सृजन चेतना की समर्थता और गरिमा

ध्वंस सरल है, सृजन कठिन। पतन सहज है, उत्थान कष्टसाध्य। उथली बालक्रीड़ा कोई भी कर सकता है, पर समुद्र की गहराई में उतरकर मोती बटोरना किन्हीं साहसी गोताखोरों द्वारा बन पड़ता है। वातावरण में अवांछनीयता का समावेश करने में उथले लोग भी बहुत कुछ कर गुजरे हैं। विषैली घुटन उत्पन्न करने में कूड़े-करकट की छोटी ढेरी भी तनिक-सी चिनगारी का सहयोग पाकर सहज समर्थ हो सकती है, किंतु वातावरण में शांति-शीतलता भरने की बात तो अंतरिक्ष में व्याप्त बादल सोचते और कर गुजरते हैं। धरती की उर्वरता वर्षा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण और प्रखर बनाए रखने में युगमनीषा ही पावस की भूमिका निभाती है। सुखद संभावनाओं का फला-फूला माहौल बनाने और वातावरण को नयनाभिराम— उल्लासमय बनाने में बसंत का अवतरण ही सफल होता है।

कभी कार्तिक अमावस्या को तमिस्रा से छुटकारा दिलाने के लिए गुहार की गई थी। सूरज, चंद्रमा ने समर्थ होते हुए भी उसे अनसुनी कर दिया। तब छोटे दीपकों ने अपनी तुच्छता का संकोच न करते हुए अंधकार से जूझने का संकल्प प्राण हथेली पर रखकर किया था। दीपपर्व उसी आदर्शवादी— बलिदानी साहसिकता को अनंतकाल तक जीवंत रखने वाला और अनुकरण की प्रेरणा देने वाली स्मारक है। सृजनशिल्पियों को कुछ ऐसा ही सोचना और करना होता हैं।


वर्त्तमान की विपन्नता का तात्त्विक पर्यवेक्षण

इन दिनों प्रवाह कुछ ऐसा चल रहा है, जिसमें लोक-मानस को अचिंत्य-चिंतन, कुकृत्य-कर्त्तृत्व में निमग्न देखा जा सकता है। पेट और प्रजनन से आगे की बात किसी को सूझती ही नहीं। संकीर्ण स्वार्थपरता की खुमारी ऐसी चढ़ी है कि लोभ और मोह की खाई पाटने के अतिरिक्त और कोई लक्ष्य सामने रह ही नहीं गया है। बड़प्पन की एक ही परिभाषा है— दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करके अपनी विशेषता सिद्ध करना और अहंता की, दर्प की आत्मप्रवंचना से मन बहलाना। नीति और अनीति का विचार छोड़कर, जिस प्रकार भी, जितना भी संग्रह संभव हो, करते रहना। उसे ठाट-बाट के प्रदर्शन, वैभव-विलास एवं दुर्व्यसनों में जी खोलकर उड़ाना। इतने पर भी कुछ बचा रहे तो मात्र वंशजों के लिए छोड़ मरना, भले ही उनके पास निर्वाह की कोई कमी न हो। प्रस्तुत परिवार के प्रति उत्तरदायित्व न निभ पाने पर भी आए दिन संतानें जनना, अपना अर्थ-संतुलन, पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों का भविष्य और देश का व्यवस्थाक्रम मटियामेट करना।

इस आसुरी रीति-नीति को अपनाने पर मनुष्य का अंतराल निष्ठुर, निकृष्ट होना स्वाभाविक है। पिछड़ापन इसी को कहते हैं। स्तर का गया-गुजरापन, शिक्षित-अशिक्षित, धनी-निर्धन किसी में भेदभाव नहीं करता और सब पर समान रूप से लदा रहता है। इस सड़न भरे वातावरण में घिनौने व्यक्तित्व वाले अपराधी, निर्मम, दुष्ट और भ्रष्ट स्तर के लोग ही पनपते हैं या फिर हेय, हीन, आलसी, प्रमादी ऐसे नर-पशुओं की संख्या बढ़ती है, जिनके भार के सहन करने में धरती भी बहुत कष्ट अनुभव करती है। वे जिस समाज में जन्मते हैं, उसके लिए भारभूत होकर रहते हैं। विग्रह और विक्षोभ उत्पन्न करने, अव्यवस्था फैलाने, घृणा-जुगुप्सा का वातावरण बनाने, चैन की साँस न लेने-देने की विडंबना ही वे रचते हैं। उनके जीवित रहने से समाज और राष्ट्र का संतुलन बिगड़ता और गौरव नष्ट होता है।

गहराई के साथ पर्यवेक्षण करने पर चित्र-विचित्र कलेवरों में इस निकृष्ट स्तर के व्यक्तित्व अपनी विविध गतिविधियों में संलग्न पाए जाते हैं। क्षुद्र लोगों का उद्देश्यरहित चिंतन और आदर्शरहित चरित्र ही ऐसे घृणित वातावरण का सृजन करता है, जिसे पुरातन भाषा में नरक कहा जाता था। नरक की परिणति पीड़ा और पतन में ही होती है। जहाँ वरिष्ठ और कनिष्ठ सभी मानवी गरिमा को तिलांजलि देकर भूत-प्रेतों जैसे उद्धत आचरण में निरत हों। वहाँ शांति कहाँ, प्रगति कहाँ, स्नेह कहाँ? सौजन्य कहाँ, न्याय कहाँ, औचित्य कहाँ? जहाँ दैवी विभूतियों को बहिष्कृत कर दिया गया हो वहाँ समस्याओं, विपत्तियों, विभीषिकाओं की भी कमी कहाँ रहने वाली है। पतन की ढलान ही ऐसी है, जिस पर लुढ़कने वाले त्रास देते, त्रास सहते, अंततः महाविनाश के गर्त्त में गिरते, आत्महत्या का कलंक ओढ़ते हैं।

आश्चर्यचकित करने वाली विडंबना यह है कि एक ओर भौतिकी, औद्योगिकी और बौद्धिकी का तूफानी प्रगति ने सुविधा-साधनों के पर्वत खड़े कर दिए हैं। इतने पर भी मनुष्य क्रमशः भीतर से खोखला और बाहर से ढोल-ढकोसला मात्र क्यों बनता जा रहा है? उसकी जीवट, उमंग, तुष्टि, तृप्ति, शांति का बेतरह पलायन क्यों होता चला जा रहा है? अणु-आयुधों की सैन्य-सज्जा ने इंद्रवज्र को पीछे छोड़ दिया, फिर सर्वत्र असुरक्षा का, आशंका का, अनिश्चितता का, आतंक का वातावरण क्यों? प्रगति के लिए हर दिशा में बनने वाली योजनाओं, तैयारियों, व्यवस्थाओं और उपलब्धियों को देखकर लगता है कि अब अभाव— दारिद्र्य का कहीं कोई अस्तित्व रहने वाला नहीं है। फिर भी निष्कर्षों तक पहुँचते-पहुँचते प्रतीत हो गया है कि किसी बेताल-ब्रह्मराक्षस ने आशाओं के अंबार फूँक से उड़ाकर अंतरिक्ष में विलीन कर दिए।

उपचार अपनी जगह पर, क्षरण और मरण का क्रम अपनी गति पर, दोनों के मध्य कोई तालमेल नहीं। इसे अनहोनी ही कहना चाहिए। यह बेबूझ पहेली—पकड़ से बाहर की भूल-भूलैया किसी तिलस्म महल-सी लगती है। प्रतीत होता है कि मानवी अस्तित्व अभिमन्यु की तरह किसी ऐसे विचित्र चक्रव्यूह में फँस गया है, जहाँ से बच निकलना कदाचित अब शक्य रह नहीं गया है। आए दिन भविष्यवक्ताओं, मनीषियों, वस्तुस्थिति के आकलनकर्त्ताओं, दूरदर्शियों के कथन-प्रतिपादन सुनने को मिलते रहते हैं कि दुर्दिन तेजी से बढ़ता आ रहा है और अपने विकराल मुख में इस धरातल की संचित शोभा-सुषमा को निगल जाने की तैयारी पूर्ण कर चुका है। बढ़ता हुआ प्रजनन, प्रदूषण, पर्यावरण, विकिरण, प्रकृति-संपदा के असंतुलित दोहन के फलस्वरूप पदार्थ-संपदा का समापन ऐसे तथ्य हैं जो निकट भविष्य में जीवन-मरण जैसे संकट की पूर्ण सूचना देते हैं। प्रत्यक्ष सुविधा-संपादन के लिए जब आदर्शों और भावनाओं को तिलांजलि देने की परंपरा चल पड़ी तो फिर स्नेह-सौजन्य का क्या काम? उदार आत्मीयता को जीवंत रखने के लिए तो आत्मसंयम और सेवा-साधना करनी पड़ती है। जहाँ स्वार्थांधता का बोलबाला हो वहाँ इन श्रद्धासिक्त सत्प्रवृत्तियों के पैर कैसे टिकें? उनका अस्तित्व समाप्त हो जाने पर जिस प्रकार सोचा जाता है, जो किया और कराया जाता है, उसकी तुलना पिशाचकृत्यों से ही की जा सकती है। जहाँ पिशाचों की भरमार हो, उसे मरघट ही कहा जाएगा । वहाँ जलने-जलाने, डरने-डराने, रोने-रुलाने के अतिरिक्त और किसी माहौल की आशा कैसे की जाए?

यही है उन विसंगतियों का रहस्योद्घाटन, जिनके कारण एक हाथ से भौतिक उत्कर्ष, दूसरी ओर आत्मिक अपकर्ष का जादुई हेर-फेर चलता, दृष्टिगोचर होता है। जब तक यही स्थिति बनी रहेगी; प्रवाह, माहौल, वातावरण ऐसा ही बना रहेगा; जिसमें घुटन, संकट, असंतुलन, विभ्रम, विग्रह के अतिरिक्त और कहीं कुछ न दिखे, न सूझे। फिर किया क्या जाए? अच्छा तो यही लगता है कि अपने काम-से-काम रखा जाए। दुनिया का लेखा-जोखा लेकर सुधार-संभाल की चिंता का भार सिर पर न लादा जाए; किंतु कठिनाई यह है कि बात इस प्रकार भी तो नहीं बनती। चारों ओर अग्निकांड की लपटें उठें, सारा मुहल्ला धूँ-धूँकर जले तो अपने मध्यवर्त्ती घर की सुरक्षा कहाँ बन पड़ती है? गाँव में महामारी फैले तो अपने परिवार का निश्चिंत रहना कैसे संभव है? गुंडे, बदमाशों का समुदाय किसी क्षेत्र में छाया हो तो अपने घर के लोगों को उनके कुचक्र से कैसे विरत रखा जाए? गेहूँ के साथ घुन पिसता है। दुर्जनों का बाहुल्य हो तो मुट्ठी भर सज्जनों की भी खैर नहीं। प्रश्न समृद्धि की कमी का नहीं, भावनाओं के दुर्भिक्ष का हैं। मनुष्य हाड़-माँस का पुतला नहीं, भावना और आस्था का पुंज है। उसका जैसा भी अंतराल होगा वैसी ही उसकी आदतें ढलेगीं, इच्छाएँ उठेंगी, गतिविधियाँ चलेंगी। फलतः मनःस्थिति के अनुरूप ही वह परिस्थितियाँ सृजन करता और उनमें जकड़ता चला जाएगा। यही है आज की वस्तुस्थिति का सूक्ष्मनिरीक्षण, शवच्छेदन और विश्लेषण।

विपन्नता को उलटने के लिए एक ही प्रयास करना होगा कि व्यक्तित्त्वसंपन्न मानवों को ढूँढ़ा, उभारा, उछाला और लोक-मानस को प्रभावित करने वाली भूमिका निभाने के लिए अग्रिम मोर्चे पर खड़ा किया जाए। इतना बन पड़े तो उन समस्त समस्याओं का हल संभव और सरल है जो लाख प्रयत्न करने पर भी सुलझने का नाम नहीं ले रहा है। सवाल न तो संपदा की कमी का है और न साधनों के बिना कोई काम रुका पड़ा है। मनुष्य का श्रम और कौशल ही संपत्ति का उत्पादन-उपार्जन करता है। वह पिछड़े स्तर का हो तो दरिद्रता से, विपन्नता से छुटकारा नहीं। वह प्रखर हो तो बालू से तेल निकालने, लात मारकर पाताल से पानी निकालने की बात संभव हो सकती है। फरिहाद का कोह खोदकर नहर निकालना एकाकी संकल्प के सहारे संभव हो सका। कल-परसों एक हजारी किसान ने बिहार में एक हजार आम्र-उद्यान लगाकर उस इलाके को हजारी बाग का श्रेयाधिकारी बना दिया।

महामानवों की समूची इतिहास शृंखला इसी प्रकार की हैं। शंकराचार्य, बुद्ध, गाँधी, विवेकानंद, दयानंद, कबीर, दादू, नानक, समर्थ, केशव, प्रताप, सुभाष आदि की गाथाएँ यही प्रामाणित करती हैं कि सफलताएँ सदा मनस्वी के चरण चूमती रही हैं। ओजस् आगे बढ़ा है, जो उसके तूफानी पराक्रम के साथ अनुयायियों के अनगिनत पत्ते-तिनके अनायास ही पीछे दौड़ते चले आए हैं। प्रवाह उत्पन्न करने में व्यक्तित्व ही समर्थ रहे हैं और रहेंगे। आज के पतन-पराभव का सृजन भी उन्होंने किया है।

उदाहरण के लिए साहित्य, कला, अभिनय, संगीत को ही लें। इस अकेली धारा ने कोटि-कोटि मानवों के मनःक्षेत्रों को कलुष-कालिमा से भर दिया है। पतन-प्रवाह को, सर्वनाश की भूमिका निभाने के लिए स्वच्छंद गति से बढ़ते चलने, जो भी लपेट में आए उसे निगलते चलने के लिए स्वच्छंद छोड़ दिया है। यदि इस कला-क्षमता को सृजन-प्रयोजन में, आदर्शों के लिए प्रोत्साहन में प्रयुक्त किया गया होता तो उसकी स्थिति आज कि स्थिति से सर्वथा भिन्न होती। लोक-मानस के पतनोन्मुख बनाने में कला-क्षेत्र के मूर्धन्यों की संपदा, बुद्धि और कुशलता नियोजित हो सकी होती तो निश्चित रूप से आज सतयुग के दृश्य उपस्थित हुए होते। शक्ति तो शक्ति है। उसे दुधारी तलवार की संज्ञा दी गई है। वह सुरक्षा, दुष्ट-दमन, बालवध, आतंक, आत्महत्या आदि किसी भी भले-बुरे काम में प्रयुक्त की जा सकती है। जो बात कला के संबंध में कही जा रही है, वही विज्ञान, शिक्षा, शासन, उत्पादन, व्यवसाय, गठन, प्रचलन आदि सभी क्षेत्रों के लिए समान रूप से लागू होती है।

न प्रकृति-संपदा की कमी है, न बुद्धि-कौशल की। मानवी, पशु-समुदाय का, भाप, तेल, विद्युत का बल-वैभव भी कम नहीं। उन उपलब्धियों का यदि सही दिशा में सुनियोजन-सदुपयोग किया जा सके तो विश्वास किया जाना चाहिए कि वर्त्तमान साधनों से ही व्यक्ति का, समाज का, विश्व का कायाकल्प हो सकता है। संव्याप्त हाहाकारी— विपन्नता का स्थान सुख-शांति से भरी-पूरी सुसंपन्नता ग्रहण कर सकती है। इसके लिए किसी विप्लव— विद्रोह जैसी भयावह मार-काट या उथल-पुथल की भी आवश्यकता न पड़ेगी। दुर्बुद्धि को संमति में बदल लेना इतना कठिन काम नहीं है, जितना कि महायुद्धों का नियोजन। जब अंतरिक्षयुद्ध से महाप्रलय के नियोजन की, अणु-आयुधों से धरती की धज्जियाँ उड़ा देने की, प्रदूषण-विकिरण से प्राणी-समुदाय का दम घोट देने की, श्रमसाध्य, व्ययसाध्य असंभव जैसी लगने वाली योजनाएँ संभव हो सकती हैं तो कोई कारण नहीं कि मानवी संकल्प दुर्बुद्धि को सद्बुद्धि में बदल देने, अवांछनीय की दिशा में बहने वाले प्रचलन-प्रवाह को मोड़ने-मरोड़ने में सफल न हो सके। संकल्प, साहस और पुरुषार्थ का समन्वय जब भी, जहाँ भी, जिस प्रयोजन के लिए भी हुआ है, वहाँ असंभव को संभव में बदलने का चमत्कार उत्पन्न होता रहा है। यदि सृजन सोचा गया होता, उत्कर्ष लक्ष्य रहा होता, दूरदर्शी विवेक को आश्रय मिला होता तो आज वह स्थिति सामने न आई होती, जिसमें कुछेक को छोड़कर हर व्यक्ति खिन्न, असंतुष्ट, विपन्न, निराशा एवं भयभीत दिखाई पड़ रहा है।

यों धरती पर सदाशयता भी विद्यमान रहती है। बीजनाश तो प्रलयकाल में भी नहीं होता। सज्जन अभी भी मौजूद हैं। सत्प्रवृत्तियों की इतिश्री हो गई हो, सो बात भी नहीं है। सृजन की बात सोचने वाले और उसके लिए अपनी नगण्य-सी सामर्थ्य से छुट-पुट कुछ-कुछ करते रहने वाले भी ढूँढ़ने पर मिल ही सकते हैं, पर उनकी गणना लंका में विभीषण की दाँतों के बीच जीभ जितनी ही हो सकती है। बाहुल्य और बहुमत को ही प्रधानता देनी होती है और मूल्यांकन उसी का होता है। इस दृष्टि से आज की मनःस्थिति और परिस्थिति पर से चमकदार पर्दा उठाते ही जो दिखता है, उसे एक शब्द में विघातक ही कहा जा सकता है। प्रश्न एक ही है कि आधारभूत कारण को समझने-समझाने, प्रवाह को मोड़ने-मरोड़ने, गुत्थी को सुलझाने के लिए कटिबद्ध होने की तैयारी की जाए या जो हो रहा है, होने जा रहा है, उसे मूकदर्शक की तरह देखते रहा जाए?


विभीषिका से जूझने कौन आगे आए?

विश्व-विचित्रताओं में एक अद्भुत विडंबना यह भी है कि पतन सरल है और उत्कर्ष कठिन। कुकृत्यों के सूत्रसंचालक और सहभागी अनेकानेक बनते, गिरोह बनाते, षड्यंत्र रचते और बड़े-बड़े दाँव चलाने में सफल रहते हैं। जबकि सत्प्रवृत्तियों के पक्षधर अपनी एकाकी टंट-घंट करते रहते हैं। संत-सज्जनों का समुदाय इस संसार में न हो, ऐसी बात नहीं, पर न जाने क्यों उनमें मिल-जुलकर बड़े प्रयास करने की उत्कंठा ही नहीं जगती है। ऐसी दशा में अकेला चना क्या भाँड़ फोड़े, डेढ़ चावल की खिचड़ी कैसे पके, ढाई इट की मस्जिद कैसे बने? प्रवाह तो सामुदायिक प्रयत्नों से ही बनते हैं। सज्जन भी यदि दुर्जनों की तरह एकत्रीकरण का महत्त्व समझे और मिल-जुलकर सृजन, उत्थान की योजना बनाएँ, उपलब्ध साधनों को जुटाएँ तो कोई कारण नहीं कि पतन का माहौल बनाने वालों की तुलना में उत्थान का सरंजाम जुटाना संभव न हो सके।

सृष्टा की इस अनुपम कलाकृति विश्व-वसुंधरा पर जब-जब भी महाविनाश की घटाएँ छाई हैं तब असंतुलन को संतुलन में बदलने की प्रतिक्रिया अदृश्य अंतरिक्ष से अवतरित होती रही है। परिवर्तन के ऐसे क्रांतिकारी तूफान आए हैं, जिनने सज्जनता को सृजनात्मक पराक्रम के लिए उत्साहित किया है। वे कटिबद्ध हुए हैं तो “सत्य में हजार हाथी की बराबर बल होता है," यह उक्ति अक्षरशः सत्य सिद्ध होती रही है। पाप दुर्बल है, पर वह पराक्रम के कंधे पर बैठकर उचकता-मचलता रहता है। पुण्य समर्थ है, पर वह किसी कोने में निरहंकारिता, अनासक्ति आदि की चादर ओढ़कर मात्र कल्पना-लोक की बिना पंखों वाली उड़ानें उड़ता रहता है। लोकहित के लिए पुरुषार्थ-क्षेत्र में उतरने की माँग होती है तो बगलें झाँकने और किसी बहाने जान बचाने का उपक्रम करता देखा जाता है। यों पुण्य की यह मूल प्रवृत्ति नहीं है, पर जब वह सज्जनता का लबादा ओढ़कर भीरुता से आक्रांत लोगों के पल्ले बँधता है तो उसकी भी दुर्गति होती है। आज पुण्य और पलायन लगभग एक ही वस्तु के दो नाम माने जाने लगे हैं, पर वस्तुतः वैसा है नहीं। पुण्य में तथ्यतः प्रचंड पराक्रम का भी समावेश है, जो समय आने पर अपने वास्तविक रूप में प्रकट भी होता है।

विघातक विपन्नता की परिस्थितियों को उलटने की विश्व-व्यवस्था का नाम ‘अवतार’ है। व्यापक असंतुलन को निरस्त करने में उस परंपरा का प्रकटीकरण बार-बार समय-समय पर होता रहा है। ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ की परिस्थितियों में उसकी प्रतिमा 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' की पूरी होती रही है। उस तूफान ने 'परित्राणाम् साधूनां' वाली परिवर्तित परिस्थिति उत्पन्न करके ही चैन लिया है। यदि यह प्रतिक्रिया विश्व-व्यवस्था का अंग न रही तो अब तक यह दुनिया न जाने कब की दुष्कृतों और दुष्प्रवृत्तियों की असुरता निगल गई होती।

अतीत का इतिहास ऐसी महाक्रांति से भरा पड़ा है, जिनमें साधनों का, समर्थों का अभाव रहते हुए भी ऐसे उत्साह उभरे हैं, जिनने विपन्नताओं को देखते-देखते उलटकर रख दिया। अनौचित्य की भी प्रतिक्रिया होती है। शरीर में उभरने वाले भयानक रोग, शरीर में संचित विषाक्तता को उखाड़ फेंकने की प्रतिक्रिया, नियति-व्यवस्था के अनुरूप उभरने वाले विद्रोह ही हैं। समाज, शासन, अर्थ-व्यवस्था, मान्यता, परंपरा आदि के क्षेत्रों में भी ऐसी प्रतिक्रियाएँ समय-समय पर उभरी हैं, जिनमें प्रचलित अवांछनीयताओं को उखाड़ फेंकने में आश्चर्यजनक कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। अब राजसिंहासन कहाँ बचे हैं? दास-दासियों का क्रय-विक्रय कहाँ होता है? सामंतों का पड़ोसियों पर चढ़ दौड़ना और जो हाथ लगे हाऊ-हड़प कर जाना आज की न्याय-व्यवस्था में उतना सरल नहीं रहा। अब भूमि और प्रजा किसी राजा की व्यक्तिगत संपदा नहीं समझी जाती। मृत राजाओं के साथ न तो जीवित रानियाँ, बाँदियाँ, नौकर-चाकरों, विपुल संपदा के साथ दफनाएँ जाने का प्रचलन ही अब रहा है। विधवा को मृत पति के साथ सती होने के लिए भी अब विवश नहीं किया जाता। स्वर्गनिवास का प्रमाण पत्र अब धर्मावलंबी पुरातनकाल की तरह बेचते नहीं है। यहाँ तक कि जन्म-जाति के आधार पर चलने वाली ऊँच-नीचप्रथा भी मात्र पिछड़े क्षेत्रों में ही अपनी साँसें गिन रही है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। इनके विरुद्ध विद्रोह उभरे हैं, माहौल बने हैं और छोड़ने के लिए दबाव पड़े हैं। भले ही वे मार-काट की प्रधानता न होने के कारण घटनाओं के रूप में ऐतिहासिक अभिलेखन में स्थान न पा सके हों।

अवतार इसी रूप में होते हैं। उन्हें अनौचित्य के विरुद्ध औचित्य का नियति-समर्थित विद्रोह कहा जा सकता है। वे तूफान की तरह आते हैं और अपने साथ असंख्यों तिनके, पत्ते और धूलिकण साथ उड़ाते ले चलते हैं। जो पददलित थे, वे आसमान पर छाए दिखते हैं। साथ ही गर्वोन्नत मस्तक वाले विशालकाय वृक्षों को बात ही बात में धराशाई होते देखा जाता है। युग अवतार ऐसे ही होते हैं। उनमें भी अग्रगामियों को स्वाभाविक श्रेय मिलता है, इतने पर भी वह प्रचंड प्रतिक्रिया किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित नहीं मानी जा सकती। अवतार को व्यक्ति के रूप में मानना भूल है। यह एक औचित्य के पक्षधर प्रचंड प्रतिक्रिया भर होती है जो अनौचित्य की उस प्रकार कमर तोड़ देती है कि देखने-सुनने वालों को सहसा अपने आँखों और कानों पर विश्वास नहीं होता। किशोर कृष्ण का, दुर्दांत कंस को उसके चारुण, कुवलियापीड़ जैसों को धराशाई कर देना ऐसी घटना है, जिस पर सामान्य विधि-व्यवस्था को देखते हुए सहसा विश्वास नहीं होता। गोवर्धन का उँगली पर उठाना, समुद्र पर पुल बाँधना ऐसे ही कथानक है, जिनमें अवतारी क्रांति-प्रवाह द्वारा असंभव को संभव कर दिखाने के तथ्य पर विश्वास करने के लिए कहा जाता है। यह आश्चर्य तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब वह साधनविहीन स्वल्प शक्ति-सामर्थ्य के द्वारा हलके दर्जे के थोड़े-से सहयोगियों के सहारे कर दिखाए गए। ग्वाल-बालों और रीछ-वानरों का मूल्यांकन इसी रूप में हो सकता है।

जिन्हें पौराणिक गाथाएँ अविश्वास और अरुचिकर लगती हों, वे इन्हीं प्रतिपादित तथ्यों को इतिहास के पृष्ठों पर महान क्रांतियों के रूप में पढ़ सकते हैं। उनमें भी स्वल्प साधनों से मनस्वी लोगों द्वारा आगे बढ़कर ऐसी चिनगारी जलाने का उल्लेख है जो आगे चलकर विशालकाय दावानल के रूप में परिणत हुई और यह सिद्ध करके रही कि एक सत्य में एक हजार हाथियों की बराबर बल होता है। सृष्टा अपनी इस अनुपम कलाकृति विश्व-वसुधा का सौंदर्य नष्ट कर डालने, अस्तित्व मिटा डालने की छूट किसी दैत्य-दानव को नहीं दे सकता। यहाँ दैत्य-दानव का तात्पर्य ऐसे कुप्रचलन को समझा जाना चाहिए, जिसमें भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट आचरण का बोलबाला रहता है।

यह पंक्तियाँ प्रस्तुत अवांछनीयता के निराकरण को ध्यान में रखते हुए लिखी जा रही हैं और कहा जा रहा है कि परिस्थितियों की विषमता को देखते हुए किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे अवसरों पर सहज ही क्रांति प्रति क्रांति का नियत चक्र चलता है और अनाचार के विरुद्ध न्यायपक्ष सीना तानकर मोर्चे पर आ खड़ा होता है। साधनों की कमी वाली आशंका एक कोने पर रखी रह जाती है और सृष्टा की इच्छा नियति-व्यवस्था अपना संतुलन आप बिठा लेती हैं। हाँ, इतना अवश्य होता है, वह कृत्य कुछेक अग्रगामी व्यक्तित्वों के हाथों संपन्न होता है। वे साधनहीन होते हुए भी हनुमान, अर्जुन की तरह श्रेयाधिकारी भी बनते हैं।

इतिहास चक्र का हर प्रकरण इस बात का साक्षी है कि समय-समय पर असंतुलन को संतुलन में बदलने वाली प्रक्रिया उभरी है और स्वल्प साधनों के रहते हुए भी सफल होती रही है। इस बार भी, इन दिनों भी, उसी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होने जा रही हैं; हो रही है। यदि वैसा न होता तो मात्र सर्वनाशी, महाप्रलय जैसा विनाश ही शेष रह जाता है। इस संभावना की आगाही प्रामाणिक सूत्रों से समय-समय पर मिलती भी रही है। इसाई धर्म में “सेविन्थ टाइम्स” की, इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी’ की, भविष्य पुराण में ‘खंड प्रलय’ की विभीषिका का इन्हीं दिनों दैवी-प्रकोप के रूप में उबरने की चर्चा है। सूरदास की भविष्यवाणी प्रसिद्ध है। संसार भर के मूर्धन्य दिव्यदर्शी और खगोलवेत्ता अपने-अपने कारणों को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करते हुए, विनाशकारी संभावनाओं की पूर्वसूचना देते रहे हैं। धरातल के ऋतुचक्र का पर्यवेक्षण करने वाले ध्रुव-क्षेत्र की बर्फ पिघलने से समुद्र में बाढ़ आने और उससे थल-क्षेत्र का बड़ा भाग पानी में डूब जाने की आशंका व्यक्त करते हैं। दूसरी ओर पृथ्वी की धुरी में अंतर पड़ने से हिमयुग की संभावना इन्हीं दिनों साकार होने की बात कही जाती है। परिस्थितियों के आंकलनकर्त्ता बढ़ती हुई जनसंख्या, खनिज-संपदा की इतिश्री, भूमि की उर्वरता का समापन, बढ़ते हुए प्रदूषण, विकिरण, कोलाहल के आधार पर विषाक्तता की घुटन जैसे संकटों की भयावह परिणति समीप बताते हैं। अणुयुद्ध की नंगी तलवार किस प्रकार कच्चे धागे पर झूल रही है, इसे सभी जानते हैं। सामान्य नागरिक से लेकर शासनाध्यक्षों द्वारा अपनाई गई संकीर्ण स्वार्थपरता और आक्रामक उद्दंडता का अंत कहाँ जाकर होगा, इसका अनुमान लगाना किसी भी दूरदर्शी के लिए कठिन नहीं है। विकल्प सुनिश्चित रूप से यही है, यदि समय रहते रोक-थाम के कारगर उपाय न किए गए।

संतुलन बनाने वाले सृजनात्मक संकल्प एवं प्रयोग कब होंगे, किस रूप में होंगे, कौन करेगा? इसकी प्रतीक्षा न करके हममें से प्रत्येक जागृत आत्मा को ‘युगप्रहरी' के नाते अनिष्ट से जूझना चाहिए और प्रसुप्तों द्वारा सौंपी गई या अनायास ही कंधे पर आई जिम्मेदारी को वहन करना चाहिए। ‘जागृत आत्मा’ से तात्पर्य उन सभी भावनाशीलों से है जो अंतराल की वरिष्ठता उपलब्ध होते ही युगधर्म को समझने और उसके निर्वाह का कष्टसाध्य साहस करने से चूकते नहीं। ऐसे लोग कहाँ हैं, कौन हैं, कब क्या करेंगे? यह ढूँढ़ने की अपेक्षा यही अच्छा है कि अखण्ड ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजन अपने आपको इसी वर्ग में सम्मिलित कर लें और वर्तमान परिस्थितियों में पतन-पराभव से जूझने, उज्ज्वल भविष्य की हरीतिमा का बीजारोपण करने के उभयपक्षीय प्रयत्नों में, जितनी संभव हो उतनी भूमिका निभाने के लिए कमर कस लें।

इस संदर्भ में अपनी साधनहीनता, अयोग्यता, व्यस्तता, अनुभवहीनता आदि अनेक व्यवधान सामने आते हैं और लगता है कि उतना बड़ा बोझ उन लोगों के लिए वहन करना कठिन है जो अपनी निजी समस्याएँ तक सुलझा नहीं पा रहे हैं। तर्क की दृष्टि से असमंजस ठीक है, पर तथ्य पर ध्यान दें तो वह अशक्तता, असमर्थता काल्पनिक कृपणताजन्य ही प्रतीत होती है। ऐसे ही असमंजस महाभारत में अर्जुन के सामने, समुद्र लाँघते समय हनुमान के सामने भी थे। उन दिनों उसका समाधान तत्कालीन मार्गदर्शकों ने किया था। कृष्ण ने अर्जुन से कहा— "कौरव मर चुके, महाभारत जीता जा चुका, तुझे तो मात्र श्रेय भर लेना है।" यही बात प्रकारांतर से जामवंत ने हनुमान से कही थी और छलांग लगाने के लिए उन्हें साहस से भर दिया था। जिन्हें सृष्टा की संतुलन-प्रक्रिया का तूफानी प्रवाह के सामयिक अवतरण होने पर विश्वास है, वे जानते हैं कि नियति को परिवर्तन अभीष्ट है। वह होकर रहेगा। प्रश्न उस दूरदर्शिता के होने न होने का है जो समय का लाभ लेने के लिए श्रेयाधिकारी अग्रगामियों को पंक्ति में ला खड़ा करती है। यदि वह अपने भाग्य में हो तो फिर समझना चाहिए कि सभी असमंजसों का समाधान निकल आया। जागृत आत्माओं की, युगसृजेताओं की भूमिका हममें से प्रत्येक अपने-अपने ढंग से निभा सकता है। इसमें न व्यस्तता बाधक होगी, न अभावग्रस्तता, न अयोग्यता, न अक्षमता।

शबरी, केवट, गिलहरी, गिद्ध से अधिक अशक्त हम में से कोई नहीं। ग्वालबालों से अधिक अयोग्यता किसी की नहीं। टिटहरी का समुद्र सुखाने का संकल्प अगस्त के सहयोग से पूरा हो सका, भागीरथ गंगा को धरती पर उतारने में शिव का समर्थ सहयोग अर्जित कर सके तो कोई कारण नहीं कि अखण्ड ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजन प्रस्तुत युग विभीषिका से जूझने में अपने को अक्षम समझें और कुछ भी न कर सकने की कृपणता व्यक्त करे।


दो हाथों से ताली बजेगी, दो पहियों की गाड़ी चलेगी

युग विभीषिकाएँ जिन स्रोतों से उभरी हैं, उन सभी को दृष्टि में रखना होगा और सभी छिद्रों को बंद करने की बात को महत्त्व देना होगा। उपचार का श्रीगणेश कहाँ से किया जाए, यह बात दूसरी है, पर अंततः छेद तो सभी बंद करने होंगे अन्यथा एक द्वार भी खुला रखने से चोरों के आवागमन का क्रम यथावत बना रहेगा।

अवांछनीयता से जूझने और औचित्य की प्राण-प्रतिष्ठा नए सिरे से करने के दुहरे मोर्चे पर लड़ने वालों को यह देखना होगा कि प्रस्तुत विभीषिकाओं को इस स्तर तक पहुँचाने में किन क्षेत्रों की कौन-कौन विकृतियाँ, किस अनुपात में, किस प्रकार, क्या भूमिका निभाती रही हैं। निदान सही बन पड़े तो उपचार में सरलता होती है, अन्यथा चिकित्सा पर हुआ व्यय और श्रम निरर्थक ही चला जाएगा।

यों एक शब्द में बात समाप्त करनी हो तो इस प्रकार भी कह सकते हैं कि व्यक्ति के मन में दुर्बुद्धि उपजी, कुकर्मों पर उतारू हुआ, दुष्प्रवृत्तियाँ पनपी और परिस्थितियाँ विषम होती चली गई, इसलिए परिस्थितियाें को सुधारने के लिए समाजव्यापी दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ना चाहिए। चूँकि समाज व्यक्तियों के समुच्चय का नाम है, इसलिए जन-जन की नीति-निष्ठा बनाने के लिए चिंतन को परिष्कृत किया जाए। इसके लिए लोक-मानस में उत्कृष्ट आदर्शवादिता को प्रतिष्ठित करने वाली विचार-क्रांति को प्रखर किया जाए। इसके लिए नवजागरण का अलख घर-घर जगाया जाए। जन-जन के मन तक नवचेतना का आलोक पहुँचाया जाए। मान्यताओं और परंपराओं का नए सिरे से दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे नया निर्माण-निर्धारण किया जाए। इसी सार-संक्षेप को प्रकारांतर से युगनिर्माण योजना द्वारा पिछले लंबे समय से कहा और लिखा जाता रहा है।

समय आया है कि बारीकी में उतरा जाए और ध्वंस को निरस्त करने और सृजन को गति देने के लिए नए सिरे से, व्यापक दृष्टिकोण लेकर संबंधित सभी पक्षों पर विचार किया जाए और देखा जाए कि व्यक्ति के स्वाभाविक प्रगतिक्रम को अग्रगामी बने रहने में व्यवधान कौन उत्पन्न करता है। किस प्रकार अड़चनें खड़ी करता और गतिरोधों की चट्टानें अड़ाता है। साथ ही कौन से ऐसे क्षेत्र हैं जो मानवी व्यक्तित्व, वर्चस्व, कौशल, स्वभाव, वैभव एवं बल-विवेक को प्रखर बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इस संदर्भ में शिक्षा, साहित्य, कला, विज्ञान, उत्पादन, चिकित्सा, खेल, विनोद आदि अनेकों की उपयोगिता और क्षमता का उल्लेख किया जा सकता है और यह सिद्ध किया जा सकता है कि उनमें सुधार-परिष्कार बन पड़े तो व्यक्ति और समाज की स्थिति आज की तुलना में कल कहीं अधिक अच्छी हो सकती है।

उपरोक्त सभी आधारों की वरिष्ठता स्वीकार करते हुए भी यदि यह वर्गीकरण छोटा करना हो और जिनके अंचल में अनेक प्रसंग सिमटा सकते हैं उन्हें खोजा जाए तो फिर शक्तिमान तथ्य दो ही रह जाते हैं। अन्य संदर्भ उनकी शाखा-प्रशाखा के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इन दो में से एक है— शासन। दूसरा है— धर्म। दोनों ही क्षेत्रों में विकृतियाँ तो अनगिनत घुस पड़ी हैं, फिर भी अंततः आश्रय उन्हीं का लेना होगा। सुधार-समीक्षा के लिए कोसने, खीजने में हर्ज नहीं; किंतु तथ्यतः यही दो शक्तियाँ हैं जो मनुष्य के भाग्य, भविष्य को बनाने-बिगाड़ने की भूमिका निभाती हैं और निभाती रहेंगी। इनमें से एक को भी निषिद्ध नहीं ठहराया जा सकता है और किसी भी स्थिति में इनसे विमुख रहने, पीछा छुड़ाने की बात बन पड़नी संभव नहीं, इसलिए अच्छा होगा कि इन दो की खामियों को सुधारने की बात सोची जाए और उनके परिष्कृत स्वरूप के साथ उत्पन्न होने वाले प्रभाव की परिस्थितियाँ सुधारने में प्रयुक्त किया जाए।

मानवीसत्ता दो भागों में विभक्त है— एक पंचभौतिक प्रकृति पदार्थों से विनिर्मित शरीर। दूसरा, आस्था-भावना-विचारणा वाला चेतन। उसकी प्रेरणा का अनुगमन करते हुए काया विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ कठपुतली की तरह संपादित करती रहती है। जड़ और चेतन के सम्मिश्रण से यह समूचा संसार बना है। ब्रह्मांड की ही छोटी अनुकृति पिंड भी है। उसका प्रत्यक्ष रूप पदार्थ से बना है। वह पदार्थों की सहायता से ही जीवित रहता है, पदार्थों में ही रमण करता है। उसका दूसरा परोक्ष रूप चेतन है, जिसमें भाव-संवेदनाएँ, आस्थाएँ और विचारणाएँ अपने-अपने ढंग से काम करती हैं। इन्हें भी तृप्ति, तुष्टि, शांति चाहिए। वे कर्त्तव्यपालन, मर्यादा-निर्वाह एवं स्नेहसौजन्य अपनाने से उपलब्ध होती हैं। दूसरे शब्दों में इन्हीं को उत्कृष्ट चिंतन, आदर्श, कर्त्तृत्व के नाम से जाना जाता है।

शरीर का अस्तित्व और उसका निर्वाह भौतिकी द्वारा होता है। भौतिकी के इस पक्ष का नियमन, निर्धारण राज्यसत्ता द्वारा होता है। उत्पादन, वितरण, परिवहन, संचार, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, नियंत्रण, व्यवस्था, अनुशासन, न्याय, सुरक्षा जैसे विषय मनुष्यों के निर्वाहक्रम के साथ ही जुड़ते हैं, इसलिए शासन को मनुष्य की वैयक्तिक एवं सामूहिक निर्वाह-व्यवस्था के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझा जा सकता है। अभाव, अशक्ति, अज्ञान जैसी कठिनाइयों का समाधान करने की आशा-अपेक्षा शासन में रखी जा सकती हैं।

यों अब पुरातन वर्गीकरण ढीले पड़ गए और शासन के हाथ में चिंतन को प्रभावित करने वाली प्रचार क्षमता भी चली गई है। फिर भी उसका प्रमुख विषय प्रज्ञाजनों के निर्वाहक्रम में संतुलन बिठाए रहना ही है। रेडियो, टेलीविजन, सरकारी प्रेस, प्रकाशन, समाज कल्याण, जनसंपर्क, स्कूली पाठ्यक्रम आदि विभागों के माध्यम से यों सरकारें लोक-चिंतन को भी एक सीमा तक प्रभावित करती हैं, फिर भी उनका वह मूल विषय है नहीं। जहाँ तक नैतिक प्रश्नों का, व्यक्तित्व का, परिष्कृत करने वाले संदर्भों का, परंपराओं के प्रवाह का संबंध है, वे किसी नीतिनिष्ठ तंत्र से प्रसारित होने पर ही प्रभावी बनती हैं। अन्यथा चिह्नपूजा जैसी विडंबना बनकर रह जाती है। शासनतंत्र और अर्थतंत्र दोनों ही लगा-लपटों से भरे, कुचक्रों से सने रहते हैं। उनकी कूटनीति प्रमुखता को सभी जानते हैं, इसलिए इस मंच से किए गए प्रचार को सही होने पर भी संदेह की दृष्टि से देखते हैं और किसी प्रयोजन विशेष के छिपे होने की गंध सूँघते हैं। स्पष्ट है कि सरकारी प्रचारतंत्र लोगों को उपयोगी जानकारियों देने तक अपनी प्रभाव क्षमता की इतिश्री कर लेता है। उसमें इतना दम-खम नहीं है कि व्यक्ति या समाज की पतनोन्मुख दिशाधारा को उलटकर उसे आदर्शवादिता के अंतरिक्ष में उछाल सके। यह कार्य विशुद्ध रूप से धर्मतंत्र का है।

धर्म का स्वरूप आज पूजा-पाठ, रीति-रिवाज, कर्मकांड, कथा-प्रवचन, जप-तप तक सीमाबद्ध होकर अनेकानेक संप्रदायों में बँट गया है। पूर्वाग्रह ही उसकी पूँजी है। अपनी बात सच दूसरे की झूठ मान बैठने की हठवादिता उन्हें परस्पर एकत्रित तक होने नहीं देती। विचार-विनिमय से किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की, मिल-जुलकर धर्मोंपदेशक की दिशाधारा अपनाने की बात तो दुराग्रह के रहते बनती ही नहीं। धर्मध्वजों, निहित स्वार्थों ने भावुक जनता को अपने-अपने जाल-जंजालों में इस प्रकार जकड़ रखा है कि वे शोषकों के शोषण बने रहने वाले निरीह प्राणियों से अधिक कुछ रह ही नहीं जाते। औंधी-सीधी रंग-बिंरगीं कल्पनाओं में उड़ते रहने, निरर्थक विडंबनाओं में धन और समय गँवाकर स्वर्गमुक्ति झटक लेने, देवताओं को उँगली के इशारे पर नचाने के मनसूबे ही यह तथाकथित धर्मप्रेमी बाँधते रहते हैं। “राम मिलाई जोड़ी। एक अंधा एक कोढ़ी।” की उक्ति इन धर्मध्वजों और स्वर्गप्रेमी लोगों के साथ इसी प्रकार बैठी रहती है जैसे रिश्वत देने लेने वाले, जुआ खेलने-खिलाने वाले, नशा पीने-पिलाने वाले, रंडी-भडुए आपस में तालमेल बिठा लेते हैं। उनके व्यवसाय निषिद्ध होने पर भी चिरकाल से अपनी पटरी पर निर्बाध गति से चल रहे हैं। ठीक इसी प्रकार धर्म-व्यवसाय भी अपनी मंडी में, अपने ग्राहकों के सहारे सर्वत्र लुढ़कता-दौड़ता देखा जा सकता है।

राजतंत्र अधिकारियों में घुसी हुई विकृतियों की छीछालेदारी अखबारों, हिस्सेदारी से वंचित राजनीतियों द्वारा किस प्रकार होती रहती है। इसे अखबारों के पाठक और वैसी सभाओं में पहुँचने वाले, संपर्क में आने वाले आए दिन पढ़ते-सुनते रहते हैं। ऐसी दशा में भी कोई यह नहीं सोचता कि शासन को समाप्त कर दिया जाए। यह और भी बुरी बात होगी। भला-बुरा जैसा भी कुछ ढाँचा बना हुआ है, उसे मान्यता तो मिली हुई है। अनुशासन का लकीर तो बनी हुई है। सुधार की आशा तो है, पर यदि शासनतंत्र रहा ही नहीं तो अराजकता फैलेगी, जंगल का कानून चलेगा और बड़ी मछलियाँ सभी छोटी कमजोरों को उदरस्थ करके रहेंगी, इसलिए शासन की खामियों को कोसते हुए भी कोई यह नहीं सोचता कि उस ढाँचे को समाप्त कर दिया जाए। ठीक यही बात धर्मतंत्र के संबंध में भी है। उसे सुधारने की बात ही सोची जानी चाहिए। अभी वह स्थिति नहीं आई कि फोड़े वाले हाथ को ही काटकर फेंक दिया जाए। अभी छोटे ऑपरेशन और मरहम-पुलटिस से काम चलने की गुंजाइश है। शासन और धर्म दोनों ही रुग्ण हो गए हैं। उनका उपचार होना चाहिए और बीमारी को मारने, बीमार को बचाने की गति अपनानी चाहिए। संव्याप्त अव्यवस्था को नियंत्रण में लाने के लिए उज्ज्वल भविष्य का उद्यान उगाने के लिए जिस मार्ग पर चलना है, उसके लिए शासनतंत्र और धर्मतंत्र के दोनों कदम क्रमबद्ध सुनियोजित रूप से तालमेल बिठाते हुए उठने चाहिए। विभीषिकाओं से मुक्ति पाने और सुनहरे लक्ष्य तक जा पहुँचने के लिए इन्हीं दोनों कदमों को प्रगति-पथ पर अग्रसर करना होगा। दोनों असंबद्ध रहेंगे, एकाकी अहंमन्यता में डूबे रहेंगे तो एक पहिए की गाड़ी किस प्रकार परिवहन का उद्देश्य पूरा करेगी? लंगड़ी दौड़ से कितनी दूरी, कितनी गति से पार हो सकेगी? यों काम तो एक हाथ वाले भी चलाते हैं, पर छैनी-हथौड़े का कारगर प्रयोग करने वाले जानते हैं कि दोनों हाथों के बिना कुछ कारगर परिणाम बन नहीं पड़ता। कोसने, झिड़कने की भी उपयोगिता है, पर उसका संतुलित प्रयोग होना चाहिए। संबंध-सूत्र तोड़ बैठने की बात सोची जाए तो पति-पत्नी का विग्रह घर-परिवार की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा देगा। दोनों की अपनी क्षमता— उपयोगिता है, उसका चमत्कार तभी देखा जा सकता है जब सघन सहयोग का आधार बना रहे। बिजली के दो तार मिलने से ही करेंट प्रवाहित होता है। राजतंत्र और धर्मतंत्र का स्वरूप और कार्यक्षेत्र भले ही पृथक रहे। दोनों अपने-अपने उत्तरदायित्व अपने-अपने ढंग से निबाहें, पर साथ में यह भी ध्यान रखें कि एक के बिना दूसरा अपूर्ण रहेगा। उस प्रयोजन की पूर्ति न कर सकेगा, जो संतुलन बना रहने पर सरलतापूर्वक संभव हो सकता है। हमारा चिंतन, सब कुछ या कुछ नहीं का रहा है। बैर और प्रीति के बीच का मध्यवर्ती मार्ग तालमेल बनाए रहना भी हो सकता है, उस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा ही नहीं जाता। संघर्ष और सहयोग का समन्वय हो सकता है। एक आँख दुलार की, दूसरी सुधार की बनी रहे तो विकृतियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन साथ-साथ चल सकता है। कुशल माली यही करते हैं, निराई और सिंचाई का परस्पर विरोधी सिलसिला साथ-साथ चलाते रहते हैं और इसे विसंगति नहीं, पूरक प्रक्रिया मानते हैं। जिन्हें साथ-साथ जीना-मरना और रहना है, उन्हें सुधार और सहकार की रीति-नीति अपनानी चाहिए।

प्रस्तुत विकृतियाँ उपरोक्त दोनों ही क्षेत्रों के गड़बड़ाने से उत्पन्न हुई हैं। गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए दोनों ही लाइनों में जो टूट-फूट हुई है, उसे सुधारने की आवश्यकता है। सोचा जाना चाहिए कि यह विश्वसमाज— जनसमुदाय जड़ और चेतन के समन्वय से बना है। जहाँ तक मानवी व्यवस्था का संबंध है वहाँ भौतिक-क्षेत्र को समुन्नत-सुसंतुलित बनाने का काम शासनतंत्र को संभालना चाहिए और चेतना का भावना, मान्यता, विचारणा, दृष्टिकोण में उत्कृष्ट आदर्शवादिता को, शालीन सुसंस्कारिता को प्रखर बनाए रहने का उत्तरदायित्व धर्मतंत्र को संभालना चाहिए। इसके बिना उस लक्ष्य तक पहुँचना संभव न हो सकेगा, जिसमें दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।


धर्मतंत्र की उपेक्षित, किंतु मूर्धन्य शक्तिसामर्थ्य

समझा यह जाता रहा है कि धर्म कुछेक भावुक भक्तजनों, पुरातनपंथियों, पूर्वाग्रहग्रस्तों की रंग-बिंरगीं कल्पना उड़ानों का समुच्चय है। व्यक्तिवादी संकीर्णता का, परावलंबन का, पलायनवाद का दर्शन ही प्रकारांतर से धर्मधारणा का प्रतिपादन और कार्यक्षेत्र है। उसके प्रभावचक्र में फँसकर व्यक्ति यथार्थता का पर्यवेक्षण करने में असमर्थ हो जाता है। फलतः भ्रम-जंजालों में उलझता-उलझाता ऐसी रीति-नीति अपनाता है जो सार्वजनिक हित-साधन की दृष्टि से निरर्थक जैसी बनकर बैठ जाती है। आमतौर से विज्ञ समाज की मान्यताएँ धर्म के संवर्द्धन में इसी से मिलती-जुलती पाई जाती हैं और वे उसे कूड़ा-करकट समझकर उपेक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं। अच्छा होता, वे उसे सुधारने का प्रयास करते और अवांछनीय, आधिपत्य एवं प्रचलन को निरस्त करके सुधारक का स्थान ग्रहण करते; पर ऐसा हुआ नहीं, होता नहीं— कारण यह है कि धर्मतंत्र की शक्ति एवं उपयोगिता के संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया और उसे कूड़ा-करकट समझकर मनीषा और प्रतिभा द्वारा मुँह मोड़ लिया गया। यदि उस क्षेत्र की क्षमता, व्यापकता और उपयोगिता को समझा गया होता तो ऐसी सड़न और दुर्गति न होने देने के लिए विज्ञजनों ने निश्चय ही कुछ गंभीर सोचा और ठोस कदम उठाया होता।

प्राचीनकाल में हर क्षेत्र का विस्तार, कार्यक्षेत्र एवं प्रयोगतंत्र सीमित था। धर्म शब्द के अंतर्गत ही उन सभी संदर्भों का समावेश होता था जो मानवी चेतना को परिष्कृत-प्रगतिशील बनाए रहने के लिए आवश्यक थे। अब वैसी बात नहीं रही। जब विचारणा और व्यवस्था के सभी क्षेत्रों में विस्तार हुआ है तो धर्म के क्षेत्र विस्तार को भी पृथक-पृथक धाराओं में बहते हुए और अंत में एक सरोवर के रूप में जा मिलते हुए देखा जा सकता है। चेतना को, चिंतन को प्रभावित करने वाले मंत्रों में साहित्य, संगीत, कला की क्षमता सर्वविदित है। दर्शन से व्यक्ति और समाज के चिंतन को दिशा मिलती है। भाव-संवेदनाओं और आस्था-मान्यताओं को किसी बिंदु पर एकत्रित करना उसी का काम है। उत्कृष्टतावादी दर्शन को अध्यात्म कहते हैं। धर्मतत्त्व का बौद्धिक पक्ष यही है।

दूसरा पक्ष कर्म है। इसमें प्रचलन-परंपरा का समावेश है। कर्मकांडों से लेकर रीति-रिवाजों तक की श्रद्धा इसी में केंद्रीभूत है। इसी व्यवहार-पक्ष को इन दिनों धर्म माना जाता है। वह विभिन्न समयों पर विभिन्न परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप, जहाँ-जहाँ जिस-जिस रूप में पनपा, उस विधि-व्यवस्था को संप्रदायों का रूप मिलता चला गया है। कहना न होगा कि मनुष्य की क्षुद्रता जहाँ भी अवसर पाती है, वहीं घुसपैठ किए बिना नहीं चूकती। धर्मधारणा का, संप्रदायों का दुराग्रही रूप बना और अध्यात्म स्वरूप चेतना के सुनियोजित आस्था विज्ञान के आधार पर लोक-मानस को उत्कृष्टता का पक्षधर बनाने वाला न रहकर देवाश्रित बनाने जैसी विडंबना में उलझ गया। पर्यवेक्षण से प्रतीत होता है कि धर्म की मूलसत्ता विशुद्ध वैज्ञानिक है, उसमें लोक-चिंतन की शालीनता को सहकारिता के प्रति निष्ठावान बनाना है। पूजा, उपासना, शास्त्र, कथा-सत्संग, दान-पुण्य-तीर्थ, भजन आदि क्रिया-कृत्यों के पीछे मूलभूत उद्देश्य एक ही है कि मानवी चिंतन, पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से विरत होकर पवित्रता और प्रखरता अपनाएँ, संयमी और उदारचेता बनें। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसमें कूट-कूटकर भरे हैं। चिथड़ों में लिपटा हुआ हीरा भी ग्राह्य है। प्रस्तुत विकृतियों के ढकोसले को उखाड़कर यदि अंतराल तक पहुँचने और वस्तुस्थिति का पता लगाने का प्रयत्न किया जाए तो पता चलेगा कि धर्म मानवी उत्कृष्टता का जीवन-प्राण है।

मनुष्य की काय-संरचना, पशु वर्ग के अन्य जीवधारियों से भिन्न नहीं है। विकासवादियों के अनुसार वह वानरवंश का है। यदि वैसा है तो मानना पड़ेगा कि पूर्वजों ने एक पेड़ से दूसरे पर उछल जाने की क्षमता भी क्रमशः गँवा दी और लंबी वाली सुशोभित पूँछ से भी हाथ धो बैठा। इस प्रकार पूर्वजों की तुलना में उत्तराधिकारी घाटे की दिशा में ही चले है, पर वस्तुतः वैसा है नहीं। निश्चित रूप से हम आगे बढ़े हैं। इस अभिवृद्घि में उसका बौद्धिक पक्ष ही प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। व्यक्ति आचार संहिता, समाज संगठन, शिक्षा, परिवार, विज्ञान, अर्थतंत्र, शासन, चिकित्सा आदि अगणित उपयोगी अवलंबनों के सहारे ही मनुष्य समर्थ, सुसंपन्न एवं सुसंस्कृत बन सका है। प्रकृति पर उसके आधार की चर्चा गर्वपूर्वक की जाती है।

वैज्ञानिक आविष्कारों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। यह सारा चमत्कार मानवी चेतना के प्रगतिशील दिशाधारा में बहने का सत्परिणाम है। तात्पर्य एक ही है, मानवी सत्ता में प्रमुखता उसके चेतना पक्ष की है। शरीर तो औजार, उपकरण, वाहन मात्र माना जाता है। शरीर की सुडौलता, समर्थता, सक्रियता का भी आधारभूत कारण चिंतन-चेतना ही है। यदि वह गड़बड़ाने लगे तो भली-चंगी काया को रुग्ण, अक्षम, कुरूप बनने और अकालमृत्यु का ग्रास बनने में देर न लगे। हर दृष्टि से चेतना की ही गरिमा-वरिष्ठता सिद्ध होती है। इसी दशा में जो विज्ञान दर्शन निर्धारण-प्रवाह उसे सुनियोजित दिशाधारा प्रदान करता है, उस धर्मतत्त्व की महिमा उपयोगिता इतनी ऊँची ठहरती है कि उसे एक शब्द में मनुष्य का भाग्यविधाता कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। यदि उसका अस्तित्व उभरकर आगे न आया होता तो शारीरिक संगठन एवं मानसिक संरचना की दृष्टि से अनेक प्राणियों की तुलना में ओछा पड़ने वाला आदमी इतना ऊँचा न उठ सका होता, जितना कि इन दिनों जा पहुँचा है।

साधना-सामग्री का अपना महत्त्व है; पर वह है शरीर के लिए, सुविधाएँ उसी को चाहिए। पंचतत्त्वों का बना शरीर पदार्थों पर ही निर्वाह करता है। पदार्थों में ही मोद मनाता है। उसकी सत्ता एवं प्रकृति अपने सजातीय को चाहती, समेटती है तो यह स्वाभाविक है। वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, अर्थतंत्र के आधार पर मिलनी वाली सुविधाएँ और शासन द्वारा की जाने वाली व्यवस्थाएँ मिल-जुलकर काय-कलेवर का, सामुदायिक विकास का आधार खड़ा करती है। यह आवश्यक तो है, पर पर्याप्त नहीं। अंतःचेतना का स्तर गया-गुजरा हो। उसमें आदर्शों का, मर्यादाओं का समावेश न हो तो पशु-जगत की तरह हर समर्थता अपने से छोटों के लिए संकट ही उत्पन्न करती चली जाएगी। पशुओं में प्रकृति ने मर्यादा— अनुशासन की चेतना रखी है, इसलिए वे विनाश भी सीमित ही कर पाते है। यों समर्थ स्वच्छंद मनुष्य की उच्छृंखलता तो सर्वनाश ही करके रख सकती है। उद्दंड मनुष्य अपना और दूसरों का अहित-ही-अहित करेगा। पशुता, पैशाचिकता की दुष्प्रवृत्तियों से विरत करने और उसे पवित्रता, प्रखरता प्रदान करते हुए सर्वजनीन विकास में सहभागी बनने की प्रेरणा धर्मतत्त्व के अतिरिक्त और कहीं से नहीं मिल सकती।

साधनों के उत्पादन में विज्ञान, अर्थतंत्र, शासन को समन्वित भूमिका ने मनुष्य को साधनसंपन्न बनाया है। उपभोग में विग्रह खड़ा न हो, समृद्धि का सही उपयोग हो। यह उत्तरदायित्व शासन वहन करता है। इतने पर भी मूल प्रश्न जहाँ का तहाँ बना रहता है कि यदि चेतना का स्तर गया-गुजरा रहा तो फिर जो कुछ हाथ में होगा। उसे दुर्व्यसनों में, दुष्प्रयोजनों में ही नियोजित किया जा सकेगा। फलतः परिणाम ऐसे भयंकर होंगे, जो दरिद्रता की तुलना में कहीं अधिक कष्टकारक सिद्ध होंगे।

इन पंक्तियों में यह कहा जा रहा है कि मानवी चिंतन के साथ उत्कृष्टता का जुड़ा रहना ही साधनों को सार्थक बना सकता है। चिंतन ऊँचा हो तो ऋषियों की तरह स्वल्प साधनों में भी बादशाहों से बढ़कर सुखी, समुन्नत एवं शानदार जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरीत यदि आंतरिक निकृष्टता का बोलबाला हो, तो समझना चाहिए वैभव का वैसा ही दुष्परिणाम होगा जैसा कि रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, जरासिंधु, वृत्तासुर आदि को अपने समुदाय समेत भुगतना पड़ा था। महत्ता संपदा को, समर्थता को तो मिलनी चाहिए; पर यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि दूरदर्शी, विवेकशीलता, मेधा, प्रज्ञा के अनुभव से वह सारी विभूतियाँ बंदर के हाथ पड़ने वाली तलवार का काम करेंगी और उस पुरुषार्थ, सौभाग्य का परिणाम हितकर न बनकर, विनाशकारी ही सिद्ध होगा। तथ्य को समझा जा सके तो चिंतन की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि ठहरती है, उसे विकसित करने के एकमात्र अवलंबन— धर्मतंत्र को इस विश्व-व्यवस्था में सर्वोपरि स्थान सम्मान मिलता है।

फिर उसकी उपेक्षा क्यों हुई? उत्तर एक ही है कि उसका स्वरूप, प्रभाव एवं विनियोग ठीक प्रकार समझा नहीं गया। यदि वैसा होता तो शासनसत्ता को, अर्थव्यवस्था को, वैज्ञानिक उपलब्धियों को महत्त्व देने वाले यह भी सोचते हैं कि यदि चेतना को परिष्कृत कर सकने में एकमात्र समर्थसत्ता धर्म की पिछड़ी स्थिति में छोड़ दिया गया तो फिर अन्यान्य सभी उपलब्धियाँ निरर्थक बनकर ही नहीं रह जाएगी; वरन उनका दुरुपयोग होने पर वे विघातक भी सिद्ध होंगी ।

बुद्धितंत्र को बहुत महत्त्व दिया जाता है। शिक्षा के स्कूली, अभ्यासी, परामर्शप्रधान अनुभव संबंधित कितने अवलंबन अपनाए जाते हैं और समझा जाता है कि जो जितना बुद्धिमान होगा वह उतना ही उपयोगी सिद्ध होगा, उतना ही समर्थसंपन्न होगा। यह मान्यता भी आंशिक रूप से ही सत्य है। बुद्धि के सहारे वैभव कमाया जाता है, उसमें संदेह नहीं, पर उस वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करके उसका वास्तविक, परिपूर्ण एवं श्रेयस्कर लाभ कैसे उठाया जा सकता है, इसका निर्धारण उस प्रज्ञा के बिना संभव नहीं जो धर्मधारणा के सहारे ही उत्पन्न एवं परिपक्व की जाती हैं।

यह धर्मतंत्र की दार्शनिक गरिमा हुई। उसका एक दूसरा पक्ष भी है— धर्मतंत्र का प्रस्तुत स्वरूप, सरंजाम का जनता पर प्रभाव और साधनों का बाहुल्य। यह दोनों ही शक्तिस्रोत ऐसे हैं, जिनके सहारे व्यक्ति और समाज की परिस्थितियों को जमीन से आसमान तक उछाला जा सकता है। नरक से विरत करके स्वर्ग के साथ जोड़ा जा सकता है।

आज धर्म के प्रति उपेक्षा— अवमानना का दौर है। फिर भी उसके जीर्ण-शीर्ण कलेवर को यथावत बनाए रहने में कितनी धनशक्ति और जनशक्ति नियोजित होती है, उसे देखकर आश्चर्य होता है। तीर्थ स्थानों के दर्शन, पर्वस्नान, चित्र-विचित्र कर्मकांड, पंडा-पुरोहितों को मिलने वाला दान, साठ लाख साधु-बाबाओं का मँहगा निर्वाह, मंदिर-मठों की प्रचुर आजीविका धर्म संस्थानों के भव्य भवन, उत्सव-समारोह, कुंभपर्व, क्षेत्रीय धर्म स्थानों के मेले आदि में निरंतर लगने वाली जनशक्ति और धनशक्ति का यदि लेखा-जोखा तैयार किया जाए तो प्रतीत होगा कि देश में शिक्षा और चिकित्सा पर होने वाले खर्च की तुलना में वह कहीं अधिक है। इसी प्रकार शादियों पर होने वाले, मृतकभोज में लगने वाले धन का विवरण बने तो पता चले कि औसत भारतीय की एक तिहाई आमदनी इन्हीं प्रचलन-परंपराओं में खप जाती है, जिन्हें प्रकारांतर से धर्मप्रथा का अंग ही कहा जा सकता है। यह तो प्रत्यक्ष एवं सामूहिक रूप से धर्म-प्रयोजनों के लिए नियोजित होने वाली श्रम, संपदा की चर्चा हुई। व्यक्तिगत रूप से कितने लोग कितना जप-तप, पूजा-पाठ, व्रत-दान आदि इस निमित्त करते रहते हैं। उस सबका भौतिक आंकलन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि राजतंत्र में नियोजित शक्ति तो दबाव देकर वसूल की जाती है; किंतु धर्मतंत्र के लिए वह स्वेच्छा-श्रद्धा के आधार पर समर्पित किया जाता रहता है। विचारणीय हैं कि जब कलेवर के लिए इतना हो सकता है तो जीवंत धर्म के लिए कितना कुछ जनसहयोग अर्जित हो सकता है और उसके सुनियोजन से उज्ज्वल भविष्य की संरचना से कितना बड़ा योगदान संभव हो सकता है।


मुहिम युगमनीषा को संभालनी होगी

कभी व्यक्ति की निर्वाह-परिधि छोटी थी, समाज की समस्याएँ भी नगण्य थी। चिंतन और दर्शन का विस्तार एक सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। संसार के सुदूर क्षेत्र संचार एवं परिवहन माध्यमों के अनुरूप इतने निकट नहीं आए थे। भौगोलिक कठिनाइयों ने हर क्षेत्र को अपनी परिधि में सीमाबद्ध कर रखा था। तब धर्म का स्वरूप भी छोटा ही था। शास्त्रों का वाचन-पाठन, साधना, उपचार, जप-तप, पूजा-अर्चा, कर्मकांड, तीर्थ, व्रत आदि का जितना विस्तार था, उतने में ही काम चल जाता था। तत्त्व दर्शन प्रायः ईश्वर, जीव, प्रकृति के निरूपण तक ही अपनी दौड़ लगाता था। उतने से ही भली प्रकार काम चल जाता था। निर्धारित आचार संहिता और परंपरा जिनसे निभती थी, वे अपने को धर्मात्मा मान लेते थे; पर अब वैसा नहीं रहा। अंतरिक्ष विज्ञानियों के अनुसार इस ब्रह्मांड का क्रमशः फैलाव-विस्तार हो रहा है। ज्ञान-विज्ञान के संबंध में भी यही बात है। किसी समय आग जलाने, अन्न उगाने, पशु पालने, वस्त्र बुनने जैसे आविष्कार भी मनुष्य का सिर उतना ही गर्वोन्नत करते थे, जितना कि आज अणुशक्ति लेसर, होलोग्राफी एवं राॅकेट कंप्यूटर निर्माता, अंतरिक्षीय उड़ान, पनडुब्बी, रेडियो, टेलीविजनों के निर्माता करते हैं। इन दृष्टि से विश्व के विकास-विस्तार की उपलब्धि असंदिग्ध है। असमंजस तो मात्र एक ही स्थान पर अड़ गया है कि बुद्धिमत्ता का पग-पग पर प्रमाण देने वाले मनुष्य का हृदय क्यों सिकुड़ता जा रहा है? उसकी भावना, आकांक्षा, आस्था, विचारणा क्यों पतनोन्मुख हो रही है, आत्मीयता का सुविस्तृत क्षेत्र क्यों संकीर्ण स्वार्थपरता में बँधता-जकड़ता जा रहा है? गतिविधियों में निकृष्टता का समावेश कैसे सहन हो सका और क्यों स्वभाव का अंग बनता चला गया?

धर्म की परिधि में नागरिक कर्त्तव्य, समाज-संगठन, विचार विज्ञान, भाव-संवेदना नीतिशास्त्र, शिक्षा, कला, दर्शन, लोकाचार जैसे उन सभी प्रसंगों को एक साथ समेटकर चलना होगा, जो चेतना को प्रभावित करते हैं; चिंतन और कर्त्तृत्व की दिशाधारा निर्धारित करते और पृष्ठभूमि बनाते हैं। जब विज्ञान ने मत्स्यावतार की तरह अपनी परिधि को इतना विशाल— व्यापक बना लिया है तो धर्म को सभी सांप्रदायिक प्रथा-पूजा की सीमाओं में जकड़कर रखे रहना संभव नहीं है। युग धर्म, विश्व धर्म, चेतना धर्म आदि शब्दों में ही धर्म की वर्तमान दायरे की व्याख्या-विवेचना करना और उसके भावी स्वरूप-निर्धारण के संदर्भ में विचार कर सकना संभव हो सकता है। इसमें संप्रदायों को अपने-अपने ढंग से सोचना और अपनी रुचि को कार्यांवित करने का नागरिक अधिकार है। उसे मनुष्य के मौलिक अधिकारी के कारण अपने ढंग से अपनी गतिविधियाँ चलाते रहने की छूट है, पर उस क्षेत्र के इस दावे को मान्यता नहीं मिल सकती कि वे जो सोचते हैं वही सत्य, तथ्य या उचित है। ऐसा करने से ही फिर अन्य सभी प्रतिपादन मिथ्या हो जाएँगे और किसी प्रसंग पर नए सिरे से चर्चा, समीक्षा करने की गुंजाइश ही नहीं रहेगी। ऐसा गतिरोध उत्पन्न करने का किसी धर्म-संप्रदाय को इस व्यापक दृष्टिकोण वाले युग में दुस्साहस नहीं करना चाहिए। वस्तुतः धर्म को ऐसी ही कट्टरता ने बदनाम किया है और इसी कारण अब उसे संप्रदाय कहकर काम चलाना पड़ रहा है। अन्यथा पूर्वकाल की तरह अभी भी अध्यात्म दर्शन और आचार धर्म का सम्मिलित स्वरूप ‘मानव धर्म’, ‘विश्व धर्म’ के नाम से प्रतिष्ठित होता।

प्रस्तुत समस्याएँ दिखतीं तो पदार्थपरक हैं, पर वस्तुतः वे हैं चिंतन से संबंधित। यदि ऐसा न होता तो वस्तुओं के वर्त्तमान बाहुल्य एवं स्तर में देखते हुए उसे अभूतपूर्व माना जाता और इतने से ही सर्वत्र सुख-शांति का, प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन गया होता। विकृतियाँ चिंतन-क्षेत्र में घुसी हैं। दृष्टिकोण गड़बड़ाया है। आस्था-क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ा है। रुझान में निकृष्टता को प्रश्रय मिला है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, वासना-तृष्णा की तूती बोलने लगी है। उपलब्धियों का दुरुपयोग हुआ है और अमृत को दुर्बुद्धि ने विष बनाकर रख दिया है। वस्तुओं का बाहुल्य और भी बढ़ सकता है। व्यवस्था और भी कड़ी हो सकती है। शासन के लिए इतना ही संभव है, पर बात तो इससे कहीं अधिक आगे की— कहीं अधिक गहरी है। सुधार-परिष्कार तो चिंतन-चरित्र का होना है। इसके लिए उत्कृष्टता का पक्षधर जीवन दर्शन पुनर्जीवित करना होगा। उसे जन-जन के व्यवहार में उतारने— प्रचलन में सुनिश्चित स्थान बनाने वाले प्रचंड प्रयत्न करने होंगे। यह कार्य विशुद्धरूप में ‘धर्म’ का है। अध्यात्म दर्शन की आदर्श निर्वाह की दिशाधारा फिर से इस प्रकार ढालनी होगी, जिसमें मानवी गरिमा अक्षुण्ण रह सकें और विश्वशांति का सुनिश्चित वातावरण बना रहे। यही अपने युग का सबसे बड़ा काम है। इसे ‘युगमनीषा’ के अतिरिक्त और कोई संपन्न नहीं कर सकता। यह न शासन के हाथ की बात है और न समृद्धि के माध्यम से इसे जुटाया जा सकता है। उन दोनों का समर्थन, प्रोत्साहन, सहयोग एवं पृष्ठ-पोषण भर मिलता चले तो बहुत है। उत्तरदायित्व तो मनीषा का है। अपना भार उसे ही वहन करना होगा।

यहाँ युगमनीषा से तात्पर्य किसी व्यक्तिविशेष का संगठन-समुदाय विशेष से नहीं; वरन उस समुदाय से है जो मात्र निर्वाह को ही सब कुछ नहीं मानता। अपने तक ही चिंतन और श्रम को नियोजित नहीं रखे रहता; वरन अपने को समाज का एक अविच्छिन्न घटक मानकर उसके उत्थान-पतन की भी चिंता करता है। दुःख बँटाने, सुख बाँटने में संतोष अनुभव करता है। युगमनीषा, जिसे नवसृजन का भार उठाना है, ऐसे ही भावनाशील आदर्शवादी लोगों के समुदाय को कहा जाएगा। एक शब्द में इन्हें ‘जागृत आत्मा’ नाम दिया जाता है। दूसरे तो ‘पीत्वामोह मयही मदिरा उन्मुक्त भूत्वा जगत्’ की श्रेणी में आते हैं। जिन्हें अपनी ही आपा-धापी से फुरसत नहीं, वे तथाकथित बुद्धिजीवी कहलाते हुए भी, इस समुदाय में सम्मिलित नहीं हो सकते। बुद्धिमानों की कमी नहीं, वे जिधर भी रस लेते हैं। बातों के बतंगड़ खड़े कर देते हैं। देश धर्म में उनका मस्तिष्क रस लेने लगे तो समझना चाहिए कि उस संदर्भ में धुँआधार बोलते-लिखते देखे जा सकते हैं, पर होता यह सब विनोद-व्यसन की तरह ही है, जिसमें करना कुछ न पड़े, वाक्-विलास से ही उबाल की इतिश्री हो जाए, समझना चाहिए कि खोखलेपन के अतिरिक्त यहाँ कुछ है नहीं। मस्तिष्कीय श्रम करने वाले वर्ग में यह प्रतिभा भी सहज ही हथेली पर सरसों की तरह उग आती है कि वे दिल्लगीबाजी की तरह देश धर्म के संबंध में भी लच्छेदार बकवास करने में अपनी प्रवीणता प्रदर्शित कर सकें। बहुपठित और बहुश्रुत, बातूनी आदमी तो और भी जल्दी इस प्रकार का धुँआधार मचाते रह सकते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि बुद्धि व्यवसायी वर्ग और युगमनीषियों का पृथक्करण संभव हो सके। जिन्हें समाज और संस्कृति की समस्याओं में गहरी दिलचस्पी हो और उसके लिए जो उपयुक्त हो, वह निजी जीवन में उतारने और दूसरों पर अपनाने के लिए दबाव डालने का उभार अंतराल में उमगें तो यह समझा जा सकता है कि युगमनीषा का उदय हुआ। ऐसी ही जागृत आत्माओं को प्राचीनकाल में धर्मात्मा कहा जाता था। आज तो कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा उस पद का दावेदार दिखता है।

शासन और धर्म की तुलना की गई है। उसमें शासन को कनिष्ठ और धर्म को वरिष्ठ माना जाता है, क्योंकि धर्म का कार्यक्षेत्र चेतना को सुसंस्कृत बनाना है। जबकि शासन की पहुँच-पकड़ संपन्नता के क्षेत्र तक ही सीमित रह जाती है। चेतना वरिष्ठ है, संपदा कनिष्ठ। व्यक्तित्व का मूल्यांकन श्रद्धापूर्वक होता है, जबकि पुरुषार्थ को सराहा भर जाता है। सर्वतोमुखी प्रगति में शासन से भी बढ़ी-चढ़ी भूमिका धर्म को निभानी पड़ती है; अस्तु स्वभावतः शासकों की तुलना में मनीषियों की गरिमा वरिष्ठ मानी गई है। वशिष्ठ-दशरथ, याज्ञवल्क्य-जनक, विश्वामित्र-हरिश्चंद्र, चाणक्य-चंद्रगुप्त, शंकराचार्य-मांधाता, समर्थ-शिवा, गाँधी-नेहरू जैसे युग्मों में यह स्पष्ट है कि धर्म ने नेतृत्त्व किया है और शासन ने निर्वाह। ये ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणित संस्मरण हैं। दर्शन के क्षेत्र में अध्यात्म और धर्म के परिवार में यह वरिष्ठता और भी स्पष्ट है। जब कभी चेतना को, चिंतन-चरित्र को, प्रखर-परिष्कृत करने की आवश्यकता पड़ी है, तब मनीषा को ही आगे आना पड़ा है। अपने समय भी अवरोधों में थी, इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। शासन अपना काम करे; पर यह उचित नहीं कि मनीषा का उत्तरदायित्व भी उसी पर लद पड़े। इस दिशा में शासन रेडियो, टेलीविजन प्रकाश आदि के द्वारा जो कर लेता है, उतने को भी न कुछ-से-कुछ कह कर संतोष किया जा सकता है। साहित्य और कला की विकृतियों पर अंकुश लगाने का कुछ कारगर कदम भर उठने लगे तो फिल्म एवं प्रकाशन-उद्योग की विकृतियाँ फैलने से रोकने का आग्रह भी प्रस्तुत किया जा सकता है। युग दर्शन को शासन का सहयोग न सही, समर्थन भर मिलता रहे तो काम चलेगा। अवरोध उत्पन्न न करना भी प्रकारांतर से समर्थन ही माना जाएगा।

लोकशक्ति के उदय की चर्चा समय-समय पर होती रहती है। उसके गुणगान किए जाते हैं और समर्थ बनाने पर जोर दिया जाता रहता है। देखना होगा कि यह प्रत्यक्ष शासनशक्ति के समतुल्य परोक्ष लोकशक्ति आखिर है क्या? उसे जागृत आत्माओं का समुच्चय कह सकते हैं, भले ही वे मुट्ठी भर ही क्यों न हों। लोकशक्ति का अर्थ जनसाधारण नहीं है। सर्वविदित है कि बहुमत में तो अवांछनीयता ही रहती है। अधिकांश लोगों को भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण में संलग्न पाया जाता है। यदि समूचे जनसमुदाय को समेटने की बात हो तो फिर लोगों का जैसा स्तर है वैसा ही संगठन भी बनेगा। उसके माध्यम से बन पड़ने वाले कार्यों से भी उत्कृष्टता की पक्षधर विधि-व्यवस्था बन पड़ने की आशा नहीं की जा सकती। सृजनात्मक उच्चस्तरीय कार्य तो सदा से वरिष्ठ लोग ही हाथ में लेते और संपन्न बनाते रहे हैं। उसी की पुनरावृत्ति इसी विषम बेला में भी होनी है। जागृत आत्माओं को ही नवसृजन की मुहिम संभालनी है, उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना है। आवश्यक नहीं कि वे मतदान से चुने गए ही हों। गणमान्य प्रतिभाएँ जिस मार्ग पर चलती हैं, उस पर अनुगमन करने वालों की भी कमी नहीं रहती। इंजन चलता है, डिब्बे लुढ़कते हैं। अंधड़ आता है, तिनके और धूलिकण बिना बुलाए ही साथ उड़ते हैं। प्रतिभावान दुष्ट दुराचारियों ने समय-समय पर अपने ढंग की परंपराएँ चलाने में सफलता पाई है तो कोई कारण नहीं कि युगमनीषियों का समुच्चय विचारशील जनसमुदाय को साथ लेकर न चल सके। वस्तुतः भावनाशील आदर्शवादी और परमार्थपरायण व्यक्ति ही वास्तविक लोकशक्ति होते हैं। सृजनात्मक प्रयोजनों में उसी की भूमिका प्रमुख होती हैं। संख्याबल की तुलना में सदा मनोबल का, आत्मबल का पलड़ा भारी रहा है। अल्पमत में रहने पर भी सूर्य-चंद्र असंख्य तारागणों से भरे-पूरे आकाश में अपनी गरिमा अक्षुण्ण बनाए रहते हैं। जागृत आत्माओं में पनपने वाली युगमनीषा के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। प्रभाव उनका नहीं पड़ता जो बकवास तो बहुत करते हैं, पर स्वयं उस ढाँचे में ढलते नहीं। जिनने चिंतन और चरित्र का समन्वय अपने जीवनक्रम में किया है, उनकी सेवा-साधना सदा फलती-फूलती रही है। चरित्रवान उपदेष्टा ही जनमानस पर शासन करते, उसे सुधारते और मोड़ते-मरोड़ते देखे गए हैं। सेवा की जिनने सस्ती वाहवाही लूटने और दूसरों की आँखों में चकाचौंध करने को ही अपनाया है, निराशा उन्हीं के हाथ लगती है। जो दूसरों से कहे जाने वाले प्रसंगों को निजी जीवनचर्या की प्रयोगशाला में परखकर खरी सिद्ध करते हैं, उनके निर्धारण कभी असफल नहीं हुए। पवित्रता, प्रखरता, शालीनता और उदारता के कदम सदा से लक्ष्य तक पहुँचकर ही रुके हैं। युगमनीषा यदि नवसृजन का, समय के परिवर्तन का संकल्प चरितार्थ करने में कटिबद्ध होती है तो उज्ज्वल भविष्य की संरचना में कोई संदेह रह नहीं जाएगा।


महत्त्व लोक-मानस के परिष्कार का भी समझें!

रोजी-रोटी का प्रश्न कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों; पर हर किसी को वही सर्वोपरि मानने और उसी एक प्रयोजन को पकड़कर बैठने से काम नहीं चलेगा। यदि ऐसा ही सीमाबंधन कस लिया जाए तो फिर चिकित्सा, वैज्ञानिक अनुसंधान, सैन्य-सज्जा, शिक्षा, कला, संगीत, संस्कृति जैसे उन सभी प्रयोगों को तिलांजलि देनी होगी, जो प्रत्यक्षतः रोजी-रोटी उपार्जन में सहायता करते प्रतीत नहीं होते। परोक्ष में रोजी-रोटी की समस्या हल करने में तो तत्त्व दर्शन की भी महती भूमिका देखी जा सकती है। श्रमशील, मितव्ययी, सद्गुणी, सुसंस्कृत जीवनक्रम अपनाने से भी रोजी-रोटी के प्रश्न का उतना ही संबंध है, जितना कि कृषि उद्योगों के माध्यम से दैनिक आवश्यकता की सामग्री उगाने का। दुर्गुणी व्यक्ति तो रोजी-रोटी का बाहुल्य होने पर भी उससे अपने लिए और दूसरों के लिए मात्र संकट ही उत्पन्न करते रहते हैं।

रोजी-रोटी के प्रश्न की उपेक्षा, अवहेलना, अवमानना न करते हुए भी यह समझना होगा कि चिंतन में उत्कृष्टता का समावेश पेट भरने से कम महत्त्व का नहीं है। शरीर को जीवित रहना चाहिए, यह ठीक है; पर यह भी गलत नहीं है कि आत्मा को तो न मरने-सड़ने देना चाहिए और न व्यक्तित्व का पतित—  पिछड़ा, गया-गुजरा रहना ही सहन होना चाहिए। प्रयत्न होना चाहिए कि दोनों को ही स्वस्थ-समर्थ रहने का अवसर मिले।

प्रमुखता व्यक्तित्व को परिष्कृत करने, अंतराल को सद्गुणों से संपन्न करने, जीवनचर्या की आदर्शवादिता अपनाते हुए गौरवांवित करने की बात को मिलनी चाहिए, इसलिए यदि कुछ युगमनीषी उसी को अपना कार्यक्षेत्र चुनें और रोजी-रोटी का प्रश्न राजनीतिज्ञों, धनाध्यक्षों, वैज्ञानिक तथा अगणित क्रियाकुशल लोगों के लिए छोड़ दें, तो हर्ज नहीं। सैनिक जिस महत्त्वपूर्ण सुरक्षाकृत्य में संलग्न हैं, उसे देखते हुए उन पर कोई यह लाँछन नहीं लगा सकता कि वे धनसंपदा कमाने और कृषि-उद्योग बढ़ाने में क्यों नहीं लगते? सैनिक उत्तर भले ही न दें, पर दूरदर्शिता कह सकती है कि यदि सैनिकों के अभाव में सुरक्षा-पंक्ति कमजोर होगी तो शत्रुओं के आक्रमण-अंतःविग्रह जैसे संकट खड़े होने और जो कमाया जा चुका है, वह भी हाथ से चला जाएगा; इसलिए उत्पादन बढ़ाने की तरह ही सुरक्षा-पंक्ति को मजबूत करने के लिए सेना में भर्ती होना और युद्धकौशल में प्रवीण होना भी आवश्यक है। ठीक यही बात युगमनीषा पर लागू होती है। उसके लिए लोक-मानस के परिष्कार को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाने और एकात्म भाव से उसमें तन्मय— तत्पर होने के लिए अनुरोध करने में ही दूरदर्शित है।

किया क्या जाए? इसका उत्तर एक ही है कि मानवी अंतराल में आदर्शवादी आस्थाओं का बीजारोपण अभिवर्द्धन करने की बात को सामयिक समस्याओं का समाधान मानकर चला जाए। सड़ी कीचड़ से ही मक्खी, मच्छर, कृमि-कीटक, दुर्गंधभरे विषाणु उत्पन्न होते हैं। उनमें से एक-एक को बीन-बीनकर मारते रहने का, थकने और निराश करने वाले काम हाथ में लेने की अपेक्षा यही अधिक अच्छा है कि हिम्मत करके एक बार सड़ी नाली को पूरी तरह बुहार दिया जाए। आहार-विहार का असंयम न छूटा तो रुग्णता और दुर्बलता भी पल्ले बँधी ही रहेगी। भले ही टाॅनिकों और इंजेक्शनों पर पर्वत जितनी धनराशि खर्च की जाती रहे। अन्यान्य प्राणी प्रकृतिपरायण मर्यादित जीवन जीते और स्वस्थ-प्रसन्न जीवन जीते हैं, यही बात यदि मनुष्य के गले उतारी जा सके तो वह गरीबी में भी वनवासी, आदिवासियों की तरह परिपुष्ट दीर्घ जीवन सहज ही उपलब्ध कर सकता है। अन्यान्य समस्याओं के संबंध भी यही बात है। मानसिक असंतुलन, उद्वेग, तनाव परिस्थितियों के कारण नहीं मनःस्थिति की विपन्नता के कारण उत्पन्न होता है। दरिद्रता स्वनिर्मित है। आलसी, प्रमादी, अपव्ययी ही प्रायः आर्थिक कठिनाइयों का रोना रोते देखे जाते हैं। पुरुषार्थी तो पहाड़ की चोटियों पर धान उगाते और चट्टानें तोड़कर जलस्रोत उभारते देखे गए हैं। पारिवारिक कलह में कुसंस्कारी वातावरण और गलत रीति-नीति का अवलंबन ही प्रमुख कारण होता है। हर परिजन को यदि आरंभ से ही सुसंस्कारी, स्वावलंबी, शिक्षित और कर्त्तव्यनिष्ठ बनाने वाले ढाँचे में ढाला जाए तो कोई कारण नहीं कि कुटुंबी जन हिल-मिलकर रहने, एकदूसरे को स्नेह, सम्मान, सहयोग प्रदान करने में कोताही दिखाए। समाज में प्रचलित भ्रष्ट परंपराएँ और अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियाँ जड़ें तभी जमाती हैं, पैर वहीं अड़ाती हैं जहाँ कुकर्मी और कायर लोग उन्हें सहन करते, समर्थन देते हैं। जहाँ चरित्रनिष्ठा जीवंत होगी वहाँ सामाजिक कुप्रचलनों को उगने-पलने की नौबत ही न आएगी।

इस दृष्टि से व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित सभी समस्याओं का एक ही कारण सिद्ध होता है। व्यक्ति का ओछा दृष्टिकोण और घिनौना चरित्र यदि इस मर्मस्थल को सुधारा जा सके तो समझना चाहिए कि समस्त समस्याओं का हल मिल गया। “एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।” वाली उक्ति इस प्रसंग में शत-प्रतिशत सही सिद्ध होती है। यदि आस्था संकट से निपटा जा सकें तो समझना चाहिए, हर क्षेत्र को विपन्न बनाने वाले पतन-पराभव से, शोक-संताप से सदा-सर्वदा के लिए पीछा छुड़ाने वाला हल मिल गया।

इस संदर्भ में प्रत्यक्षतः क्या-क्या किया जाना चाहिए? व्यावहारिक कदम क्या उठने चाहिए? कार्य का बीजारोपण, अभिवर्द्धन और उपलब्धियों का संग्रह-संकलन किस क्रम से होना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही हो सकता है कि उन सभी अवलंबनों को अपनाया जाए जो मानवी चिंतन को प्रभावित करके, दृष्टिकोण एवं स्वभाव बनाने की भूमिका संपन्न करते हैं।

जन-जन को यही सुझाया जाना चाहिए कि वह किसान, विद्यार्थी, व्यापारी, पहलवान से यह शिक्षा ग्रहण करें कि भविष्य की सुखद संभावना को महत्त्व दिया जाए और इसके लिए प्रारंभ में कुछ बोना, लगाना, सहना पड़ता है। उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया जाए। वह आतुरता न बरती जाए, जिसके कारण चिड़िया जाल में, मछली काँटे में, चींटी चासनी में फँसती और बेमौत मरती है। इतने भर के लिए यदि लोक-चिंतन को सहमत किया जा सके और इस कसौटी पर अपनी मान्यताओं, आदतों और गतिविधियों की जाँच-पड़ताल करने का उत्साह जग पड़े तो समझना चाहिए कि विचार क्रांति आरंभ हुई। विघातक अवांछनीयता से पीछा छूटा और सुखद संभावना से भरा-पूरा प्रभाव उगा।

यह समझदारी कैसे उगे? इसका एक ही उपाय है कि भले और बुरे दोनों पक्षों को सामने रखकर यह समझने का अवसर दिया जाए कि उनके दूरगामी परिणाम क्या होते है? सच तो यह है कि दो में से एक को चुनने का इन दिनों अवसर ही नहीं रहा। सर्वत्र एक ही प्रकार की विडंबना का साम्राज्य है। आदर्शवाद का सुखद संभावनाओं को समझने-समझाने का जब कोई आधार ही नहीं रहा तो फिर अभ्यस्त अनाचार के दुष्परिणामों की ओर ध्यान ही क्यों हो। अभ्यास तो ऐसी बुरी बला है कि मनुष्य सड़न और घुटन तक को छोड़ने में आना-कानी करता है। युगमनीषा को अवांछनीयता के प्रति लोक-मान्यताओं के दुराग्रह के विरुद्ध व्यापक मोर्चा खड़ा करना है।

चिंतन को, दृष्टिकोण को, प्रभावित करने के लिए जिन आदर्शवादी प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें चार माध्यमों से प्रस्तुत किए जाने की परंपरा है। यदि उनका निर्वाह ठीक तरह बन पड़े तो फिर हृदयंगम करने में भी बहुत हद तक सफलता मिल सकती है। यह चार आधार इस प्रकार हैं— (1) प्रवचन-परामर्श (2) साहित्य अध्ययन (3) दृश्य घटनाक्रम (4) अनुरूप कृत्यों में सम्मिलित होने, हाथ बँटाने का उपक्रम। यह चारों अपने-अपने स्थान पर अपने-अपने स्तर की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और व्यक्ति को किसी भी दिशा में मोड़ने-मरोड़ने में बहुत हद तक सफल होकर रहते हैं।


झकझोरनें वाली वाणी मुखर करें

मनुष्य कोरे कागज की तरह है, वह उसी प्रवाह में बहता है जो उसके इर्द-गिर्द बहता है। मनुष्य स्वच्छ दर्पण की तरह है, जिसमें सामने खड़ी छवि अंकित होती चली जाती है। इन दिनों प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में मनुष्य की अवांछनीयता का समर्थन और प्रदर्शन ही चारों ओर घिरा दिखता है। फलतः उसी की छाप उसके अचेतन पर पड़ती है और सहज ही प्रवाह के साथ बह चलना बन पड़ता है। प्रतिपक्षी रोक-थाम आड़े आए तो रुकने-ठहरने का वस्तुस्थिति पर पुनर्विचार करने का अवसर मिले। आज ऐसे दबाव का घोर अभाव है जो अपनाई गई रीति-नीति के दुष्परिणाम और युगचेतना के अनुरूप ढलने के सत्परिणाम हलके-फुलके ढंग से नहीं; वरन इस प्रकार समझा सकें जिससे दबाव पड़े और परिवर्तन की बात सोचने के लिए बाधित होना पड़े। जन-जन के सामने इन दिनों ऐसे ही प्रखर परामर्श प्रस्तुत करने की प्रथम आवश्यकता है।

प्राचीनकाल में यह परामर्श ही लोक-चेतना को जागरूक, प्रबुद्ध, प्रखर, समर्थ बनाए रहने और उसे उत्कृष्टता के साथ जुड़े रहने के लिए सहमत-बाधित करता था। यह परामर्श बाजारू नहीं, श्रद्धासिक्त होता था। धर्म प्रवचन के रूप में कथा-पुराणशैली से व्यासपीठों पर बैठकर अधिकारी व्यक्तित्त्वों द्वारा वह दिया जाता था। यह मात्र कथन-प्रतिपादन नहीं होता था; वरन श्रद्धा भरे वातावरण का संपुट लगने के अतिरिक्त पौराणिक-ऐतिहासिक संदर्भों के साथ उसे प्रामाणिक भी सिद्ध किया जाता था। यह कथाशैली सुनने वालों को आकर्षक लगी और करने वालों ने पाया कि इस प्रकार का लोक-शिक्षण आशातीत परिमाण में सफल होता है।

यहाँ लोक-मानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावी सत्परामर्श देने की चर्चा हो रही है और कहा जा रहा है कि यदि उसका दूरगामी परिणाम देखना हो तो फिर वह बाजारू ढंग से नहीं चलना चाहिए। चारों ओर घिरा हुआ वातावरण, अपनी भाषा में, अपने ढंग से अनैतिक चिंतन और आचरण अपनाने की प्रेरणा देता है। उसकी काट कर सकने के लिए कैंची, उस्तरे से नहीं, कुल्हाड़े-फरसे से काम चलेगा। सत्परामर्श के लिए प्रामाणिक व्यक्तियों को श्रद्धासिक्त वातावरण में तर्क और प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए ऐसा परामर्श देना होगा, जिसमें अपनाई गई अवांछनीयता के दूरगामी दुष्परिणाम गिनाए जा सकें, साथ ही शालीनता की रीति-नीति आरंभ से अनाकर्षक लगाने पर भी व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न बनाने वाले आधार किस प्रकार खड़े करती है, उसका हर पहलू ऐसी शैली में समझाया जाना चाहिए जो अंतराल की गहराई तक उतर सके, हृदयंगम हो सके और नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर सके।

परामर्शों का सिलसिला अभी भी धीमी गति से नहीं चल रहा है। सरकारी तंत्र में रेडियो, टेलीविजन, प्रकाशन, स्कूली पाठ्यक्रम से जो दिशा दी जाती है। उसमें सत्परामर्शों की न्यूनता और शिथिलता तो पाई जाती है, पर सर्वथा अभाव नहीं होता। कोई चाहें तो उससे भी लाभ उठा सकता है। यह बात पत्र-पत्रिकाओं के संबंध में भी है। उनके प्रतिपादन में भी आदर्शों का समर्थन पक्ष कुछ न कुछ रहता ही है। इसके अतिरिक्त सभा, सम्मेलनों, गोष्ठियों में धुँआधार भाषण चलते रहते हैं। पंडिताऊ कथ, वार्त्ता की भी लकीर पीटती रहती है। यह वाणी द्वारा दिए जाने वाले आदर्शवादी परामर्श का प्रचलित स्वरूप है। यह कुल मिलाकर भी इतना प्राणवान नहीं बन पाता कि कौतूहल-मनोरंजन से आगे बढ़कर श्रवणकर्त्ताओं को तिलमिला दे और वातावरण द्वारा निरंतर मिलने वाली अवांछनीय प्रेरणा के विरुद्ध तनकर खड़ा हो जाने का साहस उत्पन्न कर सके। प्राचीनकाल में सत्संगों का स्वरूप और स्तर यही रहता था। वे उपस्थित समुदाय का विवेक जगाते थे। ऐसा संभव तभी होता था जब कथनकर्त्ता अपने प्रतिपादन के प्रति निजी निष्ठा का प्रमाण प्रस्तुत कर सके। क्या कहा जा रहा है, इसका महत्त्व नहीं। प्रभावोत्मक क्षमता के लिए यह आवश्यक समझा जाता है कि उसे कौन कह रहा है। यहाँ आकर गुब्बारे से हवा निकल जाती है। परामर्शदाता, प्रवचनकर्त्ता निजी जीवन-क्षेत्र में जब छूँछ होते हैं तो वे सामान्य जानकारी मात्र दे सकते हैं, वैसा कुछ नहीं कर सकते जिससे लोक-मानस को पतन-प्रवाह से मोड़कर आदर्शवादिता की दिशा में उलटने के लिए भाव-विभोर किया जा सके।

सत्परामर्श आज के लोक-मानस को परिष्कृत करने के लिए नितांत आवश्यक है, पर इसके लिए क्या कहा जाए? हृदयस्पर्शी कैसे बनाया जाए? इसके लिए जहाँ अनेक तथ्यों का समावेश करना होगा, वहाँ एक कार्य और भी करना होगा कि इस सत्संग-प्रक्रिया का सूत्र-संचालन करने वाले उसे धर्ममंच से प्रयुक्त करें और अपना स्तर व्यासपीठ पर बैठ सकने जैसा बनाएँ।

इसके लिए जनसमुदाय को एकत्रित करके सभा-सम्मेलन करने का वर्त्तमान प्रचलन में इतना सुधार और करना होगा कि उसे प्रवचनकर्त्ता के स्तर तथा श्रद्धासिक्त वातावरण से भी युक्त बनाया जाए। अन्यथा ग्रामोफोन रिकार्डों की तरह उससे बाजारू जानकारी भर मिलेगी और आयोजन में लगाया गया श्रम, धन एक विशेष प्रकार का मनोरंजन भर बनकर रह जाएगा। वातावरण से तात्पर्य कथामंच या पुरातन कर्मकांडों का समावेश करने से ही नहीं है; वरन उसके लिए उस प्रक्रिया को जोड़ने की ओर भी संकेत है जो प्राचीनकाल में तीर्थसेवन के रूप में प्रयुक्त होती थी। धर्मप्रेमी घर से दूर प्रकृति की गोद में बने किसी ऐसे शांतिदायक स्थान में पहुँचते थे, जहाँ ऋषि-मनीषियों के आश्रम आगंतुकों की निजी परिस्थिति का पर्यवेक्षण करते और उसे सुधार परामर्श देने के साथ साधनाएँ भी कराते थे। साधना, व्यक्ति जीवन का श्रद्धा समारोह है। उसके द्वारा ऐसी विशेष मनःस्थिति बनती है, जिसमें स्वाध्याय-सत्संग को चिंतन-मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है। जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।

परामर्श क्या दिये जाएँ? इसके लिए नए निर्धारण करने पड़ेगें। प्राचीनकाल में न नैतिक अनाचार था और न सामाजिक भ्रष्टाचार का बाहुल्य। न विग्रहों की भरमार थी न भटकाव का व्यामोह। उन दिनों तत्त्व दर्शन के विभिन्न पक्ष के लाक्षणिक प्रतिपादन भर से काम चल जाता था; पर अब वैसी स्थिति है नहीं। इन दिनों जनसंख्या वृद्धि, दहेज जैसी अगणित विकृतियाँ उपजी हैं, जिनका उन दिनों अता-पता भी नहीं था। सामयिक अवांछनीयताओं के निरस्त करने वाले और इन दिनों भावनात्मक नवनिर्माण की दृष्टि से जो आवश्यक एवं संभव है, उसी को परामर्श प्रवचन का विषय बनाना पड़ेगा। श्रद्धासिक्त वातावरण में, प्रज्ञावानों द्वारा कर्त्तव्यनिष्ठा का उपदेश देना यह पुरातन परिपाटी अक्षुण्ण रखते हुए भी, आज का लोक-शिक्षण उन तथ्यों से भरा-पूरा होना चाहिए जो समय की विकृतियों से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना में व्यावहारिक योगदान दे सके। इसके लिए मात्र दर्शन नहीं, तर्क, तथ्य और प्रमाण, उदाहरण भी चाहिए। वे आधुनिक हों तो भी हर्ज नहीं और यदि पुरातन इतिहास में से उन्हें ढूँढ़ा जा सके तो फिर सोना-सुगंध जैसी बात बनेगी।

संक्षेप में, यही है वह पृष्ठभूमि, जिस पर युगांतरीय चेतना को व्यापक बनाने के लिए धर्ममंच से लोक-शिक्षण की क्रिया-प्रक्रिया संपन्न की जानी चाहिए। युगमनीषा को इसके लिए सर्वतोमुखी ऐसा प्रचारतंत्र खड़ा करना होगा, जो उपरोक्त सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकने वाली शृंखला की सभी कड़ियाँ ठीक प्रकार से जोड़ सके। बाजारू भाषण-प्रक्रिया से इतना भार उठेगा नहीं। जो विडंबना इन दिनों मंचों और लाउडस्पीकरों पर धुँआधार करते सुनी देखी जाती है, वह खोखली होने के कारण विनोद-कौतुक की ही एक पद्धति बनकर रह जाएगी।

इस संदर्भ में जहाँ युगमनीषा से बड़े प्रयोजन के लिए बड़े मोर्चे संभालने और बड़े सरंजाम जुटाने के लिए कहा जा रहा है, वहाँ सुझाव के साथ एक छोटा प्रयोग भी सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दिनों शान्तिकुञ्ज के सृजनशिल्पी अपने-अपने घरों, क्षेत्रों में प्रज्ञा पुराण के प्रथम खंड की कथा कहते हैं। कथन के साथ-साथ श्रद्धासिक्त वातावरण भी बनाते हैं। पुराण में कथानक तो पुराने एवं पौराणिक है, पर उनमें उन सभी समस्याओं के सामयिक समाधान समाहित हैं जो इन दिनों व्यक्ति और समाज को बेतरह संत्रस्त, अस्त-व्यस्त किए हुए हैं। युगधर्म को पहचानने वाले क्षेत्रों में पुरातन और नवीन का यह दूरदर्शितापूर्ण प्रतिपादन बहुत ही लोकप्रिय हुआ है। आशा बँधी है कि प्रज्ञा पुराण के अगले 19 खंडों में अभीष्ट परिवर्तन की समग्र प्रक्रिया को इस माध्यम से जन-जन के गले उतारना संभव हो जाएगा।

युग-प्रवक्ताओं की वाणी कैसे मुखर हो, इसके इसलिए प्रज्ञा पुराण और स्लाइड प्रोजेक्टर की चित्र-विवेचना में जहाँ दार्शनिक तथ्यों का समावेश है। वहाँ प्रवचन की उस अभिनवशैली का भी प्रशिक्षण है जिसे अपनाकर भाषण कला के अनभ्यस्तों को भी मुखर बनने का भी अवसर मिलता है। इस प्रकार जीवनदानी युगशिल्पी, प्रज्ञापुत्रों की, युग-प्रवक्ताओं की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। वे सत्संग के प्राचीन माहौल को नए परिवेश में पिछड़े देहातों और अशिक्षित देश बांधवों तक पहुँचाने का प्राणपण से प्रयत्न कर रहे हैं। यह छोटा प्रयोग परीक्षण है। इसे बड़े लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर व्यापक बनाने का प्रयत्न होना चाहिए। ताकि संसार के पाँच अरब जनसमुदाय तक न सही सत्तर करोड़ देशवासियों तक परिवर्तन की अनिवार्यता और संभावना से भली प्रकार परिचित-प्रभावित किया जा सके।

एकांत परामर्श को मनन-चिंतन के माध्यम से हृदयंगम करने वाले तदनुकूल वातावरण और तप-साधना का समन्वय भी साथ-साथ चलना चाहिए। यह प्रयोग शान्तिकुञ्ज की गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित करके कल्प-साधना सत्रों के रूप में वह प्रयोग चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने वाला जीवन-दर्शन बदल सके। भविष्य के लिए आदर्शवादी निर्धारण साथ लेकर वापस लौट सके। प्राचीनकाल में मात्र तीर्थयात्रा ही नहीं होती थी, उस प्रयास का तीर्थसेवन प्रमुख अंग था, जिसका अर्थ था तेजस्वी वातावरण में, मनस्वी-ऋषियों के संरक्षण में, साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती है। पुरातन निर्धारण तो लगता है तिरोहित ही हो गए। प्रयत्न उसके पुनर्जीवन का किया गया है। इस दृष्टि से शान्तिकुञ्ज की तीर्थ प्रयोगशाला और उसमें चल रही कल्प-साधना, जीवन-साधना की विधि-व्यवस्था दृष्टव्य है। साधनों के अभाव में छोटे परीक्षण ही संभव हैं, वे ही चल भी रहे हैं। यह प्रस्तुतीकरण इसलिए किया गया है कि युगमनीषा को इस प्रक्रिया का स्वरूप और परिणाम समझने की सुविधा मिली। आवश्यक नहीं कि इसे इसी रूप में लिया जाए। उसमें परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक हेर-फेर भी करने पड़ेंगे। इतने पर भी मूल तथ्य यथावत रहेंगे। अभ्यस्त अवांछनीयता से लोक-मानस को विरत करने और दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए ऐसा प्राणवान प्रशिक्षण चाहिए जो न केवल जन-जन के गले उतर सके; वरन औचित्य के पक्षधर युग-चिंतन को अपनाने में भी साहस भरा उत्साह प्रकट कर सके।


तथ्य, तर्क और प्रमाणों से भरे-पूरे युग साहित्य का सृजन

सत्परामर्शों की उपयोगी आवश्यकता समझने वालों को यह भी देखना होगा कि जानने वाले भी अनजान क्यों हैं? दूसरों को शिक्षा देने वाले उन्हें स्वयं क्यों अपने व्यवहार में नहीं उतारते? प्रतिपादन ऐसे होने चाहिए जो तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण के सहारे यथार्थवादी एवं व्यावहारिक सिद्ध किए जा सकें। इस युग में बुद्धिवाद का दौर है। क्यों और कैसे का प्रश्न हर प्रसंग में किया ही जाता है, साथ ही यह भी देखा जाता है कि जो कहा जा रहा है उसमें अवास्तविकता की रंगीली उड़ाने ही तो काम नहीं कर रहीं? उन्हें अपनाया भी जा सकता है या नहीं? लोग कठिन काम भी कर गुजरते हैं; पर उन्हें विश्वास होना चाहिए कि जिस मार्ग पर चलने के लिए कहा जा रहा है, वह लक्ष्य तक पहुँचता भी है या नहीं?

विचार-क्षेत्र में पिछले दिनों असाधारण उथल-पुथल हुई है। अगले दिनों उससे भी बढ़कर होने वाली है। विज्ञान ने मनुष्य को चलता-फिरता पौधा बताया और प्रकृतिक्रम से जीवन का क्रम निचक्र-निरुद्देश्य भ्रमण करने की बात कही। उसके पक्ष में उनने विज्ञान, दर्शन और प्रत्यक्ष की साक्षी भी प्रस्तुत की। फलतः नीति-मर्यादाओं का, धर्म और आध्यात्मिक का पक्ष डगमगा गया। संकीर्ण स्वार्थपरता, आपा-धापी पनपी और मत्स्य-न्याय के समर्थक उपयोगितावाद ने लोक-मानस पर अपना आधिपत्य कर लिया। पशुप्रवृत्तियों का पूर्वाभ्यास इसमें और भी सहायक हुआ। तात्कालिक लाभ भी इसी में लगा। भविष्य को देखने-सोचने की दृष्टि एक प्रकार से कुंठित ही होती चली गई। यही वह प्रत्यक्षवाद, बुद्धिवाद, स्वेच्छावाद है, जिसके प्रवाह में जाने-अनजाने, शिक्षित-अशिक्षित, पिछड़े प्रगतिशील समान रूप से बहते चले जा रहे हैं। नीति-मर्यादा का प्रत्यक्ष विरोध करने पर बदनामी होने के रूप में कोई कुछ कहता तो नहीं, पर उनके पालन का उत्साह दिन-दिन घटता जा रहा है। इस माहौल को नीति-क्षेत्र की, आस्था-क्षेत्र की प्रतिक्रांति या अराजकता भी कह सकते हैं। यही है— अपने समय का दार्शनिक विश्लेषण। यही है चिंतन का वह प्रवाह-प्रचलन, जिसने व्यक्ति और समाज को अनौचित्य का पक्षधर बनाकर वहाँ ला पटका जहाँ सर्वनाशी संकट का सामना करना पड़ रहा है।

मानवीसत्ता को यदि अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है तो प्रस्तुत निर्धारण-प्रचलन पर नए सिरे से पर्यवेक्षण करना होगा और देखना होगा कि अति उत्साह से प्रगतिशीलता के नाम पर जिस कूड़े-कचरों को जोश-खरोश के साथ गले बाँध लिया गया है, वह कहीं भूतकाल की प्रतिगामिता से भी अधिक अवांछनीय तो नहीं है। जो हो, मानवी गरिमा के सनातनकेंद्र तक लौटने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। विकल्प केवल वह सर्वनाश ही है, जिसकी घोषणा स्थिति की गंभीरता को समझने वाले हर क्षेत्र से कर रहे हैं।

वापसी का रास्ता भी अब सरल नहीं रहा। जिस बुद्धिवाद के सहारे आस्था से अनास्था तक पहुँचा गया है, उसी सीढ़ी से उलटे पैर रखते हुए नीचे उतरना होगा। इन परिस्थितियों में काँटे से काँटा निकालने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। बुद्धि की बुद्धि से ही मुठभेड़ कराई जाती है। तर्क को तर्क से ही निरस्त किया जाएगा। प्रमाण, उदाहरण मात्र अनाचार की सफलता के पक्ष में ही साक्षी नहीं देते, उनसे बड़े आधार ऐसे प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जो आदर्शों की गरिमा, आत्मिक शांति से भी बढ़कर भौतिक प्रगति में योगदान करने की बात सिद्ध कर सके। सत्य को तथ्य और श्रेयस्कर सिद्ध करने पर किसी का आग्रह हो तो उसे उस रूप में भी प्रमाणित करने वाली मनीषा ने चुनौती स्वीकार करने का निश्चय कर लिया है।

धर्मतत्त्व के शाश्वत सिद्धांतों को बुद्धिवाद की कसौटी पर कसे जाने के उपरांत मान्यता मिले, यह लगता तो बड़ा अटपटा है, पर बालहठ के सामने कोई क्या करे। मचले बच्चे को बहलाने के लिए बाबा को यदि घोड़ा बनना पड़े तो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया जाता। यदि विज्ञान और बुद्धिवाद में तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण के आधार पर ही किसी प्रतिपादन को स्वीकारने की ठान ठानी है तो उसमें शैली बदलने भर की कठिनाई पड़ेगी। नए आधार ढूँढ़ने का झंझट नहीं है। लोक-मानस को यदि आदर्शवादिता की ओर पीछे लौटने के लिए बुद्धिवाद की सवारी चाहिए तो इसके लिए उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। थोड़ा झंझट तो है; पर बात असंभव नहीं। एक भाषा बोलने वाले को यदि दूसरी बोलने और सीखने के लिए विवश किया जाए तो यह झंझट भरा काम भी किसी प्रकार पूरा किया ही जाएगा। इसमें असंभव जैसा तो कुछ है नहीं।

लोक-मानस को अभ्यस्त अवांछनीयता से विरत करने के लिए जिन परामर्शों की आवश्यकता है, उनका स्वरूप विज्ञान, तर्क और प्रमाण पर आधारित यदि इतनी छोटी बात पर गाड़ी अड़ गई है तो उसे आस्तीनें चढ़ाकर आगे धकेल देने में किसी बड़े असमंजस का सामना नहीं करना पड़ेगा। युगमनीषा यह कर लेगी। परामर्श के प्रतिपादन चाहिए। वाणी से जो कहा जाना है, वह लेखनी के माध्यम से सुस्थिर होना चाहिए। ऋषियों ने लिखा है, मुनियों ने उसे फैलाया है। युग-प्रवक्ताओं की मुनि बिरादरी सृजनशिल्पियों के रूप में मोर्चा संभालने जा पहुँची। अब उनकी पेटियाँ कारतूसों से भरने का काम शेष है। यह ऋषि को करना होगा। युगसाहित्य का सृजन इसी प्रक्रिया का नाम है। उसकी अपनी विशेषता इतनी ही है। जो शास्त्रकार-आप्त पुरुष प्राचीनकाल की श्रद्धाशैली को प्रतिपादित करते रहे हैं, उन्हें अब वैज्ञानिक की, वकील की, दार्शनिक की शैली में नए ढंग से क्रमबद्ध करना पड़ेगा। युगलेखनी को इस तौर-तरीके से व्यक्ति और समाज से संबंधित प्रायः हर समस्या पर नए सिरे से प्रतिपादन प्रस्तुत करना पड़ेगा।

जर्मनी, एशिया, चीन, ईरान आदि की अधिनायकवादी सरकारों ने ब्रेनवाशिंग का लक्ष्य रखकर स्कूली पाठ्यक्रम एक वर्ष की अवधि में बदल दिए थे। साहित्य और सिनेमा की क्षमता का उपयोग शासकों की इच्छानुकूल हुआ था। उन लोगों ने चिंतन को प्रभावित करने वाले हर क्षेत्र को इच्छित प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया। अपने देश में वैसा तो नहीं हो सकता और न वैसी आवश्यकता ही है। नीति और धर्म का पक्ष इतना सशक्त है कि यदि उसे बुद्धिवादीशैली में प्रस्तुत करने के लिए युगमनीषा कमर कस ले तो बिना शासन की सहायता के भी जन स्तर पर वैसा हो सकता है और जन-जन को युगचिंतन के हर पक्ष का समर्थन करने वाला साहित्य मिल सकता है। जो सत्य है, जो श्रेष्ठ है, जो श्रेय है, उसे उसी रूप में प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध किया जा सकता है। इस प्रकार के लेखन-प्रतिपादन में मात्र मनीषा को संकल्पपूर्वक कटिबद्ध भर होना है। प्रकाशन और विस्तार का काम भी मनस्वी लोग संभालेंगे ही। थोड़े दिनों की अड़चन के बाद, वस्तुस्थिति को समझने के बाद ऐसा साहित्य प्रकाशन और विक्रय की अपनी व्यवस्था आप बना लेगा। समर्थ की सहायता के बिना बुद्ध, शंकराचार्य, मार्क्स, रूसो, तुलसी, सूर आदि के प्रतिपादन बिना छपे बिक बिक कहाँ रहे।

नवयुग के अनुरूप, मनुष्य की समस्त समस्याओं और आवश्यकताओं को समुचित समाधान प्रदान करने वाला बुद्धिवादी साहित्यसृजन आज की महती आवश्यकता है। समर्थ लोग उसे ईसाई मिशन की तरह बड़े रूप से सोचें और करें, यह समय की माँग है। इसे पूरा करने के लिए कौन प्रतिभाएँ, कब आगे आएँ, इसकी प्रतीक्षा न करके युगांतरीय चेतना ने इस महान प्रयोजन को अपने छोटे साधनों का संकोच न करते हुए बिना समय गँवाये आरंभ कर दिया है। इस प्रयास में टिटहरी और गिलहरी के समुद्र सुखा देने वाले संकल्प से महती प्रेरणा मिली है।

शान्तिकुञ्ज के ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के अंतर्गत इसी संदर्भ में अनुसंधान कार्य पिछले दिनों से चल रहा है। उसका विज्ञान पक्ष जितना सशक्त है, उसमें से अधिक दर्शन को भी महत्त्व दिया गया है। जहाँ विज्ञान और दर्शन को अध्यात्म की धुरी के साथ दो पहियों की तरह जोड़ने और प्रगति-रथ को लक्ष्य की दिशा में दौड़ाने में प्रयत्न चला है, वहाँ इस प्रयास में भी कोताही नहीं की गई तो धर्मतत्त्व को तर्क के आधार पर जन-जन के गले उतारने योग्य बनाया जाए। इस संदर्भ में अखण्ड ज्योति का तथा उसकी सहयोगी अन्य पत्रिकाओं का लेखन सामने है। आर्ष साहित्य से लेकर प्रचुर परिमाण में छोटा-बड़ा साहित्य लिखा और छपा है। इसकी लाखों प्रतियाँ छपती हैं और करोड़ों की संख्या में पढ़ी जाती हैं। इतने पर भी यह कहा जा सकता है कि मानव समुदाय की व्यापकता और आवश्यकता को देखते हुए यह जलते तवे पर कुछ बूँदें पड़ने के समान नगण्य है।

वाणी के मुखर करने की तरह लेखनी का प्रखर करने के लिए विचार-क्रांति की सामयिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए तात्कालिक कदम उठाए गए हैं। शान्तिकुञ्ज की सत्र-शृंखला में अब प्रवचन-कौशल की तरह साहित्यसृजन के निमित्त लेखनकला की भी अभिनव प्रशिक्षणपद्धति इन्हीं दिनों आरंभ की गई है। ग्रेजुएट स्तर के छात्र लिए गए हैं और उनका पाठ्यक्रम हर अंगरेजी महीने की पहली तारीख से तीस तारीख तक का एक-एक महीने का रखा गया है। वे नियमित रूप से निरंतर चलेंगे। इनमें ब्रह्मवर्चस् की शोध-प्रक्रिया के अंतर्गत विज्ञान तत्त्व दर्शन के दोनों ही क्षेत्रों की शोध-प्रक्रिया का अभ्यास कराया जाएगा। अध्ययन, संकलन, वर्गीकरण, मंथन, निर्धारण की अनेक पगडंडियों को पार करते हुए युग साहित्यसृजन की स्थिति तक कैसे पहुँचा जा सकता है। इससे संबंधित अनेकों उतार-चढ़ावों की व्यावहारिक जानकारी उस छोटी अवधि में यथासंभव अधिक-से-अधिक करा देने की कार्यपद्धति बनाई गई है। शोध और सृजन से संबंधित एक भी पक्ष ऐसा नहीं छोड़ा गया है, जिसका सार-संक्षेप इन थोड़े से दिनों में ही करा न दिया जाए। शब्द-भंडार, भाषा-विन्यास, व्याकरण ज्ञान, शैली-प्रवाह, भाव-संवेदन के समावेश का अच्छा ज्ञान हर लेखक को होना चाहिए। इन संदर्भ में यों स्वेच्छा प्रयत्न और सामान्य मार्गदर्शन से भी कुछ-न-कुछ क्रमिक प्रगति होती है, पर यदि कहीं अनुभव संपदा को एक से दूसरे को हस्तांतरित करने को क्रम चले तो समझना चाहिए कि रास्ता कठिन होते हुए भी सरल हो गया।

प्रस्तुत विचारणा-पद्धति की खामियों, भ्रांतियों और दुखदाई प्रतिक्रियाओं से जनसाधारण को प्रभावी ढंग से समझाया जा सके तो दिशाभूल का पता चलने पर मनुष्य तत्काल लौट पड़ता है। इसी प्रकार उज्ज्वल संभावनाओं से भरे-पूरे तथ्यों का यदि विश्वास दिया लिया जा सके तो उसे अपनाने के लिए बौड़मों का भी मन चलता है। युगसाहित्य इसी स्तर का लिखा जाएगा, इसलिए उसकी तैयारी के लिए विश्वकोश का निर्माण करने जैसा मनोयोग और अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। यही सब उस एक महीने में अधिकाधिक मात्रा और गहराई के साथ शिक्षार्थियों के अनुभव-अभ्यास में उतारा जा रहा है।

प्रभावी परामर्श-प्रवचनों के लिए भी तथ्य चाहिए। विचार-क्रांति का प्रयोजन पूरा कर सकने वाले तथ्याश्रित साहित्य को तो हर पंक्ति में संदर्भ भरे रहने चाहिए। शान्तिकुञ्ज ने इस प्रक्रिया का छोटा शुभारंभ करके युगमनीषा को उकसाया है कि जब छोटे साधन इतना दुस्साहस कर सकते हैं तो जिनके लिए बड़े साधन जुटा सकना— बड़े कदम उठा सकना शक्य है वे बड़े स्तर की बड़ी बात क्यों न सोचें? बड़ी योजना क्यों न बनाएँ? युग परिवर्तन का अर्थ है— विचार परिवर्तन। इस महाक्रांति के लिए लाखों शस्त्र-सज्जा संजोने की, पर्वत जैसे अवरोधों को कुचल डालने वाली रणनीति अपनानी पड़ेगी। महाप्रज्ञा के वरदपुत्र समय की इस माँग को भी पूरा करके रहेंगे।

लेखन की एक मंजिल पूरी होते-होते विशद प्रकाशतंत्र खड़ा करने की, प्रस्तुत बुक सेलरों के ढर्रे में फिट न बैठ सकने के कारण स्वतंत्र विक्रय का प्रबंध करने की योजना भी हाथ लेनी पड़ेगी। प्रस्तुत पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी विचार का यह सिलसिला चल सकता है। यह साधन पक्ष हुआ। प्रसार की दृष्टि से वह भी कम महत्त्व का नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि सृजन का सिलसिला चलाने के लिए युगमनीषी अपनी श्रद्धा प्रखर करेंगे तो साधनसंपन्नों की दुनियाँ भी नितांत कृपण बनकर न बैठेगी। प्रकाशन और प्रसार की आवश्यकता पूरी कर सकने वाले साधन भी किसी-न-किसी प्रकार आसमान से धरती पर उतरेंगे।


लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का समन्वय

मनुष्य की कोई वास्तविक सेवा हो सकती है तो एक ही है कि उसके दृष्टिकोण, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में सहारा दिया जाए। ऐसा बन पड़े तो अपंग व्यक्ति भी स्वावलंबी, सम्मानित एवं श्रेयाधिकारी जीवन जी सकते हैं। इस प्रकार के प्रमाणों के लिए इतिहास के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं, उतना तो अपने इर्द-गिर्द ही दृष्टि दौड़ाकर प्रमाण, उदाहरणों का ढेर ढूँढ़ा जा सकता है। मुसीबत के समय एकदूसरे की सहायता करना मनुष्य का धर्म है, पर जहाँ तक सेवा-सहायता और पुण्य-परमार्थ के स्तर का संबंध है, वहाँ एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि चिंतन-प्रवाह को पतन-पराभव से मोड़कर उसे उत्कृष्टता के साथ नियोजित कर दिया जाए, इतने भर से वह अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता के उच्चशिखर पर पहुँच सकता है और विपन्न परिस्थितियों में रहते हुए भी असंख्यों के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय जीवन जी सकता है।

सामयिक समस्याओं का कारण और निवारण भी इसी क्षेत्र में ढूँढ़ा जाना चाहिए। विपन्न परिस्थितियों के निराकरण के लिए आर्थिक, बौद्धिक, शासकीय प्रयत्न से सुविधा-संवर्द्धन का उपक्रम चलना ही चाहिए; किंतु बात इतने से भी बनने वाली नहीं। फुंसियों पर मरहम लगाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रक्तशोधन के स्थाई उपचार को भी नजरअंदाज न किया जाए। वस्तुतः यही समस्याओं का उद्गम है और यहीं समाधान भी खोजा जाना चाहिए। मूर्धन्यों में से सब न सही कम-से-कम मनीषा वर्ग को तो अपने जिम्मे लेना ही चाहिए। उनका चिंतन इस केंद्र पर केंद्रीभूत रहना चाहिए कि किस प्रकार लोक-मानस में घुसी हुई भ्रांतियों, विकृतियों एवं दुष्प्रवृत्तियों को उन्मूलन किया जाए। उनके स्थान पर किस प्रकार दूरदर्शी विवेकशीलता को, शालीन सुसंस्कारिता को प्रतिष्ठित किया जाए? इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिक, समाजसेवियों, अपराध-नियामकों, चिकित्सकों, शासकों का तीन-चौथाई भार हलका हो सकता है।

लोक-मानस को परिष्कृत करना है तो कठिन, पर युगमनीषा की मूलभूत क्षमता को देखते हुए उसे असंभव किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता। "संकल्प उठते हैं तो साधन भी जुटते हैं", इस शाश्वत सत्य पर जिनका अटूट विश्वास हैं वे ‘एकला चलो रे ‘ गुनगुनाते हुए सूर्य-चंद्र की तरह अपना पथ बनाने और अपने पैरों चल पड़ने से भी हिचकते नहीं। इन विपन्न परिस्थितियों में अनेकानेक विभीषिकाओं से एक ही मोर्चे पर लड़ा जा सकता है। लोक-मानस के परिष्कार का, विचार-क्रांति का, प्रज्ञा अभियान का महत्त्व यदि समझा जा सके तो उस एक ही काम को हाथ में लेने से समस्त समस्याओं का हल सुनिश्चित रूप से निकल सकता है। प्रबुद्ध व्यक्तित्व अपनी सामान्य गतिविधियों से ही कठिनाइयों के घटाटोप को देखते-देखते तिरोहित कर सकते हैं। छोटे से प्रकाश के सम्मुख सुविस्तृत सघन अंधकार के भी पैर टिक नहीं पाते।

चिंतन को प्रभावित करने वाले चार प्रयोजनों की चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। इस संदर्भ में वाणी-लेखनी का प्रयोग किस प्रकार होना चाहिए, इसके कुछ सुझाव-प्रयासों का उल्लेख भी हुआ है। अब तीसरे ‘दृश्य’ और चौथे ‘कृत्य’ प्रयोजन पर प्रकाश पड़ने की आवश्यकता है। वाणी-लेखनी का किस पर कितना प्रभाव पड़ा, इसमें वक्ता एवं लेखक की भूमिका ही सब कुछ नहीं है। उसमें श्रोता एवं पाठक की मनोभूमि का, कोमलता, कठोरता को भी अपना रोल अदा करती है। आदर्शवादी प्रतिपादनों का हृदयंगम करा सकना वहीं सफल होता है जहाँ भाव-संवेदनाओं की, विवेक एवं औचित्य की उर्वरता पहले से ही विद्यमान हो, पाषाण हृदय, दुष्ट-दुराग्रही, असुर-आतंकवादी श्रेष्ठता का समर्थन सुन तो सकते हैं, पर उसे हृदयंगम करने लिए अहंकारी-अहंमन्यता को लाँघने के लिए सहमत नहीं हो सकते ऐसे लोगों के लिए एक कदम आगे बढ़कर ‘दृश्य’ उपक्रमों के साथ कडुई गोली चीनी लपेटकर देनी पड़ती है। स्पर्श का, दृश्य का प्रभाव स्वाध्याय और सत्संग से भी अधिक पड़ता है। उसे बालबुद्धि और कठोर मनोभूमि के लोग भी अपेक्षाकृत अधिक सरलता से हृदयंगम कर सकते हैं।

चित्रकथाएँ बालकों को कितनी प्रिय होती हैं। समूचा फिल्म उद्योग इसी मानवी प्रकृति पर टिका हुआ है कि लोग घटनाक्रम देखना अधिक पसंद करते हैं। अभिनय-नाटकों की लोकप्रियता सर्वविदित है। संगीत समारोहों में समा बँधता है और बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी उन्हें सुनने के लिए दौड़ पड़ते हैं। महँगे टिकट खरीदकर भी उनमें स्थान सुरक्षित कराते हैं। ऐसे आयोजन खुले में, बिना किसी टिकट के हों तो भीड़ का बारापार नहीं रहता। रीछ, बंदरों का— मदारी, सपेरे और बाजीगरों तक का तमाशा देखने के लिए रास्ता चलते लोग काम छोड़कर धूप-छाँव की परवाह न करते हुए मजमा लगा लेते हैं। जुलूसों में बच्चे तक घुसते हैं और अर्थ न समझने पर भी दूसरों द्वारा बोले गए नारे खुद भी जोर-शोर से लगाते हैं। बाजारों में बारात निकलती है, लोग रुककर देखते हैं। मेले, ठेले, रामलीला, नौटंकी, कठपुतली, ख्याल, स्वाँग, दंगल-प्रतियोगिता, कवि सम्मेलन, मुशायरे, प्रदर्शनी, सरकस जब लगते हैं तो उन्हें देखने को कितनों का मन मचलता है और बिना बुलाई भीड़ का जमघट लग जाता है। दर्शनीय स्थानों को देखने लोग पैसा खरचते और समय निकालते हैं। तीर्थयात्रा, पर्यटन-प्रवास की योजना बनाते समय पुण्य का कम और अनदेखे दृश्य देखने का उत्साह अधिक रहता है। मनुष्य की सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति यह बताती है कि उसे दृश्य देखने में सहज रुचि होती है। टहलने, घूमने में लोग स्वास्थ्य-संवर्द्धन की दृष्टि से कम, चित्र-विचित्र दृश्य देखने का आनंद लेने की उत्सुकता अधिक रहती है।

दृश्य मात्र विनोद-मनोरंजन ही नहीं है; उसका दर्शक पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव भी पड़ता है। भूकंप, बाढ़, अग्निकांड, दुर्भिक्ष जैसी दुःखद दुर्घटनाएँ देखकर कठोर लोगों का भी हृदय द्रवित हो उठता है और वे सेवा-सहायता के लिए अनायास ही अंतःप्रेरणा से दौड़ पड़ते हैं। विवाह-शादियों की धूम-धाम में सम्मिलित रहने का उत्साह सभी को रहता है। घर-खाना एक बात है और प्रीतिभोज में सम्मिलित होना दूसरी। सभा-सम्मेलनों में लोग मात्र ज्ञानवर्द्धन के लिए ही नहीं पहुँचते, उपस्थित जनसमुदाय की चित्र-विचित्र शकल-सूरत को देखने का चोर भी मन में छिपा रहता है। विज्ञापनों में आकर्षक आकृतियों को इसलिए जोड़ा जाता है कि लोग उन्हें देखने के साथ-साथ विज्ञप्तित वस्तु का परिचय भी प्राप्त कर लें। इन्हीं तथ्यों को देखते हुए स्वाद और यौन कर्म की तरह दृश्य देखने में रस लेने वाली नेत्र इंद्रिय को भी प्रमुख माना गया है। लोग अपने को वस्त्राभूषणों से, शृंगार-साधनों से इसीलिए सजाते हैं कि उन पर दृष्टि खिंचने के साथ-साथ अपना परिचय भी लोगों को मिलता या बढ़ता चले। यह तथ्य ऐसे हैं जिन्हें मानव प्रकृति का अंग ही माना जा सकता है। इतना ही नहीं, उनके भले-बुरे प्रभाव पड़ने की गंभीरता से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

इस तथ्य को लोक-मानस की परिष्कार-प्रक्रिया में भी सम्मिलित किया जाना चाहिए और अधिक लोगों को अधिक प्रभावित करने की बात को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के सरंजाम खड़े करने चाहिए। लोक-मंगल को गले उतारने के लिए उसके साथ लोकरंजन भी गुथना चाहिए। इस माध्यम से शिक्षित-अशिक्षित, पिछड़े-प्रगतिशील सभी को आकर्षित किया और उपस्थित देखा जा सकता है। यह दृश्यतंत्र यदि उद्देश्यपूर्ण है और उसमें वर्तमान विकृतियों से जूझने, सत्प्रवृत्तियों को उभारने की ललक हो तो उसे न केवल प्रचार की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है; वरन व्यवसाय के स्तर पर आर्थिक स्वावलंबन भी रखा जा सकता है। छोटे देहातों में भी फेरी वाले ‘ऑटो विजुअल’ उपकरण सिर पर लिए घूमते रहते हैं। नट और मदारी अभी भी जीवित हैं। सिनेमा और नाटकों के भारी पूँजी वाली स्थापनाएँ अभी भी रामलीला, रासलीला को प्रतिद्वंद्विता में पछाड़ नहीं सकी हैं। भारत पिछड़ी एवं विरल क्षेत्रों में बसा हुआ अशिक्षित लोगों के बाहुल्य वाला देश है। 70 प्रतिशत लोग इसी में निवास-निर्वाह करते हैं। यही असली भारत है। शहरों की दर-गुजर की जा सके और देहात को अपने कल्पना-चित्र से प्रमुखता दी जा सके तो उसे युगचेतना से अवगत-प्रभावित करने के लिए इस ‘दृश्य’ माध्यम को नए सिरे से गठित किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि वह फिल्म-उद्योग की तरह मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हाथ में ही रहे। उसे छोटी पूँजी वाले सरकारी मंडली की सहायता से हर जगह स्थानीय प्रतिमाओं के सहारे गठित किया जा सकता है। स्वसंचालित विशालकाय कारखानों की प्रतिद्वंद्विता का सामना करते हुए यदि चरखा और करघा जीवित रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का समन्वय योजनाबद्ध रूप से आगे न बढ़ाया जा सके। पारमार्थिक न सही व्यावसायिक आधार पर भी इस तंत्र को खड़ा करने और सफल बनाने की अपने देश में पूरी-पूरी गुंजाइश है।

बड़ी और व्यापक योजनाएँ बड़े लोग बड़े साधनों से खड़ी करने में सफल रहते हैं, पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि बड़े आगे बढ़ें और छोटे रुके रहें। प्रगतिशील प्रयत्नों से गतिरोध तो नहीं ही अड़ना चाहिए। छोटे शुभारंभ से भी चिनगारी की स्थापना ज्वालमाला के रूप में विकसित हो सकती है। न कुछ-से-कुछ करने की नीति अपनाना ही अधिक श्रेयस्कर है।

प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत एक छोटा रेडियो-स्टेशन और छोटा फिल्म-उद्योग बड़ी सफलता के साथ चल रहा है। टेप-रिकार्डर द्वारा सुनाए जाने वाले संगीत और प्रवचनों के टेप बड़ी संख्या में बनने और उन्हें छोटे समुदायों को एकत्रित करके सुनाए जाने के प्रयत्न में हजारों युगशिल्पी लगे हैं। लाउडस्पीकरों की सहायता से इन प्रेरक टेपों को प्रतिदिन हजारों-लाखों की संख्या में लोग सुनते हैं। यही है अपना छोटा-सा चलता-फिरता नितांत सस्ता-सर्वसुलभ मिनी रेडियो-स्टेशन। इस संदर्भ में एक छोटा स्लाइड प्रोजेक्टर बना है। इसके लिए 36-36 रंगीन स्लाइडों के दर्जनों सैट बने हैं। किसी भी गली-मुहल्ले के लोगों को एकत्रित करके प्रकाश-चित्रों की व्याख्या करते हुए भाव-भरा प्रदर्शन होता है। खर्च कुछ नहीं, टिकट कुछ नहीं। लागत आश्चर्यजनक रूप से कम। 200रु. की पूरी मशीन। 36 स्लाइडों का एक प्रसंग फिल्म 45रु. का। इसे कोई भी लोकसेवी निजी पूँजी से अथवा मिल-जुल खरीद लेता है और हर दिन मुहल्ले-मुहल्ले में दिखाते रहने का उपक्रम चलाता है। हर दिन पचास की उपस्थिति मानी जाए तो वर्ष में देखने वालों की संख्या 360 X 50 =18000 होती है। ऐसे पाँच हजार स्लाइड प्रोजेक्टर कार्यक्षेत्र में उतरें तो उस मिनी सिनेमा से, उससे अधिक लोग इस प्रभाव-प्रेरणा की परिधि में आते हैं, जितने कि अरबों-खरबों की लागत वालो फिल्म-उद्योग द्वारा होता है। यह है— अपना मिनी फिल्म उद्योग।

छोटी चित्र प्रदर्शनियाँ, छोटी संगीत मंडलियाँ इन दिनों प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत देश के कोने-कोने में पहुँचना और लोक-मानस के परिष्कार की भूमिका निभाती हैं। वाहनों का प्रबंध तो नहीं हो सका। कठिनाई से कुछ जीपें हाथ लगीं। सोचा गया है, वह प्रयोजन साइकिलों से भी पूरा हो सकता है। घर-घर अलख जगाने की परिव्रज्या के लिए, परिव्राजक का बिस्तर लाद ले चलने और कभी-कभी सवारी के रूप में प्रयुक्त हो सकने की आवश्यकताएँ साइकिल से सधती हैं, इसलिए एक हजार युगशिल्पियों का लक्ष्य रखकर प्रायः उतनी ही साइकिलें जुटाने की दौड़-धूप हो रही है। आधे साधन बन गए। जितना और प्रबंध होगा प्रचारकों की वानरसेना उसी अनुपात से संस्कृति की सीता की खोज के लिए निकलती और बढ़ती चली जाएगी। इस छोटे से प्रयास को देखकर युगमनीषी यह सोच सकते हैं कि बड़े विस्तार के साथ, व्यापक रूप में यह प्रयत्न किस प्रकार अग्रगामी बनाए जा सकते हैं।


जागृत आत्माओं की समयदान-अंशदान श्रद्धांजलि

यह क्यों किया जाए? कैसे किया जाए? इसकी एक झलक-झाँकी पिछले पन्नों पर पढ़ चुकने के उपरांत देखना होगा कि क्या इतने भर से काम चल जाएगा? और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने पर प्रयोजन सध जाएगा? इसके उत्तर में यही कहा जाएगा कि यह सभी प्रयास नितांत आवश्यक होने पर जिसे साथ लिए बिना अपूर्ण-अपंग बनकर रह जाते हैं, उसका नाम है— ‘कृत्य’। उसी को अभ्यास कहते हैं। संचित अनुभव को प्रखर-परिपक्व करना हो तो उसे कृत्य रूप में परिणत करना होता है। अन्यथा जानकारी हवा में तैरती रहेगी— स्वभाव का अंग न बन सकेगी।

विचार और कर्म मिलकर संस्कार बनते हैं। चेतना को किसी ढाँचे में ढालने और उस खाँचे में दृढ़तापूर्वक खिंचे रहने में इन संस्कारों की ही प्रधान भूमिका होती है। वे आदतों के रूप में विकसित होते हैं और जैसे भी भले-बुरे हैं, अपने साथ जीवनचर्या और गतिविधियों को घसीटे फिरते हैं। इन संस्कारों का समुच्चय ही व्यक्तित्व है। वह अपनी जगह अड़ा रहता है और प्रतिपक्षी वातावरण में भी अभ्यस्त ढर्रे को यथावत बनाए रहने के लिए दृढ़ता का परिचय देता रहता है। अंतराल को इसी स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए किसी व्यक्ति के स्तर का पता चलता है।

कथन, श्रवण दोनों ही क्षणिक एक हवाई हैं। वे एक क्षण उत्साह भरते और दूसरे क्षण बबुले की तरह समाप्त होते भी देखे जा सकते हैं कि चिरकाल तक जिस प्रकार के कृत्य किए जाते रहे हैं, स्वभाव का अंग बन जाने पर वे हटने का नाम नहीं लेते। नशेबाजों की विवशता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मनःसंस्थान की बनावट विचित्र है। वह दुमुँही की तरह उलटा और सीधा दोनों तरफ चलता है। आकांक्षाओं के अनुरूप मन और शरीर को काम करने पड़ते हैं, इस तथ्य से सभी परिचित हैं; किंतु इसी रहस्य की एक कड़ी यह भी है कि निरंतर के कृत्य अपने अनुरूप मन को ढाल लेते हैं। वातावरण का प्रभाव इसी को कहते हैं। इसमें गतिशील प्रभाव ही नहीं, अपना निजी क्रियाकलाप भी सम्मिलित होता है तो स्वभाव उस ढाँचे में ढल जाता है। आदतें उसी प्रचलन को पकड़ लेती हैं। कसाई कालांतर में इतनी कठोर मनोभूमि के हो जाते हैं कि उनमें दया, करुणा नाम की कोई चीज शेष रह नहीं जातीं। अपना कृत्य वे बिना किसी भय, संकोच के करते रहते हैं। वह उन्हें सहज लगता है, जबकि दया-धर्म की मनोभूमि वाले के लिए उस वीभत्स को देखने तक में ही दिल दहलता है, साँस रुकती है।

दुष्ट-दुराचारी आरंभ से ही असमंजस करते हैं, वेश्याएँ कुछ दिन ही झिझकती हैं। डाकुओं, तस्करों, ठगों को अपना व्यवसाय सहज मनोरंजन एवं सामान्य कृत्य जैसा लगता है। कृत्य से अंतस् ढालने की बात यहाँ प्रत्यक्ष है। यही बात पुण्य-परमार्थ के, चरित्र संयम के संबंध में भी लागू होती है। कुछ दिन उस मार्ग पर चलने वाले अड़चन, अवरोध, असमंजस, विरोध अनख जैसा अनुभव करते हैं; किंतु जैसे-जैसे समय बीतता है, वे उस मार्ग पर चलते रहना उनके स्वभाव का अंग बन जाता है और फिर उसमें शौर्य-साहस,  त्याग-बलिदान जैसा विशिष्ट कुछ भी नहीं लगता। पटरी पर गाड़ी अपने क्रम से लुढ़कती रहती है। साधुओं की अपने ढंग की मनोभूमि और दिनचर्या होती है। दूसरे लोग उसे अपनाने में भी भारी असुविधा अनुभव करते हैं, पर अभ्यस्तों के लिए वह ढर्रा ही प्राणप्रिय बन जाता है। इसमें आदर्श की कम और स्वभाव की भूमिका अधिक होती है। देशभक्तों, समाजसेवियों के कई परिवार ऐसे होते हैं जो अन्य व्यवसायियों की तरह सीधे-साधे अभ्यास को सहज स्वाभाविक रीति से अपनाए रहते हैं। भौतिक, आत्मिक सभी क्षेत्रों में यह बात समान रूप से लागू होती है।

लोक-मानस के परिष्कार में व्यक्तिगत पवित्रता— प्रखरता पर जोर दिया जाता है और समाजगत न्यायनिष्ठा एवं उदार सहकारिता को प्रोत्साहित किया जाता है। यह मात्र चिंतन ही नहीं, कृत्य भी है। ताने-बाने के दोनों धागे मिलकर इस कपड़े को बुनते हैं। आवश्यक है कि जहाँ दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने का समग्र लोक-शिक्षण दिया जाए, वहाँ यह भी न भुला दिया जाए कि उस स्तर के कुछ-न-कुछ क्रिया-कृत्य भी साथ में जुड़े रहने चाहिए। बीजारोपण को अंकुरित-पल्लवित करने के लिए इसी खाद-पानी की आवश्यकता पड़ती है।

प्रयत्न यह चलना चाहिए कि देशधर्म को आत्मा-परमात्मा का गौरव और उत्तरदायित्व समझने वाले प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा कुछ नियमित रूप से करते रहने के लिए तत्पर किया जाए, जिसमें लोक-मंगल को सत्प्रवृत्तियों में प्रत्यक्ष सहयोग मिलता हो। कार्य छोटा ही क्यों न हो, पर यदि वह नियमित रूप से चलेगा तो उस दिशा में प्रगति होगी और परिपक्वता बढ़ेगी। जैन धर्म की एक तीर्थकर की कथा है कि वे आरंभिक जीवन में बहेलियों का धंधा करते थे। दीक्षा लेने आए तो अहिंसा पालन का व्रत लेने के लिए कहा गया। इसमें आजीविका चले जाने का संकट न सह सकने का तर्क देते हुए, उनमें स्वल्प अहिंसा की सरलता बना देने का अनुरोध किया। सोच-विचार के बाद में वैसी सुविधा मिली और कौए की हत्या न करने का संकल्प लेकर हल निकाला गया। वे अहिंसा की महिमा पर कौए पर दया दिखाने के माध्यम से विचार करते रहे और अंततः अहिंसा धर्म के परिपालक ही नहीं, प्रवक्ता भी बन गए। यही अणुव्रत है। थोड़ा शुभारंभ भी भविष्य की महती संभावनाओं का विश्वास दिलाता है।

युगांतरीय चेतना को अग्रगामी बनाने के लिए हर जागृत आत्मा को स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन, पूजन, भजन तक सीमित न रहकर कुछ ऐसा करने के लिए भी कहा जाना चाहिए, जिसमें उसे श्रम करना और सहयोग देना पड़ता हो। यही प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित होने का व्रत-धारण है। प्रज्ञापरिजनों को इस देव परिवार का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम एक घंटा समय और दस पैसा नित्य की अपने क्षेत्र में रचनात्मक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए नियमित रूप से देना होता है। इससे कम में किसी को प्रज्ञापरिजन कहलाने का अधिकार नहीं मिलता। यह समय अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र में मिशन की बीससूत्री योजना में लगाना पड़ता है। प्रौढ़ शिक्षा, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, गृह-उद्योग अपव्यय की रोक-थाम स्वास्थ्य-संवर्द्धन, नशा-निषेध, दहेज विरोध, जाति और लिंग के नाम पर चलने वाली असमानता का उन्मूलन जैसे कितने ही रचनात्मक कार्य इस योजना में सम्मिलित हैं। व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण, समाज निर्माण के लिए नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रांति के लिए बहुत कुछ करने के लिए योजनाबद्ध कदम उठाए गए हैं। एक घंटा नित्य समय इन्हीं कार्यों में हर प्रज्ञापरिजन को लगाना पड़ता है। हर दिन न बन पड़े तो सप्ताह में सात घंटे या महीने में तीस घंटे सुविधानुसार लगाने का भी विकल्प रहता है। इसके अतिरिक्त दस पैसा नित्य की राशि भी उन्हें निकालनी पड़ती है। इसका उपयोग युगसाहित्य अपने घर-परिवार में तथा पास-पड़ोस में पढ़ाने के लिए भी इस पैसे का उपयोग होता है।

बात छोटी-सी है, पर उसे एक कृत्य व्रत के रूप में अपनाने और उज्ज्वल संभावनाओं से भरे-पूरे शुभारंभ के लिए स्वभाव अभ्यास बनता है। देखने में यह समयदान-अंशदान नगण्य जितना है, फिर भी उसका संयुक्त प्रभाव कितना बड़ा होता है, इसका अनुमान लगाने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। दस लाख प्रज्ञापरिजन एक घंटा समय निकालकर दस लाख घंटे का श्रमदान करते हैं। काम के घंटे 7 माने गए हैं। दस लाख घंटे के प्रायः डेढ़ लाख श्रमदिन होते हैं। इतने श्रम समय निरंतर सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहे तो अनुमान लगाया जाता है, वे लोग अपने-अपने क्षेत्रों में जितना कुछ उत्साहवर्द्धक कर रहे होंगे। दस पैसा प्रतिदिन की राशि भी दस लाख व्यक्तियों के लिए एक लाख रुपया प्रतिदिन होती है। इस अंशदान के उपरांत सत्प्रवृत्तियों के लिए आवश्यक खर्च का पूरा समय देने वाले कार्यकर्त्ताओं का निर्वाह, स्वाध्याय-साहित्य, प्रज्ञा-संस्थानों का दैनिक खर्च सरलतापूर्वक चल जाता है। यह ही बूँद-बूँद से घड़ा भरने की कहावत का प्रत्यक्ष प्रमाण— उदाहरण है। उसे व्यापक क्षेत्र में बड़े रूप में चरितार्थ किया जा सके तो नवसृजन के लिए श्रम साधन जुटाने में कहीं भी अवरोध-असमंजस न दिख पड़े। सरकारी सहायता माँगने एवं धनिकों के सम्मुख नाक रगड़ने की फिर कहीं, किसी को आवश्यकता न पड़ेगी। भावनाशील परमार्थपरायणों के मुट्ठी-मुट्ठी समयदान-अंशदान में नवसृजन की वे योजनाएँ सहज संपन्न हो सकती हैं, जो आज साधनों के अभाव में अवरुद्ध बनी पड़ी हैं।

भारत की देव संस्कृति का व्यवहार निर्धारण वर्णाश्रम धर्म के रूप में हुआ है। चार आश्रमों में पूर्वार्ध के दो ब्रह्मचर्य और गृहस्थ— निजी प्रयोजनों के लिए हैं और उत्तरार्ध के दो वानप्रस्थ और संन्यास परमार्थ-प्रयोजनों के लिए। पचास वर्ष की अधेड़ आयु पूरी कर लेने के बाद प्रायः पारिवारिक उत्तरदायित्व बड़े लड़के संभाल लेते थे और पिता को परमार्थ-प्रयोजनों के लिए छुट्टी मिल जाती थी। इन चारों में वानप्रस्थ को संस्कृति का मेरुदंड माना गया है। अनुभवों से परिपक्व, भावना से निवृत्त व्यक्ति अपनी निजी खर्च संचित-संपदा से चलते और निरंतर लोक-मंगल में निरत रहते थे। इस प्रकार सुयोग्य लोकसेवा प्रचुर परिमाण में अवैतनिक रूप से मिलते थे। अपनी निस्पृहता चरित्रनिष्ठा एवं परमार्थ भावना से जन-जन का हृदय जीतते और उन्हें सन्मार्ग पर अग्रसर किए रहने में सफल होते थे। यही था प्राचीनकाल का गौरव-गरिमा का सबसे बड़ा स्रोत और रहस्य। पिछले अंधकार युग में वह पुण्यपरंपरा समाप्त प्रायः हो गई और पलायनवादी तथाकथित साधु-संन्यासी विपुल संख्या में भ्रांतियाँ फैलाते, निर्धन जनता पर भाररूप लदते विचरने लगे। दुर्गति के कारणों में एक बड़ा हेतु यह भी है। प्रज्ञा अभियान में उस पुण्यपरंपरा को पुनः जीवित किया है और लोकसेवी वानप्रस्थों को परिव्राजक रूप में व्रतशील बनाकर घर-घर अलख जगाने, जन-जन से संपर्क साधने और युगांतरीय चेतना से अनुप्राणित करने के लिए भेजा है। यही प्रक्रिया प्राचीनकाल में तीर्थयात्रा, धर्मप्रचार की पदयात्रा के नाम से प्रख्यात थी। तीर्थों के नाम पर चलने वाली विडंबना के पीछे जो निहित स्वार्थ जुड़ गए हैं, उन्हें वर्तमान परिस्थितियों में विलग करना कठिन है। दूसरा उपाय एक ही था— युगतीर्थों की स्थापना। प्रज्ञापीठों के रूप में पिछले दिनों वे चौबीस सौ के लगभग बने हैं। उन्हें रचनात्मक गतिविधियों का केंद्र बनाकर समयदानी वानप्रस्थों, परिव्राजकों के माध्यम से जनजागरण का, नवसृजन के उल्लास का वातावरण बनाया गया है। यह प्रयोग आशातीत ढंग से सफल भी हो रहा है।

कंबोडिया के बौद्ध मठों में पिछले दिनों एक वर्ष के संन्यास के लिए धर्मप्रेमी लोगों को तैयार किया था। वे मठों में रहकर साधना भी करते थे और योग्यता के अनुसार लोक-मंगल के कामों में भी निरत रहते थे। उन दिनों इस परंपरा ने उस क्षेत्र की सुख-शांति का भंडार बनाकर रख दिया था। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत एक वर्ष के संन्यास की, घर से बाहर रहकर लोक-मंगल के कार्यों में निरत रहने की परंपरा आरंभ की जा रही है। यह परिव्राजक दो-दो की टोलियों में साइकिल सवारी के साथ सुदूर देहातों में पहुँचेंगे और जन-जन को संगीत के माध्यम से अनुप्राणित करते हुए, सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए सहमत करेंगे। समय बताएगा कि लोक-मानस के परिष्कार की भूमिका निभाने में शान्तिकुञ्ज के यह प्रयत्न कितने सफल होते हैं और नवयुग की पृष्ठभूमि बनाने में कितना बड़ा योगदान करते हैं।

यह एक संगठन के सीमित प्रयत्नों की चर्चा है। यह प्रकटीकरण इसलिए आवश्यक समझा गया कि युगमनीषा जनजागरण का लक्ष्य सामने रखकर जब भाषण, लेखन दृश्य को आधार मानकर योजनाबद्ध बड़े कदम उठाएँ तब यह न भूलें कि जागृत आत्माओं को नियमित रूप से सेवाकृत्य का भी व्रत लेना पड़ेगा। समयदान और अंशदान का व्यापक उत्साह उत्पन्न करने से ही उस समग्र लोकशक्ति का उद्भव होगा, जो प्रस्तुत विपन्नताओं को उलट देने और उज्ज्वल भविष्य का अभिनव सृजन करने में सफल हो सके।


मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण

सभी धर्म-पुराणों में स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों का सुविस्तृत वर्णन है। वहाँ रहने वाले देवताओं का ऐसा आकर्षक उल्लेख है जिसे पढ़ने से प्रतीत होता है कि यदि मनुष्य को उस स्थिति में रहने, उस स्तर तक पहुँचने का अवसर मिले तो उसकी चरम मनोवांछित मनोकामना पूर्ण हो सकती है। यह धारणा सर्वथा कपोल-कल्पित नहीं हो सकती। इसके पीछे कुछ आधार अवश्य हैं। मरने के बाद किसी अदृश्य, अविज्ञात-लोक में वैसी परिस्थिति मिलती होगी, ऐसा मात्र श्रद्धा के आधार पर ही सोचा जा सकता है। उसके अस्तित्व का बुद्धिवादी प्रत्यक्ष प्रमाण-परिचय नहीं मिलता। ऐसी दशा में भूत और भविष्य पर दृष्टि डालनी होगी और सोचना होगा— क्या कभी वैसी परिस्थितियाँ ऐसे क्षेत्रों में रही हैं, जिसका प्रमाण-परिचय मिल सके? क्या वैसी सुखद संभावना है, जिसमें मनुष्य को उस स्थिति में रहने का अवसर मिल सके? काम किसी अदृश्य लोक की कल्पना से न चलेगा, क्योंकि ब्रह्मांड विज्ञान की अद्यावधि खोजों में वैसा कुछ अता-पता नहीं चलता। भविष्य की आशा भी कम है, क्योंकि ग्रह-नक्षत्र जितनी दूर हैं, वहाँ तक धरती के वातावरण में पली हुई चेतना का पहुँच सकना अतिकठिन है। फिर उन वर्णित परिस्थितियों के कहीं होने की बात तो गले से जरा भी नहीं उतरती। ऐसी दशा में यदि देवताओं के स्वर्ग को तथ्याधारित अन्वेषण करना हो तो चिर अतीत के इतिहास पृष्ठ पलटने पड़ेंगे, जिसमें मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थिति उन दिनों बनी होने का उल्लेख है। रामराज्य सतयुग की धारणाएँ उसी स्तर की हैं, तब मनुष्यों की मनःस्थिति देवताओं जैसी थी और परिस्थिति स्वर्ग जैसी।

क्या वैसे समय, वातावरण का पुनः वर्त्तमान जनसमुदाय को रसास्वादन करने का अवसर मिल सकता है। इस प्रश्न का उत्तर “दूरदर्शी विवेकशीलता” ‘हाँ’ में देती है और कहती है कि वैसा नितांत संभव है; किंतु उसके लिए पुण्यात्मा होने की वही शर्त पूरी करनी पड़ेगी, जिसमें संयम और परमार्थ के दो कदम उठाते हुए लक्ष्य तक पहुँचने की अनिवार्यता है। भूतकाल में यदि सतयुग रहा होगा या भविष्य में प्रज्ञायुग विनिर्मित होगा तो उसके लिए मनुष्य को वही रीति-नीति अपनानी होगी, वही दिशाधारा ग्रहण करनी होगी जिसे व्यवहृत करने पर पौराणिक स्वर्ग में पहुँच सकना संभव होता है।

आज की खोज अब से उद्विग्न मनुष्य उस सुखद संभावना का रसास्वादन करने के लिए सहज लालायित हो सकता है, यदि उसे विश्वास हो सके कि वैसा कभी संभव रहा है या हो सकता है। इस संदर्भ में पौराणिक या ऐतिहासिक प्रतिपादनों की एक बार उपेक्षा करने में भी दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर यह सुनिश्चित विश्वास हो सकता है कि वैसा नितांत संभव है। गणितीय आधार पर अध्यात्म विज्ञान और उसकी स्वर्गमुक्ति सिद्धि जैसी उपलब्धियाँ पर उसी प्रकार विश्वास किया जा सकता है जैसा कि भौतिक विज्ञान में, सुविधा-साधन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष कर दिखाया। गणित ही भौतिक विज्ञान का आधार है। उसी के सहारे अध्यात्म विज्ञान की उन विभूतियों के हाथ लगने पर भी विश्वास किया जा सकता है, जिसमें सतयुग की पुनरावृत्ति का होना नितांत संभव दिखता है, जिसमें मनःस्थिति और परिस्थिति के उच्चस्तरीय बनने पर उस परोक्ष-प्रत्यक्ष में परिणति हो सकने की बात विश्वासयोग्य दिखती है।

मनःस्थिति ही परिस्थिति को जन्म देती है। यह तथ्य मानवी संरचना और मनःशास्त्र के सुनिश्चित सिद्धांतों के सहारे हस्ताभलकवत सिद्ध हो चली। अब वह मान्यता झीनी होती जा रही है, जिसमें परिस्थिति की अनुकूलता से मनःक्षेत्र की प्रसन्नता मिलने की आशा की जाती है। सुविधाएँ मात्र शरीर को थोड़ा गुदगुदा सकती हैं। मनःक्षेत्र तो उस वातावरण में संतोष की साँस लेता है, जिसमें आदर्श, सिद्धांतों, मर्यादाओं और कर्त्तव्यों का परिपालन होता है। मानवी गरिमा उत्कृष्टता पर अवलंबित है। वह जहाँ भी, जितनी भी, जब भी उपलब्ध होगी मनुष्य उतना ही संतुष्ट— प्रसन्न रहेगा। उतना ही स्वभाव और व्यवहार की दृष्टि से विशिष्ट होगा। व्यक्तित्व का स्तर इसी विशिष्टता के आधार पर आँका जाता है। यही है वह सार-संक्षेप जिसे उच्चस्तरीय मनःस्थिति कहा जा सकता है। यह हस्तगत हो तो उन परिस्थितियों के उपलब्ध होने में संदेह न रहेगा, जिसे पुरातन भाषा में बंधनमुक्ति या स्वर्गीय उल्लास के रूप में अलंकारिक वर्णनों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

इसे प्राप्त करने की आकांक्षा यदि सचमुच ही जगे और जीवन की सार्थकता देखने का उत्साह यदि वस्तुतः उठे तो पुण्य अपनाने व पाप छोड़ने के रूप में उसका मूल्य चुकाना होगा। सभी जानते हैं कि प्रत्यक्ष पाप क्रिया-कृत्यों के रूप में शरीर द्वारा किए जाते हैं; पर यह दृश्य प्रवंचना है। शरीर जड़ है, उसका प्रेरक मन है, इसलिए कठपुतली के नृत्य में बाजीगरी का कौशल काम करता मानना होगा। मनःक्षेत्र की उत्कृष्टता, दूरदर्शी विवेकशीलता ही पुण्य निर्झरिणी का उद्गम स्रोत है। वहाँ विषाक्तता रहेगी तो जीवन व्यवहार का स्वरूप भी हेय स्तर का बनेगा। शरीर को दोष न देकर विज्ञजन सदा किसी के पाप-पुण्य की, उत्थान-पतन की विवेचना, उसकी आस्था-आकांक्षाओं की बातें अंतराल के साथ जोड़ते हैं। स्वर्ग-नरक के संदर्भ में यदि पाप छोड़ने और पुण्य अपनाने की आवश्यकता प्रतीत हो तो उसका व्यावहारिक रूप एक ही हो सकता है। अवांछनीय चिंतन से विरत होने और उत्कृष्टता की सदाशयता अपनाने का साहस करना होगा। यही तत्त्व दर्शन का पुरातन निर्धारण रहा है, इसी को अध्यात्म विज्ञान के आधार पर वर्त्तमान प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी सर्वथा खरा उतरते देखा जा सकता है।

पाप को अपराधों के रूप में और पुण्य को परमार्थ के रूप में दृश्यमान देखा जा सकता है, पर कुरेदने पर तथ्य दूसरे ही सामने आते हैं। पापकर्म मात्र भ्रांतियों के परिणाम हैं। दुर्बुद्धि जब उचित को अनुचित और अनुचित को उचित सुझा देती है, तभी मनुष्य सदाशयता का राजमार्ग छोड़कर पतन-पराभव के लुभावने गर्त में गिरने की ओर कदम बढ़ाता है। इसी प्रकार यदि विवेक जीवित रहे तो दूरगामी सत्परिणामों की सुखद संभावनाओं के सुनहरे चित्र सामने प्रस्तुत करता रहेगा और चिंतन तथा चरित्र को एक कदम भी कुमार्ग पर न चलने देगा। मानसिक संतुलन सौमनस्य यदि बन पड़े तो उस क्षेत्र में विवेकशील दूरदर्शिता का ही साम्राज्य होगा और फिर मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं का प्रवाह उस दिशा में बह चलेगा, जिसमें कृत्यों की पवित्रता-प्रखरता के अतिरिक्त और कुछ बन पड़ने की संभावना ही नहीं है। पुण्य-पथ इसी को कहते हैं। पापों से आत्यंतिक निवृत्ति इसी अवलंबन के सहारे मिलती है। नरक से निवृत्ति और स्वर्ग सोपान में प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि यही है। उस शुभारंभ-संकल्प और व्रत-धारणा की बात बन पड़े तो समझना चाहिए की पुण्यात्माओं को मिलने वाला स्वर्ग सहज संभव होगा। उस स्तर पर पहुँचने वाला या तो देवता बन जाता है अथवा देवताओं को उस क्षेत्र में रहने का अवसर मिलता हैं। प्रतिपादन दो प्रकार होते हुए भी एक ही तथ्य यथास्थान, यथावत बना रहता है।

आँखों की बनावट कुछ विचित्र है, बाहर का कूड़ा-करकट देखती हैं, भीतर की रत्न-राशि का पता ही नहीं चलता। हाथ भी विलक्षण हैं, धूलि मिट्टी में सने रहते हैं, पर भीतर की गंदगी बुहारने का नाम नहीं लेते। मनःसंस्थान का क्या कहना; दुनिया भर के संकटों से जूझता है, पर न जाने क्यों यह नहीं सूझता कि चेतना पर चढ़े कुसंस्कारों से छुटकारा पाने के साथ-साथ समस्त समस्याओं के समाधान का भी सहज हल ढूँढ़ा जाए। दोष तो दुष्प्रवृत्तियों को दिया जाता है, पर यह कोई विरले ही जानते हैं कि तथ्यतः वह दुर्बुद्धि का अभिशाप भर है। भ्रांतियाँ ही विकृतियाँ बनती हैं और विकृतियाँ प्रतिकूल परिस्थितियों के रूप में बदलकर अंततः विभीषिकाओं की विकरालता बनकर नग्न नृत्य कर रही हैं। यदि तथ्य तक पहुँचा जा सके तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि नरक से उबरने और स्वर्ग तक पहुँचने के लिए जिस पुण्य-परमार्थ की आवश्यकता होती है, उसका शुभारंभ उन भ्रांतियों से छुटकारा पाने के रूप में करना होता है, जो अंतराल व्यक्तित्व, पराक्रम एवं वातावरण को विपन्न बनाने के लिए एकमात्र उत्तरदाई हैं।

काम की बात वहाँ आकर टिकती है, जहाँ सुखद संभावनाओं को साकार करने के लिए मनःक्षेत्र को निभ्रांत, मान्यताओं का परिमार्जित, आदतों को विवेकसम्मत बनाने के लिए प्रचंड साहस जुटाना पड़ता है। व्यक्ति हो या समाज, राहत पाने का यही एकमात्र उपाय है कि समूचे विचार-तंत्र की एक बार नए सिरे से सफाई, धुलाई की जाए और अनुपयोगिता बहुत बढ़ गई हो तो उसे गलाने और नए ढाँचे में ढालने की हिम्मत सँजोई जाए। युग को इसी महती आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों महाकाल ने विचार-क्रांति का, प्रज्ञा अभियान का, ज्ञान यज्ञ के नियोजन का, लोक-मानस के परिष्कार का संदेश भेजा है। इसे अपनाया जा सके तो नदियों में बहने वाली विषाक्तता का परिशोधन एक कायाकल्प उपचार का सुयोग सहज ही बन सकता है।

मनुष्य प्रायः साढ़े पाँच फुट ऊँचा, डेढ़ सौ पौंड भारी, दाढ़ी-मूँछ वाला, सोता-खाता, बोलता-लिखता, सजता-अकड़ता देखता भर है। वस्तुतः उसकी मूलसत्ता श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा के त्रिविध तत्त्व से विनिर्मित एक अदृश्य इकाई है, जिसे प्रकारांतर से मान्यताओं और आदतों का पुँज कह सकते हैं। चेतना को निकृष्टता की सड़ी कीचड़ से उबारा जा सके, उत्कृष्टता की पुष्पवाटिका में बिठाया जा सके तो समझना चाहिए, वह चमत्कार हो गया, जिसे दार्शनिक आत्मसाक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, धार्मिक स्वर्गमुक्ति का जीवन लक्ष्य, कविहृदय— कायाकल्प और बुद्धिवादी समग्र क्रांति के नाम से पुकारते हैं। वस्तुतः इसका मूलभूत स्वरूप इतना ही है कि अवांछनीय मान्यताओं का एक बार पूरी तरह परिशोधन कर लिया जाए। जो विवेक और औचित्य की कसौटी पर खरी उतरे, उन्हें सम्मानपूर्वक, सुरक्षित रखा जाए, यथास्थान प्रतिष्ठित किया जाए, साथ ही भ्रम-जंजाल के मकड़ी जाल को साहस के साथ लंबी झाड़-बुहार करके कूड़े के ढेर में पटक दिया जाए। इतना किए बिना उस दिव्य विचारणा की पुनः प्राणप्रतिष्ठा हो नहीं सकेगी, जो मानवी गरिमा को जीवंत रखती, व्यवहार से स्नेह-सौजन्य भरती तथा वातावरण को संपन्नता, प्रसन्नता से भर देने में पूरी तरह समर्थ है।

लोक-मानस के परिशोधन, परिष्कृतीकरण का महत्त्व इतना बड़ा है कि उसे सामयिक समाधान और उज्ज्वल भविष्य के अवतरण का सुसंबद्ध कार्यक्रम कहा जा सकता है। दूसरे श्रेष्ठ कामों की आवश्यकता उपयोगिता अपने स्थान पर बनी रहे, वे प्रयास अपने ढंग से चलते रहें; पर साथ ही इस उपेक्षित पक्ष को भी उभरने का अवसर दिया जाए, जिसके माध्यम से समय के प्रवाह को पतन के गर्त्त में गिरने से रोका जा सकता है। विनाश को रोकने और विकास को गतिशील बनाने का यही मार्ग है।

इस महत्त्वपूर्ण, कठिन; किंतु समय से निपटने के लिए नितांत आवश्यक कार्य को करे कौन? उस उत्तरदायित्व को वहन करने के लिए कंधा किसका बढ़े? इसका उत्तर तलाशने के लिए युगमनीषा की ओर ही दृष्टि जाती है। वह उभरे तो ही प्रवाह पलटे। 'हम बदलेंगे, युग बदलेगा' का सत्य और तथ्य जन-जन के गले उतारने, युगांतरीय चेतना को लोक-मान्यता में सम्मिलित करने का कठिन काम और किसी के बूते का है नहीं। भागीरथ, दधीचि, बुद्ध, शंकर, गाँधी, विवेकानंद जैसी प्रतिभाएँ उसे अपने ही क्षेत्र से निकालनी और सुविस्तृत कार्यक्षेत्र में खपानी पड़ेंगीं।


सद्वाक्य

वित्ते त्यागः क्षमा शक्तौ दुःखे दैन्यविहीनता।

निर्दम्भता सदाचारे स्वभावोऽयं महात्मनाम्॥

‘धन में त्याग (धन की स्थिति में श्रेष्ठ कार्यों में नियोजन) शक्तिवान होकर क्षमाशील रहना, दुःख में दीनता का अभाव और सदाचार पालन में दंभ का अभाव—महापुरुषों का स्वभाव होता है।


नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र की समग्र क्रांति

नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्रों में घुसी हुई भ्रांतियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में चित्र-विचित्र प्रथा-परंपरा बनकर रही हैं और प्रचलन में इतनी गुँथ गई हैं कि उनकी अनुपयुक्तता के बारे में संदेह करने तक की आवश्यकता नहीं समझी जाती।

मानवी सत्ता, सृष्टा की अनुपम कलाकृति है, उसे इसलिए सृजा गया है कि अपनी विशिष्टता और वरिष्ठता के सहारे इस विश्व-उद्यान को सुरभित, समुन्नत रखे। औसत नागरिक की तरह सादगी भरा निर्वाह करे, उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाए रहे, पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तित्व समर्थ रखे तथा ऐसी योजना बनाकर चले, जिसका अनुकरण करने वाले निरंतर ऊँचे उठते, आगे बढ़ते रहे। संक्षेप में यही है, मनुष्य की नीति-मर्यादा का सार-संक्षेप। इसका जो जितना परिपालन करता है, वह उतना ही नीतिवान है। इस निर्धारण को जो जितना तोड़ता है। जो लोभ, मोह और अहंकार के लिए ही मरता-खपता है, जिसे वासना-तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं, जिसे संकीर्ण स्वार्थपरता में आगे की बात सोचने की फुरसत ही नहीं, जिसके मन में लोक-मंगल के उत्तरदायित्व निभाने के लिए उल्लास उठता ही नहीं उसे अनैतिक कहना चाहिए। उद्धत अपराधों की तरह संकीर्ण स्वार्थपरता भी तत्त्वदर्शियों द्वारा अनीति ही मानी गई है। देखा जाना चाहिए कि अनीति ने व्यक्तिगत रुझान और सामुदायिक प्रचलन में कितनी गहरी जड़ें जमाई हैं। इन्हें उखाड़ने के लिए उतनी ही गहरी खुदाई करने की आवश्यकता पड़ेगी। हर व्यक्ति को समझाया जाना चाहिए कि प्रस्तुत प्रवाह में बहने पर वह किस प्रकार हर दृष्टि से घाटे ही घाटे में रहता है। समझना होगा कि यदि आदर्शवादिता अपनाई जा सके तो उसमें पूरी तरह लाभ ही लाभ है।

बौद्धिक-क्षेत्र में अंधविश्वासों के उलूकों ने कितने घोंसले बना रखे हैं और वे कितनी निश्चिंततापूर्वक बस गए हैं, यह देखकर आश्चर्य होता है। आहार को ही लें भूना-तला, मिर्च-मसाले वाले स्वादिष्ट समझा जाने वाला अभक्ष्य ही हम सब उदरस्थ करते हैं, नशे पीते हैं। यह भूलते ही जा रहे हैं कि मानवी आहार में शाक-भाजी की प्रमुखता कितनी आवश्यक है। अन्न लेना हो तो उबाल लेना ही पर्याप्त है। माँस मानवी आहार में किसी दृष्टि से फिट नहीं बैठता। खारी नमक सोडियम क्लोराइड एक प्रकार का विष है। इसी प्रकार शीरा निचोड़ देने के बाद चीनी भी मीठा जहर सिद्ध होती है; पर कौन किसे समझाए कि वर्त्तमान पाक-विद्या एवं स्वाद-लिप्सा प्रकारांतर से धीमी आत्महत्या ही सिद्ध होती है। यदि आहार-क्षेत्र में विचार-क्रांति का समावेश हो सके तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि प्रस्तुत दुर्बलता और रुग्णता से आधा छुटकारा अनायास ही मिल सकता है। इसी प्रकार सोने, जागने, श्रम करने, धूप-हवा के संपर्क में रहने, कम कपड़े पहनने, ब्रह्मचर्य पालने जैसे मोटे-मोटे प्रकृति निर्देशों को पाला जा सके तो मनुष्य भी अन्य स्वच्छंद जीवन जीने वाले प्राणियों की तरह निरोग एवं दीर्घजीवी रह सकता है। यदि आहार-बिहार का प्रचलित प्रवाह उलटा जा सके तो समझना चाहिए कि पीड़ा सहने, चिकित्सा में धन गँवाने, अशक्त रहने, अनुपयोगी बनने, कुसमय बेमौत मरने जैसे अगणित संकटों से सहज छुटकारा मिल गया।

मानसिक विक्षोभों का प्रधान कारण है— निषेधात्मक चिंतन। जो उपलब्ध है, उसका संतोष, आनंद लेने की अपेक्षा जो नहीं है, उसी की सूची बनाए फिरना, अधिक संपन्नों के साथ तुलना करके दरिद्र अनुभव करना। तुलना ही करनी हो तो पिछड़ों के साथ करके अपने सौभाग्य को सराहा क्यों न जाए? चारों ओर जो उत्साहवर्द्धक भरा पड़ा है जिसे देखने, सोचने, स्मरण करने से कृतज्ञता, प्रसन्नता की अनुभूति होती है, उसी पर ध्यान केंद्रित क्यों न किया जाए? मनोकामनाओं के पर्वत सिर पर लादने की अपेक्षा निर्वाह में संतोष करने की आदत क्यों न डाली जाए? अभीष्ट प्रतिफल की ललक में आकुल-व्याकुल रहने की अपेक्षा कर्त्तव्यपालन में निरत रहने और उतने भर में गर्व-गौरव अनुभव करने की आदत क्यों न डाली जाए? हार-जीत की परवाह न करते हुए भी खिलाड़ी जब प्रसन्नतापूर्वक खेल का आनंद ले सकते हैं तो जीवन-नाटक में आने वाले उतार चढ़ावों में अपना ही संतुलन क्यों बिगाड़ा जाए? हर कोई हमारी मर्जी पर चले इसका आग्रह क्यों हो? अपनी जैसी विचार स्वतंत्रता दूसरों को क्यों न अपनाने दी जाए? आदि प्रश्न ऐसे हैं जिन पर यदि ठंडे मन से विचार किया जा सके और चिंतन के अभ्यस्त ढर्रे में विवेकयुक्त परिवर्तन किया जा सके तो तनाव, खीज़, चिंता, आशंका, आवेश जैसे कितने ही मनोविकारों द्वारा निरंतर झुलसते रहना समाप्त हो सकता है।

हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी चिंतन-प्रक्रिया एक आदत भर है, जिसका अनुकूलता या प्रतिकूलता से कोई गहरा संबंध नहीं है। मस्तिष्क सभी को उपलब्ध है। भाव-संवेदना से भरा-पूरा अंतःकरण किसके पास नहीं है। उस क्षीर सागर, कैलाश जैसे पुण्य क्षेत्र में भ्रष्टता और दुष्टता से सने कषाय-कल्मष भर लेने का ही परिणाम है कि ऋषिकल्प संभावनाओं वाली देवात्मा चेतना, निकृष्ट नारकीयता में आबद्ध होकर रह जाती है। इसे उलटना हर विवेकशील के लिए संभव है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, विल्व मंगल जैसे जब दृष्टिकोण बदलते ही कुछ से कुछ हो सकते हैं तो अन्य किसी के लिए वैसा आत्मपरिवर्तन क्या कठिन हो सकता है।

परिवार एक भला-चंगा उद्यान है। उसे सृष्टा की अमानत समझकर कर्त्तव्यनिष्ठ माली की तरह सुसंस्कृत, स्वावलंबी बनने का प्रयत्न चले। पत्नी के साथ मित्र-साथी भर मानकर चला जाए। यौनाचार की अति करके उसके शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को क्षत-विक्षत न किया जाए, अनावश्यक प्रजनन से हर किसी के लिए सर दर्द उत्पन्न न किया जाए। लड़की लड़के में भेदभाव करने की कुटिलता से बचा जाए, हर सदस्य के प्रति एक आँख प्यार की दूसरी सुधार की रखी जाए तो वह भ्रष्टाचार न पनपेगा, जिसमें प्रसन्न करने के लिए अनुचित उपहार देने की रीति-नीति अपनाई जाती है । उत्तराधिकारियों के स्वावलंबी होते हुए उन्हें पूर्वजों की संपत्ति मिले यह कानून प्रचलन चोरों ने चोरों के लिए ही बनाया है। हर समर्थ व्यक्ति को अपनी कमाई खानी चाहिए। पूर्वजों का छोड़ा धन सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में लगना चाहिए। आलस्य, प्रमाद, विलास, अपव्यय, उपेक्षा, असहयोग के विषवृक्ष यदि परिवार के खेत में न पनपने दिए जाए तो कोई कारण नहीं कि अपने इन्हीं घर-घरौंदों को नर-रत्नों की खदान के रूप में परिणत न किया जा सके। नए परिवार बनते और पुराने टूटते जा रहे हैं। खंडहरों और मरघटों का विस्तार हो रहा है। ऐसी दशा में परिवारों को भटियारों की सराय तथा भेड़ों के बाड़े जैसा कुरुचिपूर्ण देखा-पाया जा रहा है तो आश्चर्य ही क्या है।

शरीर, मस्तिष्क, परिवार की तरह ही अर्थ-व्यवस्था का भी जीवन तंत्र पर भारी प्रभाव पड़ता है। आज धनी-निर्धन हर किसी की आर्थिक आवश्यकता बढ़ी-चढ़ी है और तंगी अनुभव होती रहती है। संचय और अपव्यय के लिए तो कुबेर का खजाना भी कम पड़ता है। अनीति उपार्जन, अपराध, ऋण, रिश्वत, बेईमानी का दौर आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के नाम पर चलता है। इस कमी की पूर्ति उस तरह नहीं हो सकती जिस तरह कि लोग चाहते हैं। लोभ-लिप्सा को न पाटने वाली खाई और न बुझने वाली आग कहा गया है। रावण, हिरण्यकश्यपु, वृत्तासुर, सिकंदर जैसे धनाध्यक्षों को जब वैभव के पहाड़ हाथ लगने पर भी संतोष न मिल सका तो सामान्य स्तर वालों की बात ही क्या है। ऐसी दशा में अर्थ-संतुलन बिठाने के लिए दृष्टिकोण परिवर्तन का नया आधार अपनाना पड़ेगा। औसत देशवासियों के स्तर का निर्वाह, जितनी लंबी सौर तेते पाँव, सादा जीवन उच्च विचार वाले, विलास और अपव्यय में कटौती जैसे दूरदर्शितापूर्ण सिद्धांत अपना लेने पर इस संबंध की समस्याएँ सहज ही हल हो जाती हैं। आलस्य-प्रमाद छोड़ा, श्रमशील बना, काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न माना और योग्यता वृद्धि में उत्साह रखा जाए तो स्तर के अनुरूप आजीविका बढ़ भी सकती है। प्रश्न-विस्तार से कम, सदुपयोग से अधिक संबंधित है। थोड़े से साधनों का भी यदि श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़े तो गरीबी में भी अमीरों से बढ़कर आनंद के साथ जिया जा सकता है। परिश्रम और ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती है, इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर उपार्जन और उपयोग का संतुलन बिठाया जाए तो अर्थसंकट इस तरह किसी को भी न सताए जैसा कि अपव्ययी, दुर्व्यसनी और सामाजिक कुरीतियों की मूढ़मान्यताओं से ग्रसित लोगों को निरंतर भुगतना पड़ता है।

इच्छित संपदा उपलब्ध कराने के लिए गढ़ा खजाना, लाटरी का नंबर, लक्ष्मीसिद्धि, ठगी-चोरी के फेर में पढ़े रहने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा है कि सोचने का तरीका उलट दिया जाए और सामर्थ्य भर कमाने, आवश्यकता भर खर्रचने की सुसंतुलित नीति अपनाई जाए। अध्यात्मवादी और साम्यवादी दोनों इस निर्धारण पर समान रूप से सहमत हैं। लिप्सा और तृष्णा को नियंत्रित किया जा सके तो निर्वाह में औचित्य की मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए बचत को सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में लगाया जा सके तो उतने भर से दरिद्रता का युग समाप्त हो सकता है और सीमित साधनों से हर दिशा में हर्ष-उल्लास बरस सकता है।

शिक्षितों का असंतोष देखते ही बनता है। कुछेक को छोड़कर अधिकांश को बेकारी या आत्म आजीविका की शिकायत है। हर कोई ठाट-बाट की नौकरी चाहता है। श्रम कम-से-कम, आजीविका अधिक-से-अधिक आमतौर से शिक्षितों पर यही भूत चढ़ा रहता है। सभी को ऐसी ही ठाट-बाट की नौकरियाँ चाहिए। वे सभी को मिले कैसे? उन्हें रखे कौन? अभी तो देश में शिक्षा मात्र 30 प्रतिशत है। जब अधिकांश शिक्षित होंगे और सभी ठाट-बाट की नौकरी माँगेंगे तब उनका मनोरथ पूरा होने में और भी विग्रह उत्पन्न होगा। शिक्षा का लक्ष्यमात्र नौकरी ही रहा तो संकट और भी अधिक बढ़ेगा। फलतः उस वर्ग का असंतोष विग्रह ऐसे संकट खड़े करेगा जैसे कि बिना पढ़े रहने या उत्पन्न न होते।

यहाँ शिक्षा की निंदा नहीं की जा रही। न उसे अनुपयोगी बताया जा रहा है; वरन कहा यह जा रहा है कि सामान्य ज्ञान की मैट्रिक स्तर की जीवनोपयोगी प्रारंभिक शिक्षा सर्वसुलभ हो। उसके बाद काॅलेज में प्रवेश करने से पूर्व हर अभिभावक अपने बच्चों का आजीविका लक्ष्य निश्चित करें। यह मानकर चलें कि नौकरी हर वर्ष के छात्रों में से कठिनाई से 10-5 प्रतिशत को मिलेगी। शेष को अन्य आधार अपनाकर अपने पैरों खड़ा होना होगा। जो भी धारा जिसे अनुकूल पड़े, वह उस स्तर की औद्योगिक शिक्षा प्राप्त करे। जिन्हें किसी विषय का विशेषज्ञ बनना हो, वे उसमें पारंगत होने की दृष्टि से लंबे अध्ययन की योजना बनाएँ, इसमें हर्ज नहीं; पर भेड़िया-धसान की तरह नौकरी के लिए काॅलेज की खरचीली पढ़ाई के लिए धकापेल मचाना सर्वथा अबुद्धिमत्तापूर्ण है। नई पीढ़ी के लिए सहकारी उद्योग के सहारे उत्पादन तंत्र खड़े करने और उनमें कठोर श्रम करने के लिए उद्धत रहने की बात मस्तिष्क के हर कोने में बिठा दी जाए तो शिक्षिता की जिस घुटन में घुटने और अवांछनीय दिशा में चल पड़ने का जो संकट खड़ा है, उससे छुटकारे का मार्ग मिल सकता है।

शिक्षा-व्यवस्था बनाने वालों का उत्तरदायित्व है कि वे पिछले दिनों से चले आ रहे घपले को बंद करें। असंतोष उत्पन्न करने वाली शिक्षापद्धति को बदलें और ऐसा कुछ पढ़ाएँ, जिससे जीवनोपयोगी सामान्य ज्ञान के अतिरिक्त आजीविका उपार्जन का भी पथ-प्रशस्त होता हो। कोसने से नहीं, ढर्रे पर लुढ़कते रहने से भी नहीं, बात तब बनेगी जब छात्र, अभिभावक एक शिक्षातंत्र के निर्माता व्यावहारिक नीति अपनाने और पढ़ने-पढ़ाने का समूचा ढाँचा नए सिरे से निर्धारित करें।

व्यक्तिगत जीवन से संबंधित समस्याओं में अब अध्यात्म दर्शन का, आस्तिकता-आध्यात्मिकता का, धार्मिकता का मात्र भक्ति और कर्मयोग का क्षेत्र बना रहता है। बौद्धिकता का दायरा तो बहुत बड़ा है; पर उसे स्वास्थ्य-संतुलन, अर्थ परिवार के अतिरिक्त धर्म दर्शन की ओर जोड़कर जीवन-साधना के पंचशीलों से समेटा जा सकता है। दर्शन क्षेत्र की मान्यताओं को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि वे मनुष्य को अधिक सुसंस्कृत, अधिक पराक्रमी, अधिक उदार समाजनिष्ठ बनने में किस हद तक सहयोग देती हैं।


युगमनीषा कहाँ पाएँ ,कहाँ खोजें, कहाँ पुकारें?

धन, शस्त्र, शासन, ज्ञान, विज्ञान और संघ की शक्तियाँ इन दिनों विभिन्न क्षेत्रों में अपने चमत्कार दिखातीं और मोर्चा फतह करती देखी जाती हैं। इनकी महत्ता और उपयोगिता में किसी प्रकार का संदेह न करते हुए भी सोचना यह पड़ेगा कि समस्त समस्याओं के प्रमुख कारण चिंतन के भटकाव को रास्ते पर लाने का उत्तरदायित्व कौन संभाले? कौन आगे बढ़े और कौन उसका सहयोगी रहकर व्यापक प्रयोजन को पूरा करे?

जहाँ तक आस्थासंकट का प्रश्न है, वहाँ तक, उस गहराई तक पहुँच सकने की क्षमता मात्र धर्म में ही दिखती है। धर्म शब्द से जिन्हें चिढ़— एलर्जी है, उन्हें युगमनीषा शब्द से उस तथ्य को समझना चाहिए। अंतराल के मर्मस्थल तक उपरोक्त छः प्रमुख शक्तियों में से एक भी एकाकी बलबूते समर्थ नहीं हो सकतीं। उनका संयुक्त प्रभाव भी सीमित परिणाम ही प्रस्तुत कर सकता।

युग समस्या के समाधान में युगमनीषा को अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चाहिए। कृष्ण आगे थे, पांडवों के सहयोग से महाभारत में विजय मिली। राम आगे थे, वानरसेना ने लंका को जीता। वशिष्टों के नेतृत्व में रघुवंशियों की पीढ़ियाँ सतयुगी व्यवस्था बनाती रहीं। चाणक्य ने चंद्रगुप्त के सहयोग से भारत को चक्रवर्त्ती बनाया। समर्थ के नेतृत्त्व में शिवाजी छत्रपति बने। सप्तऋषियों ने अपने समय में समस्त संसार को प्रगति और समृद्धि की ओर धकेला और जगद्गुरु की भूमिका निभाई। शंकराचार्य को मान्धाता का, बुद्ध को हर्षवर्धन अशोक का समर्थन मिला और बड़े काम संपन्न हुए। सहयोग सभी का चाहिए। भौतिक क्षेत्र की हर सामर्थ्य का भी इतने पर भी जनमानस के अंतस् की भाव-श्रद्धा का स्पर्श करते, उसे भ्रांतियों की तमिस्रा से उबारकर अरुणोदय के आलोक से संबद्ध करने का काम मनीषा के हिस्से में रहता है। उसके द्वारा उपेक्षा बरतने पर समाधान मिलेगा नहीं और बिल्ली के गले में घंटी बाँधने में असमर्थ चूहों की सभा बिना किसी निर्णय के विसर्जित होगी।

पिछले दिनों संसार में चमत्कारी परिवर्तन हुए हैं। उसमें दृश्यमान भूमिका किसी की भी क्यों न रही हो— श्रेय किसी को भी क्यों न मिला हो, परोक्ष पृष्ठभूमि बनाने में मनीषा ने ही अपनी गरिमा और प्रखरता का परिचय दिया है। कार्लमार्क्स की भूमिका के बिना वर्त्तमान साम्यवादी विस्तार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नीत्से का दर्शन ही जर्मनी, इटली आदि को नाजी बनाने का निमित्त कारण था। दो महायुद्धों की जिम्मेदारी तत्त्वतः ऐसे ही दार्शनिक प्रतिपादनों के हिस्से में आती है। रुसों के प्रतिपादन ने विश्वमानव के चिंतन को प्रभावित न किया होता तो प्रजातंत्र की अभूतपूर्व कल्पना इतनी तूफानी गति से संसार के अधिकांश भाग को अपनी लपेट में न ले पाती। अपने समय में मेजिनी के प्रतिपादन पीड़ित पक्ष को तनकर खड़ा होने का साहस प्रदान करते रहे हैं। बुद्ध ने विचार-क्रांति की मशाल का भी तो समर्थ सहयोगियों की कमी रही होती, वह नेतृत्त्व न मिलता, तो अन्य माध्यमों से समय को उलट देने वाले उस बुद्धिवादी का कोई आधार ही खड़ा न होता। प्रश्न श्रेय-सहयोग का नहीं, वह किसी को भी मिल सकता है, किसी का भी हो सकता है; पर उन चिनगारियों को भुलाया नहीं जा सकता जो चमकी-भड़की और अपनी लपेट में वन-प्रदेशों को ईधन बनाकर दावानल की तरह गगनचुंबी बनती चली गई ।

सुकरात, अफलातून, अरस्तू जैसे मनीषियों के परोक्ष अनुदानों के गुणगान मुकुटधारियों जैसे ढोल-ताशे बजाकर नहीं होते, फिर भी तथ्य बताते हैं कि उनकी भूमिकाएँ शत-सहस्र शासकों से बढ़कर रही है। जापान के गाँधी कागावा मूलतः समाजनिष्ठ सेवाभावी संत थे। समय ने सहयोग दिया और वे जापान के पतित वर्ग के मसीहा बन गए। ऐसे तो भारत में भी कबीर, विवेकानंद, दयानंद, गुरु गोविंद सिंह, विनोबा आदि की भूमिकाएँ भी अविस्मरणीय हैं। महत्त्वपूर्ण सेवा संस्थान खड़े करने बाबा साहब आक्टे, हीरालाल शास्त्री, श्रद्धानंद, स्वामी केशवानंद, राजा महेंद्र प्रताप, महामना मालवीय आदि के व्यक्तित्व और कृतकृत्य को चिरकाल तक स्मरण रखा जाएगा। ये प्रतिभाएँ वस्तुतः युगमनीषियों की श्रेणी में ही आती हैं। लेखनी, वाणी, संगठन आदि जिसे जो उपाय सूझा उसने वह अपनाया; किंतु लक्ष्य एक ही रहा दिग्भ्रांत लोक-मानस को आदर्श उत्कृष्टता अपनाने के लिए साहसिक उमंगों से भर देना।

धन, कौशल, बाहुबल आदि की कमी पहले भी नहीं थी, अभी भी नहीं है। शासन भूतकाल में भी सामर्थ्यवान रहे हैं। जनता की लोकशक्ति पहले भी विद्यमान थी, पर उन्हें दिशा न मिलने के कारण भटकाव की स्थिति बनी रही और उपरोक्त शक्ति-स्रोतों का अवांछनीय अपव्यय दुरुपयोग होता रहा। उस बिखराव को समेटकर एक बुहारी में कस देने और उसे सुनियोजित सृजन-प्रयोजन में लगा देने की व्यवस्था यदि बनी होती तो साधनों के अभाव का, प्रतिकूलता का रोना रोना पड़ता है और स्वल्प-साधनों में ही शांति, समृद्धि और स्नेह-सहकारिता का भरा-पूरा स्वर्गीय वातावरण आज की स्थिति में भी बना हुआ होता। अभाव उस प्रखरता का है जिसे न केवल उच्चस्तरीय प्रतिपादन प्रस्तुत करने पड़ते हैं; वरन निज की आदर्शवादिता का परिचय देते हुए जनसाधारण को आश्वस्त भी करना पड़ता है। युगमनीषा की यह दुहरी भूमिका निभाते हुए ही लोक-शिक्षण की वास्तविक क्षमता अर्जित करनी पड़ती है।

बुद्धिवाद एक बात है और मनीषा दूसरी। बुद्धिवादी तो अपनी प्रखरता और चतुरता के बलबूते धुँआधार भाषण देने से प्रदर्शन जुलूस के घटाटोप खड़े करने में देखते-देखते सफल हो सकते हैं। प्रतिभावान संपन्नों का गला पकड़कर, इच्छित धनराशि एकत्रित कर सकते हैं और उसके सहारे आदर्शवादी ढकोसले भी कागजी रावण की तरह खड़े कर सकते हैं। यह चित्र-विचित्र तमाशे रोज ही देखने को मिलते हैं। अहंमन्यता यश, लिप्सा साथ ही धन अपहरण के अनेकों क्षेत्रों में यह दरबार लगाए रहने वाले मेजबान अपने को अभिनेता स्तर को नेता सिद्ध करने वाले कौतूहल रचते रहते हैं। यह विडंबनाएँ सायंकाल के लाल-पीले अंबर-डंबर की तरह सुहावनी तो लगती हैं; पर उनके बलबूते वैसा कुछ ऐसा बन पड़ने की आशा नहीं बँधती, जिसमें उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न साकार होते हैं।

बुद्धि व्यवसायियों की बिरादरी एक हैं, युगमनीषियों की, दूसरी बुद्धिवाद मानसिक विलक्षणता है। वह नट-गायक की तरह अपनी कला का चमत्कार दिखाता और चका-चौंधभरा आकर्षण उत्पन्न करता है। मनीषा न केवल आदर्शवादी प्रतिपादन करती है, न केवल लोक-शिक्षण में निरत होती है, पर साथ ही इस बात की आवश्यकता सर्वोपरि समझना है कि आदर्शवादी लोक-शिक्षण के लिए प्रवक्ता का चरित्र ऋषिकल्प होना चाहिए। उसे अपनी स्थिति संदेहों से परे और प्रामाणिकता की हर कसौटी पर खरी सिद्ध करनी होती है। जो दूसरों से कहा जा रहा है, उसे अपने निजी चरित्र-चिंतन से पूरी तरह उतारने के उपरांत ही दूसरों को यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि प्रतिपादन शक्य एवं व्यावहारिक भी है या नहीं। क्या कहा जा रहा है, इस पर मनोरंजन स्तर का ही ध्यान जाता है। प्रभाव तब पड़ता है, जब कौन कहता है वाली बात का समाधान मिल सके। भौतिक-क्षेत्र में प्रतिभा, संपन्नता, सुंदरता चतुरता, समर्थता एवं कला-कौशल का बखान करने से भी प्रभावोत्पादन बन पड़ता है, पर आस्थाओं को उछालने की सामर्थ्य उन्हीं व्यक्तित्वों में उत्पन्न होती है जो केवल आदर्शवादी प्रतिपादन करते हैं; वरन अपने उज्ज्वल चरित्र, सेवा-साधना तथा त्याग-बलिदान की दृष्टि से ही अपनी वरिष्ठता सिद्ध करते हैं। युगमनीषा के नाम से इसी वर्ग का उल्लेख किया जा रहा है। उन्हें युगऋषि भी कहा जा सकता है। बकवासी वाचालता की कीमत बाज़ार में कुछ भी क्यों न हो, पर जब वह आदर्शवादी लोक-शिक्षण के क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो अपने व्यवसाय, निर्वाह, संचय, स्वभाव आदि के निजी स्वरूप का बहीखाता भी खोलकर, जनता के सामने प्रस्तुत करना पड़ेगा। इसके अभाव में नेता, अभिनेता की हैसियत प्रायः जैसी बनकर रह जाती है।

महाकाल ने युगमनीषा को पुकारा है। इसे कहाँ पाया, कहाँ बुलाया जाए। यह खोजने पर आँखों के सामने अँधेरा छाता है। धर्मोपदेशकों, देशभक्तों, साधु-संन्यासियों का क्षेत्र ढूँढ़ते हैं, कलाकारों, साहित्यकारों का दरवाजा खटखटाते हैं, धर्म-संप्रदायों मठ-मंदिरों, तीर्थों को खोजते हैं तो भी कुछ वैसा नहीं मिलता, जिससे युगमनीषा की आवश्यकता पूरी होती हो। सेवा संस्थानों की कमी नहीं, धर्मस्थान नित नए बनते हैं। इनमें आश्रय पाने वाले लगते तो धर्म-ध्वजियों जैसी आकृति के हैं, पर नंगे उधाड़कर देखते हैं तो लबादे के नीचे वही सब दिखता है, जिससे निराशा ही नहीं होती; वरन मर्मभेदी पीड़ा भी होती है। फिर कहा क्या जाए? क्या सबसे पूछा जाए? खोई हुई संस्कृति सीता का अता-पता भी तो कोई नहीं बताता। सभी स्तब्ध हैं। सर्वत्र असमर्थता का माहौल है।

ऐसी दशा में एक ही उपाय सूझता है कि अपने निजी परिवार को लेकर समय की माँग को टूटे-फटे साधनों से पूरा करने के लिए हिम्मत तो दिखाई जाए। संभव है, इस श्रीगणेश के उपरांत समर्थों का साहस उभरे तो सेतुबंध बँधते समय कहाँ से कुशल नल-नीलों का समुदाय आ टपके। गुरुगोविंद सिंह ने अपने पुत्रों की बलि चढ़ाई थी। “पाँच प्यारे” भी वही थे, जिनने बलिदान के लिए तलवार के सामने सिर झुकाया। बुद्ध के सहयोगियों में उनका पुत्र राहुल भी था। अशोक की बेटी संघमित्रा भी संन्यासिनी बनी थी। विवेकानंद की शिष्या निवेदिता ने भी हाथ बँटाने का निश्चय किया था। आवश्यक नहीं कि परिवार में वंशजों को ही गिना जाए। आदर्शों के क्षेत्र में हाथ बँटाने वाले, अनुगमन करने वाले सहयोगी भी वंशजों की श्रेणी में गिने जाते हैं। ऋषिगोत्रों का प्रचलन वंश-परंपरा से ही नहीं शिष्य परंपरा के आधार पर भी हुआ है।

दूसरों पर अपना क्या बस? विरानों पर अपना क्या अधिकार? उन्हें तो उपदेश ही दिए जा सकते हैं। बहुत हुआ तो अनुरोध, आग्रह तक बढ़ा जा सकता है; पर अपनों पर तो अपेक्षाकृत अधिकार होता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग भी किया जाता है। हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी को भी बेच दिया था। नारद ने अपने चारों पुत्र सनक, सनद, सनातन और सनत कुमार भक्ति प्रसार के क्षेत्र में धकेल दिए थे। नचिकेता ने अपने पिता वाजिस्रवा से पूछा कि— "गायों के उपरांत एक मैं ही शेष रह गया हूँ, मुझे भी किसी को दान दे दीजिए न।" व्यंग-उपालंब की परवाह न करते हुए पिता ने उसे हाथ पकड़कर आचार्य यम के हवाले कर दिया। कहीं लोग शिष्य पुत्र होने की बात कहते हैं और “कुछ आदेश कीजिए” पूछते हैं तो इच्छा होती है कि यदि इन पर अधिकार चले तो नचिकेता की तरह इन्हें किसी महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया जाए। शुकदेव अपने पिता के इकलौते थे। पिता ने उन्हें रोका नहीं; वरन उकसाया। कुंती ने भी अपने पुत्रों को विलासी नहीं, देवमानव बनाया और वैसे ही कुछ कराने के लिए कृष्ण के हाथ में सौंपा। नारद के दर्शन तो असंख्यों ने किए थे, पर उनके शिष्य ध्रुव, प्रहलाद, वाल्मीकि जैसे कुछेक ही निकले। रामकृष्ण परमहंस के भी एक ही शिष्य था। विरजानंद के भी एक ही। यों वे दोनों तथाकथित सहस्रों शिष्यों से सदा ही घिरे रहते थे, पर काम के उन्हें भी कहाँ मिले?

नजर अखण्ड ज्योति परिवार पर है, उसमें आस्थावानों की संख्या कम नहीं लगती। मन आता है कि उन्हीं में से कुछ को युगमनीषा की छुट-पुट भूमिका निभाने और रीछ-वानरों के संयुक्त प्रयास से बन पड़े, महान पुरुषार्थ की पुनरावृत्ति का प्रयत्न किया जाए।


सद्वाक्य

सर्व त्यागश्च निर्वाणं निर्वाणार्थि च मे मनः।

त्यक्तव्यं चेन्मना सर्वं वरं सत्वेणु द्रीयलाम्॥

मेरा मन मोक्ष चाहता है। मोक्ष क्या है? सर्वस्व का त्याग ही मोक्ष है। हे मन! यदि एक दिन यहाँ सब कुछ छोड़कर ही चले जाना है तो जो कुछ भी तेरे पास है, उसे अभी निम्न कल्याण के लिए क्यों नहीं दे दिया जाए? जिससे सहज ही में मोक्ष प्राप्त हो जावे।


सृजन प्रयासों में धर्मतंत्र का शासन के साथ सहकार

धर्म और शासन की समानांतर गरिमा का प्रतिपादन करते हुए कहा जा चुका है कि उपलब्ध अनेकानेक शक्ति-स्रोतों में यही दो प्रमुख हैं। क्षत-विक्षत स्थिति में होते हुए भी वे कम-से-कम अपना स्वरूप तो स्थिर रखे हुए हैं और इसके प्रभाव से ग्रसित न सही, उभय क्षेत्रीय अराजकता की रोक-थाम तो हो ही रही है। भौतिक-क्षेत्र की शासन और चेतन-क्षेत्र की धर्म जिम्मेदारी उठाएँ, यही उनकी अपनी मर्यादाएँ हैं। मनुष्य जड़ शरीर और चेतन अंतःकरण का समुच्चय है।

शासन की शक्ति असाधारण है। वह चाहे तो अपने तंत्र का इस प्रकार उपयोग कर सकती है, जिससे आदर्शवादी चिंतन और उच्च चरित्र के निर्माण में कारगर साहसिकता मिल सके। इसके लिए उसे अपने स्वरूप, कार्यक्रम एवं निर्धारण में अपेक्षाकृत अधिक बड़े और तेज कदम उठाने चाहिए। अपने भारतीय शासन से ऐसी अपेक्षा की जाती है कि वे गाँधी जी की परंपरा को जीवंत एवं अग्रगामी बनाने के लिए उससे भी अधिक प्रयत्न करे, जैसे कि किए जा रहे हैं।

जिन कर्मचारियों के द्वारा शासनतंत्र चलता है, उन्हें केवल क्रियाकुशल; वरन चिंतन और चरित्र की दृष्टि से भी ऐसा होना चाहिए, जिससे उन्हें जनसाधारण का विश्वास, समर्थन और सहयोग मिल सके। उनकी नियुक्ति मात्र शिक्षा पर आधारित नहीं; वरन पिछले अनुभवों और प्रयत्नों को भी वरिष्ठता माना जाए। छोटी आयु के लड़के उच्च पदों पर आसीन न किए जाए। इसके लिए कार्यपद्धति इतनी सरल बनाई जाए कि बिना पेचींदगियों में उलझे पारस्परिक सहयोग पर निर्भर बिना समय गँवाए और खीज़ उत्पन्न किए, सरलतापूर्वक संपन्न होते रहें। कार्यपद्धति में प्रस्तुत पेचींदगियों को सरल किया जाना चाहिए, ताकि वे लंबी अवधि न गँवाकर काम को जल्दी निपटा दिया करे। अधिकारियों का हाथ में हैरान करने की क्षमता न रहे तो रिश्वतखोरी के कारण अपंग बने शासनतंत्र को नवजीवन प्राप्त हो सकता है और उपयोगी योजनाओं में जनता का सहयोग मिल सकता है। यों यह कार्य दोनों पक्षों का है। अधिकारी और नागरिक दोनों ही अपने-अपने पथ के कर्त्तव्य निभाने के लिए उत्तरदाई हैं।

चुनाव में सही और श्रेष्ठ प्रतिनिधि चुने जा सकें, इसलिए वोट का अधिकार सर्वजनीन न रहकर समझदारी एवं ईमानदारी की कुछ शर्तें पूरी करने वालों को ही दिया जाए। इसी प्रकार प्रतिनिधित्व के लिए हर किसी को खड़ा होने का अधिकार न हो। इसकी वरिष्ठता इससे पूर्व ही प्रामाणित होनी चाहिए। जनता को यह अधिकार रहे कि गुटबंदी के कारण, भ्रांत प्रचार के कारण तो नहीं, पर यदि भ्रष्टाचाररत पाया जाए तो उन्हें वापिस भी बुला सके। चुनाव में इन दिनों जैसा दुष्प्रचार चलता है, जैसा जितना धन व्यय होता है, उस पर कड़ा अंकुश लगे।

जनता को भी मौलिक अधिकारों की तो छूट रहे, पर उस बहाने स्वेच्छाचार बरतने की गुंजाइश न रहने दी जाए। कर्त्तव्यपालन के लिए हर किसी को वापिस किया जाए। मात्र अधिकार और सुविधा की ही रट न लगती रहे। उच्छृंखलता और अवरोधों का आरंभ ही न हो सके, ऐसा वातावरण बने। गुंडागर्दी का आचरण भी अपराधों में गिन लिया जाए और उसकी रोक-थाम के लिए किसी के द्वारा मुकदमा चलाए जाने की प्रतीक्षा न करके सहकारी हस्तक्षेप का ही विषय बने। अपराधियों को सुधारा तो जाए; पर साथ ही दंड की कठोरता में कमी न की जाए। इस क्षेत्र में बरती गई सरलता से अपराध घटते नहीं, बढ़ते हैं। व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन में अनैतिक आचरण की रोक-थाम करने के लिए पुरानी सामाजिक पंचायतों की परंपरा को पुनर्जागृत किया जाए। अवज्ञा करने वालों को वे पंचायतें सरकारी प्रताड़ना भी दिला सकें।

शिक्षा स्वावलंबी बनाई जाए। मैट्रिक स्तर का जीवनोपयोगी सामान्य ज्ञान सबको सरलतापूर्वक उपलब्ध हो; पर आगे की शिक्षा व्यवस्था में फूँक-फूँककर कदम उठे। नौकरी उद्देश्य न रहे। स्वावलंबन के लिए उद्योगों का शिक्षा के साथ समावेश रहे। सरकारी नौकरियों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उतने ही छात्र भरती किए जाए जो न केवल स्तरीय हों, वरन खप भी सकें। उपयोगी विषयों के विशेषज्ञ बनने की इच्छा वालों को ज्ञानार्जन की अतिरिक्त सुविधा रहे। पाठ्यक्रम बहुत बोझिल न हो। साथ ही उनमें चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा को आदर्शों की हृदयंगम कराने वाली प्रेरणा भरी रहे।

उद्योगों का विकेंद्रीकरण हो। वे छोटी इकाइयों में बँटे और सुदूर देहातों तक फैले हों। सहकारिता के आधार पर चलें। बड़े मिलों को कुटीर-उद्योगों के प्रति स्पर्धा न करने दी जाए। टूट-फूट की मरम्मत एवं पुराने को नया बनाने की व्यवस्था को अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाए। शहरों की आबादी बहुत न बढ़ने दी जाए। कस्बों को विकसित किया जाए, ताकि वे समीपवर्त्ती छोटे देहातों की प्रगति एवं सुविधा में सहायक सिद्ध हो सकें। विलासिता के साधनों का उत्पादन घटाया और दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ सर्वत्र सुलभ हो, औद्योगिक नीति का आधार ऐसा ही बने।

सहकारिता का हर क्षेत्र में प्रवेश हो। संयुक्त परिवार की आवश्यकता पूरी करने वाले सुनियोजित कम्यून चलें। विवाहों पर सामाजिक नियंत्रण हो और वे पंजीकृत हों। जाति, लिंग तथा आर्थिक आधार पर पनपने वाली विषमता को देर तक सहन न किया जाए। कुरीतियों पर होने वाले अपव्यय निषिद्ध रहें। विद्यालयों की तरह पुस्तकालयों की भी स्थापना है। साहित्य और कला को उच्छृंखल न बनने देने के लिए उनके निर्माताओं को सुरुचिपूर्ण सृजन की शर्त पालन करनी पड़े। मौलिक अधिकारों के नाम पर किसी को भी ऐसे काम करने की छूट न मिले, जिसमें वह सार्वजनिक हित के विरोध में काम करे। नशा उत्पादन जैसे कार्यों की रोक-थाम, अंकुश कड़े करने से ही हो सकती है। अर्थसंग्रह की सीमा हो, उसी प्रकार निजी खरच पर भी अंकुश रहे। इसके बिना दुर्व्यसनों और कुप्रचलनों की रोक-थाम न हो सकेगी।

ऐसे सुझाव और भी हो सकते हैं, जो स्थाई सामयिक एवं स्थानीय आवश्यकता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हों। यह चरित्रनिष्ठा, समाजनिष्ठा में सहायक एवं व्यक्तित्वों को विकसित करने वाली विधि-व्यवस्था की ओर कुछ संकेत हैं। इन्हें अपनाने के लिए शासन को सहमत प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वह पनपने वाली अनीति अव्यवस्था की रोक-थाम में अपनी समुचित भूमिका निभा सके।

वस्तुतः यह कार्य राजनीतिज्ञों और उस क्षेत्र की पेचींदगियाँ, बारीकियाँ समझने वालों का है। सुधार और दबाव का कार्य उन्हीं के हाथ छोड़ देना चाहिए। प्रज्ञा आगमन की नीति, लोक-मंगल के सभी कार्यों में सरकारी प्रयत्नों में सहयोग देने और भाग लेने की है। शिक्षा प्रसार, वृक्षारोपण, स्वास्थ्य-संवर्द्धन, समाज कल्याण, परिवार नियोजन, बचत आंदोलन, सहकारिता, कुटीर-उद्योग, नशा निषेध, अपराध नियमन जैसे लोक-मंगल से संबंधित सभी सरकारी कार्यों में भरपूर सहयोग देने की है। इसके बदले न श्रेय लेना है और न पारिश्रमिक। श्रेय अफसरों को मिले। पुरस्कार अन्य उपयोगी कामों में लगे। इसी में धर्मतंत्र की गरिमा है। न आश्रित रहा जाए, न असहयोग किया जाए, बिना टकराए जितना सहयोग संभव हो, अपनी ओर से करते रहा जाए। साथ ही धर्मक्षेत्र की विकृतियों को देखते हुए किसी अतिरिक्त सहयोग-अनुदान की भी आशा न रखी जाए। जब सरकार जनता से वांछित सहायता अर्जित कर सकती हैं, तब कोई कारण नहीं कि अपनी वरिष्ठता और उपयोगिता सिद्ध करके उसी जनता से भाव भरा स्वेच्छा सहयोग अर्जित न किया जा सके, जिसकी सहायता से सरकार अपना खर्चीला तंत्र चलाती है। प्रज्ञा अभियान का तथ्य सृजन है, उसमें सहयोग और सद्भावना की ही प्रधान भूमिका हो सकती है। यही अपनी सुस्पष्ट नीति है। जनसाधारण की तरह शासनतंत्र के साथ भी अपनी ओर से संबंध इसी आधार पर मधुर संबंध रखने की है, विग्रह की नहीं। अच्छा है, शासन भी धर्म के प्रति ऐसा ही सहकारी सद्भाव बरतें।


नवसृजन का पूर्वार्ध जो हो चुका

जनमानस के परिष्कार का प्रज्ञा अभियान आरंभ करने वालों ने इस तथ्य का पूरी तरह ध्यान रखा है कि लेखनी, वाणी, दृश्य आदि के सहारे लोक-शिक्षण करने के साथ-साथ ऐसे रचनात्मक कार्यों का भी समावेश रखा जाए जो पुरोहित और यजमान को साथ-साथ धर्मानुष्ठान में जुटाए रहें। व्यक्ति का निर्माण हो या समाज का उसे परामर्श प्रस्तावों तक सीमित रखा जा सकता है। जो कहा जा रहा है उसे कार्यांवित करने की योजना भी साथ-साथ जुड़ी रहनी चाहिए। सेवा-धर्म की विशेषता यही है कि जहाँ उस माध्यम से परमार्थ होता है, वहाँ स्वार्थ भी कम नहीं सधता। अनेकों सद्गुण इस प्रक्रिया के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। स्नेह, सद्भाव, उदारता, त्याग, संयम आदि विषमताएँ सेवा का अवलंबन लेने के साथ-साथ ही बढ़ने लगती हैं। दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वालो के हाथ अनायास ही रच जाते हैं। सदाशयता का बीजारोपण करने वाले अभीष्ट फसल काटने में तभी सफल होते हैं, जब पौधों की सिंचाई का सुप्रबंध रखें। सेवा को सिंचाई कह सकते हैं। ईसाई धर्म के प्रचारकों ने अपने धर्म का विस्तार करने में प्रवचनों का क्रम और सेवा-सहायता के माध्यम से सहानुभूति अर्जित करने के प्रयास को प्रमुखता दी है। प्रज्ञा अभियान को भी लोक-मानस के परिष्कार का लक्ष्य पूरा करने के लिए अपनी योजना में जन-सेवा का सघन समावेश करके आगे बढ़ने के अतिरिक्त और कोई चारा है नहीं।

प्रचार-प्रयोजनों में हर शिक्षित को घर बैठे नित्य नियमित रूप से युगसाहित्य की एक पुस्तिका पहुँचाने, वापस लेने की स्वाध्याय-प्रक्रिया व्यापक रूप से चल रही है। इस योजना के अंतर्गत 360 दिन के लिए 360 पुस्तिकाएँ हर वर्ष छपने और ज्ञानरथ में सँजोकर घर-घर उन्हें पहुँचाने का प्रावधान है। इसी की सहयोगी दूसरी योजना है, हर मुहल्ले स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से मुहल्लों में मनोरंजन जन-चित्र, प्रकाश-चित्र-प्रदर्शन कार्यक्रम रखना। चित्रों की व्याख्या करते हुए युगांतरीय चेतना जन-जन के गले उतारना यह सत्संग प्रचलन हुआ। स्वाध्याय और सत्संग की यह समन्वित प्रक्रिया हर दिनों हजारों लाखों को अभिनव प्रेरणा देती और दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर नए ढाँचे में ढलने के लिए गरम करती हैं। तीर्थयात्रा, धर्म प्रचार की पदयात्रा पर निकलने वाली टोलियाँ साइकिलों पर सामान लादकर चलती और ढपली, तिकोन के सहारे युग गायनों को सुनाती, घर-घर अलख जगाती आगे बढ़ती हैं। प्रचार तंत्र का यह छोटा; किंतु अत्यंत प्रभावी उपक्रम देखने ही योग्य है। उसकी परिणति प्रतिक्रिया को जिनने निकट से, भीतर घुसकर देखा है, वे यही कहते पाए गए हैं कि साधनहीन तंत्र द्वारा जीवन के बलबूते इतना दुस्साहस कर बैठना और शकट को इतना आगे घसीट ले जाना अद्भुत है। इसे ग्वालबालों की सहायता से गोवर्धन उठाने जैसा, अपने समय का चमत्कार कहा जा सकता है।

इस प्रचार-प्रक्रिया को प्राणवान बनाने में सेवा-धर्म का, रचनात्मक कार्यक्रम का, समावेश अनिवार्य रूप से आवश्यक था। इसके लिए कुछ देखने में छोटे; किंतु परिणाम में महान प्रयास हाथ में लिए गए हैं। निरक्षरता अपने समाज पर लदा गरीबी जैसा अभिशाप है। पिछड़ेपन के कारणों में दरिद्रता एवं अशिक्षा भी कम कष्टकारक नहीं है। 70 प्रतिशत देशवासियों को शिक्षित बनाना सरकार के बलबूते से बाहर है। स्कूली शिक्षा में कुछ लाख बच्चे का प्रबंध ही उसके लिए कठिन पड़ता है, फिर 70 करोड़ में से जहाँ 47 करोड़ नर-नारियों को पढ़ाने का प्रश्न हो वहाँ उतना भार किसी सरकार पर भी नहीं लद सकता। इसे उदार लोक-चेतना द्वारा संपन्न किया जाना चाहिए। प्रज्ञा परिजनों की संख्या दस लाख के लगभग है। वे दो-दो घंटा समय अपने-अपने गली-मुहल्ले में छोटी प्रौढ़ कक्षाएँ लगाने में जुटाए गए हैं और आशा की गई है कि निरक्षरता के अभिशाप से इस आधार पर जूझना संभव हो जाएगा। इस योजना के अंतर्गत जहाँ व्रतशील युगशिल्पी स्वयं काम करते हैं, वहाँ घर-घर जाकर भावनाशील शिक्षितों से संपर्क साधते हैं और उन्हें विद्या ऋण चुकाने के लिए थोड़ा समयदान करते रहने के लिए सहमत करते हैं। इस प्रकार अध्यापकों की एक बड़ी सेना दिन-दिन सुविस्तृत होती चली जा रही है और उस माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किए गए प्रौढ़ नर-नारियों को साक्षर बनाने की योजना अत्यंत उत्साहपूर्वक, आश्चर्यजनक सफलता के साथ आगे बढ़ती चली जा रही है।

शिक्षाप्रसार की तरह ही घर-घर में शाक-वाटिका उगाने और कुपोषण से राहत पाने के लिए आँगन, छत-छप्पर पर शाक-भाजी, चटनी के लिए धनिया, पोदीना अदरक, हरी मिर्च आदि उगाने की प्रतिस्पर्धा खड़ी कर देना, देखने में तो एक मजाक जैसा काम है; पर उतने भर से जो आर्थिक बचत तथा आहार संतुलन की आवश्यकता पूरी होती है, उसका व्यापक परिमाण पर्वत जितना बड़ा होता है। सबसे बड़ी बात है, हाथ पर हाथ रखे बैठे रहने की अपेक्षा उत्पादन की आवश्यकता अनुभव करने की प्रवृत्ति। यह दिशा पकड़े तो फिर आगे की बात भी सूझेगी और संव्याप्त आलस्य-प्रमाद से राहत मिलेगी। वृक्षारोपण तो वही कर सकते हैं जिनके पास भूमि है, पर जिन्हें किराए की कोठरियों में रहना पड़ता है, वे भी वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव से बचने के इस प्रयास में तो सम्मिलित हो ही सकते हैं।

इस दिशा में अगला कदम गृह-उद्योगों के ऐसे प्रयासों का नंबर आता है, जिन्हें घर के बैठे-ठाले लोग खाली समय में चलाते रह सकते हैं और हर हाथ की, काम की आवश्यकता किसी अपने-अपने बलबूते आगे बढ़ा सकते हैं। इसे सुचारु रूप से चलाने के लिए सहकारी पद्धति अपनाई जा रही है और हिल-मिलकर करने और मिल-बाँटकर खाने के सिद्धांत का घर-घर में प्रचलन किया जा रहा है।

सामूहिक श्रमदान के सहारे स्वच्छता अभियान चलाना, मल-मूत्र से लेकर कूड़े-करकट तक की गंदगी को बहुमूल्य खाद के रूप में बदलना ऐसा काम हैं, जिसमें सभ्यता, स्वच्छता, सेवा, समाजनिष्ठा, नागरिक जिम्मेदारी, सहकारिता जैसी अनेकों सत्प्रवृत्तियों को जनजीवन में विकसित होने का अवसर मिलता है। सामूहिक श्रमदान की तरह आजीविका के एक अंश को नियमित रूप से मुट्ठी फंड के रूप में निकालने का जो उत्साह उत्पन्न किया गया है। उसके सहारे पुस्तकालय, व्यायामशाला, खेलकूद, पार्क, उद्यान, तालाबों का गहरा करना, रास्ते सही करना, गलियाँ सुधारना जैसे अनेकों प्रयास स्वेच्छा सहयोग के सहारे चल पड़े हैं, जिन्हें सहकारी प्रयत्नों द्वारा किए जाने पर लाखों करोड़ों की आवश्यकता पड़ती।

निषेधात्मक प्रयत्नों में नशाविरोध, दहेज, शादियों की धूम-धाम, छुआ-छूत, पर्दाप्रथा, भिक्षा व्यवसाय, मृतकभोज, बालविवाह जैसी कुरीतियों का डटकर मुकाबला करना। इनके विरुद्ध वातावरण बनाना छोड़ने की शपथ लेना, दूसरे करते हों तो उनमें भागीदार न बनना जैसे काम उठाए जा रहे हैं। उसमें सामूहिक रूप से गुंडागर्दी, मिलावट आदि अनाचारों के विरुद्ध लोहा लेना भी सम्मिलित हैं। अंधविश्वासों की अपने देश में कमी नहीं। भूतपलीत, टोना-टोटका भाग्यवाद, शकुन-मुहूर्त्त आदि की इतनी भ्रांतियाँ अपने समाज में प्रचलित हैं कि उन्हें देखते हुए मूढ़मान्यताओं पर हँसी आती है और उनके कारण जिस भय, आतंक, विद्वेष, अपव्ययजन्य हानि होती हैं, उसे देखते हुए कष्ट होता है। लगे हाथों इन कुप्रचलनों के विरुद्ध भी मोर्चा अड़ा दिया गया है।

प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत हर भावनाशील को दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की दृष्टि से दिए गए, वे काम हैं जो देखने में छोटे-छोटे होने पर भी बूँद-बूँद से घड़ा भरने की उक्ति को चरितार्थ करते हैं और उनके संयुक्त प्रयत्नों की प्रतिक्रिया दूरगामी होती है। अवसाद एक दुष्प्रवृत्ति है, जिसके कारण हीनताजन्य पिछड़ेपन के परिपोषण अनेकों कुप्रचलन पनपते हैं। उसे उखाड़ा जा सकें और नवसृजन के प्रति उत्साह उत्पन्न किया जा सके तो उस शृंखला में एक के बाद दूसरी कड़ी जुड़ती जाती है और बात बढ़ते-बढ़ते कहीं से कहीं जा पहुँचती हैं। इन प्रयत्नों से जुलूस, रैली, हड़ताल, घिराव, उद्घाटन समारोह जैसी धूम-धाम तो नहीं है, पर उनके पीछे रेडक्रास, फस्ट एड होम नर्सिंग, स्काउटिंग, भूदान, सर्वोदय, एन.सी.सी. जैसी रचनात्मक सत्प्रवृत्तियाँ नर्सरी रूप में उगती देखी जा सकती हैं और विश्वास किया जा सकता है कि उन रचनात्मक प्रयत्नों के शांत, सौम्य रहते हुए भी परिणाम उतने श्रेयस्कर होंगे, जिसे सृजन की पक्षधर समग्र-क्रांति कहा जा सके।

इन्हीं प्रयत्नों को हर क्षेत्र में विस्तृत करने के लिए पिछले दिनों 2400 प्रज्ञा संस्थानों की इमारतें बनी हैं। इन सभी में औसतन दो कार्यकर्त्ता काम करते हैं। एक स्थानीय गतिविधियाँ चलाने के लिए दूसरा समीपवर्त्ती सात गाँवों में एक-एक दिन का कार्यक्रम बनाकर जन-संपर्क साधने और युगांतरीय चेतना का वातावरण बनाने के लिए। प्रज्ञा संस्थानों की दिनचर्या में प्रौढ़-शिक्षा, बाल-शिक्षा की कक्षाएँ चलाने, कथा कीर्तन के माध्यम से लोक-मानस में सृजन परिवर्तन की उमंगें उत्पन्न करने का नियमित प्रशिक्षण चलता है। व्यायामशाला तथा गाँव में पौध बाँटने की नर्सरी भी इन छोटे संस्थानों में चलती है। इन कार्यकर्त्ताओं का निर्वाह व्यय महिलाओं द्वारा धर्मघटों में नित्य एक मुट्ठी अन्न डाले जाने वाले धर्मघटों के सहारे चलता है। प्रचारात्मक तथा रचनात्मक गतिविधियों में मार्ग व्यय तथा अन्य साधनों का व्यय प्रज्ञा परिजनों के द्वारा ज्ञानघट में डाली जाने वाली नित्य दस पैसा अनुदान की राशि से चल जाता है। कार्यकर्त्ताओं में से अधिकांश समयदानी, आत्मदानी, वानप्रस्थ, परिव्राजक, ब्रह्मचारी ही अधिक हैं, जिनमें से अधिकांश अवैतनिक कार्य करते हैं। जिनके पास अपने निर्वाह साधन नहीं हैं, ऐसे सृजनशिल्पियों को ही ‘ब्राह्मणोचित परिवार निर्वाह’ देने की व्यवस्था चलती है।

यह प्रयास के उस पूर्वार्ध का परिचय है जो अब तक हो चुका। इसे एक शब्द में उत्साहवर्द्धक, आशाजनक और अपने ढंग की अनुपम प्रक्रिया कहा जा सकता है। अनुपम इसलिए कि अब तक ऐसे-ऐसे प्रयत्न सरकारी या गैर सरकारी समाज कल्याण संगठनों के अंतर्गत ही होते रहे हैं। धर्मतंत्र का इस प्रकार के प्रयत्नों में मुहल्लों से कभी कोई योगदान नहीं रहा। ईसाई चर्चों में ही अपने धर्म-परिवर्तन योजना में इस प्रकार के प्रयासों में मात्र सेवा, सहानुभूति वाला पक्ष कार्यांवित किया है। लोक-मानस के परिष्कार के लिए योजनाबद्ध प्रयास में इस प्रकार का उदाहरण ढूँढ़ने के लिए हमें ढाई हजार वर्ष पुराने इतिहास पृष्ठ उलटने होंगे। बुद्ध का धर्मचक्र-प्रवर्तन प्रायः इसी पृष्ठभूमि पर आधारित था, जिसे कि अब प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सामयिक परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए नए परिवेश में, नए सिरे से आरंभ किया गया है।

बौद्धकालीन धर्मचक्र-प्रवर्तन का इतिहास बताता है कि एकाकी प्रयत्न से सीमित-साधनों वाली वह प्रक्रिया धीमी गति से छोटे क्षेत्र में चलती रही; किंतु जब उसे समर्थ, सहयोगियों और उपयुक्त साधनों का बल मिला तो बात कहीं से कहीं जा पहुँची। बचपन प्रौढ़ता से जा जुड़ा। पुष्प वाटिका सुरम्य उद्यान में विकसित हुई और रिमझिम ने घटाटोप बनकर जल-थल एककर देने वाले बवंडर की तरह बरसना शुरू कर दिया। नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों के खंडहर अपनी भाषा में अभी भी यह बताते हैं कि यह प्रयास देखते-देखते किस द्रुतगति से आगे बढ़े होंगे और किस प्रकार एशिया क्षेत्र से आगे बढ़कर समस्त भूमंडल की नवचेतना प्रदान करने में सफल हुए होंगे। कितनी प्रतिभाओं ने उसमें अपना कितना बड़ा श्रमदान, अंशदान प्रस्तुत किया होगा।

इतिहास की पुनरावृत्ति भी होती रहती है। लगता है, वैसा ही कुछ इन दिनों भी होने जा रहा है। 'धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि' का बीजमंत्र जिस धर्मधारणा, देव संगठन एवं प्रबुद्ध विचारणा का उद्घोष करते थे, लगभग उन्हीं मंत्रों का नए वेदी पर, नया धर्मानुष्ठान प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत हो रहा है। संभव है, वैसी ही प्रतिभाएँ भी उसमें सहभागी बने और नए युग का, नया अध्याय, नए ढंग से सृजे।


युग परिवर्तन प्रक्रिया का उत्तरार्ध, जो अभी ही क्रियांवित होना है

पिछले पृष्ठों पर प्रज्ञा अभियान की उस रचनात्मक प्रक्रिया का उल्लेख हुआ है, जिसमें भावनाशीलों को छोटे-छोटे सरल-सुलभ सेवाकार्य अपनाकर अपने समर्थन को जीवंत स्तर का सिद्ध करने का अवसर मिले। निःसंदेह वे आरंभिक हैं। सीधे, सरल और स्वल्प श्रमसाध्य हैं; पर उन्हें प्राथमिकता इसलिए दी गई है कि जिनमें आदर्शवादी प्राण-प्रतिभा होगी वे न केवल समर्थन करेंगे; वरन सहयोगी बनने के लिए आरंभिक कदम बढ़ाएँ। यह युगमनीषा की प्राथमिकता परीक्षा है।

अब तक की कार्यपद्धति यों सृजनात्मक वातावरण बनाने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है और उसमें युग-परिवर्तन के बीजांकुर पूरी तरह विद्यमान हैं। गांधी का चरखा और नमक अभियान कितना नगण्य लगता था; पर उस शुभारंभ की परिणति कहाँ से कहाँ पहुँची, यह सभी ने प्रत्यक्ष देखा है। प्रज्ञा अभियान के प्रथम चरण में पूर्वार्ध में उन्हीं कार्यक्रमों का समावेश है जो सर्वसाधारण के लिए सरल-सुगम हैं। चयन में इतनी सी जाँच-पड़ताल भर से काम चल जाता है। प्रखरता उत्पन्न करने के लिए तो पीछे तेज भट्टी में गलाई-ढलाई होती हैं। पूर्वार्ध की सफलता उत्साहवर्द्धक हैं। उस प्रक्रिया से परिवर्तन का माहौल बना है, प्रवाह चला है और विश्वास बँधा है कि इस दिशा में चलते हुए कुछ ऐसा बन पड़ेगा, जिसे महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी एवं ऐतिहासिक कहा जा सके।

बड़े कामों के लिए, बड़े कदम उठाने पड़ते हैं। बड़े साहस जुटाने होते हैं, बड़े साधन जुटाए जाते हैं। उपलब्ध युगमनीषा को उत्तरार्ध में इसी की तैयारी करनी चाहिए। यों इस संसार में एक से एक बड़े विभूतिवान भरे पड़े हैं। वे चाहें तो नवसृजन का विशालकाय तंत्र देखते-देखते खड़ा कर सकते हैं, पर उन तक पहुँच कैसे हो? वे इस मिशन से परिचित कैसे हों? फिर उनकी अपनी योजनाओं की तुलना में युगांतरीय चेतना की गरिमा को वरिष्ठ कैसे सिद्ध किया जाए? अन्यत्र वैसा कुछ दृष्टिगोचर न होने पर भी एकाकी अग्रसर होने के लिए कैसे सहमत किया जाए? यह अति कठिन प्रश्न है, जिनके कारण नवयुग के शिलान्यास की दृष्टि से नितांत आवश्यक, अनिवार्य कार्यों को अविलंब अग्रसर करने पर गाड़ी रुक जाती है। लंबी अवधि के भाव भरे प्रयत्नों से जिस देव परिवार का सृजन किया गया है, उसी के परिजनों को लेकर अगले दिनों के भारी भरकम कार्यों को भी हाथ में लिया जाएगा। जब विभूतियाँ विश्वास करेंगी और बड़े प्रयत्नों के लिए बड़ा साहस करेंगी, अभी उस समय की दूरी कुछ अधिक लंबी दिखती है; इसलिए जो हाथ में है, जो साथ है, उसी के सहारे अगले बड़े कदमों का श्रीगणेश भी उसी प्रकार किया जाना है। जिस प्रकार कि छोटे प्रयत्न का ताना-बाना छोटे सहयोग से बुनते हुए, छोटों का बड़ा काम सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत कर सकने में सफल मनोरथ हुआ गया है।

कहा जा चुका है कि विचारणा को प्रभावित करने में लेखनी, वाणी और दृश्य शक्ति की प्रमुखता मानी गई है। इनके लिए हमें लेखन, प्रकाशन और विक्रय का ऐसा समर्थ तंत्र खड़ा करना चाहिए जो व्यक्ति और समाज से संबंधित सभी समस्याओं के निषेधात्मक और विधेयात्मक पक्षों से जन-जन को अवगत कराए तथा नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रांति की सर्वतोमुखी पृष्ठभूमि बनाए। इसका विस्तार सभी प्रमुख भाषाओं के क्षेत्र तक इस प्रकार होना चाहिए जैसा कि ईसाई मिशन और साम्यवाद के अंतर्राष्ट्रीय विस्तार ने किया है।

वाणी को मुखर करने के लिए ऐसे वक्ता, गायक बड़ी संख्या में प्रशिक्षित किए जाने हैं। जो जनसंपर्क साधें, घर-घर अलख जगाएँ, विचार गोष्ठियों में उस तथ्यों से जन-जन को अवगत कराएँ जो भले-चंगे, सुखी-संपन्न मनुष्य को सामूहिक आत्महत्या की दिशा में घसीटे लिखे जा रहे हैं। साथ ही यह भी बताना होगा कि किन उपायों के अवलंबन से विनाश की विभीषिकाओं से बचा जा सकता है। किन प्रयोजनों में मानवी प्रयत्न नियोजित करने पर उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित सृजन हो सकता है। ऐसे आदर्शवादी प्रचारक अनुभवी भी हों, सुयोग्य भी, सेवाभावी भी। इसके लिए वानप्रस्थ परंपरा पुनर्जागृत करनी होगी। अधेड़ों में लोभ, मोह से विरत होकर लोक-मंगल में संलग्न होने की भाव-चेतना जगानी होगी। थोड़ा-थोड़ा समय देने वाले समयदानियों की दूसरी पंक्ति खड़ी होगी। एक वर्ष का संन्यास लेने और उस अवधि में मात्र सृजन, प्रयोजन में संलग्न रहने की एक नई परंपरा चलानी होगी। ऐसे ही प्रयत्नों से युगमनीषा का प्रचारक परिव्राजक वर्ग उभरेगा। उसे कार्यक्षेत्रों में उतरने और स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए कार्यपद्धति अपनाने के लिए नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय खड़े करने होंगे। छोटे संधाराम और बौद्ध बिहारों की अनुकृति भी हर व्यवसायी-क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए विनिर्मित करनी होगी।

कहना न होगा कि यह वाणीप्रधान प्रचार तंत्र भी लेखनी वाले प्रकाशन तंत्र की तरह खर्चीला है। कार्यकर्त्ताओं को भोजन, वस्त्र, मकान तो चाहिए ही। बाहर जाने पर मार्ग व्यय भी लगता है। प्रशिक्षण में पुस्तकों तथा संगीत उपकरणों की आवश्यकता पड़ेगी। इस प्रकार लेखन का न सही प्रकाशन के लिए कागज छपाई की पूँजी तो चाहिए ही। उपरोक्त दोनों ही कार्य साधनों की अपेक्षा रखते हैं। उनके लिए पैसा न मिले तो समझना चाहिए, बिना पानी वाले तालाब की स्थिति रही। खिले कमलों वाले सुरम्य, शीतल सरोवर का दृश्य देखना है, तैराकी से लेकर सिंचाई तक का लाभ उठाना है तो कागजी चित्र सरोवर से काम नहीं चलेगा। उसमें जलराशि भरते रहने वाले निर्झरों को भी उस सुखद संभावना में भागीदार बनने के लिए सहमत करना होगा।

प्रचार-प्रकाशन के समतुल्य ही कला का क्षेत्र है। उस पर इन दिनों फिल्म उद्योग का आधिपत्य है। पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों से भी कहीं अधिक संख्या सिनेमा दर्शकों की रहती है। अभिनय, संगीतयुक्त कथानक अपने पीछे जो प्रभाव सँजोए रहते हैं, उसका प्रभाव सीधे चिंतन और चरित्र पर पड़ता है। प्रचलित प्रवाह को सिनेमा संस्कृति के देन कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। उसने अपना प्रभाव प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जन-जन के मन पर छोड़ा है, उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं की जा सकती। इस महाशक्ति को पतन-पराभव से रोकने में यों उनके निर्माता और सरकारी सेंसर भी सक्षम हो सकता है, फिर भी यह आवश्यकता तो बनी ही रहेगी कि दिशा परिवर्तन की, अभिनव निर्माण की जिम्मेदारी कोई दूसरा उठाए। अंधों को रास्ता दिखाने में कोई आँख वाला भी चाहिए।

आवश्यकता यह अनुभव की जानी चाहिए कि पुरातन सतयुगी वातावरण को आज की स्थिति में अवतरित कर सकने वाले कथानकों को कम-से-कम एक फिल्म-शृंखला तो चल ही पड़े। मार्गदर्शन और पथ प्रशस्त होने पर दूसरे लोग भी उसका अनुकरण करेंगे। यह बड़ी पूँजी का उद्योग है। एक फिल्म बनाने से नहीं एक शृंखला चलाने से काम बनेगा। इस शृंखला शुभारंभ के अपने निजी साधन बनाने होंगे। इसमें न्यूनतम पचास लाख की पूँजी चाहिए। करोड़ों की लागत वाले मिल, कारखाने खड़े कर देने वालों के लिए यह लाभदायक न सही, हानिरहित उद्योग में हाथ डालने का उत्साह उत्पन्न किया जाना चाहिए।

मध्यववर्त्ती प्रज्ञा परिजन भी रामलीला, रासलीला स्तर की अभिनय मंडलियाँ खड़ी कर सकते हैं। एक्शन स्वांग, एकाकी नाटक, संगीतमंडली आदि छोटे तंत्र बड़ी संख्या में खड़े किए जा सकें तो भी उनका प्रभाव उन देहाती क्षेत्रों में उत्साहवर्द्धक होता है, जहाँ भी सिनेमा का आधिपत्य नहीं हुआ है। सोलह मिलीमीटर के चलते-फिरते सिनेमा भी जनरेटर की सहायता से उन क्षेत्रों में पहुँच सकते हैं और इस स्तर का एक मिनी सिनेमा उद्योग भी बड़ों के समानांतर से खड़ा हो सकता है। इसमें पूँजी भी कम लगेगी। इसे क्षेत्र में कठपुतली के तमाशे, जादू के खेल जैसे कौशल भी उद्देश्यपूर्ण आधार अपनाकर लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का आधार खड़ा कर सकते हैं। कला के क्षेत्र में चित्र प्रकाशन का अपना विशिष्ट स्थान है। चित्र प्रदर्शनियों के इन दिनों कितने ही रूप प्रचलित हैं। उनमें से कुछ को नवसृजन का वातावरण बनाने में प्रयुक्त किया जा सकता है। छोटी चिह्नपूजा तो आदर्श वाक्य, चित्र वाले प्रकाशन और चित्र प्रदर्शनी आयोजनों के रूप में चल भी रहा है। उपरोक्त सभी प्रयत्नों को बड़े काम में, बड़ी पूँजी में, संगठित रूप में किए जाने की आवश्यकता है। कला को दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करने के फलस्वरूप लोक-प्रवाह में विषाक्तता का समावेश हुआ है। यदि उसे सदउपदेशों के लिए प्रयुक्त करने वाली कोई बड़ी योजना कार्यांवित हो सके तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से वातावरण में अमृत भर देने के रूप में दृश्यमान होगा।

कृत्यों में प्रगतिशील शिक्षा तंत्र जनसहयोग से खड़ा किया जाना चाहिए। जीवन-साधना के, लोक-व्यवहार के असंख्य पथ ऐसे हैं, जिनका अभाव शिक्षितों और अशिक्षितों में समान रूप से पाया जाता है। आदतें, विचारणाएँ, प्रथाएँ, गतिविधियाँ अवांछनीय स्तर की होने पर किस प्रकार सर्वनाश रचती और विवेकशील दूरदर्शितायुक्त होने पर किस प्रकार दैवी अनुकंपा की तरह प्रगति और समृद्धि बरसाती हैं, यह विषय मात्र स्वाध्याय का ही होना चाहिए। ऐसे पूरे या अधूरे समय के फीस, बिना फीस के विद्या या जगह-जगह पर चलने चाहिए, जिनमें आजीविका उपार्जन, स्वास्थ्य-संरक्षण एवं व्यवहार-कौशल की शिक्षा का समावेश है। प्रगतिशील देशों में सरकारी शिक्षा की परिधि सीमित और निजी प्रयासों से चलने वाली शिक्षण संस्थाएँ अपेक्षाकृत कहीं अधिक हैं। इससे वहाँ के नागरिकों को अपनी मर्जी के बिना अपनी अनुकूलता के समय में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध होती रहती है। हमें सरकारी शिक्षा का स्वागत और सहयोग करते हुए भी उन प्रसंगों के पाठ्यक्रम बनाने और विद्यालय चलाने चाहिए जो योग्यता-संवर्द्धन के साथ-साथ प्रतिभा निखरने, व्यक्तित्व उभारने और प्रगतिशील सुखी, समुन्नत जीवनक्रम बनाने में कारगर सहायता दे सके। ऐसी लोकशिक्षा, सरकारी शिक्षा के समानांतर चल सकती है और समग्र शिक्षण की पूरक बन सकती है।

इन पंक्तियों में उन प्रयत्नों का उल्लेख नहीं किया गया है, जिनसे पिछड़े दुखी वर्ग को राहत पहुँचाने, बेकारी गरीबी को दूर करने, अनीति से जूझने की दृष्टि से बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इन पृष्ठों पर उनका उल्लेख न करने का तात्पर्य यह नहीं है कि वे महत्त्वहीन या उपेक्षणीय हैं। उन्हें दूसरे अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री शासन अधिकारी अपने ढंग से अपने साधनों से संपन्न करें। यहाँ मात्र प्रज्ञा अभियान के उस पक्ष पर प्रकाश डाला गया है, जो लोक-मानस की दिशाधारा बदलने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। युगमनीषी अपने जिम्मे इस सीमित काम को संभाले और अगणित कार्यों को विभिन्न क्षेत्रों की अगणित प्रतिभाएँ अपने-अपने साधनों और अनुभवों के अनुसार करती रह सकती हैं। शासन सुधार की बात को यहाँ जान-बूझकर छोड़ दिया गया है कि जब उस क्षेत्र की सूझ-बूझ वाले ही धकापेल मचाएँ हुए हैं तो अछूते; किंतु अति महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व को युगमनीषा क्यों न अपने कंधों पर उठाए।

उपरोक्त चारों तंत्रों को छुट-पुट रूप से अलग-अलग संगठनों के अंतर्गत भी किया जा सकता है, पर प्रारंभिक स्थिति में पूर्व अनुभव और दूरदृष्टि के अभाव में भटकाव की आशंका है। सभी जानते हैं कि जंक्शन पर खड़ी गाड़ियों में कोई निर्धारित पटरी के स्थान पर दूसरी पर चढ़ चले तो कुछ ही समय में यह भटकाव हजारों मील का अंतर पड़ जाता है और शक्ति एवं समय का भारी अपव्यय पल्ले बँधता है। अच्छा हो उपरोक्त चारों प्रयासों का प्रथम चरण शान्तिकुञ्ज के तत्त्वाधान में हो। इस सुयोग से युगमनीषा को दिव्य प्रेरणाओं से सुसंपन्न होने का अवसर मिलेगा। उनके उत्तरार्ध प्रयास, पूर्वार्ध प्रयासों की तुलना में असंख्य गुने सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होंगे। ऐसे सत्परिणाम, जिनके सहारे मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का सतयुग इन्हीं आँखों के आगे प्रभातकालीन अरुणोदय के रूप में सुखद संभावनाओं के साथ उदीयमान दृष्टिगोचर हो सके।


हमीं एक कदम और आगे बढ़ें

युगांतरीय चेतना से परिचित, प्रभावित, प्रशंसक, समर्थक, प्रज्ञा परिवार को एक कदम आगे बढ़कर अब सघन सहयोग की भूमिका में प्रवेश करना होगा। उन्हें अपना एक विशिष्ट स्तर एवं स्वरूप विनिर्मित करना होगा। समय के परिवर्तन में उनकी भावभरी भूमिका होनी चाहिए। ऐसे भावभरी जो उन्हें महामानवों की, युगपुरुषों की पंक्ति में खड़ा कर दे। ऐसी भावभरी, जिसमें त्याग-बलिदान और सेवा-साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे, जिससे समूचे संपर्क-क्षेत्र को नवजीवन मिले। ऐसा नवजीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वंदन करते रहें।

बात दूसरे स्तर के साहस भर की है। मानव जीवन दुस्साहसियों से भरा है। इसमें पग-पग पर जोखिम है। त्याग और संयम की विवशता भी बनी ही रहती हैं। इच्छा से नहीं, अनिच्छा से, प्रकृति-प्रेरणा से करना तो वही पड़ता है। प्रश्न इतना भर है कि क्या वह सब ढर्रे से बाधित होकर करने की अपेक्षा, विवेकपूर्वक अंतःप्रेरणा से, आदर्शों के निमित्त किया जा सकता है क्या? बाधित होकर या स्वेच्छापूर्वक व्यामोह के दबाव से या विवेकभरे उत्साह से चयन इन्हीं दो में से एक का काम करना पड़ता है। जोखिम दोनों में समान है। न चाहने पर भी जो करने के लिए प्रकृति बाधित करती है, उसी को यदि अंतःप्रेरणा से आपत्तिकालीन युगधर्म की पुकार पूरी करने के लिए किया जा सके तो एक शब्द में उसे विवेकभरी साहसिकता और मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली साहसिकता ही कहा जाएगा। समय आ गया कि इस परीक्षा की घड़ी में अपने चयन, चुनाव में राजहंसों जैसी उत्कृष्टता का परिचय देना होगा। इस विषमबेला में उन्हें प्रेय का नहीं, श्रेय का वरण करना चाहिए।

मनुष्य कमाता बहुत हैं, पर प्रकृति उसमें से थोड़ा-सा ही खाने की छूट देती है। चार रोटी ही पेट में प्रवेश कर पाती हैं। चाहने पर भी कोई अधिक उदरस्थ नहीं कर सकता। तन ढकने के वस्त्र, सोने का बिस्तर औसत लंबाई से अधिक के प्रयुक्त नहीं हो सकते। जो खाया, खरचा उसके उपरांत का बचत भाग किन्हीं दूसरों के लिए छोड़ना ही पड़ता है। मरने के बाद तो सिकंदर कुछ न ले जा सका और ताबूत से बाहर खुले हाथ निकलवाकर ऐसे ही रोता-कलपता चला गया। प्रश्न इतना भर है कि उस बचत की अनावश्यक रूप से कुटुंबियों पर ही लादा जाए या उस स्वाति-बूँद की तरह असंख्य प्यासों पर बरसा दिया जाए? चुना किसे गया इसी में अपनी सूझ-बूझ है। स्वयं के लिए तो सीमित उपयोग ही संभव है। यह समय साधना, यह उदारता अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं। बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्मप्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।

यह सोचना मात्र भ्रम है कि आदर्शवादी गतिविधियों में भाग लेने से, परमार्थ-प्रयोजनों में सहयोग करने से घाटा पड़ता है और घरवालों की सुविधा में कमी पड़ती है। इस चिंतन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गंभीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धंधे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट-प्रजनन के कोल्हू में पिसने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती। दुनियादार कबीर, नानक दादू, रैदास, ज्ञानेश्वर, चैतन्य, वह न बन सके होते जो कृपणता का परित्याग करने के उपरांत बन गए।

गीताकार ने योगी की व्याख्या करते हुए उसकी पहचान 'दिन में सोने रात में जगने की' बताई है। इस अलंकारिक निरूपण का तात्पर्य है— दुनियादारी की रीति-नीति को मूर्खतापूर्ण मानकर अपने एकाकी विवेक के आधार पर स्वतंत्र निर्णय करना। भले ही वे लोक-प्रचलन के साथ तालमेल न खाते हों। ऐसा कर- गुजरना किसी के लिए भी संभव है। न इसमें घाटा है, न मूर्खता। बहुत लोगों द्वारा अपनाए गए ढर्रे को उचित मान बैठना नहीं है। अंधी भेड़ों के पीछे-पीछे चलने की अपेक्षा रवींद्र का वह उद्बोधन मार्मिक है, जिसमें 'एकला चलो रे' का सूर्य-चंद्र जैसा साहस अपनाने और ज्वलनशील दीपक का अनुकरण करने की प्रेरणा दी गई है। चिंतन का यह मर्मबिंदु ही ऐसा है, जिसको गर्त्त में गिरने या आकाश में उछलने की दिशाओं में से किसी एक का वरण किया जा सकता है।

युगमनीषियों की श्रेणी में सम्मिलित होने के लिए किसी उच्च शिक्षित होने के तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके लिए कबीर जितना अक्षरज्ञान भी पर्याप्त है। बड़े कुचक्र-षड्यंत्र रचते रहने वाले बहुपथिता को इस देव मानवों की बिरादरी में उनकी डिग्री के कारण सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस विद्यालय में इन मनीषियों को पढ़ना है, उसमें अपना उदाहरण प्रस्तुत करने की एकमात्र योग्यता ही काम करती है। बकवासी वाचालता का काम तो अब टेप रिकार्डर से भी मजे में लिया जा सकता है। आवश्यकता तो स्वल्प शिक्षित बुद्धी की है, जिनके अनुगमन के लिए कोई-कोई अंतःकरण उमड़ पड़े। इन दिनों तिलक चाहिए, सुभाष, पटेल, विनोबा, दयानंद, विवेकानंद जैसे धुनी के धनी। यहाँ वाचालता या चतुरता की नहीं, बड़े दिल, बड़े साहस और उदात्त दृष्टिकोण भर की आवश्यकता है। वह जितना, जिस अनुपात में होगा, वे उतने ही ऊँचे स्तर के युगमनीषा गिने जा सकेंगे और युग की पुकार पूरी करने में महती भूमिका निभाते हुए अपने को कृत-कृत्य कर सकेंगे। इस दिशा में तथाकथित व्यस्त और अभावग्रस्त लोग भी यदि ईमानदारी की यथार्थता अपनाएँ तो देखेंगे कि प्रतिकूलताओं के बीच भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। बड़ा न सही, छोटा योगदान तो गिलहरी से भी बन पड़ा था। मनुष्य अपने को सर्वथा असमर्थ कहे यह बात हजार बार दुहराने पर भी किसी के गले नहीं उतरती है। आदर्शवादिता के क्षेत्र में आंतरिक कृपणता के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं है। उसी के कारण तो अर्जुन, वकीलों जैसी दलीलें प्रस्तुत करता चला जा रहा है। उसी प्रवंचना को धमकाते हुए गीताकार ने कहा था— 'प्रज्ञा वांदाश्च भाष से’। वाचालों की छल भरी भाषा मत बोल। वस्तुस्थिति को समझ और मन की आँखें खोल।

प्रज्ञा परिजनों में इन दिनों ऐसे ही असमंजस भरे व्यामोह से जूझना पड़ेगा। अच्छा हो वे जोखिम उठाएँ, छलांग लगाएँ और हनुमान जैसा दुस्साहस अपनाएँ। इससे कम में बात बनेगी नहीं, दल-दल में फँसी हुई गाड़ी आगे बढ़ेगी नहीं। परमार्थ के सम्मुख स्वार्थ को सिकोड़ने का ठीक यही समय है। लोभ और मोह में कटौती करते ही ऐसा उपाय निकल आता है, जिसमें निर्वाह और परिवार की उचित व्यवस्था पर बिना किसी प्रकार का आंतरिक दबाव डाले युगधर्म की पुकार सुनने वाले, उसके लिए कुछ करने वाले प्राणवानों के साथ-साथ चला जा सके।

इस संदर्भ में सबसे बड़ी आवश्यकता भाव-संवेदना की है। वह उमंगें तो प्रचलित ढर्रे में हेर-फेर करने का उत्साह उमगें साहस उभरे। जहाँ ऐसी अंतःप्रेरणा उठेगी, वहाँ बुद्धि के सामने उसकी व्यवस्था बनाने में फिर कोई कठिनाई न रहेगी। अभीष्ट अनुकूलता मिलने पर हाथ खाली होने वाली कल्पना ऐसी है, जिसकी कम-से-कम इस जन्म में तो पूरी होने की आशा नहीं ही की जानी चाहिए। विवेक दूसरे उपाय ढूँढ़ता है और उन प्रस्तावों की लड़ी लगा देता है, जिनमें से किसी को भी अपनाकर युग देवता के चरणों में भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने की सुविधा सरलतापूर्वक निकल आती हैं। इच्छित परिस्थितियों में इच्छित काम की बात सोचते रहना अवास्तविक है। जो सामने है उसी में हेर-फेर करके तालमेल बिठा लेने का तरीका ही ऐसे अवसरों पर काम देता है। ललक, लिप्सा और महत्त्वाकांक्षाओं में कटौती हो सके, परिवार को सुविधाओं से लादने की अपेक्षा स्वावलंबी भर बनाने का विवेक जगे तो इतने भर से हममें से अधिकांश की वह स्थिति हो सकती है, जिसमें महाकाल की समयदान याचना का उत्साहवर्द्धक उत्तर दिया जा सके।

आदर्शवादी बीजारोपणों की संकल्प और साहस का खाद-पानी मिले तो उनके उगने, लहराने और देखते-देखते पुष्पित फलित होने में फिर कोई कठिनाई शेष न रहे। संकट परिस्थितिजन्य नहीं, मनःस्थिति में घुसी हुई कृपणता का है। चोर पकड़ा और हटाया जा सके तो समझना चाहिए कि प्रज्ञा परिजनों में से हर किसी को बहुत कुछ कर गुजरने का सुयोग सौभाग्य उपलब्ध हो गया।

श्रम, समय की इन दिनों महती आवश्यकता है। जनजागरण के लिए जनसंपर्क साधने और युगचेतना से अवगत कराने वाले प्रयास आरंभ करने होंगे। यह बन पड़े तो जनसमर्थन और जनसहयोग की कहीं कोई कमी न रहेगी। बीमा एजेण्टों और वोट बटोरने वालों जैसी ललक हो तो जनसंपर्क में निकलने में लगने वाले संकोच, असमंजस देखते-देखते हवा में उड़ जाएँगे। कथनी और करनी का समन्वय ही प्रज्ञा अभियान की गतिविधियों को आगे बढ़ाता है। परामर्श देने से ही छुटकारा नहीं मिलता कुछ ऐसी भी करना पड़ता है, जिसमें समय लगे और पसीना बहे। ज्ञानरथ चलाने, स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाने जैसे प्रारंभिक काम तक जब श्रम माँगते हैं तो उन बड़े कामों के लिए तो और भी बड़े प्रयास-परिश्रम की आवश्यकता पड़ेगी। खादी प्रचार के दिनों पं. नेहरू और टंडन धकेल गाड़ी लेकर निकलते और खादी बेचते थे। लगन हो तो हममें से अधिकांश की वह स्थिति है कि स्वाध्याय और सत्संग को सर्वसुलभ बनाने वाले उपरोक्त तीनों उपकरणों को अपने एकाकी बलबूते अपने संपर्क-क्षेत्र में चलाते और उत्साहवर्द्धक आलोक वितरण करते रह सकें। बात एक कदम और आगे बढ़े तो शिक्षा प्रचार, हरीतिमा-संवर्द्धन, स्वच्छता अभियान जैसे कितने ही सेवाकार्यों में कुछेक घनिष्ठ साथियों को लेकर जुटा जा सकता है। स्वयं संकल्प पूर्व आगे बढ़ने पर सहयोगी अनुयायियों की कभी कमी नहीं पड़ती। इंजन दौड़ेगा तो डिब्बे भी पीछे-पीछे घिसटते चलेंगे ही। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत असंख्यों प्रचारात्मक, सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यक्रम हैं, जिनमें से योग्यता और सुविधा के अनुरूप स्थानीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं के अनुसार कुछ भी चुना जा सकता है। लक्ष्य एक ही है— लोकमानस का परिष्कार। सुविधा-संवर्द्धन से अधिक महत्त्व इन दिनों विचार परिवर्तन को दिया जाना है। यह तथ्य हम में से किसी को भी भुला नहीं देना चाहिए।

यह सर्वसाधारण की बात हुई। विभूतिवानों को, प्रतिभाओं को कुछ बड़े कदम उठाने चाहिए और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए। भावनाशील, बुद्धिमान, धनवान, प्रतिभाशाली, प्रभावशाली लोग इन कामों में हाथ बँटा सकते हैं। जो किए जा रहे हैं या किए जाने हैं, उनकी चर्चा पिछले दो लाखों में हो चुकी है। इनमें सच्चे मन से रुचि ली जा सके तो यह खोजने में कठिनाई न पड़ेगी कि स्वयं क्या किया और दूसरों से क्या कराया जा सकता है। कई बार मनुष्य को अपनी क्षमताएँ ही इतनी बड़ी होती हैं कि एकाकी बलबूते महत्त्वपूर्ण काम करने में उनके लिए साधन जुटाने में कीर्तिमान स्थापित किया जा सके। कई बार स्वयं की तो वैसी स्थिति नहीं होती, पर दूसरे समर्थों को प्रोत्साहित करके उतना कुछ कराया जा सकता है, जिसे चमत्कार कहा जा सके। युगसाहित्य के प्रकाशन, प्रचारकों के निर्वाह अन्यान्य कार्यक्रमों के लिए साधन-उपकरण जुटाने में ढेरों पैसा चाहिए। इसका भी प्रबंध हो सके तो ईंधन मिलने पर चिनगारी की ज्वलंत-ज्वालमाला बनने का अवसर मिल सकता है। उमंग उठे, साहस जगे और चिंतन मुड़े तो हजार उपाय, हजार मार्ग ऐसे सामने अनायास ही प्रस्तुत होने लगेंगे, जिनके सहारे नवसृजन अभियान को आगे बढ़ाया जा सके। स्वयं करने के साथ-साथ दूसरों से कराने की बात का भी उतना ही महत्त्व है। जामवंत स्वयं समुद्र लाँघने की स्थिति में नहीं थे; पर उनने हनुमान को प्रोत्साहन देकर वह कार्य करा लिया। परिणामतः यह प्रयास जामवंत के स्वयं समुद्र लाँघने के समतुल्य ही श्रेयस्कर सिद्ध हुआ।

जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हैं। जिनके पास गुजारे के साधन हैं, वे परिव्राजकों की भूमिका निभा सकते हैं, अपने समय को पुरातन वानप्रस्थों की तरह लोक-मंगल के लिए लगा सकते हैं। इसमें निकटवर्त्ती प्रज्ञापीठों के माध्यम से सुव्यवस्थित कार्य करना अधिक सरल और सफल हो सकता है। एक वर्ष का वानप्रस्थ लेकर जनजागरण की तीर्थयात्रा पर निकल पड़ना अपने आप में एक मनोरंजक, अनुभव संपादन, तप-साधन एवं उच्चस्तरीय पुण्य-परमार्थ है। साइकिलों पर तीर्थयात्रा और ढपली पर युगगायन के लिए निकलने वाली दो-दो की टोलियाँ जो काम कर सकती हैं, उसका मूल्यांकन असाधारण या अद्भुत के रूप में ही कहा जा सकता है। जिनसे बाहर जाना न बन पड़े, वे अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र में ही नित्य दो घंटे लगाकर प्रज्ञा अभियान के निर्धारित कार्यक्रमों में हाथ बँटाते रह सकते हैं।

शान्तिकुञ्ज के केंद्रीय संचालन तंत्र को प्रचार, निर्माण और साहित्यसृजन में सहयोग दे सकने योग्य कितने ही वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता रहती है। संगीत एवं अभिनय की प्रशिक्षण योग्यता रखने की भी खोजबीन की जा रही है। जिनकी योग्यताएँ उस स्तर की हों और पारिवारिक भारी उत्तरदायित्व सिर पर नहीं है, वे हरिद्वार पहुँचने और वहीं रम जाने की बात सोच सकते हैं। अंग्रेजी और हिन्दी के बीच अच्छा अनुवाद कर सकने वालों की भी इन दिनों विशेष आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इन प्रयोजनों में जो हाथ बँटा सकते हों, वे शान्तिकुञ्ज पहुँचने की तैयारी करें। यह समयदान स्थानीय क्षेत्र में भी हो सकता है, हरिद्वार भी जिनकी आवश्यकता हो उन्हें बुलाया जा सकता है। हर हालत में भावनाशील प्रज्ञा परिजनों को वैसा ही कुछ करने का साहस जुटाना चाहिए।

समयदान की तरह ही देव परिवार की जागृत आत्माओं को अंशदान का भी प्रबंध अपने ही स्रोतों से करना होगा। सुसंपन्नों से न तो अपना सीधा संपर्क है, न उन पर कोई प्रभाव है। नाक रगड़ने और जिस-तिस के सामने पल्ला पसारने की आदत नहीं। मिशन के कार्य विस्तार के साथ-साथ साधनों की आवश्यकता भी बढ़ रही है। उसकी पूर्ति भी बाहर का कौन करेगा? उदारता इस दिशा से भी अपेक्षित है। अपने बदले का सेवाकार्य दूसरों से कराया जा सकता है और बदले में उनके निर्वाह का उत्तरदायित्व उठाया जा सकता है। इन दिनों युगशिल्पियों के निर्वाह तथा मार्गव्यय आदि पर औसत एक रुपया घंटा खरच आता है। स्वयं समयदान न दे सकने वाले, अपने स्थान पर दूसरों से कराने की बात सोच सकते हैं और अपने उपार्जन में से महीने में एक दिन की आजीविका इस पुण्य प्रयोजनों के लिए लगाते रह सकते हैं।

दस पैसा का दैनिक अनुदान तो न्यूनतम प्रतीकमात्र है। उतने भर से बड़े काम कहाँ बन पड़ेंगे? उदारचेता अपने परिवार का एक सदस्य ‘प्रज्ञा अभियान’ को उसके सूत्र-संचालन तंत्र को भी गिने और निजी परिवार के अन्य लोगों में एक संख्या और बढ़ाकर उसकी साझेदारी भी स्वीकार करे, तो काम चले। बात उदारता सिकोड़ने-फैलाने भर की है, अन्यथा परिवार में एक बच्चा और बढ़ जाए तो उसके भरण-पोषण की गुंजाइश निकलेगी ही। शिक्षा, विवाह एवं उत्तराधिकार की व्यवस्था बनेगी ही। ऐसा ही कुछ निर्धारण, युगसृजन अभियान के संबंध में भी सोचा जा सके तो अनुदान इतना हो सकता है, जिसके सहारे उन कार्यों को आगे बढ़ाया जा सके, जिन्हें साधनों के अभाव में मन मसोसकर रोके रहना पड़ रहा है। प्रज्ञा परिजनों का उदात्त दृष्टिकोण और उदार सहयोग ही भावी बड़े क्रियाकलापों को उसी प्रकार आगे बढ़ाएगा, जैसा कि पिछले दिनों छोटे सहयोग से संपन्न किया जाता रहा है।


सद्वाक्य

धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म कः।

अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रमः।।

— महाभारते वनपर्वणि 131।11

जो धर्म दूसरे धर्मों का विरोधी हो, वह वास्तविक धर्म नहीं है। जिसका किसी से विरोध नहीं होता, वही वास्तविक धर्म कहलाता है।


तमसो मा ज्योतिर्गमय


तमसो मा ज्योतिर्गमय


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अगला युग-साधना अंक, अंतःक्षेत्र की श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठापरक भाव-संवेदना का कार्य ‘मनीषा' द्वारा संपन्न होता है। उस महान भांडागार की देव-दानव जैसी अद्भुत शक्तियों की उपलब्धि उद्भव-साधना की प्रखर ऊर्जा द्वारा संभव होती है। भक्ति और शक्ति के समन्वय से ही अध्यात्म की समग्रता बनती है।

इस अंक में युगमनीषा को संबोधित किया गया है। अगले अंकों में युग-साधना से संबंधित रहस्यों की अनावरण विज्ञ पाठक देखेंगे और एक अभिनव, किंतु अतिपुरातन शक्ति-स्रोत का परिचय प्राप्त करेंगे। अगले मास की प्रतीक्षा करें।


तमसो मा ज्योतिर्गमय (कविता)

तम प्रेरक है, दुष्प्रवृत्तियों, दुर्भावों का,

सत्प्रवृत्तियों का प्रेरक, पावन प्रकाश है।

छाई रहती वहाँ तिमिर की काली छाया,

दुष्प्रवृत्तियों, दुर्भावों का जहाँ वास है॥1॥

अंधकार में प्रायः सभी भटक जाते हैं।

सत्प्रवृत्ति के पहिए वहाँ अटक जाते हैं, क्रूर-कृत्य चलते रहते हैं अंधकार में,

सद्भावों के दर्पण वहाँ चटक जाते हैं।

कुंठाएँ, कुत्साओं और गहन होती हैं,

पीड़ा और पतन करते रहते विनाश हैं॥2॥

निर्ममता का नाता रहता सदा ज्योति से,

सद्भावों के सुमनों का विकास होता है।

प्राण प्रफुल्लित हो उठते, भरते उमंग से,

शक्ति जगाना, किरणों का प्रयास होता है।

जहाँ प्राण को नवप्रकाश मिलता रहता है,

वहाँ प्रगति है, उन्नति है, नूतन विकास है॥3॥

आओ! हम जनमानस का तम तोम मिटाएँ,

कुत्साओं का कुंठाओं का जोर घटाए।

रह न सके कोई भी जन अज्ञानग्रसित अब,

बाहर भीतर के सारे व्यवधान हटाएँ।

चलो! उगाएँ जनमानस में सूर्य ज्ञान का,

जनमानस को नवप्रभात की लगी आशा है॥4॥

धनी-अमावस का तम हम पीने वाले हैं,

दीप मालिका बनकर हम जीने वाले हैं।

परंपरा है चिर प्रकाश की संस्कृति की,

यह निशा न चुक जाए, तब तक जीने वाले हैं।

जलते और जलाते रहना, प्राण-प्रदीपों, 'युग-परिवर्तन' नवविहान का ही प्रयास है।’

— मंगल विजय

*समाप्त*