प्रकृति विनिर्मित सभी वस्तुएँ मनुष्य के यथावत् उपयोग में नहीं आ पातीं। उनमें से कुछेक ही ऐसी हैं, जिन्हें प्राकृत रूप में प्रयोग किया जा सकता है। साधारणतया प्राणी-समुदाय आहार-पोषण तक ही सीमित रहते, काम चलाते और संतुष्ट रहते हैं। यही बात चेतना के संबंध में भी है। सभी प्राणी अपनी इंद्रिय क्षमता और अंतःप्रेरणा के सहारे सामान्य निर्वाह की आवश्यकता तथा सुरक्षा की कठिनाइयों का सामना कर लेते हैं। इससे अधिक की उन्हें आवश्यकता भी तो नही पड़ती। जिस स्तर का जीवन उन्हें जीना है, उसके लिए अतिरिक्त प्रयोजन अभीष्ट न होने से सृष्टा ने अधिक कुछ देने की आवश्यकता भी नहीं समझी और अतिरिक्त भार का झंझट लादा भी नहीं।
मनुष्य को इस समुदाय में नहीं गिना जाता। उसे सृष्टा ने इस जगती का मुकुटमणि बनाकर भेजा है। उसके लिए पेट भरने एवं आक्रमणों से जान बचाने की पशु स्तर की सुविधाएँ पर्याप्त नहीं समझी गईं; इससे अधिक भी उसे कुछ चाहिए। शरीर भी उतने से संतुष्ट नहीं होता, जितने से कि अन्य प्राणियों का काम चल जाता है। मन की आकांक्षाएँ भी बढ़ी−चढ़ी हैं। साथ ही अंतःकरण उच्चस्तरीय रीति−नीति अपनाने के लिए अन्यान्य समर्थताओं की भी माँग करता है। यह साधन न मिले तो फिर वनमानुष स्तर का निर्वाह करने से आगे की कुछ बात नहीं बनती है।
मानवी संरचना बड़ी विचित्र है। उसकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों की आवश्यकताएँ इतनी अधिक हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए मात्र इंद्रिय, चेतना एवं मूल प्रवृत्तियों के आधार पर गतिशील अंतःप्रेरणाओं के सहारे उस तरह काम नहीं चल सकता, जिस तरह कि अन्य प्राणियों का चल जाता है। आवश्यकताओं के असंख्य क्षेत्र बढ़ जाने के कारण मनुष्य को अगणित पदार्थों का रूपांतरण करने, उन्हें अपने उपयोग में आ सकने योग्य बनाना पड़ा है। इसी प्रयास−प्रक्रिया का नाम भौतिकी है। इस विज्ञान का आश्रय लिए बिना मनुष्य को आदिमयुग से आगे बढ़ सकने का अवसर ही नहीं मिल सकता था। वर्तमान विकासयुग का पूरा-पूरा श्रेय इसीलिए भौतिकी को दिया जा सकता है।
उदाहरण के लिए कपास से वस्त्र, कच्चे अन्न से सुपाच्य भोजन, रात्रि में प्रकाश, भूमि से उत्पादन, पशुपालन, नौकायन, चिकित्सा, परिवहन, शिक्षा जैसे कार्यों में जिन वस्तुओं का उपयोग होता है, वे प्राकृत रूप में उपलब्ध नहीं होते, उन्हें पदार्थ के मौलिक स्वरूप को बदलकर काम में आने योग्य बनाना पड़ता है। औजार जमीन में से नहीं निकलते। प्रकृतितः तो भूमि में से मिट्टी मिला लोहा निकलता है, उससे कोई भी वस्तु नहीं बन सकती। अनेकों अग्नि संस्कार करने के उपरांत ही कच्चा लोहा शुद्ध होता है और उससे उपयोग योग्य अनेकों वस्तुएँ बनती हैं। पानी की आवश्यकता वर्षा के द्वारा बनने वाले नालों–जोहड़ों से पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए कुआँ खोदने, पंप, चरस आदि का प्रबंध करना पड़ता है। यह ‘भौतिकी’ है।
इससे आगे उन अनेकानेक आविष्कारों, यंत्र–कारखानों का सिलसिला शुरू होता है, जिसके माध्यम से प्राकृत पदार्थों को उलट−पुलटकर अनेकों वस्तुएँ बनती हैं। यह निर्वाह की प्रक्रिया हुई। इसके आगे अस्त्र−शस्त्र, कला−कौशल, सुविधा−संवर्धन, परिवहन−संचार, विनोद−उपचार आदि के अनेकों ऐसे साधनों का क्षेत्र प्रारंभ होता है, जो निर्वाह से आगे की आवश्यकता पूर्ण करती है। संक्षेप में भौतिकी का वह स्वरूप समझा जाना चाहिए, जो अभ्यास में आने के कारण नया जैसा— महत्त्वपूर्ण जैसा तो प्रतीत नहीं होता, पर वस्तुतः वे हैं सभ्यता और प्रगति का मेरुदंड। उनके अभाव में मनुष्य की आज क्या स्थिति हो सकती है, इसकी कल्पना मात्र से भय का संचार होता है।
ठीक यही बात आत्मिकी के संबंध में है। स्पष्ट है, जड़ से चेतन का स्तर ऊँचा है। चेतन ड्राइवर के बिना लाखों-करोड़ों की बनी रेलगाड़ी सही रीति से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती। स्वसंचालित यंत्रों का भी कोई संचालक— नियामक होता है। पदार्थसत्ता का मानवोपयोगी पक्ष पूर्णतः भौतिकी के चमत्कारों से भरा पड़ा है। आत्मिकी का उद्देश्य मानवी चेतना को इस योग्य बनाना व ऊँचा उठाना है कि पदार्थों और प्राणियों के साथ व्यवहार करने की ऐसी विधि सुझाए, जिसके कारण सुविधा एवं प्रसन्नता बढ़ती रहे। इस आलोक के अभाव में वस्तुओं के दुरुपयोग और प्राणियों से दुर्व्यवहार की अव्यवस्था फैलेगी और फलतः ऐसी परिस्थिति सामने आ खड़ी होगी, जिससे कि सुविधा−सहयोग देने वाले उल्टी हानि पहुँचाने लगें और प्राणघातक संकट खड़े करें। आत्मिकी ही है, जिसके आधार पर मनुष्य अपने चिंतन और चरित्र को परिष्कृत स्तर का— ताल-मेल बिठा सकने में सक्षम बनाता है। इसके अभाव में उसे अनगढ़, पिछड़े, असभ्य लोगों की तरह वनमानुष जैसा जीवन जीना पड़ेगा। साधन होते हुए भी सही उपयोग न बन पड़ने के कारण उलटे संकट में फँसना पड़ेगा।
अन्य प्राणियों में बुद्धि और आवश्यकता का संतुलन है, इसलिए उनकी गाड़ी पटरी पर लुढ़कती रहती है। मनुष्य ने प्रगति की है, सुविधा बढ़ाई है, तो उसे यह भी जानना होगा कि उपलब्धियों का उपयोग करते समय किस प्रकार सोचा जाए और व्यवहार में किन मर्यादाओं का ध्यान रखा जाए। इसके अभाव में बढ़े हुए साधनों का दुरुपयोग होने पर विपत्तियों और विग्रहों के टूट पड़ने का खतरा रहेगा। विक्षिप्तों, सनकियों, दुर्बुद्धि−दुराचारियों को अपने पैरों कुल्हाड़ी मारते और दूसरों के लिए संकट खड़े करते, आए दिन देखा जाता है। इसका कारण साधनों का अभाव नहीं, उनके उपार्जन, संरक्षण एवं उपयोग की प्रक्रिया में अनजान−अनभ्यस्त रहना होता है। प्रगतिशील और पिछड़े लोगों के बीच इसी विशेषता की न्यूनाधिकता होती है, जिसे सभ्यता, बुद्धिमत्ता, सज्जनता, व्यवहारकुशलता आदि नामों से पुकारते हैं। संस्कृति यही है। इसी के सहारे मनुष्य प्रगतिशील बनते, सुखी रहते और दूसरों की सहायता करके उनका स्नेह−सहयोग अर्जित करते है।
आत्मिकी की यह चर्चा व्यावहारिक जीवन में सरलता और प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह चलाने की, संतुलन बनाए रहने की प्रक्रिया हुई। इससे आगे और भी बहुत कुछ जानने योग्य है। श्रमशक्ति के चमत्कार से सभी परिचित है। शारीरिक हो या मानसिक, विद्युत आदि के माध्यम से उत्पन्न की गई श्रमशक्ति ही विविध–विध निर्माणों की व्यवस्था बनाती है। इसके बाद दूसरी शक्ति है— विचारणा। इसके अनेकों पक्ष हैं— कल्पना, तर्क, निर्धारण, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, आकांक्षा, आस्था आदि। इन्हीं मानसिक क्षमताओं के द्वारा मनुष्य अपनी विशिष्टताओं को प्रकट करता, सफलताएँ प्राप्त करता तथा श्रेय बटोरता है। विचारशक्ति बढ़ाने की आवश्यकता सभी समझते हैं और शरीर को स्वस्थ रखने के निमित्त आहार−उपचार की तरह बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण एवं अनुभव संपादन के अनेकों साधन जुटाते हैं। यह विचारणा का काम−काजी पक्ष हुआ। इसके सहारे ही समृद्धि, प्रगति एवं प्रसन्नता के आधार बनते हैं। इस प्रक्रिया को ‘सभ्यता’ कहते हैं। नागरिकता, सामाजिकता, शिष्टता, व्यवहार कुशलता से संबंध रखने वाली आवश्यक मर्यादा से अवगत एवं उन्हें ठीक तरह क्रियान्वित कर सकने वालों को सभ्य कहते हैं। यह आवश्यकता भी स्वास्थ−रक्षा की तरह नितांत उपयोगी है। इस प्रयास में यथासंभव अधिकांश लोग प्रयत्नशील भी रहते हैं।
आत्मिकी— ’अध्यात्म विद्या’ विचारणा में उत्कृष्टता का समावेश कर सकने की विशिष्ट व्यवस्था है, जिसमें निर्धारण और अभ्यास दोनों का ही समावेश है। दृष्टिकोण इसी आधार पर विनिर्मित होता है। आत्मिकी का सीधा संबंध अंतःकरण के उस मर्मस्थल से है, जिसमें श्रद्धा−विश्वासरूपी उमा–महेश का निवास है। अंतःकरण-चतुष्ट्य की व्याख्या मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में की जाती है। मनोविज्ञान की भाषा में इन्हीं को आकांक्षा, आस्था, आदतें कहते और व्यक्तित्व का मूलभूत आधार मानते हैं। यह क्षेत्र जिसका जिस स्तर का होता है, उनका व्यक्तित्व उसी ढाँचे में ढलता चला जाता है। घड़ी की चाबी ही उस मशीन के समस्त कलपुर्जों को चलाती हैं। उसी प्रकार मनुष्य के अंतराल से उठने वाली उमंगें ही मस्तिष्क को तदनुसार सोचने के लिए, शरीर को अभीष्ट साधन जुटाने के लिए विवश करती हैं। मस्तिष्क सोचने के लिए स्वतंत्र नहीं है और न अपनी मर्जी से कुछ करता है। इन दोनों को स्वामीभक्त नौकर की तरह अंतःकरण से उठने वाली आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विवश होकर कार्यरत होना पड़ता है।
मानवी सत्ता का मर्मस्थल— केंद्रबिंदु, उसका अंतःकरण ही माना गया है। वह जिस भी भले−बुरे रूप में ढल जाता है, प्रत्यक्ष जीवन का स्वरूप और प्रवाह तदनुसार बनता चला जाता है। व्यक्तित्वों की उत्कृष्टता—निकृष्टता के रूप में जो कुछ भी घटित होता दीखता है; वस्तुतः उसे अंतःकरण का स्तर ही समझा जाना चाहिए। एक शब्द में अंतःकरण का आधारभूत उद्गम इसी रहस्यमय केंद्र को समझा जाना चाहिए। दृष्टिकोण यहीं विनिर्मित होता है। नीति−निर्धारण एवं निर्देशन यहीं से होता है। बाकी शारीरिक और मानसिक ढाँचा तो गाड़ी के दो पहियों की तरह वजन ढोने में लगा रहता है। दिशा−निर्धारण करने एवं गति देने की सारी व्यवस्था जिस ड्राइवर को करनी होती है, उसे अंतःकरण ही समझा जाना चाहिए। प्रगति, अवगति और दुर्गति की चित्र−विचित्र प्रतिक्रिया है। वह कठपुतली की तरह नाचती तो है; पर उनके धागे अंतःकरण का बाजीगर अपनी उँगली से बाँधे हुए पर्दे के पीछे छिपा बैठा रहता है। मनुष्य का विश्लेषण–परीक्षण, गुण−कर्म−स्वभाव के आधार पर होता है; पर वस्तुतः यह तीनों भी स्वनिर्मित नहीं होते, वरन् अंतःकरण के प्रजापति द्वारा बनाए गए चित्र−विचित्र आकृति के खिलौने भर होते हैं।
भौंड़ी अक्ल से किसी के ठाट−बाट, चातुर्य, उपार्जन या पदवैभव को देखकर गरिमा का मूल्यांकन किया जाता है; पर इस अवास्तविक निर्धारण की पोल तब खुलती है, जब परिस्थितियाँ तनिक भी प्रतिकूल पड़ने पर उथले आधार पर खड़ा हुआ बड़प्पन झाग बैठने, गुब्बारा फूटने और बबूले के अदृश्य हो जाने की तरह जादुई सरंजाम हवा में गायब होते दीखता है और तथाकथित बड़ा आदमी छोटे लोगों से भी गई−गुजरी स्थिति में होने से मुँह मारा हुआ दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत जिनके व्यक्तित्व उच्चस्तरीय आधार पर विनिर्मित हुए हैं, वे आंतरिक प्रखरता के बलबूते अभावों−प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए साहसपूर्वक आगे बढ़ते हैं। अपने निजी चुंबकत्व से ये न केवल लोकश्रद्धा, जनसहयोग; वरन् आत्मसंतोष और दैवी अनुग्रह भी प्रचुर परिमाण में उपलब्ध करते हैं।
शरीर एवं मस्तिष्कीय संरचना में मनुष्य−मनुष्य के बीच कोई भारी भेद नहीं है और न परिस्थितियाँ ही किसी के इतनी अनुकूल−प्रतिकूल होती है कि प्रगति, प्रतिभा एवं प्रखरता की दृष्टि से जमीन−आसमान जितना अंतर देखा जा सके। एक ही जंक्शन पर, बराबर वाली पटरियों पर खड़ी हुई दो गाड़ियाँ, लीवर गिराने में अंतर रहने के कारण दो भिन्न दिशाओं में चल पड़ती हैं और कुछ ही देर में उनके मध्य हजारों मील की दूरी बन जाती है। चाल दोनों की एक जैसी, साधन, ड्राइवर आदि एक जैसे; फिर यह दूरी का अंतर क्यों पड़ गया? साथ−साथ क्यों नहीं चलती रहीं? इसका एक ही उत्तर है— उनकी दिशा बदल गई। जीवन की दिशाधारा बदलने का आधार मात्र एक ही है— दृष्टिकोण। किस स्तर का जीवन जिया जाए? उसे किस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाए? निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किन मान्यताओं और गतिविधियों को अपनाया जाए? यही है वह आधारभूत निर्धारण, जिसके सहारे भली या बुरी दिशाओं में जीवन-प्रवाह बहता है और पतन के गर्त या उत्थान के शिखर पर जा पहुँचता है।
अमीबा से लेकर मनुष्य स्तर तक पहुँचने में विकासक्रम की जो लंबी यात्रा करनी पड़ी है, उसमें विभिन्न स्तर के अनुभव−अभ्यास होते और उपार्जित संपदा की तरह जमा होते रहे हैं। यह पूँजी संचित संस्कारों के नाम से जानी जाती है। मनोविज्ञानी इसी को मूल प्रवृत्ति के नाम से निरूपित करते हैं। स्वभावतः यह मानवी गरिमा से तुलना करते हुए हेय स्तर की होनी चाहिए। कृमि−कीटकों और पशु−पक्षियों को जिस आचार−संहिता का पालन और अनुभव−अभ्यासों का संचय करना पड़ा है, वे निश्चय ही मनुष्य स्तर के नहीं हो सकते। छोटे बालकों को जो कपड़े पहनाए जाते हैं, वे बड़े होने पर उनके उपयोग योग्य नहीं रहते। पशु−प्रवृत्तियाँ मनुष्य द्वारा अपनाई जाने पर उपहासास्पद एवं निंदनीय बन जाती है; उन्हें बरबस छोड़ना ही पड़ता है, भले ही संचित अभ्यास उन्हें ही अपनाए रहने का आग्रह क्यों न करता रहे। इतना ही नहीं, छोड़ने के अतिरिक्त पद एवं उत्तरदायित्व के अनुरूप कुछ नया ग्रहण भी करना पड़ता है। अध्यात्म विज्ञान की भाषा में इसी को तप कहते हैं। पदोन्नति करते−करते छोटे कर्मचारी जब बड़े अफसर बनते हैं, तो प्रगति के हर नए मोड़ पर उन्हें ट्रेनिंग लेनी होती है; अन्यथा पद ऊँचा और अनुभव नीचा होने पर सारी व्यवस्था ही गुड़−गोबर हो जाती है।
मनुष्य जीवन सृष्टि के समस्त जीवधारियों की तुलना में सर्वोच्च पद है। प्राणी के लिए इससे बड़ा न कोई पद है और न गौरव। उसे ईश्वरप्रदत्त सर्वोपरि उपहार और उपलब्धकर्त्ता का अभूतपूर्व सौभाग्य कहा जा सकता है। ऐसे बड़े पद का कार्यभार सफलतापूर्ण चलाने के लिए किस रीति−नीति का, किस दिशाधारा का अपनाया जाना आवश्यक है, इसके लिए कुछ ऐसा सोचना, मानना और अपनाना पड़ता है, जो भूतकाल की तुलना में सर्वथा भिन्न ही कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया को आत्मिकी कहते हैं। उपयोगिता की दृष्टि से भौतिकी की तुलना में कम नहीं, वरन् अधिक ही महत्त्व दिया जा सकता है। भौतिकी की उपलब्धियाँ मात्र शरीर की सुविधा एवं मन की गुदगुदी भर प्रदान करती है; किंतु आत्मिकी के आधार पर जिस तरह समूचे व्यक्तित्व की गलाई–ढलाई होती है, उसे एक प्रकार से कायाकल्प ही कहना चाहिए।
यह कायाकल्प द्विजत्व नाम से भी पुकारा जाता है। साधना की प्रक्रिया नर-पशु को नर-नारायण में किस प्रकार बदलती है, इसे जानने के लिए जिज्ञासु मनीषियों को आत्मिकी विद्या के गूढ़ तत्त्वदर्शन को भलीभाँति जानना चाहिए। उच्चस्तरीय साधना-सोपानों को तुरंत पाने का प्रयास करने वालों को इस एक तथ्य को समझ लेना बहुत अनिवार्य है कि अंतःकरण का परिष्कार— वृत्तियों का शोधन ही समस्त सिद्धियों का राजमार्ग है।
साधना के दर्शन में भ्रांति घुस पड़ने से ही इन दिनों देवत्व के साथ संपर्क-साधना और उससे लाभान्वित हो सकना अशक्य बन गया है। हर क्षेत्र अपने पुरुषार्थ की उपलब्धियों पर प्रसन्न होता और गर्व करता दीखता है। एक अध्यात्म क्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें उदासी, निराशा, असफलता का माहौल है। अविश्वास बढ़ने से प्रयत्न शिथिल हो रहे हैं और उस शून्य को भरने के लिए निहित स्वार्थों की विडंबना अनेकानेक प्रपंचों का ढकोसला सर पर लादकर सामने खड़ी हो रही है। इस स्थिति का अंत होने के लिए आवश्यक है कि आत्मिकी का वास्तविक स्वरूप और प्रयोग सामने आए।
यह एक स्पष्ट एवं सुनिश्चित तथ्य है कि प्रत्येक सामर्थ्य का ठीक तरह उपयोग आना चाहिए, अन्यथा वह बंदूक की तरह उलटा वार भी करती है और चलाने वाले की ही पसली तोड़ देती है। आग, बिजली, बारूद, जैसी शक्तियों की महिमा सभी जानते हैं, उनसे कितने बड़े−बड़े प्रयोजन सिद्ध होते हैं; किंतु साथ ही यह खतरा भी रहता है कि प्रयोक्ता अनाड़ी या उच्छृंखल हुआ, तो उन्हीं से अपना और संपर्क-क्षेत्र का देखते−देखते विनाश भी कर सकता है। ठीक यही बात ईश्वरप्रदत्त आंतरिक क्षमताओं के संबंध में भी है। चेतना का क्षेत्र पदार्थ-सामग्री से कम नहीं, वरन् अधिक ही है। यदि उसकी प्रयोग विधि मालूम न हो तो समझना चाहिए कि वरदान भी अभिशाप सिद्ध होंगे; हो भी रहे हैं।
दृष्टि पसारकर चारों ओर देखने से कुछ विचित्र प्रकार के नजारे देखने को मिलते हैं। शारीरिक दृष्टि से लोग दिन−दिन दुर्बल और रुग्ण बनते जा रहे हैं; जबकि उनसे कहीं गई−गुजरी स्थिति वाले पशु−पक्षी निरोग जीवन जीते हैं। मानसिक दृष्टि से समुन्नत समझे जाने वाले लोग भी उद्वेग, विक्षोभ, असंतोष, आवेशग्रस्त स्थिति में रहते और अर्धविक्षिप्त सनकी लोगों जैसी जलती−जलाती जिंदगी जीते हैं। जबकि मोर, कबूतरों को नाचते, फुदकते, पेड़ों पर कलरव करते, मोद मनाते देखा जाता है। धरती को स्वर्ग की संरचना कहे जा सकने योग्य मानवी परिवारों के क्लेश-कलह और पतन-पराभव को सड़ी कीचड़ों जैसा देखा जा सकता है। समाज में एकदूसरे को गिराने, ठगने और सताने की प्रक्रिया ही लोकमान्यता प्राप्त करती और चतुरता समझी जाती है। न कहीं स्नेह है न सहयोग। न कहीं सौहार्द्र है न सहयोग। ऐसे ही लोग एकदूसरे के लिए जाला बुनते और मीठी गोली खिलाकर चंगुल में फँसाने की तिकड़में लड़ाते रहते हैं। व्यवहार कुशलता यही तो है। अपव्यय, दुर्व्यसन, प्रदर्शन, आकर्षण के आधार पर लोग मौज उड़ाते और दूसरों पर रौब गाँठते देखे जाते हैं। अनैतिकताओं के छोटे−बड़े प्रचलन इतने अधिक हैं कि लगता है कि नीति-सदाचार की बात केवल कहने-सुनने की विडंबना भर बन गई है। अंधविश्वासों, मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों का अपना दौर है। एकदूसरे के प्रतिघात-प्रतिपात रचते रहने के परिणाम अंततः भयावह ही होते हैं। आक्रमण-प्रत्याक्रमण की प्रतिशोध भरी विनाशलीला का कहीं अंत नहीं। बहुमूल्य सामर्थ्य इसी जंजाल में चुक जाती है और खीजने-खिजाने, रोने-रुलाने के अतिरिक्त किसी के पल्ले और कुछ नहीं पड़ता।
यही है आज की स्थिति, जिसमें समस्याएँ— कठिनाइयाँ, विपत्तियाँ, विभीषिकाएँ चित्र-विचित्र रूप से सामने आती हैं। संपन्नता, शिक्षा, सुविधा की कमी न होते हुए भी परिस्थितियाँ इतनी विकट होती चली जा रही है, जितनी दुर्भिक्ष एवं दुर्घटनाग्रस्त लोगों को भी सहन नहीं करनी पड़तीं। आखिर इस गोरखधंधे जैसी पहेली में उलझन कहाँ हैं, इसका गहराई में उतरकर पता लगाने पर एक ही सूत्र हाथ लगता है कि दृष्टिकोण में निकृष्टता भर जाने से ही सरल-सौम्य जीवन में विकृत विषाक्तता भरी है और उसी ने रस में विष फैलने जैसा संकट खड़ा किया है। एक शब्द में इसे लोकमानस का पतन-पराभव कह सकते हैं। आस्थासंकट के रूप में वही अपनी प्रेत-पिशाच जैसी करतूतें दिखाने में लगा हुआ है। यह स्थिति वैयक्तिक रूप में नारकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करती और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में महाविनाश व प्रलय संभावना प्रस्तुत करती दीखती है। लगता है चिरसंचित मानवीसत्ता और सभ्यता सामूहिक आत्महत्या की तैयारी में जुट पड़ी हो।
निदान-कारण को जानने पर उपचार— समाधान कठिनाई नहीं होना चाहिए। प्रेरणास्रोत अंतःकरण है। वहाँ से आकांक्षाएँ उठती है। मस्तिष्क को सोचने और शरीर को करने के लिए विवश करती है। इन अंतःप्रेरणाओं— आस्थाओं, विचारणाओं, संवेदनाओं को कुसंस्कारों के दलदल से निकालकर सुसंस्कारी बनाना अध्यात्मतत्त्व दर्शन का ही काम है। उस गहराई तक प्रवेश और किसी का हो ही नहीं सकता। अंतःकरण को प्रभावित करके व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय प्रेरणा देने में— निकृष्टता को उत्कृष्टता में ढाल देने में, अध्यात्म विज्ञान द्वारा प्रतिपादित उपाय-उपचारों के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं। आज की हेय परिस्थिति वस्तुतः मनःस्थिति की निकृष्टता के साथ जुड़ी हुई है। छेद जहाँ हुआ है, रोकना वहीं पड़ेगा। इस प्रसंग में समर्थ आत्म विज्ञान ही अपना चमत्कार दिखा सकता है। विभीषिकाओं से लदे भविष्य को उज्ज्वल भविष्य में बदलने की सामर्थ्य और किसी में है नहीं। अस्तु समय की माँग एक ही है कि मृतक न सही मूर्छित स्थिति में पड़ी हुई आत्मविद्या को उसके सही स्वरूप में पुनर्जीवित किया जाए।
यहाँ ‘सही स्वरूप’ शब्द को जानबूझकर प्रयुक्त किया जा रहा है; क्योंकि इन दिनों हर क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियों ने अध्यात्म विज्ञान को भी अछूता नहीं छोड़ा है। बाजीगर विज्ञान को भी झाँसा देते हैं और वे अध्यात्म को भी उपहासास्पद बना देते हैं। प्रायः यह बाजीगरी ही अध्यात्म के तत्त्व दर्शन और उपचार-प्रयोगों में बुरी तरह घुस पड़ी हैं। निहित स्वार्थों ने इस महान विज्ञान को क्षत-विक्षत करके इस रूप में बदल दिया है कि उससे भावुक, धर्मभीरु मात्र समय, श्रम और धन की बर्बादी भर करते रहते हैं। सस्ते उपचारों से उच्चस्तरीय लाभ दिलाने के झाँसे देने वाले देवताओं के दलाल ही इन दिनों गुरुजन कहलाते और अंधे द्वारा अंधों का मार्गदर्शन किए जाने का उपहासास्पद प्रयोग खड़ा करते हैं। उस विडंबना से किसी के पल्ले कोई बड़ी उपलब्धि तो क्या पड़ती है, बर्बादी और अश्रद्धा की प्रतिक्रिया ही हाथ लगती है। इस प्रवाह में बहते रहने पर मानवी सत्ता की जीवनधारा का प्राणविद्या— अध्यात्म विद्या के किसी भँवर में समा जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
मनुष्य जाति ने इतिहास के अनेक अवसरों पर अनेकों हानियाँ उठाई और सहन की हैं; पर आदर्शों के प्रति आस्थावान बनाए रहने वाले ‘अध्यात्म विज्ञान’ के लिए खतरा कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु आज की स्थिति भिन्न एवं विचित्र हैं। विज्ञान और प्रत्यक्षवाद ने इन दिनों खुले आम अध्यात्मतत्त्व दर्शन को झुठलाया है। उसे अवास्तविक और अनावश्यक ठहराने के लिए ऐसे तर्क-प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिन्हें देखते हुए चिंतन की प्रखरता न रखने वालों के बहक जाने और अनास्था अपना लेने का पूरा−पूरा खतरा है। अनैतिकता, विलासिता और उच्छृंखलता के समर्थन में और भी कितने ही प्रवाह चल रहे हैं, जो चतुरता और संपन्नता की अभिवृद्धि से भी कहीं अधिक तेजी के साथ भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट आचरण को उत्तेजना दे रहे हैं। इन परिस्थितियों में आस्था-संकट दिनों- दिन घनीभूत होता चला जा रहा है। यह लक्षण महाविनाश के हैं। उस मार्ग पर चलते हुए यादवी गृहयुद्ध में हम सभी किसी न किसी प्रकार अपना आत्मघात कर बैठेंगे।
यह सामयिक संकट बताता है कि समय रहते उस, साधना विज्ञान को— तत्त्व दर्शन को पुनर्जीवित किया जाए, जो चेतना की गरिमा को समझाने और उसे सदुद्देश्य में निरत करने की विद्या समझा सके। इससे कम में वर्तमान विनाश-विग्रह से बच निकलने का और कोई उपाय है नहीं। बुद्धि, संपदा और सुविधा की अभिवृद्धि के साथ−साथ उनका सदुपयोग करा सकने वाली भाव-चेतना— आत्मविद्या का पुनर्जीवन इन दिनों जितना आवश्यक है, उतना इससे पूर्व कभी भी नहीं रहा। इस दिशा में इन दिनों बरती गई उपेक्षा इतनी आत्मघाती होगी कि इसका सुधार— समाधान फिर कभी हो ही न सकेगा।
यह तो हुई सामयिक विभीषिकाओं के समाधान की बात। स्थायी और दूरगामी महत्त्व की बात यह है कि मानवी प्रगति ने जिस प्रकार भौतिकी में गहराई तक प्रवेश करके अनेकानेक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हस्तगत की हैं, उसी प्रकार यह प्रयास चेतना के क्षेत्र में भी चलने चाहिए। कुछ शताब्दियों पूर्व की तुलना में आज की वैज्ञानिक प्रगति में असाधारण अंतर है। इस क्षेत्र के अन्वेषण ने प्रकृति के अंतराल में प्रवेश करके उसकी सूक्ष्म परतों को कुरेदा तथा इतना कुछ पाया है, जिसकी कुछ दिन पहले तक किसी को कल्पना तक नहीं थी। बिजली, रेडियो, टेलीविजन, रेल, मोटर, वायुयान, पनडुब्बी, अणु विद्युत, हाइड्रोजन बम, मिसाइलें, अंतरिक्ष यान, मृत्युकरण, होलोग्राफी, लेसर जैसी चमत्कारी उपलब्धियों को यदि कुछ शताब्दी पूर्व के कहीं छिपे मनुष्य देख पाए, तो वे आश्चर्यचकित हुए बिना न रहेंगे और उसे किसी देव-दानव की करतूत मानेंगे। प्रकृति को कुरेद डालने वाला मनुष्य जगत का एक प्रकार से अधिपति न सही, अधिष्ठाता तो बनता ही जा रहा है। इन आश्चर्यों के मूल में मनुष्य की वह गरिमा काम करती देखी जा सकती है, जिसे चेतना की प्रखरता कह सकते हैं। वस्तुतः यही वह क्षमता है, जो अन्य प्राणियों की तुलना में अतिरिक्त होने के कारण मनुष्य को सृष्टि का मुकुटमणि और परमेश्वर का युवराज कहाने का सौभाग्य मिला है। अन्य प्राणियों को यह अनुदान उतनी ही मात्रा में मिला है, जिसमें वे अपना निर्वाह सुविधापूर्वक कर सके। मनुष्य को भगवान का अतिरिक्त उपहार यही है। बीजरूप में उसे वह सब कुछ प्राप्त है, जो नियंता के अपने पास है। इस बीज को उगाना मनुष्य का काम है। मानवी चेतना ने प्रकृति को कुरेदा और अनगढ़ पदार्थ को उसने अपने लिए असाधारण रूप से उपयोगी बना लिया। अब इसी प्रयास को दूसरे उच्चस्तरीय प्रयोजन में नियोजित करने की बारी है।
‘भौतिकी’ से असंख्य गुनी सामर्थ्यवान् ‘आत्मिकी’ है। भौतिक विज्ञान के चमत्कारों से सभी परिचित हैं। आत्म विज्ञान के रहस्यों से भी हमें अवगत होना चाहिए। जब जड़ की तुलना में चेतना का सामर्थ्य अधिक है तो भौतिक विज्ञान की तुलना में आत्म विज्ञान की उपलब्धियाँ भी अत्यधिक विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए। इस क्षेत्र की सफलताओं की तुलनात्मक दृष्टि से विशिष्टता एवं वरिष्ठता कहीं अधिक ऊँची है। भौतिकी द्वारा मिलने वाली उपलब्धियाँ मात्र शरीर की सुविधा प्रदान करने— इसी स्तर की अनुकूलताएँ उत्पन्न करने भर में काम आती हैं; जबकि आत्मिकी द्वारा उपार्जित विभूतियाँ मनुष्य का अपना स्तर ऊँचा उठाती हैं। कहना न होगा कि यह व्यक्तित्व की गौरव-गरिमा ही मनुष्यों की वरिष्ठता उभारती है। उन्हें महामानव, अतिमानव, लोकनायक, ऋषि, देवता एवं अवतार स्तर तक ऊँचा उठा ले जाती है। संपन्नता तो आतंकवादी-दुष्ट-दुरात्मा भी संचित करने में सफल हो जाते हैं, किंतु महानता की गौरव-गरिमा मात्र उन्हीं को उपलब्ध होती है, जो अपने अंतराल कोे— चरित्र-चिंतन को, उच्चस्तरीय बनाने में सफल होते हैं। इस दिशा में की गई प्रगति ही वास्तविक प्रगति है। उसके सहारे महानता एवं संपन्नता के दोनों ही क्षेत्रों में आशातीत प्रगति हो सकती है।
कीमती फसलें उगाने के लिए भूमि को विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है, संवेदनशील औषधियाँ रेफ्रिजरेटर में ऋतु प्रभाव से बचाकर रखनी पड़ती हैं, ज्यादा बड़ी धनराशि घर में रखनी हो तो सुरक्षा के लिए तिजोरी चाहिए ही। उच्चस्तरीय आत्मबल उगाने, उपलब्ध विभूतियों को संभालकर रखने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व चाहिए और वह सहज ही नहीं मिल जाता, परिश्रमपूर्वक उपार्जित करना होता है। आत्म साधना की उपेक्षा करते हुए भी, अनगढ़ आदतों से, घिनौनी जीवनचर्या से लदे रहते हुए भी, जो आत्मिक प्रगति की उस क्षेत्र की विभूतियाँ अर्जित कर लेने का ‘शार्टकट’ ढूँढ़ते हैं, वे भूल करते हैं। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक ही सुनिश्चित राजमार्ग है— आत्म साधना का। इसे छोड़कर पगडंडियों में भटकने से थकान, खीज और निराशा के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ता नहीं है।
कौन कितने दिन जिया? इसका उत्तर प्रायः वर्ष गणना में दिया जाता है; किंतु तात्त्विक दृष्टि से इस संबंध में यह गणना होनी चाहिए कि किसने, किस स्तर का, किस प्रयोजन के लिए, क्या पुरुषार्थ किया? आद्य शंकराचार्य मात्र 32 वर्ष जिए, विवेकानन्द 38 वर्ष; किंतु उनकी उच्च उद्देश्यों के निमित्त जितनी तन्मयता, तत्परता रही, उसी अनुपात से उनने इस स्वल्प अवधि में ही इतना कुछ कर दिखाया, जितना कि सैकड़ों वर्ष जीकर भी नहीं कमाया, बखेरा जा सकता।
कौन, कितना सौभाग्यशाली है? इसके उत्तर में उसके वैभव, पद, प्रभाव आदि की नाप-जोख की जाती है। सुविधा-साधनों के सहारे इस प्रकार का मूल्यांकन किया जाता है। जबकि देखा यह जाना चाहिए कि गुण, कर्म, स्वभाव की, चिंतन और चरित्र की दृष्टि से कौन, किस स्तर पर रह रहा है। वस्तुतः व्यक्तित्व की पवित्रता एवं प्रखरता के आधार पर बनने वाली प्रतिभा ही वह संपदा है, जिसके सहारे उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर दूर तक जा पहुँचने का अवसर किसी को मिलता है। आंतरिक प्रफुल्लता, लोक, श्रद्धा एवं दैवी अनुकंपा को सफल जीवन की महान उपलब्धियाँ माना गया है। इन्हें अर्जित करने में परिष्कृत व्यक्तित्व ही सफल होते हैं। वैभव बटोरने में तो दुष्ट— दुराचारी भी सफल हो जाते हैं, किंतु इस विष-संचय से उन्हें भीतरी और बाहरी जलन भी झुलसाती-उबालती रहती है। वास्तविक उपार्जन एक ही है— परिष्कृत व्यक्तित्व। इसे संपादित करने में जो, जितना सफल रहा, समझना चाहिए कि उसने मनुष्य जन्म के सौभाग्य का लाभ उसी अनुपात से उठा लिया।
काय-संस्थान मनुष्य का स्वनिर्मित नहीं है। अन्न भूमि की देन है। पानी बादलों से बरसता है। हवा आकाश में भरी है। पदार्थ प्रकृति ने बनाए हैं। मनुष्य इनका उपयोग भर करता है। किंतु ‘व्यक्तित्व की उत्कृष्टता’ ऐसी संपदा है, जो स्वयं ही श्रद्धा, व्रतशीलता एवं सूक्ष्म साधना के सहारे अर्जित करनी पड़ती है। यह न तो उत्तराधिकार में मिलती है और न किसी से वरदान-उपहार में उपलब्ध होती है। भोजन स्वयं ही उदरस्थ करना होता है। मल विसर्जन का कष्ट भी स्वयं ही सहना पड़ता है। कुछ कार्य ऐसे हैं, जिन्हें जन्म-मरण की तरह स्वयं ही सहन या वहन करना होता है। व्यक्तित्व का निर्माण भी ऐसा ही काम है, जिसके लिए निजी तन्मयता एवं तत्परता का सघन समावेश करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। जो इस तथ्य को स्वीकारते-अपनाते हैं, उन्हीं को यह श्रेय मिलता है कि वे जीवन को सार्थक बना सकने वाले पराक्रम कर सकें; इसके लिए अपने में आवश्यक समर्थता एवं योग्यता उत्पन्न कर सकें।
संसार कला-कौशलों से भरा पड़ा है। उन्हीं के आधार पर लोग समृद्ध, प्रख्यात एवं समर्थ बनते हैं। कला-कौशलों में मूर्धन्य है— जीवन-कला। इसी को संजीवनी विद्या कहते हैं। जिसे जीना आता है, उसे सब कुछ आता है। जो इस विद्या से अपरिचित है, समझना चाहिए कि उसका विशाल वैभव भी कागजी रावण की तरह खोखला— ढकोसला है। वैभव को बदली की छाँव की तरह अस्थिर कहा गया है। तनिक-सी प्रतिकूलता आने पर साधन-सामग्री न जाने किस प्रवाह में बहकर कहाँ से कहाँ चली जाती है। राजाओं को रंक बनने की घटनाएँ आए दिन देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। तिनके और पत्ते झोंके के साथ आसमान पर चढ़ते और स्थिरता आते ही लाते खाते और कीचड़ में सड़ते देखे जाते हैं; किंतु जिनका वजनदार व्यक्तित्व है, उन चट्टानों से आँधी-तूफान भी टकराकर वापस लौट जाते हैं।
जीवन को सार्थक बनाने वाली क्षमता अर्जित करने का ही दूसरा नाम ‘व्यक्तित्व−निर्माण' है। साधना इसी के लिए करनी पड़ती है। अंतरंग जीवन में उसका अस्तित्व ‘सुसंस्कारिता’ के नाम से जाना जाता है और बहिरंग जीवन में इसी शालीनता भरे व्यवहार को ‘सभ्यता’ कहते हैं। यों इस उपलब्धि में वातावरण एवं संपर्क भी सहायक होता है, तो भी प्रमुखता अपने ही दृष्टिकोण एवं प्रयास की रहती है। सत्संग या कुसंग के प्रभाव को यहाँ झुठलाया नहीं जा रहा है; वरन् यह कहा जा रहा है कि उसकी उपयोगिता भी तभी लाभदायक होती है, जब अपने में ग्रहण करने एवं पचाने की सामर्थ्य विद्यमान हो। पाचन शक्ति जवाब दे जाए तो पौष्टिक भोजन क्या करे? आँखें न हों तो दृश्यों की मनोरमता का आनंद कैसे मिले? भूमि के ऊसर होने पर बढ़िया बीज एवं परिश्रमी किसान का प्रयास भी कैसे सफल हो? बाहरी अनुदानों की फिराक में रहने वाले हर मनुष्य को स्मरण रखना चाहिए कि सत्पात्र के अभाव में या तो कहीं से कुछ महत्त्वपूर्ण जैसा मिलता ही नहीं अथवा मिलता है तो उसका स्थिर रहना, सुखद प्रतिक्रिया उत्पन्न करना, सम्भव नहीं होता। इन्हीं तथ्यों को देखते हुए जीवन−साधना को सर्वोपरि पराक्रम एवं सर्वश्रेष्ठ सौभाग्य कहा गया है। स्मरण रहे यह स्व−उपार्जन है। यह प्रयास चले तो खिले फूल पर मँडराने वाले भौंरे, मधुमक्खियों, तितलियों के झुंड छाए रहते हैं। बाहरी अनुग्रहों के संबंध में भी ठीक यही बात है। जहाँ पात्रता होगी, वहाँ बाहरी सहायता की भी कमी न रहेगी। वह उक्ति अक्षरशः सही है, जिसमें एक महान सत्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा गया है— "ईश्वर मात्र उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।"
अध्यात्म का विकृत स्वरूप आज कुछ भी क्यों न बन गया हो, उस चेतना विज्ञान का मूलभूत प्रतिपादन एक ही रहेगा— आत्मावलंबन एवं आत्मपरिष्कार। इस दिशा में जिसे, जितनी सफलता मिली होगी, वह उतना ही व्यक्तित्वसंपन्न बन सका होगा। प्रतिभा के धनी— प्रखरता से संपन्न व्यक्ति प्रायः स्वनिर्मित होते हैं। उनने अपने को स्वयं ही समझा, सुधारा, बढ़ाया एवं उछाला होगा, दूसरों का तो उन्हें सहयोग भर मिला होगा। इस संसार में प्रामाणिकों को ही विश्वास एवं सहयोग मिलने की प्रथा है। कुपात्रों द्वारा की गई छीन-झपट को तो डकैती भर कहा जा सकता है। लूट-मार से धनी बनने वालों का बड़प्पन टिकता कहाँ है? अनीति का उपार्जन साँप की तरह चमकता तो है और सुहाना भी लगता है; पर उसे पालने वाले कितना खतरा उठाते हैं, उसे भुक्त-भोगियों से ही पूछकर जाना जा सकता है।
प्रगति का सहज और सुनिश्चित राजमार्ग एक ही है— व्यक्तित्व को शालीनता एवं प्रखरता के समन्वय से प्रतिभावान बनाना। इसी आधार पर व्यक्ति ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी बनते हैं। इसी के बलबूते भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र की अनेकों सफलताएँ करतलगत होती हैं। उत्कृष्टता ही व्यक्ति और समाज की प्रगति, समृद्धि एवं शांति की सुनिश्चित गारंटी है। निजी और सामूहिक उत्कर्ष की बात सोचने वालों को यह तथ्य ध्यान में रखना ही होगा कि वैभव की न्यूनाधिकता जितनी विचारणीय है, उससे अधिक विवेचन एवं निर्धारण मानवी सदाशयता के संवर्धन का होना चाहिए। स्वल्प साधनों से काम चलाते हुए ऋषिकल्प महामानवों ने अपना तथा असंख्यों का उद्धार— उत्थान किया है। इसके अभाव में रावण, मारीच जैसे समर्थ व्यक्ति भी अपने को–अपने संपर्क क्षेत्र को, दुखद दुर्दशा के गर्त में ही धकेलते रहे हैं। वैभव वृद्धि एवं भौतिक प्रगति की योजनाएँ तो बननी ही चाहिए, पर इसी प्रसंग में इस तथ्य को जोड़कर चलना चाहिए कि उपार्जन का उपयोग कर सकने वाली सहायता की उपेक्षा होती रही, तो वैभव के अनुपात से दुर्व्यसनों और अनाचारियों की बाढ़ आवेगी। अभावों के कारण जो दुर्बुद्धि अपंग बनी बैठी रहती थी, उसी की सामर्थ्य से सोचा गया, तो साँप को दूध पिलाने की तरह दुःखद दुष्परिणाम ही सामने होंगे।
शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय आदि के लिए जितना प्रयास होता है, उतना ही इस निमित्त भी होना चाहिए कि लोग जीवन का महत्त्व समझें, उसके साथ जुड़ी हुई विशेषताओं को उभारें और उपलब्धियों का सदुपयोग करना सीखें। यहाँ एक भारी कठिनाई यह है कि वैसा न तो कहीं वातावरण है, न प्रशिक्षण। यहाँ तक कि ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में जहाँ असंख्य विषयों पर भारी अनुसंधान, प्रयोग−परीक्षण होते रहे हैं, निष्कर्ष-निर्धारण प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, वहाँ जीवन-कला के संबंध में नहीं के बराबर खोज-बीन हुई है। उसके आधारभूत सिद्धांतों तक का कोई अता-पता नहीं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर जो कहा जाता रहा है, वह अतिशयोक्तिपूर्ण एवं अव्यावहारिक है। दूसरी ओर नागरिक शास्त्र, नीतिशास्त्र, समाज शास्त्र के माध्यम से जो प्रतिपादन हुए हैं, वे भी उथले एवं सतही हैं। उनमें टकराव से बचाने वाली सभ्यता भर का उल्लेख है। उस श्रद्धा को उभारने वाली कोई सामग्री नहीं है, जो उत्कृष्टता अपनाने के लिए अंतराल को बेचैन कर दे। आदर्शवादी आचरणों के लिए जिस अदम्य उत्साह और उच्चस्तरीय साहस की आवश्यकता है, वह अनायास ही प्रकट नहीं हो सकता। बौद्धिक कलाबाजी एवं परोपदेश पांडित्य की पुरोहिती से भी उसे अंतराल में निष्ठा के रूप में प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता। वह बड़ा काम है; इसलिए बड़े और भारी-भरकम उपाय-उपचार भी प्रयुक्त करने होंगे। आज का व्यक्ति जिस चिंतनशैली का— जिस प्रथा-प्रचलन का, अभ्यस्त हो गया है, उसी से तालमेल बिठा सकने वाला तत्त्व दर्शन इन दिनों सृजा जाना चाहिए। यह सृजन ऐसा होना चाहिए, जो चिंतन की उत्कृष्टता और चरित्र की आदर्शवादिता को तर्क, तथ्य, प्रमाण, प्रयोग, उदाहरण आदि की हर कसौटी पर, हर किसी के लिए, हर क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध कर सके।
जीवन-साधना आज की शोध का सबसे बड़ा महत्त्वपूर्ण विषय है। अब पुरातन जैसी न तो मनःस्थिति है, न परिस्थिति। शाश्वत सिद्धांतों को आज के परिवेश में किस प्रकार व्यावहारिक बनाया जा सकता है, यह असाधारण एवं अद्भुत कार्य है; क्योंकि विज्ञान, उद्योग, शिक्षा, विलास, प्रचलन आदि ने मिल−जुलकर जो माहौल बनाया है, उससे एक प्रकार की नई संस्कृति ने जन्म लिया है। बहुसंख्यक लोग उससे प्रभावित ही नहीं हुए, अभ्यस्त भी बन गए हैं। यह जैसी भी है, सामने है। इसमें विलासिता, अहमन्यता, अनास्था, उच्छृंखलता, धूर्तता जैसी दुष्प्रवृत्तियों ने चतुरता और संपदा के समन्वय से कुछ ऐसा माहौल बनाया है कि इसे न निगलते बनता है न उगलते, न टूटती है न छूटती। कुटिलता भरी दुरभि संधियाँ रचने में इन दिनों की चतुरता ही प्रकारांतर से सामयिक सभ्यता के रूप में मान्यता प्राप्त कर रही है। इन दिनों जीवन की उत्कृष्टता और उसके सदुपयोग की आदर्शवादिता किस प्रकार समझाई जाए, जबकि दर्शन क्षेत्र में नीत्सेवाद, कामूवाद जैसे नास्तिकता के किशोर बाल-बच्चे, आत्मा, परमात्मा, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि स्थापनाओं को ही नहीं; नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को अमान्य ठहराने के लिए विधिवत् अभियान चलाते और नीतिनिष्ठा की धज्जियाँ उड़ाने पर तुल गए हैं। कहना न होगा कि ऐसी व्यापक अनास्था इससे पूर्व कभी भी देखने में नहीं आई। इन दिनों जीवन दर्शन के साथ शालीनता के सिद्धांतों को जोड़ना, उन्हें उपयोगी ही नहीं व्यावहारिक भी सिद्ध करना, निश्चित रूप से टेढ़ी खीर है। इस प्रयास की आधारभित्ति अब ऐसे सशक्त आधार पर खड़ी करनी होगी, जिसे उच्छृंखलतावादी तूफान गिरा न सके; वरन् टकराकर वापस लौटने की विवशता अनुभव करे।
मानवी गरिमा के अनुरूप जीवनयापन करने की उच्चस्तरीय प्रक्रिया को अतिवादियों की बपौती समझा जाता है और कहा जाता है कि वह विरक्त संन्यासियों के लिए कष्टसाध्य कौतूहल का काम दे सकती है। यह प्रतिपादन कितने ही जोश-खरोश के साथ क्यों न कहा जाए, भले ही उसके अनुयायी बरसाती कीट-पतंगों की तरह रहे हों; पर तथ्यतः वह है अवास्तविक। सत्य शाश्वत है। मानवी गरिमाओं के साथ शालीनता अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई हैं। आवश्यकता मात्र यह है कि इस तथ्य को प्रत्यक्षवाद एवं अनास्थावाद की रीति-नीति अपनाने वालों की भीड़ में तर्क व प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया जाए। लोकमानस को आदर्शवादी जीवनचर्या अपनाने के लिए प्रोत्साहित, सहमत एवं कटिबद्ध कर सकना तभी संभव है, जब उच्चस्तरीय अध्यात्म सिद्धांतों की चर्चा करने वाले सबसे पहले इन प्राथमिक सूत्रों को अपने जीवन में उतारें। जीवन-साधना अपनाने वाले ही साधना की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ने के पात्र बन सकते हैं, इस अकाट्य तथ्य को एक बार नहीं, बार-बार समझ लेना चाहिए।
इसे एक विडंबना ही कहना चाहिए कि मनुष्य बाह्य संसार एवं संबंधित वस्तुओं के विषय में अधिकाधिक जानकारियाँ एकत्रित तो करता रहता है; पर स्वयं अपने विषय में अपरिचित बना रहता है। अपने स्वरूप का बोध न होने तथा सांसारिक आकर्षणों में भटकते रहने से अंततः भटकाव ही हाथ लगता है। जड़प्रकृति की खोज साधन−सुविधाओं की उपलब्धि के लिए आवश्यक है; पर उससे भी अधिक जरूरी है— उनके उपयोगकर्त्ता सत्ता का स्वरूप जानना।
मनुष्य क्या है? जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है? जीवन के साथ जुड़े संसार एवं प्राप्त विभूतियों का सही उपयोग क्या है? इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से एक प्रकार की आत्मविस्मृति छाई रहती है। अंतःकरण के मूर्च्छित स्थिति में जा पहुँचने से जीवन नीति का गंभीर निर्धारण नहीं हो पाता। इंद्रियों की उत्तेजना ही प्रेरणा बनकर रह जाती है। जिस तरह मनुष्येत्तर जीव शरीरेंद्रियो से अभिप्रेरित होकर विभिन्न प्रकार के कर्म करते पेट और प्रजनन की परिधि में चक्कर काटते रहते हैं, उसी प्रकार का जीवनक्रम मनुष्य का भी बन जाता है। लोक-प्रचलित का अनुकरण ही स्वभाव बन जाता है। कटी पतंग और पेड़ से टूटे पत्ते दिशाविहीन स्थिति में इधर−उधर उड़ते और छितराते रहते हैं। जीवन भी मात्र इसी प्रकार दिन काटने के लिए जिया जाता है। उच्चस्तरीय आदर्श सामने न रहने से न तो कोई महत्त्वपूर्ण प्रयास बन पड़ता है और न ही जीवन का वास्तविक आनंद मिल पाता है। भौतिक सुखाकांक्षा में भटकती जीवात्मा अशांति और असंतोष की आग में जलती रहती है। रोने–कलपने में ही हारी−थकी जिंदगी कट जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि मनुष्य को अपनी सत्ता का बोध न होने से जीवन लक्ष्य का निर्धारण भी नहीं होने पाता।
अंतःज्ञान की उपयोगिता−उपादेयता बाह्य ज्ञान की तुलना में कहीं अधिक है। सुख−साधनों की अभिवृद्धि की तरह उपभोगकर्त्ता की विवेकदृष्टि का प्रखर होना आवश्यक है; अन्यथा भौतिक उपलब्धियों का दुरुपयोग ही बन पड़ेगा और उससे अगणित समस्याएँ उत्पन्न होंगी। मोटर अच्छी होना पर्याप्त नहीं है, ड्राइवर यदि अनाड़ी हुआ तो कितने ही संकटों का सामना करना पड़ सकता है। साधनों की कमी रहते हुए भी जीवन लक्ष्य सामने हो तो अभावों में भी सदा प्रसन्न और संतुष्ट रहा जा सकता है, जबकि अंतःविवेक के अभाव में साधनों की प्रचुरता से बंदर के हाथ में तलवार पड़ जाने जैसी स्थिति उत्पन्न होगी; जिसने अपने मालिक की नाक पर बैठी मक्खी को उड़ाने के लिए गर्दन ही उड़ा दी थी।
मनुष्य के लिए खोज का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न कौन-सा हो सकता है, श्वेताश्वतरोपनिषद् का ऋषि यह स्पष्ट करता है—
“किं कारणं ब्रह्म कुतः स्मजाता जीवाम् केन क्वच सम्प्रतिष्ठाः।
अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहेब्रह्म विदो व्यवस्थाम्॥1।1॥”
अर्थात्— हे वेदज्ञ महर्षियों! इस जगत् का प्रधान कारण ‘ब्रह्म’ कौन है? हम सभी किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं तथा किसमें प्रतिष्ठित हैं? साथ ही किसके अधीन रहकर हम लोग सुख और दुःख का अनुभव करते हैं।
इस प्रश्न के उत्तर की अर्थात् आत्मज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके तो सर्वप्रथम यह विचार करना होगा— हम कौन हैं? और क्यों जी रहे हैं? इस तथ्य पर आत्मवेत्ता ऋषियों ने गंभीर चिंतन एवं अनुसंधान से जो निष्कर्ष निकाले थे, वे बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं तथा आत्मानुसंधान में प्रवृत्त होने के इच्छुक जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
अणु की सत्ता की व्याख्या— विवेचना करने वाले वैज्ञानिक उसे सुविस्तृत पदार्थ वैभव का एक छोटा-सा अविच्छिन्न घटक मानते हैं। आत्मा क्या है?— परमात्म सत्ता का एक छोटा-सा अंश। अणु की अपनी स्वतंत्र सत्ता लगती भर है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उसका अस्तित्व बना है तथा क्रियाकलाप चल रहा है, वह व्यापक ऊर्जा तत्त्व से भिन्न नहीं है। एक ही सूर्य की अनंत किरणें समस्त संसार में फैली रहती हैं। एक ही समुद्र में अनेकों लहरें उठती रहती हैं। ऐसा देखने पर प्रतीत होता है कि किरणों एवं लहरों की स्वतन्त्र सत्ता है, जो परस्पर एकदूसरे से भिन्न है। पर सत्य की गहराई में जाने पर पता चलता है कि भिन्नता कृत्रिम और एकता वास्तविक है। अलग−अलग बर्तनों में आकाश की कितनी ही स्वतंत्र सत्ताएँ दिखाई पड़ती हैं; पर तथ्यतः उनका अस्तित्व निखिल आकाशीय सत्ता से भिन्न नहीं है। पानी में अनेकों बुलबुले उठते और विलीन होते रहते है। बहती धारा में कितने ही भँवर पड़ते हैं। दिखने में बुलबुले और भँवर अपना स्वतंत्र अस्तित्व प्रकट कर रहे होते हैं; पर यथार्थ में वे प्रवाहमान जलधारा की सामयिक हलचलें मात्र हैं। जीवात्मा की स्वतंत्र सत्ता दिखती भर है; पर उसका अस्तित्व एवं स्वरूप विराट चेतना का ही एक अंश है।
इस निष्कर्ष के आधार पर ही अध्यात्मवेत्ताओं ने उद्घोष किया कि— “हम विश्व चेतना के एक अंश मात्र हैं। समष्टि ही आधारभूत सत्ता है। हम उसकी छोटी चिनगारी भर हैं। व्यष्टि और समष्टि की एकता शाश्वत है, पृथकता कृत्रिम। सबमें अपने को और अपने में सबको समाया हुआ, देखा, समझा और माना जाए। सबके हित में अपना हित सोचा जाए। परस्पर एकदूसरे के सुख−दुःख को अपना ही सुख−दुःख माना जाय। सबका उत्थान अपना उत्थान और सबका पतन अपना पतन, यह मानकर चलने से सीमित परिधि में सुखी रहने की क्षुद्रता घटती है तथा आत्मविस्तार की प्रेरणा उठती है। सीमा-संकीर्णता से निकलने से व्यक्तिवाद पर अवलंबित स्वार्थपरता घटती है। मनुष्य विराट समाज का अपने को एक अभिन्न अंग मानने लगता है। सामूहिक हित सोचने और सामूहिक गतिविधियाँ अपनाने में ही उसे आनंद आता है।
अपनापन हर किसी को प्यारा लगता है। यह आत्मीयता जिस भी पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है वही परम प्रिय अपने लगते हैं। अपनेपन का दायरा जितना ही छोटा होगा, आत्मिक दृष्टि से मनुष्य उतना ही पिछड़ा माना जाएगा। अपने शरीर और परिवार तक सीमित रहने वाला व्यक्ति आत्मविस्तार का आनंद नहीं ले पाता। छोटा-सा क्षेत्र ही अपना बनकर रह जाता है। यह क्षेत्र जितना विस्तृत होगा उतनी ही आत्मीयता की परिधि भी बढ़ती जाएगी। सभी अपने लगेंगे और अपना परिवार अत्यंत सुविस्तृत बन जायेगा। किस व्यक्ति की कितनी आत्मिक प्रगति हुई, इसका अनुमान इस आधार पर लगाया जा सकता है कि उसने किस सीमा तक आत्मविस्तार किया है।
आत्मा-परमात्मा की, जीव-ब्रह्म की, व्यष्टि-समष्टि की, एकता का दूसरा निष्कर्ष है कि अंशों के सभी गुण सूक्ष्म रूप से अंशी में विद्यमान रहते हैं। अस्तु परमात्मा की समस्त विशेषताएँ एवं सम्भावनाएँ जीवात्मा में मौजूद है। साधना द्वारा उन्हें जगाया एवं विकसित किया जा सकता है। आत्मा के परमात्मा स्तर तक जा पहुँचने की पूरी−पूरी संभावना है। चिनगारी में दावानल बनने की सभी विशेषताएँ मौजूद रहती हैं। विशाल वृक्ष का ढाँचा बीज के भीतर सन्निहित है। नन्हें से शुक्राणु में प्राणी की आकृति एवं प्रकृति का अधिकांश स्वरूप समाहित रहता है; जो नेत्रों से दिखाई नहीं पड़ता। छोटे−से परमाणु में पूरे सौरमंडल का नक्शा होता है। इस तथ्य से यह बात स्पष्ट है कि, जीव की मूलसत्ता ईश्वर के ही समतुल्य है। इस संभावना को साकार करना मनुष्य जीवन में संभव है। मनुष्य के रूप में शरीर धारण करने का सुअवसर भी इसीलिए मिला है कि वह अपने महान लक्ष्य को समझे तथा पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करे। परमात्मा द्वारा दिए गए मनुष्य जीवनरूपी बहुमूल्य उपहार की सार्थकता पूर्णता की प्राप्ति−आत्मज्ञान की उपलब्धि में ही सन्निहित है।
इस परम लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय आदर्श एवं पवित्रमय देव जीवन जिया जाए और अपनी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक उपलब्धियों में से न्यूनतम अपने लिए तथा अधिकतम परमार्थ प्रयोजनों में उपयोग किया जाए, यही है ईश्वरप्रदत्त सुरदुर्लभ मानव जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग। अन्य जीवधारियों की तुलना में मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिवैभव परमात्मा ने दिया है। ऐसा पक्षपात उसने क्यों किया? इसका उत्तर मनुष्य जीवन के लक्ष्य को समझने पर स्पष्ट हो जाता है। यदि मनुष्य प्राप्त अतिरिक्त अनुदान को व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थों को पूरा करने में प्रयुक्त करता है तो उस उपहार का दुरुपयोग हुआ समझा जाना चाहिए।
मन और शरीर जीवनरूपी रथ के दो पहिये— दो घोड़े हैं। अन्तःकरण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप यह दोनों स्वामीभक्त सेवक की भाँति गतिशील रहते हैं। शरीर जड़ है, उसकी अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता अथवा इच्छा नहीं है। इंद्रियों भी पंचतत्त्वों से बनी हैं। मन भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं सोचता। अन्तःकरण से जैसी भी प्रेरणाएँ उभरती हैं, वह उसी के अनुरूप विचारों का ताना−बाना बुनता है। अन्तःप्रेरणा के निर्देशों को पूरा करना मात्र उसका काम है। सज्जनों का चिंतन और कर्त्तव्य एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इन दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियों में शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। दोषी अन्तःकरण होता है, जिसमें जमे संस्कार भली−बुरी प्रेरणाएँ उभारने का कारण बनते हैं।
आत्मज्ञान का अर्थ है— अंतरात्मा के गहन स्तर को स्पर्श करना। कुसंस्कारों का परिशोधन करना तथा यह आस्था एवं अनुभूति उत्पन्न करना कि हम सत्−चित−आनंद परमात्मसत्ता के अविच्छिन्न अंग है। पूर्णता हमारा लक्ष्य है। अध्यात्म की भूमिका में जगा हुआ जीवात्मा संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लांघकर सब में अपने को और अपने में सब को देखता है। इसलिए वह जो कुछ भी करता एवं सोचता है वह व्यापक लोकहित मानव मात्र के कल्याण को ध्यान में रखकर उसके हर क्रियाकलाप में आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे आत्मज्ञानी अभावों एवं संकटों में रहते हुए भी अंतःकरण में सदा असीम आनंद एवं संतोष की अनुभूति करते रहते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसके विषय में वृहदारण्यक उपनिषद् का ऋषि कहता है— "आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।"
अर्थात्—वह एक ऐसी पूर्ण चैतन्य आनंदमय सत्ता है, जिसके ज्ञान से सब कुछ जान लिया जाता है। अर्थात् कुछ भी जानने को शेष नहीं रहता।
“य एवं वेदाहं ब्रह्मा स्मीति स इदं सर्वं भवति”
अर्थात्–आत्मवेत्ता सर्व हो जाता है, क्योंकि दृष्टा का अनुभव ही विश्व का विस्तार है। निद्रा से टूटने पर स्वप्न की स्थिति मिट जाती है। आत्मज्ञान के प्रकाश में यह अनुभव होता है कि, संसार की सत्ता आत्मा के बाहर नहीं है। भगवान बुद्ध आत्मज्ञान होते ही दिव्यमानव बन गए। यह अन्तःजागरण का ही प्रतिफल था, जिसके कारण उन्हें सबमें आत्मसत्ता का प्रकाश दिखाई पड़ने लगा।
आत्मज्ञान की चरम उपलब्धि के लिए तत्त्वदर्शन को समझना जितना आवश्यक है उतना ही साधना का मार्गावलंबन भी अनिवार्य है।
इन दिनों आत्मिकी के बारे में चल रहे अंधविश्वासों ने जन−मान्यता कुछ विचित्र स्तर की बना दी है। समझा जाता है कि आसमान में रहने वाले देवी−देवता बेकार बैठे रहते हैं। उन्हें पूजा कराने की भारी उत्कंठा है। जो उनकी इस आवश्यकता को छोटे रूप में भी उपेक्षापूर्वक भी कर दें उसी को वे अपना भक्त मान लेते हैं और मनोकामना पूर्ण करने के लिए आँख मूँदकर दौड़ पड़ते हैं, उचित−अनुचित जैसा कुछ भी उन्हें नहीं सूझता। पूजा लेने और वरदान देने भर का धंधा उन्होंने अपनाया हुआ है, इसी भ्रमग्रस्तता में देवपूजा के नाम पर आत्मिकी का अधिकांश आडंबर कागजी रावण की तरह अपना विशालकाय ढकोसला रचे खड़ा है।
अध्यात्म-साधना में एकाग्रता को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साधनाओं में से अधिकांश का एक ही उद्देश्य है— एकाग्रता−संपादन। नादानुसंधान, चक्र−वेधन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि जितनी भी योग की शाखा−प्रशाखाएँ हैं–उन सब में एक ही प्रक्रिया है— उच्चस्तरीय चिंतनसहित एकाग्रता की साधना। राजयोग, हठयोग, भक्तियोग, लययोग की समस्त दिशा धाराएँ जिस एक स्थान पर आकर केंद्रित होती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। एकाग्रता में वृद्धि के अनुपात में ही साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान लगाते हैं। इसीलिए उपनिषद्कार ने नारद−सनत्कुमार जिज्ञासा-समाधान के माध्यम से कहा है— "संकल्पो वाव मनसी भूयान। चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो। ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो।” अर्थात् मन से बढ़कर संकल्प, संकल्प से भी बढ़कर चित्त तथा चित्त से भी बढ़कर ध्यान है। इस प्रतिपादन में वस्तुतः ध्यान−साधना अर्थात् एकाग्रता मिश्रित ध्यान−धारणा को ही प्राथमिकता दी गई है।
एकाग्रता की शक्ति से सभी भली−भाँति परिचित हैं। छोटा-सा आतिशी शीशा सूर्य की किरणों को केंद्ररितकर देखते−देखते अग्नि उत्पन्न कर देता है। यह अग्नि, दावानल का रूप तक ले लेती है। वही सूर्य अपना प्रकाश चारों ओर बिखेरे है, जिसकी गर्मी उस शीशे में कैद ऊर्जा से कहीं करोड़ों गुना अधिक है। मीलों परिधि में बिखरी होने के कारण वह मात्र देखने योग्य प्रकाश, चकाचौंध तथा सामान्य-सी गर्मी दे पाती है। नदियों, तालाबों, समुद्र से ढेरों भाप उठती व बिखरती रहती हैं; पर थोड़ी−सी भाप का केंद्रीकरण प्रेशर कुकर से मिनटों में भोजन बनाने स्टीम इंजन से भारी-भरकम रेलगाड़ी चलाने तथा थर्मल पॉवर स्टेशन से विद्युत का भारी मात्रा में उत्पादन कर सकने में समर्थ होता है। बिखरे धागों की तुलना में बुनी हुई मोटी रस्सी, सींकों की तुलना में बुहारी, बिखरी बारूद की तुलना में बंदूक की नली में उसका उपयोग, मोटी छड़ की अपेक्षा नुकीले बर्मे या सुई से अधिक काम ले लेना; इस एक ही तथ्य के प्रत्यक्ष स्थूल उदाहरण हैं कि बिखरी शक्ति की तुलना में समेटी हुई, केंद्रीभूत हुई शक्ति अधिक समर्थ होती है। इसी प्रकार आत्मिक-क्षेत्र में एकाग्रता की शक्ति का महत्त्व उससे भी कहीं अधिक है, जितना कि सामान्यतया इन उदाहरणों से समझा जाता है। इस शक्ति की प्रतिक्रिया ही सारी ऋद्धि−सिद्धियों एवं सफलता–यश−सम्मान के रूप में बहिरंग में दृष्टिगोचर होती है।
साधना-मार्ग पर चलने वाला पथिक यही पुरुषार्थ करता है। मस्तिष्कीय ऊर्जा को केंद्र-विशेष पर एकत्र कर वह उसे दिशा-विशेष में नियोजित करता है। ध्यान का यही प्रमुख उद्देश्य है। ईश्वर-प्राप्ति और आत्मकल्याण जैसे महत् प्रयोजनों के लिए भी तन्मयता−तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाग्रता जिसमें तन्मयता का समावेश हो, जड़ता का नहीं, किस माध्यम से अर्जित की जाती है, उसमें इष्ट के प्रति किन भावनाओं को चिंतनक्षेत्र में उतारना होता है, इष्ट का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है, इस पर ऋषि−मनीषियों ने विशद अनुसंधान किया है एवं आप्त वचनों के रूप में अपने निष्कर्ष जनमानस के सम्मुख रखे हैं।
मुंडकोपनिषद् के द्वितीय मण्डूक के द्वितीय खंड में ऋषि कहते हैं—
“आविः संनिहितं गुप्तचरं नाम महत् पदमत्रैतत् समर्पितम्। एजत् प्राणग्नि मिषच्च त्रदेतज्जानथ सदसद्ववरेण्यं परं विज्ञानाद्य द्वरिष्ठं प्रजानाम्॥1॥ यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाड् मनः। तदेतत् सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि।”॥2॥
अर्थात्— ”उस परमेश्वर को जानना चाहिए जो सत्-असत् रूप में सबके द्वारा वरणीय, वरिष्ठ और जीवात्माओं की बुद्धि के परे हैं। ज्योतिस्वरूप निकटस्थ, गुप्तचर नामधारी, महान पद वाले, श्वांस लेने वाले, नेत्रों का खोलने–बंद करने वाले जो प्राणी हैं, वे सब इसी परम सत्ता को समर्पित हैं। हे सौम्य! तू उस बेधने के योग्य लक्ष्य को बेध डाल; जो तेजस्वी सूक्ष्मातिसूक्ष्म हैं और लोकों में निवास करने वाले प्राणियों के आश्रय स्थान हैं, वही अविनाशी ब्रह्म है। वही मन, वाणी, प्राण, सत्य और अमरत्व से युक्त है।”
उपनिषद्कार ने इस व्याख्या में आगे प्रणव को धनुष, आत्मा को बाण तथा ब्रह्म को उसका लक्ष्य बताया है और कहा है कि सच्चा योगी लक्ष्य को बेधकर उसी में तन्मय हो जाता है। “शरवत् तन्मयः भवेत्” से तात्पर्य यही है कि जीव को बाण के समान तद्रूप हो जाना चाहिए। लक्ष्यबेध में प्रमाद न हो, वैसी ही एकाग्रता हो, जैसी धनुर्धारी की होती है। यही उपासना का तत्त्वदर्शन है। जागृत अवस्था में कार्य करने वाला मन विभिन्नता की कल्पना करता है। जब वही मन एकाग्र हो स्थिर होने लगता है तो विविधता की कल्पनाएँ मिट जाती हैं और एकता का— जीव−ब्रह्म की पारस्परिक निकटता का अनुभव होने लगता है। जागृति की दूसरी अवस्थाएँ हैं— स्वप्न एवं सुषुप्ति। भूमा-अवस्था तो वहाँ भी होती है; पर वह मन की स्थिरता नहीं है। इसीलिए लक्ष्यबेध वाली तन्मयता को एकाग्रता के साथ जोड़कर साधना के तत्त्वज्ञान का विवेचन किया जाता है।
धनुर्धारी की इस उपमा को अर्जुन ने समझा, बिखरी मनःस्थिति को एकाग्रचित्तकर लक्ष्यबेध किया और वे सर्वगुणसंपन्न द्रौपदी का वरण कर सके। इस द्रौपदीरूपी चरम लक्ष्य की प्राप्ति हर आत्मारूपी अर्जुन द्वारा संभव है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में तो इस तथ्य को बड़ी ही प्रांजल भाषा में समझाया गया है। ऋषि कहते हैं—
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वयार्रात्राधिरुध्यते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः॥ 216
अर्थात्— जहाँ अग्नि का मंथन होता है, जहाँ प्राण का विधिवत् निरोध किया जाता है, जहाँ सोमरस का प्राकट्य होता है। उस स्थान पर मन नितांत पवित्र होता है।”
यही पवित्र—निरोध किया मन इष्ट प्राप्ति में सहायक होता है, पर इसके लिए बड़ा पुरुषार्थ करना होता है।
“दुष्टाश्वयुक्तभिव वाहमेनं, विद्वान मनो धारयेता प्रमत्तः।"
अर्थात्— जैसे चतुर सारथी दुष्ट अश्वों वाले रथ को भी निर्दिष्ट मार्ग में ले जाता है, वैसे ही मन को भी सावधानीपूर्वक वशीभूत रखें।” ध्यान-प्रक्रिया के लिए धनुर्धारी और चतुर सारथी बने बिना गाड़ी आगे चलेगी नही।
पातंजल योग दर्शन का मुख्य उपदेश यही है, कि मनुष्य चित्तवृत्तियों के निरोध से स्थूल भाव से प्रगति करके सूक्ष्मता की ओर अग्रसर होता जाए अथवा भौतिकता को कम करके आत्मतत्त्व को ग्रहण करता चले। मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ ही भौतिक अथवा स्थूलजगत की वस्तुओं को ग्रहणकर उनमें लिप्त होने वाली होती हैं। जैसे−जैसे उनका निरोध किया जाता है, उन्हें बहिर्मुख अवस्था से अंतर्मुख बनाया जाता है, वैसे−वैसे मनुष्य आत्मजगत में प्रवेश होता चला जाता है। मुख्य साधन है, किसी विशेष विधि के द्वारा चित्तवृत्तियों को एक लक्ष्य पर केंद्रित करना। इस अभ्यास से अंततः समाधि अवस्था प्राप्त हो जाती है जो कि योगमार्ग का चरम उद्देश्य है। इसीलिए दृष्टा मुनि ने आरंभ में ही योगसिद्धि के मूल मंत्र ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ का उपदेश देकर उसकी पूर्ति के लिए अष्टांगयोग का साधन बतलाया है। इसी योगमार्ग की विभिन्न शाखा–प्रशाखाएँ विकसित हुई हैं, जिनका सहारा लेकर साधक आत्मकल्याण का पथ−प्रशस्त करता है। चंचलता का निरोध परंतु इन सबमें एक प्राथमिक शर्त है, जो ऐसा कर सकेगा, वही अपनी बहुमूल्य क्षमताओं को योजनाबद्ध रूप ये अभीष्ट दिशा में लगाने में समर्थ हो सकेगा। प्रगति हमेशा बिखराव को सिमेटने और दिशाबद्ध चरण बढ़ाते चलने पर ही संभव होती है।
अपने भीतर क्या है? पिंड की पिटारी में कैसे−कैसे बहुमूल्य रत्नों के भंडार छिपे पड़े हैं? यह तब तक नहीं ज्ञात हो पाता जब तक कि व्यक्ति अंतर्मुखी नहीं बनता। समुद्रतल पर मणि−माणिक्य मोती तो हैं; पर उन्हें समेटने के लिए गोताखोर स्तर की प्रवीणता विकसित करनी होती है। इंद्रियों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि वे बहिरंग को ही देख पाती हैं व बिखरी संपदा के सान्निध्य से होने वाली रसानुभूति का आनंद लेने को लालायित रहती हैं। अंतः में भरे पड़े अपार वर्चस्व को जानने-खोजने के लिये इंद्रियशक्ति व बौद्धिकशक्ति का नहीं—आत्मिक शक्ति को खटखटाने वाली एकाग्रता सम्पादन की योगशक्ति का ही आश्रय लेना होता है। परम पिता ने न केवल विशाल ब्रह्मांड बनाकर रख दिया है, वरन् उसकी लघु इकाई ‘पिंड’ के रूप में गोरख धंधे से जकड़ दी है। पहेलियाँ उलझाने हेतु एक लीला-जगत विनिर्मित कर दिया है; ताकि हम अविज्ञात को जान सकें, प्रसुप्त को जगा सकें, अनुपलब्ध को हस्तगत कर सकें।
आत्मिक प्रगति की दिशा में चरण बढ़ाते समय जब साधक अंतर्मुखी बनता है तो उसे एकाग्रता संपादन की ध्यान-प्रक्रिया का सहारा लेना होता है। इसका एक ही प्रयोजन है— भीतरी सत्ता को, उसके वैभव को समझा जाए। यह परखा जाए कि इस क्षेत्र में भरी विकृतियों के दलदल में प्रगति का रथ क्यों फँसा−रुका पड़ा है। ध्यान तभी सार्थक है जब एकाग्रता से अर्जित–संग्रहित शक्ति को अभीष्ट प्रयोजन में प्रयुक्त कर लिया जाए। ‘मेडीटेशन’ की चर्चा तो बहुत होती रहती है; पर इसे एकाग्र हो सकने की कुशलता भर मानना चाहिए। इस प्रवीणता को प्राप्तकर मनुष्य अपनी बिखरी चेतना को एकत्रित करके किसी एक कार्य में लगा देने पर जादू जैसी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है।
बाँधों में पानी को रोक लिया जाता है, पर यदि इसका प्रयोग न किया जाए, इसे ऐसे ही संग्रहित रखा जाए तो उसका क्या उपयोग? जब उसे छोटे छेदों से निकाला जाता है तो वही शक्तिशाली धारा ताकतवर ‘टर्बाइन्स’ को घुमाती है व विद्युत उत्पादन होने लगता है। यह संग्रहित जल का सदुपयोग ही है जो इस शक्तिशाली रूप में निकलता है। छोटे−छोटे जलप्रपातों से पनचक्की जैसी उपयोगी मशीनें चल पड़ती हैं। यह एकाग्रता की— अर्जित प्रखरता की शक्ति है। एकाग्रता को दूसरे शब्दों में शक्ति का एकीकरण कह सकते हैं। इससे सामान्य-सा जीवन, असाधारण विशेषताओं और सफलताओं से भरा−पूरा दृष्टिगोचर होने लगता है।
असफलताओं में अन्यमनस्कता, अरुचि, उपेक्षा एवं बिखराव ही प्रधान कारण होते हैं। महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ रुचि का केंद्रीकरण एवं मानसिक क्षमता के एकीकरण का ही चमत्कार होती हैं। यह तत्त्वदर्शन समझ लिया जाए तो योग-साधना का पहला चरण पूरा हो जाता है। ध्यानयोग का उद्देश्य एक ही है—मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर एक चिंतन बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त कर लेना। जिसे इस प्रयोग में सफलता मिलने लगती हैं, वह उसी अनुपात में अंतःचेतना को बेधक प्रचंडता से अभिपूरित करता चला जाता है। शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्यबेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है।
इस प्रकार सारे मंथन का निष्कर्ष निकल कर यही आता है–
तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धदि गतं क्षयम्। एतज् ज्ञानञ्च ध्याञ्च शेषेऽन्यो ग्रन्थ विस्तरः॥
अर्थात्— तब तक मन का निरोध करे जब तक कि सब वासनाएँ नष्ट न हो जाए। यही ज्ञान है, यही ध्यान है, बाकी सब ग्रंथों का विस्तार है।
रागों का निराकरण एवं आत्मविकास की सुनियोजित रीति−नीति का निर्धारण ही ध्यान है। उस परम पिता के पवित्र और उत्कृष्ट स्वरूप के अनुरूप बनने के प्रबल प्रयास हेतु प्रचंड संकल्प उभारना ध्यानयोग की अगली सीढ़ी है। पहले निरोध, फिर सुनियोजन। धीरे−धीरे इस प्रगतिक्रम पर चलते हुए इष्ट की तादात्म्यता जीव को ब्रह्मस्तर तक ही पहुँचा देती है। जब अपनी सघन आत्मीयता का आरोपण इष्ट में किया जाता है, भले ही वह साकारोपासना का भगवान के ‘रूप’ का ध्यान हो अथवा उच्चस्तरीय सिद्धांतों से, आदर्शों से प्यार, जीव−ब्रह्म की सत्ता का एकीकरण होने लगता है।
ध्यानयोग का–एकाग्रता संपादन का सच्चा परिपक्व स्वरूप यही है कि अवांछनीय बिखराव पर नियंत्रण स्थापितकर मन को विधेयात्मक प्रयोजन में नियोजित करने की प्रवीणता अर्जित की जाए। तन्मयता और तत्परता जब एकाग्रता से मिल जाते हैं तो सफलता सुनिश्चित हो जाती है। ईश्वर, गुरु या आप्त मानवों के प्रति गहन श्रद्धा उत्पन्न करके, उनसे सघन आत्मीयता स्थापित करने की मनोविज्ञान समर्पित अध्यात्म-साधना से तन्मयता जन्म लेती है और एकाग्रता उत्पन्न होने का साधक बन जाती है। वैचारिक नियोजन और भावभरी ललक का समावेश हुए बिना चिंतन उखड़ा−उखड़ा ही रहेगा। प्रगति-पथ पर आगे बढ़ने के लिए इसी कारण दोनों का समन्वय आवश्यक है।
दैनंदिन जीवन की समस्त गतिविधियों को सुनियोजित करने, आलस्य-प्रमाद की अस्त-व्यस्तता पर अंकुश स्थापित कर लेने से प्रारंभ हुई एकाग्रता संपादन की यह साधना कालांतर में भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों के रूप में साधक पर बरसती हैं— उसे कृतकृत्य बनाती हैं। अपनी साधना का ककहरा यहीं से आरंभ किया जाए और पल−पल, पग−पग पर ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ के दर्शन को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए।
सामान्यतया मनुष्य का चिंतन पेट−प्रजनन में लगा रहता है। वासना, तृष्णा, और अहंता के भवबंधनों में जकड़ा हुआ इन्हीं ललक-लिप्साओं की पूर्ति में कोल्हू का बैल बना रहता है। इस स्थिति को उलटकर अंतःकरण की भावनाएँ और मनःसंस्थान की विचारणाओं को उत्कृष्ट आध्यात्मिकता के साथ जोड़ देने के सुयोग को योग कहते हैं। साधारणतया स्वभाव— संस्कार इसे करने नहीं देते। ऊँचा चढ़ने की इच्छा को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति रोकती है और बलपूर्वक नीचे घसीटती है। ऊपर चढ़ना, खींचना या उछालना अभीष्ट हो तो फिर साधन एवं सामर्थ्य जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा जब परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रयत्न करता है तो संचित कुसंस्कार इस मार्ग में अनेकानेक अड़चनें उत्पन्न करते हैं। उनसे जूझने के लिए जो सरंजाम जुटाना पडता है, इसी को योग-साधना कहा जाता है।
योगाभ्यास के नाम से बताई−अपनाई जाने वाली विभिन्न आकार−प्रकार की क्रिया−प्रक्रियाओं के मूल में एक ही उद्देश्य सन्निहित है कि अंतरात्मा को पशु−प्रवृत्तियों से विरत करके महान् की विशालता के साथ जोड़ दिया जाए। योग का अर्थ है–जोड़ना। किसे किसके साथ जोड़ा जाय? इस प्रश्न का एक ही उत्तर है— आत्मा को परमात्मा के साथ। यहाँ आत्मा से अभिप्राय जीव की उस स्थिति से है, जिसमें वह संचित कुसंस्कारों की दलदल में फँसा हुआ, हेय प्रयोजनों में रस लेता और उन्हीं में प्रवृत्त रहकर जीवन संपदा को समाप्त करता है। यहाँ परमात्मा से तात्पर्य ब्रह्मचेतना की उस तरंग से है जो जब भी मनुष्य से मिलेगी, आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने की प्रेरणा अंतःकरण में उत्पन्न करेगी। विशालता उसका स्वरूप है। यह आत्मीयता की व्यापकता है— जिसकी उदार सेवा-साधना से ही तृप्ति होती है। पक्षी सुविस्तृत आकाश में उड़ने पर व्यापक अंतरिक्ष को अपना कार्यक्षेत्र पाता है। परमात्मा की परिधि में प्रवेश करने वाले साधक को भी सर्वत्र अपना ही आपा दिखता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की रीति−नीति अपनाने वाला दृष्टिकोण एवं कार्यक्रम ही वरण करना होता है।
योग का तात्पर्य है— सीमित को असीम के साथ, क्षुद्र को महान के साथ, नर को नारायण के साथ, कामना को भावना के साथ, स्वार्थ को परमार्थ के साथ जोड़ देना। योगाभ्यास का समूचा परिकर साधक को उसी आस्था का अभ्यस्त बनाने के लिए सृजा गया है।
घर में बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर, रेडियो आदि उपकरण अपने आप में सही होने पर भी चलते तभी हैं, जब उनका संबंध बिजलीघर से जुड़ा हो। यह जोड़ने वाले तार न तो बिजली घर है और न उपकरण; फिर भी उन्हीं के आधार पर बिजली की शक्ति का लाभ मिल पाता है।
बड़े तालाब और छोटे तालाब की ऊपरी सतह एक करनी हो तो, दोनों के बीच नाली बना दी जाती है। बड़े का पानी छोटे में आने लगता है और वह प्रवाह तब तक चलता ही रहता है, जब तक कि दोनों की सतह एक जैसी नहीं हो जाती। योग-साधना में आत्मा और परमात्मा दोनों परस्पर जुड़ते हैं; अंततः एक जैसे हो जाते हैं।
बेल की कमर पतली होती है, वह फैल तो सकती है, पर ऊँची नहीं चढ़ सकती। पेड़ से लिपट जाने पर वह क्रमशः ऊपर उठने लगती है और पेड़ की ऊँचाई तक पहुँच जाती है। आत्मा बेल की तरह है; पर परमात्मारूपी पेड़ से लिपटने लगे तो उसका स्तर भी उतना ही ऊँचा उठ जाता है।
पतंग की डोर किसी कुशल उड़ाने वाले के हाथ में रहे तो वह कागज का टुकड़ा आसमान चूमता है। लकड़ी के नगण्य से टुकड़े से बनी कठपुतली जब बाजीगर के हाथों अपने को सौंप देती है तो उसका अभिनय देखते ही बनता है। उड़ाने वाले के हाथ से डोर छूट जाने पर पतंग जमीन पर ही पड़ी दिखाई देगी। यह बात कठपुतली के संबंध में भी है। बाजीगर से संपर्क न रहने पर वह किसी कोने में छितराई पड़ी होगी। डोरी को उपासना कह सकते हैं जो सही और सुदृढ़ हो तो आत्मा, पतंग की तरह ऊपर उठेगा और कठपुतली की तरह प्रशंसा योग्य अभिनय करेगा।
बाँस का टुकड़ा अपने को खाली कर देता है। साथ ही वादक के होठों के साथ सटकर समर्पण में भी कमी नहीं रहने देता, वादक की फूँक के अनुरूप बजने लगता है। यही है बांसुरी का सौभाग्य जिससे उसकी ध्वनि पर सभी मोहित होते हैं। हिरन खड़े रह जाते हैं और साँप नाचने लगते हैं। योग में साधक को साध्य के प्रति यही आत्मसमर्पण कथनी तक सीमित न रहकर करनी में उतारना पड़ता है।
सीप का मुँह खुला होता है तो स्वाति बूँदों का अनुग्रह उसमें मोती उत्पन्न करने का सुअवसर प्रदान करता है। चंदन वृक्ष के समीप उगे हुए झाड़−झंखाड़ भी वैसे ही सुगंधित बन जाते हैं। इसे एकात्मता का चमत्कार कह सकते हैं।
आग के समीप पहुँचने पर हर वस्तु गरम होने लगती है। इसी प्रकार बर्फ की समीपता से ठंडक का आनंद मिलता है। ईंधन जब आग के साथ एकात्म होता है तो उसका अपना मूल्य नगण्य होने पर भी अग्नि के समस्त गुणों से भरपूर बन जाता है। उपासना की योगपरक प्रक्रिया यही है। उसमें आत्मसमर्पण और अनुशासन का अवधारण करना पड़ता है। तादात्म्य होने का यही तरीका है, इसमें भक्त को भगवान के अनुशासन मानने होते हैं, उसे अपनी मर्जी पर चलाने— मनोकामना को पूरी करने के लिए बाधित नहीं करना पड़ता। चिड़ीमार-मछलीमार की तरह फुसलाकर चंगुल में फँसा लेने और उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कुचेष्टा कोई सच्चा भक्त न कर सकता है और न वैसा कुछ सोच ही सकता है।
नाला नदी में मिलकर तद्रूप होता है। नदी को लौटकर नाला बनने के लिए बाधित नहीं करता। बूँद समुद्र में अपने को विलीन करके उतनी ही विशाल बनती है, किंतु समुद्र को बूंँद बना लेने की बात नहीं सोचती। लोहा परस से मिलकर अपनी कलिका गँवा देता है और उसका परिवर्तित स्वरुप सोना बनकर चमकता है। उसका यह आग्रह नहीं होता कि पारस को लोहा बनना चाहिए। पत्नी-पति को आत्मसमर्पण करती है और बदले में उसके यश-वैभव की उत्तराधिकारिणी बन जाती है। आग ईंधन नहीं बनती। ईंधन को ही आग बनना पड़ता है। पानी दूध में मिलता है और उसी में विलय हो जाता है। उसका यह हठ नहीं होता है कि दूध को पानी बनना चाहिए। वरिष्ठ के साथ कनिष्ठ जुड़ते हैं। वरिष्ठ को कनिष्ठ बनने के लिए विवश नहीं करते हैं। यही अध्यात्म योग है। आँधी के साथ चलने वाले तिनके और पत्ते आसमान में उड़ते दिखाई पड़ते है। भक्त की स्थिति भी भगवान को आत्मसमर्पण करने के उपरांत ऊँची उठती चली जाती है और अंततः दोनों इकट्ठे होकर रहते हैं। बादल के साथ मिलकर समुद्र का खारा–भारी और अचल पानी आकाश की सैर करता है। वर्षाजल बनकर सबकी प्यास बुझाने का श्रेय प्राप्त करता है। भक्ति की प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया भी यही होती है।
योग की सिद्धियों का शास्त्रों में विशद वर्णन मिलता है। उसे किसी क्रिया−प्रक्रिया का प्रतिफल नहीं; व्यक्ति की उस आस्था की प्रतिक्रिया कहना चाहिए जो साधक को महान के प्रति आत्मसमर्पण करने के लिए विवश करती है। इसी को एकात्म या अद्वैत की स्थिति कहते हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले अपने को देवत्व के लिए समर्पित करता है और बदले में दैवी संपदाओं का अधिष्ठाता, सिद्धपुरुष बनता है।
चित्तोन्मेषनिमेषाभ्यां संसारस्योदयक्षयो।
वासनाप्राणसंरोधादनिमेषं मनः कुरु॥
चित्त (मन) के उदय और अस्त से संसार का उदय और अस्त होता है। अतः वासना और प्राण का निरोध करके ‘मन’ का निरोध करें।
प्रगति-पथ पर चलते हुए दो कदम बढ़ाने पढ़ते हैं। पिछला एक पैर जिस जगह पर था उसे छोड़ता है और दूसरा जहाँ था उसे पीछे छोड़कर स्वयं आगे बढ़ता है। यह क्रम दूसरे को भी अपनाना पड़ता है। आगे बढ़ने के लिए पिछला छोड़ना पड़ता है, छोड़ने के बाद साथी से आगे निकल जाने का प्रयास करना होता है। यही सामान्य यात्रा में भी होता है और यही जीवनलक्ष्य की प्रगतियात्रा में भी करना होता है।
आत्मोत्कर्ष की दिशा में अग्रसर होने वाले को दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक वह जिसमें पूर्वजन्मों की पिछड़ी योनियों में संचित हुए उन कुसंस्कारों का परिमार्जन करना होता है। जो उन परिस्थितियों में भले ही उपयुक्त रहे होंगे, पर मानवी कलेवर में प्रवेश करने के उपरांत वे अनावश्यक ही बन जाते हैं। गरिमा की दृष्टि से ओछे भी जान पड़ते हैं और अपनाए रहने पर हानिकारक भी सिद्ध होते हैं। छोटे बच्चे की पोशाक बड़े होने पर बेकार हो जाती है। कोई उसी को पहने रहने का आग्रह करे तो न केवल उपहासास्पद ही बनेगा; वरन् ताल-मेल बिठाने में भारी अड़चन भी अनुभव करेगा; जबरदस्ती करने पर मुसीबत में भी फँसेगा। पशु−पक्षी निर्द्वंद होकर नंगे विचरते हैं जहाँ चाहे बिना किसी प्रतिबंध अनुशासन के मल−मूत्र भी त्यागते हैं; पर वैसा करना मनुष्य के लिए अशोभनीय है। वह जब उन योनियों में रहा होगा तब उसे प्रवृत्तियाँ सहज लगती थी और अभ्यस्त थी; पर अब उनके लिए आग्रह करना अबुद्धिमत्तापूर्ण ही माना जाएगा। उन्हें छोड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
न केवल पशु और मनुष्य के बीच भारी अंतर पड़ता है; वरन् मनुष्य की अविकसित और विकसित स्थिति में भी ऐसा ही फर्क पड़ जाता है। बच्चे जैसा स्वेच्छाचार बरतते हैं, वैसी अनुशासनहीनता बड़े होने पर नहीं चल सकती। बचपन और प्रौढ़ता न केवल आयु के हिसाब से आँकी जाती है; वरन् स्तर भी एक कसौटी है। अनगढ़ कुसंस्कारी, लालची, मोहग्रसित, निष्ठुर, कृपण, संकीर्ण, स्वार्थी प्रकृति के व्यक्ति किसी भी आयु के क्यों न हों अनगढ़, अविकसित, बचकाने ही माने जाएंगे। ऐसे ही लोग ऐसी भूलें करते हैं, कुचेष्टाएँ बरतते हैं, जिन्हें अनैतिक अवांछनीय कहा जाए। पाप-कर्मों का इसी स्थिति में उभार बाहुल्य रहता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वालों काे यह पिछला कदम उस स्थान से हटाना पड़ता है, जहाँ वह जमा हुआ था। इसे परिशोधन-परिमार्जन भी कह सकते हैं।
दीवार चुनने से पूर्व नींव खोदनी पड़ती है। पोशाक सीने का प्रथम चरण काटना है, दूसरा सीना। बीज बाेने से पहले खेत की जुताई होती है। उपकरण ढालने से पहले धातु को गलाना पड़ता है। सरकस के कलाकार अच्छा सम्मान और वेतन पाते हैं, पर इससे पहले उनकी अच्छी खासी कुटाई−पिटाई होती है। पकवान को पहले चूल्हे पर अग्नि परीक्षा देनी होती है। रोगग्रस्त को कड़ुई औषधि पीने, सुई चुभने, आपरेशन की मेज पर लेटने जैसी नई आफतें ओढ़नी पड़ती हैं। इसे पिछला पैर उठाना कह सकते हैं। वाल्मीकि को डाकू से ऋषि बनने के मध्यांतर में कठोर तप करना पड़ा था। इतिहास में ऐसे अगणित व्यक्तित्वों का उल्लेख है जो बहुत समय तक गई−गुजरी स्थिति में रहे अथवा हेय, निंदनीय जीवन जीते रहे; इसके उपरांत पलटा खाया तो कुछ से कुछ हो गए। इन परिवर्तनों की एक मध्य बेला भी रही है, उसमें उन्हें अभ्यस्त कुसंस्कारों से जूझना पड़ा है, साथ ही परिष्कृत जीवनचर्या अपनाने के लिए जिस अभिनव शासन एवं कठोर अनुशासन की आवश्यकता पड़ती है उसे भी जुटाना पड़ा है।
इन दो मोर्चों पर एक साथ लड़ने की प्रक्रिया को तपश्चर्या कहते हैं। महान परिवर्तनों में हर मध्यांतर का यही स्वरूप रहा है, उसको असुविधा भी होती है, कष्ट भी होता है और एक अच्छे−खासे अंतरंग एवं बहिरंग विग्रह का सामना करना पड़ता है। अशुद्ध धातुओं का परिशोधन और उनका उपयोगी उपकरणों में परिवर्तन भट्टी की प्रचंड ऊष्मा ही संपन्न कर सकती है। बंधनग्रस्त भ्रूण को उन्मुक्त वातावरण में गतिशील होने का अवसर मिले, इसके लिए प्रसवपीड़ा की कष्टसाध्य प्रक्रिया में से गुजरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। जननी की तरह बालक को भी भयंकर त्रास सहना पड़ता है, तभी दोनों अपने−अपने स्तर के लाभ उठा पाते हैं। गर्भवती को पुत्रवती होने का सौभाग्य मिलता है और उदरस्थ भ्रूण एक गांठ के रूप में न रहकर खुले वातावरण में साँस लेता है; हाथ-पैर चलाता देखा जाता है। यह सुअवसर देने में प्रसवपीड़ा का स्वरूप कष्टकर होते हुए भी उसे सफल करना ही होता है।
तपश्चर्या का दूसरा पक्ष है— प्रगति के लिए पूर्वाभ्यास। इसे परिष्कार कह सकते हैं। प्रत्येक दुर्बल को सबल बनने के लिए व्यायामशाला में निर्धारित कसरतें करनी होती हैं। सभी जानते हैं कि अखाड़े की उठक−पटक कितना दबाव डालती है, कितनी चोटें सहने को विवश करती है। आग की तपन सहनकर सामान्य-सा पानी ऐसा सशक्त भाप बनता है, जिससे रेल का इंजन तूफानी गति से दौड़ सके। कच्ची मिट्टी की ईंटें भट्टे में लगने के उपरांत पत्थर जैसी कठोर, सुंदर एवं चिरस्थाई बन जाती हैं। यह प्रगति−पथ पर अग्रसर होते समय अपनाया जाने वाला दुस्साहस है। इसी रीति−नीति को अपनाकर सामान्यजन महामानव बनते रहे हैं। ऐसे लोगों को आत्मानुशासन— त्याग-बलिदान करना पड़ता है और लोकहित में परमार्थपरायण रहकर अनेकानेक असुविधाओं का सामना करना पड़ा है। इस परीक्षा में से गुजरे बिना किसी की प्रामाणिकता एवं विशिष्टता परखी भी तो नहीं जा सकती। आदर्शों के लिए कष्ट सहने वाले तपस्वी ही जन सम्मान पाते हैं। महत्त्वपूर्ण कार्य एवं पद उन्हीं के हाथों सौंपे जाते हैं। कष्ट से बचते रहने और बातों के छप्पर तानकर वरिष्ठता झटक लेने वाले प्रायः निराश, खाली हाथ ही बने रहते हैं। परखें बिना सिक्के तक को कोई लेता नहीं। खोटी चवन्नी देने वाले के सिर पर ही मार दी जाती है। आदर्शों की बकवास का कोई महत्त्व नहीं, उनके प्रति किसकी निष्ठा है इसकी जाँच−पड़ताल एक ही आधार पर की जाती है कि उच्चस्तरीय प्रतिपादन के निमित्त कौन कितनी कठिनाई सहन करने के लिए स्वेच्छापूर्वक अग्रगामी बना। तप-साधना का सिद्धांत यही है। प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए आदर्शवादी त्याग−बलिदान करने की माँग पूरी करनी होती है। जीवनचर्या को सन्निहित सिद्धांतों के सहारे अधिकाधिक पवित्र प्रखर एवं परिष्कृत करने का न केवल संकल्प करना पड़ता है; वरन् उसे निष्ठापूर्वक निभाना भी होता है।
सद्गुणों का संवर्धन इस बात की पक्की गारंटी है कि कुछ अपवादों को छोड़कर संपर्क-क्षेत्र में सम्मान बढ़ेगा और सहयोग मिलेगा। आए दिन क्लेश-विग्रहों में परिस्थितियों की प्रतिकूलता ही कारण प्रतीत होती है; पर वस्तुतः वैसा है नहीं। अपनी ही मनःस्थिति दोष−दुर्गुणों से भरी होती है तो सामने वाले भी तदनुरूप अवांछनीय प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं; फलतः असहयोग— उपेक्षा के वातावरण पग−पग पर असमंजस खड़े होते हैं। कई बातों से उग्र प्रतिक्रियाएँ भी होती हैं और मार-काट जैसे झंझट भी खड़े हो जाते हैं। यों इनमें सर्वथा अपना ही दोष नहीं होता। संसार में भरी हुई दुष्टता भी कम त्रासदायक नहीं होती, फिर भी इतना तो है ही कि आक्रमणों से सही एवं साहसपूर्ण तरीकों से निपटने में न्यूनतम हानि उठानी पड़ती है। कम से कम असंतुलनजन्य त्रास से तो बचाव हो ही जाता है जो कि स्वनिर्मित होने पर भी दूसरों द्वारा किए गए आक्रमण जितना ही हानिकारक होता है।
आत्मानुशासन बरतने वाले अपनी क्षमताओं को अवांछनीयताओं में नष्ट−भ्रष्ट होने से बचाकर उन्हें सत्प्रयोजनों में लगाते और उच्चस्तरीय योजनाओं में समाहित किए रहते हैं; फलतः अपनाई गई दिशा में आशाजनक सफलता मिलती चलती है। ऐसी सफलताएँ बहुधा आश्चर्यजनक होती हैं और सामान्यजन उन्हें दैवी वरदान जैसा मानने लगते हैं; जबकि वस्तुतः वे उपलब्धियाँ अपने ही सद्गुणों की प्रतिक्रिया होती हैं।
हर दिन नया जन्म और हर रात नया मरण मानकर चलने से जीवन-संपदा के सदुपयोग के लिए अन्तःप्रेरणा उभरती है। इसलिए हर साधक को इस साधना को अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए।
प्रातःकाल नींद खुलते ही नया जन्म होने की कल्पना जगाई जाए, भावना उभारी जाय, साथ ही यह भी सोचा जाए कि मात्र एक दिन के लिए मिले इन सुयोग-सौभाग्य का श्रेष्ठतम सदुपयोग किस प्रकार किया जाए? कुछ समय इसी सोच-विचार में समय लगाने के उपरांत बिस्तर छोड़कर उठना चाहिए और नित्यकर्म से निवृत्त होने के लिए जाना चाहिए।
ठीक इसी प्रकार रात्रि को सोते समय यह विचार करना चाहिए कि निद्रा एक प्रकार की मृत्यु है। अब मरण की गोद में जाया जा रहा है। मृत्यु के उपरांत प्राणी, ईश्वर के दरबार में पहुँचता है। पहुँचते ही तत्काल पूछताछ होती है। उस पूछताछ का एक ही विषय होता है— "सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन जिस प्रयोजन के लिए दिया गया था, उसका उपयोग किस प्रकार किया गया, इसका विवरण दिया जाए।” इस विवरण को शानदार ढंग से सिर उठाकर दिया जा सके और उसे सुनकर परलोक के अधिष्ठाता संतोष व्यक्त कर सकें। अगली बार कुछ बड़ा पद—उत्तरदायित्व सौंपने का विचार कर सकें। यही है वह भविष्य चिंतन जिसे रात्रि को सोते समय तब तक करते ही रहना चाहिए, जब तक कि निद्रा स्वयं आकर अपने आँचल से ढक न ले।
उठते समय की उपरोक्त साधना को ‘आत्मबोध’ और सोते समय वाले चिंतन को ‘तत्वबोध’ कहा गया है। यह दोनों देखने, कहने, सुनने एवं करने में अत्यंत साधारण जैसे लगते हैं; किंतु यदि चिन्ह पूजा की तरह उनकी लकीर न पीटी जाए और गंभीरतापूर्वक उन विचारणाओं की परिणति एवं फलश्रुति पर विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि इस बीज का विकास विस्तार विशालकाय वटवृक्ष के रूप में होता है। चिनगारी तनिक-सी होती है; किंतु उसे ईंधन की सुविधा मिल सकें तो उसे प्रचंड दावानल बनते और योजनों लंबे वनप्रदेश उदरस्थ करते देर नहीं लगती। आँख से न दीख पड़ने वाला, बाल की नाक से भी कम विस्तार वाला शुक्राणु जब नौ महीने जितने स्वल्पकाल में एक अच्छा खाना शिशु बनकर प्रकट होता है तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त विचारद्वय समुचित परिपोषण पाने पर जीवन को देवत्व से लपेट लेने वाले वरदान— सौभाग्य के रूप में प्रकट-विकसित न हो सकें।
जन्म के उपरांत जीवन-संपदा के उपयोग का अवसर मिलता है और मरण के उपरांत ईश्वर की न्याय दीर्घा में खड़े होकर कृत्यों का परिणाम भुगतने के लिए विवश होना पड़ता है। इन दोनों समस्याओं का सामना न करना पड़े, बचाव किसी भी मनुष्य शरीरधारी के लिए संभव नहीं। अस्तु उनका सामना करने के लिए मनोभूमि बनाने एवं तैयारी करने में ही बुद्धिमत्ता है। चिंतन-चेतना को इस संदर्भ में उपेक्षा नहीं बरतनी चाहिए; वरन् जो अवश्यंभावी है इसके लिए समय रहते जागरूकता बरतने एवं तत्परता अपनाने में ही दूरदर्शिता है।
इस तथ्य को जितनी गंभीरतापूर्वक समझा जाए उतना ही अच्छा है कि “उपलब्ध मनुष्य जीवन ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है।” उसमें आत्मोत्कर्ष की समस्त संभावनाएँ भरी पड़ी है। साथ ही ईश्वर को प्रसन्न करने तथा उस अनुकंपा के आधार पर बहुत कुछ पाने का ठीक यही अवसर है। इसे महत्त्वहीन न समझा जाए, उसे भार की तरह न ढोया जाए। इस अलभ्य सौभाग्य को अस्त−व्यस्त प्रयोजनों में न गँवाया जाए। बुद्धिमत्ता इसी में है कि संयोगवश आँगन में लगे इस कल्पवृक्ष को ठीक सींचा-पोषा जाए— प्रतिकूलताओं से बचाया जाए और इस विकसित स्थिति तक पहुँचाया जाए, जिसमें उसके सुखद छाया में बैठने और अभीष्ट वरदान पाने का सौभाग्य बरसने लगे। अज्ञानग्रस्त इस अलभ्य अवसर का मूल्यांकन नही कर पाते हैं और न उसके सदुपयोग की कोई योजना-व्यवस्था बनाते हैं; फलतः अनाड़ी के हाथ पड़े हुए हीरे की हार की तरह उसके साथ खिलवाड़ हो तो धागे टूटने, मनके बिखरने जैसी विडंबना बनती रहती है। इससे बड़ी दुर्भाग्यभरी दुर्घटना और कोई हो नहीं सकती कि जीवन का महत्त्व न समझा जा सके, उसका मूल्यांकन न बन पड़े और किसी प्रकार मौत के दिन पूरे कर लेने के अतिरिक्त और कुछ पल्ले न पड़े। पेट-प्रजनन में व्यस्त रहना तो तुच्छ प्राणियों को क्रियाशील रखने वाले प्रकृति का हण्टर भर है। वह तो हर याेन में पड़ता ही रहा है, भविष्य में जन्म लेना पड़े तो उनमें भी यह सड़ासड़ बरसेगा ही। मानवी बुद्धिमत्ता की सार्थकता इसमें है कि वह इस अलभ्य अवसर का सौभाग्य-सदुपयोग मनुष्य को समझाए, उस निष्कर्ष पर पहुँचाए— उस मार्ग पर चलाए जिसके आधार पर वर्तमान को समुन्नत और भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकना संभव हो सकता है। उसके लिए उपयुक्त दिशाधारा का सुनिश्चित निर्धारण बन पड़े तो ही प्रस्तुत सौभाग्य से लाभांवित हो सकना संभव है। देखना यही है कि इस दैनंदिन जीवन की तप-साधना द्वारा जीवन को एक महान मोड़ दे सकने वाली प्रखरता से संपन्न बनाया जा सका या नहीं।
हर साधक को यही अनुभव करना चाहिए कि वे साधना की अवधि में माता के गर्भ में निवास कर रहे हैं और ऐसा आवश्यक पोषण प्राप्त कर रहे हैं, जिसके सहारे जन्म लेने के उपरांत समूचे जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने में समर्थ हो सके। गुरुगृह को भी माता के गर्भ सदृश्य माना गया है। साधक की इन दिनों मान्यता ऐसी ही होनी चाहिए। ऊषाकाल, रात्रि की दिखाई की विदाई और दिनमान की अगवानी करता है। साधना-अवधि में ऐसी ही अनुभूति होनी चाहिए कि पशु का स्तर त्यागने और देवस्तर में प्रवेश करने का यह ऊषाकाल है। इन्हीं क्षणों में महान परिवर्तन की संभावना बन रही है। सघन संव्याप्त तमस का पलायन और समूचे आकाश में प्रभाव का प्रकाश वितरण सच-मुच ही एक आश्चर्य है। इतने थोड़े क्षेत्रों में इतना महान परिवर्तन देखते हुए लगता है, ऊषाकाल की प्रभातबेला कितनी अद्भुत, कितनी सशक्त एवं कितनी सौभाग्यशाली है। ठीक इसी प्रकार साधना-तपश्चर्या की भूमिका भी ऐसी ही होनी चाहिए, जिसे कर्त्ता का अभिनव भाग्योदय कहकर शेष सारे जीवन सराहा और स्मरण रखा जा सके।
पर यह संभव तभी है जब साधक अपनी भाव-भूमिका को गतिशील रखें और पराक्रम की चरम सीमा तक पहुँचे। यों माता भी भ्रूण को बहुत कुछ देती है, पर उसे भ्रूण के निजी पुरुषार्थ की तुलना में नगण्य ही कहा जा सकता है। शरीरशास्त्री जानते हैं कि गर्भस्थ शिशु आत्मविकास के लिए जितना पराक्रम करता है उतना ही वह जन्म लेने के उपरांत भी जारी रख सके तो उसे देव-दानवों जैसी महानता उपलब्ध हो सकती है। भ्रूण जब परिपक्व हो जाता है तो उदरदरी से बाहर निकालने में उसी को चक्रव्यूह बेधने जैसा पराक्रम करना पड़ता है। प्रसवपीड़ा उसी व्याकुल प्रयत्नशीलता की परिणति है। यदि भ्रूण दुर्बल हो तो उसे पेट चीरकर ही बाहर निकालना पड़ेगा। स्वाभाविक प्रसव संभव न हो सकेगा। अंडे को मुर्गी सेती तो है, पर उसके भीतर भरे हुए कलल में अपना जो निजी समुद्र मंथन चलता है उसे देखकर चकित रह जाना पड़ता है। पका अंडा जब फूटने को होता है तो उसकी सारी भूमिका भीतर वाले चूजे को ही निभानी पड़ती है। फूटने के समय अंडा थरथराता है उसमें पतली दरार पड़ती है। दरार तेजी से चौड़ी होती है और बच्चा उछलकर ऊपर आ जाता है। यह पुरुषार्थ न बन पड़े तो अंडा सड़ेगा और उससे बच्चा निकलने की बात किसी भी प्रकार बनेगी नहीं। साधना-पथ के पथिक को दैवी अनुग्रह की भी कमी नहीं रहने वाली पर उतने भर से ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा होने वाला नहीं है। भ्रूण एवं चूजे की तरह आवरण को तोड़कर बाहर निकलने के लिए पराक्रम तो उसका ही प्रमुख रहेगा। उस उक्ति में परिपूर्ण सच्चाई भरी हुई है, जिसमें कहा गया है कि “ईश्वर मात्र उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।”
जीवन अपने आप में पूर्ण है। वह पूर्ण से उत्पन्न हुआ है और पूर्णता से परिपूर्ण है। अंगार और चिनगारी में आकार भेद तो है, पर गुण-धर्म का नहीं। परमात्मा विभु है और आत्मा लघु। यह आकार भेद हुआ, तात्त्विक दृष्टि से दोनों में समानता है। इसलिए “शिवोऽहम् –सच्चिदानंदोऽहम्’ रूप में उस तात्त्विक एकता का उद्बोधन कराया जाता है। इस तथ्य के रहते मनुष्य की दुर्गति क्यों होती है? वह दीन-दुर्बल क्यों रहता है? शोक−संताप क्यों रहता है? प्रगति-प्रक्रिया से वंचित रहने का क्या कारण है? इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है। उपलब्ध संपदा का अपव्यय-दुरुपयोग। इस दुर्गुण के रहते तो कुबेर का खजाना भी खाली हो सकता है। रावण जैसा समर्थ भी सपरिवार धराशायी हो सकता है। भस्मासुर, वृत्तासुर, हिरण्याक्ष जैसे दुर्दांत दैत्य बेमौत मारे गए, इस विनाशलीला में उनके अपने दोष−दुर्गुणों की भूमिका ही प्रधान थी।
मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु असंयम है। सामर्थ्यों का अपव्यय— दुरुपयोग ही असंयम है। शक्ति तथा संपन्नता का लाभ तभी मिलता है जब उसका सदुपयोग बन पड़े। दुरुपयोग होने पर तो अमृत भी विष बन जाता है। माचिस जैसी छोटी एवं उपयोगी वस्तु अपना तथा पड़ौसियों का घर-बार भस्म कर सकती है। ईश्वरप्रदत्त सामर्थ्यों का सदुपयोग कर सकने की सूझ−बूझ एवं संकल्पशक्ति को ही मर्यादापालन एवं संयमशीलता कहते है। इसी का अभ्यास करने के लिए कई प्रकार की तप-साधनाएँ करनी पड़ती है। साधना द्वारा उस प्रखरता को उभारना एक बड़ा उद्देश्य है, जो मानवीशक्ति को अभ्यस्त अपव्यय से बलपूर्वक बचाती और दबाव देकर उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित करती है।
अध्यात्म का ककहरा वहाँ से प्रारंभ होता है जहाँ मनुष्य उच्चचेतन का द्वार खटखटाता है, अन्तःकरण के परिष्कार−परिमार्जन में निरत होता है। इस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलती है वह उतनी ही चुंबकीय क्षमता अर्जित कर लेता है और सांसारिक सफलताओं की सिद्धि— आत्मिक-प्रगति की ऋद्धि को प्रचुर परिमाण में हस्तगत करता है। आत्मिकी इसी उच्चस्तरीय प्रगति-पथ पर बढ़ चलने और अभीष्ट सफलता प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त करती है। इसी प्रयास में निरत रहकर देवत्व की— उसके साथ जुड़ी हुई अगणित विशिष्टताओं की उपलब्धि संभव होती है।
आध्यात्मिक भाव−कल्प को आयुर्वेदीय शरीरकल्प का समानांतर ही समझा जाना चाहिए। एक में काया की दुर्बलता, रुग्णता, जीर्णता आदि अनपेक्षित परिस्थितियों से मुक्त किया जाता है, दूसरी में आस्था, आकांक्षा एवं अभ्यास पर चढ़ी हुई कुसंस्कारिता से त्राण पाने का प्रयत्न किया जाता है।
शरीर की प्रकृति-संरचना ऐसी अद्भुत है कि यदि उस पर असंयमजन्य अस्त–व्यस्तता न लादी जाए तो वह शतायु की न्यूनतम परिधि को पार करके सैकड़ों वर्ष जी सकती है। मरण तो प्रकृति धर्म है पर जीर्ण-शीर्ण होकर जीना मनुष्य का अपना उपार्जन है। आरंभ में ही में ही सुपथ पर चला जाए तब तो कहना ही क्या, अन्यथा मध्यकाल में रुख बदल दिया जाए तो भी ऐसा सुधार हो सकता है, जिसे अद्भुत-अप्रत्याशित कहा जा सके।
चेतनातंत्र की संरचना भी ऐसी ही है। ईश्वर का अंश होने के कारण मानवी चेतना में उच्चस्तरीय विभूतियाँ भरी पड़ी हैं। पिंड ब्रह्मांड का छोटा रूप ही तो है। परमात्मा की ही छोटी प्रतिकृति आत्मा है। शरीर में वे सभी तत्त्व विद्यमान हैं जो प्रकृति के अंतराल में बड़े एवं व्यापक रूप में पाए जाते हैं।
कल्प-साधना से न केवल आरोग्य लाभ मिलता है; वरन तपश्चर्या की ऊर्जा से स्वयं को पकाकर ऐसा भी बहुत कुछ पाया जा सकता है, जो प्रकृति की रहस्यमयी परतों में खोजा-पाया जाता है। सिद्धपुरुषों का प्रकृति पर आधिपत्य होता है। इनका आधारभूत कारण यह है कि काया में उन्हीं रहस्यों की बीजरूपी उपस्थिति को कृषिकार्य जैसे साधनों से विकसित कर लिया जाता है; फलतः काया समूची माया का प्रतिनिधित्व करने लगती है। काया और प्रकृति के बीच आदान−प्रदान होने लगता है। जिस प्रकार पृथ्वी के ध्रुवकेंद्र व्यापक ब्रह्मांड से अपनी आवश्यक सामग्री खींचते, उपयोग करते रहते है, उसी प्रकार सिद्धपुरुषों की काया न केवल ब्रह्मांडव्यापी माया से— प्रकृति से आदान−प्रदान करती है; वरन चेतनात्मक विशेषता के कारण कई बार उस पर आधिपत्य भी करने लगती है। तपस्वियों की अलौकिक चमत्कारी सिद्धियों का यही रहस्य है।
आत्मा के नाम से पुकारी जाने वाली ब्रह्मऊर्जा की छोटी चिनगारी का मौलिक स्वरूप भी प्रायः वैसा ही है। वह भी उतनी ही जाज्वल्यमान— प्रदीप्त है। उसकी तीव्रता में मंदता एवं ऊर्जा में कमी तो कषाय−कल्मषों के कारण आती है। पतित— पराजित तो यह आवरण करता है। दर्पण के सामने जो भी वस्तु आती है, उसका प्रतिबिंब दिखने लगता है। मूढ़ता और दुष्टता सामने हो तो आत्मा का स्वरूप भी वैसा ही दिखने लगता है। यदि पर्दा हटा दिया गया तो दृश्य बदलते देर न लगे।
पुरुष−पुरुषोत्तम की, जीव-ब्रह्म की, नर-नारायण की एकता का प्रतिपादन काल्पनिक नहीं है। योगीजनों का प्रमाण— उदाहरण सामने है। उन्हें ईश्वर नहीं तो ईश्वरवत्— ईश्वर का प्रतिनिधि तो माना ही जाता है। इस स्थिति को प्राप्त कर सकना हर किसी के लिए संभव है। मनुष्य शरीर में अनेकों देवदूत समय−समय पर आए है और ऐसे काम करते रहे हैं, जिससे उन्हें अवतार की— भगवान की मान्यता मिली। इस स्थिति को उपलब्ध करने में किसी दैवी वरदान की आवश्यकता नहीं पड़ती। मनुष्य अपने ही पराक्रम-पुरुषार्थ से कषाय−कल्मषों के आच्छादन को तोड़ना है और चक्रव्यूह बेधकर बाहर जा निकलता है। चक्रवेधन जैसी प्रक्रियाएँ भवबंधनों की जकड़न तोड़ने और चक्रव्यूह से बाहर निकलने की भावनात्मक प्रक्रिया है। उसे पूरी करने वाले योगी उस जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त करते हैं, जिनका सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य नामों से वर्णन−विवेचन किया जाता है।
‘योग' किसी शारीरिक या पदार्थपरक हलचल का नाम नहीं है। जैसा कि आमतौर से आसन, प्राणायाम या नेति, धोति आदि को बताया जाता है। ये तो शरीर और मन का व्यायाम भर है जो प्रकारांतर से आत्मपरिष्कार में सहायक सिद्ध होते हैं। तत्त्वतः योग अंतराल पर चढ़े हुए अवांछनीय आच्छादनों को हटाने और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय परिधान पहनाने की भावनात्मक प्रक्रिया है। उसमें अभ्यस्त आदतों के रूप में स्वभाव का अंग बनी हुई कुसंस्कारिता की जड़ें काटनी होती हैं और उन झाड़−झंखाड़ों के स्थानों पर उच्चस्तरीय आस्थाओं को अंतराल में उगाना— परिपुष्ट करना होता है। अन्तःक्षेत्र का यह समुद्रमंथन ही ‘योग‘ है। खारे जल से युक्त सागर को मथकर किसी समय विषवारुणी को हटाया और अमृत जैसी अनेकों विभूतियों को हस्तगत किया गया था। योग व्यक्तिगत ‘समुद्रमंथन’ है जिसकी सारी प्रक्रिया अंतःक्षेत्र में चलती है। उखाड़ने और जमाने के ऊहापोह से धातुओं का ताप भट्टी में गरम होता है और गलाने–ढलाने का कायाकल्प प्रस्तुत करता है। इसी को योग-साधना कहते हैं। संक्षेप में आंतरिक परिष्कार का नाम ‘योग' और क्रिया−प्रक्रिया में संयम-अनुशासन का समावेश ‘तप’ कहा जाता है। इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए कुछ न कुछ प्रत्यक्ष प्रयोगोपचार भी चलाने पड़ते हैं। योग-साधना— तपश्चर्याओं की समस्त ध्यानपरक, तितिक्षापरक क्रिया−प्रक्रिया ऐसे ही निर्धारणों से भरी पड़ी है। इतने पर भी इस तथ्य को समझ ही लेना चाहिए कि उपचारों की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि व्यक्तित्व के अदृश्य स्तर का; अंतराल का, कायाकल्प संभव हो सके। दृष्टिकोण और कार्य−प्रवाह में निकृष्टता यथावत् बनी रहे और क्रिया−प्रक्रिया के रूप में चित्र−विचित्र उपचार चलते रहें तो समझना चाहिए कि जड़ की उपेक्षा करके पत्ते धोने जैसी विडंबना चल रही है।
मंथन में रई घुमाई जाती है। उसकी रस्सी एक बार आगे चलती है, दूसरी बार पीछे लौटती है। पीछे लौटना चिंतन है और आगे बढ़ना— मनन। चिंतन को आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार कह सकते हैं। उसे वस्तुतः तपश्चर्या की, संयम-अनुशासन अपनाने की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। मनन को आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। क्षुद्रता को, महानता के साथ जोड़ देना ही योग है। इस उद्देश्य के लिए कामना को भावना में, तुच्छ को महान में, सीमित को असीम में परिवर्तित करना होता है। यही योग है। उसमें अपनी आस्थाएँ, आकांक्षाएँ एवं चिरसंचित आदतें किस प्रकार उच्चस्तरीय बन सकें, इसका निर्धारण एवं कार्यान्वयन करना होता है। प्रगतिक्रम को व्यवहार में उतारने की, योजनाबद्ध साहसिकता की, पृष्ठभूमि मनन के माध्यम से ही बनती है।
साधनावधि में आस्था एवं विचारणा-क्षेत्र के नवनिर्माण का प्रयत्न पूरी तत्परता के साथ चलना चाहिए। शरीर तप−अनुशासन में संलग्न रहे, समय−चर्या उन्हीं अनुबंधों के शिकंजे में किसी रहे; किंतु विचार-प्रवाह को सतत भौतिक क्षेत्र से हटाकर अंतर्मुखी रहने के लिए विवश किया जाता रहे। इन दिनों भौतिक क्षेत्र की चिंता−समस्याओं से उबर ही लेना चाहिए। जो गंभीरतापूर्वक कभी विचारा ही नहीं गया, जिस उद्देश्य के लिए यह जन्म हुआ था, उस पर चिंतन ही नहीं किया गया, उसे इन दिनों सोचना चाहिए। जिस क्षेत्र में कभी बुहारी तक नहीं लगी, कभी दृष्टि ही नहीं गई, उसे इन दिनों साफ−सुथरा बनाने से लेकर सुंदर–सुसज्जित बनाने के लिए तत्परता एवं तन्मयता के साथ जुटे रहना चाहिए।
साधनाकाल में जप−अनुष्ठान के समय एकाग्रता, तल्लीनता— ईश्वरीय गुणों से तद्रूपता का, ध्यान किया जाता है। इस समय के अतिरिक्त शेष सारा ही समय ऐसा है, जिसमें-विचार मंथन सतत किया जाना चाहिए। साधना का अर्थ ही है— अनुशासन— मजबूती से विचारों को साध लेना। यह तभी संभव है, जब मनन पल−पल चले। तभी नित्य की क्रियाओं में साधना अपना चमत्कार दिखाने लगेगी। अपने क्रियाकलापों में वे सारी उपलब्धियाँ साकार होती दिखाई देने लगेंगी जिनकी चर्चा आप्त वचनों व शास्त्रों में की गयी है।
चिंतन−मनन के लिए सतत मंथन के अतिरिक्त एक घंटा नित्य अलग से निकाल लिया जाए, जिसमें मात्र आत्मसमीक्षा, सुधार, निर्माण व विकास की प्रक्रिया में ही निरत रहा जाए। इसके अतिरिक्त भी कभी भी खाली रहने या काम करते रहने की स्थिति में यह चिंतन−मनन का उपक्रम जारी रखा जा सकता है। चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है। धुलाई के उपरांत रंगाई होती है। नींव खोदने पर ही दीवार चुनी जाती है। साँस छोड़ने पर नई साँस मिलती है। प्रयाण में पिछला पैर उठता और अगला बढ़ता है। आत्मपरिष्कार प्रथम और आत्मविकास द्वितीय है। जो लोग चिंतन और चरित्र से निकृष्टता हटाने की उपेक्षा करके सीधे ईश्वर तक जा पहुँचने— साक्षात्कार करने या योग सिद्धियों की बात करते हैं, उन्हें हवा में तैरने वाले— कल्पना-लोक के पखेरू ही कहा जा सकता है। ऐसे शेखचिल्ली अध्यात्म-क्षेत्र में भी कम नहीं हैं, जो जिस−तिस क्रिया−प्रक्रिया को ही सब कुछ मान बैठते हैं और बिना चिंतन सुधारे श्रम−प्रयास के आधार पर ही साधना की सफलता का स्वप्न देखते हैं।
शरीरकल्प में कुटी-प्रवेश की, आहार−विहार अपनाए रहने की, आवश्यकता पड़ती है। साथ ही चिंतन को भी कायिक परिवर्तन की परिधि में ही घुमाना पड़ता है। उस नियत क्षेत्र में चिंतन करते रहने पर ही शरीरकल्प संभव हो पाता है। यदि वैसा न बन पड़े तो कुटी-प्रवेश की स्थिति में प्रयोग की असफलता, व्यर्थता का संदेह छाया रहे, जी घबराने लगे एवं उद्विग्नता छाई रहे। ठीक इसी प्रकार साधना−अनुष्ठान की अवधि में साधक यदि मात्र आहार संयम एवं मुँह से जीभ हिलाकर जप की बेगार भुगते और आत्मचिंतन की उपेक्षा करे तो समझना चाहिए कि शरीरश्रम जितना लाभ मिल सकता है, उतना ही मिलेगा। मनोयोग के अभाव में उस उच्चस्तरीय प्रतिफल की आशा न की जा सकेगी जो शास्त्रकारों ने–अनुभवी सिद्धपुरुषों ने बताई है।
समझा जाए कि चिंतन का विषय अनुशासन है। इसी को ‘संयम’ कहा जाता है। इंद्रिय संयम, अर्थ, समय, विचार संयम के अंतर्गत विभिन्न पक्षों की चर्चा होती रही है। साधक को अपने वर्तमान स्वभाव-अभ्यास में इन प्रसंगों में कहाँ क्या त्रुटि रहती है, इसकी निष्पक्ष निरीक्षक एवं कठोर परीक्षक की तरह जाँच−पड़ताल करना चाहिए। आत्मपक्षपात मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण है। दूसरों के प्रति कठोरता— उनके दोष ढूँढ़ना और अपने छिपाना, आम लोगों की आदत होती है। कड़ाई से आत्मसमीक्षा कर सकने की क्षमता आध्यात्मिक प्रगति का प्रथम चिहन है। चित्त में— गुण, कर्म, स्वभाव में घुसी हुई अवाँछनीयताओं को बारीकी से ढूँढ़ निकालना, उन्हें किस प्रकार निरस्त करना तथा अभ्यास हेतु दिनचर्या का ऐसा ढाँचा बनाना, जिसे अपनाकर चारों संयमों का क्रमबद्ध अभ्यास चलता रहे, इसी में साधक का पुरुषार्थ है।
इतना बन पड़ने पर आगे का आत्मिक प्रगति−पथ सरल हो जाता है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति पूजा उपचारों से नहीं हो सकती। वे तो मात्र आत्मजागरण भर की क्रिया पूरी करते हैं। उसके लिए आत्मा को श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रज्ञा जैसी उच्चस्तरीय आस्थाओं से अभ्यस्त कराना होता है। अपना सुधार करने ईश्वर के विश्व-उद्यान को सुविकसित बनाने में कुशल माली की भूमिका निभाई जाए। सृष्टा की विश्व−व्यवस्था में उत्कृष्टता बनाने−बढ़ाने से ईश्वर की इच्छा तो पूरी होती है, साथ−साथ आत्मकल्याण का, आत्मोत्कर्ष का, प्रयोजन भी पूरा होता है।
द्वौ क्रमौ चित्तनाशाय योगो ज्ञानं च राघव।
योगश्चित्तनिरोधों हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम्॥
–योग वाशिष्ठ
मन को वश में करने के लिए योगमार्ग अथवा ज्ञानमार्ग का अवलंबन लेना चाहिए। चित्त की वृत्तियों के निरोध को ‘योग' और ठीक प्रकार से आत्मा−अनात्मा को जानना ‘ज्ञान’ कहलाता है।
अन्न को ब्रह्म कहा गया है। शास्त्रकार इसी को प्राण कहते हैं। उपनिषद्कारों ने अन्नब्रह्म की उपासना हेतु साधक को सहमत करने के लिए अनेकानेक तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। इनका अवगाहन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि आमतौर से आहार से क्षुधा निवृत्ति और स्वाद तृप्ति भर का जो लाभ समझा जाता है, यह मान्यता अधूरी-अविवेकपूर्ण है। आहार प्रकारांतर से जीवन है, साधक के लिए तो सफलता प्राप्ति के मार्ग का एक महत्त्वपूर्ण ‘माइलस्टोन’ है। यदि इस देवता की आराधना ठीक प्रकार से की जा सके तो शरीर को आरोग्य, मस्तिष्क को ज्ञान−विज्ञान, अंतःकरण को देवत्व का अनुदान, व्यक्तित्व को प्रतिभावान एवं भविष्य को उज्ज्वल संभावनाओं से जाज्वल्यमान बनाया जा सकता है।
अथर्ववेद में अनुपयुक्त अन्न को त्याज्य ठहराया गया है। प्राचीनकाल में मात्र पुण्यात्माओं का ही अन्न स्वीकार किया जाता था। किसी के सज्जन, धर्मपारायण होने की कसौटी भी एक ही थी— उसने किसका अन्न खाया, वह किस प्रकार उपार्जित था। पुण्यात्मा वही कहाता था, जिसका अन्न लोग ग्रहण करते थे।
“सवौ वा एष जग्ध पाप्मा यस्यान्नमश्रन्ति”।
— 9।6।24 अथर्ववेद
अर्थात— वाल्मीकि रामायण में अंतःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसी प्रकार कहा गया है—
“यदन्नं पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः।”
अर्थात— "मनुष्य जैसा अन्न खाता है, वैसे ही उसके देवता खाते हैं।” यदि साधक कुधान्य खाता है तो साधक का इष्ट भी भ्रष्ट हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी, वह प्रायः नहीं ही प्राप्त होती।
तैत्तरीयोपनिषद् में ऋषि उद्घोष करते हैं—
"अन्नाद्व प्रजाः प्रजायन्ते। काश्च पृथिवीश्रित्षः। अथो अन्ने नैव जीवन्ति। अथैन दवि−यन्त्यन्ततः। अन्ने हिभूतानां जेष्ठम्। तस्मात्स−वेर्षिधयमुच्यते। सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽनं ब्रह्मोपासते।”
—द्वितीय अनुवाक
अर्थात— "इस पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं। फिर अन्न से ही जीते हैं। अंत में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। अन्न ही सबसे श्रेष्ठ है। इसलिए वह औषधिरूप कहा जाता है। जो साधक अन्न ब्रह्म की ब्रह्मरूप में उपासना करते हैं, वे उसे प्राप्त कर लेते हैं।
आगे वे कहते हैं कि इस रसमय शरीर के भीतर जो प्राणमयपुरुष है, वह अन्न से व्याप्त है। वह प्राणमयपुरुष ही आत्मा है।
इस प्रतिपादन से अनुमान होता है कि अन्न को कितना महत्त्व हमारे ऋषिगण देते आए हैं। यह सब अकारण नहीं है। अन्न को औषधि की उपमा देते हुए कहा गया है कि यह सभी प्राणियों के क्षुधाजन्य संतापों को दूर करता है, साथ ही उनके मन की गतिविधियों, दैनंदिन जीवन की हलचलों का भी निर्धारण करता है।
‘जैसा खाये अन्न वैसा बने मन’ वाली उक्ति बहुत ही सारगर्भित है। मन को सात्विक बनाना आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से नितांत आवश्यक है। उसके लिए आहारशुद्धि को प्रथम चरण माना गया है। तमोगुणी, उत्तेजित करने वाला, अनीति उपार्जित, कुसंस्कारियों द्वारा पकाया-परोसा भोजन न केवल मनोविकार उत्पन्न करता है वरन रक्त को अशुद्ध, पाचन को विकृत करके स्वास्थ्य संकट भी उत्पन्न करता है। आत्मिक प्रगति में, साधना की सफलता में तो कुधान्य का, अभक्ष्य का विषवत् प्रभाव पड़ता है। मन की चंचलता इतनी तीव्र हो जाती है कि सामान्य क्रियाकलापों में एकचित्त होकर कुछ कर सकना कठिन हो जाता है। फिर साधना में जिस एकाग्रता की, मनोयोग की आवश्यकता है, वह अभक्ष्य एवं अधिकमात्रा में खाने पर मिल ही नहीं सकती।
पिप्पलाद ऋषि पीपलवृक्ष के फल मात्र खाकर अपना निर्वाह करते थे। कणाद ऋषि जंगली धान्य समेट कर उससे अपनी क्षुधा शांत करते थे। कृष्ण−रुक्मिणी का जंगली बेर खाकर तथा पार्वती के सूखे पत्तों पर रहकर तप करना प्रसिद्ध है। उच्चस्तरीय साधनाओं में व्रत−उपवास का अविच्छिन्न स्थान है। इसके लिए अन्न की सात्विकता पर ध्यान देना अनिवार्य हो जाता है। ऐसा न करने से वही स्थिति होती है जो भीष्म पितामह की हुई। वे शरशैय्या पर लेटे युधिष्ठिर को धर्मोपदेश दे रहे थे कि अचानक द्रौपदी हँस पड़ी। वे बोले— ”बेटी! तू इतनी शीलवती है, फिर असमय क्यों बड़ों के समक्ष तू हँसी।” द्रौपदी ने कहा— "पितामह! अपराध क्षमा करें। जब मेरे वस्त्र खींचे जा रहे थे और दुर्योधन की उस राजसभा में आप भी वहाँ विराजे हुए थे, तब आपका यह ब्रह्मज्ञान कहाँ चला गया था?” “बेटी तेरा सोचना ठीक है,” भीष्म पितामह ने गुत्थी हल करते हुए कहा—"उस समय में दुर्योधन का अन्यायपूर्वक अर्जित कुधान्य खा रहा था तो मेरी बुद्धि भी अशुद्ध थी, वह मन भी कुसंस्कार युक्त। इसी कारण मैं अन्याय के विरुद्ध बोल न सका।” कितना मार्मिक प्रेरणाप्रद प्रसंग है यह, जो प्रत्यक्षतः अन्न और चिंतन का पारस्परिक संबध बताता है।
सभी आध्यात्मिक साधनाएँ उपवास प्रधान होती हैं। कई कड़ी होती हैं, कुछ मृदु। पूर्णिमा से पूर्णिमा तक क्रमशः घटाते हुए बढ़ाने वाला चांद्रायणक्रम इन अंकों में पहले ही विस्तार से समझाया जा चुका है। कुछ लोग मात्र जल या पेय पर उपवास करते हैं। प्राचीनकाल के मनोबल और शरीरगत क्षमता को दृष्टिगत रखकर यह कभी ठीक रहा होगा, पर अब बदली हुई परिस्थितियों में इस क्रम को सरल बनाया जा सकता है। पर इसमें उपवास का महत्त्व, अन्न की सात्विकता की प्रधानता अपनी जगह है। उपवास एक शरीरगत तितिक्षा है। अन्न की सात्विकता, उसका चयन तथा उसे ग्रहण की जाने वाली मात्रा का सीमा बंधन वस्तुतः चिंतन से जुड़ी हुई एक महत्त्वपूर्ण साधना है।
आरोग्य-रक्षा की दृष्टि से पेट को भी साप्ताहिक छुट्टी मिलना चाहिए। उद्योगपति जानते हैं कि श्रमिकों को अवकाश न दिया जाए, उन्हें निरंतर काम में लगाया जाए तो उनकी शारीरिक−मानसिक क्षमता घट जाती है; फलतः छुट्टी देने पर जितना काम का हर्ज होता है, उससे भी अधिक की हानि होती है। अतएव मालिक और मजदूर दोनों का ही लाभ इसमें है कि श्रम और अवकाश दोनों का तालमेल बिठाकर चला जाए। यही नीति पेट के संबंध में भी अपनानी पड़ेगी। उसे भी साप्ताहिक अवकाश चाहिए। अवकाश अर्थात उपवास। पूर्ण उपवास का तात्पर्य है, निराहार— जल का निर्वाह। इतना न बन पड़े तो रस, छाछ जैसे द्रव आहार लिए जाएँ। इतना भी संभव न हो तो शाकाहार–फलाहार पर गुजारा किया जाए। वह कठिन पड़े तो एक समय लंघन अथवा आहार का आधा भाग घटा देना चाहिये। जो खाया जाय वह सात्विक, सुपाच्य हो। इंद्रिय संयम के अभ्यास के रूप में अस्वाद भोजन सप्ताह में एक या दो बार कर लिया जाय तो वह भूख जैसी छोटी कठिनाई बर्दाश्त करने का अभ्यास कराने वाली तितिक्षा से भी अधिक फलदायी होता है। साधक का आहार सात्विकता की दृष्टि से संतुलित होता है, पुष्टाई की दृष्टि से नहीं। इस एक तथ्य को आत्मिक-पथ के हर पथिक को ध्यान में रखना होता है।
हठयोग प्रदीपिका कहती है—
अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्यो नियमग्रहः।
जन संगश्च लौल्यं च षडभिर्योगो विनश्यति॥ 1/15
अर्थात्— "अधिक आहार, अधिक परिश्रम, अनियमित दिनचर्या, अधिक लोगों के घिरा रहना, चंचलवृत्ति ये योगमार्ग में साधक के प्रमुख विघ्न हैं।” आत्मपरिष्कार की साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से पूर्व आहारशुद्धि का ही व्रत लिया जाता है।
छांदोग्योपनिषद् में ऋषि कहते हैं कि “खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका स्थूलभाग मल, मध्यम भाग माँस और सूक्ष्मभाग मन बन जाता है। हे सौम्य! मन अन्नमय है! प्राण जलमय है, वाक् तेजोमय है।”
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आत्मिक-प्रगति का मुख्य माध्यम मन है। वही बंधन और मोक्ष का कारण है। मन की चंचलता एवं कुटिलता को नियंन्रित करके ही अध्यात्म साधना के मार्ग मे प्रगति होती और तदनुसार सफलता मिलती है। इस प्रकार न केवल शरीरशुद्धि अपितु योगी के अनुरूप हलकी काया बनाने हेतु मनोनिग्रह एवं चित्तवृत्तियों के नियंत्रण के लिए भी अन्नशुद्धि अनिवार्य है। हर मार्गदर्शक साधक को अपने आहार पर ध्यान देने का निर्देश देता है। अन्न के स्तर में जितनी सात्विकता का समावेश होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा।
शास्त्रकार का मत है—
अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरयन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठियतम्। स य एतदन्न मन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्न वानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन्। महान् कीर्त्या। –तैत्तिरीयोपनिषद् 3/7
यहाँ भावार्थ यह है कि अन्न की निंदा न की जाए। इस तथ्य को समझा जाए कि वही प्राण है और प्राण ही अन्न है, क्योंकि अन्न से ही प्राणों में बल आता है और प्राणशक्ति से ही अन्नमय शरीर में जीवनी शक्ति आती है। प्राण ही शरीर में अन्न के रस को सर्वत्र फैलाता है। यदि आज की वैज्ञानिक भाषा में इस प्राण को ‘बायोइलेक्ट्रिसिटी’ अथवा जीवकोषों में विद्यमान 'एक्शन पोटेन्शियल' मान लिया जाए तो एन्जाइम्स, पाचक रसों व सूक्ष्मस्रावों के माध्यम से उसकी सारे अवयवों में ऊर्जा— प्राणशक्ति पहुँचाने की भूमिका को स्पष्ट समझा जा सकता है। यह एक सर्वमान्य अनुभूत सत्य है कि प्राणों को आहार न मिलने पर वे शरीर की धातुओं को ही सोखने लगते हैं। शरीर की स्थिति प्राण के अधीन होने से प्राण भी अन्न ही हुआ या उसका सूक्ष्म स्वरूप हुआ। इस तत्त्वदर्शन को समझने वाला ही प्राणशक्ति का सुनियोजन बल संवर्धन, योग साधन, शक्ति-उपार्जन एवं प्रसुप्त के जागरण में कर पाता है। ऐसे व्यक्ति की, जो ब्रह्मतेजसंपन्न होता है, कीर्ति संसार भर में फैलती है और उससे यह सृष्टि भी अभिनंदित होती है।
अन्न ही नहीं जल, जो नित्य विभिन्न अवसरों पर शारीरिक आवश्यकतानुसार ग्रहण किया जाता है, आहार है। उसका भी मनःस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। आहारशुद्धि की तरह जलशुद्धि पर भी साधक को ध्यान देना चाहिए। इसीलिए साधना प्रयोजनों में पवित्र नदी−सरोवरों के जल को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कहा गया है—
“आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। –तैत्तिरीयोप. 3/8
आज प्राचीनकाल के योगाभ्यासी ऋषियों की भाँति अन्न शुद्धिकर आहार लेना दुष्कर कार्य लगता है। वन्य-प्रदेशों में उपलब्ध कंद-मूल, फलों से वे अपना निर्वाह करते थे। उनके निवास भी उन्हीं क्षेत्रों में होते थे। अब वैसी स्थिति तो नहीं रही, पर जितना भी संभव हो सके, आहार की सात्विकता और ग्रहण की गई मात्रा पर अधिकाधिक अंकुश रखना अन्नमयकोश से प्रारंभ होने वाली साधना-प्रक्रिया की सफलता के लिए नितांत आवश्यक माना जाय। इस संबंध में शास्त्रमतों व वर्तमान परिस्थितियों में तालमेल बैठाकर कुछ निर्धारण कर लिए जाएँ। सप्ताह में एक दिन उपवास, नियम अवधि के लिए अस्वाद व्रत का पालन, एक समय अन्नाहार–एक समय शाकाहार, दूध−छाछ−रस−द्रव्य कल्प, दलिया या अमृताशन इत्यादि में से किसी एक को अपनाकर साधनावधि इसी प्रकार व्यतीत की जाए। इस तपश्चर्या का माहात्म्य अवर्णनीय है। सामान्यजन तो इसकी फलश्रुति चर्मचक्षुओं से स्वास्थ्य में परिवर्तन देखकर ही आश्चर्यचकित हो जाते हैं। जब साधना का, सात्विक जीवनक्रम का तथा सोद्देश्य चिंतन व दिशा-निर्धारण का इसमें समावेश हो जाता है तो अगणित विभूतियों के रूप में इसके परिणाम सामने आते हैं।
साधना-पथ के हर जिज्ञासु को इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। आहार संबंधी सतर्कता अपनाकर अपने साधना पुरुषार्थ को सफल बनाना हर किसी के लिए संभव है।
मुक्तिपथ एवं योगसाधन पर बड़ा ही विचारोत्तेजक एवं मार्गदर्शक विवेचन शास्त्रों में किया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य एवं महाराज जनक के मध्य सम्वादों के माध्यम से योगसाधन का अंतिम उपाय वैराग्य और अभ्यास को बताया गया है। जनक के पूछे जाने पर “विज्ञातारमरे केन विजानीयात?” (विधाता को किसके द्वारा जानें), महर्षि उत्तर देते हैं—
“यमेवैष वृणते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा वृणुते तनूस्वाम्।"
अर्थात्— वह तपः शुद्ध चेतना का वरण करके स्वयं ही अपने स्वरूप को प्रकट करता है तथा—
“एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वास्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम्।”
अर्थात्– उस परम सत्ता से साक्षात्कार उचित उपाय करने से ही संभव होता है। (मुण्डकोपनिषद् 3/2/4) ये उचित उपाय हैं— वैराग्य और अभ्यास। सांसारिक विषयों की क्षणभंगुरता और अस्थायित्व पर चिंतन करके मन को उनमें न रमने देना वैराग्य है। यह विचारपरक है। इंद्रियों का सहज रुझान विषयों की ओर होता है। विषयासक्ति से उन्हें निकालकर आत्मलक्ष्य प्राप्ति में सहयोग करने वाली— जीवनोद्देश्य को सार्थक करने वाली, गतिविधियों में प्रवृत्त करने को अभ्यास कहते हैं।
अभ्यास में दुहरी प्रक्रिया अपनानी होती है। एक मानसिक परिशोधन के लिए तप−तितिक्षा की, दूसरी सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के लिए साधना उपचार की। मानसिक परिशुद्धि के पूर्व, मन के दोषों को जानना आवश्यक है। विषय-सेवन इंद्रियों का सहज स्वभाव है, पर उसमें मनोयोग होने से प्रत्येक विषयानुभूति मन पर एक आशक्तिजनक संस्कार छोड़ती है। विषय-सुख तो क्षणिक होते हैं, पर मन की विशेषता यह है कि जब उसे कोई विषय प्राप्त नहीं होता, तो वह अपने पूर्वानुभव जन्म संस्कार के कारण उसे पाने की लालसा करता है। इसे ही मनीषियों ने राग कहा है। राग अप्राप्त सुख का स्मरण दिलाकर अभाव का दुःख देता है। फिर अनेकों प्रकार के दोषों की श्रृंखला चल पड़ती है। राग से द्वेष और द्वेष से क्रोध की उत्पत्ति होती है। राग से परिग्रह का लोभ पैदा होता है। द्वेष−घृणा, ईर्ष्या और हिंसा की दुर्भावनाएँ जगाता है। फिर छल, कपट, अहंकार, कुटिलता, असहिष्णुता, कृतघ्नता जैसी दुष्प्रवृत्तियों का सिलसिला आरंभ हो जाता है। मन की आसक्ति अंततः पतन का कारण बनती है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर मन को आत्मचिंतन में सदा निरत रखने से वैराग्य का भाव जागृत होता है।
मन, बुद्धि और अहंकार की संयुक्त भूमिका का नाम ही चित्त है। चित्तशुद्धि के लिए अभ्यास आवश्यक है। मुनि पातंजलि ने योगाभ्यास के आठ अंग बताए हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
“यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणाध्यान समाधयोऽष्टावंगानि।” ( पा. यो. सू्. 1/33)
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह ये पाँच प्रकार के निषेध यम कहलाते हैं। नियम के अंतर्गत बाह्याभ्यंतर परिशुद्धि के लिए की जाने वाली सभी क्रियाएँ आती हैं। शरीर की बाह्यस्वच्छता का अपना महत्त्व है, पर इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है “आंतरिक पवित्रता”। मन की शुद्धि में भोजन का अत्याधिक महत्त्व है। “अन्नमयंहि सोम्य मनः” छांदोग्य उपनिषद्कार के अनुसार अन्न से ही मन भी पुष्ट होता है, यही तथ्य प्रतिपादित है। जैसा भोजन होगा वैसी ही प्रवृत्ति होगी। चित्त की पाँच अवस्थाएं योग ग्रंथों में वर्णित हैं— मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। तमसाच्छन्नचित्त मूढ़ता से ग्रस्त होता है। रजसतत्व की प्रधानता में वह क्षिप्त रहता है। सत्वप्रधानचित्त ही सरलता से एकाग्र होकर ध्यान−धारणा और समाधि की उच्चस्तरीय साधनाओं में सहायक होता है। इंद्रियों को उत्तेजित करने वाले खट्टे, मीठे, तीक्ष्ण, राजसी और तामसी भोजन से मन में अस्थिरता और मलीनता बढ़ती है। अस्तु साधना-पथ के साधक के लिए सरस, स्निग्ध, मृदु और नीतिपूर्वक उपार्जित पवित्र आहार का सेवन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
सुख−दुःख हर तरह की परिस्थिति में संतुष्ट रहने को संतोष कहते हैं। कुसंस्कारों के परिशोधन एवं सुसंस्कारों के अभिवर्धन के लिए स्वेच्छापूर्वक जो कष्ट उठाया जाता है,वह तप कहलाता है। स्वयं के अध्ययन-विश्लेषण के लिए किया जाने वाला अध्यवसाय स्वाध्याय है। अपने चित्त को श्रद्धापूर्वक परमात्मा के दिव्य–स्वरूप में नियोजित करना ईश्वर प्राणिधान कहलाता है।
मेरुदंड को सीधा रखकर शरीर को हलचलों से रहित स्थिति में स्थिर करना आसन है। प्राणों की गति पर इच्छित नियंत्रण-नियमन कर लेना प्राणायाम कहलाता है, जिसके अनेकों भेद−उपभेद हैं। विविध प्रयोजनों के लिए विभिन्न प्रकार के प्राणायाम किए जाते हैं। इंद्रियों को विषयों से खींचकर आत्माभिमुखी प्रवृत्तियों में समाहित कर देना प्रत्याहार है। प्रत्याहार में इंद्रियों सहित मन के साथ जोर−जबरदस्ती करनी पड़ती है। अड़ियल घोड़ा शीघ्रता से काबू में नहीं आता। इंद्रियाँ भी आरंभ में बगावत करती हैं, पर बारंबार उन पर अंकुश रखने पर उनकी विषय लोलुपता समाप्त हो जाती है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार योग के पाँच बहिरंग पक्ष हैं, जो शारीरिक क्रियाओं से संबंधित हैं। धारणा, ध्यान और समाधि वे अंतरंग साधन हैं, जो मन और बुद्धि के भावपरक पुरुषार्थ पर आधारित हैं।
निर्धारित समय के लिए किसी स्थानविशेष में चित्त को बाँधने का नाम धारणा है। धारणा के अवलंबन के लिए मन में ईश्वर के किसी स्वरूप की कल्पना करनी पड़ती है। किसी देवता अथवा देवी की मूर्ति, दीपक की ज्योति, उदीयमान सूर्य आदि किसी स्वरूप में मन को स्थिर करना पड़ता है। इसका अगला चरण ध्यान है। जब चित्त पर्याप्त समय तक अपने इष्ट में स्थिर हो जाए तो इसे ‘ध्यान’ कहते हैं। ध्यानाभ्यास करते−करते जब ध्यान के अवलंबन का स्थूल स्वरूप विलीन हो जाता है तथा चित्त मात्र इष्ट के गुण या विशेषता से ओत−प्रोत होकर स्थिर हो जाता है तो उस अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधिवस्था में द्रष्टा को अपने भौतिक शरीर का बोध नहीं रहता। साधक और साध्य की सत्ता एक हो जाती है। भौतिक शरीर चैतन्यरहित होते हुए भी आंतरिक चैतन्यता अधिकतम होती है। समाधि की परिपक्वता से चेतना सूक्ष्म से सूक्ष्मतम तत्त्वो का साक्षात्कार करने में समर्थ होती चली जाती है।
समाधिवस्था में श्वासोच्छ्वास क्षीण हो जाता है। पर्वतों के उत्तुंग शिखरों पर वायु दाब की न्यूनता के कारण पर्वतारोहियों को श्वास में आॅक्सीजन की मात्रा कम पड़ जाती है जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएँ ठीक प्रकार काम नहीं कर पाती; प्रायः भ्रम होने लगता है और साँस लेने में कठिनाई होती है; पर समाधि की स्थिति इससे उल्टी है। मन और प्राण की चंचलता थम जाने से स्वतः समाधि अवस्था में श्वास लेने की आवश्यकता महसूस नही होती। मस्तिष्क को किसी प्रकार कष्ट नहीं होता। शरीर और मन की चंचलता में होने वाले प्राण का अपव्यय रुक जाता है; फलतः मस्तिष्क में प्राण की अधिकता से वह और भी अधिक सक्षम हो जाता है। मन की अवचेतन ग्रंथियाँ खुलने लगती हैं। चित्त में अनेकों जन्मों के संस्कार अंकित एवं संग्रहित रहते हैं, वे समाधिवस्था के अंतःप्रकाश में प्रत्यक्ष साकार होकर समाप्त होते अथवा वांछित दिशा पाते रहते हैं।
‘पातंजलि योग दर्शन’ में समाधि की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन है। जब चित्त किसी एक तत्त्व पर अधिक देर तक स्थिर न रहकर उसके नाम, अर्थ और ज्ञान में संचरित होता है तो उसे सवितर्क समाधि कहा गया है। जब चित्त अधिक शांत होकर मात्र अर्थ में स्थिर हो जाता है तो वह समाधि निर्वितर्क कहलाती है। विचारपूर्वक सूक्ष्मतत्वों पर स्थिरचित्त जब उनके स्वरूप को जान लेता है तो उसे विचारानुगत समाधि की प्रथम अवस्था ‘सविचार’ समाधि कहा गया है। सूक्ष्मतत्त्व का स्वरूप विलीन होकर जब उसके ज्ञान में समाधि होने लगती है तो उसे निर्विचार समाधि कहते हैं।
इन अभ्यासों से मन की चंचलता समाप्त हो जाती है और द्रष्टा साधक उसे जिस भी लक्ष्य की ओर नियोजित करता है, वह आज्ञाकारी सेवक के रूप में उधर ही स्थिर हो जाता है। परिष्कृत और निर्मल चेतना प्राण को मनचाही दिशा में प्रवाहित कर सकती है। प्राण पर नियमन एवं नियंत्रण से उसे शरीर के किसी भी अंग में भेजकर अभीष्ट प्रकार का कार्य संपादित कराया जा सकता है। इस प्राणविद्युत से व्यक्तियों एवं वातावरण को भी प्रभावित कर सकना संभव है। बाहर से भी प्राणतत्त्व को खींचकर अपने शरीर में प्रचुर परिमाण में भर सकना प्राण पर नियंत्रण हो जाने पर शक्य हो जाता है।
निर्विचार समाधि की परिपक्वता से अंतःकरण शांत, निर्मल और ज्योतिर्मय हो जाता है। ऐसी स्थिति में साधक एक अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति करता है। इसे ही ‘आनंदानुगत’ समाधि करते हैं। जब चित्त की विषयवृत्ति पूर्णतया समाप्त हो जाती तथा मात्र स्वानुभव ही शेष बचता है तो उसे ‘अस्मितानुगत’ समाधि कहा जाता है। ये निर्विचार समाधि की उच्चतर स्थितियाँ हैं, जिन्हें 'सम्प्रज्ञात’ समाधि कहा गया है। ऋतम्भरा प्रज्ञा की यही स्थिति होती है। ऐसी पवित्र प्रज्ञा से अनुप्राणित अंतःकरण में सत्य स्वयं ही अपने शाश्वत स्वरूप में प्रकट होने लगता है।
प्रज्ञा के ज्योतिर्मय प्रकाश में अवस्थित होने पर साधक की संपूर्ण सत्ता भी उससे आलोकित हो उठती है। उस ज्योति में एकाग्रता बनी रहने पर संपूर्ण चेतना में प्रकाश फैल जाता है, जो समाधि की दृढ़ता में और भी दिव्यतर होता जाता है। उस अलौकिक दिव्य प्रकाश में द्रष्टा साधक का पृथक अस्तित्व भी विलीन हो जाता है। तब यह अनुभव होता है कि ज्ञाता ज्ञेय से सर्वथा अभिन्न है। जिसे पाने के लिए असाधारण पुरुषार्थ किया गया वह तो अपनी ही आत्मा है। द्रष्टा और परम ध्येय इष्ट के इस पूर्ण एकाकार होने को ही असम्प्रपात समाधि कहते हैं। चित्त के सच्चित् में पूर्णतः विलीन होने से भवबंधन समाप्त हो जाते हैं। सच्चिदानंद स्वरूप का दिग्दर्शन होता है। यह अनुभव अनिवर्चनीय और वर्णनातीत है।
योग-साधना के दो चरण वैराग्य और अभ्यास का अवलंबन लेकर हर साधक आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। वैराग्य के लिए मनःस्थिति के अनुरूप चिंतन के आधार क्या हों? अभ्यास किस क्रम से और किस प्रकार आरंभ किया जाए? इसका निश्चय−निर्धारण हर कोई नहीं कर सकता। मरीज स्वयं दवा का निर्धारण करने लगे तो उसे कितने ही संकटों का सामना करना पड़ सकता है। कुशल चिकित्सक का परामर्श उसके लिए आवश्यक है। यह सच है कि साधना-पथ पर पुरुषार्थ साधक को स्वयं करना पड़ता है पर पथप्रदर्शक के मार्गदर्शन के बिना भटकाव की की गुंजाइश अधिक है। अस्तु-साधनामार्ग पर चलने वाले हर जिज्ञासु साधक को संरक्षण— मार्गदर्शक की व्यवस्था भी बनाकर चलना चाहिए। वैराग्य और अभ्यास के विशाल स्वरूप की एक झाँकी मात्र कराई गई है। सोपानों पर चढ़ते−बढ़ते इनके उच्चस्तरीय आयाम भी खोले जाने हैं। इन्हें साधक क्रमशः मार्गदर्शन के रूप में प्राप्त करते रहेंगे।
आत्मिकी को भौतिकी के समतुल्य एवं उससे भी अधिक उपयोगी सिद्ध करने के लिए, जन−जन को उसे अपनाने पर सहमत करने के लिए प्रथम आवश्यकता इस बात की है कि इस महाविज्ञान के प्रचलित स्वरुप को संशोधन एवं प्रमाणिक स्तर का प्रतिपादन करने के लिए आधारभूत ढाँचा खड़ा किया जाता। ऐसा ढाँचा जो तत्त्वदर्शी, महामनीषियों के चिरकालीन अनुभव की साक्षी भी साथ लिए हो और साथ ही तर्क, प्रमाण एवं प्रत्यक्ष की हर कसौटी पर पूर्ण रूप से खरा सिद्ध होता हो।
‘साधना’ अपने आप में एक बड़ा व्यापक शब्द है। इसका अर्थ हुआ— "आत्मसत्ता के परिष्कार के लिए किए गए अनेकानेक पुरुषार्थ−प्रयास।” अपने को कुमार्ग से हटाकर, भली प्रकार साधकर सही दिशा में मोड़ देना व उस पथ पर तेजी से चल पड़ना, इसी शब्द की विवेचना के अंग हैं। विडंबना यह है कि आज इससे अभिप्राय जप-ध्यान, पूजा−उपचार, विभिन्न यौगिक क्रियाओं इत्यादि तक ही सीमित होकर रह गया है। जबकि ये सभी उच्चस्तरीय प्रयोजन अपने स्थान पर सही होते हुए भी एकांकी हैं— निष्फल हैं, यदि प्रारंभिक पुरुषार्थ, आत्मपर्यवेक्षण एवं आत्मविकास का नहीं हुआ तो। व्यावहारिक जीवन की साधना के बाद ही वे विधि−विधान आरंभ होते हैं, जिनमें सबको सहज कौतूहल रहता है।
अंतरंग तो उपेक्षित पड़ा रहे, वहाँ कभी झाँका भी न जाए तो बहिरंग कैसे सधेगा? जिसने भी बहिरंग में वास्तविक सुख−शांति चाही है, सबसे पहले अपने अंतरंग में प्रवेश किया है। साधनसंपन्न व्यक्तियों के संबंध में यही कहा जाता है कि वे सर्वथा सुखी हैं; पर यदि उन्हें समीप से देखा जाए तो ‘कुंभीपाक’ जैसी नरक योनियों के दृश्य प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। शांति के लिए बेचैन व्यक्ति अपने अंदर झाँकने का साहस भी नहीं जुटा पाता। साधना की यहीं पर आवश्यकता है। यह एक तथ्य है कि आंतरिक उत्कृष्टता के अभाव में पाई गई संपदा एक ज्वरग्रस्त रोगी को मिष्ठान भरपेट खिला देने की तरह ही भयावह सिद्ध होती है। उदात्त दृष्टिकोण के अभाव में वैभव का दुरुपयोग होता है तथा व्यसन−अहंकार की पूर्ति में संलग्न व्यक्ति अपना सर्वनाश देखते−देखते कर बैठता है।
‘ब्रह्मविद्या’ का अर्थ यही है कि दृष्टिकोण में दूरदर्शी विवेकशीलता का, आदर्शवादिता का, समन्वय हो, जो चिंतन में, व्यवहार में तथा फिर साधना के क्रिया-क्षेत्र में परिलक्षित हो। व्यक्तिगत संपन्नता साधना की परिणति सुपात्र हैं। व्यक्तित्व का सारा आधार ही दृष्टिकोण है। अंतरंग जैसा भी कुछ है, इसी आधार पर बनता है कि अपने आंतरिक विकास के लिए क्या सोचा गया और उसकी रूपरेखा किस प्रकार बनाई गई।
उस मारे ऊहापोह को तत्त्ववेत्ताओं ने ‘कर्मयोग‘ की संज्ञा दी है, जिसमें व्यक्ति अपने अंतःक्षेत्र के कुसंस्कारों के विरुद्ध विद्रोह खड़ाकर तपश्चर्या की नीति अपनाता है। वह अंतः पर छाए कषाय−कल्मषों की निवृत्ति करता है तथा क्रियाकलापों में आदर्शवादिता का समावेश, ताकि निर्वाह से बचने वाली सामर्थ्य का परमार्थ प्रयोजनों में प्रयोग हो सके।
‘ज्ञानयोग‘ की साधना यह है, जिसमें मस्तिष्कीय गतिविधियों पर, वैचारिक प्रवाहों पर विवेक का अंकुश बिठाया जाता है। चाहे जो कुछ सोचने की छूट नहीं दी जाती। मात्र औचित्य को ही चिंतन का आधार बनाया जाता है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने, अपना चिंतन व्यापक दूरदर्शी बनाने के लिए जिन आधारों की सहायता ली जाती है वे ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आते हैं। स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
सद्भावना के रूप में अंतर्जगत में वास करने वाले परमेश्वर की साधना ‘भक्तियोग‘ के अंतर्गत की जाती है। उच्च आदर्शों के प्रति सघननिष्ठा, भक्तिभावना कही जाती है। इसका अर्थ याचना— मनुहार या व्यक्ति−मूर्ति से प्रेम नहीं; अपितु आदर्शों के समुच्चय के रूप में−श्रद्धातत्त्व का स्वरूप लिए विद्यमान निराकार ईश्वर को अपने ही अंतः में ढूँढ़ना, पाना और उसमें अवगाहन करना है। उपासना आदि उपचार इसी के अंतर्गत आते हैं।
कर्मयोग स्थूलशरीर की, ज्ञानयोग सूक्ष्मशरीर की तथा भक्तियोग कारणशरीर की साधना का—परिष्कार का विज्ञान है।
इन्हीं तथ्यों को उपनिषद्कारों ने अपने−अपने ढंग से समझाया है।
नारद परिव्राजकोपनिषद् में स्वयं पितामह ब्रह्मा ने नारदादि की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा है—
इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृत्छत्यसंशयः।
संनियम्यतुतान्येव ततः सिद्धि निगच्छति॥
न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णावतर्मेव भूय एकाभिवर्धते॥ 3। 36−37
अर्थात्— इंद्रियों के विषय में आसक्त रहने के कारण अनेक दोषों का प्रादुर्भाव होता है। यदि वे ही इंद्रियाँ भली प्रकार वशीभूत हो जाए तो वह सिद्धिदायिनी होती हैं। भोगों का उपभोग करने से विषयों की कामनाएँ कभी शांत नहीं होतीं, भोग तो घृत द्वारा अग्नि प्रदीप्त होने के समान उनकी वृद्धि की करते हैं।
स्थूलशरीर के परिष्कार की–कर्मयोग की साधना की ओर जब साधक आगे बढ़ता है तो उसे इन्हीं व्यवधानों को पार करते हुए आगे बढ़ना होता है। आत्मपरिष्कार की साधना के लिए उसे मन पर ही अंकुश लगाना होता है। चंचल वृत्तियों की ओर प्रवृत्त करने वाला भी वही तो है। उसमें संचित कुसंस्कार प्रदीप ज्वालारूपी अंतरात्मा पर कषाय-कल्मषों की तरह छाए रहते हैं। न वह स्वयं प्रकाशवान हो पाती है, न ही जीवन को प्रकाशवान करने, औरों को प्रखर−प्रेरणा दे सकने योग्य बन पाती है। पहले आत्मपर्यवेक्षणकर, अंतर्मुखी बनकर अपने वर्तमान क्रियाकलापों, भूत व भविष्य का सुनियोजन करना होता है, ताकि अल्पावधि के लिए मिला यह जीवन इंद्रिय उपभोगों में नष्ट न हो जाए।
इंद्रियलिप्सा के लिए नहीं, जीवन-धारणा किए रहने के लिए जब आहार−विहार का संतुलित-समन्वित क्रम निर्धारित कर लिया जाता है तो फिर शरीर के व्याधिग्रस्त होने का कोई कारण नहीं रह जाता। स्वस्थ शरीर–सधा शरीर ही साधना का उपयुक्त वाहन बन सकता है, मात्र इंद्रियाँरूपी सारथियों को संभावना पड़ता है। महामानव दुबली−पतली काया के होते हुए भी अंतः से जीवांत बने रहते हैं, यह मात्र कर्मयोग की महत्ता है। जिस भी व्यक्ति ने शरीर को मंदिर माना–लिप्साओं को शत्रुवत माना, उनसे मोर्चा लिया औषधिरूप सात्विक आहार ग्रहण किया और संतुलित श्रम-साधना का निर्धारण किया, उसे अपने इस कर्मयोग का प्रतिफल सुदृढ़ आरोग्य और दीर्घ जीवन के रूप मिलता ही रहेगा।
अवांछनीयता की ओर प्रेरित करना, दुष्ट दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करना तो अचेतन में बैठे कुसंस्कारों का ‘कर्त्तव्य’ है। वे अपना काम करते हैं व मानवी अंतःसाहस की परीक्षा लेते हैं। आत्मबलसंपन्न व्यक्ति इन परामर्शों को बलपूर्वक कुचल देते हैं; इसके लिए आवश्यक तप-तितिक्षा शरीरगत एवं मनोगत करके अपने आपको मजबूत बनाते हैं। व्रत, उपवास, अस्वाद, भूशयन, पदयात्रा, मौन, ब्रह्मचर्य, जैसी तितिक्षाएँ इसी प्रयोजन से की जाती हैं कि शरीर अपनी मनमानी न बरते, उच्छृंखल क्रिया−कृत्यों की ओर न बढ़े, औचित्य की मर्यादा में ही रहें। कर्मयोग का उत्तरार्ध है— अपने निर्वाह से बची व निरोध द्वारा संचित सामर्थ्य को सत्प्रयोजनों में नियोजित कर देना। पीड़ा−पतन निवारण में ऐसा व्यक्ति अपने भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करता है। इसे चाहे नैतिकी कहा जाए अथवा समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र कहा जाए अथवा व्यवहार−विज्ञान। सिद्धांत एक ही है— अपने लक्ष्य को जान−पहचानकर प्रभु समर्पित ब्राह्मण जैसा जीवन जीना और साधु जैसी परमार्थपरायणता का परिचय देकर अपनी सामर्थ्य को सेवा धर्म में लगाना।
ज्ञानयोग में अपने अंदर विवेकरूपी ऋषि की प्रतिष्ठापना कराई जाती है। मात्र कर्मयोग ज्ञानयोग के बिना अधूरा है। औचित्य-अनौचित्य का निर्धारण तो अपने क्रियाकलापों को सुनियोजित बनाने के लिए करना ही होगा। चिंतन को अस्त−व्यस्त उड़ान−भटकावों से रोककर एक लक्ष्य निर्धारितकर उस पर विचार तरंगों को केंद्रीभूत करना, यही प्रक्रिया ध्यान में भी अपनी जाती है, जो ज्ञानयोग का ही एक अंग है।
शरीरगत क्रियाकलाप तो चर्मचक्षुओं से भी देखे जाते हैं, पर मानसिक हलचलें अदृश्य होती हैं, उन्हें देखने−समझने के लिए सूक्ष्मदृष्टि विकसित करनी होती है। स्थूलतः धर्म−अध्यात्म जैसे विषयों का पठन–उन पर चिंतन-मनन , श्रवण−स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है। कथा, सत्संग, प्रवचन इसी उद्देश्य से सुने भी जाते हैं; पर ये तो मात्र निर्देश हैं, दिशा में चलने के संकेत भर हैं, जीवन की दिशा निर्धारित करने के आधार नहीं। मस्तिष्क को वांछित प्रवाह में चलने देने के लिए अवतारों के, ऋषियों के–महामानवों के विचारों व चरित्र का अवलोकन–श्रवण–स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
भक्तियोग कारणशरीर को सुसंस्कृत सुविकसित बनाता है। प्रेम का–भक्ति का प्रकटीकरण सद्भावनाओं–आदर्शों के प्रति प्रगाढ़ प्यार के रूप में प्रकट होता है। साधक सबसे पहले स्वयं इस साधना का लाभ पाता है। 'रसौ वै सः' का सही स्वरूप जान वह अंतः में छिपे यथार्थ-रस का आस्वादन करता है, जिह्वा तथा इंद्रियलिप्सा में नष्ट होने वाले रस उसे नष्ट नहीं कर पाते। आत्मक्षेत्र का पर्यवेक्षणकर उसके अंदर शरीर के प्रति करुणा जागती है, ब्रह्मचर्य के प्रति कठोर रहने की बुद्धि जागृत होती है। ये ही सद्भावनाएँ जब परायों पर आरोपित होती हैं तो सबके प्रति करुणा, सहज ममत्व जाग उठता है और व्यवहार में उतरा यह औदार्य सहकारिता–आत्मविस्तार की वृत्ति के रूप में प्रकट होता है।
विचार बाहर से आते हैं, ज्ञान अर्जितकर व शिक्षण−अनुभव से प्रविष्ट होते हैं। भाव भीतर से उठते हैं। वे अंतःकरण के उत्पादन हैं। ज्ञान से बुद्धि तो परिपक्व होती है, पर आंतरिक उत्कृष्टता उभरेगी ही, यह कोई निश्चित नहीं। अपना अंतः तो प्रत्यक्षतः भगवान का मंदिर है। भावों का भांडागार है। यहाँ से निःसृत सद्भावनाएँ साधक के आस−पास ऐसा चुंबकीय-क्षेत्र बनाती हैं कि सद्विचार अपने आप समीप आते चले जाते हैं, एक अभिरुचि के सत्परायण व्यक्ति अपने आप समीप आते हैं व भाव–संवेदनाओं का आदान−प्रदान करते हैं। सद्भावयुक्त अंतःकरण कभी घाटा या प्रत्यक्ष लाभ जैसी बात मस्तिष्क में नहीं आने देता। सारे तर्कों को परे रख कोई अंतः का उल्लास ऐसा उठता है, जो उच्चस्तरीय भाव-संवेदनाओं की भूख बुझाने के लिए त्याग–बलिदान की माँग करता है। वह देश के प्रति भी हो सकता है, समाज के प्रति भी, कर्त्तव्यों–आदर्शों−महामानवों के प्रति भी। होता वह अंततः भगवान के लिए ही है।
भक्तियोग सतत-सघन-निष्ठा, भक्तिभावना, आत्मिक आकांक्षाओं में मग्न रहता है। वह गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता को सबसे बड़ी संपदा–बड़प्पन मानता है। ऐसी आत्माएँ ही देवदूत कहलाती हैं, असंख्यों प्राणियों का उद्धार स्वयं के साथ कर सकने में समर्थ होती हैं। संयम शरीर में बैठा भगवान है तथा सद्विचार मस्तिष्क में विराजमान परमेश्वर। पहली स्थूलशरीर की परिष्कृति से प्राप्त कर्मयोग की उपलब्धि है। सद्विचार सूक्ष्मशरीर की उपलब्धि हैं, जो ज्ञानयोग द्वारा संपादितकर अर्जित की जाती हैं। सद्भाव कारणशरीर के परिष्कार की फलश्रुति है, जो प्रत्यक्षतः ईश्वर— परम पिता के रूप में अंदर बैठे होते हैं।
स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीरों का परिष्कार करने के लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग का साधनाक्रम व्यावहारिक जीवन में उतारा जाए, ताकि आत्मिक-प्रगति की दिशा में अग्रसर हुआ जा सके। ‘साधना’ शब्द को भ्रम-जंजाल में न उलझाकर, मानव जन्म रूप में सहज प्राप्त इस अनुदान को न भुलाकर यदि इन तीन शरीरों की ही साधना कर ली जाए तो वह सब कुछ हस्तगत हो सकता है, जिसकी चर्चा सिद्धियों-चमत्कारों के रूप में की जाती है। पथ है तो कठिन, पर इसे पार किए बिना उच्चस्तरीय सोपानों पर पहुँचने वालों के प्रयास निष्फल ही रहेंगे।
कर्म की धुरी पर ही सृष्टि का गतिचक्र अविराम चक्कर काट रहा है। संसार का दृश्य स्वरूप इस गति प्रक्रिया पर अवलंबित है। जड़ परमाणु एक सुनिश्चित परिकर में गति करते और अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं और चेतन-जीव दूसरे तरह की हलचल में अपने को नियोजित रखते हैं। कर्म किए बिना यहाँ कोई नहीं रह सकता। जीवित रहने के लिए कर्म आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। अविकसित मनुष्येत्तर जीवों में यह प्रकृति प्रेरणा से परिचालित है। शिश्नोदर जीवन चक्र तक सीमित है। उदरपूर्ति और कामतुष्टि जैसे दो सीमित प्रयोजनों तक उनके सुख और आनंद की अनुभूतियाँ परिसीमित हैं। इसके इर्द-गिर्द ही उनका समूचा जीवन परिभ्रमण करता रहता और एक दिन काल के गर्भ में समा जाता है। अस्तु उनके लिए सुख−दुःख की उच्चस्तरीय वैचारिक और बंधनमुक्ति की आत्मिक अनुभूतियाँ निरर्थक हैं।
मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से सुविकसित होने के कारण मनुष्य ऐंद्रिय सुख की निम्न परिधि में नहीं रह सकता। उसे उच्चस्तरीय और शाश्वत आनंद की खोज है, जिसके लिए वह सांसारिक मृगमरीचिका में अज्ञानवश भटकाता रहता है। ऋषियों ने इस भटकाव से बचने और जीवनमुक्ति के शाश्वत आनंद की प्राप्ति के लिए ज्ञानयोग, भक्तियोग अथवा कर्मयोग का मार्ग अपनाने का निर्देश दिया है। कर्मयोग के पथ को राजमार्ग इसलिए माना गया है कि यह हर तरह की मनःस्थिति के व्यक्तियों एवं आज की परिस्थितियों के अनुकूल है। भटकाव की गुंजाइश कम है, जबकि ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग के मार्ग पर चलने के लिए एक निश्चित प्रकार की मनःस्थिति का होना अनिवार्य है। कर्मयोग सभी के लिए इसलिए अधिक उपयुक्त है; क्योंकि मनुष्य जीवनपर्यन्त किसी न किसी रूप में कर्मों से जुड़ा रहता है, उनसे विरत रहना संभव नहीं है। अस्तु यदि कर्मयोगयुक्त जीवन शक्य हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का आनंद लेना हर किसी के लिए संभव है।
‘कर्म’ आत्मा और परमात्मा को एकाकार कर देने वाला ‘योग’ तब बन जाता है जब वह निष्काम हो। निष्काम क्यों, कामना से युक्त क्यों नहीं? क्योंकि मन की कामना ही भवबंधनों का कारण है। गीताकार ने इसी सत्य का रहस्योद्घाटन इस प्रकार किया है— 'मन एवं मनुष्याणाम् कारणं बंध मोक्षयोः।' अर्थात्— मन ही मनुष्य के बंधन या मुक्ति का कारण है।’ कामनायुक्त कर्म जहाँ बंधनों में बाँधता है, निष्काम कर्म ‘मुक्ति ‘ का साधन बन जाता है। एक क्षण के लिए भी कर्म से विरत रहना संभव नहीं है, साथ ही कर्म भवबंधनों में भी जकड़ता है, फिर संसार में किस तरह रहा जाए? जीवनमुक्ति का आनंद कैसे उठाया जाए? यजुर्वेद का ऋषि इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए कहता है— 'तेन त्यक्तेन भुंजीथाः’ अर्थात्— संसार को भोगे; परंतु निर्लिप्त होकर, निस्संग होकर, निष्काम भाव से।
निष्काम कर्मयोग के पथ पर चलने वाला साधक अपनी समस्त इच्छाओं, आकांक्षाओं को परमात्मा को समर्पित कर देता है। कर्मफल के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति वह तत्पर और सजग रहता है। उनके निर्वाह में संतोष की अनुभूति करता है। शरीर से कर्म और मन से चिंतन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति निरासक्त होता है।
अर्जुन को संबोधित कर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गंत्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयासिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योगउच्यते॥
अर्थात — "हे अर्जुन! आसक्ति छोड़कर सिद्धि और असिद्धि के विषय में समबुद्धि रखकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व को ही योग कहते हैं।”
‘समत्व’ का अर्थ हुआ समान भाव, समभाववृत्ति की एकरूपता, चित्तवृत्तियों की चंचलता पर निरोध। जिसे पातंजलि ने “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” करके समझाया है, उसे भगवान ने यहाँ एक ही शब्द ‘समत्व’ में गूँथ दिया है। हर पल चित्त की चंचलता कर्मों के करने में बाधा डालती है। सुख−दुख, जय−पराजय, हानि−लाभ के द्वंद्व मानसपटल पर सतत उभरते हैं। जय होने से घमंड होता है और पराजय से व्यक्ति हताश हो जाता है। परिस्थितियों मे जो मनःस्थिति को प्रभावित न होने दे, वह समत्व योग की ही उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्त्तव्यपालन कर सकते हैं।
चित्त की चंचलता के कई कारणों में अनुकूल भोग पाने की इच्छा भी एक प्रमुख कारण है। मनोवृत्ति की यही चंचलता असंयम को जन्म देकर उसे पथ भ्रष्ट कर देती है। समत्व योग का उपासक वस्तुतः निष्काम कर्मयोगी के साथ चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण रखने वाला कठोर साधक भी है जो पल−पल अपनी मनःस्थिति पर पैनी नजर रखता है। सिद्धि हो चाहे असिद्धि, हम जीवन-क्षेत्र में सफल हों अथवा असफल, कभी भी अपनी समस्वरता पर उसका प्रभाव न पड़ने देंगे, यही साधक का लक्ष्य होता है।
इसी श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है— 'संग व्यक्त्वा’ अर्थात फल की आसक्ति भी त्यागी जाए। वही मानव आमंत्रित दुर्बुद्धिजन्य आपत्तियाँ हैं। संग से ही विषयासक्ति की कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मूढ़ता, मूढ़ता से भ्रम व भ्रम से बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि का नाश ही मनुष्य के नाश का कारण है। इसीलिए कहा गया है कि—
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोतियः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा॥
“जो मनुष्य आसक्ति छोड़कर ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्मों को करता है, वह पानी में कमलपत्र की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।” इसीलिए फलेच्छा का त्याग करके किए गए कर्म ही सात्विक कहे जाते हैं। ऐसा व्यक्ति ही योगी; कर्त्तव्यपरायण साधक कहा जा सकता है।
ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म बहुत अनिवार्य है। साधारण मनुष्य जो कर्म करता है, वह स्वार्थवश करता है। सकाम कर्म करने वाला मनुष्य अपने अंश, रूप, आत्मा को प्रधान और सर्वव्यापी परमात्मा को गौण मानता है। किरण को प्रधान मानना और सूर्य का विचार तक न करना, अज्ञान का ही घोतक है, इसीलिए इस अज्ञान के निवारण तथा ब्रह्मार्पण बुद्धि से कार्य करने से ज्ञान की प्राप्ति कराने वाले इस ‘समत्व योग’ को ‘निष्काम कर्मयोग’ के अलावा ‘बुद्धियोग’ भी कहा गया है। अज्ञान ही सारे अभावों व अनास्था का कारण है। यह भावना चली जाए तो संकीर्ण स्वार्थपरता में लिप्त; यह जीवात्मा भवबंधन से निकले और कुछ विश्वात्मा के लिए भी सोचे; पर आरंभ वहीं से होता है, जिसे भगवान् ‘संगं त्यक्त्वा’ अर्थात अनासक्ति कहते हैं।
कर्मफल के प्रति अनासक्ति का होना इसलिए भी आवश्यक है कि मनुष्य का अधिकार नहीं है। यह सच है कि कर्मों का फल अपने निश्चित समय पर मिलता है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि यह प्रक्रिया किसी अदृश्य के हाथों संचालित है। कई बार कर्मफल प्रक्रिया में व्यतिरेक पड़ते भी दिखाई पड़ता है। एक निश्चित प्रकार के कर्म करते हुए भी उसका परिणाम उलटा देखकर मन में कर्मफल के सिद्धांत को सही रूप से न समझने के कारण ही होता है। प्रत्यक्ष जीवन और उससे जुड़ी भली-बुरी उपलब्धियाँ मात्र इसी जीवन की ही नहीं जन्म−जन्मांतरों के संचित कर्मों का परिणाम होती हैं। कितनी ही बार अच्छे कर्म करते हुए भी उनके परिणाम अनुकूल नहीं निकलते और अप्रत्याशित विघ्न−बाधाएँ ऐसे आकर अड़ जाती हैं, जिन्हें हटाने में मानवी पुरुषार्थ असमर्थ सिद्ध होता है। यह वस्तुतः अदृश्य उन कर्मों के फल होते हैं जो पिछले जन्मों में किए गए होते हैं। जो कर्मफल के सुनिश्चित विधान के अनुसार कालांतर में रोग−शोकों के रूप में प्रकट होते दिखाई देते हैं; अस्तु कर्मफल का सिद्धांत अक्षरशः सत्य होते हुए भी उसमें आसक्ति का न होना ही श्रेयष्कर है। फलासक्ति होने और तदनुरूप परिणाम न निकलने से भारी निराशा होती है।
भागवत गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहते हैं— "जो सुख−दुःख, सर्दी−गर्मी, लाभ−हानि, जीत−हार, यश−अपयश, जीवन−मरण, भूत−भविष्य की चिंता न करके मात्र अपने कर्त्तव्य−कर्म में निरत रहता है वही सच्चा ‘निष्काम−कर्मयोगी है।” कर्मयोगी इस सत्य से भली-भाँति परिचित होता है कि सांसारिक द्वंद्व तो एक के बाद एक आते हैं और आते रहेंगे। इनका प्रभाव क्षणिक और अस्थाई तथा मात्र नाशवान शरीर तक सीमित है। स्थाई शाश्वत तो आत्मा है, उसका उत्थान और पतन ही मनुष्य का वास्तविक उत्थान और पतन है। अस्तु जो भी कार्य किए जाए वे आत्मोन्नति को ध्यान में रखकर ही किए जाए।
अनासक्त कर्मयोग के संबंध में कितने ही व्यक्तियों के मस्तिष्क में अनेकों प्रकार की भ्रांतियाँ बैठी हुई हैं। कितने ही अतिवादी यह कहते हैं कि “हम जो भी काम करते हैं, वह वास्तव में हमसे कराए जाते हैं और वह कराने वाला परमात्मा है। हमारे द्वारा किया जाने वाला काम अच्छा है या बुरा इसकी न तो हमें चिंता करनी चाहिए और न ही अपने ऊपर उत्तरदायित्व लेना चाहिए। सबके लिए जिम्मेदार परमात्मा है।” इस भ्रांतियुक्त धारणा के कारण मनुष्य कर्म-अकर्म के बीच अंतर नहीं करता और दोनों ही में प्रवृत्त होता है। ऐसे में मन को अपनी निम्नगामी प्रवृत्तियों को तुष्ट करने की खुली छूट मिल जाती है; फलतः पतन के गर्त में गिरता चला जाता है।
सृष्टि का नियामक, संचालक होते हुए भी परमात्मा ने मनुष्य को अतिरिक्त रूप से विवेक-बुद्धि देकर उसे कर्मों का अधिष्ठाता बनाया है। उसे कर्म करने की पूरी−पूरी छूट दे रखी है। चाहे तो वह सत्कर्म का मार्ग अपनाकर आत्मिक-प्रगति की ओर बढ़ सकता है अथवा दुष्कर्मों में प्रवृत्त होकर अपनी अवनति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भले−बुरे कर्मों के लिए इस प्रकार पूर्ण उत्तरदायी मनुष्य ही है, न कि परमात्मा। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि कर्मों के लिए प्रेरणाएँ परमात्मा से मिलती हैं तो इस सत्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ से युक्त परमात्मा कभी मनुष्य को दुष्कर्म करने की प्रेरणा देगा। ऐसी प्रेरणाएँ अपने ही मन की उपज होती हैं, उस महानसत्ता का प्रतीक— प्रतिनिधि आत्मा के रूप में अपने भीतर बैठा है, जो सदा उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ ही संप्रेषित करता है; पर मन द्वारा उनकी उपेक्षा−अवहेलना होने से वे व्यवहार में नहीं उतर पातीं। मन को अपेक्षा यदि सचमुच ही अपनी गतिविधियों को आत्मप्रेरणा के अनुरूप परिचालित किया जाए तो कभी दुष्कर्मों की ओर बढ़ने का अवसर ही न प्रस्तुत हो। अस्तु कर्माकम का दायित्व अपने ऊपर न मानकर परमात्मा पर मानना अनासक्त कर्मयोग का गलत अर्थ लगाना है।
अनासक्त कर्मयोग शब्द स्वयं भी अपने वास्तविक आशय को प्रकट करता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है— अनासक्त और कर्मयोग। अनासक्ति का अर्थ यह है कि राग न रखना। कोई भी छोटा अथवा बड़ा काम क्यों न किया जाए उसके प्रति कर्त्तव्य का अहंकार न जोड़ा जाए। “पापमूल-अभिमान”— अहंकार को सभी पापों की जड़ माना गया है। अहंकार की उत्पत्ति आसक्ति से होती है। दूसरा शब्द है– कर्मयोग। गीता इसकी व्याख्या इस प्रकार करती है— ”योगः कर्मसु कौशलम्”— कर्म में कुशलता ही योग है। कार्यकुशल वही हो सकता है जिसे उचित-अनुचित कर्मों के बीच स्पष्ट अंतर का बोध हो। कुशल शब्द के अंतर्गत 'सत्यं शिवं सुंदरम्' का भाव प्रवाहित है। इसलिए कार्यकुशलता में अशुभ कर्मों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। अनासक्त कर्मयोग का वास्तविक तात्पर्य यह है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्त्तापन का अभिमान छोड़कर किया जाए और उसके फल के प्रति निर्लिप्त— निस्पृह रहा जाए। निष्काम कर्मयोग के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करने और इस राजमार्ग का अवलंबन लेकर साधक संसार में रहते हुए भी स्वर्गमुक्ति का उच्चस्तरीय आनंद प्राप्त कर सकता है।
साधना-क्षेत्र में समर्पण का असाधारण महत्त्व बताया गया है। अपने पुरुषार्थ के बलबूते तो एक सीमा तक ही आगे बढ़ा जा सकता है। स्वयं के पुरुषार्थ के साथ−साथ बाह्य अनुदान भी आगे बढ़ने के लिए आवश्यक हैं। मनुष्य को कितनी ही ऐसी सुविधाएँ प्राप्त हैं जिनके लिए उसे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ा है। प्रकृति ने उसे मुक्तहस्त से प्रदान किया है। यदि वे अनुकूलताएँ नहीं मिली होतीं तो उसका पुरुषार्थ अपने स्थान पर धरा रह जाता और अपना अस्तित्व भी सुरक्षित रखना कठिन पड़ता। सूर्य का प्रकाश, ताप और प्राण सतत् प्रचुर परिमाण में मिलता रहता है, जिसकी न तो कीमत लगाई जा सकती और न चुकाई जा सकती है। प्राणवायु का उपलब्ध भांडागार मनुष्य की पदार्थ की उपार्जित संपदा नहीं है। पृथ्वी एवं संबद्ध खनिज पदार्थ मनुष्य द्वारा विनिर्मित नहीं हैं। जलरूपी जीवन संपदा का विपुल भंडार मनुष्य ने नहीं जुटाया है। सृष्टा ने अपनी करुणा एवं उदारता का पूरा−पूरा परिचय देकर इन सुविधाओं को प्राणी मात्र के लिए पहले से ही अनुदान के रूप में दे रखा है। यह सब अनुकूलताएँ न मिली होतीं तो जीवन की सुरक्षा न हो पाती।
पुरुषार्थ का अपना महत्त्व है और बाह्य अनुदान का अपना। बाहरी सहयोग न मिले तो प्रगति-पथ पर एक कदम भी आगे बढ़ सकना संभव नहीं होगा। गर्भस्थ शिशु पूर्णतया पराश्रित होता है। माँ के अनुदान न मिले तो वह दम तोड़ देगा। जन्म लेने के बाद भी उसे माता−पिता का अनुग्रह सतत मिलता रहता है।
शारीरिक परिपोषण से लेकर मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए अनेकानेक प्रकार के साधन माता−पिता द्वारा जुटाए जाते हैं। समाज उसके शिक्षा आदि की व्यवस्था जुटाता है। सतत दूसरों का सहयोग पाकर ही वह आगे बढ़ता है। उसका पुरुषार्थ अभीष्ट वातावरण पाकर ही फलीभूत होता है। अपने पुरुषार्थ की भूमिका तो लंबे समय बाद आरंभ होती है। प्रारंभ में तो दूसरों के सहयोग से ही जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती है।
उपरोक्त अनुदान ऐसे हैं जो लगभग सभी को प्राप्त होते हैं। उन्हें पाकर अपने−अपने पुरुषार्थ के अनुरूप लोग आगे बढ़ते और सफलताएँ प्राप्त करते हैं। भौतिक-क्षेत्र की भाँति आध्यात्मिक-क्षेत्र में प्रगति करने के लिए भी प्रचंड पुरुषार्थ का परिचय देना पड़ता है। आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार के लिए तप−तितिक्षा के साधनात्मक शारीरिक एवं मानसिक उपचार करने पड़ते हैं। ये आवश्यक है और उपयोगी भी। आत्मनिर्माण का प्रथम चरण इन्हीं के सहारे पूरा होता है; पर इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है दैवी अनुग्रह−अनुदान प्राप्त करना। जीवात्मा में सत्चित्आनंदस्वरूप परमात्मा के अवतरण के बिना साधना का— पूर्णता का— लक्ष्य पूरा नहीं होता है। इसके लिए समर्पण योग— भक्तियोग की साधना करनी पड़ती है।
कर्मयोग की साधना से कर्मों में प्रखरता आती है, ज्ञानयोग से चिंतन उत्कृष्ट होता है– तत्त्वदृष्टि विकसित होती है। भक्तियोग से अंतःकरण सुविकसित होता, पवित्र बनता और इस योग्य होता है कि परमात्मसत्ता का वहाँ अवतरण हो सके। जीवात्मा की सामर्थ्य सीमित है, परमात्मा से मिलने पर ही उसमें परिपूर्णता आती है। यह सम्मिलन समर्पण के आधार पर ही संपन्न होता है। कर्म और ज्ञानयोग की साधना में कर्त्तापन का बोध बना रहता है, जिसके कारण आत्मसत्ता और परमात्मासत्ता के बीच एकत्व स्थापित नहीं हो पाता। इस स्थिति के कारण ही अर्जुन का संशय बना हुआ था, जिसका समाधान भगवान् कृष्ण ने गीता के उपदेश में ‘समर्पण योग‘ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा— "हे अर्जुन! मुझमें अपना मन रख, मुझे अपनी बुद्धि सौंप दे, उतने भर से तेरा कल्याण हो जाएगा।”
मय्येवयन आधत्स्वमपि बुद्धि निवेशय।
निवसिष्यति मय्येव अत उर्ध्व न संशय॥
–गीता
अर्थात— हे अर्जुन तू अपना मन मेरे में लगा। मेरे में ही बुद्धि को लगा, इसके उपरांत तू मेरे में निवास करेगा। मेरे को ही प्राप्त करेगा। इसमें कुछ संशय नहीं।
समर्पण के, शरणागति के अनेक आमंत्रणों में भगवान इतना ही कहते हैं कि ‘अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को, अहम् को, ईश्वर को समर्पित कर दे। इसके बाद सच्चे अर्थों में समर्पण का जो लाभ मिलना चाहिए, वह अनेकों प्रकार के अनुग्रह के रूप में भक्त को मिलता है। यहाँ ईश्वर से अभिप्राय किसी अदृश्य व्यक्ति अथवा सूक्ष्मशरीरधारी देवी−देवता के साथ दोस्ती बढ़ा लेने, मनुहार-उपहार के आडंबर रचने से नहीं, आदर्शों के समुच्चय के रूप में विद्यमान विश्वचेतना— समष्टिचेतना के सम्मुख आत्मसमर्पण से है। इस तथ्य को और अधिक समझना हो तो यों कहना कि व्यष्टि का समष्टि में, व्यक्तिवाद का समूहवाद में संकीर्णता का उदारता में, निकृष्टता का उत्कृष्टता में विसर्जन करना है। समर्पण के महत्त्व का प्रतिपादन अध्यात्म−सिद्धांतों में अनेक स्थानों पर अनेक ढंग से किया गया है। गोपियों के साथ कृष्ण के रास रचाने के पीछे यही प्रेरणा है कि सभी प्रवृत्तियाँ आत्मा की पुकार का– वेणुनाद का अनुसरण करें। अर्जुन को भी भगवान कृष्ण ने यही करने के लिए कहा। भक्तियोग के अनेकानेक कृत्य, पूजा, स्तवन, अर्चना में समर्पण की भावना को प्रबल बनाने का ही अभ्यास किया जाता है। भक्तियोग में समर्पण की ही प्रधानता है। वेदांत में अद्वैत के प्रतिपादनों में भक्तियोग का–समर्पण योग का ही समर्थन है—
‘भक्ति’ शब्द अपने लक्ष्य को और भी अधिक स्पष्ट करता है। यह संस्कृत के ‘भज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘भज्−सेवायाम्’ अर्थात् सेवा को भजो। सेवा किसकी? ईश्वर की। ईश्वर अर्थात उच्चस्तरीय आदर्शों का समुच्चय। व्यावहारिक भाषा में श्रेष्ठ आदर्शों से लिपटी सघन आत्मीयता को भक्ति कहते हैं। अर्थात भक्ति में समर्पण किन्हीं विशेष आदर्शों के लिए होता है। समर्पण के उपरांत उन्हीं आदर्शों पर चलना और प्रबल पराक्रम करना पड़ता है। जिन विशेषताओं से परमात्मा युक्त है वैसा ही बनना−ढलना पड़ता है। ईश्वर की अपनी स्वयं की कोई इच्छा नहीं है। विश्व-वसुधा का कल्याण ही उसे अभीष्ट होता है। भक्त को भी इन्हीं विशेषताओं से अनुप्राणित होना पड़ता है। संकीर्णता से निकलना और आत्मविस्तार के लिए बढ़ना होता है। संसार के पीड़ा-पतन को देखकर वह द्रवित हो उठता है। यह पीड़ा भावनाओं को उद्वेलित करने तक सीमित नहीं रहती, व्यवहार में परिलक्षित होने लगती है। संव्याप्त सामर्थ्य लगा देता है। आत्मीयता जब व्यापक होती है तो उसी के अनुरूप अनुभूतियाँ भी होती हैं। दूसरों के कष्ट-कठिनाइयाँ अपनी ही जान पड़ती हैं। जितना प्रयत्न−पुरुषार्थ अपने लिए किया जाता है। दूसरों के कष्टों के निवारण के लिए सच्चे भक्त कही अधिक करते देखे जाते हैं। वे उदार होते हैं— करुणा की प्रतिमूर्ति होते हैं। दुःख, दारिद्र्य, पीड़ा-पतन को देखकर उनकी करुणा सहज ही उमड़ पड़ती है।
समर्पण के चमत्कारी परिणाम सर्वत्र देखे जा सकते हैं। बीज की सत्ता अत्यंत लघु-नगण्य होती है, पर जब वह अपने आपको तुच्छ घेरे से निकालकर धरती माता की गोद में समर्पित कर देता है तो उसमें से नन्हें−नन्हें अंकुर फूटने लगते हैं। सूर्य किरणें उसे शक्ति देती हैं। पवन उसे दुलारता है, मेघ उसका अभिसिंचन करता है। संपूर्ण प्रकृति उसकी सेवा— उसके विकास के लिए जुट जाती है। बीज नीचे बढ़ता और अपनी जड़ें धरती की गोद में सुदृढ़ कर लेता है। ऊपर उठता है तो एक विशाल वृक्ष के रूप के परिणत होता चला जाता है। ऐसा वृक्ष जिसकी छत्र−छाया में सैकड़ों जीव−जंतुओं को पोषण, पक्षियों को विश्राम मिलता है। अपने संपूर्ण जीवन में वह एक नन्हा-सा बीज करोड़ों बीजों का जनक होने का गौरव प्राप्त करता है। नवजात शिशु की अपनी कुछ भी सामर्थ्य नहीं होती है; पर समर्पण के आधार पर उसे सारी सुविधाएँ प्राप्त हो जाती हैं। माता−पिता स्वयं कष्ट सहकर भी उसके पोषण की व्यवस्था जुटाते। उनका स्नेह−वात्सल्य अनायास ही बच्चे के प्रति उमड़ता रहता है।
समर्पण का चमत्कारी प्रतिफल दाम्पत्य जीवन में भी देखा जा सकता है। पति के समक्ष अपना तन, मन और आत्मा सब कुछ समर्पित कर देने वाली पत्नी कुछ खोती नहीं, पाती ही है। वह घर की मालकिन बन जाती है। जो अधिकार और सुविधाएँ पति को प्राप्त हैं उनकी अधिकारिणी बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के वह हो जाती है। उसे स्वामित्व के कानूनी अधिकार भी मिल जाते हैं। अपनी सत्ता को गंगा में विसर्जितकर देने वाले नदी-नाले भी गंगा जैसा ही श्रेय प्राप्त कर लेते और श्रद्धास्पद बनते देखे जाते हैं। मात्र उन्हें समर्पण का साहस भर जुटाना पड़ता है। अमरबेल वृक्ष से लिपट जाती है और वृक्ष की ऊँचाई जितनी ही जा पहुँचती है। ये उदाहरण समर्पण की महिमा का ही प्रतिपादन करते हैं।
समर्पण से अभिप्राय विलय−विसर्जन से है। आग के निकट आकर ईंधन भी उसी जैसा बन जाता है। दूध और पानी मिलकर एक जैसे बन जाते हैं। नाला गंगा में मिलकर गंगा का स्वरूप ही नहीं, विशेषताएँ भी प्राप्त कर लेता है। भक्त को भी समर्पण के लिए भगवान जैसा ही बनना पड़ता है। उन्हीं गुणों को अपने व्यक्तित्व में भरना पड़ता है, जो कि परमात्मा में हैं। भक्ति का अर्थ मनुहार-चापलूसी नहीं, प्रखर पराक्रम के लिए अपने को तैयार करना है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परमात्मा के आदर्शों के अनुरूप बनाना−ढालना पड़ता है। समर्पण ईश्वरभक्ति के नाम पर जहाँ कहीं भी निष्क्रियता दिखाई पड़ रही हो तो समझा जाना चाहिए कि मात्र विडंबना रची जा रही है। भक्ति और भक्त की एक ही कसौटी है कि सदुद्देश्यों के लिए वह शरीर, मन और अंतःकरण से कितना अधिक सक्रिय है। उसकी क्रियाशीलता, मस्तिष्क की विचारणा और अंतःकरण की उदारता परमार्थिक कार्यों में कितना अधिक नियोजित हो रही है।
समर्पण भक्त के, निष्ठा की परख है। एक संत ने कहा है कि, "समर्पण का अर्थ है— मन अपना, विचार इष्ट के, हृदय अपना, भावनाएँ इष्ट की।" इस परिभाषा के अनुसार जीव को अपनी अहंता से पूरी तरह अवकाश पा लेना है। शरीर, मन और अंतःकरण पर स्वयं का आधिपत्य होते हुए भी इनकी विशेषताएँ-क्षमताएँ पूरी तरह इष्ट के लिए अर्थात उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित हो जाए। समर्पण के लिए इस भावना को सदा परिपुष्ट करते रहना पड़ता है कि, "मैं पतंगें की तरह हूँ, इष्टदेव दीपक की तरह। अनन्य प्रेम के कारण द्वैतश्रद्धा को समाप्तकर अद्वैत की उपलब्धि के लिए, अपने इष्ट के साथ, प्रियतम के साथ एकात्म होता हूँ। जिस प्रकार पतंगा दीपक पर आत्मसमर्पण करता है, अपनी सत्ता को मिटाकर प्रकाश-पुंज में लीन होता है, उसी प्रकार मैं अपना अस्तित्व इस अहंकार को मिटाकर ब्रह्म में, समष्टिचेतना में विलीन होता हूँ। अपनी अहंता, ममता और द्विधा मिटा देने के कारण मैं आत्मा की परिधि से उठकर परमात्मसत्ता के रूप में विकसित होता हूँ, उसी स्तर की व्यापकता धारण करता हूँ। अपनी समस्त श्रद्धा को मैं प्रभु को समर्पण करता हूँ। वे मुझे अपने में एकाकार कर लेते, अपने समान बना लेते हैं। मेरे अंतः को वे ज्ञान, विवेक, प्रकाश एवं आनंद से भर देते हैं। अपने समान ही रीति−नीति अपनाने की प्रेरणा एवं प्रकाश प्रदान करते हैं।”
ईश्वर के प्रति परिपूर्ण समर्पण भक्त को भी उसी जैसा बना देता है। उसके दिव्य अनुग्रहों का अधिकारी भक्त सहज ही बन जाता है। परमात्मा का स्वरूप ‘सत्-चित्आनंद ’ है। भक्त का अंतःकरण भी वैसा ही हो जाता है। भीतर का आनंद सतत बाहर छलकता रहता और सान्निध्य में आने वाले अनेकों व्यक्तियों के अंतःकरण को परितृप्त करता है। ऐसे भक्तों की समीपता प्राप्त करने के लिए कितने ही व्यक्तियों का मन लालायित होता रहता है। उनका व्यक्तित्व स्वयं दूसरों के लिए प्रेरणा−प्रकाश देने का केंद्र बनता है। सदुद्देश्य के सत्प्रेरणाएँ उभारने वाले भक्त स्वयं तो धन्य होते ही हैं, वह समाज धन्य बनता है जहाँ वे पैदा होते हैं।
‘योग-साधना’ शब्द योग एवं साधना दो से मिलकर बना है। योग का अर्थ होता है— जुड़ना एवं साधना अर्थात नियंत्रण में कर लेना— मजबूती से अपनी पकड़ में ले लेना। किसे जोड़ना, किसे जुड़ना व किसे नियंत्रण में लेना, इनके ठीक तरह न समझ पाने के अज्ञान के कारण ही इस क्षेत्र में नाना प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं। इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में एक समस्या मानकर चला जाए तो चमत्कार–सिद्धियों संबंधी मान्यताओं का जो अनाधिकार प्रवेश इस क्षेत्र में गलत रूप में हो गया है, उससे स्वयं बचा व अन्यों को बचाया जा सकता है।
योग न तो आसन है, न प्राणायाम, न ही एकाग्रता। यह तो एक भावपरक भूमिका है, जिसमें व्यक्ति को अपनी सत्ता का समर्पण, समष्टि में करना होता है। आदर्शों से भरी ब्रह्मचेतना ही ‘उपास्य ब्रह्म’ है, जो जीव से मिलने को आतुर है। व्यक्तिवादी संकीर्णता से उबरकर आना व विश्वमानस की परिधि में मानव का भावोत्कर्ष होना योग-साधना कहा जा सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण का, भावनात्मक मनोभूमि का, परिष्कार करना होता है। पाशविक चिंतन को हेय स्थिति से उलटकर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में रत होना पड़ता है। समस्त अध्यात्मयोग-साधनाओं का लक्ष्य यही है। यही वह लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के लिए योग-साधक तत्पर हो स्वयं आगे बढ़ता है व अन्यों को आगे बढ़ाता है।
साधना का अर्थ है— ”अपने को सुसंस्कृत-सभ्य बना लेना।’ अपने जीवन देव की सुव्यवस्था के लिए की गई चेष्टाएँ ही साधना कहलाती हैं।
व्यक्तित्व पर चढ़ी दुष्प्रवृत्तियों का निवारण, सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना प्रत्यक्षतः एक पुरुषार्थ है। इस कीमत पर ही साधारणजन व्यक्तित्व सम्पन्न–महामानव बने हैं। साधना आत्मिक-क्षेत्र में भी होती है तथा भौतिक में भी। जैसे प्रयास किए जाते हैं, वैसी ही सफलता मिलती है।
माली अपनी क्यारी की निराई–गुड़ाई करके खरपतवार अलग करता है व वांछित पौधे को खाद-पानी देने से लेकर उसे सहारा देने तक की आवश्यकता को भली−भाँति समझता है। किसी के दबाव से नहीं– स्वप्रेरणा से ही खेत की, बैलों की, हल आदि संबद्ध उपकरणों की व्यवस्था जुटाकर चलता है। आज का श्रम कल ही लाभप्रद हो, ऐसा दुराग्रह उसका नहीं होता। फसल समय के अनुसार पकती है, तब तक वह धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता है, मौसम से लेकर कीड़ों से सुरक्षा तक के सभी अवरोधों से निपटता रहता है व समय आने पर जितना मिला, उसे ईश्वरीय उपहार समझ घर ले आता है। इस साधना को वह सतत् जीवन भर चलाता है। साधना कैसे की जाती है–इसकी विधि का मर्म किसान की गतिविधियों तथा मनोभूमि का पर्यवेक्षणकर भली-भाँति समझा जा सकता है।
अध्यात्म-साधना का क्षेत्र अंतर्जगत है। अपने भीतर दबे खजाने को व्यक्ति स्वयं नहीं जानता; पर खोजने−उभारने का प्रयास करने पर उसे यही काया— यही जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष दृष्टिगोचर होता है। लगता है बाहर किसी से माँगने की, दीनता दिखाने की बजाए पहले अपने भीतर ही हल चला लिया होता तो कितना ठीक रहा होता। भीतरी प्रसुप्त क्षमताओं को ही विभिन्न तत्त्वदर्शियों ने देव माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अंतःसंस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान मात्र बताया है। वे साधक की निष्ठा को पकाते हैं, उसे अभ्यस्त बनाते हैं। साधक की मूर्च्छना जागृत होती है। आत्मविस्मृति को भूल वह आगे बढ़ चलता है।
आत्मचेतना की जागृति, उसे साधकर लक्ष्य विशेष पर केंद्रीभूत कर देना एवं उस लक्ष्य से जुड़ने के लिए प्रारंभिक पुरुषार्थ–आत्मशोधन के साथ उच्चस्तरीय आदर्शवादी दृष्टिकोण का विकास— यही यह नींव है, जिस पर योग-साधना का भवन खड़ा होता है। इसके फलित होने पर जो चमत्कार बहिरंग व अंतरंग-क्षेत्र में दिखाई पड़ते हैं वे मनोबल— आत्मबल की फलश्रुतियाँ नहीं; वरन प्रसुप्त की जागृति की चमत्कृति ही होते हैं। उन्हें पाकर मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य बन जाता है।
विडंबना यह है कि ऊपर वर्णित इस दर्शन को भूलकर आसन, प्राणायाम, एकाग्रता की तीन टाँग की सवारी पर सवार होकर योग-साधना के क्षेत्र में दौड़ लगाने की प्रतियोगिता ही चारों ओर नजर आती है। कहीं−कहीं तो मुद्रा, बंध, नेति, धोति, वस्ति आदि बहिरंग योगपरक क्रियाओं को ही योगशिक्षा में सम्मिलित कर लिया गया है। चौथे अनिवार्य चरण पर किसी का ध्यान गया ही नहीं, जिसके बिना ये तीनों अधूरे हैं। मात्र शरीर का शोधन, अभिवर्धन व एकाग्रताजन्य स्थूल परिणतियों तक ही सीमित रह जाने वाले हैं। स्वार्थवादी संकीर्णता में उलझे कुसंस्कारी मन को उच्च आदर्शों को अपनाने की तपश्चर्या में लगा देना ही योग-साधना का प्राण है। चूँकि यह सबसे दुष्कर कार्य है, सबसे बड़ा आत्मिक पुरुषार्थ इसी में करना होता है, इसी कारण सबसे अधिक अवहेलना भी इसी की, की जाती है। कहा जाता है कि योग विज्ञान प्रथम तीन व अन्य हठयोग की क्रियाओं तक सीमित है। चिंतन व आहार, कर्त्तव्य व व्यवहार में पूरी छूट है।
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अध्यात्म-क्षेत्र के प्रवक्ता कहे जाने वालों ने यह भ्रम-जंजाल सबसे अधिक फैलाया है। योग की दुकान खूब तेजी से फैली है। मानसिक शांति, शरीर-स्वास्थ्य की किसे जरूरत नहीं है? आज विश्व में समृद्धि की सहचरी इन दो कुलटाओं— मानसिक तनाव व शारीरिक कुस्वास्थ्य ने प्रत्यक्ष रूप से विकसित समाज को अपने शिकंजे में जकड़ रखा है। औषधि उपचार व्यर्थ नजर आते हैं, ऐसे में वे सहज ही उस ओर भागते हैं, जहाँ उन्हें कुछ आसानी से मिलने की आशा हो। यह सब योग-साधना के नाम पर ही हुआ है कि आत्मिक पुरुषार्थ–आत्मोत्थान की इस पद्धति— क्रियाविधान को सरल–सुगम बनाने के नाम पर आत्मप्रवंचकों ने जमकर तथ्यों की अवहेलना की है व अध्यात्म विज्ञान को हानि भी पहुँचाई है। आस्था संकट का एक कारण यह भी है कि व्यक्ति उपचारों को गलत ढंग से अपनाने पर परिणाम न मिलने की शिकायत करे एवं प्रकारांतर से इन उपचारों में अपनी अनास्था व्यक्त करे।
आज सबसे बड़ा परिष्कार इसी क्षेत्र में किए जाने की आवश्यकता है। यहाँ तक तो उचित भी है कि शरीर सक्रिय, सबल−स्वस्थ हो एवं मन संतुलित। योग-साधना की ओर प्रवृत्त साधक का शरीर दूसरे अन्य लोगों की तरह ही स्वस्थ बनाए रखने के लिए आसन, प्राणायाम जैसे व्यायामों का प्रयोग जरूरी है। आहार-विहार ठीक हो— संयमित दिनचर्या हो। योगी हो अथवा साधारण लोक−जंजाल में फंसा व्यक्ति दोनों ही के लिए यह जरूरी है कि, आसन आदि तथा बलवर्धक शरीरपरक क्रियाएँ करके शरीर को सुगठित-क्रियाशील रखा जाए। यह स्वास्थ्य-रक्षा हर स्थिति में उपयोगी है, अनिवार्य है, पर गलती तब होती है जब शारीरिक अवयवों की तोड़−मरोड़, अंगों को ऐसे−वैसे घुमाना, इन्हीं को योग-साधना कह दिया जाता है।
इसी प्रकार प्राणायाम स्थूलतः ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहन श्वास−प्रश्वास प्रक्रिया भर है, यदि उसके साथ भावना नहीं जुड़ी है। महत्ता तो तब है जब अंतःचेतना को प्राणाकर्षण— प्राण-धारणा-प्रक्रियाओं द्वारा प्रदीप्त किया जाता है एवं इसे उच्चस्तरीय स्थिति में पहुँचाने की बात सोची जाती है। शरीर के अवयवों को साफ रक्त मिले, उनके अंदर जमा विकारों का शोधन हो यह जरूरी है व डीप ब्रीदिंग की प्रक्रिया यह करती भी है; पर यदि इसे ही योग, कुण्डलिनी आदि का स्वरूप दे दिया जाए तो यह हास्यास्पद कदम ही होगा। किसी भी वस्तु को उतना ही महत्त्व मिले जितनी कि वह है। नकली जेवर नाटकों में खूब पहने जाते हैं, गोल्ड पालिश किए श्रृंगार के सभी साधन सस्ती कीमत में बाजार में मिलते हैं; पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि ये सोने का स्थान ले लेंगे। आज बाजारों में जिस प्रकार हर वस्तु का चाहे वह लिखने वाली कलम हो अथवा विदेशी आयातित उपकरण— एक डुप्लीकेट नकल बिकती है। जानकार उसे पहचानते हैं व इस धोखाधड़ी से बचते हैं। मात्र प्राणायाम को ही योग-साधना कह देना इसी प्रकार की एक धोखाधड़ी षड्यंत्र है। अध्यात्म के सरलीकरण की यह प्रक्रिया किसी भी प्रकार उचित नहीं ठहरायी जा सकती। एक मजदूर जो दिन में 3−3 क्विंटल वजन उठाकर इधर−उधर करता है अथवा जो खेत में हल जोतता है, एक सैनिक जो अपनी कवायद करता है, उतना शरीर-शोधन कर लेता है, जितना इन क्रियाओं से संभव है; पर यह योग तो नहीं हुआ? ऐसी दशा में मात्र आसन-प्राणायाम को तिल का ताड़ बनाकर खड़ा कर देना अध्यात्म विद्या के साथ मजाक है।
एकाग्रता— मेडीटेशन तीसरा पक्ष है, जिस पर खूब लिखा जाता है व कहा जाता है। ध्यानकेंद्र इतने खुल गए हैं लगता है सारा विश्व अध्यात्मवादी हो गया; पर बाद में देखने पर लगता है इन व्यक्तियों के चिंतन व कार्य तो बदले ही नहीं। वैसे के वैसे ही घटिया रहे। एकाग्रता मन के विधि−व्यवस्थापूर्वक सोचने की, बिखरी शक्तियों को एक ओर केंद्रित सुनियोजित करने की विधा मात्र है। यह तो एक कला है। घड़ी साज जब अपने ग्राहक की घड़ी का सूक्ष्मपुर्जा अपनी जगह लगाता है व त्रुटि को ठीक करता है तो वह एकाग्रता के माध्यम से ही यह सब कर पाता है। इसी प्रकार एक सफल विद्यार्थी, साहित्यकार, कलाकार, मूर्तिकार, वैज्ञानिक मनोयोग के संपादन से ही वह सब कुछ अर्जित कर पाता है; पर यह है एकाग्रता की–एक स्थूल भौतिक शक्ति के सुनियोजन द्वारा अर्जित सिद्धि। मनोयोग−तन्मयता जहाँ होगी वहाँ सफलता मिलती चली जाएगी। अस्त−व्यस्त चिंतन रोककर एक जगह केंद्रित किया जाए तो उसके सत्परिणाम मिलेंगे ही। मस्तिष्क की घुड़दौड़ जब रुक जाती है— विचार-प्रवाह सुनियोजित हो जाता है तो, भौतिक क्षेत्र में अपार सफलताएँ मिलती हैं, यह सत्य है। मात्र यहाँ तक ही एकाग्रता या ‘मेडीटेशन की भूमिका है। यह मस्तिष्कीय व्यायाम मात्र हुआ; पर यह योग-साधन नहीं है। इसे यदि इतनी हलकी परिधि में सीमाबद्ध कर देंगे तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। विचारों में उच्चस्तरीय, उद्देश्यपरक, भाव–परिष्कारयुक्त चिंतन का समावेश हुए बिना योग कहाँ हुआ? चूँकि चरित्र निर्माण, भावनात्मक उत्थान एवं जीवन लक्ष्य का उच्चस्तरीय निर्धारण कठिन एवं सबके लिए सुलभ नहीं है, इसलिए मात्र भीड़ एकत्र करने के लिए योग के नाम पर बाजीगरी उपयुक्त नहीं।
आदर्शवादी चिंतन–महत्त्वाकांक्षाओं को भौतिक से आत्मिक में बदल देना, संकीर्ण स्वार्थपरता के भवबंधनों— लोभ, मोह, अहंकार से मुक्त होकर आत्मविस्तार करना यह योग का वह पक्ष है, जिसके बिना ऊपर वर्णित तीनों साधन मात्र स्थूलक्रियाएँ भर हैं। आदर्शवादी भावचेतना को ही ‘उपास्य ब्रह्म’ कहते हैं। अपनी ‘लघु−स्व’ चेतना को ऊँचा उठाकर उसे परम सत्ता के साथ जोड़ देना अथवा उसका अपने अंदर अवतरण होने की अनुभूति करना, दोनों एक ही हैं। लक्ष्य एक ही है, दृष्टिकोण का परिष्कार— पाशविक स्तर, हेय चिंतन एवं कर्त्तव्य के उलटकर उसे कुमार्गगामिता के पथ से रोककर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना। इसी तथ्य की ओर योग-साधना के उत्सुकों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। यह ध्यान-साधना क्रियाओं में सद्कर्म, चिंतन में सद्ज्ञान व अंतः में सद्भाव के रूप में परिलक्षित होने लगती है। यही वह चरम उपलब्धि है, जिस पर मानव का उत्थान एवं समाज का उत्कर्ष निर्भर है। जितनी जल्दी इन तथ्यों को हृदयंगम कर लिया जाए, श्रेयस्कर है। बाल−क्रियाओं में समय भी नष्ट किया और पाया कुछ नहीं, यह पश्चात्ताप मन में बना रहे, इससे उचित तो यही है कि योग-साधना, अध्यात्म उपचारों के मर्म, स्वरूप एवं लक्ष्य पहले अच्छी तरह समझ लिया जाए। उतना होने पर आगे बढ़ चलना, बिना किसी कठिनाई के ही संभव है। लक्ष्य यही रहे कि इस पंचतत्त्वों की कायामात्र नहीं; वरन अपने प्रसुप्त आत्मतत्त्वों को जगाना, उठाना, उभारना है।
संचित दुष्कर्मों को यथास्थान छोड़कर आत्मिक-प्रगति की साधना कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। कक्षाएँ उत्तीर्ण करके ही विद्यार्थी स्नातक की उपाधि पाते, उच्चपदाधिकारी बनते हैं। छलांगें भौतिक जगत में कई क्षेत्रों में लगाई जाती हैं और सफल भी होती हैं; पर आत्मिक-क्षेत्र में ऐसी सुविधा नहीं है। संचित दुष्कर्मों से विनिर्मित प्रारब्ध न केवल विपत्तियों–असफलताओं का त्रास देता है; वरन उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर चलने में भी अनेकों विघ्न उपस्थित करता है। रास्ते में अड़ी इन चट्टानों को हटाने−सरकाने के लिए साहसपूर्ण पराक्रम करना होता है। यही है वह प्रायश्चित-प्रक्रिया जिसे तप-साधना में वरिष्ठता–प्रमुखता दी गई है।
कर्मफल की संभावना सुनिश्चित है। उसे विश्व-व्यवस्था का एक अनिवार्य एवं अविच्छिन्न अंग ही समझा जाना चाहिए। इन संचयों को स्वयं ही भुगतना होता है। देवदर्शन, नदीस्नान, पूजा, उपचार, कथावार्ता एवं छुट-पुट कर्मकांडों का प्रयोजन इतना ही है कि उनसे परिशोधन, परिमार्जन की ओर ध्यान मुड़े, महत्त्व समझने का अवसर मिले और वह साहस उभरे जिससे कर्मफल भुगतने का दूसरा विकल्प प्रायश्चित स्वेच्छापूर्वक बन पड़े। प्रायश्चित के लिए किए जाने वाले व्रत-उपवासों के सामयिक प्रतिफल भी होते हैं; किंतु वास्तविक एवं चिरस्थाई लाभ देने वाला तथ्य यह है कि दुष्कृत्यों के प्रति घृणा उभरे, भविष्य में वैसा न करने का संकल्प मचले, साथ ही जो किया गया हो उसकी क्षतिपूर्ति करने ही सदाशयता की खाई पाटने के लिए उत्साह उत्पन्न करें।
यह सारा संसार कर्म-व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। भगवान ने दुनिया बनाई और उसके सुसंचालन के लिए कर्म-विधान रच दिया। ‘जो जैसा करता है वह वैसा भोगता है,' सिद्धांत अकाट्य है। लोग भ्रम में इसलिए पड़ते हैं कि कई बार कर्मों का तत्काल फल नहीं मिलता, उसमें विलंब हो जाता है। यदि शुभ−अशुभ कर्मों का फल तत्काल मिल जाया करता तो फिर दूरदर्शिता, विवेकशीलता की आवश्यकता ही न पड़ती। आग छूते ही हाथ जल जाता है। इस प्रत्यक्ष तथ्य के कारण कोई आग में हाथ डालने की मूर्खता नहीं करता; किंतु सुकृत्यों और दुष्कृत्यों का परिणाम तत्काल नहीं मिलता। उसके परिपाक में देरी हो जाती है। इतने में ही बालबुद्धि के लोग अधीर हो जाते हैं। पुण्य के संबंध में निराश और पाप के संबंध में निर्भय हो जाते हैं। जो करणीय है उसे छोड़ बैठते हैं और जो न करना चाहिए उसे करने लगते हैं। यही वह माया है जिसके बंधनों में जकड़े हुए लोग दिग्भ्रांत होते, भूलभुलैयों में उलझते तथा भटकावों में खिन्न, उद्विग्न बने दिखाई पड़ते हैं।
आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता हैॆ। आज का अध्ययन व्यायाम, व्यवसाय आज ही कहाँ फल देता है? परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं; पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा, विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता, जिस दिन चोरी की जाए, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े, ऐसा कहाँ होता है? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं तो परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्मों-दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए; पर लोग भ्रमग्रस्त होकर कर्मफल के संबंध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकारी को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।
दुष्कर्मों का प्रतिफल कई रूपों में भुगतना पड़ता है। लोकनिंदा होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अप्रामाणिक−अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें किसी का सघन विश्वास एवं सच्चा सहयोग नहीं मिलता। श्रद्धा और सम्मान तो उसी को मिलता है, जिसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होती है। जन−विश्वास एवं सहयोग के आधार पर कोई व्यक्ति प्रगति करता और सफल होता है। संदिग्ध चरित्र व्यक्तियों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है और वे मित्रविहीन एकाकी नीरस जीवन जीते हैं। घनिष्ठता का लाभ तो उन्हें स्वजनों से भी नहीं मिलता। वे भी सदा आशंका की ही दृष्टि से देखते हैं और दिखावे का सहयोग दे पाते हैं। आत्मप्रताड़ना का दुरूह दुःख ऐसे ही लोगों को सहना पड़ता है। दूसरों को झुठलाया जा सकता है; पर अपनी ही आत्मा को कैसे बहकाया जाए? वह दुष्कर्मों से स्वयं खिन्न रहती है। आत्मधिक्कार से आत्मबल निरंतर गिरता जाता है।
समाज में तिरस्कार, असहयोग, विरोध, उपेक्षा जैसे प्रत्यक्ष हानि है। जिसके ऊपर घृणा और तिरस्कार बरसता है, उसकी अंतरात्मा को पत्थर बरसने से भी अधिक अंतःपीड़ा सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी हानि नहीं है जितना कि विश्वास, सम्मान और सहयोग चला जाना। दुष्कर्मों का यह सामाजिक दंड हर कुमार्गगामी को भुगतना पड़ता है। पाप और पारा छिपता नहीं, वह फूट−फूटकर देर−सबेर में बाहर निकलता ही है। सत्कर्म छिप सकते हैं, दुष्कर्म नहीं। हींग की गंध कई थैलियों में बंद करके रखने पर भी फैलती है और दुष्कर्मों की दुर्गंध हवा में इस तरह उड़ती है कि किसी के छिपाए नहीं छिपती। समाज दंड— असहयोग-बहिष्कार के रूप में तो बरसता ही है; कई बार वह प्रतिशोध और प्रत्याक्रमण के रूप में भी सामने आता है। लोग अनीति के विरुद्ध उबल पड़ते हैं तो दुरात्मा का कचूमर ही निकालकर रख देते हैं। न केवल अध्यात्म-क्षेत्र में; वरन भौतिक जीवन में भी यही सिद्धांत काम करता है। रक्तविकार जैसे रोगों को दूर करने के लिए कुशल वैद्य पेट की सफाई करने के उपरान्त अन्य रक्तशोधक उपचार करते है। कायाकल्प चिकित्सा में बलवर्धक औषधियों को नहीं, संचित मलों का निष्कासन करने वाले उपायों को ही प्रधान रूप से कार्यान्वित किया जाता है। वमन, विरेचन, स्वेदन आदि क्रियाओं द्वारा मल-निष्कासन का ही प्रयास किया जाता है। इसमें जितनी सफलता मिलती जाती है। उसी अनुपात से जरा−जीर्ण रोगग्रस्त व्यक्ति भी आरोग्य लाभ करता और बलिष्ठ बनता चला जाता है। कायाकल्प चिकित्सा का विज्ञान इसी सिद्धांत पर आधारित है।
दोष−दुर्गुणों के रहते चिरस्थाई प्रगति के पथ पर चल सकना किसी के लिए भी संभव नहीं हुआ है। फूटे बर्तन में दूध दुहने से पल्ले कुछ नहीं पड़ता। पशुपालने और दुहने का श्रम निरर्थक चला जाता है। कषाय−कल्मषों से,दोष-दुर्गुणों से लड़ने के लिए जो संघर्ष-पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी के विधि−विधानों को तप-साधना कहते हैं।
आयुर्वेद के प्रख्यात ग्रंथ 'माधव निदान' के प्रणेता माधवाचार्य अपने साधनाकाल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महापुरश्चरणों में संलग्न थे। उन्होंने पूर्ण विधि−विधान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गए।
काशी के गंगा तट पर वे बडे दुःखी मनःस्थिति में बैठे हुए थे कि उधर से एक अघोरी कापालिक आ निकला। साधक की वेशभूषा और छाई हुई खिन्नता जानने के लिए वह रुक गया और कारण पूछने लगा, माधवाचार्य ने अपनी व्यथा कह सुनाई। कापालिक ने आश्वासन दिया कि उसे भैरव की सिद्धि का विधान आता है। एक वर्ष तक उसे नियमित रूप से करते रहने से सिद्धि निश्चित है। माधवाचार्य सहमत हो गए और कापालिक के बताए हुए विधान के साथ मणिकर्णिका घाट श्मशान भूमि की परिधि में रहकर साधना करने लगे। बीच−बीच में कई डरावनी, लुभावनी परीक्षा होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा, एक वर्ष पूरा होते−होते ही भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।
माधवाचार्य ने आँख खोलकर चारों ओर देखा, पर बोलने वाला कहीं दिखाई न पड़ा। उन्होंने कहा— "यहाँ आए दिन भूत−पलीत ऐसी ही छेड़खानी करने आया करते हैं और ऐसी ही चित्र−विचित्र वाणियाँ बोलते हैं। यदि आप सचमुच ही भैरव हैं तो सामने प्रकट हों। आपके दर्शन करके चित्त का समाधान कर लूँ तो वरदान माँगू।” इसका उत्तर इतना ही मिला। “आप गायत्री उपासक रहे हैं। आपके मुखमंडल पर इतना ब्रह्मतेज छाया हुआ है कि सामने प्रकट होकर अपने को संकट में डालने की हिम्मत नहीं है। जो माँगना हो ऐसे ही माँग लो।” माधवाचार्य असमंजस में पड़ गए यदि गायत्री पुरश्चरणों से इतना ही ब्रह्मतेज उत्पन्न होता है तो उसकी कोई अनुभूति मुझे क्यों नहीं हुई? सिद्धि का आभास क्यों नहीं हुआ? यह प्रश्न बड़ा रहस्यमय था, जो भैरव के सम्वाद से ही उपजा था। उन्होंने समाधान भी उन्हीं से पूछा। कहा— "देव! यदि आप प्रकट नहीं हो सके और गायत्री उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपाकर यह बता दें कि मेरी इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।"
भैरव ने उनकी इच्छापूर्ति की और पिछले ग्यारह जन्मों के दृश्य दिखाये। जिसमें अनेकों पापकृत्यों का समावेश था। भैरव ने कहा— "आपके एक−एक वर्ष के गायत्री पुरश्चरण से एक−एक जन्मों के पाप कर्मों का परिशोधन हुआ है। ग्यारह जन्मों के संचित पाप-प्रारब्धों के दुष्परिणाम इन ग्यारह वर्षों के तप-साधन से नष्ट हुए है। अब आप नए सिरे से फिर उसी उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।"
माधवाचार्य फिर वृन्दावन लौटे और बारहवाँ पुरश्चरण करने लगे। अबकी बार उन्हें आरंभ से ही साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवाँ वर्ष पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई, जिसके सहारे 'माधव−निदान' जैसा महान ग्रंथ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हित साधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीवन का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।
इस गाथा से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है। संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय संभव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जाएगी। यही बात संचित पुण्यकर्मों के बहुत देर में फल देने वाली व्यवस्था में जल्दी भी हो सकती है।
द्रुतगामी वाहनों पर सवार होकर पैदल चलने से देर में संपन्न होने वाली यात्रा अपेक्षाकृत कहीं जल्दी पूरी की जा सकती है। हमारे वर्तमान प्रयत्न ही सब कुछ नहीं होते, उनमें पूर्वसंचित सत्संग्रहों का भी योगदान होता है। उनका योगदान मिलने से सफलताओं का परिणाम स्वल्प प्रयत्न से भी इतना अधिक हो सकता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।
शरीर को जीवित रखने और अवयवों के संचालन में भी जठराग्नि ही काम करती है। सूर्य से लेकर चूल्हे तक अग्नि का ही सर्वत्र साम्राज्य छाया हुआ है। पदार्थ में हलचल, प्राणी में चिंतन की जो सामर्थ्य काम करती दिखती है, उसे अग्नि का एक नाम ‘आतप’ है। अध्यात्म-क्षेत्र में उसके उत्पन्न करने की पद्धति का नाम ‘तप’ है।
बालविनोद की प्रारंभिक साधनाएँ नित्यकर्म कहलाती हैं और उनमें देव प्रतिमाओं के पूजा-उपचार को भी महत्त्व दिया व माहात्म्य बताया जाता है। उच्चस्तरीय साधनाओं का सत्परिणाम भी असाधारण होता है। उसके लिए उनका मूल्य चुकाने के लिए क्लिष्ट तप-साधनों को उपयुक्त मार्गदर्शन में अपनाते हुए ही प्रगति-पथ पर अग्रसर होना होता है।
महाभारत का धर्मयुद्ध आरंभ होने वाला था। युद्ध को निर्णायक स्थिति में पहुँचाने के लिए ‘श्री कृष्ण’ किसी ऐसे स्थान की खोज में थे जहाँ के वातावरण में निष्ठुरता के तत्त्व अधिक हों। इसका कारण यह था कि कौरव-पांडवों के बीच युद्ध तो होते थे, पर वे भावुकतावश अपने संबंधों को स्मरण करके पुनः समझौता कर लेते थे और समस्या का समाधान नहीं निकल पाता था। धर्मयुद्ध को निर्णायक भूमिका में लाने के लिए कृष्ण ने एक दूत को भेजा कि उपयुक्त स्थान की खोज करे। दूत पता लगाकर वापिस लौटा और उसने अपनी जानकारी का एक ऐसा प्रसंग सुनाया, जिससे युद्ध के लिए उपयुक्त स्थान की समस्या हल हो गई।
दूत ने आँखों देखा वर्णन सुनाते हुए कहा— "तेज वर्षा हो रही थी। बड़े भाई ने छोटे भाई को खेत पर मेंड़ बाँधकर पानी रोकने के लिए कहा, इस पर छोटा क्रोधित हो उठा। अवज्ञा भरे कटुवचन बोलने लगा। सुनते ही बड़े का आवेश चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने तत्काल लाठी से छोटे का सिर फोड़ दिया और लाश को घसीटते हुए खेत के बहते हुए पानी को रोकने के लिए गाड़ दिया।” घटना को सुनकर श्रीकृष्ण ने जान लिया कि उस वातावरण में ऐसे तत्त्व मौजूद हैं, जिसमें स्नेह-सौजन्य की नहीं क्रूर–निष्ठुरता की ही बहुलता है। यही महाभारत युद्ध के लिए उचित क्षेत्र होगा। कुरुक्षेत्र के नाम से कुविख्यात स्थान में महाभारत युद्ध आरंभ हुआ और तभी समाप्त हुआ जब दोनों पक्षों के स्वजन संबंधी आपस में लड़कर समाप्त हो गए।
एक और घटना प्रख्यात है— श्रवण कुमार अपने अंधे माता−पिता को तीर्थयात्रा पर ले जा रहे थे। वाहन का प्रबंध नहीं था। उन्होंने काँवर बनाई। दोनों को काँवर में, दोनों ओर बिठाया और कंधे पर लादकर यात्रा कराने चले। प्रसन्नतापूर्वक यह कष्टसाध्य यात्रा करते रहे? पर एक दिन एक स्थान पर पहुँचने पर उनकी विचारधारा बदल गई। काँवर को जमीन पर रखकर श्रवण कुमार बोले— "आप लोगों की आँखें खराब हैं, पैर नहीं। अपने पैरों चलिए, मुझसे इतना बोझ लेकर चलते नहीं बनता। श्रवण कुमार के पिता इस आकस्मिक परिवर्तन को देखकर चकित रह गए। ऋषि होने के कारण उन्होंने अपनी सूक्ष्मदृष्टि से वस्तुस्थिति जान ली। पुत्र की बात पर सहमति व्यक्त कर दी और पैदल चलने के लिए तैयार हो गए; पर उन्होंने श्रवण कुमार से शीघ्रातिशीघ्र उस स्थान सेबाहर निकल चलने के लिए कहा। तेजी से वे लोग उस स्थान को पार करके आगे निकल गए।
कथा के अनुसार जैसे ही वह क्षेत्र समाप्त हुआ, श्रवण कुमार को अपनी भूल ज्ञात हुई। वे आत्मग्लानि से भर उठे और फूट−फूटकर रोने लगे। अपने कुकृत्य के लिए माता−पिता से क्षमा माँगी। पिता ने बताया— "इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। वह वातावरण ही ऐसा था, जिसमें पहुँचकर विचार निष्ठुरता से भर उठते हैं। बहुत समय पूर्व इस क्षेत्र में ‘मय’ नामक दानव रहता था। वह बड़ा नृशंस था। अपने ही माता−पिता को उसने मार डाला था। उसी की दुष्टता उस क्षेत्र पर किसी न किसी रूप में छाई हुई है। उसी ने तुम्हारे मन में विद्रोह का भाव भड़काया, वह क्षेत्र पीछे छूट गया। फलस्वरूप तुम्हारी सहज एवं स्वाभाविक बुद्धि वापिस लौट आई।”
मनुष्य के प्रयत्न−पुरुषार्थ का अपना महत्त्व है; पर यह भी सच है कि वातावरण का प्रभाव उस पर असाधारण रूप से पड़ता है। आकृति और प्रकृति दोनों ही गढ़ने में वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ठंडे देशों के निवासी गोरे रंग के, सुदृढ़ और दीर्घजीवी होते हैं। जहाँ गर्मी अधिक पड़ती है, वहाँ के मनुष्य के स्वास्थ्य गिरने तथा शरीर दुर्बल एवं काले पाए जाते हैं। पशुओं के ऊपर भी यह प्रभाव देखा जाता है। कच्छ, हरियाणा, नागौर आदि क्षेत्रों के गाय कितनी दुधारू,बैल कितने परिश्रमी होते हैं, यह सर्वविदित है। बंगाल और दक्षिणी बिहार में जन्मने वाले गाय-बैल अपेक्षाकृत अधिक दुर्बल होते हैं, इसमें नस्ल का उतना श्रेय-दोष नहीं जितना कि जलवायु का होता है। उपरोक्त स्थानों के इन पशुओं के स्थान, क्षेत्र यदि बदल दिए जाएँ तो नस्ल में भी अंतर पड़ता चला जाता है।
यही बात वनस्पतियों के संबंध में भी है। जड़ी−बूटियाँ वहीं है, पर विभिन्न क्षेत्रों में उगाए जाने पर उनके गुणों में न्यूनाधिकता उत्पन्न हो जाती है। हिमालय क्षेत्र में गंगातट पर उगी ब्राह्मी की तुलना में मैदानी क्षेत्रों में नदियों के किनारे उगी मंडूकपर्णी के गुणों में भारी अंतर आ जाता है। अन्यान्य जड़ी−बूटियों के संबंध में भी यही बात है।
विभिन्न प्रकार के फल भी अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध होते हैं। नागपुर क्षेत्र के संतरे, भुसावल के केले, लखनऊ के आस−पास के आम, खरबूजे प्रख्यात हैं। कश्मीर के सेबों की अपनी अलग विशेषता होती है। मैसूर के जंगलों में उगे चंदन वृक्ष अधिक सुगंधित होते हैं। अन्नादि के गुण स्वभावों में भी वातावरण की भिन्नता के कारण भारी अंतर देखा जाता है। पंजाब का गेहूँ अन्य प्रांतों की तुलना में कहीं अधिक उत्तम होता है।
मनुष्यों के शरीरों में ही नहीं स्वभावों में भी क्षेत्रीय विशेषता के अनुरूप अंतर पाया जाता है। यों तो मनुष्य स्वतंत्र और समर्थ है। वह अपनी संकल्पशक्ति के बल से परंपरागत सभी दबावों को बदल सकने में सैद्धांतिक दृष्टि से पूर्णतया सक्षम है; पर व्यावहारिक स्तर पर देखा यह जाता है कि वातावरण अपने प्रभाव से इस क्षेत्र के मनुष्यों को ढालता चला जाता है। व्यक्ति की मौलिक विशेषता को मान्यता देते हुए भी यह स्वीकार करना होगा कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग विचारपूर्ण नहीं वातावरण के प्रभाव से जीवनयापन करता है। जातियों और वंशों में भी कई प्रकार की अपनी−अपनी विशेषता पाई जाती है। ब्राह्मण में धार्मिकता, क्षत्रिय में अक्खड़ता, वैश्य में अर्थदृष्टि, शिल्पकारों में क्रियाकुशलता जैसी विशेषताएँ दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक मात्रा में पाई जाती हैं। कायस्थ वर्ग में शिक्षा का बाहुल्य पाया जाता है। पिछड़े वर्ग में अशिक्षा, अस्वच्छता, अशिष्टता पाई जाती है। कुछ समाजों में चोरी, उठाईगिरी की आदत जातीय विशेषता के रूप में मिली होती है। कुछ कायरता और मूर्खता के लिए बदनाम हैं। स्वभावतः इन भिन्नताओं के कारणों की खोज करने पर एक यही तथ्य सामने आता है कि अमुक प्रकार के वातावरण में रहने का अवसर मिलता है, जिससे उसी के अनुरूप विशेषताएँ उनमें विकसित हो जाती हैं।
जंगली जातियों में चित्र−विचित्र रिवाज पाए जाते है। उनके स्वभाव और अभ्यास भी अपने ढंग के होते हैं। सुधारकों के सुधार-प्रयास उसमें परिवर्तन लाने में समर्थ नहीं हो पाते क्योंकि, उनके चारों ओर घिरा वातावरण उन्हें यत्किंचित् सुधार स्वीकार करने की ही छूट देता है। परिवर्तन के लिए वातावरण बदलना आवश्यक है। कितने ही अफ्रीकी नीग्रो बहुत समय से अमेरिका में बस गए हैं। उनकी प्रवृत्ति में भारी अंतर आ गया है। अब अमेरिकी नीग्रो भी प्रायः अमेरिकी गोरों के स्तर का ही जीवनयापन करते हैं। उत्तरी ध्रुव एस्किमो जाति के बहुत से व्यक्ति कनाडा में आ बसे हैं। उनमें आश्चर्यजनक अंतर आ गया है। इसी प्रकार अन्यान्य देशों में जा बसने वाले अपने मूल देश की अपेक्षा नई परिस्थितियों में— नए ढंग से बदलते देखे जाते हैं। कोई−कोई अपवाद ही ऐसे होते हैं जो वातावरण के दबाव से अपने को बनाए रखने तथा अपनी मौलिक विशेषताओं को अक्षुण्ण रखते हैं; अन्यथा अधिकांश तो परिस्थितियों के अनुरूप ढलते-बदलते रहते हैं।
सामान्य स्तर का कोई कार्य सामान्य वातावरण में भी किया जा सकता है; पर विशिष्ट स्तर का कार्य करना हो तो उपयुक्त वातावरण की ही खोज−बीन करनी पड़ती है। जहाँ फोटोग्राफिक फिल्में बनाई जाती हैं, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाए तो सारे साधनों के रहते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना संभव नहीं हो सकता। स्वास्थ्य के लिए कुछ पर्वतीय क्षेत्र बहुत ही उपयोगी माने जाते हैं। विशिष्ट रोगियों को, दुर्बल व्यक्तियों को, विशिष्ट सेनेटोरियमों में रहने का प्रबंध किया जाता है।
निश्चित ही साधना के उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए भारत के हिमालय क्षेत्र को अद्वितीय गौरव प्राप्त है। यह क्षेत्र ऋषि, योगियों की भूमि मानी जाता रहा है। उच्च आध्यात्मिक प्रयोग इसी क्षेत्र में अनादिकाल से होते चले आ रहे है। आयुर्वेद, रसायन, विद्या, साहित्य सृजन, योगानुसंधान जैसे महत्त्वपूर्ण प्रयोग हिमालय क्षेत्र की सुविस्तृत प्रयोगशाला में समय−समय पर होते रहे हैं। सप्तऋषियों, महामनीषी, देवमानवों के कार्यक्षेत्र इसी भूमि में रहे हैं। छात्रों के लिए गुरुकुल, श्रेयार्थियों के लिए आरण्यक यहीं थे। राजतंत्रों के सूत्रसंचालक वशिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों और विश्वामित्र जैसे तपस्वी साधकों की तपस्थली इसी भूमि में थी। दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता रहा है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केंद्रबिंदु विज्ञान-जगत ने ध्रुवप्रदेश को माना है। अध्यात्म-क्षेत्र में वैसी ही मान्यता हिमालय के संबंध में है। यह क्षेत्र ब्रह्मांडव्यापी विश्वचेतना का अवतरण केंद्र है, जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए मनीषी-साधकगण अपने को देवशक्तियों से सुसंपन्न करते थे। अभी भी इस क्षेत्र में सारी सूक्ष्म विशेषताएँ प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं जो आत्मिक-प्रगति में सहयोग के लिए आवश्यक है। आत्मसाधना के लिए यह शीत प्रदेश उपयुक्त है, साथ ही जलवायु की दृष्टि से आरोग्यवर्धक भी। गंगाजल को वैज्ञानिकों ने दिव्य औषधियों का सम्मिश्रण माना है। ऐसी मान्यता है कि मात्र गंगाजल के सेवन से कितनी ही बीमारियों का उपचार अपने आप हो जाता है।
योगियों, तपस्वियों ने उग्र तपश्चर्याएँ इस क्षेत्र में की हैं, जिसके कारण इस वातावरण में विशिष्ट अध्यात्मतत्त्वों की भरमार है। इस वातावरण में पहुँचने पर मन में अनायास ही सात्विक विचारणा, पवित्र भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। आज के गए−गुजरे जमाने में भी इस क्षेत्र में सतयुगी वातावरण के दृश्य देखे जाते हैं। ऐसा लगता है कि चारों ओर के संव्याप्त कलुषित वातावरण से यह क्षेत्र अभी भी अछूता है।
सामान्यतया जिस वातावरण में अन्य लोग रहते हैं, उसमें विक्षोभकारी तत्त्वों का बाहुल्य है। साधना−उपासना के विधि-विधान और मर्यादाओं का परिपालन करते हुए भी अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता। विषाक्त वातावरण का असाधारण प्रभाव पड़ता है। साथ ही परिवार-समाज के जिस परिवेश में मनुष्य रहता है, उसके संस्कार भी बने रहते हैं। फलस्वरूप मन को जबरन उन संस्कारों से मुक्त कर पाना कठिन पड़ता है। ऐसी स्थिति में–साधना का उच्चस्तरीय लाभ उठाने की दृष्टि से आवश्यक होता है कि सदा के लिए न सही, तो कुछ समय के लिए ऐसे सात्विक वातावरण में रहकर साधना की जाए जहाँ से अभीष्ट परिमाण में आत्मिक ऊर्जा जुटाई जा सके। कहना न होगा, इस दृष्टि से हिमालय का उत्तराखंड सर्वश्रेष्ठ है।
शान्तिकुञ्ज, गायत्री नगर, ब्रह्मवर्चस् की स्थापना ऐसे ही स्थान पर हुई है जहाँ कि कभी सप्तऋषियों ने प्रचंड तप किया था। गंगा की धाराएँ पहले इन स्थानों से होकर बहती थीं। बाद में बाँध आदि बनाकर उनका प्रवाह मोड़ दिया गया। साधना के लिए गंगा की गोद, हिमालय की छाया का दिव्य लाभ साधक को मिलता है। साथ ही सबसे बड़ी बात यह है कि साधना के लिए जिस समर्थ–मार्गदर्शन और दिव्य संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है, वह सहज ही प्राप्त है। गंगा, हिमालय और समर्थ मार्गदर्शन की त्रिवेणी में स्नान करने वाले साधक ऐसी पवित्रता एवं आत्मिक समर्थता साधना के उपरांत वापिस लेकर लौटते हैं, जिससे भौतिक एवं आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
शरीर की इंद्रियों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि उनके माध्यम से दृश्य संसार, जो बाहर फैला पड़ा है, दिखाई पड़ता और अनुभव में आता है। जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है, उसे ही महत्त्व दिया जाता और उपयोग में लाया जाता है। इस मोटी दृष्टि के कारण सर्वत्र बिखरे पदार्थवैभव का भी मनुष्य पूरा-पूरा उपयोग नहीं कर पाता। दीर्घकाल तक तो पदार्थसत्ता की सामर्थ्य का पूरा परिचय भी नहीं मिल पाया था। एक सदी पूर्व तक यह कहाँ किसी को मालूम था कि पदार्थ का सूक्ष्मतम नगण्य घटक परमाणु प्रचंड शक्ति का स्रोत हो सकता है; पर मनुष्य की अनुसंधान प्रवृत्ति ने परमाणुसत्ता को कुरेदा; फलतः शक्ति का भांडागार हाथ लगा। आज सर्वत्र परमाणुशक्ति की गरिमा स्वीकार की जा रही है। ध्वंस और सृजन के दोनों ही प्रयोजनों में उसका उपयोग हो रहा है। परमाणु ही नहीं, इस धरती पर अभी बहुत कुछ खोजने योग्य, जानने योग्य और पाने योग्य है। मनुष्य ने बाह्यजगत में जितना प्रयास किया है, उसने उतना ही वैभव और वर्चस्व प्राप्त किया है। अनेकानेक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अनवरत शोध-प्रयासों का ही प्रतिफल हैं। समुद्र किसी समय निरर्थक व्यवधानमात्र समझा जाता था। उसकी खोजें हुई तो कितनी ही बहुमूल्य संपदाएँ प्राप्त हुई। शून्य और निस्तब्ध समझे जाने वाले अंतरिक्षीय क्षेत्र को शक्तियों और उपलब्धियों का केंद्र माना जा रहा है। शोधित वैज्ञानिकों की दृष्टि विशिष्ट भौतिक संपदाओं के लिए समुद्र और अंतरिक्ष में गाड़ी हुई है।
स्थूलजगत के जल, नभ और थल-क्षेत्र में जो कुछ वैभव भरा पड़ा है, उससे असंख्य गुना सूक्ष्मजगत में विद्यमान है, पर सूक्ष्म जगत इतना व्यापक है कि समूचा ब्रह्मांड ही उसकी परिधि में आ जाता है। इतने विस्तृत-क्षेत्र की खोज कैसे की जाए? तत्त्वदर्शियों ने इस प्रश्न का उत्तर हमें पिंडसत्ता में सन्निहित सूक्ष्मरूप में विद्यमान ब्रह्मतत्त्व की खोजबीन करने के रूप में दिया है। जिसके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। उस सत्ता का अवलंबन लेना ही श्रेयस्कर है।
हिरण्मये परे कोशे निरजं ब्रह्मनिष्कलम्।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विभः॥
2।2।9 (मुण्डकोप)
भावार्थ— यह कि हिरण्यमयकोश में निर्मल, सरल, शुभ्र, स्वच्छ ब्रह्म रहता है।
अपने भीतर क्या है? इसके विषय में मनुष्य की जानकारी अत्यल्प है। हाड़, माँस, रक्त, मज्जा से बने शरीर और मस्तिष्क का एक छोटा परिचय अब तक चिकित्साशास्त्री प्राप्त कर सके हैं; पर अपनी सत्ता का वास्तविक परिचय प्राप्त करने के लिए अंतर्मुखी होना पड़ता है। समुद्रतल में बिखरे मोती समेटने के लिए गहरे पानी में उतरने की, गोताखोर स्तर की प्रवीणता प्राप्त करनी पड़ती है। अंतःक्षेत्र में अपार वर्चस्व भरा पड़ा है उसे जानने के, खोजने के लिए न तो इंद्रियशक्ति काम देती है और न ही मस्तिष्क कुछ पुरुषार्थ दिखा पाता है। शरीर के भीतर क्या हो रहा है— रक्तसंचार-प्रक्रिया, पाचन-पद्धति, रोग-विकृति, मस्तिष्कीय गतिविधियों को कोई कहाँ जान पाता है। अपनी शारीरिक स्थिति का पता लगाने के लिए ‘पैथालॉजी’ विशेषज्ञ से जाँच कराते हैं। मानसिक रुग्णता का पता लगाने के लिए ‘न्यूरोलॉजिस्ट’ का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, चारित्रिक एवं व्यक्तित्व के विश्लेषण के लिए आत्मवेत्ता गुरुजनों के सामने स्वयं को प्रस्तुत करना पड़ता है। सामान्य साधनों द्वारा अपनी सूक्ष्मस्थिति की जाँच करना संभव रहा होता तो गुत्थियों को समझने तथा सुलझाने में हम सहज ही सफल हो सकते थे, पर ईश्वर की लीला ऐसी विचित्र है कि उसने न केवल विशाल ब्रह्मांड; वरन हमारे हिस्से का पिंड भी रहस्य भरे गोरख धंधों से जकड़ दिया है, ताकि अविज्ञात को जानने के लिए विशेष प्रयत्न पुरुषार्थ का परिचय दें।
इंद्रियों के सहारे तो स्थूलशरीर की भीतरी गतिविधियों तक का परिचय नहीं मिल पाता, फिर सूक्ष्मतम आत्मसत्ता का स्वरूप उनसे कैसे जाना जा सकता है जो इंद्रियों, मन एवं बुद्धि की पकड़ सीमा के बाहर है। ऋषियों ने इसका हल साधना की ध्यान-प्रक्रिया द्वारा प्रस्तुत किया है। योग-साधना में ध्यान का महत्त्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक धर्मों के साधना-विधानों में ध्यान की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है। उसके बिना प्रगति का एक चरण भी आगे नही बढ़ता। योगशास्त्रों में ध्यान की महिमा का गुणगान अनेकों स्थानों पर किया गया है–
‘सयाध्धानं ब्रह्मेत्युपासते यावद ध्यानस्य गतंतत्रास्य यथा कामा चारों भवति,
यो ध्यानं ब्रह्मेंत्युपास्तेऽस्ति।’
–छान्दोग्य
अर्थात— जो यह मानकर उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है’ उसके ध्यान की गति इतनी विस्तृत हो जाती है, जितनी की ब्रह्म की।
‘न चक्षुषा गृह्यते नापि वाया नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणावा।
ज्ञान प्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तुतं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः।’
–मुण्डकोपनिषद्
अर्थात— वह परमात्मा न आँख से दिखता है और न वाणी से जाना जाता है, न उसे इंद्रियों के तप से या कर्म से जान सकते हैं। ज्ञान के निर्मलता से जब मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है तब ध्यान द्वारा वह उस ब्रह्म को देखता है।
‘पराञ्चि खानि व्यतृण स्वयम्मूस्तस्मात्परांङ्पश्चयति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्त चक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥’
–कठोपनिषद्
अर्थात— स्वयंभू भगवान ने इंद्रियों को विषयों की ओर जाने वाला बनाया है, इसलिए मनुष्य बाहर के विषयों को तो देखता है, किंतु आत्मा को नहीं देखता। कोई विरला ही ध्यानीपुरुष मोक्ष की ओर से अंतःकरण में रहने वाले परमात्मा को ध्यान द्वारा देखता है।
आत्मिक-प्रगति की दिशा में प्रथम चरण बढ़ाते हुए साधक को अंतर्मुखी बनना पड़ता है। कुछ समय के लिए बाहर की ओर आँखें बंद करके चित्तवृत्तियों को समेटकर भीतर क्या है, यह देखना-समझना पड़ता है। ध्यान इसी प्रक्रिया का नाम है। उसका एकमात्र प्रयोजन भीतरी सत्ता को, उसके वैभव को समझना है। साथ ही यह भी परखना होता है कि इस क्षेत्र में भरी हुई विकृतियों के दलदल में प्रगति का रथ कैसी बुरी तरह फँसा और रुका हुआ है। आंतरिक दोष-दुर्गुण ही बाह्यजीवन में शोक-संताप बनकर प्रकट होते हैं।
बोल-चाल की भाषा में किसी भूली हुई या खोई हुई वस्तु का स्मरण करने की मानसिक प्रक्रिया को ‘ध्यान करना’ कहते हैं। अध्यात्म दर्शन में भी वही तथ्य सामने आता है। हम अपने वर्चस्व को–लक्ष्य को पूरी तरह भूल बैठे हैं। मेले के आकर्षण में भटकते हुए बच्चे जैसी हमारी मनोदशा है। न गन्तव्य का पता है और न अभिभावकों का; पर भटकाव ने कुछ ऐसा जादू डाला है कि मेले की चमक-दमक ही सब कुछ दिखती है। ध्यानयोग का प्रयोजन अपने मूलस्वरूप को, अपने कण-कण में समाए हुए प्रसुप्त वैभव को, लक्ष्य को समझने के लिए अंतःक्षेत्र में प्रवेश करना है। प्रत्यक्ष से–भौतिक क्षेत्र से कुछ समय तक चित्त को पूरी तरह हटा लिया जाए और उतनी अवधि तक परोक्ष से–अभौतिक से रिश्ता जोड़ लिया जाए तो समझना चाहिए कि ध्यान का उद्देश्य समझ लिया गया।
आमतौर से ध्यान के लिए कोई दृश्य पदार्थ अथवा व्यक्तित्व को माध्यम बनाया जाता है। दृश्यों में प्रकाश-ज्योति को कल्पना-क्षेत्र में प्रतिष्ठापित करना और श्रद्धासिक्त भावना से उसका अवलोकन कर सकना अधिक प्रचलित है। प्रकाश का ध्यान सार्वभौम है। विश्व के समस्त साधना-संप्रदायों ने किसी न किसी रूप में इसे मान्यता दी है। दीपक की ज्योति अथवा प्रभातकालीन सूर्यमंडल की आभा को ध्यान में लाया जाता है। सामान्य के अतिरिक्त भी ध्यान की कितनी ही असामान्य प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिसका अभ्यास समर्थ मार्गदर्शन में अपनी-अपनी मनोभूमि के अनुरूप किया जाता हैं।
साकार और निराकार दोनों ही प्रकार की ध्यान-प्रक्रियाओं में दिव्य प्रकाश-ऊर्जा के धारण करने तथा अंतःक्षेत्र के आलोकित होने की भावना अनिवार्य रूप से करनी होती है। इष्टदेव की ऊष्मा और तेजस्विता साधक के स्थूल, सूक्ष्म एवं कारणशरीरों में भीतर प्रवेश करके नवचेतना का संचार कर रही है। ऐसी भावना की जाती है। प्रकाश-ऊर्जा के साधक में प्रवेश करने के साथ-साथ उसके स्थूलशरीर में ओजस्विता की वृद्धि होती अनुभव की जाती है। शक्ति, ज्ञान और भाव के संचार की आस्था जितनी प्रगाढ़ एवं परिपक्व होगी, उतनी ही ध्यान की सार्थकता मानी जाएगी।
भावरहित ध्यान से तो मात्र एकाग्रता का लाभ मिलता है, जिससे केवल भौतिक प्रयोजन पूरे हो सकते हैं। आत्मिक-प्रगति के लिए ध्यान के साथ भावनाओं का गहरा पुट होना चाहिए। इष्टदेव के साथ अपना भावनात्मक संपर्क प्रगाढ़ करना पड़ता है। प्यार-दुलार मनुहार की, श्रद्धा वात्सल्य की, घनिष्ठता और समीपता की, आंतरिक एकात्मकता, की इस प्रकार की अनुभूतियाँ अंतःक्षेत्र में उभारनी पड़ती हैं कि हम दो नहीं— दो शरीर एक प्राण हैं। दांपत्य जीवन में कभी-कभी ऐसी घनिष्ठता की बिजली कौंधती है, इस अभिन्न आत्मीयता का प्रगाढ़तम मनोभाव इष्टदेव के साथ संजोना पड़ता है। घनिष्ठता को सजीव बनाने एवं प्रत्यक्ष करने के लिए तरह-तरह के शारीरिक, मानसिक आदान-प्रदानों के कल्पना-चित्र गढ़ने पड़ते हैं। घनिष्ठ मित्रों के बीच, माता और पुत्र के बीच जो भाव भरे क्रीड़ा-विनोद संभव हैं, उनकी अनुभूतियाँ भावलोक में गढ़नी होती हैं। दृश्य की दृष्टि से इष्टदेव का बहिरंग परिकर और भाव की दृष्टि से प्रगाढ़ आत्मीयता के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली अनुभूतियाँ और संवेदनाओं की गहराई, इन दोनों स्थूल एवं सूक्ष्मतत्त्वों का समन्वय हो जाने से ध्यान की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती हैं। इससे मात्र एकाग्रता का ही लाभ नहीं मिलता वरन विश्वव्यापी दिव्यसत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेने और उसके साथ संपर्क साध सकने वाले आत्मिक चुंबकत्व का भी विकास होता है। इस मार्ग पर चलते-चलते मनोनिग्रह और मनोलय की स्थिति प्राप्त हो सकती है तथा समाधि का, आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वरदर्शन का लाभ मिल सकता हैं। अस्तु, ध्यान साकार हो अथवा निराकार उसमें भाव-संवेदनाओं का गहरा पुट लगाते रहना आवश्यक है। यदि नीरस मन से उपेक्षापूर्वक प्रकाश अथवा आकृति का दर्शनमात्र किया जा रहा है तो, उस स्थिति में सरसता उत्पन्न ही न हो सकेगी और हजार प्रयत्न करने पर भी मन के बारंबार उचटने का व्यवधान दूर न हो सकेगा। मनुष्य की मूलसत्ता सरस है, वह सरसता से बँधती है। ध्यान में यदि सरसता मिली हुई होगी तो मनोनिग्रह से लेकर मनोलय के सभी चरण अनायास ही उठते चले जाएँगे और अभीष्टलक्ष्य तक पहुँचना सुगम हो जाएगा।
कायकलेवर को— शरीर के व्यायाम, संयम, पौष्टिक आहार के माध्यम से परिपुष्ट किया जाता है। अंतःचेतना को परिपुष्ट करने के लिए किए जाने वाले व्यायामों में–साधना उपचारों में ध्यान-प्रक्रिया का महत्त्व सर्वोपरि है। जप को परिशोधन और ध्यान को बीजारोपण की उपमा दी गई है। जपयोग से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से कषाय-कल्मषों के परिशोधन का प्रयोजन पूरा होता है। यह सोने को तपाकर खरा बना देने वाली बात है। अलंकार-आभूषण बनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है, उसकी उपमा ध्यान से की जा सकती है। ध्यान के सहारे जो संकल्पशक्ति प्रखर होती है उसी के द्वारा अंतःशक्तियों के जागरण और दिव्यलोक से विभूतियों के अवतरण के दोनों लक्ष्य पूरे होते हैं। ध्यानयोगी व्यक्तित्व सम्पन्न बनता है और दिव्यशक्तियों का कृपापात्र भी। भीतर से ऋद्धियाँ उदय होती हैं और बाहर से सिद्धियाँ उपलब्ध होती हैं।
विस्मरण का निवारण–आत्मबोध की भूमिका में जागरण यही है ध्यानयोग का लक्ष्य। इस कल्पवृक्ष की छाया में बैठकर सब कुछ पाया जा सकता है। ईश्वरीय सत्ता से संपर्क, सान्निध्य, घनिष्ठता बना लेने के बाद ऐसा कुछ शेष नहीं रहता जिसे अभाव, दारिद्रय अथवा शोक-संताप कहा जा सके। ‘ध्यानयोग‘ इसी महान लक्ष्य की पूर्ति में सहायता करता है।
भले-बुरे व्यक्तियों के सान्निध्य में पड़ने वाला प्रभाव सर्वविदित है, जिसे प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया जा सकता है। पदार्थों की भाँति व्यक्तियों का भी अपना आकर्षण होता है। मानवी चुंबकत्व की इस विशेषता को साधना-क्षेत्र में तेजोवलय के रूप में जाना जाता है। यों समस्त शरीर में उसकी मात्रा होती है; पर आवाज की भाँति शरीर से निकलकर दूर क्षेत्र में जाते ही उसका प्रभाव कम हो जाता है। शरीर से निकलते समय यह विद्युतधारा अत्यंत तीव्र होती हैं, जिसके शरीर में तेजोवलय जितना अधिक प्रखर होता है वह उतना ही अधिक प्रभावशाली होता है। यह ‘वलय’ भला भी हो सकता है और बुरा भी। अपने-अपने ढंग का आकर्षण और प्रभाव दोनों में रहता है। समीपवर्ती व्यक्ति तथा वातावरण उसी के अनुरूप प्रभावित होते हैं।
तेजोवलय की सर्वाधिक मात्रा चेहरे पर होती है। देवताओं के चित्रों में उनके चेहरे के इर्द-गिर्द सूर्य जैसा एक घेरा चित्रण किया जाता है। यह इसी अदृश्य तेजोवलय का चित्रण है। ज्ञानेंद्रियो का जमघट तथा मस्तिष्क का विद्युतभंडार एक ही जगह है, इसीलिए चेहरा सबसे अधिक आकर्षक एवं प्रभावशाली होता है। मोटेतौर पर चेहरे को देखकर कितने ही व्यक्ति बहुत कुछ जानने और समझने में सफल हो जाते हैं। आकृति देखकर प्रकृति का अनुमान लगाने वाले सूक्ष्मदर्शी नाक, कान, आँख, मुँह आदि की बनावट को नहीं; वरन चेहरे के चारों ओर उमड़ते-घुमड़ते तेजोवलय को ही परखते हैं और उसी के आधार पर व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व का प्रभाव एवं परिचय प्राप्त करते हैं।
तेजोवलय का एक केंद्र चेहरे की ही तरह जननेंद्रिय क्षेत्र में छाया रहता है, पर इस क्षेत्र में प्रजनन संबंधी केंद्र होने से वलय का प्रभाव यौन-आकर्षण उत्पन्न करने वाला होता है। किशोर वय के भिन्न लिंगों के बीच यह वलय ही अधिक उभार उत्पन्न करता है। समलिंगों की समीपता में वह तेजस् उत्तेजित नहीं होता। कटिप्रदेश को सदा ढके रहने के पीछे यही आधार होता है कि समलिंगों का तेजोवलय भिन्न लिंगों के बीच अनावश्यक उभार न पैदा करे।
जैसा भी तेजोवलय होगा अपने निकटवर्ती क्षेत्र को, संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को, स्पर्श-व्यवहार में आने वाले पदार्थों को सुनिश्चित रूप से प्रभावित करेगा। जिस तरह विद्युत, ताप, चुंबक जैसी ऊर्जाएँ अपनी विशेषताओं के अनुरूप व्यक्तियों एवं पदार्थों पर प्रभाव डालती हैं, उसी प्रकार तेजोवलय का विद्युतमंडल समीपवर्ती क्षेत्र एवं संबंधित व्यक्तियों एवं पदार्थों में अपना प्रकाश— प्रभाव फैलाता रहता है। इसे अब वैज्ञानिक यंत्रों के माध्यम से भी नापा और जाना जा सकता हैं। ‘ह्यूमन औरा’ पर पश्चिमी देशों में विस्तृत शोध भी सतत चल रही हैं। इसका मापन व फोटोग्राफिक अंकन भी अब संभव है।
कितने ही व्यक्तियों की समीपता अनायास ही बड़ी सुखद, प्रेरणाप्रद और हितकर होती है और कइयों का सान्निध्य अरुचिकर तथा कष्टकर प्रतीत होता है। इसका वैज्ञानिक कारण व्यक्तियों के शरीर से निकलने वाली इस ऊर्जा का पारस्परिक आकर्षण-विकर्षण होता है। समान प्रकृति के लोगों की ऊर्जा घुलती-मिलती और सहयोग-प्रोत्साहन प्रदान करती है; पर यदि समीपवर्ती व्यक्तियों की प्रकृति में प्रतिकूलता हो तो वह ऊर्जा टकराकर वापिस लौटेगी तथा घृणा, द्वेष, अरुचि, अप्रसन्नता, एवं खीज जैसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करेगी। रास्ता चलते कितने ही अनजान व्यक्तियों के बीच मित्रता हो जाती और वह घनिष्ठता में परिवर्तित हो जाती है। इसके विपरीत सदा एकदूसरे के निकट रहते हुए कितने ही घनिष्ठ नहीं बन पाते, पराए जैसे लगते हैं। यह सब अंतःऊर्जा के प्रतीक तेजोवलय का ही प्रभाव चमत्कार है, जो एक जैसी प्रकृति वालों के बीच आकर्षण तथा विपरीत के बीच विकर्षण पैदा करता है।
तर्क के आधार पर अनायास उत्पन्न हुआ आकर्षण भावुकता मात्र प्रतीत होता है और जल्दबाजी में घनिष्ठता में बँध जाने से खतरे की आशंका की जा सकती है; पर तथ्य इतने प्रबल होते हैं कि इन संभावनाओं को निरस्त करते हुए घनिष्ठता उत्पन्न कर ही देते हैं, जबकि स्वजन संबंधियों से भी अकारण अरुचि रहती हैं और उनकी समीपता में कष्टकर अनुभूति ही होती रहती है। ढूँढ़ने पर ऐसा कोई कारण प्रतीत नहीं होता तो भी विषमता बनी ही रहती है। इसमें तेजोवलय के कंपनों की गति में छाई असाधारण विपन्नता ही प्रधान अवरोध होती है।
यह तो समस्तरीय तेजोवलयसंपन्न व्यक्तियों की चर्चा हुई। प्रचंड प्रतिभा से युक्त व्यक्तित्वों में तेजोवलय की प्रखरता एवं बहुलता होती हैं। चुंबक का स्पर्श करने से साधारण लोहे में भी चुंबक की विशेषता उत्पन्न हो जाती है। प्रखर व्यक्तित्वों में मानवी विद्युत की प्रचंडता होती है। उनके परामर्श, ज्ञान, सहयोग का भी लाभ समीपवर्ती लोगों को मिलता है; पर सबसे बड़ा लाभ उस तेजोवलय का होता है, जो अपनी शक्तिशाली क्षमता को निरंतर निःसृत करता रहता है। जो भी उस संपर्क-सान्निध्य की लपेट में आता है उसे बदलने, प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के दर्शन, चरणस्पर्श, आशीर्वचन, दृष्टिपात में जो सत्परिणाम विद्यमान रहते हैं, उसमें उनका प्रकाशपुंज-तेजोवलय ही काम करता है। दूसरे शब्दों में इस सूक्ष्मसत्ता को अदृश्य व्यक्तित्व भी कह सकते हैं। दृश्य व्यक्तित्व पंचतत्त्वों से बनी काया के रंग रूप, सुडौलता, अंगों की बनावट आदि पर निर्भर करता है; पर अदृश्य व्यक्तित्व पर इस दृश्य स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। शरीर से स्वस्थ, सुंदर, आकर्षक होते हुए भी कोई व्यक्ति आचरण की दृष्टि से हेय और हीनस्तर का हो सकता है इसके विपरीत कोई काला, दुर्बल, कुरूप होते हुए भी अत्यंत तेजस्वी और प्रतिभा का धनी हो सकता है, जबकि वह बाहर से कितना भी उपहासास्पद क्यों न लगे। आँखों को आरंभिक दर्शन में कायकलेवर के अनुरूप किसी की वस्तुस्थिति समझने में भ्रम हो सकता है; पर जैसे ही उसकी यथार्थता अनुभव की जाएगी वह भ्रम दूर हो जाएगा और वास्तविक व्यक्तित्व के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन किया जाने लगेगा।
सामान्यतया रंग, रूप का आकर्षण हर किसी को मुग्ध करता है, पर यदि तेजोवलय तदनुरूप न हुआ तो कुछ ही समय में वह मूल्यांकन बदल जाता है। रूपवान काया में भी विषधर सर्प जैसी विद्रूपता प्रकट हो सकती है एवं कुरूप व्यक्ति अष्टावक्र, सुकरात, गाँधी की तरह सिर आँखों पर बिठाया जाने लगता है। साज-सज्जा द्वारा तो शरीर की कुरूपता एक सीमा तक छिपाई भी जा सकती है, पर तेजोवलय के सूक्ष्मशरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता है। सुविकसित अंतःकरणसपन्न व्यक्तियों को किसी की भीतरी स्थिति को पहचानने में देरी नहीं लगती है। यही कारण है कि महामानव किसी की बाह्य सुंदरता अथवा कुरूपता को अधिक महत्त्व नहीं देते हैं। वे रंगरूप की अपेक्षा तेजोवलय में संव्याप्त सुंदरता एवं कुरूपता को वास्तविक व्यक्तित्व मानते हैं। भले−बुरे व्यक्तित्वों के प्रति जनसामान्य की श्रद्धा एवं अश्रद्धा भी इसी अंतःऊर्जा के आधार पर बनती है।
शरीर को खुला-नग्न छोड़ देने पर शरीर विद्युत की मात्रा स्फुल्लिगों के रूप में उड़ने लगती है। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है; पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किए रहना ही है। भीतर की ऊर्जा बाहर न निकलने पाए इसीलिए वस्त्रों का आवरण ढका जाता है। आध्यात्मिक साधनाओं में निरत रहने वाले कठोर तप-तितिक्षा के अभ्यासी, साधु, संन्यासी तथा योगी भी नग्न शरीर में भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाए रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इस मान्यता के पीछे प्रमुख कारण सामाजिक मर्यादाएँ हैं, पर आत्मिक कारण यह है कि शरीर को नग्न रखने वाला अपनी शक्ति तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बिखेरता रहेगा, साथ ही दूसरों के भले-बुरे प्रबल भावों से अपने को बचा भी न सकेगा। धूप का तीव्र प्रभाव नग्न शरीर पर पड़ता है। इसी प्रकार दूसरों का चुंबकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है। ऊन और रेशम में शारीरिक विद्युत पर आवरण डाले रहने की क्षमता अधिक होती है। इसीलिए प्राचीन समय में प्रायः पुरश्चरण जैसी प्रखर साधना प्रयोगों में ऊनी अथवा रेशमी वस्त्रों को अधिक महत्व दिया जाता था। ऊन ऐसी होती थी जो अहिंसात्मक तरीके से प्राप्त हो जाए। वध के उपरांत भेड़ों की उतारी गई ऊन अथवा कीड़ों को उबालकर उन्हें मार डालने के उपरांत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक-प्रगति के लिए की जाने वाली साधना के प्रयोग योग्य नहीं होते। वध के समय प्राणियों का करुण क्रंदन, निकला हुआ चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता है। ऐसे वस्त्रों को धारण करने वाले के ऊपर भी उस विक्षोभ का प्रभाव पड़ता है। साधना में शारीरिक विद्युत के आवागमन में प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमतासंपन्न होते हुए भी ऐसे वस्त्रों के धारण करने से अनेकों प्रकार की मानसिक बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, फलतः आध्यात्मिक उन्नति का प्रयोजन पूरा नहीं होने पाता। ऊन अथवा रेशम अहिंसात्मक तरीके से प्राप्त हुआ हैं, इस बात की गारंटी हो तभी उनसे बने वस्त्र प्रयोग किए जाए, संदिग्ध स्थिति हो तो उनका प्रयोग न करना ही श्रेष्ठ है। ऐसी हालत में सूती वस्त्रों का उपयोग कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
अन्य वस्त्रों तथा उपयोग में आने वाली वस्तुओं के बारे में भी यही बात है। भली या बुरी प्रकृति के मनुष्य अपनी प्रिय वस्तुओं पर, जिन्हें वे उपयोग में लाते हैं, अधिक प्रभाव छोड़ते हैं। साधु, संतों, महापुरुषों की माला, जनेऊ, खड़ाऊ, वस्त्र अथवा अन्य वस्तुएँ उपहार आशीर्वादस्वरुप पाकर लोग कृतार्थ हो जाते और उनके प्रभाव से देर तक लाभांवित होते रहते है। दीर्घकाल तक उनमें दिव्य प्रभाव बना रहता है। भगवान बुद्ध का एक दांत लंका में आज भी सुरक्षित रखा है। मुहम्मद साहब का सिर का एक बाल कश्मीर की एक मस्जिद में रखा हुआ है। इंग्लैण्ड के एक गिरजाघर में ईसामसीह का रखा कफन कितने ही श्रद्धालुओं की प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
शरीर के अंग-अवयवों में मरणोपरांत भी वलय का प्रभाव देखा जाता है। मरघट में तांत्रिक साधनाएँ करने कापालिकों के मृतकों की खोपड़ी साफ करने, उससे जल पीने जैसी अघोर-क्रियाओं के पीछे मृतकों की अवशिष्ट वलय-ऊर्जा को संग्रहित करने का सिद्धांत ही कार्यान्वित होता है। तंत्र-साधना में तांत्रिक अपने मनोबल की वृद्धि अन्यों के शरीरों की ऊर्जा के दोहन द्वारा भी करते हैं। कभी-कभी श्मशानों में धुँधले प्रकाश की गोलियाँ, लहरें अथवा धुँध उड़ती देखी जाती है। यह मृतक या अवशिष्ट तेजोवलय ही होता है जो शरीर के जल जाने के बाद भी सूक्ष्मरूप में वहाँ विद्यमान रहता है। श्मशान में जाने पर वहाँ रुकने की इच्छा नहीं होती, अकारण भय छाया रहता है। मन विक्षुब्ध हो उठता है। यह उस वातावरण में छाये तेजोवलय का ही प्रभाव होता है।
व्यक्तित्व पर तेजोवलय की भारी छाप रहती है। प्रायः यह जन्म-जन्मांतरों के प्रयास, अभ्यास एवं संस्कार के आधार पर विनिर्मित होता है; पर मनुष्य अपनी स्वतंत्र चेतना का उपयोग करके उसे बदल सकता तथा बड़ा सकता है। सामान्य स्तर के व्यक्ति इस बने बनाए तेजोवलय के अनुरूप अपना स्वभाव और कर्म बनाए रहते हैं; पर मनस्वी साधक अपनी दृढ़ संकल्पशक्ति से अभ्यस्त बाह्य एवं आंतरिक स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर लेते हैं। तत्पश्चात तेजोवलय भी उसी के अनुरूप बन जाता है।
सत्-तत्त्वों से ओत-प्रोत तेजोवलय में परिवर्तन ही आध्यात्मिक कायाकल्प है। साधना की तप-तितिक्षा द्वारा तेजोवलय के प्रखरीकरण का उद्देश्य पूरा होता है। कहना न होगा कि इस महती उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही तप-साधना के उच्चस्तरीय प्रयोगों, उपचारों की व्यवस्था बनायी जाती है। जिससे प्रत्येक साधक साधना के उपरांत तेजोवलय की एक बहुमूल्य आध्यात्मिक पूँजी लेकर वापिस लौटता है।
चेतना की परिष्कृत स्थिति उसे कहा जाता है, जहाँ भौतिक तत्त्वों का कम और आत्मिक उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश होता है। जब भौतिकता ही मन-मस्तिष्क-अंतःकरण पर छाई रहती है तो जीव एक सीमा में पाशबद्ध होता है, जिसे कषाय-कल्मष, भवबंधन, लोभ-मोह, वासना-अहंकार का आवरण कहते हैं। जब अंतरात्मा का स्वार्थ विकसित होकर परमार्थ में बदल जाता है तो इसे ‘स्व’ की सुपर ईगो’ में, चेतन की ‘सुपर चेतन’ में परिणति कहते हैं। योगी इसी मनःस्थिति में रमण करते हैं। वैसी स्थिति में आस्थाएँ वातावरण के संपर्क से नहीं, आदर्शों से प्रभावित होती हैं व अन्यों को भी अनुकरण के लिए प्रेरित करती हैं।
साधना का अर्थ हैं— जन-जन के अंतःकरण पर संकीर्णता— मोह-ममता की परत-दर-परत चढ़े आवरणों को उघाड़ना, चेतना को परिष्कृत करना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पूर्णरूपेण बदल जाता है। वह जैसा भी कुछ बहिरंग में दृष्टिगोचर होता है, उसमें तो नहीं, पर अंदर से वह असामान्य स्तर का महामानव बन जाता है।
जिस दुनिया के संपर्क में मानव सामान्यतया विचरण करता है, वह स्थूल है— बुद्धिगम्य है। इसके भीतर प्रकृति की वह सत्ता है, जो पदार्थ की तरह प्रत्यक्ष नहीं, शक्ति के रूप में विद्यमान है। इंद्रियाँ— यंत्र-उपकरण इसका परिचय हमें देते रहते हैं। इससे आगे सूक्ष्मजगत का अस्तित्व आरंभ होता है, जो इंद्रियगम्य न होने से अतींद्रिय या इंद्रियातीत कहा जाता है। भौतिक उपादानों–स्थूल उपकरणों द्वारा प्रयोगशाला में इसे प्रामाणित नहीं किया जा सकता और न ही बुद्धि उनका कारण समझ पाने में समर्थ हो पाती है। इतने पर भी उस सूक्ष्मजगत का आधार अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग है। उसका अस्तित्व स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चार नहीं।
मानवी बुद्धि ने अतींद्रिय कही जाने वाली जिन हलचलों को विचार-संचार, पूर्वाभास, दूरदर्शन, दूरश्रवण, पदार्थ-प्रत्यावर्तन मानकर स्वीकार किया है, वे अविज्ञात सूक्ष्मजगत में ही घटती हैं। जीवन समाप्ति के बाद जीवात्मा का निवास, मरण के समय की अनुभूतियाँ, मरणोत्तर योनियाँ व पुनर्जन्म के विवरणों को स्थूलबुद्धि प्रमाण रूप में देखते हुए सूक्ष्मजगत का अस्तित्व स्वीकार करते ही ‘यथार्थता’ की मोहर लगाती हैं। किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में विशिष्ट स्तर की अतिमानवी क्षमताएँ पाई जाती हैं। इन्हें चमत्कारी सिद्धियाँ कहा जाता है। शाप-वरदान से लेकर प्राण-प्रहार आदि आश्चर्यजनक क्रियाकलापों को प्रत्यक्षीकृत कर देने की विचित्रताएँ कहाँ से उत्पन्न होती हैं, इसका उत्तर सूक्ष्मजगत की सत्ता का अस्तित्व स्वीकार किए बिना दिया नहीं जा सकता।
दृश्य-स्थूल तथा सूक्ष्म-इंद्रियातीत जगत से भी परे कोई नियामक— नियंत्रक सत्ता होनी चाहिए, यह विचार सहज ही मन में उठता हैं। जब कल-उपकरण मानवी बुद्धि प्रयोग के बिना नहीं चल सकते तो इतना विशाल ब्रह्मांड बिना किसी नियामक सत्ता के कैसे चल सकता है, यह सहज ही समाधान भी निकलता है। यह पूरा समुच्चय जो इंद्रियातीत व उससे भी परे हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है— चेतनजगत का संसार है। अदृश्य जगत की इस समग्र चेतनशक्ति को ‘ब्रह्म’ या ‘ब्राह्मीचेतना’ कह कर पुकारते हैं। जीव-चेतना इस ब्रह्मांडव्यापी महाचेतना का ही एक अंश है। अंश और अंशि, महान और लघु, विभु और अणु के गुण-धर्म समान होते हैं। अंतर विस्तार के अनुरूप क्षमता का होता है। हम सब जीव-चेतनाएँ इस ब्रह्मांडव्यापी महासमुद्र में छोटी-बड़ी मछलियों की तरह जीवनयापन करते हैं।
जो साधक इस महाचेतना से सघन संपर्क स्थापित कर सकने में सफल हो जाते हैं, वे अन्यों से अलग नजर आने लगते हैं। उनके क्रियाकलाप, चिंतन में वे सभी गुण नजर आने लगते हैं। जिनकी अभ्यर्थना ईश-स्तवन में की जाती हैं। ऐसे व्यक्ति अपने अंतरंग को प्रसुप्त— को जगाकर देवशक्तियों का अपने अंदर आह्वान कर सकने में समर्थ हो जाते हैं। किसी-किसी में यह क्षमता जन्मजात पाई जाती है। किन्हीं-किन्हीं बालकों की स्मृति-सूझबूझ ऐसी होती है, जिसे विलक्षण कहा जा सकता हैं। सिद्धियाँ-चमत्कार, दैवी अनुग्रह, मृतात्मा सहयोग मंत्र-साधना के प्रतिफल ऐसे प्रकरण हैं, जिन्हें हम यह कहकर नहीं टाल सकते कि ये अंधविश्वास हैं। योगियों के साथ जुड़ी विभूतियाँ, ईश्वरभक्तों को प्राप्त विशिष्टताएँ मात्र संयोग नहीं हैं; पर यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि ये सिद्धियाँ ही सब कुछ नहीं हैं। बिना व्यक्ति के अंतरंग के परिष्कार के, नीतिमत्ता के विकसित हुए, वे आत्मिक विभूतियाँ न रहकर, भौतिक सिद्धियाँ भर रह जाती हैं। उनकी चमत्कृति का आकर्षण स्थूल तक ही सीमित बना रहता है।
यदि यह कहा जाए कि ये सभी इसलिए अप्रामाणिक हैं कि बुद्धि की पकड़ में नहीं आती तो यह भी गलत होगा। किसी तथ्य से इंकार करने का यह कोई सशक्त कारण नहीं हैं। सूक्ष्म तो सूक्ष्म है। उसकी बहिर्अभिव्यक्ति ही अपने आप में एक प्रमाण है। ज्ञात या प्रत्यक्ष न होने पर भी जीव और ब्रह्म के मध्यवर्ती चल रहे आदान-प्रदान को झुठलाया नहीं जा सकता। इनमें अवरोध केवल आत्मा पर चढ़े कषाय-कल्मषों के कारण होता है।
जब भी भौतिक, अंश बढ़ जाता है तो जीव प्रकृतिपरक हो जाता है। उसकी प्रवृत्ति भौतिक आकांक्षाओं और उपलब्धियों तक ही सीमित रह जाती है। यदि जीवसत्ता निर्मल है तो उसकी सूक्ष्मता ब्रह्मतत्त्व से, सूक्ष्मजगत से घनिष्ठ तादात्म्य स्थापित कर सकती है। यह आदान-प्रदान जिसके लिए भी संभव हुआ है, वह स्वयं को देवोपम स्तर का बना सकने में समर्थ हुआ। है। ऐसे लोग सूक्ष्मजगत से अत्यधिक मात्रा में महत्त्वपूर्ण अनुदान हस्तगत कर सकने में सफल हो जाते हैं। इस उपलब्धि के सहारे वे अपने संपर्क क्षेत्र के असंख्यों का तथा समूचे संसार का महत्त्वपूर्ण हित साधन कर पाते हैं।
इस संदर्भ में शास्त्राभिमत है—
वपषः कान्तिरुत्कृष्ठा जठराग्निविवर्धनम्।
आरोग्यं च पटुत्वं च सर्वज्ञत्वं च जायते॥
भूतं भव्यं भविष्यच्च वेत्ति सर्वं कारणम्।
अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेद ध्रुवम्॥
वक्त्रे सरस्वती देवी सदा नृत्यति निर्भरम्।
मन्त्र सिद्धिर्भवेत्ततस्य जपादेव न संशयः॥
–शिवसंहिता
आत्मसाधना से शरीर में उत्तम कांति उत्पन्न होती है। जठराग्नि बढ़ती है, शरीर निरोग होता है, पटुता और सर्वज्ञता बढ़ती है तथा सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
तब भूत, भविष्य और वर्तमानकाल की सब वस्तुओं के कारण का ज्ञान होता है। जो शास्त्र सुने नहीं है उनके रहस्य जानने तथा व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त होती हैं।
उस योग-साधक की जिह्वा पर सरस्वती नृत्य करती है और मंत्रादि सरलतापूर्वक सिद्ध होते हैं।
यथा वा चित्त सामर्थ्य जायतेयोगिनोध्रुवम्।
दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः अणाददूरागमस्तथा॥
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–योग तत्वोपनिषद्
जैसे-जैसे चित्त की सामर्थ्य बढ़ती है वैसे-वैसे दूर श्रवण, दूरदर्शन, वाक् सिद्धि, वाक् सिद्धि कामनापूर्ति आदि अनेकों दिव्य सिद्धियाँ मिलती चली जाती हैं।
योगियों ने बताया है कि आसन से रोग, प्राणायाम से पातक, प्रत्याहार से मनोविकार दूर होते हैं। धारणा से धैर्य, ध्यान से ऐश्वर्य एवं समाधि से कर्म बंधन कटकर मोक्ष प्राप्त होती है।
साधना की ये सब उपलब्धियाँ परिष्कृत अंतश्चेतनारूपी स्वच्छ दर्पण पर स्पष्ट दिखाई देती हैं। सब प्रकार से कल्याणकारी पथ अध्यात्म-साधना को सही रूप में समझा, बढ़ाया व अपनाया जा सके तो ये दिव्य अनुदान हर किसी के लिए पा सकना सहज-सुलभ है।
संचित पापकर्मों का प्रतिफल रोग, शोक, विक्षोभ, हानि, विपत्ति आदि के रूप में उपस्थित होता है। यह विपत्तियाँ भुगतनी पड़े, इसका आधार मनुष्य का भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट आचरण ही होता है। पापकर्म के बीज सर्वप्रथम दुष्प्रवृत्ति बनकर अंकुर की तरह पौधे उगते हैं। इसके बाद वे पेड़-पौधे बनकर फलने-फूलने लगते हैं। जब तक वे फलने योग्य नहीं होते तब तक उनका स्वरूप पतन-पराभव के रूप में दृष्टिगोचर होने वाले दुराचरण जैसा होता है। पीछे जब वे यदि पुष्ट-परिपक्व हो जाते हैं तो आधि-व्याधि, विपत्ति, हानि, भर्त्सना के रूप में कष्ट देने लगते हैं। दुष्कर्मों के अकाट्य प्रतिफल से बचने का देवी, विपत्ति एवं समाज प्रताड़ना के अतिरिक्त दूसरा मार्ग प्रायश्चित का है। इस तप-साधना का आश्रय लेकर मनुष्य आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार का दुहरा प्रयोजन एक साथ पूरा कर सकता है।
प्रगति-पथ पर चलने के लिए आंतरिक अवरोधों से पीछा छुड़ाना और आत्मबल पर आश्रित अनुकूलताओं को अर्जित करने की आवश्यकता पड़ती है। यही है आत्मिक पुरुषार्थ का एकमात्र स्वरूप। यात्री को एक पैर उठाना दूसरा बढ़ाना पड़ता है। उठाने का तात्पर्य है कुसंस्कारों को छोड़ना, इसके लिए तप करना। बढ़ाने का अर्थ है— सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव एवं आचरण में सम्मिलित करना। कच्ची धातुओं को बहुमूल्य उपकरण के रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रचंड ताप की भट्टी द्वारा गलाई-ढलाई करनी पड़ती है। गलाई को तप और ढलाई को योग कहते हैं। चांद्रायण में तप और योग दोनों का समावेश है। उसकी समूची प्रक्रिया में पग-पग पर परिशोधन और परिष्कार के उभयपक्षीय तत्त्व पूरी तरह गुँथे हुए हैं।
उपवास सुसंस्कारी अंत से काय-शोधन होता है और मनःक्षेत्र में प्रज्ञा का आलोक बढ़ता है। शरीरकल्प के यही दो आधार हैं। आत्मिक कायाकल्प के लिए भी शरीर की तप-तितिक्षा के आधार पर परिशोधन होता है। उपवास पर आधारित आहार-चिकित्सा को कायिक निरोगता का मूलभूत आधार माना जा सकता है। पेट का भार हलका रहने और सुसंस्कारी आहार से गुण, कर्म, स्वभाव पर उपयोगी प्रभाव पड़ने का प्रत्यक्ष लाभ स्वास्थ्य सुधार के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार इंद्रिय संयम, अर्थ संयम समय संयम और विचार संयम का अभ्यास करने से अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियों से सहज ही छुटकारा मिलता है। अंधकार हटना और प्रकाश बढ़ना एक ही बात है। कुसंस्कार घटेंगे तो आंतरिक प्रखरता अनायास ही बढ़ती चली जाएगी। इसके अतिरिक्त उन दिनों आंतरिक परिवर्तन के लिए भावनात्मक प्रयत्न करने होते हैं और साथ-साथ योगाभ्यास सम्मत कोई अतिरिक्त प्रयत्न भी चलते हैं। यह अभ्युदय उत्कर्ष की सशक्त प्रक्रिया है।
प्रायश्चित में तीन पक्ष हैं। एक— व्रत-उपवास जैसी तितिक्षा। दूसरा— संचित कुसंस्कारों को उखाड़ने और उस स्थान पर उच्चस्तरीय शालीनता को स्थापित करने का अंतर्मुखी पुरुषार्थ। तीसरा— खोदी हुई खाई को पाटने वाली क्षतिपूर्ति के लिए पुण्य-परमार्थ का उदार साहस। इन तीनों के संयुक्त समावेश से प्रायश्चित की पूर्णप्रक्रिया सधती है। मात्र आहार में कटौती करने भर से तो चांद्रायण का एक छोटा भाग ही सधता है।
चांद्रायण को एक प्रकार से आयुर्वेदोक्त कायाकल्प उपचार के समान समूचे व्यक्तित्व को संशोधन-सम्वर्धन करने वाली प्रक्रिया कह सकते हैं। इसे आत्मिक कल्प कह सकते हैं। इतने पर भी कल्प के भौतिक सिद्धांत दोनों में ही एक जैसे हैं। एकांत सेवन, आहार संयम तथा निर्धारित चिंतन। यही तीन आधार चांद्रायण के भी हैं। रोगी अपने रोग का स्वरूप ही नहीं इतिहास भी चिकित्सक को बताता है, उसी निदान के आधार पर उपचार की व्यवस्था बनाती है। चांद्रायण में मार्गदर्शक को अपने संचित पापकर्मों का विस्तृत वर्णन–स्वभावगत दोष-दुर्गुणों का परिचय एवं भौतिक-आत्मिक अवरोधों का विवरण प्रस्तुत करना पड़ता है। इन दोनों पक्षों पर गंभीर विचार करने के उपरांत ही हर व्यक्ति के लिए कुछ विशेष परामर्श दिए जाते हैं, उपाय-उपचार बताए जाते हैं। चांद्रायण के सामान्य नियम उपचार तो एक जैसे हैं; किंतु साथ ही हर साधक की स्थिति के अनुरूप उसे कुछ अतिरिक्त उपाय-साधन भी बताए जाते हैं। इन निर्धारणों को कौतुक-कौतूहल एवं बेगार जैसी चिह्न पूजा नहीं बनाया जाता। लकीर पीटने की आधी-अधूरी, लंगड़ी-लूली-प्रक्रिया अपनाने भर से इतना बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं होता। उसमें गंभीर होना पड़ता है और निर्धारित अनुशासन का कठोरतापूर्वक परिपालन करना पड़ता है।
चांद्रायण तप घर के व्यस्त–अभ्यस्त वातावरण में नहीं हो सकता है। उपवासपूरक अनुष्ठान तो आए दिन होते रहते हैं। चांद्रायण उससे आगे की चीज है। उसके लिए तद्नुरूप तीर्थ जैसा पवित्र वातावरण, उपयुक्त साधन एवं ऋषिकृत्य मार्गदर्शन चाहिए। यह आवश्यकता शान्तिकुञ्ज गायत्री नगर में जैसी अच्छी तरह संपन्न हो सकती है, वैसी सुविधा कहीं अन्यत्र मिल सकना कठिन हैं। पूर्ण चांद्रायण एक महीने का— पूर्णिमा से पूर्णिमा तक होता है और लघु (शिशु) चांद्रायण दस दिन का। दोनों में समय का ही अंतर है। विधान-अनुशासन दोनों में एक जैसे हैं। सबसे महत्त्व की बात यह है कि शरीरगत अनुबंधों की निर्धारित दिनचर्या अपनाए रहने के अतिरिक्त मानसिक स्थिति ऐसी बनानी पड़ती है मानों किसी अन्य लोक में उन दिनों रहा जा रहा है। इन दिनों सांसारिक चिंतन एक प्रकार से विस्मृत ही कर देना चाहिए और मात्र अध्यात्म लोक की आवश्यकताओं तथा अंतःक्षेत्र की समस्याओं को हल करने में ही चित्त को पूरी तरह केंद्रित रखना चाहिए। भौतिक जीवन की समस्याएँ इतनी विकट होती हैं कि उन्हें सुलझाने वाले साधन जुटाने में प्रायः समूची जीवन अवधि खप जाती है। फिर आत्मिक जीवन तो और भी अधिक व्यापक एवं महत्त्वपूर्ण है। उसकी गुत्थियाँ सुलझाने और प्रगति के सरंजाम जुटाने के नए सिरे से, नए दृष्टिकोण तथा नया साहस जुटाना होता है। इतने बड़े काम के लिए निर्धारित साधनाकाल स्वल्प ही है। उसमें से भौतिक चिंतन एवं प्रयास के लिए तनिक भी कटौती नहीं करनी चाहिए। समय तथा मनोयोग को निर्धारित प्रयोजन में ही जुटाए रहना चाहिए, उसे अन्य किसी कार्य में रत्ती भर भी अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहिए।
चांद्रायण साधना को ‘व्रत’, 'तप’ एवं ‘कल्प’ के नाम से जाना जाता है। ‘व्रत’ अर्थात् संयम, अनुशासन निर्धारण एवं परिपालन। 'तप' अर्थात संचित कुसंस्कारों के संघर्ष और शालीनता के अवधारणा का अभ्यास के संघर्ष और शालीनता के अवधारणा का अभ्यास-पुरुषार्थ। 'कल्प' अर्थात पिछली हेय स्थिति को उलटकर उसके स्थान पर उत्कृष्टता का प्रतिष्ठापन। यह तीनों ही प्रयास परस्पर मिलते हैं तो ज्ञान और कर्म की गंगा-यमुना मिलने से एक नई धारा भक्तिभावना की, दिव्य जीवन की सरस्वती के रूप में उद्भूत होती हैं। इस समन्वय में त्रिवेणी संगम बनता है। उसका अवगाहन करने वाले इस धरती पर स्वर्ग का आनंद लेते हैं। जीवनमुक्त बनते हैं और मनुष्य रूप में देवता कहलाते हैं। इसी परम लक्ष्य की पूर्ति करना चांद्रायण का आधारभूत उद्देश्य है।
चांद्रायण के तीन पक्ष हैं– (1) संयम साधना (2) प्रज्ञा उपासना (3) भविष्य निर्धारण की आराधना। संयम साधना में उपवास प्रमुख हैं। इस अवधि में सामान्य आहार की तुलना में आधा ही लिया जाता है। जो खाया जाए वह पूर्ण सात्विक एवं सुसंस्कारी हो, इसका ध्यान रखा जाता है। संयम को ही तप कहते हैं। सामान्य जीवन में यह तप चार प्रकार अपनाया जाता है। (1) इंद्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य, मौन, अस्वाद आदि की तितिक्षा (2) अर्थ संयम के लिए मितव्ययिता परिश्रमशीलता अपनाकर सादा जीवन— उच्च विचार का अभ्यास। औसत भारतीय स्तर के निर्वाह का अभ्यास। (3) समय संयम— एक घड़ी भी आलस्य-प्रमाद में बर्बाद न होने देना। दिनचर्या बनाकर उसके परिपालन में तत्परता बरतना (4) विचार संयम चिंतन की अस्त-व्यस्त उड़ानें भरने से रोकना। सौंपे हुए काम में ही मनोयोग नियोजित रखना। चांद्रायण में यह चारों ही संयम साधनाएँ तपश्चर्या के रूप में निर्धारित करनी होती हैं। तपस्वी सच्चे अर्थों में सामर्थ्यवान बनता है। उसकी ऊर्जा से प्रखरता, परिपक्वता बढ़ती हैं। तपस्वी ही शरीरगत ओजस्, मनोगत तेजस् एवं अंतःकरण वर्चस् से सुसंपन्न बनते हैं। इसी आत्मबल के सहारे ऋद्धि-सिद्धियों का द्वार खुलता हैं।
प्रज्ञा-उपासना में गायत्री पुरश्चरण मुख्य हैं। ढाई घण्टा नित्य का समय इसके लिए नियत है। इस बीच निर्धारित जप संख्या पूरी की जाए। साथ ही प्रभातकालीन सूर्य किरणों के तीनों शरीर में प्रवेश करने का ध्यान किया जाए। अनुभव किया जाए कि गायत्री के प्राण सविता देवता का दिव्य आलोक जीवनसत्ता के कण-कण में प्रवेश करके तीन अनुदान प्रदान करता है। स्थूलशरीर को सत्कर्म। सूक्ष्म शरीर को सद्ज्ञान। कारणशरीर को सद्भाव। इन्हीं तीनों को क्रमशः निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के अंतर्गत इन्हीं दिव्य अनुदानों का विवेचन किया जाता है और तृप्ति, तुष्टि, शांति की त्रिविधि विभूतियों के सहारे देवोपम जीवन जी सकने का लाभ समझाया जाता हैं। जिनको यह दिव्य संपदा जितनी मात्रा में उपलब्ध होती हैं, वह उसी अनुपात से आत्मसंतोष, जनसहयोग एवं दैवी अनुग्रह का प्रतिफल हाथों-हाथ प्राप्त करता हैं। ऋतंभरा प्रज्ञा ही गायत्री हैं। प्रज्ञा अर्थात दूरदर्शी विवेकशीलता। यही है मनुष्य का आराध्य इष्ट। इस दिशा में होने वाली प्रगति से इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति के रसास्वादन का लाभ मिलता है।
भविष्य निर्धारण को आराधना के निमित्त इस अवधि में स्वाध्याय-सत्संग और चिंतन-मनन के चार प्रयोजनों में निरत रहना पड़ता है। नित्यकर्म उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है। ताकि ईश्वरप्रदत्त अलभ्य उपहार मनुष्य जन्म का सही उपयोग संभव हो सके। इसके लिए शरीर निर्वाह एवं परिवार पोषण की तरह ही परमार्थ प्रयोजनों को महत्त्व देना होता हैं। आत्मकल्याण और लोक मंगल की समन्वित जीवनचर्या का निर्धारण एवं अभ्यास ही आराधना है।
परमात्मा को आदर्शों का समुच्चय मानकर उसके साथ तादात्म्य होना उपासना हैं। जीवन को अधिकाधिक पवित्र एवं प्रखर बनाने वाली सुसंस्कारिता की अवधारणा साधना है। लोक-मंगल का परमार्थ और उसके सहारे अपनी सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही आराधना है। उपासना परमात्मा की, साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
कुलं पवित्नं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिल्लीनंपरे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥
–स्कन्द. माहेश्वर. कौमार. 55।140
उस व्यक्ति का कुल पवित्र हो गया, उसकी जननी कृतार्थ हो गई और उससे यह पृथ्वी पुण्यवती हो गई, जिस व्यक्ति का मन ‘अपारचिदानंद सिंधु परब्रह्म’ में लीन हो गया। अर्थात् परम आनंद के स्रोत परमात्मा से जुड़ा गया-उनके लोक-कल्याणकारी कार्यों में हाथ बँटाने लगा।
देख खुला है द्वार पुजारी!
बैठ गया क्यों फेंक धूल में फूलों का यह हार पुजारी!
स्वर्ग-कमल से खिले हुए हैं मंदिर के वे कलश मनोहर,
मलयानिल के मृदु अञ्चल में फहर रहा केतन पट सुंदर।
रोम-रोम, कण-कण इन तन में कल्पवृक्ष अमृत और पारस,
है आनंद भरा इस घन में उड़ते हैं आशा के सारस॥
दृग मीचे तू सोच रहा क्या देख तनिक उस पार पुजारी!
देख खुला है द्वारा पुजारी!!
क्या सहलाता इन छालों को तू पूजा का थाल उठा ले॥
देख रहा तू क्या पथ पर ये पर्वत, ये नदियाँ, ये नाले।
यह संस्कृति का क्रम न रुका है जीवन तो चलता जाएगा,
रुक जाने से तो पीछे तू अपने मन में पछताएगा॥
शीतल हो जाएँगे क्षण में ये जलते अंगार पुजारी!
देख खुला है द्वार पुजारी!!
पल में अरे समा जाएँगे तब प्रवाह में ये सब सागर,
मिल जाएँगी नदियाँ तुझमें डूबेंगे नभचुंबी गिरिवर।
अपने भीतर झाँक बटोही उसमें कितनी गहराई है,
तुझ पर करुण निर्झरी कितनी प्रभु प्रियतम की लहराई है॥
रुक न सकी है अब तक जग में शुद्ध प्रेम की धार पुजारी!
देख खुला है द्वार पुजारी!!
साज सजाए आज जा रहा तू जिसकी पूजा करने को,
आएगा वह स्वयं दौड़कर तुझसे पथ में ही मिलने को॥
भवसागर का ज्वार भले ही हो कितना दुर्दांत भयावह,
लेकर गोद लगा अंतर से अपनी नाव बिठाएगा वह॥
गूँथ हृदय के टुकड़े तुझको पहनाएगा हार पुजारी!
देख खुला है द्वार पुजारी!!
— श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी
सम्पादक–भगवती देवी शर्मा प्रकाशक व मुद्रक–मृत्युञ्जय शर्मा अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा जन-जागरण प्रेस मथुरा 281003 में मुद्रित।
*समाप्त*