दूसरों की सहायता करना और आवश्यकतानुसार लेते रहना - मानवी लोक व्यवहार का आधार है। आदान-प्रदान की व्यवस्था अपना कर ही यह समूचा संसार चल रहा है। पदार्थों, वनस्पतियों और प्राणियों के बीच यह प्रक्रिया निर्बाध गति से चलती देखी जाती है। इसे बनाये रहने में योगदान करने का औचित्य भी है और लाभ भी।
इतने पर भी यह मानकर चलना चाहिए कि आत्मावलम्बन ही प्रधान तथ्य है। उसी को अपनाने से गुजारा होता और भविष्य बनता है। दूसरों पर निर्भय रहकर कोई न तो अपना अस्तित्व बनाये रह सकता है और न प्रगति पथ पर दूर तक अग्रसर हो सकता है।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से सभी परिचित है। वह हर वस्तु को पकड़ती और अपनी ओर घसीटती है। मानवी सत्ता का भी एक चुम्बकत्व है। वह अपने सजातीय व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थितियों को न केवल पकड़े रहती है, वरन् घसीटकर भी अपने समीप बुलाती है। जो व्यक्ति जैसा होता है, उसे अपने सहधर्मी की तलाश करने में देर नहीं लगती। जलाशयों का पानी जिधर-तिधर होते हुए समुद्र में जा पहुँचता है। इतना ही नहीं, समुद्र भी चैन से नहीं बैठता, वरन् जहाँ भी जलाशय होते हैं वहाँ जलराशि पहुँचाने के लिए अपने दूत बादलों को भेजता ही रहता है।
जैसी अभिलाषा है, उसके अनुरूप अपनी पात्रता विकसित करनी चाहिए। विश्व व्यवस्था में ऐसा प्रावधान है कि क्षमता के अनुरूप उपलब्धियाँ सरलतापूर्वक हस्तगत होती रहें। इसके लिए अन्यान्यों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा यही अच्छा है कि अपने को न केवल देखें, समझे; सुधारें वरन् उभारने का भी प्रयत्न करें। यही सफलता का राजमार्ग है।
एक तपस्वी थे। पेड़ के नीचे बैठे थे। ऊपर से चिड़िया ने बीट कर दी। तपस्वी ने क्रोध से ऊपर देखा तो चिड़िया जलकर भस्म हो गई और नीचे आ गिरी उन्हें अपनी तप शक्ति का चमत्कार प्रथम बार देखने को मिला, गर्व से सीना फूल गया।
वे नगर चले। एक गृहस्थ के दरवाजे पर भिक्षा की याचना की। किवाड़ बन्द थे। गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया-“थोड़ी देर बाहर विराज लीजिये। अपनी योग साधना पूरी करके भिक्षा दूँगी।” योग साधना में बोलना कैसा? किवाड़ के छेद में झाँककर देखा तो वह अपने पति की सेवा में निरत थी। “ऐसा ही होता है-योग। मेरे साथ ठिठोली कर रही।” तपस्वी की आँखें लाल हो गई।
गृह स्वामिनी ने दरवाजा खोला। नमन किया, भिक्षा थाल आगे रखा और नम्रतापूर्वक कहा-क्रोध न करें। यहाँ कोई चिड़िया नहीं रहती।
क्रोध आश्चर्य में बदल गया। “चिड़िया क्रोध इसे क्या पता?” गृह स्वामिनी ठिठक गयी। बोली-“योगी त्रिकालदर्शी होते हैं। मैं भी तो योग करती हूँ। कर्त्तव्य धर्म का पालन भी योग है। पति सेवा भी। उसकी भी तो सिद्धि है। चिड़िया वाली घटना जानने की क्षमता मुझमें क्यों न होती?”
तपस्वी ने भोजन तो ग्रहण किया पर साथ ही जिज्ञासु भाव से यह भी पूछा-आपके कर्मयोग की साधना तो सरल भी है। मुझे इसका दर्शन और विधान समझादें।
गृहिणी बोली-“मैंने गुरु वचन पर अनन्य श्रद्धा रखी। जो उनने बताया सो करने लगी न मुझे तत्वदर्शन आता है न विधि-विधान। गुरु वचन में पति सेवा को योग कहा गया सो ही मैं निष्ठापूर्वक करती आ रही हूँ।”
तो फिर अपने गुरु का पता बता दें, जो मुझे कर्मयोग समझा दें-तपस्वी ने कहा।
गृहिणी ने पता बता दिया-ब्रह्मावर्त नगर के तुलाधार वैश्य। तपस्वी चल दिये। रास्ता नापते नियत स्थान पर जा पहुँचे। तुलाधार की छोटी दुकान थी। ग्राहकों को सतर्कतापूर्वक निपटा रहे थे।
दुकान के सामने तपस्वी को खड़ा देखकर नमन किया। सत्कारपूर्वक आसन दिया। बोले-“कर्मयोग का रहस्य पूछने आये हैं न? आपको गृह स्वामिनी ने भेजा है न? आप चिड़िया जलाने वाले सिद्ध पुरुष है न?”
इतनी जानकारी? बिना कुछ पूछे बताये? तपस्वी का असमंजस दूर करते हुये तुलाधार ने कहा-“मैं योगी हूँ। त्रिकालदर्शी भी। व्यवसाय कर्म को श्रद्धापूर्वक करना भी कर्मयोग का एक अंग है। आपकी शंका का निवारण तो मैं कर नहीं सकूँगा। गुरु वचन पर अगाध विश्वास करके मैं व्यवसाय साधना में लग पड़ा। बिन पढ़ा हूँ। शास्त्र नहीं जानता। कुछ पूछना हो तो मेरे गुरुदेव के पास चले जाइये।” सन्त के आश्चर्य का ठिकाना न था। उनने इतना ही कहा-तब अपने गुरुदेव का पता बतादें।
तुलाधार ने काशी के श्वेतार चाण्डाल का पता बता दिया। वे उस कर्मयोगी को प्रणाम करके काशी की राह चल पड़े। काशी आने से पूर्व ही एक व्यक्ति सम्मुख आया। तपसी को साष्टाँग दण्डवत करके बोला-मेरा नाम श्वेतार चाण्डाल है। गंदी बस्ती में रहता हूँ। मुझे कोई जानता नहीं। पता पूछने और पहुँचने में आपको कष्ट होता सो मैं पहले ही आ पहुँचा। अब आप बैठे मैं नियत योगाभ्यास करलूँ तब आपकी जिज्ञासा का समाधान करूंगा। चाण्डाल मल-मूत्र ढोने और नालियाँ साफ करने लगा। समीप बैठे इस कौतुक को देखने वाले तपस्वी से चाण्डाल ने कहा-‘देव! ऊँचे उद्देश्य रखकर सामान्य कार्यों को भी यदि मनोयोगपूर्वक जीवन साधना का अविच्छिन्न अंग मानकर करते रहा जाय तो वह कर्म-योग भी एक तपस्या है। उसका प्रतिफल भी अन्यान्य योगाभ्यासों के समान ही होता है। त्रिकालदर्शी होने की सिद्धि मुझे इसी आधार पर मिली है।
तपस्वी का समाधान हो गया। वे स्वार्थ-परमार्थ का समन्वय करने वाले कर्मयोग को श्रेष्ठ मानकर भविष्य के लिए उसी साधना में निरत हो गये।
मनःस्थिति परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य के सुख-दुःख, विकास अथवा पतन के लिए मुख्यतः वही जिम्मेदार है। परिस्थितियों की अपनी स्वतन्त्र सत्ता तो है, पर मनुष्य की प्रगति-अवगति में उनकी नगण्य भूमिका ही होती है। मूलतः कारण वह आन्तरिक स्थिति ही होती है। मन की विलक्षण सामर्थ्य और सम्भावनाओं को देखकर ही ऋषियों ने उसे व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष घटकों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना था तथा यहाँ तक कहा था कि मनुष्य का मन ही उसके बन्धन अथवा मुक्ति का कारण है।
प्रगति की आकाँक्षा रखने तथा महानता का मार्ग चमन करने वालों को सर्वप्रथम मन को ही समझाना, सँभालना तथा सुधारना पड़ता है। अनगढ़ रहने पर वह अड़ियल घोड़े की तरह परेशान करता तथा विकास का मार्ग अवरुद्ध करता है। सुगढ़ता प्राप्त करते ही वह सधे घोड़े की सवारी ढोने, भार लादने की तरह इच्छाओं-आकाँक्षाओं का सही नियोजन तथा पूर्ण मनोयोग का परिचय देकर अनेकों प्रकार से सहयोग देता है। उसका स्तर निकृष्ट हो तो पतन-पराभव का मार्ग स्वयमेव खुल जाता है। अनियन्त्रित-निरुद्देश्य इच्छाएँ हवा के साथ उड़ने वाले तिनकों की भाँति भटकती रहती हैं। उनसे कोई विशेष प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता।
श्रेय मार्ग का चयन करने तथा महानता का वरण करने की जो आकाँक्षा करते हैं, उन्हें साधनात्मक प्रयत्न करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी यह भी है कि मन को सही दिशा दें। इच्छाओं-आकाँक्षाओं का सही स्वरूप समझें ताकि उनमें से उचित का ही वरण कर सकें। श्रेय मार्ग के पथिक को लक्ष्य ही नहीं अपने चिन्तन का स्वरूप भी निर्धारित करना पड़ता है। कारण कि उत्कृष्ट जीवन की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
फ्रायड से अलग हटकर मनुष्य के विकास की असीम संभावनाओं पर दृढ़ विश्वास रखने वाले मनःशास्त्री मैस्लो का कहना है कि व्यक्तित्व विकास के लिए एक विशिष्ट तरह की चिन्तन पद्धति भी अपनानी पड़ती है। मैस्लो ने परमार्थ परायण महापुरुषों के चिन्तन एवं दृष्टिकोण का मनःशास्त्र के आधार पर विश्लेषण किया है। उन्होंने उस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे अति उपयोगी तथा हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
मैस्लो के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्तित्व, सहज-स्वभाव के होते हैं। उनमें कृत्रिमता का अभाव पाया जाता है। बाहर एवं भीतर से एक जैसे होते हैं। उनकी भावना, विचारणा एवं क्रिया तीनों ही में एकरूपता पायी जाती है। जैसा विचार करते हैं, हृदय में वैसे ही भाव उठते तथा व्यवहार में उसी स्तर के कृत्य दिखाई पड़ते है। उनका स्वभाव स्वच्छन्द होता है। यह स्वच्छन्दता प्रगतिशीलता की, श्रेष्ठ प्रयोजनों की पक्षधर होती है। पर उसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे मर्यादा हीन होते हैं। स्वच्छन्दता से अभिप्रायः उस स्वतन्त्रता से है, जिसके सहारे वे परम्परागत कुरीतियों-रूढ़ियों का विरोध करने तथा तोड़ने में जरा भी नहीं हिचकते। विचारों की सीमित परिधि में रहना उन्हें नहीं रुचता। नित नये एवं प्रगतिशील विचारों का आह्वान करना उनकी विशेषता होती है। समाज एवं देश को वे उपयोगी विचार देते हैं। साथ ही अनुपयोगी के खण्डन में भी पीछे नहीं रहते। मौलिकता उनमें कूट-कूटकर भरी रहती है। अन्धानुकरण को वे पिछड़ापन का चिन्ह मानते तथा उससे सदा बचते हैं। अपनी राह स्वयं बनाते तथा बिना किसी की परवाह किये एकाकी चल पड़ते है। परम्परावादियों के विरोध का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता। अपने मार्ग से, वे संघर्षों के कारण विचलित नहीं होते। संकटों, संघर्षों एवं प्रतिकूलताओं को वे स्वयं आमन्त्रित करते हैं तथा उन्हें खेल-खिलवाड़ मानकर उनके माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ाते हैं।
ऐसे व्यक्तियों को सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वे उन समस्याओं को ही महत्व देते तथा उन पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, जिनमें समाज, देश एवं मानव जाति का हित जुड़ा हो। उनका अहम्-विराट् में विसर्जित हो जाता है। अपने स्व एवं उससे जुड़े स्वार्थों पर उनका कड़ा अंकुश रहता है। अपनी परिस्थितियों से वे सन्तुष्ट होते हैं। प्रसिद्ध विचारक कैप्टन शोटोवर कहा करते थे-“इस संसार में हम रुचि तभी लेते हैं, जब हमारी रुचि स्वयं से परितृप्त होकर बाहर निकलने लगे।’ अर्थात् स्वयं की इच्छाएँ अतृप्त हों, तो बाह्य समस्याएँ निरर्थक जान पड़ती है। प्रकारान्तर से यह भी कहा जा सकता है कि अपनी इच्छाओं का विगलित किये बिना समाज एवं संसार की सेवा सम्भव नहीं है।’
मैस्लो की अवधारणा है कि सभी परमार्थी, रचनात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। उनमें कलात्मक, वैचारिक तथा वैज्ञानिक स्तर की विशेषताएँ होती है। वे वस्तुओं को सदा नये अन्दाज में ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि उनके जीवन में एकरूपता की ऊब नहीं पायी जाती। एक ही वस्तु को सदा नये-नये रूप में देखते रहने से उसमें सदा नयापन का आभास होता है। जबकि सामान्य व्यक्तियों में दृष्टिकोण की यह विशेषता नहीं होती।
कोलिन विल्सन रचित “न्यु पाथवेज इन साइकोलॉजी” में मैस्लो के चिन्तन का निष्कर्ष दिया गया है। “सामान्य लोगों की तुलना में महामानव अधिक प्रसन्नचित्त एवं प्रफुल्लित पाये जाते हैं। यह उनकी सन्तुलित एवं परिष्कृत दृष्टि का ही परिणाम होता है। उनमें यथार्थता को पहिचानने एवं ग्रहण करने को भी अद्भुत क्षमता पायी जाती है।” असली नकली चीजों में विभेद करने की भी इन महामानवों में विलक्षण सामर्थ्य देखी गयी है। ऐसी समर्थ ग्राह्य क्षमता उनमें हर क्षेत्र में विद्यमान पायी गयी है। जिस भी क्षेत्र में उनकी परीक्षा ली गयी, वे अपनी अद्वितीय क्षमता का परिचय देते देखे गये। कला, संगीत, राजनीति तथा अन्यान्य सभी क्षेत्रों में भी वे अग्रणी होते हैं।
इसी पुस्तक में मैस्लो ने लिखा है कि “स्नेह-सौजन्य की भावना अपेक्षाकृत अन्य लोगों के महामानवों में अधिक होती है। स्नेह-प्यार-करुणा-दया से उनका अन्तःकरण लबालब भरा रहता है।” आगे वे लिखते हैं-“उनका किसी से बैर नहीं होता, दुष्प्रवृत्तियों से तो वे घृणा करते हैं, पर किसी व्यक्ति विशेष से नहीं। हर व्यक्ति में सर्वोपरि सत्ता का निवास है, इस विश्वास के कारण वे सबसे प्रेम करते हैं, प्रेम बाँटते तथा प्रेम पाते हैं। एकान्त तथा शान्तिप्रियता उनके स्वभाव का अंग होता है। सामाजिक एवं नैतिक नियमों का वे उल्लंघन नहीं करते। इन अनुबन्धों को तोड़ना वे अपराध मानते हैं। उनमें सहनशक्ति तथा सामंजस्य की प्रवृत्ति असाधारण रूप से पायी जाती है। उनका स्वभाव विनोदी होता है, पर उसमें उथलापन का अंश कभी नहीं होता। दूसरों की निन्दा-उपहास नहीं करते। प्रायः वे हर व्यक्ति को उठाने का प्रयत्न करते हैं, गिराने का नहीं। चिन्ता, भय, परेशानी, संकट के अवसर तो उनके सामने भी आते रहते हैं, पर उन परिस्थितियों में उनका धैर्य एवं सन्तुलन देखते बनता है। ऐसे अवसरों पर भी वे निषेधात्मक चिन्तनधारा में नहीं बहते, विधेयात्मक ढंग से ही सोचते तथा हर समस्या का हल शान्तिपूर्ण ढंग से निकालने का प्रयत्न करते हैं।
मैस्लो फ्रायड की इस मान्यता का भी खण्डन करते हैं कि ‘प्रत्येक मनुष्य की गतिविधियाँ यौन-अभिप्रेरित होती हैं। उनका कहना है कि संसार में अनेकों ऐसे सन्त-महापुरुष हुए हैं, जिनका आचरण यौन से पूर्णतः ऊपर उठा हुआ था। उनका यौन-प्रवृत्ति पर पूर्ण नियन्त्रण था। वे किसी ऊँचे लक्ष्य से प्रेरणा एवं शक्ति प्राप्त करते थे। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध विद्वान विचारक जार्ज बर्नार्डशा ने भी मैस्लो की इस धारणा का समर्थन करते हुए कहा है-सेक्स से इतर भी श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ मनुष्य के भीतर पायी जाती है। समाज, देश एवं संस्कृति के लिए सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले त्यागी-बलिदानी, महापुरुषों-सन्तों का जीवन चरित्र इस बात का साक्षी है। स्नेह एवं प्यार का उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा का विलक्षण सैलाब उनके हृदय में उमड़ता देखा जाता है। देश की बलिवेदी पर मर मिटने वाले बलिदानियों, समाज के उत्थान के लिए जीवन होम देने वाले समाज सेवियों, आविष्कार में एकनिष्ठ होकर जुटे वैज्ञानिकों की प्रेरक शक्ति सेक्स नहीं, वह महानता होती है, जो उनके भीतर से प्रस्फुटित होती तथा कुछ विशेष प्रचलित ढर्रे से अलग हटकर कुछ करने को अभिप्रेरित करती है।”
अर्थशास्त्र एवं समाज शास्त्र की मूर्धन्य प्रतिभा कार्लमार्क्स की कृति ‘डास कैपिटेल’ की गणना सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में की गयी है। मनोविज्ञान के आधार पर समाज के नव-निर्माण की विचारधारा मैस्लो ने अपनी पुस्तक ‘यूपसाइकियन मैनेजमेंट’ में व्यक्त की है। प्रगतिशील विचार के समर्थकों ने मैस्लो की इस पुस्तक को ‘डास कैपिटल’ के तुल्य ही माना है। इस पुस्तक में मैस्लो ने महानता वरण करने के कुछ व्यावहारिक सुझाव भी दिये हैं। उनके अनुसार लक्ष्य निर्धारित कर लेने के उपरान्त मनुष्य को कार्यों के छोटे, बड़े का भेद-भाव नहीं करना चाहिए, वरन् उनका स्तर श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करना चाहिए। प्रायः ऊब, नीरसता, अकर्मण्यता का कारण वह चिन्तन ही होता है, जिसमें मनुष्य काम को छोटा मानकर उनमें रस नहीं लेता। सामान्य और असामान्य व्यक्तियों में मौलिक अन्तर यह पाया जाता है कि सामान्य व्यक्ति जिस काम को छोटा मानकर उपेक्षा कर देते अथवा उसे करने में मनोयोग का परिचय नहीं देते, महापुरुष उनमें भी पूरी तल्लीनता-मनोयोग से जुटे दिखायी पड़ते अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर करते देखे जाते हैं। वे काम के प्रतिफल पर नहीं उसके स्तर पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। यह असाधारण मनोयोग ही अन्ततः श्रेष्ठ परिणामों का भी कारण बनता है।
मूर्धन्य मनःशास्त्री मैस्लो ने उपरोक्त विचारों में महानता के सिद्धान्तों तथा महापुरुषों की जिन विशेषताओं का वर्णन-विश्लेषण किया है, वे शाश्वत है। अध्यात्म तत्ववेत्ता भी इसी जीवन दर्शन का समर्थन विभिन्न माध्यमों से समय-समय पर करते देखे जाते हैं। इन्हें चर्चा श्रवण एवं अध्ययन तक सीमित न रखकर सचमुच ही आचरण में उतारने के लिए कटिबद्ध हुआ जा सके, तो देखते ही देखते मानस से महामानव की स्थिति में जा पहुँचने का सौभाग्य इसी जीवन में हर किसी को मिल सकता है।
सफर लम्बा था। रास्ते में कई विराम करने थे। एक जगह उनने प्यासे गधे को देखा जो मरणासन्न स्थिति में पड़ा था। उस क्षेत्र में कहीं दूर-दूर तक पानी था नहीं।
एकनाथ जी को दया आई। प्यासे गधे को देखकर उनने गंगाजल का एक घड़ा गधे के मुँह में डाल दिया। पीकर वह खड़ा हो गया, और बोला दूसरा घड़ा भी पिला दें तो बड़ी कृपा होगी। इसके बिना इस रेगिस्तान से पार नहीं जा सकूँगा।
सन्त ने दूसरा घड़ा भी पिला दिया और खाली काँवर एक ओर पटककर वापस चलने लगे। भगवान पर जल चढ़ाने का पुण्य न मिला, तो न सही एक प्यासे की जान तो बच गई।
गधा लौट पड़ा। बोला, सन्त आओ गले मिलें और एक दूसरे को निहाल करने पर प्रसन्नता व्यक्त करें।
आश्चर्यचकित सन्त का समाधान करते हुये गधे ने कहा-मैं रामेश्वरम् हूँ। सच्चे भक्त का दर्शन करने हेतु इस मार्ग पर पड़ा रहता था। पुजारी बहुत निकलते थे, पर दयालु सन्त आप ही मिले, मेरा दर्शन मनोरथ पूर्ण हो गया।
एकनाथ ने पीड़ित के रूप में भगवान् को देखकर नमन किया। बोले, अब में सदा आपके दरिद्रनारायण स्वरूप की ही पूजा करूंगा और पीड़ितों-पतितों की सेवा में निरत रहकर आपकी सच्ची भक्ति में संलग्न रहूँगा।
यह लोक मान्यता सही नहीं है कि मनुष्य साधना के सहारे आगे बढ़ता और सफल होता है। वास्तविकता यह है कि परिष्कृत व्यक्तित्व ही साधन एकत्रित करता और उनके सदुपयोग का लाभ उठाता है। घटिया व्यक्तित्व अवसर होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा पाता। जबकि प्रतिभावान् प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता खोज निकालते हैं और अवसर न होते हुए भी उसे अपने कौशल से उपार्जित करते हैं।
साधन सम्पन्नों की सम्पदा का किस प्रकार उपयोग हुआ इस पर दृष्टि दौड़ाने से निराशा होती है। उपार्जन कर सकना सरल है। अनीति पर उतारू व्यक्ति उसे और भी जल्दी समेट लेते है। किस के पास कितना है प्रश्न इस बात का नहीं वरन् इस बात का है किसने, किस प्रकार कमाया। ठीक इसी प्रकार का यह भी प्रश्न है कि उपलब्ध था उसे किसने किस प्रकार, किन प्रयोजनों का खर्च किया।
साधनों की विपुलता उतनी महत्वपूर्ण नहीं, जितनी कि उन्हें सही तरीके से कमाने और सही कामों में खर्च करने की। यदि विपुलता को ही महत्व दिया जाय तो भी बात वहीं आकर टिकती है कि व्यक्तित्व कितना प्रखर था। बुरे तरीकों से सफलता पाने में भी अन्ततः व्यक्तित्व को ही श्रेय मिलता है। इस संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि बुरे किस्म की प्रखरता बुरे उपाय अपनाकर सफलता अर्जित करती है। यहाँ भी श्रेय बुराइयों को नहीं मिलता वरन् चमत्कार उस व्यक्तित्व का दीखती है जिसका विकास तो हुआ पर बुरे क्षेत्र में फला-फूला।
साधनों को कमाने, रखाने और खर्चने के लिए एक विशेष प्रकार की सूझ-बूझ चाहिए। उसे प्रखरता कहते हैं। सूझ-बूझ के अतिरिक्त उसमें पराक्रम भी जुड़ा रहता है। न केवल पराक्रम वरन् प्रतिभावान् सिद्ध करने वाले गुणों से भी अपने आपको सुसज्जित करता पड़ता है। इसमें प्रमाणिकता और कुशलता दोनों का ही समान समन्वय रहता है। इन दोनों में से एक की भी कमी पड़े तो कठिनाई अड़ जायगी। प्रामाणिकता रचित व्यवहार कुशल धूर्त कहलाते हैं और बबूले की तरह जहाँ तहाँ उछलते-डूबते रहते हैं। स्थायित्व के लिए प्रामाणिकता की भी आवश्यकता है। हाँ, यह माना जा सकता है कि केवल प्रामाणिक होने से भी काम नहीं चलता। प्रगति के लिए व्यवहार कुशलता भी न्यूनाधिक मात्रा में उतनी ही आवश्यक होती है जितनी कि प्रामाणिकता।
व्यक्तित्व का विनिर्मित करना सफलताओं और सम्पन्नताओं को अर्जित करने के लिए आवश्यक है। इसकी उपेक्षा करके धूर्तता के सहारे प्रगति करने की बात सोचने वाले कमाते कम और खोते ज्यादा है। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान गँवाने वाले ईश्वर का कोप भी सहते हैं। ऐसे लोगों के लिए उपार्जन का सदुपयोग करते भी नहीं बन पड़ता। दुरुपयोग से अमृत भी विष बनता है। विलासी अपव्यय और दुर्व्यसन और कुपात्रों को हस्तान्तरण, यही है साधनों का दुरुपयोग जिसे व्यक्तित्व रहित व्यक्ति करते देखे गये हैं। वे अपना, उपार्जित वैभव का ही नहीं उनका भी विनाश करते हैं जिनके साथ उनकी मैत्री, घनिष्ठता या अनुकम्पा बरसती है। डूबने वाला अकेला ही नहीं पहने हुए कपड़ों को भी साथ ले डूबता है।
व्यक्तित्ववान् सही रीति से सही साधन सीमित मात्रा में कमाये, यह हो सकता है, पर जो भी वे कमाते हैं उसे उनकी दूरदर्शिता इस प्रकार प्रयुक्त करती है जिसे असंख्यों के लिए आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। सराहनीय और चिरस्थायी सफलताएँ सदा महामानवों ने ही अर्जित की हैं। व्यक्तित्ववानों से ही वैभव का सदुपयोग बन पड़ा है। परिश्रम और मनोयोग का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए परिस्थितियों की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती, जितनी परिष्कृत मनःस्थिति की।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य के जीव में ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण अपने पिता की सभी विशेषताएँ विद्यमान है। छोटे-से शुक्राणु में समूचे मनुष्य का परिपूर्ण ढाँचा विद्यमान रहता है। परमाणु के घटकों में पूरे सौर-मण्डल स्तर की गतिविधियाँ काम कर रही होती है। बीज में समूचे वृक्ष का ढांचा विद्यमान रहता है। इस अखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक विभूतियों का जो भाण्डागार भरा पड़ा है, वह बीज रूप में मानवी सत्ता के भीतर विद्यमान है। ब्रह्माण्ड का छोटा स्वरूप पिण्ड मनुष्य कलेवर है। इसके गर्भ में ब्रह्म चेतना की सभी विशेषताएँ एवं क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में मौजूद है। आत्म-साधना के द्वारा इस प्रसुप्ति को जागृति में बदला जा सकता है। सामान्य से असामान्य बन सकने की इस प्रक्रिया को आत्म-साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
उपयोगिता की दृष्टि से जितना महत्व भौतिक प्रगति एवं व्यवस्था का है उससे अधिक महत्व आत्म चेतना के परिष्कार का है। पदार्थ का उपयोग तो चेतना ही करती है। यदि इस मूल सत्ता का स्वरूप ही अनगढ़ एवं विकृत बना रहा तो फिर पदार्थों का बाहुल्य होते हुए भी उनका सदुपयोग न हो सकेगा और दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बनते देखा गया है। चेतना का स्तर ऊँचा हो तो आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण अभावग्रस्त परिस्थितियों एवं प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए भी हँसता-हँसाता, हलका-फुलका जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरीत अन्तःक्षेत्र में विकृतियाँ भरी रही-अनगढ़पन बना रहा तो फिर रावण जैसा वैभव होने पर भी नारकीय दुर्गति का वातावरण बनेगा। अस्तु विचारशीलों के भौतिक प्रगति के लिए किए गए साधना प्रयासों की तुलना में आत्मिक प्रगति के लिए किए जाने वाले पुरुषार्थ का असंख्य गुना महत्वपूर्ण बताया है।
इस दिशा में कोई भी प्रभावशाली कदम तभी उठाया जा सकता है, जबकि आत्मचेतना के स्वरूप, उद्देश्य और दिशाधारा के निर्धारण में अध्यात्म-विज्ञान का सहारा लिया जाय। उसी आधार पर यह सम्भव हो सकता है कि मनुष्य तन धारी जीव अपनी प्रतिभा एवं प्रखरता को समुन्नत बनाते हुए महामानव कहलाने का अधिकारी बन सके। आत्मा और समूची मानव जाति को आगे बढ़ाने-ऊँचा उठाने का श्रेय प्राप्त किया जा सके।
अपनी-युग की सबसे बड़ी माँग यह है कि भौतिक प्रगति पर आध्यात्मिकता का अंकुश स्थापित हो। अन्यथा बढ़ा हुआ वैभव उद्दण्ड तक्षक की तरह अपने दूध पिलाने वाले को ही दंश लेगा। सम्पदा और कुशलता का लाभ तभी है जब उन्हें सदुद्देश्य के लिए नियोजित किया जा सके अन्यथा उनकी विकृति विनाश के लिए सरंजाम ही रचेगी। विज्ञान की प्रगति ने सुख-साधनों की निश्चित रूप से वृद्धि की है। यह अभिवृद्धि जहाँ सुखद है, वहाँ निरंकुश बनते जाने के कारण एक भयावह समस्या भी है। सद्ज्ञान सम्वर्धन से ही इसका सन्तुलन बैठेगा। विज्ञान और तत्वज्ञान के सन्तुलित पहिए ही प्रगति रथ को सुनियोजित रूप से आगे बढ़ा सकने में समर्थ होंगे। यह प्रयोजन अध्यात्म विज्ञान के प्रति उसी स्तर की अभिरुचि उत्पन्न करने से सम्भव होगा जैसी कि इन दिनों भौतिक उपलब्धियों के लिए आकुलतापूर्वक संलग्न हो रही है।
आत्मिक प्रगति के दो आधार है-एक ज्ञान दूसरा विज्ञान। ज्ञान पक्ष में ब्रह्मविद्या के आधार पर उस लक्ष्य, कर्त्तव्य, तत्व-दर्शन के रूप में समझा जाता है और जीवन की सार्थकता के लिए उच्चस्तरीय मार्गदर्शन मिलता है। अन्तःकरण की आस्थाओं, आकाँक्षाओं, अभिरुचियों, स्फुरणाओं, सम्वेदनाओं को परिष्कृत करने के लिए जिस प्रकार की श्रद्धा एवं मान्यता को हृदयंगम करना आवश्यक होता है वह ब्रह्मविद्या में सन्निहित सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाए जाते हैं। कथा-प्रवचनों का सिलसिला इसी संदर्भ में चलता है। धर्मशास्त्रों का-तत्वदर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
आत्मिक प्रगति का दूसरा आधार है-साधना। साधना वह प्रक्रिया है-जिसमें अमुक विधि-विधानों, कर्म-काण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु-प्रवृत्तियाँ अभ्यास में आती है, उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है, उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियाँ अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है। छोटे बच्चे नंग-धड़ंग फिर सकते है और कहीं भी मल-मूत्र का त्याग बिना संकोच के कर सकते हैं, पर प्रौढ़ावस्था में तो वैसा करना अनुपयुक्त ही माना जायगा। प्रौढ़ता के साथ जो मर्यादाएँ जुड़ी होती है, उन्हें पालन करना भी आवश्यक होता हैं। मनुष्य जन्म के अनुरूप आस्थाएँ विकसित करने के लिए पिछड़ी पशु-प्रवृत्तियों को उखाड़ना आवश्यक होता है। यह कार्य कठिन भी है और जटिल भी। समझने-समझाने भर से इतना बड़ा आन्तरिक परिवर्तन नहीं हो पाता जिसे पशुता के स्थान पर देवत्व की प्रतिष्ठापना का काया-कल्प माना जाता है।
मानवी अवगति का एकमात्र कारण उसकी आन्तरिक दुर्बलता एवं विपन्नता ही होती है। इसको दूर कर सकना साधना प्रक्रिया को अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। आन्तरिक दुर्बलता एवं विपन्नता के भार को यदि किसी प्रकार हटाया जा सके तो मनुष्य की गरिमा महामानवों जैसी, नर देवताओं जैसी बनी रह सकती है। परिष्कृत मनःस्थिति में रहने वाले सहज ही समुन्नत मनःस्थिति प्राप्त कर लेते हैं, यह तथ्य सर्वविदित है।
मानवी सत्ता इतनी स्वल्प नहीं हैं जिससे कि शरीर यात्रा भर का प्रयोजन पूरा होता रह सके। निर्वाह के लिए जितने पुरुषार्थ एवं मनोयोग की आवश्यकता है उतना ही अनुदान क्षुद्र प्राणियों को मिलता है, पर मनुष्य की स्थिति उससे भिन्न है व उसके अन्तराल में समुद्र गर्भ की तरह विभूतियों की बहुमूल्य रत्नराशि भरी पड़ी है।
आत्मबल की यह सम्पदा ही जीवन के हर पक्ष में आलोक उत्पन्न करती दिखाई पड़ती है। उसकी ज्योति शरीर को ओजस्वी, मस्तिष्क को मनस्वी और अन्तःकरण को तेजस्वी बनाती है। इस आत्मबल का उपार्जन साधना उपचार से सम्भव होता है। संकल्पशक्ति का बिखराव रोकने-उसे प्रचण्ड बनाने और अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित किए रहने की अन्तःक्षमता विकसित करने के लिए ‘साधना’ को अतीव उपयोगी माना गया है। यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्पशक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा अनुभवों के आधार पर प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञान और विज्ञान के दोनों चरण उसी प्रकार उठाने पड़ते हैं, जिस प्रकार कि भौतिक प्रगति के लिए इन्हीं दो आधारों को अपनाया जाना आवश्यक होता है। आर्थिक तथा दूसरे सुविधा साधन भी तो भौतिक ज्ञान-विज्ञान का सहारा लेकर ही प्राप्त किए जाते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए भी ब्रह्म विद्या पर आधारित तत्वज्ञान हृदयंगम करना आवश्यक होता है। योग साधना एवं तपश्चर्या की समन्वित साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित् शक्ति के संवर्धन का लाभ मिलता है।
नीतिशास्त्री मैकडूगल का कथन है-“आत्म-विकास का अर्थ है-चरित्र का विकास। भीतर क्या है, इसे अपने के सिवाय कोई दूसरा नहीं जानता। बाहरी क्षेत्र में किसी के सम्बन्ध में धारणा बनाने का अवसर कैसे मिले? इसका एक ही आधार है-उसके चरित्र की परख। उत्कृष्ट सिद्धान्तों को समझ लेने भर से न अपना काम चलता है और न दूसरों पर प्रभाव पड़ता है। प्रतिक्रिया उस आचरण की होती है जो क्रियान्वित होता रहता है। इसी का नाम चरित्र है। प्रमाणभूत इसी को माना गया है। किसी की सच्चरित्रता परखने के लिए उसके आचरणों को ही साथी माना जाता है न कि उसके एकान्त चिन्तन को।”
“एकान्त चिन्तन यदि कल्पनाओं की उड़ान का जाल-जंजाल हो तो बात दूसरी है अन्यथा जिन विचारों का मनः क्षेत्र पर आधिपत्य होगा वे व्यवहार में परिणति हुए बिना रहेंगे ही नहीं, विचार यदि विश्वासयुक्त हों तो वे मनःक्षेत्र तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरते और सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। अस्तु अन्तःक्षेत्र के चिन्तन की यथार्थता को जाँचने के लिए चरित्र एवं व्यवहार की ही जाँच परख करनी पड़ती है।”
चरित्र की व्यक्तित्व के स्तर का यथार्थ है। उस पर प्रवंचनाओं का आडम्बर चढ़ाते और मुखौटा लगाकर कुरूप को सुन्दर बनाने के प्रयत्न तो अनेकों चलते हैं, पर उनकी कलाई उखड़ते देर नहीं लगती। पाखण्ड से आत्म प्रवंचना ही हो सकती है। कुछ लोगों को कुछ समय तक धोखे में भी रखा जा सकता है, पर सत्य का कोई विकल्प नहीं। विशेषतया व्यक्तित्व की परख के सम्बन्ध में उत्कृष्टता की वह परख ही निर्णायक होती है जो किसी घटना विशेष से नहीं वरन् अनवरत जीवन प्रवाह की दिशाधारा को देखते हुए सुस्थिर मान्यता के रूप में विकसित होती है।”
आग और गर्मी का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। व्यक्तित्व और चरित्र एक ही तथ्य को प्रामाणित करने वाले दो रूप हैं। चरित्र व्यवहार की शालीनता एवं निजी जीवनचर्या में प्रकट होता है। इसी आधार पर जो आत्मविश्वास जमता और लोक श्रद्धा का स्वरूप बनता है उसी को चरित्र कहते हैं। चरित्र और व्यक्तित्व एक ही तथ्य के दो नाम रूप है।
देखने में तो असफलताओं के कारणों में परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साधनों का अभाव, सम्बद्ध लोगों का असहयोग जैसी कुछेक विशेषताएँ ही गिनाई जाती है। कुछ भाग्य दोष या दैव प्रकोप कहकर भी मन समझाते रहते हैं। किन्तु वास्तविकता खोजने पर कुछ दूसरे ही तथ्य उभरकर सामने आते हैं। अपवाद रूप में तो श्रेष्ठ जन भी मात खाते देखे गये हैं या सामान्यतया तथ्य एक ही होता है कि उनकी वैयक्तिक दुर्बलताएँ सफलता के मार्ग में प्रमुख अवरोध बनकर अड़ी रही। चिन्तन तथा प्रयास उस स्तर का नहीं बनने दिया जिसकी गर्मी से अभीष्ट की उपलब्धि पकती, फलती और उत्साहवर्धक उपलब्धि के रूप में हाथ आती।
शारीरिक ढाँचा, मन्द बुद्धि, स्वल्प शिक्षा, सुसंस्कारिता की अनुपलब्धि, दरिद्रता, जन्मजात अपँगता आदि कुछ ऐसी कमियाँ हैं जिन्हें प्रारब्धजन्य या परिस्थिति जन्य कहकर एक सीमा तक मनुष्य को दोष मुक्त किया जा सकता है। एक सीमा तक इसलिए कि इसी के रहते हुए भी असंख्यों ने इतनी प्रगति की और सफलता पाई है कि सर्व समर्थों को भी दाँतों तल उँगली दबानी पड़ती है। साथ ही मानना पड़ता है कि कोई भी साँसारिक अभाव अवरोध ऐसा नहीं जो मनस्वी का प्रगति पथ अवरुद्ध कर सके।
कुछ व्यवधान ऐसे हैं जो मनुष्य के स्व उपार्जित हैं। अभ्यास में उतरते, रहन-सहन करते रहने से स्वभाव के अंग बन जाते हैं और निर्दोष तक प्रतीत होने लगते हैं।
आलस्य, प्रमाद, असंयम, आवेश, अस्थिरमति, अदूरदर्शिता, उद्दण्डता, हठवादिता, आत्महीनता जैसे दुर्गुण स्वनिर्मित होते हैं। इन्हें अनगढ़ अविकसित व्यक्तित्व कहा जा सकता है। जिस प्रकार बालकों का मानसिक स्तर अपरिपक्व सामाजिक नीति नियमों से अनभिज्ञ जीवनयापन की विधि-व्यवस्था से अपरिचित होता है, उसी प्रकार की स्थिति कई मनुष्यों में बड़ी आय हो जाने पर भी बसी रहती है। वे खाने-कमाने भर की मोटी जानकारी भर प्राप्त करके अपना काम चलाते और समय गुजारते रहते हैं, पर ऐसा कुछ उनके पल्ले नहीं बँधा होता जिसके आधार पर उन्हें सुसंस्कारी एवं सभ्य समाज का सदस्य कहा जा सकता है।
शेखीखोर, बन-ठन कर रहने वाले, रौब गाँठने वाले ठग और प्रपंची लोग मन में ऐसा सोचते हैं इन हथकण्डों से उन्हें अधिक चतुर प्रवीण समझा जायेगा और लोग प्रभावित होते प्रशंसा करते दिखाई पड़ेंगे किन्तु वैसा होता कुछ नहीं। शारीरिक बचपन चेहरा देखते ही प्रकट हो जाता है ठीक उसी प्रकार मानसिक बचपन आत्म प्रकटीकरण और आचरण, व्यवहार पर सामान्य सी नजर डालते-डालते अपनी बात अपने मुँह कहने लगता है।
अनेकों हानिकारक दुर्गुणों की नामावली लोगों की विदित है। उनमें कुछ व्यक्तिगत दोष होते हैं और पिछड़ेपन से जकड़े दबोचे रहते हैं कुछ उच्छृंखलता और आक्रामकता के रूप में प्रकट होते हैं इनमें स्तर भर का अन्तर है। दोनों ही अविकसित और विकृत व्यक्तित्व का परिचय देते हैं और प्रकट करते हैं उस शालीनता का विकास अभी नहीं हुआ जिसे सभ्यता कहा और प्रगति के लिए आवश्यक माना जाता है।
‘ए मैनुअल आफ एथिक्स’ ग्रन्थ में एम. मैकेन्जी लिखते हैं-‘दुराचारी मनुष्य के हाथ से कोई भला काम नहीं बन पड़ेगा। उसके हाथ से भले काम सौंपे जाय तो भी वह उनमें अपने चरित्र की छाप छोड़ेगा और कहीं न कहीं ऐसी गड़बड़ी उत्पन्न कर देगा जिसमें भला दीखने वाला काम भी उलझन में फँसे और विग्रह उत्पन्न करे।”
वे कहते हैं-“काम करने की कुशलता कैसी भी क्यों न हो, उसके सहारे इतना भर हो सकता है कि प्रयोजन को कम समय और कम लागत से खूबसूरती के साथ कर निपटा दिया जाय। इस विशेषता और सफलता के होते हुए भी एक कमी बनी ही रहेगी कि इस कार्य में लगे हुए सहयोगी अपने मार्गदर्शक से ऐसी परोक्ष बुराइयाँ भी अपना लें जो उन्हें उपलब्ध पारिश्रमिक की तुलना में अधिक घाटे की सिद्ध हों। इसी प्रकार जो काम हाथ में लिया गया है उसके कितने भी भागों में ऐसी खामियाँ जान-बूझकर या अनजाने रह सकती है जो अन्ततः उपभोक्ता को महंगी पड़े और निर्माता को बदनामी का कारण बनकर उसके व्यवसाय को बेतरह गिरादें।”
यही बात हर क्षेत्र के बारे में हैं। बुरे आदमी भी परिश्रम करने और चतुरता का परिचय देने में खरे भी सिद्ध हो सकते हैं इतने पर भी इस कार्य का स्तर सदा गया गुजरा ही बना रहेगा। लोक सेवा के कार्यों में संलग्न व्यक्ति प्रत्यक्षतः देश भक्त होते और समाज कल्याण के काम करते पाये जाते हैं इतने पर भी यदि वे चरित्र की दृष्टि से बुरे आदमी है तो अपने कार्यों के सम्बन्ध में भी जन-साधारण को आश्वस्त न कर सकेंगे और चरित्र की तरह उद्देश्य के सम्बन्ध में भी सन्देह उत्पन्न करते रहेंगे।
आदमी काम जो भी करे, प्रक्रिया कोई भी अपनाये पर उस पर कर्त्ता के वास्तविक व्यक्तित्व की छाप रहेगी ही। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कर्त्ता किसी भी स्तर का क्यों न बना रहे उसकी कृतियाँ सत्परिणाम ही उत्पन्न करती रहें। काम को खूबसूरती से निपटा देना कुशलता के ऊपर निर्भर है किन्तु उसकी अन्तिम परिणति तो उस चरित्र एवं उद्देश्य के अनुरूप ही होगी तो कर्त्ता के अन्तराल या व्यक्तित्व में सन्निहित है।
कुशलता और सफलता को, सदाशयता से अधिक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। यह मान्यता सही नहीं है कि मनुष्य निजी जीवन में कुछ भी क्यों न बना रहे उसका परिश्रम लोकोपयोगी होना चाहिए। व्यक्ति मशीन नहीं है जो अपने निर्माण में एक सपना बनाये रह सके। वह अपने चिन्तन, चरित्र और व्यक्तित्व की छाप भी किये हुए कार्यों पर छोड़ता है और यह छाप इतनी विलक्षण होती है कि कामों का स्तर बनाने तथा परिणाम उत्पन्न करने में आश्चर्यजनक भूमिका निभाती है।
इस संसार के बाजार में एक से एक आकर्षक वस्तुएँ निकलते हैं उधर की ही चमकीली वस्तुओं को देखकर ललचाने-और पाने के लिए मचलने लगते हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता है कि जिनके लिए इतनी आतुरता है वे उनके उपयोग की भी हैं या नहीं।
अनुकरण की प्रवृत्ति होती तो हैं, पर देखना यह भी होता कि किनका अनुगमन किया जाय? चाहे जिसके पीछे चल पड़ते-चाहे जिसकी नकल बनाने-चाहे जिसका कहना मानने और चाहे जिस जैसा बनने का उपक्रम सपना है, जिसे देखकर यही कहा जा सकता है कि मेले के आकर्षण में बौखलाये बच्चे की तरह अनुपयोगी और जेब से अधिक कीमत की वस्तुएँ प्राप्त करने की बाल-बुद्धि अनियन्त्रित हो रही है।
दुनिया में क्या नहीं? यहाँ हर प्रयोजन की हर चीज मौजूद है पर उसका मतलब यह तो नहीं है कि वे सब अपने लिए ही है। ललचाता मन देते समय भगवान ने मनुष्य को ऐसा विवेक भी दिया है जिसके सहारे यह जाना जा सके कि अपने लिए क्या उपयोगी और क्या अनुपयोगी है। क्या अपनी सामर्थ्य के भीतर और क्या बाहर है? परामर्श देने वालों की जो मनः स्थिति योग्यता, साधन, परिकर, वातावरण है वह अपने पास भी हो यह आवश्यक नहीं। उन्हें जो रुचता या पचता है वही अपने लिए भी फिट बैठेगा इसका कोई निश्चय नहीं। ऐसी दशा में हर विचारशील की अपनी स्वतन्त्र बुद्धि का ही उपयोग करना चाहिए कि उन्हें किस मार्ग पर चलना या क्या बनना है?
लक्ष्य निर्धारण करते समय एक बात का ध्यान रखा ही जाना चाहिए कि उत्कृष्टता का परित्याग न किया जाय। सराहनीय समझदारी यह है जो जीवन प्रवाह को आदर्शवादी दिशाधारा में गतिशील होने की प्रेरणा देती है। मार्ग कुछ लम्बा भी है, कठिन भी उस पर चलने वाले उतनी ऊँचाई तक चढ़ सके हैं जिसे सामान्य लोग जीवित रहते स्वर्ग तक जा पहुँचने के समतुल्य माने और आश्चर्यचकित होकर देखें। आवश्यक नहीं है कि विलासिता, संग्रह और वाहवाही समेटने को ही बुद्धिमत्ता माना जाय। ऐसी जीवनचर्या अपनाना-ऐसा रास्ता अपनाना भी घाटे का सौदा नहीं जिसमें वैभव तो सामान्य ही रहता है पर आत्म गौरव और श्रद्धा सहयोग अर्जित करने में कमी नहीं रहती।
रसायनाचार्य नागार्जुन को अपनी रसायनशाला के लिए एक सहयोगी की तलाश थी। वे उपयुक्त को खोज रहे थे।
उस महत्वपूर्ण पद का श्रेय और अनुभव पाने के लिए अनेक इच्छुक आते रहते। नागार्जुन उनकी जिस-तिस प्रकार परीक्षा लेते। खरा न उतरने पर प्रायः वापस ही लौटते रहते। इस बार एक नया प्रार्थी आया। उसे तीन दिन में पूरा करने के लिए कुछ काम सौंपा गया। तीन दिन बाद वह लौटा तो, कुछ भी न कर सकने की विवशता प्रकट की। नागार्जुन ने कारण पूछा तो उसने इतना ही कहा-“समीपस्थ एक मरणासन्न रोगी पड़ा था। उसकी सेवा में जुट गया और सोचा रसायन बनाने की उपेक्षा इसकी प्राण रक्षा अधिक आवश्यक है।
नागार्जुन को भावनाशील की खोज थी। वह पहली बार मिला और तत्काल नियुक्त कर लिया।
छात्रों ने काशी में संस्कृत विद्या पढ़ी। उनमें से चार पारंगत हो गये, तो घर वापस लौटे। मार्ग लम्बा था। सो कुछ महत्वपूर्ण नीति-वाक्य उनने याद कर लिए ताकि उलझने, सुलझाने में काम आये। वे वाक्य थे-
1.महाजनो येत गतः स पन्थाः।
2.राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः।
3.धर्मस्य त्वरिता गतिः।
4.आगमिष्यति यत्पन्नं तदस्माँस्तारयिष्यति।
5.सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्ध त्यजति पण्डितः।
6.छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति।
इन वाक्यों का यथा समय प्रयोग करते हुए, मार्ग पूरा करने का निश्चय उन लोगों ने किया।
आगे जाते हुए एक चौराहा पड़ा। सही रास्ता कौन सा है, यह जानना था। श्लोक याद आया-महाजनो येन गतः स पन्थाः। महाजन जिस पर चलें, वही मार्ग। एक मार्ग पर मुर्दे के साथ भीड़ जा रही थी। चारों उनके पीछे चल पड़े और श्मशान पहुँच गये।
यहाँ अपना कौन? पराया कौन? स्मरण आया, भाई सगा होता है। यहाँ कोई भाई है क्या? नजर दौड़ाई। श्मशान में एक गधा चर रहा था। याद आया-राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः।’ राजद्वार और श्मशान में जो खड़ा हो वह भाई। इस कसौटी पर गधा ही खरा उतर रहा था। सो, वे उसके गले मिले और रास्ता पूछा। गधे ने दुलत्तियाँ जमा दी।
भटकते-भटकाते वे नदी तट पर पहुँचे। पार कैसे हों? कौन पार करे। नाव दीखी नहीं। केले का बड़ा पत्ता बहता आया। नीति वाक्य याद आ गया-आगमिष्यति यत्पन्नं तदस्माँस्तारयिष्यति। जो पत्ता बहता आयेगा, वही उद्धार भी करेगा। सो, वे पत्ते पर चढ़ कर पार होने की बात सोचने लगे। डूबते-डूबते बचे। एक अधिक गहरे में उतरा दीखा, तो उसका शिर काट लिया। श्लोक में यही तो कहा गया था कि - सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धत्यजति पण्डितः-सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न होने पर पण्डित लोग आधा छोड़ देते हैं।
जैसे-तैसे रास्ता पार करते, जो शेष थे, वे एक गाँव में ठहरे। निवासी उन्हें अपने-अपने घर ले गये और अलग-अलग प्रकार के भोजन से सत्कार किया। एक के घर आटे के लम्बे तन्तु जैसी ‘सेवईं’, दूसरे के घर बड़ी पूड़ी, तीसरे के घर छेद वाले ‘बड़े’ परोसे गये तीनों ने खाने से पूर्व यह सोचा-इनमें कोई खोट तो नहीं है?
नारुन्तुदः स्यादार्तोऽपि न परद्रोह कर्म धीः। ययाऽस्योद्विजते वाचा नालोक्याँ तामुदीरयेत्। -मनुः 2।161
स्वयं कष्ट की स्थिति में रहते हुए भी दूसरों को कष्ट न पहुँचाये। दूसरों के प्रति द्रोहन रखे। साथ ही दूसरों को कष्ट (उद्विग्न) पहुँचाने वाली अशुभ वाणी भी न बोलें।
‘सेवईं’ वाले को स्मरण आया-‘दीर्घ सूत्री विनिश्त दीर्घ सूत्री का नाश होता है। उसने खाने से इनकार कर दिया। दूसरे ने बड़ी पूड़ी खाने समय सोचा-अति-विस्तार विस्तीर्ण तद्भवेन्न चिरायुषम्-बहुत फैली हुई का सेवन करने वाला जल्दी मरता है।” तीसरे ने भी छेद वाले ‘बड़े’ खाने से इनकार कर दिया। उसे वाक्य स्मरण था-‘छिद्रेप्वनर्था बहुली भवन्ति-छिद्र में बहुत अनर्थ होते हैं। सो, खाया उसने भी नहीं। तीनों परोसी थालियाँ छोड़कर चल दिये।
दुःखी होकर घर पहुँचे, लोग इन अर्थ का अनर्थ करने वाले पण्डितों की मूर्खता सुनकर लोट-पोट हो गये।
तब उनने समझा-शकार्थ समझना ही पर्याप्त नहीं-आप्त वचनों का भावार्थ समझना भी चाहिए।
रायल मेडिकल सोसायटी के सम्मुख सन् 1896 में चिकित्सा विज्ञान के निष्णात् डा. ग्लोस्टन ने कहा था ‘शारीरिक रोगों के उपजने बढ़ने से लेकर अच्छे होने या कष्ट साध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है। शारीरिक कारणों या परिस्थितियों का जितना सम्बन्ध रोगों के उतार-चढ़ाव का है उससे कहीं अधिक मनोदशा प्रभावित करती है। यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो तो फिर रोगों की सम्भावना बहुत ही कम रह जायगी। आक्रमण करने पर भी वे बहुत समय ठहर न सकेंगे। इसलिए चिकित्सा के औषधि उपचार पर जितना अधिक ध्यान दिया जाता है उससे अधिक मनःस्थिति को सही बनाने का प्रयत्न होना चाहिए।
‘मन और स्वास्थ्य’ पुस्तक के लेखक हेक ट्यूक ने शरीर पर पड़ने वाले मानसिक प्रभाव का सुविस्तृत पर्यवेक्षण प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं-यों शरीर पर आहार-विहार का भी प्रभाव पड़ता है और अभाव तथा व्यतिरेक भी अपनी प्रतिक्रिया छोड़ते हैं। तो भी उस पर सर्वाधिक प्रभाव व्यक्ति के अपनी मनःस्थिति का पड़ता है। यह प्रभाव प्रतिक्रिया नाड़ी मण्डल पर 36 प्रतिशत, अंतःस्रावी हारमोन ग्रन्थियों पर 56 प्रतिशत, माँसपेशियों पर 8 प्रतिशत पाया गया है। कई रोगियों के पर्यवेक्षण पर पाया गया कि उनके शरीर में कोई ऐसी गड़बड़ी नहीं है। जिससे उन्हें गम्भीर रोगों का शिकार बनना पड़े। तो भी वे हृदयरोग, कैन्सर, कोलाइटिस, हिस्टीरिया, रक्तचाप, अनिद्रा, अपच आदि के मरीज पाये गये। कठिनाई यह भी बनी रही कि किसी औषधि उपचार से उन्हें कोई राहत न मिली। जबकि उनका चिन्तन प्रवाह मोड़ देने पर बिना उपचार के ही बहुत कुछ ठीक हो गया।
श्री हेक ने अपने प्रतिवेदन का अन्तिम निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है - फेथ (विश्वास), होप (आशा), कान्फीडेन्स (श्रद्धा), बिल (इच्छा) और सजेशन (स्वसंकेत) जैसे प्रयोगों, को अब स्वास्थ्य संवर्धन में प्रयोग किया जाना चाहिए। रोग निवारण का यह सबसे सस्ता, सुनिश्चित और हानि रहित निर्धारण है।
योगशास्त्र के निर्धारणकर्ता पातंजली गीता के प्रस्तोता व्यास और योग वशिष्ठ के उपदेष्टा वशिष्ठ का इस तथ्य पर पूर्णतया मतैक्य है कि मानसिक संयम से मनुष्य सुखी रहता और प्रगति पथ पर अग्रसर होता है। योग दर्शन में चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहा है। अनियन्त्रित, अस्त-व्यस्त और भ्रान्तियों में भटकने वाली मनःस्थिति को मानवी क्षमताओं के अपव्यय एवं भक्षण के लिए उत्तरदायी बताया हैं और उनको दिशा विशेष में नियोजित रखने का परामर्श दिया है। गीताकार मन को ही मनुष्य का मित्र एवं शत्रु ठहराते हैं और उसे भटकाव से उबारकर अपना भविष्य बनाने का परामर्श देते हैं। वशिष्ठ का कहना है कि जिसने मन जीत लिया उसे त्रैलोक्य विजेता कहना चाहिए। इन प्रतिपादनों में एक ही संकेत है कि मनोदशा की गरिमा शारीरिक स्वस्थता से भी बढ़कर मानी जाय और समझा जाय कि अनेकानेक समस्याओं के उद्भव एवं समाधान का आधार इसी क्षेत्र की सुव्यवस्था पर निर्भर है। इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की अनगढ़ कुसंस्कारिता का नियमन करना चाहिए।
आत्मानुशासन (साइकोफिजिकल डिसीप्लिन), आत्म सन्तुलन (इक्वानिमिटी ऑफ स्प्रिट) का अभ्यास ही योग साधना है। इससे नाड़ी मण्डल और स्नायु संस्थान पर इच्छित नियमन की क्षमता उपलब्ध होती है फलतः मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य अपना स्वामी आप बन जाता है। जबकि अव्यवस्थित कल्पनाओं और अनुपयुक्त इच्छाओं में उलझा हुआ व्यक्ति अपने साथ ठठोली करने और अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने जैसी विडम्बनाएँ रचता रहता है। निरोग और दीर्घायु वे ही रह सकते हैं जो अपने के स्वामी आप हैं। इच्छाओं और आदतों के गुलाम को आत्म निरीक्षण करने तक की फुरसत नहीं मिलती और न इतना साहस रहता है कि पतनोन्मुख प्रवाह को रोकें और उसे श्रेय पथ की दिशा में मोड़ें। ग्रह असमर्थता ही मनुष्य की वास्तविक दरिद्रता और दुर्बलता है। इसे हटाये बिना दुर्गति से बचने का और कोई उपाय नहीं। यही कारण है कि सुव्यवस्थित प्रगतिशील और प्रसन्नता भरा जीवन जीने के लिए आत्म नियमन सीखना होता है। शरीर निर्वाह के लिए सुविधा साधनों के सहारे काम चल जाता है किन्तु यदि इतना ही पर्याप्त न लगे और मानवोचित वरिष्ठता प्राप्त करने की आवश्यकता प्रतीत हो तो फिर उसके लिए मनोनिग्रह की व्यवस्था भी जुटानी पड़ेगी। उद्दण्डता और बलिष्ठता के सहारे अपहरण और संग्रह भर हो सकता है। आतंक में डराने और विवश करने भर की क्षमता है। स्नेह और सहयोग अर्जित करने के लिए जिन सद्गुणों की आवश्यकता है उन्हें अपने में उगाने और बढ़ाने के लिए मानसिक सुसंस्कारिता की अनिवार्य आवश्यकता हैं। उसके लिए संचित कुसंस्कारिता से जूझना पड़ता है। इसी संघर्ष को दिव्य सत्ता ने इसी के लिए दबाव देकर बाधित किया था।
धारणा (कन्सन्ट्रेशन), ध्यान (मेडीटेशन) और समाधि (कन्टम्पलेशन) के अभ्यासों में साधक को एक ही लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बनाया जाता है कि वह मन की अस्त-व्यस्तता पर नियमन करना सीखे। इसके उपरान्त ही सधे हुए मन की उत्कृष्टता की दिशा में चल सकने योग्य प्रशिक्षित पाया जा सकता है। शारीरिक और मानसिक अनुशासन (साइकोफिजिकल डिसीप्लन) बन पड़ने पर व्यक्तित्व की प्रौढ़ता परिपक्वता मानी जाती है और उसी को महत्वपूर्ण कार्य कर सकने की क्षमता एवं सम्भावना आँकी जाती है। बालकों जैसी चंचलता और लक्ष्यहीनता की स्थिति में पड़े हुए लोग बन्दरों की तरह निरर्थक उचक-मचक तो बहुत भी करते रह सकते, पर वे ऐसा कुछ कर नहीं पाते जिसे दिशाबद्ध-क्रमबद्ध या महत्वपूर्ण कहा जा सके।
योग न तो रहस्यवाद है न पलायनवाद। उसमें काय कष्ट का वैसा विधान नहीं है जैसा कि कई अतिवादी अपना दुस्साहस दिखाकर भावुकजनों पर विशिष्टता का आतंक जमाते और उस आधार पर शोषण करते देखे गये हैं। योग कल्पना लोक व अवास्तविक विचरण भी नहीं है और न उसे जादू चमत्कारों की श्रेणी में गिना जा सकता है। देवताओं की दशवर्ती बनाकर या भूत-प्रेतों की सहायता लेकर मनोकामना पूरी करने कराने जैसी ललक लिप्सा पूरी करने जैसा भी इस विद्या में कोई आधार नहीं है। योग एक विशुद्ध विज्ञान है। जिसका वास्तविक आधार है आत्मानुशासन का अभ्यास और क्षमताओं का उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए सफल नियोजन। जो इतना कर सकते हैं उन्हें सच्चे अर्थों में सिद्ध पुरुष कहा जा सकता है। सिद्धि का अर्थ है - सफलता। किसी सफलता? किस स्तर की सफलता? इसका उत्तर एक ही है अपने सामर्थ्य भण्डार को अस्त-व्यस्त स्थिति में बचा सकने की सफलता और आत्मा को अभीष्ट है जो जीवन का लक्ष्य है उसे उपलब्ध कर सकने के लिए आवश्यक क्षमता सम्पादन की सफलता।
गुजारे भर से सन्तुष्ट रहने वालों की बात दूसरी है। जो ज्यों-त्यों करके दिन काटने भर से काम चलाते रह सकते हैं उनके लिए भी अन्यान्य प्राणियों में पाये जाने वाले प्रकृति अनुशासन को अपनाना आवश्यक है। पशु-पक्षी निरोग सुखी जीवन जीते हुए पूर्णायुष्य पाते और मोद मनाते देखे गये हैं। इसका प्रधान कारण एक ही है प्रकृति संकेतों का पूर्णतया अनुगमन। यह भी एक स्वसंचालित योगाभ्यास है। वे भी यदि इसमें व्यतिक्रम करें और मनुष्य जैसी उच्छृंखलता अपनायें तो भयंकर विपत्ति में फंसेंगे और अस्तित्व तक गँवा बैठेंगे। मनुष्य पर छाई रहने वाली दुर्बलता, रुग्णता, खिन्नता, विपन्नता का कारण ढूँढ़ने पर जो तथ्य सामने आता है वह प्रकृति अनुशासन की अवहेलना ही कहा जा सकता है।
मानवी विशेषता में उसके चेतन स्तर को ही दैवी विभूति माना गया है। वह उसे प्रचुर परिणाम में उपलब्ध है, उसका सुनियोजन और सदुपयोग तो चाहिए भी। यह न बन पड़े तो समझना चाहिए कि दुरुपयोग से अमृत के भी विष हो जाने की कहावत इस क्षेत्र में भी लागू होगी और मानसिक क्षमता की विशेषता उलटी विपत्तियाँ खड़ी करेगी। जैसा कि सामान्य जनों को निर्वाह सुविधा उपलब्ध रहने पर नाना प्रकार के शोक सन्तापों से ग्रसित देखा भी जाता है। अन्य प्राणियों की पदार्थ विनिर्मित शरीर मिला है वे पदार्थ परम्परा के अधिष्ठानों-प्रकृति के निर्धारित अनुशासनों को समझते पालते और सुखी रहते है। मनुष्य को न केवल शरीर वरन् उच्चस्तरीय मनःसंस्थान भी मिला है। इसलिए समझदारी बताती है कि उसे दुहरी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। शारीरिक स्वस्थता के लिए प्रकृति अनुशासन और मानसिक विशिष्टता के लिए उसे आत्मिक अनुशासन अपनाना चाहिए। इस क्षेत्र में जो असन्तुलन बन पड़ा है उसे सुधारने के लिए योगाभ्यास आवश्यक है। इस सुधार प्रयोजन के बिना यह सम्भव नहीं कि मानवी क्षमताओं का उपयुक्त प्रयोजनों के लिए उपयुक्त रीति-नीति अपनाते हुए-उपयुक्त नियोजन सम्भव हो सके।
शारीरिक व्याधियों और मानसिक आधियों से छुटकारा पाना ही नहीं, अवाँछनीय आदतों के कारण उत्पन्न होती रहने वाली विषम परिस्थिति से निपटने के लिए परिष्कृत मनोभूमि चाहिए। महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना तो इसके बिना बनता ही नहीं इसलिए मानसिक दक्षता की उपयोगिता समझने वाले हर व्यक्ति को योगाभ्यास की बात सोचनी और व्यवस्था बनानी चाहिए।
महामानवों में से प्रत्येक को अन्तः चेतना की उत्कृष्टता (हाई लेवल कान्सेन्स) को किसी न किसी प्रकार अर्जित करना ही पड़ा है। जो उस दिशा में बढ़ना चाहते हों उनके लिए सरल और सुनियोजित विधि-व्यवस्था योगाभ्यास की सामने है। बलिष्ठता के लिए व्यायाम, विद्वता के लिए अध्ययन, उपार्जन के लिए पराक्रम की जिस प्रकार आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार मनस्वी बनने के लिए योग साधना का स्वरूप समझें तथा प्रयोग करने की दिशा में भी कदम बढ़ाने चाहिए।
सन् 1963 में औषधि विज्ञान की खोज पर नोबेल पुरस्कार विजेता जान एकल्स ने कहा था-‘वे सिद्ध कर सकते हैं कि हर मनुष्य के पास एक जीव रसायन तथा रहस्यमयी ऊर्जा से बना एक ऐसा पदार्थ प्राप्त है जिसे आत्मा कहा जा सकता है।”
जीव विज्ञान की सूक्ष्म तांत्रिकी शाखा के वैज्ञानिक अब आत्मा के सम्बन्ध में जिस निष्कर्ष पर पहुँचे है वह इस संबंध में धार्मिक क्षेत्र में जो कहा जाता रहा है उससे बहुत भिन्न नहीं है। कृत्रिम कणों के समूह की एक सघन सत्ता का अस्तित्व अनुभव में आ रहा है, इसमें ताप, विद्युत आदि की मूलभूत संरचना का अनोखा समन्वय देखा गया है। रहस्यमय होते हुए भी यह सत्ता ऐसी है जिसका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।
कैलेच विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रोजर स्पेरी को सन् 1981 में रासायनिक अध्ययन पर नोबेल पुरस्कार मिला था। उनका आत्मा के संबंध में कहना है कि यह एक सुनिश्चित तथ्य है। रासायनिक पदार्थों के मस्तिष्कीय गुणों के संबंध होने पर एक ऐसी सत्ता बन जाती है जो न केवल मनःक्षेत्र के 10 अरब न्यूरोनों पर वरन् समूचे शरीर पर अपना शासन चलाती है। इसका कार्य क्षेत्र सीमित नहीं वरन् असीम एवं व्यापक है।
भौतिक शास्त्र में 1963 के नोबेल पुरस्कार विजेता यूजीन डिगमर ने आत्मा को ऐसी अचेतन सामर्थ्य कहा है जो चेतन का नियन्त्रण और सूत्र संचालन करती है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भौतिकी विशेषज्ञ ब्रियान जोसेफन ने लिखा है - मानवी सत्ता एक ऐसा गठन है जो रसायनों और ऊर्जाओं के साथ गुथा रहने पर भी उनके अधीन नहीं है वरन् अपनी सत्ता को चेतना सम्पन्न होने के कारण अपने क्षेत्र पर पूरी तरह शासन करता है।
स्प्रिचुअल सोसायटी के अध्यक्ष जान एकिल्स ने कहा है - हम आत्मा की प्रत्यक्षता का क्रमशः अधिकाधिक अनुभव करते जा रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब वह अदृश्य या अविज्ञात न रहकर सामने प्रस्तुत होगी। उसे हम उसी तरह अनुभव कर सकेंगे जैसे संबंध अन्य शक्तियों का स्पष्ट अनुभव करता है।
आत्मा रसायन है, ऊर्जा या ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाचेतना की एक अविच्छिन्न इकाई है। यदि एक विवाद में न पड़ा जाय तो भी यह मानना होगा कि वह जो भी है वह असाधारण सामर्थ्य की पुँज है। उसकी रहस्यमय परतें ऐसी है जिन्हें जगाने, उभारने, सुधारने और सही रीति से प्रयुक्त कर सकने की क्षमता अर्जित कर सकने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी विशिष्टता का परिचय दे सकता है। इस समर्थता को अर्जित करने के लिए योग साधना ही एक असंदिग्ध मार्ग है।
अमेरिकी हिल्टन होटल शृंखला के मालिक कोनराल्ड हिल्टन अपने समय के गिने चुने धन कुबेरों में से एक थे। अनवरत रूप से मिलती गई सफलताओं का कारण वे ‘भीतर की आवाज’ को बताते थे। उनके साथ गणित और तथ्यों के आधार पर योजनाएँ बनाते थे और हिल्टन के आधार को अवैज्ञानिक बताते थे तो भी यह बात आश्चर्यजनक ही बनी रही कि ‘भीतरी आवाज’ ने कभी धोखा नहीं खाया जबकि तथ्यानुयायी अनेक बार असफल रहे और घाटे की चपेट में आये। यह रास्ता उन्होंने अलास्का हिमाच्छादित प्रदेश में तेल की खुदाई का ठेका लेने वाले लिडलेन हेस से सीखा था। उन्होंने वह दुस्साहस भरा काम हाथ में लिया था और असाधारण धन तथा यक्ष कमाया था। हेस अपने पुरुषार्थ को दाँव कहते थे और उस बाजी को जीतने में अंतःप्रेरणा के मार्गदर्शन को श्रेय देते थे।
विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण सफलता पाने वाले लोगों की विशेषता का क्या कारण हो सकता है यह जानने के लिए दो रहस्यवादी अनुसंधानकर्ताओं ने कदम बढ़ाया और उस स्तर के लोगों के साथ संपर्क साधा। ऐसे सफल लोगों में उद्योगपतियों को प्रथम महत्व का समझा जाता है। इसलिए उन्होंने उस वर्ग को प्रधानता देते हुए अन्य क्षेत्र के लोगों को भी द्वितीय-तृतीय श्रेणी का गिना और अनुसंधान का कार्यक्रम बनाया। इस अन्वेषण के निमित्त की गई पूछताछ से पता चला कि उनमें से अधिकाँश को भीतर की आवाज पर विश्वास था और असमंजस की घड़ियों में उन्होंने उन्हीं का सहारा लेकर कदम बढ़ाया है।
यह क्षमता किन्हीं में जन्मजात रूप से उत्पन्न हुई या अनुमान से मिली भी हो सकती है कोई उसे योगसाधना द्वारा भी उत्पन्न कर सकते हैं। किन्हीं-किन्हीं में अनायास ही प्रकट होते देखा जाता है। यह प्रकटीकरण यह बताता है कि यह क्षमताएँ तो हर किसी में विद्यमान है, पर उनका दृश्य स्वरूप यदि संयोगवश देखा जा सकता है तो यह आशा करने का भी औचित्य है कि प्रयत्नपूर्वक उन्हें जागृत किया जा सके तो उन्हें भी वैसी ही मानसिक विशेषताओं की तरह प्रयुक्त किया जा सके जैसी कि कला-कौशल आदि के रूप में जगाया और काम में लाया जाता है। अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मनुष्यों के कितने ही उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहते हैं।
चेतना क्षेत्र की इन्हीं विशेषताओं में अतीन्द्रिय क्षमताओं का क्षेत्र आता है। सामान्यतया मानवी क्रिया प्रक्रिया की एक छोटी सीमा है। आँखें एक सीमित दूरी तक ही देख सकती है। बुद्धि उन्हीं का अनुमान लगा सकती है जो किन्हीं प्रमाणों या साधनों से जाना जा सके। इसके अभाव में उसे बहुत दूर की, कालान्तर की, देशान्तर की जानकारियाँ प्राप्त कर सकने की क्षमता नहीं है किन्तु ऐसा भी देखा गया है कि इन जानकारियों को प्राप्त किया जा सका तो मस्तिष्क तथा इन्द्रिय तन्त्र की पकड़ से सर्वथा बाहर हैं। इसे अतीन्द्रिय क्षमता कहते हैं। मानवी मस्तिष्क का एक अविज्ञात निष्क्रिय पक्ष जिसे शरीर शास्त्री ‘डार्क एरिया’ के नाम से पुकारते हैं। सामान्य ज्ञान व्यवहार में मानवी मस्तिष्क का बहुत थोड़ा प्रायः सात प्रतिशत अंश ही काम में आता है। 93 प्रतिशत क्षेत्र यही प्रसुप्त क्षेत्र है। जिसके बारे में शरीर शास्त्री मनःशास्त्री यह जानने में समर्थ नहीं हो सके कि यहाँ क्या छिपा है, और उसे किस प्रकार किन प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
तत्व ज्ञानी इस प्रसुप्त क्षेत्र को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न कहते हैं। इसका कुछ भाग यदाकदा अपनी रहस्यमय परतों की थोड़ी झाँकी कराता है तो प्रतीत होता है कि हर किसी में वे विशेषताएँ विद्यमान हैं जो यदा-कदा सिद्ध पुरुषों द्वारा प्रकट होती देखी जाती है।
हम समूह में रहते और पलते हैं। साथ-साथ हँसते, खेलते और सहयोगपूर्वक निर्वाह करते हैं-यह तथ्य जितना सत्य है, उतना ही यह भी सही है कि आदमी अकेला है। वह अकेला ही आया है और अकेला ही जायेगा खाना, नहाना, मल-मूत्र त्यागना, सोना जैसे नित्य कर्म उसे अकेले ही करने पड़ते हैं। मशीनें कुछ सहायता तो अवश्य करती हैं, पर इन्हें चलाने के लिए भी तो अपने ही हाथ काम करते हैं। मनुष्य जीवन में जितना चलता है, उसमें से अधिकाँश यात्रा अपने पैरों के सहारे ही सम्पन्न करनी पड़ती है। इसी प्रकार हाथों की उपेक्षा करने पर किसी का गुजारा नहीं होता। ढेरों नौकरों और साधन रहने पर भी अपने हाथों की आवश्यकता और कोई पूरी नहीं कर सकता, इस दृष्टि से मनुष्य समूह पर निर्भर होते हुए मूलतः एकाकी है। माँ के पेट में वह अकेला रहता है और कब्र में या स्वर्ग-नरक में उसे अकेले रहकर ही लम्बी अवधि गुजारनी पड़ती है।
साथ-साथ काम करने और मिल-बाँटकर खाने की नीति अपना कर मनुष्य आगे बढ़ा है, उसमें उदारता का समावेश करने पर वह महान भी बनता है। इतने पर भी उस साथ रहने की अवधि में भी हर व्यक्ति रहता अकेला ही है। कोई किसी के साथ गुँथ नहीं जाता। दो मित्र कितने ही घनिष्ठ क्यों न हो, पर कोई किसी के शरीर में तो प्रवेश नहीं करता है। हर किसी को अपनी इकाई अलग ही अनुभव होती है। उसका व्यक्तित्व अपना रहता है और साथ ही हर किसी का उत्तरदायित्व भी उसके अपने कन्धे पर लदा रहता है। कोई किसी की सहायता तो कर सकता है, पर यह नहीं हो सकता है कि उसके स्थान पर अपने को बिठा दे। कोई किसी के स्थान पर परीक्षा नहीं दे सकता और न प्रतिस्पर्धा में ऐसी बाजी जीत कर दिखा सकता है जिसमें अपने किये का लाभ-हानि दूसरे को उठाना पड़े। न्यायालयों की भी ऐसी परम्परा रही है कि किसी के बदले का दण्ड किसी दूसरे को दे सके। इसी प्रकार बीमारी का कष्ट भी स्वयं ही भुगतना पड़ सकता है। किसी के कितने ही मित्र सहयोगी क्यों न हों, वे चिकित्सा परिचर्या में पूरा उत्साह दिखा सकते हैं, इस दृष्टि से मनुष्य को अपने को एकाकी समझना पड़ता है और उस क्षेत्र को स्वयं ही समर्थ बनाना पड़ता है। साथियों के परामर्श का लाभ एक सीमा तक मिल सकता है।
हर आदमी का अपना व्यक्तित्व है और अपना भाग्य। कठिनाइयों का सामना भी उसे ही करना पड़ता है और सुविधाओं का लाभ उसे ही मिलता है। साझेदारी बात दूसरी है। मिल-जुलकर सुख बाँटे या दुःख बँटाये। इसमें हर्ज नहीं, पर जो अपने हिस्से का भला-बुरा है, उतना तो अपने को ही वहन या सहन करना पड़ेगा। कोई किसी के प्रति सहानुभूति-सम्वेदना कितनी ही क्यों न रखे फिर भी अपना वजन आप ही उठाना पड़ेगा। समय-कुसमय की बात दूसरी है, पर हर किसी को अपना बोझ अपने पैरों पर ही लादना पड़ता है। दूसरों के कन्धों पर कौन कब तक चढ़ा रह सकता है।
कहते हैं सृष्टि के आदि में आदमी अकेला था। उसे यह बहुत खला। ईश्वर ने उसके जिस्म के ही दो हिस्से बाँटे और एक को मर्द और दूसरे को औरत बना दिया। तब से वे एक दूसरे के निकट भी हैं और सहायता भी भरपूर करते हैं। और सुख-दुःख में हिस्सा भी बंटाते हैं, फिर भी दोनों का अकेलापन दूर न हुआ। दोनों में से कोई किसी के भाग्य का साथी न हो सका। अकेलेपन का दुर्भाग्य फिर भी दोनों के ऊपर वैसा ही लदा हुआ है। आवेश में ही दोनों एक दूसरे को अभिन्न करते हैं पर नशा उतरते ही वे अनुभव करते हैं कि दोनों अपनी जगह पर अलग-अलग हैं भले ही कदम मिलाकर साथ चल रहें हों।
ईसा ने अपने विश्वासियों से कहा था-“तुम मेरी ओर देखो, करुणा करो, क्योंकि मैं अकेला हूँ और पीड़ित भी।” यह करुणा को सहचरी बना लेने का निर्देश है, ताकि सच्चे अर्थों में भाव-सम्वेदना प्रदान कर सकने वाली सहचरी का साथ मिल सके। ईश्वर अकेला है। इस व्यथा से पीड़ित भी, सो वह चाहता है कि उसे दूसरों के साथ रहने का अवसर मिले और यह अकेलापन दूर हो। पर दूरी मिटे कैसे? इसका उपाय करुणा ही है। जिससे स्नेह दुलार किया जाता है, जिस पर प्रेम भरा आत्मभाव उड़ेला जाता है, वही अपना बन जाता है। इसी आधार पर एकाकीपन दूर हो सकता है। अपनी तो मात्र करुणा ही है। इसकी लपेट में जो आते हैं, वे ही अपने बन जाते हैं।
बाइबिल के प्रकरण मैथ्यू के अध्याय 14 मन्त्र 23 में आता है-“उनने भीड़ को दूर भगा दिया। वे सबसे अलग होकर प्रार्थना करने के लिए पहाड़ पर एकाकी चले गये। रात हो गयी तो भी वे वहाँ अकेले थे।”
प्रकरण मार्क में आना है-‘वे वहाँ चालीस दिन अकेले रहे। शैतान ने उन्हें फुसलाया, जंगली जानवरों ने उन्हें डराया। सहायता तो उनकी सिर्फ देवदूतों ने की।”
यह एकान्त ही अद्वैत है। इसी को कैवल्य कहा है। जहाँ दूसरा न हो। मात्र एक सत्ता ही शेष रहे। उसे एकाकीपन कहते हैं। गुफाओं में प्रवेश इसी निमित्त किया जाता है। समाधि का यही स्वरूप है कि अपने सिवाय कहीं और कोई शेष न रहे। प्रलयकाल में एक बाल भगवान ही शेष थे। कमल पत्र पर पड़े हिलोरों के साथ बह रहे थे। विनोद सूझा तो अपने ही पैर का अँगूठा आप चूसने लगे।
शरीर पर वस्त्र पहनने का उद्देश्य अपने अकेलेपन को दाब-ढांक कर रखना है। आँखों की लज्जा, कामाँगों को छिपाकर रखना इसी उद्देश्य से है कि अपने एकाकीपन में हर किसी को प्रवेश न मिले।
प्रेम निभता तभी है-एक, एकाकी एक पक्षीय हो। जहाँ आदान-प्रदान की भावना उठी नहीं कि बात बिगड़ी नहीं। किसी से यह अपेक्षा रखना कि वह हमारी मर्जी के अनुरूप ही सोचे और चले। अपने व्यक्तित्व और रचित स्वभाव संस्कार में प्रेम के नाम पर निछावर कर दें, यह विशुद्ध अत्याचार है। जो इस प्रकार का बदला चाहते हैं उन्हें या तो निराश रहना पड़ता है या विग्रह के शिकार होते हैं या फिर ठगे जाते रहते हैं। प्रेमी इनमें से एक भी स्थिति नहीं चाहता। इसलिए उसे एकाकी रहना पड़ता है। ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’-वाली उक्ति दुहराने की अपेक्षा यह कहना चाहिए, दर्पण में अपना ही भूत दीखता है।
एकाकी बनकर ही हम आत्म-निरीक्षण कर सकते हैं। आत्म-सुधार और आत्म-विकास की बात ऐसी ही मनःस्थिति में बन पड़ती है। लोगों के साथ अपने को गुंथा लेने पर न्याय बन पड़ता है न विवेक दिखता है। पक्षपात या विद्वेष का दबाव पड़ते ही चिन्तन का प्रवाह अस्त-व्यस्त होने लगता है। अपनों का बचाव, दूसरों से दुराव की मनोभूमि बनती हैं। मनुष्य भ्रष्टता के मार्ग पर चल पड़ता है। ऐसी दशा में न सदाशयता टिकती है न धार्मिकता निभती है।
आत्मा को देखो, आत्मा को जानो, आत्मा की सुनी के उपनिषद् वाक्य में गीता की वह उक्ति भी आ मिलती है। ‘कहा गया है कि अपना उद्धार आप करो। अपने को अपने आप मत गिराओ। अपनी आत्मा ही अपना शत्रु और वही अपना मित्र है। ऐसे आत्म तत्व को देखने समझने के लिए हमें न केवल एकान्त सेवन की आवश्यकता पड़ती है वरन् अपने आप को सबसे अलग भी देखना पड़ता है। यह पृथकता ही सामूहिकता की आधारशिला है। जो नागरिक कर्त्तव्य पालन में एकनिष्ठ है उसी से समान निष्ठा बन पड़ती है। अन्यथा भीड़ से भटकाव में मनुष्य अपना आपा तक खो बैठता है। जो स्वयं डूबता है, वह दूसरों को कहाँ उबार पाता है।
आत्म सुधार के साथ संसार सुधार की सम्भावना जुड़ी है। दूसरों के साथ चलने में हर्ज नहीं, पर अपने आप को मेले की भीड़-भाड़ में धक्का देना और लक्ष्य से विरत होकर जहाँ-तहाँ ठोकरें खाते फिरने में कस्तूरी मृग जैसी ही दुर्गति का साथी बनना पड़ता है। इस आत्म सुधार के लिए अपने को अपने ही निर्धारण के अनुरूप चलना और लक्ष्य की ओर स्वयं घसीट ले चलने का एकाकी साहस जुटाना पड़ता है।
शरीरों की क्षमता सीमित है। ऊँचाई, चौड़ाई, मोटाई, कद की दृष्टि से मनुष्य शरीर प्रायः एक जैसे होते हैं। इसी प्रकार उनके खाने, काम करने, सहने की क्षमताएँ भी सीमित है। इतने पर भी तथ्य यह है कि उसकी क्षमता और सम्भावना असीम है। प्रश्न इतना भर है कि किसी ने उन विशेषताओं को जगाने का प्रयत्न किया या नहीं किया। यदि किया होगा, तो उसमें प्रयत्न एवं परिस्थिति के अनुरूप यथा समय सफलता मिलकर रहेगी।
किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों का आकार-प्रकार, बल, पराक्रम असाधारण रूप से न्यूनाधिक पाया जाता है। बहुत बार ऐसा होता है कि वैसी स्थिति अनायास ही बन गई होती है। उसके लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया गया होता। ऐसी स्थिति में उसे कौतूहल की तरह देखकर आश्चर्य भर व्यक्त किया जाता है।
सोचा जाना चाहिए कि मानवी काया में अगणित विशेषताएँ भरी पड़ी हैं जिनके कारण सामान्य स्तर से नीचे भी गिरा जा सकता है और ऊँचा भी उठा जा सकता है। जो इस सम्भावना पर विश्वास करते हैं, वे भाग्यवादी नहीं बनते, यथास्थिति में सन्तोष नहीं करते, वरन् उत्कर्ष को सम्भव बनाने और पतन की रोकथाम करने के लिए अपने प्रयास-पराक्रम का सदा उपयोग करते रहते हैं।
असाधारण रूप से छोटे या बड़े आकार के कितने ही उदाहरण भूतकाल में उपलब्ध रहते हैं और अब भी उनकी कमी नहीं है, पर यह नहीं जाना जा सकता है कि इस विचित्रता का वास्तविक कारण क्या है। सामान्य जाँच-पड़ताल में उनकी संरचना में कोई रासायनिक न्यूनाधिकता ऐसी नहीं पाई गई जिसे इस असामान्य व्यतिरेक का निमित्त कारण बताया जा सके।
उपलब्ध प्रमाणों में रिकार्ड के रूप में एक 17 वर्षीया ‘लूसिया जाकतें’ की जानकारी मिलती है जिसका वजन मात्र 407 पौण्ड था। इसी प्रकार सबसे अधिक ऊँचाई वाला व्यक्ति बैडली माना गया है। वह प्रायः 9 फुट का था। सन् 1947 में वह 22 वर्ष की भरी जवानी में ही मर गया। सामान्यतया अधिक से अधिक लम्बे व्यक्ति साढ़े छह फुट ऊँचे और 200 किलो भारी पाए गए हैं। अपवाद स्वरूप राबर्ट अर्लह्यूजस का एकाध उदाहरण भी है। वह 1069 पौण्ड भारी था। बलिष्ठ भी। किन्तु 32 वर्ष की आयु तक ही जी सका।
इण्डोनेशिया के कम्पास दैनिक पत्र में एक समाचार छपा है, जिसमें उस देश में जन्मी एक ऐसी लड़की का जिक्र है, जिसे संसार भर में सबसे छोटी कहा जा सकता है। यह सिरेंग गाँव में जन्मी है। नाम है कर्सी। इसकी ऊँचाई मात्र दो फुट है फिर भी वह अपनी आयु आठ वर्ष के समान बालकों की तरह चुस्त और बुद्धिमान है।
संसार की सबसे लम्बी महिला 17 वर्षीय जंग बिलियन का कुछ ही दिन पूर्व देहान्त हुआ है। हुनान प्रान्त निवासी इस महिला की ऊँचाई 2.47 मीटर थी। उसके सोने के लिए अतिरिक्त लम्बाई की चारपाई बनवाई गई थी। उसे एक वर्ष पूर्व ही मधुमेह हुआ था और वह इस तेजी से बढ़ा कि उसकी मृत्यु का कारण ही बन गया।
कानपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक ऐसे मरीज को दाखिल किया गया जिसका वजन 212 कि.ग्रा. है। मधुमेह संबंधी जाँच-पड़ताल के लिए उसे भी भरती किया गया था। वजन करते समय अस्पताल की तौलने वाली मशीन टूट गई तो रेलवे स्टेशन पर भारी पार्सल तौलने वाली मशीन पर उसे तौला गया। इस व्यक्ति की खुराक सामान्य व्यक्तियों की तुलना में दस गुनी अधिक पाई गई।
न्यू चाइना न्यूज एजेन्सी के अनुसार-मध्य चीन के हुबे प्रान्त में जन्मी बालिका जिनगढ़ अपनी 3 वर्ष की आयु में ही 40.5 किलो भारी है। जब जन्मी थी तब भी वह 7 किलो भारी थी। वह न केवल स्वस्थ है वरन् दूध और दूसरे पौष्टिक पदार्थ इतनी मात्रा में हजम करके दिखाती है, जितनी जवान-पहलवान की कठिनाई से खाने और पचाने में समर्थ हो सकते हैं।
लन्दन के दक्षिणी भाग वेजवर्थ निवासी इस मुक्केबाज का वजन 95.25 किलोग्राम है और ऊँचाई 1.9 मीटर। यह ऐसे व्यक्ति के लिए बहुत ही आश्चर्यजनक है जो बचपन में बहुत ही दुबला और डरपोक रहा है। व्यायामों में उसे मुक्केबाजी इसलिए पसन्द आई कि वह प्रतिद्वन्द्विता में उतरे और सामने वाले से अपने को अधिक समर्थ सिद्ध कर सके। फ्रेन ब्रूसों के कथनानुसार उसकी यह प्रगति क्रमिक हुई है। उसने अपने शरीरबल और मनोबल को बढ़ाने का निरन्तर ध्यान रखा, प्रयत्न किया और समयानुसार उसका समुचित प्रतिफल पाया है। मुक्केबाजी की 18 विशिष्ट स्पर्धाओं में 17 को जीतने वाले फ्रेन ब्रूसो अपनी आरम्भिक और आज की शारीरिक स्थिति की तुलना करते हैं, तो दोनों के बीज जमीन आसमान जितना अन्तर सिद्ध करते हैं। जब वे स्कूल में भर्ती हुए तो बहुत दुर्बल थे। सभी लड़के उनका मजाक उड़ाते थे। पन्द्रह वर्ष की आयु तक वे साथियों के झुण्ड कतराकर चलते थे कि कहीं कोई उनकी दुर्बलता देखकर चिढ़ाने या छेड़ने न लगे। किन्तु उन्होंने अपने पिता के सत्परामर्श से स्वास्थ्य-सुधार के नियमों पर पूरा ध्यान दिया और व्यायाम द्वारा शरीर को मजबूत बनाने का भरपूर प्रयास करते रहे। वे प्रयत्न बेकार नहीं गए और समयानुसार चमत्कार दिखा सकने जैसे सिद्ध हुए।
कर्निंघम की विचित्र कहानी है। वह बचपन में स्टोव फटने से बुरी तरह जल गया था। अस्पताल में मुद्दतों पड़े रहने के बाद उसके हाथ-पैर निकम्मे हो गए थे। घर आकर वह दयनीय स्थिति में किसी प्रकार जीवित भर रह रहा था। किन्तु उसके बाप ने सहारा दिया, हिम्मत बँधाई, उपाय बताए जिनके सहारे वह उठने तथा चलने का प्रयत्न करता। कभी थोड़ा सफल होता कभी असफल रहता। जब कभी दुःखी होता और दुर्भाग्य को कोसता तो उसका पिता हिम्मत बँधाता और ऐसे सपने दिखाता जिसके अनुसार उसे भविष्य में बड़ी प्रगति करनी थी। लड़के की हारती हिम्मत को नया प्रोत्साहन मिला तो वह तन कर खड़ी हो गई। चूँकि हर समय स्वास्थ्य सुधारने और गई बीती स्थिति में भी शारीरिक समर्थता अर्जित करने के पाठ उसे पढ़ाए गए, इसलिए वह उसी दिशा में बढ़ता चला गया और अनेक उतार-चढ़ावों को पार करते हुए, वह विश्व के धावकों में मूर्धन्य होने का श्रेय पा सका।
ग्लेन कर्निंघम संसार के प्रमुख धावकों में से एक था। उसने कई ओलम्पिक पदक जीते। सन् 1933 से 1940 के बीच न्यूयार्क में आयोजित 31 दौड़ आयोजनों में से 21 में उसने बाजी मारी। उसने 1600 मीटर की दौड़ का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। रिटायर होने पर उसने कैन्सास के रीडर पाउन्ट स्थान में ‘कर्निंघम यूथ रेंज’ स्थापित किया। जिसे वह 30 वर्ष तक अपनी पत्नी रुथ समेत चलाता रहा। इसके माध्यम से उसने 9000 से अधिक ऐसे लड़कों को सहायता दी, जो किन्हीं कारणों से विपत्तिग्रस्त हो गए थे और स्वावलम्बी बनने तथा प्रगति करने में असमर्थ थे।
अमृतसर का रहने वाला इच्छा शक्ति का धनी एक 40 वर्षीय सिख सुरेन्दर सिंह अपनी एक विलक्षण विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। वह सीना फुलाने की अद्भुत क्षमता रखता है। अपने 28 इंच सीने में साँस भरकर उसे 36 इंच तक फैला देता है। इसका प्रदर्शन उसने पंजाब, हरियाणा, तथा दिल्ली में अनेक स्थानों पर किया है ओर पुरस्कार पाया है। एक्साइज विभाग में वह एक सामान्य क्लर्क था। विभाग ने उसकी इस प्रयत्नशीलता से प्रसन्न होकर पदोन्नति भी की है और स्वर्ण पदक भी दिया है। सुरेन्दर सिंह का कहना है कि यह कोई जादू नहीं है। अभ्यास करके ही उसने यह क्षमता उपार्जित की है।
इस्तम्बूल का समाचार है कि तुर्की का एक पहलवान मुहम्मद कराटाय न केवल कुश्तियाँ पछाड़ता है वरन् पेट में इतना आहार पचाकर दिखाता है जिसकी सामान्यजन तो कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। औसत आदमी जितना खाता है उससे उसकी खुराक दस गुनी अधिक है। इतना मसाला उदरस्थ कर जाने के उपरान्त भी उसे आलस्य नहीं आता और तनिक देर सुस्ताने के उपरान्त फिर अपना काम सामान्य समय की तरह करने लगता है। उसके निर्धारित आहार की लागत हर महीने 850 डालर अर्थात् 6800 रुपये आती है।
उत्तरी इंग्लैण्ड की शेफील्ड युनिवर्सिटी के मेडिकल विभाग के सम्मुख एक विलक्षण केस आया जिसमें मस्तिष्कीय संरचना के संबंध में पुरानी मान्यता पर नये सिरे से सोचने के लिए विशेषज्ञों की चुनौती है।
एक असाधारण मेधावी छात्र को न्यूरोलॉजिस्ट जॉन लोरवर के सम्मुख इसलिए प्रस्तुत किया गया कि उसका सिर औसत अनुपात से कहीं अधिक बड़ा था जो देखने में कुरूप लगता था और अधिक बढ़ोत्तरी होने पर किसी विपत्ति की आशंका थी। परीक्षण में एक अद्भुत बात देखी गई कि विद्धता का प्रमुख क्षेत्र सेरिब्रल कार टैक्स ही नगण्य स्थिति में था। आमतौर से यह 4.5 से. मी. मोटी पर्त का होता है। पर उस छात्र के सिर में मात्र 1 मि. मी. का था। उसे औसत मस्तिष्क की तुलना में 45 वाँ भाग ही कहना चाहिए। अब तक किसी व्यक्ति की विद्वता का प्रतिपादन इसी सेरीब्रल कारटेक्स की मात्रा एवं परिधि के साथ जोड़ जाता रहा है। अब यह सोचने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि प्रतिभा किन्हीं अन्य अविज्ञात कारणों एवं क्षेत्रों पर भी निर्भर हो सकती है।
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में एक जन्मजात अपाहिज राज जिल्वा नामक लड़के ने नये प्रकार का साहस बटोरकर अध्ययन प्रारम्भ किया और उस प्रयास में आश्चर्यचकित करने वाली सफलता पाई। हाथ बेकार थे। बांये पैर को कुछ सक्षम पाया तो उसी के सहारे उसने लिखने का अभ्यास किया और उसी से लिखकर हायर सेकेन्डरी की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इतना ही नहीं उसने तैरने का भी अभ्यास करके अपने कौशल का परिचय दिया। महाराष्ट्र सरकार ने उसे उच्च शिक्षा पाने के लिए 15 हजार का अनुदान दिया है।
दान्ते ने नौ वर्ष की आयु में भावपूर्ण कविताएँ लिखी थी। पास्कल और कान्ट ने दस-दस वर्ष की आयु में ही अपने दार्शनिक प्रतिपादनों से विद्वानों को चकित कर दिया था। गेटे ने भी दस वर्ष की आयु में एक कहानी गढ़ी थी और उसे सात भाषाओं में लिख डाला था। बायरन आठ वर्ष की आयु में ही अच्छे कवियों की पंक्ति में बैठने लगे थे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भी नौ वर्ष की आयु में ही कविताओं की समस्या पूर्ति करने में ख्याति अर्जित कर ली थी।
ये सारे उदाहरण एक ही सत्य का उद्घाटन करते हैं कि मानव जन्म तो सहज रूप है, पर वह सामान्य रूप से जीने के, मरने-खपने के बजाय असाधारण रूप से जिया जा सके तो मजा ही कुछ और है। सम्भावनाओं की कोई सीमा नहीं। वे अद्भुत एवं अपरिमित हैं-समय-समय पर ऐसी प्रतिभाओं का जब भी परिचय मिलता है, लगता है जितना भी कुछ है, वही पर्याप्त नहीं। और भी कुछ कर सकना सम्भव है-बहुत कुछ प्रसुप्त के अन्तराल में छिपा पड़ा है। अध्यात्म बाजीगरी का नाम नहीं है वरन् मानव में प्रसुप्त महामानव की जागृति की इसकी एक सार्थक परिभाषा मानी जा सकती है। यदि इन सूत्रों से कुछ संकेत लिया सके तो ऐसे विवेचन की सार्थकता भी है।
आँगस्टी रैनक्वायर गठिया रोग से ग्रस्त थे, फिर भी उन्हीं मुड़ी-तुड़ी उंगलियों से उन्होंने चित्रकारी सीखी और वे विश्व विख्यात कलाकारों की श्रेणी में आ गए। कला साधना में तन्मय यह साधक कभी अपने मर्द की चिन्ता न कर निरन्तर स्वयं व अपने शिष्यों के साथ चित्र बनाया करता। सत्तर वर्ष से अधिक आयु हो जाने पर भी उसकी साधना में कोई कमी नहीं आयी। वे अपने दर्द को इस साधना में भुला देते थे। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि कौन-सी शक्ति हैं जिसके कारण इतनी विकृतियों के बावजूद वे जीवित हैं।
जीवन एक संघर्ष है। उसमें अनेक मोर्चों पर लड़े जाने वाले युद्ध में जीतने वाला कौशल अपनाना पड़ता है। जीवन का आरम्भ नहीं, अन्त ही आनन्द से भरा है। जो आरम्भ से ही आनन्द की बात सोचते हैं वे प्रगति के लिए आवश्यक संघर्ष से जी चुराते और मुँह छिपाते देखे गये हैं। जो चलेगा नहीं वह पहुँचेगा कहाँ? जो लड़ेगा नहीं सो जीतेगा कैसे?
जीवन एक खेत है जिसमें बोया जाता है वही उगता और फलता है। निकृष्टता अपनाये रहने वाले उसे सुयोग सौभाग्य से वंचित ही बने रहते हैं जो सज्जनों को मिलता और उदारजनों पर अन्तरिक्ष से बरसता है। चतुरता और कुटिलता दूसरों को ठगने डराने के काम आ सकती है किन्तु जीवन की प्रसन्नता एवं महानता से भर देने में उससे तनिक भी सहायता नहीं मिलती।
कोई रास्ता ऐसा नहीं जो काँच की तरह चिकना या सरपट दौड़ाने के लिए बनाया गया हो। यहाँ हर जगह रोड़े और खड्डे हैं जो उनसे बचते या रौंदते हुए चल सकते हैं उन्हीं का मंजिल तक पहुँचना सम्भव है। जो जूझकर बलिष्ठ बनना चाहते हैं उनके लिए यह संसार व्यायामशाला की तरह प्रिय भी है, सुहावना भी और अनुकूल भी। किन्तु जिन्हें बिना उचित मूल्य चुकाये बहुत कुछ बटोरने की ललक है, उन्हें भिक्षा वृत्ति अपनानी पड़ती है या उठाईगीरी पर उतरना पड़ता है। इस आधार पर किसी ने कुछ कमाया भी तो उसमें श्रेय सम्मान जैसी कोई बात नहीं और न गर्व गौरव की अनुभूति इस रास्ते हो सकती है।
जीवन भव-बन्धनों से जकड़ा हुआ है इसका अर्थ किसी विवशता का लदा हुआ होना नहीं वरन् यह है कि उसे संकीर्णता की परिधि में आबद्ध किया गया है। क्षुद्रता के घरौंदे से बाहर शिर निकाल कर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि संसार कितना विशाल और महान है। घोंसले से बाहर निकल कर उन्मुक्त आकाश में अपने बलिष्ठ पंखों के सहारे उड़ने वाले पक्षी विश्व वैभव के साथ जुड़ते हैं। पेट और परिवार की तीलियों से घिरे आवरण में आबद्ध लोगों के लिए ही भव-बंधनों की जकड़न है। यह किसी की थोपी हुई नहीं वरन् स्वेच्छापूर्वक बाँधी और अपनाई गई है।
अपनी मर्जी का जीवनक्रम अपनाने में भय, संकट, पतन और विनाश की पूरी-पूरी आशंका है। अच्छा हो हम ईश्वर की मर्जी पर जियें और परमार्थ का रास्ता अपनायें। राजमार्ग को छोड़कर जो अपनी पगडंडी बनाते है उन्हें श्रम भी बहुत पड़ता है और लक्ष्य तक पहुँचने का निश्चय भी नहीं होता। बुद्धिमत्ता इसी में है कि महामानवों की राह पर चले और उन्हें अपना मार्गदर्शक चुने जो स्वयं उठे और अपने कन्धों पर बिठाकर अनेकों को ऊँचाई की झाँकी करा सकें।
त्याग का प्रतिफल स्वर्ग कहा जाता है। यहाँ त्याग का अर्थ निर्वाह साधनों, पारिवारिक उत्तरदायित्वों, नैतिक कर्त्तव्यों एवं सामाजिक अनुबंधों का परित्याग करना नहीं वरन् यह है कि क्षुद्रता को छोड़ें। संकीर्णता का दायरा तोड़ें और उन आदतों से उबरें जो पतन पराभव के गर्त में गिरती और भ्रष्ट चिन्तन दुष्ट आचरण की प्रलोभन देती हैं। त्याग से जिस स्वर्ग को प्राप्त होने की बात कही जाती है वह किसी अन्य लोक में अवस्थित ग्राम नगर नहीं वरन् श्रेष्ठता का रसास्वादन कराने वाला दृष्टिकोण भर है जब अपनी आकाँक्षा, विचारणा एवं चेष्टा सत्प्रयोजनों में निरत होती है तो आत्म-सन्तोष, लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह के रूप में ऐसी अनुभूति होती है जिसे स्वर्ग की उपमा दी जा सके। इसे कोई प्रदान नहीं करता। वरन् शालीनता की चाबी से स्वयं ही इस द्वार को खोला और प्रवेश किया जाता है।
पवित्रता, प्रसन्नता, प्रखरता और दूरदर्शिता यही जीवन वृक्ष के चार प्रतिफल हैं। जिन्हें जितनी मात्रा में यह मिल सके समझना चाहिए कि उसी अनुपात से जीवन सार्थक हो गया।
सुप्रजनन की दृष्टि से संयमी लोग ही सफल एवं सक्षम होते हैं। कामुकों में रति-कौशल हो सकता है, किन्तु वे बीज निर्माण के क्षेत्र में सर्वथा पिछड़े हुए पाये जाते हैं। ऐसे लोगों द्वारा व्यक्तित्व सम्पन्न सन्तान की आशा नहीं की जा सकती। बलिष्ठ और सुन्दर लोग अपनी अनुकृति को जन्म दे सकते हैं। इसी प्रकार प्रज्ञा, प्रतिभा और सुसंस्कारिता के क्षेत्र में भी उसी स्तर के सृजनकर्ताओं की आवश्यकता पड़ती है। इस संदर्भ में संयम, सदाचार को जितना महत्व दिया जा सके, देना चाहिए।
प्रजनन विशेषज्ञ जॉन मैक्लाइड की गणना के अनुसार स्वस्थ मनुष्य के एक मिलीमीटर वीर्य में 1 करोड़ 70 लाख शुक्राणु होने चाहिए, पर इन दिनों औसत अमेरिकी में वे घट कर साठ-सत्तर लाख से अधिक नहीं पाये जाते हैं। किसी-किसी वर्ग या क्षेत्र में तो उनकी संख्या और भी कम होकर 40 लाख से भी कम रह गई। इसका प्रभाव न केवल प्रजनन पर पड़ता है, वरन् रति कर्म में शारीरिक अक्षमता के रूप में भी देखा जाता है। मानसिक कामुकता चिन्तन एक बात है; उसे तो वृद्धजन भी करते रहते हैं, किन्तु शारीरिक क्षमता विशुद्ध रूप से उस क्षेत्र के स्नायविक, रक्त-प्रवाह एवं ऊर्जा प्रदान करने वाले उन तत्वों पर निर्भर है, जो शुक्राणुओं में पाये जाते हैं।
इन दिनों कामुकता निस्सन्देह बढ़ रही है। उसे अश्लील साहित्य तथा फिल्म-चित्रों ने विशेष रूप से भटकाया है। ऐसे क्लब और चकले भी आग में घी का काम करते हैं और मानसिक प्रवाह को घसीटकर कहीं से कहीं ले जाते हैं। इतने पर भी यह देखने योग्य है कि क्या इस चिन्तन में निरन्तर निरत रहने वाले शारीरिक दृष्टि से भी रति कर्म के लिए उपयुक्त क्षमता बनाये हुए हैं। उसकी जाँच-पड़ताल के स्थिति क्रमशः निराशाजनक बनती जा रही है, क्रमशः मनुष्य नपुँसकता की ओर बढ़ रहे हैं। यह तथ्य न केवल पुरुषों पर लागू होता है, वरन् नारियों पर भी यही छाया घिरी हुई है। इसी कमी के कारण प्रजनन की उपलब्धियाँ भी शिथिल स्तर की होती है। सन्तानें दुर्बल, निस्तेज और आलसी होती जाती है। जवानी में बुढ़ापा घिर जाने का यह स्वाभाविक परिणाम है।
अब तक बढ़ती हुई नपुँसकता का कारण मनोवैज्ञानिक समझा जाता था और अनुमान लगाया जाता था कि यह लज्जा, भय, संकोच एवं आत्महीनताजन्य है। कई प्रसंगों में असफल रहने वालों की मान्यता बन जाती है कि वे अपना पौरुष गँवा बैठे। बस इतने भर से वैसा मन ढल जाता है और सचमुच ही नपुँसकता आ घेरती है। ऐसे लोगों का उपचार मनोबल बढ़ाने, उत्साह प्रदान करने एवं सफलता की अनुभूति कराने वाले उपायों के द्वारा किया जा सकता है, किन्तु जब चूल्हे में ईंधन कम पड़े, भण्डार चुकने लगे, तो उन उपचारों से भी क्या बनेगा। वृद्धता आने पर शारीरिक शिथिलता बढ़ जाने पर उत्तेजना देने वाले अवसर प्राप्त रहने पर भी कुछ प्रत्यक्ष पुरुषार्थ बन नहीं पड़ता।
घटते हुए पौरुष का न केवल दम्पत्ति सन्तोष पर, वरन् सन्तानोत्पादन की अक्षमता के रूप में भी देखा जाता है। इतना ही नहीं उससे मनुष्य की कर्मशीलता, स्फूर्ति, तत्परता, क्षमता, दक्षता पर भी प्रभाव पड़ता है। बूढ़ों की तरह पौरुषहीन भी अपनी घटी हुई क्षमता के कारण इच्छा रहते भी कहने लायक पराक्रम किसी भी क्षेत्र में नहीं कर पाते। यह प्रकारान्तर से समर्थता का अवमूल्यन है।
शुक्राणु की घटती हुई संख्या के साथ घटते हुए पौरुष का संकट क्यों बढ़ता जा रहा है-इसके कई कारण बताये जाते हैं। फसलों पर विषैले रसायनों का छिड़काव घूम फिर कर आहार द्वारा रक्त में मिलता और कीटाणुओं की तरह शुक्राणुओं को भी मारता है-यह एक अनुमान है। इसके अतिरिक्त स्वाद प्रेरित व्यंजनों में पोषण तत्व की न्यूनता रहना भी इसका कारण है। चिन्ता, आशंका, अनिश्चितता, निराशा, खीज, असफलता जैसे कारणों से भी उद्वेग रहने पर बढ़ा हुआ मानसिक तनाव शरीर की हर क्षमता को घटाता है। उसी घटोत्तरी में शुक्राणुओं की कमी एवं शिथिलता भी एक कारण हो सकता है। ऐसे-ऐसे और भी कई कारण सोचे जा रहे हैं, उनके कारण के परामर्श दिये जा रहे हैं, ताकि बढ़ती हुई सर्वतोमुखी अक्षमता की रोकथाम सम्भव हो सके।
सर्दी-गर्मी से सर्वथा बचे रहने वाले, एयर कंडीशन घरों में रहने वाले लोग भी प्रकृति प्रदत्त ऋतु उत्तेजनाओं से वंचित रह जाते हैं। सुविधा बढ़ने पर भी दक्षता में कमी आती है। इस दृष्टि से वन प्रदेश के वनवासी भाग्यवान हैं जो सर्दी-गर्मी सहने के अभ्यस्त रहने से अपनी स्वास्थ्य-सम्पदा अक्षुण्ण बनाये रहते हैं।
साधारणतया एकबार का खाली किया गया वीर्य भण्डार भरने में प्रायः 48 घण्टे लगते हैं। जो भण्डार भरे रहने की आवश्यकता नहीं समझते और उत्पादन की तुलना की आवश्यकता नहीं समझते और उत्पादन की तुलना में खर्च अधिक बढ़ा देते हैं, ब्रह्मचर्य का अनुबंध नहीं पालते, उन्हें भी अपनी भूल का जल्दी ही पता चल जाता है और वे क्रमशः क्षमता गँवाते चले जाते है।
शुक्राणुओं की संख्या ही नहीं, उनकी सजीवता, संरचना, स्फूर्ति भी पौरुष को अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक होती है। संख्या घटना ही नहीं, उससे प्रखरता घटना भी पौरुष घटने का एक बड़ा कारण है। यह कमी क्यों पड़ती है? इसका कारण क्षेत्रीय नहीं, समूचे शरीर की समर्थता पर निर्भर है। शरीर बलिष्ठ परिपुष्ट हो तो उनके शुक्राणुओं समेत अन्यान्य घटक समर्थ पाये जायेंगे। रोगी और दुर्बल काया का हर घटक इसी स्थिति में देखा जाता है; उसकी दक्षता में उसी अनुपात में कमी पड़ती है। इस दृष्टि से मात्र शुक्राणुओं की शिथिलता, न्यूनता दूर करने का काम स्थानीय उपचार कारगर नहीं हो सकता। इसलिए पौरुष बढ़ाने वाली दवाओं की ढूँढ़-खोज करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि स्वास्थ्य संवर्धन की समूची समस्या पर विचार किया जाय और उसमें जिन कारणों से भी व्यवधान पड़ता हो, उन सभी का निराकरण किया जाय।
परिस्थितियों का मनुष्य के स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है-यह बात आँशिक रूप से ही सत्य है। कितने ही विलक्षण व्यक्ति संसार में ऐसे हुए हैं जिन्होंने परिवार या संपर्क क्षेत्र के प्रचलनों का उल्लंघन करके अपनी परिस्थितियों में पले हुए व्यक्ति सामान्य स्तर के ही बने रहे।
कहा जाता है कि व्यक्तित्व का निर्माण कच्ची उम्र में होता हैं। स्वभाव का बहुत बड़ा भाग बचपन में ही बन चुका होता है। जो कमी रहती है वह किशोरावस्था में पूरी हो जाती है। इसके बाद पच्चीस की आयु तक पहुँचते-पहुँचते ऐसी मनःस्थिति बन जाती है, जिसमें किसी बड़े परिवर्तन की आशा बहुत ही कम रह जाती है यह मान्यता अधिकाँश लोगों पर तो लागू होती है पर उन प्रसंगों को भी झुठलाया नहीं जा सकता जिसमें अनेकों ने परिपक्व आयु में भी ऐसा पलटा खाया जिसकी पिछली लम्बी अवधि से चले आ रहे ढर्रे के साथ कोई संगति नहीं बैठती। यदि उपदेश परामर्श मिलने की बात को इसका कारण बताया जाय तो भी वह गले नहीं उतरती, क्योंकि इस प्रकार के उपदेश उसने पहले भी अनेकों बार सुने होते हैं। ऐसे अप्रत्याशित परिवर्तनों में किसी देवता या सिद्ध-पुरुष का कोई बड़ा हाथ नहीं रहा होता, वरन् तथ्यतः वे उभार भीतर से ही उमंगे होते हैं। भले ही श्रेय देने के लिए उन्हें किसी व्यक्ति विशेष का अनुदान परामर्श कहकर मन समझा लिया जाय।
एक ही माता-पिता के जन्मे; एक ही वातावरण में पले, एक जैसे घटनाक्रमों से होकर गुजरे बच्चों के स्वभाव में क्यों अन्तर पाया जाता है? उनमें से किसी का व्यक्तित्व प्रखर और किसी का मन्दमति, कुसंस्कारियों जैसा पिछड़ा क्यों होता है? इसका उत्तर सामान्य बुद्धि के लिए दे सकना कठिन है। अटकलें लगाने पर भी वे समाधान कारक नहीं होती। फिर इसे भाग्य विधान, विधाता के लेख, ग्रह दशा आदि कहकर मन समझाया जाय? बात इससे भी नहीं बनती, क्योंकि दूसरे ही क्षण यह प्रश्न उठता है कि विधाता ऐसा पक्षपात क्यों करता है? किसी का भाग्य औंधा, किसी का सीधा लिखने में उसे क्या मजा आता है? ग्रह-नक्षत्र अकारण किसी पर प्रसन्न और किसी पर अप्रसन्न ही क्यों होते हैं? किसी को उठाने किसी को गिराने में उन्हें क्यों अपना समय लगाने और झंझट उठाने का शौक चर्राता है।
वर्कले युनिवर्सिटी के जीव विज्ञानी जैक लॉक ने सैंकड़ों व्यक्तियों के बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के उतार-चढ़ावों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया है। वे कहते हैं कि परिस्थितियों के साथ-साथ मनुष्य का दृष्टिकोण और व्यवहार तो बदलता है, पर मूल प्रकृति में नगण्य सा ही अन्तर हो पाता है। बचपन के हँसोड़ जीवन के अन्त तक प्रायः वैसे ही बने रहे। इसी प्रकार एकान्त प्रिय के झेंपू, शर्मीले लोगों की वह आदत गयी ही नहीं। झगड़ालू आदत भी ऐसी ही है, जो व्यक्तित्व के साथ इस प्रकार गुँथी रहती है, मानो वह जन्म के समय से ही साथ आयी हों।
स्वभाव के परिवर्तन में कोई बड़े आघात तो कभी-कभी अपना प्रभाव दिखाते भी हैं, पर सामान्यतया उसमें कोई बड़ा अन्तर नहीं आता। किसी घनिष्ठ की मृत्यु-भारी हानि-लाभ, मानापमान, भयंकर रोग, दुर्घटना स्थान या व्यवसाय में भारी हेर-फेर जैसे बड़े कारणों में कई बार जीवन की दिशा बदलती देखी गई है और साथ ही प्रकृति में भी परिवर्तन होते पाया गया है। किन्तु वैसी घटनाओं को अवसाद ही कहा जा सकता है। साधारणतया तो स्थिति ऐसी ही रहती है मानो व्यक्ति जन्म से ही किसी ढाँचे में ढला हुआ आया हो। धातुएँ खदान से अपनी विशेषताएँ साथ लाती हैं। बाद में तो उन्हें गलाने, पीटने में आकृतियाँ ही बदलती रहती हैं। प्रकृति में अन्तर नहीं हो पाता।
फ्रान्सिस गाल्टन ने सन् 1896 में अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘हेरीडिटी जीनियस’ प्रकाशित कराई थी। उनका दावा था कि बुद्धिमान और व्यक्तित्व सम्पन्न माता-पिता ही अपने जैसी विशेषताओं वाली सन्तान को जन्म दे सकते हैं। ग्रन्थ प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही उस प्रतिपादन को संदिग्ध बताने वाले अन्य वैज्ञानिक सामने आये और उनने ऐसे अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये जिनसे मूर्धन्य लोगों की सन्तानें गई-गुजरी निकली और पिछड़े लोगों के घरों में प्रतिभावान जन्मे।
वंश विज्ञान के अनुसंधानी एफ.ए. बुड्स ने बीज की महत्ता बताते हुए कहा कि “प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति प्रायः राजघरानों में ही जन्मे हैं और वैज्ञानिकों का उद्भव व्यवसायी परिवारों में हुआ है।” कार्लपियर्सन ने वातावरण का महत्व तो माना है पर साथ ही यह भी कहा है कि वातावरण की तुलना में वंश बीज का प्रभाव प्रायः सात गुना अधिक होता है।
सन्तान को श्रेष्ठता का जो उपहार सामान्य दम्पत्ति दे सकते हैं, वह यह है कि वे अपने व्यक्तित्व को निरन्तर इस महान प्रयोजन का उत्तरदायित्व वहन कर सकने की साधना में लगाये रहें। प्रकारान्तर से यह मनःक्षेत्र में सुसंस्कारिता परिपक्व करने की प्रक्रिया है। इसमें कामुकता अश्लील चिन्तन एवं अवाँछनीय क्षरण से बचाव करने का ध्यान तो रखना ही होगा। साधना, उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का सान्निध्य, तीर्थसेवन, वातावरण संपर्क इसी निमित्त किये जाते रहे हैं। स्वाध्याय की महत्ता भी इसीलिए मानी गयी है। गर्भाधान की अवधि में माता को श्रेष्ठता का ही वातावरण मिले, उसके लिये आवश्यक है कि अमर्यादित प्रजनन तो रुके ही; साथ ही ऐसा वातावरण भी बने जिससे कामुकता को प्रश्रय न मिलकर सत्प्रवृत्ति संवर्धन श्रेष्ठता का महत्व मिले। दायित्व न केवल व्यक्ति एवं परिवार का है वरन् सारे समाज का है। यह मात्र आस्तिकता एवं आध्यात्मिकता का वातावरण बनने पर ही सम्भव है। सत्साहित्य का प्रचार, विस्तार एवं लोकरंजन के श्रेष्ठ माध्यम भी कामुकता विरोधी वातावरण बना सकते हैं। तभी श्रेष्ठ व्यक्तित्वों का विकास हो सकता है।
नर और नारी के मध्य कई अन्तर पाये जाते हैं। दोनों में से कहीं कोई पक्ष हलका पड़ता है, कहीं कोई भारी। इस आधार पर किसी की गरिमा न बढ़ती है न घटती। हर विशेषता अपने-अपने स्थान पर सराही जा सकती है। इसमें हलकेपन का अपना महत्व है और भारीपन का अपना।
नारी का शरीर कितना ही दुर्बल क्यों न हो, उसमें चर्बी का अनुपात पुरुष से अधिक होगा। नारी में आमतौर से 35 पौण्ड माँसपेशियों में 28 पौण्ड तक चर्बी पाई जाती है। जबकि पुरुष की 41 पौण्ड माँसपेशियों में चर्बी मात्र 18 पौण्ड भर होती है।
पुरुष का मस्तिष्क 48 ओंस भारी होता है और नारी का 44 ओंस। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह बुद्धिमत्ता की दृष्टि से हलकी पड़ती है। अनेकों नारियों ने इस क्षेत्र में अपनी वरीयता ही सिद्ध की है।
नारी की हड्डियाँ अपेक्षाकृत पतली होती है और हलकी भी। किन्तु पैरों के अँगूठे लम्बाई में बड़े होते हैं। उँगलियों के बीच फासला भी कम होता है। उनका चलना तथा दौड़ना भी पुरुषों की तुलना में भिन्न प्रकार का होता है। कारण कि उनके पैरों के जोड़ नितम्बों के भिन्न कोणों पर जुड़े रहते हैं।
पुरुषों की औसत ऊँचाई 5 फुट 8 इंच होती है जबकि नारी की 5 फुट 5 इंच। नारी की त्वचा पतली होती है। रक्त कण भी कम होते हैं। पुरुष के रक्त में प्रति मिलीमीटर 50 लाख कण होते हैं जबकि नारी शरीर में 45 लाख का अनुपात रहता है। इतने पर भी उसकी नाड़ी अपेक्षाकृत अधिक तेजी से धड़कती है। इसका अर्थ होता है रक्त की गति अधिक होना। साँस भी अधिक बार चलती है इसका अर्थ होता है। फेफड़ों का अधिक सक्रिय होना। यही कारण है कि नारी को अधिक ऑक्सीजन मिलने से उसमें सजीवता अधिक रहती है और फेफड़े अधिक मजबूत होते हैं। जीवन शक्ति उसमें अधिक पाई जाती है। फलतः वह बिना थके अधिक समय तक अपना काम करती रह सकती है।
पुरुष के ज्ञान तन्तु शरीर के विभिन्न अंगों की अनुभूतियाँ मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य 52 इंच और 5 मीटर प्रति सेकेंड के हिसाब से करते हैं किन्तु नारी में यह क्षमता अधिक तेजी से सन्देश पहुँचाने की होती है। उसके ज्ञान तन्तुओं की दौड़ 547 मीटर प्रति सेकेंड है। यही कारण है नारी अधिक संवेदनशील होती है। इसे पीड़ा की अनुभूति जल्दी होती है और अधिक भी। इतने पर भी उसमें एक अतिरिक्त विशेषता पाई जाती है सहन करने की। नारी बिना घबराये-असन्तुलित हुए लम्बे समय तक शारीरिक पीड़ा और मानसिक व्यथा सहन कर सकती है।
लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा जल्दी बोलने लगती हैं। इसका अर्थ है उनकी मानसिक बनावट में अपने मनोभावों को व्यक्त करने की उत्सुकता और आतुरता अधिक होती है। यह गुण उनमें आदि से अन्त तक बना रहता है। बातूनी में वे सदा पुरुषों से आगे रहती है। उसमें प्रसन्न रहने का गुण भी है और स्नेह, सहानुभूति सेवा का भी। पुरुष इस क्षेत्र में पीछे पाये जाते हैं उन्हें उद्विग्नता उदासी खीज के कुचक्र में अधिक समय तक फँसा पाया जाता है जबकि नारी सामान्य या गई बीती परिस्थितियों में भी हँसते-हँसाते दिन काट लेती है। सामाजिक परिस्थिति में उन्हें अधिक शिक्षा पाने या अधिक अनुभव एकत्रित करने के लिए वैसी सुविधा प्रदान नहीं की जैसी कि आम पुरुष की होती है। वे परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा लेती हैं और वह सोचती और करती हैं जो वर्तमान में सम्भव है। अव्यावहारिक कल्पनाओं की उड़ानें उड़ते उनमें से बहुत कम ही देखी जाती है।
भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है। बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है। सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है। हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है। साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते।
आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवनचर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है और इस प्रकार लगाया गया है कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे।
मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं। जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दीखता है। या तो मक्खी आदि शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उचले तभी उसे काम की वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है। अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है।
कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है। आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है। खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले।
घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है। प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं।
चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं। उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी शिर उठाती है कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है।
मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता है। किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 के लगभग बनते हैं। इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं।
टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है। वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दीखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं तो उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई।
मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है। दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है। मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है।
प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है। प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है, अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है। मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं। वे समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है।
मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है।
पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है। इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप से महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार-चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है। वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है। इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों या डरने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधारभूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है। कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैं।
इसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है। इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं। यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है। इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है।
मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी क्षेत्र से सम्बन्धित है। शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं।
चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है, उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए और अपनी दक्षता तथा क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे।
पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।
मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है। इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है।
जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 7 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का एक अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम आने के लिए पर्याप्त समझा है और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है। यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है।
सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी। इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है।
ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी।
पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है। आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है। शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना, संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं।
चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय, उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है। यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है। ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं। तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए।
विज्ञजन विष में से अमृत ढूंढ़ निकालते हैं। रसायनें इसी प्रकार बनती है। पारा, गन्धक जैसे अखाद्य और विषाक्त पदार्थ मकरध्वज जैसी रसायन में परिणत होकर काया-कल्प की भूमिका बनाते हैं। जीवन के अनगढ़ स्वरूप को यदि सुगढ़ बनाने का पुरुषार्थ बन पड़े तो उस भारभूत कुरूपता में से कीचड़ में से, कमल उगने जैसा चमत्कार हस्तगत हो सकता है।
जीवन का उथला स्वरूप मल, मूत्र के रक्त, माँस के घिनौने आवरण से आच्छादित है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों की कमी नहीं। पशु प्रवृत्तियाँ हर घड़ी छाई रहती है। कुत्सित अस्थिर, अनगढ़, कुरूप और घृणित स्तर का जीवन हर किसी पर लदा दीखता है। हमारी कुछ अपनी मौलिकता एवं विशेषता होनी चाहिए। विशालकाय भवन न सही कोई चकित करने वाले घटनाक्रम न सही, इतना तो किया ही जा सकता है कि अपनी सुरुचि को प्रोत्साहित किया जाय, और उसके सहारे एक महकने वाले सुरम्य उद्यान की तरह जीवन को सद्गुणों की पुष्प वाटिका बना दिया जाय। दूसरों को बनाना, ढालना, उठाना कठिन हो सकता है किन्तु शरीर और मन तो अपना ही है उसे इच्छानुरूप बनाने में किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं। अपनी स्वतन्त्र संरचना से-मात्र आत्म नियन्त्रण के सहारे उसे इच्छानुसार मोड़ा मरोड़ा और सुधारा सँजोया जा सकता है।
लम्बे समय तक जीवित रहने की आशा करना अच्छी बात है, पर उससे भी अच्छी बात यह है कि हमारी कृतियाँ चिरकाल तक अक्षुण्ण बनी रहें और उनसे अगली पीढ़ियाँ प्रेरणा लेती रहें। जो निरन्तर अच्छाई सोचेगा और ऊँचा उठने की योजना बनाता रहेगा उसी के लिए यह सम्भव है कि एक दिन अपने सपनों को साकार होते हुए देखे और वरिष्ठों में न सही श्रेष्ठों में अपनी गणना करा सके।
बूढ़े आदमी अपनी काया और सम्पदा से अधिक मोह बढ़ाते और मौत के भय से अधिक भयभीत रहते देखे गये हैं। ऐसा बुढ़ापा हम पर न छाये, यह ध्यान रखने की बात है। आयु के साथ बाल पके, दाँत गिरे और झुर्रियाँ पड़ें, इस प्रकृति नियम में किसी का क्या हस्तक्षेप हो सकता है पर यह अपने हाथ की बात है मानसिक जवानी बनाये रहे। न किसी से चिपकें न किसी से डरें। ऐसा करने पर ही प्रसन्नता और सरसता भरा जीवन जिया जा सकता है।
जीवन एक प्रश्न है जिसका उत्तर है-मृत्यु। मरण में न कुछ भयावह है और न अचरज। डरावनी हमारी रीति-नीति होती है। गलत दिशाधारा अपनाने पर लोग भटकते भटकाते ठोकरें खाते और ठोकरें मारते हुए जाते हैं। इस अनौचित्य से बचकर निकलने का एक ही तरीका है कि दूसरों की नकल न करे। न किसी का अन्धानुकरण करे और न किसी का आसरा तके। आदर्शों की राह पर चल सकना उन्हीं के लिए सम्भव होता है जो अपने संबंध में आप सोचते और भविष्य निर्माण के पथ पर चलने के लिए आत्मा और परमात्मा के अतिरिक्त और किसी का सहारा नहीं तकते। जीवन को मृत्यु के साथ जोड़कर चलने वाले ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उपलब्ध सौभाग्य का श्रेष्ठतम उपयोग किया जाना चाहिए।
प्रभृति प्रकृति सौंदर्य एक संयोग है पर आत्मा को सुन्दर और जीवन को सुरभित सुसज्जित बना सकना हर किसी के अपने हाथ की बात है। यही सौंदर्य सराहनीय भी है और चिरस्थायी भी। सर्प की आकृति सुन्दर है किन्तु मधुमक्खी की प्रकृति। हमें प्रकृतितः सुन्दर होने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि जीवन कमल पुष्प की तरह खिले और हर किसी की आँखों में गुदगुदी उत्पन्न करे।
बहुत सी वस्तुओं का महत्व तब प्रतीत होता है जब वे चली जाती हैं। जवानी ही नहीं जिन्दगी भी ऐसी है जिनके चले जाने पर पता चलता है कि समय रहते उनकी उपेक्षा की गई और जो उनके हित किया जा सकता था, उस पर ध्यान न गया। हमें इस तरह जीना चाहिए मानों इन्हीं दिनों महाप्रयाण करना है।
जो यथार्थ नहीं है, उसे सत्य की तरह प्रत्यक्ष देखने का नाम स्वप्न है। यों रात्रि में सोते समय मनः क्षेत्र के सम्मुख जो चित्र तैरते रहते हैं उन्हें स्वप्न कहते हैं। लोग जानने पर उनकी विसंगतियों का तारतम्य देखकर आश्चर्य करते हैं और असमंजस भी। आश्चर्य इस बात का जबकि उस प्रकार का घटनाक्रम घटित ही नहीं हुआ। अमुक पदार्थ, स्थान या व्यक्ति जब उपस्थित ही नहीं थे तो वे दीखते कैसे रहे। उनके साथ वार्त्तालाप एवं आदान-प्रदान कैसे चलता रहा? असमंजस इस बात का है कि अपना मस्तिष्क जो यथार्थ और असंगत के बीच भेदभाव करना भली प्रकार जानता है। दिनभर यही तो करता रहता है, फिर रात्रि में ऐसा क्या हो जाता है कि असंगत के प्रति सन्देह व्यक्त नहीं करता और उसे सत्य मानकर कस लेता रहता है। क्यों उसे मिथ्या नहीं बताता? क्यों उस मूर्खता को दुत्कार नहीं देता?
रात्रि स्वप्नों को ही आमतौर से चर्चा का विषय बनाया जाता है। सो कर उठने के उपरान्त उन्हें याद किया और दूसरों को बताया सुनाया जाता है जो देखा था। इतने पर भी यह रहस्य ही बना रहता है कि अकारण अनियमित यह असंगत फिल्म चलती क्यों रही, और उस समय उसके मिथ्या भ्रान्ति होने का आभास क्यों नहीं हुआ?
स्वप्न रात्रि में ही नहीं देखे जाते। दिवा स्वप्न भी होते हैं और वे जब शिर पर चढ़ते है तो यथार्थ के समान ही संगत, सम्भव और सही दीखते हैं। कल्पनाएँ कई बार इतनी रसीली हो जाती हैं कि उनमें तन्मय व्यक्ति यह तक सोच नहीं पाता कि जो सोचा जा रहा है सो अपनी वर्तमान परिस्थिति एवं योग्यता के अंतर्गत है भी या नहीं। उसे बोने से लेकर पकने तक में कितना समय लगेगा, कितना श्रम पड़ेगा और कितना सघन एवं सहयोग जुटाना पड़ेगा। यह सभी तथ्य तर्क जो बुद्धिमत्ता कहे जाते हैं-न जाने कहाँ चले जाते हैं और मनुष्य कल्पना मात्र को यथार्थता अनुभव करने लगता है। शेखचिल्ली की सर्वविदित कहानी में इसी स्थिति का आभास कराया गया है। यह दिवास्वप्न हुए।
दिवा स्वप्नों के और भी अनेक रूप हैं। परिस्थितियों से संगति न खाने वाली महत्वाकाँक्षाएँ साधनों की जाँच-पड़ताल न करके कुछ भी कर गुजरने की योजनाएँ भी दिवास्वप्न हैं जिन्हें सोचते समय तो बड़ा रस आता है। किन्तु जब यथार्थता से पाला पड़ता है तब प्रतीत होता है कि वैसा सम्भव था भी नहीं और बन भी नहीं पड़ा। प्रेम और द्वेष की स्थिति में सामने वाले की मनःस्थिति का-गतिविधियों का-भी एक कल्पना चित्र बन जाता है। जिसमें दूसरे सघन मित्र या कट्टर दुश्मन प्रतीत होते हैं। यह अपनी ही गढ़न्त है इसका यथार्थता से सीधा संबंध नहीं। जो सोचा या माना जा रहा था वह बहुत बार सर्वथा असत्य सिद्ध होते हैं, पर यह निष्कर्ष तो बाद का रहा। जिस समय अपनी मान्यताएँ आवेश में होती हैं तब तो कोई सामान्य मनःस्थिति का व्यक्ति भी देवता या राक्षस प्रतीत होता है। जबकि वस्तुतः वह वैसा होता नहीं।
देवी देवताओं के प्रति विश्वासी व्यक्ति भी कई बार अध खुली आँखों से उनके दर्शन झाँकी करते रहते हैं। कइयों पर भूत-पलीत का आवेश इस प्रकार आता है जिनमें उन्हें वस्तुतः सारा घटनाक्रम नितान्त सत्य प्रतीत होता है। यदि ऐसा न होता तो ऐसे लोगों को भूत इतना शारीरिक और मानसिक त्रास कैसे दे पाते। यह दिवा स्वप्नों की सृष्टि हैं। जो असंगत होते हुए भी अपने उभार काल में मनःक्षेत्र को एक प्रकार से स्व सम्मोहित बनाकर रख देते हैं। तब इतना तर्क काम नहीं करता कि अपने इस स्व रचित ताने-बाने का यथार्थता की कसौटी पर परखें और भ्रान्ति का जो आवेश नशे की तरह चढ़ा हुआ है उसका आवरण उतार फेंके।
फिर यह रात्रि स्वप्न या दिवा स्वप्न आते क्यों हैं? इनकी आवश्यकता ही क्या है? यह अनचाही विसंगतियाँ उपजती क्यों हैं? उनका उद्गम या सूत्र-संचालन होता कहाँ से हैं? इस संबंध में अधिक जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक है। समाधान न होने पर नई कठिनाई यह खड़ी होती है कि मनुष्य उसका ऐसा कारण ढूँढ़ने के लिए चल पड़ता है जिसे समाधान न कहकर और भी उल्टी दिशा में घसीट ले जाने वाला भटकाव कहना चाहिए। स्वप्नदर्शी को सामान्यतः कौतूहल असमंजस ही होता है। पर उससे कोई प्रत्यक्ष हानि नहीं होती। किन्तु इस अनबूझ पहेली का भ्रान्त समाधान ढूँढ़ लेने पर समझदारी ही भटक जाती है और ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचना पड़ता है जो वस्तुतः हानिकारक परिणाम प्रस्तुत कर सकें।
स्वप्न फल बताने वालों की कमी नहीं। वे उनका कुछ न कुछ औंधा सीधा अर्थ बता देते हैं। किसी शुभ या अशुभ को सम्भावना-देवी देवताओं की प्रेरणा-मृतात्माओं की फेरी, आत्मा का काल या देश की परिधि से बाहर जाकर अतीत या भविष्य का दर्शन जैसे कारण आमतौर से स्वप्न फल के रूप में बताये जाते हैं। पर वस्तुतः वे वैसे होते नहीं। इन फलिताओं पर विश्वास करने वाले वैसे होते नहीं। इन फलिताओं पर विश्वास करने वाले कई बार आशंकाग्रस्त, भयाक्रान्त एवं निराश होते देखे गये हैं और अपनी सामान्य क्षमता से भी उस हड़बड़ी में हाथ धो बैठते हैं और बने काम बिगाड़ते हैं। कइयों को गढ़ा खजाना, लाटरी का नम्बर या कोई विलक्षण भाग्योदय का आभास मिलता है। वे लोग भी बेपर की उड़ानें उड़ने लगते, मनमोदक खाते और सनकी स्तर के लोगों की पंक्ति में जा बैठते हैं। देवी देवताओं द्वारा स्वप्न में किसी की बलि माँगने और बदले में कोई बड़ा लाभ कराने का आश्वासन देने की बातें भी सूनी जाती रहती हैं। कई निरीह बालकों की हत्याएं इस प्रयोजन के लिए होती रहती हैं, फलतः वे स्वप्नदर्शी कठोर दण्ड पाते और भर्त्सना के भाजन बनते हैं। बलि दे दी पर मिला कुछ नहीं, उल्टी विपरीत टूट पड़ी।
यह हैं स्वप्नों के अवाँछनीय समाधान ढूँढ़ने के दुष्परिणाम। किसी के द्वारा जादू टोना किये जाने, घात लगाने की सूचना पाकर इन रात्रि स्वप्नों या दिवा स्वप्नों के सहारे कितने ही अनर्थ के गर्त में गिरते हैं। कइयों को इसी आधार पर ऐसे जंजाल में फँसते देखा गया है जिससे इन दृश्यों के पीछे वह विपत्ति झाँकती दीखती है जो चलती गाड़ी की पटरी पर से उतार दें। इस विपत्ति से बचने और स्वप्नों के तारतम्य के पीछे काम करने वाली यथार्थता के संबंध में अधिक गहराई तक उतरने और उनके वास्तविक कारण को समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
स्वप्न वस्तुतः मानवी अचेतन का कुछ समय के लिए दबाव मुक्त होकर निर्द्वंद्व बच्चों की तरह मनचाहा खेल खेलने जैसा स्वेच्छाचार है। हमारे मनःक्षेत्र की यों हैं तो परतें पर उनमें से यहाँ चेतन और अचेतन के दो वर्गों को समझ लेने से काम चल जायगा। चेतन मस्तिष्क वह है जो कल्पनाओं में निरत रहता है और बुद्धिपूर्वक उसमें से काट-छाँट करने के उपरान्त जो उचित है उसका निर्धारण करता रहता है। इसे चेतन या कामकाजी मन कहना चाहिए। दूसरा वर्ग वह है जो अभ्यासों और संस्कारों से परिचालित होता है। शरीर की स्वसंचालित कार्य पद्धति का निर्धारण करता है। आदतों, रुझानों और स्वभावों के स्तर बढ़ाता है और उन्हें स्थिर रखता है। व्यावहारिक कामकाज में इसका उपयोग इच्छित रूप से तो नहीं होता, पर उसकी भूमिका व्यक्तित्व का स्तर देखते हुए जानी आँकी जा सकती है।
जागृत अवस्था में चेतन भाग सक्रिय रहता है। फलतः अचेतन को अपनी गतिविधियाँ शरीर चर्या जैसे कामों तक ही सीमित रखनी पड़ती है। चिन्तन होता तो उसमें भी है पर चेतन की घुड़दौड़ में उसे अवसर ही नहीं मिलता। फलतः उस समय तो चुप बैठा रहता है, पर जैसे ही बुद्धिमत्ता की पकड़ ढीली पड़ती है, अचेतन का अपनी उमंगों के अनुरूप एक नई स्वप्न सृष्टि रच लेने का अवसर मिल जाता है। यह विसंगत इसलिए होते हैं कि अचेतन मनःक्षेत्र में भूतकाल की अनेकानेक प्रिय अप्रिय, सार्थक निरर्थक स्मृतियाँ दबी पड़ी होती हैं। इनमें से जो भी हाथ पड़ जाती हैं उसी से स्वेच्छाचारी बालक की तरह खेलने लगता है। अचेतन की कुछ अपनी इच्छाएँ भी होती हैं। उन्हें असंख्य जन्मों की संग्रहित संस्कार पूँजी भी कहा जा सकता है। उनमें से अधिकाँश अतृप्त पड़ी रहती है। तृप्ति तो थोड़े ही प्रसंगों में मिल पाती है। परिस्थितियाँ हर इच्छा की पूर्ति के उपयुक्त कहाँ होती है। ऐसी दशा में अतृप्त मानस अपनी मर्जी के खेल खिलौने बनाता बिगाड़ता रहता है। यही है संक्षेप में रात्रि स्वप्नों का आधार। दिवा स्वप्नों का आधार है तो भिन्न, फिर भी एक बड़ी समता विद्यमान रहती है।
गहरी और हलकी नींद का अन्तर करने और उसके कारण स्वप्नों में कमीवेशी होने से संबंध में फ्रांसीसी शरीर विज्ञानी ब्रेमर ने बहुत से प्रयोग किये और निष्कर्ष निकाले हैं वे कहते हैं कि भीतरी अवयवों में कहीं पीड़ा तनाव सूचना या गतिरोध उत्पन्न होने से ऐसे स्वप्न आते हैं जिनमें अपने को या किसी अन्य को त्रास मिल रहा है। थकान, गर्मी, घुटन, मच्छर जैसे कारणों से भी नींद घटती है और ऐसे कारण सामने आते हैं जिनमें हैरानी तो बढ़ रही हो पर रास्ता न मिल रहा हो। मानसिक उद्वेग भी अशुभ स्वप्नों का एक बड़ा कारण होते हैं। चिन्ता, भय, शोक, आशंका, क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसी विपन्नताओं से घिरी मनःस्थिति में युद्ध, आक्रमण, रक्तपात, षड़यन्त्र की झलक दिखाने वाले स्वप्न दीखते हैं। ब्रेमर का कथन है कि गहरी और थकान मिटाने वाली नींद लेने के लिए शारीरिक पीड़ाओं और मानसिक उद्विग्नताओं से पीछा छुड़ाना आवश्यक है।
अमेरिका में शिकागो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर क्लीट मैन ने नींद और स्वप्न के संबंध में जीवन भर अनुसन्धान जारी रखे। उनके बाद उस प्रयास को उनके शिष्य एसेरिष्की ने जारी रखा। वे लोग सोते हुए लोगों की अन्तःस्थिति जानने के लिए इलेक्ट्रोड़ों का प्रयोग करते थे और देखते कि स्वप्नों की स्थित में मस्तिष्क का कौन-सा क्षेत्र किस प्रकार की हरकतें करता है। इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रकार के इलेक्ट्रो एन्सिफेलो ग्राफी’ के उपकरण बनाये और कि माँसपेशियों की स्थिति का गहरी हलकी नींद से सघन संबंध है। थक कर सोने वाले अपेक्षाकृत अधिक गहरी नींद लेते और हलके-फुलके स्वप्न देखते हैं। इसकी अपेक्षा दिमागी काम करने वाले या चिन्तातुर रहने वाले मनःसंस्थान को उलटे उत्तेजित किये रहते जिसके कारण नींद में बाधा पड़ती है। उनींदी जैसी स्थिति रहती है और ऐसे सपने देखते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता। नींद के समय किसकी पुतलियाँ किस अनुपात से स्तब्ध या सक्रिय हैं इस आधार पर भी स्वप्नावस्था का अनुमान लगाया जाता है। इसके लिए आर.आई.एम. स्लीप के नाम से जाना जाता व इस आधार पर एक विशेष शोध पद्धति का निर्धारण किया गया है।
सिगमण्ड फ्रायड की प्रख्यात पुस्तक ‘दि इन्टर प्रिटेशन आव ड्रीम्स’ में इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि महत्वाकाँक्षाओं, चिन्ताओं और सम्वेदनाओं का भार बहन करने से जो लोग अपने को बचाये रहते हैं और हलकी-फुलकी जिन्दगी जीते हैं उन्हीं के लिए गहरी निद्रा का आनन्द ले सकना सम्भव होता है। उन्हें स्वप्न भी प्रसन्नतादायक दिखाई पड़ते हैं। ऐसी मनःस्थिति बनाये रखना किसी भी विचारशील के लिए सम्भव है। परिस्थितियाँ अपने हाथ में नहीं, पर इतना तो किया ही जा सकता है कि उन्हें संसार चक्र का स्वाभाविक विधान समझा जाय और घटनाओं को अधिक महत्व न देते हुए सन्तुलन बनाये रखा जाय।
ब्राउन, पीने, मेक्स ड्रगल, हेण्ड फील्ड, आदि स्वप्न विशेषज्ञ मनःशास्त्रियों के मन्तव्य इस संदर्भ में मिलते-जुलते हैं कि सपनों में शरीर की भीतरी स्थिति का उनमें संकेत और विवरण रहता है। यह साँकेतिक भाषा में कहा जाता है। उसे समझने के लिए बाल मनोविज्ञानियों की तरह अनुमान लगाने पड़ते हैं। छोटे बच्चे बोलना नहीं जानते पर अपनी स्थिति या आवश्यकता का परिचय अंग संचालनों के माध्यम से देते है। इस भाषा को जानने वाले समझ लेते हैं कि वह क्या चाहता है। ठीक उसी प्रकार स्वप्नों के दृश्य तो अनगढ़ होते हैं पर उनमें यह संकेत मिलता है कि शरीर के किसी अवयव में कोई विपन्नता तो नहीं है। इस आधार पर किसी रोग की स्थिति पनपने, सम्भावना उभरने का भी कुशल चिकित्सक अनुमान लगा सकते हैं।
पैथालाजी के आधार पर भीतरी अवयवों की स्थिति की जिस प्रकार जाँच पड़ताल की जाती है। उसी प्रकार स्वप्नों की साँकेतिक भाषा समझने वाले यह भी समझ सकते हैं कि भीतर ही भीतर क्या खिचड़ी पक रही है और क्या संकट उभारने की आशंका है। इस संबंध में रूसी मनःशास्त्री कासानकिन ने लगातार बीस वर्ष तक हजारों सपनों का विश्लेषण शरीरगत पर्यवेक्षण की दृष्टि से किये हैं और अपने निष्कर्षों का विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया है कि रोगों की सामयिक परीक्षा एवं निकटवर्ती सम्भावना समझने में स्वप्नों की साँकेतिक भाषा बहुत साहसिक हो सकती है। उनमें ऐसे कितने ही सपनों का विवरण प्रकाशित किया है जिनमें इस प्रकार की अविज्ञान स्थिति को समझा गया और उपचार को सरल बनाया गया।
कैलीफोर्निया के डॉक्टर मार्टिन और इविंग ओले के प्रतिपादनों में कहा गया है कि रोगों की जड़ें पाचन और रक्त सम्पदा में ही नहीं होती वरन् उनका अधिकाँश आधार मनःक्षेत्र में पाया गया है। मानसिक विद्युत के प्रभाव से ही समस्त अवयव काम करते हैं। उसकी प्रखरता से अंगों की क्षमता सुव्यवस्थित रहती है और वे सही काम करके रोगों की जड़ें काटते रहते हैं, किन्तु इस विद्युत प्रवाह में शिथिलता या गड़बड़ी चल पड़े तो अवयवों की स्थिति पर उसका प्रभाव पड़ेगा और रुग्णता जहाँ-तहाँ से फूटने लगेगी। वे कहते हैं मनःस्थिति को समझना तथा उसका उपचार करना ही रोगों की अत्यन्तिक निवृत्ति का ठोस उपाय समझा जाना चाहिए। इस प्रतिपादन के आधार पर उन्होंने स्वप्नों को शारीरिक एवं मानसिक स्थिति की गहनता पर प्रकाश डालने वाला आधार कहा है।
डा. कासानकिल ने अपना उपचार ही स्वप्न विवरण के आधार पर आरम्भ किया और इसमें उन्हें आश्चर्यजनक सफलता भी मिली हैं।
इन निष्कर्षों से यह अनुमान लगता है कि स्वप्न शारीरिक स्थिति से प्रेरित होते हैं और अपने आप में ऐसी जानकारियाँ सँजोये रहते हैं जिनके आधार पर यह जाना जा सके कि स्वस्थता कितनी सुदृढ़ एवं कितनी दुर्बल है। उसमें कहाँ खराबी पड़ी है और रुग्णता का दौर कितनी गहराई में, किस क्षेत्र में, किस स्तर का चल रहा है?
इसी प्रकार मनःशास्त्री यह सोचते हैं कि मनुष्य जिस प्रकार के चिन्तन या क्रिया कलाप में व्यस्त रहता है उसकी प्रतिच्छाया, स्वप्न में अनबूझ पहेली बनकर दीखती है और अपनी स्थिति तथा आवश्यकता की जानकारी साँकेतिक भाषा में देती है। यदि इस भाषा को समझा जा सके तो किसी व्यक्ति की उसकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का विश्लेषण किया जा सकता है। यह पता लग सकता है कि वह किस प्रवाह में बह रहा है इस आधार पर उसका भविष्य क्या बन सकता है और अशुभ की रोकथाम तथा शुभ की सम्भावना को फलित करने के लिए क्या किया जा सकता है?
इतने पर भी यह नहीं मान बैठना चाहिए कि स्वप्नों में भूतकाल के संचय एवं वर्तमान के पर्यवेक्षण के अतिरिक्त उनमें और कोई तथ्य है ही नहीं। स्वप्न जितनी गहरी परतों से उभर कर ऊपर आते हैं उसी अनुपात से वे वस्तुस्थिति की जानकारी देने का माध्यम बनते हैं।
बूढ़े, अतीत की चर्चा करते और बच्चे भविष्य के सपने देखने में निरत रहते हैं। समर्थ और वयस्क मात्र वर्तमान को देखते हैं। उसमें जुटते हैं जो आज ही करना है।
सूर्य और चन्द्र पर लगने वाले ग्रहण क्या है? इस संदर्भ में अब तो प्राथमिकशाला के विद्यार्थी भी बता सकते हैं कि चन्द्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने और सूर्य प्रकाश को उस तक पहुँचने में बाधा पड़ने का दृश्य ही चन्द्र ग्रहण है। इसी प्रकार सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने देने में जब चन्द्रमा व्यवधान उत्पन्न करता है तो उसे सूर्य ग्रहण कहते हैं। पर ऐसी मान्यता सदा से नहीं थी। खगोल विज्ञान का उपयुक्त ज्ञान जब तक सर्व साधारण को नहीं था तब तक मात्र अटकलों और किंवदंतियों के सहारे ही तद् विषयक समाधान किये जाते थे।
ग्रहण के समय याचक लोग शोर मचाते, ढोल बजाते और निकलने वाले दैत्यों की भर्त्सना में जोर-जोर से अपशब्द कहते सुने जाते हैं। धार्मिक लोग उस समय विशेष रूप से जप-तप और दान पुण्य करते है। विश्वास किया जाता है कि राहु केतु नामक दैत्य सूर्य चन्द्र पर आक्रमण करके उन्हें निगलने का प्रयत्न करते हैं। जितना अंग उनके मुँह में घुस जाता है उतने से ग्रहण दृष्टि गोचर होता है। इस प्रताड़ना से इन देवताओं को बचाने के लिए दान पुण्य जप तक काम आता है इसलिए कृतज्ञता निर्वाह के लिए वैसा करने की आवश्यकता समझी और पूरी की जाती है।
चीन देश में मान्यता थी कि आकाश के दोनों सिरों पर ड्रैनग परिवार समेत बसते हैं। जब परिभ्रमण करते हुए चन्द्र सूर्य उनकी समीप से गुजरते हैं तब वे दैत्य उन पर टूट पड़ते हैं। मनुष्य लोक का शोर सुनकर ही वे डरकर भागते और इन देवताओं को मुख में उगलते हैं। यूनान में भी ग्रहण को दैत्यों का आक्रमण माना जाता रहा है। अमेरिकी रैड इण्डियन और अफ्रीकी हब्सी उस समय सूर्य चन्द्र के बीमार पड़ने की किम्वदंती पर विश्वास करते हैं। अन्यान्य देशों में उसे भेड़ियों-कुत्तों, बाघों, साँपों का आक्रमण होने की मान्यता है। प्रशान्त के तराहती द्वीप वासियों की कल्पना इन सबसे अनोखी है। वे सूर्य को प्रेमी और चन्द्र को प्रेमिका मानते हैं और कभी सुयोग मिलने पर उनके मधुर मिलन की बेला को ग्रहण मानते हैं। उस दृश्य को देखने में वे लज्जा अनुभव करते हैं और मुँह छिपाते फिरते हैं। फलित ज्योतिषी ग्रहणों को धरती के लिए, प्राणियों तथा वनस्पतियों के लिए अनिष्ट कर मानते हैं और इस आधार पर भावी विपत्तियों का आकलन करते हैं। तन्त्र मन्त्र पर विश्वास करने वाले सोचते हैं कि यह अवसर देव या प्रेत सिद्धि के लिए उपयुक्त मुहूर्त है। उस समय वे वैसे ही विधि-विधानों में प्रवृत्त रहते हैं।
अमेरिका के आदिवासियों का विद्रोह शान्त करने के लिए भी कोलम्बस ने ऐसी ही चतुरता से काम लिया। उसने बागियों के नेताओं को बुलाकर कहा-तुम्हारे कृत्यों से देवता बहुत नाराज है। वे पूर्व सूचना के रूप में अमुक दिन चन्द्रमा को अपनी झोली में डालकर ले चलेंगे और तुम्हारे ऊपर विपत्ति बरसने का शाप देंगे। नियत समय पर आदिवासी एकत्रित हुए और उनके उस पूर्व कथन को सर्वथा सच पाया। फलतः वे बुरी तरह डर गये और विरोध छोड़कर कोलम्बस का सहयोग करने लगे।
अन्ध विश्वास किसी भी विचित्र घटना के साथ जुड़ सकते हैं। इन्द्रधनुष, बिजली की कड़क को देवताओं की करतूत माना जाता है। और डरे हुए लोगों द्वारा उनका कोप शमन करने तथा अनुग्रह पाने के लिए पूजा प्रार्थना का विधि-विधान अपनाया जाता रहा है। ग्रहण भी ऐसे ही देव विग्रह का एक स्वरूप समझा जाता रहा है और कई बार तो उस मान्यता से चतुर लोगों द्वारा लाभ भी उठाया जाता रहा है।
चीन के ज्योतिषी अब से चार हजार वर्ष ग्रहणों की भविष्यवाणी करने लगे थे। यूनानियों ने भी इस गणित को जाना और वे भविष्यवक्ता के रूप में अपनी सिद्धावस्था प्रामाणित करने लगे। एक बार तो उन्होंने इस आधार पर एक बड़े संकट को टाल देने जैसा लाभ भी उठाया। यूनान के मेडीज और लाइडियन्स के बीच जोरदार युद्ध छिड़ा हुआ था। ज्योतिषी बेलीज ने इन दिनों बड़ी चतुरता से काम लिया और घोषित किया कि इस युद्ध से सूर्य देवता अत्यधिक कुपित हैं और अपने रोष का प्रदर्शन करने के लिए वे 28 मई सन् 585 को काले पड़ जायेंगे। इस संकेत में उनका अभिप्रायः यह होगा कि युद्ध करने वाले यदि रुके नहीं तो उनके ऊपर दैवी प्रकोप बरसेगा और तहस-नहस करके रख देगा।
भविष्यवाणी सच निकली। सभी ने सूर्य को दिन-दहाड़े कुपित होते और काला पड़ते देखा। फलतः सन्नाटा खिंच गया। सैनिकों ने हथियार डाल दिये। युद्ध रुका और तत्काल सन्धि हो गई।
भारत के ज्योतिषियों ने ग्रह गणित से यह जान लिया था कि 223 चन्द्र मासों अर्थात् 6545 दिनों बाद ग्रहणों की गतिचक्र की पुनरावृत्ति होने लगती है। इस सिद्धान्त के हस्तगत होने से हजारों वर्ष आगे के सूर्य चन्द्र ग्रहणों की भविष्य वाणियाँ करना सम्भव हो गया। इसी आधार पर आस्ट्रिया के देवज्ञ थियोडोर आपोल्जेर ने एक विवरण पत्र में प्रकाशित किया जिसमें भावी 8000 सूर्य ग्रहणों और 5200 चन्द्र ग्रहणों की तारीखें तथा घण्टा मिनटें दी गई है। इसमें 7207 से 2162 तक के निर्धारण छपे है। वस्तुतः इन सबकी पृष्ठभूमि भारतीय ज्योतिष शास्त्र ही रही है।
सूर्य ग्रहण की बेला पर वैज्ञानिक शोधों के निमित्त बड़ा अनुकूल माना जाता है। आमतौर से दिन में तारे नहीं दीखते पर यदि किसी गहरे कुंए में झाँककर देखा जाय तो पानी की परछाई में दिन के समय भी तारे देखे जा सकते हैं। इसका कारण कुंए के भीतर उस सूर्य प्रकाश का न पहुँचना है जो धरातल पर चारों ओर छाया रहता है और तारक दर्शन से आँखों को वंचित रखे रहता है। यही स्थिति सूर्य ग्रहण के समय भी होती है। यदि उस समय खग्रास हो अथवा अधिक ढका हो तो प्रकृति की उन विलक्षणताओं को खोजा जा सकता है जो सूर्य की सामान्य गर्मी रोशनी के कारण देखने, समझने, पकड़ने में नहीं आती।
भूतकाल में कितने ही महत्वपूर्ण अनुसंधान सूर्यग्रहण की अवधि में ही सम्भव हुए हैं। विज्ञानी लाकेयर और जान्सन की संयुक्त खोजों से 1868 में सूर्य के वातावरण में एक नया तत्व ‘हीलियम’ खोजा था।
प्राणी तथा पदार्थ एक अभ्यस्त एवं सामान्य वातावरण में रहने के अभ्यासी होते हैं। पर ग्रहण बेला में न केवल प्रकाश ही घटता है वरन् वातावरण में और भी बहुत कुछ परिवर्तन हो जाता है। इसकी जानकारी पक्षियों को विशेष रूप से मिलती है। फलतः वे डरकर अपने घोंसलों में जा घुसते हैं जबकि उससे भी अँधेरा करने वाली बदली आसमान पर छा जाने के समय उनकी सामान्य गतिविधियों में कोई अन्तर नहीं पड़ता। वातावरण का यह विचित्र परिवर्तन, सामान्य जीवन तथा पदार्थों पर भी विशेष रूप से पड़ता है। फलतः उसकी स्थिति में सावधानी रखने तथा सुरक्षा बरतने की आवश्यकता होती है। गर्भिणियों तथा भ्रूणों पर पड़ने वाले प्रभाव का इन दिनों विशेष रूप से आकलन उन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।
इस वर्ष 1983 में भी चन्द्र ग्रहणों और सूर्य ग्रहणों की एक बड़ी शृंखला है। एक वर्ष के भीतर ही छह पड़ेंगे। जिनमें से कुछ पड़ चुके कुछ पड़ने वाले हैं। इतनी धमाचौकड़ी पिछले हजारों वर्षों से नहीं मची। इनके साथ जुड़ी हुई अस्त-व्यस्तता को देखते हुए हमें भावी कठिनाइयों का ध्यान रखते हुए अधिक आत्म-बल बढ़ाना और साहस सँजोना चाहिए।
भजन और योग साधन से स्वर्ग मुक्ति जैसे लाभ मिल सकते हैं। पर शान्ति और सन्तोष पाने के लिए सेवा धर्म अपनाये बिना काम नहीं चलता।
बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। सद्गुणों की सम्पदा संग्रह करने के लिए दत्त-चित्त और प्रयत्नशील रहने वाले मनुष्य एक दिन महामानवों का स्तर प्राप्त करते हैं।
सूर्य की प्रकाश किरणों में सात रंग हैं। किन्तु उसके हलके भारी सम्मिश्रणों से प्रायः 10 लाख रंग बन सकते हैं। इनमें से विभिन्न जीवन जन्तु अपनी-अपनी नेत्र क्षमता के अनुरूप रंग ही देख सकते हैं। मनुष्य की आंखें मात्र 378 रंग देख सकने में समर्थ हैं। हमें उतने पर ही सन्तोष करना पड़ता है।
रंगों में विशेष प्रकार का वातावरण बनता है। वस्त्रों में, कमरे की दीवारों में, फर्नीचर में किस प्रकार के रंग लगे होते हैं वे अपना प्रभाव उनका उपयोग करने वालों पर भी छोड़ते हैं। लाल रंग गर्मी उत्तेजना और चिड़चिड़ापन उत्पन्न करता है। इससे स्नायु विकार हो सकते हैं। इसके विपरीत नीला रंग शीतल और शान्तिदायक होता है। गर्मी वाले मौसम या स्थान में नीले रंग का उपयोग करने से आँखों के माध्यम से शरीर को भी राहत मिलती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण रंगीन चश्मे हैं। लाल काँच वाला चश्मा लगाकर निकला जाय तो चारों ओर आग बरसती दिखाई पड़ेगी और शिर गरम होने लगेगा। इसके विपरीत हरा या नीला चश्मा लगाकर निकलने पर कड़ी धूप भी हल्की प्रतीत होती है और बदली सी छाई लगती है। गर्मी दूर करने के लिए यह छाता लगाने जैसा उपाय है।
एक कारखाने के श्रमिकों को अधिक प्यास लगने और अधिक बार पेशाब जाने की शिकायत बढ़ गई। फलतः बीच-बीच में काम छूटता और उत्पादन कम होता। इस नई व्यथा का कारण विशेषज्ञों को बुलाकर तलाश कराया गया तो प्रतीत हुआ कि कमरे काले रंग के पुते हुए थे। वह रंग हटाकर हरा रंग पुताया गया तो उस व्यथा से सहज छुटकारा मिल गया। एक दूसरे कारखाने के मजूर जिन लोहे के बक्सों को ढोते थे उनके अधिक वजनी होने की शिकायत करते थे। जब उनका रंग बदलकर हरा करा दिया गया तो सभी की शिकायत दूर हो गई और अपेक्षाकृत हलके लगने लगे।
लन्दन की टेम्स नदी के पुल पर से कूदकर आत्महत्या करने वालों की संख्या जिन दिनों असाधारण रूप से बढ़ गई थी उन दिनों इसका कारण तलाशने वालों में से कुछ विशेषज्ञों ने यह सलाह दी कि पुल पर लगाये गये काले रंग को हटाकर उसे बदल दिया जाय। वैसा करने पर आत्म-हत्याओं की संख्या आश्चर्यजनक रूप से घट गई।
अनेक अस्पतालों में कमरों के- पर्दों के- रंगों में हेर-फेर करके उनका प्रभाव देखा गया तो परिणाम सामने आया कि लाल रंग गर्मी उत्तेजना बढ़ाता है और नीला तथा हरा ठण्डक पहुँचाता है।
शरीर की धातुओं और कार्य पद्धतियों पर रंगों का प्रभाव होता है और इस आधार पर नये रंग चिकित्सा विज्ञान का नया ढाँचा खड़ा हो रहा है। सदी-गर्मी की मात्रा घटाने-बढ़ाने में भी रंग सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी कम नहीं है। हर रंग में कुछ विशेष भावनाएँ उत्तेजित एवं शान्त करने का गुण है। जो लोग जिस प्रवृत्ति की विशेषता अपने भीतर बनाये होते हैं वे तद्नुरूप रंग पसन्द करते और चुनते हैं। इसी प्रकार जिन्हें जिस भावना से प्रेरित प्रभावित करना होता है उनके लिए उस रंग के आवरण आच्छादित जुटाने का प्रबन्ध आवश्यक होता है। फूलों के बगीचे में परिभ्रमण करने, उन्हें घर आँगन में लगाने, मेज पर गुलदस्ता सजाने में रंगों से मस्तिष्क का प्रभावित करने की आवश्यकता पूर्ण होती है। शोभा, सुरुचि और कला सौंदर्य का इसमें समावेश तो है ही।
नीले रंग के साथ, स्नेह, सौजन्य, शान्ति, पवित्रता जैसी प्रवृत्तियाँ जुड़ती हैं। लाल रंग उग्रता, उत्तेजना, संघर्ष का प्रतीक है। सफेद में सादगी, सात्विकता, सरलता की क्षमता है। चाकलेटी रंग में एकता, ईमानदारी, सज्जनता के गुण हैं। पीले रंग में संयम, आदर्श पुण्य, परोपकार का बाहुल्य है। हरे रंग में ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति एवं शीतलता का प्रभाव है। चाकलेटी रंग कल्पनाशीलता उभारता है। सिलहटी में दूरदर्शी बुद्धिमत्ता की विशेषता है। काला रंग तमोगुणी है उसमें निराशा, शोक एवं दुःख एवं बोझिल मनोवृत्ति का परिचायक है। नारंगी रंग जीवन में आत्म विश्वास साहस की जानकारी देता है। गुलाबी रंग में आशाएं, उमंगे और सृजन की मनोभूमि बनाने की विशेषता है।
रंग विशेषज्ञ-एन्थोनी एल्डर के अनुसार बहिर्मुखी जीवन लालिमा प्रधान होता है। अन्तर्मुखी जीवन में नीलाकाश जैसी उदात्त मनःस्थिति होती है। पीले रंग की कर्मठता, तत्परता और उत्तरदायित्व निर्वाह की भाव चेतना का प्रतीक माना जा सकता है। हरे रंग का स्थिरता और बुद्धिमत्ता का प्रतिनिधि समझा गया है। एल्डर कहते हैं कि स्वभावगत विशेषताओं को घटाने बढ़ाने के लिए उन रंगों का उपयोग या बहिष्कार करना चाहिए जिनमें अभीष्ट विशेषताओं का समावेश है।
रत्नों की अंगूठी, नाक, कान, गले में पहनने में जहाँ मनुष्य की सम्पन्नता का बोध होता है वहाँ उस रंग के कारण पहनने वाले को लाभ भी होते हैं। साथ ही विपरीत गुण रहने पर हानि भी हो सकती है। रत्नों के इन गुण, दोषों में उनके प्राकृतिक रंग को भी आधारभूत कारण माना गया है।
इंग्लैण्ड के द्वितीय महायुद्ध के समय रहे प्रख्यात प्रधानमन्त्री लार्ड विस्टन चर्चिल ने सेवा निवृत्त होने पर खाली समय के अनुभवों का विस्तारपूर्वक उल्लेख अपनी आत्मकथा से किया है। वे लिखते है-जीवन भर अत्यधिक व्यस्त रहने महत्वपूर्ण सोचते और करते रहने के कारण मनोभूमि ऐसी बन गई है जिससे निरर्थक दिन गुजारना मेरे लिए कष्टकारक बन गया। पर किया क्या जाय न शरीर काम देता था और न मस्तिष्क ही उपयुक्त कल्पनाएँ कर सकने में समर्थ था। इस भारभूत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए एक मित्र ने चित्रकला में रुचि लेने और उसमें उलझे रहने की सलाह दी। इस दिशा में सर्वथा अपरिचित होने के कारण लगा तो अटपटा पर मैंने उसका भी प्रयोग किया। चित्र बनाने के लिए आवश्यक साधन सामग्री मँगाई और मार्गदर्शिका पुस्तकों के सहारे अपने आप ही कुछ औंधा-सीधा करने लगा।
इस प्रयोग से मुझे बहुत राहत मिली। निरर्थक पड़ी हुई सृजन क्षमता फिर जगी और बगीचे में रंग-बिरंगे फूल उगाने में रस लेने लगा। रंगों को साथी बनाने पर ऐसा लगा मानों किसी अविज्ञात लोक के साथियों से रिश्ता जुड़ गया। जिन्दगी भारभूत नहीं रही और रंग रंगीली हो गई।
सन् 1938 में आड्रियन हिल नामक चित्रकार ने एक पुस्तक छपाई जिसका नाम था ‘कला बनाम रोग’। उसने इस पुस्तक में संगीत और चित्रकला को स्वास्थ्य संवर्धन और रोग निवारण के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बताया है।
उसमें अपने अस्पताल की चारपाई पर व्यतीत हुई लम्बी अवधि का वर्णन किया है। जिसमें लिखा है कि इन दिनों पीड़ा, असमर्थता, निराशा और ऊब के अतिरिक्त और कोई साथी दीखता न था। डाक्टर और नर्स अपना-अपना काम करके चले जाने पर निरन्तर साथ रहने कोई तैयार न था। निदान मैंने समीपवर्ती मेज पर रखे हुए एक गुलदस्ते से मित्रता जोड़ी और उसमें लगे हुए रंग बिरंगे तथा विभिन्न आकार-प्रकार के फूलों को रुचिपूर्वक देखना आरम्भ किया। कितने कोमल और कितने उमंग भरे थे वे सब। बच्चों जैसी मुसकान बखेरते देख उन सबको तो मेरा मन बहुत हलका हो गया और उन्हीं की बिरादरी में सम्मिलित हो गया। इस नये सहचरत्व में नया जीवन मिला और मन की मुरझाई दूब फिर से हरी भरी हो गई। मेरे स्वास्थ्य सुधार में इस नई बिरादरी ने डॉक्टरों और औषधियों से किसी भी प्रकार कम सहायता नहीं की।
अस्पताल से छुट्टी पाने के उपरान्त उसने अपने पुराने प्रकृति पर्यवेक्षण वाले रुझान को कला में सम्मिलित करने और आजीविका आधार बनाने का निश्चय किया। फलतः सतत् अभ्यास से न केवल प्रकृति चितेरा बना वरन् अन्य स्तर की कला कृतियाँ बनाने में भी समर्थ हो गया।
उसने अपनी चित्र चिकित्सा चलाई। जिसका आधार रंगों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करके रोगियों की मनोदिशा में परिवर्तन करना था। यह समझने समझाने में देर नहीं लगी कि मानसिक परिवर्तन का किस प्रकार स्वास्थ्य सुधार के साथ सघन संबंध है। रोगी भर्ती हुए और अच्छे होते गये। उसने अन्य अस्पतालों को भी अपनी सेवाएँ दी और विशेषतया विकृत मनःस्थिति वाले रोगियों को रंग उपचार से प्रभावित करने का सिलसिला शुरू किया। इस प्रयास में आशाजनक सफलता मिली।
पीछे यह पद्धति जन साधारण की चर्चा एवं रुचि का विषय बनी। सन् 1942 में उसके ‘आर्ट थैरेपी’ पर कई विचारोत्तेजक भाषण भी प्रसारित हुए जिन्हें जनता ने बड़े चाव पूर्वक सुना, नोट किया और लाभ उठाया।
ठीक ऐसा ही प्रसंग एक यहूदी चित्रकार का भी है। उसका नाम था हिमन सिनाल। वह सर्वप्रथम बाल मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे चित्र बनाता था और उनमें पेड़-पौधों फूलों तथा पशु पक्षियों की आकृतियाँ बनाकर रंगों से सुसज्जित करता था। जब उसकी कृतियाँ बालकों में लोकप्रिय हुई तो उसमें बड़ों के लिए भी इस कला का लाभ देने का निश्चय किया। उससे सैंकड़ों चित्र बनाये। वे कला प्रधान नहीं थे वरन् विभिन्न मनुष्यों की मानसिक स्थिति का समाधान संवर्धन करने के लिए उन्हें बनाया गया। लेखा-जोखा लेने पर अपने समय का यह अभिनव प्रयोग बहुत सफल भी रहा और सराहा भी गया।
पुरातन चीन की युवतियाँ अपने पतियों और प्रेमियों को आकर्षित वशवर्ती किये रहने के लिए अपने वस्त्रों का आवश्यकतानुसार उपयोग करती रही हैं। उनकी मान्यता थी कि-सफेद रंग के प्रभाव से पुरुष कोमल बन जाते हैं। पीले रंग से उन पर बसन्ती बहार आती है। नीला रंग वशवर्ती बनाता है। हरे रंग से वे खिंचते चले आते हैं। गुलाबी रंग से वे व्याकुल हो उठते हैं। नीले रंग से उबल पड़ते हैं और लाल रंग के प्रभाव से झल्लाने लगते हैं। काला रंग बीच में दीवार खड़ी करता है।
ग्रीक रोमन, ईजिप्ट में देवताओं के गुण और रंग निर्धारित हैं। उन देवताओं की पूजा के लिए भी उसी रंग की वस्तुएँ प्रयुक्त होती हैं। भारत वर्ष में चार वर्षों की संगति चार रंगों से बिठाई गई है ब्राह्मण का पीला, क्षत्रिय का लाल, वैश्य का नीला और क्षुद्र का काला बताया गया है। चेकोस्लाविया में बच्चों को वातिस्मा के समय गिरजे में लाल तौलिये से ढ़ककर ले जाया जाता है। आयरलैण्ड में केसरिया रंग बड़प्पन का प्रतीक माना जाता है।
एक रेस्टोरेन्ट के ग्राहक घट गये और जो खाते थे उसकी मात्रा कम हो गई इस होटल के मालिक ने उसका रंग बदलवाकर नारंगी करा दिया फलतः दोनों ही शिकायतें दूर हो गई। एक महिला अपनी क्रिया शक्ति घटा बैठी थी उदास और शिथिल रहती थी उसे नये सिरे से पीले कपड़े पहनाये गये और वह ठीक हो गई। एक गठिया की मरीज महिला नारंगी रंग के कपड़े पहनने पर ठीक हुई। साबुनों में पड़े रंगों के प्रभाव का अध्ययन करने पर पता चला कि वे स्नान करने वाले पर ने केवल अपने रसायनों का वरन् रंगों का प्रभाव भी छोड़ रहे थे।
पान अमेरिकन एयरवेज के सामने एक संकट आया वे यात्रियों की आकाशीय बीमारी-मितली की शिकायत बढ़ गई। कारणों की खोज करते हुए उसके भीतरी भाग की पुताई बदली गई। चाकलेटी के स्थान पर हरा रंग कराया गया साथ ही उभरी हुई शिकायत भी दूर हो गई।
विश्व विख्यात मनोरोग चिकित्सक डॉ. गोल्ड स्फेन ने विभिन्न रोगों से या कठिनाइयों से ग्रसित लोगों पर किये गये रंग प्रयोगों का विवरण प्रकाशित करते हुए यह प्रदर्शित किया है कि मात्र आकर्षण के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले रंगों का अतिरिक्त प्रभाव क्या होता है या क्या हो सकता है।
उनने अपने अनुभव से पाई अनेक घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया है। जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-एक अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर को भीतर से हरा पोतने पर देखा गया कि रोगी अपेक्षाकृत जल्दी बेहोश हो जाते हैं और देर तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इस कारखाने के मजदूर आपस में लड़ने झगड़ने अधिक लगे। काम में भी शिथिलता आई। इस पर कारखाने की मशीनों पर जो काला रंग पुता था वह हटाकर हरा रंग कराया गया और अगले ही सप्ताह लड़-झगड़ बन्द हो गई। रंग वस्तुतः जीवन की हर गतिविधि को प्रभावित करते हैं। इनके विषय में जितनी भी जानकारी उपलब्ध है, कम है पर बड़ी रोचक है।
वर्कले कैलीफोर्निया के डायरेक्टर कैनेथ पैलिटियर ने कहा है कि अगले दिनों मात्र काय चिकित्सा पद्धति पर रोग उपचार को अवलम्बित न रखा जा सकेगा। उसके साथ मानसिक परिशोधन और परिशोधन के प्रयोग भी जोड़ने होंगे। मनुष्य मात्र शरीर नहीं है। उसमें मन की सत्ता का भी बाहुल्य है। मन ही है जो शरीर को उठाने गिराने की भी भूमिका निभाता है। इसलिए शरीर की मात्र रासायनिक संरचना मानकर औषधियों पर ही पूरी तरह निर्भर रहना उचित न होगा। हर रोगी की मानसिक स्थिति में भी सामयिक परिवर्तन करने की बात सोची जानी चाहिए।”
इसी तरह की उक्ति अलबर्ट श्वीटसर की भी थी। वे रोगियों का औषधि उपचार तो करते थे पर साथ ही उन्हें प्रार्थना, परिशोधन एवं प्रसन्न रहने की भी शिक्षा देते थे। वे अक्सर कहा कहते थे कि मनुष्य के भीतर भी एक डाक्टर है यदि उसका साथ लेकर चिकित्सक अपना उपचार क्रम चलाये तो निश्चय ही अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी रोगों से निवृत्ति मिलेगी।
इन दिनों चिकित्सा क्षेत्र में एक से एक बढ़कर प्रयोग हो रहे हैं और नित नये निष्कर्ष हस्तगत हो रहे हैं। किन्तु उसमें विचार विद्या का समावेश, रहने से जैसी चाहिए वैसी सफलता मिल नहीं रही है।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की एक शोध मण्डली ने अपने अनुसंधानों से चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी। उनने एक जैसी स्थिति के रोगियों के दो वर्ग किये। एक को औषधि विशारदों द्वारा किये जाने वाले बहुमूल्य उपचारों के अंतर्गत रखा गया और दूसरे वर्ग को मात्र गुण रहित औषधियों के सहारे रखकर बहलाया जाता रहा। किन्तु देखा गया कि दोनों की प्रगति में कोई खास अन्तर नहीं था। गुण रहित औषधियों से तात्पर्य है नमक का पानी या शकर की गोलियाँ अथवा सामान्य खाद्य पदार्थों का औषधि जैसा रूपांतरण।
गुण रहित औषधियाँ भी मारक उत्तेजक औषधियों जैसा गुण क्यों दिखाती हैं। इस संबंध में जाँच-पड़ताल से पता चला कि मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाला एक विशेष तत्व ‘ऐंडोर्फीन’ न केवल पीड़ा हलकी करता है वरन् रोगों से मुक्ति दिलाने के भी काम आता है। उसे अधिक मात्रा में उत्पन्न करने में मनुष्य का मानसिक विश्वास या उत्साह अधिक काम करता है। यदि रहित औषधियाँ भी रोगी की मनःस्थिति को जल्दी अच्छी होने का विश्वास दिला सकें तो यह तत्व अधिक मात्रा में उत्पन्न होगा और रोगी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप स्वयमेव अच्छा होने लगेगा।
‘कमेटी फार दि इनवेस्टिगेशन ऑफ क्लेम्स ऑफ पैरानार्मल’ के प्रतिनिधि डा. लेवाक मार्टिन गार्डडर ने अनेक प्रयोग परीक्षणों से यह सिद्ध किया है कि प्रसन्न चित्त, उत्साही तथा आत्म विश्वासी प्रायः बीमार ही कम पड़ते हैं और यदि पड़ते हैं तो उनकी बीमार न तो लम्बी चलती है और न अधिक कष्ट ही देती है। शोधकर्ता वैज्ञानिकों से लेकर गम्भीर उत्तरदायित्व वहन करने वाले सेनापतियों तक में अधिक सफल वे लोग हुए हैं जो अधिक प्रसन्नचित्त रहते थे और चिन्ता उद्विग्नता के दबाव से बचे रहते थे।
अमेरिकन साइको सोमेटिक सोसायटी के अध्यक्ष राबर्ट ऐडर का कथन है कि अधिक महत्वपूर्ण और अधिक परिमाण में काम करने वाली व्यस्तताग्रस्त नहीं रही हैं। उनने हलका-फुलका स्वभाव बनाया है और हँसना-हँसाना सीखा है। इस प्रकार दबाव रहित मनोभूमि के द्वारा ही अधिक सूझ-बूझ का परिचय दे सकना सम्भव होता है वे जहाँ अधिक सफल होते हैं वे शारीरिक दृष्टि से भी निरोग रहते हैं।
वाल्टर रीड आर्मी मेडिकल सेन्टर ने सैनिकों की रुग्णता और चिकित्सा के संदर्भ में जो निष्कर्ष निकाले हैं उनसे पता चला है कि जिन्हें भय, आशंका और खिन्नता घेरे थी उनकी सामान्य-सी चोटें भी देर में अच्छी हुई। इसी प्रकार जिन्हें घर की याद सताती रही उनकी जीवन शक्ति कमजोर हुई और जुकाम, गला बैठना, अनिद्रा, अपच जैसी शिकायत बनी ही रही इसके विपरीत अलमस्त स्वभाव के सिपाही अधिक गहरी चोट या रुग्णता से ग्रसित होने पर भी अपेक्षाकृत जल्दी अच्छे हो गये।
माडण्द सिताई स्कूल ऑफ मेडिसिन-न्यूयार्क के अध्यक्ष मार्टिन स्टाइन ने कहा है कि विषाणु तो हवा में ही हर जगह इतनी अधिक संख्या में मंडराते रहते हैं कि उनके बच सकना उनके लिए भी सम्भव नहीं जो सफाई या रोकथाम का बहुत ध्यान रखते हैं। वे तो साँस के द्वारा भी शरीर में घुस सकते हैं। प्रश्न यह है कि उनके कारण जिन्हें कितनी क्षति पहुँचती है? किस पर वह आक्रमण कितना हल्का या भारी होता है? उसके उत्तर में आमतौर से रक्त कणों में पाई जाने वाली जीवनी शक्ति का कारण जाना जाता है। किन्तु नये निष्कर्ष यह बताते हैं कि मानसिक स्थिति के कारण घटने-बढ़ने वाली विद्युत शक्ति ही वस्तुतः रोग निरोध का काम करती है। उसका सहयोग पाये बिना रक्त कण भी निर्बल रहते हैं और अपने काम का अंजाम ठीक तरह नहीं दे पाते। इसके विपरीत मनस्वी लोग शरीर के अथवा रक्त भाग के दुर्बल होते हुए भी रोगों के आक्रमण से बचे रहते हैं। आक्रान्त होने पर देर तक उनके चँगुल में फँसे नहीं रहते।
प्रसिद्ध पत्रिका ‘सटरडे रिव्यू’ के सम्पादक नार्मन कर्जिस ने अपनी भयंकर बीकारी के दिनों का संस्मरण लिखा है और बताया है कि सत्रह वर्ष लगातार बीमार पड़े रहने के कारण वे निढाल हो गये थे और निराश रहने लगे थे। भविष्य अँधेरे से भरा और मृत्यु के निकट दीखता था। इन दिनों उनके एक हितैषी ने हँसने-हँसाने का उपाय आजमाने की सलाह दी। वे बिस्तर पर पड़े-पड़े ही हास्य विनोद की पुस्तक पढ़ते फलतः बार-बार हँसने मुस्कराने का अवसर मिलता। यही था वह उपचार जिसने उनकी अनिद्रा दूर की। रुग्णता घटाई और सुधारते-उभारते उन्हें इस योग्य बनाया जिसमें फिर से समर्थ लोगों की तरह काम कर सकें।
राक फेलर युनिवर्सिटी न्यूयार्क को शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विभाग के अध्यक्ष नील मिलर ने लिखा है। अब वह समय चला गया जब सभी रोगों की प्रकृति विपर्यय या विषाणु आक्रमण के कारण उत्पन्न हुए माना जाता था और उनकी चिकित्सा के लिए मात्र औषधियों का ही सहारा लिया जाता था। अब हम बहुत आगे आ गये हैं और ऐसे अगणित तथ्य दीखते हैं जो मन की स्थिति को स्वस्थता के साथ जोड़ते हैं। अनुसंधान बताते हैं कि मानसिक दृष्टि से उद्विग्न व्यक्ति शारीरिक व्यथाओं के चंगुल में फँसा ही रहेगा। स्थिर स्वास्थ्य के लिए प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर मानसिक सन्तुलन और उत्साह को नितान्त आवश्यक पाया जाता है।
हार्बर्ट मेडिकल स्कूल के डा. बेन्सन का कथन है कि मानसिक विश्रान्ति पर चिर यौवन और दीर्घजीवन अवलम्बित है। जो लोग उद्विग्न रहते हैं वे पौष्टिक आहार या अन्यान्य सुविधा साधन प्राप्त करने पर भी निरोग रह नहीं पाते। ऐसी विश्रान्ति मानसिक संयम का अभ्यास करने पर सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सकती है। इस संदर्भ में डेविड ब्रेस्लर ने अनेकों हृदय रोगियों पर परीक्षा करके पाया कि उनकी निराशा दूर करने से इतना अधिक लाभ हुआ जितना कि बहुमूल्य उपचार से भी उन्हें उपलब्ध नहीं हो रहा था।
सान फ्राँसिस्को के हृदय रोग अनुसंधान में निरत डा. मेयर फ्रीडमेन ने कहा है-लम्बे पर्यवेक्षण के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि हृदय रोगियों को आत्मविश्वास उत्पन्न करने तथा निराशा आशंका से पीछा छुड़ाने की शिक्षा दी जानी चाहिए। उनकी व्यथा दूर करने में मात्र औषधियों पर अवलम्बित रहने से काम न चलेगा।
लार ऐजोलस के डा. फील्डिंग का कहना है कि सुधारी हुई नवीनतम चिकित्सा पद्धति में शारीरिक रुग्णता मिलाने के लिए औषधियों के प्रयोग में एक पक्ष और जुड़ना चाहिए कि रोगी का आत्मविश्वास कैसे जगाया जाय और उसमें आशा भरा उत्साह किस प्रकार बँटाया जाय।
यौवन अक्षुण्ण रखा जा सकता है। यौवन का अर्थ चेहरे की चमक बनाये रहना या त्वचा पर झुर्री न पड़ने देना ही है वरन् स्फूर्ति एवं कार्य क्षमता को अक्षुण्ण बनाये रहना है। इसके दो आधार है-एक मनोबल एवं उत्साह, दूसरा लगन एवं पराक्रम। यह दोनों ही गुण प्रधानतया मानसिक है। मनोबल बढ़ा रहे तो यह व्यवस्था हर आयु में बनी रह सकती है। शर्त एक है कि रुग्णता का आक्रमण शरीर पर न हो और मस्तिष्क पर मनोविकारों की आक्रामकता न चढ़ दौड़े।
यह दोनों ही उपाय अपना सकना मनुष्य के अपने हाथ में हैं। आत्म विश्वास और साहस बनाये रहने के लिए ऐसी दिनचर्या से भी कार्यपद्धति अपनानी चाहिए जिसमें सरलतापूर्वक सफलता मिलती रहे और मनोबल क्रमिक गति से निरन्तर बढ़ता रहे। यही बात आरोग्य के संबंध में है इसके लिए कोई विशेष उपचार तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। आहार-विहार को प्रकृति के अनुरूप बनाये रहा जाय। जीवनक्रम में शालीनता का अनुशासन रखे रहा जाय तो न दुर्बलता से पाला पड़ेगा और न रोगों का शिकार होना पड़ेगा। वृद्धावस्था में शक्तियाँ घटती हैं तो तद्नुसार शारीरिक मानसिक श्रम का भार और स्तर हलका रखा जा सकता है। इतनी-सी सावधानी बरतने पर मनोबल और शरीर बल दोनों ही अपने-अपने स्थापन पर सही बने रह सकते हैं।
कष्टकारक बुढ़ापा जीवनक्रम को अस्त-व्यस्त; अव्यवस्थित रखने की अवाँछनीय परिणति है। यदि शरीर और मन को सरल सौम्य ढंग से रहने दिया जाय और उन्हें अनौचित्य के रस्सों से बाँधकर खाई खंदकों में घसीटने पटकने की अव्यवस्था न फैलाई जाय तो बिना किसी अतिरिक्त उपाय के आरोग्य एक उत्साह का अक्षुण्ण बनाये रखा जा सकता है। यही है यौवन जो मरण पर्यन्त सदा साथ देता और सहायता करता रह सकता है।
इन दिनों शान्ति-कुँज में एक-एक महीने के कल्प साधना सत्र चल रहे हैं। उनमें आत्मोत्कर्ष की, परिष्कार परिशोधन की प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये साधना एवं प्रेरणा की उभयपक्षीय व्यवस्था का समावेश है। शारीरिक और मानसिक परीक्षण ब्रह्मवर्चस् प्रयोगशाला निष्णात् शरीर शास्त्रियों द्वारा कराने के उपरान्त निर्णय होता है कि कौन क्या साधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार सम्पन्न करे। सभी को एक जैसी साधना नहीं कराई जाती।
इसके अतिरिक्त अब इन्हीं सत्रों में युग शिल्पी शिक्षण भी सम्मिलित कर दिया गया है। भाषण, सम्भाषण, सुगम संगीत, स्वास्थ्य संवर्द्धन एवं धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण के लिए आवश्यक योग्यता संवर्द्धन के आवश्यक तथ्यों एवं पाठ्यक्रमों का समावेश किया गया है।
प्रातः से मध्याह्न तक कल्प साधना सत्र चलते हैं और मध्याह्न से सायंकाल तक युग शिल्पी सत्र। अब दोनों का एक साथ समावेश हैं साथ-साथ चलने के कारण दोनों का पाठ्यक्रम एक मास में ही पूरा हो जाता है। शिक्षकों और शिक्षार्थियों पर दबाव तो निश्चित रूप से अधिक पड़ता हैं, किन्तु दुहरा लाभ भी प्रत्यक्ष है। हर महीने तारीख एक से उनतीस तक यह सत्र चलते हैं। जिन्हें सम्मिलित होना हो आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लें।
शास्त्रों में काम को भी धर्म, अर्थ और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों के समान वन्दनीय माना गया है। सामान्यतया काम का अर्थ यौन लिप्सा से लिया जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार काम को सन्तति उत्पादन का आधार माना गया है। यह काम की एकाँगी व्याख्या है। भौतिकवादी प्रतिपादनों में फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिकों ने तो काम को मानवी चेतना की मूल प्रवृत्ति ही ठहरा दिया है। कितने ही मनोवैज्ञानिकों ने तो कामुकता की पूर्ति पर बहुत जोर दिया है। इसे प्रकृति की प्रेरणा मानते हुए बच्चे के स्तनपान तक में काम-क्रीड़ा का दर्शन किया है। इस प्रकार की भ्रान्तियों का मूल कारण काम के श्रेष्ठ स्वरूप को न समझ पाने के कारण ही है। कामुकता के धरातल पर ला पटकने के कारण ही उसका वह स्वरूप लुप्त हो गया जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है।
काम वस्तुतः प्रत्येक वाणी के अन्तराल में कार्य करने वाला एक उल्लास है। जो आगे बढ़ने, ऊँचे उठने के लिए सदा प्रेरित करता है। साहसिक प्रयासों, प्रचण्ड पुरुषार्थों के रूप में वही उभरता दिखायी पड़ता है। सरसता एवं सौंदर्य का यही कारण है। इसे आकर्षण शक्ति भी कहते हैं। जड़ पदार्थों में ऋण और धन विद्युत के रूप में कामशक्ति ही हलचल करती दृष्टिगोचर होती हैं। सृष्टि की समस्त गतिविधियों का उद्गम स्त्रोत यही है।
इसी के कारण प्राणी, उछलते, फुदकते तथा उमंग, उत्साह में भरे रहते हैं। इसी का एक छोटा रूप यौनाचार भी है। यौनाचार के आकर्षण में प्रकृति प्रेरणा का एक मात्र लक्ष्य है-सृष्टि का प्रजनन क्रम चलता रहे। किन्तु उसे यौन तृप्ति का आधार मान लेना एक भारी भूल है। अन्य सृष्टि के प्राणी तो प्रकृति की मर्यादाओं में रहकर सन्तानोत्पादन तक ही में मर्यादित कामशक्ति का उपयोग करते हैं। इसमें मनुष्य ही अधिक स्वेच्छाचारी हुआ है।
वस्तुतः काम-चेतना की प्रगति एवं जड़ प्रकृति के सौंदर्य का मूल आधार है। प्राणियों की प्रगति और पदार्थों की हलचल इसी काम प्रेरणा एवं अवलम्बित है। बच्चों की फुदकन, किशोरों को स्फूर्ति एवं प्रौढ़ों की महत्वाकाँक्षाओं में यह शक्ति ही प्रेरित करती है। जिस अन्तःशक्ति से संसार में रस लेने, तथा प्रगति के क्रम में आगे बढ़ चलने की उमंग प्राप्त होती है उसे ही शास्त्रों में ‘काम’ कहा गया है। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं उनमें वे अन्तः उमंग से प्रेरित अदम्य अभिलाषा एवं उसकी पूर्ति के लिए साहसिक पुरुषार्थ ही प्रधान कारण रहा है।
भाव सम्वेदनाओं का उत्कृष्ट स्वरूप प्रेम है। उसे ईश्वर के साथ जोड़ देने पर ‘भक्ति’ बन जाता है। स्नेह, सहयोग, करुणा, सेवा, सहृदयता इसकी ही उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ हैं। श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले त्याग, बलिदान में कार्य कर रही भाव-सम्वेदनाएँ काम की ही परिणति हैं। काम की महत्ता एवं प्रगति के लिए इसकी उपयोगिता का प्रतिपादन शास्त्रों में इसी कारण किया गया है।
काम में अद्भुत सृजन की शक्ति छिपी पड़ी है। यह विषय सुख की लालसा नहीं, मौलिक सृजन का आधार है। विभिन्न रूपों में प्रकट होने वाली शक्ति भिन्न दिखायी पड़ने हुए भी एक ही है। कलाकार की सुन्दर अभिव्यक्ति, कवि की काव्यान्जना, साहित्यकार की कल्पना में इसी उमंग का योगदान रहता है।
साधना में भाव सम्वेदना के रूप में प्रकट होकर साधर-साध्य के मध्य दिव्य आदान-प्रदान करने में काम की प्रमुख भूमिका होती है। गंगा हिमालय से चलती है। उसका प्रचण्ड वेग विविध नदी नहरों से होकर अपने पावन जल से जीव-जन्तु एवं वनस्पतियों को तृप्त करता विशाल समुद्र में मिल जाता है। इस प्रकार की उमंगों को प्रकृतिगत काम-क्रीड़ा कहा जा सकता है। सृजनात्मक दिशा में मोड़ने एवं श्रेष्ठ उद्देश्यों में नियोजित करने से वह उदात्त बनती और अन्ततः समष्टिगत प्राण शक्ति से मिलकर एकाकार हो जाती है।
निकृष्टतम अभिव्यक्ति संसति एवं उच्चतम सृजेता के रूप में होती है। मीरा के भावभरे गीतों, तुलसी के भावनापूर्ण मानस के प्रसंगों, कालीदास के शाकुन्तुलम, सूर के गीतों को पढ़ने पर पाठक एक अनिवर्चनीय आनन्द के रस में डूब जाता है? पाश्चात्य कवियों में ‘ड्यौडे’ की ‘आइकिजनिया’, शैली की एपित्स्किडियन रचनाएँ शाश्वत सौंदर्य की अदृश्य कृतियाँ हैं। जो मनुष्य को अदृश्य सत्ता के दिव्य स्वरूप का परोक्ष दर्शन कराती है।
सामान्यतः इस महाशक्ति का दुरुपयोग मनुष्य विषय भोगों की लिप्सा में करता है। फलस्वरूप इसके दिव्य अनुदानों का लाभ जो श्रेष्ठ विचारों, उदात्त भाव सम्वेदनाओं के रूप में मिलता है, उसे नहीं उठा पाता। सृजनात्मक यह आधार क्षणिक इन्द्रिय सुखों के आवेश में नष्ट होकर मनुष्य की प्रगति को रोक देता। यही कारण है कि शास्त्रों में ब्रह्मचर्य पर अधिक जोर दिया गया तथा समस्त सफलताओं का मूल आधार माना गया है। इसका आरम्भ तो इन्द्रिय संयम से ही होता है। किन्तु अन्त ब्रह्म में एकाकार होकर होता है। इस दृष्टि से इन्द्रिय के स्थूल संयम का भी कम महत्व नहीं हैं। यह दमन का नहीं परिष्कार एवं उर्ध्वीकरण का मार्ग हैं। ब्रह्मचर्य का सुन्दरतम स्वरूप आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा के रूप में दिखायी पड़ता है। इस तथ्य से अवगत हो जान पर यौन आकर्षणों से विरक्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य का बल कुछ क्षणों के लिए प्रकृति के नियमों में भी हेर-फेर कर सकने में समर्थ होता है। सीता और सावित्री भारतीय नारियों के आदर्श हैं। उनकी उनके नाम लेने मात्र मन में पवित्र भावों का संचार होने लगता है।
ब्रह्मचर्य द्वारा मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। इस प्रतिपादन में तथ्य यह है कि उसे बहुत समय के लिए टाला जा सकता है। निस्सन्देह ब्रह्मचर्य सृजन शक्ति का उत्पादक है। यह प्रवाह का अवरोध नहीं वरन् उमंगों का उन्नयन है। जर्मन के महाकवि ‘नेवातिस’ को अपनी प्रेमिका सोफी से असीम प्रेम था। वह पन्द्रह वर्ष की आयु में दिवंगत हो गई। ‘नेवातिस’ ने अपने हृदय में आदर्शों की प्रतिमूर्ति एक ऐसी आध्यात्मिक चैतन्य प्रियतमा की स्थापना की जिसने उसके जीवन की दिशा-धारा ही मोड़ दी। आदर्शों के प्रतिमूर्ति यह प्रियतमा उसे आजीवन प्रेरणा देती रही। हृदय में आदर्शों के-रूप में विद्यमान सोफी ने कवि को आत्मपरायण बनाकर ईश्वर के निकट पहुँचा दिया। काम के उन्नय का यह उदाहरण उल्लेखनीय है। अपने विषय में वह लिखता है-“एक बार में अपनी प्रेमिका के शोक में आँसू बहा रहा था। उसकी कब्र पर खड़ा असीम वेदना की अनुभूति कर रहा था। अपने को निर्बल और असहाय अनुभव कर रहा था। अचानक दूर क्षितिज से दिव्य प्रेरणाओं के रूप में एक ज्योति हमारे अन्तःकरण में प्रविष्ट हुई। अन्धकार की तमिस्रा दूर हुई। जन्म का बन्धन, स्थूल आकर्षण टूटकर बिखर गया। निराशा दिव्य प्रेरणा के रूप में बदल गयी। मेरी प्रियतमा ईश्वरीय स्फुरणा के रूप में अवतरित हुई। उसके नेत्रों में अनन्तता के भाव थे। वह अनन्तता मेरी अन्तरात्मा में स्थापित हो गई। आदर्शों के रूप में विद्यमान मेरी आध्यात्मिक प्रियतमा मेरे प्रेरणा की केन्द्र बिन्दु है।”
काम के स्थूल आकर्षण का आध्यात्मिक प्रेम का परिवर्तित होना ही उर्ध्वगमन है। ब्रह्मचर्य का पालन विशेष प्रतिभा, चिन्तन में प्रखरता, वाणी की ओजस्विता, हृदय की विशालता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। काम की सुंदरतम अभिव्यक्ति यही है। उसकी चरम परिणति ईश्वरीय प्रेम के रूप में होती है। ईश्वरीय सान्निध्य के दिव्य रसास्वादन का यही आधार बनता है।
काम के इस वन्दनीय स्वरूप के दिग्दर्शन के लिए उसे यौन लिप्सा के निम्नतर एवं एकाँगी धरातल से उठाकर दिव्य-भाव सम्वेदनाओं के स्तर पर पहुँचाना होगा। सृष्टि के सभी जड़-चेतन में समाहित काम के दिव्य स्वरूप का दर्शन कर सकना तथा उसके अनुदानों से लाभ उठा सकना तभी सम्भव है।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणतत्व ही हमारी स्थिति, गति एवं क्रिया का आधार है। उसी समष्टि व्यापी प्रखर तत्व को ब्रह्माग्नि कहा जाता है। व्यष्टि में समाहित उसी प्राण सत्ता को आत्माग्नि कहा जाता है। व्यष्टि से समष्टि तक, पिण्ड से ब्रह्माण्ड तक यही एक तत्व लघु और विभु-असंख्य रूपों में गतिशीलता को जन्म दे रहा है। उसी की स्फुरणाएँ स्तर-भेद एवं उपभेद से भिन्न भिन्न नाम धारण करती तथा भिन्न भिन्न प्रक्रियाओं और परिणामों को जन्म देती हैं। उसके बिना अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अस्तित्व या स्थिति और गति दोनों का आधार यही प्राणतत्व है।
सृष्टि का अस्तित्व गति में है। स्फुरणा प्रत्येक वस्तु में है। छोटे से छोटे परमाणु से लेकर ग्रह, नक्षत्र, सूर्य सभी पिण्ड पदार्थ गतिशील हैं। प्रकृति में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। स्थिर दिखायी पड़ने वाली वस्तुओं के अन्तराल में भी प्रचण्ड गति हो रही है। एक अणु भी यदि गतिहीन हो जाय तो सारी व्यवस्था लड़खड़ा उठेगी। घटनाएँ अलग-अलग दीखते हुए भी परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध होने के कारण एक सामान्य अणु की स्थिति का कुछ न कुछ प्रभाव सारे ब्रह्माण्ड के ऊपर पड़ता है। अनवरत स्फुरण से ही विश्व का व्यापार हो रहा है। पदार्थ शक्ति द्वारा संचालित है। जिसके कारण अगणित रूप एवं भेद उत्पन्न हो रहे हैं। किन्तु ये रूप एवं भेद भी स्थायी नहीं है। परिवर्तन की शृंखला में आकर वे भी नया रूप ग्रहण कर लेते हैं। कोई भी वस्तु नित्य एवं स्थायी नहीं हैं। किन्तु स्थिति, क्रिया एवं गतिशीलता का मूल तत्व स्थायी है। वही प्राणतत्व है। परिवर्तन भी उसी की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं।
शरीर को ही लें तो पता चलता हैं कि इसमें भी परमाणु अनवरत स्फुरण कर रहे हैं। थोड़े ही दिनों में पूरा शरीर परिवर्तित हो जाता है। इन सभी प्रकार के स्फुरणों में एक ही प्राणतत्व की क्रमबद्ध ताल है। जो सर्वव्यापक एवं सभी छोटे पिण्डों से लेकर ब्रह्माण्ड में कार्य कर रहा है। ग्रहों के सूर्य के चारों और घूमने, समुद्र के उभरने, ज्वार के उठने, भाटा के बैठने, हृदय की धड़कन, पदार्थों के परमाणुओं की फड़कन सबमें इसी के क्रमबद्ध ताल का नियम कार्य कर रहा है। सूर्य किरणों का निस्सारण, जलवृष्टि सभी उसके अंतर्गत आते हैं। मानव शरीर भी प्राणतत्व के ताल-नियम के वशवर्ती उसी प्रकार है, जिस तरह ग्रहों का सूर्य के चारों ओर घूमना।
इस प्राणतत्व कि मात्रा और चेतना जिन पिण्डों में अपेक्षाकृत अधिक और उन्नत स्तर की होती है, उसे प्राणी कहा जाता है। मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ एवं समर्थ इसीलिए है कि उसमें प्राणतत्व का औरों की अपेक्षा बाहुल्य रहता है।
सजीवता, प्रफुल्लता, स्फूर्ति, सक्रियता जैसी शारीरिक विशेषताएँ प्राणतत्व की प्रखर किरणें ही तो हैं। मनस्विता, तेजस्विता, चातुर्य, दक्षता, प्रतिभा जैसी मानसिक विभूतियाँ इसी प्राण समुद्र की प्रचण्ड तरंगों की संज्ञाएँ हैं। कारण शरीर में अभिव्यक्त यही तत्व सहृदयता, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, संयमशीलता, तितीक्षा, श्रद्धा, सद्भावना, समस्वरता जैसी प्राण-सम्वेदनाओं समझने वाला मनुष्य प्रकृति-नटी का प्रिय साथी बन जाता है। वह सृष्टि की सौंदर्य प्रक्रिया और आनन्द-प्रक्रिया को समझकर उसमें अपना भी योग देता है। किन्तु इन नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति उसमें व्यवधान उत्पन्न करता है। सुन्दर सुमधुर संगीत की स्वर लहरी के बीच कोई बेसुरा स्वर जिनने सुना है और कुशल नृत्य मण्डली की झंकृत लय-ताल के बीच कभी किसी आकस्मिक कारण से विक्षेप होते जिनने देखा है, वे ही जान-समझ सकते हैं कि ऐसी बेसुरी आवाज और ऐसा अनुचित विक्षेप कितना अप्रिय लगता है, कितने उद्वेग का कारण बनता है। प्रकृति में संव्याप्त प्राणतत्व के लय-ताल के नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति भी प्रकृति नटी की ऐसे ही के रूप में प्रकट होता है प्राण वह विद्युत है, जो जिस क्षेत्र में, जिस स्तर पर भी प्रयुक्त होती है, उसी में चमत्कार उत्पन्न कर देती है।
इस प्राण-शक्ति की सक्रियता के निश्चय नियम हैं। इसकी प्रत्येक स्फुरणा में लय है, ताल है। वस्तुतः सर्वत्र यह प्राणतत्व नटराज निरन्तर नृत्य-निरत रहता है। इसके नृत्य की हर भंगिता में लास्य है। सौंदर्य है, रस है, भाव है, आनन्द है। प्राणों का नृत्य ही जीवन है। जीवन-शक्ति प्राण-शक्ति का ही दूसरा नाम है।
अध्यात्म शास्त्र में प्राण तत्व की गरिमा का भाव भरा उल्लेख है। प्राण की उपासना का आग्रह किया गया है। इसका तात्पर्य इसी प्राणतत्व की लय-तालबद्धता के नियमों को जानना और उससे लाभ उठाना है। यही प्रखर, पुष्ट प्राण संकल्प बनकर प्रकट होता और सिद्धि का आधार बनता है। प्राण को आकर्षित करने में सफलता उन्हें ही मिल सकती हैं, जो इस लय-ताल की विधि को समझते और अपनाते हैं। योगी इसी विधि को जानकर प्राणाकर्षण द्वारा प्राण संवर्धन में समर्थ होते हैं।
लय-ताल की एकतानता का चमत्कारी प्रभाव देखा जाता है। सेना के पुल पार करते समय उनके कदम के क्रमबद्ध ताल को तोड़ दिया जाता है। ऐसा न किया जाय तो उत्पन्न होने वाली प्रतिध्वनि से पुल के टूटने का खतरा हो सकता है। वेला वाद्य यन्त्र पर एक स्वर को तालयुक्त बारम्बार बजाया जाय तो पुल टूट जायेगा। यह तालबद्धता की शक्ति है।
तालयुक्त श्वास प्रक्रिया द्वारा ही अन्तरिक्ष में संव्याप्त प्राण-तत्व को अधिक मात्रा में खींचा एवं अपने अन्दर भरा जाता है। इस प्रक्रिया में जितनी दक्षता प्राप्त होती जाती है, उतनी ही सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है। प्राणाकर्षण का विकसित रूप वह है, जिसमें श्रद्धा निष्ठा का समावेश होता है और जो प्राणतत्व की चेतना को भी आकर्षित करने तथा धारणा करने में समर्थ होता है। उस स्थिति में वह तत्व ब्रह्म प्रेरणा बनकर भीतर आता है। यह प्राणविद्या की परिपक्व उच्चस्तरीय अवस्था है। प्राणविद्या का प्रारम्भिक अंश वह है, जो गहरे, लय-तालबद्ध श्वास-प्रश्वास के अभ्यास से आरम्भ होता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा उतनी बढ़ी-चढ़ी नहीं रह पाती। मात्र स्वास्थ्यप्रद, स्फूर्तिदायक प्राणशक्ति को भीतर गहराई तक खींचने और धारणा करने का ही भाव रहता है। आरम्भिक अभ्यासियों के लिए इतना ही पर्याप्त है।
हल्के और विश्रृंखलित श्वास-प्रश्वास से फेफड़ों तक के सारे हिस्से लाभान्वित नहीं हो पाते। इसीलिए जो लोग गहरे श्वास-प्रश्वास का पर्याप्त अभ्यास नहीं करते और न ही, सुदीर्घ श्वसन को प्रेरित करने वाला श्रम करते, वे शरीर के पोषण के लिए वाँछित पर्याप्त प्राण-शक्ति तक वायुमण्डल से नहीं खींच पाते और बीमार पड़ जाते हैं। इसलिए सुदीर्घ श्वास लेने योग्य परिश्रम करना, अथवा उसका नियमित अभ्यास करना स्वास्थ्य-लाभ एवं स्वास्थ्य-संरक्षण के लिए अनिवार्य है। यह शरीर-शक्ति की बात हुई।
मनःशक्ति के अभिवर्धन के लिए प्राण-प्रक्रिया को लय-तालयुक्त रखना आवश्यक है। प्रसन्नता, उत्फुल्लता, सरसता और स्फूर्ति की प्राप्ति का यही उपाय है। इसीलिए मनःशक्ति के विकास के आकाँक्षी व्यक्ति को लय-तालयुक्त श्वास-प्रक्रिया का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। प्राणायाम की विशिष्टता भी उसके लय-तालबद्ध होने में ही है। सोऽहम् साधना प्राण-प्रक्रिया की इसी लय-तालबद्धता का विकसित रूप है। अनायास फूट पड़ने वाली गुनगुनाहट प्राणतत्व की इसी लय-ताल की हठात् अभिव्यक्ति है। साधकों और उत्कर्षशीलों को इस लय-तालबद्ध श्वास-प्रश्वास का सचेत अभ्यास करना चाहिए। श्वास-प्रश्वास की स्वयं की सामान्य गति निश्चित कर ली जाय और प्रयास किया जाय कि अधिकाधिक समय इस गति में एकतानता, समस्वरता बनी रहे। आरम्भ यहीं से किया जाता है। आगे इस अभ्यास को सूक्ष्म, उच्चस्तरीय, श्रद्धासिक्त बनाया जाता है। जिसका सर्वोत्कृष्ट रूप है सोऽहम् की सहज-साधना। उस लक्ष्य की प्राप्ति तो बाद की बात है। किन्तु प्राणतत्व का अधिकाधिक लाभ लेना चाहने वालों को लय-तालयुक्त श्वास-प्रक्रिया का अभ्यास तो आरम्भ कर ही देना चाहिए।
संसार की महत्वपूर्ण शक्तियों में एक है-शब्द। जिसके बारे में सर्वजनीन जानकारी बहुत ही कम है। सामान्यतया इतना ही समझा जाता है कि परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करने में वार्तालाप के माध्यम से शब्द का उपयोग होता है। या फिर प्रकृति की-प्राणियों की-यन्त्र वाहनों की हलचलों से शोर कोलाहल होता रहता है। यह सब सामान्य प्रतीत होता है, पर है निश्चित रूप से असाधारण।
सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ इस संबंध में तत्वज्ञान का प्रतिपादन है कि सर्वप्रथम प्रकृति और पुरुष के मिलन में घड़ियाल पर हथौड़ी की चोट पड़ने पर उत्पन्न होने वाली झनझनाहट सहित ऊँकार जैसा ध्वनि प्रवाह उत्पन्न हुआ। उससे प्रकृति में हलचल उत्पन्न हुईं गतिशीलता ने छोटे-बड़े पिण्ड गोलक बनाये और फिर उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन का चक्र चल पड़ा। इस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ठहरी।
वैज्ञानिक पदार्थ की गहरी खोजबीन करते हुए अब बहुत आगे बढ़ गये हैं। कभी पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु थी। फिर परिवार परिकर का मध्यवर्ती ‘नाभिक’ को वह श्रेय मिला। बाद में शक्ति तरंगें प्रमुख मानी गई और कहा गया कि उन तरंगों का समुच्चय ही परमाणु है। अस्तु तरंगें प्रमुख हैं। तरंगों में शब्द, प्रकाश और ताप को तीन विभागों में विभाजित किया। अन्ततः अब उन तीनों में प्रमुख शब्द होने की मान्यता अग्रणी है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा रहा है कि यह प्रकृति विस्तार फलतः शब्द तत्व की परिणति है।
योगाभ्यास में नाद ब्रह्म, शब्द ब्रह्म, सुरति योग, स्वरयोग, मन्त्रयोग लय होगा, आदि के माध्यम से शब्द साधना को प्रमुखता दी गई है। मन्त्र विज्ञान का समूचा आधार ही ध्वनि शक्ति के विभिन्न उपयोगों, उपचारों, निर्धारणों पर ही ठहरा हुआ है। मंत्रों की संरचना में भाषा विज्ञान और व्याकरण अनुबन्धों का उतना ध्यान नहीं रखा गया है जितना कि अक्षरों के पारस्परिक गुँथन क्रम के आधार पर उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रकार के स्तर एवं प्रभाव का। गायत्री मन्त्र की प्रमुखता न उसके अर्थ पर निर्भर है और न व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से उसकी परख की गई है। उसके उच्चारण क्रम में ही वह विशेषता है जिसके आधार पर अन्तराल के प्रसुप्त चक्रों उपत्यिकाओं में जगाने का उद्देश्य पूरा होता हैं। अदृश्य जगत की हलचलों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे-ऐसे रहस्यमय कारण ही मन्त्र विज्ञान की आधारशिला है।
शब्द शक्ति का उपयोग अब विज्ञान के क्षेत्र में भी बढ़ चढ़ कर होने लगा है। यन्त्र मानव (रोबोट) शब्द को समझता है उसका उत्तर देता है तथा आदेशानुसार हलचल करने लगता है। अन्तरिक्ष को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली रेडियो तरंगों, तथा लेसर किरणों के मूलतत्व को अब शल्य परक माना गया है। उनकी प्रत्यक्ष क्षमता है, शब्द मूलक मानी गई है। भले ही वे अपना प्रभाव ऊर्जा के रूप में प्रकट करती हों।
प्राचीन काल में मन्त्र शक्ति का-शब्द शक्ति का-प्रयोग विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएँ उत्पन्न करने तथा प्रकृति प्रयोजनों के लिए उपयुक्त माध्यम माना गया था। यह उत्पादन में सरल सस्ती होने के कारण प्रभाव क्षेत्र में भी अद्भुत अद्वितीय है। अन्य प्रकार की ऊर्जाएँ उत्पन्न करने के लिए महंगे उपकरण चाहिए साथ ही बहुमूल्य ईंधन भी प्रचुर परिणाम में हो। ईंधन चुक सकता है। उपकरण घिसते-बिगड़ते रहते है। जबकि शब्द मानव शरीर की प्रयोगशाला में ही अभीष्ट स्तर एवं क्षमता के उत्पन्न किये जा सकते हैं। समझा जाना चाहिए कि मनुष्य शरीर ऐसा अद्भुत यन्त्र उपकरण है जिसमें प्रकृति जगत और चेतना जगत को प्रभावित करने-संपर्क साधने और आदान-प्रदान के लिए आवश्यक क्षमता अभीष्ट परिणाम में विद्यमान है। यही कारण है कि योग और तप द्वारा शरीर यन्त्र और मनःतन्त्र का इस प्रकार परिशोधन परिष्कार किया जाता है कि उससे उपयुक्त ध्वनि प्रवाह उत्पन्न किये जा सके और मन्त्र विद्या से प्रतिपादित लाभ उठाये जा सकें।
शब्द विद्या का सामान्य उपयोग भी कम नहीं है उसमें पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। गद्य का उपयोग प्रवचन परामर्श, वार्त्तालाप आदि में होता ही रहता है। पद्य की क्षमता उससे भी बढ़कर है। संगीत में ताल और लय का उपयोग होता है। इन दोनों के समुच्चय को ही स्वर विज्ञान कहते हैं थपकी ताल कहलाती है और अलाप को स्वर कहते हैं। यों दोनों के मिलन से समान संगीत बनता है, पर उनका पृथक-पृथक् उपयोग भी है। यह बात सामान्य गायक वादन के संबंध में प्रत्यक्ष है। संगीत के द्वारा रोग निवारण, भावनात्मक अभ्युदय, उत्साह संवर्धन, प्राणी विकास, वनस्पति उन्नयन, जैसे काम लिये जाने लगे हैं। अब संगीत मात्र मनोविनोद की सीमा तक ही सीमित नहीं है। उसके माध्यम से मनःक्षेत्र में आनन्द उल्लेख उत्पन्न किया और सम्वेदनाओं को भाव-तरंगों के साथ जोड़ते हुए मनुष्य को आनन्द विभोर किया जा सकता है। अन्य प्राणियों पर तथा प्रवृत्ति प्रवाह पर भी यह उपचार अपना असाधारण प्रभाव छोड़ता है।
संगीत शास्त्र में ध्वनि प्रवाह के अनेकानेक प्रभावों का उल्लेख है। बुझे हुए दीपकों को जला देने वाला दीपक राग-बादलों को बरसने के लिए विवश करने वाला मेघ मल्हार-हिरन स्तब्ध कर देने वाली गजगति, साँपों को लहरा देने वाला मोहन राग-मदोन्मद हाथियों को वश में करने वाला राग शंकर-सूखे पेड़ों को हरा करने वाला श्रीराम-किस प्रकार अपना प्रभाव उत्पन्न करता है इसका वर्णन मिलता है। लोक व्यवहार में मधुर वचनों की अनुकूल और कटुवचनों की प्रतिकूल प्रतिक्रिया का प्रत्यक्ष प्रमाण, हर किसी को अपने इर्द-गिर्द ही मिल सकता है। अब विज्ञान ने इस ओर ध्यान देना आरम्भ किया है तो यह सम्भावना अधिकाधिक स्पष्ट होती जा रही है कि संगीत का शब्द शक्ति का महत्व प्रकृति की अन्यान्य सामर्थ्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है।
ध्वनि विज्ञानियों का कहना है कि यदि किसी नर्तकी की पायल ध्वनि लय ताल से बँधकर एक प्रवाह में बहने लगे तो इतने भर से वह नृत्य का बड़ा हाल नीचे ढह सकता है।
नैपोलियन के समय में एक ऐसी ही दुर्घटना हुई। उसकी सेना एक पुल पर होकर कदम से कदम मिलाये चल रही थी कि पदचाप के क्रमबद्ध हो जाने से पुल हिला और नीचे ढह गया। पूरी टुकड़ी नदी में बह गई। कारण तलाश करने पर यह क्रमबद्ध पद्चाप का प्रभाव निकला। तब से पुल पर चलना हो तो सेना को तितर-बितर चलने का नियम बना। जिसका अभी भी पालन किया जाता है।
भूकम्पों में जो विनाश शक्ति देखी जाती है उसका कारण मात्र विस्फोट नहीं वरन् पृथ्वी के भीतर से उठने वाले क्रमबद्ध कम्पन हैं। यदि उतना विस्फोट मानवी प्रयासों से किया जाय तो बहुत कम विनाश होगा। किन्तु ऐसे अवसरों पर धरती के भीतर जो क्रमबद्ध ध्वनि प्रवाह उठते हैं उन कमलों से प्रभावित क्षेत्रों को भारी हानि उठानी पड़ती है।
वाशिंगटन क्षेत्र के टेकोमा नदी पर प्रायः एक किलोमीटर लम्बा और 12 मीटर चौड़ा पुल बँधा था। वह 44 सेन्टीमीटर मोटे लोहे के रस्सों पर टँगा था। नियमानुसार उस पर 180 किलोमीटर प्रति घन्टे की चाल से चलने वाले तूफान का भी कोई असर नहीं होना चाहिए किन्तु 7 नवम्बर 1940 को हवा कुछ तेज तो जरूरी था पर ऐसा कुछ नहीं था, जिसे तूफान कहा जा सके। अचानक पुल ने काँपना आरम्भ किया। वह तेज हिलोरें लेने लगा। ऊपर उचका और धड़ाम से नदी में जा गिरा।
ठीक ऐसी ही घटनाएँ अन्यत्र भी हो चुकी हैं। फ्रांस का लाहोक बर्नार्ड पुल सन् 1852 में ठीक इसी प्रकार गिरा था। उसे फिर से बनाया गया तो दुबारा भी ठीक वही घटना घटी और 1871 में फिर वैसा ही धराशायी हुआ।
अमेरिका की ओहियो नदी का पुल भी इसी प्रकार सन् 1854 में बैठा था। नियाना जल प्रपात का झूला मजबूत पुल भी इसी प्रकार दो बार धराशायी हुआ। एक बार सन् 1864 में दूसरी बार 1889 में। कारण तलाश करने पर न निर्माण सामग्री में कोई खराबी पाई गई और न बनाने वालों की विधि व्यवस्था में। फिर इन दुर्घटनाओं का क्या कारण हो सकता है इसकी गहरी खोज-बीन करने पर यह निष्कर्ष निकला कि धरती के भीतर उत्पन्न हुए भूकम्प की नगण्य सी हलचल ने तालबद्ध ध्वनि तरंगें उत्पन्न की और उसके प्रभाव से यह अनर्थ होते रहे।
बारूद विस्फोट का इन दिनों बहुत उपयोग होता है। पहाड़ों को गिराने या पोला करने में आमतौर से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। विस्फोटों की आवाजें भी बहुत होती हैं। पर उससे समीपवर्ती क्षेत्र में मकान गिरने जैसी कोई दुर्घटना नहीं होती। देखा गया है कि 50 टन बारूद का विस्फोट मात्र 200 मीटर की दूरी पर बने हुए मकानों को काई क्षति नहीं पहुँचाता। 130 किलो बारूद यदि फट पड़े तो उससे 350 मीटर दूर के मकानों की किवाड़ें भर खड़खड़ा सकती है। साधारण भूकम्पों में उन्हीं मकानों को क्षति पहुँचती है जो सामग्री या बनावट के नियमों की दृष्टि से दोषपूर्ण होते हैं।
उपरोक्त दुर्घटनाओं के लिए धरती के भीतर ध्वनि कंपन उत्तरदायी ठहराये गये है। यह प्रचण्ड शक्ति तब उत्पन्न होती है। जब उनमें एक निश्चित गति से उत्पादन हो और वह एकीभूत होकर एक दिशा में प्रवाहित हो। यह प्रवाह सामान्य घटनाओं से, यहाँ तक कि घड़ी के पेण्डुलम की खट-खट को तालबद्ध कर देने तक से उत्पन्न हो सकते हैं और कोई भयानक दुर्घटना उत्पन्न कर सकते हैं।
स्नायविक रोगों तथा मानसिक विक्षेपों में संगति के विशेष ध्वनि प्रवाहों के माध्यम से चिकित्सा का एक नया प्रचलन इन्हीं दिनों चला है और बहुत सफल हुआ है। शोक, क्रोध, उद्वेग, तनाव, रक्तचाप आदि को शान्त करने में भी उससे बड़ी सहायता मिलती देखी गई है। सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि अन्यान्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह अगले दिनों संगीत उपचार भी उभर कर आवेगा और जन स्वास्थ्य के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेगा।
इसके अतिरिक्त उसका प्रभाव पशु पक्षियों को उल्लसित एवं वृक्ष वनस्पतियों को अधिक विकसित करने की दृष्टि से भी बहुत लाभदायक पाया गया है। दुधारू पशु अधिक दूध देने लगे। बैल घोड़े बिना थके अधिक परिश्रम करने में समर्थ रहे। मुर्गियों और मछलियों ने अधिक अण्डे बच्चे दिये। डरते रहने और असहयोग करने वाले अन्य प्राणी इस आधार पर नरम पड़े और मनुष्य के अधिक निकट आये। इस आधार पर हिंस्र पशुओं को भी किसी हद तक सौम्य बनाने में सफलता मिली है। सरकस वाले अब पशुओं को कलाकार बनाने के लिए साधने में मात्र हण्टर या लालच का ही उपयोग नहीं करते वरन् संगीत का सम्मोहन चलाकर भी वशवर्ती बनाने का एक नया उपाय अपनाने लगे हैं। यह प्रयोग वृक्ष वनस्पतियों पर भी बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है।
वेस्ट विल अमेरिका की कृषि प्रयोगशाला में ऐसे परीक्षण हुए हैं जिनमें संगीत के प्रभाव से खेती की फसलों को अधिक फैलने तथा फूलने फलने वाली बनाने में सफलता प्राप्त की गई है। इस संबंध में विस्कोन्सिन के आर्थर लाके के प्रयोगों की उस देश के वनस्पति विशेषज्ञों में बहुत चर्चा है उसने फूलों के जल्दी तथा भारी बनाने में इसी आधार पर सफलता पाई। जिन खेतों को संगीत सुनाये गये वे अधिक समुन्नत हुए और जिन्हें इससे वंचित रखा गया वे खाद पानी की दृष्टि से समान लाभ प्राप्त करने पर भी पिछड़े रह गये।
संगीत मनुष्यों की तरह पेड़-पौधों को भी पसन्द है। सुनियोजित संगीत तरंगों से वे प्रसन्न पुलकित होते है और उत्साह भरे वातावरण में अधिक जल्दी अच्छा विकास करने लगते हैं। ब्रिटिश विज्ञानी जार्ज मिलसटोन इस संदर्भ में अधिक रुचि लेते रहे हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि संगीत के पौधों को भी उल्लसित करने की क्षमता है। न्यूयार्क के डॉक्टर डोरोवो रेटालक ने रुग्ण वृक्षों में चिकित्सा से संगीत की ध्वनि लहरों का उपयोग किया है और कहा है कि जिनका भविष्य संदिग्ध हो रहा था जिन्हें रुग्ण समझा जा रहा था ऐसे पौधों को भी संगीत चिकित्सा के माध्यम से रोगमुक्त किया और नया जीवन दिया गया।
कनाडा, ब्रिटेन, इसराइल तथा पश्चिमी जर्मनी में भी यह प्रयोग हुए हैं। प्रयोग कर्त्ताओं ने कुछ खेतों और उद्यानों में खाद-पानी के अतिरिक्त संगीत सुनाने का भी प्रबन्ध किया। इस पर जो अतिरिक्त खर्च पड़ा उसकी तुलना में अच्छी फसल का लाभ कहीं अधिक था। इसके विपरीत यह भी देखा गया कि कर्कश स्वर और कोलाहल कुहराम का बुरा असर भी पड़ता है। धड़धड़ाते रहने वाले कारखानों के इर्द-गिर्द के बगीचे सदा मुरझाये कुम्हलाये पाये गये।
वनस्पतियों के संगीत पर प्रभाव के संबंध में महाकौश महाविद्यालय के रसायन शास्त्री प्रो. गोरे ने लम्बे समय तक परीक्षण करने के बाद अपना मत यही बनाया है कि जिस प्रकार मनुष्य को संगीत प्रिय है उसी प्रकार उसके द्वारा वनस्पति को भी उल्लसित ही नहीं विकसित भी किया जा सकता है।
लन्दन विश्वविद्यालय के एक वनस्पति इंजीनियर जेम्स स्मिथ ने पौधों के साथ किये गये दुर्व्यवहार और सद्व्यवहार की प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए लम्बी अवधि तक अनेक क्षेत्र उद्यानों में विभिन्न प्रकार के पर्यवेक्षण किये हैं। उनने पाया है कि वनस्पतियाँ प्रताड़ना तथा प्रतिकूलता उत्पन्न करने से खिन्न होती है उनके यह मनोभाव कुम्हलाने मुरझाने के रूप में देखा गया। इसी प्रकार खाद पानी ऋतु प्रभाव की तरह वे सज्जनोचित व्यवहार से भी पोषण प्राप्त करती, बढ़ती और सुखी रहती पाई गई हैं। हँसी-खुशी का वातावरण जिस प्रकार मनुष्यों को पसन्द है वैसा ही अनुभव पेड़-पौधे भी करते हैं। शोक सन्ताप जहाँ छाया रहता है वहाँ पौधे भी दुःखी निराश एवं कुरूप कठोर स्थिति में रहते हैं। श्मशानों, कसाई घरों के नये और तेजी से बढ़ने वाले पौधों की विकास गति अपेक्षाकृत अधिक मन्द और असन्तोषजनक पाई गई है।
वनस्पति विज्ञानियों का यह मत बनता जाता है कि संगीत की प्रतिक्रिया पौधों पर स्नेह सद्भाव जैसी होती है। वे गायन वादन से प्रसन्न होते उत्साहित रहते और जल्दी बढ़ते तथा फूलते फलते हैं।
शब्द तत्व असाधारण क्षमताओं एवं सम्भावनाओं से भरा-पूरा है, उसका रहस्य समझा जा सके और उपयोग सीखा जा सके तो मनुष्य के हाथ सामर्थ्य का विशिष्ट स्त्रोत हाथ लग सकता है। प्राचीनकाल की तरह इस सामर्थ्य की शोध में संलग्न होकर उज्ज्वल भविष्य की एक नई सम्भावना को हस्तगत किया जा सकता है।
शबरी के घर भगवान गये और उससे माँग-माँगकर झूठे बेर खाये। यह प्रसंग उन दिनों भक्त जनों में सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ था। “अन्त्यज, अशिक्षित नारी, साधना विधान से अपरिचित रहने पर भी उसे इतना श्रेय क्यों मिला? हम लोग उस श्रेय सम्मान से वंचित क्यों रहें?”
मातंक ऋषि ने चर्चारत भक्त जनों से कहा। हम लोग स्वयं पूजन कर मात्र अपनी सद्गति के लिए किये गये प्रयास को भक्ति मानते रहे हैं। जबकि भगवान की दृष्टि में सेवा साधना की प्रमुखता है। शबरी ही है जो रात-रात भर जागकर आश्रम से लेकर सरोवर तक का कंटीला रास्ता साफ करती रही और सज्जनों का पथ प्रशस्त करने के लिए अपना अविज्ञात निरहंकारी भावभरा योगदान प्रस्तुत करती रही भक्तजनों का समाधान हो गया। उन्होंने जाना कि भक्त की और भगवान की दृष्टि में अन्तर क्या है।
पूज्य गुरुदेव का प्रज्ञा परिजनों के नाम एक विशिष्ट उद्बोधन
आपत्तिकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए समर्थ भावनाशीलों को आगे आना पड़ता है। अग्निकाण्ड, भूकम्प, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष जैसे संकट आ खड़े होने पर उदारचेता अपने काम धन्धे में हर्ज करके भी दौड़ते और संत्रस्त जन समुदाय की सहायता करने में कुछ उठा नहीं रखते। दुर्घटना घटित होने पर यथा सम्भव सहायता किये बिना कोई सहृदय रुक नहीं सकता।
स्थानीय डॉक्टरों की जिम्मेदारी और भी अधिक है। उस अवसर पर उनकी योग्यता विशेष रूप से आवश्यक होती है। यदि वे मरहम पट्टी करने के लिए जाने से इनकार या आनाकानी करें तो यह तत्काल के झंझट से परे रहना अन्ततः हानिकारक ही सिद्ध होगा। उस निष्ठुरता के लिए उन्हें आत्म प्रताड़ना और लोक भर्त्सना दोनों ही सहनी पड़ेगी। हो सकता है कि इस निष्ठुरता से रुष्ट होकर मरीज भी उनके पास आना बन्द कर दें और धन्धे में घाटा पड़े।
प्रज्ञा परिजनों की स्थिति सुयोग्य चिकित्सक जैसी है और समय की विपन्नता भयानक दुर्घटना जैसी। इन दिनों आस्था संकट के सर्वनाशी घटाटोप पूरी प्रौढ़ता पर हैं। साधन सम्पन्न परिस्थितियों में भी मनुष्य को दिन-दिन अधिकाधिक कष्टदायक परिस्थितियों में फँसना पड़ रहा है। दुर्बलता, रुग्णता, उद्विग्नता, आर्थिक तंगी, स्वजनों की कृतघ्नता, मित्रों की शत्रुता, प्रचलित दुष्ट परम्परा से जन-जन को कितना संत्रस्त रहना पड़ता है, उसे यदि कोई पर्दा उघाड़कर देखें तो प्रतीत होगा कि दृश्यमान चमक-दमक के पीछे कितनी अधिक पीड़ा, खीज, निराशा संव्याप्त है। आदमी इस कदर खोखला बन गया है कि इस ढकोसले के पीछे झाँकने पर लगता है कि जीवितों में पाई जाने वाली प्रसन्नता-प्रखरता का एक प्रकार से पलायन ही हो गया है।
व्यक्ति की तरह ही समाज की चूलें भी चरमरा रही हैं। शान्ति और व्यवस्था के परखच्चे उड़ रहे हैं। अणु-आयुधों के जखीरे, तृतीय युद्ध के नगाड़े, विकिरण और प्रदूषण के विष प्रवाह, बढ़ती हई जनसंख्या का हाहाकार, अपराधी दुष्प्रवृत्तियों का व्यापक विस्तार देखते हुए लगता है मानवी गरिमा और सभ्यता का अन्त होगा। लोग ऐसे माहौल में जी रहे हैं जिसमें आतंक, अनाचार और प्रपंच-पाखण्ड के अतिरिक्त और कुछ बच ही नहीं रहा। कल के संबंध में सभी आशंकाग्रस्त हैं। कब न जाने कितने किधर से बादल फटे, बिजली टूटे और सृष्टा के इस सुन्दर ग्रह की परिणति अन्तरिक्ष में छाये हुए एक विषाक्त वातावरण जैसी बन पड़े।
जिस चौराहे पर हम खड़े हैं, उसमें विनाश विभीषिकाओं के अतिरिक्त एक छोटी पगडण्डी उज्ज्वल भविष्य की ओर भा जाती है। उस पर चला जा सके तो यह आशा भी विद्यमान है कि वातावरण बदले और ध्वंस के स्थान पर सृजन का उपक्रम चल पड़े।
इन उभयपक्षीय सम्भावनाओं के बीच अधर में लटकते हुए पाँच अरब मनुष्यों के भाग्य को सही दिशा देने के लिए इन दिनों ऐसी प्रखर प्रतिभाओं की आवश्यकता है जो अपनी नाव खेने का कौशल जानते हों जिनकी भुजाओं में डाँड चलाने और असंख्यों को पार कर सकने की पराक्रम विद्यमान हो। कहना न होगा कि समय को जिस स्तर की उद्धार क्षमता चाहिए उसकी उपयुक्त मात्रा प्रज्ञा परिजनों के अतिरिक्त अन्यत्र कदाचित् ही कहीं दीख पड़े।
युग विभीषिकाओं से निपटने के लिए बलवानों, योद्धाओं, श्रीमन्तों, कूटनीतिज्ञों, प्रशासकों, सुशिक्षितों, शिल्पियों वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों की नहीं; ऐसे मनीषियों की आवश्यकता है जो अपने को नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर सकें। पतन का गुरुत्वाकर्षण जहाँ पूरे जोर-शोर पर हो वहाँ उत्कृष्टता की दिशा
में उछाल उत्पन्न करने के लिए प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता है। उसे उत्पन्न किये बिना कोई गति नहीं। स्पष्ट है कि यह शक्ति, पवित्रता और प्रखरता की उभयपक्षीय क्षमता से सम्पन्न व्यक्तियों में ही हो सकती है और किसी में नहीं। इन्हीं को तलाशना, संजोना, सिखाना, पढ़ाना और मोर्चे पर अड़ाना-लगाना अपने समय का सबसे बड़ा काम।
विश्वामित्र दशरथ के प्राणप्रिय पुत्र को इसी निमित्त अनिच्छापूर्वक उन्हें यज्ञ रक्षा के बहाने माँग ले गये थे। बला-अतिबला विद्या सिखाकर उन्हें इस योग्य बनाया था कि लंका उजाड़ने और धर्मराज्य की स्थापना कर सकने में समर्थ हो सकें। इतना महान काम कर सकने के लिए अभीष्ट आत्मबल-आत्मविश्वास निरखने के लिए उन्हें मैनाक पिनाक तोड़ने और स्वयंवर जीतने की दो आरम्भिक सफलतायें भी सम्भव बनाकर दिखाई थी। युग परिवर्तन में भी प्रत्यक्ष पराक्रम तो राम, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान जैसों का ही था, पर जानने वाले जानते हैं कि परोक्ष भूमिका निभाने एवं सूत्र संचालन करने में विश्वामित्र की कितनी बड़ी भूमिका थी।
प्रज्ञा अभियान का वर्तमान रोल विश्वामित्र के युग यज्ञ जैसा है। इसके साथ ही जनक का धनुष यज्ञ भी गुँथा हुआ है। इस श्रेय सौभाग्य का भागीदार बनने के लिये ‘प्रज्ञावान्’ प्रज्ञा परिजनों को बुलाया गया है। वे चाहें तो लिप्सा के वशीभूत रहकर अनेकानेक बहाने भी गढ़ और कह सकते हैं। वे चाहें तो तथाकथित स्वजनों के दबाव अवरोधों को भी तिल का ताड़ बनाकर देख सकते हैं। यह उनकी इच्छा है।
अब न कहीं सुमित्रा है-न उर्मिला, जो लक्ष्मण के मस्तक पर तिलक लगाकर राम के साथ स्वेच्छापूर्वक चौदह वर्ष वनवास के लिये विदा हो सके। पाँच पुत्रों को महाभारत की महान योजना को सम्पन्न करने के लिए प्रेरित कर सकें ऐसी माँ कुन्ती भी नहीं है। अपने पुत्रों को-पाँच प्यारे शिष्यों को जो बलिदानी उपहार दे सके ऐसे गुरु गोविन्दसिंह भी अब कहीं नहीं मिलेंगे-न कहीं हरिश्चन्द्रों की परम्परा है, न भामाशाहों की।
पेट-प्रजनन की खाई में डूब मरने के अतिरिक्त और किसी को आज कुछ सूझता ही नहीं। ऐसे माहौल में व्यामोहग्रस्त मनःस्थिति को कभी भी जीवित रहते ऐसा समय नहीं मिलेगा जिसमें व्यस्तता से छुटकारा मिलने और समस्या सुलझने जैसी अनुकूलता अनुभव कर सके। बात तो साहसियों की है जो भगवान भरोसे नाव खोलते और भुजाओं के बल पर डाँड़ चलाते, मझधार में नाव खेते और किनारे तक पहुँच कर रहते हैं।
समय की माँग इतनी बड़ी और समर्थ प्रतिभाओं की भारी कमी को देखते हुए सूझ नहीं पड़ता है कि डूबते को बचाने और रेंगते को उछालने के लिए जिस सामर्थ्य की आवश्यकता है उसे कहाँ जाकर खोजा और किस प्रकार संजोया जाय। जिसकी थाली खोती है वह उसे घड़े में हाथ डालकर भी तलाशता है। आवश्यकता और आतुरता कई बार ऐसे विचित्र वानक बना लेती है। प्रज्ञा परिवार की खाना तलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हैं। ये हाथ लगें तो काम चले।
धर्मतन्त्र की सामर्थ्य राजतन्त्र से किसी भी प्रकार कम नहीं। शासन व्यवस्था, सम्पदा और सुरक्षा के लिये उत्तरदाई है तो धर्मक्षेत्र का पुरोहित भी ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ के संकल्प से वचनबद्ध होता है कि उसके रहते राष्ट्र को जीवित और जागृत रखने की जिम्मेदारी पूरी तरह उसकी रहेगी, उसमें कही कोई व्यतिरेक व्यवधान उत्पन्न न होने दिया जायगा। लोक-मानस के परिष्कार में ऐसा ज्वलन्त पुरोहित ही अपेक्षित है जो ध्वंस को निर्माण में उलटने का बुद्ध और गाँधी जैसा पराक्रम प्रस्तुत कर सके। समय की विषमता को देखते हुए अभीष्ट परिवर्तन में समर्थ युगशक्ति उपलब्ध करने के लिए ऐसे ही भागीरथों, शुनः शेपों और दधीचियों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। महाकाल की नव सृजन की समर्थ योजना प्रस्तुत है, पर उसे वहन करने के लिये सूर्य रथ में जुतने वाले सात घोड़े भी तो चाहिए। सारथी अरुण न हो तो सविता का रथ विश्व भ्रमण के लिये कैसे निकले। चन्द्रमा तक की कुलाचें भरने वाले हिरन घर ही बैठकर धरती की परिक्रमा करते हैं। यहाँ तक कि बुद्धि के देवता लम्बोदर तक को गतिशील होने के लिये चूहे पर आश्रित रहना पड़ता है। महाकाल की युग अवतरण योजना का प्रतिनिधि प्रज्ञा अभियान भी उस वाहन की प्रतीक्षा में लाइन में खड़ा है जो उसे लादकर अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचा सके।
प्रज्ञा परिजनों से समयदान, की युग पुकार को पूरा करने के लिये कहा जा रहा है और तथ्यों का स्मरण दिखाते हुए कहा जा रहा है कि वे समय की आवश्यकता और ऐसे अवसरों पर जागृत आत्माओं के कन्धों पर आने वाले उत्तरदायित्वों को समझें। आनाकानी न करें और नव सृजन के महायज्ञ में अपनी भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करें। व्यामोह के बन्धन ढीले करें-तृष्णाओं को सिकोड़े, लिप्साओं पर अंकुश लगाये; इतने भर से नक्शा बदल जायगा और रास्ता एक ओर से न सही दूसरी ओर से मिल जायगा। त्याग में अनख असमंजस तो होता है। अनभ्यस्त मार्ग पर चलने में डर तो लगता है, पर उसके लिए साहस न करने पर कोलम्बस की तरह नई दुनिया तलाश करना भी तो नहीं बन पड़ता। महानता के लक्ष्य पर चलकर ही उच्चस्तरीय लक्ष्यों के प्राप्त होने का स्वप्न साकार किया जा सकता है। यह इतना सस्ता नहीं है कि माला घुमाने या बाबा के सत्संग में जा बैठने भर से चुटकी बजाते हथियाया जा सके। आन्तरिक जागरुकता का एक ही दण्ड पुरस्कार है कि उन्हें बीज की तरह गलने तथा बरगद की तरह फैलने का मार्ग अन्तःप्रेरणा या दबाव भरी परिस्थिति से विवश होकर इच्छा या अनिच्छा से अपनाना पड़ता है। इसके बिना एक ओर आत्म प्रताड़ना कचोटती है दूसरी ओर समय की चीत्कार पत्थरों तक पर हथौड़े चलाती है।
प्रज्ञा अभियान मत्स्यावतार की तरह द्रुतगति से सुविस्तृत होता जा रहा है। उसकी गतिविधियों में योगदान देने के लिये देव मानवों का आह्वान अन्तरिक्ष से चल पड़ा है। कितने ही काम ऐसे हैं जिन्हें इन्हीं दिनों में पूरा किया जाता है। उनमें से एक है घर-घर अलख जगाने, जन-जन के मन-मन को युग चेतना से अवगत अनुप्राणित करने का। इसके लिए बादलों की तरह हर खेम पर बरसने के लिए परिभ्रमण करना पड़ेगा। प्रज्ञा आयोजनों की इन दिनों सुविस्तृत शृंखला चल पड़ी है। हर दिन छोटी बड़ी सैकड़ों-हजारों ज्ञान गोष्ठियों के आयोजन चल रहे हैं। इनमें युग गायकों, वक्ताओं तथा चित्र प्रदर्शनी दिखा सकने वालों की मंडलियां जीपों तथा मोटर साइकिलों में जत्थे बनाकर भेजी जा रही है। अभीष्ट उपकरणों के साथ-साथ अपना लाउडस्पीकर भी रहता है। 2400 डाक बँगले-प्रज्ञा संस्थान पहले से ही बन चुके हैं। उन्हें केन्द्र मानकर समीपवर्ती गाँव, नगरों में जन-जागरण के ज्ञान यज्ञों की व्यवस्था होती है और लोक-मानस के परिष्कार का उद्देश्य भावभरे वातावरण में सुसम्पन्न होता है।
दूसरा है शान्ति-कुँज में चलने वाली साधना और शिक्षा की सत्र व्यवस्था। युग शिल्पियों को प्रशिक्षित करने एवं तपाने के लिए एक मास के, नौ दिन के, चार दिन के सत्र निरन्तर चलते रहते हैं। इनमें सम्मिलित होने वालों से वाँछित अनेकों प्रकार की अध्यापक, व्यवस्थापक एवं श्रमिक स्तर की व्यवस्था करनी पड़ती है। इनमें से प्रत्येक हलका भारी काम ऐसा है जिसे खरीदा हुआ श्रम किसी भी प्रकार पूरा नहीं कर सकता। उसके लिए आदर्शवादी प्रतिभाओं का समयदान ही काम देता है।
इसके अतिरिक्त भी अनेकानेक प्रकार की नव सृजन योजनायें हैं जिन्हें पूरा करने के लिये घर से बाहर निकलना और शान्ति-कुँज को निवास केन्द्र बनाकर कार्यक्षेत्र में उतरना होता है। इसमें से जिसकी क्षमता जिस स्तर की है उसे वहाँ फिट कर दिया जाता है। जो अपने को उपरोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए उपयुक्त समझते हों वे अब शान्ति-कुँज आने की बात सोचें। अब तक के समयदानियों में से अधिकाँश ऐसे हैं जिनने अपनी संचित सम्पदा से निर्वाह का तालमेल बिठाया है। अब समय की आवश्यकता को देखते हुए उन्हें भी आमन्त्रित किया गया है जिनके पास अपने कुछ साधन तो नहीं है, पर ब्राह्मणोचित निर्वाह लेकर काम चला सकते हैं। ऐसे लोगों के सपरिवार रहने जैसी व्यवस्था भी शान्ति-कुँज में मौजूद है। जिन्हें उत्साह हो, शान्ति-कुँज के साथ संपर्क साधें और विचार विनिमय करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयत्न करें।
जो घर छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं वे भी अपने समीपवर्ती क्षेत्र में कुछ नियमित समय देकर कुछ न कुछ करते ही रह सकते हैं। प्रज्ञा-अभियान की योजनायें ऐसी हैं जिनमें हर स्तर का व्यक्ति किसी न किसी प्रकार सहभागी बन सकता है। कौन कहाँ, किस प्रकार क्या करे इस संबंध में भी आवश्यक विचार विनियम से हर किसी को उपयोगी एवं सन्तोषजनक मार्ग मिल सकता है।
(आदर्श)
जन-जन शुभ संकल्प भरे हों ज्ञान-गिरा लहराये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥
ईश्वर और धर्म के अवलम्बन से श्रद्धा जागे, मात्र बुद्धि ही नहीं हृदय से हो हम सबसे आगे।
विश्वासों की इसी नींव पर जीवनक्रम को ढालें, इतने ऊँचे उठें कि जग के ज्योति केन्द्र को पालें॥
स्वयं ढूंढ़ता हुआ अमृत अपने आँगन तक आये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥1॥
भरी हुई तेरे कण-कण में पौरुष की गाथाएँ, वह फिर से प्रज्ञा पुराण बन घर-घर गाई जाएँ॥
तेजस्विता जगा हे जननी! राम-लक्ष्मण जैसी, शुनःशेप, भागीरथ जैसे जग के बनें हितैषी॥
हर नारी हो सावित्री, नर सत्यवान् कहलाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥2॥
कहने को तो अब भी लाखों सन्त-भक्त कहलाते, रामतीर्थ वह कहाँ स्वयं जो तीर्थकर बन जाते।
सोये हुए आत्मबल को जो यों झकझोर जगाते, आरण्यक वह कहाँ जहाँ जन तुष्टि-तृप्ति पा जाते॥
शान्तिकुँज की प्राण ऊर्जा हर देवालय पाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥3॥
मेरे देश तुम्हारे कण-कण से सुगन्ध हो आती, शीतलता बिखेर दे तेरी हवा बहे लहराती।
आज असुरता से लड़ने को बच्चा-बच्चा चल दे, माँ अपने प्रज्ञा पुरुषों को इतना पावन बल दे॥
त्याग-तपस्या का नूतन जन-जन इतिहास लिखाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥4॥
*समाप्त*