उठो, जागो और विकास करो

“उत्तिष्ठत, जागृत।” उत्थान करो, जागृत होओ−यह श्रुति का आदेश है। परम पिता का हरेक के अन्तःस्थल में गूँज रहा उद्घोष है। इसे हममें से किसने सुना, किसने नहीं,पता नहीं, किन्तु यह वाक्य बारबार गूँजा है और इस ने हमारे अंतर्कपाटों को हर बार खटखटाया है। संसार में प्रायः हर बाधा ने, हर दुःख ने, हर विच्छेद ने शत शत बार हमारी अन्तरात्मा की तंत्रिकाओं को आघात कर झंकृत किया है और उससे केवल एक ही वाणी निकली है−” उत्थान करो, जागृत होओ।” हमारे नव जागरण के लिए अन्तः में प्रतिष्ठित वह आत्मदेव निखिल अनिमेष नेत्रों से प्रतीक्षा कर रहा है कि कब प्रभात आयेगा और कब रात्रि का यह अन्धकार दूर होकर हमारे अपूर्ण विकास को निर्मल नवोदित आलोक से प्रकाशवान−उदीयमान कर देगा।

पुष्प को प्रभात होते ही कहना पड़ता कि ‘रजनी गयी’, प्रभात हो गया−तुम अब प्रस्फुटित होओ। यह आत्म विस्तार की एक सहज प्रेरणा है जो पुष्प को प्रफुल्लित−विकसित कर देती है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सोचता है कि क्यों नहीं विश्वव्यापी आनन्द किरण वर्षा से,ऐसी ही स्वाभाविकता से वह भी विकसित सो उठता। वह क्यों अपनी पंखुड़ियों को संकुचित किये बैठा है। प्रभातकालीन सूर्य से लेकर प्रकृति का कण कण निखिल जगत प्रतिक्षण हमसे यही कहता है−अपने आपे का समर्पण करो, अपने स्वार्थों की ओर से मुँह मोड़कर एक बार विश्व वसुधा की ओर भी देखो, इस सुख दुःख से भरे विचित्र संसार में अचिन्त्य अगोचर ब्रह्मसत्ता के प्रति अपने आपको अर्पित कर दो।


व्यक्ति चेतना का समष्टि चेतना से संयोग

भारतीय दर्शन प्रकृति के दो स्वरूप माने हैं, एक परा प्रकृति और दूसरी अपरा प्रकृति। परा वह है जिसे पंच भौतिक कहा जा सकता है। इन्द्रिय चेतना से जो अनुभव की जा सके अथवा यन्त्र उपकरणों की सहायता से जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान किया जा सकता है वह परा प्रकृति है। भौतिक विज्ञान का कार्यक्षेत्र यहीं तक सीमित है। कुछ समय पूर्व तक वैज्ञानिक इतने को ही सब कुछ मानते थे। चेतना की व्याख्या करते समय यही कहा जाता था कि यह मात्र आणविक एवं कम्पन परक हलचलों की प्रतिक्रिया भर है। लेकिन विज्ञान की नई और अधुनातन खोजों ने उसके क्षेत्र को विस्तृत कर दिया है तथा अब अपरा प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकार किया जाने लगा है।

अब वैज्ञानिक इस आणविक हलचल और कम्पन की प्रतिक्रिया नहीं मानते वरन् सूक्ष्म जगत कहते हैं। इस क्षेत्र की हलचलें अब आणविक गतिविधियाँ नहीं कही जातीं और न ही ताप, प्रकाश, शब्द के कम्पनों से उसकी तुलना ही की जाती है। वरन् इस क्षेत्र की हलचलों का कारण समष्टि चेतना के नाम से जाना, सम्बोधित किया जाता है। बल्ब में जलने वाली बिजली अन्तरिक्ष में संव्याप्त विद्युत शक्ति की ही एक चिनगारी जमझी जाती है और दोनों का सघन सम्बन्ध किया जाता है। यही बात अब व्यष्टि के सम्बन्ध में लागू समझी जाती है और व्यष्टि चेतना को समष्टि चेतना का ही अंग, अंश समझा जाता है। व्यष्टि चेतना की एक चिनगारी और समष्टि चेतना को व्यापक अग्नि के समकक्ष समझा स्वीकार किया जाता है।

व्यक्ति मस्तिष्क की, व्यष्टि चेतना की अपनी क्षमता है किन्तु वह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है बल्कि वह समष्टि मस्तिष्क का ही एक अंग है। इस समष्टि मस्तिष्क को वैज्ञानिक क्षेत्र में ब्रह्माण्डीय चेतना नाम दिया जाता है। इस तथ्य को व्यक्ति और समाज के उदाहरण से भी भी भांति समझा जा सकता है। व्यक्ति समाज का ही एक अविच्छिन्न अंग है। वह समाज से अलग रहा नहीं है। एकाकी रहने लगे तो भी वह समाज से पृथक होने का दावा नहीं कर सकता। उसे अब तक जो ज्ञान, अनुभव,संस्कार कौशल आदि मिला है, उसे जो शरीर पोषण प्राप्त हुआ है सबके लिए वह समाज का ही ऋणी है। यदि वह एकाकी रहने लगे, संन्यासी बनकर गिरि कंदराओं में जीवन व्यतीत करने लगे तो भी उसे निर्वाह के लिए कुछ उपकरण साथ रखने ही पड़ेंगे। माला, कमण्डल, कैम्पीन, कुल्हाड़ी जैसे साधनों के बिना तो संन्यासियों का भी काम नहीं चलता। समाज शास्त्री इस तथ्य को बड़ी दृढ़ता के साथ प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य जब तक एकाकी रहा तब तक वह आदिम जंगली स्थिति में रहा। उसका सामाजिक जीवन आरम्भ करना ही मनुष्य की प्रगति यात्रा का पहला चरण था। इस प्रकार एक तवासी कहलाने वाले का भूतकालीन और वर्तमान क्रिया−कलाप निश्चित तथा अनिवार्य रूप से समाज के साथ सम्बद्ध रहा है तथा आगे भी उस परम्परा में कोई अवरोध नहीं आना है।

व्यक्ति का निर्वाह और विकास जिस प्रकार समाज पर आश्रित है तथा उससे अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है ठीक इसी प्रकार व्यक्ति चेतना या व्यष्टि मस्तिष्क स्वतन्त्र दिखाई भले ही दे, वह है समष्टि चेतना का ही एक अंग। लोक रुचि और लोक मान्यताओं के बदलते रहने का भी यही कारण है। लोगों का चिंतन प्रवाह अपने में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतन्त्र चिन्तक के प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। युद्ध और शांति के दिनों में इस तथ्य को बड़ी आसानी से साकार हुआ देखा जा सकता है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणिक मान लेने की श्रद्धा अब उखड़ रही है तथा तर्क और प्रमाणों पर आधानीति एवं दर्शन शास्त्र के प्रख्यात विद्वान् डयूरेन्ट डे्रक अपने ग्रन्थ “सामान्य व्यक्ति के लिए ईश्वर जगत का निर्माता पोषण तथा संहारक बनकर सद्मार्ग अपनाने एवं सदाचरण की प्रेरणा देता है। असामान्य व्यक्ति उस सत्ता को श्रेष्ठ सिद्धान्तों एवं आदर्शों के पुँज के रूप के रूप में देखता है और उसी के अनुरूप ढलने का बाध्य करता है।” वे आगे कहते है कि “ यदि हमें विश्व में एकता, समता की−सुख शान्ति एवं आनंद की− निर्झरिणी प्रवाहित करनी है तो उसके मूलभूत स्रोत एवं श्रेष्ठतम मानवी आदर्शों के प्रतीक ईश्वर को अपनाना होगा।”

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाय तो हर व्यक्ति चाहता है कि कोई उसका एक ऐसा संरक्षक हो जो समर्थ हो तथा आपत्तिकाल में उसका सहयोग करे। ऐसी समर्थ सत्ता ईश्वर ही हो सकती है जो मनुष्य को हर समय अपना सूक्ष्म संरक्षण दे सके। वाल्टेयर ने इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखकर, एक बार कहा था कि “यदि ईश्वर नहीं है तो हमें उसकी सर्जना करनी होगी क्योंकि ईश्वर के बिना अधिकांश लोगों का जीवन तुच्छ, असहाय एवं दुःख पूर्ण है।”

काल जुँग के अनुसार धर्म के अवलम्बन से मनुष्य उसी प्रकार शान्ति की अनुभूति करता है जिस तरह बच्चा माँ की गोद में पहुँचने के बाद अनुभव करता है। व्यक्ति जब अपने को निस्सहाय महसूस करता है। तो ऐसे अवसरों पर किसी सर्व समर्थ पिता पर विश्वास कर ही वह शान्ति अनुभव करता है।

मनोविज्ञान वेत्ता कार्ल जुँग की मान्यता है कि “धर्म की सहायता एवं किसी सर्वसमर्थ सत्ता के अवलम्बन से व्यक्ति जीवन के कालुष्य को जीत सकता है” शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य स्थिर बनाये रखने से लेकर मनुष्य को श्रेष्ठ महान बनाने के सारे आधार अध्यात्म में विद्यमान है।”


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एक एव मनो देवो ज्ञेथः सर्वार्थ सिद्धिदः। अन्यत्र विफलक्लेशः सर्वेषाँ तज्जयं बिना॥ −योगवाशिष्ठ

‘एक मात्र मन’ देवता को ही सम्पूर्ण सिद्धियों का देने वाला समझो। उसको बिना जीते हुए, अन्य क्रियाओं को असफल वाली ही जानो।’

पवनो वध्यते येन मनस्तेनैव बध्यते, मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन बध्यते। मनो यत्र विलीयते पवनस्तत्र लीयते, पवनों लीयते यन्त्र विलीयते। −हठयोग प्रदीपिका

(प्राणायाम द्वारा) प्राणवायु को अधीन कर लेने वाला मनुष्य अपने मन को भी अपने अधीन कर सकता है। उसी प्रकार अपने मन का अधीन कर लेने वाला प्राणवायु को भी अपने अधीन कर लेता है। जिस स्थान (आधारचक्र) पर मन का लय होता है, उसी स्थान में प्राणवायु का भी लय हो जाता है। इसी भाँति जिस स्थान में प्राणवायु का लय होता है, उसी आधार चक्र संस्थान में मन भी आप ही आप लीन हो जाता है।


जड़ चेतन में समाई हुई परमशक्ति

प्रकृति की समस्त हलचलों का केन्द्र बिन्दु एक केन्द्रीय शक्ति है। वही विविध रूप धारण करती तथा केन्द्रीय शक्ति है। वही विविध रूप धारण करती तथा संसार को रचती है। सम्पूर्ण सृष्टि में वही संव्याप्ति है। वेदान्त को रचियता हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में वही सव्यसाची है। वेदान्त में इस महाशक्ति को ब्रह्म कहा गया है। वेदान्त दर्शन के अनुसार ब्रह्मा के अतिरिक्त ब्रह्माण्ड में और कुछ नहीं है। “एको ब्रह्मा द्वितीयोनास्ति” की उक्ति इसी तथ्य पर आधारित है। उसके प्रकाश से ही तारे, नक्षत्र, सूर्य सभी प्रकाशित हैं। जीव, जन्तु, वनस्पतियों में उसकी चेतन तरंगें ही क्रीड़ा−कल्लोल कर रही हैं। उत्पत्ति, विकास एवं विनाश की प्रक्रिया इस महाशक्ति द्वारा ही संचालित है।

जिस प्रकार सूर्य ओस की असंख्यों बूँदों में असंख्य प्रतीत होता है उसी प्रकार देश काल की परिधि में आकर उससे परे रहते हुए भी वह शक्ति में भिन्नता होते हुए भी कारणभूत सत्ता की दृष्टि से समस्त जड़ चेतन में वही विद्यमान है। सृष्टि की समस्त रचनाएं उसकी ही क्रमिक अभिव्यक्तियाँ हैं। इस तथ्य के अनुसार सारा संसार एक शक्ति के सूत्र में माला के मनके के मसान गुँथा हुआ है। गुँथने वाली इस शक्ति को ही लौकिक परिभाषा के अनुसार ‘मन’ कहा गया है। सबमें विद्यमान इस सूक्ष्म शक्ति द्वारा ही सृष्टा समस्त प्रकृति पर नियंत्रण रखता एवं संचालन करता है।

ब्रह्माण्ड की वास्तविक शक्ति सूक्ष्म में ही निहित है। ऊर्जा, प्रकाश,चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण, विद्युत उसी के विविध रूप हैं। इन सबके समष्टिगत स्वरूप कोही ब्रह्म कहा गया है। आधुनिक विकासवाद की अवधारणा भी इस सिद्धान्त पर ही अवलम्बित है। जीव द्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) से जीव के विकास प्रक्रिया में एक शक्ति के अनेक में रूपांतरित होने का ही तथ्य छिपा है। सापेक्षवाद के प्रवर्तक भौतिक शास्त्र के मूर्धन्य वैज्ञानिक आइन्स्टीन के अनुसार सर्वत्र ऊर्जा संव्याप्त है। समस्त पदार्थ ऊर्जा के ही स्थूल रूप हैं। ठोस,द्रव्य,गैस की विभिन्न अवस्थाएँ ऊर्जा की क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म तर स्थितियाँ हैं ये अवस्थाएँ परिवर्तनशील हैं। स्थूल से सूक्ष्म से स्थूल में बदलती रहती हैं। इसे जीवन चक्र नाम ऊर्जा के रूपांतरण प्रक्रिया के कारण ही दिया गया है। ठोस रूप में दिखायी पड़ने वाला पदार्थ भी अत्यधिक विकिरण के प्रभाव से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। यह प्रकाश की गति प्राप्त करले तो पूर्णतया ऊर्जा में परिवर्तित हो जायेगा। इसका स्थूल स्वरूप अदृश्य हो जायेगा।

एक ही शक्ति किस प्रकार विभिन्न रूपों में रूपांतरित होती रहती है, इसे भौतिक विज्ञान के अनुसार समझा जा सकता है। किसी भी द्रव्य की तीन भौतिक अवस्थाएँ हैं—ठोस, द्रव एवं गैस। समयानुसार यह अवस्थाएँ परस्पर परिवर्तित होती रहती हैं। ठोस के रूप दिखाई पड़ने वाला बर्फ ताप के संपर्क में आते ही द्रव में बदल जाता है। तापक्रम बढ़ा देने से वाष्पित होकर गैस अवस्था प्राप्त कर लेता है। इसकी उल्टी प्रक्रिया भी चलती है। भाप शीत के संपर्क में आने पर अथवा कम ताप होने पर द्रव एवं तापमान न्यून हो जाने पर जमकर बर्फ बन जाती है। यह प्रक्रिया समस्त प्रकृति में चलती है। पानी का वाष्पित होकर बादलों में परिवर्तित होना तथा सघन होकर पानी के रूप में बरसना प्रकृति की एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यही पानी नदी, नालों के माध्यम से जीव−जन्तुओं एवं वनस्पतियों के शरीर में पहुँचता है। शरीर के तत्वों से मिलकर रक्त, जीवनी शक्ति, स्थूल अंशों से संयुक्त होकर—माँस मज्जा एवं हड्डियों का निर्माण करता है। वनस्पतियों में घुल मिलकर वह उसका ही अंश बन जाता है। जीवों के मरने पर उसके स्थूल अवयव, जल एवं सड़गल कर पुनः सूक्ष्मावस्था में पहुँच जाते हैं। व्यक्त से अव्यक्त से अव्यक्त और अव्यक्त से व्यक्त अवस्था में ऊर्जा की रूपांतरण प्रक्रिया में समस्त सृष्टि का व्यापार चल रहा है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया पदार्थ के असंख्यों परमाणुओं के परस्पर संयोग एवं वियोग के कारण ही हो पाती है। इन परमाणुओं की गतिशीलता के कारण ही स्वरूप में परिवर्तन होता है।

अनेकों रासायनिक जटिल प्रक्रियाओं से गुजरते हुए यह शक्ति भी उस महाशक्ति का ही भौतिक रूप है। विशिष्ट प्रक्रियाओं में आकर एक शक्तियों में रूपांतरित हो जाती है। प्रकाश, ताप विद्युत, चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण, घर्षण, दबाव उसके ही विविध रूप है। नवीन वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि गुरुत्वाकर्षण को छोड़कर सभी भौतिक शक्तियाँ मूल रूप सु चुम्बकीय स्वरूप भी पदार्थ के परमाणुओं की गतिशीलता के कारण ही उत्पन्न होता है।

आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त के अनुसार विविध सापेक्ष आधारों के कारण ही संसार का विभिन्न स्वरूप दिखायी पड़ता है। जड़−चेतन के बीच भेद भी सापेक्ष आधारों की विषमता के कारण है। यदि सम्पूर्ण प्रकृति एवं सभी जड़−चेतन को देखने का कोई निरपेक्ष आधार करतल गत हो जाय तो संसार के वास्तविकास्वरूप का पता लग सकता है। सर्वत्र एक सत्ता, एक शक्ति का बोध तो निरपेक्ष सत्ता के अवलम्बन से ही सम्भव है। विविधता तो आधारों की भिन्नता के कारण दृष्टिगोचर होती है। संसार को समझने एवं सर्वत्र व्याप्त एक महाशक्ति की अनुभूति करने के लिए उस अपरिवर्तनीय नित्य, चेतना का ही अवलम्बन लेना होगा। विज्ञान के बढ़ते हुए चरण अब उस केन्द्र बिन्दु पर पहुँच रहे हैं जहाँ से ऋषियों ने उद्घोष किया था।

ईशावस्यनिदं सर्वं यत्किञ्च लगत्याँ जगत्। — ईशावास्योपनिषद्

इस समस्त जगत में जो कुछ भी जड़ और चेतन दृष्टिगोचर हो रहे हैं वे सभी ईश्वर में ही व्याप्त हैं।

परमाणु के विविध कणों से विनिर्मित होने के सिद्धान्त से आगे बढ़कर विद्युत तरंगों के रूप में प्रतिपादित होने से पदार्थों की भिन्नता का सिद्धान्त भी खण्डित हो रहा है। नवीनतम शोधों के अनुसार विद्युत तरंगों की विविध गति के कारण ही एक पदार्थ के परमाणु दूसरे पदार्थ के परमाणु में अन्तर होता है यह अन्तर ही पदार्थों की भिन्नता के रूप दिखायी पड़ता है।

भौतिक शास्त्र के प्रख्यात विद्वान ‘सर जेम्स जीन्स’ का कहना है कि “विद्युत तरंगों का सिद्धान्त प्रकृति की एकरूपता एवं उसके असंख्यों संरचनाओं में व्याप्त एक महाशक्ति का बोध कराता है।” ‘जेम्स जीन्स’ का यह प्रतिपादन भारतीय दर्शन की एक शक्ति, अवधारणा का ही समर्थन करता है।

सैद्धान्तिक दृष्टि से दर्शन एवं विज्ञान सृष्टि में संव्याप्त एक महती चेतना की ही पुष्टि करते हैं। इसकी अनुभूति के लिए तो आत्म विज्ञान का ही अवलम्बन लेना होगा। साधना सोपानों पर चढ़ते हुए इस सत्य की अनुभूति की जाती है। सत्य के दिग्दर्शन के साथ ही उस महाशक्ति के सान्निध्य से मिलने वाले दिव्य अनुदानों का भी रसास्वादन किया जा सकता है। यह इतनी बड़ी उपलब्धि है जिसे प्राप्त करने के उपरान्त न कुछ जानना शेष रह जाता है और न ही कुछ पाने की कामना रह जाती है। इस एकत्व की अनुभूति ही जीवन का परम लक्ष्य है।


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किं करोमिवव गच्छामि किं गृह्यामि त्याजामि किम्। आत्माना पूरितं सर्वं महाकल्पाम्षुना यथ॥ —योगवाशिष्ठ

जिस प्रकार प्रलयकाल में सर्वत्र जल ही जल होता है उसी प्रकार आत्मा की सर्वत्र उपस्थिति होती है, जब सब ओर ब्रह्मा ही− आत्मा ही व्याप्त है, तो क्या करूं, कहाँ जाऊँ? क्या छोड़ूं? इत्यादिक समस्त प्रश्नों का समापन हो जाता है।


विज्ञान क्रमशः अध्यात्म के निकट आ रहा है

वह समय अब पीछे छूटता जा रहा है जब विज्ञान के क्षेत्र द्वारा सचाई खोज निकालने की ठेकेदारी का जोर शोर से घोषणा की जाती थी और साथ ही यह भी कहा जाता था कि अध्यात्म की मान्यताएँ काल्पनिक एवं निरर्थक है। पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। विज्ञान और बुद्धिवाद को अब अपने पूर्व प्रतिपादनों पर नये सिरे से विचार करना पड़ रहा है।

जैसा−जैसा यह पुनर्विचार उपलब्ध नये तथ्यों को खोजता जा रहा हैं वैसे वैसे उसे अपनी पूर्व मान्यता बदलने को विवश कर रहा है। कारण यह है कि बुद्धिवाद पर नीति और उत्कृष्टता का अनुशासन आवश्यक प्रतीत हो रहा है। इसके बिना उच्छृंखल समर्थता भ्रष्टता और दृष्टता की ओर तेजी से बढ़ रही है साथ ही विनाश की ओर भी। इसी प्रकार तथ्य अब इन निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संसार में सब कुछ जड़ ही नहीं है। पदार्थ पर अंकुश रखने वाली चेतन सत्ता का भी स्वतन्त्र अस्तित्व है और उसका विश्व व्यवस्था एवं प्राणि जगत् पर सुनिश्चित अनुशासन है।

विज्ञान का जैसे जैसे बचपन दूर हो रहा है और प्रौढ़ता परिपक्वता की स्थिति आ रही है वैसे वैसे विज्ञजनों ने अध्यात्मिक सत्ता, शैली एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में अपनी पुरानी मान्यताएँ बदली है और कहा है− विज्ञान मात्र पदार्थ तक ही सीमित नहीं है। चेतना की वरिष्ठता को खोज निकालना और उसके सहारे जन जीवन को सर्वतोमुखी प्रगति पथ पर अग्रसर करना भी विज्ञान का ही काम है।”

इसके साथ ही अध्यात्म ने भी हठधर्मी छोड़ी है और यह स्वीकार है कि उसकी गरिमा विज्ञान की कसौटी पर अपने स्वरूप को निखारने से ही इस युग में सम्भव हो सकेगी।

परिवर्तित विचारधारा का परिचय विश्व के मूर्धन्य महामनीषियों द्वारा इन्हीं दिनों व्यक्त किये गये उद्गारों से मिलता है। इसका थोड़ा-सा संकलन नीचे है−

प्रसिद्ध वैज्ञानिक ओलीवरलॉज कहते थे−” मुझे विश्वास है अब वह समय निकट आ गया है जब कि विज्ञान को नये क्षेत्र में प्रवेश करना होगा। विज्ञान अब भौतिक जगत का ही सीमित नहीं रहेगा। चेतन जगत भी अब वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।”

इंग्लैंड की रॉयल सोसायटी के सेक्रेटरी सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘सर जेम्स जीन्स’ ने लिखा है −”पहले यह मान्यता थी कि जड़ जगत ही चेतन ही उत्पत्ति का आधार है। भौतिक तत्वों के समन्वय से ही मन की उत्पत्ति होती है। लेकिन यह पदार्थवादी मान्यता अब बदल गयी है। अब यह माना जाने लगा है कि चेतन सत्ता ही जड़ पदार्थों की उत्पत्ति करती है। इस जड़ जगत के पीछे एक विराट् चेतना काम कर रही है।”

सर जेम्स जीन्स ने “ दि न्यू बैंक ग्राउण्ड ऑफ साइन्स” नामक पुस्तक में यह उल्लेख किया है−

“उन्नीसवीं सदी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक जगत था लेकिन अब प्रतीत हो रहा है कि विज्ञान जड़ पदार्थों से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है।”

“दि मिस्टीरियस युनिवर्स” में उन्होंने लिखा है− “वैज्ञानिक विषय के संदर्भ में हमने जो पूर्व मान्यता बना ली है अब उसकी पुनः परीक्षण की आवश्यकता है। जड़ जगत को जो प्रधानता दे बैठे थे− अब प्रतीत हो रहा है कि वह गौण है। जड़ जगत के पीछे एक नियामक सत्ता काम कर रही है।

प्रो.ए.एस. एडिंगटन ने का है− “अब विज्ञान इस निर्णय पर पहुँचा है कि समस्त सृष्टि को एक अज्ञात शक्ति गतिमान कर रही है”

“अब विज्ञान का जड़ पदार्थों से लगाव समाप्त हो गया। चेतन, मन, आत्मा का अस्तित्व माना जाने लगा है। चेतन सत्ता ही जड़ जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है।”

प्रसिद्ध वैज्ञानिक हरवर्ट स्पेन्सर ने कहा−” जिस शक्ति को मैं बुद्धि की पहुँच से परे मानता हूँ वह धर्म का खण्डन नहीं करती अपितु उसे और अधिक बल पहुँचाती है।”

प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्फ्रेड रसेल वैलेस ने अपनी पुस्तक “सोशल इनवाइरमेन्ट एण्ड मॉरल प्रोग्रेस “ में स्पष्ट लिखा है− “ मुझे विश्वास है कि चेतना ही जड़ पदार्थों को गति प्रदान करती है।”

सन् 1934 में “दि ग्रेट डिजाइन” नामक पुस्तक में चौदह वैज्ञानिकों ने अपना मत इस प्रकार प्रकट किया− “यह संसार चेतना रहित कोई मशीन नहीं है। इसका निर्माण अकस्मात् ऐसे ही नहीं हो गया। ब्रह्माण्ड के सभी क्रिया कलापों को एक चेतन शक्ति नियन्त्रित कर रही है चाहे हम उसे कुछ भी नाम दे दें।”

अलबर्ट आइंस्टीन ने कहा है−”मैं ईश्वर को मानता हूँ। इस अविज्ञात सृष्टि के अद्भुत रहस्यों में वह ईश्वरीय शक्ति ही परिलक्षित होती है। अब विज्ञानों भी इस बात का समर्थन कर रहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि का नियमन एक अदृश्य चेतन सत्ता कर रही है।”

जे.बी.एम. हैलडेन ने लिखा है −” अविज्ञात सृष्टि के कुछ ही रहस्यों को हम जान पाये हैं। सृष्टि को हम एक निर्जीव मशीन मात्र समझ रहे थे − यह हमारी भूल थी। वास्तव में यह सृष्टि चेतन शक्ति से सम्बद्ध है। जड़ पदार्थों का संचालन यह चेता शक्ति कर रही है।”

आर्थर एस. एडिंगटन ने लिखा है − “ईश्वर का अस्तित्व नहीं है यह मान्यता टूट चुकी है। चूँकि धर्म खण्डन नहीं किया जा सकता।”

आर्थर एस. क्राँम्पटन ने कहा है—”हमारे चिन्तन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी आगे एक शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व तना रहता है।”


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ध्यानात्मा साधकेन्द्रो भवति परपुरे शीघ्रगामी मुलीन्द्रः सर्वज्ञः सर्वदर्शी सकल हिलकर सर्वशास्त्रार्थवेत्ता। अद्वैताचास्वादी विलसति परमापूर्वसिद्धित्रसिद्धो दीर्घायुः सोऽपि कर्त्ताः त्रिभुवन भवनै संहृतौ पालने च॥35॥ − षत् चक्र निरुपणम् 35

अर्थात् − आज्ञाचक्र को सिद्ध कर लेने वाला दूरगामी बन सकता है, सूक्ष्म रूप धारण कर सकता है। परकाया प्रवेश कर सकता है। सबका हितकारी शास्त्रों का ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ता,

प्रसन्न चित्त सिद्धि यदाऽऽत्मतत्वेन ब्रह्मातत्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। − श्वेताश्वर 2।15

योग साधक आत्मा के द्वारा ही दीपक से समान प्रकाशयुक्त के दर्शन करता है।

नीहारधूमार्कानलानियानाँ खेद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम्। एतानि रुपाणि पुरः सराणि ब्रह्ण्यभिव्यक्ति कराणि योगे॥ − श्वेताश्वर 2।11

अर्थात्− योग साधक को साधक को कुहरा, धुँआ, वायु, अग्नि, जुगनू, बिजली, स्फटिक मणि चन्द्रमा जैसे कई प्रकाश दृश्य दिखाई पड़ते हैं। यह योग की सफलता के चिन्ह हैं।


क्या मानवी सभ्यता मात्र आठ हजार वर्ष पुरानी है

विकासवादी मान्यता चल पड़ी है कि मनुष्य के आदि पुरुष वानर जाति के निकटवर्ती थे। अनुभवों से से सीख सीखकर सभ्य हुये। ऐसी ही एक सभ्य जाति थी आर्य, जो ईसा से दो हजार साल पहले मध्य पश्चिम एशिया में थी। उसी की एक शाखा ईरान से होते हुए भारत में आयी। यहाँ उस आर्य सभ्यता का कालक्रम से और अधिक विकास हुआ। उन्हीं द्वारा लगभग डेढ़ हजार ईसवी पूर्व से बारह सौ ईसवी पूर्व के बीच जो सांस्कृतिक साहित्य रचा गया, वह वेदों के रूप के रूप में विद्यमान है। इन अवधि के उपरान्त आरण्यक, उपनिषद्, सूत्र ग्रन्थ आदि रचे गये। इस स्थापना का कारण यही है कि विकासवादी पुरातत्व वेत्ता पृथ्वी पर मानव सभ्यता का आरम्भिक उदय कुल 4−5 हजार वर्ष पूर्व ही मानते हैं। किन्तु इस स्थापना के पीछे न कोई ठोस तर्क है, न ही पर्याप्त तथ्य।

जब ईसाई लोगों का विश्व पर प्रभुत्व बढ़ा और ज्ञान विज्ञान की अग्रिम पंक्ति में वे लोग आये तो आने अनजाने उन्होंने अपने ईसाई−संस्कारों का वैज्ञानिक परिकल्पनाओं (हाइपोथीसिस) में प्रक्षेपण किया। बाइबिल ने लिखा है कि सृष्टि को हुए मात्र आठ हजार वर्ष हुए हैं। उधर आधुनिक वैज्ञानिक गणनायें यह सिद्ध कर रही थी कि पृथ्वी की आयु 4 अरब वर्ष है। ऐसी स्थिति में ईसाई संस्कारों वाले विकासवादी वैज्ञानिकों ने यह परिकल्पना प्रस्थापित की की मनुष्य का वानर रूप में जन्म तो कुछ लाख वर्ष पूर्व हुआ है, किन्तु सभ्य मानव का जन्म मात्र आठ हजार वर्ष पूर्व हुआ। उससे उन्हें यह सन्तोष कर सकने का अवसर मिला कि बाइबिल की बात आँशिक रूप से सत्य है। किन्तु यह सन्तोष सत्य पर नहीं, परिकल्पना पर आधारित है। बिना सत्य का पूर्ण निष्ठा से अनुसंधान किये व्यक्ति को शान्ति मिल सकती है।

यहाँ तीन बातें स्मरण कर लेनी आवश्यक हैं− पहली यह कि वैज्ञानिकों के ही अनुसार अपनी इस पृथ्वी की आयु लगभग 4 अरब वर्ष है। दूसरी बात यह है कि यह पृथ्वी किन्हीं भी श्रेष्ठ प्राणियों के निवास के उपयुक्त है, और तीसरी यह कि आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह माना है कि अपने इस ब्रह्माण्ड के कतिपय अन्य ग्रहों में भी न केवल जीवन की, अपितु सुविकसित सभ्यता होने की भी सम्भावना है। अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. विल्स के अनुसार तो ब्रह्माण्ड में 18 करोड़ों ग्रह ऐसे हैं, जहाँ किसी न किसी रूप में जीवन अवश्यम्भावी हैं। 18 हजार ऐसे हैं, जहाँ मनुष्यों की तरह के विचारशील प्राणी रहने की सम्भावना है और 180 ग्रह तो ऐसे हैं, जो पंचभौतिक तत्वों की अत्यन्त सूक्ष्म जानकारियों से ओत प्रोत समृद्ध प्राणियों के निवास स्थल हो सकते हैं। यह भी वैज्ञानिक मानते हैं किसी पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म 10 लाख वर्ष से भी पहले हुआ।

जैवरसायन शास्त्री डॉ. एस. मिलर ने प्रकाश स्रोतों की रासायनिक संरचना का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि ऐसे समुन्नत एवं जीवधारी ग्रहों की संख्या एक लाख से कम कदापि नहीं हो सकती। ऐसे ग्रहों तक विद्युत−चुम्बकीय संकेत भेजकर उनसे संपर्क करने के प्रयास भी वैज्ञानिक कर रहे हैं। यदि उन ग्रहों में इन दिनों श्रेष्ठ सुविकसित प्राणी हो सकते हैं, तो आज से लाखों वर्ष पर्व इसी पृथ्वी पर श्रेष्ठ सुविकसित मनुष्य क्या न रहे होंगे? चार अरब वर्ष पुरानी पृथ्वी पर करोड़ों या लाखों वर्ष पूर्व सुविकसित बुद्धिमान मनुष्य रहें हों, इसमें कुछ भी असम्भव नहीं और सभ्य मनुष्य मात्र 5−6 हजार वर्ष से हुये हैं। इसका अर्थ है कि शेष सारी अवधि यानी 8 लाख 95 हजार वर्षों तक लगातार वन्य मानव तो रहा ही। इतनी लम्बी अवधि में अरबों खरबों वन्य मानव जन्में और मरे होंगे। उन सभी के कंकाल मिट्टी में दबते रहे। किन्तु आज तक पुरातत्व विदों को उनके कुल जीवाश्म जो मिले हैं, वे हजार भी नहीं हैं, उनकी संख्या सैकड़ों तक ही सीमित है और वे भी जीवाश्म आधे अधूरे मिले हैं। शेष अरबों खरबों वन्य मानवों के जीवाश्म कहाँ गये? वे क्यों नहीं मिलते?

इसके साथ ही दूसरी युक्ति यह है कि आज से लाखों वर्ष पूर्व सुविकसित मनुष्य थे तो फिर क्या प्रकृति के परमाणुओं में किसी व्यवस्था नहीं कि एक बीज से दूसरे भिन्न बीज वाले पदार्थ की उत्पत्ति हो सके। अमीबा अभी अमीबा ही है। अमीबा से ही ह्वेल और डायनासोर आदि विशाल आकार के जीव बने और फिर महासरीसृप आदि छोटी छिपकलियों में भी बदल गये,ऐसे विचित्र प्रतिपादन जो विकासवाद के पक्ष में किये जाते हैं, विवेक ग्राह्य नहीं है। जीवधारियों की आकृति एवं प्रकृति में कालक्रम से हेर फेर तो स्वाभाविक है किन्तु वह हेर फेर इतने आश्चर्यकारी अन्तर वाला नहीं हो सकता कि जिससे किसी जीव वर्ग की मूल सत्ता का कोई आधार तक शेष न रहे। मनु की सन्तान मानव ने अपनी लम्बी यात्रा में अनेक उतार−चढ़ाव तो अवश्य देखे होंगे। उसके चिन्तन, कर्तृत्व एवं जीवनयापन के क्रम में भी परिवर्तन स्वाभाविक ही हुये होंगे।

ईश्वर ने हर प्राणी को अपनी स्वतन्त्र सत्ता सृष्टि के आरम्भ में ही दी है। मनुष्य भी अपनी मूलभूत विशेषताओं के साथ प्रारम्भ में ही दी है। मनुष्य भी अपनी मूलभूत विशेषताओं के साथ प्रारम्भ से ही जन्मा है और काल −चक्र के अलग अलग सोपानों में वह अनेकानेक उतार चढ़ावों से गुजरता रहा है।

मनुष्य आगे पीछे, दायें बायें सभी ओर चलता रह सकता है। यात्रा आकाश की भी हो सकती है और पाताल की। दोनों को अपने अपने ढंग से प्रगति ही कहा जा सकता है। अपनी स्वतन्त्र सत्ता एवं इच्छाशक्ति के कारण मनुष्य तथा अन्य प्राणी भी जीवन के अनेक उतार चढ़ावों से गुजरते हैं, इस आलोक में ही विकास के क्रमों का अन्वेषण अधिक युक्ति युक्त होगा तथा सत्य के अधिक नजदीक ले जायेगा।

भारतीय आर्ष−ग्रन्थों में ऐसे अनेक सूत्र संकेत तथा विवरण भी विद्यमान हैं, जिनसे मानवी विकास के क्रम अन्वेषण में दिशा निर्देश व सहायता मिल सकती है। बाल्मिकीकृत रामायण में रावण का द्वार यानों और विमानों से सज्जित होने का उल्लेख है। कुछ पूर्व समय मेक्सिको में भूमिस्खनन से एक अतिश्रेष्ठ युद्धक विमान का अति प्राचीन प्रारूप प्राप्त हुआ है, जो मय−सभ्यता का अवशेष है। मानव मय रावण का समकालीन था और उसके नाम से मय वंश चला। यह शिल्पी समुदाय से रूप में प्रसिद्ध हुआ है। महाभारत काल में भी इस समुदाय के शिल्पी विद्यमान थे, ऐसे विवरण मिलते हैं।

विश्व के विभिन्न हिस्सों में हाथियों के जो जीवाश्म मिले हैं, उसके आधार पर पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि चार करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग में हाथी विशाल संख्या में शिवालिक के जंगलों में विचरण करते थे। यह ‘तैतरा वेलोडान’ वर्ग, तदुपरान्त ‘मास्ताडान’ वर्ग और फिर ‘स्टेगोडान’ वर्ग। ‘स्टेगोडान’ वर्ग और फिर ‘स्टेगोडान’ वर्ग के ही हाथियों में चार दांतों वाले हाथी भी थे जो लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व शिवालिक पहाड़ियों में विचरते थे। भारत की परम्परागत गणना के अनुसार भी राम रावण का समय लगभग पौने नौ लाख वर्ष पुराना है। चार दाँतों वाले हाथियों का काल भी लगभग वही है। अतः राम रावण युद्ध का काल लगभग पौने लाख वर्ष पुराना ठहरता है। उस समय भारत में इतने सुविकसित सभ्य लोग रहते थे, कि उनके पास विमान, आग्नेयास्त्र आदि की दृष्टि से भी वे लोग अत्यन्त विकसित थे, विज्ञान और दर्शन में तो विकसित थे ही।

ऐसे विशिष्ट प्रमाणों और संकेतों के आधार पर हमें पूर्वाग्रह से पूर्णतः मुक्त रहकर अपने यथा सम्पूर्ण मानव जाति के इतिहास तथा क्रम विकास का गहराई और सूक्ष्मता से अध्ययन−विश्लेषण करना चाहिए। तभी ऐसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होंगे, जो सृष्टि−चक्र तथा मनुष्य की संकल्प शक्ति के यथा तथ्य स्वरूप पर प्रकाश डालेंगे और मनुष्य को ऊर्ध्वगामी, आलोकवादी बनने के प्रेरणा दे सकेंगे।


दिग्भ्रान्त शक्तियाँ ज्वालामुखियों की तरह विध्वंसक

साढ़े तीन हाथ लम्बे और साठ सत्तर किलो भारी मनुष्य के भीतर ऐसी क्षमताएँ और संभावनाएं भरी पड़ी है कि उनका प्रत्यक्षीकरण उसे दृष्टि का अद्भुत विलक्षण चमत्कार ही सिद्ध करता है। मनुष्य की अन्त निहित क्षमताओं और शक्तियों की कोई सीमा नहीं है। यदि वे रचनात्मक दिशा में लग सके साधारण-सा कलेवर धारण किये दिखाई देने वाला मनुष्य विराट् विश्व वसुन्धरा का सुरभित सुमन बन सकता है और यदि वही क्षमताएँ विध्वंसकारी प्रयोजनों में लग जाएँ तो वह स्वयं अपने आपको तो नष्ट करता ही है, अन्य औरों के लिए भी अगणित विपदाएँ खड़ी कर देता है।

किसी का भी बाहरी कलेवर देखकर यह नहीं सोच लेना चाहिए कि यह हाड़ माँस का एक साधारण या पुतला है। दीखने हुए बहुत-सी वस्तुएँ सामान्य दिखाई देती है परन्तु उनकी अन्तर्निहित क्षमताएँ जब उजागर होकर आती है तब पता चलता है कि वास्तव में वह वस्तु कितनी क्षमता सम्पन्न है बहुत-सी वस्तुएँ क्या संसार की लगभग सभी वस्तुएँ सामान्य स्थिति में अत्यन्त साधारण प्रतीत होती हैं किन्तु जब उनके भीतर की शक्तियाँ जागृत होती हैं तो सृजन या विनाश के चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती हैं। मनुष्य के भीतर भी ऐसी ही शक्तियाँ निहित हैं। यदि उनका सृजनात्मक उपयोग किया जाय तो सुखद परिणाम सामने आते है और उनकी दिशा यदि विध्वंस की ओर उन्मुख हो किए गए शक्तियों के उपयोग का नाम ही पुण्य है जब शक्तियां विध्वंस की दिशा में अग्रसर होती है तो उनसे ऐसे विस्फोट उत्पन्न होते हैं कि वे शक्तिधारी सहित अन्य समीपवर्ती और क्षेत्रों को भी नष्ट कर विनाश का दृश्य उपस्थित कर देते हैं। इन विनाश के परिणाम प्रस्तुत करने वाले कर्तृत्वों को, शक्तियों के दुरुपयोग को पाप, कल्मष, अपराध, अनैतिकता, अवाँछनीयता कुछ भी कहा जा सकता है।

साधारण अस्तित्व में छिपी हुई शक्ति की विभरीषि का को ज्वालामुखी के उदाहरण से भली भांति समझा जा सकता है। पृथ्वी की सतह धूल कंकड़ मिट्टी से ही बनी दिखाई देती है। ठोकर लगकर उस पर गिरने से केवल चोट ही लग सकती है किन्तु पृथ्वी के भीतर की ऊष्मा या शक्ति जब ज्वालामुखी बनकर फूटती है तो विनाश का दृश्य नहीं बनता। ज्ञात विवरणों के अनुसार अब तक पृथ्वी पर 455 क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अक्सर ज्वालामुखी फूटते रहते सबसे अधिक ज्वालामुखी प्रशाँत महासागर और उसके द्वीपों तथा तटवर्ती इलाकों में हैं। यहाँ इतने अधिक जाग्रत ज्वालामुखी हैं कि इस क्षेत्र को अग्निरेखा का क्षेत्र कहा जाता हैं।

पृथ्वी के गर्भ में अग्नि की अधिकता हो जाती है और उसके निकलने का कोई रास्ता नहीं रह जाता तब वह अग्नि की अधिकता हो जाती है और उसके निकलने का कोई रास्ता नहीं रह जाता तब वह अग्नि ज्वालामुखी क्षेत्रों से बाहर निकलती है मानवीय चेतना के सम्बन्ध में भी यह बात लागू होती है। इसके भीतर भी शक्ति का एक अस्त्र प्रवाह बहता रहता है जब उन शक्तियों का उपयोग नहीं हो पाता या गलत दिशा में चल पड़ता है तो अपराध अनीति कुकर्म और अवाँछनीयता के रूप में प्रकट होने लगती हैं जिससे निजी जीवन के साथ साथ सामाजिक जीवन में भी कई विकृतियाँ उत्पन्न होती है। जिनका परिणाम निश्चित ही अनिष्ट कर होता है।

ज्वालामुखी जब फूटते हैं तो उस क्षेत्र की सतह से आग, धुँआ राख और लावा भयानक आवाज के साथ बाहर निकलता है। यद्यपि बहुत कुछ यह जान लिया गया है कि ज्वालामुखी किन क्षेत्रों में अधिक आते है। यह जान लेने के बाद उस क्षेत्र में जन हानि का कोई विशेष तय नहीं रहती। समय रहते पूर्व वहाँ के लोगों को हटाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा जा सकता है। किन्तु इतना जान लेने के पर भी विनाश की विभीषिका को रोका नहीं जा सकता क्योंकि ज्वालामुखी फूटने पर उससे निकल पड़ने वाला लावा किस दिशा में बह निकलेगा यह कुछ पता नहीं चलता। इसलिए कई बार कड़े सुरक्षा प्रबन्ध किये जाने पर भी बहुत अधिक विनाश होता है

दो वर्ष पूर्व 18 मई 1980 को अमेरिका के दक्षिणी भाग में स्थित वेन्फुवर पर्वतीय क्षेत्र में सुबह ज्वालामुखी का भयंकर विस्फोट हुआ कुछ ही क्षणों में वह सारा क्षेत्र घटाटोप धुएं से घिर गया और उससे निकली राख आस पास के 400 किलोमीटर क्षेत्र में फैल गई। इस विस्फोट की सम्भावना एक महीने पहले से आँकी जा रही थी। काफी सुरक्षा प्रबन्ध भी किये गए किन्तु फिर भी उससे होने वाले विनाश का पूरी तरह टाला नहीं जा सका। अपराधी प्रवृत्ति को भले ही पहचान लिया जाय, उससे बचने के भी चाहे जितने प्रयास कर लिये जाँय परन्तु इस तरह की प्रवृत्ति पहले से ज्ञात सम्भावना वाले ज्वालामुखी की तरह कुछ न कुछ हानि तो पहुँचाती ही हैं।

ज्वालामुखी में विस्फोट के समय निकलने वाला लावा प्रायः 3 या 4 मील प्रति घण्टे की गति से 40 से 60 मील तक के क्षेत्र में फैलता है। ऐसे स्थिति में तो फिर भी सुरक्षा प्रयास किये जा सकते है किन्तु कई बार इनकी गति 300 मील प्रति घण्टा तक होती है। उस स्थिति में ज्वालामुखी के कारण होने वाले महाविनाश को रोका पाना असम्भव ही होता है। जन धन की किसी प्रकार रक्षा कर भी ली जाए तो ज्वालामुखियों में लावे के साथ जो गैसें निकलती है। वृक्ष वनस्पति और फसलें तो इनमें नष्ट होती ही हैं।

पृथ्वी के निर्माण से लेकर अब तक उसके कई क्षेत्रों में हजारों ज्वालामुखी फूट चुके हैं। पिछली कुछ शताब्दियों में ही अनेक ज्वालामुखियों ने महाविनाश का दृश्य उपस्थित किया। 5 अप्रैल 1815 को इण्डोनेशिया के बोलकाना क्षेत्र में 36 वर्ग मील क्षेत्र में भयंकर ज्वालामुखी फूटा। इस ज्वालामुखी के कारण 4100 फूट ऊंचाई वाली बौल्कानों पहाड़ी नष्ट हो गई और वहाँ 7 मील गहरा वृत्ताकार गड्ढा बन गया। पिछले सौ वर्षों में अब तक का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट 27 अगस्त 1883 को जावा और सुमात्रा के बीच वाले भूभाग में हुआ था। इस ज्वालामुखी के कारण 163 गाँव पूरी तरह नष्ट हो गए। विस्फोट इतना प्रचण्ड था कि बड़े बड़े पत्थर 34 मील लम्बी ऊँचाई तक आकाश में छिप गए और करीब 3500 वर्ग मील के घेरे में धूल छा गई। इस विस्फोट को गूँज 154 लाख वर्गमील क्षेत्र में सुनी गई।

सबसे निष्क्रिय अर्थात् जहाँ पहले विस्फोट हुआ करता था, ज्वालामुखी, चिली तथा अर्जेण्टाइना की सीमा पर स्थूतिया के क्षेत्र में है। निष्क्रिय ज्वालामुखी का अर्थ यह नहीं है कि अब वहाँ कभी विस्फोट होगा नहीं। निष्क्रिय से तात्पर्य विस्फोट हुए वर्षों अवधि बीत जाने से ही कुसंस्कारी मन कब अपनी कुसंस्कारिता के वशीभूत होकर कुकृत्यों से संलग्न हो जाए, इसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं रहता। उसी प्रकार निष्क्रिय ज्वालामुखी भी कभी भी जाग उठते हैं और विनाश मचाने लगते हैं।

सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखी एण्टोकेला एवं माउण्ट हेलेना हैं, जो कभी भी धूल, गुबार, धुएं और आग लावे के साथ बहने लगता है। हजारों वर्ष पर्व कहाँ ज्वालामुखी धधक रहे थे? इसका कोई पता ठिकाना नहीं है, और वे कभी भी फिर से जाग सकते है जापान का बादाई ज्वालामुखी 1000 तक शान्त रहने के बाद फट पड़ा था। 7000 वर्ष तक शाँत रहने के बाद आइलैंड के ज्वालामुखी ने सन् 1973 में लावा उगलना शुरू किया था। कौन जाने जिस स्थान पर हम बैठे हैं, वहाँ कभी कोई ज्वालामुखी लावा उगलता रहा हो और वह कब फूट पड़े।

पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई अमित शक्ति का परिचय ज्वालामुखियों से मिलता है। मनुष्य के भीतर भी ऐसी ही प्रचण्ड शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं। वह आखिर है तो भूमिपुत्र ही। महत्व उन शक्तियाँ का तभी है जब उन्हें सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाया जाए अन्यथा संचित शक्तियाँ दिग्भ्रान्त होकर ज्वालामुखियों की तरह ही विनाशकारी सिद्ध होती हैं।


मानवी नस्ल सुधारने में “जेनेटिक्स” का प्रयोग

विकास साधनों की उपयोगिता आवश्यकता से कोई इन्कार नहीं करता, वे अपना काम करते है और करना चाहिए। इनने पर भी यह असमंजस अपने स्थान पर यथावत् ही बना रहता है कि मनुष्य की अपनी निजी विशेषता एक सुनिश्चित तथ्य जैसी बनकर भारी चट्टान की तरह अड़ी बैठी रहती है और बहुत हिलाने डुलाने उठाने हटाने का प्रयत्न करने पर भी उत्साहवर्धक परिणाम उपलब्ध करने के मार्ग में बाधा ही बनी बैठी रहती है। देखा गया है कि शारीरिक और मानसिक विकास में मनुष्य की निजी विशेषता का असाधारण महत्व है। सुधार प्रयत्नों से उन पर सीमित प्रभाव ही होता है और परिवर्तन भी यत्किंचित् ही हो पाता है। उदाहरण के लिए मनुष्य के चेहरे, रंग एवं कार्यशक्ति पर दृष्टिपात किया जा सकता है। अफ्रीका के नीग्रो, योरोप के गोरे चीन के मंगोल, अरब के तगड़े काया के बौने एकत्रित करके यह जा सकता है कि उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति में भी भारी अन्तर पाया जाता है। चेहरा, नाक, आँख, होंठ, दाँत, बाल, नाखून जैसे अंगों को देखकर रह जाना सका है कि यह भिन्नता उन समुदायों की निजी विशेषता है। इसका परिस्थितियों या साधनों से कोई प्रधान देश में गोरों के बीच बसते हुए भी अपने रंग और चेहरे को पीढ़ी दर पीढ़ी यथावत् बनाये रहते हैं। इसी प्रकार गोरे लोग दक्षिण अफ्रीका जैसे गर्म क्षेत्र में शताब्दियों से बसे होने पर भी काले नहीं हुए। उनकी सन्तानें गोरे रंगी की तथा माँ−बाप जैसे चेहरों की ही होती हैं जबकि पड़ोस में बसे मूल निवासी अपने काले रंग घुंघराले छोटे बाल, चौड़ी नाम मोटे होठ जैसी विशेषताएँ यथावत् बनाये रहते है सन्तानें इसी प्रकार की उत्पन्न होती रहती हैं।

इससे प्रतीत होता है कि प्रान्त, क्षेत्र, वातावरण आदि का प्रभाव मनुष्य की शारीरिक स्थिति पर उतना नहीं पड़ता जितना कि वंश परम्परा का। पख्तूनिस्तान के पठान बंगाल में वन जाने पर भी प्रायः वैसी ही पीढ़ियाँ बनाये जाते रहते हैं और दुबले बंगाली पख्तूनिस्तान में बस जाने पर अपने वंशजों के कार्य कलेवर में कोई विशेष परिवर्तन कर नहीं पाते।

यही बात बौद्धिक संरचना के सम्बन्ध में भी है। मारवाड़ी, बंगाली, द्रविड़ केरली ब्राह्मण कार्यस्थ आदि वासी जैसे वंशजों के चिन्तन, स्वभाव, कौशल, स्वर चातुर्य आदि पर एक विशेष अवतरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है,पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।

एक ही पेड़ पर रहने वाले, एक ही वातावरण में पड़ने वाले, एक जैसा आहार करने वाले पक्षियों की आकृति और प्रकृति का अन्तर स्पष्ट देखा जा सकता है। पशुओं,पक्षियों से लेकर कृमि कीटकों तक के अगणित प्राणी,पास पड़ौस में बसते और एक ही प्रकार के साधनों पर निर्भर रहते हुए भी अपनी मौलिक विशेषताएँ बनाए रहते हैं और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलाते रहते हैं। इसे वंश परम्परा कहते हैं।

वंश परम्परा की चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि अगले दिनों मानवी विकास के लिए किए जाने वालों प्रबल प्रयत्नों में यही कठिनाई सबसे अधिक आड़े आयेगी कि परम्परागत आकृति एवं प्रकृति में हेर−फेर कैसे किया जाय? धीमी गति से यत्किंचित् सुधार होते चलने की प्रतीक्षा करते रहना अब इस प्रगति युग में सम्भव नहीं। न इतना धैर्य है और न अवकाश, अवसर कि वंश परम्परा के साथ जुड़ी हुई विशेषताओं में क्रमिक परिवर्तन की आशा लगाये बैठा रहा जाय और सुधार प्रयत्नों से होने वाले अत्यन्त धीमे परिवर्तन पर सन्तोष किया जाय?

मानवी विकास के नये आधारों में वंशानुक्रम विज्ञान का आश्रय लेने की बात गम्भीरतापूर्वक सोची जा रही है। यह विज्ञान अभी नया है और सर्वसाधारण को उसकी उतनी जानकारी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। अतएव आवश्यक समझा गया कि इस संदर्भ में प्राथमिक जानकारी और पीढ़ी विकास के साथ उसके समावेश का आधार संक्षेप में समझा किया जाय। इन पृष्ठों पर उसी का प्रयत्न किया जा रहा है। मानवी नस्ल का सुधारने में दिलचस्पी रखने वाले प्रत्येक विज्ञजन को इस संदर्भ में काम चलाऊ जानकारी तो नोट करनी ही चाहिए।

समझा जाना चाहिए कि मनुष्य के अन्दर एक प्रकार से दो विशिष्ट आनुवाँशिक व्यवस्थाएँ हैं। एक तो वह जिसके माध्यम से जीन्स तथा गुणसूत्र द्वारा पिता से सन्तान को जैविक सूचनाएँ स्थानान्तरित होती हैं। दूसरी व्यवस्था वह है कि जिसके माध्यम से साँस्कृतिक आदान प्रदान होता है उदाहरणार्थ बोलने वाले से सुनने वाले को, पाठक को अध्ययन से दर्शक का दृश्यावलोकन से। यही हमारी साँस्कृतिक धरोहर बनाता है।

‘यूजेनिक्स’ एक विज्ञान का नाम है जिसके द्वारा जीन्स को सुधारने एवं वंश परम्परा को परिष्कृत करने की बात सोची जाती है। फ्रांसिस गॉल्टन ने इस सदी के प्रारम्भ में इस शब्द से वैज्ञानिक समुदाय को परिचित कराया। वैसे तो इससे भी पहले ‘प्लाटो’ ने ‘द रिपब्लिक’ नामक अपनी रक्षा में इस प्रकार की सम्भावनाओं का वर्णन किया है। जिसमें (सलेक्टिव ब्रीदिंग) सही चयन से उत्तम नस्ल का निर्माण पक्ष पलटकर आया। उसके अनुसार केवल शारीरिक रूप से समर्थ एवं मानसिक दृष्टि से बुद्धिमत्ता युक्त जोड़ो को ही विवाह की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि उत्पन्न सन्तान उत्तम कोटि की हो। जो इस दृष्टि से हीन या निम्नकोटि के पाये जायें उन्हें राज्य द्वारा विवाह की अनुमति ही न मिलनी चाहिए या सन्तानों को पैदा होने से पूर्व ही नष्ट कर देना चाहिए ताकि समाज पर अनावश्यक बोझ न बढ़े। यह तो प्लाटो का अतिवादी चिंतन था, जो उस समय साकार न हो सका। पर गॉल्टन ने इस तथ्य की ‘प्राकृतिक चयन’ (नेचुरल सलेक्शन) की तकनीक के बजाय समाज को बुद्धिमानी प्राणी देने के लिए ‘सोशल सलेक्शन’ की विधि अपनाई जानी चाहिए।

गॉल्टन एवं नीत्से के प्रतिपादनों से समर्थन पाकर जर्मनों ने ‘यूजेनिक्स’ का हवाला देते हुए स्वयं को ‘मास्टर रेस’ घोषित कर दिया। एक जर्मन आर्यन एवं एक अनार्य के बीच विवाहों पर बन्धन लगा दिया गया। हिटलर के अनुसार लाखों व्यक्ति मात्र उसकी इस मान्यता के कारण मार दिए गए कि वे अनार्य थे, हीन नस्ल के थे एवं उनके रहने से वंश परम्परा के विकृत होने की सम्भावना थी।

अमेरिका में उलटा देखा गया है। इस राष्ट्र में विभिन्न देशों की विभिन्न वंश परम्पराओं में उत्पन्न व्यक्ति ही इससे नागरिक हैं। ये सभी बाहर से आकर गत चार शताब्दियों में यहाँ बसे हैं। मूलवासी कहने को मात्र कुछ हजार”रेड इंडियन” हैं। यहाँ कहा पाया गया है कि बुद्धिमत्ता की दृष्टि से काले व गोरे एक से ही हैं बल्कि पदों पर अश्वेत नस्ल के व्यक्ति अधिक सक्षम पाये गये हैं।

विचारकों का कहना है कि नस्ल के आधार पर विशेषताओं का निर्धारण विज्ञान सम्मत नहीं है। बुद्धि की कुशाग्रता व शरीर की बलिष्ठता किसी एक वंश की बपौती नहीं है। हाँ, यह बात जरूर है पौष्टिक आहार की उपलब्धि, सांस्कृतिक विकास के अवसर एवं समाज की सन्तुलित से ऊँचा उठने की सम्भावनाएँ किसी एक वंश को अधिक आसानी से मिल जाने से वह अधिक श्रेष्ठ हो गयी हो।

आनुवाँशिकता अपनी जगह है एवं पर्यावरण अपनी जगह। अलग अलग जीन्स वाले व्यक्ति उपयुक्त अनुकूल वातावरण पाकर बुद्धि की दृष्टि से सुनिश्चित विकास दर्शाते हैं। समाज और अधिक रचनात्मक व्यक्तित्व तैयार कर सकता हैं, यदि इसके प्रत्येक घटक को शैक्षणिक एवं आर्थिक, साँस्कृतिक एवं नैतिक विकास का परिपूर्ण अवसर दिया जाए। ऐसे विकास के अभाव में कई ऐसे व्यक्ति उभर नहीं पाते जो सम्भवतः न्यूटन गल्टेयर,नेपोलियन, आइन्स्टीन की कोटि के जीन्स वाले थे। इस कारण दोनों ही परस्पर अन्योन्याश्रित हैं।

‘यूजेनिक्स’ शब्द अपने आप में पवित्र है, यदि इसमें से वंशवाद नस्लवाद जैसा पूर्वाग्रहयुक्त दुर्गुण निकाल दिये जायें। नेगेटिव यूजेनिक्स का अर्थ है नुकसान पहुँचाने वाले जीन्स को हटाने का प्रयास कर सन्तति को शुद्ध परिपूर्ण बनाना। पॉजेटिव यूजेनिक्स का अर्थ है लाभदायक (शरीरगत बलिष्ठता, मानसिक कुशाग्रता बढ़ाने वाले) जीन्स को सन्तति में पहुँचाने का प्रयास करना।

‘सलेक्टिव मेटिंग‘ अर्थात् उचित नस्ल के चुनिन्दा समूहों में परस्पर संसर्ग के लिए जो एक सुझाव समाने आया था वह था “वीर्य बैंक” के रूप में, जिसके प्रणेता थे −−− हेनरी मूलर। प्रतिभावान, प्रख्यात एवं हर दृष्टि से समग्र कुछ व्यक्तियों के वीर्य को ‘डीप फ्रीज’ में रखकर उसका समय आने पर विरोधी लिंग का उचित पात्र मिलने पर उपयोग हो ताकि इनके से एक सर्वश्रेष्ठ सन्तति का जन्म हो, यही दृष्टि इसके पीछे थी। इसे वैज्ञानिकों के नाम दिया “यूटेलेजेनेसिस”। कृत्रिम गर्भाधान का इसे पर्यायवाची कह सकते है ‘महामानव निर्माण हेतु तो नहीं, परन्तु नपुँसक व्यक्तियों को पिता’ बनाने के लिए अवश्य अमेरिका में इसका प्रतिवर्ष 10 से 15 हजार बार प्रयोग होता है एवं करीब 60 प्रतिशत में सन्तति का जन्म इस विधि से सफलता पूर्वक हो जाता है।

दूसरी विधि जो सुझाया जाती है, वह है जीन्स के घटक डी.एन.टी के साथ सीधा हस्तक्षेप। इसे “जेनेटिक सर्जरी” नाम दिया गया। यूजेनिक्स की यह विधि लगती तो बड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण हैं, पर जिस द्रुतगति से आनुवाँशिकविदों के प्रयास इस दिशा में चल पड़े है, उससे लगता है डी.एन.ए की संरचना में वाँछित रूपांतरण करने में वैज्ञानिकों से सफलता अवश्य मिलेगी। जेनेटिक सर्जरी को कई प्रकार से प्रयुक्त किया जा रहा है।

प्रथम विधि में एक जीन के डी.एन.ण् को पृथक कर उसे जैविक अतिक्रमण (सेल्युलर इर्न्सशन) की तकनीक द्वारा प्रयोगशाला में दूसरे जीन के डी.एन.ए से सम्मिलित किया जाता है। 10 लाख में जीव जीवकोष इस विधि से पूरी तरह रूपांतरित किया जा सकना सम्भव है। दिक्कत यह है कि विशेषताओं को हम नये जीवकोष में चाहते है, उसका प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे छोटे घटक ‘न्यूक्लियोटाइड’ को पहले से कैसे पहचाना जाय ताकि चुनाव शत प्रतिशत कारगर हो?

दूसरी विधि में ‘वायरस’ के कणों की मदद से डी.एन.ए. का स्थानान्तरण किया जा सकता है। ज्ञातव्य है कि वायरस में एक रहस्यपूर्ण क्षमता यह होती है कि वे जीवकोषों में प्रवेश हेतु किसी रसायन अथवा वैद्युतिक व्यवस्था का सहयोग नहीं लेने देते। उसे भी असम्भव-सा ही माना जा रहा है।

तीसरी विधि में रसायनों की सहायता से डी.एन.ए के घटक न्यूक्लियोटाइडो में से कुछ की संरचना को आमूल चूल बदलने की बात सोची जाती है।

चौथी विधि जिसे पार्थिनोजोनेसिस कहा जाता है और भी विलक्षण युक्त है। इसमें वाँछित गुण संप्रेषित करने वाली महिलाओं की जनन ग्रन्थियों (आवेरी ) से डिप्लाइड (अण्डे) अलग कर लेने की बात सोची जाती है, जिन्हें अभी निषेचित न किया गया हो। माता से मिली इस जेनेटिक संरचना को आनुवाँशिक विशेषज्ञ कर सकते हैं तो सम्भवतः निषेचन के बाद उभर कर न आ पाते।

“जीन्स की कलम” के समर्थक वैज्ञानिकों की प्रतिपादित पांचवीं विधि में शारीरिक ऊतकों को प्रयोगशाला में भ्रूणवत् (एम्ब्रियोनिक) बना लिया जाता है। ऐसे ‘क्लोन्स’या कलम उन गुणों से भरे पूरे होते हैं जो उस व्यक्ति के क्रोमोसोम्स में परिपूर्ण मात्रा में थे, सम्भवतः निषेचन से उनमें परिवर्तन आ जाता। ऐसी कलम को उचित वातावरण व पोषण देकर कई कार्बन कॉपी उस व्यक्ति की तैयार की जा सकती है जिसके कि ऊतकों से कलम को तैयार किया गया था।

इस क्षेत्र में आनुवाँशिक रोगों को दूर करने में लगे वैज्ञानिकों को जिस सीमा तक सफलता मिली है उससे कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं, जब किसी भी भावी सन्तति के डी. एन.ए. में निर्धारित क्रमानुसार वाँछित परिवर्तन कर उसकी संरचना को मोड़ दिया जा सकता है।


क्या चेतन जड़ से उत्पन्न हुआ?

जीवन कैसे उत्पन्न हुआ? उसका प्रारम्भिक रूप क्या था? प्रगति किस आधार पर हुई। उन प्रश्नों में से सबका उत्तर एक साथ देना तो कठिन है पर इतना निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि जड़ से चेतन की उत्पत्ति नहीं हुई, जैसा कि अति उत्साही प्रकृति समर्थक नास्तिकवादी वैज्ञानिक पिछले दिनों मानने लगे थे।

जीवन,जीवन से ही उत्पन्न हो सकता है। उसका लय−कलेवर भले ही भौतिक रसायनों का बना हुआ हो पर उसका मूल अस्तित्व वैसा नहीं है जिसे कि पदार्थ का उत्पादन कहा जा सकेगा। इस संदर्भ में जो भ्रान्तियाँ समय समय पर उठती रही हैं, क्रमशः उनका समाधान भी होता चला आया है।

शताब्दियों तक इस पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति एक साधारण-सी बात समझी जाती थी। उस समय लोगों के लिए यह बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। अनेक वैज्ञानिकों एवं विज्ञान के जनक माने जाने वाले ग्रीक दार्शनिक अरस्तू का भी विचार था कि जीवों की उत्पत्ति स्वतः ही निर्जीव पदार्थों से हुई है। जबकि ईसा के तीन शताब्दी बाद के महान दार्शनिक प्लोटिन का विचार था कि जीवों से उत्पत्ति मिट्टी के सड़ने से हुई है।

सन् 1862 के बाद उपरोक्त मान्यता को बहुत बड़ा आघात पहुँचा जब कि “जीवन की उत्पत्ति जीवन से ही सम्भव है।” “लुई पास्चर” के प्रयोग ने यह साबित कर दिखाया कि वर्तमान परिस्थितियों में छोटे−छोटे जीवधारियों की भी उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती। पास्चर के इस प्रतिपादन के बाद जीवधारियों की उत्पत्ति सम्बन्धी समस्या वैज्ञानिकों के लिए दर्द बन गयी।

इस पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दो विचारधाराएँ हैं। एक दल की मान्यता है कि जीवन शाश्वत और इसकी उत्पत्ति हमारी पृथ्वी पर नहीं हुई, अपितु अन्तरिक्ष है और इसकी उत्पत्ति हमारी पृथ्वी पर नहीं हुई, अपितु अन्तरिक्ष से यह हमारी पृथ्वी पर आया जहाँ उसका स्थायी निवास है। वैज्ञानिकों के दूसरे दल का विचार है कि जीवों की उत्पत्ति इसी पृथ्वी पर हुई, लेकिन जीवन विहीन पदार्थों से। उस मान्यता को सर्वमान्य बनाने के लिए उन्होंने कुछ प्रायोगिक आंकड़े भी प्रस्तुत किये लेकिन इस मान्यता को ख्याति नहीं मिल पाई। ‘फ्रेडरिक ऐन्जिल्स ही पहला वैज्ञानिक था, जिसने जीवधारियों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अपना उत्पत्ति आकस्मिक रूप में नहीं हुई, वरन् पदार्थों के क्रमिक विकास के दौरान हुई।

प्राणि−संरचना के बारे में भारतीय मत सर्वथा भिन्न है। भारतीय मत ऐसा है कि − ईश्वर ने हर प्राणी को सृष्टि के आरम्भ में ही स्वतंत्रता सत्ता सौंपी है। अमीबा अभी भी अमीबा है, हाथी हाथी है, सरीसृप सरीसृप है, बन्दर बन्दर है तथा मनुष्य मनुष्य है। वह प्राणियों के आदिम सृजन काल से ही मनुष्य काल से ही मनुष्य है। शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक क्षमताओं में उतार चढ़ाव, हेर फेर क्रियाशीलताओं की दिशाओं में उलट पुलट और जीवनयापन के स्वरूप में कालक्रम से परिवर्तन तो होता ही रहता है इस संसार का ध्रुव नियम परिवर्तन ही है, किन्तु मूल सत्ता अक्षुण्ण रहती है। समस्त प्राणी आरम्भ काल में अपनी समस्त मौलिक विशेषताओं के साथ जन्मा है− यही भारतीय प्रस्थापना है जो पश्चिम के विकासवाद और कुछ धार्मिक कठमुल्लों के विघटनवाद या पतनवाद दोनों सर्वथा भिन्न है। साथ ही प्राण चेतना भारतीय दृष्टि से मौलिक आदि तत्व हैं− वह जड़ की उत्पत्ति नहीं है।


धरती से लोक लोकान्तरों का आवागमन मार्ग

वारमूडा त्रिकोण क्षेत्र में पाये गये ‘ब्लैक होल’ के प्रसंग को ध्यान में रखते हुए से शताब्दी के खगोल वेत्ताओं ने भारी खोज बीन की है और यह जानने में सफलता पाई है कि आखिर यह आकाश क्षेत्र में पाये जाने वाले यह अदृश्य भँवर है क्या?

पता चला है कि वह विस्तार के तारे जब मरते हैं तो अपनी स्मृति से एक विचित्र कुतुबमीनार या अशोक की लाट खड़ी कर जाते हैं। इन विजय स्तम्भों के साथ जितनी विभीषिकाएँ जुड़ी हुई हैं उतनी ही असीम शक्ति स्रोत के रूप में उनकी विशेषता भी प्रकाश में आती है। धरती निवासियों को एक ही ब्लैक होल से पाला पड़ा है और वह नितान्त कटु तथा भयानकता भरी छाप ही छोड़कर गया है। इतने पर भी यह कहा जा सकता है कि इस नियमित जो खोजें हुई हैं वे भावी सम्भावनाओं के सम्बन्ध में बिजली कौंधने जैसी आशा भारी चमक दिखाते है। ब्लैक होलों के माध्यम से लोकलोकान्तरों के मध्य आवागमन की एक कड़ी जुड़ती है। इन भंवरों से भरी असीम शक्ति स्रोत के साथ सम्बन्ध जुड़ जाने पर इतनी ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है कि आवश्यकताएँ बिना किसी कठिनाई के सहज पूरी होती रह सकें।

ग्रह तारकों के जीवन मरण की अन्त्येष्टि और पिण्ड तर्पण प्रक्रिया पर भी इस खोज ने ऐसा प्रकाश डाला है जो इससे पूर्व उपलब्ध नहीं था। प्रयासों को गति मिली तो धरती निवासियों को अपनी मातृभूमि से भी अधिक महत्वपूर्ण ग्रह नक्षत्रों की रिश्तेदारी बिरादरी का भी बहुत कुछ परिचय प्राप्त हो सकेगा। कहना न होगा कि जिस प्रकार प्रकृति के अविज्ञात रहस्यों को जानकर मनुष्य निवासी न केवल प्राणि जगत का मूर्धन्य बना है वरन् इस ब्रह्माण्ड में अपनी विशेष स्थिति बनाकर रह रहा है। यह जानकारियाँ जिस अनुपात से बढ़ेगी उतने ही नये शक्ति स्रोत हाथ लगेंगे। सदुपयोग बन पड़ा तो मनुष्य धरती का नहीं समूची प्रकृति का भी अधिष्ठाता बन सकेगा।

ब्लैक होलों को मृतक तारा पिण्डों की समाधि का जा सकता है मिस्र के पिरामिड वहाँ के शासकों को सजीव स्मृति है। ताजमहल का नाम भी इस सिलसिले से अविस्मरणीय ही रहेगा ब्लैक होलों को मृत तारकों को कौतूहल युक्त तथा अनेक असंभावनाओं −रहस्यों से भी पूरी वाला समाधि कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी

खगोल शास्त्रियों का कहना है कि यदि ब्लैक होल के शक्ति भण्डार का उपयोग किया जा सके तो ऊर्जा के लिए मुहताज न होना पड़े। ब्लैक होल का शक्ति भण्डार अनन्त काल तक चलाने वाला होता है, ऐसी मान्यता है

कोई एक विशालकाय तारा जब मृत्यु के सन्निकट पहुँचता है तब उस दृश्य का अवलोकन करते हुए खगोलशास्त्रियों ने बताया कि उस अवधि में तारे का प्रकाश करोड़ों गुना बढ़ जाता है। यह इतना अधिक बढ़ता है कि सम्पूर्ण तारा समूह का प्रकाश एक ओर इस मृतप्राय तारे का प्रकाश और विकिरण एक ओर। कई अरब वर्षों में एक तारे से जो प्रकाश शक्ति निःसृत होती है मृत्यु के कुछ घण्टे पूर्व उतनी ही मात्रा में शक्ति व प्रकाश प्रवाहित हो जाता है। यदि अति विशालकाय तारे की मृत्यु का गहराई से अध्ययन किया जाय तो उसकी मृत्यु के साथ कभी कभी एक ब्लैक होल का जन्म हो जाता है। खगोल शास्त्रियों ने मृतप्राय तारे की तुलना करने हुए बताया है कि जिस पर ज्वलनशील पदार्थ या लकड़ी से निर्मित 40−50 मंजिल का मकान जलते−2 ही टूटकर गिरने लगता है और अन्त में बहुत छोटे रूप में शेष रह जाता है उसी प्रकार तारा भी जलते−2 अपने करोड़ों गुने छोटे रूप में संकुचित हो जाता है।

तारों के सामान्यतः तीन प्रकार होते है। (1) वामन (2) विराट् और (3) समरूप। तारों की पहचान सामान्यतः उनके तापमान से की जाती है रंग उनके तापमान का द्योतक है। लाल तारे औसतन ठण्डे तारे हैं। जबकि नीले तारे अत्यन्त गरम। इन दोनों के बीच नारंगी, पीले, पीतश्वेत और नीलश्वेत तारे आते है। लाल तारों का तापमान दो हजार से तीन हजार सेंटीग्रेट तक है। तारंगी का 4 हजार पीले का 6 हजार पीत श्वेत 8 हजार और नील श्वेत 10 अति नीले तारे का तापमान 20 हजार से 30 हजार सेंटीग्रेट होता है। हमारा सूर्य 6 हजार सेन्टीग्रेट तापमान वाला एक पीला तारा है।

तेजस्वी तारों को ‘विराट्’ तथा निस्तेज को वामन कहा गया है। हमारा सूर्य ‘समरूप’ है। श्वेत वामन का तापमान ज्यादा होने पर भी उनकी सतह बहुत छोटी होती है क्योंकि वामन तारे के द्रव्य की घनता बहुत अधिक है।

सभी तारों की तुलना में नील तारे कम उम्र वाले होते है इन्हें युवा तारे कहते हैं। लाल तारे अधेड़ उम्र के होते हैं। सूर्य जैसे समक्रम तारे अपना स्वरूप कई अरब वर्षों के बाद बदलकर लाल विराट् तारे के रूप परिवर्तित होते हैं। लेकिन इस स्थिति को प्राप्त करने से पूर्व कई परिवर्तन होते है। उसे रूपविकारा (पलसेटिंग) तारा कहते हैं। कई अरबों वर्ष बाद वह श्वेत तारा बनता है।

अपने सूर्य से जो तारे कम से कम तीन गुने बड़े हैं उनका ही ब्लैक होल में परिवर्तन हो सकता है। इससे छोटे श्वेत वामन बन जाते है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब कोई विराट तारा अपनी ऊर्जा शक्ति समाप्त कर चुका हो तब वह इतना संकुचित हो जाता है कि प्रकाश की बाहर नहीं निकल पाता।

यदि कोई विराट तारा जो सूर्य में 10 गुना बड़ा हो, उसकी मृत्यु हो तो वह ब्लैक होल में प्रवर्तित होता है। उस स्थिति में यह कितना संकुचित होता है इसे प्रकार समझा जा सकता है। गुरु पृथ्वी से 13 सौ गुना बड़ा है और सूर्य गुरु से 1 हजार गुना बड़ा है। तो 10 सूर्य जितने आकार का तारा पृथ्वी से 130 लाख गुना बड़ा होता। ब्लैक होल बनने के बाद यह विराट् तारा पृथ्वी पर स्थित किसी हवाई टापू जितना रह जाता है अपने स्वरूप से कितने अरबों गुना छोटा हो जाता है?

ब्लैक होल 2 प्रकार के होते है(1) भँवरदार और (2) बिन भँवर वाले। जैसे नदियों में कई स्थान पर गहरे पानी में भँवर होती है ठीक उसी प्रकार ब्लैक होल भी अपने पास जाने वाली किसी भी वस्तु को अपनी ओर लेता है। इसी एक लक्षण द्वारा ब्लैक होल का अनुमान लगाया जा सकता है। क्योंकि यह प्रकाश भी सोख लेता है।

सर्वप्रथम ब्लैक होल सिग्नस (नराश्व) तारा विश्व में पाया गया जिसे सिग्नस एक्स बन नाम दिया गया। वृश्चिक राशि (स्कोरपिओ) में भी एक ब्लैक होल पाया गया है जिसे जी एक्स 336 −4 नाम दिया गया है दिनों दिन ओर अधिक ब्लैक होलों का पता लगाया जा रहा है।

हमारे मंदाकिनी तारा ‘विश्व’ में ही 50 लाख से ब्लैक होने की सम्भावना है। एक बड़ी ब्लैक होल कन्या राशि में पाया जाता है जिसका एम 85 नाम है। एवं पृथ्वी से 6 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है।

प्रसिद्ध भौतिकविद् ‘जॉन ए विलर’ की मान्यता है कि एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड में जाने के लिए गुप्त सुरंग मार्ग ब्लैक हो सकते है।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ता स्टीफन होडिंग के अनुसार ब्लैक होल में स्थल और समय का कोई बन्धन नहीं होता। ब्लैक होल के माध्यम से मनुष्य वर्तमान से कई लाखों वर्ष पूर्व और लाखों वर्ष आगे भी पहुँच सकता हैं।

स्टीफन ने कहा है ब्लैक होल में कण और प्रति कण एक दूसरे को नष्ट करते रहते हैं

जिस प्रकार ब्लैक होल प्रत्येक प्रकार के पदार्थ एवं प्रकाश किरण सोख लेता है और कही कुछ दिखाई नहीं देता है। इसी ब्रह्माण्ड में खगोलविदों ने ऐसे स्थान पाये हैं जहाँ पहले कुछ नहीं था वहाँ तीव्र गति से प्रकाश गति से प्रकाश एवं अनेकों प्रकार के आयोनाइज कण पाये गये। ऐसे स्थानों को ‘व्हाइट होल’ और ‘व्हाइट होल’ के बीच आपस सम्बन्ध है। दोनों के माध्यम को ‘वर्महोल’ कहते हैं।

व्हाइट होल की खोज के बाद वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं कि संलग्न व्हाइट होल और ब्लैक होल के माध्यम से किसी अन्य ब्रह्माण्ड में भी पहुँचा जा सकता है क्या? इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि इन संलग्न ब्लैक और व्हाइट होल के माध्यम में किसी अन्य ब्रह्माण्ड में कुछ ही समय में पहुँच सकते है क्या? जबकि यदि सीधे मार्ग से चला जाय तो कई अरब वर्ष लग जायेंगे।

महाभारत काल में भगीरथ से पूर्व सगर राजा ने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ का घोड़ा घूमते घूमते किसी ऐसे अज्ञात स्थान में पहुँच गया जिसका पता नहीं लगा। उसे ढूंढ़ने में 60 हजार का जन समुदाय भी गायब हो गया। किंवदंती है वे सब पाताल पहुँच गये और भगीरथ ने तप द्वारा गंगा अवतरण कर उनका उद्धार किए। ऐसी ही कुछ गति इन तारकों का भी होती होगी।

1980 में ‘स्पेस शटल’ नामक अन्तरिक्ष यान पर गामाकिरण संवेदनशील टेलिस्कोप लगाने की योजना थी जो ऐसे ब्लैक होलों पर लगा सके। इस वर्ष यह योजना पूरी हो गयी है।

यदि हमारे सूर्य मण्डल में ऐसे कुछ के ब्लैक होल का पता लगा सके तो उसके ऊर्जा भण्डार का उपयोग कर सकते हैं। ब्लैक होल की प्रचण्ड ऊर्जा शक्ति को माइक्रोवेव में परिवर्तित करके पृथ्वी की भ्रमण कक्षा में प्रवेश करने की कल्पना वैज्ञानिक कर रहे हैं। अनुमान है कि अनन्त काल तक विश्व की ऊर्जा ईंधन की समस्या का हल हो सकता है।

यह अनुमान उन अनन्त सम्भावनाओं में से एक है जिसमें ब्लैक होलों से लाभान्वित होने के बात सोची गई है। अधिक महत्वपूर्ण बात वह है जिसमें लोक लोकान्तरों के आवागमन का द्वार खुलता है और उनके साथ आदान प्रदान का सिलसिला चल पड़ने पर ऐसी सम्भावनाओं का स्वरूप निखरता है जिसमें मनुष्य का स्थिति पौराणिक देवताओं से कम नहीं वरन् अधिक अच्छी ही रहेगी।


Quotation

विन्दु ब्रह्मासकृद्दृष्ट्वा मनस्तस्मिन्नियोजयेत्। स्वयंमेव तु संपश्येदेह विन्दुँ च निष्फल्।

भ्रूदहरादुपरि सच्चिदानन्द तेजः कूट रुपम्। परब्रह्म अवलोकयन्तद्र पो भवति गर्भजन्मजरा। मरण संसारभयातसंतारयेति तस्यात्तारक मिति॥ — महायोग विज्ञान

अर्थात्− भू मध्य भाग के ऊपर सच्चिदानंदय तेज राशि विद्यमान है उसे परब्रह्म कहते हैं। इस ब्रह्म बिन्दु को जन्म मरण से छुड़ता है संसार सागर से पार करता है इसलिए उसे तारक ब्रह्मा भी कहते हैं। यह बिन्दु ध्यान तारक योग भी कहलाता है।

स ज्योर्तिषा अभूमेति से देवैरभूमत्येदेतदाह।

हम उस परम ज्योति में अपनी मिलाकर ही देवताओं की पंक्ति में बैठ सकने योग्य बनें।


अदृश्य सहायकों का अद्भुत संसार हमारे इर्द−गिर्द

मरण और पुनर्जन्म के बीच की अदृश्य सूक्ष्म कड़ी अपने में कितने ही रहस्यों एवं विलक्षणताओं को समाहित किये हुए है। अशरीरधारी जीवों की इस दुनिया में ही भूत, प्रेत, पितर जैसी योनियाँ निवास करती हैं। पृथ्वी के जीवधारियों की तुलना में उनकी गतिविधि अभिरुचि आकृति एवं प्रकृति सर्वथा भिन्न है। भौतिक नियम मर्यादाओं से वे परे हैं। अशरीरधारी सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाले इन जीवधारियों से यदि किसी तरह संपर्क साधा और सहयोग प्राप्त किया जा सके तो निश्चित ही महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ करतलगत करने का एक ऐसा मार्ग खुल सकता है जो भौतिक प्रयासों द्वारा सम्भव नहीं है।

कभी कभी अनायास भी अशरीरी आत्माएं अपने अस्तित्व का परिचय देती है। ये दुष्ट और सौम्य दोनों ही स्तर की होती हैं। किसी किसी को उनका कभी कभी अप्रत्याशित सहयोग मिलने लगता है और कितनों को ही उनके कोप का भोजन भी बनना पड़ता है। जीवन काल में जिनसे सघन आत्मीयता जुड़ी रहती है, मरणोपरान्त भी कितनी ही आत्माएँ अपना सम्बन्ध उन प्रियजनों से बनाये रहती तथा समय समय पर सहयोग करती देखी गयी हैं। इसके विपरीत दुष्ट की आत्मा का परिचय उनके विभिन्न प्रकार के दुष्कृत्यों से मिलता है। वे स्वयं विक्षुब्ध रहतीं तथा दूसरों को भी संत्रस्त करती हैं।

अमेरिका का ‘आर्थर एडवर्ड स्टिवैल’ नामक व्यक्ति मजदूरी करके किसी तरह अपना गुजारा करता था। घोर आर्थिक तंगी के कारण वह सदा चिन्तित रहता था। एक दिन उसे एक प्रेत ने नौकरी छोड़ देने का सुझाव दिया। पहले तो उसने सुनाई पड़ने वाली अदृश्य आवाज पर ध्यान नहीं दिया, पर कई दिनों तक इस घटना की पुनरावृत्ति हुई। साथ ही उसे यह आश्वासन मिला कि छः प्रेतों को एक पूरी मण्डली उसका निरन्तर सहयोग करती रहेगी ‘एडवर्ड स्टिलबैल’ के अनुसार प्रेतों की इस मण्डली में तीन इंजीनियर एक लेखक, एक कवि और एक अर्थशास्त्री थे। रेलमार्ग, बन्दरगाह बनाने तथा नहर खोदने जैसे स्वतन्त्र कान्टे्रट लेने के लिए प्रेतों ने परामर्श दिया। साधनों एवं योग्यता की दृष्टि से अक्षम होते हुए भी आर्थर को यह विश्वास हो चला कि उसे हर तरह का सहयोग मिलेगा। देखते ही देखते अप्रत्याशित ढंग से सभी साधन जुटने लगे और अरबों अरबों की योजनाएं पूरी हो गयीं जिनमें आर्थर एडवर्ड को अरबों रुपये का लाभ हुआ। उसने न केवल अपार संपत्ति अर्जित की वरन् साहित्य के क्षेत्र में भी उसे मिली। इन उपलब्धियों को श्रेय ‘आर्थर’ उस प्रेत मंडली को देवता था जो समय समय पर उसका मार्ग दर्शन करती थी।

सन् 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध चल रह था। 13 न. को भारतीय सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी नक्शे के सहारे जम्मू कश्मीर की घाटियों की ओर की बढ़ रही थी। ‘कमाण्ड पोस्ट’ से वायरलैस सेट द्वारा टुकड़ी संपर्क बनाये हुए थी। पर नक्शे अथवा ‘पोस्ट’ से प्राप्त निर्देशों के बावजूद भी आगे का मार्ग स्पष्ट नहीं हो रहा था। वापस पीछे भी लौटना खतरे से खाली न था अगली भारतीय चौकी अभी 15 मील दूर थी जहाँ सवेरा होने के पूर्व पहुँचना था,अन्यथा डर था कि समीप में गश्त दे रहे पाकिस्तानी सैनिकों से मुठभेड़ न हो जाय। भयंकर बर्फ गिरने के कारण मार्ग अवरुद्ध था और अस्पष्ट भी। सभी गहरी चिन्ता में डूबे − किंकर्तव्य विमूढ़ बने खड़े थे। इतने में पेड़ों के झुरमुट से पदध्वनि सुनायी पड़ी है। सैनिकों ने देखा कि सामने एक भारतीय आप लोग उससे अपरिचित हैं। मेरे पीछे पीछे चलते आइये। सैनिकों ने देखा कि लेफ्टीनेन्ट की कमीज में पीठ पर गोल निशाना है। लगता था उतना अंश जल गया हो। लेफ्टीनेन्ट ने स्वयं बनाया कि कल की पाकिस्तानी गोलाबारी से पीठ पर था हिस्सा जल गया है बात के रुख को मोड़ देते हुए लेफ्टीनेन्ट ने कहना आरम्भ किया कि “क भी कभी मृत आत्माएँ भी आपत्ति कालीन परिस्थितियों में अपने स्नेह पात्रों का सहयोग करती हैं।” इस विषय पर बातचीत चलती रही, तब तक सामने चौकी आ गयी लेफ्टीनेन्ट चौकी की ओर इशारा किया तथा वहाँ स्वयं जाने में असमर्थता व्यक्त की। दस− पन्द्रह गज चलने के बाद सैनिकों ने पीछे मूढ़ पर देखा। आश्चर्य कि लेफ्टीनेन्ट का कहीं नामोनिशान नहीं था। एक मिनट से भी कम समय लगा होगा। इतना देर से कहीं दूर जाने की सम्भावना भी नहीं थी कुछ सैनिकों ने उत्सुकता वश पीछे वापस लौटकर पता लगाने की कोशिश की पर कहीं कुछ भी पता न लग सका। चौकी पर पहुँचने के उपरान्त सैनिकों ने चौकी का आश्चर्य को ठिकाना न रहा। कमाण्डर ने बताया कि कल ही बमबारी में उक्त लेफ्टीनेन्ट की मृत्यु पीठ पर चोट लगने से हो गयी थी जिसका दाह संस्कार भी कर दिया गया था। जिसने अदृश्य सहायक के रूप में प्रकट होकर सैनिक टुकड़ी की सहायता के रूप में प्रकट होकर सैनिक टुकड़ी की सहायता की।

प्रसिद्ध उपन्यास लेखक डॉ. ओलीवरलॉज ने एक पुस्तक में इंग्लैण्ड पर प्रकाश डाला है जो समय समय पर राज घराने के सदस्यों को सहयोग करती थी। जार्ज पंचम के समय उनकी बड़ी बहन ‘लुईस’ शादी के कुछ ही दिनों बाद विधवा हो गयी। लुई को अपने पति ड्यूक आफफिफ से गहरी आसक्ति थी। दिवंगत आत्मा न मरणोपरांत भी लुईस से सम्बन्ध रखा। ड्यूक की वार्ता सुनी। सम्राट एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी एलेक्लेण्ड्रा को प्रेतो के अस्तित्व पर पूर्ण विश्वास था। वे प्रेतात्माओं का मन्त्रों द्वारा आह्वान भी करती थी। एक साधारण-सी बीमारी में सम्राट दिवंगत हो गये, पर महारानी विक्टोरिया के विषय में भी ऐसा ही उल्लेख मिलता है कि प्रेत विद्या विशेषज्ञ के माध्यम से उनका सम्बन्ध अपने पति से मरणोपरान्त भी जुड़ा रहा।

सन्त सुकरात कहा करते थे कि मेरे साथ रहस्यमय प्रेत डेमन रहता है जो समय समय पर मेरा मार्ग दर्शन करता है। प्लुटार्क नामक विद्वान ने दी ‘जेरिनयोसोक्रिटिस’ पुस्तक में एक प्रामाणिक घटना का उल्लेख किया है कि एक बार सुकरात कुछ सहयोगियों के साथ कहीं जा रह थे। एकाएक एक स्थान पर रुककर बोले कि आगे खतरा है मेरा डेमन आगे बढ़ने से रोक रहा है। अन्य साथियों ने इसे सुकरात के मन का भ्रम माना तथा चेतावनी की अवहेलना करते हुए आगे बढ़े। कुछ ही दूर बाद उन्हें जंगली सुअरों का सामना करना पड़ा जिसमें कितने ही लोग बुरी तरह घायल हुए।

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नावोरी के जीवन की एक घटना है। एक बार उसे रात्रि की किसी कार्य वश होटल में ठहराना पड़ा। होटल मालिक को मरे हुए कुछ ही दिन बीते थे। होटल की संपत्ति के बँटवारे को लेकर के मालिक के पुत्र आपस में कई दिनों से झगड़ रहे थे बाप द्वारा लिखी गयी वसीयत कहीं गुम हो गयी थी जिस कमरे में रोमान ठहरा था रात्रि के समय बार बार आलमारी में से आवाज भी सुनायी पड़ी कि आलमारी में लिखी हुई वसीयत रखी है उसे निकालकर लडको दे दें। बारम्बार वह आवाज कमरे में गूँजने लगी। नोवारो ने उठकर देखा तो सचमुच ही अलमारी में वह वसीयत रखी थी जिसमें नम मिलने से होटल मालिक के लड़के आपस में लड़ झगड़ मिलने से होटल मालिक के लड़के आपस में लड़ झगड़ रहे थे अमेरिका के भूतपूर्व अब्राहम लिंकन प्रेत विद्या विशारद कुमारी नैटी कोल वर्म के सहयोग से ह्वाइट हाउस में प्रेतों को आमन्त्रित करते तथा कितनी हरी राजनैतिक गुत्थियोँ में उनका सहयोग प्राप्त करते थे।

पं. जर्मन के एक साथ आश्रम के संचालक ‘एडवर्ड नेपल्स’ एक ईमानदार और प्रामाणिक व्यक्ति समझे जाते थे, पर उन्होंने जीवन के अन्तिम चरण में आश्रम की सम्पत्ति का एक बड़ा भाग चुपके से अपने नाम कर लिया था। मरते समय उन्हें इस बात का भारी पश्चात्ताप हुआ। तब तक उनकी अप्रामाणिकता का भेद भी खुल चुका था। आश्रम के ट्रस्टियों ने उनके मरने के बाद कोर्ट में दावा किया। पर कोई प्रमाण नहीं था कि जिसके आधार पर यह सिद्ध हो सके कि एडवर्ड के पुत्र को प्राप्त संपत्ति आश्रम की है। पुत्र को इस बात की पूरी जानकारी थी। न्यायालय में बयान देते समय उसने इस बात से स्पष्ट इन्कार कर दिया कि पिता से प्राप्त सम्पत्ति आश्रम की है।ठीक बयान देते समय एक विलक्षण घटना घटी। कोर्ट में एक तेज आवाज गूँजी तथा एक तमाचा लड़के के गल पर पड़ा। सभी यह देखकर आश्चर्यचकित थे। लड़के को यह समझते देर न लगी कि यह तमाचा उसके पिता द्वारा मारा गया है। उसने अपनी गलती स्वीकार कर आश्रम की संपत्ति वापस लौटा दी।

स्ट्रॉमवर्ग जून 1961 को जेमी केलधन नामक व्यक्ति शराब के नशे में धुत आधी रात बीते वापस घर की आरे बढ़ रहा था। इतने में पीछे से आवाज आयी ‘रुको’ मुड़कर देखा तो कहीं कोई नजर आ रहा था। आगे बढ़ने वाला ही था कि पुनः वही नारी आवाज सुनायी पड़ी। केलधन का नशा गायब हो गया। आवाज उसे सुपरिचित-सी लगी। ध्यान देने पर उसे मालूम हुआ कि आवाज उसकी माँ की है जो कुछ वर्षों पूर्व दिवंगत हो चुकी थी। दृश्य स्वर पुनः गूँज उठे ‘बेटे’ तुम कुकृत्यों को छोड़ दो। तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे इन कारनामों को देखकर मरणोपरान्त भी मुझे कितना कष्ट पहुँच रहा है माँ की वेदना पूर्ण बातों को सुनकर केलधन अपने कुकृत्यों के विषय में सोचने लगा। सचमुच ही उसने समूची पैतृक सम्पत्ति शराब में बहा डाली थी, और स्वयं अनेकों प्रकार के अवगुणों को शिकार बन गया था। केलधन ने संकल्प लिया कि आज से वह अपने जीवन में सुधार लायेगा। शराब कभी नहीं पीयेगा। माँ की उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण जानने के लिए केलधन ने कहा कि “मैं सभी बुरी आदतों छोड़ दूँगा पर यदि तुम मेरी माँ हो तो अपने स्पर्श द्वारा मुझे आभास कराओ।” इतना कहना था कि माँ के ममता भरा हाथ केलधन के सिर पर रख दिया और पीठ को सहलाया हाथ के निशान कमीज पर उभर आये लन्दन के परगेटी म्यूजियम में केलधन की वह कमीज आज भी सुरक्षित रखी है जिस पर प्रेतात्मा के हाथ के निशान उभरे हुए हैं।

फ्रांस के हेनरी चतुर्थ को एक प्रेतात्मा छाया द्वारा यह सूचना मिली कि उनकी हत्या का षडयन्त्र रचा जा रहा है अतः अपने बचाव के लिए सुरक्षा उपाय कर लें। इस घटना का उल्लेख हेनरी न राजदरबारियों की उपेक्षा कर दी। पर संसार जानता है कि हेनरी चतुर्थ कर निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी पादरी जेरेन्सीटेलर घोड़े पर सवार होकर बेलफास्ट में गेटो जा रहे थे। रास्ते में अचानक कोई अपरिचित व्यक्ति घोड़े के पीछे बैठ गया। पूछने पर उसने अपना नाम ‘हैडकजेम्स’ बताया तथा अपना पूरा परिचय देते हुए कहा कि ‘मैं में प्रेत योनि मैं हूँ। मेरी जीवित पत्नी के कृपया यह सन्देश पहुँचा दे कि उसका नया पति शीघ्र ही उसकी हत्या कर देगा।” पादरी ने निर्दिष्ट पते पर सन्देश पहुँचा दिया किन्तु पत्नी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। निश्चित समय पर पति द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।

ये तो विदेशों के कुछ उदाहरण मात्र हैं। भारतीय ग्रन्थों में तो भूत प्रेत पितर योनियों के विषय में विशद वर्णन मिलता है। उनसे संपर्क साधन तथा लाभ उठाने की विद्या का भी उल्लेख है। अदृश्य जगत में विचरण करने वाली इन अशरीरी आत्माओं से विशिष्ट साधनाओं द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर उनसे इतना सहयोग प्राप्त किया जा सकता है जितना कि प्रत्यक्ष भौतिक पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं।

अन्तरिक्ष से निरन्तर आती ध्वनियों के अनुसंधान क्रम में भिन्न भिन्न प्रकार की लहरें खोजी, पकड़ी गई हैं। ज्ञात यह हुआ है कि सौर मण्डल तथा मन्दाकिनी आकाश गंगा से प्रकाश ही नहीं, शब्द प्रवाह भी पृथ्वी पर निरन्तर झर रहा है। अन्तरिक्ष की इन आवाजों का रहस्य वैज्ञानिक ढूँढ़ने में जुटे हैं। आशा है, निकट भविष्य में वे ऐसे समर्थ और संवेदनशील यन्त्र बना सकेंगे, जो इन शब्दों को सुन सकें।

दिव्य ध्वनियों का रहस्य भारतीय मनीषियों को शताब्दियों पूर्व ज्ञात था। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में विभूतिपाद (41) में लिखा है−

“श्रौत्राकाशयोः सम्बन्ध संयमाद्धिव्य श्रोत्रम्॥”

अर्थात्− प्रवणोन्द्रिय तथा आकाश के सम्बन्ध पर संयम करने से दिव्य ध्वनियों को सुनने की शक्ति प्राप्त होती है।

वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने जो कान दिये हैं, उनकी सामर्थ्य अनुपम है। प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि कानों की मदद से मनुष्य लगभग 5 लाख आवाजें सुनकर पहचान सकता हैं। जबकि सैकड़ों फुट ऊँचे एण्टीना, ट्रान्समीटर, रिसीवर, सुपर फ्रिक्वेन्सी वाली रेडियो ऊर्जा इन्डिकेटर, माडुलेटर, सिन्क्रोनाइजर जैसे अनेकानेक यन्त्र प्रणालियों से सज्जित राडारों में इससे बहुत कम क्षमता होती है। सामान्यतः कानों की बाह्यमुखी संवेदनधर्मिता और प्रखर एकाग्रता का अभाव व्यक्ति की श्रवण सामर्थ्य को सीमित रखता है। परन्तु कर्णेंद्रिय की शक्ति को योग साधना द्वारा जगाया जा सकता है और तब अनन्त ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल, पृथ्वी के चलने की आवाज, सौर घोष, मंदाकिनियों के टक्कर के भीषण निनाद सभी कुछ किसी भी स्थान में बैठकर सुने जा सकते हैं। परन्तु ऐसा सम्भव तभी है, जब सूक्ष्म और कारण शरीर में सन्निहित श्रवण शक्ति को विकसित किया जाय।

भारतीय मनीषियों ने ‘शब्द ब्रह्म’ एवं नाद ब्रह्म की बात कही है। अकूत, अनन्त, विराट्, सर्वव्यापी सत्ता का एक नया रूप और नाद भी है। ओंकार शब्द है, नाद भी। शब्द और उसके निहितार्थ दोनों का अपना महत्व है। नादानुसंधान सूक्ष्म शब्द प्रवाह को सुनने की क्षमता विकसित करने वाला साधन विधान ही है। परा प्रकृति से सम्बन्धित सूक्ष्म जगत की सचेतन हलचलें ध्वनि रूप में भी। ये हलचलें नादयोग के अभ्यास से सुनी समझी जा सकती हैं। ब्रह्माण्ड के अज्ञात केन्द्र से धरती पर आने वाले विलक्षण अन्तर्ग्रही ध्वनि प्रवाह से भूलोक के विभिन्न पदार्थों एवं क्रिया कलापों का सूत्र संचालन होता है, ऐसा इन अन्तरिक्षीय ध्वनि प्रवाहों के अध्ययन के उपरान्त विज्ञानियों ने माना है।

प्रकृति में संव्याप्त इन सूक्ष्म हलचलों की भली भांति समझने की क्षमता मानवीय अन्तरंग में विद्यमान है। दृश्य रूप में इन हलचलों को देख सकने में समर्थ बनाने वाली साधनों को अनहित योग कहते हैं। नाद और शब्द रूप में भी उन्हें जाना समझा जा सकता है और इस साधना को ही नाद योग कहा जाता है। इन सूक्ष्म शब्दों को और उनमें छिपे भावों दोनों को उसके द्वारा पकड़ा जा सकता है। उस हेतु सूक्ष्म शरीर के संयंत्र के विकसित करना होता है। सूक्ष्म जगत से अनुभूतियों के आदान प्रदान की भी अनेक विधियाँ हैं। इनमें से ध्वनियाँ और शब्दों के माध्यम से कि ये जाने वाले सूक्ष्म संपर्क को अध्यात्म विज्ञान में नादानुसंधान कहा जाता है।

जिस प्रकार इन अन्तरिक्षीय ध्वनि प्रवाहों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक कर रहे है, उसी प्रकार अध्यात्म वैज्ञानिकों ने इस दिशा में व्यापक और विस्तृत अनुसंधान किये हैं और नादयोग का ढाँचा खड़ा किया है। उस साधना विधान द्वारा चेतन और जड़ दोनों से सम्बन्धित जानकारियाँ मशीनों की तुलना में अधिक अच्छी तरह प्राप्त की जा सकती हैं।

नादयोग का अभ्यासी साधक थोड़े अभ्यास के उपरान्त अपने शरीरगत अवयवों की हलचल, रक्तप्रवाह, हृदय की धड़कन, पाचन संस्थान आदि की जानकारी उसी भांति प्राप्त कर सकता है, जैसे डॉक्टर स्टेथिस्कोप आदि उपकरणों द्वारा प्राप्त करते हैं। अभ्यास बढ़ने पर दूसरों के शरीर की स्थिति का विश्लेषण भी संभव है। ‘सूक्ष्म शरीर’ की कर्णेन्द्रिय का विकास कन नादयोगी मनुष्य पशु पक्षियों और जीव जन्तुओं की मनःस्थिति को भी जान सकता है और संसार में घटित होने वाले घटना क्रम को भी।

सूक्ष्म प्रकृति में हो रही हलचलों के संकेत शब्द − तरंगों को पकड़कर समझे जाते हैं। दूरवर्ती घटनाक्रमों के संकेत प्रकट करने वाली सूक्ष्म आवेश पकड़कर उनसे घटना का देशकाल क्रम समझा जा सकता है बिना उच्चारण के एक मन से दूसरे मन का परिचय, आदान प्रदान हो सकता है। प्रकृति संकेतों को पकड़ा जाना और अपने इच्छित संकेतों द्वारा प्रकृति में हलचलें पैदा कर सकना भी संभव है। दैवी संकेतों को समझने, ईश्वर के साथ वार्त्तालाप और भावनात्मक आदान प्रदान करने से समर्थ बनाने वाली साधना ही नाच साधना कही जाती है। सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के संयुक्त प्रयास से यह सम्भव होता है स्थूल कर्णेन्द्रिय को ग्रहण शक्ति तो स्वल्प और सीमित ही है।

अतिस्वन ध्वनि तरंगों का महत्व विज्ञानों जान चुके हैं और उनका उपयोग आज कपड़े धोने सुखाने सफाई तेल निकालने कागज बनाने से लेकर इस्पात की मोटी चादरें काटने तथा अतिस्वन (अल्ट्रासोनिक) और (सुपरसोनिक) महास्वन विमानों के निमार्ण तक में भिन्न भिन्न ढंग से किया जा रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में अश्रव्य ध्वनियों के प्रयोग से शरीर के कोमल ऊतकों की जानकारी पाने और रोग निवारण करने के कार्य हो रहे हैं। सुपरसोनिक माइक्रोस्कोप सिद्धान्त पर बने माइक्रोस्कोपों से अधिक शक्तिशाली होते है यह सब तो अश्रव्य ध्वनियों का रहस्य जानने का परिणाम है। अज्ञात लोकों से बरसने वाले ध्वनि प्रवाहों की जानकारियों की उपयोगिता इससे बढ़ी−चढ़ी होना स्वाभाविक ही है।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि नाद ध्वनियाँ स्थूल कर्णेंद्रियों से नहीं, सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से सुनी जाती है। सूक्ष्म कानों की यह शक्ति अभ्यास और तन्मयतापूर्वक साधना द्वारा जगाई जाती है। सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के सिद्धान्त सूत्र योग दर्शन में निर्दिष्ट हैं−

“शब्दार्थ प्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत् प्रविभाग संयमात् सर्वभूतरुत्ज्ञानम्।”योग सूत्र (3।17)

अर्थात् − शब्द, अर्थ तथा प्रत्यय के परस्पर अभ्यास के कारण अभिन्न भास होता है। उनके प्रविभाग में संयम करने से सभी प्राणियों के उच्चारित शब्दों को अर्थज्ञान होता है।

वाक् इन्द्रिय के विषय हैं—वर्ण समूह और कानों से सुनी जाती हैं ध्वनियाँ। कान वर्ण की ध्वनि ग्रहण करता है। इन ध्वनियों के क्रम को समझ के साथ ग्रहण करने की सूक्ष्म सामर्थ्य विकसित हो जाने के साथ ग्रहण करने की सूक्ष्म सामर्थ्य विकसित हो जाने पर ध्वनियों के संघात का मूल अभिप्राय हृदयंगम हो जाता है। इसी सामर्थ्य के बल पर योगी इच्छानुसार किसी भी प्राणी की उच्चारित वाणी का अभिप्राय समझ सकते हैं। यह हुआ सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय की प्रक्रिया का विश्लेषण अर्थात् जब शब्द तन्मात्रा की साधना में सिद्धि प्राप्त हो जाता है और शब्दों की ध्वनियों के क्रम को अलग अलग समझ सकने की विश्लेषण क्षमता आ जाती है, तब सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय विकसित समझनी चाहिए। इसे ही शब्द शक्ति सम्बन्धी संयम कहते हैं।

यह संयम शक्ति विकसित होने पर जब श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध पर उसे केन्द्रित किया जाता है, तब आकाश में सतत् प्रवाहमान दिव्य ध्वनि कम्पनों का कानों से ग्रहण सम्भव होता है।

ये दिव्य ध्वनियाँ उच्चस्तरीय प्रेरणाओं और प्रकाश द्वारा साधक के व्यक्ति को ऊपर उठाती और आगे बढ़ाती हैं। नाद संकेतों के सूत्रों के सहारे परमात्मा शक्ति से जुड़ा साधक अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ता चला जाता है।


जाको राखे साइयाँ मारि सके ना कोय

अप्रत्याशित अदृश्य सहयोग की कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आती हैं जिन्हें मात्र संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता। उनकी गहराई में जाकर सूक्ष्म पर्यवेक्षण करें तो सहायता के पीछे करुणामय नियामिक सत्ता की ही करुणा परोक्ष सहयोग बनकर बरसती दिखायी पड़ती है। मानवी पुरुषार्थ जब समाधान ढूँढ़ने में असमर्थ सिद्ध होता है तो ऐसी विकट घड़ियों में उस महान सत्ता की अनुकम्पा कितने ही परोक्ष अथवा माध्यमों के रूप में अवतरित होकर पीड़ितों की रक्षा करती है निराकार होने से वह साकार माध्यमों को ही विशेष प्रयोजन के लिए विशेष प्रकार की प्रेरणा भरकर सहयोग के लिए प्रेरित करती है। ऐसी घटनाओं के कितने ही प्रमाण समय समय पर मिलते रहते हैं।

विश्व के न्यायिक इतिहास में यह अद्भुत,आश्चर्य जनक और अविश्वनीय घटना थी। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में इंग्लैंड के एक्स्टर जेल में जॉन ली नामक व्यक्ति को फाँसी की सजा दी जानी थी। निर्धारित तिथि और समय पर डॉक्टर ने जॉनली के स्वास्थ्य की परीक्षा की और उसे स्वस्थ घोषित किया। आपराधिक न्याय शास्त्र के अनुसार ‘ली’ की अन्तिम पूछी गयी। उत्तर में उसने मात्र इतना कहा −” मैं निरपराध हूं।” मजिस्ट्रेट ने उसकी इस बात पर बिल्कुल नहीं दिया। स्थानीय धार्मिक रिवाज के अनुसार पादरी ने जॉनली के अपराधों के लिए परमात्मा से क्षमा प्रार्थना करने जॉनली के अपराधों के लिए परमात्मा से क्षमा प्रार्थना करने की रस्म पूरी की। मजिस्ट्रेट की देखरेख में फाँसी का फन्दा ली के गरदन में फंसा दिया। जल्लाद ने पैरों के नीचे से मजिस्ट्रेट का आदेश पाते ही तख्ता खींचा पर टस से मस नहीं हुआ। जल्लाद जेम्स ने तख्ते की परीक्षा की कि शाय वह कहीं जाम हो गया हो, पर ऐसा कुछ नहीं था। परीक्षा की अवधि में वह भली भांति सरकने लगा था, पर जैसे ही पुनः फाँसी के लिए उसने तख्ता खींचना चाहा वह चट्टान की भांति अड़ा रहा। तीसरी बार मजिस्ट्रेट ने स्वयं भी जेम्स के साथ तख्ते का परीक्षण करने पर किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं पायी। तीसरी बार पूरे जोर से जेम्स ने तख्ता खींचना चाहा पर वह पूर्णतया असफल रहा। पूरे सात मिनट तक ली को फाँसी दी जाती रही, पर अन्त तक असफलता ही हाथ लगी।

जेम्स और मजिस्ट्रेट दोनों ही हैरान थे। इस घटना को देखकर। घटना का पूरा विवरण देखकर मजिस्ट्रेट ने उच्चतम न्यायालय में फाँसी के लिए अगली तारीख देने के लिए निवेदन किया किन्तु न्यायालय ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की कारण यह था कि न्यायालय की आपराधिक दण्ड प्रक्रिया में ऐसा कोई प्राविधान नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को दो बार फाँसी दी जाय। जॉनली कैद से छूट गया। पत्रकारों ने ली से पूछा कि वह फाँसी के फन्दे से जीवित बचकर कैसे आ गया। उत्तर में उसने कहा −”मैं निर्दोष था। अपने को निर्दोष साबित करने के लिए मैं सबूत जुटाने में असमर्थ रहा। मैं हृदय से परमात्मा को स्मरण करता रहा उसने मेरी पुकार सुन ली। उसी के अदृश्य हाथों ने मुझे बचाया है”

नवम्बर 1950 की बात है। एक दिन वाशिंगटन के प्रसिद्ध लेखक ग्लक अपने कमरे में धूम रहे थे। बाहर ठण्डी हवा चल रही थी। हल्की बूँदा बाँदी भी तेज हवा के साथ शुरू हो चुकी थी। अचानक उनके मन में यह तीव्र प्रेरणा उठी कि समुद्र के किनारे चलना चाहिए। कारण वह स्वयं भी नहीं समझ पा रहे थे। पत्नी ने कहा तो उसने विरोध किया कि ऐसे मौसम में जाना उचित नहीं, पर वे रुके नहीं और चल पड़े। मार्ग में एक मित्र का घर था उसे भी साथ लिया और समुद्र के किनारे पहुँच गये। मित्र को भी प्रतिकूल मौसम में समुद्र के किनारे जाना उचित नहीं लगा, पर स्नेह वश इन्कार नहीं कर सका।

किनारे पहुँचने पर दोनों ने देखा कि थोड़ी दूर पर दो व्यक्ति समुद्र पर तूफानी लहरों से संघर्ष कर रहे हैं। थोड़ा भी विलम्ब होने का अर्थ था कि उन दोनों का मृत्यु की गोद में जा पहुँचना। किनारे समुद्र के एक छोटी नाव पड़ी थी। बिना एक क्षण गंवाये हैराल्ड ने नाव को तूफानी लहरों के बीच छोड़ दिया। दोनों मित्र पतवार से सहारे नाव का सन्तुलन बनाये रखते हुए डूबते व्यक्तियों तक पहुँचने पर मौत के मुख से वापस लौटे व्यक्तियों ने बताया कि एक नाव दुर्घटना में दोनों समुद्र में गिर पड़े। डूबते उतराते वे ईश्वर में वे दोनों समुद्र में गिर पड़े। डूबते उतराते वे ईश्वर से सहायता की याचना करते रहे। कृतज्ञता व्यक्त करते हुए सजल नेत्रों से उन दोनों ने कहा कि आपको भेजकर परमात्मा ने हमें नवजीवन दिया है। अकारण मन में उठने वाली तीव्र प्रेरणा का रहस्य हैराल्ड ग्लड को तब समझ में आया। उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उनके हाथों से किसी के जीवन की रक्षा हुई।

सन् 1874 की प्रख्यात घटना इंग्लैंड के इतिहास में आज भी अंकित है जिसका अध्ययन करके उस करुणा मय सत्ता के प्रति हृदय श्रद्धा से आविर्भूत हुए नहीं रहता। इंग्लैण्ड का एक जहाज धर्म प्रचार के लिए न्यूजीलैण्ड के लिए रवाना हुआ। कुल 214 यात्री जहाज में सवार थे। अचानक जैसे ही जहाज विस्के की खाड़ी पार कर रहा था उसके पैंदी में छेद हो गया। पानी भीतर आने से बन्द करने के सारे प्रयास असफल रहे। जहाज में पानी निरन्तर भरता जा रहा था। नाविक ने सूचना दी कि जो अपने की रक्षा कर सकते हैं तैर कर कर लें अन्यथा जहाज अब डूबने ही वाला है। नाव में बैठे चन्द ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्हें तैरना आता था। अधिकाँश तैरना नहीं जानते थे। पादरियों की एक मण्डली नाव में बैठी परमात्मा से इस खतरे से रक्षा के लिए प्रार्थना कर रही थी। जो तैरना जानते थे वे कूदने ही वाले थे कि एक अनहोनी घटना घटी, नाव में जहाँ छेद हुआ था। उसमें एक बड़ी मछली इस प्रकार डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड जान बच गयी।

ऐसे उदाहरण पुराणों में अनेकों मिलते हैं जो उपरोक्त घटनाओं की भाँति विकट घड़ियों में ईश्वरीय सहयोग की पुष्टि करते हैं। कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीर हरण किया जा रहा था, मनुष्य का नहीं ईश्वरीय सहायता से उसकी लाज बच गयी। दमयन्ती बीहड़ बन में अकेली थी। व्याघ्र उसका सतीत्व नष्ट करने पर तुला था। कोई सहायक नहीं था। दमयन्ती के नेत्र ज्योति में से शक्ति धारा फूटी और व्याघ्र जलकर भस्म हो गया। प्रहलाद का पिता उसकी जान का ग्राहक बना था। खम्भे से नृसिंह भगवान प्रकट हुए और प्रहलाद की रक्षा की। घर से निकलने गये पाण्डवों की सहायता करने भगवान स्वयं आये। नरसी महत्ता के सम्मान की रक्षा स्वयं भगवान ने आगे बढ़कर की। ग्राह के मुख से गज के बन्धन छुड़ाने के लिए प्रभु नंगे पैरों दौड़े आये थे। मीरा को विष का प्याला और साँपों का पिटारा भेजा गया न जाने कौन उनके हलाहल को चूस गया और मीरा बच गयी। समुद्र से टिटहरी के अण्डे वापस दिलाने में सहायता करने भगवान अगस्त्य मुनि बनकर आये थे। इस तरह के उदाहरणों से पुराणों की गाथाएँ भरी पड़ी हैं जो यह बताती हैं कि मानवी पुरुषार्थ जब संकटों के निवारण में अक्षम सिद्ध होती है तो ईश्वरीय सत्ता का सहयोग माँगने पर अवश्य मिलता है।

शर्त एक ही है कि उस नियामक सत्ता की मर्यादाओं के अनुरूप कार्यविधि अपनायी जाय और अपनी अन्तः श्रद्धा को जीवन्त बनाये रखा जाय। जो स्वयं किया जा सकता है उसमें किसी प्रकार की कमी न रखी जाय। स्वयं की सामर्थ्य कम पड़ने पर अच्छे कार्यों के लिए माँगने नियम आदि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा।


मस्तिष्क को असंतुलित न रहने दें

मस्तिष्क मानवी सत्ता का ध्रुव केन्द्र है। उसकी शक्ति असीम है। इस शक्ति का सही उपयोग कर सका यदि सम्भव हो सके तो मनुष्य अभीष्ट प्रगति पथ पर बढ़ता ही जला जाता है। अभीष्ट प्रगति पथ पर बढ़ता ही चला जाता है। मस्तिष्क के उत्पादन इतने चमत्कारी है कि इनके सहारे भौतिक ऋद्धियों में से बहुत कुछ उपलब्ध हो सकती है।

मस्तिष्क जितना शक्तिशाली है उतना ही कोमल भी है। उनकी सुरक्षा और सक्रियता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि अनावश्यक गर्मी से बचाये रखा जाय। पेन्सलीन आदि कुछ औषधियाँ ऐसी हैं जिन्हें कैमिस्टों के यहाँ ठण्डे वातावरण में− रेफ्रिजरेटरों में− सँभालकर रखा जाता है गर्मी लगने पर वे बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं। औषधियों ही क्यों अन्य सीले खाद्य पदार्थ कच्चे या पकी स्थिति में गरम वातावरण में जल्दी बिगड़ने लगते हैं। उन्हें देर तक सही स्थिति में रखना हो तो ठण्डक की स्थिति में रखना पड़ता है। मस्तिष्क की सुरक्षा के मोटे नियमों में एक यह भी है कि उस गरम पानी पर न डाला जाय−गरम धूप से बचाया जाय। बाल रखाने और टोपी पहनने का रिवाज इसी प्रयोजन के लिए चला है कि उस बहुमूल्य भण्डार को यथा सम्भव गर्मी से बचाकर रखा गया जाय। सिर में ठण्डे प्रकृति के तेल या धोने के पदार्थ ही काम में लाये जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि मस्तिष्क को अनावश्यक उष्णता से बचाये रहने की सुरक्षात्मक प्रक्रिया को बहुत समय से समझा और अपनाया जाता रहा है।

यह बाह्योपचार हुआ। वस्तुतः। मस्तिष्कीय सम्पदा खोपड़ी के भीतर है। बाहरी गर्मी के ऋतु प्रभाव से तो हड्डी से ऊपर का भाग ही बचाया जा सकता है। भीतर क्षेत्र में अनावश्यक गर्मी न बढ़ने देने की बात मुख्य है। बाह्य सुरक्षा के लिए तो प्रकृति डड भी मजबूत तिजोरी जैसी खोपड़ी पहले से ही रच दी है। दृष्टा को पता था कि जो भीतर अवयव जिनने अधिक महत्वपूर्ण हैं उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध उतनी ही अधिक अच्छी तरह किया जाना है। हृदय, मस्तिष्क, फुफ्फुस, जिगर जैसे अति महत्वपूर्ण अवयवों को हड्डियों के मजबूत खोखले में बन्द करके रखा गया है। इन सब में मस्तिष्क उसे खोपड़ी की मजबूत डिब्बी में इस तरह सँभालकर रखा गया है जिसे खजाने की तिजारी या मोती की सीप, राज की फिलेबन्दी दी जा सकती है।

मस्तिष्क का बहुमूल्य यन्त्र तभी ठीक तरह दाम का सकता है जब से शान्तिमय वातावरण में−एयर कण्डीशन कमरों जितने तापमान में काम करने दिया जाय मर्यादा से अधिक गरम रहने पर इंजन, मोटर या अन्य मशीनें अपना काम करना बन्दकर देती है ठीक यह स्थिति मस्तिष्क की है। उससे ठीक काम लेता हो सन्तुलित परिस्थितियाँ बनाये रहना आवश्यक है। फोन फिल्में अनावश्यक गर्मी सहन नहीं कर पाती। इस प्रकार के मस्तिष्क अब भी उत्तेजना एवं आवेश की स्थिति उत्पन्न होने पर एक प्रकार से अपना काम करना ही बन्द देते हैं। यदि कुछ करते भी हैं तो वह उलटा होता वह उलटापन लाभ के स्थान पर हानि ही उत्पन्न करने लगता है।

मस्तिष्क को बाहरी गर्मी, तेज धूप, गरक किन्हीं रसायनों की पड़ती है किन्तु भीतरी गर्मी उत्पन्न होने का कारण उत्तेजना होती है उसका जितनी बढ़ेगी उतनी ही मानसिक संरचना स्पष्ट रूप से हानि पहुँचेगी और सामने पड़े कामों को ठीक कर सकना उसके लिए सम्भव न रहेगा। देखा जा कि कोई आवेश चढ़ने पर आदमी अर्ध विक्षिप्त स्थिति में जा पहुँचता है। उसकी कल्पना, निर्णय, हरकतें सब कुछ विचित्र हो जाती हैं। क्रोध का जिस पर चढ़ रहा हो उसकी गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक दृष्टि डाली जाय तो पता चलेगा, पागलपन में अब बहुत थोड़ी ही कमी रह गई है। अधिक क्रोध आने पर मस्तिष्कीय द्रव एक प्रकार से उबलने लगता है और यदि से ठण्डा न किया जाए तो मानसिक रोगों को लेकर हत्या आत्म हत्या जैसे क्रूर कर्म कर बैठने जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

क्रोध का आवेश शरीर पर क्या असर डालता है और बुद्धि को कैसा नष्ट कर देता है उसके उदाहरण हम सब आये दिन अपने आप पास ही देखते रहते हैं गुस्से से तमतमाया चेहरा राक्षसों जैसा बना जाता हैं। आंखें, होंठ नाक आदि पर आवेशों के उभार प्रत्यक्ष दीखते हैं। मुँह से अशिष्ट शब्दों का उच्चारण चल पड़ता है। रक्त प्रवाह की तेजी से शरीर जलने लगता है। हाथ पैर काँपते और रोये खड़े होते देखे जाते हैं। ऐसा स्वयं एक समस्या बन जाता है। ऐसी दशा होने पर हितैषी लोग सबसे पहला काम यह करते हैं। कि आवेशग्रस्त को येनकेन प्रकारेण शान्त करते हैं। जिस कारण उत्तेजना आई थी उसका निवारण करने पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना कि आवेश ठण्डा करने पर, किसी भी प्रतिकूलता में उतनी हानि नहीं होती जितनी कि आवेशग्रस्तता से। इस मोटी जानकारी से हर कोई परिचित रहता है इसलिए हितैषियों को प्रथम कार्य गुस्सा ठण्डा करना होता है। अन्य बातें पीछे सोची जाती हैं। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि एक घण्टे का क्रोध एक दिन के तेज बुखार में भी अधिक जीवनी शक्ति का विनाश करता है।

रक्त चाप में व्यतिरेक दो प्रकार के होते हैं−एक ऊँचा दूसरा नीचा। उच्च रक्तचाप हाई ब्लड प्रेशर लो ब्लड प्रेशर − ये लक्षण तो भिन्न होते हैं, पर कष्ट उससे भी उतना ही होता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज भारी कमजोरी अनुभव करता है। और अपने का अपंग असहाय जैसी स्थिति में पाता है। इन दो ही प्रकार के व्यतिरेकों में रोगी की कार्य क्षमता एवं मनः स्थिति पर हानिकारक प्रभाव लगभग एक जैसा ही होता है।

क्रोध की उच्च रक्तचाप से और खिन्नता को निम्न रक्तचाप से तुलना की जा सकती है। क्रोध वर्ग में द्वेष घृणा आक्रमण विनाश जैसे क्रूर प्रकृति के विचार एवं कृत्य गिने जा सकते हैं। खिन्नता वर्ग में निराशा, चिन्ता, शोक, भय, संकोच जैसी निष्क्रियता उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों का गणना होती है। इन्हें ज्वार भाटा के समतुल्य और अस्थिरता अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला कहा जा सकता है। उफनते समुद्र में तैरना कितना कठिन होता है इसे सभी जानते हैं।

शोक ग्रस्त, भयभीत, निराशा व्यक्ति की मनोदशा उसके अच्छे खासे स्वास्थ्य को देखते देखते तोड़ मरोड़कर रख देता है। चेहरे पर मुर्दनी छा जाती है यही आवाज तक नहीं निकलती। लगता है शरीर को काठ मार गया, कुछ करते धरते नहीं बनता है। भूख प्यास गायब हो जाती है। नींद आने में भारी कठिनाई पड़ती है क्रोध में भी लगभग ऐसा ही होता है अन्तर इतना भर रहता है कि खिन्नता में बर्फ में जमने और गलने जैसी। सामान्य स्थिति तो दोनों ही दशाओं में नष्ट हो जाती है और न केवल मस्तिष्क वरन् साथ साथ शरीर भी अपनी साधारण गतिविधियाँ जारी रख सकने में असमर्थ बन जाता है।

मस्तिष्कीय क्षमता एवं कुशलता बढ़ाने का महत्व सभी जानते हैं और इसके लिए अध्ययन, परामर्श, संपर्क अनुभव सम्पादन अभ्यास जैसे कितने ही साधन जुटाते हैं। प्रसन्नता से मानसिक उर्वरता बढ़ने की बात को ध्यान में रखते हुए मनोरंजन के लिए कई ऐसे कार्य करते है जिनमें समय और पैसा काफी लग जाता है। इन रचनात्मक प्रयोजनों से परिचित होते हुए भी न जाने इस तथ्य को क्यों भुला दिया जाता है कि आवेश एवं अवसाद जैसी अव्यवस्था फैलाने वाली मनःस्थिति उत्पन्न न होने दी जाय। लाभ उपार्जन करने की बात का जितना महत्व है उतना हो हानि न होने देने का भी। एक ओर लाभ कमाया जाय, दूसरी और हानि बढ़ती जाय तो फिर अन्ततः व्यवसाय घाटे में फँसता चला जायगा और दिवालिया बनने की नौबत आ जायगी।

आवेशों का शरीर पर क्या असर होता है इसका पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि सामान्य कार्य क्षमता को उनके कारण भारी आघात पहुँचता है। आँख,कान, नाक, जीभ अपना काम मुश्किल से ही आधा अधूरा कर पाती हैं। जीभ का स्वाद चला जाता है। पेट की भूख उड़ जाती है। कान कुछ का कुछ सुनते हैं। आँखों से सामने गुजरने वाली घटनाओं में से बहुत कम की स्मृति रहती है। तापमान बढ़ता है। रोमाँच बड़े होते हैं। साँस तेज चलती है। हृदय की धड़कन और रक्त प्रवाह की तेजी बढ़ती है। यह सारे लक्षण मिलकर जीवनी शक्ति का बड़ी मात्रा में विनाश करते हैं। यह तो यदा कदा की बात हुई। यदि यह असन्तुलन आदत बन जाय—स्वभाव में सम्मिलित हो जाय तो समझना चाहिए कि व्यक्तित्व की स्थिरता और सुसम्भावना समाप्त ही हो चली। ऐसे असन्तुलनग्रस्त मनुष्य प्रायः अर्ध विक्षिप्तों जैसी स्थिति में जिन्दगी गुजारते हैं। पग−पग पर उपहासास्पद बनते, तिरष्कृत होते और असफल रहते देखे जाते हैं।

मानसिक असन्तुलन को परिस्थितिजन्य माना जाता है और कहा जाता है—अपना क्या कसूर है, घटनाक्रम ही ऐसा बन गया कि उत्तेजना या खिन्नता का शिकार बनना पड़ा। तर्क सीधा-सा लगता है और सही भी प्रतीत होता है किन्तु वास्तविकता वैसी है नहीं। एक ही परिस्थिति की भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न प्रतिक्रिया देखी जाती है। तनिक-सी प्रतिकूलता आने पर एक व्यक्ति बेतरह घबराता और उत्तेजित होते देखा जाता है। जबकि दूसरा व्यक्ति ठीक वैसी ही अथवा उससे भी अधिक प्रतिकूलता में अपना सन्तुलन यथावत् बनाये रखता है। उसे जीवन क्रम का साधारण-सा उतार चढ़ाव मानता है और घबराने की तनिक भी आवश्यकता अनुभव नहीं करता। उसकी प्रतिक्रिया गड़बड़ी को सुधारने के लिए उपाय सोचने, काम करने और साधन जुटाने में संलग्न होने की होती है। घबराहट उत्पन्न करके असन्तुलन की नई विपत्ति को न्यौत बुलाना उसे मूर्खतापूर्ण लगता है। अस्तु स्वयं परेशान होने और दूसरों को परेशान करने वाली अस्त−व्यस्तता पर वह अपने सहज विवेक से नियन्त्रण कर लेता है। इन घबराने और बिना घबराने वाले दोनों व्यक्तियों के सामने परिस्थिति एक जैसी होते हुए भी मनःस्थिति में जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। यह आत्म नियन्त्रण का— दृष्टिकोण के परिमार्जन का—प्रतिफल है। एक उससे वंचित रहता और दुःख पाता है। दूसरा उसका संचय करके हँसता मुस्कराता रहता है और आये दिन उत्पन्न होती रहने वाली प्रतिकूलताओं को ऐसे ही मजाक मसखरी में उपेक्षा पूर्वक उतार ही नहीं देता। दूरदर्शी विवेक को अक्षुण्ण बनाये रहकर उनका समाधान भी सरलतापूर्वक कर लेता है।

मस्तिष्क को ठण्डा बनाये रहना, उस पर आवेशों का आक्रमण न होने देना एक महत्वपूर्ण साज सँभाल है। घड़ी, साइकिल, आदि छोटी−छोटी मशीनों की साज सँभाल रखी जाती है तो मस्तिष्क को क्षति ग्रस्त होने से क्यों नहीं बचाया जाता है। जबकि दवाओं और खाद्य पदार्थों को ठण्डा रखा जाता है तो मस्तिष्कीय शान्ति बनाये रखने की आवश्यकता क्यों न समझी जाय। सन्तुलन बनाये रहना एक अत्यन्त ही बुद्धिमत्तापूर्ण उपाय ही हैं जिसमें रहना सुखी रहने और सफल होने के दोनों ही उद्देश्य प्राप्त किये जा सकते हैं।


Quotation

करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामिति चिन्ताया। मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामिति विस्मृत॥

अर्थात्— मैं एक दिन मर जाऊँगा, मर जाऊँगा निश्चय ही शरीर नाशवान् है, यह भूलकर मनुष्य यह करूंगा, वह करूंगा, अभी सब कुछ करने को पड़ा है,यही सोचता रह जाता है और परलोक जैसी महत्वपूर्ण आवश्यकता अधूरी की अधूरी रह जाती है।


जिससे मृत्यु भी डरती हैं

यह सुनकर अत्यन्त आश्चर्य होता है कि प्राचीन काल में सौ वर्ष से अधिक आयु तक जीवित रहना एक सामान्य बात थी। कि ऐसे उदाहरण अब मात्र अपवाद बनकर रह गये हैं शतायु पार करने वाले व्यक्तियों को तो अब दैवीय सामर्थ्य से सम्पन्न मानकर संतोषकर लिया जाता है। पर वास्तविकता यह है कि प्राकृतिक जीवनचर्या अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन का लाभ प्राप्त कर सकता है, पर समय समय पर विरले व्यक्तियों के तो उदाहरण मिलते रहते हैं। जो शतायु को पार कर चुके हैं, पर हाल ही में एक ऐसे गाँव का उदाहरण सामने गाँव का कोई भी व्यक्ति सौ वर्ष के पूर्व नहीं मारता है।

सोवियत रूस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका स्पूतनिक के मार्च 1882 अंक में ऐसे ही एक गाँव का उल्लेख है जहाँ कि शतायु प्राप्त करने वाले व्यक्तियोँ का जमघट है। रूस के दक्षिण पश्चिम भाग के अझैटवैजन प्रान्त के वृहत् काकेशश पहाड़ी के बीच तेट नेट नदी की घाटी में अवस्थित उस गाँव का नाम है− कासिंमबीना केण्ड। सारे संसार में मात्र यही एक ऐसा गाँव है जहाँ कि प्रायः अधिकांश व्यक्तियों की मृत्यु सौ वर्ष करने के बाद ही होती है। समुद्र तल से तीन हजार मीटर ऊपर बसे इस गाँव के चारों ओर गगनचुम्बी पर्वत की चोटियाँ गाँव के चारों ओर आठ माह तक बर्फ रूपी चादर ताने रहती हैं प्रकृति का यह अनुपम श्रृंगार देखते बनता है। ऐसी मान्यता है पहले यह गाँव सुनसान था। भीषण ठंड और आवागमन की असुविधा के कारण लोग वहाँ रहने से कतराते थे। कासिंमबीना केण्ड गाँव का नाम कासिंम नामक एक व्यक्ति के कारण पड़ा कहते है कि प्रकृति के इस उन्मुक्त ‘नयनाभिराम अंचल में स्थायी रूप से रहने का दुस्साहस उस व्यक्ति ने किया। धीरे धीरे परिवार की आबादी बढ़ती गयी और पूरा गाँव ही बस गया। कासिम की मृत्यु 130 वर्ष पूरे करने पर हुई। गाँव में परिवारों की संख्या अब दो सौ के लगभग है।

इस गाँव में अभी दर्जनों ऐसे हैं जिनकी आयु सौ वर्षों से ऊपर 148 वर्षीय गुलीयण्डम मेरी नामक वृद्धा जो अपने को युवती कहती है आज भी नव जवानों की भांति घुड़ सवारी करते देखा जा सकता है। दर्शक उसकी अधिकतम आयु पचास वर्ष आँकते हैं। ‘रुस्तम कीशी’ नामक व्यक्ति की आयु 120 वर्ष है। वन रक्षक का कार्य पूरी मुस्तैदी से संभलते उन्हें देखा जा सकता है। रुस्तम कीशी के साथ ही उसका 135 वर्षीय मित्र लकड़ी का व्यवसाय करता है। कईबार वन विभाग ने रुस्तम को सवैतनिक स्थायी रूप से छुट्टी देनी चाही पर उसने यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि काम के बिना तो मैं जिन्दा भी नहीं रह सकता।

उनके दीर्घ जीवन का रहस्य जानने के लिए विश्व के कितने ही देशों के विशेषज्ञ वहाँ जा चुके है। सबने एक स्वर से स्वीकार किया है कि गाँव के लोगों की निरोगता, स्वस्थता तथा दीर्घ जीवितता का एकमात्र रहस्य है− “उसकी प्राकृतिक जीवनचर्या। आज की तथाकथित सभ्यता की कृत्रिम जीवनचर्या के प्रभाव से ये अभी भी अछूते हैं। प्रसन्नता प्रफुल्लता चेहरे से टपकती रहती है। क्रोध एवं आवेश को वे रोगों की श्रेणी में गिरते हैं। आहार में दूध, फल, साग, सब्जियों की प्रधानता देते हैं। परिश्रम उनका आभूषण है। ग्रामवासियों के साक्षात्कार के लिए गये एक पत्रकार कहना है कि “ रुग्णता दुर्बलता एवं अशक्तता के दावानल में जलते सुख−सुविधाओं से युक्त आज के प्रगतिशीलों को जीवन कैसे जीना चाहिए, यह प्रेरणा इन पिछड़े ग्रामवासियों से लेनी चाहिए।”


भावनाशील तो बनें, पर भावातिरेक से बचे

प्रत्यक्ष शरीर और बुद्धि के ही क्रिया कलाप दिखायी पड़ते हैं, इसलिए महत्व भी इन्हीं दोनों पर अधिक दिया जाता हैं, इसलिए महत्व भी इन्हीं दोनों को अधिक दिया जाता है। मानवी सामर्थ्यों में शरीर बल और बुद्धिबल को ही प्रतिष्ठा प्राप्त है। इनसे सम्बद्ध संस्थानों पर ही प्रायः अधिक ध्यान दिया जाता है। इन्हें बलिष्ठ एवं प्रखर बनाने तथा असन्तुलनों को दूर करने के लिए विविध प्रकार के उपचारों की व्यवस्था बनायी जाती है। यह उचित है और आवश्यक भी। पर शरीर और बुद्धि के अतिरिक्त एक सूक्ष्म परत और भी है जो इनकी तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान है− वह है− भाव संवेदनाओं से युक्त अन्तःकरण की। जिसमें विक्षेप होने से समूचा शरीर संस्थान प्रभावित होता है। भावनात्मक असन्तुलन शारीरिक एवं मानसिक असन्तुलनों की तुलना में कहीं खतरनाक सिद्ध होता है।

विगत दिनों शरीर और मस्तिष्क संस्थान के सन्तुलन पर ही अधिक ध्यान दिया जाता रहा, भाव−संस्थान उपेक्षा की गर्त में पड़ा रहा। फलस्वरूप अनेकों प्रयत्नों के बावजूद भी मनुष्य को स्वस्थ और सन्तुलित जीवन का लाभ नहीं मिल सका। मनःशास्त्री इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि भावनात्मक विक्षोभों के रहते स्वस्थ और सफल जीवन की आशा नहीं की जा सकती। मनोविज्ञान की आधुनिकतम खोजों ने भावनात्मक असन्तुलन को सर्वाधिक खतरनाक ठहराया है तथा यह तथ्य उजागर किया है कि शारीरिक एवं मन के उपचार के लिए भी दिया जाना चाहिए।

सम्बद्ध विषय पर गहराई से खोजबीन करने वाले मनःशास्त्री जार्ज बेंगल का कहना है कि भावातिरेक ही सभी प्रकार के मानसिक एवं भावनात्मक व्यतिरेकों को जन्म देता है। लेखक ने एक लेख “कैनयोर इमोशन्सकिल यू” में लिखा है कि उसे इस सम्बन्ध में खोज करने की प्रेरणा स्वयं के जीवन की एक घटना से मिली। उसके भाई का आकस्मिक निधन दिल के दौरे से हो गया इस घटना की बरसी की तिथि पर शोकातुर था। अचानक उसे भी दिल का गम्भीर दौरा पड़ा जिस पर बड़ी कठिनाई से नियन्त्रण हो सका। स्वस्थ होने पर उसने आकस्मिक मौत से मरने वाले दो सौ पचहत्तर व्यक्तियों की मृत्यु के कारणों का अध्ययन किया तो पाया कि अधिकाँश की मृत्यु का एक मात्र कारण था, भावात्मक असन्तुलन। जार्ज बेंगल का मत है कि भावातिरेक की स्थिति में मनुष्य सामान्य-सी घटना को भी असाधारण महत्व देता और छोटी−मोटी प्रतिकूलताओं का सामना करने में भी अपने को असमर्थ पाता है। परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठा पाने के अभाव में वह जीवन से निराश होकर ऐसे आत्मघाती कदम उठाता है। उदाहरणार्थ उपरोक्त दो सौ पचहत्तर मृत व्यक्तियों के मृत्यु के कारणों का पता लगाने पर उन्होंने पाया कि वे इतने गम्भीर नहीं थे, पर अतिशय भाव−विक्षेप के कारण उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। इन व्यक्तियों में से एक सौ दस ऐसे थे जिनकी मृत्यु मात्र उनके निकटतम सगे सम्बन्धियों के मृत्यु कारण हो गयी। एक सौ पाँच व्यक्तियों की मृत्यु का समाचार सुनकर दिल का दौरा पड़ने लगा और थोड़ी देर बाद ही मृत्यु की गोद में जा पहुँचे जबकि इसके पूर्व उन्हें कभी भी दिल का दौरा नहीं पड़ा था। तीस व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मोटर दुर्घटना के शिकार होते−होते बचे थे, पर उस दुर्घटना की आशंका से उतना घबड़ा उठे कि बिना किसी रोग अथवा कारण के अकाल मृत्यु की गोद में जा पहुँचे। मरने वाले तीस व्यक्ति छोटी−मोटी जीवन की ऐसी असफलताओं से निराश थे जिन्हें कि सामान्यतः अधिकाँश व्यक्ति उतना महत्व नहीं देते हैं।

‘हाउ योर माइन्ड कैन कन्ट्रोल−योर हेल्थ’ नामक एक शोध निष्कर्ष में डॉ. फ्रान विल्सन लिखते हैं कि ‘भावातिरेक अनेकों प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों को जन्म देता है। भावातिरेक की स्थिति में मनःसंस्थान तनावग्रस्त हो जाता है जिससे शरीर के ‘हारमोनल सिस्टम’ पर दुष्प्रभाव पड़ता है। मनःशास्त्री इस असन्तुलन से होने वाले मनःरोगों को ‘साइकोजेनिक’या ‘इमोशन काँल्ड’ रोगों का नाम देते है। प्रायः मनोचिकित्सकों के पास उपचार के लिए पहुँचने वाले ऐसे रोगियों की बहुलता होती है।

मनःशास्त्री डॉ. फ्रान विल्सन का कहना है कि प्रायः प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनाधिक रूप से यह जानकारी होती है कि स्वस्थ एवं विकृत भावनाओं का मन एवं शरीर संस्थान पर तद्नुरूप प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ का मुकता के भाव अपनी तुरन्त प्रतिक्रिया दर्शाते हैं तथा समूचे शरीर और मन को उत्तेजित कर डालते है। पर जाने अनजाने दुष्प्रभावों को देखते हुए भी अधिकाँश व्यक्ति उन्हें नियन्त्रण करने का प्रयास नहीं करते है। फलस्वरूप अश्लील चिन्तन शारीरिक और मानसिक शक्तियों को भीतर ही भीतर क्षीण करता रहता है। भावातिरेक का यह भी एक विकृत पक्ष है। जो अन्य प्रकार का भी हो सकता है तथा अपनी दुःखद प्रतिक्रिया छोड़ सकता है।

डॉ. जाँनविग ने एक घटना का उल्लेख किया है कि रुथ केडविक नामक स्त्री ने चार बार गर्भधारण किया और चारों बार उसे गर्भपात हो गया। पांचवीं बार वह एक गर्भ−विशेषज्ञ के पास पहुँची जो मनःशास्त्र का भी विशेषज्ञ था। उस गर्भ−विशेषज्ञ आँव्स्ट्रेटिशियन ने महिला से पूछा—’आपके मन में प्रसव वेदना के सम्बन्ध में कैसा विचार है? उत्तर में महिला ने बताया कि ‘सन्तान उत्पन्न करने की तो मेरी हार्दिक इच्छा है, पर बचपन में प्रसव के सम्बन्ध में मैंने इतनी खौफनाक बातें सुन रखी है कि मेरे मन में भयानक धारणाएँ बन गयी है। जब भी प्रसव का समय सन्निकट आता है मैं असामान्य रूप से भयभीत हो उठती हूँ। डॉक्टर ने उसकी मानसिक तुष्टि के लिए कुछ मीठी गोलियाँ दवा के रूप में दे दीं और अपनी रिपोर्ट हर दूसरे दिन देते रहने के लिए कहा। चिकित्सक के निर्देशानुसार वह हर दूसरे दिन अपने स्वास्थ्य की रिपोर्ट देने पहुँचने लगी। जब भी वह चिकित्सक के पास अपने स्वास्थ्य की रिपोर्ट देने जाती वह विस्तार से उसके मनोभावों को जानने का प्रयास करता। साथ ही मनोवैज्ञानिक ढंग से उसके मन में जड़ जमायी प्रसव के सम्बन्ध में भय की प्रबल भावना को समाप्त करने का प्रयत्न करता। क्रमशः इस प्रयास से महिला का भय जाता रहा और निश्चित समय पर उसने एक स्वस्थ बालक को जन्म दिया।

इस घटना का विश्लेषण करते हुए कोलोरेडा विश्वविद्यालय के अनुसंधान कर्त्ताओं ने बताया कि महिला के गर्भधारण करने के बाद प्रसव वेदना की भयपूर्ण कल्पनाओं के कारण शरीर से ऐसे विशेष प्रकार के हार्मोन पैदा होने लगते थे जो गर्भ स्राव में सहायक होकर गर्भपात के कारण बनते थे। इन विशेषज्ञों के अनुसार मस्तिष्क अवस्थित पिट्यूटरी ग्लैण्ड जिसे मास्टर ग्लैण्ड कहा गया है भावातिरेक से उत्पन्न होने वाले मानसिक व्यतिरेकों, भय, चिन्ता, आशंका आदि से अत्यधिक प्रभावित होता है। इसका नियन्त्रण मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस, गले में स्थित थाइरायड तथा एडीनल ग्रन्थि के स्रावों पर भी होता है। पिट्यूटरी ग्रन्थि के प्रभावित होने से हारमोनल सिस्टम भी असन्तुलित हो उठता है जिसका दुष्प्रभाव विविध प्रकार के शारीरिक एवं मनोरोगों के रूप में दिखायी पड़ता है।

इस विषय पर कोलोरेडा विश्वविद्यालय में अनुसंधान करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक जो जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं उनसे यह ज्ञात हुआ है कि भावनाओं के कारण होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाओं का रहस्य इसी पिट्यूटरी ग्रन्थि में छिपा है। जिसके सम्बन्ध में अभी चिकित्सा शास्त्र को बहुत थोड़ी जानकारी प्राप्त हो सकी है अधिकाँश तो अविज्ञात हैं।

अमेरिकन ‘हैण्डबुक ऑफ साइकियाट्री’ पुस्तक में डॉ. मेलिटाश्मिडबर्ग ने कहा है कि जितनी आवश्यकता शरीर के आवश्यक अंगों की है उतनी ही मानसिक प्रतिरक्षा मेंटल डिफेंस की है। यह प्रतिरक्षा भावनाओं के ऊपर नियन्त्रण द्वारा ही सम्भव है। डॉ. इमान स्टीवेंसन ने अमेरिकन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में लिखा है कि जिस प्रकार विभिन्न रोगों से लड़ने के लिए शरीर की प्रतिरोधक शक्ति एण्डीबाँडी उत्पन्न कर लेती है उसी प्रकार मन में भी विरोधी मानसिक तत्वों से लड़ने की सामर्थ्य विद्यमान है। मन भी विचार रूपी सूक्ष्म एण्टीवाँडी पैदा करने में समर्थ है, पर उसकी सामर्थ्य का लाभ इसलिए नहीं मिल पाता है कि भावातिरेक की स्थिति में मानसिक एण्टीवाडी का बनना बन्द हो जाता है। यदि भावनात्मक सामंजस्य स्थापित किया जा सकें तो दुःखदायी परिस्थितियाँ जो मनःविक्षोभ का कारण बनती है, वे भी मनुष्य के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है। अपनी बात के समर्थन में डॉ. स्वीवेंसन कहते है कि “मानसिक आघात की अवस्था में मानसिक रिआर्गेनाइजेशन की प्रक्रिया उसी प्रकार सम्पन्न होती है जिस प्रकार शारीरिक टूट−फूट की स्थिति में। ऐसी हालत में भावनात्मक सन्तुलन बना रहे तो कितने ही बच्चों का विकास असाधारण रूप से होता है। उदाहरण स्वरूप विश्व की मूर्धन्य प्रतिभाओं का जन्म एवं विकास प्रतिकूलताओं में हुआ। इसका कारण यह है कि प्रतिकूलताओं में आत्मविश्वास जगने एवं सुदृढ़ होने का अधिक अवसर मिलता है। जो प्रगति में असाधारण सहायक सिद्ध होता है।

सुप्रसिद्ध साइकियाट्रिस्ट डॉ. डॉक्टर कार्ल मिर्निजर ने ऐसी अनेकों प्रतिभाओं का प्रमाण प्रस्तुत किया है जिन्हें भयंकर मानसिक वेदनाओं से होकर गुजरना पड़ा प इसके बावजूद भी उनका मनोबल घटने के स्थान पर बढ़ता ही गया। उदाहरणार्थ विश्वविख्यात लेखक तथा विचारक जॉनस्टुअर्ट मिल, विलियम जेम्स, बर्नार्डशा आदि को अपने आरम्भिक दिनों गम्भीर मानसिक असन्तुलनों तथा नर्वस ब्रेक डाउन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इनसे गुजरने के बाद उनकी प्रतिभा में निखार आया। फलस्वरूप वे सर्वोत्तम साहित्य लिखने में सफल हो सके। संस्कृत के उद्भट विद्वान कालीदास तथा मानसकार तुलसीदास की प्रतिभा भी इसी प्रकार आघात सहकर निखर कर सामने आयी।

अन्तःकरण की इस सर्वोत्तम प्रतिरक्षा व्यवस्था को अध्यात्म मनोविज्ञानियों ने आत्मश्रद्धा के नाम से सम्बोधित किया है। शब्दों के हेर फेर से आधुनिक मनोविज्ञान इसे ही ‘सेल्फ एक्सेप्टेन्स’ कहता है। विलियम जेम्स तथा डॉ.मिनिजर ने इसे अन्तःशक्ति का नाम दिया है। इन विद्वानों का मत है कि प्रसुप्त अथवा जागृत अवस्था में हर व्यक्ति के भीतर यह महान शक्ति विद्यमान है। जिसका अवलम्बन यदि मनुष्य ले सके तभी मानसिक व्यतिरेकों के मूलभूत कारण भावनात्मक असन्तुलनों से बचाव सम्भव है।


Quotation

त्रिपञ्चांगान्यथो वक्ष्येपूर्वोक्त स्य हिलबधये। तैश्च् सर्वेः सदा कार्य निदिध्यासनमेव च॥

नित्याभ्यासाहते प्राप्तिर्न भवेत्सच्चिदात्मनः। तस्माद्ब्रह्म निदिध्यासेज्जिज्ञासुः श्रेयसे चिरम्॥ —अपरोक्षानुभूति—100−101

अर्थात्—स्वामी शंकराचार्य जी कहते है कि—आत्म ज्ञान के लिए अब मैं पन्द्रह साधन बताता हूँ, उन सबसे सर्वदा निदिध्यासन करना चाहिए। निरन्तर अभ्यास कि ये सत् और चित् स्वरूप आत्मा की प्राप्ति नहीं होती। अतः आत्मज्ञान के इच्छुक साधक को चिरकाल तक निदिध्यायन—ब्रह्म चिन्तन—करना चाहिए।


आरोग्य शास्त्र का पूरक ज्योतिर्विज्ञान

ऋतु परिवर्तन के साथ−साथ मनुष्य की अपनी गतिविधियों में उपयुक्त अन्तर करना पड़ता है। सोने का स्थान, कपड़े, पंखे, हीटर आदि का उपयोग सर्दी और गर्मी की ऋतुओं में भिन्न प्रकार से होता है। आहार की मात्रा एवं प्रकृति में अन्तर आता है। किसानों की बौने काटने की सारी कार्य पद्धति महीने के अनुसार निर्धारित रहती है। वर्षा में छत्त छप्पर सँभालने की खेतों की मेड़ बाँधने की धुन रहती है। गर्मी में आँधी तूफानों से बचाव करना पड़ता है। विद्यार्थी जाड़े के दिनों में देर तक पढ़ते है, पहलवानों को उन्हीं दिनों कसरत बढ़ाते देखा जाता है। पशु पक्षियों का कुदकने फुदकने और घरौंदों में मुंह छिपाकर बैठे रहने का मौसम होता है। बसन्त में कुछ ऐसा वातावरण होता है जिसमें वनस्पतियाँ फूलती और मादाएँ गर्भ धारण करती है। यह सारे परिवर्तन ऋतु परिवर्तन की प्रकृति सूचना के अनुसार होते रहते है। कृमि कीटकों से लेकर वृक्ष वनस्पति तक इस परिवर्तन प्रवाह से बेहतर प्रभावित होते है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या। मक्खी मच्छर वर्षा के दिनों में सर्वत्र छाये रहते है, पर शीत ऋतु में उनके दर्शन दुर्लभ रहते है।

यदि कोई ऐसी मूढ़मति हो जिसे ऋतुओं का समय, परिवर्तन एवं प्रभाव विदित न हो और वह उनके अनुरूप सुरक्षा एवं उपलब्धियों के लिए पूर्व तैयारी न करे तो समझना चाहिए कि उसका निर्वाह कठिन पड़ जायगा और अप्रत्याशित संकटों का सामना करना पड़ेगा। बुद्धिमत्ता के महत्वपूर्ण पक्षों में एक यह भी है कि ऋतु प्रभाव को समझें और तद्नुसार तालमेल बिठाने की दूरदर्शिता बदले।

ऋतु प्रभाव क्या है? अन्तरिक्ष से ग्रहों की स्थिति का हेर−फेर। सूर्य अपनी पृथ्वी को प्रभावित करने वाला प्रधान ग्रह है। पृथ्वी भी एक ग्रह है। दोनों ही अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। इस गति क्रम में जो उतार−चढ़ाव आते है। उसी की रात दिन—सर्दी गर्मी, वर्षा, बसन्त आदि के रूप में जाना जाता है पानी बरसने से लेकर भूकम्प तूफान आने तक की अनेकों प्रकृति विचित्रताएँ इसी आधार पर घटित होती रहती है। इनका मनुष्य,वनस्पति, प्राणी तथा परिस्थितियों पर कितना प्रभाव पड़ता है और उससे कितनी सुविधा असुविधा बढ़ती है उसे कौन नहीं जानता। संक्षेप में निर्जीव दीखने वाले और एक दूसरे से बहुत दूर रहते हुए—अपने अपने रास्ते चलते हुए एक दूसरे पर कितना प्रभाव छोड़ते है। इसे बारीकी से देखा समझा जाय तो कोई विचारशील आश्चर्यचकित हुए बिना न रहेगा।

यह मोटी जानकारियाँ हुई। अब तनिक और गहराई में उतरा जाये तो प्रतीत होगा कि ग्रह प्रभाव से न केवल धरती का वातावरण प्रभावित होता है वरन् मनुष्य का स्वास्थ्य और स्वभाव भी समुद्री ज्वार भाटे को किसी अदृश्य प्रवाहों से प्रभावित होकर झूले झूलता रहता है। माना कि ग्रहों का प्रभाव बदल सकना मनुष्य के हाथ की बात नहीं है। इतने पर भी उस जानकारी के आधार पर बचाव करने तथा लाभ उठाने की वैसी ही पूर्व योजना बनाई जा सकती है जैसी कि आमतौर से मौसम बदलने की बात को ध्यान में रखते हुए क्रिया−कलापों में तद्नुरूप परिवर्तन किये जाते रहते है।

स्वास्थ्य के प्रसंग में ग्रहों को—मौसम के प्रभाव को—यदि समझा जा सकें तो खतरे से बचने और अवसर के अनुकूल लाभ उठाने की सुविधा हर किसी को मिल सकती है।

चरक सूत्र—अ. 6।4 के अनुसार ऋतुओं के अनुरूप आहार−विहार में परिवर्तन करते रहने से ही स्वास्थ्य और निरोग रहा जा सकता है। चरक ने ऋतुओं के विभाग के अनुसार वर्ष को छः अंग और छः ऋतुओं में विभाजन किया है। [1] माघ−फाल्गुन को शिशिर [2] चैत्र बैसाख को बसन्त [3] ज्येष्ठ, आषाढ़ को ग्रीष्म [4] श्रावण,डडडड डडडड डडडड डडडड डडडडड डडडड भाद्र पक्ष को वर्षा [5] आश्विन, कार्तिक को शरद [6] अगहन, पौष को हेमन्त ऋतु समझा जा सकता है। यह विभाजन सुश्रुत संहिता के अनुसार किया गया है।

आयुर्वेद में ज्योतिर्विद्या का विशद वर्णन मिलता है। दिन रात और ऋतुओं आदि का प्रभाव प्राणियों एवं वनस्पतियों पर समान रूप से पड़ता है। आयुर्वेद शास्त्र के आचार्य इस तथ्य से परिचित थे कि इन परिवर्तनों का मूल कारण पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और वायु की गति विशेष है। चरक संहिता के अनुसार वनस्पतियों में से सौम्य अंश सूख जाने से इनमें तिक्त, कषाय और कटु रस की क्रमशः वृद्धि होती है तथा प्राणियों में रुक्षता अधिक पायी जाती है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य पृथ्वी का जलीयाँश ले लेता है तथा वायु तीव्र और रुक्ष होकर संसार के स्नेह भाग का शोषण करती है परिणाम स्वरूप शिशिर बसन्त और ग्रीष्म इन तीनों ऋतुओं में रुक्षता उत्पन्न हो जाने से तिक्त, कषाय और कटु रसों की वृद्धि से मनुष्य शरीर में दुर्बलता आती है।

बसन्त ऋतु में जब सूर्य मीन और मेष राशि पर रहता है सूर्य की उष्णता बढ़नी आरम्भ होती है। फलतः दुर्बलता एवं व्याधियों का बढ़ना भी यही से आरम्भ होता है। ग्रीष्म ऋतु में जब सूर्य वृष और मिथुन राशि पर आता है तो उसकी किरणें अत्यन्त प्रखर हो जाती है जिससे भूमण्डल के सभी पदार्थों में कटु रस की वृद्धि होती तथा प्राणियों में रुग्णता और दुर्बलता सर्वाधिक बढ़ती है।

सूर्य और चन्द्र की गति और स्थिति का पृथ्वी की वनस्पतियों और प्राणियों पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की रोकथाम के लिए ऋतुओं के अनुरूप आहार−विहार में हेर−फेर करने का आयुर्वेद में ‘विस्तृत वर्णन आता है। मनीषी सुश्रुत के अनुसार—

हेमन्त ऋतु में सामान्यतया शरीर की जठराग्नि सशक्त रहती है। इन दिनों वायु का प्रकोप अधिक रहता है। स्निग्ध पदार्थ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते है।

शिशिर ऋतु में कटु, तिक्त, कषाय रसों से युक्त बात वर्धक पदार्थों का सेवन वर्जित है।

हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ बसन्त ऋतु में सूर्य किरणों से प्रभावित होकर जठराग्नि को मन्द कर देता है अतः अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते है। अतः स्निग्ध और अम्लीय पदार्थों का सेवन वर्जित है पुराने अन्न का सेवन लाभकारी है।

ग्रीष्म ऋतु में शरीर में स्निग्धता का अभाव पड़ जाता है। इस काल में स्निग्ध पदार्थ, मधुर रस, घी, चावल आदि का सेवन अधिक करना चाहिए, लवण, अम्लीय तथा कटु रस वाले पदार्थों का सेवन हानिकारक है।

वर्षा ऋतु में जठराग्नि सर्वाधिक दुर्बल रहती है। रोगों की बहुलता भी इसी कारण इन्हीं दिनों देखी जाती है। दिन में सोना, धूप में बैठना वर्जित है। पुराने जौ, गेहूँ का प्रयोग लाभप्रद है। अम्लीय लवण से युक्त, स्निग्ध पदार्थों की बहुलता स्वास्थ्य रक्षक है।

शरद ऋतु में वर्षा ऋतु में संचित पित्त प्रकुपित रहता है, वसा, क्षारीय एवं दही का सेवन वर्जित है।

पश्चिम जर्मनी, ‘वोकुम’ स्थित वेधशाला के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. हाइन्ज कामिस्की के अनुसार हर नवें ग्यारहवें, अठारहवें वर्ष सूर्य के धरातल पर भंसकर विस्फोट होते हैं। इस सदी में किए गये अध्ययन के अनुसार विस्फोटों की तीव्रता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। सन् 1972 अगस्त माह में सूर्य पर एक विस्फोट हुआ जो करोड़ों हाइड्रोजन बमों की शक्ति के बराबर था।

इस विस्फोट की घातक तरंगें बाह्यावरण आयनोस्फियर को चीरकर पृथ्वी पर पहुंची जिनका घातक प्रभाव पृथ्वी के वातावरण, वृक्ष वनस्पतियों एवं जीवों पर भी पड़ा। प्रो. हाइन्ज के अनुसार कैंसर, हृदय रोग, रक्त चाप जैसी बीमारियों में अभिवृद्धि का एक कारण सूर्य का विषैला प्रभाव है। प्रो. कामिस्की का मत है कि यदि उस समय कोई अन्तरिक्ष यात्री अन्तरिक्ष में रहा होता तो एक्स किरणों से उसकी तत्काल मृत्यु हो सकती थी।

अमेरिका के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. स्टीफन कोजेन ने बताया है कि मौसम का प्रभाव सुनिश्चित रूप से औषधि पर व उसे लेने वाले पर पड़ता है। न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एवं इण्डियन एक्सप्रेस 7 अगस्त 1981 द्वारा उद्धृत इस समाचार के अनुसार जिसने औषधि सेवन में मौसम की अवहेलना की—उसे या तो दुष्परिणामों या मृत्यु का सामना करना पड़ा है। मौसम से उनका मतलब है गृह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार पृथ्वी पर संभावित वातावरण में परिवर्तन। यदि सूखी गर्म जलवायु में बिना सोचे समझे व व्यक्ति का पूरा निरीक्षण किये आँख में एट्रोपीन नामक दवा डाल दी जाय, जो पुतलियों को चौड़ा करती है, तो शरीर के तापमान नियमन की व्यवस्था छिन्न−भिन्न हो जाती है एवं हीट स्ट्रोक से रोगी की मृत्यु हो सकती है। दोष यहाँ लू को देकर छुट्टी पा ली जाता है जबकि उत्तेजक कारण था जलवायु का ध्यान रखें बिना एण्टी कोलिनर्जिक औषधि दे देना।

पिछले दिनों तीन मानसिक रोगी न्यूयार्क के एक अस्पताल में अप्रत्याशित रूप से मृत पाये गये। उन्हें जो एण्टी सायंकोटिक औषधियाँ दी गयीं उन्होंने उन रोगियों को वातावरण से जूझने की क्षमता को नष्ट कर दिया एवं वे जरा से मौसम परिवर्तन को भी सहन न कर पाये। डॉ. रोजेक का कहना है कि पहले से रोगी की मनःस्थिति व वातावरण में संभावित परिवर्तनों का ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर एक चार्ट बना लेना चाहिये तथा तभी औषधि दी जानी चाहिये जब उसे मौसमीय प्रतिकूलताओं से लड़ने के लिये बाध्य न होना पड़े।

डॉक्टर रोजेक का कहना है—कि कितने व्यक्ति जानते हैं कि—दवा की पोटेन्सी, दुष्प्रभाव व वाँछित प्रभाव मनुष्य के पर्यावरण पर पूर्णरूपेण निर्भर है। मौसम परिवर्तन के अनुसार ही औषधियाँ अपने प्रभाव बनाती हैं। यही बात कुछ एण्टी बायोटिक, कुछ एलर्जी की औषधियों एवं कुछ तनाव शामक औषधियों पर भी लागू होती है।

रोगों के निराकरण, आरोग्य सम्वर्धन के संदर्भ में जहाँ आहार−बिहार परिचर्या उपचार पर ध्यान दिया जाता है वहाँ इस तथ्य को भी नजर अंदाज किया जाना चाहिए कि अन्तरिक्षीय परिस्थिति से भी मानवी स्वास्थ्य के बनने बिगड़ने का बहुत कुछ सम्बन्ध है उस विवशता को भाग्यवाद के समर्थन में तो प्रस्तुत किया जाय पर सतर्कता एवं चेष्टा के अन्याय उपाय सोचते समय एक मार्ग यही भी जुड़ा रखा गया जाय कि अंतरिक्षीय स्थिति से अवगत रहा जाय और उस आधार पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुकूलन का प्रयत्न उठा न रखा जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति आरोग्य शक्ति के साथ−साथ ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी रखने से ही हो सकती है।


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समाधौ क्रियमाणे तु विघ्ना आयन्ति वैबलात्। अनुसन्धानराहिल्यमालस्यं भोगलालसम्॥

लयस्तमश्च विक्षेपो रसास्वादश्च् शून्यता। एवं यद्विघ्नबाहुल्यं त्याज्यं ब्रह्विदा शनैः॥ —अपरोक्षानुभूति—127-128

‘समाधि का अभ्यास करते समय कौन−कौन से विघ्न आते हैं, जिनसे साधक को सावधान रहने की नितान्त आवश्यकता होती है। इस विषय में आचार्य शंकर का मत है कि—समाधि के अभ्यास के समय—अनुसन्धान राहिल्य, आलस्य भोगेच्छा, लय, तम, विक्षेप, रसास्वाद और जड़ता [शून्यता] आदि विघ्न हठात् आ जाते हैं। इन आने वाले विघ्नों के प्रति साधक—ब्रह्मवेत्ता—को समाधान रहना चाहिए और शनैःशनैः उसे दूर करना चाहिए।


यज्ञोपचार और व्याधि निवारण

आज के चिकित्सक को यह भलीभाँति समझ में आ गया है कि आधुनिक युग में उपलब्ध औषधियों से समग्र चिकित्सा सम्भव नहीं है। बड़ी ही जल्दी शरीर इन औषधियों के प्रति इम्युनिटी विकसित कर लेता है, जिससे वे तकरीबन प्रभावहीन ही सिद्ध होती है। एक ‘टर्मीनल इलनेस’ नामक व्याधि समूह भी विकसित हो गया है, जिसमें चिकित्सक रोगी को रोग का स्वरूप समझ नहीं पाता, पर उसे गम्भीरता एवं शीघ्र ही मृत्यु के मुख में जाने का भविष्य दर्शन करा देता है। “आएट्रोजिसिटी” अर्थात् औषधियों के दुष्प्रभावों से होने वाली व्याधियों का एक अलग ही विषय विगत एक दशक में चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत आ चुका है।

एक और क्षेत्र ऐसा है जिसमें वैज्ञानिक स्वयं को अन्धकार में पाता है। वह है पर्यावरण में बढ़ता जा रहा असन्तुलन। विशेषकर काष्किक किरणों एवं अन्य माइक्रोवेग्स की धरती ग्रह पर बरस रही बाढ़ जिसने मानव जन्य प्रदूषण में और भी वृद्धि कर दी है।

“मेटोरियो बायोलॉजी” एवं ‘क्लीनिकल इकॉलाजी” जैसे विषयों पर शोध का क्षेत्र बढ़ता चला जा रहा है। जितनी व्याधियाँ हो रही हैं, उसमें प्रधान कारण वातावरण का बीमार होना है। जिस ग्रह पर मनुष्य रह रहा है, इसके “एनर्जी सायकल”(ऊर्जा चक्र) को यदि सुसंतुलित न किया गया, तो इसके दुष्परिणाम सभी को सामूहिकतः भुगतने होंगे।

“होलिस्टीक हेल्थ” का जो नया स्वरूप अब उभर कर आ रहा है इसमें प्रधानता रोग निवारण मात्र को नहीं दी जायेगी। वरन् स्वास्थ्य के उस पक्ष को दी जायेगी जिससे समस्त दबावों, प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेने की मानवी क्षमता में वृद्धि हो। स्वास्थ्य का अर्थ मात्र बीमारी से मुक्ति नहीं है। यह अरौ भी ऊँचा विस्तृत शब्द है, जिसमें मानसिक उल्लास, स्फूर्ति, आत्मिक दृष्टि से उन्नत स्वास्थ एवं जीवन के प्रति विधेयात्मक दृष्टिकोण भी आ जाता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, रोग विकृति विज्ञान अधिक है एवं थेरेपी या उपचार विज्ञान कम। इससे निदान का स्वरूप तो उभर कर आया है, चिकित्सा की बात अधिक सशक्त ढंग से प्रस्तुत नहीं हो पायी है।

कुछ व्याधियों में निरन्तर बढ़ोत्तरी हुई है। कैंसर से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब तो यह बच्चों में भी होने लगा है। बढ़ती औद्योगिक समृद्धि ने साँस लेने वाली हवा में घटोत्तरी की है एवं एलर्जी तथा अशुद्ध हवा से होने वाली बढ़ोतरी की है। एसर पालुशन (वातावरण प्रदूषण) एवं कैंसर में अब सीधा सम्बन्ध माना जा रहा है।

किसी भी गैस पाइजनिंग का पहला दुष्प्रभाव होता है सांसों का उथलापन। गहरी साँस लेने में कष्ट होता है, इसलिये साँस ली जाती है। एवं यह धीरे−धीर साँस लेने में तकलीफ तक को जन्म देने लगती है। हल्की साँस एवं डिस्पनिया के भावी दुष्परिणाम होते है—दमे का हल्का व गम्भीर आक्रमण मस्तिष्कीय माइग्रेन, (सिरदर्द—आधाशाशी), थकावट, अवसाद, मंदाग्नि वजन में निरन्तर कमी, कोलाइरिस एवं नरवस डामरिया तथा अन्य स्नायविक कमजोरियाँ।

प्रदूषण का प्रभाव जन्म ले रहे बच्चों पर पड़ा रहा है। अधिक संख्या में विकलाँग अब जन्म ले रहे हैं। गर्भपात अब अधिक संख्या में हो रहे हैं।

ऐसे में यज्ञ चिकित्सा एक ऐसा माध्यम हो सकती है जो स्नायविक अनियमितताओं से लेकर कैंसर की अन्तिम स्थिति तक को ठीक कर सके किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव से रहित यह थेरेपह किस प्रकार काम कर सकती है, इस पर बृहत् अनुसंधान की आवश्यकता है।

गलत आदतों से होने वाली व्याधियों को किस प्रकार ठीक लिया जाये, उन सभी सूक्ष्म घटकों का सुनियोजित किस प्रकार किया जाये, जो स्वास्थ्य को किसी सीमा तक प्रभावित करते हैं, यही यज्ञोपचार का प्राण है। साइकोथेरेपी में वो साइकियाट्रिस्ट का स्वयं का व्यक्तित्व, उसका ज्ञान एवं रोग की तह में जाने की उसकी सामर्थ्य महत्वपूर्ण होती है, पर यह पहुँच अन्तःस्थल तक नहीं हो पाती। इसके लिए आध्यात्मिक एनोटॉमी एवं थेरेपी के ज्ञाता। ‘होलीस्टीक हीलर’ की आवश्यकता होती है जो गहराई तक न केवल प्रवेश करें बल्कि परामर्श भी दें। यज्ञ प्रक्रिया से जुड़ी सारी प्रवेश क्रियाएं इस पक्ष को भी साथ लेकर चलती हैं।

अब हमें वैज्ञानिकों को उस धरातल पर ले जाना होगा। जहाँ तक तथ्य एवं प्रमाण की भाषा में वे यह समझ सकें कि वनौषधियों को यज्ञशाला की ज्वाला में होमीकृत करने से कुछ नियम अनुशासन का पालन करने से, आहार−बिहार का संयम एवं कुछ चुने हुए मन्त्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करने से ब्राह्मी चेतना या “समष्टि प्राण” में कुछ ऐसे परिवर्तन होते है जो सभी के मस्तिष्कों पर स्वास्थ्यवर्धक, तनावनाशक, आनन्दवर्धक लाभ प्रभाव डालते हैं।

न्यूटोलॉजी, बैक्टीरियालॉजी एवं मूर्च्छा विज्ञान पर इस शोध का क्षेत्र खुला पड़ा है।

समष्टि में व्याप्त प्राण शक्ति एवं व्यष्टि की मनःशक्ति को ही एक ही सिक्के के 2 पहलू मान सकते हैं। वातावरण में होने वाला परिवर्तन निश्चिततः शरीर के स्वास्थ्य का निर्धारण करने वाली प्राणशक्ति को प्रभावित करेगा।

अग्नि की ऊर्जा के माध्यम से यज्ञ चिकित्सा में वातावरण को प्राण शक्ति से अभिपूरित किया जाता है तो शरीर की शक्ति को मानसिक सामर्थ्य को बायोटिथम को लौटा कर प्रभावित करती है। इससे जो मनःऊर्जा व्यक्ति के समग्र स्वरूप से उत्सर्जित होती है, वह पर्यावरण में तो सन्तुलन लाती ही है, उसे भी शक्तिवान बनाती है। यही है यज्ञोपचार का आधार एवं सिद्धान्त जिसके सहारे लोक स्वास्थ्य को सुधारने की सम्भावना दिन−दिन समुज्ज्वल होती चली जा रही है।


Quotation

उद्देश्य स्वाध्याय और सत्संग को ध्यान योग का ही अंग माना गया है। उत्कृष्टता की गरिमा पर श्रद्धा केन्द्रित करने को ‘चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने को आकाँक्षा उभारना—योजना बनाना—मनन कहलाता है। योगाभ्यास की ध्यान योजना के अंतर्गत आत्म−समीक्षा, आत्म−परिष्कार, आत्म−निर्माण, आत्म−विकास की सुविस्तृत रूपरेखा खड़ी करना तथा उसे सफल बनाने के लिए कटिबद्ध होना प्रमुख कार्य है। इसी के निमित्त साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।


खिचरी यस्त सिद्धातु स शुद्धोनाऽत्र संशयः’

ध्यानयोग की समस्त साधनाएँ व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाती हैं तथा साधक को आनन्द उल्लास का स्रोत अपने ही अन्दर खोजने, उसे उभारने व तद्जन्य सामर्थ्य से उसे अति मानवी क्षमताएँ धारण करने योग्य बनाती हैं। इन सभी साधना उपचारों में ब्रह्मरन्ध्र की साधना को महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें खेचरी मुद्रा के भाव प्रधान प्रयोगों का प्रावधान है। हठयोग के साधक तो इस साधना को मात्र जीभ लम्बी करके उसे उलटकर तालूमूर्धा तक लगाने, जिह्वा पर विभिन्न वस्तुओं का लेपन कर इसे थन की तरह दुहने का प्रयत्न करने तक सीमित मानते हैं। अतिवादी तो जीभ के नीचे की त्वचा को काटकर उसे और अधिक पीछे मोड़ने योग्य बनाते हैं। परन्तु ध्यानयोग में इसके भाव पक्ष का ही प्राधन्य है, वही उस प्रक्रिया का प्राण भी है। इसमें ब्रह्मरन्ध्र को मस्तिष्क मध्य अवस्थित माना जाता है और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने की कल्पना की जाती है। जीभ रूपी तन्मात्रा से इसी सोमरस का पान किया जाता है।

सोमरस, अमृत कलश, जिह्वा के सम्वेदनशील तन्तु, ब्रह्मरन्ध्र, तालु मूर्धा—इन सब शब्दों व इस प्रक्रिया को समझने के पूर्व कुछ दार्शनिक तथा वैज्ञानिक तथ्यों पर विचार करना होगा। परब्रह्म के अनुदान यों तो सारे जीवधारियों पर सृष्टि के अन्तराल से निरन्तर बरसते रहे हैं। परन्तु मनुष्य की बात अलग है। मानवी काया में कुछ ऐसे सूक्ष्म शक्ति केन्द्र होते हैं जिनके माध्यम में इन अनुदानों को सहज ही अपने अन्दर ग्रहण अवशोषित किया जा सकता है। साधारण स्थिति में तो थे और प्राणधारियों की तरह प्रसुप्त ही पड़े रहते हैं परन्तु साधना पुरुषार्थ से इन सूक्ष्म शक्ति संस्थानों, चक्र−उपत्यिकाओं तथा ग्रन्थियों को विकसित समर्थ बनाया जा सकता है।

ब्रह्मरन्ध्र मानवी मस्तिष्क में अवस्थित एक ऐसा स्थान है जिसे योग शास्त्र में रहस्यों से भरा, महिमायुक्त एवं ब्राह्मी चेतना का ही एक अंग माना गया है। तालु गह्वर से ऊपर स्थित, दोनों सेरिबल हेमीस्फियर्स (मस्तिष्क पटलों) के मध्य विद्यमान यह सूक्ष्म संरचना अदृश्य जगत से आने वाले प्रवाहों को रेडियो क्रिस्टल की तरह ग्रहण करती व आवश्यकतानुसार काया के विभिन्न अवयवों को भेजकर शेष अन्तरिक्ष में छोड़ देती है। यदि कोई यह उत्सुकता बताये कि ब्रह्मरंध्र स्थूल मस्तिष्क में कहाँ है, उसे इन चर्म चक्षुओं से क्या देखा जा सकना सम्भव है? तो उसे निराश ही होना पड़ेगा। शरीर की सूक्ष्म संरचना कुछ इस प्रकार की है कि स्थूल अवयवों को उसके आँशिक प्रतीत के रूप में माना तो जा सकता है, पर पूर्णरूपेण उनका पर्यायवाची उन्हें नहीं कहा जा सकता। इस साधना से होने वाली फलश्रुतियों से सूक्ष्म अवयवों की सामर्थ्य का अनुदान तो लगाया जा सकता है, पर उन्हें आँखों से देखा नहीं जा सकता।

आध्यात्मिक शरीर विज्ञान के अनुसार ब्रह्मरन्ध्र को मस्तिष्क मध्य में उसकी अधों सतह पर स्थित कुछ महत्वपूर्ण अंगों के समीपस्थ माना जाता है। पिट्यूटरी ग्रंथि की महत्ता से अब परिचित हैं। यहाँ से उत्सर्जित हारमोन्स सीध रक्त में मिलकर पूरे शरीर की अचेतन चेतन क्रियाओं, उसके शारीरिक विकास व मानसिक क्षमताओं के जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। पुरुषोचित दृढ़ता और स्त्रियोचित कोमलता, न केवल अंगों में अपितु स्वभाव−रुझान में भी इन्हीं रस स्रावों के कारण ही देखी जाती है। व्यक्तित्व का सुसन्तुलित गठन संचालन ये सूक्ष्म स्राव ही करते है। इसी पिट्यूटरी ग्रन्थि व भाव संस्थान के नियन्ता हाइपोथेलेमस के मध्य जो विद्युत प्रवाहों से चारों ओर से ऐसे घिरा है—मानों एक फव्वारे के केन्द्र में कोई वस्तु रखी हो तथा लिम्बिक सिस्टम नामक एक महत्वपूर्ण केन्द्र से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर पिट्यूटरी ग्रन्थि के न्यूरोसरकु लेटरी हारमोन्स तथा हाइपोथेलेमस को सिनेप्सो का समन्वय संयोग होता है। यह स्थान सेरिव्रोस्पाइनल फ्ल्यूड की थर्डे वेन्ट्रीकल नामक थैली में भरे द्रव्य से ऐसे घिरा है, मानो शिवजी क मस्तक से गंगा की धारा निकल रही हो। यही पर ब्रह्मरन्ध्र के ब्राह्मी चेतना के जीव चेतना में स्थिति प्रतिनिधि के अवस्थित होने की कल्पना की जाती है।

जिह्वाग्र से इस स्थान का क्या सम्बन्ध? खेचरी मुद्रा में जिह्वा को पीछे घुमाकर धीरे−धीरे तालु के कोमल हिस्से मूर्धा को सहलाया जाता है, इसके पीछे क्या कारण है, इसकी भावनात्मक व्याख्या तथा इस क्रिया के साथ की जाने वाली ध्यान धारणा के विस्तार में जाने के पूर्व जिह्वा की संरचना प पिट्यूटरी ग्रन्थि की उत्पत्ति−विकास पर कुछ विवेचन करेंगे।

जिह्वा के सम्वेदनशील तन्तु पैपीली कहलाते हैं। अगले हिस्से पर वे सबसे सघन होते हैं। स्नायु तन्तु जहाँ समाप्त होते हैं व जिनके कारण जीभ स्वाद आदि का अनुभव होते हैं व जिनके कारण जीभ स्वाद का अनुभव करती है, ‘टेस्टबड’ नामक टर्मिनल बनाकर पैपीली में ही समाप्त होते हैं। प्रत्येक पैपीली एक स्वतंत्र माइक्रोफाइन्ड इलेक्ट्रोड का काम करता है। इसे तालु मूर्धा से लगाने से प्रयोजन है, हौले−हौले सहलाकर वहाँ के कोष्ठकों को उत्तेजित करना। आध्यात्मिक दृष्टि से जीभ को मुख गह्वर में रहने वाली रसेन्द्रिय, ऋण विद्युत प्रधान—रयि शक्ति सम्पन्न मुखर कुण्डलिनी माना जाता है। सर्पिणी की उपमा इस पर भी सही रूप में लागू होती है। जीभ से डंक मारने की उक्ति, रसना से अहंयम आदि वाणी तथा वाणी तथा स्वाद के अधोगामी प्रवाहों से सभी परिचित हैं। हेय सलाह, छलछद्म द्वारा व्यक्ति वाणी का है उपयोग कर कुमार्गगामी बनता है व दूसरों को बनाता है। यदि यह अनगढ़ प्रसुप्त मुख सर्पिणी जागृत सुसंस्कृत हो सके तो अनेकों अनुदान उपलब्ध कराती है। जिस प्रकार मूलाधार चक्र में स्फुरणा व सूर्यबेधन प्राणायाम तथा शक्तिचालिनी मुद्रादि का आश्रय लिया जाता है उसी प्रकार जिह्वा को ऊर्ध्वगामी बना, इस ऋण प्रवाह प्रधान शक्ति केन्द्र को धन विद्युत के केन्द्र मस्तिष्क की डडडड सतह से जोड़कर एक सर्किट पूरा किया जाता है। जिह्वा और तालु की हल्की रगड़ से विशिष्ट आध्यात्मिक स्पंदन आरम्भ होते है और इस उत्तेजना से उच्चकोटि के ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है। योगी इसे अमृत निर्झर का रसास्वादन कहते हैं।

ब्रह्मरंध्र की आध्यात्मिक विवेचना के पूर्व संरचना पर चिन्तन करते है तो ज्ञात होता है कि वह स्थान जहाँ जिह्वा को हल्के−हल्के स्पर्श किया जाता है सीधे पिट्यूटरी से जुड़ा है। विचित्र बात यह है कि यहाँ पर (नेजोफेरिक्स) पिट्यूटरी ग्रन्थि की संरचना का ही पदार्थ माँस पेशियों में—स्नायु तन्तु के जाल में उलझा बैठा होता है। इसका कारण यह है कि गर्भ काल में पिट्यूटरी का जन्म तालु मूर्धा में ही होता है—यही से ‘राथके पाऊच’ नामक स्थित होने पहुँच जाता है। दोनों स्थानों को जोड़ने वाली नलिका जन्म के बाद बन्द हो जाती है पर बहुसंख्य महिलाओं−पुरुषों में इसका अस्तित्व तालु मूर्धा में होता है। इसे इलेक्ट्रोडों से उत्तेजित कर हारमोन्स का उत्सर्जन उन व्यक्तियों में वैज्ञानिक करने में सफल हुए है जिनका मस्तिष्क स्थित पिट्यूटरी काम करना बन्द कर देता है। कहने का आशय यह कि इसी प्रसुप्त पिट्यूटरी के, हिस्से को जिह्वाग्र रूपी इलेक्ट्रोड से उत्तेजित करना केवल हारमोन्स का स्राव रक्त में पहुँच सकना शक्य है, अपितु स्नायु संस्थान व रक्त प्रवाह को भी प्रभावित किया जा सकना पूर्णरूपेण सम्भव है, इसकी पुष्टि चिकित्सक डॉ. मैग्राथ ने ग्रैज एनाटाँमी के 1980 के संस्करण में अपने एडिनोहाइपोफिसस सम्बन्धी अध्याय में की है। यह एक स्मरणीय तथ्य है कि तालु मूर्धा के ठीक ऊपर काफी सघन रक्त प्रवाह, स्नायु जल सेरिब्रोस्पायनल द्रव्य से भरी थैलियाँ होती है। यह द्रव्य (सी.एस.एफ.) ही स्नायु संस्थान को पोषण देता है।

खेचरी मुद्रा के माध्यम ले आत्मा−परमात्मा के मिलन संयोग की अनुभूति आनन्द और उल्लास के रूप में होती है। सामान्य स्थिति में तो इनका अनुभव मनुष्यों को नहीं होता, पर इस योगाभ्यास द्वारा भगवान की मनुष्य की दो प्रेरणाएँ—सन्तुष्टि, आनन्द तथा उत्कृष्टता की ओर कदम बढ़ाने के लिये अदम्य उत्साह−उल्लास सहज ही मिलती है। ये इस साधना की सूक्ष्म प्रतिक्रियाएँ है। हर व्यक्ति अन्दर भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरन्तर पेण्डुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। साधना में परिपक्वता के दो ही चिन्ह हैं—ध्यान करते समय यह अनुभव होने लगे कि मानव जीवन जैसा अनुपम उपहार हमें उपलब्ध हुआ है। हमें छोटे−मोटे अभावों पर ध्यान न देकर समस्वरता की स्थिति में सन्तुलित जीवन जीना चाहिए। यही सच्चा आनन्द है। आनन्द अकेला नहीं आता, उल्लास भी साथ लेकर आता है। उच्चस्तरीय प्रयासों के लिये प्रचण्ड कर्मठता अपनाने हेतु अदम्य उत्साह, स्फूर्ति एवं उमंग ही उल्लास है। अपनी प्रौढ़ावस्था में यह उल्लास ईश्वरीय अनुशासन के अनुरूप नीति निर्धारण हेतु मचलने पर साधक को विवश कर देता है। यही भगवान की भक्त से वार्तालाप की चैनेल है, यही आत्मा−परमात्मा का परस्पर संवाद है।

मनीषी जिह्वा को तालु से लगाने और सहलाने से सोमरस के निर्झरित होने की चर्चा करते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि सोमरसपानजन्य मादकता ही आन्तरिक मस्ती है। उत्कृष्ट भावनाओं में रमण अपने में एक अलग ही प्रकार की अनिवर्चनीय आनन्ददायक अनुभूति देता है। यह मात्र अलंकारिक वर्णन उस मिठास के लिये है जो अमृत में होती है और जिसका रसास्वादन जिह्वा तालु स्पर्श से करती है। खेचरी मुद्रा में इस स्पर्श से मिठास प्रधान स्वाद की अनुभूति होती है और लगता है उसमें कुछ मादकता भी साथ है। यह समाधि स्थिति के पूर्व की आनन्द मग्न होने की स्थिति है। चित्त की चंचलता नष्ट होकर मन उत्कृष्ट विचारों में लगने लगता है।

गोरक्ष संहिता में शास्त्रकार ने कहा है—

चितं चलति नो यस्माज्जिह्वा चरति खेचरी। तेनेयं खेचरी सिद्धा सर्वा सिद्धं नमस्क्रत॥

अर्थात्—जिस योगी का चित्त चंचल नहीं होता और जिसकी जिह्वा खेचरी में रमण करती है, उसी की खेचरी मुद्रा सिद्ध है। अर्थात्—चित की तन्मयता खेचरी साधना का एक अनिवार्य अंग है।

यह चिर तन्मयता ही खेचरी साधना की परिणति प्रतिक्रिया है। वस्तुतः यह भाव पक्ष ही इस साधना अधिक। जिह्वा को सरलता से जितना पीछे तालु से सटाकर ले जा सके—ले जाते है व इसके उपरान्त ध्यान करते है मधु के छत्ते के समान तालु छिद्र से सोम अमृत का—सूक्ष्म रस स्राव हो रहा है यह रस जिह्वा के गहन किया जा रहा है। निवास करने वाली रस तन्मात्रा द्वारा ग्रहण किया जा रहा है। इससे अक्षय आनन्द की उत्पत्ति रोम−रोम में हो रही है। इस प्रक्रिया से होने वाली सफलताओं एवं साधक को प्राप्त अतीन्द्रिय क्षमताओं दिव्य सामर्थ्यों से शास्त्र भरे पड़े है। इसी कारण इसे हठयोग में नहीं, ध्यानयोग में ही गिना जाता है क्योंकि यह एक उच्चस्तरीय ध्यान प्रक्रिया ही है। शिव संहिता, घेरण्ड संहिता, योग कुंडल्योपनिषद्, योग रसायनम् आदि ग्रन्थों में इस प्रक्रिया के अनेकों लाभ बताये गये हैं। इनमें रोगों से मुक्ति, जीवनी शक्ति वृद्धि, दीर्घ आयुष्य, सतत् उत्साह आदि स्थूल तथा अणिमा, गरिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती है, ऐसा वर्णन ग्रन्थों में है।

शिव संहिता लिखती है—

ब्रह्मरन्ध्रे मनोदत्वा क्षणार्धं मदि तिष्ठति। सर्वपाप विनिमुक्तः सयाति परमाँगतिम्। अस्मिल्लीनं मनोयस्य स योगीमयिलीयते। अणिमादि गुणान् भुक्त वा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः॥

अर्थात्— ब्रह्मरंध्र में मन लगाकर खेचरी मुद्रा की साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ तथा पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों का अधिकारी बनता हैं।

खेचरी अर्थात् आकाश में विचरण करना। इसीलिये साधक को हमेशा भाव श्रद्धा के निखिल आकाश में विचरण करने का ध्यान करने को कहा जाता है। दैहिक क्रिया जो साथ जुड़ी है वह तो संक्षिप्त है। मूल है उसका सूक्ष्म भाव पक्ष जो साधक के अन्तरंग को आमूल−चूल बदल देता है—बहिरंग में प्रसन्नता,स्फूर्ति, तेजस् व्यवहार में सुसंस्कारिता के समावेश के रूप में जिसकी परिणति होती है।


डडडड काया की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना - एक वैज्ञानिक विवेचना−2

मानव शरीर के अन्दर भरी पड़ी प्राणाग्नि के भाण्डागार की जानकारी विज्ञान जगत को आधुनिक उपकरणों की सहायता से आज मिल पायी है। इस सम्बन्ध में उपनिषद्कार पहले ही लिख चुके हैं—

“प्राणाग्नये वासिमन ब्रह्मपुरे जागृति”

अर्थात्—इस ब्रह्मपुरी यानी शरीर में प्राण ही कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है। (प्रश्नोपनिषद्)

प्राण को अंगारा व प्राणाग्नि को उससे निकलने वाली ताप ऊर्जा−धधकती लौ के रूप में समझा जा सकता है। जड़−जगत में वेव− क्वांटम (तरंगों) के रूप में तथा चेतन जगत में विचारणा एवं सम्वेदना के रूप में व्याप्त यह प्राण−प्रवाह वस्तुतः विद्युत ऊर्जा का सूक्ष्मतम स्वरूप है। अदृश्य अन्तरिक्ष जगत से अनुदान रूप में प्राप्त ब्राह्मी प्राणशक्ति को मानव शरीर सतत् ग्रहण करता—अवशोषित करता तथा निस्सृत करता रहता है। इसका संचय ही प्राण निग्रह कहलाता है जो व्यक्ति को ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, बना देता है। क्षरित होने पर यही शिथिल जीवनी शक्ति, निरुत्साह, रुग्णता, हताशा, अवसाद के रूप में प्रकटीकृत है।

प्रश्न यह उठता है कि इस विद्युत भण्डार के अपने शरीर में संव्याप्त होने पर भी हम उसे जान क्यों नहीं पाते? बिजली के नंगे तार को छू लें तो ‘शँट’ लगता है। उसमें तो कुछ ही ‘वाल्ट’ की विद्युत प्रभावित होती है जबकि मानव शरीर में तो 1 लाख वोल्ट प्रति सेण्टीमीटर का विद्युत दबाव होता है। इतनी महत् शक्ति वाले संस्थान को तो एक विशाल बिजली घर की ही संज्ञा दी जा सकती है। फिर शरीर की विद्युत वैसा झटका क्यों नहीं देती, जैसा बिजली का तार देता है− अथवा उसे हम जान क्यों नहीं पाते? इसका उत्तर एक ही है−मानवी विद्युत का मात्र थोड़ा-सा अंश ही व्यावहारिक रूप से काम में आता है। नियन्ता ने इस विद्युत को चक्रों, ग्रन्थियों उपत्यिकाओं में—जीवकोष ऊतकों में कैद कर रखा है। इस इन्सुलेशन के हटने पर ‘लीक’ हो रहे तार की तरह शरीर भी कभी−कभी झटका देने लगता है और आँटोकम्बशन, शरीर से स्फुल्लिंगों का चमक उठना, प्रसिद्ध महिला जेनीमार्गन की तरह छूने वालों को तेज शॉट देकर गिरा देना—(अखण्ड−ज्योति जनवरी 81), इन माध्यमों से अपने अन्दर छिपे विद्युत्भण्डार का परिचय दे उठता है। वस्तुतः यह सूक्ष्म विद्युत शक्ति का स्थूल परिचय मात्र है। भण्डार तो इतना सामर्थ्यवान है कि उसे मापा जाना उपकरणों से सम्भव नहीं।

हृदय की धड़कन, माँसपेशियों का आकुँचन−प्रकुचन आँतों की गतिविधियाँ, मस्तिष्क में सन्देशों का आवागमन, अंतःस्रावी ग्रन्थियों से रस स्राव, अस्थिविकास आदि शरीर व्यापार विद्युत शक्ति की ही चमत्कृति हैं। स्वादेंद्रियों से रसों का रसास्वादन, नासिक से ग्रहण किये जाने वाले आहार की गन्ध व लार का टपकने लगना आदि संवेदन ग्रहण करके प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में भी विद्युतीय शक्ति अपना खेल दिखाती है। आँखों में बाह्य प्रकाश के रेटिना से टकराने पर रेटीना के कोषों का विद्युतीय सन्तुलन जिस प्रकार बदलता है—वही दृश्यों के मानस पटल पर बनने का कारण बनता है। इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम, इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राम, इलेक्ट्रोमायोग्राम, इलेक्ट्रोरेटीनोग्राम, इलेक्ट्रो आँक्युलोग्राम, स्किनरेसीस्टेन्स आदि से तो क्रमशः हृदय, मस्तिष्क, माँसपेशियों, आँख का रेटीना, आँखों की गतिविधि, त्वचा प्रतिरोध के रूप में विद्युत का एक आँशिक भाग ही मापा जाता है। इन्हीं का मापन कर चिकित्सक, शोध−अन्वेषक शरीर की प्राण शक्ति की न्यूनाधिकता तथा रोगों की उत्पत्ति का कारण बताते हैं।

अब पता चला है कि शरीर में जो विद्युत का असीम भण्डार है वह मनुष्य एक विद्युतचक्र के माध्यम से सतत् अवशोषित कणों के रूप में बनाये हुए हैं। विद्युत आवेशधारी कण वायु−मण्डल की गैसों में घुल होते हैं। इस विद्युत आवेश का कारण है—सौर ऊर्जा अन्तरिक्षीय किरणें जिनके स्रोतों की अभी वैज्ञानिकों को जानकारी नहीं, तथा धरती की स्वाभाविक रेडियो धर्मिता। विद्युत आवेशधारी वे अणु−परमाणु ‘आयान’ कहलाते हैं और हर श्वास के साथ मनुष्य के फेफड़ों में प्रवेश करते रहते हैं। इन मानवी अंगों की विशेषता है कि वे ऋण आवेश वाले आयनों को ही सोखते हैं और फेफड़ों से रक्त में प्रवेश कर यह ऋण विद्युत शरीर के सभी भागों में फैल जाती है और शरीर के सभी कोष और ऊतक अपनी−अपनी संधारक क्षमता (केपेसीटी) के अनुसार इसे संचित कर लेते हैं। यदि क्षरण की गति (श्वास से, अत्यधिक श्रम से, अनिद्रा से या असंयम के कारण—वाणी, स्वाद, जननेंद्रिय)। संचय से अधिक न हुई तो शरीर के सभी ऊतक विद्युत संतृप्त हो जाते हैं और धीरे−धीरे विद्युत आवेश उस व्यक्ति जीवधारी की त्वचा से बाहर निकलने लगता है। जिसे डॉ. किलनर ने ‘आँरा’ के रूप में मापा व क्वान्टीफाम किया है, जिसे थियाँसाफी वाले इथरिकडबल व अध्यात्मवादी प्राण शरीर कहते हैं, वह यही शरीर से निरन्तर उत्सर्जित विद्युतधारा ही है। अवशोषण, संतृप्तीकरण व उत्सर्जन तीनों मिलकर एक विद्युतचक्र बनाते हैं। सभी जीवधारियों में यह बराबर चलता रहता है, मात्र मनुष्य को एक अतिरिक्त विशेषता प्राप्त है। इसे अतिरिक्त मात्रा में संचित कर अपने प्रसुप्त केन्द्रों को जगा लेने व इस विद्युत से स्वयं ही नहीं औरों को लाभान्वित कर सकने की क्षमता न्यूनाधिक रूप में हर मनुष्य में होती है। यह बात अलग है कि उसका प्रयोग—सदुपयोग बहुत कम कर पाते हैं अथवा जानकारी के अभाव में इसका सतत् दुरुपयोग करते रहते हैं।

विद्युत चयापचय की आधुनिकतम जानकारी का मूल स्रोत फ्राँस की स्ट्रासबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. फ्रेड ब्लेज रहे हैं जिन्होंने अपना शोध प्रबन्ध ही इस विद्युतचक्र पर लिखा है। अपनी पुस्तक “दी बायोलॉजिकल कन्डीशन्स क्रिएटेड बाय द इलेक्ट्रीकल प्रोपर्टीज ऑफ द एटमोस्फियर” में उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने प्रयोगों पर विस्तार से लिखा है। 75 हजार अरब कोषों के समन्वय से बनी मानवी काया को उन्होंने इस चक्र के आधार पर चलता−फिरता बिजली घर बताया है तथा इसके सुनियोजन की भारतीय अध्यात्म में वर्णित प्राण विद्या की चर्चा करते हुए कहा है कि यदि ‘हाइडल पॉवर’ की तरह चक्र रूपी ‘टर्बाइन्स’ चलाये जा सकें तो इस आदान−प्रदान को बढ़ाया व अनेक अतिमानवों शक्तियों को जगा पाना सम्भव है।

डॉ. हिरोशी मोटोयोमा, जो जापानी वैज्ञानिक समुदाय में एक विवादास्पद चिकित्सक माने जाते रहे हैं ने शरीर की इस विद्युत पर शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया है। वे एक अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न जापानी महिला ‘ओडाइसामा’ द्वारा पाले गये। इस महिला की इस शताब्दी की विगत की कई भविष्यवाणियाँ बाद में सत्य सिद्ध हुई। अध्यात्म विद्या व झेन योग पर गहरा विश्वास रखने वाली इस महिला के संरक्षण में रहकर उन्होंने टोक्यो यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी व फिजियोलॉजी में क्रमशः एम. ए. व एम. डी. करके ड्यूक यूनिवर्सिटी (प. जर्मनी) में परामनोविज्ञान पर शोध कार्य किया। अपनी संरक्षिका की मृत्यु के बाद 1974 में उन्होंने उनकी इच्छानुसार एक संस्था टोक्यो में स्थापित की − “इन्स्टीट्यूट फाँर रिलीजन एण्ड साइकोलॉजी”। अदृश्य सूक्ष्म अन्तःशक्तियों का कैसे उद्घाटन व मापन किया जाय—इसी पर उन्होंने अपने शोधकार्य को केन्द्रित किया।” “कम्पेरेटिव स्टडीज ऑफ इर्स्टन एण्ड वेर्स्टन मिस्टीसीज्म”, “द वल्ड ऑफ रिलीजस एक्सपीरीयेन्सेस” तथा “साइन्स एण्ड इवाँल्यूशन ऑफ काँशसनेस” ये तीन पुस्तकें उन्होंने अपने गहन अध्ययन के आधार पर लिखी हैं। इसके लिये उन्होंने उपनिषदों, प्राणयोग, पातंजलि के योगदर्शन तथा चीनी चिकित्सा पद्धति का विशद मंथन किया व अपने निष्कर्षों के आधार पर उन्होंने कुछ उपकरण अपनी ही प्रयोगशाला में बनाये जिनसे सूक्ष्म विद्युत का मापन व चक्रों की हलचलों का ग्राफिक अंकन डडडड जा सके। यह तो वे भी जानते थे कि चक्र− उपत्यिकाएं स्थूल अंग नहीं वरन् उस स्थान विशेष से भँवर−चक्रवात यानी विद्युत संतृप्तीकरण के कारण उठ रहे आभा मण्डल का ही दूसरा नाम है। तो फिर मापन कैसे? उन्होंने विभिन्न अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न व पंचकोशी जागरण की साधना कर रहे तिब्बती लामाओं पर प्रयोग किए तथा अपने सूक्ष्म उपकरण से उनके ‘आँरा’ व विद्युत शक्ति के स्थान विशेष पर केन्द्रीभूत हो जाने की प्रतिक्रिया को मापा।

अपने विशद प्रयोगों को उन्होंने जिस उपकरण से सम्पादित किया, उसे ‘चक्रा’ मशीन नाम दिया। सूक्ष्म शरीर के हर चक्र को उन्होंने स्थूल शरीर के प्लेक्ससों से जोड़कर आर्ष ग्रन्थों में वर्णित फलश्रुतियों के आधार पर प्रयोग किए। उन्होंने पाया कि चक्र जागरण की बहिविद्युतीय प्रतिक्रिया को नापा जा सकता है। ‘लेडशील्डेड’ कमरे में साधक को बिठाकर बिना कोई इलेक्ट्रोड शरीर से छुए एक शरीर के चारों ओर घूमने वाले ताँबे के इलेक्ट्रोड द्वारा उत्सर्जित विद्युत्प्रवाह को 800 मेगाओम के प्रिएम्पलीफायर व डी. सी. एम्पली फायर से गुजार कर कमरे के बाहर रखे ‘पॉवर स्पेक्ट्रम एनालाइजर’ से उन्होंने मापा व एक रिकार्डर पर उसे अंकित किया। ध्यान−धारणा व स्थान विशेष पर प्राण−प्रवाह को केन्द्रीभूत करने की प्रतिक्रिया उन्होंने पायी।

गत 8 वर्षों में उन्होंने अपने अनुसंधान का केन्द्र बिन्दु मानव शरीर के अन्दर छिपी इस ‘सटलर’ विद्युत को ही बना रखा है और इस साधना से वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं जिसकी चर्चा प्राणमय—विद्युतमय शरीर के रूप में लेख के प्रारम्भ में की गयी। कोई कारण नहीं कि प्रयास किये जाने पर विद्युत चुम्बकत्व, रक्त में घुले रसायनों आदि के विश्लेषण से निकट भविष्य में यह बताया न जा सके कि मानव के सूक्ष्म संस्थान के जागरण की सम्भावनाएँ भी असीम व महान हैं। न जानने व अपनी तकनीक को उस सीमा तक न पहुँचा पाने के कारण यदि जीव विज्ञानी इस विद्युत भण्डार को माप सके तो मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। मानवी काया की संरचना इतनी विलक्षण है कि उसके कई रहस्यों का अभी विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं। विद्युत भण्डार तक चर्चा सीमित हो जाती तो एक बात थी, पर जब हम चुम्बकत्व की सत्ता की चर्चा करते हैं तो हतप्रभ रह जाते हैं। इतना सामर्थ्यवान यह चुम्बकीय विश्व इस काया में विराजमान है कि वह उक्ति यथार्थ ही प्रतीत होती है जिसमें पृथ्वी के दो ध्रुवों की तरह मानव को भी ‘डायपोल मैग्नेट बताया गया है। विद्युतधारा जहाँ भी बहती है—वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण हो जाता है—यह सर्वविदित है।

मानव सतत् श्वास द्वारा प्राणशक्ति खींचता है तथा उसका संचय−ऊतकों का संतृप्तीकरण कर अवशिष्ट को प्रश्वास द्वारा वापस वातावरण में धकेल देता है। यह संचित प्राण ऊर्जा ही वास्तविक सम्पदा है जो विशिष्ट प्रयोगों द्वारा चक्र— उपत्यिकाओं रूपी खजानों में बन्द कैद कर ली जाती है व इसी को आँखों से, वाणी से, उँगली के पोरों से, काया के रोम−रोम से तेजोवलय विद्युतचुम्बकत्व के रूप में साधक निरन्तर निस्सृत कर वातावरण को—व्यक्ति को—वस्तु विशेष को—प्रभावित कर सकने की सामर्थ्य से सम्पन्न बनते हैं। प्राण ऊर्जा सम्बन्धी ‘सटलर पॉवर’ के ये प्रयोग अब तो विज्ञान जगत के समख परीक्षण के विषय वस्तु बन गये हैं। सही भी है—विज्ञान सम्मत होने पर प्राणाकर्षण—प्राण संचय की विद्या को, क्षरण रोकने से होने वाले लाभों इत्यादि को प्रामाणिक मान सकना सबके लिए सहज ही सम्भव भी हो सकेगा।

प्राणशक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण−कण में प्रवाहित हो रही है। मानवी सत्ता उसका एक अंग मात्र है। उस शक्ति प्रवाह के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं। शरीर को समर्थ−शक्ति सम्पन्न बनाने, निरोग−बलिष्ठ बनाने के लिये आवश्यक है कि व्यष्टि प्राण सत्ता के तारों को उस असीम समष्टि प्राणसत्ता के विद्युत केन्द्र से जोड़ दिया जाय। उस आदान−प्रदान को आरम्भ कर दिया जाय, जिसे सम्पादित कर अपनी सूक्ष्म सत्ता को जगाना व जीव−ब्रह्म सम्मिलन−संयोग के शास्त्र वर्णित लाभों से स्वयं को कृतकृत्य अतिमानवी सामर्थ्य सम्पन्न बना सकना सम्भव है।

(क्रमशः)


अध्यात्म प्रयोगों की वैज्ञानिक साक्षी एवं ब्रह्मवर्चस् के प्रयास 2

प्रामाणिकता हर क्षेत्र में अनिवार्य है। साधना विज्ञान पर भी वही सिद्धान्त लागू होता है जो भौतिकी के विभिन्न पक्षों में प्रयुक्त होता है। साधक की आत्मिक प्रगति का क्रम क्या रहा, क्या−क्या परिवर्तन उसके अन्तरंग व बहिरंग में हुए, इसकी प्रत्यक्ष जानकारी हर बुद्धिजीवी चाहता है। उसे मात्र आप्त वचनों—शास्त्र वाक्यों पर विश्वास नहीं। अन्वेषण बुद्धि वाले हर असामान्य तथा दिन भर की कमाई—पेट भरने तक सीमित रहने वाले साधारण व्यक्ति तक को फलश्रुति पर ही विश्वास होता है एवं उसकी धारणा किसी भी तथ्य के विषय में तब ही सशक्त बन पाती है।

व्यक्ति यदि उत्साहित आशान्वित, विश्वासी हो तो थोड़ी-सी सफलता भी बड़ी लगने लगती है और यदि निराशाग्रस्त−दीन−दुःखी प्रकृति का हो तो बड़ी सफलता भी अकिंचन-सी लगती है। सही जानकारी अनुमान के आधार पर नहीं लगाई जा सकती। उस कठिनाई का समाधान कल्पना बुद्धि नहीं, विज्ञान के सशक्त आधार उपकरण, प्रमाण, तथ्य एवं तर्क ही कर सकते हैं। इन्हीं आधारों पर साधक की मनः स्थिति, परिस्थिति बतायी जा सकती तथा साधना उपचारों की प्रतिक्रिया पर विवेचना भी की जा सकती है।

अध्यात्म अनुशासन आज की परिस्थिति में तर्क की पैरवी माँगते हैं। कुशल वकील अपनी दलीलों से फैसले को विरोधी पक्ष में जाने से बचा ले जाते हैं। प्रयोग की प्रत्यक्ष रिपोर्टों तथा प्रमाण— गणनादि के आधार पर चिकित्सक गण रोग का निदान व विकृति का समाधान बता देते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया यदि तर्क व प्रयोगों के आधार पर प्रतिपादित कर दी जाय तो कोई संशय नहीं कि बुद्धिवादी जनमानस अध्यात्म प्रयोगों की उपयोगिता मानने को तैयार न हो।

ब्रह्मवर्चस् के शोध विशेषज्ञों ने साधना विधानों की वैज्ञानिकता को प्रयोगशाला स्तर पर प्रमाणों द्वारा तथा साहित्य के विशद् विवेचन के माध्यम से तर्कों व प्रमाणों द्वारा सत्यापित करने का बीड़ा दो वर्ष पूर्व अपने हाथ में लिया। प्रज्ञा परिवार के सभी परिजनों को इस शोध संस्थान के विषय में सामान्य जानकारी है। उसका उद्देश्य जितना विशाल है उतने ही बड़े स्तर पर प्रयोग परीक्षण का एक प्रारूप बनाया गया है तथा उसका प्रारम्भिक स्तर पर श्रीगणेश कर दिया गया। अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति की जा सके, ऐसे उपकरण अभी और आना शेष है, फिर भी वर्तमान में जो भी कुछ है, कम नहीं। अभी तक की प्रगति की समीक्षा तथा साधना क्रमों के उतार−चढ़ाव का लेखा−जोखा जब करते हैं तो ज्ञात होता है कि एक ऐसा असम्भव कार्य सम्भव बनाया जा रहा है, जिसके विषय में हर व्यक्ति सामान्यतया शंका की दृष्टि ही रखता है।

प्रयोग−अनुसंधानों के निष्कर्ष तब तक प्रामाणिक नहीं माने जाते जब तक कि काफी अधिक संख्या में प्रयोग−परीक्षण नहीं कर लिये जाते, साँख्यिकी की दृष्टि से उनका विश्लेषण नहीं कर लिया जाता। इस कारण अति उत्साह में जल्दबाजों की तरह उनका उद्घाटन करना हास्यास्पद तो होगा ही, वैज्ञानिक दृष्टि से एक गलत—बचकाना कदम भी। प्रस्तुत विवेचन को उद्देश्य है,अभी तक इस क्षेत्र में अन्यान्य व्यक्तियों द्वारा किए गए अनुसन्धानों का विश्लेषण तथा अपने समग्र प्रयास पुरुषार्थ की एक जानकारी देना। इसे ‘शोध सिनाप्सिस’ भी कह सकते हैं। यह लिखना तो आत्मश्लाघा होगी कि हमारा प्रयास समग्र है, औरों का अपूर्ण। पर एक वैज्ञानिक ऋषि के नाते हम यह कह सकते हैं कि औरों के प्रयास की अवहेलना न कर हम उससे भी आगे बढ़कर सूक्ष्म अध्यात्म विज्ञान की जानकारी बुद्धिजीवियों को उन्हीं की भाषा में देना चाहते हैं जिसे पाकर वे ही नहीं सारी मानवता कृतकृत्य होगी। नास्तिकता का वर्तमान स्वरूप बदलकर आस्तिकता उभरेगी, विज्ञान सम्मत बनेगी। अभी तक जो प्रयोग−परीक्षण किये गये हैं वे भौतिकी की सीमा में परिबद्ध रहे हैं। श्रद्धा को भौतिकी में स्थान कहाँ? श्रद्धा−विश्वास को मापने वाला कोई एल. सी. डी. अभी तक वैज्ञानिक नहीं बना पाए। पर यह तो सम्भव है कि जिस व्यक्ति में अध्यात्म उपचारों व उनके परिणामों के प्रति श्रद्धा हो—उसके आंतरिक परिवर्तनों की पूर्व की तथा बाद की स्थिति की तुलना ऐसे व्यक्ति से की जा सके जिसे इन पर विश्वास न हो। ‘फेथ’ अपने आप में एक साइन्स है जिसे हर समझदार आदमी आज समझता है, उसके अस्तित्व को मानता है। विदेशों में तो ‘के थ हीलिंग‘ एक चिकित्सा विज्ञान के रूप में मान्यता ले चुका है। ‘मिस्ट्री ऑफ हीलिंग‘ नामक ग्रन्थ (रीडर्स डायजजेस्ट प्रकाशन) में ऐसे ढेरों उद्धरण हैं जिसमें पेस्टर (पादरी), साइकेट्रिट (मनःचिकित्सक) तथा फिजीशियन (शरीर चिकित्सक) की एक सम्मिलित टीम द्वारा कई असाध्य रोगियों को जिनमें कैंसर भी सम्मिलित है, रोगमुक्त किया गया है। यह तो पाश्चात्य जगत की बात हुई जहाँ अन्ध विश्वास को कोई मान्यता प्राप्त नहीं। कम्यूनिस्ट राष्ट्र तो नास्तिक ही माने जाते हैं। रशिया में चर्चों की स्थापना को निरुत्साहित ही किया जाता है फिर भी ‘फै थ’ तत्व को उन्होंने भी माना है तथा परामनोविज्ञान पर की जा रही शोधों में उसे महत्वपूर्ण स्थान भी दिया है। श्रद्धा के अस्तित्व को माने बिना साधना उपचारों की सफलता की बात ही नहीं बनती। इसी कारण जरूरी समझा गया कि हम ही इस कार्य को अपने हाथ में लें व श्रद्धा तत्व के अस्तित्व व चमत्कार युक्त परिणति को प्रामाणित करके दिखायें। चान्द्रायण साधना के एक मास के अनुष्ठान सत्रों में यह किया भी गया व परिणाम भी सुखद सम्भावनाओं से भरे मिले।

अभी तक देश−विदेश में जो प्रयोग किये गये हैं उनका उद्देश्य है—आसन, प्राणायाम के क्रियायोग वाले स्वरूप के परिणामों की जानकारी प्राप्त करना तथा ध्यान की शिथिलीकरण वाली स्थिति, जिसमें चयापचयिक प्रक्रिया शून्य के समीप पहुँच जाती है, की प्रतिक्रियाएँ जानना। ध्यान भी,—सोद्देश्य, साकार या डडडड अथवा किसी उच्चस्तरीय चिन्तन से जुड़ा न होकर मात्र विचारों को खुला छोड़ देने तक सीमित माना गया। इन शोध कर्त्ताओं ने पूरे अध्यात्म उपचारों को इन तीन प्रयोगों के बहिरंग सीमित कर ही उनके अति फलदायी परिणाम बताये हैं। तनाव निवारण से लेकर शरीर की स्थूल जीवनी शक्ति में वृद्धि तक लाभों को गिनाते हुए उन्होंने यह प्रामाणित करने का प्रयास किया कि आयुष्य वृद्धि तथा रोग प्रतिरोधी सामर्थ्य वृद्धि में अध्यात्म उपचार काफी सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं।

पाश्चात्य वैज्ञानिकों का ध्यान काफी समय से ‘इर्स्टन मिस्टीसिज्म’ (पूर्वार्त्त रहस्यवाद) की ओर आकर्षित होता रहा है। भारतीय ऋषियों की योग पद्धति तथा झेन बौद्धिज्म की ध्यान पद्धति उनके लिये रहस्य रोमाँच का विषय रहा है। उनकी उत्कण्ठा अपनी प्रारम्भिक स्थिति में मात्र यहीं तक सीमित रही कि क्या हृदय की धड़कन को रोक सकना सम्भव है? एक एयरटाइट बॉक्स में या एकदम ठण्डे स्थान पर बिना भोजन के योगीजन कैसे रह पाते हैं, यह कौतूहल प्रारम्भ से ही उनके मन में रहा है। फ्रेंच कार्डियोलॉजिस्ट थेरेसी ब्राँसे 1935 में भारत आयीं व उन्होंने योगियों पर अपने प्रयोगों से पाया कि वास्तव में अधिकाँश अपनी धड़कन पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ हैं। इनमें से एक ने काफी समय तक अपने हृदय की धड़कन को बन्द करके दिखाया। 1957 में 2 अमेरिकन फिजियोलॉजिस्ट एम. ए. वेन्गर (यू. सी. एल. ए.) तथा डॉ. बी. के. बागची (यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन मेडिकल स्कूल) ने नयी दिल्ली में मेडीकल इन्स्टीट्यूट के डॉ. बी. के. आनन्द के सहयोग से कुछ वालंटियर्स पर प्रयोग किये व पाया कि ध्यान की गहरी स्थिति में प्रवेश करने पर बन्द तो नहीं पर हृदय की गति 60 प्रति मिनट से कम तथा श्वास गति को 12 प्रति मिनट से कम कर सकना सम्भव है।

1957 से 1972 तक का समय ध्यान व प्राणायाम पर शोध कार्य का ही रहा और विभिन्न प्रयोगकर्ताओं ने भिन्न−भिन्न परिणाम अपने प्रयोगों के विज्ञान जगत के समख रखे। जापान के वाय. सूगी. तथा के. अकात्सू, ए. कासामात्सू तथा टी. हिराई, नयी दिल्ली के सी. एस. आनन्द, बलदेव सिंह, जी. एस. चीना, अमेरिकी रॉबर्ट, कीथ, वेलेस तथा एच. बेन्सन इत्यादि ने ध्यान प्रक्रि या पर तथा के. एन. उडुपा व आर. एस. सिंह, स्वामीराम, स्वामी सत्यानन्द तथा स्वामी कुवल्यानन्द (लौनावला−पुणे) आदि ने मूलतः आसन−प्राणायाम पर प्रयोग किए। इन सबके निष्कर्षों का सार इस प्रकार दिया जा सकता है—

(1)ध्यान से साधकों की आक्सीजन को अन्दर पचाने की क्षमता (ऑक्सीजन कन्जम्पशन) में बीस प्रतिशत से भी ज्यादा कभी हो जाती है अर्थात् वे कम ऑक्सीजन में भी अपना काम चला लेते हैं।

(2)मस्तिष्क की विद्युत सक्रियता ध्यान से अत्यधिक प्रभावित होती है—अल्फा, थीटा वेव्स का ई. ई. जी. द्वारा विश्लेषण करने पर यह पता चलता है कि उनकी नियमितता बढ़ती जाती है—विशेषकर सामने वाले (फन्टल) व केन्द्रीय हिस्से (सेण्ट्रल रिजन) में। यह स्थिति तभी होती है जब व्यक्ति पूर्ण विश्राम की स्थिति में हो, फिर भी चेतन मस्तिष्क पूर्ण जागृत हो। जिनका ध्यान अभ्यास अधिक गहरा था, उनमें साधारण 9 से 12 साइकल्स (आवृत्ति) प्रति सेकेंड से घटकर अल्फा तरंगें 7−8 पर आ गयीं जबकि अनुपस्थित थीटा तरंगें 6−7 आवृत्ति प्रति सेकेंड पर उभर आयीं।

(3) त्वचा की विद्युतीय प्रतिरोध सामर्थ्य (स्किन रेजिस्टेन्स) वैज्ञानिकों ने उन्हीं में कम पायी है जो अत्यधिक तनावग्रस्त होते हैं। जिनमें यह बढ़ती चली जाती है, उनकी तनाव स्थिति में शिथिलता आने लगती है। करीब−करीब सभी प्रयोगकर्ताओं ने यह पाया है ध्यान से यह रेजिस्टेन्स बढ़ जाता है।

(4) क्रियापरक प्रयोगों यथा आसन−प्राणायाम जिनसे ध्यान−धारणा को प्रमुखता नहीं दी गयी थी, वैज्ञानिकों ने पाया कि यद्यपि शरीर की सामान्य जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है, पर ऑक्सीजन कन्जम्पशन उनका अधिक होता है अर्थात् उन्हें अधिक प्राण वायु को प्रयुक्त करना होता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य परिवर्तन पाये गये हैं, वे हैं—रक्त चाप में कमी, रक्त ओषजन में बढ़ोत्तरी; रक्त केलैक्टेट स्तर में औसतन दस मिलीग्राम प्रति सी. सी. प्रति घण्टे की दर से कमी (यह तनाव शैथिल्य का बोधक है), रक्त −प्रवाह में तीन सौ प्रतिशत तक कमी (बाह्य माँसपेशियों में) तथा शरीर के सिम्पेथेटिक आँटोनॉमिक संस्थान से सम्बन्धित स्नायु रसायनों में अत्यधिक कमी। यह वर्णन कुछ जटिल अवश्य हो गया है, पर इतना बताये बिना वह पूरी विस्तृत चर्चा सम्भव नहीं जो इस अति महत्वपूर्ण विषय के लिये अपरिहार्य है।

मनोवैज्ञानिक, शरीर के जैव−रासायनिक तथा स्नायु प्रवाह सम्बन्धी सभी पैरामीटर्स का विश्लेषण कर सीमित अध्यात्म उपचारों में विज्ञान क्षेत्र के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ध्यान एक जागृत, पूर्ण विश्राम की स्थिति है जिसमें चयापचयिक प्रक्रिया न्यूनतम हो जाती है। महर्षि महेशयोगी के भावातीत ध्यान, बौद्ध झेन पद्धति के ध्यान तथा विपासन एवं शिथिलीकरण प्रक्रिया के विश्लेषण से सभी एक मत हैं कि वैज्ञानिक दृष्टि से अध्यात्म उपचारों द्वारा आज की मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का हल निकाल पाना सम्भव है। आदमी को तनाव से मुक्ति दिलायी जा सकती है। आसन आदि के प्रयोग से शरीर शोधन व स्वास्थ्य संवर्धन भी सम्भव है। पर क्या यही वह उद्देश्य है जिसके लिए इन अध्यात्म अनुशासनों की महत्ता शास्त्रों ने प्रतिपादित की है? क्या वास्तव में मन से ही अधिकाँश रोगों की उत्पत्ति होती है या उससे भी गहरे में कोई और परत है जो सारी विकृतियों के लिये उत्तरदायी है। रोग निवारण की बात छोड़कर यदि व्यक्ति को और भी अधिक समर्थ बनाना—अदृश्य जगत के शक्ति केन्द्र से उसे जोड़कर अति मानवी क्षमता सम्पन्न बनाना चाहें तो यह किस प्रकार सम्भव है? इन सब प्रश्नों का उत्तर हमें इन शोध निष्कर्षों से नहीं मिलता इसके लिये और भी सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने वाली प्रक्रिया व उपकरण चाहिए।

जब वैज्ञानिकों ने जीवकोष की जानकारी मानव समुदाय को दी तो उसे विलक्षण कहा गया। मात्र बीस वर्षों में इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से लेकर स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री एक्सरे−लेसर आदि के प्रयोगों ने यह बता दिया है कि उस समय का हर्षातिरेक कितना बचकाना था। अन्त जीवकोष के अन्तराल में छिपे एक−एक घटक के विस्तृत विवरणों पर बड़े−बड़े ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं, जीन्स की फोटोग्राफी ही नहीं—उनका संश्लेषण तथा कृत्रिम कलम लगाने तक का अभियान आरम्भ किया जा चुका है। ऐसे में अध्यात्म उपचारों की प्रतिक्रिया को मात्र ई. ई. जी. तथा रक्त में घुले कुछ रसायनों में परिवर्तन भर तक सीमित मान लेना अपना मार्ग बन्द कर लेने के समान है। शोध का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। शरीर के विद्युतीय ढाँचे का मापन−विश्लेषण अब इलेक्ट्रोमीटर, मैग्नेटोमीटर तथा अन्य मल्टी चैनेल फिजियोग्राफिक उपकरणों द्वारा है। रसायनों के सूक्ष्म मापन के लिये भी ऐसे यन्त्र बनाये जा चुके हैं जो नैनोग्राम (एक मिलीग्राम का दस लाखवाँ हिस्सा)तक विभिन्न शरीर द्रव्यों में उनका स्तर मापने में सक्षम हैं। यह तो रही उपकरणों की चर्चा। अध्यात्म उपचारों में भी जो प्रयोग अब तक किये गये हैं वे अपने आप में समग्र नहीं कहे जा सकते। जीवन साधना से आरम्भ होने वाला अध्यात्म ध्यान धारण—समाधि की स्थिति तक अपना कलेवर फैलाये हैं। ऐसे में हठयोग की कुछ क्रियाओं व ध्यान योग के छुटपुट प्रयोगों तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता।

अध्यात्म वस्तुतः चेतना का विज्ञान है। अन्तःकरण का अपना अस्तित्व है। आस्थाओं, आकाँक्षाओं की इस जन्मस्थली का परिचय पाये बिना प्रखरता सम्पादन आत्मबल अभिवर्धन सम्भव नहीं। प्रखरता सम्पादन आत्मबल अभिवर्धन सम्भव नहीं। अन्तःकरण की उपेक्षा करके किसी भी उपचार को अध्यात्म उपचार का नाम नहीं दे सकते। इसीलिये पहले उस दृष्टि का परिष्कार करना होगा, जिसे अपनाकर शोध कार्य में प्रवृत्त हुआ जाता है। ब्रह्मवर्चस् ने प्रारम्भ में मन्त्र विज्ञान, ध्यान विज्ञान, यज्ञ विज्ञान की तीन अध्यात्म विधाओं को प्रयोग परीक्षण पर कसने का निश्चय किया। इनमें योग एवं तप दोनों का सम्मिश्रण है। कर्मकाण्ड, आस्था, अग्निहोत्र मन्त्र प्रयोग, संयम, तितिक्षा, साकार−निराकार ध्यान इन सभी के विभिन्न सम्मिश्रणों का मानव के अंतरंग व बहिरंग पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे मूल लक्ष्य बनाकर शोध कार्य को आगे बढ़ाया गया है। जैसा कि साधना विशेषाँकों में पहले ही प्रतिपादित किया जा चुका है—किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य से जब तक तल्लीनता−तन्मयता न जुड़ पाये, इसे ध्यान नहीं कहा जा सकता। ऐसे निरुद्देश्य ध्यान का न तो किसी सदुद्देश्य हेतु सुनियोजन सम्भव है और न अन्तरंग में परिवर्तन ही कर सकना शक्य है। बहिरंग में जो परिवर्तन होता है उसे ही सब कुछ नहीं माना जा सकता।

वस्तुतः व्यक्ति के हिस्से में थोड़ी-सी सामर्थ्य ही आई है। किन्तु वह जिस विराट् शक्ति भण्डार से—परब्रह्म से जुड़ा है, उसकी सामर्थ्य का कोई अन्त नहीं। कम ताकत का बल्ब कम प्रकाश देता है, पर यदि उसी स्थान पर बड़ी ताकत का बड़ा बल्ब लगा दिया जाय तो उसी विद्युत फिटिंग से अनेकों गुना प्रकाश उत्पन्न हो सकता है। परब्रह्म सत्ता के साथ आमतौर से आत्मा का सीमित एवं सामान्य सम्बन्ध ही रहता है। पर यदि व्यक्ति को अधिक परिष्कृत प्रखरता सम्पन्न बनाया जा सके तो वह अदृश्य जगत की महान देव शक्तियों से भरपूर लाभ उठा सकता है। अन्तरिक्ष में—प्रकृति जगत में भरी पदार्थ सम्पदा का भी अध्यात्म प्रयोगों के माध्यम से दोहन कर धरती को वैभव सम्पन्न बनाया जा सकता है−इन्हें ही सिद्धियों का नाम देकर महत्ता बतायी जाती रही है। पर सही अर्थों में कैसे इन्हें हस्तगत किया जाय, कैसे वह क्षमता अर्जित की जाय—यह जानकारी शास्त्रों तक ही सीमित न रख वैज्ञानिक बना दी जाय तो कई प्रकार के भ्रम जंजालों से बचा जा सकता है।

शोध के आयाम कई हैं, सीमित नहीं। आवश्यकता थी साधना उपचारों के विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण की। विज्ञान और अध्यात्म के इस समन्वय सहयोग की परिणति कितनी सुखद होगी, इसकी मात्र कल्पना ही अभी की जा सकती है। प्रयोगकाल की मध्यावधि में इससे अधिक क्या कहा जाय कि जो कुछ भी किया जा रहा है वे आगे के लिये जिसकी योजना बनायी गयी है—वह निश्चय ही अद्वितीय है। यह सब कैसे किया जा रहा है—उपलब्ध उपकरणों का आश्रय लेकर मंजिल पर कदम कैसे बढ़ रहे हैं? इसका विवेचन विस्तार से अगले अंकों में करेंगे। पाठक गण अपनी उत्सुकता को तब तक के लिए विराम दें।

(क्रमशः)


मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

विश्व के सभी तत्ववेत्ताओं ने मनुष्य की मूलभूत सत्ता को ‘सत्यं, शिवं सुन्दरम्’ से युक्त माना है। प्लेटो का कहना है कि ‘मनुष्य की अन्तरात्मा शक्तियों एवं सौंदर्य का भाण्डागार है, विकृतियाँ तो मन और भौतिक जगत के संयोग की उपज होती है।” प्रसिद्ध दार्शनिक स्पिनोजा ने मनुष्य को पूर्ण माना है। उसका कहना था कि अपनी मूलसत्ता तथा सम्बद्ध निर्देशों की विस्मृति के कारण ही वह अपूर्ण बनता है। रूसो कहता था कि सृष्टि के निर्माता ने सभी वस्तुएँ सुन्दर बनायी हैं, मनुष्य तो उसकी सर्वोत्तम कलाकृति है, पर अपने ही हाथों मनुष्य अपने सौंदर्य को नष्ट करता तथा स्वभाव को विकृत बनाता है। सन्त इमर्सन का कथन है कि “मनुष्य परमात्मा का प्रतीक−प्रतिनिधि है, पर विकृत आचरण के कारण उस गरिमा को गँवा बैठता है और अन्ततः दुःख कष्ट भोगता है।” संसार के मूर्धन्य मनः चिकित्सकों में डॉ. विलियम ब्राउन, चार्ल्स युँग, डॉ. एमील कुए आदि की विचारधारा भी लगभग इसी प्रकार की है। वे सभी मनुष्य की मूलभूत को सुन्दरतम् परिपूर्ण और शक्तियों का अजस्र स्रोत मानते हैं।

इमील कुए का मत था कि ‘मनुष्य की आत्मा में अनन्त शक्ति है। पर आत्म−विस्मृति के कारण उस सामर्थ्य का लाभ नहीं उठा पाता और असमर्थता की अनुभूति करता रहता है। आत्मसत्ता के निर्देशों का परिपालन न करने और बहिर्मुखी मन के आदेशों का गुलाम बने रहने से व्यक्तित्व की पूर्णता खण्डित होती और अंतर्द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न होती है। द्वन्द्व की हालत में आन्तरिक शक्तियों का नियोजन एक दिशा विशेष में नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में मनुष्य के भीतर दो प्रकार के व्यक्तित्व परस्पर विरोधी आचरण करने लगते हैं। अन्तरात्मा अपनी विशेषताओं के अनुरूप प्रेरणा देती है जबकि मन बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का गुलाम होता है। फलस्वरूप दोनों का सामंजस्य नहीं बन पता। फलतः मनुष्य अपनी सामर्थ्य का सही लाभ नहीं उठा पाता।

आधुनिक मनोविज्ञान को शोधों के अनुसार मानव सत्ता के भीतर परस्पर दो विरोधी व्यक्तित्वों का संघ अनेकों प्रकार के मानसिक रोगों को जन्म देता है तथा आन्तरिक शक्तियों को क्षीण करता है। मानसिक अशान्ति, क्लेश, भय, चिन्ता, आशंका, इच्छा शक्ति व दुर्बलता, आत्म−विश्वास की कमी तथा अनेकों प्रकार मानसिक एवं शारीरिक रोगों का एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के भीतर काम करने वाले दो व्यक्तित्व के बीच परस्पर सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता। यह उन दोनों के बीच परस्पर एकता बन सके तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है। मनः शास्त्री के अनुसार मनुष्य अपने बाह्य व्यक्तित्व में सैद्धांतिक दृष्टि से नैतिक, सदाचारी और महान हो सकता पर भीतरी व्यक्तित्व में अनुदार, अनैतिक क्रूर और व्यभिचारी बने रहने से अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न होता है। यह हर प्रकार के मानसिक असन्तुलनों का कारण बनता है

अध्यात्म तत्व वेत्ताओं के अनुसार मूलतः अन्तःकरण की संरचना दैवी तत्वों से हुई है। स्नेह, सौजन्य, सद्भाव जैसी क्रम को श्रेष्ठ बनाने तथा महानता के पथ अग्रसर होने की ही अदृश्य प्रेरणाएँ उठा करती सामान्यतया अन्तःकरण की देवी चेतना दुष्प्रवृत्तियों जीवन सत्ता में प्रवेश करने की छूट नहीं देना चाहती, जब इस क्षेत्र में निकृष्टता प्रविष्ट करती है तो उस सहज प्रतिक्रिया होती है। दोनों के बीच संघर्ष छिड़ा है। यही देवासुर संग्राम है जो मनुष्य के अन्तरंग चलता रहता है। मनोवैज्ञानिकों ने इसे ही अंतर्द्वंद्वरूप में निरूपित किया है। संघर्ष की प्रतिक्रियाएँ सीमित स्थान तक नहीं रहती हैं—समीपवर्ती क्षेत्र को भी प्रभावित करती हैं। जहाँ युद्ध होते हैं—जिनके बीच डडडड जाते हैं प्रभाव उन्हीं तक सीमित नहीं रहता। अर्चना आकाश सामान्य भी हानि उठाता है। द्वंद्व तो भीतर चलता है पर उसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया दिखायी पड़ती है। मन और तन दोनों ही क्षेत्रों से विकृतियाँ शारीरिक, मानसिक आधि−व्याधियों के रूप में फूट–फूटकर निकलती है। दुष्प्रवृत्तियां आत्मसत्ता पर आधिपत्य जमाने के लिए जी–जान से प्रयत्न करती है। अन्तरात्मा को यह दबाव असह्य होता है। वह विरोध पर अड़ी रहती है, फलस्वरूप मनुष्य के अन्तराल में संघर्ष चलता है जिसके दुष्परिणाम शोक सन्तापों के रूप में, रोग−क्लेशों के रूप में प्रस्तुत होते हैं।

मनःशास्त्री इस स्थिति को ‘डबल परसनाल्टी’—दुहरा व्यक्तित्व कहते हैं। एक शरीर में दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों का होना शरीर शास्त्रियों के अनुसार भी हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होता है तथा अनेकों प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न करता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई शोधों से भी यह निष्कर्ष निकला है कि एक शरीर में दो व्यक्तित्व का होना मनुष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। श्री एस. जे. डायमण्ड नामक विद्वान एवं न्यूरोसाइकोलॉजी विशेषज्ञ ने एक पुस्तक लिखी है—’इन्ट्रोड्यु सिंक− न्यूरोसाइकोलॉजी।’ पुस्तक में बताया गया है कि किन्हीं−किन्हीं व्यक्तियों के मस्तिष्क में व्यक्तित्व की दो परतें विकसित हो जाती है तथा स्वतन्त्र रूप से दो मस्तिष्कों के रूप में अलग−अलग व्यक्तित्वों का परिचय देती हुई काम करने लगती है। सामान्यतया मनुष्य के दृष्टितन्त्र की कार्यप्रणाली दोनों सेरिब्रल−हेमीस्फियर के संयुक्त प्रयास से काम करती है, पर किन्हीं− किन्हीं में दाहिने और बायें सेरिब्रल हेमीस्फियर्स में परस्पर तालमेल नहीं बिठा पाता और वे स्वतन्त्र तथा परस्पर एक−दूसरे के विरोधी आचरण का परिचय देने लगते हैं लेखक के अनुसार ऐसे व्यक्तित्वों में सामान्य मनुष्य की तरह एक नहीं, अपितु दो भिन्न−भिन्न दृश्य जगतों का अनुभव होता है।

‘साइन्टिफिक अमेरिकन’ पत्रिका के नवम्बर 1981 अंक में प्रकाशित एक शोध प्रबन्ध में डॉ. जे. शास्त्रियों सका मत है कि मस्तिष्क के दोनों सेरिब्रल हेमीस्फियर कभी−कभी अपनी−अपनी दिशा के अंगों को परस्पर विरोधी निर्देश भी देने लगते है। उदाहरणार्थ एक रोगी के परीक्षण में उन्होंने पाया कि उसका बांया हाथ जब भी गाडन का फीता बाँधने का प्रयत्न करता, दाहिना उसी समय उसे खोलने का प्रयत्न करने लगता। इसी प्रकार एक दूसरा रोगी जब भी घास काटने की मशीन की हैंडिल पर एक हाथ रखता। एक−हाथ उसे आगे चलाता तो दूसरा हाथ उसे पीछे की ओर उल्टी दिशा में धकेलने लगता। ऐसी स्थिति में रोगी की मानसिक उत्तेजना बढ़ जाती तथा वह अव्यावहारिक आचरण करने लगता। इसी तरह एक तीसरा रोगी जब पढ़ने के लिए बाँये हाथ से पन्ने उलटता तो दांया हाथ बार−बार उसे पलट देता था। इस कठिनाई को दूर करने के लिए वह दायें हाथ को नीचे दबाकर उसी के ऊपर बैठ जाता। ऐसी हालत में प्रायः उसका स्वभाव उग्र हो जाता और वह पागलों जैसे व्यवहार करने लगता था। एक अन्य परीक्षण में देखा गया कि एक रुग्ण लड़की जब कभी भी आवश्यकता से अधिक सोती थी अथवा टेलीविजन में अवाँछनीय दृश्य देखती थी तो अनायास ही उसका बांया हाथ उसकी गाल पर चपत लगाने लगता था। लड़की का कहना था कि जागृतावस्था में वह इस कृत्य को रोकने का प्रयास करती पर असफल रहती थी।

प्रख्यात मनःशास्त्री प्रिंस मार्टिन ने अपनी मनोविज्ञान की एक पुस्तक में श्रीमती व्यूसाम्प नामक एक ऐसी महिला का उल्लेख किया है जिसके भीतर एक साथ दो व्यक्तित्व कहते थे। जिसमें एक का स्वभाव सन्त जैसा था जबकि दूसरे का शैतान जैसा। दोनों का व्यवहार परस्पर विरोधी होने से लड़की मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सदा रुग्ण रहती थी। उसके जीवन पर कभी एक व्यक्तित्व हावी रहता तो कभी दूसरा। उदाहरण के लिए अपने नियत स्थान पर सन्त स्वभाव का व्यक्तित्व यदि कोई पुस्तक रख देता था तो दूसरा थोड़ी देर बाद उठाकर किसी ऐसे स्थान पर छुपाकर रख देता था जिसे ढूंढ़ने में भी कठिनाई होती थी।


अपनों से अपनी बात - जागृत आत्माएँ भाव−भरे अनुदान प्रस्तुत करें

प्रज्ञा परिवार उत्कृष्टता में रुचि लेने वाले विवेकवान,दूरदर्शिता को प्रश्रय देने वाले और आदर्शों के लिये सक्रियता अपनाने वाले ऐसे लोगों का समुदाय है जिनकी प्रकृति को दैवी कहा जा सकता है। जब−जब भी महत्वपूर्ण समय आते हैं, ऐसे ही परिकरों की खोजबीन की जाती है और उसमें से उपयोगी तत्व ढूंढ़ निकाले जाते हैं। मोती समुद्र में हर जगह नहीं मिलते। उनके कुछ विशेष क्षेत्र होते हैं। बहुमूल्य धातुओं की खदानें एवं तेल के कुएँ कहीं−कहीं ही मिलते हैं। सन्त अलख जगाने तो गली मुहल्लों में सर्वत्र जाते हैं। पर द्वार उन्हीं का खटखटाते हैं, जहाँ से कुछ सहानुभूतिपूर्ण उत्तर की अपेक्षा हो।

अब तो परिवर्तन की प्रचण्ड बेला आ पहुँची। इन दिनों बड़े कदम उठाने हैं, बड़े उत्तरदायित्व सौंपने हैं एवं इसके लिये भारी—भरकम व्यक्तित्व ढूंढ़ने या बनाने हैं। इन दिनों महाकाल द्वारा ऐसे ही व्यक्तियों की खोजबीन चल रहीं है जिनमें महानता को अवधारणा करने की पात्रता, प्रामाणिकता और सुसंस्कारिता के तत्व उपयुक्त मात्रा में विद्यमान हों। व्यक्तित्व कुछ ऐसे विनिर्मित होने हैं जो न केवल स्वयं पार हों, वरन् अपनी डोंगी पर लादकर असंख्यों को पार कर सकें। प्रज्ञा परिवार ऐसी ही प्रसुप्त, पर व्यक्तित्व सम्पन्न आत्माओं से सुसम्पन्न हैं, पर अब इन वरिष्ठों को अपनी बाल−क्रीड़ा समाप्त करके वयस्कता के साथ−साथ कन्धों पर आने वाली जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए। आह्वान आमन्त्रण के स्वर प्रस्तुत बसन्त पर्व पर विगत दो वर्षों की तुलना में अधिक प्रखर हुए हैं। समझाने−बुझाने की प्रक्रिया झकझोरने—चिकौटी काटने से लेकर जहां आवश्यकता थी, कान पकड़ने तक आ पहुँची है। इतिहास में ऐसे अनेकों व्यक्तियों, अवसरों एवं घटनाओं का उल्लेख है जिनमें स्वेच्छाक्रम से थोपी गयी प्रेरणा ने अधिक बड़ी भूमिका निभाई है। लगता है ऐसा ही कुछ फिर से होने जा रहा है।

प्रज्ञा, परिजनों में से एक हजार ऐसों को समग्र समय के लिये आमन्त्रित किया गया है जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हल्के हैं और जो अपनी वरिष्ठता एवं प्रतिभा लोक मानस को मोड़ने-मरोड़ने में समर्थ हो सकते हैं। युग सृजन के लिये न तो पलायनवादी चाहिए न आलसी−न प्रतिभा रहित ही। वे ऐसे होने चाहिए जा अपनी समर्थता और दूसरों की महानता दोनों कसौटियों पर खरे उतर सकें। उन्हें जमकर मन लगाना और स्वेद बहाना हैं। चंचल चित्त लोगों को नहीं, इन दिनों अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए उन्हें बुलाया गया है जो अंगद की तरह दुर्धर्ष रावण के समझ अपना पैर गाड़ सकें और भगीरथ जैसा करने−मरने का व्रत ले सकें।

उन्हें क्या करना होगा, उसका निर्णय सबके लिए एक नहीं हो सकता। व्यक्ति की योग्यता और मिशन की आवश्यकता का तालमेल बिठाते हुए यह निर्णय किया जा सकेगा कि किसे क्या कार्य सुपुर्द किया जाय। हर लोक सेवी को बिना किसी काम को छोटा−बड़ा अनुभव किए वैसा ही निरभिमानी,कर्त्तव्यनिष्ठ होना चाहिए जैसा कि एक आदर्श स्वयंसेवक को होना चाहिए। गाँधी जी के आश्रम में टट्टी साफ करने का काम बिना हिचक के करना पड़ता था। ऊँचे कामों की माँग करने वाले और निम्न स्तर के समझे जाने वाले कामों में अरुचि दिखाने वालों को अपनी महत्वाकांक्षा अन्यत्र पूरी करना चाहिए। लोक सेवा का क्षेत्र उनके लिए है ही नहीं। मान और पद के लिये जिस प्रकार राजनैतिक क्षेत्रों में आए दिन विग्रह खड़े होते रहते हैं, वैसी परम्परा से नव सृजन का क्षेत्र तो बचाया ही जाना चाहिए। जिन

एक हजार का आमन्त्रण किया जा रहा है उनका स्तर ऐसा नहीं चाहिए जिसे सुधारने के लिए अनगढ़ बन्दरों को लकड़ी के बल पर सिखाने की व्यवस्था संचालकों को करनी पड़े। इन दिनों तो सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जो हाथ बँटा सके और बिगड़ी बना सकें। ऐसी प्रकृति प्रायः जन्मजात होती है। सिखाने का काम तो हीरे की खराद कर चमका भर देने का है। कौए को कबूतर में कैसे बदला जाय?

युग निर्माण मिशन को आगामी दिनों विश्व की महती समस्याओं को सुलझाने के लिए व्यापक वातावरण बनाना है—नव सृजन की प्रचण्ड चेतना उत्पन्न करनी है। प्रज्ञा संस्थानों के माध्यम से शक्ति संचय की प्रारम्भिक प्रक्रिया पंच सूत्री योजना के रूप में आरम्भ की गयी है। इसे कलम पकड़ने, वर्णमाला सीखने जैसी प्राथमिक आवश्यकता घोषित किया गया है। जो इतने सरल प्रयोजनों को भी हाथ में न ले सकेंगे, उनके कंधों पर बड़े उत्तरदायित्व सौंपने की व्यवस्था कैसे बनेगी?

कुछ ही दिनों बाद साक्षरता संवर्धन, वृक्षारोपण, सृजन प्रयोजनों के लिये अंशदान, विवाहोन्माद जैसी कुरीतियों का उन्मूलन, शिक्षा व्यवसाय का उच्छेदन, नशेबाजी पर कुठाराघात, पर्दा प्रथा और जाति गत ऊँच−नीच की मान्यता की अन्त्येष्टि, आलस्य−प्रमाद को अपराधों के हेयवर्ग में सम्मिलित करना मुफ्तखोरी और हरामखोरी को चोरी−डकैती स्तर की भर्त्सना से लाद देना, प्रजनन के सीमा बन्धन कड़े करना जैसे अनेक कार्यों को जन सहयोग एवं शासन व्यवस्था के माध्यम से सम्पन्न कराने के लिए विशालकाय काम हाथ में लिये जाने और उन्हें पूरा कर दिखाने के लिये हर स्तर के साधन जुटाने होंगे।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श को क्रिया रूप देने और आत्मवत् सर्वभूतेषु, की स्नेह−सम्वेदना जन−जन के मन−मन में लगाने की युगान्तरीय चेतना का सरंजाम जुटाने के लिए कि तने प्रकार के, कितने स्थानों पर, कितने स्तर के ढांचे खड़े करने होंगे। इसका आज तो संकेत ही किया जा सकता है। समय आने पर वे सभी कार्य प्रायः उसी स्तर पर चल पड़ेंगे जिस प्रकार कि सरकार पंचवर्षीय योजनाएँ हाथ में लेती है और महायुद्ध के दिनों में समस्त साधनों को सुरक्षा के मोर्चे पर जुटाया जाता है। जिन्होंने भी कभी बड़े काम हाथ में लिए है और पूरे कराये हैं, वे ही जानते हैं कि ‘सृजन शब्द की व्याख्या, विवेचना, योजना, तैयारी किस स्तर की होती है और उसे कितनी क्षमता सम्पन्न जनशक्ति तथा कितने प्रचार साधनों द्वारा सम्भव किया जाता है।

एक राष्ट्र, एक भाषा, एक नीति, एक व्यवस्था के एकता सूत्र में 450 करोड़ों को बाँध देना, उनकी विषमतावादी उलटी मान्यताओं को उलट कर सीधी कर देना ऐसा कार्य है जिसे आज की स्थिति में असम्भव ही कहा जा सकता है ऐसी दिशा में निराशा में आशा की एक ही किरण ज्योतिर्मान होती दिखाई देती है कि सृष्टा ने समय−समय पर असंतुलन पर निभाई है। सृष्टि महान है। सृष्टा और भी महान है। फिर उसका संकल्प तो इतना सक्षम है कि राई को पर्वत बनते देर नहीं लगती।

प्रज्ञा परिवार से एक हजार जागृतात्माओं की सृजन प्रयोजनों के लिए माँग की गयी है। उनकी पूर्ति इस देव समुदाय में से सहज ही हो जाने की आशा है। इन्हें आकर तत्काल जो कार्य हाथ में लेने हैं, उनमें तीन प्रमुख हैं—(1)प्रज्ञा संस्थानों के समीपवर्ती क्षेत्रों में लोक शिक्षण आयोजनों की प्रव्रज्या(2)शाँतिकुञ्ज में प्रशिक्षण की बहुमुखी व्यवस्था (3) साहित्य सृजन में सहयोग। ये तीनों ही कार्य ऐसे हैं जिनके लिए पूरी तरह से स्वयं को झंझटों से मुक्त कर यहाँ आना होगा। सुविधाओं की दृष्टि से कुछ कमी तो यहाँ रहेगी ही क्योंकि यह ऋषि आश्रम है, होटल नहीं। जो पूरा समय नहीं दे सकते, वे घर रहकर भी समीपवर्ती क्षेत्र में सेवा साधना का नियोजन कर अपना योगदान देते रह सकते हैं। जो कुछ भी समय नहीं दे सकते हैं। जो कर रहे हैं, उनके लिए निर्वाह के साधन जुटा देना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आशा है महाकाल का यह आमन्त्रण अनसुना उपेक्षित नहीं रहेगा।


प्रज्ञा साहित्य को अन्य भाषाई क्षेत्रों में पहुँचाना युग की आवश्यकता

इन दिनों युग सन्धि केक प्रथम चरण में युग मनीषियों द्वारा लोकमानस के परिशोधन—परिष्कार का महापुरश्चरण संयुक्त रूप से चलाया जा रहा है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि काँटे से काँटा निकलता है विष को विष से मारा जाता है और घूँसे का जवाब घूँसे से दिया जाता है। प्रचालनों की अवाँछनीयता का उन्मूलन प्रतिपक्षी प्रचलन उत्पन्न करके ही सम्भव है। इन तथ्यों को दृष्टिगत रख नवयुग का शिलान्यास चिन्तन में ‘शालीनता’ भरने की सुविस्तृत योजना के साथ किया गया है। वही अगले दिनों आदर्श चरित्र बनकर उभरेगी। चिन्तन और चरित्र के समन्वय से ही भली बुरी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे प्रभावित होकर लोग पतन−पराभव गर्त्त में गिरते, रोते–कल्पते मौत के दिन पूरे करते है अथवा उमंगों से उछलते, सुख−सन्तोष व्यक्त करते प्रगति पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होते है। अगले दिन प्रज्ञा युग के होंगे। सृष्टा की युगान्तरीय चेतना ‘महाप्रज्ञा’ बनकर अवतारी प्रयोजन पूर्ण करेगी। परिवर्तन की आधारभूत पृष्ठभूमि यही है।

इस अनुष्ठान के तीन विनियोग हैं [1] लेखनी [2] वाणी [3] क्रिया। अदृश्य क्षेत्र के भाव परिवर्तन में लेखनी और वाणी द्वारा प्रतिपादित विचारधारा अपना चमत्कार दिखायी है। मस्तिष्क को ज्ञानेन्द्रियों के दृश्य माध्यम से प्रभावित करने के लिए एक रचनात्मक घटना क्रम प्रस्तुत करने होते है जिनसे उत्साह बढ़े, साहस उभरे और अनुकरण का प्रवाह चल पड़े। दृश्य रचनात्मक कार्यों की भूमिका निभाने में चिन्तन क्षेत्र में लेखनी और वाणी के माध्यम से अनुकूलता उत्पन्न करती है। वही किया भी जा रहा है। प्रज्ञा अभियान में प्राथमिकता धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण को दी गई है। उसी का दूसरा पक्ष रचनात्मक कार्यक्रमों का स्वरूप बनाना और गति देना है। जिन्हें मिशन की गतिविधियों से निकट का संपर्क है वे जानते है कि युग परिवर्तन के सूत्र संचालक किस प्रकार लेखनी की गंगा, वाणी की यमुना और कार्यक्रमों की सरस्वती का त्रिवेणी संगम बनाने के लिए भागीरथी और दधिचि जैसा पुरुषार्थ करने में संलग्न है।

इन पंक्ति यों में लेखनी वाले प्रथम चरण की चर्चा हो रही है। परिवर्तन प्रयासों में अब तक की प्रगति का पर्यवेक्षण करने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इतने स्वल्प समय में इतना बड़ा काम जिन आधारों के सहारे सम्भव हो सका लेखनी की भूमिका को प्रधान मानने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। प्रज्ञा साहित्य भले ही प्रचार पत्रकों में छपा हो या ग्रंथों के बड़े आकार में उसमें भरी हुई ज्योति ज्वाला ने जन−जन के मन−मन को हुलसाया है और सृजन शिल्पियों के रूप में जागृत आत्माओं का अग्रदूतों का एक बड़ा समुदाय परिवर्तन के लिए की गई मोर्चे बन्दी में जुझारू योद्धाओं की तरह शस्त्र पाणि किया है। अब उस प्रयास को समय की बढ़ती हुई आवश्यकताओं के अनुरूप और भी बड़ा आकर और भी प्रचण्ड प्रवाह देने का निश्चय किया गया है। मनुष्य जीवन बहुमुखी है। चिन्तन की अनेकानेक धाराएं है। समस्याओं और के अगणित स्वरूप है इन सभी में घुसी हुई विकृतियों का समाधान अभीष्ट है। अतएव युग चेतना भी बहुमुखी होगी और चिन्तन के हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे जन−जन तक पहुँचाने का व्यापक प्रयास करना होगा। जिनके कन्धों में सूत्र संचालन का उत्तरदायित्व है, वे उस प्रयास में प्राणपण से निरत भी हैं। इस क्षेत्र की उज्ज्वल सम्भावनाओं के सम्बन्ध में विज्ञ समुदाय पूरी तरह आशावान है।

जागृत लोक−मानस की भूख बुझाने के लिए इन दिनों प्रज्ञा साहित्य उसी गति से लिखा जा रहा है जिससे कि व्यास ने एकांत गुफा में बैठकर अठारह पुराणों और अठारह उपपुराणों का सृजन एकाकी प्रयासों से संपन्न किया था और उस समय की बौद्धिक आवश्यकता को समाधान दिया था। यह एक पक्ष हुआ। उन दिनों विश्व भाषा संस्कृत थी। इसलिए किसी लेखन को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। प्रेस न होने पर भी वह कार्य हाथ से लिखकर भी सम्पन्न कर लिया जाता था। पर आज एक विशेष कठिनाई है। भाषाओं के अपने−अपने सामन्ती ठिकाने और किले है। जिनमें प्रवेश पाने के लिए किसी न किसी प्रकार अवरुद्ध लौह कपाटों को खोलना ही पड़ेगा। बन्द दरवाजों के बाहर खड़े रहकर गुहार मचाने, सिर फोड़ने से काम नहीं चलेगा। प्रवेश पाये बिना कोई रास्ता नहीं। अभी प्रज्ञा साहित्य प्रधानतया हिन्दी क्षेत्र तक ही सीमित है। जबकि भारत में ही चौदह भाषाएँ है। संसार भर में उनकी संख्या 450 से अधिक है। अपने देश को तो प्रथम चरण में ही सँभालना पड़ेगा। अस्तु प्रज्ञा साहित्य को युग सन्धि के प्रथम पाँच वर्षा में ही इन सभी भाषाई क्षेत्र में प्रवेश दिलाने का पथ प्रशस्त करना है। इसके बिना देश की एक तिहाई हिन्दी भाषी जनता तक ही युग आलोक सीमाबद्ध होकर रह जायगा। यह बन्धन कटने ही चाहिए और व्यापकता का पथ प्रशस्त होना ही चाहिए।

इस संदर्भ में दो कठिनाइयाँ हैं—[1] देश की भाषाओं में अनुवाद करने के लिए श्रम [2] उनके प्रकाशन के लिए धन। प्रज्ञा अभियान के वर्तमान साधनों में इन दोनों की ही कमी है। न तो शान्ति−कुञ्ज में ऐसे शब्द एवं प्रवाह में अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद कर सकें और न उतनी पूँजी ही जिससे अब तक के हिन्दी प्रकाशन के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में बड़े परिमाण में प्रकाशन सम्भव हो सके यह दोनों ही आवश्यकताएँ कितनी महत्वपूर्ण है। हैं यदि इस तथ्य को हृदयंगम किया जा सके तो उसका परिणाम एक शब्द में आश्चर्यजनक हो सकता है। जो कार्य हिन्दी क्षेत्र में पिछले तीस वर्षा में सका वह समूचे भारत की समस्त भाषाओं में एक वर्ष के भीतर ही हो सकता है। अनुवाद के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का श्रम और प्रकाशन के लिए आर्थिक साधनों को जुटा लेने भर से ऐसा कुछ हो सकता है जिसकी कल्पना भर से बाँछे खिलती और रोमाञ्च उठते है।

समय ही बतायेगा कि यह आवश्यकताएं किस प्रकार पूरी हुई। इन पंक्ति यों का सीमित उद्देश्य है। अखण्ड−ज्योति परिवार में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें गुजराती, मराठी, बँगला, उड़िया उर्दू, तमिल, तेलुगु, अँग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान है। जिनमें अनुवाद की ऐसी साहित्यिक क्षमता है, जो हिन्दी अभिव्यक्तियों को उसके प्रवाह की रक्षा करते हुए सही स्वरूप में अनुवादित कर सकते हों ऐसे लोग पूरे या अधूरे समय शान्ति−कुञ्ज में रहकर अनुवाद कार्य में सहायता कर सकते है। यह कार्य घर रह कर भी हो सकता है। न्यूनतम दो घण्टे नित्य एवं साप्ताहिक छुट्टी का आधा दिन इन दिनों सभी प्रज्ञापुत्र दे रहे हैं। उपरोक्त सेवा कर सकने में समर्थ व्यक्ति अपने घरों पर रहकर भी यह कार्य कर सकते है। यह कार्य वैतनिक आधार पर नहीं सभी सेवा भाव से करते हैं। जिनके लिए यह सम्भव हो वे पत्र व्यवहार कर लें। आवश्यकता है कि अनुवाद कार्य तो अभी से आरम्भ कर दिया जाय। इसमें मात्र श्रम का नियोजन है जिसे भावना रहने पर व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी युग धर्म की गरिमा समझते हुए बिना किसी कठिनाई के दे सकता है। इन पंक्ति यों में आह्वान उन्हीं लोगों का है। इससे प्रथम चरण तो उठ ही सकेगा। अनुवाद संग्रह रहने पर प्रकाशन की सुविधा होते ही उस उपक्रम को चला देने में न तो कठिनाई पड़ेगी न समय लगेगा। अनुवाद समय और श्रमसाध्य है। उसमें परामर्श; मार्गदर्शन संशोधन आदि अनेक प्रकार की काट छाँट करनी पड़ती है, किन्तु प्रकाशन में वैसी कठिनाई नहीं है। साधन होते ही अनेकों प्रेसों में पुस्तकें छपने दे देने पर इतना कार्य कुछ महीनों में ही पूरा हो सकता है जितना कि युग निर्माण योजना के अंतर्गत पिछले तीस वर्षा से सीमित साधनों की कठिनाई के कारण धीरे−धीरे होता रहा है।

जो उपरोक्त आवश्यकता का अनुभव करते हैं, जिन्हें उपरोक्त भाषाओं में अच्छी साहित्यिक प्रतिभा प्राप्त हैं, जिन्हें अपनी क्षमता का उल्लेख करते हुए यह बताने का अनुग्रह करें कि उनका समयदान किस प्रकार, कितनी मात्रा में इस पुण्य प्रयोजन के लिए उपलब्ध हो सकता है। अनुवाद शृंखला को इन्हीं दिनों अविलम्ब अग्रसर करने की आवश्यकता अनुभव की गई है। आकाश परस्पर विरोधी व्यवहार डडडड डडडड की पुष्टि की।

मनोविज्ञानियों ने व्यक्तित्वों के अन्तर्द्वन्द्व को समस्त मनोविकारों एवं मनोरोगों की जड़ माना है। आधुनिक मनोविज्ञान व्यक्तित्व की परतों के अध्ययन, विश्लेषण तक सीमित है। अन्तर्द्वन्द्वों की समाप्ति किस प्रकार हो, इसके लिए इतना कहकर चुप हो जाता है कि परस्पर दो व्यक्तित्वों के रूप में विघटित मानवी सत्ता में ऐक्य स्थापित किया जाय तभी द्वन्द्वों से छुटकारा पा सकना सम्भव है। दूसरा व्यक्तित्व क्यों विकसित हो जाता है जो मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियों में—अनैतिक गतिविधियों में निरत करता है। इस दिव्य द्वन्द्वात्मक स्थिति से छुटकारे के लिए, कोई ठोस उपाय मनोविज्ञान नहीं बताता। अध्यात्म मनोविज्ञान की मान्यताएँ इस गुत्थी को सुलझाने एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहयोग देती हैं।

अध्यात्म मनोविज्ञान का कहना है कि मानवी अन्तः−करण की संरचना दैवी तत्वों से मिलकर हुई है। अन्तः−करण अन्तरात्मा का क्रीड़ा क्षेत्र है। यहाँ से सदा सत्प्रेरणाएँ उभरती रहती हैं। अन्तःकरण की सद्प्रेरणाओं की उपेक्षा−अवहेलना करने तथा दुष्कृत्यों में निरत होने से अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति उत्पन्न होती तथा मनुष्य को त्रास देती है। मनुष्य की मूलभूत सत्ता दैवी तत्वों से युक्त है तो क्यों कर कोई दुष्कर्मों की ओर आकृष्ट होता है? अध्यात्म विज्ञानी इसका कारण कर्मों के संस्कार को मानते हैं। जन्म−जन्मान्तरों के पशुवत् संस्कार मानवी चेतना पर छाये रहते हैं। उनकी जड़े मन की अचेतन परतों में गहराई तक जमी रहती हैं।

स्थिति से अन्त में सद्प्रेरणाएं उभरती डडड हैं, पर अभ्यास में पूर्वकृत कुकृत्यों के कुसंस्कार बने रहने से कोई विशेष प्रतिफल नहीं दिखा पाती। अन्तःकरण की दैवी सत्ता पर कुसंस्कार हावी रहते और मनुष्य को श्रेष्ठता के—महानता के मार्ग पर बढ़ने में भारी अवरोध खड़ा करते हैं।

अधिकाँश व्यक्तियों को दुष्प्रवृत्तियों से उबरने की इच्छा होती है। इसके लिए प्रयास भी करते हैं, पर आँधी, तूफान की भाँति हठीले कुसंस्कार अपने प्रवाह में बहाले जाते हैं और अभीष्ट इच्छा मात्र एक कल्पना बनकर रह जाती है। दुष्प्रवृत्तियों से जकड़े जाल−जंजाल से निकलते नहीं बनता। मनःचिकित्सा शास्त्र एवं आधुनिक मनोविज्ञान इस असमंजस की स्थिति से उबरने का कोई ठोस उपाय नहीं सुझाता। अध्यात्म तत्ववेत्ताओं ने इसके लिए तप−तितिक्षा की प्रायश्चित प्रक्रिया को एक समग्र और समर्थ उपचार माना हैं। मानसिक द्वन्द्वों से उबरने के लिए पूर्व में किये पापों का जहाँ समर्थ मार्गदर्शक के समक्ष प्रकटीकरण आवश्यक है वही यह भी जरूरी है कि जो किया गया है उस भूल के लिए सहर्ष प्रायश्चित्त भी किया जाय। प्रायश्चित्त द्वारा ही दुहरे व्यक्तित्व से बन आयी मनोग्रन्थियों, का उन्मूलन सम्भव है। साथ ही अन्तःकरण की सत्प्रेरणाओं का परिपालन कर सकना सम्भव है। इन प्रेरणाओं के अनुरूप मन का भी चिन्तन चलने लगे तो व्यक्तित्व की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करना सुगम बन जाता है। अन्तरात्मा अपनी निश्छल तथा श्रेष्ठ विशेषताओं के रूप में व्यक्तित्व में परिलक्षित होने लगे, यही पूर्णता की स्थिति है।


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योग साधना में कई प्रकार की ध्यान धारणाएँ− प्राणायाम, बंध, मुद्रा, व्रत, उपवास, तितिक्षा आदि का अभ्यास करना पड़ता है और कराया जाता है। यह टानिक सेवन एवं चिकित्सा उपचार की तरह विशेष प्रयोग है। यह फलप्रद भी है और सहयोगी सहायक भी। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि कुछ समय तक कुछ क्रिया−प्रक्रिया करने भर से आत्मिकी की प्रयोगशाला की तरह कार्य−सत्ता को विकसित परिष्कृत किया जा सकेगा। इसके लिये चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समावेश करना होता हैं।

*समाप्त*