से एक बड़े जादुई कौतूहल प्रकट होते हैं। हृदय, मस्तिष्क, यकृत, वृक्क आदि की संरचना को देखते हुए कहा जाता है कि ऐसा सृजन समस्त मानवों के समन्वित कला−कौशल का नियोजन करने पर भी बन नहीं पड़ेगा। इन दृश्यमान क्रम अवयवों में आगे बढ़कर जब रक्त कणों, हारमोनों, एन्जाइमों, कोशाणुओं, न्यूरोनों आदि की संरचना क्षमता और सुसंबद्धता की समन्वित प्रक्रिया पर विचार किया जाता है तो प्रतीत होता है कि उस औसतन साड़े पाँच फुट लम्बे और डेढ़ मन भारी शरीर में भूतनाथ का यक्ष गंधर्वों वाला कोई जादुई किला है। इनकी एक−एक लड़ी और कड़ी देखने योग्य है। खुली आँखों से न दीख पड़ने वाले यह बाल की नोक पर दर्जनों की संख्या में बैठ सकने वाली इकाइयां इतनी समर्थ और सक्रिय है कि उन्हें जड़ परमाणु की संरचना से कहीं अधिक उच्चस्तरीय सम्वेदनशील माना जायगा।

जो जाना गया है उससे अनजाना असंख्य गुना है। जो पाया गया उसकी तुलना में वह अत्यधिक है जिसकी अभी मान्यता तो स्थिर हो गई है, पर हस्तगत होने की कड़ी हाथ नहीं लगी है। यह पदार्थ जगत के सम्बन्ध में नहीं चेतना के अदृश्य जगत की ओर संकेत है। पदार्थ जगत की शोध का मोर्चा जमा हुआ है। सहस्रों प्रयोगशालाओं से सम्बद्ध लाखों मूर्धन्य वैज्ञानिक पदार्थ सत्ता के विभिन्न क्षेत्रों का अनुसंधान कर रहे हैं और प्रयत्नशील हैं कि जड़ जगत की क्षमता सम्पदा का जितना दोहन बन पड़े किया जाय। प्रश्न उस अदृश्य जगत का है जो चेतना के साथ सम्बद्ध है। उसे सूक्ष्म लोक कहा जाता है। यह तीन या सात वर्गों में विभाजित किये जाते हैं। इन्हें आयनोस्फियरों की तरह समीपवर्ती एवं सम्बद्ध ही कहा जा सकता है। काया के तीन शरीर सात आयाम माने गये हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की आध्यात्मिक संरचना और उनके द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली विभूतियों का अनुमान लगाने से प्रतीत होता है कि ‘जल में मीन पियासी। मोहि लखि−लखि आवे हाँसी॥ वाली कबीर की व्यंगोक्ति प्रकारान्तर से अपने ऊपर ही लागू होती है। चेतना क्षेत्र का विस्तार अंतरंग में भी है और बहिरंग में भी। काया में समस्त देवताओं और लोकों का निवास माना गया है।

मरणोत्तर जीवन जिस स्वर्ग नरक में निवास करते हुए बीतता है वह जीवात्माओं का एक अदृश्य लोक है। उसमें ऐसे ही अदृश्य प्राणी निवास करते हैं जैसे कि इस दृश्य जगत में रहने वाला प्राणि समुदाय। प्रति विश्व, प्रति पदार्थ, प्रति कण की—ऐन्टीयुनिवर्स की— एन्टीमैटर की— एन्टीएटम की कभी चर्चा कल्पना थी। अब उनका अस्तित्व मान्यता प्राप्त करने की स्थिति में है। यह अदृश्य जगत का संकेत है। पदार्थ क्षेत्र में काम करने वाले विज्ञान की अब इस चेतनात्मक अदृश्य में प्रवेश करना होगा और इस लक्ष्य तक पहुँचना होगा जिससे मात्र सुविधा संवर्धन ही नहीं, आनन्द उल्लास और सुख−शान्ति का विभूति वैभव भी हस्तगत हो सके।


मात्र सुविधा ही नहीं प्रतिभा भी अर्जित करें

यह संसार जड़ और चेतन दो भागों में विभक्त है। दोनों परस्पर मिल−जुलकर रहते हैं। एक दूसरे के पूरक भी है। यदि ऐसा न होता तो धरती का यह सुरम्य रूप जो आज है वह बन ही न पड़ा होता। इतने पर भी दोनों की अपनी क्षमता और अपनी−अपनी मर्यादा है। पदार्थ में गति है और चेतन में मति। गति के पीछे का उद्देश्य न डडडड, मति का समन्वय न हो तो वह ऐसे ही निरर्थक परिश्रम की खिलवाड़ भर करती रहे। अन्यान्य ग्रह पिण्ड न जाने कब से—न जाने क्यों ऐसे ही अपनी धुरी और कक्षा पर चक्कर काटने में निरत है। उनके भीतर का पदार्थ भी ऐसी स्थिति में ऐसे ही निरर्थक लोट−पोट करते हुए अपना समय गुजारना होगा। पर जब गति को मति का दिशा निर्देशन मिलता है तो उसका चमत्कार देखते ही बनता है। जलयान, थलयान, वायुयान इसके साक्षी है। प्रक्षेपणास्त्रों से लेकर अन्तरिक्ष यानों तक की गतिविधियाँ यह बताती हैं कि शक्ति के पीछे बुद्धि का सहयोग बन पड़ा है।

यही बात मति के बारे में भी है। आकाँक्षा, कल्पना, उत्कंठा कुछ भी क्यों न हो पर उसके लिए यदि साधन न मिले तो फिर रंगीली उड़ाने मस्तिष्क की तलैया में ही शेखचिल्ली की तरह लहरों की तरह उठती विलीन होती रहेंगी। वैसा कुछ बन नहीं पड़ेगा, मिल नहीं सकेगा जैसाकि चाहा गया है। चेतना की निजी परिधि तो भावना विचारणा तक सीमित है। उसे बुद्धि कल्पना का रूप देने में अनुभवों की पृष्ठभूमि रहती है। यह अनुभव परिस्थितिजन्य होते हैं। परिस्थितियाँ हलचलों पर निर्भर हैं। हलचल पदार्थ करता है। इस प्रकार प्रकारान्तर से मन, बुद्धि, चित्त का विकसित एवं व्यवस्थित स्वरूप भी पदार्थ जगत के सहारे ही बन पड़ता है। फिर शरीर तो प्रत्यक्ष पदार्थ ही है। चेतना का मूल स्वरूप जो भी हो उसे प्राणी के रूप में विकसित होने लिए काया की नितान्त आवश्यकता रहती है। सभी जानते हैं कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों से छुटकारा मिल जाय तो फिर चेतना का स्वरूप उपनिषद्कार के अनुसार अचिन्त्य, अनिवर्चनीय परब्रह्म जैसा बन जाता है। उसकी सत्चित्आनन्द जैसी दिव्यानुभूतियों और देव मानवो जैसी विभूतियाँ शरीर के सहयोग से ही उपलब्ध होती है। यही डडडड चेतन का सुखद सहयोग जिसने अपनी धरती का उस पर निर्वाह करने वाले वनस्पति समुच्चय से लेकर डडडड समुदाय तक का—अत्यन्त मनोरम कलात्मक स्वरूप विनिर्मित कर दिया है। यदि होना पृथक्−पृथक् रहते तो अपना यह भूलोक भी अन्यान्य ग्रह पिण्डों की तरह निस्तब्ध स्थिति में ही निर्वाह कर रहा होता।

जड़ का स्वरूप और उपयोग समझने के कौशल को पदार्थ विज्ञान कहते हैं। उसी की उपलब्धियों को वैज्ञानिकों ने खोजा, पकड़ा और घसीट कर मानवी सुविधा के लिए प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से विज्ञान प्रत्यक्ष देवता है, मानवी सुविधा के लिए किसी अदृश्य क्षेत्र से उतरा देवता। उसी के वरदानों ने मनुष्य को इतने सुख−साधनों से सुसम्पन्न किया है जिनके आधार पर वह प्राणि जगत का मुकुट मणि होने जैसा दावा करता है। विज्ञान पर उसे गर्व है और विश्वास भी। इसीलिए भविष्य में स्वर्गोपम सुविधाओं की कल्पना करते हुए वह विज्ञान की ओर ही आशा भरी दृष्टि से दीखता है। जिसने इतना दिया वह आगे भी देता रह सकता है। बच्चा विश्वास कर सकता है कि पात्रता बढ़ने पर बिना उसके लिए वे सभी साधन जुटा देगा जो आवश्यक एवं सामर्थ्य के अंतर्गत हैं। मनुष्य बच्चा है तो विज्ञान उसका अभिभावक। प्रकृति माता के अमृतोपम दूध को दुहने में थन निचोड़ने वाले विज्ञान की भी भूमिका रही है। यदि वैसा सुयोग न बना होता तो प्रकृति ने मनुष्य को भी मनुष्य प्राणियों की तरह पेट प्रजनन की सुविधा वाले खिलौने देकर बहका और भगा दिया होता। जो विशिष्ट उपलब्ध है, उसके लिए विज्ञान अभिभावक के अनुग्रह को ही कृतज्ञतापूर्वक सराहा जायगा।

यह उस क्षेत्र की चर्चा हुई जिसे गति, शक्ति और सुविधा साधनों वाला पदार्थ सोपान कहना चाहिए। एक शब्द में इसे उपलब्ध सुविधाओं का आधारभूत कारण कह सकते हैं। जड़ कहलाते हुए भी वह इतना समर्थ है कि मनुष्य की वासना, तृष्णा, ममता को उद्दीप्त करने वाले साधन समुचित मात्रा में जुटाता रहे। यही है उसकी मर्यादा न वह उससे आगे बढ़ता है, न पीछे हटता है।

अब दूसरे पक्ष चेतना के बारे में समझा जाना चाहिए। उसकी विशेषता है—’मति’। आकाँक्षाएँ, कल्पनाएँ, विचारणाएँ, आदतें उसी के साथ लिपटी रहती हैं। काय−कलेवर के अंग अवयव तो इन भीतरी ललक लिप्साओं के साधन जुटाने भर में लगे रहते हैं। इन्द्रियाँ उस स्तर का रसास्वादन कराने की भूमिका निभाती हैं। चेतना का गुण धर्म चिन्तन है। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति के तथाकथित साधन जुटाने वाला चिन्तन। यहाँ तथाकथित शब्द का उपयोग इसलिए किया गया है कि जिन साधनों को तृप्ति का कारण समझा जाता है वे वस्तुतः वैसे होते नहीं। यहाँ मृगतृष्णा और कस्तूरी भ्रान्ति वाला भटकाव ही आड़े आ जाता है। जो हो चेतना की प्रक्रिया ‘चिन्तन’ माननी पड़ेगी। और उसके द्वारा अन्तराल की उमंगों को परितृप्त करने वाली दिशाधारा अपनाते रहने की बात माननी पड़ेगी। इस संदर्भ में सही निर्णय तक पहुँचाने में मात्र विवेक ही कारण होता है और उसे भी चेतना की उच्चस्तरीय क्षमता में सम्मिलित रखा गया है। प्रज्ञा की सराहना इसी संदर्भ में होती है।

विज्ञान का अनुदान है सुविधा। अध्यात्म का वरदान है—प्रतिभा। दोनों को अपनी−अपनी उपयोगिता और आवश्यकता है। इसलिए इनमें से जिसे जिस मात्रा में उपलब्ध करना अभीष्ट हों, उसी क्षेत्र का प्रधान रूप से वहाँ दोनों का वर्गीकरण भर किया जा रहा है किसी की निन्दा, प्रशंसा का प्रश्न ही नहीं है। वरिष्ठता, कनिष्ठता की बात सोचनी हो तो बात दूसरी है।

सुविधा साधनों को उपलब्ध करने के लिए विज्ञान का आश्रय लेना होगा। पदार्थ अपनी अनगढ़ स्थिति में अधिक उपयोगी नहीं होते। उन्हें उपयोगी बनाने के लिए विज्ञान की प्रक्रिया में होकर गुजरना पड़ता है। न सूखे अन्न से पेट भरता है और न कपास से तन ढकता है। खाने योग्य रसोई बनाने और पहनने योग परिधान विनिर्मित करने में जिस कुशलता की आवश्यकता पड़ती है−वह विज्ञान है। शरीर का निर्वाह इसी के सहारे होता है। उदर पोषण से लेकर प्रजनन उमंगों और सुरक्षा सुविधा के अन्यान्य साधन इसी प्रक्रिया को अपनाने से सम्भव होते हैं। इसलिए उसका आश्रय लेना उचित भी है और आवश्यक भी। शरीर यात्रा ही लक्ष्य हो तो उस क्षेत्र की उपलब्धियों से भी काम चल सकता है। किन्तु सम्मान यश, गौरव, उत्कर्ष जैसा कुछ उच्चस्तरीय प्राप्त करना हो तो उसके लिए उस आन्तरिक वरिष्ठता का उपार्जन करना होगा जिसे बोलचाल की भाषा में प्रतिभा कहते हैं। आध्यात्मिक की भाषा में इसे गरिमा कहा जाता है। उसका सीधा सम्बन्ध दृष्टिकोण, विश्वास, संकल्प, रुझान, गुण, कर्म, स्वभाव से है। संक्षेप में इसी समुच्चय को व्यक्तित्व भी कहते हैं। व्यक्तित्व के धनी ही अपने−अपने क्षेत्रों की मूर्धन्य भूमिका निभाते हैं।

सुविधा अपनी जगह आवश्यक है और प्रतिभा अपनी जगह। शरीर की आवश्यकताएँ अपनी हैं और आत्मा की अपनी। जब दोनों मिलजुल साथ−साथ रहे और परस्पर गुण कर जीवनचर्या चला रहे हैं तो आवश्यक यह भी है कि दोनों को समान रूप से प्रसन्न सन्तुष्ट रहने का अवसर मिले। पर वैसा होता नहीं। शरीर दीखता है—चेतन नहीं। सुविधा आवश्यक लगती है और प्रतिभा के लिए उत्साह नहीं दीखता है। इस भूल के कारण मनुष्य पक्षापात पीड़ित की तरह आधे अंग से ही काम चलाता है और लंगड़े, लूले, काने, कुबड़े की तरह अपंग स्थिति में निर्वाह करता है। अच्छा होता समग्रता का स्वरूप, परिणाम और आनन्द समझा गया होता और दोनों ही क्षेत्रों में समान प्रयत्न करते हुए दोनों कदम बढ़ाते हुए सुविधापूर्वक प्रगति के परम लक्ष्य तक पहुँचा गया होगा। लोग एक पहिये की गाड़ी लिये फिरते हैं और जब उस पर लदना सम्भव नहीं होता तो खीज और निराशा व्यक्त करते हैं।

सुविधा को वीरयता दी जाय और सम्पन्नता को ही सब कुछ माना जाय तो भी एक प्रश्न उठता है कि उसका सदुपयोग कैसे बन पड़े? अपव्यय और अनाचार में वैभव का दुरुपयोग कैसे रुके? सर्वविदित है कि निरंकुश सम्पन्नता ही नहीं शिक्षा चतुरता का उपभोक्ता के लिए—संपर्क में आने वाले अन्यान्य लोगों के लिए भी विषैले परिणाम उत्पन्न करती है। आरम्भ में कुछ चमक दिखाकर परिणाम अँधेरे गर्त में गिरा देने जैसा भयावह उत्पन्न करती है। चासनी पर टूट पड़ने वाली मक्खी किस प्रकार अपने पंख पैरों को लपेटती है, मछली कैसे आटे की गोली के प्रलोभन में गला काटती है, चिड़िया दाने के लालच में किस प्रकार जाल में फँसती और जान गँवाती है उसे सभी जानते हैं। दुर्बुद्धि और समति का समन्वय, व्यक्ति विशेष के लिए उसके परिवार के लिए अन्ततः ऐसे ही दुःखद दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। स्पष्ट है कि कौशल, वैभव के साथ वह सुमति भी चाहिए जिसे ‘प्रज्ञा’ कहते हैं। प्रज्ञा अध्यात्म क्षेत्र की उपलब्धि है।

सही, विपुल और चिरस्थायी वैभव उपार्जन का सुयोग तभी बैठता है जब उसके पीछे गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता, प्रतिभा का सुयोग हो। चोरी, चाण्डाली से कुछ लूट−खसोट लेना एक बात है और पीढ़ियों तक सुखद परिस्थिति परम्परा बनाये रहने वाली उपलब्धियाँ अर्जित करने वाली विशिष्टता दूसरी। किसी को गढ़ा खजाना मिले, लाटरी खुले, आँगन में हुण्डी बरसे, बाप दौलत छोड़ मरे तो उस आकाश से कुबेर की अनुकम्पा बरसाने वाले संयोग को कोई क्या कहे? किन्तु जहाँ तक सही, यशस्वी और चिरस्थायी सफलताओं का प्रश्न है वे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को संकल्प एवं पराक्रम के बदले ही अर्जित होती है। यह आन्तरिक उत्कृष्टता का, सुसंस्कारों की साधना का परिणाम है। संसार के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यश गाथा स्वर्णाक्षरों में चमकती है। बड़े काम करने में बड़े लोग ही समर्थ होते हैं। इस कथन में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि बड़े लोग व्यक्तित्व सम्पन्नों को कहते हैं। व्यक्तित्व सम्पन्न अर्थात् सदाशयता से भरी−पूरी प्रतिभा।

पदार्थ विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान के क्षेत्रों को यथार्थवादी पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि सुविधा सम्पादन में भौतिक विज्ञान काम आता है। फिर भी उसके सुनियोजन और सदुपयोग के लिए प्रतिभा की आवश्यकता बनी ही रहती है। इसलिए वह विपुल होते हुए भी अपूर्ण ही बना रहता है। इसके विपरित अध्यात्म उत्कृष्टता पर आधारित प्रतिभा की वह विशेषता है जो पत्थर पर उद्यान लगा सकती है। लात मारकर जमीन से पानी निकाल सकती है। बहुमूल्य प्रखरता के सहारे हर क्षेत्र की सफलताएँ उपार्जित कर सकना सम्भव हैं।

वैभव अस्थिर है। प्रकृति को उसका एक जगह जगे रहना अस्वीकार है। साथ ही उसे हजम करने वाला समर्थ तन्त्र भी चाहिए। उसके अभाव में उसकी बहुलता भी भारभूत होकर रह जाती है। अध्यात्म अपने आप में पूर्ण है। उसके वरदान भी समग्र हैं। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की दुहरी सफलता इसी क्षेत्र की प्रतिभा द्वारा अर्जित की जाती है। यह प्रत्यक्ष जीवन में अनेकानेक क्षेत्रों को उच्चस्तरीय सफलताएँ दिलाने में अध्यात्म विज्ञान की उपलब्धियों का विवेचन हुआ। रहस्यमयी प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं के जागरण और उसके आधार पर चमत्कारी ऋद्धि−सिद्धियों का—स्वर्ग मुक्ति का आनन्द लेने की बात इससे आगे की है। अध्यात्म ही है जो पदार्थ और चेतना के साथ जुड़ी हुई अनेकानेक सम्पत्तियों, सफलताओं एवं विभूतियों से व्यक्ति की सुसम्पन्न बनाने में सुनिश्चित रूप से सफल रहता है।

पदार्थ विज्ञान की शारीरिक सुविधा सम्वर्धन के लिए और अध्यात्म विज्ञान की आन्तरिक प्रतिभा विकसित करने, व्यक्तित्व सम्पन्न बनाने तथा देवोपम ऋद्धि−सिद्धियों से परिपूर्ण बनाने के सम्बन्ध में आवश्यकता इस बात की है कि दोनों का महत्व समझा जाय और उन्हें अपनाने के लिए दूरदर्शितापूर्ण नीति अपनाने की दिशा में प्रयास चल पड़ें।


सामयिक समस्याओं का चिरस्थायी समाधान

पदार्थ दृश्यमान होने, शरीरगत सुविधाओं को बढ़ाने, तथा इन्द्रियों को गुदगुदाने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण इन दिनों सभी को प्रिय लगता है। इतना ही नहीं वह अभिरुचि का केन्द्र, आकाँक्षा का इष्ट, जीवन का आराध्य तक बन गया है। सभी उसी के पीछे पड़े हैं। उसी को अर्जित करने में सभी का प्रयत्न और कौशल नियोजित है। विज्ञान का तो विषय ही वह है जो प्रत्यक्ष है वही उपकरणों की पकड़ में आता है तथाकथित प्रगति की धुरी साधनों के इर्द−गिर्द ही परिभ्रमण करती रही है। फलतः शोध अनुसन्धान के नाम पर उसी क्षेत्र की खोजबीन होती रहा है। सुविधा सम्वर्धन में सफलता पाने के कारण उसे श्रेय भी मिलता है और पुरस्कृत भी किया गया है। प्रगतिशीलता और बुद्धिमत्ता इन दिनों प्रत्यक्षवादी सफलताओं की ही चेरी बनकर रह रही है।

पराक्रम हर क्षेत्र को चमत्कृत करता है और उपलब्धियाँ प्रस्तुत करने में समर्थ होने के कारण सराहा भी जाता है। इस दृष्टि से विज्ञान द्वारा पदार्थ क्षेत्र में किये गये पुरुषार्थ का भी अभिनन्दन होना स्वाभाविक है। इस प्रसन्नता की घड़ी में चिन्ता को बात एक ही रह गई है कि अंकुश के अभाव में समृद्धि के मनोन्मत्त हाथी को दिशा कौन देगा? लगाम न रहने पर यह घोड़ा मालिक को न जाने कहाँ ले पहुँचेगा? नकेल हाथ में न हो तो ऊँट क्या दिशा पकड़ बैठे इसका क्या भरोसा? बिना हाथ का बैल गाड़ी की चित्र विचित्र जानकारी द्वारा खेल कौतुक दिखाये जाने की बात तभी बनती है जब रिंग मास्टर हाथ में हण्टर लिये उन्हें धमकाता और संकेत देता रहे। वह न रहे तो फिर सरकस के दर्शकों की सुरक्षा ईश्वर के हाथ में ही रह जायगी।

पदार्थ दुधारी तलवार है। उसकी उपयोगिता तभी है जब उसके प्रयोग में औचित्य, और अनुशासन का समुचित समावेश रहे अन्यथा सम्पन्नता, विपन्नता से भी भारी और महंगी पड़ती है। अशिक्षित, अभावग्रस्त तथा पिछड़े समझे जाने वाले किसी के लिए विपत्ति का कारण नहीं बनते। पर बुद्धिमानों, धनवानों, सत्ताधारियों, कलाकारों ने अपनी समर्थता का दुरुपयोग करके धन साधारण को जो हानि पहुँचाई है उसका लेखा−जोखा सामने रखने पर आँखों के सामने अँधेरा छाता है। विज्ञान ने जिन प्रलयंकर आयुधों का निर्माण करके उद्धतों के हाथ में सौंप दिया है उसे देखते हुए मानवी अस्तित्व ही आतंकित, आशंकित हो रहा है। मासूम बच्चे तक यह कह सकते हैं कि भगवान इस प्रगति को धरती पर से उठालें। हम सब उस पिछड़ेपन के बीच ही गुजारा कर लेंगे जिसमें रोज कुआं खोदना और रोज पानी पीना पड़ता था। दुर्व्यसनों, अनाचारों, अपराधों का घटाटोप समर्थता और सम्पन्नता के सहारे दैत्य दानव की तरह बढ़ा है। कुचक्रों, षड़यंत्रों, को छल प्रपंचों की करतूतें दिनोंदिन गगनचुम्बी बनती चली जा रही है। यह बुद्धिमत्ता की ही देन है। यदि सम्पन्नता, बुद्धिमत्ता, समर्थता, कुशलता की भर्त्सना करने को जी न कहे तो फिर उस उच्छृंखलता को आड़े हाथों लेना पड़ेगा जिसने अमृत को विष बनाकर रख दिया। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि समर्थता तो बढ़े पर उस पर सदुपयोग का अंकुश भी रहे।

विचारणीय यह है कि मनुष्य को स्वतन्त्रता और समर्थता पर अंकुश कौन लगाये? कैसे लगाये? प्रत्यक्ष है कि बाहरी रोकथाम इस संदर्भ में असफल न सही दुर्बल और उपहासास्पद भर रही है। कानून, पुलिस, कचहरी जेल का अंकुश अपराधों की रोकथाम कर सकने में इतना दीन दुर्बल सिद्ध हुआ है कि इसके खर्चीले ढाँचे ढकोसले पर दया आती है। रिश्वत लेने और देने वाले के विरुद्ध कानून है। दहेज और छुआछूत को अपराधों में गिरा और दण्डनीय ठहराया गया है। व्यभिचार के विरुद्ध कड़े कानून है। कोई भी कुकृत्य ऐसा नहीं है जिसके विरुद्ध दण्ड विधान न हो। न्यायाधीशों की नियुक्ति इसी निमित्त होती है। पुलिस यही देखभाल तो करती है। बन्दीगृहों की इमारतें तो इसी रोकथाम के लिए तो खड़ी है। इस सरंजाम की आवश्यकता को उपयोगी मानते हुए भी, जब यह पर्यवेक्षण होता है कि अपराधों के विस्तार में इस प्रतिबन्ध से कितनी रोकथाम हुई तो निराशा भरी गहरी साँस लेते हुए सफलता को नगण्य और असफलता की बहुलता को स्वीकार करना पड़ता है। आज का मनुष्य इतना चतुर है कि वह किसी को भी चकमा दे सकता है। अपने आपको भी, ईश्वर को भी, समाज को भी। फिर शासन के नियन्त्रण तन्त्र की तो बिसात ही क्या है जो अपनी ढीली पकड़ से अनाचार को शिकँजे में कस सके। नीति मर्यादा के निर्वाह बिना—समाज का व्यवस्थाक्रम कैसे चले? अनाचार वे घुटन भरे वातावरण में कोई भला मानस भी कहाँ तक साँस रोके खड़ा रहे? तूफानी प्रवाह में किसी हलके−फुलके के पैर कब तक टिके रहें?

व्यक्ति के दृष्टिकोण में निकृष्टता−स्वभाव में भ्रष्टता और आचरण में दुष्टता का अनुपात बढ़ेगा तो फिर निजी जीवन तथा सामाजिक प्रचलन में शालीनता सुव्यवस्था का स्थिर रहना कठिन है। इस कठिनाई के रहते सर्वत्र सुन्द−उपसुन्द की तरह सहोदर भाई भी प्राणघातक आक्रमण करते दृष्टिगोचर होंगे। सगर पुत्रों की उद्दण्डता सर्वविदित है और उसका परिणाम भी किसी से छिपा नहीं है। कृष्ण के वंश गोत्र वाले परस्पर लड़−मरकर ही समाप्त हो गये थे। अब किसी देश, गाँव, वंश, वर्ग का सवाल नहीं रहा। ‘प्रगति’ की तूफानी गतिशीलता ने मनुष्य समाज में मत्स्य न्याय को —जंगल के कानून को—”जिसकी लाठी उसकी भैंस” को मानवी रीति−नीति का अंग बनाने का विधिवत् अभियान छेड़ा है। नीत्सेवाद, कामूवाद, स्वेच्छावाद, अवज्ञावाद उपयोगितावाद जैसे कितने ही दर्शन इस बात का खुला प्रतिपादन करते हैं कि नीति मर्यादाओं का धर्म सदाचार का जो झीना पुराना लबादा बच रहा है उसे भी उतार कर कचरे के ढेर में फेंक दिया जाय। आचरण के क्षेत्र में तो आस्तिक तक नास्तिकों की तुलना में बुरे सिद्ध हो रहे हैं, धर्मात्मा की तुलना में वे कहीं अच्छे सिद्ध हो रहे हैं जो अपने को धार्मिकता का पक्षधर तो नहीं कहते किन्तु भले मनुष्यों जैसा जीवन जीते हैं।

यों धरती पर खंभ तो लगे नहीं हैं। सदा न तो सब लोग भले ही होते हैं और न बुरे ही। दोनों का अस्तित्व किसी न किसी रूप में हर स्थान पर हर क्षेत्र में पाया जाता है। प्रश्न बहुलता का है। इन दिनों मनुष्य जहाँ साधनों की दृष्टि से सम्पन्न होता जा रहा है वहाँ उसका दृष्टिकोण, स्वभाव, चरित्र एवं लक्ष्य क्रमशः अधिकाधिक पतनोन्मुख ही बनता जा रहा है। इस प्रवाह की परिणति भी प्रत्यक्ष है। साधनों की बहुलता होते हुए भी व्यक्ति गत और सामूहिक जीवन में विपन्नता ही द्रुतगति से बढ़ती चली जा रही है। दुर्बलता, रुग्णता, चिन्ता, उद्विग्नता, तंगी, असुरक्षा आशंका से जितना आतंकित मनुष्य आज है, उतना कदाचित इससे पूर्व कभी भी न रहा होगा। बाहर का ढकोसला और भीतर का खोखला किस प्रकार अपना तालमेल बिठा सकते हैं यह विडम्बना देखते ही बनती है। बात बढ़ती जा रही है। आपाधापी, निष्ठुरता और आक्रामकता की बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियाँ, लगता है कहीं मानवी अस्तित्व और विश्व सौंदर्य को ही न निगल बैठें।

एक ओर वैभव, दूसरी ओर विनाश। दोनों के मध्य सामान्य बुद्धि के द्वारा कोई कड़ी नहीं जुड़ती। यह पहेली उलटी सीधी सहज ही सुलझने वाली भी नहीं है। विसंगतियों के मध्यवर्ती सूत्रों को जोड़ने के लिए मानवी प्रकृति के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और समझना होगा कि व्यक्ति की मूलभूत सत्ता उसकी आस्थाओं पर अवलम्बित है। विशेषतः मानवी गरिमा जिसे प्रकारान्तर से दूरदर्शी विवेकशीलता, चरित्र निष्ठा, उदार सहकारिता आदि नामों से पुकारा जाता है, मानवी व्यक्तित्व ही धुरी है। उसी का स्तर गिरने या उठने से मनुष्य भला−बुरा सोचता और बनता है। इस मर्म स्थल तक पहुँचने की सामर्थ्य उन साधनों में भी नहीं है जिनके आधार पर सामान्य जानकारियों का आदान−प्रदान होता रहता है। नीति धर्म—सदाचार की शिक्षा देने वालों की कहीं कोई कमी नहीं। इस संदर्भ में भाषणों और पुस्तकों की भी कमी नहीं। उतने पर भी उन्हें ध्यान से पढ़ने और श्रद्धा पूर्वक अपनाने वाली पृष्ठभूमि ही नहीं है जो उन परामर्शों पर गौर करे और अपनाने के लिए संकल्प भरी श्रद्धा उभारे। इसमें दोष न प्रचार मन्त्र का है और न निरोधक विधि व्यवस्था का। दुर्बलता उस आस्था अन्तराल की है जो तत्व दर्शन और साधना प्रयोग का खाद पानी न मिलने के कारण अपनी उर्वरता गँवा बैठी और मरुस्थल जैसा अनगढ़ और श्मशान जैसा वीभत्स बनकर रह रही है।

आस्थाएँ क्षेत्र को सुधारने, सँभालने और संजोने की जिम्मेदारी एक मात्र जिस विधि व्यवस्था के ऊपर निर्भर है, उसी को अध्यात्म कहा गया है। यह आस्था प्रधान होने से उसी स्तर की है जो सहगामी को विकृतियाँ से उबार सके। दल−दल में फँसे हाथी को प्रशिक्षित हाथी ही जंजीर से जकड़ कर किनारे तक घसीट लाने में सफल होते हैं। काँटे से काँटा निकलता है। विष से विष मरता है। लाठी को रोकने के लिए लाठी और घूंसे को प्रत्युत्तर देने से ही बन पड़ता है। मानवी आस्था संस्थान को अवाँछनीयता से विरत करके और शालीनता का पक्षधर बनाने के लिए अध्यात्म विज्ञान में सन्निहित क्रिया प्रक्रिया का अवलम्बन ही एक मात्र उपाय है।

प्रवलित अध्यात्म का स्वरूप अलंकारिता ने कुछ का कुछ कर दिया है। प्रतीकों का अवलम्बन सीढ़ी के सहारे ऊपर तक चढ़ने जैसा होना था पर वे भ्रान्तिग्रस्त होकर साध्य बन गये हैं। इष्ट कहते हैं जीवन लक्ष्य को। अब उस स्थान पर सस्ते मनुहार को बाँटते असंगत मनोकामना पूरी करने वाले देवी देवता आ विराजे हैं। आत्म परिशोधन के स्थान पर देवता को फुसलाने और उससे उचित अनुचित मनोकामना पूरी करा लेने भर का बाल−विनोद आडम्बरों से लद कर बैठ गया है। यह विडम्बना कितनी ही बड़ी क्यों न हो, उसे अध्यात्म विज्ञान की मान्यता नहीं मिल सकती। तमिस्रा कितनी ही सघन या व्यापक क्यों न हो, ऊषा के मुस्काने भर से उसके पैर उखड़ जाते हैं और अरुणोदय होने पर तो उसका अता−पता भी नहीं मिलता। इन दिनों जादूगरी और ब्रह्म विद्या का एक ही अर्थ बनकर रह गया है। चमत्कार कौतूहल देखने दिखाने वाले धूर्तों और मूर्खों का उस खुली बारादरी में जमघट लगा रहता है पर यह कोई वास्तविकता थोड़ी है। इसे अधिक से अधिक प्रवंचना का प्रपंच भर कह सकते है। अध्यात्म विज्ञान इससे ऊँचा है। वह सुनिश्चित यथार्थता पर अवलम्बित होने के कारण प्रत्यक्ष भी है और तर्क, तथ्य, प्रमाणों पर पूर्णतया आधारित भी।

मनुष्य की दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाया जाना आवश्यक है। उसे अपनी गौरव गरिमा का बोध होना चाहिए। साथ ही आस्था क्षेत्र के उस विभूति भण्डार का भी ज्ञान होना चाहिए, जहाँ से मनुष्य में देवत्व का उदय होता है और उतना बन पड़ने पर सर्वत्र ऐसा वातावरण उमड़ पड़ता है जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा और अनुभव किया जा सके।

न केवल नीति, धर्म सदाचार के संदर्भ में मनुष्य को अध्यात्म विज्ञान का अवलम्बन उच्चस्तरीय स्तर तक पहुँचा सकता है वरन् उसे विवेक दृष्टि तथा साहसिकता भी प्रदान कर सकता है जिसके सहारे व्यक्तित्व में सन्निहित अनेकानेक प्रतिभाओं को भी प्रखर परिष्कृत किया जा सके। जड़ पदार्थ को भौतिक विज्ञान ने अनगढ़ स्थिति से अविज्ञात के गर्त्त से उबारा और मानवी सुविधा सम्पादन की दृष्टि से असाधारण रूप से उपयोगी बनाया है। उसके प्रतिपक्षी या सहयोगी —अध्यात्म विज्ञान को भी प्राचीन काल की तरह इन दिनों अपनी वरिष्ठता सिद्ध करनी है और सिद्ध करना है कि व्यक्तित्व को प्रखर बनाने—स्तर की दृष्टि से असाधारण रूप से समुन्नत बनाने की क्षमता उसमें विद्यमान है।

अध्यात्म एक बड़ी शक्ति है। विज्ञान से भी बड़ी। विज्ञान मात्र सुविधा सम्वर्धन में समर्थ है जबकि अध्यात्म व्यक्ति के अन्तराल में ऐसे तत्वों की प्रतिष्ठापना कर सकने में समर्थ होता है जिसके सहारे विकृतियों के माहौल से लड़ सकना और उन्हें पूरी तरह निरस्त कर सकना सम्भव हो सके। सामयिक विकृतियों, समस्याओं, और विभीषिकाओं के समाधान में उसका अनुपम योगदान हो सकता है। साथ ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का सबसे बड़ा आधार भी उसी के सहारे खड़ा हो सकता है। स्मरण रहे साधनों की बहुलता से नहीं व्यक्तित्वों की पवित्रता और प्रखरता से ही वह माहौल बनेगा जिससे सर्वतोमुखी प्रगति और समृद्धि का विस्तार स्वल्प साधनों के सहारे सम्भव हो सके।


युग साधना का अभिनव निर्धारण

पंच तत्वों से शरीर बना है और पंच प्राणों से चेतन। तत्व जड़ है और प्राण चेतन। तत्व प्रत्यक्ष है और प्राण परोक्ष। प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ पंच तत्वों के दृश्यमान स्वरूप तक उलझकर रह जाती हैं। उनकी रुचि उन्हीं तक सीमित रहती है। जिन्हें सुविधा भर चाहिए उनका पदार्थ के साथ ही तादात्म्य होना स्वाभाविक है। इन दिनों अपनाये गये उथले दृष्टिकोण ने शोध अनुसंधान का, उपार्जन उपयोग का क्षेत्र पदार्थ तक ही सीमाबद्ध कर लिया है। इस एकाँगी प्रगति का लाभ वैभव की वृद्धि में तो हुआ है, पर उन उपलब्धियों का सदुपयोग निर्देशन कर सकने वाली दूरदर्शी विवेकशीलता के अभाव में अपव्यय ही होता रहा। फलतः प्रगति से अधिक अवगति पल्ले बँधी। इस भूल की जब चौंकाने वाली परिणति सामने आई तब पता चला कि एक टाँग की दौड़ कितनी थकान भरी निराशात्मक और कष्टकारक होती है।

पुरातन काल में तत्वदर्शी महामनीषियों ने चेतना की वरिष्ठता मानी थी और उसके साथ जुड़े हुए पाँच प्राणों को पाँच प्रमुख देवताओं की संज्ञा देकर उनकी साधना में अपना ध्यान और पुरुषार्थ केन्द्रित किया था। निर्वाह की साधन सामग्री की अपेक्षा तो उनने भी नहीं की थी, पर इतना अवश्य ध्यान रखा था कि उचित—आवश्यकता पूर्ति के लिए जितना आवश्यक है उतना ही कमाया, जुटाया जाय। अनावश्यक संचय और उद्धत उपयोग में वैभव सुखद नहीं रहता वरन् बिना पके भोजन की तरह उलटा सिर दर्द बनता है। अकारण भार लादने में उपेक्षा दिखाने पर ही यह बन पड़ा कि अपना ध्यान और पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की विभूतियाँ अर्जित करने में लगा सके व्यक्तित्व के धनी कभी अभावग्रस्त नहीं रहते, कारण वश कुछ कठिनाइयों का सामना भी करना पड़े तो वे उसका साहसपूर्वक प्रतिकार करते हैं अथवा विवशता होने पर उसे धैर्यपूर्वक हँसते−हँसते सह भी लेते हैं। यही मनोभूमि और दिशाधारा रही है अपने महान पूर्वजों की। फलतः उनने पाया बहुत और गँवाया कम। जब कि आज सब कुछ गँवाया ही गँवाया जा रहा है। पाने के नाम पर तो बाल विनोद के लिए विनिर्मित चमकीले गुब्बारों जैसा ही अधूरा उथला हाथ लग रहा है।

यों अनुसंधान हर क्षेत्र का अपेक्षित हैं, पर भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों की कनिष्ठता, वरिष्ठता का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि सम्पदाओं की तुलना में विभूतियों का महत्व अत्यधिक है। अन्तःप्रतिभा के आधार पर श्रेय और प्रेय दोनों ही हस्तगत किये जा सकते हैं जबकि पदार्थ सम्पदा विवेक रहित होने पर उलटे विनाश का कारण बनती है। वैसा न हो तो भी वह मन का धन किसी बड़े काम नहीं आता। पेट भरने तन ढकने की तनिक−सी आवश्यकता भर उससे पूरी होती है शेष तो दुर्व्यसनों और कुपात्रों की भेंट चढ़ता है। अविवेकी के पास कुबेर जैसा वैभव हो तो भी वह उसे सत्प्रयोजनों में प्रयुक्त करने का उदारता दिखा नहीं सकेगा। ऐसी दशा में सच्चे अर्थों में बुद्धिमान उन्हीं को कहा जायगा जो गुण, कर्म, स्वभाव की, आत्मिक गौरव गरिमा की, विभूति सम्पदा की उपलब्धि में प्रयत्नरत रहते और कहने योग्य सफलताएँ प्राप्त करते हैं।

चेतना का अपना क्षेत्र है। उसे प्रकृति पक्ष से कम विस्तृत समर्थ, सुखद नहीं कहा जा सकता। अपरिचित के लिए तो हीरा का ढेर भी काँच के टुकड़ों जैसा है पर पारखी जानते हैं कि बहुमूल्य रत्न राशि का हाथ लगना कितना बड़ा सौभाग्य होता है। चेतना उसकी परिधि, एवं विभूति सम्पदा का कोई वारापार नहीं। जिन दिनों चेतना की विशिष्टताएँ खोजने और उन्हें हस्तगत करने के प्रयत्न चलते थे, उन दिनों इस देश के नागरिक हर्षोल्लास भरा जीवन जीते थे। उद्योग और उपार्जन के उतने साधन न होने पर भी सम्पदा से भरे−पूरे थे। यह वैभव संसार भर में विख्यात था। लालच भरी दृष्टि लेकर कोलम्बस इसी का पता लगाने निकला था। कि रास्ता भूल कर अमेरिका जा पहुँचा और बहुत दिन तक उसी को इण्डिया—वहाँ के निवासियों को “रेड इण्डियन” कहता रहा। सामान्य जीवन में इस देश के महामानव अपने को हर दृष्टि से प्रसन्न और सन्तुष्ट कहते थे। शिक्षा, उद्योग, चिकित्सा, व्यवस्था आदि में वे इतने प्रवीण पारंगत थे कि उन विभूतियों को उन्हें अन्यत्र पहुँचाने की आवश्यकता पड़ी और विश्व के कोने−कोने में उनका वितरित करने के लिए परिभ्रमण करते रहे। इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें जगद्गुरु, चक्रवर्ती, स्वर्ग सम्पदाओं के स्वामी एवं देव मानव कहा जाता था।

मानवेत्तर, उच्चस्तरीय शक्तियाँ भी उनने कम अर्जित नहीं की थी। ऋद्धि−सिद्धियों के भण्डार उनके कोश में भरे पड़े थे। पौराणिक इतिहास का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि उन्हें इन्द्रियातीत क्षमताएं प्राप्त थीं। दिव्य अस्त्रों का, वे प्रयोग करते थे। लोक−लोकान्तरों की यात्रा उनके लिए सरल थी। शाप वरदान की शब्द शक्ति का आश्चर्यजनक प्रयोग करना उन्हें आता था और भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसे आज तो अत्युक्ति भी समझा जा सकता है। यह उपार्जन उन्होंने अन्तराल की अदृश्य, अविज्ञात प्रसुप्त शक्तियों की जागृत करके उपलब्ध किया था। अध्यात्म, चेतना का विज्ञान है। उस क्षेत्र की विभूतियों को, भौतिक सम्पदा की तुलना में असंख्यों गुना समर्थ एवं महत्वपूर्ण कहा जायगा।

आज का विज्ञान भी शरीर तन्त्र और मनःसंस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक शक्तियों को खोजता और उन्हें अद्भुत बताता हुआ आगे बढ़ रहा है। एन्जाइम, हारमोन, जीन्स, सैल्स अपने भीतर न जाने क्या−क्या अद्भुत छिपाये बैठे हैं। उनकी क्षमता का एक छोटा अंश ही शरीर मात्रा में प्रयुक्त होता है। जिसका इच्छित प्रयोग अभी नहीं हो पाया वह इतना विशाल एवं विराट् है कि उनके सहारे सामान्य शरीरधारी दैत्य जैसा असामान्य हो सकता है। मनुष्य शरीर एक अच्छा खासा बिजली घर है। उसके अगणित ज्ञान तन्तु उसी के सहारे समस्त शरीर को गतिशील बनाते—स्फूर्ति एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह मानवी विद्युत भण्डार का नगण्य−सा उपयोग है। जो प्रसुप्त पड़ा है उसको यदि सक्षम किया जा सके तो सिद्ध होगा कि कोई विशालकाय अणु ऊर्जा संस्थान अपने ही भीतर विद्यमान है। अणु विस्फोटों से उत्पन्न ऊर्जा विकिरण की ऊर्जा सभी पड़ते रहते हैं। यदि चेतन जीवाणु के मचल पड़ने का अनुमान लगाया जा सके तो प्रतीत होगा कि जड़ की तुलना में चेतन जितना समर्थ है उसी अनुदान से परमाणु और जीवाणु की तुलना करते हुए वरिष्ठता−कनिष्ठता का मूल्याँकन किया जा सकता है।

विश्व ब्रह्माण्ड को सूक्ष्म वैभव को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है। इनका प्रतिनिधित्व मानवी सत्ता में अन्तर्हित स्थूल, सूक्ष्म, और कारण शरीर करते हैं। इस प्रकार इस विराट् को सात आयामों में विभक्त किया गया है। यही सात लोक हैं। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई के तीन आयाम सर्वविदित हैं। आइन्स्टीन के अनुसार टाइम, स्पेस और काँजेशन भी तीन आयाम हैं। सातवाँ वह है जिसमें दृश्यमान लोक और अदृश्य लोक परस्पर आदान−प्रदान के लिए खुल जाते हैं। स्थूल, सूक्ष्म में प्रवेश कर सकता है और सूक्ष्म को स्थूल में परिणत कर सकना शक्य होता है। यह आज के सात आयाम पुरातन के सात लोक हैं। इनके साथ सम्बन्ध सूत्र जोड़ लेने वाले को टाइम, स्पेस और कन्जेक्शन सम्बन्धी व्यवधानों का सामना नहीं करना पड़ता। वह वर्तमान की ही तरह भूतकाल को भी प्रत्यक्ष देख सकता है। इसी प्रकार भावी सम्भावनाओं का पूर्व आभास प्राप्त कर लेने में भी उसे कठिनाई नहीं रहती। स्पेस के आयाम में प्रवेश करने वालों के लिए दूरी नाम की कोई कठिनाई नहीं रहती। वह प्रकाश की गति से भी आत्म सत्ता को यहाँ से वहाँ जा पहुँचने के लिए प्रशिक्षित कर लेता है।

उपेक्षा और अवज्ञा से कोई भी वस्तु हाथ से चली जाती है। अध्यात्म विज्ञान की पुरातन विधाएँ अब उपलब्ध नहीं रहीं। प्रयोग अभ्यास के अभाव में उनका प्रयोग ही नहीं, दर्शन भी लुप्त हो गया। अब हमें गिनती भूल जाने पर नये सिरे से गिनने जैसी पुनरावृत्ति करनी होगी। लुप्त का तो कुछ लँगड़ा, लूला अतापता भी अध्यात्म ग्रन्थों में संकेत रूप से मिल जाता है। उस आधार पर उस मूली कड़ी को जोड़ते समय एक नई कठिनाई और बन गई है कि अध्यात्म विज्ञान वाले सतयुग के आज के कलियुग के बीच इतना लम्बा समय गुजर गया, इतनी तेजी से परिवर्तन हुआ कि शरीर बहिरंग ही उस समय वालों की आकृति से मिलता−जुलता है। संरचना में प्रयुक्त हुई रसायन सम्पदा तथा ऊर्जा का स्तर ही कुछ से कुछ हो गया। सभी जानते हैं कि आणविक विकिरण की चपेट में आने वालों की रासायनिक स्थिति में भारी परिवर्तन होता है और मनुष्य बाहर से सही दीखने पर भी भीतर से विषाक्तता का पिटारा बन जाता है। विषैली, नशीली वस्तुएँ खाते रहने पर भी शरीर विषकन्याओं जैसा बन जाता है जिनके संपर्क में आने भर से उपभोक्त काल की गति में चला जाता था। कितनी ही औषधियों के हानिकारक तत्व पीढ़ियों को अपंग, विकृत बना देते देखे गये हैं। कुछ ऐसा ही माहौल पिछले दिनों बना है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कोलाहल कीटनाशक, रासायनिक खाद, आदि कारणों से समूचा धरातल, वनस्पति जगत, जल भण्डार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इन्हीं के सहारे मनुष्य जीता है। यदि वे विषाक्त विकृत होने लगे तो अनायास ही मानवी काया पर उसका अवाँछनीय प्रभाव पड़ेगा। ऐसी दशा में वे प्रयोग उस रूप में फलप्रद नहीं हो सकते जिस प्रकार कि प्राचीन काल के निर्मल और प्राण पुँज वातावरण में सफल होते थे। यह बात औषधियों के सम्बन्ध में भी जितनी सही बैठती है उतनी ही अध्यात्म प्रयोग उपचारों और साधना उपक्रमों के सम्बन्ध में भी लागू होता है। अब दोनों ही क्षेत्र नई खोज की अपेक्षा करते हैं।

जिन जड़ी−बूटियों के जो गुण शास्त्रों में मिले हैं वे अब उस रूप में नहीं मिलते। च्यवन प्राशायलेह से वृद्ध च्यवन ऋषि का युवा होना, या तो मिथ्या कथानक है अथवा फिर उन बूटियों में वे गुण नहीं रहे। दूसरी बात ही सही है। भूमि की उर्वरता, बादलों की वर्षा, वायु के प्राण तत्व में कुछ ऐसी गिरावट आदि और उलट−पुलट हुई है कि नाम और आकृति में वनस्पति वर्ग का कलेवर पूर्ववत् रहते हुए भी भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला हो गया है। फिर उनका उपयोग भी वैसा परिणाम कहाँ उत्पन्न कर सकेगा जैसा कि कभी किया करता था। आज द्रव्य गुण विधान की नये सिरे से शोध करने की आवश्यकता है।

तथ्यों को देखते हुए आयुर्वेद की वहीं से शोध आरम्भ होनी चाहिए जहाँ से महर्षि चरक, सुश्रुत, बाण भट्ट आदि ने की थी। जब काया की सूक्ष्म संरचना में भारी उलट−पुलट हो गई। अब वनस्पतियाँ अपने पुरातन गुण धर्म गँवाकर कुछ से कुछ हो गई तो फिर उनके उपयोग एवं प्रभाव के सम्बन्ध में क्या उस समय जैसी आशा की जा सकती है। आज उस क्षेत्र में नये सिरे से अनुसंधान अपेक्षित है। यज्ञ चिकित्सा के परिप्रेक्ष्य में यही नीति अपनाई गई है और हवन द्रव्यों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री तथा समिधाओं के सम्बन्ध में नये सिरे से अनुसंधान निर्धारण किये जा रहे हैं।

ऊपर चिकित्सा क्षेत्र के एक व्यवधान एवं समाधान का उदाहरण इसलिए दिया गया है कि अध्यात्म साधनाओं के पुरातन स्वरूप का नये परिप्रेक्ष्य में वैसा प्रभाव उत्पन्न करने की कठिनाई का रहस्य समझा जा सके। एक तो यही बाधा कम नहीं थी कि अध्यात्म विज्ञान के दर्शन और प्रयोग का सही एवं सुविस्तृत रूप उपलब्ध नहीं होता। जो मिलता है उससे समग्रता नहीं बनती। कुछ अनुमान आभास जैसा ही हस्तगत होता है। समग्र प्रक्रिया किसी भी प्रयोग की सन्तोषजनक बाल बोझ रूप में नहीं मिलती। संकेतों के सहारे इतने गहरे और खतरे से भरे क्षेत्र में कैसे प्रवेश किया जाय। यह असमंजस तब और भी दूना हो जाता है। जब वातावरण और काम संस्थान में अप्रत्याशित उथल−पुथल का तथ्य भी सामने है।

गिनती−गिनना भूलने पर नये सिरे से मिलना होता है। वनस्पति औषधियों के सम्बन्ध में ही नहीं अध्यात्म विज्ञान के आधे−अधूरे प्रयोग प्रतिपादनों का भी नये सिरे से अनुसंधान निर्धारण करना होगा। युग के अनुरूप—परिस्थिति से सम्बद्ध साधना ही अभीष्ट फलदायक सिद्ध हो सकती है। इस प्रक्रिया को ‘युग साधना’ नाम देना अधिक उपयुक्त होगा।


सस्ते खोखले में भरा बहुमूल्य भाण्डागार

काय संरचना के सम्बन्ध में मोटी जानकारी इतनी ही सीखी सिखाई जाती है कि अस्थि, माँस, नाड़ी संस्थान, पाचन तन्त्र, रक्त नाचरण, मस्तिष्क आदि अवयवों का स्वरूप और क्रिया−कलाप क्या है? इससे आगे जलकर उसकी सूक्ष्म संरचना जानने का जिन्हें अवसर मिलता है वे आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि सामान्य से काय कलेवर के प्रत्येक छोटे बड़े घटक का निर्माण कितनी विशिष्टताओं, कुशलताओं और सम्भावनाओं से ओत−प्रोत बनाया गया है। देखने में लिबलिबे अस्थि मज्जे से बने हुए अंग अवयव माँस पिण्ड लगते भर हैं उनके अन्तराल में इतनी विचित्रताएँ—विविधताएँ, क्षमताएँ और सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं कि उनकी महान परिणति का अनुमान लगाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं रह जाती।

डॉ. केनिव राँसले की पर्यवेक्षण रिपोर्ट के अनुसार मनुष्य के गुर्दे 200 वर्ष तक, हृदय 300 वर्ष तक, चमड़ी 1000 वर्ष तक, फेफड़े 1500 वर्ष तक और हड्डियाँ 4000 वर्ष तक जीवित रह सकने योग्य मसाले से बनी हैं। यदि उन्हें सम्भाल कर रखा जाय तो वे इतने समय तक अपना अस्तित्व भली प्रकार बनाए रख सकती हैं। इनके जल्दी खराब होने के कारण दो ही हैं—उनसे लगातार काम लिया जाना और बीच−बीच में मरम्मत का अवसर न मिलना।

सहयोग की भावना के आधार पर ही खरबों कोश मिलकर एक शरीर बनाते हैं। सहयोग के आधार पर ही सारे कोश अपने को ऊतकों में वर्गीकृत कर लेते हैं। ऊतक पूरे सहयोग से अवयव बनाते हैं और अवयव मिलकर एक तन्त्र बनाते हैं। फिर विभिन्न तन्त्र पूर्ण सहयोग से पूरी मानवी काया बनाते हैं। इस प्रकार लगभग साढ़े सात सौ खरब इकाइयों (कोशों) का एक शरीर बनता है।

सहयोग व सहकार शरीर की हर इकाई का गुण है। अनेकों एन्जाइम मिलकर भोजन पचाते हैं। भोजन पचाने में हर एन्जाइम जो वस्तुतः एक प्रोटीन होता है, का बनना स्वयं सैकड़ों एन्जाइमों पर निर्भर करता है। इस प्रकार मात्र भोजन पचाने में कई सौ एन्जाइमों का योगदान होता है। यदि इनमें से कोई भी अपना काम न करे तो शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता।

स्वस्थ शरीर एक ऐसे किले के समान है जिसे घातक से घातक एवं प्रबल सामर्थ्यवान जीवाणु−विषाणु कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। स्वस्थ शरीर की संरचना−पर जब एक दृष्टि डालते हैं तो एक अद्भुत चमत्कारी संस्थान के दर्शन होते हैं। जीवाणु, जो शरीर पर व अन्दर जमे बैठे है, से संघर्ष व सहयोग की प्रक्रिया किस प्रकार सम्पन्न होती है, कैसे काया के विभिन्न घटक इन आक्रमणकारियों से जूझते हैं अथवा तालमेल बिठाते हैं−इसकी भी अपने आप में एक गौरव गाथा है।

यदि किसी व्यक्ति का एक गुर्दा या एक फेफड़ा पूर्णरूप से निकाल भी दिया जाये तो भी वह इन परिस्थितियों से तालमेल बिठा लेगा और बचा हुआ दूसरा गुर्दा या फेफड़ा शरीर का वह सारा काम अकेला कर लेगा जो दो अवयव कर पाते थे। बचा हुआ अवयव फैलकर बड़ा हो जायेगा और सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देगा।

हृदय 250 ग्राम का एक माँस पिण्ड होते हुये भी प्रतिदिन छियानवे हजार किलोमीटर लम्बी रक्त वाहिनियों में सतत् रक्त को चलायमान रखता है।

जितना रक्त वह दिन भर में पम्प करता है, उतना 18000 लीटर के एक टैंक को भरने के लिए काफी है। ऐसा अनुमान है कि चालीस वर्ष की उम्र तक यह करीब 300000 टन रक्त को पम्प कर चुका होता है।

औसतन साठ किलोग्राम के एक व्यक्ति के 7 किलोग्राम वजनी अस्थि शृंखलाओं से युक्त संस्थान, सवा बारह मीटर लम्बे पाचन संस्थान, एवं अगणित कोशों को घेरे 14 लीटर के करीब स्थान को अपने प्रवाह द्वारा निरन्तर निर्मल बनाये रखना, इस आध पौंड के जीवन्त अंग हृदय का ही कार्य है।

इसकी एक दिन की शक्ति द्वारा दस हजार किलोग्राम वजन एक मीटर की ऊँचाई तक बिना किसी कठिनाई के उठा सकते हैं और यदि मनुष्य की पूरी जिन्दगी के औसत सत्तर वर्ष मात्र ले लिए जायें तो फिर दो लाख टन रक्त को लगभग छियानवे हजार मीटर की ऊँचाई तक चढ़ाया जा सकता है।

यह एक ऐसी ट्राँसपोर्ट व्यवस्था है जिसका कार्यक्षेत्र 1 लाख 20 हजार किलोमीटर लम्बा है। 5॥ फुट लम्बी काया में इतना बड़ा जंजाल बिखरा पड़ा है जो छह सौ अरब जीवकोश रूपी सदस्यों तक अपना सन्देश पहुँचाता है। सारे विश्व की हवाई उड़ानों के परिपथ की कुल लम्बाई को जोड़ दिया जाये तो भी रक्त वाहिनी नलियों की कुल लम्बाई से कम ही होगा।

एक डबल सेट पम्प एक दिन में 3250 गैलन पानी फेंकता है, किन्तु उसे दिन भर बिना एक—आध घण्टा विश्राम दिये चलाये रखा जाये तो मशीन इतनी गर्म हो जायेगी कि उसके जल उठने या फट जाने का संकट उत्पन्न हो उठेगा। इसीलिए मशीन वाले लोग उसे दिन में एक बार विश्राम दे लेते हैं। हमारे शरीर में हृदय ही एक ऐसा शक्ति स्रोत है, जो जीवन भर एक पल को भी विश्राम किये बिना काम करता रहता है, जीवन भर 6 लीटर रक्त सारे शरीर में दौड़ता रहता है। अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए हृदय 1 सेकेंड की नींद तक नहीं लेता। यह अपने आप में एक कर्मयोगी की समतुल्य भूमिका है जिसे हम मानवी काया के अतिरिक्त और कहीं नहीं देखते। कभी कहीं कोई स्थान कट जाता या चोट लग जाती है, तो हृदय अपनी कुछ विशेष धमनियों को चलाकर उस स्थान में पहले से बहुत अधिक मात्रा में तब रक्त पहुँचाता रहेगा जब तक उतने रक्त की आवश्यकता बनी रहेगी।

मस्तिष्क—सारे जीवन का केंद्र बिन्दु एवं प्राण है। उसे प्रतिपल शुद्धतम रक्त की आवश्यकता होती है। हृदय उसे शुद्ध से शुद्ध रक्त देता है।

कहने को तो हृदय सारे शरीर को रक्त पम्प करता है। वह 99 प्रतिशत तो समस्त शरीर को बाँट देता है, पर एक प्रतिशत अपने पोषण के लिए भी बचाकर ‘कोरोनरी’ धमनियों द्वारा स्वयं का पोषण भी कर लेता है। जीवन जीने की यह स्वर्णिम समन्वय नीति है।

एक धड़कन एक मिनट के 72 वें भाग में सेकेंड के पाँच बटे छः भाग में सम्पन्न होती है। इस अल्प अवधि में ही असंख्य विद्युत तरंगें उस संस्थान से प्रवाहित होती हैं। इन तरंगों के विद्युत आवेशों की इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम के माध्यम से रिकार्ड करके हृदय की स्वास्थ्य परीक्षा की जाती है।

सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं जबकि उसे मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर हृदय भी 6 मिनट जी लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही बुझ जाता है। हृदय फेल होने की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना ही होता है। औसत दर्जे के मनुष्य शरीर में पाँच से छः लीटर तक खून रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरन्तर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्ति कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घण्टे में हृदय को 13 हजार लीटर खून का आयात निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका समेटा जाता है जिसे यदि एक बार भी इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी कि दस टन बोझा जमीन से 50 हजार फुट तक उठा ले जाने में लगानी पड़ती है।

रक्त के लाल कण शरीर के प्रत्येक अंश−तन्तु और कोश को आहार एवं आक्सीजन पहुँचाते हैं। मल रूप निकली कार्बनडाइ आक्साइड गैस को ढोकर फेफड़ों तक ले जाते हैं, ताकि वहाँ से साँस द्वारा उसे बाहर निकाला जा सके।

सफेद कण वस्तुतः कोशाणु हैं। उनकी संख्या कम ही होती है। 650 लाल कणों के पीछे एक। इन्हें शत्रु रोगाणुओं से लड़ने वाले सैनिक कहा जा सकता है। शरीर के किसी भाग में यदि रोग कीट हमला करदें तो यह श्वेत कण उनसे लड़ने को तत्काल जा पहुँचते हैं। साधारणतया प्रति घन मिली मीटर रक्त में 5 से 10 हजार तक श्वेत कण होते हैं। लाल रक्त कण इनसे छोटे होते हैं। यदि 3000 की संख्या में उन्हें सीधे एक लाइन में रख दिये जाँय तो एक इंच से भी कम लम्बाई में रख दिये जाँय तो एक इंच से भी कम लम्बाई बन सकेगी। युवा मनुष्य के शरीर में 25000000000000 लाल रक्त कण होते हैं वे चार महीने जीवित रहकर मर जाते हैं और उनका स्थान लेने के लिए नये पैदा हो जाते हैं। रक्त की चाल धमनियों में प्रति घण्टा 35 किलोमीटर की है।

लाल रक्त कणिकायें प्रायः 4 महीने में लगभग 1500 चक्कर सारे शरीर में लगा देने के बाद बूढ़ी होकर मर जाती हैं। इन 2500 करोड़ लाल रक्त कणों को यदि एक सीधी पंक्ति से सटाकर बिठा दिया जाय तो इतना छोटा आकार रहते हुए भी वे इतनी बड़ी लाइन में होंगे जो समस्त पृथ्वी की चार बार परिक्रमा कर सकें।

हृदय के समान ही फेफड़े भी आजीवन कभी विश्राम नहीं करते 20 से 30 इंच घन हवा को बार−बार भरते और शरीर को ताजगी प्रदान करते रहते हैं। प्रति मिनट 17 बार के हिसाब से यह आजीवन धौंकते रहते हैं।

शरीर में उत्पन्न दूषित वायु कार्बनडाइ−आक्साइड को शरीर पोषण के लिए उपलब्ध कराना यह दुहरा उत्तरदायित्व फेफड़ों को निबाहना पड़ता है। फेफड़ों में आँख से भी न दीख पड़ने वाली बहुत पतली वायु नलिकाएँ बहती हैं। इन 40 नलिकाओं के मिलने से एक वायुकोष्ठ एयरसैक बनता है। यही सघन होकर फेफड़े का रूप लेते है। इनकी संख्या प्रायः 1600 होती है। इन्हें श्वास विभाग के सफाई कर्मचारी भी कहा जा सकता है। इन वायुकोष्ठों की लचक अद्भुत है। इन्हें पूरी तरह फूलने का अवसर मिले तो वे समूचे शरीर से 55 गुने विस्तार में फैल सकते हैं। एक मनुष्य एक मिनट में 17 से 20 बार साँस लेता है। प्रत्येक साँस के साथ 300 से 500 क्यूविक सेण्टीमीटर हवा 1 पौण्ड वजनी फेफड़ों में भर जाती हैं। फेफड़ों की सूक्ष्म इकाइयाँ बुलबुलों के आकार के वायु कोष्ठ (एलब्रियोलाइ) हैं जिनकी संख्या लगभग 25 करोड़ होती है और जिनकी दीवारों का बाहरी क्षेत्रफल साठ वर्ग मीटर होता है। साधारण साँस लेने वाला व्यक्ति जब 100 मीटर की लम्बी दौड़ में भाग लेता है तो एक सौ अस्सी लीटर हवा श्वास के माध्यम से खींचता है। लचीले स्पंज जैसे ऊतकों के बने हुए ये विलक्षण फेफड़े परिस्थितियों के अनुसार आठ गुना तक फैल जाते हैं।

शरीर का ढोल चमड़ी से मढ़ा है। यह देखने में पिटारी-सा लगता है जिसमें भीतर चित्र−विचित्र कबाड़ खाना भरा पड़ा है। किन्तु उस लिफाफे की संरचना पर दृष्टिगत करने से प्रतीत होता है कि वह इतना साधारण नहीं जितना कि दीखता या समझा जाता है। बारीकी समझने के प्रयत्न करने पर प्रतीत होता है कि सामान्य-सी दीखने वाली त्वचा कितनी विचित्र—कितनी रहस्यमयी है।

शरीर पर चमड़ी का क्षेत्रफल लगभग 250 वर्ग फुट होता है। वजन 6 पौण्ड। सबसे पतली वह पलकों पर होती है। 0.5 मिलीमीटर। पैर के तलवों में सबसे मोटी होती है—6 मिलीमीटर। साधारणतया उसकी मोटाई 0.3 से 3 मिलीमीटर की होती है। उसमें बारीक−बारीक अगणित छेद होते हैं जो खुर्दबीन की सहायता से देखे जा सकते हैं। इन छंदों से दिन−रात से औसतन 10 छटाँक पसीना बाहर निकलता है। गर्मी पड़ने पर या अधिक परिश्रम करने पर जब शरीर का इंजन गरम हो उठता है तो उसे ठण्डा करने के लिए स्वेद ग्रन्थियाँ तेजी से पसीना बाहर निकालती हैं और बदन ठण्डा कर देती हैं। पर सर्दियों में शरीर को गरम रखने की जरूरत पड़ती है इसलिए वे छेद सिकुड़ जाते हैं। भीतर की गर्मी रुकी रहती है और ठण्ड से बचाव हो जाता है। इस तरह त्वचा की संरचना शरीर को “एअर कन्डीशन” बनाये रहती है।

त्वचा−छिद्र पसीना ही नहीं निकालते, वे एक प्रकार से साँस भी लेते रहते हैं। वाष्प की तरह कुछ चीजें निकलती रहती है और जरूरत की चीजें भीतर घुसती रहती है।

त्वचा के भीतर बिखरे हुए ज्ञान तन्तुओं की लम्बाई 45 मील कूती गई है। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार के तन्तु भी हैं जो दृश्य, गन्ध, ध्वनि, दबाव, स्वाद, सर्दी−गर्मी की आँख, नाक, कान, जीभ आदि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विशिष्ट प्रकार की अनुभूतियाँ कराने में योगदान करते हैं।

त्वचा में एक विशेष तेल रहता है जो “कोरियम” कहलाता है। शरीर पर इसी चिकनाई की चमक रहने से सौंदर्य बढ़ता है और तेजस्विता झलकती है। इसी प्रकार त्वचा की रंजक कोशिकाएँ—’मेलानिक’ नामक रंग उत्पन्न करती हैं। इन्हीं के कारण गोरा, काला, गेहुँआ, पीला आदि रंग मनुष्य का होता है।

एक वर्ग फुट त्वचा में लगभग 72 फुट लम्बी तन्त्रिकाएँ जाल की तरह बिछी हुई हैं। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई लगभग 12 फुट बैठती है। शरीर की गर्मी को जब बाहर निकालना आवश्यक होता है तो वे फैल जाती हैं और जब ठण्ड लगती है तो भीतर की गर्मी बाहर न निकलने देने से शरीर को गरम बनाए रखने के लिए वे सिकुड़ जाती है।

सम्पूर्ण शरीर की त्वचा में लगभग दो लाख स्वेद ग्रन्थियाँ हैं इनमें से पसीने के रूप में शरीर के हानिकारक पदार्थ बराबर बाहर निकलते रहते हैं।

एक वर्ग सेंटीमीटर चमड़ी में 15 तेल ग्रन्थियाँ, 10 रोएँ, 30 लाख कोशिकाएँ, 4 ताप सूचक तन्त्र, 200 दर्द सूचक स्नायु छोर, 25 स्पर्शानुभूति तन्त्र, 4 गज स्नायु, 3 हजार सम्वेदना ग्राहक कोशिकाएँ, 100 स्वेद ग्रन्थि, 3 फुट रक्त वाहिनियाँ होती है।

त्वचा का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जिस पर प्रति वर्ग इंच करोड़ों जीवाणु अच्छे मित्र की तरह शान्ति और सौहार्द के वातावरण में मनुष्य के साथ जीवन पर्यन्त न रहते हों। ये जीवाणु शरीर का द्विपक्षीय लाभ करते हैं—एक तो ये सतत् समाप्त होते रहने वाले कोशों को खाकर उनकी सफाई करते हैं, साथ ही अपना पेट भी भरते हैं, तथा दूसरे ये किसी बाह्य जाति के जीवाणु को घुसने नहीं देते। स्वयं में निरापद इन जीवाणुओं को सहभोजी (कमेन्सल) या सहजीवी (सिम्बीयोटिक) कहते हैं।

शरीर रात दिन में 160 से 180 लाख कैलोरी ऊष्मा नित्य फेंकता रहता है। बिजली के छोटे हीटर भी प्रायः इतना ही तापमान उत्पन्न करते हैं शरीर में यह गर्मी घर्षणात्मक हलचलों से उत्पन्न होती है।

यह एक दो अवयवों की चर्चा हुई। इनके अतिरिक्त गुर्दे, आमाशय, यकृत, प्रजनन तन्त्र, मेरुदण्ड जैसे घटकों पर दृष्टि डाली जाय तो वे सभी अपने आप में एक समूचे तिलस्म जैसे दीखते हैं। मस्तिष्क की संरचना इन सबसे अद्भुत है। उसके छोटे घटकों—जीवकोशों, न्यूरानों की बनावट के सम्बन्ध में तो सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों की सहायता से बहुत कुछ जाना जा चुका है परन्तु उनकी गतिविधियों और रहस्यमयी परतों के सम्बन्ध से तो तनिक-सी ही जानकारी मिल सकी है। विज्ञान में मस्तिष्कीय क्रिया−कलापों के सम्बन्ध में जो जाना उसे समग्र की तुलना में सात प्रतिशत ही कहा गया है जो जानना शेष है उसे 93 प्रतिशत कहना चाहिए। सामान्य व्यवहार में जो अंश काम में आता है—वह स्वल्प है। अतीन्द्रिय क्षमताओं से भरा−पूरा कार्यक्षेत्र जो तिलस्म से भरा है उसे तो अचेतन, अब चेतन, सुपर चेतन कहकर अविज्ञात की संज्ञा में ही धकेल दिया जाता है।

यह काया की भौतिक संरचना के उस भाग की चर्चा हुई जिसे खुली आँखों से नहीं वरन् यन्त्र उपकरणों की सहायता से ही देखा जाना जा सकता है। आत्मा और उसकी क्षमता का क्षेत्र इससे आगे का है। इसी काया में उसकी स्थिति उपस्थिति होने के कारण, समूचा तिलस्म और भी अधिक सुविस्तृत एवं रहस्यमय बन जाता है। इतने पर भी जो सूक्ष्म आँखों से दीखता है और प्रत्यक्ष क्रिया−कलाप में प्रयुक्त है अत्यन्त ही तुच्छ है। उसका बाजारू मूल्य इतना कम है कि यह देखते हुए हैरानी होती है कि इतने सस्ते खीखले में इतना बहुमूल्य भण्डार भरने का और भी अधिक कौतूहल कौतुक किसने किया? क्यों किया?


प्राण ऊर्जा बनाम अतीन्द्रिय क्षमता

घर में हीटर, कूलर, पंखा, बल्ब, रेडियो, टेलीविजन आदि कितने ही उपयोगी यन्त्र लगे हैं, पर उनकी सार्थकता तभी है जब उनमें विद्युत धारा का समुचित स्तर प्रवाहित हो रहा है। करेन्ट ही न हो, अथवा नगण्य जितनी मात्रा में हो तो फिर वे उपकरण किसी काम आयेंगे। व्यर्थ ही जगह घेरे पड़े रहेंगे। मनुष्य शरीर में एक से एक महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी उपकरण सृष्टा ने फिट करके रखे हैं। उनके लिए समुचित मात्रा में बिजली जुटाना उनका काम है जो उसकी उपयोगिता जानते हैं तथा प्रयुक्त होने पर जो सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं उनसे परिचित है।

सूक्ष्म शरीर की संरचना प्राण ऊर्जा से हुई है। उसके अवयव ही उसी स्तर के प्राण गुच्छकों से बने हैं। चक्र उपत्यिका इसी प्रकार के भँवरों का नाम है। उन्हें साधना द्वारा उत्तेजित किया जाता है तो ये चक्रवातों की तरह उछलने लगते हैं। बुद्धिमत्ता इसमें है कि उन्हें उभारने और सही प्रयोजन में लगाने की कला का ज्ञान अनुभव उपलब्ध हो।

कभी अदृश्य होने और इन्द्रिय यन्त्रों की पकड़ में न आने के कारण उस क्षेत्र पर विश्वास करना और प्रयोग के लिए कदम बढ़ाना कठिन प्रतीत होता था, पर अब वैसी बात नहीं रही। विज्ञान ने स्थूल तक सीमित न रहकर सूक्ष्म में प्रवेश करने का संकल्प किया है। फलतः उसे इन्द्रियातीत क्षेत्र की न केवल जानकारी मिली है, वरन् उपयोगिता समझ में आने पर श्रद्धा भी बढ़ी है।

न्यूयार्क विश्व विद्यालय के डॉ. रॉबर्ट बेकर इस निष्क र्ष पर पहुँचे हैं, कि ब्रह्माण्डव्यापी विद्युत चुम्बकीय शक्ति विश्व के प्रत्येक पदार्थ को—जड़ चेतन को−अपने साथ जकड़े हुए हैं। विश्व की प्रत्येक इकाई उसी समष्टि की घटक है। अस्तु पृथक्ता के बीच सघन एकता विद्यमान है और उस एकता के कारण ही पदार्थों और प्राणियों में दृश्य−अदृश्य आदान−प्रदान होता है। दो क्रम आयेदिन अनुभव में आता रहता है, वह सामान्य और जो यदा−कदा दीख पड़ता है, वह असामान्य अतीन्द्रिय या चमत्कारी कहा जाता है।

कुछ ही वर्षों पूर्व की बात है कि प्रकाश विज्ञानी ‘एर्नेस्ट एटो’ और उनके सहयोगी वैज्ञानिक डी. गैवर ने होलोग्राफ के एक नहीं सिद्धांत का आविष्कार किया, जिसके आधार पर त्रिआयामीय स्तर का छाया चित्रण आँखों से देखे जा सकने की परिकल्पना साकार हुई। भूतकालीन दृश्यों को इन्हीं आँखों से इस प्रकार देखा जा सकने की भी कल्पना की जाने लगी मानों वह घटनाक्रम अभी−अभी ही बिल्कुल सामने घटित हो रहा हो।

विज्ञानी ट्रेवर जेम्स का कहना है—”हमारी आँखें वर्णक्रम की अल्प मात्रा देख पाने में ही समर्थ है। हमारी आँख वर्णक्रम के सिर्फ सात रंगों को ही पकड़ पाती है, किन्तु इसमें लाल से लेकर बैंगनी तक केवल सात ही रंग नहीं होते वरन् ऐसे लगभग दस अरब अदृश्य रंग होते हैं जो आँखों को दिखाई नहीं पड़ते। इनकी ‘बेज लेंग्थ’ (आवृत्ति) हमारी आँखों की पकड़ से बाहर होती है।”

“सूक्ष्म जीवाणु हम नंगी आँखों से नहीं देख सकते, किन्तु माइक्रोस्कोप के सहारे उन्हें देखा जा सकता है। उसी प्रकार इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट फोटोग्राफी की सहायता से एक ऐसे अदृश्य−चेतनात्मक जगत में पहुँचा जा सकता है जो देश और काल की सीमा से बाहर है।”

आज वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक एवं परावैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं कि ‘प्रेत’ एक कल्पना ही नहीं मानव के अभौतिक जीवन के दीर्घकरण की ही अभिव्यक्ति है, और अल्ट्रावायलेट तकनीक द्वारा ली गई प्रेतों का तस्वीर, अदृश्यता की वैज्ञानिक सम्भावना की ओर इंगित करती है।

विज्ञान इस सम्बन्ध में अपनी दलील देते हुए कहता है कि धूप की अदृश्य तरंगें हमारा शरीर, हमारे जीवन एवं नियति तक को प्रभावित करती है। हमारे शरीर के विद्युत क्षेत्र से उनका संपर्क अपवर्तनाँक को जन्म दे सकता है। सम्भवतः यही अदृश्यता का कारण है।

“प्रापगेशन ऑफ शार्ट रेडियो वेव्ज’ नामक अपने शोध प्रबन्ध में हर्बर्ट गोल्डस्टीन ने कहा है—”वायुमण्डल में संव्याप्त इस विद्युतमय जगत की तह के पीछे जो कुछ भी है वह अदृश्य प्राणियों की दुनिया है, जिन्हें आँखों अथवा अत्याधुनिक इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शियों के सहारे भी नहीं देखा जा सकता।”

सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक एच. जी. वेल्स ने अपनी एक पुस्तक ‘द इनविजिवल मैन’ में उन सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला है, जिनके अनुसार कोई दृश्य पदार्थ या प्राणी अदृश्य हो सकता है और अदृश्य वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगती है। इस विज्ञान को उन्होंने ‘अपवर्तनाँक’ परफ्लेक्टिव इन्डिसेम नाम देकर उसके स्वरूप एवं क्षेत्र का विस्तृत वर्णन किया है। निश्चित ही एक ऐसे सूक्ष्म जगत का अस्तित्व भी है जो अपने इस ज्ञात जगत की तुलना में न केवल अधिक विस्तृत वरन् अधिक शक्तिशाली भी हैं।

पहली घटना के तथ्य मनीला की यू.पी.आई. नामक प्रामाणिक समाचार एजेन्सी ने जुटाए थे। इस एजेन्सी ने पूरी खोजबीन के पश्चात् एक समाचार प्रकाशित कराया था कि कार्नेलियों क्लोजा नामक एक बारह वर्षीय छात्र जब तब अनायास ही अदृश्य हो जाता है। स्कूल के क्लास से गायब हो जाता और दो−दो तीन−तीन घण्टे बाद वापस लौटना आरम्भ में लड़के की चकमेबाजी समझा गया किन्तु पीछे उसके दिये गए विवरण पर ध्यान देना पड़ा। वह कहता था कि कोई समवयस्क परी जैसी लकड़ी उसे अपने पास बुलाती है और वह रुई की तरह हलका होकर उसके साथ खेलने व उड़ने लगता है। पुलिस ने बहुत खोज की। उस लड़के पर विशेष पहरा भी बिठाया गया। यहाँ तक कि उसे एक कमरे में बन्द भी कर दिया गया परन्तु उसका गायब होना नहीं रुका। पीछे तान्त्रिकों द्वारा मन्त्रोपचार किये जाने से उसका गायब होना बन्द हुआ।

दूसरी घटना का उल्लेख फ्राँसीसी वैज्ञानिक सेलारियर द्वारा किया गया है। उनकी प्रामाणिकता पर या विश्वसनीयता पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता। घटना पैरिस की एक प्राचीन प्रतिमा से सम्बन्धित है। वैज्ञानिकों का एक दल जब इस प्रतिमा की परीक्षा कर रहा था, तब देखते ही देखते प्रतिमा गायब हो गई और उसके स्थान पर एक−दूसरी विशालकाय मूर्ति आ विराजी जो पहले की तुलना में बड़ी थी।

सन् 1920 में लन्दन के युवा साँसद पिक्टर ग्रेसर एक दुकान से बाहर निकलते ही सहसा विलुप्त हो गए। इसी प्रकार पोलैण्ड निवासी पादरी बोनिस्की 13 जुलाई 1950 को एक मित्र के पास जाने के लिए अपने घर से निकले। लगभग 80 मीटर दूर जाकर वे भी हवा में विलीन हो गए। खोज−ढूँढ़ के बहुतेरे प्रयास किए गए किन्तु सब निष्फल रहे।

इन घटनाओं से प्रतीत होता है कि दृश्य जगत के अति निकट कोई अदृश्य लोक है। इन दोनों के बीच आदान−प्रदान चलता रहता है कोई दृश्यमान वस्तु या काया अदृश्य लोक में प्रवेश पाकर अदृश्य हो सकती है। साथ ही यह भी सम्भव है कि अदृश्य लोक के पदार्थ या प्राणी यकायक प्रकट होकर अपना आकस्मिक प्रकटीकरण करते हुए दर्शकों को चमत्कृत कर सकें।

23 सितम्बर 1908 को टेनेसी (अमेरिका) निवासी एक किसान ‘डेविड लाग‘ अपने दो मित्रों के साथ शाम को हवाखोरी करने निकले और मित्रों के देखते ही देखते हवा में गायब हो गए। मित्रों ने उस स्थान की काफी छान−बीन की। परन्तु वहाँ झाड़−झंखाड़ और गढ्ढे तो क्या कोई छोटी-सी सूराख भी नहीं नजर आई। साथ घूम रहे मित्रों में से एक प्रतिष्ठित न्यायाधीश थे। उनने लाग को खोजने के लिए भरपूर सरकारी प्रयास किए किन्तु सफलता नहीं मिली। आखिरकार हार कर उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा—”यह एक अविश्वसनीय सत्य घटना है जिसका समाधान खोजने पर भी नहीं मिलता।”

अचानक गायब होने की ऐसी घटनाएँ एक−एक व्यक्ति पर ही नहीं घटी अपितु ऐसी घटनाएँ भी हैं जिनमें एक साथ सैकड़ों लोग अचानक अदृश्य हो गए और उनका कोई पता न चल सका।

श्री एलन और श्रीमती क्रिस्टीन 1975 की गर्मी की छुट्टियाँ मनाने उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर निकले थे। लैपलैण्ड के एक गिरजाघर के पास से गुजरते हुए श्रीमती क्रिस्टीन चलते हुए श्री एलन से दो−तीन कदम आगे निकल गई। फिर ज्यों ही उनने पीछे मुड़कर देखा उनके पति लापता दिखाई दिये। न केवल उनने स्वयं खोजबीन की अपितु स्थानीय लोगों ने उनकी सहायता के लिए अपने कुत्तों का प्रयोग भी किया परन्तु कुत्ते उस स्थान पर पहुँचकर रुक जाते और भौंकने लगते थे जहाँ से श्री एलन अदृश्य हुए थे। पास ही सेना का कैम्प था। उन लोगों ने भी श्रीमती क्रिस्टीन के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उनके पति की शोध में विशेषज्ञों की मदद ली। पर सारे प्रयास विफल रहे। वे चार साल तक अपने पति की प्रतीक्षा करती रही। अन्ततः 1979 में उनके अपने पति के यकायक हवा में गायब हो जाने की घटना का हवाला देते हुए लन्दन की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर किया। अदालत में तथ्यों का अवलोकन करते हुई श्री एलन को मृत घोषित करके उनकी पत्नी के विवाह−सम्बन्ध विच्छेद की याचिका को स्वीकृति दे दी।

इन दिनों कितने ही विश्वविद्यालयों में परा मनोविज्ञान सम्बन्धी शोध कार्य बड़े उत्साहपूर्वक चल रहे हैं। कैलीफोर्निया की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, नीदरलैण्ड की योनिंगन यूनिवर्सिटी, हारवर्ड यूनिवर्सिटी, शिकागो यूनिवर्सिटी, ड्यूक यूनिवर्सिटी आदि में चल रहे शोध प्रयत्नों ने इस विज्ञान के नये अध्याय आरम्भ किये हैं और ऐसे प्रमाण एकत्रित किये हैं जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य से काम चलाऊ व्यवहार बुद्धि के अतिरिक्त और ऐसा भी बहुत कुछ है जिसे असामान्य एवं अद्भुत कहा जा सके। ऐसा क्यों होता है? अचेतन और उपचेतन मन की विलक्षण क्षमताओं का स्वरूप और कारण समझने में इन शोध प्रयत्नों से बहुत सहायता मिली है और भविष्य में अधिक जान सकने की सम्भावना का पथ−प्रशस्त हुआ है।

अदृश्य जगत की चर्चा कई रूपों में होती है। भूत, और देवी देवता तो अपने अस्तित्व का प्रमाण और प्रभाव का परिचय तो देते हैं किन्तु शरीरधारी प्राणियों की तरह दृष्टिगोचर नहीं होते। इसके अतिरिक्त उनका अस्तित्व काया के अनेक केन्द्रों में शक्ति गुच्छकों की तरह पाया जाता है। वे शरीर से ऋषियों की और मनःसंस्थान से सिद्धियों की दिव्य−विभूतियों का परिचय देते हैं। अतीन्द्रिय क्षमताएँ यही है। इनकी अलौकिकता के प्रमाण मिलते तो पहले भी थे पर तब उन्हें भूत की करतूत कह कर जादुई रहस्यवाद की गर्त में धकेल दिया जाता था। पर अब वैसी बात नहीं रही। मनुष्य में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमता अब इतनी स्पष्ट है उसे विज्ञान क्षेत्र ने अपने अनुसंधानों में मूर्धन्य मानना आरम्भ कर दिया है क्योंकि पदार्थ की तुलना में व्यक्ति की सत्ता निश्चित रूप से वरिष्ठ है।

मनुष्य की विभिन्न शरीर क्रिया विज्ञान परक एवं मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं की जाँच की गई तो देखा गया कि सुषुम्ना नाड़ी का केन्द्र, अनेक स्नायविक कोशिकाओं के गुच्छों के साथ जुड़ा एक जैवप्लाज्मीय सक्रियता का केन्द्र है। बायोप्लाज्मिक−सक्रियमा “मूड” पर निर्भर देखी गई। उदाहरणार्थ कलाकार किसी कलाकृति के बारे में सोचते समय उच्चस्तरीय चेतना की स्थिति में थे तब उनका “कोरोना” अत्यन्त प्रकाशवान था, जबकि कुण्ठित और तनाव की अवस्था में बहुत क्षीण तथा मन्द उसमें काले धब्बे भी थे।

एक अन्य प्रख्यात वैज्ञानिक जर्मनी के प्रो. बिलहोम राइख भी ‘प्राण शरीर’ के अस्तित्व में भारतीय सिद्धान्त का, मानवीय देह की एक प्रतिकृति के अस्तित्व के रूप में समर्थन करते हैं। वे इसे ‘आर्गोन’ कहते हैं यानी “एक जैव विद्युतीय शक्ति −जो नीले रंग की है।”

अब सभी जानते हैं कि प्राण विद्युत पर अनुसंधानरत रूस के विज्ञानवेत्ता ऐमयोन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार कर लिया है जो मानव के इर्द−गिर्द होने वाली विद्युतीय हलचलों का भी छायाँकन करती है। इससे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर के साथ−साथ सूक्ष्म शरीर की भी सत्ता विद्यमान है और वह ऐसे पदार्थों से बनी है जो इलेक्ट्रोनों से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न स्तर की है और अधिक गतिशील भी। प्रो. एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक ‘मिरेकल्स ऑफ मेचर’ में लिखा है−प्रकाश की तुलना में विचार विद्युत प्रवाह गति कहीं अधिक हैं। अभी यन्त्रों के द्वारा उसे नापा और देखा नहीं जा सका तो भी वह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ है। उसकी गति तथा क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।

पदार्थ वैज्ञानिकों का कथन है कि पृथ्वी अपनी चुम्बकीय शक्ति के सहारे समस्त विश्व−ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनेकानेक विशेषताओं को आकर्षित करती रहती है। उसकी अपनी सम्पदा तो नगण्य ही है। मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता में वह चुम्बकत्व है जिसके द्वारा वह दुस्साध्य एवं असम्भव दीखने वाले कार्यों को भी कर सकता है। वह दूरस्थ घटनाओं का सचित्र आँखों देखा जैसा वर्णन कर सकता है। ‘दूर की श्रवणातीत ध्वनियों को भी समीप की ही भाँति स्पष्ट सुन सकता है। ध्रुवों के क्षेत्र में चुम्बकीय तूफान उठते रहते हैं, जिनका प्रकाश ‘अरोरा बोरीएलिस’ तेजोवलय (ध्रुव प्रभा) के रूप में छाया करता है। इसे पृथ्वी के साथ अन्य ग्रहों की सूक्ष्म हलचलों के मिलन−स्पन्दन की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। ठीक इसी प्रकार शरीरगत जीवाणु भी ईथर एवं वायुमंडल में भरे विद्युत प्रवाह से टकराते रहते हैं और विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जीव कोशों में उन धातुओं तथा रसायनों की समुचित मात्रा रहती है जो आघातों से उत्तेजित होकर विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर सकें।

मानवी−चुम्बक अन्तरिक्ष से बरसने वाले अनेक भले−बुरे अनुदानों को अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप स्वीकार−अस्वीकार करता रहता है। वह अपने चुम्बकत्व के आधार पर इस विश्व−ब्रह्माण्ड में से अपनी जैसी सूक्ष्मधारा को एकत्रित कर उपयोग करता रहता है।

प्राण चुम्बकत्व पदार्थ में से अपने उपयोगी भाग को खींचता है—उसे अपने ढाँचे में ढालता है और इस योग्य बनाता है कि चेतना के स्वर में अपना भी ताल बजा सके। किस प्राणी के डिम्ब से किए आकृति−प्रकृति का जीव उत्पन्न हो, इसका निर्धारण मात्र रासायनिक संरचना के आधार पर नहीं हो जाता, वरन् वह निर्धारण रज, शुक्र कीटों के अन्दर भरी हुई चेतना के द्वारा होता है। इसी चुम्बकत्व से भ्रूण में विशिष्ट स्तर के प्राणियों की आकृति एवं प्रकृति ढलनी शुरू हो जाती है। यदि ऐसा न होता तो संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी प्रायः एक ही जैसी आकृति−प्रकृति के उत्पन्न होते क्योंकि अणुओं का स्तर प्रायः एक ही प्रकार का है।

शरीर की सामान्य क्षमता तनिक-सी प्रतीत होती है किन्तु यदि उनको दृढ़ता, और जीवट को देखा जाय तो प्रतीत होगा कि उसका प्रत्येक छोटा बड़ा अवयव असाधारण रूप से सामर्थ्यवान है। इसे प्राण शक्ति का चमत्कार जानना चाहिए।

एक व्यक्ति 70 वर्ष का होते−होते 100 टन भोजन खा लेता है। अपने वजन की तुलना में यह 1.250 गुना अधिक है। कहा जाता है कि अधिकतर लोगों को तीन दिनों के उपवास की आवश्यकता है। इंसान बगैर भोजन किये बहुत दिनों तक जिन्दा रह सकता है। रूसी शोधकर्ताओं का कहना है कि एक आदमी के बारे में कहा गया कि उसने 52 दिनों तक उपवास किया।

70 वर्ष के समय तक में एक औसत आदमी 13 वर्ष सोता है, 6 वर्ष खाता है, और इतना चलता है जो चाँद तक पहुँचने और इस दुनिया को 9 बार चक्कर लगाने तक है। साफ त्वचा रोगाणुओं को नष्ट करती है मानवीय त्वचा है 3 करोड़ रोगाणु पाये जाते हैं। इनमें से 7,20,000 एक घन्टे तक और 7000 दो घन्टों तक जीवित रहते हैं।

शरीर की ही भाँति मनःसंस्थान भी विशिष्ट सामर्थ्यों से भरा−पूरा है। प्रश्न केवल जागृति और सुषुप्ति का है। जो अपने मनःसंस्थान के अन्धेरे की गर्त्त में पड़े केन्द्रों को जगा लेता है, वह अविज्ञात विलक्षण क्षमताओं से सम्पन्न बनता है। बहिरंग की दृष्टि में ये सभी असम्भव−अद्भुत जान पड़े, परन्तु है यह सब प्रकृतिगत नियमों पर आधारित गूढ़ विज्ञान जिसे ऋषियों ने जाना व्यवहार में उतारा तथा योगाभ्यास प्रक्रिया द्वारा क्रियान्वित कर स्वयं को प्राण ऊर्जा से सम्पन्न अतीन्द्रिय सामर्थ्यों से भरापूरा बनाया था। यह राजमार्ग सबके लिये खुला पड़ा है।


मानवी काया की दैत्ययोपम क्षमताएँ

भारतीय पुराणों में भीम और दुर्योधन, कुम्भकरण और कंस, रावण और बाली−हनुमान और मेघनाद के सुदृढ़ शरीर और वज्र की काया के अनेकों प्रसंग भरे पड़े हैं। किन्तु उन्हें पड़कर ऐसा लगता है कि ये मात्र अतिश्योक्ति और कोरी गप्प है। हाथियों द्वारा रौंदा जाना विष बुझे बाणों का असर न होना क्या रहस्य था। इसके विषय में कोई विज्ञान सम्मत तर्क नहीं मिलता किन्तु इसी शताब्दी के आरम्भ में अमेरिका के एक व्यक्ति रिचर्ड ने यह सिद्ध कर दिया है व वैज्ञानिकों को यह मानने को विवश कर दिया है कि पहले ऐसी सुदृढ़ देह वाले बलशाली योद्धा अवश्य रहे होंगे।

रिचर्ड नामक इस व्यक्ति ने अपनी काया की क्षमता को इतना विकसित कर लिया था कि बड़े से बड़े हथौड़े, भारी वजनी लकड़ी के लट्ठे, हाथी और तोप के गोले, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे। न्यूयार्क टाइम्स के सुर्खी भरे समाचारों में रिचर्ड के प्रदर्शन का विवरण प्रकाशित हुआ था। उसमें बताया गया कि 64 वर्षीय रिचर्ड, जो अच्छा खासा लम्बा, चौड़ा मजबूत था, का पन्द्रह फुट लम्बी और 1 फीट मोटी लकड़ी पेट पर दे मारने पर भी कुछ नहीं बिगाड़ सकी। सेन फ्रांसिस्को के 6 भारी भरकम पहलवान घूँसे मारते थक गये किन्तु रिचर्ड ऐसे बैठा रहा जैसे उसकी मालिश की जा रही हो अथवा सहलाया जा रहा हो। 1964 में 100 पौण्ड वजन तक के गोले को उठाने का उसे अभ्यास था। 1966 में उसने एक प्रदर्शन में तोप के मुंहाने के सामने खड़े होकर 150 पौण्ड वजन का गोला दगवाया। रिचर्ड अविचलित खड़ा रहा और टेबलटेनिस की गेंद की तरह गोला टकराया और छिटक कर अलग जा गिरा। इस प्रकार रिचर्ड को “इस्पात” का आदमी कहा जाने लगा। रिचर्ड को यह विद्या कहाँ से हाथ लगी। इसके उत्तर में उसने कहा कि वह बचपन में सन् 1924−25 में हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयाग, और वाराणसी गया जहाँ भारतीय योगियों ने उसे योग साधना बताई जिसके अभ्यास से यह चमत्कारी परिणाम में सब देख सके हैं।

पोर्टलैण्ड (ओरक्न) की 8 वर्षीय सड़क पर खेल रही थी, खेल में वह इतनी मस्त थी कि उसे पता भी न चला कि उधर से सड़क पीटने वाला इंजन दौड़ा आ रहा है। वह गिर पड़ी। 3 टन वजन का रोलर पहिया उसके पैरों से निकल गया। इंजन आगे बढ़कर रुक गया। ड्राइवर यह देखकर गया। ड्राइवर यह देखकर भौंचक्का रह गया कि वह लड़की उठकर खड़ी हो गई है और जिस लड़के के साथ खेल रही थी, उसे पकड़कर खिलखिलाकर हँस रही है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

शून्य डिग्री से. ग्रे. तापमान पर कोई व्यक्ति 10 मिनट से अधिक नहीं ठहर सकता किन्तु मेजर डोनगैल्ड एक घण्टे तक नंगे बदन, बर्फ के शिला खण्डों पर लेटे रहे और बाद में कपड़े पहनकर चलते बने।

शरीर में इतना लचीलापन है कि वह किसी भी दबाव को सहन कर सकता है। किसी भी ढाँचे में ढल सकता है। किसी भी प्रतिकूलता के लिए अभ्यस्त बनाया जा सकता है। गर्भाशय मूलतः बहुत छोटा होता है, पर परिपक्व भ्रूण को धारण करते समय वह अपने मूल आकार की तुलना में पचास गुना बढ़ चुका होता है। पेट में उतना ही स्थान है जितने में कि स्थापित अवयव अपनी−अपनी गतिविधियाँ चला सके और सिकुड़ बटुरकर यथाक्रम बैठे रह सकें। किन्तु जब गर्भ बढ़ता है तो आँतें आमाशय आदि कम स्थान में गुजारा करते हैं और भ्रूण के लिए पर्याप्त जगह देकर भी अपनी गतिविधियों में कमी नहीं आने देते। समूचे शरीर के सम्बन्ध में यही बात लागू होती है। उसका कोई भी अवयव अभ्यास से अपनी सामान्य क्षमता से कई गुने पराक्रम का बिना किसी कठिनाई के देखा जा सकता है। सन् 1902 में बंगाल के एक साधु अगस्तिया ने हठयोग की एक प्रतिज्ञा की। प्रतिज्ञा यह थी कि वह लगातार 10 वर्ष तक अपना बाँया हाथ उठाये ही रहेगा कभी नीचे नहीं गिरायेगा। और सचमुच ही वह लगातार 10 वर्षों तक बिना हिलाये हाथ ऊँचा किये रहे। इस बीच एक चिड़िया ने समझा यह किसी पेड़ की टहनी है सो उसने बड़े मजे के साथ योगी के उठाये हुए हाथ की हथेली पर घोंसला बना लिया और उस पर अण्डे भी दे दिये।

मैसूर क्षेत्र के दक्षिण कनारा जिले का निवासी चालीस वर्षीय बेनारी वेंकट रामन कुछ समय पूर्व एक विचित्र प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध था। उसने अपनी दाढ़ी में मधुमक्खियों का छत्ता जमा रखा था। उसमें मक्खियाँ भली प्रकार जीवन निर्वाह करती थीं।

सरर्सोजम—अफ्रीका के हब्शियों में अपने ओठ बढ़ाने की प्रथा है इसके लिये वे लकड़ी की तश्तरियाँ बनाकर उनसे ओठों को बाँध देते हैं। ओठ जितना बढ़ते जाते हैं बड़ी तश्तरियाँ बाँध दी जाती हैं और इस प्रकार कई स्त्रियाँ तो अपने ओठ 14-15 इंच अर्थात् सवा फुट व्यास की ढक्कनदार तश्तरी की तरह बढ़ा लेती है।

इसका एक उदाहरण विन्ध्याचल के योगी गणेश गिरि ने प्रस्तुत किया। उन्होंने एक बार अपने होठों के आगे ठण्डे वाले समतल मैदानी हिस्से में थोड़ी गीली मिट्टी रख कर उसमें सरसों बो दिये जब तक सरसों उगकर बड़े नहीं हो गये और उनकी जड़ों ने खाल चीर कर अपना स्थान मजबूत नहीं कर लिया तब तक वे धूप में चित्त लेटे रहे।

“साहिब अल्लाह शाह” नामक लाहौर का एक मुसलमान फकीर 600 पौण्ड से भी अधिक वजन की मोटी लोहे की साँकलें पहने रहता था। वृद्ध हो जाने पर भी अपने अभ्यास के कारण इतना वजन भार नहीं बना। पंजाब में वह “साँकलवाला” और जिंगलिंग के नाम से आज भी याद किया जाता है। उसकी मृत्यु के बाद साँकलों की तौल की गई तो वह 670 पौण्ड निकलीं।

साधारणतया आग अपने संपर्क में आने वाले हर पदार्थ का गरम करती और जलाती है। किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि शरीर बड़े तापमान में बिना जले अपनी स्थिति बनाये रह सके। इसी प्रकार जम जाने वाले शीत में भी उसका अस्तित्व लम्बे समय तक बना रहे ऐसी अवरोधक शक्ति का विकास हो सकता है।

दक्षिण जापान के कई बौद्ध मन्दिरों में ऐसे धर्मानुष्ठान होते हैं जिनमें छः फुट लम्बी दहकती हुई कोयलों से सजाई हुई वेदी पर नंगे पैरों चलकर उसे पार करना पड़ता है। पुरोहित आगे चलता है और अनुयायी पीछे। जो लोग इस रास्ते को हँसते हुए पार कर लेते हैं वे सच्चे जैन विश्वासी माने जाते हैं।

ऐसी अग्नि परीक्षा मलेशिया के कई क्षेत्रों में धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित है। होली के अवसर पर भारत के कई स्थानों में पुरोहित लोग जलती हुई ऊँची लपटों में होकर नंगे पाँवों और नंगे शरीर पार निकलने का प्रदर्शन करते हैं।

वाली द्वीप में एक धर्मानुष्ठान होता है— सघ यंग। इसमें पुरोहित धधकते अंगारों पर नंगे पैरों झूम–झूमकर नाचते हुए निकलते हैं। साथ में नंगे पैर उसी तरह नंगे पैर कुछ प्रशिक्षित बच्चों की मण्डली भी निकलती है।

24 फरवरी 1978 को उदयपुर (राजस्थान) भारतीय लोक कला मण्डल का समारोह था उसमें एक हठयोगी ने जलती आग में प्रवेश किया और घण्टों नृत्य करता रहा। पेट्रोल छिड़क−छिड़क कर कितनी ही बार आग भड़काई जाती रही योगी का नृत्य चलता ही रहा इस प्रदर्शन से पूर्व योगी के शरीर पर किसी विशेष रासायनिक पदार्थ आदि न होने की आशंका का भली प्रकार निराकरण कर लिया गया था।

कभी−कभी ऐसे प्रदर्शन भी देखे गये हैं जिससे मनुष्य को एक अच्छा−खासा दैत्य कहा जा सके। जादू के हाथ की सफाई—नजरबन्दी के खेलों की चर्चा को बाल विनोद कहा जा सकता है किन्तु असंख्य कुशल परीक्षकों को जाँच की चुनौती देते हुए खुले आम किये जाने वाले परीक्षण जहाँ हो चुकें और दृश्य को किसी प्रकार की जालसाजी न होने की बात जब घोषित की गई तो उन्हें शरीर की विस्मयकारी विलक्षणता ही कहा जायगा।

सन् 1968 में फूजी टेलीविजन कम्पनी जापान के डाइरेर्क्टस भारत आये दिल्ली में उन्हें पता चला कि भारत में एक ऐसा व्यक्ति है जो काँच, लोहा, ताँबा, पिन, कंकड़, पत्थर चाहे जो कुछ खा सकता है तो भी उसकी शारीरिक क्रियाओं में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने उस व्यक्ति को दिल्ली बुलवाया। स्वागत में जहाँ अतिथि स्वादयुक्त भोजन पाते हैं चाय, नाश्ता करते हैं वहाँ इस बेचारों को कीलें, पिनें, टूटे फ्लास्क और काँच के गिलास खाने को दिये गये। उसने वही बड़े प्रेम से खाये और जापानियों को दंग करके रख दिया। जापानी उन्हें साढ़े तीन माह के लिए जापान ले गये उन पर तरह−तरह के प्रयोग किये पर कोई रहस्य न जान सके आखिर इस मनुष्य दैत्य के पेट में क्या है जो वह मोटर ठेले खा जाने तक की क्षमता रखता है।

क्वीवलैण्ड (यू.एस.ए.) के वैज्ञानिक जार्ज कायल ने इस सम्बन्ध में अपना एक शोध प्रबन्ध सन् 1933 में मैन फिश के मूर्धन्य चिकित्सक परिषद् के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उसमें उनने कहा था कि आवश्यक नहीं कि आहार मात्र मुँह से ही ग्रहण किया और गले से उतार कर पाचन तन्त्र में पचाया ही जाय। वह माँस द्वारा आकाश में फैली हुई वायुभूत खाद्य सामग्री से भी उपलब्ध किया जा सकता है। जीवन धारण के लिए जिस प्रोटोप्लाज्म की जरूरत है उसे उपलब्ध करने के लिए शरीर में अन्य भी ऐसे छिद्र या चुम्बक केन्द्र हैं जो आहार की पूर्ति प्रचलित चबाने और पचाने की प्रक्रिया की पूर्ति अन्य उपायों से कर सकें।

सन् 1972 में सम्वाददाता निकोलाई स्वितेको के अनुसार खार्कोव की श्रीमती ओल्गा ब्लिज नोवा की 9 वर्षीया पुत्री में विलक्षण सामर्थ्य पाई गई। ‘सोवियत विज्ञान एकादमी’ के समक्ष उसके परीक्षण के प्रयोग किए गए। आँखों पर पट्टी बँधी हुई अवस्था में उसने बिछी हुई शतरंज को काली एवं सफेद गोटों को अलग−अलग छाँटकर रख दिया। रंग–बिरंगे कागजों की कतरनों को रंगों के अनुसार बारी−बारी से छाँटकर अलग कर दिया। परिचित लोगों के फोटो भी पहचान लिए। साथ ही बच्चों की रंग−बिरंगी पुस्तकों को हाथ से छूकर पढ़कर भी सुनाया। इतना ही नहीं 5 सेंटीमीटर दूर रखी चीजों को उसने उँगली के पोरुवों की सहायता से पड़ लिया। कुछ चीजों का सही परिचय तो उसने पैर की उँगलियों से छूकर ही बता दिया।

रूस के वैज्ञानिकों का ध्यान तब से इस दिशा में अधिक गया है और उन्होंने उस सम्बन्ध में लगातार शोध कार्य किया है। मनोविज्ञान शाखा के वरिष्ठ शोधकर्ता प्रो.कोन्स्टाटिन प्लातोनोव ने कहा है—’मानवीय चेतना विद्युत की व्यापकता को देखते हुए इस प्रकार अनुभूति अप्रत्याशित नहीं है। नेत्रों में जो शक्ति काम कर रही है, वही अन्यत्र ज्ञान−तन्तुओं में विद्यमान है, उसे विकसित करने पर मस्तिष्क को वैसी ही जानकारी मिल सकती है जैसी आँखों से मिलती है।’ प्रो. एलेक्जोदर स्मिर्नोव ने कहा है—’यह कोई अलौकिक बात नहीं है, वरन् सामान्य विज्ञान सम्मत सिद्धान्तों का ही एक दिलचस्प प्रतिपादन है। एक अंग की चेतना दूसरे अंगों में भी काम कर सकती है।’

ऐसे पराक्रमी न केवल श्रम शक्ति के क्षेत्र में चमत्कार दिखाते हैं वरन् उतना पुरुषार्थ उपलब्ध करने के लिए आहार भी बड़ी मात्रा में खाते पचाते देखे गये हैं। इसमें उनकी बलिष्ठता का पता चलता है। बड़ी मात्रा में भोजन करना ही नहीं उसे पचा लेना भी उदरदरी की भीतरी समर्थता है। वही जब बाहरी कामों में आती है तो सिद्ध करती है कि न केवल खाने में वरन् करने में भी उसका उतना ही बढ़ा−चढ़ा चमत्कार है। अधिक खाने पचाने को भी यदि एक पुरुषार्थ माना जा सके तो ऐसे उदाहरण भी समय−समय पर दृष्टिगोचर होते रहे हैं। हो सकते हैं।

ग्रीस का क्रोटोना कामिलो नामक पेटू अधिक खा जाने और पचा जाने के लिये प्रसिद्ध था। वह 150 पौण्ड माँस एक दिन में खा जाता था। डेट्रायट निवासी एडिको नामक एक रेलवे मजदूर उसका भी ताऊ निकला। उसने 60 सुअरों के माँस से बनी हुई टिकिया एक दिन में खाकर पचाई। इसके बाद भी उसने कुछ जामुन की कचौड़ियाँ खाकर और दिखाई। उसकी सामान्य खुराक इतनी थी जितनी पाँच व्यक्ति यों के सामान्य परिवार के लिये एक हफ्ते के लिये पर्याप्त होती। उसने शादी इसलिए नहीं की कि जो कमाता था, वह अपने पेट के लिए ही कम पड़ता। घर वालों को क्या खिलाता। वेतन से एडिको का काम न चलता तो उसके मित्र सहायता करते थे ताकि वह भूखा न मरे।

दक्षिण अफ्रीका के केपेटाइन नगर में एक प्रीतिभोज था। भोजन सामग्री तैयारी थी। आगन्तुकों को कौतुक सूझा। प्रसिद्ध पेटू मेलायन लकड़हारे को बुलाया गया और तय हुआ कि पहले उसे भोजन कराया जाय बाद में जो बचे और मेहमान लोग बाँट खायें। मेलायन आया। उसे भरपेट खा लेने की छूट दी गई। सोलह आदमियों के लिए बनाई गई पूरी सामग्री उसने चट करली और तब उठा जब रसोई घर में कुछ शेष नहीं बचा। अतिथियों को दुबारा बनी चाय पीकर भूखे ही वापस लौटना पड़ा।

आहार प्रतिद्वन्दता में उन दिनों फैगोन ने बाजी, मारी। रोम के राजा आकेलियान ने इस सम्बन्ध में एक प्रतियोगिता नियोजित की देखें कौन अधिक खा और पचा सकता है। कितने ही प्रतिद्वन्दी सम्मिलित हुए पर बाजी फैगोन ने ही जीती। जो शास्त्र का ही एक बड़ा अधिकारी था। उसने भरे दरबार में एक पूरा सुअर—एक भेड़ 100 डबल रोटियाँ तथा एक पीपा शराब गले उतार ली। देखभाल रखें जाने पर पाया कि उसने उतना खाया ही नहीं वरन् पचा भी लिया।

शरीर का प्रचलित क्रम एक चिर अभ्यस्त ढर्रे के अनुसार चलता है। आदिम काल से लेकर उसमें अनेक प्रकार के हेर−फेर हुए हैं। फलतः मनुष्य की प्रकृति और जीवन चर्या पद्धति में भारी परिवर्तन होते रहे हैं। कभी कच्चे माँस पर एवं सूखे बीजों पर गुजारा करने वाला मनुष्य अब इस परिपाटी का अभ्यस्त नहीं रहा अब उसका पेट पकाये आहार का अभ्यस्त है। भविष्य में यदि प्रवाह बदले तो सह अभ्यास किसी ऐसी पद्धति को भी अपना सकता है जो इन दिनों असम्भव जैसी प्रतीत होती है।

शरीर की सभी प्रत्यक्ष गतिविधियाँ मन के इशारे पर चलती है। रक्ताभिषरण, श्वास, प्रश्वास, आकुँचन−प्रकुँचन, निमेष, उन्मेष आदि स्वसंचालित समझी जाने वाली गतिविधियाँ भी अचेतन मन की प्रेरणा पर निर्भर हैं। मन और शरीर का वर्तमान तालमेल एक परम्परा के अनुरूप चल रहा है। वह बदली भी जा सकती है। मन का अंकुश यदि अवयवों, जीवकोशों को दूसरे ढाँचे में ढलने के लिए वासित करे तो वे उस निर्देश को पालने से इनकार नहीं कर सकते। शरीरगत परमाणुओं के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों का कहना है कि निर्जीव पदार्थों में पाये जाने वाले अणु परमाणुओं की तरह हठीले नहीं है, वरन् मन के निर्देशन पर चलने वाले—लचीले स्वभाव के हैं। यदि कोई अपने शरीर की वर्तमान प्रचलन से भिन्न प्रकार की प्रक्रिया ढालने के लिए दबाव डाले तो वह उस अनुशासन से सर्वथा इनकार न करेगा। थोड़ी−सी अनुभव के बाद भी उसे स्वीकार कर लेगा।

जीव विज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान रिची काल्डर ने इस तथ्य का प्रतिपादन इस तरह किया है—इलेक्ट्रान हमारा दास है, क्योंकि वे मानवीय प्रतिक्रियाओं में अधिक तेजी से चलते हैं, ये मानवीय नेत्र से भी अधिक देख सकते हैं, मानवीय स्पर्श से अधिक हर्ष अनुभव कर सकते हैं। मानवीय कान से अधिक तेज सुन सकते हैं, मस्तिष्क की अपेक्षा शीघ्र और ठीक गिनती कर सकते हैं। हमारे सामने दूर आस्वादन (टेलीगेस्टेशन), दूर श्रवण (टेलीआडीशन) दूर प्राण ग्रहण (टेलीआल्फेक्शन) सुगन्धि पदार्थ जैसी सामर्थ्य भी हैं। वह इन्हीं दास इलेक्ट्रोनों की लीला है। नियन्त्रण मोटरों (सर्वोमोटर) के द्वारा इलेक्ट्रान किसी रोलिंग मिल के हजारों टन इस्पात को पाव भर वजन की तरह उठा देता है, जबकि वह पदार्थगत मन है। इसके सहारे यदि मानव के जीवकोशों में अवस्थित मन (चेतना कणों) की शक्ति का अनुमान लगाए तो वहाँ तक सम्भवतः हमारी बुद्धि न पहुँचे। इस तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि ऐसी कोई विद्या हो सकती है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपनी विशेष शक्ति का उपयोग कर अपने आपे को अप्रचलित ढाँचे में ढाल सके और अपने प्रभाव क्षेत्र में भारी उथल−पुथल उत्पन्न कर सके।


साहस सबसे बड़ा साधन

रक्त माँस की दृष्टि से सभी मनुष्यों की शरीर संरचना एक जैसी है। मस्तिष्कीय कलपुर्जों की बनावट में भी कोई अन्तर नहीं। सबके अंग अवयव सृष्टा की निर्धारित विधि−व्यवस्था के अनुरूप काम करते हैं। इतने पर भी कई साहस के धनी होते हैं और पराक्रम पुरुषार्थ में गर्व गौरव समझने के कारण—धैर्य सन्तुलन बनाये रहने के कारण महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करते हैं। असंख्यों के सम्मुख अपने शौर्य साहस का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिन पर भीरुता कायरता कृपणता की गहरी परतें चढ़ी होती हैं। कठिनाई आने के से पूर्व ही उनकी बड़ी−चढ़ी कल्पना करते हैं और उस स्वनिर्मित भय भूत से डरकर थर−थर कांपने लगते हैं। विपत्ति का सामना करने का अवसर तो तब आये जब वह सामने प्रकट हो। इससे पूर्व ही जिनकी कुकल्पनाएँ अनिष्ट, अहित और संकट के कल्पना चित्र ही इतने दुष्कर प्रतीत होते हैं जिनसे निपटना वैतरणी पार करने की तरह कठिन हो जाता है।

ऐसे लोगों के सामने यदि कहीं सचमुच ही विपत्ति आ खड़ी हो तो समझना चाहिए कि मरण की पूर्ववर्ती ‘रिहर्सल’ हो गयी। सामना करने, उपाय सोचने वाले सारे तन्त्र ही अस्त−व्यस्त हो जाते हैं। ऐसी दशा में उनकी अपनी हड़बड़ी ही एक अनेकों विपत्तियाँ न्यौत बुलाती हैं। विपत्ति का आक्रमण जितना अनिष्ट करता उससे कहीं अधिक अपना भयभीत, उद्विग्न विक्षुब्ध मन ही अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने और सर्वनाश रचने का काम पूरा कर चुका होता है।

जहाँ ऐसे डरपोक, कायरों की संसार में भरमार है वहाँ ऐसे साहसी शूर वीरों की भी कमी नहीं जो वास्तविक संकट सामने रहने पर भी मनोबल टूटने नहीं देते। उपाय खोजते हैं। रास्ता बनाते हैं और सन्तुलित सूझ−बूझ के आधार पर विपत्ति को पार कर लेते हैं। पार करना सम्भव न हो तो भी मुसीबत से कटकट जूझते हैं। आघात शरीर भर की क्षति कर सकते हैं। साधनों को छीन सकते हैं। परिस्थितियाँ प्रतिकूल कर सकते हैं। इतने पर भी यदि मनोरथ बना रहे—साहस न टूटे और अन्तिम समय तक जूझने की हिम्मत बनी रहे तो सामान्य शरीर वाले व्यक्ति भी ऐसे पराक्रम कर दिखाते हैं जिन को गौरव गाथा सुनने वालों के भी हौंसले बुलन्द होते हैं।

प्रशंसा ऐसे लोगों की है जिनने अपने साहस और पराक्रम का परिचय दिया। जिनने संकट की घड़ी में धैर्य रखा और मनाने के स्थान पर जूझने का निश्चय किया। ऐसे लोगों के उदाहरण स्मरण भर से पढ़ने−सुनने वालों में उत्साह भरता है और शूर साहसियों की पंक्ति में खड़ा होने को मन करता है।

फ्रांस के न्यूर्स प्रदेश का कप्तान मैलर मुस्टैमे जीवन भर युद्धों का अग्रिम मोर्चा सम्भालता रहा। उसने 122 युद्धों में भाग लिया और प्रत्येक में कई−कई धाब लगे। सभी का वह सामना करता रहा और अच्छा होता रहा। उसको मृत्यु 1349 में हुई। रात को सोते−सोते ही बिस्तर पर मर गया। किसी को उसकी कराह या बीमारी का पता भी न चला।

फ्रांसीसी जनरल वैपटिस्टे मान्टमरिन की जीवट अपने ढंग की अनोखी है। उनने 20 वर्ष की आयु से सेना में प्रवेश लिया 75 वर्ष की आयु होने पर सन् 1779 में मरे। इस बीच वे पूरे 55 वर्ष सेना में विभिन्न पदों पर काम करते रहे। वे युद्ध मोर्चा पर पाँच बार भयंकर रूप से घायल हुए और मृतक घोषित किये जाते रहे। हर बार वे कब्रिस्तान पहुँचने से पूर्व जी उठे। उनका सारा शरीर अनेकों आपरेशनों से बेतरह कटा फंसा था। उनने मरने तक हिम्मत कभी भी नहीं हारी।

आस्ट्रिया का एक जनरल काउन्ट एन्टम स्टार ने अपने देश की सेना में 47 वर्ष तक काम किया। इस बीच उनने 89 लड़ाइयाँ लड़ी। इनमें उन्हें 84 भयंकर और सैकड़ों छोटे घाव लगे। उनकी मृत्यु युद्ध मोर्चे पर ही हुई। मरते समय उनके चेहरे पर कोई विषाद नहीं था।

समुद्र के आर्कटिक क्षेत्र में एक जहाज पालिरस बर्फ में फँसा और एक चट्टान से टकराकर डूब गया। जीवित बचे 19 नाविकों ने एक बहते हुए हिमि खण्ड पर सवारी गाँठी और मछलियाँ पकड़ते खाते हुए उसी चट्टान पर दिन काटते तथा आगे धकेलते हुए बर्फ की चट्टान को नाव बनाकर वे 196 दिन में 1200 मील की यात्रा करके लैब्रेडोर तट पर पहुँचे और अपने प्राण बचाने में सफल रहे।

मैक्सिको के निकट प्रशान्त महासागर में लारा नामक एक जलयान गुजर रहा था। आग लग जाने से जहाज समेत सभी कर्मचारी जल गये। मात्र 7 नाविक एक छोटी जीवन नौका पर सवार होकर समुद्र में उतरे। किनारा 1500 मील था। सभी बेतरह थके हुए भी। प्यास से प्राण निकल रहे थे। इसी बीच कुछ ऐसा अद्भुत हुआ कि नाव समुद्र के मध्यवर्ती एक मीठे चश्मे के पास जा पहुँची वहाँ उनने प्यास बुझाई। फिर उनने हिम्मत बाँधी और किनारे की ओर चले। पूरे 23 दिन बिना कुछ खाये−पिये मैक्सिको तट पर सुरक्षित पहुँचे।

सन् 1783 में फ्रेंस वैज्ञानिक प्रो.चार्ल्स ने पहला गुब्बारा बनाया। इसके बाद उसकी क्षमता और आकृति में क्रमशः सुधार होता गया। उस समय के विकसित गुब्बारे को, जिसका नाम था ‘जैपलीन’ को लेकर कुछ दुस्साहसी युवक ‘नौटिलस’ नामक पनडुब्बी जहाज पर सवार हो उत्तरी ध्रुव की कठिन यात्रा के लिए चल पड़े। उस योजना का संचालन किया जर्मन डॉ. उल्सटीन ने। जैपलीन में कुज 56 आदमी सवार थे—40 चलाने वाले और 16 अनुसंधान करने वाले। गुब्बारा एक छोटे फुटबाल मैदान के बराबर था और गिरेजेघर जैसा ऊँचा जिसमें खटोले जैसे लटकनें थीं। यात्री उन्हीं पर बैठते थे।

लेक काँसटैस ने उड़कर यह गुब्बारा जर्मनी, स्वीडेन, ऐस्थोनिया, फिनलैण्ड, रूस की सीमाएँ पार करते हुए ध्रुव प्रदेश पर पहुँचा। ल्फोरा अन्तरीय से लेकर सुविस्तृत ध्रुवीय क्षेत्र पर इसने उड़ानें भरी और चित्र−विचित्र फोटो लिए। लगभग एक सप्ताह तक यह गुब्बारा उड़ा और पनडुब्बी को उससे भी अधिक समय लगाना पड़ा।

कैस्टाइन (स्पेन) के एक सैनिक स्वेटो, जवानी के आरम्भिक दिनों में अपनी प्रेमिका के साथ सम्बद्ध था। रिश्ता निभा नहीं और दोनों अलग हो गये। फिर भी उस योद्धा ने गले में एक लोहे का छल्ला अपनी बिछुड़ी प्रेयसी की स्मृति में पहने रखा। वह बाँका लड़ाकू था। उन दिनों भाला प्रधान शस्त्र था। उसने 68 योद्धाओं के साथ 727 भाला आक्रमणों का प्रहार तथा सामना किया। हर संघर्ष में उसने अपने स्मृति चिन्ह पर आँच न आने देने के लिए भरी−पूरी सावधानी बरती। अन्तिम बार एक संघर्ष में ऐसी चोट लगी कि न केवल उसकी जान गई वरन् यह स्मृति चिन्ह भी टूट कर लाश के साथ ही समाप्त हो गया। उसने दूसरा विवाह नहीं किया था।

एकबार समुद्री यात्रा करते समय रोम के शासक जूलियस सीजर को समुद्री डाकुओं ने आक्रमण करके कैद कर लिया और होडस द्वीप में बन्धी कर दिया, फिर सीजर के सम्बन्धियों को धन भेजने का सन्देश दिया।

इस सम्बन्ध में प्लूटार्च ने लिखा है कि सीजर डाकुओं को बन्दी होते हुए भी एक सम्राट के रौब–दौब में रहता, जिस किसी डाकू को डाँट देता, वही सुन्न रह जाता। सब डाकू उसकी आज्ञा का पालन करते थे। वह उन्हें धमकाते हुए कहता था कि यहाँ से जाने के बाद तुम सबको फाँसी के तख्ते पर चढ़ा दूँगा किन्तु कोई डाकू चूँ तक नहीं करता था। वहाँ से छुटकारा पाने के बाद उसने वैसा ही किया भी, पर वहाँ तो उसके आत्म, तेज की ही महत्ता थी जो गिरफ्तार होकर भी डाकुओं पर शासन करता रहा। नैपोलियन कैद से छूटकर भागा उस समय बोर्बोर्न की सेनायें सतर्क करदी गई। सेनापतियों को आदेश दे दिया गया कि नैपोलियन उधर आये तो उसे गोली मार दी जाये पर हुआ कुछ और ही। नैपोलियन उधर ही गया, जहाँ सन्नद्ध सेना राइफलें ‘लोड’ किये खड़ी थी, पर उसके आगे किसी को भी घोड़ा दबाने का साहस नहीं हुआ। सारी सेना फिर नैपोलियन के सेनापतित्व में आ गई।

एथेन्स के वियेडोज ने एक बार शर्त लगाकर नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हिप्पेनिकोस को सबके सामने थप्पड़ लगा दिया और दूसरे ही दिन उसने उसे इतना प्रसन्न कर लिया कि हिप्पेनिकोस ने अपनी पुत्री का विवाह ही उसके साथ कर दिया। बियेडोज के बारे में कहा जाता है कि उसके पास इतनी प्रबल आत्म−शक्ति थी कि दुश्मन को एक मिनट में मित्र बना सकता था।

समझा जाता है कि लोग साधनों के सहारे उन्नति करते हैं। परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो सफलता मिलती है। इस कथन में इतनी ही सचाई है कि अनुकूलता तथा साधन सुविधा के सहारे प्रगति का पथ अपेक्षाकृत सरल हो जाता है किन्तु बात ऐसी नहीं है कि जिनके पास साधन नहीं अथवा जो अवरोधों से घिरे हैं वे उन्नति कर ही नहीं सकते। सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने का श्रेय वस्तुतः मनुष्य की जीवट को है। कोई बिन अधीर हुए प्रतिकूलताओं के साथ तालमेल बिठाते हुए—जो साधन उपलब्ध हैं उन्हीं का सदुपयोग करते हुए−आगे बढ़ता रहा तो कल न सही परसों अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना हो जायगा। ऐसे उदाहरणों से इतिहास के पृष्ठ भरे पड़े हैं। जो गई−गुजरी परिस्थितियों से घिरे थे। फिर भी उनने अपने प्रयास पौरुष को मजबूती से पकड़े रखा—निरन्तर चलते पट्टे के क्रम में व्यतिरेक न पड़ने दिया और अभीष्ट सफलता प्राप्त करके कृत−कृत्य हुए।

ईसाई धर्म प्रचारकों में अग्रणी ड्वाइटमूडी जवानी तक अनपढ़ रहा। उसकी स्त्री थी तो कम पढ़ी पर चाहती यह थी कि उसका पति पादरी बने। सो उसने उसे पढ़ना−लिखना स्वयं सिखाया और जोर देकर गिरजे का शौक लगाया। वही लगी ही रही और अन्ततः मूडी को धर्म प्रचारक ही बनाकर मानी। पादरी भी ऐसा जिसने ईसाई जगत में असाधारण ख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त की।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन −पोषण उनकी सौतेली माँ ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच दिन काटने वाली उस महिला ने इस बालक को ऐसी प्रेरणाएँ और नसीहतें दी जिनके सहारे बच्चे की समझ और शिक्षा ही नहीं, आत्मा भी ऊँची उठती चली गई और वह क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अमेरिका का राष्ट्रपति ही नहीं विश्व के महामानवों में से एक बना।

महान वैज्ञानिक टामस अल्वा एडीसन बचपन में अत्यन्त मन्द बुद्धि थे। पढ़ने में उनकी अक्ल चलती ही न थी। सो अध्यापक ने बच्चे के हाथों अभिभावकों को पत्र भेजा। इसे स्कूल से उठा लें, मन्द बुद्धि होने के कारण वह पढ़ न सकेगा। बच्चे की माँ ने भरी आँखों और भारी मन से पत्र को पढ़ा। बच्चे को दुलारा और छाती से चिपका कर कहा—”मेरे बच्चे, तुम मन्द बुद्धि नहीं हो सकते। मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊँगी।” बच्चे को स्कूल से उठा लिया गया और उसकी माँ ने पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। परिणाम सभी के सामने है। बच्चा विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक बना।

जापान के मुसाशी प्रान्त का निवासी हनाबा हाकोची सात वर्ष की आयु में ही अन्धा हो गया था। किन्तु उसने अपनी मस्तिष्क ीय चेतना को इतना प्रखर बनाया था कि 4,00,000 हस्तलिपि की विषय सूची तैयार कर सकता था। कहते हैं वह अँधेरे में भी पढ़ सकता था। उसने एक ऐसी पुस्तक संकलित की जिसके 2820 खण्ड हैं। ऐसी विशाल पुस्तक आज तक दुनिया में किसी ने भी नहीं लिखी। उसने बागाक्सी में एक स्कूल भी खोला जिसमें जापानी साहित्य का अध्यापन वह स्वयं किया करता था।

इस प्रकार की क्षमताएँ बीज रूप से होती सभी में हैं, पर उन्हें जागने, प्रखर बनाने के लिए हर किसी को साहस, संकल्प और अध्यवसाय काम में लाना पड़ता है। मनस्वी ही जीतते हैं। आन्तरिक क्षेत्र की और बाह्य जगत की समस्त सफलताएँ साहसिक पुरुषार्थ पर ही निर्भर हैं।


अन्तराल की छिपी क्षमताओं का प्रयत्न पूर्वक उभार

काया पर इच्छा शक्ति का समग्र नियन्त्रण कितना उपयोगी एवं कितना महत्वपूर्ण है इसका अनुभव तब होता है जब इस आधार पर उपार्जित की गई क्षमता को अतिरिक्त क्षमता सम्पादन के रूप में हस्तगत किया जाता है। सर्वविदित है कि सामर्थ्य के बदले ही सुविधा साधन खरीदे जाते हैं। सामर्थ्य के नाम पर मनुष्य में समर्पित शरीर बल और बुद्धिबल ही अनुभव में आता और प्रयुक्त होता है। इन दोनों क्षेत्रों की व्यापकता असीम है। उस पर जितना नियन्त्रण हस्तगत होता है उतनी ही विशिष्ट क्षमता का वैभव मनुष्य को ऐश्वर्यवान बनाता जाता है। इस आधार पर वह चाहे तो ऐसे काम कर सकता है जैसे कि सामान्य लोगों के लिए अशक्य ही समझे जाते हैं।

इस स्तर की सफलताएँ न कठिन है न दुस्तर। अनवरत प्रयत्न करने पर कोई भी धैर्यवान साहसी उन्हें उपलब्ध कर सकता है। ऐसा होते देखा भी गया है। कई व्यक्ति यों में इस स्तर की दिव्य क्षमताएँ पूर्व संचित भी होती हैं। वे अनायास भी जग जाती हैं अथवा थोड़े से प्रयत्न से इतनी बड़ी सफलता सामने ला खड़ी करती हैं कि देखने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

एजली इटली के मोची का लड़का था किन्तु घर से भागकर वह किसी जहाज कम्पनी में नौकर हो गया। जहाँ वह तैरना सीख गया। इसी एजली के कारनामे ऐसे रहे कि कोई भी अमेरिका का ऐसा अखबार अछूता न रहा, जिसने उसके करतब न छापे हों। एजली तैराकी में इतना सिद्ध हो गया कि उसे ‘मैन ऑफ कार्क’ के नाम से पुकारा जाने लगा। घन्टों पानी में रहना, पर बिना हाथ पैर हिलाए, तैरते रहना, हाथ पैर कुर्सी से बाँधकर समुद्र में फेंका जाने पर भी कुछ न होना—अपने आप में विलक्षण है। मनोपत्थर लोहा बाँधकर उसे पानी में फेंका गया किन्तु एजली मजे में तैरता रहा, डुबा नहीं। पन्द्रह−पन्द्रह घण्टे तैरते रहकर एजली ने बता दिया कि वह कोई विलक्षण मनुष्य है सामान्य नहीं।

क्यूबा में रहने वाला सेनर एवेलिनो पेरेज नामक व्यक्ति की यह विशेषता थी कि वह अपनी इच्छानुसार अपनी एक आँख या एक साथ दोनों आँखों की पुतलियों को कोटर से दो इंच बाहर निकालकर आपस यथास्थान बैठा लेता था और देखने की शक्ति में किसी तरह का दबाव भी नहीं पड़ता था।

केन्या के सम्बरु नामक व्यक्ति 28 वर्ष का था, तब उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि खाना−पीना, टट्टी−पेशाब सब खड़े ही खड़े किया जाय। अब तक उसे 30 वर्ष हो गये और सचमुच में वह जिन्दगी भर कभी बैठा नहीं। लेटने या खड़े रहने की प्रतिज्ञा मृत्यु पर्यन्त निबाहने की अब उसकी सामान्य आदत बन गई है। जबकि सामान्य व्यक्ति यों के लिये उसकी चर्चा भी कम विस्मयकारक नहीं होगी।

फ्रांस के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता पितरी मिसी में जहाँ अभिनय सम्बन्धी अनेक विशेषतायें थीं वहाँ उसमें कई अभूतपूर्व चमत्कारिक विशेषतायें भी थीं। वह अपनी इच्छानुसार ही शरीर के किसी भी हिस्से का कोई भी बाल हिला सकता था। बाल की नोक को खड़ा कर सकता था उन्हें पानी और आँधी के कारण गिरी हुई फसल की तरह लिटा सकता था, इतना ही नहीं कोमल सपाट बालों को को वह जब चाहे अपनी इच्छा शक्ति द्वारा ही घुँघराले बना सकता था।

साम्राज्ञी मेरी लुईस अपनी इच्छानुसार अपने कानों को बिना हाथ से छुये किसी भी दिशा में मोड़ सकती थी और आगे पीछे हिला सकती थी।

एक फ्राँसीसी अभिनेता अपनी इच्छानुसार अपने बालों को घुमा सकता था। बालों को गिराने उठाने और घुँघराले बनाने की क्रिया इच्छानुसार कर सकने की उस अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन करके वह धन भी कमाता था। एक बाल को घुँघराला और ठीक उसी की बगल में उगे हुए दूसरे बाल को चपटा कर देना इसका अति आश्चर्यजनक करतब था। डॉक्टरों ने उसका परीक्षण किया और प्रो.आगस्ट कैवेनीज ने बताया कि उसने शिर त्वचा की माँस पेशियों तथा तन्तुओं को अपनी इच्छा शक्ति के आधार पर असाधारण रूप से विकसित और सम्वेदनशील कर लिया है।

घटना सन् 1908 की है। सर कार्नरोंश को हाउस ऑफ कमेन्स में विरोधी दल के विरुद्ध मतदान में भाग लेने जाना आवश्यक था किन्तु अस्पताल के डॉक्टरों ने बीमारी की गम्भीरता को देखते हुए उन्हें जाने की अनुमति नहीं दी अतः हार्दिक आकाँक्षा रहते हुए भी कार्नराँश को नहीं जाने दिया। किन्तु हाउस ऑफ लार्ड्स के सदन में कितने ही सहयोगी सदस्यों ने देखा कि अपनी सीट पर बैठे कार्नराँश मतदान कर रहे हैं उनका मत गिना भी गया। दूसरी ओर एक डॉक्टर का ही नहीं पूरी टीम का कहना है कि कार्नराँश बिस्तर से हिलने लायक ही नहीं थे। उठना, जाना तो बहुत दूर की बात है।

स्वामी विवेकानन्द ने बिना अन्न, जल के मुद्दतों से जीवित “पौहारी बाबा” का विवरण प्रकाशित किया था। आज भी कई हठयोगी समाधि लेकर गुफा में बन्द हो जाते हैं और लम्बी अवधि तक बिना अन्न, जल एवं हवा के जीवित रहते हैं। जिस स्थिति में बैठे थे उसी में बने रहते हैं। मल−मूत्र विसर्जन करने एवं सोने उठने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। कितने ही हठयोगी रक्त संचार एवं हृदय की धड़कन बन्द करके भी जीवित रहने के प्रमाण विशेषज्ञों के परीक्षण के साथ दे चुके हैं। सामान्य मनुष्य जीवन में कई गुनी अधिक आयु वाले तथा असह्य शीत में निर्द्वन्द्व निवास करने वाले योगी अभी भी विद्यमान हैं।

काशी के प्रसिद्ध सिद्धयोगी स्वामी विशुद्धानन्द ने एक बार अपनी इच्छा−शक्ति का प्रदर्शन यों किया—”अपने शिष्यों को अपनी−अपनी मुट्ठी में इच्छित वस्तु के आ जाने की इच्छा करने को कहा। शिष्यों ने वैसा किया परन्तु कोई वस्तु नहीं आई। तब उन्होंने कहा अभी केवल तुम्हारी इच्छा ही थी अब में शक्ति का संचार करता हूँ। इस बार सभी शिष्यों की छुट्टियों में उनकी इच्छित वस्तु आ गई थी। स्वामीजी ने बताया कि वह मात्र संकल्प शक्ति की सिद्धि है जो हर व्यक्ति सामान्य क्रम में अर्जित कर सकता है। उसमें गुह्य या रहस्य जैसी कोई बात नहीं।”

स्वामी विशुद्धानन्द जी के बारे में कहा जाता है कि वे हाथ रगड़ कर मन चाहे पुष्पों की सुगन्ध उत्पन्न कर देते थे। अनेक शिष्यों द्वारा अनेक प्रकार की सुगंधियों की फरमाइश करना और तत्काल वैसी ही उत्पन्न हो जाना कम आश्चर्यजनक नहीं था। एक वस्तु को दूसरे रूप में परिवर्तित करने की विद्या को वे सूर्य विद्या बताते थे उन्होंने उसे प्रामाणित भी किया था। उनने एक फूल उठाया और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी से एक−एक अलग फूल उत्पन्न कर दिया। रुई के टुकड़े को सफेद से लाल रंग का और फिर पत्थर जैसा कठोर बना दिया। खजूर के हरे भरे पत्ते को उन्होंने पत्थर जैसा बना दिया। स्वामी जी का कहना था कि कोई जादू नहीं विशुद्ध विज्ञान है। सूर्य की सूक्ष्म शक्ति के साथ यदि साधना द्वारा संपर्क बना लिया जाय तो उसके सहारे प्रकृति के पदार्थों में हेर−फेर करने की विद्या करतलगत हो सकती है।

पाओसा से सेण्ट फ्रांसिस रात्रि में प्रार्थना के समय आकाश में उठ जाते थे। नेप्ल्स के राजा ने एक बार उन्हें अपने यहाँ आमन्त्रित किया। रात्रि को राजा ने दरवाजे के छेद से देखा तो आश्चर्यचकित रह गये। सेण्ट फ्रांसिस प्रार्थना कर रहे थे और एक प्रकाश पुँज उन्हें घेरे हुए था एवं शरीर मेज से कई फुट ऊँचा आकाश में अवस्थित था।

दाराशिकोह ने “औलियों के जीवन− वृतान्त” में मियाँ मीर की अलौकिक सिद्धियों के बारे में उल्लेख करते हुए लिखा है कि वे कभी−कभी लाहौर से आकाश मार्ग द्वारा ‘हजाद’ जाते थे। रात्रि व्यतीत करके पुनः सूर्योदय से पूर्व ही लाहौर वापस लौट आते थे। शेख अब्दुल कादिर एक बार व्याख्यान करते समय अचानक शून्य में ऊपर उठ गए। व्याख्यान में उपस्थित हजारों लोगों ने इस घटना को देखा। ऊपर कुछ देर ठहरने के बाद पुनः अपने स्थान पर आ विराजे। इस आकस्मिक घटना का स्पष्टीकरण उन्होंने स्वयं देते हुए कहा—”मुझे अचानक सन्त ‘खिदिर’ जाते दिखाई दिये। आकाश मार्ग में जाकर उन्हें अभिवादन करके व्याख्यान सुनने के लिए आमन्त्रित किया।”

फ्राँस में प्रथम विश्व युद्ध के बाद जूल्स रोमैन ने सैकड़ों अन्धे व्यक्ति यों पर दृष्टि सम्बन्धी, प्रयोग−परीक्षण किये तो पाया कि उनमें से कुछ अन्धकार और प्रकाश की उपस्थिति का अत्यन्त दक्षतापूर्वक बता सकने में समर्थ थे।

इटली में एक ऐसी अन्धी लड़की थी जो अपने नासाग्र एवं बाह्य कर्ण (पिन्ना) से देख सकती थी। जब अचानक कोई तेज रोशनी उसकी नाक अथवा कान पर डाली जाती तो वह चौंक उठती थी।

1956 में स्काटलैंड में एक इसी प्रकार के अन्धे स्कूली छात्र का पता चला जो विभिन्न प्रकार के रंगीन प्रकाशों में विभेद कर सकने में निष्णात था। साथ ही कुछ फुट की दूरी पर स्थित अनेक वस्तुओं में से सबसे चमकीली वस्तु के बारे में बताने की क्षमता थी।

सन् 1960 में वर्जीनिया की लड़की पर, जो कि अतीन्द्रिय दृष्टि से सम्पन्न समझी जाती थी, वहाँ के एक विशेष मेडिकल बोर्ड ने सच्चाई जानने के लिए अनेक प्रयोग किये। उसकी आँखों में मोटी पट्टी बाँध दी गई, किन्तु फिर भी वह देखने में सक्षम समर्थ रही और किताबों को पढ़ भी सकी।

लुईविले (फ्राँस) की एक 12 वर्षीय लड़की थी एन्नेट फ्रेलाम। इस अद्भुत लड़की ने भारतीय योगियों जैसी अद्भुत पराशक्ति प्राप्त की थी। उसने अधिकाँश मौन रहने का नियम बनाया था, कभी बोलती भी तो अत्यन्त सारगर्भित संक्षिप्त और आवश्यकता से अधिक नहीं। वह कहा करती थी कि मनुष्य के बोलने का जितना प्रभाव होता है उससे अधिक प्रभाव उसके गहरे विचारों का होता है। वह इस तथ्य को प्रत्यक्ष प्रामाणित भी करती थी। कभी कोई व्यक्ति प्रश्न पूछता तो वह एकाग्र चित्त को हो जाती फिर जो पूछा जाता उसका उत्तर उभरे लाल बड़े−बड़े अक्षरों में उसकी बाँहों में, पैरों में तथा कन्धों में लिख जाता। इच्छा शक्ति से उत्पन्न यह लेखन कुछ देर दृष्टव्य रहते। धीरे−धीरे बिना कोई छाप छोड़े ही गायब हो जाते।

13 वर्षीय ‘लू विन्ग‘ ने केन्द्रीय चीन के ‘वुहन’ में सिद्ध करके दिखाया कि वह लिखावट को कान से पढ़ सकती है। एक कागज जिस पर वह बिना देखे बैठा था जो लिखा था उसे उसने कान के पढ़ दिया। चीनी पत्रकारों ने ऐसे ही बीस विचित्र स्थितियों का अध्ययन किया है। शिंशून प्रान्त में पहली घटना पायी गयी। जहाँ के बच्चे कान, नाक, हाथ, पैर, पेट अथवा आँख द्वारा पढ़ लेते थे।

कुछ समय पूर्व न्यू बिन्द्रा ने अपनी बहन में यह गुण देखा जब वह प्राथमिकशाला में पढ़ रही थी। लू बिन्ग को “इन्ग“ लिखावट को समझने में 10 मिनट का समय लगा। किया यह गया था कि यह एक कागज नी लिखकर और उसे मोड़कर लू बिन्ग की कान के पास लाया गया था।

फ्राँसीसी परामनोविज्ञान वेत्ता डॉ. पाल गोल्डीन का कहना था—”हमारे पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सुनने, बोलने, देखने, सूँघने तथा स्पर्शानुभूति क्षमता से सभी परिचित हैं, पर इनसे भी महत्वपूर्ण एक और शक्ति है−परा चेतना शक्ति, जिसे छठी इन्द्रिय भी कहा जा सकता है। लोगों का इस अद्भुत किन्तु बलवती सामर्थ्य के बारे में स्वल्प ज्ञान है। किन्हीं−किन्हीं में यह संयोगवश प्रकट होता है परन्तु यह आकस्मिक नहीं है। प्रयत्नपूर्वक उसे अभिवर्द्धित किया जा सकता है एवं उससे लाभ उठाया जा सकता हैं।”

अन्तराल की इन सामर्थ्यों की यदा−कदा झाँकी देखने को मिलती है। सामान्य से व्यक्ति भी असामान्य सामर्थ्यों से भरे−पूरे देखे गये। इसका एक ही अर्थ है कि ये सभी सम्भावनाएँ मानवी अन्तराल में हैं। उन्हें जगाने का प्रयास पुरुषार्थ हर किसी के लिए सम्भव है। कुछ में ये अनायास जग जाती हैं, कालान्तर में समाप्त भी हो जाती हैं। इनसे अचम्भित होने की बजाय, इससे दिशा लेकर यदि अपना आपा और भी अद्भुत आत्मिक विभूतियों से भरा−पूरा बनाया जा सके तो स्वयं को धन्य बनाया जा सकता है।


स्वप्नों की निरर्थकता और सार्थकता

सपनों के सम्बन्ध में शरीर शास्त्री इतना ही कह सकते हैं कि वे अधूरी नींद की परिणति होते हैं। गहरी नींद आये तो कोई सपना न दीखे। अपच रहने, दर्द सूजन बुखार आदि होने, मच्छर खटमल, दुर्गन्ध आदि के कारण जब नींद टूटती रहती है तो उसी उनींदी स्थिति में मस्तिष्क सुव्यवस्थिति रूप से कुछ सोचने लगता है। उन्हीं टुकड़ों की शृंखला स्वप्न बन जाती है।

मनोविज्ञानी इसे अचेतन मन का क्रीड़ा कल्लोल कहते हैं। जागृत मन, सचेतन मस्तिष्क दैनिक कार्य व्यवहार में कल्पना करता और काट−छाँट करते हुए बुद्धि संगत निर्णय लेता है। उस अवधि में कोई प्रिय व अप्रिय परिस्थिति मन पर गहरा प्रभाव छोड़े तो सोते समय उसी प्रसंग को उलटा−सीधा व्यक्त करने वाले सपने आने लगते है। अपनी इच्छाएँ, आशंकाएँ भी सपनों में व्यक्त होती हैं। इसके अतिरिक्त एक गहरी परत अचेतन मन की है जिसमें संचित स्मृतियाँ, आदतें, इच्छाएँ, मान्यताएँ, कबाड़ियों के गोदाम की तरह जमा रहती है। वे अनुकूल अवसर ताकती रहती हैं और जब भी दाव लगता है चिन्तन को दृश्य में बदल लेती हैं। यह सपने लाक्षणिक होते हैं। उनमें मनःसंस्थान की स्थिति का पहेली बुझो डाल जैसा संकेत रहता है। विज्ञजन उसका अर्थ लगाते हैं। चिकित्सा शास्त्री सपनों के आधार पर शारीरिक एवं मानसिक रोगों का कारण स्वरूप खोजते हैं। कुछ के लिए यह बिना पैसे का सिनेमा हैं।

यह मोटी मान्यताओं की—सामान्य समाधानों की घिसी−पिटी जानकारी है। इसमें आगे की रहस्यपूर्ण गुत्थियाँ तब उत्पन्न होती हैं जब कई सपने पिछले दिनों घटित हुई किसी अविज्ञात घटना का यथावत् परिचय देते हैं। उसी समय जो किसी दूर देश में घटित हो रहा है उससे सही रूप में परिचित कराते हैं। जहाँ तार, बेतार के संचार साधन मौजूद नहीं हैं वहाँ कुछ स्वप्न सन्देश वाहक का काम करते देखे गये हैं। इतना ही नहीं कुछ स्वप्नों में भावी सम्भावनाओं का पूर्वाभास भी होता है। उस समय तो सही गलत होने का कोई प्रमाण नहीं होता किन्तु समय आने पर जब वे स्वप्न सूचनाएँ भविष्यवाणी की तरह घटित होती हैं तो प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र से किसी ऐसी शक्ति का भी सम्बन्ध सूत्र जुड़ा है जो अदृश्य और भविष्य का निर्धारण संचालन करती है।

आत्मवेत्ता इसका समाधान इस प्रकार करते हैं कि सूक्ष्म शरीर में अतीन्द्रिय क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। वे अभ्यास से दिव्य दृष्टि के रूप में अविज्ञात को जानती, अदृश्य को देखती हैं, पर सपने में उस क्षेत्र को बिना किसी प्रयास के ही ऐसा अवसर कभी−कभी मिल जाता है जिसमें दिव्यताएँ उन अनुभूतियों का सहज लाभ ले सके जा योनियों और सिद्ध पुरुषों में देखी पाई जाती हैं। चेतना की एक और भी गहरी परत है जो कारण से सम्बन्धित है इसमें मनुष्य की अपनी चेतना से बहुत ऊँचे उठकर दैवी जगत के साथ सम्बन्ध जोड़ने की क्षमता है। उसे जब जितना सुअवसर मिलता है वह उच्चस्तरीय शक्तियों के साथ सम्बन्ध साध लेती हैं और उनके अहेतुकी अनुग्रह से लाभान्वित एवं कृत−कृत्य होती है।

ऐसे सार्थक, सारगर्भित सपने कभी−कभी—किसी−किसी को ही आते हैं। अधिकाँश मनःक्षेत्र निरर्थक सपनों का ही जाल−जंजाल बुनता रहता है। सार्थक अवश्य होता है कि दिव्य दर्शन का भी स्वप्न लोक के साथ सघन सम्बन्ध जुड़ा हुआ है।

“दि न्यू फ्रान्टियर्स ऑफ माइण्ड” में उसके लेखक श्री जे.बी. राहन ने दूरदर्शन के तथ्यों का वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके संकलन किया है—एक घटना के सम्बन्ध में लिखा है कि उनके पड़ौस के एक सज्जन की धर्म−पत्नी ने एक रात को स्वप्न देखा कि वहाँ से बहुत दूरी पर रहने वाला उसका भाई घोड़ा गाड़ी से खलियान जाकर मचान पर चढ़कर अपनी पिस्तौल की गोली से आत्म−हत्या कर लेता है और भूसे के ढेर पर लुढ़क पड़ता है। स्त्री घबड़ा गई और अपने पति के साथ भाई के गाँव गई तो खलियान में जाकर पाया कि उसके भाई की मृत्यु ठीक वैसे ही हुई जैसा कि उसने स्वप्न में देखा था।

सन् 1774 में न डाक तार का कोई प्रबन्ध था न यातायात का साधन। इटली के पादरी अलोफोन्सा लिगाडरी ने अर्धतन्द्रित अवस्था में दिवा स्वप्न देखा कि रोम के बड़े पोंप नहीं रहे। उन्होंने यह बात अपने शिष्यों और साथियों को बताई वे इसे निराधार समझते रहे। कुछ ही दिन बाद समाचार मिला कि अलोफोन्सा ने जिस दिन यह घटना सुनाई उसी दिन बड़े पोप चल बसे।

“वाशिंगटन हैराल्ड” की संचालिका स्वर्गीय इलेग्नर मेरिट एक मध्याह्न विश्राम करने के लिए झपकी ले रही थीं। कि उन्हें दिखाई पड़ा कि उनके पति कैसी पास में खड़े हैं अचानक उन्होंने देखा कि वे गायब हो गये। वे विस्मय में पड़ गई क्या करें। दफ्तर गई जहाँ लोगों को स्वप्न सुनाया सबने साधारण माना। किन्तु दूसरे दिन तार आया कि उनके पति की अचानक मृत्यु ठीक उसी समय हुई जब वे स्वप्न देख रही थीं।

फ्राँसिस्को रूसो व्यापार के सिलसिले में कुछ दिनों में बाहर गया था और पत्नी एमेलिया रूसो घर में अकेली थी। एक दिन उसने स्वप्न में देखा कि उसके बड़े खाली कमरे में पड़ा हुआ है और उस शव पर एक युवती बैठी हुई है। यह देखकर एमेलिया चीख निकल गई और उसे लगने लगा कि उसके पति को कुछ हो गया है। तीन दिन बाद जब उससे न रहा गया तो वह पुलिस अधिकारियों के पास पहुँची। आरम्भ में पुलिस अधिकारियों ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया परन्तु कुछ ही दिन बाद रोम से 50 किलोमीटर दूर तक दुर्घटनाग्रस्त कार में फ्रांसिस्को का शव मिला।

शव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह सिद्ध हो गया कि फ्राँसिस्को की मृत्यु दुर्घटना के कारण नहीं विष देने के कारण हुई है। इसके बाद तो एमेलिया द्वारा देखे गए स्वप्न तथा उसके बारे में और अधिक पूछताछ करने के बाद उस स्त्री को गिरफ्तार किया जा सका जिसने फ्रांसिस्को की हत्या की थी। उस स्त्री को देखते ही एमेलिया ने पहचान लिया कि स्वप्न में यही स्त्री शव पर बैठी थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपनी मृत्यु से तीन चार दिन पहले जो स्वप्न देखा था वह “वार्ड लेमन” जो उनकी जीवनी लिख रहे थे को सुनाया किन्तु वार्ड लेमन ने उसे साधारण स्वप्न कहकर टाल दिया। लिंकन ने बताया कि “गत रात मैं ह्वाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति के निवास) में चारों ओर घूमा किन्तु सभी कमरे खाली पड़े देखे। तभी पूर्वी भाग से कुछ लोगों के रोने की आवाज सुनाई दी जहाँ जाकर देखा तो पाया कि वहाँ मेरे परिवार के सदस्य, दूसरे राजनयिक, भी है। कौतूहलवश मैंने पूछा यह शव किसका है? उनमें से एक आकृति ने मेरी ओर देखकर कहा—राष्ट्रपति की हत्या कर दी गई है और यह शव उन्हीं का है। इतना सुनते ही मेरी नींद टूट गई। अतः इस स्वप्न का मेरे जीवन से कोई घनिष्ठ सम्बन्ध है। वार्ड लेमन ने उक्त घटना को शीघ्र लिपि में लिपिबद्ध तो कर लिया किन्तु अँध विश्वास समझ कर कोई विशेष ध्यान अथवा चौकसी का प्रबन्ध या सुझाव भी नहीं दिया। ठीक तीसरे दिन उन्हीं परिस्थितियों में जो स्वप्न में लिंकन ने बताई थीं, उनकी हत्या कर दी गई, तब से आज तक यह प्रसंग राष्ट्रपति लिंकन की जीवनी के साथ जुड़ा है। और आज तक इसकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या भी नहीं की जा सकी।

सन् 1765 की बात है। वाय जैन्टियम के जेलखाने में बन्द एक कैदी ने सपना देखा कि वह उस देश की महारानी का प्रेम पात्र बन गया है। कैदी ने सपना पहरेदार को बता दिया। पहरेदार ने रिपोर्ट राजा से करदी। राजा ने उसे मृत्युदण्ड दिया पर रानी ने सपने के कारण फाँसी देने की बात को अनुचित बताकर राजा से उसे क्षमादान करा दिया।

संयोग की बात दो वर्ष बाद राजा कान्स्टेटाइन दशम की मृत्यु हो गई। कुछ सिलसिला ऐसा चला कि जेल से छूटे कैदी सैनिक रोमेनस के साथ रानी का प्रेम−बन्धन ही नहीं बना उसने उससे विवाह भी कर लिया। फलतः वह सम्राट बना और रोमेनस चतुर्थ डायोजानेस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

फ्रांसीसी क्रान्ति के नेताओं में से एक था— जीनपीशना। उसे बचपन से ही एक डरावना सपना आता है कि उस की मित्र मंडली पर हिंसक जानवरों का झुण्ड टूट पड़ता है वह मित्रों के सहित उस दुर्घटना में समाप्त हो जाता है। यह सपना अनेक बार उसने देखा और हर बार मित्र संबंधियों को सुनाया।

संयोग कुछ ऐसा बना कि जून सन् 1764 में एक यात्रा पर जाते हुए भूले−भेड़ियों का झुण्ड उसकी मंडली पर टूट पड़ा और वे सभी उसी प्रकार मारे गये जैसा कि सपने में दीख पड़ता था।

इंग्लैंड के बोस्टन नगर के समाचार पत्र “वोस्टन ग्लेख” में 28 अगस्त 1883 के अंक में एक भयंकर समाचार छपा कि “एक समुद्री द्वीप ‘प्रालेप’ में महाभयंकर ज्वालामुखी फटा और उसने उस क्षेत्र का समुद्र में असाधारण कुहराम मचा दिया।

छपने के बाद यह जाँच−पड़ताल हुई कि वह समाचार इतनी जल्दी कैसे प्राप्त हुआ? जबकि उन दिनों तार बेतार जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। फिर उस विस्फोट का पूरा विवरण क्या है?

पूछताछ अखबार के समाचार सम्पादक से हुई। उनने हड़बड़ाते हुए इतना ही कहा कि रात को वह दफ्तर में ही सोया हुआ था। अचानक वह भयंकर उसे सपना दिखा। उनींदी स्थिति में उसे चेत किया और पता लगाने के लिए सुरक्षित रखे जाने वाले स्थान पर रख दिया। दुबारा नींद आई और वह सो गया। दूसरे संपादक ने उसे विश्वस्त समाचार समझा और विस्तारपूर्वक मुख पृष्ठ पर छाप दिया।

प्रतिष्ठित अखबार के लिए ऐसे बेबुनियादी समाचार छापना बड़ी लज्जा की बात थी। दिन भर संसार भर से बेतार द्वारा पूछताछ चलती रही कि वैसा कहीं कुछ हुआ है क्या। दूसरे दिन वह समाचार सही निकला। अखबार में पहले दिन वह समाचार गलत होने की क्षमा याचना पाठकों से की। किन्तु दूसरे दिन फिर उस क्षमा याचना को छापा कि समाचार सपने के माध्यम से मिला होने पर भी अक्षरशः सही निकला। मात्र उस द्वीप के नाम से ही एक दो अक्षरों का अन्तर पाया गया।

कई सपने बड़े प्रेरणा प्रद सिद्ध हुए हैं। उनने इतना उत्साह प्रदान किया कि देखने वालों ने उसे संकल्प की तरह अपनाया और असम्भव जैसा लगने पर भी पूरा करके ही दम लिया।

फ्राँस के एक ग्रामीण डाकखाने का पोस्ट मैन प्रायः 20 मील रोज चलता था। उसी कठोर परिश्रम से उसका परिवार पलता था। एक दिन उसने सपना देखा कि उसने पास के पहाड़ की चट्टानें काट कर एक भव्य उसका नाम पैलाइस आइडियले रखा गया।

सपने से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने बचे समय में वैसा ही भवन अपने हाथों बनाने का निश्चय कर लिया। वह जुट पड़ा और अपनी सारी पूँजी और मेहनत लगा कर लगातार 33 वर्षों के परिश्रम से उस सपने को साकार कर दिया। हैटोराइव—फ्राँस का वह स्वप्न महल अभी भी दर्शकों के लिए कौतुक और आकर्षक का विषय है।

ये समस्त प्रसंग एक ऐसे अदृश्य लोक का वर्णन करते हैं जो मानवी मन के रूप में हम सबके अन्दर विद्यमान है। स्वप्नों में पूर्वाभास से लेकर महत्वपूर्ण गुत्थियों के समाधान मिलते रहे हैं। परामनोविज्ञान का यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ समष्टि एवं व्यष्टि मन के परस्पर आदान−प्रदान का लीला सन्देह चलता रहता है। मस्तिष्क के शान्त प्रसुप्त पड़े क्षेत्रों की निद्रा की स्थिति में जागृति यही सम्भावना बताती है कि प्रयासपूर्वक साधना पराक्रम से उन्हें जगाकर व्यक्तित्व−दैवी क्षमता सम्पन्न भी बना जा सकता है। अध्यात्म क्षेत्र की विज्ञान को चुनौती के रूप में स्वप्न विद्या का यह क्षेत्र इतनी असीम सम्भावनाओं से भरा है जिसकी कोई परिधि सीमा नहीं।


दुर्भाग्यग्रस्तों की दुनिया

सितम्बर अंक में इसी शीर्षक से प्रकाशित लेख का उत्तरार्ध

कई बार अनीतिकर्ताओं को सताने वालों की हाय ले बैठती है। कई बार दुरात्माओं को दण्ड स्वरूप आत्मबल सम्पन्न शाप देते भी देखे गये हैं। कोई व्यक्ति पूर्व संचित संस्कारों पर अविज्ञात कारणों से ऐसे दुर्भाग्य ग्रस्त होते हैं कि सामान्य घटनाएँ भी उनके विपरित पड़ती हैं। कई बार दूसरों के सताने वाला व्यक्ति एवं पदार्थ कर्मफल भुगतने और दैवी प्रकोप से ग्रसित होते देखे गये हैं। ऐसे अभागे अभिशप्त के अनेक उदाहरण जहाँ−तहाँ मिलते रहते हैं।

ब्राजील की भूतकालीन राजधानी ‘रियो−डि−डिनरो के सम्बन्ध में पुरातत्व अभिलेखागार में सन् 1734 का दस्तावेज रखा है। क्रमांक है इसका—512/1734। इन दस्तावेजों के अनुसार वोलोविया और ब्राजील की सीमा के निकट एक हिमाच्छादित पर्वत शृंखला के निकटवर्ती सघन वन में ऐसे ध्वंसावशेष नगर की चर्चा है जहाँ किसी समय सम्भवतः ब्राजील की राजधानी रही होगी और कोई सभ्य जाति शासन करती रही होगी। उन ध्वंसावशेषों में बहुमूल्य स्वर्ण खण्ड बिखरे पड़े हैं। आसान है कि खुदाई करने पर जहाँ सोने और चाँदी के बहुमूल्य भण्डार मिल सकते हैं।

विवरण के अनुसार अठारहवीं सदी के प्रारम्भ में एक खोजी दल क्षेत्र में दबे स्वर्ण खजाने का पता लगाने के लिए चला। कई महीनों के बाद वह उस खण्डहर तक पहुँचा और इन खण्डहरों में जहाँ तहाँ सोने के सिक्के, सलाखें, बर्तन, शस्त्र आदि बिखरे पड़े पाये। खोजी दल आवश्यक जानकारी एकत्रित करके वापस लौटा तो पराणुवासु, नदी के तट बसे आदिवासियों के हाथों अपने साथियों को आने के लिए एक पत्र भेजा जिसमें उस स्वर्ण नगरी का नक्शा, वहाँ की सम्पदा, पहुँचने का मार्ग आदि के बारे में साँकेतिक भाषा में लिखा। यही है वह 512 नम्बर का दस्तावेज जिसकी खोज में अब तक कितनों ने अपनी जानें गँवायी है। पत्र यथा स्थान पहुँच गया। सहायक दल पहुँचा भी पर उसे अपने अग्रणी साथियों का कहीं पता नहीं चल सका।

सन् 1947 में लन्दन के एक प्रोफेसर ऐरिक हेमण्ड उस खोज पर निकले। उन्होंने दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया और हवाई जहाज, जीप, मोटर साइकिल आदि का सहारा लेकर चले। आगे बीहड़ रास्ते में पैदल ही चल पड़े। वे इस वन प्रदेश में ईसाई धर्म के प्रचारक पादरी जोनायन वेल्स से मिले। उन्होंने आगे जाने से मना किया फिर भी हेमण्ड नहीं माने। तब उन पादरी ने हेमण्ड को तेरह प्रशिक्षित कबूतर दिए और कहा—’एक−एक करके वह इनके पैरों में पत्र बाँधकर उन तक सन्देश पहुँचाते रहें। हेमण्ड ने किया भी ऐसा ही परन्तु छठें, ग्यारहवें, और तेरहवें नम्बर के कबूतर ही पहुँचे शेष रास्ते में ही गायब हो गये। तेरहवें पत्र में हेमण्ड ने लिखा—”मैं बीमार पड़ गया हूँ, मेरा मृत्युकाल निकट है लेकिन फार्सेट द्वारा आरम्भ की गई खोज का अन्तिम चरण पूरा कर लिया।” पादरी जोनायन ने स्वयं खोजबीन की पर बाद में इन सज्जन श्री हेमण्ड का कहीं पता नहीं चला।

दूसरी घटना है—सन् 1832 की। पाइलीन बीवर नामक व्यक्ति को कहीं से पता चला कि समीपवर्ती सघन वन की पर्वत शृंखला में न केवल सोने का भण्डार दवा पड़ा है वरन् वह उस स्थान पर पहुँचा, खेमा गाढ़ा। रात्रि के समय उसने स्वर्ण कणों की वर्षा होते देखा और लगा सोना समेटने। ऊपर सिर उठाया तो कुछ छायाओं के खिलखिलाते चेहरे दिखाई दिये। भयभीत हो जैसे ही खेमे की ओर नजर दौड़ायी—खेमा गायब था। वह भयभीत हो सोना छोड़कर वापस घर लौट आया। ठीक इसी से मिलता−जुलता अनुभव मैक्सिको निवासी एक युवक ‘डान पैरेलता’ भी कर चुका था। वह तो कम से कम अपनी जान बचा सकने में सफल हो गया लेकिन उसके साथी इसी कुचक्र में अपनी जान गँवा बैठे।

स्टेनले फर्नेड को ‘जेम्स’ नामक व्यक्ति की लिखी एक डायरी मिली जिसमें अमेरिका स्थित एक खूनी पहाड़ का वर्णन था जहाँ सोना दबा ही नहीं पड़ा है वरन् बरसता भी है। जेम्स इसी खोज में अपनी जान गँवा बैठा था लेकिन इसके पूर्व वह वहाँ के समस्त विवरण लिख चुका था। फर्नेड उस डायरी के आधार पर अपने साथी बेजामिन फरेश को साथ ले सौ मील लम्बे निस्तब्ध वनों को पार करते हुए सायंकाल तीन बजे उस पर्वत के निकट पहुँच गए। ठहरने के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश कर रहे थे कि अचानक फरेश के शिर में कहीं से आकर दो गोलियाँ लगीं और वह खून से लथपथ होकर वहीं गिर पड़ा। स्टेनले वापस भाग तो गया पर वह पागल हो गया। यह समाचार मेक्सिको और अमेरिका के समाचार पत्रों में सविस्तार छपा। मामला अमेरिका खुपिया पुलिस के एफ. वी. आई. को सौंपा गया। कुछ समय पूर्व रॉबर्ट मेरे नामक व्यक्ति के साथ भी यही घटना घट चुकी थी। अतः मामले की गहराई से जाँच की गई लेकिन कुछ भी ज्ञात न हो सका।

बाल्ज नामक युवक ने इस दिशा में अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण कदम उठाने का निश्चय किया। उसने उस क्षेत्र के आदिवासियों के साथ घनिष्ठता बढ़ाई और एक आदिवासी युवती से शादी करली जिससे उस क्षेत्र में देर तक टिक सके एवं उनकी सहायता से अधिक जानकारी प्राप्त कर सके। बस जाने पर वह सोना समेटने और भेजने का काम तो करता रहा पर आदिवासियों से उद्गम की अधिक जानकारी प्राप्त करने में सफल न हो सका, उस क्षेत्र में सबसे अधिक दिन तक रहने और अधिक खोज करने का काम बाल्ज ने ही किया। अपने विवरणों के सम्बन्ध में उसने एक ऐसी सुरंग का उल्लेख किया है जिसमें सैकड़ों नर कंकाल भरे पड़े थे। सम्भवतः इस क्षेत्र के रखवाले देवताओं या तान्त्रिकों का तूफानी आक्रमण ही स्वर्ण खोजियों की जान ले बैठता है। प्रथम महायुद्ध के पराक्रमी योद्धा बरेनी ने भी इस क्षेत्र में अधिक दिन रहकर अधिक खोजें की। उनका मत था कि इस क्षेत्र में विपुल सम्पदा है जिसका रहस्य वहाँ के कबीले आदिवासी जानते हैं पर वे किसी को उस क्षेत्र में आने नहीं देते और ताँत्रिक पुरोहितों की आज्ञानुसार आगन्तुकों की हत्या कर देते हैं।

होप नामक हीरा योरोप में अपने अमंगल के लिए बहुत विख्यात हो चुका है। वह जिसके पास भी रहा उसे चैन से नहीं रहने दिया। यह हीरा ब्रह्मा के किसी हिन्दू मन्दिर में भगवान की मूर्ति में आँख में जड़ा हुआ था। 300 वर्ष पहले की बात है, बेपटिस्ट अवर्नियर नामक अंग्रेज उसे चुरा ले गया। उसने उसे जौहरी टामस होप के हाथ बेच दिया। उसी ने हीरे का नाम होप रखा। हीरे के पहुँचते ही उसका कारोबार बैठ गया। उसने घबड़ाकर उसे कम दामों में बेच दिया। बाद में वही हीरा वाशिंगटन (अमेरिका) की एक नवयुवती ईवलिन मैकलिन रेनल्ड्स ने खरीदा और उसके कुछ दिन बाद ही उसने निद्रा की गोलियाँ अधिक मात्रा में लेकर आत्म−हत्या कर ली। इसके बाद हीरा एण्टानयट के पास पहुँचा। उसके पहुँचते ही उसके जीवन में झगड़ों की बाढ़ आ गई। अभी वह हीरे को बेचने की ताक में ही था कि उसका सिर काट लिया गया। अब वह हीरा प्रिन्सेस दि तम्बल ने पहना और उसकी भी हत्या कर दी गई। उसके पास से फास नामक एक जौहरी ने यह हीरा चुरा लिया और उसने कुल सात दिन में आत्महत्या कर ली। तब फाँलीज वर्गर नामक एक ड्रामा करते समय वह हीरा पहना। रंगमंच (स्टेज) पर चढ़ते ही किसी ने उसे गोली मार दी। स्टाक मार्केट के प्रमुख उद्योगपति लार्ड फ्रांसिस होप ने यह हीरा लेकर अपनी सारी सम्पत्ति गँवादी। तब वह पहुँचा अरब के सुल्तान अब्दुल हमीद के पास। उसे गद्दी से उतार दिया गया। तब इसे श्रीमती वाल्श मैकलीन ने खरीदा और उसी दिन उनका प्रियपुत्र मोटर से कुचलकर मारा गया। इस तरह यह हीरा अपने अमंगल के कारण सारे योरोप में बदनाम हुआ।

सगर पुत्रों का कपिल मुनि के शाप से भस्म हो जाना, श्रृंगी ऋषि के शाप से परीक्षित को साँप द्वारा काटा जाना, मेघदूत वर्णन में यक्ष का वियोग दुःख सहना, गांधारी के शाप से यदुकुल का लड़कर समाप्त होना, नहुष का सर्प बनना, त्रिशंकु का उलटा लटकना, दमयन्ती के शाप से व्याध की दुर्गति होना जैसी असंख्य पुराण कथाएँ सुनी जाती हैं। पुराण के इन घटनाक्रमों की साक्षी आज भी देखने को मिलती।

केप कालानी के उच्च गवर्नर की अदालत से 9 सैनिकों को फाँसी की सजा सुनाई थी। गवर्नर का काम था। पीटर जिर्ज्वट नार्दन सैनिकों पर इल्जाम था कि वे भागने की कोशिश कर रहे थे। वस्तुतः सैनिक निर्दोष थे। फिर भी उन्हें फाँसी के तख्ते पर चढ़ना पड़ा।

अन्तिम सिपाही जब मृत्यु वेदी की ओर जा रहा था तो वह जोर से चिल्लाया—”नार्दन, जरा ठहरो, मैं कुछ ही समय में तुझे ईश्वर के दरबार में जवाब देने के लिए घसीटकर ले चलूँगा।” फाँसी लगा दी गई। देखा गया कि कुछ ही मिनटों के उपरान्त गवर्नर अपने दफ्तर की कुर्सी पर बैठा−बैठा मर गया।

बेनिस के वैज्ञानिक फ्रान्सेस्को डेले वार्न ने युद्ध में काम आने वाले एक विचित्र राकेट का आविष्कार किया। वह 3000 पौण्ड भारी गोला लेकर उड़ता था और लक्ष्य तक जा पहुँचता था। उन दिनों इस आविष्कार की बहुत चर्चा थी।

एक बार इस आविष्कार का उपयोग यूगोस्लाविया की घेराबन्दी तोड़ने में किया जाना था। गोला दागा गया। संयोग की बात कि दंगित समय आविष्कारक खुद उस मशीन में फँस गया और गोले के साथ उड़ता हुआ निर्धारित निशाने के नजदीक मरा। वह एक महिला से जा टकराया। महिला और कोई नहीं उसकी पत्नी जो किसी काम से उस इलाके में आई थी। टक्कर में पति−पत्नी दोनों चूर−चूर हो गये। दोनों एक साथ दफनाये गये।

30 मई 1887 को इटली के टोरिओटिकाने की राजकुमारी का विवाह इटली के राजकुमार ड्यूक डिआडस्टा के साथ हुआ। विवाह का दिन ऐसा अभागा निकला कि उस समारोह में भाग लेने वालों में से कितनों को ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। उन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में से कुछ इस प्रकार हैं—

(1)राजकुमारी की निजी नौकरानी ने उसी दिन फाँसी लगाकर आत्म−हत्या कर ली।

(2)द्वारपाल ने अपना गला काट डाला।

(3)बारात के जुलूस का नेतृत्व करने वाला कर्नल लू लगने से ऐसा बीमार पड़ा और मरने के बाद ही चारपाई से उठा।

(4)जिस ट्रेन से वे दोनों सुहाग रात मनाने जा रहे थे उसका स्टेशन मास्टर गाड़ी के नीचे आ गया और कुचल कर मर गया।

(5)राजा का व्यक्ति गत सहायक घोड़े से शिर के बल गिरा और वहीं मर गया।

(6)विवाह के विशेष प्रबन्धक वेस्ट मैन अर्धविक्षिप्त स्थिति में असन्तुलित हो गये और प्राण गँवा बैठे।

ऐन्टोनिया रोम के राजा क्लाईडयस की बेटी थी। राजकुमारी तथा सुन्दरी होने के कारण उसके सामने विवाह प्रस्ताव सदा पड़े ही रहे। दो बार उसने विवाह किया था पर उनमें से सफल एक भी नहीं हुआ। विभिन्न कारणों से उसके यह पति कुछ ही दिन पीछे किसी अपराध में फँसे और मृत्यु दण्ड के अधिकारी बने। एन्टोनिया ने उन दिनों की भयानक मृत्यु अपनी आँखों से देखी। तीसरी बार सम्राट नीरो की बारी आई। उनसे जोशीला विवाह प्रस्ताव भेजा। पर वह स्वीकृत न हुआ। इस पर अपमानित और क्षुब्ध नीरो ने स्वयं अपने आपको फाँसी लगाकर आत्म−हत्या कर ली।

अभिशाप जिस भी वस्तु अथवा व्यक्ति के साथ जुड़ा हो, अन्ततः उन्हें विनाश की ओर ही ले जाता है। यह प्रकृति की एक सुनिश्चित विधि व्यवस्था है। दुस्साहस की चरम सीमा और वह भी गलत दिशा में हो तो परिणाम निश्चित ही दुःखद होंगे। यदि यही प्रयास सही दिशा में हों तो फिर सुखद परिणतियों की कल्पना ही की जा सकती है।


ज्योतिर्विज्ञान का पुनर्जीवन देव संस्कृत का पुनीत कर्त्तव्य

प्राचीन काल में ज्योतिर्विज्ञान विज्ञान सम्मत था। भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने वाले विदेशी विद्वानों ने इस विद्या से प्रभावित होकर अन्य भाषाओं में अनुवाद कराया। मुस्लिम ज्योतिषाचार्यों में इब्नबतूता और अलवरुनी का नाम उल्लेखनीय है। भारत की यात्रा पर आये इन विद्वानों ने अन्य भारतीय विधाओं के साथ ज्योतिष विद्या का भी गहन अध्ययन किया। अरब देशों ने इसके विस्तार की योजना बनाई। अलबरुनी सन् 1017 से 1031 तक भारत में रहा। महमूद गजनवी के साथ वह भारत आया था। ज्योतिष शास्त्र से प्रभावित होकर उसने भारतीय ज्योतिष के पौलिश सिद्धान्त व ‘ब्रह्म गुप्त’ का विवेचन करते हुए गणित ज्योतिष पर अरबी भाषा में इण्डिका नामक ग्रन्थ लिखा।

अलवरुना संस्कृत भाषा और ज्योतिष शास्त्र दोनों ही विषयों का मर्मज्ञ था। उसके मूल ग्रन्थ ‘इण्डिका’ को विश्व ख्याति मिली। जर्मनी विद्वान एडवर्ड सी. साँचो इण्डिका में वर्णित सूक्ष्म ज्योतिर्विज्ञान से सूत्रों से विशेष प्रभावित हुआ और उसने इण्डिका का रूपांतर जर्मन विद्वानों को ध्यान भारत की ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुआ और कितने ही विद्वान यहाँ आकर प्राचीन वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन करते रहे और अपने साथ ढेरों दुर्लभ वैदिक साहित्य ले गये। एडवर्ड सी. साँचो की पुस्तक दो विशाल खण्डों में है तथा विश्व ख्याति प्राप्त है। इस ग्रन्थ में सन् 1031 के पूर्व प्रचलित ज्योतिष सिद्धान्त एवं इस विषय के मर्मज्ञ भारतीय विद्वानों का परिचय विस्तार से मिलता है।

अलफजारी, याकूब विनतारिक, अबूअलहसन नामक अरबी विद्वानों की गणना भी ज्योतिष के विशेषज्ञों में की जाती है। यूनान के विद्वान यवनाचार्य भी दीर्घकाल तक भारत में रहे और ज्योतिर्विज्ञान का अध्ययन करते रहे। वे संस्कृत, अरबी और यूनानी भाषा के विशेषज्ञ थे। इनकी कारिकाएँ प्रसिद्ध हैं। ग्रन्थों में ‘वृहयवन जातक’ और ‘लघुयवन जातक’ प्रसिद्ध हैं। बाराहमिहिर जैसे विद्वानों ने अपनी पुस्तक वृहत्संहिता और बृहज्जातक में यवनाचार्य, का वर्णन बड़े सम्मान एवं विस्तार से किया है। ऐसा अनुमान है कि ईसा पूर्व से ही यूनानी अरबी, विद्वानों की अभिरुचि भारतीय ज्योतिर्विद्या में थी और समय−समय पर अध्ययन के लिए—वे लोग भारत आते रहे हैं।

अकबर के नवरत्नों में से अब्दुल रहीम खानखाना न केवल भारतीय संस्कृति के पुजारी और कवि थे बल्कि महान ज्योतिर्विद् भी थे। उनकी रचनाएँ ‘खेट कौटुकम्’ और द्वाविंशद्योगावला आज भी ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं का मार्गदर्शन करती है।

ईसा पूर्व सातवीं से दूसरी शताब्दी तक बेबीलोन में भी इस विद्या का बहुत विस्तार हुआ। जहाँ से यहूदियों और मिस्रवासियों ने इसे अपनाया। मध्य अमेरिका की प्राचीन एजटिक एवं मय संस्कृतियों में भी ज्योति विद्या प्रचलित थी। पीछे ग्रीकवासियों में भी यह विशेष लोकप्रिय हुई। मार्सेली फिकनो (सन् 1433−1499) ने ज्योतिर्विज्ञान पर एक पुस्तक लिखी—’लिबर्डीविटा’। जिसमें अन्तर्ग्रही प्रभावों का विस्तृत उल्लेख है। प्रसिद्ध दार्शनिक पैरासैल्सस ने ज्योति−विज्ञान का उपयोग चिकित्सा जगत के लिए लाभप्रद बताया। उसका कहना था कि मैक्रोकास्मिक प्रभाव के अनुसार मनुष्य शरीर (माइक्रोकास्मिक) पर प्रभाव पड़ते रहते हैं तथा चिकित्सा शास्त्र से उसका घना सम्बन्ध है। उन्होंने शरीर के अवयव एवं ग्रह नक्षत्र का सम्बन्ध सूचित करने वाली तालिका बनायी। फलतः अन्तर्ग्रहीय गतियों का शरीर की क्रियाओं एवं औषधियों पर होने वाले असर के अनेकों प्रयोगों का संकलन ज्योतिर्विज्ञान के रूप में सामने आया। इसे अँग्रेजी में ‘एस्ट्रोलाँजिकल कारेस्पौण्डेन्स’ कहते हैं जिसके अनुसार विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुरूप उपयोग करने की वैज्ञानिक पद्धति विकसित हुई जो चरक और सुश्रुत के वर्णित चिकित्सा शास्त्र से बहुत कुछ मिलता−जुलता है।

हेपोक्रेट्स और गेलेन आदि की यह मान्यता थी कि प्रत्येक चिकित्सक को ज्योतिर्विज्ञान का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है। पंद्रहवीं शताब्दी में इस दिशा में आशातीत प्रगति हुई और एस्ट्रोमेडिसिन (ग्रह नक्षत्रों से सम्बन्धित चिकित्सा विज्ञान) अस्तित्व में आया। ‘रेनेसा’ नामक दार्शनिक के समय इसका सुव्यवस्थित उपयोग होने लगा। इंग्लैण्ड के वनौषधि शास्त्री कैरिचर और जर्मनी के ‘फ्राक ‘ नामक विद्वान ने इसका विस्तार किया। इंग्लैण्ड के ही रॉबर्ट टर्नर ने तो ज्योतिर्विज्ञान से प्रभावित होकर वोटाँनोलाजिया नामक विज्ञान की शाखा को जन्म दिया। एस्ट्रोलाजिकल हर्वलिस्ट निकोलस कल्पिपर की ख्याति इस क्षेत्र में अभी भी बनी हुई है। वह 1616 में एक पादरी के घर पैदा हुआ। कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय से चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। बाद में हृदय रोग का मरीज होते हुए भी उसने ज्योतिष को चिकित्सा शास्त्र से जोड़ने का उत्साहवर्धक प्रयास किया। अपने अनुभवों के आधार पर उसने ‘कल्पिर हर्बल्स’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की। आज भी यह ग्रन्थ प्रामाणिक माना जाता है उसकी स्मृति में लन्दन में कल्पिर हाउस नामक भवन में ‘सोसाइटी ऑफ हर्बलिस्ट संस्था काम कर रही है।

अतीत काल में ज्योतिर्विद्या का न केवल सैद्धान्तिक ज्ञान विश्व भर में लोकप्रिय हुआ वरन् अनेकों स्थानों पर अन्तरिक्षीय गतिविधियों के अध्ययन पर्यवेक्षण के लिए विलक्षण वेधशालाओं का भी निर्माण हुआ है। जिनकी निर्माण प्रक्रिया और सन्निहित विशेषताएँ अभी भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्यमय बनी हुई हैं।

‘दी वर्ल्ड एटलस ऑफ मिस्ट्रीज’ पुस्तक के लेखक हैं—फ्रान्सिस हचिंग। पुस्तक में रॉयल सोसाइटी के फेलो तथा लन्दन सोलर फिजिक्स लैबोरेटरी के डायरेक्टर ‘नार्मन लाँकर’ जो ‘नेचर’ पत्रिका के संस्थापक और 52 वर्षों तक सम्पादक भी रह चुके हैं, के शोध निष्कर्षों का वर्णन है। नार्मन लाकर ने लम्बे समय तक मिस्र के विश्व प्रसिद्ध पिरामिडों का अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इनकी रचना सूर्य एवं ग्रह नक्षत्रों की वेधशाला के रूप में का गई है उसकी पुष्टि में अनेकों तथ्य मिले हैं। जो यह बताते हैं कि गणितीय आधार पर यहाँ विनिर्मित हुई हैं। पिरामिड का वजन 5923400 टन है जो पृथ्वी के वजन का 1 हजार अरबवाँ भाग है। इसमें 2 करोड़ 60 लाख पत्थर लगाये गये हैं। पिरामिडों की ऊँचाई को 100 करोड़ गुना करने पर पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी मापी जा सकती है। आकार प्रिज्म जैसा है तथा सभी भुजाएँ समान हैं। इसके सभी भुजाओं की परिमिति 36520 इंच है जा पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण के समय 365.20 दिन से सम्बन्धित है। पिरामिड का घनत्व 5.7 है। यही पृथ्वी का भी है। इसके आधार और ऊँचाई का अनुपात वृत्त और वृत्त की त्रिज्या के अनुपात में हैं।

पीटर टाम्पकिन्स नामक विद्वान ने सीके्रटस ऑफ दि ग्रेट पिरामिड नामक पुस्तक में लिखा है कि ये मात्र मृत शरीरों को रखने के लिए बनाई गई इमारतें नहीं है वरन् ज्योतिर्विज्ञान के अनेकों गूढ़ रहस्यों को अपने में समाहित किए हुए हैं। विलियम पीटर्सन कॉलेज न्यूजर्सी (अमेरिका) के एन्सियण्ट हिस्ट्री के प्रो. डॉ. लिवियो स्टेकेनी के अनुसार पिरामिडें अपने समय में वेधशाला का प्रयोजन पूरा करती रही हैं। अभी भी इसके आधार पर खगोल का नक्शा बनाया जा सकता है। गणित के, गूढ़ प्रश्नों पाइथागोरस के विश्व विख्यात प्रमेय आदि की व्याख्या इसके विभिन्न भुजाओं के आधार पर की जा सकती है। पृथ्वी और सूर्य का अन्तर, दिन की लम्बाई, एक दिन का 2422 वाँ भाग समय जो ज्योतिष विज्ञान के लिए आवश्यक है इससे निकाला जा सकता है। पृथ्वी का गुरुत्व बल, सूर्य की गति एवं स्थिति भी जानी जा सकती हैं।

इसकी प्रयोग विधि पूर्णरूपेण अभी भी अविज्ञात है यदि यह जाना जा सके तो कितने ही चमत्कारी सूत्र हाथ लग सकते हैं। इस अनुसंधान के बाद ‘नार्मन लाकर’ ने ब्रिटेन के स्टोनहैन्ज नामक विश्व प्रसिद्ध स्थान पर दृष्टि दौड़ाई और यह पाया कि यह स्थान अन्तर्ग्रही आदान−प्रदान के रहस्यात्मक सूत्रों को अपने में समेटे हुए है। इस सम्बन्ध में उन्होंने विस्तृत उल्लेख अपनी पुस्तक स्टोन हैन्ज एण्ड अदर ब्रिटिश स्टोन मौन्युमेण्ट्स नामक पुस्तक में की है। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार इंग्लैण्ड के दूसरे खगोलविद् ‘मोर्टिमर व्हीलर’ जो सोसाइटी ऑफ एण्टीक्वेरीज इन लन्दन के प्रेसीडेन्ट हैं ने भी अपने शोध निष्कर्षों के बाद ‘नार्मन लाकर’ के अन्वेषण की पुष्टि की है। लन्दन के ही आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग प्रभाग के प्रोफेसर डॉ. ‘अलेक्जेण्डर थाम्ब अमेरिटस’ ने 1945 से 1961 तक इन अद्भुत पत्थरों का अध्ययन किया तथा ‘मेगेलिथिंक साइट्स इन ब्रिटेन’ नामक पुस्तक में सन्निहित विशेषताओं का विस्तृत उल्लेख किया उन्होंने अनेकों तथ्य एवं प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध किया है कि स्टोन हैन्ज नामक स्थान पर पाये जाने वाले विशालकाय पत्थरों की भूमितीय रचना में विस्मयकारी सूक्ष्मता से ग्रह नक्षत्रों का वेध करने के लिए स्थापित किया गया है। उनका कहना है कि इन विशालकाय एवं विचित्र पत्थरों को उस स्थान पर स्थापित करने वाले न केवल सूक्ष्म गणित के ज्ञाता थे वरन् ज्योतिष विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान भी थे। 1 से.मी. के 1000वें भाग तक के सूक्ष्म वेध करने की क्षमता इन प्राचीन पत्थरों में विद्यमान है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ब्रिटेन में पलियस सीजर के पदार्पण से 1500 वर्ष पूर्व ड्रुइड सम्प्रदाय के धर्मावलम्बी स्टोन हैन्ज क्षेत्र को देव स्थान मानते तथा उपासना, आराधना किया करते थे। वे अन्तरिक्षीय गतिविधियों के अध्ययन पर्यवेक्षण के साथ−साथ उनसे लाभ उठाने के लिए साधनात्मक विधि−व्यवस्था बनाते थे।

‘सेकेट्स ऑफ दी वारमूडा ट्रेंगिल’ के लेखक एलन टेन्सवर्ग ने ब्रिटिश टापू में स्थित उत्तर स्काटलैण्ड, पोर्टुगल से लेकर वारमूडा तक के 2500 कि.मी. क्षेत्रफल वाले भाग को किन्हीं अन्तर्ग्रही शक्तियों को केन्द्र माना है। वहाँ 900 विशालकाय पत्थर सूर्य के विभिन्न अंशों पर खड़े हैं कि किसी समय यह स्थान अन्तरिक्षीय विज्ञान की वेधशाला रहा होगा। इन पत्थरों के माध्यम से प्रति 9 वर्षीय सौर मण्डल चक्र की गतियों का अध्ययन किया जा सकता है।

भारते में भी अनेकों स्थानों पर ऐसी वेधशालाएँ स्थापित थीं पर विदेशियों ने आक्रमण कर देश की सभी महत्वपूर्ण साँस्कृतिक निधियों को नष्ट किया जिसमें वेधशालाएँ भी थीं। अनेकों विद्वानों ने अपने खोज द्वारा यह बताया है कि दिल्ली का कुतुबमीनार किसी समय विश्व की प्रख्यात वेधशाला थी। जिसे बाद में मुगलों ने तुड़वा दिया। उस वेधशाला का अब मेरु स्तम्भ (कुतुबमीनार) ही अब शेष बचा है। इस महान स्तम्भ का निर्माण अन्तरिक्षीय अध्ययन के लिए सम्राट विक्रमादित्य के प्रसिद्ध नवरत्नों में से प्रख्यात ज्योतिर्विद् आचार्य बाराहमिहिर द्वारा सम्राट के सहयोग से किया गया था। दिल्ली के निकट बसा मिहिरावली (महरौली) ग्राम भी आचार्य बाराह मिहिर के नाम पर ही बसा हुआ है।

अनुमान है कि 2200 वर्षों पूर्व बाराहमिहिर ने सत्ताईस नक्षत्रों, सात ग्रहों एवं ध्रुव तारे का वेध करने के लिए तथा सम्बन्धित जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए जल के बड़े सरोवर के मध्य इस मेरु स्तम्भ का निर्माण कराया। इस स्तम्भ की ऊँचाई श्रीमद् भागवत पुराण में वर्णित हिमालय के शिखर मेरु पर्वत की ऊँचाई के अनुपात में ली गई है। सात ग्रहों के अनुसार इसकी सात मंजिलें और नीचे से ऊपर तक सत्ताईस नक्षत्रों को देखने के लिए सत्ताईस रोशनदान बने थे। स्तम्भ के निर्माण में भीतर काले पत्थरों का प्रयोग हुआ है ताकि अन्दर बिल्कुल अन्धेरा रहे। इस स्तम्भ का प्रमुख द्वार ध्रुव उत्तर की ओर है और झुकाव पाँच अंश दक्षिण की ओर है। इसकी नींव 16 गज गहरी है और ऊपर ऊँचाई लगभग 84 गज थी जा इस समय ऊपरी झुकाव को अंग्रेजों द्वारा तुड़वा दिए जाने के कारण 76 गज रह गई है।

मेरु स्तम्भ (वर्तमान कुतुबमीनार की अनेकों विशेषताओं में से एक) यह है कि 21 जून को 12 बजे दोपहर में इसकी छाया पृथ्वी पर नहीं पड़ती। छाया न पड़ने का कारण यह है कि सूर्य 21 जून को भूमध्य रेखा से 23.5 अक्षाँश उत्तर की ओर होता है। इन दोनों अक्षांशों में 5 अंश का अन्तर है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ज्योतिष गणना के अनुसार स्तम्भ निर्माण में ऊपरी हिस्से को 5 अंश दक्षिण की ओर झुकाव दे दिया गया था। ब्रिटिश शासन काल में इंजीनियर इस स्तम्भ के टेड़े होने का रहस्य न जान सके और यह समझकर कि नींव खिसकने से स्तम्भ झुक गया है तथा गिरने का खतरा है, भार को हल्का करने के लिए ऊपरी खण्ड को तुड़वाकर गिरवा दिया।

बाराहमिहिर के समय में इस स्तम्भ के चारों ओर सत्ताईस अन्य वेधशालाएँ थी जिन्हें सत्ताईस मन्दिरों का स्वरूप दिया गया था। इन मन्दिरों को कुतुबद्दीन नामक विदेशी आक्रमणकारी ने तुड़वाकर मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया तथा अपना नाम उस पर खुदवाया। इन सब तोड़−फोड़ के बावजूद भी स्तम्भ के ध्वंसावशेष अभी भी ऐसे किसी समय की वेधशाला होने का बोध कराते हैं तथा अपनी विचित्रताओं से वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित करते हैं।

भारत से प्रादुर्भूत होकर ज्योतिर्विज्ञान का ज्ञान विश्व भर में फैला था। उस महान विद्या के विकास के प्रमाण अभी भी भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न भाषाओं में लिपिबद्ध है तथा अपनी विलक्षणता के लिए अनेकों प्रकार की वेधशालाओं के अवशेष विद्यमान हैं जो किसी समय इसकी उपयोगिता−उपादेयता का बोध कराते हैं। उस महान विज्ञान को पुनर्जीवित करने की दिशा में विज्ञ मनीषियों द्वारा प्रयास किया जाना चाहिए।


त्रिपदा गायत्री की त्रिविधि भाव साधना

गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। त्रिपदा अर्थात् तीन पद—तीन चरण वाली। जीव, ब्रह्म, प्रकृति,। सत्रज−तम। सत्−चित्−आनन्द। स्थूल, सूक्ष्म, कारण। ज्ञान, कर्म, भक्ति आदि कितने ही त्रिकों का अध्यात्म शास्त्रों में उल्लेख मिलता है। देखा जाय तो यह सब गायत्री के ही तीन चरणों का विस्तार विवेचन हैं। गायत्री महाशक्ति अपने ब्रह्म उद्गम हिमालय से निकल कर दो भागों में विभक्त होती है। इनमें से एक ज्ञान धारा है, दूसरी शक्तिधारा। प्रयागराज के संगम में एक और सूक्ष्म सरिता सरस्वती भी मिलती है और वह त्रिवेणी संगम कहा जाता है।

गायत्री की सामान्य उपासना में फर्ममाण्ड परक पर्ट्पग, आत्मशोधन, जप, देवपूजन आदि उपचार सम्पन्न करने पड़ते हैं। इससे डडडड की उच्चस्तरीय गायत्री साधना में भावपद का प्राधान्य है। इसके भी तीन चरण हैं। उच्चस्तरीय गायत्री साधना के भावपक्ष को (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।

उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के भाव पक्ष के तीन चरण हैँ। (1)भजन, (2)मनन, (3)चिन्तन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार जीवन के लिए भजन, मनन और चिन्तन का सूक्ष्म आहार, प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।

उच्चस्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँसपेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किसी आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्ध पद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिये उपयोगी भले ही हों−ध्यान के लिए उलटे बाधक होते हैं।

यह बात मन के सम्बन्ध में भी है। समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नील आकाश है। सर्वत्र परम शान्तिदायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलयकाल का ऐसा चित्र बाजार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय तो शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की—उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।

शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार से हो सकता है। आपरेशन करते समय इन्जेक्शन लगाते समय हिलने−डुलने पर प्रतिबन्ध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश कराते समय दोनों व्यक्ति यों को हिलाया डुलाया नहीं जाता। भाव परक ध्यान योग के समग्र—भजन के समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शान्त रहना चाहिए यह भजन का पूर्वार्ध है।

भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्वशक्तिमान्−सर्ववैभववान्—सर्वउत्कृष्टताओं से सम्पन्न—सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए—घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापी दिव्य प्रकाश के सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय। जिस प्रकार से मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप ‘कीचड़’ बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम−रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1) शरीर के अंग प्रत्यंग में वह संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा परक तेजस् बनकर बिखर रखा है। अन्तरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनन्द रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलन्त अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्या वन्दन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बन्धन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि—”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग−प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उधाड़े गये अवयवों की तरह उलटना−पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।

इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर किया जा सकना सम्भव हो, करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण−हंस की आत्म सत्ता सर्वथा स्वतन्त्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काय−कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए लिए सहायक के रूप में मिला था। उस की शोभा सुसज्जा के लिए आत्म−कल्याण के लक्ष्य को तिलांजलि नहीं दी जानी चाहिए।

मनन का दूसरा अर्थ है−आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव—अपनी गतिविधियाँ और रीति−नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव−बन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।

भजन अर्थात् ईश्वरीय सत्ता के साथ आत्मसत्ता का समीकरण—परस्पर विलय समन्वय की अनुभूति। भजन अर्थात् आत्मबोध, शरीर और आत्म के स्वार्थों और सम्बन्धों का पृथक्करण, जीवन लक्ष्य के प्रति आस्था और सरल रीति−नीति का साहसपूर्वक निर्धारण दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय में या अलग−अलग समय में सुविधा समय और शान्त−एकान्त स्थान में, सुसन्तुलित चित्त से यह दोनों ध्यान किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर दिव्य सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जायेगी।

भाव साधना का तीसरा चरण है—चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का, आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसन्तुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जन्म−हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की−समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर दत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए—जीवन लाभ लेने के लिये साहसपूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।

प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक की समयचर्या निर्धारित करनी चाहिए। नित्य कर्म, विश्राम, उपार्जन से लेकर परमार्थ प्रयोजनों तक के लिए उचित रीति व समय विभाजन किया जाय। उपार्जन के और परिवार पोषण के उत्तरदायित्व अभी जिनके कन्धों पर है उन्हें भी आठ घण्टा कमाने के लिए, छः घण्टा सोने के लिए चार घण्टा नित्य नैमित्तिक कर्मों के लिए लगाकर साँसारिक प्रयोजनों के लिए अधिकतम 20 घण्टे ही खर्च करने चाहिए। शेष 4 जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने चाहिए।

हर क्रिया के साथ एक विचारणा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। क्या कार्य, किस लाभ या प्रयोजन के लिए किया जा रहा है, उसमें रुचि या उत्साह किस लिए है, इसका कुछ न कुछ आकर्षण होना ही चाहिए। मनोगत आकाँक्षा और शरीरगत क्रिया दोनों के सम्मिश्रण से समग्र कर्म बनता है, उसी के आधार पर संस्कार बनते हैं, पाप पुण्य का निर्धारण होता है और कर्मफल की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। भाव रहित क्रिया तो मात्र उछल कूद भर होती है। हमें अपने पर क्रिया−कलाप के साथ उच्च आदर्शों से भरी−पूरी भावना नियोजित रखनी चाहिए। पत्नी को अपने संरक्षण में रखी गई ईश्वर की पुत्री समझा जाना चाहिए और वह पिता के घर से जिस स्थिति में आई थी उसकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सुयोग्य सुविकसित, प्रसन्न, प्रफुल्लित बनाने का प्रयास निरन्तर करते रहने की बात सोचनी चाहिए।

बालकों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरभित पुष्प माना जाय और उन्हें माली की तरह सींचा, सम्भाला जाय। अपनी सम्पदा, बुढ़ापे की लकड़ी, वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र उन्हें माना समझा जायगा तो वे ही बालक बन्धन रूप सिद्ध होंगे और लोक−परलोक में विविध विधि दुर्गति का कारण बनेंगे। दृष्टिकोण का अन्तर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण, परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेगा। जब कि परिष्कृत चिन्तन शैली से की गई परिवार सेवा−गृहस्थयोग साधना बन जाती है। माता−पिता, भाई−बहन आदि का भरा−पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिये उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगन वाला अधिकाँश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है। ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।

तात्पर्य यह है कि दिन भर की समस्त कार्य पद्धति के साथ उच्चकोटि की भावनाएँ नियोजित रखी जायें। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट करली जाय जिसमें दिनभर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रखी जाने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहे। यह कागज मेज पर या जेब में रखा रहे। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घण्टे करते रहा जाय। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिल रही है कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घण्टे करते रहा जाय। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिली कितनी असफलता। सफलता के लिये प्रसन्न हुआ जाय और जो भूलें हुई हों उन्हें दूसरे जन्म में—दूसरे दिन सुधारने के लिए अधिक सतर्कता जागृत की जाय।

रात्रि को सोने के लिये जब बिस्तर पर जाया जाय तब संन्यास जैसी भावनाओं को हृदयंगम किया जाय। जो कुछ कर्त्तव्य थे वे ईश्वर के सौंपे हुए थे, ईमानदारी से पूरे किये गये। जो शेष हैं उन्हें ईश्वर पूरा करेगा। कुटुम्ब, परिवार, धन, वैभव आदि सब भगवान का था उसकी धरोहर उसे सौंपकर निश्चिन्तता पूर्वक निर्लिप्त मन से अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा मृत्यु की गोद में शयन किया जा रहा है। अन्तिम मृत्यु के लिये यह श्रेष्ठतम साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शान्ति और सद्गति ही मिलेगी।

चिन्तन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कस देना है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुंजाइश न रहे। ढीली–पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियां सवार होती है यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को सेंध लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो चिन्तनशील उसके लिये विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने और अड़ने के लिये तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिये व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।

यह गायत्री की उच्चस्तरीय भाव साधना है। इसके लिए भजन, मनन और चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए तथा उपासनात्मक कर्मकाण्ड के साथ−साथ इस भाव साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।


यज्ञों के भेद−उपभेद और शाखा−प्रशाखाएँ

प्रयोजन एवं विधान भेद से एक ही यज्ञ तत्व के अनेक भेद उपभेद हो जाते हैं। अनेकों शाखा प्रशाखाएँ फूटती हैं। तद्नुसार उनके प्रयोग परिचय जानने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नामकरण भी पृथक−पृथक किये गये हैं। इतने पर भी उन सबको एक−दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझा जा सकता है। शरीर के विभिन्न अवयवों की बनावट तथा कार्य क्षमता पृथक−पृथक हैं। इतने पर भी वे सब किसी एक सूत्र शृंखला में पिरोये हुए हैं और सभी का समन्वय एक समग्र शरीर बनता है। यह बात भिन्न−भिन्न नामों से जाने गये यज्ञों की मूलभूत एकात्मता बनी ही रहती है। भले ही उनकी प्रयोग प्रक्रिया पृथक−पृथक ही क्यों न दृष्टिगोचर होती हो।

सूत्र ग्रन्थ में यज्ञ के कितने ही भेद उपभेद बताये गये हैं और उनके विधान तथा प्रयोजनों का उल्लेख किया गया है। इस विभाजन को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। एक श्रौत यज्ञ दूसरे “स्मार्त यज्ञ” इस वर्गीकरण में ‘गोपथ ब्राह्मण’ गौतम धर्म सूत्र और कात्यायन श्रौत सूत्र के आधार पर किये गये विभाजनों को अधिक मान्यता मिली है। यों अन्य ऋषियों एवं शास्त्रकारों ने भी अपने−अपने मतानुसार कई अन्य प्रकार से भी वर्गीकरण किये हैं।

गोपथ ब्राह्मण के असार श्रौत यज्ञों के में अनन्याधेय अग्निहोत्र—दर्श—गौणमास—चातुर्मास्य नव सस्येष्टि और पशु बन्ध को हविर्यज्ञ माना है। उसमें अग्निष्टोम—अत्यग्निष्टोम—उक्थ्य—षोडशी−वाजपेय−अतिरात्र, और आप्तोर्याम का प्रावधान है।

गोपय ब्राह्मण के दूसरे विभाजन को ‘स्मार्त यज्ञ’ कहा गया है। इनका एक नाम पाक यज्ञ—चरुयज्ञ भी है। इस विभाग में जिनका विधान है वे यह है—प्रातः होम—सायंहोम—स्थाली पाक—बलि वैश्य, पितृयशअष्टका।

गौतम धर्म सूत्र में भी आधारभूत विभाजन तो श्रौत यज्ञ और स्मार्त यज्ञ दो रेखाओं के अंतर्गत ही हुआ है, पर उनके नामों में तथा विभाजनों में यत्किंचित् अन्तर है। वे भी श्रौत यज्ञों के दो भेद करते हैं हविर्यज्ञ और सोम यज्ञ। स्मार्त यज्ञ तो उनने भी एक ही वर्ग में रखे हैं। इस प्रकार उनका विभाजन भी गोपथ की तरह ही तीन विभागों में ही बँट जाता है। उनका विभाजन इस प्रकार है−

(1) हविर्यज्ञ−अग्नि होत्र, दर्श पूर्णमास आग्रयण−चातुर्मास्यय−निरुद−सौत्रामणि−पिण्ड पितृ।

(2) सोमयज्ञ−अग्निष्टोम−अति अग्निष्टोम−उक्थ्य−षोडशी−वाजपेय−अतिरात्र− आप्तोर्याम।

(3) स्मार्तयज्ञ−औपासन−वैश्यदेव−पार्षण−अष्टका− श्राद्ध− श्रवणा−शूल गव।

कात्यायन श्रौतसूत्र में निर्दिष्ट याग−अग्न्याधान अग्निहोत्र, दर्शपीर्णभास दाक्षायण यज्ञ, आग्रयणेष्टि, दर्विहोम (क्रैडिनीयेृष्टि, आदित्येष्टि, मित्रविन्देष्टि), चातुर्मास्य, निरुद पशुबन्ध, सोमयाग, एकाह, द्वादशाह सत्र (द्वादशाह), पुरुषमेध, अभिचारबाग, अहीन−अतिरात्र, सत्र (द्वादशाह से सहस्रसंवत्सरपर्यन्त) और प्रवर्ग्य।

कुछ अन्य स्मार्त्त यज्ञ इस प्रकार हैं—

ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्य यज्ञ। यज्ञों का एक अन्य वर्गीकरण इस प्रकार भी है। सात्विक−राजसिक तामसिक−नित्य−नैमित्तिक और काम्प।

अन्यान्य पौराणिक याग—विष्णुयाग, रुद्रयाग, सूर्ययाग, गणेशयाग लक्ष्मीयाग, मृत्युँजयाग, शतचण्डी, सहस्रचण्डी, लक्षचण्डीयाग, महाशान्तियाग भागवत सप्ताह यज्ञ इत्यादि।

आत्म−कल्याण और लोक−कल्याण की दृष्टि से किये गये समस्त श्रेष्ठ कार्य यज्ञ की कोटि में आते हैं। इनमें कुछ तात्विक भेद भी होता है। कुछ कर्म पूर्णतया स्थूल पदार्थों से सम्बद्ध होते हैं। कुछ भावनात्मक स्तर पर होते हैं और कुछ आत्मिक स्तर पर होते हैं। इन विभिन्न स्तरों पर सम्पन्न होने वाले कार्य विभिन्न यज्ञों के नाम से जाने जाते हैं—

(1) द्रव्यात्मक यज्ञ (हविष्य होम)

(2) भावनात्मक यज्ञ (ध्यान धारणा)

(3) केवलात्मक यज्ञ (समर्पण, एकात्म, विलय)

जिस यज्ञ का सम्बन्ध स्थूल पदार्थों से होता है, उन्हें द्रव्यात्मक यज्ञ या पदार्थात्मक यज्ञ कहा जाता है। व्यक्ति जिन भौतिक आकर्षणों में फँसा है, उसे जब वह भगवदर्पण करता है, तो यह यज्ञ सम्पन्न हुआ माना जाता है। द्रव्य और पदार्थ का तात्पर्य ही होता है चित्त को द्रवीभूत आकर्षित करने वाला और भगवान (पद) का प्रकाश या विग्रह (अर्थ) सभी पदार्थ भगवान की विभूति ही तो है। इन पदार्थों को स्वार्थ से हटाकर परमार्थ में नियोजित करना−भगवान तक समष्टि तक पहुँचाना पदार्थ यज्ञ है।

भावनात्मक यज्ञ में स्थूल हविष्यों का प्रयोग नहीं होता है। इसमें अपने अन्तःकरण को समस्त कामना−वासना−आसक्ति −स्वार्थ−सुख− स्पृह्य —अहंकार−प्रतिष्ठा का मोह इत्यादि से खाली करना होता है, दूसरे शब्दों में यों कहा जा सकता है कि इन दुर्भावनाओं की आहुति प्रदान करके, हृदय को निर्मल स्वच्छ एवं द्वन्द्वातीत अवस्था में पहुँचा दिया जाता है। इस स्थिति में चित्त को भगवान भाव से पूर्णकर सर्वत्र भगवद्−दर्शन−भगत सेवा के लिए तैयार किया जाता है।

सभी प्राणियों एवं पदार्थों में ईश्वर की−देवता की− अनुभूति करना भावनात्मक यज्ञ कहा जाता है। जब यह स्थिति पराकाष्ठा पर पहुँचती है और प्राणिभेद −पदार्थ भेद का अन्तर ही मिट जाता है, एकमात्र ब्रह्म ही सर्वत्र विद्यमान है ऐसा अनुभव होने लगता है, तब इसे केवलात्मक यज्ञ की संज्ञा प्रदान की जाती है।

‘सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ की अनुभूति केवलात्मक यज्ञ की ही परिणति कही जा सकती है। इसी को ‘एकमेवाद्वितीयं’ मन्त्र द्वारा भी स्पष्ट किया गया है।

योगों का एक विभाजन कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग के रूप में है। इस संदर्भ में तीन यज्ञों का भी उल्लेख है—कर्म यज्ञ, ज्ञानयज्ञ, देव यज्ञ।

सिद्धान्तों को योग और प्रयोगों का यज्ञ कहा गया है। निर्धारण और विधि−व्यवस्था के मिलने से ही एक पूरी बात बनती है। इस प्रकार योग और यज्ञ भी परस्पर पूरक बन जाते हैं।

निघण्टु 3.।17 में यज्ञ के विविध 15 नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं—यज्ञ, बेन, अध्वर, मेध, विदध, नार्थ, सवन, होत्र, इष्टि, देवताता, मख, विष्णु, इंद्र, प्रजापति और धर्म।

जिस प्रकार एक ही चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत रोगियों की स्थिति एवं आवश्यकता को देखते हुए कई प्रकार के उपचार निर्धारण किये जाते हैं उसी प्रकार विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यज्ञ विज्ञान के विभिन्न निर्धारण प्रयुक्त होते हैं। अस्पताल एक ही होता है। प्रवेश करने वाले भी सभी रोगी कहलाते हैं। किन्तु उन सब की चिकित्सा प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती। रोगियों की स्थिति और आवश्यकता को देखते हुए उपचार की अनेक शाखाओं का प्रयोग किया जाता है। पीने की खाने की, लगाने की दवाओं का स्वरूप और विधान अलग−अलग होता है। इन्जेक्शन, आपरेशन, मेकएनीमा, कथेडर आदि उपचारों की प्रक्रियाएँ भी एक−दूसरे से भिन्न होती है। कारखाना एक ही होने पर भी उसमें कितने ही प्रकार के काम होते रहते हैं। उनकी हलचलें एक−दूसरे से भिन्न होती हैं इतने पर भी सभी का सम्मिलित उद्देश्य एक ही रहता है। अस्पताल रोग−मुक्ति का—कारखाने उत्पादन का—लक्ष्य लेकर चलते हैं। अभीष्ट प्रयोजन का पूर्ति के लिए आवश्यकतानुसार व्यवस्था बनाने और बदलते रहते हैं। यही बात विभिन्न यज्ञ निर्धारणों में भी व्यक्ति और समाज और वातावरण की स्थिति सुधारने के लिए विभिन्न नाम रूप वाले यज्ञों को निर्धारण करने वाले अन्तर के सम्बन्ध में भी समझा जाना चाहिए। नाम रूप पृथक होते हुए भी वे सभी मिलकर सर्वतोमुखी उत्कर्ष की विधि−व्यवस्था बनाते हैं।


अपनों से अपनी बात - आत्म शक्ति के संवर्धन प्रयास में योगदान अपेक्षित

सम्पदा, बुद्धिमत्ता, बलिष्ठता, प्रतिष्ठा, कला कुशलता जैसी भौतिक उपलब्धियों का शारीरिक सुविधा संवर्धन में कितना योगदान है इसे सभी जानते हैं। उस उपार्जन के लिए सभी अपनी सूझ−बूझ और सामर्थ्य के अनुरूप प्रयत्न भी करते हैं। इस संदर्भ में एक बात और भी जानने योग्य है कि आत्मिक प्रखरता का मूल्य इन सबसे अधिक है। चेतना का स्तर ऊँचा उठने पर जो प्राप्त किया जाता है उस विभूति वैभव को अद्भुत ही समझा जाना चाहिए। व्यक्तित्व की गरिमा को जिन्हें हस्तगत होती है वे आत्मबल के धनी वह सब कुछ प्राप्त करते हैं जो इस संसार से न इस जीवन में पाने योग्य है।

आत्मिक प्रगति की महत्ता तो कितने ही लोग जानते हैं, उनके साथ जुड़ी हुई ऋद्धि−सिद्धियों की विभूतियों के प्रमाण उदाहरण भी देखे सुने होते हैं किन्तु अपने समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य एक ही है कि इस दिशा में सुनिश्चित गति से बढ़ा सकने वाला मार्गदर्शन एवं सहयोग उपलब्ध होता नहीं। भ्रान्तियों में भटकाने वाली, सस्ते में बहुत लाभ का लाटरी जैसा प्रलोभन देने वाली तथाकथित अध्यात्म की दुकानें तो हर गली−कूचे में लगी रहती है, पर उनमें से कदाचित् ही कोई यह सिद्ध करती हो कि अध्यात्म के तीन लाभ—आत्म−सन्तोष, लोक−सम्मान और दैवी वरदान की कसौटियों पर भी खरा सिद्ध होने वाली महानता उनके द्वारा किनने कहाँ कब उपलब्ध की या कराई। भ्रान्तियों और विडम्बनाओं में उलझने वाले अन्ततः खिन्न, निराश होते और संजोई हुई आस्था तक गँवा बैठते हैं।

युग सन्धि के प्रभात पर्व पर आत्म शक्ति की ही सबसे बड़ी आवश्यकता पड़ेगी। इसी से वरिष्ठ प्रतिभाएँ उभरेंगी और उनके माध्यम से युग अवतरण का महान प्रयोजन पूरा होगा। यह क्षमता आत्म−शक्ति में ही है कि वे आत्म−कल्याण और लोक−कल्याण का दुहरा प्रयोजन पूरा करा सके। जागृत आत्माओं के लिए सबसे बड़ी सामयिक आवश्यकता एक ही है कि अपने में अपेक्षाकृत अधिक आत्मबल सम्पन्न करें। उस विभूति के सहारे स्वयं ऊँचे उठे, प्रखर बने और समूचे वातावरण का नव जीवन को युग चेतना से अनुप्राणित करें।

यह सब कैसे हो? इसका उत्तर अखण्ड−ज्योति के गत अक्टूबर−नवंबर अंक के पृष्ठों पर मिल सकता है। उसमें अध्यात्म विभूतियों के सम्पादन का राजमार्ग यों क्रमिक गति से आरम्भ से ही प्रस्तुत किया जाता रहा है पर अब उसकी आवश्यकता एक प्रकार से अनिवार्य हो गई है और अपना समाधान तत्काल माँगती है। अस्तु अखण्ड−ज्योति ने तद्नुरूप अपनी प्रशिक्षण व्यवस्था में अधिक प्रखरता का समावेश किया है। अध्यात्म विज्ञान के सारगर्भित पक्षों को इस प्रकार प्रस्तुत करना आरम्भ किया है जिसके सहारे उसे गले उतारना और व्यवहार में समाविष्ट कर सकना अपेक्षाकृत अधिक सुविधा और अधिक सरलतापूर्वक सम्भव हो सके। राजमार्ग पर चलते हुए देर लगती है, पर कभी−कभी ऐसी पगडण्डियाँ भी हाथ लग जाती हैं जो समय श्रम में असाधारण बचत करके अधिक ऊँचाई तक पहुँचाने का सुयोग प्रदान कर सके। इन दिनों ऐसे आधार उपलब्ध करना और अवलम्बन अपनाना आवश्यक हो गया है।

अध्यात्म विज्ञान प्रधानतया ‘श्रद्धा’ शक्ति पर आधारित है। इन दिनों बढ़ती तार्किकता एवं प्रत्यक्षवादिता ने श्रद्धा की जड़ें हिलायी हैं। दूसरे इस क्षेत्र में इन दिनों विडम्बना और प्रवंचना ने जिस बुरी तरह अड्डा जमाया है उसे देखते हुए सर्वत्र अविश्वास का वातावरण बना है। दोनों ही कारणों से प्रधानता श्रद्धा पर आधारित अध्यात्म एक प्रकार से अविश्वस्त एवं उपेक्षित स्थिति में जा गिरा है। एक ओर आत्मशक्ति की महती आवश्यकता दूसरी ओर उसे उपलब्ध कराने वाले मार्ग पर घनघोर तमिस्रा। इन कारणों से एक प्रकार का अवरोध ही अड़ गया है। न सामयिक आवश्यकता की उपेक्षा की जा सकती है और न भ्रान्तियों, विकृतियों से भरे पूरे प्रचलन का अन्धानुकरण करने की सलाह प्रेरणा ही किसी को दी जा सकती है। असमंजस इतना जटिल और वास्तविक है जिसका समाधान न सूझ पड़ता है और न उससे विमुख होने को मन करता है।

इन परिस्थितियों में अखण्ड−ज्योति ने अपना विशिष्ट उत्तरदायित्व नये सिरे से युग धर्म के अनुरूप अपनाया है और निश्चय किया है कि अध्यात्म तत्व ज्ञान और साधना विधान का इस प्रकार नये सिरे से प्रस्तुतीकरण किया जाय जो तर्क, तथ्य और प्रमाण, की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके। साथ ही व्यवहार में उतारने की दृष्टि से भी सर्व साधारण के उपयोग में आ सकने योग्य हो। कठिन और जटिल साधनाएँ कर सकने की क्षमता जब लोगों में रही नहीं। उत्कृष्टता की दिशा में अनवरत अग्रसर करने वाला साहस, संकल्प बल एवं पराक्रम भी घटते−घटते बहुत दयनीय स्थिति में जा पहुँचा है। ऐसी दशा में पुरातन काल में जिन साधनाओं तपश्चर्याओं को अपनाने वाले कौतुक जैसा सरल सुगम माना जाता था वही अब पर्वत जैसा भारी प्रतीत होता है। यह एक नया संकट है जिसके कारण इन दिनों पुरातन काल को कठिन निर्धारणों को अपनाने के लिए सर्व साधारण को उत्साहित सहमत करना कठिन हो चला है।

इन जटिलताओं के बीच युग धर्म का निर्वाह करते हुए सर्वसाधारण को विशेषतया जागृत आत्माओं को—आत्मबल से सुसम्पन्न बनाने वाला पथ प्रशस्त करना ही होगा। यह कैसे हो? इसका निर्धारण गहरे विचार मन्थन के उपरान्त अब एक प्रकार से निश्चित कर ही लिया गया है। उसे प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख इन्हीं दिनों प्रस्तुत किया जाना है।

अखण्ड−ज्योति के अगले अंकों की एक प्रकार से उच्चस्तरीय अध्यात्म विज्ञान का व्यावहारिक शिक्षा पाठ्यक्रम समझा जाना चाहिए। उस आधार पर घर बैठे भी बहुत कुछ समझा सीखा किया और पाया जा सकता है। जो इस संदर्भ में शान्ति−कुँज हरिद्वार की कल्प साधना सत्र शृंखला में सम्मिलित हो सकें वे और भी अधिक लाभान्वित होंगे।

अखण्ड−ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से निवेदन है वे इस आत्म−शक्ति संवर्धन प्रयासों को सफल बनाने में हाथ बढ़ाये और प्रत्यक्ष योगदान दें। यह योगदान अखण्ड−ज्योति के नये पाठक बढ़ाने के रूप में हो सकता है। जो अगले वर्ष के अंक पढेंगे वे एक प्रकार से पत्राचार विद्यालय के माध्यम से आत्मोत्कर्ष प्रयास में संलग्न होने वाले छात्रों जैसा लाभ घर बैठे प्राप्त कर सकेंगे।

अनेकों उच्चस्तरीय कारण, उद्देश्य और आधार ऐसे हैं जिन्हें उपलब्ध करने के लिए अगले वर्ष की अखण्ड−ज्योति सदस्यता हर किसी के लिए अतीव लाभदायक सिद्ध होगी। इसलिए वर्तमान पाठकों से आग्रहपूर्वक यह अनुरोध किया गया है कि वे अपने संपर्क क्षेत्र में जिन पर भी प्रभाव अधिकार समझें उनमें कम से कम तीन को पत्रिका के सदस्य बनाने का प्रयत्न करें। इसी प्रयोजन के लिए रसीद पत्रक इसी अंक में लगाये गये हैं। जिनसे चन्दा प्राप्त हो उन्हें विश्वास दिलाने के लिए यह रसीदें दी जा सकती है। चन्दा कार्यालय में पहुँचते ही सन् 83 की पत्रिकाएँ आरम्भ हो जायेंगी।


अध्यात्म साधना और शिक्षा के महत्वपूर्ण सत्र

गत दो अंकों में युग मनीषा के रूप में अध्यात्म तत्व दर्शन की और कल्प तपश्चर्या के रूप में युग साधना की एक झाँकी प्रस्तुत की जा चुकी है। उसे एक प्रकार से व्यावहारिक मार्गदर्शन ही समझा जाना चाहिए। अभीष्ट जानकारी से अवगत होने के उपरान्त उस मार्ग पर घर रहते हुए भी चला जा सकता है। जिन्हें अधिक समझना और गम्भीरतापूर्वक समझना हो उनके लिए एक−एक मास के कल्प साधना सत्र में सम्मिलित होने के लिए शान्ति कुँज हरिद्वार का सहयोग लिया जा सकता है।

जिन्हें बहुत व्यस्तता है—जो एक महीने का समय नहीं निकाल सकेंगे उनके लिए एक महीने की कल्प साधना का एक दस दिवसीय छोटा संस्करण भी आरम्भ किया गया है। उनमें एक महीने की कल्प साधना के सभी आवश्यक सिद्धान्तों और प्रयोगों का समावेश करने का प्रयत्न किया गया है।

नये निर्धारण की इस शृंखला में एक संशोधन परिवर्धन यह भी किया गया है कि एक मास की कल्पसाधना के दो विभाग कर दिये गये हैं एक साधना प्रधान दूसरा शिक्षा प्रधान। शिक्षा प्रधान में कल्प साधना की उपासनाएँ कुछ कम कर दी जायेंगी और बदले में उन्हें (1) भाषण सम्भाषण (2) संगीत अभ्यास (3) आसन प्राणायाम एवं जड़ी−बूटी विज्ञान के स्वास्थ्य सम्वर्धन की तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिलेगा साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।

यह संशय किसी को भी नहीं करना चाहिए कि शीत ऋतु में हरिद्वार जाना ठीक न रहेगा। तापमान सर्वत्र बढ़ा है, अस्तु हरिद्वार का मौसम भी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक गरम हो गया है। कनाडा जैसे देशों के कई क्षेत्रों में पूरे वर्ष बर्फ पड़ती है फिर भी वहाँ लोग निरन्तर महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न रहते हैं। हरिद्वार की ठंड तो उसके आगे कुछ भी नहीं। फिर उच्चस्तरीय साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है। जितना अच्छी तरह ध्यान लगने से लेकर साधना प्रयासों में सुविधा रहने की बात शीत ऋतु में रहती है उतना और कहीं नहीं। यही कारण है कि तपस्वी सदा शीत प्रधान हिमालय में अपना डेरा डालते और अन्यत्र की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ प्राप्त करते हैं इन तथ्यों पर विचार करते हुए हरिद्वार में कल्पसाधना के लिए आने में शीत ऋतु का समय असुविधाजनक नहीं, सुविधा प्रधान ही सिद्ध होगा।

संक्षेप में शान्ति कुँज की सत्र व्यवस्था में एक−एक महीने के कल्प साधना सत्र ही प्रमुख है। उन्हीं को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है एक साधना प्रधान दूसरे शिक्षा प्रधान। दस दिवसीय सत्र में साधना का ही संक्षेप है। उतनी कम अवधि में भाषण—संगीत चिकित्सा उपचार का समावेश सम्भव नहीं। जिन्हें उपरोक्त सत्रों में से जिनमें आना हो वे (1) सत्र का नाम तथा तारीखें (2) अपना पूरा नाम पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म−जाति (6) शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के सही होने सम्बन्धी स्पष्ट जानकारी (7) यहाँ का अनुशासन पूर्णरूपेण पालन करने के आश्वासन समेत आवेदन−पत्र भेजना चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए। मास वाले सत्र हर महीने, पहली से तीस तारीख तक चला करेंगे और दस दिवसीय 1 से 10, 11 से 20, 21 से 30 को चला करेंगे। जिसमें प्रवेश पाना हो उसके लिए आवेदन−पत्र भेजते समय साथ में यह भी लिख देना चाहिए कि यदि इच्छित सत्र में स्थान भर गया हो तो अन्य किसी सत्र में स्थान दिया जाय।


पू. गुरुदेव प्रणीत अध्यात्मविद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

गायत्री−विद्या के अमूल्य ग्रन्थरत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्ति गत उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1−गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (तीनों भाग) 22.5 (2)गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग) 3.00 (3)सामूहिक गायत्री यज्ञ विधान (द्वितीय भाग) 3.00 (4)गायत्री चित्रावली 4.00 (5)गायत्री मन्त्रार्थ 3.50 (6)गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य।

(अ)छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट−आकर्षक कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मू. 12.00 ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार है।

1. गायत्री का स्वरूप और रहस्य। 2. गायत्री की गुप्त शक्ति। 3. सर्वसुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9.गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13.स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध। (ब) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि मू.60 पैसे। (स) दैनिक गायत्री साधना मू. 60 पैसे (द)गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।

अध्यात्म का वैज्ञानिक प्रतिपादन साहित्य

प्रस्तुत बुद्धिवादी युग में तर्क, तथ्य, प्रत्यक्ष, प्रमाण एवं विज्ञान को प्रामाणिकता मिली है और शास्त्र, श्रद्धा एवं आप्त वचनों को अमान्य किया गया है। इस मनःस्थिति में पनपने वाले नास्तिकवाद एवं स्वेच्छाचार को निरस्त करने के लिए युगदृष्टा गुरुदेव की लेखनी से अभिनव युग साहित्य सृजा गया है। प्रत्येक पुस्तक विचारशील वर्ग के लिए अत्यन्त प्रेरणाप्रद है।

(1) विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व, (2) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है? (3) दृश्य जगत के माध्यम संचालन सूत्र, (4) चेतना की प्रचण्ड−क्षमता एक दर्शन, (5) असीम पर निर्भर ससीम जीवन, (6) मनुष्य चलता−फिरता पेड़ नहीं है, (7) पाँच प्राण−पाँच देव, (8) दिव्यशक्तियों का उद्भव प्राण शक्ति से, (9) मानवीय क्षमता−असीम अप्रत्याशित, (10) अणु भ विणु−सागर में सागर, (11) आत्मा न नर है, न नारी, (2) मानवीय मस्तिष्क विलक्षण कम्प्यूटर (13) अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि, (14) जड़ के भीतर विवेकवान चेतना, (15) शरीर की अद्भुत क्षमताएं और विलक्षणताएं, (16) मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, (17) क्या धर्म अफीम की गोली है? (18) धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक, (19) विज्ञान को शैतान बनने से रोकें, (20) पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य, (21) स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया, (22) तात्विक दृष्टि से बन्धन मुक्ति, (23) मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ, (24) भूत कैसे होते हैं? क्या करते हैं? (25) पितरों को श्रद्धा दें—वे शक्ति देंगे, (26) सपने झूठे भी सच्चे भी, (27) शब्द ब्रह्म−नाद ब्रह्म, (28) आध्यात्मिक बाम विज्ञान,(29) जीव−जन्तु बोलते भी हैं सोचते भी हैं (30) संसार चक्र की गति प्रगति, (31) अमान्य एवं विलक्षण किन्तु सम्भव और सुलभ, (32) मनुष्य गिरा हुआ देवत या उठा हुआ पशु, (33) दृश्य−जगत की अदृश्य पहेलियाँ, (34) हम सब एक दूसरे पर निर्भर, (35) चेतना का हज स्वभाव−स्नेह, सहयोग (36) सहृदयता आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य, (37) बच्चे बढ़ाकर अपने पैरों कुल्हाड़ी न मारें, (38) युग शक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण, (39) ब्रह्मवर्चस् की ध्यान−धारणा, (40) कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि, (41) सर्वोपयोगी गायत्री साधना, (42) गायत्री के पाँच सुख पाँच दिव्य कोश।

प्रत्येक की छपाई−सफाई सुन्दर! कवर आकर्षक। पृष्ठ संख्या 112, मूल्य तीन रुपया। डाक व्यय अलग। पूरे सेट का मूल्य 110) डाक व्यय मुफ्त।


अपना दीप जलाओ


अपना दीप जलाओ (kavita)

अपना दीप जलाओ साथी, करो ज्योति अगवानी। साथी करो ज्योति अगवानी॥

अन्धकार के पाँवह न पूजो, अपनी ज्योति उतारो, श्री प्रकाश के पुँज, जागकर अपनी ओर निहारो।

तुम जागे हो नहीं, इसी से, छाया छद्म अँधेरा, जब प्रकटेगा सूर्य तुम्हारा, होगा नया सवेरा।

तुम सविता के पुत्र तेज की तुमको मिली जवानी। साथी करो ज्योति अगवानी॥

सूर्य सुतों की क्षीण तपस्या, तभी रात ने घेरा, बना अरुणोदय के घर में, है क्या चीज अँधेरा?

काला कौन पहनकर निकला, क्या आलोक निराला, तुम से समझौता कर बैठा क्या सुर−लोक−उजाला?

है अचरज की बात, प्रातः से रात करे मनमानी। भावी करो ज्योति अगवानी॥

सूरज की जिम्मेदारी है हँसता और रचाये, किरणों डडडड दर्शन है, कण−कण को महकाये।

सूरज को भगवन बनाती हँसता मिल ऊषायें, फूल−फूल मुस्कान बिखेरे आती मिले दिशायें।

प्राण बरसती पवन उतार भूपर सुरभि सुहानी। साथी करो ज्योति अगवानी॥

तन−मन जीवन स्वच्छ,तुम्हारा है प्रकाश का गीता, गंगा−गायत्री माता, डडडड देवी सावित्री सीता।

देव शक्ति ने सदा समय है, सुशक्ति हो जीता, शान्ति−साधना−चिरसंगिनी बना रही क्रान्ति परिणीता

कण−कण के आलोक पिलाती है जीवन्त कहानी। अपना दीप जलाओ, साथी करो ज्योति अगवानी॥

—माखन सिंह भदौरिया, सौमित्र,

*समाप्त*