उत्तिष्ठ,जागृत प्राप्य वरानिबोधत्त

हनुमान आरम्भ में सामान्य बानर थे। सुग्रीव के साधारण सेवक। वे अपने मालिक की श्रमजन्य सारी गृहस्थी को वापस दिला सकना उनके बलबूते सम्पदा की बात नहीं थी। राम–लक्ष्मण जब ऋष्यूक पर पहुँचे तो सुग्रीव को आशंका यह हुई कि यह कोई बालि के भेजे हुए आक्रमणकारी हैं। भेद लेने के लिए हनुमान को भेजा गया। सुग्रीव की तरह हनुमान भी अपनी प्राण रक्षा के सम्बन्ध में भयभीत थे। उन्होंने आक्रमणकारी होने पर प्रथम आघात से बचने की दृष्टि से वेश बदलने की छल नीति अपनाई। ब्राह्मण परिधान पहने और नमन प्रणपात करते हुए उनका परिचय पूछने लगे।

इस प्रसंग में हनुमान में जन्मजात विशिष्टता होने का कहीं अता−पता नहीं लगता। यदि वैसा कुछ रहा होता तो अपने मालिक की धनधरणी इस प्रकार अपहरण न सहते। प्रतिकार करते। इसी प्रकार भेद लेने के लिए न तो ब्राह्मण वेश बनाने का छल करते और न फिर उस वेश की मर्यादा गिराकर नमन प्रणपात अपनी ओर से आरम्भ करते।

इसके बाद भी वे सुग्रीव के साथ हुए राम के समझौते के आधार पर सीता को खोजने के लिए एक गुप्त चर के रूप में ही अपनी छोटी मण्डली समेत बाहर भेजे गये थे। उसी कार्य में निरत भी रहे। यह साधारण भूमिका ही थी। यहाँ तक उनकी महानता का परिचय नहीं मिलता। बात आगे तक बढ़ जाती है। सीता खोजने के संदर्भ में समुद्र पार करके लंका पहुँचने का प्रसंग सामने आता है। समुद्र पार करना इसके लिए आवश्यक था। हनुमान मण्डली में बलिष्ठ थे। उनसे पूछा गया तो वे चुप बैठे रहे। अपने पराक्रम पर विश्वस्त नहीं थे। वे इतना बड़ा काम कैसे कर सकेंगे, यह आत्म विश्वास था नहीं। फिर जान किसे प्यारी कौन डाले? आदर्शवाद के नाम पर अपनी जान कौन गँवाए? हनुमान को समुद्र तैरने या लाँघने में कोई उत्साह नहीं उठा और वे भी दूसरों की तरह चुपचाप, सिर नवाये, मुँह लटकाये बैठे रहे।

उदासी और हीनता को तोड़ते हुए बूढ़े जामवन्त ने उन्हें ‘आत्मबोध’ कराया। कहा−उनमें सामर्थ्य की कमी नहीं,मात्र आत्म विश्वास घट रहा है। वे महान कार्य कर सकते हैं पर इसके लिए उन्हें आत्मविश्वास उभारना होगा। अपना स्वरूप समझना होगा। ऐसा बन पड़े तो आदर्शों के ऊपर सामान्य सुविधाओं को निछावर करने में कुछ भी कठिनाई नहीं रहेगी वरन् यह एक लाभदायक सौदा प्रतीत होगा। ऐसा ही परामर्श अपने शब्दों में जामवंत ने हनुमान को दिया। व्यामोह के कुचक्र में फँसे हुए−भव−बन्धनों में जकड़े हुए अन्य प्राणियों की तरह हनुमान की मनःस्थिति भी वैसी बनी रहती तो वे जामवंत के परामर्श पर ध्यान नहीं देते और संपर्क क्षेत्र के अन्यान्य लोगों की तरह अपने मतलब से मतलब रखने की नीति पर ही चलते रहते। किन्तु आत्मबोध की शक्ति सामर्थ्य के भी कुछ चमत्कार हैं। वह जिस सौभाग्यशाली के हाथ लगता है वह ‘अतुलित बलधाँम रामदूतं नमामि’ का श्रेयाधिकारी बनता है। हुआ भी ऐसा ही। जामवन्त ने हनुमान को आत्मबोध करा दिया। उनका वास्तविक स्वरूप समझा सकने में सफलता प्राप्त करली। फलतः वे व्यामोह मुक्त हुए। तथ्य तक पहुँचे, जीवन की सार्थकता आदर्शों के परिपालन में अनुभव करने लगे। साहस उभरा और हेय हीनता का मकड़ जंजाल टूट गया। वे आदर्शों के लिए जोखिम उठाने कुछ क्षणों तक घाटा समझते हैं, पर अब बदली स्थिति में लाभ अनुभव करने लगे और रामकाज करने के लिए आदर्शों पर अपने निछावर करने के लिए कटिबद्ध हो गये यही है हनुमान काया−कल्प। इसी क्षण से वे बजरंगी बन गये। समुद्र छलाँगने। पर्वत उखाड़ने, भारत के तीर से भी अधिक वेगवान सिद्ध होने, दस लाख असुरों के बीच अकेले जा जूझने, सोने की लंका का जलाने में समर्थ बन सके। लंका विजय− सीता की वापसी से लेकर रामराज्य की स्थापना जैसे महान कार्यों में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। यह सब कैसे सम्भव हुआ? आरम्भ के सामान्य हनुमान और बाद में महान हनुमान में जो अद्भुत परिवर्तन दीखता है वह कैसे बन पड़ा? इसके लिए किसी चमत्कार वरदान को खोजने की आवश्यकता नहीं। आत्म सत्ता का स्वरूप, लक्ष्य, सदुपयोग समझा जा सके तो दृष्टिकोण बदलेगा ही। फिर अन्धी भेड़ों का अनुमान करते हुए गर्त में गिरते चलने बादले समुदाय में अलग हटकर अपना नया रास्ता बनाना होगा और उस पर बिना साथियों को सहयोग खोजे एक की चल पड़ने का साहस जुटाना पड़ेगा। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि कृतकृत्य होने वाला भाग्योदय हो चला, तमिस्रा, मोह निद्रा के बीच ब्रह्ममुहूर्त आया और अरुणोदय मुस्काया।

हनुमान की उपरोक्त गाथा अखण्ड ज्योति के प्रिय परिजनों को इसलिए सुनाई जा रही है कि वे उस प्रसंग के साथ अपना तुलनात्मक अध्ययन करें और देखें कि उनकी जीवनचर्या में क्या किसी बड़े सौभाग्योदय की सम्भावना है? अब तक महान सम्भावना के बीच यदि प्रत्यावर्तन सम्भव हो सके तो समझना चाहिए वैसा सुयोग अपने पल्ले भी बँधा था जैसा कि महावीर को उपलब्ध हुआ।

महान परिवर्तन का ध्रुव केन्द्र आत्मबोध है। भगवान बुद्ध का आरम्भिक और उपरान्त के जीवन क्रम में जो आश्चर्यजनक परिवर्तन दीखता है उसका एकमात्र कारण वह आत्मबोध था जो उन्हें बोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि अनायास ही नहीं हुई। उनने आत्म सत्ता का पर्यवेक्षण परिशोध और परिष्कार की तप साधना की। फलतः वह सिद्धि उनके हाथ लगी जिसे आत्मज्ञान कहते है−पोथी के बेंगनों वाला पढ़ने सुनने तक सीमित रहने वाला बुद्धि विलास नहीं वरन् वह सुनिश्चित निर्धारण जो विश्वास ही नहीं साहस से भी भरा रहता है। जिसके कारण दृष्टिकोण बदलता है और कार्यपद्धति का प्रवाह ही उलट जाता है। सामान्य राजकुमार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना देने का चमत्कार कैसे उत्पन्न हुआ इसका उत्तर एक शब्द में देना हो तो उसे आत्म बोध कहा जा सकता है।

अखण्ड−ज्योति परिजनों को सुनिश्चित तथ्यों पर विश्वास करना चाहिए। वे असाधारण हैँ। उनकी चेतना में संचित सुसंस्कारिता के बीज हैं। इसके अनेक प्रमाणों में से एक यह है कि वे अखण्ड−ज्योति की विचार धारा के साथ भावनात्मक घनिष्ठता निरन्तर बढ़ाते ही चले आ रहे हैं। यह साहित्यिक रुचि का परिणाम नहीं है। बुद्धि विलास के लिए पढ़ते रहने का व्यसन अनेकों को होता है। ऐसे लोग अपना विनोद तो करते हैं पर किसी विचार धारा के साथ उनके संचालक सूत्र के साथ घनिष्ठता स्थापित नहीं करते। पतनोन्मुख प्रवृत्तियों में तो सहज आकर्षण भी होता है किन्तु आदर्शों के प्रति आमतौर से उपेक्षा ही बनी रहती है। यदि वैसा न हो तो उस दिशा में अभिरुचि बढ़े। घनिष्ठता उमंगे और आत्मीयता तादात्म्यता तक जा पहुँचे तो समझना चाहिए कि कोई अतिरिक्त −असामान्य बात है। अखण्ड ज्योति की विचार धारा को एक शब्द में युगान्तरीय चेतना की विचार धारा को एक शब्द में युगान्तरीय चेतना कहा जा सकता है। समय प्रवाह के यह सर्वथा प्रतिकूल पड़ती है ऐसी दशा में जिनका रुझान उस दिशाधारा के साथ साथ बहने लगा उनके सम्बन्ध में यही सोचा जा सकता है कि प्रवाह को चीरती हुई उलटी दिशा में चलने जैसी कोई विशेषता यहाँ विद्यमान है। हर अखण्ड−ज्योति परिजन को अपने सम्बन्ध में यह मान्यता बना ही लेनी चाहिए कि वे असामान्य है और यदि सुयोग मिले तो वे निश्चित रूप से असामान्य भूमिका निभा सकने में समर्थ हैं। हनुमान और बुद्ध के उपरोक्त उदाहरण उन पूरी तरह चरितार्थ हो सकते हैं। सम्भावों में कोई कमी नहीं। प्रवाह मुड़ने, दृष्टिकोण बदलने, साहस जुटने और पुरुषार्थ उभरने भर की देर है।

नारद का काम एक ही था। वे निरन्तर परिभ्रमण करते थे। भक्ति चर्चा तो रास्ता चलतों से भी करते थे पर विशेष रूप से घनिष्ठता उनसे स्थापित करते थे जिनमें पूर्व संचित सुसंस्कारिता की अतिरिक्त मात्रा दृष्टिगोचर होती थी। आज की स्थिति प्रतिकूल होने पर भी यदि संचित सुसंस्कारों की सम्पदा विद्यमान है तो परिष्कार परिवर्तन में बहुत देर नहीं लगती। इसलिए देवर्षि बादलों की तरह बरसते तो सर्वत्र थे पर निहाल उन्हीं सरिता सरोवरों को करते थे जिनमें पहले से ही गहराई बनी होती थी। उन्होंने वाल्मीकि, ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती, सावित्री आदि के कान में गुरुमन्त्र दिया। वह अंकुरित हुआ और फला फूला। कितने ही उस अनुग्रह से कृतकृत्य हो गये। किन्तु सब नहीं। बहुतों को छप्पर के नीचे बैठे−बैठे, बिना भीगे मेघमाला के आवागमन जितना ही दृश्य लाभ हो सका। जबकि कुछ निहाल हो गये।

अखण्ड−ज्योति को नारद माना जाय तो इसमें अत्युक्ति न होगी। इसने लम्बी अवधि में व्यापक परिभ्रमण किया है। अनेकों को सत्परामर्श दिया है किन्तु उनमें कुछ ही ऐसे हैं जिन्होंने इस विचारणा को हृदयंगम किया है जिनका तादात्म्य जुड़ा है, जो परिजन स्तर तक पहुँच हैं, उनकी संख्या बहुत बड़ी नहीं है। पाठ अगणित बनते और छूटते बिखरते रहते है पर परिजन शब्द तो घनिष्ठता आत्मीयता का बोधक है। वैसे लोग एक समुदाय बनाते हैं और ‘पव जल सरिस विकाहि’ का उदाहरण बनते हैं। स्वाति नक्षत्र सर्वत्र बरसता है, पर उससे लाभ कुछ ही लेते हैं। कुछ ही सौंपे उसके लिए मुँह खोलती हैं, कुछ ही केले कपूर पाने और कुछ बाँस बंसलोचन उगाने का सौभाग्य लाभ लेते हैं। अखण्ड ज्योति की युगान्तरीय चेतना के साथ जो क्रमशः तादात्म्य स्थापित करते आये हैं, उन्हें अखण्ड ज्योति परिजन कहा जाता रहा है। अब ‘प्रज्ञा परिजन’ का जाएगा।

ऐसा क्यों? इसका एक ही उत्तर है। प्रज्ञा युग आ पहुँचना। अदृश्य से महान परिवर्तन की संभावना प्रेरणा बन कर बरस रही है। युग सन्धि की बेला में महाकाल की गलाई और ढलाई वाला कारखाना क्रमशः अधिक गरम होता और अधिक गतिशील बनता जा रहा है। इस प्रसंग में अखण्ड ज्योति की छत्र छाया में एकत्रित हुए समुदाय की उस परिवर्तन प्रवाह में अग्रदूतों की भूमिका निभानी होगी। प्रभातकाल की किरणें सर्वप्रथम पर्वत के उच्च शिखरों पर ही दीख पड़ती है। दूध गरम करने पर मलाई तैर कर ऊपर आती है। ब्रह्ममुहूर्त में प्राची में ही ऊषा काल की लालिमा दृष्टिगोचर होती है। प्रभात परिवर्तन की पूर्व सूचना कुक्कुट की लम्बी बाँग ही देती है। प्रज्ञा परिजनों को प्रज्ञा युग के अनुरूप अपनी भूमिका में परिवर्तन करना होगा। यही अखण्ड ज्योति और उसके परिकर के मध्य चल रही घनिष्ठ आत्मीयता की वह ऐतिहासिक परिणति। जिसके सम्मुख भावी पीढ़ी अनंतकाल तक भावभरी स्मरण गाथा कहती सुनती और यश गाथा से प्रेरणा ग्रहण करती रहेगी। यह संपर्क सान्निध्य इसी रूप में सार्थक एवं कृतकृत्य होने जा रहा है।

इन दिनों बहुत कुछ बदल रहा है। आवश्यक नहीं कि परिवर्तनों की पूर्व भूमिका सर्वसाधारण पर प्रकट होती ही रहे। गर्भस्थ बालक को आँख से देखने और गोदी में खिलाने की बात कहाँ बनती है। वैसा प्रसव प्रजनन के उपरान्त ही सम्भव होता है। नव युग का शिशु इन दिनों ‘गर्भस्थ’ स्थिति में भ्रूण बन कर रह रहा है पर कल उसका प्रत्यक्ष होना एक सच्चाई है। उस प्रभात बेला में जागृत आत्माएँ अपनी भूमिका निभाये बिना नहीं रह सकती। अरुणोदय होते ही चिड़िया घोंसले छोड़कर बाहर निकल आती है। कलियाँ अनायास ही मुस्कराने लगती हैं। पवन सौरभ दिखने लगता है फिर कोई कारण नहीं कि परिवर्तन की महान वेला में प्रज्ञा परिजन अपने में कुछ परिवर्तन प्रस्तुत न करें। यथावत् जड़ता अपनाये रहें।

मदालसा ने अपने सभी बच्चों को आत्मबोध कराया और महान बनाया था। वे सदा एक ही बात कहती थीं। “शुद्धोसि, बुद्धोसि, निरंजनोसि” तुम शुद्ध बुद्ध और निरंजन हो। अपने को पहचानो और अपने गौरव के अनुरूप मार्ग चुनो। सभी बालक महान बने। अखण्ड ज्योति का प्रयास भी मदालसा जैसा ही रहा है। माता मूर्ति ने नर−नारायण को—कुन्ती ने अपने लाड़लों को जो ज्ञान दिया, उसी प्रवाह को युगान्तरीय चेतना के अंतर्गत भी बहाया गया है। भर्तृहरि शिष्य गोपीचन्द को ब्रह्मज्ञानी उनकी माता ने ही बनाया था। शिवाजी,नेपोलियन आदि को महानता के पथ पर धकेलने में उनकी माताओं का ही हाथ रहा है। अखण्ड ज्योति की बौद्धिक सामग्री संग्रह करने वाली हलवाई की दुकान से नहीं−उस मेघमाला से तुलना की जानी चाहिए जो जहाँ जाती है वहीं नव जीवन उभारती है।

प्रज्ञा परिजन अपना स्वरूप समझें। उनके भीतर दूसरों की तुलना में कहीं अधिक संस्कारिता −आध्यात्मिकता की ऊर्जा विद्यमान है। इस ऊर्जा के सदुपयोग का ठीक यही मौसम है। समय चूक जाने पर पछताना ही शेष रह जाता है। गाड़ी चूक जाने पर यात्री पछताते और दूसरी गाड़ी के लिए प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं। जो गाड़ी इन दिनों प्लेटफार्म पर है वह चली गई तो फिर दूसरी आने के लिए कितनी लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी? और तब तक कौन सौभाग्यशाली अपनी वर्तमान स्थिति बनाये रहेगा? इस सम्बन्ध में कुछ कह सकना कठिन है।

इस पंक्तियों में सामयिक उद्बोधन इतना ही है कि प्रज्ञा परिजन अपनी विशिष्ट उत्कृष्टता पर बार बार विचार करें। अपना स्वरूप लक्ष्य समझें और युग धर्म की चुनौती स्वीकार करने में आनाकानी न करें। हनुमान और बुद्ध की तरह बीजाँकुर मौजूद हैं मात्र इन्हें उभरने का अवसर मिलने भर की कमी है। इसके लिए ठीक यही समय है। आत्म कल्याण और विश्व कल्याण की दुहरा सुयोग सामने है। मात्र इतना भर करना शेष है कि अपने को−समय को−पहचाना जाय और तद्नुरूप दिशाधारा निर्धारित करने में प्रमाद न बरता जाय।

सुसंस्कारों की− सुसंस्कारी विचारशीलों के लिए युग चुनौती ऋषि परम्परा के स्वर में कार मिलाकर इन दिनों नेय सिरे से प्रखर हो रही है। उसका उद्बोधन हैं−

“उत्तिष्छठ जागृत प्राप्त वरान्निबोधत।” “उठो जागो और श्रेय प्राप्तकरो”

लिए आवश्यक है कि − आदर्शों को चिन्तन तक सीमित न रखकर उसे व्यवहार में −तनाव में− प्रवेश होने दिया जाय। आदर्शवादिता पढ़ने, सुनने मात्र से नहीं निभती उसका चमत्कार तभी देखा जा सकता है जब उसे आचरण में उतारा जाय−जीवनचर्या का अंग बनाया जाय।

प्रज्ञा परिजनों को अपनी संचित विशिष्टताओं को उभारने के लिए वर्तमान समय की गरिमा को समझना चाहिए और अवसर नहीं ही चूकना चाहिए। युग धर्म को पहचानने और तदनुरूप साहस दिखाने वाले ही हनुमान, अर्जुन, नेहरू−विवेकानन्द बने हैं। समय चूक गये होते −बाद में होते तो उनकी सदाशयता सामान्य बनकर रह जाती और”का वर्षा जब कृषि सुखाने” की तरह हाथ मलती रह जाती।

प्रज्ञा परिजन इन दिनों अपने जीवन क्रम में युग धर्म का समावेश करें। भले ही यह न्यूनतम क्यों न हो। ऊपर दीक्षार्थी बहेलिये का उदाहरण इसी हेतु प्रस्तुत किया गया है। बड़ा पराक्रम न बन पड़े तो छोटा करना चाहिए।

एक व्यक्ति चारपाई पर बैठा भजन कर रहा था। देखने वाले किसी सज्जन ने आपत्ति उठाई और चारपाई पर बैठकर भजन करने को अश्रद्धा बताया और उस मूर्ख बताया। चारपाई पर बैठे कर भजन करने वाले ने भर्त्सना करने वाले से उलटकर पूछा− आप कहाँ बैठकर किस प्रकार भजन करते हैं। इस पर वह सकपका गया और कहा−हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता इसलिए कहीं भी नहीं कर पाते। इस पर पहला व्यक्ति हँसा और बोला−फिर आप से हमें हैं? कुछ भी न करने से कुछ करना अच्छा। यही बात उनके लिए भी लागू होती है जो मनःस्थिति अथवा परिस्थिति की अनुकूलता के कारण आत्म निर्माण एवं लोक− निर्माण की सामयिक आवश्यकता को पूर्ण करने में कोई बढ़ा चढ़ा योगदान नहीं दे सकते। इतने पर भी यह निश्चित है कि हर कोई आज की तुलना में कल को अधिक अच्छा बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है− रहना चाहिए। भौतिक के क्षेत्र में हर किसी का मन इस प्रकार का रहता है। जिससे जो बनता है वह उसके लिए सचेष्ट भी रहता है। फलतः अधिकाँश लोगों का प्रयास किसी सीमा तक सफल भी होता है। यही प्रयत्न आत्मिक प्रगति की दिशा में भी चल पड़े तो सफलता का आधार उस क्षेत्र में भी बनेगा। प्रयासों का शुभारम्भ ही न हो − अथवा उसका सही तरीका ही विदित न हो तो दूसरी बात है। परिजनों को कहा यह जा रहा है कि मात्र भौतिक प्रगति की बात ही न सोचते रहें। आत्मिक उत्कर्ष का महत्व भी समझें और उसके लिये भी नये सिरे से प्रयास आरम्भ करें। व्यक्ति और समाज के सामने जो अगणित कठिनाइयाँ हैं उनका कारण साधनों का अभाव और परिस्थितियों का विग्रह उतना बड़ा कारण नहीं जितना कि चिन्तन और चरित्र में आदर्शों का अनुपात घट जाना। आस्था संकट ही आज की अगणित कठिनाइयों का एक मात्र कारण है। पारस्परिक स्नेह,सहयोग अपनाने की अपेक्षा जब लोग स्वार्थान्ध होकर अनीति और आक्रमण को अपनाते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया अपने तथा दूसरों के लिए घातक होती है। यही बात है वह विग्रह जो असंख्य चिनगारियों के रूप में उभरता और स्थान स्थान पर विस्फोटों का हाहाकार करता दीखता है।

युग अवतरण का एक ही स्वरूप है लोक−मानस का परिष्कार। इसी आधार पर सत्प्रवृत्तियाँ पनपेंगी और आत्मघाती विपन्नताओं का परिवर्तन उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना में हो सकेगा। इसके लिए ‘हम बदलेंगे−युग बदलेगा’ का उद्घोष रोग का सही निदान और उपचार प्रस्तुत करता है। व्यक्ति यों का समुदाय ही समाज है व्यक्ति सुधर तो समाज सुधार। निजी जीवन में शालीनता को स्थान मिले तो प्रचलन परम्पराओं में भी उसी स्तर की उत्कृष्टता उभरे। व्यक्तिगत उत्कृष्टता का संवर्धन ही वह उपाय है जिसके आधार पर सामान्य साधनों एवं सामान्य परिस्थितियों के रहते हुए भी मनुष्य सुखों समुन्नत जीवन जी सकता है। समाज को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने में योगदान दे सकता है।

स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय एक केन्द्र पर आकर गंगा यमुना की तरह मिलता है कि ‘अपना सुधार सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा’ वाले सूत्र को योजनाबद्ध रूप से व्यवहार में उतारा और संकल्प साहस के साथ कार्यान्वित किया जाय। संसार बहुत बड़ा है। इसके समग्र स्वरूप की सेवा कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। समय कमी, योग्यता की सीमा, दूरी को लांघना, भाषा सम्बन्धी कठिनाई, साधनों की न्यूनता जैसे कारणों से कोई भी समस्त संसार की सेवा नहीं कर सकता। अपने संपर्क एवं प्रभाव क्षेत्र में ही कुछ करते धरते बन पड़ सकता है। यदि यह साधना व्यापक क्षेत्र भी इसके लिए चुना जा सकता है। इसकी न्यूनतम परिधि अपने आपकी सुधार सेवा तक भी सीमित हो से सकती है। संसार को हजार मन भारी माना जाय और अपने को एक छटांक तो समझना चाहिए। अपने सुधार से भी संसार की उतनी मात्रा में सेवा हो गई जितना कि हजार मन की तुलना में एक छटांक का अनुपात है।

अपने सुधार परिष्कार में ही स्वार्थ की परिपूर्ण सिद्धि होती है। साधनों की अभिवृद्धि से सुविधाएँ भर बढ़ती हैं पर व्यक्ति का वजन तो गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता के सहारे ही बन पड़ता है। आकाँक्षा विचारणा, और आदतों में निकृष्टता घुसी पड़े हो तो समझना चाहिए कि इस आन्तरिक पिछड़ेपन के रहते कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी समर्थता के रहते हुए क्षेत्र को भी कुढ़ाता, झुलसाता, और गिराता रहेगा। इसके विपरित जहाँ शालीनता, सज्जनता की कमी नहीं वहाँ स्वल्प साधनों में भी आनन्द उल्लास से भरा पूरा हँसता−हँसाता−खिलता−खिलाता जीवन जिया जा सकेगा। जहाँ सद् गुण रहेंगे वहाँ अभाव दरिद्रता नहीं टिकेगा। दुर्बलता रुग्णता के पैर भी नहीं जमेंगे। अपमान तिरस्कार सहने और लज्जित रहने आत्म−प्रताड़ना सहने जैसी स्थिति भी नहीं बनेगी। यह अत्यन्त सराहनीय स्वार्थ सिद्धि है। इसी में परमार्थ का भी समुचित समावेश है।

लोक निर्माण के लिए यों बहुत कुछ करने की आवश्यकता है पर उतना ने बन पड़े तो आत्म निर्माण से भी उसकी आँशिक पूर्ति होती है। इन दोनों महती आवश्यकताओं के समन्वय में जब युग धर्म की पुकार को भी सम्मिलित कर लिया तो तीर्थराज का त्रिवेणी संगम बन जाता है। जंग की माँग एक ही है कि अवाँछनीयताओं के प्रवाह को उलट कर उसे सत्प्रवृत्तियों की दिशा में मोड़ा−मरोड़ा जाय। मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति सुसंस्कारिता के गह्वर से ही समृद्धि, सामर्थ्य और प्रगति के झरने फूटते हैं। समस्त संकटों का निवारण, श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा से बने दिव्यास्त्र ही कर सकते हैं। समस्याओं और विभीषिकाओं की वैतरणी पार करने से लिए दूरदर्शी विवेकशीलता − ऋतम्भरा प्रज्ञा− की नौका चाहिए। यह साध जुट सके तो सर्वनाशी विभीषिकाओं से उत्पन्न महाप्रलय जैसे विग्रह से मानवी अस्तित्व को बचाया जा सकता है। इसके लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि मूर्धन्य लोग ही ऐसा परिवर्तन प्रस्तुत कर सकते हैं। वे आगे बढ़े तो स्वागत। अन्यथा प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ रख बैठे नहीं रहा जा सकता। छोटों को ही मिल−जुलकर कुछ सोचना चाहिए और जो अपनी सीमित सामर्थ्य के अंतर्गत हैं वह कर गुजरना चाहिए।

एक बार कार्तिकी अमावस्या के घनघोर अन्धकार में प्रकाश की आवश्यकता पड़ी। सूर्य से प्रार्थना की, उनने इस आपत्ति कालीन अनुरोध को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। चन्द्रमा ने भी असमर्थता प्रकट की। कोई उपाय न देखकर एक दीपक ने जलना आरम्भ किया। दूसरे बुझे हुओं ने सोचा जो एक कर सकता है वह दूसरा क्यों न करें? जब बुराई छूत की तरह फैल सकती है तो अच्छाई की लहरें भी एक दूसरे को सहारा देते हुए आगे क्यों नहीं बढ़ सकती? दीपक एक दूसरे के निकट आते गये। जलों ने बुझों को जलाया और छदाम कीमत वाले दीपकों की पंक्ति देखते देखते सर्वत्र जलने लगी। कार्तिकी अमावस्या इन जुगनुओं की चादर ओढ़ कर सूर्य पत्नी जैसी गौरवान्वित होकर इठलाने लगी। सभी ने दीप मालिका की जय बोली और उस दिन से वह सहकारी आदर्शवादिता महालक्ष्मी की तरह पूजी जाने लगी।

छोटों के छोटे काम भी मिलजुल कर बड़ों के बड़े कामों की प्रतिद्वन्दिता कर सकते हैं। तिनकों से रस्सा बटा जाता है। धागे मिलकर वस्त्र बुनते है। ईंट परस्पर चिपटकर महल खड़े करती हैं। सीकों से बुहारी बनती है। बूंद–बूंद से घट भरता है। अणुओं के समन्वय से विराट् की संरचना हुई है। इन तथ्यों से अवगत लोगों को यह विश्वास करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि छोटों में सज्जनता का दौर चल पड़े तो उनके संयुक्त प्रयासों का प्रतिफल समष्टि को सतयुगी परिस्थितियों से भरपूर बना सकती है। बड़ों की प्रतीक्षा में बैठे रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि छोटे लोग मिलजुलकर नव सृजन के प्रयास करें। उसका शुभारम्भ अपने अपने सीमित क्षेत्र को कार्यक्षेत्र बनाकर −छोटी समझ, थोड़ी सामग्री और अस्त व्यस्त परिस्थितियों में ही कुछ के लिए जुट पड़े।

रीछ वानरों, ग्वाल−बालों, बौद्ध भिक्षुओं, सत्याग्रहियों का इतिहास जिन्हें विदित है, वे जानते हैं कि यदि श्रद्धा अटूट हो तो स्वल्प सामर्थ्य के सहारे छोटे−छोटे प्रयास भी कितने बड़े संयुक्त परिणाम प्रस्तुत कर सकते हैं। छोटे सितारे आसमान में चमकते हैं, तो उतने भर से राहगीरों को दिशा मिल जाती है और ठोकर खाने से बचते हैं। इन्हीं उदाहरणों से प्रेरणा लेते हुए प्रज्ञा परिजनों को समय की पुकार के संदर्भ में कुछ सोचना चाहिए और कुछ करना चाहिए। सुख सुविधा बढ़ाने और साधन जुटाने के लिए जो श्रम किया जाता है, उसमें कटौती किये बिना अतिरिक्त उत्साह के आधार पर ऐसा कुछ भी नये सिरे से किया जा सकता है जिससे युग परिवर्तन में अपनी भूमिका हनुमान, अंगद न सही, गीध गिलहरी जैसी तो बन ही पड़े।

इस संदर्भ में वह न्यूनतम बिन्दु खोज निकालना होगा जिसे कर सकने में हर स्थिति का− हर व्यक्ति समर्थ हो सके। समय भी रबड़ की तरह है जो तनिक-सी खींचतान करने पर अपनी लम्बाई बढ़ा देती है। साधारण महिला का पेट भी खाली नहीं होता उसमें भी आतों समेत अन्यान्य अवयव पूरी तरह ठुँसे रहते हैं पर जब गर्भस्थ बालक भी उसी में घुस पड़ता है तो उसके लिए भी जगह बन जाती है। ठीक इसी प्रकार व्यस्तता रहते हुए भी यदि श्रद्धा उमंगे तो सदाशयता का विस्तार करने वाले चिन्तन एवं व्यवहार को भी उसी में ठूंसा जा सकता है। कुछ समय में उसके लिए भी जगह बन जाती है और बिना किसी कठिनाई के वह नया ढर्रा भी अपने ढंग से −अपनी धुरी पर घूमने लगता है। हमें इसी तरह सोचना चाहिए और जो सुधार परिवर्तन आवश्यक हो गया है उसे कर गुजरने का रास्ता निकालना चाहिए।

प्रज्ञा परिजनों के निमित्त नवयुग के संदर्भ में न्यूनतम कार्यक्रम की यही पृष्ठभूमि है वे घर छोड़कर सेवा कार्यों के निमित्त बाहर जा सकने की स्थिति में हों तो हर्ज नहीं। निजी जीवन क्रम में भी वे ऐसे सुधार परिवर्तन कर सकते है,जिनसे आत्म निर्माण और लोक निर्माण के दोनों प्रयोजन बिना किसी अतिरिक्त कठिनाई के बिना कोई अतिरिक्त योजना बनाये सहज स्वाभाविक रीति से सधते रहें। जो आर्थिक कठिनाई के कारण दान पुण्य नहीं कर सकते, दूसरों की सहायता नहीं कर सकते वे वर्तमान साधनों में ही कुछ ऐसा ही हेर−फेर कर सकते हैं कि उतने भर से आत्मिक प्रगति का नया दौर चल पड़े। व्यस्तता और अभावग्रस्तता के साथ बिना कोई छेड़खानी किये ऐसा हो सकता है कि दृष्टिकोण और कार्य पद्धति में थोड़ा-सा अन्तर कर देने मात्र से ऐसा क्रम चल पड़े जिसे नव सृजन में भावभरा योगदान कहा − और मुक्त कंठ से सराहा जा सकें।

अखण्ड ज्योति अपने प्रिय परिजनों में से प्रत्येक से इन शब्दों में एक ही अनुरोध करने चली है कि वे अपने छोड़ें। उनकी आयु इतनी हो गई है कि अपने पैरों खड़े हो सकते हैं, दीवार पकड़ कर चल सकते हैं और उत्साह दिखाएँ तो बिना किसी कठिनाई के पूरे आँगन में ठुमक–ठुमक कर चलने पर सारे परिवार में हर्ष उत्साह की एक लहर दौड़ा सकते हैं। प्रज्ञापुत्र बड़ी आयु के हैं वे अग्रिम पंक्ति में खड़े और युग प्रहरी की− जुझारू योद्धा की भूमिका निभा रहे हैं। किन्तु प्रज्ञा परिजन भी ऐसी स्थिति में हैं कि अधिक कुछ न कर पाने की बात कहते हुए भी इतना कुछ कर सकते हैं जिसे असंख्यों के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय कहा जा सके।


Quotation

सौर ऊर्जा स्वभावतः सर्वत्र बरसती रहती है। उससे कौन, कितना लाभ, किस प्रकार उठाये? यह प्रयोक्ता की अपनी रुचि एवं कुशलता पर निर्भर है। धूप सेंकने,कपड़ा सुखाने से लेकर सूर्य शक्ति ही प्रचण्ड ऊर्जा उपलब्ध करने वाले यन्त्रों का प्रयोग करने तक की अनेक विधि−व्यवस्थाएँ मनुष्य स्वयं ही बनाते हैं। सूर्य को इससे न तो प्रसन्नता है न अप्रसन्नता। वह इन प्रयोक्ताओं पर प्रसन्न होता हो या महल कन्दराओं में रहकर धूप से बचे रहने वालों पर अप्रसन्न होता हो ऐसी कोई बात नहीं है। दोनों प्रकार के लोगों के साथ उसका कोई सहयोग असहयोग भी नहीं है। भगवान् सूर्य का अनुग्रह पाना न पाना जिस प्रकार प्रयोक्ता की अपनी चेष्टा एवं तैयारी पर निर्भर है, उसी प्रकार अध्यात्मिक पुरुषार्थ के बलबूते पर ब्रह्मा का विशेष अनुग्रह किस प्रकार प्राप्त सकता है। आत्मिकी की इस परम्परा का इन दिनों न तो प्रतिपादन होता है न प्रचलन ही रह गया है,फलतः आत्मिकी असफल उपहासास्पद बनकर रह रही है, उल्टे को उलटकर सीधा करना यही है आत्मिकी का पुनर्जीवन।


दूसरी पंक्ति में हर किसी की साझेदारी सम्भव

सेना के मोर्चे पर लड़ने वाले योद्धाओं को विजय पराजय की प्रशंसा, निंदा मिलती है। वे ही चर्चा का विषय भी रहते हैं किन्तु यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि इन जुझारुओं की एक दूसरी पंक्ति भी रहती है, जो अग्रगामी होने का श्रेय तो नहीं पाते किन्तु उसकी महत्ता उपयोगिता, तत्परता किसी भी प्रकार कम नहीं होती। लड़ना जितना महत्वपूर्ण है उतनी ही आवश्यकता उनके लिए साधन जुटाने वालों की भी है। उनके हाथ ढीले हों तो फिर साधने के अभाव में योद्धाओं की देशभक्ति, कुशलता एवं बलिष्ठ साहसिकता भी कुछ न आवेगी और पराक्रमियों का त्याग बलिदान उच्चस्तरीय होते हुए भी विजय श्री का वरण न करा सकेगा।

बन्दूकें बनाने वाले, बारूद पीसने वाले, गोली छर्रे ढालने वाले, डॉक्टर, इंजीनियर, आपरेटर आदि मिल−जुलकर वह व्यवस्था बनाते है जिसके सहारे योद्धाओं को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिल सके। इस सफलता में एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका उनकी भी है जो सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत होने वाले खर्च का व्यय भार अपने कन्धों पर उठाते हैं और टैक्स भरते हैं। विजय का श्रेय किसी को भी मिलें। भले ही वह समझने वाले जानते हैं कि अगली पंक्ति की तरह पिछली पंक्ति की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है

प्रज्ञा युग अति निकट है। चिन्तन और चरित्र में बढ़ती हुई निकृष्टता ने महामरण का प्रलय काल जैसा संकट उपस्थित कर दिया हैं। अणु, युद्ध, प्रदूषण, अर्थ वैषम्य, दुर्व्यसन, स्वार्थान्धता, बहु प्रजनन, अवाँछनीय प्रचलन जैसे कारण ऐसे हैं जो मिल जुलकर मानवी सभ्यता के सर्वनाश की तैयारी में जुटें है। ऐसे अवसरों पर सृष्टा ने बागडोर अपने हाथ में समय समय पर सम्भाली है। अयोग्य विधान सभाएँ जब शासनतन्त्र को ठीक तरह संभाल नहीं पातीं तो उन्हें निलम्बित या निरस्त किया जाता है और राष्ट्रपति शासन लागू होता है। विश्व व्यवस्था का उत्तरदायित्व सृष्टा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र−युवराज− मनुष्य के हाथों सौंपा है। वह कुमार्ग अपनाये, मर्यादा छोड़े और अनाचार पर उतरे तो सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने विभीषिकाएँ उमड़ने में क्या देर लगती? पिछले दिनों से यही कुछ चल रहा है। नाव को डूबती देखकर बेड़े के अधिष्ठाता ने डाँड खेने और पानी उलीचने की कमान सम्भाली है। प्रवाह उलटना आरम्भ हो गया है। गलाई ढलाई वाली भट्टियाँ गरम हो गई हैं और नव निर्माण का कारखाना सृजन सामग्री उपजाने में पूरे जोश खरोश का साथ तत्पर हुआ। ध्वंस के आतंक से सभी परिचित हैं,पर सृजन की सामर्थ्य का जिन्हें पता है वे जानते हैं कि संसार में जो कुछ भी दर्शनीय प्रशंसनीय है उसे सृजन की शक्ति यों का चमत्कार ही कहा जा सकता है। सृजन कटिबद्ध हो तो साधनों का पर्वत वह हिमालय से भी उखाड़कर ला सकता है और वाहनों का अभाव रहने पर भी समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए तीर से अधिक वेग अपनाकर मरण को जीवन में बदल सकता है। लक्ष्मण की मूर्छा जगाने में हनुमान ने जो दृश्य रूप से किया वही युग का सृजन प्रवाह आज की व्यापक समस्याओं के समाधान के लिए भी कर गुजरने वाला है। यही है प्रज्ञा युग के अवतरण का आधार। उद्देश्य में चल रहे प्रवाह को जो मानसून उभार की तरह सूक्ष्म दृष्टि से देख सकते हैं वे इस बात की सुनिश्चित सम्भावना बताते हैं कि ध्वंस निरस्त होकर रहेगा और सृजन जीतेगा। युगान्तरीय चेतना का तूफानी प्रवाह जिस गति से चल पड़ा है उसे देखते हुए युग सन्धि की बीस वर्ष वाली अवधि में से मानवी मनःस्थिति और व्यापक परिस्थिति में काया कल्प जैसा परिवर्तन होते देखा जा जाय तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

प्रज्ञा युग मानवी सौभाग्य का अरुणोदय है। उसको सम्भव मोर्चे पर अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर निशाना साधते हुए देखा जा सकता है। दूसरी पिछला मोर्चा सम्भालती है और जुझारुओं को सफल बनाने के से लिए साधन जुटाने एवं वातावरण बनाने में संलग्न है। बहती तो गंगा ही है। पर उसे जलराशि प्रदान करने में व्यापक क्षेत्र की बर्फ गलती है इसे जानते हुए भी अधिकाँश लोग अनजान बने रहते हैं। गंगा की जय बोलते हैं हिमि प्रदेश की नहीं। लोग क्या सोचते हैं यह उनका काम है पर तथ्य अपनी जगह चट्टान की तरह अचल है। जौहर भुजाएँ ही दिखाती हैं, पर उन्हें इस योग्य बनाने के लिए वक्षस्थल के गह्वर में छिपा हुआ रक्त संचार तन्त्र क्या कुछ करता है उस अदृश्य भूमिका को वे लोग कैसे समझ पायेंगे जो भुजाओं के चमत्कार को ही दृश्यमान आँखों से देख सकने तक सीमाबद्ध है।

नव सृजन के दो पक्ष हैं एक भौतिक दूसरा आत्मिक। एक परिस्थिति का सँभालता है दूसरा मनःस्थिति को। परिस्थिति को संभालने का काम समाज एवं शासन का अनुपात बनाये रहने की जिम्मेदारी धर्म और अध्यात्म की है शासन प्रत्यक्ष है और अध्यात्मिक परोक्ष। प्रज्ञा युग का अवतरण अन्तःक्षेत्र में दृष्टिगोचर होगा। प्रकाश उदय होते ही अन्धकार भागेगा। प्रस्तुत विभीषिकाओं का निराकरण महाप्रज्ञा के आलोक द्वारा ही सम्भव होगा। युगान्तरीय चेतना जन जन के मन मन की निकृष्टता से विरत करके उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करेगी। यह अदृश्य जितना बन पड़ेगा उतना ही वातावरण बदलेगा और सृजन की गतिविधियों का बहुमुखी स्वरूप दृश्यमान घटनाक्रमों के साथ प्रकट होगा।

इस सुनिश्चित सम्भावना को मूर्त रूप देने में प्रज्ञा अभियान की विशिष्ट भूमिका है। गंगा में अगणित धाराएँ पक्ष हैं। उन्हें अनेक प्रयासों द्वारा सम्पन्न किया जाना है किन्तु जनमानस के परिष्कार की मूल धारा को किया जाना है। इतिहास बतायेगा कि अन्धकार को प्रकाश में बदलने के लिए प्रज्ञा अभियान के भागीरथी प्रयास कितने कारगर सिद्ध हुए।

निर्धारणों को क्रियान्वित करने में जिन सृजन सैनिकों की युग वाहिनी मोर्चे पर डटी हुई है उसको दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। उसमें से एक को अग्रगामी दूसरी को साधन वाहिनी के रूप में जगना चाहिए। अग्रगामी प्रज्ञापुत्र हैं दूसरी पंक्ति में खड़े प्रज्ञा परिजन। दोनों का अपना अपना महत्व है− अपना−अपना स्वरूप और अपना अपना कार्यक्रम।

प्रज्ञा पुत्रों की चर्चा आये दिन इन पंक्ति यों में होती रहती है। उन्हें लोभ मोह की हथकड़ी बेड़ी काटकर युग पुकार की पूर्ति के लिए पवन पुत्रों की भूमिका निभाने के लिए महाकाल का आमन्त्रण भी सुनाया जाता रहा है युग शिल्पियों की एक बड़ी सेना पहले से ही कार्यरत है। अब गत मास एक हजार और नये रंगरूटों की भर्ती करने −अनुभवियों को तत्काल डाड उठाते और पाल बाँधने के लिए कहा गया है। सृष्टा की इच्छा में अवरोध कैसा? हजार नये युग शिल्पी भी कल परसों तक एकत्रित होने वाले हैं और आपत्ति धर्म पालन करने में बड़े से बड़ा जोखिम भी उठाने वाले हैं। उनके अब तक के प्रयासों और भावी उत्तरदायित्वों की रूप रेखा भी इन पंक्तियों में समय समय पर प्रकट होती रहती है।

इस बार इस अंक में प्रमुखता दूसरी पंक्ति को दी गई है चर्चा उसी की, की जा रही है और कहा जा रहा है। कि उसके महत्व गौरव को तनिक भी कम न आँका जाय। दूसरी पंक्ति में वे प्रज्ञा परिजन आते हैं। जो भावना की दृष्टि से अभियान के पूरी तरह साथ है। उसका सच्चे मन से समर्थन करते हैं। और सफलता देखने के लिए आतुर हैं। किन्तु मनःस्थिति की दुर्बलता एवं परिस्थिति की जटिलता के कारण अभी उस मूड में नहीं है कि प्रज्ञा पुत्रों की तरह समय दे सकें और जोखिम उठा सकें। ऐसी दशा में भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। उनका नव सृजन में परोक्ष योगदान इतना हो सकता है कि तथ्यान्वेषी उसकी भूमिका को भी सराहे बा नहीं रह सकते। नव सृजन एक महाभारत है उसे लंका युद्ध की समता दी जा सकती है। महाभारत का लक्ष्य विशाल भारत की संरचना था और लंका विजय के साथ ही रामराज्य की स्थापना भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई थी। प्रज्ञा अभियान को भी अवाँछनीयता उन्मूलन के साथ साथ सत्प्रवृत्ति संवर्धन में भी निरत जा सकता है। दोनों प्रयास साथ साथ चल रहे है। दो पहियों की गाड़ी ही तो ठीक तरह चल पाती है।

चर्चा प्रज्ञा पुत्रों और प्रज्ञा परिजनों की ही रही थी। अखण्ड ज्योति के सदस्यों में से ऐतिहासिक सन्धि बेला में मूक दर्शक किसी को भी नहीं होना चाहिए। किसी को भी ऐसी आत्म प्रताड़ना ही सहनी चाहिए कि कभी−कभी ही आने वाले सौभाग्य सुयोगों में से एक अपने जीवन में आया था। उनमें जीवन्तों जागृतों में रहने या योग्य भूमिका निभाई थी किन्तु हम विवशता व्यक्त करते, कठिनाइयों की आड़ लेते और परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना रोते रहे। इन दिनों कुछ तो हममें से हर किसी को करना चाहिए। अखण्ड −ज्योति ने अपने प्राणप्रिय पाठकों को वाचन सामग्री ही नहीं दी है उनके अन्तराल को भी छुआ है और प्रयास किया है कि उस क्षेत्र की मूर्छना, नव चेतना में बदले और जीवन्त जागृतों के लिए शोभनीय पराक्रम बनकर उभरे। यह प्रयास कितना प्रत्यक्ष बन सका उसे तो समय की कसौटी पर कसने के बाद भावी इतिहासकार ही बता सकेंगे, पर इतना तो आज भी कहा जा सकता है कि जो इस भट्टी के संपर्क में आया है किसी न किसी मात्रा में गरम अवश्य हुआ है। अखण्ड−ज्योति परिजन पूर्व जन्मों की संचित सुसंस्कारिता के का रण भी “अपने मतलब से मतलब रखने वाले दुनियादारी” से भिन्न हैं। लगातार की अमृत वर्षा ने उनके अन्तराल की और भी अधिक उकसाया है। फलतः उनका सामयिक असमंजस स्वाभाविक है। अधिक करने की मनःस्थिति नहीं और थोड़ा करने के लिए कोई कार्यक्रम सामने नहीं। इस असामंजस्य को दूर करने के निमित्त ही यह अंक लिखा जा रहा है। और कहा जा रहा है कि परिवार का एक भी सदस्य ऐसा न रहे जिस पर युग सन्धि की बेला में सर्वथा निष्क्रिय रहने का लाँछन लग सके। जागृतों का प्रसुप्तों की तुलना में निश्चय ही अधिक उत्तरदायित्व है उसे समझा ही नहीं सम्भाला भी जाना चाहिए। कार्यक्षेत्र में न उतर सकने पर भी व्यक्तिगत क्षेत्र में उन्हें ऐसा कुछ करना ही चाहिए जिस दूसरी पंक्ति वाली साधन वाहिनी का सदस्य तो उन्हें गिना ही जा सके।

प्रज्ञा पुत्रों के लिए तुरन्त कार्यान्वित करने के लिए पंचसूत्री योजना सुपुर्द की गई है। इसके बाद उन्हें बाद उन्हें पाँच सृजनात्मक और पाँच सुधारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेने हैं। युग संधि के पाँच वर्षों में हर साल पाँच पाँच बढ़ाते हुए पच्चीस सूत्री निर्धारणों की पूर्ति में जुटना है। इस स्तर की विधि−व्यवस्था और रूपरेखा ‘प्रज्ञा अभियान’ पत्रिका में निरन्तर छपती रहती है। प्रथम पंक्ति के युग प्रहरी उन्हें गतिशील बनाने में प्राण पण से जुटे भी हुए हैं। सर्वत्र उनकी चर्चा और सराहना भी है। निराशा की अधिकारी में उनकी प्रखरता बिजली की तरह कौंधती और आशा की उमंगें उठती देखी जा सकती हैं।

प्रसंग दूसरी पंक्ति दूसरी का चल रहा है। उनकी अखण्ड ज्योति पठन, अवगाहन, बुद्धि विलास तक सीमित न रहना चाहिए। उसे धुने बीज की तरह निरर्थक निष्क्रिय सिद्ध नहीं होने देना चाहिए वरन् वर्षा ऋतु आने पर जीवन्त बीज को अंकुरित होने की तरह अधिग्रहण को गतिशील बनने देना चाहिए। इस समुदाय के लिए सप्त सूत्री योजना निर्धारित की गई है। वह वाले भी उपार्जन और निर्वाह तक सीमित रहने वाले भी बिना किसी कठिनाई के−बिना कोई अतिरिक्त भार उठाये −जीवनचर्या में थोड़ा-सा हेर फेर करके महायज्ञ से अपनी साझेदारी सिद्ध कर सकते हैं।

ढेरों व्यक्ति सचमुच ही ऐसे होते हैं जो प्रज्ञा पुत्र की भूमिका निभाने जैसी परिस्थितियों में होते ही नहीं। न उनकी योग्यता वैसी होती है और न प्रतिभा ऐसी दशा में इच्छा रहते हुए भी उन्हें घर से बाहर निकलना और जन संपर्क साधना का कठिन पड़ता है। अपने देश में महिलाओं की स्थिति ऐसी ही दयनीय है। उन पर घर से बाहर जाने दूसरों से वार्त्तालाप करने में प्रतिबन्ध लगे हुए हैं। बच्चों का लालन पालन और रसोईदारी चौकीदारी, घर की साज सम्भाल के झंझट भी इतने होते हैं कि देखने में बैठी ठाली प्रतीत होते हुए भी वे प्रज्ञा पुत्रों की भूमिका निभाने घर की परिधि से बाहर नहीं जा सकतीं। इस प्रकार किशोरों एवं वृद्धों की भी स्थिति ऐसी ही होती है। किशोरों को लड़का बच्चा समझा जाता है उनके उपदेश कौन सुने? वयोवृद्धों की आँखें, वाणी, घुटने, कमर जबाब दे जाते हैं। स्मृति घट जाती है और स्वभाव में अस्त−व्यस्तता दृष्टिगोचर होती है। ऐसी दशा में वे पवन पुत्र, प्रज्ञा पुत्र की भूमिका कैसे निभायें। कितना का ही आजीविका उपार्जन ऐसा कैसे निभायें। कितनों का ही आजीविका उपार्जन ऐसा होता है जिसमें उठने से लेकर सोने तक निरन्तर जुटा रहना पड़ता है। किन्हीं को भय,संकोच लगता है। कुछ दूसरों के पास जाने में अपने अहंकार में कमी आने की बात सोचते हैं। कुछ ही शिक्षा, प्रतिभा इतनी कम होती है कि जन संपर्क में उनकी कुछ उपयोगिता ही नहीं रह जाती। अपंग असमर्थों को, रोगी दुर्बलों को भी सम्मिलित कर लिया जाय तो प्रतीत होगा कि आधी से अधिक जनसंख्या को, रोगी दुर्बलों को भी सम्मिलित कर लिया जाए तो प्रतीत होगा कि आधी से अधिक जनसंख्या ऐसी है जिसे युग शिल्पी की जागृत भूमिका निभाने में− लोक मानस के परिष्कार कठिनाई है। इस वर्ग का सृजन यज्ञ से अलग नहीं रखा जा सकता। उन्हें अपने व्यक्तिगत क्षेत्र में भी बहुत कुछ करने योग्य है दूसरी पंक्ति वाले उसी वर्ग में आते हैं। उनके लिए सप्तसूत्री योजना युग देवता ने प्रस्तुत की है और कहा है कि हर स्थिति का हर व्यक्ति किसी ने किसी रूप में नव सृजन के निर्धारण में भागीदारी ग्रहण कर सकता है। असमर्थता का असमंजस छोड़कर −हर किसी को इन दिनों अपनी क्षमता के अनुरूप केवट, शबरी, जामवन्त और गिलहरी की देखने में नगण्य किन्तु परिणाम में महान सिद्ध होने वाली तत्परता अपनानी ही चाहिए।


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नीवार शूकवत् शुक्र ज्योतिर्वतश्यं वत्क्वचित्। चन्द्र वच्चाणुवत्सूक्ष्मं प्रादेश परिमाणवत्॥

खद्योतच्च स्फटिकदृशस्तारवत्वक्वचित्॥ नीलज्योतिः क्वचित् रक्तज्योतिः शुभ्रद्यु तिःक्वचित्॥

विविध ज्योतिरन्यत्र ज्योतिरेव सः। अभिव्यक्ति करा एवं अकारा ब्रह्माणि स्थिता॥

ज्योतिरेव परंब्रह्मा ज्योतिरवे परं सुखम्। ज्योतिरेव परा शन्तिर्ज्योतिरेव परं पदम्॥ − महायोग विज्ञान

अर्थात्− यह आत्म−ज्योति किसी को शुक्र के तारे के समान, किसी को सूर्य, चन्द्र,अग्नि, अथवा अणु जैसी प्रतीत होती है। जुगनू, स्फटिक मणि अथवा मोती की तरह यह दीखती है। यह सब अन्तःकरण में विद्यमान ब्रह्मा का अभ्यास कराती हैं। यह आत्मज्योति परब्रह्म है। इसी से परम पद और परम शान्ति की प्राप्ति होती है।


डडडड

प्रज्ञा परिजनों के निमित्त निर्धारित किये गये न्यूनतम स्तर सूत्री कार्यक्रम इस प्रकार हैं−

(1)दैनिक उपासना के माध्यम से परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़ना और उस भण्डार से अभीष्ट समर्थता उपलब्ध करना।

(2)जीवन निर्माण की संयम साधना। छेदों से रिसने वाले जीवन तत्व को रोकना और उस उपलब्ध शक्ति स्रोतों को सृजन प्रयोजनों के लिए मोड़ना।

(3)परिवार में सुसंस्कारिता का संवर्धन। निजी सत्प्रवृत्तियों को उभारने और आत्मीयजनों की सच्ची सेवा सहायता करने की दृष्टि से परिवार क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण परिपोषण करने में अभ्यासरत रहना।

(4)सद्ज्ञान का उपार्जन अभिवर्धन। अपनी तथा परिवार की शालीनता समर्थक शिक्षा का विकास प्रयास।

(5)हरीतिमा संवर्धन। प्राणि वर्ग में वनस्पतियों को भी सम्मानित करके उनके अभ्युत्थान के साथ−साथ अपने समग्र अभ्युत्थान का पथ प्रशस्त करना।

(6) अवाँछनीय प्रचलनों की अवज्ञा के लिए साहसिक संकल्प। इसका शुभारम्भ शादियों से होने वाले अपव्यय को अमान्य ठहराने का सत्याग्रह।

(7) आलोक वितरण। युगान्तरीय चेतना से अपने संपर्क क्षेत्र को अवगत प्रभावित तथा प्रोत्साहित करना। जनमानस के परिष्कार में योगदान देना।

उपरोक्त सातों निर्धारण कार्य की दृष्टि से छोटे, सरल एवं सीमित हैं। इतने पर भी उनमें उन सभी प्रमुख सृजन सूत्रों का समावेश है जो अगले दिनों युग परिवर्तन के संदर्भ में विस्तारपूर्वक कार्यान्वित किये जाने हैं। सूत्रों का गम्भीर पर्यवेक्षण, तात्विक विवेचन करने पर सहज ही यह पता चल जाता है कि परिशोधन और परिष्कार के दोनों ही तथ्य निर्धारण में पूरी तरह गुँथे हुए हैं

बीज में वृक्ष विशेषताओं का समावेश रहता है। शुक्राणु में एक समग्र व्यक्तित्व अनेकों पीढ़ियों के उत्तराधिकार समेटे बैठा होता है। परमाणु एक समूचा सौर मण्डल है। उसके छोटे छोटे घटक सो परिवार के सदस्यों की विधि व्यवस्था का पूर्ण रूपेण परिपालन करते हैं। चिनगारी में दावानल की समस्त संभावनाएं विद्यमान रहती हैं। समुद्र की सारी विशेषताएँ एक बूँद का विश्लेषण करने पर भली−भांति देखी जा सकती हैं। सप्त सूत्री कार्यक्रम को सप्त ऋषियों का प्रतिनिधित्व करते पाया जायगा। उनमें सूर्य सात घोड़ों की तरह अपनी अपनी ऐसी विशेषताएँ जिन्हें एक सूत्र में पिरो देने पर सप्त रत्नों से बड़ी बहुमूल्य हार जितना मूल्याँकन किया जा सकता है छोटा या थोड़ा होना हीनता या असामंजस्य उत्पन्न न करता। छोटापन या पिछड़ापन तो निकृष्टता में है ही वह लंका की तरह स्वर्णनिर्मित एवं दैत्य दानवी पराक्रम से ही भरी पूरी क्यों न हो।

युग परिवर्तन के कुछ मूलभूत सूत्र हैं।

(1) आत्मा में परमात्मा स्तर की उदार उत्कृष्ट का अवतरण। महानता के अजस्र भण्डार जिस केन्द्र भरा पड़ा है। इसका नाम परब्रह्म है। आत्मा परमात्मा की एकता से क्षुद्र को महान बनने का अब मिलता है। लकड़ी आग की समीपता से अग्नि रूप जाती है। पारस छूकर लोहा सोना बनता है। चय की समीपता से झाड़ियाँ सुगन्धित होती है। स्वाति को धारण करने पर सीप में मोती बनते हैं। बिजली से जुड़ने पर बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर आदि उपकरण अपनी क्षमता प्रकट करते है। हिमालय से जुड़ी रहना ही गंगा की धारा सूखती नहीं। मिलने वाली नाली सके तो ऊँचे और नीचे जलाशयों की सतह समान होती देखी गई है। दूध से मिल जाने पर लोहखण्डों में भी चुम्बकत्व उत्पन्न होता है। पति−पत्नि की एकता से एक संयुक्त, विनिर्मित होता हैं। बड़ों के कन्धे पर बैठने से बच्चे का सिर बड़े से भी ऊंचा उठ जाता है। भगवान की समीपता उपासना यदि सही रीति से की जा सके तो उसके परिणाम भी ऐसे ही होते हैं जैसे कि उपरोक्त उदाहरणों से छोटों की बड़ों के साथ एकता होने पर विनिर्मित होते हैं। आत्मा अपूर्ण है। उसकी पूर्णता से वह समीपता अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है जिसे अध्यात्म भाषा में ‘उपासना’ कहा जाता है। महामानवों के संपर्क सान्निध्य अनुग्रह से अनेकों सामान्य व्यक्ति महान बने हैं। फिर परमात्मा सत्ता के साथ एकात्मता स्थापित करने वाले क्यों ऐसे लाभों से लाभान्वित न होंगे जैसे कि भक्तजनों में पाई जाने वाली विशेषताओं और विभूतियों के रूप में कहे, समझे और जाने जाते हैं।

आत्म शक्ति ही अगले युग की सर्वोपरि शक्ति होगी। इसके उपार्जन में जिस प्रयोग विनियोग की आवश्यकता पड़ेगी। उसे सामान्यतया उपासना कहते हैं। इन्हीं दिनों उसे युगावतार के अनुरूप प्रज्ञा आराधना कह सकते हैं। इसका अभ्यास इन दिनों करना ही होगा। मात्र सामर्थ्यों से ही इन दिनों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इन आवश्यकता की पूर्ति का छोटा श्री गणेश प्रज्ञा परिजनों के लिए निर्धारित प्रथम सूत्र में होता है।

उपासना इसलिए फलवती नहीं होती कि उसके साथ श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का त्रिविधि समन्वय नहीं होता। अन्न, जल, वायु शरीर के ऊर्जा प्रदान करते और जीवित रखते हैं। आत्मा को परमात्मा के साथ आदान−प्रदान स्तर की घनिष्ठता स्थापित करने के लिए श्रद्धा,प्रज्ञा और निष्ठा चाहिए। कर्मकाण्ड तो उसकी प्रयोग प्रक्रिया का वाहन वारण हैं। मात्र कृत्यों से तो शरीरगत हलचल का ही प्रमाण मिलता हैं। यह आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं। उपासनात्मक कर्मकाण्डों में अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकने की क्षमता जब आती है जब उसमें भाव संस्थान का श्रद्धा, विचार संस्थान की प्रज्ञा और शरीर संस्थान की व्यवहार गत निष्ठा का भी त्रिविधि समन्वय हो। यह त्रिवेणी संगम जहाँ भी बनेगा उपासना अपना चमत्कार दिखाये बिना न रहेगी।

प्रज्ञा परिजनों को उपासना की युग प्रक्रिया सीखनी, अपनानी और कार्यान्वित करनी होगी। इस आधार पर वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई बड़ा आश्रय अवलम्बन मिला है। अकेले नहीं रह रहे हैं किसी सर्वसमर्थ सत्ता की छत्र छाया में उनका चेतनात्मक अभ्युत्थान हो रहा है। स्मरण रहे यह आन्तरिक बलिष्ठता भौतिक समर्थताओं की तुलना में कहीं अधिक उच्चस्तर की और समस्त सम्पदाओं की तुलना में अधिक दूरगामी अधिक चिरस्थायी, सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है।

(2) आत्मिक प्रगति का दूसरा चरण है जीवन साधना। समझना होगा कि मनुष्य जीवन ईश्वर का सर्वोपरि उपहार और आत्मा को पूर्णता के परम लक्ष्य तक पहुँचा सकने वाला सुयोग सौभाग्य है। उसके साथ उज्ज्वल भविष्य की समस्त सम्भावना बीज रूप से समाविष्ट है। जो उपलब्ध है उसके स्वरूप, महत्व,उद्देश्य और सदुपयोग को समझना मनुष्य का अपना अनुत्तरदायित्व है। इसी विधि व्यवस्था को जानने न अपनाने के बदले ही अनेकों अभिशाप सहने पड़ते हैं, गया−गुजरा जीवन जीना पड़ता है। अभाव दरिद्र का पिछड़ापन और खिन्नता−विपन्नता का असन्तोष सिर पर लदा रहे इस लज्जास्पद स्थिति में पड़े रहने का एकमात्र कारण असंयम है। बहुमूल्य उपलब्धियों को भी यदि अस्त व्यस्त किया जाय, दुरुपयोग में गँवाया जाय तो वह वैभव लाभ के स्थान पर हानि ही उत्पन्न का करेगा। जीवन अकेला ही नहीं मिला है। उसके साथ चार शक्ति भण्डार भी अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए साथ आये हैं। प्रश्न इतना ही है कि कौन उनका उपयोग किस रूप में करता है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बनते देखा गया है। जीवन सम्पदा को अनगढ़ अस्त व्यस्त रहने दिया जाय और गुण,कर्म, स्वभाव की निकृष्टता के गर्त में उसे धकेला जाय तो उस दुर्गति का परिणाम दुर्गति ही होगा। अन्तःक्षेत्र में कुसंस्कारिता पनपे और निकृष्टता को भ्रष्टता−दुष्टता के कुकृत्य करते रहने की छूट मिले तो समझना चाहिए कि सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने की रीति−नीति अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने की तरह अपनाई जा रही है।

जीवन के साथ चार विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं।(1) समय (2)साधन (3) चिन्तन(4) पराक्रम। इन चारों को अपव्यय से रोककर सदुद्देश्यों की पूर्ति में नियोजित करने का नाम ही साधना है। जो इसे कर सके वे धन्य हो गये। जिसने इस उत्तरदायित्व की अवहेलना की वे सौभाग्य में बदलने वाली अवाँछनीयता अपनाकर शोक−सन्तापों को सहते असन्तोष तिरस्कार की भट्टी में झुलसते, अपनी और साथियों की दुर्गति कराते, रोते−कलपते, हाथ−मलते इस दुनिया से चले गये। बुद्धिमत्ता का एक ही प्रधान चिन्ह है कि जो हस्तगत है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे किया गया? जो इतना कर लेते हैं उन्हें प्रामाणिक ठहराया जाता है और हाथों हाथों पदोन्नति का लाभ मिलता है।

जीवन साधना को व्यावहारिक जीवन की तपश्चर्या कहा गया है। तप को चमत्कारी शक्ति की फलश्रुति धर्मशास्त्री और आप्त वचनों में विस्तारपूर्वक समझाई गई है। दृष्टि पसार की−प्रगतिशील महामानवों की− रीति−नीति का पर्यवेक्षण करके यह जाना जा सकता हैं कि उन्हें अभ्युदय−लाभ का सुअवसर आसमान से टूटकर नहीं मिला है। इसके लिए उन्होंने अनगढ़ को सुगढ़, अस्त−व्यस्त को सुव्यवस्थित। पतन को उत्थान में परिणति करने का प्रचण्ड पराक्रम किया है। तप यही है। संचित कुसंस्कार और अनगढ़ जन समुदाय का परामर्श प्रचलन सदा पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को भड़काते हैं। उनका प्रतिरोध करते हुए,दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे और अपने चिन्तन और चरित्र को आदर्शवादिता के ढाँचे में ढाल लेना यही है जीवन साधना का उपक्रम। इसमें अपनी अनगढ़ आदतों से जूझना पड़ता है। पतनोन्मुख चिन्तन प्रवाह को उलटना पड़ता है। लोक प्रचलन की अपेक्षा करने आत्मावलंबन के सहारे नये सिरे से नई रीति−नीति अपनाने और उसे हठपूर्वक अभ्यास में उतारने वाले संकल्प साहस को प्रखर करना पड़ता है, जो इतना कर सके उन्हें सुनिश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति का अवसर मिला है। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की त्रिविधि सिद्धियाँ उन्हें सुनिश्चित रूप से उपलब्ध हुई हैं।

जीवन साधना का तात्पर्य उपलब्धियों के दुरुपयोग को रोककर सदुपयोग में लगाने के महाभारत में विजय प्राप्त करना है। अर्जुन को इसी में प्रवृत्त किया गया था हनुमान को यही सौंपा गया था। लंका में दुरुपयोग होने वाले वैभव जब रामराज्य में नियोजित हुआ तो सारी परिस्थितियाँ ही उलट गई। दुस्साहस को उलट कर जब परिस्थितियाँ ही उलट गई। दुस्साहस को उलट कर जब परिक्षित ने महान भरत का लक्ष्य पूरा किया जो काया −कल्प जैसा परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ। हर जीवन में इसी चुनौती को स्वीकार करने न करने की परीक्षा जुड़ी रहती है। हारने वाले मुँह लटकाये और जीतने वाले गर्वोन्नत मस्तक किये, सीना ताने,घूमते है और हर ओर से सम्मान सहयोग पाते हैं।

समय, साधन, चिन्तन और पराक्रम की चार सम्पदाएँ हर किसी को जन्म के साथ ही उपलब्ध हुई हैं। यह विभूतियां ही कामधेनु गौ है। इनका दूध जो छेद वोल बर्तन में दुहते और उसे जमीन पर गिराते,कपड़ों पर टपकाते हैं और खाली हाथ रहने का रोना रोते हैं उन अभागों को यही समझना पड़ेगा कि इसमें परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं अपनी कुमार्ग गामिता, मति भ्रष्टता ही निमित्त कारण है। इसे उलटेपन को उलट कर सीधा किया जा सके तो दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलते देर न लगे।

प्रज्ञा परिजनों को अपनी गतिविधियों में जीवन साधना के उपक्रम का समावेश करना होगा। चिन्तन और व्यवहार में घुसी हुई अवाँछनीयता का निरीक्षण उठाना होगा। दूसरा पूरक का दम यह है कि जो नहीं है उसे किस प्रकार उपार्जित उपलब्ध किया जाय। यही है परिशोधन और परिष्कार की उभयपक्षीय प्रक्रिया जिसे अपनाकर लैफ्ट राइट करते हुए सर्वतो मुखी प्रगति एवं सुख−शांति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अध्यात्म नगद धर्म है। इसका प्रतिफल पाने के लिए मरणोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती,वह उस हाथ दे इस हाथ ले की उक्ति के अनुरूप क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। जीवन साधना कल्पवृक्ष की आराधना है। इसे किसी न किसी रूप में प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को इन्हीं दिनों आरम्भ करना चाहिए और उसके प्रतिफल का सौभाग्य सूर्योदय जैसा आनन्द लेना चाहिए।

(3) उपासना को अध्यात्म कहते हैं और जीवन साधना को धर्म−धारणा। उपासना से आस्था उच्चस्तरीय बनती है और साधना से व्यवहार में शालीनता उभरती है यह दोनों तत्वतः आस्थाएँ हैं। जिन्हें भाव संस्थान और मनःसंस्थान में प्रतिष्ठित करने के उपरान्त गाड़ी आगे चलती हैं। इस स्थिति पर पहुँचने से ही आदर्शवादिता अपना चमत्कार दिखाती है।

प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि निर्धारण को परिपक्व करने वाला अभ्यास कहाँ किया जाय? इसका एक ही उत्तर है−परिवार की पाठशाला प्रयोगशाला में। अंग अवयवों की तरह हर व्यक्ति के साथ परिवार जुड़ा होता है। परिवार जुड़ा होता है। विवाहित, बाल−वृद्ध,नर नारी सभी परिवार में रहते हैं। भले ही वह वंश परम्परा से विनिर्मित हों अथवा जिनके साथ निर्वाह चलता है उनके आधार पर इस समुदाय के साथ व्यवहार करने में अपने गुण, कर्म,स्वभाव में सुसंस्कारिता समावेश करने का तालाब में − कसरत का अखाड़े में, अन्वेषण का प्रयोगशाला में,अध्ययन का पाठशाला में और कृषि कौशल का खलिहान में अभ्यास किया जाता है। ठीक इसी प्रकार सत्प्रवृत्ति को अपने स्वभाव का अंग बनाने और उस दिव्य अनुदान से सहचरों को कृत कृत्य करने का अभ्यास परिवार परिकर में सरलतापूर्वक बन पड़ता है।

कुटुम्बियों को सभी प्यार करते हैं। उन्हें प्रसन्न और सुखी देखना चाहते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इसके लिए सुविधा बढ़ाने भर से काम नहीं चलता। इसमें अति बरसने पर तो दुष्प्रवृत्तियाँ पनपने और व्यक्ति याँ पनपने और व्यहक्ति त्व में बना देने जैसी विडंबना उठ खड़ी होती है। सच्ची सम्पन्नता सुसंस्कारिता है। उसे परिजनों के स्वभाव में उतारा जा सके तो समझना चाहिए कि कुबेर जितना वैभव कुटुम्बियों को प्रदान करने का सुयोग बन पड़ा। दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ भी रच जाते हैं। कुटुम्बियों को सुसंस्कारी बनने के प्रयास में मात्र उपदेश काम नहीं करते। अपने को उदाहरण बना कर ही किसी को चरित्र निष्ठा सिखाई जा सकती है। परिवार निर्माण के सम्बन्ध में भी यही बात है। गृह संचालक अपने में सत्प्रवृत्तियों का समावेश करने पर ही कुटुम्बियों पर यह प्रभाव दबाव डालते हैं कि उन्हें सज्जनोचित शालीनता से अभ्यस्त कुटुम्बियों को अवाँछनीय दुलार देकर बिगाड़ना हो तो बात दूसरी है अन्यथा एक आँख प्यार की, दूसरी सुधार की,रखकर ही योजनाबद्ध रीति से घर के लोगों को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में प्रयत्नरत रहना होगा। परिवार एक छोटा राष्ट्र है उसे बना लेना एक छोटे रूप में राष्ट्र निर्माण का ही पुण्य परमार्थ है। इसके लिए जितना सम्भव हो उतना प्रयास प्रज्ञा परिजनों को इन्हीं दिनों में आरम्भ करना होगा।इस प्रयास से आत्म निर्माण परिवार निर्माण और समाज निर्माण के तीनों ही उद्देश्य एक महत्वपूर्ण अंश में पूरे होते हैं।


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पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिदृ ष्टास्यनान्यनुष्ठितकर्मणा॥—विवेक.—55

अर्थात्—’पथ्य और औषधि को सेवन करने वाला रोगी ही आरोग्य लाभ प्राप्त करते देखा गया है,न कि किसी और के द्वारा किये हुए (औषधादि सेवन) कर्म से वह निरोग होता है। इसी प्रकार आत्म−कल्याण के लिए स्वयं ही प्रयास करना होता है।


प्रज्ञा परिजनों के लिए निर्धारित सप्तसूत्री कार्यक्रम-2

भाव क्षेत्र में उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धा सम्वर्धन की उपासना−चिन्तन और चरित्र में शालीनता की− महाप्रज्ञा का समावेश करने की− जीवन साधना का समन्वय ही प्रकारान्तर से आत्म−निर्माण है। अग्रगामी सूर्य प्रथम इन शाश्वत लक्ष्यों को निजी जीवन में प्रतिष्ठापित करके सर्वसाधारण को यह विश्वास दिला सकने में समर्थ होंगे कि यह प्रयोग ने केवल सरल और सरस है वरन् हाथों−हाथों सत्यपरिणाम प्रदान करने वाला भी है। व्यक्तित्व में गरिमा का संवर्धन इतना बड़ा उपार्जन है जिसकी तुलना हजार मन रत्नराशि एकत्रित करने से भी भारी सिद्ध होती है।

परिवार निर्माण वस्तुतः आदर्शों को व्यवहार में उतारने का सर्वसुलभ किन्तु सर्वोत्तम कार्यक्षेत्र है उसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही साथ साथ सधते हैं। साथियों का कुटुम्बियों का हित साधन मनुष्य की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति है। सहकारी उदारता के आधार पर भी प्रगति पथ पर चलते चलते मनुष्य यहाँ तक आ पहुँचा है। उसकी अभिवृद्धि में हर दृष्टि से कल्याण ही कल्याण है अपना भी− पराया भी। कुटुम्ब के क्षेत्र में यदि सत्प्रवृत्तियों को बोया उगाया जा सकेगा तो शालीनता की हरियाली उत्पन्न होगी और सर्वतोमुखी सुख शान्ति की फसल धन−धान्य से कोठे भरेगी। प्रज्ञा परिजनों की उपासना जीवन साधना और परिवार निर्माण की आराधना करते हुए अन्तरंग, बहिरंग और पारिवारिक क्षेत्र को किस प्रकार समुन्नत बनाना चाहिए। इसकी विद्या सीखनी और कार्य रूप में परिणति करनी होगी। अभ्यास के कारण ही यह प्रयोग कठिन प्रतीत होता है, पर जब उस असमंजस को दूर कर नव निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया जायगा तो प्रतीत होगा कि जो कठिन समझा जाता रहा यहां कितना सरल है। जिस नीरस माना गया था वह कितना सरस है। जिसमें घाटा प्रतीत होता था वह कितना लाभदायक है अवाँछनीयता अपनाने में बुद्धिमानी और आदर्शों के अवलम्बन में मूर्खता समप्र जाने को लोक मान्यता की असत्यता प्रज्ञा परिजन इस दिशा में कुछ ही कदम उठाने के उपरान्त भला प्रकार सिद्ध कर सकते हैं।

(4)प्रज्ञा परिजनों के लिए निर्धारित सप्तसूत्री योजना में चौथा सूत्र है शिक्षा− संवर्धन। यह कार्य अपने आप से अपने परिवार में भी आरम्भ किया जा सकता है। समझा जाना चाहिए का सम्पदाओं में ज्ञान की गरिमा सर्वोपरि है भौतिक जानकारियाँ देने वाली शिक्षा जिनने जितनी अर्जित की है वे उसी अनुपात में गर्व गौरव अनुभव करत हैं, साथ ही आजीविका उपार्जन में भी उसके सहारे अपेक्षाकृत अधिक सफल रहते हैं। स्वास्थ्य के बाद संपदा को नहीं शिक्षा को महत्व मिलना चाहिए। शरीर ही नहीं −मनःसंस्थान भी प्रगति और गरिमा का दूसरा आधार स्तम्भ है। इसलिए भोजन वस्त्र की तरह मानसिक समर्थता के लिए शिक्षा को अनवरत प्रबन्ध होना चाहिए। इसमें विराम नहीं लगना चाहिए, जब हर दिन भोजन की आवश्यकता शरीर को पड़ती है तो मस्तिष्क ज्ञान क्षुधा बुझते रहने का अनवरत क्रम क्यों नहीं चलना चाहिए।

आवश्यक नहीं कि स्कूली शिक्षा परीक्षा के आधार पर पिटने वाली लकीर का ही अनुसरण किया जाए। नौकरी भर के काम आने वाले इस भार जंजाल से बचा भी जा सकता है और जीवन के हर पक्ष को समुचित दिशा देने वाले सद्ज्ञान का स्वाध्याय क्रम अधिक उपयोगी मानकर विद्यार्जन की तरह दिनचर्या में सम्मिलित रखा जा सकता है।

यह प्रयोग परिवार के हर सदस्य पर कार्यान्वित होना चाहिए। निरक्षरों को पढ़ाया जाय। साक्षरों की आगे की पढ़ाई जारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। जो वैसा नहीं कर सकते उन्हें सुनाया जाय। जिनकी शिक्षा काम चलाऊ है उन्हें विद्या के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। विद्या का अर्थ है− चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने वाले तथ्यों को तर्क और प्रमाणों के आधार पर हृदयंगम कर सकने में समर्थ विचार पद्धति। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग दो प्रयोग बताये गये हैं। इन दिनों यह दोनों ही प्रयोजन सत्साहित्य से पूरे हो सकते हैं। सत्संग की सान्निध्य परक प्रक्रिया तो अब दुर्लभ होती जा रही है। उपयुक्त व्यक्ति यों की उपस्थिति की उपस्थिति हर घड़ी कहाँ सम्भव हो सकती हैं? उनका साहित्य ही अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करता है। प्रेस प्रकाशन ने उसे सुलभ भी बना दिया है।

निजी जीवनचर्या तथा परिवार की विधि व्यवस्था से शिक्षा संवर्धन का वातावरण बनना चाहिए। उसका प्रयोग उत्साहपूर्वक चलना चाहिए। एक दूसरे को पढ़ाने सुनाने में सहयोग दें। इसे घर की समृद्धि प्रतिष्ठा और सुखद सम्भावना का अंग मानकर चले। गृह संचालक स्वयं स्वाध्यायशील रहे और परिवार के लिए जिस प्रकार निर्वाह साधन जुटाये जाते हैं उसी प्रकार अध्ययन अध्यापन में भी समय एवं धन का एक अंश लगता रहे इसकी गुंजाइश निकालें।

अपने देश में 70 प्रतिशत निरक्षर हैं। साक्षर भी स्वाध्यायशील नगण्य-सी संख्या में हैं। आर्थिक दरिद्रता में भी अधिक कष्टकर स्थिति है। शिक्षित भी पिछड़े रह सकते हैं किन्तु प्रगतिशील बनने के लिए शिक्षा की अनिवार्य आवश्यकता रहेगी। मस्तिष्कीय विकास के बिना न तो दूरदर्शिता बन पड़ती है और न विचारणा भावना को ही सुनिश्चित दिशाधारा मिलती है। इस तथ्य को समझा जाना चाहिए और शिक्षा संवर्धन के लिए व्यक्तिगत एवं पारिवारिक दिनचर्या में समुचित स्थान रखने के लिए कोई न कोई मार्ग खोज निकालना चाहिए।

(5) राष्ट्रीय आवश्यकताओं में एक महती आवश्यकता हरितिमा अभिवर्धन की है। समझा जाना चाहिए कि मनुष्य जीवन हरितिमा पर निर्भर है। वनस्पति ही अन्न है। हवा में जीवनदात्री प्राण वायु ओषयन का अनुदान उसी के द्वारा जुड़ता है। ईंधन न हो तो चूल्हा कैसे जले। चारपाई कैसे बने। किवाड़ कहाँ से लगें। विवश करने की आकर्षण शक्ति वृक्ष वनस्पतियों में ही होती है। रेगिस्तानी इलाके पेड़ न होने कारण ही बने हैं। वर्षा और आँधी से होने वाले भूमि क्षरण को पेड़ ही रोकते हैं। फल फलों से लदे रहकर वे शरीर को पोषण एवं मन को उल्लास प्रदान करते हैं। उनकी छाया में अगणित प्राणियों को आवास मिलता है। थकान को उतारने में तरु छाया से बढ़कर और कोई उपचार नहीं।

रोटी,कपड़ा और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। शरीर को अन्न, जल और प्राण वायु चाहिए। इन सभी को वनस्पति जगत से ही उपलब्ध किया जाता है। पशुओं को मनुष्य जीवन का साझीदार माना जाता है। उनके दूध,माँस श्रम, चर्म गोबर आदि का उपयोग मानवी निर्वाह के अविच्छिन्न अंग बने हुए है। किन्तु स्मरण रखा जाय मनुष्य की तरह पशु भी वनस्पतियों के आधार पर जीवित हैं। संसार में जितना भी जीवन दृष्टिगोचर होता है उसे जल से उत्पन्न तो कहा जा सकता है, पर उसे जल से उत्पन्न तो कहा जा सकता है,पर उसे स्थिर और अग्रसर रखने में वनस्पतियों का ही असंदिग्ध योगदान है। मनुष्येत्तर प्राणियों में पशु पक्षियों को कृमि कीटकों को ही नहीं वृक्ष वनस्पतियों को भी सम्मिलित समझा जाना चाहिए।

तथ्यों को समझने के उपरान्त हर किसी का कर्त्तव्य हो जाता है कि जिस वनस्पति का हम अनेकानेक माध्यमों से जीवन धारण करने में उपयोग करते हैं उनको उगाने बढ़ाने के उत्तरदायित्व को भी समझें अन्यथा खर्च होता रहे,उपार्जन न बढ़े तो दिवालिया बनने जैसा संकट उत्पन्न होगा। चिकित्सा उपचार के लिए प्रायः जड़ी बूटियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। उपेक्षा बरतने पर तो यह सारी जीवन सम्पदा घटती और समाप्त होती चली जायगी। हरितिमा मरेगी तो प्राणि समुदाय भी जीवित न रहेगा और तब मनुष्य का अस्तित्व बच सकना भी असम्भव है।

इन दिनों सामयिक संकट के रूप में दो कठिनाइयाँ भयावह रूप में सामने उपस्थित हैं (1) बढ़ता हुआ प्रदूषण और (2) भयावह कुपोषण। कल कारखाने जिस प्रकार विष धूम्र उगलते हैं। अणु परीक्षणों से जैसे विकरण बढ़ते हैं उससे दम घुटने का संकट बढ़ता ही जा रहा है इसका प्रतिकार परिशोधन वृक्ष वनस्पतियों से निकलने वाली प्राण वायु ही करते हैं। पेड़ घिर जाते और अमृत उगलने वाले प्रत्यक्ष शिवशंकर हैं उनका नीलकंठ ही इस प्रदूषण विषाक्तता को पचा सकता है और प्राणियों के सर्वनाश पर उतारू प्रदूषण विष के महादैत्य के त्रास दिला सकता है।

भोजन में कृत्रिमता बढ़ती जा रही है। सूखा, जला, भुना खाने की आदत ने खाद्य पदार्थों का जीवन रस समाप्त कर दिया है और वे मसालों की भरमार से विषैले कोयले की तरह पेट में जाते हैं पेट पर लदते ही हैं पर पोषण तनिक भी प्रदान नहीं करते। यही है कुपोषण की समस्या जिसके कारण बालकों से लेकर वृद्धों तक सभी की दुर्बलता तथा रुग्णता का अभिशाप करना पड़ता है। इसका प्रतिकार न टॉनिक कर सकते है और न मारक औषधियाँ कारगर हो सकती हैं। अत्यधिक समाधान हरितिमा युक्त वनस्पतियाँ ही है जिनका प्रयोग बढ़े तो संकट कटे। प्रयोग तब बढ़े जब उत्पादन उभरे। इस संदर्भ में हममें से हर किसी को निजी क्षेत्र में कुछ करना पड़ेगा। किसानों, मालियों, भूस्वामियों की, शासकों की प्रतीक्षा में बैठे रहने से काम कैसे चलेगा। भूख बुझाने के लिए अपना ही मुँह चलाना पड़ेगा। पढ़ने के लिए अपने ही मस्तिष्क पर दबाव डालना होगा। हरितिमा उत्पादन में हममें से प्रत्येक का योगदान होना चाहिए। भले ही वह न्यूनतम −प्रतीकात्मक ही क्यों न हो।

घरों में आँगन बाड़ी, छप्पर बाड़ी,छत बाड़ी लगाकर शाक भाजी फल फुलवारी लगाने उगाने का काम सहज ही किया जा सकता है। पूरे परिवार के लिए नित्य हरी चटनी उपलब्ध करने जितना धनिया पोदीना, पालक, ब्याज, अदरक, हरी मिर्च, तो खिलते खिलते उगाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त तुलसी का बिरवा आँगन में लगाकर न केवल जड़ी बूटी समुदाय के प्रति अपनी अभिरुचि परिष्कृत की जा सकती है वरन् देवता के रूप में वनस्पति को मान्यता देने वाली धर्म श्रद्धा का भी इस आधार पर विस्तार हो सकता है। प्रदूषण का शमन करने और घरेलू उपचार के रूप में तो तुलसी का असंदिग्ध उपयोग है ही। प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक की प्रवृत्ति इस दिशा में गतिशील रहनी चाहिए।

(6) सत्प्रवृत्ति संवर्धन की पूरक है−अवाँछनीयता उन्मूलन। सामाजिक कुरीतियों के रूप में प्रगति पथ के भारी चट्टान सामने खड़े हैं। उन्हें विकसाये बिना आगे बढ़ने का रास्ता रुका ही पड़ा रहेगा। अपना पिछड़ापन राजनैतिक या आर्थिक कारणों पर टिका हुआ नहीं है उसका प्रमुख कारण है सामाजिक प्रचलनों में अवाँछनीयता की भरमार। इनके कारण इतना समय, श्रम और धन खर्च होता है कि पेट भरने के उपरान्त अपव्यय की सबसे बड़ी मद यहीं रह जाती है उपार्जन प्रायः इसी भट्टी में जलता रहता है।

सभी जानते है कि खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं उस प्रचलन के कारण गरीबों की सुयोग्य बेटियाँ भी दर दर ठुकरा जाती और अपमान नफे में नहीं रहते। लूट का माल तो धूम धमाके की बारूद में समाप्त हो जाता है साथ ही जेवर, कपड़े आदि में घर की पूँजी भी फँसानी पड़ती है दूसरे का घर की पूँजी भी फँसानी पड़ती है। दूसरे का घर उजाड़ कर अपना घर भर लेते तो भी एक बात थी पर मूर्खता और दुष्टता का सह दुहरा समन्वय उसे भी तो नहीं बनने देता।

इसी प्रकार की अन्यान्य कुरीतियों की अपने समाज में भरमार हैं। पर्दा प्रथा ने आधे समाज को अपंग असमर्थ, एवं कैदी बंदी की स्थिति में लटका पटका हैं। वे पुरुष की तरह ही समाज की प्रगति में भागीदार हो सकती थी, पर आधी जनता को बंधी बनाये रहने वाली अनाचार निरंकुशता कुछ करने दे तब लड़की लड़की के बीच बरता जाने वाला भेदभाव मानवी आदर्श की छाती चीरता है।

जाति−पाँति के नाम पर बरसी जाने वाली ऊँच नीच, मृतक भोज, भिक्षा व्यवसाय −भाग्यवाद − भूत प्रेत− टोना टोटका जैसे असंख्यों कुप्रचलन तथा अन्ध विश्वास अपने समुदाय पर हावी हैं। उनके विरुद्ध आवश्यकता इस बात की है कि संगठित रूप से इनके विरुद्ध धर्मयुद्ध छेड़ा जाय, किन्तु यदि वैसी व्यवस्था न बने। विरोध संघर्ष का उपक्रम न बैठे तो इतना तो हो ही सकता है कि उनसे असहयोग बरता जाय। समर्थन न दिया जाय। जो रोके जा सके उन्हें समझाया रोका जाय या कोई न माने तो उतना तो पूर्णतया अपने हाथ में है कि उस अनाचार में सम्मिलित रहकर पाप का भागी न बना जाय। अपने घर में अपने प्रभाव का उपयोग करके ऐसा कुछ किया जाना चाहिए कि कुरीतियाँ मिटें या घट सकें वे अपने घर परिवार से ही विदा करने का प्रयत्न किसी न किसी रूप में चल ही पड़े।

(7) सातवाँ निर्धारण है− आलोक वितरण। जो प्रेरणा से युग परिवर्तन केन्द्र तन्त्र से मिलती है उसे अपने सीमित न रहने देकर अपने संपर्क क्षेत्र में आगे बढ़ाया जाय। चन्द्रमा में अपना प्रकाश नहीं है, पर वह सूर्य से उधार लेकर रात्रि को प्रकाशवान होता है। लाउडस्पीकर में अपनी वाणी नहीं, पन वह दूसरों की नन्हीं-सी आवाज को लाखों के कान तक पहुँचाने की भूमिका निभाता है। युगान्तरीय चेतना का प्रादुर्भाव सशक्त केन्द्र से हो रहा है, पर उसे सफल सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि जिन्हें मिले वे उस आलोक को अपने प्रभाव क्षेत्र में—सहज संपर्क में आने वालों तक पहुँचायें। लहरें एक दूसरे को आगे धकेलती हुई जलाशयों की शोभा बढ़ाती को भी अपनानी चाहिए। ज्ञान यज्ञ की भागीदारी—प्रज्ञा अभियान की साझीदारी के लिए आवश्यक है कि लोक मानस के परिष्कार के युग धर्म को पूरा करने के लिए अपनी स्थिति और सामर्थ्य के अनुरूप कुछ न कुछ प्रयास किया ही जाय।

प्रज्ञा परिजन उन्हीं को कहा गया है जो प्रज्ञा साहित्य को नियमित रूप से पढ़ते है। मिशन की पत्रिकाएँ इस पुण्य प्रयास में निरन्तर संलग्न है। छोटी−बड़ी पुस्तकें भी इस प्रयोजन की पूर्ति में भारी योगदान देती हैं। इसे मँगाने और पढ़ने का क्रम तो अपनाया ही जाता रह है। सामग्री मंगाई जाती है उससे कुछ अधिक मंगाई जाय और जिनके साथ अपना सहज संपर्क है उन्हें पढ़ाने सुनाने के लिए क्रमबद्ध योजना बनाई जाय।

घर के लोगों में से एक भी ऐसा न बचे जो घर में संग्रहित तथा नियमित रूप से आने वाले साहित्य को रुचिपूर्वक पढ़ने से जी चुराये। अपनों को अच्छे भोजन वस्त्र का लाभ दिया जाता है तो उन्हें सत्प्रेरणा देने वाले साहित्य के प्रति भी लगाव उत्पन्न करना चाहिए। जो न संपर्क में कुछ लोग तो रहते ही हैं। व्यवसाय कि सिलसिले में कुछ लोग तो मिलते जुलते रहते ही। इनमें से जिनमें सुरुचि के थोड़े से भी चिन्ह दृष्टिगोचर हो उन्हें धीमे से अपनी प्रज्ञा साहित्य का चस्का लगाना चाहिए। पढ़ने देने और वापिस लेने में कुछ अतिरिक्त समय नहीं लगता है। माहात्म्य बताने, स्मरण दिलाने और हल्का-सा अनुरोध करने पर वह प्रक्रिया चल पड़ती है जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत ‘झोला पुस्तकालय’ कहा जाता है।

बात छोटी-सी है पर उसके सत्यपरिणाम कुछ ही समय में फलित होते देख जा सकते हैं। जो पढ़ेगा सो प्रभावित ही नहीं होगा अपने को बदलेगा भी। इस परिवर्तन में बदलने वाले का − समूचे समाज का परोक्ष किन्तु असाधारण लाभ है। कहना न होगा कि इस पुण्य परमार्थ के भागीदार वे सभी प्रज्ञा परिजन हो सकते हैं जो आलोक वितरण की हल्की-सी प्रक्रिया को अपने दैनिक क्रिया कलाप को सम्मिलित कर लें।


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नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वापर्यनिंगात़। एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वाँस्त −स्यैष आत्मा विशते ब्रह्मा धाम॥

अर्थात्− यह आत्मा निर्बलों द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता है और न प्रमाद या निरुद्देश्य किये गये तप से ही प्राप्त किया जा सकता है। जो ज्ञानी साधक इनके विपरीत बल, अप्रमाद तथा सोद्देश्य किये गये तप के द्वारा यत्न करता है वही इस आत्मा का दर्शन कर पाता हैं।


डडडड

इसे विधि विडम्बना ही कहना चाहिए कि बहिर्मुखी इन्द्रियों पर निर्भर मस्तिष्क की दृश्यमान सत्ता ही परिलक्षित होती है। अदृश्य उपेक्षित ही परिलक्षित होती है। अदृश्य उपेक्षित ही पड़ा रहता है। जबकि प्रत्यक्ष की तुलना में परोक्ष की सामर्थ्य अत्यधिक है। शरीर दीखता है, आत्मा नहीं। वर्तमान दीखता है भविष्य नहीं। स्वाद दीखता है अपच नहीं। वासना दीखती है जर्जरता नहीं वैभव दीखता है व्यक्तित्व नहीं। इसी को बुद्धिमान द्वारा अपनाई गई मूर्खता कह सकते हैं। विवेक युक्त दूरदर्शिता अपनाई जा सके तो ही प्रेय की तुलना में श्रेय का महत्व मिल सकता है। दैवी अनुग्रह में जिस वरदान की अपेक्षा की जानी चाहिए उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा दूरदर्शी विवेक शीलता ही माना गया है। देवताओं के पास देने के लिए उच्चस्तरीय प्रेरणा भर है। शेष उपलब्धियाँ तो मनुष्य के उस पराक्रम का प्रतिफल हैं जिसकी अजस्र क्षमता उसे जन्मजात उपहार के रूप में अनायास ही उपलब्ध है।

अन्तः प्रज्ञा जगे तो एक सूझ सूझे कि शरीर और उससे सम्बन्धित साधन एवं कुटुम्बी ही सब कुछ नहीं हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में ही सफलता की इति श्री नहीं हो जाती,वरन् करने योग्य एक और भी बड़ा काम है− आत्मोत्कर्ष। इसके लिए अपनाये जाने वाले उपाय अवलम्बनों में प्रमुखता उपासना की है। सृष्टा की अगणित क्षमताएँ इस विश्व ब्रह्माण्ड की दृश्य और अदृश्य गति विधियों का सूत्र संचालन करती है उनमें से एक सत्ता है−परमात्मा। यह आत्मा के चरम उत्कर्ष की परिणति है। आत्मा के चरम उत्कर्ष की परिणति है आत्मा क्षुद्र है परमात्मा महान। आत्मा सीमित है—परमात्मा असीम। आत्मा की लिप्साएँ घेरे रहती है—कषाय−कल्मष चढ़े रहते हैं−लोभ,मोह के भव−बंधन जकड़े रहते हैं। किन्तु परमात्मा की उत्कृष्टता इससे बहुत आगे की है। वह आदर्शों की समुच्चय है। परब्रह्म के इस अंश की उपासना आत्मा की करनी होती है। समग्र परमेश्वर तो अचिन्तय है। साक्षी, दृष्टा भी। उसकी व्यापकता और विधि −व्यवस्था तो मानवी बुद्धि की कल्पना से भी परे हैं। इसलिए परब्रह्म की सत्ता के साथ जुड़े हुए अनुशासन का निर्वाह की पर्याप्त माना जाता है उपासना परमात्मा की,की जाती है। परमात्मा का अर्थ फिर एक बार समझ लेना चाहिए। विराट्−महान उदात्त। उसे आदर्शों का समुच्चय कह सकते हैं। उसके साथ सम्बन्ध स्थापित करने का नाम ही प्रतिफल है− संकीर्ण स्वार्थपरता से मुक्ति। व्यक्तित्व में श्रद्धा,प्रज्ञा, निष्ठा की सन्तोषजनक मात्रा में अभिवृद्धि। अंतःक्षेत्र की विशिष्टताओं को विभूतियाँ कहते हैं। जहाँ वे रहेगी वहाँ सफलताओं−सम्पदाओं की कमी न रहेगी। फूल खिलता है तो तितलियाँ, मधु मक्खियां अनायास ही उससे लिपटने दौड़ पड़ती हैं। महानता अपने साथ ऋषि सिद्धियों का परिकर भी समेटे रहती है। आत्मोत्कर्ष के साथ वैभव भी रहता है। यह दूसरी बात है कि कोई उदात्त सम्वेदनाओं से प्रेरित होकर उसे उपभोग की अपेक्षा परमार्थ प्रयोजनों में लगा दे। आत्मवान् विभूतिवान् भी होते है। उपासना की दिशा में कदम बढ़ाने का तात्पर्य है आत्मा में महानता के समावेश का उपक्रम इससे तत्काल प्रत्यक्ष कितना लाभ होता है। इसका तो निश्चय नहीं किन्तु कुछ ही कदम बढ़ने पर समय को बर्बादी जैसा असमंजस दूर हो जाता है। बीज बोकर धैर्य पूर्व अंकुर उगने और समयानुसार फसल पकने पर विश्वास करने वाले किसान जैसी मनःस्थिति उपासना मार्ग पर चलने वाले की भी हो जाती है।

स्तोत्र पाठ की चापलूसी और पूजा पत्री को रिश्वत मानकर जो देवता को बरगलाने फुसलाने की बाल बुद्धि अपनाये रहते हैं, उन्हें लाटरी ने फलने की तरह निराशा भी होती है। जिनने तन्त्र मन्त्र को मनोकामना पूर्ति की जादूगरी समझा है और राई जैसी क्रिया−कृत्य के बदले कर्मफल की मर्यादा को लाँघकर मनमानी ऋद्धि−सिद्धियाँ समेटने का दिवास्वप्न गढ़ा है उनका निराश होना स्वाभाविक है। संसार के हाट बाजार में हर बाजार में हर वस्तु उचित मूल्य पर खरीदी बेची जाती है। देवता भी इस विधि− व्यवस्था से अनुशासन मुक्त नहीं हैं। कोई मन्त्र−तन्त्र ऐसा नहीं है जो पात्रता उपार्जन किये बिना मनचाही सफलताएँ लाकर हथेली पर रख दे। अध्यात्म प्रबल पुरुषार्थ का नाम है जिसमें आत्म परिष्कार के लिए महाभारत जैसी लड़ाई लड़नी पड़ती हैं। इस अग्निपरीक्षा में जो उत्तीर्ण होते है वे खरे सोने की तरह अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करते और मन्डी में महंगे मोल बिकते हैं। यही है आध्यात्मिक उपलब्धियों का तत्वदर्शन राजमार्ग, विधि−विधान और सुनिश्चित निर्धारण। जो इस झंझट से बचाकर मनुहार के सहारे बहुत कुछ झटक लेने का जाल−जंजाल बुनते रहते हैं वही तथाकथित ‘भक्त जन’ रोते−कलपते पाये जाते हैं। आत्मा का परमात्मा स्तर तक पहुँचाने के लिए अपनाया गया उपासना उपक्रम सुनिश्चित आधार पर अवलम्बित सुनिश्चित विज्ञान है। उसमें न भटकाव है न दिवास्वप्न देखने का जंजाल। पुरुषार्थ का प्रतिफल हर क्षेत्र में सुनिश्चित है फिर आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में ही क्यों कोई व्यतिरेक खड़ा होगा।

प्रज्ञा परिजनों को इस तथ्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और जिस प्रकार अभाव को वैभव में बदलने के लिए सतत् प्रयत्न किया जाता है उसी प्रकार आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाने के लिए भी दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर— उपासनात्मक पुरुषार्थ का अवलम्बन करना चाहिए। इसके लिए लक्ष्य−इष्ट−निर्धारण करना होता है। भारत की सनातनी परम्परा में वह महाप्रज्ञा के रूप में ही निर्धारित है। गुरु मन्त्र गायत्री है। संध्या−वन्दन का आधार वही है। योग और तप को उसे धुएँ कहा गया है। आद्यशक्ति और आत्मशक्ति को पर्यायवाचक माना गया है। अनेक देवी−देवता, अवतार उसी के अंग अवयव मात्र हैं। जड़ को सींचना चाहिए। शाखा−प्रशाखाओं—टहनियों पत्तियों के साथ तो सम्बन्ध अनायास ही सध जाता है। उपनिषदों में जिसे ब्रह्म विद्या, आत्म−विद्या कहा जाता है— उसे महाप्रज्ञा का ही दार्शनिक ढाँचा कहना चाहिए। परमात्मा की उपलब्धि में ऋतम्भरा का आश्रय ग्रहण करना ही राजमार्ग है। प्रज्ञा परिजनों को यह उच्च समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। वे आत्मशक्ति गायत्री के सम्बन्ध में चिरकाल से बहुत कुछ पड़ते−सुनते आ रहे हैं। पूर्ण शक्ति के रूप में उस के सामयिक प्रकटीकरण की बात भी सर्वविदित है। नव युग, प्रज्ञायुग होगा। अपने समय का अवतार इसी रूप में प्रकट होगा। आस्था संकट के निवारण में युग साधकों को महाप्रज्ञा का अवलम्बन ही अपनाना होगा।

जो अन्य देवी देवताओं के मन्त्र उपचारों के अभ्यासी रहे हों। वे उन्हें भी अपनाये रह सकते हैं। छोड़ने को कुछ नहीं कहा जा रहा है। जोर अपनाने पर दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अपनी उपासना का केन्द्र बिन्दु परमात्मा सविता को—महाशक्ति−सावित्री पर अवलम्बित होना चाहिए। उसका दृश्य स्वरूप सविता और शब्द शक्ति सावित्री है। सविता सूर्य को कहते हैं। सावित्री वही है जो ॐकार, तीन व्याहृति सहित चौबीस अक्षरों वाली गायत्री के रूप में प्रख्यात है। सविता का ध्यान किया जाता है और गायत्री का जप। जप और ध्यान का समन्वय ही अन्तः चेतना में उतना लोच उत्पन्न करता है जिससे आत्मा को परमात्मा के साथ जुड़ने का सौभाग्य मिल सके। जप और ध्यान अदृश्य प्राण पर शरीर का कलेवर चढ़ा रहता है उसी प्रकार उपासना के सूक्ष्म पुरुषार्थ पर पूजा अर्चा को उपचार प्रक्रिया का भी समावेश करना पड़ता है। महाप्रज्ञा के रूप में परमात्मा सत्ता के साथ घनिष्ठता साधने की विधि−व्यवस्था के तीन आधार समझे जाने चाहिए (1) प्रतीकोपचार (2)गायत्री जप (3)सविता की ध्यान धारणा। तीनों का त्रिवेणी संगम बनता है। आत्मोत्कर्ष में इन तीनों की वैसी ही उपयोगिता है जैसी कि शरीर निर्वाह में अन्न, जल और वायु की।

इन पंक्ति यों में न्यूनतम की चर्चा की जा रही है। ताकि अनभ्यस्त लोगों को तनिक-सा अधिक भार पड़ने पर अनख मानने और व्यस्तता, चिन्ता आदि की आड़ लेकर असमर्थता का कोई बहाना न गढ़ना पड़े। आरम्भ सरल हो। पीछे जैसी श्रद्धा बढ़े, रुचि बदले जैसे−वैसे अधिक मात्रा में कठिन स्तर के उपचार भी अपनाये जा सकते हैं। बच्चों को बेबी फ्रूड दिया जाता है और पहलवान को बादाम का हलुआ। यही नीति उपासना क्षेत्र में भी अपनाई जानी चाहिए। यहीं यह मानकर चला जा रहा है कि सभी प्रज्ञा परिजनों का पट्टी पूजन हो रहा है। वर्णमाला का ककहरा पढ़ाया जा रहा है। जिसकी प्रगति आगे तक पहुँची हो वे गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ एवं युग शक्ति गायत्री के पिछले अंक पढ़लें निजी पत्र−व्यवहार करके अपने उपयुक्त अगला मार्ग दर्शन प्राप्त कर लें इन पंक्ति यों का उद्देश्य श्रीगणेश शुभारम्भ कराना है। अच्छा हो सभी एक साथ कदम मिलाकर चलें और नये पुराने का भेद न करके एक ही पंक्ति में बैठ कर भोजन करें। सर्वजनीन सुविधा की दृष्टि से यही उपाय अवलम्बन सफल और श्रेयस्कर है।

हमारे घरों में गायत्री माता का चित्र सुसज्जित चौकी पर स्थापित रहना चाहिए। उसे घर परिवार का देवालय माना जाय। जिस प्रकार बड़ों के अभिवादन की परम्परा सभी सद्गृहस्थों में होती है उसी प्रकार परमात्म सत्ता की प्रतिनिधि गायत्री माता की चित्र प्रतिमा का नमन वन्दन भी दैनिक शिष्टाचार का अंग होना चाहिए। घर के सदस्यों को कहा जाना चाहिए कि वे नित्यकर्म से निवृत्त होकर उस प्रतीक स्थापना के सम्मुख पहुँचें। हाथ जोड़कर सिर नवाकर नमन वन्दन करें। पाँच मिनट आँखें बन्द करके सविता के प्रकाश अवतरण का ध्यान करें साथ ही गायत्री मन्त्र का मानसिक जप भी। यह पाँच मिनट का न्यूनतम संध्या− वन्दन परिवार के जो सदस्य प्रसन्नतापूर्वक अपना सकें उनके इसके लिए अनुरोध आग्रह करना चाहिए। दबाना किसी को भी नहीं चाहिए इससे प्रतिरोध उत्पन्न होता है। महत्ता समझने, परामर्श देने से ही जो मान सके उन्हीं को मनाना चाहिए। दबाव देकर विग्रह खड़ा करने से तो उपासना का महत्व ही चला जाता है। जो भी, जितना भी किया जाय श्रद्धा युक्त हो।

यह पारिवारिक परम्परा में उपासना के न्यूनतम समन्वय की बात हुई। अब निष्ठावान् प्रज्ञा परिजनों की बात आगे आती है। उनके लिए न्यूनतम निर्धारण में इतना और जुड़ता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े−पड़े पन्द्रह मिनट मानसिक जप और आलोक अवतरण का ध्यान करें। इसी प्रकार रात्रि को सोने से पूर्व पन्द्रह मिनट निदिध्यासन की साधना करें। इसके दो अंग हैं—मनन और चिन्तन। इन दिनों की— विशेषतया आज की अपनी स्थिति का पर्यवेक्षण मनन हो और भूलों को सुधारने अभीष्ट को अपनाने के लिए अगले दिन का कार्यक्रम बनाना—चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए। यह न्यूनतम है। इसमें स्नान का, समय का, उपचार सामग्री का कोई बन्धन नहीं है। यह कहीं भी−किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। पन्द्रह−पन्द्रह मिनट प्रातः−सायं का समय इस प्रयोजन के लिए निर्धारित रखा जाय तो भी काम चल जायगा। यह घर के अन्य लोगों की अपेक्षा प्रज्ञा परिजनों के लिए विशेष साधना पुरुषार्थ हुआ।

इसी प्रकार पूजा की चौकी की सफाई, सज्जा एवं अक्षत, जल, पुष्प, रोली, अगरबत्ती, नैवेद्य से पूजा भी उन्हीं को करनी चाहिए। यह बन्धन रहित उपासना ऐसी है जिसमें उपेक्षा, अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई कठिनाई आड़े नहीं आती। पूजा उपचार देवता का करने से आत्म देव में पात्रता और प्रखरता की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए पवित्रीकरण, आचमन, शिखा− वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन के षट्कर्म करने चाहिए। इसका सरल विधान किसी भी अभ्यस्त उपासक से पूछ लेना चाहिए।

इससे एक कदम आगे की बात है कि प्रातः उठने पर नित्य कर्म स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थान पर बैठा जाय और तीन माला गायत्री जप किया जाय। इसमें प्रायः पन्द्रह मिनट लगते हैं। माला न होने पर घड़ी या उँगलियों पर गिनगिन कर भी काम चलाया जा सकता है। जप करने में होठ तो हिलते रहें पर उच्चारण इतना मन्द हो कि दूसरे उसे सुन न सकें।

जप के साथ ध्यान आवश्यक है। पूजा गायत्री माता की और ध्यान सविता पिता का। इस प्रकार उभयपक्षीय उपक्रम से जप और ध्यान का सहज संयोग बन पड़ता है। जप में शरीर और ध्यान में मन को कार्यरत कर देने से एकाग्रता बन पड़ती है और मन की चंचलता पर नियन्त्रण कर सकना सहज सम्भव होता है। ध्यान तो अकेला भी हो सकता है, पर जप के साथ तो ध्यान का संयोग रहना चाहिए। पानी तो अकेला भी पी सकते हैं पर रोटी के साथ पानी का संयोग तो रहना ही चाहिए। ध्यान पानी है और जप रोटी।

ध्यान में उदीयमान स्वर्णिम आभा वाले सूर्य का ध्यान करना चाहिए उसे परमात्म सत्ता का प्रतीक ऋतम्भरा आदि शक्ति गायत्री का प्राण अनुभव करना चाहिए। सविता परमात्मा की प्रतीक प्रतिमा प्रभात कालीन सूर्य को माना गया है। नेत्र बन्द करके उसका ध्यान करना चाहिए, साथ ही भावना करनी चाहिए कि निस्सृत ज्योति किरणें साधन के सम्पूर्ण कायकलेवर में प्रवेश करके उसमें ऊर्जा तथा आभा भर देती हैं। ऊर्जा अर्थात् प्रतिभा प्रखरता। आभा अर्थात् पवित्रता उत्कृष्टता। ध्यान द्वारा महाप्रज्ञा की प्राणधारा दिव्य− ज्योति को आत्म सत्ता में ओत−प्रोत करने का भावनात्मक पुरुषार्थ करना चाहिए। इसे कल्पना नहीं संकल्प पुरुषार्थ मानकर चना चाहिए।

सविता की प्राण ऊर्जा शरीर में पुरुषार्थ, मन में विवेक और अन्तःकरण में श्रद्धा का संचार कर रही है इस भावना को अधिकाधिक सुदृढ़ एवं सुनिश्चित करना चाहिए। गर्मी और रोशनी आत्म सत्ता में घुसती, बढ़ती और सदा सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित होती चली जा रही है। इस विश्वास को ध्यान−धारणा के समय अधिकाधिक परिपक्व करना चाहिए। भागीरथ के तप ने स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतरने के लिए बाधित किया था। अपनी ध्यान धारणा दिव्यलोक से परमात्म सत्ता को स्वर्णिम ज्योतिधारा के रूप में अन्तराल में अवतरित कर सकने में सफल हो रही है। यही विश्वास भरा भावचित्र जप के साथ−साथ ध्यान रूप में अन्तःकरण को प्रभावित, प्रकाशित करने लगे तो समझना चाहिए कि ध्यान में प्रगति चल पड़ी। यह ज्योति धारा प्रेरणा बनकर उभरती हैं। कारण शरीर में श्रद्धा—सूक्ष्म शरीर में प्रज्ञा होती है। आदर्शवादी उत्कृष्टता के अन्तराल में अभिवर्धन ही आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने में समर्थ होता है। यह संयोग क्षुद्र को महान, बन्दी को मुक्त बनाने में समर्थ होता है। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति के रूप में इसके प्रतिफल की अनुभूति होने लगती है।

युग सन्धि की इस पुण्य बेला में प्रज्ञा परिजनों के लिए एक विशेष शक्ति संचार उपक्रम है। हिमालय के अध्यात्म ध्रुव केन्द्र से युग सन्धि के बीस वर्षों में एक विशिष्ट शक्ति धारा प्रवाहित होती रहेगी। यह विभिन्न स्तर के लोगों की बदलती समय सारणी के द्वारा उपलब्ध होगी। प्रज्ञा परिजनों के लिए गुरुवार का एक दिन निर्धारित है। सूर्योदय से एक घंटा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक धारा प्रवाहित होगी। परिजन सप्ताह में एकबार इसका लाभ उठा सकते हैं। नित्यकर्म से निवृत्त होकर कोलाहल रहित एकांत में पालथी मार कर—आँखें बन्द रख कर दोनों हाथ गोदी में रखकर शान्त चित्त स्थिर शरीर से ध्यान मुद्रा में बैठना चाहिए। भावना करनी चाहिए कि हिमालय के सर्वोच्च शिखर सुमेरु पर्वत से एक दिव्य प्रेरणा बहती हुई साधक तक पहुँचती है। अन्तराल तक पहुँचती है और वहाँ दिव्य लोक के कुछ अभिनव सन्देशों से अवगत कराती है।

यह न्यूनतम उपासना पद्धति प्रज्ञा परिजनों के लिए इन दिनों निर्धारित हो गई है जो इसे अपनायेंगे वे अनुभव करेंगे कि उनकी आत्मा परमात्मा के साथ जुड़ने के लिए अग्रसर हो रही है। यह मिलन संयोग ही आत्म−साक्षात्कार, या ब्रह्म साक्षात्कार कहलाता है। आरम्भ में इसकी मात्रा थोड़ी या सामान्य हो, कोई गहरी अनुभूति न होती हो तो भी हर्ज नहीं। पूर्व संचित और श्रद्धा विश्वास का स्तर उपासना की सफलता में आधार भूत कारण होता है। उसमें जैसे−जैसे वृद्धि होगी आत्मा से परमात्मा का प्रकाश अनुदान भी उसी अनुपात से उतरता बढ़ता चला जायगा। यह उपलब्धि मात्रा में थोड़ी होने पर भी व्यक्तित्व को उभारने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना सुनिश्चित बनाने में भावभरी उपासना का असाधारण योगदान रहता है इस तथ्य को समझना और उस मार्ग पर चल पड़ना ही श्रेयष्कर है।


जीवन साधना की व्यावहारिक तपश्चर्या

ईश्वर का प्राणी को सबसे बड़ा उपहार मनुष्य जीवन है। इससे श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य सम्पदा ईश्वर के विभूति भण्डार में और कोई है नहीं। शरीर संरचना एवं मनःसंस्थान की दृष्टि से मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत आगे है। उसे प्रकृति रहस्यों को खोज निकालने और उनके आधार पर पदार्थ वैभव का मनचाहा उपयोग करने की अद्भुत क्षमता मिली है। ज्ञान और विज्ञान के दिव्य अस्त्र−शस्त्रों से उसकी सत्ता सुसज्जित है। क्रियाशीलता विचारणा तथा भावना के तन्त्रों में इतनी उत्कृष्टता भरी पड़ी है कि उनके सहारे भौतिक एवं आत्मिक सम्पदाओं का प्रचुर परिमाण में उपार्जन कर सकना उसके बाँये हाथ का खेल है। गृहस्थ आनन्द, आजीविका के सुनिश्चित आधार अन्य किसी प्राणी को उपलब्ध नहीं। ऐसा क्रिया कौशल और किसी के भाग्य में बदा नहीं है। उपलब्धियों को देखते हुए उसे सृष्टि का मुकुटमणि कहा जाना सर्वथा सार्थक है।

जीवन सत्ता का स्वरूप, लक्ष्य एवं सदुपयोग समझा गया या नहीं, समझने के उपरान्त उत्कर्ष का मार्ग अपनाया गया या नहीं। मार्ग पर उत्साह साहस पुरुषार्थ सहित चला गया या नहीं? इसी चयन निर्धारण पर उत्थान पतन की आधारशिला रखी जाती है। मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। अवाँछनीयता अपनाकर पतन के गर्त में गिरने की उत्कृष्टता का वरण करके उत्कर्ष के चरम लक्ष्य तक जा पहुँचने की उसे पूरी छूट है। कोई परिस्थितियों का रोना रोता रहे और मनःस्थिति को न सुधारे तो उसे विडम्बना रचे बैठे प्रमादग्रस्त से कोई क्या कहे?

देवता अनेक हैं। पर तत्काल फलदायक अत्यन्त निकटवर्ती और अनुदान देने के लिए आतुर—आत्मदेव से बढ़कर और कोई नहीं। जीवन को कल्पवृक्ष कहा गया है। उसकी गरिमा समझने वाले और निर्धारित लक्ष्य के लिए उसे प्रयुक्त करने वाले वह सब कुछ प्राप्त करते हैं जो पाने योग्य है। अन्य देवताओं की अनुकम्पा संदिग्ध है। पर जीवन देवता की साधना का प्रतिफल सर्वथा असंदिग्ध है। दुःख इसी बात का है कि जीवन का महत्व समझा ही नहीं पाया और उसे ऋद्धि−सिद्धियों से सुसम्पन्न स्नान की ओर ध्यान गया ही नहीं। अन्यथा स्थिति वैसी न होती, जैसी कि सामने है।

भूमि की साधना से किसान और माली फसल काटते और उद्यानों को सोना उगलने के लिए विवश करते है। विद्या की साधना वाले विद्वान कहलाते और उच्च पदासीन बनते हैं। व्यवसाय की साधना करने वाले धन कुबेर बनते हैं। शरीर साधने वाले बलवान पहलवान अनेकों पर हावी रहते हैं। कला साधना से गायक, अभिनेता, मूर्तिकार, चित्रकार, कवि साहित्यकार आदि यशस्वी भी बनते हैं और सम्मानित समृद्ध भी। देवताओं की साधना भी जब तब कुछ वरदान अनुदान देती रहती है। इन सबसे उठकर जीवन साधना है, जो उसके लिए अग्रसर हुआ वो निहाल हो गया। ढेले की तरह निरर्थक दीखने वाले जीवन को यदि गहराई में उतरकर कुरेदा जा सके तो उसके अन्तराल में ऐसे अगणित परमाणु खचे मिलेंगे जिनमें से एक−एक कर विस्फोट ही धरती को हिला सकता है। उपेक्षा से तो हीरा भी काँच की तरह ठुकराया जा सकता है। फिर जीवन का स्वरूप और रहस्य न समझने डडडड उसकी साधना विरत रहने पर कोई अभाव डडडड शोक संतत डडडड पतन पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जायेगा जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप उस संसार में ओर कोई नहीं। अन्य पापों से कर्त्ता को तत्काल डडडड मिल ही जाता है, पर जीवन की उपेक्षा का पालक ऐसा है जिसमें उस छोर से इस छोर तक−आरम्भ से अन्त तक नरक ही नरक सड़ता देखा जा सकता है।डडडड का डडडड चिन्ह है कि जीवन के साथ जुड़ी हुई महान सम्भावनाओं को समझा जाय और उसे कषाय−कल्मषों के गर्त से उबार कर परिशोधन परिष्कार की प्रयोगशाला में भेजा जाय।

प्रज्ञा युग में धरती पर स्वर्ग अवतरित होगा। इस स्मृति को प्रत्यक्ष करने की पूर्ण भूमिका होगी—मनुष्य में देवत्व का उदय। इसका स्वरूप संचित कुसंस्कारों का परिशोधन—दृष्टिकोण एवं स्वभाव व्यवहार का परिष्कार। इस प्रयास में संलग्न होने वाले योद्धा आत्म विजय करने के उपरान्त विश्व विजयी बनते हैं। गीताकार ने अपने को ही अपना भयंकर शत्रु ओर अपने को ही सर्व समर्थ स्नेह सौजन्य से भरपूर मित्र कहा है। अनगढ़ जीवन ही वह अभिशाप है जिसके रहते कुबेर भी दरिद्रता से, इन्द्र भी असमर्थता से संत्रस्त पाथा जायगा। जिसे जीवन को निखारने में सफलता मिल गई वस्तुतः वही सच्चा कलाकार है। उसी की सूझ−बूझ और भाग्य रेखा को दसों दिशाएँ सराहती पाई जायेंगी।

सर्प, बन्दर, भालू, शेर आदि भयानक पशुओं को सधाकर उपयोगी और कमाऊ बनाया जाता है। असभ्य अनपढ़ और कुसंस्कारी भी आत्म साधना की भट्टी में अभिशप्त जीवन को गलाना और श्रेय सौभाग्य के ढाँचे में ढालना नितान्त सम्भव है। लोग जितना पुरुषार्थ साधन जुटाने प्रतिपक्षी को हराने में करते हैं उससे आधा भी यदि अपने आपका परिशोधन, परिमार्जन करने में कर सके तो प्रतीत होगा कि यह सबसे अधिक बुद्धिमत्ता का सबसे अधिक सम्पन्नता सफलता उपार्जन का−काम बन पड़ा। व्यक्तित्व एक प्रकार का चुम्बक है जो अपने स्तर का संपर्क समर्थन सहयोग प्रचुर परिभाषा में खींच बुलाता है। यह कठिन कार्य नहीं है। दूसरे कहना न मानें, पकड़ में न आय तो बात समझी भी जा सकती है पर यह समझ से बाहर की बात है कि अपना शरीर अपना मन, कहना न माने और अपने दृष्टिकोण, स्वभाव, रुझान, अभ्यास को बदलना सुधारना भी अपने आप से न बन पड़े।

पानी का नीचे ढलना ढेले का नीचे गिरना स्वाभाविक है पर ऊँचा उठाने के लिए आगे बढ़ने के कुछ अतिरिक्त साहस करने—कोई नया मार्ग अपनाने—की आवश्यकता पड़ती है। अवाँछनीय ढर्रे को तोड़ना और चिन्तन तथा व्यवहार को उत्कृष्टता के साथ जोड़ना ही जीवन साधना के निमित्त किया गया सच्चा पराक्रम एवं तप साधन है।

जीवन ही अपना घनिष्ठतम स्नेही सहयोगी है। अन्यान्यों की सेवा सहायता की बात सोचने से पहले देखना होगा कि इस अपने ऊपर सर्वथा आश्रित को सुखी समुन्नत बनाने का प्रयत्न हुआ या नहीं? उत्तरदायित्व निभाया नहीं। यहाँ यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए साधन सम्पदा मात्र शरीर यात्रा के काम आती है। जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए गुण, कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता भर देने वाली विभूतियों का संचय करना पड़ता है।

समृद्धि सम्पादन के दो ही उपाय हैं कि घाटा देने वाले छिद्रों को रोकना—दूसरा वैभव बढ़ाने वाले उपाय उपचारों को अपनाना। शारीरिक मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक क्षेत्रों में लोग दिवालिया होते और समुन्नत बनते देखे जाते हैं उनमें निमित्त कारण उन्हीं दो अवलम्बनों को अपनाने न अपनाने की सूझ−बूझ काम करती है। यही बात जीवन्त साधना के माध्यम से व्यक्तित्व को पवित्र प्रखर बनाने और आत्मोत्कर्ष की आवश्यकता पूर्ण करने के सम्बन्ध में भी है। हर काम योजनाबद्ध ढंग से होता है। बिना सोचे बिना कार्य की रूपरेखा बनाये कुछ भी करते−धरते रहने वालों की परिणतियां भी ‘घुणाक्षर न्याय’ जैसी संयोग मात्र होते हैं। कार्य छोटा हो या बड़ा उसके सभी पक्षों पर विचार करने के उपरान्त कदम उठाना ही बुद्धिमानी का चिन्ह माना जाता है यही बात आत्मिक प्रगति के सम्बन्ध में भी लागू होती है।

जीवन साधना में मनन और चिन्तन की निदिध्यासन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद—जब चित्त शान्त एकान्त हो तब अपने अन्तरंग बहिरंग स्थिति का लेखा−जोखा लेना चाहिए, और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक हैं उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान स्थिति बिना समय गँवाये कार्यान्वित हो सके।

प्रतीक न बने, उसके लिए स्थान तो रहे पर ऐसा न हो कि टालटूल, अनख, आलस में समय गुजरता रहे। रावण ने काल पाटी से बाँधकर सफलताएँ अर्जित की थीं। वही मार्ग हर विवेकवान को अपनाना पड़ा है। उनने समय का एक क्षण भी बर्बाद नहीं होने दिया। योजनाबद्ध रूप से व्यस्त दिनवाली बनाकर उसका सदुपयोग किया है। प्रगतिशील प्रथा परिजनों को भी वही करना चाहिए।

समय का सदुपयोग पराक्रम के सहारे उन पढ़ता है। पराक्रम का अर्थ है—तत्परता और तन्मयता। तत्परता अर्थात् उत्साह भरा परिश्रम। तन्मयता अर्थात् रुचि पूर्वक मनोयोग। दोनों का संयोग वहाँ भी होगा चमत्कारी प्रतिफल हस्तगत होंगे। पसीने में लक्ष्मी निवास करती है। व्यस्तता से ही आरोग्य वीर मनोबल स्थिर रहता है। आलस्य और दारिद्रय और डडडड मित्र बनकर साथ−साथ रहते हैं। जैसे सूत्रों को स्मरण रखना चाहिए। हाथ में लिये कामों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उसे श्रेष्ठतम स्तर का बनाने के लिए अपनी समूची प्रतिभा, कुशलता का नियोजन करना चाहिए। जो समय और श्रम की संगति बिठालेना उसे कुशल व्यवस्थापकों की तरह हर क्षेत्र सम्मान मिलेगा। जिसका समय आलस्य से और मस्तिष्क प्रमाण से घिरा रहेगा। वह पतन पराभव के गर्त में गिरेगा। पिछली और दुर्गति ग्रस्त परिस्थितियों में जकड़ा रहेगा। इसलिए पराक्रम में व्यस्तता का नियोजन रहना ही चाहिए।

तीसरा वैभव है चिन्तन। शरीर काम करता है किन्तु उसमें रस न लिया जाय। बेगार भूणतों जाय तो उसमें मनोयोग न लगेगा। मात्र शरीर काम करता रहेगा। ऐसी दशा में खाली दिमाग शैतान की दुकान बने बिना न रहेगा। विचार ही कर्म की पूर्व भूमिका बनाते हैं। उन्हीं का स्तर उत्थान पतन के लिए उत्तरदायी होता है। विचार दीखते नहीं किन्तु वस्तुतः वे ही सौभाग्य और दुर्भाग्य के दिशाधारा के नियोजन करते हैं। विचारों की दिशाधारा देने ही वह बहुचर्चित मनोनिग्रह है जिसे एकाग्रता कहा जाता है और जिसका दैवी वरदान जैसा माहात्म्य बताया जाता है।

विचारों को आवारा कुत्ते की तरह जहाँ−तहाँ झूठे पत्ते चाटते फिरने की—अनपढ़ विचारों को कीचड़ में लोटते रहने की छूट नहीं देनी चाहिए। उन्हें सृजनात्मक सज्जनोचित चिन्तन का अभ्यास कराना चाहिए। अवाँछनीय कल्पना करते रहने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। बुरे विचार मस्तिष्क में प्रवेश करते ही उनमें मल्ल युद्ध करने के लिए प्रतिपक्षी सद्विचारों को जुटा देना चाहिए। काँटे से काँटा निकाला जाता है और अवाँछनीय विचारों को उत्कृष्टता आदर्शवादिता की मान्यताओं को उभार कर निरस्त करना चाहिए। चिन्तन के लिए विषयों का पूर्व निर्धारण हो। वैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं महापुरुषों की तरह अपना चिन्तन निरन्तर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए सीमित एवं सुनिश्चित रहना चाहिए।

चौथी सम्पदा है—धन। यह है तो पराक्रम की उपलब्धि, पर उसे भी ईश्वर प्रदत्त समय, पराक्रम और चिन्तन के ईश्वरीय सम्पदा के बदले खरीदी हुई विभूति मानना चाहिए। नीति पूर्वक कमाया जाय और सत्प्रयोजनों में खर्च किया जाय यही है सच्ची और समझदारी की अर्थ नीति। धन को अपनी परिवार की एवं समाज की सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने में खर्च करना चाहिए। दुर्व्यसनों में एक छटाँक भी खर्च न होने देने का नियन्त्रण बरता जा सके तो असंख्यों दुर्व्यसनों और अनाचारों से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। बजट बनाकर खर्च किया जाय। अपव्यय को पास न फटकने दिया जाय तो थोड़े से धन से भी अपनी तथा परिवार की सर्वतोमुखी प्रगति के अनेक रास्ते खुल सकते हैं। समय, श्रम, चिन्तन की ही तरह अर्थ साधनों का भी संयम बरता जाना चाहिए। स्मरण रहे संयम तप है। व्यावहारिक जीवन में उपरोक्त चार सम्पदाओं का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए उन्हें अपव्यय दुरुपयोग से बचाने की सावधानी बरती जानी चाहिए।


परिवार में सत्प्रवृत्तियों की फसल उगायें

शरीर में जिस प्रकार अंग अवयव गुँथे हुए हैं उसी प्रकार शरीर के साथ परिवार के सदस्य भी जुड़े हुए हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका निर्वाह एकाकी नहीं हो सकता आवश्यकता एवं समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि उनका समाधान मिलजुल कर अपनाई जाने वाली सहकारिता के आधार पर ही निकलता है। मनुष्य की मूल प्रवृत्ति सामाजिक सहकारिता है उसी ने उसे बुद्धि वैभव प्रदान किया है और साधन सम्पदा बढ़ाने तथा खर्चने का वह उपाय सुझाया है जिसे आज की भाषा में पदार्थ विज्ञान, अर्थशास्त्र, एवं क्रिया कौशल कहते हैं। बुद्धिमत्ता के यही क्षेत्र हैं। इनमें अतीत से लेकर अधावधि जो भी प्राप्ति हुई है उसके मूल में सहकारिता की सत्प्रवृत्ति की परोक्ष भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है। समाज का वह भाग जो निरन्तर साथ सम्बद्ध रहता है—परिवार कहा जाता है।

परिवार की सुरक्षा एवं प्रगति का ध्यान भी उसी तरह रखना कर्त्तव्य है जितना कि शरीर का रखा जाता है। जिन लोगों के बीच निवास निर्वाह होता है वे सभी कुटुम्बी हैं। अपने स्त्री बच्चों से ही परिवार का सीमा बन्धन नहीं जोड़ना चाहिए वरन् वे भी परिजन कहलाते हैं, जो एक साथ रहते और परस्पर स्नेह सहयोग का आदान−प्रदान करते हैं। इसमें विवाहित− अविवाहित होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। वंशधरों की तरह व्यवसाय और विचार भी मनुष्यों में घनिष्ठता उत्पन्न करते हैं। एक नाव में बैठने वाले सभी कुटुम्बी बन जाते हैं क्योंकि उनका डूबना उतरना साथ−साथ ही होता है।

परिवार के भरण−पोषण की जिम्मेदारी आमतौर से समझी और निभाई जाती है। इसमें एक कड़ी प्रज्ञा परिजनों की और भी जोड़नी चाहिए कि परिजनों के शरीरों को ही पोसने से सम्पन्न एवं प्रसन्न बनाने तक ही अपनी जिम्मेदारी सीमित न रखी जाय वरन् इस समूची व्यवस्था से भी कहीं अधिक भारी उत्तरदायित्व उनके व्यक्तित्व निखारने का समझा जाना चाहिए। यदि इस सम्बन्ध में उपेक्षा बरती गई तो समझना चाहिए कि व्यक्तित्व अनगढ़ कुसंस्कारी बने रहने पर सम्पन्नता शिक्षा बलिष्ठता मात्र से उनका भला न हो सकेगा। दुर्गुणी व्यक्ति उपलब्धियों का दुरुपयोग करते हैं। फलतः अपनी तथा साथियों की दुर्गति ही मनाते रहते हैं। वैभव आवश्यक तो है, पर स्मरण रखने योग्य तथ्य यह भी है कि शालीनता के अभाव से उससे दुष्प्रवृत्तियों का ही परिपोषण होता है और साँप को दूध पिलाने की तरह उलटा दुष्परिणाम ही उत्पन्न होता है। लाड़−चाब में जो अपने परिवार को दुर्गुणी बना लेते हैं उनका अविवेक भरा प्यार भी अत्याचार से भी भारी पड़ता है।

परिवार संस्था को सद्गुणों की प्रयोगशाला, पाठशाला, फैक्ट्री, नर्सरी मानकर चला जाय और इसके लिए “एक आँख प्यार की दूसरी सुधार की” रखने वाली नीति अपनाई जाय तो आत्मीयजनों के उस छोटे समुदाय को सच्ची सेवा कहा जायगा। इस दिशा में आरम्भ से ही ध्यान रखा जा सके तो बहुत ही उत्तम अन्यथा गिनती भूल जाने पर उसे नये सिरे से गिनना चाहिए। देर से समझ आये तो भी उसे समझदारी ही कहा जायगा। प्रज्ञा परिजनों की दृष्टि अपने सम्बद्ध परिजनों को सुसंस्कारी बनाने की रहनी चाहिए। सम्पन्नता की कमी रह जाने पर भी सज्जनता के सहारे काम चल सकता है,किन्तु सज्जनता रहित सम्पन्नता अन्ततः दुःखद दुष्परिणाम ही प्रस्तुत करती है।

उत्तराधिकारियों के लिए कुबेर जितना वैभव छोड़ मरने की ललक न उनके हित में है न अपने हित में। मुफ्त का माल पचता नहीं। भले ही वह अत्याचार छल छद्म से कमाया गया हो या उत्तराधिकार लाटरी आदि के माध्यम से पाया गया हो। विष खाद्य छोड़ मरने की अपेक्षा यह अच्छा है कि अपना पुरुषार्थ उन्हें सद्गुणों बनाने के लिए नियोजित रखा गया है। किसी से सम्पन्नता की प्रतिस्पर्धा नहीं करती चाहिए। होड़ करनी हो तो शालीनता का उन्मुक्त क्षेत्र उसके लिए खुला पड़ा है। उसी में अपने पराक्रम एवं कौशल का परिचय देना चाहिए।

जानकारियाँ तो कहने−सुनने से भी मिल सकती हैं। भूगोल, गणित, शिल्प, संगीत तो उस्तादों से भी सीखा जा सकता है, पर चरित्र निर्माण की प्रेरणा प्रदान करने वाले को अपना उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ता है। आगे चलने पर ही अनुयायी भी पीछे लगते हैं। बातूनी नसीहतें इस प्रयोग में तनिक भी काम नहीं आतीं। अपनी फजीहत दूसरों को नसीहत देने वाले व्यंग उपहास का कारण ही बनते हैं। उनकी बात गले नहीं उतरती भले ही वह हित कारक क्यों न हो। साँचे में खिलौने ढलते हैं, परिवार में जिन सत्प्रवृत्तियों का प्रचलन करना हो उनका अभ्यास प्रयोक्ताओं की सर्वप्रथम करना पड़ता है। परिवार को सुसंस्कृत बनाने की आकाँक्षा तभी पूरी होती है जब अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता का समावेश उत्साहवर्धक, प्रेरणाप्रद मात्रा में किया जा सके। दोनों प्रयोजन सम्बद्ध हैं। आत्मनिर्माण और परिवार निर्माण की प्रक्रिया गाड़ी के दो पहियों की तरह साथ−साथ चलती है। दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ अनायास ही रच जाते हैं। परिवार के प्रति यदि सच्ची आत्मीयता शुभेच्छा और सद्भावना हो तो उसे क्रियान्वित करने का उपयुक्त मार्ग एक ही है कि उन्हें सद्गुणी, सज्जन, प्रतिभावान एवं सुसंस्कृत बनाया जाय। इसका शुभारम्भ अपने को सुधारने और ढालने के साथ ही बन पड़ता है। आदर्श उपस्थित करने से ही उत्साह उत्पन्न होता है।

पारिवारिक पंचशीलों की चर्चा समय−समय पर की जाती रही है। श्रमशीलता, सुव्यवस्था, मितव्ययता, शालीनता और सहकारी उदारता की आदत घर परिवार के लोगों में डाली जा सके तो आरम्भ में अनख लगने पर भी—आनाकानी अवहेलना अवज्ञा होने पर भी—यदि उस बीजारोपण, परिपोषण को जारी रखा जा सके तो इस पुण्य प्रयास के सत्परिणाम हाथों−हाथ देखने को मिल सकते हैं। आत्म सन्तोष, एवं दूसरों का सम्मान सहयोग पाने पर कोई भी अपनी विशिष्टता पर गर्व गौरव अनुभव करता है। उस मार्ग पर उठते कदम उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को सुनिश्चित बनाते हैं। औलाद के लिए दौलत छोड़ मरने उनकी बेतुकी फरमाइशें पूरी करते रहने की अपेक्षा समझदारी इसमें है कि उनके स्वभाव एवं व्यवहार में आदर्शवादिता का अनुपात बढ़ाया जाय। यह ऐसा उपकार है जिसके प्रति कुटुम्बियों की अन्तरात्मा चिरकाल तक कृतज्ञ कृत−कृत्य बनी रहेगी। यह ऐसा उपहार है। जिसकी तुलना में उन्हें हीरक हारों से लाद देना भी हलका पड़ता है। दूसरों के यहाँ क्या होता है इसकी नकल करने—ललचाने की आवश्यकता नहीं। हमें अग्रणी होना चाहिए और पड़ौसी परदेशियों के सामने यह आदर्श उपस्थित करना चाहिए कि उन्हें इस परिवार का अनुकरण करते हुए गौरवान्वित होना चाहिए। अनुयायी क्यों बनें? अग्रणी क्यों नहीं। कुप्रचलनों को अस्वीकार करने में भी साहसिकता है। अन्धी भेड़ों की तरह हेय उन लोगों का अनुसरण नहीं करना चाहिए जो वैभव का उद्धत प्रदर्शन करने के लिए अन्तरात्मा वेध चुके। आदर्श छोड़ चुके और चरित्र गँवा चुके।

प्रज्ञा परिजनों को अपने घर परिवार में पंचशील के प्रति ऐसा सम्मानास्पद वातावरण बनाना चाहिए जैसा कि धार्मिक लोग पाँच देवताओं के प्रति अपनाते और संसारी लोग पाँच रत्नों के रूप में धन, लक्ष्मी को पूजते हैं। सभी बलिष्ठता सुन्दरता, विद्वत्ता, ख्याति, सम्पन्नता चाहते हैं। यदि आकाँक्षाओं में शालीनता के पक्षधर पंचशीलों का भी समावेश किया जा सके तो समझना चाहिए कि सुरुचि जागी और पाने योग्य उपलब्धियों की महत्ता समझाने वाली विवेक बुद्धि उभरी। यह जागरण ऐसा ही है जैसा कि रात्रि को मृतक, मूर्छितों जैसी घोर निद्रा का परित्याग कर लोग प्रभातकाल में जगते, निवृत्त होते और श्रेयष्कर क्रियाशीलता में संलग्न होते हैं।

घर से आलस्य प्रमाद को विदा करना चाहिए और वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि हर सदस्य को हर समय उपयोगी कार्यों में व्यस्त रहने का अवसर मिले। निठल्ले न स्वयं बैठें न आत्मीयजनों को बैठने दें। विश्राम की भी आवश्यकता है किन्तु आलस्य प्रमाद को विश्राम या बड़प्पन का चिन्ह नहीं माना जाना चाहिए। जीवन का स्वरूप है—समय। समय का सदुपयोग श्रम पराक्रम के साथ ही किया जा सकता है। घर में ऐसे क्रिया−कलापों का प्रचलन करना चाहिए जिसमें हर समर्थ सदस्य को अपने−अपने ढंग से व्यस्त रहना पड़े। उनसे उनका आरोग्य, बुद्धिबल, कौशल बढ़ेगा, साथ ही व्यक्तित्व निखरेगा। घर को सुव्यवस्थित, सुसज्जित रखने तथा गृह उद्योग स्तर के, शाकवाटिका, टूट−फूट मरम्मत कपड़े धोना, सीना जैसे हलके ऐसे अनेकों छोटे−बढ़े काम खड़े किये जा सकते हैं जो श्रम सामर्थ्य को अस्त−व्यस्त होने से बचाये रह सकें, जो सृजनात्मक प्रवृत्ति का परिपोषण करते रह सकें।

स्वच्छता, सुन्दरता, सुव्यवस्था यह सारे उपक्रम सुरुचि के परिचायक हैं सच्ची कलाकारिता इसी में है कि शरीर, वस्त्र, उपकरण, निवास का हर पक्ष सुन्दरता किन्तु सादगी से भरा−पूरा दृष्टिगोचर हो, गन्दगी सहन न करना ही सौंदर्य की आराधना है। अस्त−व्यस्तता और कुरूपता एक ही बात है। शरीर का गठन ईश्वर के हाथ है। खर्चीली सजधज में विलासिता और अहमन्यता के उद्धत प्रदर्शन की गंध आती है किन्तु हर वस्तु को, हर निर्धारण को, हर प्रयास को योजनाबद्ध सुव्यवस्थित रखा जा सके तो समझना चाहिए कि दृष्टिकोण में गौरवास्पद कलाकारिता का समावेश हो रहा है। समझना चाहिए कि ‘मैनेजर’ का पद संसार में सबसे ऊँचा है। जो अपनी−अपने परिवार की सुव्यवस्था का अभ्यास कर रहा है वह किसी दिन महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों के निर्वाह में अपनी प्रतिभा का परिचय भी देगा।

मितव्ययता से सादगी और सज्जनता की, दूरदर्शिता और आदर्शवादिता का परिचय मिलता है। फैशन आदि अपव्यय करने वाले अपने मन में जो भी समझते रहें, विचारशैली की दृष्टि में ओछे बचकाने एवं अप्रामाणिक ही सिद्ध होते हैं। धन अपव्यय के लिए नहीं कमाया जाता, उसकी एक−एक पाई ऐसे सत्प्रयोजनों में खर्च करनी चाहिए जिससे भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के साधन जुटते हों। समाज को भी सत्प्रवृत्तियां संवर्धन के लिए उदार अनुदानों की निरन्तर आवश्यकता रहती है। और सब कुछ उन्हीं से बन पड़ता है जो अपव्यय से पैसा बचा सकते हैं। जो पैसे को कूड़ा समझते हैं और उसकी फुलझड़ी जलाते हैं उन्हें उपयोगी प्रसंग पर मन–मसोलना पड़ता है, कर्जदार बनना पड़ता है। इस सारे जंजाल से वे सहज ही बच सकते हैं जो खर्च करने से पहल हजार बार विचार करते हैं और गाँठ तभी खोलते हैं जब खर्च को औचित्य की कसौटी पर हजार बार कस लें। ऐसी विवेक युक्त कृपणता उस उद्धत अपव्यय से हजार गुनी अच्छी हैं पर अनेकानेक दुर्गुणों, दुर्व्यसनों को जन्म देती और भविष्य को अन्धकारमय बनाती है।

शालीनता चौथा पारिवारिक पंचशील है। घर के लोग परस्पर मीठा बोलें, शिष्टाचार बरतें, एक दूसरे का आदर करें हाथ बढ़ावें और मान मर्यादा का ध्यान रखें। असमय अनगढ़ लोग उच्छृंखलता बरतें और अनुशासन हीनता का परिचय देते देखे जाते हैं। बात−बात में आवेश लाने वाले और संतुलन गँवा बैठने वाले मानसिक रोगियों में गिने जाते हैं। उन्हें कोई दया का पात्र समझता है कोई घृणा का। सज्जनता के साथ धैर्य जुड़ा हुआ है उसमें सहिष्णुता और तालमेल बिठा कर चलने की दूरदर्शिता का समावेश रहता है। परस्पर स्नेह−सौजन्य बनाये रहने, सहयोग भरा आदान−प्रदान चलाने के लिए स्वभाव में शालीनता का समावेश करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यह समझा ही नहीं, व्यवहार में भी लाया जाना चाहिए। निरन्तर पर्यवेक्षण और अभ्यास करते कराते रहने से यह आदत भी स्वभाव का अंग बन जाती है।

उदार सहकारिता से—एक−दूसरे का हाथ बटाने की प्रवृत्ति को प्रधानता दी जाती है। कर्तृत्व को प्रधान, अधिकार को गौण रखना पड़ता है। उदारता बरतने पर उलट कर सद्भावना मिलती है जो पूँजी की अपेक्षा अनेक गुना लाभाँश उत्पन्न करने वाली उच्चस्तरीय भाव प्रेरणा देती है।

प्रज्ञा परिजनों को अपने परिवार में इन पंचशील की सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण अभिवर्धन करना चाहिए। वे देखेंगे कि इस आधार पर कैसी हरीतिमा लहलहाती है और कैसी बहुमूल्य फसल कटती है।


अवाँछनीयता के आगे शिर न झुकाएँ

महत्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवाँछनीयता निरस्त करने पर सृजनात्मक कदम उठाने की सम्भावना बनती है। खेत में कंकड़, पत्थर, झाड़ झंखाड़ जड़ जमाये बैठे हों तो उपयुक्त बीज बोने पर भी फसल न उगेगी। इस प्रसंग में सर्वप्रथम जोतने, उखाड़ने, बीनने और साफ करने का काम हाथ में लेना होगा। पहलवान बनने से पूर्व बीमारियों से छुटकारा पाना आवश्यक है। बर्तन में पानी भरने का प्रयत्न करने से पूर्व उसके छेद बन्द करने चाहिए। उद्यान लगाने वालों को पौधे चर जाने वाले पशुओं और फल कुतरने वाले पक्षियों से रखवाली का प्रबन्ध भी करना होता है।

अवतारों को पहले दुष्ट दमन करना पड़ा है तभी धर्म स्वामना का उपक्रम बना है। लंका विजय, महाभारत ही नहीं, व्यक्ति विशेष को भी इसी मार्ग पर चलना होता है। दुष्प्रवृत्तियों जड़ जमाये बैठी रहें तो सदाशयता को पनपने का अवसर ही न मिलेगा।

जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवाँछनीयताओं ने कहाँ−कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मक्कड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोई घर की−पात्र उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी

मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़ती है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्योहार मनाने का पहला काम है— सफाई। पूजा उपचार भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभि संधियों से निपटना भी है अन्यथा ‘अन्धी पीसे कुत्ता खाय’ वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुआं खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है। अनुपयुक्त से न निपटा जाय तो उपयुक्त प्राण प्रतिभा हो नहीं सकेगी। बौद्धों की एकाँगी अहिंसा को मध्य एशिया के वुतरे मुट्ठी भर आक्रमणकारी किस प्रकार देखते−देखते चट कर गये इसका स्मरण इतिहास के हर विद्यार्थी को होगा।

मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू, जुएँ, घुन, मकड़े चूहे आदि कृमि−कीटकों से न निपटा जाय—घरों में रहने वाले कनखजूरे, साँप बिच्छू, आदि आत्मरक्षा के उपाय न बरते जाँय तो अच्छे−खासे घर में भी जाना कठिन हो जायगा। पूजा कक्ष में अगरबत्ती जलाना अच्छी बात है पर नाली फिनायल छिड़कने की भी तो उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, उच्छृंखलताओं एवं बुरी आदतों से उत्पन्न होने वाली हानियाँ इतनी अधिक हैं कि उनकी आग में उपार्जन, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तुलन, भविष्य परिवार सभी कुछ ईंधन तरह जलते और समाप्त होते देखा जा सकता है। इसलिए संगति की योजनाएँ बनाते समय—यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों ने कहाँ−कहाँ डेरे तम्बू गाढ़ रखे हैं। अनुपयुक्त आदतों की विष बेलें कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमाती जा रही हैं। इस उखाड़−पछाड़ के बिना सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण ही नहीं सकेगा।

प्रत्यक्ष शत्रुओं से निपटना आसान है। चोर उचक्कों को सुरक्षा चौकीदारी से हो सकती है किन्तु उन दुष्प्रवृत्तियों से निपटना तो दूर उनको ढूँढ़ निकालना और होने वाली हानियों का अनुमान लगाना तक कठिन पड़ता है। अदृश्य को कैसे देखा जाय? अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय। सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइस्क्रोप ही इन विषाणुओं का अता−पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विषाणुओं की भूमिका निभाते और सर्वनाश का ताना−बाना बुनते रहते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में किस हेय स्तर की दुष्प्रवृत्तियाँ अधिकार जमाती हैं, इसका तीखा− निष्पक्ष पर्यवेक्षण करना चाहिए। शरीर क्षेत्र का शत्रु नम्बर एक−आलस्य है और मनःक्षेत्र का—प्रमाद। आलसी और प्रमादी प्रकारान्तर से आत्म हत्यारे हैं, वे अपने इन बहुमूल्य यन्त्रों को जंग लगाकर भोंथरे, अनुपयोगी एवं अपंग बना देते हैं। पक्षाघात पीड़ित जीते तो हैं किन्तु अशक्त असमर्थ, अर्ध मृतक की तरह रहकर। जिनके शरीर पर आलस्य का शनिश्चर छाया है वे काम से जी चुराते, और परिश्रम में बेइज्जती अनुभव करते देखे जाते हैं। प्रमादी मस्तिष्क पर जोर नहीं डालते। उचित अनुचित के पक्ष विपक्ष पर माथा−पच्ची नहीं करते जो चल रहा है उसी ढर्रे पर बेपैंदी के लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। न समय की परवा होती है न हानि−लाभ की। किसी तरह दिन काटते चलना ही अभीष्ट होता है। सुख सुविधाओं की कल्पना भर करते हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए किस प्रकार योजनाबद्ध कदम उठाना और साहस जुटाना आवश्यक है इसके लिए दिमाग पर जोर नहीं डालते। वस्तुस्थिति समझने और तद्नुरूप सोचने करने की सूझ−बूझ न रहने से ऐसे ही शेखचिल्ली की सनक सनकते रहते हैं। श्रम बिन्दुओं में लक्ष्मी रहती है और सुव्यवस्थित संकल्पों में प्रगति। आलसी और प्रमादी इन दोनों से वंचित रहते हैं। पराक्रम रहित शरीर अपंग है और उत्साह रहित मस्तिष्क मूढ़ मति। ऐसी दीन दयनीय स्थिति मनुष्य की अपनी बनाई होती है। यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक−एक क्षेत्र का उपयोग करने के लिए दिन भर के—भविष्य के—कार्य निर्धारित कर लिये जाँय और उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर श्रमशील तत्परता और रुचि रस से भरा पूरी तन्मयता का संयुक्त नियोजन किया जा सके तो सफलता चरण चूमेगी और प्रगति पथ पर सरपट दौड़ने वाली चाल चौगुनी सौगुनी बढ़ती दीखेगी।

न शरीर पर आलस्य का शनिश्चर चढ़ा रहने देना चाहिए और न मस्तिष्क पर प्रमाद का राहु−केतु। समय, श्रम और मनोयोग का ऐसा समन्वय किया जाय कि प्रगतिशील, सफल सौभाग्यवानों की राह अपनाने का श्रेय गौरव उपलब्ध हो सके।

स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर−’लो ब्लड प्रेशर’ की तरह अपने−अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव की सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जाएगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।

ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल−जुलकर रहन—मिल−बाँटकर खाना—हँसने− हँसाने की हलकी−फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सकें तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालू, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहम्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। ऐसों से न किसी को सहानुभूति होती है और न आड़े वक्त में कोई साथ देता है। वह बात उन ढोंगियों के सम्बन्ध में है जो वस्त्र, आभूषण, शृंगार, ठाठ−बाट की फिजूलखर्ची पर पैसा उड़ाते, कार्टून बनते इधर−उधर मटकते फिरते हैं। सज−धज में समय और पैसा गँवाना न अमीरी है न सभ्यता। बड़प्पन दिखाने के लिए रचा गया यह ढकोसला कितनों की आँखों में धूल झोंकने, चकाचौंध उत्पन्न करने में सफल हुआ यह कहना कठिन है। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हों तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।

ऐसे−ऐसे और भी अनेकों दोष−दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्ति यों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे− धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहने से नहीं मिट जाती उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती हैं। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उन से जूझने के लिए मोर्चे पर खड़ा करते हैं।

जीभ का चटोरपन अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य पेट पर लादता है और क्रमशः अपच, रक्त − दूषण बढ़ाते−बढ़ाते समूची स्वास्थ्य सम्पदा को ही बर्बाद करके रख देता है। इसी प्रकार कामुक चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं अपनी एकाग्रता, और चिन्तन की शालीनता गिराते−गिराते, घटाते−घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्र के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई−गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं। इन्द्रिय संयम, समय संयम, धन संयम, विचार संयम के महत्व को न समझने वाले, महत्वपूर्ण क्षेत्रों की बर्बादी अपने पैरों कुचल मारने की तरह करते हैं। आरम्भ की उच्छृंखलता कुछ ही दिनों में पहले सिरे की मूर्खता सिद्ध होने लगती है।

व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आपे से स्वयं लड़ते रहने की शूरता, किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है” इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।

यह व्यक्तिगत सुधार परिधि की—गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज के प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवाँछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। टिड्डी दल किसी कन्दरा में जन्मता है, पर जब उड़ने लगता है तो दूर−दूर तक के खेत खलिहानों को उजाड़ता चला जाता है। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर−दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं। तालाब में एक जगह डेला फेंकने पर उससे उत्पन्न होने वाली लहरें समूचे सतह को हिलाने उछालने लगती हैं।

मूढ़ मान्यताओं के क्षेत्र में ऐसी अनेकों बातों का समावेश है जो अभ्यास में आ जाने से निर्दोष भी लगती है और रुचिकर भी। पर उनमें आदि से अन्त तक अवास्तविकता ही भरी रहती है। जादू−टोना, भूत− पलीत, देवी−देवता, भविष्य कथन, भाग्यवाद, फलित ज्योतिष के कुचक्र में कितने ही अपनी शान्ति गँवाते, भ्रम जंजालों में उलझते, विग्रह मोल लेते, जिस−तिस पर लाँछन लगते और भूल सुधारने के स्थान पर भाग्य को कोसते देखे जाते हैं। यदि इन भ्रम जंजालों से निकला जा सके तो भ्रान्तियों से उत्पन्न होने वाली विकृतियों एवं क्षतियों से बड़ी मात्रा में बचा जा सकता है।

आहार−बिहार सम्बन्धी कितनी ही मूढ़ मान्यताएँ इस विज्ञान के युग में भी बुद्धिमानों की मूर्खता बनकर रह रही हैं। आहार को स्वाभाविक रूप में लेने की अपेक्षा लोग उसे भुनते, तलते, मसालों, जायकों से विकृत करते हैं। फलतः खाद्य अखाद्य बन जाता है और खाद्य का कोयला खाकर किसी प्रकार जीवित रहना पड़ता है। कामुकता में इन्द्रिय उत्तेजना कम और दिमागी खुराफात के रूप में विकसित हुई— काल्पनिक शृंगारिता मुख्य है। इसे कला का व्यभिचार कहा सकते हैं। अन्यथा नर−नारी के बीच साधन सहयोग तो समझ में आता है, पर उस कामुकता के घटाटोप में कोई सार नहीं दीखता, जो इन दिनों हर आदमी को भूत−पिशाच की तरह जकड़े हुए है। नशेबाजी—माँसाहार को अपनाने वाले तथ्यों के समर्थक नहीं, वरन् प्रचलन के साथ जुड़े हुए तथाकथित सभ्यता के अभिशाप ही समझे जा सकते हैं। इन मान्यताओं का यदि नये सिरे से परीक्षण, पर्यवेक्षण किया जा सके तो प्रतीत होगा कि आदिम काल के अन्ध−विश्वासी मनुष्य में आज के सभ्यताभिमानियों की विचारशीलता में कोई विशेष अन्तर नहीं आया है। कम से कम प्रचलनों और मान्यताओं के क्षेत्र में तो अभी भी अन्ध विश्वासों का बोलबाला है। चिकित्सा क्षेत्र में तो अभी भी टोना−टोटका की तरह ही अभी भी अन्धेरे में पत्थर फेंक जाती है। इसमें तथाकथित मूर्धन्य चिकित्साशास्त्री भी सम्मिलित हैं।

कुरीतियों की दृष्टि से यों आत्म समाज भी अछूते नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक्त जोड़ों का विवाह कर दिया जाय और सार्वजनिक घोषणा के रूप में उनका पंजीकरण करा देने या घरेलू त्यौहार जैसा कोई हलका-सा हर्षोत्सव कर देना यही औचित्य की मर्यादा है। पर अपने यहाँ उसे युद्ध जीतने या पहाड़ उठाने जैसा बना लिया गया है। उस घमात में पैसे की समय की जितनी बर्बादी होती है, उसका हिसाब लगाने पर प्रतीत होता है कि आजीविका का एक तिहाई अंश इसी कुप्रचलन में होली की तरह जल जाता है। खर्चीली शादियाँ हमें किस तरह दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। कितने ही परिवारों की सुख−शान्ति और प्रगति किस प्रकार इस नरभक्षी पिशाचिनी की बलिवेदी पर नष्ट होती है इसे अधिकाँश लोग समझते भी हैं और कोसते भी। फिर भी आश्चर्य यह है कि छोड़ते किसी से नहीं बनता, इसे कुरीतियों का माया जाल ही कहना चाहिए जो तोड़ने का दमखम करने वालों को भी अपने शिकंजे से छूटने नहीं देता।

जाति−पाँति के नाम पर प्रचलित ऊँच−नीच की मान्यता के पीछे न कोई तर्क है न तथ्य, न प्रमाण, न कारण। फिर भी अपने समाज में ब्राह्मण−ब्राह्मण के —ठाकुर−ठाकुर के—अछूत−अछूत के बीच जो ऊँच− नीच का भेदभाव चलता है उसे देखते हुए लगता है कि यह सवर्ण असवर्ण के मध्य चलने वाला विग्रह नहीं है, वरन् हर बिरादरी वाले अपनी ही उपजातियों में ऊँच− नीच का भेद बरतते−बरतते इस प्रकार बँट गये हैं मानो उनका कोई एक देश, धर्म, समाज या संस्कृति रह ही नहीं गई हो। हर जाति, उपजाति ने अपने छोटे गड्ढे घरोदे बना लिये हैं और उतने से दायरे में कूपमंडूकों की तरह अपने को सीमाबद्ध किये बैठे हैं। इसी विलगाव का कारण है कि अपना कोई धर्म समाज बन ही नहीं पाता। इस दुर्विपाक से सभी परिचित हैं, सभी दुःखी हैं, सभी विरुद्ध हैं। फिर भी कुरीतियों का कुचक्र तो देखिये कि बरताव में सुधारक भी पिछड़े लोगों की तरह ही आचरण करते हैं।

नर−नारी के बीच बरता जाने वाला भेदभाव कुरीतियों की दृष्टि से और भी घिनौना है। इसने पर्दे के प्रतिबन्ध में आये जन समुदाय को दूसरे दर्जे के नागरिक की− नजरबन्द कैदी की—स्थिति में ले जाकर पटक दिया है। नारी आज की स्थिति में देश की अर्थ व्यवस्था में—सामाजिक प्रगति में कुछ योगदान दे सकने की स्थिति रही ही नहीं। अशिक्षा, उपेक्षा, अयोग्यता, पराधीनता, अस्वस्थता के बन्धनों में जकड़ी हुई, अन्धा−धुन्ध प्रजनन के प्राण घातक भार अत्याचार से लदी हुई नारी अपने आपके लिए—नर समुदाय के लिए—समूचे समाज के लिए−भारभूत बरकर रह रही है। कन्या और पुत्र के बीच बरता जाने वाला भेदभाव कितना कष्टकर है। उसके रहते सन्तान और अभिभावक के बीच बरते जाने वाली सद्भावना का एक प्रकार से समापन ही हो जाता है।

भिक्षा व्यवसाय, मृतक भोज, बाल−विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय, पत्नी त्याग आदि अनेकानेक प्रचलन ऐसे हैं जो औचित्य की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरे सिद्ध नहीं होते फिर भी हमारे गले में फाँसी के फंदे की तरह कसे हुए हैं। इन कुरीतियों को इसी प्रकार सहते रहा गया, उनका मोह न छोड़ा गया तो समझना चाहिए कि हम दिन−दिन गलते, फिसलते, पिछड़ते और घटते गिरते ही जायेंगे।

अनैतिकताओं का तो कहना ही क्या? समय का पालन, वचन का पालन, विश्वास का पालन घटता जा रहा है। व्यवसाय, आचरण कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व के क्षेत्रों में तनिक−तनिक-सी बात पर मनुष्य ऐसी कला− मुण्डी खाता है मानो नीति मर्यादा, पालन की नहीं, कहने−सुनने भर की बार रह गई है। कामचोरी, हराम− खोरी, करचोरी, रिश्वत, धोखाधड़ी, छल, स्वार्थांधता, नागरिक कर्त्तव्यों की अवहेलना, आदि की अवांछनीयताएं अब सामान्य व्यवहार का—चातुर्य कौशल का− अंग बनती जा रही है। लगता है मनुष्य अपनी गरिमा का परित्याग कर प्रेत पिशाच जैसी अपनाई जाने वाली दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने के लिए तेजी से अग्रसर हो रहा है।

ऊपर की पंक्तियों में कुछ ऐसी अवाँछनीयताओं की चर्चा हो जो प्रचलन का अंग बनती जा रही है। अपना परिवार परिकर भी इन सर्वव्यापी छूत से बचा हुआ नहीं है। नौकरी के लिए पढ़ाई की अब कोई उपयोगिता रह नहीं गई है फिर भी लोग घर फूँककर तमाशा देखते और बालकों को उच्च शिक्षा के नाम पर ऐसी स्थिति में पटक देते हैं जिनमें से नौकरी न मिलने पर किसी काम के नहीं रहते। सन्तानोत्पादन का अब कोई तुक नहीं रहा। परिवार के लोगों को स्वावलम्बी सुसंस्कारी भर बनाने की बात किसी की समझ में नहीं आती। उत्तराधिकारियों को मुफ्त में खाने के लिए कुबेर जितनी संपदा छोड़ मरने की हर किसी योग्य अयोग्य के सिर पर सनक सवार है।

यह कथा पुराण की चर्चा नहीं है। हम सबसे व्यवहार में आये दिन प्रयुक्त होने वाली अनुपयुक्तताएँ हैं जिन्हें एक दिन के लिए भी सहन नहीं किया जाना चाहिए। कूड़े करकट की तरह बुहार के सड़ने को किसी गड्ढे में दबा दिया जाना चाहिए। किन्तु हम हैं जो मरे बच्चे को छाती से चिपकाये फिरने वाली बंदरों की तरह उन्हें आत्मसात किये बैठे हैं! उन्हें छोड़ने का नाम नहीं लेते।

प्रज्ञा परिजनों की व्यस्तता को देखते हुए उनसे यह आशा तो नहीं की जा सकती कि चक्रव्यूह तोड़ने वाले अभिमन्यु की भूमिका निभायें। पर इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वे अपने निजी जीवन में—परिवार के क्षेत्र में—जो मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ, अवाँछनीयताएँ पनपती देखें उन्हें समय रहते उखाड़ने का प्रयत्न करें। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि उनका समर्थन न करें उनकी प्रशंसा भी न करे। विरोध बन पड़े तो करे पर यदि− वैसा साहस न हो तो कम से कम असहमति और असहयोग करी स्थिति तो बनाये ही रहें। यह भी गाँधीजी का बताया हुआ व्यक्तिगत सत्याग्रह का एक छोटा रूप है। उसे तो अपनाया ही जा सकता है।

निजी जीवनक्रम और परिवार क्षेत्र हर व्यक्ति का अपना है। उस पर प्रभाव का रहना भी असंदिग्ध है। एक क्षेत्र में दुष्प्रवृत्तियों को पनपने से रोका जा सकता है और उन्हें उखाड़ने में सफल भी रहा जा सकता है। यदि सत्य निष्ठा उमँगे, औचित्य के प्रति श्रद्धा जगे तो उसे साहस भरे संघर्ष के रूप में परिणति करना चाहिए और जितना सम्भव हो उतना विरोध अथवा असहयोग जारी रखना ही चाहिए। इतनी प्रखरता यदि जीवन्त रखी जा सकती तो उतने से भी अनौचित्य के असुर का मनोबल टूटेगा और देवत्व पनपेगा।


शिक्षा और विद्या की अभ्यर्थना हमारे हर परिवार में चल पड़े

इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि परिस्थिति की जन्मदात्री मनःस्थिति है। दैवी प्रकोप, प्रकृति विग्रह इसके अपवाद हैं। जो कभी−कभी ही देखने को मिलते हैं। आमतौर से आकाँक्षाएँ विचारणाओं को प्रेरित करती हैं। विचारों से कर्म बनते हैं और कर्म की प्रतिक्रिया भली−बुरी परिस्थिति बनकर सामने आती है। सृष्टि क्रम यही है। मानव जीवन का—समाज प्रवाह का— विधि−विधान यही है। तथ्यों को समझते हुए प्रतिकूलताओं को सुधारने के प्रत्यक्ष प्रयत्न तो होने ही चाहिए, सामयिक सन्तुलन बिठाने वाले कदम तो उठने ही चाहिए किन्तु यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि मनःक्षेत्र यदि मूढ़ता और दुष्टता से भरा रहा तो प्रगति एक शान्ति की अभिलाषा मृग, तृष्णा मात्र ही बनी रहेगी।

सुधार प्रयासों में जन मानस का स्तर उठाया जाना आवश्यक है। उसमें बसी अवाँछनीयताओं का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस दिशा में उपेक्षा बरती गई तो सुधार के लिए किये गये प्रयत्न बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियों के गर्त्त में गिर कर नष्ट होते रहेंगे। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रगतिशील पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा किये जाने वाले पराक्रम का निरर्थक चला जाना, इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। वैज्ञानिक, बौद्धिक एवं आर्थिक प्रगति के अनेकों द्वार इन दिनों खुले हैं और उनमें सन्तोषजनक सफलता भी मिली है फिर भी हर क्षेत्र में दिन−दिन संकटों का घिरते जाना, इस बात का प्रमाण है कि चिन्तन और चरित्र की गिरावट समस्त उपलब्धियों को नष्ट निरस्त करके रखे दे रही है।

दूसरे लोगों को प्रगति के प्रत्यक्ष प्रयत्नों में लगे रहने देना चाहिए। प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को अपने हिस्से का उत्तरदायित्व यह मानना चाहिए कि उन्हें लोक मानस के परिशोधन परिष्कार का काम विशेष रूप से अपने कन्धों पर उठाना है। दूसरे लोग उसका महत्व नहीं समझ पा रहे और प्रयत्न नहीं कर रहे तो किसी का कोसने की अपेक्षा यह अच्छा है कि उस अभाव की पूर्ति में हम जुट पड़े और प्रयास का प्रतिफल प्रस्तुत करते हुए सर्वसाधारण को इस तथ्य से अवगत—सहमत करें कि सर्वसाधारण को इस तथ्य से अवगत—सहमत करें कि सर्वतोमुखी प्रगति के अन्यान्य प्रयासों में विचार−क्रान्ति की—प्राथमिकता दी जाय साथ ही दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रत्यक्ष प्रयास परिवर्ण तत्परता−तन्मयता के साथ सम्पन्न किया जाय। प्रज्ञा परिजन इस युग धर्म को समझें और अपने हिस्से का काम श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न करने के लिए आगे आयें।

इस दिशा में दो उपाय अपनाने होंगे—दो कदम उठाने होंगे। एक लोक व्यवहार की अधिक जानकारी देने वाली शिक्षा का संवर्धन। दूसरा चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने वाली विद्या का पुनरुत्थान। यह दानों काम साथ−साथ चलने चाहिए।

शिक्षा के लिए निरक्षरों को साक्षर बनाया जाना और साक्षरों को अधिक ज्ञानवान बनाया जाना आवश्यक है। विद्या के लिए स्वाध्याय सत्संग जैसे प्राणवान माध्यम खड़े करने होंगे और व्यक्तिगत रूप से जन−जन को दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए मनन चिन्तन की आदत डालनी होगी।

अपने देश में इन दिनों 70 प्रतिशत व्यक्ति अशिक्षित हैं। साक्षरों शिक्षितों की संयुक्त संख्या 30 प्रतिशत है। सर्वविदित है कि शिक्षा के अभाव में मनुष्य विज्ञ बहुज्ञ नहीं बन सकता है। इसके बिना कूप मंडूक बना मनुष्य उतना ही सोच सकेगा जितना कि सीमित घिराव में रहते हुए सम्भव है। सर्वतोमुखी विचार क्रान्ति से लेकर भौतिक प्रगति की सामयिक जानकारी प्राप्त करने तक में शिक्षा का विस्तार नितान्त आवश्यक है।

अगले दिनों प्रज्ञा अभियान के पैर मजबूत होते ही साक्षरता संवर्धन की जिम्मेदारी भी अपने ही कन्धों पर आने वाली है। शिक्षितों को विद्या ऋण चुकाने के लिए अनुरोध ही नहीं आग्रह भी किया जाना है। अध्यापकों की आवश्यकता उसी उदार समयदान से सम्भव होगी। आकर्षित नर−नारियों के गले यह बात उतारी जायेगी कि ही नहीं वयस्कों, अधेड़ों और वृद्धों को भी बिना नर−नारी का अन्तर किये शिक्षा सम्पदा उपार्जित करना आवश्यक है। प्रौढ़−पाठशालाओं की हर गली मुहल्ले में स्थापना करने की बात प्रज्ञा अभियान की प्रमुख योजनाओं में से एक है। साधनों और सहायकों की सामर्थ्य के साथ तालमेल बिठाते हुए उसे व्यापक बनाने का क्रम यों चल तो इन दिनों भी अधिक विलम्ब लगने लिए बालकों की शिक्षा व्यवस्था ही भारी पड़ रही है प्रौढ़ अशिक्षितों को साक्षर बनाने की बात तो जन आन्दोलन के सहारे ही बन सकना सम्भव है।

शिक्षा विस्तार का दूसरा उपाय यह है कि अक्षरों को अधिक शिक्षित बनाया जाय। सामान्य जीवन में सुव्यवस्था और प्रगतिशीलता ला सकने वाले ज्ञान का सम्पादन का अंग बना दिया जाय। विदेशों में लोग आजीविका उपार्जन के उपरान्त मिलने वाले अवकाश में से एक−दो घण्टे का समय उपयोगी ज्ञान को बढ़ाने के लिए बने रात्रि विद्यालयों में नाम लिखाते और पढ़ने जाते है। आजीविका उपार्जन और ज्ञान संवर्धन की दुहरी प्रक्रिया किसी के लिए भी कठिन नहीं पड़ती। दुहरा लाभ उठाना हर किसी को रुचिकर होता है। यह प्रचलन अपने यहाँ भी होना है। व्यस्त शिक्षितों को अधिक ज्ञानवान बनाने के लिए रात्रि विद्यालयों की व्यापक व्यवस्था बनानी पड़ेगी। विदेशों में अनेक विद्यालय शनिवार,रविवार की साप्ताहिक छुट्टी के दो दिन चलते हैं। अपने यहाँ एक दिन के साप्ताहिक अवकाश का उपभोग भी विभिन्न विषयों के विद्यालयों के लिए हो सकता है। साक्षरता एवं ज्ञान संवर्धन के दोनों प्रयास साथ−साथ चलाने से ही अपने देश की बौद्धिक सम्पदा बढ़ेगी। इतना बन पड़े तो सम्पन्नता, समर्थता एवं प्रगतिशील की भी कमी न रहेगी।

यह व्यापक क्षेत्र में अपनाई जाने वाली ज्ञान संवर्धन योजना की चर्चा हुई। प्रज्ञा परिजनों को अपने निजी कार्यक्षेत्र परिवार में—इसका कार्यान्वयन तत्काल आरम्भ कर देना चाहिए। घर में जो अशिक्षित हों उन्हें पढ़ने के शान्त चित्त से—धीमी गति से— प्रयत्न करना चाहिए। एक बारगी दबाव डालने से तो आवेश में इन्कार भी कर सकते है। और उस इनकारी को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर न करने के लिए अड़ भी सकते हैं। ऐसा विग्रह मनोमालिन्य खड़ा न हो इसलिए इन प्रयत्नों को धीमीगति से ही चलने देना चाहिए। आवश्यक नहीं कि सभी सहमत हों जो बात मानले उन्हीं को लेकर कार्य आरम्भ याचना से ही जुटेंगी, पैसा देकर नहीं। अपने घर में भी ऐसा ही चले। शिक्षित अशिक्षितों को पढ़ायें। दोनों की सुविधा के समय का तालमेल बैठ जाना कुछ कठिन नहीं है। एक−एक करके घर के सभी अशिक्षित ज्ञानयज्ञ की इस शिक्षा साधना में भागीदार बनते जायें यह प्रयास बिना सकें, बिना खीजे, बिना निराश हुए जारी रखा ही जाना चाहिए भले ही उसकी गति मन्द ही क्यों न हो।

यही बात साक्षरों को अधिक शिक्षित बनने—अधिक ज्ञानवान बनने की इच्छा जगाने के सम्बन्ध में भी लागू होती है। ऐसी पाठशालाएँ गली−मुहल्लों में चल सकती हैं। पर वैसा न बन पड़े तो भी अधिक ज्ञानवान, कम ज्ञानवानों को पढ़ाने का प्रचलन आरम्भ करें। निजी प्रयत्न से भी यह चलता रह सकता है। स्कूली परीक्षा देने की बात दूसरी हैं उसके लिए ट्यूटर चाहिए। घर ज्ञान सम्पदा के लिए अध्यापन जारी रखने के लिए स्वाध्याय में रुचि जगा देने भर से बात बन जाती है। किसी विषय का साहित्य लगातार पढ़ते रहने पर अभीष्ट ज्ञान को बिना किसी दूसरे की सहायता के प्रचुर परिमाण में एकत्रित किया जा सकता है। स्कूली परीक्षाओं में भी कितने ही छात्र बिना स्कूलों में भर्ती हुए भी घर पर बिना किसी सहायता के पढ़ते है। कुँजियों के सहारे काम चलाते और अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते रहते हैं। अपने घर में भी ऐसी ही अभिरुचि जगानी चाहिए। उसे जगाने में अपनी नम्र, मधुर धीमी भूमिका होनी चाहिए कि एक−एक करके सभी उस नव निर्धारण को अपनाने में रुचि लेने लगे। तत्पर दीखने लगें।

इसके लिए पुस्तकालयों की नितान्त आवश्यकता है। हर व्यक्ति खरीद कर कहाँ तक पढ़े। अपने देश में तो दरिद्रता और अरुचि का दुहरा दबाव होने से उपयोगी पुस्तकें नियमित रूप से मिल सकें ऐसी व्यवस्था कठिन है। ऐसी दशा में पुस्तकालय हो, ज्ञान सम्पदा की सहकारी समिति, उदार बैंक एवं समर्थ अध्ययन की भूमिका निभा सकते है। अगले सम्पादन मिलने वाला है। पर निजी क्षेत्र में इतना तो अभी भी हो सकता है कि बजट में परिवार की बौद्धिक भूख बुझाने के लिए घरेलू पुस्तकालय बढ़ते रहने की भी एक मद रहे। अन्न,वस्त्र की तरह ही यदि बौद्धिक आवश्यकता पूरी करने वाले सत्साहित्य को भी महत्वपूर्ण मान लिया जाए तो फिर उसके लिए कुछ राशि नियमित रूप से निकालते रहने में कठिनाई नहीं रह जायगी। दस पैसा ज्ञान घटों में डालने की न्यूनतम शर्त प्रायः सभी प्रज्ञा परिजन निभाते हैं। इसे बढ़ाकर पच्चीस पैसा—एक रुपया—या महीने में एक दिन की आमदनी जितना बना लिया जाय तो उतने से एक अच्छा घरेलू पुस्तकालय बन सकता है। उसमें नया साहित्य नियमित रूप से बढ़ता रह सकता है। इसके न केवल घर के वरन् मित्र पड़ौसी भी लाभ उठाते रह सकते हैं।

आत्मिक प्रगति के चार सूत्रों में(1) साधना (2)स्वाध्याय (3)संयम (4)सेवा के चार चरण निर्धारित है। साधना के बाद दूसरा नम्बर स्वाध्याय का है। स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें प्रज्ञा साहित्य सुनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए। कथा श्रवण वाचन का शास्त्रों में बहुत पुण्यफल बताया। गया है। इस धर्म कृत्य का हमें अपने−अपने घरों में मनोयोगपूर्वक पढ़ने और उसका सार तत्व हृदयंगम करने व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करने की घर में नित्य धर्म कथा होने की तरह ही पुण्य प्रचलन मानना चाहिए। इस संदर्भ में नव प्रकाशित प्रज्ञा पुराण का उपयोग भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। पारिवारिक सत्संग यही है। इससे उस ब्रह्म विद्या की— महाप्रज्ञा की आराधना बन पड़ती है जिसकी परिणति आत्म−सन्तोष, जन सम्मान एवं दैवी अनुग्रह जैसी विभूतियाँ उपलब्ध कराने में होकर ही रहती है।

जन्म दिवसोत्सव, षोडश संस्कार, पर्व त्यौहार सभी धर्म आयोजनों में वे प्रेरणा भरी पड़ी है जिनके सहारे आत्मज्ञान तथ्य ज्ञान एवं व्यवहार ज्ञान की त्रिविधि आवश्यकताएँ पूरी होती है। इन अवसरों पर सामूहिक आयोजन की विधि−व्यवस्था स्थानीय प्रज्ञा पुत्रों के का ह देने पर बिना किसी कठिनाई के सम्पन्न हो जाती है। वैसा न बन पड़े तो इन शुभ अवसरों—पुण्य पर्वों पर स्वयं ही अपने परिवार को प्रगतिशील बनने के लिए समझाने को निजी सत्संग का प्रबन्ध समय−समय पर स्वयं ही करते रहा जा सकता है। धार्मिक वातावरण में उपलब्ध हुई उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ अपेक्षाकृत अधिक सरलतापूर्वक हृदयंगम होती हैं। व्यवहार में उतरने पर अपना उत्साहपूर्वक चमत्कार भी दिखाई है। शिक्षा और विद्या की अभ्यर्थना उपरोक्त उपायों का अवलम्बन लेकर प्रज्ञा परिजनों को अपने−अपने परिवारों की परिधि में करनी और करानी ही चाहिए। नव सृजन के लिए करने को तो अनेकानेक सृजनात्मक क्रिया−कलपना है, उनमें शिक्षा संवर्धन को प्रथम और हरितिमा आरोपण को दूसरा स्थान दिया जा सकता हे। मनुष्य वनस्पतियों से जीवन धारण करने वाला प्राणी है। अन्न, शाक, फल वनस्पतियों की देन है। यहाँ तक कि जिन पशु−पक्षियों का मांस खाया जाता है वे भी शाकाहारी ही होते है। इस प्रकार भी वनस्पति का ही उत्पादन है। दूध, घी, शहद जैसे पदार्थ भी प्रकारान्तर से वनस्पति का प्राणियों द्वारा किया गया रूपांतरण ही है। अन्न के बाद जल मनुष्य का दूसरा आहार है। वृक्ष आकाश से बादलों को अपनी आकर्षण शक्ति से खीचते और बरसने को विनहि सम्भव न हो सके। यह ठीक है कि पौधे जल से सींचे जाते है, पर यह भी उतना हो सही है कि पेड़ जल बरसाने प्राणियों के लिए भी पानी की व्यवस्था बनाते है। जिस सांस को लेकर हम सब जीते है उसमें हवा के साथ ऑक्सीजन भी धुली रहती है। इसी के सहारे शरीर को ऊर्जा मिलती है। यह प्राणवायु वृक्षों की देन है, वे सांस से निकलने वाली ‘कार्बन’ को सोखते है। और बदले में जीवन तत्व फेंकते है। इस प्रकार मनुष्य और पीछे एक−दूसरे के जीवन निवहि में निमित्त कारण बन कर रह रहे है। यह तथ्य है कि यदि पेड़ न रहें तो मनुष्य भी प रहेगा। जड़ों के अभाव में वह जायगी और सर्वत्र खाई टील ही दृष्टिगोचर होंगे।

हरितिमा संवर्धन इस धरती पर विद्यमान जीवन तत्व की जड़ को सींचता है। यदि अपने लोक में सजीवता बनाये रखनी है ध्यान रखना होगा कि वृक्ष वनस्पतियों की वन भी घटने न पाये। ईंधन के बिना न भोजन पकता है और न ठंड से निपटने बन सकता है। ईंधन की अधिकाँश आवश्यकता जलाऊ लक्कड़ों के बिना बनती नहीं। फर्नीचर बक्से, तथा पैकिंग पार्सलों के लिए लकड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है। फलों की पौष्टिकता और फलों की शोभा सुषमा की अन्यत्र होती ही है मनुष्यों के लिए भी थकना मिटाने वाले आच्छादन की आवश्यकता पूर्ण करते है।

वृक्षों को देवता की उपमा दी गई है। विल्व, आंवला, वट, पीपल को देवता की तरह पूजा जाता है। तुलसी का विरवा देव मन्दिर बनाने की तरह आँगन में रोपा जाता है। सूर्य को अर्ध चढ़ाने की तरह उस पर भी जल चढ़ाते है। नित्य दीपक जलाने और परिक्रमा करने का धार्मिक घरों में वैसा ही प्रचलन है जैसा कि देवालयों के सम्मान में श्रद्धापूर्वक सम्पन्न किया जाता है।

जड़ी बूटियाँ संजीवनी मूरी है। रोग निवारण में उनका ही आश्रम लेना पड़ता है। च्यवन ऋषि को यौवन और लक्ष्मण को पुनर्जीवन प्रदान करने में उनकी अद्भुत शक्ति का परिचय मिलता है। इनकी शोध में चरक, सुश्रुत, बाणभट्ट, आदि अनेकानेक ऋषि तपस्वियों ने अपने जीवन रुपा दिये। अभी भी उस प्रयास का अन्त नहीं हुआ है। जराजीर्ण काया को नव यौवन प्रदान करने में जिस कल्प चिकित्सा की कभी भारत ने विश्व ख्याति प्राप्त की थी, इसकी पुनःखोज निकलने के प्रयास अभी भी चल रहे है। वनस्पति को देवता प्रतिष्ठा देने के लिए तुलसी ही बूटी से संसार के समस्त रोगों के निवारण को अनुपम रूप से विज्ञजन चिकित्सा करते पाये जाते है। चंदन को शिर पर लगाने के लिए मनुष्य ही नहीं डडडड सी आतुर रहते है। यज्ञ कर्म में समिधाएं ही डडडड होती है। जन्म के समय पालने से लेकर मरण डडडड के चिता संस्कार तक काष्ठ ही साथ रहता है। दिन के की कुर्सी पर और रात्रि में चारपाई पर बैठ ही बिताते है। हल हो या हथौड़ा, लकड़ी साथ रहेगी। ऐसे डडडड मित्र, साथी और सहचर कदाचित ही और काँई मिलता हो जैसा कि वृक्ष परिकर। आंखों को शीतलता, मस्तिष्क को शान्ति देने में वनस्पतियों की तुलना और किसी से नहीं की जा सकती है। इतना सुन्दर और कोई नहीं जितना कि फूल के अति−रिक्त प्रकृति ने और किसी में नहीं किया।

हमें वनस्पति से स्नेह, सहयोग, सौजन्य प्राप्त है। बदले में हमें भी वैसी ही कृतज्ञता बरतनी चाहिए और आदान−प्रदान का सिलसिला जारी रखना चाहिए। उनका वशं नष्ट न होने दें। हरितिमा हमारा परिपोषण करती है हम उसके संवर्धन में रुचि लेकर कृतज्ञता व्यक्त करें। सभ्य देशों में सामान्य नागरिकों को देहाती जीवन पसन्द है। वहाँ वे अपने घरों के चारों ओर हरियाली लगाते है। व्यस्त, व्यवसायियों या दारिद्री, व्यसनी आलसियों को छोड़कर बड़े नगरों में काम करने वाले भी देहातों में रहने की व्यवस्था बनाते है। भले ही आवागमन में पैसा या समय खर्च होता हो। वे जानते है कि जिस वातावरण में जीवन की अन्तःसत्ता विकसित होती है। वह वृक्ष वनस्पतियों के छोड़कर बड़े नगरों में भी अब जो नये निर्माण हो रहे है उनके घर डडडड उद्यान लगाने के लिए उपयुक्त भूमि सुरक्षित रखो का प्रावधान रहता है। घरों की हरितिमा के साथ जोड़ रखा का तात्पर्य है —जीवन और प्रकृति का सहचरत्व रहना। इस और कुरुचि भर जाने का ही प्रमाण परिचय मिलता है।

घर छोटे हो या बड़े। सवन हो या बिरल उनमें परिवार के अन्य सदस्यों की पौधों के लिए भी स्थान रहना चाहिए। डडडड को पालने की तरह उन्हें भी पाला−पोसा जाना चाहिए। छोटी−सी पुष्प वाटिका हर घर में हो। तुलसी विरबा हर आंगन में दृष्टिगोचर हो और वह श्रद्धा एवं सुरुचि के जीवन रहने का परिचय दें। आँगन वक्का हो तो गमलों का उपयोग ही सकता है। आंगन में जगह कम पड़ती हो तो अधर में भी लटकाये जा सकते है। बेलें छप्पर पर चढ़ सकती है। छत पर भी बक्सों, गमलों, टोकरों में एक उद्यान लग सकता है। घर के अगल−बगल में जगह में भी शाकवाटिका, पुष्प वाटिका लग सकती है। उसकी साज सम्भाल में शिशु पालन जैसी आह्लाददायिनी सेवा साधन बन पड़ता है। इतना ही नहीं उसकी सिंचाई, गुड़ाई, निराई छटाई में हलकी−फुल्की दैनिक कसरत भी बन पड़ता है। विनोबा सबसे अच्छी कसरत बागवानी को बताते है, इससे उत्पादक श्रम बन पड़ता है और स्वास्थ्य रक्षा के अतिरिक्त सुरुचि पोषण और का त्रिविधि लाभ मिलता है।

इस संदर्भ में दो और भी महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश किया जा सकता है। एक है—आहार सम्बन्धी वर्तमान प्रचलन में क्रान्तिकारी परिवर्तन। दूसरा है गृह उद्योगों का घर−घर में संस्थापन। कमटोरी बीमारी से निपटने के लिए हमें अपनी भोजन रुचि बदलनी होगी और निठल्ले मनके सहचर दारिद्रभ से पीछा छुड़ेगा। इन दोनों ही पुष्प प्रयोजनों के बीजाँकुर गृह उद्यान के उपक्रम में विद्यमान है।

हमारा आहार जीवन्त होना चाहिए। भुना, तला, सूखा, मसलों की उत्तेजना से भरा आहार एवं प्रकार से अखाद्य है। पोषक पदार्थों का कोयला बना कर खान की आदत बदलनी होगी, अन्यथा धनी दरिद्र सभी की कुपोषणजन्य दुर्बलता डडडड अपने शिकंजे में डडडड रहेगी। हरे शाकभाजी, मौसमी फल एवं अंकुरित अन्न का प्रचलन चल पड़े तो गरीबी के रहते हुए भी किसी को कुपोषण का शिकार नहीं बनना पड़ेगा। घरों में शाक भाजी उगाने का उपक्रम स्वास्थ्य की दृष्टि से इस लिए आवश्यक है कि उससे आहार की उत्कृष्टता समझने समझाने में जीवित पदार्थों की उपयोगिता पर ध्यान टिकता हैं। शाक−वाटिका की उपज से उतना तो लाभ मिल ही जाता है जितने से परिवार भर को कुपोषण के अभिशाप से बचाया जा सके। जगह और रुचि हो तो एक छोटे परिवार के लिए शाक भाजी, आंगन,छप्पर और छत पर उगने वाली शाक वाटिका से ही उपलब्ध होते रह सकते हैं। हरी मिर्च,पोदीना,धनिया, सलाद, पालक, अदरक, प्याज आदि से घर को हरी चटनी मिल सकती है और उतने से भी कुपोषणजन्य संकट टल सकता हैं।

इन दिनों वातावरण में प्रदूषण भरते जाने की विभीषिका से उत्पन्न होने वाली हानियों से सभी विचारशील परिचित और आतंकित हैं। इसका सर्वसुलभ समाधान हरितिमा संवर्धन ही हैं। विषाक्तता को खाने पचाने में समर्थ नील कंठ भगवान के उपरान्त दूसरा नम्बर वनस्पति सम्पदा का ही आता हैं। इसके लिए उत्साह दिखाया जा सके तो परिवार को प्रदूषणजन्य हानियों से बचाने के अतिरिक्त समूचे वातावरण के परिशोधन से भी इस आधार पर योगदान मिल सकता हैं। इसमें स्वार्थ के साथ−साथ परमार्थ का समन्वय भी है।

शाकवाटिका एक गृह उद्योग होने वाला आर्थिक लाभ स्पष्ट है। इन दिनों शाक भाजी की कितनी महंगाई है और मनमाने दाम देने पर भी गन्दे नालों से उगाई,हुई कई−कई दिन की रखी वासी सब्जी खरीदनी पड़ती है। इसकी तुलना में घर उगाये शाकों से स्वास्थ लाभ के अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी हैं। इस दृष्टि से इसे एक गृह उद्योग ठहराया जा सकता है। इस दिशा में पहल करना नितान्त आवश्यक है। बेकारी और गरीबी के नागपाश से छूटने के लिए, घर में सौभाग्य लक्ष्मी का दर्शन, करने के लिए जापान की तरह हमें भी घर−घर में सहकारी गृह उद्योग लगाने होंगे। इसका प्रतीक पूजन—शुभारम्भ, शाक वाटिका लगा कर किया जा सकता है।

उत्पादन का दूसरा पक्ष है—बचत। इसे भी गृह उद्योग में सम्मिलित किया जा सकता है। कपड़ों की सिलाई, धुलाई, पुरानों को काटकर छोटे नये बना लेना एक बचत उद्योग हैं। टूट−फूट की मरम्मत भी इसी श्रेणी में आती है और बताती है कि बचाना भी कमाने के ही समतुल्य लाभदायक है। सुई, कैंची, साबुन, बुहारी फिनायल जैसे उपकरण सभी घरों में होते हैं। इन्हीं में पोतने का चूना, किवाड़, फर्नीचरों का रंग वार्नस भी सम्मिलित रखा जा सकता है बर्तन, फर्नीचर आदि के टूट−फूट को सुधारने के लिए थोड़े से अभ्यास से काम चल सकता है। पुस्तकों की जिल्द बाँध से अभ्यास से काम चल सकता है। पुस्तकों की जिल्द बाँध देना कठिन नहीं। चूहों के छेद,छत की दरारें, फर्सों के गड्ढे बन्द करने में तनिक से अभ्यास और थोड़े से उपकरणों की आवश्यकता है आरी, छैनी, हथौड़ी, वसूली, कन्नी, जैसी थोड़े से उपकरणों से घर में छोटी मरम्मत फैक्टरी चल सकती है। चारपाई की टूटी रस्सियों के साथ थोड़ी नई मिला कर उसे कम खर्च में बुना जा सकता है। सस्ता और अच्छा साबुन घर पर ही बन सकता है। बालकों के लिए तरह−तरह के खिलौने बना कर देते किसी कुशल गृहणी के बाँये हाथ का खेल है। आटा पीसने की चक्की लगा ली जाय और पति−पत्नी रोज की काम चलाऊ पिसाई मिल−जुलकर कर लिया करें तो मनोरंजन, स्वास्थ्य संवर्धन और आत्म बचत के तीनों प्रयोजन साथ−साथ सधते रह सकते हैं।

गृह उद्योगों की उपरोक्त चर्चा शाक वाटिका, पुष्प वाटिका के संदर्भ में, इसलिए की गई है कि वह पुण्य प्रक्रिया बहुमुखी लोगों से भरी−पूरी होने के साथ−साथ सधते रह सकते है।

गृह उद्योगों की उपरोक्त चर्चा शाकवाटिका, पुष्पवाटिका के संदर्भ में इसलिए की गई है कि वह पुण्य प्रक्रिया बहुमुखी लाभों से भरी−पूरी होने के साथ−साथ गृह−उद्योगों की एक छोटी इकाई रहने पर भी उस महान प्रयोजन की ओर ध्यान आकर्षित करती है जिसमें न केवल लाभ वरन् रचनात्मक प्रवृत्तियों के स्वभाव में सम्मिलित होने का सुयोग सौभाग्य भी सम्मिलित है।

प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक का ध्यान इस और रहना चाहिए। वे तत्काल कुछ गमले खरीद कर लायें। एक में तुलसी दूसरों में फूल तथा चटनी के पौधे बोये। इसके अतिरिक्त शाक वाटिका पर ध्यान दें। जिनके पास जमीन है उन्हें वृक्षारोपण की बड़ी योजना कार्यान्वित करने में भी कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फूलों के ही नहीं आज तो जलावन के लिए काम आने वाले पेड़−पौधे लगाना उतना ही आवश्यक है जितना कि इमारती सामान और फर्नीचर के लिए प्रयुक्त होने वाले बड़े पेड़ों का उद्यान लगाना। इस दिशा में हम सबको जिससे जो बस पड़े शुभारम्भ अविलंब ही करना चाहिए।


आलोक वितरण का पुण्य परमार्थ आज का युगधर्म

सामाजिक सहयोग से ही मानवी प्रगति सम्भव हुई है। एकाकी श्रम प्रयासों से तो वह अन्न, वस्त्र, निवास शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका जैसी दैनिक जीवन की आवश्यकता तक पूरी नहीं कर सकता। निर्वाह से लेकर उल्लास तक की सभी आवश्यकताएँ जिसे सामूहिक सहयोग से उपलब्ध होती हैं, उसमें मनुष्य का यह भी कर्त्तव्य उत्तरदायित्व है कि समाज को सुखी बनाने वाले परमार्थ प्रयोजनों को भी जीवन क्रम में सम्मिलित रखें। परमार्थ की बात सोचें। लोक−कल्याण में रुचि ले और उपकारों का ऋण चुकाये। जब अपने को असंख्यों का सहयोग मिला है तो कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी आवश्यक है। इसके लिए दाँत निपोर देने या शब्द जंजाल बुन देने से काम नहीं चलेगा। सक्रिय प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी। इन्हीं प्रयासों को लोक मंगल की साधना कहते हैं।धर्मशास्त्रों में इसी को पुण्य परमार्थ कहा गया है और स्वर्ग मुक्ति का—जीवन लक्ष्य की पूर्ति का−आधार−भूत कारण माना गया है। पूजा−पाठ—स्वाध्याय−सत्संग आदि कर प्रखर बनाने की भूमिका निभानी है।

परमार्थों में मूर्धन्य है, चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने में प्रयत्नरत रहना। मनुष्य की संरचना ऐसी नहीं है कि उसे दुःखी दरिद्र रहना पड़े। यह तो मात्र दृष्टिकोण की विकृति मात्र है जो रुझान, चिन्तन और व्यवहार में विकृतियाँ भरते−भरते संकटों के पहाड़ सामने ला खड़े करती हैं। मनःस्थिति सुधरे तो परिस्थिति सुधारने में तनिक भी देर न लगे। विचारणा यदि कुपथ गामिनी हो तो सोने की लंका जैसा वैभव, दस शिरे जितना ज्ञान, और कुम्भकर्ण जैसा बलिष्ठ रहते हुए भी वह समूचा परिकर कुकर्म करेगा और बेमौत मरेगा। तथ्यों को देखते हुए आधारभूत परमार्थ एक ही ठहरता है—सद्ज्ञान सम्वर्धन। लोक−मानस का परिष्कार यदि बन पड़े तो सीमित साधनों से ही स्वर्गीय सुख−शान्ति का रसास्वादन करते जिया जा सकता है। विग्रहों, अपराधों से संत्रस्त जन समुदाय को अभयदान देने के लिए न शस्त्र कारगर होते हैं और दमन समाधान के दायरे में भटकते रहने से अत्यंतिक हल निकलता है। इस संदर्भ में अपनाया जाने वाला एक ही उपाय है कि चिन्तन की निकृष्टता उलट देने वाले प्रयासों को अपनाया जाय। अन्धकार से लड़कर नहीं जीता जा सकता। प्रकाश का प्रज्ज्वलन और वितरण ही वह आधार है जिसमें तमिस्राजन्य भटकाव, एवं आतंक को परास्त कर सकना सम्भव हो सकता है। तथ्य तो सनातन है, पर आज तो उसे प्रस्तुत विभीषिकाओं का सामाजिक समाधान भी माना जा सकता है। आत्मघात पर उतारू जन समुदाय को विनाश के गर्त से बचाने का एक ही उपाय है कि हर किसी को नये सिरे से सोचने के लिए वातावरण एवं आधार दिया जाय। उलटे को उलटकर सीधा करना ही विचार क्रान्ति है। इसी प्रयास में इन दिनों प्रज्ञा अभियान अपनी समूची शक्ति लगाकर नव सृजन की प्रक्रिया अग्रगामी बनाने में प्राण−पण से संलग्न है। विश्वास किया जाना चाहिए कि दुर्गति के रहते दुर्गति से पिण्ड छूटेगा नहीं। विश्वास किया जाना चाहिए कि सद्भाव संवर्धन में यदि सफलता मिले—व्यवहार में सत्प्रवृत्तियों का समावेश हो सके तो वातावरण में काया−कल्प जैसा अन्तर दिखाई देगा। सम्पन्नता,सुरक्षा,शान्ति और प्रगति के लिए बहुत कुछ कुछ करने की आवश्यकता है किन्तु यह स्मरण रखा जाने योग्य है कि उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लोक चिन्तन हो सकेगा। घिनौना चिन्तन, कमीना आचरण यदि यथा स्थान बना रहा तो फिर समझना चाहिए कि प्रगति और शान्ति की कल्पना, बिना पंख की उड़ान ही बनी रहेगी।

निदान के उपरान्त ही उपचार बन पड़ता है।

प्रस्तुत समस्याओं, विग्रहों, संकटों और विभीषिकाओं का एक ही कारण है—जन−मानस में निष्कृष्टता की भरमार। लोक व्यवहार में अवाँछनीयताओं के बढ़ते जाने से उसकी प्रतिक्रिया चित्र−विचित्र प्रकार की कठिनाइयाँ आगे खड़ी करती रहती हैं। जड़ न काटने पर विष वृक्ष के पत्ते तोड़ते, कोपल पोछते रहने से कुछ बनने वाला है नहीं। तथ्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना अपना और सब का भला है। आज का सर्वोपरि परमार्थ है—आलोक वितरण। आलोक वितरण अर्थात् वह प्रयास जिसे प्रज्ञा अभियान के मंच से विचार क्रान्ति आन्दोलन—सत्प्रवृत्ति संवर्धन−लोक−मानस का परिशोधन आदि नामों से प्रतिपादित एवं प्रस्तुत किया जाता है।

प्रज्ञा परिजनों को इस पुण्य परमार्थ में—युग धर्म में किसी न किसी रूप में भागीदार बनना ही चाहिए। हाथ बढ़ाना ही चाहिए। कृतज्ञता, ऋण मुक्ति, प्रत्युपकार जीवन लक्ष्य, ईश्वर की अपेक्षा, समय की पुकार जैसे अनेक कारण मिलकर इन दिनों प्रत्येक जागृत आत्माएँ कुछ विशेष आशा अपेक्षा रखते हैं। वह है आलोक वितरण में योगदान। विनाश को विकास में परिवर्तित कर सकने में समर्थ युगान्तरीय चेतना का इन दिनों जो दौर चल रहा है उसमें प्रत्येक दूरदर्शी विवेकवान को किसी न किसी रूप में महाकाल में हाथ बँटाना ही चाहिए। जो समय को पहचानेंगे वे इस संयोग सौभाग्य को हाथ से जाने नहीं देंगे। हनुमान, अंगद जैसा न सही−शबरी, गिलहरी जितना योगदान तो तथाकथित व्यस्तों, चिन्ता ग्रस्तों के लिए भी सम्भव हो सकता है। इच्छा जगेगी तो मार्ग मिलेगा ही। उपेक्षा रहने पर अवसर न मिलने की विवशता ही व्यक्त का जाती रहेगी। उस बहानेबाजी का अन्त तो प्रलय के दिन से पूर्ण हो सकने की आशा करना व्यर्थ है। आकाँक्षा उभरे तो चट्टानों को तोड़कर मरते−कूटते और दुर्गम रास्तों को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं।

समर्थ सूर्य, चन्द्र संसार का अन्धकार हरते हैं, पर नगण्य-सा दीपक भी अपने छोटे क्षेत्र में प्रकाश वितरण करता हुआ धन्य बनता है। बड़ों जैसी समर्थता न हो तो भी हर छोटे समझे जाने वाले की अपनी कुछ न कुछ विशेषता रहती है। उसका उपयोग प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को किसी न किसी रूप में करना है चाहिए। इस संदर्भ में युग निर्माण परिवार की उस प्रथम एवं प्रमुख शर्त की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है जिसमें न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य आलोक वितरण के लिए लगाते रहने का अनुबन्ध है। उसे अनिवार्य माना जाना चाहिए और किसी को भी—किसी भी बहाने उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। निर्वाह, परिवार, विनोद विश्राम को सार्थक और आलस्य प्रमाद में निरर्थक गतिविधियों में प्रायः सारा समय चला जाता है उसमें से एक घण्टा युग निर्वाह के लिए—जागरूकों के कन्धों पर आने वाले उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए हमें एक घण्टा समय की कटौती इस जंजाल में से करनी ही चाहिए जिसे व्यस्तता कहा जाता है। इसी प्रकार दस पैसा नित्य की राशि भी हमें उपरोक्त पुण्य प्रयोजन के लिए निकालनी ही चाहिए। यह इन दिनों एक चम्मच चाय की—एक ग्रास रोटी की कीमत है। इतना न बन पड़ना, आर्थिक कठिनाई का कारण नहीं उसमें उपेक्षा ही प्रधान है। अन्यथा इतनी कटौती तो अपने भोजन के कुछ ग्रास घटाकर चाय के दो घूँट कम करके भी की जा सकती है। प्रज्ञा परिवार के परिजन अपने को कहने वालों की संख्या लाखों करोड़ों हैं पर उनमें से अनुबंध पालन करने वाले व्रतशील कितने हैं यह जानना होगा कि सदस्यता की न्यूनतम शर्त निष्ठा पूर्वक नियमित रूप से पूरी होती है या नहीं। जहाँ अब उसका अन्त होना चाहिए। उसके समापन का आज ही शुभ मुहूर्त समझा जाना चाहिए।

दस पैसा नित्य का प्रज्ञा साहित्य खरीदा जाता रहे और एक घण्टा समय का उपयोग उसे अपने परिवार पड़ौस परिचय वाले लोगों को पढ़ाने वापस लेने में किया जाता रहे तो प्रक्रिया सहज ही निभती रह सकती है। नये काम में अनख लगता है। मात्र इतनी भर कठिनाई है। इसे दूर किया जा सके, कुछ दिनों इसे क्रमबद्ध रूप से चलाया जा सके तो प्रतीत होगा कि कुटुम्बियों पड़ोसियों की कितनी बड़ी सेवा है। उनका आतिथ्य करने, उपहार देने के अन्य सभी शिष्टाचार उपचार इस प्रयास के आगे फीके पड़ जाते हैं। आरम्भ में तो देने वाले की तरह लेने वाले को भी अनख लगेगा ओर व्यर्थ का जंजाल प्रतीत होगा किन्तु कुछ ही दिनों में दोनों पक्षों को रस आने लगता है और प्रतीत होता है कि इस छोटे से प्रयास से लोक मानव के परिष्कार का युग धर्म कितनी सरलता और कितनी खूबसूरती के साथ सधता है। कितनी प्रसन्नता होती है और कितनों में ही कितना उपयोगी परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।

मिशन की पत्रिकाएँ सभी परिजन मँगाते पढ़ते हैं। पुराने अंक सभी के पास होंगे। नये पुराने में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मोटे कागज का नया कवर उन पर चिपका लेना चाहिए और झोला पुस्तकालय के रूप में घर पड़ौस−परिचय के लोगों को उन्हें आग्रह पूर्वक पढ़ाने वापिस लेने का सिलसिला आरम्भ कर देना चाहिए। दस पैसा नित्य ‘ज्ञानघट’ में जमा किये जाँय और महीना होते−होते तीन रुपये का युग साहित्य खरीदने और उस नवीन का संपर्क क्षेत्र में पढ़ाने का नया आधार अपनाते रहना चाहिए। यदि कार्य नियमित रूप से—महत्वपूर्ण समझकर किया जाता रहे तो उतने भर से इतने दूरगामी परिणाम हो सकते हैं जिन पर आत्म−सन्तोष, हर्ष, उल्लास एवं आत्म−गौरव अनुभव किया जा सके। सामयिक परमार्थ की दृष्टि से यह छोटा दीखने वाला कार्य दूरगामी सत्परिणाम प्रस्तुत किये बिना रह नहीं सकता।

अच्छा लगे, उत्साह उभरे, रस आये तो परिवार पड़ोस से आलोक वितरण का कार्यक्षेत्र आगे भी बढ़ाया जाय। संपर्क क्षेत्र में कितने ही लोग कार्यवश या संयोग−वश मिलते रहते हैं। उन्हें प्रज्ञा साहित्य देने लेने के लिए विशेष रूप से परिभ्रमण की योजना बनाई जा सकती है। अधिक साहित्य की जरूरत पड़े तो दस पैसे की राशि बढ़ाकर पच्चीस पैसा—एक रुपया या महीने में एक दिन की कमाई जितना अंशदान बढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार समयदान बढ़ सके तो उससे मिशन की पंचसूत्री योजना को गतिशील बनाने के लिए नियोजित किया जा सकता है। प्रश्न महत्व समझने, संकल्प करने और नियमित रूप से युग धर्म के निर्वाह में योगदान करने की उदारता विकसित करने भर का है। जिनके कदम इस दिशा में बढ़ेंगे तो प्रज्ञा परिजन से आगे बढ़कर प्रज्ञा पुत्र की कक्षा में सहज ही प्रवेश करने, और स्वार्थ परमार्थ का समन्वय करने वाली जीवन नीति का नये सिरे से निर्धारण करेंगे।

समयदान, अंशदान की माँग आलोक वितरण की सामयिक आवश्यकता को पूरा करने के निमित्त जागृत आत्माओं से की गई है। इस चुनौती को अस्वीकार नहीं ही किया जाय। जिससे जितना बन पड़े कर गुजरे। कुछ न बन पड़े तो अंशदान में समयदान की कीमत जोड़कर कुछ ऐसा अनुदान बना लिया जाय जिसके बदले युग शिल्पियों की निर्वाह समस्या का हल हो सके और वे अपने स्थान पर उन्हें कार्यरत देखा जा सके। इन्हीं दिनों नव सृजन की गतिविधियाँ तीव्र करने के लिए एक हजार समय दानियों की माँग प्रज्ञा–अभियान के अंतर्गत की गई हैं ऐसे जीवनदानी शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार में एकत्रित हो रहे हैं। उनकी निर्वाह व्यवस्था में यह अंशदान, योगदान लगे तो भी वही काम हो सकता है जो स्वयं अधिक समय देने की परिस्थिति में किया जाय।

छोटा मकान बनाने में कितने साधन जुटाने पड़ते हैं−इसे भुक्त भोगी जानते हैं। जानने वालों को यह भी जानना चाहिए कि धरातल के सुविस्तृत क्षेत्र में फैले हुए 450 करोड़ मनुष्यों के विशाल समुदाय की मनःस्थिति और परिस्थिति बदलने के लिए कितने श्रम, मनोयोग और साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। इसे कौन जुटाये? दृश्य प्रवंचना में उलझी हुई स्थूल दृष्टि लोक मानस के परिष्कार की अदृश्य आवश्यकता को कैसे समझे? जो समझा ही नहीं गया उसके लिए योगदान कैसा? वर्तमान परिस्थितियों में आलोक वितरण का कार्य कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, उसकी पूर्ति के लिए जन−साधारण से नहीं मात्र जागृत आत्माओं से ही आशा अपेक्षा की जा सकती है। इसकी पूर्ति में प्रज्ञा परिजन अपनी उदार श्रद्धा सद्भावना प्रदीप्त करें और उसे सृजन प्रयोजन के सर्वप्रमुख आलोक वितरण में जितना सम्भव हो उतना योगदान करें। बात तभी बनेगी। समय की पुकार तभी पूरी होगी।


छोटे सप्त सूत्र सात समुद्रों की तरह महान

प्रज्ञा युग के अवतरण की भागीरथी भूमिका का उत्तरदायित्व बहन करने और श्रेय पाने के लिए नियति ने प्रज्ञा परिजनों को अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया है। बिगुल बजाते हुए वे आगे−आगे डडडड तो युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित भावनाशीलों की सृजन वाहिनी कदम मिलाकर, सीना−ताने चल पढ़ने में आगा−पीछा नहीं देखेगी। प्रश्न अग्रगमन का है। इस ऐतिहासिक सृजन पर्व में यह श्रेय जागृत आत्माओं के ही भाग्य में बदा है। उन्हें इस सुयोग को खोना नहीं चाहिए।

अगले दिनों जो व्यापक क्षेत्र में, विशा परिमाण में—अगणित सृजन शिल्पियों द्वारा किया जाना है उसी का सार संक्षेप उस निर्धारण में सन्निहित देखा जा सकता है जो इन पंक्तियों में प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत है। बीज की लघुता और वृक्ष की विशालता के बीच जो सूत्र श्रृंखला काम करती है उसी को प्रज्ञा परिजनों द्वारा अपनाई जाने वाली इस छोटी-सी विधि−व्यवस्था में झाँकते देखी जा सकती है।

प्रज्ञा युग के हर व्यक्ति को चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता भरनी पड़ेगी। व्यक्तित्व को पवित्र और प्रखर बनाना पड़ेगा। उसकी निजी सत्ता इतनी समर्थ होगी कि अपनी नाव स्वयं खे सकें और दूसरे अनेकों को बिठाकर पार कर सकें। इसके लिए अन्तराल में श्रद्धा—मस्तिष्क में प्रज्ञा और आचरण में निष्ठा का अधिकाधिक समावेश करना होगा। इस प्रयोजन के प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत सप्त सूत्री योजना के अंतर्गत प्रथम तीन का महत्व आँका जा सकता है। उपासना से अन्तराल की प्रसुप्त श्रद्धा को जगाया और समर्थ, सक्षम बनाया जाता है। उपासना देवताओं की जेब काटने वाली चालाकी नहीं वरन् अन्तः− करण में उत्कृष्टता भर वाली ब्रह्म विद्या है। इस तथ्य को पुजारी लोग तो अनुभव नहीं कर सकते किन्तु यथार्थता के अति निकट जा पहुँचने के कारण प्रज्ञा परि−जन उस तथ्य का—सत्य का—प्रत्यक्ष दर्शन करेंगे।

मनःक्षेत्र की प्रज्ञा को ही दृष्टिकोण में आदर्शवादिता का समावेश कहा गया है। श्रद्धा क्षेत्र की आकाँक्षा जब बुद्धि को प्रेरित करेगी तो चेतन और अचेतन मनःसंस्थान को देवत्व को उभारने वाली सत्प्रवृत्तियाँ अनायास ही कार्यरत दीखेगी और बहुमूल्य व्यक्तित्व के रूप में उनका सर्वतोमुखी सफलताएँ उपलब्ध कराने वाली क्षमता हस्तगत होगी। जीवन साधना नकद धर्म है। जो उसे अपनायेंगे, निहाल होकर रहेंगे।

सद्भावनाओं की सत्प्रवृत्तियों में परिणति करने का अभ्यास जिस पाठशाला, व्यायामशाला में सफलतापूर्वक किया जा सकता है उसका नाम परिवार है। यह साधन एवं अवसर हर किसी को उपलब्ध है। आत्मोत्कर्ष के लिए आवश्यक सद्गुणों का अभ्यास करना परिवार निर्माण के सहारे जितनी सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है उतना और किसी प्रकार नहीं। परिवार में सुसंस्कारिता संवर्धन के लिए प्रज्ञा परिजनों को उत्तेजना दी गई है। यदि वे इस प्रयोग को अपना सकें तो देखेंगे कि अपनी और अपने प्रियजनों का वास्तविक एवं बहुमूल्य हित साधन के कितनी अच्छी तरह कितने बड़े परिमाण में कर सके।

अगले दिनों वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श ही व्यक्ति और समाज के प्रचलनों में पूरी तरह सम्मिलित होने वाला है। कोई संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में फँसा रहना स्वीकार न करेगा। समष्टि के सुविस्तृत क्षेत्र में मानवी प्रतिभा क्षमता का नियोजन होगा। पारिवारिकता इसी को कहते हैं। आध्यात्मिकता यही है। राज−नीति की भाषा में इसी को साम्यवाद समाजवाद कहते हैं। परिवार को सुसंस्कारी रीति−नीति के आधार पर विकसित करने के लिए प्रज्ञा परिजनों को कहा जा रहा है। यही सत्प्रवृत्ति अगले दिनों व्यापक विकसित होगी तो समूचा विश्व पारिवारिक स्नेह सूत्र में जकड़ा होगा। एकता, एकात्मता, समता, शुचिता के सिद्धान्त धरती पर स्वर्ग का अवतरण करके रहेंगे। मनुष्य में देवत्व उभरने का प्रत्यक्ष प्रतिफल इतना तो होना ही है।

युद्ध में विजय पाने वाले अपने डग के पराक्रमी, श्रेयाधिकारी होते हैं। पर युग जाना है। उसमें विचारों की विचारों से— आदर्शों की आदर्शों से और प्रचलनों की प्रचलनों से टक्कर होगी। हाथी से हाथी ही टकराते हैं, बकरे नहीं। भावी युग विचारक्रांति का है। टकराव क्रान्तियों की यश गाथा लोगों ने सुनी देखी है। अपने समय में विचार क्षेत्र की अदृश्य लड़ाई प्रकार लड़ी जायगी। जिसे पौराणिक काल के देवासुर संग्राम के समतुल्य माना जा सकेगा। इस विश्व युद्ध का सूत्र संचालन मनीषा करेगी। लेखनी, वाणी और प्रयोक्ताओं का, प्रखर व्यक्तित्व इस संग्राम के प्रमुख अस्त्र−शस्त्र होंगे। प्रज्ञा परिजनों को अपने निजी जीवनक्रम तथा परिवार क्षेत्र में इसी युग संग्राम को लड़ाने का अभ्यास कराया जा रहा है। मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों एवं अनैतिकताओं का सूर्पनखा, सुरसा, एवं ताड़का के विरुद्ध आक्रोश अपनाने असहयोग के सहारे संघर्ष आरम्भ करने की बात इसी दृष्टि से कही गई है। खेल−खेल का यह अभ्यास अगले दिनों चिनगारी का दावानल रूप में प्रकट होने जैसा उदाहरण बनेगा।

विचार क्रान्ति के लिए जिस बौद्धिक कुरेद−बीन की जरूरत है उसे सम्पन्न करने के लिए शिक्षा और विद्या के दुहरे उपाय अपनाने पड़ेंगे। साक्षरता संवर्धन और सद्ज्ञान विस्तार एवं ऋतम्भरा का अवलम्बन ग्रहण करने की कार्य पद्धति इसी आवश्यकता की पूर्ति करती है। पाठशालाएँ, पुस्तकालय, विचार गोष्ठियां किसी न किसी रूप में अपने घरों में स्थान पाने लगें। विचार क्रान्ति के छोटे शुभारम्भ में उत्साह दिखाने के लिए प्रज्ञा परिजनों को कहा गया है।

हरितिमा संवर्धन का अर्थ है—जीवन को प्यार और कलाकारिता का उभार प्रदान करना। उसके असंख्य लाभ हैं। सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के उन्नयन का इसे प्रतीक माना जा सकता है। गाँधी जी ने स्वतन्त्रता संग्राम के अनेक मोर्चे नहीं खोले थे। सर्वप्रथम उन्होंने एक सत्याग्रह हाथ में लिया था। विरोध और संघर्ष को उभारने के लिए वह छोटा सूत्र भी चिनगारी से दावानल बनता चला गया और अंततः सफल होकर रहा। छोटे प्रयास का उपहास उड़ाने वालों को लज्जित होना पड़ा। हरितिमा संवर्धन सर्वतोमुखी सृजन प्रयोजनों का एक छोटा किन्तु महत्वपूर्ण उद्योग है। इसे अपनाने पर ध्यान मुड़ेगा और उन सद्वृत्तियों का दौर बढ़ेगा जिन्हें पंच सूत्री से लेकर समयानुसार बढ़ते चलने वाली शत सूत्री योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ध्वंस को निरस्त करने सृजन को अपनाने की यह पुण्य−प्रक्रिया अगले दिनों तुच्छ को महान बनने जैसा उदाहरण बन कर रहेगी।

आलोक वितरण का कार्य बहुत बड़ा और व्यापक है उसे घर−घर अलख जगाने, जन−जन के मन−मन को गुदगुदाने से ही उस प्रयोजन की पूर्ति होगी। प्रज्ञा परिजन उस कार्य को अपने परिवार परिचय के क्षेत्र में कार्यान्वित करेंगे तो भी उसका प्रभाव लहरों द्वारा एक−दूसरे को धकेलकर आगे बढ़ाने की तरह बहुत ही सुखद होगा। दीपक स्वयं प्रकाशवान होता है और अपने क्षेत्र को प्रकाशित करता है। प्रज्ञा परिजन सूर्य,चन्द्र न हों सके, मूर्धन्य स्तर का नेतृत्व न कर सकें तो भी अपने संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण करेंगे। आसमान में चमकने वाले छोटे तारे की तरह टिमटिमाते हुए भी वे भटकने वाले यात्रियों को प्रकाश देकर धन्यवाद के मात्र बन सकेंगे।

संक्षेप में यही है प्रज्ञा परिजनों के निमित्त प्रस्तुत हुई सप्त सूत्री योजना का रहस्य और भविष्य। शुक्राणु विकसित होकर एक प्रौढ़ परिपक्व बन सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा परिवार के व्यस्त सदस्यों द्वारा अपनाया गया यह छोटा कार्यक्रम एक से दूसरे को प्रोत्साहित करते हुए समग्रता के लक्ष्य तक न जा पहुँचे। इस छोटी योजना में वे सभी निर्धारण और उपक्रम सार रूप में जुड़े हुए हैं जिन्हें अगले दिनों व्यापक बनना है और युग परिवर्तन का सुनिश्चित आधार सिद्ध होना है।


प्रज्ञा परिजनों के पाँच दिवसीय प्रेरणा डडडड

जानकारी और प्रेरणा का अन्तर समझा जाना चाहिए। यों दोनों ही भ्रान्तियों को मिटाती और तथ्यों के साथ जोड़ती हैं, पर दोनों की क्षमता और स्थिति भिन्न है। जानकारी की पहुँच मस्तिष्क तक है, वह समझने की भूल या कमी को सुधारती है। उसे कोई भी दे सकता है। वह कार्य अध्यापकों, परामर्शदाताओं या पुस्तकों की सहायता से भी प्रकार होती रहता है। किन्तु प्रेरणा की बात दूसरी है। वह उदाहरणों से प्रभावित होती और अन्तःकरण में अपनी हलचलें उत्पन्न करती है। प्रेरणाएँ महान घटनाओं से— किन्हीं विशिष्ट व्यक्ति यों से—अथवा प्रभावी वातावरण में उत्पन्न होती हैं। जानकारियाँ मस्तिष्क के कबाड़खाने में जमा रहती हैं और आवश्यकता पड़ने पर ही काम आती हैं। उनमें पराक्रम का अभाव रहता है। नित्य सैकड़ों हजारों बातें सुनने जानने में आती हैं, पर उन्हें अपनाने या तद्नुरूप चलने का उत्साह तनिक भी उत्पन्न नहीं होता किन्तु प्रेरणा उस स्तर की रहती और उमँगें उभरती हैं जो मस्तिष्क को शरीर को उस संदर्भ में कुछ करने के लिए विवश करती है। प्रेरणा में शक्ति है। जानकारी तो जानकारी भर ठहरी वह अधिक से अधिक समझदारी बढ़ा सकती है। कुछ कर गुजरना हो, विशेषतया ऊँचा उठने आये बढ़ने के सम्बन्ध में तो प्रेरणा की आवश्यकता पड़ेगी। नीचे गिराने के लिए तो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अनादि काल से विद्यमान है। ऊँची उड़ान उड़नी है तो उसके लिए विशिष्ट सामर्थ्य चाहिए। प्रेरणा यही करती है।

जानकारी और प्रेरणा की तुलनात्मक विवेचना यहाँ इसलिए की जा रही है कि प्रज्ञा परिजनों का व्यक्तित्व उभारने एवं परिवार को सुसंस्कारी बनाने का जो छोटा सीमित, किन्तु महान एवं व्यापक प्रभाव उत्पन्न करने वाला काम सौंपा गया है उसको कार्यान्वित करना किस प्रकार सम्भव हो। पिछले पृष्ठों पर जिस सप्त सूत्री योजना का उज्ज्वल और अपनाने का आग्रह किया गया है उसकी उपयोगिता पर कदाचित ही कहीं कोई विवाद खड़ा हो। उसकी आवश्यकता सभी विज्ञजन अनुभव करेंगे। जिनमें दूरदर्शी विवेकशीलता की थोड़ी भी यात्रा विद्यमान है वे अनुभव करेंगे कि इतना सुधार परिष्कार करने में न व्यस्तता बाधक होती है और न विवशता। बताने के लिए किन्हीं परिस्थितियों को कारण बताया जा सकता है। वे नितान्त सरल और हर किसी के लिए— हर परिस्थिति में कार्यान्वित कर सकते हैं उनकी कल्पना कोई भी तथ्यान्वेषी भली प्रकार कर सकता है। इतनी सरल किन्तु इतनी सुखद संभावनाओं से भरी−पूरी प्रक्रिया को अपनाने के लिए सहमत होना या सहमत करना भी कठिन नहीं है। वस्तुतः यह निर्धारण है ही ऐसे कि उन्हें जानकारी में तनिक आगे बढ़ाकर व्यवहार में उतारने का प्रयास चल पड़े तो आज की तुलना में अगला रूप असाधारण रूप में परिवर्तित दृष्टिगोचर होगा। वातावरण में काया−कल्प जैसा परिवर्तन होगा और उज्ज्वल भविष्य का विश्वास सुनिश्चित रूप से परिपक्व होगा।

इतने पर भी यह अविश्वास बना ही हुआ है कि उस प्रतिपादन को मिशन के प्रति असीम स्नेह सौजन्य रखने पर भी—प्रस्तुत अनुरोध से सहमत होने पर भी—उसे व्यवहार में उठेंगे या नहीं। इस सन्देह का कारण एक ही है−प्रेरणादायक परिस्थितियों का अभाव। इसकी पूर्ति न होने पर एक से एक श्रेयस्कर प्रवचन परामर्श एक कान से सुनते दूसरे से निकालते रहते हैं। स्वाध्याय प्रेमी और सत्संगों में सम्मिलित रहने वाले भी जब व्यवहार में पूर्ववत् गये−गुजरे बने रहते हैं तो प्रतीत होता है कि जानकारियों की आवश्यकता तो है पर पर्याप्त नहीं। भोजन की उपयोगिता तो है, पर पाचन शक्ति के अभाव में उसकी उपलब्धि भारभूत ही बनी रहेगी। प्रज्ञा परिजन चिरकाल से अखण्ड−ज्योति के पाठक हैं। उन्हें ज्ञान विज्ञान के समुद्र मंथन से निकाला हुआ नवनीत घर बैठे मिलता रहता है। मधु संचय में किसे कितना श्रम करना पड़ा इसे समझने की उसे क्या आवश्यकता जिसे कटोरी भर शहद थाली में नित्य नियमित रूप से परोसा हुआ मिलता है। पत्रिका के पृष्ठों पर बाजारू सामग्री नहीं छपती। उसमें दूरदर्शी एवं सारगर्भित प्रतिपादन रहते हैं। फिर भी यह कहन कठिन है कि पाठकों में से कितने उन्हें हृदयंगम करते और व्यवहार में उतारते होंगे। कारण एक ही है कि शक्तिशाली प्रेरणा एवं प्राणवान वातावरण के अभाव में यह सम्भव नहीं होता कि अनभ्यस्त, अप्रचलित प्रतिदानों को सहज कर कार्यान्वित करना पड़े। भले ही वे परामर्श कितने ही सारगर्भित महत्वपूर्ण, उच्चस्तरीय ही क्यों न हों। ढूँढ़ने पर प्रेरणा की उपलब्धि का सुयोग न बैठना ही असमंजस अवरोध का एकमात्र आधारभूत कारण सामने आता है।

प्रज्ञा परिजनों को सुनना समझना ही नहीं, कुछ बनना ढलना भी है। इसलिए उन्हें प्रतिपादन परामर्श ही नहीं प्रेरणा और प्राणवान वातावरण भी चाहिए। पेट्रोल न हो तो अच्छी मोटर भी खड़ी रहती है। सोया न जाय तो अच्छा−खासा अंग भी चूजा उत्पन्न करने में विफल रहता है। जानकारी देने वाले परामर्श प्रतिपादन को यदि कार्य रूप में परिणत करने की यदि सचमुच ही आवश्यक प्रतीत होती है तो उसके लिए प्रेरणा उपलब्ध करने वाले उपाय भी अपनाने ही होंगे। इस संदर्भ में आज की स्कूली शिक्षा और प्राचीन काल की गुरुकुल प्रणाली के प्रतिफलों का अन्तर सामने है।

प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख प्रज्ञा युग की सृजन शिल्पियों में अपनी भागीदारी सम्मिलित करने के लिए कहा जा रहा हैं और इसके लिए—सरलतम—न्यूनतम—इन पृष्ठों पर अंकित सप्त सूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है। उसकी उपयोगिता गरिमा को समझने समझाने में कोई अड़चन दीखती नहीं। अवरोध एक ही प्रतीत होता है कि प्रेरणा के अभाव में अभ्यस्त ढर्रा कुछ नया परिवर्तन करने में बाधक बनकर खड़ा होगा और कुछ करने धरने का अवसर ही न आने देगा। इस व्यवधान को पार कैसे किया जाय? इसका उपाय एक ही सुझाया जा रहा है कि जहाँ प्रतिवेदन के प्रति सहमति सहानुभूति व्यक्त की जा रही हो वहाँ प्रेरणाप्रद वातावरण के सान्निध्य में जा पहुँचने की योजना भी बनाई जाय और उसे कार्यान्वित करने की हिम्मत दिखाई जाय।

शान्ति−कुञ्ज को प्रज्ञा तीर्थ के रूप में परिणति किया गया है। वहाँ युगान्तरीय चेतना को व्यापक बनाने के लिए बहुमुखी प्रयास चलते हैं। भागीरथी, तप और दधिचि के आत्मदान का सामयिक संस्करण यहाँ देखा जा सकता है। व्यास की लेखनी—सूत की वाणी और परशुराम की कुल्हाड़ी का समन्वित उपयोग यहाँ इन दिनों किस कौशल के साथ क्रियान्वित होता है इसे कोई भी सूक्ष्मदर्शी पैना नजर गढ़ाकर आसानी से देख, परख सकता है। उस विधि व्यवस्था में अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया प्रशिक्षण सत्रों की है। नव सृजन की बेला में आत्मनिर्माण और लोक−निर्माण की दृष्टि से प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ न कुछ करना ही होगा। मूक दर्शक बनकर बैठे रहने वाले आत्म प्रताड़ना, लोक भर्त्सना सहेंगे। इतना घाटा कदाचित् ही कोई दूरदर्शी उठाये। इस ऐतिहासिक बेला में सबसे अधिक नाम सृजन क्षेत्र के अग्रगामी ही उठावेंगे। उन्हें क्या करना चाहिए। इसका स्वरूप समझाने और अभ्यास करने के लिए तीन स्तर के सत्रों की व्यवस्था शान्ति−कुञ्ज में इन दिनों नई तैयारी नई व्यवस्था के आधार पर आरम्भ हुई है। (1) केन्द्रीय सूत्र संचालन में सहभागी प्रज्ञा पुँज माने गये है−और उनके लिए एक−एक महीने के कल्प साधना सत्र चले हैं। इससे आत्मोत्कर्ष के लिए आवश्यक परिशोधन परिष्कार के लिए जो आवश्यक है उसका शिक्षण नहीं अभ्यास कराया जा रहा है। (2) प्रज्ञा पुत्रों के लिए एक−एक महीने के युग−शिल्पी सत्र है। अपने क्षेत्रों को युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित करने वाले समयदानी इनमें सम्मिलित होते रहेंगे। इस अवधि में उन्हें वक्त एवं चिकित्सक बनाने की अतिरिक्त योजना सम्मिलित की गई है। पंचसूत्री योजना तथा अन्य रचनात्मक, सुधारात्मक कार्यक्रमों की सामयिक डडडड व्यवस्था का अभ्यास तो इस पाठ्यक्रम में सम्मिलित है ही। यह दोनों ही प्रशिक्षण उन लोगों के लिए हैं जो निजी कामों से थोड़ा अवकाश पाये हैं। कार्य क्षेत्र में उतरें और जितना सम्भव हो युग देवता का हाथ बँटायें। इन सत्रों को सेमिनारों की वाचालता जैसी चिन्ह पूजा नहीं समझा जाना चाहिए। प्रेरणा का संचार करने के निमित्त ही यह व्यवस्था बनी है। इनमें शिक्षण कम और अनुदान अधिक है। इसके बिना अपनी नाव पर असंख्यों को पार करने का पराक्रम उभरेगा भी कैसे?

इसी संदर्भ में तीसरी सत्र प्रज्ञा परिजनों के लिए हैं। डडडड पाँच−पाँच दिन के हैं। नाम संगम−सत्र दिया गया है। [1] इस क्षेत्र का तीर्थ पर्यटन, [2]आत्म−निर्माण परिवार−निर्माण का भावभरा प्रशिक्षण, [3] अन्तराल को कुरेदने वाली—परिष्कार की उमंग भरने वाली—साधना तथा परिशोधन प्रायश्चित का उपक्रम भी इसी में सम्मिलित है। तीनों को मिला देने में यह पाँच दिवसीय सत्र संगम सत्र कहे जायेंगे। इस अंक में प्रस्तुत सप्तसूत्री योजना को कार्यान्वित करने की पृष्ठभूमि बनाने—प्रेरणा देने—तथा भिन्न परिस्थितियों में इस संदर्भ को भिन्न प्रकार से शुभारम्भ किये जाने का व्यक्तिगत परामर्श इसी थोड़ी अवधि में देने का प्रयास किया जायगा। व्यस्तता तो व्यस्तता ठहरी। प्रज्ञा परिजनों को आरम्भ से ही व्यस्त’ मानकर चला गया है। यह व्यस्तता वास्तविक है या व्यामोहजन्य इसकी विवेचना कौन करे? यहाँ तो इतना ही कहा जा रहा है कि जो लोक−निर्माण के लिए जन संपर्क साधने और आलोक वितरण करने का युग धर्म अपना नहीं सकते वे ‘व्यस्त’ धर्म के लोग हैं। उनकी व्यस्तता को देखते हुए शिक्षण सत्रों को भी व्यस्त स्तर का ही होना चाहिए। पाँच दिन में तीन कार्यक्रम और सात निर्धारण इस प्रकार कुल 12 तथ्य इसमें जुड़े होते हैं। एक दिन में प्रायः ढाई कार्यक्रम निपट जाने का औसत पड़ता है। विज्ञ जन इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए इतना समय कम कहेंगे। ऐसे लोगों को दो सत्रों में ठहरने की अनुमति भी मिल सकती है किन्तु साधारण नियम एक सत्र की ही स्वीकृति देने का है। इसमें एक कारण प्रज्ञा परिजनों की व्यस्तता और दूसरा कारण लाखों को इन्हीं दिनों इस सुयोग सुअवसर का लाभ देने के लिए हर किसी के हिस्से में थोड़ा−थोड़ा अनुदान आता भी है। दोनों को मिला देने पर पाँच दिन की व्यवस्था ही उपयुक्त समझी गई है।

इन पंक्ति यों में जहाँ प्रस्तुत सप्तसूत्री योजना को अपनाने के लिए अनुरोध किया जा रहा है वहाँ परिजनों से एक आग्रह और भी किया जा रहा है कि यदि वे इस प्रयास परिवर्तन की आवश्यकता सचमुच ही अनुभव करते हैं और उस क्रियान्वयन के सत्परिणामों का अनुमान लगाते हैं तो फिर उन्हें इतना और भी करना चाहिए कि किसी संगम−सत्र में सम्मिलित होने की योजना बनायें। उसके लिए स्थान सुरक्षित करायें। स्थान सुरक्षित कराने की प्रक्रिया पहले से चलती आ रही है और भविष्य में भी सदा सर्वदा चलती रहेगी। क्योंकि प्रज्ञा परिवार अब लाखों की संख्या पार करके करोड़ों की संख्या में व्यापक विस्तृत होता चला जा रहा है। उपरोक्त तीन सत्रों तथा अन्य आवश्यक परामर्शों के लिए अनेकानेक लोग आये दिन शान्ति−कुञ्ज आते रहते हैं। ठहरने का स्थान आवश्यकता को देखते हुए दसवां भाग भी नहीं है। इसलिए स्थान की तुलना में अत्यधिक भीड़ हो जाने, व्यवस्था बिगड़ जाने, हर किसी को असुविधा होने की स्थिति न आने देने की दृष्टि से यह नियम बना दिया गया है कि ठहरने के लिए कोई व्यक्ति बिना पूर्व स्वीकृति के बिना स्थान सुरक्षित कराये न आये। इस नियम में अब और भी कठोरता बरती जा रही है।

यह सत्र निरन्तर चलते रहेंगे। [1] 1 से 5 [2] 7 से 11 [3] 13 से 17 [4] 19 से 23 [5] 25 से 29 का क्रम हर महीने रहेगा। सत्र आरम्भ होने से एक दिन पूर्व सायंकाल तक पहुँच जाना चाहिए। समाप्त होने वाले दिन ही विदाई ले लेनी चाहिए। बहुत पूर्व आने या बाद में भी ठहरे रहने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए। स्थान शिक्षार्थियों से निरन्तर भरा रहता है। उनका अधिकार छीनकर ही कोई अनावश्यक रूप से डेरा डाले रहना सम्भव हो सकता है। ऐसा कोई भी न करें। हर शिक्षार्थी का अलग आवेदन पत्र हो। बच्चों का आवेदन उनके अभिभावक भरें। बिना स्वीकृति वाले किसी पड़ौसी सम्बन्धी को साथ लेकर न चलें। आवेदन भेजते समय वाक् छल का उपयोग करके कोई स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न न करें केवल उन्हीं को आना चाहिए जिनकी शारीरिक मानसिक क्षमता इस प्रकार के प्रशिक्षण के उपयुक्त है। धर्मशाला की, बारात की तरह पर्यटकों की अनपढ़ भीड़ जमा करने का तात्पर्य है आश्रम की—सत्र की मर्यादा को चौपट करके रख देना। आशा की गई है कि सभी परिजन इस मर्यादा का पालन करेंगे। हर आवेदन अलग होना चाहिए। इतनी संख्या में आ रहे हैं ऐसा लिखने पर किसी को भी स्वीकृति न मिलेगी। हर आवेदन में निम्न विवरण रहना चाहिए। [1] पूरा नाम पता [2]शिक्षा [3] आयु [4] जन्म−जाति [5] व्यवसाय [6] शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की गड़बड़ी दूसरों को प्रभावित करे ऐसी स्थिति तो नहीं है [7] अनुशासन पालन का सुनिश्चित आश्वासन [8] जिस मास के सत्र में आना हो उसका उल्लेख [9] यदि इस सत्र का स्थान घिर गया हो तो उसके स्थान पर अन्य सत्र में सम्मिलित होने का विकल्प।

अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों की संख्या लाखों है। उसमें से हजारों निश्चित रूप से इस सत्र योजना में सम्मिलित होने और अभीष्ट प्रेरणा प्राप्त करने के इच्छुक होंगे। पर सभी के लिए इतनी दूर आना, मार्ग व्यय तथा समय श्रम वहन करना सम्भवं न हो सकेगा। इसलिए यह योजना बनाई जा रही है कि वर्षा समाप्त होने पर अक्टूबर से पाँच−पाँच दिन के ‘प्रज्ञा आयोजन’ सभी क्षेत्रों में किये जायें। उनमें समीपवर्ती परिजन सम्मिलित हों। न केवल प्रज्ञा परिजन वरन् प्रज्ञा पुत्र एवं प्रज्ञा पुँज भी इनमें सम्मिलित होकर—सामयिक प्रेरणाएँ प्राप्त करें और उस क्षेत्र में नव जागरण के वातावरण गरम करें। रचनात्मक गतिविधियों को अग्रगामी बनायें। जो लोग हरिद्वार नहीं पहुँच सकते वे अपने समीप होने वाले इन आयोजनों में भी सम्मिलित होकर वह परामर्श उत्साह प्राप्त कर सकेंगे जो हरिद्वार आने पर उपलब्ध होगा। उनमें गुरुजी माताजी की उपस्थिति न हो सकने तथा वातावरण में उतनी प्रखरता न रहने पर भी उनसे उस आवश्यकता की बड़े परिमाण में पूर्ति हो सकेगी जो हरिद्वार आने पर ही सम्भव होता। इनसे शान्ति−कुञ्ज के वरिष्ठ प्रतिनिधि अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पहुँचेंगे। ‘प्रज्ञा आयोजनों’ का स्वरूप सब स्तर का होगा। साथ ही स्थानीय जनता के लिए सार्वजनिक प्रवचनों की—वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की−शोध प्रक्रिया स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से प्रबुद्ध लोगों को समझाने की विशेष प्रक्रिया भी सम्मिलित रहेंगी जहाँ इन आयोजनों की माँग हो, वे शाखाएँ अपनी माँग अभी से नोट करादें ताकि अक्टूबर से आरम्भ होने वाले देशव्यापी प्रज्ञा आयोजनों का स्थान अभी से निर्धारित कर सकना सम्भव हो सके।


Quotation

बीज के अन्तराल में विशालकाय वृक्ष की सभी विशेषताएँ सन्निहित रहती हैं। शुक्राणु से वंश परम्परा की अनेकानेक विशेषताएं सँजोये हुए एक परिपूर्ण मनुष्य छिपा बैठा होता है। इस प्रसुप्ति को जागृति में बदल देने की कुशलता का नाम ही विज्ञान है। भौतिक विज्ञान और आत्म−विज्ञान में यही मौलिक विशेषताएँ समान रूप से विद्यमान हैं कि वे अप्रकट को प्रकट करते हैं−अनपढ़ को सुगढ़ बनाते हैं और रहस्य को प्रत्यक्ष में बदल देते हैं। भौतिकी के प्रयोक्ताओं यही सब करते रहते हैं। आत्मिकी भी अपने वैभव काल में इस विशिष्टता का परिचय देती रहती हैं। उसके अनुभवी अभ्यासी सामान्य लोगों की तुलना में अनेक दृष्टियों से विभूतिवान रहे हैं।


अपनों से अपनी बात - प्रज्ञा परिजनों का सात संसदों में संगठन

युग संधि का प्रभात पर्व सन्निकट है। इस समय विशेष में युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित हुए बिना कोई जागृत जीवन्त आत्मा रह नहीं सकती। अपवाद तो सर्वत्र रहते हैं, किन्तु यह विश्वास करने का कारण है कि प्रज्ञा परिजनों ने अपनी पूर्व संचित सुसंस्कारिता को अनायास ही उभरती पाया है और जिस प्रकार बिगुल बजते ही सैनिकों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं, उसी प्रकार अन्तःकरण में युगान्तरीय चेतना की उमंगों से अपने को अनुप्राणित पाया है। प्रज्ञा परिजनों में से कुछ अभागों को अपवाद की तरह आदर्शवादिता अपनाने से सर्वथा इन्कार करते पाया जा सकता है। अन्यथा नव सृजन में हर किसी की भावभरी श्रद्धाञ्जलि उपलब्ध होगी, भले ही वह तुलसी दल जितनी नगण्य ही क्यों न हो। प्रज्ञा परिजनों के लिये इस अंक में सप्तसूत्री योजना प्रस्तुत है। व्यस्तों और अभावग्रस्तों की विवशता भी इतना कुछ करने में बाधक नहीं हो सकती कि अपना निजी दृष्टिकोण सुधारा और जीवनक्रम दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर नये सिरे से निर्धारित किया जाय। घर परिवार के लिये हर आदमी आमतौर से खपता है। उस समुदाय को सुसंस्कारी बनाने वाली एक और पद्धति अपना ली जाय तो यह कार्य भी बिना कोई अतिरिक्त खर्च के सम्पन्न होते रह सकता है। आशा की गयी है कि ये पंक्तियाँ प्रत्येक परिजन को झकझोरेगी और उन्हें किसी न किसी रूप में युग धर्म अपनाने की चुनौती स्वीकारने के लिये विवश करेंगी।

इस अंक में प्रस्तुत सप्तसूत्री योजना का क्रियान्वयन करने वालों से कहा गया है कि वे उसकी सूचना तथा कार्यविधि अपने परिचय विवरण के साथ इसी मास शान्ति−कुञ्ज भेज दें

विवरण—[1] जिस संसद में सम्मिलित होता है [2] पूरा नाम पता [3] आयु [4] शिक्षा [5] व्यवसाय [6] जन्म−जाति [7] अब तक के जीवन क्रम के उल्लेखनीय घटना प्रसंग एवं पारिवारिक स्थिति [8] वर्तमान समस्याएँ [9] भावी योजना तथा आकाँक्षा। इन नौ विवरणों के साथ विस्तारपूर्वक लिख भेजें। उत्तर तो अब जवाबी पत्रों का ही दिया जा सकेगा, पर अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें आवश्यक प्रकाश, एवं अनुदान परोक्ष माध्यमों से—बिना लेखनी वाणी की सहायता के ही मिलना आरम्भ हो जायगा। क्रियाशीलों का—उनकी गतिविधियों का पंजीकरण इसलिए किया जा रहा है ताकि विकासशीलों को अभ्युदय तथा अग्रगमन के लिए अदृश्य सहयोग का नया द्वार खुल सके। इस अंक के पाठकों से ऐसी ही आशा, अपेक्षा की गई है कि उनके अभिनव प्रयासों का शान्ति−कुञ्ज को यथा सम्भव जल्दी ही विवरण प्राप्त होगा।

इसी संदर्भ में प्रज्ञा परिवार में से तनिक अधिक उत्साह रखने वालों का नये स्तर पर इन्हीं दिनों पुनर्गठन भी किया जा रहा है। जो नितान्त व्यक्तिगत तथा पारिवारिक परिधि तक ही सीमित रहेंगे, उनकी बात दूसरी है। अन्यथा जो अपने सरल स्वाभाविक संपर्क क्षेत्र में दैनिक मिलनवार्ता करते हुए कुछ आलोक वितरण नियमित या अनियमित रूप से करते रहने जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उठा सकते हैं। उनके ऊपर आशा भरी दृष्टि लगने और नव सृजन में संकेत सहयोग पाने की अपेक्षा करने का भी आधार बनता है। हर किसी को दैनिक काम−काज करते हुए कुछ न कुछ लोगों से संपर्क साधना ही पड़ता है। उसी अवसर पर काम काज की अन्यान्यवार्ता करते कराते “युग परिवर्तन और उस संदर्भ में जागृत आत्माओं का राई रत्ती अनुसरण सहयोग भी सम्भव हो सकने की चर्चा भी की जा सकती है जिस प्रकार परिवार−निर्माण की प्रक्रिया भी घर के लोगों के साथ सामान्यवार्ता व्यवहार करते समय ही बिना अतिरिक्त समय लगाये—सरलतापूर्वक सम्पन्न होती रह सकती है। ठीक उसी प्रकार दैनिक संपर्क में आने वालों से भी नव सृजन के संदर्भ में कुछ न कुछ जिक्र तो करते ही रहा जा सकता है भले ही तत्काल उसका अनुकूल प्रतिफल न मिले। जो इतना प्रयास करने के लिए समर्थ हों, उनको ‘जन जागरण का अग्रदूत’ माना जायगा और उनके राई रत्ती सहयोग से ही बूँद−बूँद करके घड़ा भरा जायगा।

लाखों प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को जिस संगठन के अंतर्गत सूत्रबद्ध किया जा सके उसका एक नया आधार खड़ा किया गया है। शान्ति−कुञ्ज में प्रज्ञा परिजनों की सात संसदें गठित की जा रही हैं। उनमें भागीदार बनने की एक ही शर्त है कि वे अपने दैनिक संपर्क में आने वाले—अनुकूल प्रकृति के—व्यक्ति यों से नव सृजन के लिए स्वेच्छापूर्वक स्वीकारे गये प्रसंग पर कुछ न कुछ चर्चा भी करते रहें। चर्चा को ही कर्त्तव्य पालन की सफलता मान लें। यह प्रतीक्षा न करें कि कहना माना गया या नहीं। चर्चा करते रहना भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कार्य है। बीजारोपण करते रहने पर उसमें से कुछ न कुछ दाने कभी न कभी अवश्य ही फलेंगे।

इन्हीं दिनों जिन सात संसदों का गठन किया जा रहा है। वे इस प्रकार है :—

शोध संसद

इसमें ग्रेजुएट स्तर के स्वाध्यायशील व्यक्ति ही सम्मिलित होंगे। वे अपने प्रिय विषय, रुझान एवं अवसर का उल्लेख करते हुए कोई कुछ न कुछ विषय ब्रह्मवर्चस् शोध में सहयोग देने के लिए केन्द्र के परामर्श द्वारा निर्धारित कर लेंगे। स्थानीय पुस्तकालयों से निश्चित विषय की पुस्तकें लेकर उन्हें अवकाश के समय पढ़ते रहेंगे और निर्धारित प्रसंगों के जो भी संदर्भ उपलब्ध होंगे, उन्हें शान्ति−कुञ्ज भेजते रहेंगे। अपने अतिरिक्त संपर्क क्षेत्र के समान रुचि वाले अन्यों को भी ऐसा ही कुछ सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते रहेंगे। ब्रह्म डडडडडड अगले दिनों अत्यन्त व्यापक होगी। उसके लिए हरिद्वार रहने वाले अनुसंधान कर्त्ता अपर्याप्त पड़ रहे हैं। इसलिए अखण्ड परिवार के अन्यान्य मनीषियों से उस संदर्भ में सहयोग करने की योजना बनानी पड़ रही है। जो तत्पर हों, वे ‘शोध संसद’ में अपना नाम पंजीकृत करालें और परामर्श का आदान−प्रदान तत्काल आरम्भ कर दें।

इसी समुदाय में वे लोग भी आते हैं जो हिन्दी रचनाओं का अँग्रेजी या अन्य किसी प्रान्तीय भाषा में अनुवाद कार्य करते रह सकें। अगले दिनों प्रज्ञा साहित्य को हर भाषा में प्रकाशित करने की योजना है।

(2) अध्यापक संसद

इसमें वे सभी अध्यापक पंजीकृत किये जायेंगे जो अपने छात्रों को नैतिकता सामाजिक की शिक्षा भी निर्धारित पढ़ाई के अतिरिक्त देते रहने के लिए अतिरिक्त प्रयास करते रह सकें। इस समुदाय में पच्चीस पैसे वाला युग साहित्य पढ़ने देने, वापस लेने तथा इस प्रसंग में कुछ प्रश्नोत्तर करते रहने—परामर्श देते रहने—का सिलसिला बड़ी सरलता के साथ चलता रह सकता है।

छात्रों के अभिभावकों से अध्यापकों का सहज संपर्क रहता है या सरलतापूर्वक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार घर परिवार के शिक्षित सदस्यों तक छात्रा के माध्यम से युग साहित्य पहुँचाने तथा वापिस लेने का उपक्रम बिना किसी कठिनाई के चल सकता है।

इसके लिए अध्यापकों को अपने घर ज्ञानघट रखना होगा, जिसमें न्यूनतम दस पैसा व साधारणतया पच्चीस पैसा डालते रहा जाय और उससे सस्ता युग साहित्य खरीदते और पढ़ाते रहने का कार्य आगे बढ़ाया जाय। यह ज्ञान घट अपने अन्य भावनाशील घनिष्ठों के यहाँ भी रखाये जा सकते हैं और उस राशि से पढ़ाने के लिए हर महीने नया साहित्य खरीदते रहने—इस प्रज्ञा पुस्तकालय का वैभव बढ़ाते रहने का कार्य चलाते रहा जा सकता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि इसी उपक्रम को अन्य साथी अध्यापक भी अपनायें और वे भी सम्बन्धित छात्रों में इस प्रकार का सद्ज्ञान बीजारोपण क्रम गतिशील बनायें।

[3] संपर्क संसद

कुछ लोगों का व्यवसाय ही ऐसा है, जिसमें अनायास ही अनेकों से आये दिन संपर्क बनता है। इनके साथ स्वाभाविक वार्त्तालाप के अतिरिक्त नव सृजन सम्बन्धी कुछ वार्ता भी जिस−तिस प्रसंग के साथ जोड़ते हुए चलाई जाती रहे। प्रज्ञा साहित्य पढ़ने देने और वापिस लेने की प्रक्रिया चलाने में इस प्रकार के संपर्क में न कोई अतिरिक्त समय लगाना पड़ता है और न बोझ डालने वाला प्रयास ही करना पड़ता है।

संपर्क संसद के लिए अध्यापक −अध्यापिकाओं के अतिरिक्त भी कई वर्ग हैं। जैसे (1) चिकित्सक। (2) पोस्ट मैन (3) ग्राम सेवक (4) लेखपाल (5) दुकानदार भी मिलनसार प्रकृति के रहते हैं। संपर्क साधने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं पड़ता। ऐसे लोग रास्ता चलते, हाट, बाजार जाते, अपना काम निपटाने के साथ साथ जन–संपर्क साधते और उन तक वार्ता एवं साहित्य के माध्यम से युगान्तरीय चेतना का प्रकाश पहुँचाते रह सकते हैं। ज्ञानघट के नियमित अनुदान से अध्यापकों की तरह ही वे भी घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय बना सकते हैं।

[4] कला संसद

इसमें गायक, वादक, नृत्य अभिनय आदि में रुचि एवं गति रखने वाले लोग सम्मिलित होंगे। वे अपने संपर्क क्षेत्र में और भी साथी तलाश करेंगे और छोटी मण्डली बना लेंगे। यह मण्डली अपनी सुरुचि को युग परिवर्तन के अनुरूप ढालेंगी। उसी स्तर के आधार अपनायेगी और परिचय क्षेत्र में जब भी सुविधा होगी छोटे−बड़े आयोजन करती रहेगी। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत आये दिन आयोजन होते रहते हैं। (4) जन्म दिवसोत्सव (2) संस्कार (3) पर्व त्यौहार (4) नवरात्रि सत्र तो सर्वत्र मनाये ही जाते हैं और उनमें युग संगीत की आवश्यकता भी पड़ती ही है। इसके अतिरिक्त प्रज्ञापुराण आयोजनों की अगले वर्ष भारी धूम रहेगी। यह सम्मेलन आयोजन हर क्षेत्र में चलेंगे। उनमें इन युग गायकों की सर्वत्र माँग रहेगी। इसके अतिरिक्त निजी तैयारी की रूप से कला विद्यालय चलायें जायें, जिसमें उपयुक्त अभिरुचि वालों का अध्ययन−अध्यापन चलता रहे। और कला का जो भी पक्ष उभर सकता हो स्थानीय परिस्थितियों और साधनों के अनुरूप उसे उभारा जाय। प्रचलनों की तरह ही गायन अभिनय कला का भी महत्व है। लोकरंजन के साथ लोक−मंगल का कार्य और भी अच्छी तरह हो सकता है।

[5] महिला संसद

इसमें शिक्षित और मुख्य महिलाएँ सम्मिलित होंगी, वे अपने घर−पड़ौस की महिलाओं को तीसरे प्रहर दैनिक या साप्ताहिक गोष्ठी बुलाया करेंगी। या उनके घर जाया करेंगी। इस मिलन संपर्क का प्रधान उद्देश्य होगा—”परिवार निर्माण प्रक्रिया का घरों में यथा सम्भव समावेश।” नव निर्माण मिशन के तीन पक्ष हैं (1) आत्म निर्माण (2) परिवार निर्माण (3) समाज निर्माण। इनमें से आत्म निर्माण और समाज निर्माण को दो पहिये माना जाय तो परिवार निर्माण को उसकी मध्यवर्ती धुरी कहा जायगा। घड़ी का फिनर, परमाणु का नाभिक मूर्धन्य माना जाता है। इसी प्रकार परिवार निर्माण की उपेक्षा विडम्बना का विषय है। उसी के पुनर्जीवन की रूपरेखा इस प्रज्ञा परिजन अंक में सप्त−सूत्री योजना के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है। इसका श्रीगणेश करने, व्यवस्था बनाने और गति देने की जिम्मेदारी तो परिवार संचालकों की ही है। पर इसके उपरान्त उसे निरन्तर सम्भालना और बढ़ाना सुयोग्य नारी का ही काम है। गृह लक्ष्मी वे ही हैं और उन्हें ही रसोईदारिन, चौकीदारिन, जननी, धात्री, चलती−फिरती गुड़िया तक सीमित न रहकर एक बड़ी जिम्मेदारी परिवार का नवयुग के अनुरूप निर्माण करने की भी नई जिम्मेदारी सम्भालनी है। इसका कुछ आभास इस अंक में है। भविष्य में प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत बहुत कुछ बताया जाता रहेगा। यह कार्यान्वित कैसे हो? इसकी जिम्मेदारी उठाने के लिए ही शिक्षित, मुखर एवं उत्साही सेवा भावी महिलाओं को महिला संसद की सदस्य बनने के लिए कहा जा रहा है।

[6] युवा संसद

इसमें किशोर, नवयुवक और प्रौढ़ स्तर के वे उत्साही परिजन सम्मिलित रहेंगे जो आत्म−निर्माण और समाज निर्माण और परिवार निर्माण के कार्य अपनी स्थिति के अनुरूप करते रहेंगे। ऐसी प्रवृत्तियों में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अधिकाधिक सुदृढ़ बनाने वाले प्रयासों की प्रमुखता रहेगी। व्यायाम, ड्रिल, खेलकूद, लाठी चलाना, आसन, प्राणायाम के लिए निजी रूप से या सामूहिक प्रयास से कुछ न कुछ किया ही जाना चाहिए। आहार−विहार का संयम, स्वच्छता, व्यस्त दिनचर्या स्वास्थ्य रक्षा का ही अंग है। इसके अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए स्वाध्याय सत्संग का कोई न कोई नियमित कार्यक्रम बनाया, निभाया और चलाया जाना चाहिए।

समाज सेवा की दृष्टि से घरों में शाक वाटिका लगाने−लगवाने जैसे छोटे−छोटे आन्दोलन चलाये जा सकते हैं। सामूहिक श्रमदान से स्थानीय स्वच्छता के लिए कुछ न कुछ किया और अन्यान्य लोगों आ सहयोग अर्जित किया जा सकता है। साक्षरता प्रसार के लिए प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था हर गली मुहल्ले में बननी चाहिए। चलते−फिरते पुस्तकालय तो प्रत्यक्ष देव मन्दिर ज्ञानरथ हैं। इस प्रकार की कितनी ही रचनात्मक योजनाएँ हैं, जिन्हें युवा संसद के सदस्य मिलजुल कर भली प्रकार सम्पन्न करते रह सकते हैं।

इसी प्रकार का एक महत्वपूर्ण कार्य है—”विवाहोन्माद से समाज को मुक्ति दिलाना। “सर्वविदित है कि खर्चीली शादियां हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। अपने समाज का सर्वोपरि कलंक और विनाश विष वृक्ष यही है। युवक आगे बढ़कर इसकी जड़ पर कुल्हाड़ी चलायें। स्वयं दहेज न लेने, धूमधाम की शादी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा करें। साथ ही जिन साथियों पर अपना प्रभाव हो उनमें भी इस प्रकार के प्रतिज्ञा पत्र भराये और निर्धन परिवारों की लड़कियाँ, उनके अभिभावकों से भी प्रतिज्ञा पत्र संकलन करने के रूप में समाज सुधार आन्दोलन का सिरा पकड़कर उसे क्रमशः अधिकाधिक विस्तृत किया जा सकता है। युवा संसद के सदस्य इसी प्रकार के कार्यों में हाथ डालेंगे और उन्हें पूरा करने में जुटे रहेंगे।

[7] धर्म संसद

उसमें साधु, वानप्रस्थ, पुरोहित, कथा वाचक, उपदेशक वर्ग के लोग सम्मिलित होंगे। वे अपने−अपने प्रभाव क्षेत्र में जो भी धर्मकृत्य करें, उनमें युगान्तरीय चेतना की विचारधारा का समावेश किये रहें। कर्मकाण्डों के विधि−विधान करते हुए उनकी व्याख्या करते हुए—कृत्य का स्वरूप सर्वोपयोगी बनाते हुए—लोक श्रद्धा को नये सिरे से अर्जित कर सकते हैं। प्रज्ञा पुराण का एक खण्ड छप चुका। तीन खण्ड और भी सन् 82 के अन्त तक छप जाने की सम्भावना है। इनके माध्यम से कहीं भी कथा−कीर्तन की संयुक्त प्रक्रिया जनमानस में प्रगतिशीलता का अभिनव संचार कर सकती है। पुरोहित अपने यजमानों का वास्तविक हित साधन कर सकते हैं। धर्मोपदेशक काल्पनिक गपबाजी में निरत भ्रान्ति फैलाने वालों में से अपना नाम कटाकर समय की माँग पूरी करने वाले—युग धर्म को समझने वाले कहला सकते है। यही बात साधु बाबाओं के सम्बन्ध में है। वे समय को पहचानें, धर्म का वास्तविक स्वरूप समझें।

इसके लिए वे युग शिल्पी सत्र में न्यूनतम एक महीने की, सम्भव हो तो अधिक समय की शिक्षा प्राप्त करके अपनी गतिविधियों का अभिनव निर्धारण करने में समर्थ हो सकते हैं। बढ़ते हुए प्रज्ञा परिवार एवं प्रज्ञा अभियान में उनका समुचित स्वागत होगा।

उपरोक्त सात ‘संसदों का इन्हीं दिनों गठन किया जा रहा है।’ एक व्यक्ति कई संसदों का भी अपनी योग्यता एवं रुचि अनुरूप सदस्य बन सकता है। न्यूनतम पाँच व्यक्ति यों से संपर्क साधें और उसमें युग चेतना का समावेश करते रहने भर की शर्त है। प्रज्ञा पुँज, प्रज्ञा पुत्र, प्रज्ञा परिजन तीनों ही वर्ग के लोगों को इन सात संसदों में विभक्त हो जाने के लिए कहा जा रहा है। उपरोक्त दिशा संकेतों को मूल−भूत आधार समझा जा सकता है और पूछे गये नौ विवरणों द्वारा आत्म−परिचय प्रस्तुत करते हुए अभीष्ट संसदों को सदस्य बनाया जा सकता है। अब यह संसद संगठन क्रम यथासम्भव जल्दी ही पूर्ण कर लिया जाना चाहिए।


अगले वर्ष के सम्मेलन समारोह

प्रज्ञा परिवार को उनकी विशिष्ट रुचि, परिस्थिति एवं योग्यता के आधार पर सात भागों में विभक्त किया गया है। जो नितान्त व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन चर्या तक ही सीमित रहना चाहते हैं उनके लिए भी इस अंक में सप्तसूत्री योजना प्रस्तुत की गई है। पर जो एक कदम आगे बढ़कर सामान्य संपर्क के क्षेत्र में न्यूनतम पाँच व्यक्ति यों तक युगान्तरीय चेतना का आलोक पहुँचाने के लिए सहमत हैं, उन्हें उपरोक्त सात संसदों में से किसी एक का सदस्य बन जाना चाहिए। पूछे गये आठ प्रश्नों का उत्तर हरिद्वार भेजने का नियम नहीं रखा गया है। जवाबी पत्र आने पर पंजीकरण की सूचना भर दे दी जायगी।

जिनने घर से बाहर के पाँच व्यक्ति यों से संपर्क साधा है, उन्हें अपनी टीम का ‘टोली नायक’ माना जायगा। इन पाँच साथियों की संख्या क्रमशः बढ़ानी चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो सके वहाँ तक उसके विस्तार का प्रयास चलना चाहिए। इस संपर्क समुदाय के सदस्यों को आवश्यकतानुसार बदला भी जा सकता है। यह कार्य टोली नायक को अपनाना होगा। टीम−मण्डली के सदस्यों की नामावली —उनके साथ संपर्क साधनों की कार्य पद्धति तो आरम्भ में ही लिखनी चाहिए। साथ ही बसन्त पंचमी—गुरु पूर्णिमा तथा शरद पूर्णिमा की—वर्ष में तीन बार इस संपर्क की प्रगति उपलब्धि का विवरण केन्द्र को भी भेजते रहना चाहिए।

साँसदों के सान सम्मेलन इस वर्ष अक्टूबर से जून 83 के मध्य शान्ति−कुञ्ज में होंगे। तिथियाँ बाद में घोषित की जायेंगी। सामूहिक रूप से मार्गदर्शन तथा व्यक्तिगत मनःस्थिति—परिस्थिति के अनुसार आवश्यक परामर्श, विचार विनिमय इन्हीं सम्मेलनों समारोहों में होगा। भविष्य में भी हर संसद के अखिल भारतीय एवं विश्व परिवार के सम्मिलन शान्ति−कुञ्ज में ही वार्षिकोत्सव के रूप में होते रहेंगे।

इसके अतिरिक्त सातों संसदों के सात सम्मेलन हर प्रान्त में भी होंगे। एक सम्मेलन एक स्थान में होगा तो दूसरा दूसरे में। इस प्रकार हर प्रान्त में सात समारोह सात स्थानों पर हुआ करेंगे। इसमें सहयोग तो स्थानीय लोगों का ही होगा और प्रयत्नरत भी वे ही रहेंगे। किन्तु आमन्त्रित करने से लेकर व्यवस्था बनाने तक की पूरी जिम्मेदारी केन्द्र वहन करेगा, ताकि स्थानीय लोगों की ढील−पोल असावधानीवश उपेक्षा के कारण अस्त−व्यस्तता अव्यवस्था न फैलने पावे, आपस की आपाधापी— नेतागिरी एवं खींचतान की स्थिति भी न बने। व्यवस्थापक मात्र केन्द्र के सहयोगी माने जायेंगे और अपनी मर्जी चलाने की अपेक्षा केन्द्र का अनुशासन भर मानेंगे। वर्तमान परिस्थितियों में इससे कम में कहीं भी सुव्यवस्था बन सकने की सम्भावना नहीं है। पिछले कटु अनुभवों ने यही सिखाया है। इसलिए वस्तुस्थिति एवं कठिनाई को ध्यान में रखते हुए तद्नुरूप कदम उठाने का निश्चय किया गया है।

केन्द्र में सात वार्षिक समारोह होंगे। हर प्रान्त के सात स्थानों पर सात संसदों के सात समारोह होंगे। इसमें पारस्परिक विचार विनिमय एवं भावी निर्धारण तो प्रमुख है ही। इसके अतिरिक्त सर्वसाधारण को उद्बोधन करने के लिए खुला अधिवेशन—प्रवचन समारोह भी होगा। जिससे मिशन की विचारधारा से सर्वसाधारण को भी अवगत होने एवं प्रस्तुत प्रतिपादनों को अपनाने का अवसर मिल सके।

इन सातों समारोहों को सात मेलों का रूप देने की बात सोची गई है, जिससे विचारशील ही नहीं सामान्य जन भी विनोद मनोरंजन की दृष्टि से पहुँच सकें और उस वातावरण से अभिनव प्रकाश उपलब्ध कर सकें।

सम्मेलन में उस प्रान्त भर के साँसद एकत्रित होंगे इसलिए उनके भोजन निवास की—परामर्श पाण्डाल एवं प्रवचन पाण्डालों की संख्या को दृष्टि में रखते हुए व्यवस्था बनानी होगी। यह साधारण सभा सम्मेलनों से भिन्न प्रकार की—अपेक्षाकृत अधिक भारी— और अधिक दौड़−धूप लगना सूझ−बूझ माँगने वाली व्यवस्था होगी। अतएव यह भार किसी भी अति भावुक या अति उत्साही को उसके आग्रह के आधार पर नहीं, वरन् समर्थता की जाँच पड़ताल करने के उपरान्त की कन्धों पर डाला और स्थान का चयन किया जाया करेगा।

यह साँसद समारोह मेलों का रूप धारण करें इसलिए यह प्रबन्ध किया जायगा कि जन साधारण के लिए मनोरंजन माध्यम भी उसमें रहें। जलपान गृह, खिलौने, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ दुकानें तो लगेंगी ही। बच्चों के झूले, खेल तमाशे भी नियन्त्रित किये जायेंगे। केन्द्र से युग चेतना को हृदयंगम कराने वाली चित्र प्रदर्शनी हर जगह पहुँचा करेगी। कठपुतलियों के नाटक भी लक्ष्य की ओर दर्शकों को मोड़ने का प्रयत्न करेंगे। बन पड़ा तो नाटक मण्डली अन्यथा संगीत मण्डली तो अवश्य ही पहुँचेगी। सरकारी सहयोग मिल सका तो उनके समाज कल्याण जैसे विभागों की प्रदर्शनियाँ—फिल्में भी आमन्त्रित की जायेंगी। क्षेत्रीय संगीतज्ञों के मधुर गान सुनने का अवसर मिलेगा। कला संसदें यदि अपने क्षेत्र में नाटक, अभिनव का प्रबन्ध कर सकीं तो उनसे भी पहुँचने का आग्रह किया जायगा। उस क्षेत्र के युवा साँसद स्वयं सेवकों को सौंपी जाने वाली जिम्मेदारियाँ वहन करेंगे।

इन समारोहों को विवाह मेलों का रूप भी दिया जायगा। पूर्व निर्धारित आदर्श विवाह तो होंगे ही। साथ ही यह प्रयत्न भी किया जायगा कि विवाह योग्य लड़की−लड़कों को लेकर अभिभावक उस समारोह में सम्मिलित हों, अपने−अपने खाँचे बिठायें, किन्तु जो भी सम्बन्ध निश्चित हो, उनमें बिना दहेज बिना जेवर तथा बिना धूमधाम की शादी की शर्त अनिवार्य रूप से रहे। इस प्रकार प्रज्ञा परिवार की अपनी बिरादरी होगी और अपनी रीति−नीति तथा विधि व्यवस्था। यह प्रचलन चल पड़े तो इसकी बहुमुखी प्रतिक्रिया होगी। फिर अन्य कुरीतियों के धुर्रे उड़ा देने का रास्ता खुल जायगा। सर्वविदित है कि अपने समाज में सर्वोपरि संकट खर्चीले विवाहों की कुरीति का है। हमारा आर्थिक, सामाजिक और नैतिक ढांचा लड़खड़ा देने में जितना इस कुरीति ने विष वृक्ष की—विनाश संकट की भूमिका खड़ी की है वैसी अन्य किसी संकट के कारण उत्पन्न नहीं हुई। हर प्रान्त में हर वर्ष होने वाले यह सात−सात समारोह अगले दिनों कितनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकेंगे। इसकी कल्पना करने भर से आँखें चमकने लगती हैं।

अगले वर्ष प्रज्ञा पुराणों के आयोजन प्रत्येक समर्थ शाखा एवं जीवन्त प्रज्ञा पीठ को करने चाहिए। इन सभी के लिए इन्हीं पंक्ति यों द्वारा अनुरोध भेजा जा रहा है कि वे अपनी सहमति भेजकर अभी से अपनी तिथि निश्चित करा लें और उसे हर दृष्टि से महत्वपूर्ण शानदार बनाने के लिए समय रहते जुट पड़े। सभी प्रज्ञा आयोजनों में प्रातः प्रज्ञा पुराण की कथा, दोपहर को नव सृजन चित्र प्रदर्शनी, कठपुतली, संगीत समारोह चलेगा। रात्रि को खुला सभा सम्मेलन होगा। चार दिन के आयोजन होंगे। चौथे दिन दोपहर को नौ कुण्डी यज्ञ की पूर्णाहुति हो जाया करेगी। उसी अवसर पर देव दक्षिणा में दुर्गुण छोड़ने तथा सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने का संकल्प श्रद्धाञ्जलियाँ अर्पित की जाया करेंगी।

अगले वर्ष दो−दो साइकिलों के हजार जत्थे तीर्थ यात्रा पर निकला करेंगे और अपने−अपने क्षेत्रों में योजनाबद्ध रूप से दिन में परिभ्रमण संपर्क एवं रात्रि का कथा संगीत का सार्वजनिक सत्संग किया करेंगे। इन परिव्राजकों को ढपली−मजीरे की शिक्षा विशेष रूप से दी जायगी ताकि युग गीतों के साथ मिशन की विचारधारा को मिलाकर उपस्थित समुदाय को उद्बोधन कर सकेंगे। युग गायक—सड़क गायक—स्टेट सिंगर—अलख जगाने वाले इसी प्रकार के गीत प्रचार का उपक्रम अपनाते हैं। तीर्थयात्री टोलियों का कार्यक्रम भी प्रायः ऐसा ही होगा। वे कहीं भी जन उपस्थिति के स्थान पर बैठकर सुविधा के समय प्रचार किया करेंगे। डडडड बजते ही सुनने वालों की भीड़ सहज ही जुट जाया करेगी। अगले वर्ष की प्रचार प्रक्रिया यही है।


पुरोहित से


पुरोहित से (kavita)

ओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ। ‘धर्म को जागृत रखेंगे’—धर्म यह अपना निभाओ॥

थे तुम्हीं जिनने सिखाया राम को शर−धनु चलाना। और युग की असुरता से−प्राणपण से जूझ जाना॥

बनो विश्वामित्र फिर, दुष्वृत्ति से लड़ना सिखाओ। ओओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ।

है जरूरत एक अर्जुन की पुनः इस भरत−भू को। दे सके सम्मान वापिस जो कि पाँचाली वधू को॥

जगो युग के द्रौण! सोया राष्ट्र का पौरुष जगाओ। ओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ।

राष्ट्र को नव चेतना दो, साधना दो, स्वयं तपकर। लोकमंगल की सुरक्षा का बड़ा दायित्व तुम पर॥

लोकहित तप की पुनीत परम्परा फिर से चलाओ। ओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ।

भूल बैठे हैं सभी अध्यात्मविद्या—आत्म दर्शन। जाग्रित उसको करो—सब व्यक्ति हों ईश्वर परायण॥

तुम रहे भूसुर धारा के मान मत अपना गँवाओ। ओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ।

युग तपस्वी! और युग के ऋषि! तुम्हें आह्वान युग का। है तुम्हारे हाथ में ही—टूटता सम्मान युग का॥

दिग्भ्रमित मेधा, मनीषा, और प्रज्ञा को बचाओ। ओ पुरोहित राष्ट्र के! जागो स्वयं−सबको जगाओ॥

—माया वर्मा

*समाप्त*