आध्यात्मिक दृष्टि से मानवी सत्ता का विश्लेषण किया जाय, तो उसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है, पहला–अस्थि, माँस का पंचतत्वों का बना पिण्ड जिसे स्थूल शरीर कहते हैं। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा इसके माध्यम से विविध−विधि क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं। दूसरा– मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार द्वारा बना, शब्द−रूप−गन्ध−स्पर्श की तन्मात्राओं स विनिर्मित अनुभूतियों, इच्छाओं और प्रेरणाओं का आधार सूक्ष्म शरीर जिसे ‘माइण्ड’ या ज्ञान संस्थान भी कहते हैं। तीसरा–आस्थाओं, मान्यताओं, आकाँक्षाओं का उद्गम। जीवन की दिशाओं का निर्धारण करने वाला कारण शरीर जिससे अन्तरात्मा अथवा अन्तःकरण भी कहते हैं। भाव−सम्वेदनाएँ, उच्चस्तरीय आवेग यहीं जन्म लेते हैं। संक्षेप में इन तीनों को क्रमशः क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और इच्छाशक्ति का उद्गम केन्द्र कह सकते हैं। इन तीनों का समन्वित रूप ही मानवी सत्ता है।
साधना की दृष्टि से इन तीनों की विवेचना आवश्यक है। जब तक संरचना का ज्ञान न होगा–प्रतिक्रियाओं व परिणति की जानकारी कैसे होगी? इसी कारण साधना−विधान के विस्तार में जाने वाले साधकों को पहले ‘स्प्रिचुअल एलाँटामी’ की जानकारी करायी जाती है। साधना क्रमों का चयन इस प्रारंभिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित होता है।
तीनों शरीरों की महत्ता और सामर्थ्य अपने आप में अलग एवं अद्भुत है। स्थूल शरीर द्वारा सम्भव श्रम का मूल्य स्वल्प है। वह तो पशु व मशीनों द्वारा भी कराया जा सकता है। महत्वपूर्ण तो है पंचतत्वों द्वारा विनिर्मित यह कलेवर जिसके माध्यम से अन्य दो सूक्ष्म−गहराई में विराजमान परतें अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करती हैं।
सूक्ष्म शरीर वह संस्थान है जिसको परिमार्जित– प्रखर बना कर हम वैज्ञानिक–कलाकार–विद्वान बनते हैं। बौद्धिक क्षमता के उपार्जन से धन−यश−सम्मान प्राप्त करते हैं। वासना−तृष्णा का उद्भव इसी में होता है। तरह−तरह की महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला ताना−बाना यहीं बुना जाता है। ‘माइण्ड’ रूप में विद्यमान इसी चेतन परत को विकसित कर बुद्धिमान, दूरदर्शी, कला–कौशल सम्पन्न बना जाता है।
इन दोनों से ऊँची परत है कारण शरीर की। यह सबसे शक्तिशाली स्तर है। यहाँ आस्थाएँ, मान्यताएँ, विश्वासों की गहरी परतें जमा होती हैं। सम्वेदनाएँ यहीं जन्म लेती हैं। शौर्य, साहस एवं आदर्शवादी– प्रेरणाओं का उभार इसी क्षेत्र में होता है। अपने आत्मस्वरूप का निर्धारण– आध्यात्मिक जीवन की रीति−नीति अभिरुचियों का नियोजन यहीं होता है। व्यक्तित्व का निर्धारण और निखार यहीं से सम्भव होता है। इसी केन्द्र के उत्थान या पतन पर व्यक्तित्व का समुन्नत बनना अथवा गिरना सम्भव हो पाता है। आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दृष्टि से यही जीव चेतना केन्द्र है। आस्थाओं की जैसी परत यहाँ चढ़ी होती है, उसी प्रकार गतिविधियों का संचालन मन व शरीर द्वारा सम्भव हो पाता है।
आमतौर से ध्यान शरीर पर दिया जाता है। खाने पीने−सोने से लेकर तरह−तरह के इन्द्रिय उपभोगों से इसी पिण्ड को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया जाता है। रुग्ण व स्वस्थ यही होता है। बहिरंग में सुन्दर व कुरूप यही नजर आता है, अतः स्थूल दृष्टि इसे सुन्दर−स्वच्छ−समुन्नत बनाने में नियोजित होती है। निम्न वर्ग के व्यक्ति अपनी गतिविधियों को इसी शरीर तक केन्द्रित रखते हैं। “मावज्जवेत् सुखं जीवेत्” का सिद्धान्त ही उनके लिये अनुकरणीय होता है।
जिनका चेतन स्तर मध्यवर्ती विकास तक पहुँच चुका होता है, उनको मस्तिष्कीय विकास का महत्व समझ में आता है। वे शिक्षार्जन, बुद्धि−कौशल उपार्जन व ज्ञान सम्पादन में रुचि लेते हैं। विद्यालयी शिक्षा से लेकर सामान्य जीवन व्यवहार का ज्ञान, सत्संग−स्वाध्याय द्वारा ज्ञानवृद्धि कर वे सम्मान, नेतृत्व पाते हैं, यशस्वी बनते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएं इसी उद्देश्य की पूर्ति तक सीमित रहती हैं। इसी कारण मस्तिष्क विकास के जितने भी विनोदात्मक सम्वर्धनात्मक, उपभोगात्मक तरीके उपलब्ध हो सकते हैं उसे वे जुटाते रहते हैं। जीवन का अधिकाँश समय उनका इसी पुरुषार्थ में निकल जाता है। यह सामान्य से ऊँचे स्तर वाली प्रक्रति की स्थिति हुई।
तीसरा स्तर जो सर्वोच्च व शक्तिशाली है– कारण शरीर का है। इसके स्वरूप को समझना एवं परिष्कृत करने का प्रयत्न करना मात्र उच्च भूमिका में विकसित व्यक्ति के लिये ही सम्भव हो पाता है। इस स्तर की उपयोगिता– महत्ता सामान्य बुद्धि के व्यक्तियों को समझ में नहीं आती, न ही उन्हें प्रत्यक्ष रूप में इसका कोई प्रतिफल ही नजर आता है। भाव सम्वेदनाएँ, आस्थाएँ ही समग्र मानवी व्यक्तित्व को दिशा देती हैं, उसका स्वरूप निखारती हैं– उच्चस्तरीय चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं– यह समझना–अनुभव करना− व उस स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करना हर किसी से नहीं बन पाता। अस्तु यह अछूत ही पड़ा रह जाता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदतें सुधरती नहीं, पशुवृत्तियों से मोर्चा लेते बनता नहीं व जीवन−संकट जैसे− तैसे खिंचता रहता है। ऐसे व्यक्ति भोंडे, असभ्य कहलाते हैं। वह अस्तु−व्यस्त असफल जीवन जीकर, बहुसंख्य जीवों की तरह मृत्यु की शरण लेते हैं। अतीन्द्रिय दैवी क्षमताओं की –सिद्धियों की–व्यक्तित्वोत्थान की चर्चाएँ जो भी सुनी जाती हैं, वे इसी ‘कारण शरीर’ के विकासोन्मुख उभार है। पाश्चात्य विज्ञान के ज्ञाताओं ने थोड़ा−थोड़ा स्पर्श मात्र इस विषय को किया है, पर वहाँ भी वे ‘आँकल्ट’ का जिक्र कर चुप हो गये हैं। ‘मिस्टीसिज्म’ नाम से जाना जाने वाला यह विषय उतना ही स्पष्ट एवं खुला हुआ है जितने भौतिकी के अन्य अध्याय। पर स्वरूप को सही जानकारी के अभाव में उथले प्रयत्नों को ही समग्र मान उनकी परिणति हुई समझ ली जाती है।
अगले दिनों जब भी साधना विज्ञान का सह स्वरूप लोगों की समझ में आयेगा तो वे जानेंगे कि मानवी सत्ता के इस मूल आधार को विकसित करने पर शारीरिक कायाकल्प– मानसिक प्रत्यावर्तन एवं अतिसूक्ष्म स्वर्ग और मुक्ति जैसे दिव्य वरदानों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। व्यक्ति स्वयं को लघु से महान्, नर से नारायण एवं आत्मा से परमात्मा बना सकता है। सारे महामानव अपने इसी आस्था संस्थान को परिष्कृत समुन्नत बनाकर ऊँची स्थिति पर पहुँच पाये हैं।
अध्यात्म विज्ञान भारतीय संस्कृति की अमूल्य सम्पदा व विश्व को एक बहुमूल्य देन है। साधना विधान का जो स्वरूप पूर्व में प्रचलित था उसके अनुसार हठयोग द्वारा स्थूल शरीर का– राजयोग से सूक्ष्म शरीर अथवा मनस् का एवं ब्रह्मयोग द्वारा अन्तःकरण का परिशोधन−परिमार्जन किया जाता था। इन्हीं का व्यावहारिक स्वरूप था–कर्म, ज्ञान एवं भक्ति योग। साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति−विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं−तप अर्जित, मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त हो पाता था। आज तो अति सुगम बनाने के चक्कर में इस अध्यात्म विज्ञान को एक षड्यन्त्र द्वारा मात्र स्थूल तक ही सीमित कर दिया गया है। यह एक शाश्वत−सनातन सत्य है कि अन्तरात्मा का गहन स्तर ही व्यक्तित्व को दिशा एवं समर्थ बनाता है। अतिमहत्वपूर्ण, अतिमानव− देवपुरुष, अग्रगामी, महापुरुष कहे जाने वाले व्यक्ति अपने इसी स्तर को दिशा विशेष में परिपुष्ट कर आगे आये हैं। जिसका यह अन्तस्−अन्तःकरण का गहनतम स्तर खोखला होगा वह बहिरंग में सम्पन्न होते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से ओछा, बौना एवं गया−गुजरा ही बना रहेगा। ऐसे व्यक्ति का वैभव उसके तो अभिशाप सिद्ध होगा ही, समाज में अन्य सभी के लिये विपत्ति का कारण बनेगा।
सारे साधना उपचारों का लक्ष्य एक ही रहता है– इस मर्मस्थल अन्तःकरण की गहन परतों को स्पर्श कर–वहां छाये अन्धकार को मिटाना तथा उस स्थान को श्रेष्ठ समुन्नत बनाना। साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग तक परत दर परत छूने के लिये अलग−अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न−भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने हेतु क्रियायोग तथा सूक्ष्म एवं कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
अध्यात्म विद्या को भी तत्ववेत्ताओं ने इसी प्रकार चिंतन और क्रिया के दो भागों में विभक्त किया है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इस प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र वचनों का स्वाध्याय, चिन्तन, मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
दूसरा पक्ष साधना का है। सूक्ष्म जगत से – दैवी शक्तियों से− संपर्क का आदान−प्रदान का द्वार खोलने वाला यह प्रयास उपासना−साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
चिन्तनपरक ब्रह्म विद्या तथा साधनापरक तपश्चर्या दोनों ही तथ्यपूर्ण हैं। एक ज्ञानपक्ष है तो दूसरा विज्ञान पक्ष। एक को ब्रह्मवर्चस् का ब्रह्म पक्ष व दूसरे को वर्चस् पक्ष कह सकते हैं। दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण बनते हैं। ब्रह्मवर्चस् विज्ञान की इन दोनों ही विधाओं का सारे साधना उपक्रमों में समावेश रहता है। ज्ञान व विज्ञान दोनों का समन्वय क्रियायोग व ध्यानयोग में है। बिना चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे तप साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहेंगे। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर, क्रियायोग व ध्यानयोग, ब्रह्मविद्या एवं साधनापरक तपश्चर्या ये सभी विभाजन साधना विज्ञान की तात्विक पृष्ठभूमि को समझने के लिये ही किये गये हैं। वस्तुतः इन सभी के पीछे तथ्य एक ही है कि समस्त साधना उपक्रमों का लक्ष्य एक ही हो। अन्तःकरण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार–परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण, तथा देवपुरुष–ऋषि– महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन। इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्त वचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय−समय पर आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है। परन्तु वास्तविक सहायता उसी आत्मतत्व से मिलती है जिसे अपने अतः में जगाया जाता है। यदि आत्मतत्व परिष्कृत– जागा हुआ न हो तो गुरु कृपा भी सूखी चट्टान पर बरसे वर्षा जल की तरह निरर्थक चली जाती है।
अपने आपे को परिष्कृत करने–जगाने की–जो साधना की जाती है उसमें ध्यान−धारण का महत्वपूर्ण स्थान है। अपने चिन्तन को इधर−उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईथर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान−प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना। सद्भाव सम्वर्धन –श्रद्धा अभिवर्धन हेतु ध्यानयोग से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं। सोऽहं की– हंसयोग साधना, नादयोग, त्राटक, बिन्दु, अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
साधना विधान का महत्वपूर्ण अंग है– उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
उपासना को सही अर्थों में समझाना हो तो पहले उसके अर्थ पर एक दृष्टि डाली जाय। उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली। जीव की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठे। शिश्नोदर परायण जीवन जीते हुए मनुष्य अपनी आस्थाओं को– आकाँक्षाओं को–दिव्य नहीं बना सकता। फिर तो उसे नर–कीट या नर–पशु ही कहना उचित होगा। कायिक विकास तो सभी कर लेते हैं, पर चेतना की दृष्टि से विकास न हो सका, ईश्वर का सामीप्य पाने की पात्रता न बन सकी तो आयु की दृष्टि से प्रौढ़ होते हुए भी ऐसे व्यक्ति अविकसित ही कहे जाएँगे।
पिछली योनियों की निकृष्टताओं से अपना पीछा छुड़ाने के लिये ही उपासना का, ईश्वर की समीपता का उपक्रम अपनाया जाता है। संगति का−समीप बैठने का– महत्व सर्वविदित है– चन्दन के समीप बहने वाली सुगन्धित पवन आस−पास के वृक्षों को भी वैसा ही सुरभित बना देती है। टिड्डा हरी घास में रहता है तो उसका शरीर वैसा ही हो जाता है और जब सूखी घास में रहता है तो पीला पड़ जाता है। महामानवों का सामीप्य पाने वाले उनकी शक्ति से–संगति से– लाभान्वित होते, उन्हीं गुणों से ओत−प्रोत होते देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी एकाकी सत्ता के रूप में विकसित हुए पर इस वट वृक्ष के नीचे पलने – बढ़ने वाले पटेल, जवाहर, लाल बहादुर बने। यह संगति का सामीप्य का ही प्रतिफल है। कीट−भँगी का तद्रूपता का उदाहरण सुप्रसिद्ध है।
चन्द्रमा तभी चमकता है जब वह सूर्य का प्रकाश पाता है। अपने आप में वह प्रकाशवान नहीं, उसकी अकेली कोई सत्ता नहीं। सूर्य का आलोक जब उसे प्राप्त नहीं होता तो अमावस्या के दिन चन्द्रमा के यथा स्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। परमात्मा वह दिव्य शक्ति आलोक से भरा प्रकाश पुंज है जिससे हम सभी अनुप्राणित प्रकाशवान होते हैं। उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।
उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो–इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।”
इन पाँच सत्प्रवृत्तियों को परमेश्वर का प्रतिनिधि–पंचदेव भी कह सकते हैं। इन्हीं पाँच पाण्डवों को आजीवन आँतरिक असुर कौरवों से लड़ना होता है। जब असुरता के उन्मूलन का हृदय मंथन आक्रोश पूर्वक हो रहा हो–स्पष्ट मान लेना चाहिये कि जीव रूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह कृष्ण की आज्ञा मान कर्त्तव्य पारायण–सच्चा योगी–ईश्वर भक्त हो गया। उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।
आत्मा−परमात्मा के निकट पहुँचने पर भौतिकी का ऊर्जा स्थानान्तरण वाला सिद्धान्त ही सार्थक होता है। गरम लोहे को ठण्डे के साथ बाँध देने पर गर्मी एक से दूसरे में जाती है और थोड़ी देर में तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाबों को यदि परस्पर सम्बद्ध कर दिया जाय तो अधिक पानी वाले तालाब का जल दूसरे कम पानी वाले तालाब में पहुँचकर दोनों का स्तर समान कर देता है। उपासना के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित करने का प्रयास किया जाता है। यों तो वह हर समय, हर एक के पास, हर स्थिति में कोई भी काम करते समय बना रहता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति उसके सान्निध्य की अनुभूति नहीं कर पाते। यदि मनुष्य अपने हर काम को परमात्मा को सौंप दे, हर काम उसी को जान समझ कर करे और हर क्रिया को उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।
ऋषियों और सन्त भक्तों के जीवन इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने अपार आत्म−शान्ति पाई, अपने आशीर्वाद और वरदान से असंख्यों के भौतिक कष्ट मिटाये, अन्धकार में भटकतों को प्रकाश दिया और उन दिव्य विभूतियों के अधिपति बने जिन्हें ऋद्धि एवं सिद्धि कहा जाता है। नाम गिनाये जायें तो रैदास, दादू, नानक, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम ऐसे अनेकों हैं जिन्होंने गृही और विरक्त सन्त का जीवन जिया। इनके जीवन–चरित्रों को कसौटी पर कसा जा सकता है और देखा जा सकता है कि कोल्हू के बैल की तरह ढर्रे का नीरस जीवन बिताने की अपेक्षा यदि उनने ईश्वर का आश्रय लेने का निर्णय लिया तो वे घाटे में नहीं रहे। कम लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ का व्यापार करना बुद्धिमत्ता ही कहा जायेगा। फिर उपासना का अवलम्बन लेना क्यों अदूरदर्शिता माना जाय? निस्सन्देह यही सही जीवन की रीति−नीति है कि शरीरगत स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म−कल्याण की भी आवश्यकता समझी जाय और उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।
शरीर को नित्य स्नान कराया जाता है, वस्त्र हम नित्य धोते हैं, कमरा नित्य बुहारी लगा कर साफ करते हैं। कारण यह कि एक बार की सफाई रोज काम नहीं दे सकती। मन को एक बार चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
अपने आपे को साधने, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने हेतु सुसंस्कारिता की साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।
अध्यात्म क्षेत्र में मार्गदर्शक की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। बच्चा अपना पठन−पाठन आरम्भ करता है तो विद्यालय में शिक्षक से लेकर घर में माता−पिता तक–सभी गुरु की भूमिका निभाते हैं। लौकिक समृद्धि एवं भौतिक प्रगति के प्रबन्ध में भी यह एक सुविदित तथ्य है कि मार्ग−दर्शन के सही मार्ग पर स्वयं चल पड़ना शक्य नहीं। पुरुषार्थ तो स्वयं को ही करना पड़ता है, पर उँगली पकड़ कर चौराहे के भ्रम−जंजाल से मुक्त कर सही रास्ता दिखा देने का कार्य गुरु ही करते हैं।
सद्गुरु की महिमा गाते शास्त्रकार थकते नहीं। मनीषीगण निरन्तर यही कहते आये हैं कि आत्मिक प्रगति बिना गुरु की सहायता के सम्भव नहीं। आत्मकल्याण का द्वार इसके बिना खुलता नहीं। सारी साधनाओं की सफलता सद्गुरु के मार्गदर्शक पर निर्भर है। इसके लिए व्यक्ति विशेष को गुरु मानने की भी आवश्यकता पड़ती है। परन्तु उसका कार्य एक ही है–व्यक्ति को सद्गुरु की पहचान करा देना–उपासना की सही दिशा दे देना तथा अध्यात्म−पथ का पथिक बना देना। यात्रा पूरी करने में हमें अपने पैरों का सहारा लेना होता है। लाठियाँ तो सहारा भर देती हैं। सद्गुरु हमें पार उतारते हैं, पर उन तक पहुँचने के लिये शरीरधारी गुरु की भी अपने ढंग की आरम्भिक किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सद्गुरु कैसे हों, उनकी पहचान क्या हो–इस विषय में आचार्य शकर ‘विवेक चूड़ामणि’ में लिखते हैं–
श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतो यो ब्रह्मवित्तमः ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः
अहतुकदया, सिन्धुर्बन्धुरानमताँ सताम् तमाराध्य गुरं भक्त्या प्रह्न प्रश्रयसेवनैः। प्रसन्नं नमनुप्राप्य पृच्छे ज्ञातव्यनात्मनः॥
अर्थात्− जो श्रुति के ज्ञान से युक्त हों, पाप रहित हों, कामना शून्य हों, श्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ हों, ईंधन रहित अहित अग्नि के समान शान्त हों, अकारण दयालू हों और शरण में आये हुए सज्जनों के हितैषी हों, उन सद्गुरु की विनम्रतापूर्वक अभ्यर्थना करके उनके प्रसन्न होने पर अपना ज्ञातव्य पूछ।
इतनी विशेषताएँ गुरु में हों और पात्रता तथा असीम श्रद्धा शिष्य में, तो वह आदान−प्रदान सम्भव है जो आत्मिक प्रगति में सहायक होता है। रामकृष्ण परमहंस बनने के लिये जन्म−जन्मान्तरों की साधना अभीष्ट है, पर विवेकानन्द बनना पात्रता अर्जित करना सरल है। समुद्र बनना कठिन है, परन्तु उसका जल लेकर मेघ बनकर उड़ना सरल है। पारसमणि बनना कठिन है, पर लोहे का उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी प्रचण्ड सत्ता–अग्निपुँज बन सकना हर किसी का काम नाम नहीं, पर एक दासी पुत्री का चाणक्य का अनुग्रह पाकर दिग्विजयी सम्राट बनकर सफल होना सरल है। बुद्ध कभी−कभी ही ईश्वरीय विधिव्यवस्थानुसार अवतरित होते हैं, पर उनके वट वृक्ष रूपी व्यक्तित्व की छाया में अशोक, आनन्द, अंगुलिमाल, आम्बपाली आदि अगणित व्यक्ति संकीर्णता की परिधि लाँघकर महानता का वरण कर सकने में सफल हो जाते हैं। समर्थ गुरु रामदास बनने के लिये तलवार की धार पर चलने जैसी साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता। परन्तु शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाला बालक भी छत्रपति के रूप में विकसित हो सकता है। गाँधी कभी−कभी ही उत्पन्न होते हैं पर उनका अनुगमन करने वाले व्यक्ति महान राजनेता पद पाकर इतिहास में अपना नाम अमर कर जाते हैं।
वस्तुतः आत्मिक प्रगति की उपलब्धियाँ भौतिक प्रगति की तुलना में असंख्यों गुनी सामर्थ्य से भरी पड़ी है। बशर्ते सही मार्ग−दर्शन उपलब्ध हो गया हो। जिन्हें समर्थ, आत्मबल सम्पन्न और अनुभवी गुरु का प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन मिल गया हो, समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये सशक्त अवलम्बन प्राप्त हो गया। ऐसे गुरु न केवल शिष्य का साधनात्मक मार्गदर्शन करते हैं वरन् अपनी शक्ति का एक अंश देकर साधक को आत्मबल से अनुग्रहीत भी करते हैं। साधना ग्रन्थों में इस गुरु−शिष्य आदान−प्रदान की प्रक्रिया व महत्ता के सम्बन्ध में काफी प्रकृति लिखा जाता है। यह सब मात्र इसलिए कि ग्रन्थों का पठन पाठन, एकाँगी तप−तितिक्षा ही नहीं−गुरु की शक्ति का अंश तथा अनुभवजन्य मार्गदर्शन अत्यन्त आवश्यक है। नहीं तो हर मोड़ पर भटकाव की सम्भावना होती है। इसके लिये भक्त को सद्गुरु का चयन करने के अतिरिक्त अपनी साधन श्रद्धा का भी आरोपण करना होता है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में ऋषि लिखते हैं–
“जिसकी अपने अभीष्ट देव के प्रति प्रगाढ़ भक्ति होती है और उस देव के समान ही गुरु के प्रति भी प्रगाढ़ श्रद्धा होती है, उस महापुरुष को सारा ज्ञान स्वयमेव प्रकट हो जाता है।”
साथ ही यह भी ध्यान रखना होता है कि कोई विदूषक गुरुपद का स्वांग रचने बैठा हो और अपने साथ−साथ अनुगमनकर्त्ता को भी न डुबा रहा हो। सही एवं सफल मार्ग−दर्शन की तलाश में निकले जिज्ञासु पथिक को जहाँ श्रद्धालु होना चाहिए वहाँ सतर्क भी, अन्यथा इस धूर्तता के युग में किसी अनाड़ी छलिया के जाल में फँसकर प्रगति तो दूर, जो पास में था उसे भी वह गँवा बैठेगा। इसीलिये शास्त्रकार लिखता है–
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तयमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मपरे च समाश्रयम्॥
अर्थात्–आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले जिज्ञासु को बौद्धिक ज्ञान से परे, परब्रह्म की स्थिति के अनुभवी, अध्यात्म शास्त्र में निष्णात ‘गुरु’ का सान्निध्य प्राप्त करना चाहिए।
ऐसे गुरु की प्राप्ति हर साधक के जीवन का एक बहुत बड़ा सौभाग्य है। वह अपनी शक्ति में गुरु से प्राप्त शक्ति को जोड़कर स्वयं को आत्म बल सम्पन्न एवं प्रगति पथ पर अग्रगामी होते प्रत्यक्षतः देखता है।
गुरु द्वारा अपनी शक्ति हस्तान्तरित करने, अपने तेजोवलय द्वारा चक्षु, वाणी, स्पर्श से शिष्य की क्षमताओं को विकसित करने की घटनाओं का उल्लेख योग ग्रन्थों में स्थान−स्थान पर आया है। साधना पथ पर चलने वाला प्रत्येक साधक जिज्ञासु हो उठता है कि यह शक्तिपात क्या है, किस सीमा तक वैज्ञानिक है? उसकी प्रक्रिया क्या है एवं क्या प्रत्येक व्यक्ति ऐसे समर्थ व्यक्ति, महापुरुषों के अनुदान प्राप्त कर सकता है? पात्रता विकसित करने के लिये क्या करना पड़ता है? सामान्य व्यक्ति इसकी परख कैसे करें, ये ऐसे प्रश्न हैं जो साधना मार्ग और उन्मुख हर साधक जानना चाहता है।
योगीराज अरविंद एवं माताजी, स्वामी रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानन्द, युक्तेश्वरगिरी एवं योगानन्द इनके प्रसंगों में इसी प्रकार के वर्णन मिलते हैं। शैव धर्म में तो शिष्य के कल्याण का मूल कारण शक्तिपात को माना गया है।
“शक्ति पातानुसारेण शिष्योऽनुग्रहमर्हति। शैवधर्मानुसारस्य तन्मूलत्वात् समासतः॥
जिस शिष्य को इसका लाभ नहीं मिल पाता उसका कारण बताते हुए कहा गया है कि–
यत्र श्क्ति र्नपतिता तत्र शुद्धिर्न जायते। न विद्या न शिवाचारो न मुक्ति र्न च सिद्धयः॥
अर्थात्− कषाय कल्मषों की अशुद्धि, अविद्या, अनुचित आचरण वाला मुक्ति को नहीं प्राप्त होता, नहीं शक्तिपात का लाभ उठा पाता है अथवा प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि जिसे गुरु की शक्ति नहीं मिली वह मुक्ति नहीं पाता तथा कषाय−कल्मषों से आच्छादित अन्तःकरण लिये अविद्या, अनाचरण युक्त जीवन बिताता है।
गुरु−शिष्य परम्परा में शक्पात की यथार्थता पर सन्देह नहीं किया जाना चाहिए। गुरु के सुपात्र शिष्य को प्राप्त अनुदान उसे सामान्य से असामान्य बना देते हैं, इन प्रसंगों से पुराण–इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। परन्तु प्रकृति भ्रान्तियाँ इस क्षेत्र में ऐसी व्याप्त हैं जिन्होंने सामान्य व्यक्ति को दिग्भ्रान्त ही नहीं किया है−शक्तिपात के नाम पर गुरु शिष्य परम्परा को कलंकित भी किया है। तथाकथित गुरुओं ने ऐसे जाल−जंजाल खड़े कर दिये हैं जिन्हें देखकर कोई भी व्यक्ति भटक सकता है। इसलिये इसके वास्तविक स्वरूप को जानना जरूरी है।
साधना पथ में गुरु वरण किया जाता है। गुरु वह जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलता है। कहा गया है–
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलित येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
“जिस गुरु ने ज्ञान के अंजन की शलका आँखों में लगाकर अज्ञान रूपी अन्धकार को मिटाया उन गुरुदेव को नमस्कार है।”
गुरु भी दो होते हैं। एक वह जो अन्तरात्मा के रूप में बैठे प्रेरणा देते रहते हैं, दूसरे वह जिन्हें विशिष्ट व्यक्ति −मार्गदर्शक के रूप में वरण किया जाता है। महत्ता दोनों की ही है।
निरन्तर सद्शिक्षण और ऊर्ध्वगमन का प्रकाश दे सकना अन्तःकरण में विराजमान गुरुद्वारा ही सम्भव है, बाहरी .गुरु हर समय शिष्य के साथ तो है नहीं। जबकि शिष्य के समक्ष, निरूपण और निराकरण हेतु अगणित समस्याएँ प्रस्तुत होती रहती हैं। इनमें से किस का किस प्रकार समाधान किया जाय, इसका मार्गदर्शन मात्र अपना परिष्कृत सत्ता का लघु रूप में हर समय साथ रहता है। यह भीतरी और बाहरी परिस्थिति की जितनी जानकारी रखता है उतनी और किसी को नहीं है।
परन्तु मानव की दृष्टि स्थूल है। इस कारण वह सूक्ष्म आत्म−प्रेरणाओं को नहीं समझ पाती। आत्मबल सम्पन्न गुरु का वरण शिष्य को इन प्रेरणाओं को समझने–आत्मसात कर दिशा निर्धारित करने के लिये ही किया जाता है। अन्तःगुरु को जगाने का काम भी गुरु ही करता है। अपने आत्मबल द्वारा वह शिष्य में ऐसी शक्ति प्रेरणाएं भरता है जिससे वह सद्मार्ग पर चल सके। साधना मार्ग के विक्षोभों एवं अवरोधों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है। मनुष्य की सामर्थ्य अनन्त है। वह शक्ति का पुञ्ज है। पर जब तक यह आत्मबोध न हो जाय अन्तःशक्ति के वैभव का समुचित लाभ उठा पाना साधक के लिये सम्भव नहीं हो पाता। गुरु शिष्य को अंतर्जगत का पर्यवेक्षण कराते हैं, उसकी सामर्थ्य का बोध कराते हैं। सामर्थ्य को जागृत विकसित कर सुनियोजित करने के हर सम्भव उपाय बताते है। इसका साधक को आत्मबल व मनोबल के रूप में मिलता है। यही शक्ति साधक के अंतर्जगत के देवासुर संग्राम में विकारों को उखाड़ फेंक देने में सहायक सिद्ध होती है।
गुरु का यह अनुदान शिष्य अपनी आन्तरिक श्रद्धा के रूप में उठाता है। जिस शिष्य में आदर्शों व सिद्धान्तों के प्रति जितनी अधिक निष्ठा होगी वह गुरु के इस अनुभव से उतना ही लाभान्वित होता है। प्रत्येक शिष्य अपनी श्रद्धा−पूँजी के अनुरूप उसी अनुपात में उसे प्राप्त करता है।
अधर्म अधर्मयोःसाम्ये जात शक्तिःपतत्यसै। ज्ञानात्मिका पराशक्तिः शंभोर्यास्मिन्निपातिता॥ (महायोग विज्ञान)
अर्थात्– जब शिष्य के धर्माधर्म, रूप, संस्कार सभ्यता को प्राप्त होते हैं, तब ईश्वर से प्राप्त उस ज्ञानात्मिका पराशक्ति का समर्थ गुरु द्वारा शक्तिपात किया जाता है।
लोहा जिस प्रकार के संपर्क में आकर सोना बन जाता है। उसी प्रकार ऐसे उच्चस्तरीय प्राण प्रहार प्रयोगों में साधक में जीवन में आमूल−चूल परिवर्तन न हो जाता है। ऐसे शिष्य जन−प्रवाह के बहते ढर्रे के जीवन से मुख मोड़कर वह मार्ग अपनाते है जो कठिनाइयों–संघर्षों से भरा होता है। वे अपने व्यक्तित्व को गुरु की प्राणशक्ति के चुम्बक से प्रभावित कर उसे भी वैसा ही प्रभावशाली–प्रबल बना सकने में समर्थ हो जाते हैं। शक्तिपात की अनुभूति नहीं–परिणति महत्वपूर्ण है। चरित्र की उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व में उदार आत्मीयता ही गुरु अनुग्रह की वास्तविक उपलब्धि है। जिस भी साधक में यह जितनी अधिक मात्रा में दीख पड़े समझना चाहिए गुरु कृपा प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में उसी अनुपात में मिली है।
मानवी मस्तिष्क असीम शक्तियों का भण्डार है, पर कठिनाई एक ही है कि उनमें बिखराव बने रहने और एक स्थान पर केन्द्रित न हो पाने से अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता। यदि उन्हें एकाग्र किया जा सके तो सामान्य व्यक्ति भी असामान्य मस्तिष्कीय शक्ति का स्वामी बन सकता और उसके सहारे आश्चर्यजनक कार्य कर सकता है। बिखरी हुई सूर्य की किरणें गर्मी और ताप आतिशी शीशे द्वारा द्वारा एक छोटे से केन्द्र पर वे एकत्रित की जा सके तो मात्र दो इंच घेरे की धूप में से ही अग्नि एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जा सके तो सामान्य मस्तिष्क भी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दे सकने में सक्षम है।
शक्ति को उपलब्ध कर लेना बड़ी बात सुनी है, उसे बिखरावजन्य हानि एवं अनव्यय की बर्बादी से बचाया जाना चाहिए। शक्ति की उपलब्धि का समुचित लाभ तभी मिल पाता है जब कि उसे संग्रहित करने और सत्प्रयोजनों में लगाने की बात बने। धूप एवं गर्मी के प्रभाव से समुद्र, तालाबों, नदियों का पानी भाप बनकर उड़ता रहता है। किन्तु रेल इंजन में थोड़ा-सा पानी ही भाप बनकर शक्तिशाली बन जाता है। उसे हवा में उड़ने से बचाकर एक टंकी में एकत्रित कर लिया जाता है फिर उसका शक्ति प्रवाह एक छोटे से छेद से होकर पिस्टन तक पहुँचा दिया जाता है। मात्र इतने से रेलगाड़ी का भारी इंजन अपने साथ सैकड़ों टन वजन लेकर तीव्र गति से दौड़ने लगता है। ढेरों बारूद यदि जमीन पर फैला दी जाय और उसमें माचिस से आग लगा दी जाय तो वह मात्र थोड़ी ही चमक और आवाज के साथ तुरन्त जल जायेगी, पर जब उसे ही किसी बन्दूक की छोटी-सी नली के भीतर कड़े खोल वाले कारतूस में बन्द कर दिया जाय और बन्दूक का घोड़ा दबा दिया जाय तो एक तोले से भी कम बारूद की मात्रा गजब ढाती दिखाई पड़ने लगती है। अपने साथ प्रचण्ड गति से लोहे की गोली और छर्रों को भी घसीटती ले जाती है और जहाँ टकराती है ध्वंस पैदा कर देती है। बिखरी बारूद की निरर्थकता और उसकी संग्रहित शक्ति को एक दिशा विशेष में प्रयुक्त किये जाने की सार्थकता में कितना अन्तर होता है, इसे सहज ही देखा और समझा जा सकता है।
बाँधों में पानी भरा रहता है पर जब उसे एक छोटे से छेद से होकर गुजारा जाता है तो पानी के दबाव से उस धारा की गति अत्यन्त तीव्र हो जाती है। इस धारा में असाधारण शक्ति हो जाती है। धारा के प्रहार से कितने ही शक्तिशाली टर्बाइन्स घुमाये जाते है और उनके घूमते ही कितने ही प्रकार के यन्त्र चलने लगते हैं। बड़े−बड़े बिजलीघरों का निर्माण जलाशय के बाँधो पर ही विपुल परिमाण में विद्युत उत्पन्न की जाती है। छोटे−छोटे जल प्रपातों में भी पवन चक्की जैसी मशीनें चलायी जाती है। यह एकाग्रता की शक्ति का ही परिणाम है कि फैले हुए विशाल क्षेत्र को छोटा कर देने से सहज ही उसकी प्रखरता बढ़ जाती है। किसी मोटे लोहे को किसी कड़ी वस्तु में धँसाया जाय तो इसमें भारी कठिनाई होगी, पर यदि उसकी नोक पतली कर दी जाय तो साधारण दबाव से भी वह गहराई तक धंसता चला जायेगा। मोटे तारों एवं सुई की नोक का अन्तर सहज ही देखा और अनुभव किया जा सकता है, तार को कागज अथवा कपड़ों की तह में ठूंसना कठिन पड़ता है जबकि पतली नोक वाली सुई उनके भीतर सरलता से प्रवेश करती चली जाती है। पत्थर, लोहा, लकड़ी जैसे कड़े पदार्थों में छेद करने के लिए नोकदार बर्मे का प्रयोग होता है। जमीन की गहरी खुदाई करके बहुमूल्य खनिज सम्पदाएँ प्राप्त कर पाना नोकदार बर्मे के सहारे ही सम्भव हो पाता है।
स्थूल भौतिक शक्तियों की तरह सूक्ष्म शक्तियों का लाभ भी तभी मिल पाता है जब उन्हें एकत्रित करके दिशा में लगा दिया जाय। मस्तिष्क एक सशक्त बिजलीघर है। इसमें से निरन्तर प्रचण्ड विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है। उसके शक्तिशाली विघात कंपन ऐसे ही अनन्त उड़ते−बिखरते एवं नष्ट होते रहते हैं। यदि उस प्रवाह को केन्द्रित करके किसी विशेष लक्ष्य पर नियोजित किया जा सके तो चमत्कारी परिणाम निकल सकते है। ध्यान योग की साधना में उसी एकाग्रता सम्पादन का अभ्यास किया जाता है। विचारों के एक लक्ष्य विशेष पर केन्द्रीकरण में सफलता तभी मिलती है जब कि चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियन्त्रण सध जाय। ध्यान एक ऐसा व्यायाम है जिसके द्वारा विचारों पर नियन्त्रण करना सम्भव होता है। इसके अनेकों उपयोग है जिनमें से एक यह है कि मन में आवेशों उपयोग है जिनमें से एक यह है कि मन में आवेशों, उत्तेजनाओं, भावुकताओं का अवाँछनीय उभार जब भी उठे तब उसे रोककर प्रवाह को दूसरी दिशा में उलट सकना सम्भव किया जाय। सामान्यतः अनगढ़ मन मनुष्य को कहीं भी घसीट ले जाता है और प्रकृति भी करा लेता है किन्तु सुसंस्कृत एवं नियन्त्रित मन अंतःकरण का निर्देश एवं अनुशासन मानता है तथा उसका निर्देश मिलते ही अपनी हलचलें निर्देशित दिशा में मोड़ लेता है। ऐसी दशा में मस्तिष्कीय तन्त्र रचनात्मक उपयोगी और विवेकपूर्ण कार्य ही करता है। अवाँछनीयता के प्रवाह में वह नहीं बहेगा। विचारों की सामर्थ्य को भटकाव से रोककर एक निश्चित लक्ष्य की ओर नियोजित कर देना ध्यानयोग साधना की एक सफल एवं विलक्षण परिणति है।
सर्वविदित है कि शोक क्रोध, व्यामोह, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, निराशा आदि मानसिक विक्षोभ निषेधात्मक विचारों की प्रतिक्रिया मात्र है। जिनके कारण जीवन की सरसता और आनन्द नष्ट हो जाते है और पग−पग पर जलने झुलसने जैसा कष्ट सहना पड़ता है। ध्यान द्वारा विचारो को पकड़ने और एक दिशा से हटाकर दूसरे उपयोगी कार्यों में नियोजित करने की क्षमता उत्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति व्यक्ति अपने प्रचण्ड मनोबल के सहारे आवेगों को वशवर्ती करने में समर्थ हो जाय तथा चिन्तन की धारा को सृजनात्मक दिशा में नियोजित कर लेने की विशेषता प्राप्त कर ले तो समझना चाहिए अपने स्वयं के भव बन्धनों को काटने का एक सशक्त आधार बन गया। सभी जानते है कि सफलताओं में साधनों की कमी अथवा परिस्थितियों की प्रतिकूलता उतनी बाधक नहीं होती जितनी कि चित्त की चंचलता और मन की अस्त−व्यस्तता। इन दोनों अवरोधों को दूर करने में ध्यानयोग की प्रक्रिया विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। ध्यान का लक्ष्य होता है चंचल चित्त को मजबूत रस्सों से कसकर नियत प्रयोजन में लगा देने की क्षमता प्राप्त कर लेना इसी आध्यात्मिक भाषा में मनोनिग्रह के रूप में सम्बोधित किया गया है। योग शास्त्रों में मनोनिग्रह का असाधारण महत्व बताया गया है। निग्रहित मन को कल्पवृक्ष कहा गया है तथा उसकी चमत्कारों उपलब्धियों का विस्तारपूर्वक वर्णन शास्त्रों में मिलता है।
निग्रहित मन ही प्रचण्ड संकल्पशक्ति के उभार का कारण बनता है। मन कीक अस्त−व्यस्तता रुकने एवं एकाग्रता बढ़ने से संकल्प शक्ति अभिवर्धित और परिपक्व होती है। संकल्प बल को ही आत्मबल कहा गया है। इसी विद्युत धारा को अन्तरंग को प्रसुप्त क्षमताओं के ऊपर फेंका जाता है और उन्हें जागृत किया जाता है। मनुष्य के स्थूल सूक्ष्म, कारण शरीरों में एक से एक अद्भुत शक्ति संस्थान छिपे पड़े हैं। इन्हें ढूंढ़ निकालना और परिष्कृत कर सकना–संकल्प शक्ति के सहारे ही सम्भव हो पाता है। जन्मजात तो मनुष्य की उतनी ही क्षमताएँ जागृत रहती हैं, जिससे पेट और प्रजनन का सामान्य निर्वाहक्रम सरलतापूर्वक चलता रह सके। शेष दिव्य क्षमताओं का भण्डार प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है।
व्यायामशाला में जाकर शरीर बल उपार्जित किया जाता है और फिर उससे निरोग काया तथा दीर्घ जीवन के अनेकों लाभ प्राप्त किये जाते है ठीक इसी प्रकार ध्यान की मानसिक व्यायाम प्रक्रिया से संकल्प शक्ति प्रखर एवं परिपक्व होती है और उससे चेतना की विशिष्टता का परिचय देने वाले अनेकानेक सत्परिणाम सामने आते हैं। जीवन को समृद्धियों एवं विभूतियों सुख सम्पदा–शान्ति सन्तोष से–वैभव वर्चस्व से भर देने वाले अवसर जिस आधार पर मिलते हैं उनमें शरीर बल से भी बढ़कर संकल्पबल का स्थान है। इस महान उपलब्धि को करतलगत करने में ध्यान साधना से बढ़कर और कोई दूसरा सरल एवं सफल उपाय नहीं है। छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय के सातवें खण्ड में ध्यानयोग की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन है। ध्यान योग को उपासना की उच्च कक्षा माना गया है। नामोच्चार से बढ़कर वाक्, वाक् से बड़ा मन, मन से भी अधिक महत्वपूर्ण संकल्प से भी अधिक बलवान चित्त को कहा गया है। चित्त से भी बढ़कर सामर्थ्यवान ध्यान को बताया गया है। नाम−जप वाक् संयम, मनोनिग्रह, संकल्पोद्भव, चित्त निरोध ये सभी उपासना के क्रमिक सोपान है। ध्यान इन सबके ऊपर है।
ध्यान का आरम्भ विचारों पर नियन्त्रण और उनके सुनियोजित से किया जाता है। पर ध्यान की पूर्णता परमात्मा सत्ता के साथ आत्म सत्ता को जोड़ देने पर ही निर्भर है। इस योग साधन से उच्चस्तरीय अध्यात्म चुम्बकत्व की उत्पत्ति होती है। यह चुम्बकत्व चमत्कारी भूमिका सम्पन्न करता है अनन्त अन्तरिक्ष में–दिव्य लोकों में विद्यमान दिव्य चेतना के विभिन्न घटकों को−देवताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकना इस चुम्बकत्व द्वारा ही सम्भव हो पाता है। साकार एवं निराकार ध्यानों में परमात्मा को प्रतीक मानकर उसके साय एकत्व स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। आरम्भ में तो यह कल्पना ही रहती है, पर पीछे उसके साथ सघन आत्मीयता जुड़ते जाने की भक्ति भावना बढ़ने लगती है और एकाग्रता के अभ्यास में सरसता की अनुभूति होती है। पीछे यही सरसता दिव्य आनन्द की अनुभूति कराती है और आगे चलकर दीप पतंग जैसी, दूध पानी जैसी, आग ईंधन जैसी, नदी नाले, पति पत्नी जैसी एकता की–अद्वैत की अनुभूति कराती है। इस स्तर पर साधना में पहुँचे हुए साधक को अहम् ब्रह्मास्मि का–तत्वमसि का–शिवोऽहम्–सच्चिदानंदोऽहम् का आभास ही नहीं अनुभूति भी होने लगती है। यही एकात्म भाव है जहाँ पहुँचने पर भक्त भगवान एक हो जाते हैं।
आग के गुण समीपवर्ती ईंधन में उत्पन्न हो जाते हैं। बिजली की धारा का स्पर्श होते ही विद्युत एक घटक से दूसरे घटक में दौड़ने लगती है। भगवान की समीपता का अभ्यास ध्यान धारणा के माध्यम से किया जाता है। आस्था और अनुभूति के स्तर पर पहुँची हुई कल्पना अथवा भावना अन्ततः यथार्थता की स्थिति तक जा पहुँचती है। ध्यान की यह चरम परिणति है जिसमें साधक को जीव ब्रह्म की एकरूपता की प्रत्यक्ष अनुभूति अपने अन्तःकरण में होने लगे। अनुभूति ही नहीं साधक में वह विशेषताएँ भी परिलक्षित होने लगती हैं जिन्हें दैवी स्तर का कहा जा सके। उसमें ऋद्धि−सिद्धियों की−चमत्कारों की−झलक देखी जा सकती है।
ध्यान की सामान्य साधनाओं में ज्योति अवतरण की धारणा का और उच्चस्तरीय विशिष्ट साधनाओं में त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक साधना भी विभिन्न माध्यमों से की जाती है। बिन्दु त्राटक, दीपक त्राटक, सूर्य त्राटक आदि का अभ्यास मनःस्थिति के अनुरूप अपनाया जाता है। त्राटक की क्रिया तो सामान्य होती है, पर उसके साथ जुड़ी हुई कल्पनाओं एवं भावनाओं का अधिक महत्व होता है। उन्हें ही अधिक बलिष्ठ और परिपक्व बनाने का प्रयास किया जाता है।
यह बात भली−भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि दीपक और सूर्य जड़ हैं उनमें चेतना भावना का अभाव है इसलिए मात्र उनके प्रकाश का ध्यान करते रहने से ध्यान का लक्ष्य पूरा नहीं होता। चैतन्य सविता ही उपास्य है। उसी में सद्भावनाओं, सत्प्रेरणाओं और विभूतियों का भांडागार सन्निहित है। सूर्य त्राटक करते समय अन्तरिक्ष से दिव्य चेतना की वर्षा होने का ध्यान करते रहना चाहिए। दीपक त्राटक में भी यही भावभूमिका सम्पन्न करनी पड़ती है। कहना उन होगा कि त्राटक में दर्शन के साथ−साथ अन्तःक्षेत्र में दिव्य प्रेरणाओं के अवतरण की बात जितनी गहरी श्रद्धा के साथ हृदयंगम की जायेगी, ध्यान का लक्ष्य उतनी ही मात्रा में पूरा होता चलेगा। सुमित्रा
प्रकृति और पुरुष का जिस स्थल पर संयोग होता है वहाँ से एक अनाहत ध्वनि निरन्तर प्रसृत और निनादित होती रहती है। योगियों, ऋषियों ने उस ध्वनि प्रवाह को ॐकार गुँजन–ब्रह्मनाद कहा है। उसी से सप्त−स्वर प्रस्फुटित हुए। श्रुति−शास्त्रों में प्रयुक्त होने वाले उदात्त अनुदान स्वरूप उसी के आरोह−अवरोह हैं। संगीत शास्त्र में वे ही आगे चलकर सा, रे, ग, म, प, ध, नि के स्वर सप्तक बन गये। जिस प्रकार सूर्यरथ के सप्तअश्व उसके प्रभा किरणों में सन्निहित रंग हैं, उसी तरह ब्रह्मनाद का ध्वनि गुँजन सप्तधा स्वर लहरी में निनादित होता रहता है। प्रकृति के अन्तराल में एक प्रकार का ध्वनि स्पन्दन होता रहता है जिसकी तुलना घड़ियाल में हथौड़ी मारने से उत्पन्न होने वाली टंकार से कर सकते हैं। टंकार के उपरान्त जो झनझनाहट होती है उसे दिव्यदर्शियों ने ॐकार ध्वनि कहा है। उनका मत है कि प्रकृति और ब्रह्म के संयोग से निस्मृत होने वाले ध्वनि प्रवाह के आघात प्रतिघात से ही सृष्टि की समस्त हलचलों का आरम्भ एवं अग्रगमन होता है। अणु सत्ता की गति यहीं से मिलती है। ऊर्जा की तरंग शृंखला इसी केन्द्र से उत्पन्न होकर ब्रह्माण्डव्यापी बनती है।
एकोऽहम् बहुस्यामि की उक्ति का आरम्भ इसी गर्म बिन्दु से आरम्भ होता है। नादयोग की नाभि यही है। शब्द ब्रह्म का अपनी माया स्फुरणा इच्छा के साथ चल रहा यही संयोग ॐकार के रूप में निस्मृत होकर परा और अपरा प्रकृति के गह्वर में जड़ चेतन की हलचलों एवं गतिविधियों का कारण बनता है।
दीवार में लटकी घड़ी का पेन्डुलम एक बार हिला दिया जाय तो घड़ी की चाबी रहते वह अपने क्रम में निरन्तर हिलता रहता है। ठीक इसी प्रकार एक बार आरम्भ हुई सृष्टि एवं संचालित प्रक्रिया के अनुसार अपना कार्य करती अपनी धुरी पर एक बार घुमाये गये लट्टू की तरह देरी तक घूमती रहती है। इसकी संचालक सत्ता शब्द ब्रह्म की वह ध्वनि है जिसे ॐकार कहते हैं। यों सुनने में ध्वनि के सप्त स्वर और उनके आरोह−अवरोह शब्दों का उतार−चढ़ाव भर प्रतीत होते हैं। उनका उपयोग वाद्य−गायन में प्रयुक्त होना भर लगता है पर वस्तुतः उनकी सीमा इतनी स्वल्प नहीं है। मनुष्यकृत स्वर लहरी के अतिरिक्त प्रकृतिगत स्वर प्रवाह और जीवधारियों द्वारा विविध प्रकार के उच्चारण भी कम महत्व के नहीं हैं। मेघ गर्जन, समुद्र की लहरों का विद्युत शोर की कड़क, वायु की सनसनाहट तथा पक्षियों का कलरव सुनकर ऐसा लगता है कि स्वर ब्रह्म अपने अगणित ध्वनि प्रवाहों में न जाने कितने भाव भरे संकेतों और सन्देशों को इस विश्व ब्रह्माण्ड में भरता रहता है।
यह सब आहत ध्वनियाँ हैं जो कानों से सुनी जा सकती हैं। वे ध्वनियाँ भी विज्ञान की पकड़ में आ गयी हैं जो मनुष्य के कानों से सुनी जा सकने वाली मर्यादा से या तो ऊँची हैं या नीची। आविष्कृत साधन उपकरणों द्वारा उन्हें उसी प्रकार सुना जा सकता है जैसे खुली आँख से न दिखने वाले लघु जीवाणु सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से भली प्रकार देखे जा सकते हैं। ये प्रकृतिगत ध्वनियाँ हैं जो जड़ अणुओं के परस्पर आघात से उत्पन्न होती हैं।
इससे उच्चस्तर की ध्वनियाँ वे हैं जिन्हें जड़ परमाणुओं द्वारा स्पन्दित नहीं कहा जा सकता। उनका सीधा सम्बन्ध चेतना जगत के जीवन प्रवाह से है–मूल स्रोत चेतना तत्व है। इसलिए उन्हें ब्रह्म वाणी भी कहते हैं। इसी का अलंकारिक वर्णन कृष्ण की वंशी, शंकर के डमरू, सरस्वती की वीणा के रूप में किया जाता है। सरस्वती की वीणा मानवी काया का मेरुदण्ड, कृष्ण वंशी की कण्ठ स्थित स्वर नलिका, शंकर का डमरू धड़कता हुआ हृदय कहा जा सकता है। लप−डप को, धड़कन को शंकर का डिमडिम घोष कहा जाता है। श्वास नलिका में वायु का आवागमन ‘सोऽहम्’ की ध्वनि में कृष्ण−बांसुरी के रूप में निनादित होता है।
कृष्ण द्वारा रात्रि की नीरवता में वंशी बजाये जाने और गोपियों के घर−बार छोड़कर उस रास आह्वान को सुनकर निकल पड़ने का सविस्तार वर्णन भागवत आदि पुराणों में मिलता है। यह सामाजिक एवं व्यावहारिक मर्यादाओं की दृष्टि से प्रतिकूल लगता है, पर अध्यात्म परम्परा के सर्वथा अनुकूल है। वस्तुतः कथा–गाथाओं में रहस्यमय पहेली की तरह गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। रास−लीला के पीछे नादयोग की व्याख्या विवेचना ही सन्निहित है। भगवान वंशी बजाते हैं अर्थात् मधुर दिव्य रसास्वादन के लिए आह्वान करते हैं। गोपियाँ समस्त साँसारिक बन्धनों को तोड़कर उस ओर दौड़ पड़ती हैं। संकेत आह्वान का स्वागत करती हैं और उसी के लिए आकुल व्याकुल होकर अपना समर्पण कर देती हैं। अपना आपा खोकर दिव्य ध्वनि के साथ थिरकना, नाचना आरम्भ कर देती हैं। यही रासलीला है। कृष्ण अर्थात् परमात्मा, वंशी ध्वनि अर्थात् ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए चल पड़ने का संकेत, गोपियाँ अर्थात् जीव सत्ता की भौतिक एवं आत्मिक सम्पदाएँ रास−नृत्य अर्थात् दिव्य संकेतों के अनुरूप कठपुतली जैसा भाव विभोर आचरण एवं समर्पण।
वर्णन मिलता है कि रासलीला में सम्मिलित गोपियाँ आनन्द विलग्न हो जाती थीं। यों एक पुरुष के साथ इतनी नारियों का सहवास एवं नृत्य न तो अभिनन्दनीय हो सकता है और न ही सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल। पर आत्मा और परमात्मा के बीच आदान−प्रदान का जो भावभरा अलंकारिक चित्रण रासलीला में किया गया है वह पहेली जैसा लगते हुए भी आध्यात्मिक दृष्टि से अर्थपूर्ण तथा तथ्यपूर्ण है। रास की प्रधान नायिका राधा हैं और अन्य सभी सखियाँ सहेलियाँ। वे उनके साथ पूर्ण स्नेह–सहयोग के साथ नृत्य में तल्लीन होती हैं। राधा अर्थात् आत्मा, उनकी सहयोगिनी सखियाँ, अन्तरंग की सत्प्रवृत्तियाँ, बौद्धिक विभूतियाँ और साँसारिक सम्पदाएँ। ये सभी आत्मा का आकांक्षा में सहयोग देती हैं। आत्मा और परमात्मा के मिलन सत्प्रयत्नों में कोई अवरोध नहीं उत्पन्न करतीं वरन् उसे सफल बनाने के लिए अपना पूर्ण समर्पण प्रस्तुत करती हैं। आत्मा की दिव्य आकाँक्षा की पूर्ति में उनका पूरा−पूरा सहयोग मिलता है। यह स्थिति प्राप्त हो सके तो हर राधा को–हर आत्मा को रासलीला का–जीव ब्रह्म मिलन का दिव्य आनन्द मिल सकता है। नादयोग की साधना इसी उपलब्धि के लिए की जाती है।
नादयोग के साधक सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों के माध्यम से घण्टा, शंख, नाद, बाँसुरी, वेणु, मेघनाद, निर्झर प्रवाह आदि के रूप में सुनने का प्रयास करते हैं और उसी आधार पर सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में चल रही अगणित गतिविधियों के ज्ञाता बन जाते हैं। इन स्वर निनादों के साथ जो अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है वह प्रकृति पर आधिपत्य स्थापित करने और उसके अनुदानों का लाभ उठाने में सफल हो जाता है। नादयोग की साधना में कानों की सूक्ष्म चेतना की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। कई बार ये मन्द होती हैं और कई बार अत्यन्त प्रखर। ध्वनियों को श्रवण करने के साथ−साथ उच्चस्तरीय विचारों एवं भावनाओं का समन्वय भी उनके साथ होना चाहिए। कृष्ण की बाँसुरी सुनने की भाव भूमिका का वर्णन किया जा चुका है। बंशी के अतिरिक्त भी कई प्रकार की ध्वनियाँ साधकों को सुनाई पड़ती हैं। उनका तत्व दर्शन समझना भी नादयोग के साधकों के लिए आवश्यक है।
अन्य स्वर लहरियों की भी तात्विक संगति बिठायी जाती है। भगवती सरस्वती अपनी वीणा झंकृत करते हुए ऋतंभरा प्रज्ञा और अनासक्त भूमा के मृदुल मनोरमा तारों को झनझना रही हैं और अपनी अन्तःचेतना में वही दिव्य तत्व उभर रहे हैं। साधक को वीणा की झंकार सुनते समय यह भावना करनी चाहिए। भगवान शंकर का डमरू बज रहा है–उससे प्रलय के –मरण के संकेत आ रहे हैं और सुझाया जा रहा है कि इस नश्वर काया का अन्त करने वाला ताण्डव किसी भी सम्मुख आ सकता है, इसलिए प्रमाद में न उलझा जाय। माया−मोह से निकला एवं यथार्थता को समझा जाता। शंखनाद की ध्वनि को महाभारत के पाञ्चजन्य का, महाकाल में भैरव नाद का उद्घोष माना जाय और ऐसा अनुभव किया जाय कि अब महाप्राण का ऐसा समय आ पहुँचा है जिसमें आनाकानी करने की गुँजाइश नहीं है। युग की–कर्त्तव्य की–पुकार गुँजित हो रही है कि अविलम्ब जीवनोद्देश्य की दिशा में कदम बढ़ाया जाय।
नादयोग का अभ्यास जब परिपक्व होने लगता है तो भावोत्कर्ष से आगे बढ़कर सुविस्तृत अन्तरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। ‘ब्रह्माण्ड में संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं। उनके स्पन्दन हमारी कर्णेन्द्रियों से शब्द रूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की क्षमता साधना में परिपक्वता के साथ−साथ सहज ही बढ़ने लगती है। सूक्ष्म जगत की अदृश्य घटनाओं का बोध होने लगता है। क्या हो रहा है और क्या होने वाला है, उसकी जानकारी नादयोग के साधक को मिल जाती है। इस अविज्ञात स्तर को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली सिद्ध होती है।
नाद साधना में मिलने वाले संकेत सूत्र ऐसे होते हैं जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति स्रोतों के साथ आदान−प्रदान कर सकना सम्भव है। जिस प्रकार टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलैस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्ती व्यक्तियों से संपर्क साध सकते तथा परस्पर विचार विनिमय कर सकते हैं ठीक उसी तरह ईश्वर के विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ इन ध्वनियों के माध्यम से सम्बन्ध मिला सकते हैं और उस स्थिति पर पहुँच सकते हैं कि अपनी बात ईश्वर तक पहुँचा सकें और उससे आवश्यक निर्देश प्राप्त कर सकें। सिद्ध पुरुषों एवं योगियों में यह विशेषता दिखायी पड़ती है। वे ऐसे ही माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़कर अभीष्ट आदान−प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।
नादयोग की महिमा से शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं–
उक्त त्ममानतः पूर्व पश्चात् च विविधः कंपे। अभिव्यंजन्त एतस्य नादास्तत्सिद्धि सूचकाः॥
अनाहतमनुच्चार्य शब्द ब्रह्म परं शिवम्। ब्रह्मरधं्र गतेवायौ नादश्चोत्पद्यतेऽनघ॥ शंख ध्वनि निभश्चादो मध्ये मेघध्वनिर्यथा॥
पवने व्यौम सम्प्राप्ते ध्वनि रुत्पद्यते महान्। घण्टादीनाँ प्रवाद्यानाँ ततः सिद्धिरदूरतः॥ –महायोग विज्ञान
भावार्थ यह कि जब अन्तर में ज्योति स्वरूप आत्मा का प्रकाश जागता है तब साधक को कई प्रकार के नाद सुनाई पड़ते हैं। इसमें से एक व्यक्त होते हैं दूसरे अव्यक्त। जिन्हें किसी बाहर के शब्द से उपमा न दी जा सके उन्हें अव्यक्त कहते हैं, यह अन्तर में सुनायी पड़ते हैं और उनकी अनुभूति मात्र होती है। जो घण्टा आदि की तरह कर्णेन्द्रियों द्वारा अनुभव में आवें उन्हें व्यक्त कहते हैं। अव्यक्त ध्वनियों को अनाहत अथवा शब्दब्रह्म भी कहा जाता है।
‘चित्त की चंचलता’ की रोकथाम करने में नादयोग की साधना विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। नादयोग चंचल मन के निग्रह एवं प्राणों के निरोध में उसी प्रकार सफल सिद्ध होता है जिस तरह सपेरा विषधर चपल सर्प को पकड़ने में। इस अभ्यास में चित्तवृत्ति नाद श्रवण में लीन हो जाती है। फलस्वरूप मन की चंचलता अपने आप रुक जाती है। इससे चित्त में शास्त्र भाव प्रबल होता है और वासना की मादकता से विरक्ति होती चली जाती है। शास्त्रकार इसी तथ्य को स्पष्ट करता है–
बुद्धः सुनाद−गन्धेन सधः संत्यक्त चापलम्। नाद ग्रहणतश्चिन्तमतरंग भुजंगम्॥
विस्मृत्य विश्वमेकाग्र कुत्रचिन्निहि धावति। मदोन्मत्त गजेन्द्रस्य विषयोद्यान चारिणः॥
नियामन समर्थोज्यं निनादो निशिताँकुशः।
अर्थात्– सपेरे की बीन से सुध−बुध खो देने वाले सर्प की तरह नाद साधना से चित्त स्थिर हो जाता है और अपनी चपलताएँ भूल जाता है। वह कहीं दौड़ता भागता नहीं। विषय वासनाओं के उद्यान में मदोन्मत्त गजेन्द्र की तरह विचरण करने वाले मन के नियमन में यह नाद का अंकुश ही समर्थ हैं।
शब्दोच्चारण को प्रायः जानकारियों के आदान−प्रदान का एक माध्यम भर समझा जाता है। उसके दिव्य प्रवाह संचार की बात से कम व्यक्ति ही परिचित होते हैं। शब्दों के साथ अनेकानेक भाव अभिव्यंजनाएँ−सम्वेदनाएँ, प्रेरणाएँ एवं शक्तियाँ भी जुड़ी होती हैं। यदि ऐसा न होता तो वाणी में मित्रता एवं शत्रुता उत्पन्न करने की सामर्थ्य न होती। दूसरों को उठाने अथवा गिराने में उसका उपयोग न हो पाता। प्रायः देखा यह जाता है कि कटु शब्द सुनते ही क्रोध तथा आवेश उभर आता है और न कहने योग्य कहने और न करने योग्य करने की स्थिति बन जाती है। शोक सम्वाद सुनते ही भूख, प्यास और नींद मारी जाती है, मनुष्य अर्धमूर्छित जैसा हो जाता है। भावुकता भरे उद्बोधन तर्क, तथ्य और प्रमाण के आधार पर देने पर देखते ही देखते जन समूह की विचारधारा बदल जाती है और उस उत्तेजना से सम्मोहित भीड़ कुशल वक्त का अनुसरण करने के लिए बिना आग−पीछा सोचे तैयार हो जाती है। महाभारत कथा प्रसिद्ध है कि द्रौपदी के थोड़े से व्यंग्य−उपहार भरे अपमानजनक शब्द–’अन्धों के अन्धे ही होते हैं’, की प्रतिक्रिया इतनी गम्भीर हुई कि महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध का सूत्रपात हो गया, जिसमें अठारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी। इन तथ्यों पर विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वाणी का प्रयोजन मात्र जानकारी देना नहीं है। शब्दोच्चारण में प्रभावोत्पादक चेतन तत्व भी जुड़े होते हैं। वे ध्वनि कम्पनों के साथ घुले रहकर जहाँ भी टकराते हैं, वहाँ विलक्षण चेतनात्मक हलचलें उत्पन्न करते हैं।
पदार्थ विज्ञानियों ने शब्द को भौतिक तरंगों का स्पन्दन भर कहा है, पर उसकी चेतना को प्रभावित करने वाली सम्वेदनात्मक−वैचारिक क्षमता की भौतिक व्याख्या नहीं हो सकी है। आधुनिक मनोविज्ञान ने पदार्थ विज्ञान से एक कदम आगे बढ़कर वाणी के वैचारिक प्रभाव की गरिमा को स्वीकारा है तथा मानसोपचार में उस क्षमता के छोटे−मोटे प्रयोग भी होने लगी हैं। इतने पर भी शब्द की विभिन्न प्रकार की सामर्थ्यों से वे भी अपरिचित हैं। शब्द की वैचारिक एवं सम्वेदनात्मक क्षमता, भौतिक विज्ञान एवं मनोविज्ञान का विषय वस्तु न होकर वस्तुतः आध्यात्मिक है।
जपयोग में मन्त्रशक्ति के इसी आध्यात्मिक प्रभाव का उपयोग करके काम में लाया जाता है तथा आन्तरिक परिवर्तनों के हेतु नियोजित किया जाता है। जपयोग की प्रक्रिया में ऐसी चेतन शक्ति का उद्भव होता है जो साधक के शरीर एवं मन में विचित्र चैतन्य हलचलें उत्पन्न करती है तथा अनन्त अन्तरिक्ष में उड़कर विशिष्ट व्यक्तियों एवं परिस्थितियों को ही नहीं समूचे वातावरण को प्रभावित करती है।
मन्त्रों में उनके अर्थ का उतना महत्व नहीं होता जितना कि ध्वनि विज्ञान का। गायत्री मन्त्र को ही लें तो मालूम होगा कि अर्थ की दृष्टि सेवा सामान्य है, पर सामर्थ्य की दृष्टि से उसे अद्भुत एवं सर्वोपरि मन्त्र बताया गया है। इस मन्त्र में भगवान से सद्बुद्धि की कामना भर की गई है इसी अर्थ को व्यक्त करने वाले मन्त्र श्लोक हजारों हैं। हिन्दी तथा अन्य कितनी ही भाषाओं में ऐसी कविताएँ–छन्द आदि ढूँढ़ते पर सहस्रों मिल जायेंगे जिनमें परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है, पर उनका उच्चारण उतना फलप्रद नहीं हो पाता। न ही उनसे गायत्री मन्त्र जैसी शक्ति उत्पन्न हो पाती है। कारण स्पष्ट है कि मन्त्र सृष्टा ऋषियों की दृष्टि में अर्थ नहीं शब्दों का गुँथन महत्वपूर्ण रहा है। कितने ही बीज मन्त्र ऐसे हैं जिनका कोई विशिष्ट अर्थ नहीं निकलता। पर वे सामर्थ्य की दृष्टि से अद्भुत हैं। ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐ, हूं, यं, फट् आदि बीज मन्त्रों का अर्थ निकालने की माथा पच्ची करने पर भी प्रकृति सफलता नहीं पाती। वस्तुतः उनका सृजन यह ध्यान रखते हुए किया गया है कि उनका उच्चारण किस स्तर का कितनी सामर्थ्य का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है तथा जप कर्त्ता अभीष्ट प्रयोजन एवं समीपवर्ती वातावरण पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?
जपयोग की प्रक्रिया दुहरी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है–एक भीतर, दूसरी बाहर। जिस स्थान पर आग जलती है उस स्थान को तो गरम करती ही हैं, साथ ही वायु मण्डल में भी ऊष्मा बिखेर कर अपने प्रभाव क्षेत्र का परिचय देती है। जप के ध्वनि प्रवाह से शरीर में यत्र−तत्र सन्निहित अनेकों चक्रों तथा उपत्यिकाओं में एक विशिष्ट स्तर का शक्ति संचार होता है इस विशिष्ट शक्ति संचार की अनुभूति जपकर्ता अपने भीतर करता है। बाहर प्रतिक्रिया यह होती है कि लगातार एक नियमित क्रम में किये जाने वाले मन्त्र जप से निकली विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निखिल अन्तरिक्ष में विशेष तरह का स्पन्दन पैदा करती हैं जो प्राणि मात्र और समस्त वातावरण को प्रभावित करती हैं।
एक क्रम एक गति से निरन्तर किये जाने वाले सूक्ष्म आघात का चमत्कार वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में देखा जा चुका है। इस प्रयोग की पुष्टि हो चुकी है कि एक टन भारी लोहे का गार्डर किसी छत के बीचों−बीच में लटका दिया जाय और उस पर पाँच ग्राम के नगण्य वजन वाले कर्क का निरन्तर आघात एक गति, एक क्रम ने कराया जाय तो प्रकृति ही समय बाद गार्डर काँपने लगेगा। पुलों पर से होकर गुजरती सेना की पैर मिलाकर चलने से रोक दिया जाता है। कारण यह है कि लेफ्ट–राइट के ठीक क्रम से तालबद्ध पैर पड़ने से जो एकीभूत शक्ति उत्पन्न होती है उसकी सामर्थ्य इतनी अद्भुत एवं प्रचण्ड होती है कि उसके प्रहार से मजबूत पुलों के भी टूटकर गिर पड़ने की सम्भावना बन जाती है। मन्त्र जप के क्रमबद्ध उच्चारण से इसी प्रकार का तालक्रम उत्पन्न होता है। फलस्वरूप शरीर के अन्तःसंस्थानों में विशिष्ट प्रकार की हलचलें उत्पन्न होती हैं जो आन्तरिक मूर्च्छना को दूर करने एवं सुषुप्त अन्तःक्षमताओं को जागृत करने में सक्षम रहती हैं।
इस तथ्य को टाइप राइटर के उदाहरण से और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। उँगली से चाबियाँ दबाने पर कागज पर तीलियाँ गिरकर अक्षर छापने लगती हैं। मुख में उच्चारण के लिए प्रयुक्त होने वाले कल−पुर्जों को टाइप राइटर की कुँजियाँ कह सकते हैं। मन्त्रोच्चार उँगली से उन्हें दबाना हुआ। इस प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ शक्ति प्रवाह नाड़ी तन्तुओं की तीलियों के सहारे सूक्ष्म चक्रों तथा सूक्ष्म ग्रन्थियों तक पहुँचकर उन्हें जगाने की भूमिका सम्पादित करता है। जागृत शक्ति −संस्थान अक्षरों के छपने जैसे उपलब्धि के रूप में दिखायी पड़ते हैं, जिसकी अनुभूति जपयोग के विधि−विधानों का ठीक प्रकार पालन करके हर साधक कर सकता है।
रगड़ से गर्मी, बिजली पैदा होने के सिद्धान्त से विज्ञान वेत्ता भली−भाँति परिचित हैं। जप में अनवरत उच्चारण एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है। निरन्तर पत्थर पर रस्सी की रगड़ पड़ने से घिसाव के निशान पड़ जाते हैं। श्वास के शरीर में आवागमन तथा रक्त अभिसरण से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। जीवन का व्यापार उपार्जन उसी ऊर्जा के सहारे चलता है। जप में जो घर्षण प्रक्रिया गतिशील होती है वह अन्तर्निहित दिव्य शक्ति संस्थानों को उत्तेजित–जागृत करके दिव्य उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त करती है।
जपयोग का दूसरा लाभ है अन्तरिक्ष में प्रवाहित होने वाले दिव्य चैतन्य प्रवाह से अभीष्ट परिमाण में शक्ति खींच कर उससे लाभ उठाना। मन्त्र जप से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म तरंगें विश्व ब्रह्माण्ड में प्रवाहित ऊर्जा प्रवाह को खींच लाती हैं। जिस प्रकार तालाब में डेला फेंकने पर लहरें पहुँचती हैं, उसी प्रकार मन्त्र जप में भी चुम्बकीय विप्र तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह विश्व ब्रह्माण्ड भी एक तालाब है, पर इसकी आकृति गोल है। इसलिए इसका अन्तिम छोर वही स्थान होता है जहाँ से ध्वनि तरंगों का संचरण आरम्भ हुआ था। इस तरह जप से पैदा होने वाली ऊर्जा तरंगें धीरे−धीरे बहती−बढ़ती चली जाती हैं और अन्ततः एक पूरी परिक्रमा करके अपने मूल उद्गम स्थान−जपकर्ता के पास शब्दवेधी बाण की तरह लौट आती हैं।
परन्तु तरंगों की यह यात्रा चुपचाप नहीं पूरी होती; तरंगों की चुम्बकीय शक्ति बहुत प्रकृति ग्रहण−विसर्जन भी करती चलती है। यह तरंगें जिस क्षेत्र से संपर्क बनाती हैं उसे प्रभावित करतीं और स्वयं प्रभावित होती हैं। यह प्रभाव सजातीयता के सिद्धान्त पर चलता है। समान वर्ग के पदार्थ अथवा प्राणी एक−दूसरे से प्रभावित व आकर्षित होते हैं। मस्तिष्क से निकलने वाले भले−बुरे विचार अपने साथ सजातियों का एक पूरा झुण्ड लेकर अपने उद्गम स्थान पर अपेक्षाकृत अधिक बलवान होकर लौटते हैं। इस प्रक्रिया के अनुसार मनुष्य अपनी विचार सम्पदा से जहाँ असंख्यों को लाभान्वित करता है वहाँ उनसे बहुत प्रकृति प्राप्त भी करता है। इस तरह अपने विचार दूसरों को कम एवं स्वयं को कहीं अधिक प्रभावित करते हैं। अशुभ विचारों के साथ भी यही बात लागू होती है। वे दूसरों को भी हानि पहुँचाते हैं, किन्तु वापिस लौटने पर उनकी बढ़ी−चढ़ी घातक शक्ति की हानि स्वयं को ही अधिक भुगतनी पड़ती है। परिभ्रमण एवं परिपोषण का यह सिद्धान्त सर्वत्र देखा जा सकता है।
मन्त्र जप से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म विचार तरंगों की यात्रा भी इसी प्रकार आरम्भ होती है। वे अपने साथ सजातीय शक्तियों एवं अनुभवों के अनुदान लेकर वापिस लौटती हैं तथा अपनी चैतन्य विशेषताओं से साधक की सामर्थ्य को कई गुनी बढ़ा देती हैं। सजातियों का एकत्रीकरण प्रकृति का भी नियम है। भू गर्भ की खदानें इस सिद्धान्त पर ही बनती और बढ़ती हैं कि अमुक स्थान पर एकत्रित खनिज एक संयुक्त चुम्बकत्व उत्पन्न करते हैं। उस आकर्षण का प्रभाव जितने क्षेत्र में होता है वहाँ से उसी जाति के बिखरे कण खिंचते हुए चले आते हैं। जितनी बड़ी व सम्पन्न खदान होती है उतना ही सशक्त चुम्बकत्व और फिर उतने ही सुदूर क्षेत्र तक उसकी आकर्षण प्रक्रिया, यही वह आधार है जिसके सहारे धातु आदि की खदानें धीरे−धीरे अपना आकार बढ़ाती रहती हैं।
रेडियो प्रसारणों में एक सामान्य−सी आवाज को विश्व व्यापी बना देने तथा उसकी असामान्य गति बढ़ा देने में इलेक्ट्रो मैगनेटिक तरंगों का ही चमत्कार होता है। पदार्थ विज्ञान के विशेषज्ञ जानते हैं कि इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेक्स पर साउण्ड को सुपर इम्पोज कर रिकार्ड कर लिया जाता है। फलस्वरूप वे पलक मारते ही सारे संसार की परिक्रमा कर लेने जितनी शक्ति प्राप्त कर लेती हैं। इन शक्तिशाली तरंगों के सहारे ही अन्तरिक्ष में भेजे गये राकेटों की उड़ान को धरती पर से नियन्त्रित करने, उन्हें दिशा देने, उनकी यान्त्रिक खराबी दूर करने का प्रयोजन पूरा किया जाता है। लेसर स्तर की बनी शक्ति किरणें और भी अधिक सामर्थ्यवान होती हैं। एक फुट मोटी लोहे की चादर में सुराखकर देना उस के लिए एक सामान्य बात है। चिकित्सा जगत में उपचार के लिए इन किरणों का प्रयोग होने लगा है। सुपरसोनिक स्तर की तरंगों का जप प्रक्रिया के द्वारा उत्पादन और समन्वय होता है। जप के समय उच्चारण किये गये शब्द एवं उसके साथ आत्म निष्ठा, श्रद्धा एवं संकल्प के समन्वय से वही क्रिया उत्पन्न होती है जो रेडियो स्टेशन पर बोले गये शब्दों में होता है। प्रकृति ही क्षणों में वे शक्तिशाली होकर समस्त भू−मण्डल पर प्रसारण का उद्देश्य पूरा करते हैं। जपयोग से न केवल समस्त संसार का वातावरण प्रभावित होता है वरन् साधक का व्यक्तित्व भी परिष्कृत होकर जगमगाने लगता है। रेडियो स्टेशनों से प्रसारण तो होता है, पर स्थानीय स्तर पर कोई विलक्षणता नहीं दिखायी पड़ती। लेसर किरणें फेंकने वाले यन्त्रों में निजी प्रभाव नहीं देखा जा सकता। वे उन स्थानों का ही प्रभावित करती हैं जहाँ उनका आघात होता है। जप प्रक्रिया के साथ ऐसी बात नहीं है। इसमें साधक और वातावरण को प्रभावित करने की दुहरी शक्ति होती है। जप के साथ जुड़ी इन मर्यादाओं एवं वैज्ञानिक विधि–विधानों का सही ढंग से पालन किया जा सके तो उससे चमत्कारी लाभ उठाया जा सकता है।
तपोहि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत्सृखम्। –वाल्मीकि (71849)
तप (कष्ट सहिष्णुता) ही परम कल्याण को करने वाला होता है। तप से रहित जो सुख है वह तो बुद्धि के सम्मोहन को उत्पन्न करता है।
एकाकीपन की अपेक्षा सामूहिकता अधिक बलशाली−सामर्थ्यवान है। लोहे का लम्बा गार्डर एक व्यक्ति अकेला नहीं उठा पाता, पर जब कई व्यक्ति मिलकरन ‘हईशा’ के निनाद के साथ जोर लगाते हैं तो वे समूह शक्ति के सहारे कई गार्डरों को जोड़कर बाँध का ढाँचा तैयार कर देते हैं। बड़े−बड़े पहाड़ काटकर नहरें निकालना व गगनचुम्बी भवन बना सकना समूह शक्ति का ही काम है। बड़ी शक्तियों को भी कुचल सकना के वल समूह बल द्वारा ही सम्भव है। एक से चार का बल हमेशा बड़ा ही होता है।
जब वातावरण को परिष्कृत करने– युग−परिवर्तन की बात सामने आती है तो सामूहिक प्रयासों को ही महत्ता दी जाती है। उस तूफानी प्रवाह में सामान्य जन भी असामान्य भूमिका सम्पादित कर दिखाते हैं। व्यापक परिवर्तन बड़े परिमाण में चिरस्थायी उद्देश्यों के लिये करने हों तो उसके लिये ऐसे सामूहिक प्रयासों की ही आवश्यकता पड़ती है। ऐसे सामूहिक आध्यात्मिक प्रयास जिन्हें प्रार्थना, धर्मानुष्ठान अथवा ध्यान धारणा किसी भी रूप में किया जा सकता है अपने दिव्य प्रवाह से सूक्ष्म जगत को अनुप्राणित कर सक ने में समर्थ होते हैं।
आये दिन देखा जाता है कि एकाकी और सम्मिलित शक्ति में कितना अन्तर है। बुहारी की अलग−अलग सींके चाहे हजारों−लाखों क्यों न हो अलग रहकर किसी स्थान की सफाई नहीं कर सकतीं। वे मिल जायें तो ही समर्थ झाडू बन पायेगी। धागे परस्पर गुंथे तो कपड़ा बने व तन ढक पाये। अलग−अलग दीपक तो सदा जलते हैं, पर जब वे योजनाबद्ध रूप से नियत समय पर पंक्ति बद्ध प्रकाशित होते हैं–दीपावली का उत्सव अपनी निराली छटा लिये अलग ही दृष्टिगोचर होता है। अलग−अलग रहकर शूरवीर योद्धा कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते। उनका सम्मिलित स्वरूप –सेना का प्रदर्शन जब ‘मार्च पास्ट’ अथवा गणतन्त्र की परेड के रूप में देखते हैं तो लगता है युद्ध मोर्चे पर इनका पराक्रम अवश्य सफल होगा। उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। सामूहिक और सुगठित स्वरूप की उपासना के विशालकाय आयोजन वातावरण को बदलने– आमूलचूल रूप से सुधारने का महत् प्रयोजन पूरा करते हैं।
आत्म−कल्याण के लिये की गई करुण आर्त पुकार पर परमात्मा द्रवित होता है, पर जब इस पुकार में सैकड़ों मनुष्यों का करुण स्वर समा जाता है तो अनन्त गुनी शक्ति प्रादुर्भूत होती है। संघ−शक्ति की प्रतीक दुर्गा शक्ति का रहस्य भी यही है कि परमात्मा एकाकी की अपेक्षा अनेकों की पुकार पर अधिक ध्यान देते हैं। सामूहिकता का प्रभाव तुरन्त होता है।
श्रुति का आदेश है–”सहस्र साकमर्चत्”–अर्थात्–”हे पुरुषों! तुम सब सहस्रों मिलकर देवार्चन करो।” समगान व ऋग्वेद की समस्त ऋचाएँ सामूहिक गान ही हैं।
देव प्रयोजनों में सामूहिकता का ही प्रावधान है। यज्ञ प्रक्रिया एक सनातन धर्मानुष्ठान परम्परा है। देवाराधन के समस्त तत्वों का उसमें समावेश है। प्रत्यक्ष है कि यज्ञ का समूचा क्रिया−कलाप सामूहिकता पर ही निर्भर है। ब्रह्मा, आचार्य, अर्ध्वयु, उद्गाता, यजमान, ऋत्विक आदि यज्ञ पदाधिकारियों की मण्डली उसका सूत्र संचालन करती है। संगतिकरण–सामूहिकता यज्ञ का एक अर्थ भी है तथा उसके हर कृत्य में सहकारिता–सामूहिकता का समावेश है। राजनैतिक उद्देश्यों के लिये राजसूय, एवं धार्मिक उद्देश्यों के लिये वाजपेय यज्ञों की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। अश्वमेध जैसे आयोजन राजसूय तथा गायत्री यज्ञ जैसे आयोजन वाजपेय कहलाते रहे हैं। इनमें राजनेताओं व धर्मवेत्ताओं की बड़ी संख्या में एकत्र कर उनके प्रयत्नों में एकरूपता का सामूहिक शक्ति से सामयिक प्रयोजन पूरे किये जाते थे। नैमिषारण्य आदि आरण्यकों में सूत−शौनक कथा प्रसंगों जैसे विशालकाय ज्ञान सत्र सम्पन्न होते थे जिनमें हजारों ऋषि आत्माएँ श्रद्धापूर्वक भाग लेकर अनुष्ठान को सफल बनाती थीं।
ऋषियों ने रावणकालीन अनाचार से जूझने के लिये सूक्ष्म शक्ति उत्पन्न करने हेतु सामूहिक साधना की व सबने मिल−जुलकर अपना−अपना रक्तसंचय किया। उसे एक घड़े में बन्द करके भूमि में गाड़ दिया, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई और उनकी भूमिका के फलस्वरूप तत्कालीन अनाचारों का निराकरण सम्भव हो सका।
सामूहिक साधना, उपासना, प्रार्थना में महत्वपूर्ण प्रयोजन यही है कि सदाशयता की संघबद्ध होने और एक दिशाधारा में चल पड़ने की व्यवस्था बन सके। महत्व तो व्यक्तिगत उपासना का भी है और वैयक्तिक परिष्कार के लिये अलग−अलग एकान्त उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।
सन्त मैकेरियस ने लिखा है–”तुम अकेले गाओगे तो तुम्हारी आवाज थोड़ी दूर जाकर नष्ट हो जायेगी। मिलकर प्रार्थना करोगे तो उसका नाद प्रत्येक दिशा में व्याप्त होगा।” प्रार्थना का वैज्ञानिक रहस्य यही है कि हमारे पास अपनी उतनी सामर्थ्य नहीं है जितने से बाधाओं से टकरा सकें। इसलिये अन्ततः सब मिलकर अनन्त शक्तिशाली परमात्मा से शक्ति तत्व खींचकर हम समष्टिगत कल्याण की–सफलता की कामना करते हैं। आवाज जितने अधिक लोगों की होगी उतनी ही बुलन्द होगी। जितने अधिक भावपूर्ण स्वर उसमें जुड़ेंगे उतनी ही अधिक शक्ति प्रादुर्भूत होगी।
शास्त्रकार कहते हैं–
बहूनामल्य साराणाँ समवायों हि दुर्जनः। तृणैरा वेष्टयते रज्जुः बध्यन्ते तेन दन्तिनः॥
अर्थात्–”क्षुद्र और कमजोर आदमियों की सामूहिकता भी अजेय बन जाती है। कमजोर तिनकों से बनाई गयी रस्सी परस्पर मिल जाने के कारण इतनी मजबूत हो जाती है कि उससे हाथी भी बंध जाता है।”
वेद भगवान ने इसीलिये मानवों को एक होकर प्रार्थना करने का आदेश दिया है। सम्पूर्ण मानव समाज एक दूसरे से इस तरह सम्बद्ध है कि अपने स्वार्थ को सर्वोपरि समझकर सबके हित की भावना का तिरस्कार नहीं किया जा सकता। जब−जब एकाकीपन की यह संकीर्णता उभर कर आयी है, मानवता की बड़ी हानि हुई है। देवासुर संग्रामों के कई वर्णन शास्त्रों में मिलते हैं। असंगठित देवताओं पर संघबद्ध असुरों की जीत से यही प्रेरणा मिलती है कि जब तक संगठन के प्रतीक रूप से युग वितरण का पुरुषार्थ न होगा असुरता हमेशा हावी रहेगी। स्वार्थ से समाज में निकृष्टता, जड़ता, व अशाँति व असन्तोष फैलता है इसीलिये वेद भगवान कहते हैं–”धियो यो नः प्रचोदयात्।” अर्थात्–”हे भगवान्, हमारी बुद्धि को आप सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।” यहाँ जो “नः” शब्द का प्रयोग किया गया है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। नः अर्थात् हमारी–हम सबकी, अकेले एक की नहीं। इसीलिये गाँधीजी कहा करते थे–”जब तक एकता स्थापित न हो तब तक प्रार्थना, उपवास, जप–तप निर्जीव समान है।”
यहाँ सामूहिक उपासना−साधना की चर्चा इसलिये का जा रही है कि समय विशेष को– संक्रान्तिकाल को देखते हुए यह आवश्यक है। सामूहिकता में जो शक्ति है उसे यदि अपने अन्तः से सब लोग मिलकर उभार सकें तो इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होने में जरा भी देर न लगे।
जहाँ तक परम्परा की बात है–यह स्पष्टतः देखा जा सकता है कि प्राचीन काल में साधना के सामूहिक स्वरूप से अलग हटकर किसी अन्य स्वरूप की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक साहित्य में समस्त स्तुतियाँ बहुवचन में है। ”आ नो भद्राः क्रनवो यन्तु विश्वतः” अर्थात्−विश्व भर से श्रेष्ठ विचार हमारे भीतर आएँ। प्रार्थना और साधना का सर्वोत्कृष्ट मन्त्र इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि साधक गायत्री मन्त्र में अकेले अपनी ही नहीं, पूरे समूह की बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना सविता देवता से करता है। ईशोपनिषद में साधक अपनी अनुभूति बताता है–”हे प्रकाश पुँज! मैं आपके परम कल्याणकारी तेजोमय स्वरूप की देख रहा हूँ। वह मैं स्वयं ही हूँ।” और तुरन्त इसके बाद कहता है–”अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्।” अर्थात्–हे तेज पुँज! हम सबको सन्मार्ग की ओर खींच लीजिये।
जहाँ सामूहिक साधना की जाती है, वहाँ तादात्म्य की चरम सीमा में एक और जहाँ साधक की अनुभूति मुक्त रूप में फूट पड़ती है वहीं उसे समष्टि का भी ध्यान रहता है। इसीलिये ऋषि कहते हैं–
संगच्छध्वं, सं वदध्वं सं वो मनाँसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वें, संजानाना उपासते॥
अर्थात्–’हम सब साथ−साथ चलें, साथ−साथ बातचीत–विचार विमर्श करें व एक से मनोभावों से युक्त रहें।”
समानी व आकूतिः समाना हृदयानिवः। समानमस्तु वो मनोयथा वः सुसहासति॥
अर्थात्–’हमारी चित्त वृत्तियाँ समान हों, हृदय और मन समान हो, जिससे सौहार्द्र रह सके।
इन पंक्तियों में सामूहिक साधना की अनिवार्यता ही प्रकट हुई है। समान चित्त वृत्ति तभी होगी, जब समान साधना की जायेगी। एक-सी विचार तरंगें और भाव तरंगें एक−सी चित्त वृत्तियों को जन्म देती हैं। एकाग्रता का अर्थ यही है कि मन का प्रवाह एक ही दिशाधारा में चलने लगे। चारों तरफ चित्त बिखरे नहीं। जब व्यक्ति समुदाय एक ही भावधारा को एक साथ अपनाता है तो ध्यान धारणा प्रगाढ़ होती है, उससे एकाग्रता बलवती होती है।
सामूहिक उत्कर्ष के प्रयास सामूहिक साधना द्वारा ही सम्भव हुए हैं। जब−जब सामूहिक साधना से जनमानस विरत हुआ है तब−तब व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ पनपी व बढ़ी हैं, समाज की अवनति हुई है। समुद्र मंथन एक सामूहिक साधना ही थी जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
इसी प्रकार इन मतों का समर्थन करते हुए ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थ कहते हैं कि–”देवता सामूहिक रूप से सबके कल्याण की इच्छा करते हैं। एक व्यक्ति के हित के लिये अनेकों के हित का मर्दन उन्हें प्रिय नहीं होता।” सम्भवतः इसीलिये हमारी संस्कृति में ही सर्वप्रथम सामूहिक उपासना का प्रचलन हुआ। वातावरण के अनुकूलन एवं सूक्ष्म जगत के परिशोधन में ऐसी ही संयुक्त उपासना शक्ति सफल कारगर सिद्ध होती है। सामूहिक रूप से नियत समय और नियत क्रम से विधि व्यवस्था से की गयी उपासना प्रचण्ड शक्ति का उत्पादन कर सकने में समर्थ हो सकती है। इस तथ्य को इन दिनों प्रत्यक्षतः कारगर होते देखा जा सकता है।
आज का समय एकाकी साधना–एकाकी मुक्ति का नहीं अपितु समष्टिगत सुरक्षा–सबकी आत्मिक समृद्धि हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का है। नवयुग की सुखद परिस्थितियों की सम्भावना का एकमात्र आधार यही है कि व्यक्ति का अन्तराल उत्कृष्ट बने, दृष्टिकोण में उदारता और चरित्र में शालीनता का समावेश हो। यह एक के नहीं, समग्र मानवता के परिष्कार से ही सम्भव है। आस्थाओं के दुर्भिक्ष का निवारण अन्तःक्षेत्र में उत्कृष्टता की मान्यताओं को स्थापित करके ही सम्भव है। सामूहिक उपासना का उद्देश्य अन्तःक्षेत्र में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण एवं अभिवर्धन। इस प्रचण्ड सामर्थ्य से देव शक्तियों को भी आह्वान आमंत्रण ताकि उनकी तपः शक्ति से असुरों से संघर्ष किया जा सके।
सामूहिक धर्मानुष्ठानों की शक्ति से वातावरण गरम होता है और उस गर्मी से परिस्थितियों के प्रवाह में असाधारण मोड़ आते और परिवर्तन होते देखे गये है। समय के प्रवाह में तिनकों और पत्तों की तरह अगणित व्यक्ति बहते चले जाते हैं। आँधी के साथ धूल से लेकर छत−छप्पर तक ने जाने क्या−क्या उड़ता चला जाता है। आँधी का रुख जिधर होता है उधर ही पेड़ों की डालियाँ और पौधों की कमरें झुकी दिखाई पड़ती है। इसे प्रवाह का दबाव ही कहेंगे यह भी उस वातावरण का ही प्रभाव है जो सामूहिक शक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। गायत्री महापुरश्चरणों, नवरात्रि अनुष्ठानों, यज्ञायोजनों के पीछे युगान्तरकारी चेतन सत्ता का सही उद्देश्य छिपा होता है कि समय−समय पर एकत्र होने वाली अनाचार, अज्ञान, अभावरूपी अवाँछनीयताओं की कालिमा धुलती रहे।
तत्वदर्शी ऋषियों ने उपासना विज्ञान के निर्धारण में इस तथ्य को बहुत महत्ता दी है कि नियत समय, नियत क्रम से निर्धारित मनोभूमि की व्यवस्था बनाकर उपासना की जाय ताकि सूक्ष्म जगत का उद्देश्य पूरा होता रहे। सूर्योदय और सूर्यास्त काल को ही सन्ध्यावन्दन के लिये क्यों निर्धारित किया गया, इसका एक ही उत्तर है कि इससे संयुक्त शक्ति की अत्यन्त प्रभावशाली प्रचण्ड धारा उत्पन्न होती है। यह शक्ति के केन्द्रीकरण का चमत्कार है। गायत्री उपासना में वे सारे तत्व विद्यमान है जो व्यक्ति को लौकिक दृष्टि से स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट, समृद्ध बनाने वाला प्राण तो फूँकते ही हैं, साथ ही उसे आत्मिक दृष्टि से इतना अधिक सक्षम और समर्थ बना देते हैं जिससे कोई भी अवाँछनीयता, अनैतिक उसका कोई अनिष्ट न कर सके। इस शक्ति का सामूहिक उत्पादन तो और भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों के द्वार खोलता है।
एकाकी प्रयत्न व पुरुषार्थ का भी अपनी जगह महत्व है व ऐसे भागीरथी प्रयासों को सम्मानित–प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिये। ईश्वर का अंश राजकुमार अपने रचयिता सृष्टा की समस्त विभूतियाँ साथ लेकर आया है और यदि वह चाहे तो अपनी प्रसुप्ति को जागृति में बदलकर–प्रखरता को अपनाकर समष्टि क्षेत्र में भी इतना प्रकृति कर सकता है जिसे चमत्कारी कहा जा सके। तेजस्वी, मनस्वी, तपस्वी स्तर के व्यक्ति ऐसा ही प्रकृति कर गुजरते हैं। इतने पर भी वातावरण की महत्ता अपने स्थान पर यथावत् बनी रहती है। उसके प्रभाव की प्रचण्डता पग−पग पर परिलक्षित होती है। हमेशा यह आवश्यकता प्रतीत होती है कि किसी प्रकार समूचे वातावरण का अनुकूल सम्भव बनाया जाय। इसके लिये सुनिश्चित उपचार सामूहिक साधना को ही जाना माना जाता रहा है।
विभिन्न धर्मों में प्रचलित उपासनाओं को भी सामूहिकता की शृंखला में ही बाँधा गया है। मुसलमानों की नमाज का समय नियत है व प्रत्येक धर्मानुयायी कड़ाई के साथ उसका पालन करता है। जुम्मे की, ईद की नमाज पर एकत्र समुदाय की उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठान का ही एक स्वरूप है।
ईसाई रविवार को चर्च में एकत्र होते व सामूहिक प्रार्थना करते पाये जाते हैं। कोई भी ईश्वर−विश्वासी इस समय को चूकता नहीं। जब उद्देश्य सभी का समष्टिगत कल्याण की प्रार्थना ही है तो क्यों न उसे एक समय पर एक साथ किया जाय। इसका अर्थ यह नहीं कि एक स्थान पर बैठा जाना ही अनिवार्य है। सन्धिकाल की नैष्ठिक साधना नियत समय पर ध्यान धारण के रूप में नियमित रूप से प्रातः सायं की जा सकती है। इसे युग परिवर्तन के लिये समर्थ मार्गदर्शन में दैवी प्रवाक् के द्वारा युगशक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित की गयी विशिष्ट साधना समझा जा सकता है। इसके आधार पर ही सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण के अनुकूलन व प्रसुप्त की जागृति की अपेक्षा की जा सकती है।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञाच कौर्ल्य चदमः श्रुतंच। पराक्रमश्चा बहुभाषित च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
आठ गुण पुरुष को श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। वे इस प्रकार हैं–प्रज्ञा, कुलीनता इन्द्रिय दमन, ज्ञान, पराक्रम, मितभाषण, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।
ब्रह्माण्ड−व्यापी महाशक्तियों में ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण क्षमता सर्वविदित है। आकाश में अवस्थित सभी ग्रह परस्पर इसी आकर्षण शक्ति के आधार पर टिके हुए हैं और गतिशील हैं। यह गुरुत्वाकर्षण आखिर है क्या? इसका सूक्ष्म अन्वेषण करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मूलतः इलेक्ट्रो मैग्नेटिक–विद्युत चुम्बकीय क्षमता का ही रूप है। जो ग्रह−नक्षत्रों की भ्रमणशीलता और आकर्षण शक्ति के उभयपक्षीय प्रयोजन परे करती है। प्रकाश, ताप, ध्वनि विद्युत आदि इसी के विविध स्वरूप हैं पदार्थ में अणुओं की हलचल से लेकर रासायनिक परिवर्तनों का सरंजाम वही जुटाती है। ईथर के ब्रह्माण्ड व्यापी महासागर में इसी विद्युत चुम्बक का आधिपत्य छाया हुआ है। यह शक्ति जड़ नहीं चैतन्य ऊर्जा है जो प्रकृति के सुव्यवस्था और हलचलों का कारण है।
यही विद्युत चुम्बक प्राण है। मनुष्य काया के इर्द−गिर्द फैले तेजोवलय की एक हल्की परत के रूप में उसे देखा जा सकता है। शरीर में जीवन ऊर्जा के रूप में उसका अस्तित्व विद्यमान है। मस्तिष्क की मशीन अद्भुत है, पर वह स्वसंचालित नहीं है। यदि उसकी अपनी सामर्थ्य रही होती तो मृत शरीर का मस्तिष्क भी काम करते रह सका होता, पर ऐसा नहीं होता। प्राण ही है जो मस्तिष्क के चेतन−अचेतन पर छाया रहता, विविध प्रकार की हलचलों के लिए उन्हें प्रेरित करता है। ग्रहों में अपना−अपना आकर्षक होते हुए भी वह उनका निज का उत्पादन नहीं है। ब्रह्माण्ड−व्यापी विद्युत चुम्बकीय क्षमता में से वे अपना−अपना हिस्सा ले लेते हैं। यह सम्मिलित पूँजी है जिससे से विश्व ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक अपना−अपना हिस्सा पाते और गुजारा करते है। प्राणशक्ति के सम्बन्ध में भी यही बात है। विश्व−व्यापी महाप्राण के विशाल सागर में से पृथ्वी के जीवधारी भी अपनी−अपनी आवश्यकता एवं पात्रता के अनुरूप प्राण का अंश प्राप्त कर लेते हैं। सहज उपलब्ध प्राण का महत्व न समझने के कारण मनुष्य इसे उपेक्षापूर्वक गँवाता है। पर साथ ही यह भी सम्भव है कि वह अपने संकल्प बल का आश्रय लेकर व्यापक प्राणशक्ति में से एक बड़ा भाग अपने लिए उपलब्ध कर लें। प्राणयोग की साधना इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए की जाती है।
प्राण एक ऐसी चैतन्य ऊर्जा है जिसकी मात्रा बढ़ी चढ़ी होने पर मनुष्य के भीतर चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है। व्यक्तिगत जीवन में दिखायी पड़ने वाला अदम्य साहस, जीवट, उत्साह, तत्परता और दृढ़ता प्राण शक्ति सम्पन्नता का ही परिचय देते हैं। प्रचण्ड संकल्प शक्ति का प्रादुर्भाव प्राण का ही चमत्कार है। इसी के सहारे मनुष्य अनेकानेक कठिनाइयों को चीरते हुए आगे बढ़ता और अपनी मंजिल में जा पहुंचता है। कई शक्ति शारीरिक दृष्टि से समर्थ और मानसिक दृष्टि से सुयोग्य होते है, पर साहस का अभाव होने से कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठा सकते और प्रायः लोक प्रवाह के साथ बह जाते है। शंका−कुशंकाओं से ग्रस्त रहने आपत्तियों असफलताओं की सम्भावना उन्हें पग−पग पर डराती रहती है। ऐसे व्यक्ति प्रगति के उपयुक्त अवसर सामने होने पर भी उन्हें गँवाते और गई−गुजरी स्थिति में आजीवन पड़े रहते हैं। इसके विपरीत साहसी व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन एवं उपयुक्त अवसर न होने पर भी दुस्साहस भरे कदम उठाते और आश्चर्यजनक असफलताएं प्राप्त करते देखे जाते है। ऐसे ही दुस्साहसी इतिहास में अपना नाम अमर कर जाते हैं। यह साहसिक मनोभूमि आन्तरिक समर्थता प्राण के आधार पर ही विनिर्मित होती है।
भौतिक सफलताएँ ही नहीं आध्यात्मिक प्रगति का आधार भी प्राणशक्ति के आधार पर ही बनता है। साधना को समर कहा गया है। एक ऐसा समर जिसमें स्वयं के शत्रुओं से शुद्ध करना पड़ता है। अनेक योनियों में भ्रमण करते हुए जीव जिन पशु−प्रवृत्तियों का अभ्यस्त होता है उन्हें घटाये−हटाये बिना मानवी गरिमा के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का निर्माण नहीं हो सकता। आन्तरिक अवाँछनीयताओं को हटाकर उस स्थान पर उत्कृष्टताओं की स्थापना करने के प्रयोग को साधना कहते हैं। आन्तरिक साहसिकता के बिना इस साधना समर को न ही जीता जा सकता। बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए जितना युद्ध−कौशल चाहिए उतना ही शौर्य, साहस अपने भीतर घुसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद–मत्सर जैसे भीतरी शत्रुओं से लड़ने और परास्त करने के लिए आवश्यक होता है। दुर्बल, मनःस्थिति के लोग अपनी भीतरी कमजोरियों को जानते हैं, उन्हें हटाना चाहते हैं, पर साहस, संकल्प के अभाव में उनसे लड़ने का पराक्रम नहीं कर पाते। फलस्वरूप आत्म−सुधार एवं आत्म−निर्माण का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता। आन्तरिक शत्रुओं पर विजय भी प्राणशक्ति के संचय−अभिवर्धन द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। प्राणयोग की साधना इसीलिए हर साधक के लिए अनिवार्य बतायी गयी है।
शक्ति उत्पन्न करने का एक तरीका प्रख्यात है–घर्षण का। भौतिक जगत में इस प्रयोग से शक्तिशाली उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती हैं। आत्मिक क्षेत्र में भी शक्ति संचय के लिए यही प्रक्रिया अपनायी जाती है। प्राणायाम साधना इस घर्षण प्रयोजन के लिए की जाती है। सुनसान जंगलों में कई बार भयंकर आग लगती है और विस्तृत क्षेत्र के वृक्षों को जलाकर खाक कर देती है। यह आग मनुष्यों द्वारा उत्पन्न की गयी अथवा लगायी गई नहीं होती है। वृक्षों की टहनियाँ ही तेज हवा के कारण हिलती और बारम्बार टकराती हैं। आग इसी से पैदा हो जाती है। इस कार्य में बाँस सबसे आगे है। झुरमुट में प्रायः बाँस एक−दूसरे से सटकर उगे रहते हैं। तीव्र हवा के कारण वे रगड़ खा कर पहले गरम होते हैं फिर उनमें से चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। यह आग क्रमशः फैलती जाती और दावा नल का स्वरूप धारण कर लेती है। चकमक पत्थर के दो टुकड़ों को रगड़कर आग पैदा करने की विद्या आदिकाल से चली जा रही है। यज्ञ कार्यों में रगड़कर–अरणि मन्थन की क्रिया द्वारा अग्नि पैदा कर ली जाती है।
प्राण−साधना में श्वास−प्रश्वास क्रिया को क्रमबद्ध−लयबद्ध बनाया जाता है, साँस लेने की अव्यवस्था को दूर करके उसे व्यवस्था के बन्धनों में बाँधा जाता है। सामान्यतः श्वास का आवागमन फेफड़ों में तथा अन्य अवयवों में सिकुड़ने−फैलने की हलचल उत्पन्न करता है। उसी से दिल धड़कता तथा रक्त−संचार होता है–माँसपेशियों के आकुंचन–प्रकुंचन का क्रम चलता है। जिस तरह घड़ी के पेन्डुलम का हिलना घड़ी को गतिशील रखने का कारण होता है उसी प्रकार श्वास−प्रश्वास क्रिया को एक प्रकार से समस्त शारीरिक हलचलों का उद्गम केन्द्र कहा जा सकता है। मृत्यु का मोटा ज्ञान श्वास चलना बन्द हो जाने को माना जाता है। साँस को ही जीवन कहा गया है। यह जीवन तत्व वह हवा नहीं है जो धूल कणों अथवा तिनकों को उड़ाती रहती है, पर यह अवश्य है कि प्राण का सूक्ष्म अस्तित्व उसके भीतर विद्यमान है। मोटेतौर पर हवा एक पदार्थ प्रतीत होता है, पर उसकी भीतरी परतों में महत्वपूर्ण चीजें विद्यमान हैं। दूध में घी दिखायी नहीं पड़ता, पर उसमें रहता अवश्य है, उसे विशेष प्रक्रिया अपनाकर निकाला जा सकता है। वनस्पतियाँ बाहर से हरियाली के रूप में दीखती हैं, पर प्रयोगशाला में विश्लेषण करने पर उनमें से प्रोटीन, चूना, चिकनाई, नमक जैसे कितने ही तत्व पाये जाते हैं। इसी प्रकार साँस द्वारा द्वारा शरीर में प्रविष्ट होने वाली हवा मात्र स्पर्श तन्मात्रा वाली प्रकृति की हलचल नहीं है। उसके भीतर कितने ही भौतिक एवं चेतनात्मक तत्व भरे होते हैं जो शरीर मन और मस्तिष्क को परिपुष्ट करते हैं।
विज्ञान वेत्ताओं का मत है कि वायु भूत भौतिक पदार्थ आकाश की सुविस्तृत पोल में भरे पड़े हैं। आत्मवेत्ताओं का कहना है कि वायु शरीर के भीतर एक चेतन शक्ति भरी हुई है–यही प्राण है। जिस तरह साँस में रक्त घुला रहता है उसी प्रकार वायु में प्राण का अस्तित्व विद्यमान रहता है। सामान्यतया वे एकत्रित रहने पर विशेष प्रयत्नों द्वारा उन्हें अलग किया जा सकता है और जिस पदार्थ की आवश्यकता हो उसे प्राप्त किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार वायु में घुले हुए प्राण तत्व को अलग करके खींचा जा सकता और अपने प्राण में सम्मिलित करके अधिक सामर्थ्यवान बनाया जा सकता है।
श्वास−प्रश्वास की सामान्य प्रक्रिया में हवा के फेफड़ों में पहुँचने उससे रक्त को आक्सीजन मिलने तथा भीतर की विषाक्त गैस कार्बन−आक्साइड को बाहर निकालने भर शरीर यात्रा का सीमित प्रयोजन पूरा होता है। इस क्रिया को विशेष ढंग से–विशेष क्रम से किया जाने लगे तो भिन्न प्रकार की मन्थन प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। मन्थन द्वारा दूध में से घी निकलता है। अनेकों वैज्ञानिक प्रयोगों में मंथन प्रक्रिया के द्वारा अणुओं के विकेन्द्रीकरण से अणु विस्फोट जैसी स्थिति उत्पन्न होती देखी जाती है। यह मन्थन क्रिया प्राणायाम की विशेष प्रक्रिया में विशेष में विशेष स्तर की होती है।
घर्षण के चमत्कार पग−पग पर देखे जा सकते हैं। विज्ञानवेत्ता इस तथ्य से भली भाँति परिचित हैं कि शीशे की छड़ एवोनाइट से घिसने पर बिजली उत्पन्न हो जाती है। चलती रेल के पहियों में जब चिकनाई समाप्त हो जाती है अथवा किसी अन्य कारण से घिसाव पकड़ने लगता है तो उससे उत्पन्न होने वाली गर्मी धुरे तक को गला देती है और तब दुर्घटना की स्थिति बन जाती है। आकाश से कभी−कभी प्रचण्ड प्रकाश बिखेरते तारे टूटते दिखायी पड़ते हैं, यह तारे नहीं उसका पिण्ड होते हैं जो धातु अथवा पाषाण के छोटे−छोटे टुकड़े जैसे अन्तरिक्ष में छितराये रहते हैं जो कभी कभी पृथ्वी के वायुमण्डल में आ जाते हैं। प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण तथा हवा के टकराव के कारण वे जल उठते हैं। उनके जाने पर भी प्रकाश निकलता है उसे देखकर तारों के टूटने का अनुमान लगाया जाता है। यह सब घर्षण का ही चमत्कार है। प्राणायाम प्रक्रिया में इसी की विशिष्ट ढंग से दुहराया जाता है। दही मन्थन से रई को रस्सी के दो छोरों के बीच पकड़कर उल्टा−सीधा घुमाया जाता है। फलतः दूध में घुला हुआ घी उभर कर बाहर आ जाता और उभरी सतह पर तैरने लगता है। बांये−दांये नासिका स्वरों से चलने वाले इड़ा−पिंगला विद्युत प्रवाहों का विशेष विधि से मन्थन करने पर दूध बिलोने जैसी हलचल उत्पन्न होती है। फलस्वरूप काय चेतना में भरा हुआ ओजस् उभर कर ऊपर आता है।
काया में संव्याप्त प्राण का मन्थन और उभार प्राणायाम का एक पक्ष है। दूसरा है−अन्तरिक्ष में संव्याप्त प्राण सम्पदा में से अभीष्ट परिमाण में प्राण तत्व को अकर्षित करके भीतर भर लेता। इस तरह प्राणयोग की साधना में दुहरी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। एक−अपने भीतर के प्राण तत्व का परिमार्जन करना तथा उभारना। दूसरे चरण में चारों ओर बहते हुए प्राण सागर से प्राण तत्व को खींचना और अपने भीतर भरना पड़ता है। प्राणों के भी भेद एवं उपभेद बताये गये हैं तथा शरीर के विभिन्न कार्यों के प्राणों की अलग−अलग भूमिका होती है। आवश्यकता एवं प्रयोग के अनुरूप ही प्राणायाम की विशिष्ट प्रक्रिया अपनायी जाती है। विशेष प्रयोजन के लिए विशिष्ट प्राणायाम साधना द्वारा विशेष प्रकार के प्राण को खींचा और धारण किया जा सकता है।
कहना न होगा प्राणयोग की साधना विधिवत् की जा सके–उत्पन्न प्राण तत्व को धारण किया जा सके तो साधक को मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी बनने का अवसर मिलता है। यह ऐसी उपलब्धियाँ हैं जिनका अवलम्बन लेकर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशाओं में आगे बढ़ना सम्भव है भौतिक क्षेत्र में भी देखा जाता है कि जिनमें प्राण का बाहुल्य होता है उनमें प्रभावोत्पादक क्षमता अधिक होती है। अपना इस आकर्षण शक्ति द्वारा वे दूसरों को प्रभावित कर लेते तथा सहयोग प्राप्त कर लेते हैं। यह प्राण शक्ति की ही विशेषता होती है कि महापुरुषों के सान्निध्य में आने बालों का चिन्तन भी उत्कृष्टता की दिशा में चलने लगता है। कितनी बार तो अप्रत्याशित परिवर्तन होते देख जाते हैं। दुष्ट, दुराचारी भी उनकी डडडड प्राप्त करके बदलते, दुष्प्रवृत्ति को छोड़ते और सद्मार्ग पर चलने को विवश हो जाते हैं। यह प्राण ऊर्जा का ही प्रभाव है जो उन्हें जबरन श्रेष्ठता के मार्ग पा घसीट ले चलती है।
उच्चस्तरीय प्राणायामों में सोऽहम् साधना को सर्वोपरि माना जाता है। यह मूलतः ध्यानयोग की साधना है एवं उच्चस्तरीय प्राणयोग भी इसे कहा जाता है। इस साधना को प्राणायाम प्रक्रिया एवं प्राणयोग की प्राणाकर्षण साधना से अलग व विशिष्ट माना जाना चाहिए। प्राणायाम तो मात्र श्वास−प्रश्वास का एक विशिष्ट क्रिया विधान है जिससे फेफड़ों का व्यायाम–रक्त का शोधन व जीवनी शक्ति संवर्धन ये तीन लाभ होते पाये जाते हैं। ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहरी साँस लेना भी इसी के अंतर्गत आता है।
प्राणयोग साधना जिसका वर्णन पिछले लेख में किया गया, वह प्रक्रिया है जिसमें दिव्य चेतना शक्ति के रूप में प्राण तत्व के शरीर में प्रविष्ट होने की आस्था विकसित की जाती है। यह मूलतः संकल्प शक्ति से सम्भव हो पाता है कि साधक वायु के अन्तराल में घुले प्राण तत्व को अपने अन्दर खींचता–उसे धारण करता व पचाता है। संध्या वंदनादि के समय किये जाने वाले प्राणायामों के संकल्प एवं साधक की प्राण धारणा क्षमता का ही महत्व अधिक रहता है। संकल्प रहित अथवा दुर्बल–भाव−संवेदना रहित प्राण का धारण मात्र एक व्यायाम भर बनकर रह जाता है। यदि प्राण तत्व का चेतनात्मक लाभ उठाना है तो श्वास क्रिया से भी अधिक महत्व प्राणायाम के लिये नितान्त आवश्यक संकल्प बल को दिया जाना चाहिये। यह प्राणायाम मनोनिग्रह में–ध्यान साधना के प्रारम्भिक अभ्यास के रूप में साधना विज्ञान का एक अनिवार्य चरण माना जाता है।
सोऽहम् साधना भावोत्कर्ष व शक्ति अवतरण की साधन प्रक्रिया है। इस साधना के साथ जुड़ा संकल्प चेतना को उच्चतम स्तर तक उछाल देने में, जीव−ब्रह्म का समन्वय संयोग करा सकने में समर्थ होता है। इतनी इस स्तर की–भाव संवेदना और किसी प्राणायाम में नहीं। इसीलिये इसे प्राणयोग नाम न देकर हंसयोग भी कहते हैं एवं इसे एक स्वतन्त्र शाखा के रूप में महत्व दिया जाता है। इसे ‘अजपा जप’ अथवा प्राण गायत्री भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्वास के शरीर में प्रवेश करते समय ‘सो’ जैसी और बाहर निकलते समय ‘हम’ जैसी अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि होती है। इस प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्त भूमिका में अनुभव करना और इस अवधि में निरन्तर प्राण द्वारा बीज रूप में गायत्री जप करना–यही संक्षेप में सोऽहम् साधना का विधान है। चूँकि ध्वनि सूक्ष्म है–इसलिये उसे अपने सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा–शब्द तन्मात्रा के रूप में सुना जा सकता है।
सोऽहम् साधना की शास्त्रकारों ने स्थान−स्थान पर विवेचना करते हुए प्रशस्ति की है व इसे कुण्डलिनी योग की साधना का भी एक अनिवार्य अंग माना है।
पंच तन्त्र कहता है–
देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो नाम सदाशिवः। त्यजेद् ज्ञानं निर्माल्यं सोहं भावेन पूजयेत्॥
अर्थात्– देह देवालय है जिसमें जीव रूप में शिव विराजमान हैं। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं, सोऽहम् साधना से करनी चाहिए।
योग रसायनम् में शास्त्रकार लिखते हैं–
हंसो हंसोहमित्येवं पुनरावर्त्तन क्रमात्। सोहं सोहं भवेन्नूनमिति योग विंदो विदुः॥
अर्थात्– हंसों, हंसोहं इस पुनरावृत्ति क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही सोऽहं−सोऽहं ऐसा जप होने लगने लगता है। योगवेत्ता इसे जानते हैं।
प्रश्न उठता है कि सोऽहम् की प्रक्रिया ऐसा क्या परिवर्तन शरीर में लाती है जो इसे उच्चस्तरीय प्राणयोग में गिना जाता है सोऽहम् को तत्ववेत्ता अनाहत शब्द कहते हैं। आहत वे हैं, जो कहीं चोट लगने से उत्पन्न हुए हों। जबकि अनाहत बिना किसी आघात के उत्पन्न होते हैं। नादयोग में सुनाई देने वाले शब्द प्रकृति के अन्तराल की उथल−पुथल व पंचतत्वों की काया के भीतर की गतिविधि हलचलों के होने से आहत माने जाते हैं। जप भी आहत है क्योंकि मुख से जो शब्द उत्पन्न होते हैं वे वाणी संस्थान के अवयवों की गतिविधियों से उत्पन्न होते हैं। सोऽहम् अनाहत है। यह ब्राह्मी चेतना की गतिविधियों का सूक्ष्म श्रवण है। इसीलिये इसे अत्यधिक महत्व दिया जाता है।
वायु का प्रवाह जब तीव्र वेग से छोटे छिद्रों में होकर होता है तो घर्षण से ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी में इसी सिद्धान्त के आधार पर स्वर लहरियाँ उत्पन्न होती हैं। बाँसों में विद्यमान छेदों से जब हवा निकलती है तो जंगलों में बांसुरी जैसी ध्वनि निकलती सुनाई देती है। वृक्षों से टकराकर जब तेज गति से हवा चलती है तो घर्षण की प्रतिक्रिया स्वरूप ऐसी ही ध्वनि सुनाई देती है। यहाँ यह तुलना इस कारण की गयी कि नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छेदों के समान हैं। इस सीमित परिधि से होकर जब वायु भीतर प्रवेश करती है तो सूक्ष्म ध्वनि प्रवाह इस घर्षण से उत्पन्न होता है। गहरी और मन्द गति से ली गयी साँस से नासिका छिद्रों से टकराकर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है, पर इसे कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही अनुभव किया जा सकता है।
चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र कर भावना को इस स्तर का बनाया जाता है कि श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। साँस छोड़ते समय यह मान्यता बनानी चाहिए कि ‘हम’ ध्वनि प्रवाह निसृत हो रहा है। धीरे−धीरे चित्त एकाग्र करते−करते यह अनुभूति तीव्र होती जाती है और एक अभूतपूर्व आनन्द की प्राप्ति इसमें होने लगती है। ‘सो’ का तात्पर्य परमात्मा और ‘हम्’ का अर्थ है जीव चेतना। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण ‘सो’ की ध्वनि के साथ नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और हमारे अंग प्रत्यंग में–जीव कोष, तन्तु जाल तथा नाड़ी–नाड़िकाओं में प्रविष्ट हो उसको अपने संपर्क, संसर्ग का लाभ प्रदान करता है। यहाँ प्राणायाम के साथ यह ध्यान परक अनुभूति अनिवार्य है। ‘हम’ शब्द के साथ निश्वास द्वारा यह सोचा जाय कि जीव ने अपनेपन का भाव छोड़ दिया तथा काय–कलेवर से अपना आधिपत्य हटा कर उसने महाप्राण को स्थान दे दिया। प्रकारान्तर से यह परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनःक्षेत्र पर अधिकार स्थापित हो जाने की धारणा है।
तत्वदर्शी ऐसा मानते हैं कि जीवात्मा के गहन अन्तराल में उसकी आत्मबोध प्रज्ञा जो उसके वास्तविक ‘स्व’ का स्वरूप है, जागृत अवस्था में रहती है और उसी की स्फुरणा से सोऽहम् का आत्मबोध अजपा जाप बनकर स्वसंचालित रहता है। सोऽहम् का भाव स्थापित हो जाने का अर्थ है–आत्मा−परमात्मा का एकीकरण–अद्वैत की स्थापना। तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म–शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि आदि विवेचनों में इसी वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन है।
सोऽहम् उपासना की सार्थकता इसी में है कि जीव अपने आपको भ्रम जंजाल से मुक्त करे। यह मात्र प्राणायाम व ध्वनि की अनुभूति मात्र न बनकर रह जाय। स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध−लोभ, मोह आदि भव−बन्धनों से जकड़ी यह जीवात्मा दिग्भ्रांत बनी रहती है। इस स्थिति को ही जीव−भाव या जीव भूमिका कहा जाता है। इस भ्रम−जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया तो ईश्वर का विशुद्ध अंश ही अविनाशी निश्छल आत्मा के रूप में शेष रह जाता है। अपने काय कलेवर के कण−कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना ही इस साधना का चरम लक्ष्य है। परमात्मा अर्थात् आदर्शों का समुच्चय, जीवात्मा अर्थात् उसी का एक अंश जो भटकाव में लिप्त है, पर मार्ग नहीं खोज पा रहा। सोऽहम् की श्वास−प्रश्वास प्रक्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम्’ की ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है−समूचा काया−कल्प हो रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ, मोह का−वासना−तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है। उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तव्य, दूरदर्शी दृष्टिकोण एवं व्यवहार में सज्जनता–परमार्थ परायणता प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। सूर्य स्वर के समय शरीर में दिन तथा चन्द्र स्वर के समय शरीर में रात्रि होती है। दिन रात्रि में मनुष्य शरीर में 21600 बार श्वास का आवागमन स्वाभाविकतः होता है अर्थात् 1 मिनट में 15 या 16 बार। इस प्रकार प्रत्येक जीवधारी का पूर्ण आयु प्राप्त करना, दीर्घजीवी होना उसकी श्वास क्रिया पर आश्रित है। जो इस सम्पदा का अपव्यय करता है अर्थात् 1 मिनट में अधिक बार श्वास लेता है वह आयु उतनी ही कम करता जाता है−व्यसनी, भोगी, रोगी इसी श्रेणी में आते हैं। जो कम श्वास लेता है वह अपने खजाने का दुरुपयोग कम करने से दीर्घायु होता है। प्रतिमिनट श्वास की संख्या जैसे−जैसे घटती है, आयुष्यकाल वैसे ही गुणित क्रम में बढ़ता चला जाता है।
ऐसा कहते हैं कि प्रत्येक पखवारे में श्वास की गति बदलती है और प्रायः एक नासिका से एक घण्टा श्वास चलकर बदल जाती है। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी अर्थात् दाँया स्वर चलना चाहिये, उसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को इसी समय पिंगला नाड़ी अर्थात् बाँया स्वर चलना चाहिये। प्रत्येक दिन में पाँच बार स्वर का परिवर्तन होता है। श्वास चलने का यह नैसर्गिक नियम सब में शाश्वत है। इस क्रम को जानकर और परिस्थिति के अनुकूल साध कर स्वर विज्ञानी अपने हर कार्य को सफल बनाते हैं। योगी बताते हैं कि विवेकपूर्ण स्थायी नीति नियोजन सम्बन्धी कार्य तब किये जाने चाहिये जब चन्द्र नाड़ी का प्रवाह गतिमान हो। उत्तेजक–आवेश, जोश वाले कार्यों के लिये उचित समय वही बताया गया है जब सूर्य नाड़ी का प्राधान्य हो।
योगियों का यह निष्कर्ष पूर्णतः वैज्ञानिक है। साइन्स डायजेस्ट (जून 1981) में प्रकाशित एक शोध लेख के अनुसार बांये व दांये मस्तिष्क की गतिविधियों का बांये व दांये नथुने से श्वास लेने के क्रम से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। डा. रेमण्डक्लीन एवं रोजीन आर्मीटेज (डलहौजी यूनिवर्सिटी− नोवास्काँटिया) ने पाया कि प्रति 90 या 100 मिनट में दाहिना मस्तिष्क विराम चाहता है व बाँया मस्तिष्क गतिशील हो जाता है। ऐसे में यदि नथुने से श्वास द्वारा इस चक्र से जिसे वे “नेजल सायकल” कहते हैं, संगति बिठा ली जाय तो कार्य क्षमता में उल्लेखनीय परिवर्तन हो सकता है, साथ ही कई प्रसुप्त पड़े केन्द्रों की जागृति में भी इससे सहायता मिल सकती है। हिमालयन इन्स्टीट्यूट पैंसिलवानिया ने तो इस विषय पर पूरी एक प्रयोगशाला ही स्थापित की है और इससे वे मानस रोगों सम्बन्धी महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर भी पहुँचे हैं।
स्वर विज्ञान बताता है कि सही ढंग से श्वास नाड़ी चलने की प्रक्रिया से संगति बिठाते हुए यदि अपना श्वास क्रम सुनियोजित कर लिया जाय तो न के वल जीवन व्यापार में सन्तुलन साधने हेतु वरन् आत्मिक प्रगति के लिये भी इस योग विद्या का उपयोग हो सकता है। प्राण प्रवाह पर नियन्त्रण कर योगी अपनी सूक्ष्म चेतना को विकसित कर लेते हैं। भविष्य के गर्भ में छिपी कई घटित होने वाली बातें वे पहले से ही जानते हैं और तद्नुसार ही अपनी गतिविधियों का निर्धारण करते हैं। इसे दिव्य दृष्टि एवं अतीन्द्रिय सामर्थ्य भी कह सकते हैं। न केवल प्राणशक्ति के संरक्षण व संवर्धन हेतु वरन् स्वर योग के माध्यम से दिव्य उपलब्धियों के लिये भी स्वर ज्ञान तथा श्वसन क्रिया का नियमन सुनियोजन जरूरी है। भगवान शंकर ने स्वरयोग की महत्ता बताते हुए कहा है−
सर्वशास्त्र पुराणादि स्मृति वेदांग पूर्वकम्। स्वर ज्ञानात्परं तत्वं नास्ति किचिद्वरानने॥
अर्थात्− सम्पूर्ण शास्त्र पुराणादि, स्मृति और वेदांग आदि ये सब स्वर ज्ञान से श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् इनका ज्ञान भी स्वर के ही बल से होता है।
गुह्याद गुह्यतरं सारमुपकार प्रकाशकम्। इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञननाँ मस्तकेमणिः॥
अर्थात्− यह स्वर ज्ञान गुप्त से भी गुप्त वस्तु है। इसमें छिपा रहस्य उपकारों का प्रकाशक है और सब ज्ञानों में शिरोमणि है।
प्राण विद्या की इस विद्या को आज के वैज्ञानिक युग में भी पूर्णतः मान्यता मिल चुकी है। स्वर साधना की सिद्धि के लिये उत्सुक साधकों के लिये इससे सुगम प्राण योग की साधना और कोई नहीं।
पौराणिक गाथा के अनुसार पुरातन काल में जब यह दुनिया जीर्ण−शीर्ण हो गयी, तीन रिपुओं–काम, क्रोध, लोभ के कारण उसकी उपयोगिता नष्ट हो गयी, तब भगवान शिव ने अपना तृतीय नेत्र खोलकर प्रलय का दावानल उत्पन्न किया था और ध्वंस के ताण्डव नृत्य में तन्मय होकर भविष्य की–विश्व के अभिनव नव−निर्माण की भूमिका सम्पादित की थी। उस प्रलयकारी ताण्डव नृत्य का बाह्य स्वरूप कितना ही रोमाँचकारी क्यों न रहा हो, कथा तृतीय नेत्र की महत्ता के ऊपर मूलरूप से प्रकाश डालती है। मनुष्य के जीवन क्रम तथा समाज के समष्टिगत जीवन में भी कभी−कभी ऐसी आवश्यकता पड़ जाती है कि प्रचलित ढर्रे में आमूल−चूल परिवर्तन किया जाय, जो चल रहा है उसे उलटना अनिवार्य बन जाय। यह महान परिवर्तन भी तृतीय नेत्र के जागरण अर्थात् उद्भूत दूरदर्शी विवेकशीलता द्वारा ही सम्भव है। शिव के द्वारा ताण्डव नृत्य के समय तृतीय नेत्र खोले जाने के पीछे यही अलंकारिक रहस्य सन्निहित है।
भूमध्य भाग में आज्ञाचक्र अवस्थित है। इसी को तृतीय नेत्र कहा गया है। शंकर एवं दुर्गा के चित्रों में इसी स्थान पर तीसरा नेत्र दिखाया जाता है। एक कथा और आती है कि इसी तीसरे नेत्र को खोलकर भगवान शंकर ने अग्नि तेजस् उत्पन्न किया था और उससे विघ्नकारी कामदेव जलकर भस्म हो गया था। दमयन्ती ने भी व्याघ्र से अपने शील की रक्षा तृतीय नेत्र से प्रचण्ड अग्नि ज्वाला उत्पन्न करके की थी। इन वर्णनों से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि अवाँछनीयताओं का कूड़ा−करकट जलाने में तृतीय नेत्र की अग्नि अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता ही सक्षम हो सकती है। तृतीय नेत्र के प्रदीप्त होने पर संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी थी। फलस्वरूप घर बैठे ही टेलीविजन की भाँति महाभारत युद्ध के सभी दृश्य उन्हें दिखायी पड़ने लगे थे।
प्रत्यक्ष जगत के दृश्य पदार्थों का एक छोटा-सा क्षेत्र ही इन नेत्रों की पकड़ में आता है। चमड़े की आँखों से देखे जाने की सीमा स्वल्प है। स्पष्ट दिखने वाली वस्तुएँ ही उसकी पकड़ में आती हैं। पर यह संसार अत्यन्त विस्तृत है। उस विस्तार को देख सकना इन स्थूल नेत्रों द्वारा सम्भव नहीं है। परमात्मा ने हर मनुष्यों को एक ऐसी सूक्ष्म दृष्टि दे रखी है कि उसके द्वारा असीम विस्तार को देख एवं समझ सकना शक्य हो। सामान्य अवस्था में अधिकाँश व्यक्तियों में यह सूक्ष्म दृष्टि सुषुप्त स्थिति में रहती है। फलतः वे उसका लाभ नहीं उठा पाते। ध्यान में त्राटक–साधना का उद्देश्य अपनी दृष्टि क्षमता में इतनी तीक्ष्णता उत्पन्न करता है कि वह दृश्य एवं अदृश्य की गहराई में उतरकर उसके अन्तराल में जो अति महत्वपूर्ण घटित हो रहा है उसे पकड़ने एवं समझने में समर्थ हो सके। मानवी विद्युत का अत्याधिक प्रवाह नेत्रों द्वारा ही होता है। उस प्रवाह को एक दिशा विशेष में नियोजित एवं लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित कर देने की प्रक्रिया को ‘वाटक’ कहा गया है।
सरसरी एवं उथली निगाह से असंख्यों वस्तुएँ देखी जाती हैं, पर उनमें से किसी−किसी की ही मन पर छाप पड़ती है अन्यथा अधिकाँशतः आँखों के सामने से यों ही गुजर जाती है। देखने की क्रिया होती रहने पर भी दृश्य पदार्थों एवं घटनाओं का प्रभाव मस्तिष्क पर नगण्य पड़े, इसका कारण है– मन की चंचलता, उपेक्षा एवं अन्यमनस्कता। यदि गम्भीरतापूर्वक किसी पदार्थ अथवा घटना का निरीक्षण किया जाय तो उसमें से भी कितने ही महत्वपूर्ण तथ्य उभरते दिखायी देंगे। वैज्ञानिकों, कलाकारों, तत्वदर्शियों की यही विशेषता होती है कि वे सामान्य समझी जाने वाली घटनाओं को अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखते हैं और उसी में से कितने ही ऐसे तथ्य ढूँढ़ निकालते हैं जो अद्भुत एवं असाधारण सिद्ध होते हैं। अपने बचपन से वृद्धावस्था तक सभी पेड़ से फल टूटकर नीचे गिरने का दृश्य अनेकों बार देखते हैं। पर उनके लिए यह कोई विशिष्ट घटना नहीं होती। किन्तु ‘न्यूटन’ ने पेड़ पर से सेब का फल टूटकर जमीन पर गिरते देखा। उनकी सूक्ष्म दृष्टि अन्वेषण में लगा गयी और अन्ततः पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का क्रान्तिकारी सिद्धान्त विज्ञान जगत में एक नवीन आविष्कार के रूप में उभरकर सामने आया। महर्षि चरक ने जमीन पर उगती रहने वाली सामान्य जड़ी-बूटियों के गुणों की खोज से चिकित्सा जगत की प्रगति में असामान्य सहयोग दिया। यह सब विशिष्ट उपलब्धियाँ सूक्ष्म दृष्टि की ही महिमा का प्रतिपादन करती है। जिसके जागरण का अभ्यास प्रत्यक्ष बेधक दृष्टि की ही महिमा का प्रतिपादन करती है। जिसके जागरण का अभ्यास प्रत्यक्ष बेधक दृष्टि से–त्राटक के माध्यम से किया जाता है।
विद्युत का प्रवाह शरीर के रोम-रोम में कार्यरत है पर तीन स्थानों पर उसका प्रवाह अत्यन्त तीव्र होता है–नेत्र जननेन्द्रिय और वाणी। इन तीनों से निकालने वाली विद्युत ही व्यक्तियों एवं परिस्थितियों को अधिक प्रभावित करती है। मस्तिष्क का ब्रह्मरन्ध्र भाग उत्तरी ध्रुव की तरह लिखित ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण को आकर्षित एवं धारण करता है तथा तीन मार्गों–नेत्र, जननेन्द्रिय तथा वाणी से होकर बहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में इन्हीं तीनों के संयम एवं नियमन पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जिह्वा की वाक् साधना के लिए जप, पाठ, मौन जैसे कितने ही अभ्यास किये जाते हैं। ब्रह्मचर्य के परिपालन से जननेन्द्रियों को संयमित रखा जाता है। पर इन सबमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र है– नेत्र। कारण यह है कि जिह्वा मुँह के भीतर रहती है। जननेंद्रिय भी कटि प्रदेश में वस्त्रों से ढकी रहती है। नेत्रों के ऊपर कोई परदा–आवरण नहीं होता। इसलिए विद्युतधारा अत्यधिक इसी केन्द्र से होकर प्रवाहित होती रहती है। त्राटक का उद्देश्य नेत्र गोलकों से होकर बहने वाली विद्युत शक्ति को केन्द्रीभूत करना एवं तीक्ष्ण बनाना है।
कहा जाता है कि मनुष्य का अन्तरंग व्यक्तित्व नेत्रों से होकर बाहर झाँकता है। यही कारण है कि प्रेम, द्वेष, ईर्ष्या, उपेक्षा, चिन्ता, उद्वेग के भावों की अन्त स्थिति को आँख मिलाते ही देखा, समझा एवं अनुभव किया जा सकता है। काम कौतुक के आवेश का आरंभिक संचार नेत्रों द्वारा ही होता है। कवि, कलाकार नेत्रों के सौंदर्य एवं प्रभाव की चर्चा करते नहीं थकते। शृँगार रस की कविताओं में सर्वाधिक अलंकार नेत्रों के लिए ही प्रस्तुत किये गये हैं। सज्जनता एवं दुष्टता को उभरने वाली भाव भंगिमा को नेत्रों में प्रत्यक्ष उटते देखा जा सकता है तथा उसके आधार पर व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति का पता लगाया जा सकता सम्भव है।
किन्हीं-किन्हीं के नेत्रों में एक विशेष प्रकार का आकर्षण भी पाया जाता है। बरबस ही लोग उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। यह आकर्षण भला एवं बुरा दोनों ही प्रकार का प्रभाव डालने में सक्षम होता है। यों तो छोटे बच्चों एवं वस्तुओं को नजर लगने की किम्वदंतियां चुनी जाती है। जिनमें प्रायः अन्ध विश्वासों का पुट अधिक होता है, पर मानवी विद्युत विज्ञान की दृष्टि से ऐसा प्रभाव पड़ना सर्वथा असम्भव नहीं है। नेत्रों की बेधक दृष्टि में भले-बुरे दोनों ही प्रकार के तत्व समाहित रहते हैं जिनका प्रयोग मनचाही दिशा में किया जा सकता है। यह डडडड सहज उपलब्ध बेधक दृष्टि की क्षमता हुई जो किसी-किसी को अनायास ही प्राप्त होती है। त्राटक साधना में इसी क्षमता को प्रखर किया जाता तथा उच्च भूमिका में प्रविष्ट करके दिव्य दृष्टि जागरण का प्रयोजन पूरा किया जाता है।
यह तीसरा नेत्र–आज्ञाचक्र यदि जागृत किया जा सके तो उसके राडार, टेलीविजन और एक्सरे यन्त्रों की भाँति ही कितने ही असाधारण काम लिये जा सकते हैं। राडार रेडियो फिरजे फेंकता है और उसके वापिस लौटने से उस स्थान का विवरण देता है जिस स्थान से वे किरणें टकराई था। टेलीविजन में दूरगामी दृश्य दिखायी देता है। तीसरे नेत्र के जागरण से बिना किसी यन्त्र के भी सुदूर क्षेत्र की घटनाओं एवं दृश्यों को देखा जा सकता है। संजय ने महाभारत का सारा दृश्य इसी पद्धति से देखा था तथा धृतराष्ट्र को युद्ध की विस्तृत खबरें देते रहने का दायित्व भाँति-भाँति पूरा किया था। एक्सरे से आवरण में ढकी वस्तुएँ भी दीखती हैं। शरीर के भीतरी भागों का चित्रांकन इसी से सम्भव हो पाता है। भूमध्य पर अवस्थित आज्ञाचक्र की जागृति अवस्था इन तीनों ही प्रयोजनों को पूरा कर सकने में सक्षम हैं।
कितने ही व्यक्तियों में भविष्य बोध की सामर्थ्य पायी जाती है। चलचित्र की भाँति उन्हें भविष्य के गर्भ में पक रही घटनाएँ पहले ही दिखाई पड़ने लगती है। प्रत्यक्ष नेत्रों एवं संपर्क क्षेत्र से दूर रहने वाले व्यक्तियों की परिस्थितियों में क्या हेर फेर हो रहा है तथा वहाँ किस तरह की घटनाएँ घटित हो रही हैं इसका आभास किन्हीं-किन्हीं को होने लगता है। यह सब आज्ञाचक्र की जागृति का ही चमत्कार है। इससे वहाँ के दृश्य देखे जा सकते हैं जहाँ कि नेत्रों की पहुँच नहीं है। भूगर्भ के अन्तराल में छिपे रहस्य, अन्तरिक्ष के सूक्ष्म क्रिया-कलापों का पूर्व स्वरूप देखा और समझा जा सकना सम्भव हैं।
तृतीय नेत्र जागरण की यह भौतिक उपलब्धियाँ हैं। आध्यात्मिक विभूतियाँ तो और भी अधिक रहस्यमय और महत्वपूर्ण हैं। साँसारिक अलभ्य ज्ञान की तुलना में आत्मिक ज्ञान कहीं अधिक उपयोगी है। अपने भीतर क्या है? मूल सत्ता का स्वरूप कैसा है? यह प्रायः अविज्ञात ही बना रहता है। मनुष्य न तो अपने स्वरूप से परिचित होता है और न ही उसे अपनी सामर्थ्य का बोध रहता है। बाह्य संसार एवं सम्बन्धित वस्तुओं की जानकारी मात्र उसे बनी रहती है। रंग–बिरंगा संसार अधिक लुभावना और आकर्षक दिखायी पड़ता है। अपनी आत्मसत्ता का स्वरूप अनुभव में आ जाय तो मनुष्य को मालूम होगा कि संसार की सबसे विलक्षण और सामर्थ्यवान सत्ता अपने ही भीतर बैठी है। तृतीय नेत्र के दिव्य प्रकाश से अन्तः पर छाये मलीनताओं के आवरण कटने छटने लगते हैं और आत्म-सत्ता उस प्रकाश में जगमगाने लगती है। ऐसी शाश्वत अनुभूति में पहुंचे हुए व्यक्ति को परा और अपरा प्रकृति के सम्पूर्ण रहस्यों का अनुभव होने लगता है। तब वह स्थूल जगत के क्रिया-कलापों को बाल-क्रीड़ा में रचे हुए रेत बालू के घर, मकानों जैसी स्थिति में पाता है। अनुभूतियाँ आत्म-सत्ता के स्वरूप को जानने तक ही सीमित नहीं रहती। उद्गम स्रोत परमात्म सत्ता की प्रत्यक्ष अनुभूति सर्वत्र विराट् चेतना के रूप में होने लगती है। ऐसी दिव्य अनुभूतियों का साक्षात्कार करने वाला साधक बाल-बुद्धि की ओछी रीति-नीति त्यागकर अपनी गतिविधियों में उस तत्वों का समावेश करता है जो महामानवों के लिए उचित और उपयुक्त है।
तृतीय नेत्र जागरण से वह दूरदर्शी विवेक बुद्धि जागृत होती है जिसके प्रकाश में–आन्तरिक मनोविकार काम-क्रोध, लोभ मोह आदि अपने असली रूप में प्रकट हो जाते हैं। तब उनकी कुरूपता स्पष्ट दिखायी पड़ने लगती है। वे मानवी गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल हैं, ऐसा मात्र बोध ही नहीं होता वरन् उनके निष्कासन के लिए प्रचण्ड संकल्प एवं पुरुषार्थ उभरता है। दिव्य दृष्टि खुलने एवं परिष्कृत दृष्टिकोण विकसित होने से सोचने एवं करने का तरीका माया–मोहग्रस्त अज्ञान अन्धकार में भटकने वाले लोगों से सर्वथा भिन्न होता है।
त्राटक साधना अपने समय पर परिपक्व एवं विकसित होकर साधक को समाधि की उच्चस्तरीय अवस्था में पहुँचाती है। शास्त्रों में अनेकों स्थानों पर उसका वर्णन आता है।
त्राटकाभ्यास तश्चापिकालेन क्रमयोगतः। राजयोग समाधिः स्यात् तत्प्रकारोऽधुनोच्यते॥ –योग रसायन्
अर्थात्–’त्राटक के अभ्यास से समयानुसार राजयोग की समाधि का लाभ सम्भव हैं।’
सामान्य-सी दिखने वाली पर असामान्य भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों से साधक को अनुप्राणित करने वाली त्राटक साधना का तत्वदर्शन समझा जा सके और प्रक्रिया को ठीक प्रकार अपनाया जा सके तो दिव्य दृष्टि जागरण का लाभ उठा सकना हर किसी के लिए सम्भव है।
प्राणापानव्णनोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः। स्वयमेववृत्तिभेदात् सुवर्णहलिलादिवत्॥ –विवेक.97
अर्थात्–जिस प्रकार सुवर्ण और जल अनेक कार्यों व रूपों के आधार पर अनेक नामों (कंगन, कुण्डलादि, बर्फ, भाप आदि) से जाने जाते हैं, उसी प्रकार ‘प्राणी भी वृत्ति भेद–कार्य भेद–से अनेक नामों–प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान–से जाना जाता है।
दिव्य दृष्टि जागरण के लिए की जाने वाली साधनाओं में त्राटक प्रमुख है। इसे बिन्दुयोग भी कहा गया है। भटकाव से रोककर बाह्य एवं अंतर्दृष्टि को किसी बिन्दु विशेष अर्थात् लक्ष्य विशेष पर एकाग्र करने की साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। त्राटक साधना में बाह्य नेत्रों एवं स्थूल साधनों–मोमबत्ती, दीपक, सूर्य आदि का प्रयोग कि या जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में की गई है। बिन्दुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश की ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है। दोनों का अन्तर मात्र भौतिक साधनों के प्रयोग करने की आवश्यकता रहने न रहने का है। आरम्भिक अभ्यास बाह्य त्राटक के बिना नहीं बन पाता। बिन्दुयोग साधना की स्थिति इसके बाद बनती है जिसमें बाह्य त्राटक की आवश्यकता नहीं रहती। कहीं-कहीं इस अन्तर के कारण त्राटक साधना को बाह्य त्राटक तथा अन्तःत्राटक के रूप में भी निरूपित किया गया है।
त्राटक के अभ्यास की अनेकों विधियाँ है। मैस्मरेज्म-हिप्नोटिज्म के अभ्यासी सफेद कागज पर काला गोला बनाते हैं। उसके मध्य में श्वेत बिन्दु अवशेष रहने देते हैं। इस बिन्दु पर नेत्र दृष्टि एवं मानसिक एकाग्रता को केन्द्रित किया जाता है। अष्ट धातु के बने तश्तरीनुमा पात्र के मध्य ताँबे की कील लगाकर उस मध्य बिन्दु पर दृष्टि को केन्द्रित करने का भी लगभग वैसा ही लाभ बताया गया है। पर मैस्मरेज्म का लक्ष्य एकाग्रता सम्पादन तथा बेधक दृष्टि प्राप्ति के भौतिक प्रयोजन तक ही सीमित है। इसलिए इस अभ्यास से वह लाभ नहीं मिल पाता जो त्राटक के–बिन्दुयोग के बताये गये हैं।
भारतीय योग शास्त्रों के अनुसार त्राटक के अभ्यास में चमकते प्रकाश का उपयोग करना श्रेष्ठ माना गया है। सूर्य, चन्द्रमा, तारे अथवा दीपक के प्रकाश साधनों का प्रयोग में लाने का विधान है। सूर्य की ज्योति अत्यन्त तीव्र होती है। खुले नेत्रों से उसे देरी तक देखते रहने से हानि भी हो सकती है इसलिए सूर्य त्राटक मात्र ध्यान द्वारा ही किया जा सकता है। चन्द्रमा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसका प्रकाश तेज तो नहीं होता पर शरीर शास्त्रियों के अनुसार किसी भी प्रकाश को लगातार देखते रहना हानिकारक माना है। तारों को प्रकाश का माध्यम बनाकर बाटक करने में कठिनाई यह है कि वे मात्र रात्रि को ही दिखायी पड़ते हैं। बदली कुहरा, धुन्ध आदि छा जाने पर तो रात्रि में भी नहीं दिखायी देते। दूसरी असुविधा यह पड़ती है कि आकाश में अनेकों तारे होने से ध्यान बंटता है। फलतः एकाग्रता का लाभ नहीं मिल पाता है। त्राटक के लिए एक बिन्दु ही उपयुक्त पड़ता है। करने को तो अभ्यास इनके माध्यम से भी किया जा सकता है, पर प्रकृति सेकेंडों से अधिक इन प्रकाश केन्द्रों को नहीं देखना चाहिए।
त्राटक साधना के लिए धृत दीपक सर्वश्रेष्ठ है। पर घृत होना शुद्ध चाहिए। मिलावटी या नकली धी की अपेक्षा शुद्ध चाहिए। मिलावटी या नकली धी की अपेक्षा शुद्ध सरसों आदि का तेल प्रयोग करना अधिक उत्तम है। इनके अभाव में मोमबत्ती का भी प्रयोग किया जा सकता है। त्राटक के लिए प्रातःकाल का समय अधिक उपयुक्त है, पर रात्रि को भी अभ्यास किया जा सकता है। दिन में कठिनाई यह पड़ती है कि सर्वत्र सूर्य का प्रकाश फैला रहने से यह साधना ठीक प्रकार बन नहीं पाती। दिन में यदि करना ही हो तो कमरे में ऐसी व्यवस्था बनाना चाहिए कि कृत्रिम अन्धेरा पैदा हो जाय।
अभ्यास में जलता दीपक साधक की छाती की सीध में लगभग पाँच फुट का दूरी पर अवस्थित होना चाहिए। साधना के लिए कमर सीधी, दोनों हाथ गोदी में तथा ध्यान मुद्रा में बैठना चाहिए। नेत्र अधखुले हों। वातावरण में घुटन, दुर्गन्ध, मक्खी, मच्छर जैसे चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करने वाले तत्व न हों। खुले नेत्रों से दीपक अथवा मोमबत्ती की लौ को पाँच सेकेंड देखना, इसके बाद आँखें बन्द करके भूमध्य भाग में उसी प्रकाश आलोक को ज्योतिर्मय देखना। जब वह ध्यान आलोक शिथिल पड़ने लगे तो फिर नेत्र खोलकर पाँच सेकेंड प्रकाश दीप को देखना और फिर आँखें बन्द करके पूर्ववत् भ्रूमध्य भाग में प्रज्वलित ज्योति का ध्यान करने लगना। यही है। त्राटक साधना का क्रिया पक्ष। जिसका आरम्भ दस मिनट से किया जा सकता है तथा अभ्यास क्रम को क्रमशः एक-एक मिनट प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ाते हुए आधे घण्टे तक पहुँचाया जा सकता है। ध्यान के समय आँखें खोलकर दीपक की ज्योति को देखने का प्रयास एक-एक मिनट के अन्तर से करना चाहिए। मिनटों एवं सेकेंडों का सही-सही अनुमान बिना घड़ी के कर पाना तो ठीक-ठीक सम्भव नहीं है, पर अनुमान के आधार पर ही यह क्रम चलाना पड़ता है क्योंकि घड़ी बार-बार देखने से ध्यान की एकाग्रता भंग होती और अभीष्ट परिमाण में ध्यान का लाभ नहीं मिल पाता।
आमतौर से नेत्र खोलकर दीपक की ज्योति को देखने के उपरान्त जब पलक बन्द किये जाते हैं तो ध्यान में प्रकाश अधिक स्पष्ट रहता है, पर धीरे-धीरे वह धुँधला पड़ने लगता है उसे फिर से सतेज करने के लिए ज्योति को देखने की आवश्यकता पड़ती है। हर व्यक्ति की मस्तिष्कीय संरचना अलग-अलग होने के कारण ज्योति को देखने की आवश्यकता भिन्न-भिन्न तरह की हो सकती है। किसी को एकबार प्रकाश का दर्शन कर लेने से उसकी झाँकी देरी तक बनी रहती है। किसी की स्मृति जल्दी ही धुँधली पड़ जाती है। उन्हें शीघ्र ही ज्योति देखना पड़ता है। हर व्यक्ति को अपना निरीक्षण स्वयं करना चाहिए तथा उसके अनुसार आँख खोलने तथा बन्द करने की समयावधि का निर्धारण करना चाहिए। प्रमुख उद्देश्य यही है कि त्राटक साधना काल में ध्यान भूमिका को निरन्तर प्रकाश की झाँकी मिलती रहे।
योग रसायन में त्राटक के विधान एवं प्रगति क्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है–
दृश्यते प्रथमाभ्यासे तेजो बिन्दु समीपगम्। चक्षुषो रश्मि जातानि प्रसरंति समंततः॥
अर्थात्–” त्राटक के अभ्यास से प्रथम तेजोमय बिन्दु पास आया दीखेगा। फिर नेत्रों से रश्मियाँ निकलती दिखेंगी।”
तेजसा संवृतं लक्ष्यं क्षणं लुप्तं भवेन्ततः। क्षणं दृष्टिगतं भत्वा पुनर्लुप्तः भवेत्क्षणात्॥
अर्थात्–”फिर वह तेजपूर्ण बिन्दु कभी लुप्त दीखेगा, कभी प्रकट हुआ। ऐसा क्रम बार-बार चलेगा।”
दृष्ट्या सयंमनश्चापि लक्ष्यस्थाने प्रवेशयेत्। लक्ष्यं विहाय नैवान्यच्चिंतथेन्नावलोकयेत्॥
अर्थात्–”मन भी उसी ओर लगा रहे। लक्ष्य के अतिरिक्त प्रकृति न देखें न सोचें।
अन्तःत्राटक के अभ्यास में बाह्य उपकरणों का अवलम्बन छोड़ना पड़ता है तथा प्रकाश धारण की भाव भूमिका में प्रवेश करना होता है। आरम्भ में प्रकृति समय प्रकाश की स्थापना वहीं रहने देनी चाहिए जहाँ उसे देखा गया हो। प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य को सुदूर पूर्व में उगते हुए अथवा दीपक के प्रकाश को जहाँ देखा गया था, आरम्भिक दिनों में उन्हें वहीं सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिए। भावना यह करनी चाहिए कि उस प्रकाश पुञ्ज की ज्योति किरणें अन्तरिक्ष से होकर उतरती हैं और अपनी उत्कृष्टता से स्थूल शरीर में ज्ञान एवं कारण शरीर में भाव बनकर प्रवेश करती हैं। फलतः शरीर संयमी, सक्रिय एवं स्वच्छ बनता है। मन में वे किरणें विवेक, सन्तुलन, सद्ज्ञान बनकर बरसती हैं। कारण शरीर में अन्तःकरण में सद्भावना, सम्वेदना, श्रद्धा भक्ति के रूप में उन प्रकाश किरणों का अवतरण होता है जिसके कारण समूचा व्यक्तित्व ही दिव्य प्रकाश से– ब्रह्मज्योति से जगमगाने लगता है।
अन्तःत्राटक का यह प्राथमिक चरण है जिसमें बाहर से भीतर की ओर ज्योति प्रविष्ट होने की भावना परिपुष्ट करनी पड़ती है। यह स्थिति अधिक परिपक्व होने पर ही प्रकाश की स्थापना भीतर की जाती है। फलस्वरूप उस आत्म ज्योति की–ब्रह्म ज्योति की आग भीतर से निकलकर बाहर प्रकाशवान् होती है। बल्ब का फिलामेन्ट भीतर तो ज्योतिर्मय होता ही है–अपनी आभा से समीपवर्ती क्षेत्र को भी प्रकाशित करता है। अन्तःज्योति के प्रज्वलित होने पर लगभग ऐसी ही स्थिति बन जाती है। अन्तः त्राटक के परिपूर्ण देखता है साथ ही उस प्रकाश से अपने प्रभाव क्षेत्र को भी आलोकित करता है।
अन्तः त्राटक में भाव पक्ष की प्रधानता है यह जितना ही परिपुष्ट होगा, अनुभूतियाँ उतनी ही संजीव होगी। अभ्यास अवधि में भ्रूमध्य में प्रदीप्त ज्योति का के कण−कण में, रोम−रोम में प्रकाश आलोक की आभा प्रदीप्त हो रही है। शरीर के किसी कोने में भी अन्धकार का अस्तित्व नहीं रहा उसे पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया गया। त्राटक साधना में प्रत्येक तन्तु एवं कोशिका को आलोकित देखा जाता है। मस्तिष्क के चार परत माने गये है–मन, बुद्धि, चित, अहंकार, इन चारों को प्रकाश पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होने से अन्धकार का हर दिशा से पलायन होने लगता है उसी तरह अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को भ्रूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रकाश प्रवाह से आलोकित अनुभव करने की भावना करनी पड़ती है। बिन्दुयोग की अन्तःत्राटक की साधना परिपक्व होकर जीवन सत्ता के कण−कण में प्रकाश उद्भव की संजीव अनुभूति तो कराती ही है, साथ ही उसकी प्रत्यक्ष अभिनव हलचलें शारीरिक मानसिक एवं आत्मिक धरातल में उभरती दृष्टिगोचर होती है।
प्रकाश शब्द अध्यात्म की भाषा में जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है उसका अभिप्राय बिजली की चमक से नहीं है वरन् ज्ञान और क्रिया में सम्मिश्रित उल्लास भरी भाव तरंगों से होता है। सामान्यतया पंच भौतिक जगत में गर्मी और रोशनी के सम्मिश्रण को प्रकाश कहा जाता है। किन्तु अध्यात्म क्षेत्र में गर्मी का अर्थ सक्रियता और प्रकाश का अर्थ दूरदर्शी विवेकशीलता, उत्कृष्टता से भरे सद्ज्ञान के रूप में किया जाता है अस्तु साधना क्षेत्र में प्रकाश की प्राप्ति की चर्चा जहाँ कहीं भी होगी उसका अर्थ भौतिक ताप एवं रोशनी देने वाले प्रकाश से नहीं होगा। उसका अभिप्राय अधिक गहरा है। आत्मोत्कर्ष की भूमिका आध्यात्मिक प्रकाश अर्थात् विवेकयुक्त सक्रियता अपनाने पर ही निर्भर है। भौतिक गर्मी या रोशनी से वह महान प्रयोजन नहीं पूरा हो सकता।
त्राटक की भाव भूमिका में अन्तःकरण के प्रकाशवान होने की भावना प्रबल करनी होती है। दिव्य चेतना की किरणें काय−कलेवर की प्रत्येक परत पर प्रतिबिम्बित हो रही हैं। विवेक की आभा फूट रही है जिसके प्रकाश में सतोगुणी तत्व झिलमिला रहे हैं। सत्साहस प्रखर प्रचण्ड बनकर सक्रियता की ओर अग्रसर हो रहा है। अज्ञान के आवरण कट रहे हैं। भ्रमित करने वाले डराने वाले दुर्भाव एवं संकीर्ण विचार अपनी काली चादर समेटकर चलते बने। प्रकाश से युक्त श्रेय पथ पर चल पड़ने का शौर्य प्रबल हो जाने से अशुभ चिन्तन के दुर्दिन चले गये। सर्वत्र उल्लास एवं आनन्द आलोकित हो रहा है। ईश्वरीय बनकर शरीर में सत्प्रवृत्ति और मन की सद्भावना बनकर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकाने वाली काली निशा का अन्त हो गया। भगवान की दिव्य ज्योति ने समूची जीव सत्ता पर अपना आधिपत्य जमा लिया–अपनी दिव्यता से अन्तरात्मा को अनुप्राणित कर दिया। उपरोक्त भावनाओं को त्राटक का अभ्यास करते समय हर साधक को परिपक्व परिपुष्ट बनाने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।
त्राटक की साधना से अन्ततः दिव्यदृष्टि खुलती और ज्योतिर्मय बनती है। यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसके आधार पर अन्तःक्षेत्र में दबी हुई रत्न राशि को खोजा और पाया जाता है तथा देश एवं काल की स्थूल परिसीमाओं को लाँघकर अविज्ञात और अदृश्य का रहस्यमय ज्ञान प्राप्त करना सम्भव है।
ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधंन पापकर्मणाम्। अग्नि पुराण–21
ध्यान के बराबर आत्म शोधन का और कोई उपाय नहीं है।
कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था। वह अबला असहाय खड़ी थी। हृदय से पुकारने पर अप्रत्याशित ईश्वर की सहायता प्राप्त हुई और उसकी लाज बच गयी। दमयन्ती बीहड़ वन में अकेली थी, व्याघ्र उसका सतीत्व नष्ट करने पर तुला था। उसकी नेत्र ज्योति में से भगवान की शक्ति प्रकट हुई और व्याघ्र जलकर भस्म हो गया। दमयन्ती पर कोई आँच नहीं आई। प्रहलाद के लिए उसका पिता ही जान का ग्राहक बन बैठा था। बचकर कहाँ जाय? खंभे में से नृसिंह भगवान प्रकट हुए और प्रहलाद की रक्षा हुई। घर से निकाले गये पाण्डवों की असहाय स्थिति देखकर भगवान उनकी सहायता करने स्वयं आये। ग्राह के मुख से गज के बन्धन को छुड़ाने के लिए भगवान नँगे पैरों दौड़े आये थे।
मीरा को विष का प्याला भेजा गया और विषैले सांपों का पिटारा भी, पर वह मरी नहीं। न जाने उसके हलाहल को कौन चूस गया और मीरा जी बच गयी। भागीरथ की तपस्या से द्रवीभूत होकर ही गंगा पृथ्वी पर आकर बहने के लिए तैयार हो गयी और स्वयं महाकाल ने गंगा को जटाओं में धारण किया। महर्षि के शाप से संत्रस्त राजा अंबरीष की सहायता करने भगवान का चक्र सुदर्शन स्वयं दौड़ा आया था। समुद्र से टिटहरी के अण्डे वापिस दिलाने में सहायता करने के लिए भगवान अगस्त्य मुनि बनकर आये थे। नल और नील ने समुद्र पर पुल बाँधने का असम्भव कार्य सम्भव कर दिखाया था। हनुमान को समुद्र में छलाँग लगाने की शक्ति अदृश्य दैवी चेतना सत्ता द्वारा ही प्राप्त हुई थी।
प्राचीन काल में ही नहीं हमेशा से ही कितने ही व्यक्तियों को अदृश्य सहायताएं समय−समय पर प्राप्त होती रही हैं। ईश्वरीय अनुकम्पा मिलने के सिद्धान्त सनातन और शाश्वत हैं। उस महान सत्ता के अनुदान जिन दो चैतन्य तारों से होकर प्रवाहित होते और हर काल में प्रकट होते हैं, वे है–श्रद्धा और विश्वास। विद्युत एक अदृश्य शक्ति है पर उसे प्राप्त करने के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। टंगस्टन के तारों में धन और ऋण विद्युत धाराओं के प्रवाहमान होने पर ही विद्युत−शक्ति जन्म लेती है। बल्ब में उस अदृश्य विद्युत का प्रभाव दृश्य प्रकाश के रूप में परिणित हो जाता है। चुम्बक एक ऐसी शक्ति है जिसे देखा नहीं जा सकता किन्तु जब उसे एक विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा लोहे की सुई में पिरो दिया जाता है तो वह दिशासूचक यन्त्र कुतुबनुमा बन जाता है। परमात्मा एक अदृश्य शक्ति है किन्तु अन्तःकरण की श्रद्धा और मन का विश्वास जहाँ भी एकाकार होते हैं, उस सत्ता का प्रकटीकरण विभिन्न रूपों में निश्चित ही होता है।
साधना क्षेत्र में प्रगति करने और दिव्य ईश्वरीय अनुदानों को आकर्षित करने में साधक की आन्तरिक श्रद्धा ही प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। अस्तु मनीषियों ने श्रद्धा और विश्वास को परिपक्व करने पर अत्यधिक जोर दिया है। व्यायाम के अनेकानेक प्रयोगों से शरीर बल बढ़ता है। ज्ञान वृद्धि में शिक्षा का अवलम्बन सहायक होता है। धनी बनने के लिए उद्योग व्यवसाय अपनाने पड़ते हैं ठीक इसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास को विकसित करने के लिए देव प्रतिमाओं–पूजा−प्रतीकों को माध्यम बनाना पड़ता है। उनमें आरोपित हुई श्रद्धा ही प्रतिध्वनित और प्रतिफल होकर साधक के पास वापिस लौट आती है गदा को दीवार या धरती पर मारने से टकराकर वह उसी स्थान को लौटती है जहाँ से उसे फेंका गया था। किंवदंती है कि शब्दबेधी बाण लक्ष्य बेध करने के बाद लौटकर पुनः तरकश में आ जाते है। गुम्बज में की गई आवाज प्रतिध्वनित होकर उस स्थान पा वापस आ टकराती है। पृथ्वी गोल है। यदि सीधी रेखा बनाकर चलते चला जाय तो चलने वाला लौटकर वहीं आ जायेगा जहाँ से उसने चलना आरम्भ किया था।
श्रद्धा देव प्रतिमाओं−पूजा प्रतीकों पर सघन रूप में आरोपित की जाती है। वे निर्जीव होने के कारण स्वयं तो प्रकृति नहीं कर सकते, पर प्रतिक्रिया को सुनिश्चित रूप से प्रयोग कर्त्ता के ऊपर लौटा देते है। गोबर से बने गणेश भी उतने ही चमत्कारी फल प्रदान करते है जितना कि असली गणेश कर सकते हैं। एकलव्य ने मिट्टी से बने द्रोणाचार्य की प्रतिमा से उतना लाभ प्राप्त कर लिया था जितना कि असली द्रोणाचार्य से पाण्डव स्वयं भी नहीं उठा सके थे। यह श्रद्धा की शक्ति का ही चमत्कार है। देवता का निवास काष्ठ पात्रों अथवा पाषाणों में नहीं, अन्तः की उच्चस्तरीय श्रद्धा में होता है। ‘भावोहि विद्यते देव तस्मात् भावों हि कारणम्’ की उक्ति अक्षरशः सत्य है। भावना में ही देवता का निवास होता है। अस्तु देव−दर्शन से होने वाले लाभों में भावना का स्तर ही प्रमुख कारण है।
अन्तःकरण की जिस उत्कृष्टता को श्रद्धा के नाम से जाना जाता है, उसका व्यावहारिक स्वरूप है भक्ति। दोनों एक दूसरे के पर्याय है। श्रद्धा अन्तरात्मा की आस्था है। श्रेष्ठता के प्रति असीम प्यार के रूप में उसकी व्याख्या विवेचना की जाती है। श्रद्धा की प्रेरणा है–श्रेष्ठता से घनिष्ठता, तन्मयता एवं समर्पण की प्रवृत्ति का विकास। परमेश्वर के प्रति इसी भाव सम्वेदना को विकसित करने का नाम है–भक्ति। भक्त को भगवान के प्रति अनन्य प्रेम उत्पन्न करना पड़ता है और उसे स्तर कर बनाना पड़ता है कि सच्चे प्रेमी की तरह आत्मसात् होने और आत्म समर्पण किये बिना चैन ही न पड़े। लौकिक जीवन में भी पत्नी पति के प्रति इसी प्रकार के आत्म−समर्पण से पति के अस्तित्व के साथ अपना अस्तित्व मिला देती है। इसे ही विलय, विसर्जन, समर्पण कहते हैं।
श्रद्धा जब घनीभूत होती है तो वह निष्ठा के रूप में प्रकट होती है। उसे ही विश्वास के रूप में सम्बोधित किया गया है। विश्वास की प्रतिक्रिया संकल्प शक्ति के उभार के रूप में होती है। आस्थाएँ आकांक्षाएं जब परिपक्व स्थिति में पहुँचती है और निश्चयपूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है तो उन्हें संकल्प कहते हैं। संकल्प की प्रचण्ड शक्ति सर्वविदित है। संकल्प की प्रखरता मस्तिष्क और शरीर दोनों को ही अभीष्ट दिशा में घसीट ले जाती है। इस संकल्प रूपी प्रचण्ड शक्ति का उभार विश्वासरूपी बीज से ही होता है। अंतःकरण की इन्हीं उच्चस्तरीय आस्थाओं को श्रद्धा और विश्वास का रूप दिया गया है तथा विविध रूपों में उनकी अभ्यर्थना वन्दना की गयी है।
उत्कृष्ट श्रद्धा विश्वास को शिव−पार्वती का युग्म कहा गया है। गोस्वामीजी ने रामचरित मानस के आरम्भ में अन्तःकरण की इन दो महाशक्तियों की ही सर्वप्रथम वन्दना की है।
‘भवानी शंकरौ बन्दे, श्रद्धा विश्वास रुपिणौ। याभ्याँ बिना न पश्यन्ति सिद्धाः, स्वान्तः स्थमीश्वरम्॥”
अर्थात्–” मैं श्रद्धा और विश्वास रूपी भवानी और शंकर की वन्दना करता हूं जिनके बिना अन्तःकरण में अवस्थित परमात्मा सत्ता को सिद्ध जन देख नहीं सकते।”
गीताकार इसी तथ्य को स्पष्ट करता है–”श्रद्धा मयोऽयं पुरुष यौ यच्छद्धः स एवसः।” व्यक्ति श्रद्धामय ही है जिसकी जो श्रद्धा है वह वही है। अर्थात् जीव की स्थिति श्रद्धा के साथ लिपटी हुई है। क्रिया, विचारणा और भावना यही तीन चैतन्य शक्तियाँ हैं। श्रेष्ठता की दिशा में जब वे बढ़ती हैं तो सत्कर्म, सद्ज्ञान एवं सद्भाव के रूप में प्रकट होती हैं। ब्रह्म विद्या का विशालकाय कलेवर इन तीनों को ही सुविकसित करने के लिए खड़ा किया गया है। पर इन तीनों का विकास श्रद्धारूपी बीज से ही होता है। कहना न होगा कि मानव जीवन की सर्वसमर्थ शक्ति श्रद्धा ही है। शरीर को जन्म तो माता−पिता के प्रयत्न से मिलता है, पर आत्मा की उत्कृष्टता, श्रद्धा और विश्वास रूपी दिव्य जननी और पिता की अनुकम्पा का प्रत्यक्ष फल माना जा सकता है। अन्तःकरण का स्तर ही मनुष्य की प्रगति−अवनति का कारण बनता है। अदृश्य कृपा, दैवी अनुग्रह अथवा, दैवी कोप का तात्विक स्वरूप समझना हो तो उन्हें अन्तःकरण के ही वरदान अभिशाप के रूप में समझा जा सकता है।
लोक व्यवहार में कहा जाता है कि–मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। गीता इसी तथ्य को प्रतिपादित करती है–”आत्मैवह्यात्म् बन्धु−आत्मैव रिपुरात्मनः”। अर्थात् मनुष्य स्वयं अपना शत्रु और मित्र है। पतन और उत्थान की कुँजी पूरी तरह उसके हाथ में है। निश्चित रूप से वह कुँजी अन्तःकरण में सुरक्षित रखी है। शास्त्रकारों ने इसी कुँजी को विविध नामों से–आस्था, निष्ठा, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, संकल्प आदि के रूप में सम्बोधित किया है। निश्चित ही आत्मिक विकास के लिए की जाने वाली साधनाओं में सद्श्रद्धा का विकास के लिए की जाने वाली साधनाओं में सद्श्रद्धा का असाधारण महत्व है। इसी का उभारने एवं सुविकसित करने के लिए विविध प्रकार के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष पूजा उपचार किये जाते हैं।
बीज की परिणति वृक्ष के रूप में होती है। श्रद्धा ही बहिरंग व्यक्तित्व का रूप धारण करती है। मनुष्य जो कुछ बनता है और जैसा भी दिखाई पड़ता है वह सब श्रद्धा शक्ति का ही चमत्कार है। शास्त्रकार कहते हैं–”उद्धरेत् आत्मनात्मानं–नात्मनं अवसादयेत्”। अर्थात्−”अपना उद्धार आप करो–अपने को गिराओ मत।” प्रकारान्तर से शास्त्रकार अंतःश्रद्धा को ही उत्कृष्ट बनाने तथा परिपुष्ट करने का निर्देश देते हैं। यही दृढ़ और परिपक्व होकर उच्चस्तरीय अनुभूतियों का कारण बनती है। घनीभूत एवं व्यापक होकर साधक को उन अनुभूतियों के निकट लाती है जहाँ पहुँचने पर ऋषिगण कह उठते थे–अयमात्मा ब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम्। श्रद्धा की इस गरिमा को देखते हुए ही अध्यात्मवादियों ने उसे मानवी सत्ता में विद्यमान साक्षात् ईश्वरीय शक्ति के रूप में नमन अभिवंदन किया है। उसी की उपलब्धि को आत्मोपलब्धि कहा गया है और उसे जीवन लक्ष्य पूर्ति का केन्द्र−बिन्दु माना गया है।
श्रद्धा के अभिसिंचन से ही पत्थर में से देवता का उदय हो जाता है। मीरा, सूर, तुलसी का भगवत् दर्शन उनकी गहन श्रद्धा का ही प्रतिफल था। रामकृष्ण परमहंस की काली उनसे साक्षात् वार्तालाप करती थी− भोग लगाती थी। रानी रासमणि में स्वयं इस तथ्य की पुष्टि की थी। आज भी काली की प्रतिमा यथावत् है, पर वह चमत्कार नहीं देखा जाता। यह सब अन्तःकरण की उत्कृष्ट श्रद्धा की ही परिणति थी जिसने काली की पाषाण प्रतिमा को इतना सजीव बना लिया था। साधना क्षेत्र में कितने ही साधक उत्साह के साथ प्रविष्ट होते हैं, उपासना के विधि−विधान एवं नियमों का कड़ाई के साथ पालन करते हुए भी देखे जाते हैं, पर उनमें से प्रकृति ही ऐसे होते हैं, जो अभीष्ट परिमाण में आध्यात्मिक उपलब्धियों को करतलगत कर पाते हैं। अधिकांश तो सीमित लाभ ही उठा पाते हैं। एक ने चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित करली जबकि दूसरा खाली हाथ रह गया, इस अन्तर के कारणों का बारीकी से अध्ययन−विश्लेषण किया जाय तो एक ही तथ्य हाथ लगेगा कि श्रद्धा की न्यूनाधिकता ही इस भारी विरोधाभास का कारण बनती है।
आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भीतर से तो निकलती ही हैं, ईश्वरीय अनुदानों−परोक्ष सहयोगों के रूप में भी बरसती हैं। पर उन्हें अन्तःकरण की श्रद्धा का चुम्बकत्व ही खींच पाने में सफल हो पाता है। ईश्वरीय सत्ता में सुदृढ़ विश्वास रखने वाला ही उन्हें प्राप्त कर पाने में सफल होता है। जिन्हें अन्तः और बाह्य क्षेत्र के दिव्य अनुदानों को उपलब्ध करता हो उन्हें अपनी साधना का शुभारम्भ श्रद्धा और विश्वास को उभारने–सुविकसित करने के रूप में करना चाहिए।
शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पञ्च, पञ्चत्वमापुः स्त्रगुणेन बद्धाः। कुरंगमातंग पतंगमीन भृंगा नरः पञ्चभिरञ्चितः किम्॥ –विवेक. 78
अर्थात्–’ हरिण, हाथी, पतिंगा, मछली और भौंरा’–ये अपने-अपने स्वभाव के कारण शब्दादि पाँच विषयों में से केवल एक-एक से आसक्त होने के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो फिर इन पाँचों विषयों से जकड़ा हुआ, असंयमी पुरुष कैसे बच सकता है। (उसकी तो दुर्गति सुनिश्चित ही है।)
साधना तत्वदर्शन को जानने की इच्छा रखने वाले हर जिज्ञासु को इस अटल तथ्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि जीवन साधना– ईश्वराधना हेतु किसी मुहूर्त्त की प्रतीक्षा नहीं की जाती। इन सिद्धान्तों को तो जितना शीघ्र जीवन में उतारा जाय उतना ही उत्तम है, परन्तु क्रमबद्ध रूप से उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने वालों को प्रकृति समय विशेषों की महत्ता जानना जरूरी है। उन दिनों आरम्भ किये गये प्रयास संकल्पबल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारो को दृष्टिगत रख ही ऋतुओं के मिलन काल की संधिबेला को आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों को महत्ता दी है।
इन दिनों सूक्ष्म जगत से दैवी प्रेरणाएँ अनुदान रूप में बरसती हैं और सुसंस्कारी जागृत आत्माएँ अपने भीतर समुद्र-मन्थन जैसी हलचलें इन दिनों उभरती देखते हैं। इन उमंगों का सुनियोजन का सकने वाली बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध करते हैं और कृतकृत्य होते हैं। यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सर्वदा ही बरसता है, पर ऐसे अवसरों पर बिना अधिक पुरुषार्थ के अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है। इसी कारण नवरात्रि पर्वों को अध्यात्म विज्ञान में अत्यधिक महत्व दिया जाता है।
रात्रि और दिन का मिलन प्रातःकालीन और सायंकालीन ‘संध्या’ नाम से प्रख्यात है। मिलन की बेला हर क्षेत्र में उल्लास से भरी होती हैं। मित्रों का मिलन, प्रणय मिलन, आकाँक्षाओं और सफलताओं का मिलन कितना सुखद होता है, सभी जानते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना तृप्तिदायक–आनन्द देने वाला होगा। जैसे ही पुराना वर्ष बीतता है, व नया आता है–नये उल्लास से नव वर्ष मनाया जाता है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के परिवर्तन के दो दिन अमावस्या एवं पूर्णिमा पर्वों के नाम से जाने जाते हैं। अधिकाँश पर्व इसी सन्धि बेला में मनाये जाते हैं। दीपावली, होली, गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, हरियाली अमावस्या, शरदपूर्णिमा जैसे प्रधान-प्रधान पर्व इन्हीं ऋतु संध्याओं में आते हैं।
जब भी ऋतु परिवर्तन होता है–चैत्र में मौसम ठण्डक से बदलकर गर्मी का रूप ले लेता है और आश्विन में गर्मी से ठण्ड का। वैसे इस परिवर्तन में समय तो क्रमिक गति से अधिक लगता है, परन्तु इन नौ दिन विशेषों में प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल व मानवी काया का सूक्ष्म कलेवर एक विशिष्ट परिवर्तन क्रिया से गुजरता है। शरीर में ज्वार-भाटे जैसी हलचलें उत्पन्न होती हैं और जीवनीशक्ति पूरी प्रबलता से देह में जमी विकृतियों को हटाने के लिये तूफानी संघर्ष करती हैं। वैद्यगण इसे लाक्षणिक उभार काल कहते हैं। बहुधा बीमारियाँ इन्हीं समयों पर अधिक होती हैं और शरीर शोधन-विरेचन के उपचार इन दिनों करायें जाने पर विशेष सफल होते हैं। काया-कल्प के विभिन्न प्रयोगों के लिये भी सन्धिकाल की इसी अवधि की प्रतीक्षा करते हैं।
नवरात्रियों को देवत्व के धरती पर उतरने का, जागृतात्माओं में देवी प्रेरणा फूँकने वाला समय माना गया है। इन अवसरों पर देव प्रकृति की साधना परायण आत्माएँ अदृश्य प्रेरणा शक्ति से बरबस प्रेरित हो आत्मकल्याण व लोक-मंगल के क्रिया-कलापों में नियोजित हो जाती हैं। इन दिनों न केवल मानवी चेतना को प्रभावित करने वाली वरन् अनुकूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बन जाती हैं। अन्य जीवधारियों में प्रजनन की उत्तेजना इस समय ही सताती है और वे गर्भाधान की क्रिया सम्पन्न करते हैं। सूत्र–संचालन तो कोई अदृश्य सत्ता ही करती है, प्राणीमात्र कठपुतली की भूमिका निभाते हैं। इन दिनों वातावरण प्रकृति इस प्रकार का बनता है कि आत्मिक प्रगति के लिये अन्तःप्रेरणा सहज ही उठने लगती है।
इस प्रकृति के दो ही गुण माने गये हैं–तम् और सत्। तम् अर्थात् जड़, सत् अर्थात् चेतन। दोनों अपनी स्थिति में पूर्ण हैं। पर जब इन दोनों का मिलन होता है, एक नई हलचल उठ खड़ी होती है जिसे रज कहते हैं। मनुष्य के अन्दर इच्छा, आकाँक्षा, भोग, तृप्ति, अहंता, संग्रह, हर्ष, स्पर्धा आदि चित्त को उद्विग्न किये रहने वाले और विविध बहिर्मुखी क्रिया कलापों में उलझाने वाले प्रवाह ‘रज’ की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। साधना की आवश्यकता इस ‘रज’ के निविड़ बन्धनों से शरीर चेतना को मुक्त करने के लिये ही पड़ती है। तम से बना जड़ शरीर तो समय समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है और उसे जलाकर उसके स्थूल स्वरूप की इतिश्री कर ली जाती है। चेतन आत्मा सत् का अंश है–ईश्वर का अंश होने से निर्मल है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी जड़ चेतन मिश्रित जीव चेतना ही हर घड़ी अशान्त बनी रहती है। इसी के परिमार्जन परिशोधन हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिये संध्याकाल की नवरात्रि बेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
रज वस्तुतः सत् और तम् का सम्मिश्रण ही है जिसमें उत्पादन की अद्भुत शक्ति है। नारी का नारीत्व उसकी ‘रज’ चेतना पर ही टिका हुआ है। यही गर्भधारण और सृष्टि विस्तार का मूल आधार है। रज प्रधान ऋतुमती मार्दा ही गर्भधारण करती है। प्रकृति जगत में भी ऋतुएँ वर्ष में दो बार ऋतुमती होती हैं। सर्दी-गर्मी प्रधानतः दो ही ऋतुएँ हैं। वर्षा इनके बीच आँख-मिचौनी खेलती रहती हैं। दोनों प्रधान ऋतुओं का ऋतुकाल नौ-नौ दिन का होता है, इसी को नवरात्रि कहते हैं। इसी समय प्रकृति का रज तत्व भी अपने पूरे यौवन पर होता है।
उमँगें मनुष्य की स्व उपार्जित सम्पदा नहीं है। वे इन नवरात्रि के समय विशेषों में तो अविज्ञात उभार के दौर के रूप में विशेषतः सक्रिय पायी जाती हैं। इन दिनों चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में बढ़ने लगते हैं जिसकी किसी को कभी सम्भावना नहीं होती। युग सन्धि की बेला और उस पर भी नवरात्रि एक अप्रत्याशित अवसर–अपवाद के रूप में ही मानी जानी चाहिये। जो अवसर को पहचानते हैं, वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाने व अन्तः की प्रगति हेतु आत्मिक पुरुषार्थ के लिए इस वर्ष की नवरात्रियाँ एक असामान्य अवसर के रूप में आयी हैं। इन दिनों वस्तुतः अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसने व उससे व्यापक जन समूह के उससे लाभान्वित होने की आशा की जा सकती है, आवश्यकता मात्र यही है कि इस पुरुषार्थ से कोई भी नैष्ठिक साधक छूटने न पाये।
यों तो सारा समय ही भगवान का है, सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने के लिये हर घड़ी शुभमुहूर्त्त है और अशुभ कर्म के लिये अनेकानेक बन्धन बताये जा सकते हैं। सामान्य या विशेष किसी भी कालचक्र की प्रतिक्रिया से लाभ उठाना बुद्धिमत्ता ही माना जायेगा। बसन्त के दिनों में उस उत्सव के अनुरूप ही सूक्ष्म प्रवाह वातावरण में बह रहे होते हैं, अस्तु उनकी सहायता से यह पर्व मानने के लिये सभी की उल्लास मय मनःस्थिति अनायास ही बन जाती हैं।
मध्यकाल में तन्त्र प्रयोजनों की मान्यता अत्यधिक थी। अधिकाँश कर्मकाण्डों को–मन्त्र सफल बनाने की साधनाओं को तंत्रवेत्ता इन नवरात्रियों में ही सम्पन्न करते थे। वाममार्गी साधक अभी भी अभीष्ट इच्छापूर्ति हेतु इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। सतोगुणी साधनाओं को अपनाने वाले–आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को तो इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में ही मानकर अपनी तप साधना का सुयोग बिठाना चाहिये। गायत्री साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी कारण लिये सर्व श्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करते रहने के लिये सुदृढ़ मनोबल चाहिये। संकल्प किसी बहाने से टूटे या उपेक्षापूर्वक चिन्ह पूजा की जाय इस से उत्तम यही है कि छोटे संकल्प लिए जायें। नियम यही ठीक है मनोभूमि में जितनी दृढ़ता हो उतना ही बड़ा संकल्प लिया जाय।
नियत दिनों में नियत जप संख्या, ब्रह्मचर्य व्रत पालन भोजन में उपवास तत्व का समावेश, जैसी स्थिति जिसमें अपनी शरीर सेवा दूसरों से कम से कम करायी जाय भूमिशयन-कमवस्त्र-चमड़े का परित्याग जैसी तितिक्षाएं, अन्त में हवन की पूर्णाहुति–ये अनुष्ठान की सामान्य मर्यादाएँ हैं। लघु अनुष्ठान, जिसमें 24 हजार जप 9 दिन में पूरा करना होता है–ही सर्वसुलभ साधना विधान है।
गायत्री अनुष्ठान की महत्ता नवरात्रि में सर्वाधिक मानी जाती है। गायत्री ‘गुरुमन्त्र’ है। देव मन्त्र कितने ही हैं–सम्प्रदाय भेद से कई प्रकार के मन्त्रों के उपासना विधान हैं, पर जहाँ तक ‘गुरुमन्त्र’ शब्द का सम्बन्ध है वह मात्र गायत्री के साथ जुड़ा है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में बपतिस्मा को जो स्थान प्राप्त है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मन्त्र गायत्री को प्राप्त हैं। साधना की दृष्टि से गायत्री को ही सर्वांगपूर्ण माना जाता है। त्रिपदा के रूप में इसकी तीन सिद्धियों अमृत (आनन्द-उल्लास से भरा अन्तःकरण–चिरयौवन), पारस (उत्कृष्टतावादी प्रगतिशील सत्साहस) तथा कल्पवृक्ष (परिष्कृत चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है। यही नहीं, इसमें जिन तथ्यों का समावेश है, उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में इसके मानव जाति का सार्वभौम मंत्र माने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है। देश, धर्म, जाति, समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर इसे सार्वजनीन उपासना कहा जा सकता है। जब भी कभी मानवी एकता के सूत्रों को चुना जायगा तो निश्चिततः गायत्री को ही महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा।
दैवी आह्वान को सुना जाय और तद्नुसार ही आचरण किया जाय, यही उत्तम है। साधकों को उपासना के चमत्कार देखना हो तो वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों ही आधारों की कसौटी पर नवरात्रि की गायत्री साधनावधि में कसकर देख सकते हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तराल से विभूतियों के रत्नों का निकल पड़ना व विपत्ति बाधाओं का निराकरण ये प्रत्यक्ष प्रति फलों से रूप में मिलते देखे जा सकते हैं।
इस देव पर्व पर देवत्व की प्रेरणा व दैवी अनुकम्पा निरन्तर बहती है। सतर्क–प्रयत्नशील मनस्वी साधक ऐसे ही शुभ मुहूर्त का लाभ उठाते व अन्यों को भी इसके लिये प्रेरित करते हैं। देवत्व की विभूतियों के जीवनचर्या में समावेश के रूप में इस अनुदान वर्षा को सहज ही देखा जा सकता हैं।
जन-मानस की बनावट प्रकृति इस प्रकार की है कि सुशिक्षित–कर्मशील होते हुए भी चमत्कारों–देववाद के प्रति आस्था प्रकृति अधिक ही होती है। आये दिन ऐसे बाजीगरों के किस्से सुनने में आते हैं जो पढ़े लिखों को कौतूहल दिखाकर ठग लेते हैं और सब प्रकृति पोल खुल जाने पर भी सन्त का वेश पहने अध्यात्म की दुहाई देते रहते हैं। वस्तुतः अध्यात्म का बाजीगरी से प्रदर्शन बाजी से कोई सम्बन्ध नहीं। विभूतियाँ और सिद्धियाँ हमेशा आध्यात्मिक होती है– परहितार्थाय होती हैं एवं कभी भी पुरुषार्थवाद की मान्यताओं को चोट नहीं पहुंचाती। उनका विकसित होना मात्र यही बताता है कि आत्मिक प्रगति का एक सोपान यह भी है।
भौतिक सिद्धियाँ तो कीड़े-मकोड़ों में भी पाई जाती हैं, जो चलते समय पैर के नीचे दबकर मर जाते हैं। मक्खी आकाश में उड़ सकती हैं, बत्तखें पानी में तैर लेती हैं और तीक्ष्ण दृष्टि सम्पन्न गीध की आँखों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। जुगनूँ अन्धेरे में प्रकाश फैलाता चमकता रहता है, मकड़ी को आने वाले मौसम का ज्ञान रहता है तो गिरगिट भाँति-भाँति के रंग बदल लेता है। पर यदि ये ही सिद्धियाँ हैं एवं इन्हीं की प्राप्ति के लिये साधना रूपी पुरुषार्थ किया जाता है तो सफलता के अन्तिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा जा सकता है जहाँ यह कीड़े-मकोड़े विकसित होते-होते पहले ही से पहुँच गये हैं।
रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर के अपने काली मन्दिर में शिष्यों के बीच बैठे थे। शिष्यों की सिद्धियों के विषय में जानने की उत्सुकता को देख उन्होंने एक कथा सुनाई–”एक शिष्य कठोर साधना कर वापस लौटा। नदी के इस पार गुरु की झोंपड़ी थी। गुरुजी से मिलने को उत्सुक शिष्य ने नदी पार करने के लिए कदम बढ़ाये। उसका स्वागत करने आये गाँव के श्रद्धालु परिजनों ने नाव की ओर इशारा किया व बताया–”आपको उस पार ले चलते हैं। “ शिष्य बोला–”नहीं। रहने दीजिये। में ऐसे ही पार कर लूँगा।” योगी महाराज ने 15 वर्ष कठोर तपस्या करके सीखी भी तो एक ही सिद्धि थी–पानी पर चलना। उसके प्रदर्शन का इससे श्रेष्ठ और क्या अवसर हो सकता था। लोगों के देखते-देखते वह पानी पर पैर रखते हुए उस पार पहुँच गया। गुरु जी झोंपड़ी के दरवाजे पर खड़े देख रहे थे। दम्भ से सिर ऊँचा किये, छाती फुलाये शिष्य महोदय बढ़े चले आ रहे थे। गुरु ने सारा माजरा समझ लिया–बोले–”वत्स! तूने 15 वर्ष की अवधि में वही सीखा जो 4 पैसे नाव पर बैठकर भी किया जा सकता था। सिद्धि के लिये उपासना की व उस पर भी प्रदर्शन का दम्भ तुझ में है। यदि आत्मिक प्रगति की ओर ध्यान दिया होता तो मछली–कछुए को प्राप्त इस विशेषता से प्रकृति ऊँचा ही उठा होता।” शिष्य की आँखें खुलीं। वह फिर चल पड़ा आत्मिक प्रगति हेतु तपश्चर्या करने। इतना कहते हुए परमहंस बोले–सच्चा साधक कभी सिद्धियों के व्यामोह में नहीं उलझता। ये तो सहज ही मिल सकती है–पर इनसे आत्म-कल्याण का–लोक-कल्याण का पथ-प्रशस्त नहीं होता। ऐसी सकाम साधना से तो जीवन को औरों के लिये काम आने लायक बनाना ज्यादा श्रेयस्कर है।
अधिकाँश लोगों में कौतूहल दिखाकर ‘आँकल्ट-मिस्टीसिज्म’ के नाम पर करिश्मे दिखाकर अपनी विशेषता सिद्ध करने की आत्मश्लाघा पूरी करने मात्र की हविश होती है। दूसरी ओर तमाशबीन दर्शकों की मानसिक संरचना भी ऐसी होती है कि उन्हें तमाशों में रस आता है–इससे कर्म न करने व तुरन्त लाभ मिलने की नीति सामने नजर आती है। एक तीसरा पक्ष और भी है। वह है–धर्म मंच पर बैठे उसके प्रवक्ताओं द्वारा इन्हीं कलाबाजियों को अध्यात्म की फलश्रुति बताना और प्रमाण-उदाहरण ऐसे देना जिससे लोगों में सहज रुचि, सिद्धियाँ प्राप्ति हेतु मचल उठे। यदि यही सब प्रकृति है तो फिर इतनी कष्टसाध्य प्रक्रिया अपनाने और सामान्य सुख−सुविधाएँ छोड़ उपवन में जाने की क्या आवश्यकता है। लोगों को अचम्भे में तो बाजीगर−जादूगर भी डाल देते है। ‘हाथ की सफाई’ के थोड़े दिनों के अभ्यास से ही वे तथाकथित ‘सिद्ध हो जाते है और तमाशा दिखा−दिखाकर पेट भरते रहते है।
देखना यह चाहिये कि इसमें अपना क्या लाभ हुआ व दूसरों का क्या हित सधा। भारत से हमें यदि उड़कर अटलांटिक पार अमेरिका जाना है तो यह काम थोड़ा-सा किराया भर देने से विमान यात्रा या जहाज से पूरा हो सकता है। उसके लिये उड़ना सीखने की कठिन तपस्या करने की क्या जरूरत? दूरदर्शन, दूरश्रवण के जब सभी साधन आज वीडियो, टी. वी., रेडियो के रूप में विद्यमान है तो फिर दूरदर्शन−−दूर श्रवण की सिद्धि के लिये अतिरिक्त प्रयास क्यों किया जाय?
साधना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही उद्देश्य है अपने अन्तःकरण में प्रसुप्त पड़ी सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावों का उन्नयन, सद्ज्ञान के रूप में दृष्टिकोण का अभ्यास। सिद्धियों की उत्कृष्टता इसी कसौटी पर रखी जाती है। इसी से अपना भला होता है व सारे जगत का भी।
सिद्धियाँ अनावश्यक और अस्वाभाविक है। उनका मनुष्य के सामान्य रोजमर्रा जीवन में कोई उपयोग नहीं, उल्टे हानि ही है। सच्चे आत्मवेत्ता इसी कारण न किसी को चमत्कार दिखाते है न ऐसा करने के लिये किसी को शिक्षा ही देते है। स्वयं समर्थ होते हुए भी कभी वे सृष्टि के विधान के विरुद्ध प्रकृति करते नहीं। यदि संयोग−वश किसी सुपात्र के लिये प्रकृति करना ही पड़ जाय तो कभी भी उसे प्रकट नहीं होने देते। सच्चे अर्थों में अध्यात्म का चमत्कार एक ही है−सामान्य स्थिति में रहते हुए भी देवोपम जीवन का आनन्द ले लेना। यह उत्कृष्ट चिन्तन व आदर्श कर्तृत्व के रूप में प्रकट होता है व यही शाश्वत सिद्धि उपलब्धि है जो महामानव अर्जित करते हैं जिसके लिए पुरुषार्थरत रहते हैं।
भगवान बुद्ध ने अपने एक शिष्य का स्वर्ण कमण्डल तुड़वाकर नदी में प्रवाहित कर दिया व चमत्कार दिखाने पर कड़ा प्रवाहित कर दिया था। वस्तुतः एक नट प्रकृति ही समय पूर्व भिक्षुक बना दिया था। उसने स्थानीय राज्य के अधिपति की घोषणा सनी कि एक ऊँचे बाँस पर रखे स्वर्ण कमण्डल को जो चढ़कर उतार लायेगा, उसे सिद्ध पुरुष माना जायेगा व राजा उसी का शिष्य बनेगा। बाँस पर चढ़कर अभ्यास किये नट के लिये यह कोई खास मुश्किल की प्रशस्ति भी तथा राजा से सम्मान, धन व गुरुपद पाकर आया था। उसके लौटने पर जब चर्चा भगवान तक पहुँची तो वे बहुत दुःखी हुए और उस उपहार को नष्ट कर दिया। उनका कहना था कि यदि चमत्कार ही अध्यात्म की कसौटी बनने लगे तो फिर बाजीगर ही सब प्रकृति होंगे और तपस्वी, ज्ञानवान, लोक−सेवी, अध्यात्मवेत्ताओं की कोई बात न मानेगा, न उन्हें पूछेगा।
क्या यह सच नहीं कि पूरे विश्व में इस बारे में एक समानता है कि अधिसंख्य व्यक्ति चमत्कारों में विश्वास रखते है। चाहे वह चिकित्सा हो अथवा धन उपार्जन, पदोन्नति की मनोकामना हो अथवा सन्तान प्राप्ति की? यह एक विरोधाभास है कि एक और तो विज्ञान की प्रगति अपनी चरम सीमा पर, दूसरी और अलौकिक अद्भुत घटनाओं पर विश्वास भी उतना ही अधिक। यह एक प्रकार का सकता है। बालों से बालू निकालना या ऐसे ही अन्य अजूबे दिखला देने का अर्थ यह नहीं कि वह व्यक्ति अवतारी या सिद्ध पुरुष है। विडम्बना तो यह है कि ऐसे धूर्त मक्कर में पड़कर समय, श्रेय व धन खोते रहते है।
सर्वसाधारण को समझना बहुत जरूरी है कि अध्यात्म का चमत्कारों में कोई सम्बन्ध नहीं। इस मार्ग पर चलते हुए जो भी प्रकृति अतीन्द्रिय क्षमताएं विकसित हो जाती है, उनका सदुपयोग किसी अति महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिये प्रकृति के विधान के अनुसार ही उच्चस्तरीय आत्माएं कर पाती है। इस अनुदान की जहाँ−तहाँ लुटाते नहीं फिरतीं। वे लोग, जो चमत्कार प्रदर्शन में उत्साह दिखाते हैं, वस्तुतः सिद्ध पुरुष नहीं, बाजीगर होते हैं।
अलौकिक आध्यात्मिक सिद्धियाँ सर्वसाधारण के लिये उपयोगी नहीं होती–अतः ईश्वरीय विधान उन्हें अविज्ञात एवं रहस्य के पर्दों में ही छिपाकर रखता है। यदि वे इसी प्रकार सर्वविदित हो जायें तो भारी सृष्टि की व्यवस्था, व्यक्तियों के कार्य कलाप ही अस्त-व्यस्त हो जायें। हमें भगवान ने ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ दी हैं क्षमता व स्तर उतना ही रखा है जिससे जीवन का आवश्यक क्रम भर चलता रहे। यदि हमारी सभी इन्द्रियाँ अपनी सीमा से परे सभी काल-आयामों का बोध करने में सक्षम हो जायें तो हमारे बहिरंग जीवन में अव्यवस्था छा जायेगी।
मान लीजिये हमें मृत्यु का समय पूर्वविदित हो–अपने भाग्य की–भविष्य में घटने वाली घटनाओं की पूर्व जानकारी हो तो पहले से हो भय, उदासी व खिन्नता छा जायेगी। पुरुषार्थ करते बनेगा नहीं। शेषावधि रोते कलपते निकल जायेगी। अदृश्य हो जाने की विद्या सीखने वाला व्यक्ति क्या-क्या गजब ढा सकता है व समाज तथा स्वयं के लिये भी मुसीबत खड़ी कर सकता है।
इसी प्रकार अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियों का वर्णन पढ़ने तक ही कौतूहल की पूर्ति करने वाला है–सर्वसाधारण को वे मिल भी जायें तो उससे उनके लिये संकट उत्पन्न करने का कारण ही बनेगी। सिद्धि द्वारा अपने विषय में पूर्व जानकारी प्राप्त करना तथा भविष्य जान लेना सामान्य बुद्धि के मनुष्य के लिये तो अकर्मण्यता को न्योता देने के समान हैं। जब हानि लाभ होता है ही, मरना है ही तो प्रयास पुरुषार्थ की क्या आवश्यकता है ऐसी स्थिति निश्चित ही न तो मनुष्य को ही स्वीकार्य होगी न ही विधाता को ही।
महर्षि पातंजलि ने अपने योग ग्रन्थ में सारी सिद्धियों का परिचय देते हुए सचेत भी कर दिया है। क्योंकि ये सिद्धियाँ अन्तिम लक्ष्य–मोक्ष, आत्म-कल्याण की प्राप्ति में बाधक ही बतायी गयी हैं। मात्र सदुपयोग करने वाले सुपात्र को साधना पुरुषार्थ के मार्ग पर चलते हुए थे अपने आप मिलती हैं। इनका दुरुपयोग चूँकि वह नहीं करता–इसी कारण परम सत्ता भी अपनी ओर से कंजूसी नहीं करती। पर बच्चों के हाथ में वह कभी बन्दूक या विस्फोटक पदार्थ नहीं देती। यह एक शाश्वत नियम है–सदा से यही चला आ रहा है व हमेशा रहेगा भी। जिनने इस सिद्धियों का दुरुपयोग किया–यथा, भस्मासुर, रावण, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु आदि, अन्ततः बड़ी विपत्तिग्रस्त स्थिति में जीवित रहे और उनका बुरा अन्त हुआ। सिद्धियाँ वस्तुतः दिव्य शक्ति के वरदान हैं, बड़े उपयोगी भी हैं, पर उन्हें पाने वाला सम्भाल कर रखे, तभी तक। कहीं भी थोड़ी-सी असावधानी हुई तो इससे हानि की ही सम्भावना अधिक हैं।
आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति चमत्कार नहीं बताते। अपनी तिजोरी में बन्द विभूतियों को वे छिपाकर रखते हैं–जहाँ-तहाँ उसका प्रदर्शन नहीं करते फिरते। उपयोगी पात्र मिलने पर वे शिवाजी, विवेकानन्द, दयानन्द,जवाहर, चन्द्रगुप्त अवश्य तैयार कर देते हैं, पर ऐसे समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विरजानन्द, गाँधी व चाणक्य इसका प्रचार नहीं करते। सामान्य से असामान्य स्वयं बन जाना, औरों को भी बना देना क्या कम चमत्कार है? पर उन्हें क्या समझाया जाय जो चमत्कार का अर्थ ही करतब-सिद्धि-अजूबा मान बैठे हैं। अध्यात्म पथ पर चलने वाले हर साधक को पहले अपने मस्तिष्क में छाया सिद्धि सम्बन्धी भूल व भ्रम जंजाल निकालना पड़ता है तो ही प्रगति पथ पर आगे बढ़ने में मदद मिल पाती हैं।
इस सर्वमान्य तथ्य को भली-भाँति आत्मसात कर लेना चाहियें कि हमारा लक्ष्य आत्मबल संवर्धन है, सिद्धियों की प्राप्ति नहीं, हम मार्ग से भटकेंगे नहीं चाहे कितने ही आकर्षण मार्ग में दिखाई पड़े, हमारी श्रद्धा को हम किसी बाजीगर–से प्रभावित नहीं होने देंगे चाहे उसने कितना ही मनोवैज्ञानिक प्रभाव हम पर डाला हो तथा सदैव यह याद रखेंगे कि अध्यात्म का लक्ष्य मात्र आत्म-कल्याण–मोक्ष प्राप्ति नहीं है वरन् सत्पथ पर चलकर अन्य अनेकों को यह दिखाना भी है। साधना आरम्भ करने के पूर्व ही इस आचार-संहिता का पाठ कर लिया जाय व नित्य इसे दुहराया जाय तो कभी कहीं भटकाव की गुँजाइश शेष न रहेगी।
एकबार रामकृष्ण परमहंस से एक शिष्य ने पूछा–”गुरुदेव! क्या कारण है कि एक मंत्र, एक उपासना प्रक्रिया को अपनाते हुए भी एक चमत्कारी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है, ऋद्धियों, सिद्धियों का स्वामी बन जाता है जबकि दूसरे को कोई विशेष लाभ नहीं मिल पाता?” परमहंस ने उत्तर में एक कथा सुनायी जो इस प्रकार थी– ‘‘किसी राज्य के मन्त्री ने अपने जप, तप से विशेष आध्यात्मिक शक्ति अर्जित करली। उसकी चमत्कारी विशेषताओं की सूचना राजा को मिली। राजा ने मन्त्री को बुलाकर रहस्य पूछा तो उसने बताया, यह सब गायत्री मन्त्र की उपासना का चमत्कार है। इसकी उपासना, साधना द्वारा सब प्रकृति प्राप्त कर सकना सम्भव है। राजा ने भी मन्त्र और सम्बन्धित विधि-विधान पूछा और उपासना करने लगे। एक वर्ष तक वे जप करते रहे। पर उन्हें वह उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकीं जो मन्त्री को हुई थीं। निराश होकर एक दिन मन्त्री को बुलाकर कारण पूछा। मन्त्री ने उत्तर देने के बदले राज्य के एक किशोर लड़के को बुलाया और कहा–बेटे! राजा के गाल पर एक चपत लगाओ। अपनी आज्ञा को मन्त्री ने बार-बार दुहराया, पर बालक अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। मन्त्री की धृष्टता एवं उद्दण्डता को देखकर राजा का चेहरा तमतमा उठा। उसने लड़के को कड़े स्वर में निर्देश दिया–” इस मन्त्री को दो चपत लगाओ” लड़के ने तुरन्त दो चपत जड़ दिए। राजा का चेहरा अभी भी क्रोध के आवेश में तमतमा रहा था।
मन्त्री ने नम्रता से उत्तर दिया, “राजन! धृष्टता क्षमा करे। यह सब आपके समाधान के लिए किया गया था। आपके प्रश्न का यही उत्तर है। वाणी से कही बात अधिकारी पात्र की ही मानी जाती है। मन्त्र जप से चमत्कार पात्रता विकसित होने पर ही आता है।”
इस कथा को सुनाने के बाद रामकृष्ण परमहंस ने कहा–”उपासना का–मन्त्र जप का–चमत्कारी प्रतिफल उन्हें ही मिल पाता है जिन्होंने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परमात्मा के अनुरूप ढाल लिया हैं।”
सन्त ज्ञानेश्वर में जहाँ ज्ञान, विवेक, सदाशयता एवं सहिष्णुता की लौकिक विशेषताएँ दिखायी पड़ती थीं वहीं अलौकिक स्तर की ऋद्धि-सिद्धियों एवं चमत्कारों झाँकी भी मिलती थी। एक महिला उनकी इन उपलब्धियों से विशेष प्रभावित होकर साधना करने लगी। प्रकृति समय तक उपासना करने के बाद जब उसे कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई तो वह सन्त के पास जाकर बोली देव! भगवान भी बड़ा पाती है। वह किसी-किसी को तो ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बना देता है और किसी को प्रकृति भी नहीं देता हैं। सन्त ज्ञानेश्वर मुस्कराये और बोले–”बहिन। ऐसा नहीं है। भगवान विशिष्ट विभूतियाँ सत्पात्रों को देता है। पात्रता विकसित करके हर कोई उन्हें प्राप्त कर सकता हैं।” तो इसमें भगवान की क्या विशेषता रहीं? उसे तो सबको समान अनुदान देना चाहिए,” महिला ने प्रति-प्रश्न किया। सन्त उस समय तो चुप रहे, पर दूसरे ही दिन उन्होंने प्रातःकाल मुहल्ले के एक मूर्ख व्यक्ति को उस महिला के पास यह कहकर भेजा कि उससे सोने का आभूषण माँग लाओ।
मूर्ख ने जाकर आभूषण माँग। पर उस महिला ने झिड़ककर उसे बिना आभूषण दिए ही भगा दिया। थोड़ी देर बाद सन्त ज्ञानेश्वर स्वयं उस स्त्री के पास पहुँचे और बोले ‘आप एक दिन के लिए अपने आभूषण दे दें। आवश्यक काम करके लौटा देंगे। महिला ने बिना कोई प्रश्न पूछे सन्दूक खोला और सहर्ष अपने कीमती आभूषण सन्त को सौंप दिए। आभूषण हाथ में लिए ही सन्त ने पूछा ‘अभी-अभी जो दूसरा व्यक्ति आया था उसे आभूषण क्यों नहीं दिए। स्त्री बोली ‘उस मूर्ख को आभूषण कैसे दे दें? सन्त ज्ञानेश्वर बोले ‘बहिन! जब आप सामान्य से आभूषण बिना सोचे विचारे कुपात्र को नहीं दे सकती हैं तो फिर परमात्मा अपने दिव्य अनुदानों को कुपात्रों को कैसे दे सकता हैं। वह तो बारम्बार इस बात की परीक्षा करता है कि जिसको अनुदान दिया जा रहा है उसमें पात्रता है अथवा नहीं?
पात्रता के अभाव में साँसारिक जीवन में भी कहाँ किसी को प्रकृति विशेष उपलब्ध हो पाता हैं? अपना सगा होते हुए भी एक पिता मूर्ख गैर जिम्मेदार पुत्र को अपनी विपुल सम्पत्ति नहीं सौंपता। विशिष्ट सरकारी सेवाओं में चयन योग्यता की कसौटी पर खरे उतरने वालों का ही होता है। कोई भी व्यक्ति निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरकर विशिष्ट स्तर की सफलता अर्जित कर सकता है। मात्र माँगते रहने से प्रकृति नहीं मिलता, हर उपलब्धि के लिए मूल्य चुकाना पड़ना है। बाजार में विभिन्न तरह की वस्तुएँ दुकानों में सजी होती हैं, पर उन्हें कोई मुफ्त में कहाँ प्राप्त कर पाता है? अनुनय−विनय करने वाले तो भीख जैसी नगण्य उपलब्धि ही करतलगत कर पाते हैं। पात्रता के आधार पर शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में भी विभिन्न स्तर की भौतिक उपलब्धियाँ हस्तगत करते सर्वत्र देखा जा सकता है।
अध्यात्म क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में अध्यात्म के प्रतिफल कई गुने अधिक महत्वपूर्ण सामर्थ्यवान और चमत्कारी हैं। किन्हीं-किन्हीं महापुरुषों में उन चमत्कारी विशेषताओं को देख एवं सुनकर हर व्यक्ति के मुँह में पानी भर आता है तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है, पर अभीष्ट स्तर का आध्यात्मिक पुरुषार्थ न कर पाने के कारण उस ललक की आपूर्ति नहीं हो पाती। पात्रता के अभाव में अधिकाँश को दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों से वंचित रह जाना पड़ता है जबकि पात्रता विकसित हो जाने पर बिन माँगें ही वे साधक पर बरसती हैं। उन्हें किसी प्रकार का अनुनय-विनय नहीं करना पड़ता है। दैवी शक्तियाँ परीक्षा तो लेती हैं, पर पात्रता की कसौटी पर खरा सिद्ध होने वालों को मुक्त हस्त से अनुदान भी देती हैं। मिलता उन्हें ही है जो लौकिक कामनाओं, ऐषणाओं से मुक्त हैं, निस्पृह और उदार हैं। जिनका हृदय दया-करुणा से अनुप्राणित है। मातृवत् परदारेषु, आत्मवत् सर्वभूतेषु, की आस्था को जिन्होंने साकार कर लिया है। ऐसों पर ऋद्धि-सिद्धियों की वर्षा अपने आप देव शक्तियाँ करती हैं।
यह सच है कि अध्यात्म का–साधना का चरम लक्ष्य सिद्धियाँ–चमत्कारों की प्राप्ति नहीं हैं, पर जिस प्रकार अध्यवसाय में लगे छात्र को डिग्री की उपलब्धि के साथ-साथ बुद्धि की प्रखरता का अतिरिक्त अनुदान सहज ही मिलता रहता है, उसी तरह आत्मोत्कर्ष की प्रचण्ड साधना में लगे साधकों को उन विभूतियों का भी अतिरिक्त अनुदान मिलता रहता है जिसे लोक-व्यवहार की भाषा में सिद्धि एवं चमत्कार के रूप में जाना जाता है। पर चमत्कारी होते हुए भी ये प्रकाश की छाया जैसी ही हैं। प्रकाश की ओर चलने पर छाया पीछे-पीछे अनुगमन करती हैं। अन्धकार की दिशा में बढ़ने पर छाया आगे आ जाती है, उसे पकड़ने का प्रयत्न किया तो भी पकड़ में नहीं आती। इसी प्रकार प्रकाश अर्थात् दिव्यता की ओर–श्रेष्ठता की ओर परमात्म पथ की ओर बढ़ने पर छाया अर्थात् ऋद्धि-सिद्धियों साधक के पीछे-पीछे चलने लगती हैं। इसके विपरीत उन्हीं की प्राप्ति को लक्ष्य बनाकर चलने पर तो आत्म-विकास की साधना से वंचित बने रहने से वे पकड़ में नहीं आतीं।
दिव्यता की ओर बढ़ने का अर्थ है–अपने गुण, कर्म, आचरण में देवतत्व प्रकट होने लगे। इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ देवस्तर की बन जांय। संकीर्णता, स्वार्थपरता हेय और तुच्छ लगने लगे। समष्टि के कल्याण की इच्छा एवं उमंग उठे और उसी में अपना भी हित दिखायी दे। दूसरों का कष्ट, दुःख अपना ही जान पड़े और उनके निवारण के लिए मन मचलने लगे। सभी मनुष्य समस्त प्राणी अपनी ही सत्ता के अभिन्न अंग लगने लगें। आत्म विकास की इस स्थिति पर पहुँचे हुए साधक की, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ सहचरी बन जाती हैं। पर इन अलौकिक विभूतियों को प्राप्त करने के बाद वे उनका प्रयोग कभी भी अपने लिए अथवा संकीर्ण स्वार्थों के लिए नहीं करते। संसार के कल्याण के लिए ही वे उन शक्तियों का सदुपयोग करते हैं।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस को कितनी ही चमत्कारी विभूतियाँ प्राप्त थीं। पर उन्होंने कभी भी उनका प्रयोग व्यक्तिगत कार्यों के लिए नहीं किया। प्रख्यात है दूसरों के दुःख-दर्द मिटाने में कितनी ही बार उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग किया। असाध्य रोगी से पीड़ित रोगियों को भी कईबार चमत्कारी लाभ मिला। वे स्वयं गले के कैंसर से परेशान थे। मर्मान्तक पीड़ा गले में होती रहती थी। एकबार उनके पास शशिधर चूड़ामणि नामक एक व्यक्ति पहुँचे। उन्होंने कहा–”आप समर्थ हैं, चाहें तो अपने संकल्पशक्ति का प्रयोग करके अपने रोग को अच्छा कर सकते हैं।” परमहंस बोले–”ईश्वरीय कार्यों के लिए मिली शक्ति का उपयोग अपने इस नश्वर शरीर के लिए करूं इससे बढ़कर दुःखी की बात दूसरी नहीं होगी। यह सृष्टी के विधान का उल्लंघन हैं।”
जगत गुरु आद्य शंकराचार्य यौगिक सिद्धियों–विभूतियों से परिपूर्ण थे। दीन-दुःखियों को उनकी अलौकिक विशेषताओं का लाभ भी मिलता रहता था। वे स्वयं भगन्दर रोग से ग्रसित थे। धर्म प्रचार के लिए उन्हें अनवरत यात्रा करनी पड़ती थी। तब परिवहन और यात्रा की आज जैसी सुविधा भी नहीं थी। पैदल ही चलकर लम्बी दरिया तय करनी पड़ती थीं। ऐसे में भगन्दर की पीड़ा मृत्यु जैसी कष्ट देती थी। स्वयं कष्ट सहते रहे, पर उन्होंने कभी उस के निवारण के लिए प्राप्त दैवी शक्तियों का उपयोग नहीं किया।
अपने स्वयं के प्रति कठोर होते हुए भी महापुरुष समाज, देश एवं मानव मात्र के हित के लिए इन सम्पदाओं का उदारतापूर्वक उपयोग करते देखे जाते हैं। उन दिनों स्वामी विवेकानन्द इंग्लैंड में थे। जमशेद जी राय भी उद्योग की तकनीकी जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड के विशेषज्ञों से परामर्श लेने गये थे। उन्हें भारत में एक ऐसे स्थान की खोज थी जहाँ कि स्टील उद्योग के लिए प्रचुर परिमाण में कोयला एवं पानी की मात्रा उपलब्ध हो। लक्ष्य था, देश की समृद्धि बनाना। कार्य अत्यन्त कठिन था। भूगर्भ में दबी सम्पदा का परिचय दे सकना किसी अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति द्वारा ही सम्भव था। इंग्लैंड में ही उन्हें सूचना मिली कि स्वामी विवेकानन्द उद्बोधन देने के लिए आये हैं। उनकी ख्याति टाटा ने पहले ही सुन रखी थी। अविलम्ब स्वामी जी के पास पहुँचे तथा सहज एवं निर्मल भाव से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया। स्वामी जी की पैनी दृष्टि ने टाटा का परमार्थ भाव स्पष्ट देख लिया। उन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से टाटा को बिहार के वर्तमान जमशेदपुर स्थान का पता बताया। उल्लेखनीय है कि यह स्थान स्टील उद्योग के विकास में सर्वाधिक सहायक सिद्ध हुआ।
उपासना मार्ग पर आरुढ़ साधकों को दिव्य-अलौकिक शक्तियाँ भी मिलती हैं, पर उनके मिलने का आधार एक ही हैं–उपासना के साथ-साथ अपनी पात्रता का विकास करना। पात्रता अर्थात् अपने व्यक्तित्व को दैवी गुणों–देवत्व से परिपूर्ण बनाना। यह सम्भव हो सके तो वे विभूतियाँ अपने आप सहचरी बन सकती हैं जिन्हें विभूतियों एवं चमत्कारों के रूप में जाना जाता हैं।
फार्म–4
1 प्रकाशन स्थान–मथुरा
2 प्रकाशन अवधि–मासिक
3 मुद्रक का नाम–मृत्युँजय शर्मा
क्या भारत का नागरिक है –हाँ
पता – जन–जागरण प्रेस, वाटी वाली कुँज, वृन्दावन दरवाजा, मथुरा।
4 प्रकाशक का नाम–मृत्युञ्जय शर्मा
क्या भारत का नागरिक है –हाँ
पता – अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
5 सम्पादक का नाम – माता भगवती देवी शर्मा
क्या भारत का नागरिक है – हाँ
पता –शान्ति कुँज, हरिद्वार
6. उन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार पत्र के स्वामी हों तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के हिस्सेदार हैं– मृत्युँजय शर्मा
मैं मृत्युँजय शर्मा एतद्द्वार घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं।
प्रकृति का अन्तराल अपार विद्युत सम्पदा से भरा हुआ है। जब से मानव की अन्वेषण बुद्धि जागृत हुई, उसने इस विपुल सामर्थ्य की जानकारी एवं सदुपयोग में स्वयं को लगाया तथा उसे अपना घनिष्ठ सहयोगी बना लिया। वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी उतनी ही ऋण विद्युत से युक्त है। 5 वोल्ट प्रति मीटर की औसत से विद्युत का दबाव पृथ्वी के हर जीवधारी पर 60 किलोमीटर ऊँचाई पर अवस्थित आयनोस्फियर की सबसे निचली परत से सतत् बना हुआ है। यह भण्डार कितना समर्थ व सशक्त है, उसकी कल्पना मात्र से वैज्ञानिक हतप्रभ हैं। यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि मानवी काया एक अच्छी विद्युत चालक हैं। ऊपर उल्लिखित विद्युत दबाव मानव शरीर में एक विद्युतधारा को प्रवाहित करता है जिसका सूक्ष्मतम उपकरणों द्वारा मापन भी कर लिया गया है और यह लगभग 10 पर ऋण सोलह घात एम्पियर सेकेंड प्रति वर्ग सेण्टीमीटर बैठती हैं। मोटे अनुमान से लगभग दस पीको एम्पियर की ताकत (एक एम्पीयर का एक अरबवाँ भाग) का यह विद्युत्प्रवाह नगण्य-सा दिखाई पड़ता है, पर वस्तुतः तथ्य प्रकृति और ही है। यह कितना सामर्थ्यवान हो कसता हैं, इसकी चर्चा करने से पूर्व मानवी काया के प्रकृति अदृश्य सूत्रों की मोटी रूपरेखा जान लेना समीचीन होगा।
यहाँ जिस वैज्ञानिक विवेचन की चर्चा की गयी है, उसका आशय है मनुष्य के इस सूक्ष्म काय-कलेवर की खोज, जो विद्युत एवं चुम्बकत्व के रूप में हर काया में विद्यमान है और जिसे घटा-बढ़ाकर मानवी काया को सामर्थ्यवान तथा परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा सकता है। यह विद्युत शक्ति ही जीवधारियों के शरीर संस्थान व मनःसंस्थान का मूल प्राण-प्रेरक बल कहा जा सकती हैं। वैज्ञानिक तो मात्र उतना ही जान पाये हैं जितना मापा जा सका या देखा जा सका, पर ऐसा भी प्रकृति अदृश्य इस ढाँचे में विद्यमान है जो भौतिकी के सिद्धान्तों के आधार पर अति सामर्थ्यशाली पॉवर हाउस के रूप में सिद्ध किया जा चुका है। मानव शरीर को एक प्रकार का महासागर कह सकते हैं जिसमें असंख्यों नस-नाड़ियाँ, नदी नालों की तरह बहती हैं, श्वास-प्रश्वास के रूप में ज्वार-भाटे उठते रहते हैं। अब तो समुद्र में उठने वाले साइक्लोन्स व ज्वार-भाटों से भी विद्युत उत्पन्न करने की तकनीक खोज कर ली गयी है, परन्तु मानव शरीर एक मिनट में 15 से 15 बार जो श्वास-प्रश्वास लेता-निकालता रहता है उससे वायुमण्डल से विद्युत आयनों का अन्दर प्रवेश एवं उसके शक्तिशाली विद्युत संचार के रूप में सारे शरीर में प्रवाहित होने की जानकारी सनातन काल से मनीषियों की है। मस्तिष्क रूपी जेनरेटर और हृदय रूपी विद्युत उत्सर्जन केन्द्र मिलकर जिस स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करते है, वह सारे जीवकोषों में समान रूप से प्रवाहित होकर प्रकृति स्थान विशेषों पर प्रचुर मात्रा में विद्यमान पायी गयी है। इस सूक्ष्म स्तर की विद्युत व चेतन स्तर की प्राणसत्ता का जब मिलन संयोग होता हैं तो यही समन्वित स्वरूप व्यक्ति विशेष के आस-पास परिलक्षित होने वाले आकर्षण क्षेत्र के रूप में प्रकट होता है। यह एक सुविदित तथ्य है कि जहाँ विद्युतधारा प्रवाहित होती है वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है। इसी चुम्बकीय क्षेत्र को ‘आँर’ या तेजोवलय नाम से पुकारते हैं।
यान्त्रिक दृष्टि से तो चुम्बक शब्द से सामान्य अर्थ लोहे के कणों को आकर्षित करने वाले चुंबक से किया जाता है जिसे ‘मैग्नेट कहते हैं। पर उसकी चर्चा जब जीवधारियों के संदर्भ में होती है जो उसे ऐसी सचेतन विद्युत के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं जो न केवल पदार्थ-परमाणुओं को वरन् वातावरण में अपने प्रवाह को फेंकती और सजातीय जीवधारियों को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रभावित करती पायी जाती हैं। यदि इस आणविक ऊर्जा प्रवाह तथा चेतना में संव्याप्त प्राण तत्व के सम्मिश्रण से उत्पन्न ब्रह्मवर्चस् की सामर्थ्य को किसी प्रकार डडडड सके तो यह मानवी सत्ता की सबसे सशक्त -विभूति-सम्पदा कही जा सकती हैं। आध्यात्मिक भाषा में जिसे तेजी डडडड कहते हैं और योगियों, देवपुरुषों के आस-पास जो इस स्तर का चुम्बकत्व पाया जाता है वह इसी सामर्थ्य, के कारण है। मनीषी बताते हैं कि वह वैयक्तिक चुम्बकत्व विचार शक्ति के माध्यम से अपने ऊपर– संपर्क क्षेत्र में तथा समस्त ब्रह्माण्ड में उत्पन्न होने वाले संक्षोभों के आधार पर अनुभव किया जा सकता है। इसी शक्ति के सहारे अतीन्द्रिय क्षमताएँ उभरती है और ब्रह्माण्डीय चेतन प्राण प्रवाह के साथ संपर्क मिलाते हुए सूक्ष्म जगत की गतिविधियों को समझ सकना सम्भव हो पाता है।
ब्रह्म की अंशधर जीवसत्ता का चिन्तन परक तथा संवेदनात्मक गतिविधियों का उभार एवं अवसाद इसी प्राण शक्ति पर निर्भर है जो अपने सूक्ष्म रूप में प्राण प्रवाह का स्वरूप लेकर जीवकोषों–ऊतकों से लेकर मस्तिष्क–सुषुम्ना के स्नायु सिनेप्सों तक तथा एन्जाइम केमीकल्स के रूप में ग्रन्थि उपत्यिकाओं तक इसी प्रकार संव्याप्त हैं, जैसे समुद्र में घुला नमक। इस प्राण शक्ति की प्रखरता ही शरीर में चारों ओर वितरित-विस्तारित होकर मनुष्य को ओजस्वी बनाती है। मनःसंस्थान में गतिमान होने पर उसे मनस्वी तथा अन्तःकरण में सक्रिय होने पर मनुष्य को तेजस्वी बनाती है।
ऐसे व्यक्ति जिनमें तीनों ही काया के स्तर समुचित रूप से प्रभावित हो सक्रिय होते हैं–अपने आत्मतेज से समीपवर्ती वातावरण को भी प्रभावित करते, हैं। इन आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों के समीप आने पर एक विचित्र-सा आकर्षण, खिंचाव प्रतीत होता हैं। उनकी आँखों, वाणी चेहरे की भाव-भंगिमाओं, हाथों-उंगलियों से मानों ऊर्जा का प्रवाह निरन्तर गतिशील बना रहता है। महामानव, ऋषि, देवदूत अवतारी महापुरुष ऐसे ही होते हैं। उनके समीपस्थ वातावरण ऐसा बन जाता है कि व्यक्ति नजदीक आने पर अपने अन्दर भी उत्कृष्टता के भाव बढ़ते अनुभव करता है। इसके विपरीत अपराधी, छली, द्विमुखी व्यक्तित्व वाले, हीन-निषेधात्मक चिन्तन प्रधान, कामुक–लम्पटों के चेहरे–शरीर से एक अलग प्रकार का विकर्षण करने वाला (रिपेलिग) प्रवाह निस्सृत होता है। ऐसे व्यक्तियों से दूर रहने को ही मन करता है, साथ ही आस-पास का वातावरण तक वे अभिशप्त बना डालते हैं–यह सारी मानवी विद्युत–चुम्बकत्व-प्राण प्रवाह से युग्म की न्यूनाधिकता की ही परिणति है।
यह एक डडडड तथ्य है कि हर व्यक्ति अपने इस चुम्बकत्व को ब्रह्मवर्चस् को साधना-उपचारों के माध्यम से बढ़ाते रह सकता है। शरीर में सतत् प्रवाहित इस प्राण प्रवाह का ही कमाल है कि व्यक्ति स्वयं को समर्थ आत्मबल अनुभव करता है। मानवी अन्तराल की इस सूक्ष्म संरचना की जानकारी व कैसे इस प्रवाह को बढ़ाया जाय इनका अध्यात्म शास्त्र के ग्रन्थों में विशद रूप में विवेचन किया गया है। ओजस्, तेजस्, वर्चस् को उभारने की विधाओं का ही साधना उपक्रमों के माध्यम से ऊहापोह किया जाता है। ध्यानयोग, क्रियायोग प्राणयोग इत्यादि की साधनाओं के माध्यम से जिन उपचारों का वर्णन व साधकों का मार्गदर्शन प्रस्तुत विशेषांकों में किया जा रहा है, वे इस आध्यात्मिक कायकलेवर की क्षमता–मानवी चुम्बकत्व के सम्वर्धन से ही सम्बन्धित हैं। यह उचित समझा गया कि साधकों को इस सूक्ष्म काय-कलेवर की भी जानकारी करायी जाय जिसे माइाक्रो–सटलर (अति सूक्ष्म) कहा जा सकता है व जिसकी विकृति से ही अदृश्य रूप में रोगों का आक्रमण तथा जिसके परिष्कार-सम्वर्धन से व्यक्तित्व में आकर्षण, ऋद्धि-सिद्धियों का प्रवेश सम्भव हो पाता है। यह सारी आध्यात्मिक संरचना पूर्णतः विज्ञान सम्मत है, सारे भौतिकीय व गणितीय प्रमाण इसकी पुष्टि भी करते हैं।
भूमण्डल पर बैठा मनुष्य वातावरण से न जाने क्या-क्या अदृश्य प्रवाह ग्रहण करता व उन्हें विसर्जित करता रहता है। गामा, बीटा, लेसर एक्स किरणों तथा इंफ्रारेड अल्ट्रावायलेट स्तर की तरंगों की शक्ति वायुमण्डल में काम करती रहती है। इन सबका ही समग्र समावेश मानवी काया में भी है। स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में बँधा होने के कारण ससीम है, पर सूक्ष्म शरीर में इन शक्तियों की कोई सीमा नहीं। बाहर से एक जीवधारी नजर आते हुए भी इसी कारण मनुष्य असीम सामर्थ्यों का पुँज है। चूँकि वे प्रसुप्त पड़ी रहती हैं व उन्हें बाहर से ग्रहण करने का भी कोई आधार नहीं बन पाता, सामान्य जन इस शक्ति स्रोत का लाभ नहीं उठा पाते। डडडड डडडडड डडडड डडड
पृथ्वी पर जिस भूमण्डलीय दबाव तथा विद्युत विभव के आकर्षण क्षेत्रे में जीवधारी रहते हैं वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर रुपो जेनरेटर तथा मनःसंस्थान की विद्युत को सक्रिय बनाये रखने के लिये वह अत्याधिक आवश्यक है। यह विशेषकर तब देखा गया जब अन्तरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी के वातावरण से दूर भेजा गया व उनमें स्फूर्ति का अभाव, निर्णय लेने में अक्षमता व अत्याधिक शारीरिक थकान पाई गयी। कृत्रिम रूप से अन्तरिक्ष यानों के अन्दर जब ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की गयीं जैसी पृथ्वी पर होती हैं, तब ये लक्षण समाप्त हो गये। इससे स्पष्ट होता है कि मानव जिस वातावरण में रहता है, वहाँ से विद्युत्बल अपने अन्दर अवशोषित कर निरन्तर सक्रिय बना रहता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक द्वय डाण्डेनियल एवं कार्ट वर्ग ने तो यह भी सिद्ध कर दिया है कि मानव का दीर्घजीवन तथा प्रजनन क्षमता अदृश्य बाह्य क्षेत्रों से आ रही विद्युत वर्षा पर निर्भर है। आज के आधुनिक युग में आयुष्य कम होने व नपुँसकता बढ़ने का कारण वे वातावरण की विद्युत में सतत् कमी व मनुष्य की कृत्रिमता को अपनाने के कारण जो प्रकृति भी उपलब्ध है, उसे ग्रहण करने में अक्षम बताते हैं।
इस विशाल विद्युत को, जिसके मध्य हम सब बैठे हैं–वैज्ञानिक ‘ग्लोबल केपेसीटर’ कहते हैं। यह शान्त नहीं बैठा रहता वरन् उसमें प्राकृतिक हलचलें व विद्युत स्खलन निरन्तर होता रहता है। इस ‘केपेसीटर’ से जो तरंगें निस्सृत होती है। उनकी मूल आवृत्ति लगभग 7-8 तरंगें प्रति सेकेंड होती है। वे पृथ्वी सतह तथा आयनों स्फियर के बीच निरन्तर गुंजायमान होती रहती है। इन तरंगों को ‘शूमेन रेजोनेन्स भी कहते हैं और यह एक अद्भुत साभ्य हैं कि हमारे मस्तिष्क की विद्युत तरंगें इनसे हर गुण में मिलती-जुलती हैं। एक ही आवृत्ति फ्रिक्वेन्सी) पर दोनों चलायमान हैं। श्री आर. ए. वेद ने तो अपनी पुस्तक “दि सर केडियन रिदम्स ऑफ मैन” में यहाँ तक सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य के रिद्म (क्रिया-कलाप) विद्युतीय क्षेत्रों और विद्युत चुम्बकीय तरंगों से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं तथा आस-पास के वातावरण को अपने अन्दर चलायमान इन हलचलों से प्रभावित करने में भी पूर्णतः सक्षम होते है।
इसके अतिरिक्त मनुष्य जिस धरती पर रहता है उसके गर्भ में एक प्रचण्ड प्रभावशाली विद्युतीय शक्ति क्षेत्र पाया गया है। प्रति वर्ग सेण्टीमीटर एक एम्पियर के लगभग प्रवाहित यह शक्ति धारा सारे पृथ्वी क्षेत्र में कुंडलाकार व्याप्त होने के कारण कई गुना हो जाती व चुम्बकीय–विद्युतीय तूफानों का रूप ले लेती है और मानवी काया के हर अंग अवयव को, जीवकोषों, रक्त कोषों तथा चक्र–उपत्यिकाओं को प्रभावित करती हैं। रूस में इस दिशा में परामनोवैज्ञानिक शोधों ने बताया है कि अतीन्द्रिय क्षमता का जागरण बहुत प्रकृति अपने अन्दर के प्रवाह का इस चुम्बकीय धारा से साम्य बिठाना सम्भव है।
ऊपर वर्णित गूढ़ वैज्ञानिक विवेचन का सार समझने का प्रयास करें तो हम प्रकृति निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। ब्रह्माण्ड में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सत्ता विद्यमान है जो ग्रह नक्षत्रों की भ्रमणशीलता और आकर्षण शक्ति के उभय-पक्षीय प्रयोजन तो पूरा करती ही है, साथ ही अणु जगत की हलचलों के लिये भी जिम्मेदार होती है। ईथर के ब्रह्माण्डव्यापी महासागर पर इसी विद्युत चुम्बक का आधिपत्य छाया है। यह जड़ शक्ति नहीं है वरन् प्राण शक्ति का प्रवाह है। अणु परमाणुओं की संरचना व गतिविधियों के रूप में हर जीवधारी के अन्दर वह दृश्यमान होती है।
यह प्राण एक चेतन ऊर्जा है जो मनुष्य में काया के इर्द-गिर्द फैली दिखाई देती है। इसे ही तेजोवलय कहते हैं। विश्वव्यापी महाप्राण के वैभव भण्डार से हर जीवधारी अपनी-अपनी पात्रता के अनुसार इसे पाते रहते हैं। यह मानव के लिये ही सहज सम्भव है कि वह प्रयत्न करे उत्साह सँजोये और संकल्पबल के माध्यम से इस समष्टिगत प्राण प्रवाह को अधिकतम अपने अन्दर खींच सके।
इस प्राण-चुम्बक को काया में प्रविष्ट कर कैसे प्रयोग किया जाता है उसे जानने से पूर्व मानवी काया की संरचना की भी थोड़ी जानकारी ली जाय। मनुष्य शरीर लगभग 75 हजार अरब कोषों का समन्वय है। हर जीवकोष के आर–पार 60 से 90 वोल्ट का विद्युत डिडडभव होता है। इस प्रकार मानव शरीर एक शक्तिशाली साधन सम्पन्न बिजलीघर है। हर अवयव की गतिविधि-हृदय की धड़कन, मांस–पेशियों का आकुँचन–प्रकुँचन, मस्तिष्क में संदेशों व प्रेरणाओं का आवागमन, अंतःस्रावी क्रिया-कलाप हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने वायु मण्डल से ऋण विद्युत आयनों को श्वास द्वारा सोखता रहता है। ये आयन (विद्युत आविष्ट कण) रक्त के माध्यम से शरीर के सभी भागों में फैलकर समस्त ऊतकों और कोषों को ऋण विद्युत से संतृप्त कर देते हैं। ये विद्युत आयन त्वचा से निष्कासित हो वातावरण में फैल जाते हैं। इस प्रकार वैज्ञानिक फ्रेडब्लेस के अनुसार शरीर में एक विद्युत चक्र सतत् चलता रहता है।
सुषुम्ना को वैज्ञानिक स्थायी विद्युतीय द्विध्रुव केन्द्र (पैरमानेन्ट इलेक्ट्रिक डायपोल) मानते हैं। इसका निचला भाग जो मूलाधार चक्र में अवस्थित है। (काँडा इक्वाइना स्थित) ऋण विद्युत आवेशयुक्त तथा ऊपरी सिरा सहस्रार (सेरिब्रम स्थित) धन विद्युतधारी है। असामान्य स्थिति में यह ग्वाह नीचे से प्रबल होकर उल्टी दिशा में अर्थात् ऊपर की ओर ऊर्ध्वगमन करता बह सकता है व मस्तिष्क को सतत् जागृत व अति सामर्थ्यवान बनाये रख सकता है- वैसे सामान्यतः जीवधारियों में इसका प्रवाह ऊपर से नीचे होता है। मात्र मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि वह प्राण प्रहार–विद्युत केन्द्रीकरण के माध्यम से लोअर पोल को सशक्त बनाकर अपने प्रवाह को क्षरण से रोककर ऊर्ध्वगमन की ओर दौड़ा दे। वैज्ञानिकों का चिन्तन अभी इस विषय में और भी सम्भावनाओं को लेकर गतिशील है और अध्यात्म विज्ञान तो इन मान्यताओं को पहले से ही प्रतिपादित करता आया है कि ओजस् का संग्रह किया जाता है व यही मनःशक्ति –संकल्पबल को बढ़ाकर मनुष्य के तेजोवलय को प्रभावशाली बना देता है। यह ‘आँरा’ और प्रकृति नहीं त्वचा से, आँखों से, वाणी से सतत् प्रवाहित होते रहने वाला विद्युत्प्रवाह ही है।
शरीर में कुल मिलाकर 1 लाख वोल्ट प्रति मेण्टी मीटर करा विद्युत दबाव होता है। अन्य जीवधारियों की भाँति यह भी श्वास से, त्वचा से, जननेन्द्रियों से क्षरित हो वातावरण में बहता रहता है। यदि इस विद्युतधारा को सुनियोजित किया जा सके तो इसी से उस चुम्बकत्व का निर्माण किया जा सकना सम्भव है जो व्यक्ति को आकर्षक शक्ति सम्पन्न बनाता है। मनःक्षेत्र में यही साहस, विवेक, सन्तुलन आदि गुणों के रूप में तथा अन्तः क्षेत्र में सम्वेदनाओं–आत्मबल–ओज–के रूप में विकसित होकर समीपवर्ती लोगों पर गहरी छाप छोड़ता है। ऐसे व्यक्तियों का लोग अनुगमन करने को बाध्य होते हैं।
ध्रुवीय प्रदेशों में जिस प्रकार चुम्बकीय तूफानों का प्रकाश “अरोरा बोरिएलिस” के रूप में छाया रहता है, उसी प्रकार महापुरुषों का चुम्बकत्व–विद्युत ऊर्जा के प्रकाशवलय के रूप में उनके चतुर्दिक् व्याप्त रहता है। यह प्रकाश वलय भी आन्तरिक चुम्बकत्व व विद्युत प्रवाहों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। तत्वदर्शी–मनीषी किसी व्यक्ति के चतुर्दिक् व्याप्त इसी तेजोवलय से उसका आन्तरिक चेतना स्तर व अन्तःकरण में जन्म ले रही प्रवृत्तियों की झाँकी देख लेते हैं।
ब्रह्मतेजस् संवर्धन की इस विद्या को और विस्तार से समझने के लिये आध्यात्मिक काय-कलेवर के सूक्ष्म पक्ष को अभी और भी खोलना है, उसके विभिन्न प्रसुप्त पक्षों पर वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन किया जाना है। साधना विज्ञान के वटवृक्ष की जड़ों के रूप में इस विद्या को उपमा दी जा सकती है। इसका ज्ञान भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि साधना उपचारों के विभिन्न पक्षों का। इसी लेखमाला में आगे इस सूक्ष्म संरचना को और विस्तार से समझाने का प्रयास किया जायेगा।
(क्रमशः)
अन्तःकरण का मनःसंस्थान पर, मनःसंस्थान का शारीरिक स्थिति पर, शारीरिक स्थिति का क्रिया-कलाप पर और क्रिया-कलापों का परिस्थिति पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। इस रहस्य को समझा जा सके तो वह स्वीकार करने में किसी को भी कठिनाई का सामना न करना पड़ेगा कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है, इस तथ्य को भलीभाँति हृदयंगम किया जा सके तो फिर जिस-तिस पर दोषारोपण की आवश्यकता ही न रह जायेगी। फिर परिस्थितियों की प्रतिकूलता को भी उतना दोषी न ठहराया जा सकेगा जितना कि बात-बात में इन दिनों जन साधारण द्वारा किया जा रहा है। सारी असफलताओं और कठिनाइयों के लिये इन्हीं परिस्थितियों को दोषी ठहराने वालों को फिर अभागा ही कहा जायेगा।
अध्यात्म का तात्पर्य है–अपने आपे का स्वरूप समझने, उसे बलिष्ठ विकसित करने की विद्या। यही है उसका उद्देश्य एवं प्रयोगोपचार। विडम्बना यह है कि इन दिनों उसे बाह्योपचारों–पूजा कर्मकाण्ड आदि के माध्यम से अमुक देवी-देवता को वशवर्ती बनाकर चित्र−विचित्र मनोकामनाओं की पूर्ति जादूई ढंग से करा लेने की कल्पना जल्पना भर माना जाता है। पर इससे क्या? भ्रान्तियाँ मात्र भटकाव उत्पन्न कर सकती हैं। उनसे प्रकृति प्रयोजन थोड़े ही सधता है। जिन्हें भी आत्म विज्ञान में तात्विक अभिरुचि है, उन्हें यही समझना होगा कि आत्मनिर्माण के लिये किया गया पुरुषार्थ ही उलझी हुई समस्याओं का समाधान है। इस पुरुषार्थ के लिए आत्मावलम्बन-आत्मविश्वास और आत्मानुभूति की दार्शनिक पृष्ठभूमि होनी चाहिए।
आत्मबोध को मानव जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि माना गया है। इसी के आधार पर मनुष्य अपनी सत्ता, महत्ता, क्षमता एवं सम्भावना का मूल्याँकन कर सकने में समर्थ होता हैं। इसी अनुभूति के साथ वह पराक्रम शीलता उभरती है जिसके सहारे व्यक्ति अपने जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों को समझता, उनकी हानियों को अनुभव करता तथा उन्हें उखाड़ने के लिये कृत संकल्प हो जाता है। वस्तुतः इस उखाड़-पछाड़ने की प्रक्रिया–अपने आप से संघर्ष में जितना पराक्रम लगता है उतना ही अनगढ़ मन को उत्कृष्टता के पक्षधर अनभ्यस्त आधारों को अपनाने के लिये मनाने व स्वभाव का अंश बना लेने की मंजिल पूरी करने में नियोजित करना पड़ता है। अपने हाथों अपने आपको ढालना बहुत बड़ा काम है। दिखने में सामान्य यह पुरुषार्थ एक असाधारण आत्मबल संकल्प शक्ति का सम्पादन चाहता है। इस आत्मबल की प्राप्ति-उसे धारण करने की सामर्थ्य की उपलब्धि तथा तदुपरान्त अभिवर्धन करने के लिये ही विभिन्न तप साधनाओं की आवश्यकता पड़ती हैं।
आर्ष ग्रन्थों में वर्णित तप तितिक्षाओं चांद्रायण जैसी कठोर तपश्चर्याओं, ध्यानयोग-प्राणयोग की साधनाओं कुसंस्कार उन्मूलन तथा सुसंस्कारिता संवर्धन–आत्मपरिष्कार के द्विविधि प्रयोजन साथ-साथ पूरे होते रह सकें। इन्हें परम्परागत धर्मानुष्ठानों से अलग ही माना जाय। इन उपचारों के पीछे ऐसे तथ्यों का समावेश है जिनका प्रतिफल उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध हो सके। ये साधना उपक्रम मूलतः आस्था परक हैं। इनमें श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा को प्रभावित करने वाली, अन्तराल को उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाली क्रिया-प्रक्रिया का समावेश अत्यन्त दूरदर्शिता एवं एक तत्वान्वेषी सूक्ष्म बुद्धि के साथ किया गया है।
आज तो परिस्थितियों को ही सब प्रकृति मानने वाले-साधनों को ही सौभाग्य समझने वाले लोगों को नये सिरे से अध्यात्म की वर्णमाला पढ़ानी पड़ेगी और सिद्ध करना पड़ेगा कि परिस्थितियाँ एवं सम्पन्नताएँ मानवी प्रगति की आवश्यकता का एक बहुत छोटा अंश पूस करती हैं। समस्त विभूतियों का उद्गम तो मानवी अन्तराल है। उसे सम्भाला, सुधारा जा सके तो सुखद सम्भावनाओं का स्रोत हाथ लग जायेगा और फिर किसी बात की कमी न रहेगी। पाताल फोड़ कहे जाने वाले कुंओं को चट्टान के नीचे वाली जलधारा का अवलम्बन मिलता है। फलतः निरन्तर पानी खींचते रहने पर भी उनकी सतह घटती नहीं जितना खर्च होता है उतना ही उछलकर ऊपर आ जाता है।
मनुष्य को अनेक क्षेत्रों में काम करना पड़ता है। इसके लिये अनेक प्रकार की शक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। स्वास्थ्य संवर्धन के लिये एक प्रकार की, तो बौद्धिक क्षमता का विकास करने के लिए दूसरे प्रकार की। सूझ-बूझ एक बात है और व्यवहार कुशलता दूसरी। विद्वता एक चीज है और एकाग्रता का स्वरूप दूसरा है। कलाकारों का ढाँचा एक प्रकार क होता है और योद्धाओं का दूसरा। इन सभी को अपने-अपने ढंग की शक्तियाँ चाहिए। उनके अभाव में सफलताएँ तो दूर, प्रकृति कदम जागे बढ़ चलना तक सम्भव नहीं हो पाता। कहना न होगा कि असंख्य सामर्थ्यों का असीम भाण्डागार मनुष्य के अन्तराल में विद्यमान है। यह चेतना क्षेत्र का एक बृहत्तर महासागर है, जिसमें हर स्तर की सामर्थ्यों की खोज निकाली जा सकती हैं। दृश्यमान समस्त विभूतियों–सफलताओं का उपार्जन एवं उपयोग इसी आत्मबल रूपी सामर्थ्य के सहारे सम्भव हो पाता है। उसके अभाव में तो अधिकाँश पर जीवित मृतकों जैसी अशक्तता ही छायी रहती हैं।
ऊपर वर्णित इन तथ्यों–अध्यात्म विद्या के मर्म सार, सहसा, विश्वास नहीं होता। इन दिनों आत्मा का अस्तित्व तक संदिग्ध माना जाता है और इस विद्या में सन्निहित सामर्थ्यों के प्रभाव पर अविश्वास भी किया जाता है। ऐसी दशा में यह एक अत्यन्त दुष्कर कार्य है कि प्रत्यक्षवादी समझे जाने वाले बुद्धिजीवी वर्ग को यह विश्वास दिलाया जा सके कि वे अन्तः की सामर्थ्य का महत्व समझें और उसके उपार्जन का सच्चे मन से प्रयास पुरुषार्थ करें। यदि यह तथ्य इस समुदाय के गले न उतारा गया तो साधना उपचार की, अध्यात्म विज्ञान की कोई भी क्रिया प्रक्रिया उथले मन से लकीर पीटने की तरह ही किसी प्रकार धकेली-घसीटी जाती रहेगी। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में उत्कृष्टता के पक्षधर प्रयासों के साथ तादात्म्य जुड़ सकना कठिन है। मात्र पशु-प्रवृत्तियों में वह आकर्षण है कि वे व्यक्ति को वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिये उत्तेजित करती व उससे कुकर्मी कराती रहें। आज इस चिन्तन से विरत किये जाने के लिये अध्यात्म की वैज्ञानिकता सिद्ध करने की अनिवार्यता और भी बढ़ गयी है।
मूर्धन्य तत्त्वदर्शियों के अतिरिक्त गहराई में उतर कर कौन समझे और कौन समझाये? ऐसी दशा में आत्मिकी प्रयोगों की परिणति का स्वरूप समझना एक अत्यन्त जटिल प्रक्रिया है। यह कठिनाई बनी ही रहेगी कि यदि आत्मिकी के प्रयत्नों की प्रतिक्रिया को उपयोगी उत्साहवर्धक न माना गया तो फिर सर्वसाधारण के लिये यह अति कठिन होगा कि वे परिपूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ उस क्षेत्र में आगे बढ़े।
इस असमंजस के निवारण हेतु ही ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में प्रयोग परीक्षण का क्रम बिठाया गया है जिसमें साधकों की आस्था एवं प्रयत्नों की गम्भीरता तथा तद्जन्य प्रतिक्रिया को वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे परखा जाता है। किस प्रयोग का शरीर एवं मन के किस क्षेत्र पर कितना, किस स्तर का प्रभाव पड़ा, इसका विवरण प्रस्तुत कर सकने वाले बहुमूल्य वैज्ञानिक उपकरण यहाँ देश-विदेश से माँगकर लगाये गये हैं, ताकि उनकी साक्षी से यह जाना जा सके कि साधनारत व्यक्ति अपने प्रयत्नों का समुचित प्रतिफल प्राप्त कर रहे हैं या नहीं। इस व्यवस्था की आवश्यकता न केवल आस्था क्षेत्र के प्रयत्नों की परिणति जानने के लिये करनी पड़ी है वरन् इसलिये भी कि साधक का शारीरिक, मानसिक व अन्तःकरण का स्तर जाँचा जा सके और तद्नुसार निराकरण–उपचार सुझाया जा सके।
प्रयोग के फलदायी-आशाप्रद परिणाम सामने आर है–समय-समय पर साधना प्रशिक्षण मार्गदर्शन के साथ-साथ उन निष्कर्षों को भी इस पत्रिका में प्रकाशित किया जाता रहेगा। निश्चित ही इससे आध्यात्मिकता के पक्षधर सभी तर्कों, तथ्यों को प्रमाणों का बल मिलेगा।
अन्तर्ग्रही प्रवाह अपना प्रभाव धरती के वातावरण, पदार्थ तथा जीवधारियों पर डालते हैं, इस सम्बन्ध में अधिसंख्य वैज्ञानिक अब एकमत हैं। सौर मण्डल से जो विकिरण प्रवाहित होते हैं, उन्हें पृथ्वी अत्याधिक संवेदनशील होने के कारण ग्रहण करती हैं और परिणाम स्वरूप इसके वातावरण में व्यापक परिवर्तन होते हैं। एस्ट्राँनामी वलाँजी में यों मतभेद तो बहुत समय से चलता आ रहा है, पर इन दिनों एक ऐसा घटनाक्रम घटित हो रहा है जिसने इन दोनों कों एक मंच पर ला खड़ा किया है। दोनों ही परोक्ष रूप से एक ही बात कह रहे हैं, पर कहने का ढंग अलग है।
यह विलक्षण अन्तर्ग्रही योग है डडडड ग्रहों का एक साथ एक ओर इकट्ठा हो जाता है जो फरवरी-मार्च 1982 में सम्भावित है। इसे जुबिटर इफक्ट नाम से गत 2-3 वर्षों से सम्बोधित कर–इस पर काफी मत व्यक्त किये गये हैं तथा विभीषिकाओं से लेकर सामान्य मौसम परिवर्तन तक की अलग-अलग चर्चाएँ की गयी हैं। इसी नाम से जॉन ग्रिबिन, स्टीफेन एच. प्लेजमान तथा जॉन एबडन ने एक पुस्तक भी लिखी है, जिसकी विज्ञान जगत में काफी चर्चा है। इन तीनों ने अपने वर्षों के अनुसंधान के आधारों पर घोषणा की है कि “सन् 1982 में नौ ग्रह सूर्य की एक सीध में आ जायेंगे। हमारे शनि, यूरेक्स, वरुण और प्लूटो के सूर्य के एक और इकट्ठा हो जाने पर सूर्य की गतिविधियों में असाधारण परिवर्तन होंगे। सारी पृथ्वी पर भयंकर तूफान भूकम्प, अकाल-सूखा, बाढ़ आदि प्राकृतिक विपदाएँ इसी असाधारण सौर-गतिविधि की परिणति स्वरूप घटेंगी।”
इन सब विवेचनों को खगोल वैज्ञानिकों ने सही माना है और कहा है कि नौ ग्रहों का ऐसा संगम हर 179 वर्ष में एक बार होता है। पिछली बार जब भी ऐसा हुआ, पृथ्वी पर असाधारण घटनाएँ घटी हैं। इन वैज्ञानिकों का, जो अपने-अपने क्षेत्र के लब्ध, प्रतिष्ठित विद्वान हैं, कथन है कि ग्रहों की एक सीध में आने से सूर्य के अन्दर प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान उठ खड़े होंगे, साथ ही सौर कलंकों की संख्या भी बढ़ जायेगी। इन दो परिवर्तनों के साथ इस वर्ष जो सात ग्रहण एक साथ आ रहे हैं वे भी अभूतपूर्व हैं।
इन सबकी सम्मिलित प्रक्रिया क्या होगी? क्या अष्टग्रही योग की चेतावनी की तरह यह नवग्रही योग भी मात्र विनाश की चेतावनी का हल्ला मचाकर चला जायेगा अथवा वास्तव में प्रकृति परिवर्तन होंगे जिनसे मानव जाति को हानि पहुँच सकती हैं, इस सम्बन्ध में काफी मत व्यक्त किये गये हैं। प्रकृति का कहना है कि प्रशान्त महासागर डडडड के सीमावर्ती क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित होगा। इस हिस्से में भूकम्प, विनाश कारी बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाएँ घटने की की सम्भावना है। अंतर्ग्रही परिवर्तन से पृथ्वी के अन्दर भी तीव्र परिवर्तन होंगे तथा पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी लीलाएँ होंगी। जुपीटर इफेक्ट के लेखकों का तो कथन है कि इस क्षेत्र विशेष में (उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका तथा प्रशान्त महासागर) जो भूकम्प आएंगे वे कई शताब्दियों की तुलना में अत्यधिक संहारकारी होंगे। वैसे यह भविष्यवाणी जियोलॉजिस्टों की भी है जो सीस्मोग्राफी” की अपनी विद्या द्वारा किसी भी क्षेत्र विशेष में भावी भूकम्पों की भविष्यवाणी करते हैं।”
एक अनुमान के अनुसार प्रतिदिन 2 हजार से भी अधिक भूकम्प हमारी पृथ्वी पर आते हैं, जिनमें से 95-97 प्रतिशत बहुत ही हल्के होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में विकसित तकनीकी ज्ञान के सहारे वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि जब भी सौर कलंक बढ़ते हैं, तूफान व्यापक स्तर पर पृथ्वी के गर्भ में जन्म लेते हैं व यही भूकम्पों का कारण बनते हैं। हर 11 वर्ष की अवधि पर आने वाले ये सौर-कलंक इस वर्ष अपनी चरम सीमा पर हैं। प्रतिवर्ष 10-12 बड़े भूकम्प तो वैसे आते ही हैं पर उनसे उस प्रकार के व्यापक संहार की सम्भावना नहीं की जाती जैसी कि इस वर्ष विशेष रूप में की जा रही हैं। कहा जा रहा है कि भूमध्यसागर, अल्पाइन, हिन्दुकुश, हिमालय जैसे प्रसिद्ध ‘क्वेट बेल्ट’ तथा मृतसागर दक्षिण पूर्व तुर्की-सीरिया- इराक आदि प्रसुप्त क्षेत्र भी अब सोये न रहेंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार अन्तर्ग्रही परिवर्तन तथा सौर कलंकों के कारण ही इन भूकम्पों परिवर्तन तथा सौर कलंकों के कारण ही इन भूकम्पों की सम्भावना बढ़ गयी है।
ग्रहों व सूर्य के बीच का जो स्थायी खिंचाव होता है, वह सन्तुलन की सामान्य स्थिति कही जाती है। इस खिंचाव में कोई भी उलट-फेर गम्भीर परिणाम ही उत्पन्न करेगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस फरवरी-मार्च की अवधि में जब सभी ग्रह सूर्य के एक ओर एक सतह में आयेंगे तो इन सभी का प्रबल गुरुत्वाकर्षण एक साथ सूर्य पर प्रचण्ड दबाव डालेगा, सूर्य असन्तुलित होगा व इन सबका सभी ग्रहों पर तथा अति सम्वेदनशील पृथ्वी पर भी दुष्प्रभाव पड़ेगा।
लन्दन स्थित अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के प्लेनेटोरिम के निर्देशक ने तो यह चेतावनी दी है कि ‘बृहस्पति प्रभाव’ से भयंकर सूखा या प्रलयकारी बाढ़ें आ सकती हैं। इस स्थिति में सूर्य की ज्वालाओं की फेंक और बढ़ती जायेगी तथा कलंकों में भी वृद्धि होगी। सारी पृथ्वी पर रेडियो एक्टीविटी शून्य हो जायेगी, रेडियो तरंगों को लकवा मार सकता है तथा ध्रुओं पर विचित्र प्रकार की आभाएँ-ध्रुवप्रभाएँ दिखाई पड़ेंगी।
इस सब वैज्ञानिक विस्तारों में न जाकर यदि हम सीधे पृथ्वी से सम्बन्धित प्रभावों का विश्लेषण करें तो वैज्ञानिकों से हमें यह ज्ञात होता है कि हवा के बहाव में अनियमितता, पर्यावरण में व्यापक स्तर पर असन्तुलन, संचार व्यवस्था में रुकावट तथा मौसम पर बहुत ही बुरे प्रभाव की आशंका को टाला नहीं जा सकता। ये प्रभाव ऐसे हो सकते हैं कि कहीं बर्फ के तूफान आने लगें, कहीं बाढ़ का प्रकोप अपनी पूरी तेजी पर होगा तथा कहीं असमय वर्षा का।
सन् 82 के प्रस्तुत दिनों में जब ये पंक्तियाँ पढ़ी जा रही होंगी, पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों की वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल के लिये विश्व के अनेकों भागों में पहले से ही काफी तैयारी हो चुकी होगी। अमेरिका ‘गैलीलियो’ नामक एक अन्तरिक्षयान छोड़ रहा है जो सूर्य के साथ-साथ प्रभावित करने वाले ग्रहों की परिस्थितियों का भी अध्ययन करेगा। अमेरिका व अन्तरिक्षीय यूरोपीय संगठन ने मिलकर एक सोलर पोलर मिशन प्रोजेक्ट बनाया है जो 1983 तक व आगे भी सम्भावित पर्यावरण परिणामों तथा आयोनोस्फायर्स के आसपास होने वाले परिवर्तनों को नोटकर पृथ्वी पर भेजता रहेगा।
सूर्य कलंक, सूर्य व चन्द्र ग्रहणों की शृंखला तथा ‘बृहस्पति प्रभाव’ निश्चित ही पृथ्वी के अयन मण्डल को प्रभावित करने वाले परिवर्तनों का पूर्व संकेत हैं। साथ ही सूर्य लपटों, उसमें चल रहे कम्पन, बढ़ती सिकुड़न आदि इसी तथ्य का द्योतक है कि युग सन्धि की प्रस्तुत बेला व्यापक परिवर्तन की स्थिति से गुजर रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह कलियुग के अन्त व सतयुग के प्रारम्भ का समय हैं। अतीन्द्रिय दृष्टा तथा भविष्यविज्ञानी कहते हैं कि यह युगसंधि की बेला है और इन दिनों संसार में अधर्म, अशान्ति, अनाचार का जो व्यापक बोलबाला है, उसके अनुसार परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर है। न केवल मानवी कृत्यों ने सूक्ष्म वातावरण को प्रभावित किया है वरन् दैवी परिस्थितियाँ भी अन्तर्ग्रही विभीषिकाओं के रूप में ऐसी बन रही है कि मनुष्य अपने आचरण पर एकबार फिर सोचने पर विवश हो जाय।
सम्भावनाओं का साहसपूर्वक सामना करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। जो घबराते हैं वे स्वयं तो गिरते हैं, दूसरों को भी कठिनाई में डालते हैं। साधनात्मक पुरुषार्थ, चिन्तन में प्रौढ़ता-प्रखरता के समावेश एवं युग देवता के सृजन प्रयोजनों में सहयोग कर हम सभी विभीषिका निवारण तथा नव सृजन में हाथ बँटा सकते हैं।
उपवासपूर्वक सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान प्रायः लोग अपने-अपने घरों पर भी करते रहते हैं। उपवास में आमतौर पर आधे पेट से अधिक भोजन नहीं किया जाता। पेटू लोगों की बात अलग हैं। जो उपवास जैसी तपश्चर्या को भी मात्र आहार परिवर्तन भर समझते हैं और पेट पर अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक बोझ लादते हैं। चान्द्रायण में कुल मिलाकर आधे पेट भोजन का प्रबन्ध तो हो ही जाता है। ऐसी दशा में चान्द्रायण साधना का वैसा स्वरूप नहीं रह जाता, जैसा कि शास्त्रकारों न उसका असाधारण माहात्म्य वर्णन किया है।
जिस विशेषता के कारण देखने में साधारण किन्तु परिणाम में महान चांद्रायण तपश्चर्या का माहात्म्य बताया गया है, वह है “आत्मिक काया-कल्प”। इसी के निमित्त अनेकानेक नियम, संयमों एवं विधि-विधानों का निर्धारण हुआ है। उपवास और जप तो उस प्रक्रिया के दृश्यमान एवं शारीरिक क्रिया-प्रक्रिया के रूप में सम्पन्न होने वाले उपचार भर हैं।
वस्तुतः चान्द्रायण को अध्यात्म कल्प उपचार समझा जाना चाहिए और उसके साथ उन सभी प्रयोजनों का महत्व समझा जाना चाहिए जो उसके साथ चिन्तन और भावना के रूप में अविच्छिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यदि उन पर ध्यान न दिया जाय और केवल शरीरचर्या वाली प्रक्रिया चलती रहे तो समझना चाहिए कि शास्त्र निर्धारण का एक बहुत छोटा ही अंश पूरा हुआ।
साधना विधानों के अंतर्गत आने वाले अगणित क्रिया-कलाप जिनमें चान्द्रायण भी सम्मिलित है, एक ही उद्देश्य है–देव जीवन की दृष्टि से हेय समझी जाने वाली मान्यताओं एवं आदतों का निराकरण तथा सदाशयता को स्वभाव में सम्मिलित करने का अभ्यास। पशु-प्रवृत्तियों को देव प्रवृत्तियों में बदलने का जो पुरुषार्थ किया जाता है उसी को साधना कहते हैं।
चान्द्रायण साधना में भक्ति योग, ज्ञानयोग और कर्मयोग की त्रिविध क्रिया-प्रक्रियाओं का समन्वय हैं। गायत्री उपासना एवं ध्यान धारण को भक्ति योग, स्वाध्याय-सत्संग को स्थूल और चिन्तन-मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
व्यक्तित्व की गलाई ढलाई होने लगती है। इस समग्र समन्वय की कार्य पद्धति से ही चांद्रायण का तात्विक प्रयोजन पूर्ण होता है। मात्र उपवास या जप का उपक्रम चलता रहे और जीवन के हर क्षेत्र की उत्कृष्टता की दिशा में धकेलने वाले अन्यान्य अनुबन्धों की उपेक्षा होती रहे तो समझना चाहिए कि बाह्य कलेवर की ही व्यवस्था बनाई गई हैं। उसमें प्राण संचार करने वाली आध्यात्मिक प्रखरता उत्पन्न करने में समर्थ भावनात्मक तपश्चर्याओं का समावेश नहीं किया गया। सर्वविदित है कि कलेवर कितना ही सुन्दर क्यों न हो, उसमें प्राण नहीं होगा तो अभीष्ट हलचल उत्पन्न होने और परिणति का लाभ मिलने जैसा अवसर ही उत्पन्न न होगा।
एक महत्वपूर्ण सूचना− प्रज्ञा पुराण के संदर्भ में परिजनों में अभूतपूर्ण उत्साह उभर कर सामने आया है। प्रज्ञापुराण कथा आयोजकों की माँग और प्रज्ञापुराण सत्रों के प्रति परिजनों की उमंग देखते ही बनती है। प्रज्ञा पुराण प्रशिक्षण के दो सत्रों में अधिक स्वीकृतियाँ देने पर भी माँग पूरी नहीं की जा सकी हैं।
अस्तु एक नया 15 दिवसीय सत्र 19 मार्च से 2 अप्रैल की अवधि में रखने का निर्णय लेना पड़ा है। इस सत्र में 26 मार्च से 2 अप्रैल तक नवरात्रि भी पड़ रही है। इस प्रज्ञा पुराण सत्र में सम्मिलित होने वाले नवरात्रि साधना का लाभ भी ले सकेंगे। नवरात्रि साधना के लिये जाने वाले परिजन एक सप्ताह पहले आने की व्यवस्था कर सकें तो इस दुहरे लाभ को प्राप्त कर सकते हैं।
ध्यान रहे इन सत्रों में परिवार सहित, दर्शन-आशीर्वाद के लिये आने वालों पर कड़ी रोक हैं।
इतने अमूल्य मानव जीवन को, नाच नचायेगा क्या-क्या?
कुल चार दिनों का जीवन था, दो काट चुके दो कटने हैं, दो दिन के बाकी जीवन में, संसार दिखायेगा क्या-क्या?
खुद जान-बूझ कर ही जिसने काँटों में पैर बढ़ाया हो, तरकीब काँटों से बचने की तरकीब बताएगा क्या-क्या?
अनुमान लगाने बैठूँ तो सचमुच सिर चकरा जायेगा, मैंने थोड़े से जीवन में खोया क्या-क्या पाया क्या-क्या?
सब भले-बुरे की परिभाषा ही बदल जाएगी क्षण भर में, यदि तुम्हें बताने बैठूं मैं देखा है भला-बुरा क्या-क्या?
हर चीज मुझे जब हासिल था, मिलता था मगर एक तू ही नहीं, क्या तुझको बताएँ तेरे बिना इस दिल का तमाशा था क्या-क्या?
मैं तो पहचान नहीं पाया तू ही जाने तेरी माया, जीवन के इन व्यापारों में, मेरा क्या-क्या तेरा क्या-क्या?
–यादराम शर्मा रजेश
*समाप्त*