हे विश्वकर्मन्! आज हम तुम्हारे सिंहासन के सम्मुख खड़े यह बात सुनाने आये हैं कि हमारा संसार आनन्दमय है, हमारा जीवन उल्लासमय है। यह तुमने बहुत अच्छा किया कि हमें क्षुधा तृष्णा के आघात से जागृत रखा–तुम्हारे जगत में, तुम्हारी बहुधा शक्ति के असीम लीला क्षेत्र में हमें जगायें रखा। यह भी अच्छा ही हुआ कि तुमने हमें दुःख देकर सम्मानित किया विश्व के असंख्य जीवों में जो दुःखताप की आग है उससे संयुक्त करके हमें गौरवान्वित किया। उन सबके साथ हम तुम्हारे समक्ष प्रार्थना करने आये हैं–तुम्हारी प्रबल सामर्थ्य सदैव बसन्त के दक्षिण−पवन की तरह प्रवाहित रहे, मानवता के स्वर्णिम इतिहास से युक्त इस महाक्षेत्र पर यह पवन बहता रहे। अपने विविध फूलों के परिमल को वहन करता हुआ हमारे राष्ट्र के शब्दहीन, प्राण हीन, शुष्कप्राय चित्त अरण्य के सारे शाखा पल्लवों को यह समीर कम्पित, मुखरित, सुगन्धित करे, हमारे हृदय की प्रसुप्त शक्ति फूल−फूल किसलय में सार्थक होने के लिये रो उठे।
हमारे मोह के आवरण हटाओ, उदासीनता की निद्रा से हमें जगाओ। यही, इसी क्षण, अनन्त देशकाल में धावमान चिरचांचल्य के बीच हम तुम्हारे आनन्द रूप को देख सकें। तुम्हें प्रणाम करते हुए हम सृष्टि के उस क्षेत्र में प्रवेश करने की आज्ञा माँगते हैं जहाँ अभाव की प्रार्थना, दुःख का क्रन्दन, मिलन की आकाँक्षा और सौंदर्य का निमन्त्रण हमें सतत् आह्वान देते हैं, जहाँ विश्वमानव का महायज्ञ हमारी आहुतियों की प्रतीक्षा कर रहा है।
कक्षसेन पुत्र अभिप्रतारी और शोनिक का पेय प्रीतिभोज का रसास्वादन ले ही रहे थे कि एक ब्रह्मचारी द्वार पर आ पहुँचा, बड़े अधिकारपूर्वक उसने द्वार खटखटाया और कहा–”अन्न तो मुझे भी चाहिए।”
अभिप्रतारी ने कहलवा दिया–”अपने पकवानों का उपयोग हम स्वयं करेंगे, उसमें से भाग किसी को नहीं बांटेंगे।” भिक्षुक द्वार पर ही बैठा रहा। आचमन करके वे लोग जब बाहर आये तो ब्रह्मचारी ने उनसे पूछा–”एक देवता है जो चार ऋषियों को खा जाता है। अन्न उसी की तृप्ति के लिये पकाया गया था। फिर तुम लोगों ने अकेले ही क्यों खा लिया? उसे क्यों नहीं दिया?”
शोनिक, कापेय और काक्षिसेन सन्न रह गए। उनने विस्मित होकर पूछा–”भला चार ऋषियों को खाने वाला देव कौन है? और कैसे, कौन उसके लिए अन्न पकाता है। हमने तो पेट भरने के लिए ही पकवान बनाए थे। आप जो भी कुछ कह रहे हैं, इसकी जानकारी हमें नहीं है। हे ब्रह्मचारी! कृपया हमारी धृष्टता को क्षमा करते हुए हमारा समाधान करें।”
ब्रह्मचारी ने कहा–”सब में समाया हुआ सूत्रात्मा प्राण ही वह देव है। जल, पवन, अग्नि और यह पदार्थ उसी के ऋषि अन्न हैं। जो कुछ इस संसार में दृश्यमान है, वह समष्टिगत सूत्रात्मा के लिए बनाया गया है।” ब्रह्मचारी ने अपनी बात को और भी स्पष्ट करते हुए कहा–”शरीर में वाणी, चक्षु−श्रोत्र और मन ये चार ऋषि हैं। यह चारों और व्यापक ब्रह्म सत्ता की समष्टि आत्मा के लिए ही बनाए गये हैं।
अभिप्रतारी युगल सार्श्चय यह सब सुन रहे थे। उनके कौतूहल का समाधान करने की दृष्टि से ब्रह्मचारी से पूछा–”क्या आप लोगों ने रैक्य ऋषि की रहस्य विद्या के सम्बन्ध में कभी कुछ पढ़ा सुना नहीं। वे कहते रहे हैं समस्त प्राणधारी–एक ही महाप्राण के अविच्छिन्न घटक हैं। एक−एक ही सूत्र में पिरोये हुए हैं। यह जो कुछ उपार्जन होता है, महाप्राण के लिये वही सर्व सम्पदाओं का उत्पादक है और वही उपभोक्ता से पहला अधिकार उसी का है। पीछे घटक उत्पादक का।”
“मैं भी उसी महाप्राण का एक घटक हूँ, जिसके आप लोग हैं। मेरी भूख की अनुभूति तुम्हें भी होनी चाहिए थी? महाप्राण की संवेदनाओं का ध्यान रखे बिना तुम क्यों खाते रहे? क्या यह उचित था। महाप्राण की तृप्ति के लिए–यह अन्न पकाया गया था–प्राण ने माँगा–फिर प्राणों को क्यों नहीं दिया गया?”
छान्दोग्योपनिषद् के रचियता ने इस कथानक के मर्म को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है–”वही महान महिमा वाला महाप्राण समस्त अन्नों का उपभोक्ता है। वही सबको खाता है। उसे कोई नहीं खाता।”
उपार्जन और उपभोग का मूल अधिकारी समष्टिगत सूत्रात्मा है। उस विश्व मानव का भाग उसे प्रदान करते हुए ही अपनी तृप्ति करनी चाहिए। इस प्रकार जो खाना जानता है, वही सच्चे अर्थों में मानव है। “अन्ना दो भवति य एवं वेद” जो खिलाकर खाता है, वही खाने का रहस्य जानता है।
कपि गोत्रज शोनिक और कक्षसेन पुत्र अभिप्रतारी की आँखें खुल गयीं। उसने ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मचारी को नमन किया, ज्ञान चक्षु खोल देने के लिये अपनी कृतज्ञता प्रकट की और सेवकों से ब्रह्मचारी को तृप्त करने को कहा वे बोल उठे–”आपने हमारी विस्मृति हटा दी। भविष्य में हम खिलाकर ही खाया करेंगे।
अभी तक विकास के उतने ही चरण उठे और साधन जुटे हैं जिसने आदिम बन मानुस को सभ्यता के युग में प्रवेश करने का अवसर मिल सके। सुविधा साधनों का दृष्टि से अन्य प्राणियों को अभावग्रस्त समझा और मनुष्य को साधन सम्पन्न कहा जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मानवी गरिमा का स्वरूप एवं महत्व अनुभव अभ्यास में आ गया। उस उपलब्धि के लिये सच्चे मन से प्रयत्न भी नहीं चले हैं। धर्म और अध्यात्म की चर्चा भर जोर−शोर से होती है, किन्तु उसे हृदयंगम करने तथा व्यवहार में उतारने का कोई ठोस एवं कारगर प्रयत्न नहीं होता। आवश्यकता इस बात की है कि अब नये अध्याय का शुभारम्भ किया जाए।
वन मानुष ने सभ्य कहलवाने की मंजिलें पूरी कर ली, पर यह तो एक विराम मात्र हुआ। पूर्णता तक पहुँचने के लिए मनुष्य में देवत्व का उदय करना होगा। यही है वह आधार जिसे योजनाबद्ध रूप से कार्यान्वित किया जाना चाहिए। उपार्जित कौशल एवं वैभव का सदुपयोग बन पड़े, इसके लिये स्तर का विकास परिष्कार इन्हीं दिनों चाहिए। सम्पदा की आवश्यकता समझी गई और उसे उपार्जित करने में सफलता भी पाई गई, पर इतने भर से काम नहीं चलेगा? बीच रास्ते में बैठ जाने से, मझधार में लंगर डालने से बात कहाँ बनेगी। अब तो पार जाने और लक्ष्य तक पहुँचने की तैयारी की जानी चाहिए।
प्रकृति सम्पदा की निर्वाह भर की मात्रा की प्राणियों को हजम होती है। यदि इससे अधिक कमा लिया गया है या कमाया जाता है तो यह भी समझा जाना चाहिए कि बारूद के खिलौने बनाने वाले जैसी सावधानी बरतते हैं ठीक वैसी ही आज के मनुष्य को बरतनी होगी। इस सावधानी के लिए जिस दूरदर्शिता की आवश्यकता है उसे प्राप्त करने के लिये मानवी चेतना के अन्तस्थल को कुरेदा, उभारा और उर्वर बनाया जाए।
पुरातन युग में यह कार्य धीमी गति से चलते रहने की गुंजाइश थी, क्योंकि तब तक सभ्यता और सुविधा प्राप्त करके आदिम कालीन पिछड़ेपन से छुटकारा पाना ही लक्ष्य था, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही शक्ति और साधनों की इतनी मात्रा एकत्रित हो गई है कि उनका सदुपयोग सम्भव हो सके। शक्ति दुधारी तलवार है उससे आत्म−रक्षा ही नहीं आत्मघात का संकट भी खड़ा हो सकता है। इन दिनों आत्मघात की दिशा में बढ़ रहे लोक प्रवाह को आत्म रक्षा के लिये नियोजित करने की आवश्यकता जितनी अधिक अनुभव की जा रही है, उनकी इससे पूर्व कभी नहीं की गई।
पिछले दिनों मानवी तत्परता ने भौतिक क्षेत्र के सभी क्षेत्र को मथ डाला है जहाँ से जो कुछ हस्तगत हो सका है उसे उपलब्ध करने में कभी नहीं छोड़ी गई। भूमि की ऊपरी परत से लेकर अत्यधिक गहराई तक खोदकर उसकी खनिज सम्पदा तक के दोहन में कमी नहीं रही, प्राणि जगत के हर वर्ग को अपने आधिपत्य में ले लिया गया है और जिससे जो प्रयोजन सध सकता था साधा गया है, समुद्र, सरोवरों और नदी, निर्झरों में से जिससे जितना लाभ लिया जा सकता था लिया गया, आकाश पर आधिपत्य जमाने की घुड़दौड़ इन दिनों तेजी से चल रही है। बिजली, रेडियो, लेसर आदि प्रकृति के रहस्यों को बहुत हद तक कुरेद लिया गया है, अन्तर्ग्रही धावे बोले जा रहे हैं। उद्योग, विज्ञान, शिक्षा, कला आदि के क्षेत्रों में भी आश्चर्यजनक प्रगति हुई है, कूटनीति का हर जगह बोलबाला है।
अछूत क्षेत्र एक ही रह गया है मानवी गरिमा के अन्तराल का पुनर्निरीक्षण और पुनर्जीवन। प्राचीनकाल में इस दिशा में समुचित ध्यान दिया गया था और मनुष्य में देवत्व तथा धरती पर स्वर्ग का प्रत्यक्ष दर्शन किया गया था, अब मध्यकालीन भटकाव को दूर करने और मानवी आस्था तथा आत्मा को जगाने की फिर से आवश्यकता अनुभव की गई है। युग चेतना की इस माँग को पूरा करने के लिए हमें तथ्यों पर अधिक गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए और समय की माँग को पूरा करने में प्रमोद नहीं बरतना चाहिए।
योगी अरविन्द कहते हैं–’युग समस्याएँ विकट से विकट होती जा रही हैं, इनके समाधान के छुटपुट प्रयास भर चलते रहते हैं। उन्हें उत्साही लोग ‘क्रान्ति’ के नाम से सम्बोधन करते रहते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्रांतियों की चर्चा आयेदिन सुनी जाती है। पर तथ्यतः यह सभी पैबन्द मात्र हैं, इस समय का वास्तविक कार्य तो यह है कि समूची मनुष्य जाति को कोई नया वस्त्र दिया जाय। नया वस्त्र अर्थात् स्थिति का समग्र रूपांतरण अर्थात् जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप में उत्कृष्टता का सर्वतोमुखी समावेश। इसकी पृष्ठभूमि अन्तःकरण में अध्यात्मवादी आस्थाओं को जमाने वाली प्रक्रिया अपनाने से ही सम्भव हो सकेगी। प्रसिद्ध नीतिज्ञ स्माइले वायेन्टन का कथन है–’मनुष्य के ओछे और बौने रह जाने का एक ही कारण है कि वह अपने गहन अन्तराल तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं करता। वैभव के खिलौनों से खेलने और अचिन्त्य चिन्तन के जंजाल में फँसे रहने के अतिरिक्त उससे एक कदम आगे बढ़ना ही नहीं बन पड़ता। यदि उच्च चेतना से भरे−पूरे आस्था संस्थान के साथ संपर्क साधा जा सके और उसे अनुकूल बनाया जा सके तो हर कोई यह अनुभव कर सकता है कि अपनी गरिमा को ऊँचा उठाने के कितने आधार उसके पास मौजूद हैं, प्रशंसा पाने के लिये तरह−तरह के आडम्बर रखने वालों को यह प्रतीत नहीं होता कि वे अन्तःकरण को भारी भरकम बना सके तो असंख्यों द्वारा सम्मान पाने और श्रद्धास्पद बनने का अवसर उन्हें सहज ही मिल सका है।”
जीन डब्ल्यू आलपोर्ड ने मानवी पूर्णता की व्याख्या करते हुए लिखा है–”शरीर,बुद्धि,पद,धन और स्वामित्व की छोटी परिधियों को पार करते हुए जो अपने को विश्व कल्याण की बात सोचता है वह पूर्ण है, अपूर्णता के बन्धन उसे उसी अनुपात से जकड़े रहते हैं जितनी कि ममता और आसक्ति घनीभूत होती है।”
वस्तुतः मनुष्य जिन बन्धनों से बँधा छटपटाता रहता है वे उसके आन्तरिक एवं बाहरी पर्यावरण मात्र हैं, संचित आदतें प्रायः पशु प्रवृत्तियों से मिलती जुलती होती हैं। इसी प्रकार जिस ढर्रे का जीवन आम लोगों के द्वारा जिया जाता है उसमें आदि से अन्त तक संकीर्णता एवं आपा−धापी भरी रहती है, उसका प्रभाव ही क्रमशः सहचरों पर पड़ता और सघन होता जाता है, यही है चेतना पर छाया हुआ वह पर्यावरण जो मनुष्य को छोटी सीमा में सोचने और छोटे काम करने के लिए विवश करता है यदि इस घेरे को तोड़ा जा सके और विराट् के साथ अपने को जोड़ा जा सके तो पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त होने में देर न होगी। क्षुद्रता ही बन्धन और विशालता ही मुक्ति का सोपान है।
सामान्य मनुष्य का व्यक्तित्व अनेकों जाल−जंजालों से बना हुआ अच्छा खासा तमाशा होता हैं, उसमें कुसंस्कारों, निकृष्ट अभिलाषा और उलझते उद्वेगों की भरमार होती है। ऐसे लोगों के लिए न तो एकाग्र होते बन पड़ता है और न अन्तर्मुखी होने की स्थिति आती है, ऐसे लोग वस्तुओं की माँग परिस्थितियों की शिकायत और साथियों पर आक्षेप करते−करते ही दिन गुजारते रहते हैं उन्हें यह सूझता ही नहीं कि आत्म−तत्व में विकृति भर जाने से ही अनेकानेक विपन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। इस विषम स्थिति से छूटना कठिन नहीं है। अपने हाथों बुने जाले को समेटने का साहस किया जा सके तो मुक्ति का आनन्द ले सकना हर स्थिति के व्यक्ति के लिए भी सरल हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक एडलर का मत है कि–’जिस शक्ति को प्राप्त करके व्यक्ति सच्चे अर्थों में समर्थ एवं श्रेष्ठ बनता है उसका नाम आत्मबल है, जिसे
भी वह प्राप्त होगी वह स्वार्थी नहीं रह सकेगा। अपनी सम्पन्नता एवं सरलता के लिए चिन्तित रहने की अपेक्षा उसका मन सदा परमार्थ प्रयोजनों की बात सोचता रहता है, और करने के लिए हाथ डालने से पूर्व देखता है कि यह सब कुछ श्रेष्ठता का समर्थक सहायक है या नहीं? ऐसे व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में समाज सेवा कर पाते हैं भले ही उनके द्वारा कोई बड़े कहे जाने वाले काम नहीं ही हुए हों।”
विद्वान लेखक साइमण्ड्स ने अपने ग्रन्थ ‘डायनामिक साइकोलॉजी में कहा है–’पूर्णता के समीप जैसे−जैसे पहुँचा जाता है वैसे हो वैसे वह परोपकारी परमार्थ परायण होता जाता है उसकी इच्छाएँ और क्रियाएँ इस प्रयोजन के लिए उठती हैं कि सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन बन पड़े और अपना श्रम समय दूसरों के काम आये।’
महामनीषी जॉन हार्वे का कथन है–’जब अपनी दृष्टि संकीर्ण स्वार्थपरता की अहंमन्यता से हटाते हैं, तो राग−द्वेष रहित परम सत्य के दर्शन होने लगते हैं, सभी अपने लगते हैं और सभी की सुख−शान्ति की बात सोचते और वैसी ही चेष्टा करते समय बीतता है, असीमता और उस छोटी परिधि में लिप्तता हो आत्मिक प्रगति की प्रधान बाधा है, आत्मदर्शी अनुभव करता है कि उसकी गति,क्रिया,सम्पदा,क्षमता, की अमानत है और जो साधन हाथ में है उन सभी का उपयोग मात्र अनन्त के लिए होगा और किसी के लिए नहीं।
यह एक वास्तविकता है कि वातावरण और साथियों का दबाव अपना प्रभाव छोड़ता है। पर वह इतना भारी नहीं है कि आदर्शवादी संकल्पों के द्वारा उसे हटाया–घटाया न जा सके अपना भौतिक दृष्टिकोण न होने से ही प्रवाह में बहते चलने की स्थिति बनती है, यदि सब निर्भरता के सूत्र हृदयंगम किये जा सकें तो वातावरण की उपेक्षा करना और दूरदर्शी नीति अपना सकना तनिक भी कठिन न रहेगा। आत्मावलम्बन का अभाव ही मनुष्य को ढर्रे का गुलाम बनाये रहता है, नीति का पालन और मर्यादाओं का अनुसरण एक बात है और अवाँछनीयता के जंजाल में जकड़े रहना सर्वथा दूसरी।
शेल्डन का मत है कि–”व्यक्ति का विकास उसकी परिस्थितियों पर अवलम्बित माना जाता है इसमें दूसरों के सहयोग असहयोग को भी प्रमुखता दी जाती रहती है,पर यदि गम्भीरता से वस्तुस्थिति का विश्लेषण किया जा सके तो प्रतीत होगा कि अपनी ही चिन्तन शैली–कार्य पद्धति−ने ही अधिकाँश उलझनें पैदा की हैं। उन्हें सुधारा जा सके तो समाधान का मार्ग सहज ही हस्तगत हो जायेगा।
सारे उपनिषदों का सार इन वाक्यों में व्यक्त किया जा सकता है–”यदि अचेतन और उच्च चेतन को गढ़ने में जुट पड़ा जाए तो प्रतीत होगा कि बड़ी से बड़ी सम्पदा एवं सफलता पाने की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण लाभ उठाया जा रहा है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि बहुमूल्य रत्नराशि अपनी ही तिजोरी में भरी पड़ी हो और तनिक−तनिक-सी बात में लिए जिस−तिस से याचना करते फिरा जाए। बाह्य पुरुषार्थ से वैभव कमाया जाता है किन्तु अन्तर्मुखी पराक्रमों से मनुष्य को तत्वदर्शी,मनीषी और देव मानव बनने का सौभाग्य मिल सकता है।
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता मनोहारिणी, सन्मित्रं सुधनं स्वयोषिति रतिः सेवारताः सेवकाः।
आतिथ्यं सुर पूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान्नपानं गृहे, साधोः संग उपासना च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥
अर्थात्–सचमुच वह गृहस्थाश्रम धन्य है, जिसमें आनन्दमय घर, विद्वान् पुत्र,मनोनुकूल स्त्री, सच्चे मित्र, सात्विक धन, अपनी पत्नी से प्रीति, सेवापरायण सेवक, अतिथि−सत्कार, नित्य−प्रति देव पूजा, सन्तोषप्रद भोजन, सज्जनों की संगति और उपासना–साधना– ये सभी विशेषताएँ उपलब्ध रहती हैं। तात्पर्य यह कि अपनी घर−गृहस्थी को उत्कृष्ट बनाने की चाह हो तो इन विशिष्टताओं का उसमें समावेश अवश्य करना चाहिए।
परिपक्व व्यक्तित्व प्रौढ़ता प्राप्त करने में समय ले जाते हैं। बरगद और खजूर से फल प्राप्त करने में काफी लम्बी अवधि तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। खाद पानी की तरह मनुष्य को भी सुविकसित होने में अनुभव और अभ्यास चाहिए। अनुभव दूसरों को देख समझ कर या उनके परामर्श सिखावन के सहारे भी प्राप्त हो सकते हैं अभ्यास तो स्वयं अपने को ही करना पड़ता है। संगीतकार, कलाकार, साहित्यकार आदि बनने के लिए उन प्रसंगों के सिद्धान्त समझ लेना भर काफी नहीं है जो समझा है उसको क्रिया रूप में उतारना पड़ता है। सो भी दो बार भी नहीं कईबार भी नहीं–ढेरों बार लगातार उसे करते रहने पर भी वैसी रुचि बनती और आदत पड़ती है। जीवनक्रम को अमुक ढर्रे में ढालने के लिए उस प्रक्रिया में होकर असंख्यों बार गुजारना पड़ता है। अन्यथा एक दो बार के अभ्यास तो बालू का महल बनाने की तरह मात्र तात्कालिक मनोरंजन करता है। जरा-सी तेज हवा चलते ही इधर−तिधर बिखर कर समाप्त हो जाता है।
यहाँ एक बात और भी स्मरण रखने योग्य है कि हर वस्तु को पकने के लिए अभीष्ट पातमान की आवश्यकता पड़ती है। अण्डे से बच्चा तब निकलता है जब उसे उपयुक्त समय तक उपयुक्त गर्मी उपलब्ध हो चुकी होती है। भ्रूण के पकाने में भी उदरदरी की ऊर्जा काम करती है। भोजन पकने पर भी वही सिद्धान्त लागू होता है। कुम्हार के आवे से लेकर लुहार की भट्टी तक में जो कुछ नहीं बनता है उसमें निर्माताओं का कौशल ही सब कुछ नहीं कर लेता। उसके लिए पकाने वाली भट्टी में उपयुक्त स्तर की गर्मी भी होनी चाहिए। मनुष्य को भी ऐसे जीवनक्रम के साथ पाला पड़ना चाहिए जो कठिनाइयों से भरा हो जिसमें अवरोधों से जूझने, अभीष्ट साधन जुटाने और प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के लिए प्रबल पराक्रम और अनवरत संघर्ष करना पड़े। रगड़ से गर्मी उत्पन्न होने का सिद्धान्त सभी को विदित है। विकास के लिए जिस गर्मी की आवश्यकता है वे भी प्रतिकूलता के साथ गुंथ पड़ने और और मल्ल युद्ध करने पर ही उत्पन्न होती है।
जिन्हें संघर्ष नहीं करने पड़े, जिनने सदा सुविधाएँ और अनुकूलताएँ ही देखी हैं जिन्हें प्रशंसा और सहायता की कमी नहीं रही, उनकी सफलताएँ चिरस्थायी नहीं हो सकतीं, वे तभी तक ठहरती हैं जब तक कि किसी अवरोध या आक्रमण में वास्ता नहीं पड़ता कमजोर रस्सियों से बँधे छप्पर एक ही अन्धड़ में यहाँ से वहाँ जा पहुँचते हैं। उनके अंजर–पंजर जहाँ−तहाँ छितरते देखे जाते हैं, किन्तु मजबूत ईंट गारे बनी ढाली छतें प्रचण्ड तूफानों का सामना करते हुए भी जहाँ की तहाँ बनी रहती हैं। फसल तभी पकती है जब उनके ऊपर से एक अच्छी खासी गर्मी गुजर जाती है।
जिन्हें प्रौढ़ता में गौरव प्रतीत होती है वे जानबूझ कर विपरीतताओं से जूझने का अभ्यास करते हैं। आंकड़ों की कार्यपद्धति यही है। पर्वतारोही, तैराक, प्रतियोगिताओं में उतरने वाले ऐसी ही तैयारियों में संलग्न रहते और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की गौरव गाथा से यशस्वी बनते हैं। तपस्वी जीवन में उन कठिनाइयों को आमंत्रित किया जाता जो देव जीवन में प्रवेश करते समय, प्रस्तुत वातावरण से भिन्न प्रकार का आचरण करने से प्रस्तुत होती है। इसके बाद उन कठिनाइयों का सिलसिला आरम्भ होता है जो उत्कृष्टता के उपार्जन करने लिए मूल्य चुकाने के रूप में स्वेच्छापूर्वक वरण करनी होती है।
‘दि स्टडी ऑफ पर्सनालिटी’ ग्रन्थ में विद्वान लेखक एच. ब्राण्ड लिखती है–”व्यक्तित्व के विकास में कितने ही साधनों तथा सहयोगियों की आवश्यकता पड़ती है। वे बाहर से जुटाये जाते हैं। पर इस संदर्भ में एक आवश्यकता ऐसी है जिसकी पूर्ति स्वयं ही करनी पड़ती है।चरित्र ही वह विभूति है जिसके सहारे दूसरों को आकर्षित करना, प्रशंसक बनाना तथा साथी सहयोगी बनने के लिए सहमत किया जा सकता है। वजन हर वस्तु का अपना होता है। दूसरे लोग तो उसकी नाप तौल भर करते हैं। रुई का हलका और पत्थर का भारी होना उसका अपना निजी गुण है। इसी प्रकार चरित्र के रूप में अपना वजन घटाना या बढ़ना हर किसी के अपने हाथ की बात है।
चरित्र आत्म संयम से आरंभ होकर लोक सेवा में तत्पर रहने की उदारता तक विकसित होता चला जाता है। आमतौर से चरित्रवान उन्हें कहते हैं जो दुर्व्यसनों और दुर्गुणों से बचे रहते हैं। परिश्रमपूर्वक कमाते और सन्तोष के साथ गुजर करते हैं। यह चरित्र की प्रथम कक्षा है। संयमी ही अपनी क्षमताओं का अपव्यय रोक सकते हैं और उस बचत के बलबूते निजी तथा सर्वजनीन सत्प्रवृत्तियों के उत्कर्ष में कुछ कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। अपव्ययी असंयमी के लिए तो अपनी ही समस्याएँ−अनाचरण की प्रतिक्रियाएँ की प्रतिक्रियाएँ ही इतनी भरी पड़ती है जिन्हें सुलझना समेटना पहाड़ जैसा भारी पड़ता है।
चरित्र का प्रथम सोपान संयम है। पुरुषार्थ को उपार्जन और संयम की बचत माना जाता है। इन दोनों को अपनाने से ही व्यक्तित्व का धनी बना जा सकता है। इसके बाद यह प्रसंग आता है कि इस सम्पन्नता का कहाँ उपयोग किया जाय? इसका उत्तर एक ही है पीड़ा और पतन से जन−समुदाय को उबारने वाले सत्प्रयोजनों का संक्षेप में यह लोक सेवी का उदारता का मूलभूत स्वरूप है। चरित्रवान संयमी−सादगी प्रिय सज्जन तो होते ही हैं साथ ही उनकी विभूतियों का अधिकाँश उपयोग जन सेवा के कल्याणकारी प्रयोजनों में होता रहता है। चरित्रवान जिस प्रकार उपभोग के सम्बन्ध में भी कड़ाई बरतते और रोकथाम लगाते देखी जा सकती है। जो इतने कर पाने योग्य विवेक विकसित कर लेगा उसमें उतनी सूझ समझ भी उठेगी कि प्रतिभा एवं सम्पदा का सर्वश्रेष्ठ उपयोग सत्प्रवृत्ति संवर्धन में ही हो सकें है। इस प्रकार समग्र चरित्र निष्ठा मर्यादाओं के पालन तथा सेवा परायण होने की दो कसौटियों पर जाँची, परखी जा सकती है।
मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि व्यक्तित्व समीपवर्ती सामाजिक ढाँचे का एक घटक मात्र है। वह वही सीखता है जो सीखने के लिए सामने बिखरा पड़ा है। वही सीखता है जो समीप में उगता और पकता है। अपनी मर्जी का उगाना और पकाना तर्क के माध्यम से शक्य सिद्ध किया जा सकता है। इतने पर भी वह सरल नहीं है। इसके लिए भी जानकारी, अनुभव, अभ्यास चाहिए और वैसा कर गुजरने के साधन उपलब्ध रहने चाहिए। यदि कोई इतना सरंजाम जुटा सकता है तो भी इसके लिए यह शक्य होगा कि अपने अनुरूप वातावरण बनाये और उसके सहारे अपना काम चलाये। ऐसा कर सकना किसी−किसी मनस्वी के लिए कभी−कभी ही सम्भव होता है। आमतौर से सामाजिक ढाँचे का कुम्हार ही लोगों को बर्तनों की तरह अपने चाक पर बनाता और आवे में पकाता रहता है।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रयास यह होना चाहिए कि सामाजिक वातावरण वैसा बनाया जाय जैसा कि वर्तमान या भावी पीढ़ी को ढालना ढाला जाना है। यह कार्य बड़े लोगों का है बड़े से तात्पर्य है−वे समाज को प्रभावित कर सके−उसे उपयुक्त बनाने वाले परिवर्तन का दबाव डाल सके। दबाव डालने वाला प्रवाह उत्पन्न कर सके।
इतने पर भी व्यक्तिगत प्रयास का द्वार बन्द नहीं हो जाता। छोटा इच्छित समाज बनाया जा सकता है अथवा जहाँ ऐसा वातावरण मौजूद है वहाँ जा पहुँचने का परिवर्तन किया जा सकता है। पक्षी चुनकर अपना घोंसला बनाते हैं। इसी प्रकार अच्छे मनुष्य चुन−चुन कर एक स्वतन्त्र मण्डली खड़ी की जा सकती है। यह अपना निजी सृजन है जो छोटा होते हुए भी व्यक्तित्व के निर्माण में असाधारण भूमिका निभा सकता है। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि श्रेष्ठता का वातावरण ढूंढ़ लिया जाय और वर्तमान निवास संपर्क एवं व्यवसाय को बदलकर वहाँ रहने लग जाय। ऐसी कई शिक्षण संस्थाएं होती है कई लोक सेवी आश्रम संगठन भी होते हैं जिसमें रहने या खपने का अवसर प्राप्त कर लेना सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है।
इस प्रकार हो या उस प्रकार व्यक्तित्व के विकास में सामाजिक वातावरण के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता, उसे अनुकूल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर काम करें और समूचे ढर्रे को श्रेष्ठ परम्पराओं के अनुरूप बदलें बनायें। दूसरी ओर इच्छुकों को अपने निजी प्रयास अपनी मित्र मण्डली गढ़ने अथवा जैसी वैसी अनुकूलता है वहाँ जा पहुँचने का प्रयास करना चाहिए बड़े लोग बड़े पैमाने पर नहर बनाते हैं अथवा छोटे लोग छोटे प्रयत्नों से छोटे कुएँ बनाते है यह बात दूसरी है, पर हालत में प्यास बुझाने के लिए पानी का प्रबन्ध तो करना ही पड़ेगा। प्रगतिशीलता यदि पनपेगी तो उसके लिए सामाजिक पर्यावरण की अनुकूलता उपलब्ध करने का प्रयत्न तो करना ही होगा।”
यहाँ यह और स्मरण रखने योग्य है कि व्यक्तित्वों को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका छोटे परिवार की होती है। छोटे परिवार का तात्पर्य है वह समुदाय जिसके साथ सोने खाने का एवं विभिन्न प्रयोजनों के लिए संपर्क साधने का अवसर मिलता है।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ग्रंथ ‘दी इंटर परसनल थ्योरी ऑफ साइकोमेट्री” में विद्वान लेखक है–”श्रेष्ठ व्यक्तित्व के विकास में मनुष्य के सामाजिक घेरे का बहुत बड़ा हाथ रहता है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त सदा सीखने की ही प्रक्रिया जारी रहती है। यह सब कुछ कोई अकेलेपन में नहीं कर सकता। शरीर यात्रा में प्रयुक्त होने वाली आदतें भी उसने प्रकृति के वातावरण से टकरा−टकरा कर ही सीखी है। समाज का प्रभाव प्रकृति से किसी प्रकार कम नहीं है। जिन लोगों के साथ घनिष्ठता रहती है उनमें कई प्रकार की सुविधाओं का आदान−प्रदान ही नहीं होता उस संपर्क से स्वभाव भी बनता बदलता है। संगति के प्रभाव से भलों का बुरा और बुरों का भला बन जाना आयेदिन देखा जाता है।
सामाजिक परिस्थितियां किसे कैसी मिलती हैं। इसमें कुछ तो पूर्व निर्धारित ही होता हैं पर वह सर्वथा छाया ही रहे ऐसी कोई विवशता भी नहीं है। अपरिपक्व रहने तक की अवधि में ही परावलंबन रहता है। उन्हीं दिनों पूर्व निर्धारित वातावरण में घिरे रहने की विवशता रहती है। जैसे−जैसे स्वतन्त्र व्यक्तित्व के विकास की वय आरम्भ होती है वैसे−वैसे अपनी इच्छानुसार मैत्री संपर्क बनाने की सुविधा मिलने लगती है। कुटुम्ब परिवार की तरह मैत्री परिवार के साथ आदान−प्रदान चल पड़ता है। यह स्वनिर्मित−इच्छाओं के अनुरूप होने के कारण और भी अधिक प्रभावी होता है।
मैत्री परिवार अपनी इच्छानुसार अपनी खोज घनिष्ठता एवं क्रिया−प्रक्रिया के आधार पर बनता है। किसने किस प्रकार का मैत्री परिवार बनाया और किस प्रकार का प्रभाव समेटा यह उसके अपने चुनाव एवं प्रयास पर निर्भर है।’ वातावरण के पूर्व निर्धारित रहने वाली बात एक अंश तक ही सही है। समाज की परिस्थितियाँ मनुष्य को ढालती है यह बात ही एक सीमा तक ही सही बैठती है। इससे भी अधिक प्रबल तथ्य यह है कि निजी आकाँक्षा के अनुरूप भले बुरे मैत्री परिवार बनते हैं और उन्हीं के उत्थान और पतन का सरंजाम जुटाने वाले परिवार की स्थिति को विवशता कहा जाता है वहाँ इस बात की भी जानकारी होनी चाहिए कि अपने प्रयासों से मैत्री परिवार का गठन करने किसी भी भले−बुरे समाज में से अपनी इच्छा का समान खोजा और सृजा जा सकता है। समाज के दबाव से मनुष्य बनता है। इस प्रतिपादन में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि “समाज के समुद्र में सभी प्रकार के तत्व है और उसमें से कोई भी–कहीं भी–अपने अनुरूप निजी समाज इच्छानुरूप निर्मित कर सकता है।
व्यक्तित्वों को विकसित करने वाला वातावरण बनाने समाज के मूर्धन्य व्यक्ति का काम है पर वैसा न बन पड़ने पर भी हर मनुष्य अपने भावी प्रयास से अपनी वह परिपक्वता विकसित कर सकता है जिसे प्रतिभा या प्रखरता का नाम दिया जा सके।
उच्चस्तरीय सहयोग किस मूल्य पर खरीदें?
संसार के समाज शास्त्री यह मानते रहे हैं कि किसी देश या समाज को समुन्नत या प्रगतिशील तभी माना जा सकता है जब वहाँ के नागरिक व्यक्तित्व सम्पन्न हों। ऊँचा दृष्टिकोण और सुदृढ़ चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक मजबूती है। मजबूत ईंट पत्थरों का प्रयोग होने से ही कोई इमारत सुदृढ़ एवं चिरस्थायी बनती है। यही बात समाज या देश के सम्बन्ध में भी है। यदि नागरिक व्यक्तित्व की दृष्टि से घटिया रहेंगे तो वैभव की दृष्टि से प्रचुर सम्पदा के अधिपति होते हुए भी वे दोष−दुर्गुणों से ग्रस्त रहेंगे। सामर्थ्य का अनुपयुक्त कार्यों में अपव्यय करेंगे तथा दुष्प्रवृत्तियों से संलग्न रहकर समूचे समाज के लिए विक्षोभ संकट उत्पन्न करेंगे। फलतः वह सम्पदा निकम्मी सिद्ध होगी और उस समाज की सशक्तता तथा प्रगति कही जाने वाली सफलताएँ उत्पन्न करने में तनिक भी सहायक सिद्ध न होगी।
चरित्रवान नागरिकों वाला समाज वैभव की दृष्टि, से पिछड़ा कहा जाय तो भी कुछ बनता बिगड़ता नहीं। सद्गुणी व्यक्ति स्वल्प साधनों का मिलजुल कर नीति युक्त सदुपयोग करते हैं और उतने भर से उतना काम चला लेते हैं, जितना कि धन कुबेरों के लिए भी सम्भव नहीं हो पाता। युद्ध में मनस्वी जीतते हैं। अस्त्र−शस्त्रों की विपुलता रहने पर भी उस पक्ष को पराजित होना पड़ता है जिसके सैनिकों में वीरता एवं देश भक्ति की कमी रहती है।
इतिहास के सभी वर्गों पर दृष्टिपात करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्तिवादी लोग–संकीर्णता की रीति−नीति अपनाते हैं फलतः समाज की उपेक्षा करके निजी लाभों का ताना−बाना बुनते रहते हैं। इस बिखराव का प्रतिफल समाज की दुर्बलता बन कर प्रकट होती है। सभी जानते हैं कि समन्वय, संगठन, एकीकरण में कितनी अधिक सामर्थ्य होती है। तिनके मिलकर रस्सी बनते और सींकों का समूह बुहारी बनकर उपयोगी भूमिका निभाता है। यदि तिनकों और सींकों को बखेर दिया जाय तो वे निरुपयोगी तो होंगे ही, साथ ही अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकने में भी समर्थ न होंगे।
एकता को दृढ़ता का प्रतीक माना गया है। संगठन को जीवित प्राणियों की क्षमताओं में मूर्धन्य समझा जाता है। यह एकता सैनिकों में पाई और मधुमक्खियों, चींटी दीमकों में देखी जाती है। फलतः उनकी संयुक्त शक्ति का प्रतिफल चमत्कारी देखा जाता है। यदि इन समुदायों के सदस्य पृथक पृथक ढंग से सोचें और अपनी ढपली अपना राग की नीति अपनायें तो समझना चाहिए कि उनकी विशिष्टता समाप्त हो गई।
बन्दर अनुपयोगी,हानिकारक होते हुए भी लम्बे समय से मनुष्य का विरोध आक्रोश सहते हुए भी अपना अस्तित्व अभी तक इसलिए अक्षुण्ण रखे हुए है कि उनमें मिलजुल कर प्रतिरोध या आक्रमण करने की एक मौलिक विशेषता विद्यमान है। इसके विपरीत सिंह, व्याघ्र अति समर्थ होते हुए भी पारस्परिक विग्रह के कारण अपना अस्तित्व धरती से समाप्त करते चले जा रहे हैं।
एकता यों एकरूपता में सम्मिलित निवास में भी दृष्टिगोचर होती है, किन्तु वास्तविक एकता भावनात्मक ही है। इसको आत्मीयता, सहकारिता, सामाजिकता आदि नामों से पुकारते हैं। मिलजुल कर रहना, मिलकर खाना यों एक प्रथा परम्परा जैसी प्रतीत होती है, पर वस्तुतः वह है विशुद्ध रूप से वैयक्तिक उत्कृष्टता। दूसरों के प्रति प्रेम भाव सम्मान रखने पर ही यह सम्भव होता है कि कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में समूहवादी बन सके।
एकाकीपन, व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता में लाभ यह दीखता है कि दूसरों के मामले में दिलचस्पी लेकर या सहायता देकर क्यों अपना समय, श्रम या धन खर्च किया जाय? इसमें दूसरों का लाभ हो सकता है, पर अपने को तो नुकसान ही पड़ेगा। खुदगर्जी इसी तर्क एवं मान्यता की परिणति है। उथले चिन्तन से यह तर्क मजबूत मालूम पड़ता है, पर थोड़ी-सी गहराई में प्रवेश करते ही उसका खोखलापन सिद्ध हो जाता है। मनुष्य में सामर्थ्यों तो अनेक हैं पर खाने, सोने को छोड़कर और कोई उपलब्धि ऐसी नहीं है जो दूसरों के सहयोग बिना हस्तगत हो सके। इसलिए सहयोग मिलने की आवश्यकता तो पग−पग पर रहेगी ही। यह कैसे मिले? न मिले तो काम कैसे चले? एकाकी प्रयत्न एवं सीमित साधन निर्वाह से लेकर प्रगति तक के अनेकानेक प्रयोजनों की पूर्ति कैसे सम्भव हो? दूसरों की सहायता यदि पग−पग अपेक्षित रहती है तो उसे प्राप्त कैसे किया जाय? मुफ्त में कोई क्यों देगा? जिस प्रकार हम खुदगर्जी को बुद्धिमत्ता मानते हैं–उसी प्रकार अन्य लोग क्यों न मानेंगे? पैसा देकर हर सहयोग कहाँ तक खरीदा जाता रहेगा? फिर उतना पैसा कमाया कैसे जायगा? एकाकी पुरुषार्थ से तो कमाई भी सीमित ही हो सकती है। आर्थिक क्षेत्र के आदान−प्रदान को श्रम, समय, साधन बेचकर पैसे के रूप में या अन्य अपने उपयोग की वस्तुओं के रूप में खरीदा जा सकता है। पर इतने से ही सारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो नहीं हो जाती। मैत्री आत्मीयता,स्नेह, सौजन्य जैसी भावनात्मक आवश्यकताएँ पैसा देकर खरीदी जा सकती। माता से सन्तान को मिलने वाला वात्सल्य, पत्नी का एकात्म समर्पण कहाँ, कितने मूल्य पर कोई खरीद सकता है। वफादार मित्र कोई कहाँ से किस प्रकार क्रय करेगा? यदि इस स्तर का कुछ न मिल सका तो क्या रूखी, नीरस,निराश कुरूप, कर्कश जिन्दगी जीनी न पड़ेगा? कुटुम्बिकता में वस्तु परक आदान−प्रदान की प्रमुखता नहीं होती वरन् उस आनन्द में पारिवारिकता के रूप में अनुभव की जाने वाली उदार आत्मीयता ही सारी पृष्ठभूमि बनाती है। भावनात्मक आदान−प्रदान के बिना एक पक्षीय सहयोग कैसे मिले? एक अपने मतलब में चौकस रहे और दूसरा उसे अकारण ही स्नेह−सहयोग देता रहे इसकी व्यवस्था कैसे बन सकेगी?
इस विश्व व्यवस्था में हर वस्तु मूल्य देकर खरीदनी पड़ती है। कर्मफल इसी प्रक्रिया का नाम है। सहयोग प्राप्त करने के लिए भी सहयोग देना पड़ता है। भावनात्मक सहयोग के लिए भावनात्मक सहयोग देना होता है। उच्चस्तरीय सहयोग जिस वस्तु के बदले मिलता है वह है प्रामाणिकता, सदाशयता। इससे कम में किसी के प्रति किसी के मन में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। वह न हो तो फिर सम्मान और सहयोग का ढोंग भर रचा जा सकता है वैसा कुछ स्वाभाविक रूप से उमड़ता उभरता नहीं देखा जा सकता है। यदि किसी को सद्भाव अपेक्षित हो तो अपने खेत में उसकी अच्छी खासी फसल उगानी पड़ेगी, जिसे बेचकर अनेकों से अनेक स्तर के स्नेह सम्मान अर्जित किये जा सकें। अपनी जेब खाली होने पर दूसरों से माँग−जाँच कर काम चलाने का धंधा बहुत समय तक नहीं चल सकता।
प्रगति के लिए शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रशिक्षण आर्थिक वैभव, पद कौशल आदि की आवश्यकता तो है ही, पर यह भी भुला न दिया जाय कि इन सबसे अधिक सहयोग की आवश्यकता है। यह जितने ऊँचे स्तर का−जितनी अधिक मात्रा में, उन्हें उपलब्ध होता है वे अनुपात से ऐसी परिस्थितियाँ प्राप्त करते हैं जो प्रगति पथ पर अग्रगामी बनाने में असाधारण रूप से अनुकूलता उत्पन्न कर सकें। उपार्जन सभी अच्छे हैं क्योंकि उनके बदले अभीष्ट वस्तुओं, परिस्थितियों एवं सेवकों को खरीदा जा सकता है।
तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक समझा जाना चाहिए कि महत्वपूर्ण उपलब्धियों एवं सफलताओं के लिए उत्सुक व्यक्ति अपने गुण, कर्म, स्वभाव को ऐसे ढाँचे में डालें जिससे प्रामाणिक, आकर्षक एवं सम्मानास्पद प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सके। यह प्रतिक्रिया ही चिरस्थायी एवं उच्चस्तरीय प्रगति का पथ−प्रशस्त करती है। यही कारण है कि समाज शास्त्री इस बात पर बहुत जोर देते रहे हैं कि किसी देश या समाज को समुन्नत बनाने के लिए उसके सदस्यों को व्यक्तित्व की दृष्टि से वजनदार होना चाहिए। यह वजन जिन कारणों से बढ़ता है उसमें मूर्धन्य वे हैं जो व्यक्ति को ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न कर सके, जो किसी भी संपर्क में आने वाले पर अपनी छाप छोड़ती और प्रभावित करके सहयोगी बनाती हैं।
प्रगति की आकाँक्षा स्वाभाविक भी है–और श्रेयस्कर भी। इसमें सृष्टा की इच्छा पूर्ण होती है– सृष्टि का क्रम चलता है और प्राणी को उत्साहपूर्वक अग्रगमन का मार्ग मिलता है। बुद्धिमत्ता इसमें है कि इस गति चक्र की दिशाधारा सही बनाये रखी जाय और श्रम की सार्थकता प्रकट होते रहने का सुनियोजित निर्धारण एवं व्यवस्था क्रम बनाया जाय।
भटकाव वहाँ उत्पन्न होता है जब मात्र भौतिक प्रगति को ही सब कुछ मान बैठा जाता है और उसी के साथ−साथ आत्मिक प्रगति के जिस सन्तुलन को अनिवार्य रूप में बनाये रहना आवश्यक है उसकी उपेक्षा की जाने लगती है। एकाकीपन काना, कुबड़ा, लंगड़ा−लूला एवं पक्षापात पीड़ित जैसा विचित्र अनगढ़ लगता है। उपार्जन में जिस कुशलता की आवश्यकता है, उपयोग में उससे कम नहीं वरन् अधिक ही दूरदर्शिता चाहिए। अन्यथा अनगढ़ दृष्टिकोण उपलब्धियों का सदुपयोग न कर सकेगा। दुरुपयोग होने पर तो उपयोगी वस्तुएँ भी हानिकारक सिद्ध होती हैं। बन्दर के हाथ तलवार जैसा बहुमूल्य शस्त्र पड़ जाने पर संकट ही संकट उत्पन्न खड़ा होता है उसी प्रकार सम्पदा का प्रयोक्ता यदि अदूरदर्शी हो तो हर स्तर के भौतिक उपार्जन अपने तथा दूसरों के लिए हानिकारक–कष्टकारक सिद्ध होते रहेंगे। अतएव भौतिक उपलब्धियों का उत्साहपूर्ण उपार्जन करते समय यह ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है कि प्रयोक्ता का विवेक उपयुक्त मात्रा में जग रहा है या नहीं।
कोई किसी को सहयोग क्यों दे? अपनी इच्छा सहयोग प्राप्त करने की हो, सो ठीक है, पर देखना यह भी है कि दूसरा कोई क्यों अपने समय, श्रम, मनोयोग, उत्साह, कौशल आदि किसी को देने की हानि उठाये? अपनी ही तरह दूसरों के भी स्वार्थ हैं। जब हम अपने ही लाभ या सुख की बात सदा सोचते रहते हैं और उसी आधार पर कुछ करने के लिए प्रयत्नरत होते हैं तो दूसरे भी क्यों न वैसे ही स्वभाव के होंगे? मनुष्यों की आकृति में बहुत अन्तर नहीं है उसी प्रकार प्रकृति भी प्रायः मिलती−जुलती ही है। स्वार्थ सभी को प्रिय है। पर इसके लिए साधन जुटाने में आदान−प्रदान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही। वह न मिल सके तो फिर अकेले प्रयत्नों से न जीवनोपयोगी साधन जुटेंगे न सहयोग मिलेंगे और न उल्लास उभरेंगे।
जीवन सत्ता एक साझे का व्यवसाय है। जिसमें शरीर और चेतना दो हिस्सेदारों की अपने−अपने ढंग की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इन दोनों के समन्वय सहयोग से ही समग्र उद्देश्य की पूर्ति होती है। गाड़ी के दो पहिये मिलकर ही उसे गति प्रदान करते है। एक पैर से चल सकना तो दूर खड़े रह सकना भी कठिन है। असली न सही निकली पैर का सहारा तो लेना ही पड़ता है। नाव खेने में एक हाथ से डाँड चलाने पर सन्तुलन नहीं बनता। इसी प्रकार प्रगति की आकाँक्षा मात्र दूसरों का श्रम या साधन उपलब्ध करने भर से पूरा नहीं होता। उसमें जीवित रहने की शरीर निर्वाह की आवश्यकताएं पूरी होती रह सकती हैं। प्रगति इतने तक ही तो सीमित नहीं है।
जीवन सत्ता का सर्वोपरि पक्ष चेतना है। चेतना की भी अपनी कुछ आवश्यकताएँ हैं। शरीर की भूखों से सभी परिचित हैं और उसकी पूर्ति इंद्रियां तृप्ति के रूप में–पेट प्रजनन के साधन जुटाने के रूप में−प्रयत्न चलते भी रहते हैं। समझा जाना चाहिए कि अन्तःचेतना की भूखे भी अपने ढंग की हैं और वे विशु। रूप से भावनात्मक हैं। चेतना, ज्ञान एवं भावना के समन्वय में प्रकट परिलक्षित होती है। इसकी तृप्ति एवं पुष्टि दूसरों की सद्भावनाएँ अर्जित करने पर ही सम्भव है। अस्तु प्रयत्न यह ही होना चाहिए कि सहकारिता का आश्रय लेते हुए यह भी देखा जाय कि अन्तःकरण को उल्लास दे सकने वाली सद्भावनाओं को अर्जित कर सकना सम्भव हो रहा है या नहीं। यदि नहीं तो समझना चाहिए कि सर्वतोमुखी प्रगति की बात बनी ही नहीं।
सहकारिता का भाव पक्ष अन्तरात्मा की तुष्टि के लिए साधन पक्ष शरीर पोषण के लिए समान रूप से आवश्यक है। अस्तु दोनों ही क्षेत्रों में दोनों ही प्रयोजनों के लिए समग्र सहायता उपलब्ध करने के लिए प्रयत्न चलने चाहिए। यह कैसे हो? इसका उत्तर एक ही है–मूल्य चुका कर। जिस प्रकार सुविधा सामग्री उपलब्ध करने के लिए अपने श्रम साधनों का प्रतीक पैसा देना पड़ता है उसी प्रकार दूसरों की सद्भावना प्राप्त करने के लिए बदले में अपनी बनावटी–शिष्टाचार परक नहीं वरन् अन्तराल की गहराई से निकली हुई आत्मीयता प्रदान करनी पड़ती है। सर्वविदित है कि जैसा बोया जाता है वैसा ही पौधा उगता है और फल मिलता है। घटिया बीज बोया जाय तो उसी स्तर की फसल कटेगी। आरम्भ अपनी ओर से–प्रतिक्रिया दूसरों की ओर से प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। ऐसा कहाँ होता है कि पहले दूसरे लोग अपना सहायता उपक्रम चलाये, इसके बाद अपनी ओर से कृतज्ञता व्यक्त की जाय या कीमत चुकाई जाय? पोस्ट ऑफिस–स्टेशन कहीं भी जाइए पहले पैसा देना पड़ता है पीछे टिकट, पोस्टकार्ड आदि मिलता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, न कि प्रतिक्रिया उपलब्ध होने के बाद क्रिया के रूप में बदला चुकाना। पहले अपनी ओर से करने और बदला दूसरों की ओर से मिलने का सिद्धान्त सर्वमान्य है। उधार खाता तो कभी−कभी कहीं−कहीं किन्हीं विशेष अवसरों पर–विशेष व्यक्तियों के लिए ही प्रयुक्त होता देखा गया हैं। बैंक में राशि जमा करने पर ही तो चैक भुनाने की सुविधा मिलती है।
हमें दूसरों के खेत में अपनी सद्भावना के बीच बोने चाहिए ताकि उपयुक्त समय पर उपयुक्त परिणति की आधा बंध सके। अभिभावक बच्चों के साथ जो स्नेह दुलार करते हैं उसी की परिणति बच्चे बड़े होने पर अभिभावकों की सेवा सुश्रूषा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रगति स्वाभाविक भी है और सुखद भी,पर उसके लिए आकाँक्षा की मौलिक किन्तु अनगढ़ प्रवृत्ति को उद्देश्यपूर्ण उच्चस्तरीय बनाना पड़ता है अन्यथा अनगढ़ आकाँक्षा पाशविक हो सकती है और नीति मर्यादाओं के समस्त अनुबन्धों की उपेक्षा करके अनैतिक एवं आक्रमण तरीके अपना कर भी उद्धत तृष्णा वासना के रूप में प्रकट हो सकती है। इससे प्रयास भी निरर्थक जायगा और परिणाम भी उलटा मिलेगा। ठीक इसी प्रकार दूसरों की सेवा सहायता अनुकूलता, सद्भावना उपलब्ध करने के लिए शालीनता, सज्जनता, आत्मीयता, उदार सेवा भावना का अभ्यास आचरण करना होगा। अन्यथा बिना मूल्य पायें मुफ्त में सद्भाव सिक्त सहायता करने के लिए किसी के मन में क्यों उत्साह उठेगा। दोनों ही क्षेत्रों में दूरदर्शिता भरे निर्धारण एवं प्रयास अपनी ही ओर से आरम्भ करने होंगे। अन्तःक्षेत्र में उद्धत आकाँक्षाओं का नियमन करते हुए उन्हें सदाशयतापूर्ण बनाना होगा। इसी प्रकार सद्भावना सहायता प्राप्त करने के लिए अपने चिन्तन एवं चरित्र में ऐसी उत्कृष्टता का समावेश करना होगा जो दूसरों को प्रशंसक, समर्थक ही नहीं, सच्चे अर्थों में मित्र सहयोगी भी बना सकने में सफल हो सके। इन दो निर्धारणों को क्रियान्वित होने की व्यवस्था बनते ही प्रगति की आकाँक्षा को पूरा कर सकने वाले अनेकों आधार खड़े होते तथा सफल बनते दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
देवताओं के पूजा लोलुप, मन्त्रों के बाजीगरी कौतुक, तथा छुटपुट कर्मकाण्डों से स्वर्ग मुक्ति जैसी मान्यताओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो अपनी यथार्थता प्रामाणित कर सके। इस मकड़ी के जाले के स्थान पर ऐसे आधारों की प्रतिष्ठापना करनी होगी जिसके परिणाम प्रतिफल नकद धर्म की तरह प्रत्यक्ष देखे जा सकें। इस निर्धारण में नया कुछ करना है मात्र ऋषि युग की धारणाओं और प्रयोग विधियों को फिर से खोजना और अपनाना भर पड़ेगा, इसे खोये को ढूँढ़ लेना– भूले को याद करना भर समझा जा सकता है।
भौतिक विज्ञान जैसे−जैसे अपना बचपन पूरा करके प्रौढ़ता में प्रवेश करता जाता है वैसे−वैसे उसके अनेकों पूर्वाग्रह घटे हैं जो आरम्भ में तथ्य और सत्य जैसे प्रतीत होते थे। नई पीढ़ी के वैज्ञानिक अब पदार्थ को ही सब कुछ मानने का आग्रह नहीं करते वरन् चेतना के स्वतन्त्र अस्तित्व के सम्बन्ध में भी सम्भावना स्वीकारने लगे हैं। पिछले दिनों से चली आ रही इस मान्यता का नई शोध के निष्कर्षों से सहज ही खण्डन हो जाता है। जो जगत को परमाणु घटकों की स्व संचालित संरचना मात्र मानती थी सृष्टि संचालन आत्मा या परमात्मा जैसी किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता नहीं समझती थी।
हलचलों के साथ सम्वेदनाएँ किस प्रकार जुड़ सकती हैं इसका कोई समाधान वैज्ञानिकों के पास नहीं है। जो उत्तर वे देते हैं उनसे सन्तोषप्रद समाधान नहीं निकलता इस संदर्भ में जो अगली खोजें हुई हैं ‘रिअला−इजेशन’–अनुभूति को एक स्वतन्त्र सत्ता मानना पड़ा है और यह समझा जाने लगा है कि चेतना का नियन्त्रण जब पदार्थगत हलचलों के साथ जुड़ता है तभी जीवन का स्वरूप सामने सामने आता है।
“मिस्टीरिअस यूनीवर्स” ग्रन्थ के रचियता सरजेम्स जीन्स ने लिखा है–’विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता नियन्त्रण करने वाली चेतना सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है और यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति−नीति से नियन्त्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालित, अचेतन, सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता अब इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं।
फिजियोलॉजिकल साइकोलॉजी के लेखक श्री मैकडूगल ने लिखा है– मस्तिष्कीय संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि पाशविक स्तर से ऊँचे उठकर मानव प्राणी अपने में उच्चस्तरीय ज्ञान, विज्ञान की धारायें कैसे बहाता रहता है और भावनापूर्ण संवेदनाओं से कैसे ओत−प्रोत रहता है? भाव संवेदनाओं की गरिमा समझते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्तिक सत्ता भी विद्यमान है जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।
अणु विज्ञान के आचार्य अलबर्ट आइंस्टीन ने परमाणु प्रक्रिया का विशद विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष को घोषित करते हुए कहा है–मुझे विश्वास हो गया है कि जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना भी काम कर रही है।
सर ए. एस. एडिग्टन का कथन है– भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रिया−कलाप अभी नहीं जानते पर यह अनुभव करते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है–वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है।
पी. गेईडर्स अपने ग्रन्थ ‘इवोल्यूशन’ में अपने निष्कर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं– सृष्टि आरम्भ जड़ परमाणुओं से हुआ और ज्ञान पीछे उपजा यह मान्यता सही नहीं है। लगता है सृष्टि से भी पूर्व कोई चेतना मौजूद थी और उसी ने क्रमबद्ध एवं सोद्देश्य रीति−नीति के साथ इस विश्व ब्रह्मांड का सृजन किया।
‘इन्ट्रोडेक्शन टू साइन्स’ पुस्तक में विज्ञानी जे. ए. थामसन ने कहा है–विश्व में जीवन कब और कैसे उत्पन्न हुआ उसका विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है।
ख्याति प्राप्त विज्ञानवेत्ता टेन्डल ने अपने ‘ग्रन्थ फ्रेग मन्ट्स ऑफ साइन्स’ में स्वीकार किया है–हाइड्रोजन, आक्सीजन, कार्बन नाइट्रोजन, फास्फोरस प्रभृति तत्वों के ज्ञान शून्य परमाणुओं से मस्तिष्क की संरचना हुई है इस यान्त्रिक प्रक्रिया के माध्यम से देखना, सोचना स्वप्न संवेदनाएँ एवं आदर्शवादी भावनाओं के उभार की कोई तुक नहीं बैठती। शरीर यात्रा की आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त मनुष्य जो कुछ सोचता, चाहता और करता है वह इतना अद्भुत है कि जड़ परमाणुओं से बने मस्तिष्क के साथ उसकी कोई संगति नहीं बिठाई जा सकती। चौपड़ के फोसे खड़खड़ाने से होमर कवि की प्रतिभा एवं गेंद की फड़फड़ाहट से गणित के–डिफरेन्शियल सिद्धान्त का उद्भव कैसे हो सकता है इसका उत्तर मस्तिष्क को जड़ परमाणुओं की संरचना मात्र मानकर चलने से मिल ही नहीं सकता।
जे.वी. एस हेल्डेन का कथन है पदार्थ या शक्ति ही इस संसार का समग्र स्वरूप नहीं है। हम दिन−दिन इसी निष्कर्ष पर पहुँचते जाते हैं कि एक समष्टिगत मनःतत्व समस्त विश्व पर नियन्त्रण स्थापित किये हुए है।
आर्थर एच क्राम्पटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि–संसार के पदार्थों को जलते हुए ईंधन जैसा समझा जा सकता है। जड़ चेतन की ज्वलन्त गतिविधियाँ ऐसे अग्नि तत्व के साथ सम्बद्ध हैं जिसे व्यापक चेतना या आत्मा आदि किसी नाम से सम्बोधित किया जा सकता है।
हर्बर्ट स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘फर्स्ट प्रिंसिपल’ में कहा है–एक ऐसे विशेषतया मानव प्राणियों में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीन काल में धर्माचार्य या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे हैं भले ही वह संदिग्ध हो, भले ही उसका सही स्वरूप अभी समझा न जा सका हो पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण होना चाहिए।
डॉ. गाल कहते हैं–संसार का मुख्य,तत्व, पदार्थ नहीं वरन् वह चेतन सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती, और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।
संसार के प्रमुख विज्ञान वेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ “दी ग्रेट डिजाइन” में प्रतिपादन किया गया है कि यह संसार निर्जीव यन्त्र नहीं है। यह सब अनायास अकस्मात ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही है उसका नाम भले ही कुछ भी दिया जाय।
“साइन्स एण्ड सोल” के लेखक आर. डबलिन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्राणि जगत के अस्तित्व को जड़ परमाणुओं की हलचल मात्र–मान बैठने से काम नहीं चलेगा। भावना, विचारणा, कल्पना और संवेदना जैसी तरंगें उत्पन्न करने वाली ज्ञान सत्ता को यदि अस्वीकार किया जाय तो जीवधारियों की सत्ता की सही व्याख्या ही नहीं हो सकती।
इसी प्रकार विश्व के अगणित प्रख्यात विज्ञान वेत्ता चेतना के अस्तित्व को स्वीकार कर चुके हैं और इस संदर्भ में चल रहे शोध प्रयास निरन्तर अधिक स्पष्ट रूप से यह प्रामाणित कर रहे हैं कि चेतना प्रवाह की सत्ता को न आत्मा के अस्तित्व को संदिग्ध मानने का कोई कारण नहीं है।
क्रिएटिव इवोल्यूशन नामक अपने ग्रन्थ में शरीर शास्त्री वर्गसन ने इस बात पर अत्यन्त विस्मय प्रकट किया है कि नेत्र गोलकों की संरचना अत्यधिक जटिलताओं के साथ हुई है। और साथ ही उनके द्वारा प्रकाश तरंगों को ग्रहण करके मस्तिष्क क्षण भर में पकड़ लेता है। इतनी लम्बी और जटिलताओं के बीच घूमती हुई दृष्टि प्रक्रिया इतनी अधिक सरलतापूर्वक गतिशील रह सकती है। इस पर यदि गंभीरता से विचार किया जाय तो यह तथ्य अधिक स्पष्ट को जाता है कि इतनी जटिल संरचनाओं वाला शरीर अनायास ही जड़ प्रकृति द्वारा नहीं बनाया जा सकता। इसकी सृजेता कोई विचारशील बुद्धिमान सत्ता होनी चाहिए।
चेतन सत्ता केवल प्राणधारियों के–अस्तित्व में चिन्तनात्मक एवं भावनात्मक संवेदना उत्पन्न करती हो सो बात नहीं। जड़ समझे जाने वाले वृक्ष वनस्पति से लेकर रासायनिक एवं खनिज पदार्थों में भी उसका न्यूनाधिक प्रभाव रहता है। चेतना तत्व के सम्बन्ध में जो शोध संशोधन चल रहे हैं उन्होंने वृक्ष−वनस्पतियों को भी प्राणि जगत का असंदिग्ध सदस्य बना दिया है। मनुष्य से लेकर वनस्पति तक की विभिन्न प्राण योनियों में संवेदनाओं का स्तर विभिन्न प्रकार का पाया जाता है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इन सभी में चेतन सत्ता आत्मा का अस्तित्व विद्यमान है इससे आगे जल, खनिज, मृतिका आदि–रासायनिक वर्ग में आते हैं। इनके सम्बन्ध में भी दिन−दिन अधिक स्पष्ट समझा जा रहा है कि ये भी वैसे निःचेष्ट निर्जीव नहीं हैं जैसा दिखाई पड़ता है।
लोहे पर जंग लगना कीचड़ से कीड़ों का उत्पन्न होना, जल पर काई जमना, इस बात के प्रमाण हैं कि जीवन तत्व विद्यमान है। जल की प्रत्येक बूँद से अणुवीक्ष्ण यन्त्र से चलते फिरते कीड़े देखे जा सकते हैं इस प्रकार जल की सजीवता भी स्वयं ही प्रकट है। यह जीवन धातुओं, पत्थरों में कम भले ही हों पर क्रमशः उनकी बद्धता और विनष्ट होते रहने की रीति−नीति को देखते हुए उन्हें भी मन्द जीवनधारी वर्ग में विभाजित किया जा सकता है। इन तथ्यों से अब वैज्ञानिक मान्यताएँ परिपुष्ट हो चली हैं कि विश्व के कण−कण अणु−अणु में न केवल हलचलें हो रही हैं वरन् उनमें जीवन तत्व भी हिलोरें ले रहा है।
जीवन ही आत्मा है समष्टिगत आत्मा ही परमात्मा है। जिस ब्रह्मांड की छोटी प्रतिकृति पिण्ड ग्रह और ग्रह का छोटा घटक परमाणु है उसी प्रकार विभिन्न प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान जीवन सत्ता आत्मा का समग्र स्वरूप परमात्मा है।
विज्ञान अब उतना नास्तिक नहीं रह गया है जितना कि पचास वर्ष पूर्व था। अब वह आत्मा ही नहीं प्रकारांतर से परमात्मा सत्ता भी स्वीकार करने लगा है। शोध प्रयास इसी प्रकार जारी रहे तो चेतना के स्वरूप, लक्ष्य एवं क्रिया−कलाप का सर्वमान्य आधार भी सामने आ सकेगा भले ही धर्म, सम्प्रदायों द्वारा की गई चेतना की परिभाषाएँ कितनी ही भिन्न क्यों न हों। वह दिन भी दूर नहीं जब आत्मा और परमात्मा का जीवनोपयोगी, उपयोग, कर सकने का आधार भी उपलब्ध होगा और उपासना, साधना, का भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मानकर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
नागेश भट्ट की विद्वता की ख्याति सुन बाजीराव पेशवा वाराणसी दर्शनार्थ आये। देखा–एक जर्जर शरीर पुस्तकों के ढेर के बीच बैठा था। युवावस्था से ही अध्यवसाय में रत यह साधक दर्शन,साहित्य तथा संस्कृति को पतितावस्था में देख–उनकी समयानुकूल व्याख्या लिखने में लगा था। न भोजन का ध्यान रहता, न कपड़ों का। जैसे−जैसे शरीर ढलता गया, तप साधना और भी कठोर होती चली गयी। शरीर सूख गया व उस पर कूबड़ निकल आया।
बाजीराव पूछ बैठे–”आचार्य प्रवर! आज्ञा दें– मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ यह मेरा सौभाग्य होगा।”
आचार्य अपनी एकाग्र चित्त अध्ययन समाधि से उठ बैठे–बोले, “हाँ महाराज! आत्मा के अस्तित्व को प्रामाणित करने के लिये एक सूत्र कठिनाई से हाथ लगा है। उसकी व्याख्या कर रहा हूँ। उसमें यदि मेरी सहायता कर सकें तो बड़ी कृ पा होगी।”
वस्तुतः संस्कृति के ऐसे सच्चे साधक अपने कार्य में तन्मय होते हैं, तभी महत्वपूर्ण उपलब्धि कर पाते हैं, उन्हें अपने मुख्य लक्ष्य की तुलना में हर सुविधा नगण्य प्रतीत होती है।
मत, मतान्तरों को देखकर श्रावस्ती नरेश चन्द्रचूड़ विभ्रमित हो उठे। धर्म के प्रति उनकी अविचल श्रद्धा थी पर साम्प्रदायिक मतभेदों एवं परस्पर विरोधी मान्यताओं के कारण मन में कितने ही प्रकार आशंकाएँ उठ रही थीं। राज पुरोहित के सामने उन्होंने अपनी शंकाएँ रखीं किन्तु राज पुरोहित समाधान नहीं कर सके। उन्हीं दिनों श्रावस्ती के एक सघन एकान्त में बने संधाराम में भगवान बुद्ध निवास कर रहे थे। “धर्म के मर्मज्ञ और द्रष्टा हैं, ऐसा सोचकर उचित समाधान के लिए महाराज चन्द्रचूड़ भगवान बुद्धि से मिलने चल पड़े।
“श्रावस्ती नरेश आपका दर्शन करना चाहते हैं भगवन्! सुना है धर्मों की विविधता तथा परस्पर विरोधी मान्यताओं के कारण वे अत्यन्त दुखित हैं। धर्म का शाश्वत स्वरूप जानने की जिज्ञासा लेकर आपके दर्शनार्थ आये हैं। आदेश हो तो उन्हें आपके सम्मुख उपस्थित करूं।” एक भिक्षुक ने भगवान बुद्ध से निवेदन किया।”
तथागत भिक्षुक की ओर उन्मुख होकर बोले–”तात! चन्द्रचूड़ एक धर्मात्मा सम्राट हैं, उन्हें शीघ्र यहाँ लेकर आओ।” थोड़ी देर बाद महाराज चन्द्रचूड़ भगवान बुद्ध के समक्ष प्रस्तुत हुए। देवमूर्ति ‘महाप्रा’ को प्रणाम किया। तथागत ने उन्हें सादर आसन पर बिठाया–कुशल क्षेम पूछा। चन्द्रचूड़ ने अपने आने का मन्तव्य स्पष्ट किया। सायंकाल की परिचर्या कुशल क्षेम पूछने तक सीमित रखकर भगवान बुद्ध ने महाराज के विश्राम आदि की व्यवस्था बनाने के लिए एक शिष्य को आदेश दिया।
प्रातःकाल सघाराम में एक वृक्ष से बँधे हाथी और जन्मान्धों की एक टोली को देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गये। थोड़ी देर बाद तथागत चन्द्रचूड़ को साथ लेकर अन्धों के पास पहुँचे और उनसे प्रश्न किया, ‘बान्धव! आप लोगों ने हाथी देखा है क्या? ‘नहीं भगवन्–सबने एक स्वर से उत्तर दिया। “ठीक है आज मैं तुम लोगों को हाथी दिखाता हूँ।” ऐसा कहकर भगवान बुद्ध ने प्रत्येक अंधों का स्पर्श हाथी के विभिन्न अंगों से कराया। हाथ से टटोलते हुए किसी ने हाथी की पीठ, किसी ने सूंड़, किसी ने कान, किसी ने दाँत,किसी ने पूँछ तथा किसी ने पैर को छूकर यह समझा कि उन्होंने हाथी देख लिया। सभी प्रसन्न थे कि आज उनकी हाथी से पहचान हो गयी।
अब तथागत ने पूछा–”बताइये हाथी कैसा होता है? एक ने उत्तर दिया खम्भे की तरह”−उसने हाथी के पाँव स्पर्श किये थे। कान के संपर्क में आने वाले ने हाथी की आकृति सूप जैसी बतायी। पूँछ पकड़ने वाले ने हाथी का वर्णन मोटी रस्सी के रूप में किया। सिर को स्पर्श करने वाले ने पत्थर जैसा बताकर अपनी सर्वज्ञता व्यक्त की। यह सब देख एवं सुनकर श्रावस्ती नरेश चन्द्रचूड़ हँस पड़े और बोले “भगवन्! यह सब तो हाथी के किसी अंग भर की जानकारी दे रहे हैं। हाथी तो इन सब जानकारियों से मिली−जुली आकृति होता है।”
भगवान बुद्ध के अधरों पर सारगर्भित मुस्कराहट दौड़ पड़ी। वे बोले–”तात! धर्म का शाश्वत स्वरूप भी ऐसा ही है। मत, मतान्तर विविध सम्प्रदाय एक−एक अंग की समीक्षा, प्रशंसा एवं प्रचार करते हैं तथा मतभेदों में उलझे रहते हैं। वे यह नहीं जानते कि बाह्य कलेवर के रूप में सम्प्रदायों, मत, मतान्तरों का स्वरूप समय−समय पर परिवर्तित होता रहता है, पर धर्म के शाश्वत सिद्धान्त सदा एक जैसे रहते हैं। समता, एकता, सहिष्णुता, उदारता, सहृदयता धर्म की शाश्वत विशेषताएँ हैं जो हर काल में एक समान धर्म रहती हैं। धर्म इन्हीं सहारे फूलता−फलता और समस्त संसार के लिए उपयोग बनता है।”
भगवान बुद्ध की सारगर्भित बातों से महाराज चन्द्रचूड़ की शंका का निराकरण हो गया, धर्म का डडडड समझ में आया तथा धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा और सुदृढ़ हो गयी।
विश्व का भविष्य मानवी उत्कृष्टता के साथ जुड़ा होने का तथ्य यदि हृदयंगम किया जा सके तो अवाँछनीय चल रहे सन्तति नियमन आन्दोलन की तरह सुप्रजनन के लिए ऐसे ही रचनात्मक कदम उठाने की आवश्यकता पड़ेगी।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता सुयोग्य नारियों की पड़ेगी। उनका स्तर गया−गुजरा रहा तो फिर मात्र पुरुषों की उत्कृष्टता से प्रयोजन की पूर्ति हो नहीं सकेगी। बीज की भी उपयोगिता आवश्यकता तो है, पर ध्यान में रखने स्तर की है। पुरुष प्रधान समाज में अब तक इस संदर्भ में श्रेय पुरुष को ही मिलता रहा है जबकि तथ्य ठीक इससे उलटे रहे। मदालसा, सीता, शकुन्तला आदि के विकसित व्यक्तित्व ही ऐतिहासिक सन्तानें दे सके। विनोबा, शिवाजी आदि को उनकी माताओं ने ही गढ़ा था। द्रौपदी, सुभद्रा और कुन्ती के उदाहरण प्रख्यात हैं। उच्चस्तरीय नारी व्यक्तित्व के बिना मात्र नर का पौरुष कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर सकता।
एक नर के शरीर से निःसृत शुक्राणुओं से सहस्रों नारियाँ गर्भाधान पा सकती हैं। परम्परागत रतिक्रिया की उपेक्षा कर दी जाय और कृत्रिम गर्भाधान के प्रयोग को अपना लिया जाय तो एक सुयोग्य नर से हजारों लाखों तक सन्तानें उसी के जीवन काल में प्राप्त हो सकती हैं। इतना ही नहीं, मरण के उपरान्त भी इस प्रक्रिया के आधार पर कोई सुयोग्य व्यक्ति सन्तानोत्पादन का क्रम जारी रखे रह सकता है।
इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त नारियाँ न मिलने पर क्या कृत्रिम गर्भाशय में पका कर अभीष्ट सन्तानें उत्पन्न की जा सकती हैं? इस ऊहापोह में इन दिनों ‘टेस्ह ट्यूवों’ का प्रयोग उत्साहपूर्वक हो रहा है। इस प्रयास में ब्रिटेन के दो वैज्ञानिकों ने भारी ख्याति अर्जित की है। (1) आर. जी. एडवड्ंस वेब्सेटर (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय) (2) डॉ. पी. पी. स्टेपोर्ट (ओलडम जनरल अस्पताल यू. के.) उसने बंध्या नारियों को छोटे आपरेशनों के उपरान्त सन्तानोत्पादन में समर्थ ही नहीं बनाया, कृत्रिम गर्भाधान के सहारे अधिक समुन्नत स्तर की सन्तानें उत्पन्न कराई जो उनके विद्यमान जोड़े नहीं कर सकते थे। अमेरिका के प्रजनन विज्ञानी डॉ. हैरिम ने भी इसी स्तर के प्रयोग किए हैं और परिणामों को देखते हुए भावी सम्भावनाओं के सम्बन्ध में उत्साहपूर्ण सफलताओं का संकेत दिया है।
बुद्धि और कौशल को सुविधा−सम्पन्न
उपयोगी मानते हुए तत्वज्ञों का यह कथन दिन−दिन अधिक प्रखर होता जा रहा है कि आनुवाँशिकी आधार पर मनुष्य की समर्थता बढ़ाने को प्रमुखता दी जाय। क्योंकि चिरस्थायी विशिष्टताएँ विकसित किया जाना उसी आधार पर सम्भव हो सकता है। वे पतित प्रवृत्तियों के लोगों को बदलने में भी सुधार या प्रताड़ना वाले प्रयासों को अपर्याप्त मानते हैं और कहते हैं उनको अभ्यस्त ढाँचे को बदलने में जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग होना चाहिए। उनकी नस्ल में हेरफेर किया जाना चाहिए
डॉ. क्रुक शैक ने मानवी प्रवृत्तियों को पौढ़ियों से चला आ रहा संचय कहा है। वे मानवी पुरुषार्थ डडडड महत्व तो मानते हैं, पर साथ ही यह भी कहते हैं कि “वंशानुक्रम से न केवल आकृति एवं प्रकृति का सम्बन्ध है वरन् अच्छी एवं बुरी परम्पराएँ आदतें एवं प्रवृत्तियों भी श्रृंखलाबद्ध रूप में जुड़ी चलती हैं। व्यक्तित्व डडडड सुधारने के लिए शिक्षण परक उपायों की उपयोगी मानते हुए भी वे कहते हैं यदि प्रवृत्तियों की दृष्टि से मनुष्य का परिष्कृत बनाना हो तो यह कार्य डडडड जन्मदाताओं को प्रजनन की बात सोचने से पूर्व डडडड निज के सुधार परिष्कार के रूप में आरम्भ डडडड चाहिए। इतना ही नहीं यह प्रयास पीढ़ी दर पीढ़ी चलें तो ही बात बनेगी।”
जातियों का बहुत कुछ सम्बन्ध प्रदेशों से भी है। वातावरण में न केवल उस क्षेत्र के प्रचलन वरन् जलवायु में घुसे हुए तत्व भी भावनात्मक प्रवाह उत्पन्न करने और परम्पराओं को दिशा देने की अदृश्य भूमिका प्रस्तुत करते देखे गये हैं।
जातीय विशेषताओं पर “विस्काँसिन विश्वविद्यालय” के एक प्रोफेसर ई. ए. राँस ने एक पुस्तक लिखी है–”प्रिन्सिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी।” इस पुस्तक में राँस ने विभिन्न जातियों की मौलिक विशेषताओं का उल्लेख सामान्य घटनाक्रमों के माध्यम से किया है। उनका कहना है कि वंश परंपरा से प्राप्त नैतिक संस्कारों में उत्तरी यूरोप के निवासी दक्षिणी यूरोप के निवासियों से आगे बढ़े हुए हैं। अपने एक उदाहरण से उन्होंने अपनी बात और भी स्पष्ट की है कि “जहाजी दुर्घटनाओं के अवसर पर उत्तरी यूरोप के निवासियों में दक्षिणी यूरोप के निवासियों की तुलना में अनुशासन, कर्त्तव्य निष्ठा, दुर्बलों के प्रति करुणा एवं सेवा की भावना अधिक पाई जाती है। दक्षिणी यूरोप के निवासी ऐसे अवसरों पर घबड़ा जाते तथा अपना सन्तुलन खो बैठते हैं। स्त्रियों, बच्चों, बूढ़ों जैसे कमजोर वर्गों के बचाव के लिए प्रयत्न करने की तुलना में मात्र अपनी इसके विपरीत प्रवृत्ति पाई जबकि उत्तरी यूरोपवासियों में इसके विपरीत प्रवृत्ति पाई जाती है। उदाहरणार्थ उन्होंने मान्तटैवर, नोटिस, एजेस, मोहिगान वेसलैण्ड, टाइटैनिक जहाजों के डूबने के समय का मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत किया है कि जहाज के अधिकारियों ने सभी बच्चों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। जबकि लाबुर्गोये, एलिसा, योरोपिया, जैसे विशालकाय जहाजों में हजारों की संख्या में व्यक्ति मारे गये। दक्षिण यूरोप के जहाज अधिकारी अपनी ही रक्षा में लगे रहे।
विभिन्न क्षेत्रों के वातावरण में ऐसी विशेषताएँ पाई जाती हैं जिससे उस परिधि में जन्मने वालों के कुछ अन्यत्र से भिन्न प्रकार की विचित्रताएँ देखी जाती हैं। उदाहरणार्थ–हिमालय के निकट रहने वाले पहाड़ियों में अपराध की प्रवृत्ति कम पाई जाती है। सरहदी पठानों का खूंख्वारपन प्रसिद्ध है।
जान स्टुअर्ट मिल अपनी पुस्तक “प्रिन्सिपल्स ऑफ पाँलिटिकल इकोनाँमी” में लिखते हैं कि यूरोपीय देशों के मिल मालिक अपने यहाँ अँग्रेज मजदूर नहीं रखना चाहते हैं क्योंकि वे वेतन पाते ही शराब पीने में रखना चाहते हैं क्योंकि वे वेतन पाते ही शराब पीने में इतने मस्त हो जाते हैं कि कई दिनों तक काम पर नहीं आते।
स्थान−स्थान पर विभिन्न जातियों एवं समुदायों में रहने वाले व्यक्तियों के स्वभाव, मान्यताओं, आकाँक्षाओं एवं क्रिया–कलापों में भारी अन्तर दिखाई पड़ता है। किसी स्थान के निवासी अधिक बहादुर एवं साहसी होते हैं तो कहाँ के अधिक खूँख्वार। किन्हीं−किन्हीं जातियों में चरित्रनिष्ठा विलक्षण दिखाई पड़ती है। कहीं−कहीं के व्यक्ति अत्यधिक उद्यमी होते हैं जैसे कि जापान, इसराइल, डेनमार्क। उनकी क्रियाशीलता में वातावरण में घुले तत्वों का भी योगदान है। जूलियन हक्सले ने इस विशेषता को साँस्कृतिक विशेषता नाम दिया है तथा यह स्वीकार किया है कि साँस्कृतिक विशेषता को हर कोई उस वातावरण के सान्निध्य में रहकर प्राप्त कर सकता है।
“डडड इमेज, क्लोनिंग ऑफ मैन” पुस्तक में डेविड रोकविक ने कहा है– जीन विश्लेषण की प्रक्रिया को यदि विकसित किया जा सके तो बिना रतिक्रिया के भी समर्थ एवं सुयोग्य व्यक्तियों की प्रतिलिपि सन्तानें पैदा की जा सकेंगी। वह बन पड़ा तो उसे मानवी भविष्य का एक उज्ज्वल चिह्न माना जायगा।
नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. जोशुला लेटर वर्ग (केलीफोíया) का मत है कि संसार के वर्तमान महामानवों के शुक्राणु संचय करने के लिए एक ऐसी बैंक स्थापना की जानी चाहिए जो उपयुक्त स्तर की महिलाओं के माध्यम से उच्चस्तरीय सन्तानें प्राप्त करने के काम आ सके।
वैज्ञानिक जे. बी. एस. हैल्डेन का कहना था कि मानव कलम को कुशलता से तैयार कर वर्तमान की सारी खामियों को दूर किया जा सकता है जो भावी वैज्ञानिक प्रगति में सम्भावित सभी प्रतिकूलताओं डडडड सामना कर सके जिसमें दूसरे ग्रहों की यात्रा भी है। फ्राँसीसी जीव वैज्ञानिक जीन रोंसे का विचार है कि मानव कलम का उपयोग व्यक्ति के खण्डित स्वरूप में बदलने के लिए, उसे अमरत्व प्रदान करने के लिए भी किया जा सकता है।
मिनिसोटा यूनिवर्सिटी के जीवकोशिका विशेषज्ञ रॉबर्ट मैकिवेल ने निम्न जाति के जीवधारियों पर मानवी कलम लगाकर उन्हें नरपशु या पशुनर स्तर के नये जीवधारियों की संरचना की बात सिद्धान्ततः स्वीकारी है। वे कहते हैं कि आवश्यक नहीं कि समान जाति के बीच ही प्रजनन प्रक्रिया सीमित रहे। यह कदम रतिक्रिया द्वारा तो नहीं पर जीन्स आरोपण के प्रयोग द्वारा आज न सही कल सम्भव हो सकता है। फिलाडेल्फिया के रॉबर्ट ब्रिग्स भी इस सम्भावना को स्वीकार करते हुए तदर्थ शोध करने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं।
जैक्सन लेबोरेटरी बारहार्वट मैंने के जीव पुनरुत्पादन विभाग के वैज्ञानिक पीटर होप के अनुसार यदि स्तनधारी जीवों पर प्रयास किए जायें तो मानव कलम सम्भव है।
कैलीफोर्निया के 74 वर्षीय रॉबर्ट के. ग्राहम ने एक ऐसा अभियान चलाया है जो दुनिया में आश्चर्यजनक है। उन्होंने पाँच नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के शुक्राणुओं को एकत्र कर ‘शुक्राणु बैंक’ का निर्माण किया है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि इन शुक्राणुओं से सर्वोच्च आई. क्यू. की महिलाओं से संसर्ग कराके अति बुद्धिमान बच्चे पैदा किये जा सकें। अपने इस प्रयास में वे तीन महिलाओं का अभी तक कृत्रिम गर्भाधान भी करा चुके हैं।
अमेरिका के प्रायः एक सौ से भी अधिक विश्वविद्यालय एवं दर्जनों निजी शोध संस्थान जीन के परिवर्तन एवं प्रत्यारोपण पर शोध कर रहे हैं। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी एवं रूस ने भी इस विषय में काफी दिलचस्पी दिखाई है।
वनस्पति जगत एवं मनुष्येत्तर प्राणियों पर जेनेटिक इंजीनियरिंग के सफल प्रयोगों के उपरान्त अब विज्ञान जगत में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय यह है कि क्यों न वे प्रयोग मनुष्य की नस्ल सुधारने के लिए भी किए जायें। इस संदर्भ में वे संसार के मूर्धन्य नर−नारियों से एक मार्मिक अपील करने जा रहे है कि वे अपनी प्रतिभा को भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ जाने की बात सोचें और व्यक्तिगत असुविधा को सहन करते हुए भी प्रतिभा सम्पन्न पीढ़ियों के सृजन में सक्रिय योगदान दें।
यद्यपि इस प्रसंग में दाम्पत्य जीवन की सघनता पर आँच आने और नैतिक मूल्यों तथा पारिवारिक उत्तरदायित्वों में व्यतिक्रम होने जैसे खतरे सोचे जाते हैं। फिर भी विज्ञजनों का कथन है कि बड़े लाभ के लिए छोटे नुकसान उठा लेने में इतना हर्ज नहीं कि उतने से अपडर के लिए एक महान सम्भावना का परित्याग किया जा सकें।
महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में ‘नियोग‘ प्रथा की परम्परा को शास्त्र सम्मत बताया है और उसका समर्थन किया है। नियोग का अर्थ है–आवश्यकतानुसार विवाहित पति−पत्नी का अन्य किसी से सन्तानोत्पादन कर लेना। विशेष परिस्थितियों में इसे उन्होंने अनुचित नहीं माना हैं। साथ ही समर्थन में कई शास्त्र वचन तथा घटना उद्धरण भी दिये हैं।
हनुमान पुत्र मकरध्वज, भीमपुत्र घटोत्कच, कुन्ती पुत्र पाण्डव की कथा−गाथा प्रख्यात है। व्यासजी ने अपनी तीन भावजों से नियोग करके पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर को जन्म दिया था। परामर्श द्वारा मत्स्यगंधा के नियोग का भी पुराणों में उल्लेख है। ईसामसीह का जन्म कुमारी माता के पेट से हुआ था।
आचार्य रजनीश उच्चस्तरीय नर−नारियों की समुन्नत स्तर की सन्तानें पैदा करने की आवश्यकता बताते है और इसके लिए वीर्य बैंक की स्थापना तथा मानवी कलम लगाने का समर्थन करते हैं।
तरीके क्या अपनायें जायें यह विवादास्पद है। तो भी इस निर्णय पर पहुँचने में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि मानवी प्रगति के लिए व्यक्तित्वों के मूलभूत आधार वंशानुक्रम को भी ध्यान में रखा जाय। आशा की जानी चाहिए कि आज नहीं तो कल कोई ऐसा मार्ग निकल आवेगा जिसमें दाम्पत्य−जीवन की सुविधा तथा पवित्रता बनाये रखकर जीन्स स्तर पर मनुष्य को समुन्नत बना सकना सम्भव हो सके।
श्रावस्ती नगरी में सर्वत्र तपस्वी सुधारक की ही चर्चा थी। लोभ और मोह, वासना और तृष्णा पर उन्होंने विजय पा ली थी। तत्वदर्शियों ने साधना से सिद्धि के तीन सोपान बताये हैं–’मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु’। साधु−सुधारक रूपी आरम्भिक दो सोपानों पर चढ़ चुके थे। उनके तप और त्याग से–निस्पृह जीवन चर्या से हर कोई प्रभावित था। लोगों की श्रद्धा एवं सम्मान के सुमन उन पर चढ़ रहे थे। उग्र साधन के ताप में इन्द्रियों की वासना विगलित हो चुकी थी। संयम और तितिक्षा की अग्नि में तपने के बाद मन ने वित्तेषणा की निस्सारता सिद्ध कर दी थी, पर अभी भी लोकेषणा मन के एक कोने में अपना अड्डा मजबूती से जमाये हुई थी। जिसके कारण साधना की अहम्यता पोषण पा रही थी। शास्त्रकारों ने लोकेषणा को सबसे सूक्ष्म और प्रबलतम शत्रु माना है जिस पर विजय पाना प्रायः कठिन पड़ता है। यही तपस्वी सुधारक के साथ हुआ। सम्मान और श्रेय प्राप्त कर सुधारक का अहंकार बढ़ता ही गया।
निरासक्त तपस्वी के प्रति उमड़ने वाली श्रद्धा ने वन, सम्पत्ति, वस्त्र आदि उपादानों के अम्बार लगा दिए। यह देखकर सुधारक के मन में वितर्क उठा कि–अब मेरी तपस्या सफल हो गयी। योग सिद्ध हो गया, जीवन मुक्ति का अधिकारी बन गया। अहंकार साधक के पतन का कारण बनता है। अनेकों स्थानों पर परिव्रज्या के निर्मित परिभ्रमण करने के उपरान्त जब वे आश्रम में वापिस लौटे तो वृद्ध गुरु की तीक्ष्ण दृष्टि से उनका अहंभाव छुपा न रह सका। एक दिन गुरु ने उन्हें पास बुलाया और कहा “वत्स! आश्रम में समिधाएँ समाप्त हो चुकी है। जाओ जंगल से समिधाएँ ले आओ। प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी करनी है। सुधारक ने उपेक्षा दर्शाते हुए कहा–”मुझे अब कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।” तत्वदर्शी गुरु भावी आशंका से चिन्तित हो उठे। उन्होंने स्नेह मिश्रित स्वर में कहा–”तात! तुम यह काम रहने दो, पर एक काम अवश्य करो। भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगरी में पधारे है। उनसे एक बार अवश्य मिल आओ।” सुधारक ने बुद्ध की ख्याति सुन रखी थी। मन में उत्कण्ठा भी थी मिलने की। गुरु के प्रस्ताव को स्वीकार करके वह महाप्राज्ञ से मिलने चल पड़े।
जैतवन बौद्ध बिहार में बौद्ध भिक्षुकों की मण्डली ठहरी थी। वहाँ पहुँचने पर सुधारक को मालूम हुआ कि बुद्ध भिक्षाटन कि लिए गये है। इतने भिक्षुओं के रहते हुए भी बुद्ध को भिक्षाटन के लिए जाना पड़ता है, यह बात सुधारक की समझ में न आ सकी। खोजते−खोजते एक गृहस्थ के यहाँ भीख मांगते बुद्ध से उनकी भेंट हो गयी। अपना परिचय सुधारक न स्वयं एक तपस्वी के रूप में दिया तथा बन्धन मुक्ति का उपदेश देने का आग्रह किया। महाप्राज्ञ मौन रहे और सुधारक के साथ जैतवन वापिस लौटे। रात्रि विश्राम करने का आदेश देने तथा प्रातः− कान सम्बन्धित विषय पर चर्चा करने के साथ संक्षेप में वार्ता समाप्त की।
दूसरे दिन भगवान बुद्ध के सामने अपनी जिज्ञासा लिए सुधाकर बैठे थे। अंतर्दृष्टा महाप्राज्ञ से सुधारक की स्थिति दर्पण की भाँति स्पष्ट थी। तपस्वी और त्यागी होते हुए भी सुधारक अहंकारी है, यह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से, वे देख चुके थे। उनकी मर्मभेदी वाणी फूट पड़ी–”वत्स! जीवन मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक है–अहंकार। यह लोकेषणा की कामना से बढ़त है, पर निरासक्त कर्मयोग–सेवा भावना से भावना से घटता है। लोकसेवा में निरत होकर ही अहंकार पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की उच्चस्तरीय अनुभूति इस सेवा साधना से ही सम्भव है।”
सुधारक को अपनी भूल ज्ञान हुई। भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर उन्होंने क्षमा माँगी और लोकसेवा में प्रवृत्त होकर अपनी अवरुद्ध आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में लग गये।
अन्तरिक्ष यान अपोलो–11, 2 लाख 96 हजार किलोमीटर अर्थात् 1 लाख 60 हजार अन्तरिक्षीय मील दूर स्पेस में था। इतने में ह्यूस्टन के मिशन कन्ट्रोल में अपोलो–11 से अनेकों जीवों के एक साथ हुँकार भरने एवं विचित्र स्वर में हँसने की आवाज सुनाई पड़ी। कन्ट्रोल अधिकारी ने चन्द्र यात्रियों से संपर्क साधा तथा इस डरावनी आवाज के विषय पूछा। अन्तरिक्षीय यान में मौजूद नील आर्मस्ट्राँग, एडविन एल्ड्रिन तथा माइकेल कालिस ने भी उक्त आवाज को सुना और उत्तर दिया कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि यान के आस−पास कुछ जीव मंडरा रहे है। वे अहश्य हैं, किन्तु उनकी उपस्थिति का आभास मिल रहा है।
बहुत दिनों तक यह घटना चर्चा की विषय बनी रही किन्तु उस विचित्र आवाज का कारण न जाना जा सका। क्या पृथ्वी से परे भी जीवन का अस्तित्व है? यदि है तो कैसा है, इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक क्षेत्र में खोजबीन चल रही है जो प्रमाण मिल रहे हैं उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्यान्य ग्रहों पर जीवन है। सम्भव है अन्य ग्रहों पर रहने वाले जीवों का स्वरूप पृथ्वी जैसा न हो। वे अदृश्य प्राणी भी हो सकते है। चन्द्र यात्रा के बीच सुनाई पड़ने वाली विचित्र ध्वनि उन अदृश्य जीवों की हो सकती है।
सन् 1971 में पृथ्वीत्तर जीवन की खोज के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय कमेटी बनायी गई जिसकी बैठक रूस के आर्मीनिया प्रदेश में हुई। अनेकों वैज्ञानिकों ने यह सम्भावना व्यक्त की कि अन्य ग्रहों पर भी जीवन है। सन् 1969 में आस्ट्रेलिया में गिरी एक उल्का के विश्लेषण−परीक्षण से ज्ञात हुआ कि उनमें पाँच अमीनो−एसिड्स ऐसे हैं–जो पृथ्वी पर जीवित प्राणियों में पाये जाते है। इसके अतिरिक्त 11 प्रकार के अन्य अमीनो एसिड और भी हैं जो पृथ्वी पर कुछ ही जीवित प्राणियों में विशेष रूप से पाये जाते है। ये अमीनो एसिड वामहस्त एवं दक्षिणहस्त दोनों प्रकार के थे। जबकि पृथ्वी पर मात्र वाम हस्त अमीनो एसिड ही पाये जाते है। वैज्ञानिकों ने अमीनो एसिड ही पाये जाते है। वैज्ञानिकों ने अमीनो एसिड की इस विकसित स्थिति के आधार पर घोषणा की कि जिन ग्रहों, उपग्रहों से उल्का पिण्ड टूट कर गिरा, वहाँ पृथ्वी से भी अधिक विकसित एवं बुद्धिमान प्राणियों के होने की सम्भावना है। 1953 में अमेरिका के भौतिकविद् श्री मिलर ने जीवन के उद्गम की सम्भावना के लिए गैसों में विद्युत विसर्जन का प्रयोग किया जिससे अमीनो एसिड, प्रोटीन तथा एल्डीहाइड और अन्ते में न्यूक्लिक एसिड बना, जो पृथ्वी पर के जीवन रहस्य को अपने अन्दर छिपाये हुए है। उन्होंने अपने खोज के उपरान्त कहा कि पृथ्वी पर गिरने वाली उल्काओं में, पानी, हाइड्रोजन सायनाइड, फारमल्डी हाइड आदि गैलेक्सी के सघन धूल−पेटिकाओं में मिले हैं। यह इस बात का परिचायक है कि अन्य ग्रहों में भी जीवों के होने की सम्भावना है।
अमेरिका के जीव विज्ञान डॉ. कार्ल साँगन का कहना हैं कि अन्य ग्रहों एवं नक्षत्रों में वैसी ही रासायनिक एवं भूगर्भीय प्रक्रियाएं चल रही हैं, जैसी कि पृथ्वी पर जीवन के उद्गम के समय चली थी। उनका कहना है कि ब्रह्मांड में प्राणियों का अस्तित्व एक नहीं अनेकों स्थानों पर है क्योंकि जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ ब्रह्माण्ड में कई स्थानों में विद्यमान हैं। सी. यस. लेविस अपनी पुस्तक आउट ऑफ दी सायलेण्टप्लेनेट में लिखते हैं कि पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य लोकों में भी मनुष्य से मिलते−जुलते प्राणी रहते है। सन् 1950 में डॉ. फ्रेंड डे्रक ने ताउसेटी और एप्सिलोन नामक सूर्य तारों से प्राप्त तरंगों का पता एक शक्तिशाली रेडियो−दूरबीन द्वारा लगाया 1975 से ही डॉ. कार्ल सागन एवं डॉ. डे्रक प्यूरिटोरिको के एरिक्वों नामक स्थान में स्थापित विशाल रेडियो दूरबीन से पृथ्वीत्तर जीवों के सन्देश सुनने का प्रयास कर रहे है। रूस और ब्रिटेन में भी इस प्रकार के प्रयास चल रहे है। अमेरिका में तो पृथ्वीत्तर प्राणियों की खोज के लिए वैज्ञानिकों ने सेटी (सर्च फार एक्स्ट्रा टैरेस्ट्रियल इन्टेलिजेन्स) नामक योजना बनायी है, जिसके अनुसार अन्य लोकों के प्राणियों से संपर्क जोड़ने का प्रयास चल रहा है।
गत वर्ष अमेरिका में ही एक गोष्ठी खगोल शास्त्रियों की हुई। इसमें बताया गया कि शनि के उपग्रह टाइटन में वायु मण्डल का दबाव पृथ्वी जैसा ही है। शनि के वायुमण्डल में इथेन प्रयुर मात्रा में है। ‘बेस्तर’ नामक ताराखण्ड में हाइड्रोकार्बन है। बृहस्पति के वायुमण्डल में पानी की भाप विद्यमान है जो इस बात की ओर संकेत करती है कि इन पर यदि जीवन हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
यह तो वातावरण के आधार पर निकले वैज्ञानिक निष्कर्षों की बात हुई। समय−समय पर दिखाई पड़ने वाली उड़न तश्तरियों के प्रमाण भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अन्य ग्रहों पर न केवल जीवों का निवास है वरन् सभ्यता की दृष्टि से वे कहीं मनुष्य से भी अधिक विकसित हैं। 1973 में ट्यपेलो क्लीवलैड, संयुक्त राज्य अमेरिका के एक मजिस्ट्रेट तथा चार वन−विभाग के रेंजरों ने तश्तरीनुमा आकृति को देखा जो आकार में दो कमरे वाले मकान के बराबर थी। उक्त यान से लाल, पीली एवं हरी रोशनी निकल रही थी। इसके ठीक दो सप्ताह बाद इसी नगर के 80 किलोमीटर दक्षिण में एक सैनिक हेलीकाप्टर एक गुंबदाकार धातु से बने डडडड के आकार के यान से टकराते−टकराते बचा। यान चालक कप्तान क्यायन का कहना था कि उसका हेलीकाप्टर उस विचित्र यान के निकट आते ही अपने आप उसके साथ 600 मीटर ऊँचाई तक उठता गया। कन्ट्रोलिंग कक्ष का हेलीकाप्टर पर नियन्त्रण न रहा। 600 मीटर ऊँचे उठने के बाद उसका हेलीकाप्टर एक झटके के साथ दूर धकेल दिया गया। बड़ी कठिनाई से नियन्त्रण हो सका। कप्तान ‘क्वायन’ का कहना था कि विलक्षण यान कुछ ही क्षणों में जाने कहाँ लुप्त हो गया।
कोरिया युद्ध के समय वहाँ के एक सैनिक एवं उसके साथी ने हल्की नीली रोशनी फेंकने वाले आकाश में पृथ्वी के अत्यन्त निकट एक विचित्र यान को मंडराते हुए देखा। उस यान से तीन साँवले से जीव उतरे। जिनकी लम्बाई 4 फीट होगी। यान से वे उसी प्रकार उतरे जैसे चिड़ियाएँ पृथ्वी पर उतरती है। उन दोनों सैनिकों में से एक तो बेहोश हो गया। दूसरे ने जो वर्णन किया वह विस्मित कर देने वाला था। दूसरे व्यक्ति ने बताया कि उसे विचित्र जीव यान में खींच ले गये। ऐसा अनुभव हो रहा था मानो कोई शक्तिशाली चुम्बक यान के भीतर खींचे ले जा रही हो। यान के भीतर इलेक्ट्रॉनिक आँख जैसे यन्त्र द्वारा उसके प्रत्येक अंग का परीक्षण किया गया। परीक्षण की अवधि में वह बेहोश हो गया। होश आने पर उसने अपने को भूमि पर पड़ा पाया। यान का कहीं नामोनिशान नहीं था। वहाँ पर विद्यमान रेडियो धर्मिता को यह अवश्य संकेत मिलता था कि कोई ऐसी घटना यहाँ घटी है। उसका सैनिक कई दिनों तक भयभीत बना रहा। वैज्ञानिकों ने उसके शरीर का परीक्षण किया किन्तु सभी अवयव ठीक प्रकार काम कर रहे थे। इस प्रकार की घटनाएँ विश्व के अनेकों स्थानों पर घटित हो चुकी हैं किन्तु अब तक यह ज्ञात न हो सका कि उड़न तश्तरियों जैसे यान अचानक कहाँ से आते है और देखते−देखते कहाँ लुप्त हो जाते है। यह सभी मानव मस्तिष्क के लिए रहस्य ही बना हुआ है। आधुनिकतम यन्त्रों से सुसज्जित इन यानों की संरचना तथा अचानक प्रकट होकर इनके गायब हो जाने की प्रक्रिया, इस बात की परिचायक हैं कि वे किन्हीं ऐसे ग्रहों से आते है जहाँ की भौतिक सभ्यता पृथ्वी की तुलना में कहीं अधिक विकसित है। ग्रह, नक्षत्र कौन से हैं तथा वहाँ के प्राणी कैसे हैं, यह रहस्य तो अभी अभी अविज्ञात है। किन्तु यह तथ्य तो एक मत से स्वीकार किया जा रहा है कि अन्यान्य ग्रहों पर जीवन है। सम्भव है प्रगति के आगामी सोपानों में उनसे परस्पर संपर्क का–ज्ञान के आदान−प्रदान का क्रम बन जाय।
(नवम्बर 81 में इसी शीर्षक से प्रकाशित लेख का उत्तरार्ध)
अपनी धरती पर अब तक मात्र एक ही ‘ब्लैक होल’ का पता चला है– ’वारमूडा त्रिकोण’। क्योंकि वह जलयानों और वायुयानों के आवागमन मार्ग पर है। आवश्यक नहीं कि मात्र यह एक ही हो। अपने पृथ्वी पर ऐसे अनेकों सुविस्तृत क्षेत्र हैं जिनमें मानवी आवागमन अभी सम्भव नहीं हुआ है या आवश्यक नहीं समझा गया है। हो सकता है कि उन क्षेत्रों में कोई और ब्लैक होल हो। आवश्यक नहीं कि वे धरती के पदार्थ को ऊपर ही उड़ा ले जाते हो, हो सकता है उनमें से कुछ ऐसी प्रकृति के भी हो जो अन्य लोकों के पदार्थों एवं प्राणियों को अपनी धरती पर भी लाते है। और पट्टी का काम करते है।
पिछले लेख (पृष्ठ 28, नवम्बर 81) में कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें समय−समय पर धरती के पदार्थों और प्राणियों के अदृश्य हो जाने का विवरण है। यह शृंखला बहुत लम्बी है। पिछली शताब्दी की ज्ञात और अविज्ञात घटनाओं का तारतम्य जैसे−जैसे प्रकाश में आता जायगा, यह विदित होगा कि यदि समय रहते यह जानकारी मनुष्य के हाथ लग गई होती तो उस क्षेत्र से दूर रहा जा सकता था और डडडड रही भयावह क्षति से बचाव हो सकता था।
12 सितम्बर 1971 को कैप्टेन जॉन रोमेरो जब उसके साथी पायलेट ने फ्लोरिडा के होम स्टेड डडडड वेस’ से ‘जेट−फेन्टम द्वितीय’ में उड़न की। डडडड से ‘मियामी’ के दक्षिण पूर्व में जेट को उड़ते देखा गया उसके तुरन्त बाद वह रेडार के परदे पर दिखाई न दिया। ‘एअर फोर्स’ एवं ‘कोस्टल गार्ड’ के द्वारा बड़े पैमाने पर विस्तृत खोज की गयी, परन्तु गायब हुए जेट एअर लाइनर’ का चिन्ह प्राप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक निर्णय खुला छोड़ दिया गया अर्थात् कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
जून 1965 में ‘फ्लाइंग बाक्सर ए.सी. 119 बिस्कान्सिन’ की उड़ान प्रारम्भ हुई। उसमें 10 कर्मचारी थे। ‘ग्रान्ड ट्रन्क रोड−द्वीप’ पर माल पहुँचाना था। उड़ान के कुछ समय बाद ‘बहरमा’ के उत्तर तट से जहाज का आखिरी रेडियो सन्देश मिला। उसके तुरन्त बाद वह अदृश्य हो गया। शोध करने पर कुछ ऐसे अवशेष चोक आदि पाये गये जो यह प्रदर्शित करते थे कि वे जहाज से गिर गये हों। दुर्घटना या यान्त्रिक संरचना की गड़बड़ी का कोई संकेत नहीं मिला। उस समय मौसम भी अच्छा था।
उस समय ‘जेमिनी चार’ नामक उपग्रह भ्रमण–कक्षा में था। उसके संकेतों से ‘कै रेबियन समुद्र तट पर एक सफेद धब्बा दिखाई दे रहा था, सम्भवतः वह यूफो (यू. एफ. ओ.) था। वैज्ञानिक उस सफेद धब्बे का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
जुलाई 1949 को ‘मियामी इन्टरनेशनल एअर पोर्ट के ‘फ्लाइट−कन्ट्रोलर’ कार्लटन हेमिल्टन’ एक हवाई जहाज सी−46 के पायलेट को गाइड कर रहे थे। पायलेट ‘बोगोटा’ से आ रहा था और कन्ट्रोलर कर परिचित था। कन्ट्रोल टॉवर से 40 मील से कम दूरी पर से उसके संकेत मिल रहे थे, परन्तु एकाएक वह अदृश्य हो गया। बार−बार विभिन्न रेडियो सूत्रों से संपर्क करने का प्रयत्न किया गया परन्तु संपर्क न हो सका। 15 मिनट के अन्दर ही उसकी खोज की गयी– उसका कोई अवशेष चिन्ह नहीं मिला। अधिकारीगण कोई निर्णय न कर सके।
कार्लटल हैमिल्टन के अनुसार समय−समय पर कुछ अदृश्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विक्षोभों के कारण रेडियो एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपना कार्य करना बन्द कर देते हैं जिसके फलस्वरूप यन्त्र तथा मानव शरीर भी अदृश्य हो जाते है। नवम्बर 1971 में “लकीएडर” नामक मछली पकड़ने वाली 25 फुट लम्बी यान्त्रिक नाव “जरसी” के दक्षिणी समुद्र तट पर पायी गयी। किसी भी कर्मचारी का पता न चला। ‘लाइफ−−प्रिजर्बर्स’ दस रखे थे−−ज्यों के त्यों रखे पाए गए। विस्तृत खोज किए जाने पर भी कोई जानकारी न मिल सकी कि आखिर कर्मचारी कहाँ गायब हो गये। दिसम्बर 1945 में पाँच फाइटर हवाई जहाज फ्लोरिडा के ‘फोर्टलाडर डेल’ हवाई अड्डे से नियमित ‘ट्रनिग एक्सरसाइज’ की उन्नीसवीं उड़ान कर रहे थे जिनकी उड़ान पूरी होने का समय 3−45 (पी.सी) था। उड़ान के पूर्व प्रत्येक हवाई जहाज की यान्त्रिक कमियों की जाँच की गयी थी। सुरक्षा के सभी उपकरणों से हवाई जहाज सुसज्जित थे एवं दुर्घटना होने पर बाहर निकलने के साधन भी मौजूद थे। मौसम बिल्कुल साफ था। 3−45 उड़ान पूरी होने का समय था−उस समय तक किसी भी हवाई जहाज से कोई सन्देश नहीं पाया गया। 6−30 से कुछ मिनट पूर्व इन हवाई जहाजों से संकेत मिल और रेडार पर भी दिखाई दिये उसके तुरन्त बाद वे अदृश्य हो गए। इनकी शोध के लिए आठ−दस ‘रेस्क्यू प्लेन’ भेजे गये। उनमें से एक रेस्क्यू प्लेन भी गायब हो गया। अधिक जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि फ्लाइट के कप्तान ने उस दिन उड़ान की अनिच्छा प्रकट की थी, अपनी धड़ी भी नहीं पहनी और रेडियो को ‘इमरजेन्सी चैनल’ पर भी रखने से इन्कार कर दिया। बचाव के लिए भेजा गया ‘इमरजेन्सी चैनल’ पर भी रखने से इनकार कर दिया। बचाव के लिए भी रखने से इन्कार कर दिया। बचाव के लिए भेजा गया ‘रेस्क्यू प्लेन’ उसी दिन 7−27 पर निकला। 8−30 तक ़ उसकी प्रतीक्षा करने के उपरान्त उसको गायब समझा गया। कन्ट्रोलर टावर से उसने संपर्क भी नहीं किया। 7−50 पर हवा में विस्फोट होने वाले किसी निर्णय पर न पहुँच सके। आत्मविस्मृति और अदृश्य होने की संभावना बतायी।
ब्लैक होलों के माध्यम से अदृश्य हुए मनुष्य और पदार्थ आखिर चले कहाँ जाते हैं। और फिर जहाँ पहुँचते हैं वहाँ उनकी क्या स्थिति होती है। इस सम्बन्ध में विज्ञान की पहुँच अभी उतनी लम्बी नहीं हुई है जितनी कि ऐसे रहस्यों पर से पर्दा उठाने के लिए आवश्यक है। फिर भी कुछ अतिरिक्त सूत्र ऐसे हाथ लगे हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यह ‘ब्लैक होल’ किसी अन्य लोक के साथ धरती का सम्बन्ध जोड़ते हैं और जो कुछ इस मार्ग से खींचा घसीटा जाता है वह नष्ट नहीं होते वरन् सुरक्षित रहने के साथ−साथ अच्छी स्थिति में भी बना रहता है।
इस संदर्भ में अनायास ही एक रेडियो वार्ता किसी ऐसे मनुष्य के साथ हो गई जिससे मनुष्य लोक ब्लैक−होल’ के मार्ग से पहुँचे हुए मनुष्यों के स्थिति का कुछ आभास मिलता है।
सन् 1975 की 18 अप्रैल की रेडियो सुनने वाले डब्ल्यू.एफ.टी.एल.स्टूडियो (फ्लोरिडा के लाँडरडेल स्टूडियो) से अपने प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये संपर्क करने का प्रयत्न कर रहे थे। स्टूडियो के प्रोग्राम डायरेक्टर रे.स्मिािर्स’ की टेबल पर एक ‘की बोर्ड’ था। जिसमें उपयोक्त (सब्सक्राइबर) का नम्बर संकेत मिल जाता था। संकेत के क्रमानुसार उन्होंने फोन उठाये−पहले फोन से कोई जवाब नहीं आया, दूसरा उठाया−कोई जवाब नहीं मिला। दुबारा इसी प्रकार नौ टेलीफोन उठाने पर भी उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
अचानक एक सन्देश सुनाई दिया जिसने अदृश्य लोक की स्थिति की जानकारी पृथ्वी वालों को बताने की चेष्टा की गई थी। संदेश इस प्रकार था। (1) जिस लोक से हम बात कर रहे हैं। यहाँ प्रत्येक जीवित वस्तु की आभा (औरा) होती है। (2) उसी प्रकार इस लोक की भी अपनी आभा है। जिस क्षेत्र से सम्बन्धित आ बात कर रहे हैं यह इस ‘औरा−प्रदेश’ में पड़ता है। (3) ‘मिलियन काउंसिल’ इस ग्रह का नियन्त्रण कर रहा है। वारमूडा प्रदेश उस नियन्त्रण माध्यम का क्षेत्र है। (4) ‘चैनेल खुली होने के समय इसमें जो प्रवेश करते है, वे अदृश्य नहीं हो जाते। जीवित स्वस्थ अवस्था क्रम में कालातीत शून्य में हैं। (5) इस ग्रह के साथ कौंसिल से संपर्क स्थापित करने के लिए केवल यही एक मार्ग है बात अधूरी रहे गई और वार्ताक्रम टूट गया।
इस रहस्य को सुलझाने के लिए अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न प्रसिद्ध महिला ‘प्रेग ब्रायन्ट’ को बुलाया गया। ऐसे प्रसंगों पर प्रकाश डालने–रहस्योद्घाटन करने के लिए प्रख्यात थी। ‘रेडियो स्टूडियो’ में आते ही वह ध्यानमग्न हो गई। कुछ मिनट बाद उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। रे. स्मिथर्स के द्वारा पूछे जाने पर उस महिला ने बताया “मैंने एक मृतक वायुयान चालक को देखा है जो सन् 1969 में वारमूडा क्षेत्र से गायब हो गया था।”
दूसरी बार स्मिथर्स महोदय ने उसे महिला से–1969 में गायब हवाई बेड़े के कप्तान ‘गलीबान’ से संपर्क करने को कहा। ‘प्रेग−ब्रायन्ट’ ने कहा–”इसके ठीक−ठीक संकेत नहीं मिल रहे हैं।” सही संकेत प्राप्त करने के लिए वह घटनास्थल पर कईबार गयी। अन्त में उसने बताया कि वे लोग ऐसे आयाम में रहते हैं। जिसे हम मृतलोक कहते हैं।
रे. स्मिथर्स ने ‘प्रेग‘ से तीसरा प्रश्न पूछा–”वहाँ क्या विशेषता है? उसने बताया कि उस त्रिकोण क्षेत्र में चुम्बकीय ऊर्जा मालूम होती है जिसका शरीर व मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है जिसके फलस्वरूप आत्म−विस्मृति हो जाती है।”
इस रेडियो वार्ता को यदि प्रामाणिक माना जा सके तो अन्य लोकों की स्थिति के सम्बन्ध में–वहाँ के आवागमन मार्ग के सम्बन्ध में ऐसी आशा बँधती है कि भविष्य में और भी अधिक महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध हो सकेंगी।
साधना के दो पक्ष हैं–एक योग, दूसरा तप। योग में अनपढ़ अन्तरंग के चिन्तन प्रवाह को उत्कृष्टता की सुगढ़ता के साथ जोड़ना पड़ता है। इसी को समर्पण, शरणागति, अद्वैत, एकत्व आदि के नाम से पुकारते हैं। इसी स्थिति को उत्पन्न करने के लिये ध्यानयोग या भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है।
नाले का नदी में, नदी का समुद्र में, बूंद का समुद्र में, पतंगे का दीपक में, पानी का दूध में, पत्नी का पति में विलय हो जाने के उदाहरण देकर इसी स्थिति को हृदयंगम कराया जाता है। बेल वृक्ष से लिपटकर उतनी ही ऊँची उठ जाती है, बांसुरी वादक के होठों से लगकर मादक ध्वनि सुनाती है। धागा उड़ाने वाले के हाथ में सौंपने पर ही पतंग आसमान पर चढ़ने का सौभाग्य पाती है। इन उदाहरणों में योग का तत्वज्ञान भरा पड़ा है,एक तालाब का दूसरे तालाब के साथ नाली के माध्यम से जुड़ जाने पर दोनों की जल सतह एक हो जाने वाली बात भी इसी निमित्त बताई जाती है कि साधक की अन्तःचेतना को अभ्यस्त कुसंस्कारिता से मुक्ति दिलाकर परब्रह्म की उच्चस्तरीय विशिष्टता में आत्म−समर्पण करने के लिये तैयार होना होता है। यह सर्वमेध यज्ञ है।
ब्रह्माण्ड के विस्तार, स्वरूप, आयुष एवं प्राविधान को खोजने की मनुष्य की उत्सुकता का होना स्वाभाविक है। क्योंकि अन्ततः वह उसी का एक छोटा घटक है। आग और चिनगारी के विस्तार में तो अन्तर है, पर गुण धर्म में नहीं। ब्रह्मांड जैसा भी है उसकी स्थिति एवं व्यवस्था के अनुरूप पिण्ड का निर्माण हुआ है। समुद्र का पानी खारा है तो उसकी लहरें या बूंदें भी उस गुण धर्म से पृथक् नहीं हो सकती। चिनगारी का तात्विक विश्लेषण छोटे रूप में नहीं हो सकता, उसमें सन्निहित विशेषताओं को समग्र रूप से समझने के लिए प्रकृति कलेवर में संव्याप्त अग्नि तत्व का स्वरूप एवं क्रिया−कलाप समझना होगा।
‘वर्ल्ड एटलस ऑफ मिस्ट्रीज ‘ के लेखक फ्रांसिस हिचिंग ने ऐसे अगणित परिणाम एकत्रित किये हैं जिनसे इस धरातल पर पाई जाने वाली विशेषताएँ स्थानीय न होकर ब्रह्माण्डव्यापी स्थिति का प्रभाव परिचय प्रस्तुत करती है। उन्होंने समुद्र के गहन अन्तराल में ऐसे महापाषाण खोजे हैं जो पहाड़ों की सामान्य चट्टानों से सर्वथा भिन्न है। उनमें जो पदार्थ पाया गया है वह धरती के रसायनों से मिलता−जुलता भी है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे पृथ्वी पर इन दिनों पायें जाने पाले पदार्थों की सीमा में बँध सकते है।
अटलाँटिक महासागर की तलहटी में 2500 किलो मीटर लम्बे महापाषाण पड़े हुए जो सौर मण्डलीय पदार्थों के साथ पृथ्वी की पदार्थ सम्पदा को जोड़ते है। इंग्लैंड के सेलिसबरी मैदान में स्टोनहेज नामक स्थान पर ऐसी सैकड़ों भीमकाय चट्टानें पाई गई है जिनके अध्ययन करने पर अन्तर्ग्रही तारतम्य ही बिठाने बिना और कोई गति नहीं। स्टोनहेंज का ‘हेली स्टोन’ महापाषाण तो एक प्रकार से सूर्यमापक यन्त्र ही बना हुआ है। वह 21 जून को सबसे लम्बे दिन ही सभी ओर से स्वप्रकाशित दीखता है। इसके बाद दिनमान के घटने बढ़ने के साथ−साथ उसका प्रकाश भी घटता बढ़ता रहता है। अन्वेषणकर्ता इस काल घड़ी के अनुसार किसी भी तारीख का दिनमान बता सकते है। प्रो. कीरो मध्य ‘सूर्यवेदी’ होने की बात कही है। इस संदर्भ में ज्योतिर्विद् सर नॉरमन लाक्टर ने ‘स्टोन हेंज ऐण्ड अदर स्टोन माँन्यूमेन्ट्स’ नामक एक सुविस्तृत ग्रन्थ ही लिखा है। इंग्लैंड में डार्टमूर के ‘कार्नवाल’ और ‘सोमर सैट’ तथा स्काटलैण्ड के–’स्टैन्टन ड्रियू’ में अवस्थित चट्टानें केवल सूर्य की स्थिति का ही नहीं, ब्रह्माण्ड के अनेकों ग्रहनक्षत्रों की स्थिति का परिचय कराती है। लगता है यह प्रकृति निर्मित वेधशाला किसी महामनीषी ने अथवा ब्रह्माण्डीय चेतना की कलाकारिता ने अद्भुत निर्माण की तरह विनिर्मित की है।
आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग साइन्स के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर ‘डॉ. एलेक्जेण्डर थाम’ ने 1930 में ‘नार्थ स्काटलैंड’ के समुद्री तट पर ‘ग्रेट स्टोन सर्किल ऑफ कैलेनिश’ को देखा और उनकी इतनी दिलचस्पी बढ़ी कि उसके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए 1945 से 61 तक इन सर्किल्स का सूक्ष्मता से निरीक्षण करते रहे। 1967 ई. में उन्होंने ‘मेगालिथिक साइट्स इन ब्रिटेन’ नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें 600 से अधिक ऐसे ‘सर्किल्स ‘ ज्यामिती के अनुसार विनिर्मित है और ज्योतिर्विज्ञान की दृष्टि से विस्मित कर देने वाली ‘एकुरेसी’(शुद्ध एवं सूक्ष्म मापक) की पराकाष्ठा दर्शाते हैं।
कितना रहस्यमय विलक्षण है यह प्रकृति का संसार जो भूतकाल में अति मानवी शक्तियों की पृथ्वी पर उपस्थिति की एक झाँकी मात्र देता है। अपनी पृथ्वी तो उस महान ब्रह्माण्ड की एक छोटी इकाई मात्र है। उस विराट् में और क्या−क्या है, इसे समीप वृद्धि तो कभी समझ ही नहीं सकती।
शक्ति, सामर्थ्य और विलक्षणता की दृष्टि से ज्ञात सृष्टि की तुलना में अविज्ञात का क्षेत्र कई गुना अधिक है। अभी तो प्रकृति की स्थूल शक्ति का एक छोटा-सा परिचय भर मिला है। जिसे प्राप्त कर दम्भी मनुष्य अपने को प्रकृति का स्वामी– नियंत्रणकर्ता मानने लगा है। पर सचमुच ही जिस दिन मानव को सृष्टि के स्थूल एवं सूक्ष्म घटकों–चेतना की रहस्यमय परतों तथा उनमें सन्निहित सामर्थ्यों की सही जानकारी प्राप्त होगी उसे यह अनुभव होगा कि सर्वत्र शक्ति का भण्डार भरा पड़ा है। जिसमें एक से बढ़ कर एक सम्पदाएँ भी विद्यमान है।
दृश्य की अपेक्षा अदृश्य जितना रहस्यमय है उतना ही सामर्थ्यवान भी। जड़ की तुलना में चेतन अधिक शक्ति सम्पन्न है। जड़ जगत की हलचलें भी उसे की शक्ति से प्रेरित है। प्रत्यक्ष न दीखते हुए भी जड़ एवं चेतन के बीच गहरा तारतम्य तथा अविच्छिन्न सम्बन्ध है। दोनों के परस्पर तालमेल एवं सहयोग से ही संसार का चक्र अविराम गति से गतिशील है। इन दोनों से भी विलक्षण है वह सूत्राधार जो सृष्टि का नियन्ता–संचालक है। मनुष्य तो अभी जड़ प्रकृति में उलझा पड़ा है। पदार्थ की शक्ति को प्राप्त कर ही गर्व करने लगा है। जिस दिन चेतना की अकूत सामर्थ्य और जड़−चेतन की सामर्थ्यों के आदि केन्द्र−सृष्टा के वास्तविक स्वरूप का मान होगा सचमुच ही वह दिन मनुष्य के लिए सर्वाधिक सौभाग्य का होगा।
कभी−कभी प्रकृति भी ऐसे घटनाक्रमों का परिचय देती है जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता जिसे देखकर मानवी बुद्धि हतप्रभ रह जाती तथा उसे यह मानना पड़ता है कि उसकी जानकारियाँ सृष्टि के संदर्भ में अत्यल्प है। समय−समय पर घटित होने वाले घटनाक्रमों की कुछ गुत्थियाँ ऐसी हैं जो लम्बे समय के बाद भी अब तक नहीं सुलझाई जा सकीं। प्रकृति के स्थूल नियमों का उल्लंघन करने वाली से घटनाएँ आज भी रहस्यमय बनी हुई है।
जिन दिनों भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम, जिसे ‘गदर’ के नाम से भी जाना जाता है छिड़ा, कैलीफोर्निया की नापाकाउण्टी स्टेट में एक विलक्षण घटना घटी। पर यह वर्षा सामान्य से भिन्न थी। बरसने वाले पानी में से अधिकाँश ने वर्षा के पानी को शर्बत जैसा मीठा बताया। कितने व्यक्तियों ने बरसात के जल को बड़े पात्रों में एकत्रित कर लिया तथा कई दिनों तक शर्बत के रूप में प्रयोग करते रहे। ‘नापा–काउण्टी ‘ के वैज्ञानिकों के एक दल ने जल का प्रयोगशाला में परीक्षण करने के उपरान्त पाया कि उसमें मिश्री घुली हुई थी जिसके रवे संसार बनायी जाने वाली मिश्री की ही विशेषताओं से सम्पन्न थे।
फ्रांस के राजकीय रिकार्ड में एक सदी पूर्व की एक घटना का उल्लेख मिलता है कि एक दिन क्लरमान्ट नगर में ऐसी वर्षा हुई जिसे आज भी लोग रक्त वर्षा के नाम से चर्चा करते हैं। किसी देवता का कोप मानकर नगर के अधिकाँश व्यक्ति उस दिन भयभीत हो गये। राज पुरोहितों ने इस घटना के बाद अनेकों प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किए। कोई दूसरी अन्य घटना तो नहीं घटीं पर वर्षों तक नगर में रक्त वर्षा के कारण भय संव्याप्त रहा।
विश्व में कितने ही ऐसे स्थान हैं जो अपनी विलक्षणता के लिए विख्यात है। एविग्वान के निकट एक ठण्डे पानी का कुण्ड है। उसे वाडक्लुर्स का स्रोत कहते हैं। समीप में ही सोरग्यू नामक नदी बहती है। नदी के दूसरे तट पर एक अंजीर का खूबसूरत पेड़ उगा हुआ है। बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के नदी का जल स्तर मार्च माह में हर वर्ष अपने आप बढ़ जाता है और बाढ़ जैसी स्थिति आ जाती है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि नदी का जल प्रवाह उल्टी दिशा में ऊँचाई पर अवस्थित अंजीर की पेड़ की ओर बढ़ने लगता है और पेड़ की जड़ को स्पर्श करके वापस लौट जाता है। इस घटना की पुनरावृत्ति हर वर्ष नियंता समय पर मार्च में होती है। वैज्ञानिक लम्बे समय ये सोरग्यू नदी के जल स्तर के बढ़ने तथा मार्च माह में अंजीर के पेड़ को छूने के लिए चल पड़ने का कारण खोज रहे हैं, पर यह रहस्य अभी भी अविज्ञात बना हुआ है। एविग्नान के लोगों में लोक कथा प्रचलित है कि कोप भोजन बने हुए हैं उन्हें केवल मार्च माह में मिलने की छूट देवता द्वारा की गयी हैं। किंवदंती कहाँ तक सत्य है नहीं मालूम, पर इस विलक्षण दृश्य को देखने के लिए प्रति वर्ष वहाँ निश्चित समय पर भीड़ एकत्रित होती है।
कोरिया में कोयम नदी के किनारे नाक्वाह्म नामक पत्थर की चट्टान है। सन् 660 में सम्बन्धित क्षेत्र पर चीन के राजा ने आक्रमण कर दिया। उसने स्थानीय राजा मन्त्री तथा सेना के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को बन्दी बनाकर चीन भेज दिया। राज्य साम्राज्ञी सहित 71 रानियों ने नाक्वाह्म चट्टान से नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना को बीते लगभग 14 सौ वर्ष हुए। पर उसके बाद प्रति वर्ष चट्टान के पास एक ही नस्ल के मात्र 71 पौधे एक साथ उगते हैं और निश्चित समय पर 71 ही फूल आते हैं। ये फूल एक साथ ही कलियों के रूप में विकसित होते हुए पुष्पित होते हैं। ऐसा उल्लेख मिलता है कि बसन्त ऋतु के एक निर्धारित दिन को राज रानियों ने जौहर किया था, ठीक उसी दिन सभी 71 पुष्प एक साथ नदी में गिर जाते हैं। इस दृश्य को देखने तथा अपनी भाव श्रद्धा को समर्पित करने के लिए हजारों व्यक्ति उस स्थान पर आते हैं। उनका विश्वास है कि प्रति वर्ष पौधों के रूप रानियाँ शरीर धारण करती हैं तथा जौहर की घटना की पुनरावृत्ति करके फूलों के रूप में नदी में गिरकर देशवासियों को यह प्रेरणा देती है कि “अनीति अत्याचार के समक्ष कभी सिर न झुकाओ भले ही मृत्यु को वरण कर लो।”
‘एलवर्टा’ का एक किसान पानी भरने के लिए जब भी अपने कुएं की चादर की हटाता था तो कुएँ के तेल से तालबद्ध संगीत सुनाई पड़ती थी। यह खबर समीपवर्ती क्षेत्र में फैल गयी। अविश्वसनीय किन्तु सत्य घटना की पुष्टि अनेकों व्यक्तियों ने की। वैज्ञानिकों के एक दल को यह सन्देह हुआ कि शायद किसान ने कुएं में कहीं रेडियो सैट छुपाकर रख दिया हो। इसलिए उन्होंने कुएं के चप्पे−चप्पे की जाँच पड़ताल कर ली। पर सन्देह निराधार निकला। दूसरा सन्देह यह हुआ कि रेडियो संगीत को पकड़कर प्रतिध्वनित करने वाला कोई ऐसा स्रोत कुएं में विद्यमान हो, यह सोचकर गाँव के सभी रेडियो सैट बन्द करा दिए गये। पर आश्चर्य यह कि कुएं से तालबद्ध संगीत निरन्तर आती रही। थककर वैज्ञानिकों ने संगीत प्रसारित होने का कारण बता पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। ऐसा ही एक विचित्र अनुभव नाइरियाल की एक महिला को हुआ। वह जब भी स्नान करने टब में जाती थी तो उसमें से मधुर संगीत ध्वनियाँ आने लगती थीं। प्रत्यक्ष दर्शियों ने भी यथार्थता की पुष्टि की। ध्वनि विशेषज्ञ लम्बे समय तक ध्वनि का कारण पता लगाते रहे, पर कुछ बता पाने में असमर्थ सिद्ध हुए। उनका कहना था प्रस्तुत घटना का कारण अदृश्य तथा अभौतिक तथा विज्ञान के नियमों की पकड़ सीमा के बाहर है।
ये घटनाक्रम प्रकृति की विलक्षणता तथा अदृश्य सृष्टि के रहस्य पक्षों पर प्रकाश डालता है। विलक्षणता ही नहीं सामर्थ्य की दृष्टि से भी अभी बहुत कुछ ढूँढ़ा जाना बाकी है। सृष्टि का एक नगण्य पक्ष स्थूल जड़ पक्ष का स्वरूप ही अब तक उजागर हो सका है। चेतन जगत अपने गर्भ में अनन्त रहस्यों एवं सामर्थ्यों को छुपाये हुए अविज्ञात बना हुआ है। सम्भवतः प्रकृति उपरोक्त विलक्षण घटनाओं द्वारा कभी−कभी इसी तथ्य का परिचय देती हैं। जड़ चेतन की आपसी तारतम्य और सम्बन्धित गुत्थियों को सुलझा सकना तथा सन्निहित प्रचण्ड सामर्थ्य का लाभ उठा सकना प्रचलित भौतिक विज्ञान द्वारा नहीं आत्म विज्ञान के अवलम्बन द्वारा ही सम्भव है।
मनुष्य जैसा भी सोचता एवं करता है वरन् उसका प्रभाव उसी तक नहीं रहता है वरन् समीपवर्ती वातावरण एवं सम्बन्धित व्यक्ति भी प्रभावित होते हैं। यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं के ऊपर भी भला−बुरा प्रभाव पड़ते देखा गया है। घटनाओं के सूक्ष्म संस्कार भी चिरकाल तक बने रहते हैं और विभिन्न प्रकार की प्रेरणाओं के रूप में अपना परिचय देते हैं। इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति अच्छे बुरे व्यक्तियों एवं उनसे जुड़े स्थानों पर जाकर की जा सकती है, भले ही वे वर्तमान में जीवित न हो। देवालयों, मन्दिरों, देव पुरुषों, महामानवों, सन्त ऋषियों की तप स्थली पर पहुँचने वालों के मन में परमार्थ की–लोक मंगल की भावनाएँ हिलोरें लेने लगती हैं। इसके विपरीत कसाईखानों आदि स्थानों पर पहुँचने से मन घृणा, विरोध एवं अशान्ति से भर उठता और शीघ्रातिशीघ्र वहाँ से भागने को जी करता है। यह स्थान एवं उनसे जुड़े सूक्ष्म वातावरण का ही प्रभाव है। सद्विचारों सद्भावों के अवगाहन एवं अभ्यर्थना से सत्प्रवृत्तियों की अभिप्रेरणा उठना देव स्थलियों पर सहज ही देखी गई हैं। जबकि युद्ध स्थलियों, कसाईखानों में जीवों का आर्तनाद एवं उनकी पीड़ा सूक्ष्म वातावरण में उमड़ते−घुमड़ते रहते तथा उस संपर्क में आने वाले हर किसी को आकुल−व्याकुल अशान्त एवं विक्षुब्ध बनाते हैं।
प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार मरणोपरान्त भी आत्माएँ अपने से जुड़े वातावरण में चिरकाल तक विद्यमान रहती तथा अपनी सद्भावना अथवा दुर्भावना का परिचय सहयोग अथवा आतंक के रूप में देती हैं। कितनी ही बार उसका प्रमाण विविध प्रकार की घटनाओं के माध्यम से मिलता है। ‘लायल वैमिस्टर’द्वारा लिखी गई पुस्तक “स्ट्रैन्ज हैपनिंग“ में एक ऐसी ही घटना का उल्लेख मिलता है। यार्क शायर इंग्लैण्ड में स्थित एक शराब−गृह की कुर्सी–मृत्यु की कुर्सी के नाम से जानी जाती है। इस कुर्सी पर अब तक बैठने वाले अनेकों व्यक्ति अपनी जान गँवा चुके हैं। कुर्सी के विषय में किम्वदन्ती इस प्रकार है।
‘बसवी’ नाम का एक प्रख्यात अपराधी था। वह उसी शराबखाने में नित्य शराब पीने आता था। अपने आतंक से उसने शराब खाने में आने वाले व्यक्तियों एवं मालिक को भयभीत कर रखा था। शराब गृह में उसकी एक सुरक्षित कुर्सी रखी रहती थी जिस पर उसके अतिरिक्त कोई नहीं बैठता था। एक रात वह शराब खाने में अपने ‘ससुर’ के साथ आया और खूब शराब पी। शराब के आवेश में ही उसने अपने ससुर की हत्या कर दी। उसे फाँसी की मजा हुई। संयोगवश फाँसी का मंच भी शराब गृह के ठीक सामने बनाया गया। जिस समय उसकी फाँसी हुई वह अत्यधिक उत्तेजित था। उसने कहा कि–”मेरी कुर्सी पर जो भी बैठेगा उसे मैं जिन्दा नहीं छोड़ूंगा। “
कहते हैं कि उसके मरने के बाद उक्त कुर्सी अभिशप्त हो गई। शराब गृह के मालिक अर्नशो ने यह स्वीकार किया कि उस कुर्सी के साथ किसी दुष्ट आत्मा का प्रकोप जुड़ा हुआ है। उसने जब से शराब गृह खरीदा है, उस कुर्सी पर बैठने वाले अनेकों व्यक्ति जान से हाथ धो चुके हैं। आगंतुकों को सतर्क करने की दृष्टि से मालिक “अर्नशो” ने अभिशप्त कुर्सी के इतिहास को छपाकर शराब गृह में टाँग रखा है ताकि अपने वालों को कुर्सी से जुड़े प्रकोपों का सामना न करना पड़े।
एक बार वायु सेना के दो सैनिक शराब पीने आये। शराब गृह में टंगी लिखित चेतावनी को पढ़कर वे व्यंग कसने तथा अन्ध−विश्वास मानकर मालिक की हँसी उड़ाने लगे। मालिक के मना करने पर भी उन दोनों ने कुर्सी पर बैठकर शराब पी। शराब पीने के बाद वे कार में बैठकर चल पड़े। अभी दो−तीन मील ही चले होंगे कि इतने में गाड़ी एक वृक्ष से जाकर टकरा गई और दोनों को अकस्मात् अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। दूसरा शिकार बना एक मेजर। कुर्सी एवं उससे जुड़ी कहानी की सत्यता का परीक्षण करने के लिए मेजर ने दुस्साहस किया। लम्बे−चौड़े, हट्टे−कट्टे मेजर ने कुर्सी पर बैठकर शराब पी। दूसरे ही दिन इस दुस्साहस की बुरी परिणित हुई। बिना किसी रोग के अचानक मेजर की मृत्यु हो गई।
एक दिन अनजाने में एक मजदूर उस कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसकी आयु मात्र सत्रह वर्ष थी। ठीक दो घण्टे बाद वह एक मकान की छत से ऐसे उछला जैसे कि किसी ने उठाकर फेंक दिया हो। नीचे गिरते ही उसने दम तोड़ दिया। शराब गृह के मालिक अर्नशो के समक्ष अब भारी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। एक बार तो उसने सोचा कि कुर्सी को आग लगाकर जला दूँ। किन्तु यह सोचकर कि विक्षुब्ध दुरात्मा के कोप का भोजन कहीं उसे स्वयं भी न बनना पड़े, उसने अपना इरादा बदल दिया। अन्य किसी को आगे शिकार न बनना, पड़े, अतएव कुछ न कुछ तो करना ही चाहिए, यह सोचकर उसने कुर्सी को एक कमरे में बन्द कर दिया। अब तक कुर्सी की ख्याति दूर−दूर तक फैल चुकी थी। एक दिन उनका एक मित्र जिसका नाम हैरी था मिलने आया। उसे कुर्सी की पूरी कहानी मालूम हुई। कौतूहल बढ़ा और अर्नशो को कुर्सी दिखाने के लिए वह बारम्बार आग्रह करने लगा। हैरी के साथ उसका एक मित्र और भी साथ में था। इस शर्त पर कि कोई कुर्सी पर बैठेगा नहीं ‘अर्नशो’ कुर्सी दिखाने के लिए सहमत हुआ। तीनों कुर्सी को देखने के लिए तहखाने में पहुँचे। कुर्सी के निकट पहुँचते ही अचानक बाहर से अर्नशो का बुलावा आया। उन दोनों को कुर्सी पर न बैठने की चेतावनी देकर अर्नशो तहखाने के बाहर आया। वापिस तहखाने में लौटा तो वह यह देखकर विस्मित रह गया कि उसका मित्र ‘हैरी’ कुर्सी पर बैठा हँस रहा है। अर्नशो को घबड़ाया हुआ देखकर वह बोला कि डरने की आवश्यकता नहीं हैं। पुरानी कहानी मात्र एक बकवास और अन्ध विश्वास है उसमें थोड़ा भी सार नहीं है। हैरी ने अपने साथ आये दूसरे मित्र को भी कुर्सी पर बैठने के लिए प्रेरित किया। मित्र के दबाव के कारण वह कुर्सी पर बैठा तो मन ही मन बुरी आशंकाओं से भयभीत रहा। दोनों थोड़ी देर बाद अपने घर वापिस चले गये। इधर शराब गृह का मालिक अर्नशो भीतर ही भीतर डर रहा था कि कहीं पुरानी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
उसकी आशंका निराधार न थी–पिछले अनुभव साथ में जुड़े हुए थे। कुछ ही समय बाद सन्देह सिद्ध हुआ। हैरी की मृत्यु ठीक 48 घण्टे बाद बिना किसी शारीरिक बीमारी के हो गई। दूसरे मित्र ने आत्म−हत्या कर ली। उसका निर्जीव शरीर दूसरे दिन प्रातः ‘रीवन मार्केट’ के समीप एक सड़क पर पाया गया। यह समाचार अर्नशो को भी मिला। उसने उसी दिन से कुर्सी को कभी भी किसी को भी न दिखाने का निश्चय कर लिया।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य के चिन्तन एवं आचरण से व्यक्ति ही नहीं वस्तुएँ एवं वातावरण भी प्रामाणित होते हैं। यह प्रभाव इस जीवन तक ही नहीं मरणोपरान्त भी बना रहता है। उस वातावरण के संपर्क में आने वालों के ऊपर तो प्रभाव पड़ता ही है। इस सत्य में एक कड़ी और भी जुड़ी हुई है कि जो जैसा आचरण करता है उसके सूक्ष्म संस्कार मरणोपरान्त भी बने रहते हैं और वैसे ही कृत्यों के लिए प्रेरित करते हैं। जीवन में अपने चिन्तन एवं कृत्य को श्रेष्ठ बनाये रखने वाले मरणोपरान्त शान्ति एवं सन्तोष की अनुभूति करते हैं जबकि दुष्कृत्यों के सूक्ष्म संस्कार मरने के बाद भी उस व्यक्ति को चैन से नहीं बैठने देते और स्थान तथा वातावरण को विक्षुब्ध बनाये रखते हैं
ब्रह्मैवाहं समः शान्तः सच्च्दानन्द लक्षणः। नाहं देहो ह्यसद्रूपो ज्ञानभित्युच्यते बुधैः॥ अपरोक्षानुभूति–24
‘सभी के समान रहने वाला, शान्त, सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म ‘मैं’ [जीवात्मा] ही हूँ। क्षण−भंगुर देह मैं नहीं हूँ–इसी को बुध जन ज्ञान कहते हैं।
जीवन यज्ञ है। उसकी प्रत्येक साँस एक आहुति है जो इस यजन को विधिवत् सम्पन्न करता है उसे रुग्णता का कष्ट नहीं सहना पड़ता और वह पूर्णायुष्य प्राप्त करता है। छान्दोग्य उपनिषद् में इस तथ्य और रहस्य पर अच्छा प्रकाश डाला गया है।
उपनिषद्कार ने जीवन को वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल चार भागों में बाँटा है। पूर्ण आयु 96 वर्ष क्रियाशील जीवन की मानी है। शतायु के अन्तिम चार वर्ष थकान, असमर्थता भरे होने की बात सोचकर 96 को ही पूर्ण मान लिया है। प्रत्येक चरण 24 वर्ष का माना है। चौबीस इसलिए भी, कि गायत्री महामन्त्र में 24 अक्षर हैं। प्रथमचरण ब्रह्मचर्य की अवधि को प्रातःकाल माना गया है। द्वितीयचरण यौवन की उपमा मध्याह्न काल से दी है। इसके बाद शेष दो चरण वानप्रस्थ और संन्यास की परमार्थ युग्म में गणना करते हुए उन्हें एक में गिन लिया गया है। इस प्रकार विपदा गायत्री के तीन चरणों में जीवनक्रम के तीन विभाजनों की संगति बिठा दी गई है। इस प्रकार संयम, पराक्रम, प्रखरता और परमार्थ के तीन भागों में विभक्त जीवन यज्ञ, प्रकारान्तर से गायत्री यज्ञ बन जाता है।
इन तीन विभागों के तीन देवता हैं– प्रथमचरण के वसु, द्वितीय के रुद्र, तृतीय के आदित्य। वसु संयम के रुद्र पराक्रम के और आदित्य तेजस्विता के अधिष्ठाता हैं। जीवन का सदुपयोग भी इसी क्रम से होना चाहिए। यदि यह गतिचक्र ठीक तरह चलता रहे तो फिर रोगशोक का, पतन पराभव का कोई कारण नहीं रह जाता।
उपनिषद्कार के अनुसार यदि बीच में कोई विकृति विपत्ति आ खड़ी होती हो तो समझना चाहिए कि नियति के निर्धारण को व्रत पूर्वक अपनाये रहने में कहीं कोई चूक हो रही है। उसे ढूंढ़ना और सुधारना चाहिए। साथ ही देवात्मा सत्ता से विनय अनुरोध करना चाहिए कि वह अपनी प्रेरणा से वर्तमान को ऐसा बनाये जिसमें वह भविष्य की सम्भावनाओं को समुज्ज्वल बनाये रहने के लिए समुचित सतर्कता बरते। ऐसे मार्ग पर न चले जिसके कारण जीवन क्रम की अगली शृंखला को गड़बड़ाने−लड़खड़ाने की दुर्गति का सामना करना पड़े।
गलती के सुधर जाने पर उस कारण प्रस्तुत हुई विकृतियाँ और विपत्तियाँ भी निरस्त हो जाती हैं। रुग्णता का शमन हो जाता है। शरीर मन और लोक−व्यवहार के क्षेत्र में जो दुर्भाग्यपूर्ण अवरोध उत्पन्न हो गये थे, उन भव रोगों को टिके रहने का आधार नहीं रह जाता, फलतः वे निरस्त होकर वापिस लौट जाते हैं।
सुख−शान्ति का यही मार्ग है। जीवन का विभाजन उद्देश्य और उपयोग समझ लेने, तद्नुरूप गतिविधियाँ निर्धारित करने, भूलों को सुधारने, सर्वशक्ति मान सत्ता से सन्मार्ग गमन में प्रेरणा सहायता उपलब्ध करने वाली प्रार्थना करने से उन शोक−सन्तापों का शमन हो जाता है जो जीवन−क्षेत्र के किसी न किसी वर्ग को रुग्ण एवं संकटग्रस्त रखे जाती हैं।
जीवन यज्ञ है। गायत्री उसका इष्ट। समय उसका हविष्य। संयम, पराक्रम और परमार्थ के रूप में उसे वसु, रुद्र और आदित्य के अनुशासन में चलाना चाहिए। जो इस अध्यात्म रहस्य को समझ लेते हैं वे रोग, शोक, सन्ताप में से किसी के भी चंगुल में नहीं फँसते। यदि फँस भी जायें तो भूल−सुधार की प्रायश्चित प्रक्रिया तथा परमात्मसत्ता से सन्मार्ग पर चलने की साहसिकता माँगनी चाहिए। यह है चिरस्थायी एवं समग्र आरोग्य की उपलब्धि का राजमार्ग।
छान्दोग्यकार ने इस तथ्य का वर्णन इस प्रकार किया है :–
‘पुरुषों वाव यज्ञः, तस्य यानि चतुर्विशति वर्षाणि, तत् प्रातः सवनं, चतुर्विशति अक्षरा गायत्री, गायत्नं वाव वसवः एते हीदं सर्वं वासयन्ति॥1॥
तं चेदस्मिन् वयसि किंचिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा यसवः। इदं में प्रातः सवनं माध्यन्दिनं सवनं अनुसन्तनुत इति, माऽहं प्राणानाँ वसूनाँ मध्ये यज्ञो विलोप्सीय इति, उद्धैव तत एति, अगदो ह भवति।”॥ 2॥ –छान्दोग्य 3।16।1−2
‘मनुष्य का जीवन एक यज्ञ है। मनुष्य की आयु के प्रथम चौबीस वर्ष, जीवन यज्ञ का प्रातःसवन (प्रातःकालीन यज्ञ) है। गायत्री छन्द चौबीस अक्षरों वाला है, प्रातःसवन में गायत्री छन्द का ही प्रयोग होता है, इस यज्ञ से वसु देवता का सम्बन्ध होता, प्राण ही (समस्त शक्तियों के निवास से)वसु देवता कहलाते हैं। यदि कहीं इन चौबीस वर्षों में मनुष्य को कोई रोग हो जाय, तो उसे ऐसा कहना चाहिए, हे वसु गणों (प्राणों)! यह मेरा प्रातःसवन, माध्यन्दिन सवन के साथ संयुक्त करो (अर्थात् जीवन के प्रथम चौबीस वर्ष को जीवन के शेष आयु से युक्त कर उसे आगे बढ़ाओ) वसुगणों (प्राणों) का यह यज्ञ हमारा बीच में ही विलुप्त करेगा।
जीवन के प्रथम चौबीस वर्ष तो इस प्रकार व्यतीत हुए। उसके आगे के लिए पुनः कहा गया :–
‘अथ यानि चतुश्चत्वारिंश द्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्च्त्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुपु, त्नैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनं, तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा, एते हीदं सर्वं रोदयन्ति॥ 3॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किंचिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणाँ रुद्राः! इदं में म्राध्यन्दिनं सवनं, तृतीय सवनं मनुसन्तनुतेति, माऽहं प्राणानाँ रुद्राणाँ मध्ये यज्ञो विलोप्सीय इति, उद्धैव तत एत्यगदोह [भवति॥4॥ –छान्दोग्य 3।16।3,4
(मनुष्य के जो यौवन वाले) अगले चवालीस वर्ष हैं, वह माध्यन्दिन−सवन का समय है। त्रिष्टुप छन्द चवालीस अक्षरों का होता है, इस माध्यन्दिन सवन में इसी त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग होता है। इस यज्ञ के साथ रुद्र देवता का सम्बन्ध है। यदि इस अवधि में मनुष्य को कोई रोग हो जाये तो उसे इस प्रकार कहना चाहिए हे रुद्र रूपी प्राणो! मेरे इस माध्यन्दिन−यज्ञ की अवधि को तृतीय सवन के साथ जोड़ दो (अर्थात् चवालीस वर्ष की अवधि को अगली आयु से सम्बद्ध कर दो) मेरे द्वारा सम्पन्न होने वाला यह रुद्र देवता (प्राण)प्रधान माध्यन्दिन−यज्ञ बीच में ही विलुप्त न हो जाय।
48 वर्ष के बाद का शेष जीवन भी यज्ञरूप है, इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है–
अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि, तत् तृतीय सवनं, अष्टाचत्वारिंश दक्षरा जगती, जागतं तृतीय सवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः, प्राणा वाव आदित्याः, एते हीदं सर्व आददते॥ 5॥
तं चेदस्मिन् वयत्ति किचिदुपतचेत् स ब्रूयात्–प्राणा आदित्या! इदं में तृतीयसवनं आयुरनुसंतनुत इति, माऽहं प्राणानामादित्यानाँ मध्ये यज्ञो विलोप्सीय इति, उद्धैव तत् एत्यगदोह भवति॥ 6॥ –छान्दोग्य. 3।16।5,6
मनुष्य जीवन का शेष अगला 48 वर्ष, जीवन रूपी दिन का तृतीय सवन है–सायंकालीन यज्ञ है। जगती छन्द अड़तालीस अक्षर का होता है और इस यज्ञ में इसी जगती छन्द का प्रयोग होता है। इस तृतीय सवन के साथ आदित्य नामक प्राण का सम्बन्ध है। आदित्य ही प्राण है क्योंकि यह ही सभी को ग्रहण करते हैं। इस अवधि में रोग होने पर मनुष्य को यह कहना चाहिए कि– हे आदित्य नामधारी प्राणो! यह मेरी आयु का तीसरा खण्ड–तृतीय−सवन है, इसे पूर्ण आयु तक ले चलो। आदित्य (प्राण) प्रधान इस यज्ञ के बीच में ही मेरा यह जीवन−यज्ञ विलुप्त न हो जाय’ ऐसी प्रार्थना करने से आरोग्य का पथ प्रशस्त होता है।
उपयुक्त तथ्य का समापन और फलश्रुति बताते हुए उपनिषद्कार ने अन्त में इस आधार का अवलंबन करके रोग मुक्त हुए महर्षि ऐतरेय का प्रमाण उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है।
एतद्ध स्म वै तद्विद्वान् आह महीदासः ऐतरेयः। स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति, स ह षोडशं वर्षशतं अजीवत्। प्रहषोडशं वर्ष शतं जीवति य एवं वेद॥6। –छान्दोग्य. 4/16/7
जीवन तथ्य (जीवन−यज्ञ) को जानने वाले विद्वान महीदास ऐतरेय एक बार रोगी हुए और उस स्थिति में उन्होंने रोग से कहा–’हे रोग! तू मुझे क्यों कष्ट देता है? सन्ताप देता है? मैं इससे नहीं मरूंगा।’ ऐसा दृढ़ निश्चयात्मक प्रश्न करने से वे रोग−मुक्त हो गये और पूर्ण आयु तक जीवित रहे जो भी व्यक्ति जीवनयज्ञ के इस तत्वज्ञान को जानता है वह पूर्णायु तक जीवित रहता है।
बाजार में हर स्तर की वस्तु दुकानों में सजी हुई पायी जाती है। वे सभी विक्रय के लिए हैं। दुकानदार पूरे समय एक ही आशा लगाए–प्रतीक्षा करते बैठे रहते हैं कि कोई ग्राहक आए–उन्हें खरीदे। दूसरी ओर उन आकर्षक वस्तुओं के इच्छुकों की भी कमी नहीं। रास्ते में उन लोगों की आँखें उन्हें ललचाती हुई देखी हैं। पैर थोड़े ठिठकते हैं, पर पा न सकने की स्थिति जब सूझती है तो मन मसोसकर आगे बढ़ जाना पड़ता है। दुकानदार आतुर, ग्राहक इच्छुक। फिर तालमेल क्यों नहीं बैठता? इस विडम्बना का कारण खोजने पर एक ही तथ्य निखर कर आता है कि मूल्य चुकाने की स्थिति नहीं थी।
मनुष्य बहुत कुछ चाहता है। उसे अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घजीवन चाहिए। मन में उत्साह−उल्लास भरे रखने वाली परिस्थितियों की आकाँक्षा रहती है। कौन नहीं चाहता कि उसे पैसे की तंगी न रहे। मित्रों का सम्मान व सहयोग किसे अपेक्षित नहीं है। इतने पर भी देखा यह जाता है कि उन अभिलाषाओं की पूर्ति कुछ बिरले ही कर पाते हैं। जिनसे अपेक्षा की गयी थी वे लोग सहयोग देने के इच्छुक न हों, यह बात भी नहीं। शरीर की दृश्य−अदृश्य संरचना ही ऐसी है जिसके सहारे पूर्ण स्वस्थ और दीर्घजीवी रह सकना हर किसी के लिये सम्भव है। फिर मनुष्य पर ही ऐसी क्या मुसीबत उतरी है कि उसे दुर्बलता और रुग्णता से निरन्तर कष्ट सहते हुए अकाल मृत्यु मरना पड़े?
प्रश्न अत्यन्त टेढ़ा है। किन्तु उत्तर अति सरल। इस संसार में हर वस्तु मूल्य चुका कर खरीदी जाती है। मुफ्त में तो काया, प्राण, धरती, आकाश, सूर्य, पवन, बादल जैसी विभूतियाँ पहले ही मिल चुकी हैं। अब जो कुछ पाना हो, उसके लिये तत्पर परिश्रम और तन्मय मनोयोग नियोजित करना होगा। उससे भी बड़ी बात है परिष्कृत व्यक्तित्व में पाया जाने वाला चुम्बक। यही है वह आकर्षण जिसके खिंचाव से अभीष्ट सफलताएँ खिंचती चली आती हैं। वह कथन अक्षरशः सत्य है जिसमें पसीने की हर बूँद को हीरे मोती के समतुल्य माना और तादात्म्य मनोयोग को चमत्कारों का पुँज कहा गया है। पात्रता इन्हीं के समन्वय का नाम है। इसी कीमत पर हर क्षेत्र की आत्मिक एवं भौतिक, विभूतियाँ, सफलताएँ खरीदी जाती हैं।
यदि जीवन साधना की गरिमा पर विश्वास किया जा सके तो समझना चाहिए, अध्यात्म शास्त्र में जिस ‘श्रद्धातत्व’ को सर्वोपरि बताया गया है, शुभारम्भ बन पड़ा। देवता वस्तुतः भीतर से उगते हैं, बाहर तो वे खड़े भर दीखते हैं। मनःस्थिति अदृश्य आन्तरिक है और परिस्थिति दृश्यमान परिणति। विभूतियाँ अन्तः से निकलती हैं। आज तक ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि कुपात्रता के रहते किसी दैवी शक्ति ने मात्र पूजा पत्री से प्रसन्न होकर पक्षपात किया हो और पात्रता से अधिक अनुपात में अनुग्रह उड़ेला हो।
यज्ञ की सामान्य प्रक्रिया वायु को सुगन्धित करने के लिए किये गये अग्नि पूजन जैसी प्रतीत होती है और कम महत्व की लगती है। किन्तु बात वैसी है नहीं। यज्ञ एक समूचा विज्ञान है। दूसरे शब्दों में इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि अध्यात्म विज्ञान का प्रत्यक्ष माध्यम यज्ञ है। आत्म संयम की तपश्चर्या और भावनात्मक केन्द्रीकरण की योग साधना का समन्वय ब्रह्मविद्या कहलाता है। उसे अध्यात्म विज्ञान का भाव पक्ष कह सकते हैं। दूसरा क्रिया पक्ष है। क्रिया में हलचलें होती हैं और उसके लिए साधन जुटाने पड़ते हैं। यह यज्ञ प्रक्रिया में भी सम्पन्न किया जाता है। उपरोक्त दोनों पक्षों को मिलाने से ही समान आत्म विज्ञान बनता है। भक्ति भाव की तरह ही यज्ञ कृत्य को भी अध्यात्म विज्ञानियों ने समान महत्व दिया है। और दोनों को एक दूसरे का पूरक कहा है।
जड़−जगत के पदार्थ विज्ञान की उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपे हुए अनेकानेक शक्ति स्रोतों को मनुष्य ने जाना और उनमें से जो उपयोगी था उसे दुहा है। विश्व व्यवस्था में दूसरा चेतना जगत है। उस के विज्ञान को अध्यात्म कहा जाता है। इस विज्ञान की वरिष्ठता और भी अधिक है। पदार्थ की तुलना में प्राणी की सामर्थ्य अधिक है। उसी प्रकार पदार्थ विज्ञान की तुलना में अध्यात्म विज्ञान भी अधिक क्षमता सम्पन्न है। विश्व व्यवस्था में चेतन जगत की ही प्रमुख भूमिका है। भौतिकी तो उसका आहार भर जुटाती है। इसलिए संसार का सुख−दुःख भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर जैसा लगता भर है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। वह बताती है कि यह संसार चेतना शक्ति के सहारे ही संचालित, अनुप्राणित और नियन्त्रित, परिवर्तित होता रहता है।
इस तथ्य को जिज्ञासु अपने ढंग से कवित्व जैसी भाषा में पूछता है और उसका उत्तर भी उसे उसी लहजे में मिलता है :–
“पृच्छामि यज्ञ भुवनस्य नाभिः।”
अर्थात्–इस ब्रह्माण्ड की नाभि– ध्रुव केन्द्र जैसी− आधारभूत सत्ता यज्ञ में सन्निहित है।
स्पष्ट है कि अग्नि पूजा यज्ञ का उपचार स्वरूप है किन्तु वह इतने तक ही सीमित नहीं है। वह अध्यात्म का चेतना जगत का अति प्रभावशाली ऊर्जा केन्द्र है जिसके सहारे व्यक्ति सूक्ष्म जगत से संपर्क साधने में समर्थ होता है।
यज्ञीय ऊर्जा के सम्बन्ध में ऋषि−मनीषियों का प्रतिपादन गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए उनने ‘अग्नितत्व’ को तीन भागों में विभाजित किया है और प्रत्येक का अलग−अलग महत्व एवं उपयोग बताया है। (1) पावक (2) पवमान और (3) शुचि। पावक वह है जो गर्मी उत्पन्न करती है चूल्हा जलने जैसे लौकिक कार्यों में प्रयुक्त होती है। पवमान मनुष्य की काया में रहने वाली वह अग्नि है जो भोजन पचाने से लेकर गतिशीलता तक के अनेक क्रिया−कलापों में काम आती है। तप संयम द्वारा इसी को बढ़ाया जाता है और व्यक्तित्व के हर पक्ष को प्रखर किया जाता है। तीसरी ‘शुचि’ वह है जिसके सहारे वातावरण को प्रभावित किया जाता है अदृश्य जगत को अनुकूल बनाया जाता है विश्व व्यवस्था को वही प्रभावित करती है।
यज्ञ विज्ञान में अग्नि का प्रयोग तो चूल्हा जलने जैसे ईंधन डालकर ज्वाला जलाने की तरह ही होता है किन्तु यह प्रत्यक्षीकरण है। उसका मात्र वास्तविक स्वरूप पवमान और शुचि स्तर तक पहुँचने पर ही बिखरता है और चमत्कारी सत्परिणामों का शुभारम्भ यहीं से गतिशील होता है।
अग्निहोत्र के माध्यम से लौकिक प्रयोजनों में आने वाली ऊर्जा को विकृत होकर ऋतु प्रभावों और प्रकृति उपद्रवों को प्रेरक नहीं बनने दिया जाता और इस स्तर को देखा जाता है कि वह वर्षा से लेकर तूफानों तक की सभी प्रकृति हलचलों को जीव जगत के लिए उपयोगी बनाये रह सके ‘पावक’ यही है। यज्ञाग्नि का पावक पर भी प्रभाव रहता है।
दूसरा अग्नि पवमान है इसे व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कषाय−कल्मषों की कुसंस्कारिता भी इसी से दूर होती है। सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों एवं विभूतियों को इसी आधार पर पाया बढ़ाया जाता है। पवमान को साधना क्षेत्र की प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है।
तीसरी शुचि की समर्थता और व्यापकता अत्यधिक है उसके सहारे अदृश्य जगत के प्रवाह को निष्कृष्टता की विभीषिका उत्पन्न करने से रोका जा सकता है और सुखद सम्भावनाओं से भरा−पूरा सतयुग की स्थापना में योगदान लिया जा सकता है।
संक्षेप में अग्नि के तीन क्षेत्र ऊर्जा, प्रखरता एवं विश्व नियामक शक्तियों के रूप में जाना जा सकता है। यज्ञाग्नि का स्वरूप ऐसा बनाया जाता है कि उसके द्वारा पवमान और शुद्धि की भूमिका सम्पन्न की जा सके।
अग्नि का शब्दार्थ है–ऊर्ध्वगामी। (अगि−गतौ, अगर्ना लोपश्च, अंग–नि और न का लोप) इस व्याकरणिक विश्लेषण से अग्नि शब्द से अग्नि तत्व में ऊर्ध्वगमन की विशेषता का संकेत मिलता है। वस्तुतः है भी वैसी बात अग्नि शिखा सदा ऊपर की ओर उठती है। उसके माध्यम से उठने वाला धुआं भी ऊपर की ओर ही चलता है। भाप की दिशा भी वही है। हवा गरम होने पर न केवल फैलती है वरन् ऊपर की ओर भी बढ़ती है। यह क्रिया−कलाप चेतना को प्रभावित करने वाली ‘यज्ञाग्नि’ की भी है वह संपर्क साधने वालों को ऊँचा उठाती–आगे बढ़ाती है। उत्कर्ष की उमंगे उठाने और तदनुरूप साहस प्रदान करने में यज्ञाग्नि के माध्यम से असाधारण योगदान मिलता है।
पावक, पवमान और शुचि के अतिरिक्त प्रयोग एक प्रयोजन भेद से उसके और भी अनेकों नामकरण हुए हैं। जिनमें से कुछेक इस प्रकार हैं–
अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते। पुँसवने चन्द्रनामा शंगणकर्मणि शोभनः॥
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि। नाम्नि स्यात्पार्थिवो प्राशने च शुचिस्तथा॥
सत्यनामाथ चूडायाँ व्रतादेशे समुद्भवः। गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते॥
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजकः स्मृतः। चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे॥
प्रायश्चिते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहसः। लक्षहोमे तु वह्निःस्यात् कोटिहोमे हुताशनः॥
पूर्णाहुत्याँ मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा। पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारके॥
वश्यर्थे शमनो नाम वरदानेऽभिदूषकः। कोष्ठे तु जठरो नाम क्र्रव्यादो मृत भक्षणे॥ (गोमिलपुत्रकृत संग्रह)
गर्भाधान में अग्नि को ‘मारुत’ कहते हैं। पुँसवन में ‘चन्द्रमा’, शुँगाकर्म में ‘शोभन’, सीमान्त में ‘मंगल’ जातकर्म में ‘प्रगल्भ’, नामकरण में ‘पार्थिव’, अन्नप्राशन में ‘शुचि’, चूड़ाकर्म में ‘सत्य’, व्रतबन्ध (उपनयन) में ‘समुद्भव’ गोदान में ‘सूर्य’, केशान्त (समावर्त्तन) में ‘अग्नि’, विसर्गं (अर्थात् अग्निहोत्रादि क्रिया−कलाप) में वैश्वानर’, विवाह में ‘योजक’, चतुर्थी में ‘शिखी’, धृति में ‘अग्नि’,प्रायशित्त (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृति होम) में ‘बिधु’, पाकयज्ञ (अर्थात् पाकाँग होम, वृषोर्त्सग, गृह प्रतिष्ठा आदि) में ‘साहस’, लक्ष होम में ‘वह्नि’, कोटि होम में ‘हुताशन’, पूर्णाहुति है ‘मृड’, शान्ति में ‘वरद’, पौष्टिक में ‘बलद’, आभिचारिक में ‘क्रोधाग्नि’, वशीकरण में ‘शमन’, वरदान में ‘अभिदूषक’, कोष्ठ में ‘जठर’ और मृत−भक्षण में ‘क्रव्याद’ कहा गया है।
अनेक नामों से प्रख्यात यज्ञाग्नि के विभिन्न उद्देश्य है। इनमें से सभी कर्मकाण्डपरक नहीं कुछ भावपरक भी है। इस प्रकार अध्यात्म क्षेत्र को समस्त उत्कर्षपरक गतिविधियाँ यज्ञ तत्व की परिधि में आ जाती हैं।
जैसाकि गीता में उल्लेख है−
द्रव्य यज्ञास्तपो यज्ञा योग यज्ञास्तथा परे। स्वाध्याया ज्ञान यज्ञाश्च यतयः संशित व्रताः। −गीता 4। 28
यज्ञों के अनेक प्रकार हैं−अग्निहोत्र, तप यज्ञ, योग यज्ञ, स्वाध्याय, ज्ञानयज्ञ आदि।
भगवान ने स्वयं भी कहा है−
यज्ञानाँ जप यज्ञोस्मि स्थावरणाँ हिमालयः। −गीता 10।25
यज्ञों में जप यज्ञ और पर्वतों में हिमालय मैं हूँ।
नादयोग में शब्द को ब्रह्मा माना गया है। इस साधना में शब्द ब्रह्मा को इष्टदेव मानकर चला जाता है। इसके लिए अभीष्ट ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती है इस पर संस्कृत के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ संगीत दर्पण में प्रकाश डाला गया है और संगीत के मूल में− नाद ब्रह्मा की साधना में अग्नि तत्व को ही आधारभूत कारण ठहराया गया है। इस प्रकार नाद ब्रह्मा −संगीत साधना का उद्गम स्रोत दिव्याग्नि में ही केन्द्रित माना गया है। संगीत दर्पण में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :−
आत्मना प्रेरित चित्त बह्निमाहन्ति देहजम्। ब्रह्माग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावकः॥
पावक प्ररितः सोऽथ क्रमादूर्ध्वपये चरन्। अति सूक्ष्म ध्वनिं नाभौ ह्दि सूक्ष्मं गले पुनः॥
पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टंच कृत्रिम बदने तथा। आविभवियतीत्ये वंञ्चधा कीर्त्यते बुधैः॥
नकारं प्राणानामानं दकारमनलं विदु। जातः प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते॥
अर्थात् − आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्म में स्थित प्राणवायु को वह अग्नि प्रेरित करता है। अग्नि के द्वारा प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट तथा मुख में कृत्रिम ध्वनि करता है। इस प्रकार विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है। नकार प्राण का नाम है, दकार अग्नि का नाम है। प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है।
योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी ‘अग्नि’ का प्रयोग होता है। गीता में कथन है।
ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।’ ज्ञानग्नि दग्ध कर्माणिं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥
आग को शरीर और यज्ञाग्नि को उसका दैवी प्राण तत्व कहा जाता है। शरीर और आत्मा के मिलने से जिस प्रकार जीवनचर्या चलती है उसी प्रकार अग्नि प्रज्ज्वलन की प्रत्यक्ष प्रयोग प्रक्रिया को ‘यज्ञ’ स्तर की तब बनाया जाता है जब उसके साथ उच्चस्तरीय भावनात्मक आधारों का समावेश हो। यज्ञ माहात्म्य के रूप में जो कुछ में आध्यात्मिक विज्ञान के विशेष प्रयत्नों के आधार पर उत्पन्न की गई’यज्ञाग्नि’ कहना चाहिए। यह पदार्थ जैसी दीखती भर है उसकी उच्चस्तरीय प्राण ऊर्जा का समावेश करना पड़ता है तभी वह चमत्कारी प्रतिकूलता उत्पन्न कर सकने में समर्थ होती है।
यस्य मौर्ख्य क्षयं यातं सर्व ब्रह्मेति भावनात्। नोदेति वासना तस्य प्राज्ञस्याम्बुमतिर्मरो॥ −योगवाशिष्ठ
‘सर्वत्र ही परमात्मा [ब्रह्मा] विद्यमान है−इस भावना के दृढ़ हो जाने पर अज्ञान का स्वयमेव विनाश हो जाता है इस स्थिति में −मति के निर्मल जल के समान शुद्ध हो जाने पर फिर वासना का उदय नहीं होता है।
रोग चिकित्सा में औषधियों का उपयोग सर्वत्र होता है। यह औषधियाँ आमतौर से वनस्पतियों से बनी होती हैं। उन्हें खाया और पचाया जाता है। इसमें समय तो लगता ही है, साथ ही पचने की प्रक्रिया में पेट के जिन रसों का सम्मिश्रण होता है उनके कारण वे अपना स्वाभाविक गुण खो भी बैठती हैं। पचने की प्रक्रिया में अन्न रक्त बन जाता है अर्थात् उदरस्थ वस्तु का आरंभिक रूप ज्यों का त्यों न रह कर कुछ से कुछ बन जाता है। अस्तु यह नहीं कहा जा सकता कि औषधि में जो पदार्थ था गुण प्रयोगशाला ने बताये थे वे पचने के उपरांत भी वैसे ही रहेंगे या नहीं। यही कारण है कि खाये गये विटामिन, मिनिरल्स पचने की प्रक्रिया में थपेड़े खाते हुए मल−मूत्र आदि के माध्यम से निकल जाते हैं अथवा उस बीच में ही अपना प्रभाव खो बैठते हैं। यही कारण है कि औषधि सेवन से भी रोगियों का कष्ट निवारण नहीं होता और वे एक दूसरे चिकित्सक पर भटकते, अंधेरे में टटोलते, निराशाग्रस्त बने रहते हैं।
यज्ञ चिकित्सा की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। उसमें उपयुक्त औषधियों को पेट में प्रवेश करके पचने में समय लगने और अपना प्रभाव खो बैठने का खतरा नहीं है। औषधियों को वायुभूत बनाया जाता है। वह छिद्रों एवं रोम कूपों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करती हैं। फेफड़ों के माध्यम से सीधी रक्त में जा मिलती हैं। वायु की पहुँच शरीर के छोटे छोटे जीव कोषों तक है इसलिए यज्ञोपचार के माध्यम से ग्रहण की गई वायु भूत औषधि शरीर के समस्त घटकों तक जा पहुँचती है और अपना प्रभाव दिखाती है, जबकि इन्जेक्शनों के द्वारा प्रवेश कराई गई दवा अधिक स्थूल होने के कारण रक्त कणों से टकराती है। वे उस विजातीय द्रव्य को मार भगाने में कोई कसर नहीं रहने देते। यही कारण है कि इन्जेक्शन में पचने का झंझट बन जाने पर भी रक्त कणों से संघर्ष लेना पड़ता है और उनकी भी वही दुर्गति होती है जो पचने के चक्र में फँसने पर मुँह से खाई गई औषधियों की होती है। यज्ञोपचार इन दोनों ही झंझटों से बच निकलता है। वायुभूत औषधियों से न पेट के पाचक रस टकराते है और न विजातीय पदार्थों से जूझने वा रक्त कण ही उनसे उलझने के लिए आगे आते हैं। यही का है कि यज्ञोपचार न केवल सरल है वरन् साथ ही सभी चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में अधिक सत्यपरिणाम प्रस्तुत का सकने में समर्थ रहता है।
मानसिक रोगों में जो कार्य यज्ञ चिकित्सा कर सकती है वह अन्य किसी पद्धति के माध्यम से नहीं हो सकता। वायु भूत औषधियों के शरीर में प्रवेश करने का राजमार्ग नासिका मार्ग ही है। नाक से साँस फेफड़े में पहुँचती है, पर उसका रास्ता मस्तिष्क से होकर ही गुजरता है। इसलिए उसका प्रभाव भी पहले मस्तिष्क पर बाद में फेफड़ों पर ओर इसके उपरान्त शरीर के समस्त छोटे−बेड़े घटकों तक पहुँचता है। ऐसी दशा में स्पष्ट है कि मस्तिष्क, श्वास नली और फेफड़ों पर इस उपचार का प्रथम प्रभाव पड़ेगा। फलतः अन्य अवयवों की तुलना में लाभ भी उन्हीं को अधिक मिलेगा।
मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा अभी बाल्यावस्था में चल रही है। जबकि बाहर वालों को न दीखने वाले किन्तु आक्रान्त को निरन्तर उद्विग्न रखने वाले मनोरोगों की संख्या शारीरिक व्याधियों की तुलना में कही अधिक हैं। सनकी, शंकालु, भयभीत,उत्तेजित, अधीर, दुराग्रही क्रोधी दिग्भ्रान्त, चिन्तित, लोभी, अहंकारी, उद्धत, स्तर के लोग शारीरिक रोगियों से भी अधिक कष्ट सहते और कष्ट देते हैं। इनका इलाज कहीं किसी चिकित्सा पद्धति में नहीं है। बहुत हुआ तो अनिद्रा जैसे रोगों में नींद की गोली जैसे कुछ जादुई इलाज चले हैं। सिर दर्द में संज्ञा शून्य करने वाली गोलियाँ, दर्द में सुन्न या बेहोश करने वाली कुछेक प्रकार की कानी कुबड़ी चिकित्साएँ हकीम डॉक्टर करते रहते हैं। पागलपन में बिजली के झटके ट्यूमर आदि होने पर ऑपरेशन जैसी थोड़ी-सी चिकित्साएँ सोची खोजी गई हैं जबकि उनका विस्तार शारीरिक रोगों की तुलना में कही अधिक है। अपेक्षाकृत हानि भी उन्हीं से अधिक उठानी पड़ती है। पिछड़े हुए अपराधी कुसंस्कारी व्यक्ति ने केवल अपने लिए वरन् समूचे समाज के लिए सिर दर्द बने रहते हैं जबकि शारीरिक रोगी स्वयं कष्ट भुगतते और घर वालों को थोड़ा परेशान करते हैं।
इन दिनों मानसिक रोगों के अतिरिक्त फेफड़े के श्वास नली के रोगों का ही नम्बर आता है। तपैदिक−ब्राँकइटिस,दमा जैसे रोग श्वसन
तन्त्र से सम्बन्धित हैं। इनके उपचार पेट और हृदय दोनों से दूर पड़ने के कारण औषधि उपचार पेट और हृदय दोनों से दूर पड़ने के कारण औषधि उपचार के सहारे कठिन पड़ते हैं। यज्ञ चिकित्सा इन सभी तन्त्रों को सीधे प्रभावित करने के कारण अपना लाभ स्वभावतः अधिक परिमाण में और कम समय में प्रस्तुत कर सकती है।
औषधि विज्ञान की मान्यता है कि रोग विषाणुओं से उत्पन्न होते हैं, इसलिए उन्हें मारने वाली प्रक्रिया अपनानी चाहिए। प्रयोग में अधिकाँश दवाएँ मारक (एण्टीबायोटिक) स्तर की ही आती है। इस प्रयोग से जितने विषाणु मरते हैं उससे भी अधिक रक्षक स्वस्थ कोषों का सफाया होता है जितने शत्रु मरते हैं उससे भी अधिक मित्रों को मरना पड़े तो ऐसा युद्ध लाभदायक− उत्साहवर्धक, सन्तोषजनक नहीं माना जा सकता। देखा जाता है कि औषध उपचार से रोग मुक्त होने के उपरांत भी बेहतर क्लान्ति छाई रहती है और एक से निवृत्त होते ही दूसरे रोगों की काली छाया झाँकने लगती है। यह कठिनाई यज्ञ चिकित्सा में नहीं है। क्योंकि यजन कृत्य में जो हविष्य होमे जाते हैं। उनमें एक भी मारक गुणवाला नहीं होता। सभी परिशोधन एवं परिपोषण प्रकृति के होते हैं। आत्मिकी का प्रतिपादन यह हैं कि रुग्णता दुर्बलता से उत्पन्न होती है। विषाणु मात्र दुर्बलों पर आक्रमण करने में सफल होते है। इसलिए उपचार ऐसा होना चाहिए जिससे हर स्तर की दुर्बलता घटती और समर्थता बढ़ती चली जाए। यज्ञ चिकित्सा का आधार यही हैं। रोगियों के शरीर में जिस स्तर की दुर्बलता बढ़ गई होती है, उसे दूर करने के लिए उसी स्तर के पौष्टिक तत्व शरीर में पहुँचाये जाते हैं। इस प्रकार यज्ञ चिकित्सा को एक प्रकार से सर्वथा निर्दोष और रोग मुक्ति के साथ दुर्बलता निवारण को दुहरा प्रयोजन पूरा करने की प्रक्रिया कह सकते हैं।
मानसिक रोगों में यज्ञीय ऊर्जा के साथ साथ मन्त्र का प्रभाव अभीष्ट उपचार की पूर्ति करता है। रोगी को देव सान्निध्य की,पाप प्रायश्चित की श्रद्धा अपनाने के लिए मनोविज्ञान सम्मत प्रक्रिया से लाभान्वित किया जाता है। देव अनुग्रह से प्रारब्ध रोग कटने एवं उस धर्मानुष्ठान से अन्तराल में जमी रोगों की जड़ कटने की बात यदि हृदयंगम कराई जा सके तो यज्ञ प्रक्रिया के साथ आत्म विश्वास भी बढ़ता है जो न केवल मनोरोगों के निराकरण में वरन् मनोबल की अभिवृद्धि में भी असाधारण रूप से सहायक होता है।
प्रस्तुत चिकित्सा पद्धतियां अपने अपने ढंग से कार्य कर रही हैं। इतने पर भी वे लोक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकने में इतने न्यूनतम स्तर की सफलता का ही दावा कर सकी हैं। अब तक एक रोग की भी किसी चिकित्सा पद्धति ने सुनिश्चित दवा खोज निकालने में जादुई नुस्खे ही उनके साथ लगे हैं। इनसे भी बढ़ते हुए रोगों के निवारण और दिन दिन गिरते स्वास्थ्य का संरक्षण हो सकने की आशा नहीं बँधती। ऐसी अन्धकार भरी परिस्थितियाँ में यज्ञ चिकित्सा एक ऐसी आशा किरण है जिसके प्रखर होने पर लोक स्वास्थ्य पर छाया हुआ संकट उबर जाने की आशा है।
पश्यमौषध सेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिदप्टास्य नान्यानुष्ठित कर्नणा॥ −विवेक−55
पथ्य और औषधि को सेवन करने वाला रोग ही आरोग्य लाभ प्राप्त करते देखा गया है न कि किसी और के द्वारा किये हुए (औषधादि सेवन) कर्मों से वह निरोग होता है। इसी प्रकार आत्म कल्याण के लिए स्वयं ही प्रयास करना होता है।
मौसम की पूर्व जानकारी होने से तद्नुरूप व्यवस्था बनाली जाती है। वर्षा से सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के सरंजाम जुटाए जाते हैं। शीत ऋतु में ठण्ड से बचाव के लिए गरम कपड़े एवं विस्तार आदि बनवाने पड़ते है। गर्मी में उसके अनुरूप व्यवस्था करनी होती है। न केवल सुरक्षा का ही प्रबन्ध करना होता है। न केवल सुरक्षा का ही प्रबन्ध करना होता है वरन् दैनिक कार्यक्रमों को मौसम के अतरुप नये सिरे से निर्धारण भी करना पड़ता है। मौसम विज्ञान की पूर्व जानकारी हर दृष्टि से उपयोगी है,मानवी विकास के लिए एक सम्मत पृष्ठभूमि बनाने वाली एक विद्या भी है।
पृथ्वी पर उपलब्ध परिस्थितियाँ, वातावरण उसकी स्वयं की उपार्जित सम्पदा नहीं है। उसका एक बड़ा भाग अन्यान्य ग्रहों से प्राप्त होता है। उसका एक बड़ा भाग अन्यान्य ग्रहों से प्राप्त होता है। सूर्य को प्रकाश,ताप और प्राण का अधिष्ठाता माना जाता है। ये अनुदान पृथ्वीवासियों को सतत् सूर्य से ही प्राप्त होते रहते हैं। सूर्य ही नहीं सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रहों का पृथ्वी पर अनुकूल वातावरण विनिर्मित करने में अपने अपने ढंग का योगदान है। समस्त और −मण्डल ही एक “इकॉलाजिकल” चक्र में बँधा हुआ है। ग्रहों की गति एवं स्वरूप में होने वाले हेर फेर से पृथ्वी का वातावरण और सम्बन्धित जीव तन्तु और वनस्पतियाँ समान रूप से प्रभावित होते है। मौसम में असामयिक होने वाले हेर फेर, प्रकृति विक्षोभों और असन्तुलनों में भी अंतर्ग्रही परिवर्तनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वर्षा, शीत और ग्रीष्म ऋतुओं की भाँति सौर−मण्डलीय गतिविधियों और उनमें होने वाले हेर फेर से पड़ने वाले पृथ्वी पर प्रभावों की जानकारी पहले ही मिल जाय तो उनके अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था करने में भारी सहयोग भी मिलता है।
‘ज्योतिष विज्ञान’ पुरातन काल में यही प्रयोजन पूरा करता था। कालान्तर में यह विद्या धीरे−धीरे विलुप्त होती चली गई और उसके स्थान पर भ्रान्तियाँ अन्ध विश्वासों ने जड़ जमा ली। इतने पर भी उसकी गरिमा और उपयोगिता अपने स्थान पर यथावत हैं। ऐसी मान्यता है कि यह विज्ञान की सबसे प्राचीन शाखा है। इस विषय पर भारत ही नहीं चीन तथा यूरोप के विभिन्न देशों में प्रमाणिक पुरातन साहित्य उपलब्ध है जो ज्योतिष विद्या पर प्रकाश डालते हैं। बृहत्तर भारत के प्रसिद्ध ज्योतिर्विदों में श्रीधर,वाराह मिहिर,आर्य भट्ट भास्कराचार्य आदि के नाम ओर उनकी लिखी पुस्तकें आज भी कितनी ही देशों में चर्चा और शोध के विषय बने हुए है।
ज्योतिष विज्ञान को क्षेत्र इतना विस्तृत है कि इसे सभी विज्ञानों का अधिष्ठाता माना जा सकता है। इसकी आदर्श परिभाषा के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि यह ऐसा विज्ञान है जो खगोलीय पार्थिव व मानवीय घटनाओं से सम्बन्ध जोड़ता तथा ब्रह्मांड और मनुष्य और मनुष्य के बीच अन्तः सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करता है। यह आकाश गंगाओं के संसार और जीवित कोशिकाओं के संसार को एक दूसरे से जोड़ने का प्रयत्न करता है।
संस्कृत का ‘ज्योतिष’ शब्द इसके वास्तविक स्वरूप की व्याख्या करता है। ज्योतिष का अर्थ होता है प्रकाश है विकिरण या प्रसरण। अस्तु ज्योतिर्विज्ञान को विकिरण विज्ञान माना जा सकता है हजारों वर्ष पूर्व आर्ष ऋषियों को इस विषय की गहन जानकारी थी। उन्हें विभिन्न प्रकार के पार्थिव क्रिया कलापों के आधार पर नक्षत्रों की गति व तारों के सापेक्ष स्थानों के बीच आपसी संबंध का ज्ञान था। फलतः समय समय पर वे भवितव्य की महत्वपूर्ण घटनाओं के सम्बन्ध में गणनाओं के आधार पर भविष्यवाणी भी किया करते थे। हजारों वर्ष बाद भी कितने ही पुरातन ग्रन्थों में वर्णित उनके कथन समय समय पर सही उतरते देखे गये हैं। ये ज्योतिर्विज्ञान की प्रामाणिकता का ही बोध कराते हैं।
विज्ञान की दूसरे ग्रहों में छलांग लगाने और टोह अनुभव किया जा रहा है कि ज्योतिष विज्ञान का नये सिरे से अध्ययन किया जाय। चिकित्सा एवं मने यह सत्य एक मत से स्वीकार किया जाने लगा है कि घटती बढ़ती चन्द्र कलाओं का मानव शरीर, स्वास्थ्य और मनःस्थिति पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। जीवधारियों में पूर्णिमा के दिन सर्वाधिक व्यग्रता और विक्षोभ देखा जाता है। पागलपन के दौरे अधिक पड़ते हैं। अपराध भी इन्हीं दिनों अधिक होते हैं। भूगर्भ एवं खगोल शास्त्रियों के निष्पक्षों के अनुसार अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भूकम्प अधिक आते है। सूर्य में धब्बों की वृद्धि होने से प्रकृति प्रकोप बढ़ते हैं। इन्फ्लुएंजा और दिल के दौरे जैसी बीमारियाँ अधिक होती है।
‘जॉन ग्रिविन’ जैसे खगोल शास्त्रियों का कहना है कि वायुमंडलीय आवेश का आयनीकरण सूर्य की लपटों से सम्बन्धित है। वायु से धनात्मक एवं ऋणात्मक आयनीकरण का स्वास्थ्य और मनोकायिक क्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सन् 1971 में ‘अमेरिका इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडिकल क्लाइमेटोलाजी ‘ संस्थानों ने अपने शोध के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला कि वायुमंडल में विद्यमान विद्युतीय आवेश हमारे अनुभवों,विचारों और व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। वायुमण्डल के ये आवेश भी सूर्य की लपटों द्वारा नियंत्रित होते हैं।
आये दिन भूकम्पों,ज्वालामुखियों के फटने से भारी नष्ट होती है और मनुष्य असहाय,असमर्थ बना मूक रूप से अपनी बर्बादी पर आँसू बहाता रहता हैं। मानवी पुरुषार्थ और विज्ञान साधन भी उपसे अपनी सुरक्षा नहीं कर पाते। अन्तर्ग्रही असन्तुलनों के दुष्परिणाम ही इस प्रकार के प्रकृति प्रकोपों के रूप में प्रस्तुत होता है। ज्योतिर्विज्ञान की यदि ठीक तरह जानकारी होती तो समय के पूर्व ही मौसम में हुए हेर फेर के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था बनाने की तरह आवश्यक कदम उठाया जा सकता है। किन्तु अभी भी यह महत्वपूर्ण विद्या अंधकार के गर्त में पड़ी है। विश्व के मूर्धन्य भौतिक विज्ञानी अब इस तथ्य स्वीकार करने लगे है कि ज्योतिष विज्ञान के क्षेत्र में गहन शोध की आवश्यकता है। इससे कितने ही अविज्ञात का रहस्योद्घाटन होगा। प्रसिद्ध नाभिकीय भौतिक विद डॉ.’रुडाल्फ तोमास्कोक’ ने इस तथ्य को हृदय स्वीकार किया है। इन्होंने एक बार प्रख्यात भारतीय भौतिक शास्त्री डॉ. वी वी रमन एवं नार्लीकर से कहा “यह विचित्र बात है कि बयासी प्रतिशत से भी अधिक माताओं में भयंकर भूकंपों के दौरान जब पृथ्वी डोलती है तो ‘यूरेनस ग्रह’ याम्योत्तर के ठीक ऊपर होता है यह एक ऐसा रहस्य है जिसकी आपको गम्भीरता से खोज बीन करनी चाहिए। यह एक स्मरणीय तथ्य है कि श्री रमन व मार्लीकर दोनों ही विश्व स्तर पर काँस्माँलाजी व एस्ट्रानामी सम्बन्धी अपने सिद्धान्तों के लिये ख्याति प्राप्त विद्वान हैं।
पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों में ज्योतिर्विज्ञान के विषय में इन दिनों अभिरुचि जगी है। कितने ही देशों में इस दिशा में प्रयास भी आरम्भ हो गये हैं। ‘आइन्स्टीन’ अट्टकि का वेधशाला केपटाऊन (दक्षिण अफ्रीका), माउन्ट विल्सन वेधशाला−यू.एस.ए.,रूस का जाईस संस्थान,हारवर्ड वेधशाला, डोमिनियन एस्ट्रो फिजिकल इन्स्टीट्यूट,रायल आँब्जर बेटरी एडिन वर्ग, बावेल्स वर्ग आब्जर बेटरी प. बर्लिन आद में ग्रहों की स्थिति एवं गति और उनमें होने वाले परिवर्तनों के सम्बन्ध में व्यापक स्तर पर खोज बीन चल रही है। ये आरंभिक चरण हैं। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अभी अछूता है−अन्तर्ग्रही प्रभावों के अन्वेषण का। जिसकी उपेक्षा अब तक होती रही है।
कार्ल जुंग जैसे मनोवैज्ञानिक का कहना है कि “ज्योतिर्विज्ञान में कितनी ही महत्वपूर्ण सम्भावनाएँ विद्यमान हैं अब तक इस विज्ञान की उपेक्षा हुई। फलतः आधुनिक सभ्यता ने खोया अधिक पाया कम है। वस्तुतः एक प्राचीन किन्तु उपयोगी विद्या की अवहेलना से उससे मिलने वाले लाभों से हम वंचित रह गये हैं।”
फलित ज्योतिष की मूढ़ मान्यताएं, भाग्यवाद,मुहूर्तवाद जैसे अन्ध−विश्वासों से जड़ जमा लेने के कारण भी विचार शील वर्ग द्वारा इस विज्ञान की उपेक्षा होती रही। ज्योतिष विज्ञान के प्रति अविश्वास और विरोध जो समय समय पर प्रकट होते है इसका एक मात्र कारण इस विद्या के संबंध में फैली हुई भ्रान्तियाँ भी हैं। आज भी कितने ही तथाकथित ज्योतिषी इस विद्या की आड़ में भ्रम एवं भय फैलाते, शोषण करते तथा जन सामान्य में अश्रद्धा उत्पन्न करते हैं। वे ज्योतिर्विज्ञान के वास्तविक स्वरूप से स्वयं तो अपरिचित होते ही हैं। साथ ही अंध विश्वासों को बढ़ावा देते हैं।
प्रचलित भ्रान्तियों का निवारण और ज्योतिष विद्या का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत किया जा सके तो यह आज भी उतना ही उपयोगी हो सकता है जितना कि प्राचीन काल में था। विज्ञान की अन्यान्य शाखाओं की भाँति ही यह मानव जाति की प्रगति में सहायक हो सकता है। आवश्यकता इतनी भर है कि इस दिशा में अभिरुचि जगे और खोज के लिए सुव्यवस्थित प्रयास चलें। विश्व के विभिन्न देशों में इस सम्बन्ध में छुटपुट चल भी पड़े हैं। भारत
में भी कर्नाटक विश्व विद्यालय ने ज्योतिष विज्ञान को अपने पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स में सम्मिलित कर विधिवत् अध्ययन की व्यवस्था बनायी है। यह प्रसन्नता की बात है। अन्य स्थानों पर भी इस तरह के प्रयत्न चलने चाहिए।
ज्ञान की अन्यान्य विद्याओं विद्याओं की तुलना में ज्योतिर्विज्ञान की महत्ता कम नहीं,अधिक ही आँकी जानी चाहिए। इसके लिए ज्योतिष शास्त्र को वैज्ञानिक स्तर पर शोध कार्य में सम्मिलित करने के प्रयास भी अब चल पड़े हैं।
सत्रों सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य
शान्तिकुँज के त्रिविधि सत्रों सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों को अपने परिचय समेत अलग अलग आवेदन पत्र भेजना चाहिए। भोजन व्यय सभी को अपना वहन करना होगा। उचित मूल्य पर भोजन मिलने के लिए अलग से भोजनालय की व्यवस्था कर दी गयी है।
इस बात तीनों सत्रों की पाठ्य पुस्तकें छपी हैं। इनके सहारे शिक्षण को हृदयंगम करने की बात अच्छी तरह बन जाती है। प्रकाशन इस प्रकार हुआ है−
प्रज्ञा परिजन सत्र(एक मई से) (1)तीर्थ सेवन से आत्म परिष्कार (2)तीर्थों की प्राणवान प्रेरणायें (3)आत्म शुद्धि के लिये प्रायश्चित उपचार।
युग शिल्पी सत्र (एक जन से)− (1) युग शिल्पी का चिन्तन और चरित्र (2) सृजन शिल्पियों की योजनाबद्ध कार्य पद्धति (3) जड़ी बूटीयों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण (4) आसन प्राणायाम से आधि व्याधि निवारण (5) गायत्री यज्ञ और षोडश संस्कार। प्रज्ञा पुराण इसके अतिरिक्त है।
कल्प साधना सत्र (एक जुलाई से)−−(1) साधना से सिद्धि−भाग 1 (2) साधना से सिद्धि भाग 2 (आहार कल्प)।
भोजन व्यय,मार्ग व्यय,पाठ्य पुस्तक खरीद आदि की व्यवस्था बनाकर ही घर से चलें। आवश्यक वस्त्र बिस्तर आदि साथ लेकर आयें शिक्षार्थी अधिक,स्थान कम रहने से इच्छित सत्र में स्थान न मिले तो अन्य किसी सत्र जिसकी सुविधा हो विकल्प के रूप में आवेदन पत्र मँगाकर उसे भरकर उसके साथ ही लिख भेजें। स्वीकृति मिलने पर ही आएँ।
ज्योतिर्विज्ञान का मुख्य उद्देश्य है ब्रह्माण्ड में बिखरे ज्योतिर्पिंडों के संदर्भ में पृथ्वी ग्रह के निवासियों के वातावरण एवं जैविक परिवर्तनों का विश्लेषण। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि अन्तरिक्षीय पिंडों का मानव जीवन से अविच्छिन्न सम्बन्ध है। आकाश तो अनंत है पर उसके तीन प्रमुख भाग हैं− भूलोक पृथ्वी व उसका वायुमण्डल,द्युलोक −तारामण्डल, अन्तरिक्ष−भूलोक तथा द्युलोक का सन्धिस्थल।
एक विज्ञ ज्योतिर्विज्ञानी अपने विशद ज्ञान के माध्यम से वर्तमान तथा भूत−भविष्य में हुए,हो सकने वाले अन्तरिक्षीय ग्रह सन्तुलन परिवर्तन का अध्ययन करता है। इसे (वेध) करने की प्रक्रिया कहा जाता है। वेधशाला चाहे वह चिरपुरातन स्टोन आब्जर्वेटरी हो अथवा आधुनिक दूरदर्शी यन्त्रों से सुसज्जित,उसका एक ही उद्देश्य व्यवस्था का चिन्तन। मानव शरीर, मन, वनस्पति जगत, प्राणी जगत एवं इकॉलाजिकल सन्तुलन पर ग्रहों के छोटे से परिवर्तनों के बड़े महत्वपूर्ण प्रभाव होते से परिवर्तनों के बड़े महत्वपूर्ण प्रभाव होते देखे गए हैं। पृथ्वी का मौसम पूरी तरह ग्रहों के सन्तुलन पर निर्भर है। थोड़ा-सा भी व्यतिरेक भूकम्पों, अनावृष्टि जैसे विनाशकारी परिवर्तनों के रूप में निकलता है। इसके विपरित ज्योतिर्विज्ञान की विद्या अपने गणितीय अनुमान तथा तथ्यों के आधार पर ऐसे कदम उठाने की दिशा निर्देश देती है जिससे वातावरण में वाँछित मोड़ लाया जा सके, प्रतिकूल को पलटा जा सके। वातावरण अनुकूलन प्रक्रिया आर्षकालीन महामानवों द्वारा इसी माध्यम से सम्पन्न की जाती रही है। सूर्या तो हमें दूर है, हमारे समीप उसकी किरणें ही पहुँच जाती हैं। सूर्य से प्रकाश तो एक ही वर्ण का उत्सर्जित होता है लेकिन यह बुध, शुक्र, चन्द्रमा, मंगल, गुरु शनि आदि ग्रहों से परावर्तित होकर मिश्रित रूप में हम तक पहुँचता है। ये सभी ग्रह हमें हमारी धरती की रश्मियों के माध्यम से ही प्रभावित करते हैं।
इसी प्रकार सारी वनस्पतियों −आयुर्वेद वर्णित औषधियों की जीवनीशक्ति चन्द्रमा के अधीन है इसी को सोम कहते हैं। पन्द्रह दिन तक उनकी एक एक कला के रूप पत्ता घटता चला जाता है। सारे औषधीय वनस्पति जगत पर चन्द्र कलाओं का प्रभाव पड़ता है। इसीलिये नक्षत्र विशेष में चन्द्रकलाओं की विशेष स्थिति में ही जड़ी बूटीयों को चिकित्सा हेतु चयन करने का विधान है। संक्षेप में चन्द्रमा पृथ्वी के समीपस्थ होने के कारण आकाश मण्डल में विद्यमान तारों की रश्मियों को हम तक पहुँचाने से संचार उपग्रह का काम करता है। सत्ता इसी दिन के अपने चक्र में वह 27 नक्षत्रों से भिन्न−भिन्न प्रकार की दिव्य रश्मियाँ प्रदान करता है। इसीलिये इसे ‘ग्रहाधीन जगत् सर्वत्’ के चिर पुरातन सिद्धान्तानुसार ग्रह संसार के सभी जड़ चेतन पदार्थों को प्रभावित करते हैं। सूर्य उदित होने पर कमल पुष्पों का खिलना, सूरजमुखी पुष्प का क्रमशः अपनी दिशा बदलना आदि सूर्य के वनस्पतियों पर प्रत्यक्ष चमत्कारी प्रभाव के कतिपय उदाहरण हैं। कभी कभी वे
पृथ्वी से भी भयंकर छेड़छाड़ कर बैठते हैं। ऐसे प्राकृतिक प्रकोपों में भूकम्पों का नाम अग्रणी है। एक वर्ष में बड़े लगभग 20 भूकम्प आते है। समुद्र में तूफान ज्वार भाटे पृथ्वी पर भूचाल आदि का प्रमुख कारण ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव ही है।
सूर्य कलंकों के अनेकानेक विकिरण कारक घातक प्रभाव प्राणी जगत पर होते पाये गये है सन् 82 में 9 ग्रहों की युति का मार्च से नवम्बर तक प्रभावी होना,सौर−कलंकों की सम्भावित वृद्धि,7 प्रकार के ग्रहणों की घटना एक अभूतपूर्व स्थिति है। ऐसे में सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने वाले सामूहिक धर्मानुष्ठान ही कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
ग्रह नक्षत्रों, सौर मण्डल की गतिविधियों उनके आपसी संबंधों और परस्पर एक दूसरे पर, पृथ्वी के वातावरण, वृक्ष, वनस्पति एवं जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी देने के अतिरिक्त भी ज्योतिष विज्ञान का एक पक्ष है–सूक्ष्म अन्तरिक्ष में चलने वाले चैतन्य प्रवाह और उनकी भली−बुरी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराना। एकाँगी सौर गतिविधियों की जानकारी तो आज के विकसित खगोल शास्त्र और सम्बन्धित आधुनिकतम यन्त्रों द्वारा भी मिल जाती है। सशक्त रेडियो टेलीस्कोपों से लेकर अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित −स्थापित कृत्रिम सेटेनाइट्स हजारों की संख्या अन्तरिक्ष की विभिन्न कक्षाओं में घूमते हुए यह सीमित प्रयोजन पूरा कर ही रहे हैं? ग्रह, नक्षत्रों, तारा पिण्डों के स्वरूप, स्थिति एवं गति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ज्ञान दिन−प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है और कितने ही नवीन तथ्यों का आविष्कार हो रहा है। यह ज्ञान उपयोगी और मानवी प्रयास प्रशंसनीय है।
इतने पर भी ज्ञान का वह पक्ष अभी भी अछूता है जिसके सहारे सूक्ष्म अन्तरिक्षीय चैतन्य प्रवाहों की जानकारी मिलती थी। उपयोगी प्रवाह को पकड़ने, लाभ उठाने और हानिकारक से बचाव करने की बात सोची जाती थी। कहना न होगा कि यह महत्वपूर्ण प्रयोजन भी ज्योतिर्विद्या में प्राचीन काल में समाहित था जिसका चेतना विज्ञान खगोल जानकारियों की तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान और मनुष्य जाति के लिए उपयोगी था। जिसके सहारे जाति प्रकृति की हलचलों में भी हेर−फेर की बात सोची और आध्यात्मिक उपचारों की व्यवस्था बनायी जाती थी।
प्रगति की ओर आगे बढ़ते हुए विज्ञान कल नहीं तो परसों वहाँ पहुँचने वाला है, जिसके सहारे भावी अन्तरिक्षीय घटनाक्रमों के विषय में पूर्व ज्ञान प्राप्त कर सकें। कई बार भविष्य विज्ञानियों के प्रकृति विक्षोभों के सम्बन्ध में कथन सही भी उतरते हैं। सम्भव है अगले दिनों वे और भी यथार्थता के निकट पहुँचे। पर इतने पर भी मूलभूत समस्या का समाधान नहीं निकलता। कहने का आशय यह है कि अन्तर्ग्रही असन्तुलनों के कारण जानने एवं निवारण के लिए उपचारों के अभाव में अन्तर्ग्रही जानकारी मात्र होने से कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अस्तु वैज्ञानिक प्रयास उत्साहपूर्वक एवं सराहनीय होते हुए भी एकाँगी और अपूर्ण हैं।
आये दिन भूकम्प, तूफान, चक्रवात, भू स्खलन, बाढ़, ज्वालामुखियों का जैसी प्रकृति की विभीषिकाएँ अपनी विनाश−लीला पृथ्वी पर रच जाती हैं। मनुष्य एक असहाय बना उन्हें देखता और अपनी बेबसी पर आँसू बहाता है। आँकड़े एकत्रित किए जायें तो पता चलेगा कि प्रतिवर्ष विश्व भर में युद्धों–बीमारियों से मरने वालों की तुलना में प्रकृति प्रकोपों से जान गंवाने वालों की संख्या कहीं अधिक होती है। भौतिक सम्पदा का एक बड़ा भाग प्रकृति विक्षोभ लीला जाते हैं और मानवी पुरुषार्थ पर निर्दयता पूर्वक पानी फेर जाती हैं। जितनी सम्पदा प्रकृति विक्षोभों के कारण नष्ट हो जाती है वह किसी प्रकार सुरक्षित रहती तो उससे प्रगति में भारी योगदान मिल सकता था। प्रस्तुत होने वाली विभीषिकाओं की यदि किसी प्रकार विज्ञान द्वारा जानकारी मिला जाय तो भी उन्हें रोक सकने–सूक्ष्म अन्तरिक्ष में पक रहीं घटनाओं में हेर−फेर कर पाने में भौतिक विज्ञान अभी भी असमर्थ है। वह तकनीक अभी तक विकसित नहीं हो पाई है जिसके माध्यम से यह प्रयोजन पूरा हो सके।
प्राचीन काल में ज्योतिर्विज्ञान के आचार्य न केवल अन्तर्ग्रही गतिविधियों के ज्ञाता होते थे वरन् आत्मविज्ञान–चेतना विज्ञान के क्षेत्र में भी उनकी पहुँच होती थी। फलतः सौर मण्डल की जानकारियाँ प्राप्त करने के साथ−साथ उनमें अभीष्ट हेर−फेर करने के आध्यात्मिक उपचारों से परिचित होने से समय−समय पर इस प्रकार के प्रयोग परीक्षण भी किए जाते थे। ऐसे कितने ही उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलते हैं जिनमें मंत्र शक्ति का प्रयोग प्रकृति विप्लवों को रोकने–वर्षा कराने–असन्तुलनों के निवारण में समय−समय पर किया जाता रहा है। सूर्य−सविता की उपासना किसी समय घर−घर प्रचलित थी। भारत ही नहीं जापान, चीन, इंग्लैंड, रोम, जर्मनी आदि स्थानों पर भी सूर्य उपासना के प्रचलन का उल्लेख विविध ग्रन्थों में मिलता है। सूर्य सौर मण्डल के सदस्यों का मुखिया है। पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रभाव भी उसी का पड़ता है। अन्याय ग्रह सूर्य के साथ मिलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ पृथ्वी पर प्रकट करते हैं। अस्तु सूर्य उपासना विज्ञान सम्मत और विविध प्रयोजनों के लिए विविध रूपों में प्रचलित थी। मन्त्र शक्ति यज्ञोपचार आदि द्वारा वर्षा पर नियन्त्रण प्राप्त करने, प्राण तत्व को धरती पर उतारने जैसे प्रयोग सुलभ थे।
चेतना की सामर्थ्यं जड़ की तुलना में कई गुना अधिक है। जब प्रकृति पर नियमन नियन्त्रण ही नहीं उसमें हेर−फेर करने में भी वह सक्षम है। अन्तर्ग्रही चैतन्य प्रवाह की उलटना−पलटना हो तो चेतना की सामर्थ्य का ही उपयोग करना होगा। अन्तर्ग्रही शक्तियों की विशालता और प्रचण्डता अद्भुत और विलक्षण है। इतने पर भी चेतन की प्राण शक्ति द्वारा उस प्रवाह में परिवर्तन कर सकना सम्भव है। ऐसे परिवर्तन जो पृथ्वी के जीवधारियों के लिए उत्पन्न अविज्ञात कठिनाइयों को रोकने और अदृश्य अनुदानों का बढ़ाने में समर्थ हो सके। खगोल विज्ञान की पूर्णता ज्योतिर्विज्ञान में है जो अपने में चेतना विज्ञान की सामर्थ्य को भी समाहित किए हुए है कुशल चिकित्सक रोग का निदान ही पर्याप्त नहीं समझते रुग्णता हटाने और आरोग्य हटाने का उपचार भी सोचते है ज्योतिर्विज्ञान केवल ग्रह नक्षत्रों की स्थिति ही अवगत नहीं कराता अपितु अदृश्य प्रभावों के अनुकूलन का भी प्रबन्ध करता है।
इस संदर्भ में एक बात और समझने योग्य है कि सौर मण्डल के ग्रह उपग्रह भौतिक दृष्टि से रासायनिक तत्वों से बड़े आकार के गतिशील पिण्ड मात्र नहीं हैं। आत्म विज्ञानियों का मत है कि प्रत्येक जड़ सत्ता का एक चेतना अभियान होता है। उसी के नियन्त्रण से इन घटकों को अपनी गतिविधियाँ चलाने का अवसर मिलता है। नवग्रहों को ज्योतिर्विज्ञान में नव चेतना माना गया है। जबकि खगोल शास्त्री इनकी चेतना विशेषताओं से अपरिचित होने के कारण मात्र पदार्थ पिण्ड मानते हैं। आत्मवेत्ताओं ने तैंतीस कोटि देवता गिनाए हैं। यहाँ कोटि का अर्थ करोड़ से नहीं श्रेणी से है। इस समुदाय में ग्रह पिण्ड, निहारिकाएं पंच तत्व, पंचप्राण, देवदूत, जीवनमुक्त, पितर जैसी सूक्ष्म अदृश्य दिव्य सत्ताओं को गिना जा सकता है, जो सृष्टि के सुसंचालन में हिस्सा बंटाती हैं। देवाराधना–उपासना में इन्हीं के साथ संपर्क और परस्पर आदान−प्रदान का मार्ग खोलने का प्रयास किया जाता है।
भूमण्डल का विस्तार सीमित है–अन्तरिक्ष का अनन्त। जितनी सम्पदा पृथ्वी तथा इसके निकटवर्ती वातावरण में है उससे असंख्यों गुना अधिक अन्तरिक्षीय परिकर, परिसर में संव्याप्त है। जिसमें पदार्थ भी है और चेतना भी पितरों से लेकर देव समुदाय के सूक्ष्म शरीर धारी तथा महाप्राण की शक्तियाँ इसी विस्तृत अन्तरिक्ष में निवास करती है। इस प्रत्यक्ष और परोक्ष−जड़ और चेतन की शक्तियों का तारतम्य न मिल पाने से कितने ही अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है और मात्र प्रकृति प्रवाह जो सहज ही मिल जाती है उतने भर से पृथ्वीवासियों को सन्तुष्ट रहना पड़ता है।
अस्तु ज्योतिर्विज्ञान पर समग्र शोध के साथ कितनी ही उपयोगी सम्भावनाएँ भी जुड़ी हुई हैं। इससे मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत अनेकानेक विभीषिकाओं के पीछे विद्यमान अदृश्य कारणों को ढूँढ़ने व उनके निवारण में सहयोग मिलेगा। साथ ही दैवी चैतन्य प्रवाह से अनुकूल लाभ पा सकना भी सम्भव हो सकेगा।
पूज्य गुरुदेव के तपस्वी जीवन के साथ सामयिक समस्याओं से जूझने और अनिवार्य आवश्यकताओं को जुटाने की रणनीति जुड़ी हुई है। उनने सदा से अपने को एक व्यक्ति नहीं शक्ति माना है। स्व को ‘अहम्’ न रहने देकर विराट् के एक नगण्य किन्तु अविच्छिन्न घटक के रूप में विकसित किया है। उनकी आकाँक्षाएँ व्यक्तिगत लिप्सा, लालसा एवं अहंता से हजार मील ऊँची रही हैं। घोंसला तो पेड़ पर रखा और आहार के लिए धरती पर बैठकर गहरे पानी में डुबकी लगाते रहने का उपक्रम बनाया है किन्तु राजहंस की तरह उड़ानें ऊँची भरी हैं और अनन्त अन्तरिक्ष में अपने खुले पंखों को उन्मुक्त रूप से निवारण करने दिया है। तद्नुसार उनकी जीवनचर्या की दिशाधारा सुनिश्चित रहते हुए भी, परिस्थितियों के अनुरूप मोड़–मरोड़ अगणित आते हैं। गंगा की धारा तक के सम्बन्ध में यही बात देखने को मिलती है। कितने ही स्थानों पर उनमें भयानक मोड़ और प्रपात है। उत्तरकाशी जैसे अनेक स्थानों पर तो वह दक्षिण से उत्तर की ओर उलटी बहती हुई दिखाई देती है। इससे भागीरथी की गौरव गरिमा गिरी नहीं है। उलट−पुलट को अस्थिरता, चंचलता का नाम देकर लाँछित नहीं किया गया है। किन्तु मोर्चे पर सेना को लड़ाने वाले कप्तान की व्युत्पन्नमति और सूझबूझ कहकर ही सराहा ही गया है।
बहत्तर वर्ष के भूतकाल में ऐसे कितने ही मोड़, करवट, प्रपात, उछाल उनकी जीवन−जाह्नवी में उत्पन्न हुए दृष्टिगोचर होते हैं। इतने पर भी यह निश्चित है कि इसमें अपनी मनमर्जी, सनक, महत्वाकाँक्षा के लिए कभी कही रत्ती भर भी स्थान नहीं रहा। कठपुतली की तरह उन्होंने कई अभिनय तो किये है, पर उन सबके पीछे किसी बाजीगर की कलाकारिता ही सूत्र−संचालन करती रही है। चौबीस वर्षों तक अद्भुत प्रतिबन्धों के साथ जुड़ी हुई पुरश्चरण साधना से व्यक्तित्व को वज्र अस्थि दधिचि जैसी पवित्रता और प्रखरता से सम्पन्न किया, युगान्तरीय चेतना के अन्तरिक्ष से धरातल पर अभिवर्षण की महाकाल इच्छा की भागीरथी प्रयत्नों के सहारे शक्य सम्भव बनाने की निमित्त युग साहित्य सृजा। हनुमान की तरह के निमित्त न केवल पर्वत उखाड़ने, समुद्र छलाँग ने जैसे दुस्साहसों को अपनाया किन्तु अकेले से वह साध−सधते न देखकर अनुचरों का एक विशाल सैन्य−दल मोर्चे पर ला खड़ा किया। भले ही वह समुदाय रीछ−वानर जैसे तथाकथित छोटे लोगों का ही क्यों न ही समझा गया हो। भारतीय देवसंस्कृति को सिकुड़ते, गलते और गरिमा खोते देखकर उनकी आंखें ही सजल नहीं हुई, भुजाएँ भी फड़की हैं। विशाल भारत की संरचना में उनने अर्जन की तरह महाभारत लड़ने का आदेश भी इच्छा, अनिच्छा से स्वीकार किया है। धर्म मच से जनमानस का परिष्कार और लोकमानस के नवनिर्माण का जो अभिनव किन्तु अति सशक्त प्रयास पिछले दिनों मत्स्यावतार की तरह बढ़ता रहा है उसे प्रवाह को उलट देने की सुसम्बद्ध योजना का अंग ही माना जाना चाहिए। उसके पीछे पंडिताऊ व्यवसायी बुद्धि नहीं समर्थ गुरु रामदास जैसे महावीर मन्दिरों की पुनरावृत्ति और चारों धाम बनाने की आद्य शंकराचार्य जैसी सूझ−बूझ झाँकती हुई देखी जा सकती है। चाणक्य की तरह कोई चन्द्रगुप्त तो उन्होंने नहीं बनाये पर रामकृष्ण परमहंस की भूमिका निभाते हुए अग्रदूतों विवेकानन्दों का एक अच्छा खासा समुदाय नवसृजन के अग्रिम मोर्चे पर ला खड़ा किया है। यह सभी प्रवृत्तियाँ एक दूसरी से भिन्न हैं। महामानव अपने−अपने समय की लिए उतना भी बहुत था। किन्तु पूज्य गुरुदेव के कंधों पर महाकाल ने एक साथ कितने ही काम लादे हैं और उनमें से कोई ऐसे भी लगते हैं जिनकी परस्पर संगति बिठाना कठिन पड़ता है। परशुराम का आरम्भ तपश्चर्या में, मध्यकाल कुल्हाड़े से मुण्डमाला के पर्वत खड़े कर देने में और अन्त उद्यानों से समूचे धरातल को लहलहा देने में हुआ। यह प्रत्यक्ष विसंगतियाँ है। उस स्तर का तो नहीं पर अवांछनीयता उन्मूलन में उनका आक्रोश भरा संघर्ष पराक्रम और दूसरी ओर श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का त्रिवेणी संगम खड़ाकर देने वाला अनुष्ठान भी कम आश्चर्यजनक नहीं हैं। ऐसी परस्पर विरोधी गति विधियाँ पूज्य गुरुक्षेत्र के जीवन में भी कम नहीं हैं। कभी वे स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में बलिदानियों की सेना में खड़े हुए बन्दी गृह में हथकड़ियों पर गीत गाते दीखते हैं तो कभी हिमालय की कन्दराओं में अपनी चेतना का उच्चस्तरीय कायाकल्प करने के लिए एकान्त सेवी भूमिका निभाते हैं। एक दिशा क्यों न हो इसका उत्तर पोलो खिलाड़ियों के पास जाकर उनकी रणनीति में कबूतरों जैसी कलामुण्डी दिखाने के पीछे छिपे रहस्य को पूछना चाहिए। रणनीति में अप्रत्याशित उतार−चढ़ाव लाने वाले सेनापति भी आगे बढ़ने, पीछे हटाने, छिपने और टूट पड़ने की अपनी विचित्रताओं का रहस्य यदि बता सकें तो उन सभी का समाधान हो जायगा जो गुरुदेव के एकनिष्ठ जीवन में कई तरह के मोड़−मरोड़ देखते हैं। यह ज्वार भाटे सतही हैं। समुद्र का अन्तराल तो शान्त और सुस्थिर ही पाया जाता है। विसंगतियाँ कहा जाय था विशेषताएँ, यह एक सुयोग संयोग ही है कि पूज्य गुरुदेव की छोटी-सी जिन्दगी अनेक मोर्चों पर एक साथ लड़ने रहने की रही है। उन्हें अपने नाट्य अभिनय में एक होते हुए भी अनेक पात्रों की भूमिका निभानी पड़ी है। सिया स्वयंवर वनगमन, लंका विजय,रामराज्य स्थापना, दशाश्वमेध, सीता परित्याग और हिमालय की तप साधना में परस्पर कोई तालमेल नहीं दीखता। फिर भी उन विसंगतियों के बीच तत्वान्वेषी एक सुसम्बद्ध श्रृंखला की कड़ियाँ परस्पर जुड़ी हुई देख सकते हैं।
यह चर्चा इन पंक्तियों में इसलिए की जा रही है कि कुछ महीनों पूर्व शक्ति पीठों का उद्घाटन, उद्बोधन करते हुए लाख−लाख जनसमूहों के बीच प्राण फँकते उल्लास उछालते और तूफानों का मत करने वाले दौरे करते दीखते थे, वे यकायक स्तब्ध कैसे हो गये। शान्तिकुँज की सत्र–शृंखलाओं में अपनी मुखर वाणी को मौन कैसे कर लिया? जन संकुल से निरन्तर घिरे रहने और दरबार लगाए बैठे रहने की अभ्यस्त रीति−नीति ने ऐसा पलटा कैसे खाया के नितान्त आवश्यक कार्य होने पर ही कुछ मिनटों तक मात्र नियत समय ही मिलना सम्भव हो सके। व्यापकता सिकुड़ कैसे गई। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है। इसके तात्कालिक कारण ढूंढ़ने से असमंजस दूर न हो सकेगा। पूर्ण संगति समझनी होगी और देखना होगा कि जिन्हें कितनी ही चित्र−विचित्र भूमिकाएँ निभानी पड़ी हैं उन्हीं में से गुरुदेव भी हैं। रासमंडल, गोचारण, कालियमर्दन, गोवर्धन, धारण, कंसचाणूरवध, गीताबोध, रथ चालन, जरासंध, की सोलह हजार रानियों का संरक्षण, द्वारिका गमन, अन्ततः अपना समस्त उपार्जन सन्त सुदामा के चरणों पर अर्पण इस क्रिया−कलाप में आदि से अन्त तक विसंगतियाँ ही भरी पड़ी हैं। नियति ने जिन्हें विचित्र भूमिकाएँ निभाने के लिए भेजा है केवल वे ही बता सकते हैं कि ऐसी उलट−पुलट से उत्पन्न होने वाली असुविधाओं का उन्हें ध्यान क्यों रहता।
गुरुदेव के सामने समय ने अधिक ऊँची जिम्मेदारियाँ इन्हीं दिनों नये सिरे से सौंपी हैं और उस आपत्ति धर्म को पालने के लिए तवे पर रोटी जलती छोड़कर बच्चे को बिच्छू पकड़ने से रोकने के लिए दौड़ पढ़ने वाली माता की तरह नई रीति−नीति अपनानी पड़ी है। अदृश्य वातावरण असाधारण रूप से विक्षुब्ध होता जा रहा है। नवग्रहों के एकत्रीकरण से अन्तर्ग्रही विचित्रताओं की, पाँचवाँ हिमयुग आरम्भ हो जाने की प्रदूषणों से विषाक्त वायु मंडल में प्राणियों का दम घुट जाने की, आणविक महायुद्ध की, वह प्रजनन से उत्पन्न दुर्भिक्ष संकट की, समर्थों द्वारा अपनाई जा रही दुर्गति की, आये दिन खड़े होते रहने वाले विग्रहों की चर्चाएँ निरन्तर सुनने को मिलती रहती हैं। इस व्यापक विपन्नता का मूल अंतर्जगत में खोया जा सकता है। यह विभीषिकाएँ मेघमाला की तरह परस्पर सम्बद्ध हैं। जो इनके द्वारा उत्पन्न हो सकने वाले महाविनाश की बात सोचते हैं उन्हें डराने वाली अफवाहें फैलाने वाले उच्छृंखलों में नहीं गिना जाना चाहिए। उनकी चिन्ता के पीछे ठोस तथ्यों को भी विद्यमान देखा पाया जा सकता है।
अदृश्य के विग्रहों से अदृश्य हथियारों से ही लड़ा जा सकता है। इस क्षेत्र में आध्यात्मिक उपचार ही काम आते हैं और अदृश्य की विपन्नताओं को किन उपायों से परिमार्जित किया जा सकता है उसका उपाय उपचार अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत ही खोजा जा सकेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि उसके लिए भौतिक प्रयत्नों की आवश्यकता नहीं। वे तो होने की चाहिए, होने भी चाहिए। किन्तु अदृश्य की लड़ाई भौतिक आयुधों से नहीं लड़ी जा सकती। उसके लिए ध्रुव, प्रहलाद, दधिचि, भगीरथ जैसी कार्यपद्धति अपनानी होगी। समय ने उसको प्रमुखता देने की माँग की है। फलतः इस क्षेत्र के मूर्धन्यों को अपने को अभीष्ट ऊर्जा उत्पादन में महाकाल ने नियुक्त कर दिया है। यह प्रयोजन उग्र तपश्चर्याएँ हो पूर्ण करती है। उसकी पात्रता जिनमें है वे आप्त पुरुष हर युग में उँगलियों पर गिनने जितने ही होते हैं। उस प्रयोजन का जो ठीक तरह निर्वाह कर सकते हैं उनमें पूज्य गुरुदेव का महान व्यक्तित्व भी एक सशक्त तेज पुँज है। उस प्रकार प्रक्रिया से विरत होकर अदृश्य को मोर्चे बन्दी में जुटना पड़ा है तो उसे पलायन नहीं मानना चाहिए और खिन्नता, निराशा, प्रताड़ना उपेक्षा जैसी क्षुद्रताएँ उस संदर्भ में नहीं सूँघनी चाहिए। अदृश्य जगत में कहाँ क्या हुआ? किसने किया? इसके प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करना तो कठिन है, पर जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है उन्हें ऋषि रक्त संचय से उत्पन्न सीता का, देव शक्ति के समन्वय से विनिर्मित दुर्गा का, इन्द्र वज्र का, गंगावतरण का इतिहास विश्वास उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। ऐसे−ऐसे प्रमाणों की सुविस्तृत शृंखला भूतकाल में भी रही है और मध्यकाल में भी। पिछले दिनों भी योगी अरविन्द, महर्षि रमण की तपश्चर्या से उत्पन्न वातावरण की उच्चस्तरीय ऊर्जा भारतीय स्वतन्त्रता का किस प्रकार अदृश्य कारण बनी इन तथ्यों को नये सिरे से समझा जा सकता है। उसी दिशा में पूज्य गुरुदेव की भावी रीति−नीति का निर्धारण हुआ है। वे क्या करेंगे? इसका विवरण उनके और उनके मार्गदर्शक के दीप के निर्धारण है।
प्रत्यक्ष का प्रयास यदि अप्रत्यक्ष स्तर के बनते हैं तो स्वभावतः उससे जनसंपर्क कटता है और प्रचार प्रक्रिया में कटौती होती है, किन्तु इसके बिना एकान्त साधना से विशिष्ट ऊर्जा उत्पादन भी तो सम्भव नहीं हो सकता।
इस स्तर की कटौती व्यक्ति विशेष की वार्त्तालाप सुविधा पर अंकुश तो लगाती है। पर उससे उनका भी वास्तविक हित साधन होता है। घन्टों का बकवास करने से भी वह प्रयोजन नहीं सधता जो सामर्थ्य युक्त वरदान एक शब्द में देने से भी हो सकता है। पुराणों में देवताओं के महान वरदान मात्र ‘तथास्तु’ के तीन अक्षरों में सम्पन्न होते रहने का उल्लेख है। सत्संग नारदजी का थोड़े ही समय होता था। वे ढाई घड़ी से अधिक कहीं ठहराते ही नहीं थे। इतनी ही अवधि में उन्होंने ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती, सावित्री, वाल्मीकि आदि कितनों को ही न जाने क्या−क्या सिखा दिया और वह लिखावन हजार दिन की बकवास से भी अधिक सामर्थ्यवान सिद्ध हुई। आत्मवेत्ता जानते हैं कि वैखरी–मुखरवाणी जिह्वा से निकलकर कानों तक पहुँचती और जानकारी देने का प्रयोजन पूरा करके आकाश में विलीन हो जाती है। उससे जानकारी के आदान−प्रदान भर का प्रयोजन पूरा होता है। किसी को प्रभावित, परिवर्तित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए प्राणशक्ति युक्त ‘मध्यमा’, ‘परा’ और ‘पश्यन्ति’ वाणियाँ काम करती हैं। उनका प्रयोग बिना शब्द उच्चारण के भी सूक्ष्म तरंगों के माध्यम से होता रहता है।
शक्तिशाली प्राण प्रवाह उपरोक्त तीव्र अदृश्य वाणियों से होता है। इसलिए पूज्य गुरुदेव का भावी कार्यक्रम यदि प्रचार प्रवास से विरत होता है या घन्टों की बकवास में नष्ट होने पर प्रतिबन्ध लगाता है तो इससे विचारशीलों को कोई असमंजस नहीं होना चाहिए। एक−एक गिनकर किसी को एक हजार रुपये की राशि देने में एक घन्टे का समय न लगाकर यदि वही कार्य एक अशर्फी हाथ में थमाकर एक मिनट में किया जा सकता है तो इस कटौती में किसी को क्यों खेद मानना चाहिए। प्रचार के लिए दौरे करना और भाषण देना आवश्यक नहीं वह कार्य अरविन्द की नीति अपनाकर मौन वाणी से वातावरण गरमाने के रूप में और भी अच्छी तरह और भी व्यापक क्षेत्र में और भी प्रभावी ढंग से हो सकता है। जो कार्य पहले सत्संग परामर्श से होता का वह अब कुछ समय शांतिकुंज के प्राणवान वातावरण में निवास करने भर से भी प्राप्त हो सकता है। इस निमित्त विविध साधना संगम का नया क्रम बना भी दिया गया है। एक महीने की कल्प साधना एक महीने का युगशिल्पी प्रशिक्षण, पाँच दिन के तीर्थसेवन सत्रों का उपक्रम और भी अधिक सुव्यवस्थित रूप से चलने जा रहा है। उसके सत्रों के साथ जुड़े हुए उद्देश्यों के अतिरिक्त बड़ा और विशेष लाभ यह है कि शांतिकुंज के वातावरण में अगले दिनों पूज्य गुरु देव की प्राणऊर्जा से जो प्रखरता आने वाली है, उसकी समीपता का अतिरिक्त लाभ उठाया जा सकेगा। जलती हुई भट्टी के निकट बैठते ही, बर्फ जमने की फैक्टरी में प्रवेश करते ही गर्मी एवं सर्दी की अनुभूति तत्काल की होती है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह–गाय एक घाट पर पानी पीते थे। इन तथ्यों के पीछे वहाँ के वातावरण की विशिष्टता का ही प्रमाण मिलता है। भविष्य में पूज्य गुरुदेव के निकट सान्निध्य का लाभ लेने के लिए उनका प्रवचन परामर्श आवश्यक नहीं रहेगा। अपितु शान्ति कुँज में कुछ समय ठहरकर अपने स्वल्प प्राण को महाप्राण के साथ जोड़ देने भर से काम चल जाया करेगा। सूर्य के समीप कौन पहुँचता है, बादलों के साथ कौन उड़ता है। फिर भी तादात्म्य जोड़ लेने वालों को उसमें से घर बैठे भी उनका लाभ पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। ऐसे ही कुछ पूज्य गुरुदेव का सान्निध्य चाहने वालों को भी सोचना पड़ेगा।
प्रवास पर न जाना, भेंट−दर्शन का सिलसिला बन्द करना, आवश्यक होने पर ही सीमित स्वल्प समय में उपयुक्त वार्त्तालाप करना, पूज्य गुरुदेव के बुलाने या वन्दनीय माताजी के कहने पर ही पूज्य गुरुदेव तक जाना–इन नये प्रतिबन्धों, नये निर्धारणों से किसी का भी हर्ज नहीं हुआ है। वरन् हरेक के लिए हर दृष्टि से नये स्तर का लाभ प्राप्त कर सकने का नया द्वार खुला है। इसमें निराशा उन्हीं को हो सकती है जो समय का मूल्य नहीं समझते और वार्त्तालाप करने सुनने के आदी हैं। वह समय जो इस विडम्बना में लगता था, यदि उसे व्यक्ति और समाज के लिए उच्चस्तरीय परिणाम के निमित्त नियोजित किया जाता है तो कोई दुराग्रही ही दर्शन, भेंट, वार्त्तालाप करने में अपनी श्रद्धा सिद्ध करने की बात सोचेगा।
पू. गुरुदेव के आत्मीयजनों में सामान्य स्तर के प्रज्ञा परिजनों की और असामान्य स्तर के प्रज्ञा पुत्रों की बहुत बड़ी संख्या है। इस देव समुदाय पर उन्होंने अपना वह कार्यभार लाद दिया है जिसका अधिकाँश भारवहन अब तक वे स्वयं ही करते थे। पूज्य गुरुदेव की तपश्चर्या और प्रज्ञा परिवार की प्रखरता से ही वे संयुक्त प्रयास बन पड़ेंगे जिनसे प्रत्यक्ष और परोक्ष स्तर की दोनों ही सामयिक आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं। इस नये निर्णय से खिन्न होने की अपेक्षा प्राणवानों के लिए यही उचित है कि वे उनके उत्तराधिकार को सम्भालें। अब तक जो ‘वे’ करते रहे हैं वे स्वयं करें और ऊँची शक्ति को ऊँचे प्रयोजन के लिए पूरी तरह लग जाने की सुविधा प्रदान करें। आत्मीयता का, श्रद्धा का, घनिष्ठता का सच्चा प्रमाण परिचय इसी प्रकार दिया जा सकता है।
आलस्यं स्त्रीसेवा, सरोगता जन्मभमि वात्सल्यम्। सन्तोषो भीरुत्व षड् व्याघात महत्वस्य॥
‘आलस्य में समय बिताना, स्त्री में आसक्ति, अस्वस्थता, जन्मभूमि का अनावश्यक मोह, थोड़े बहुत में ही सन्तोष और भीरुता–ये छह−दोष मनुष्य की उन्नति में बाधक होते हैं।
प्रज्ञा परिजनों में सबसे बड़ा वर्ग प्रज्ञा परिजनों का है। इस वर्ग में समर्थक और सहयोगी आते हैं। वे परिस्थितिवश घर से बाहर किये जाने वाले कार्यों के लिए तो अधिक बड़े योगदान नहीं दे सकते किन्तु घर रहकर भी आत्म−निर्माण, परिवार निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य सीमित क्षेत्र में सीमित प्रयासों के साथ करते रह सकते हैं। स्त्री−बच्चे, वयोवृद्ध, गृहस्थी की भारी जिम्मेदारियाँ उठाने वाले व्यस्त व्यक्ति इसी श्रेणी में आते है।
प्रज्ञा परिजनों की व्यस्तता को देखते हुए उनके प्रशिक्षण सत्र कम समय के लिये हलके−फुलके रखे गए हैं। वे मात्र पाँच−पाँच दिन के होंगे। विशिष्टों और वरिष्ठों के एक−एक माह वाले सत्रों में स्त्री−बच्चों को साथ लाने की कतई छूट नहीं है, किन्तु प्रज्ञा परिजनों के हलके−फुलके सत्रों में वैसी मनोयोग पूर्ण साधना न रहने से स्त्री−बच्चों समेत आने की भी छूट रहेगी। परिभ्रमण मनोरंजन करते रहने की भी उन्हें सुविधा रहेगी। दो दिन दोपहर से शाम तक की छुट्टी देकर उन्हें हरिद्वार, कनखल, ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला आदि देखने की सुविधा मिलने से बाल−सुलभ मनोरंजन में कोई कटौती नहीं करनी होगी।
ये परिजन सत्र पाँच−पाँच दिन के होंगे। बीच का एक दिन आने जाने वालों के लिये खाली रखा गया है। हर माह 5 सत्र होंगे। एक से पाँच, सात से ग्यारह, तेरह से सत्रह, उन्नीस से तेईस, पच्चीस से उनतीस तारीखों में। बीच की छह, बारह, अठारह, चौबीस तारीखें आने−जाने वालों के लिये खाली रखी गयी हैं। शिक्षा पूरे पाँच दिन चलेगी, छठे दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति करके आशीर्वाद लेने के उपरान्त भोजन करके सभी प्रातः दस तक चले जाया करेंगे।
छोटे से परिजन सत्र में पाँच बहुद्देशीय कार्यक्रम सम्मिलित हैं। [1]108 माला का गायत्री अनुष्ठान जिसमें हर दिन 20 मालाएँ और नित्य हवन करना होता है। दोनों कार्यों को मिलाकर कुल तीन घण्टे प्रातःकाल के लग जाते हैं। साथ ही अब तक के पाप कर्मों का प्रायश्चित उपक्रम,[2] भोजन से पूर्व डेढ़ घण्टे का मंगल प्रवचन जिसमें आत्म−निर्माण, परिवार−निर्माण, समाज−निर्माण का सर्वसुलभ एवं नितान्त व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जायगा। [3] बच्चों के–बड़ों के संस्कार कराने की शास्त्रोक्त विधि व्यवस्था। बालकों के पुंसवन, नामकरण, अन्न, प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ यज्ञोपवीत संस्कार। बड़ों के दीक्षा, जन्म दिवस, विवाह दिवस, वानप्रस्थ संस्कार। स्वर्गीय आत्माओं के लिये श्राद्ध तर्पण। [4] पर्यटन के लिये हरिद्वार, कनखल, ऋषिकेश लक्ष्मण झूला के सभी प्रमुख दर्शनीय स्थानों का परिभ्रमण। यह वो दिन में मध्याह्नोत्तर से सायंकाल तक की अवधि में भली प्रकार पूरा हो जायेगा। [5] निजी समस्याओं के सम्बन्ध में उपयुक्त मार्ग दर्शन– उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा बनाने के लिये आवश्यक निर्धारण।
उपरोक्त पाँच प्रसंगों के लिए अलग−अलग एक−एक दिन नहीं रखा गया है किन्तु पाँचों दिन पाँचों का परस्पर गुँथा हुआ कार्य−क्रम बनाया गया है ताकि हर प्रसंग को ठीक तरह समझने का अवसर मिलता रहे और जो सन्देह रह गये हों, उनका निराकरण पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होगा कि समय सीमित और कार्यक्रम हल्का−फुल्का होने पर भी उनके साथ महान सम्भावनाओं के बीजाँकुर जुड़े हुए हैं। तीर्थ सेवन में साधना अनुष्ठान आवश्यक है। साथ ही पाप कर्मों का प्रायश्चित्त भी। स्वाध्याय, सत्संग से गुत्थियों को सुलझाने और चिंतन−मनन के सहारे भविष्य निर्धारण का निश्चय जिसमें जुड़ा हुआ हो उसी को तीर्थसेवन कहा गया है। शास्त्रों में उसी के पुण्यफल की चर्चा है। प्रतिमा−दर्शन, जल, स्नान, और लुटेरों जैसी भगदड़ से तो तीर्थ पुण्य तो दूर, पर्यटन का मनोरंजन भी पूरा नहीं होता। प्रस्तुत परिजन−सत्र की अवधि तो कम है पर उनमें उन तथ्यों का समुचित समावेश किया गया है जिन्हें यदि ठीक तरह समझा जा सके तो अन्तराल में ऐसा बीजारोपण हो सकता है जिसे कल्पवृक्ष की उपमा दी जा सके। प्राचीन काल के तीर्थों में गुरुकुल, तीर्थ−परायण और आरण्यक–यह तीन उपक्रम चलते थे। शान्तिकुँज को उपरोक्त स्थापनाओं को पुनर्जीवित करके सच्चे अर्थों में तीर्थ बनाया गया है। कनिष्ठों को बालक, वरिष्ठों को प्रौढ़ और विशिष्टों को अधेड़ माना जाय तो उनके लिए गुरुकुल, पारायण और आरण्यक की व्यवस्था यहाँ मौजूद है। वातावरण में हर दृष्टि से वे विशेषताएँ देखी जा सकती हैं जिनके आधार पर प्राचीन काल में किसी आश्रम को तीर्थ कहा जाता था।
इमारतें नहीं, प्रेरणाएँ और निर्धारणाएँ ही पुण्यफल प्रदान करती हैं। शान्ति−कुँज में भारत के सभी प्रमुख तीर्थों के चित्र मन्दिर बनाये गए हैं। दृश्य रूप में तो यह छोटे और सस्ते दृष्टिगोचर होते हैं किन्तु आगन्तुकों को इन तीर्थों की प्रेरणाओं से अवगत कराने की व्यवस्था रहने से देशव्यापी सुविस्तृत तीर्थयात्रा का पुण्यफल इस एक ही जगह पहुँचने से मिल जाता है। गंगा की गोद और हिमालय की छाया में आत्मोत्कर्ष का सुयोग अधिक अच्छी तरह बनता है। चित्र तीर्थों की तरह हिमालय और गंगा का अद्भुत देवालय भी यहाँ प्रतिष्ठित है अखण्ड दीपक, अखण्ड अग्नि, नित्य का यज्ञ, वर्ष में 24 करोड़ जप का संकल्प, गायत्री में रहने से पुरातन काल की तीर्थ परम्परा की छोटी किन्तु प्रभावी झाँकी उपलब्ध होती है। मार्गदर्शन, समाधान या अनुदान के लिए भी अभी तो ऐसी आत्माएँ भी यहाँ मौजूद हैं जिन्हें जीवन्त तीर्थ कहा जा सके। उत्तराखण्ड की यात्रा पर जाने वाले अगणित व्यक्ति सर्वप्रथम इन जीवित तीर्थों का आशीर्वाद प्राप्त करके अपनी यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न होने, सफल रहने का विश्वास लेकर आगे प्रयाण करते हैं।
संस्कारों का अपना महत्व है। इसे व्यक्तित्व निर्माण को अध्यात्म उपचार पद्धति कह सकते हैं। प्राचीन काल में सोलह बार संस्कारित करके पशु को मनुष्य, मनुष्य को देव बनाने की पद्धति अपनाई जाती रही है। इसमें शिक्षा, प्रेरणा तो है ही, साथ ही अध्यात्म विज्ञान पर निर्भर ऐसे तथ्य भी हैं जिनसे इन उपचारों द्वारा मानवी अन्तराल में उत्कृष्टता का बीजारोपण और अभिवर्धन का लाभ भली प्रकार समझा जा सकता है। ऐसी सुविधा प्राचीन काल में भी तीर्थों में ही रहती थी। वहाँ स्थान बच्चों के संस्कार तीर्थ में ही कराते थे। प्रज्ञा परिजनों का मूर्धन्य तीर्थ–युग तीर्थ–गायत्री तीर्थ ही है। यहाँ जन्म दिवस व आदर्श विवाह मनाने देश−विदेश से अनेकों परिजन आते रहते हैं। अब यही क्रम हर संस्कार के विषय में चल पड़ने से ऋषि प्रणीत धर्म परम्परा में एक कड़ी और जुड़ गयी है।
तीर्थयात्रा, सोद्देश्य शिक्षण, संस्कार मानना, सिद्ध पीठ में साधना तथा ऊर्जा स्रोत से सघन सम्बन्ध ये ऐसे पंचविधि लाभ इस तीर्थ सत्र शृंखला के हैं जिसके समाज निर्माण सम्बन्धी दूरगामी परिणाम परिजन अगले दिनों देखेंगे। हिमालय के साथ जुड़ी नदियाँ बहती ही रहती हैं। गायत्री तीर्थ हिमालय है, जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेने वाले परिवारों को उत्कृष्टता के अनुदान एक सुनिश्चित परम्परा के आधार पर मिलते रहेंगे। यह संपर्क सूत्र पाँच दिन के संपर्क से भी जुड़ जाता है। लम्बी अवधि के ये लगाए भी नहीं जा सकते थे क्योंकि लाखों परिजनों में से सभी को थोड़े−थोड़े दिन का अवसर मिल सके, इस सदृष्टि से भी उन्हें छोटा मात्र पाँच दिन जितना ही रखा जा सकता था।
रास्ता चलते परामर्श तो कोई भी किसी को दे सकता है किन्तु किसकी मनःस्थिति और परिस्थिति में प्रगति पथ पर पर बढ़ सकने वाला व्यवहार पथ कौन-सा है और उस पर चल सकने का साधन उपलब्ध करने की चाबी कहाँ है? इस प्रसंग का अवसर किन्हीं सौभाग्यशालियों को ही मिल सकता है। प्रज्ञा परिजन सत्र के आगन्तुकों को ये सभी सुविधाएँ अति सरलतापूर्वक प्राप्त हो सकती है, इसी कारण इसमें सम्मिलित होने के लाभों को असंख्य गुना कहा जा सकता है।
प्रज्ञा परिवार में तीन स्तर की जागृत आत्माओं को एकत्रीकरण हुआ है। वातावरण में प्रभाव प्रेरणा भर सकने की दृष्टि से–उपयुक्त “प्रज्ञापुँज”, नव सृजन के अग्रदूत युग शिल्पी, जो परिवर्तन के महान निर्णय को अपने में उतारने और दूसरों में प्रवेश कराने के लिए प्रचण्ड पराक्रम करेंगे, उन्हें “प्रज्ञापुत्र” कहा गया है। तीसरे “प्रज्ञा परिजन” जो जन संपर्क और लोक सेवा के क्षेत्रों में भी अपनी विशेषताओं के कारण कुछ अधिक न कर सकेंगे किन्तु आत्म−निर्माण और परिवार निर्माण की दृष्टि से कुछ उठा भी न रखेंगे। इन दोनों में से प्रज्ञा पुँजों को विशिष्ट, प्रज्ञा पुत्रों को वरिष्ठ, और प्रज्ञा परिजनों को कनिष्ठ कहकर सम्बोधित किया जाता है। इन्हें मूर्धन्य, प्रखर और पराक्रमी भी कहा जा सकता है।
पिछले दिनों शान्ति−कुँज में चान्द्रायण साधना, ब्रह्मवर्चस् साधना के नाम से आत्म−शोधन–आत्मपरिष्कार की–साधनाएँ कराई जाती रही हैं। समय−समय पर पुरश्चरण एवं परिष्कृत रूप ‘कल्प साधना’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चान्द्रायण पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलते थे। तिथियों की घट बढ़ से सभी को असुविधा होती थी अब उसे तारीखों के हिसाब से पहली से तीस तक का किया गया है। अवधि महीने भर की ही पूर्ववत् रहेगी। चान्द्रायण में पन्द्रह दिन आहार घटाना और पन्द्रह दिन बढ़ाना पड़ता था। अब उसमें परिशोधन करके शाकाहार पर निर्धारित ‘आहार कल्प’ की व्यवस्था की गई है। साथ ही शारीरिक और मानसिक परिशोधन के लिए जड़ी−बूटी कल्प भी साथ−साथ चलते रहने की अभिनव व्यवस्था का समावेश किया गया है।
शांतिकुंज में इस वर्ष से तीनों के लिए तीन प्रकार की शिविर व्यवस्था की गई है विशिष्ट प्रज्ञापुत्रों के कल्प सत्र जो एक−एक मास के होंगे। पहली से तीस तारीख तक हर महीने चला करेंगे। दूसरे प्रज्ञापुँजों के युग−शिल्पी सत्र यह भी पहली से तीस तक एक−एक महीने लगातार चलेंगे। तीसरे प्रज्ञा परिजनों के पाँच−पाँच दिन के होंगे। प्रज्ञा परिजनों के–तीर्थ पर्यटन सत्र 1 मई से प्रज्ञापुत्रों के युग शिल्पी सत्र 1 जून से और प्रज्ञा पुँजों के कल्प साधना सत्र 1 जुलाई से आरम्भ होंगे और भविष्य में लगातार तीनों सत्र साथ−साथ चलते रहेंगे यही है अभिनव सत्र व्यवस्था जिसका निर्धारण इन्हीं दिनों किया गया है।
ऐसे महत्वपूर्ण प्रशिक्षणों के लिए लम्बी अवधि के शिक्षण होने चाहिए थे किन्तु परिजनों की सुविस्तृत संख्या–समय की तात्कालिक माँग और स्थान साधनों की कमी को ध्यान में रखते हुए यही सोचा गया कि थोड़ों को बहुत लाभ देने के स्थान पर बहुतों को थोड़ा−थोड़ा देने की नीति उत्तम है। फिर जिन्हें अधिक पाना है वे कई किश्तों में भी बार−बार आकर प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास को परिपक्व करने की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।
1] उपासना के निमित्त−साधक की स्थिति के अनुसार जप ध्यान, पुरश्चरण, स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन−मनन।
[2] साधना के निमित्त–आसन, प्राणायाम, चक्रवेधन नादयोग, लययोग, बिन्दुयोग प्राणायाम आदि की यथोचित साधनाएँ।
[3] संचित पाप कर्मों का प्रायश्चित।
[4] कल्प उपवास–शाकाहार कल्प, तथा छाछ कल्प। एक महीने तक एक ही वस्तु पर रहना आहार कल्प कहा जाता है। लौकी, तोरी, गाजर, परवल जैसे शाक, खरबूजा, आम−पपीता जैसे सस्ते फल इसके लिए सर्व सुलभ हैं। बन पड़े तो दूध या छाछ कल्प भी हो सकता है।न्यूनतम अमृताशन है। अमृताशन अर्थात् खिचड़ी, दूध−चावल मूँग आदि उबले अन्न।
[5] सौम्प औषधि कल्प–इसमें तुलसी, आँवला, हरीतकी, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शतावरी जैसी हानि रहित औषधियों की नियमित मात्रा महीने भर सेवन करना।
यह कल्प साधना के प्रयुक्त अंग हैं। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदिक पंच कर्म स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, नस्य। पंचतत्व चिकित्सा के मिट्टी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश आदि के विशेष प्रयोग। जब जिसके लिए जिस प्रकार उपयुक्त समझे जायेंगे, कराये जाते रहेंगे।
‘कल्प’ शब्द आयुर्वेद में पुनर्यौवन प्राप्ति के लिए किये गये उपचार रूप में प्रयुक्त होता है। च्यवन, ययाति आदि द्वारा इसी विधि से जराजीर्ण स्थिति से छुटकारा पाकर नवयौवन प्राप्त किये जाने का उल्लेख मिलता है। महामना मालवीय जी ने भी किन्हीं तपसी बाबा के संरक्षण में ऐसा ही उपचार कराया था और आँशिक लाभ पाया था। पाश्चात्य देशों ने बन्दर की पौरुष ग्रन्थियाँ मनुष्य के शरीर में फिट करके पशु भ्रूणों का सत्व पिलाकर इस उद्देश्य के लिए प्रयोग किये हैं और उनके सामयिक लाभ भी पाए हैं। स्थायी परिवर्तन किसी को भी नहीं हो सका। क्योंकि यदि प्रकृति का नियत क्रम जन्म, बन्धन और परिवर्तन का क्रम यथावत् रहना है तो मरण से पूर्व की स्थिति वृद्धावस्था का तो सामना करना ही पड़ेगा। सृष्टि व्यवस्था को बदल सकना मनुष्य की शक्ति के बाहर है। इसलिए टूटे की मरम्मत करके काम चलाऊ बना लेने की बात तक ही शरीर कल्प की बात सोचनी चाहिए। जितनी किसी चिकित्सा पद्धति से शरीर शोधन और नवीनीकरण की गुँजाइश है उतनी उपरोक्त कल्पसाधना में भी विद्यमान है। सच तो यह है कि यह प्रकृति के अधिक निकट और अध्यात्म उपचारों से मुक्त होने के कारण अधिक निर्दोष एवं अधिक चिरस्थाई है।
प्रस्तुत कल्प साधना का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अन्तराल का काया कल्प करना है। दृष्टिकोण का व्यक्तित्व से सीधा सम्बन्ध है। देवतुल्य, महामानवों और हेय पतित, नर पामरों की मनःस्थिति–परिस्थिति में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। व्यक्तित्व में पिछड़ापन और अभिनन्दनीय गौरव की आश्चर्यजनक भिन्नता देखी जाती है। उसका कारण लगता तो परिस्थितियों का विपर्यय है, पर वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं। हर परिस्थिति में आन्तरिक गरिमा प्रगति का मार्ग बनाती हुई, चट्टान तोड़ कर बहने वाली गंगा की तरह अपना मार्ग बनाती है। इसके विपरीत समस्त सुविधाएँ रहते हुए अमीर उमरावों सन्तान की तरह अपना और साथियों का सर्वनाश करने में संलग्न रहा जा सकता है। शरीर तो प्राण रहने न रहने से जीते मरते रहते हैं। किन्तु व्यक्तित्व का उत्थान पतन विशुद्ध रूप से मानवी दृष्टिकोण पर निर्भर रहता है। दृष्टिकोण ही आकाँक्षा उभारता है। वही बुद्धि विचारणा में दिशा देता है और के दबाव में विवश होकर काया को कठपुतली का नाच नाचना पड़ता है। अन्तराल को ही अन्तरात्मा कहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र का यही प्राण है। इसी क्षेत्र का परिशोधन परिष्कार करने के लिए अध्यात्म विज्ञान का समूचा ढाँचा खड़ा है। तत्व दर्शन–योग के आधार पर चिन्तन और तपश्चर्या व्रतशीलता के सहारे चरित्र में, स्वभाव, अभ्यास में अन्तर लाने का प्रयत्न किया जाता है। जो इस घुड़दौड़ में जितना आगे निकल जाता है वह उतना ही वरिष्ठ कहा जाता है। जो इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया वही पतित पराजित की दयनीय स्थिति में पड़ा खीजाता किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे करता है।
कल्प साधना का मूल प्रयत्न यह है कि इस एक महीने की अवधि में अपने आप पर नियन्त्रण करने का अभ्यास कराया जाय। अनगढ़ ढर्रे के विरुद्ध विद्रोह किया जाय, संचित कुसंस्कारिता पर पूरे जोश खरोश के साथ आक्रमण किया जाय और उस खरदूषण सूर्पणखा के साम्राज्य का उखाड़ फेंकने की विजयश्री का वरण किया जाय। इतना ही नहीं उन्मूलन की रिक्तता को भी तुरन्त ही भरा जाय और उस स्थान पर उत्कृष्टता की पक्षधर सत्प्रवृत्तियों को अपनाया जाय। अपनाने का अर्थ है न केवल विश्वास में वरन् स्वभाव अभ्यास में भी उस रीति−नीति को पूरी तरह भर लिया जाय।
आयुर्वेदोक्त काया−कल्प के दो तरीके हैं एक “एक प्रवेश”, दूसरा सीमित संपर्क से दोनों का उद्देश्य एक है। अभ्यस्त ढर्रे से एकदम कटकर अपनी दुनिया नई आसानी अभ्यस्त ढर्रे को एकाकी मनोबल के सहारे बदल डालना। बाहर के अवाँछनीय प्रभाव से पूरी तरह विलग हो जाना। न कोई मिलेगा, न कोई दीखेगा तो बाहरी प्रभाव व्यतिरेक भी क्यों उत्पन्न होगा। कन्दराओं में रहकर तपश्चर्या का मौन एकान्त का उद्देश्य भी यही है। दूसरे सीमित संपर्क में इस एकात्मता एवं एकाग्रता से थोड़ी छूट है। इसमें शरीर को खुली हवा के सौम्य वातावरण से संपर्क में रहने की स्वतन्त्रता है। साथ ही उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों, देवात्म क्षेत्र में धकेलने वाले माध्यमों के साथ संपर्क रखने की भी सुविधा है।
प्रज्ञापुँजों के लिए निर्धारित एक महीने की व्रत साधना में यथा सम्भव एकान्त सेवन का उतना अवसर दिया गया है जिसे हजम किया जा सके। एक साधक के लिए एक कुटिया। अपने हाथों अपना भोजन पकाना कुटी में ही यंत्र साधनों से अपने आसन पर बैठे हुए ही मार्गदर्शकों का भावभरा परामर्श सुनना। तृतीय नेत्र जगाने की आज्ञाचक्र उन्मीलन से सम्बन्धित त्राटक के लिए अपने कमरे में ही उपयुक्त प्रकाश की सुविधा रहना। देखने की इष्टदेव का ही एकमात्र चित्र कमरे में रहना। निर्धारित स्वाध्याय के अतिरिक्त और कुछ न पढ़ना। निर्धारित समय के अतिरिक्त और किसी से न मिलना। जैसे इस अवधि के निर्धारण ऐसे हैं जिसमें बाल कोठरी जैसी असुविधा न होते हुए भी आत्मावलंबी, आत्मकेन्द्रित रहने की बहुत कुछ सुविधा है। अनावश्यक पत्र व्यवहार एवं मिलने−जुलने पर भी अंकुश है। यह इसलिए कि आत्म निर्भरता में व्यतिरेक उत्पन्न न हो और मननचिन्तन की निर्धारित दिशाधारा में विक्षेप न पड़े।
उच्चस्तरीय साधनाओं के लिए मात्र पूजा की विधि−व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं होती, वरन् उसके फलने−फूलने का अवसर देने वाला तद्नुसार वातावरण भी तलाशना पड़ता है। घर परिवार में एक अभ्यास ढर्रे का चक्र−व्यूह घिरा रहता है और उस जकड़न में ऊँचा उछलने आगे बढ़ने की सम्भावना बहुत कम रह जाती है। इसलिए सदा से उच्चस्तरीय साधन के लिए घर छोड़कर तीर्थ वातावरण के उच्चस्तरीय संपर्क में रहकर महत्वपूर्ण अभ्यास सम्पन्न करने की परम्परा है। राम को अयोध्या छोड़कर देव प्रयाग, लक्ष्मण को लक्ष्मण झूला, भरत को ऋषिकेश, शत्रुघ्न को मुनि की रेती में महाप्राण वशिष्ठ के सान्निध्य में अपनी साधना करनी पड़ी थी। अयोध्या में समस्त सुविधाएँ होते हुए भी अभ्यस्त ढर्रे का संपर्क और वातावरण का घेरा इतना प्रबल था कि वहाँ रहकर योग, तप, क्रियात्मक प्रयोगों में कदाचित ही कुछ सफलता मिलती। वस्तुस्थिति उनने समझी तो उपयुक्त वातावरण में आत्म निर्भर साधना की पृष्ठभूमि बनाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर सके। यही मार्ग अन्यान्यों के लिए भी है। वानप्रस्थ में घर छोड़कर वन में अर्थात् भिन्न स्तर के उपयुक्त वातावरण में रहने का पहला कदम उठाना पड़ता है। अन्यथा बाह्य कर्मकाण्ड भर चलते रहते हैं। दृष्टिकोण स्वभाव अभ्यास में काया−कल्प जैसा परिवर्तन सम्भव नहीं हो पाता।
प्रज्ञापुँजों के लिए निर्धारित एक मास की कल्प साधना में अन्तराल के परिशोधन, परिष्कार की कथा सम्भव अधिकाधिक सुविधा उत्पन्न की गई है। बड़ी बात यह है कि उसमें न केवल आत्मबल के सम्वर्धन का, वरन् मनोबल और शरीर शोधन के त्रिविधि प्रयोजनों का भी समुचित समावेश किया गया है। आहार कल्प और जड़ी−बूटी कल्प से शरीर शोधन का प्रयोजन बहुत कुछ सध जाता है। आसन−प्राणायाम, पुरश्चरण, तप, व्रत, तितिक्षा−प्रायश्चित्त की साधनाएँ मनन क्षेत्र की अवाँछनीयता को हटाने की भूमिका निभाते हैं। लययोग, प्राणयोग से परब्रह्म के साथ एकात्म सधता है। और द्वैत से अद्वैत की ओर अन्तराल की उन्मुखता, गतिशीलता में तीव्रता उत्पन्न होती है। इस त्रिविधि, त्रिवेणी, संगम में तीर्थराज के अवगाहन का वह पुण्यफल मिलता है जिसे रामायणकार ने कौए को कोयल, बगुले को हंस बनने की उपमा दी है। प्रकारान्तर से यह आन्तरिक कायाकल्प का ही अलंकारिक संकेत है।
प्रज्ञापुँज (विशिष्टों) को मनस्वी मल्लाह की भूमिका निभानी है। उन्हें न केवल प्रवाहमान प्रचण्ड धारा के लिए खिलवाड़ करने, आँख−मिचौली खेलने का मजा लूटना है, वरन् अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पार भी करना है। अग्रदूतों को न केवल स्वयं जीवन मुक्त होना होता है, वरन् दूसरों को भी भव−बन्धनों से बन्धी मुश्कें छुड़ानी हैं। ऐसी दशा में उनका ओजस्, तेजस्, वर्चस् असाधारण स्तर का होना चाहिए। इसी को अर्जन करने के लिए यह एक महीने की कल्प साधना का प्रावधान रखा गया है।
नई−सृष्टि को नव−सृजन हो रहा है। मनुज−शक्ति का जागरण हो रहा है॥1॥ मनुज वृत्तियाँ अब निखरने लगी हैं, सहज दिव्यताएँ उभरने लगी हैं। उदित हो रहीं दिव्य−सम्भावनाएँ, द्रवित हो रहीं श्रेष्ठ−सम्वेदनाएँ॥
मनुज में नई श्रेष्ठता आ रही अब। विमल−भव्यता का वरण हो रहा है॥2॥ अखरने लगा है सभी को अँधेरा, सहज भा गया है सभी को सवेरा। किरण की सभी बात सुनने लगे हैं सभी जागरण−गीत गुनने लगे हैं॥
सभी ज्योति के संग−साथी बने अब। मनुज−मन किलकती−किरण हो रहा है॥3॥ सहज स्नेह उर का छलकने लगा अब, हृदय प्यार देने ललकने लगा अब। करुण भाव बेचैन अभिव्यक्त होने, हृदय आज आतुर क्षमासिक्त होने॥
मुखर आज सौजन्य, सद्भावनाएँ। सरल, सात्विक आचरण हो रहा है॥4॥ हवा लोक मंगलमयी चल पड़ी है, विमल−ज्योति सर्वार्थ की जल पड़ी है। सभी का भला हो सभी चाहते हैं, विषमता, विलगता नहीं चाहते हैं॥
मनुज, हर मनुज को गले से लगाता। स्वजन−भाव का अनुसरण हो रहा है॥5॥ कभी आत्मबल, आस्था की नहीं अब, हुये जा रहे स्वावलम्बी, श्रमी सब। मिला बल नैतिक−मनोवृत्तियों को, सदाचार का पथ, मनुज−शक्तियों को॥
मनुज साज ऐसे सजाने लगा अब। यहीं स्वर्ग का अवतरण हो रहा है॥6॥ सरल−स्नेह, शुचिता गले मिल रहे हैं, हृदय−वाटिका में सुमन खिल रहे हैं। सदाचार−सौरभ महकने लगा है, सुहृद−शील का स्वर चहकने लगा है॥
नई−चेतना से भरा लोक−मानस। कि युग–देव का आगमन हो रहा है॥7॥
–मंगल विजय
*समाप्त*