हमारे ऋषि कह गये हैं कि “आनन्द से ही सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। उसी से वे विकास पाने और अन्त में आनन्द में ही लीन हो जाते हैं।” इसका अर्थ यह नहीं कि ऋषियों को प्रकृति के नियमों का ज्ञान नहीं था अथवा वे कल्पना जगत में इतना विचरण करते थे कि उन्हें वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं रहता था। वायु, अग्नि और मृत्यु भी प्रकृति के कठोर अनुशासन में बंधे हैं, यह भी वे जानते थे। फिर भी उनका अन्तः-कवि हृदय आनन्द विभोर होकर यह गीत गाता था। आनन्द से ही सब जीव उत्पन्न होते हैं, विकास पाते हैं और आनन्द में ही जाते हैं। “आनन्द रुपमृत यद्विभाति” यह कहते हुए वे सृष्टि के आनन्द स्वरूप का ही वर्णन करते थे। आनन्द की पूर्णता की स्वाभाविकता ही इसी में है कि वह इस रूप में जो नियम व्यवस्था है, विधि अनुशासन हैं-अपनी अनुभूति करें-स्वयं को प्रकट करें। रूप हीन आनन्द रूप में प्रकट होने के लिये रचना करता है। गायक का आनन्द संगीत में, नर्तक का नृत्य में, कवि का छन्दों के रूप में प्रकट होता है। मनुष्य का असोध आनन्द भी कई रूपों में प्रकट होकर मनुष्य को निर्माता की पदवी दे देता है।
यह आनन्द जिसे-प्रेम-रस भी कहते हैं, स्वभाव से ही द्वित्वमय है। यह व्यक्ति को तो उसकी अनुभूति कराता है, आस-पास परिकर को भी उसके अन्तः के उल्लास का परिचय देता है। गायक गीत गाते हुए श्रोता भी होता है। प्रेमी अपनी प्रिय वस्तु के माध्यम से अपने ही रूप की छाया देखता है प्रिय वस्तु से वियोग की कल्पना भी उसी के आनन्द की कृति है जो वियोग के बाद फिर मिलन की इच्छा बन जाती है। परमात्मा का यह शाश्वत स्वरूप इन सबक अन्दर विद्यमान है। प्रेम साधना से-आत्मीयता विस्तार से-आनन्द उल्लास को बिखेर कर हम सब उसका प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं-यह एक शाश्वत सत्य है।
अध्यात्म विद्या एक प्रकार का गुह्य विज्ञान है, रहस्यवाद है-यह भ्रान्ति बहुसंख्य व्यक्ति यों के मन में जड़ जमाये बैठी हैं। सही मार्ग-दर्शन के अभाव में आत्मिक प्रगति के अधिकाँश जिज्ञासु भटकते, निराश होते देख जाते हैं। ब्रह्म को, मुक्ति को, ईश्वर को बहिरंग में नहीं, अपने अन्दर कैसे तलाशे-अपना विस्मृत स्वरूप पहचान कर किस प्रकार आगे बढ़े, इसका मार्गदर्शन करने के लिये यहाँ अध्यात्म तत्त्वदर्शन के सात स्वर्णिम सूत्र दिये जा रहे हैं। इस सार गर्भित दर्शन में सारी ब्रह्मविद्या का मर्म छिपा पड़ा है। ये सात सूत्र इस प्रकार हैं—
सूर्य का प्रतिबिम्ब लहरों पर चमकता है। हर लहर अलग-अलग दीखती है और सूर्य भी अगणित। किन्तु वस्तुतः समुद्र का जल भी एक है और सूर्य भी एक। मानवी सत्ता एक है जिसे समष्टि आत्मा-परमात्मा विराट्-विश्वमानव आदि कहते हैं। फिर भी शरीरों की भिन्नता के कारण वह लहरों की तरह अलग-अलग दीखता है। परब्रह्म एक है। उसी के प्रतिबिम्ब प्रकाश ज्योति के रूप में हर किसी के अन्तराल में विद्यमान हैं। कपड़ों की अनेक परतों से ढक देने पर बल्ब का प्रकाश धूमिल पड़ जाता है है। इसी प्रकार कषाय-कल्मषों-मल आवरणों से आच्छादित रहने के कारण अन्तराल में विद्यमान ब्रह्म सत्ता भी प्रसुप्त जैसी स्थिति में जा पहुँचती है। उसका प्रकाश उपयुक्त मार्ग-दर्शन करने में अधिक सफल नहीं हो पाता। जीवन में प्रगति और प्रखरता भर देने में जैसा उसका सहयोग एवं अनुदान सम्भव है वह के मध्य में खड़ी हुई दीवार है। इसे गिराने के लिए जिस संकल्प, साहस और पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है उसी को आत्म साधना कहते हैं। यह मनुहार, रिश्वत, याचना या गिड़गिड़ाहट नहीं आत्मशोधन की प्रक्रिया है। कच्ची धातु को शोधने पर ही उसका वास्तविक स्वरूप निखरता और उपयुक्त , आभूषण बनता है। ठीक इसी प्रकार आत्म शोधन की प्रक्रिया में जो जितना सफल होता है वह उसी स्तर का महामानव भगवद् भक्त , सिद्ध पुरुष माना जाता है। आत्मिक प्रगति का राजमार्ग आत्मशोधन ही हैं।
परब्रह्म की सत्ता ब्रह्माण्डव्यापी है। वह उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की नियति व्यवस्था बनाती और समस्त गतिविधियों को स्वसंचालित क्रम से अनुशासन से बाँध कर रहती है। उसकी उपासना कर्मफल व्यवस्था स्वीकारने, मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने और नीति मर्यादा का अनुशासन पालने भर से हो सकती है।
उपासना वाला परमेश्वर-परमात्मा-ससीम हैं। परब्रह्म असीम। ससीम परमात्मा की उन सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय समझना चाहिए जो मानवी गरिमा का स्तर ऊँचा रखने की प्रेरणा देती है। साथ ही पात्रता के अनुरूप प्रतिफल अनुग्रह, अनुदान भी प्रदान करती है। इसे मनोविज्ञान का भाषा में सुपर चेतना-परिष्कृत अन्तःकरण कहते हैं। अध्यात्म भाषा में इसी को परम ज्योति कहते हैं। यह देव सत्ता विश्वव्यापी हैं। जो उसके साथ जिस स्तर का संपर्क साधता उसे वह तदनुरूप निहाल करती रहती है। यही आत्मा परमात्मा के बीच चलने वाला आदान-प्रदान है। भक्त और भगवान के बीच चलने वाले आदान- प्रदान का यही केन्द्र बिन्दु है। भक्ति का तात्पर्य है अन्तराल में विद्यमान उच्चस्तरीय आस्थाओं के साथ एकात्म भाव की-अद्वैत की-स्थापना इसके लिए शरणागति, समर्पण, विसर्जन, विलय की मनोभूमि बनानी पड़ती है। बिन्दु का सिन्धु में, नाले का नदी में, पतंगे का दीपक में, चीनी का दूध में, पत्नी का पति में विलय विसर्जन इसका उदाहरण है कि आत्मा का परमात्मा में किस प्रकार एकात्म होना चाहिए। यह न तो कल्पना की उड़ान है न भावावेश का उत्तेजन, यह न तो कल्पना की उड़ान है न भावावेश का उत्तेजन, वरन् इसका सीधा और सुनिश्चित प्रमाण उपाय यह है कि भक्त अपनी क्षुद्र कामनाओं का ईश्वर के-विराट् के-आदर्श के चरणों में समर्पण करे और अन्तराल में परमात्मा के संकेत, संदेश एवं अनुशासन को पूरी तरह प्रतिष्ठित करे।
विश्वव्यापी उत्कृष्टता ही परमात्मा है। समष्टि आत्मा-विराट् ब्रह्म यही है। इसे अन्तराल में धारण करने के लिए स्थान खाली करना और बुहारना पड़ता है। संकीर्ण स्वार्थपरता की गन्दगी हटानी पड़ती है। उसके स्थान पर अपने को विराट् का एक छोटा घटक-विश्व नागरिक अनुभव करना पड़ता है। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना विकसित करके घर परिवार के थोड़े से लोगों को ही अपना मानते रहने की संकीर्णता छोड़नी पड़ती है और विश्व मानव के-समष्टि जगत् के प्रति अपनी सघन आत्मीयता विकसित करनी पड़ती है। वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को व्यावहारिक जीवन में उतारना पड़ता है। संक्षेप में स्वार्थ को परमार्थ में-संकीर्णता को व्यापकता में, कामना को भावना में परिणत करने का नाम ही ईश्वरी प्राप्ति है। जो इस दिशा में जितना आगे बढ़ा वह उसी स्तर का भक्त बना और भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर सकने में सफल हुआ है।
जीवन सत्ता को परमात्मा सत्ता मे-क्षुद्र को महान में-परिणत करने की प्रक्रिया विशुद्ध भावनात्मक है। दृष्टिकोण, रुझान, स्वभाव, आदर्शवादी परिवर्तन देखकर ही यह अनुमान लगाया जात है कि कौन किस स्तर का भगवद् भक्त है और किसे उस दिशा में कितनी सफलता मिली है। इसकी पृष्ठभूमि बनाने के लिए भगवान के-आदर्शवादी समुच्चय के साथ भक्त अपने आपे को जोड़ने, लिपटने और घटाने की भाव कल्पनाएँ करता रहता है। इसके लिए बेल का पेड़ के साथ लिपटना, बंसी का वादक के होठों से लगना, सीप को स्वाति बिन्दुओं को आत्मसात् करना, ईधन का आग में खप जाना, झाड़ियों का समीपवर्ती चन्दन की सुगन्ध अपने में भर लेना, नाले का नदी में मिलकर तद्रूप हो जाना, पतंग का उड़ाने वाले के इशारे पर उचकना, बाजीगर के इशारे पर कठपुतली का नाचना जैसे उदाहरणों के साथ आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती सघन आत्मीयता-शरणागति की-श्रद्धा विकसित करनी होती है।
वृक्ष का अस्तित्व एवं विकास उसकी जड़ों पर निर्भर रहता है। जड़े दीखती नहीं। तना, टहनियाँ और पत्र, पुष्प ही दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु अदृश्य तथ्य यह है कि जड़ें ही जमीन से खुराक खींचती और पेड़ को विकसित परिपुष्ट बनाती हैं। व्यक्तित्व वृक्ष की जड़े मनुष्य के अदृश्य अन्तराल में हैं। वे जितनी गहराई तक प्रवेश करती हैं-धरती से जितना खाद पानी खींच पाती हैं उसी अनुपात से वृक्ष बढ़ता है। वृक्ष को पत्ते, फलों फूला से लदते देखकर यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सुषमा आकाश के ग्रह नक्षत्रों ने भी स्वर्गस्थ देवताओं ने बरसाई है। बाहर का वैभव वस्तुतः आत्म सत्ता की पवित्रता और प्रखरता पर निर्भर है। बाहर भटकने में कस्तूरी मृग जैसी मूर्खता नहीं अपनानी चाहिए अंतर्मुखी होना चाहिए। अन्तराल को कुरेदना चाहिए। जमीन को जोतने से ही अच्छी फसल उगती है। जिसने अपने कुसंस्कारों का जितना परिशोधन कर लिया, जो चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता का जितना समावेश कर सका, समझना चाहिए उसकी समर्थता, सम्पन्नता और प्रगतिशीलता उसी अनुपात से सुनिश्चित हो गई।
आत्मदेव सबसे बड़ा देव है। उसकी सेवा साधना का प्रतिफल नकद धर्म का तरह सुनिश्चित है। हेय अन्तःकरण वाले नर-पिशाच नर-पशु नारकीय, पिछड़े पतित कहे जाते हैं और प्रतिकूलता, भर्त्सना एवं खीज़ से भरे रहते हैं। उदात्त परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वभाव, एवं क्रिया कलाप समन्वय स्वर्ग कहलाता है। उत्कृष्ट व्यक्ति त्व ही देवत्व है। संकीर्णताएँ, निकृष्टताएँ ही भव-बन्धन है जो उनसे उबर सका वह जीवन मुक्त कहलाता है।
व्यक्तित्व में चुम्बकत्व रहता है। वह अपने सजातियों को खींचता और घेरता रहता है। वह अपने सजातियों को खींचता और घेरता रहता है। वृक्षों का चुम्बकत्व बादलों को आकाश से खींचता और बरसने के लिए विवश करता है। धातुओं की खदान अपने चुम्बकत्व से दूर-दूर तक की भूमि से सजातीय कणों को खींचते और अपने भण्डार में निरन्तर वृद्धि करते रहते हैं। मनःस्थिति ही परिस्थितियों को-साथी सहयोगियों को-न्यौत बुलाती है। फूल खिलता है तो भौंरे गीत गाते और तितलियों के शोभायमान झुण्ड इठलाते हैं। गंदगी से मक्खी, मच्छर और दुर्गन्धित कृमि-कीटक लदे रहते हैं। इसमें किसी का बाहरी हस्तक्षेप नहीं। अपने ही आन्तरिक स्तर एवं आकर्षण का चमत्कार है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वर्तमान को सुव्यवस्थित बनाकर कोई भी अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकने में समर्थ है। इसी प्रकार दुष्टता-भ्रष्टता अपनाने से लेकर आत्म हत्या करने तक की हर किसी को छूट है। किन्तु कृत्यों का प्रतिफल सृष्टि व्यवस्था का अविच्छिन्न अंग है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक ही उपाय है अपने वर्तमान का सुव्यवस्थित निर्धारण। उसका तात्पर्य है आकांक्षाओं-विचारणाओं और गतिविधियों का उत्कृष्टता परक निर्धारण। यह कार्य हर किसी को स्वयं करना पड़ता है। दूसरे इस प्रयास में यत्किंचित् सहायता भर दे सकता है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना, व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की प्रक्रिया में स्वयं तत्परता बरतने पर निर्भर है। अपना काम आप ही करना चाहिए। ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।
उपासना के समस्त उपचारों का एकमात्र उद्देश्य है आत्मा को परमात्मा स्तर का विकसित करने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दो कदम अनवरत रूप से बढ़ाते चलना। आत्मशोधन अर्थात् संचित कुसंस्कारों का दृढ़तापूर्वक उन्मूलन। आत्म परिष्कार अर्थात् सत्प्रवृत्तियों का अपने गुण, कर्म, स्वभाव में अधिकाधिक समावेश। पूजा अर्चा के-योग तप के-जप ध्यान के समस्त क्रिया कृत्य-आत्मनिर्माण एवं आत्म विकास का लक्ष्य प्राप्त कराने के उद्देश्य से ही सृजित किये गये हैं। कार्य कारण को संगति बिठाकर जो क्रिया-कृत्यों को-लक्ष्य का ध्यान रखते हुए-भावना पूर्वक सम्पन्न करते हैं उनकी उपासना सही होने के कारण सुनिश्चित परिणाम भी उत्पन्न करती है-जो ऐसे ही अन्धेर में ढेले फेंकते हैं और मनमाने अर्थ लगाते हैं उन्हें भटकावजन्य थकान के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपासना याचना नहीं है। याचना करने से भी किसी को कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ कहाँ मिलती है। पात्रता और प्रामाणिकता ही सब कुछ रहे। याचना से उच्च पदवी किसे मिली हैं? प्रतिस्पर्धा जीतने वाले ही पुरस्कृत होते हैं।
भक्त और भगवान के मध्यवर्ती आदान-प्रदान में कुछ भ्रान्तियाँ इन दिनों बुरा तरह घर कर गई हैं। इनसे जितनी जल्दी पीछा छुड़ाया जा सके उतना ही उत्तम है। “भगवान प्रशंसा के भूखे हैं। उन्हें भेंट उपहारों की भारी जरूरत पड़ रही है। जो प्रशंसा और पूजा की जितनी रिश्वत देता है, उस पर भगवान उतने ही प्रसन्न होते हैं। प्रसन्नता का उपहार एक ही है-पूजा अर्चा करने वाले को उचित अनुचित मनोकामनाओं को पूरी कर देना। आज वही भ्रान्ति जन-जन के मन-मन में घुसी हुई है। पूजा पत्री का सारा उपचार इसी भ्रान्ति की धुरी पर भ्रमण करता है। इस मान्यता को अपनाने वाले ‘सस्ते में बहुमूल्य लाभ’ प्राप्त करने की नीति का औचित्य अनौचित्य तक नहीं सोचते। यह तो ठग विद्या, जेब कटी की मछलीमारों चिड़ीमारों जैसी दुर्गति हुई। इसमें भक्ति के साथ जुड़ी हुई नीति निष्ठा कहाँ है? कम देकर अधिक पाने की लिप्सा अनैतिक एवं अवांछनीय है। भक्ति को उत्कृष्टता में तो सेवा साधना की उदारता का समावेश रहता है। अधिक देकर कम पाने या न पाने की मनोवृत्ति की भक्ति भावना कही जाती है। भगवान को प्रसन्न करने और उनसे कुछ महत्वपूर्ण पाने के लिए इससे घटिया स्तर का दृष्टिकोण तनिक भी काम नहीं आता।
भगवान यदि तथाकथित भक्तों की मनुहार उपहार प्रक्रिया को ही सब कुछ मान बैठे और इतने भर आडम्बर से मनोकामना पूरी कर दे तो फिर उन्हें न्यायकारी, निष्पक्ष, कर्म व्यवस्था का सूत्र संचालक कैसे कहा जा सकेगा? ईश्वर अपना स्तर और विधान समाप्त करके ही भक्तों के लिए उनकी कामना पूर्ति वाली नई आचार संहिता गढ़ते तो ही यह आशा का जा सकती है कि पूजा उपचार के बदले मनोकामनाएँ पूर्ण होने का सिलसिला चल सके। इस स्वार्थान्ध परिकल्पना का अध्यात्म क्षेत्र से जितनी जल्दी बहिष्कार बन पड़े किया जाना चाहिए।
मनुष्य में भी अन्य प्राणियों की तरह कुछ जन्मजात प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। वे पूर्ण संचित अनुभवों एवं अभ्यासों का प्रतिफल है। विकास क्रम की लम्बी मंजिल पूरी करते-करते उसे बहुत कुछ भूलना और सीखना पड़ा है। इसी समुद्र मन्थन की उपलब्धियों से जितनी कुछ पूँजी हस्तगत है, उसी पिटारी को संचित प्रवृत्तियाँ कहा जा सकता है।
विगत शताब्दी के मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रवृत्तियों को असाधारण महत्व दिया है और लगभग पत्थर की लकीर जैसी मान बैठने की भूल की है। सामान्य-जन प्रेरणाओं से प्रेरित होकर रुचि लेते और कर्म करत हैं उसका पर्यवेक्षण करने पर उन्हें जिन अंतःप्रेरणा का पता चला है उन्हें उन्होंने मौलिक प्रवृत्तियाँ मान लिया और यह कहना आरम्भ कर दिया कि वे अकाट्य हैं। इन्हीं के समन्वय से व्यक्ति त्व बना है। इसलिए इन्हें हटाने की अपेक्षा तुष्ट करना चाहिए। इस प्रतिपादन का फल यह हुआ कि मनुष्य की स्थिति कठपुतली जैसी मानी गई और सोचा गया है कि जड़ पदार्थों की तरह ही मनुष्य की प्रकृति को बदलना भी अशक्य है। इस चिन्तन में मौलिक भूल यह होती रही है कि विकासवाद के उन सिद्धान्तों को भुला दिया गया जिन्हें अपनाकर एक कोशीय स्थिति से आगे बढ़ते-बढ़ते उस स्थिति तक पहुँचा जिसमें आज है। इस बीच जहाँ उसने अपनी काय संरचना में आश्चर्यजनक परिवर्तन किए वहाँ पुरानी आदतों, प्रवृत्तियों को भी सुधारता, समुन्नत बनाता चला गया। यदि यह क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है तो मनुष्य जीवन में प्रवेश पाने के उपरान्त वह प्रक्रिया क्यों समाप्त हो जायगी? और क्यों तथाकथित मूल प्रवृत्तियाँ जड़वत् जहाँ की तहाँ बनी रहेंगी? क्या मनुष्य शरीर प्राप्त करते ही अब तक की प्रवृत्ति परिष्कार प्रक्रिया समाप्त हो जायगी?
विकासवाद और मनोविज्ञान की यदि संगति बिठाई जाय तो भी यह आग्रह समाप्त हो जाता है कि मूल प्रवृत्तियों को परिष्कृत करने का प्रयास छोड़कर उनके तुष्टिकरण के लिए सिर झुका दिया जाय और रीति-नीति ऐसी अपनाई जाय जो प्रवृत्तियों के अनुरूप हो। देखना यह है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्तियाँ क्या है? यों सभी मनोविज्ञानी इस संदर्भ में एकमत तो नहीं हैं फिर भी उन सबके प्रतिपादनों का जो सार निकलता है उसे इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है। (1) कामुकता (2) आत्मरक्षा (3)आक्रमण (4) वरिष्ठता (5) साहचर्य (6) अनुकरण (7) ईर्ष्या (8)दुराव (9) आधिपत्य आदि।
कहा जाता हैं कि इन्हीं उत्तेजनाओं से प्राणियों की विभिन्न प्रकार की आकांक्षाएँ उत्पन्न होती हैं और उनकी पूर्ति के लिए तरह-तरह के उपाय सोचने एवं प्रयत्न करने पड़ते हैं। आज की तुलना में कल अच्छा स्थिति प्राप्त करने में अपने पुरुषार्थ जगाने, साधन बढ़ाने पड़ते हैं और दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा में उतरना पड़ता है। उसी आधार पर जीवनचर्या चलती और कुशलता तथा सुविधा बढ़ती हैं। यह भी कहा जाता है कि यदि इस प्रवृत्ति प्रवाह में अवरोध खड़े किए जाएँगे तो मानसिक कुण्ठाएँ बढ़ेगी और उनका शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और प्रगति क्रम में भी अवरोध उत्पन्न होगा।
यदि उपरोक्त प्रतिपादन को सही माना जाय तो उस ‘सर्वाइवल आँव फिटेस्ट’ के सिद्धान्त को भी सही मानना पड़ेगा जिसमें जंगल के कानून का समर्थन किया गया है। छोटी मछली को बड़ी मछली निगलती है, छोटे पौधों की खुराक ऊपर छाये हुए बड़े वृक्ष खा जाते है-वाली बात ही यदि प्रकृति को स्वीकार है तो फिर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली उक्ति को ही न केवल प्राणि समुदाय में वरन् मनुष्यों में भी चरितार्थ होता पाया जाएगा, अथवा प्रगति के निमित्त वैसा प्रचलन आरम्भ करना पड़ेगा।
विचारणीय यह है कि क्या सचमुच ही इस जगत में उपभोग, आक्रमण की वृत्तियाँ ही प्रधान रहेंगी और उसी आधार पर कुछ बलिष्ठों को जीवित रहने और शेष दुर्बलों को उनका शिकार बनते जाने का सिलसिला चल पड़ेगा। अभी तो यह प्रवृत्ति मात्र माँसाहारी जीव जन्तुओं में ही पाई जाती है और वह एक सीमित वर्ग पर ही लागू होती है, पीछे जब यह मान्यता प्रकृति प्रेरणा के नाम पर जोर-शोर से समर्थन प्राप्त करने लगेगी तो अपने पराये का भी भेद न रहेगा और जो वर्ग अभी सीमित उस आक्रामकता से बचे हुए हैं वे भी उसकी चपेट में आ जायेंगे? सिंह, व्याघ्र मात्र कुछेक पशुओं को ही बैठकर दाँतों में फँसा माँस निर्भय होकर निकालते कुरेदते रहते हैं, उनके लिए कोई संकट उत्पन्न नहीं होता। जलचर, थलचर, नभचर अपने-अपने वर्ग के कुछेक प्राणियों को आहार बनाते हैं और शेष के साथ छेड़खानी नहीं करते। पर जब भूख के लिए नहीं प्रगति के लिए आक्रामक वृत्ति का तुष्टिकरण आवश्यक माना जाएगा और उसके लिए अधिकाधिक अवसर प्राप्त करने का उत्साह उठेगा तो उसके लिए क्षेत्र विस्तार की आवश्यकता पड़ेगी और अधिकाधिक आक्रमण करने, अधिकाधिक लाभ उठाने की यह सामंतशाही एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जायगी जिसने मध्यकाल के अन्धकार युग में सारे नीति-नियम उठाकर ताक पर रख दिये थे और खुली लूट, कत्लेआम, युवा-युवतियों का दास-दासियों के रूप में अपहरण एक राज्य नियम बना दिया था। उन दिनों की रोमांचकारी घटनाओं की स्मृतियाँ तक आज भी दिल दहला देती हैं और गुहार उठती हैं कि हे भगवान् वे दिन लौटकर इस धरती पर फिर कभी न आयें।
उस मदान्ध प्रचलन को यदि मूल प्रवृत्तियों का तुष्टिकरण करने के नाम, प्रकृति प्रेरणा या प्रगति व्यवस्था में सम्मिलित करके लोक मान्यता स्तर तक पहुँचा दिया गया तो फिर अन्य प्राणियों का तो इस धरती से अस्तित्व उठ ही जाएगा, मनुष्य भी सुन्द-उप-सुन्द की कथा को चरितार्थ करते पाए जायेंगे और भाई को भाई का खून पीते देखा जाएगा । पूर्वजों के उत्तराधिकार में भाई ही प्रथम प्रतिद्वन्द्वी होता है। जब आक्रामकता और प्रतिद्वंद्विता ही नीति रही तो अन्यों पर आक्रमण करने से पहले भाई को ही क्यों न समाप्त किया जाय? ताकि बँटवारे में जो घाटा पड़ने वाला था उसकी आशंका हो न रहे।
जब कामुकता प्रकृति प्रेरणा हैं और उत्साह उभारने के लिए आवश्यक हैं तो उसकी पूर्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटकने का, नया झंझट बढ़ाने की क्या आवश्यकता हैं? परिवार की स्त्रियाँ जो पहले से ही घर में रहतीं और खर्च कराती हैं उन्हीं से काम तृप्ति का काम भी क्यों न चला लिया जाय। बहिन या बेटी का अन्यत्र विवाह करने की क्या आवश्यकता? पिता, भाई आदि उन्हीं से संपर्क बनाकर सरलतापूर्वक तृप्ति क्रम क्यों न चलाते रहें! जब नीति-मर्यादाओं का मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्तियों में कोई स्थान ही नहीं है तो उन परम्पराओं का निर्वाह क्यों किया जाय जिनका समर्थन उपरोक्त मल प्रवृत्तियाँ नहीं करतीं?
बच्चों को प्यार, दुलार देने और उनका पालन करने में एक ऐसा तत्व ही काम करता है जिनका न तो अर्थशास्त्र समर्थन करता है और न जिससे सुविधा संवर्द्धन में कोई सहायता मिलती है। ऐसी दशा में वात्सल्य को क्यों न प्रतिगामिता, कुरीति, मढ़ मान्यता घोषित करके उसे समाप्त कर दिया जाय? आँगन में उगने, फलने वाले शाक-भाजी पकाकर खाए जा सकते हैं तो बाल-बच्चों का वैसा ही उपयोग क्यों नहीं हो सकता।
ऐसी दशा में दया, उदारता, सेवा, दान, परोपकार जैसा उन सत्प्रवृत्तियों के समर्थन का भी कोई आधार नहीं रह जाता जो आत्म-रक्षा सुरक्षा, ईर्ष्या, आक्रामकता आदि किसी भी मूल प्रवृत्ति का समर्थन नहीं करतीं।
मूल प्रवृत्तियाँ यदि वही हैं जिन्हें फायड या उनके साथी प्रतिपादित करते हैं तो उनके साथ एक तथ्य और भी जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए कि प्रगति क्रम में मिली आ रही पुरानी आदतें भर हैं। आदतों की जड़ें यों होती तो गहरी हैं, पर साथ ही समयानुरुप वे बदलती भी रहती हैं। बचपन से लेकर यौवन काल में पहुँचने तक ढेरों बार आदतें बदल जाती हैं। छोटा बच्चा वातावरण का निरीक्षण करने और पड़े रहने को तुलना में खड़े होने या घूमने की इच्छा से अभिभावकों की गोदी में चढ़ने का प्रयत्न करता है और उसके लिए संकेत करने से लेकर मचलने तक का उपक्रम करता है किन्तु दो-तीन वर्ष का होते ही वह आदत बदल देता है और अपने पैरों चलने लगता है। इसी प्रकार असमर्थ रहने तक दूसरों का सहयोग पाकर काम चलाने की प्रवृत्ति भी हट जाती है। इतना ही नहीं उसमें लज्जा संकोच का अनुभव भी होने लगता है। शिशु की इच्छा होते ही कहीं भी मल-मूत्र त्यागने में संकोच नहीं होता किन्तु बड़ा होते ही समय और स्थान की अनुकूलता न होने तक उन्हें इस पर रोकथाम भी लगानी पड़ती है। ऐसे-ऐसे उदाहरण आये दिन देखे जाते हैं। विवाह के उपरान्त लड़कियों की आदत नई परिस्थितियों के अनुरूप किस तेजी से बदलती है इसे देखकर आश्चर्य होता है। परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाने में मनुष्य अपने स्वभाव, अभ्यास में किस प्रकार कितना परिवर्तन कर लेता है इसे कैदी, सैनिक और संन्यासी की पूर्व परिस्थितियों के साथ तुलना करने पर लगता है कि न केवल परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अन्तर आ गया वरन् स्वभाव भी बदल गया। साथ ही नया ढर्रा में रहने के लिए फिर से किसी प्रकार जेल में जा पहुँचें और निश्चिन्तता पूर्वक दिन गुजारे । आरम्भ में उन्हें जेल का प्रवेश कष्टकारक लगा होगा, पर बाद में तो वही अनुकूल बन गया और संतोषजनक लगने लगा।
यह उदाहरण बाहरी आदतों के सम्बन्ध में है। मूल प्रवृत्ति इससे गहरी होती है और प्रेरणा उत्पन्न करने वाले अन्तराल के साथ सम्बद्ध होती हैं। इतना होते हुए भी उन्हें अपरिवर्तनीय नहीं कहा जा सकता। मूल प्रेरणा में सुविधा संवर्धन, गौरव-सम्पादन कामोपभोग जैसे तथ्य भी जुड़े हो सकते हैं। पर वे इतने प्रबल नहीं है कि नैतिक परतों के साथ विग्रह खड़ा करें या उनके अनुशासन की सर्वथा उपेक्षा करने लगें। यदि ऐसा होता तो सदुद्देश्यों के लिए कोई त्याग-बलिदान की बात सोचने या करने में समर्थ हो न होता, वैसी उमंगें हो किसी के भीतर न उठतीं। वयस्क पुत्री के साथ अवसर मिलने पर पवित्रता बनाए रहने तक किसी के लिए भी शक्य न रहा होता। पर देखा इससे विपरीत ही जाना है। कसाई भी अपने बालकों तथा परिजनों को प्यार करते हैं और सहानुभूति भरा उदार व्यवहार करते हैं। आक्रमण की मूल प्रवृति को निरन्तर परिपोषण मिलते रहने पर तो कसाइयों को सर्वथा क्रूर हो जाना चाहिए था। पर ऐसा कुछ होता नहीं है इससे प्रकट होता है कि मूल प्रवृत्तियाँ अकाट्य नहीं है।
गत शताब्दी के मनोविज्ञानी शोधकर्ताओं ने लगता है उथले अन्वेषणों में सन्तोष कर लिया है। सम्भव है उसने ओछे स्तर के, नैतिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को अपने अन्वेषण का निमित्त कारण चुना हो। हो सकता है उन्हें शोधकाल की वर्तमान स्थिति को ही सब कुछ मान बैठने का भ्रम रहा हो। यदि ऐसा न होता तो उन्हें मूल प्रवृत्तियों में कुछ और भी ऐसी बातें मिल सकती थीं जो आदर्शवादी आदतों की पुष्टि करती और बताती कि वे भी अवसर पाते ही प्रकट और प्रखर हो सकती हैं। माता का सन्तान के प्रति जो भावभरा अनुदान होता है उसे कहीं से सिखाने-सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती और न उसके लिए कोई दबाव डालना पड़ता है। वह सब कुछ भीतर से ही उभर कर आता है। पीड़ितों के प्रति करुणा का, देशभक्ति जैसे उच्च उद्देश्यों के लिए प्राण उत्सर्ग करने का, ईश्वर भक्ति में भाव-विभोर होकर वैराग्य लेने की जो उमंगें अन्तराल में उठती हैं उन्हें भी किसी मूल प्रवृत्ति का कारण होना चाहिए। यह सोचा गया होता तो विश्लेषण कर्ताओं को जितने सूत्र हाथ लगे हैं वे अधूरे प्रतीत होते और उस शृंखला में उनने ऐसी खोजें भी की होती जो मूल प्रवृत्तियों की उत्कृष्ट परमार्थ परायणता को भी सम्मिलित कर लेती।
आदर्शवादिता का आचरण अपनाने पर अन्तराल में एक अलौकिक सन्तोष की अनुभूति होती है। यों बाहर से उसमें अनुदारता या अनाचार अपनाने की तुलना में घाटा, उपहास आदि सहने की ही अधिक सम्भावना रहती है। इतने पर भी यह सन्तोषानुभूति क्यों उठती हैं? चित्त में शान्ति और प्रसन्नता क्यों लगती है? इसका कारण भी किसी न किसी मूल प्रवृत्ति से जुड़ना चाहिए था। हिंस्र प्राणियों का आहार के लिए आक्रमण करना प्रकृति प्रेरणा भी कहा जा सकता, पर मनुष्य जैसे शाकाहारी, समूहवादी आदर्श में गरिमा अनुभव करने वाले विकसित प्राणी को भी उसी प्रवृत्ति का अनुयायी मान बैठना गलत है। प्रवृत्तियों के विश्लेषण से जो निष्कर्ष निकले हैं वे एक पक्षीय एवं एक परिस्थिति की परिस्थिति बालों को सामने रखकर किए गए प्रतीत होते हैं। अन्यथा आदर्शवादी जीवनयापन करने वालों की उच्चस्तरीय आदतों को भी शोध-क्षेत्र में सम्मिलित किया गया होता और देखा गया होता कि जिन्हें आधारभूत प्रेरणा माना जा रहा है, वे शाश्वत नहीं, मात्र परिस्थितिजन्य हैं। परिस्थितियाँ बदलने पर उनमें आमूलचूल परिवर्तन होना सम्भव है। जबकि हर प्राणी को मरण से भय लगता है और खतरे से बचने के लिए भाग खड़े होने की सूझती है तब सैनिक छावनियों में रहने वाले क्यों निरन्तर मौत के साथ खिलवाड़ करने में रस लेते और गर्व अनुभव करते देखे जाते हैं। वे युद्ध मोर्चे पर प्रबल शत्रु को देखते ही भाग खड़े होने की बात क्यों नहीं सोचते? देवभक्तों को सारा जीवन त्याग बलिदान से भरा-पूरा रखे रहने में स्वार्थ पोषक मूल प्रवृत्तियाँ बाधक क्यों नहीं बनती?
काम प्रवृत्ति यदि जन्मजात है और माता का स्तन पान करने में भी उसी कारण आनन्द मिलता है तो समर्थ होने पर सन्तान अपनी माता के साथ रमण करने में उत्सुकता क्यों नहीं प्रकट करती? ऐसे कुछ प्रश्न वर्तमान मनोविज्ञानियों की सूझ-बूझ से बाहर ही बने रहे होंगे। अन्यथा जान-बूझकर वे इतनी बड़ी समस्याओं को क्यों अनदेखा करते और क्यों अनसुलझा छोड़ देते?
नीति निष्ठा थोपी हुई वस्तु नहीं है। उत्कृष्टता को मूल प्रवृत्तियों के विपरीत कहा जाय तो फिर मानवी सुसंस्कारिता को भी अमान्य ठहराना पड़ेगा और प्रगति अद्यावधि इतिहास को झुठलाकर कोई ऐसा प्रतिपादन खोजना पड़ेगा जो पशु प्रवृत्तियों को ही आधारभूत कारण ठहराए रहकर भी भावनात्मक उत्कर्ष का कोई और कारण सिद्ध कर सके।
प्रवृत्तियों की प्रौढ़ता और समर्थता को मान भी लिया जाय और यह हठ किया जाय कि वे चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई ही हैं तो भी उसमें इतना सुधार तो बिना किसी असमंजस के किया जा सकता है कि उनकी तृप्ति के लिए ऐसे आधार भी ढूँढ़े जा सकते जो नीति-निष्ठा के साथ विग्रह न करें। प्रवृत्तियाँ काय तृप्ति और मनःतुष्टि के काम आती हों तो भी ऐसे अवसर उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय हो सके। इतना तो और भी अधिक सम्भव है कि सामान्य हास-परिहास से, विनोद कौतुक से भी उन्हें सन्तुष्ट किया जा सके।
जो हो, विज्ञ जनों ने देर से सही यह अनुभव किया है कि विज्ञान के नाम पर यदि उपयोगी मर्यादाओं का उल्लंघन चल पड़ा तो बाँध टूटते ही बाढ़ का पानी सर्वत्र फैलता चला जायेगा और खेत-खलिहानों घर-झोपड़ों को निस्सार करके रहेगा। अतएव वह आवश्यक है कि मानवी प्रगति की आधारभूत आदर्शवादी सत्प्रवृत्ति को इस प्रकार अस्त-व्यस्त नष्ट-भ्रष्ट न होने दिया जाय। इसके लिए उन्होंने मानवशास्त्र की अधूरी खोजों को अपर्याप्त माना और जो खोजना शेष रह गया है उसे पूरा करने का कदम बढ़ाया है। पिछली शताब्दियों में हुए थे और भ्रमवश नीति-विरोधी उच्छृंखलता समर्थक समझे गये थे। अब उनमें समुचित संशोधन किया जा चुका है। अपेक्षा यह की जा सकती है कि जब मनो विज्ञान वर्तमान प्रायः सन्धि को पार करके प्रौढ़ता तक पहुँचेगा वैसे ही प्रतिपादन करेगा जैसे कि दूरदर्शी मंचों से की जाती है।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति। नान्यः पंथा अयनाय विद्यते-श्वेताश्वर उपनिषद्
अर्थात्-उस आत्मा परमात्मा को जान कर व्यक्ति मृत्यु को जीत लेता है। मुक्ति प्राप्ति का इससे भिन्न और कोई उपाय नहीं है।
कोई भी वस्तु तब तक उपयोगी सिद्ध नहीं होती जब तक उसके विषय में पूरी जानकारी न हो। वह चाहे कितनी भी कीमती क्यों न हो, उसका ठीक उपयोग कर सकना तथा लाभ उठा पाना तभी सम्भव है जब उससे पूर्णतया परिचित हों। एक मोटर ड्राइवर मोटर के कल-पुर्जे से अवगत होता है तभी वह भली-भाँति गाड़ी को चला सकने में समर्थ हो पाता है। मोटर के विभिन्न अंगों की जानकारी न हो तो वह कभी न कभी दुर्घटना कर बैठेगा। डाक्टर दवाओं के विषय में अच्छी प्रकार परिचित होता है। रोगों के उपचार कर पाने में इसी कारण वह समर्थ होता है। दवाओं एवं उनका मनुष्य शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन न हो तो किया गया उपचार सफल नहीं होता, उल्टे हानि की सम्भावना बनी रहती है।
इंजीनियर को इंजीनियरिंग का ज्ञान होता है। सुन्दर मकान, बड़े-बड़े कल-कारखाने नहर, पुल का निर्माण कर सकना तभी सम्भव हो पाता है। अध्यापक अपने विषय में पारंगत होता है। विद्यार्थियों को ठीक निर्भर करता है। अधकचरे ज्ञान से वह विद्यार्थियों को ठीक प्रकार पढ़ा नहीं सकता उल्टे उनको क्षति ही पहुँचायेगा।
यह तो उन विषयों की बात हुई जिसके लिए विशेष प्रेम, समय एव मनोयोग लगाना पड़ता है। तत्पश्चात अभीष्ट सफलता मिलती है। उसका सही उपयोग बन पड़ता है। ऐसे सामान्य विषय भी हैं जिनकी जानकारी इस दृष्टि से आवश्यक होती है कि उनका प्रयोग हम दैनिक जीवन में करते हैं। दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं से सभी परिचित होते हैं। उनका प्रयोग विभिन्न कार्यों के लिए करते हैं। सामान्यतया ये जानकारियाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक होती हैं। सुचारु रूप से उनका उपयोग कर सकना तभी सम्भव हो सकता है। जीवन से सम्बन्धित एवं नित्य प्रयोग में आने वाली चीजों से परिचित होना आवश्यक है और उपयोगी भी।
जिस सत्ता द्वारा विभिन्न वस्तुओं का-संसार का-बोध होता है उसको जानना इन सबकी अपेक्षा कहीं अधिक आवश्यक है। आश्चर्य की बात यहाँ है कि जड़-वस्तुओं से मनुष्य भली-भाँति परिचित होता है किन्तु जिसके कारण उनके अस्तित्व का बोध होता है उससे सर्वथा अपरिचित बना रहता है। विचारशीलता का इससे बढ़कर दोष कोई दूसरा नहीं हो सकता। मैं का प्रयोग करते तो सभी हैं किन्तु 'मैं' क्या है, उसका स्वरूप क्या हैं-इस पर विचार करने तथा जानने का प्रयत्न बिरले व्यक्ति ही करते है इससे बढ़कर विडम्बना और क्या हो सकती है कि मनुष्य को अपने विषय में ही जानकारी न हो। अपना आइना ही पराया बना रहे। जीवन के स्वरूप, महत्व, लक्ष्य एवं उपयोग का पता न हो तो हर दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण हो कही जायेगी। अपनी चीजों से अपरिचित बने रहने में तो उस पर अन्य व्यक्ति ही अधिकार कर लेते हैं।
शरीर और वस्तुओं के विषय में मनुष्य ने अनेकों प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त कीं। उन्हें सुधारने, सँवारने के लिए कितने शास्त्र गढ़ डाले। किन्तु अपना आपा ही अनजान बना रहा। दूसरों को खिलाया गया, उनकी सेवा की गई किन्तु अपनी सत्ता भूखी बनी रही। न उसे जानने का प्रयत्न किया गया और न ही सँवारने का चेष्टा एवं मनोयोग इन्द्रियों की साज-सज्जा में लगी रहीं।
क्षमता, इन्द्रियों की आवश्यकता की पूर्ति में नियोजित होने के कारण अपने से ही अनजान बने रहे अपना वास्तविक के परिचय तो अपने द्वारा ही सम्भव है अपरिचित बने रहने का परिणाम ही है कि अपनी आत्मा की विभूतियों एवं उनसे मिलने वाले दिव्य अनुदानों में हम आजीवन वंचित रहते हैं। बाह्य आकर्षणों के भी करने की मृग तृष्णा का कारण है-आत्म स्वरूप एव उसकी सम्पन्नता का बोध न होना। यदि यह पता चल जाय कि अपना आपा कितना महान एव सम्पन्न है तो जब पदार्थों के लिए की जाने वाली अनावश्यक एवं अवांछनीय भाग-दौड़ समाप्त हो जाय।
बाह्य आकर्षणों में अत्याधिक लिप्त चेतना अपनी जानकारी से वंचित रह जाती है। जड़-पदार्थों में आबद्ध रहने से अपना परिचय मिल सकना सम्भव भी नहीं है। उससे विमुख होते, आसक्ति को विरक्ति में बदलने से ही स्व को-आत्मा की-खोज कर सकना सम्भव है। बुद्धि भी जड़ इन्द्रियों के सदृश्य है। वह भी इन्द्रियों की सहयोगी बनी रहती तथा उनके हाँ में हाँ मिलाती रहती है। प्रवृत्तियों को बाह्य जगत से मोड़ कर अन्तर्मुखी करने में इन्द्रियों के साथ वह भी अन्तरंग की खोज में सहयोग देने लगती है। जड़ तत्वों का ही उपादान होने के कारण बुद्धि भी शरीर को ही सब कुछ माने रहती है। अपने को शरीर मान लेना बुद्धि का एक बड़ा दोष है। 'मैं' का प्रयोग जिसके लिए किया जाता है वह शरीर नहीं है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि भी 'मैं' नहीं हो सकती। इनकी जानकारी एवं अनुभव भौतिक संसार तक सीमित है। इनकी क्षमता भी अपनी स्वयं की नहीं है। स्पष्ट है कि जिसके कारण इन्द्रियाँ एवं बुद्धि संचालित हैं वह कारण सत्ता ही ‘मैं’ है। उसका प्रकाश ही इन्द्रियों को करने एवं बुद्धि को सोचने का सामर्थ्य देता है। उसके आलोक से ही संसार का स्थल स्वरूप आकर्षण प्रतिभासित होता है। अन्यथा जड़ में आकर्षण कहाँ? आत्मा स्वयं आनन्द स्वरूप है। उसकी आनन्दमयी किरणें ही वस्तुओं पर पड़कर आकर्षण उत्पन्न करती है। भूल यह होती है कि आकर्षण वस्तुओं में मान लिया जाता है जबकि उसका केन्द्र बिन्दु अन्तरात्मा है।
अपने स्वरूप एवं सामर्थ्य से परिचित न होने कारण ही व्यक्ति यों, वस्तुओं एवं परिस्थितियों की पवित्रता स्वीकार कर ली जाती है। अन्यथा अन्तरात्मा इतनी समर्थ है कि उसे बाह्य परिस्थितियाँ प्रभावित नहीं कर सकती। अविवेक के कारण ही वस्तुओं की प्रतिभासित होने वाली सत्यता एवं नित्यता को यथार्थ मान लिया जाता है। विवेक के प्रकाश में अपने विषय में बोध होते ही इनकी निस्सारता स्पष्ट मालूम होने लगती है।
अन्तरात्मा शान्त एवं आनन्द स्वरूप है। वह इतनी सम्पन्न है कि उसकी सम्पन्नता में कभी अभाव हो ही नहीं सकता कामनाओं की तृष्णा जो आजीवन मनुष्य को उद्विग्न बनाये रहती है, अन्तरंग की सम्पन्नता प्राप्त होते ही गल जाती है और कुछ पाने की कामना नहीं रह जाती है। जो भौतिक वस्तुएँ आकर्षक प्रतीत होती थी वे ही नीरस लगने लगती हैं। अपने दिव्य स्वरूप के अलौकिक आनन्द की मस्ती में डूबे साधक को जड़ वस्तुओं एवं संसार की वास्तविकता का बोध हो जाता है। ऐसी स्थिति में पहुँचा हुआ साधक शरीर को-इन्द्रियों को-वाहन मानकर उनका सदुपयोग श्रेष्ठ कार्यों के लिए करता है।
शरीर वस्तु एवं संसार की जानकारी एक सीमा तक उपयोगी हो सकती है। किन्तु इनसे भी आवश्यक है-अपने विषय में जानना-अपनी क्षमताओं से परिचित होना। अपने विषय में अपरिचित बने रहने से जीवन का सही उपयोग कर सकना सम्भव नहीं हो पाता। जो परिणाम एक अनाड़ी ड्राइवर, अज्ञानी डाक्टर एवं उथली जानकारी रखने वाले अध्यापक का होता है, वही मनुष्य को भी होता है अपना आपा ही अनजान बना रहा जो मनुष्य जीवन का इससे बढ़कर दुर्भाग्य दूसरा कोई नहीं हो सकता है। अपने को जानना ही मानव जीवन का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए
यथा वायं समाश्चित्य बर्तते सर्व जन्ततः। तथा गृहस्थमाश्रित्य बर्तन्ते सर्व आश्रमाः॥
यस्मत्त्रयोऽप्या श्रमिणों दानेनान्नेन चान्बहम्। गृहस्थेनैत धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमों गृही॥
जिस प्रकार सारे प्राणी वायु के आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार सारे आश्रम गृहस्थ के आश्रित रहते हैं।
ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों आश्रमों को अन्नादि के दान से पालन करने वाला गृहस्थाश्रम ही सबसे श्रेष्ठ है।
समस्याएँ असन्तुलन से उत्पन्न होती है। व्यक्ति और समाज, पिण्ड और ब्रह्माण्ड सबमें ही यह नियम समान रूप से लागू होता है। असन्तुलन शरीर में विभिन्न प्रकार के रोगों के रूप में प्रकट होता है और समाज में वह विघटन, विद्वेष एवं अवांछनीय प्रवृत्तियों के रूप में अपना परिचय देता है। जड़ परमाणुओं में विस्फोट इस तथ्य का परिचायक है। अन्तर्ग्रही विक्षोभों में यह व्यतिक्रम ही काम करता दिखाई पड़ता है। चाहे जड़ परमाणु हो अथवा चेतन शरीर, समाज हो अथवा ब्रह्माण्ड ये सभी सुव्यवस्थित एवं उपयोगी सुसंतुलन के कारण ही बने रहते हैं।
सात सिद्धान्त ऐसे हैं जो व्यक्ति , ब्रह्माण्ड सभी को समान रूप से प्रेरणा देते, सन्तुलन रखते एवं प्रगति पथ पर आगे धकेलते हैं। वे है—(1) सहकारिता (2)संघर्षशीलता (3) सामंजस्य की प्रवृत्ति(4) क्रियाशीलता (5) अनुशासन (6) गतिचक्र (7) एकात्मता। ये ही जड़-चेतन की सुव्यवस्था एवं प्रगति के आधारभूत कारण हैं।
शरीर का स्वास्थ्य एवं विकास इन्हीं पर अवलम्बित है। आकार एवं प्रकार में शरीर के अंग-प्रत्यंग दीखते भर अलग-अलग हैं। इनकी क्रियाओं में भी अन्तर दिखाई पड़ता है। शरीर की गतिविधियों को सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो मालूम होगा कि एक अंग की उपयोगिता दूसरे के सहकार पर टिकी हुई है। हाथ काम करता है, पैर शरीर का बोझ सम्हालता है। दोनों के कार्य अलग हैं पर अवलम्बित हैं-एक दूसरे पर। पैर बागी हो जाय तो शरीर को खड़ा रखना मुश्किल होगा। हाथ अपनी भूमिका सिकोड़ ले तो श्रम के अभाव में भूखों मरने की स्थिति आ जायेगी। शरीर के भीतरी अवयवों पर भी यही नियम लागू होता है। भोजन करने से लेकर, पाचन से रसों में परिवर्तन तक और रसों से रक्त , मज्जा, हड्डी एवं माँस बनने तक की प्रक्रियाओं में विभिन्न संस्थानों की सहयोग भरी भूमिका ही सम्पन्न होती दिखाई पड़ती है। परिवार एवं समाज की सुव्यवस्था भी सहकार की भावना पर आधारित है। समाज रूपी बृहद् परिवार का हर व्यक्ति इकाई है। इसमें रहने वाले व्यक्तियों की योग्यताओं एवं क्षमताओं में अन्तर है। कोई किसी कार्य में निपुण है तो कोई किसी में। एक व्यक्ति प्रत्येक कार्य में दक्ष नहीं हो सकता।
जीवनरूपी गाड़ी को गतिशील रखने के लिए विभिन्न प्रकार के साधनों की आवश्यकता पड़ती है। जिनकी आपूर्ति कोई भी व्यक्ति अपने एकांगी बलबूते नहीं कर सकता। परस्पर एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। कृषक अन्न पैदा करता है और उदार हृदय से एक छोटा-सा भाग अपने लिए रखकर शेष समाज के लिए दे देता है। श्रमिक विभिन्न प्रकार के उत्पादनों द्वारा दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं। व्यवसायी वस्तुओं के आदान-प्रदान द्वारा उन्हें उपलब्ध कराने में सहयोग देते रहे हैं। अध्यापक शिक्षा के अनुदान से समाज का बौद्धिक विकास करते हैं। चिकित्सक स्वास्थ्य रक्षा का दायित्व सम्हालते हैं। सबका कार्य अलग-अलग है, पर समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे पर किसी न किसी कार्य के लिए आश्रित है। सभी के सहकार से ही जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की आपूर्ति होती है।
व्यक्ति एवं समाज के चेतन घटक में ही नहीं, पिण्ड एवं ब्रह्माण्ड के जड़ परमाणुओं में भी सहकार की परम्परा ही उनके सन्तुलन को बनाये रखती है। ग्रह नक्षत्र अपनी सम्पदा को अपने तक ही सीमित नहीं रखते दूसरे ग्रहों को भी देते हैं। सूर्य की उदारता तो देखते ही बनती है। अपने मण्डल के समस्त ग्रह नक्षत्रों को ऊर्जा एवं प्रकाश बाँटता रहता है। अन्यान्य ग्रह भी सन्तुलन चक्र में अपना सहयोग देते हैं। अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान से ही सामंजस्य बना रहता है।
सहयोग के साथ संघर्ष का क्रम भी अनिवार्य रूप से डडडडडा है। सन्तुलन के लिए यह भी आवश्यक है। सहयोग सजातीय के प्रति-सत्प्रवृत्तियों के प्रति होना आवश्यक है। विजातीय तत्व-अवांछनीयताओं के प्रति नहीं। वहाँ तो संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ता है। विकृतियाँ समय-समय पर कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं। वे शरीर की हो अथवा समाज की उनसे लोहा लेना पड़ता है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए शरीर के अंगों का आपसी सहकार जितना आवश्यक है उतना ही बाहरी अवरोधों से सुरक्षा के उपाय भी। नेत्र को हर क्षण धूल के कणों, छोटे कीड़ों का सामना करना पड़ता है। रक्त के श्वेत कण बाहर से आये विषाणुओं को मारने के लिए अपनी पूरी शक्ति से जुट जाते हैं। हार और जीत का-मरने और मारने का फैसला हुए बिना वे कुशल सैनिकों की भाँति युद्ध मोर्चे पर डटे रहते हैं। संघर्ष की यह प्रवृत्ति ही शरीर संस्थान को बीमारियों के बाह्य प्रकोप से बचाये रहती है। कमजोरी जराजीर्ण स्थिति में इसके अवरोध आने से ही अनेकों प्रकार की बीमारियाँ अपना अड्डा शरीर में जमा लेती हैं।
समाज की सुव्यवस्था के लिए भी सहकार के साथ-साथ संघर्ष का होना आवश्यक है। अवांछनीय तत्व वहीं घुसपैठ मचाते हैं जहाँ वे देखते है कि विरोध का अभाव है। विरोध न करने के करण ही चन्द डाकू आततायी अपने प्रयोजन में सफल हो जाते हैं अन्यथा उनकी इतनी सामर्थ्य कहाँ कि विपुल जन-समुदाय से लोहा ले सकें। समाज का पराभव सहकार के अभाव में ही नहीं होता वरन् अवांछनीयताओं के प्रति संघर्ष न करने के कारण भी होता है।
सन्तुलन के लिए तीसरा सिद्धान्त है-सामंजस्य की प्रवृत्ति-परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की कला। सहनशीलता सहिष्णुता का गुण। मौसम के अनुरूप शरीर अपने को ढाल लेता है। शीत ऋतु में ठण्ड सहन करने की क्षमता तथा गर्मी में ताप सहन करना। अभ्यास करने पर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रहने की सामर्थ्य विकसित कर लेता है। ध्रुव प्रदेशों की भयंकर ठण्ड एवं सहारा जैसे मरुस्थल की भीषण गर्मी में भी शरीर अपने को ढाल लेता है। शरीर की सहनशीलता एवं सहिष्णुता की क्षमता ही उसका अस्तित्व बनाये रखती है।
सामंजस्य समाज की सुव्यवस्था के लिए भी अपनाना पड़ता है। समाज में रहने वाले व्यक्तियों के स्वभाव अभिरुचियों में भारी अन्तर होता है। हर मनुष्य में देव और दानव भी-सद्गुण है और अवगुण भी। उनसे तालमेल बिठाकर चलना पड़ता है। अवगुणों से अपने को बचाये रखने तथा सद्गुणों से लाभ उठा लेना सामंजस्य दृष्टि द्वारा ही सम्भव है। हर व्यक्ति को न तो अपने इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है और न ही स्वभाव में परिवर्तन किया जा सकता है। आपसी संघर्ष परस्पर ताल-मेल न बिठा पाने के कारण ही उत्पन्न होता है।
जड़-चेतन में, व्यक्ति एवं समाज में सन्तुलन के लिए चौथा महत्वपूर्ण पक्ष है क्रियाशीलता का। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय स्पष्ट होगा कि विराम नाम की स्थिति का कहीं भी अस्तित्व नहीं है। स्थिर-जड़ दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं के परमाणुओं में भी तीव्र गति हो रही है। बिना विश्राम लिये परमाणु के कण प्रोटान, इलेक्ट्रान एक निश्चित गति से नाभिक के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे हैं। वस्तुओं का अस्तित्व इस गति प्रक्रिया पर ही टिका हुआ है। यह एक क्षण के लिए भी बन्द नहीं होता स्थिरता का अर्थ होगा वस्तु को अपनी सत्ता ही गँवा बैठना।
विराट् सृष्टि का कोई भी घटक स्थिर नहीं रहता। पृथ्वी 29.8 कि. मी. प्रति सेकेण्ड की गति से चक्कर काट रही है। चन्द्रमा तीव्र रफ्तार से दौड़ा चला जा रहा है। सूर्य भी स्थिर नहीं है। अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की भी यही स्थिति है। उनमें से एक भी विश्राम के मूड में आ जाय तो सारा सन्तुलन डगमगा जायेगा।
बाह्य रूप से स्थिर दिखाई पड़ते हुए भी शरीर के भीतर निरन्तर गति बनी हुई है। श्वास 18 बार प्रति मिनट के हिसाब से भीतर आता है। हृदय 72 सब 75 बार प्रति मिनट धड़कता है। हृदय 5−6 लीटर रक्त प्रति मिनट फेंकता है। रक्त 07 से. मी. प्रति सेकेण्ड की गति से चलता है। शरीर के भीतरी अवयव कभी भी शान्त नहीं बैठते। स्थिरता तो मृत्यु का पर्याय है-क्रियाशीलता जीवन का शरीर ही नहीं परिवार एवं समाज को सुविकसित करने, जीवन्त बनाये रखने में गतिशीलता की ही भूमिका होती है।
पाँचवाँ पक्ष है-अनुशासन का। अनुशासन के अभाव में क्रियाशीलता उच्छृंखल बन जाती है। यही जड़ परमाणुओं को आपस में बाँधे रहता है परमाणु के प्रत्येक कण अपनी निर्धारित कक्षा एवं गति में चक्कर काटते रहते हैं। अनुशासन की मर्यादाओं का उल्लंघन करते ही भयं कर विस्फोट का संकट उत्पन्न हो जाता है। शरीर के प्रत्येक अवयव अपने सीमा क्षेत्र में रहते हुए अपनी निर्धारित भूमिका सम्पन्न करते हैं। उनके बागी होते, उच्छृंखल बनते ही अनेकानेक रोग उठ खड़े होते हैं। तथा जीवन-मरण तक का संकट उत्पन्न हो जाता है।
पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता एवं अनैतिकता को बढ़ावा देती हैं। नैतिकता का अंकुश न रहे तो परिवार को टूटते एवं समाज को बिखरते देरी नहीं लगती। जड़ सृष्टि हो अथवा चेतन दोनों के सन्तुलन के लिए अनुशासन का होना आवश्यक है।
जड़-चेतन को सुव्यवस्थित बनाये रखने के लिए एक स्वचालित प्रक्रिया चल रही है। जिसे गतिचक्र कहते हैं। जिसका एक निश्चित प्रयोजन है। सृष्टि का प्रत्येक घटक अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न है। बादल बरसता है पृथ्वी की प्यास बुझाने के लिए। नदियाँ प्राप्त जल को समुद्र को सौंप देती है। समुद्र भी संग्रह नहीं करता। प्राप्त जल को वाष्प बनाकर उड़ा देना है जो बादलों में परिवर्तित हो जाता है। यह चक्र बिना किसी व्यतिरेक के चलता रहता है।
शरीर में भी यह परिवर्तन चक्र सतत् देखा जा सकता है। भोजन से रस, रस से रक्त माँस-मज्जा बनने की प्रक्रिया निर्बाध रूप से सम्पन्न होती रहती हैं। नई कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं-पुरानी का निष्कासन होता है। शरीर मरता है-नये का प्रादुर्भाव होता है। फलतः जीवन-मरण का चक्र जीव-जगत का प्रवाह बनाये रहता है। यदि वह चक्र रुक जाय तो जीवन का अस्तित्व हो संकट में पड़ जायेगा ।
सहकारिता, संघर्षशीलता, सामंजस्य, क्रियाशीलता, अनुशासन, गतिचक्र के सिद्धान्त एकात्मकता के बिना अधूरे रह जाते हैं। समस्त सृष्टि में-जड़-चेतन में एक जोड़ने के लिए ही सभी व्यापार चल रहे हैं। एक सत्ता में समस्त सृष्टि गुँथी हुई है। एक ब्रह्म ही सर्वव्यापी है- सब में समाया हुआ है। सभी सिद्धान्त इसी तथ्य का बोध कराते हैं। प्रकृति एवं जीव जगत के बीच काम कर रहा इकालोजिकल सन्तुलन उस एक सत्ता का ही परिचय देते हैं। जैसे-जैसे इस दिशा में मनुष्य के कदम आगे बढ़ेंगे वह विराट् एक चेतना और भी स्पष्ट रूप में व्यक्त होती जायेगी। अनुभूति का अभाव ही समाज में अनेकानेक समस्याएँ खड़ी कर रहा है। एकात्मता के बोध से ही समाज में स्नेह-सौहार्द एवं आत्मीयता की भावना बढ़ेगी।
ये सात सिद्धान्त ऐसे हैं जो सन्तुलन के लिए आवश्यक हैं। चाहे वह शरीर के लिए अभीष्ट हो अथवा समाज अथवा ब्रह्माण्ड के लिए। इन सातों का परिपालन अनिवार्य हैं। असन्तुलन जन्य विक्षोभों को दूर करने के लिए मनुष्य को इन सातों सिद्धान्तों का व्यावहारिक जीवन में समावेश करने से चैन से रहने और प्रगति डडडड पर आगे बढ़ने का सुयोग मिलेगा।
‘नानिरतो दुश्चरितान्नाशान्तो ना समाहितः। ना शान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्-कठोपनिषद्
अर्थात्-जो मनुष्य निषिद्ध कर्मों से विरत नहीं है, जिसने अपनी इन्द्रियों को जीता नहीं है, जिसका मन एकाग्र नहीं है, जिसका चित्त शान्त नहीं हुआ है-उसको आत्म-साक्षात्कार कभी नहीं होता है।
सामान्य पौधों में उच्चस्तरीय पौधों की कलम लगा कर विकसित कि स्म के वृक्ष वनस्पतियाँ उत्पन्न करने में पिछले दिनों उत्साहवर्धक सफलताएँ मिली हैं। एक ही पेड़ पर अनेक किस्म के फूल और अनेक किस्म के फल लगा देने जैसे चकित करने वाले प्रतिफल सामने आये हैं। देर से बढ़ने और छोटे एवं खट्टे फल देने वाले आम की कलम बनाने की विधि अब सर्व विदित है उस आधार पर थोड़े ही समय में बड़े आकार के एवं मीठे फल उत्पन्न किये जाने लगे हैं। चीकू जैसी अनेक कलमी जातियाँ अपने अनोखेपन का परिचय दे रही हैं। फूलों में भी यह प्रयोग सफल हुआ है। गुलाब की इतनी अधिक किस्में सामने हैं कि उनकी भिन्नता और विचित्रता देखते ही बनती हैं। शाक और धान्य के क्षेत्र में भी क्रान्तिकारी परिणाम उपलब्ध हुए हैं। पशु और पक्षियों की कितनी ही नई बिरादरी उत्पन्न कर ली गई हैं। इन प्रयोगों में घोड़े और गधे की कलम लगाकर खच्चर उत्पन्न करने का प्रयोग तो शताब्दियों पूर्व सफल हो चुका है। मुर्गे और मछलियों पर यह प्रयोग अत्यन्त उत्साह के साथ चल रहा है। गाय जैसे दुधारू पशुओं को अपने वंश परम्परा को द्रुतगति से उल्लंघन करने और एक नया वर्ग बना कर खड़ा कर देने में सफलता मिल चुकी हैं। जिन्हें कौतूहलवर्धक प्रयोगों में रस आता है वे प्राणियों के निर्माण में प्रजापति की भूलों को सुधारने और जीव सृष्टि को नये सिरे से गढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। सफलताएँ उनकी हिम्मत को दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रही हैं। कुत्तों की बिरादरी में छः इंच ऊँचाई जितने छोटे और गधे जितने ऊँचे किस्म के नये जानवर रच लिये गये हैं। यह कलम लगाकर उत्पन्न की जाने वाली बिरादरियाँ अपने पूर्वजों की तुलना में शारीरिक क्षमता और स्वभाव विशेषता की दृष्टि से आश्चर्यजनक मात्रा में भिन्न किस्म की बन रही हैं। कलम पर नई कलम, नई कलम पर नई कलम-चढ़ाते-चढ़ाते बात यहाँ तक पहुँची है कि आगे चल कर यह ढूँढ़ निकालना तक कठिन हो जाता है कि इसके मूल पूर्वज कौन थे और किस स्थिति में रह रहे थे? इसे कलम लगाने की विद्या की चमत्कारी सफलता कहा जा सकता है।
‘मानव कलम’ या जेनेटिक इंजीनियरिंग को अब विज्ञान में एक अति महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है। जे.बी.एस. हैल्डेन ने जो इस शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली जीव वैज्ञानिक माने जाते हैं, कहा था कि “यदि कुशलता से मानव कलम को तैयार किया जाये तो समस्त कमियों को दूर कर एक नया मानव बनाया जा सकता है।” फ्राँसीसी जीव वैज्ञानिक जीन रोंसे का विचार हैं-मानवी कलम का उपयोग व्यक्ति के खण्डित स्वरूप को नये स्वरूप में बदलकर उसे अमरत्व प्रदान करने के लिये किया जा सकता है।” इस कार्य में वरीयता प्राप्त करने वाले इस दशाब्दी के वैज्ञानिक हैं नोबुल पुरस्कार प्राप्त डा. जोशुआ लेडरबर्ग एवं यू. सी. एल. ए.के डा. एलोफ एक्सेल कार्लसन। डा. लेडरबर्ग का सुझाव है कि-शरीर कोशिका दान करने वालों का उपयोग उनके युवा अंकुरों को बढ़ाने के लिये किया जा सकता है। उनके अनुसार समान जीव वाले ऐतिहासिक व्यक्ति यों की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने के लिये मृतकों की भी मानव कलम लगायी जाए।
अब जीन संश्लेषण से जीवित व्यक्ति का प्रतिरूप, एक प्रतिमानव एक वैज्ञानिक सत्य है। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘इन हिज इमेंज, क्लोंर्निग आँफ मैन’ में डेविड रोरविक ने इसका बड़ा आश्चर्य चकित करने वाला वर्णन किया है।
डा. रोरविक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सुविकसित स्तर पर मनुष्य की हू-बहू वैसी ही ‘ब्लूप्रिन्ट’ कापियाँ बनाकर तैयार की जा सकेंगी। तव गाँधी और जवाहरलाल के न रहने से किसी क्षति की आशंका न रहेगी क्योंकि उनके जीवन काल में ही अथवा मरने के बाद हू-बहू वैसे ही व्यक्ति सैकड़ों हजारों की संख्या में प्रयोगशालाएँ उत्पन्न करके रख दिया करेंगी। एक अन्य डा. रोस्टाक ने टिश्यू कल्चर अर्थात् “कोशिकाओं की खेती” के अगले दिनों सामान्य बागवानी की तरह प्रयुक्त होने की भविष्य वाणी की है। कार्नेल विश्व विद्यालय के डा. फ्रेंड्रिक सी स्टीबर्ड द्वारा गाजर की एक कोशिका को पूरी गाजर में विकसित करने में सफलता प्राप्त करने के बाद अब यह सोचा जाने लगा है कि मनुष्यों की भी ऐसी ही अभीष्ट पीढ़ियाँ उत्पन्न करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
विचारक माँल कम मेगरिज का कथन है कि सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक प्रकृति के जितने रहस्य जानने में मनुष्य को सफलता मिली थी, उसकी तुलना में कहीं अधिक ब्रह्माण्ड का रहस्योद्घाटन इस शताब्दी में हुआ है। यह क्रम आगे आर भी तीव्र गति से चलेगा। इन उपलब्धियों में एक सबसे बड़ी कड़ी जुड़ेगी अभीष्ट स्तर के मनुष्यों के उत्पादन की। अगले दिनों शरीर की दृष्टि से असह्य समझी जाने वाली परिस्थितियों में रहने वाले मनुष्य उत्पन्न किये जा सकेंगे और विद्वान दार्शनिक कलाकार, योद्धा, राजनीतिज्ञ वैज्ञानिक, व्यापारी, श्रमिक आदि वर्ग न्यूनाधिक योग्यता के आवश्यकतानुसार उत्पन्न किये जा सकेंगे। तब मनुष्य सर्व शक्ति मान न सही असीम शक्ति सम्पन्न अवश्य ही कहा जा सकेगा।
कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टैकनोलाँजी के डाक्टर विलियम जेड्रेअर ने भविष्यवाणी की है कि ऐसे निरोधक तत्वों का जीन्स में प्रवेश कराया जा सकेगा जो पैतृक रोगों का उन्मूलन करके नयी स्वस्थ स्थापना के लिए रास्ता साफ कर सके। यह तो निवारण की बात हुई। इसका दूसरा पक्ष स्थापना का है। जिस प्रकार किसी अच्छे खेत में इच्छानुसार बीज बोकर अभीष्ट फसल उगाई जा सकती है उसी प्रकार परम्परागत अवरोधों को हटा सकने की सफलता के साथ एक नया अध्याय और जुड़ जाता है कि वंश तत्व में इच्छानुसार विशेषताओं के बीज बोये जा सकेंगे। अगली पीढ़ियों को वैसा ही उत्पन्न किया जा सके जैसा कि चाहा गया था।
वस्तुतः आनुवांशिक इंजीनियरिंग के रूप में एक नयी क्रान्ति विज्ञान जगत में हुई हैं। पिछले दिनों जीव-विज्ञानियों एवं आनुवांशिकी के अधिकाँश शोधकर्ताओं का ध्यान इस दिशा में विशेष रूप से नियोजित रहा। इसकी कल्पना करीब 15 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक हरमन जोसेफ मूलर ने की थी। उन्हें आनुवांशिकी के क्षेत्र में अनुसंधान हेतु नोबुल पुरस्कार भी मिला। अपनी मृत्यु से 6 माह पूर्व शिकागो में सितम्बर 66 में हुये मानवीय आनुवांशिकी अधिवेशन में उपस्थित वैज्ञानिक समुदाय से उन्होंने अनुरोध किया था कि एक शुक्राणु बैंक की स्थापना की जानी चाहिये जिसमें शारीरिक विकास, मानसिक प्रखरता, एवं नैतिक दृष्टि से ऊँचे गण वाले प्रख्यात महापुरुषों के शुक्राणुओं को जमा किया जा सके। स्वस्थ, सुन्दर और सच्चरित्र भावी सन्तान जन्म ले, इसके लिये उपयुक्त माँओ का चयन कर कोल्ड स्टोरेज से इन शुक्राणुओं की वितरण व्यवस्था की जानी चाहिये।
क्रोमोज़ोम व जीन्स के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध करने वाले नोबेल पुरस्कृत वैज्ञानिक क्रीक, जिनके नाम पर डी. एन. ए. की संरचना वाले मॉडल का नाम रखा गया है, तो तानाशाही व्यवस्था का समर्थन करते हुये इस प्रकार के प्रयोगों पर अपनी वैज्ञानिक मुहर भी लगा चुके हैं। उनका मन्तव्य है कि राष्ट्र को जैसी सन्तानों की आवश्यकता है, वैसी ही पीढ़ी वैज्ञानिक तैयार करें। इसके लिये वे सन्तानोत्पत्ति की स्वतन्त्रता अविलम्ब समाप्त करना चाहते हैं। उनके अनुसार किसी ऐसी वस्तु का आविष्कार होना चाहिये जिसे भोजन में मिला देने से ही सबकी प्रजनन शक्ति समाप्त हो जाये। इसका एण्टीठोट (विलोम) सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाये जिनके बच्चों की शासन को आवश्यकता हैं।
वास्तव में ‘जीन्स’ की विस्तृत लीला जानने के लिये जितने अधिक वैज्ञानिकों ने अपने श्रम को इसमें नियोजित किया है, वह अपने आप में एक कीर्तिमान है। जीन्स के सूक्ष्म घटक डी. एन. ए. की संरचना ज्ञात हो चुकी है। जीन्स के चित्र लिये जा चुके हैं। डी. एन. ए. द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेने की सम्पूर्ण आनुवांशिक संहिता को जान कर अब सीधे उसी पर प्रयोग किये भी जा रहे हैं।
ब्रिटेन की इण्टरनेशनल साइन्स राइटर्स ऐसोसिएशन के अध्यक्ष जी. आर. टेलर थे अपनी पुस्तक “दि वायो लाँजिकल टाइम बम’ को जीव विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों करते हुए यह बताया है कि वह दिन दूर नहीं तरह उगाई जा सकेंगी और उन्हें कलम लगाकर कुछ से कुछ बनाया जा सकेगा।
इस संदर्भ की नई उपलब्धियाँ ऐसी सम्भावना का द्वारा खोलती हैं कि मानव भ्रूण का पालन किसी उपयुक्त प्रकृति की पशु मादा के पेट में पालन करा लिया जाय। इससे उस बच्चे में मनुष्य और पशु के सम्मिलित गुण विकसित हो जायेंगे। इस प्रयोगों से आरम्भ में थोड़े से बच्चे बनाने में ही अधिक परिश्रम पड़ेगा। पीछे तो कृत्रिम गर्भाधान विधि से वे थोड़े ही बच्चे तरुण होकर सहस्रों बच्चे पैदा कर देंगे। एक स्वस्थ साँड़ के द्वारा जीवन भर का संचित शुक्र 50 हजार तक बच्चे पैदा कर सकता है। विशेष रासायनिक प्रयोगों से उत्तेजित मादा डिम्बों द्वारा एक साथ 5 तक सन्तानें उत्पन्न करायी जा सकती हैं। नयी मनुष्य जाति को जल्दी बढ़ाने के लिए ऐसे ही तरीके काम में लाये जायेंगे साथ ही पुरानी पीढ़ी को समाप्त करके उन सबका बन्ध्याकरण किया जायेगा।
आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डा. जे. बी. गर्डन ने मेंढ़कों पर नई नस्ल पैदा करने के लिए कल में लगाने का प्रयत्न किया है। इस कार्य में दो अमेरिका वैज्ञानिक डा.व्रिग्स और केन्ग उनके सहयोगी रहे हैं। इस प्रयास में उन्हें आशातीत सफलता मिली है। इन प्रयोगों में वे ऐसे नयी किस्म के-नई नस्ल के मेढ़क पैदा करने में समर्थ हुए जो अपने पूर्वजों की तुलना में कही अधिक सुन्दर, बलिष्ठ, सौम्य एव बुद्धिमान थे। वैज्ञानिक मण्डली ने इसी प्रकार के प्रयोग अन्य छोटे-छोटे जीवों पर भी किये हैं और उनमें से प्रायः सभी में सफलता मिली हैं।
संसार भर में चल रहे प्राणियों की नस्ल सुधारने के प्रयत्नों में भारी दिलचस्पी ली जा रही हैं और भरपूर कोशिश की जा रही है। पेड़-पौधों पर यह प्रयोग बहुत पहले से ही सफल होता रहा है। कलमी फलों की नस्लें सर्वविदित लोकप्रिय और लाभकारी सिद्ध हो रही है। अब प्राणियों को भी अधिक उपयोगी बनाने के प्रयत्न उसी उत्साह से चल पड़े हैं जैसे कि कुछ समय पूर्व फूलों और शंकर जातियाँ उत्पन्न करने के लिए चले थे।
वंशानुक्रम विज्ञान के महा मनीषी रार्क्ट एम. शेस्मीरे ने भविष्य’ वाणी की है। अगले दस साल में मनुष्यों की कलम लगाने और आज की तुलना में अधिकतम समुन्नत पीढ़ी पैदा करने में सफलता मिल जायेगी।
यदा न ज्ञायते मृत्युः कदा कस्य भविष्यति। आकस्मिके हि मरणे धृर्ति बिंदेत कस्तदा॥
परित्यज्य यदा सर्वमेकाकी यास्यसि ध्रुवम्। न ददा तदासि कस्मात्पाथेयार्थमिदं शुभम्-भविष्य पुराण
अर्थात्-जब कि यह नहीं जाना जाता है कि यह मृत्यु किस समय में किसकी हो जायेगी, जब अचानक ही मृत्यु प्राप्त होगी तो उस समय में कौन तुझे धीरज प्राप्त कराएगा? उस समय तू तो यहाँ पर ही यह सभी कुछ ठाट-बाट छोड़कर अकेले ही निश्चय रूप से जायेगा। इसलिये उस समय के वास्ते पाथेय के लिये सत्कर्म क्यों नहीं किया करता?
आर्थर कोसलर ने एक पुस्तक लिखी है-रु टस आफ काँइन्सीडिन्स’। लेखक ने यह बताने और समझाने की कोशिश की है कि विराट् सृष्टि में सर्वत्र नियम और व्यवस्था का सिद्धान्त काम कर रहा है। ‘संयोग‘ प्रकृति नियमों का एक अपवाद है जो यदा-कदा ही प्रस्तुत होता है। वस्तुतः वह भी किसी न किसी अविज्ञात नियमों द्वारा ही परिचालित है। उन नियमों से अपरिचित होने के कारण ही रहस्यमय घटनाओं को ‘संयोग‘ की संज्ञा दे दी जाती है। अन्यथा सत्य यह है कि सृष्टि के प्रत्येक जड़ चेतन घटकों-लघुतम अणु-परमाणुओं में भी सुव्यवस्था का नियम काम करता दिखायी पड़ता है।
जीवन मरण का गतिचक्र भी उस स्वसंचालित व्यवस्था का एक अंग है। यह गतिचक्र अपने सामान्य क्रम में चलता रहता है तो किसी तरह का तार्किक प्रश्न नहीं खड़ा होता है। प्रकृति के नियमों से सुपरिचित होने तथा घटनाओं के कारण का बोध रहने से सब कुछ स्वाभाविक-सा लगता है। कौतूहल तब उत्पन्न होता है। जब ज्ञात प्रकृति नियमों को तोड़ती हुई ऐसी रहस्यमय घटनाएँ प्रस्तुत होती हैं जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता। बुद्धि और उसका आविष्कार विज्ञान दोनों ही उन घटनाओं की विवेचना करने में जब अपनी असमर्थता व्यक्त करता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि अदृश्य घटनाओं के कुछ सूत्र ऐसे हो सकते है जो इनकी पकड़ सीमा के बाहर है। मन और बुद्धि के सामान्य स्थूल परतों द्वारा उन घटनाओं को समझ पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। इनकी सूक्ष्मत्तर चैतन्य परतों को कुरेदकर ही उन विलक्षण घटनाओं का रहस्योद्घाटन कर सकना सम्भव हो सकता है।
उदाहरणार्थ कितनी ही बार ऐसे अवसर आते है जब मनुष्य का पुरुषार्थ प्रस्तुत संकटों के निवारण में असमर्थ सिद्ध होता है। कहीं से किसी प्रकार कोई सहयोग की सम्भावना नहीं नजर आती। असहाय और असमर्थता की स्थिति में ऐसा लगता है कि जीवन का अन्त सन्निकट है। पर परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष सहयोग की आकस्मिक परिस्थितियाँ ऐसे आ खड़ी होती है जैसे उनके लिए सुनियोजित ढंग से पूर्व तैयारी की गयी हो। मृत्यु के मुख से कितने ही व्यक्ति दैवी सहयोग पाकर बच निकलते है। ऐसी घटनाओं को मात्र संयोग कहकर टाला और सन्तोष नहीं किया जा सकता। समय-समय पर ऐसी कितनी ही घटनाओं के समाचार मिलते रहते हैं जो यह सोचने को बाध्य करती है विराट् सृष्टि में ऐसी कोई समर्थ सत्ता है जिसकी नर ब्रह्माण्ड की प्रत्येक घटनाओं पर है। वह न केवल विश्व का संचालन और सुनियोजित करती है, वरन् आवश्यकता पड़ने पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष माध्यमों द्वारा सहयोग देकर अपनी करुणा का भी परिचय देती है।
इंग्लैण्ड के एक गिरजाघर के विशप-राइटारेवरेण्ड विलियम मैकक्रेट’ हैरिडट का उपर नामक एक जलपोत से 28 यात्रियों तथा कर्मीदल के सदस्यों के साथ समुद्री यात्रा पर निकले। एक दुर्घटना में जहाज ध्वस्त हो गया। निकटतम तलीय प्रदेश से वह स्थान हजारों मील दूर था। जलपोत चालक सहित तीन व्यक्ति यों के अतिरिक्त किसी को तैरना नहीं आता था। पर समुद्र की तूफानी लहरों में उनकी शक्ति भी साथ नहीं दे रही थी। बचने का अन्य कोई उपाय नहीं नजर आ रहा था। असहाय स्थिति में समुद्री तरंगों की थपेड़ों के साथ बहते जा रहे थे। इतने में एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एकाएक समुद्र से आग का एक विशाल गोला फूटा की ऊँचाई तक उठ गया। इसके साथ ही एक नया द्वीप पानी से 50 फीट ऊपर उभर आया। बहते हुए सभी व्यक्ति एक-एक करके उस द्वीप पर चढ़ आये। उन्होंने इस नये द्वीप का नाम ‘टाइमली आइलैण्ड’ रखा। तीन दिनों बाद एक दूसरा ब्रिटिश जहाज उन्हें खोजता हुआ पहुँचा। नये द्वीप और सबको सुरक्षित देखकर उन्हें भारी अचरज हुआ। एक स्वर से हर व्यक्ति ने कहा किसी अदृश्य शक्ति ने सहायता न की होती तो मृत्यु सुनिश्चित थी। ब्रिटिश सरकारी रिकार्ड में इस घटना का विस्तृत वर्णन मौजूद है।
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ की एक घटना है। ‘सैलीएन’ नामक एक बजनी जहाज ‘हैलीफाक्स’ नोवा स्काटिया में बारमुडा जा रहा था। तूफान के कारण अचानक वह उलट गया। नौ व्यक्ति जहाज पर सवार थे। सभी बहने लगे। अचानक अप्रत्याशित घटना घटी। एक दूसरी समुद्री लहर ने नाव को सीधा कर दिया। एक दूसरी लहर ने बहते हुए सभी यात्रियों को नाव के भीतर उछाल दिया। ऐसा मालूम पड़ता था कि समुद्र की लहरों को कोई शक्ति नियन्त्रित कर रही हो। यह दुर्घटना द्वारा बचाव का कार्य कुछ ही मिनटों में सम्पन्न हुआ। नाव का उलटना, अचानक सीधा हो जाना विपरीत दिशा में बहते यात्रियों को एक साथ नाव के भीतर बिना किसी दुर्घटना के उछाल दिया जाना, इन सभी घटनाओं को मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।
1917 में प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। जर्मन वायु सेना का लेफ्टिनेण्ट बोहले प्रथम विश्व युद्ध में फ्राँसीसी सीमा के ऊपर निरीक्षण करने के लिए जहाज से उड़ान भर रहा था। अकस्मात् जहाज का इंजन बन्द हो गया। बोहलें तेरह हजार फुट की ऊँचाई से जहाज के बाहर उछल गया। नियन्त्रण के अभाव में जहाज नीचे गिरने लगा। इंजन बन्द हो जाने से चालक रोजेन गार्ड भी कुछ कर सकने में असमर्थ। तभी हवा का एक तीव्र झोंका महसूस हुआ और बोहलें को उसने जहाज के भीतर ला पटका। आश्चर्य यह कि ठीक उसी समय जहाज का इंजिन भी अपने आप चालू हो गया। इस तरह दोनों ही बच गये। बाहर्ले ने एक पत्रकारों की भेंट वार्ता में कहा कि “मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि अदृश्य जगत में कुछ अदृश्य शक्तियाँ भी काम करती तथा दूसरों को संकट की हालत में सहयोग करती है।”
‘विलीव इट आर नाट’ पुस्तक में ऐसी ही एक और घटना का उल्लेख है। पोर्ट रायल जमैका का लुइस गैल्डी नामक एक व्यक्ति एक भयंकर भूकम्प में जमीन के नीचे दब गया। दिन भर वह असहाय स्थिति में पड़ा रहा, पर एक दूसरा भूकम्प का झटका आया जिससे जमीन पुनः फट गयी। भूकम्प के झटके ने गैल्डी को उछालकर बाहर फेंक दिया। इस तरह उसके जीवन की रक्षा हो गयी।
इसी पुस्तक में एक दूसरी घटना का उल्लेख है। माटसेन्स, फ्राँस की एक 18 माह की बच्ची ‘रिनी निवरनास’ का अपहरण आठ
व्यक्ति यों ने मिलकर कर लिया। एक बड़ी रकम वे बालिका के अभिभावक हड़पना चाहते थे। उसे अपहरणकर्ताओं ने एक समुद्री नौका पर रखा। लड़की के अभिभावक को एक निश्चित धनराशि लेकर पहुँचने की सूचना दी। सूचना के साथ यह धमकी भी दी गयी थी यदि निर्धारित समय पर धन नहीं पहुँचा तो बालिका को समुद्र में डुबाकर मार दिया जायेगा। पर सम्भवतः प्रकृति को ऐसा मंजूर नहीं था “जाको राखों साइयाँ मार सके ना कोय, बाल न बाँका हो सके, जो जग बैरी होय।” यह उक्ति अक्षरशः चरितार्थ हुई। प्रकृति का आक्रोश उल्टा अपहरणकर्ताओं के ऊपर ही फूट पड़ा। तूफान ने नौका को डूबो दिया जिसमें आठों अपहरणकर्ता मारे गया। पर छोटी बच्ची पैकिंग के बने तख्ते पर तैयारी हुई ‘कासिस’ फ्राँस के समुद्र तट पर सकुशल आ लगी। तब तक वह निद्रा मग्न रहीं जब तक कि तैरता हुआ लकड़ी का तख्ता समुद्र के किनारे न जा लगा। किनारे पर कुछ मछुआरों ने जाकर स्थानीय पुलिस को सूचना दी। रिपोर्ट पुलिस को पहले ही मिल चुकी थी। उस आधार पर बालिका को उसके माता पिता के पास पहुँचा दिया गया।
यदि इस घटना को मात्र एक प्रकृति संयोग माना जाय तो कुछ समाधान नहीं निकलता। समुद्री तूफान की चपेट में आना और उसमें अपहरणकर्ताओं का मारा जाना, बालिका का लकड़ी की तख्ती में अपने आप आ जाना तथा सकुशल समुद्र के किनारे निद्रावस्था में जा लगना आदि घटनाओं का तारतम्य ‘संयोग के सिद्धान्त द्वारा कैसे बिठा जा सकता है। दुर्घटना एक संयोग थी तो उसकी चपेट में बालिका को भी आना चाहिए था। पर बिना किसी क्षति के सुरक्षित भयंकर तूफान से निकलकर समुद्र के किनारे बालिका के जा पहुँचने की घटना यह बताती है कि किसी अदृश्य सत्ता द्वारा बालिका के जीवन रक्षा की व्यवस्था बनायी गयी।
24 दिस.1923, न्यू कैर्लेडोनिया के निकट एक ऐसी विलक्षण घटना जो यह बताती है कि सृष्टि में सर्वत्र कोई ऐसी शक्ति काम कर रही है जो असमर्थता की स्थिति में मनुष्य को सहयोग भी देती है। एडोल्फ पान्स नामक एक फ्राँसीसी व्यापारी अपने एक अन्य साथी कि साथ मोटर वोट से समुद्र में बिहार करने के लिए निकला। अचानक एक समुद्री लहर के कारण मोटर वोट अनियन्त्रित हो गयी। पान्स समुद्र में गिर पड़ा उसके दूसरे साथी ने स्वयं भी पान्स के बचाव के लिए समुद्र में छलाँग लगा दी। लगभग आठ मील दूर दोनों ही को शार्क मछलियों के बीच छोड़कर मोटर वोट जा पहुँची। मृत्यु अब सन्निकट थी। अचानक बिना किसी सवार की नौका पीछे की ओर मुड़ने लगी। ऐसी प्रतीत होता था कि किसी अदृश्य शक्ति ने मोटर वोट का नियन्त्रण अपने हाथों में ले लिया हो। आठ मील दूर जा पहुँची मोटर वोट तीव्र रफ्तार से ठीक वहाँ जा पहुँच गयी जहाँ कि दोनों व्यक्ति अब मृत्यु की घड़िया गिन रहे थे। दोनों ही नौका पर जा चढ़े और सुरक्षित समुद्र के किनारे जा लगे। व्यापारी पान्स का कहना था कि “मुझे विश्वास नहीं होता यह सब कैसे हुआ, पर जो कुछ हुआ वह संयोग नहीं था। किसी अदृश्य शक्ति ने ही हमें मृत्यु के मुँह से बचाया और नया जीवन दिया।
किन्हीं-किन्हीं को इस तरह के अप्रत्याशित सहयोग मिलते है जबकि कितने ही दुर्घटनाओं में सारे जाते है। इन्हें वैसी सहायता क्यों नहीं मिलती? क्या कर्म फल सिद्धान्त से ऐसी घटनाओं का कुछ तारतम्य है? कितने ही ऐसे प्रश्न उभर कर सामने आते है, जिनका उत्तर सामान्य तार्किक बुद्धि देने में असमर्थ प्रतीत होता है। सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर तथा दैवीय अनुग्रह सिद्धान्त की जानकारी के लिए पिण्ड के चेतन अन्तराल में प्रविष्ट करना होगा। उन सूत्रों को ढूँढ़ना होगा जिनके द्वारा दिव्य आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त करती है।
जिह्वाधो नाड़ी संछिन्नाँ रसनाँ चालयेत्सदा।
दीहहेन्नवती तेन लोहयन्त्रेण कर्षयेत्॥ एवं नित्य समभ्यासाल्लम्बिका दीर्घताम् व्रजेत्।
यातन्दच्छेद् भ्रवोर्मध्ये तथा गच्छति खेचरो॥ रसना तालुतध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत्।
कपाल कुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरितगा॥ भ्रवोर्मध्ये गताँ दृष्टिमुद्रा भवति खेचरी॥
भावार्थ- जिह्वा के नीचे और उसकी जड़ को मिलाने वाली जो नाड़ी है, उसका छेदता हुआ निरन्तर रसना के अग्रभाग को परिचालित करे, प्रतिदिन ऐसा करने से जिह्वा बड़ी हो जाती है। क्रम से अभ्यास द्वारा जिह्वा को इतना लम्बा करे वह भौंह के मध्य तक पहुँच जाय, जिह्वा को क्रमशः तालु मूल में ले जाय। तालु के बीच के गड्ढे को कपाल-कुहर कहते हैं। जिह्वा को इस कपाल-कुहर के मध्य में ऊपर को उल्टी करके ले जाय और दोनों भौहों के मध्यस्थल को देखता रहे, इसे खेचरी मुद्रा कहते हैं। (घेरण्ड संहिता-तृतीयोपदेश
महापुरुषों, ऋषि कल्प व्यक्तियों के प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ सुरक्षित रखी जाती है। भगवान बुद्ध के दाँत, हजरत मुहम्मद साहब के बाल, ईसा के वस्त्र इस लिए सुरक्षित रखे गये हैं कि उन दिवंगत आत्माओं के साथ सम्बद्ध रहने के कारण वे पदार्थ भी विशिष्ट पवित्रता और प्रखरता युक्त समझे गये हैं। महामानवों के हाथ का प्रसाद ग्रहण करके भी लोग कृत-कृत्य होते हैं। इसमें प्रसाद के खाद्य पदार्थ की नहीं उन स्पर्शकर्ताओं की प्राण प्रतिभा का समावेश रहने से ही विशेषता उत्पन्न होती है।
इसी प्रकार दुरात्माओं के दुष्कृतों से भी स्थान, उपकरण आदि पर भी उनका प्रभाव देखा जाता है। बूचरखानों, वेश्यालय, मद्यशालाओं के भीतर तथा इर्द-गिर्द ऐसा वातावरण रहता है जिससे सौम्य सज्जनों का मन भी विक्षुब्ध होने लगे। इसलिए ऐसे स्थानों से दूर रहना ही श्रेयस्कर माना जाता है।
कई बार कुछ मकान, आभूषण, वस्त्र, उपकरण आदि में भली-बुरी विशेषताएँ सम्बन्धित लोगों के संपर्क से उत्पन्न होती देखी गई हैं। जहाँ अचिन्त्य-चिन्तन का-अकरणीय कृत्यों का बाहुल्य रहा है। जहाँ उत्पीड़न शोषण अन्याय आतंक का दौर चला है वहाँ ऐसी विभीषिकाएँ जम जाती हैं जिनके संपर्क में आने वालों का अहित अनिष्ट होने लगता है। ऐसे स्थान अभिशप्त कहलाते। भुतहे मकान, मरघट आदि में डेरा डालने पर जिस प्रकार भय, आतंक की अनुभूति होती है उसी प्रकार अभिशप्त मकान या पदार्थ
भी उपयोग करने वालों का अनिष्ट करते देखे गये हैं। इसे चेतना के चुम्बकत्व का प्रभाव प्रमाण ही समझना चाहिए।
मिशिगन की विशालकाय झील में मुसाफिर और सामान इधर से उधर ढोने के लिए सन् 1888 में एक स्टीमर बना। उसका आदि, मध्य और अन्त सभी दुर्भाग्य से जुड़ा रहा। जल प्रवेश को एक वर्ष भी न होने पाया था कि वह टकरा कर क्षति ग्रस्त हो गया। 1890 में वह डूबकर तली में बैठ गया। बड़ी कठिनाई से उसे निकाला और तैराया गया। चलाने वाली कम्पनी भी मुसीबत में पड़ी और ढोये गये मुसाफिर तथा अस्वाव भी क्षतिग्रस्त होते रहे। 1893 और 1902 में वह डूबते-डूबते बचाया जा सका। 1917 में एक पुल से जा टकराया। 1920 में एक बर्फीली चट्टान से जा टकराया और उलट गया। अन्त में इस आये दिन की क्लेश से पीछा छुड़ाने के लिए 1921 में उसे कबाड़ियों के हाथ बेच दिया गया।
पेरु की सेन्ट्रल रेलवे का एक इंजन जिस दिन से बना उसी दिन से दुर्घटना करने लगा। आये दिन कभी अपने कलपुर्जे तोड़ लेता कभी दूसरों के प्राण संकट खड़ा करता। वह पाँच बार पटरी से उतरा, जमीन में घुसा और क्रेन पर लादकर यथास्थान लाया गया। संचालकों को उसका दुर्भाग्य मिटाने के लिए एक उपाय सूझा। उसका नम्बर 37 था। बदल कर 33 कर दिया गया। प्लेट उसी नम्बर की। कागजात में इन्दराज उसी नम्बर का। तो भी उसका दुर्भाग्य छूटा नहीं वरन् और भी उग्र हो गया। ब्रेक फेल हुआ और एक दूसरी ट्रेन से जा टकराया। टक्कर बहुत भयानक थी उसने समूचे रेल के पुल को ही उखाड़ दिया। उखड़ा पुल नीचे नदी में गिरा और धन जन की बहुत क्षति हुई।
सन् 1685 की बात है। जापान के एक फैंसी ड्रेस विक्रेता ने एक बहुमूल्य-किमोनो-महिला परिधान तैयार किया। उसे देखने तो अनेकों लड़कियाँ आई पर मूल्य को देखते हुए खरीदने की हिम्मत किसी की न पड़ी। एक धनी लड़की ने उसे खरीदा। घर ले जाने के बाद वह उसे पहनने भी न पाई थी कि मर गई। घर वालों ने कुछ कम मूल्य पर उसी विक्रेता को लौटा दिया। दूसरी जिसने खरीदा वह भी इसी तरह मरी और पोशाक वापिस लौटी। तीसरी बार भी ठीक यही हुआ। इस अभागे परिधान की सुन्दरता, कीमत के साथ-साथ उसके अभागी होने चर्चा पूरे जापान में फैल गई। देखने कौतूहल वश बहुत आते, पर उसे खरीदना तो दूर कोई छूता तक नहीं था।
मामला राज दरबार तक पहुँचा। पोशाक कचहरी में पेश हुई। विवरण सुनने के बाद धर्मगुरु ने उसे आग में जला देने की दण्डाज्ञा सुना दी। परिधान जिस समय जा रहा था। ठीक उसी समय भयंकर आँधी आई। चिनगारियाँ उड़-उड़कर दूर-दूर तक पहुँची और उससे भयंकर अग्निकाण्ड खड़ा हो गया। उससे इतनी बड़ी क्षति हुई जितनी कि उससे पूर्व कभी भी नहीं हुई थी। प्रायः तीन चौथाई टोकियो शहर जल गया। इस अभूत पूर्व अग्नि काण्ड में 300 मन्दिर, 500 शाही महल, 9000 स्टोर, 61 पुल और हजारों लाख घर झोंपड़ी जलकर स्वाहा हो गये। इतना ही नहीं उस अग्निकाण्ड में लगभग एक लाख मनुष्य भी जलकर खाक हो गये।
ब्रिटिश म्यूजियम में एक अभिशप्त ममी रखी हुई है। यह ममी सन् 1864 में अरब देश की एक खुदाई से प्राप्त हुई थी। आकर्षण से प्रभावित होकर बाबसिसरो नामक एक पूँजीपति ने उसे खरीद लिया। दो माह के भीतर उसे व्यापार में इतना बड़ा घाटा हुआ कि वह अपने को सन्तुलित न रख सका। हृदय की धड़कन रुक जाने से उसकी मृत्यु हो गयी। ममी की देख-रेख करने वाले दो नौकर भी बिना किसी रोग के बिस्तर पर सोये हुए मृत पाए गए। उक्त पूँजीपति का इकलौता बेटा ट्रक दुर्घटना की चपेट में आ गया और उसे अपनी दोनों टाँगें कटानी पड़ीं। अभिशप्त जानकर घरवालों ने बिना कोई मूल्य लिए एक फोटोग्राफर जे. एस. सैक्सन ने अधिक कीमत प्राप्त करने के उद्देश्य से ममी का फोटो लेना चाहा जिससे विभिन्न पत्रिकाओं में उसे प्रकाशन के लिए दिया जा सके। फोटो साफ करने पर यह देखकर विस्मित रह गया कि उसमें मिश्र की अधेड़ महिला का स्पष्ट चित्र आ गया है। चित्र लेने के दूसरे दिन ही वह पागल हो गया तथा कुछ ही दिनों में मर गया। उसकी पत्नी ने परेशान होकर, लन्दन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम को ममी को वापस सौंप दिया। ममी को म्यूजियम में पहुँचाने वाले दो मजदूरों में से एक तो एक सप्ताह के भीतर ही मर गया दूसरा कार दुर्घटना में हाथ-पैर गँवा बैठा। म्यूजियम में पहुँचने के बाद भी अभिशप्त ममी का प्रकोप कम नहीं हुआ। शहर की मशहूर फोटोग्राफर कम्पनी मेसर्स डब्ल्यू. ए. मैनसल ने इस ममी का चित्र लेने का प्रयास किया। उक्त कम्पनी का लड़का फोटोग्राफर को लेकर ममी का निरीक्षण करने आया। निरीक्षण के उपरान्त वापिस लौटते समय कार दुर्घटना में उसका हाथ टूट गया। फोटोग्राफर इन संकेतों को न समझ सका। दूसरे दिन म्यूजियम से उक्त ताबूत का चित्र खींचकर वह लौट ही रहा था कि कहीं दूर से एक काँच का टुकड़ा उसकी नाम में आकर टकराया। नाम कट गयी। उक्त संकटों को देखकर म्यूजियम के अधिकारियों ने उसका चित्र लेना ही वर्जित कर दिया। इन घटनाओं को देखकर म्यूजियम के अधिकारियों न ममी के इतिहास का पता लगाने का कार्य पुरातत्व वेत्ताओं को सौंपा। पर्यवेक्षण करने पर मालूम हुआ कि ताबूत मिस्र कही एक ऐसी महिला का है जो अथाह सम्पत्ति की मालकिन थी। अनैतिक कार्यों द्वारा उसने यह सम्पत्ति एकत्रित कर ली थी। जीवन के अन्तिम दिनों में कुछ व्यक्ति यों ने उसके साथ षड्यन्त्र करके संपत्ति हड़प ली। वह विक्षिप्तावस्था में मरी। विशिष्ट सूत्रों द्वारा जानकारी मिली कि वह ताबूत पहले भी अनेकों व्यक्ति यों की मृत्यु का कारण बन चुका है। उसकी आत्मा निरन्तर ताबूत के साथ बनी रही। जो भी उसे छूता अथवा छेड़छाड़ करने का प्रयत्न करता उसके कोप का भाजन होता।
ब्रिटेन के एक अपराधी के घर से एक ऐसा चित्र बरामद हुआ जो बिल्ली का था तथा नीले पेपर पर काले चाक से बनाया हुआ था। ध्यान से देखने पर इस अस्पष्ट चित्र में खूँखार जानवर की आँखें चमकती दिखाई देती थीं। सर्वप्रथम वन विभाग के एक अधिकारी ने उसे प्राप्त किया। उसने उसे अपने शयन कक्ष में लगाया। अभी कुछ ही दिन बीते होगे कि वन अधिकारी ने आत्महत्या कर ली। चित्र आकर्षण था पर उसे दुर्भाग्यशाली जानकर पत्नी ने काउण्ट अलेक्जेन्डर नामक व्यक्ति के हाथों बेच दिया। जिसे उसने अपने ड्रेसिंग रुम में सजाया। काउण्ट अलेक्जेन्डर जब भी ध्यान से चित्र को देखता उसे दो हिंसात्मक आँखें घूरती दिखाई पड़ती । एक दिन विक्षिप्तावस्था में उसने स्वयं को गोली मार ली। इस चित्र ने अपना तीसरा शिकार काउण्ट अलेक्जेन्डर के युवा पुत्र को बनाया। दुर्लभ वस्तुओं को एकत्रित करने के शौक को पूरा करने के लिए वह उस चित्रा को अपने घर ले आया। चित्र को एक दिन वह ध्यान से देख रहा था। अचानक डरने लगा कि किसी व्यक्ति की खूनी आँखें उसे घूर रही हैं। असन्तुलन की स्थिति में उसने भी आत्म-हत्या कर ली। चौथा शिकार उस युवक का एक रिश्तेदार बना। चित्र की पेंटिंग बनाने के लिए वह उसे अपने घर ले आया। दूसरे दिन वह अपने बिस्तर पर मृत पाया गया। इसके साथ ही यह रहस्यमय चित्र भी न जाने कहाँ गायब हो गया।
जिस अपराधी के घर से उक्त चित्र बरामद हुआ उसकी विस्तृत जानकारी एकत्रित करने पर कई रोचक तथ्य सामने आए। इन्टेलिजेन्स डिपोर्टमेंट के विवरण में वर्णन था कि वह रहस्यमय चित्र एक अपराधी गिरोह का कोई संकेत था। जिस घर से वह प्राप्त हुआ उसका मालिक उक्त गिरोह का सरदार था। वह चित्र उसे अत्यधिक प्रिय था तथा सदा अपने पास रखता था। उसके ऊपर अनेकों हत्याओं एवं अपराधों का आरोप दर्ज था।
इटली का एक जहाज द्वितीय विश्वयुद्ध के समय एटलाँटिक महासागर से होकर जा रहा था। नाविकों को सागर की लहरों पर कोई चीज तैरती दिखी जाल डालकर खींचने पर वह काठ की एक आदमकद युवती की प्रतिमा निकली। प्रतिमा के जहाज पर आते ही नाविक एवं यात्री चारों ओर एकत्रित होकर देखने लगे। नारी सौंदर्य की इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति उस काष्ठमूर्ति में हुई थी कि सभी मंत्रमुग्ध बने देखते रहे प्रतिमा की लकड़ी की चौकी पर नाम अंकित था ‘एटलाँश’। प्रतिमा पर आसक्त दो नाविक अपना सन्तुलन गँवा बैठे उन्होंने अथाह समुद्र में छलाँग लगा दी। नाव के कप्तान ने इस आकस्मिक घटना के फलस्वरूप प्रतिमा को केबिन में मजबूत ताले के भीतर बन्द कर दिया। इटली बन्दरगाह पर पहुँचकर जहाज के कप्तान ने प्रतिमा को निकटवर्ती अजायबघर को सौंप दिया। प्रतिमा में आकर्षण इतना अधिक था कि वहाँ भी दर्शकों की भीड़ जमा हो गयी। कितने ही व्यक्ति तो देखकर पागल हो गए। जर्मन सेना के एक लेफ्टिनेण्ट ने 13 अक्टूबर 1944 को प्रतिमा के समक्ष सीने में गोली मारकर आत्महत्या कर ली। एक अन्य व्यक्ति ने भी इसी प्रकार गोली मार ली। अजायबघर के अधिकारियों ने यह स्थिति देखकर विचार किया कि उस प्रतिमा को हटा देना चाहिए। पर दुर्लभ एवं अनोखी कलाकृति होने के कारण उसे हटाया न जा सका। हाँ, अधिकारियों ने उसके प्रदर्शन पर रोक अवश्य लगा दी। प्रतिमा के कलाकार का नाम पता नहीं मालूम हो सका पर ऐसा अनुमान गया कि प्रतिमा किसी द्वीप की राजकुमारी की है जो अपने समय की अद्वितीय सुन्दरी थी एवं यौवनकाल में ही राजकीय दुष्चक्रो के कारण उसकी मृत्यु हो गयी थी।
ऐसे प्रसंग घटते है तो दुर्भाग्यग्रस्तों एवं उनसे जुड़ी वस्तुओं के अभिशापों का स्मरण दिला देते है। यह तथ्य अपनी जगह अटल है कि अभिशप्त वातावरण चेतन जगत जगह के प्रवाह का ही एक निषेधात्मक पहलू है। इनसे बचना व सुसंस्कारी वातावरण के सान्निध्य में आना ही श्रेयस्कर है, भले ही तुरन्त आकर्षण पहली ही ओर घसीटता हो। (क्रमशः)
भविष्य का भरोसा मत करो, वह चाहे जैसा सुखद प्रतीत हो, मृत भूत काल को अपने मुर्दे गाड़ते दो। जीवित वर्तमान में कार्य करो, दिल में साहस और ईश्वर पर भरोसा रखो।
—लाँग फेलो
अतीन्द्रिय क्षमताएँ परामनोविज्ञान के अनुसार मनः संस्थान का ही एक अंग है और उनका कारण एवं आधार मस्तिष्कीय संरचना में खोजा जा सकता है। अध्यात्म शास्त्र में रहस्य लोक को सूक्ष्म शरीर का विषय माना है। इस सूक्ष्म शरीर का प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करना हो तो उसे मानसिक चेतना की गहरी परतों के साथ जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। शरीर यात्रा में काम आने वाली-दैनिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली-क्षमता व्यवहार मस्तिष्क में हैं। उसे शिक्षा, अनुभव अभ्यास से विकसित किया जा सकता है किन्तु सूक्ष्म शरीर की क्षमताएँ विकसित करने के लिए ऐसे प्रयोग अपनाने पड़ते है जो मनःसंस्थान में सन्निहित सूक्ष्म चेतना केन्द्रों को सजग सक्रिय कर सकने में सफल हो सकें।
अब विज्ञान मनुष्येत्तर विभिन्न प्राणियों की शारीरिक एवं मानसिक संरचना में जुड़ी हुई अद्भुत विशेषताओं को खोजने में संलग्न है। इसका एक स्वतन्त्र शास्त्र ही बन गया है-जिसका नाम है-बायोनिक्स
वैज्ञानिकों का कहना है कि-दूर की फोटो लेना अथवा दूरवर्ती वस्तुओं का फोटो लेना, केवल माइक्रो फिल्म द्वारा ही सम्भव है और वह भी जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेंसी पर निश्चित माइक्रो फिल्म द्वारा ही संभव है और वह भी जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेंसी पर निश्चित माईक्रोट्रान्समीटर द्वारा शक्ति शाली विद्युत तरंगों द्वारा प्रेक्षित किया गया हो।
किन्तु शिकागो के टेडसीरियल ने मानसिक कल्पना के आधार पर ध्यान में लाए गये चित्र कैमरे से खिचायें तो ध्यान कर्त्ताः टेड सीरियस के फोटो के स्थान पर ध्यान की गई वस्तु के साफ-साफ फोटो थे। जैसे ध्यान में घोड़ा अथवा शेर है तो स्पष्ट घोड़ा और शेर का ही फोटो था टेड का चित्र क्यों नहीं आया यह एक विचित्र उलझन अजीब पहेली है। विज्ञान के लिए चुनौती और चैलेन्ज है।
वैज्ञानिक इसे न ट्रिक मानते है न हिप्नोटिज्म और टेड ने कभी भारत आकर किसी योगी से भी ऐसा प्रतिक्षण नहीं लिया।
1962 में टेड सीरियस ने भारत का नक्शा देखकर फतेहपुर सीकरी, के मुख्य द्वार “बुलन्द दरवाजा” दिल्ली के लाल किले के दीवाने आम की कल्पना कर कैमरे के चित्र खिचायें तो हूबहू वैसे ही थे जैसे कि दिल्ली और फतेहपुर सीकरी के। किन्तु टेड तो कभी भारत भी नहीं आये जो अतीत में देखी कल्पना मस्तिष्क में उभर सके। नवम्बर 1968 की कादम्बिनी में टेड के कल्पना चित्रों का फोटो भी छपा था। आश्चर्य है कि अमेरिका में बैठा व्यक्ति हिन्दुस्तान के कल्पना चित्र का फोटो उतरवाकर भारतीय उपासना दर्शन की प्राथमिकता सिद्ध करता रहा है।
गुप्त या अप्रकट बातों को जानने की जिसे शक्ति प्राप्त होता है उसे “डिवाइनिंग“ कहा जाता है।
अंग्रेजी सेना के प्रसिद्ध सेनापति और बाद में इंग्लैण्ड के युद्ध मंत्री किचनर इस विद्या में पारंगत थे। जब वे अंग्रेजी सेना में लेफ्टिनेण्ट पद पर कार्यरत थे तब कोरस्को के रेगिस्तान में 250 मील लम्बी रेल लाइन बनाई जा रही थी, जहाँ पानी का भारी संकट और अभाव था। वहाँ लार्ड किचनर ने अपनी इस क्षमता का उपयोग कर भयंकर रेगिस्तान में दो कुएँ बनवाये, जिनमें मीठा स्वच्छ जल निकला। इस तरह रेल लाइन बनने में जो पानी की कठिनाई आ रही थी वह दूर हो गई।
प्रथम विश्व युद्ध के अवसर पर इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री लार्ड जायज ने बुढ़ापे में बगीचा लगाया तो उनके फार्म के पास जल साधनों के अभाव में बगीचा सूख रहा था किन्तु पड़ोसी किसान के खेत हरे-भरे देखकर वे उस किसान के पास पहुँचे तो उन्होंने उसके खेतों को पानी मिलने के साधनों की जानकारी करनी चाही। उस किसान ने बताया कि इस भूमि में सभी स्थानों पर जल नहीं मिलता मेरी स्त्री को एक ऐसी विद्या (डिबाइनिग) आती है जिससे वह पानी के स्रोतों का पता लगा लेती है। लार्ड जायज को जहाँ-जहाँ उस महिला ने बताया वहाँ खोदने पर अपार जल भण्डार मिले जिससे 3 लाख गैलन पानी प्रतिदिन निकाला जा सकता था।
कालोरोडो प्रान्त के लेडीवली नगर में के. डब्लू. पी. जोन्स नाम का एक ऐसा व्यक्ति हुआ है जो जमीन पर चलकर यह बता देता था कि जिस भूमि पर वह चल रहा है उसके बीच किस धातु की-कितनी बड़ी खदान है उसे जमीन में दबी भिन्न धातुओं का प्रभाव अपने शरीर पर विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से होता था। अनुभव ने उसे सिखा दिया था कि किस धातु का स्पन्दन कैसा होता है। अपनी इस विशेषता का उसने भरपूर लाभ उठाया। कइयों को खदान बताकर उनसे हिस्सा लिया और कुछ खदानें उसने अपने धन से खरीदी और चलाई। अमेरिका का यह बहुत धन-सम्पन्न व्यक्ति अपनी इसी विशेषता के कारण बना था।
गेविन मेक्सवेल ने अपने अनुसन्धानों में एक अस्सी वर्षीय अन्धे का वर्णन किया है। जिसने समुद्र में डूबी हुई एक मछुआरे की लाश का सही स्थान बताने और उसे बाहर लाने में सहायता की थी। उन्होंने के पश्चिमी पठार के द्वीप समूहों के लोगों में यह क्षमता विशेष रूप से पाये जाने का उल्लेख किया है। शमूस फियारना द्वीप में एक मछुआ मछली पकड़ते समय गाँव के समीप की खाड़ी में डूब गया। उसकी लाश निकालने और विधिवत् दफनाने के लिए सारा गाँव उत्सुक था। सभी नावें कई दिन तक लगातार खाड़ी में चक्कर काटती रही, पर किसी के काँटे में लाश फँसी नहीं। निराशा छाई हुई थी। तभी एक अस्सी वर्षीय अन्धे कैलम मेकिनन ने कहा आप लोग मुझे नाव में बिठा कर ले चलें और खाड़ी में घुमाते रहे। सम्भवतः में लाश को तलाश करा दूँगा। चिल्लाया-काँटा डालो लाश ठीक नीचे है। वैसा ही किया गया। फलतः मृतक को बाहर निकाल लिया गया और उसे विधिवत् दफनाया गया।
आयरलैण्ड के प्रो. वैरेट। भूमिगत जल स्त्रोतो एवं खदानों का पता लगाने के संदर्भ में प्रख्यात थे। वहाँ के विकलो पहाड़ी क्षेत्र में दूर-दूर तक पानी का कहीं नामोनिशान नहीं था, कड़ी एवं पथरीली जमीन पर प्रो. वैरेट खदान विशेषज्ञों के सामने उस क्षेत्र में कई घण्टे घूमते रहे, अन्ततः एक स्थान पर रुककर बोले-यहाँ 14 फुट गहराई पर एक अच्छा जल स्त्रोत है। खुदाई के पश्चात् वहाँ मात्र 15 फुट जमीन खोदने पर पानी की एक जोरदार धारा फूट पड़ी।
भारत के राजस्थान प्रान्त में “पानी वाले महाराज” अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर कई सफल कुएँ बनवा चुके हैं, उन्हें माधवनन्द जी के नाम से जाना जाता था।
चेकोस्लोविया के एक शिल्पी व्रेतिलाव काफ्थ में अतीन्द्रिय दर्शन की अद्भुत क्षमता थी। उसके द्वारा उत्तरी ध्रुव की ऋतुओं और परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त करने में महत्वपूर्ण सहयोग मिला तथा दूसरे महायुद्ध के समय उसने युद्ध के मोर्चे की हलचलों के बारे में जो विलक्षण जानकारियाँ दी, वे आश्चर्यजनक रूप से सत्य सिद्ध हुई। इतना ही नहीं उसकी इस क्षमता का लाभ भी युद्ध में उठाया गया। ‘इन साइक्लोरीडिया आँफ आँकल्ट’जो तन्त्र विद्या के विश्वकोश के रूप में प्रसिद्ध है, में एण्ट्रीन मेसकर नामक एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख मिलता है जो पेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष एवं अदृश्य वस्तुओं का विवरण बताया करता था। फ्राँसीसी वैज्ञानिक और कवि जलस ने इस व्यक्ति की जाँच करके यह लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति की त्वचा में ऐसे कोशणु उपस्थिति रहते है जो देखने की क्षमता रखते है। मेसकर में ये कोशणु अधिक विकसित स्थिति में विद्यमान है। यह कोश स्पर्श के आधार पर देखने का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करते है। स्मरणीय है अन्धे व्यक्ति अपनी त्वचा और कानों द्वारा ही नेत्रों के अभाव की बहुत कुछ आवश्यकता पूरी कर लेते हैं।
वैज्ञानिक अलेक्जेन्डर किताई गोरोरस्की ने कई परा मनोवैज्ञानिक शोधों का निकट से अध्ययन किया और अतीन्द्रिय क्षमता को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार किया है। उन्होंने बूल्फ मेंसिग नामक एक व्यक्ति का उल्लेख किया है जिसमें अनायास ही ऐसी क्षमता उत्पन्न हो गई जिससे वह दूरस्थ घटनाओं एवं विचारों का परिचय प्राप्त कर लेता था। गोरोरस्की के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्ति यों ने भी उसका परीक्षण किया और पाया कि टेलीपैथी कोई जादूगरी अथवा धोखाधड़ी नहीं बल्कि एक ध्रुव सिद्ध सत्य है।
विचार संचालन विद्या भी अतीन्द्रिय क्षमताओं के अंतर्गत आती है। एक व्यक्ति दूसरे के मन की बात जान सकता है। अपने मन की बात बिना वार्तालाप किये ही दूसरों को जता सकता है। इतना ही नहीं इस वार्तालाप किये ही दूसरों को जता सकता है। इतना ही नहीं इस क्षेत्र में आग्रह करने और दबाव डालने की भी गुँजाइश है यहाँ तक कि किसी पर चढ़ बैठने और पछाड़ देने की बात भी तांत्रिकों द्वारा प्रयुक्त की जाती रहती है। उतना आगे तक न बढ़ा तो भी विचार शक्ति की जानकारी के आदान-प्रदान से आगे बढ़ाकर दूसरों की सेवा सहायता करने में तो निश्चित रूप से लगाया जा सकता है। इस तथ्य की प्रामाणिकता का परिचय देने वाले कितने ही प्रमाण समय− समय पर मिलते रहते है।
टेलीपैथी के एक प्रयोगकर्ता इंग्लैण्ड के ए. एन. क्रीरों ने बहुत समय तक वह प्रयोग चलाया कि बन्द कमरे में क्या हो रहा है इसकी जानकारी प्राप्त की जाय। इस प्रयोग में एक महिला अधिक दिव्यदृष्टि सम्पन्न सिद्ध हुई।
क्रीरी ने अपने प्रयोगों की सचाई जाँचने के लिए अनेक प्रामाणिक व्यक्ति यों से अनुरोध किया। जाँचने वालों में डबलिन विश्व-विद्यालय के प्रो. सर विलियम वैरट इंग्लैण्ड की ‘सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च’ के प्रधान प्रो. सिजविग जैसे मूर्धन्य लोग थे। उन्होंने कई तरह से उलट-पलटकर इन प्रयोगों को देखा और उन प्रयोगों के पीछे निहित सचाई को स्वीकारा।
परा मनोविज्ञान अनुसंधान की दिशा में विधिवत् प्रयत्न लगभग एक शताब्दी से चल रहे हैं। इसका श्री गणेश लन्दन सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च’ के रूप में हुआ। इसके तीन वर्ष वैसी ही शोध सभा अमेरिका में भी गठित हुई उसका नाम रखा गया— ‘अमेरिका सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च’ इंग्लैण्ड में सर विलियम क्रूक्स जैसे मनीषियों ने इन प्रयोगों में गहरी दिलचस्पी ली। अमेरिका में हुए शोध प्रयत्नों में पिछली पीढ़ी के मनीषियों में विलियम जेम्स, मैक्डागल का नाम अग्रिम पंक्ति में है। रूस के शरीर शास्त्री बी. एम. वेख्तेरेफ की खोजों ने परा-मनोविज्ञान शोध को आगे बढ़ाने में भारी प्रयत्न किये है।
फाउण्डेशन आफ रिसर्च आन दि नेचर आफ मेन से सम्बद्ध 'इंस्टीट्यूट फार पैरासाइकोलोजी’ ने परा मनःशक्ति के संदर्भ में अति महत्वपूर्ण शोध सामग्री एकत्रित की है।
ड्यूक विश्व विद्यालय के डा. जे.वी. राइन द्वारा लिखित पुस्तक न्यू फटियर्स आफ माइन्ड में मस्तिष्कीय विलक्षणता पर गम्भीर प्रकाश डाला गया है। इनको विकसित करने पर प्राप्त हो सकने वाले लाभों की ओर मात्र निर्देश किया है।
स्विट्जरलैंड के सेन्ठ पेरुस नगर में बड़े गिरजे के पादरी ऐलाक्सिस गर्मेट अपनी दिव्य दृष्टि के लिए प्रसिद्ध रहे थे। उन्होंने उस क्षमता का उपयोग जमीन के छिपे जल स्त्रोतो की जानकारी देने और सिंचाई की सुविधा बढ़ाने में की। बिना किसी भूमि पर जाये वे उसके नक्शा को देख-भाल करके ही नीचे के पानी का विवरण बता देते थे। उनके ऐसे चमत्कारी कृत्यों में कोलम्बिया के पोपापन नगर को जल सुविधा प्रदान करने की घटना बहुत प्रसिद्ध है। वहाँ उनने माँ नक्शा देखकर 88 फुट से 6 इंच नीचे जल स्त्रोत होने की सूचना दी जो खोदने पर बिलकुल सही निकली। इतना ही नहीं उनने पानी के दबाव की सही स्थिति भी पहले ही बता दी थी। प्रति मिनट 500 लीटर का बहाव होने की बात उनने बताई थी। खोदने पर वह दबाव भी ठीक उतना ही निकला।
कैलीफोर्निया के पुलिस अधिकारी ‘रिचमाण्ड’ ने अचानक फोन पर किसी व्यक्ति की सूचना सुनी-पैनपाब्लो के मैकडोल्ड एवेन्यू में स्टीम लाइनर से टकराकर एक दुर्घटना-ग्रस्त हो गया। चालक के सीने में गम्भीर चोट लगी है और दूसरे व्यक्ति घायल हो गये है। वहाँ जल्दी पहुँचिये”।
फोन पर प्राप्त सूचना के अनुसार अधिकारी ने एक पुलिस दल को तुरन्त वहाँ भेज दिया। वहाँ पूछताछ करने पर पता चला कि इस तरह की कोई घटना अभी नहीं घटी है। पुलिस कर्मचारियों ने समझा कि किसी ने यों ही मजाक में उन्हें तंग किया है।
पुलिस दल लौटने ही वाला था कि उसके सामने ही एक स्टीम लाइनर सामने से आ रहे एक ट्रक से टकरा गया। ड्राइवर की छाती चूर-चूर हो गयी और कई अन्य व्यक्ति बुरी तरह घायल हो गए।
विंसेट तथा मारग्रेट नामक दो वैज्ञानिकों ने सैकड़ों जुड़वा बच्चों पर शोध कर अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। जुड़वा बच्चों में कुछ सामान्य अन्तर होते हुए भी उनकी आदतों, विचारों एवं स्वभाव में पर्याप्त साम्य पाया गया है। इस संदर्भ में उक्त वैज्ञानिकों ने कई घटनाक्रमों का उल्लेख किया है। पार्टी में सम्मिलित एक डाँक्टर की पत्नी डोंग मार्टिन अपने मित्रों से हँस-हँसकर बोल बतिया रही थी, अचानक वे उदास हो गई और फूट-फूटकर रोने लगीं। तत्काल तो उनका कोई कारण न ढूँढ़ा जा सका परन्तु कालान्तर में ज्ञात हुआ कि उसी समय उसकी जुड़वा बहन अचानक बीमार पड़ गई थी।
बकिंघम शहर की एक और घटना इसी प्रकार आश्चर्यचकित कर देने वाली हुई। मारग्रेट एक परिवार में अतिथि बन कर गये हुए थे। उस परिवार की महिला रसोई में, खूब प्रसन्न और स्वस्थ स्थिति में काम कर रही थीं। अचानक रसोई से कराहने की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी । मारग्रेट सहित परिवार के अन्य सदस्य दौड़ आये। कराहने का कारण पूछने पर महिला ने बताया कि अचानक उसके चेहरे, पीठ और पैरों में इस प्रकार दर्द होने लगा था, जैसे वह किसी दुर्घटना से आहत हो गई हो। तत्काल तो उसका कारण पता न चला, पर बाद में ज्ञात हुआ कि उसी समय जब महिला कराह रही थी उसकी बहिन ‘जैक्स’ एक कार दुर्घटना से बुरी तरह घायल हो गई थी और उसके चेहरे, पीठ और पैरों पर काफी चोटें आई थीं।
ब्रिटेन की लेबर पार्टी के संसद सदस्य डैगलस की बेटी कैथरीन ने लिस समय एक बच्चे को जन्म दिया, उसी समय उसकी जुड़वा बहन हेलन के पेट में भी सख्त पीड़ा हो रही थी।
प्रो. जे. एच. कैमरान ने लिवरपूल के एक मैकेनिक का विचित्र विवरण दिया है, जिसे न कहीं चोट आई न कोई बीमारी हुई फिर भी वह एक सप्ताह तक चलने-फिरने में असमर्थ रहा, कारण कि उसके एक जुड़वा भाई की टाँग एक दुर्घटना में टूट चुकी थी।
इस प्रकार की अनेक घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं, जिससे जुड़वा बच्चों को एक ही व्यक्ति त्व के दो बिम्ब कहा जाये तो भी अत्युक्ति नहीं होगी। कई ऐसे व्यक्ति यों में तो सुदूर प्रवेश में रहने पर भी एक दूसरे तक अपने विचार और सम्वेदना सम्प्रेषित करने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है।
इन साम्यों का कारण ढूँढ़ना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती सदृश है। अमरीकी विशेषज्ञ विंसेट का कथन है कि ‘उन बच्चों का विकास गर्भाशय के भीतर ही एक-सी ही स्थितियों में होता है। उस समान स्थिति में पलने के कारण अलग-अलग देहधारी होते हुए भी उनके व्यक्ति त्व तथा आचरण में समानता आ जाती है।’
लन्दन हास्पिटल के ‘साइकी आर्टी इंस्टीट्यूट के डाँ. जेम्स शील्ड ने जुड़वा बच्चों पर काफी अनुसन्धान कार्य किया और उनमें पाई जाने वाली समानताओं के वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत किये हैं। उनका विचार है कि एक ही परिवेश में पले और विकसित हुए बच्चों के शरीर, स्वभाव, आदतों, व्यवहार, रुचियों एवं मस्तिष्कीय क्षमताओं में पर्याप्त समानता आ जाती है। इसका प्रधान कारण गर्भ में एक ही प्रकार का पोषण मिलना है।
वुडलैण्ड (अमेरिका) के डाँक्टर जियो वर्नहाट ने अपना अनुभव परामनोविज्ञान की एक प्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित कराया है। वे लिखते हैं कि ‘सन् 1971 की घटना है-एक दिन बैठे-बैठे लगा कि उनका पुत्र जाँन वियतनाम के युद्ध मोर्चे पर बुरी तरह आग में फँस गया है और उसके तंबू की आग फैल रही है। वह बड़े सन्दूक के नीचे दब गया है। उन्हें लगा कि जैसे उन्होंने जान को सन्दूक के नीचे से उठाया और तंबू से बाहर घसीट लाये और खड़ा कर दिया। इसके बाद मुझे अपना शरीर पूर्ववत् महसूस होने लगा। आँखें खोलीं तो मालूम पड़ा कि तन्द्रा-सी आ गई है। पत्नी नब्ज़ टटोल रही थी मैंने पूछा कि क्या बात है तो वे बोली ऐसा लगा कि आप “एव नाँर्मल” हैं मैंने पत्नी को वह सपने की-सी बात कह सुनाई उन्होंने हँसकर टाल दिया। बात आई गई हो गई छः माह बाद जाँन मोर्चे से वापस आया तो सर्वप्रथम उसने अग्निकाण्ड में फँसने और अचानक किसी अनजान शक्ति की मदद से निकालने की बात ने पुनः उस घटना की स्मृति तरोताजा कर दी और रहस्य पर से पर्दा उठा दिया।”
परामनोविज्ञान की परिधि बड़ी विशाल है। यह अविज्ञात का क्षेत्र है। मानवी चेतना की रहस्यमयी परतों में ऐसी न जाने कितनी विलक्षणताएँ छिपी पड़ी हैं। अध्यात्म शास्त्र में इन्हें सामान्य मन की प्रसुप्त सामर्थ्य माना जाता है। यह कोई सिद्धि अथवा विलक्षण उपलब्धि नहीं, प्रकृति प्रदत्त क्षमता है जो सबमें एक समान रूप से विद्यमान है। कोई इन्हें साधना पुरुषार्थ से व कोई-कोई पूर्व अर्जित सुसंस्कारोंवश जल्दी जगा लेते हैं। पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्री व शोधकर्ता इन्हें आश्चर्य से देखते हैं जबकि यह मनःसंस्थान के सूक्ष्म शक्ति केन्द्र के जागरण की प्रतिक्रिया मात्र है। मनुष्य असीम सामर्थ्यों से भरपूर है। अपने आपको पहचानने का प्रयास तो किया जाय। फिर तो असीम उपलब्धियों का क्षेत्र खुल जाता है।
इसमें सन्देह नहीं कि स्वप्नों का अधिकाँश भाग निरर्थक होता है। सोते समय जो चित्र-विचित्र दृश्य दीखते, विचार उठते और भाव उभरते हैं उनकी तर्क, तथ्य के साथ संगति नहीं बैठती। कोई कारण समझ में नहीं आता कि जाने− अनजाने सन्दर्भ लेकर यह बिना पैसे का सिनेमा कौन दिखाता है और किस लिए दिखाता है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए चिरकाल से प्रयत्न चलता रहा है, पर अभी तक कोई सार गर्भित निष्कर्ष निकल नहीं सका। स्वप्न फल बताने वाले रहस्यवादी कुछ तुक तो बिठाते रहे हैं, पर अभी तक कोई ऐसी सुनिश्चित संगति बैठी नहीं, जिसके आधार पर स्वप्नों की सही समीक्षा या विवेचना की जा सके। अपच की उत्तेजना, अर्धनिद्रा, परिण, विक्षुब्ध मानस की बाल क्रीड़ा स्मृति भण्डार की झाड़-बुहार जैसे कुछ कारण मनोवैज्ञानिक बताते तो हैं, पर इन प्रतिपादनों से न तो वे स्वयं ही सन्तुष्ट हैं और न विश्वास पूर्वक जिज्ञासुओं का समाधान कर सकने में ही समर्थ हैं।
अनिश्चितता का असमंजस रहते हुए भी कुछ तथ्य ऐसे हैं जो यह दबाव डालते हैं कि इसे भ्रम-जंजाल ही नहीं मानते रहना चाहिए, वरन् गहराई में उतर कर यह पता लगाना चाहिए कि स्वप्नों में कुछ सार होता है क्या? वे प्रत्यक्ष जीवन में किसी प्रकार सहायक समाधानपरक हो सकते हैं क्या? इस पक्ष के पास बहुत कुछ ऐसे कारण प्रमाण विद्यमान हैं जो कहते हैं कि सभी न सही, कुछ स्वप्नों में उपयोगी सार संक्षेप छिपा रहता है। उतने भर को भी यदि समझा और काम में लाया जा सके तो इससे मानवी सुविधा, सन्तुष्टि, प्रगति और सम्भावना में उत्साहवर्धक कड़ियाँ जुड़ सकती हैं।
स्वप्नों में सारगर्भित अंश भी विद्यमान है, भले ही वह थोड़ा-सा ही क्यों न हो, भले ही वह यदा-कदा ही दृष्टिगोचर क्यों न होता हो। उनमें से कुछ के द्वारा अपनी वर्तमान शारीरिक मानसिक स्थिति को समझने में सहायता मिल सकती है। निदान उपलब्ध हो तो उपचार सरल पड़ता है इसे सभी जानते हैं। स्वप्नों के सहारे मनःस्थिति ही नहीं, परिस्थिति का विश्लेषण वर्गीकरण करने में सहायता मिल सकती है। इतना ही नहीं उनमें भविष्य दर्शन कराने वाले, भवितव्यता का पूर्वाभास देने वाले तथ्य भी जुड़े रहते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे दिव्य-लोक के बहने वाले प्रवाह तक जा पहुँचते हैं और उस धारा के हाथ बहते हुए उस ओर चल पड़ते हैं जिस ओर चलने के लिए आत्म विज्ञानियों को शोध परिष्कार के लिए कठिन योग तप का आश्रय लेना पड़ता है।
बाइबिल में वर्णित ‘गाँस्पेल आँफ सैंट मैथ्यू’ के अनुसार यीशु के पिता जोसेफ को जब इस बात की जानकारी मिली कि उसकी अविवाहिता पत्नी मेरी तुरन्त ही एक बच्चे की माँ बनने वाली है तो उसे बड़ा धक्का लगा और उसने अपनी पत्नी को त्याग देने का निश्चय किया। जब वह ऐसा सोच रहे थे उसी समय एक दिन रात में सोते समय उन्हें स्वप्न में एक देवदूत दिखा। वह बोला “ओ डेविड के पुत्र! तुम मेरी को अपने साथ रखने में डरो मत। तो तुम्हारा सौभाग्य होगा। क्योंकि उसके गर्भ से परम पवित्र आत्मा ईसा का जन्म होगा। उस पुत्र का नाम जीसस रखा जाएगा। यही सब मनुष्यों को पाप से बचायेगा।”
उस समय के क्रूर यहूदी राजा हेरोड के खोफ से जीसस को बचाने के लिए जोसेफ को फिर स्वप्न में देवदूत आया और संकेत दिया कि बच्चे को लेकर मिस्र चले जाओ। इसी प्रकार यीशु से मिलने के लिए तीन प्रज्ञा पुरुष आये थे। उन्हें भी रात्रि में स्वप्न के माध्यम से देवदूतों ने कहा कि-हेरोड को जीसस के जन्म की भनक दिये बिना ही आप लोग चुपचाप यहाँ से प्रस्थान कर जायें।”
कुछ वर्षों बाद हेरोड की मृत्यु हो जाने पर जोसेफ को स्वप्न के माध्यम से देवदूतों द्वारा बताया गया कि आप वापस इज़राइल लौट आयें। लेकिन आते समय अपना रास्ता बदलकर आयें तथा हेरोड की राजधानी में नहीं अपितु गैलीली नामक स्थान में अपना निवास बनायें।
इजराइल पहुँचने पर देवदूतों ने बताया कि रहने के लिए सर्वाधिक निरापद स्थान गैलीली ही है। उन दिनों अविवाहित संतान को अवांछनीय माना जाता था और राजा से लेकर धर्माध्यक्ष तक सभी ऐसे प्रसंगों में कठोर क्रूरता का परिचय देते थे। ईसा का जन्म ऐसी विपत्ति से जुड़ा हुआ था इसलिए देवदूतों को उसकी सुरक्षा के उपाय इस प्रकार दिव्य स्वप्नों के माध्यम से बनाने पड़े। जो बाद में बहुत ही सही और उपयोगी सिद्ध हुए।
बुद्ध के जन्म के समय उनकी माता माया ने अपने एक सांकेतिक स्वप्न के बारे में अपने पति शुद्धोधन को बताया—
“बरफ या चाँदी जैसा शुक्र, सूर्य और चन्द्र से भी अधिक तेजस्वी, वज्र सदृश छह दाँतों वाला हाथी मेरे गर्भ में प्रवेश कर गया। इस सांकेतिक स्वप्न को मुझे समझना है। ज्योतिषियों को बुलाया गया। उनने बताया कि-आपके गर्भ से एक ऐसे महाप्रतापी पुरुष का जन्म होगा जो अपने करुणा और त्याग से सब राजाओं का राजा और सब इच्छाओं का परित्यागी भ्रमणशील सन्त होगा।”
इस्लाम धर्म में भी स्वप्न के माध्यम से अनेक चमत्कारी घटनाओं का वर्णन है। पहली बात तो यह है कि कुरान का सन्देश भी खुदा ने मुहम्मद साहब को स्वप्न में ही दिया था। दूसरे एक स्वप्न के अनुसार उन्हें मक्का से भागते समय बताया गया कि-डरो मत। तुम फिर यहीं बसोगे तथा यहीं से इस्लाम का प्रसार-विस्तार होगा। पैगम्बर को भी स्वप्नों पर बहुत भरोसा था और इस्लाम के प्रारम्भिक साहित्य में हजरत की रात्रि चर्या के सम्बन्ध में चौदह अध्यात्म लिखे गये हैं जिनमें दृष्टिगोचर हुए स्वप्नों के रहस्य का सविस्तार वर्णन है। पैगम्बर साहब स्वप्नों के इतने प्रभावित थे कि अपने अनुयायियों से प्रायः पूछते थे कि आज रात में तुम्हें कैसा स्वप्न आया।
इतिहास से सम्बन्धित प्रमुख व्यक्ति यों के बारे में भी स्वप्न की अनेक घटनाएँ बतायी जाती हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं—
प्रथम विश्व-युद्ध के तृतीय वर्ष में जर्मन सेना में हिटलर एक वरिष्ठ अधिकारी था। बावेरिया प्रदेश और फ्राँस की सीमा पर उसे तैनात किया गया था। एक रात्रि को उसे स्वप्न आया कि ‘एक विस्फोट के कारण उसकी छावनी तहस-नहस हो जाती है और पिघला हुआ लोहा उसके चारों ओर उड़ रहा है। बहता हुआ खून उसकी छाती को स्पर्श कर रहा है। जगने पर उसने देखा कि कहीं कुछ ऐसी घटना नहीं घटी थी। सब कुछ शान्त था। फिर भी उसके अचेतन मन ने उसे सचेत कर दिया था। अतः वह अपनी छावनी छोड़ दुश्मन की छावनी की ओर भागने लगा। तभी उसके अंतर्मन से चेतावनी आई कि वहाँ जाने की बेवकूफी क्यों कर रहे हो? दुश्मन तुम्हें गोलियों से भून डालेंगे। परन्तु इसके बावजूद भी वह किसी अदृश्य शक्ति से खिंचा हुआ वह अपनी छावनी से काफी दूर निकल गया। ज्यों-ही उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि सपना सत्य बन चुका था। दुश्मन की गोलाबारी से छावनी तथा उसके आस-पास को सभी व्यक्ति यों, वस्तुओं का सफाया हो चुका था। बच रहा केवल अकेला वही हिटलर। उसे आगे भी तो अभी और बहुत कुछ पापड़ बेलने शेष थे। फ्राँस के प्रसिद्ध दार्शनिक और गणित वेत्ता रेने डेस्कार्टेस जितने आधुनिक वैज्ञानिक युग के सिद्धान्त उसकी कार्यपद्धति और मूलभूत दर्शन का प्रतिपादन किया। एक स्वप्न में मिली प्रेरणा का ही प्रतिफल समझा जा सकता है। अपनी व्यक्ति गत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक समस्याओं तथा पत्नी व सम्बन्धियों की जटिल परिस्थितियों के बीच यह समझ नहीं आ रही थी कि आखिर क्या किया जाय। उसी समय 10 नवम्बर 1619 की रात को उसे तीन स्वप्न आये। इनमें से पहले दो तो परिवार एवं घरेलू प्रसंगों से सम्बन्धित थे। अन्तिम स्वप्न में उसको निर्देश दिया गया कि सत्य के अन्वेषण के लिए गणित सब विज्ञानों का खजाना है। गणितीय पद्धति के विकास में जीवन समर्पित करने की प्रेरणा इस स्वप्न के माध्यम से उन्हें प्राप्त हुई। इस स्वप्न के बाद उसने अपना सम्पूर्ण जीवन उस उद्देश्य में ही लगाया और एक ऐसा दर्शन-शास्त्र का विस्तार किया जो विज्ञान के दृष्टिकोण से बुद्धिगम्य हो और धार्मिक गूढ़ तत्वों का समन्वय करता हो। जिस दर्शन से पश्चिमी दुनिया विगत तीन सौ वर्षों से प्रभावित रही है। यह एक पहेली ही है कि यदि वह स्वप्न न आया होता तो उसकी जीवन-दिशा क्या होती?
इसी प्रकार कई लेखक कलाकार, कवि, विज्ञानी एवं आविष्कर्ताओं ने अपने मौलिक विचार, बेधक दृष्टि और सूझ-बूझ अपने-अपने जीवन में स्वप्नों के संकेत के माध्यम से पाया है।
प्रसिद्ध जर्मन रसायनविद् केकुले ने बैंजिन के सूत्र का आविष्कार करके जैव रसायन में क्रान्ति मचा दी। यह जानकारी उन्हें एक स्वप्न के माध्यम से प्राप्त हुई। जब वह अपने अनुसंधान कार्य को करते-करते अपनी प्रयोगशाला में निराश बैठे थे। ठंड से बचने के लिए सिगड़ी को कुर्सी के नजदीक खींच लिया। आराम महसूस होने पर उन्हें झपकियाँ आने लगीं। नींद में एक स्वप्न आया। “रासायनिक सूत्रों के परमाणु नृत्य करने लगे और जैसे साँप टेढ़ी-मेढ़ी लकीर बनाता है उसी प्रकार नाचने लगे। थोड़ी देर में एक साँप ने अपनी पूँछ मुँह में ले ली।” जैसे ही यह स्वप्न दीखा यह स्फुरणा जगी कि रासायनिक सूत्र को एक सीधी लकीर में लिखने की अपेक्षा क्यों न बहुमितिक बहुकोणीय आकारों में लिखा जाय? इसी परिकल्पना के आधार पर सूत्र बनाने की उनने अपनी कार्य पद्धति बनाई और अप्रत्याशित सफलता पाई।
परमाणुओं के परिभ्रमण की रचना की जानकारी देने पर नेल्स बोर को नोबुल पुरस्कार मिला था। उस जानकारी ने बीसवीं सदी में विज्ञान जगत में हाइड्रोजन परमाणुओं के संदर्भ में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। 1913 में नेल्स बोर को एक स्वप्न के माध्यम से इस थ्योरी का संकेत मिला था।
स्वप्न विशेषज्ञ विज्ञान वेत्ता मनोविज्ञानी वार्सिली निकोलायेविच कासात्किन का कहना है कि-सपने बीमारियों की भी सूचना देते है।” उनने अपनी जानकारी को कुछ घटनाओं का उल्लेख किया है। एक प्रसंग प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं-एक लड़के को कई रातों से यह स्वप्न आ रहा था कि वह किसी अजगर की चपेट में आ गया है तथा उसके कसान से उसका सारा शरीर दर्द करने लगता है। कुछ दिनों बाद वह सचमुच से बीमार हो गया। जाँच करने वाले डाँक्टर ने कहा कि तुम्हें कोई रोग नहीं है। फिर भी, एक साल के अन्दर ही उसकी रीढ़ की हड्डी में भयंकर व्रण हो गया।
“एक महिला को स्वप्न में ऐसा लगता था मानो वह मिट्टी के दबाव से दबी जा रही है तथा उसकी साँस बेतरह घुट रही है। डाँक्टर से जाँच कराने पर किसी रोग का पता नहीं चला लेकिन दो माह बाद जाँच कराने पर उसे ट्यूबर कुलोसिस का मरीज पाया गया।” “इसी प्रकार एक महिला को स्वप्न में दम घुटने जैसा अनुभव उसके फेफड़े की टी. वी. का पूर्वाभास देता था।”
डाँ. कासात्किन का कहना है कि हमारे मस्तिष्क की ऊपरी सतह में एक ड्रीम बैण्ड है जिसमें शरीर में होने वाले रोगी की पूर्व सूचना दिखाई पड़ती है। हमारे स्वस्थ शरीर की स्थिति में किसी प्रकार की सूक्ष्मतम गड़बड़ी भी यहाँ अंकित हो जाती है। यों स्वप्न तो हमेशा आते ही रहते हैं। वे अजीबों गरीबी भी हो सकते हैं। पर यदि एक ही तरह का स्वप्न बार-बार आता रहे तो समझना चाहिए कि उसमें किसी विशेष जानकारी के सूत्र सन्निहित होने की सम्भावना है।
स्वप्नों का विश्लेषण भी एक विज्ञान है। यदि उसका समुचित अनुसंधान हो सके तो किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है जो अनेक रहस्यों पर से पर्दा उठा सकने में समर्थ होने के कारण मनुष्य जाति के लिए असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हो सके।
मानवी प्रगति के इतिहास वेत्ता यही कहते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। पारस्परिक सहयोग से ही उसने प्रगति के विभिन्न सोपान पार किये और आदान-प्रदान की रीति-नीति अपना कर सुविधा साधनों का उपार्जन किया। यह प्रतिपादन बहुत हद तक सही भी है। किन्तु इसे पत्थर की लकीर नहीं मानना चाहिए। यह मानने के भी कारण हैं कि जीवधारी का अपना निजी जीवट भी उसका अस्तित्व बनाये रहने, प्रकृति प्रतिकूलताओं से जूझने और निर्वाह के साधन जुटाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। पारस्परिक सहयोग वाली बात उतनी ही महत्वपूर्ण सचाई मनुष्य के निजी जीवट में भी केन्द्रीभूत है।
बर्फीले प्रदेशों में रहने वाले हिरन, भालू, कुत्ते अनादि काल से उन्हीं विकट परिस्थितियों में रहते वाले आ रहे हैं। बर्फीले समुद्रों में पाई जाने वाली मछलियाँ तथा अन्य जल जीव उसके प्रमाण हैं। मनुष्यों में ध्रुव क्षेत्र के निवासी ‘एस्किमो’ इसके प्रमाण हैं। आदिवासी वनवासी प्रजातियाँ में अनेकों ऐसी हैं जिन्हें पारस्परिक सहयोग पर कम और अपने निजी जीवट पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
बानर वर्ग से मिलता-जुलता विशालकाय हिम-मानव इसका प्रमाण है है। इसके अस्तित्व के सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक प्रमाण रहते हैं। साथ ही यह भी पता चलता है कि वह स्वभावतः एकाकी रहता है। वंश वृद्धि की आवश्यकता से विवश होकर ही वे कभी जोड़ा खोजते होंगे और कुछ ही क्षण उपरान्त नर मादा अपना-अपना रास्ता नापते होंगे। जीव जन्तुओं में से अनेकों की एकाकी प्रकृति एवं जीवन चर्या समझ में आती है किन्तु मनुष्य एवं उसके सजातियों के सम्बन्ध में उस तथ्य को गले उतारना कठिन पड़ता है। हिम-मानव इसका अपवाद है। उसके अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले यह भी सिद्ध करते हैं कि वह मनुष्य का निकटवर्ती है। आकृति प्रकृति में बहुत कुछ मिलता-जुलता है। फिर भी वह हिम क्षेत्रों की कठिन निर्वाह परिस्थितियों में अपने आपको ढाले हुए है और बिना झुण्ड बनाये, अपने जीवट के बलबूते चिरकाल से निर्वाह करता चला आता है। हिम मानव के अस्तित्व और निर्वाह क्रम के सम्बन्ध में समय-समय पर जो जानकारियाँ मिलती रहती हैं। वे सभी असाधारण रूप से आश्चर्यजनक हैं।
25 मार्च सन् 1970 को ब्रिटिश पर्वतारोहियों का एक दल अन्नपूर्णा शिखर की सबसे ऊँची चोटी पर अपनी विजय-पताका फहराने के उद्देश्य से दुस्साहस भरी यात्रा कर रहा था। चन्द्रमा की चाँदनी से आलोकित हिमाच्छादित प्रदेश में पर्वतारोही दल के सदस्य रात्रि विश्राम के लिए कैम्प लगाकर सोने की तैयारी में थे। अचानक सामने हाथी जैसी भयानक आकृति वाली लम्बी परछाई के साथ एक वन्य जीव इधर-उधर घूमते दिखाई दिया। खतरे की आशंका से उन लोगों ने बाहर निकलकर राइफलें तान लीं। निरीक्षण करने पर पाया कि दूसरे जीव की आकृति प्रकृति बहुचर्चित हिम-मानव जैसी है। आधा घण्टे बाद वह उछल-कूद करता पर्वत शृंखलाओं की ओट में गायब हो गया।
बर्नार्ड होवेल मेन्स ने अपनी यात्रा, पुस्तक ‘आन दि ट्रैक आफ अननोन एनिमल्स’ में ‘येति’ नामक मानवाकृति का वर्णन किया है। जिसका सारा शरीर घने लम्बे वालों से आच्छादित रहता ऊँचाई 5 मीटर या इससे अधिक रहती है। येति क अतिरिक्त दो अन्य जीवधारियों को वर्णन है। ‘रिमि’ नामक प्राणी 3 से 4 हजार मीटर की ऊँची पहाड़ियों में हैं जिनकी ऊँचाई करीब 3 मीटर बताई गयी है। दूसरा है ‘न्यालमों’ जो 4 हजार मीटर से अधिक ऊँचे बर्फीले स्थान में रहते है जिनकी ऊँचाई 4 से 5 मीटर होती है। न्यालमों के चेहरे की त्वचा सफेद और सम्पूर्ण शरीर काले घने बालों से ढँका रहता है। उसके हाथ इतने लम्बे होते है जो घुटने से नीचे तक जाते हैं। मुखाकृति मानव से मिलती-जुलती है। पैर बहुत बलिष्ठ हाथों के बल से बड़े-बड़े पेड़ उखाड़ना और चट्टानें उठा फेंकना जिसके लिए कोई बड़ी बात नहीं।
1921 में एवरेस्ट चढ़ाई करने वाले दल के अध्यक्ष सी. के. हावर्ड बरी ने इस प्रकार के मानव के अस्तित्व के बारे में पुष्टि दी। लन्दन के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘डेली मेल’ में 1954 व 57 में ऐसे मानवों के पदचिह्नों के फोटोग्राफ छपे थे। 1954 में हार्वर्ड बरी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया, इसी प्रकार की पहाड़ी शेरपा ने 7 हजार मीटर पर मानवाकृति दिखाई। तब उन्हें विश्वास नहीं हुआ, उसे भेड़िया समझा लेकिन पदचिह्न मनुष्य जैसे थे। 1957 में किसी वैज्ञानिक ने 5 हजार मीटर की ऊँचाई पर मानव आकृति वाला दो पैरों से चलने वाला विशालकाय जीव देखा। जो चलते-चलते एक-एक कर घास-पात की तरह पेड़ उखाड़ रहा था। चेहरे का रंग हल्का पीला शरीर पर घने बाल सिर पर बाल जटाओं जैसे लम्बे थे।
1944 में वुड क्रिकलैंड एवं मैक्स ने अपनी यात्रा वर्णन में बताया कि 4 हजार मीटर की ऊँचाई पर मनुष्य जैसी ऊँचाई के लंगूर रहते हैं। दो पैरों से चलते हैं।
1970 में प्रसिद्ध पर्वतारोही डाँन विलन्स ने नेपाल में 4 हजार फुट की ऊँचाई पर बर्फ के पहाड़ पर रहस्यमय पद चिन्ह देखे और चन्द्रमा के प्रकाश में पर्वत की तलहटी पर मानवाकृति को देखा।
ऐसी अन्य अनेक घटनाओं को तो वैज्ञानिकों ने निराधार सिद्ध कर दिया लेकिन 1951 में माउण्ट एवरेस्ट पर 6 हजार 500 मीटर की ऊँचाई पर लिये गये पदचिह्नों के फोटोग्राफ अब भी रहस्यमय बने हुए हैं। एरिक सिप्टन और माइचेल वार्ड दोनों शेरपा तेनसिंह के साथ माउण्ट एवरेस्ट पर गये थे उसे समय की यह घटना है।
स्मिथ सोनियल इन्स्टीट्यूट अमेरिका के प्रिमेटोलाँजी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. जाँन नेपियर ने ऐसी अनेकों घटनाओं के साथ उपर्युक्त घटना का है। अध्ययन किया और बताया कि “माउण्ट एवरेस्ट की घटना को निराधार नहीं कह सकते। लेकिन फिलहाल यह अनिर्मित ही बनी है।”
‘तास’ की खबर के अनुसार कुछ रुसियों ने उत्तरी साइबेरिया के याकुत इलाके में ‘छछना’ (यत्ती) देखा है। 1980 में समाचार पत्रों में खबर छपी कि केन्द्रीय चीन में 48 से. मी. लम्बे पैरों के निशान मिले। 1974 में ‘नेपाली न्यूज एजेन्सी’ की रिपोर्ट के अनुसार नौजे (नामचे बाजार) में लगभग तीस किलोमीटर फेरिचे गाँव की 10 साल की लाक्पा नाम की शेरपाणी ने यति देखा। वह अपने पाँच याकचरा रही थी कि एकाएक यति न उसे उठाया और खड्डे में डाल दिया और उसके पाँचों याकों को गले से पकड़ कर मार दिया। बेचारी दहशत के मारे बाद में चार महीनों तक विक्षिप्त-सी रही।
चीन के हुबेई प्रान्त में हाल के वर्षों में कई ‘वनमानुष’ देखे गये जिनकी लम्बाई दो मीटर से भी अधिक तथा अंग बालों से ढके हुए थे।
शंघाई के दैनिक ‘वेनहुई बाओ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 1976 में हुबेई के निवासियों ने 14 बार वनमानुष देखे। अगले वर्ष उनकी खोज के लिए 110 सदस्यीय खोजी दल का गठन किया गया। ये वनमानुष मानवों की भाँति पैरों के बल चलते हैं और ताली बजाने, चिल्लाने, हँसने व छड़ी आदि लेकर चलने की क्रियायें करते हैं। उन्हें मनुष्यों के साथ रहना अच्छा लगता है।
उनके चेहरे भी बालों से ढके होते हैं। मुँह बड़ा होता है तथा चेहरे का ऊपरी हिस्सा चौड़ा व निचला हिस्सा सँकरा होता है।
पत्र के अनुसार इन वनमानुषों के पूँछ नहीं होती और कान मनुष्यों से बड़े होते हैं तथा आँखें बड़ी व गहरी होती हैं। शंघाई विश्व विद्यालय के जीव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर वी लिड मिन हुआँग के अनुसार ये वनमानुष मानव तथा ओरंगउटाँग के बीच के जीव हैं।
यों तो हिमालय में 3000 मीटर से 6000 मीटर की ऊँचाई तक जहाँ-तहाँ पर्वतारोहियों, चरावाहों और शेरपाओं को इसके पद चिन्ह दिखाई दिये हैं, किन्तु इसका मुख्य क्षेत्र है-एवरेस्ट-श्रेणी की हिमानियाँ और तलहटियाँ। इसलिये नेपाल में एवरेस्ट-श्रेणी के लिए ‘महालंगूर हिमाल’ शब्द का प्रयोग मिलता है। महालंगूर शब्द से यही रहस्यमय हिम-मानव यती अभिप्रेत है।
इसके अतिरिक्त अमेरिका में भी उसके अस्तित्व के प्रमाण मिले हैं। 1969 की 30 जून को ‘नेशनल बुलेटिन’ में प्रकाशित घटना का विवरण इस प्रकार है− एक अमेरिकी लड़की ने बताया कि अमेरिका के मिनेसोटा जंगल में एक भीमकाय हिम मानव ने मुझे छेड़ा किसी तरह मैंने उसकी दाहिनी आँख में गोली मारी और छुटकारा पाया। इस हिम मानव का फ्रेंक डी. हेन्सन प्रदर्शन के लिए उपयोग करता था। सामान्यतः जंगली जानवरों को पिंजरों में रखा जाता है लेकिन इसे बर्फ के कटघरे में रखा जाता था प्रदर्शन के समय हेन्सन सबको इसका परिचय इस प्रकार देता था कि सायबेरिया के पास आखोटस समुद्र में तैरते हुए 6 हजार पौंड के हिमशैल पर मैंने इसे पकड़ा था। उसके मर जाने के बाद वैसा ही कृत्रिम हिम मानव प्रदर्शन हेतु बनाया। लेकिन आश्चर्य की बात है कि प्रसिद्ध जीवशास्त्री इवान सेंडरसन और बर्नार्ड होवेलमेन ने “बुलेटिन आफ दि रायल इंस्टीट्यूट आफ नेचुरल साइन्सिस बेल्जियम’ नामक पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया जिसके अनुसार-उन्होंने विशालकाय आकार के प्राणियों की वैज्ञानिक जाँच भी की यह रहस्यमय मानवाकृति ‘होमोपोंगाइड्स’ नामक प्राणी से मिलती है।
1920 में स्विट्जरलैंड के जिओलोजिस्ट फ्रोकोइस डी. लोइस ने एक महाकाय बन्दर जैसे प्राणी को गोली से मारा था। जिसकी लम्बाई 2 मीटर थी। इस प्रकार के अनेकों बन्दर दक्षिणी अमेरिका में देखे गये हैं।
1924 में लाँयर्स नामक वैज्ञानिक ने बन्दर की आकृति से मिलते-जुलते भीमकाय प्राणी को देखने और उसके पदचिह्नों फोटो के प्रस्तुत किये थे।
1933 में एक रिपोर्ट समाचार पत्रों में छपी थी। 4500 मीटर ऊँचाई के हिमाच्छादित पहाड़ों पर दो पर्वतारोही बैठे थे वहाँ से उन्होंने मानवाकृति के विशालकाय प्राणी को 400 मीटर नीचे पहाड़ की तलहटी में फल खाते देखा था। बाद में पदचिह्नों को देखकर मालूम हुआ कि वे रीछ के पर से भिन्न थे।
1950 में छपी रिपोर्टानुसार चैपमैन परिवार की दो महिलाएँ खेत में काम कर रही थीं। उन्होंने 3−4 मीटर ऊँचाई का घने बालों वाला राक्षसाकृति व्यक्ति देखा। उसे देखकर दोनों डरकर भागने लगीं, नदी के उस पार उनका घर था। वह व्यक्ति पीछा करते हुए नदी के किनारे आया वहाँ लकड़ी की पेटी में मछलियाँ रखी थीं। उसने वह पेटी उलट दी।
1955 में एक व्यक्ति ने एक महाकाय शरीर वाली स्त्री को स्वयं से 20 मीटर दूरी पर कुछ खाते हुए देखा। पेड़ की टहनियाँ तोड़कर उसके पत्ते खा रही थी। जब वह चली गयी, उस स्थान का निरीक्षण करने गया। वहाँ उसके मल में भी पत्तियों के टुकड़े थे।
1958 में एक बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था। एक कारीगर ने जंगल की ओर का दरवाजा खोला। घने बालों से ढके विशालकाय मनुष्य को देखा मजदूर के हाथ में खाने की वस्तु थी उसने उसे दे दी, लेते ही वह चला गया।
1963 में एक मकान के निर्माण का कार्य चल रहा था। कंक्रीट के बड़े-बड़े ब्लाक पड़े थे। एक ट्रक भी वहीं खड़ा था। रात्रि में एक विचित्र घटना घटी। दूसरे दिन प्रातः लोगों ने मनुष्य की पदाकृति के बड़े आकार में पद चिन्ह देखे वजनी कंक्रीट ब्लाक इस तरह बिखरे पड़े थे जैसे किसी शक्ति शाली हाथों ने इधर-उधर कर दिया हो, ट्रक भी उल्टा पड़ा था।
1967 की घटना इस प्रकार है-शीतकाल में कई जंगली चूहे शीत निद्रा में सो जाते हैं। उन जंगलों में लोगों ने दो विशालकाय मानवाकृति एवं एक बच्चे को पत्थर में टटोलते कुछ देखा। कुछ पत्थरों के नीचे उन्हें जंगली चूहे मिल गये। इतने बड़े चूहों को वे केले की तरह खाने लगे।
1969 में अमेरिका बोस वर्ग नामक शहर से बाहर जहाँ शहर के कूड़े का ढेर रहता था। वहाँ बड़ी आकृति के असंख्यों पद चिन्ह देखे गये। गिनने पर उनकी संख्या 10089 थी।
1970 में जंगल में रात्रि के समय एक शिकारी ने मानवाकृति जैसे डरावने विशालकाय प्राणी को देखा। उसकी आँखें लाल प्रकाश से चमकती दिखाई दे रही थीं वह ऐल्फ नामक जंगली जानवर को खा रहा था। पीछा करने पर वह भाग गया। ऐल्फ का अधखाया शरीर वहीं पड़ा था। उसके बड़े-बड़े पैरों के निशान भी देखे गये।
1972 में रबर की नाव में समुद्र यात्रा करने वाले दो यात्रियों ने बन्दर की आकृति जैसे बड़े प्राणी देखे। एक की ऊँचाई 1.8 मीटर और दूसरे की 1.2 मीटर थी। इन दोनों प्राणियों ने उत्सुकतापूर्वक नेत्रों से समुद्री यात्रियों को देखा। उनकी आँखों में भयानकता नहीं थी।
प्रस्तुत घटनाएँ अपवाद रूप में ही सही, हिममानव का अस्तित्व अथवा अपनी जिजीविषा के बल पर उसकी दुर्गम स्थानों पर जीवित रहने की संभावनाएँ उजागर करती हैं। यही सामर्थ्य मनुष्य में भी विद्यमान है। ‘हिममानव’ हमें हतप्रभ तो करता है पर इतना ही काफी नहीं। मनुष्य इसे प्रतिकूलताओं में भी जीने की चुनौती मानकर स्वीकार करे तो ही इस अविज्ञात की खोज की सार्थकता है।
काया को पंच तत्वों से बना हुआ माना जाता है। अब तत्वों की संख्या एक सौ से भी ऊपर चली गई है और पदार्थों की संरचना में अनेकानेक इकाइयों का अस्तित्व सिद्ध किया गया है। रासायनिक पदार्थ एक दूसरे के संयोग से बनते हैं और उस सम्मिश्रण में मात्रा तथा घटकों के समावेश को देखते हुये उनकी संख्या इतनी जा पहुँचती है जिसे प्रकारान्तर से अगणित कहा जा सके।
जीवन निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले प्रारम्भिक तत्वों के अतिरिक्त जीवधारियों में कुछ धातुओं के धनात्मक आयरन भी पाये जाते हैं। इनमें सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम मुख्य हैं। ऋणात्मक आयनों क्लोरीन (क्लोराइड) प्रमुख है। इनके साथ ही मैंगनीज, लोहा, कोबाल्ट, ताँबा, जिंक की अल्प मात्रा विद्यमान रहती है। कभी-कभी दुर्लभ रूप में बोरान, ऐल्यूमीनियम, वैनेडियम, माँलीब्डेनम एवं आयोडीन भी पाये जाते हैं।
शरीर में सबसे अधिक मात्रा पानी की है। यह जलीय अंश ही कोमलता, स्फूर्ति एवं सजीवता का प्रतीक है। यह अंश जैसे-जैसे घटने लगता है वैसे ही मनुष्य कठोर, कुरूप, आलसी एवं जराजीर्ण होने लगता है। एक नियत सौभा से अधिक कमी हो जाने पर तो दुर्बलता, रुग्णता बढ़ती और मरण की बड़ी निकट आ पहुँचती है।
भिन्न-भिन्न जीवों में पानी की प्रतिशत मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। पूर्ण रूप से विकसित मानव शरीर का 70 प्रतिशत भार उसमें पाये जाने वाले पानी के कारण होता है। उसी प्रकार चूहे एवं बैक्टीरिया में क्रमशः 73 एवं 80 प्रतिशत भार उनके शरीर में विद्यमान जल के कारण होता है। सीलन्ट्रेट में जल का भार कुल भार का 98 प्रतिशत से भी अधिक होता है। विकसित एवं जटिल जीवधारियों में जो अंग अधिक प्रयोग में आते हैं उसमें जल की मात्रा अन्य अंगों की अपेक्षा अधिक होती है जबकि कंकाल मात्र 22 प्रतिशत ही जल रखता है। माँसपेशियों में 766 प्रतिशत हृदय में 793 प्रतिशत, मस्तिष्क के सेरीब्रल हेमी-स्फोयर में 833 प्रतिशत पानी की मात्रा पायी जाती है। गर्भस्थ शिशुओं में जब उनके विभिन्न अंगों का निर्माण कार्य चल रहा होता है, जल की मात्रा 90 प्रतिशत से भी अधिक होती है जबकि वयस्कों में घटकर यह 50 प्रतिशत हो जाती है।
जल में ताप ग्रहण करने की बहुत ही अधिक क्षमता होती है, परन्तु इसकी ताप परिवहन क्षमता अत्यन्त कम होती है। इसके इसी गुण के कारण सागरों-महासागरों का तापक्रम स्थिर रहता है। जल की इसी विशेषता के कारण विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं में उनके शरीर का तापमान प्रायः सदैव स्थिर रहता है।
प्रसिद्ध रूसी जीवशास्त्री एम. एम. कामशिलोव का कहना है कि जीवन की उत्पत्ति में जल का निश्चय ही महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा। उनका कथन है कि जीवों की उत्पत्ति के आरम्भिक काल में जब कि उनके चलने-फिरने के अंगों का विकास नहीं हुआ होगा जल विभिन्न लवणों एवं पोषक तत्वों के वाहक के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा होगा। जीवधारियों में इसका मुख्य काम विभिन्न प्रकार के लवणों एवं पोषक तत्वों को एक अंग से दूसरे अंग में पहुँचाने का एवं हानिकारक और अनुपयोगी पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का है।
कैपीलरी ऐक्शन जल का एक प्रमुख गुण है। इसकी इस प्रक्रिया के माध्यम से ही पौधे विभिन्न प्रकार के खनिज लवण एवं पोषक तत्व पृथ्वी से प्राप्त करते हैं। इसकी प्रकाशीय विशेषता के कारण इसके हजारों फीट नीचे भी फोटो-सिन्थेसिस प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया यथावत् हो सकती है। ये सारे तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि जल जीवन का एक महत्वपूर्ण घटक है, इसके बिना जीवन सम्भव नहीं हो सकता। जीवनोत्पत्ति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होना संदिग्ध नहीं लगता।
जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक जानकारी भगवान ने सभी प्राणियों को समान रूप से दी है। उदर पोषण, वंश-वृद्धि आत्म रक्षा, क्रीड़ा विनोद की जीवनचर्या के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति सभी जीवधारी कुशलतापूर्वक करते रहते हैं। इस परिधि से आगे बढ़ने पर ज्ञान विज्ञान का क्षेत्र कहते हैं। मनुष्य ने आरम्भ से ही इसमें प्रवेश करने का प्रयत्न किया है और उस पुरुषार्थ का समुचित प्रतिफल भी पाया है।
सुविधा सम्पादन को प्रधानता देते हुए ज्ञान विज्ञान की खोज होती रही है। अब तक की प्रगति उसी प्रयास का प्रतिफल है। इतने पर भी यह सोचना बाकी है कि प्रकृति के अनन्त रहस्यों में से ऐसा कुछ अधिक उपलब्ध कर सकने के लिए किस प्रकार प्रयत्न किया जाय तो सुविधा सम्पादन तक ही सीमित न हो, वरन् मानवी गौरव के अनुरूप उसे विशिष्टता एवं वरिष्ठता भी प्रदान कर सके।
भगवान महान है। उसका संसार भी एक से एक अद्भुत विशेषताओं ओर महानताओं से भरा पूरा है। प्रश्न खोज पर्यवेक्षण और रहस्योद्घाटन के निमित्त किये जाने वाले प्रयत्न पुरुषार्थ का है। यदि वह जुट सके— अपने क्षेत्र को व्यापक बना सके तो प्रकृति का अन्तराल कुरेदने के लिए अभी असंख्यों क्षेत्र सूने पड़े हैं। उनमें से प्रत्येक ऐसा है जो विकसित स्थिति में पहुँचने पर न केवल सुविधा संवर्द्धन की-अभावों को पूर्ण करने की-संकटों को निरस्त करने की आवश्यकता पूर्ण करता है वरन् मनुष्य की उस वरिष्ठता तक भी पहुँचाने में समर्थ है जिसका कि वह युवराज होने के नाते अधिकारी भी है।
शरीर के विभिन्न अवयव एक दूसरे से भिन्न प्रकार की आकृति प्रकृति के हैं। साधारणतया वे जिस निमित्त बने हैं उसी कार्य को पूरा करते हैं। किन्तु कई बार ऐसा भी होता है कि एक अवयव का काम दूसरा अंग करने लगे। सामान्य क्रम से भिन्न होने के कारण यह आश्चर्य तो लगता है किन्तु शरीर संरचना के मर्म को जानने वाले इसे असम्भव नहीं मात्र व्यतिक्रम मानते हैं। उनका कहना है कि हर जीव कोश में स्वतन्त्र शरीर बनाने की क्षमता है। इस क्षमता में यह तथ्य भी सम्मिलित है कि सभी अवयव एक ही मूल चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। अतएव किसी अंग से दूसरे अंग वाली क्षमता जग पड़े और हाथ पैरों का काम करने लगे तो असम्भव नहीं कहना चाहिए। इस तथ्य को प्रभावित करने वाली अनेकानेक घटनाएँ जहाँ-तहाँ प्रकट होती रहती हैं।
मिशिगन, अमेरिका में एक ऐसा व्यक्ति है जो मुँह से साँस खींचकर आँखों से निकाल सकता है। इन सज्जन का नाम है-एल्फ्रड लागेवेन। इस तरह की अनुभूति उन्हें अपने आप तब हुई जब एक दिन उन्होंने मुँह में हवा भर गाल फुलाया तो अनायास ही ऐसा लगा कि वह हवा आँखों से निकल रही है। आँखों के आगे हाथ लाकर देखा तो हवा की स्पष्ट अनुभूति हुई। इसे वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने भी अनुभव किया।
एक अवयव के खराब हो जाने पर दूसरे काम में लगाने पर उसकी संस्थान पूर्ति दूसरे अवयव से कराई जा सकें तो उसे शारीरिक विशिष्टता की दृष्टि से अतीव उपयोगी समझा जा सकता है।
कान कुछ सीमित लम्बाई के ध्वनि प्रवाह ही सुन पाते हैं किन्तु शरीर में ऐसे अन्यान्य कलपुर्जे विद्यमान हैं जो श्रवण शक्ति से ऊँची या नीची आवाज सुनकर संसार के अनेक क्षेत्रों में, अनेक हड्डियों में, अनेक स्तर की पकती रहने वाली खिचड़ी रसास्वादन कर सके। रेडियो यन्त्र के माध्यम से मात्र प्रेक्षक केन्द्रों से-निर्धारित फ्रीक्वेंसी पर, निर्धारित ऊर्जा के साथ प्रेषित ध्वनि प्रवाह ही सुना जा सकता है किन्तु शरीर में ऐसे पुर्जे भी विद्यमान हैं जो यदि जग सके तो अपनी आवश्यकता एवं रुचि वाली ध्वनियों को अनन्त आकाश में से पकड़ना और उस आधार पर बड़ी-बड़ी योजनाएँ पूर्ण कर सकना सम्भव हो सकता है।
चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग के दो नवयुवकों के बारे में एक बड़ी विचित्र बात सुनने को आई। जब दोनों जोर-जोर से साँस लेते हैं तो उनके शरीर के अन्दर से विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ और संगीत आने लगता है, जो किसी समीपवर्ती रेडियो स्टेशन की ब्राँड क्रास्टिग भी हो सकती है। दोनों युवक जोर-जोर से साँस लेते समय किसी लाउडस्पीकर के सिरे का स्पर्श करते थे तो आवाज इतनी ऊँची हो जाती थी कि सुनने वालों को ऐसा लगता था, जैसे कोई रेडियो पूरा खोल दिया गया हो।
पशु पक्षी और पेड़ पौधे भी अपने सहचर हैं। सबके समन्वित सहयोग से मानवी वरिष्ठता बनी और निभ रही है। इस क्षेत्र में भी एक से एक बढ़ी-चढ़ी अलौकिकताएँ विद्यमान हैं। अभ्यस्त जानकारी के अतिरिक्त भी बहुत कुछ ऐसा ही है जो प्रकृति के अन्तराल में ही नहीं पशु पक्षियों में भी पाया जाता है। उन रहस्यों का समझना और अविज्ञातों को हस्तगत करना, अगले दिनों विज्ञान का प्रयास पक्ष होना चाहिए।
साथी जानवरों में कुत्ते का महत्वपूर्ण स्थान है। उसे अभी मात्र चौकीदारी के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पर उसकी विशिष्ट घ्राण शक्ति पर जब दृष्टि गई तो चोरों का, चोरी के सामान के पता लगाने के लिए उनसे जासूसों जैसा काम लेना भी चल पड़ा है। आगे चलकर उसकी अन्य अतीन्द्रिय क्षमताओं का भी उपयोग किया जा सकता है।
एक घटना आस्ट्रेलिया की इससे भी विचित्र है। अपने मृत मालिक की ताबूत में रखी हुई लाभ की पहरेदारी उसके पालतू कुत्ते ने आरम्भ कर दी। किसी को भी वह पास फटकने नहीं देता। जो भी व्यक्ति ताबूत के नजदीक जाता उसे ही वह काट खाता। तीसरे दिन जब ताबूत कब्रिस्तान ले जाया जा रहा था तो कुत्ते ने कंधा देने वालों के पैर काट लिए। इस पर ताबूत उनके हाथों से छूटकर नीचे गिर पड़ा और टूट गया। देखा गया कि मृतक की साँसें चल रही हैं। उसे वापस घर ले जाया गया। तब लोगों ने समझा कि कुत्तों को अपनी अतीन्द्रिय शक्ति से मालिक के जीवित होने की बात पहले ही मालूम हो गई थी।
पर्वतारोही मनुष्य अनेक हुए हैं, पर एक कुत्ता भी ऐसा हुआ है जो अपने मालिकों के साथ जीवन भर आश्चर्यजनक ऊँचाई की हिमाच्छादित चोटियों पर चढ़ता रहा। यह अल्पाइन निवासी कूलिज का पालतू था। नाम था उसका ‘तिशिन’। वह मात्र 11 वर्ष जिया पर इसी अवधि में उसने 30 ऊँची चोटियाँ चढ़ी और 36 दर्रे पार किये। कुत्ता जब तक अल्प वयस्क ही था वह तिशिन दर्रे पर चढ़ जाने में सफल हुआ। इसी आधार पर उसका नाम भी रखा गया।
मनुष्य की तरह पालतू कुत्तों को भी बुद्धिमान, जीवन वाला, पराक्रम, साहसी बनाया जा सके तो वे एक समर्थ साथी सहयोगी का काम दे सकते हैं।
पशुओं के श्रम एवं शरीर का ही अब तक लाभ उठाया जाता रहा है। किन्तु उनकी विशेषताओं में से भावना वाला अंश अभी कार्यान्वित न होने के कारण प्रसुप्त ही पड़ा है। यदि उसे उभारा जा सके तो इस परिकर से भी स्नेह सौजन्य का-स्नेह सद्भाव का वैसा ही आनन्द उपलब्ध हो सकता है जैसा कि घनिष्ठ आत्मीय जनों की मित्रता सद्भावना से पाया जाता है।
बर्दवान जिले के चाँदमारी काँलोनी, आसनसोल के एक अध्यापक श्री रामनारायण सिंह के यहाँ 30 अक्टूबर, 1969 को एक गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया। बछड़ा बड़ा ही विलक्षण प्रकृति का था। उसमें मानवी बच्चे के से गुण विद्यमान थे। बछड़े के मानवेत्तर व्यवहार व स्वभाव को देखकर लोग उसे पूर्व जन्म का भावुक मनुष्य बताते थे।
बछड़ा आदमी को गोद में बच्चे की तरह सोने का प्रयत्न करता था। जब कोई उसे प्यार से सुलाता तो आनन्द विभोर होकर ऐसी मुद्रा में चला जाता मानो होश-हवास खो गहरी नींद सो रहा हो। अपने मालिक की गोद में किसी बच्चे को बैठा देखता तो उसे उतारकर ही छोड़ता और उसकी जगह खुद बैठ जाता। यों खाता तो घास भी था, पर जब थाली में मनुष्य का भोजन दिया जाता तो खाने की तरकीब और सलीका देखते ही बनता। पास बैठे मनुष्य को हल्का धक्का देकर यह इशारा करता कि उसे घास या रोटी हाथ से खिलाई जाये। बिना दाल-साग के साथ वह रोटी कभी नहीं खाता। गृह स्वामिनी उसके प्रति आवेश प्रकट करती तो घर के एक कोने में सटकर बैठ जाता और आँसू बहाने लगता। यों प्रसाद में तुलसी के पत्ते वह प्रसन्नता पूर्वक खाता किन्तु आँगन में लगे तुलसी के गमले पर उसने कभी मुँह नहीं लगाया । पूजा के समय शाँति पूर्वक आकर बैठ जाता। उस वक्त रस्सी से बँधा होता तो उसे तोड़ने का प्रयत्न करता और देव स्थान तक पहुँचने की कोशिश करता।
पक्षियों से न जाने क्या-क्या काम लिये जा सकते हैं। प्राचीन काल में कबूतर संदेश वाहक का काम करते थे और पत्रों को इधर से उधर पहुँचाते थे। उनकी गतिविधियों को देखकर मुख-विद्या के आधार पर भावी सम्भावनाओं का पूर्वाभास प्राप्त किया जाता था।
वनस्पति जगत में सर्वत्र उपलब्ध होने वाली और सबसे छोटा समझी जाने वाली इकाई घास है। पशुओं का प्रमुख आहार वही है। वह प्रचुर परिमाण में सर्वत्र उपलब्ध भी है। अगले दिनों मनुष्य के लिए आहार जुटाने में-खाद्य समस्या के समाधान में उसकी महती भूमिका हो सकती हैं। पशुओं की तरह मनुष्य भी उस पर भली-भाँति निर्वाह कर सकते हैं। अन्न, शाक आदि वस्तुतः एक विशेष प्रकार की घास ही हैं। चिकित्सा उपचार में काम आने वाली जड़ी-बूटियों में धरती के अतिरिक्त और क्या कहा जाय?
साधारणतया 200 ग्राम घास से उतनी शक्ति मिलती है, जिससे किसान आधा घण्टा फावड़ा चला सकता है, यात्री डेढ़ घण्टे तक पैदल चल सकता है, लुहार आधा घण्टा कुल्हाड़ी चला सकता है और स्त्री कोई भी काम तीन घण्टे तक करती रह सकती है। प्रयोग से देखा गया है कि 770 बीघे जमीन की घास सूर्य से एक दिन में जो शक्ति प्राप्त कर लेती है वह 20,000 टन टी. एन. टी. अर्थात् पूरे एक परमाणु बम के बराबर होती है।
सूर्य की ऊर्जा और धरती की रासायनिक उर्वरता से घास का कलेवर भरा पूरा है। उसका उत्पादन अभिवर्धन भी कठिन नहीं। प्रश्न केवल इतना ही है कि उसे गले में उतारने योग्य स्वादिष्ट और पेट के द्वारा अपनाये जा सकने योग्य सुपाच्य किस प्रकार बनाया जा सकता है। विज्ञान के लिए इसका मार्ग खोज निकालना कठिन नहीं होना चाहिए।
वन्य पशुओं को दूध श्रम परिवहन से लेकर सरकस के विचित्र क्रिया-कलापों तक के लिए प्रशिक्षित कर लिया गया है। अन्न और फल प्राकृत रूप में वैसे नहीं थे जैसे कि इन दिनों अपने विकसित स्वरूप में है। पेड़ों में कलम लगी है और एक में ही अनेक रंगों के पुष्प अनेक स्वाद आकारों के फल उगा सकना सम्भव हो गया है। नारियल और पपीते पर जड़ में ही फल लदने लगे हैं। इस कौशल को वृक्षों का प्रजातियाँ सुधारने में प्रयुक्त किया जा सकता है। कई वृक्ष पाये जाते हैं जिनकी विशेषता यदि अन्यान्यों में भी उत्पन्न की जा सके तो वे अब की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
शीत ऋतु में आमतौर पर सभी बड़े वृक्ष पतझड़ के शिकार होते और ठूँठ जैसे दीखते हैं। फूलता तो उन दिनों कोई भी नहीं। किन्तु इटली का काले काँटे वाला ‘ब्लैक थार्न’ वृक्ष इसका अपवाद है। वह जब अत्यधिक ठण्डक का मौसम होता है उन्हीं दिनों पूरी तरह फूलता हैं और उसकी सभी टहनियाँ सुन्दर फूलों से लदी दीखती हैं।
दक्षिण अफ्रीका के वेलाविस्किया क्षेत्र में पाया जाने वाला एक वृक्ष ऊँचा कम ओर मोटा अधिक होता है। वह सौ वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहता है और पशुओं के चरने योग्य घास जैसी पत्तियों से लदा रहता है। एक दिन तोड़ने पर उसकी पत्तियाँ दूसरे दिन फिर ज्यों की त्यों हरी भरी बन जाती हैं।
आम का पेड़ 15−20 फीट ऊँचा बढ़ने के बाद ही बौराया और फल देता है। लेकिन जबलपुर में किसी व्यक्ति ने कुछ माह पूर्व आम का एक पौधा लगाया। यह पौधा दो फीट ऊँचा बढ़कर ही आम के फल देने लगा। कुछ महीनों की आयु वाले इस पौधे में 80 आम लगे। इस आम के पौधे को देखने के लिए दूर-दूर से हजारों लोग आये। कोई भी यह नहीं समझ सका कि इतने छोटे पौधे में फूल-फल कैसे लग आये।
पशुओं को अधिक उपयोगी बनाने का मनुष्य ने असाधारण लाभ अर्जित किया है उस कौशल को वृक्ष वनस्पतियों के क्षेत्र में प्रयुक्त करने का ठीक यही समय है।
मानवी काया का मात्र एक ही कलेवर सूक्ष्म शरीर काम में आता है, शेष छः कलेवर अविज्ञात एवं प्रसुप्त स्थिति में उपेक्षित अशक्त स्थिति में पड़े रहते हैं। उन्हें समझा और परिपुष्ट बनाया जा सके तो मनुष्य अब की अपेक्षा कम से कम सात गुना अधिक समर्थ हो सकता है।
शरीर बाहर से एक दीखते हुए भी उसके भीतर सन्तरे की तरह पाये जाने वाले स्वतन्त्र घटकों की तरह सात शरीर पाये जाते हैं। इन्हें ब्रह्माण्ड व्यापी प्रकृति के सात शरीर भी कह सकते हैं। (1) दैवीय-डिवाइन (2) सृष्टि के प्रथम जीव से सम्बद्ध-मोनेडिक (3) परमाणु-एटामिक आत्मिक-स्प्रिचुअल (5) मानसिक-मेन्टल (6) सूक्ष्म-एस्ट्रल (7) भौतिक- फिजीकल-इन सातों के भीतर ही समस्त अगणित सिद्धियाँ समृद्धियाँ समाविष्ट हैं।
ज्ञान और विज्ञान को भूतकाल की तरह मात्र सुविधा सम्पादन के इर्द-गिर्द परिभ्रमण नहीं करते रहने देना चाहिए वरन् उन असंख्यों कार्य क्षेत्रों को खोजने उभारने में लगाना चाहिए जो अब तक की उपलब्धियों की तुलना में असंख्य गुने अधिक सशक्त समृद्ध एवं समुन्नत हैं।
कल्प साधना एवं युग शिल्पी सत्रों के अतिरिक्त नये लेखन सत्र का शुभारम्भ-नव सृजन के युग शिल्पियों को परिष्कृत, परिपक्व एवं प्रवीण करने की दृष्टि से इन दिनों शान्ति कुञ्ज में कई महत्वपूर्ण शिक्षण सत्रों का उपक्रम चल रहा है। कल्प साधना सत्रों में शारीरिक मानसिक परिशोधन तथा आत्मिक परिष्कार के लिए जो आवश्यक है उसका समावेश करके प्रयत्न को समग्र बनाने का प्रयत्न किया गया है।
युग शिल्पी सत्रों में वाणी को सुखद करने और उस आधार पर लोक मानस की गहराई में युग चेतना को उतारना लक्ष्य है। भाषण कला-सम्भाषण कौशल, सरल संगीत एवं आसन प्राणायाम, जड़ी-बूटियों पर आधारित स्वास्थ्य सम्बोधन, रोग निवारण आदि के कई महत्वपूर्ण विषयों का उसमें समुचित समावेश है। यह दोनों ही सत्र उत्साहपूर्वक वातावरण में सन्तोषजनक सफलता के चल रहे हैं। दोनों ही एक-एक महीने के है। पहली तारीख से आरम्भ होकर 30 तक चलते हैं।
अब इस शृंखला में एक-तीसरे सत्र का शुभारम्भ किया गया है-वह है एक महीने का लेखन सत्र । वाणी की तरह लेखनी का भी युग चेतना को व्यापक बनाने के लिए समान रूप से प्रयोग होना चाहिए जागृत लोक मानस की बौद्धिक भूख बुझाने और परिवर्तन का स्वरूप उद्देश्य एवं प्रतिफल समझने समझाने के लिए अगले दिनों लेखनी को भी महती भूमिका निभानी पड़ेगी। इसके लिए सुयोग्य प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करना भी इन्हीं दिनों आवश्यक हो गया है। ग्रेजुएट स्तर की शिक्षा प्राप्त, अध्ययन में गहरी रुचि रखने वाले छात्र ही इसमें प्रवेश पा सकेंगे। यह सत्र भी हर महीने 1 से 30 तक चलेंगे। शिक्षा निःशुल्क है। अन्य सत्रों की तरह भोजन व्यय इन कक्षाओं के क्षात्नों को स्वयं ही वहन करना होता है जिन्हें रुचि हो आवेदन पत् मँगा लें और भरकर भेजें। स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए।
शरीर के किसी भाग पर आघात पहुँचता है तो उसकी प्रतिक्रिया से शरीर का रोम-रोम काँप उठता है। मन और मस्तिष्क भी उद्विग्न और बेचैन हो उठते हैं। समूचा ध्यान शारीरिक पीड़ा पर केन्द्रित हो जाता है। मनःसंस्थान असन्तुलित हो तो शरीर भी स्वस्थ एवं नीरोग नहीं रह पाता। शरीर के प्रत्येक अवयव मनःसंस्थान परस्पर एक-दूसरे की स्थिति से प्रभावित होते हैं। यह शरीर की चैतन्यता एवं एकता के प्रमाण हैं। दृश्य और अदृश्य प्रकृति समूचा ब्रह्माण्ड भी इसी प्रकार एक चेतन पिण्ड है जिसके सभी घटक परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जिसके एक सिरे पर जो कुछ भी घटित होता है तो अन्यान्य स्थानों पर उसकी प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है।
इस तथ्य को प्रतिपादित करने एवं रहस्योद्घाटन करने का जो विज्ञान भारत में प्राचीन काल से प्रचलित था उसे ज्योतिष विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इसका लक्ष्य था अन्तर्ग्रही सम्बन्धों की वैज्ञानिक विवेचना करना तथा एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना। फलतः इस विद्या के सहारे पृथ्वी से इतर ग्रह-नक्षत्रों के अनुदानों से लाभ उठा सकना एवं दुष्प्रभावों से बचाव कर पाना सुलभ था जो आज विकसित भौतिक विज्ञान द्वारा भी सम्भव नहीं है। कालान्तर में यह विज्ञान विलुप्त होता गया और उसका स्थान फलित ज्योतिष की मूढ़-मान्यताओं एवं भ्रान्तियों ने लिया। जिसे देखकर विज्ञजनों द्वारा इस विद्या की उपेक्षा हुई।
इसके बावजूद भी विज्ञान ने जब से प्रौढ़ता की ओर कदम रखा है उसका ध्यान अन्तरिक्ष की खोजबीन की ओर आकर्षित हुआ है। साफ ही ग्रह-नक्षत्रों सौर-मण्डल की गतिविधियों, आपसी सम्बन्धों एवं परस्पर एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों को जानने के लिए छुटपुट प्रयास भी चल रहे हैं। प्रकारान्तर से भौतिक विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है जिस पर सदियों पूर्व तत्त्ववेत्ता ऋषि जो ज्योतिर्विज्ञान के मर्मज्ञ भी थे पहुँच चुके थे।
ज्योतिर्विज्ञान के आचार्यों ने सौर-मण्डल के ग्रह-नक्षत्रों को देवशक्ति यों के रूप से प्रतिष्ठापित किया था। नौ ग्रहों की नौ देवताओं के रूप में प्रतिष्ठापना की गई है ज्योतिर्विज्ञान की यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि सौर मण्डल का अधिपति सूर्य मात्र अग्नि का धधकता पिण्ड नहीं है अपितु जीवन प्राण और सक्रिय अग्नि का पुञ्ज है। जो पल-प्रतिपल अपने सौर-मण्डल के सदस्यों को अपनी गतिविधियों से प्रभावित करता है। न केवल सूर्य बल्कि मंगल, बृहस्पति, बुध आदि भी पृथ्वी के वातावरण को प्रभावित करते हैं।
इस तथ्य को विश्व के प्रसिद्ध भौतिक विद् भी स्वीकार करने लगे हैं कि सौर-मण्डल की गतिविधियाँ पृथ्वी के वातावरण एवं जैविक परिस्थितियों पर प्रभाव डालती हैं। यूगोस्लाविया के नाभिकीय भौतिकविद् प्रो. ‘स्टीवेन डेडीजर’ जैसे विद्वानों का कहना है कि विज्ञान को अपनी अन्तरिक्षीय खोज की सफलता के लिए प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान का अवलम्बन लेना होगा। प्राकृतिक घटनाओं की अभी भी कितनी ही गुत्थियाँ ऐसी हैं जिनको सुलझा पाने में आज का विकसित विज्ञान भी असमर्थ हैं। आधुनिक विज्ञान अन्तरिक्ष एवं सब्न्यूक्लीयर क्षेत्र में अपनी शानदार सफलता के बावजूद भी ब्रह्माण्ड सम्बन्धी घटनाओं की व्याख्या कर पाने में अपनी अक्षमता व्यक्त कर रहा है, क्योंकि इसका क्षेत्र सीमित है। इसके विपरीत ज्योतिष विज्ञान का ब्रह्माण्डीय ज्ञान अन्तरिक्षीय रहस्यों का उद्घाटन करने में पूर्णतया सक्षम है।
भौतिक विज्ञान के सिद्धान्तानुसार हर पदार्थ कण इस ब्रह्माण्ड में एक-दूसरे के सापेक्ष गतिशील है। वे अपना स्थान भी परिवर्तित करते रहते हैं। फलतः जिस पर्यावरण में वे गतिशील रहते हैं, वह बदलता रहता है और एक अविच्छिन्न ब्रह्माण्डीय शृंखला में बँधे होने के कारण कणों का सन्दोह विशेष प्रभाव उत्पन्न किया है। जो अन्यान्य ग्रहों तथा पृथ्वी, चर, अचर, पदार्थों एवं खगोलीय पिण्डों को प्रभावित करता है। इस तथ्य से परिचित होते हुए भी विज्ञान ग्रह-नक्षत्रों की गति स्थिति और प्रभावों की स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ है। उपरोक्त टिप्पणी देते हुए भौतिक ‘विद्स्टीवेन्ड डेडीजर’ का कहना है कि समग्र जानकारियों के लिए ज्योतिर्विज्ञान के विलुप्त ज्ञान को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
प्रख्यात आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक एरनेस्ट मैक का मत है कि ब्रह्माण्ड के अनन्त कण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा उनमें घना सम्बन्ध है। सौर लपटें जो कि ग्रहों की निकटता एवं चन्द्रमा की गति से किसी न किसी प्रकार सम्बन्धित हैं, पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के व्यतिरेक उत्पन्न करती हैं। ग्रही योग पृथ्वी एवं जैविकीय चुम्बकत्व पर अपना प्रभाव डालते हैं। ग्रहों के असन्तुलन से उत्पन्न होने वाली चुम्बकीय आँधी प्रकृति प्रकोपों एवं पृथ्वी के जीवधारियों में अनेकों प्रकार के मानसिक एवं नर्वस सिस्टम के रोग उत्पन्न करती है। भू चुम्बकत्व में होने वाले हेर-फेर से मानवी आचरण और स्वभाव भी अछूता नहीं रहता है।
रूस के वैज्ञानिक चीनेवस्की ने इस क्षेत्र में लम्बे समय तक खोजबीन करने के उपरान्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। उनका कहना है-सौर मण्डल की हलचलों से पृथ्वी के वातावरण एवं घटनाक्रमों का घना सम्बन्ध है। हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य में आणविक विस्फोट होता है। इन वर्षों में पृथ्वी पर युद्ध और क्रान्तियाँ जन्म लेती हैं। प्रकृति प्रकोप एवं महामारियाँ बढ़ती हैं।
जियोजारजी गिआरडी नामक वैज्ञानिक ने ज्योतिर्विज्ञान से प्रेरणा लेकर विज्ञान की एक नवीन शाखा को जन्म दिया-ब्रह्माण्ड रसायन शास्त्र। गिआरडी का कहना है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है इसका कोई भी घटक अलग नहीं वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। इसलिए कोई भी ग्रह तारा पिण्ड कितना भी दूर क्यों न हो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करते हैं।
प्रो. ब्राउन का मत है कि पृथ्वी सौर-मण्डल का ही एक सदस्य है और चन्द्रमा उसका ही एक उपग्रह। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और चन्द्र की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। न केवल चन्द्र और सूर्य वरन् मंगल, बृहस्पति शुक्र और शनि की गतियाँ भी पृथ्वी को प्रभावित करती हैं। उन्होंने अन्तर्ग्रही प्रभावों को ‘समानुभूति’ नाम दिया है।
3 फरवरी 1969 को अहमदाबाद में तीसरी अन्तर्राष्ट्रीय विषुवतीय वायु विज्ञान गोष्ठी का उद्घाटना हुआ। अहमदाबाद भौतिक अनुसंधानी के दो वैज्ञानिकों, प्रो. के. आर. रामनाथन और डा. एस. अनन्त कृष्णन् ने यह घोषणा की है कि पृथ्वी सौर मण्डल की अभिन्न घटक है। आकाशीय पिण्डों के स्पन्दन धरती को भी व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। अपनी एक खोज में इन वैज्ञानिकों ने पाया कि वायु मण्डल के ‘डी’ क्षेत्र में शक्तिशाली एक्स-किरणों के स्रोत स्कोपिओं−11 के गुजरने से वनस्पति एवं जीव जगत की हलचलें बढ़ जाती तथा उनका हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
परमाणु शक्ति आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष और विश्व विख्यात भौतिकविद् डाँ. सारा भाई ने विभिन्न देशों से आये वैज्ञानिकों की एक गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि सूर्य के अतिरिक्त भी अन्य आकाशीय पिण्डों का प्रेक्षीय प्रभाव धरती पर आता है यदि ज्योतिर्विज्ञान के सूत्रों को ढूँढ़ा जा सके और अन्तरिक्षीय ज्ञान में प्रयुक्त किया जा सके तो अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ हाथ लग सकती हैं।
रूसी वैज्ञानिक ब्लादीमोर देस्यातोब ने इस सम्बन्ध में व्यापक शोध कार्य किया है उनका कहना है कि पृथ्वी पर समय-समय पर आने वाले चुम्बकीय तूफानों से धरती के निवासियों में स्नायविक एवं मनोरोगों की बहुलता देखी जाती है। धरती पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता या फ्रीक्वेंसी बदलना आकाशीय पिण्डों के ऊर्जा प्रवाह के परिणाम हैं। अपनी आरम्भिक खोजों में ब्लादीमोर ने यह पाया कि जब सूर्य पर एक विशेष प्रकार के ज्वाला प्रकोप (फ्लेयर) फूटते हैं तो धरती पर प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान आते हैं जिनसे प्रभावित तो सभी होते हैं, पर कमजोर मनःस्थिति वाले व्यक्ति यों पर उनकी प्रतिक्रिया अत्यधिक दिखाई पड़ती हैं। आत्महत्याएँ, हत्याएँ, एवं असन्तुलन के फलस्वरूप सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं। इसी आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्कीय क्रिया-क्षमता का मूलभूत स्रोत-अल्फा-एनर्जी धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और भू-चुम्बकत्व का सीधा सम्बन्ध आकाशीय पिण्डों से है। इसलिए मानवी जीवन अन्तरिक्षीय घटनाक्रमों एवं शक्ति यों से विलक्षण रूप से सम्बन्धित है। अस्तु अन्तरिक्ष में पैदा होने वाली हरा हलचल पृथ्वी, मानवी, प्रकृति, मन, बुद्धि, एवं चेतना को प्रभावित करती है।
प्रसिद्ध खगोल शास्त्री पास्कल का कहना है कि सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा आरोपित सशक्त खिंचाव से सभी परिचित हैं जो समुद्रों-सागरों में ज्वार-भाटे उत्पन्न करते हैं। ये जीवधारियों पर भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं। पास्कल के अनुसार समस्त जीवधारी कम्पायमान समष्टिगत ऊर्जा के एक विशाल समुद्र में निवास करते हैं फिर विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा तरंगों से अप्रभावित कैसे रह सकते हैं। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में यह तथ्य अगले दिनों सप्रमाण पुष्ट होगा कि पृथ्वी पर विद्यमान जीवन का अन्तरिक्ष के ग्रह-नक्षत्रों से घना सम्बन्ध है और अविज्ञात होते हुए भी सूक्ष्म आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है।
प्रौढ़ता को प्राप्त करता हुआ विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है जिन पर सदियों पूर्व भारतीय तत्त्ववेत्ता ज्योतिर्विद् पहुँच चुके थे। समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर है जिसका प्रत्येक स्पन्दन हर घटक को प्रभावित करता है जिसमें पृथ्वी और सम्बन्धित वातावरण वनस्पति एवं जीवधारी भी सम्मिलित हैं। प्राचीन काल में ज्योतिष विज्ञान इसी दिशा में अनुसंधान करने, प्रमाण जुटाने और अन्तर्ग्रही तथ्यों की खोजबीन करने में सचेष्ट था, जिसकी अनेकानेक उपलब्धियों से समय-समय पर मानव जाति लाभान्वित होती रहती थी। विज्ञान का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और अन्तर्ग्रही टोह लेने का सिलसिला आरम्भ हुआ है, यह शुभ चिन्ह है। फिर भी ज्योतिर्विज्ञान के बिना अन्तरिक्षीय खोजबीन करने में विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। इस दिशा में प्राचीन भारतीय ज्ञान सहायक सिद्ध हो सकता है। इस विषय पर भारतीय प्राचीन ज्योतिविदों ने गहन अनुसंधान किए एवं निष्कर्ष निकाले हैं। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रियापाद, गोलपाद, सूर्य सिद्धान्त और उस नारदेव, ब्रह्म गुप्त के संशोधन, परिवर्धन, भास्कर स्वामी का महाभास्करीय आदि दुर्लभ और अमूल्य ग्रन्थ अनेकानेक रहस्यों एवं निष्कर्षों से भरे पड़े हैं। ज्योतिष सिद्धान्त पुस्तकों क प्रथम पाद में अंक गणित, बीजगणित और रेखागणित के सिद्धान्त समझाये गये हैं। मात्र तीस श्लोकों में दशमलव, वर्ग क्षेत्रफल, घनमूल, त्रिभुजाकार शंकु का घनफल निकालने जैसे महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी सूत्र रूप में आबद्ध है। कालक्रियापाद में खगोलशास्त्र का विशद वर्णन है। इसी तरह उसका अन्तिम पाद 50 श्लोकों का अध्याय ‘गोलपाद’ अपने में ज्योतिष विज्ञान के महत्वपूर्ण रहस्यों पर प्रकाश डालता है। अपने पंच सिद्धान्तिक में वाराह मिहिर ने पौलिश, रोमक, वाशिष्ट, सौर और पितामह नामक पाँच ज्योतिर्विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डालते हैं। ज्योतिर्विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए अतीत के महान ज्योतिविदों द्वारा संग्रहित किया गया यह ज्ञान पथप्रदर्शन कर सकता है।
इस बार दो आश्विन मास हैं। नवरात्रियों के सम्बन्ध में इस बार भी पंडिताई विवाद चल रहा है। प्रज्ञा परिजनों को ता. 17 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक नौ दिनों की नवरात्रि माननी चाहिए। एक तिथि की वृद्धि हुई है तो भी नवरात्रि में कोई अन्तर नहीं आता वह नौ रात्रियों में ही सम्पन्न होता है।
शान्ति-कुञ्ज में नवरात्रि साधना सत्र उपरोक्त तिथियों में होंगे। जो अनुष्ठान के निमित्त मात्र आना चाहें, समय रहते स्थान सुरक्षित करा लें। सीमित स्थान भर जाने पर स्वीकृति न मिल सकेगी।
यह तथ्य न केवल सर्वविदित है वरन् प्रत्येक का अनुभव है कि आज का जीवन व्यस्त और तनावपूर्ण है। आजकल सभी लोग तनाव पूर्ण जीवन के शिकार हैं। युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, व्यवसायी और नौकर पेशा, गरीब और अमीर हर वर्ग तथा हर स्तर का व्यक्ति तनावग्रस्त है। सड़कों पर भागती हुई जिन्दगी, आपस में बात करने और मिलने जुलने के लिए समयाभाव की समस्या, जरा सी बात पर दाँत पीसना और बाँहें चढ़ाना, व्यापारियों का चीख
चिल्लाकर बात करना .गृहिणी की बच्चों पर डाँट फटकार आदि सभी इस बात के प्रतीक हैं कि चारों ओर मानसिक तनाव व्याप्त है। यों तनाव से सामान्य अर्थ मानसिक तनाव ही लिया जाता है, पर वस्तुतः तनाव तीन प्रकार के होते है, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव । इन्हें आधि भौतिक आधिदैविक, दैविक और भौतिक चिन्ताओं तापों के रूप में भी इन्हीं की चर्चा की जाती है।
लम्बे समय तक लगातार एक ही प्रकार का काम करने और अत्यधिक श्रम करने के कारण जो थकान उत्पन्न होती है, उसे शारीरिक तनाव कहा जाता है। थक जाने या बहुत अधिक श्रम करने के बाद मनुष्य किस कदर अस्त-पस्त हो जाता है कि उसकी और कुछ करने की बात तो दूर रही, कुछ कहने या सुनने की भी की भी इच्छा नहीं होती। यहाँ आवश्यक नहीं है कि बहुत अधिक श्रम करने के कारण ही शारीरिक तनाव उत्पन्न हो। अधिक सोने, दिन चढ़े तक पड़े रहने, ज्यादा खाने आवश्यकता से अधिक आराम करने के कारण भी मस्कुलरटेन्शन उत्पन्न होता है। आहार-बिहार की गड़बड़ी और अस्त-व्यस्तता भी शारीरिक तनाव उत्पन्न करती है। जहाँ तक अधिक श्रम कारण उत्पन्न हुई थकान से पैदा होने वाले शारीरिक तनाव का प्रश्न है वह मुख्यतः दो कारणों से उत्पन्न होता है। एक तो अनिच्छा पूर्वक कार्य करना और दूसरे मैं काम कर रहा हूँ-यह भावना काम करते समय विद्यमान रहना। श्रम की यह भावना कि मैंने काम किया यदि मनुष्य किसी प्रकार भूल जाय तो तीन-चार घण्टे का विश्राम कर और एक दो बार भोजन कर आसानी से सोलह घण्टे तक काम कर सकता है।
शारीरिक तनाव के बाद मानसिक तनाव का क्रम आता है। यह बहुत अधिक सोचने विचारने या चिन्ता करने से उत्पन्न होता है। सोचना केवल उसी दिशा और उसी विषय जिसमें कि सोच विचार आवश्यक हो। परन्तु अधिकाँश व्यक्ति काम की बातें बहुत कम और व्यर्थ की, बेकार या ऊल-जलूल की बातें ज्यादा सोचते हैं जिनसे वर्तमान जीवन का कोई सम्बन्ध नहीं होता। पिछली बातों या घटनाएँ जिनको अनसुना करना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है अधिकाँश व्यक्ति उन्हीं की स्मृतियों में डूबते उतरते रहते हैं और सोच-सोच कर परेशान होते रहते है। किसी से लड़ाई हो गई, किसी ने गाली दे दी या अपमान कर दिया अथवा कोई दुर्घटना हो गई तो इतने मात्र से लम्बे समय तक मानसिक सन्तुलन अस्त-व्यस्त हो गया। इस तरह के मानसिक तनाव का पहला परिणाम नींद कम हो जाने के रूप में होता है।
स्वास्थ्य के लिए अच्छी, पूरी और प्रगाढ़ निद्रा आवश्यक है यह तो सभी जानते हैं। कोई व्यक्ति एक हफ्ते तक बिना कुछ खाए रह सकता है, पर एक सप्ताह तक नींद के बिना रह पाना सम्भव नहीं है क्योंकि नींद शरीर और को विश्राम पहुँचाती है। लेकिन जब मानसिक तनाव के कारण नींद में अवरोध उत्पन्न होते हैं तो उसका शरीर और स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। पहले तो चिड़चिड़ापन, थकान, अरुचि
और ऊब उत्पन्न होती है। इसके बाद और कई तरह की मानसिक समस्याएँ उत्पन्न होती है।
अत्यधिक सोच विचार और चिन्ता करने से उत्पन्न होने वाला मानसिक तनाव यदि लम्बे समय तक बना रहे तो “मेंटल रिटार्डेशन” नामक स्थिति आ जाती है। इस स्थिति में आने पर मस्तिष्क की शक्तियाँ काम करना बन्द-सी कर देती हैं और मस्तिष्क लगभग सुन्न सा हो जाता है आधुनिक जीवन की यांत्रिक सभ्यता के कारण उत्पन्न होने वाले मानसिक तनावों के परिणाम स्वरूप “मेंटल रिटार्डेशन” के लाखों मामले प्रकाश में आ रहे हैं। इस दुःख स्थिति का सामना तो मानसिक तनाव सह पाने की क्षमता सीमा टूट जाने के बाद उत्पन्न होती है। प्रथम तो इनके लगातार बने रहने के कारण अवसाद ग्रस्त स्थिति बन जाती है, जिसे डिप्रेशन भी कहा जाता है।
इस प्रकार का तनाव बढ़ जाने पर शिराएँ फटने सी लगती हैं, आँखें कमजोर हो जाती हैं। कब्ज रहती है खाना हजम नहीं होता। नशा पीने की इच्छा होती है और यदि शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार के तनाव एक साथ उत्पन्न हो गए तो काम और क्रोध के आवेग भी बार-बार पैदा होने लगता हैं। शारीरिक व मानसिक तनाव के बाद आता है भावनात्मक तनाव। मनुष्य को अपने जीवन में कई तरह के उतार-चढ़ावों का सामना करना पड़ता है। वह निरन्तर भावनाओं के थपेड़े खाता रहता है।
प्रायः भावनाएँ यथार्थ पर आधारित नहीं होती । किन्तु अत्यधिक आसक्ति के कारण मनुष्य उन्हीं से चिपके रहते हैं। किसी का प्रिय मित्र, पुत्र, पति या पत्नी अथवा रिश्तेदार कल आने वाला है तो उसे रात भर नींद नहीं आती। एक घण्टे बाद परीक्षाफल घोषित होने वाला है तो दिल की धड़कन बहुत बढ़ गई। दूर कहीं प्रवास पर है, रात में सहसा किसी की याद आ गई तो नींद गायब, यही है-भावात्मक तनाव। ये भावनात्मक तनाव प्रायः हमारे जाने-अनजाने व्यवहारों में प्रकट होते हैं। कुछ लोग कन्धे उचकाते रहते हैं, कुछ पैर हिलाते रहते हैं, कुछ गुनगुनाते रहते हैं, कुछ सीटी बजाते हैं। कोई बार-बार पलकें झपकाते रहते हैं तो किसी के नाक से खू खू की आवाज आती रही। ये सब भावनात्मक तनाव के ही परिणाम हैं।
इन तनावों की तत्काल प्रतिक्रिया परिणति किसी न किसी रूप में तो देखने को मिलती ही है। इनके दूरगामी प्रभाव भी होते हैं और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर इनकी तीखी प्रतिक्रिया होती है, जिनसे अनेक रोग उत्पन्न होती हैं। मानसिक तनाव के कारण सिर दर्द रहना तो साधारण सी बात है। कई बार पेट के फोड़े (अल्सर) उच्च रक्त चाप, हृदय रोग तथा अन्य कई बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। समय पर तनावों का यदि नियन्त्रण समाधान नहीं किया गया तो हाइपरटेन्शन हार्ट अटैक या पैरालिसिम जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं और जीवन अस्तित्व को ही संकट ग्रस्त कर देते हैं।
इस प्रकार के रोग किसी भी तरह के तनावों के कारण उत्पन्न हो सकते हैं। कभी मस्कुलरटेन्शन से, कभी मेंटल से, कभी इमोशनल से या कभी तीनों के सम्मिश्रित कारणों से इस प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उदाहरण के लिए थके-हुए व्यक्ति को बहुत जल्दी क्रोध आता है। क्रोध आने के अलावा जल्दी थक जाने वाले व्यक्ति चिंतित भी रहने लगते हैं। दिमागी उलझन में फँसे व्यक्ति को सिरदर्द, हृदय की पीड़ा, अम्लता, कब्ज आदि रोग तंग करते रहते हैं। जब व्यक्ति अपने को उपेक्षित समझता है और उसकी भावनाएँ अतृप्त रही आती हैं, तो उसे दमा, यक्ष्मा, आर्थराईटिस, कुष्ठ रोग आदि जैसे रोग उत्पन्न होने लगते हैं।
कहने का आशय यह कि तनाव किसी भी क्षेत्र में संव्याप्त क्यों न हो उससे शक्ति का क्षरण होता है। शारीरिक और मानसिक श्रम से थकान आती तो है पर वह उथली रहती है और विश्राम करने एवं बलवर्धक आहार उपचार लेने इसकी क्षतिपूर्ति थोड़े ही समय में ही जाती है, किन्तु मानसिक या भावात्मक तनाव ऐसे होते हैं जिनके मूल में गहरे आघात विद्यमान रहते हैं। आघातों से उत्पन्न हुए ये घाव नासूर बन जाते हैं और समय-समय पर उभरते फूटते रहते हैं। यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट करने में केवल आहार-बिहार की अनियमितता ही कारण नहीं है। मानसिक शान्ति को नष्ट करने में केवल प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही निमित्त नहीं होती, वरन् उनका कारण मनुष्य की भावनात्मक दुर्बलता और मानसिक सन्तुलन का अभाव भी है। क्योंकि बड़े-बड़े संकट सामने होने पर भी कितने ही मनस्वी लोग उन्हें सामयिक चुनौती मात्र मानते हैं और उनका मुकाबला खेल के मैदान में गेंद से जूझने वाले खिलाड़ियों की तरह करते हैं। इसके विपरीत कितने ही व्यक्ति विपत्ति की कल्पना मात्र से घबड़ा उठते हैं और इतने असन्तुलित हो जाते हैं मानो आपत्तियों का पर्वत ही उन पर टूट पड़ा हो।
जो भी हो, तनाव के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों को जितना विघातक माना जाय उतना कम है। इनके कारण उस जीवनी-शक्ति का बुरी तरह अपव्यय होता है जिस पर स्वास्थ्य, सन्तुलन, शान्ति और आनन्द निर्भर रहते हैं। दीपक का यदि का यदि तेल समाप्त हो जाय तो वह मात्र रुई बत्ती आदि के सहारे ही ज्वलन्त नहीं रखा जा सकता। जीवनी शक्ति को मानवीय सत्ता का तेल भण्डार कहा जा सकता है। तनाव का सीधा आक्रमण उसी पर होता है और जितनी तेजी से उस भण्डार का क्षय होता जाय है उतनी ही तेजी से सोचने समझने की क्षमता और व्यवस्थापूर्वक कुछ करने की दोनों सम्भावनाऐं ही अस्त-व्यस्त होती चली जाती हैं। इस स्थिति में फँसकर व्यक्ति खोखला बनकर रह जाता है। उसके शरीर की बनावट भले ही न बदले पर स्थिति अर्ध विक्षिप्त जैसी बन जाती है। ऐसे व्यक्ति केवल स्वयं सन्तप्त रहते हैं वरन् संपर्क करते रहते हैं।
तनाव के कारण मनःस्थिति दिनों दिन दुर्बल होती चली जाती है, उसके साथ ही दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्ति छोटे-छोटे कारणों से भी भयंकर तनाव उत्पन्न हो सकता है। अतः तनाव से छुटकारे की युक्ति सभी व्यक्ति यों को आनी चाहिए। प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न होने पर विचार करना चाहिए कि उसकी चिन्ता कर असन्तुलित होने के स्थान पर उतार-चढ़ाव को स्वाभाविक मानते हुए सन्तुलन बनाये रखने की दूरदर्शिता अपनानी चाहिए तथा प्रस्तुत प्रतिकूलताओं के साथ खिलाड़ी की भावना से आँख मिचौली खेलने की दृष्टि रखना चाहिए। इस तरह का साहस, ऐसा दृष्टिकोण रखा जाय तो फिर कोई भी कठिनाई ऐसी नहीं रह जाती जिसका प्रयत्न पूर्वक हल अथवा धैर्यपूर्वक समाधान न किया जा सके।
सर्वप्रथम तो उन स्थितियों को समझने और उनके कारणों के पहचाने की चेष्टा की जानी चाहिए जिनसे तनाव या चिन्ताएँ उत्पन्न होती हैं। चाहे वह परिवार में असामंजस्य के कारण उत्पन्न होने वाला तनाव हो या आर्थिक कठिनाइयों से पैदा हुई चिन्ता हो। कई बार बहुत ही समस्याएँ व्यक्ति को परेशान किए रहती हैं। उन सबको एक साथ सोचने का अर्थ है सब शत्रुओं को एक साथ लड़ने के लिए चुनौती देना। सब समस्याओं पर एक साथ विचार करने के कारण किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो पाता और परेशानी अपने स्थान पर खड़ी रहती है। इस स्थिति से निबटने के लिए कारगर उपाय यह है कि एक-एक समस्या के क्रमवार सुलझाया निबटाया जाए।
समस्याओं के समाधान में सन्तुलित और सुलझी हुई नीति अपनाने के साथ यह भी आवश्यक है कि सुखद सम्भावनाओं की आशा लगाने की तरह दुःखद दुर्घटनाओं एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। उस तरह सजग रहने पर ढेरों कठिनाइयों से बचा जा सकता है। कम से कम तनाव के बोझ को तो हल्का किया जा सकता हैं। मानसिक श्रम को अदलते बदलते रहकर और किये जा रहे कार्यों में दिलचस्पी रखते हुए , उन्हें सुव्यवस्थित बनाने का कला-कौशल प्रस्तुत करने की रीति-नीति अपनाकर मानसिक तनाव से बचा जा सकता है। भावनात्मक तनाव से बचने के लिए आवश्यक है-आत्मबल उच्चस्तरीय दृष्टिकोण और आदर्शवादी क्रिया-कलाप अपनाकर आत्मबल बढ़ाया जा सकता है। यही वह दिव्य उपलब्धि है जिसके कारण मनुष्य तनावों से मुक्त सुख शान्तिमय जीवन जी सकता और आनन्द में निमग्न रह सकता है।
परमात्मा सत्य है शिव है और सुन्दर भी। उसकी स्थूल अभिव्यक्ति यह सृष्टि है। जीवात्मा भी उसी का अंश है। इन्हीं गुणों से ओत-प्रोत है। इसी तथ्य की व्याख्या करने के लिए धर्म का इतना बड़ा कलेवर ऋषियों ने खड़ा किया। उपनिषद् यही सन्देश देते हैं। शास्त्रों की रचना का मूल प्रयोजन यही है आत्म स्वरूप परमात्मा स्वरूप का बोध कराना। शास्त्रों में गूढ़ एवं विशद व्याख्या परमात्मा के दिव्य स्वरूप की ही की गई है। जिसका लक्ष्य है मनुष्य यह जाने के कि परमात्मा का अंशी होने के कारण विरासत में उसे भी वह विशेषताएँ मिली हैं। दैवी क्षमताओं से वह सम्पन्न है। प्रसुप्ति के कारण अज्ञान के कारण मनुष्य को अपनी दिव्यता का बोध नहीं रहता और अन्धकार में भटकता रहता है।
ऋषियों की यह विशेषता रही है कि गूढ़ रहस्यों को उन्होंने सूत्रों के रूप में व्यक्त किया है। वेद, शास्त्रों, उपनिषदों में जिन तथ्यों की विशद व्याख्या की गई है वे सारे के सारे गायत्री महामन्त्र के छोटे सूत्र में समाहित में हैं। मन्त्र शिरोमणि कहे जाने एवं भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च स्थान पाने का कारण गायत्री मन्त्र की विशेषताएँ ही हैं जो सूत्र रूप में आबद्ध हैं। परमात्मा के सत्य, शिव एवं सुन्दर स्वरूप की अभिव्यक्ति गायत्री मन्त्र में है। इसके तीन पद इसी शाश्वत सत्य का बोध कराते हैं।
भूः भुवः एवं स्वः लोक में संव्याप्त ॐ परमात्मा का दिव्य स्वरूप ही वरेण्य है। 'तत्सवितुर्वरेण्यं' गायत्री का प्रथम पद इस गूढ़ रहस्य का उद्घाटन करता है। वही एक मात्र सत्य है। सत्ता-अस्तित्व इसी का है। तीनों लोकों में वह विद्यमान है। मानवी सत्ता में भूः स्थूल अभिव्यक्ति शरीर के रूप में भुवः सूक्ष्म मन के रूप में और स्वः कारण अभिव्यक्ति अन्तःकरण में विद्यमान आत्मा के रूप में है। प्रथम पद सत को जानने की प्रेरणा देता है, प्रेरणा ही नहीं, वरेण्य करने धारण करने की शिक्षा देता है।
आज मनुष्य में वरण करने की क्षमता नहीं रही। वरेण्य शक्ति के अभाव में समस्त मानव जाति अज्ञान के अन्धकार में भटक रही है। हम चयन करते हैं भौतिक वस्तुओं का-जड़-पदार्थों का-नष्ट हो जाने वाले तत्वों का। फलतः अज्ञानान्धकार में आजीवन भटकते, रहते हैं। धन, सम्पत्ति, पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए कितना श्रम एवं पुरुषार्थ करते हैं। अपना सम्पूर्ण मनोयोग लगा देते हैं। विभूति के रूप में मिली हुई शारीरिक बलिष्ठता एवं मानसिक प्रखरता की शक्ति को इन्हीं प्रयोजनों के लिए झोंक देते हैं। आकांक्षा की केन्द्र बिन्दु साँसारिक वस्तुएँ ही रहती हैं। पुत्र की, धन, की पद एवं प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए प्रयास चलते हैं। सम्पूर्ण प्रयास असत को-नश्वर आकर्षणों को वरण करने में ही लग जाता है। सत की उपेक्षा बनी रहती है। परमात्मा आत्मा के अस्तित्व एवं सामर्थ्य से अपरिचित बने रहते हैं। गायत्री का प्रथम पद सत को वरण करने-तमसो मा ज्योतिर्गमय की प्रेरणा देता है। वह सर्वत्र संव्याप्त है-शाश्वत है। उसकी दिव्यता ही वर्णनीय है इसी तथ्य का उद्घोष करता है। नश्वर अस्तित्व रहित वस्तुओं के आकर्षण को ही वास्तविक मानकर मनुष्य सतत् उनके पीछे दौड़ता रहता है। मृगमरीचिका की भाँति भटकता है। यह भटकाव अपने साथ असन्तोष एवं अतृप्ति का अभिशाप साथ लेकर प्रकट होता तथा मानवी प्रवृत्तियों में काम, क्रोध, और मोह के विकारों के रूप में उतरता है। गायत्री मन्त्र का ‘वरेण्य’ साधक को वरण करने-चयन करने की सामर्थ्य देता है। सत्ता जो सत है दिव्यताओं से ओत-प्रोत है उसी का वरण करने में मनुष्य का कल्याण निहित है।
द्वितीय चरण ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ सुंदरम् की शाश्वत सौंदर्य की अभिव्यक्ति है। जो दिव्य है, पाप नाशक-निष्कलंक है, देवतुल्य है-दैवी गुणों से भरपूर है। उसको अन्तःकरण में धारण करें। सौंदर्य की अनुभूति अन्तःकरण ही करता है। भावनाओं, सम्वेदनाओं का मर्मस्थल यही है। इस केन्द्र बिन्दु से उठने वाली भाव-तरंग ही वस्तुओं-पदार्थों में टकराकर आकर्षण उत्पन्न करती है। दृश्य जगत का सौंदर्य आपन निज का नहीं है। अदृश्य चेतन तरंगें ही उनमें गति प्रदान कर तो दृश्य संसार नीरस, आकर्षण रहित दृष्टिगोचर होगा। अपनापन जहाँ भी आरोपित किया जाता है-सौंदर्य आकर्षण यहीं दिखायी पड़ने लगता है। चाहे वस्तुओं में किया जाय अथवा व्यक्तियों में। अपना घर अपना सामान, अपना बच्चा, अपनी पत्नी, अपने संगी सभी अच्छे लगते है। अपनापन हट जाने पर वे ही वस्तुएँ अप्रिय लगने लगती है।
गायत्री के द्वितीय चरण में शाश्वत सौंदर्य की अनुभूति का भाग प्रशस्त करता है। उसका दर्शन कैसे करें, सुंदरम् अनुभूतियों में कैसे उतरें, इसका समाधान द्वितीय पद विद्यमान है। परमात्मा के उस दिव्यतम स्वरूप को हम धारण करें जो दुःखों से रहित, आनन्द-दायक पापनाशक तथा द्विधा है। हम धारण करते हैं संकीर्ण स्वार्थों से युक्त प्रवृत्तियों को, काम, क्रोध, लोभ एवं अहंकार की वृत्तियों को, इसी कारण अन्तःकरण मलीनताओं से ढक जाता है। आवरण से अन्तः में निवास करने वाली दिव्य सत्ता के दिग्दर्शन से वंचित बने रहते है। देव प्रवृत्तियों को न अपना पाने के कारण अपनी दिव्यता का बोध नहीं हो पाता। फलतः आत्मसत्ता की गरिमा के प्रतिकूल कृत्य करते है। सौंदर्य का दर्शन पाप रहित होने पर ही सम्भव है। अनीति अत्याचार करने और उनके ताप-संताप में जलते रहने से सम्भव नहीं है। नीति, सदाचार से युक्त राज-मार्ग ही सौंदर्य के उद्गम स्थल तक पहुँचा सकता है।
गायत्री महामन्त्र का तृतीय पद मानव मात्र के लिए शिवं का-कल्याण का मार्ग प्रशस्त प्रशस्त करता है। ईश्वर प्रदत्त मनुष्य को सर्वोत्तम विभूत बुद्धि है। उत्थान-पतन प्रगति का क्रम इस पर ही टिका हुआ है। यह मनुष्य को देवता बना सकती है और दानव भी। नर से नारायण बना सकती है और नर पशु भरी। यह बुद्धि की दिशा धारा पर निर्भर करता है।
सामान्यतया यह शरीर एवं मन की ही पक्षधर बनती है। शरीर की पुष्टि एवं मन की तुष्टि ही इसे भी रुचती है। फलतः प्रत्यक्ष लाभों का ही समर्थन करनी है। उसे त्याग-बलिदान का मार्ग अपनाने-परमार्थ पर चलने से मिलने वाले आत्मा-सन्तोष एवं आनन्द का दूरवर्ती लाभ नहीं दीख पड़ना है। बुद्धि की इस प्रवृत्ति से परिचित ऋषियों ने मार्ग दर्शाया। गायत्री महामन्त्र के अवलम्बन की प्रेरणा दी।
गायत्री मन्त्र में अपने लिए किसी वस्तु की कामना नहीं की गई है। ‘योनः’ समष्टिगत प्रज्ञा के अवतरण के लिए प्रार्थना हुई हे। गायत्री मन्त्र व्यक्ति नहीं समूह-व्यष्टि नहीं समष्टि के कल्याण में विश्वास व्यक्ति करता हे। यही कारण है कि कल्याण साधन सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है वह मात्र अपने लिए नहीं वरन् सबके लिए-नः (हम सबकी ) की गई है। सन्मार्ग पर चलने में इससे बढ़कर लाभ संसार में दूसरा और कुछ नहीं हो सकता। आत्म-सन्तोष जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है जिसकी प्रगति के लिए ही सम्पूर्ण भौतिक प्रयास चलते है। यह उपलब्धि परमार्थ पथ को अपनाने वाले को सहज ही प्राप्त हो जाती है। शिवं का-कल्याण का यही वास्तविक स्वरूप है।
सत्यं, शिवं सुन्दर की तीनों धाराएँ गायत्री महा-मन्त्र से फटती तथा साधक के अन्तःकरण में जाकर एका-कार ही जाती हे। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला अमृत तुल्य दिव्यताओं का-परमात्मा का दर्शन करता है। आत्म स्वरूप सत्यं-शिवं एवं सुंदरम् के दिग्दर्शन के उपरान्त उसे किसी अन्य साँसारिक वस्तु की कामना नहीं रहती।
चेतना जगत की हलचलें जिसे ऊर्जा के माध्यम से गतिशील रहती है वह है-शब्द पदार्थ जगत की क्रिया-शीलता के पीछे जिस ऊर्जा का उपयोग होता है वह है-ताप धरती पर जिस स्तर का जीवन विद्यमान है और जिस प्रकार हलचलें होती रहती हैं उनमें सूर्य ताप की प्रधान भूमिका है। सौर मण्डल के जिन ग्रह-उपग्रहों में सूर्य ताप की जहाँ असन्तुलित स्थिति है वहाँ आग के गोले जैसी या हिम खण्ड जैसी स्थिति बनी हुई हे। धरती को जो सौभाग्य मिला है उसमें उसकी निजी संरचना का उतना महत्व नहीं जितना कि सौर ऊर्जा के सन्तुलित अनुदान का। इसलिए सूर्य को इस पदार्थ जगत की आत्मा कहा गया है-सूर्य आत्मा जगतस्थुषरच।”
यों पदार्थ जगत की साँचाना में अन्य तत्वों का भी सम्मिश्रण है, पर जहाँ तक क्रियाशीलता का सम्बन्ध है वहाँ अग्नि को ही प्रधानता देनी पड़ेगी। ताप और क्रियाशीलता एक प्रकार से पर्यायवाची ही समझे जा सकते है। शरीर का तापमान समाप्त होते ही न कोई अंग अवयव काम करता है न उसमें जीवन के चिह्न ही शेष रह जाते है। अन्य जीवधारियों के जगह की सबसे छोटी इकाई परमाणु मानी जाती है। अव उसके अन्तर्गत विद्यमान इलेक्ट्रान, प्रोटान आदि की उपस्थिति एवं मध्यवर्ती ‘न्यूक्लियस’ के सम्बन्ध में भी विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ली गई है और अणु विस्फोट के माध्यम से प्रचण्ड ऊर्जा उभारने में सफलता प्राप्त कर ली गई है। अणु क्षेत्र से आगे तरंग जगत् है। पदार्थ की मूल प्रकृति अव परमाणु नहीं तरंगों के कितने ही भेद- उपभ्द है। इनमें से चेतन क्षेत्र में जिसे प्रकार शब्द की प्रमुखता है। कहा जा चुका है कि ताप और हलचल उसी प्रकार आपस में सम्बद्ध हैं जिस प्रकार कि शब्द और चिन्तन परस्पर सम्बद्ध है। उसी प्रकार ताप और गति को भी अन्योऽन्याश्रित माना जा सकता है।
यह सब स्मरण इसलिए दिलाया जा रहा है कि आत्मिकी के प्रयोग प्रयोजनों में जहाँ चेतनात्मक उत्कर्ष के लिए शब्द शक्ति का —गायत्री विद्या का महत्व समझाया जा रहा है उसी प्रकार सूक्ष्म विज्ञान में जहाँ कही पदार्थ साधनों का उसी उपयोग करना पड़े कहाँ उसके गति केन्द्र ‘ताप’ का महत्व भी ध्यान में रखा जा सके। शब्द शक्ति गायत्री विद्या के माध्यम से अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार से प्रयुक्त होती है। इसी प्रकार ताप शक्ति का दिव्य प्रयोजनों के लिए जब भी उपयोग करना पड़े तब उसके लिए क्या करना होगा ? इस प्रसंग का पूर्व निर्धारण यही ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए। कि इसके लिए अग्निहोत्र का माध्यम अपनाना पड़ेगा। जिस प्रकार प्रत्यक्ष प्रयोजनों का माध्यम अपनाना पड़ेगा। जिस प्रकार प्रत्यक्ष प्रयोजनों में आग, बिजली, भाप, तेल आदि माध्यमों से ताप उत्पन्न करके दीपक जलाने, रसोई पकाने से लेकर बिजली घर, मिल, कारखाने, यान जैसे अगणित प्रयोजन पूरे किये जाते हैं उसी प्रकार अग्नि-होत्र के माध्यम से ऐसी दिव्य ऊर्जा उत्पन्न की जाती है जो अध्यात्म विज्ञान के आधार पर भौतिक उद्देश्यों के काम आ सके।
अध्यात्मवेत्ता साधना प्रयोजनों में अग्निहोत्र के अनेकानेक प्रयोगों का उपयोग एवं उल्लेख करते रहे हैं। उपासना उपचार में दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, अग्नि-होत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती, धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर, गिरजाघर, गुरुद्वारे, चैतन्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है। उन्हें तो एक प्रकार से ‘अग्निपूजक’ ही माना जाता है। ‘अग्यारी’ का उस
धर्म में देवता जैसा सम्मान है।
भारतीय धर्म संस्कृति के साथ यज्ञ परम्परा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त समय-समय पर होने वाले षोडश संस्कारों का विधान है। इन सभी में अग्निहोत्र अनिवार्य है। विवाह का प्रधान संस्कार परिक्रमा है। यह उस अवसर पर किए जाने वाले यज्ञ की ही होती है। लाश को चित्ता में जलाने की प्रक्रिया मूलतः अग्निहोत्र का ही जल्दबाजी में किया गया औंधा-सीधा स्वरूप है। अन्यथा यदि उस कृत्य को विधिवत् किया जा सके तो फिर अन्त्येष्टि यज्ञ में ही भूत शरीर का समापन करना पड़ेगा। होली वार्षिक यज्ञ का ही ध्वंसावशेष है। अन्याय त्यौहारों में भी अग्निहोत्र आवश्यक है भले ही उसे महिलाएँ चूल्हे से अग्नि निकालकर चिह्न पूजा के रूप में ही क्यों न करले । देवी, देवताओं में से एक भी ऐसा नहीं जिसकी पूजा प्रक्रिया में अग्निहोत्र का कोई न कोई छोटा-बड़ा रूप अपनाये बिना काम चल जाता हो। यहाँ तक कि भूत-पलीत जादू-टोना उच्चाटन-अभिचार में भी किसी न किसी रूप में अग्निहोत्र का समावेश करना पड़ता है। किसी भी मन्त्र की साधना अग्निहोत्र के रूप में पूूर्णाहुति किये बिना सम्पन्न नहीं होती।
गायत्री और यज्ञ को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। एक को भारतीय संस्कृति की माता और दूसरे को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। इस प्रतिपादन के आध्यात्मिक, नैतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पक्ष भी है और वे सभी विचारणा एवं भावना को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भी है। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष स्वरूप-अग्निहोत्र उपयोगिता की दृष्टि से अपनी अतिरिक्त गरिमा विशेष रूप से बनाए रहेगा। गायत्री को प्रज्ञादर्शन कहा जाय तो यज्ञ को उसका सहयोगी वर्चस् कहा जाएगा। इस आध्यात्मिक वर्चस् के अंतर्गत ही शारीरिक तेजस् और मानसिक ओजस् की ऊर्जा भी उभरती है। गायत्री अनुष्ठानों की पूर्णाहुति में ‘अग्निहोत्र’ को अनिवार्य माना गया है। प्रज्ञा को परमार्थ परायण बनाने का संकेत तो इसमें है ही, साथ ही यह वैज्ञानिक रहस्य भी समाहित है कि आत्मिक और भौतिक प्रगति के दोनों पक्ष परस्पर गुँथे हुए हैं। एक के बिना दूसरे की न तो साधना बनती है और न प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। अतएव ‘शब्द के साथ तप’ शक्ति का समावेश भी होना चाहिए। अर्थात् गायत्री उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है। उन दिनों जप के समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी, अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है। नित्यकर्म में पंचयज्ञ, बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं।
अध्यात्म विज्ञान में पंचाग्नि विद्या का विशेष उल्लेख है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसकी सारगर्भित व्याख्या है। श्रोत्रिय अग्निहोत्री पाँच अग्नियों की स्थापना करके उनका विधिवत् यजन करते हैं। जीवन रूपी समिधा को समाज रूपी यज्ञ में होम देने की कई स्तर की प्रेरणाएँ यज्ञ कृत्य के विभिन्न क्रिया-कृत्यों में कितने ही प्रकार से समाविष्ट है। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी है और वरण करने वालों को देवत्व की, विभूतियों की रत्नराशि उपलब्ध होने का आश्वासन दिया गया है। अध्यात्मदर्शन और विज्ञान के दोनों ही पक्षों में यज्ञ की जितनी चर्चा हुई है, जितनी व्यवस्था बताई, महिमा गाई गयी है उतना ऊहापोह कदाचित् ही किसी अन्य प्रसंग पर हुआ हो। यजुर्वेद, शपथ ब्राह्मण तथा सत्रों-ग्रन्थों में यज्ञ चर्चा की ही प्रमुखता है। मीमांसा दर्शन एवं कर्मकाण्ड ग्रन्थों पर दृष्टि डालने से उनमें यज्ञ ही सर्वोपरि महत्व का प्रतिपादित दीखता है? जन्मजात रूप से तो सभी अनगढ़ शूद्र होते हैं फिर मनुष्य शरीर में ब्राह्मण का उदय कैसे हो? इसी काया में देवत्व का उदय किस प्रकार सम्भव हो? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मनुस्मृति में एक ही दिया गया है-महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीय कृयते तनुः” अर्थात् यज्ञों, महायज्ञों के माध्यम से इसी शरीर को ब्राह्मणस्य-ब्राह्मण स्तर का-बनाया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अग्निहोत्र के माध्यम से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा सम्बद्ध व्यक्ति सत्ता का स्तर बदल सकती है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक उपचार हुआ। शरीर के लिए औषधि उपचार, शल्य कर्म आदि का जो महत्व है वही प्रकारान्तर से विचारणा एवं भावना तन्त्रों में सुधार परिष्कार करने के लिए यज्ञ उपचार द्वारा सम्भव हो सकता है।
प्राणाग्नि को कुण्डलिनी के रूप में और योगाग्नि को ब्रह्मतेजस् के रूप में प्रतिपादित किया गया है। एक को भौतिक जगत की अधिष्ठात्री और दूसरी को चेतना परिसर की स्वामिनी कहा गया है। इन दोनों के उत्पादन में जो प्रयोग करने पड़ते हैं ऊर्जा उत्पादन की इस प्रक्रिया के प्रत्यक्ष और परोक्ष, ज्वलनशील और ज्योतिर्मय दोनों ही पक्ष हैं। इतने पर भी उपरोक्त दोनों ही अग्नियों का प्रज्ज्वलन जिस प्रकार होता है उसमें यज्ञ प्रक्रिया किसी न किसी रूप में सम्मिलित ही रहती है। ऐसे-ऐसे अनेकों प्रसंग हैं जिन पर प्रकाश डाला जा सके तो वे तथ्य उभर कर ऊपर आ सकेंगे जिनके आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकेगा कि मनुष्यों के बीच देवात्मा की तरह रहने वाले प्रज्ञा पारंगत ऋषियों ने किन कारणों से ‘यज्ञ’ को आत्मविज्ञान के प्रतिपादन निर्धारण में क्यों मूर्धन्य स्थान दिया? आर्ष ग्रन्थों और आप्त वचनों के पीछे कल्पनाओं की मनगढ़न्त उड़ानें नहीं चिरकाल के प्रत्यक्ष अनुभवों का सार निष्कर्ष ही प्रस्तुत करने की परम्परा रही है। ऐसी दशा में यह मानना होगा कि यज्ञ तत्व के सम्बन्ध में जो कहा गया है वह सारगर्भित ही होना चाहिए।
यह भूतकालीन देवयुग की चर्चा हुई। आज के परिप्रेक्ष्य में देखना यह होगा कि क्या वे प्रतिपादन आज की स्थिति में भी सही है। क्या इन दिनों भी उस प्रक्रिया का उपयोग पुरातन काल की तरह अर्वाचीन भी हो सकता है? इस संदर्भ में नये सिरे से खोज करनी होगी। कारण यह है कि इन दिनों यज्ञ विद्या का एक प्रकार से लोप हो गया ही माना जा सकता है। मात्र आग जला देना और उसमें सुगन्धित सामग्री होम देना ही यज्ञ नहीं हो सकता। उसका प्रयोजन वायु को सुगन्धित करना भी नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो उसमें मंत्रोच्चार एवं अत्यन्त सतर्कतापूर्वक बरते जाने वाले विधि-विधानों एवं अनुबन्धों को उसके साथ न जोड़ा गया होता। आग में सभी सुगन्धित द्रव्य एक साथ ही झोंके देने से भी वह कार्य बिना किसी झंझट के अत्यन्त सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता था। वस्तुतः ‘यज्ञ’ प्रक्रिया के अंतर्गत उन अनेकानेक संस्कार उपचारों का समावेश है जो गर्मी, रोशनी भर देने वाली आग को दिव्य प्रयोजनों में काम आ सकने वाली उच्चस्तरीय ऊर्जा के रूप में परिणत कर सकें। यह संस्कार प्रकरण ही यज्ञ का प्राण है। उसे न अपनाया जा सके तो अग्नि समारोह के माध्यम से प्राचीनकाल के राजसूर्य, अश्वमेध आयोजनों की तरह राजनैतिक न सही सामाजिक कार्यों के लिए समारोह स्तर की आवश्यकता ही पूरी हो सकती है। यज्ञ के साथ जुड़े हुए दिव्य प्रयोजन पूरे नहीं हो सकते। यज्ञाग्नि को दिव्य ऊर्जा में परिणत करने की विधि-व्यवस्था एक प्रकार से विलुप्त ही हो गई। कर्मकाण्ड की पुस्तकों में तो पूजा उपचार में प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों एवं विधानों भर का उल्लेख है। उससे क्रिया-कृत्य तो विधिवत् हो सकता है किन्तु यज्ञाग्नि की प्राण-प्रतिष्ठा के रहस्यों को भूल जाने के कारण कोई महत्वपूर्ण कार्य सधते नहीं। उन खोई हुई कड़ी को ढूँढ़ा न जा सका तो स्थिति ऐसी ही उपहासास्पद बनी रहेगी। जैसी कि आज विज्ञ समाज में उपेक्षा, अवहेलना एवं भर्त्सना के रूप में सर्वत्र उभरी दृष्टिगोचर होती है। आज तो उसे खाद्य-पदार्थों की बर्बादी तथा समय, श्रम की होली जलाने की बात कहकर व्यंग्य वचनों की वर्षा ही सुशिक्षित वर्ग में होती दीखती है। परिस्थितियों की प्रतिक्रिया को देखते हुए इसे अनुचित भी नहीं ठहराया जा सकता।
अपूर्णता, अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था के रहते कोई भी प्रक्रिया अपना सही और समुचित परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। फिर निहित स्वार्थों द्वारा लाभ संचय के लिए मूढ़-मान्यताओं की भरमार किए जाने पर तो रही बची बात भी समाप्त हो जाती है। खंडहर भी यथावत् बने रहने पर पूर्व स्मृतियों का प्रतिनिधित्व करते और सम्मानास्पद बने रहते हैं, पर यदि उन स्थानों पर दुष्प्रवृत्तियों के केन्द्र बनकर खड़े हो जाएँ तो पुरातन इतिहास के आधार पर मिल सकने वाला गौरव भी हाथ से चला जाएगा । यही हो भी रहा है। यज्ञ एक समूचा विज्ञान सम्मत उपचार है।
अन्य वैज्ञानिक प्रयोजन के खोज अन्वेषणों में विपुल धन राशि खर्च होती रहती है। यदि ‘यज्ञ’ विज्ञान की पुरातन गरिमा बनी रहती, तो वह स्थिति न आती जो इन दिनों भर्त्सना के रूप में सुननी पड़ती है। सिक्का खोटा होने पर तो परखने वाले उसका तिरस्कार करेंगे ही।
बात निन्दा-प्रशंसा की, मान्यता-अवहेलना की नहीं वरन् यह है कि जिस तथ्य की आत्म-विज्ञान में मूर्धन्य भूमिका रही और जिसकी प्रतिक्रिया मनुष्य समुदाय को हर दृष्टि से कृत-कृत्य करती रही, उसकी अपने ही हाथों अन्त्येष्टि किस प्रकार कर दी जाय? उस विद्या के महान् आविष्कारों को सनकियों या आडम्बरियों की संज्ञा में सम्मिलित किया जाना किस प्रकार स्वीकार कर लिया जाय? आग, बिजली, पाक शास्त्र, संगीत, कला, शिक्षा, चिकित्सा आदि की जो उपलब्धियाँ अर्जित की गई वे सुधार परिवर्तनों की प्रक्रिया से होकर गुजरते हुए भी निरन्तर उन्नतिशील बन रही हैं। फिर यज्ञ तत्व जैसी उपलब्धियाँ निरुपयोगी बर्बादी समझे जाने की स्थिति में क्यों पड़ी रहें? प्राचीनकाल में उससे जो लाभ उठाएँ जाते रहे इस प्रगतिशील एवं साधन सम्पन्न युग में उससे हर क्षेत्र की तरह इसमें भी उन्नति अभिवृद्घि होनी चाहिए थी। पर यदि ऐसा नहीं हो सका तो इसमें दोषी उन्हीं को ठहराया जाएगा जो उस कृत्य को करते तो हैं पर लोक भर्त्सना से उसे बचाने के लिए कोई सुरक्षात्मक प्रयत्न नहीं करते। समय आ गया कि अब वस्तुस्थिति को तथ्यों की कसौटी पर खरे-खोटे की यथार्थता प्रकट होने का अवसर मिले। आवश्यक नहीं कि पुरातन के नाम पर वस्तुतः निरुपयोगी है तो उसकी न केवल उपेक्षा भर्त्सना होनी चाहिए वरन् उसे बन्द करने कराने का भी उपक्रम चलना चाहिए। यदि वह वस्तुतः उपयोगी है तो फिर आवश्यकता इस बात की होगी कि अध्यात्म विज्ञान का पक्षधर विज्ञ समाज उसे उस स्तर पर पहुँचाए , जिसमें उपयोगिता पर उँगली न उठ सके और लाभों को देखते हुए उसे अपनाने के लिए सहज उत्साह उठ पड़े।
वो वा एतदक्षरं गार्य्यविदित्वा स्मँल्लोके जुहोति यजते। तपस्यप्यते बहूनि वर्षसहस्त्राव्यन्तवदेवास्स्य तद् भवति यो॥
वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात् प्रैतिस कृपणोऽथः। य एतदक्षरं गागिं विदित्वास्माल्लोकात् प्रैतिस ब्राह्मणः॥ (वृहदारण्यक 3। 8। 10)
हे गार्गी जो इस ब्रह्म को न जानकर इस जगत् में बहुत वर्षों तक होम, यज्ञ, या तपस्या करत है, उसका फल अनंतकाल होता है। एवं जो अक्षर ब्रह्म को बिना जाने इस जगत से प्रयाण करता है, वह दीन होता है और जो उसको जानकर इस जगत् से प्रस्थान करता है, वह ब्राह्मण (ब्रह्मविदः) होता है।
यज्ञ विज्ञान जो प्रमुख उद्देश्य मानवी अन्तराल का परिष्कृतीकरण तथा अदृश्य वातावरण का अनुकूल है। साथ ही उस माध्यम से कितने ही भौतिक प्रयोजन भी सिद्ध होते हैं। शरीरगत प्राण ऊर्जा से जीवन स्थिर रहता है और प्रकृतिगत ऊष्मा से कच्चे को पकाने के अनेकानेक प्रयोजन सम्पन्न होते रहते हैं। दोनों अग्नियाँ मूलतः एक है। चेतना क्षेत्र में काम करते समय उसे प्राणाग्नि और पदार्थों के साथ गूँथने पर उसे पावक कहते हैं। यज्ञ तत्व का मूल प्रयोजन चेतना में प्रखरता भर देने के अतिरिक्त आरोग्य लाभ जैसे लौकिक लाभ भी जुड़े हुए।
श्रम अग्नि है। पराक्रम अग्नि है। साहस अग्नि है। प्रतिभा अग्नि है। उमंग अग्नि है। श्रद्धा अग्नि है। समर्पण अग्नि है। इन अर्थों की बोधक अनेकों ऋचाएँ उपलब्ध हैं। संक्षेप में मानवी सत्ता के अंतर्गत जितनी पवित्रता और प्रखरता दृष्टिगोचर होती है उसे दिव्याग्नि का अनुदान कह सकते हैं। ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म समन्वय वर्चत् अर्थात् तदनुरूप पराक्रम। दोनों के मिलने से ब्रह्मवर्चस् शब्द बनता है। इस समन्वय को ब्रह्म-यज्ञ या विश्व-यज्ञ कह सकते हैं। यही ब्रह्माग्नि है। चाहें तो उसी को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा भी कह सकते हैं। यज्ञ का यह विराट् स्वरूप है। अग्निहोत्र तो उसका प्रतीक प्रतिनिधि भर है। भौतिक प्रयोजनों के अनेक प्रयोगों में एक आरोग्य रक्षा के लिए किया जाने वाला प्रयास 'भेषज यज्ञ’ के नाम से प्रख्यात है। व्यक्ति गत दुर्बलता एवं रुग्णता को निरस्त करने के लिए एवं वायुमण्डल की व्यापक विषाक्तता के कारण उत्पन्न होने वाले रोग उपद्रवों के शमन में ऐसे आयोजन का प्रयोग होता रहा है। यज्ञ की अनेक उपलब्धियों में एक आरोग्य उपचार विधि भी है। इसमें शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण की विधि व्यवस्था है। यज्ञ चिकित्सा का सीमा बन्धन मानवी रोग निवारण ही नहीं, मानसिक अस्त-व्यस्तताओं को दूर करना तथा अन्तरिक्ष में संव्याप्त विषाक्तता से उत्पन्न होने वाली विपत्तियों का निराकरण भी है। इस प्रकार यज्ञ चिकित्सा प्रचलित सभी चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में अधिक व्यापक और अधिक श्रेयस्कर ठहराती है।
‘भैषज यज्ञ’ के सम्बन्ध में अनेकों सूत्र संकेत शास्त्रों में उपलब्ध होते हैं।
अग्निष्कृणोतु भेषजम्। अथर्व. 6। 106। 3
यज्ञाग्नि औषधि का काम भी करती है।
तनूपा अग्नेऽसि तन्वं में पाहि। आयुर्द्रा अग्नेऽस्यायुमें देहि। बर्च्चेदा अग्नेऽसि वर्चो में देहि। अग्ने यन्मे तन्वा अनं तन्म आपृण-यजु 3। 17
अर्थात्-हे अग्नि! तुम शरीर के रक्षक हो, मेरे शरीर के करो। तुम दीर्घायु तुम दीर्घायु प्रदान करने वाले हो मुझे दीर्घायु बनाओ। तुम तेजस्वी हो, हमें तेजस्विता प्रदान करो। मेरे शरीर की कमी और विषमता को दूर कर उसे पूर्ण बनाओ।
यदि क्षितायुर्यदि वापरेतो यदि, मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निर्ऋ्रतोरुपस्था-दस्यार्ष मेन शतशारदाय॥
अर्थात्-अग्निहोत्र के माध्यम से, आयु क्षीण हुए जीवनी-शक्ति नष्ट हुए तथा मृत्यु के समीप पहुँचे हुए व्यक्ति रोग के चंगुल से छूटते हैं। रोगी मृत्यु के मुख से पुनः आते हैं और 100 वर्ष जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करते हैं।
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैन शपथको अश्नुते। यं मेषजस्यं गुग्गुलोःसुरभिर्गन्धो अश्नुते॥ विष्वञ्चस्तमाद् यक्ष्मा मृगाद्रश्ला द्रवेरते आदि॥ अथर्व. का. 19 सू. 38 मं. 1, 2
अर्थात्-जिनके शरीर को रोग नाशक गूगुल का उत्तम गन्ध व्यापक है उसको राज-यक्ष्मा की रोग पीड़ा नहीं होती। दूसरे का शाप भी नहीं लगता। उससे सब प्रकार के यक्ष्मा-रोग शीघ्रगामी हरिणी के समान काँपते हैं, डर कर भागते हैं।
यदि क्षितायुर्यदि वा परे तो यदि, मृत्योरन्तिकं नीत एवं। तमा हरामि निऋते रुपस्था− फस्पार्शमेनंशतशारदाय-अथर्व का. 3 सूक्त 11 मन्त्र 2
अर्थात्-यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा इस संसार के सुखों के से दूर हो, चाहे मृत्यु के निकट आ चुका हो, ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश के यज्ञ छुड़ाता है। साथ ही दीर्घ जीवन भी प्रदान करता है।
प्रयुक्त ता यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुराजिता। ताँ वेद विहिता मिष्टमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्॥
—चरक चि. स्थान अ. 8 श्लोक 12
अर्थात्-जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्षमा रोग नष्ट किया जाता था, आरोग्य चाहने वाले मनुष्य को उसी वेद-विहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए।
सन्तान न होने पर पुत्रेष्टि यज्ञ किये जाते थे। जो जन्म ले चुके उनकी स्वस्थता एवं प्रतिभा निखारने में भी यज्ञ का उपभोग है—
....................एष एतत्करोति याश्य त्वेवास्य प्रजा जातायाश्चाजातास्ताउभयी रुद्रियात्प्रमु्रञ्च्ति अस्यानमीवाः अकिल्वषाः प्रजाः प्रजायन्त तस्माद्वाऽएष एतैर्यजते-शतपथ 2। 6। 2। 2
अर्थात्-यह यज्ञ, उस सन्तान को जो उत्पन्न हो चुकी है और उस सन्तान को भी जो उत्पन्न नहीं हुई है-रोगमुक्त रखे रहता है।
भैषज्य यज्ञ’ ऋतुओं के सन्धिकाल में होते थे क्योंकि इसी समय व्यापक स्तर पर व्याधियों का प्रकोप होता था। शतपथ-ब्राह्मण में इनका इस प्रकार उल्लेख है—
भैषज्य यज्ञा वा एते। ऋतु सन्धुषु व्यार्ध्जायते तस्माहतुसन्धिषु प्रयुज्यन्ते।’
अर्थात्-ऋतुओं के सन्धि काल में —ग्रीष्म और सर्दी के बीच तथा सर्दी और गर्मी के बीच-व्याधियों का प्रकोप बढ़ जाता है अतः इन भैषज्य-यज्ञ उनका निराकरण किया जाता है।
लगभग ऐसा ही प्रतिपादन 'छान्दोग्योपनिषद्' का भी है। वहाँ भैषज्य-यज्ञ के विषय में लिखा हुआ है—
भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्नैवंविद् ब्रह्मा भवति।(छान्दो. 4। 17। 18)
अर्थात्-आरोग्य शास्त्र का ज्ञाता, जिसमें ब्रह्मा होता है, उस यज्ञ को भैषज्य-यज्ञ कहा जाता है।’
वनस्पति ही मनुष्य का खाद्य है। उसी के भीतर बनता और बढ़ता है। यह वनस्पति अंश शरीर में न्यूनाधिक पड़ने में कई प्रकार के रोग उठते हैं। उनकी पूर्ति विशेष गुण वाली वनस्पतियाँ जड़ी-बूटियाँ करती हैं और खोये आरोग्य को फिर से प्रदान करने का अवसर प्रदान करती हैं। यज्ञादि में वनस्पतियों को होमने से वही लाभ मिलता है जो उनसे बनी हुई औषधियाँ प्रदान करती हैं। यज्ञ प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाली औषधियों की अभ्यर्थना करते हुए कहा गया है—
‘शमिता नो वनस्पतिः।’ (यजु. 21। 21)
अर्थात्—’ वनस्पतियाँ हमें शान्ति-प्रदान करने वाली हैं।’ वे औषधियाँ रोगों को दूर करके शक्ति प्रदान करने वाली होती हैं—
सहस्व में आरातीः सहस्व पृतनायतः। सहस्व सर्व पाप्मान सहमानास्योषधेः-यजु 12। 99
अर्थात्—’ हे औषधि (वनस्पति) तू रोगों को दूर करने वाली है, अतः मेरी शक्ति हरने वाले रोगों को दूर कर। युद्ध की तरह शरीर में हलचल मचाने वाले सब रोगों को पराजित कर। दूर कर।
भेषज यज्ञों में होनी गई वनस्पतियों में वैयक्तिक और सामूहिक आरोग्य रक्षा के उपरोक्त सूत्र संकेतों के अतिरिक्त और भी बड़ी बात यह है कि उस प्रयोग से मनोविकार दूर होते हैं। कषाय-कल्मष कटते हैं और व्यक्ति यों को सत्प्रवृत्तियों में भर देने वाले उभार उमगते हैं। ऐसी सर्वतोमुखी प्रखरता उपलब्ध होने का आश्वासन श्रुति देती है। प्रार्थना शैली वेदों की अपनी प्रतिपादन प्रक्रिया है। उसे मात्र मनुहार न माना जाय वरन् समझा जाय कि अमुक्त अवलम्बन अपनाने में अमुक्त लाभ प्राप्त करने का आश्वासन है। यज्ञ से समग्र
व्यक्ति त्व विकसित होने का एक आश्वासन इस प्रकार है—
‘प्राणश्च मेऽपानश्च मेऽव्यानश्च मेऽसुश्च में चित्तं च म आधीतं च में वाक् च में मनश्च में चक्षुश्च में श्रौत्नं च में दक्षश्च में बलं च में यज्ञेन कल्पताम् ॥ (यजु. 18। 2)
मेरा, प्राण मेरा अपान, मेरा व्यान, मेरे अन्य प्राण, मेरा चित्त, मेरे विचार, मेरी वाणी, मेरा मन, मेरा नेत्र, मेरा कान, मेरी दक्षता, और मेरा बल यज्ञ के सम्पन्न हो-यज्ञीय ऊर्जा से युक्त होकर अधिक प्रखर व प्रभावी हो।
देव सविता प्रसुव यज्ञं प्रसुवयज्ञपतिं भगाय। दिव्यो गर्न्धवःकेतपूःकेतंनःपुनातु वाचस्पतिर्वाचं न ॥
स्वदतु-यजु अर्थात्-मन वाणी, बुद्धि की उन्नति तब होगी जब यज्ञ एवं यज्ञपति की उपासना की जाय।
आयुर्यज्ञेन कल्पताँ प्राणो यज्ञेन कल्पताँ चक्षुर्यज्ञेन कल्पताँ श्रोत्नं यज्ञेन कल्पताँ वाग्यज्ञेन कल्पताँ मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पताम्॥ यजु. 18। 29
अर्थात्-यज्ञ से आयु, यश से प्राण, यज्ञ से दर्शन-शक्ति यज्ञ से श्रवण-शक्ति , यज्ञ के वाक्-शक्ति , यज्ञ से मन, तथा यज्ञ से आत्मा, बलवान्, समर्थ व प्रखर बने।
विपत्तियाँ मात्र शारीरिक रुग्णता के रूप में ही नहीं आती वरन् उनकी आधि भौतिक, आधि दैविक एवं आध्यात्मिक कारण एवं स्वरूप भी है। ‘प्रारब्धजन्य, दुष्कृतों के फलस्वरूप ने केवल रोग वरन् अन्य प्रकार के संकट भी उत्पन्न होते हैं। उनके निराकरण में यश विधि जितनी फलप्रद सिद्ध होती है उतनी और कोई नहीं। इस संदर्भ में कितने ही शासन वचन उपलब्ध होते हैं। जिनमें यज्ञानुष्ठान जैसे अन्य धर्मकृत्यों को अपनाने से रुग्णता तथा दूसरी व्यथाओं के निराकरण की बात कही गई है—
“मन्तौषधि, मणि मगंल, वत्युपहार होम, प्रायश्चित्तोपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपातगमनादि। युक्तिव्यपाश्रयं-पुनराहरौषधि द्रव्याणाँ योजना। सत्वावजयः पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्योमनोनिग्रहः।”
अर्थात्-मन्त्र यन्त्र, होम, यज्ञ, निगम, प्रायश्चित्त, उपवास, प्रणिपात (साष्टांग प्रणाम) तथा तीर्थाटन आदि के द्वारा इसमें कायिक, मानसिक एवं महामारी रोगोपचार होता है।
प्रशाभ्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्ति व्यपाश्रयैः। —चरक सूत्र 1। 15। 56
अर्थात्-पूर्व जन्माजित भोग अथवा देव एवं ग्रह जनित रोगोपचार के लिए जो यन्त्र, मन्त्र, यज्ञ, हवन, दान पूजन एवं व्रतोपवास किया जाता है, आशु फलदायक होने के कारण इसे प्रथम कहा गया है।
रसायन तपो जाप योग सिर्द्धर्महात्मभिः। कालमृत्युरपि प्राज्ञैर्जीयते नालसै नरै॥
अर्थात्-रसायन महौषधि, मृत्युञ्जय आदि जप− तप, ब्रह्मचर्यादि एवं योग की सिद्धियों से काल-मृत्यु भी टाल जाता है।
इस प्रकार भेषज यज्ञ से आरोग्य लाभ होने की तरह की अन्य समस्याओं के समाधान एवं उत्थान अभ्युदय के अनेक प्रयोजनों में यज्ञ का आश्रय लेने से भारी सहायता मिलती है।
स्वास्थ्य रक्षा एवं जीवनी शक्ति संवर्द्धन के लिये यज्ञ प्रक्रिया द्वारा मानव मात्र की तथा पर्यावरण की चिकित्सा का प्रावधान आर्षकालीन महामानवों द्वारा बनाया गया है। इस पूरे प्रकरण के हर पहलू को वैज्ञानिक पद्धति से जाँचना-परखना मनीषा का कर्त्तव्य है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने इस दुष्कर कार्य को अपने हाथ में लिया है अगले दिनों सारा विश्व इस ऋषि प्रणीत विद्या के रहस्यों को व उसके महत्व को जानकर कृतकृत्य होगा, इसमें रत्ती मात्र भी सन्देह नहीं।
सब शिखर के स्वप्न-दृष्टा ही बने यदि, तो भवन की नींव का पत्थर बनेगा कौन। सब पवन-प्रेरित पताका ही बने यदि, नींव की चट्टान जैसा फिर तनेगा कौन॥1॥
नींव पर ही भवन को विश्वास होता है। नींव में ही शिखर का इतिहास होता है। शिखर की चर्चा हुआ करती महोत्सव पर, नींव में चिर-प्राण का आवास होता है। सब महोत्सव की प्रतीक्षा ही करें यदि, महोत्सव अनुकूल दिनचर्या बनेगा कौन॥2॥
उच्चतम शिखरे उठाना ‘लक्ष्य’ अच्छा है। क्योंकि सृष्टा की यहीं तो प्रबल इच्छा है। सुशोभित करना शिखर पर है पताका भी, ‘श्रेष्ठतम’ के वरण की ही तो प्रतीक्षा है। किन्तु! सब ही कीर्ति के किंकर बने यदि, कर्म की महिमा उजागर फिर करेगा कौन॥3॥
जिस नये युग का कि नव निर्माण होना है। हमें उसकी नींव का पाषाण होना हैं। सीढ़ियों पर सीढ़ियाँ धरते चले आओ, अवतरण तब स्वर्ग का आसान होना है। उदय ही देवत्व का हममें न हो यदि, इस धरा पर स्वर्ग का सृष्टा बनेगा कौन॥4॥
नींव बनने से अगर कतरा गये तो। शेख चिल्ली की तरह इतरा गये तो। मनुजता का फिर कहाँ आवास होगा, मनुज के ही आचरण पथरा गये तो। ‘व्यष्टि का निर्माण’ ही पीछे रहा यदि, ‘सृष्टि का आदर्श’ फिर निर्मित करेगा कौन॥5॥
—मंगल विजय
*समाप्त*