आत्म शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। भौतिक सम्पदा एवं सामर्थ्य के सहारे मनुष्य को भाव निर्वाह तथा सुविधा की साधन सामग्री प्राप्त होती है, जबकि आत्मशक्ति प्रसुप्त चेतना को जगाती, अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभारती तथा मनुष्य में देवत्व का उदय−उद्भव कर दिखाती है। महामानव, ऋषि एवं देवदूत बनने का अवसर नर−पशुओं को इसी आधार पर उपलब्ध होता है। अपना और दूसरों का भला करने की एक सीमित सामर्थ्य ही बुद्धि वैभव में पाई जाती है, किन्तु आत्मबल के सहारे ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की ऐसी प्रखरता प्राप्त की जा सकती है, जिसके सहारे अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का भी उत्थान, अभ्युदय सम्भव हो सके। शरीर और प्राण के मध्य जो अन्तर है वही भौतिक सम्पदाओं और आत्मिक विभूतियों के बीच पाया जाता है। साधन सम्पन्न सुख भोगते है, किन्तु आत्मबल से समर्थ व्यक्ति इसी जीवन में स्वर्ग मुक्ति का परमानन्द प्राप्त करता और परब्रह्म के साथ तादात्म्यता का जीवन लक्ष्य प्राप्त करता है।
आत्म शक्ति प्राप्त करने के लिए जो साधना करनी पड़ती है उसके दो पक्ष हैं–एक क्रिया–कांड, भजन–पूजन का उपचार। दूसरा ब्रह्माण्डीय चेतना के, उत्कृष्टता देवात्मा के साथ योग एकात्म्य। उपचारों में जप, भजन, व्रत, उपवास जैसे शरीर साध्य कृत्य करने पड़ते हैं। योग भावना प्रधान है उसमें समर्पण स्तर की भाव श्रद्धा जगानी पड़ती है। भक्ति का, प्रेम का अभ्यास करना और स्वभाव बनाना पड़ता है। आदर्शों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व को योगी कहते हैं जबकि मात्र कर्म−काण्डों में ही निरत रहने वाले भाव शून्यों को अधिक से अधिक पुजारी की संज्ञा दी जा सकती है। उपचारों को तीर और योग एकात्म्य को धनुष कहते हैं। तीर उतनी ही दूर जाता, उतनी ही चोट करता है, जितना कि प्रत्यंचा का खिचाव उसे प्रेरणा देता है। धनुष के बिना तीर की कोई चमत्कृति नहीं, किन्तु अकेला धनुष किसी छोटे से कंकड़ को फेंककर लगभग तीर लगने जैसा परिणाम उत्पन्न कर सकता है। उपचार का कोई महत्व नहीं, सो बात नहीं। लेखक को कलम, दर्जी को सुई, चित्रकार को तूलिका, वादक को वीणा जैसे उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है। इतने पर भी उनकी अन्तःचेतना का प्रखर प्रवीण होना आवश्यक है अन्यथा वे उपकरण हाथ में रहते हुए भी किसी सफलता का श्रेय प्रदान न कर सकेंगे। पूजा परक उपचारों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। उनकी उपेक्षा करने से काम नहीं चलेगा। हथौड़ी के बिना लुहार, बाजे के बिना वादक अपने कौशल का परिचय कैसे देगा? उस्तरा न हो तो नाई किस प्रकार किसी की हजामत बनाये?
बीज की महत्ता सर्वविदित है। उसके बिना न खेती होती है और न बगीचा लगता है। इतने पर भी मात्र बीज को ही सब कुछ मान बैठने वाले न फसल काट सकते हैं और न फल सम्पदा के सहारे धनवान बन सकते हैं। बीज बोने की तरह ही खाद पानी का प्रबन्ध करना भी आवश्यक हैं। बीज को उपासना उपचार कह सकते हैं, किन्तु उसे लहलहाते पौधे का रूप देने के लिए भाव श्रद्धा का खाद पानी अनिवार्यतः चाहिए। अन्यथा बीज बोने में जो परिश्रम एवं धन खर्चा गया, वह भी बेकार चला जायेगा। यहाँ उस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया जा रहा है जिस पर साधना की सफलता–असफलता का केन्द्र–बिन्दु निर्धारित है।
‘साधना को सिद्धि के रूप में परिणित होते देखने के इच्छुक प्रत्येक विचारशील को जहाँ निर्धारित पूजा−उपचार नियमित रूप से करने चाहिए वहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इष्ट के−लक्ष्य के−प्रति श्रद्धा का क्रमिक विकास हो रहा है या नहीं? प्राण विहीन शरीर को लाश कहते हैं और आस्था रहित पूजा उपक्रम को विडम्बना। दोनों को बाह्य स्वरूप तो सही दीखता है, पर आन्तरिक खोखलेपन के कारण उनके सहारे किसी उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती। मृतक के निर्जीव कायकलेवर से किसी को क्या कुछ मिल सकेगा? इसी प्रकार भाव−श्रद्धा से रहित पूजा को परिश्रम से इतना ही लाभ हो सकता है कि वह समय किसी दुष्ट कर्म में न लगाकर सत्प्रयोजन के अभ्यास में व्यतीत हुआ। इतने पर भी उससे किसी चमत्कारी प्रतिफल की आशा अपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रत्येक तथ्यान्वेषी साधक को जितना परिश्रम, उपासना उपचार पर करना होता है, उससे कहीं अधिक प्रयास अपनी भाव चेतना में उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए करना होता है। यह मरुस्थल को सुरम्य उद्यान में बदलने जैसा परम पुरुषार्थ है।
कई भ्रान्तिग्रस्त व्यक्ति मात्र पूजा−उपचार के कर्मकाण्डों को ही ऋद्धि−सिद्धि का भाण्डागार मान बैठते हैं और बाजीगरों द्वारा तुर्त−फुर्त करतब कौतूहल दिखाये जाने की तरह अपने तन्त्र−मन्त्र से आकाश, पाताल जैसी कल्पना करने लगते हैं। वे पूरी नहीं होती तो नास्तिक जैसा आक्रोश प्रकट करने और उपासना विज्ञान पर चित्र−विचित्र लाँछन लगाते देखे जाते हैं। सभी जानते हैं कि जादूगरी मात्र छलावा है। मिट्टी से रुपया बनाना, हथेली पर सरसों जमाना विज्ञान के सामान्य नियमों से सर्वथा विपरीत है। मिट्टी से रुपया बन तो सकता है, पर उसके लिए किसान, कुम्हार या ईंट पकाने वाले जैसी सुनियोजित प्रक्रिया का आश्रय लेना होता है। पूजा−उपचार के जादूगरी जैसे परिणाम देखने के लिए आतुर व्यक्ति बालकों जैसी आशा−निराशा के झूले में झूलते रहते है। अध्यात्म वस्तुतः अन्तःचेतना के परिष्कार का एक सुनियोजित विज्ञान है। जो आत्मसत्ता से जिस स्तर की उत्कृष्टता का समावेश कर पाता है वह उतना ही पवित्र और प्रखर होता जाता है। सभी जानते हैं कि व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति जिस भी क्षेत्र में हाथ डालते हैं, उसी में सफलता पाते हैं। जबकि मंत्र−तंत्र के बाजीगर व्यक्तित्व के सुधार परिष्कार की ओर नजर तक नहीं डालते और मात्र जादुई क्रिया−कृत्यों के सहारे उन सफलताओं को तत्काल उपलब्ध करने की बात सोचते हैं जो अभीष्ट योग्यता एवं तत्परता के मूल्य पर ही खरीदी जा सकती है। बिना समुचित मूल्य चुकाये इस संसार में किसी को कोई चिरस्थायी सफलता नहीं मिल सकती। उचक्के उठाईगीरे ही जहाँ−तहाँ सेंध मारते, जेब काटते और तुर्त−फुर्त अमीरी झटक लेने का सपना देखते और हथकंडे अपनाते हैं। ऐसी सफलताएँ अन्ततः उन्हें महंगी ही पड़ती हैं। सस्ते पूजा−पाठ भर से प्रखर पुरुषार्थ के बदले कमाई जाने वाली विभूतियों को प्राप्त करने के लिए ताना−बाना बुनने वालों को भी इसी श्रेणी में गिना जा सकता है।
इन दिनों हर क्षेत्र में भ्रान्तियों को बाहुल्य है, अध्यात्म का क्षेत्र तो उनसे बुरी तरह भर गया है। आत्म परिष्कार के–व्यक्तित्व निर्माण के उच्चस्तरीय विज्ञान की आज जो दुर्गति हो रही हैं, उसे देखकर भारी दुःख होता है। उपचार कृत्यों के गुण दोषों पर विचार पीछे किया जाना चाहिए। पहले यह देखा जाना चाहिए कि अध्यात्म के नाम पर जो मान्यताएँ प्रचलित हैं, वे कहाँ तक सत्य और तथ्य पर निर्धारित हैं। आज उस आत्म परिष्कार की पुनीत प्रक्रिया को पदच्युत करके बाजीगरी का– उठाईगिरी का सिद्धान्त मान्यता प्राप्त कर चुका है। हर व्यक्ति चित्र−विचित्र कर्मकाण्डों से जादू भरे चमत्कार और टोकरा भरे आकाश कुसुमों के उपहार पाना चाहता है। यदि उनकी मान्यता सही होती है तो फिर इस विश्व व्यवस्था में कर्मफल का–योग्यता एवं तत्परता के लिए कोई स्थान शेष न रह जायेगा। तब महत्ती सफलताएँ जादूगरों की पिटारी से ही बिखरती, बरसती पाई जायेंगी।
होना यह चाहिए कि अध्यात्म तत्व ज्ञान का प्रत्येक विद्यार्थी पूजा उपचार और आत्म−परिष्कार के उभय पक्षीय प्रयोजनों को साथ−साथ लेकर चले। संचित कुसंस्कारों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए अपने अनपढ़ स्वभाव अभ्यास को सुधारे–दबाये। यह तपश्चर्या का व्रतशीलता का पक्ष है। इसके अतिरिक्त दूसरा बहिरंग पक्ष है जिसमें पूजा उपचारों के सहारे अन्तःचेतना को व्यायाम उपचार की तरह साधने−संजोने एवं उछालने का अभ्यास जारी रखा जाता है। ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि इस अध्यात्म साधना का समूचा प्रकरण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग पक्षों को उत्कृष्टता सम्पन्न बनाने के लिए है। इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ेगा उसे उसी अनुपात में वजनदार व्यक्तित्व से सुसम्पन्न होने का गौरव मिलेगा। यही है वह आन्तरिक वैभव जिसके सहारे आत्मबल के धनी अपने को महामानव स्तर का बनाते हैं और अपने संपर्क क्षेत्रों को चन्दन वृक्ष की तरह गौरवास्पद सुरक्षित बनाते हैं।
अध्यात्म निश्चय ही जादू भरा है। संसार के महामानवों के व्यक्तित्व और कर्तृत्व का इतिहास एवं अनुदान ऐसा गौरवशाली है जिस पर हजारों लाखों जादूगरों को निछावर किया जा सकता है। वैसी ही महत्वाकांक्षा हर सच्चे अध्यात्मवेत्ता को संजोनी चाहिए। जादू भरे कौतूहलों को देखने की बचकानी ललक को कूड़े के ढेर में बुहार कर फेंक देना चाहिए साथ ही वह आत्म−तेजस् उभरना चाहिए जिसके सहारे अभ्यस्त कुसंस्कारों में, स्वभाव एवं आदतों में कायाकल्प जैसे परिवर्तन कर सकना शक्य हो सके।
आत्मीयता का विस्तार ही भक्ति योग है। इसके अभ्यास में सर्वत्र अपनापन दीखता है। उदार सेवा सहायता करने को मन करता है। आस्थाएँ उत्कृष्टता के साथ जुड़ी रहने को–अन्तरंग में जो उल्लास उमँगता रहता है उसी को अमृत, आत्मदर्शन, ब्रह्म साक्षात्कार आदि का नाम तत्वदर्शियों ने दिया है। जीवनमुक्तों की–देवदूतों की ऐसी ही अन्तःस्थिति होती है।
ज्ञानयोग उच्चस्तरीय दूरदर्शिता का नाम है। आम आदमी तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठते हैं और भविष्य की आवश्यकताओं–संभावनाओं पर तनिक भी विचार नहीं करते। यही कारण है कि उनकी बुद्धि विलास, संचय एवं अपव्यय के ताने−बाने बुनती रहती है। जिन्दगी इस व्यामोह में कट जाती है और जब परिणामों के परिपक्व होने का अवसर सामने आता है तो भाव पश्चाताप ही शेष रहता है। ज्ञान योग अन्धी भेड़ों जैसे लोक प्रवाह को अमान्य ठहराकर अपनी स्वतन्त्र विवेक बुद्धि का उपयोग करता है और इसी नर पशुओं की तरह नष्ट−भ्रष्ट होने वाले जीवन को नये निर्धारणों के आधार पर देवोपम गतिविधियों के साथ जोड़ देने का पराक्रम प्रकट करता है।
कर्मयोगी अपनी क्रिया शक्ति को पेट प्रजनन में–तृष्णा अहंता की पूर्ति से ऊपर उठाकर उसे आदर्शवादी क्रिया−कलापों में नियोजित करता है। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त ही कर्मयोग का पर्यायवाचक है, जो उच्चस्तरीय जीवन जियेगा उसे संयम बरतना पड़ेगा। आवश्यकता और इच्छाएँ घटाकर देशवासियों के औसत स्तर तक नीची लानी पड़ेगी। इतना बन पड़ने पर ही कोई अपने श्रम, समय, मनोयोग एवं वैभव को बचत करके उच्च विचारों को साकार करने वाले परमार्थ में नियोजित कर सकता है। कर्मयोगी की आंतरिक स्थिति यही होती है। उसके दृष्टिकोण, रुझान एवं प्रयास में अनिवार्यतः आदर्शवादिता घुसती तथा चढ़ती चली जाती है।
कर्मयोगी–महामानव बनते हैं। ज्ञानयोगी ऋषि कहलाते हैं और भक्ति योगी जीवन मुक्त अवतारी देवदूतों में गिने जाते हैं। मनुष्य के तीन शरीर हैं। डडडड शरीर को कर्मयोग से–सूक्ष्म शरीर को ज्ञानयोग से एवं कारण शरीर को भक्तियोग से परिष्कृत करते हुए परम लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। यही आत्मिक प्रगति का आदर्शमार्ग है। इसी पर चलते हुए सामान्यों को असामान्य बनने का–और युग प्रवाह उलटने से लेकर समूचे वातावरण में उत्कृष्टता भरे देने का सुअवसर मिलता है उनकी गतिविधियों की परिणति को देखते हुए हर विवेकवान् की आँखें उन्हें चमत्कारी सिद्ध पुरुष कहतीं और शतशत नमन करती देखी जाती हैं। बचकाने जादू जैसे दृश्य देखने कौतूहल दिखाने के लिए ललकते रहते हैं पर परिपक्व प्रज्ञा वाले उस ओर नजर उठाकर भी नहीं देखते। उन्हें अपने व्यक्तित्व के परिष्कार में–दृष्टिकोण, रुझान एवं कर्तृत्व की उत्कृष्टता में ऐसे चमत्कारों की भरमार दीखती है जिसके लिए सामान्य नर पामर प्रायः तरसते−तरसते ही मरते हैं।
हर पूजा उपचार का एक तत्व दर्शन है, उस क्रिया के माध्यम से कुछ सोचना, सीखना पड़ता है, और तद्नुरूप ढलने के लिए इष्टदेव के प्रति आत्म−समर्पण का अभ्यास करना होता है। वस्तुतः विभिन्न साधना उपचारों के पीछे छिपा हुआ प्रेरणा प्रवाह ही दिव्य शक्ति की प्रचण्डता से ओत−प्रोत प्राण−पुँज है। यदि उसे न समझा जाए और न हृदयंगम किया जाए तो फिर इतना ही समझना चाहिए कि मात्र क्रिया−कृत्यों तक सीमित श्रम उपचार से कोई वैसा बड़ा प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा। जैसी कि आमतौर से अपेक्षा की जाती है। किन्तु यदि कर्मकाण्डों में सन्निहित भाव निष्ठा को सच्चे अर्थों में हृदयंगम किया गया, तद्नुरूप जीवनचर्या को ढाला गया तो निश्चित रूप से अन्तःचेतना में देवत्व की उमँगें उभरेंगी और व्यक्तित्व उच्चस्तरीय बनाने के साथ−साथ अद्भुत कार्य कर सकने में समर्थ सिद्ध पुरुष भी बना देगी।
देव शक्तियों के स्वरूप, स्तर एवं क्रिया−कलाप के सम्बन्ध में इस तथ्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही उत्तम है कि वे चमचागिरी, जीभ की लपालपी, छोटे−मोटे पुष्प–दीप जैसे उपहारों से प्रभावित होकर किसी को अपना भक्त मान बैठने और उसकी उचित अनुचित कामनाओं की तत्काल पूर्ति में लग जाने वाले नहीं हैं। इस आधार पर उन्हें फुसलाने बहलाने की तिकड़म बाजी को ही यदि कोई पूजा साधना समझना हो तो इस भ्रम−जंजाल में फँसने के उपरान्त निराश होने, गाली देने की अपेक्षा यही अच्छा है कि बिना किसी भजन−पूजन के ही काम चलाया जाए। पुरुषार्थ के आधार पर सफलता पाने में नीतिमत्ता भी है और वास्तविकता भी। छुटपुट जादुई उपचारों के उलटे उस्तरे से देवताओं की हजामत बनाने के धन्धे में हाथ डालने की अपेक्षा उसे न करना ही अधिक समझदारी की बात है।
देवताओं को पूजा बटोरने और वरदान बाँटते रहने वाला–अन्धेर नगरी का बेवझ राजा नहीं मान बैठना चाहिए और न उनसे पात्रता का अभाव रहने पर भी मनमाने अनुग्रह पाने की आशा ही करनी चाहिए। दैवी शक्तियाँ देती तो बहुत कुछ हैं पर देने से पूर्व हजार बार यह ठोंकती बजाती हैं कि माँगने वाला आखिर किस स्तर का व्यक्ति है? अनुदानों का सदुपयोग करने की उसकी प्रामाणिकता क्या है? जो माँगा जा रहा है वह किस प्रयोजन के लिए है? इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर मिलने पर ही देवता किसी को अपना अनुग्रह अनुदान देते देखे गये हैं।
पेड़ों की आकर्षण शक्ति आकाश में उड़ने वाले बादलों को धरती पर उतरने और बरसने के लिए विवश करती हैं। साधक की चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा का समन्वय ही ऐसी आकर्षण शक्ति का उद्भव करता है जो दैवी अनुदानों को साधक पर बरसाने के लिए विवश कर सके। अस्तु मनुहार उपहार के लोभी–लालची में दैवी शक्तियों को बहेलियों और मल्लाहों की तरह फसाने का विचार छोड़कर अपना प्रयास यह करना चाहिए कि अपनी पात्रता किस प्रकार इस स्तर तक विकसित की जाए कि दैवी शक्तियों को बादलों की तरह बरसने के लिए विवश होना पड़े। बर्तन जितने बड़े होते हैं उतना ही पानी उनमें भरा जा सकता है। विपुल जलाशय भी बर्तन की परिधि से अधिक पानी दे सकने में असमर्थ रहते हैं। दैवी शक्तियाँ भी ऐसे ही अनुबन्धों में बँधी हुई हैं।
वरदान माँगने की अपेक्षा अपनी स्थिति ऐसी बनानी चाहिए कि दूसरों को वरदान दे सकना अपने लिए भी सम्भव हो सके। वस्तुतः आशीर्वाद देना उदारमना सन्तों का ही काम है। पिछड़ों को उठाने, अशक्तों की सहायता करने और विकासोन्मुखों को छात्रवृत्ति देने जैसे उदार प्रयोजन सन्तों को ही पूरे करने पड़ते हैं। भगवान् तो एक व्यवस्था मात्र है। जो आग या बिजली की तरह मात्र सदुपयोग की शर्त पर ही अनुग्रह करता है। दुरुपयोग की कुमार्गगामिता का दण्ड देने में ईश्वर भी नहीं चूकता। इस संदर्भ में उसे भक्त −अभक्त में कोई अन्तर करते नहीं पाया जाता। नौकरी पाने के लिए अर्जी देनी पड़ती है और मंजूरी भी उसी पर मिलती है। पर यह ध्यान देने की बात है कि इस बीच आवेदनकर्त्ता को परीक्षा एवं प्रतियोगिता से होकर भी गुजरना पड़ता है, ईश्वर प्रार्थना से प्रभावित होकर तुरन्त अनुकम्पा नहीं करने लगता वरन् यह भी देखता है कि प्रार्थना करने वाला अभीष्ट पात्रता एवं प्रामाणिकता अर्जित किये हुए है या नहीं?
उपासना का वास्तविक प्रयोजन अपने मन मन्दिर को बुहार कर इस योग्य बनाना है कि उस स्वच्छता से सन्तुष्ट होकर ब्राह्मी शक्ति उस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सहमत हो सके। शरीर को नित्य स्नान कराते हैं, कपड़े नित्य धोते हैं, दाँतों को मंजन नित्य करना होता है, कमरे में झाडू नित्य लगाते हैं, इस दैनिक स्वच्छता का प्रयोजन इतना ही हैं कि मलीनता के कारण उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध, रुग्णता एवं कुरुचि से बचा जा सके। इसमें कोई अतिरिक्त चमत्कार नहीं होता। स्वच्छता अपनाने से चित्त हल्का होता है। सभ्य लोगों की पंक्ति में सम्मान पूर्वक बैठने का द्वार खुलता है और मलीनताजन्य बीमारियों से सहज ही बचाव होता रहता है। इतने से सन्तुष्ट न होकर कोई स्नान, मंजन आदि से ऋद्धि−सिद्धियों के वरदान चमत्कार चाहे तो उसे बाल बुद्धि बचकाना ही कहा जायेगा। उपासना के फलितार्थों के सम्बन्ध में भी इसी दृष्टिकोण से सोचा जाना चाहिए।
ईश्वर आदर्शों का समुच्चय है। उपासना का अर्थ होता है–समीप बैठना। समीप बैठना वैसा–जैसा कि गीली लकड़ी आग के समीप पहुँचकर अपना गीलापन समाप्त कर लेती है और आग की ऊष्मा को अपने में धारण करके सूखती चली जाती है। अधिक निकट पहुँचने पर स्वयं आग बन जाती है। उपासना का वास्तविक स्वरूप यही है। महानता की समस्त उत्कृष्टताओं के पुंज परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त करके साधक उसकी गुण गरिमा को क्रमशः अपने में अधिकाधिक मात्रा में भरता चला जाए। यही दैवी विभूतियाँ व्यक्तित्व को श्रेष्ठ, शालीन उदार और उदात्त बनाती है। कहना न होगा कि व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति एक प्रकार से सिद्ध पुरुष ही होता है। उसका मूल्य हर क्षेत्र में सामान्य नर पशुओं की तुलना में हजारों लाखों अधिक आँका जाता है। तद्नुरूप उस पर चारों ओर से सम्मान सहयोग भी बरसता है। जो इस स्तर का–लाभ पा सकेगा उसे स्वभावतः उच्चस्तरीय सफलताएँ भी मिलती चली जायेंगी। ऐसे लोग ही हर क्षेत्र में श्रेय पाते और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचते हैं। इसी सुखद प्रतिफल को यदि कोई चाहे तो उपासना का चमत्कार कह सकता है।
ईश्वर निष्पक्ष न्यायकारी है, उसके दरबार में किसी का मूल्य उसकी प्रामाणिकता एवं परमार्थ परायणता के आधार पर ही आँका जाता है। न उसे प्रशंसा की आवश्यकता है न पूजा सामग्री की। नाम लेने न लेने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे किसी उपहार की भी आवश्यकता नहीं। विश्व सम्पदा के अधिष्ठाता की ऐसी इच्छा आवश्यकता हो भी नहीं सकती। यह हमारी अपनी क्षुद्रता है जो इतनी बड़ी शक्ति को नगण्य से उपचारों से प्रभावित करके उससे उचित अनुचित मनोरथों की पूर्ति करा लेने की बात सोचते हैं। ऐसा पक्षपात तो कोई ईमानदार न्यायाधीश तक नहीं करता। फिर ईश्वर जैसी महान् शक्ति प्रशंसा पूजा जैसे उपहासास्पद उपहारों के बदले कर्मफल की समस्त नियम मर्यादाओं को नष्ट−भ्रष्ट कर देगी यह सोचना पहले सिरे की मूर्खता का परिचय देना है।
ईश्वर उपासना जिन्हें भी करनी हो वे इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए करें। उस आधार पर उपलब्ध होने वाली दिव्य प्रेरणाओं के सहारे अपने गुण, कर्म, स्वभाव की प्रसुप्त विशेषताओं को विकसित करें और उन्हीं समस्त सिद्धियों−विभूतियों को पाने के अधिकारी बनें जो भक्ति योग की साधना करने वालों में मिलने की बात शास्त्रकारों एवं आप्त जनों ने अपने प्रतिपादनों में समय−समय पर बताई है।
जीवात्मा की सामर्थ्य सीमित है–परमात्मा की असीम। एक लघु है तो दूसरा विभु। एक सरोवर है–दूसरा चेतना का–शक्ति का महासागर। सामर्थ्य सीमित होते हुए भी जीवात्मा के विकसित होने–असीम बनने और परमात्मा सत्ता के स्तर तक जा पहुँचने की पूरी−पूरी गुंजाइश है। लघु के विभु, बिन्दु के सिन्धु, सीमित के असीम और चेतना के महाचेतना में विकसित होने की प्रक्रिया जिस माध्यम से सम्पन्न होती है उसे योग कहते हैं।
बोलचाल की भाषा में योग का अर्थ होता है–जुड़ना। आध्यात्मिक अर्थ में योग कहते हैं–जीवात्मा के परमात्मा से जुड़ जाने को। जीव सत्ता–विराट् सत्ता से अपना संपर्क सूत्र जोड़ ले– तादात्म्य स्थापित कर उसमें एकाकार हो जाय, इसे ही योग कहा गया है। योग का लक्ष्य है जीवात्मा का विराट् चेतना से संपर्क जोड़कर−दिव्य आदान−प्रदान का मार्ग खोल देना। निस्सन्देह अपना आपा महान है। सामर्थ्यवान है। पर सीमाबद्ध होने से उसकी शक्ति सीमित रह रही है। अपने एकाकी बलबूते वह कोई महान प्रयोजन पूरा नहीं कर पाता। विराट् से–चेतना के महासागर से जुड़ जाने–असीम स्रोत से संपर्क मिल जाने से अपनी सामर्थ्य भी उसी स्तर की बन जाती है।
संपर्क में आने–जुड़ जाने के चमत्कार पग−पग पर दिखाई पड़ते हैं। बिजली के दो तार जुड़ते हैं तो प्रचण्ड धारा मध्य से प्रवाहित होने लगती है। नर−नारी के सान्निध्य, घनिष्ठता से संतानोत्पादन का क्रम चल पड़ता है। नये परिवार एवं नये समाज की रचना का अभिनव आरम्भ हो जाता है। यह तो समान स्तरीय व्यक्तियों एवं पदार्थों की सम्मिलन की प्रतिक्रिया हुई। जिसकी विलक्षण परिणित दैनिक जीवन में सर्वत्र परिलक्षित होती है।
जुड़ने का एक असामान्य पक्ष भी है जिसमें एक का स्तर निम्न तथा दूसरे का महान होता है। एक की शक्ति सीमित–दूसरे की असीम होती है। एक नगण्य होता दूसरा विशेषताओं−विभूतियों से सम्पन्न। पर संपर्क में आने, जुड़ जाने से सामान्य वस्तु एवं व्यक्ति भी अपने से विशिष्ट क्षमता एवं विशेषता सम्पन्न की न केवल विशेषताएँ प्राप्त कर लेते हैं बल्कि उसी स्तर के बन भी जाते हैं। लकड़ी अग्नि के निकट आती और अन्ततः अग्नि का स्वरूप प्राप्त कर लेती है। बल्ब होल्डर के निकट आते ही जल उठता, पंखा चलने लगता–हीटर गरम हो उठता, रेफ्रिजरेटर ठण्ड प्रदान करता है। अपने−अपने अनुरूप विशेषताओं को विद्युत शक्ति से ग्रहण कर लेते हैं। विभिन्न वाट के–विद्युत क्षमता वाले बल्ब अपने−अपने अनुरूप प्रकाश प्राप्त कर लेते हैं। विद्युत उत्पादन पानी से होता है पर उसका मूल स्रोत है समुद्र। नदियों, तालाबों, झरनों की जल सम्पदा भी समुद्र से ही मिलती है। सतत् वाष्पित होकर उड़ने और बादल बनकर बरसने में समुद्र का अथाह जल ही काम आता है। अस्तु प्राप्त होने वाले विद्युत का मूल स्रोत भी समुद्र है। समुद्र से सीधा संपर्क जुड़ सके तो उसके भाण्डागार से असामान्य शक्ति प्राप्त की जा सकती है।
सीमित की अपेक्षा बड़े स्रोतों से जुड़े रहने से उसी अनुपात में अनुदान भी मिलते हैं। कितनी ही नदियाँ किसी बड़े स्रोत से न जुड़ी रहने के कारण सूख जाती हैं। गंगा और यमुना का अजस्र प्रवाह हिमालय के व्यापक स्रोत से जुड़े होने से वे कभी नहीं सूखतीं। उनकी गरिमा और विशेषताएँ भी अन्य नदियों की तुलना में कहीं अधिक हैं। इनके भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुदानों से हर कोई लाभ उठाता। जो श्रद्धाभाव इनके प्रति है अन्यों के प्रति नहीं। झीलों से निकलने वाली नदियाँ भी नहीं सूखती हैं। कारण है–अथाह जलराशि के स्रोत से उनका जुड़ा रहना।
सरकारी सेवाओं में नियुक्ति होने पर कितने ही अधिकार वेतन के अतिरिक्त भी अपने आप प्राप्त हो जाते हैं। न्यायाधीश को अपराधियों को दण्डित करने का अधिकार मिलता है। अधिकारी, कर्मचारी को विभिन्न प्रकार के अधिकार दिए जाते हैं। बैंक का खजांची विपुल धनराशि का मालिक बना रहता है। जिलाधीश को पूरे जनपद की देखरेख करने और सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए निर्णय लेने की पूरी छूट होती है। पुलिस के सिपाही सन्देह होने पर किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं। प्रान्त के गवर्नर और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री को व्यापक अधिकार होते हैं। जिनका उपयोग वे देश के हितों को ध्यान में रखते हुए करते रहते हैं। पर सेवा विमुक्त होते और मन्त्री मण्डल से निकलते ही प्राप्त सभी अधिकार अपने आप समाप्त हो जाते हैं। व्यक्ति वही और उसकी क्षमताएँ भी वही बनी रहती हैं, पर कारण क्या है कि प्राप्त अनेकों प्रकार के अधिकार समाप्त हो गये। अन्तर एक ही है–वह पहले सरकार से जुड़ा था और अब वह संपर्क टूट गया फलस्वरूप अधिकार भी जाते रहे।
घनिष्ठ संपर्क में आने–जुड़े रहने के कितने ही लाभ हैं। बच्चा माता−पिता से कितनी ही बातें सीखता है–सुविधाएँ प्राप्त करता है। संरक्षण और भावनात्मक पोषण−स्नेह−दुलार पाता है। उत्तराधिकार में उसे पिता की कमाई सम्पत्ति मिल जाती है। माँ का ममत्व उसके अन्तराल में सहज ही उतरता रहता और उसके अन्तराल को तृप्त करता तथा व्यक्तित्व को परिपुष्ट बनाता है। पत्नी पति से जुड़ जाती है। उसे पति का प्यार मिलता और उसकी सम्पत्ति की अधिकारी हो जाती है। पत्नी की अवमानना–अपमान को पति का अपमान माना जाता तथा अपमान करने वाले को सामाजिक तिरस्कार प्रताड़ना से लेकर सरकारी दण्ड का भाजन बनना पड़ता है। दाम्पत्य सम्बन्धों के कारण पति पत्नी में भावनात्मक आदान−प्रदान ही नहीं करते, लड़ते−झगड़ते भी हैं। अन्यों के साथ यह सब नहीं चल पाता।
वायु के संपर्क में आने पर धूल कण भी वायु मण्डल में उड़ने लगते और व्यापक क्षेत्र में विचरण करने का आनन्द लेते हैं। बेल पेड़ का अवलम्बन पकड़कर पेड़ की जितनी ऊँचाई तक जा चढ़ती है। नगण्य बूँदें समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती–गन्दा नाला गंगा में मिलकर गंगाजल बनकर उसकी विशेषताएँ प्राप्त कर लेता है। पानी दूध में मिलकर खोता नहीं पाता अधिक है–अपना मूल्य और स्तर बढ़ा लेता है। पारस पत्थर से छू जाने पर लोहा सोना बन जाता है।
भौतिक वस्तुओं एवं व्यक्तियों के संपर्क जुड़ने एवं उनके परिणाम एवं फलितार्थ की तुलना में जीवात्मा के परमात्मा से योग की उपलब्धियाँ असंख्य गुनी अधिक और अनुभूति अत्यधिक आनन्ददायक है। वह समस्त संसार का अधिष्ठाता है और चेतना का महासागर। भौतिक और आध्यात्मिक सभी विभूतियों उसमें समाहित हैं। सृष्टि के सभी जड़ चेतन उसी से अपने−अपने अनुरूप सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। जड़ की जड़ से मिलन की प्रतिक्रिया इतनी चमत्कारी चेतन जीवों की इतनी सुखद और सरस हो सकती है वो जो इन सबका मूल स्रोत है उसका संपर्क कितना सरस, आनन्ददायक और विलक्षण होगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जड़ पदार्थ सामर्थ्य, गति एवं विलक्षणता तथा चेतनप्राणी जीवन, प्राण उस महास्रोत से सीमित मात्रा में प्राप्त कर थिरकन करते, उछलते−फुदकते और सरसता का आनन्द लेते हैं। योग बन जाने– स्रोत से सीधा संपर्क जुड़ जाने और दिव्य आदान−प्रदान का क्रम चल पड़ने की विधिव्यवस्था कितनी सरस, हृदय को दिव्य आनन्द से भर देने वाली होगी, यह सोचकर मन पुलकित हो उठता है।
सामान्यता तृष्णा, वासना और अहंता की फूहड़ परितृप्ति के लिए मृग−मरीचिका में मनुष्य जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। क्षणिक आनन्द में मोद मनाने और उसमें व्यतिक्रम उपस्थित होते ही दुःख और शोक से आकुल−व्याकुल हो उठता है। मन बन्दर की भाँति वस्तुओं एवं व्यक्तियों से सुख के लिए उनके इर्द−गिर्द मचलता–मचकता −उछलता−चक्कर काटता रहता है। अतृप्ति और अशान्ति ही अन्ततः पल्ले पड़ती। समूचा जीवन ही ऐषणाओं की पूर्ति में खप जाता है। दिव्य चेतना से संयोग न बन पाने पर शाश्वत आनन्द से मनुष्य को जीवन पर्यन्त वंचित रहना पड़ता है। अतृप्ति लेकर पैदा होता और अतृप्त ही चला जाता है। यह भटकाव मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी हार कही जायेगी।
योग का प्रयोजन है इस भटकाव को रोकना और उस विराट् चेतना से तादात्म्य जोड़ देना और दिव्य आदान−प्रदान का मार्ग प्रशस्त करना। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं शक्ति है जिसकी अनुभूति अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आस्थाओं एवं भाव संवेदनाओं के रूप में की जा सकती है। आत्म साक्षात्कार– ब्रह्म साक्षात्कार का अर्थ है अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की–अनुदारता जैसी दुष्प्रवृत्तियों के भव बन्धन से छुटकारा मिल जाय। परिष्कृत चिन्तन की सुखद प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए ही उसे स्वर्ग कहा गया है। ललक और लिप्सा, निकृष्टता एवं कुसंस्कारिता के भव बन्धनों को तोड़ फेंकने की स्थिति मुक्ति कहलाती है। स्वर्ग, मुक्ति,के विस्तृत अलंकारिक आख्यायिकाओं में तथ्य इतना भर है कि परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ सम्बद्ध सेवा उदारता की नीति अपनाते हुए लोभ−मोह के पाश से मुक्त हो जाता है। इस योग दृष्टि का विकास परमात्मा से जुड़ने से ही सम्भव हो पाता है।
जीवन साधना में यों सभ्यता और संस्कृति दोनों का ही समावेश रहता है। पर उसमें संस्कृति को उद्गम और सभ्यता को प्रवाह कहा गया है। संस्कृति विचारणा, मान्यता, आस्था, निष्ठा में उत्कृष्टता के समावेश को कहते हैं। इसी पृष्ठभूमि की प्रेरणा से गतिविधियों का निर्धारण सम्भव होता है। शालीनता की पक्षधर जीवनचर्या को सभ्यता कहते हैं। सभ्य बन सकना उसी के लिए सम्भव है जो सुसंस्कृत हो। संस्कृति मनःसंस्थान में उगाई और बढ़ाई जाती है। सभ्यता अपनाने के लिए शरीर को सधाया जाता है। जंगली जानवरों को सरकस में कलाकारिता दिखाने के लिए जिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है उसी प्रकार साधनात्मक अनुशासन में जकड़कर अनपढ़ मनुष्य को सुगढ़, सुसंस्कृत बनाया जाता है। इसी प्रयास को सभ्यता संवर्धन कहते हैं।
संक्षेप में श्रद्धा आत्मिक, प्रज्ञा बौद्धिक और निष्ठा शारीरिक उत्कृष्टता का नाम है। श्रद्धा को ब्रह्म−चेतना, प्रज्ञा को संस्कृति और निष्ठा को सभ्यता के नाम से जानी जाने वाली त्रिविधि आदर्शवादिताओं का समन्वय ही मानवी गरिमा है। उन विभूतियों की मात्रा किनके पास कितनी है उसी आधार पर उन्हें अवतार, देवदूत, ऋषि, सिद्ध पुरुष, महामानव आदि नामों से पुकारते हैं। इन दैवी सम्पदाओं का जो जितना धनी है उसी आधार पर उसमें आत्मशक्ति की प्रखरता पाई जाती है और तद्नुरूप ही वह युग सृजन जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं गौरव गरिमा भरे काम कर सकने में समर्थ होता है।
बहादुरी के साथ श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए दुस्साहस भरे बलिदान करने वालों की यश गाथा चर्चा का विषय रहती है। किन्तु वे भी कम अभिनन्दनीय नहीं जो निष्ठापूर्वक सतत् सेवा मय जीवन जीते और सर्वसाधारण के लिए आदर्श उपस्थित करते हैं।
– बल्लभ भाई पटेल
आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने का तात्पर्य है−क्षुद्रता को महानता के साथ, कामना को भावना के साथ, स्वार्थ को परमार्थ के साथ बाँध देना−बदल देना और तद्नुसार बना देना। समर्पण इसी उच्चस्तरीय भूमिका का नाम है। दिलय−विसर्जन, समन्वय समापन शरणागति उसी के दूसरे पर्याय हैं। इस आरम्भ की पूर्णाहुति जीव और ब्रह्म के साथ पूर्ण एकता स्थापित होने से होती है। इसी स्थिति को अद्वैत कहते हैं।
चेतना के विराट् समुद्र में जीव बिन्दु का विसर्जित होना ‘सायुज्य’ है। यही परम पद की प्राप्ति है। व्यष्टि जीव सत्ता का समष्टि ब्राह्मी सत्ता में विसर्जित होना ही प्रभु समर्पित जीवन है। ईंधन आग की, नदी नाले की, दूध जल की, दीप पतंग की उपमा इसी स्थिति के लिए दी जाती हैं। व्यक्ति अपने स्वार्थ की परिधि से निकल जाता हैं−मन−मस्तिष्क में एकमात्र परमार्थ छाया रहता हैं। अहंता शरीर, परिवार तक सीमित न रहकर सोऽहम् शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् , तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म, शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि की स्थिति में पहुँच जाती हैं। ‘अपनी सत्ता सब में’ और ‘सब अपने में दृष्टिगोचर होने लगते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु की अनुभूति इसी स्तर पर पहुँचने में होती हैं। योग की सिद्धावस्था यही है, परमपद−जीवन मुक्ति इसी का नाम है। व्यक्ति की अपनी इच्छाएँ−आकाँक्षाएँ समाप्त हो जाँय, मात्र ईश्वरेच्छा ही रोम−रोम में समायी रहे यही है जीव ब्रह्म की एकता का लक्षण। दोनों के बीच शिकायत, उलाहना की, खींचतान की न कोई गुँजाइश है न कोई वास्तविक कारण। दोनों की एक भावना, एक कामना, एक योजना और एक दिशाधारा हो। यही है योग का परम लक्ष्य।
संक्षेप में चेतना के भावपक्ष को उच्चस्तरीय उत्कृष्टता के साथ एकात्म कर देने का नाम ही योग है। यह आस्थाओं एवं आकाँक्षाओं को परिष्कार है। अपनी भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को, लालसा और लिप्साओं को पैरों तले रौंदकर ईश्वरीय संकेतों और उच्चस्तरीय आदर्शों का अनुसरण करने का जो साहस जुटाते हैं, वही योगी है। योगी की मनोभूमि इसी प्रकार की होती है। वह शरीरगत तथा मनोगत वासनाओं,तृष्णाओं की उपेक्षा करता, उन्हें नगण्य, हेय और महानता के मार्ग में बाधक मानता है। तीनों ऐषणाओं से उसे सहज ही विरति हो जाती है। उसे कण−कण में परमेश्वर दिखाई पड़ता है−−लगता है–’विश्व उसकी साकार प्रतिमा है। हर किसी से प्रेम करने को जी करता है। इस प्रेम में ‘दुलार’और ‘सुधार’का सन्तुलित और समुचित समन्वय विवेक के आधार पर किया जाता है। व्यष्टि, समष्टि और प्रकृति के गतिचक्र को समझ लेने के करण उसे किसी प्रिय–अप्रिय स्थिति में असन्तुलन ग्रसित नहीं होना पड़ता हैं। कमल पत्रवत् स्थिति बनी रहती है। खिलाड़ी की तरह रंग−मंच पर अभिनय करने वाले नट की तरह वह अपने कर्त्तव्यों को तो पूरे करता है, पर हानि, लाभ, मान, अपमान का बोझ नहीं ओढ़ता। जब जीवन के रंग−मंच पर खेल ही खेलना है तो हर स्थिति में विनोद की मनःस्थिति क्यों न रखी जाय? योगी इसी तरह सोचने का अभ्यास करता है। ईश्वर के हाथों अपने जीवन की बागडोर सौंपकर वह निश्चिन्त रहता है। अपनी सारी क्षमता, सत्कर्मों, सद्विचारों एवं सद्भावों में नियोजित रखने वाला ही वस्तुतः सच्चा योगी है।
पेट और प्रजनन के सीमित प्रयोजन जीवन रूपी अमूल्य सम्पदा को खपा देने वाले नर कीटकों से सर्वथा भिन्न मनोभूमि वाले चरित्रवान, सन्मार्ग पर चलने का साहस रखने वाले, लोक−मंगल के लिए आत्म समर्पण करने वाले तत्वदर्शी, युगांतरकारी समर्थ व्यक्ति महामानव देवदूत, सिद्ध पुरुष, ऋषि, योगी, तपस्वी पतन−प्रवाह की ओर बहने वाली भीड़ से अलग ही दीख जाते हैं। धारा के चीरकर उल्टी दिशा में चल पड़ने का साहस आत्मबल का चमत्कार है। जन−मानस के परिष्कार और युग प्रवाह को पलट देने का कार्य उच्चकोटि की ऋद्धि−सिद्धि जैसा ही है। योगी इन विभूतियों से विराट् चेतना से संपर्क बना लेने के बाद सुसम्पन्न बन जाते हैं।
योग के तीन पक्ष हैं कर्मयोग, ज्ञानयोग भक्तियोग की तीन धाराएँ इस हिमालय से निकलती हैं। कर्मयोग का अर्थ है–लोक मंगल के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में पुरुषार्थ को नियोजित किए रहना। कर्मयोगी को यही करना होता है। क्रियाएँ निष्काम और ईश्वरीय अनुशासन एवं संकेतों के अनुरूप होती हैं तो वह कर्मयोग बन जाता है। जिसमें कर्मयोगी सक्रिय और तत्पर तो रहता है, पर होता है–सब कुछ ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए ही। वैचारिक क्षेत्र में चिन्तन एवं रुझान जब विराट् चेतना से जुड़ जाता है तो वह ज्ञानयोग हो जाता है। ज्ञानयोग अर्थात् परिष्कृत चिन्तन। दृष्टिकोण परिमार्जित होकर उदात्त बन जाय। उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों को उसमें समावेश हो। व्यक्तिवादी निकृष्टता से विरति एवं अरुचि हो जाय। भक्ति योग का अर्थ है अन्तःकरण की भाव सम्वेदनाएँ। परमात्मा से–विश्वात्मा से जुड़ जाना−एकाकार हो जाना। भक्तियोग के अनुयायी को यही करना होता है। इन विविध योगों में भाव परक आधार समर्पण के द्वारा ही बनता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सभी योगों की सफलता समर्पण योग के आधार पर ही बनती है। गीता में भगवान इसी तथ्य को विस्तारपूर्वक समझाते हुए अर्जुन से कहते हैं−”हे अर्जुन, अपने मन, बुद्धि और समस्त चेष्टाओं को समर्पित कर दे। इतने भर से तेरा विराट् चेतन शक्ति से है जो विश्व ब्रह्मांड में समायी हुई है।
मिलन होने पर अपनी अलग सत्ता नहीं रहती। बूँद जब समुद्र में मिलती है ते अपना स्वरूप स्वभाव सभी खो देती है और समुद्र तरंगों की तरह ही लहराने लगती है। चूँकि समुद्र खारा हैं इसलिए बूँद अपने में भी खारापन भर लेती है। कोई चिन्ह नहीं रहने देती जिससे उसका अस्तित्व अलग से पहचाना जा सके। ईश्वर से मिलने का अर्थ है−अपने आपके गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से ईश्वर जैसा बना लेना अथवा जो उसे हमसे अभीष्ट है करने लगना। पतिव्रता स्त्री अपने आचरण स्वभाव एवं क्रिया−कलाप को पति की इच्छानुरूप ढाल लेती है। इसके बिना दाम्पत्य−जीवन कैसा? मिलन का आनन्द कहाँ? समर्पण के आधार पर ही है द्वैत को अद्वैत के रूप में इच्छा बनाकर उसके संकेतों एवं निर्देशों को अपनी आकाँक्षा और क्रिया में जोड़ देना इसी का नाम समर्पण है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाने–नाक रगड़ने का नाम भक्त योग−प्रार्थना नहीं है। भक्तियोगी की एकमात्र पहचान यही है, जिसने अपनी आकाँक्षाओं, वासनाओं की बलि आपको चलने के लिए सहमत कर लिया हो। भक्ति की सच्चे उपासक की यही कसौटी है। वह भगवान को अपनी मर्जी के अनुसार चलाने के लिए विवश नहीं करता वरन् उसकी इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर अपनी विचार प्रणाली और कार्यपद्धति का पुनर्निर्धारण करता है। तब उसके सामने इस विश्व को अधिक श्रेष्ठ बनाने की−अधिक समुन्नत एवं सुन्दर बनाने की एकमात्र शेष रह जाती है। वह अपने आपको काया की तथा परिवार की संकीर्ण परिधि में आबद्ध नहीं करता वरन् सबमें अपनी आत्मा को समाया देखता और लोक–मंगल के लिए जीता है। वसुधैव कुटुम्बकम् के अनुरूप अपनेपन की परिधि को अतिव्यापक बना लेता है। तब उसे अपनी काया ईश्वर के देव मन्दिर जैसी दिखती है और अपनी सम्पदा ईश्वर की पवित्र धरोहर जैसी। जिसका उपयोग ईश्वरीय महान प्रयोजनों में किया जाता है। यह दृष्टि ही योग दृष्टि है और सम्बद्ध अनुभूति ईश्वर दर्शन। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट समझना हो तो यों कहना चाहिए कि स्वार्थपरता का परमार्थ में, व्यक्तिवाद का समूहवाद में, संकीर्णता का उदारता में निष्कृष्टता का उत्कृष्टता में विसर्जन ही समर्पण का वास्तविक उद्देश्य हैं। भक्तियोग में इसी समर्पण शरणागति की प्रधानता है।
मन पर मलीनता के आवरणों के कारण उस महान सत्ता से संपर्क नहीं जुड़ पाता दिव्य आदान−प्रदान का क्रम नहीं चल पाता। चले भी कैसे? आदान−प्रदान के लिए कुछ तो एकरूपता होनी चाहिए। विद्युत का प्रवाह तारों में बहता है−लड़की में नहीं। दैवीय चेतना का प्रवाह पवित्र अन्तःकरण में अवतरित होता है। विराट् से सम्बन्ध जुड़ने एवं अनुदान प्राप्त करने के लिए मन की निर्मलता आवश्यक है अन्यथा दैवी अनुदान अवतरित हों तो भी मलीनता के कषाय−कल्मषों के कारण उससे लाभ उठाना नहीं बन पड़ता। सूर्य का प्रकाश, ताप प्राप्त करने के लिए कम से कम कमरे की खिड़की तो खोलना पड़ता है। कोठरी छोड़कर धूप में बाहर निकलने जितना न्यूनतम पुरुषार्थ तो करना ही होगा। इतना भी न बन पड़ा तो सूर्य की गर्मी प्राप्त कर पाना कैसे सम्भव होगा? ईश्वर से जुड़कर उसके दिव्य अनुदानों का लाभ उठाना तभी शक्य है जब अन्तःकरण पवित्र और उदात्त हो–मन निर्मल हो। परमेश्वर को निर्मलता, पवित्रता प्रिय है। एकरूपता स्थापित करने के लिए आरम्भिक चरण मनोनिग्रह के लिए उठाना पड़ता है। ध्यान साधना के विविध उपचार इसी प्रयोजन के लिए करने होते हैं ताकि मन की वृत्तियाँ परिमार्जित−परिष्कृत हो जांय।
योग में ‘योग’ अभ्यास की प्रमुखता है। मेडीटेशन−एकाग्रता का बहुत माहात्म्य बताया गया है, उसका तात्पर्य यही है कि निकृष्टता के, लोभ−मोह और अहंता के जाल−जंजाल में जकड़े हुए मन को इन विडंबनाओं में भटकते रहने की आदत छोड़ने और निर्धारित लक्ष्य इष्टदेव के साथ तादात्म्य होने का अभ्यास करना।
इसमें मन की बिखराव की बाल बुद्धि छोड़ने और इष्टदेव से लेकर दिनचर्या के प्रत्येक क्रिया−कृत्य में तादात्म्य होने का अभ्यास करना भी है। न तो पूजा उपचार में बिखराव रहे और न दैनिक क्रिया−कृत्यों को बेगार भुगतने की तरह आधे−अधूरे मन से किया जाय।
क्रिया के साथ मनोयोग को घनिष्ठ कर देने की सफलता बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे अपनाने वाले भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में समान रूप से सफल होते है। ध्यान केवल किसी देवता का करते रहने और उसी की छवि में मन रमाये रहना मनोनिग्रह का एक स्वरूप तो है पर उतने भर से ही अभीष्ट सफलता नहीं समझी जानी चाहिए।
ऐसी एकाग्रता तो नट, बाजीगर, मुनीम, कलाकार, वैज्ञानिक भी अपने स्वभाव का अंग बना लेते हैं। मैस्मरेज्म प्रयोगों में तो यह एकाग्रता ही चमत्कार दिखाती है। इतने पर भी वे लोग आत्मिक दृष्टि से किसी भी प्रकार ऊँचे उठे हुए नहीं कहे जा सकते। किसी कल्पना पर ध्यान जमाये रहना, उस प्रयोजन के लिए एक उपचार भर है लक्ष्य यह है कि सर्वतोमुखी उत्कृष्टता के प्रति सघन श्रद्धा उत्पन्न करना, उसके माहात्म्यों का भाव−भरा चिन्तन करना और अपनी समूची चेतना को उसी में सराबोर कर देना।
व्यक्ति चेतना का विश्व चेतना से−आत्मा का परमात्मा से−घनिष्ठ तादात्म्य किस प्रकार स्थापित हो? दिव्य आदान−प्रदान कैसे आरम्भ हो? इसके लिए कितने ही प्रकार के साधनात्मक प्रयोग करने पड़ते हैं। ध्यान के माध्यम से एकाग्रता का अभ्यास करना होता है। एकाग्रता अर्थात् इष्ट के प्रति−उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति−निष्ठा उत्पन्न करने के लिए मन को प्रशिक्षित करना। योग ग्रन्थों में योग की परिभाषा “चित्त वृत्ति निरोधः” के रूप में की गई है अर्थात् चित्त की वृत्तियों को परिष्कृत, परिमार्जित कर ईश्वरीय प्रयोजनों में लगा देने का नाम योग हैं। महाचेतना से जुड़ने की प्रक्रिया में मन की प्रवृत्तियाँ−चित्त की वृत्तियाँ ही प्रधान बाधक हैं। अभ्यस्त ढर्रा ही मन को रुचता है। पतन की ओर उसका सहज झुकाव है। अनभ्यस्त को अभ्यस्त बनाने के लिए−चित्त की वृत्तियों को मोड़ना मरोड़ना होता है। यह कार्य अतिकठिन है। अचेतन में स्वभाव एवं अभिरुचियों के संस्कार जड़ जमाये रहते हैं। क्रिया एवं विचारणा उन्हीं के द्वारा अभिप्रेरित होती है। अधिकाँश व्यक्तियों की स्थिति पराधीनों जैसी होती है। अधिकाँश व्यक्तियों की स्थिति पराधीनों जैसी होती है। कुसंस्कारों को तोड़ना भौतिक माध्यमों से कठिन पड़ता है।
मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ एवं अनावश्यक उड़ानें उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है जो मनःसंस्थान की दिव्य क्षमताओं को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट−भ्रष्ट करती हैं। संसार में जिसने भी किसी क्षेत्र, किसी विषय विशेष में प्रवीणता, पारंगतता प्राप्त की है उन सभी को विचारों पर नियन्त्रण करने−उन्हें अनावश्यक चिन्तन से हटाकर उपयोग में नियोजित करने के लिए प्रयास करना पड़ा है। इसके बिना चंचलता की वानर वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, शिक्षा विज्ञान आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों के सफलता में एकाग्रता की शक्ति की ही प्रधान भूमिका होती है। चंचलता को असफलता की सगी बहिन माना जाता है।
आत्मिक प्रगति के लिए−उस महान शक्ति से सम्बन्ध−तादात्म्य स्थापित करने के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए ध्यान के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा किया जाता है। ध्यान में जिस एकाग्रता का प्रतिपादन किया गया है उसका लक्ष्य है−भौतिक जगत की कल्पनाओं से चित्त को−मन को विरत करने और उसे अंतर्जगत की क्रिया−प्रक्रिया में नियोजित कर देना। साँसारिक प्रयोजनों में मन न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि एकाग्रता का लक्ष्य पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में− साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या लेखक का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशाधारा में सीमित रहता है। इतने भर से एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। जबकि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रखना पड़ता है ओर कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है। तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता। अपनी निर्धारित परिधि में कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय−कितनी ही कल्पनाएँ−कितनी ही स्मृतियाँ−कितनी ही विवेचना क्यों न उभर रही हों, वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप नहीं उत्पन्न करेंगी। गड़बड़ी तो अप्रासंगिक चिन्तन से उत्पन्न होती है।
ध्यान के सम्बन्ध में एक भ्रान्ति यह बनी हुई है कि कितने ही व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं। दोनों में बड़ा भारी अन्तर है। एकाग्रता अभ्यास है ओर स्थिरता उसकी अन्तिम परिणति। आरम्भ में यह कठिन पड़ता है। स्थिरता को निर्विकल्प समाधि कहा गया है और एकाग्रता को सविकल्प। सविकल्प का अर्थ है–उस अवधि में आवश्यक विचारों का मनःक्षेत्र में काम करते रहना। निर्विकल्प से तात्पर्य है–एक केन्द्र बिन्दु पर सारा चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति में उत्पन्न हो जाना। जिस एकाग्रता की आवश्यकता ध्यान की सफलता के लिए बताई गई है वह मन की स्थिरता नहीं, चिन्तन की दिशाधारा है। ध्यान के समय चिन्तन आत्मा के स्वरूप, क्षेत्र एवं लक्ष्य को समझने में लगना चाहिए और भाव क्षेत्र में यह प्रतिष्ठापना करनी चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा को बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिल सके।
एकाग्रता के अभ्यास के लिए दो बातें आवश्यक हैं। इष्ट का निर्धारण और श्रद्धा का आरोपण। इष्ट के निर्धारण से अभिप्राय है−भगवान का एक स्वरूप निर्धारित करना। स्वरूप क्यों? जबकि वह स्वरूपातीत है? क्योंकि मनुष्य की बनावट ही ऐसी है कि वह सीधे निराकार को पकड़ नहीं पाता। उसके हृदय में निराकार सत्ता से प्रेम तादात्म्य नहीं उत्पन्न हो सकता। बिजली, गर्मी,ठण्ड, चुम्बक भी शक्ति की विविध धाराएँ हैं, पर इनसे कहाँ किसी के प्यार करने का जी करता है। प्यार के लिए प्रतीक माध्यम चाहिए। मस्तिष्कीय संरचना भी ऐसी है कि उसे सोचने चिन्तन को उत्कृष्टता की और मोड़ने के लिए प्रतीक आधार चाहिए। कथा, उपन्यासों में ऐसी बातों का समावेश होता है जो मनोरंजन के लिए आवश्यक हैं किन्तु फिर भी मनुष्य सिनेमा, नाटक, सर्कस देखने जाता है और उसके माध्यम से भले−बुरे प्रभावों को ग्रहण करता है। विचार कथाएँ और सम्बद्ध सिद्धान्तों का समावेश होते हुए भी उपन्यासों, कथाओं की पुस्तकों की तुलना में सिनेमा के चलचित्र कही अधिक लोकप्रिय बने हुए हैं। कारण एक ही है−−प्रतीकों के माध्यम से मनोरंजन अधिक हो जाता है। आरम्भ में निराकार विराट् चेतना से संपर्क साधने और प्रेम भावना उत्पन्न करने में मन को कठिनाई होती है। इष्ट कष्ट निर्धारण इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है। योगाभ्यास के आरम्भ में गुण परक इष्ट के निर्धारण को तत्वदर्शियों ने आवश्यक माना है। अपनी−अपनी अभिरुचि के अनुरूप विभिन्न देवी− देवी−देवताओं को इष्ट मानकर साधना आरम्भ की जाती है। अपने को मर्यादा में बाँधने के लिए भगवान राम की साकार प्रतिमा को हृदय में प्रतिष्ठापित करना होता है। पूर्णता के लक्ष्य को याद रखने तथा अवधारण करने के लिए पूर्ण पुरुष भगवान कृष्ण को प्रतीक बनाया जाता है। समर्पण की साकार प्रतिमा हनुमान माने जाते हैं। दुर्गा की प्रतिमा प्रखरता की प्रतीक मानी जाती है। इष्ट के रूप में गायत्री माता को− प्रज्ञा महाशक्ति को इसलिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है कि इसके साथ विवादास्पद कथानक नहीं जुड़े हुए है। सभी देवी−देवता के साथ अनेकों कथाएँ जुड़ी हुई हैं। जो इष्टदेव को सामान्य मनुष्यों जैसी सीमित परिधि में बाँधती हैं। जबकि इष्ट को कथानक से रहित विशुद्ध रूप से उच्चस्तरीय आदर्शों का प्रतीक प्रतिनिधि होना चाहिए। गायत्री−प्रज्ञा महाशक्ति कथानक रहित है। वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता, ऋतम्भरा आद्य शक्ति के रूप में गायत्री महाशक्ति का निरूपण किया गया है। आदिकाल से ही गायत्री योगाभ्यासियों की इष्ट रही है। ऋषियों से लेकर अवतारों तक ने इस महाशक्ति को ही इष्ट के रूप में वरण कर उसके दिव्य अनुदानों से लाभ उठाया है। ध्यान योगी इसी का पयपान कर अमृत आनन्द का लाभ लेते रहे हैं। इस महामन्त्र के साथ जुड़ी प्रेरणाओं में उन समस्त गुणों का समावेश है जो ध्यान में चिन्तन को परिष्कृत करने−उदात्त बनाने के लिए आवश्यक है।
युवा नारी के रूप में मातृ शक्ति को वरण करने से ‘मातृवत् परदारेषु’ की भावना का अपने आप विकास होता है, वही उसके गुणों−विशेषताओं पर चिंतन करते रहने और प्रज्ञा का अवलम्बन लेने से योग का कंटकाकीर्ण मार्ग सरल बन जाता है। इस मार्ग में मन का विक्षोभ एवं चिन्तन का भटकाव ही अधिक बाधक होता है। प्रज्ञा को वरण कर लेने से वह विवेक बुद्धि विकसित होती है जिसके कारण भटकाव रुकता है।
इष्ट निर्धारण ही पर्याप्त नहीं, एकाग्रता की उपलब्धि के लिए श्रद्धा का आरोपण भी उतना ही आवश्यक है। ध्यान कास यह प्राण है। इसके अभाव में सभी यौगिक उपचार मात्र स्थूल कर्मकाण्ड रह जाते हैं और कोई विशेष उपलब्धि नहीं हो पाती। कितने ही व्यक्ति ध्यान पूजा पाठ की लकीर पीटते रहते और जहाँ की तहाँ स्थिति में पड़े रहते हैं। जबकि उसी निर्धारित प्रक्रिया को अपनाकर कितने ही चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेते हैं। इन परिणामों के भारी अन्तर का कारण क्या है? उत्तर स्पष्ट है−एक ने अपनी सघन श्रद्धा को आरोपण किया और दूसरा स्थूल क्रिया−कृत्य की लकीर पीटता रहा। इष्ट को सर्व समर्थ सत्ता मानने और उसके गुणों के अवधारण से श्रद्धा का लक्ष्य पूरा हो जाता है। श्रद्धा अर्थात्−लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा। उच्चस्तरीय सिद्धांतों एवं आदर्शों के प्रति असीम प्यार। लघु को विभु, क्षुद्र को महान, नर को नारायण और पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने की प्राण ऊर्जा जहाँ से निस्सृत होती है, वह केन्द्र बिन्दु है–अन्तः का श्रद्धा क्षेत्र। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण में श्रद्धा और विश्वास को ‘भवानी शंकरौ’ के रूप में मानकर अभ्यर्थना की है। रामकृष्ण परमहंस की काली, मीरा के शालिग्राम पत्थर सजीव बनकर पग−पग पर चमत्कार दिखाते रहे और अपने अनुदानों से उन्हें परितृप्त करते रहे। ध्यान में एकाग्रता तभी उत्पन्न होती है जब इष्ट के प्रति श्रद्धा सघन एवं सुदृढ़ हो। किसी प्रकार के विक्षोभ उसे डगमगा न सकें। उथली श्रद्धा से किसी विशिष्ट उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।
इन दिनों लौकिक प्रचलन और तथाकथित अध्यात्म के आडम्बर दोनों ही दो और से–अन्तःकरण की उत्कृष्टता को गिराने वाले आक्रमण करते हैं। लौकिक प्रचलनों में स्वार्थपरता की निष्ठुरता और अपहरण की निर्दयता की चातुर्य माना गया है और इसी को अपना कर लोग अपना उल्टा सीधा करने में निरत हैं। पीछे कितना ही पश्चात्ताप करना पड़े और दण्ड भुगतना पड़े पर आक्रमण के पहले दौर में नफा मिलने की बात तो किसी रूप में बन ही जाती है।
यह आक्रमण का एक पथ हुआ। दूसरा वह है जिसमें देवता को प्रसन्न करने ओर मन्त्र−तन्त्र के सहारे ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त करने के स्वप्न संजोये जाते हैं और आत्म निर्माण की बात को एक प्रकार से पूरी तरह उपेक्षित कर दिया जाता है। पूजा उपचार की फल श्रुतियों से पाप दण्ड से निवृत्ति और बिना तप त्याग के ऐसे ही स्वर्ग मुक्ति झटक लेने के जो सब्ज बाग दिखाये गये हैं उससे नीतिमत्ता का पक्ष बेतरह कमजोर हुआ है। जब नदी सरोवरों के स्नान भर से पाप दण्डों से बचाव हो सकता है तो फिर कोई भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट कर्त्तृत्व के द्वारा मिलने वाले लाभों के क्यों छोड़े?
जब आत्मिकी के प्रतिपादित सत्परिणाम मात्र सस्ती टंट−घंटों से ही उपलब्ध हो सकते हैं तो फिर कोई आत्म−सुधार और आत्म−निर्माण की कष्ट साध्य प्रक्रिया से होकर क्यों गुजरें?
मानवी सत्ता में सन्निहित समझ को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक ‘बुद्धि’ जो शरीर यात्रा के काम आती है, तद्नुरूप चिन्तन, प्रयास एवं व्यवहार का ताना−बाना बुनती है। दूसरी वह है जो ईश्वरीय नियम मर्यादाओं में रस लेती है। क्षुद्र को महान के साथ एकीभूत बनाने के लिए उत्कृष्टता अपनाती और उच्चस्तरीय प्रगति के लिए साहस सँजोती है इसे ‘प्रज्ञा’ कहते है। बुद्धि दैत्य का–वैभव का समर्थन करती रहे और प्रज्ञा देव का समर्थन करती है। दिव्य के साथ तादात्म्य होने की उमंगों से भरी रहती है। बुद्धि का उपार्जन सम्पदा भर है। ललक लिप्सा की पूर्ति भर से उसका काम चल जाता है, किन्तु प्रज्ञा को विभूतियों से कम में चैन नहीं। विभूतियाँ अर्थात् श्रेष्ठता में रमण करने की सरसताएँ और उस मार्ग पर रास्ते में मिलने वाली परमार्थ प्रयोजनों में काम आने वाली सिद्धियाँ।
प्रज्ञा व्यक्तिगत जीवन को अनुप्राणित करती है, इसे ‘ऋतम्भरा’ अर्थात् श्रेष्ठ में ही रमण करने वाली कहते हैं। महाप्रज्ञा इस ब्रह्मांड में संव्याप्त है। उसे दूरदर्शिता विवेकशीलता, न्यायनिष्ठा, सद्भावना, उदारता के रूप में प्राणियों पर अनुकम्पा बरसाती और पदार्थों को गतिशील− सुव्यवस्थिति एवं सौंदर्ययुक्त बनाती देखा जा सकता है। परब्रह्म की वह धारा जो मात्र मनुष्य के काम आती एवं आगे बढ़ाने,ऊँचा उठाने की भूमिका निभाती है ‘महाप्रज्ञा’ है। ईश्वरीय अगणित विशेषताओं एवं क्षमताओं से प्राणि जगत एवं पदार्थ जगत उपकृत होते हैं, किन्तु मनुष्य को जिस आधार पर ऊर्ध्वगामी बनाने−परमलक्ष्य तक पहुँचने का अवसर मिलता है उसे महाप्रज्ञा ही समझा जाना चाहिए। इसका जितना अंश जिसे, जिस प्रकार भी उपलब्ध है जाता है वह उतने ही अंश में कृतकृत्य बनता है। मनुष्य में देवत्व का–दिव्य क्षमताओं का उदय उद्भव मात्र एक ही बात पर अवलम्बित है कि महाप्रज्ञा की अवधारणा उसके लिए कितनी मात्रा में सम्भव हो सके।
महाप्रज्ञा को अध्यात्म की भाषा में ‘गायत्री ‘ कहते हैं। इसके दो पक्ष हैं–एक दर्शन दूसरा व्यवहार। तत्वदर्शन अर्थात्–’अध्यात्म’। शालीनता युक्त आचरण अर्थात्–’धर्म’। आत्मिकी क्षेत्र पर ‘गायत्री’ का आधिपत्य है और भौतिकी का सूत्र−संचालन ‘सावित्री’ करती है। यह दोनों नाम एक ही दिव्य सत्ता के हैं। यह नाम भेद उनकी प्रयोग प्रक्रिया को देखकर किया गया। एक ही व्यक्ति को कुश्ती लड़ते समय पहलवान– प्रवचन करते समय विद्वान कहा जा सकता है। दो समयों पर दो नामों से सम्बोधन किये जाने पर भी वस्तुतः वह रहता एक ही है। महाप्रज्ञा है तो एक ही पर उसे श्रद्धा भक्ति के और पुण्य प्रयोजनों में अपनी भूमिका अलग−अलग ढंग से निभाते हुए भी देखा जा सकता है। बिजली कभी हीटर जलाकर गर्मी पैदा करती है और कभी रेफ्रिजरेटर के माध्यम से बर्फ जमाती है। यह एक ही शक्ति की दो प्रक्रिया मात्र हैं। गायत्री की–महाप्रज्ञा की परिणति अन्तःक्षेत्र में–दिव्य लोक में–विभूतियों की तरह और भौतिक क्षेत्र में–लोक −व्यवहार को ‘ऋद्धि’ एवं ‘सिद्धि’ भी कहते हैं।
महाप्रज्ञा असंख्य समर्थताओं की जन्मदात्री है, गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। इसके तीन चरण−सत्, चित्, आनन्द के नाम से जाने जाते हैं। उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती का त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। देव प्रतिपादन में इन्हीं का ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सरस्वती, लक्ष्मी, काली के नाम से अलंकारिक उल्लेख होता है। तत्वदर्शी इन्हीं त्रिविधि प्रवाहों को सद्−रज−तम की संज्ञा देते और समग्र सृष्टि का आधार भूत कारण मानते हैं। गायत्री को वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता कहा गया है। (1)वेद अर्थात्−−दिव्यज्ञान। वेदमाता अर्थात्−−दिव्यज्ञान की अधिष्ठात्री। (2)देव अर्थात् पवित्र और प्रखर। देवमाता अर्थात् अपने अंचल में बैठने वाले की सत्ता को देवोपम बना देने वाली। (3) विश्व अर्थात् विराट्। विश्वमाता अर्थात् अनेकता को एकता में, बिखराव का केन्द्रीकरण में समेटने वाली− वसुधैव कुटुम्बकम् के आधार पर आत्मीयता को व्यापक बनाने वाली। इस त्रिवेणी में मनुष्य की आस्था, विचारणा एवं प्रवृत्ति को−समग्र चेतना को−स्नान करने का अवसर मिलता है तो स्थिति काया−कल्प जैसी बन जाती है। इन त्रिविधि अनुदानों की प्राप्ति के लिए भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग की पुण्य प्रक्रिया का सुविस्तृत साधना तन्त्र खड़ा किया गया हैं। इन्हीं के सहारे कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर को परिष्कृत किया जाता है।
देव संस्कृति का भाव पक्ष ब्रह्म विद्या कहलाती है। ब्रह्म विद्या का विवेचन आर्ष वाङ्मय में हुआ हैं। आप्त वचनों में उसी की चर्चा होती है। वेद, उपनिषद्, दर्शन, आरण्यक, ब्राह्मण, सूत्र पुराण आदि, आदि के रूप में जितना भी शास्त्र विवेचन है उसे ब्रह्म विद्या की व्याख्या विवेचना कह सकते हैं। इस सारे विस्तार में महाप्रज्ञा गायत्री का ही विभिन्न स्तरों पर प्रकाश डाला गया है। भगवान के अवतार 24 हुए हैं। यह गायत्री के चौबीस अक्षरों में सन्निहित रहस्यों का−−−एक−एक करके−−एक−एक प्रयोजन के लिए किया गया रहस्योद्घाटन ही समझा जा सकता है। एक ही तथ्य को मानवी संरचना एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया गया यह विवेचन भी है जिसे ब्रह्म विद्या के अंतर्गत माना गया विशालकाय शास्त्रीय निर्धारण कहा जा सकता है। एक शब्द में इस समस्त परिवार को गायत्री का तत्व दर्शन भी कह सकते हैं। इस प्रतिपादन में वह समूचा निर्धारण विद्यमान है जो मनुष्य को उच्चस्तरीय प्रगति के मार्ग पर चलते हुए अभीष्ट अनिवार्य होता है
ज्ञान और कर्म का युग्म है। सिद्धांत और अभ्यास के समन्वय में ही किसी तथ्य को हृदयंगम करना, स्वभाव व्यवहार में उतारना शक्य होता है। ज्ञान का दूसरा पक्ष विज्ञान है। ज्ञान अर्थात् आस्था, विज्ञान अर्थात् पराक्रम। दोनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती है। बिजली के ऋण और धन प्रवाहों के समन्वय से ही ‘करेंट’ (विद्युतीय प्रवाह ) उत्पन्न होता है। महाप्रज्ञा का ब्रह्मविद्या पक्ष अन्तःकरण को उच्चस्तरीय आस्थाओं से आनन्द विभोर करने के काम आता है। दूसरा पक्ष साधना है, जिसे विज्ञान या पराक्रम कह सकते हैं, इसके अंतर्गत आस्था को उछाला और परिपुष्ट किया जाता है। मात्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। कर्म के आधार पर उसे संस्कार, स्वभाव,अभ्यास के स्तर तक पहुँचाना होता है। साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में−−निर्धारण की−−अभ्यास की−−स्थिति में पहुँचाना है। इसलिये परमहंसों, तत्व ज्ञानियों एवं जीवनमुक्तों को भी साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।
चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने की प्रक्रिया योग से और आदतों को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता के क्षेत्र में उछाल देने की आवश्यकता ‘तप’ के सहारे सम्पन्न की जाती है। प्रवाह को मोड़ने−मरोड़ने के लिए इससे कम में बात बनती ही नहीं। मान्यताएँ और आदतें बड़ी ढीठ होती हैं। समझाने−बुझाने से वे औचित्य के सामने हतप्रभ तो हो जाती हैं पर अपनी स्थिति बदलने को तैयार नहीं होतीं। तर्क में हार जाने पर ऊपरी मन से स्वीकार करना एक बात है और इस आधार पर अपने स्वभाव−व्यवहार में परिवर्तन कर लेना दूसरी। तर्क प्रमाणों से काम चल गया होता तो स्वाध्याय, सत्संग की प्रचलित प्रक्रिया ने ही लोक−मानस का काया−कल्प कर दिया होता। लेखनी वाणी से ही अवाँछनीयता का प्रवाह कब का उलट दिया गया होता। किन्तु यथार्थता दूसरी ही है। गुण−कर्म−स्वभाव की–मान्यता और आदत के रूप में अन्तरंग की जैसी भी संरचना बन गई होती है उसे रास्ता बदलने के लिए तत्पर कर लेना टेढ़ी खीर है। सदाशयता का ढोल बजाने वाले दुष्ट प्रयोजनों में निरत देखे गये हैं। कारण एक ही है–हठी अन्तराल–अभ्यस्त आदतों को बदलने के लिए जितने दबाव की जरूरत थी उतना दबोचा नहीं गया। अनुपयोगी को गलाने और उपयोगी को ढालने के लिए ऊँचे तापमान की भट्टी जलानी पड़ती है। इससे कम में−−मात्र उलट−पुलट करने भर से अशुद्ध धातुओं का परिशोधन कहाँ बन पड़ता है? हठी अन्तराल को उत्कृष्टता की दिशा में उछालने के लिए योग और तप का साधना क्रम अपनाये बिना काम नहीं चलता।
ऊपर से नीचे को घसीट लेने के लिए तो पृथ्वी की प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण शक्ति बिना किसी प्रयत्न के सदा सर्वत्र विद्यमान रहती है। पानी को गिराते ही नीचे की ओर बहने लगती है। किन्तु ऊपर चढ़ने−चढ़ाने के लिए नये साधन जुटाने पड़ते हैं और उछालने में लगने वाली शक्ति जुटाने का प्रबन्ध करना होता है। अन्यथा उठने, उभरने, उछलने की बात कल्पना मात्र ही बनी रहेगी। कथा, प्रवचन सुनना, पूजा पाठ करना अपने स्थान पर सही है और उसका सीमित लाभ भी होता है किन्तु व्यक्तित्व के अन्तरंग एवं बहिरंग को यदि निकृष्टता से विरत करने और उत्कृष्टता को साथ जोड़ने का कायाकल्प करना हो तो उस प्रत्यावर्तन के लिये साधना की ऊर्जा अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ेगी। इसी प्रयोजन के लिये योग तप की उभयपक्षीय साधना करनी पड़ती है। योग से विचारणा पर और तप से आदतों पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।
महाप्रज्ञा की साधना में कोई प्रकार के उपचार कृत्यों की–कर्मकाण्ड की–साधना विधानों की आवश्यकता पड़ती है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति और परिस्थिति को–ध्यान में रखते हुए साधनाओं का निर्धारण तो पृथक−पृथक ही होता है, पर सिद्धान्त एक ही रहता है। चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु−प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल−युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए। रोग से पीछा छूटना आवश्यक तो है किन्तु पर्याप्त नहीं। चिकित्सा उपचार की ही तरह व्यायाम, पौष्टिक आहार, उपयुक्त जलवायु का प्रबन्ध भी स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए करना पड़ता है। चिकित्सा और परिचर्या दोनों ही आवश्यक हैं। योग धारणा में उन आस्थाओं को हृदयंगम किया और अन्तराल में जमाया जाता है जो आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक होती हैं।
योग मन को उलटता–मरोड़ता है। गलाई ढलाई के लिए आवश्यक श्रद्धा साहसिकता का–तप का भी उद्देश्य तो यही है। किन्तु कार्यक्षेत्र एवं विधि−विधान में पृथकता है। तप का क्षेत्र शरीर है। शरीर पर आदतें प्रवृत्तियाँ छाई रहती हैं। विलासिता, सुविधा की माँग इन्द्रियाँ करती रहती हैं। मन पर तृष्णा और अहंता का ललक छाई रहती है। लोभ, मोह और बड़प्पन का रुचिकर विषय है। शरीर को इन्द्रियजन्य अनेकानेक भोग उपभोगों के जायके चाहिए। इन समस्त ललक लिप्साओं के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर देना–हठपूर्वक पूर्वाभ्यासों का प्रतिरोध परित्याग करना तपश्चर्या का आधारभूत प्रयोजन है।
योग के क्षेत्र में स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मन के चार व्यावहारिक और जप,ध्यान,प्राणायाम, मुद्रा बन्ध, नाद, लय आदि कितनी ही प्रक्रियाएँ बताई, अपनायी जाती हैं। तप में अस्वाद, उपवास, ब्रह्मचर्य, शरीर सेवा में आत्म−निर्भर, भूमि शयन, ऋतु प्रभावों का सहन, मौन आदि ऐसे क्रिया−कृत्य आते हैं जिनमें शरीर को यह अनुभव करना पड़े कि उसे उच्चस्तरीय प्रगति का अभ्यास करना पड़ रहा है। आदतों का–आकाँक्षाओं का प्रतिरोध करने में स्वभावतः अनख लगता और कष्ट होता है। इसके अतिरिक्त आदर्शवादिता अपनाते ही अवाँछनीयता व्यंग्य, उपहास, असहयोग, विरोध करने पर उतरती है और चिढ़कर हानि भी पहुँचती हैं। महानता के मार्ग पर चलने वालों को कदम बढ़ाने से पूर्व इस सम्भावना को ध्यान में रखना चाहिए और उसकी पूर्व जानकारी एवं तैयारी रहने के रूप में विभिन्न प्रकार की तितिक्षाएं करते रहने की विधि व्यवस्था अपनानी चाहिए।
इस विश्व ब्रह्माण्ड की अजस्र शक्ति और सम्पदाओं में से जीवात्मा के हिस्से में जो सर्वोपरि उपहार आता है उस वैभव को मनुष्य जीवन कहा जा सकता है। दृष्टि पसार कर देखने पर प्राणी के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कुछ हो ही नहीं सकती। अन्य जीवधारियों को जो काय−कलेवर मिला है उससे प्रकृति की इच्छा ही पूरी होती है। आत्मा या परमात्मा को कोई प्रसन्नता या सम्भावना की आशा नहीं रहती। क्योंकि उन शरीरों की क्षमता मात्र इतनी ही है कि निर्धारित आयुष्य को पूरा करने के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति भर करते रह सकें।
शरीर के लिए आहार–आहार के लिए श्रम–श्रम की प्रेरणा भूख से। यह प्राणि−जगत की हलचलों का एक प्रयोजन है। दूसरा है–वंश रक्षा। प्रकृति चाहती है–धरती प्राणियों से रहित न रहे। मरण की तरह जन्म की प्रक्रिया भी चलती रहे। इस कट−साध्य कार्य का दबाव पड़ता है। इस व्यर्थ के कष्टकर झंझट को कोई क्यों वहन करे। इस उलझन को सुलझाने के लिए मनःक्षेत्र में एक ऐसी उमंग उत्पन्न की गई जिससे प्रेरित होकर प्राणी यौन−कर्म की ओर आकर्षित हो और परिवार बढ़ाये। यही है दो प्रयोजन जिनमें हर वर्ग और स्तर के प्राणी निरत पाये जाते हैं। इन्हीं दो उपक्रमों में उनकी जीवनचर्या घड़ी के पेण्डुलम की तरह झूले−झूलती रहती है। इन दोनों प्रयोजनों के लिए हर प्राणी में सामर्थ्य एवं कुशलता है। न इससे कम न अधिक।
मनुष्य जीवन इस सामान्य की तुलना में कहीं अधिक असामान्य है। उसे ऐसी काय−संरचना तथा बुद्धि सम्पदा उपलब्ध है जिनके सहारे वह आगे की सोच सकता है और ऊँचा उठ सकता है। काया की संरचना भी ऐसी है जिसे न केवल असामान्य प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जा सके वरन् कला−कौशल के ऐसे भाव−संवेदना भी हस्तगत कर सके जिसमें अन्तःकरण प्रफुल्लता से भर सके। अपना बहुमुखी हित साधन हो सके और उपलब्धियों का लाभ असंख्यों को वितरण करके कृत−कृत्य हो सके।
मनुष्य ही है जिसने भाव−सम्वेदना, विचारणा एवं निर्धारण की क्षमता को सुसंस्कृत सुनियोजित बनाकर अपनी आन्तरिक गरिमा को उच्चस्तरीय बनाया है। महामानव से लेकर नर−नारायण बन सकने जैसी विभूतियों को करतलगत किया है। प्रसुप्त क्षमताओं को जाना, उभारा और लाभ उठाया है। शरीर की इन्द्रिय तृप्ति सर्वविदित है, किन्तु मनुष्य ही है जिसने भाव−सम्वेदना को परिष्कृत करके संतोष, आनन्द, उत्साह, उमंग जैसी अदृश्य भाव−सम्वेदनाओं से अपने उपलब्धियाँ हैं। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का आनन्द वही लेता है। श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा के कारण अवसर उसी को मिला है। जबकि अन्यान्य प्राणी मात्र पेट प्रजनन के निमित्त कुछ करने और कुछ पाने का ही उथला−सा आनन्द ले सके।
मनुष्य ही है जिसने प्रकृति को मथ डाला और उसके अन्तराल में गहरी डुबकी लगाकर रहस्यमयी रत्न−राशि पर कब्जा जमाया। प्रकृति ने हर प्राणी को उसके निर्वाह भर के अनुदान दिये हैं। शेष को किन्हीं अविज्ञात प्रयोजनों के लिए अपनी रहस्य भरी तिजोरी में सात तालों के भीतर छिपा रखा है। मनुष्य ने चाबी ढूँढ़ी और रहस्य भरे वैभव का भारी मात्रा में माल असवाय अपने कब्जे में कर लिया। अभी भी उसका प्रयास समूची सम्पदा हस्तगत करके सृष्टा न सही अधिष्ठाता–अधिकारी कहाने का श्रेय तो प्राप्त कर ही ले। पौराणिक युग के रावण, वृत्तासुर, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, मारीच, सहस्रार्जुन आदि आज के मनुष्य की तुलना में बहुत पीछे रह गये हैं।
यह हैं मानवी उपलब्धियां। आत्मिक क्षेत्र का उसे बृहस्पति और भौतिक क्षेत्र का शुक्राचार्य दोनों का समन्वय कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। यह उस विश्वमानव का समष्टि मानव का स्वरूप है जिसकी उपलब्धियों की मुक्त कण्ठ से सराहना करनी पड़ेगी। यों उसका एक विनाशकारी पक्ष भी है जिसमें उपलब्धियों के दुरुपयोग की दुःखद दुर्घटना भी सम्मिलित है। ऐसी दुर्घटना जिसके कारण यह स्वयं पिछड़ी, पतित और कष्टकर स्थिति में फँसा और समूचा वातावरण विषाक्त बनाकर रख दिया। अवाँछनीय आकांक्षा और आदतों को अपनाकर जिस दुर्गति का वरण किया है उसे देखते हुए कई बार आश्चर्य होता है कि क्या यही मनुष्य है जिसने आत्मिक विभूतियों और भौतिक सिद्धियों का आश्चर्यजनक वैभव अर्जित करने में सफलता पाई।
ऊपर की पंक्ति यों में जो कुछ भी ऊहापोह किया जा रहा वह मनुष्य जीवन की समर्थता एवं सम्भावना की एक उथली−सी झाँकी है। मनुष्य जन्म सचमुच ही इतना बड़ा दैवी उपहार है जिसकी तुलना में अधिक मूल्यवान् इस समूचे संसार में और कुछ मिल सकना कठिन है। मानवी सत्ता की वरिष्ठता को खोजने में यदि बढ़ते ही चला जाय तो यहाँ पहुँचना पड़ेगा जहाँ उसने ईश्वर की–भौतिकी−आत्मिक की–शिक्षा, चिकित्सा की तथा और भी न जाने किस−किस की सृष्टि की है। ब्रह्माण्ड का सृष्टा तो परमात्मा ही है, पर इस सृष्टि में जो कुछ भी शोभा−सज्जा, प्रगति एवं प्रसन्नता दिखाई पड़ती है, उसे प्रकारांतर से मनुष्य का ही अर्जन, उपार्जन कहना चाहिए। इस सबका श्रेय मनुष्य के सर्वसमर्थ जीवन को है। उसकी अनन्त सम्भावनाओं में से अभी कुछ ही चरितार्थ हुई हैं, जिनका प्रकटीकरण शेष है उनकी तो कल्पना करने भर से रोमाँच हो उठता है।
असमंजस इस बात का है कि इन दिनों ऐसी दुर्गति का सामना करना पड़ रहा है जिसमें उसका शरीर दुर्बलता, रुग्णता से ग्रसित होकर आमतौर से अकाल मृत्यु का वरण करता है। मानसिक दृष्टि से तनाव, असन्तोष, खीज, भय, आशंका, चिन्ता, आक्रोश, जैसा उद्विग्नताओं के कढ़ाव में उबलता रहता है। जिस अद्भुत मनःसंस्थान से हर घड़ी प्रसन्नता प्रफुल्लता झरती रहनी चाहिए, उस पर श्मशान जैसी वीभत्स जुगुप्सा छाई रहे तो उसे दुर्भाग्य−दुर्विपाक ही कहना चाहिए। अन्य प्राणियों की तुलना में निर्वाह स्वल्प एवं सरल, उपार्जन की क्षमता अत्यधिक–इस स्थिति में उसे साधनों के सम्बन्ध में हर घड़ी प्रसन्न सन्तुष्ट रहना चाहिए। इतने पर भी यदि आर्थिक तंगी छाई रहे, दरिद्रता और कंगाली का अभिशाप लदा रहे तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं भयानक गलती हो रही है। पारिवारिक जीवन को धरती का स्वर्ग और भाव−सम्वेदनाओं से भरा−पूरा नन्दन वन कहा गया है। उसमें रहने व्यक्ति को हर घड़ी मनोमालिन्य, असन्तोष, असहयोग का सामना करना पड़े–विरोध−विग्रह बना रहे और भटियारों की सराय जैसा–कैदखाने जैसा वातावरण बना रहे तो समझना चाहिए कि परिवार तन्त्र की गरिमा, उपयोगिता, व्यवस्था एवं आचार संहिता समझी समझाई ही नहीं गई। अन्यथा हर घर−घरौंदे में स्नेह−सहयोग का वातावरण होता और गरीबी में भी अमीरी से बढ़कर प्रसन्नता का रसास्वादन उस समुदाय का हर सदस्य करता रहता।
कहाँ तो मनुष्य की विशिष्टता, वरिष्ठता और कहाँ पशु−पक्षियों से भी बीती हेय−हीनता। आखिर या आकाश, पाताल जैसा अभ्यन्तर बना कैसे? आया कहाँ से? लद पड़ा क्यों कर? इन अनबूझ पहेलियों को सुलझाते−सुलझाते, ओर−छोर ढूंढ़ते–ढूंढ़ते वहाँ पहुँचना पड़ता है,जहाँ विडम्बना के उद्गम केन्द्र को जाना−पहचाना जा सके। असमंजसों की जन्मदात्री है–मानवी की गरिमा के प्रति छाई हुई अनभिज्ञता। इस विभूति का सही मूल्याँकन न कर सकने और उसके सदुपयोग से अपरिचित होने की मूढ़ता।
समर्थता से –सम्पन्नता से लाभान्वित होने की बात तभी बनती है जब उसकी उपयोगिता समझी जा सके। साथ ही विभूतियों का सदुपयोग करा सकने वाली दूर−दर्शिता उभरे, अन्यथा सामर्थ्य दुधारी तलवार है। वह जहाँ सुरक्षा का उद्देश्य पूरा करती है, आततायी आक्रमणों को रोकती है, वह वहाँ उलटकर आत्मघात का भी निमित्त कारण बनती है। ईश्वर प्रदत्त सर्वोपरि अनुकम्पा की प्रतीक जीवन−सम्पदा है। इससे बढ़कर जीव को देने योग्य ईश्वर के खजाने में कोई रत्न−राशि है नहीं। साथ ही यह भी निश्चित है कि सर्वसमर्थ उपादान प्राप्त करने के उपरान्त और कोई आवश्यकता रह भी नहीं जाती।
प्रश्न सदुपयोग कर सकने की क्षमता का है। वह न बन पड़े तो हर महत्वपूर्ण व्यक्ति पर उलट कर उतनी ही घातक भी सिद्ध होती है। आग, बिजली, बारूद, औषधि, अस्त्र की तरह ही वैभव की भी गरिमा माननी पड़ती है, किन्तु सर्वविदित है कि यदि इनका दुरुपयोग होने लगे तो कोई व्यक्ति देखते−देखते अपना और अपने परिवार का सर्वनाश कर सकता है। विभूतियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उनसे भी अधिक उस विवेक बुद्धि की गरिमा है जो उनके सदुपयोग की पृष्ठभूमि बनाती, व्यवस्था जुटाती और अग्रगमन की साहसिक मनोभूमि उत्पन्न करती है। यह न समझना चाहिए उपलब्धियाँ उलटकर विपत्ति ही बनेंगी।
ऐसी स्थिति में तो अभावग्रस्त ही नफे में रहते हैं। ये स्वल्प से गुजरा तो करते हैं, पर साथ ही किसी विपत्ति में तो नहीं फँसते। पशु−पक्षी किसी प्रकार दिन काटने जितनी सुविधा ही प्राप्त कर सके हैं, किन्तु उतने भर से ही चैन की जिन्दगी जी लेते हैं। चहकते, फुदकते, उठते हैं–उछलते−फुदकते दिन बिताते हैं और दिन छिपते ही पैर फैला कर सोते हैं। मनुष्य जितना खिन्न उद्विग्न, है उनमें से एक भी देखा जाता। फिर विभूतियाँ पाने का लाभ क्या हुआ? अपने को, संबंधियों को जलाते−कुढ़ाते जी लेने और अन्त में पापी की गठरी सिर पर लाद कर अँधेरे भविष्य की ओर चल पड़ने में क्या कुछ हाथ लगा? जिस सौभाग्य पर समस्त प्राणि जगत ईर्ष्या कर सकता है उसे भवसागर के नाम से जानी जाने वाली सड़ी−कीचड़ में धँसे−फँसे रहकर उजाड़ देने को क्या कहा जाय? दुर्भाग्य इसलिए कहते नहीं बन पड़ता कि जीवन ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है। ऐसा उपहार जिसके लिए प्राणि जगत का प्रत्येक सदस्य लालायित रहता है। सौभाग्य कह सकना इसलिए कठिन है उससे न अपना भला हुआ और न किसी अन्य ने सुख पाया सराहा।
इस विसंगति भरी विपन्नता−विडम्बना का कारण क्या हो सकता है, जिसके कारण उपलब्ध−सौभाग्य−दुर्भाग्य की तरह भारभूत रहता और कष्टकारक सिद्ध होता है। जबकि इतने ही साधन के सहारे असंख्यों को भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र की महान उपलब्धियाँ करतलगत करने का श्रेय सौभाग्य मिलता है।
परिस्थितियों और सुविधाओं की न्यूनता−प्रतिकूलता को आमतौर से प्रगति पथ का व्यवधान कहा जाता है, किन्तु वस्तुतः जैसा कुछ है नहीं। इतिहास साक्षी है कि अभावग्रस्त गई गुजरी परिस्थितियों में जन्मे पले व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजनों की दिशा में बढ़े और व्यवधानों को चीरते हुए सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। मोटी बुद्धि कुछ भी समझती रहे, दुनिया कुछ भी कहती रहे पर यह तथ्य अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों को बनाती सुधारती है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता इसी कारण है कि वह अपने दृष्टिकोण–स्वभाव एवं पराक्रम को उपयोगी बनाकर व्यक्तित्व की प्रचण्ड सृजनात्मक शक्ति का प्रमाण परिचय दे सकता है।
मनुष्य की उपलब्धियाँ महान हैं, पर भ्रांतियां, अवाँछनीयताएँ भी इतनी हैं जिन्हें किसी अभिशाप जैसी कहा जाना चाहिए। अभिशापों में सबसे दुरूह सबसे दुस्तर–सबसे कष्टकारक है जीवन की गरिमा न समझ पाना और उसका स्तर उभारने के सम्बन्ध में अन्यमनस्क रहता। इस एक गलती को सुधारा जा सके और किसी प्रकार यह हृदयंगम कराया जा सके कि “लोक−प्रचलन एवं अभ्यस्त ढर्रा जीवन सम्पदा के सदुपयोग में सहायक नहीं है। उसका नये सिरे से पर्यवेक्षण एवं निर्धारण की आवश्यकता समझी जानी चाहिए” तो समझना चाहिए कि व्यक्ति और समाज को संत्रस्त करने वाली समस्याओं में से आधी को अनायास ही सुलझाने का सूत्र हस्तगत हो गया।
उपेक्षा बरतने से कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, परिवार आदि सभी क्षेत्रों में घाटा सहना पड़ता है। जीवन की उपयोगिता−क्षमता−सम्भावना एवं सही प्रयोग प्रक्रिया के प्रति उपेक्षा भी ऐसी कष्टकारक है जिसे दूसरे शब्दों में अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने या आत्म−हत्या करने जैसी स्वनिर्मित विपत्ति कहा जा सकता है। सर्वत्र फैले हुए पिछड़ेपन के कारणों में यों गिनाया तो बहुत कुछ जा सकता है पर उनमें प्रमुख एक ही है–जीवन के प्रति अज्ञान अथवा उपेक्षा भाव। इस अवरोध को हटाया जा सके तो मानवी क्षमता को सही दिशाधारा मिल सकती है इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि इस संसार में कहीं कोई कमी, समस्या या विपत्ति-विभीषिका शेष न रहेगी।
मनुष्य क्या है? इसका सही उत्तर दिया जा सकना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि वह एक समूची विचित्रता है। उसे भानुमती का पिटारा कह सकते हैं। जितने दृष्टिकोणों से देखा जाय उन सभी के अनुसार वह पूर्ण प्रतीत होता है। रासायनिक संरचना, ज्ञान तन्तुओं का जाल−जंजाल अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ, मनःसंस्थान, भाव समुच्चय, आदि को प्रधानता देने से भी बात बन जाती है और उसके अंतर्गत जुड़ी हुई विशेषताओं को गौण या सहायक सिद्ध किया जा सकता है।
मनुष्य अविनाशी आत्मा भी है और चलता−फिरता मरणशील पेड़ पादप भी। वह किसी का शत्रु, किसी का मित्र, किसी का ग्राहक, किसी का स्वामी, किसी का दास हो सकता है। विभिन्न सम्बन्धी–नातेदार उसे अपनी−अपनी स्थिति के अनुरूप विभिन्न रिश्तों में बाँधते हैं। किन्हीं के दृष्टिकोण में वह विद्वान, पहलवान, कलाकार हो सकता है और कोई उसके दोष−दुर्गुणों को देखते हुए आलसी, व्यसनी आँशिक रूप से ही सही हैं–समग्र रूप से नहीं। जिसने जैसा सोचा या देखा है, वह उसे उसी रूप में प्रतीत होगा। कोई भी एक व्यक्ति किसी दूसरे को समग्र रूप से जानने में समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि हर किसी की दृष्टि एक ढाँचे में ढली और एक सीमा में ही पर्यवेक्षण कर सकने में समर्थ हो सकती है।
मनुष्य क्या है? इसका उत्तर देना ही हो तो प्रश्नकर्ता से उलटकर पूछना चाहिए, मनुष्य क्या नहीं है? अर्थात् बीज रूप में उसमें वे सभी तथ्य, पदार्थ, वैभव, पराक्रम विद्यमान हैं जो इस संसार के जड़ पदार्थों तथा चेतन प्राणियों में कहीं भी देखे पाये जा सकते हैं।
एक पर्यवेक्षण के अनुसार मनुष्य एक चलता−फिरता चुम्बक है। उसकी कायसंरचना को एक अच्छा−खासा बिजली घर कह सकते हैं जिससे उसकी अपनी मशीन चलती और जिन्दगी की गुजर–बसर होती है। इसके अतिरिक्त वह दूसरों को प्रकाशित करने से लेकर भले−बुरे अनुदान दे सकने में भी भली प्रकार सफल होता रहता है। चुम्बक होने के नाते वह जहाँ प्रभावित करता है वहाँ स्वयं भी अन्यान्यों से आकर्षित किया, और दबाया घसीटा जाता रहता है।
मनुष्य चुम्बक का स्रोत ढूंढ़ने वालों ने अभी इतना ही जाना है कि वह पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से यह अनुदान उसी प्रकार प्राप्त करता है जैसे कि धरती सूर्य से। इस ऊर्जा की मात्रा में न्यूनाधिकता होने तथा सदुपयोग−दुरुपयोग करने से मनुष्य आयेदिन लाभ−हानि उठाता रहता है। अच्छा हो इस सम्बन्ध में अधिक जाना जाय और सफलतापूर्वक हानि से बचने तथा लाभ उठाने में तत्पर रहा जाय।
मनुष्य का मैग्नेट घटता−बढ़ता रहता है। किसी के चेहरे पर निराशा छायी रहती है, कोई खुशहाली से भय दिखाई पड़ता है। किसी की आँखों में विशेष आकर्षण मालूम होता है और किसी की आँखों में दीनता−हीनता की झलक दृष्टिगोचर होती है। किसी व्यक्ति के पास बैठने– संपर्क बढ़ाने की अनायास ही इच्छा होती है और किसी से दूर रहने, बात न करने तक का जी होता है। यह मानवी चुम्बकत्व की अधिकता एवं अल्पता के कारण ही होता है। जब शारीरिक चुम्बकत्व का ह्रास होने लगता है तो शरीर रूखा, नीरस, कुरूप, निस्तेज, शिथिल-सा दिखाई पड़ने लगता है और इसके आधिक्य से आकर्षक, मोहक एवं सुन्दर लगने लगता है।
चुम्बकत्व घटने में मनुष्य को विस्मृति, भ्रान्ति थकान जैसी अनुभूति होती है, बढ़ने में प्रतिभा, स्मृति, स्फूर्ति जैसी उत्साहवर्धक विशेषताएँ उभरी हुई प्रतीत होती हैं। बढ़े हुए चुम्बकत्व वाला अपने से हल्के वालों को प्रभावित करने में सफल रहता है। साथ यह ही बात भी है कि उससे बड़े स्तर की प्रतिभा उसे अपनी पकड़ में कस लेगी। इतने पर भी कुछ मनस्वी ऐसे होते हैं जो आत्मवलय पर दृढ़ रहते हैं। आदान−प्रदान तो करते हैं किन्तु आवश्यक रूप से किसी से भी प्रभावित नहीं होते।
इस मानवी चुम्बकत्व के दो प्रवाह हैं–एक ऊर्ध्वगामी–दूसरा अधोगामी। ऊर्ध्वगामी मस्तिष्क में केन्द्रित है। उस मर्मस्थल के प्रभाव से व्यक्तित्व निखरता और प्रतिभाशाली बनता है। बुद्धि−कौशल, मनोबल के रूप में–शौर्य, साहस, आदर्शवादी उत्कृष्टता के रूप में यही चुम्बकत्व मिश्रित विद्युत ही काम करती है। मनुष्य के चेहरे के इर्द−गिर्द छाये तेजोवलय –ओजस्–आरा को इस ऊर्ध्वगामी विद्युत का ही प्रतीक मानना चाहिये। अधोगामी विद्युत जननेन्द्रियों में केन्द्रित रहती–रति सुख का आनन्द देती और सन्तानोत्पादन की उपलब्धि प्रस्तुत करती है। यौन आकर्षण के पीछे यही चुम्बकीय विद्युत काम करती है।
ऊर्ध्वगामी और अधोगामी चुम्बकीय प्रवाह उत्तरी, दक्षिणी ध्रुव की तरह भिन्न प्रकृति के होते हुए भी परस्पर सम्बद्ध हैं। कामोत्तेजना और काम विकार के शमन की प्रक्रिया को क्रमशः इस अधोगामी–ऊर्ध्वगामी प्रवाह की परिणति ही मान सकते हैं। जहाँ शरीर को कई प्रकार खाद्य पदार्थ एवं पोषण चाहिये वहाँ उसे वातावरण में संव्याप्त चुम्बकीय ऊर्जा की मात्रा भी उसी प्रकार चाहिए जैसे कि साँस के लिए हवा की जरूरत पड़ती है। इसी प्रकार मस्तिष्क को भी अपनी बैटरी चार्ज करने वाला ‘चार्जर’ चाहिए। अन्यथा वह ‘डाउन’ होती चली जाएगी और मनुष्य अपने ओजस् को व्यक्तित्व में झलकते आकर्षण को–अपनी प्रखरता को गँवा बैठेगा।
मानवी सत्ता के ब्राह्मी सत्ता से सम्बन्धों की तुलना गर्भस्थ बालक और माता के सम्बन्ध से ही की जा सकती है। गर्भस्थ बालक की तन्तु नलिका (गर्भरज्जु) के समान ही मानवी चुम्बकत्व विश्वव्यापी समष्टि चेतना और व्यष्टि सत्ता को परस्पर जोड़ने में एक सशक्त गठबन्धन की भूमिका निभाता है। विष्णु की नाभिकमल से ब्रह्मा के सम्बन्ध की पौराणिक कल्पना भी इसी तथ्य का उद्घाटन करती है।
अन्तरिक्ष में संव्याप्त भले बुरे अनुदानों को मनुष्य अपने चुम्बकत्व द्वारा ही स्वीकार−अस्वीकार करता है। इस शक्ति का केन्द्र स्थल उसका मस्तिष्क ही है। इसी कारण जब तक मनुष्य निष्प्राण नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति के जीवित होने की पूरी−पूरी सम्भावना रहती है। शरीर मृत हो जाता है पर चुम्बकत्व रूपी तेजोवलय सूक्ष्म स्थिति में विद्यमान होता है व अपनी उपस्थिति का परिचय विभिन्न रूपों में देता है। फ्रांस के सरकारी रिकार्डों में वर्णन है कि राज्य क्रान्ति में सिर कटे एक व्यक्ति का मुँह और होंठ बहुत देर तक इस प्रकार चलते रहे, मानों वह कुछ कह रहा हो। प्राचीन काल में रणक्षेत्र में कई ऐसे उदाहरण देखने में आते थे जिनमें योद्धा तलवार द्वारा सिर काटने पर भी अपनी तलवार को हवा में चलाते पाये जाते थे। ये उदाहरण मृत्यु के बाद भी तेजोवलय के होने की मान्यता की सत्यापन ही करते हैं।
वैसे ब्रह्माण्ड व्यापी चुम्बकत्व, जिससे मनुष्य का आदान−प्रदान चलता रहता हैं, का उपयोगी प्रवाह की मनुष्य के काम आता है। यदि प्रतिकूल प्रवाह घुस पड़े तो विषैले खाद्य की तरह उससे भी हानि उठानी पड़ेगी। मनुष्य में अपना चुम्बकत्व है तो सही पर उसे न्यूनाधिक करने में मनुष्य के अपने प्रयत्न ही चमत्कार दिखाते हैं। अतीन्द्रिय क्षमता वाली विशेषताएँ मनुष्य के इसी चुम्बकत्व पर निर्भर हैं।
इस क्षमता को वैज्ञानिकों ने ‘मैग्नेटिक सेन्स’ (चुम्बकीय इन्द्रिय)नाम दिया है। ‘न्यू साइंटिस्ट’ पत्रिका के अनुसार मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के जीव−विज्ञान विशेषज्ञों ने एक प्रयोग में वहाँ के कुछ छात्रों की आँखों पर पूरी तरह पट्टी बाँध कर उल्टे−सीधे रास्ते से 52 किलोमीटर दूर ले जाकर एक स्थान पर छोड़ दिया। फिर उनसे आँखों पर पट्टी बाँधे ही उसी रास्ते से वापस चलने की कोशिश करने के लिये कहा गया। 15 प्रतिशत छात्र रास्ते का सही अनुमान लगा सकने में सफल रहे। प्रयोग के दूसरे चरण में हर एक छात्र के सिर पर एक चुम्बकीय छड़ रखकर उसी प्रयोग को दोहराया गया, तो सभी रास्ता भूल गये। चुम्बक की छड़ हटाकर पुनः 8 किलोमीटर की दूरी तक ले जाकर वापस पहुँचने के प्रयोग में पहले की भाँति ही अधिकाँश छात्र सफल रहे।
वैज्ञानिकों ने इस क्षमता को चुम्बकीय इन्द्रिय बताते हुए कहा कि पृथ्वी का चुम्बकत्व मानवी चुम्बकत्व पर प्रभाव डाले, इसमें दूसरे प्रयोग में रखी छड़ ने व्यवधान डाला। मानवी चुम्बकत्व अपनी क्षमता के सहारे अपनी दिशा स्वयं ढूँढ़ने में मनुष्य की सहायता करता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि बहुत दिन−प्रतिदिन के जीवन में अपनी इस चुम्बकीय क्षमता का प्रयोग करता हैं। इस प्रकार छठी इन्द्रिय (अर्थात् चुम्बकीय इन्द्रिय) कोरी कल्पना नहीं है।
चुम्बकीय क्षमता अन्य जीवधारियों में भी मिलती है। अनेकों पक्षी हजारों किलोमीटर की पृथ्वी की परिक्रमा प्रतिवर्ष करते हैं। इस ‘माइग्रेशन’ की प्रक्रिया में भी पृथ्वी की चुम्बकीय धाराएँ व जीवधारियों का वैयक्तिक का चुम्बकत्व ही आधार बनता है। वे दिन−रात, बादल छाए मौसम में भी समान रूप से निर्वाध यात्रा करते हैं, पर यदि इनके सिर पर छोटा-सा चुम्बक बाँध दिया जाय तो ये पक्षी अपना रास्ता भूल जाते हैं।
मनुष्य के जीवकोषों के सूत्र विभाजन की आरम्भिक और मध्यावस्था का चुम्बकीय शक्ति रेखाओं के साथ आश्चर्यजनक तालमेल है। कोषों के विभाजन में क्रोमोजोम निरन्तर जीवकोषों के ध्रुवों की ओर ही चलते हैं।
मनुष्य के रक्त में चुम्बकीय क्षमता होने की बात बहुत समय से मानी जाती रही है। इसका प्रधान आधार है–रक्त के लाल कणों में लोहे का प्रचुर मात्रा में होना। यह लोहा शीघ्र ही चुम्बकीय क्षेत्र से प्रभावित हो जाता है। इस कारण चुम्बक द्वारा किसी भी स्थान में रक्त के जमाव−प्रवाह को प्रभावित करके वहाँ विद्यमान किसी भी प्रकार की विकृति का शमन किया जा सकता है। रक्त अभिसरण शरीर में स्वयं अपना चुम्बकत्व भी उत्पन्न करता है। शरीर कार्यिकी की एक प्रामाणिक पुस्तक के लेखक बेस्ट एण्ड टेलर के अनुसार हर लाल कण की सतह पर एक ऋण विद्युत आवेश होता है। इसके कारण ही ये कण परस्पर एक दूसरे को विकर्षित करते है तथा सामान्यतः रक्त नलियों में चिपकते नहीं। इन कणों का रक्त में निरन्तर परिभ्रमण एक विद्युत्प्रवाह का निर्माण करता है।
लाल कणों की कुल सतह का क्षेत्रफल शरीर के क्षेत्रफल 1500 गुना होता है। इस प्रकार यदि त्वचा के क्षेत्रफल को 1॥ वर्ग मीटर मान लिया जाए तो लाल कणों की कुल सतह का क्षेत्रफल किसी भी तरह 2000 वर्ग मीटर से कम नहीं है। सारे शरीर में बिछे रक्त नलिकाओं के जाल में निरन्तर अभिसरण होते रहने से एक स्वल्प किन्तु निश्चित विद्युत्प्रवाह बनता है। इस प्रवाह से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस प्रकार शरीर में चुम्बकीय क्षमता का होना पूर्णतः विज्ञान सम्मत है।
मनुष्य की जिस क्षमता को हाल ही में वैज्ञानिकों ने ‘मैग्नेटिक सेन्स’ की संज्ञा दी है, उसके आधार पर प्राचीन काल में लोग हाथ में छड़ लेकर स्थान−स्थान पर घूमते थे और उस छड़ की चेष्टाओं से भूमिगत पदार्थों का पता लगा देते थे। यह विधि ‘डाउजिंग‘ नाम से जानी जाती है एवं पाश्चात्य देशों में कुछ समय पूर्व तक बहुत प्रचलित थी। इस प्रकार उपयुक्त होने वाली छड़ ‘डाउजिंग रॉड’ कहलाती थी और साधनहीन व्यक्ति भी मात्र इसके माध्यम से भूमिगत जल और धातुओं का अप्रत्याशित रूप से सही अनुमान लगा लेते थे।
मनःशास्त्री विक्टर–ई. क्रोमर का कथन है कि मनःशक्ति को घनीभूत कर यदि इस चुम्बकत्व को किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त किया जा सके तो बहिरंग में सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा दूसरों को तथा अन्तरंग में स्वयं की सूक्ष्म शक्तियों को प्रभावित करने–जगाने में सफलता मिल सकती है।
मैरीलैण्ड (अमेरिका) के कॉलेज ऑफ फार्मेसी की एक छात्रा ‘लुई हैबर्गर’ की अँगुलियों के अग्रभाग में चुम्बकीय गुण था। आधी इंच मोटी, एक फुट लम्बी लोहे की छड़ वह अँगुलियों के पोरों से छूकर अधर में में उठा लेती थी। धातुओं से विनिर्मित वस्तुएँ उसके हाथ में चिपककर रह जाती थीं। अन्य विद्युत्महिलाओं की तरह किसी मनुष्य को छूने पर बिजली का झटका तो नहीं लगता था, पर एक विचित्र-सा आकर्षक उसके समीप आने पर लोग महसूस करते थे।
इसी मानवी चुम्बकत्व को बायोप्लाज्मा के रूप में ‘कीट−पतंगों’ के आसपास के प्रभामण्डल को चित्राँकित कर डॉ. इन्शुसिन (कजाकिस्तान ) एवं डॉ. किर्लियन द्वारा किया जा चुका है। थियासफीस्ट इसे ‘इथरीक डबल’ कहते हैं जो शरीर के चारों ओर आवरण के समान विद्यमान है।
मैस्मरेज्म के प्रयोगों में प्रयोक्ता द्वारा इसी चुम्बकीय विद्युत के सहारे दूसरों को सम्मोहित करने की प्रक्रिया सम्पादित होती है। इसी माध्यम से एक व्यक्ति का प्राण दूसरे में प्रवाहित होने लगता है तथा शारीरिक रुग्णता एवं मानसिक अक्षमता को दूर करने में सहायक होता है। सत्संग और कुसंग के परिणाम भी व्यक्ति की निजी ऊर्जा के सहारे ही सम्भव होते हैं। मात्र कहने−सुनने भर से कोई किसी के साथ चल पड़ने या बात मानने के लिये विवश नहीं किया जा सकता।
प्राण विद्युत को विकसित एवं परिष्कृत करने के ध्यान−धारणा तथा प्राणायाम के कितने ही प्रयोग अपनी स्थिति एवं आवश्यकता के अनुरूप अपनाये जा सकते हैं। किन्तु उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि इन्द्रिय निग्रह मनोनिग्रह की नीति−निष्ठा, जीवनचर्या अपना कर ईश्वर प्रदत्त प्राण चुम्बकत्व की बर्बादी से बचे रहने की सतर्कता बरती जाय।
ऊर्जा के सहारे यन्त्रों का संचालन होता है। शरीर भी एक यन्त्र है। इसके सुसंचालन में जिस विद्युत की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राण कहते हैं। प्राण एक अग्नि है। अग्नि को ज्वलन्त रखने के लिए ईन्धन की आवश्यकता पड़ती है। प्राण रूपी शरीराग्नि आहार से ज्वलन्त बनी रहती है। प्राणियों में काम करने वाली ऊर्जा को वैज्ञानिकों ने जैव विद्युत नाम दिया है। शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ तथा मस्तिष्कीय हलचलें रक्तमाँस जैसे साधनों से नहीं शरीर में संव्याप्त विद्युत प्रवाह द्वारा परिचालित होती है। यही जीवन−तत्व बनकर रोम−रोम में व्याप्त है। मानवी विद्युत की यह मात्रा जिसमें जितनी अधिक होगी वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी होगा। प्रतिभाशाली, प्रगतिशील, शूरवीर, साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता होती है। शरीर संस्थान में इसकी न्यूनता होने पर विभिन्न प्रकार के रोग शीघ्र ही आ दबोचते हैं। मनःसंस्थान में इसकी कमी होने से अनेकों प्रकार के मनःरोग परिलक्षित होने लगते हैं।
जैव विद्युत भौतिक बिजली से सर्वथा भिन्न है जो विद्युत यन्त्रों को चालित करने के लिए प्रयुक्त होती है। मानवी विद्युत का सामान्य उपयोग शरीर को गतिशील तथा मन, मस्तिष्क को सक्रिय रखने में होता है। असामान्य पक्ष मनोबल, संकल्पबल, आत्मबल के रूप में परिलक्षित होता है, जिसके सहारे असम्भव प्रतीत होने वाले काम भी पूरे होते देखे जाते हैं। “ट्रान्सफार्मेशन ऑफ एनर्जी” सिद्धान्त के अनुसार मानवी विद्युत सूक्ष्मीभूत होकर प्राण ऊर्जा और आत्मिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित और परिशोधित परिवर्तित हो सकती है। इस ट्रान्सफार्मेशन के लिए ही प्राणानुसन्धान करना और प्राण साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।
शरीर में काम करने वाली जैव विद्युत में कभी−कभी व्यतिरेक होने से गम्भीर संकटों का सामना करना पड़ता है। भौतिक बिजली का जैव विद्युत में परिवर्तन असम्भव है, पर जैव विद्युत के साथ भौतिक बिजली का सम्मिश्रण बन सकता है। कईबार ऐसी विचित्र घटनाएँ देखने में आयी हैं जिनमें मानवी शरीरों को एक जेनरेटर−डायनेमो के रूप में काम करते पाया गया है।
आयरलैंड की एक युवती जे. स्मिथ के. शरीर को छूते ही बिजली के नंगे तारों की भाँति तेज झटका लगता था। जब तक वह जिन्दा रह, घर के सदस्यों के लिए एक समस्या बनी हुई थी। डॉ. एफ. क्राफ्ट ने उसके शरीर का परीक्षण किया तथा यह बताया कि उक्त युवती की काया से निरन्तर भौतिक बिजली की भाँति विद्युत प्रवाहित होती रहती है।
प्रसिद्ध ‘टाइम्स’ पत्रिका में ओण्टोरियो (कनाडा) की कैरोलिन क्लेयर नामक एक महिला विस्तृत वृत्तान्त छपा था, जिसमें उल्लेख था कि यह महिला डेढ़ वर्ष तक बीमार पड़ी रही, पर जब स्थिति सुधरी तो उसमें एक नया परिवर्तन यह हुआ कि उसके शरीर से विद्युतधारा बहने लगी। यदि वह किसी धातु से बनी वस्तु को छूती, उसी से चिपक जाती। छुड़ाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता।
फ्रांस से प्रकाशित होने वाले ‘मेडिकल टाइम एण्ड गजट’ में एक ऐसे ही लड़के का विवरण छपा था जिसके शरीर से सतत् विद्युत धाराएँ निकलती थीं। लियोन्स नामक व्यक्ति के घर जन्मा शिशु जब सात माह का हुआ तभी से उसको छूने से झटके लगते थे। माँ जब उसे दूध पिलाने के लिए अपनी छाती से चिपकाती तो उसे तेज झटक लगता था। कितनी बार वे बेहोश हो गयीं। बाद में उन्होंने बच्चे को अपना दूध पिलाना ही बन्द कर दिया। उसके लिए बाहरी दूध की व्यवस्था बनानी पड़ी। माँ−बाप के प्यार से वंचित यह दुर्भाग्यशाली लड़का कमरे के एक कोने में पड़ा रहता। भय वश उसे कोई उठाता नहीं था। इस माह तक यह बालक किसी तरह जीवित रहा, पर मरते समय उसके शरीर से नीले वर्ण का प्रकाश निकलते देखा गया जिसका फोटो भी खींचा गया था।
कुमारी जेनी मार्गन को चलते−फिरते पावर हाउस के रूप में ख्याति मिली। 13 वर्ष की आयु के बाद उसके शरीर से विद्युत शक्ति प्रचण्ड रूप से उभर कर प्रकट हुई। एक वैज्ञानिक ने प्रयोग करने के लिए जेनी को छुआ तो इतना तीव्र झटका लगा कि वे घण्टों बेहोश रहे। एक लड़के ने प्रेमवश उसका हाथ पकड़ा तो दूर जा गिरा। स्नेहवश जेनी ने एक बिल्ली को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया पर बिल्ली के लिए जेनी का प्रेम अत्यन्त महंगा पड़ा। वह न केवल मूर्च्छित हो गयी बल्कि कुछ ही समय बाद चल बसी। जेनी अपने हाथ के स्पर्श से सौ वाट का बल्ब जला देती थी।
आस्ट्रेलिया के एक बाईस वर्षीय युवक को उपचार के लिए न्यूयार्क लाया गया। उसका शरीर विद्युत बैटरी की भाँति काम करता था। छोटे−छोटे बल्ब उसके शरीर से स्पर्श कराके जलाये गये। पर उसके शरीर में विद्युत प्रवाह पूरे दिन एक समान नहीं रहता अपितु सूर्य के ताप की भाँति घटता−बढ़ता रहता था। जब आवेश कम होता तो बेचैनी और थकान महसूस करता। वह प्रायः अधिक फास्फोरस युक्त खाद्य−पदार्थों को खाना पसन्द करता था।
शरीर से विद्युत भौतिक बिजली की तरह क्यों प्रवाहित होती है, इस सम्बन्ध में अनेकों स्थानों पर खोजबीन हुई है तथा महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलें हैं। कोलोराडो के डॉ. डब्ल्यू पी. जेन्स और उनके मित्र डॉ. नार्मलोंग ने विस्तृत खोज के बाद बताया कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका एक छोटी किन्तु सजीव विद्युत घर है। कोशिका के नाभिक में विद्युत की प्रचण्ड मात्रा भरी पड़ी है। किसी अविज्ञात व्यतिरेक के कारण सन्निहित कोशिकाओं की विद्युतधारा फूटकर बाहर निकलने लगती है। ‘सोसाइटी ऑफ फिजीकल रिसर्च’ की रिपोर्ट है कि शरीर की कोशाओं के नाभिकों के आवरण ढीले पड़ने के कारण बिजली उसे चीरती हुई बाहर प्रवाहित होने लगती है। शरीर विद्युत पर शोध करने वाले डॉ. ब्राउन का मत है कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका में विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उनके अनुसार शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों के संचालन के लिए जितनी बिजली खर्च होती है उससे एक बड़ी कपड़ा मिल चल सकता है। छोटे बच्चे के शरीर में संव्याप्त विद्युत शक्ति से रेल इंजन को चलाना सम्भव है।
शरीर विद्युत का असन्तुलन कभी−कभी भयंकर विग्रह खड़ा करता देखा गया है तथा जीवन−मरण जैसे संकट प्रस्तुत कर देता है। अमेरिका के सेण्ट पीटर्स (फ्लोरिडा)की रहने वाली महिला श्रीमती मेरीहार्ड रोजर अपने मकान में विचित्र रूप से जली पायी गयीं। दिन के 10 बजे तक दरवाजा न खुलने पर पड़ौसियों ने कमरे का दरवाजा खटखटाना चाहा पर कुन्दा छूते ही एक पड़ौसी छिटककर दूर जा गिरा। उपस्थित लोगों ने समझा सम्भवतः मकान में बिजली का करेंट दौड़ गया हो। मेन स्विच ऑफ किया गया पर विद्युतधारा अभी भी प्रवाहित हो रही थी। बिजली के विशेषज्ञों ने पूरी जाँच−पड़ताल कर ली पर कहीं भी गड़बड़ी नहीं पायी गयी। किसी प्रकार दरवाजा तोड़ा गया। श्रीमती रोजर्स का शरीर राख का ढेर बना फर्श पर पड़ा था। कमरा अभी भी भट्टी जैसा गरम था।
पुलिस को सूचना मिली। साथ ही शरीर शास्त्रियों का एक विशेष दल अध्ययन के लिए आया। डॉ. विल्टन क्राग ने लम्बी खोजबीन की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि शरीर को भस्मीभूत करने के लिए तीन हजार फारेनहाइट तापमान चाहिए। यह केस ‘स्पान्टेनियस ह्युमन कम्बशन’ (अपने आप जल उठाना) का है। श्रीमती रोजर्स अपनी ही शरीराग्नि से जलकर मरी हैं न कि भौतिक विद्युत से।
फ्लोरिडा की सड़क पर जाते समय एक व्यक्ति के शरीर से अचानक आग की–नीली लपटें निकलने लगीं। उसके साथ चलने वालों में से एक ने बाल्टी भर पानी डाल दिया तो आग कुछ क्षणों के लिए थम गयी पर थोड़े ही देर बाद पुनः भभक उठीं और देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में वह व्यक्ति राख की ढेर में परिवर्तित हो गया। एक स्थानीय मेडिकल जनरल में छपी इस घटना पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए फ्लोरिडा के वैज्ञानिकों ने कहा कि–शरीर में नब्बे प्रतिशत जल की मात्रा विद्यमान होते हुए भी अपनी ही शरीराग्नि द्वारा कुछ ही क्षणों में जलकर मरना विज्ञान जगत के लिए एक अनोखी घटना है जो यह बताती है कि शरीर शास्त्रियों को शरीर के विषय में जितना ज्ञान है उसकी तुलना में कई गुना अधिक अभी रहस्यमय है। 7 दिसम्बर 1956 को होनोलूलू द्वीप में एक ऐसी ही घटना घटी। कॉमेट नामक महिला दूसरे पड़ौसियों के यहाँ काम करके अपना गुजारा करती थी। एक दिन काम पर नहीं पहुँचने पा पड़ौसी एक महिला खोजबीन करने पहुँची। घर जाकर जो दृश्य देखा उसे देखकर वह अवाक् रह गयी। कॉमेट के शरीर से तेज नीली लपटें निकल रहीं थीं। शरीर सूखी लकड़ी की भाँति जल रहा था। जितनी देर में आग बुझाने का उपक्रम बनाया गया कॉमेट का शरीर जल कर राख में परिवर्तित हो चुका था।
सेनफ्रांसिस्को में 31 जनवरी 1959 को लैगूना होम नामक स्थान पर जहाँ वृद्धों की देखरेख काम एक सरकारी संस्था करती है, कार्यकर्त्ताओं द्वारा शाम को दूध वितरित किया जा रहा था। अचानक लाइन में दूध के लिए लगे वृद्ध जैक लार्चर के शरीर से अग्नि की ज्वालाएं निकलने लगीं। बचाव के लिए ऊपर कम्बल डाला गया पर कुछ ही सेकेंडों में वह भस्मी भूत हो गया। अग्नि बुझाने के अन्यान्य प्रयास भी असफल सिद्ध हुए। मात्र पाँच मिनट में ही जैक लार्चर का शरीर राख की ढेरी में बदल चुका था।
जेम्सफोर्ड, इंग्लैंड की बात है। 20 सितम्बर 1938 को एक आलीशान होटल में मध्यरात्रि को आर्केस्ट्रा की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। इतने में नर्तकी के शरीर से तेज नीली लौ फूट पड़ी। भयवश कुछ लोग एक किनारे खड़े हो गये और कुछ सहायता के लिए पानी आदि लाने दौड़े। इतने में अग्नि ने लपटों का रूप ले लिया और कुछ ही क्षणों में नर्तकी के शरीर के स्थान पर धधकता अग्निपिण्ड दिखायी पड़ने लगा। थोड़ी ही देर बाद वह राख में परिवर्तित हो गयी।
ये घटनाएँ मानव शरीर में सन्निहित प्रचण्ड−प्राण शक्ति का परिचय देती हैं। जिसके व्यतिरेक द्वारा गम्भीर संकटों का सामना भी करना पड़ सकता है। प्राण पर नियंत्रण–परिशोधन और उसका संचय अभिवर्धन किया जा सके तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है।
व्यक्तित्व के उत्थान और पतन का सम्बन्ध एक सीमा तक ही शिक्षा और वातावरण से है, क्योंकि जहाँ से इस प्रकार का परिवर्तन आरम्भ और परिपक्व होता है उसे अचेतन मन का मर्मस्थल कहते हैं। मस्तिष्क का सचेतन भाग जानकारियाँ संग्रह करने और तद्नुरूप व्यवस्था बनाने में काम आता है। शिक्षा एवं अनुभव के सहारे इसी भाग को विकसित किया जा सकता है। चतुरता एवं कुशलता जैसी उपलब्धियाँ इसी केन्द्र में पनपती और प्रखर बनती हैं। इतने पर भी जहाँ तक गुण, कर्म, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का सम्बन्ध है। यह नहीं कहा जा सकता है कि विद्वान् और बुद्धिमान होने पर भी कोई मनुष्य उस क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं सुसंस्कृत सिद्ध हो सकेगा या नहीं। शिक्षा और कुशलता की दृष्टि से सुयोग्य ठहरने वाले व्यक्ति भी दुर्बुद्धि, दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्तियों में लिप्त पाये जाते हैं। जबकि अशिक्षितों और अकुशल समझे जाने वालों में से भी कितने ही आदर्शवादी, सद्गुणी और उदार जीवन जीने तथा लोक मंगल की दृष्टि से महान् प्रयोजन सम्पन्न करते देखे गये हैं।
तथ्यों पर विचार करने से प्रकट होता है कि अचेतन मस्तिष्क ही अपने क्षेत्र में आदतों की जड़ें गहराई तक जमा लेता है और उन्हीं के सहारे व्यक्तित्व का स्तर उठता गिरता रहता है। उस क्षेत्र में कारगर परिवर्तन करने से ही ऐसे परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं जिनके सहारे सामान्यों को असामान्य, दुर्बलों को समर्थ और पिछड़ों को अग्रगामी बनाया जा सके।
व्यक्तित्व को अभीष्ट दिशा में अग्रगामी बनाने के लिए विज्ञान क्षेत्र में मानवी चेतना के अचेतन पक्ष की इन दिनों गहरी कुरेद बीन की जा रही है और देखा जा रहा है कि मस्तिष्क की उन रहस्यमय परतों को किस प्रकार प्रखर, परिष्कृत, सक्षम एवं मनुष्य को अधिकाधिक समुन्नत बनाने में उन्हें किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है।
कहना न होगा कि व्यक्तित्व मान्यताओं, आदतों, इच्छाओं का समुच्चय मात्र है। वह इन्हीं तीनों के सहारे गढ़ा गया है। इनमें हेर−फेर करने से ही मनुष्य को किसी दिशा में प्रवीण−परिपक्व−तत्पर सफल बनाया जा सकता है। अचेतन को मर्मस्थल एवं अन्तराल कहा गया है। इसे प्रभावित करने में सामान्य परामर्श काम नहीं करता। उसके लिए ऐसे उपाय अपनाने पड़ते हैं जिनकी पहुँच अन्तराल की गहराई तक सम्भव हो सके।
मस्तिष्क को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है और शरीर के अन्यान्य अवयवों की तरह उसे भी अपने ढंग का एक विशेष घटक माना गया है। बुद्धिमानी की गणना लगभग पहलवानों के स्तर से की जा सकती है। बहुत हुआ तो उसे कलाकारिता प्रतिभा, प्रवीणता के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। इतने भर से महानता की उत्पत्ति नहीं होती। महामानव स्तर का व्यक्तित्व निखारने में सबसे अधिक सहायक यही सामर्थ्य स्रोत होता है जिसे वैज्ञानिक ‘अचेतन मन’ एवं अध्यात्मवादी ‘चित्त’ कहते है। चित्त का परिष्कृतीकरण इतना बड़ा पराक्रम है कि उसके बदले संसार की हर सफलता उपलब्ध की जा सके।
व्यक्ति का आज सबसे बड़ा दुर्भाग्य है–स्वयं के बारे में भ्राँतिपूर्ण मान्यता। वस्तुतः मनुष्य वह नहीं है जो उसने मान रखा है। स्काँटिश दार्शनिक डेविड ह्यूम कहते हैं–”हम अपने मस्तिष्क पर स्वयं की जो आकृति आरोपित कर देते हैं, वह त्रुटिपूर्ण है।” ‘स्व’ की वास्तविक अनुभूति जिस विवेक बुद्धि के सहारे होती है, उसे ही इण्ट्यूशन, प्रज्ञा या अंतर्चक्षु कहते हैं।
चेतन मन प्रकृति का ज्ञानेन्द्रियों एवं वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा निरीक्षण करता है जिसके फलस्वरूप विज्ञान का इतना विकास सम्भव हो सका है इसके अतिरिक्त चेतन मन आगमन− निगमन प्रक्रिया से तर्क करता है जिससे शास्त्रों का निर्माण हुआ है।
अचेतन मन में अन्तःज्ञान एवं अंतःप्रेरणायें उत्पन्न होती हैं। इनके द्वारा ही वैज्ञानिक, मनीषी सन्त नये आविष्कार करने में एवं समाज को नवीन विचार, भावनाएँ आदि भेंट करने में सक्षम होते हैं।
‘सर पीटर मेडावार’–नोबुल पुरस्कार विजेता का कथन है–”तर्क बुद्धि की पहुँच अचेतन तक नहीं है। तर्क शक्ति के उपयोग की एक मर्यादा है। विभिन्न परीक्षणों एवं निरीक्षणों के संग्रह को सूत्रबद्ध करके सार्थक सिद्धान्तों में परिवर्तित कर देना तर्क शक्ति के परे की बात है। यह कार्य अन्तःप्रेरणा के माध्यम से हुआ करता है।”
उनका कहना है कि ‘सुपरमाइन्ड’ मन के ढर्रे में चल रहे चिन्तन से ऊपर की स्थिति है। ढर्रे का चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’, यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जागृत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा “न्यूटेस्टामेण्ट” स्वर्ग का साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
इसे ऐसा समझाया जाये कि यह क्या है, इसकी संरचना क्या है, इसके बजाय यह देखा जाना चाहिए कि यह क्या नहीं है? यह कण्डीशण्ड माइण्ड नहीं है। इसमें निषेधात्मक चिन्तन को कोई स्थान नहीं इसमें भय, ऐषणा, शंका की कोई जगह नहीं है। यह सदैव प्रसन्नता से युक्त है तथा आत्मिक एवं भौतिक दृष्टि से सबल सम्पन्न जीवन के यह सपने देखता है।
कण्डीशण्ड मन को हम चित्त या अचेतन कह सकते हैं जो कुसंस्कारों से युक्त है जो रह−रहकर सचेतन पर हावी होते हैं एवं नरपशु का जीवन जीने को बाध्य करते रहते हैं। जन्म−जन्मान्तरों के संस्कारों इसमें भरे पड़े हैं। चित्त का स्वभाव है कि यह स्वचालित जीवन जीता है। अधिकाँश का जीवन क्रम इसी प्रकार का होता है जिसका स्वाभाविक एक ही स्वरूप होता है–भोजन एवं प्रजनन। इससे परे, इससे ऊँची भी कोई स्थिति हो सकती है, इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।
चित्त या कण्डीशण्ड मन हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, विश्वास, संस्कारों, शंकाओं, प्रतिक्रियाओं एवं दुराग्रहों का समुच्चय है। ये सारे पक्ष हमें व्यावहारिक जीवन कष्ट में डालते हैं। यह मनुष्य का वास्तविक ‘स्व’ या सेल्फ नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि मनुष्य अपनी इस कारा से अपने को मुक्त करे– इन बन्धनों से स्वयं को निकाल बाहर करे।
रोजमर्रा का मन आत्मिक प्रगति में सहायक नहीं हो सकता। अपनी समस्त समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना हो तो मन को ऊँची स्थिति में ले जाना होगा। वास्तविक अध्यात्म यही है जिसमें मन को अज्ञात उच्चतम स्थिति की ओर मोड़ना होता है।
सुपरमाइन्ड हर व्यक्ति के अन्दर है, पर यह सोया हुआ है। मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ यही हो सकता है कि वह इसे जगा ले। अपनी निराशा एवं असीम भ्रम जंजालों से मुक्ति पाने के लिए मानव से क्या−क्या प्रयास नहीं किये हैं–विज्ञान, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र, शान्ति सम्मेलन, नैतिक, विधि−विधान, धर्ममत, दार्शनिक प्रतिपादन सभी मार्गों से व्यक्ति ने अपनी प्रगति का पथ खोजा है, पर ये प्रयत्न गम्भीर एवं आन्तरिक ज्ञान की पिपासा से प्रेरित नहीं थे। जब सुपर मन जागता है तो बाह्य परिस्थितियाँ स्वतः ठीक होती चली जाती है। उठी हुई मनःस्थिति बाह्य जीवन की सारी परिस्थितियों को बदलकर रख देती है। वास्तव में परिस्थितियों का उद्गम स्थल अन्तःकरण ही है। जैसे−जैसे हमारा स्तर ऊँचा उठता चला जाता है, बहिर्जीवन का स्वरूप भी बदलता चला जाता है एवं परिस्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं। यदि हम अपने दैनिक जीवन में आने वाली परिस्थितियों का नियंत्रक होना चाहते हैं तो हमें मात्र एक चीज सीखनी होगी, वह है अपने ‘स्व’ पर, ‘इनरसेल्फ’ पर आधिपत्य।
जिसका मन ऊँचा उठ गया, सुपर मन बन गया, वह भय से दूर होता चला जाता है। तैतरीयोपनिषद् कहता है–”जिसने अन्तः की शरण ले ली, उसे कोई भी भय नहीं प्रभावित कर पाता।”
एक साधारण व्यक्ति को यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता है कि एक और जगत हमारी कामनाओं, ऐषणाओं से परे है। बहुसंख्य व्यक्ति यह नहीं जानते कि हमारी आदतों से–संस्कारों से गढ़े मन(चित्त) एवं अतिमन के बीच एक क्षीण−सी विभाजन रेखा है। मानव विनिर्मित कल्पनाएँ एवं मान्यताएँ, चिन्तन का जन प्रचलित ढर्रा ही इस रेखा की एनोटॉमी है। यदि इस बैरियर को तोड़ दिया जाये तो प्रकाश को पाना शक्य है जो अतिमन की जागृति का प्रथम चिन्ह है।
वस्तुतः आदमी का व्यक्तित्व विभाजित है। एक ओर वह संपर्क के व्यक्तियों तथा संचित सुख साधनों में अपनी सुरक्षा समझता है तो दूसरी ओर उनमें उसे खालीपन, एक शून्यता की भी अनुभूति होती है। उसे लगता तो है कि अन्तः में प्रवेश करना चाहिए, यह जानना चाहिए कि वस्तुतः हमारे जीवन का मकसद क्या है, पर इस सम्भावना से वह भयभीत है कि आत्म निरीक्षण मुझे कहीं निराश न कर दे, मेरा सही स्वरूप न उजागर कर दे। वह घोषणा तो करता है कि वह कुछ बड़ा काम करेगा, पर कर नहीं पाता। वह अपने आपको दूसरों के साथ सम्मिलित तो करना चाहता है पर ‘स्व’ को भुला व घुला नहीं पाता। रह−रहकर वे ही चिर संचित संस्कार आड़े आ जाते हैं जो उसके अनगढ़ मन के महत्वपूर्ण घटक बन गये हैं। उसकी मुस्कराहट में एक चिन्ता की झलक दिखाई पड़ती है। वह अपनी चिन्ता को दूर करने के लिए स्वयं को विभिन्न गतिविधियों में उलझाता है, पर जब वे समाप्त होने लगती हैं तो सम्भावित नीरवता उसे भयभीत कर देती है।
आज का व्यक्ति अत्यधिक भयभीत है। उसका तनाव उसे अस्थायी उत्तेजनाजनक सुखों में शरण लेने को बाध्य करता है, पर धीर−धीरे भटकाव उसे वापस उसी स्थान पर बल्कि आत्मिक प्रगति के मार्ग पर कुछ पीछे ले आता है।
फ्रायड का कथन है–”सचेतन बुद्धियुक्त मस्तिष्क की तुलना में अचेतन अत्यधिक समर्थ, सुदृढ़ और दूरगामी परिणाम प्रस्तुत कर सकने वाला है और लोक व्यवहार में विचार शक्ति का महत्व कितना ही क्यों न हो, व्यक्तित्व का स्वरूप बनाये रखने तथा निखारने में अचेतन कार्य क्षमता ही प्रभाव सिद्ध होती है।”
मनोविज्ञानी प्रिंसहार्न का कथन है–”भौतिक सफलताएँ चातुर्य पर निर्भर हैं किन्तु मनुष्य का असामान्य एवं प्रतिभा सम्पन्न होना पूर्णतया उसके अचेतन पर निर्भर है। महामानवों को साधारण स्थिति से उबारने और ऊँचा उछालने में उनके पुरुषार्थ का उतना योगदान नहीं रहा जितना अन्तरंग से उमड़ने वाली प्रेरणा एवं आस्था का।”
ये सारे प्रतिदिन एक ही तथ्य का समर्थन करते हैं कि साधना और कुछ नहीं अचेतन का परिष्कार एवं स्व का उभार है। इस पुरुषार्थ में जिसने अपने को खपा दिया उसने आत्मोत्थान की प्रगति की दिशा में कुछ चरण आगे बढ़ाये। व्यक्तित्व का विकास इसी कटहरे से आरम्भ होता है और चलते−चलते अतिमन की स्थिति में–व्यक्ति को महामानवों की श्रेणी में पहुँचता है। साधना इसी आपे की, की जाती है। वेदान्त में जिस देव की उपासना के गुणवान लिखे हैं– वह यही देवाधिदेव आत्मदेव है। इसके लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। वह अपने ही भीतर बैठा–प्रस्तुत की स्थिति में है। आवश्यकता इसे जगाने भर की है। साधना−पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित है।
मनुष्य के विषय में यदि उसकी आकृति, योग्यता और सम्पदा से आगे बढ़कर देखना, खोजना हो तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि जो जैसा सोचता वह वैसा ही बन जाता है। गीता ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा है–”यो यच्छ्रद्धः स एवस” जिसकी जैसी श्रद्धा है वह वैसा ही बन जाता है। श्रद्धा अर्थात् आकाँक्षा, और मान्यता का समुच्चय। मस्तिष्क सोचने में स्वतन्त्र नहीं है और न शरीर अपनी मर्जी से कुछ करता है। अन्तराल की उमगे ही उसे इधर से उधर लिये फिरती हैं। उसी प्रेरणा के अनुरूप मस्तिष्क को सोचना और शरीर को करना पड़ता है। अस्तु व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य वस्तुतः उसकी इच्छा आकाँक्षा पर पूरी तरह अवलम्बित समझा जा सकता है।
महत्व साधन सम्पदा का भी है और परिस्थितियाँ भी मनुष्य को प्रभावित करती हैं। इतने पर भी यह मान कर चलना होगा कि उनका महत्व सीमित है। साधनों के सहारे की गई प्रगति उनके हटते ही सदा के लिए समाप्त हो जाती है। परिस्थितियाँ भी बदलती उलटती रहती हैं। आज अनुकूलता कल प्रतिकूलता। यदि उन्हीं पर प्रगति निर्भर हो तो मनुष्य को सर्वथा पराधीन ही मानना होगा।
व्यक्ति की निजी सम्पदा उसके अन्तराल में छिपी रहती है जो आकाँक्षा बन कर उभरती-उछलती है। वही अपने प्रचण्ड चुम्बकत्व से ज्ञान सम्पदा परिस्थितियों की अनुकूलता जैसे अनेक साधन अनायास ही इकट्ठे कर लेता है और मनुष्य वहाँ जा पहुँचता है जहाँ उसकी आरम्भिक क्षमता और परिस्थिति को देखते हुए यह कल्पना भी कर सकना कठिन था कि क्या इतनी दूरी तक बढ़ा और इतनी ऊँचाई तक उठा जा सकता है।
समझा यह जाता है कि आकांक्षाएं अनायास ही उठती हैं, पर वास्तविकता वैसी है नहीं। संचित पशु−प्रवृत्ति के संस्कार मनुष्य पर रहते अवश्य हैं और गुरुत्वाकर्षण की तरह नीचे की दिशा में गिराते भी हैं। इतने पर भी यदि अन्यान्य उपलब्धियों की तरह आकाँक्षा क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न भावनापूर्वक किया जाय तो दृष्टिकोण एवं रुझान को अधोगामी अभ्यासों से छुड़ाकर उत्कृष्टता के साथ नियोजित कर सकना भी सम्भव हो सकता है। आकाँक्षा ही व्यक्ति को बनाती है। उठाने और गिराने का बहुत कुछ उत्तरदायित्व उसी पर रहता है।
इच्छाओं को पूर्ण करने एवं अभीष्ट साधन जुटाने में मन की कल्पना और बुद्धि की निर्धारण संयुक्त रूप से महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है किन्तु रुझान, चिन्तन एवं प्रयास को दिशा देने में अन्तःकरण ही मार्ग दर्शक होता है। अन्तःकरण को यों कई भागों में बाँटा जाता रहा है, पर उसे संक्षेप में अचेतन की यह परत कह सकते हैं, जिसमें स्वभाव, एवं अभ्यास कहा जा सकता है। यह आदतें इतनी प्रबल होती हैं कि उसके सामने न बुद्धि के निर्णय ठहरते हैं और न परिस्थितियों के दबाव। इसलिए मानवी सत्ता का सबसे प्रबल पक्ष यह अचेतन या अन्तःकरण ही माना जाता रहा है।
मनोविज्ञानी अचेतन की उसी परत का विवेचन विश्लेषण करते रहे हैं, जो बहुसंख्यक पिछड़े वर्ग के साथ जुड़ी होती है। मूल प्रवृत्तियों के नाम से उनने उसी ढर्रे का विश्लेषण किया है जो पशु स्तर से मिलते-जुलते पिछड़ेपन से ग्रसित क्षुद्र जनों में पाया जाता है। यह प्रायः स्व केन्द्रित ही होता है और क्षुद्र प्रयोजन में उलझा उन्हीं का ताना-बाना बुनता रहता है।
अचेतन की उच्चस्तरीय परत वह है जिसे समष्टिगत कह सकते हैं। इसे सामाजिकता, नीतिमत्ता, देशभक्ति उदारता एवं संस्कृति के नाम से जाना जाता है। यह सचेतन निखिल ब्रह्माण्ड में विश्वचेतना की तरह संव्याप्त है। उसे ‘ईथर’ तत्व के समतुल्य समझा जा सकता है। इसकी प्रेरणा है कि व्यक्ति गत अचेतन को सचेतन का सहयोगी एवं अनुचर बनकर रहना चाहिए।
अदूरदर्शी अचेतन कुछ और ही तरह सोचता है उसकी इच्छा एवं हठवादिता यह है कि समष्टि को उसके ‘स्व’ की वर्चस्व मानना चाहिए और अपने नियम निर्धारण छोड़कर उसी की इच्छा पूर्ति में सारा प्रवाह एवं ढाँचा बदल देना चाहिए। विग्रह इसी बात का है। अन्तर्द्वन्द्वों का समाधान इस विग्रह के कारण खड़ा होता है और उस कलह में चेतना तन्त्र की किंकर्तव्य विमूढ ही नहीं विक्षिप्तों की तरह ऐसे मार्ग अपनाने पड़ते हैं जिस पर अवरोध एवं अधःपतन के काँटे ही काँटे बिछे पड़े है।
विकास क्रम पर चलते हुए अचेतन की क्षुद्रता सचेतन की महानता को स्वीकार शिरोधार्य करने लगती है। अनगढ़ बचपन ही बच्चों को स्वेच्छाचारी बनाये रहता है वे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, आत्मानुशासन और सामाजिक अनुशासन के परिपालन में स्वेच्छापूर्वक श्रद्धा बढ़ाते चलते हैं। तब स्वार्थ और परमार्थ में अन्तर नहीं रहता, और सदुद्देश्यों के परिपालन में भी उतना ही रस मिलता है जितना कि स्वार्थ साधन में। निजी सफलताओं और सुविधाओं के लिए जितनी आतुरता अविकसित स्थिति में पाई जाती है। चेतना का विकास विस्तार होते-होते उतना ही सन्तोष एवं आनन्द समष्टि सेवा की गतिविधियाँ अपनाने पर भी मिलता और क्रमशः बढ़ता चला जाता है। यही है क्षुद्रता से महानता की ओर बढ़ चलने का प्रगतिक्रम।
शरीरगत इच्छाओं और आत्मिक आकाँक्षाओं का अन्तर समझा जाना चाहिए। इच्छाएँ कठिनाइयों के निराकरण एवं सुविधा संवर्धन को लक्ष्य कर उठता है, उनमें वैभव और वर्चस्व ही प्रधान होता है। किन्तु आकाँक्षाओं की उमंगे अपने स्तर के अनुरूप ही सोचती और सफलता का मूल्याँकन करती है। उसकी तुष्टि एवं प्रसन्नता इनसे उथले लाभ पर आधारित नहीं तो सकती। छोटे बच्चों के लिए खिलौने ही सब कुछ हो सकते हैं, पर बड़ों का समाधान इन छोटी उपलब्धियों से हो सकना सम्भव नहीं। ललक और लिप्साएँ एक स्तर के लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं, पर इस संसार में ऐसे भी लोग हैं जो इससे कुछ ऊँची वस्तु खोजते हैं।
सम्पन्नता कुछ लोगों के लिए ही सब कुछ हो सकती है। बड़प्पन या वैभव जिन लोगों को आकर्षित किये रहता है, उतने ही इस संसार में नहीं रहते। जो प्रदर्शन से दूसरों को प्रभावित करने पर विश्वास करते हैं ऐसे लोग हैं तो बहुत पर इन्हीं का आधिपत्य समूचे विचार क्षेत्र पर प्रचलन पर नहीं है। जो लोग महानता को महत्व देते और उसकी उपलब्धि में गौरव अनुभव करते हैं ऐसे लोग संख्या में भले ही कम हों, पर अभ्युदय के सुविस्तृत एवं सुनिश्चित बनाने में उन्हीं का प्रमुख हाथ रहता है।
वैभव भी आकर्षण का केन्द्र और इच्छाओं के प्रवाहित होने का एक सर्वविदित और बहु प्रचलित मार्ग है। इतने पर भी सब लोग उतने से सन्तुष्ट नहीं हो सकते विकसित व्यक्तित्व को भूख होती है–महानता उपलब्धि वे ‘मैन’ न रहकर ‘सुपरमैन बनाना चाहते हैं। परिपुष्ट व्यक्तित्व की आवश्यकता एवं आकाँक्षा यही रहती है कि वे सम्पन्नता में नहीं–शालीनता में अन्य असंख्यों से ऊँचे उठेंगे और अपने पराक्रम का इस रूप में परिचय देंगे कि लोक प्रचलन से ऊँचे उठकर उनके आदर्शों का मार्ग चुने और अवरोधों, व्यंग–उपहासों एवं आदर्शों का मार्ग चुने और अवरोधों, व्यंग उपहासों एवं अभावों को सहन करते हुए भी उस संकल्प को निष्ठापूर्वक निभाया। इच्छाएँ मनुष्य को भटकाती रहती हैं, आतुर हो उठें तो गिरा भी सकती हैं, किन्तु आकाँक्षाएँ सदा उच्चस्तरीय ताने-बाने बुनती हैं और असफल रहने पर भी ऐसे गर्व गौरव का अनुभव करती हैं कि वे टूट गये किन्तु अनौचित्य के सामने झुके नहीं।
आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्राथमिक तैयारी यह करनी होती है कि बड़प्पन की महत्वाकाँक्षा घटाएँ और सादगी की निर्वाह पद्धति अपनायें। जिनकी इच्छाएँ, आवश्यकताएँ बढ़ी-चढ़ी हैं, उन्हें उसके लिए साधन जुटाने में अत्यधिक व्यस्त रहना पड़ता। इच्छाओं की तीव्रता कईबार आतुरता के स्तर तक जा पहुँचती हैं और कम समय में अधिक पाने की पगडंडी खोजते-खोजते अनीति के झाड़-झंखाड़ों में जा फँसती हैं। ऐसा न हो तो भी अभिलाषाएँ चिन्तन क्षेत्र को इतना खाली नहीं छोड़ती कि वहाँ आदर्शवादी जीवन पद्धति पर विचार कर सकना और वैसा वातावरण बनाने के जिए ठोस कदम उठा सकना सम्भव हो सके।
श्रेष्ठ जीवन का निर्माण भी किसी बड़े कृषि फर्म व्यवसाय शासन संचालन एवं सैन्य शिक्षण की तरह समूचे मनोयोग की अपेक्षा करता है। चुटकी बजाते संग्रहित आदतों से छुटकारा पाना और देव-संस्कृति के ढाँचे में आपे को ढालना भी श्रम साध्य और समय साध्य है। इसके लिए चिन्तन तन्त्र को गम्भीरतापूर्वक सोचने एवं आत्मनिर्माण के सरंजाम इकट्ठे करने का अवकाश चाहिए। न केवल चिन्तन वरन् प्रयास परिश्रम की दृष्टि से भी बहुत कुछ करना होता है। इसकी सुविधा उन्हें ही मिल सकती हैं; जिनने अपनी बड़प्पन परक आकाँक्षाओं को सीमित करके, निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करते रहना ही पर्याप्त माना है। अमीरी और गरिमा को एक साथ प्राप्त कर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए सम्भव हुआ है।
मनुष्य की सामर्थ्य सीमित है वह एक निश्चित दिशा में ही अनवरत गति से चल सकती है। दो विपरीत में ही अनवरत गति से चल सकती है। दो विपरीत मार्गों पर एक साथ चल सकना भला किस प्रकार सम्भव हो सकता है? महत्वाकाँक्षाएँ यदि समृद्धि सम्पादन के लिए गगनचुम्बी बनी हुई हैं तो मनःतन्त्र का महत्वपूर्ण अंश उसी का ताना-बाना बुनेगा, फिर उसे आदर्शवादी निर्धारणाओं में उतनी रुचि रहेंगी न तत्परता, जितनी कि महानता के साधन जुटाने के लिए आवश्यक है। उथले प्रयासों के परिणाम भी उथले ही होते हैं। शौकिया स्तर की महानता सदा दिवास्वप्न ही बनी रहेगी। साधन न जुटे तो सफलता कैसी? मनोयोग की प्रखरता उत्पन्न हुए भी साधन और सहयोग का अभीष्ट परिणाम में मिल सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अक्षरशः सत्य है। महामानवों को अपनी आवश्यकताएँ घटानी और वैभवपरक महत्वाकाँक्षाएँ दबानी पड़ती हैं। मनोयोग एवं पुरुषार्थ की इस प्रकार की गई बचत ही महानता खरीदने के काम आती हैं।
आदतें हठीली होती हैं पर वे भी परिस्थितियाँ बदल जाने पर छूटती और नई ढलती रहती हैं। ठीक इसी प्रकार आकाँक्षा भी शाश्वत नहीं है वे समीपवर्ती लोगों के प्रभाव तथा मन मस्तिष्क को चिन्तन की सामग्री देने से बदलती रहती है। महत्वाकाँक्षाओं को आवश्यक, उपयोगी एवं शक्ति शाली माना गया है, पर यह बात तभी सच बैठती है जब उन्हें आदर्शवादिता के साथ नियोजित किया जाय। निष्कृष्टता के साथ जुड़ जाने पर भी पतन और पराभव का ही पथ-प्रशस्त करती हैं।
“सामान्यता लोक व्यवहार में काम आने वाली क्षमताओं का ही स्वरूप एवं महत्व समझा जाता है। मनुष्य इतना ही नहीं है। उसकी अपनी निजी दुनिया–निजी सम्पदा–निजी गरिमा भी है। ‘व्यक्तित्व’ इसी को कहते हैं। वह लोक व्यवहार में काम न आने पर भी इतना वजन दार हो सकता है कि अपनी प्राण ऊर्जा भर के वातावरण का परिशोधन और अनेकों को अनुदान दे सकने में समर्थ हो सके। ऋषि कल्प आत्माएँ इसी स्तर की होती हैं। उनकी यह वरिष्ठता किसी के द्वारा उपहार में मिली हुई नहीं वरन् स्व उपार्जित ही होती हैं। इस उपार्जन का एक ही आधार है–आत्म परिष्कार। आत्म परिष्कार का तात्पर्य कुसंस्कारों का निराकरण, प्रसुप्त महानता का जागरण एवं अभ्युत्थान ही समझा जाना चाहिए। इस प्रक्रिया का एक समग्र शास्त्र है–अध्यात्म विज्ञान उसी को कहते हैं।”
योग वाशिष्ठ में एक उपाख्यान इस प्रकार आता है। “बहुत समय पूर्व पद्म नाम का एक राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम शीला था। राजा और रानी में गहरी अनुरक्ति थी। शीला यह नहीं चाहती थी कि उसे कभी पति-वियोग सहना पड़े। वह माँ सरस्वती की उपासना करने लगी। प्रसन्न होकर ज्ञान की देवी प्रकट हुई और शीला से उन्होंने वर माँगने को कहा। शीला ने प्रार्थना की कि यदि उसके पति की मृत्यु पहले हो जाय तो भी पति की आत्मा उसके समक्ष बनी रहे। देवी सरस्वती यह वरदान देकर कि शीला जब भी स्मरण करेगी वह प्रकट हो जायेंगी और उसकी इस इच्छा की पूर्ति करेगी, अंतर्ध्यान हो गयी। कुछ समय बाद राजा की मृत्यु हो गयी। शोकातुर शीला ने वीणावादिनी का ध्यान किया। दिए गये वचन के अनुसार सरस्वती उपस्थित हुई। शीला ने पूछा कि उसके पति कहाँ हैं? देवी ने उत्तर दिया कि प्रत्यक्ष स्थूल सृष्टि के भीतर ही एक और सूक्ष्म सृष्टि है। उसके पति वही सूक्ष्म सृष्टि में निवास कर रहे हैं। शीला को देवी सरस्वती ने बताया कि एक जगत के भीतर दूसरा जगत और उसके भीतर तीसरा जगत इसी तरह यह सिलसिला अनन्त काल तक जारी है। एक सृष्टि के जीव दूसरी सूक्ष्म सृष्टि वाले जीवों को देख सकने में अक्षम हैं। पर साधना द्वारा विशिष्ट क्षमता अर्जित करके सूक्ष्मतम सृष्टियों में प्रविष्ट कर उनमें निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों का स्वरूप और व्यवहार देखा जा सकता हैं।”
उपाख्यान में वर्णन आता हैं कि ‘सूक्ष्मतर’ सृष्टि में प्रवेश करके पति की स्थिति को देखने की उत्कट इच्छा शीला ने व्यक्त की। देवी की कृपा से अन्य सृष्टि में विचरण करने वाले पति के सशरीर स्वरूप को उसने देखा।’ कुछ ही समय में कितनी ही योनियों और सृष्टियों में भ्रमण करने के लम्बे कथानक के साथ उपाख्यान की समाप्ति होती हैं। आख्यान में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य का रहस्योद्घाटन यह हुआ है कि प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाली सृष्टि के भीतर ही कितनी ही सूक्ष्मतर सृष्टियों का अस्तित्व विद्यमान है। जिसका बोध सामान्यतया मनुष्य को अपनी तन्मात्राओं तथा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा नहीं हो पाता।
मानवी ज्ञान की पकड़ सीमा विआयामिक विश्व तक है। दृश्य जगत लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई अथवा गहराई के अंतर्गत आता है। हमारी इन्द्रियों की बनावट भी ऐसी है कि वे तीन आयामों वाली स्थूल सृष्टि भर का अनुभव कर पाती हैं। सापेक्षवाद के जनक विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने दिक्−काल से परे चतुर्थ आयाम (फोर्थ डाइमेन्शन) की खोजकर विश्व के समक्ष एक नये रहस्य पर प्रकाश डाला। मूर्धन्य वैज्ञानिकों का मत हैं कि फोर्थ डाइमेन्शन में पहुँचने पर वस्तुओं का स्थूल स्वरूप दिखायी नहीं पड़ता। इस शृंखला में खो की एक रहस्यमय कड़ी यह जुड़ी हैं कि प्रत्येक पदार्थ के साथ प्रति पदार्थ जीव के साथ प्रति जीव तथा विश्व के एक प्रति विश्व का अस्तित्व भी है। एण्टीमैटर, एण्टी यूनीवर्स, एण्टी प्रोटान, एण्टी इलेक्ट्रान पर शोध करने वाले मूर्धन्य वैज्ञानिकों में पाल.ए. एम. डिराक, डॉ. स्नोडिंगर, डॉ. कार्ल डी. एण्डरसन, एमेलियों जी. सेगरे, ओवेन चेम्बन लेन, तथा पी. वाइपसीलेन्टिस का नाम उल्लेखनीय है। प्रति पदार्थ का अस्तित्व प्रमाणित होते ही अब यह सोचा जा रहा है कि न केवल पदार्थ का वरन् प्रत्येक संरचना का एक स्वतन्त्र प्रति स्वरूप विद्यमान होना चाहिए। किन्तु एक प्रश्न सहज ही उठता है कि पदार्थ, विश्व तो दीखता है पर प्रति पदार्थ, प्रति विश्व मानवी नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता। ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि प्रति जगत एवं सम्बन्धित पदार्थों एवं जीवधारियों का अस्तित्व चतुर्थ आयामिक अदृश्य सूक्ष्म सृष्टि में ही कहीं होना चाहिए।
कभी-कभी ऐसी विलक्षण घटनाएँ घटित होती है जो यह सोचने को बाध्य करती हैं कि अपने ही इर्द-गिर्द किसी रहस्यमय अदृश्य सृष्टि का अस्तित्व विद्यमान है, जो पदार्थों एवं जीवों को भी उदरस्थ कर लेती हैं। समय-समय पर देखते ही देखते पल मात्र में विलुप्त हो जाने वाले व्यक्तियों एवं पदार्थों की रहस्यमय घटनाएँ जिनका अब तक कुछ भी अता-पता मालूम न हो सका, उपरोक्त सम्भावना को और भी अधिक परिपुष्ट करता हैं।
ऐसी ही एक घटना 1856 में घटी। 650 फ्राँसीसी सैनिकों का एक ग्रुप निकटवर्ती जर्मन चौकी पर हमला करने के लिए आगे बढ़ रहा था। सभी सैनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे। अचानक हवा का एक हल्का-सा बवंडर आया और देखते ही देखते 55 सैनिक अदृश्य हो गये। बचे हुए ६०५ सैनिकों ने उस स्थान की एक-एक इंच भूमि देख डाली, पर उनका कुछ भी पता न लग सका। महीनों तक खोज-बीन चलती रही, पर निराशा ही हाथ लगी और एक भी सैनिक की जानकारी न मिल सकी।
सन् 1939 में चीन और जापान के बीच युद्ध चल रहा था। चीनी सेना की तीन हजार सैनिकों की एक टुकड़ी का पड़ाव नानकिंग नामक स्थान पर था। टुकड़ी का संपर्क वायरलैस द्वारा केन्द्र से निरन्तर बना हुआ था। एक दिन प्रातः अचानक यह संपर्क टूट गया। केन्द्रीय सैनिक कमांडर ने अविलम्ब सैनिकों की एक दूसरी टुकड़ी उक्त ग्रुप का पता लगाने के लिए भेजी। इस दस्ते ने आकर नानकिंग स्थान पर खोज-बीन की। सैनिकों के अस्त्र, शस्त्र, खाद्य, सामग्री, वस्त्र, बिस्तर सभी सामान वहाँ मौजूद थे, पर एक भी सैनिक का वहाँ पता न था। खोजी कुत्ते उक्त स्थान पर भेजे गये। वे वहाँ पहुँचकर भौंकते रहे पर कहीं आगे नहीं बढ़े। एक फर्लांग दूरी पर दो सैनिक सुरक्षा पहरे पर नियुक्त थे। उनसे पूछताछ की गई, पर उन्होंने किसी प्रकार के बाह्य आक्रमण आदि की पुष्टि नहीं की। इस घटना का फिर कोई पता न चला। इतने सारे सैनिक आखिर कहां काले गये कुछ भी पता न कल सका।
सन् 1920 में लन्दन के युवा पिक्टर ग्रेसर अपने एक मित्र के साथ दुकान से निकले। मार्ग में दोनों व्यक्ति राजनैतिक विषयों पर बातचीत करते हुए अपने निवास स्थल की ओर वापस लौट रहे थे। अकस्मात् मित्र के नेत्रों के सामने से ही पिक्टर ग्रेसर ओझल हो गये। आगे-पीछे चारों ओर मित्र ने देख डाला पर पिक्टर का दूर-दूर तक कोई पता नहीं था। जिस स्थान से वे विलुप्त हुए थे उसका भली-भाँति निरीक्षण कर लिया गया, पर कोई चिन्ह नहीं प्राप्त हो सका।
‘टेनेसा’ (अमेरिका) निवासी किसान डेविड लाग अपने दो मित्रों के साथ 23 सित. 1948 को सायंकाल घूमने निकला। तीनों मित्र साथ-साथ चल रहे थे। अचानक डेविड लाग गायब हो गये। उस स्थान पर मित्रों ने ध्यान से देखा कि शायद कोई खाई अथवा गड्ढा हो, किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था। भूमि समतल और कड़ी थी। जमीन में धँसने की भी कोई गुंजाइश न थी। ‘लाग‘ के दो मित्रों में से एक टेनेसी के प्रख्यात न्यायाधीश थे। घटना उनके नेत्रों के समक्ष ही घटी थी। अतएव किसी प्रकार के सन्देह की कोई गुँजाइश नहीं थी। उन्होंने अपने एक वक्तव्य में कहा कि–”यह एक अविश्वनीय किन्तु सत्य घटना है जिसका कोई समाधान ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता।”
जून 1979 में लन्दन की ‘श्रीमती क्रिस्टीन जान्टन’ नामक महिला ने वहाँ के न्यायालय में विवाह विच्छेद का एक अजीब मुकदमा दायर किया। याचिका में बताया गया था कि “उसके पति श्री एलन” के हवा में गायब हो जाने के कारण तलाक की अनुमति दी जाय ताकि वह दूसरा विवाह कर सके।” गायब होने की घटना इस प्रकार घटी। सन् 1975 में गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिए श्रीमती ‘क्रिस्टीन’ तथा उसके पति ‘श्री एलन’ उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर निकले। दोनों पति-पत्नी रूसी सीमा से लगे ‘लैपलैण्ड’ में स्थित एक गिरजा-घर के निकट से होकर गुजर रहे थे। शीतल वायु के हल्के-हल्के झोंके कल तहे थे। जिसका आनन्द लेते हुए वे दोनों आगे बढ़ रहे थे। अचानक साथ में चल रहे ‘एलन’ गायब हो गये। श्रीमती क्रिस्टीन ने उस स्थान को अच्छी तरह देख डाला पर एलन का कहीं पता-ठिकाना नहीं था। रूसी सेना का पड़ाव निकट था। खोजी कुत्ते तथा विशेषज्ञों का एक दल श्रीमती क्रिस्टीन की मदद हेतु वहाँ आया पर एलेन की कोई खबर नहीं मिल सकी।
‘मलीना’ की यू. पी. आई नामक प्रामाणिक समाचार एजेन्सी ने पूरी खोज−बीन करने के बाद एक समाचार प्रकाशित कराया कि–”कार्मेलियो क्लोजा” नामक एक बारह वर्षीय छात्र अनायास ही कभी−कभी अदृश्य हो जाता है। स्कूल से दो−दो दिन तक गायब हो जाना और पुनः वापस आ जाना–आरम्भ में तो यह समझा गया कि लड़का चकमा दे रहा है पर कितनी ही बार वह सहपाठियों के सामने ही नेत्रों से ओझल हो गया। उसका कहना था कि कोई समवयस्क परी जैसी लड़की उसे खेलने के लिए बुलाती है और अचानक वह रुई जैसा हल्का होकर सूक्ष्म जगत में जा पहुँचते है। उसे कितनी ही बार बन्द कमरे में पुलिस के पहरे के भीतर रखा गया पर चारों ओर से बन्द रहने पर भी उसका गायब होना रुका नहीं।
व्यक्तियों ही नहीं वस्तुओं के अदृश्य हो जाने के समाचार भी कितनी ही बार मिले है। फ्रांसीसी वैज्ञानिक ‘सेलारियर’ ने एक घटना का उल्लेख किया है कि “पेरिस में एक प्राचीन प्रतिमा थी। एक दिन पुरातत्ववेत्ता प्रतिमा का परीक्षण कर रहे थे कि वह अकस्मात हवा में ओझल हो गयी। अटलाँटिक महासागर का रहस्यमय क्षेत्र वारमूडा त्रिकोण वैज्ञानिकों के लिए अभी भी शोध का विषय बना हुआ है। एक सदी के भीतर उस स्थान से सैकड़ों की संख्या में विशालकाय जलपोत तथा वायुयान गायब हो चुके हैं और उनमें बैठे हजारों व्यक्तियों का आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका।
इन घटनाओं को देखते हुए विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक अब यह सोचने पर विवश हो गये है कि अपने ही इर्द−गिर्द किसी अदृश्य जगत का अस्तित्व मौजूद है जो दृश्य की तुलना में कहीं अधिक विलक्षण और सामर्थ्यवान है। भौतिकीविद् हर्बर्ट गोल्डस्टीन अपने शोध प्रबन्ध ‘प्रापेगेशम ऑफ शार्ट रेडियो वेव्स’ में लिखते हैं कि “प्रत्यक्ष दुनिया के भीतर ही सूक्ष्म अदृश्य जगत विद्यमान है जिसमें प्राणी और पदार्थ दोनों ही भरे पड़े है, पर वे मानवी नेत्रों से दिखायी नहीं पड़ सकते। किसी न किसी रूप में वह संसार हमसे भी जुड़ा हुआ है तथा प्रभावित भी करता है।” सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक “एच.जी.वेल्सन ने–”अपने फिक्सन उपन्यास दि इन विजिवल मैन” में मानव के भीतर उन सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला है जिसके द्वारा वह देश, काल के नियमों से परे अदृश्य लोक में पहुँच सकता है तथा उससे सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के डॉ.रॉबर्ट सिरगी अपने सहयोगियों के साथ ऐसे आधार खोजने में संलग्न है जिसके द्वारा पदार्थ के चौथे आयाम को देखना एवं समझ सकना सम्भव हो सके।
भारतीय ऋषियों ने सृष्टि में सात लोकों का वर्णन किया है जो एक से अधिक सूक्ष्मतर और शक्ति सम्पन्न है। भूः, भुव, स्वः जनः, तपः, सत्यम् लोकों का उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलता है। सर्वदृष्टा ऋषिगण इन लोकों में भी समय−समय पर आवागमन करते थे। देश, काल के बन्धन उन्हें नहीं बाँध पाते थे। देवर्षि नारद का लोक−लोकान्तरों में सदा भ्रमण करते रहने तथा उनमें वालों की खोज−खबर लेते रहने के कई आख्यान सुप्रसिद्ध है। ऋषियों की–योगियों की ऐसी सामर्थ्य का भी वर्णन मिलता है कि वे शरीर,एवं दिक्−काल के सभी बन्धनों को तोड़ कर अदृश्य हो जाते थे तथा अपने आप प्रकट भी हो जाते थे। प्राचीन और अर्वाचीन दोनों ही मान्यताओं से किसी ऐसे अदृश्य लोक का परिचय मिलता है जो दृश्य संसार की तुलना में कहीं अधिक विलक्षण है। उसमें पदार्थ और प्राणियों की एक विचित्र सृष्टि हो सकती है। सम्भव है उन जीवों की आकृति और प्रकृति भू−लोक पर निवास करने वाले जीवधारियों की तुलना में सर्वथा भिन्न हो। उनकी गतिविधियाँ एवं अभिरुचियों में भी भू−लोक के जीवधारियों से भारी भिन्नता हो सकती है। भूत, प्रेत, पितर, देवी−देवता जैसी कितनी ही रहस्यमय शक्तियों का परिचय समय−समय पर मिलता है। हो सकता है वे सभी उसी सूक्ष्म जगत में अपना अड्डा जमाये हुए हों और हमारे इर्द−गिर्द ही अदृश्य बने रहकर विचरण कर रहे हों, जिनकी अनुभूति हमारी इन्द्रियाँ न कर पाती हों।
निश्चित ही रहस्यों–विलक्षणताओं एवं सामर्थ्यों का भाण्डागार अदृश्य जगत अपने गर्भ में असीम सम्भावनाएँ छुपाये हुए हैं। भारतीय ऋषियों ने मानवी चेतना की शक्ति को भी असीम सम्भावनाओं से ओत−प्रोत माना है। विशिष्ट अध्यात्म साधनाओं द्वारा न केवल उस अदृश्य जगत से संपर्क साधा जा सकता है। वरन् उसमें सन्निहित विविध प्रकार की क्षमताओं तथा जीवधारियों को कल्याणकारी योजनाओ का माध्यम बनाया जा सकता है।
तपश्चर्या के चमत्कारी प्रतिफलों का अध्यात्म शक्ति में विशद वर्णन विवेचन किया गया है। उच्चस्तरीय तपश्चर्या में अधिक कठिन एवं कठोर तितिक्षाओं का भी समावेश है किन्तु यह नहीं समझा जाना चाहिए कि इससे कम के उपचार है ही नहीं। बड़े स्तर के प्रयास बड़े परिणाम उत्पन्न करते हैं तो छोटों के छोटे तो हो ही सकते हैं। चढ़ना तो हाथी पर, नहीं तो घोड़े का उपयोग ही न करने वाली नीति सही नहीं है। सर्वोपयोगी सर्वसुलभ मार्ग अपनाकर व्यापक सत्परिणाम उत्पन्न करना–कुछ लोगों के विशेषज्ञ बनने की अपेक्षा कहीं अच्छा है। कुछ लोगों को पहलवान, विद्वान पर धन केन्द्रित रहे इसकी तुलना में यह अधिक उपयुक्त है कि अधिक स्वस्थ बनाने की बात को प्रमुखता दी जाय।
सामान्य जीवन क्रम में संयम साधना को तपश्चर्या कहते हैं। उसके चार स्तर हैं (1) इंद्रिय संयम (2)अर्थ संयम (3) समय संयम (4) विचार संयम। अनगढ़, उच्छृंखल लोग स्वेच्छाचारियों की तरह जीवनयापन करते हैं। किन्तु जिन्हें भावना उत्कृष्टता की अवधारणा अभीष्ट है, वे चौरासी लाख योनियों के संचित कुसंस्कारों को निरस्त करने और दैवी विशेषताओं को अभ्यास में उतारने के लिए दुस्साहसों जैसे प्रबल प्रयत्न करते हैं। यही तपश्चर्या का सार संक्षेप।
(1) इन्द्रिय संयम–इन्द्रिय संयम में सर्वप्रथम जिह्वा पर नियंत्रण करना पड़ता है। वह स्वाद की प्रधानता देकर ऐसे पदार्थ खाती रहती है जो अनावश्यक ही नहीं हानिकारक भी है। स्वाद में मात्रा बढ़ती है। फलतः पेट खराब होता है और असंख्यों रोग उठ खड़े होते हैं। “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली उक्ति की सार्थकता अध्यात्म क्षेत्र वे हर अभ्यासी को विदित होगी अथवा जाननी चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सही सन्तुलित रखने के लिए औषधि उपचार से भी अधिक आहार चिकित्सा की आवश्यकता है उपवास को प्रतीक मानकर इन्द्रिय संयम के प्रथम चरण की तरह उसे अपनाया जाता है। साथ ही कटु, असत्य, पतनोन्मुख वचन बोलने से भी जिह्वा को रोका जाता है। इसके लिए मौन व्रत का अभ्यास भी स्वाद जप की तरह ही करना होता है।
जैसा खाये अन्न वैसा बने मन की उक्ति सर्वविदित है। आहार से रक्त माँस ही नहीं विचार संस्थान एवं अन्तःकरण भी प्रभावित होता है। चित्त की चंचलता, मनोविकार एवं काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे कषाय–कल्मषों को उभारने–अनीति की ओर अग्रसर करने में अनुपयुक्त आहार की प्रधान भूमिका रहती है। इसके विपरीत यदि सात्विक सुसंस्कृत अन्न औषधि रूप में लिया जाय तो उसकी प्रतिक्रिया मानसिक एवं आध्यात्मिक चिकित्सा की तरह अनेकों आधि−व्याधियों का निराकरण करती हैं।
ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच और कामेंद्रियां पाँच हैं। इन्द्रिय संयम में इन सभी की क्षमताओं को परिष्कृत सुनियोजित करना होता है ताकि शरीरगत मनोगत सामर्थ्य भण्डार के अपव्यय को रोककर उस प्रचण्ड क्षमता का संचय किया जा सके। इस संग्रह की आत्मधन सम्वर्धन के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित किया जा सके। उपवास का प्रभाव शरीर पर और ब्रह्मचर्य का मन पड़ता है, दोनों के समन्वय से शरीर बल और मनोबल की उभयपक्षीय आवश्यकता पूर्ण होती है।
जिह्वा को उपवास और मौन के अभ्यास से संयमित किया जाता है। दूसरे नम्बर की प्रबल इन्द्रिय है–जननेन्द्रिय। उसका मनोगत लिप्सा से सीधा सम्बन्ध है। काम को ‘मनसिज’ कहा गया है। वह सीधा मानसिक असंयम का प्रतीक है। जननेन्द्रिय के माध्यम से उस उत्तेजना का परिचय भर मिलता है। यह ब्रह्मचर्य ही है जिसमें रति कर्म को सीमाबद्ध करके शरीरगत जीवनी शक्ति के भण्डार की रक्षा करनी होती है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य का चिन्तन पक्ष भी ध्यान में रखना होता है। रूप–यौवन, हास–विलास एवं रति कर्म के कल्पना चित्र भी मानसिक उद्विग्नता उत्पन्न करने में असाधारण बाधक पहुँचाते हैं। इसलिए नर को नारी के प्रति और नारी को नर के लिए अश्लील चिन्तन से रोका जाता है। दोनों के मध्य स्वाभाविक स्नेह सहयोग को नीति मर्यादा के बन्धनों में जकड़ा जाता है। बहिन−भाई–माता−पुत्र–पुत्री−पिता का सम्बन्ध निभाता रहे तो दोनों के मध्य सहज सौजन्य बना रहेगा तो शरीरगत जीवनी शक्ति तथा मनोगत प्रतिभा शक्ति का क्षरण होने से बच जायेगा। यह पूँजी व्यक्तित्व के भौतिक और आत्मिक पथ को समान रूप से सुविकसित बनाने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होती है।
(2) अर्थ संयम–तपश्चर्या का दूसरा चरण है–अर्थ संयम। आत्मिक प्रगति के पथिक को अपव्यय करने की तनिक भी छूट नहीं है। प्रश्न यह नहीं कि पैसा अपना है या पराया। मेहनत से कमाया या मुफ्त में मिला है। हर हालत में उसे जीवनोपयोगी–समाजोपयोगी शक्ति मानी जानी चाहिए और एक−एक पैसे का मात्र सत्प्रयोजनों में ही उपयोग होना चाहिए।
भगवान ने मनुष्य को श्रम, समय, एवं मनोयोग की सूक्ष्म सम्पदाएँ दी हैं। इन्हें सुरक्षित रखने की–विनिमय की–सुविधा पैसे के माध्यम से होती है। इसलिए तथ्यतः धन को–श्रम समय का ही स्थूल रूप–प्रतीक प्रतिनिधि माना जाना चाहिए। जिस प्रकार समय का अपव्यय बुरी बात है उसी प्रकार धन की बर्बादी−फिजूल खर्ची भी अदूरदर्शिता की निशानी है।
बुद्धिमानी कमाने में मानी जाती है, पर वस्तुतः उसे परखना है तो अर्थ क्षेत्र में इस कसौटी पर जाँचा जाना चाहिए कि किस प्रकार कमाया गया और उसे किस निमित्त खर्च किया गया। सही तरीके से कमाना और सही कामों में खर्च करना ही लक्ष्मी का सम्मान है। उसका उपयोग दृष्टि प्रयोजनों के लिए नहीं होना चाहिए। दुर्व्यसनों में ही यही विलासिता के लिए अपनाई गई फिजूलखर्ची की अनैतिक अवाँछनीयता में सम्मिलित है। अनैतिक इसलिए कि जिस साधन सम्पदा का अपने लिये या दूसरों के लिए अतिमहत्वपूर्ण उपयोग हो सकता था उसे होली फूँकने या मुफ्त की लूट हड़पने के लिए जिस−तिस को दे मारने में हर दृष्टि से हानि है। जिन्हें उस सहायता की वास्तविक और अत्याधिक आवश्यकता होती है–वे वंचित रह जाते हैं और जो उसे पाकर दुरुपयोग करते–दुर्व्यसनों में निरत होते हैं उन्हें प्रोत्साहन देने से अनाचार बढ़ते हैं। यह दुहरी हानि हुई। सम्पत्ति दुधारी तलवार की तरह है वह आत्म रक्षा के लिए ही नहीं आत्मघात के लिए भी प्रयुक्त हो सकती है।
अर्ध सन्तुलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है–मितव्ययता। बजट बनाकर चलना। अनावश्यक खरीद में कुछ भी खर्च न होने देना। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाकर औसत भारतीय स्तर का निर्वाह कम अपनाना।
(3) समय संयम–मनुष्य की प्रमुख सम्पदा है–”काल बोध।” वह समय की गणना कर सकता है। साथ ही बुद्धि का उपयोग क्रमबद्ध दिनचर्या बनाने में कर सकता है। यही एकमात्र वह विशेषता है जिसके आधार पर विभिन्न प्रकार की भौतिक एवं आत्मिक विभूतियाँ सफलताएँ–सम्पदाएँ अर्जित कर सकना सम्भव होता है। समय का निर्धारण न किया जाय, उसके साथ श्रम एवं मनोयोग को जोड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि यह सम्पदा ऐसे ही आवारागर्दी में अस्त−व्यस्त होती रहेगी और कहने लायक कोई सफलता हाथ न लगेगी।
मनुष्य कितने दिन जिया इसका लेखा−जोखा इस प्रकार लेना चाहिए कितने समय का महत्वपूर्ण कार्यों में सदुपयोग किया गया। पेट प्रजनन तो शरीर के तकाजे हैं, जिन्हें हर प्राणी स्वभावतः करता रहता है। मनुष्य की दूरदर्शिता इसमें में कि वह इस सम्पदा का मूल्य समझे जिरावी हुण्डी के बदले संसार के बाजार में कुछ भी खरीदा जा सकता है। आद्य शंकराचार्य मात्र 32 वर्ष अधिक जीने का अवसर मिला, पर उनने उतने ही दिनों का तत्परतापूर्वक सदुपयोग करके वह लाभ अर्जित कर लिया जबकि दूसरे लोग सौ वर्ष जीकर भी कुछ न पा सकने की शिकायत करते–खीजते, खिजाते–हाथ मलते चले जाते हैं। यह अन्तर मात्र समय की महत्ता समझने न समझने का−उसे व्यवस्था बनाकर खर्च करने न करने भर का है। उस पौराणिक कथानक में सन्निहित तथ्य अक्षरशः सही है जिसमें रावण न काल को पाटी स बाँध कर उसे असीम वैभव प्रदान करने के लिए विवश कर दिया था। इस सचाई को सामान्य जन नहीं समझ पाते हैं और समय को जैसे−तैसे काट कर जिन्दगी के दिन पूरे करते रहते हैं। सफल और श्रेयाधिकारी महामानवों में प्रत्येक ने समय का महत्व समझा है और क्रमबद्ध दिनचर्या पर आरुढ़ रहकर–अपने एक−एक क्षण को हीरे मोतियों से तोलने लायक मानकर उसका सदुपयोग किया है। आलस्य प्रमाद को अपनाये रहने वाले अव्यवस्थित–अस्त−व्यस्त रीति से समय गुजरने वालों को हतभागी के अतिरिक्त और क्या कहा जाय। दुर्व्यसनों और कुकर्मों में निरत लोग तो एक प्रकार से अभिशप्त ही समझे जा सकते हैं।
(4) विचार संयम–चौथी तपश्चर्या है–विचार संयम। खाली समय में न जाने कितने अनगढ़, अनावश्यक अनैतिक विचार मस्तिष्क की झाड़ियों में वन्य पशुओं की तरह छिपे रहते हैं और उच्छृंखल उछल−कूद मचाते रहते हैं। धन एवं श्रम, समय की तरह ही विचार शक्ति को भी उच्चस्तरीय सम्पदा माना जाय और चिन्तन की एक−एक लहर को रचनात्मक दिशाधारा में प्रवाहित करने का जी तोड़ परिश्रम किया जाय। कुविचारों को सद्विचारों से काटने का महाभारत अहिर्निश जारी रखा जाय। विचारों के लिए उपयोगी मर्यादा एवं दिशाधारा निर्धारित की जाय जिनमें अभीष्ट प्रयोजन अथवा मनोरंजन के लिए परिभ्रमण करते रहने की छूट रहे। चिड़ियाघरों में जानवरों के लिए बाड़ा हाता है उन्हें घूमने−फिरने की छूट तो रहती है, पर उस बाड़े से बाहर नहीं जाने दिया जाय। ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भी बरती जाय। उसे जहाँ−तहाँ बिखरने न दिया जाय।
एकाग्रता की–मेडीटेशन की–ध्यान धारण की अध्यात्म क्षेत्र में बहुत चर्चा होती रहती है। अलंकारिता को छोड़ दिया जाय तो उसे विचार संयम ही कहना चाहिए। एक बिन्दु पर एक बिन्दु पर एकत्रित करने की समाधि साधना को मनःसाधना का अन्तिम चरण है। उसे सिद्धावस्था कहा जा सकता है। वस्तुतः व्यावहारिक एकाग्रता इतनी भर है कि किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य में इतनी तन्मयता सम्पादित करली जाय कि उस परिधि से बाहर की किसी बात की ओर ध्यान ही न जाय, मन ही न चले। वैज्ञानिक, कलाकार, आदि अपने−अपने विषय का ऐसा ही एकाग्रता का अभ्यास कर लेते हैं।
तपश्चर्या के मूलभूत सिद्धान्त दो हैं एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियाँ का उन्मूलन। दूसरा सत्प्रवृत्तियों की जीवन चर्या में समावेश करने के लिए प्रबल पराक्रम। इस मार्ग में अभ्यस्त आदतें–प्रचलन की परम्पराएँ तथा संपर्क क्षेत्र की प्रतिकूलताएँ एवं परिस्थितियों की विपन्नताएँ कई प्रकार की अड़चनें उत्पन्न करती हैं। उनसे जूझने और प्रगति−पथ पर अग्रसर होने का साहस जुटाने का प्रयत्न पुरुषार्थ करना पड़ता है–वही तप है। तपस्वी ही सिद्ध पुरुष बनते हैं–असामान्य सफलताओं का वरण करते हैं इसमें सन्देह नहीं।
कर्म फल ऐसी सचाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार ही करना होगा। यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की श्रृंखला से जकड़ी हुई है। किया की प्रतिक्रिया का नियम कण−कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग−पग पर होता है।
भूतकालीन कृत्यों के आधार पर वर्तमान बनता है और वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसी के अनुरूप भविष्य बनता चलता है। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या और स्वास्थ्य सम्पदा जीवन में बलिष्ठता एवं सम्पन्नता बनकर सामने आती है। जीवन का सदुपयोग दुरुपयोग−बुढ़ापे के जल्दी या देर से आने−देर तक जीने या जल्दी मरने के रूप में परिणति होता है। वृद्धावस्था की मनःस्थिति संस्कार बनकर मरणोत्तर जीवन के साथ जाती है और पुनर्जन्म का रूप में अपनी परिणित प्रकट करती है।
यही प्रक्रिया संसार की समस्त गतिविधियों में दृष्टिगोचर होती है। जीवन के हर क्षेत्र में अपने प्रभाव का परिचय देती है। आज की परिस्थितियों के सम्बन्ध में पिछले आलस्य या उत्साह को श्रेय दिया जा सकता है। सत्कर्मों एवं दुष्कर्मों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे देर−सबेर में अपनी परिणति प्रस्तुत किए बिना रहते ही नहीं। वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसमें पिछले कृत्यों की ही प्रधान भूमिका रहती है।
कुछ कर्म तत्काल फल देते है, कुछ की परिणति में विलम्ब लगता है। व्यायामशाला, पाठशाला, उद्योग−शाला के साथ सम्बन्ध जोड़ने के सत्यपरिणाम सर्वविदित है, पर वे उसी दिन नहीं मिल जाते, जिस दिन प्रयास आरम्भ किया गया था। कुछ काम अवश्य ऐसे होते है, जो हाथों−हाथ फल देते है। मदिरा नशा हो जाता है भूसा दिन−भर परिश्रम करते ही शाम को मजदूरी मिलती है। टिकट खरीदते ही सिनेमा का मनोरंजन चल पड़ता है। ऐसे भी अनेकों काम है, पर सभी ऐसे नहीं होते। कुछ काम निश्चय ही ऐसे है, जो देर लगा लेते है। असंयमी लोग जवानी में खोखले बनते रहते है, उस समय कुछ पता नहीं चलता। दस−बीस वर्ष बीतने नहीं पाते कि काया की जर्जरता अनेक रोगों से घिर जाती है।
समय−साध्य परिणतियों को देखकर अनेकों को कर्म−फल पर अविश्वास होने लगता है। वे सोचते हैं कि आज का प्रतिफल हाथों−हाथ नहीं मिला तो वह कदाचित भविष्य में भी कभी नहीं मिलेगा। अच्छे काम करने वाले प्रायः इसी कारण निराश होते और बुरे काम करने वाले अधिक निर्भय−निरंकुश बनते हैं। तत्काल फल न मिलने की व्यवस्था भगवान् ने मनुष्य की दूरदर्शिता –विवेकशीलता को जाँचने के लिए ही बनाई है। अन्यथा वह ऐसा भी कर सकता था कि झूँठ बोलते ही मुँह में छाले भर जांय। चोरी करने वाले के हाथ में दर्द होने लगे। व्यभिचारी तत्काल नपुँसक बन जाय। यदि ऐसा रहा होता तो आग में हाथ डालने से बचने की तरह लोग पाप कर्मों से भी बचे रहते और दीपक जलाते ही रोशनी की तरह पुण्य फल का हाथों−हाथ चमत्कार देखते। पर ईश्वर को क्या कहा जाय। उसकी भी तो अपनी मर्जी और व्यवस्था है। सम्भवतः मनुष्य की दूरदर्शिता विकसित करने एवं परखने के लिए ही इतनी गुंजाइश रखी है कि वह सत्कर्मों और दुष्कर्मों का प्रतिफल विलम्ब से मिलने पर भी अपनी समझदारी के आधार पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए आज की गतिविधियों को अनुपयुक्तता से बचाने और सत्साहस को अपनाने में जो अवरोध आते हैं, उन्हें भी धैर्यपूर्वक सहन करे।
कर्म फलित होने में देर लगाते हैं। हथेली पर सरसों उगाई जा सकती है। जौ बोने से दस दिन में ही उनके अंकुर छः इंच ऊँचे उग आते हैं। किन्तु जिनका जीवन लम्बा हो, जो चिरस्थायी हैं, उनके बढ़ने और प्रौढ़ होने में देर लगती है। नारियल की गुठलर बो देने पर भी एक वर्ष में अंकुर फोड़ती है और वर्षा में धीरे−धीरे बढ़ती है। बरगद का वृक्ष ही देर लगाता है। जब कि अरंड का पेड़ कुछ ही महीनों में छाया और फल देने लगता है। हाथी जैसे दीर्घजीवी पशु, गिद्ध जैसे पक्षी, ह्वेल जैसे जलचर अपना बचपर बहुत दिन में पूरा करते हैं, जबकि खरगोश जैसे छोटे प्राणी एक वर्ष में ही बच्चे पैदा करने लगते हैं। मक्खी, मच्छरों का बचपन और यौवन बहुत ही जल्दी आता है पर वे मरते भी उतने ही जल्दी है। शारीरिक और मानसिक परिश्रम का, आहार−विहार का, व्यवहार शिष्टाचार का प्रतिफल हाथों−हाथ मिलता रहता है। उनकी उपलब्धियाँ सामयिक होती है, चिरस्थायी नहीं। स्थायित्व नैतिक कृत्यों में होता है, उनके साथ भाव−सम्वेदनाएँ और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं। जड़े अन्तरंग की गहराई में धँसी रहती है, इसलिए उनके भले या बुरे प्रतिफल भी देर में मिलते हैं और लम्बी अवधि तक ठहरते है। इन कर्मों के फलित होने में प्रायः जन्म−जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है।
अन्तःकरण की संरचना दैवी−तत्वों से हुई है। उसमें स्नेह−सौजन्य−सद्भाव−सच्चाई जैसी सत्प्रवृत्तियाँ ही भरी पड़ी है। जीवन−यापन की रीति−नीति उत्कृष्टता के आधार पर बनाने की प्रेरणा इस क्षेत्र में अनायास ही मिलती रहती है।
इस क्षेत्र में जब निकृष्टता प्रवेश करती है, तो उसकी प्रतिक्रिया असहज होती है। रक्त में जब बाहरी विजातीय तत्व प्रवेश करते है, तो श्वेत कण उन्हें मार भगाने के लिए प्राण−पण से संघर्ष छेड़ते हैं और परास्त करने में कुछ उठा नहीं रखते। ठीक इसी प्रकार अन्त करण की दैवी चेतना की आसुरी दुष्प्रवृत्तियों को जीवन सत्ता में प्रवेश करने और जड़ जमाने की छूट नहीं देना चाहती। फलतः दोनों के बीच संघर्ष छिड़ जाता है। यही अन्तर्द्वन्द्व है, जिसके बने रहते आन्तरिक जीवन उद्विग्न–अशान्त ही बना रहता है और उस विक्षोभ की अनेक दुःखदायी प्रतिक्रियाएँ फूट−फूटकर बाहर आती रहती है।
दो साँड लड़ते हैं, तो लड़ाई की जगह को तहस−नहस करके रख देते है। खेत में लड़े तो समझना चाहिए कि उतनी फसल चौपट ही हो गई। दुष्प्रवृत्तियाँ जब भी जहाँ भी अवसर पाती है, वहीं घुसपैठ करने, जड़−जमाने में चूकती नहीं। घुन की तरह मनुष्य को खोखली करती है और चिनगारी की तरह चुप−चुप सुलगती हुई अन्त में सर्वनाशी ज्वाला बनकर प्रकट होती है। ठीक इसी प्रकार दुष्प्रवृत्तियाँ आत्म−सत्ता पर आधिपत्य जमाने के लिए कुचक्र रचती रहती है, किन्तु अन्तरात्मा को यह स्थिति सह्य नहीं, अस्तु वह विरोध पर अड़ी ही रहती हैं। फलतः संघर्ष चलता ही रहता है और उसके दुष्परिणाम अनेकानेक शोक−सन्तापों के रूप में सामने आते रहते है।
मनोविज्ञानी इस स्थिति को ‘दो व्यक्तित्व’ कहते है। एक ही शरीर में भले−बुरे व्यक्तित्व शान्ति−सहयोग पूर्वक रह नहीं सकते। कुत्ते बिल्ली की–साँप नेवले की–दोस्ती कैसे निभे? शरीर में ज्वर या भूत घुस पड़े तो कैसी दुर्दशा होती है, इसे सभी जानते हैं। नशेबाजी की दयनीय स्थिित देखते ही बनती है। यह परस्पर विरोधी शक्तियों का एक स्थान पर जमा होना ही है, जिसमें विग्रह की स्वाभाविकता टाली नहीं जा सकती।
आत्मा को कितना ही कुचला जाय वह न मरने वाली है और न हार मानती है। अनसुनी–उपेक्षित पड़ी रहने पर भी अन्तरात्मा की विरोधी आवाज उठती ही रहती है। दुष्कर्म करते समय जी धड़कता और पैर काँपते हैं। यह स्थिति कितनी ही दुर्बल क्यों न कर दी जाय, उसका अस्तित्व बना ही रहेगा और झंझट तब तक चलता ही रहेगा, जब तक दुष्प्रवृत्तियाँ उस घुस−पैठ से अपना पैर वापस न लौटा लें।
अन्तर्द्वन्द्व जीवन की शान्ति और सुव्यवस्था को नष्ट करते हैं। प्रगति पथ अवरुद्ध करते हैं और भविष्य को अंधकारमय बनाते है। पापों की परिणति से किसी भी बहाने बचा नहीं जा सकता। यह शारीरिक−संविधान की सामान्य क्रिया पद्धति हुई। इसके अतिरिक्त समाजगत, प्रकृतिगत एवं ईश्वरीय व्यवस्था के और भी ऐसे कितने ही आधार हैं जिनके कारण कुमार्गगामी को अपने दुष्कृत्यों के दण्ड अनेक प्रकार से भुगतने के लिए विवश होना पड़ता है। राजदण्ड की व्यवस्था इसीलिए है कि दुष्कर्मों की आवश्यक रोक−थाम की जा सके और अनीति बरतने वालों को उनकी करतूतों का मजा चखाया जा सके। पुलिस, कचहरी, जेल, फाँसी आदि की शासकीय दण्ड व्यवस्था का अस्तित्व मौजूद है। चतुरता बरतने पर भी लोग अक्सर उसकी पकड़ में आ जाते हैं और आर्थिक, शारीरिक, मानसिक दण्ड भुगतते हैं, बदनामी सहते और नागरिक अधिकारों से वंचित होते है।
इतने पर भी पीछा नहीं छूटता। शारीरिक ‘व्याधि’ और मानसिक ‘आधि’ उन्हें घेरती है और तिल−तिल करके रेतने, काटने जैसा कष्ट देती है। शरीर पर मन का अधिकार है। अचेतन मन के नियन्त्रण में आकुँचन−प्रकुँचन, निमेष−उन्मेष, श्वास−प्रश्वास, रक्त −संचार, ग्रहण−विसर्जन आदि अनेकों स्वसंचालित समझी जाने वाली गतिविधियाँ चलती है। चेतन मन की शक्ति से ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ काम करती है। शरीर तभी तक जीवित है जब तक उसमें चेतना का अस्तित्व है। प्राण निकलते ही शरीर सड़ने और नष्ट होने लगता है। चेतना का केंद्र संस्थान मस्तिष्क है। मन के रूप में ही हम चेतना का अस्तित्व देखते एवं क्रिया−कलापों का अनुभव करते हैं। यह संस्थान−मनोविकारों से–पाप−ताप एवं कषाय−कल्मषों से विकृत होता है तो उसका प्रभाव शारीरिक आरोग्य पर भी पड़ता है और मानसिक सन्तुलन पर भी। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों का निष्कर्ष यह है कि बीमारियों का केन्द्र पेट या रक्त में न होकर मस्तिष्क में रहता है। मन गड़बड़ाता है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। बीमारियों की नित नई शोध होती है और उनके लिए आये दिन एक से एक प्रभावशाली उपचार ढूँढ़े जाने की घोषणाएँ होती है। अस्पताल तेजी से बढ़ रहे है और चिकित्सकों की बाढ़ आ रही है आधुनिकतम उपचार भी खोजे जा रहे हैं, इतने पर भी स्वास्थ्य समस्या का कोई उपयुक्त समाधान निकल नहीं रहा है। तात्कालिक चमत्कार की तरह दवाएँ अपना जादू दिखाती तो है, पर दूसरे ही क्षण रोग अपना रूप बदलकर नई आकृति में फिर सामने आ खड़े होते है। यह स्थिति तब तक बनी ही रहेगी जब तक कि मानसिक विकृतियों के फलस्वरूप नष्ट होने और अगणित रोग उत्पन्न होने के तथ्य को स्वीकार नहीं कर लिया जाता।
न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों की भी इन दिनों बाढ़ आई हुई है। शिर दर्द, आधाशीशी, जुकाम अनिद्रा, उन्माद, बेहोशी के दौरे आदि तो प्रत्यक्ष और प्रकट मस्तिष्कीय रोग है। चिन्ता, भय, निराश आशंका, आत्म−हीनता जैसे अवसाद और क्रोध, अधीरता, चंचलता, उद्दण्डता, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रमण जैसे आवेश मनःसंस्थान को ज्वार−भाटों की तरह की तरह असन्तुलित बनाये रहते हैं। फलतः मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग निरर्थक चला जाता है एवं अनर्थ बुनने में लगा रहता है। अपराधी दुष्प्रवृत्तियों से लेकर आत्म−हत्या तक की अगणित उत्तेजनाएँ विकृत मस्तिष्क के उपार्जन ही तो है। तरह−तरह की सनकों से कितने ही लोग समकते रहते हैं और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते है। दुर्व्यसनों और बुरी आदतों से ग्रसित व्यक्ति अपना तथा अपने साथियों का कितना अहित करते हैं, यह सर्वविदित है। पागलों की संख्या तो संसार में तेजी के साथ बढ़ ही रही हैं। मनोविकार ग्रसित, अर्ध विक्षिप्त लोगों की गणना की जाय तो आधी से अधिक जनसंख्या इसी चपेट में आई हुई दिखाई पड़ेगी। शारीरिक रोगों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से सर्वथा अछूते व्यक्ति बहुत ही स्वल्प संख्या में मिलेंगे। जिन्हें शारीरिक एवं मानसिक रोगों से सर्वथा मुक्त पूर्ण निरोग कहा जा सके, ऐसे लोगों को ढूँढ़ निकालना इन दिनों अतीव कठिन है।
रंगाई से पूर्व धुलाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला−कुचैला हैं, तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रँगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए–उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए, जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग−पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय−कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म−शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित्त−विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर−शोधन के लिए नेति–धोति, वस्ति, न्योलि, कपाल–भाति क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम−नियमों के रूप में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका−चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई करली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण−कर्म स्वभाव को सुधारा जाय और पिछले जमा कूड़े−करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के काया−कल्प विधान में वमन−विरेचन, स्वेदन, स्नेह आदि कृत्यों द्वारा पहले मल−शोधन किया जाता है तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म−साधना के सम्बन्ध में भी आत्म−शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
आज की अपनी दुःखद परिस्थितियों के लिए भूतकाल की भूलों पर दृष्टिपात किया जा सकता है। इसी प्रकार सुखी−समुन्नत होने के सम्बन्ध में भी पिछले प्रयासों को श्रेय दिया जा सकता है। इस पर्यवेक्षण का सीधा निष्कर्ष यही निकलता है कि अशुभ विगत को धैर्यपूर्वक सहन करें या फिर उसका प्रायश्चित करके परिशोधन की बात सोचें। शुभ पूर्वकृतों पर सन्तोष अनुभव करें और उस सत्प्रवृत्ति को आगे बढ़ायें। यह नीति-निर्धारण की बात हुई। अब देखना यह है कि यदि आधि-व्याधियों के रूप में अशुभ कर्मों की काली छाया सिर पर घिर गई है, तो उसके निवारण का कोई उपाय है क्या?
जो कर्मफल पर विश्वास न करते हों, उन्हें भी मानवी अन्तःकरण की संरचना पर ध्यान देना चाहिए और समझना चाहिए कि वहाँ किसी के साथ कोई पक्ष-पात नहीं। पूजा-प्रार्थना से भी दुष्कर्मों का प्रतिफल टलने वाला नहीं। देव दर्शन तीर्थ-स्नान आदि से इतना ही हो सकता है कि भावनाएँ बदलें। भविष्य के दुष्कृतों की रोक-थाम बन पड़े। अधिक बिगड़ने वाले भविष्य की सम्भावना रुके। पर जो किया जा चुका, उसका प्रतिफल सामने आना ही है। उसका उपचार शास्त्रीय परम्परा और मनःसंस्थान की संरचना को देखते हुए, इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि खोदी हुई खाई को पाटा जाय। प्रायश्चित्त के लिए भी वैसा ही साहस जुटाया जाय, जैसाकि दुष्कर्म करते समय मर्यादा उल्लंघन के लिए अपनाया गया था। यही एक मात्र उपचार है, जिससे दुष्कर्मों के उन दुःखद प्रतिक्रियाओं का समाधान हो सकता है, जो शारीरिक रोगों, मानसिक विक्षोभों, विग्रहों, विपत्तियों, प्रतिकूलताओं के रूप में सामने उपस्थित होकर जीवन को दूभर बनाये दे रही है। यह विषाक्तता लदी ही रही, तो भविष्य के अन्धकारमय होने की भी आशंका है। अस्तु प्रायश्चित्त प्रक्रिया को अपनाकर वर्तमान और भविष्य को सुखद बनाना ही दूरदर्शिता है।
अध्यात्म क्षेत्र के सम्बन्ध में एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है–उपचार अनुष्ठानों को बाजीगरी स्तर की चमत्कारी प्रक्रिया माना और कुछ क्रिया−कृत्य करने के उपरान्त तरह−तरह के अद्भुत दृश्य देखने, ऋद्धि सिद्धियाँ टपक पड़ने की आशा लगाना। आमतौर से लोग मन्त्र−तन्त्र इन्हीं उद्देश्यों के लिये अपनाते हैं, जब वैसी कुछ बाजीगरी कौतुक−कौतूहल नहीं दीखते तो उछलते−मचलते तमाशे के लालच में इकट्ठे हुए बच्चे उदास मन से घर लौट पड़ते और उस मजमे को खरी−खोटी सुनाते हैं, आज यही स्थिति समूचे धर्मक्षेत्र की है, अध्यात्म इन्हीं भ्रान्तियों के गली−कूचों में भटक रहा है, अविश्वासों आक्षेप करें तो बात समझ में भी आती है, पर जब विश्वासी और प्रयोक्ता भी जी चुराने लगें, पीछा छुड़ाने लगें ओर अविश्वास असन्तोष व्यक्त करने लगें तो समझना चाहिए कहीं दाल में काला अवश्य है।
चान्द्रायण−कल्प को अन्तर्मुखी रहने और अन्तःक्षेत्र का पुनर्निर्माण करने के लिए उपलब्ध एक असाधारण सौभाग्य माना जाना चाहिए। ऐसा सौभाग्य जैसा कि माता के गर्भकाल में निवास करने का होता है। उन दिनों समाधिस्थ होकर गुफा−सेवन जैसा सुअवसर मिलता है। एकान्त−एकाग्रता को बन्दी−गृह नहीं, भविष्य निर्धारण की योजना बनाने में बरती गई वैज्ञानिकों जैसी लक्ष्यवेधी तत्परता ही समझा जाना चाहिए।
भव−बन्धनों की जकड़न भरे निरन्तर जलाने वाले नरक का और उत्कृष्टता के उन्मुक्त आकाश का आनन्द देने वाले स्वर्ग का दरवाजा बिल्कुल पास है। दोनों में से किसी में भी घुस पड़ने की मनुष्य को पूरी−पूरी छूट है। इस चुनाव में हर किसी को परिपूर्ण सुविधा है। प्रवेश के बाद तो परिस्थितियों का सामना करने की विवशता रहेगी ही, पर स्वेच्छाचार में कहीं कोई व्यवधान−अवरोध नहीं है। है तो उतना ही जितना कि प्रसव काल में बन्धन तोड़ने और उन्मुक्त आकाश का आनन्द लेने के लिए व्याकुल भ्रूण के सामने रहता है। चान्द्रायण को प्रसवकाल कहा जाय तो हर्ज नहीं। उसे अन्धकार और प्रकाश का मध्यवर्ती प्रभात भी कह सकते हैं। जो ऐसा सोच सकें,उनके लिए चान्द्रायण कल्पकाल है, अन्यथा कुछ दिन के लिए जलवायु बदलने–नई परिस्थितियों में जाकर ऊब हटाने का कौतुक−कौतूहल ही उसे समझा जायेगा। प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में भी उपवास की प्रायः ऐसी ही विधि व्यवस्था रहती है। वहाँ भी कितने ही लोग उपचार प्रयोजनों के लिए पहुँचते हैं। बहुत हुआ तो कुछ इस प्रकार की बात सोची जा सकती है। पाप प्रायश्चित्त तो पुण्य का अवलम्बन लेने से होता है, पर कई व्यक्ति छुटपुट कर्मकाण्डों से ही वह कार्य सस्ते मोल में सम्पन्न हो जाने की बात सोचते हैं। ऐसे लोगों के लिए चान्द्रायण साधना कुछ मन बहलाव उत्पन्न कर सकती हैं। किन्तु वास्तविक लाभ उन्हें ही मिलेगा जो इस वातावरण–तप साधना एवं परिवर्तन पर्व का लाभ उठाकर अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यही है वह क्षेत्र जिसमें प्रवेश करने और खोदने−कुरेदने के उपरान्त महामानवों को विभूतियों का हस्तगत हुआ है।
उपवास, अनुष्ठान, स्वाध्याय, सत्संग, विशिष्ट साधना उपक्रम, दिनचर्या अनुशासन आदि की निर्धारित विधि−व्यवस्था का परिपालन करते हुए साधकों को अपना चिन्तन इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए कि अन्तःक्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए क्या सोचना चाहिए क्या बदलना चाहिए और क्या कर गुजरने के लिए साहस जुटाना चाहिए। इस निर्धारण में निश्चय ही उपवास−अनुष्ठान एवं तप−साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।
इन दिनों भौतिक चिन्ताओं, आकाँक्षाओं–स्मृतियों से जितना विरत रहा जा सके उतनी ही आत्म−चिन्तन में सुविधा रहेगी। जिनका मन परिवार व्यवसाय में ही पड़ा रहेगा, वे दूर रहने के कारण कुछ कर तो सकेंगे नहीं, उल्टे चान्द्रायण काल में विकसित होने वाली पवित्रता−प्रखरता की दोनों उपलब्धियों से वंचित रखने वाले दुर्भाग्य−दुश्चिन्तन अकारण सिर पर लादे रहेंगे। इसलिए उचित यही है कि कुछ समय के लिए अपने को अभ्यस्त ढर्रे से विरक्त, वैरागी, संन्यासी बना लिया जाय। यह समय उसी स्तर का जीवनयापन करने में व्यतीत किया जाय। चान्द्रायण की सारी दिनचर्या एवं विधिव्यवस्था योगी−तपस्वी स्तर की है, फिर उसके साथ उसी स्तर का मनोयोग भी क्यों न जोड़ा जाय। शरीर कहीं मन कहीं की विसंगति बनी रही तो उस लक्ष्य की उपलब्धि कैसे हो सकेगी जिसकी आशा अपेक्षा की गई है। भूखा रहकर भगवान से मनमर्जी पूरी करा लेने वाला ‘ब्लैक−मेंलिग, तो करना नहीं–करना हो तो चलता नहीं है। ऐसी दशा में उचित–उपयुक्त यही है कि शरीर चर्या की तरह विचारणा में प्रज्ञा का और अन्तरात्मा में श्रद्धा का उच्चस्तरीय समावेश करने का प्रचण्ड पुरुषार्थ किया जाय। मन उचाटने वाली कुसंस्कारिता को तपस्वी जैसा मनोबल अपनाकर दबाया−दबोचा जाय।
जीवन का कल्प−वृक्ष, उसका दूरदर्शितापूर्ण सदुपयोग−परिवर्तनों का निर्धारण, निर्धारणों का क्रियान्वयन−क्रियान्वयनों को संकल्पपूर्वक अपनाये रहने का साहस−अवरोधों की सम्भावना और उसका निराकरण−परिवर्तन के फलस्वरूप विनिर्मित होने वाला उज्ज्वल भविष्य–यही हैं वे विषय जिन पर उलट–पुलटकर चिन्तन प्रक्रिया को इन दिनों नियोजित रखा जाना चाहिए। यह प्रयास विशुद्ध ध्यान−धारणा भर है। वास्तविक ध्यान−धारणा निर्धारित विषय पर वैज्ञानिकों की तरह तन्मय हो जाने को कहते हैं। तन्मयता अर्थात् रुचिपूर्वक अभीष्ट प्रसंग पर समूचा मनोयोग केन्द्रीभूत रखे रहना। उसी क्षेत्र की अगणित समस्याओं को समझने, समाधान करने में अत्यधिक व्यस्त रहना। ध्यान का तत्वदर्शन यही है। चान्द्रायण साधक आत्म−समीक्षा, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास के चतुर्विधि उत्कर्ष प्रसंगों में निरत रहे, तो समझना चाहिए, कि योगी तपस्वियों के लिए नितान्त आवश्यक ध्यान धारणा का लाभ भी ले रहे हैं।
भावी जीवन की रूपरेखा इन्हीं दिनों बना लेनी चाहिए। साधनाकाल की छुट−पुट समस्याओं का समाधान तो सूत्र−संचालकों के परामर्श−सहयोग से सहज ही पूरा होता रह सकता है। आहार−विहार सम्बन्धी कोई असुविधा हो तो उसका हल निकलने में आवश्यक संकोच के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। उसका अधिक महत्व भी नहीं है। महत्व इस बात का है कि भविष्य निर्धारण क्या हुआ–उसकी रूपरेखा क्या बनी अवरोधों से निपटने की सूझ बूझ किस स्तर तक उभरी–परिवर्तित दिव्य जीवन के लिए व्रतशील रहने का साहस किस सीमा तक परिपक्व हुआ? इन सारे प्रसंगों पर इन दिनों जितना अधिक मन्थन किया जायेगा, उज्ज्वल भविष्य की रूप रेखा उसी अनुपात से बनती और सुनिश्चित होती चली जायेगी।
प्रमुख प्रश्न एक ही है–जीवन सम्पदा की समस्त पूँजी लोभ−मोह और दर्प के त्रिविधि असुरों के कब्जे में पड़ी रहने दी जाय या उनसे कुछ बचाकर आत्म−कल्याण एवं ईश्वर की आशा पूरी करने में भी लगाने का मार्ग निकाल जाय? यदि निकृष्टता ही जीवन का अविच्छिन्न अंग बन गई हो तब तो बात दूसरी है अन्यथा सोचना यह पड़ेगा कि समय, श्रम, चिन्तन, प्रतिभा, सम्पदा जैसे ईश्वर प्रदत्त अनुदानों का सीमित अंश ही निर्वाह−परिवार के लिए खर्च किया जाय। अनिवार्य की पूर्ति ही दृष्टि में रहे तो उपरोक्त सम्पदाओं में से प्रत्येक को उत्साहवर्धक मात्रा में बचाया जा सकता है। इस बचत को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाने पर ही ईश्वर के खेत में पुण्य−परमार्थ बोने और उससे हीरे−मोतियों की फसल उगाने का अवसर मिल सकता है। अनुपयुक्त में कटौती और उपयुक्त के लिए श्रद्धांजलि का एक ही उपक्रम है जिसे अपनाकर महानता की दिशा में बढ़ सकना किसी के लिए सम्भव हुआ है। पूजापाठ से देवताओं को रिझाने और उनकी टोपी, चप्पल उतार लेने का जाल बुनते रहने वाले दिग्भ्रान्तों की पंक्ति में चान्द्रायण के विवेकवान साधकों में से किसी को भी नहीं बैठना है।
कटौती की बचत ही प्रभु समर्पण के काम आती है। इसी से तप और योग का प्रयोजन पूर्ण होता है और आत्मिक प्रगति सम्भव होती है। अपनी समग्र सम्पदाओं का विभाजन−नियोजन करना ही आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है। अध्यात्म के नाम पर प्रचलित छुट−पुट कर्मकाण्डों को हमें आकाश−पाताल जैसा महत्व नहीं देना चाहिए। वे जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने वाली विवेकशीलता एवं साहसिकता उत्पन्न करने वाले नगण्य से व्यायाम निर्देशन मात्र है। उन्हीं को जो साधना मान बैठेंगे, वे किसी दिन तिल का ताड़ मान बैठने वाली अपनी भूल का निश्चय पश्चात्ताप करेंगे। (1) उपासना–परमात्मा की–अर्थात् आदर्शों के लिए आत्म समर्पण की श्रद्धा−भावना। (2) साधना–अन्तरात्मा की। जीवन देवता की। जिसमें कुसंस्कारों से जूझने और सद्गुणों को अभ्यास में उतारने वाला पराक्रम। (3) आराधना– विश्वात्मा की। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए किया–बरता गया संयम और उदार−अनुदान–यही है संक्षेप में आत्मिक प्रगति की त्रिवेणी जिसमें अवगाहन करने वाले सत्यं शिवं−सुन्दरम्–की पग−पग पर अनुभूति करते हैं। यह सब किस प्रकार बन पड़े–इसका निर्णय महाप्रज्ञा के सहारे ही हो सकता है। अभ्यस्त संकीर्णता तो इसमें कितने ही छद्म रचने और व्यवधान उत्पन्न करने में ही निरत रहती है।
जीवन−साधना मध्यवर्ती मेरुदण्ड है। उसी के साथ उपासना, आराधना जुड़ी हुई है। पापों का प्रायश्चित मात्र उपवास भर से नहीं होता, परिशोधन के लिए जीवन साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।
चान्द्रायण पूर्ण होने पर घर वापिस पहुँचने पर हर साधक को इस रूप में बदलकर जाना है मानो वहाँ पहुँचते ही संपर्क क्षेत्र के हर व्यक्ति को यह अनुभव विश्वास होने लगे कि जिस ‘कल्प’ प्रयोजन के लिए गए थे, उसे वस्तुतः उपलब्ध करके वापिस लौटा गया है।
जल्दी सोना जल्दी उठना। सूर्योदय से पूर्व नित्य कर्म से निवृत्त होना। दिनचर्या बनाकर काम करना। हाथ में आये काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर परिपूर्ण मनोयोग के साथ पूरा करना। आलस्य प्रमाद का तनिक भी आश्रय न देना। स्वभाव में सज्जनता का अधिकाधिक समावेश। अपनी नम्रता और दूसरे का सम्मान प्रकट करने वाला–मधुर सम्भाषण−शिष्टाचार। समय एवं धन का एक छोटा अंश भी व्यर्थ न गँवाना। कुसंग से बचना। स्वाध्याय को दिनचर्या का आवश्यक अंग बनाना। दैनिक उपासना में व्रतशील रहना। आहार में सात्विकता रखना, सादगी अपनाना। अस्वच्छता और अव्यवस्था को बदलने में तनिक भी ढील न होने देना। मिल बाँट कर खाना। हँसते−हँसाते जीना। अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार रहना। सहायता करने और उदारता बरतने में सन्तोष अनुभव करना। अवाँछनीयताओं के प्रति असहयोग, विरोध एवं संघर्ष की प्रवृत्ति जीवन्त रखना। धैर्य, साहस और विवेक के तीन मित्रों का कभी साथ न छोड़ना। जैसे थोड़े से ही जीवन−सूत्र हैं जिन्हें व्यवहार में उतारने पर व्यक्तित्व में प्रखरता आती है, प्रामाणिकता बढ़ती है, फलतः प्रगति पथ पर तेजी से बढ़ चलने का सुअवसर मिलता है। सफलताएँ, सहायताएँ एक के बाद एक अनायास ही खिंचती चली आती हैं। व्यावहारिक नकद धर्म है जिसका प्रतिफल हाथोंहाथ मिलता है। जीवन साधना को ही व्यावहारिक योगाभ्यास एवं तपश्चर्या माना गया है। इसका माहात्म्य आकाश−पाताल की काल्पनिक उड़ानों की तुलना में कहीं अधिक है। इस मार्ग पर चलते हुए परिष्कृत दृष्टिकोण पर आश्रित स्वर्ग और व्यापक आत्मीयता की उपलब्धि जीवन−मुक्ति का आनन्द हर घड़ी मिलता है। महामानवों में से प्रत्येक को जीवन साधना तो अनिवार्यतः करनी पड़ी है। इससे बच निकलने का और कोई ‘शार्टकट’ है नहीं।
आत्म−कल्याण के लिए जीवन साधना और विश्व−कल्याण के लिए परमार्थ की आराधना–इन दोनों के मिश्रण से उस सच्ची भक्ति −भावना का उदय अनुभव होता है जिसके द्वारा आत्म−दर्शन और ईश्वर
दर्शन के दोनों ही प्रयोजन सधते हैं। परमार्थ बातों के बताशे बनाने से नहीं सधता, उसके लिए समयदान−अंशदान का एक महत्वपूर्ण भाग निकालना ही होता है। संचय का विभाजन करते समय उत्तराधिकारियों को ही नहीं–लोक मंगल को भी परिवार का एक सदस्य माना जाय और जिस तरह परिजनों का खर्च उठाना पड़ता है उसी प्रकार परमार्थ को भी एक सदस्य मानकर उसके लिए भी उतना ही दुलार अनुदान दिया जाय, जितना कि परिजनों के लिए किया जाता है। चान्द्रायण काल में भावी रीति−नीति ऐसी बनाकर लौटना चाहिए जिससे उपासना, साधना एवं आराधना की सुगन्धित शोभा सुषमा के सहारे उल्लसित रहने और प्रमुदित करने की प्रक्रिया सहज ही सधती रहे।
आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों से उपजने वाली अनेकानेक विपत्तियाँ मनुष्य को संत्रस्त करती रहती हैं। इनके नाम−रूप अनेक होते हुए भी उद्गम एक ही होता है–अन्तःकरण पर कषाय−कल्मषों का आवरण आच्छादन। समुद्र एक है, किन्तु उसमें जीव−जन्तु अनेक आकार−प्रकार के उत्पन्न होते रहते हैं। अन्तराल एक है, किन्तु उसमें सत्प्रवृत्तियों–दुष्प्रवृत्तियों की सुखद−दुःखद सम्भावनाएँ चित्र−विचित्र रूप में प्रकट होती रहती है। उसी क्षेत्र का अवाँछनीय उत्पादन मनुष्य को आधि−व्याधियों से भर देता है और प्रगति के मार्ग पर पग−पग पर अवरोध उत्पन्न करता है।
बहुत समय पहले शारीरिक रोगों की बाहरी भूत−पलीतों का आक्रमण माना जाता था। पीछे वात, पित्त, कफ का ऋतु प्रभाव का कारण उन्हें माना गया। उसके बाद रोग के कीटाणुओं की बात समझी गई। रोगों की शोधों में अगला चरण यह बना कि आहार की विकृति से पेट में सड़न पैदा होती है और उस विष से रोग उत्पन्न होते हैं। यह क्रम अधिकाधिक गहराई में प्रवेश करने का–अधिक बुद्धिमत्ता का–स्थूल से सूक्ष्म में उतरने का है। इस प्रगतिक्रम में उतरते−उतरते इन दिनों आरोग्य शास्त्र के मूर्धन्य क्षेत्र में इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के संदर्भ में आहार−विहार, विषाणु आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है। मनोविकारों की विषाक्तता यदि मस्तिष्क पर छाई रहे तो उसका अनुपयुक्त प्रभाव नाड़ी संस्थान के माध्यम से समूचे शरीर पर पड़ेगा। फलतः दुर्बलता और रुग्णता का कुचक्र बढ़ते−बढ़ते अकाल मृत्यु तक का संकट खड़ा कर देगा। नये अनुसंधान जीवनी शक्ति का केन्द्र हृदय को नहीं मस्तिष्क को मानते हैं। रक्त की न्यूनाधिकता या विषाक्तता को रुग्णता का उतना बड़ा कारण नहीं माना जाता जितना कि मानसिक अवसाद एवं आवेश को।
इन शोध प्रयासों में नये−नये तथ्य सामने आये हैं। उनसे पता चलता है कि शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है। अचेतन मन की छत्र−छाया रक्ताभिषरण, आकुंचन−प्रकुँचन, निद्रा−जागृति आदि की अनैच्छिक कहलाने वाली क्रियाएँ चलती रहती हैं। चेतन मन के द्वारा बुद्धिपूर्वक किये जाने वाले क्रिया−कलापों और लोक−व्यवहारों का ताना−बाना बुना जाता है। शरीर की परोक्ष और प्रत्यक्ष क्षमता पूरी तरह अचेतन और चेतन कहे जाने वाले मनःसंस्थान के नियन्त्रण में रहती है, उसी के आदेशों का पालन करती है। शरीर का पूरा−पूरा आधिपत्य मन−मस्तिष्क के ही हाथों में रहता है। उस क्षेत्र की जैसी भी कुछ स्थिति होती है उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है। यदि मस्तिष्क आवेशग्रस्त होगा तो शरीर के अवयवों में उत्तेजना और बेचैनी छाई रहेगी। इस स्थिति में ऐसे रोग उत्पन्न होंगे जिनसे शरीर के उत्तेजित होने, गरम होने फटने−फूटने जैसे अनुभव होने लगेंगे। यदि मस्तिष्क उदास−हताश शिथिल हो जायेगा तो उस अवसाद का प्रभाव अंग−अवयवों की दुर्बलता के रूप में देखा जा सकेगा।
यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी में उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक रोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति में कारगर परिवर्तन न हो जाय। इस अनुसंधान ने उस असमंजस को दूर कर दिया जिसके अनुसार रोगियों को चिकित्सकों के दरवाजे−दरवाजे पर ठोकरें खानी पड़ती हैं। नित नयी दवाएँ बदलनी पड़ती हैं। किन्तु आशा−निराशा के झूले में झूलते हुए समय भर बीतता रहता है। रोग हटने का नाम ही नहीं लेते। तेज औषधियाँ अधिक−से−अधिक इतना कर पाती हैं कि बीमारी के स्वरूप और लक्षण में थोड़ा−बहुत फेर−बदल प्रस्तुत कर दें। जीर्ण रोगियों में से अधिकाँश का इतिहास यही है।
शरीर शास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुँजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। मानसिक असन्तुलन और प्रदूषण का निराकरण किये बिना किसी को भी स्वस्थ शरीर का आनन्द नहीं मिल सकता। जीवनी शक्ति का पिछले दिनों बहुत गुणगान होता रहा है। उसे प्राप्त करने के लिए आकाश−पाताल के कुलावे भी मिलाये जाते रहे हैं। टॉनिकों, हारमोनों, ग्रन्थि आरोपणों जैसे प्रयोग−परीक्षणों की भरमार रही है। किन्तु गरीबों की बात तो दूर कोटाधीश, शासनाध्यक्ष एवं स्वयं चिकित्सकों तक को उस प्रयास में कुछ पल्ले न पड़ा। अब यह निर्णय निकला है कि जीवनी शक्ति कोई शरीरगत स्वतन्त्र क्षमता नहीं है वरन् जिजीविषा की मानसिक प्रखरता ही अपना परिचय जीवनीशक्ति के रूप में देती रहती है। मानसिक स्थिति के उतार−चढ़ावों के अनुरूप यह जीवनी शक्ति भी घटती−बढ़ती रहती है। शरीर की बलिष्ठता, सक्रियता, स्फूर्ति ही नहीं कोमलता, सुन्दरता और कान्ति तक मानसिक स्थिति पर अवलम्बित है। विपन्नता की मनःस्थिति में भय, शोक, क्रोध आदि के अवसर आने पर तो तत्काल आकृति से लेकर शरीर की सामान्य स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ते प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि मनोविकार जड़ जमा लें तो समझना चाहिए कि शरीर एक प्रकार से विपन्नता में फँस ही गया और उस दलदल से निकल सकना चिकित्सा उपचार के बलबूते की बात भी नहीं रह गयी है।
शारीरिक रोग प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उनकी जानकारी भी सहज ही मिल जाती है और दवादारु से इनका इलाज होने के भी साधन मौजूद रहते हैं। मानसिक रोगों के लिए प्रायः विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त स्तर के ऐसे लोग गिने जाते हैं जो अपना सामान्य काम−काज चला सकने में असमर्थ हो गये हों, जिनका शरीर−निर्वाह और लोक व्यवहार लड़खड़ाने और लटपटाने लगा हो जो अपने लिए और साथी−सम्बन्धियों के लिए भार बन गये हों। ऐसे रोगियों की संख्या भी लाखों से आगे बढ़कर करोड़ की संख्या अपने ही देश में छूने लगी है। यह विज्ञात विक्षिप्त हैं। ऐसे लोगों की संख्या का तो कोई ठिकाना नहीं जो रोजी−रोटी तो कमा लेते हैं और खाते−सोते समय भी साधारण लगते हैं, पर उनका चिन्तन विचित्र और विलक्षण होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते है और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने आशंकाओं, सन्देहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन आदि तक के सामान्य कार्यो पर अकारण सन्देह बना रहता है। सम्बन्धी और पड़ौसी को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए दीखते हैं। दुर्भाग्य और ग्रह−नक्षत्रों के प्रकोप से कितने ही हर घड़ी काँपते रहते हैं और विपत्ति का पहाड़ अपने ऊपर टूटता हुआ अनुभव करते रहते हैं। शेख चिल्लियों के से मनसूबे बाँधते रहने वाले, सम्भव−असम्भव का विचार किये बिना अपने सपनों की एक अनोखी दुनिया बनाये बैठे रहते हैं। न अपनी पटरी दूसरों के साथ बिठा पाते हैं न किसी और को अपना घनिष्ठ बनने का अवसर देते हैं। परिस्थिति का मूल्याँकन कर सकना, दूसरों की मनःस्थिति और परिस्थिति समझ सकना उनके लिए सम्भव ही नहीं होता। अटपटे अनुमान लगाते और बेतुके निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। विचार जो भी उठें वे एक पक्षीय सनक की तरह बिना किसी तर्क −वितर्क का आश्रय लिये बिना लगाम के घोड़े पर चढ़कर दौड़ते चले जाते हैं। जो सोचा जा रहा है उसका आधार क्या है और उस सनक पर चढ़े रहने का अन्तिम परिणाम क्या निकलेगा–इतना समझ पाना उनके क्षत−विक्षत मस्तिष्क के लिए सम्भव ही नहीं होता। अकारण मुँह लटकाये बैठे रहने वाले, जिस−तिस पर दोषारोपण करने वाले बेचारे, दुर्भाग्य की कुरूप तस्वीरें गढ़ने में उन्हें तनिक भी देर नहीं लगती। दुनिया को निस्सार बताने वाले, आत्महत्या की बात सोचते रहने वालों की संख्या अपने ही इर्द−गिर्द ढेरों मिल सकती है। हँसी−खुशी से उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। कहीं−न−कहीं से मुसीबत की कल्पना ढूंढ़ लाते हैं और स्वयं दुःख पाते, साथियों को दुःख देते एवं जिन्दगी की लाश ढोते रहते हैं। यह सनक कभी−कभी आक्रामक जब हो उठती है तो जो भी उनके चपेट में आता है उसे सताने में कसर नहीं छोड़ते। मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र समझने में उनकी अदूरदर्शिता पग−पग पर झलकती रहती है। ठगों के आये दिन शिकार होते रहते हैं। आयु बड़ी हो जाने पर भी सोचने का तरीका बालकों जैसा ही बना रहता है। किसी महत्वपूर्ण प्रसंग में उनका परामर्श तनिक भी काम का सिद्ध नहीं होता। अपनी कार्य−पद्धति को किसी उद्देश्य के साथ जोड़ सकना उनसे बन नहीं पड़ता। जैसे−तैसे समय गुजारते हुए, ज्यों−त्यों करके ही जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते हैं। इन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर व्यक्तित्व की परख की दृष्टि से उससे कुछ अच्छी स्थिति में भी उन्हें नहीं समझा जा सकता।
विक्षिप्त−अर्धविक्षिप्त और विक्षिप्तता के सन्निकट सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। मूढ़−मान्यताओं, कुरीतियों−अन्धविश्वासों से जकड़े हुए लोगों में तर्क शक्ति एवं विवेक बुद्धि का अभाव रहता है। उनके लिए अभ्यस्त ढर्रा ही सब कुछ होता है। उस लक्ष्मण−रेखा से बाहर निकलने में उन्हें भय लगता है। स्वतन्त्र चिन्तन का प्रकाश उनकी आँखें चौंधिया देता हैं और औचित्य को समझने, स्वीकार करने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर−पशुओं की ही श्रेणी में रखा जा सकता है।
शरीर से असमर्थों, दुर्बलों और रुग्णों की ही तरह मानसिक पिछड़ेपन और विकार−ग्रस्तता के दलदल में धँसे हुए लोगों का ही बाहुल्य अपने समाज में दृष्टिगोचर होता है। यह विक्षिप्तता भी एक प्रकार की बीमारी ही है जिसमें प्राणियों को तिरस्कार, असन्तोष, अभाव एवं चित्र−विचित्र प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं।
शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक आधियां जिसे घेरे हुए हैं उस विकृत मस्तिष्क और अस्वस्थ शरीर के द्वारा न कुछ उपयुक्त सोचते बन पड़ेगा और न उचित कर सकना सम्भव होगा। अतएव अपनी अटपटी, कानी−कुबड़ी गतिविधियाँ किसी महत्वपूर्ण सफलता तक पहुँचने ही न देंगी। सम्बन्धित व्यक्ति उस बेतुके व्यक्ति से खिंचते−खीजते रहेंगे। फलतः सच्चे सहयोग से भी प्रायः वंचित ही रहना पड़ेगा। मतभेद बढ़ते−बढ़ते शत्रुता और विग्रह तक जा पहुँचते हैं और आक्रमण−प्रत्याक्रमण के कुचक्र में ऐसे व्यक्ति को भारी घाटा उठाना पड़ता है। प्रगति−पथ तो प्रायः अवरुद्ध ही बना रहता है। यह नई विपत्ति शारीरिक और मानसिक रुग्णता की ही देन है। दो रंगों के मिलने से तीसरा एक और नया रंग प्रकट हो जाता है। आधि और व्याधिग्रस्तों को अवरोध और असफलता का तीसरा संकट अतिरिक्त रूप से सहन करना पड़ता है।
इतना सब जान लेने के उपरान्त एक ही निश्चय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि चेतन की मूल सत्ता अन्तःकरण को प्रभावित करने वाले नैतिक और अनैतिक विचार एवं कर्म ही हमारी भली−बुरी परिस्थितियों के लिए पूर्णतया उत्तरदायी है। इसी उद्गम से हमारे उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा होता है और यहीं से विपत्तियों के जाल गिराने वाली दुःखद सम्भावनाएँ विनिर्मित होती हैं। इस मूल केन्द्र का परिशोधन करना ही एक प्रकार से आन्तरिक काया−कल्प जैसा प्रयास है। प्रस्तुत संकटों से छुटकारा पाने और निकट भविष्य में फलित होने वाले संचित प्रारब्धों का निराकरण करने के लिए आन्तरिक परिशोधन का प्रयास इतना अधिक आवश्यक है कि उसे अनिवार्य की संज्ञा दी जा सकती है और कहा जा सकता है कि विष वृक्ष की जड़ काटने से ही काम चलेगा, पत्तियाँ तोड़ने से नहीं।
अन्तराल के परिशोधन में उथले उपाय कारगर नहीं होते। उसके लिए आध्यात्मिक चिकित्सा ही एकमात्र अवलम्बन है। इसमें न केवल विपन्नताओं के निराकरण की सामर्थ्य है, वरन् प्रसुप्त श्रेष्ठता को उगाने, उठाने, उभारने जैसी विशेषताएँ भी विद्यमान हैं। इतना ही नहीं उस आधार को अपनाने से जीवन के परमलक्ष्य की पूर्णता की उपलब्धि एवं ईश्वर प्राप्ति के महान प्रयोजन को प्राप्त करने का भी पथ−प्रशस्त होता है।
आध्यात्मिक क्षेत्र की चिकित्सा परिचर्या एवं बलिष्ठता अभिवृद्धि की दृष्टि से चान्द्रायण कल्प साधना की असाधारण उपचार पद्धति सिद्धि हो सकती है।
परिस्थितियों को बदलने के लिए मनःस्थिति बदलना आवश्यक है। अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं का जितना सम्बन्ध बाहरी व्यक्तियों तथा सुविधाओं पर निर्भर है उससे कहीं अधिक अपने गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर विनिर्मित व्यक्तित्व के ऊपर अवलम्बित रहता है। मनुष्य एक जीता जागता चुम्बक है। वह अपने स्तर के अनुरूप परामर्श, वातावरण, सहयोग, साधन चुपके−चुपके खींचता रहता है। फलतः वैसा ही परिवार जुट जाता है जैसी कि मनःस्थिति होती है। चोरों को गिरहकट मित्र, सहयोगी मिलते हैं। सहयोग सम्मिलन से वैसे ही प्रयास चल पड़ते हैं। फलतः घृणा, तिरस्कार से लेकर पुलिस, जेल तक की परिस्थितियाँ अनायास ही बन जाती हैं। यही बात सन्त सज्जनों के सम्बन्ध में लागू होती है। पराक्रमी पुरुषार्थियों से लेकर आलसी दरिद्रियों तक को अपने−अपने ढंग के सहयोग साधन मिलते चले जाते हैं। अपवाद तो कभी−कभी ही, कहीं−कहीं ही बनते हैं। उत्थान और पतन के लिए तत्वतः मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी होता है। इस कथन में तनिक भी अत्युक्ति नहीं कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। आस्थाओं, आकाँक्षाओं के समन्वय से बना अन्तःकरण ही समूचे मनःसंस्थान को, कायकलेवर को दिशा विशेष में चलाता है। फलस्वरूप वैसी ही परिस्थितियाँ बन जाती हैं। यही हैं सुख−दुख के, उत्थान−पतन के आधारभूत कारण।
मनःसंस्थान को–अन्तःकरण को–पवित्र परिष्कृत कैसे बनाया जाय? इसके दो उपाय हैं। एक चिन्तन के द्वारा अंतःप्रेरणा उभारने और तद्नुरूप जीवन की दिशा−धारा बदलने का भावनात्मक। दूसरा है साधन तपश्चर्या के दबाव देकर संचित कुसंस्कारों को गलाने और उन्हें सुसंस्कारिता के ढाँचे में ढालने का इन दोनों ही उपायों को साथ−साथ लेकर चलना पड़ता है। प्रगति पथ पर इन दो पहियों के सही होने से ही गाड़ी अग्रगमन की दिशा में गतिशील होती है। चिन्तन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया योग कहलाती है और चरित्र को निखारने वाले उपक्रम तप कहलाते हैं।
मन शरीर का एक भाग है। उसे ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा जाता है शरीर आहार से बनता है। अस्तु प्रकारान्तर से आहार के स्तर को ही शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक सन्तुलन का आधारभूत कारण माना गया है। आत्मिक प्रगति की बात सोचते ही सर्वप्रथम आहार साधना की बात सामने आती है। अभक्ष्य को अनावश्यक मात्रा में उदरस्थ करने वाला धर्मोपदेशक भले ही बन सके–धर्मात्मा बन सकना असम्भव है। इसलिए पूजा उपचार की ही तरह आहार साधना पर भी ध्यान देना होता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन एवं धर्मानुष्ठानों की तरह आहार में सात्विकता एवं सदाशयता का समावेश भी आत्मिक प्रगति के अनिवार्य आधारों में सम्मिलित रखा गया है।
चान्द्रायण साधना को आत्मोत्कर्ष के प्रयासों में मूर्धन्य इसीलिए कहा गया है कि उसमें धर्मानुष्ठानों से भी अधिक आहार नियमन पर ध्यान दिया गया है। आहार निग्रह के उपरान्त मनोनिग्रह कठिन नहीं रह जाता। मन को सदाशयता की ओर मोड़ा जा सके तो दृष्टिकोण बदलते ही आत्मिक प्रगति के मार्ग में फिर कोई बड़ी बाधा शेष नहीं रहती।
चान्द्रायण विशुद्ध तप है। तप में तितिक्षा का समावेश रहता है। गीता के अनुसार “विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः” उपवास करने से विषय−विकारों की निवृत्ति होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनुभवी तत्वदर्शी सदा आहार नियमन का परामर्श देते रहे हैं। चान्द्रायण के साथ प्रायश्चित प्रक्रिया जुड़ी रहने के कारण उसमें अधिक कठोर आहार–अनुशासन अनुबन्ध बरता गया है। किसी समय सर्वसाधारण की मानसिक और शारीरिक स्थिति ऐसी थी जिससे ऐसी तितिक्षाओं का संकल्प बल के सहारे सरलता पूर्वक सम्पन्न किया जा सके। पूर्व निर्धारणों को सैद्धान्तिक मान्यता देते हुए भी समय के अनुरूप थोड़ी सरलता उत्पन्न करना युग धर्म ही माना जायगा।
चान्द्रायण उपवासों की पुरातन प्रक्रिया अतिकठोर है। उसे लगभग एक महीने का अनुष्ठान करना चाहिए। एक समय भोजन के अतिरिक्त किसी समय और कुछ खाने का नियम नहीं है। कुछ चांद्रायणों में पूर्णिमा का पन्द्रह ग्रास खाने और एक−एक ग्रास घटाते चलने का नियम है। फिर एक−एक ग्रास बढ़ाया जाता है। पन्द्रह ग्रास कितने होते है? उनसे चौथाई पेट भी नहीं भरता। फिर उसे भी काम करते चलने पर तो प्रायः बीस दिन ऐसी स्थिति रहती है जिसे न खाने के बराबर ही समझना चाहिए। चतुर्दशी को एक ग्रास। अमावस्या प्रतिपदा को एक ग्रास भी नहीं। दौज को एक ग्रास। इस प्रकार एक−दो ग्रास चौबीस घण्टे में मिलने– वैसी ही कठोरता बहुत दिनों तक बनी रहने की स्थिति ऐसी है, जिसे शारीरिक स्थिति से मजबूत और मानसिक दृष्टि से संकल्पवान व्यक्ति ही सहन कर सकते हैं।
आजकल वैसे व्यक्ति बिरले ही दीखते हैं। एक दो दिन भोजन मिलना तो दूर चाय, बीड़ी जैसी वस्तुएँ न मिलने पर ही पैर काँपने–सिर घूमने और नींद न आने जैसी शिकायतें उत्पन्न हो जाती हैं। शरीर में इतनी चर्बी किसी−किसी के ही होती है जो लम्बे समय तक एक प्रकार से सर्वथा निराहार स्तर का कठोर उपवास कर सकें। साथ ही इतना मानसिक सन्तुलन भी बनाये रह सकें जिसमें कई−कई उपासनाएँ, साधनाएँ भक्ति भावनापूर्वक होती रहें।
मन भूख के कारण बेचैन हो रहा हो तो एकाग्रता, स्थिरता की स्थिति कैसी रहेगी? न रही तो भूखे रहना भले ही निभता रहे वे अध्यात्म उपचार कैसे सधेंगे, जिन्हें अपनाना चान्द्रायण साधना का मूलभूत उद्देश्य है। तपश्चर्या में उपवास भी एक अंग तो है पर उतने भर से ही आत्म परिष्कार का समग्र उद्देश्य कहाँ पूरा होता है।
समय और परिस्थितियों का, देश, काल, पात्र का ध्यान रखते हुए गायत्री तीर्थ में चलने वाले चान्द्रायण साधना सत्रों में ऐसा सन्तुलन बिठाया गया है जिससे इस तपश्चर्या के आधारभूत सिद्धान्त, स्वरूप, उद्देश्य एवं प्रयोग की तो समुचित रक्षा होती रहे, पर उपवास क्रम को अपेक्षाकृत सरल बना दिया जाय। ऐसा शास्त्रीय विधान भी है। लघु चान्द्रायण या शिशु चान्द्रायण के नाम से ऐसे विधान भी हैं जिनके आधार पर शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से दुर्बल स्तर के लोग भी अपना सकें और उस प्रयोग से सर्वथा वंचित न रहकर, जितना बन पड़े उतना करें और जितना सम्भव है उतना लाभ उठायें।
इस प्रसंग में मात्र उपवास में ही सरलता की गई है शेष सभी सिद्धान्तों को यथावत् रखा गया है। यों पन्द्रह ग्रास लेने का विधान है। किन्तु यह मान लिया गया है कि पूर्णिमा को पूर्ण आहार किया जायगा और उसका चौदहवाँ अंश घटाते−घटाते अमावस्या प्रतिपदा को निराहार रहा जायगा। इस समूचे जोड़−तोड़ में औसत हिसाब बिठाने पर गुणनफल यह आता है कि कुल मिलाकर आधे भोजन पर रहना होगा। शान्तिकुँज के चांद्रायणों में यही सिद्धान्त अपनाया गया है कि कुल मिलाकर आधा भोजन किया जाय।
आमतौर से लोग दो समय भोजन करते हैं। इसलिए यह मान लिया गया है कि एक समय भोजन करने से काम चलाया जाना चाहिए। यह आहार उतना ही होना चाहिए जितना कि नित्य प्रति होता है। शाम के बदले का भी दोपहर को खाने की, इसी समय दूना ड्यौढ़ा कर लेने का चतुरता करनी हो तो बात दूसरी है।
ऊँट एक दिन पानी पीकर एक सप्ताह तक रेगिस्तान में चल लेता है। उतना पानी पेट में भर लेता है कि एक सप्ताह तक फिर पीने की आवश्यकता न पड़े। मगर भेड़ के बच्चों को, साँप मेंढक को, व्याघ्र हिरन को इतनी मात्रा में खा लेता है कि फिर कई दिन तक मुख खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ती। तीर्थ पुरोहित भी ऐसा ही करते हैं। एक समय में उतना ‘छक’ लेते हैं कि दूसरे समय की तो बात ही क्या–दूसरे दिन भी न मिले तो पेट कुछ माँगेगा नहीं। यही नीति चान्द्रायण कर्त्ताओं को अपनानी हो तो फिर उपवास वैसा ही मखौल बन जायेगा जैसा कि एकादशी करने वाले तथाकथित फलाहारी, माल मलाई इतनी अधिक ठूँस लेते हैं कि पेट को हाहाकार करना पड़े। चान्द्रायण कर्त्ता भी ऐसी ही दिल्लगीबाजी उपवास की करने लगे तो वह तप तपश्चर्या न रहकर आत्म−प्रवंचना ही बन जायगी।
गायत्री तीर्थ की उपवासचर्या को ऐसा सन्तुलित रखा गया है कि उससे न खाली पेट रहने से उत्पन्न होने वाली कठिनाई का सामना पड़े और न पेट को विश्राम मिलने के उद्देश्य में व्यतिरेक उत्पन्न हो। मात्रा घटाना तो हर हालत में आवश्यक ही है। दोपहर को उतना भोजन किया जाय जितना कि आमतौर से किया जाता है। न कम न अधिक। शाम को सर्वथा निराहार रहा जाय।
एक समय के भोजन के अतिरिक्त शान्ति−कुँज व्यवस्था में प्रातःकाल प्रज्ञापेय (जड़ी बूटियों का चाय जैसा क्वाथ) एवं पंचगव्य दिया जाता है। दोपहर को एक दिन दाल−चावल, दूसरे दिन रोटी−शाक का क्रम चलता है। एक समय में दो से अधिक वस्तुएँ न लेना भी उपवास की मर्यादा के अंतर्गत आता है। दोपहर को हविष्यान्न (यज्ञ में काम आने वाले अन्न−तिल, जौ, चावल) की रोटी। साथ में सरस्वती पंचक (ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बच, शतावरी, गोरखमुण्डी) की चटनी आँवला, अदरक समेत। यही नित्यक्रम है। मसाले कम ही डाले जाते हैं ताकि स्वाद पर नियन्त्रण रखने की संयम साधना निभ सके और जायके के नाम पर अनावश्यक मात्रा पेट में न ठुँसे।
शान्तिकुँज के भोजनालय में सामान्य रूप से चलने वाली आहार व्यवस्था यही है। जो आवश्यक समझें शाम को भी प्रज्ञापेय या दूध, छाछ सीमित मात्रा में लेने का निजी प्रबन्ध कर सकते हैं।
फलाहार, अन्नाहार का झंझट इसलिए नहीं रखा गया है कि अब प्राचीन काल की तरह अपने उद्यान में पके हुए फल कहीं मिलते नहीं। कच्चे तोड़ना, बहुत दिन रखे−रखे उनका जराजीर्ण होकर पीले पड़ना, पकना। यही है आज के बाजारू फलों की स्थिति। केले, आम, अँगूर आदि में बाजार में ऐसे ही मिलते हैं जिन्हें देखने में पके किन्तु गुण की दृष्टि से सर्वथा कच्चे ही कहा जा सकता है। फिर वे महंगे इतने है कि मध्यवर्ती व्यक्ति उनका बोझ वहन नहीं कर सकता।
वर्तमान परिस्थितियों में फलाहार की तुलना में शाकाहार कहीं अधिक सस्ता एवं लाभदायक है। अमृताशन भी एक प्रकार का शाकाहार या फलाहार के समतुल्य ही है। जिनका मनोबल हो वे इस एक महीने को शाकाहार या अमृताशन पर निभा सकते हैं। उनके लिए स्वयं पका लेने के सभी साधन शाँति−कुँज में मौजूद हैं। जो खिचड़ी, दाल, चावल, दलिया आदि स्वयं पका सकें उनके लिए वैसी सुविधा भी उपलब्ध करा दी जाती है। शान्ति−कुँज के भोजनालय में सबके लिए एक जैसी व्यवस्था है। सुविधानुसार जो जिस व्यवस्था का लाभ उठाना चाहें वह वैसा प्रबन्ध कर सकते हैं। शाक, कोयला, अंगीठी, बर्तन, दलिया, चावल दाल आदि सभी वस्तुएँ हर किसी के लिए उपलब्ध हैं। जिन्हें जैसी सुविधा हो वे वैसी व्यवस्था कर सकते हैं।
आहार की मात्रा पर इतना ही अंकुश रखा गया है जिससे पेट सर्वथा खाली भी न रहे और उपवास की मर्यादा के अंतर्गत उसे सीमित मात्रा में खाली भी रखा जा सके। अमृताशन उस आहार को कहते हैं जिसे भगौने में पकाया जा सके। चावल, दाल, दलिया, दूध, खिचड़ी, शाकाहार जैसे उबालकर बनाये जाने वाले सभी पदार्थ अमृताशन की मर्यादा में आते हैं। उन्हें उपवास में सम्मिलित किया जाय और फलाहार समतुल्य माना जाया तो हर्ज नहीं।
आहार पर चढ़े हुए कुसंस्कारों का परिशोधन करने के लिए गौमूत्र की महत्ता शास्त्रकारों ने बताई है। इन दिनों जिस प्रकार खाद्य पदार्थ उत्पन्न किये जाते हैं उससे उनकी सात्विकता चली जाती है और ऐसे तत्व मिल जाते हैं उन्हें तामसिक ही कहा जा सकता है। रासायनिक खादों का, सीवर लाइनों की गन्दगी का उपयोग अधिक उपज लेने की दृष्टि से किया जाता है। कीड़े मारने की दवाएँ फसल पर गोदामों में छिड़की जाती हैं। फिर उनको बोने−उगाने वालों के भी अपने संस्कार होते हैं जो खाद्य पदार्थों में मिले होते हैं। फलतः उन पर अदृश्य कुसंस्कारिता छाई रहती है। अध्यात्मवादी का आहार कुसंस्कारिता से रहित होना चाहिए। “जैसा खाये अन्न
वैसा बने मन” के प्रतिपादन में साधक की साधना का प्रथम सात्विक आहार से आरम्भ होता है। सात्विक का अर्थ सुपाच्य ही नहीं सुसंस्कारी भी है।
पकाने,परोसने में भी इस सुसंस्कारिता का समावेश होना चाहिए। वैसी सुविधा न हो तो फिर अपने हाथ पकाना ही उत्तम है। साध स्वपाकी रहे तो दूसरों के द्वारा पकाये आहार की तुलना में इन दिनों इस संदर्भ में अधिक निश्चिन्तता रह सकती है।
चान्द्रायण साधना को सुसंस्कारी “आहार−चिकित्सा” कहा जा सकता है। उसमें न केवल खाद्य पदार्थों के चयन में सुपाच्य सात्विकता का ध्यान रखा जाता है, न केवल मात्रा में आधी कटौती की जाती है वरन् यह भी देखा जाता है कि वह पकाया−परोसा किन हाथों से गया है। इन उद्देश्य की पूर्ति शान्ति−कुँज में ठीक तरह होती है। वन्दनीय माता जी अपने हाथ से साधकों को उपरोक्त आहार देती हैं। प्रज्ञापेय, पंचगव्य, औषधि कल्क, चटनी, हविष्यान्न की रोटी– यह चारों ही चीजें उन्हीं के तत्वावधान में बनती है तथा उन्हीं के संरक्षण में बँटती हैं। इसे प्रकारान्तर से भगवान का प्रसाद या औषधि उपचार की संज्ञा में गिना जा सकता है। जो अपने हाथ पकाते खाते हैं उन्हें भी माताजी के हाथ से प्रज्ञापेय, औषधियों की चटनी एवं हविष्यान्न की एक रोटी मिलती है। इसे आहार नहीं औषधि माना जाता है।
खाद्य पदार्थों को गौमूत्र में परिशोधन की प्रक्रिया, चान्द्रायण की भोजन व्यवस्था का अतिमहत्वपूर्ण अंग है। जौ, तिल, चावल आदि सभी खाद्य पदार्थ गौमूत्र में भिगोकर बोने, उगाने, जमा करने की अवधि में चढ़े हुए कुसंस्कारों से मुक्त किया जाता है।
सफाई करने से लेकर आटा पीसने की, दाल दलिया दलने की आश्रम की अपनी निजी व्यवस्था है। बाजार की तुलना में वह कहीं अधिक महंगी पड़ती है फिर भी प्रबन्ध यही किया जाता है कि भले ही भोजन अन्नाहार को हो पर उस पर सुसंस्कारिता फलाहार से भी कहीं अधिक बढ़ी−चढ़ी हो। चान्द्रायण साधन में गौ सान्निध्य का अत्यधिक माहात्म्य बताया गया है। गौमूत्र सेवन का चर्चा है। इसका प्रतीक रूप में परिपालन किया जाता है। पंचगव्य में गौदुग्ध, गौदधि, गौघृत की प्रमुखता रहती है गौमूत्र की कुछ बूंदें ही सही, पर प्रायश्चित परम्परा के अनुसार समावेश उसका भी आँशिक रूप में रहता है। इसके अतिरिक्त जो भी धान्य साधक इस एक महीने की अवधि में सेवन करते हैं। वह सभी गौमूत्र में भिगोया, भिगोकर गंगाजल से धोया, धोकर सुखाया और सुखाकर आश्रम में ही पीसा गया होता है। बनाने की प्रक्रिया दो ही हैं। या तो माताजी के चौके में बना हो या अपने हाथों पकाया गया हो। बाजारू वस्तुएँ खाने खरीदने पर पूरी रोक है। चटोरेपन से लालायित होकर बाजारू चीजें खरीदना, खाना पुरानी आदत को भले ही रुचिकर लगे पर उससे तपश्चर्या की व्यवस्था बिगड़ती है।
चान्द्रायण के उपवास पक्ष पर विचार करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि पेट को खाली रखना ही मात्र उद्देश्य नहीं है। उसका मूलभूत प्रयोजन सात्विक, सुसंस्कारी, चटोरपन रहित आहार अपनाना भी है। पेट पर वजन कितना लदा, कितना हलकापन रखा गया– इस सम्बन्ध में थोड़ी रियायत व्यक्ति और समय की स्थिति को देखते हुए दी गई है। उसे परिस्थितियों की विवशता, लोगों की स्वल्प तितिक्षा क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही यह शिशु या लघु चान्द्रायण का उपक्रम अपनाया गया है। इतने पर भी इस आध्यात्मिक प्रयोजन का निमित्त की गई आहार चिकित्सा में सैद्धान्तिक कड़ाई यथावत् कायम रखी गई है। आहर की सात्विकता, सुसंस्कारिता एवं औषधि स्तर की स्थिति हर हालत में कायम रखी ही जानी चाहिए। चटोरपन की अभ्यस्त आदत तथा पेट को ठूँस−ठूँस कर गधे की तरह लादे रहने की विद्रूपता हो हर हालत में रोकी या छोड़ी ही जानी है। इतनी व्रतशीलता अपना लेने पर चान्द्रायण की उपवास प्रक्रिया अक्षुण्ण रखी जा सकेगी। भले ही आहार की मात्रा के सम्बन्ध में कुछ शिथिलता, सुविधा जुड़ी रहे।
आयुर्वेदीय कल्प चिकित्सा में कई फल, शाकों के कल्प का उल्लेख है। खरबूजा, आम, जामुन, पपीता जैसे सस्ते फलों पर 40 दिन रहकर यह कल्प होते हैं। महंगे फलों में अनार, मौसमी आदि के रसों पर ही रहा जाता है। सेव, चीकू भी ऐसे ही उपयोगी फलों में हैं शाकों में टमाटर, तोरी, लौकी भी उस प्रयोजन के लिए उपयोगी होती हैं। दूध, छाछ के कल्पों का भी विधान है। कल्पकाल में कई औषधियों भी सेवन कराई जाती हैं पर आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए कल्पों में एक महीने की अवधि उपरोक्त फलों, शाकों में से किसी एक का चयन करके उसी पर निर्वाह किया जाय तो इससे शरीर−शोधन एवं मानसिक भावनात्मक परिष्कार का भी अतिरिक्त लाभ मिलता है। दूध,छाछ भी साथ−साथ लेते रहने की छूट मिल सकती है।
तुलसी,शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शतावरी, आँवला निर्गण्डी, गिलोय, अश्वगंधा जैसी जड़ी−बूटियों का भी कल्प किया जाता है। इनका रस,क्वाथ,कल्क या अर्क बनाकर पिलाने की प्रक्रिया है। किस−किस औषधि का कल्प कराया जाय। किस रूप में किस मात्रा में उसे दिया जाय वह निर्धारण व्यक्ति विशेष की स्थिति को समझकर उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप ही किया जा सकता है। साधारणतया रस रूप में उपरोक्त औषधियों को दिन में सौ ग्राम तक दिया जाता है। अंक पिलाना हो तो उस रूप में एक किलो तक औषधियों का सार तत्व पेट में पहुँचाया जा सकता है। औषधि कल्प में फलाहार या शाकाहार ऐसा चुना जाता है जो उन औषधियों का सजातीय हो। चान्द्रायण साधना में मनोबल सम्पन्न साधकों के लिए उनकी स्थिति के अनुरूप अतिरिक्त कल्पों का भी निर्धारण किया जाता है।
चान्द्रायण की अवधि में साधक नित्य गंगाजी जाया करेंगे और अपने पीने के लिए गंगाजल का पात्र भरकर लाया करेंगे। जब भी पीना हो उसी को पिया करेंगे। इस प्रकार गंगा और गौ का सान्निध्य रहने के अतिरिक्त एक अध्याय गीता का सामूहिक पाठ भी हुआ करेगा। गायत्री के 25,000 के तीन अनुष्ठान तो साथ−साथ हैं ही। इस प्रकार गंगा, गौ, गीता और गायत्री के रूप में प्रख्यात अध्यात्म साधना के चारों चरणों को अपनाते रहकर साध का अपनी पवित्रता, प्रखरता एवं प्रगति का पथ प्रशस्त करते रहेंगे।
पदार्थ विज्ञान अपने क्षेत्र में अपने पराक्रम के लिए गौरवान्वित हुआ है। अब अध्यात्म विज्ञान की बारी है कि वह जड़ की तुलना में असंख्य गुनी सामर्थ्य का भाण्डागार अपने में दबाये हुए चेतना तत्व का अनुसंधान करे वैसी उपलब्धियाँ हस्तगत करके दिखाये जैसी कि भौतिक के वैज्ञानिकों ने अपने पुरुषार्थ के बलबूते उपार्जित की है।
मनुष्य सामर्थ्य का पुँज है उसकी अपनी सत्ता का क्षेत्र परमाणु संरचना में किसी प्रकार कम अद्भुत नहीं है। अणु ऊर्जा की इन दिनों व्यापक चर्चा है और उसके उपयोग के सम्बन्ध में सुविस्तृत योजनाएँ बन रही हैं। अब जीवन तत्व की बारी है कि उसे समझा, खोजा, पकाया और उस रूप में लाया जाय जिसमें न केवल मानव समुदाय वरन् समूची सृष्टि व्यवस्था में सतयुगी परम्पराओं से पुनः लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। उसमें अनहोनी कुछ नहीं है। प्राचीन काल में अपेक्षाकृत कम साधन रहते हुए भी जब आत्मिक क्षेत्र की महान उपलब्धियों, ऋषि−सिद्धियों के रूप में प्राप्त होती रही है तो कोई कारण नहीं कि इन दिनों वैज्ञानिक प्रगति के साथ−साथ बढ़े हुए ज्ञान और साधनों के सहारे उस क्षेत्र से कुछ बड़े अनुदान उपलब्ध न हो सकें। पौराणिक युग में देव और दानवों के मिलकर समुद्र मथा था और चौदह बहुमूल्य रत्न प्राप्त किया थे। अध्यात्म का देव और विज्ञान का दैत्य मिल−जुलकर चेतना के महासागर का मन्थन करेंगे तो निश्चय ही पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण विभूतियाँ हस्तगत हो सकेगा।
जाग रहा हूँ, पर सोने वाले का स्वाँग बनाया। देखो मुझे देखने वालों, मैं कैसा बौराया॥
नारी का रति सा यौवन, नर शशि जैसा सुन्दर था। पल भर पीछे वही वृद्ध थी झुका उसी का सर था॥
उस दिन के धन पति को देखा, भिक्षा पात्र सम्हाले। नीरव मरघट में साते देखे, सिंहासन वाले॥
जिस शरीर को मरना था जीवन भर उसे सजाया। देखो मुझे देखने वालों, मैं कैसा बौराया॥
चला चली का मेला था, यह गया और वह आया। सुख का स्वप्न देखने वाला ‘लुढ़क पड़ा चिल्लाया॥
जो कहते थे हम स्वामी हैं, धनी गुणी बलशाली। वे अर्थी पर लदे हुए थे, कर थे उनके खाली॥
सभी यहाँ का यहाँ रह गया अपना और पराया। देखो मुझे देखने वालों, मैं कैसा बौराया॥
यह सब देखा देख रहा हूँ, फिर भी आँखें मीची। विष के फल जिन पर आते हैं, वी लताएँ सींची॥
जान रहा हूँ जान, जान, जानकर भी अनजान बना हूँ। गंगा के तट पर रहता हूँ, फिर भी कीच सना हूँ॥
भुला दिया उसको ही जिसने यह संसार बनाया। देखो मुझे देखने वालों, मैं कैसा बौराया॥
–श्री जिज्ञासु
*समाप्त*