मनीषा तप-तितीक्षा में तपे और खरी उतरे

दीपक का काम है-तमिस्रा के व्यापक माहौल में भी अपने क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न करना। ऐसा प्रकाश जिससे वस्तु और स्थिति की सही जानकारी मिल सके। उस जानकारी के आधार पर सही निर्धारण कर सकना और सही कदम उठा सकना सम्भव हो सके। मनीषा का काम वही है। वह भटकती है और न अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी को यथार्थता से अनजान होने के कारण भटकने देती है। दीपशिखा जहाँ अपने को प्रकाशवान रखती है, ज्योति का प्रतिनिधित्व करती है, वहाँ यह उत्तरदायित्व भी उठाती है कि भटकाव के पैर न टिकने दें। यथार्थता से किसी को अपरिचित न रहने दें। इतना बन पड़ें तो समझना चाहिए-आधी समस्याओं का हल हो गया। अपने कुकृत्यों और दूसरों के आक्रमणों से जितनी हानि होती है इससे कहीं अधिक दुर्घटनाएँ अनजान रहने तथा दिशाभ्रम के कारण उठानी पड़ती है। मनीषा का आलोक इस स्तर के संकटों को निरस्त करता है। फलतः उसे आधी समस्याओं का हल करने वाला कहा जाता है। पूर्वार्ध निपटा नहीं कि उत्तरार्ध कठिन नहीं रह जाता। कठिन तो चढ़ाई ही पड़ती है। वह चुक गई तो शेष आधी तो ढलान भर रह जाती है और उसे पार करना कठिन नहीं रह जाता।

युग सन्धि की बेला से सबसे बड़ी जिम्मेदारी मनीषा की है। उसे अँधेरी निशा में समुद्र के बीच प्रकाश स्तम्भ की तरह एकाकी जलना होता है। उसे समर्थन किसका? सहायता किसकी? चारों ओर उफनते लहरों के कोलाहल और टकराव से अस्तित्व को चुनौती ही मिलती रहती है। फिर भी प्रकाश स्तम्भ न केवल अपनी सत्ता बचाये रहता है, साथ ही उस क्षेत्र से गुजरने वाले जलयानों की इतनी सेवा भी करता रहता है कि उन्हें इस प्रदेश की चट्टानों से टकराकर उलट जाने की विपत्ति में न पड़ने दें। बेशक, हीरक हार बाँटते रहने की स्थिति न होने के कारण उन्हें दानवीर होने का श्रेय तो नहीं मिलता फिर भी जानकार जानते हैं कि प्रहरी की जागरूकता सुरक्षा का जो प्रावधान करती है उसका कितना मूल्य-महत्व होता है। आलोक बुझ जाने पर जलयानों के उलट जाने की दुर्घटना देखकर ही कोई यह जान सकता है कि प्रकाश-स्तम्भ की मूक सेवा कितनी उपयोगी, कितनी आवश्यक होती है।

प्रज्ञा परिजनों में से जिनके अन्तराल में दूरदर्शी विवेकशीलता का आलोक दीप्तिमान हो उनको समय की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और संव्याप्त अंधकार में अपना साहस दीपक की तरह प्रज्वलित करना चाहिए। प्रत्यक्षतः इससे मन्दिर, धर्मशाला बनाने जैसा दृश्यमान ऐसा आधार तो नहीं बनता जिससे पुण्यात्मा धर्मात्मा कहलाने की ललक बुझ सके और अपनी वरिष्ठता का बखान सुनने, सुनाने का अवसर मिल सके। तो भी इस सचाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि भटकाव को रोकना और दिशा निर्देशन के लिए जन-जन को इंगित करना भी कोई छोटा काम नहीं है। सच तो यह है कि दिशा निर्देशन के अभाव में भय, आतंक, अनिश्चय, असुरक्षा और आशंका का ऐसा माहौल बन जाता है जिसमें किसी के लिए भी, कुछ भी संकट खड़ा हो सके।

मनीषा है तो श्रेष्ठ और सराहनीय, तो भी उसे आगे बढ़ने के लिए, अपने पराक्रम का परिचय देने के लिए ऐसा आत्मबल चाहिए जिसमें संकल्प और साहस की प्रखरता-प्रचुरता भरी पड़ी हो। इसके बिना सद्ज्ञान भी अपने आप तक सीमित रह जाएगा, दूसरों की सेवा-सहायता के लिए आगे न बढ़ सकेगा। परमार्थ की प्रवृत्ति भी मनीषा की तरह किन्हीं सौभाग्यवानों को ही मिलती है और वह सौभाग्य भी अनायास नहीं मिलता। मनीषा आसमान से नहीं उतरती। दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे सम्मुख उपस्थित हर पदार्थ का पुनः निरीक्षण, पुनर्निर्धारण करने की निष्पक्षता अपनाये बिना, मनीषा का पुण्य प्रसाद किसी को नहीं मिलता। इससे अगला कदम और भी बड़ा है। उसमें उपलब्ध मनीषा को जन-जन तक पहुँचाने का नया निर्धारण करना पड़ता है। मोती चुगने और कीड़ों से परहेज करने का औचित्य अपनाता है। यह उसकी व्यक्ति गत विशेषता है। अगली बात तब बनती है जब उस उपलब्धि का लाभ जन-जन को मिले और समूचा समाज उससे लाभ उठाये। यह बादलों जैसा दुस्साहस है जिसमें अपनी पूँजी होने पर भी समुद्र से जल लादकर सूखे धरातल को हरा करने के लिए लम्बी यात्रा करते हुए दूर देशों में बरसना पड़ता है। मनीषा की सार्थकता भी उसी उपक्रम को अपनाने से बनती है।

मनीषा पवित्रता है और तपस्या प्रखरता। दोनों का सुयोग तेल-बाती के समन्वय की तरह कृत-कृत्य करता है। मुनि को ऋषि बनना पड़ता है। मुनि अर्थात् मनीषी। ऋषि अर्थात् वह मनीषी जो तप साधना से अपना आत्मबल बढ़ाए और उपलब्धियों को अभावग्रस्तों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें सुलभ करायें। आत्मबल के अभाव में साहस नहीं उभरता। साहस के बिना परमार्थ कैसा? परमार्थ में प्रयुक्त न होने पर ज्ञान, वैभव, वर्चस्व आदि की सार्थकता कहाँ? अस्तु, जिस अन्तः प्रेरणा से मनीषा उभरती है देखा यह गया है कि उसी का दूसरा अनुदान तपस्वी जीवनचर्या के रूप में भी मिलता है। मनीषा यदि सच्ची और गहरी हो तो उसका दबाव व्यक्ति को तपस्वी बनने तक धकेलता कचोटता ही रहेगा।

युग मनीषा अपनी प्रखरता का परिचय युग ऋषि के रूप में प्रस्तुत करें, यही उचित और यही श्रेयस्कर है। युगसन्धि के इस प्रभात पर्व पर युगान्तरीय चेतना को किसी तरह सोचना है, चिन्तन-प्रवाह को किस तरह मोड़ना-मरोड़ना है उसका दिग्दर्शन गत अंक में यथासम्भव प्रतिपादित हुआ है। वह यदि उचित उपयुक्त है तो उसे मान्यता तक सीमित न रहने दिया जाना चाहिए। प्रचलन, प्रवाह एवं परम्परा के स्तर तक पहुँचाया जाना चाहिए। यह आवश्यक भी है और कष्टसाध्य भी। इस क्रियान्वयन के लिए भागीरथी उमंगें चाहिए। यह उमंगें उठें कैसे? गतिशील कैसे बनें? इसके लिए जहाँ प्रोत्साहन की आवश्यकता है , वहाँ इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष तप-साधना भी है। ऋषिकल्प बनने के लिए इससे कम तापमान की ऊर्जा में काम भी तो नहीं चलता।

प्रज्ञा परिजनों में यदि युग मनीषा की भूमिका निभाने का उत्साह उभरा हो तो उसके लिए आवश्यक पराक्रम उत्पन्न करने वाला संकल्पवान साहस उगाना चाहिए। यह उत्पादन तप-साधना के सहारे ही वर्जित होता है। आवे में ही कच्ची मिट्टी के बर्तन पकते हैं। सदाशयता की उमंगों को भी परिपक्व होने के लिए अन्तराल को तपाने वाले साधनात्मक उपक्रम का आश्रय लेना पड़ता है। इसी प्रयोजन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ‘कल्पसाधना’ का निर्धारण है। समय का निमन्त्रण है कि जहाँ भी युग मनीषा उभरे वहाँ उसे युग साधना की दिशा में अगला कदम उठाने का भी प्रकाश मिले। युग साधना को ही प्रकारान्तर से कल्प साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।


कल्पसाधना की पृष्ठ भूमि और विधि व्यवस्था

इन दिनों शान्ति-कुँज में एक-एक मास के अल्प साधना सत्र चल रहे हैं। इस सम्बन्ध में सभी परिजनों को कुछ अधिक जानने की इच्छा उत्सुकता स्वाभाविक है। वस्तुतः यह प्राणवान जागृत आत्माओं के लिए कायाकल्प के समतुल्य ही सुखद सद्भावनाएँ प्रस्तुत कर सकने योग्य प्रक्रिया है। समय की एक गहरी आवश्यकता की पूर्ति में इससे असाधारण योगदान मिल रहा है। इस सम्बन्ध में अधिक जानना उनके लिए भी सामयिक जानकारी की दृष्टि से आवश्यक है जो उसमें सम्मिलित होने की स्थिति में नहीं हैं।

‘कल्प’ का अर्थ होता है-व्यक्ति त्व का उपयोगी परिवर्तन। आमतौर से चर्चा का विषय ‘काया कल्प’ ही रहा है। उसी का प्रधानतया उल्लेख एवं कथनों का क्रम चलता रहता है। कारण यह कि मनुष्य अपने आपको इन दिनों शरीर भर मानता है। लाभ हानि, प्रगति अवगति की एक ही कसौटी है-सुविधा साधनों में वृद्धि होने न होने की सफलता-असफलता जब शरीर ही व्यक्ति है तो उसको प्रभावित करने वाले साधन ही सब कुछ ठहरते हैं। उनका कौन कितना अर्जन उपयोग कर सकता है, इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि कौन कितना सुखी, समृद्ध एवं सफल रहा? किसके ऊपर अभावों को दुर्भाग्य लदा?

जब मापदण्ड ही गड़बड़ा जाय तो मूल्याँकन में भूल होना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में यदि व्यक्ति त्व में उपयोगी परिवर्तन को, शरीर की स्थिति में उत्साहवर्धक हेर-फेर होने की बात को ही सब कुछ माना जाता हो तो इसमें कोई भी आश्चर्य की बात नहीं है। काया कल्प का प्रचलित अर्थ है-बुढ़ापे या नवयौवन में बदल जाना अथवा दुर्बलता के स्थान पर बलिष्ठता का हस्तगत होना। इस सम्भावना की कुछ कथानकों-उदाहरणों से पुष्टि भी होती है। च्यवन ऋषि जराजीर्ण थे। सुकन्या के अनुरोध पर अश्विनीकुमारों ने उन्हें कोई दिव्य औषधि दी और उन्हें युवा बना दिया। ययाति को उनके एक पुत्र ने अपना यौवन दिया था और उनकी वृद्धावस्था स्वयं ओढ़ी। बाल खिल्म एवं वैरवानस ऋषि का उदाहरण प्रख्यात है। इस मान्यता या आकांक्षा को पूरा करने के लिये मध्यकाल में भी प्रयत्न होते रहे हैं। आयुर्वेद में इनकी चर्चा स्थान-स्थान पर है। इस संदर्भ में वमन, विरेचन, स्नेहन, संवेदन, वस्ति की पंचकर्म प्रक्रिया प्रख्यात है। साथ ही ऐसे रसायनों के सेवन का भी उल्लेख है जो पौष्टिकता बढ़ाते तथा सूखे मुरझाए को हरा-भरा करते हैं। परिशोधन और परिवर्धन की यह उभयपक्षीय प्रक्रिया अनेकानेक विधि-विधानों और क्रिया-प्रयोगों के साथ आयुर्वेद में लिखी है और उसकी परिणति का आयुर्वेद में ‘काया कल्प’ नाम दिया गया है।

पाश्चात्य शरीर शास्त्रियों ने भी इस मानवी आकांक्षा को ध्यान में रखते हुए अनेक स्तर के प्रयोग किए हैं। इनमें मनुष्यों से मिलती-जुलती शरीर रचना वाले बन्दरों की पौरुष-ग्रन्थियों का मनुष्यों आरोपण करना मुख्य है। इसमें सफलता भी मिली पर वह अस्थायी ही रही। लम्बी शीत निद्रा के उपरान्त थकान मिटाकर जीवकोषों को पुनः नये सिरे से काम करने का अवसर देना अभी सिद्धान्त ही स्वीकारा गया। उसका परीक्षण भर आरम्भ हुआ है। वह स्थिति नहीं आई जिसमें उसकी सफलता का विश्वास किया या कराया जा सके। कुछ अवयवों की शल्य क्रिया, आरोपण, परिवर्तन भी अभी प्रयोग स्तर पर ही है। उत्तेजक, पौष्टिक औषधियों के भी अनेकानेक प्रयोग हुए हैं। उनकी सफलता भी जादू-चमत्कार जैसी क्षणिक ही मिलती रही हैं। किसी प्रयोग के सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि उससे स्थायी लाभ का सुयोग मिल गया।

इसी प्रयोग प्रयास में एक और कड़ी जोड़ने का अपना प्रयत्न जरा भी नहीं है। क्योंकि निर्धारित लक्ष्य का मापदण्ड ही गलत है। प्रकृति का परिवर्तन चक्र सुनिश्चित है। उसमें अन्तर आने का अर्थ है-सृष्टि का मूलभूत आधार ही उलट जाना। यदि कभी वैसा हुआ तो उसका आरम्भ वर्तमान सृष्टि को समाप्त करके किसी अन्य आधार पर विश्व व्यवस्था को नये सिरे से बनाकर ही हो सकता है। ऐसी हेर-फेर को महाप्रलय से कम नाम नहीं दिया जा सकता। उत्पादन, परिपोषण, क्षरण और परिवर्तन की धुरी पर ही पदार्थ और प्राणियों का निर्वाह क्रम चल रहा है। उत्पन्न होना, बढ़ना, ढलना और अन्ततः परिवर्तन को भट्टी में नये रूप में गलने ढलने के लिये चले जाना। सभी की यही गति है। यहाँ स्थिरता कहीं नहीं। गति चक्र की धुरी पर सभी को भ्रमण करना पड़ता है।

खोये स्वास्थ्य को पुनः सुधार लेना, यह टूट-फूट की मरम्मत जैसा और समझ में आ सकने योग्य है। चिकित्सा उपचार के माध्यम से ऐसा हुआ भी है और वैसा होता भी रहेगा बात इसी सीमा पर आकर रुक जाती है। उस आकांक्षा की पूर्ति में अभी कोई आशा की किरण दिखाई नहीं पड़ती जिसमें जराजीर्ण आयु वाले फिर से नवयुवक बनने में सफल हो सकेंगे। इस सन्दर्भ में एक आधुनिक प्रयोग दृष्टव्य है। महामना मालवीय जी को किसी तपसी बाबा ने काया-कल्प का आश्वासन दिया और प्रयोग किया था। कोसी (उ.प्र.) के निकट उन बाबा के आश्रम में इस प्रयोजन के लिए एक विशेष कुटी बनाई गई थी। उसी में चालीस दिन उन्हें हवा-धूप से बचते हुए रखा गया था और औषधियों का उपचार किया गया था। इस प्रयोग का परिणाम भी वैसा नहीं हुआ जैसी अपेक्षा की गई थी। ‘उपयुक्त उपचार का उपयुक्त प्रभाव’ एक सामान्य सिद्धान्त है। उस प्रयोग के संदर्भ में भी वैसा ही तो हुआ कोई आश्चर्यजनक ऐसा परिवर्तन नहीं हुआ जिसे कायाकल्प की प्रचलित मान्यता में सफलता मिलने जैसा कुछ कहा जा सके ।

शरीर क्षेत्र में काया-कल्प इतना ही सम्भव है कि आहार-बिहार में बरती जाने वाली अनियमितताओं अवाँछनीयताओं को रोकने के लिए होने वाले अस्वाभाविक क्षरण को रोका जा सके और लम्बी आयु तक निरोग रहते हुए जीवन क्रम को उत्साहवर्धक आनन्ददायक बनाया जा सके। मानवी काया की संरचना अन्यान्य जीवधारियों की तुलना में कहीं अधिक वरिष्ठ है। जब और सभी स्वच्छन्द प्राणी निरोग रहकर पूर्णायुष्य प्राप्त करते हैं तो कोई कारण नहीं कि अकेला मनुष्य ही आये दिन दुर्बलता और बीमारी का अभिशाप सहते हुए असमय बेमौत मरता रहे। इसमें आहार-बिहार की मर्यादाओं का उल्लंघन, मानसिक उत्तेजनाएँ उभारने वाले आवेश तथा रीति नियमों का व्यतिक्रम ही वह कारण है जिनका समन्वय शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को भी मटियामेट करके रख देता है। यदि इतना सुधार सम्भव हो सके अवांछनीय आदतों का पुनर्निर्माण नये सके से हो सके तो इतने भर से काया-कल्प की पृष्ठभूमि बन सकती है। चिकित्सा के नाम पर कुछ हल्के-फुलके प्रयोग भी रही बची कमी पूरी कर सकते हैं। इस दृष्टि से प्राकृतिक जीवनचर्या सिखाने वाले कोई सेनेटोरियम बनें और उनमें स्वास्थ्य का महत्व समझाने वाले कुछ समय निश्चिन्ततापूर्वक रहें तो विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि वर्षों आये दिन की आधि-व्याधि सहते-कराहते खीजते रहने की अपेक्षा कुछ समय की यह आरोग्य साधना कहीं अधिक सस्ती पड़ेगी। उतावले लोग विषाक्त उत्तेजनाएँ चिकित्सा के नाम पर अंग-अवयवों में भरते और जादुई लाभ लेने के लिए बालकों की तरह मचलते रहते हैं। इस विडम्बना में वे पाते कम खोते अधिक है। रंग-बिरंगे चिकित्सकों के चित्र-विचित्र उपचार करते रहने पर भी आमतौर से देखा गया है कि “मर्ज बढ़ता ही गया-ज्यों-ज्यों दवा की” वाली लोकोक्ति ही चरितार्थ होती रहती है। इस कुचक्र से छूटने का एक ही उपाय है प्रकृति की ओर वापसी। जो इतना भर समझकर कुछ कर सकें तो वे अपने बलबूते अथवा दूसरों के राई रत्ती सहयोग से खोया स्वास्थ्य पा सकते हैं।

चर्चा यह थी कि शान्ति-कुँज के कल्प साधना सत्रों का जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गठन किया गया है उसका स्वरूप और प्रतिफल क्या है? अध्यात्म विज्ञान के आधार पर ‘कल्प’ शब्द का उपयोग आन्तरिक परिवर्तन के रूप में होना चाहिए। आन्तरिक का तात्पर्य है-दृष्टिकोण परक। मान्यता, आकांक्षा, विचारणा, कल्पना के समुच्चय को अन्तःकरण या अन्तराल कहते हैं। यही है व्यक्ति त्व का आधार। सभी लोग शरीर की दृष्टि से प्रायः एक जैसे होते हैं और उनके बीच जो जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है, वह लगता भर परिस्थितिजन्य है। उसका वास्तविक कारण मनः-स्थिति का स्तर ही होता है। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।” “जो जैसा चाहता है, वैसा बन जाता है।” ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते है” आदि-आदि अगणित प्रचलित उक्तियाँ एक ही तथ्य को प्रकट करती हैं कि मनःस्थिति जैसी भी होगी, परिस्थितियाँ वैसी ही बनती चली जायेंगी। किसी का स्वस्थ-अस्वस्थ धनी-निर्धन विंज्ञ मूर्ख, समुन्नत अधः प्रतीत होना इस बात पर निर्भर है कि उसने अपनी मान्यताएँ और आदतें किस स्तर की बनाई हैं। साधन तो आदमी जिधर भी चलता है, उसी प्रकार के मिलते जाते हैं। सहयोगी भी वैसे ही जुट जाते हैं। विपन्न परिस्थितियों में उत्पन्न अगणित व्यक्ति संसार के इतिहास में मूर्धन्य होकर चमके हैं और साधन सम्पन्नों के अगणित वंशधर व्यसनी, अनाचारी होकर पूर्वजों के यश और धन की होली चलाते और अन्ततः दुर्गतिग्रस्त जीवन जीते देखे गये हैं। तथ्यों पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य के अन्तराल का स्तर ही उसकी प्रगति एवं दुर्गति के लिए एकमात्र उत्तरदायी है।

निदान सही होने पर उसका उपचार भी ठीक बन पड़ता है और व्याधि निवारण में देर भी नहीं लगती। शान्ति-कुँज के कल्प साधना सत्रों में इसी आन्तरिक परिवर्तन की विधि-व्यवस्था बनाई गयी है। एक माह की छोटी अवधि इतने महान प्रयोजन के लिये हैं तो नगण्य और उपहासास्पद। फिर भी लोगों की व्यस्तता और उतावली को देखते हुए उतना ही छोटा कार्यक्रम बनाया गया है जिसके आरम्भिक अनुभव मिल सके और भविष्य में उस मार्ग पर चलते रहने का संकल्प भरा साहस उभर सके। बिगाड़ने में कम और बनाने में अधिक समय लगता है। इस दृष्टि से जितने समय में जीवन का स्वरूप बिगाड़ा गया है, बनाने में उससे अधिक समय लगना चाहिए। पर लोगों की अधीरता को क्या कहा जाय जो हथेली पर सरसों जमने जैसा चमत्कार देखने से कम की कोई बात ही नहीं सुनना चाहते। अच्छा होता लोग ऐसे महान प्रयोजन के लिए न्यूनतम एक वर्ष की अवधि निकालें पर समय की विचित्रता में वैसा कुछ सम्भव नहीं दीखता। इसलिये ‘न कुछ से कुछ’ की नीति अपनायी गयी है और एक महीने का कल्प साधना का ऐसा उपक्रम अपनाया गया जिसमें पगडंडियों के लालच में अपनायी गयी भूल भुलैयों को छोड़ने और सर्वतोमुखी व्यक्ति यों को सहमत किया जा सके।

कल्प साधना में देवत्व के साथ सघन घनिष्ठता स्थापित करने वाली उपासना-मान्यताओं में-आदतों में उत्साहवर्धक परिवर्तन करने वाली जीवन साधना-एवं लोक व्यवहार को आनन्द उल्लास से सराबोर कर देने वाली आराधना का विविध समन्वय है। इसे अन्तःकरण, व्यक्ति त्व और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने वाली सुनियोजित प्रक्रिया कहा जा सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं और आदतों को बदलने की कल्प प्रक्रिया उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जैसी कि बुढ़ापे को जवानी में बदलने वाले काया-कल्प के बारे में लोक-मान्यता प्रचलित है। न तो बुढ़ापा अभिशाप है और न जवानी वरदान। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही है। दोनों का अपना समय, महत्व, उपयोग और गौरव है इसलिए शरीर का प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ परिवर्तन क्रम तो नहीं बदला जा सकता और न उसके बदलने की आवश्यकता ही है। आन्तरिक परिवर्तन की अपनी उपयोगिता है। यदि वह सही रीति से बन पड़े तो उसका लाभ काया-कल्प की तुलना में अपेक्षाकृत कहीं अधिक है।

कल्प-साधना में उन सभी तत्वों का समावेश किया गया है अन्तराल के स्तर में प्राकृत उत्कृष्टता उभरती और व्यवहार में पवित्र प्रखरता का ऐसा समावेश करती है जिसको उपलब्ध करने के उपरान्त व्यक्ति धरती से स्वर्ग में जा पहुँचने जैसा अनुभव कर सके।


उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए उपयुक्त वातावरण

विशिष्ट स्तर के परिवर्तनों के लिए जहाँ उपयुक्त उपचार पद्धति, प्रयोग अधिकारी तथा आवश्यक साधन उपकरणों की आवश्यकता होती है, वहाँ परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। स्थान और समय की बता ऐसी ही है, जिसे ध्यान में रखते हुए योजना में हेर-फेर करना पड़ता है। टीलों पर बाग लगाना-रेगिस्तान में खेती करना-दल-दल में नगर बसाना-इच्छा होते हुए भी नहीं बन पड़ता। इसके लिए समस्त साधन होते हुए भी स्थान बदलना पड़ता है। हर काम हर स्थान पर नहीं हो सकता। बहुत-सी दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ ऐसी हैं, जो ठण्डे या गरम प्रदेशों में ही उत्पन्न हो सकती हैं। उन्हें विपरीत वातावरण में लगाया जाय तो मेहनत और लागत बेकार चली जायेगी। अभीष्ट परिणाम की स्थिति बनेगी ही नहीं।

कल्प साधना के लिए सर्वप्रथम उपयुक्त वातावरण देखना पड़ता है। कुछ रोगों का इलाज घर बैठे भी हो सकता है, पर कुछ ऐसे हैं, जिसके लिए अस्पताल में भर्ती होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। बड़े-बड़ों को विवशता में यही करना पड़ता है। क्योंकि डाक्टर, नर्स, परीक्षा चिकित्सा तथा शल्य-क्रिया के साधन उपकरण किसी के निजी मकान में एकत्रित नहीं किये जा सकते। हर समय, हर सुविधा उपलब्ध कराने वाले, उपयुक्त जलवायु में बने अस्पताल ही गम्भीर चिकित्सा के लिए उपयुक्त पड़ते हैं। इस तथ्य को समझने वाले बिना ननुनच किये अस्पताल में भर्ती होते हैं। घर में ही वह सब करा लेने का हठ कोई दुराग्रही ही करता होगा। कल्प साधना में जहाँ उपचार पद्धति का सही रूप में परिपालन आवश्यक होता है, वहाँ एक आवश्यकता उपयुक्त वातावरण की भी रहती है। इसकी व्यवस्था बने बिना गाड़ी रुकी ही रहती है।

लंका विजय, सतयुग स्थापन के उपरान्त राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को आत्म कल्याण की साधना आवश्यक प्रतीत हुई। गुरु वशिष्ठ ने भी उसका समर्थन किया। बात आगे बढ़ी तो प्रथम प्रश्न यही उत्पन्न हुआ कि उसे किया कहाँ जाय? यों अयोध्या में साधनों की कमी नहीं थी, उसके लिए सभी सुविधाएँ जुट सकती थीं, पर मूल प्रश्न एक ही था कि अभीष्ट वातावरण वहाँ कहाँ से आये? जन्म भूमि और कर्मभूमि के साथ मनुष्य के अनेकानेक संस्कार जड़ होते हैं। अपना-पराया रोग-द्वेष स्मृति-अभ्यास संपर्क स्वभाव के कुछ ऐसे प्रवाह मनुष्य के साथ जुड़े होते हैं कि बहुत रोकथाम करने पर भी मनुष्य की चिन्तन पद्धति, अभिरुचि और आदत उसी अभ्यस्त ढर्रे में अनायास ही घूमती रहती है। विचारों तक की रोकथाम और मोड़-मरोड़ जब कठिन पड़ती है, तब अचेतन के साथ जुड़े रहने वाले स्वभाव-अभ्यास को कैसे बदला जाय? इसके लिए स्थान बदलने की आवश्यकता पड़ती है। परिस्थितियों का भी मनःस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। स्थान बदलने में वहाँ के पदार्थ और व्यक्ति यों के साथ सम्बन्ध भी झीने पड़ते हैं। फलतः आगे न बढ़ने देने वाले संचित संस्कारों की पकड़ भी ढीली हो जाती है। साथ ही अधिक प्रभावी वातावरण का दबाव पड़ने पर भी मन का बदलना सरल हो जाता है।

भगवान कृष्ण और रुक्मिणी का विचार एकबार उच्चस्तरीय सन्तान उत्पन्न करने का हुआ। इसके लिए उन्हें विशिष्ट तप करना था। हलकी-फुलकी साधना तो घर-गाँव में रहते हुए सामान्य क्रिया-कलापों के साथ-साथ भी चलती रहती है किंतु उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रयास ही सब कुछ नहीं होता। इसके लिए वातावरण भी चाहिए। अस्तु, दोनों को सुसम्पन्न नागरिकों में उपलब्ध अपने प्रस्तुत साधन छोड़ने पड़े और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयुक्त स्थान ‘बद्रीनाथ’ ढूँढ़ना पड़ा। वहाँ उन लोगों ने बारह वर्ष तक मात्र जंगली बेर खाकर तप किया। तदुपरान्त ही अपने समान स्तर का एकमात्र पुत्र ‘प्रद्य म्न’ उत्पन्न कर सकने में सफल हुए।

महाभारत के उपरान्त पाण्डव सिंहासनारूढ़ तो हुए पर साथ ही उनकी आत्मोत्कर्ष आकांक्षा भी उमड़ती रही। भगवान कृष्ण ने उनकी अभिलाषा को समझा और इसके लिए स्थान बदल लेने का परामर्श दिया, वैसा ही हुआ था। राज-काज उत्तराधिकारियों को देकर पाण्डव हिमालय चले, कृष्ण भी साथ थे। धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती इससे पूर्व ही हिमालय निवास करते हुए आत्म साधना में संलग्न हो चुके थे। पीछे द्रौपदी समेत पाँच पाण्डव भी चले। बद्रीनाथ के निकट ही वे जिस स्थान पर बसे उसका नाम ‘पाण्डु केश्वर’ पड़ा। भगवान ने उन्हें ‘पाण्डव गीता’ यहीं सुनाई थी। वह ज्ञान भी ‘योगवशिष्ठ’ के समतुल्य ही माना जाता है। तपस्वी जीवन बिताते हुए उच्चस्तरीय साधना करते हुए, पाण्डवों ने स्वर्ग प्रस्थान किया था, यह सभी को विदित है। यह उद्देश्य वे लोग ‘इन्द्रप्रस्थ’ ‘हस्तिनापुर’ रहते हुए-राज-काज चलाते हुए नहीं कर सकते थे। वातावरण व्यक्ति का तीन चौथाई मन अपने साथ अनायास ही जकड़े रहता है। अभ्यस्त ढर्रे में स्थान के साथ-स्वजन सम्बन्धियों के साथ-जुड़े हुए सम्बन्ध इतने सघन होते हैं, जिनका उल्लंघन करते हुए पार जा सकना दुस्तर समझकर यही उपाय अपनाया जाता है कि उपयुक्त वातावरण की दृष्टि से पुराने सम्बन्धों से जकड़ा हुआ स्थान बदल दिया जाता है। पाण्डवों ने भी राम बान्धवों की तरह वही किया।

स्वास्थ्य सुधार के लिए बनाये जाने वाले सेनेटोरियम को स्थापना करने वाले सर्वप्रथम उपयुक्त जलवायु वाले स्थानों का चुनाव करते हैं। भले ही लोगों को वहाँ पहुँचने में असुविधा होती हो। ‘भुवानी’ सेनेटोरियम आदि सभी प्रायः ऊँचे पर्वतीय स्थानों स्वास्थ्य सुधार की दृष्टि से उपयुक्त समझे गये वातावरण में बने हैं। परिणामों को देखते हुए स्पष्ट है, रोग और उपचार अन्यत्र जैसा रहने पर भी वहाँ भर्ती हुए रोगी आशातीत प्रगति करते हैं और जल्दी अच्छे होने में इन उपचार गृहों का परिणाम आश्चर्यजनक रहता है। यह सफलता रोगी अपने-अपने स्थानों पर रह कर नहीं कर सकते। ऐसे रोगियों में हर बड़ी स्वास्थ्य सुधार ही मस्तिष्क पर छाया रहता है, जबकि घर रहने पर कुटुम्ब-व्यवसाय सम्पर्क-समुदाय से सम्बन्धित अनेकानेक समस्याएँ ध्यान बँटाती रहती हैं। पूरा मनोयोग लगना भी सफलता का बहुत बड़ा रहस्य है। कल्प साधना में भी घर छोड़कर तदनुरूप स्थान चयन करने की बात पर जोर दिया जाता है।

बम्बई का केला, नागपुर का संतरा, लखनऊ का आम, मैसूर का चन्दन प्रसिद्ध है। उन्हीं पौधों को अन्यत्र लगाया जाय, तो वे स्थान और पुष्प उपलब्ध न होंगे। इसमें माली का दोष नहीं, जलवायु का कारण है। सरहदी पठान और नम क्षेत्र के निवासी बंगाली का शरीर देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि आहार आदि की सुविधा में अन्तर न रहने पर भी स्वास्थ्य में इतना अन्तर क्यों रहता है? इसमें क्षेत्रीय जलवायु की भिन्नता ही प्रमुख कारण है। जो बात भौतिक क्षेत्र में जलवायु और जमीन पर लागू होती है। वही अध्यात्म क्षेत्र के प्रयोगों और परिणामों के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय वातावरण पर निर्भर रहती है। इसमें भूमिगत संस्कार, प्राणवान सान्निध्य तथा क्षेत्रीय वातावरण, पुरातन संचित संस्कार आदि कितने ही कारण काम करते हैं। तीर्थों की स्थापना पुरातन काल में इन्हीं तथ्यों को समन्वित करते हुए की गई थी।

बालकों के गुरुकुल-वानप्रस्थों के आरण्यक-स्थापित करते समय सुविधा का नहीं, उच्चस्तरीय वातावरण का ध्यान रखना होता है, भले ही वह परम्परागत बना हो अथवा प्रयत्नपूर्वक बनाया गया हो। सुविधा का स्थान कौन नहीं चाहता। पर जब वातावरण के साथ जुड़ी हुई प्रगति का प्रश्न आता है तो सुविधा छोड़ने और वातावरण अपनाने को दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय करना पड़ता है। होटल धर्मशाला में रहकर अनुष्ठान आदि की लकीर पीट लेना एक बात है और त्रिवेणी की रेती में कुटी बनाकर माघ मास का ‘कल्पवास’ करना दूसरी। साधना में मात्र कृत्य ही सब कुछ नहीं होता। उसके लिए वातावरण भी पौधे को खाद-पानी मिलने की तरह आवश्यक है। इस दृष्टि से स्थान परिवर्तन की आवश्यकता कल्प साधना में आवश्यक मानी गयी है। मालवीयजी का काया-कल्प प्रयोग हिन्दू विश्वविद्यालय में बनी उनकी कोठी पर नहीं हुआ था। इसके लिये उन्हें मथुरा जिले के एक छोटे गाँव में तपसी बाबा के तपोवन में फूँस की कुटी बनाकर रहना पड़ा था।

महामानवों में से तो प्रत्येक को स्थायी रूप से अपनी जन्म भूमि छोड़कर अन्यत्र कार्यक्षेत्र बनाना पड़ा है। ऋषि वृन्द में से प्रत्येक को अपनी जन्म भूमि छोड़नी पड़ी वे प्रधानतया हिमालय की छाया और गंगा की गोद में बसे। कुछ को अन्यत्र भी ऐसे ही पवित्र स्थान ढूँढ़ने पड़े। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, नानक, कबीर, रामानुज, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, समर्थ, रामकृष्ण परमहंस, गाँधी, अरविन्द, रमण आदि में से एक भी अपने जन्म स्थान में नहीं बसा या उन्हें वहाँ साधन सुविधा की दृष्टि से ही सुगमता रही। ईसा, मोहम्मद और जरथुस्त्र आदि प्रमुख धर्म संस्थापकों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उन्हें जन्मभूमि से प्रेम न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर परिस्थिति का मनःस्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है और उसके कारण लक्ष्य की ओर गतिशील होने में जो व्यवधान पड़ता है, उसे देखते हुए दूरदर्शिता ने यही सुझाया कि स्थान बदल कर ही महान कार्य सम्पन्न कर सकने में सुविधा होती है।

कल्प साधना की कार्य पद्धति उतनी कठिन या जटिल नहीं है कि घर रह कर न की जा सकती हो। किन्तु कठिनाई एक ही है कि अभ्यस्त ढर्रा, आधा ध्यान अपने में ही उलझाये रहता है जबकि कल्प साधना या किसी भी साधना के लिए मन को आगे बढ़ाने वाले प्राणवान वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बहुत समय से यह प्रयत्न चलता रहा है कि उच्चस्तरीय साधना के निमित्त उपयुक्त वातावरण वाला तीर्थ विनिर्मित किया जाय। ‘विनिर्मित’ शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि परम्परागत तीर्थों को निहित स्वार्थों की दुरभि संधियों ने इस बुरी तरह जकड़ लिया है कि वहाँ श्रद्धा संवर्धक प्रेरणा मिलना तो दूर-आवश्यक शिक्षण और प्राणवान सान्निध्य मिलना तो दूर, उलटे अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला विक्षोभ ही हाथ लगता है। भीड़ भाड़ की घिचपिच और पर्यटकों जैसी बात चंचलता को देखते हुए वैसा अवसर ढूँढ़ निकालना कठिन है जहाँ साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें। ऐसी दशा में उस लुप्त परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए नये सिरे से न्यूनतम एक तीर्थ की स्थापना तो अनिवार्य रूप में आवश्यक हो ही गयी। इसके बिना प्रगति रथ एक कदम भी आगे बढ़ता प्रतीत नहीं हो रहा था।

शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ को इसी दृष्टि से विनिर्मित किया गया है ताकि उस शून्य की पूर्ति हो सके। कल्प-साधना सच्चे अर्थों में तीर्थ सेवन है। वातावरण, साधना, शिक्षण-विधान अनुशासन, अध्यवसाय की दृष्टि से यहाँ निवास करने वाले साधक को यही अनुभव होता है कि उसे तीर्थ परम्परा का जीवन्त दर्शन हो रहा है। सूत्र-संचालकों ने समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए इस संदर्भ में प्राणपण से प्रयास किया है। अनेक स्थूल कमियों के रहते हुए भी कोई भी सूक्ष्मदर्शी यहाँ यह अनुभव कर सकता है कि व्यवस्था को उन्हीं पद चिह्नों पर चलाया जा रहा है जिन पर देव संस्कृति के महान तीर्थों की स्थापना प्रचण्ड ऊर्जा केन्द्रों के रूप में की गयी थी। ऐसी प्रचण्ड जिसमें तपकर अनगढ़ धातुओं को गलने ढलने और बहुमूल्य बनने का अवसर मिलता था तीर्थ प्रकारान्तर से महामानव ढालने के उत्पादन केन्द्र थे जिनमें गुरुकुल बालकों का आरण्यक वानप्रस्थों का-साधनारत व्यस्त गृहस्थों का नव निर्माण करते थे।

वातावरण की चर्चा करने के उपरान्त एक प्रश्न फिर भी शेष रह जाता है कि सत्रों में सम्मिलित होने वाले साधक उपयुक्त प्रभाव ग्रहण करने योग्य अपनी मनःस्थिति बना पाते हैं या नहीं। परिस्थितियाँ कितनी ही अनुकूल क्यों न बन गई हों, पर यदि उन्हें स्वीकारने की मनःस्थिति न हो तो वह प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकेगा, जिसके लिए उभयपक्षीय प्रयासों की अनिवार्य आवश्यकता है, जो एकांगी होने पर बनता ही नहीं, सधता ही नहीं। एक हाथ से ताली कहाँ बजती है। एक पैर से तो बिना लकड़ी के सहारे दस कदम भी चलना नहीं हो सकता। एक पहिये की गाड़ी लम्बी यात्रा पूरी कैसे करें? सूर्य कितना ही महान क्यों न हो उसकी किरणें किसी बन्द दरवाजे में प्रवेश नहीं कर सकतीं। हवा कितनी ही स्वच्छ क्यों न हो यदि खिड़कियाँ बन्द रहें तो यह समर्थ होते हुए भी उस घर में घुस नहीं सकेगी। दृश्य कितने ही सुन्दर क्यों न हों पुतली के खराब हो जाने पर सर्वत्र अन्धकार ही दृष्टिगोचर होगा। कान के पर्दे काम न करें तो मधुर संगीत का आनन्द ले सकना सम्भव नहीं। पाचन-तन्त्र खराब हो तो पौष्टिक भोजन की कोई उपयोगिता नहीं। वाहन-साधनों की जितनी उपयोगिता आवश्यकता है, उससे भी अधिक उनका सही उपयोग कर सकने में समर्थ विवेक और कौशल की है, अन्यथा बहुमूल्य उपलब्धियाँ भी निरर्थक बनकर रह जायगी। वर्षा में सभी जल जंगल हरे-भरे दीखते हैं, पर चट्टानों पर न तो नमी के चिह्न दीखते हैं और न एक तिनका जमता है। आग को इन्धन तो चाहिए ही। अन्यथा वह प्रचंड होते हुए भी बुझ जायगी। तीर्थसेवन के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसमें उपयुक्त परिस्थितियाँ तो होनी ही चाहिए। उनके बिना उत्तम मनःस्थिति होने पर भी बात नहीं बनती, पर साथ ही इस तथ्य को भी भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि सशक्त परिस्थितियाँ भी उपयुक्त मनःस्थिति के अभाव में अपना प्रभाव प्रस्तुत कर सकने में समर्थ नहीं हो सकतीं।

कल्प साधना के साधकों को चाहिए कि इतना समय निकालने, इतना कष्ट सहने, इतना खर्च करने का जहाँ साहस दिखाया है वहाँ इतना पुरुषार्थ और भी करें कि अपने मन को पकड़-जकड़ कर, समेट-दबोच कर इसके लिए मनाये कि इन दिनों किसी दिव्य लोक में निवास करने, दिव्य ढाँचे में ढलने, भविष्य को देवोपम बनाने के लिए जिस चिन्तन की आवश्यकता है उसे तत्परतापूर्वक अपनाये । मन उचटता हो तो उसके लिए छुट्टा घूमने के अभ्यस्त किसी वन्य पशु को प्रशिक्षित करने का कौशल अपनाया जाय। विचारों को भी विचारों से काटा जाय। लोहे से लोहा कटता है, विष को विष मारता है, काँटे से काँटा निकलता है। अनगढ़ एवं अनावश्यक विचारों के अभ्यस्त मनः संस्थान को यदि उच्चस्तरीय अनुशासन में ढालना है तो वैसा ही प्रयत्न करना होगा जैसा कि बछड़े को हल में जोतने के लिए करना होता है।

परिस्थितियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं उतनी ही साधक की मनःस्थिति भी। यदि मन पर कैद होने का, जितनी जल्दी हो सके मुक्त होकर भागने के विचारों को घटा टोप छाया हो तो कितना भी सशक्त वातावरण हो, भावना, विचारणा तथा शरीर संरचना में तनिक भी परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होगा। अनुकूल मनःस्थिति के साधकों को कल्प प्रक्रिया के लिए जैसी परिस्थितियों की-तीर्थ के शक्ति प्रधान वातावरण की आवश्यकता थी, वैसा ही शान्ति-कुँज को गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित किया गया है। इसके लिये इस स्थान की महत्ता तो अपने स्थान पर है ही, गत बारह वर्षों के वे प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं। जिनके माध्यम से इस तपःस्थली को संस्कारित किया गया है। सर्वविदित है कि यह स्थान सप्त ऋषियों की तपःस्थली सप्त सरोवर पर बनाया गया है। इमारत ठीक वही बनी है, जहाँ गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र का निवास था। नौ कुण्ड की यज्ञशाला में नित्य दो घण्टे यज्ञ, पचपन साल से निरन्तर जल रही अखण्ड ज्योति, नित्य का चौबीस लाख सामूहिक जप पुरश्चरण, जड़ी-बूटी उद्यान जैसी विशेषताएँ चर्म चक्षुओं से देखी जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त वैसा भी बहुत कुछ है जिसे मात्र ज्ञान चक्षुओं से ही देखा जा सकता है। हिमालय की दिव्य सत्ता का संरक्षण वशिष्ठ अरुन्धती का सान्निध्य, अनुभव पूर्व मार्ग दर्शन तथा प्राणवान अनुदान जैसी ऐसी सुविधाएँ जो अन्यत्र मिल सकना कठिन है। ब्रह्मवर्चस् की शोध-युग शिल्पियों का प्रशिक्षण इस वातावरण को स्वर्ण सुयोग जैसा बना देते हैं। ‘कल्प साधना’ जैसे महान प्रयोजन के लिए इससे हल्के दर्जे का वातावरण काम भी नहीं दे सकता था। इस लिये पिछले बारह वर्ष तद्नुकूल स्थापना खड़ी कर देने के उपरान्त ही प्रखरता सम्पादन की कल्प साधना का सशक्त उपक्रम इसी वर्ष शान्तिकुञ्ज में आरम्भ किया गया है।


आहार तपश्चर्या के चमत्कारी परिणाम

कल्प साधना का प्रमुख उद्देश्य है दृष्टिकोण को सुधारना एवं व्यक्ति त्व को उभारना। सच्चा अध्यात्म अपने प्रयोक्ता को उसी दिशा में अग्रसर करता है। इसके समस्त विधि-विधानों का लक्ष्य बिन्दु यही है। जहाँ ध्यान धारणा आस्था क्षेत्र में उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापनाओं का पथ प्रशस्त करती है वहाँ तप साधना कुसंस्कारी आदतों के खर-पतवार को उखाड़ती और उसके स्थान पर महामानवों जैसे व्यक्तित्वों का नव-निर्माण कर दिखाती है। इस महान जागरण की फलित ही स्वर्ग, मुक्ति , सिद्धि के रूप में हस्तगत होती है।

कल्पवास में साधक द्वारा ग्रहण किये जाने वाले सात्विक आहार में इसी उद्देश्य को ध्यान में रखा गया है। उसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग का सुपाच्य सिद्ध होने वाला समन्वय किया गया है। उसे इस प्रकार के सन्तुलित आहार की तरह परोसा जाता है जिसमें काया के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों का समावेश है। कल्प प्रक्रिया में शरीर को तपाने, मन को साधने और अन्तःकरण को बन्धनमुक्त करके-विराट् के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकने योग्य व्यापक बनाया जाना है। इसे स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का समन्वित उत्कर्ष उपक्रम भी कह सकते हैं।

कल्प-साधना का प्रथम चरण है आहार शुद्धि। सर्वविदित है कि अन्न से क्रमशः रस, रक्त , माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य बनते-बनते अन्ततः उसी का अन्तिम परिपाक मन के रूप में होता है। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। नाक, कान, आँख की तरह मस्तिष्क भी एक अवयव है, भले ही वह खोपड़ी की पिटारी में बन्द ही क्यों न रहता हो। उसी के निर्धारण दृष्टिकोण कहलाते हैं। बुद्धि एवं चित्त भी उसी के कुछ विशेष स्तर है। समूचे शरीर को तराजू के एक पलड़े पर और मात्र मस्तिष्क को दूसरे पलड़े पर रखा जाय तो मस्तिष्क ही अधिक वजनदार सिद्ध होता है।

जैसा खाए अन्न वैसा बने मन वाली उक्ति स्वयं सिद्ध है। तमोगुणी, गरिष्ठ, युष्पाच्य, अभक्ष्य आहार करने वाले शरीर से भी रोग-क्रान्ति विकृति ग्रस्त रहते हैं-भले ही वे देखने में मोटे मजबूत दिखाई पड़ें। भुने तले, मसाले वाले, नशीले, दूसरों को पीड़ा देकर उपलब्ध किये गये खाद्य पदार्थ पाचन क्षेत्र को खराब करते है। इस सड़न से विषाक्त ता उत्पन्न होती है और वह रक्त के साथ घूमती फिरती जहाँ कहीं भी टिक जाती है वहीं किसी न किसी प्रकार का रोग उत्पन्न कर देती है। इस प्रकार स्वास्थ्य के बनने बिगड़ने का प्रधान कारण आहार ही सिद्ध होता है। बिहार की बात तो इसके बाद आती है।

शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। उस पर भी अन्न का बुरा प्रभाव असाधारण रूप से पड़ता है। नशेबाजों के गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टता भरी रहती है। अभक्ष्य भोजनों में मनोविकारों की भरमार उबलती रहती हैं। उनका न तो मन एकाग्र होता है और न चित्त ही शान्त रहता है। ऐसी दशा में आत्मिक प्रगति का आधार ही लड़खड़ा जाता है। जिन्हें वस्तुतः इस क्षेत्र में प्रवेश करना है, उन्हें सर्वप्रथम आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ता है। यात्रा यहीं से आरम्भ होती है। ऋषियों के आहार का यदि पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होता है कि उन्होंने इस संदर्भ में असाधारण सावधानी बरती और संयम अपनाया। पिप्पलाद ऋषि मात्र पीपल के फलों पर निर्वाह करते थे। कणाद का नाम ही इस आधार पर पड़ा है कि वे जंगली धान्य के कण संचित करके उदर पूर्ति करते थे। फल, दूध, शाक पर तो अभी भी कितने ही लोग निर्भर रहते हैं। कइयों ने अंकुरित, अधपके अथवा उबले अन्नों को अपना आहार बनाया है। यह साधना का प्रथम सोपान हैं। अनुष्ठानों में उपवास का महत्व भी ब्रह्मचर्य के ही समान माना जाता है। उपवास काल में जो आहार लिया जाता है वह फलाहार न सही-निश्चित रूप से सात्विक स्तर का तो होता ही है। पर इतना भर कर पाना भी आज के औसत आदमी को कठिन जान पड़ता है।

यदि मनुष्य आहार-विहार के सम्बन्ध में अन्य प्राणियों की तरह प्रकृति अनुशासन को स्वीकार करे तो उसे उन अभिशापों से मुक्ति मिल सकती है जो मर्यादा उल्लंघन के फलस्वरूप पल्ले बँधते हैं। जब अन्य जीवधारी असुविधाओं और अभावों के बीच रहते प्रसन्न सन्तुष्ट जीवन जीत और पूर्णायुष्य प्राप्त करते हैं तो मनुष्य की आधि-व्याधियों से ग्रसित क्यों रहे? इसमें अन्य किसी का कोई दोष नहीं। अपनी ही इन्द्रिय लिप्सा और उच्छृंखलता है जो अपने लिए आप खाई खोदती और स्वयं ही गर्त्त में गिरकर अपने हाथ पाँव आप तोड़ती है।

कल्प साधना में प्रथम पाठ आहार बिहार में प्रकृति अनुशासन का समावेश करने और खाद्य पदार्थों को कम से कम भूनना-जलाने यथा सम्भव उनके प्राकृतिक रूप में ही उपयोग करने के रूप में अभ्यास कराया जाता है। अच्छा होता साधक फलाहार पर न सही शाकाहार पर रह लेते। पर दुर्बल संकल्प वालों के लिए ढर्रे से जूझते हुए कंपकंपी छूटते देखकर काम चलाऊ निर्धारण यही किया गया है कि कम से कम अमृताशन का व्रत तो निभाया ही जाय। यह एक महीने की प्रताड़ना नहीं है वरन् भविष्य में आहार सम्बन्धी अपनाने के लिए कराया गया प्रारम्भिक अभ्यास है। साधकों से आज्ञा की जाती है कि वे इसे बन्दी मूक की विवशता या सामयिक प्रताड़ना न समझें, वरन् भविष्य में आहार सम्बन्धी मर्यादा पालन का अभ्यास मानें और यदि वस्तुतः स्वास्थ्य का महत्व समझा गया हो तो आहार-विहार का अनुशासन शेष जीवन में नियमित रूप से निभायें।

कल्पकाल में जो भी आहार लिया जाता है, उसके बारे में शर्त है कि, वह कम से कम अग्नि संस्कार वाला उबला भर होना चाहिए। साथ ही उसमें एक समय में एक या दो से अधिक का सम्मिश्रण न हो। नवरात्रि के उपवासों में जो फलाहार, शाकाहार, दूध-छाछ आदि पर नहीं रह सकते उन्हें अमृताशन का निर्देश दिया जाता है। उपवास की न्यूनतम मर्यादा यही है। अमृताशन का अर्थ है उबला अन्न। दाल-चावल दलिया दाल आदि का सम्मिश्रण इस वर्ग में आता है। दाल के स्थान पर दूध या दही भी प्रयुक्त किया जा सकता है। साधना काल में यथा सम्भव ऐसे ही आहार पर रहने की विधि है। उबले शाक भी इसी श्रेणी में आते हैं।

कल्प साधना के साधकों के लिये एक महीने एक अमृताशन का एक वर्ग नियत किया जाता है और पूरे महीने उसी क्रम को निबाहते रहने का निश्चय किया जाता है। रुचि, प्रकृति और स्थिति को ध्यान में रखते हुये साधक और मार्ग-दर्शक परस्पर विचार विनिमय करके यह निर्धारित कर लेते हैं कि कल्प अवधि में क्या आहार चलेगा। उसका परिणाम कितना होगा और खाने का समय क्या रहा करेगा। यह आहार भी दिन में दो बार से अधिक नहीं लिया जा सकता। सेंधा नमक, काली मिर्च, नींबू, जीरा, हल्दी, अदरक जैसे हानि रहित मसाले अपवाद स्वरूप थोड़ी मात्रा में ही इस अमृताशन में मिलाये जा सकते हैं। लाल मिर्च, हींग, अमचूर, अचार जैसी उत्तेजक वस्तुओं का इस भोजन में पूर्णतया निषेध है।

शान्ति-कुँज में कल्प साधना सत्रों के साधकों के लिए भाप से भोजन पकाने की एक सामूहिक प्रक्रिया विकसित की गयी है। भाप बनाने वाले दो बाँयलर लगाये जाते हैं। उनके साथ दो बड़े स्टीम चैम्बर हैं। चैम्बरों में अमृताशन पकाने के छोटे-छोटे भगोने रखने के लिए सो खाने बने हैं। प्रत्येक साधक को स्टैनलैस स्टील की भगौनी, ढक्कन, थाली, गिलास आदि सभी सामान आश्रम की ओर से मिलता है। साधक अपने लिए निर्धारित अमृताशन, निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न डालकर माताजी के सुपुर्द कर जाते हैं। सभी पात्रों में अभिमन्त्रित गंगाजल तुलसी पत्र डाला जाता है। एक घण्टे बाद सभी साधक लाइन में आते हैं और अपने नम्बर का भगोना लेकर वापिस चले जाते हैं। यही क्रम प्रातः सायं दोनों समय चलता है। मूँग की दाल, गेहूँ का दलिया, चावल, सेंधा नमक, काली मिर्च सभी वस्तुऐं शुद्ध स्वच्छ करके बाज़ार से सस्ते भाव में आश्रम के सहकारी स्टोर में उपलब्ध होती हैं। दैनिक आहार का यही क्रम है। जिसकी लागत महीने में पचास रूपये से अधिक नहीं आती है। पकाने का श्रम, ईधन आश्रम की ओर से लगता है।

आहार के बाद बिहार का क्रम आता है। बिहार अर्थात् दिनचर्या। निर्वाह क्रम में बरता जाने वाला अभ्यास। कल्प साधना का दूसरा चरण यही है। आश्रम में दिनचर्या निर्धारित है। घड़ी की सुई की तरह नियमितता बरतने, हर काम समय पर करने में जागरूकता बरतने के लिए प्रत्येक साधक को बाधित किया जाता है। आलस्य प्रमाद के लिए कहीं कोई गुँजाइश नहीं। सैनिकों की तरह चुस्ती, मुस्तैदी और फुर्ती अपनानी पड़ती है। नियत समय पर निर्धारित क्रम अपनाने के लिए हर किसी पर अंकुश रखा जाता है। अस्त-व्यस्त रहने की आदतों से ग्रसितों को प्यार से लेकर आँखें तरेरने के दबाव दिये जाते हैं और कहा जाता है कि आपको यहाँ सरकस के कलाकार प्राणियों की तरह अपने सुगठित बनना है इसलिए पिछली अनगढ़ आदतों को इच्छा या अनिच्छा से छोड़ना ही चाहिए। सरकस के मनुष्यों एवं मनुष्योत्तर प्राणियों को उनके प्रशिक्षक जितनी कड़ाई के साथ सिखाते हैं उतना दबाव ही नहीं दिया जाता किन्तु घरेलू काम-काज की सहायता करने वाले बैल घोड़ों की तरह तो सीधी राह चलने के लिए तो अभ्यस्त कराया ही जाता है। कुसंस्कारी, अनगढ़ता को गुण, कर्म, स्वभाव का अंग बनाये रहने वाला व्यक्ति शारीरिक ,मानसिक, आर्थिक एवं परिस्थितिजन्य सुविधाओं से भरा-पूरा रहने पर भी दुर्गतिग्रस्त ही रहेगा उसका भविष्य कभी चमकने वाला नहीं है। प्रगतिशीलों में से प्रत्येक को सर्वप्रथम अपने ढर्रे को परिष्कृत स्तर का बनाना पड़ा है। मनःस्थिति बदलनी पड़ी है इसके उपरान्त ही परिस्थितियों ने करवट बदली है। जो परिस्थितियों को अनुकूल बनाने सुविधा सफलतायें पाने के तो सपने देखते रहे किन्तु अपनी अनगढ़ आदतों को यथावत् बनाये रहे। उन्हें जितनी बड़ी महत्त्वाकाँक्षा रही उतनी ही गहरी निराशा के कुचक्र में भ्रमण करना पड़ा है।

बिहार क्रम में यहाँ की नियमित दिनचर्या के अनुसार साधकों को प्रातः 3॥ बजे उठना पड़ता है। जागरण की घण्टी यहाँ छावनी में बजने वाले बिगुल की तरह मानी जाती है जिसके निर्देश पर सभी को बिस्तर छोड़ देना चाहिए। शौचालय, स्नानघर, इतने हैं कि किसी की प्रतीक्षा न करनी पड़े और दो सौ शिक्षार्थी एक घण्टे में उस नित्यकर्म से निपट लें। इसके बाद प्रातःकालीन साधना का क्रम एक घण्टा चलता है। 5॥ बजे सभी माताजी के पास पहुँचते हैं। अखण्ड दीपक के दर्शन, औषधि कल्पपेय की एक प्याली, प्रज्ञापेय का एक कप-इतना प्रसाद ग्रहण करने के इस कृत्य में प्रायः आधा घण्टा लग जाता है। इसके उपरान्त छः से आठ तक का साधना क्रम चलता है। इसी बीच यज्ञ में सम्मिलित होने की अपनी पारी भी निपट जाती है। इस प्रकार आठ बज जाते हैं।

आठ बजे सभी साधक अपनी भगौनी में अपना अमृताशन डालकर माताजी के पास पहुँचते और उन्हें सुपुर्द करते हैं। इसके बाद एक घण्टे का स्वाध्याय चलता है। इसमें आत्म-शोधन आत्म-परिष्कार और भविष्य निर्माण के तत्व जुड़े रहते हैं। किसे क्या पढ़ना चाहिए इसका क्रम भी आहार उपचार की तरह आरम्भ से ही निर्धारित कर दिया जाता है। सभी के पास पुस्तकें पहुँचती हैं और वापिस ली जाती हैं। यह व्यवस्था आश्रम की ओर से हैं। जिन्हें सुविधा है वे इच्छित पुस्तकें खरीद भी सकते हैं।

नौ बजे भोजन क्रम। सभी अपने पके हुए अमृताशन की भगौनी माताजी से लेकर वापस लाते हैं और अपने-अपने कमरों में उसे खाते हैं। इस प्रकार दस बज जाते हैं। दस से बारह तक यों घोषित रूप से विश्राम का समय है, पर वस्तुतः उस चिन्तन-मनन का समय कहना चाहिए। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी हो सकता है। हर साधक का निवास स्वतन्त्र कमरे में रहता है। पति-पत्नी साथ हैं तो भी उन्हें पृथक्-पृथक् कमरों में रहना पड़ता है। यह व्यवस्था इसीलिए बनी है कि साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।

प्रातः जो प्रज्ञापेय मिलता है। उसे जड़ी-बूटियों की बनी स्वादिष्ट साथ ही अधिक गुणकारी चाय कहा जा सकता है। यह वस्तुतः क्वाथ है, इसमें चाय का अंश नाम मात्र को भी नहीं है। यही सभी को प्रातः 5−30पर उपलब्ध होती है।

प्रत्येक साधक का उसके शारीरिक-मानसिक स्थिति के अनुरूप दिव्य औषधि में से एक का जड़ी-बूटी कल्प निर्धारण कर दिया जाता है। महीने में प्रायः प्रतिदिन 50 ग्राम निर्धारित औषधि का कल्प कराया जाता है। प्रज्ञापेय के पूर्व यह घुटटी-पिसी स्थिति में हर साधक को मिलता है। दोनों ही की व्यवस्था दैनिक यज्ञ की तरह आश्रम की ओर से हर साधक के लिये बिना मूल्य की जाती है। सायंकाल साधक गंगा दर्शन के लिये जाते हैं तो अपनी-अपनी सुराही में गंगाजल भरते आते हैं जिसका सेवन वे 24 घण्टे करते हैं।

कल्पकाल की अवधि में प्रारम्भिक और अन्तिम दिनों में क्या-क्या शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन साधकों में होते हैं, इनका विश्लेषण ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के निष्णात चिकित्सकों द्वारा बराबर किया जाता है। माह में लगभग चार बार उन्हें जाँच-पड़ताल के लिये गंगा तट अवस्थित शोध संस्थान जाना पड़ता है। आदि, मध्य और अन्त में हुए परिवर्तनों को देखकर यह पता चलता है कि आहार, औषधि, साधना, प्रायश्चित, एकान्त वास, मनन− चिन्तन, संयम तपश्चर्या आदि से किसकी शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या अन्तर पड़ा। पिछले साधना सत्रों में अधिकाधिक साधक सात्विक आहार की फलश्रुति अपने जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखकर गये। उनकी इन्द्रिय चेतना, स्फूर्ति और मस्तिष्कीय क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई।

शान्ति-कुँज में गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्रचण्ड प्राण ऊर्जा का सान्निध्य, मर्मज्ञ का मार्गदर्शन, दिव्य चेतना से भरा-पूरा वातावरण यह सभी मिल-जुलकर ऐसा माहौल बनता है जिसमें रहकर कोई व्यक्ति बिना किसी साधना के भी अपनी अस्त-व्यस्तता से मुक्ति पा सकता है। फिर आहार-कल्प प्रज्ञापेय और औषधि कल्प का उसमें त्रिवेणी संगम मिल जाने से सच्चे अर्थों में रामायण की वह उक्ति लागू होने लगती है जिसमें मंजुल फल देखिये तत्काल । काक होहिं पिक बकहुँ मराला।” की अलंकारिक उपमा देते हुए यह कहा गया है कि आकृति न बदलते हुए भी प्रकृति बदल जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हो सकती है। कल्प साधना के ये प्राथमिक उपचार अवलम्बन हैं जिनके सहारे साधक की मनोभूमि में असाधारण परिवर्तन आने की सम्भावना व्यक्त की गयी है।


आहार साधना एक महत्वपूर्ण तपश्चर्या

आहार कल्प स्वयं में एक परिपूर्ण चिकित्सा है। यह तो मात्र मन की दुर्बलता है जो व्यक्ति को भाँति-भाँति के आहार स्वादेन्द्रिय की तृप्ति ग्रहण करने हेतु लालायित करती रहती है। स्वास्थ्य के बिगड़ने, जीवनी शक्ति कमजोर होने की प्रक्रिया यहीं से आरम्भ होती है। अच्छा होता कि व्यक्ति प्रकृति में विचरण करते प्राणियों से कुछ शिक्षा लेता, अपना जीवन क्रम यथा सम्भव स्वाभाविक बनाये रखता। परन्तु कृत्रिम जीवन का अभ्यासी मनुष्य आज अपने ढर्रे में कोई परिवर्तन किसी भी परिस्थिति में स्वतः स्वीकार नहीं करता। प्रकृति ही अपनी ओर से उसे दण्ड देती है तो उसे रोग विषयों में पथ्या पथ्य के रूप में स्वाद को अच्छी लगने वाली वस्तुएँ बरबस छोड़ना पड़ती हैं।

इस ढर्रे को तोड़ने की विधि एक ही है, किसी तरह अपने वर्तमान परिकर से निकलकर न्यूनतम एक आहार पर रहने के क्रम को अपनाया जाय। इसके लिये किंचित् से मनोबल से ही काम चलाया जा सकता है। यह मृदु तपश्चर्या सफल हो गयी तो आगे कड़ी तपस्या भी सम्भव है। आहार कल्प की दृष्टि से सामान्यतया अमृताशन का प्रयोग सर्वसुलभ माना जाता है। गेहूँ, चावल, मूँग इन तीन के मिश्रण से दाल− चावल-दलिया-दाल का संयोग बनता है। अच्छा तो यह है कि एक धान्य से काम चलाया जाय। दलिया या चावल को दूध-गुड़ आदि के संयोग से स्वादिष्ट भी बनाया जा सकता है। अकेली मूँग भी उबाल कर एक महीने तक भोजन का काम भली प्रकार दे सकती है। आग्रह या असमर्थता हो तो दो का संयोग करना चाहिए। स्मरण रहे हर धान्य अपने आप में पूर्ण है। उसमें वे सभी वस्तुएँ मौजूद हैं जो शरीर के लिए आवश्यक हैं। सच तो यह है कि शरीर के पाचक रस ही विभिन्न खाद्यान्न को अपने उपयुक्त परिवर्तित करते और बदलते हैं। सुअर और दुम्बा मेढ़ा के शरीर में चर्बी की मात्रा अत्यधिक होती है। वे इसे मात्र घास से ही प्राप्त कर लेते हैं। जबकि घास में चर्बी का अंश अत्यल्प मात्रा में होता है। शरीरगत पाचक रस सत्तू जैसी स्वत्व रहित वस्तु को भी उलट-पुलट कर शरीर के लिए उपयुक्त क्षमता वाले रक्त में बदल देते हैं। शाकाहार में, एक अन्न, एक फल, एक शाक भर रहने में हर्ज नहीं। कल्प का वास्तविक तात्पर्य यही है। दूध कल्प, छाछ कल्प, आम्र कल्प, खरबूजा कल्प आदि का तात्पर्य ही यह है कि नियत अवधि तक उस एक ही वस्तु का सेवन किया जाय। दूसरी और कोई वस्तु पेट में न जाने दी जाय। एक अन्न से नाक भौं सिकोड़ते वालों के लिए ही मूँग की दाल का मिश्रण करके संख्या दो कर लेने की छूट दी गई है। अन्यथा उपयुक्त यही है कि किसी एक अन्न पर निर्भर रहा जाय। उसके साथ दूसरी वस्तु का मिश्रण न किया जाय। किसी खाद्य पदार्थ को अपना पूरा प्रभाव दिखाने का अवसर इसी आधार पर मिलता है। अन्यथा दो या अधिक वस्तुओं का मिश्रण करने पर हर वस्तु अपना प्रभाव खोती चली जाती है। मिश्रण के आधार पर नये-नये किस्म के चित्र-विचित्र प्रभाव उत्पन्न होते हैं और मूल विशेषता एक प्रकार से समाप्त ही होती जाती है।

अन्नों में प्राकृतिक अन्न कहीं अधिक प्राणवान होते हैं। गेहूँ, चावल आदि की प्रचलित किस्में चित्र विचित्र संकरत्व करके, विलक्षण-विलक्षण खाद देकर-कलम बनायी विकसित की गयी हैं। फलतः आकृति मूल रूप से मिलती-जुलती रहने पर भी उनके गुणों में भारी अन्तर आ गया है। ऐसी दशा में अच्छा तो यही होता कि मनुष्य की करतूत अछूत वन्य प्रदेशों में अपने आप उगने वाले धान्यों का प्रयोग कल्प काल में किया जाय। ऐसे धान्यों में उत्तर प्रदेश की भूमि में सामाँ, मकरा, माल-काँगड़ी चना, महुआ जैसे जंगली अन्न कुछ समय तक पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होते थे। गरीब लोग उन्हीं पर निर्वाह करते थे। वे अपेक्षाकृत अधिक पौष्टिक, सात्विक एवं गुणकारी होते हैं। जौ की एक प्राकृतिक किस्म ‘जई’ होती है। चावल में जंगली चावल को ‘साठी’ कहते हैं। इन सबके गुण पृथक्-पृथक् हैं। यदि इनमें से किसी एक अन्न का कल्प किया जा सके तो उसके चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होंगे।

कठिनाई एक ही है कि अब भूमि का उपयोग कीमती फसल उत्पन्न करने में होने लगा है। फलतः जंगली अन्नों के उत्पादन का क्षेत्र समाप्त होता चला जाता है। गरीब लोग भी अब उनके लिए प्रयत्न नहीं करते। फलतः वे अधिक पौष्टिक और सात्विक प्रजातियाँ क्रमशः लुप्त और समाप्त होती चली जा रही है। फिर भी उन्हें अन्न कल्प करना हो उन्हें इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि जिसका सेवन किया जाय वह सात्विक क्षेत्र में सात्विक खाद पानी से उत्पन्न किया गया हो। आजकल बूचड़-खानों का रक्त , मछली का खाद, मनुष्य के मल-मूत्र की खाद वाले एवं गन्दे पानी से सींचे गये अन्न अधिक मात्रा में उपजते तो हैं पर गुणों की दृष्टि से उनका स्तर घटिया एवं विकृत होता चला जाता है। रासायनिक खादें एवं कीट नाशक दवाएँ जब आहार का रंग बन जाती हैं तो पेट भरने के लिए उनका उपयोग भले ही होता रहे वे अल्प जैसे उच्चस्तरीय उद्देश्यों में प्रयुक्त होने योग्य रहती ही नहीं।

आहार की किस्म ही नहीं, उसका स्तर भी उत्तम हो तभी अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति भली प्रकार होती है। पकाने वाले के व्यक्ति त्व का प्रभाव भी कम महत्व का नहीं। चाहे जैसी प्रकृति आदत वाले, अस्वस्थ, अस्वच्छ, दुष्ट, दुर्गुणी, मूर्ख, अनगढ़ व्यक्ति का बनाया-परोसा भोजन भी उस उद्देश्य की पूर्ति में बाधा ही डालता है, जिसके लिए कि कल्प साधना जैसी तपश्चर्या की योजना बनी है।

अन्न के बाद फल, ऋतु फल, एवं शाक का नम्बर आता है। जिनका अपना बगीचा है वे बिना कलम वाले पेड़ पर पके फल लेकर कल्प कर सकते हैं। बाज़ार में जो बिकते है उनमें से बहुत कम ऐसे है जिनका कल्प के लिए उपयोग हो सके। आमतौर से वे पेड़ से कच्चे तोड़े जाते है। समय बीतते-बीतते पक जाते है या भूसी-अनाज आदि में दबाकर पकाये जाते हैं। इनका स्वाद भले ही मीठा हो जाय गुणों की दृष्टि से वे नितान्त कच्चे ही होते है और लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाते हैं। कलमी आम, बेर, चीकू, जामुन, अमरूद आदि का इन दिनों खूब प्रचलन है। आकार का स्वाद उनका भले ही बड़ा रहे पर वे अपनी मौलिक विशेषताओं से कहीं अधिक दूर हट गये होते हैं। अस्तु उनके प्रयोग की उपेक्षा ही की जानी चाहिए। वे महँगे भी तो होते है।

फलों के बाद मौसमी फलों की बारी आती है। इनमें आम, शहतूत, लीची, शरीफा, अनानास, बेर, अमरूद आदि को चुना जा सकता है। खरबूजा, तरबूज अपनी किस्म के आम है ये भी प्रयोग में लाये जा सकते हैं। शाकों में लौकी, तोर, परवल, टमाटर, गाजर, मूली, शलजम जैसी हलकी प्रकृति वाले ही लेने चाहिए। आलू, अरबी, शकरकन्द, जमीकन्द, रतालू आदि भी यों शाकों में गिने जाते हैं। वस्तुतः वे गुणों की दृष्टि से अन्न वर्ग में आते हैं, भारी पड़ते हैं। पत्तीदार शाकों में पालक, चौलाई, मेथी, सरसों ग्राह्य हैं पर उन्हें पूरे आहार की तरह पचाने की क्षमता किन्हीं-किन्हीं में ही होती है। जिनका पेट गड़बड़ाता है, उन्हें दस्त होने लगते हैं। पीपल, बरगद, गूलर, अंजीर किस्म के फल भी अपने प्रकृति के अलग ही हैं। महुआ का फूल भी इस प्रयोजन में आ सकता है पर इनका पूर्ण परीक्षण इसी प्रकार कर लेना चाहिए, जैसे कि पेनेसीलीन आदि के प्रयोग से पूर्व उसकी जाँचने या चमड़ी पर जाँच पड़ताल की जाती है। इनमें से किसी का प्रयोग करना हो तो पहले दस-पाँच दिन उन पर निर्भर रह कर पेट की क्षमता परख लेनी चाहिए। तब एक महीने की कल्प क्षमता में उनका निश्चित उपयोग करने की बात सोचनी चाहिए।

ये कल्प हर किसी से नहीं निभ पाते। अपनी मनःस्थिति अपने से नहीं सही आँकी जा सकती। मार्ग दर्शन से पूछे बिना किसी भी प्रयोग को आरम्भ न कर हर पक्ष पर पहले पूरा विचार कर लेना चाहिए। वर्णित धान्य फल, ऋतु फल, शाक आदि में से चाहे जो चुन लिया जाय ऐसा नहीं हो सकता। इन्हें उपचार की ही तरह प्रयुक्त किया जाता है इसके लिए निर्णय करने से पूर्व साधक की शारीरिक मानसिक स्थिति देखनी जाँचनी होती है। उपरोक्त खाद्यों में से प्रत्येक की अपनी-अपनी विशेषताएँ तथा खामियाँ हैं। इसी प्रकार किसी प्रकृति या परिस्थिति के लिए कोई वस्तु अनुकूल कोई प्रतिकूल पड़ती है। एक वस्तु सभी के लिए एक जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करें, ऐसा नहीं होता। इससे पेट के पाचक रसों को अभ्यस्त ढर्रे की भिन्नता के कारण एक ही खाद्य पदार्थ कई मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव छोड़ता है। इसलिए खाद्य की विशेषताएँ और उपयोगिताओं का अपनी भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए अनुभवी व्यक्ति यों को ही यह निर्णय करना चाहिए कि किसे किस अन्न-शाक या फल आदि का कल्प कराया जाय। इसमें उपभोक्ता की रुचि के साथ भी तालमेल बिठाने की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई व्यक्ति किसी पदार्थ से सर्वथा अरुचि व्यक्त करे तो उसके उपयोगी होते हुए भी मनोवैज्ञानिक कारणों से वह उलटी प्रतिक्रिया प्रकट करती है। जो लोग प्याज-लहसुन नहीं खाते उन्हें उनकी गन्ध तक नहीं सुहाती और लाभ-हानि की चर्चा करने से पूर्व ही उन्हें पूर्वाग्रहों के कारण उलटी आने लगती है। ऐसी दशा में कल्प कैसे हो?

जड़ी-बूटी कल्प का अपना पृथक् विज्ञान है। किस व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप किस बूटी के रासायनिक पदार्थ उपयोगी पड़ते हैं। इसका तालमेल बिठाते हुए ही यह निर्णय करना पड़ता है कि किसके लिए किसका उपयोग समाधानकारक रहेगा।

कल्प साधना में आहार कल्प की तरह बूटी कल्प भी कराया जाता है। इसके लिए उसे एक महीने तक 50 ग्राम नित्य कल्क पेट में पहुँचाया जाता है। कल्क से तार्त्पय है-पतली चटनी। लगभग ठण्डाई से कुछ गाड़ी सीरप स्तर की। निर्धारित बूटी का कल्क प्रातःकाल खाली पेट लिया जाता है।

कल्प प्रयोजन के लिए पाँच बूटियाँ ली गयी हैं। (1)तुलसी (2)शंख पुष्पी (3)ब्राह्मी (4)शतावरी (5)अश्वगंधा। यों उनके अतिरिक्त कई कल्प व्यवस्था में आयुर्वेद में प्रचलित हैं जिनमें (1)त्रिफला (2)हरीतकी (3)पुनर्नवा(4)आँवला (5)दिधारा (6)गिलोय (7)सोंठ (8)बिल्व (9)निर्गुण्डी (10)मुशली आदि प्रमुख हैं। किन्तु उन्हें विशेष परिस्थितियों में-विशेष व्यक्तियों के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। सामान्यतः उपरोक्त पाँच में से सभी अपने पुष्पों के अनुरूप सभी प्रकृति के व्यक्ति यों की काया तथा मानवीय संरचना के अनुसार सन्तुलन बिठाने में काम दे जाती है। युवा व्यक्ति यों को एक महीने में 50 ग्राम नित्य बूटी सेवन कराई जाती हैं। यह सेवन उतार-चढ़ाव का चांद्रायण पद्धति से होता है। प्रथम पन्द्रह दिन थोड़ी-थोड़ी करके मात्रा बढ़ाना और फिर बाद के पन्द्रह दिन में मात्रा को क्रमशः चढ़ाते चलना। कल्प प्रयोग की यह एक विशेष पद्धति है। बूटी कल्प में गंगाजल ही प्रयोग होता है। उसे पीसने-छानने-बनाते समय उस प्रयोजन के लिए निर्धारित नियमों का पालन करने वाले हाथ ही काम करते हैं। अन्नाहार एवं शाकाहार में पकने की पद्धति में भी अध्यात्म स्तर के साथ जुड़ी हुई पद्धतियाँ अपने-अपने प्रभाव का समावेश कर देती हैं और वह सामग्री अपने ढंग की आन्तरिक विशिष्टताओं से सम्पन्न हो जाती है।

पदार्थ के तीन स्वरूप हैं-ठोस द्रव तथा वायु। उसी को आहार में अन्न, जल और साँस के माध्यम से ग्रहण किया और जीवित रहा जाता है। इसी क्रम का स्तर बढ़ा दिया जाय तो उसकी प्रभाव परिधि स्थूल शरीर में आगे बढ़कर सूक्ष्म और कारण शरीर तक जा पहुँचती है कल्प साधना में वह आहार सेवन कराया जाता है जिसमें उसकी सूक्ष्म और कारण शक्ति भी संयुक्त रूप में सम्मिश्रित हुई हो। इस प्रकार उसे एक प्रकार का-तप साधन जैसा डडडड उपवास स्तर का-परम सात्विक एवं दिव्य औषधि जैसी विशेषताओं से युक्त करने का प्रयत्न किया जाता है। आहार की उत्कृष्टता एवं निर्माण तथा सेवन में जुड़ी हुई भावना का समावेश होने से उसका लाभ और भी अनेक गुना बढ़ जाता है।

अमृताशन में अन्न, बूटी कल्प और प्रज्ञापेय में जप तथा नित्य के अग्निहोत्र में सम्मिलित रहने पर वायुभूत आहार को मुख नासिका तथा अन्यान्य छिद्रों के माध्यम से भीतर पहुँचाया जाता है। यह समग्र समुच्चय ऐसा है जिसमें तीनों शरीरों के परिशोधन एवं संवर्द्धन-ये दोनों ही उद्देश्य भली प्रकार पूर्ण होते हैं। अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ मात्र व्यक्ति के अंग विशेषों का उपचार करती हैं और कारण समझे जाने वाले विष को अन्य विषाक्त द्रव्य से मारने का प्रयत्न करती है। किन्तु कल्प साधना में प्रयुक्त होने वाला आहार उपचार ऐसा है जिसमें मात्र निवारण-निराकरण नहीं वरन् परिवर्तन भी जुड़ा हुआ है।

अन्न को ब्रह्म कहा गया है। काया का समूचा ढाँचा प्रकारान्तर से खाद्य की ही परिणति है। व्यक्तित्व का गुण, कर्म, स्वभाव का-मूलभूत ढाँचा आहार के आधार पर ही बनता है। शिक्षा आदि से तो उस ढाँचे को संभाग संजोया भर जाता है। यही कारण है कि अध्यात्म विज्ञान में आहार की उत्कृष्टता की अन्तःकरण विचार तन्त्र एवं काय-कलेवर की पवित्रता प्रखरता को सर्वोपरि माध्यम माना गया है। व्रत उपवास में खाली पेट रहने के अतिरिक्त ऐसे पदार्थ सेवन करने का विधान है जो परम सात्विक हो तथा स्वल्प मात्रा के लिए गये हों। यह पद्धति कल्प साधना में अपनाई जाती है। इस प्रकार आहार साधना को एक प्रकार का उपवास समझा जा सकता है एवं इसके माध्यम से आत्म-परिष्कार की सम्भावना पर भली-भाँति विश्वास किया जा सकता है।


साधना ही नहीं जीवन निर्माण का अनुपम शिक्षण भी

मध्याह्न काल के दो घण्टे विश्राम के लिए मिलते हैं। उसमें नींद तो तभी लेनी चाहिए जब रात्रि को किसी कारणवश कमी रह गई हो। आमतौर से पेट अधिक भरा होने के कारण ही नींद उचटती है। यदि पेट हलका रहे तो गहरी नींद आने में कठिनाई न रहे। ऐसी दशा में दोपहर को सोने के लिए नहीं, थकान उतारने के लिए विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। इस अवधि में शान्त चित्त बिस्तर पर पड़े रहने के संयम भी विचार तन्त्र को चिन्तन और मनन में नियोजित रखना चाहिए। चिन्तन भूतकाल का और मनन भविष्य का होता है पिछले दिनों स्तर का समय बीता? कितना खाया पाया? इसका पर्यवेक्षण अपने को आत्मा मानकर करना चाहिए। शरीर मानकर इस प्रकार का विहंगावलोकन सम्भव नहीं। शरीर तो मात्र साधनों की न्यूनाधिकताओं, व्यक्ति यों की भली-बुरी गतिविधियों का और प्रभाव छोड़ने वाली घटनाओं के ऊहापोह में ही उलझा रहता है। यदि शरीराभ्यास में निमग्न रहकर आत्म-निरीक्षण किया जाएगा तो उपरोक्त स्तर का जाल-जंजाल ही मस्तिष्क पर छाया रहेगा और भूतकाल के आध्यात्मिक पर्यवेक्षण का कोई आधार ही न बन सकेगा। चिन्तन में अपने को आत्मा और शरीर को वाहन उपकरण भर मानने के उपरान्त ही वास्तविक हानि-लाभ का लेखा-जोखा ले सकना सम्भव होता है। सोचना यह होता है कि सृष्टा ने जिस प्रयोजन के लिए यह बहुमूल्य अमानत सौंपी उसका अभीष्ट उद्देश्य के निमित्त कितना, कब, किस प्रकार उपयोग हुआ? यदि पेट-प्रजनन की पशु-प्रवृत्तियों में ही वह अवसर चला गया तो तत्त्वतः बड़ी भूल हुई। मध्याह्न काल के विश्राम वाले दो घण्टे इसी ऊहापोह में व्यतीत होने चाहिए। अधिकाँश समय भविष्य के योजनाबद्ध निर्धारण का ताना-बाना बुनने में व्यतीत होना चाहिए। विचारणाएँ ही कालान्तर ये आकांक्षा बनती, क्रिया में परिलक्षित होती और भली-बुरी परिस्थितियों, परिणतियों का निर्धारण करती है। अस्तु, इस समय को कल्पनाओं की उड़ान नहीं वरन् सुनिश्चित लक्ष्य को पूरा कराने में असाधारण सहायता करने वाली प्रक्रिया मानना चाहिए।

मध्याह्न में बारह से एक तक का समय पूज्य गुरुदेव व वन्दनीया माताजी से परामर्श एवं आपस में अथवा प्रशिक्षकों के साथ परामर्श करने का है। विचारों के इस आदान-प्रदान के कई बार अत्यन्त महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगते हैं।

मध्याह्न से पूर्व बारह बजे तक साधना और मध्याह्नोत्तर 1 से 5 बजे तक चार घण्टे प्रशिक्षण का क्रम है। प्रशिक्षण में लोक-व्यवहार में शालीनता एवं कुशलता के समावेश की ऐसी शिक्षा आवश्यक समझी गई है जिससे व्यक्ति अपने गुण, कर्म, स्वभाव को पवित्र एवं प्रखर बना सके। सज्जनता की जितनी आवश्यकता है उतनी ही जागरूकता, सतर्कता की भी। भलो के साथ सहयोग की तरह अवांछनीय से आत्मरक्षा तथा कुचक्र आक्रमण को निष्फल बनाने की रणनीति को समझना, बरतना भी उतना ही आवश्यक है। ऐसी जीवन साधना सम्बन्धी रीति-नीति की एक कक्षा प्रतिदिन होती है और समझाया जाता है कि परिवार का पाठशाला, प्रयोगशाला बनाकर दुलार और सुधार का उभयपक्षीय अभ्यास किस प्रकार किया जाय? व्यक्ति को समाज के प्रति समुचित व्यवहार कैसे करना चाहिए इसका सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रयोग करने के लिए परिवार से बढ़कर और कोई क्षेत्र नहीं हो सकता। इसमें सत्प्रवृत्तियाँ बोने और सुखद उपलब्धियाँ कमाने के लिए अपना परिवार ही एक छोटा समाज एक छोटा राष्ट्र है। आत्मीयजनों को संस्कारवान्, स्वावलम्बी कैसे बनाया जा सकता है, अपना और कुटुम्बियों का भविष्य साथ-साथ उज्ज्वल कैसे बनाया जा सकता है-इसकी समन्वित प्रक्रिया परिवार निर्माण ही है। इसका दर्शन और अभ्यास करने के लिए कल्प साधना की एक कक्षा लगती है।

दूसरी कक्षा को समाज सेवा कहना चाहिए। इसमें वक्तृत्व कला, कुशल सम्भाषण एवं गायन-वादन के त्रिविध अभ्यास कराये जाते हैं। अपने समय की सबसे बड़ी विपत्ति ‘आस्था संकट’ है। अपने समय की सबसे बड़ी सेवा ‘लोकमानस का परिष्कार’ है। इसके लिए वाणी को मुखर करने और जन-जन के मन-मन तक युगान्तरीय चेतना का आलोक पहुँचाने की आवश्यकता है। यह कार्य वाणी को मुखर करने से शक्य हो सकता है। अस्तु, उस कौशल के अभ्यास की त्रिविधि कक्षाएँ बारी-बारी चलती है।

तीसरी कक्षा स्वास्थ्य संवर्धन की है। आसनों द्वारा शारीरिक और प्राणायामों द्वारा मानसिक रोगों का निवारण करने वाली योग चिकित्सा सर्वथा हानि रहित, परिपोषण एवं बलवर्धक है। आहार-बिहार को प्राकृतिक बनाने के नियमों से परिचित कराने के अतिरिक्त सर्वतोमुखी व्यायाम उपचार की प्रक्रिया आसन-प्राणायामों की वैज्ञानिक विधि-व्यवस्था में सम्मिलित है। इस कक्षा में उसका अच्छा-खासा अभ्यास करा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बीस जड़ी-बूटियों के माध्यम से सामान्य स्तर के सभी रोगों से निपटने की एक विशेष चिकित्सा पद्धति ब्रह्मवर्चस् शोध के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है। रोगियों को कष्ट मुक्त करने में यह चिकित्सा पद्धति जहाँ सन्तोषजनक फलदायक है वहाँ सर्वथा निर्दोष भी है। तीसरी कक्षा में इन्हीं सब जानकारियों और अभ्यासों का समावेश है।

चौथी कक्षा धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण की है। नवयुग के निर्माण में प्रमुखतया इसी स्तर के प्रयासों की प्रमुखता रहेगी । अन्तराल को परिवर्तित, परिष्कृत करने में धर्मतन्त्र की सफल हो सकता है। उसके साथ प्रगतिशीलता जोड़ते हुए लोक श्रद्धा में आदर्शों का सघन समावेश कैसे किया जा सकता है इसके सभी भेद-उपभेद उतार-चढ़ाव दर्शन-प्रयोग इस कक्षा में सिखाए जाते हैं। साधारणतया उन कर्मकाण्डों और प्रतिपादनों की संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित जानकारी इस कक्षा में करा दी जाती है। वह इस स्तर की है जिससे पौरोहित्य का समग्र उत्तरदायित्व निभाया जा सके। अग्निहोत्र, संस्कार, पर्व, कथा, ज्ञानगोष्ठी आदि की कामचलाऊ शिक्षा इस कक्षा के अंतर्गत मिल जाती है। इस माध्यम से श्रद्धा भरे वातावरण में ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का व्यावहारिक स्वरूप समझने-समझाने की सरल प्रक्रिया हाथ लगती है। संक्षेप इसे व्यक्ति परिवार और समाज के भावनात्मक नवनिर्माण की पुरातन एवं परीक्षित पद्धति कहा जा सकता है।

उपरोक्त चारों कक्षाएँ एक दिनों के बीच देकर अर्थात् हर दिन दो-दो होती हैं। इस प्रकार एक महीने की अवधि में चारों वर्गों के पन्द्रह-पन्द्रह भाषणों और अभ्यासों का एक समन्वित प्रशिक्षण बन जाता है। इतने कम समय में इतना विस्तृत एवं इतना महत्वपूर्ण समग्र शिक्षण बन पड़ना अद्भुत एवं अनुपम है। उसे ‘गागर में सागर’ की उपमा बिना संकोच दी जा सकती है, उपासना, साधना, आराधना के तीनों पक्ष इस चार घण्टे प्रतिदिन चलने वाली कक्षाओं में मात्र एक महीने सम्मिलित रहकर साधक अनुभव करता है कि उसने इतनी छोटी अवधि में जितनी उपयोगी जितनी सुनियोजित शिक्षा प्राप्त की कदाचित उतनी वह जीवन भर में उपलब्ध नहीं कर सका होगा। उच्चस्तरीय एवं सामयिक व्यवहार दर्शन की ऐसी समन्वित दिशाधारा अभी तक कहीं अन्यत्र नहीं देखी गई जैसी कि कल्प साधना के साधकों को सार-सूत्रों सहित, सरल प्रतिपादन एवं सुगम शैली में हस्तगत होती है।

सायंकाल सभी गंगादर्शन के लिए जाते हैं। इसी में टहलना तथा प्रकृति दर्शन भी हो जाता है। प्रातःकाल की तरह सायंकाल भी गायत्री माता की आरती में सब लोग सम्मिलित होते हैं। रात्रि को 7 से 8॥ तक प्रज्ञापुराण की कथा तथा भावभरे युग संगीत का कीर्तन होता है। इसके उपरान्त सभी अपने-अपने कमरों में जाकर सो जाते हैं। नींद न आने पर भी भगवान के ध्यान में निमग्न रहकर चुपचाप पड़े रहने का अनुशासन है जो सभी को पालना पड़ता है।


प्रशिक्षण में समग्र उत्कर्ष के बीजांकुर

कल्प साधना के दिनों में जिस स्तर का प्रशिक्षण दिया जाता है उसका आभास चारा भागों में विभक्त पाठ्य पद्धति से भली प्रकार मिल सकता है।

कक्षाओं में व्यक्ति त्व का विकास, परिवार में स्वर्गीय परम्पराओं को संस्थापन एवं समाज के साथ सघन सद्भावों का आदान-प्रदान यह तीनों ही तत्व संक्षिप्त किन्तु समग्र रूप से जुड़े हुए हैं। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के तीनों ही प्रयोजन इस छोटी-सी किन्तु सारगर्भित शिक्षण पद्धति के सहारे सधते हैं। इस प्रकार जिस सद्ज्ञान की महिमा शास्त्रार्थ ने समग्र कल्प सम्भव कर सकने के रूप में बताई है वह इस पाठ्य-पद्धति के साथ सम्पन्न होती है। अलंकार रूप में तीन महान सिद्धियाँ के तीन प्रत्यक्ष उपकरणों की चर्चा कथा-पुराणों में सुनने को मिलती। इनमें एक है-पारस दूसरा कल्पवृक्ष, तीसरा अमृत। यह तीनों ही प्रत्यक्षतः कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते, पर परोक्ष रूप में इनकी सत्ता और परिणति सद्ज्ञान के रूप में कहीं भी देखी जा सकती है।

पारस वह जिसे छूकर लोहा सोना हो सके। यदि ऐसा कोई पदार्थ इस संसार में रहा होता तो उसका प्रभाव यह होता कि संसार भर का लोहा येन-केन प्रकारेण सोना ही गया होता। लोहे की अपनी उपयोगिता है। वह सोने से पूरी नहीं हो सकती। फलतः सोना लोहे के भाव बिकता और लोहे की कीमत सोने जितनी हो गई होती। पारस का प्रत्यक्षतः कोई अस्तित्व नहीं। यदि वह है तो परोक्ष रूप से उस सद्ज्ञान में सन्निहित समझा जा सकता है जो व्यक्तित्व को सुसंस्कारी बनाता है। पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी आदतों को उखाड़कर उनके स्थान पर सुसंस्कारी आचरणों का, सुव्यवस्थित-सुनियोजित जीवनचर्या का अभ्यास कराता है। इसी आधार पर अभावग्रस्त, विपन्न परिस्थितियों से उत्पन्न हुए व्यक्ति भी अवरोधों से जूझते हुए अपना रास्ता आप बनाने और प्रगति कउंक सोपान तक जा पहुँचने में समर्थ हुए हैं। इस आधार को पारस नहीं तो और क्या कहा जाय?

कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर मनोकामनाएँ पूरी करा लेने के पीछे कोई आधार नहीं। यदि ऐसा रहा होता तो पात्रता, पुरुषार्थ और साधन-सहयोग अर्जित करने की किसी को आवश्यकता ही नहीं पड़ती। कुपात्र व्यक्ति भी उस पेड़ की छाया में बैठकर उन कामनाओं को पूरा करा लिया करते जो पात्रता की अगणित अग्नि-परीक्षाओं में से गुजरने के उपरान्त ही खरा-उतरने पर किसी के हाथ लगती है। तर्क, प्रमाण के आधार पर इस प्रकार के पेड़ का कहीं अस्तित्व नहीं। किन्तु सद्ज्ञान की विचार सारिणी ऐसी है जिसे अपनाने पर दृष्टिकोण निखरता है, दूरदर्शी विवेक उभरता है और हर स्थिति में सन्तुलन बनाए रहने वाला सौमनस्य सहज ही हस्तगत होता है जिसे अपने विचार तन्त्र का सदुपयोग आता है, जो मनःस्थिति और परिस्थिति का तालमेल बिठाने का अभ्यस्त है उससे आँगन में कल्पवृक्ष उगा हुआ ही समझा जाना चाहिए।

तीसरी दिव्य उपलब्धि अमृत है। उसे पीने वाले अमर होते बताए जाते हैं। प्रकृति विधान को जानने वाले समझते हैं-इस विश्व व्यवस्था में ऐसा विधान है ही नहीं कि जो वस्तु जन्मे वह मरे नहीं। एक दिन धरती, सूरज को भी मरना पड़ेगा फिर मनुष्य जैसे नगण्य प्राणियों की सत्ता को चिरस्थायी बने रहने की बात सोचना तो और भी उपहासास्पद है। तब अमृत किसे कहा जाय? क्या वह दिवास्वप्न भर है। जहाँ तक शरीर के अमर होने की बात है वहाँ तक उसे वैसा ही कहा माना जाना जा सकता है। किन्तु यदि सद्ज्ञान के उस पक्ष पर दृष्टि डाली जाय तो अन्तराल के आस्था क्षेत्र को समुद्र की तरह मान देता है तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि आत्मबल के धनी देवता और भौतिक साधनों के दैत्य का सहयोग जुटाने वाले समुद्र मन्थन की उस पौराणिक गाथा को अपने निजी जीवन व्यवहार में भी उतार सकते हैं।

व्यक्तिगत जीवन का परिशोधन जिस तपश्चर्या के आधार पर बन पड़ता है उसे बोलचाल की भाषा में संयम कह सकते हैं। संयम चार प्रकार के हैं-इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थसंयम और विचार संयम।

इन अनुशासनों में अपने आपको कस लेने वाले उन दिव्य विभूतियों को नष्ट-भ्रष्ट होते रहने से बचा लेते हैं जो सृष्टा ने हर स्तर की समर्थता बनाये रहने की दृष्टि से प्रचुर परिमाण में प्रदान की है। संयम-साधना का महत्व माहात्म्य समझा-समझाया नहीं गया इसे मनुष्य का परले सिरे का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। विश्राम, अपव्यय, आलस्य और कुकल्पनाओं में उलझे रहने से किस प्रकार विरत हुआ जा सकता है और बर्बादी को रोकने भर से किस प्रकार सुसम्पन्न बना जा सकता है इसका न बोध है न अनुभव। इस कमी को पूरा करने के लिए कल्पसाधना में भरसक प्रयत्न किया जाता है और अनगढ़ आदतों को सुसंस्कारिता के साँचे में ढाल सकने वाले बौद्धिक प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक अनुशासन के शिकंजे में कसा जाता है। इस प्रकार का उभयपक्षीय दबाव पड़ने से सुनियोजित जीवन जी सकने कौशल उभरता है जो इससे पूर्व उपयुक्त वातावरण न मिलने के अभाव में मात्र कथन श्रवण और श्रवण की सीमा में ही अवरुद्ध होकर रह जाता था।

यह स्थूल शरीर की कर्मक्षेत्र की बात हुई। यह भू लोक था। अब इससे आगे का भुवः लोक है। भुवः लोक अर्थात् विचार क्षेत्र। इसमें आमतौर से अविवेक ही छाया रहता है। इसी को भ्रम-जंजाल मायापाश, चक्रव्यूह, मृग तृष्णा, व्यामोह, भटकाव आदि नामों से जाना जाता है। मनुष्य का विचारतंत्र कितना सक्षम और कितना सुगठित है। यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मस्तिष्कीय क्षमता का प्रायः 7 से 73 प्रतिशत भाग ही आम आदमी के व्यवहार में आता है। यदि उसकी समग्र क्षमता का स्वरूप और उपयोग समझा जा सके तो उसकी परिणति इसी जीवन में ऐसी हो सकती है जिस देव-दैत्य के समतुल्य कहा जा सके। सामान्यों को असामान्य बनने का जिन्हें भी अवसर मिला है जब उसका सौभाग्य उद्भव इसी आत्म-चिन्तन और आत्म-निर्धारण के सत्साहस का समावेश करने से सम्भव हुआ है। इस प्रयोजन में सर्वप्रथम अपनी संचित मान्यताओं और आदतों से ही जूझना पड़ता है। इस धुलाई के बाद ही मनमोक्ष्य रंगाई का कार्य आरम्भ होता है। आत्म-शोधन-ब्रेन वाशिंग की प्रक्रिया में संचित गल्तियों का एक बारगी निराकरण करना पड़ता है और इसके लिए यथार्थता पर अवलम्बित विवेकशीलता की कुल्हाड़ी को निर्दयता के साथ चलाना पड़ता है। पूर्वाग्रहों का ऊबड़-खाबड़ पन समदड डडड करने में संचित आदमी और मान्यताओं की अग्नि परीक्षा करनी पड़ती है। खरे को सँजोने और खोटे को फेंकने का न्यायाधीशों जैसा निष्पक्ष मानस बनाना पड़ता है। नीर-क्षीर विवेक की-मोती चुनने, कीड़ों से परहेज की राजहंस वृत्ति इसी को कहते हैं।

आमतौर से हर किसी पर तत्काल के लाभ का नशा छाया रहता है। आकर्षणों की चकाचौंध आँखों को भ्रमग्रस्त बनाये रहती है। प्रचलन ही अनुकरणीय बनने और भेड़ों जैसा अन्धानुकरण करने को बाधित करते हैं। इसी भ्रम-जंजाल की उलझन में लोग आप ही अपने लिए मकड़ी जैसा जाल बुनते और स्वयं ही उसमें उलझकर बेमौत मरते देखे जाते हैं। रेशम के कीड़े भी यही मूर्खता करते रहते हैं। लपट में जल मरने वाले भौंरे और चासनी में पंख लपेट कर बेमौत मरने वाली मधुमक्खियाँ भी इसी प्रकार दुर्दशाग्रस्त होती है। पेट और प्रजनन की वासना प्रधान पशु प्रवृत्तियाँ अपनाने से भी काम नहीं चलता तो तृष्णा, अहंता की पूर्ति के लिए लोग अनाचार आक्रमण पर उतारू होते हैं और नर-पिशाचों की भूमिका निभाते हैं।

दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने वालों की दुर्गति देखते हुए जो आँखों में पट्टी बाँधने के लिए विवश करता है वह हठवादी अविवेक ही है। इसके चंगुल से यदि छूटा और नये सिरे से दूरदर्शी निर्धारण किया जा सके तो समझना चाहिए कि भुवः लोक में पहुँचा देने वाला कायाकल्प हो गया। इस प्रक्रिया को सम्पन्न कर सकने वाले निश्चित रूप से महामानव बनते हैं और असंख्यों को अनन्तकाल तक अनुकरण का प्रोत्साहन देते रहने वाले पदचिह्न छोड़ते हैं। स्वयं हँसते हैं। दूसरों को हँसाते हैं। स्वयं पार होते और दूसरों को पार कराते हैं। ऐसी विवेकशीलता अपनाकर कल्प-साधना के साधक अपना बौद्धिक कायाकल्प कर सकें ऐसी प्रशिक्षण-प्रक्रिया का सारगर्भित समावेश कल्प-साधना के अंतर्गत विवेकशीलता जगाने के रूप में किया जाता है।

तीसरा कारण शरीर है। इसे अन्तःकरण कहते हैं। इसके बुरे-भले स्तर को आस्था कहा जा सकता है। वह निकृष्ट भी होती है और उत्कृष्ट भी। इसी ध्रुव केन्द्र की प्रेरणा से पतन भी होता है और उत्थान भी। कौन किस स्तर पर उभरेगा? किसका भविष्य कैसा है? इसका पर्यवेक्षण किसी के आस्था संस्थान में जमी हुई मान्यताओं, भावनाओं, आकांक्षाओं का स्वरूप एवं प्रवाह देखते हुए सरलतापूर्वक किया जा सकता है। इस स्तर को कैसे परिवर्तित किया जा सकता है। इस स्तर को कैसे परिवर्तित परिष्कृत किया जाय यह पृष्ठभूमि बनाने में ब्रह्मविद्या ही सफल होती है। उस प्रयोजन का चिन्तनीय स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के आधार पर किया जाता है और प्रयोग पक्ष के लिए योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के विधि-विधानों का आश्रय लेना पड़ता है। कल्प साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।

उपरोक्त तीनों तथ्य व्यक्ति त्व को उभारने, सुधारने वाले हैं। इनके अतिरिक्त आत्म-कल्याण की तरह ही लोक-कल्याण का भी महत्व किसी प्रकार कम नहीं है। दोनों का समन्वित समावेश होने पर ही जीवन लक्ष्य की पूर्ति होती है। अस्तु न केवल आत्मोत्कर्ष की बात सोचनी पड़ती है वरन् विराट् की साधना वाले आत्म-विकास को भी ध्यान में रखना पड़ता है। यह कार्य वसुधैव कुटुम्बकम् के, आत्मवत् सर्वभूतेषु के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में उतारने से ही सम्भव होता है। इसका एकमात्र अभ्यास लोकमंगल की जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाने से ही सम्भव होता है। अस्तु, कल्प साधना के हर साधक को उस प्रक्रिया का अभ्यास कराया जाता है जो इन दिनों इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि महत्व की हैं। सर्वविदित है कि इन दिनों आस्था संकट से जूझना ही महाविनाश की विभीषिकाओं से विश्वमानव की प्राण रक्षा करने का एकमात्र उपाय है। सर्वविदित है कि यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि लोकमानस का परिष्कार यदि बन पड़े तो इतने ही साधनों से, इन्हीं परिस्थितियों में धरती पर स्वर्ग के अवतरण का दृश्य देखा जा सकता है मनुष्य के दृष्टिकोण में संकीर्ण स्वार्थपरता, वितृष्णा, उद्धत अहंमन्यता, अनाचारी उद्दण्डता घुस पड़ने से ही प्रस्तुत उपलब्धियाँ विकास में लगने के स्थान पर विनाश कृत्य में जुट पड़ी है। इस विपन्नता को उलटकर सीधा किया जा सके तो समझना चाहिए कि समस्त समस्याओं का हल निकल आया।

लोकमानस का परिष्कार ही विश्व व्यवस्था को बनाने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। प्रज्ञा अभियान का वही केन्द्र बिन्दु है। युग परिवर्तन के लिए विचार क्रान्ति की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। उसे कल्प साधना के साधक अपनी वर्तमान परिस्थिति एवं योग्यता में भी क्या कुछ कर सकते हैं इस नवसृजन योजना का हर पक्ष कल्प साधना के साधकों को सिखाया जाता है। इस प्रयोजन के लिए वाणी को मुखर बनाने की आवश्यकता तो अनिवार्य रूप में पड़ती है। इसके लिए समुदाय में दिए जाने वाले भाषण, व्यक्तिगत परामर्श का सम्भाषण एवं भावनाओं को लहराने वाले संगीत की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से कौन, किसे, किस मात्रा में अपना सकता है, यह व्यक्तिगत अभिरुचि का विषय है, पर इन तीनों को ही सिखाने की समुचित व्यवस्था कल्प साधना प्रशिक्षण के अंतर्गत की गई है। इन कलाओं में अभ्यस्त व्यक्ति लोकप्रिय और सम्माननीय बनता है, उपयोगी सहयोग सम्पादित करना है। इस लाभ से तो सभी परिचित है।


नियमित रूप से चलने वाली प्रज्ञायोग-साधना

कल्प साधकों की दैनिक उपासना पद्धति का मूल आधार प्रज्ञायोग हे इसका नित्य उपासना उपक्रम को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। जप-ध्यान जैसे भावना प्रधान कृपा ‘जिन्हें परिमार्जन-प्रखरता सम्पादन के लिये नित्य करना अनिवार्य है। (2)आत्मबोध की प्रातःकालीन साधना जिसमें दिन भर क्या किया जाना है, इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग किस प्रकार होता है इस पर चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है। उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है। परिणति स्वरूप इनसे उन विभूतियों का प्रत्यक्ष रसास्वादन होने लगता है जो अध्यात्म मार्ग पर सही रूप से संकल्पपूर्वक चलने वालों को मिलना चाहिए।

प्रज्ञायोग का दैनिक उपासना उपक्रम

उपासना उपक्रम में प्रधानता दो कृत्यों की है-जप जब ध्यान। दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। क्रम से चलते हुए ही मंजिल पार की जाती है। नित्य जल्दी उठकर साधक अपने आवश्यक कर्मों में निवृत्त होकर जीवन का शुभारम्भ उपासना के मंगलाचरण से करते हैं। इस क्रम में पाँच प्रमुख कृत्य हैं-आत्म शोधन (2)देव पूजन (3)जप (4)ध्यान विसर्जन-सूर्य अर्घ्यदान ये पाँचों चिन्ह पूजा की तरह निपटाने जाने वाले कृत्य नहीं हैं वरन् श्रद्धा विश्वास के सम्पुट से किये जाने वाले सोद्देश्य उपक्रम हैं। क्रिया के साथ भावना का जितना समन्वय होना उत्तम ही उसमें आनन्द आयेगा, मन लगेगा और सत्परिणाम हस्तगत होंगे। पाँचों ही उपासना उपचारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।

(1)आत्मशोधन

इष्टदेव के सामने आसन पर बैठकर पाँच कृत्य किये जाते हैं-[अ] पवित्रीकरण शरीर पर जल छिड़कना [ब] आचमन-चम्मच से तीन बार आचमन, [स] शिखा स्पर्श वन्दन, [द] प्राणायाम-श्वास को धीमी गति से खींचना-रोकना और धीरे से बाहर निकाल देना तथा अन्तिम, [इ] न्यास-वाही हथेली पर जल रखकर दायें हाथ की पाँच अंगुलियों से निर्धारित क्रमानुसार शरीर के प्रमुख अंगों को स्पर्श करना।

(अ) पवित्रीकरण-का अर्थ है आत्म− परिशोधन भगवान के अच्छे विचारों को मन में लाना है तो सर्वप्रथम उसे निर्मल पवित्र बनाया जाना आवश्यक है मंजे हुए बर्तन पर कलई अच्छी तरह चढ़ती है। कपड़ा धुला स्वच्छ हो तो रंग चढ़ने में कोई कठिनाई नहीं। मलीनताओं के रहते जीवात्मा परमात्मा के उच्च पद तक नहीं पहुँच सकती। शरीरगत पवित्रता एवं मन का निर्मलता की भावना रखते हुए पवित्रीकरण का कृत्य किया जाता है। बायें हाथ की हथेली में जल लेकर उसे दाहिने हाथ की हथेली से ढक कर मन्त्रोच्चारण समाप्त होने पर उसे अपनी समग्र काया पर छिड़कते हैं।

(ब) आचमन-प्रथम आचमन का अर्थ है-स्वास्थ्य की कुँजी स्वादेन्द्रिय पर नियन्त्रण, द्वितीय आचमन वाणी को सार्थक शालीन बनाने के लिए तथा तृतीय आचमन वाणी का देवत्व अभिव्यक्त करने− सत्परामर्श का गुण विकसित करने के लिये किया जाता है। मुख का शरीरगत स्वास्थ्य तथा वाणी के व्यवहार पक्ष का मानसिक स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। वाणी का अन्तिम भाव पक्ष अपने अन्दर वह प्रखरता विकसित करने से सम्बन्धित है जो मनुष्य जीवन को लोक कल्याण हेतु प्रेरित करती है-साक्षात् सरस्वती बनकर साधक की जिह्वा पर विराजती है। ये तीनों सुख के ही उपादान हैं। इनके महत्व को समझकर आचमन किया जाय। मन्त्र बोलने के पश्चात् आचमन से जल मुख को बिना छुए ढाला जाय।

(स) शिखा स्पर्श वन्दन-यह एक प्रकार का आध्यात्मिक झण्डा अभिवादन है। देश का प्रतीक तिरंगा झण्डा और धर्म का प्रतीक स्वस्तिक है। शिखा और यज्ञोपवीत हिन्दू संस्कृति के प्रतीक हैं जो शरीर पर प्रतिष्ठापित हैं।

शिखा साक्षात भगवती की प्रतिमा है, महानता की गंगोत्री हैं। चोटी की संस्कृति अर्थात् शिरोमणि संस्कृति। मस्तिष्क में ऐसे ही देवत्व युक्त विचारों की स्थापना के लिए संस्कृति के इस प्रतीक का वन्दन किया जाता है। उँगलियों में जल लगाकर पाँचों उँगलियों से मन्त्र बोलते हुए शिखा को स्पर्श करते हैं।

(द) प्राणायाम-जब तक शरीर में प्राण हैं, तभी तक वह स्थिर है। विचारणाएँ, भाव-सम्वेदनाएँ भी तभी तक हैं जब तक कि मनुष्य प्राणभूत है। प्राण शक्ति को आकर्षित करना ही प्राणायाम है। साधना विधान की पृष्ठभूमि ही प्राण तत्व के अनुसन्धान पर बनी है। फलस्वरूप मनीषियों ने अविज्ञात-चेतन जगत से उन रहस्यों को खोज निकाला, जिन्हें सिद्धियाँ-चमत्कार कहा जाता है। इन उच्चस्तरीय प्रक्रिया के लिये जिस पात्रता की आवश्यकता है उसका अभिवर्धन करने के लिये ही प्राणशक्ति का संचय किया जाता है। अपने भीतर के चुम्बक को शक्ति शाली बनाने, ओजस्, तेजस्, वर्चस् बढ़ाने के लिये ही प्राणायाम का उपक्रम किया जाता है। श्रेष्ठतम का संचय पूरक है, शक्ति −स्फूर्ति से अनुप्राणित होना अर्न्तः कुम्भक, अवांछित को-अन्तः की मलीनताओं को निकाल फेंकना रोचक क्रिया है। ताजा भोजन ग्रहण करने का आनन्द तभी मिलता है जब पहले से संचित मल निकाल बाहर किया जाय। इन तथ्यों को दृष्टिगत रख प्राणायाम की पूरी क्रिया की जाय। आत्मचेतना को स्फूर्तिवान् बनाने वाले इस पूरे कृत्य के साथ संकल्पों को सम्मिश्रित किया जाता रहे तो निश्चित ही वाँछित लाभ मिलते हैं।

(इ) न्यास-का अर्थ इस तथ्य का बोध कराना है कि मनुष्य को परमात्मा ने जो अंग प्रत्यंग प्रदान किये हैं उसका सही अर्थों में उपयोग करने पर ही जीवन सार्थक बनता, श्रेय मिलता और जीवात्मा देवात्मा के पद पर पदोन्नत होता हुआ परमात्मा के उच्च पद पर जा पहुँचता है। जिन अंगों [मुख, नासिका, नेत्र, कान, भुजाएँ, जंघाएँ] समस्त काया-स्पर्श किया जाय, उनके साथ-साथ यह भावना भी की जाय कि हमें इन्द्रिय विशेषों को कुमार्गगामी होने से बचाना व स्वयं में प्रखरता-पवित्रता का समावेश करना है। अन्त में सारी काया पर जब छिड़कते समय एक ही भाव रहे कि हमारा शरीर जिस परमात्मा की देन है, उसी की सेवा में लग जाय-प्राणपण से नियोजित होता रहे-कभी भी स्वार्थपरता के कुपथ पर न चले।

(2) द्वितीय कृत्य है-देवपूजन

प्रज्ञा युग के अवतरण को इस सन्धि बेला में सभी साधक महाप्रज्ञा को अपनी उपासना का आधार केन्द्र मानें। महाप्रज्ञा का प्रतीक गायत्री माँ का चित्र है। इसे सुसज्जित पूजा वेदी पर रखें। पवित्रता सम्पादन के प्रथम पाँच कृत्यों के बाद इष्ट से घनिष्ठता स्थापन के पंचोपचार को पूरी श्रद्धा के साथ विधिवत् सम्पन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप नैवेद्य-इन प्रतीक समर्पणों को आराध्य के सम्मुख प्रस्तुत करने को ही पंचोपचार अथवा देव पूजन कहते हैं। देवताओं के वरण से अपना मनुष्यत्व भी देवत्व से उसी तरह महकने लगता है, जैसे चन्दन के समीप रहने वाली झाड़ियाँ भी सुगन्धित हो जाती हैं। देवता हमें नमन वन्दन-समर्पण के बदले श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणाएँ ही देते हैं।

जल का अर्थ है नम्रता-सहृदयता अक्षत का अर्थ है-श्रमदान-अंशदान पुष्प का अर्थ है-प्रसन्नता-प्रगति शोभा। धूप-दीप अर्थात् स्वयं जलकर सुगन्ध आलोक का वितरण-पुण्य परमार्थ। नैवेद्य अर्थात् स्वभाव, चरित्र एवं दैनन्दिन व्यवहार में सज्जनता का माधुर्य। इन पंचोपचार द्वारा वस्तुतः व्यक्ति त्व को सत्प्रवृत्तियों से सुसम्पन्न करने का ही संकल्प उभारा जाता और विश्वास किया जाता है कि परमात्मा के साथ घनिष्ठता इससे कम में स्थापित नहीं हो सकती ये हैं तो प्रतीकोपचार, पर इनसे जुड़ी भावनाएँ-श्रद्धा समर्पण अध्यात्म की प्रगति पथ की यात्रा का महत्वपूर्ण सोपान है। एक-एक करके एक छोटी तश्तरी में इन पाँचों को पूजा अभ्यर्थना के उद्देश्य से समर्पित करते चलें।

(3) जप

जप और ध्यान ये दोनों उच्चस्तरीय साधना क्रम के मध्यवर्ती विधान के अंतर्गत आते हैं। पर इन्हें प्रज्ञायोग उपासना का प्रमुख आधार मानकर नित्य किया जाना अनिवार्य है। इनका एक ही उद्देश्य है-शरीर के जड़ और मन के अर्ध चेतन स्तरों को जो सामान्य स्थिति में अविकसित ही होते हैं, परिष्कृत बनाना, अपना आपा इतना ऊँचा उठा देना कि दिव्य सत्ता हमें आध्यात्मिक प्रगति के लिये वाँछित अनुदान कर सकें।

जप सामान्यतः गायत्री मन्त्र की न्यूनतम तीन माला का किया जाता है जो पन्द्रह मिनट में पूरा हो जाता है। अधिक बन पड़े तो अधिक उत्तम है। कल्प साधकों के लिए 11 माला प्रतिदिन का निर्धारण ताकि एक माह में 24 हजार का गायत्री अनुष्ठान पूर्ण हो सके। पूर्णाहुति सत्र समाप्ति के अन्तिम दिन करनी चाहिए। माला का उद्देश्य घड़ी से भी पूरा हो सकता है। नियत समय तक यदि ध्यान मिश्रित जप प्रक्रिया की जाती रहे तो भी वही लाभ मिलता है। होंठ-कण्ठ मुख के अंग-प्रत्यंग हिलते रहें एवं ध्यान कहीं और हो तो जप समय क्षेप बनकर ही रह जाता है। जप को एक प्रकार की मलशोधक रगड़ माना जाय जिस पर बार− बार घिसने पर वस्तुएँ चिकनी हो जाती हैं। साबुन रगड़ने से मैल छूटता है। घर में नित्य बुहारी लगानी होती है। बर्तनों को नित्य माँजना पड़ता है। मन पर नित्य ही वातावरण में उड़ती फिरने वाली दुष्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है। उस मलीनता को धोने के लिए नित्य ही उपासना करनी होती है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण होता है। ईश्वर को-उच्चस्तरीय आदर्शों को अपने स्मृति पटल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए नित्य उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। स्मरण से आह्वान, आह्वान से स्थापना और स्थापना से उपलब्धि की क्रम व्यवस्था मनोविज्ञान द्वारा भी तर्क सम्मत सिद्ध होती है।

चेतना के प्रशिक्षण के चार अभ्यास सर्वविदित हैं। शिक्षण प्रक्रिया में पहले लर्निंग, फिर रिटेन्शन, फिर रिकाँल एवं फिर रिक्रिएशन-इन चार उपक्रमों को अपनाना होता है। लर्निंग अर्थात् पुनरावृत्ति-बार-बार याद करना, रिटेन्शन अर्थात् प्राप्त जानकारी को अभ्यास का अंग बना लेना, रिकाँल अर्थात् अपनी विस्मृत जानकारी को कुरेद बीन कर पुनः संजीव कर लेना एवं रिक्रिएशन अर्थात् मान्यता प्रदान कर देना। आदर्शों को-श्रेष्ठता को बार-बार याद कर उन्हें अभ्यास का अंग बनाना-अपने प्रसुप्त सुसंस्कारों को उत्तेजित कर जगाना एवं उन्हें श्रद्धा-विश्वास में परिणति कर देना ही जप प्रक्रिया का मूल प्रयोजन है। जब तक पत्थर पर रस्सी की रगड़ नहीं लगेगी, निशान नहीं पड़ेगा। हमारी कठोर मनोभूमि पर श्रेष्ठता के संस्कार स्थापित करने के लिये उनका बार-बार स्मरण जरूरी है। जप प्रक्रिया को एक प्रकार से चिन्तन क्षेत्र की जुताई कह सकते हैं। खेत को बार-बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है, फसल लहलहाती है। नाम जप का आशय यही है कि जब तक आदर्शों के प्रति अगाध निष्ठा और व्यवहार में उतारने की परिपक्वता न उत्पन्न हो, अपने चिन्तन को सतत् उस दिशा में क्रियाशील रखा जाय।

जप शब्द विज्ञान पर आधारित एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। शब्दशक्ति एक प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा है जो प्रसुप्त को जगाती-दिव्य सामर्थ्यों का उद्भव करती है। शब्द प्रवाह के साथ उनके प्रभावोत्पादक चेतन तत्व भी जुड़े होते हैं। वे ध्वनि कम्पनों के साथ घुले रहकर जहाँ भी टकराते हैं, चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं। साधना का परिणाम सिद्धि है। शरीर-मन-अन्तःकरण में चक्रों-ग्रन्थियों भेद-उपत्यिकाओं के रूप में दिव्य विलक्षण क्षमताएँ विद्यमान हैं, जिन्हें जगाया जा सके तो व्यक्ति अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न देवमानव-महामानव बन सकता है। यदि जप में मात्र क्रिया ही नहीं, ईश्वर को अपने अन्तराल में घुल जाने के लिए आग्रहपूर्वक आमन्त्रित करने को प्रधानता दी जाने लगे तो जप सार्थक हो जाता है।

(4) ध्यान

परम तत्व में मन को नियोजित करने के लिए जप के साथ ही ध्यान की अनिवार्य हो जाता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उसका सुधार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होते रहने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में प्रभात कालीन स्वर्णिम सविता देव की किरणों के शरीर में प्रवेश होने की भावना की जाती है। इस दिव्य ऊर्जा द्वारा अन्तःकरण में श्रद्धा, मस्तिष्क में प्रज्ञा, काया में निष्ठा के दिव्य अनुदान उतरने की मान्यता को परिपक्व किया जाता है। इन दोनों में से जो भी जिसे अनुकूल पड़े, अच्छा लगे, जप के साथ करना चाहिए। चित्त की एकाग्रता जप और ध्यान के समन्वय से ही बन पड़ती है। आत्म-सत्ता पर दिव्यता की छाप बिना एकाग्र हुए पड़ती नहीं।

आध्यात्मिक ध्यान का एकमात्र उद्देश्य है अपने स्वरूप और लक्ष्य की विस्मृति के कारण उत्पन्न विपन्नता से छुटकारा पाना। जीवन का लक्ष्य पूर्णता प्राप्त करना है। यह पूर्णता ईश्वरीय स्तर की ही हो सकती है। आत्मा को परमात्मा के समकक्ष बनाने के लिये पूर्णता प्राप्ति के लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करना होता है। चारों ओर संव्याप्त उद्विग्नताओं से-विक्षोभों से मस्तिष्क को उबारने, उसे सन्तुलित स्थिति में बने रहने का अभ्यास ध्यान साधना द्वारा ही सम्भव है। ध्यान का अर्थ-चिन्तन प्रवाह को अवांछित दिशा से हटाकर सुनियोजित कर देना। स्थिरता नहीं लक्ष्य के साथ तल्लीनता ध्यान है। भटकाव का स्वेच्छाचार रोककर मन को नियत निर्धारित दिशा में-इष्ट की ओर लगाना होता है। इसका लाभ आत्मिक एवं भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है। पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने पर कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का पथ प्रशस्त होता है। मन एक प्रकार का जंगली हाथी है जिसे पकड़ने-पालतू बनाने-प्रशिक्षित करने के लिए ध्यान का रस्सा ही काम आता है। सधी हुई बुद्धि ऐसे नियन्त्रित मन को सत्प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है। आत्मिक क्षेत्र में ध्यान की यही प्रक्रिया प्रसुप्त शक्ति यों के जागरण से लेकर ईश्वर प्राप्ति तक का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है।

(5)सूर्यार्ध्य दान-पूर्णाहुति-नित्य उपासना के इस अन्तिम कृत्य में पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रूप में चढ़ाया जाता है। इसके पीछे भाव एक ही है-आलोक फैलाने वाले आदर्शों को कभी अभिसिंचन की कमी न पड़ने पावे। हमारी कामना उस समय यही रहे कि हे सूर्य भगवान —हमारे द्वारा समर्पित यह जल भाप बनकर आकाश में उड़ जाये। यह यज्ञ कृत्य भविष्य में कभी बन्द न हो। हमारा श्रद्धा समर्पण से भरा यह अन्तिम कृत्य जितने गहरे स्तर का होगा, हम कभी अन्तः की सम्पदाओं से रिक्त नहीं होगे। हमारा अपना वैभव समष्टिगत सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में काम आये, यही सूर्यार्ध्य का भाव है। परमात्मा सत्ता से मिलन, शरणागति, एकत्व आदि अभिव्यक्ति यों का व्यावहारिक स्वरूप यही है कि हमारा जीवन, छोटे कलश तक सीमित न रहे-वह बाहर निकले-भगवान के, समष्टि के काम आये।

इतना करने पर प्रज्ञायोग साधना का उपासनापरक पूर्वार्ध समाप्त हो जाता है। चिंतनपरक उत्तरार्ध दो चरणों में आत्म बोध एवं तत्व बोध की साधना के रूप में सम्पन्न होता है।


प्रज्ञायोग की आत्मबोध, तत्त्वबोध प्रक्रिया

आत्मिक प्रगति का एक ही मार्ग पिछली योनियों में रहते समय जो पिछड़े संस्कार चेतना भूमि में जड़ जमाकर जहाँ-तहाँ बैठे हुये हैं उनका उन्मूलन किया जाय और देवी प्रवृत्तियाँ जो अभी तक समुचित परिणाम में अभी तक प्राप्त नहीं हो पाई उन्हें प्रयत्नपूर्वक अपनाया और बढ़ाया जाये। किसान वही करता है पिछली फसल के ठूँठों, झंखाड़ों को खोद-खोदकर ढूँढ़ना, ढूँढ़कर एक स्थान पर एकत्र करना और उन्हें आग लगाकर जला डालना-इतना करने के बाद खेत को खाद पानी देते-जुताई गोढ़ाई करते हैं तब कहीं बीज डालने का अवसर आता है। इससे पूर्व ही कोई बीज बिखेरने की मूर्खता तो कर सकता है पर उस स्थिति में उसे प्रतिफल प्राप्त करने की उसी तरह आशा नहीं करनी चाहिये जिस तरह सूखे आकाश से जल वृष्टि की कल्पना करना व्यर्थ होता है। आत्म-साधना भी ऐसी ही कृषि है जिसमें उपज के लिये किसान जैसी कलाकारिता से कम में काम नहीं चलता।

आत्मिक प्रगति का भवन चार दीवारों से मिलकर बनता है, चार स्तम्भों के सहारे खड़ा होता हे उन आधारभूत चार पाओ को आत्म-चिन्तन आत्म-सुधार (3)आत्म निर्माण तथा आत्म-विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन चारों में से किसी एक को भी छोड़कर आगे नहीं बड़ा जा सकता। भोजन के साथ जल की आवश्यक है शाक और फल भी, अकेले धोती या कुर्ता वेषभूषा परिपूर्ण नहीं बनाते उनके साथ टोपी और बनियान हो तो पूर्णता आती है इन चारों में से एक भी ऐसा नहीं जिसकी उपेक्षा कर के आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बड़ा जा सके।

1—आत्म चिन्तन

आत्म चिन्तन का अर्थ है-आत्म-समीक्षा अपना शवच्छेद। प्रयोगशालाओं में पदार्थों का विश्लेषण वर्गीकरण करके देखा जाता है इसमें कौन-कौन से तत्व मिले हैं, पोस्ट मार्टम में यह देखा जाता है आखिर मृत्यु शरीर के किस अंग में चोट और अवरोध उत्पन्न होने के कारण हुई। आत्म-चिन्तन का अर्थ यह ढूँढ़ना है कि परमात्मा की दी हुई विभूतियों और अमानतों का कितने अंश में सही उपयोग हुआ। हर श्रेष्ठ मनुष्य को दिनचर्या में सुव्यवस्थित श्रम की दृष्टि से कुशल चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान। आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मावलम्बी व आत्म सम्मानी होना चाहिये। ऐसा तभी सम्भव है जब आन्तरिक विभूतियों का और बाह्य साधनों का सदुपयोग हो। आत्म चिन्तन में अपने गुण स्वभाव और कर्म की कड़ाई के साथ परीक्षा करनी पड़ती है उसमें आत्मा को दीन-दलित बनाने वाले तत्व तो नहीं आ घुसे। उन्हें एक-एक करके खोज निकालना और मार भगाने का उपक्रम बनाना ही चिन्तन है।

ऐसा करते समय शरीर और आत्मा को भिन्न न माना गया, दोनों के हितों का वर्गीकरण न किया गया तो शरीर की अनावश्यक माँगों को, इन्द्रिय लिप्साओं को आत्म-हित मान लेने की भूल होती रहेगी। स्मरण रहे चरित्र और व्यक्तित्व को ऊँचे उठाने वाले प्रामाणिकता को खरा सिद्ध करने वाले आदर्श कर्तृत्व ही आत्मा की विभूतियाँ हैं उनके विकास की कल्पना करना ही सच्चे अर्थों में आत्म चिन्तन कहा गया है।

इस प्रक्रिया को वैयक्तिक जीवन की दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन करके ही पूरा किया जा सकता है यह आत्मिक प्रगति का दूसरा चरण है। परमात्मा का प्रकाश जहाँ भी प्रकट होगा वहाँ सर्वप्रथम दुष्ट दुर्बुद्धि पर कुठाराघात होगा, अज्ञान अन्धकार मिटेगा वह आदतें जो अब तक अपनी प्रसन्नता का कारण बनी हुई थीं और बार-बार ललचाती रहती थीं उनकी निरूपयोगिता तुरन्त सिद्ध हो जाती है वे स्वतः निरर्थक उगने लगती हैं और उन्हें निकाल बाहर करने का साहस भी उमड़ने लगता है।

तो भी यह कार्य उतना आसान नहीं। इन्द्रियों का दमन होने पर वे मरती नहीं और अधिक उत्तेजित हो उठती हैं उस स्थिति में मानसिक सन्तुलन और दृढ़ता बनाये रखना, बार-बार वैराग्य भावना मस्तिष्क में उपजाते रहना आवश्यक है तभी आत्म-सुधार का क्रम पूरा होता है। इसमें निर्दयता भी अपनानी पड़ती है, तप तितीक्षा इस प्रचलित ढर्रे में परिवर्तन का ही दूसरा नाम है। यह दूसरा चरण उठ जाने पर प्रगति का चक्र गतिशील हो उठता है।

आत्म निर्माण का तीसरा चरण है आत्म निर्माण-अर्थात् श्रेष्ठ सज्जनों के गुण, कर्म, स्वभाव की जो विशेषताएँ होनी चाहिये उनकी पूर्ति के लिये योजनाबद्ध प्रयत्न। कँटीली झाड़ियाँ हटाई भर जायें तो एक ओर झाड़ियों के फिर से जड़ पकड़ लेने की आशंका रहेगी तो दूसरी ओर फूलों के खिलने से जो सुवास और सौंदर्य उपलब्ध होने वाला था वह भी हाथ नहीं आ सकता। बीमारी दूर हो गई यह आधा काम हुआ, अब स्वास्थ्य संवर्द्धन की व्यवस्था भी हो, व्यायाम भी हो टहलना और पुष्टिकारक आहार भी आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में सद्गुणों के परमार्थ के गुणों को धारण करके यह प्रतिष्ठापना की जाती है व्रत धारण किये जाते हैं श्रेष्ठता संवर्द्धन के संकल्प उबारे जाते हैं और उन पर चल पड़ने का अभ्यास किया जाता है तभी इस तृतीय चरण की पूर्ति होती है।

आत्मोत्कर्ष की अन्तिम भूमिका आत्म-विकास की है। सन्त, शहीद और सुधारक इस चतुर्थ भूमिका के ही उपादान होते हैं। चौथेपन में संन्यास का विधान शास्त्रों में है वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते ज्ञान, कर्म, भक्ति पक जाते हैं। जीवन की नश्वरता आत्मा का अविनाशी भाव स्पष्ट हो जाता है, सारा समाज एक कुटुम्ब और सम्पूर्ण सृष्टि अपने घर जैसी लगने लगती है। विश्व बन्धुत्व और वैराग्य की भावनाओं को इस स्तर तक पहुँचा देने से जिस तरह संन्यासी का जीवन समाज के लिये समर्पित हो जाता है उसी तरह की भावना इन चतुर्थ भूमिका में पहुँचने के लिये अपनानी पड़ती है। अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं, नाम, यश, पथ प्रतिष्ठा को नितान्त हेय मानकर अपनी क्षमताओं के सच्चे हृदय से लोक-कल्याण में उपभोग की रूपरेखा बनानी पड़ती। धर्म, समाज और संस्कृति के लिये काम करने में रस लेना पड़ता है आत्म-विश्वास की यह चतुर्थ भूमिका जितनी परिपक्व होती जायेगी जीवात्मा उतने ही अंशों में महात्मा, देवात्मा और परमात्मा के रूप में विकसित होती चली जायेगी।

कल्प साधना में आत्म-विकास के इन चारों ही खण्डों की पूर्ति के लिये उपयुक्त उपकरण, वातावरण और साधनाओं का अभ्यास कराये जाने की व्यवस्था की गई है।

एकान्त सेवन अन्तर्मुखी जीवनचर्या का अभिनव अभ्यास कराने की दृष्टि से आवश्यक माना गया है। इसे गुफा प्रवेश की उपमा दी जाती है। तपश्चर्यओं में एक गुफा प्रवेश भी है। सब ओर से अपने को समेट कर आत्म केन्द्रित होने-अन्तःजगत में प्रवेश करने-आन्तरिक पर्यवेक्षण एवं परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए वातावरण नितान्त आवश्यक है। आमतौर से मन बहिर्मुखी रहता है। बाहर के जाल-जंजाल बुनता रहता है। फलतः आत्म विकृति बढ़ती जाती है। शरीर और शरीर से सम्बन्धित हेरा-फेरी ही सब कुछ बन जाती है और अपना स्वार्थ ओछे लक्ष्य तक विस्तृत हो जाता है। शरीर और उससे सम्बन्धित साधना ही व्यक्ति की सब कुछ बन जाते हैं। अपने आपे का होश हवास खो बैठने वाले मद्यप जिस प्रकार बेतुके आचरण करते हैं प्रायः वही स्थिति मानसिक क्षेत्र में ध्वामोहग्रस्तों की होती है। इसी झुठलाने-छलावे को माया कहा जाता है। माया के बन्धन अति निविड़ माने जाते हैं।

व्यामोह से-भव बन्धन से उतरने के लिए भी चार उपाय हैं। दो बाह्य दो आन्तरिक। बाह्य निर्भरता वाले स्वाध्याय एवं सत्संग है। आत्म निर्भर दो हैं-एक चिन्तन दूसरा मनन। इन चारों को चारपाई के चार पाये कहा जात सकता है। हाथ, पैर, धड़, सिर-इन चार भागों में शरीर विभक्त है। इसी प्रकार आत्म-निर्माण के लिए भी इन चारों का मनोयोग के साथ अवलम्बन करना पड़ता है। एकान्त एक कमरे की व्यवस्था इसी के लिए बनी है कि साधकों को उपयुक्त वातावरण में उपयुक्त अभ्यास करने में सुविधा रहे। उपरोक्त चारों अभ्यासों में से स्वाध्याय के लिए तो एक घण्टा आठ से नौ बजे तक का निर्धारित है। सत्संग के क्रम में प्रातः छः बजे नादयोग के साथ-साथ अपने कमरे में ही फिट किये गये स्वतन्त्र लाउडस्पीकर पर गुरुदेव का प्रवचन सुनने को मिल जाता है। इसके अतिरिक्त बारी-बारी से साधकों की वर्गीकृत टोलियाँ बारह से एक तक गुरुदेव के पास व्यक्ति गत परामर्श के लिए पहुँचती है। मार्गदर्शन का सामूहिक भाषण प्रवचन तो अब नहीं होते पर नियत समय पर आवश्यक विषयों पर परामर्श करने की अभी भी छुट है। इस अवसर पर पारस्परिक वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान भी हो जाता है। सत्संग इतना ही पर्याप्त माना गया है। हजम हो सके तो इतना ही पर्याप्त है। इस कान से सुना उस कान से निकाला वाली अन्यमनस्कता चले तो फिर सारे दिन बकवास करते और सुनते रहते भी कुछ लाभ नहीं। अध्यात्म तत्त्वदर्शन के कुछ सीमित सूत्र हैं उन्हीं को हृदयंगम करने और स्वभाव का अंग बनाने और व्यवहार में उतारने से बात बनती है। अन्यथा वाक् विलास की तरह समय क्षेप के लिए घण्टों तथाकथित सत्संग जहाँ तहाँ चलते ही हैं। स्पष्ट है कि चिकने घड़ों जैसे श्रोता और मेंढकों जैसे टर्राने वाले वक्त अपने समय की ही बर्बादी करते हैं। शान्ति कुँज में ऐसी छूट नहीं है यहाँ अन्तरंग प्रभावित करने वाले प्राणवान वातावरण का विकास करने में पूरी सतर्कता बरती गई है।

स्वाध्याय की तरह चिन्तन, मनन को परिष्कृत प्रखर और प्रगाढ़ बनाना भी आवश्यक है। कल्प साधना की अवधि में तीन दृश्य आँखों के सामने घूमते रहने चाहिए। इनमें एक है-भवसागर में डूबना, मगरमच्छों द्वारा निगलकर उदरस्थ किए जाने से पूर्व नौका पर अवस्थित महाप्रज्ञा द्वारा उबार लिया जाना। दूसरा है-हाथ में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में लौह जंजीर की जकड़न, बढ़ने और करने में असमर्थता, दिव्य लोक से चक्र सुदर्शन का उतरना और उन बन्धनों को काटकर भव-बन्धनों से मुक्त कर देना। तीसरा है-सघन अन्धकार को छोड़कर उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य प्रकाश केन्द्र तक पहुँचने वाली सीढ़ी पर एक− एक कदम उठाते हुए ऊपर उठना, आगे बढ़ना। क्रमशः लक्ष्य बिन्दु के समीप पहुँचते जाना। यह तीनों चित्र गायत्री चित्रावली में दिए हुए हैं। उन्हें बार-बार निहारते रहने से यह भाव-चित्र और भी अधिक सजीव होते जाते हैं। बार-बार उन्हीं का ध्यान करने, उन्हीं पर मन जमाते रहने से अपनी स्थिति तथा स्तर का ज्ञान होता है। दुःखद दुर्गति तथा सुखद सम्भावनाओं के मध्य आज की अपनी चयन कुशलता की परख होने वाला भाव उठता है। यदि उत्कृष्टता के लक्ष्य तक पहुँचना है तो साथियों की तलाश छोड़कर एकाकी बढ़ चलने का विवेकवान् साहस जुटाना है। यही है अपनी परिस्थितियों का भावात्मक चित्रण जिसके सहारे अपने आज के निर्धारण को बल मिलता है। उपरोक्त तीनों चित्र कल्प-साधना के दिनों अधिकाधिक समय तक भावना-क्षेत्र पर आरूढ़ रहने चाहिए।

मात्र शरीर के लिए जिया जाने वाला, वासना, तृष्णा, अहंता की अथाह गहराई वाला गर्त ही भवसागर है। उससे उबरने के लिए दूरदर्शी विवेकशीलता-महाप्रज्ञा का अंचल पकड़ना होता है। वैसा न करने पर रोग, शोक, पतन पराभव के मगरमच्छों द्वारा निगलना और दुर्गतिग्रस्त बनाया जाना निश्चित है। इस विभीषिका से बचने में ही कुशलता है।

भव बन्धन-लोभ मोह, विलास, अहंकार है। इन्हीं के लौहपाशों में जकड़ा मनुष्य बन्दी गृह की यातना सहता है। अपंग, असमर्थ जैसी गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहता है। इसे आदर्शवादी संकल्प साहस को चक्र सुदर्शन ही काटने में समर्थ है। इस ब्रह्मास्त्र को कल्प-साधना के दिनों में सम्भावित अनुदान माना जाना चाहिए।

पतन स्वाभाविक है। उत्थान के लिए एकाकी पराक्रम का ही आश्रय लेना पड़ता है। ईमान और भगवान की सहायता से ही इस मार्ग पर चल सकने का बल पैरों में आता है। यह बल देवत्व का है। इसे सद्गुरु परब्रह्म परमात्मा से ही प्राप्त किया जा सकता है।

उपरोक्त तीनों कल्पना चित्रों के साथ यह संगति भी बिठानी चाहिए कि उबारने वाली नौका, बन्धनमुक्त करने वाला चक्र और लक्ष्य तक ऊँचा उठा ले जाने वाला अनुदान कल्प साधना के दिनों अपने ही इर्द-गिर्द उपलब्ध है। उसे हस्तगत करने के लिए इन दिनों अपने भावभरे प्रयास प्राणपण से चलने चाहिए और इस सुयोग-संयोग का परिपूर्ण लाभ मिलना चाहिए।

कल्प साधना काल में इसी प्रकार के उच्चस्तरीय विधेयक विचारों को मन में भरे रखा जाय ताकि अभ्यस्त अनगढ़ चिन्तन को निरस्त कर सकना सम्भव हो सके। संयम, अनुशासन और सृजन की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले विचार ही इन दिनों अपनाएँ जाएँ। शेष को विजातीय तत्व मानकर उन्हें दूर ही रखा जाय।

समग्र जीवन की इस रीति-नीति को भुला न दिया जाये उसके लिये कल्प साधना सत्र में आत्मबोध और तत्त्वबोध के दो अभ्यास सिखाये जाते हैं आत्मबोध प्रातःकालीन अभ्यास है। प्रातःकाल बिस्तर से सोकर जागते ही बिस्तर पर ही पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर ध्यान मुद्रा में बैठें। तीन बार लम्बे-लम्बे श्वास लें और धीरे-धीरे साँस बाहर निकाल दें। साँस इतनी गहरी लें कि वह नाभिचक्र तक भर जाये। तीन बार यह क्रिया करने के उपरान्त अँगड़ाई लें और पुनः ध्यान मुद्रा में चले जायें अपने इष्ट को सम्मुख हुआ अनुभव करें यह नया जन्म हुआ है। परमात्मा के दिये हुए इस उपहार के मानवोचित गरिमा के साथ जियेंगे। पिछले दिन पिछले जन्मों में भूलों की पुनरावृत्ति नहीं होने देंगे दिन भर की दिनचर्या ऐसी रहेगी जिसमें सामान्य कृत्यों में भी असामान्य भावना परमार्थ परायणता के भाव जुड़े रहेंगे। मनुष्य को अन्य जीवों की तुलना में अधिक अनुदान और उपहार परमात्मा ने दिये है उसे कृतज्ञतापूर्वक स्मरण रखेंगे और ऐसा कोई कार्य न करेंगे जिससे पश्चात्ताप का सन्ताप भुगतना पड़े स्वयं को आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने के साथ-साथ संपर्क में आने वाले सभी व्यक्ति यों के साथ सज्जनता शिष्टाचार और उदारता का भाव बनाये रखेंगे।

इन्हीं भावनाओं से भरे हुए सर्वप्रथम धरती माँ का तीन बार चरण वन्दन करें और कल्पना करें हमारा जीवन धरती माता के समान ही सहनशील, उर्वर और परोपकारी बना रहेगा। इसके बाद शैया का परित्याग कर दें और दैनिक कृत्य में लग जायें। आत्म-बोध के इस अभ्यास में कुल 15 मिनट लगते हैं, पर यदि इन आदर्शों को सच्चाई से धारण कर लिया गया तो जंग लगे लोहे जैसा जीवन पारस र्स्पश से सोना बन जाने जैसी महान् उपलब्धि से विभूषित हो सकता है।

तत्त्वबोध की साधना रात्रि के समय के लिए निर्धारित है इसमें भी आत्मबोध जितना ही 15 मिनट का समय लगता है। रात्रि को सोने से पूर्व शैया पर पड़े-पड़े जीवन के अन्त का स्मरण करें। मृत्यु को अनिवार्य अतिथि मानें। उसके उपरान्त ईश्वर के दरबार में पहुँचने और जीवन सम्पदा के सदुपयोग-दुरुपयोग के सम्बन्ध में लेखा-जोखा माँगे जाने की बात सोचें। बरते हुए प्रमाद की परिणति निकृष्ट योनियों में भटकने, यन्त्रणाएँ सहने और पतन पराभव के गर्त में गिरने की यथार्थता को समझें। लोक के साथ परलोक को भी जोड़ें। वर्तमान ऐसा बनायें जिससे निर्वाह ही नहीं भविष्य भी सधे। सोते समय इन्हीं भावनाओं को लेकर चिर निद्रा की तरह दैनिक निद्रा की गोद में चले जायें। आज के दिन की समीक्षा करें। बन पड़े दोष दुर्गुणों का पश्चात्ताप प्रायश्चित्त करें और कल के लिए ऐसा विचार करें कि इसे आज की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ समुन्नत बनाना है। यह तत्त्वबोध साधना निद्रा से पूर्व पन्द्रह मिनट तो चलना ही चाहिए। उसमें कल्पना को चिन्ह पूजा जैसी विडम्बना नहीं यथार्थता जैसी अनुभूति रहनी चाहिए।

प्रज्ञायोग के उपरोक्त प्रयोगों को कल्प साधना सत्र समाप्त होने के उपरान्त भी नियमित रूप से जारी रखना चाहिए। समय का अभाव रहे तो 11 माला के स्थान पर 3 या 5 माला का नियम भी संकल्पपूर्वक चलाया जा सकता है। संकल्प पूर्वक से तात्पर्य है उसकी नियमितता का निर्वाह। इसमें अनुशासन का समावेश रहे, इसलिए निभाया जाना चाहिए। व्यस्तता में साधना का समय कम किया जा सकता है। स्नान आदि न बन पड़े तो जिस भी स्थिति में रहना पड़े उस स्थिति में मानसिक रूप से भी उसे किया जा सकता है। प्रधानता अनुशासन की है। अपना संकल्प अखण्ड बना रहे यही प्रयास हो, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो।


कल्प-साधना का क्रिया पक्ष

चिन्तन, आदत और विश्वास अन्तराल के यह तीन अंग है। इन्हें क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त कहते हैं। मनःक्षेत्र की यह तीन परतें हैं। इन्हीं को तीन शरीर स्थूल, सूक्ष्म, कारण भी कहते हैं। पंच भौतिक काया तो इन तीनों की आज्ञा एवं इच्छा का परिवहन मात्र करती रहती हैं। आत्मसत्ता इनसे ऊपर है।

उपरोक्त तीनों शरीरों की परोक्ष स्थिति को परिष्कृत करने के लिए योगाभ्यास में तीन साधनाएँ हैं। स्थूल को मुद्राओं से, सूक्ष्म को प्राणायाम से और कारण को योगत्रयी से परिमार्जित किया जाता है। मुद्राओं में तीनों प्रधान है-शक्ति चालिनी मुद्रा, (2) शिथिलीकरण मुद्रा, (3) खेचरी मुद्रा। प्राणायामों में तीन को प्रमुखता दी गई है—(1) नाड़ी शोधन प्राणायाम, (2) प्राणाकर्षण प्राणायाम, (3) सूर्यभेदन प्राणायाम। योगाभ्यासों में तीन प्रमुख हैं—(1) नादयोग, (2) बिन्दुयोग, (3) लययोग। कल्प साधना में इन नौ का अभ्यास इन 9 के अतिरिक्त है। क्रियायोग के यह तीन प्रयोग साधक के त्रिविधि शरीरों को परिष्कृत करने की उपयोगी भूमिका सम्पन्न करते हैं। शरीरों के हिसाब से इनका वर्गीकरण करना हो तो स्कूल शरीर के निमित्त शक्ति चालिनी मुद्रा, नाड़ी शोधन प्राणायाम और नादयोग की गणना की जायगी। सूक्ष्म शरीर के निमित्त प्राणाकर्षण प्राणायाम, शिथिलीकरण मुद्रा और बिन्दुयोग को महत्व दिया जाता है। कारण शरीर में खेचरी मुद्रा, सूर्यभेदन प्राणायाम और लययोग का अभ्यास किया जाता है।

हर साधक को उन नौ को एक साथ करना आवश्यक नहीं। त्रिविधि योग साधनाएँ तो सभी को सामान्य परिमार्जन करने की दृष्टि से आवश्यक माना गया है। वे हर स्थिति के साधक को साथ-साथ चलाने का प्रावधान है। नादयोग, बिन्दुयोग और लययोग का अभ्यास सभी कल्प साधकों की दिनचर्या में सम्मिलित है।

मुद्रायें तथा प्राणायाम तीन-तीन हैं। इनमें से साधक के अन्तराल का सूक्ष्म निरीक्षण करके एक-एक का निर्धारण करना पड़ता है। तीनों मुद्रायें, तीनों प्राणायाम भी तीन योगों की तरह प्रतिदिन साधने पड़े ऐसी बात नहीं है। मुद्राओं में से एक, प्राणायामों में से एक का ही चयन करना होता है। इस प्रकार तीन योग, एक मुद्रा, एक प्राणायाम का पंचविधि कार्यक्रम हर एक की दिनचर्या में सम्मिलित रहता है।

इसे प्राकारान्तर से पंचकोशी साधना भी कह सकते हैं। अन्तमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश की पंचमुखी उच्चस्तरीय साधना भी इसी को कह सकते हैं। इनके प्रतिफलों की उपमा पाँच प्रमुख देवताओं के पाँच प्रमुख वरदानों से दी गई है। (1)ब्रह्मा, (2)विष्णु, (3)महेश, (4)गणेश, (5)दुर्गा। उपरोक्त पाँच साधनाओं को इन पाँच देवताओं की साधना भी कह सकते हैं। पाँच कोशों को पाँच प्रकार के रत्नों का, पंच रत्नों का भण्डार माना गया है। विभूतियाँ पाँच ही हैं। इन्हीं ऋद्धि-सिद्धियों का समावेश समझा जा सकता है। (1)संयम, (2)साहस, (3)दिव्य दृष्टि, (4)स्वर्ग, बन्धन-मुक्ति —इन पाँचों के अंतर्गत ही प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन की समस्त सम्पदाओं-सफलताओं का समावेश हो जाता है।

कल्पसाधना के साधक यदि श्रद्धा, प्रज्ञा एवं निष्ठा का समुचित समावेश करते हुए इनकी साधना में संलग्न रहे तो वे अपने में आश्चर्यजनक परिवर्तन का अनुभव करेंगे। काया का रूपान्तरण तो कठिन है। उसे दुर्बलता और रुग्णता से ही एक सीमा तक उबारा जा सकता है। परिवर्तन तो सदा अन्तराल का ही होता है। इसी आधार पर क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनने का अवसर मिलता है। कामना का भावना में क्षुद्रता का महानता में, तृष्णा का उदारता में जिस अनुपात में परिवर्तन होता है उतना ही साधक सत्ता का स्तर ऊँचा उठता चला जाता है।

अपूर्णता से पूर्णता की ओर अग्रसर करने वाली इसी पुण्य-प्रक्रिया का नाम कल्प साधना है। उसे अध्यात्म-चिकित्सा की श्रेणी में गिना जा सकता है। काय-चिकित्सा के लिए आयुर्वेद, तिब्बती, एलोपैथी, होमियोपैथी, नेचुरोपैथी आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं। मानसिक चिकित्सा के लिए सामान्यतया स्कूल, शिल्प, उद्योग, कला, कौशल आदि का अभ्यास करना पड़ता है। गुरुकुल, आरण्यकों के वातावरण में रहना पड़ता है। स्वाध्याय-सत्संग भी इसी प्रयोजन के लिए है। तीसरा क्षेत्र कारण शरीर का बचता है। इसके लिए साधना ही एकमात्र आधार है। उसे तपश्चर्या और योग के आधार पर ही गलाया ढलाया जाता है। शरीर नरम है। मन उससे कठोर, अन्तःकरण को अतिकठोर माना गया है। उस पर जन्म-जन्मान्तरों की मान्यताएँ, इच्छाएँ तथा आदतों की, भूगर्भ में पाई जाने वाली चट्टानी परतों से भी कठोर सतह जमी होती हैं। उन्हें तोड़ने, उखाड़ने के लिए डायनामाइट की सुरंगों का प्रयोग करना पड़ता है। इसी प्रयोग का नाम अध्यात्म साधना है।

अन्तःकरण के परिवर्तन में इन्हीं को अपनाना पड़ता है। अध्यात्म लक्ष्य की दिशा में बढ़ने वालों को साधना का साहस सँजोना ही पड़ता है। प्राचीनकाल में भी यही क्रम चलता रहा है और अब भी उसी मार्ग पर धीमे या तेजी से चलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

शारीरिक रुग्णता को दूर करने का दावा करने वाले चिकित्सालयों की कमी नहीं। मानसिक विकास एवं परिष्कार के प्रयासों में संलग्न शिक्षण संस्थाएँ भी बहुत हैं। आवश्यकता एक ही ऐसी थी जो सर्वोपरि महत्व की होते हुए भी सर्वाधिक उपेक्षित पड़ी थी। वह है-अन्तःकरण को परिमार्जित, परिष्कृत करने की अध्यात्म चिकित्सा। इस संदर्भ में कुछ कहने लायक कारगर व्यवस्था कहीं दीखती ही नहीं। जो चल रहा है उसमें भ्रान्तियों एवं निहित स्वार्थों का इतना अधिक समावेश हो गया है कि होना, न होने भी अधिक भारी पड़ता है। इस संदर्भ में कल्प साधना को आन्तरिक की, बालकला वर्ग की तो कहा जा सकता है पर है वह ऐसी जिसमें ब्रह्मविद्या के शाश्वत सिद्धान्तों को अक्षुण्ण रखते हुए, समय के परिवर्तन और बुद्धिवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी समुचित समावेश रखा गया है।

अन्यान्य अनुशासनों तथा निर्धारणों के अतिरिक्त जहाँ तक योगाभ्यासों का सम्बन्ध है उसे उपरोक्त पंचम प्रयोगों के रूप में समझना, समझाना चाहिए। शरीर पाँच तत्वों से बना है। चेतना भी पाँच प्राणों से विनिर्मित है। दोनों को पिछड़ेपन और पतन-प्रवाह से उबार कर भौतिक क्षेत्र में अग्रगामी और आत्मिक क्षेत्र में ऊर्ध्वगामी बनाने की आवश्यकता है। गायत्री को पंचमुखी कहा गया है। उसके पाँच ज्ञानपक्ष और पाँच क्रियापक्ष हैं। ज्ञानपक्षों में (1)ज्ञानयोग, (2)कर्मयोग, (3)भक्ति योग, (4)प्रज्ञायोग, (5) परमार्थयोग की पंचधा व्यवस्थाएँ हैं।

कल्प साधना में जहाँ पंच ज्ञानपक्षों का उपरोक्त निर्धारण है वहीं पंचधा क्रिया योगों का भी स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का समर्थ तन्त्र खड़ा करके संचित कषाय-कल्मषों का निष्कासन एवं उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन किया जाता है। इस प्रकार इस आरम्भिक सोपान को भी निर्धारण की दृष्टि से पूर्णता युक्त कहा जा सकता है।

क्रिया-कृत्यों के सही स्वरूप के निर्धारण अवलम्बन में जितनी जागरूकता एवं तत्परता की आवश्यकता पड़ती है उससे भी अधिक इस क्षेत्र में श्रद्धा का सघन आरोपण आवश्यक होता है। इसके अभाव में सारी विधि-व्यवस्था मात्र कलेवर बनकर रह जाती है और प्राण रहित काय-कलेवर की तरह उसकी भी मात्र दुर्गति ही होती है। दस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में उबर कर अध्यात्म उपचार और संवर्द्धन का उभयपक्षीय प्रयोजन पूर्ण करने के लिए कल्प साधना का उपक्रम प्रस्तुत किया जाता है।


त्रिविध मुद्राएँ और उनकी प्रतिक्रियाएँ

शरीर के स्थूल अवयवों के विशिष्ट व्यायामों को आसन कहते हैं। वे साधारण कसरतों से भिन्न हैं। कसरत की पहुँच प्रधानतया माँस-पेशियों तक सीमित रहती है। नस-नाड़ियों पर भी उनका प्रभाव पड़ता है किन्तु आसनों की विशेष व्यवस्था में ऐसे आधार सन्निहित हैं जिनके सहारे भीतरी अवयवों को प्रभावित किया जा सके। आमाशय, आँखें, जिगर, गुर्दे, फेफड़े, हृदय और प्रमुख अवयवों को उनके द्वारा प्रभावित किया जाता है। उनकी असमर्थता एवं रुग्णता के निवारण में आसनों द्वारा विशेष सहायता मिलती है। किस स्थिति में किस आसन का उपयोग कितने समय तक किया जाय, इसके लिए साधक की शारीरिक, मानसिक स्थिति का पर्यवेक्षण आवश्यक है। निदान के उपरान्त ही उपयुक्त उपचार की बात बनती है। इस संदर्भ में व्यायाम को अधिक स्थूल एवं आसनों को अधिक गहरी पहुँच वाला सूक्ष्म माना जाता है।

इनके उपरान्त गहराई की तीसरी परत में मुद्राओं का नम्बर आता है। वे प्रधानतया इन्द्रियों की रहस्यमयी शक्ति से सम्बन्धित हैं। उनका प्रभाव इतनी गहराई तक पहुँचता है कि ज्ञानेन्द्रियों की क्षमता अधिक प्रखर बनाई जा सके और यदि उनमें किसी प्रकार दुर्बलता, रुग्णता का समावेश हो गया है तो उसका निराकरण, निवारण आरम्भ हो सके।

हठयोग के प्रयोगों में बीस मुद्राओं का उपयोग होता है। उनमें से कुछ का प्रभाव शारीरिक, कुछ का मानसिक, कुछ का कारण क्षेत्रों की गहराई तक होता है। इनमें से सभी को जानना, सीखना कल्प साधना साधकों के लिए न तो आवश्यक है और न उपयोगी। उनमें से जो प्रमुख प्रभावोत्पादक, अधिक सरल एवं अधिक उपयोगी परिणाम उत्पन्न करने वाली हैं मात्र ऐसी ही तीन को लिया गया है। प्राणायामों की तरह मुद्राओं में भी तीनों का प्रयोग नहीं करना पड़ता है वरन् स्थिति के अनुरूप जो सरल हो उन्हीं को उस अवधि में कार्यान्वित कराने के लिए निश्चित किया जाता है।

मुद्राओं में से तीन ली गई हैं (1) शक्ति − चालिनी मुद्रा (2) शिथिलीकरण मुद्रा (3) खेचरी मुद्रा। इनमें से शक्ति चालिनी का सम्बन्ध मूलाधार से है। कुण्डलिनी का निवास केन्द्र वही है। पौरुष, प्रजनन, उत्साह इसी केन्द्र से सम्बन्धित हैं। शक्ति − चालिनी के आधार पर मूलाधार को जागृत, नियन्त्रित एवं अभीष्ट उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। शिथिलीकरण मुद्रा का सम्बन्ध हृदयचक्र से है। उस स्थान पर जीवनीशक्ति , बलिष्ठता एवं तेजस्विता का सम्बन्ध है। भावनाओं को दिशा देना भी इसी क्षेत्र के प्रयत्नों से बन पड़ता है। तीसरी खेचरी मुद्रा है। इसका सम्बन्ध ब्रह्मरन्ध्र, सहस्रार कमल से है। पुराणों में इसी को क्षीरसागर, कैलाश पर्वत की उपमा दी गई है। यहाँ मन, बुद्धि, चित्त से सम्बन्धित सभी तन्त्र विद्यमान हैं। खेचरी मुद्रा के द्वारा उनमें से किसी को भी, किसी भी प्रयोजन के लिए जागृत एवं तत्पर किया जाता है। मंदता, तनाव से लेकर मनोविकारों तक में इस केन्द्र की सहायता ली जा सकती है।

अध्यात्म विज्ञान में सूक्ष्म शरीर की तीन रहस्यमयी शक्ति यों का उल्लेख है—(1) ब्रह्म ग्रन्थि (2) विष्णु ग्रन्थि (3)रुद्र ग्रन्थि। ब्रह्म ग्रन्थि खेचरी मुद्रा से, विष्णु ग्रन्थि शिथिलीकरण से और रुद्र ग्रन्थि शक्ति चालिनी से सम्बन्धित है। इन तीनों के स्वरूप, कारण, रहस्य, अभ्यास एवं प्रतिफल साधना ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक बताए गए हैं। उन सबका सार-संक्षेप इतना ही है कि मस्तिष्क, हृदय और प्रजनन तन्त्र में वरिष्ठता उत्पन्न करने के लिए उपरोक्त तीन मुद्राओं की साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।

तीनों मुद्राओं का परिचय इस प्रकार है—

शक्ति चालिनी मुद्रा

यह मुद्रा वज्रासन या सुखासन में बैठकर की जाती है। इसमें मल एवं मूत्र संस्थान को संकुचित करके उन्हें ऊपर की ओर खींचा जाता है। खिंचाव पूरा हो जाने पर उसे धीरे से शिथिल कर देते हैं। प्रारम्भिक स्थिति में दो मिनट व धीरे-धीरे पाँच मिनट तक बढ़ाते हुए यही क्रिया बार-बार दुहराओ । उड्डियान बंध में स्थित आँतों को ऊपर की ओर खींचा जाता है। यह क्रिया स्वतः शक्ति चालिनी मुद्रा के साथ धीरे-धीरे होने लगती है। पेट को जितना ऊपर खींचा जा सके, खींच कर पीछे पीठ से चिपका देते हैं। उड्डियान का अर्थ है-उड़ना कुण्डलिनी जागृत करने-चित्तवृत्ति को अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी करने की यह पहली सीढ़ी है। इससे सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है, मूलाधार चक्र में चेतना आती है। इन दोनों क्रियाओं के द्वारा समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर ऐसा सूक्ष्म विद्युतीय प्रभाव पड़ता है जिससे इस शक्ति स्रोत के जागरण व मेरुदण्ड मार्ग से ऊर्ध्वगमन के दोनों उद्देश्य पूरे होते हैं।

(2) शिथिलीकरण मुद्रा योगनिद्रा

इस मुद्रा का अभ्यास शवासन में लेट कर अथवा आराम कुर्सी पर शरीर ढीला छोड़कर किया जाता है। यह क्रिया शरीर मन, बुद्धि का तनाव से मुक्त करके नयी चेतना से अनुप्राणित कर देती है। साधक को शरीर से भिन्न अपनी स्वयं की सत्ता की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

कोलाहल मुक्त वातावरण में शवासन में लेटकर पहले शरीर शिथिलीकरण के स्वयं को निर्देश दिये जाते है। शरीर के निचले अंगों से आरम्भ करके शनैः-शनैः यह क्रम ऊपर तक चलाते हैं। हर अंग को एक स्वतन्त्र सत्ता मानकर उसे विश्राम का स्नेह भरा निर्देश देते हैं। कुछ देर उस स्थिति में छोड़ कर धीरे से श्वास तीव्र करके शरीर को कड़ा और फिर ढीला होने का निर्देश दिया जाता है। धीरे-धीरे शारीरिक शिथिलीकरण सधने पर क्रमशः मानसिक शिथिलीकरण एवं दृश्य रूप में शरीर पड़ा रहते देखने, चेतन सत्ता के सरोवर में ईश्वर को समर्पित कर देने की भावना की जाती है।

शिथिलीकरण योगनिद्रा का प्रथम चरण है। अचेतन को विश्राम देने-नयी स्फूर्ति दिलाने तथा अन्तराल के विकास-आत्मशक्ति के उद्भव का पथ-प्रशस्त करने की यह प्रारम्भिक क्रिया है।

(3)खेचरी मुद्रा

शान्त मस्तिष्क को ब्रह्मलोक और निर्मल मन को क्षीर सागर माना गया है। मनुष्य सत्ता और ब्रह्म लोकव्यापी समष्टि सत्ता का आदान-प्रदान ब्रह्मरन्ध्र मार्ग से होता है। यह मस्तिष्क का मध्य बिन्दु है, जीवसत्ता का नाभिक है, यही सहस्रार कमल है। मस्तिष्क मज्जा रूपी क्षीरसागर में विराजमान् विष्णु सत्ता के सान्निध्य और अनुग्रह का लाभ लेने के लिए खेचरी मुद्रा की साधना की जाती है। ध्यान मुद्रा में शाँत चित्त से बैठकर जिह्वा भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पन्दन किये जाते हैं। इस उत्तेजना से सहस्रदल कमल की प्रसुप्त स्थिति जागृति में बदलती है। बन्द छिद्र खुलते हैं और आत्मिक अनुदान जैसा रसास्वादन जिह्वा भाग के माध्यम से अन्तःचेतना को अनुभव होता है। यही खेचरी मुद्रा है।

तालु मूर्धा को कामधेनु की उपमा दी गई है और जीभ के अगले भाग से उसे सहलाना-सोमपान पय कहलाता है। इस क्रिया से आध्यात्मिक आनन्द की उल्लास की अनुभूति होती है। यह दिव्यलोक से आत्मलोक पर होने वाली अमृत वर्षा का चिन्ह है। देवलोक से सोमरस की वर्षा होती है। अमृत कलश से प्राप्त अनुदान आत्मा को अमरता की अनुभूति देते हैं।

तीनों ही मुद्राएँ भावना प्रधान हैं। चिन्तन के साथ भाव-सम्वेदनाएँ जितनी प्रगाढ़ होंगी उतनी ही क्रिया प्राणवान बनेंगी। कृत्य को ही सब कुछ मानने वालों को इस मूलभूत तथ्य को सर्वप्रथम हृदयंगम कर लेना चाहिए।


Quotation

स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विंमुच्यते-चाणक्य

जीव आप ही कर्म करता आप ही फल भोगता है, आप ही संसार में भ्रमता, आप ही उससे मुक्त होता है।


तीन विशिष्ट प्राणायाम और उनके प्रतिफल

प्राणवान बनने के लिए लोक व्यवहार में भी कई उपाय हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राणविद्या के सहारे भी इस क्षेत्र में बहुत प्राप्त किया जा सकता है। प्राण उपचार के कितने ही मार्ग हैं जिनका संकेत प्रश्नोपनिषद् में सूक्ष्म विवेचना के साथ किया गया है। संक्षेप में वह साधना ‘प्राणायाम’ की प्रक्रिया द्वारा सधती है। विज्ञात प्राणायामों की संख्या 84 हैं। अविज्ञात इससे भी अधिक हो सकते हैं। कल्पसाधना के साधकों को प्राणवान बनाने के उद्देश्य से ऐसे निर्धारण चुने गए हैं जो सर्वसुलभ हैं। जिनके प्रयोग में लाभ तो बहुत है किन्तु कोई भूल रहने पर भी हानि होने की तनिक भी आशंका नहीं है।

ऐसे तीन प्राणायाम कल्प साधना के एक मास में कराए जाते हैं। हर एक को तीन नहीं। इनमें से एक ही उसकी स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए निर्धारित किया जाता है। उसे एक महीने तक नियत समय पर नियत विधि से करते रहना होता है।

नाड़ी शोधन को एक प्रकार से आयुर्वेदोक्त पंचकर्म के समतुल्य माना जा सकता है। शारीरिक मलों के निष्कासन में दमन, विरेचन, स्वेदन, नस्य के पाँच उपाय अपनाए जाते हैं और विभिन्न अवयवों में भरे हुए संचित मलों को निकाल बाहर किया जाता है। इसके उपरान्त ही बलवर्धक रसायन पूरी तरह काम करते और प्रभाव दिखाते हैं। नाड़ीशोधन प्राणायाम का भी सूक्ष्म क्षेत्र में वही प्रभाव पड़ता है। पंचकर्म में प्रत्यक्ष मल इन्द्रिय छिद्रों से होकर निकलते हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम में बड़ी बात सूक्ष्म मलों का निष्कासन करने के रूप में शवासन क्रिया के माध्यम से सम्पन्न होती है।

प्राणाकर्षण प्राणायाम में ब्रह्माण्ड-व्यापी प्राणतत्त्व से अपने लिए जिस स्तर का प्राण आवश्यक होता है, उसे खींचा जाता है। प्राण की अनेक धाराएँ जिस प्रकार वायु में आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बन आदि अनेकों रासायनिक सम्मिश्रण रहते हैं उसी प्रकार संव्याप्त प्राण चेतना में भी ऐसे तत्व घुले हुए हैं जो विभिन्न स्तर के हैं और विभिन्न प्रकार के प्रयोजनों में प्रयुक्त होते हैं। उनमें से जिसकी जितनी मात्रा आवश्यक हो उसे उन अनुपात में खींचकर अपने किसी अंग विशेष में प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। इसकी पद्धति प्रक्रिया और विधा कल्पसाधना काल में बताई जाती है।

सूर्यभेदन प्राणायाम में प्रकाशपुँज को आर− पार करने की प्रक्रिया बनती है। चीरते हुए गुजरने में मध्यवर्ती ऊर्जा के साथ संपर्क बनता है और सतही प्रभाव के हलकापन से उलझे रहने के स्थान पर अन्तराल में पाई जाने वाली प्रखरता के साथ जुड़ने की बात बनती हैं। सूर्य को इस विश्व का प्राण माना गया है। सविता सचेतन प्राण ऊर्जा केन्द्र है। उपरोक्त तीनों प्राणायामों की विधि संक्षेप में इस प्रकार है—

(1)नाड़ी शोधन प्राणायाम

इस प्राण प्रयोग में तीन बार बायें नासिका से साँस खींचते और छोड़ते हुए नाभिचक्र में चन्द्रमा का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से साँस खींचते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश वाला ध्यान तथा आखिरी बार दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से साँस निकालने की प्रक्रिया सम्पादित की जाती है।

मुद्रा पूर्व की तरह। दायीं नासिका का छिद्र बन्दकर बायें से साँस खींचें और उसे नाभिचक्र तक ले जायें, ध्यान करें कि नाभि स्थान में पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाश विद्यमान है। साँस उसे र्स्पश कर स्वयं शीतल एवं प्रकाशवान बन रहा है। इसी नथुने से साँस बाहर निकालें व थोड़ी देर साँस रोककर बायीं ओर से ही इड़ा के इस प्रयोग को तीन बार करें। अब दायें नथुने से इसी प्रकार पूरक, अन्तः कुम्भक, रेचक व बाह्य कुम्भक करें व नाभिचक्र में चन्द्रमा के स्थान पर सूर्य का ध्यान करें। भावना कीजिये कि नाभि स्थित सूर्य को छूकर लौटने वाली वायु पिंगला नाड़ी से होते हुए उष्मा और प्रकाश उत्पन्न कर रही है। इस क्रिया को भी तीन बार करें। अन्त में नासिका के दोनों छिद्र बोल कर साँस खींचकर व भीतर रोककर मुँह खोलकर एक बार में ही बाहर निकाल दें। प्रारम्भ में एक ही नाड़ी शोधन का अभ्यास करें पीछे धीरे-धीरे संख्या बढ़ायी जा सकती है।

(2)प्राणाकर्षण प्राणायाम

इस सृष्टि में सतत् विभिन्न स्तर के प्राण प्रवाहों का स्पन्दन चल रहा है। साधक अपने पुरुषार्थ से इन्हें सहज ही प्राप्त व धारण कर सकता है प्राणाकर्षण प्रयोग में अन्तरिक्ष के असीम प्राण भंडार से अनुदान प्राप्त किये जाते हैं। इसका प्रयोग इस प्रकार है।

पूर्वाभिमुख हो पालथी मार कर बैठें। दोनों हाथ घुटनों पर, मेरुदण्ड सीधा, आँखें बन्द। ध्यान करें कि अखिल आकाश प्राण तत्व से व्याप्त है। सूर्य के प्रकाश में चमकते बादलों की शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। नासिका के दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए यह भावना कीजिए कि प्राण तत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपने अन्दर खींच रहे हैं। यह प्राण हमारे विभिन्न अंग अवयवों में प्रवेश कर रहा है। जितनी देर आसानी से रोक सकें साँस को भीतर रोकें, भावना करें कि प्राण तत्व में सम्मिश्रित चैतन्य, बल, तेज, साहस, पराक्रम जैसे घटक हमारे अंग-प्रत्यंगों में स्थिर हो रहे हैं। इसके बाद साँस धीरे-धीरे बाहर निकालें, साथ ही चिन्तन कीजिए कि प्राण का सार तत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों द्वारा पूरी तरह सोख लिया गया। थोड़ी देर तक बिना साँस के रहें व भावना करें कि जो दोष बाहर निकाले गए हैं, वे हमसे बहुत दूर चले जा रहे हैं व उन्हें अब अन्दर प्रवेश नहीं होने देना है। इस पूरी प्रक्रिया को पाँच प्राणायामों तक ही सीमित रखा जाय।

(3) सूर्यभेदन प्राणायाम

ब्रह्मप्राण को आत्मप्राण के साथ संयुक्त करने के लिए उच्चस्तरीय प्राणयोग की आवश्यकता पड़ती है सूर्य-वेधन इसी स्तर का प्राणायाम है। इसमें ध्यान-धारणा को और भी अधिक गहरा बनाया जाता है एवं प्राण ऊर्जा को साँस द्वारा खींचकर इसे सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कराया जाता है। पद्धति इस प्रकार है ः-

पूर्वाभिमुख, सरल पद्मासन, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अध खुले, घुटने पर दोनों हाथ। यह ध्यान-मुद्रा है। बायें हाथ को मोड़ें उसकी हथेली पर दायें हाथ कोहनी पर रखकर, दाहिने हाथ का अँगूठा दाहिने नथुने पर अनामिका अंगुलियों से बायें नथुने को बन्द कर गहरी साँस खींचें। साँस इतनी गहरी हो कि पेट फूल जाए, वह फेफड़े तक सीमित न रहे। ध्यान करें कि प्रकाश प्राण से मिलकर दायें नासिका-छिद्र से पिंगला नाड़ी में होकर अपने सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर रहा है। साँस रोकें व दोनों नथुने बन्द कर यह ध्यान करें कि नाभिचक्र के प्राण द्वारा एकत्रित यह तेज पुँज यहाँ अवस्थित चिरकाल से प्रसुप्त पड़े सूर्य चक्र को प्रकाशवान कर रहा है। वह निरन्तर प्रकाशवान हो रहा है। अब बायें नथुने को खोल दें और ध्यान करें कि सूर्य चक्र को सतत् घेरे रहने वाले, धुँधला बनाने वाले कल्मष छोड़ी हुई साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं। पीत वर्ण का मलिन धुँधला प्रकाश इड़ा नाड़ी से बाहर निकल रहा है।

अब दोनों नथुने फिर बन्द कर फेफड़ों को बिना साँस के खाली रखें व भावना करें कि नाभिचक्र में एकत्रित प्राण तेज पुँज की तरह, अग्नि शिखा की तरह ऊपर उठ रहा है, सुषुम्ना नाड़ी से प्रस्फुटित हुआ यह प्राण तेज सारे अन्तः प्रदेश को प्रकाशवान बना रहा है। सर्वत्र तेजस्विता व्याप्त ही रही है। यही प्रक्रिया फिर बायें नथुने से साँस खींचते व रोककर दायें से बाहर फेंकते हुए दुहराएँ व भावना उसी प्रकार करें जैसा ऊपर वर्णित है। यह पूरी प्रक्रिया लोम विलोम सूर्यभेदन प्राणायाम की कहलाती है।

प्राण धारण प्रक्रिया ‘डीप ब्रीथिंग‘ के सामान्य श्वास-प्रश्वास अभ्यास से अलग है। इसमें साधक महाप्राण के भाण्डागार से अपनी पात्रता के अनुरूप प्राण रूपी आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करते व उसका सदुपयोग प्रसुप्त की जागृति में करते हैं। अनेकानेक फल श्रुतियों से भरा यह साधना उपक्रम हर कल्प साधक को संक्षेप में ही सही जानना अनिवार्य है।


कल्प-साधना के सरल किन्तु अति महत्वपूर्ण तीन योगाभ्यास

स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के परिशोधन में संयम, विवेक और श्रद्धा संवर्द्धन को आवश्यक बताया गया है। यह बौद्धिक प्रयास है, जिसमें मनुष्य को अपने मनोबल पर ही निर्भर रहना पड़ता है। दूसरे तो मात्र मार्गदर्शन कर पाते हैं। पर इतने भर से काम कहाँ चलता है। आवश्यकता कुछ गहरे और सशक्त प्रयत्नों की भी पड़ती है। इसके लिए दो मार्ग हैं-एक किसी सशक्त आत्मा का असाधारण अनुदान जैसा कि विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस का मिला था, दूसरा-साधना-तपश्चर्या-योगाभ्यास-का कोई ऐसा प्रयोग जिसके सहारे प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों को जागृत करके रहस्यमयी शक्ति यों को आत्म-निर्माण तथा विश्व निर्माण के प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सके।

कल्प साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्माण किया गया है सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं। इन्हें अनिवार्य साधनाओं में गिना गया है। इनमें एक बिन्दुयोग, दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिन्दुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है। नादयोग को ‘अनाहत ध्वनि’ भी कहते हैं। लययोग को आत्मदेव की साधना कहते हैं। छाया पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूल शरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है। इन साधनाओं के आधार पर इन तीनों चेतना क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, अधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है। अन्न, जल, वायु की तरह इन तीन साधनाओं को भी समान उत्कर्ष की दृष्टि से सर्व सुगम किन्तु साथ ही असाधारण रूप से प्रभावी भी माना गया है।

बिन्दुयोग

त्राटक साधना को आज्ञाचक्र का जागरण एवं तृतीय नेत्र का उन्मीलन कहा जाता है। दोनों भावों के बीच मस्तक के भृकुटि भाग में सूक्ष्म स्तर का तृतीय नेत्र है। भगवान शंकर की, देवी दुर्गा की तीन आँखें विचित्र की जाती हैं। दो आँखें सामान्य-एक भृकुटि स्थान पर दिव्य। इसे ज्ञान चक्षु भी कहते हैं। अर्जुन को भगवान ने इसी के माध्यम से विराट् के दर्शन कराये थे। भगवान शिव ने इसी को खोलकर ऐसी अग्नि निकाली थी, जिसमें उपद्रवी कामदेव जलकर भस्म हो गया। दमयंती ने भी कुदृष्टि डालने वाले व्याध को इसी नेत्र ज्वाला के सहारे भस्म कर दिया था। संजय इसी केन्द्र से अद्भुत दिव्य दृष्टि का टेलीविजन की तरह-दूरबीन की तरह उपयोग करते रहे और धृतराष्ट्र को घर बैठे महाभारत का सारा आँखों देखा हाल सुनाते रहे।

आज्ञाचक्र को शरीर विज्ञान के अनुसार पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियों का मध्यवर्ती सर्किल माना जाता है और उसे एक प्रकार का किदलीय चक्र-दिव्य दृष्टि केन्द्र कहा जाता है। टेलीविजन, राडार, टेलीस्कोप के समन्वय युक्त क्षमता से इसकी तुलना की जाती है। जो चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता वह इसमें सन्निहित अतीन्द्रिय क्षमता के सहारे परिलक्षित हो सकता है, ऐसी मान्यता है। दूर दर्शन-सूक्ष्म दर्शन-विचार संचालन जैसी विभूतियों का उद्गम इसे माना जाता है। साधारणतया यह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है और उसके अस्तित्व का कोई प्रत्यक्ष परिचय नहीं मिलता, किन्तु यदि इसे प्रयत्नपूर्वक जगाया जा सके तो यह तीसरा नेत्र विचार संस्थान की क्षमता को अनेक गुनी बड़ा देता है। चूँकि यह केन्द्र दीपक की लौ के समान आकृति वाला बिन्दु माना जाता है इसलिए उसे जागृत करने की साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। इसी का एक नाम त्राटक साधना भी है।

यह साधना सरल है। आमतौर से पालथी मारकर, कमर सीधी कर एकान्त स्थान में इस साधना के लिए बैठते हैं। तीन फुट दूरी पर कन्धे की सीध में ऊँचाई पर एक दीप जलाकर रखते हैं। दस सेकेण्ड तक उसकी लौ को खुली आँख से देखना। फिर एक मिनट बन्द रखता। फिर दस सेकेण्ड देखने, पचास सेकेण्ड बन्द रखने का अभ्यास अनुमान से ही करना पड़ता है। घड़ी का उपयोग इस बीच बन पड़ता सुविधाजनक नहीं रहेगा। दूसरा कोई चुपके से धागे आदि का संकेत कर दे तो दूसरी बात है।

दीपक के प्रकाश की लौ आँखें बन्द करके आज्ञाचक्र के स्थान पर प्रज्वलित देखने का अभ्यास करना होता है, साथ ही यह भी धारणा करनी होती है कि वह प्रकाश समूचे मस्तिष्क में फैलकर उसके प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों को जागृत कर रहा है। आरम्भ में यह ध्यान दस मिनट से आरम्भ करना चाहिए और बढ़ाते-बढ़ाते दूनी-तिगुनी अवधि तक पहुँचा देना चाहिए। खोलने बन्द करने का समय एक-सा ही रहेगा। दीपक का सहारा आरम्भ में ही कुछ समय लेना पड़ता है। इसके बाद आज्ञाचक्र के स्थान पर प्रकाश लौ जलने और उनकी आभा से समूचा मनःसंस्थान आलोकमय हो जाने की धारणा बिना किसी अवलम्बन के मात्र कल्पना भावना के आधार पर चलती रहती है।

दीपक की ही तरह प्रभातकालीन सूर्य का प्रकाश पुँज लक्ष्य इष्ट माना जा सकता है। गायत्री का प्राण ‘सविता’ वही है। पालथी मारना, हाथ गोदी में और कमर सीधी रखने को ध्यान मुद्रा कहते हैं। दीपक धारणा की तरह प्रभातकालीन अरुणाभ सूर्य को पाँच सेकेण्ड खुली आँख से देखकर बाद में पचपन सेकेण्ड के लिए आँखें बन्द कर लेते हैं और आज्ञाचक्र के स्थान पर उस उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हैं। साथ ही यह धारणा करते हैं कि सविता देवता की ज्योति किरणें स्थूल शरीर में प्रवेश करके पवित्रता, प्रखरता, सूक्ष्म शरीर में दूरदर्शी विवेकशीलता, कारण शरीर में श्रद्धा, सम्वेदना का संचार करती और समग्र काय कलेवर को ज्योतिपुञ्ज बनाती है। सूर्य त्राटक की ध्यान धारणा आरम्भ में दस मिनट करनी चाहिए और धीरे-धीरे बीस मिनट तक बढ़ा देनी चाहिए। दीपक या सूर्य दोनों में से किसी को भी माध्यम बनाकर आज्ञाचक्र का जागरण-तृतीय नेत्र का उन्मीलन हो सकता है। कुछ समय तो लगता ही है। बीज बोने से लेकर वृक्ष फलने तक की प्रक्रिया पूरी होने में कुछ समय तो चाहिए ही। हथेली पर सरसों तो बाजीगर ही जमा सकते हैं।

नादयोग

दूसरी साधना नादयोग की है। यह सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि हो सुन पाते हैं। किन्तु सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय में अवणातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने को भी क्षमता है। प्रकृति का मूल शब्द है। वह अनादिकाल में ॐकार के ध्वनि गुँजन से ही विकसित हुई है। उसकी समस्त गतिविधियाँ परमाणुओं के अन्तराल में चलने वाली हलचलों और तरंगों के प्रवाहों पर अवलम्बित दीखती है। यदि उससे भी गहराई में उतरा जा सके तो प्रतीत होगा कि चरम मूल तक पहुँचते-पहुँचते मात्र शब्द गुँजन ही शेष रह जाता है। ॐकार एवं उसके परिकर की अन्यान्य ध्वनियाँ उस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड की भूतकालीन घटनाओं, वर्तमान की परिस्थितियों तथा भावी सम्भावनाओं का सारा ढाँचा इन्हीं चित्र-विचित्र स्तर की ध्वनि तरंगों पर खड़ा पाया जाता है। प्रकाश, ऊर्जा आदि की अन्यान्य तरंगें तो ध्वनि की परिणति एवं सहचरी मात्र है। नादयोग में इन्हीं को सुनने, समझने का अभ्यास किया जाता है ताकि उस आधार पर अपनी आन्तरिक स्थिति का विश्लेषण, पर्यवेक्षण किया जा सके एवं प्रकृति में चल रही सामयिक हलचलों का आधारभूत कारण समझकर अपनी ज्ञान परिधि को अत्यधिक व्यापक बनाया जा सके एवं भूतकाल के स्मृति-कम्पनों और भविष्य में घटित होने वाले प्रकरणों का पूर्वाभास उपलब्ध हो सके। नादयोग की शब्द साधना को ‘कालजयी’ कहा जाता है। उस आधार पर हम इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले सर्वविदित प्रचलन से छलाँग लगाकर दिव्य ध्वनियों के माध्यम से अपनी ज्ञान सम्पदा को न केवल अधिक प्रखर वरन् उच्चस्तरीय भी बना सकते हैं। ऋषियों को दृष्टा, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थी। यह चरम परिणति की चर्चा हुई। सामान्य स्तर पर भी नादयोग की आरम्भिक साधना परा प्रकृति और कायगत तत्व प्रपंच के साथ संगति बिठाती है और अदृश्य क्षेत्र के साथ आदान-प्रदान के नये द्वार खोलती है।

बिन्दुयोग की तरह नादयोग में भी ध्यान मुद्रा पर एकान्त स्थान में बैठते हैं। स्थूल ध्वनियों को रोकने के लिए कान में रुई लगा देते हैं। इसके उपरान्त प्रयत्न करते हैं कि प्रकृति के गर्भ में प्रवाहित दिव्य ध्वनि तरंगों का सुनना सम्भव हो सके। आरम्भ में बहुत धीमा अनुभव होता है। जो सुनाई पड़ता है वह बंसी, नफीरी बजने, झींगुर बोलने, भ्रमर गूँजने, बादल बरसते झरना झरने जैसा हलका होता है। बाद में अधिक प्रखरता, उत्तेजना और उतार-चढ़ाव भी उत्पन्न होने लगता है। यह दिव्य ध्वनियाँ बड़ी मोहक और आनन्ददायक होती है। इनकी तुलना सर्प को, मृग को मोहने वाले वीणा निनाद से दी जाती है। रामलीला में कन्हैया की वंशी बजने और गोपियों का, प्रवृत्तियों का नाच होने की संगति भी इसी नादयोग साधना के साथ जुड़ती है। ॐकार जप, सोऽहम् धारणा, मन्दिरों में शंख-घड़ियाल की ध्वनि का आधार भी यही है। नारद की वीणा, शंकर का डमरू, सरस्वती का सितार अलंकार रूप में इस नादयोग के रहस्यों का ही उद्घाटन करने वाले संकेत हैं।

कल्प साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग का है। इसमें शरीराभ्यास की आत्मसत्ता के साथ समर्पित विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा की उसके स्वरूप, लक्ष्य एवं उत्तरदायित्व को तो एक प्रकार से विस्मृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भव-बन्धन आदि नामों से पुकारते हैं। यदि अपना स्वरूप समझा जा सके, क्षमताओं का अनुमान लग सके, लक्ष्य का स्मरण आ सके और भावी सम्भावनाओं की सुखद कल्पना उठ सके तो मनुष्य निश्चय ही वर्तमान की मृगतृष्णा, भटकन, विसंगति, दुर्गति से ऊँचा उठकर उस महान के साथ संयुक्त होता है जिसकी विवेचना आत्म-बोध स्वर्ग, लक्ष्यबोध, ईश्वर दर्शन, दिव्य जीवन आदि नाम के साथ की जाती है। पुरुष से पुरुषोत्तम, नर से नारायण, क्षुद्र से महान, अर्ध-मृतक से अमर होने की बात इसी स्थिति के सम्बन्ध में कही जाती है जिसमें शरीराभ्यास को आत्मानुभूति के रूप में परिणत किया जाता है। इस प्रयास को महान साहस, परम पुरुषार्थ एवं चरम सौभाग्य कहा जाता रहा है।

ध्यान मुद्रा में बैठकर दर्पण को सामने रखा जाता है। अपने चेहरे पर सज्जा सौंदर्य की नहीं एक विशेष दृष्टि डाली जाती है कि इस माँस-पिण्ड के भीतर सृष्टा का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मसत्ता विद्यमान है। वही इस काया की अधिष्ठात्री है। उसी का उत्कर्ष परम लक्ष्य है। काया उसी प्रयोजन की पूर्ति का वाहन, साधन, उपकरण मात्र है। शरीर की सार्थकता आत्मा के प्रति वफादार, जिम्मेदार और ईमानदार रहने में ही है। आत्मा काया का पोषण तो सही रूप से करे पर साथ ही यह भी ध्यान रखे कि उसे उच्छृंखल बनाने वाली वासना, तृष्णा, अहंता के आक्रमण से सुरक्षा का प्रबन्ध भी होता रहे। जीवन यज्ञ है। इसे भ्रष्ट करने वाले सुबाहु, मारीच और ताड़का से तुलना इन्हीं उपरोक्त दानवी महत्त्वाकाँक्षाओं से दी गई है जो विनाश और पतन के सरंजाम ही रचती रहती है।

कल्प साधना में उपरोक्त तीनों साधनों को न केवल अनिवार्य माना गया है वरन् सरल भी बनाया गया है। दीपक और सूर्य के स्थान पर नीलाभ विद्युत दीप साधकों के हर कमरे में लगाए गए हैं। नादयोग का आरम्भिक अभ्यास करने के लिए टेप रिकार्डर के माध्यम से उपयोगी स्वर लहरियाँ सुनाई जाती हैं ताकि सूक्ष्म नाद को अधिक स्पष्ट होने का मार्ग खुले। उपयुक्त साइज का दर्पण हर कमरे में पहले से ही रखा मिलता है। तीनों साधनाएँ आरम्भिक स्तर के साधक भी सरलतापूर्वक चला सकें इसके लिए यथा सम्भव अधिकाधिक सुविधा, सरलता उत्पन्न की गई है। व्यवस्था ऐसी है जिसमें उपरोक्त तीनों योगाभ्यास साधनाएँ बिना किसी कठिनाई के आरम्भ की जा सके । वे जैसे-जैसे विकसित परिपक्व होती है वैसे-वैसे अपने सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष करती चली जाती है।


अन्तराल के मर्मस्थल का प्रभावी परिशोधन

अन्तःचेतना को परिष्कृत करने के दो उपाय हैं। इनमें से एक है-शिक्षण एवं संपर्क । इसका अर्थ होता है बाह्य क्षेत्र के प्रभाव-दबाव से अन्तराल को दबाना-ढालना दूसरा उपाय है-आन्तरिक प्रसुप्ति को दूरदर्शी विवेकशीलता और साहसिक संकल्पशीलता के सहारे जगाना-उभारना एक में बाहरी प्रभाव की प्रधानता है, दूसरे भीतर की ऊर्जा को उछाल कर बहिरंग क्षेत्र पर आच्छादित कर देने की। एक को बादल बरसने, धूप निकलने, आँधी चलने की उपमा दी जा सकती है। दूसरे की अणु विस्फोट, ज्वालामुखी का प्रकटीकरण, जल स्रोत का जमीन से उबल पड़ना जैसी घटनाओं से तुलना की जा सकती है। दोनों ही अपने-अपने स्थान पर कारगर है। दोनों का ही उपयोग होता रहा है। दोनों ही अपने-अपने प्रभाव प्रकट करती रही है।

मानसिक विकास, बौद्धिक प्रशिक्षण, अनुभव अभ्यास से लेकर ब्रेन वाशिंग और इलेक्ट्राडों का उपयोग कर मस्तिष्कीय संरचना में उलट-पुलट कर देने जैसे अनेकों प्रयोग पिछले दिनों चलते रहे हैं। नीति-कौशल में इसके लिए साम, दाम, दण्ड, भेद का तरीका चिरकाल से अपनाया जाता है। अब कूट-नीति के रूप में उसका एक अपना एक स्वतन्त्र शास्त्र ही बन गया है। सरकारी और गैर सरकारी प्रचार तन्त्र इस प्रयोजन के लिए अपने-अपने ढंग से काम करते रहते हैं। इस संदर्भ में विशेषज्ञों को पहले से भी बहुत कुछ जानकारी रहती है।

इन पंक्ति यों में उस उपेक्षित पक्ष पर प्रकाश डाला जाता है जो भीतर से उछल कर बाहर आने और ऊपरी सतह को सुरम्य बना देने को चमत्कारी परिणति के रूप में कभी-कभी ही देखा जाता है। मनुष्य सचेतन स्तर की दृष्टि में संस्थागत पदार्थ सम्पदा की तुलना में कम नहीं कुछ अधिक ही महत्व का है। अणु की संरचना और विभु की विशालता देख कर बुद्धि को हतप्रभ रह जाना पड़ता है, किन्तु यदि एक कदम और आगे बढ़ कर देखा जा सके और गहराई में डुबकी लगायी जा सके तो प्रतीत होगा कि वैभव का अदृश्य भण्डार उस क्षेत्र में भी इतना है, जिसे तुलनात्मक दृष्टि से वरिष्ठ न माना जाय तो कनिष्ठ भी नहीं कहा जा सकता।

यहाँ चर्चा पैरों के नीचे दबे अदृश्य क्षेत्र की नहीं हो रही है। धरातल का उदाहरण दिया जा रहा है ठीक यही उदाहरण मानवी सत्ता पर भी लागू होता है। बहिरंग क्षेत्र की प्रकृति सम्पदा उपयोगी भी है और आकर्षण भी। इतने पर भी अन्तरंग क्षेत्र में जो विद्यमान है वह भी ऐसा नहीं है जिसकी उपेक्षा और अवमानना की जा सके। सच तो यह है कि पदार्थ को इतना सुन्दर, आकर्षक एवं उपयुक्त बनाने में भी चेतना का ही कौशल काम करता रहा है, अन्यथा धरती भी अन्य ग्रह पिण्डों से मिलती-जुलती अनगढ़ स्थिति में ही रह रही होती और इसका वर्णन-विवेचन करने वाला तक कोई कहीं न होता।

चेतना का स्तर ही है जिसके कारण एक ही परिस्थिति में उत्पन्न हुए व्यक्ति यों में से कोई हेय, पिछड़ी, विपन्न स्थिति में दिन गुजारता और आत्म प्रताड़ना, लोक भर्त्सना सहता है, जबकि उनमें से कुछ तो अपना रास्ता आप बनाते, अवरोध हटाते, साधन सहयोग समेटते प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचते देखा जाता है। यह अन्तस् का चुम्बकत्व ही है जो अनुकूलता को खींच बुलाता है। यह अन्तस् का आलोक ही है जो संपर्क क्षेत्र को आलोक से जगमगाता है। यह अन्तस् का ऊर्जा भण्डार ही है जिसकी पकड़ में आने वाला हर पदार्थ इन्धन की तरह जलने लगता है। कहने को तो लोग यही कहते रहते हैं कि परिस्थितियाँ मनःस्थिति को प्रभावित करती हैं, पर वस्तुतः इसमें यथार्थता आत्यल्प है। थोड़ा गम्भीर पर्यवेक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तथ्य कुछ और ही है। मनःस्थिति ही परिस्थिति की जन्मदात्री है। मनस्वी लोग अपने भाग्य की रचना स्वयं करते हैं, प्रतिकूलताओं को कूट-पीट कर अनुकूलता में बदलते हैं और वातावरण के घेरे को चीरते हुए अपना संसार आप बसाते हैं। जिनका मनस् मर गया उन्हीं के लिए परिस्थितियाँ सब कुछ हैं। पत्ते, तिनके और धूलि कण तो हवा के साथ-साथ ही इधर-उधर भटकते-भटकते फिरते हैं। उथले व्यक्ति तत्वों को ही परिस्थितियों का गुलाम, भाग्य का अनुचर एवं प्रवाह में तैरता-डूबती लकड़ी कहा जा सकता है।

महामानवों का समूचा इतिहास इस बात का साक्षी है कि चेतना जगी है तो उनकी जीवन सम्पदा अपने लिए सौभाग्य और दूसरों के लिए वरदान रूप से प्रकट हुई है। इसके विपरीत हीनता के आच्छादन ने साधनों का ही दुरुपयोग किया है, साथियों को खिजाया है और भटकाव में पड़कर दुरूह दुःख सहा है। इसके अगणित प्रमाण हर कोई, हर कहीं, हर समय अपने इर्द-गिर्द ही प्रचुर परिणाम में बिखरे हुए तलाश कर सकता है। शिक्षित, स्वस्थ और सम्पन्नों में से ऐसे कम नहीं जो स्वयं जलते और दूसरों को जलाते रहे। इसके विपरीत दुर्बल, अनपढ़ और दरिद्र समझे जाने वाले भी ऐसे अगणित हजारी किसान हैं, जिनने आत्म सन्तोष, जन सहयोग और दैवी अनुग्रह की विभूतियाँ हर घड़ी अपने ऊपर बरसते देखी। ऋषियों को साधनों की दृष्टि से दयनीय भी कहा जा सकता है, पर वे अन्तःचेतना की विशिष्टता के कारण राजा से लेकर रंक तक के लिए अभिनन्दनीय बने रहे। उनके गौरव और सौभाग्य को शत-शत कंठों ने एक स्वर से सराहा।

इन तथ्यों पर विचार करने से चेतना की वरिष्ठता ही स्पष्ट होती है और विश्वास बँधता है कि साधनों का बाहुल्य हो तो सोना सुगन्ध, अन्यथा स्वल्प साधनों में भी खिलता-खिलता जीवन जिया जा सकता है। अस्तु अन्तस् की गरिमा को भी समझा-समझाया जाना चाहिए और इस तथ्य के प्रति गम्भीर होना चाहिए कि वैयक्तिक एवं सामूहिक समस्याओं के समाधान में चेतना की उत्कृष्टता को वरीयता दी जाय और उसे परिष्कृत बनाने के लिए न केवल बहिरंग साधनों को वरन् अन्तस् की ऊर्जा को भी उभार कर ऊपर लाया जाय। यदि चिन्तन और प्रयास को ऐसा अभिनव उत्साह अवलम्बन मिल सके तो समझना चाहिए कि वातावरण का काया-कल्प होने में, सतयुग के-प्रज्ञायुग के अवतरण में अब न विलम्ब लगेगा, न अवरोध अड़ेगा।

सामयिक व्यापक विपन्नताओं को निरस्त करने, शालीनता, प्रसन्नता एवं सुव्यवस्था का वातावरण बनाने के लिए आवश्यक है कि मानवी चेतना को परिष्कृत करने के सम्बन्ध में बढ़ती जा रही उपेक्षा को दूर किया जाय और उसके स्थान पर उस क्षेत्र में प्रभावी गतिशीलता का संचार किया जाय। इसके लिए जहाँ लोकमानस का बौद्धिक परिशोधन परिष्कार आवश्यक है वहाँ आवश्यकता इस बात की भी है कि प्रसुप्त अन्तराल के उन मर्मस्थलों को भी उभारा जाय जहाँ विभूतियों के अजस्र भाण्डागार भरे पड़े हैं। ऋषिकल्प अध्यात्म विज्ञानियों के अनुभव, प्रतिपादन एवं प्रशिक्षण में उन तथ्यों का समुचित समावेश है जिनके सहारे चेतना की गहन परतों को उभारा और इतना प्रखर किया जा सकता है कि न केवल परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जा सके वरन् मनःस्थिति को अपने निज के पराक्रम-पुरुषार्थ से उच्चस्तरीय बनाया जा सके।

कहा जा चुका है कि बाहर से भीतर को प्रशिक्षित करने की तरह ही दूसरा क्षेत्र है भीतर की प्रखरता को प्रदीप्त करके बहिरंग को-सुशोभित कर सुसम्पन्नता से भर देना। यह अपेक्षाकृत सरल है। क्योंकि इसमें अपने आपे से ही उलझना-सुलझना पड़ता है। दूसरों के हाथ रहने वाली परिस्थितियों को बदलने के लिए किये गये प्रयासों पर पग-पग पर मिलने वाली खोज निराशा उपलब्ध करने जैसी कठिनाई इस क्षेत्र में नहीं है साधना अपने हाथ की बात है। अपने शरीर को जिस प्रकार मनमर्जी से चलाया जा सकता है उसी प्रकार मनःक्षेत्र की विचारणाओं मान्यताओं, आकांक्षाओं और आदतों के ऊपर भी यदि डडडड पड़ा जाय तो उन्हें भी कुम्हार की तरह अनगढ़ मिट्टी की देव-प्रतिमाओं जैसे खिलौनों में बदला जा सकता है।

अन्तस् की विशिष्टताओं एवं विभूतियों को उभारने का एकमात्र उपाय ‘साधना’ है। ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को तात्पर्य इतना ही है कि यदि अचेतन, सुपर-चेतन इगो क्षेत्र में कोई कारगर परिवर्तन करने हो तो उसके लिए योग परक ध्यान-धारणाएँ और तपपरक संयम-नियमन की तितीक्षाएँ करनी चाहिए। सत्संग से व्यवहार और स्वाध्याय से चिंतन को सुधारा जा सकता है। यह व्यवहार में आने वाली ऊपरी परत है। इससे मन− मस्तिष्क की विचारणाएँ भटकाव से उबर कर सही दिशा में चलने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं। इतने पर भी अन्तराल का आस्थापरक क्षेत्र तो बच ही जाता है। उसके लिए उन उपचारों का प्रयोग करना पड़ता है, जो चेतना के मर्मस्थल तक पहुँच सके, वहाँ निवान करने वाली श्रद्धा प्रज्ञा और निष्ठा को संचित कुसंस्कारों से मुक्त कर सके। प्रवृत्तियों की जड़ें बहुत गहरी होती है। ये समझने-समझाने पर भी अपना अंगद जैसा पैर यथास्थान जमाये रहती हैं। दूब की पत्तियाँ सूख जाने पर भी जड़ नहीं सूखती, तनिक-सी नमी पाते ही देखते-देखते हरी-भरी होने लगती हैं। यही बात प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में भी है। कुसंस्कार उन्हीं में पलते हैं। भ्रान्तियों का कतार वहीं है। उत्कृष्टता और निकृष्टता का शासन क्षेत्र वही है। व्यक्ति त्व की जड़े इसी क्षेत्र में जमी होती हैं। यहाँ सुधार-परिष्कार करने में जो उपचार काम देते हैं वे तप-साधना से कम स्तर के कारगर नहीं होते। पत्थर की कठोर चट्टानें काटने में हीरे की नोंक वाला वरमा ही काम आता है। पहाड़ उड़ाने हों तो डायनामाइट की सुरंगों से कम में काम नहीं चलता किले को विस्मार करने में तोप के गोले ही कारगर होते हैं। टीलों को समतल करने में बुलडोजरों का प्रयोग करना पड़ता है। हल्के-फुलके उपकरण इन बड़े प्रयोजनों के लिए आवश्यक बड़ी शक्ति के अभाव में कोई कहने लायक परिणति उत्पन्न नहीं कर पाते। यहाँ धीमे प्रयत्नों की निन्दा नहीं है। समयानुसार चींटी भी अपने नन्हें पैरों के सहारे पहाड़ पर चढ़ सकती है, किन्तु वह लम्बी बात है। शालीनता का जीवन और सत्प्रयोजनों में संलग्न क्रिया-कलाप भी कालान्तर से व्यक्तित्व मर्मस्थल को उत्कृष्ट आदर्शवादिता के ढाँचे में ढाल सकता है, किन्तु यदि समयानुसार अभीष्ट सफलता पानी हो तो बड़े कदम भी उठाने पड़ेंगे, बड़े साधन भी जुटाने पड़ेंगे। यहाँ बड़े से तात्पर्य साधनात्मक पुरुषार्थ से है। पुरुषार्थ इसलिए कि उसमें अपने आपे से ही जूझना पड़ता है। बाहरी क्षेत्र के बड़े-बड़े मोर्चे जीतने वाले भी भीतरी क्षेत्र का प्रसंग सामने आने पर हथियार डालते देखे गये है। इसलिए साधना को चरम पराक्रम कहा गया है। साथ ही उसकी परिणति को स्वर्ग एवं मुक्ति जैसी उच्चस्तरीय विभूतियों के रूप में दर्शाया गया। प्रतिभा, प्रखरता, कुशलता, सम्पन्नता, सफलता जैसी उपलब्धियाँ तो आत्मिक प्रगति की सहेलियाँ हमजोलियाँ है जो दो शरीर एक मन की तरह साथ-साथ ही चलती हैं।

कल्प साधना की प्रक्रिया का निर्धारण आज की मनःस्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। वह न तो इतना कठिन है। जिसे संकल्पवान् व्यक्ति भी पूरा न कर सके और न ही वह इतना सरल है कि विलासिता और अस्वच्छता के अनगढ़ ढर्रे को यथावत् बनाये रह कर मात्र कुछ पूजा उपचार करने भर से बन पड़े। पूजा, उपचारों साधना कृत्यों का महत्व तभी है जब वे श्रद्धा, विश्वास के साथ जुड़ें और संकल्पित व्रतशीलता बन कर सैन्य अनुशासन की तरह निभायें । कल्प साधना में दान और तप के सभी तत्वों का समतुलित ढंग से समावेश है, साथ ही वह सर्वथा हानि रहित भी है। जैसा कि अन्यान्य योग साधनों में प्रयत्न भ्रष्ट होने पर कई प्रकार के विग्रह उठ खड़े होते हैं वैसी स्थिति न आने पाये इसलिए उसे नितान्त उपयोगी होने के साथ-साथ सर्वथा हानि रहित होने का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।


भावी जीवन पंचशीलों के साथ जुड़े

कल्प साधना के दिनों में यदि किसी प्रकार का चिन्तन तेजस्वी स्तर पर उभरा होगा और उससे पश्चात्ताप जैसा कुछ मरोड़ने वाला दर्द हुआ होगा तो फिर उसका समाधान एक ही हो सकता है-भविष्य का शानदार निर्धारण। मनन तभी सार्थक है जब उससे विगत के प्रमाद की भरपाई करने के लिए चौगुने, सौगुने पराक्रम की उमंगें उभरें। इस एक मास की अवधि में चिन्तन तो दो चार दिन का ही पर्याप्त हो सकता है। शेष 26 दिन एक ही योजना बनानी चाहिए कि जिन आदर्शवादी प्रेरणाओं का यहाँ माहौल है। उनका अवधारण-कार्यान्वयन कैसे सम्भव हो। उसके लिए किस क्रम में क्या कदम उठाये जाने चाहिए और उस निर्धारण में जो आन्तरिक प्रमाद तथा बाह्य व्यवधान आड़े आने वाला है उससे कैसे निपटा जाना चाहिए। असल में यही है कल्प साधना के दिनों की महानतम उपलब्धि। यदि इस प्रयत्न के फलस्वरूप उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण बन पड़ा तो उसका श्रेय सुअवसर सहयोग को नहीं, साधक की अपनी दूरदर्शी विवेकशीलता एवं संकल्पवान साहसिकता को ही मिलेगा।

व्यक्ति त्व के विकास में आने वाले कुछ प्रमुख सूत्र हैं। उनकी उपयोगिता और फलश्रुति समझनी चाहिए तथा उनके कार्यान्वयन का क्रम बनाने से लेकर अपनाये रहने का संकल्पवान व्रत भी धारण करना चाहिए। ऐसे निर्धारणों में कुछ निम्नलिखित हैं—

व्यक्तित्व का विकास

[1] प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य काम-काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्यकर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालने चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिए। इससे कम में पुण्य परमार्थ के सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारित स्वभाव का अंग बनता है और न व्यक्ति त्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।

[2] आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें, परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरतापूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनाये जो सभी के लिये अनुकरणीय हो। ठाट-बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

[3] अहिर्निशं पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते हैं। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिए। भव− बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिए। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है-प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा-थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिए। स्वाध्याय को भजन से भी अधिक प्रमुखता दी गई है। इसलिए उसे नित्य कर्म में सम्मिलित करना चाहिए और कभी प्रमाद न करना चाहिए सद्विचारों की यह स्वाध्याय संचित पूँजी ही मनुष्य की सच्ची आध्यात्मिक सम्पदा है।

[4] प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध-सोते समय तत्त्वबोध । नित्यकर्म से निवृत्त होकर जप ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन-मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त-व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिए। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिये सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञायोग‘ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठापूर्वक निभाया जाय।

[5] दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकना चाहिए और जो उपलब्धियाँ हस्तगत हैं, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिए और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते हैं।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकाँक्षाओं के रंगीले महल न रचे । ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौंदर्य निहारें आशंका ग्रस्त, भयभीत, निराश, न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बनें। आत्मावलम्बन सीखे। अहंकार तो हटाये पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपने समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठाये । सहायता करें पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़ें और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्त्वाकाँक्षा संजोयें। स्मरण रखें, हंसते-हंसते रहना और हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

परिवार निर्माण परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला-पाठशाला समझें। इस उद्यान में सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगायें। हर सदस्य को स्वावलम्बी, सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने को भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह स्वयं आदर्शवान् बनें ताकि कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे साँचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है-संचालक का आदर्शवादी ढाँचे में ढलना, दूसरा है माली की तरह हरे पौधे को शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।

[2]परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्रय असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चों को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्त्व पालन तभी हो सकता है जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। आज के समय में बच्चों की संख्या वृद्धि हर दृष्टि से अवांछनीय है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें। थोड़े लोगों का परिवार ही सुसंस्कारी बन सकता है। स्वावलम्बी सदस्यों को अलग होने की अपेक्षा छोटों की सहायता और बड़ों की सेवा करने की प्रेरणा देनी चाहिए।

[3] संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्परायें प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाय। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले। सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये, व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना उपहासास्पद पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदे । नाक, कान छेदने और उनके चित्र विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीक फैशन कोई महिला न अपनाये । विचार संयम के लिए कुविचारों का आक्रमण घर में ही हो उसके लिए सद्विचारों का स्वाध्याय और कथा कहानी परस्पर विचार विनिमय का नियमित कार्यक्रम चलता रहे। गृहपति स्वयं चतुर्विधि संयम पालें और घर के अन्य सदस्यों को भी इस शालीनता को निशानी संयमशीलता का अधिकाधिक अभ्यास करायें।

[4] पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन-शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, वरन् ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें। इसलिए घर के लोगों को साथ लेकर परिवार प्रमुखों को कुछ कर्तव्य करने होते हैं तभी अन्यों को उनको आरम्भ करने से भविष्य में अपनाये रहने की आदत पड़ती। यह क्रिया द्वारा शिक्षा देने की विधि ही आदत डालने या सुधारने में काम आती हैं।

[5] उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन में यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण-पोषण शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ हैं। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सेवा के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते हो आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बीयों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों को छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते। परिवार में उत्तराधिकार का प्रचलन इसी आधार पर करने की पहल पहले अपने घरों से करना चाहिए। इसके लिए मिशन के सूत्र संचालक का, वाजिश्रवा का, मैत्रेयी का, महर्षि कर्वे का उदाहरण हम सबके मस्तिष्कों में घूमता रहना चाहिए।

समाज निर्माण

[1]हममें से हर व्यक्ति अपने को समाज का एक अविच्छिन्न अंग मानें। अपने को उसके साथ अविभाज्य घटक मानें। सामूहिक उत्थान और पतन पर विश्वास करें। एक नाव में बैठे लोग जिस तरह एक साथ डूबते या पार होते हैं वैसी ही मान्यता अपनी रहे। स्वार्थ और परमार्थ को परस्पर गूँथ दें। परमार्थ को स्वार्थ समझें और स्वार्थ सिद्धि की बात कभी ध्यान में आये तो वह संकीर्ण नहीं उदात्त एवं व्यापक हो। मिल-जुलकर काम करने और मिल-बाँटकर खाने की आदत डाली जाय। भगवान को विराट् विश्व के उस पक्ष के समकक्ष माना जाय जिसमें उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समुच्चय है और मात्र सत्प्रवृत्तियों के रूप में उसकी लीलाओं का पर्यवेक्षण किया जाय। समाज निष्ठा जगे।

[2] मनुष्यों के बीच सज्जनता, सद्भावना एवं उदार सहयोग की परम्परा चले। दान विपत्ति एवं पिछड़ेपन से ग्रस्त लोगों को पैरों पर खड़े होने तक के लिए दिया जाय। इसके अतिरिक्त उसका सतत् प्रवाह सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिये ही नियोजित हो। साधारणतया मुफ्त में खाना और खिलाना अनैतिक समझा जाय। इसमें पारिवारिक या सामाजिक प्रीतिभोजों का जहाँ औचित्य हो वहाँ अपवाद रूप से छूट रहे। भिक्षा व्यवसाय पनपने न दिया जाय। दहेज, मृतक भोज, सदावर्त धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिये दिये जाते हैं और उस उदारता के समर्थ लोग उठाते हैं-अनुपयुक्त माने और रोके जायें। साथ ही हर क्षेत्र का पिछड़ापन दूर करने के लिये उदार, श्रमदान और धन दान को अधिकाधिक प्रोत्साहित भी किया जाय।

[3] किसी मान्यता या प्रचलन को शाश्वत या सत्य न माना जाय उन्हें परिस्थितियों के कारण बना समझा जाय। उनमें जितना औचित्य न्याय और विवेक जुड़ा हो उतना ग्राह्य और जो अनुपयुक्त होते हुये भी परम्परा के लाभ पर गले बँधा हो, उसे फेंका जाय। समय-समय पर इस क्षेत्र का पर्यवेक्षण होते रहना चाहिये और जो असामयिक-अनुपयोगी हो उसे बदल देना चाहिये। इस दृष्टि से लिंग भेद, जाति भेद के नाम पर चलने वाली विषमता सर्वथा अग्राह्य समझी जाय। इसी प्रकार वैयक्तिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक क्षेत्र में संव्याप्त अनेकानेक चित्र-विचित्र परम्पराओं में से जो विवेक की कसौटी पर उपयोगी सिद्ध हो उन्हें अक्षुण्ण रखते हुए शेष को बिना बहुजन मान्यता की परवाह किये बहुजन हिताय की बात को महत्व देना चाहिए और आवश्यक परिवर्तन प्रस्तुत करने के लिए एकाकी बढ़ चलना चाहिए।

(4)सहकारिता का प्रचलन हर क्षेत्र में किया जाय। अलग-अलग पड़ने की अपेक्षा सम्मिलित प्रयत्नों और संस्थानों को महत्व दिया जाय। विश्व परिवार का आदर्श कार्यान्वित करने का ठीक समय यही है। सभी प्रकार के विलगावों को निरस्त किया जाय। व्यक्ति की सुविधा की तुलना में समाज व्यवस्था को वरिष्ठता मिले। प्रशंसा ऐसे ही प्रयत्नों की हो जिन्हें सर्वोपयोगी कहा जाय। व्यक्तिगत समृद्धि, प्रगति एवं विशिष्टता को श्रेय न मिले। उसे कौतुक-कौतूहल मात्र समझा जाय।

(5)अवाँछनीयताओं, मूढ़ मान्यताओं और कुरीतियों को छूत की बीमारी समझा जाय। वे जिस पर सवार होती हैं उसे तो मारती ही हैं, अन्यान्य लोगों को भी चपेट में लेती और वातावरण बिगाड़ती है। इसलिए उनका असहयोग विरोध करने की मुद्रा रखी जाय और जहाँ सम्भव हो उनके साथ समर्थ संघर्ष भी किया जाय। समाज के किसी अंग पर हुआ अनीति का हमला समूचे समाज के साथ बरती गई दुष्टता माना जाय और उसे निरस्त करने के लिए जो मीठे-कड़ुवे उपाय हो सकते हों, उन्हें अपनाया जाय। अपने ऊपर बीतेगी, तब देखेंगे इसकी प्रतीक्षा करने की अपेक्षा कहीं भी हुए अनीति के आक्रमण को अपने ऊपर हुआ हमला माना जाय और प्रतिकार के लिए दूरदर्शितापूर्ण रणनीति अपनायी जाय।

व्यक्तिगत परिवार, और समाज क्षेत्र के उपरोक्त पाँच-पाँच सूत्रों को उन-उन क्षेत्रों के पंचशील माना जाय और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए जो भी अवसर मिले उन्हें हाथ से जाने न दिया जाय।

आवश्यक नहीं कि इस सभी का तत्काल एक साथ उपयोग करना आरम्भ कर दिया जाय। उनमें से जितने जब जिस प्रकार कार्यान्वित किये जाने सम्भव हों तब उन्हें काम में लाने का अवसर भी हाथ से न जाने दिया जाय। किन्तु इतना काम तो तत्काल आरम्भ कर दिया जाये कि इन्हें सिद्धान्त रूप से पूरी तरह स्वीकार लिया जाये। आदर्शवादी महानता से गौरवान्वित होने वाले जीवन इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर जिये जाते हैं। अनुकरणीय प्रयास करने के लिए जिन्होंने भी श्रेय पाया है उनने त्रिविधि पंचशीलों में से किन्हीं सूत्रों को अपनाया और अन्यान्यों द्वारा अपनाये जाने का वातावरण बनाया है।

कल्प साधना के साधक एक मास की अवधि में यह निश्चित करें कि उन्हें भविष्य में आदर्शवादी जीवन जीना है। जो बीत गया सो गया पर जो शेष है उसका उपयोग इस प्रकार करना है जिससे आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के दोनों ही प्रयोजन साथ-साथ सधते रहे। जीवन सम्पदा को यदि शरीर और आत्मा की साझेदारी माना जा सके तो दोनों पक्षों को उसके उपार्जन का समान लाभ मिलना चाहिए। अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व में एक आदर्शवादिता को-प्रज्ञा अभियान का ही एक सदस्य मान लिया जाय और जिस प्रकार अन्य कुटुम्बियों के लिए समय, धन लगाया जाता है उसी प्रकार इस महान प्रयोजन के लिए उतना ही करते रहा जाय तो इस व्रत निर्वाह से हर कल्प साधक निकट भविष्य में महामानवों की पंक्ति में खड़ा दृष्टिगोचर हो सकता है। यही सच्चे अर्थ में काया-कल्प है।


तीर्थ सेवन और कल्प साधना का सार्थक समन्वय

तीर्थ सेवन का पुण्य धर्मशास्त्रों और आप्त वचनों में असाधारण बताया गया है। उस प्रक्रिया का माहात्म्य इतना अधिक बताया गया है जिसकी तुलना में अन्य सब धर्मानुष्ठान हल्के पड़ते हैं। प्राचीनकाल में जीवन का पूर्वार्द्ध व्यतीत होते-होते लोग वानप्रस्थ धारण करते थे और संचित कुसंस्कारों का प्रायश्चित करने तथा धर्म प्रचार का पुण्य परमार्थ अर्जित करने की दृष्टि से लम्बी तीर्थ यात्रा पर निकलते थे। इस प्रकार का सोद्देश्य और कष्टसाध्य प्रयास तपश्चर्या में गिना जाता था। इसलिये उस प्रयास को पदयात्रा द्वारा करने का विधान है, ताकि अधिक जनसंपर्क सध सकें और रास्ते में मिलने वालों की धर्म-धारणा उत्तेजित उत्साहित करने का अधिकाधिक अवसर मिल सके। ढर्रे का जीवनक्रम एक प्रकार के कठोर बन्धन के रूप में बँध जाता है, फलतः आदर्शों के सम्बन्ध तो सोचते रहना भर ही सम्भव होता है, करते-धरते कुछ बन नहीं पड़ता। इस व्यवधान को रास्ते से हटाने के लिए कुछ समय पर छोड़ने की आवश्यकता पड़ती है, ताकि अभ्यस्त ढर्रे का चक्रव्यूह तोड़ा नहीं तो शिथिल तो किया ही जा सके। तीर्थयात्रा का सारभूत स्वरूप और उद्देश्य वही है।

पापों के प्रायश्चित्त में तीर्थयात्रा का सुनिश्चित प्रावधान है। मात्र क्षमा माँगने से दुष्कर्म का संचित भण्डार हटता नहीं, स्थान-दर्शन जैसी चिन्ह-पूजा भी इतने बड़े भार को हटाने में समर्थ नहीं हो सकती। खोदी हुई खाई पाटने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। इन कुकर्मजन्य कुसंस्कारों को निरस्त करने से ही आध्यात्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है, इसलिए कुछ ऐसा साहस करना होता है जिससे कषाय-कल्मष धुले और प्रस्तुत श्रद्धा-सद्भाव नये सिरे से उभरें। यह समूचा प्रयोजन दीर्घ सेवन से पूरा होता है, इसलिए उसे तीन उद्देश्य पूरा करने वाला माना गया है। पाप कर्मों का प्रायश्चित-मध्यवर्ती परिवर्तन का साधना− विधान-उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित निर्धारण और उसे कार्यान्वित करने का व्रत-धारण यह तीनों प्रयोजन जहाँ पूरे होते हों, समझना चाहिए कि वह समग्र तीर्थ यात्रा विधिवत् सम्पन्न हुई और शास्त्रों का पुण्यफल का अवसर बना। कल्प-साधना वस्तुतः तीर्थ सेवन की पुरातन परम्परा का समयानुसार सुनियोजित संस्करण है।

रास्ते में धर्म-प्रचार की पदयात्रा तो जब बन पड़े तब करनी चाहिए, किन्तु मध्यवर्ती परिवर्तन का साधना-विधान कल्प-साधना के दिनों पूरा करने का सुयोग सहज सम्मुख है। उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण भी यही हो सकता है। उसका कार्यान्वयन बाद की बात है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रह सकती है।

इन पुरातन तीर्थ परम्परा का तो इन दिनों लोप ही हो गया दृष्टिगोचर होता है। चिन्ह पूजा तो अभी भी होती है। स्थान भी पुराने हैं, उनके साथ जुड़ा इतिहास बड़े जोशीले शब्दों में व्यक्त करने वाले बकवादी भी पाये जाते हैं। फिर भी वहाँ अब जो वातावरण है उसे देखकर समझदार व्यक्ति अपना वहाँ जाना निरर्थक ही मानता है। उस वातावरण में उबले मनोरंजन और आत्म-प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता। श्रद्धा बढ़ने के स्थान पर अश्रद्धा ही पनपती है। इस निराशा के वातावरण में आशा की एक किरण के रूप में ही शान्ति कुँज गायत्री तीर्थ का नवनिर्माण हुआ है। यहाँ आकर कोई भी साधक मनःस्थिति का व्यक्ति तीर्थ सेवन तथा कल्प साधना के द्विविधि लाभ भली भाँति पा सकता है। विगत की भूलों का परिमार्जन− प्रायश्चित्त तथा भावी जीवन की रूप-रेखा का कल्प-प्रक्रिया में अनुपम निर्धारण किया गया है। कल्प साधना के लिये आये साधकों से सत्र के प्रारम्भिक दिन ही अपनी व्यक्ति गत कठिनाइयों, चिन्ताओं, समस्याओं एवं आकांक्षाओं अनुभव करते रहते हैं कि उन्हें परोक्ष रूप से सूत्र-संचालकों का नित नया सन्देश परामर्श मिल रहा है।

इस विचार विनिमय में एक पक्ष तो वर्तमान समस्याओं से सम्बन्धित है। दूसरा भूतकालीन ऊहापोह और तीसरा भविष्य निर्धारण सम्बन्धी निर्देश। आध्यात्मिक प्रगति में सबसे अधिक बाधक वे कुकृत्य होते हैं जो पके फोड़े पर चुभे काँटे की तरह अंतःक्षेत्र में कुसंस्कार बन कर जमे-गढ़े और कसकते रहते हैं। इन्हें यथावत् रहने दिया जाय तो वे अन्तःचेतना को सन्मार्ग की ओर बढ़ने का जो दण्ड विधान दुर्गति के रूप में भुगतना शेष है उसके लिए सन्मार्ग पर चलने से रोकना ही नरक व्यवस्था का निर्धारित क्रम है। इस अवरोध को हटाने के लिए प्रायश्चित ही एक मात्र उपाय उपचार है। खोदी गयी खाई को पाटना ही होगा। गबन का भुगतान करना ही होगा। क्षमा प्रार्थना नहीं प्रायश्चित साहसिकता अपनाने से ही काम चलता है। अन्यथा अध्यात्म प्रगति को तथा त्रुटिवश हुए पापकर्मों का ब्यौरा लिखवा लिया जाता है। उन्हें मात्र गुरुदेव-माताजी ही ध्यानपूर्वक पड़ते हैं तथा स्वयं निश्चय करते हैं कि किस साधक के लिये क्या निर्धारण किया जाय? कल्प आरम्भ के पूर्व का यह आध्यात्मिक वमन-विरेचन हर किसी के समक्ष नहीं मात्र उन्हीं के समक्ष करना चाहिए जिनके संरक्षण में अपना भावकल्प कराने के लिये साधक स्वयं को सौंपते हैं।’

किसके लिये क्या किया जाता है-इसमें परामर्श और अनुदान दोनों ही सम्मिलित हैं परामर्श में कुछ तो वाणी से कह दिया जाता है। शेष का उत्तर साधक के अन्तराल तक पहुँचाने के लिए मध्यमा, परा पश्यन्ती नाम से समझी जाने वाली त्रिविधि श्रवणातीत वाणियों का उपयोग होता रहता है। साधक एकान्त काल में यह में कोई न कोई विघ्न उत्पन्न होते ही रहेंगे। अस्तु पापों का प्रायश्चित्त तो मानसिक परिमार्जन के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि शरीर के संचित मलों का निष्कासन। कृत्य प्रक्रिया के ये दोनों ही अविच्छिन्न अंग हैं। अस्तु जहाँ साधकों के शरीरगत विकारों का निष्कासन और विशिष्टताओं का अभिवर्धन अभीष्ट है वहाँ यह भी आवश्यक है कि मनःक्षेत्र में कुकृत्यों के कारण उत्पन्न कुसंस्कारों और अवरोधों का भी परिमार्जन किया जाय। इसके लिए किसे क्या करना होगा? इसका निर्णय कराने के लिए साधक अपनी भूलों का उल्लेख करते हैं जिसे पढ़कर उन्हें वापस कर दिया जाता है ताकि अन्य कोई उसे पड़ न सके। इसके साथ ही यह भी बता दिया जाता है कि उन्हें प्रायश्चित्त की दृष्टि से और क्या कुछ करना चाहिए।

शारीरिक, मानसिक विकृतियों के अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयाँ भी सत्र प्रवेश के दिन लिखकर देनी होती है, पर उतने भर से काम नहीं चलता। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के कुशल चिकित्सक हर साधक का शारीरिक, मानसिक पर्यवेक्षण करते हैं।

उसकी विधिवत् रिपोर्ट देते हैं। इस विश्लेषण के आधार पर भी साधकों में से प्रत्येक को जो पृथक्-पृथक् करना होता है उन उपचारों को तभी अलग बता सिखा दिया जाता है। इन विशिष्ट साधना क्रमों में बदलती परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन निर्धारण भी होते रहते हैं। यह जाँच आखिर, मध्य और अंत में तीन बार होने से यह पता चल जाता है कि कल्प साधना किस के लिए किस क्षेत्र में कितनी उपयोगी, अनुपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रकार यह एक मास की तीर्थसेवन अवधि यदि ठीक प्रकार निभ सके तो भूतकाल की तुलना में भविष्य को अत्यधिक सफल समुन्नत बनाने वाली सिद्ध होती है।


VigyapanSuchana

साधना से सिद्धि (खण्ड 1), आन्तरिक कायाकल्प का सुनिश्चित विधान, सन्धि बेला की विशिष्ट साधना ये तीन पुस्तकें इस वर्ष के उत्तरार्ध में युगान्तर चेतना द्वारा प्रकाशित हुई हैं। साधना सम्बन्धी गूढ़ विषय पर बोधगम्य एवं सरस शैली में विरचित ब्रह्मवर्चस् की यह पुस्तक माला इस अंक के संदर्भ में सबके लिए मनन योग्य है।


प्रायश्चित और उत्कर्ष के लिए ज्ञान-यज्ञ का प्रज्ज्वलन

परिशोधन के लिए तप, प्रगति-परिष्कार के लिए पुण्य का सुयोग बिठाना पड़ता है। तीर्थसेवन में भी यही करना पड़ता है। तीर्थयात्रा, पदयात्रा में जहाँ संयम बरतने, साधु जीवन अपनाने की आवश्यकता पड़ती है वहाँ सद्ज्ञान की धर्मधारणा जन-जन को हृदयंगम कराते हुए प्रयास क्रम में क्रमशः आगे बढ़ना होता है। इस उद्देश्य के लिए प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत दो-दो की साइकिल टोलियाँ प्रव्रज्या पर निकलने की उपयोगिता बतायी है और युग शिल्पियों को इस प्रक्रिया में जुटने के लिए कहा है। दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन जहाँ अवसर हो वहीं ढपली पर युग संगीतों का गायन, रात्रि को ज्ञान गोष्ठी-विचार-विनिमय क्रम चलता रह सकता है। साइकिलों को भारवाहन के रूप में पदयात्रा का एक सहायक वाहन उपकरण भर माना गया है। उसका उपयोग आवश्यक सामान लादने तथा सुविधानुसार सवारी गाँठने का उपक्रम चलाते रहा जा सकता है। अपने घर से हरिद्वार तक की तीर्थयात्रा इसी प्रकार की जा सकती है। एक रास्ते जाने दूसरे से आने में भिन्न भिन्न मार्गों गाँवों के निवासियों से संपर्क बनता है। इन दिनों इसी आधार पर तीर्थयात्री टोलियाँ चलनी चाहिए। सत्रों में सम्मिलित होने वाले इसी प्रकार आवा जाया करें तो उनकी सत्र-साधना में तीर्थ-सेवन के तत्व और भी अच्छी तरह बढ़ी-चढ़ी मात्रा में मिल जाया करेंगे।

कई लोगों को अनेकानेक तीर्थों को देखने की इच्छा होती है और वे उसी निमित्त खर्चीली और कष्टसाध्य यात्रा करते भी हैं। स्पष्ट है कि इस भगदड़ में पर्यटन तक का आनन्द न रहने पर उसका पुण्य फल तो मिलता ही कहाँ है। प्रस्तुत लकीर पीटने वाली चिन्ह-पूजा में आँखों से ही मन्दिरों का आकार-प्रकार देख लेने भर का लाभ है। इस ललक को पूरा करने की भी शान्ति-कुँज में व्यवस्था की गई है। इसमें भारत के सभी महत्वपूर्ण तीर्थ-देवालयों के बड़े साइज के असली फोटो चित्र स्थापित किये गये हैं। साथ ही उनके साथ मन्दिरों जैसी सज्जा भी बिठा दी गई है। भाव-श्रद्धा के साथ इनका दर्शन-नमन करने का वही पुण्यफल प्राप्त हो सकता है जो उन-उन स्थानों में जाकर उन इमारतों, प्रतिमाओं को देखने से मिलता। स्पष्ट है कि प्रतीकों की अपनी कोई शक्ति नहीं, वे भक्त की श्रद्धा के अनुरूप ही अपनी सामर्थ्य का परिचय देते हैं। मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के मिट्टी से बने गुरु कितने सच्चे और कितने समर्थ थे-यह सर्वविदित है। यह समर्थता उन भक्तों ने अपनी श्रद्धा का प्रतिरोपण करने से प्रकट की थी। अश्रद्धालुओं के लिए तो तब भी पाषाण खण्ड मात्र थे और अब भी उन प्रतिमाओं का वास्तविक मूल्य नगण्य जितना है। इस श्रद्धा के बल पर ही गणेश जी धरती पर ‘राम नाम’ लिखकर उसकी परिक्रमा करने वाले देवताओं की तुलना में वरिष्ठ सिद्ध हुए थे। तीर्थ स्थानों के दर्शनों पर निकलने वाले यात्रियों का प्रयोजन यदि वस्तुतः तीर्थ दर्शन में विश्वास हो तो उसकी पूर्ति गायत्री तीर्थ में प्रतिष्ठित “तीर्थ मंडल कक्ष” का भावनापूर्वक दर्शन-नमन करते रहने से भी पूरी हो सकती है।

हिमालय को देवात्मा माना गया है। जड़ होते हुए भी अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण उसे प्रत्यक्ष देवता माना गया है। इसी प्रकार गंगा की पवित्रता प्रख्यात है। उसे तरण-तारिणी कहा जाता है। हिमालय की छाया और गंगा की गोद में साधना की उच्चस्तरीय सफलता मिलने की फलश्रुति कही सुनी जाती है। इन दोनों का भी गायत्री तीर्थ में एक समन्वित देवालय बनाया गया है। यह दर्शनीय है। आदि उद्गम पर भागीरथ को और अन्त समापन पर परशुराम को प्रहरी माना जाता है। उनके प्रतीक भी इस देवात्मा हिमालय कक्ष में प्रतिष्ठित हैं। इन्हें देख कर समूचे हिमालय में परिभ्रमण की-उसके दिव्य दर्शन की-भावना को एक सीमा तक पूरा किया जा सकता है। प्रतीकों की दुनिया में भावुक जनों की श्रद्धा को ही प्राण माना गया है। उसे शान्ति कुँज में अवस्थित प्रतीकों के साथ यदि जोड़ा जा सके तो समग्र हिमालय, सम्पूर्ण गंगा उनके अंचल में अवस्थित तीर्थों का दर्शन एक ही स्थान पर गणेशजी की तरह घर बैठे किया जा सकता है। गायत्री के गर्भ में सभी देवताओं का, सभी मन्त्रों का निवास है। प्रयत्न यह किया गया है कि गायत्री तीर्थ, शान्ति कुँज में उपरोक्त सभी महान प्रतीकों के दिव्य-दर्शन एक साथ उपलब्ध हो सकें। इस दर्शन का कितना पुण्यफल मिलेगा? इसका उत्तर एक शब्द में दिया जा सकता है कि साधक की जितनी गहरी-उथली श्रद्धा होगी, उतना। इस दृष्टि से सम्पूर्ण तीर्थयात्रा का लाभ मिल सकने वाला सुयोग भी कल्प साधकों को सहज उपलब्ध होता है। इस प्रकार दर्शन-झाँकी से सम्बन्धित तीर्थ प्रयोजन की यहाँ बिना किसी खर्च या कष्ट के भली प्रकार पूर्ति हो जाती है।

प्रायश्चित्त प्रकरण में जहाँ तक तितीक्षा का सम्बन्ध है वह चांद्रायण व्रत के समान ही आहार कल्प के माध्यम से भली प्रकार पूर्ति हो जाती है। आधे पेट रहने का जो सिद्धान्त चांद्रायण में है उसी की पूर्ति दूसरे तरीके से कल्प प्रक्रिया में भी हो जाती है। अनुष्ठान, जप, तप का जो विधान प्रायश्चितों के अवसर पर करना होता है, उससे कम नहीं कुछ अधिक ही इस साधना में समाविष्ट किया गया है। जप-ध्यान-उपवास के अतिरिक्त अनुष्ठानों में दशांश या शतांश आहुतियों का भी नियम है। कल्पकाल में हुए अनुष्ठान के अनुपात से शतांश नहीं दशांश आहुतियाँ भी इस एक महीने के नित्य हवन-क्रम के साथ सम्पन्न हो जाती है।

आत्मिक प्रगति के प्रमुख अवरोध संचित दुष्कर्मों का निष्कासन प्रायश्चित प्रक्रिया से ही सम्भव है। उसका पूर्वार्ध दुर्घटनाओं का किसी अनुभवी अध्यात्म चिकित्सक के सम्मुख वमन-प्रकटीकरण एवं आत्म प्रताड़ना के रूप में व्रत-अनुष्ठान की कष्ट सहन तप-साधना से पूर्ण हो जाता है। कल्प-साधना के दिनों ही यह दोनों प्रकरण पूरे हो चुके होते हैं। उत्तरार्ध में उस क्षति को पूरा करना चाहता है जो अनीति आचरण के द्वारा अवांछनीय परम्पराओं के प्रचलन के रूप में फैलायी गई होती हैं। पाप-कर्मों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें शोषण-अत्याचार तो नहीं कह सकते, पर उनके कारण उपयोगी मर्यादाओं का उल्लंघन एवं अवांछनीयता का छूत रोगों की तरह विस्तार होता है। एक से दूसरे तक दुष्प्रभाव पहुँचता है और प्रकारान्तर से समूचे समाज को दुःखद दुष्प्रवृत्तियों के गर्त में धकेलता है। उदाहरण के लिए व्यभिचार और रिश्वत दो ऐसे पाप हैं, जिनका सहयोगपूर्वक ही आदान-प्रदान होता है। अत्याचार होना ही पाप की परिभाषा होती तो इन्हें पाप न गिना जाता, पर चूँकि उनसे भ्रष्टाचार की छूत फैलती है और मर्यादाओं का व्यतिक्रम होता है, अतएव वे पाप माने गये हैं। समर्थ होते भी दान, जुआ, दहेज, लाटरी, उत्तराधिकार आदि के रूप में लिया हुआ धन भी बिना परिश्रम के होने के कारण हेय माना गया है। व्यक्तिगत आत्महत्या के रूप में आलस्य, प्रमाद, नशा दुर्व्यसन, अपव्यय, आदि को भी पातक माना गया है। चोरी, हत्या, ठगी आदि तो आक्रामक उत्पीड़क होने के कारण प्रत्यक्ष पाप है ही। इन सबसे व्यक्ति विशेष को भी हानि पहुँचती है, पर सबसे बड़ा अनाचार समूचे समाज में दुर्बुद्धि का, दुष्प्रवृत्तियों का विस्तार होना है। पाप-पुण्य का तत्व-दर्शन यही है कि उससे मानवी श्रेष्ठता या निष्कृष्टता पर क्या प्रभाव पड़ा। यों आक्रामक अनीति भी कम निन्दनीय नहीं है, पर उससे भी बड़ी बात समग्र शालीनता है। उस पर पड़ने वाले प्रभाव को ही प्रमुख माना जाता है। हत्या तो कई बार न्यायाधीश भी अपराधी को मृत्यु-दण्ड देकर करा देते हैं।

कल्प साधना के साधक अपने पापकर्मों का प्रकटीकरण करते हैं। उनमें से कुछ घटनाएँ विशिष्ट होने के कारण उन्हें विशेष परामर्श दिये जाते हैं। ऐसे अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी को एक ही सुझाव दिया जाता है कि वे सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के निमित्त जितना अधिक सम्भव हो उतना समयदान, साधनदान प्रस्तुत करें और प्रायश्चित का उत्तरार्ध प्रक्रिया भी पूर्ण करें।

इन दिनों आपत्तिकाल जैसी स्थिति हैं। सर्वत्र आस्था संकट छाया हुआ है। दुर्बुद्धि ने भ्रष्टता और दुष्टता को चरम सीमा तक पहुँचा दिया है। बौद्धिक, वैज्ञानिक, आर्थिक प्रगति कम नहीं हुई है, फिर भी दुर्बुद्धि की बहुलता ने हर क्षेत्र को कठिनाइयों, समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं से भर दिया है। ऐसी दशा में दुर्घटनाग्रस्तों का अस्पताल भिजवाने की तरह इन दिनों लोकमानस के परिष्कार की ही बात सोचनी चाहिए। उस एक में ही समस्त समस्याओं का समाधान सन्निहित है। प्रज्ञा अभियान इसी प्रयास का नाम है। विचारक्रान्ति, ज्ञानयज्ञ, आदि नाम इसी के हैं। प्रायश्चित की दृष्टि से भी इस सामयिक आवश्यकता की पूर्ति अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इतना ही नहीं जन-कल्याण और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण भी, इसी के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, इसलिए उसे उच्चस्तरीय पुण्य-परमार्थ भी कह सकते हैं।

प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत यों अनेकों कार्यक्रम आते हैं जिनसे व्यक्ति , परिवार और समाज के नव-निर्माण में सहायता मिलती है। उनमें से कितने ही सुधारात्मक भी है, जिन्हें नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति के नाम से जाना जाता है। इन सब का यदि एक केन्द्र बिन्दु ढूँढ़ना हो तो उसे स्वाध्याय मंडलों का संस्थापन और संचालन कह सकते हैं। यह हर स्थिति के व्यक्ति के लिए नितान्त सरल है। साथ ही उस बीजारोपण का अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होना भी हथेली पर सरसों जमने की तरह हाथों-हाथ देखा जा सकता है। प्रज्ञा साहित्य जिनने पढ़ा है वे जानते हैं कि उनकी बाजारू किताबों से कोई तुलना नहीं। इसे तत्व-दर्शन का, नीति शास्त्र का, सामाजिक आदर्शवादिता का सार-संक्षेप एवं मणु-संचय कह सकते हैं। जिसने इसे एकबार पढ़ा अनुप्राणित एवं चमत्कृत होकर रहा है। यह आलोक जहाँ भी जला है प्रकाश फैलाये बिना नहीं रहा। यह लपटें जहाँ भी उठी हैं वहीं उष्मा और आभा का तत्काल अनुभव हुआ है। इसके पठन-पाठन की सुनियोजित प्रक्रिया को अग्रगामी एवं व्यापक बनाने की दृष्टि से ही इन दिनों सर्वत्र स्वाध्याय मंडलों की स्थापना की जा रही है। इस युगान्तरीय चेतना में अपना समय एवं धन जितना भी लग सके प्रायश्चित एव पुण्य अर्जन की उभयपक्षीय आवश्यकताओं का दृष्टि से जी खोलकर लगाया जाना चाहिए। ऐसे ही दान बीजारोपण कहे जाते हैं। मक्का के एक दाने से एक पौधा उत्पन्न होता है। एक पौधे पर पाँच भुट्टे आते हैं। एक भुट्टे में प्रायः पाँच सौ दाने होते हैं। इस प्रकार एक बीज की परिणति ढाई हजार बीजों के रूप में तीन महीने के भीतर ही हो जाती है। लगभग इसी स्तर का प्रयास स्वाध्याय मंडलों में से प्रत्येक को तीस स्वाध्यायशीलों का एक सर्किल बनाना होता है। नियमित रूप से बिना मूल्य प्राणवान साहित्य मिलते रहने से इस मंडली के जीवन-क्रम स्तर में जो उत्साहपूर्वक परिवर्तन होता है उसका आभास पाने भर से हर किसी को उनकी उपयोगिता एवं गरिमा का विश्वास होता चला जाता है।

स्वाध्याय मण्डलों की रूपरेखा अत्यन्त सरल है। एक भावनाशील व्यक्ति आगे बढ़े। अपने जैसी प्रकृति के अन्य चार भी ढूँढ़े। यह पाँच नैष्ठिक सदस्यों का एक स्वाध्याय मण्डल बना। इन पाँचों को अपने-अपने संपर्क क्षेत्र के पाँच-पाँच व्यक्ति ऐसे तलाश करने होते हैं जिनका रुझान धर्म एवं विवेक की ओर हो। वे अपने से सम्बन्धित लोगों को नियमित स्वाध्याय के लिए सहमत करें साथ ही, ऐसा प्रबन्ध करें कि पाँचों सदस्य अपने सम्बन्धित पाँच-पाँच स्वाध्यायशीलों तक प्रज्ञा साहित्य नियमित रूप में देने और वापस लेने का क्रम चलाते रहें। संक्षेप में यही है वह स्वाध्याय मण्डल योजना जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सर्वोपरि प्रमुखता दी जा रही है। कल्प साधक अपने पाप नाश एवं पुण्य संवर्धन की दृष्टि से इस प्रयास में पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों


सरल, सुलभ किन्तु सम्भावना से भरी-पूरी एक महान स्थापना

धनबल, बुद्धिबल, बाहुबल, शस्त्रबल, पदबल आदि की महिमा लोग भली-भाँति जानते हैं। प्रायः इन्हीं बलों पर सुविधा-साधनों को एकत्रित करना, दूसरों को वशीकरण करना, अपने वर्चस्व की छाप डालना सम्भव होता है। यह बहिरंग जीवन को ठाठ-बाट का बनाने वाली प्रक्रिया हुई। अब दूसरा क्षेत्र आरम्भ होता है-मनोबल और आत्मबल की महत्ता है। इन दोनों को साँसारिक साधनों की तुलना में अधिक भारी भरकम, अधिक स्थायी एवं अधिक गम्भीर परिणाम उत्पन्न करने वाला समझा जा सकता है। कारण यह है कि वे चेतना क्षेत्र से सम्बन्धित है। धन बल आदि भौतिक क्षेत्र के होने के कारण मात्र बहिरंग की ही महिमा बढ़ाते हैं। उनसे दूसरों की आँख में चकाचौंध उत्पन्न किया जा सकता है। वासना तृष्णा की शरीरगत ललक भी एक सीमा तक गुदगुदाई जा सकती है। किन्तु ऐसा कुछ नहीं हो सकता जिससे व्यक्तित्व उभरे, आत्म-सन्तोष मिले, और गौरव गरिमा का आनन्द बरसे। यह उद्देश्य तो मनोबल, आत्मबल बढ़ाने से ही पूरा होता है।

सत्साहस आन्तरिक है। क्रोध, आक्रमण, ठगी, चोरी, जैसे दुस्साहस तो दुष्ट दुरात्मा भी करते रहते हैं। पर उद्देश्यों के लिए पराक्रम कर सकना मात्र संकल्पवान्, सत्साहस का ही काम है। यह अंतःक्षेत्र में उभरना है। बाहरी उत्तेजनाएँ तो क्षणिक आवेश भर उत्पन्न करती हैं और देखते-देखते पानी के बबूले की तरह बैठ जाती है। आत्मबल और भी ऊँची उपलब्धि है। भीतर के कुसंस्कारों से निबटना उसी का काम है। उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में एकाकी चल पड़ना-उपहास असहयोग, अभाव, अवरोधों का पग-पग पर सामना करते हुए भी विश्वासपूर्वक अनवरत गति अपनाये रहना आत्मबल के सहारे ही सम्भव हो सकता है।

जिसमें मनोबल न हो वह भौतिक क्षेत्र में प्रगतिशील न बन सकेगा। जिसमें आत्मबल न हो उसके लिए व्यक्तित्व की महानता और उस आधार पर मिल सकने वाली विभूति सम्पदा का सुयोग मिलेगा ही नहीं। अदूरदर्शी बाल बुद्धि भौतिक वैभवों को ही सब कुछ मानती है। उन्हीं की ललक बुझाने के लिए धनबल-बुद्धिबल आदि संचय करती हैं। किन्तु दूरगामी परिणामों का अनुमान लगाना और विश्वास करना मात्र प्रज्ञा का ही काम है। आत्मिक क्षेत्र की यही महान उपलब्धि है। इसी के सहारे आत्म-सन्तोष लोक-सम्मान जन सहयोग एवं जीवन को कुल-कृत्य बनाने वाले दैवी अनुग्रह उपलब्ध होते हैं। मानवी विशेषताओं में मनोबल, आत्मबल ही जो वरदान माने जाते हैं। जिसे वे न मिल सके सम्पत्तिवान होते हुए भी निरन्तर खिन्न, उद्विग्न ही रहेंगे। कुढ़ते-कुढ़ते ही उनका समय गुजरेगा।

आत्मिक क्षेत्र की दो प्रमुख सम्पदा, मनोबल और आत्म-बल अर्जित करने के लिए श्री गणेश किस प्रकार किया जाय? इसका एक ही उत्तर है-सद्ज्ञान का अवलम्बन। आद्यशक्ति —महाप्रज्ञा इसी को कहते हैं। उदर पूर्ति को आवश्यक जानकारियाँ सिखाने वाली स्कूली शिक्षा एवं व्यवहार कुशलता एक बात है और जीवन की समस्याओं को दूरदर्शिता के आधार पर हल करना एवं सर्वतोमुखी प्रगति पथ पर बढ़ चलना इस दूसरी स्थिति को उपलब्ध करने के लिए ब्रह्म विद्या के तत्व दर्शन का न केवल अध्ययन करना पड़ता है वरन् साधना प्रयोगों द्वारा उसे हृदयंगम भी करना पड़ता है। इससे कम में उन विभूतियों को हस्तगत करने का और कोई मार्ग नहीं। प्रज्ञा को प्रखर परिष्कृत करने के लिए स्वाध्याय के योग्य सत्साहित्य पढ़ना या सुनना पड़ता है। मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा आदि का स्वरूप एवं प्रयोग भी तो इसके बिना बन नहीं पड़ता। इसलिए गुरु ज्ञान द्वारा उच्चस्तर की प्रेरणाएँ उपलब्ध करनी होती हैं। इसके लिए समर्थ साहित्य का स्वाध्याय इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे शास्त्रकारों ने भजन पूजन से भी अधिक आवश्यक माना है और सर्वोपरि प्रमुखता देने योग्य ठहराया है। ब्रह्मदान, ज्ञानदान से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में है नहीं इसलिए पुरातन काल के देव मानव साधु ब्राह्मण इस प्रयोजन में अहर्निश निरत रहते थे।

कल्प साधकों के मन में कभी पुण्य परमार्थ की उमंग उठे तो उन्हें सस्ती वाहवाही के प्रदर्शनात्मक खिलौने से मन नहीं बहलाना चाहिए वरन् दूरगामी हित साधना में समर्थ ज्ञान विस्तार को मूर्धन्य मानकर उन उपेक्षित क्षेत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। किसी की जीवन दिशा को सामान्य से उछालकर असामान्य बना देना कितनी महान सेवा साधना है। इसको वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंजामिल, विल्व मंगल, ध्रुव, प्रहलाद आदि से पूछनी चाहिए। ऐसी साक्षी पार्वती, अरुन्धती, मैत्रेयी, सावित्री, संघमित्रा, मीरा से लेकर अम्बपाली जैसी महिलाओं में भी मिल सकती है। इन सबको नारद, बुद्ध आदि के द्वारा मिले प्रेरणात्मक सद्ज्ञान के प्रति कृतज्ञ पाया जाएगा । यह प्रेरणाएँ जिस आधार पर मिलती हैं उसे सत्संग कहते हैं। आज की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुसार सत्संग उपलब्ध कराने के लिए अनगढ़ दिग्भ्रान्त-वकवासियों के संपर्क में अपना समय नहीं खराब करना चाहिए। वरन् स्वाध्याय की ओर मुड़ना चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रज्ञा साहित्य को वरीयता दी जा सकती है। इसे मणि मुक्तकों की गहरी डुबकी लगाकर संचित किया गया है। इसे अमृतोपम मधु संचय कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस अवलम्बन से बढ़कर सस्ता, सुलभ और सर्वांगपूर्ण सत्संग कदाचित् ही कहीं अन्यत्र उपलब्ध हो सके।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कल्प साधना के साधकों को प्रायश्चित रूप से अति पूर्ति करने और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए नितान्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का संचय करने की अन्तःप्रेरणा उमंगें तो उसे दिशा विहीन होकर भटकाव में नहीं पड़ने देना चाहिए और सद्ज्ञान संवर्द्धन को प्रमुखता देनी चाहिए।

पिछले पृष्ठों पर स्वाध्याय मण्डल की स्थापना की कल्प वृक्ष आरोपण से तुलना की गई थी। यह सही है। प्रज्ञा साहित्य का नियमित स्वाध्याय करने का जिन्हें चस्का लगेगा, अवसर मिलेगा, वे कुछ ही दिन में चिन्तन और व्यवहार की दृष्टि से तेजी से बदलते हुए शालीनता की दिशा में चलते हुए दृष्टिगोचर होंगे। मनोविनोद के लिए पढ़े गये उथले साहित्य की बात दूसरी हैं। उसकी तुलना जाज्वल्यमान प्राण प्रेरणा से भरे पूरे प्रज्ञा साहित्य के साथ नहीं हो सकती।

इन दिनों उत्कृष्टता की दिशा में किसी का ध्यान नहीं, हर किसी पर तृष्णा, अहन्ता की आपा-धापी प्रेत-पिशाच की तरह चढ़ी है। ऐसी दशा में दूरदर्शी विवेकशीलता की पक्षधर विचारधारा लोगों के गले कठिनाई से ही उतारी जा सकती है। मिठाई का लोभ देकर काम नहीं देती। कुनैन की गोली पर शक्कर चढ़ाकर गले उतारा जाता है। चाय वालों ने आरम्भ में मुफ्त या एक पैसा कप बेचकर प्रचार किया और चस्का लगाया था। चाय का इन दिनों लोकप्रिय होना सहज सम्भव नहीं हुआ है। इसके लिए प्रचारकों को एड़ी चोटी का पसीना एक करना पड़ा है। आज की परिस्थितियों में सद्ज्ञान प्रेरणा को जन-जन को हृदयंगम कराने के लिए संगठित प्रयास ही काम दे सकते हैं। अपने तक सीमित स्वाध्याय साधना करने से व्यक्ति विशेष को तो लाभ मिल सकता है। पर यदि उस आलोक को व्यापक बनाना हो तो संगठित रूप से उस प्रक्रिया को अग्रगामी बनाना होगा। आरम्भ में संगठन छोटा रहे हर्ज नहीं। पर यदि वह उद्देश्यपूर्ण और सज्जनों का समुदाय हो तो उस बीजारोपण के एक दिन विशाल वृक्ष बनने की सम्भावना सुनिश्चित ही रहेगी।

स्वाध्याय मण्डल संस्थापन का कार्य एक व्यक्ति एकाकी प्रयासों से भी कर सकता है। एक स्वयं चार अपने जैसे स्वभाव और रुझान के साथी ढूँढ़ लेने भर से काम चल जायेगा। यह पाँचों मण्डली के प्रारम्भिक नैष्ठिक सदस्य कहलायेंगे । स्वयं नियमित रूप से प्रज्ञा साहित्य पढ़ने के लिए एक घण्टा समय निकालेंगे साथ ही यह भी प्रयत्न करेंगे कि अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में जहाँ भी प्रभाव हो वहाँ युग-साहित्य का चस्का लगाने का उत्तरदायित्व निभाया जाय। हर नैष्ठिक सदस्य ऐसे पाँच व्यक्ति ढूँढ़ निकालें जो स्वाध्याय के प्रति उत्साह बरतें। इन लोगों तक हर दिन बिना भूल युग साहित्य पहुँचाने वापस लेने का सिलसिला नैष्ठिक सदस्यों को ही चलाना होगा। वे अनायास मिलते रहते हों तो उस समय भी यह देने वापस लेने का क्रम चल सकता है। अन्यथा घर जाने और वापस लेने के लिए समय निकालने की बात भी सोचना चाहिए। नैष्ठिक सदस्यों की दुहरी व्रतशीलता है कि वे स्वयं नित्य कर्म की तरह स्वाध्याय को जीवनचर्या में सम्मिलित रखें साथ ही किन्हीं पाँच अन्यों को भी पढ़ाने का कार्य उतना ही पुण्यफल मानें जितना कि पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का होता है।

पाँच नैष्ठिक सदस्य हर एक के पाँच-पाँच साथी स्वाध्यायशील इस प्रकार 1+ 5 = 6 की स्वाध्याय मण्डली बन जाती है। स्वाध्याय मण्डल के यह पाँच सहचर और पाँच-पाँच उनके बच्चे यह तीस का एक छोटा परिवार बन जाता है। वे लोग पढ़ने का क्रम तो जारी रख ही सकते हैं। साथ ही सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होकर सत्संग की प्रक्रिया भी चला लिया करें। इस सप्ताह जो पढ़ाया गया हो उसे जीवनक्रम में सम्मिलित करने के उपायों के सम्बन्ध में इस सत्संग में विचार विनिमय होता रहे तो पठन के बीजारोपण को आवश्यक खाद पानी मिलता रहेगा और देखते-देखते खेत लहलहाने लगेगा। इन तीसों व्यक्ति यों के जन्म दिवसोत्सव मनाने का भी शुभारम्भ करना चाहिए। यह नितान्त सस्ते सरल और प्रभावी आयोजन यदि तीस परिवारों में चल पड़ें तो उनमें उपस्थित होंगे युगान्तरीय चेतना से अवगत प्रभावित अनुप्राणित होंगे और एक से अनेकों तक इस आलोक वितरण का क्रम चल पड़ेगा देखने में यह प्रयास नगण्य जैसा लगता है पर यदि उसे ठीक तरह चलता रक्खा जा सके तो उसके जादुई परिणाम कुछ ही दिनों में दृष्टिगोचर होने लगेंगे और एक समर्थ देव परिवार अपनी प्रखरता का परिचय देने लगेगा।

जहाँ ऐसे स्वाध्याय मण्डल बनेंगे वहाँ उनके एक दिवसीय उद्घाटन समारोह भी होंगे। इनके लिए शान्ति कुँज से दो प्रतिनिधि भेजने की व्यवस्था बनी है। वे आयोजन की गरिमा से अधिकाधिक लोगों को अवगत कराने का प्रयत्न करेंगे। सायंकाल स्वाध्याय की महत्ता बताने वाला स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन प्रातः उद्घाटन समारोह। जिसमें पाँचों नैष्ठिक सदस्य और उनके पाँच-पाँच सहयोगी कुल तीस व्यक्ति तो उस धर्मकृत्य में प्रमुख रूप से सम्मिलित होंगे ही। अन्य लोगों को भी आमन्त्रित करके उस विधा से परिचित कराने की व्यवस्था रहेगी। पाँच सदस्य और पच्चीस सहयोगी क्रमबद्ध रूप से बिठाते जायेंगे। षट्कर्म, स्वस्तिवाचन, कलश पूजन, सामूहिक गायत्री पाठ, संकल्प, व्रत धारण, अभिसिंचन आदि क्रिया-कृत्यों के अतिरिक्त उस अवसर पर संगीत एवं प्रवचन की व्यवस्था भी रहेगी। इस प्रकार रात्रि के चित्र प्रदर्शन और प्रातः के धर्मकृत्य एवं प्रवचन के साथ इस स्थापना का विधिवत् उद्घाटन सम्पन्न हो जाएगा ।

प्रश्न एक ही रह जाता है कि तीस व्यक्ति यों को नियमित स्वाध्याय सामग्री जुटाने के लिए खर्च का प्रबन्ध कैसे हो। तीस व्यक्तियों के लिए न्यूनतम एक रूपया प्रत्येक के हिसाब से तीस रूपये की पाठ्य सामग्री तो खरीदनी ही पड़ेगी। इसका सरल उपाय एक ही है कि पाँचों नैष्ठिक सदस्य अपने यहाँ ज्ञानघट स्थापित करें, और उनमें बीस-बीस पैसा प्रतिदिन डालें। अब से पैंतीस वर्ष पूर्व ज्ञानघट का अनुदान दस पैसा था। अब महँगाई कई गुनी हो जाने से वह राशि बीस पैसा कर दी गई है। यह लगभग तिहाई, चौथाई चाय के प्याले जितनी होती है। इतनी उदारता तो पाँच नैष्ठिक सदस्य अपनायेंगे ही। इसमें भी कृपणता बरतने और थोड़ा-सा समय निकालने में आना-कानी करने पर तो जो स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना और उसकी महान परिणति के रूप में संजोयी गई आशा अपूर्ण ही रह जायगी। विश्वास किया गया है कि जहाँ आदर्शवादी उत्साह उमड़ेगा वहाँ समयदान और अंशदान का यह छोटा सा अनुदान भी प्रस्तुत किया जाने लगेगा।


छोटी बीजारोपण की सुविस्तृत परिणति

सद्ज्ञान की, स्वाध्याय की, प्रज्ञा प्रेरणा की गरिमा समझने वाले पाँच एवं पच्चीस अन्यों के मिलने से बना हुआ तीस का स्वाध्याय मण्डल अपना कार्यारम्भ तो प्रज्ञा साहित्य पढ़ने-पढ़ाने से करेगा, पर उस छोटी परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। ज्ञान यदि जीवन्त है तो वह कर्म के रूप में विकसित होगा ही। सड़ना तो घुन लगा बीज है। जिसमें जीवन मौजूद है उसके अंकुरित पल्लवित होने में किसी व्यवधान की आशंका नहीं है।

विश्वास किया जाना चाहिए कि स्वाध्याय मंडल के सदस्य अपने चिन्तन और चरित्र में-स्वभाव और दृष्टिकोण में ऐसा उत्साहवर्धक परिवर्तन करेंगे जिससे प्रज्ञा साहित्य की प्रखरता सिद्ध हो सके। यह पठन ऐसा है जो अन्तराल के मर्मस्थल तक पहुँचने के उपरान्त-कर्म क्षेत्र में उतरने की तड़पन उत्पन्न करता है। युग सन्धि जैसे ऐतिहासिक अवसर पर तो समय की चुनौती स्वीकार करने में जागृत आत्माओं का पौरुष उन्हें दबा-दबोच कर अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने के लिए विवश करेगा। ऐसी उमंगें जिस भी अन्तःकरण में उठती हैं उसे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने के लिए विवश करती हैं। आदर्शों से अनुप्राणित व्यक्ति मूक दर्शक बन कर नहीं बैठ सकते उन्हें पठन-पाठन से एक कदम आगे बढ़ाकर समयदान और अंशदान की श्रद्धांजलि से युग देवता की झोली भरनी पड़ती है। आपत्तिकालीन आवश्यकता हर विचारशील को बेचैन करती है और विपत्ति से जूझने में पड़ने वाले घाटे को सहन करने का शौर्य साहस उभारता है। स्वाध्याय मंडल के छोटे-बड़े सदस्य यदि सचमुच महाप्रज्ञा के प्रति निष्ठावान् बन सकें तो समझना चाहिए कि उनमें से प्रत्येक का कतृत्व हजारीबाग जिले को यशस्वी बनाने वाले अनगढ़ हजारी किसान की भूमिका निभाने में पीछे न रहने देगा। पिसनहारी यदि पुण्य परमार्थ के क्षेत्र में यशस्वी हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा पाठक मात्र वाचक व्यसन को ही गले बाँधें बैठे रहे। युग निमन्त्रण पर कान न धरे ।

प्रज्ञा पाठकों की उमंग एक से बहुत बनने के रूप में उभरेगी। हर जीवन्त प्राणी से जब भी उभरेगी वह वंश वृद्धि में रस लेगा-उसका ताना-बाना बुनेगा-संयोग जुटायेगा और अन्ततः उस मार्ग पर कदम बढ़ाने के उपरान्त जो उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर आते हैं उन्हें खुशी-खुशी निभाएगा । जब वनस्पतियों से लेकर जीव-जन्तुओं की छोटी प्रजातियों तक में यह प्रकृति प्रेरणा अपना काम निर्बाध रूप से कर रही है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा प्रेरित आत्मायें अपने साथी सहयोगी बढ़ाने का प्रयत्न न करें। वंश में प्रजनन ही नहीं विचार शृंखला की पकड़ का विस्तार होना भी एक तथ्य है। गोत्र पूर्वजों से ही नहीं गुरु परम्परा से भी चलते हैं। प्रज्ञा साहित्य से जिन्हें नव-चेतना मिली है वे उसका कार्यक्षेत्र बढ़ाये बिना विस्तार किये बिना रह ही नहीं सकते। जब चोर लवार अपने साथी बढ़ाते चलते हैं तो कोई कारण नहीं कि स्वाध्याय मंडल के सदस्यों प्रज्ञा परिजनों को वैसा करने का उत्साह न उमंगें ।

एक से पाँच का प्रजनन-विस्तार-निरन्तर आगे बढ़ता रहेगा। यह महाकाल की प्रस्तुत प्रेरणा प्रवाह को देखते हुये एक प्रकार से निश्चित ही समझा जा सकता है। एक संस्थापक, जब पाँच साथी और पच्चीस सहयोगी ढूँढ़कर तीस की मण्डली देखते-देखते बना सकता है तो कोई कारण नहीं वह वंश वृद्धि आगे न चले। इतने पर ही समाप्त हो जाय।

प्रज्ञा अभियान के समर्थक, प्रशंसक तो आमतौर से सभी हैं। जो उसके प्रतिपादनों की व्यवहार में अवज्ञा करते हैं वे भी सिद्धान्तीय विरोध करने का साहस नहीं कर सकते। बात एक कदम आगे और बढ़ने की है जहाँ परिवार में प्रवेश करने और सहयोगी के रूप में कदम से कदम मिलाकर चलने, उत्तरदायित्वों से कन्धा लगाने का साहस दिखाना पड़ता है। मिशन के सदस्य या परिजन ऐसे ही लोग माने जाते हैं। उनके लिए अपने-अपने क्षेत्रों में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में क्रियात्मक योगदान पड़ता है। इसके दो प्रकार हैं (1)समयदान (2)अंशदान। यह दोनों ही प्रस्तुत करने पड़ते हैं।

आज से 35 वर्ष पूर्व अभियान का आरम्भ हुआ था। तब सदस्यों का न्यूनतम अनुदान दस पैसा नित्य और समय एक घण्टा था। अब पैंतीस वर्ष में महँगाई कहाँ से कहाँ बढ़ गयी। साथ ही युग सन्धि में गतिविधियाँ तीव्र से तीव्रतर हो गयीं। ऐसी दशा में उपरोक्त दोनों अनुदानों का अनुपात भी बढ़कर कम से कम दूना तो हो ही जाना चाहिए। अब जागृत आत्माओं को हर दिन दो घण्टा और बीस पैसा निकालने चाहिए। यही है वह पूँजी जिसके आधार पर लोक मानस के परिष्कार-सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन और अनुपयुक्त प्रचलनों का आमूलचूल परिवर्तन किया जाना है। हर काम श्रम और साधन माँगता है। 450 करोड़ मनुष्यों की इस दुनिया को अब अवांछनीयता से उबारना और नव− सृजन के मोर्चे पर जुटाना है। 196,938800 वर्गमील व्यास के पृथ्वी के इस धरातल की परिस्थितियों का कायाकल्प करना है तो उसी परिमाण में श्रम और साधन लगेंगे।

यह कही से दबाव देकर मिलना नहीं है। भावनाशील जागृत आत्मा जहाँ अन्तःप्रेरणा का युग चेतना का दबाव अनुभव करेंगे वहीं से ये दोनों अनुदान भी स्वेच्छापूर्वक उभरेंगे और समय की माँग पूरी करने के निमित्त कारण बनेंगे, अपना ही नहीं अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वालों का सहयोग अर्जित करेंगे। स्वाध्याय मंडल की स्थापना में रही हो रहा है। संस्थापक एक उसके घनिष्ठ साथी नैष्ठिक सदस्य पाँच। फिर उसके समर्थक पाँच-पाँच इस प्रकार बीस की एक ऐसी मंडली का निर्माण जो युग धर्म के निर्वाह में या तो कटिबद्ध हो चली या होने वाली है। यह बीस गोबर के चौथ बने रहे, एक संस्थापक ही सदा सर्वदा कट पुतलियाँ नचाता रहे, ऐसा नहीं हो सकता। आशा की जानी चाहिए कि इनमें से भी अधिकाँश लोग ऐसे निकलेंगे जो दूसरों के कन्धों पर चढ़े रहने से आगे बढ़े। अपने पैरों आप चलें। दूसरों को अपने कन्धों पर बिठाये । इस प्रकार एक से पाँच की प्रक्रिया को स्वतंत्रतापूर्वक चलाने वाले कर्मवीर भी क्रमशः निकलते ही चलेंगे। वंश वृद्धि सन्तानोत्पादन के क्षेत्र में ही रोकी जाती है। विचार क्रान्ति के क्षेत्र में ही यह एक से पाँच का क्रम अपना कर सुनिश्चित रूप से चलना चाहिए।

(1)1 से 5 (2)5 से 25 (3)25 से 125 (4)125 से 725 (5)725 से 3625 (6)3625 से 18125 (7)18125 से 90625 (8)90625 से 273125 (9)273125 से 1365625 (10)1365625 से 6828125 (11)6828125 से 34140625 (12) 34140625 से 170703125 (13) 170703125 से 853515625 (14) 853515625 से 4268068125। चौदहवीं पीड़ा पर पहुँचते-पहुँचते यह एक से पाँच का क्रम प्रायः उतना ही हो जाता है जितना कि संसार भर की जनसंख्या। वस्तुतः सुधारना सम्भालना तो इनमें से एक तिहाई को ही है क्योंकि समर्थ सक्षम तो प्रायः उतने ही है। दो तिहाई तो बच्चों-बूढ़ों अल्पवयस्क, रोगी, अपंग आदि होते हैं। इस प्रकार एक विचार पीढ़ी उत्पन्न होने में एक वर्ष से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। स्वाध्याय मंडल के पाँच नैष्ठिक सदस्य यदि एक वर्ष में अपने-अपने स्वतन्त्र पाँच स्वाध्याय मण्डल बनाले तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी प्रतिभा है हर व्यक्ति का अपना संपर्क क्षेत्र है। उसका उच्च उद्देश्य के लिए संकल्पपूर्वक प्रयोग बन पड़े तो अनपढ़ हजारी किसान की तरह हजार न सही पाँच बगीचे। पाँच बगीचे ही न सही पाँच पेड़ तो उगा ही सकता है। युग परिवर्तन नव निर्माण का यही तरीका सरल और व्यावहारिक है। बड़े आदमी, बड़े प्रभाव और बड़े साधनों से बड़े काम करें उसका औचित्य है, पर उनके लिए रुका तो नहीं जा सकता। नौ मन तेल जुटने पर राधा का नाच होने की प्रतीक्षा में कब तक बैठे रहा जाय। जेब की माचिस जलाकर पैर में चुभे काँटे को तो तुरन्त निकालना पड़ता है। सुराही-गिलास ढूँढ़कर तुरन्त गला गीला करना पड़ता है। इसके लिए माचिस की एक तीली का एवं एक गिलास पानी का आर्थिक दृष्टि से न सही उपयोगिता की दृष्टि से बहुत बड़ा मूल्य है।

साधनों की उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि श्रम की। दो घण्टा रोज समय देने में एक व्यक्ति का तप वर्ष में 720 घण्टे होता है। इसे प्रायः 100 पूरे दिन मान सकते हैं। यदि प्रज्ञा परिवार के 1 लाख प्राणवान-प्रज्ञा पुत्र इतनी छोटी श्रद्धांजलि नियमित रूप से युग देवता के चरणों में अर्पित करने लगें तो ये वर्ष में 1 करोड़ दिन होते हैं। इन्हें 360 दिनों में विभाजित किया जाय तो प्रतिदिन प्रायः 20 हजार लोकसेवी प्रतिदिन सृजन प्रयोगों में जुटे रहने जैसी चमत्कारी शक्ति हाथ लग सकती है। यही बात 20 पैसा प्रतिदिन के सम्बन्ध में भी है। एक लाख व्यक्ति हर दिन इतनी छोटी राशि निकालें तो उसका योग हर दिन 20 हजार तथा महीने में 6 लाख रूपया होता है। यह राशि कम भी है और अधिक भी। कम इसलिए कि 450 करोड़ को अगणित समस्याओं से उबारना है। अधिक इसलिए कि भाव भरे अनुदान, और उनका सर्वश्रेष्ठ उपयोग बन पड़े तो इतने भर से नव सृजन का ऐसा तूफानी आन्दोलन खड़ा हो सकता है जिसके प्रवाह में असंख्यों तिनके, पत्तों और धूल कण आकाश चूमते और घोड़े की चाल दौड़ते दृष्टिगोचर होने लगे।

प्रज्ञा परिवार में एक लाख नहीं बीस लाख नाम हैं पर हैं, उनमें से अधिकाँश भावना शून्य है। इसलिए अनुदान का वचन तो देते हैं पर निभाते नहीं। इनकी प्रसुप्त भावनाओं को झकझोरने का काम प्रज्ञा साहित्य के नियमित स्वाध्याय से कम में और किसी प्रकार बन नहीं पड़ेगा। बात वर्तमान सूची की नहीं। उसमें यदि निष्क्रियों का बाहुल्य मान लिया जाय तो भी यह भावना की जा सकती है कि स्वाध्याय मण्डलों के माध्यम से जो तीस-तीस की मण्डलियाँ बने भी उनमें आधे चौथाई अवश्य भावनाशील निकलेंगे और कम से कम न्यूनतम अनुदान प्रस्तुत करने की उदारता तो दिखायेंगे ही। फिर सभी इतने कृपण कहाँ होते हैं जो बीस पैसे से अधिक की उदारता न दिखा सकें। पारिवारिक उत्तरदायित्व से निवृत्त, आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी, जिन पर उपार्जन की जिम्मेदारी लदी ही नहीं, ऐसे अगणित व्यक्ति हो सकते हैं जो दो घण्टे की बात क्या, सोने खाने के घण्टे छोड़कर युग धर्म के निर्वाह में अंगद, हनुमान् की तरह-भीम अर्जुन की तरह-अहर्निश जुटे रह सकें। यह चर्चा मात्र एक लाख को जागृत आत्माओं की श्रेणी में मिलाकर की जा रही है। यदि वह संख्या बीस गुनी हो सके। बीस लाख तक पहुँच सके तो अपना प्रज्ञा परिवार ही समूची मानवता को प्रस्तुत विभीषिकाओं से उबारने और उज्ज्वल भविष्य के सपने साकार करने में पूरी तरह सफल हो सकता है।

युग परिवर्तन कोई जादू नहीं है। वह न तो लकड़ी घुमाकर पिटारी में से निकलने वाला है और न देवता उसे पुष्प वर्षा की तरह धरती पर बिखेरने वाले हैं। उसके लिए जागृत आत्माओं को रीछ वानरों की तरह कठोर समर्पित जीवन जीना और कठोर श्रम करना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज के समझ हजार समझेंगे विपत्तियाँ और विभीषिकाएँ प्रस्तुत हैं। उन्हें निरस्त करने के लिए अंवाछनीयताएँ के साथ जमकर लोहा लेना है। अशिक्षा, गरीबी, रुग्णता, और हीनता से ग्रसित मानवता को उबारने का-सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का-गोवर्धन उठाना है। प्रवाह को बदलना है। प्रचलनों को उलटना है। चिन्तन का परिमार्जन और चरित्र व्यवहार में नये सिरे से शालीनता को प्रतिष्ठापित करना है। इस बहुमुखी सृजन प्रयोजन के लिए अगणित भावभरे युग शिल्पी चाहिए। उन्हीं को उगाने, सींचने और पकाने के लिए प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत स्वाध्याय मण्डलों को इन दिनों प्रमुखता दी जा रही हैं। कल्प साधना के साधकों को अपना चरम पुरुषार्थ इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए। अपने प्रभाव क्षेत्र में इन्हें अधिकाधिक संख्या में बनाने-उन्हें सुनियोजित ढंग से चलाने एवं इस निमित्त जिन साधकों की आवश्यकता है उन्हें जुटाने के लिए भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। इस उदार सेवा साधना को अपनाकर वे भूल का प्रायश्चित्त परिमार्जन तथा भविष्य निर्धारण के निमित्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का उत्साहवर्धक अर्जन कर सकेंगे।


दिव्य अनुदान की ध्यान धारणा

युग सन्धि के इस पावन पर्व पर हिमालय के अध्यात्म ध्रुव केन्द्र से जागृत आत्माओं को नव सृजन की क्षमता में अतिरिक्त अभिवृद्घि के लिए कुछ विशेष अनुदान वितरित किया जा रहे हैं। उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और सुसंस्कृत लोक-व्यवहार की दिव्य विभूतियों में अभिवृद्घि करने के लिए कोई भी भावनाशील इन्हें सहज ही उपलब्ध कर सकते है इस दैवी अनुग्रह को जो जितना समेट सकेंगे वे अपना व्यक्ति त्व विकसित करेंगे और आन्तरिक पवित्रता के अतिरिक्त प्रतिभा एवं प्रखरता भी विकसित करेंगे। स्मरण रहे यह अनुदान मात्र उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए ही है, संकीर्ण स्वार्थपरता की मनोकामना तथा लोभ, मोह, विलास एवं अहंकार की लिप्सा तृष्णा पूरी करने के लिए इन दिव्य अनुदानों का उपयोग न हो सकेगा।

इस प्रवाह का समय सूर्योदय के पूर्व से लेकर सूर्योदय का एक घण्टा ही निर्धारित है। इससे पूर्व या पश्चात् उस विशिष्ट अनुदान की उपलब्धि न हो सकेगी। साधना का क्रम-विस्तार इस प्रकार है—

एकान्त खुली हवा का कोलाहल रहित स्थान ढूँढ़े। आसन बिछाकर हिमालय की दिशा में मुँह करके बैठे। पालथी मारकर ध्यान मुद्रा बनायें। ध्यान मुख के पाँच अनुशासन हैं। (1) स्थिर शरीर (2) शान्त चित्त (3) कमर सीधी (4) हाथ गोदी में (5)आँखें बन्द। शरीर और मन की स्थिति ऐसी बना देने में दस पाँच मिनट का समय लगता है। इसके उपरान्त भावनापूर्ण ध्यान करना चाहिए और आँखें बन्द करके कल्पना चित्र इस प्रकार निर्मित करने चाहिए।

हिमाच्छादित हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य का उदय।

—स्वर्णिम किरणों का हिमालय से साधक तक प्रवाह। किरणों का साधक के हृदयचक्र में प्रवेश। इसके उपरान्त उस ऊर्जा का ऊपर मस्तिष्क सहस्रार चक्र तक और नीचे मूलाधार चक्र तक उसका विस्तार। मस्तिष्क और धड़ के सभी अवयव उस आलोक से प्रकाशित। पुलकित और अनुप्राणित।

नस-नस में-रोम-रोम में दिव्य ज्योति का अभ्यास। साधक की आत्मसत्ता प्राण पुँज। प्रज्ञा पुँज। ज्योति पिण्ड जैसी।

—स्थूल शरीर निष्ठावान् । सूक्ष्म शरीर प्रज्ञावान। कारण शरीर श्रद्धावान।

—साधक पर त्रिपदा की स्नेह वर्षा। सविता की शक्ति वर्षा। अनन्त अन्तरिक्ष से अमृत की विपुल वर्षा।

—अन्तरात्मा साधक की रस विभोर। आनन्द से सराबोर। अनुभूति-तृप्ति तुष्टि। शान्ति।

—हिमालय की शक्ति धारा से साधक का परिवर्तन। परिवर्तन-प्रत्यावर्तन-पुनर्जीवन

—परिवर्तन क्षुद्रता का महानता में। परिवर्तन वासना का भावना में। परिवर्तन नर का नारायण में। परिवर्तन उद्वेग का समाधान में।

—विलय, विसर्जन-आत्मा का परमात्मा में। अनुभूति एकत्व अद्वैत।

पाँच बार मन ही मन ॐकार गुँजन। तीन बार प्रार्थनाएँ-असतो मा सद्गमय। मृत्योः माऽमृतंगमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।

उपरोक्त ध्यान मौन रूप से मन ही मन किया जाय। मुख से उच्चारण कुछ भी न करें। टेप से उपरोक्त निर्देश मिलते रहें तो उस आधार पर ध्यान-धारणा में सहायता मिलता है और कल्पना चित्र अच्छे उभरते हैं। अन्यथा उपरोक्त सारी क्रम शृंखला पहले बार-बार दुहरा कर स्मृति पटल पर बिठानी पड़ती है। तब प्रवाह ठीक प्रकार बनता है।

यह ध्यान-धारणा नित्य न बन पड़े तो सप्ताह में एक दिन गुरुवार या रविवार को भी की जा सकती है। उस दिन ब्रह्मचर्य, अस्वाद व्रत का पालन हो सके एवं सुविधा के समय दो घण्टे का मौन रखते हुये वह समय आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास के चिन्तन मनन में लग सके तो और भी अच्छा। इस सुयोग से हिमालय की शक्ति धारा को साधक की आत्म सत्ता में गहराई तक प्रवेश करने और रोम-रोम में रम जाने का अवसर मिलता है। यह साधना एकाकी भी हो सकती है और टेप रिकार्डर की सहायता से सामूहिक भी।


विज्ञान और धर्म


विज्ञान और धर्म (kavita)

विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये। विश्वास ने, सृजन के नव गीत गुनगुनाये॥1॥

विज्ञान, धर्म बिछुड़े। लय, ताल, छन्द उखड़े। संगीत शाश्वत तब आलापने न पाते। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये ॥2॥

विज्ञान के चरण पर। मुखरित न धर्म के स्वर। संगीत जिन्दगी का गाये तो कोन गाये। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये ॥3॥

यदि सर्जना इधर हो। सद् कल्पना उधर हो। तो कौन, कल्पना को साकार फिर बनाये। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये ॥4॥

विज्ञान, ध्वंस कारी। हो धर्म, भ्रांति भारी। कल्याण की दिशा में, तब कौन फिर चलाये। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये ॥5॥

विज्ञान, धर्म मिलकर। कल्याण-पंथ चलकर । सुख, शान्ति स्वर्ग को वे भू पर उतार लाये। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये॥6॥

कर्तव्य और निष्ठा। विश्वास और श्रद्धा । पुरुषार्थ, स्नेह इनका दुनिया नई रचाए । विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये॥7॥

विज्ञान धर्ममय हो। सद्ज्ञान कर्ममय हो। विज्ञान, धर्म की यूँ दूरी चलो मिटायें। विज्ञान, धर्म ने जब समवेत स्वर उठाये॥8॥

—मंगल विजय

*समाप्त*