व्यक्ति और समाज के सम्मुख बढ़ती विपन्नताओं और विभीषिकाओं से सभी परिचित हैं। इसका कारण मनुष्य द्वारा अपनाई गई अवाँछनीयतायें ही प्रधान कारण हैं। इससे प्रत्यक्ष समस्याएं विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इतना ही नहीं उनसे वायुमंडल की तरह अदृश्य वातावरण भी विषाक्त होता है। परिमार्जन-परिष्कार मात्र प्रत्यक्ष का ही नहीं परोक्ष का भी होना चाहिए। अदृश्य जगत से दृश्य परिकर प्रभावित होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष की सघनता अविच्छिन्नता समझने वाले जानते हैं कि महती और व्यापक समस्याओं के समाधान में प्रत्यक्ष सुधार उपक्रमों की तरह ही अदृश्य के अनुकूलन में आध्यात्मिक स्तर के सामूहिक उपचारों की धर्मानुष्ठानों के रूप में आवश्यकता पड़ती है।
युग सन्धि की इस विषम बेला में नियन्ता की गलाई-ढलाई प्रक्रिया तीव्र से तीव्रतम होती जा रही है। उसके साथ मानवी प्रयत्नों का भी सन्तुलन बैठना चाहिए। इस हेतु इन दिनों प्रज्ञा परिजनों द्वारा एक विशेष धर्मानुष्ठान आरम्भ किया गया है। नाम दिया गया है- प्रज्ञा पुरश्चरण।
प्रज्ञा पुरश्चरण के चार चरण हैं।
1. प्रातः सुर्योदय के समय पाँच मिनट मौन मानसिक गायत्री जप- प्रकाश का ध्यान- उस कृत्य का प्रतिफल- अदृश्य अनुकूल के लिए अन्तरिक्ष में बिखेरने के संकल्प के रूप में। इसे जो जिस भी स्थिति में जहाँ भी हो वहाँ कर सकता है। उसमें स्नान जैसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
2. महीने में एक बार किसी भी तिथि का क्रम बनाकर प्रज्ञा अग्निहोत्र- पाँच दीपक- पाँच-पाँच अगरबत्तियों के पाँच गुच्छक- चौबीस बार गायत्री मन्त्रों का सामूहिक पुरश्चरण। उपस्थित लोगों के मस्तिष्क पर चन्दन का तिलक। इस कृत्य की पन्द्रह मिनट में पूर्णता। 3. प्रज्ञा उद्बोधन- अग्निहोत्र के उपरान्त पन्द्रह मिनट युग संगीत एक घंटा प्रज्ञा प्रवचन। इसके लिए प्रज्ञा अभियान के किन्हीं चुने हुये लेखों को भावाभिव्यक्ति के साथ सुनाया जाना। इसमें एक घंटा।
इस प्रकार पंद्रह मिनट में अग्निहोत्र- पंद्रह मिनट युग संगीत और एक घंटा प्रज्ञा प्रवचन डेढ़ घंटे का समय मासिक आयोजन में लगता है। हर काम समय पर आरम्भ किया जाय।
प्रज्ञा पुरश्चरण का केन्द्र स्वाध्याय मंडल के रूप में स्थापित किया जाय। यह बिना इमारत के प्रज्ञा संस्थान छोटे रूप में उसी उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, जिसका कि गायत्री शक्ति पीठें- प्रज्ञा पीठें- बड़े रूप में सम्पन्न कर रही हैं। प्रज्ञा युग के अवतरण में इन केन्द्र संस्थानों की महती भूमिका सुनिश्चित है।
प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को इस नितान्त सरल किन्तु अतीव महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान में भागीदार बनने के लिए कहा गया है। और आशा-उपेक्षा की गयी है कि वे अपने संपर्क क्षेत्र में न्यूनतम पाँच और इसके भागीदार बनायें।
वर्तमान 24 लाख प्रज्ञा परिजनों के द्वारा किये गये इस अभूतपूर्व महापुरश्चरण में प्रतिदिन 24 करोड़ जप सम्पन्न होगा। लक्ष्य इसे इसी वर्ष पाँच गुना बढ़ा देने का है ताकि हर दिन 120 करोड़ जप नित्य नियमित रूप से सम्पन्न होता रहे। साथ ही उसी अनुपात में उसका अपेक्षित अग्निहोत्र भी साथ-साथ चलता रहे। इस शुभारम्भ के साथ-साथ युग परिवर्तन के लिए आवश्यक अनेकानेक महत्वपूर्ण दृश्य और अदृश्य उपक्रम सम्मिलित हैं। जिनकी कि चर्चा इस अंक में की गयी है।
वर्ष-46 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-8
असुरता अपने आरम्भिक दौर में सदा जीतती रही है। इसका कारण यह नहीं कि दुष्टता की सामर्थ्य अधिक है। प्रकाश से अधिक समर्थ एवं व्यापक अन्धकार हो ही नहीं सकता। सत्य देवत्व के साथ है। अतः बलिष्ठ एवं विजयी उसी को होना चाहिए। फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि देवासुर संग्रामों के प्रथम चरण में देवता ही हारे और भागे हैं।
इस विसंगति के पीछे तथ्य एक ही रहा है कि देवता संगठित नहीं हुये। मिल-जुलकर काम करना नहीं सीखे। व्यक्तिगत विलास में निरत रहे और निजी प्रगति की बात सोचते रहे। इस एकाकी चिन्तन में उन्हें स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि, पूजा प्रतिष्ठा जैसे लाभ मिले ही मिले हैं, पर वे प्रखरता की दृष्टि से दुर्बल होते गये और असुरता के संगठित आक्रमण अनाचार का सामना न कर सके। यह है असुरों की आरम्भिक सफलता का पर्यवेक्षण। यदि देवताओं ने आरम्भ में ही असुरों जैसा संगठन और सम्मिलित योजना का महत्व समझा- ध्यान रखा होता, तो उस दुर्गति का कष्ट एवं अपयश न ओढ़ते, जिसकी चर्चा सुनने भर से आदर्शवादियों के मन छोटे होते हैं।
देवासुर संग्राम के उत्तरार्ध में देव विजयी तभी हुए हैं जब वे मिल-जुलकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे और एक स्वर में बोले हैं। असुर निकंदिनी दुर्गा का उद्भव ब्रह्माजी द्वारा देवताओं की संयुक्त शक्ति संजोकर ही किया गया था। आज भी देवत्व को यदि जीतना है तो पूर्व इतिहास से शिक्षा ग्रहण करनी और संगठित प्रयासों की गरिमा समझनी चाहिए।
यह जगत दो हिस्सों में बँटा हुआ है। एक प्रत्यक्ष और दूसरा परोक्ष। दृश्य पदार्थों के भीतर एक प्रेरक शक्ति काम करती है जिसे आँखों से नहीं देखा जाता, उसकी क्षमता एवं गति को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि प्रकृति के अन्तराल में शब्द, ताप और प्रकाश की तरंगें काम करती हैं उन्हें परोक्ष ही कहा जा सकता है। शरीर सारे काम करता है, पर उसके भीतर चेतना की परीक्षा प्राण शक्ति काम करती है। भूमण्डल के संबंध में भी यही बात है। वह जल, थल और नभ के तीन भागो में विभक्त है। किन्तु उसका थोड़ा-सा भाग ही दृष्टिगोचर होता है। भूगर्भ में क्या हलचलें चल रही हैं- समुद्र तल में क्या हो रहा है- आकाश में कितना पदार्थ वायुभूत होकर उड़ रहा है इसकी जानकारी सामान्य बुद्धि या साधनों से प्राप्त नहीं होती वह सभी एक प्रकार से परोक्ष या अदृश्य है।
प्रत्यक्ष के संबंध में ही हमें हलकी- फुलकी जानकारी होती है। इतने पर भी प्रत्यक्ष की तुलना में परोक्ष की क्षमता असंख्य गुनी है। एक चुटकी धूलि का कोई महत्व नहीं किन्तु एक परमाणु की परोक्ष शक्ति का विस्फोट गजब ढा देता है। समुद्र के खारे जल में ज्वार-भाटे मात्र उठते हैं पर इसे बहुत कम लोग जानते हैं कि धरातल के कोने-कोने में जल पहुँचाने के लिए उसकी अदृश्य प्रकृति एवं हलचल ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही बात आकाश के संबंध में भी है। वह पोला दृष्टिगोचर होता है किन्तु पवन, पर्जन्य, प्राण जैसे अति महत्वपूर्ण तत्व प्रचुर परिणाम में उसी में भरे पड़े हैं। यदि उनका लाभ प्राणियों को न मिले तो किसी का भी जीवन क्रम एक कदम आगे न बढ़े।
चर्चा परोक्ष जगत की हो रही है। प्रत्येक प्रयोजन के लिए यों प्रत्यक्ष से ही पाला पड़ता है और उसी को सब कुछ मानने तथा बढ़ाने-बदलने का अभ्यास रहता है फिर भी विचारशील यह भी भूलते नहीं की परोक्ष की सत्ता असाधारण है और उसकी उपेक्षा करके खिलौने से खेलने की तरह मात्र छोटे बच्चों जैसी स्थिति हमारी बनी रहती है। एक अविकसित वनवासी मात्र घास-पात की सम्पदा पर ही निर्भर रहता है किन्तु एक वैज्ञानिक प्रकृति पर आधिपत्य जमाता और असीम शक्ति का अधिष्ठाता बनता है। इसे परोक्ष सामर्थ्य की जानकारी एवं उपलब्धि का चमत्कार ही कह सकते हैं।
यहाँ चर्चा अदृश्य जगत की हो रही है। धरातल के पदार्थों प्राणियों की हलचलों, सम्पदाओं सुविधाओं को हम देखते हैं। उस क्षेत्र की प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने के लिए प्रयत्न भी करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि प्रत्यक्ष के पीछे परोक्ष कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न कर रहे होते हैं और उन्हें समझने और निपटने के लिए भी कुछ किया जाना चाहिए। इस भूल का परिणाम है कि प्रयत्न करने पर भी समस्याएँ सुलझने में नहीं आती और श्रम निरर्थक चला जाता है। थकान, निराशा और खीज ही पल्ले पड़ती है। हमें गहराई में उतरने की आदत डालनी चाहिए और समझना चाहिए कि मोती बटोरने के लिए गहरी डुबकी लगाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। किनारे पर भटकते रहने से सीप और घोंघों के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ सकता।
रोग प्रत्यक्ष है और औषधि भी। दोनों आपस में सुलझते समझते भी रहते हैं। एक दूसरे को चुनौती चिरकाल से देते आ रहे हैं किन्तु औषधियाँ हारती और बीमारी जीतती चली आ रही है। यह क्रम तब तक चलता ही रहेगा जब तक कि असंयम से शक्तियों के अपव्यय और विषाक्तता के उद्भव अदृश्य का कारण न समझा जाय और उसके निवारण के लिए चटोरेपन की आदत का परिमार्जन न किया जाय। यह बात अर्थ संकट मानसिक तनाव, परिवार, विग्रह, समाज विक्षोभ जैसी समस्याओं के संबंध में भी लागू होती है। मनःस्थिति बदलने से परिस्थिति बदलती है, इस सूत्र की जब तक उपेक्षा होती रहेगी, झंझट, संकट, अभाव एवं विग्रह अपने स्थान पर यथावत् जड़ जमाये रहेंगे। हटने का नाम नहीं लेंगे।
इन दिनों प्रत्यक्ष जगत में वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में पतन पराभव का माहौल है। पिछले दिनों आर्थिक, बौद्धिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में असाधारण प्रगति हुई है। उस आधार पर सुविधा साधनों की इतनी अभिवृद्धि हुयी है जितनी कि सृष्टि के इतिहास में अद्यावधि कभी भी नहीं हुई। इतने पर भी व्यक्ति हर दृष्टि से घटता और घुटता जा रहा है। समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिसमें गतिरोध न अड़ गये हों। संकटों के चक्रवात न मचल रहे हों। मिल-जुलकर समाधान खोजने की प्रवृत्ति को तिलाँजलि दी जा रही है आस्तीनें ऊँची करने, ताल ठोकने, घूँसा दिखाने के अतिरिक्त और किसी को कुछ सूझता ही नहीं। अपराधों का आश्रय लेने और अन्यान्यों को नीचा दिखाने के अतिरिक्त चिन्तन और प्रचलन में कहीं कोई तत्व दिखाई नहीं पड़ते जिसमें व्यक्ति को सुखी सुसंस्कृत एवं समाज को समृद्ध समर्थ बनाने की आशा बंध सके। बुद्धिमानों की कमी नहीं। मूर्धन्य प्रतिभायें भी हर क्षेत्र में विद्यमान और सक्रिय हैं फिर भी दो गज जुड़ने के साथ-साथ चार गज टूटने जैसी विपन्नता बढ़ती जा रही है। मनुष्य कृत उत्पातों का प्रतिफल किसी भी दिन विश्व विनाश की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। युद्धोन्माद किसी भी दिन मनुष्य समुदाय की सामूहिक आत्म-हत्या के लिए विवश कर सकता है। जनसंख्या की अनियन्त्रित अभिवृद्धि, प्रदूषण और विकिरणों के घटाटोप- अपराधों के तूफानी चक्रवात, सन्निपात जैसा युद्धोन्माद ऐसा है, जिसके कारण सर्वनाश की घटायें घुमड़ती दिखती हैं।
गुत्थियों को सुलझाने के लिए कडुए-मीठे प्रयत्न न हो रहे हों सो बात नहीं। विनाश से बचाव और उत्कर्ष के आधार ढूंढ़ने के लिए अपने-अपने ढंग से सभी प्रयत्नशील हैं, पर समाधान निकट आने के स्थान पर दूर ही हटते जा रहे हैं। इन परिस्थितियों में कई बार तो वह निराशा सिर पर सवार होती है कि मनुष्य नियति के सम्मुख असहाय जैसा है। पुरुषार्थों का माहात्म्य अतिशयोक्तिपूर्ण है।
यहाँ सहज ही परोक्ष पर दृष्टि जाती है और लगता है कि कोई किसी मर्मस्थल में ऐसा काँटा तो नहीं घुसा बैठा है जो नासूर बनकर रिसते रहने की स्थिति बनाये रहे। किसी उपचार को सफल न होने दे। तत्वज्ञानी इस दृष्टि से सदैव भावनाशील रहे हैं पर प्रत्यक्ष को जड़ एवं आवरण मानते हैं। परोक्ष को उन्होंने चेतन प्रेरणा माना है और चेतना को ही वातावरण का- मनःस्थिति को ही परिस्थिति का जन्मदाता कहा है। तथ्यतः यह प्रतिपादन शत-प्रतिशत सच है। मानवी चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को प्रभावित करने वाली ‘आस्था’ विकृत हो जाने से हर क्षेत्र में अनेकानेक संकट खड़े हुये हैं। आत्यंतिक समाधान के लिए तब तक प्रतीक्षा ही करती रहनी पड़ेगी जब तक कि आस्था संकट से निपटने के लिए कारगर प्रयत्न नहीं किये जाते। इस संबंध में एक छोटे से प्रयत्न- अन्धेरे में टिमटिमाते दीपकों की तरह प्रज्ञा अभियान का मूल्यांकन भी किया जा सकता है।
परोक्ष जगत की परिधि में मानवी आस्था को महत्व तो दिया जा सकता है। फिर भी वह समग्र नहीं है। दृश्य जगत की पीठ पर एक अदृश्य जगत भी है और उसमें चल रही हलचलों और गतिविधियों से प्रत्यक्ष जगत पूरी तरह प्रभावित होता है। देखना यह भी है कि अदृश्य जगत में कहीं अवाँछनीय तत्व तो नहीं घुस पड़े हैं और उनके प्रभाव से प्रत्यक्ष जगत का वातावरण तो विषाक्त नहीं हो रहा है।
ऋतुओं के प्रभाव को सर्दी, गर्मी, नमी के रूप में अनुभव किया जाता है किन्तु वस्तुतः वे सूर्य और पृथ्वी के परिभ्रमण से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ भर हैं। इसे समझे बिना ऋतु परिवर्तन के रहस्य से अपरिचित ही बने रहना पड़ता है। अन्तरिक्ष से इतना कुछ बरसता है जिसे जल और थल की संयुक्त उपलब्धियों की तुलना में भी कहीं अधिक कहा जा सके। अदृश्य की शक्ति पर कभी तथाकथित प्रत्यक्षवादी अविश्वास करते थे पर बढ़ते हुए विज्ञान का समूचा आधार ही अप्रत्यक्ष को समझने और हस्तगत करने में केंद्रीभूत हो रहा है।
पदार्थ विज्ञान के साथ अध्यात्म विज्ञान को जोड़ने से ही समग्र तत्व ज्ञान का सृजन होता है। उसी समन्वय के आधार पर जो जानने योग्य है उसे जाना जा सकता है और जो पाने योग्य है उसे पाया जा सकता है। इन दिनों की विकट समस्याओं में यदि परोक्ष जगत की विकृतियों को समझने सुधारने का प्रयत्न किया जाय तो उसे दूरदर्शी विवेकशीलता ही कहा जायेगा। फुन्सियाँ अच्छी न हो रही हों तो रक्त विकार खोजने तक दृष्टि दौड़नी चाहिए। मच्छरों को भगाते न बन रहा हो तो सड़ी कीचड़ के खोजने और हटाने का प्रयत्न करना चाहिए। पतन और पराभव वस्तुतः भ्रान्तियों और विकृतियों की परोक्ष गड़बड़ का ही प्रतिफल होता है।
जिनको परोक्ष पर, अदृश्य पर विश्वास कर सकने योग्य समझ मिल सकी है उन्हें वर्तमान की न सुलझाने योग्य गुत्थियों के पीछे अदृश्य में संव्याप्त विषाक्तता खोजनी होगी। इसी का प्रभाव है कि लोक चिन्तन में अवाँछनीयता बढ़ रही है और प्रकृति प्रकोपों का दौर चल पड़ा है। वर्षा होती है तो धरती पर हरी चादर बिछती है। जल जंगल एक होते हैं। सर्दी का पतझड़ और गर्मी की जलन का सामना करते समय उसका कारण अदृश्य में ही खोजना पड़ता है। दृश्य के प्रत्यक्ष से निपटने की सामर्थ्य जब कुण्ठित हो चले तो परोक्ष की ओर दृष्टि डालनी चाहिए। रिसते नासूर के मूल में घुसे हुए काँटे को कुरेदना चाहिए। कठपुतली स्वयं कहाँ नाचती है। उनसे कौतूहल कराने में बाजीगर की उँगलियाँ ही चमत्कार दिखाती रहती हैं।
इन दिनों के प्रकृति प्रकोप एवं पतन-पराभव, विनाश-विग्रह के पीछे अदृश्य जगत की स्थिति को समझने का प्रयत्न होना चाहिए। साथ ही उसे सुधारने- सन्तुलित करने का भी व्यक्ति का स्तर और सृष्टि का भविष्य जिस प्रकार चिन्तनीय बनता जा रहा है, उसे महामारी प्रवाह की तरह किसी अदृश्य विष वमन का परिणाम समझा जा सकता है। अच्छा हो प्रत्यक्ष को ही सब कुछ न समझकर परोक्ष की ओर भी दृष्टि दौड़ाई जाय और उस क्षेत्र में संव्याप्त अशुभ से निपटने तथा शुभ का परिपोषण करने के लिए उपाय सोचे और प्रयास किये जायें। न सुलझने वाली गुत्थियों को सुलझाने के लिए हमारा ध्यान परोक्ष की ओर मुड़े और अदृश्य के सन्तुलन का प्रयास चले तो उसे यथार्थ का अवलम्बन ही कहा जायेगा।
आज तत्वदर्शी मनीषीगण, वायुमण्डल के प्रदूषण से नहीं, सूक्ष्म वातावरण के बिगड़ने से अधिक चिन्तित हैं। वे जानते हैं कि वातावरण का प्रवाह मानवी तूफानों से भी अधिक सशक्त होता है। कभी युद्धोन्माद का प्रवाह बहता है तो कभी विलासिता की लहर दौड़ने लगती है। नाज़ीवाद और फ्राँस के विकास की अवधि में इसे अच्छी तरह देखा गया है कि वातावरण कितना सशक्त होता है। इन दिनों व्यक्तिवादी संकीर्णता- प्रत्यक्षवादी भौतिकता का रंग हर किसी पर चढ़ा हुआ है। ऐसे में उपचार स्थूल स्तर पर नहीं सूक्ष्म स्तर पर सत्प्रवृत्ति संवर्धन के रूप में, आदर्शवादी दूरदर्शिता के व्यापक प्रचार-प्रसार के रूप में करना होगा। जिन्हें परोक्ष का थोड़ा भी ज्ञान हो, वे भली-भाँति समझ सकते हैं कि ऐसे प्रयास उपचार चल रहे हैं और संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त सन्निकट है।
अदृश्य जगत इस दृश्यमान जगत का प्राण है। उसका विस्तार, वैभव एवं सामर्थ्य स्रोत इतना बड़ा है कि प्रत्यक्ष को इसका नगण्य-सा भाग कहा जा सकता है। जल का जितना प्रवाही स्वरूप है, उसकी तुलना में आकाश में भ्रमण करने वाला उसका वाष्प स्वरूप कहीं अधिक है। इसी प्रकार प्रकृति के अन्यान्य पदार्थ जितने पृथ्वी पर ठोस रूप में विद्यमान हैं, उसकी अपेक्षा वायुभूत होकर अनेक गुनी मात्रा में आकाश में उड़ते रहते हैं। अन्तरिक्ष की तुलना में धरातल को रंचमात्र ही समझा जा सकता है। सम्पदा के असीम भाण्डागार आकाश में परिभ्रमण करते रहते हैं। परोक्ष विज्ञान के ज्ञाता उसमें से जिस वस्तु को जब जितनी मात्रा में आवश्यकता होती है, खींचकर हस्तगत कर लेते हैं। सिद्धियाँ इसी को कहते हैं। उनके सहारे दृश्य को अदृश्य और अदृश्य को दृश्य में परिणत किया जा सकता है।
अतीन्द्रिय क्षमताओं के चमत्कारी घटनाक्रम भी इसी आधार पर घटित होते हैं। दिव्य सामर्थ्यों के भण्डार मानवी अन्तराल में बीज रूप से विद्यमान हैं। उन्हें प्रसुप्त से जागृत, अदृश्य से प्रकट करने की विधा को साधना कहते हैं। यह और कुछ नहीं अप्रकट का प्रकटीकरण मात्र है। बीज रूप में अपने इर्द-गिर्द वह समस्त वैभव बिखरा पड़ा है जिसे सृष्टा की अनेकानेक विभूतियों के रूप में समझा-समझाया जाता रहता है।
शरीरधारी प्राणी इस धरातल पर विचरण करते और अपनी हलचलों का परिचय देते देखे जाते हैं। इसकी तुलना में अशरीरी प्राणियों की संख्या असंख्यों गुनी अधिक है जो आकाश में भ्रमणशील रहती है। यहाँ चर्चा जीवाणुओं, विषाणुओं की नहीं हो रही है वरन् उन सूक्ष्म शरीर धारियों की हो रही है, जो इस समय भूत स्थिति में रह रहे हैं। जो कभी मनुष्य की तरह ही दृश्यमान थे, या निकट भविष्य में फिर वैसा ही कलेवर धारण करने जा रहे हैं। प्रेत, पितर, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, भूत, पिशाच, देव-दानव ऐसे ही जीवात्मा हैं, जो स्थूल शरीर से रहित होने पर भी सत्ताधारी एवं शक्तिशाली होते हैं। इनके अनुग्रह एवं आक्रोश से पृथ्वी के पदा एवं प्राणियों को उपलब्धियों का लाभ एवं विपत्तियों का त्रास मिलता है। यह समुदाय प्रत्यक्षतः सम्बद्ध तो नहीं दीखता और न उनके साथ अविज्ञात रूप में चलते रहने वाले आदान-प्रदान का आभास मिलता है, तो भी यह नहीं समझना चाहिए कि मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान अदृश्य जीवधारियों का अस्तित्व इस विशाल अन्तरिक्ष में विद्यमान नहीं है। समय-समय पर उनका अस्तित्व प्रत्यक्ष परिचय में भी आता रहा है। पुराण गाथाओं में तो उन्हीं का कर्तृत्व प्रधान रूप से लिखा गया है।
इन दिनों प्रति विश्वएन्टी युनिवर्स की चर्चा ने वैज्ञानिक क्षेत्र में एक नई हलचल प्रस्तुत की है। अपने इसी विज्ञान जगत के पीछे अविच्छिन्न रूप से गुँथा हुआ एक-दूसरे अदृश्य संसार का अस्तित्व खोज निकाला गया है। वह सामर्थ्य एवं विस्तार की दृष्टि से सूक्ष्म होने के कारण हर दृष्टि से वरिष्ठ पाया गया है। एण्टी मैटर- ऐण्टी एटम आदि के रूप में उसकी सत्ता एवं क्षमता का विस्तृत विवेचन होने लगा है और कहा जाने लगा है कि इन दोनों के बीच का सन्तुलन किसी कारण बिगड़ गया तो फिर महाप्रलय निश्चित है। इस संदर्भ में यह चर्चा भी होती रहती है कि यदि किसी प्रकार प्रत्यक्ष विश्व और परोक्ष विश्व के मध्य अधिक गहरा आदान प्रदान चल पड़े तो अपने इसी धरातल पर स्वर्ग लोक जैसी परिस्थितियाँ दृष्टिगोचर होने लगेंगी।
विज्ञान जगत के दृश्य स्वरूप से उसका शक्ति तरंगों वाला अदृश्य क्षेत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ईथर, लेसर, जैसी अविज्ञात शक्तियाँ उसी क्षेत्र की हैं। अणु शक्ति को भी ऐसी ही सम्पदा समझा जा सकता है। यह जड़ सृष्टि का विवरण है। प्राणियों के शरीर भी इसी में सम्मिलित हैं। विज्ञान का भावी चरण इसी क्षेत्र में पदार्पण करने का है। इसके लिए उसे अनिवार्यतः अध्यात्म का अवलम्बन लेना पड़ेगा। पैरा साइकोलॉजी- मैटाफिजिक्स- एस्ट्रोफिजिक्स, पैराफिजिक्स आदि के सहारे इसका ढाँचा भी खड़ा किया जा रहा है।
अंतर्ग्रही शक्तियों का पृथ्वी के साथ संपर्क एवं आदान-प्रदान का स्वरूप ऐसा आश्चर्यजनक है कि दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। विश्व ब्रह्माण्ड की उपलब्ध जानकारी में पृथ्वी को सबसे अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुख-सुविधाओं से भरी-पूरी माना जाता है। यह स्थिति पृथ्वी को अपनी विशेषताओं के आधार पर विनिर्मित नहीं हुई हैं, वरन् सौर-मण्डल के ग्रह-उपग्रहों के- ब्रह्माण्ड स्थित अन्यान्य तारकों के सन्तुलित अनुदानों से उसे यह सौभाग्य मिला है। बच्चा अपने बलबूते ही अनेकानेक साधन-सुविधाओं से भरा-पूरा जीवन नहीं जीता। उसे यह स्थिति अभिभावकों, कुटुम्ब, सम्बन्धी, पड़ौसी ही नहीं असंख्य व्यक्ति अपने-अपने ढंग से सहयोग प्रदान करके उपलब्ध कराते हैं। ठीक इसी प्रकार पृथ्वी को ऐसा अद्भुत सुयोग मिला है कि अनेकानेक यह गोलकों के अनुग्रह ने इसकी स्थिति विलक्षण कलाकृति जैसी बना दी है। उत्तरी ध्रुव उन अन्तर्ग्रही अनुदानों को खींचता है। बचे-खुचे कचरे को दक्षिण ध्रुव मार्ग से अन्तरिक्ष के खड्डे में पटकता रहता है। पृथ्वी को प्राण पोषण सूर्य चन्द्र से नहीं अनेकानेक नक्षत्रों से उपलब्ध होता है। बादल बरसते दीखते हैं, पर लोक-लोकान्तरों से जो बहुमूल्य सम्पदा बरसती है उसे कोई इसलिए जान-समझ नहीं पाता कि वह दृश्य न होकर अदृश्य होती है। परोक्ष होने के कारण तो लोग आत्मा तक को भूल जाते हैं और उसके अस्तित्व तक को नकारने लगते हैं।
चेतना का एक विशाल समुद्र आकाश में उसी प्रकार भरा हुआ है जैसा कि वायुमण्डल। इसी को अदृश्य जगत समझा जाता है। वायुमण्डल के प्राणवान या विषाक्त होने की बात सभी जानते हैं। धुंआ, विकिरण, कोलाहल, धूल, धुन्ध आदि के कारण वायु प्रदूषण बढ़ने और उसके कारण मौसम पर, वनस्पतियाँ पर, प्राणियों पर, पदार्थों पर घातक प्रभाव पड़ने की बात सर्वविदित है। बढ़ते हुए तापमान से ध्रुवीय बर्फ पिघलने से समुद्र के उमड़ पड़ने और हिम प्रलय के आधार पर बनने जैसी आशंकाओं से भरी हुई चेतावनियाँ आये दिन पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। ठीक इसी प्रकार उपयुक्त वायुमण्डल की संजीवनी का भी ऊहापोह रहता है। लोग उपयुक्त जलवायु वाले स्थानों में रहकर स्वास्थ्य सुधारने का प्रयत्न करते हैं। सेनेटोरियम प्रायः ऐसे ही स्थानों पर बनते हैं। पंजाबियों और बंगालियों के स्वास्थ्य में जो अन्तर पाया जाता है, उसमें भी उन क्षेत्रों की जलवायु को ही प्रधान कारण माना जाता है। सर्दी के दिन स्वास्थ्य सुधरने और गर्मी में बिगड़ने की बात भी वायुमण्डलीय परिवर्तनों पर आधारित है।
अदृश्य के उपरोक्त ऊहापोह में एक कड़ी और जुड़ती है मानवी हलचलों के कारण चेतनात्मक वातावरण के प्रभावित होने की। विचारों को भी अब रेडियो तरंगों के समतुल्य एक सशक्त इकाई के रूप में आँकलन किया जा रहा है। उनके कारण व्यक्ति परस्पर तो प्रभावित होता है। यह सुनिश्चित है। सत्संग कुसंग के भले-बुरे परिणामों में भी विचारशक्ति का प्रभाव क्षमता का निरूपण होता ही है। बात इससे भी एक कदम और आगे की है। चेतनात्मक वातावरण भी उनसे प्रभावित होता है। जन-समुदाय की विचारणा, आकाँक्षा चेष्टा जिस स्तर की होती ही है उसके अनुरूप अदृश्य वातावरण बनता है और भली बुरी परिस्थितियों के रूप में प्रकट होता है। सतयुग और कलियुग की परिस्थितियों में जो अन्दर पाया जाता है, उसका कारण विधाता का मनमर्जी या नियति का निर्धारण नहीं, वरन् मनुष्य के चिन्तन चरित्र से उत्पन्न हुई प्रतिक्रिया है।
सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इन दिनों वायुमण्डल में प्रदूषण बढ़ने की तरह ही चेतनात्मक वातावरण के समुद्र में भी भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट चरित्र के कारण विषाक्तता बेतरह बढ़ चली है। समुद्र तल पर तेल बिखर जाने से उन क्षेत्रों के जलचर घुटन से संत्रस्त होकर मरण के मुख में जाते देखे जाते हैं। ठीक इसी प्रकार अदृश्य वातावरण में आसुरी तत्वों की वृद्धि से अनेकानेक संकट एवं विग्रह खड़े होते हैं। न सुलझते हैं। न घटते हैं, न टलते हैं। सामान्य स्तर के समाधान प्रयास प्रायः निरर्थक ही चले जाते हैं। प्रस्तुत परिस्थितियों का विश्लेषण इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
अपराधों की उठती लहर इन दिनों कुछ ऐसी चल रही है। जिससे बाल-वृद्ध सभी बेतरह प्रभावित हैं। अच्छे परिवारों में पलने वाले बालक भी छुटपन से अवाँछनीयताएँ अपनाते देखे जाते हैं। अब अभावग्रस्त ही अपराध नहीं करते सुसम्पन्न उनसे इस क्षेत्र में कहीं आगे हैं। सामूहिक बलात्कार, वधू दाह, बाल हत्याओं का जैसा प्रचलन इन दिनों हुआ है उतना इससे पूर्व कभी भी देखा सुना नहीं गया। मित्रघात, विश्वासघात अब एक सामान्य लोक प्रचलन जैसा बनता जा रहा है। आलस्य, प्रमाद, विलास, व्यसन, असंयम अपने समय के सर्वमान्य प्रचलन बन गये हैं। उनकी प्रतिक्रियाएँ समुदाय, समाज को बेतरह तोड़-मरोड़कर रख दे रही है। सरकारी गैर-सरकारी रोकथाम जलते तवे पर छींटे पड़ने की तरह निरर्थक सिद्ध हो रही है।
सबसे बड़ी विपत्ति है दैवी प्रकोप। मनुष्यकृत विपत्तिओं की तुलना में अदृश्य में बरसने वाली विभीषिकाओं का अनुपात और भी अधिक है। उन्हें देखते हुए कई बार तो महाप्रलय निकट होने जैसी आशंका सामने आ खड़ी होती है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? क्या भयभीत होकर मरण-पर्व की तैयारी आरम्भ कर दी जाय? जनसाधारण विचार कर सकने में भी स्वयं को असहाय पाता है। ऐसे में संघ शक्ति के सुनियोजन द्वारा अदृश्य के- परोक्ष के परिशोधन की चर्चा मनीषीगण करते आए हैं। ऐसी स्थिति पहले भी जब आयी है, पृथ्वीवासी हाथ मलते हुए चुपचाप बैठे तमाशा नहीं देखते रहे। एक विचारणा के- सतयुगी वातावरण लाने को संकल्पित मुट्ठी भर व्यक्तियों ने वह कार्य कर दिखाया है जो आज भी मार्गदर्शन दे सकने में समर्थ है। अनीति एवं अनाचार, विक्षुब्ध प्रकृति और दैवी प्रकोप स्थायी नहीं अस्थायी प्रतिक्रियाएँ हैं। नीतिमत्ता और आचरण में पवित्रता का समावेश किए बिना इनका निवारण सम्भव नहीं। प्रज्ञा अभियान के रूप में एक संघशक्ति की स्थापना प्राथमिक प्रयास है। सामूहिक धर्मानुष्ठान का आयोजन तथा सत्प्रवृत्ति संवर्धन के विभिन्न कार्यक्रम इसका उत्तरार्ध है। इन्हें इन्हीं दिनों क्रियान्वित किया जाना है। कहना न होगा कि आसन्न विभीषिकाओं का निवारण ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थ के बिना सम्भव नहीं।
“बीसवीं सदी के बढ़ते औद्योगीकरण और नाभिकीय परीक्षणों से जो विष की मात्रा वातावरण में बढ़ी है, उससे आनुवाँशिक रोगों, शारीरिक और मानसिक व्याधियों की सारे विश्व में बाढ़ आ गयी है। अपाहिजों और अपंगों की नयी पीढ़ी तैयार हो रही है जो सन् 2000 के बाद विश्व की 6 अरब जनसंख्या की दो तिहाई होगी। यह मत है- क्रीस्टोफर नारवुड का जिन्होंने विकिरण परीक्षणों पर एक पुस्तक लिखी है- “एट हाइएस्ट रिस्क”। उन्होंने पाया कि अमेरिका के शहरी क्षेत्रों में विकिरण की मात्रा दस से पन्द्रह करोड़ गुना अधिक सघन है। इससे संव्याप्त विषाक्तता ने सारे विश्व के पर्यावरण सन्तुलन को बिगाड़ दिया है।
ध्वंस की प्रक्रिया बड़ी कष्टदायी होती है। ऐसी सम्भावनाओं से ही मनुष्य भयभीत तथा भविष्य के विषय में और भी आशंकित हो उठता है। मरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, फिर भी उसका स्वरूप बड़ा वीभत्स होता है। बिछोह से प्रियजन रोते-बिलखते देखे जाते हैं। जिस प्रकार अन्त्येष्टि क्रिया की जाती है, उससे लगता है क्या यह सब सरंजाम इस कटु-हृदयस्पर्शी ढंग के करना जरूरी है। जलाने, कपाल क्रिया करने, गाढ़ने, बहाने की क्रिया उसी निर्जीव काया के साथ की जाती है, जिसे जीवित अवस्था में इतना स्नेह-सम्मान दिया गया था। सारे घर में उदासी का साम्राज्य छाया होता है। मृतक की छवि- जीवित अवधि के क्रिया-कलाप आँखों के सामने घूमते हैं। ऐसा लगता है कि सारा घटनाक्रम, मरण का विधान एक दैवी अभिशाप है। ईश्वर ने जिन सुन्दर कलाकृतियों को अपने हाथों से बनाया है, इतनी निर्दयता से उन्हें वह ऐसे तोड़ डालता है जैसे उसका कोई नाता न हो।
इस प्रसंग की चर्चा इस संदर्भ में विशेष रूप से की जा रही है प्रस्तुत संधिकाल एवं आने वाला समय कुछ ऐसी ही त्रासयुक्त विभीषिकाओं से भरा है। असमय की वर्षा, सूखा, महामारी, बवण्डर-तूफान, मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन, भूकम्पों, की बाढ़, ज्वालामुखियों का फटना, असन्तुलित जनसंख्या के साथ-साथ आयुध शक्ति में अनियन्त्रित वृद्धि, अपराधों की रोकथाम के सभी प्रयासों में असफलता, पारस्परिक विद्वेष एवं अलगाव की वृत्ति जैसी परिस्थितियाँ यही बताती हैं कि भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के साथ ही अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ भी इन दिनों बड़ी तेजी से बदली हैं। कहा यह भी जा सकता है कि प्रस्तुत विक्षुब्ध वातावरण के निर्माण में विकृत चिन्तन का भी योगदान है। महाकाल के इस बदलते समय में प्रलयंकर स्वरूप को देखते हुए यह चिन्तन सहज ही उभरता है कि क्या यह परमसत्ता अपनी शक्ति से बिना किसी अप्रिय घटनाक्रम को अपने अशुभ को शुभ में नहीं बदल सकती थी?
इन सभी के मूल कारण को समझने के लिए हमें विश्वविधान से जुड़ी व्यापक परिवर्तन प्रक्रिया को भली-भाँति समझना होगा। प्रकृति चक्र में जन्म, अभिवर्धन, जीर्णता और मृत्यु का एक नियत निर्धारित क्रम है। यह न होता तो सब कुछ स्थिर ही रहता। स्थिरता में सुविधा तो है पर नवीनता का सौंदर्य और परिवर्तन का उत्साह एक प्रकार से समाप्त ही हो जाता है। परमेश्वर को परिवर्तन चाहिए एवं जीव सत्ता को भी। आज जो युग परिवर्तन का स्वरूप देखने में आ रहा है, उसमें होने वाली उथल-पुथल में कर्कशता, निर्दयता तो नजर आती है पर वह दुर्गतिजन्य नहीं है। उसके पीछे भी सुखद सम्भावनाएँ निहित हैं।
शरीर जब वृद्ध हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, टाँगें लड़खड़ाती हैं, दमा, खाँसी जैसे रोग घर कर लेते हैं। जीव कोशों के मरने का क्रम बढ़ जाता है। जबकि उस अनुपात में युवावस्था में सतत् उनके जन्मते रहने का क्रम होता है। यह प्रक्रिया अनिवार्य है। क्योंकि अवाँछनीय को, कुरूप को हटाना ही एकमात्र उपाय है ताकि नया शरीर जन्म ले सके।
आज की परिस्थितियों में भी कुरूपता, अनुपयोगिता, अनीति, अवाँछनीयता का बेतरह विस्तार हुआ है। भौतिक सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, पर उसके साथ जो चेतना का विकास होता था, सत्प्रवृत्तियां बढ़नी थीं, नहीं बढ़ीं। ऐसे में मानव, जो न स्वयं सुखी है, न औरों को सुखी देखना चाहता है, जिसके भविष्य में सुधरने की कोई गुंजाइश भी नहीं नजर आती, को बदलने हेतु एक समग्र ‘ओवरहॉलिंग’ भी जरूरी है। गलाने व ढालने, झाड़ियाँ काटकर सुरम्य उद्यान लगाने की प्रक्रिया में यही होता है। जो भी कुछ कूड़ा, करकट है, बेकार हो गया है, उसे साफ कर कुछ नया बनाया जाय, यही चिन्तन मुख्य है। महाकाल की अनुशासित विधि-व्यवस्था को गलाने वाली एक विशाल भट्टी एवं ढालने वाली मशीन के रूप में समझा जा सकता है। यह क्रिया-कलाप देखने में तो बड़ा वीभत्स, उन्मादियों का किया हुआ लगता है पर है सारा अभिनव और सुखद सृजन के निमित्त ही।
नादान-उदर पूर्णा तक ही अपने को सीमित रखने वाले तो ऐसी परिस्थितियों में भी किसी तरह अपनी ही स्वार्थान्धता तक सिकुड़े नजर आते हैं। लेकिन बुद्धिमत्ता जिनके पास भी है, उन्हें यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होती कि ऐसी परिस्थितियाँ क्यों कर विनिर्मित हुईं व इनका समाधान क्या हो सकता है? वे यह भी भली-भाँति जानते हैं कि दुष्कृत्य भले ही एक सीमित समुदाय का हो, परिणति को सभी को भुगतना होगा। यह एक शाश्वत नियम व्यवस्था है, जिसे कड़वा घूँट पीकर ही सही, पर स्वीकार करना ही होगा। अवाँछनीयता के निवारण हेतु ऐसी विध्वंस लीला रचे बिना लक्ष्यपूर्ति सम्भव नहीं। मानवी पुरुषार्थ इसमें दूरदर्शिता का चयन कर उस दिशा में ही नियोजित हो सके तो विध्वंस का परिणाम एवं स्वरूप कम भी हो सकता है। थोड़ा-सा समुदाय भी सदुद्देश्यों में नियोजित साधना-पराक्रम द्वारा इस दुर्गति रूपी परिणति की सम्भावना का मिटा सकता है। परन्तु अदूरदर्शी समुदाय जिसे नरपशु-नरपामर की संगति दी जा सकती है, मात्र प्रताड़ना की ही भाषा समझता है। समझाने का, दूरदर्शिता के चयन के सत्परामर्श का उन पर कोई असर नहीं होता। इन्हें प्रकृति अथवा महाकाल रूपी दैवी अनुशासन फिर लाठी की भाषा से ही ठीक करता है। एक सज्जन एवं करुण हृदय न्यायाधीश को भी परिस्थिति विशेष में फाँसी की सजा सुनानी ही पड़ती है। प्रशासक भले ही निजी जीवन में कितना ही दयालु क्यों न हो, उसे जल्लाद का प्रबन्ध करना ही पड़ता है। इसमें एकमात्र प्रयोजन यह है कि अपराधी को दण्ड तो मिले, पर दूसरों को शिक्षा भी मिले। पशु-प्रवृत्तियों को, चाहे वे व्यष्टिगत हों अथवा समष्टिगत, सदाशयता का महत्व समझाने के लिए दण्ड व्यवस्था का आश्रय लेना ही होगा। इससे कम में कोई विकल्प ही नहीं बनता। आज की सामूहिक प्रताड़ना के पीछे, विक्षुब्ध प्रकृति की ध्वंस लीला के पीछे इसी उद्देश्य को समझा जा सकता है।
आज कृपणता और निष्ठुरता का जैसा प्रचलन है, चिन्तन और चरित्र का जो गिरा हुआ स्तर है, कुकृत्यों की समाज परिकर में जो भरमार है, उनकी सामूहिक प्रतिक्रिया मात्र एक ही परिणति के रूप में दिखाई देती है- विश्व विनाश लगता है मनुष्य ने सामूहिक आत्महत्या का सरंजाम ही जुटा लिया हो और उस विपत्ति से उबर पाने का कोई कारगर उपाय ही नहीं बन पा रहा हो।
जैसे-वैसे औद्योगीकरण बड़ा है, कल-कारखाने व प्रदूषण में भी वृद्धि हुई। समग्र वातावरण, धरती, जल सम्पदा, सूक्ष्म वातावरण विषाक्त होता जा रहा है। मनुष्य हर घड़ी ढेरों मात्रा में विष श्वास व उदर मार्ग से ग्रहण कर रहा है। हिम युग, जल-प्रलय, मौसम परिवर्तन व महामारियाँ इन सबकी परिणति रूप में आसन्न विभीषिकाओं की भाँति सामने खड़ी दिखाई दे रही हैं। अमर्यादित प्रजनन ने जो नये अतिथि इस छोटे से ग्लोब पर एकत्र कर दिए हैं, उनके भरण-पोषण निर्वाह की एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है। घटते ग्राम-बढ़ते कस्बे, शहर तथा गन्दी बस्तियाँ निरन्तर बेरोजगारी- दारिद्र्य एवं महामारी को आमन्त्रित कर रहे हैं। संसाधन घटते चले जा रहे हैं, उपभोग कर्त्ताओं की संख्या में कोई कमी नहीं हो रही। जब वे समाप्त ही जाएँगे तब के दृश्य की कल्पना से ही जी दहल उठता है। शोषण और अहमन्यता की वृत्ति चरम सीमा पर है। अलगाव-वृत्ति, प्राँतीयवाद, ऊँच-नीच, राष्ट्रों की परस्पर खींचतान ने कहीं गृह-युद्ध एवं कहीं शीतयुद्ध की स्थिति पैदा कर दी है। अणु आयुधों के प्रयोग से- विकिरण विभीषिका ने कितना नरसंहार होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। तब सम्भवतः आइन्स्टीन की वह उक्ति साकार नजर आएगी कि “तीसरा विश्वयुद्ध अणुशक्ति से तथा अन्तिम आदि मानवों के मध्य पत्थरों से लड़ा जाएगा।” ऐसी स्थिति के पूर्व की बेला को ही युग सन्धि काल कहा गया है।
युग सन्धि बेला की तुलना प्रसव पीड़ा से की जा सकती है। इस उपक्रम में मरणातक कष्ट और रक्तपात का रोमाँच भरा घटनाक्रम घटित होता है। परन्तु साथ-साथ नवजात शिशु के आगमन से बनती दूरगामी सम्भावना से हृदय में हिलोरें भी उठती हैं। बालक के पोषण वस्त्रादि की योजनाएँ बनतीं और तैयारी चलती हैं। पीड़ा और प्रसन्नता का जैसा समन्वय उस प्रसवकाल में देखा जाता है। लगभग वैसा ही हमें आगामी 16-17 वर्षों में देखने को मिल सकता है।
ऐसी स्थिति में सज्जन भी दुर्जनों के साथ उस चपेट में आये बिना नहीं रह सकते। जब रोगाणुओं को नष्ट करने के लिये औषधि ली जाती है। तो वह जीवाणु-विषाणुओं के अतिरिक्त स्वस्थ जीवकोषों व रक्तकणों को प्रभावित करती है। उथल-पुथल के इस समय में गेहूँ व घुन के साथ-साथ पिसने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। दण्ड व्यवस्था की- विनाश लीला की चपेट में निर्दोष दीखने वालों के भी आ जाने का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि वे भी उस समष्टिगत सत्ता के एक घटक हैं। उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे जितना ध्यान अपनी निजी सुविधा को बढ़ाने में लगाते हैं, उतना ही माली की तरह इस विश्व उद्यान को भी सजाने-बुहारने में लगाएँ। मात्र गुण्डागर्दी ही अपराध नहीं, लापरवाही गैरजिम्मेदारी, इक्कड़पन भी एक अपराध है। दण्ड उसे भी मिलना चाहिए। अपराधी क्षेत्र के निवासियों पर सामूहिक जुर्माने भी किये जाते हैं। भले ही उन्होंने कोई अपराध न किया हो पर मूक दर्शक की तरह देखा कैसे? यह भी एक अपराध है। नागरिक कर्त्तव्यों में उपेक्षा बरतना भी प्रकारान्तर से स्वयं को अपराधी की श्रेणी में ला खड़ा करना है।
संसार में विपन्नता का बढ़ना एक प्रकार से आपत्तिकाल है। ऐसे में युग धर्म निबाहा ही जाना चाहिए। प्रज्ञा पुरश्चरण की महत्ता को एक प्रकार से अवाँछनीयता के निवारण हेतु विभीषिकाओं से जूझने हेतु आत्मबल-वर्धन की सामूहिक साधना रूपी पराक्रम के रूप में समझा जा सकता है। समूह रक्षा हर व्यक्ति की विशेष जिम्मेदारी है। इसे टाला नहीं जा सकता।
सृष्टि के इतिहास में ऐसी स्थिति पहले नहीं आई। ऐसी बात नहीं। जब-जब ऐसी विभीषिकाएँ प्रस्तुत हुई हैं, उन्हें सद्भावना की सामूहिक शक्ति ने ही निरस्त किया है। प्रकारान्तर से इस संघशक्ति को ही अवतार कहते हैं जो समय काल के अनुसार छोटे अथवा बड़े रूप में प्रकट होती रहती हैं। जो-जो सहायता के लिये आगे आता है, सदाशयता को बढ़ाता है, वह स्वयं भी धन्य होता है, अनेकों की नाव पार लगाता है। कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों हमारे ही सम्मुख है, जिसे आँख मूँदकर नकारा नहीं जा सकता। कोई बहुत ही निष्ठुर स्वार्थी व्यक्ति हो तो बात अलग है। जिसके अन्दर थोड़ी सी भी शालीनता होगी, वह इस विषम-बेला को समझकर आचरण बदल कर ही रहेगा।
चरित्र की रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए। धन तो आता है और चला जाता है। धन से क्षीण मनुष्य विनष्ट नहीं होता, परन्तु चरित्र से क्षीण मनुष्य का पूर्णतया विनाश ही हो जाता है।
करना क्या होगा? यही वह धुरी है जहाँ सभी को संघबद्ध हो चिन्तन करना है। जब-जब ऐसी स्थिति आयी है, गिने-चुने व्यक्तियों के पुरुषार्थ ने ही महाप्रलय को टाला है। दिव्य दृष्टि सम्पन्न महामनीषी गणों का भी यही कथन है कि आगामी कुछ वर्षों में अवाँछनीयता विस्तार के साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन वाली गतिविधियाँ भी जन्म लेंगी। प्रज्ञा परिजनों के अन्तर इसके बीजाँकुर विद्यमान हैं। जिस गति से विभीषिकाओं के घटाटोप बादल उमड़े हैं, उसी अनुपात में जनमानस भी सारे विश्व में जागृत हुआ है। इस संघशक्ति के सामूहिक प्रयास प्रकारान्तर से अवतार प्रक्रिया के अभिन्न अंग के रूप में दैवी भूमिका निभा सकेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं। आसन्न परिस्थितियों से घबराने की नहीं, अपितु उनसे जूझने उन्हें जन्म देने वाली दुष्प्रवृत्ति को मिटाने की आवश्यकता है। प्रज्ञा पुरश्चरण इसी निमित्त अगले दिनों करोड़ों परिजनों द्वारा सम्पन्न किया जाएगा। इसकी परिणति वैसी ही सुखद होगी, जिसकी कि सम्भावना व्यक्त की जाती रही है।
“मुझे स्पष्ट आभास हो रहा है कि वर्तमान भोगवादी सभ्यता अपने ही दुष्कृत्यों से अपनी मौत मरेगी। इसके उपरान्त ही एक नयी सभ्यता जन्म लेगी।” ये शब्द हैं 19 वीं सदी के महान दार्शनिक रोमाँ रोलाँ के। इनका नाम उसी लम्बी शृंखला में आता है, जिसमें संसार भर के वैज्ञानिकों, मूर्धन्य दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों ने समय-समय पर भविष्य संबंधी अपने विचार व्यक्त किये हैं। विशिष्ट बात यह है कि लगभग सभी इस तथ्य पर एकमत हैं कि 1980 से लेकर 2000 तक का समय भयावह विभीषिकाओं का समय है। विनाशकारी कारण इन दिनों बढ़ते चले जायेंगे। फलतः विश्व संकट के बादल भी घने होते जायेंगे। महाप्रलय न भी हुई तो भी ऐसी विपन्नताजन्य विषम परिस्थितियाँ जन्म लेंगी, जिन्हें निरस्त करने के लिये महाकाल को काफी कुछ उलट-फेर, भयानक तोड़-फोड़ करनी पड़ेगी ताकि असुरता घटे व देवत्व पनपे।
ऐसे कथन, जिन्हें पूर्वाभास एवं भविष्य दर्शन की विधा द्वारा अथवा साँख्यिकी कम्प्यूटर साइन्स के माध्यम से समय-समय पर व्यक्त किया जाता रहा है, चार भागों में बाँटे जा सकते हैं। ये हैं-
(1) मूर्धन्य अदृश्य दर्शियों के भविष्य कथन (2) ज्योतिर्विज्ञान के मनीषी (3) भविष्य विज्ञान नामक विधा के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से अपने कथनों को पुष्ट करने वाले विद्वत्जन (4) विभिन्न धर्मग्रन्थों के भविष्य संबंधी महत्वपूर्ण उद्धरण।
अभी तक इन चारों ही वर्गों द्वारा की गयी समस्त भविष्यवाणियाँ समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता कि यह एक विशिष्ट समय है, संक्रान्ति काल है, जब मानवता पुराना चोला उतार कर नवीन स्वरूप में जन्मने वाली है। युग सन्धि की इस उथल-पुथल को समष्टिगत कारणों के परिप्रेक्ष्य में समझना इसलिए भी जरूरी है कि समय रहते वे उपाय-उपचार अपनाए जाएँ ताकि विक्षुब्ध अदृश्य जगत को शान्त किया जा सके, परिस्थितियों को बदलने का लंका दहन व रामराज्य स्थापना जैसा युगीन पराक्रम पुरुषार्थ सम्पन्न किया जा सके।
मूर्धन्य दिव्य दृष्टि सम्पन्न महा-मनीषियों में जो प्रख्यात हैं, उनमें जूल बर्न, जीन डीक्सन, जॉन सैवेज, प्रोफेसर हरार, एण्डरसन, कीरो, नोस्ट्राडेमस, डोरोथी एलिसन, आयरीन ह्यूजेज, रेने ड्यूमा, बर्नार्ड रोजियर, एफ.सी. हैपोल्ड, मदर श्रिफ्टन एवं योगीराज अरविन्द आदि का नाम लिया जाता रहा है। ये सभी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के अदृश्य शक्ति सम्पन्न साधक रहे हैं। अन्तरिक्ष के गर्भ में पक रही हलचलों को इन्होंने समय-समय पर व्यक्त कर विश्व मानस को चेताया है। अपनी स्वयं की योग साधना से अथवा पूर्व संचित संस्कारों के कारण, दिव्य क्षमताओं के धनी इन सभी मनीषियों के कथन का सार इसी रूप में समझा जा सकता है।
“सारे विश्व में 1979-80 के बाद व्यापक उथल-पुथल होगी। अनेकों राष्ट्र प्रमुखों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। 1984-85 का समय विश्वव्यापी तनाव एवं शीतयुद्ध की स्थिति का है। आयुध शक्ति से परिपूर्ण सभी राष्ट्र आगामी विश्व युद्ध में भाग ले सकते हैं, जो अणु-शक्ति से नहीं, विषाणुओं से लड़ा जायगा। फलतः भारी संख्या में व्यक्ति मारे जायेंगे, महामारियाँ फैलेगी, करोड़ों अपंग हो जायेंगे। इतना ही नहीं, मानवी कृत्यों से क्षुब्ध प्रकृति अपनी ध्वंसलीला विप्लव, अतिवृष्टि, कहीं भयंकर गर्मी- कहीं हिमपात, समुद्री तूफान एवं बवण्डर भूकम्प तथा भूस्खलन के रूप में रचेगी। ऐसी नयी-नयी व्याधियाँ फैलेंगी जिन्हें सारी सुविधा- ज्ञान सम्पदा के बावजूद चिकित्सक नियन्त्रित नहीं कर पायेंगे। याँत्रिक सभ्यता एवं भोगवादी जीवनयापन पद्धति से विरत होकर सारा विश्व 1990 व 1999 के मध्य एक संघ के रूप में विकसित होगा। इसके लिये साँस्कृतिक गरिमा के लिए प्रसिद्ध पूर्वी एशिया के राष्ट्र बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। एक राष्ट्र, एक भाषा, एक आचार संहिता तथा एक विश्व व्यवस्था के रूप में एक नयी सभ्यता जन्म लेगी जिसमें सुख-सुविधा के साधन तो होंगे परन्तु जीवन-मूल्यों को, आस्था को, धर्म-धारणा को प्रमुखता मिलेगी।”
ऊपर जिन पन्द्रह मनीषियों के कथनों का उद्धरण दिया गया है, उनकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है। इन सभी ने नवयुग के अरुणोदय की कल्पना की है परन्तु उसके पूर्व सम्भावित ध्वंस-लीला को भी नकारा नहीं है। इतना तो इन सभी ने समय-समय पर कहा है कि कोई अनिवार्य नहीं कि ये घटनाक्रम घटें ही। यदि संघबद्ध प्रयास पहले से चल पड़ें तो विश्वयुद्ध टाला भी जा सकता है, प्रकृति के अनुशासित चक्र को फिर व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
“रिलीजीयस फेथ ट्वेण्टीएथ सेंचुरी” पुस्तक के लेखक भविष्य दृष्टा श्री एफ. सी. हैपोल्ड ने स्पष्ट लिखा है कि 1980 से 1988 का समय भुखमरी, प्रकृति-प्रकोप, बाढ़-भूकम्प एवं अन्तर्विग्रहों से भरा होगा, जिसकी चपेट में आज का समृद्ध कहा जाने वाला पश्चिम जगत भी अनिवार्यतः आ जायेगा। वे कहते हैं कि 1985 से 1988 के मध्य होने वाले विश्व-युद्ध को कोई महाशक्ति ही टाल सकती है। यदि यह हुआ तो मात्र 30 प्रतिशत व्यक्ति इस धरती पर बचेंगे एवं वे ही नयी संस्कृति के संस्थापक होंगे।
एडिक मेयल नामक एक ब्रिटिश लेखक ने गत दिनों मदन श्रिफ्टन की भविष्यवाणियों को प्रकाशित किया है। सोलहवीं सदी में जन्मी इस महिला के इंग्लैण्ड की भयंकर बाढ़, फ्रांस की क्रान्ति, दो विश्वयुद्धों तथा नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों सम्बन्धी सभी कथन यथार्थता की कसौटी पर सही उतरे हैं। उन्होंने आज से 330 वर्ष पूर्व लिखकर रख दिया था कि तीसरा विश्वयुद्ध परमाणु-शक्ति के विकास के कारण अत्यन्त व्यापक रूप में अन्तरिक्ष में लड़ा जाएगा। क्रुद्ध मदमत्त प्रकृति युद्ध में लिप्त मानव जाति पर और भी भयंकर प्रहार करेगी। वातावरण में सतत् घुलता विष अन्ततः मानवता पर ही बरसेगा। सद्बुद्धि की प्रेरणा इस दुर्गतिजन्य महाविनाश रूपी दुर्गति से मनुष्य समुदाय को बचा सकेगी।
“गोल्डन पाथ” नामक अन्तर्राष्ट्रीय शाँति संस्थान की संस्थापिका श्रीमती आयरीन ह्यूजेज को एक प्रामाणिक भविष्यवक्ता के रूप में ख्याति प्राप्त है। उनका कथन है कि ध्यान की गहराइयों में उन्हें भविष्य में सम्भावित घटनाओं की झाँकी चलचित्र की भाँति दिखाई देती है। उनकी भयावहता से वे रोमाँचित हो उठता है। 1985 व 1991 के मध्य तृतीय विश्वयुद्ध की सुनिश्चित सम्भावना प्रकट करते हुए वे कहती हैं कि “विनाश की तैयारी होते हुए भी महासत्ता विश्व मानवता को बचा लेगी। इसके लिये समष्टिगत प्रयास भारत से आरम्भ होंगे।”
दूसरा समूह ज्योतिर्विज्ञान के मनीषियों का है जो विशुद्धतः विज्ञान सम्मत पद्धति से काल गणना करके अंतर्ग्रही ही परिस्थितियों की एक रूपरेखा बनाते हुए लगभग एक जैसी सम्भावनाएँ ही व्यक्त करते हैं।
गर्ग, पाराशर, देवल, कश्यप जैसे ऋषियों की गिनती भारत के पुरातन ज्योतिर्विदों में की जाती है। उन्होंने आज के समय की परिस्थितियों की समीक्षा काल गणना के आधार पर काफी पूर्व कर दी थी। सौर कलंकों की संख्या में वृद्धि, बृहस्पति प्रभाव से पर्यावरण असन्तुलन, सूर्य व चन्द्र ग्रहणों का बड़ी जल्दी-जल्दी आना तथा पुच्छल तारे के रूप में विश्वव्यापी संकटों की भवितव्यता की चर्चा उनके ग्रन्थों में इसी समय विशेष के लिये की गयी है। इन पुरातन मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में आज के खगोल विज्ञानियों-रसेल कारमन तथा कार्ल साँगा, बी.बी. रमन तथा नोबेल लाँरिएट फ्रिटजाँफ काप्रा ने भी प्रस्तुत सन्धि बेला के संबंध में ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं। फिजिसिस्ट श्री काप्रा ने “द टर्निंग पाँइन्ट” नामक पुस्तक में पूर्वी सभ्यता के उभर कर आने एवं भोगवादी समाज के मिटने की चर्चा करते हुए लिखा है कि यह सब बदलती अंतर्ग्रही परिस्थितियों की प्रतिक्रिया के रूप में घटित होगा।
कीरिया के विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्विज्ञान सम्मेलन (सितम्बर 1972) तथा दिल्ली के ज्योतिर्विद् समागम (1982) में भी विभीषिकाओं के साथ-साथ विश्वव्यापी परिवर्तनों का संकेत किया गया था। सियोल में सम्पन्न उस सम्मेलन में विभिन्न देशों में आए ज्योतिर्विज्ञानियों ने दो महाशक्तियों के बीच 1980-84 के बीच बढ़ते तनाव तथा फिर अणु युद्ध की सम्भावना व्यक्त की। उन्होंने यह भी सुनिश्चित बताया कि “नव सृजन की शक्तियों का साथ देने के हटने वाले राज प्रमुखों की मृत्यु का 1985 से 1990 के बीच ऐसा योग है, जिसे टाला नहीं जा सकता। मानवी चिन्तन की विकृति एवं भ्रष्ट आचरण अगले दिनों चरम सीमा पर होगा, लेकिन महाकाल का चाबुक अपनी कड़ी दण्ड व्यवस्था द्वारा उन्हें सुधार कर ही रहेगा।” इन ज्योतिर्विज्ञानियों ने राष्ट्रों की कुण्डलियाँ बनाते हुए ग्रहों के दुष्प्रभावों को इनसे जोड़ा है व यह कहा है कि “पूर्वी एशिया से उदित एक महाशक्ति संघबद्ध प्रयास कर नूतन सृष्टि को जन्म देगी। सारे मत-मतान्तर मिट जायेंगे, वर्ण सम्प्रदाय-भाषावाद-प्राँतीयवाद -नस्लवाद जैसी दुष्प्रवृत्तियों का नामोनिशान ही मिट जायगा। इतना अवश्य है कि इस सब नव निर्माण की प्रक्रिया के पूर्व प्राकृतिक विक्षोभ चरम सीमा पर होंगे एवं अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ विषम बनी रहेंगी। भूकम्प विश्व के किसी न किसी कोने में बराबर आयेंगे। कहीं अकाल होगा तो कहीं अतिवृष्टि। कलह-अनाचार-विद्वेष बढ़ेगा तथा असाध्य रोगों की बाढ़ आएगी।”
तीसरा समूह है भविष्य विज्ञानियों का। ये अपने को ‘फ्यूचराण्टॉजिस्ट’ कहते हैं एवं वर्तमान के तथ्य व आँकड़ों के आधार पर भविष्य की रूपरेखा बनाते हैं। प्रसिद्ध चिन्तकों-वैज्ञानिकों को भी इसी श्रेणी में लिया जा सकता है जिन्होंने विज्ञान के उद्भव के साथ-साथ जुड़े अभिशापों से जन-मानस को सतत् चेताया है।
जुलाई 1980 में संसार भर के 50 प्रमुख राष्ट्रों के लगभग 6000 व्यक्ति टोरोण्टो (कनाडा) में एकत्र हुए। विभिन्न शाखाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इन सभी मनीषियों का लक्ष्य था-प्रस्तुत विभीषिकाओं एवं भावी सम्भावनाओं पर गहन विचार मन्थन करके मानव जाति के भविष्य का निर्धारण करना, ताकि आगत को टाला जा सके एवं नंगे विश्व की कल्पना को मूर्त रूप दिया जाय। अगले वर्ष यह सम्मेलन बम्बई में होने जा रहा है। इसमें प्रमुखों तथा महत्वपूर्ण भविष्य विज्ञानी-मनीषी प्रवर श्री हरमन कॉन, मार्गरेट मीड, विलियम, थॉमसन, एल्विन टॉफलर आदि ने भी भाग लिया एवं अपने शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किए।
इन नेतृत्व विज्ञानियों का कथन है कि ‘मानवी चिन्तन जिस प्रकार भ्रष्ट होता जा रहा है, उससे प्रतीत होता है, ध्वंस सुनिश्चित है। प्राकृतिक विक्षोभ और कुछ नहीं, मानव के कृत्यों की ही परिणतियाँ हैं। आने वाले दिनों में सारा विश्व इनका बाहुल्य देखेगा। पारस्परिक व्यवहार में विद्वेष एवं अलगाव तथा सामूहिक व्यवहार में युद्धोन्माद जैसी स्थिति 1991 तक बनी रहेगी। तत्पश्चात् ही सृजन में विश्वास रखने वाली शक्तियाँ उभर कर आएँगी। बढ़ती जनसंख्या से नहीं चेती मानव-जाति को महामारी-बाढ़-अंतर्ग्रही दुर्घटनाएँ-बढ़ते अपराध जैसे प्रसंग ही सच्चा सबक सिखाएंगे। सन् 2000 में जनसंख्या 6 अरब नहीं होगी, जैसाकि कहा जा रहा है। व्यापक संहार, चाहे वह युद्ध के कारण हो अथवा संसाधनों की कमी के कारण, बड़ी संख्या में जनसंख्या को लुप्त कर देगा। यह घटकर चार अरब से भी कम रह जाएगी।”
इस सम्मेलन ने “उत्तरार्द्ध चिन्तन-आदर्श आचरण” का नारा दिया ताकि भवितव्यता को टाला जा सके। इस आधार पर ही वे नवीन सुसंस्कृत विश्व की कल्पना करते हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि संघबद्ध प्रतिभावान उदारचेता ही नव सृजन में प्रमुख भूमिका निभाएँगे।”
अमेरिकी वैज्ञानिक एण्ड्रयू डगलस कम्प्यूटर से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर परिस्थितियों का मूल्याँकन करते हुए कहा है कि आने वाले दिनों में सौर कलंकों की संख्या व प्रकट होने की दर और बढ़ेगी। पहले वे प्रति 11 वर्ष 3 माह के अन्तर से आते थे। अब 1990 तक उनके निरन्तर उभरते रहने, और ज्वालाओं से अन्तरिक्षीय तापमान के बढ़ते रहने की पूरी सम्भावना है। उल्कापात, कई स्थानों पर एक साथ भूकम्पों के झटके आना, समुद्री तूफान तथा अगणित टारनेडो (बवण्डर) से परिमित जन-धन की हानि होने की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता। असाध्य महामारियाँ इतनी तेजी से फैलेंगी कि उनका उपचार ढूँढ़ने से पूर्व ही नयी जन्म ले लेंगी। इससे जो संहार होगा, उसकी तुलना में विश्वयुद्ध कहीं भी नहीं ठहरता।
एक अर्थशास्त्री-नेतृत्व विज्ञान “नौरमन मेयर” ने यह निष्कर्ष निकाला है कि वातावरण की विषाक्तता इतनी बढ़ गयी है कि मानव समुदाय की जातियाँ निरन्तर नष्ट होती जा रही है। सारे विश्व में लगभग 50 लाख प्रकार की जातियाँ मानव एवं प्राणी जगत की हैं। कारण बताते हुए वे कहते हैं कि यह सृष्टि का अनुशासित गति चक्र है जिसमें अनावश्यक वृद्धि एवं प्रदूषण को जन्म देने वाले औद्योगिक विकास की प्रतिक्रिया ही दृष्टिगोचर हो रही है।
एक रोचक भविष्यवाणी वैज्ञानिक श्री फ्रैंक वार्नेशी ने की है जो स्टाक होम के इंटरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक हैं। उनका कथन है कि “तीसरा विश्वयुद्ध 15 जून 1985 का आरम्भ होगा तथा इसे समाप्त होने से मात्र 24 घण्टे लगेंगे। इस सीमित अवधि में 14 हजार सात सौ पचास अणु प्रक्षेपास्त्र व अगणित लेसर-नापाम बम प्रयुक्त होंगे। इससे 75 करोड़ व्यक्ति तो तुरन्त मर जायेंगे, लगभग एक अरब व्यक्ति अर्धमृत हो भारभूत जीवन काटेंगे। मुख्यतः उत्तरी गोलार्द्ध में होने वाले इस युद्ध में 4140 मेगाटन अग्नि ऊष्मा प्रयुक्त होगी। इससे जो विकिरण फैलेगा-उससे आने वाले दस वर्षों में मात्र केन्सर से ही मौतें होगी। दफनाने को कहीं जगह नहीं होगी। जलाने का ईंधन न होगा। लाखों को बहा देने पर सारा वातावरण विषाक्त हो जायगा।”
आयुध विज्ञान पर आधारित यह भविष्यवाणी संभव होती भी है कि नहीं, अणु अस्त्रों की दौड़ तो उसी दिशा में चल रही है। एक और बात वे कहते हैं कि प्रति वर्ष सारे विश्व में छह से दस लाख घन फुट “आणविक कचरा” एकत्र हो रहा है। समुद्र में टोह लेने के बाद अब इन विकसित राष्ट्रों को एकमात्र विकल्प सुदूर निहारिका के रूप में ही नजर आ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे जो विकिरण युक्त वर्षा होगी, वह सौ मेगाटन के अणुबमों से भी अधिक घातक होगी।
वैज्ञानिकों के इस तीसरे समूह के बाद एक और महत्वपूर्ण पक्ष भविष्य कथनों का रह जाता है। वह है-विभिन्न धर्म-ग्रन्थों में वर्णित बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का प्रसंग। बाइबल की भविष्य वाणियाँ “सेवन टाइम्स” के नाम से जानी जाती है। रूपक शैली में वर्णित इन भविष्य वाणियों में कहा गया है कि जब यह समय आएगा, सारी दुनिया परस्पर लड़ रही होगी। अकाल पड़ेंगे, महामारी फैलेगी। प्रसिद्ध एन्थ्रापॉलजिस्ट जेम्स ग्राण्ट के अनुसार यह समय 1980 से 1995 में मध्य का होना चाहिए। हर्बर्ट आर्मस्ट्राँग ने अपनी पुस्तक “वण्डरफुल वर्ल्ड टुमारो” में बाइबल के मैथ्यू 24। 22 का हवाला देते हुए कहा है कि बीसवीं सदी के अन्त में ऐसा समय आएगा, जब सारे विश्व में शीतयुद्ध एवं नाना प्रकार के विग्रहों की बाढ़ आ जायगी। ये सभी एक महायुद्ध को जन्म देंगे जिसमें बहुत कम लोग बचेंगे।
हरिवंश पुराण (भविष्य पर्व), कल्कि पुराण, श्रीमद्भागवत् तथा मनुस्मृति के अनुसार यह कलियुग का समापन समय है। इस अवधि को सन्धिकाल कहा गया है तथा व्यापक स्तर पर विनाश की सम्भावना व्यक्त की गयी है। पिरामिड पर अंकित भविष्यवाणियों तथा कुरआन के आधार पर भी नवयुग के आगमन का समय है।
वस्तुतः सभी तत्वदर्शी इस तथ्य पर एकमत हैं कि युग परिवर्तन का ठीक यही समय है। अवाँछनीयता की गलाई इन्हीं दिनों होनी है। ऐसी परिस्थितियों में सृजन को जन्म देने-समुन्नत बनाने वाली दिव्य शक्तियोँ के साथ हाथ बँटाने हेतु जिस प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता है, उसे कमर कसकर तैयार हो जाना चाहिए। अनय को निरस्त करने में सामूहिक धर्मानुष्ठान एक महती भूमिका निभा सकते हैं। हम सबको अब इस साधना-पुरुषार्थ में एकजुट हो लग ही जाना चाहिए।
पृथ्वी सौर-मण्डल की एक अविच्छिन्न घटक है। उसकी निज की सम्पदाएँ थोड़ी सी है। अधिकाँश अन्यान्य ग्रहों से अनुदानों से मिली हैं। ताप, प्रकाश, ऊर्जा आदि उसका स्वयं का उपार्जन नहीं, सूर्य का अनुदान है। गुरुत्वाकर्षण, सन्तुलन, मौसम चक्र आदि विशेषताओं को कायम रखने के अन्यान्य ग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सौर-मण्डल के जुड़े होने के कारण उसमें होने वाली उथल-पुथल परिवर्तनों का सीधा प्रभाव पृथ्वी की परिस्थितियों पर पड़ता है। ऐसा अनुमान है कि उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के माध्यम से पृथ्वी का अन्यान्य ग्रहों से आदान-प्रदान का अदृश्य उपक्रम सतत् चलता रहता है। अंतर्ग्रही व्यतिरेक सीधे दिखायी तो नहीं पड़ते, पर उनकी प्रतिक्रियाएँ पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होती है। उन व्यतिरेकों से भूमण्डल का वातावरण, मौसम जलवायु ही नहीं जीवधारियों की शारीरिक, मानसिक स्थिति तक प्रभावित होती है।
अन्तर्ग्रहीय परिस्थितियों, हलचलों तथा परिवर्तनों का अध्ययन करने वाले खगोल शास्त्रियों तथा ज्योतिर्विदों का मत है कि विगत कुछ दशकों से अन्तरिक्ष जगत में असन्तुलन बढ़ता जा रहा है, जिसकी प्रतिक्रियाएँ अनेकों प्रकार से प्रकट हो रही है। यह स्थिति यथावत् बनी रही हो अगले दिनों प्राकृतिक विपदाओं, प्रकोपों तथा भयंकर विक्षोभों की महा विभीषिका प्रस्तुत हो सकती है। सम्भव है उसकी चपेट में समस्त संसार को आना पड़े तथा अपना अस्तित्व गँवाना पड़े। उस स्थिति के स्मरण मात्र से रोमाँच हो उठाता है।
भूवैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के चुम्बकत्व में परिवर्तन से भी संसार में ऐतिहासिक उलट-पुलट हुए हैं। असम्भव जान पड़ते हुए भी जब उन्हें विदित हुआ कि पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव भी आपस में बदलते-रहते हैं, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, कितनी ही बार उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव में तथा दक्षिणी उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव में परिवर्तित होता रहा है, उनके साथ कितनी ही ऐतिहासिक घटनाएँ भी घटी हैं। शोध करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि 25 हजार वर्ष पहले से आज की भू चुम्बकत्व तीव्रता 50 प्रतिशत कम हैं। कम होने की रफ्तार बनी रही तो अगली कुछ सदियों में महाप्रलय का सामना करना पड़ सकता है।
न्यूयार्क स्टेट यूनीवर्सिटी के प्रो. रिचर्ड यूफेन का विश्वास है कि ध्रुव परिवर्तन के समय चुम्बकीय बल क्षेत्र इतना कम हो जाता है उस समय अन्तरिक्ष में स्थित वाल ऐलेन बेल्ट्स से सुरक्षा नहीं हो सकती। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का गोलार्द्ध अन्तरिक्ष में बहुत दूर तक फैला हुआ है। यह चुम्बकीय क्षेत्र ब्रह्माण्डीय घातक किरणों को परिवर्तित कर देता है। उस समय जीवधारी सौर आँधियों तथा ब्रह्माण्डीय किरणों की दशा पर निर्भर रहते हैं। ध्रुव परिवर्तन से जलवायु व मौसम में भी भयंकर परिवर्तन हो जाते हैं। उसकी चरम परिणति हिमयुग जैसे संकटों के रूप में भी हो सकती है। भूगर्भ शास्त्रियों ने अपने शोध निष्कर्षों में पाया है कि विगत कुछ दशकों से भू चुम्बकत्व की तीव्रता में लगातार गिरावट आ रही है। ऐसा कहा जाने लगा है कि आगामी 200 वर्षों में चुम्बकीय क्षेत्र पूरी तरह समाप्त भी हो सकता है। जिससे प्रलय अथवा महाप्रलय जैसे संकट भी आ खड़े हो सकते हैं।
अमरीकी परमाणु ऊर्जा आयोग की अलबुकर्क स्थित प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए कि सौर मण्डल की गतिविधियों का पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है, विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने अपराधों एवं दुर्घटनाओं से संबंधित बीस वर्षों के आँकड़े एकत्रित किए। 88 पृष्ठों की एक लम्बी रिपोर्ट तैयार हुयी। इस रिपोर्ट का सार निष्कर्ष है कि सौर क्रियाएँ तथा चन्द्रमा की कलाएँ मानव व्यवहार तथा दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। इन वैज्ञानिकों ने सूर्य के घूमने के कारण पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाली 27 दिन के चक्र की गड़बड़ी से भी दुर्घटनाओं का संबंध जोड़ा है। गहन पर्यवेक्षण के उपरान्त मालूम हुआ है कि इस चक्र के प्रथम 7 दिन, 13 वें 14 वें, 20 वें तथा 25 वें दिन अधिक दुर्घटनाएँ होती है।
मियामी यूनिवर्सिटी के दो मनोवैज्ञानिकों -आर्नोल्ड लीवर तथा कैकोलिन शेरिन ने अमेरिकन जनरल ऑफ साइकियाट्री में चन्द्रमा की कलाओं के मनुष्य के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन विस्तार से किया है। प्राप्त तथ्यों के अनुसार पूर्णिमा के तीन दिन पूर्व से हत्याओं आत्म-हत्याओं की घटनाओं में वृद्धि होने लगती है। पूर्णिमा के दिन वे चरम सीमा पर पहुँचती है।
एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि चौदहवें महीने सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी पर सबसे अधिक गुरुत्वाकर्षण डालते हैं। उस अवसर पर अपराधों की संख्या बढ़ जाती है।
अन्य ग्रहों की चुम्बकीय शक्ति के थोड़े हेर-फेर से पृथ्वी पर भारी विप्लव उत्पन्न हो जाता है। 1960 के बाद बंगाल की खाड़ी में आठ बार समुद्री तूफान आये जिसके फलस्वरूप चार लाख व्यक्ति मारे गये। सन् 1967 में महाराष्ट्र का कायेना नगर भूकम्प से नष्ट हो गया। 19 जनवरी 1975 को काँगला की घाटी किन्नौर में भीषण भूकम्प आया। उसी वर्ष चीन में आये भूकम्प से लाखों व्यक्ति मारे गये। सन् 78 के आन्ध्र में आये साइक्लोन ने हजारों व्यक्तियों की जानें ली। इन सभी दुर्घटना स्थलियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया कि उन स्थानों पर अन्तरिक्षीय रेडियो विकिरणों की बहुलता थी। इन स्थानों पर सूर्य 90 अंश तथा 180 अंश की राशि पर अवस्थित था। भौतिक विद् जानएलसन के अनुसार सूर्य जब इन राशियों पर होता है तो उसके सीध में पड़ने वाले भू-भाग पर तूफान, भूकम्प की घटनाएँ घटित होती हैं।
सौर मण्डल की गतिविधियों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का निष्कर्ष है, सन् 1980 के बाद सूर्य के नाभिक में होने वाले परमाणु विखण्डन-स्फोटों की संख्या में असामान्य रूप से वृद्धि हुई हैं। विस्फोटों के समय उत्सर्जित होने वाले प्रकाश कण सामान्य कणों से भिन्न, बेधक तथा घातक होते हैं। कोलोरेडा-अमरीका की वेधशाला में पिछले दिनों सूर्य किरणों में से विस्फोट जन्य ऐसी तरंगें पकड़ी गयी जो सामान्य अल्ट्रावायलेट किरणों से भिन्न स्तर की थी। उनमें एक्स किरणों जैसी तीव्रता एवं बेधकता भी। उसके अध्ययन से वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि सूर्य के जिस भाग में विस्फोट हुआ होगा, वहाँ का न्यूनतम तापक्रम एक करोड़ डिग्री सेन्टीग्रेड रहा होगा। इनका विकिरण प्रभाव वर्षों तक अन्तरिक्ष में बना रहता है। पृथ्वी के आयनोस्फियर में इन तरंगों के प्रवेश से जो खिड़कियाँ बनती हैं, वे घातक अन्तरिक्षीय कास्मिक किरणों को भूमण्डल के वातावरण में आने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। इनसे महामारी फैलती है, कितने ही नये प्रकार के शारीरिक, मानसिक रोग पैदा होते हैं।
सूर्य स्फोटों से अन्तरिक्ष क्षेत्र में चुम्बकीय तूफान उठ खड़े होते हैं। ये पृथ्वी के सामान्य धुरी पर चलने के क्रम में व्यतिक्रम भी पैदा करते हैं। भूगर्भ शास्त्रियों का मत है कि सन् 1980 के बाद बढ़ती हुई भूकम्पों की श्रृंखलाओं का एक प्रमुख कारण भूगर्भ का तापक्रम बढ़ना, अन्तरिक्षीय चुम्बकीय तूफानों से प्रेरित है। जापान, चीन, मंगोलिया, हिमालय की तलहटी, ईरान, ईराक, सउदी अरब, अमरीका मध्य अमरीका, उत्तरी मध्य अफ्रीका, बाँग्लादेश आदि क्षेत्रों में पिछले दशक में भयंकर तबाही मचाने वाले भूकम्पों का दौर देखा गया। तीन माह पूर्व 26 मई 83 को जापान के उत्तरी क्षेत्र में आये भूकम्प की घटना जाती है, जहाँ हजारों की संख्या में लोगों के मरने तथा असंख्यों के घायल होने का अनुमान लगाया गया। भूकम्प विशेषज्ञों का अनुमान है कि जितने भूकम्प 1985 से 2000 की बीच आयेंगे, उतने कभी एक शताब्दी में भी नहीं आये हैं।
अमरीका द्वारा भेजे गये अन्तरिक्ष यानों ने शनि ग्रह के निकट से गुजरते समय वहाँ एक प्रलयंकारी आँधी चलने का संकेत प्रेषित किया। नासा वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र के अनुसार शनि पर कुछ वर्षों से तेज चुम्बकीय आँधियाँ चल रही है। उनकी क्षमता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 64 हजार किलोमीटर क्षेत्र में फैली वे तीव्र तूफानी तरंगें पृथ्वी को डेढ़ से भी अधिक बार लपेट लेने तथा उसे तोड़-मरोड़कर महाप्रलय-सी परिस्थितियाँ पैदा कर सकने में समर्थ है। उनका मत है कि शनि ग्रह का बढ़ता असन्तुलन प्रकृति विपदाओं का कारण बन रहा है।
अंतर्ग्रहीय प्रभावों की शृंखला में इन दिनों धूमकेतु पुच्छल तारे की भी विशेष चर्चा है, जिसके साथ कितने ही प्रकार की अशुभ अटकलें लगायी जा रही हैं। मई 83 के द्वितीय सप्ताह में पृथ्वी के समीप से एक पुच्छल तारा गुजरा जिसमें एक विचित्रता पायी गयी। माइकेल अहर्न तथा पाल फील्डैन नामक दो अमरीकी वैज्ञानिकों की खोजों के अनुसार उस पुच्छल तारे में सल्फर (गन्धक) के अणु सघन परिणाम में मौजूद थे। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि यह तत्व आकाश गंगा के किसी भी ग्रह में अब तक नहीं पाया गया है।
धूमकेतु-पुच्छल तारा हर 76 वर्ष बाद उदय होता है। अब से पूर्व यह 1910 में दिखायी पड़ा था ज्योतिर्विदों का कहना है कि विगत धूमकेतु के बाद प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका बनी थी। अगला हैली नामक धूमकेतु नवम्बर 1985 में सम्पूर्ण विश्व में दिखायी देगा। उसकी पूँछ साढ़े आठ करोड़ किलोमीटर लम्बी है। जो विश्व के विभिन्न भागों में कहीं दिन में तो कहीं रात्रि में दिखायी देगा। इस तारे की लम्बाई पहले दिखायी पड़े धूमकेतुओं से एक लाख गुना अधिक है। 27 दिनों तक वह दृश्यमान रहेगा। उसी अवधि में विश्वयुद्ध छिड़ने की सम्भावना है। पृथ्वी के वातावरण पर भी उस धूमकेतु का दुष्प्रभाव पड़ेगा। उन्हीं दिनों महामारी फैलने, मानसिक विक्षोभों के बढ़ने तथा आन्तरिक विग्रहों को अधिक पनपने का अवसर मिलने की सम्भावना ज्योतिर्विदों ने व्यक्त की है।
हैली नामक इस धूमकेतु (कॉमेट) के विषय में विशेषज्ञों का मत है कि वह कई भयावह प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करेगा। यह तारा 5800 किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से धरती की ओर चल पड़ा है। धरती के निकट पहुँचने पर उसका मलबा सड़ने लगता है, विषाक्त गैसें निकलती हैं, जो समूचे सौर मण्डल के वातावरण को दूषित करती हैं। वे गैसें अनेकों प्रकार से नये रोग विषाणुओं को जन्म देती है।
रोमन ग्रन्थों में उल्लेख है कि जब भी धूमकेतु उदय होते हैं, अपने साथ कितने ही प्रकार की विभीषिकाएँ लेकर प्रस्तुत होते हैं। सन् 1531, 1607, 1687 में धूमकेतु देखे गये। उन दिनों विश्वव्यापी प्रकोपों का बाहुल्य पाया गया। विलियम दकाँकरर के आक्रमण 1066 में भी धूमकेतु दिखायी पड़ा था। सम्पूर्ण यूरेशिया युद्ध की चपेट में आया था। प्रथम विश्वयुद्ध के समय में भी उस घटना की अधिक गम्भीर रूप में पुनरावृत्ति हुयी।
यहूदी ग्रन्थों में भी अलंकारिक वर्णन धूमकेतु का है कि अभिशप्त जन समुदाय पर ईश्वर की तलवार महाविनाश के रूप में गिरेगी।
भारतीय ज्योतिर्विज्ञान के अनेकों ग्रन्थों में 33 धूमकेतुओं को राहु का पुत्र बताते हुए कहा गया है कि वे युद्ध, भय, अकाल, महामारी, महाविनाश की वर्षा करने वाले हैं।”
ऐसे अगणित प्रमाण एवं संकेत मिल रहे हैं, जो यह बताते हैं कि अंतर्ग्रही असन्तुलन विगत कुछ वर्षों से बढ़ता जा रहा है तथा अगले दिनों और भी अधिक बढ़ने की सम्भावना है। तत्वदर्शियों का मत है कि मानवकृत दुष्कृत्यों से स्थूल वातावरण ही नहीं सूक्ष्म अदृश्य वातावरण भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सौर मण्डल के अन्य ग्रह नक्षत्र भी उस असन्तुलन के शिकार हुए हैं। सामान्यतः मनुष्य के भौतिक पुरुषार्थ उन असन्तुलनों को दूर कर पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक ही उपाय अवलम्बन बचता है कि सूक्ष्म जगत के परिमार्जन परिशोधन के लिए आध्यात्मिक स्तर पर सामूहिक प्रयोग किये जायँ। महाविनाश को साथ लिए दौड़ी चली आ रही अंतरिक्षीय विभीषिकाओं से मानव जाति की सुरक्षा तभी सम्भव हो सकती है।
मानव समुदाय की अदूरदर्शी नीतियों एवं कृत्यों के कारण इन दिनों प्रकृति चक्र बुरी तरह से प्रभावित हैं। इकॉलाजी शास्त्र के विशेषज्ञों का मत है कि समूचा “पर्यावरण चक्र” अब धीरे-धीरे सामान्य क्रम से अलग हटकर उल्टी दिशा में चलने को अग्रसर हो रहा है। इतने अधिक असन्तुलन इतने व्यतिरेक पहले कभी एक साथ देखने में नहीं आए, जितने कि कुछ दशकों से दिखायी पड़ रहे हैं, तथा क्रमशः अधिकाधिक उग्र होते जा रहे हैं। घटनाओं से मिलने वाले प्रमाण इसी तथ्य का परिचय देते हैं सम्पूर्ण प्रकृति परिकर ही इस व्यतिक्रम से प्रभावित हैं।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पृथ्वी का अस्तित्व एवं वैभव सौर जगत पर अन्यान्य ग्रहों के पारस्परिक सहयोग पर निर्भर है। एक चक्र में जुड़ी होने के कारण वह मात्र दूसरे ग्रहों से प्रभावित ही नहीं होती, उन्हें अपनी स्थिति से प्रभावित भी करती है। आज उसकी जो स्थिति है, एक सदी पूर्व में नहीं थी। हरीतिमा की चादर में वह लिपटी थी। अनगढ़ होते हुए भी सर्वत्र सौंदर्य बिखरा था। औद्योगीकरण के अभिशाप ने उसका सौंदर्य, उसकी सुषमा को छीनकर उसे अनगढ़ बना दिया है। बढ़ी हुई प्रदूषण की विषाक्तता भूतल तक सीमित नहीं रही, उसके आचरण को चीरते हुए अन्तरिक्ष में जा पहुंची। सौर परिकर के अन्य ग्रह भी परोक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। उनकी गति एवं स्थिति पर भी प्रभाव पड़ा है। अंतर्ग्रही संबंध से जो इकॉलाजिकल चक्र प्रचलित रूप से काम करते रह सकते हैं। वह बिगड़ता चला गया है। इस असन्तुलन की ही परिणति आज सर्वत्र प्रकृति प्रकोपों-विक्षोभों के रूप में देखी एवं अनुभव की जा रही है।
“प्लेनट्रूथ” (अप्रैल 83) के सम्पादक डा. हर्बर्ट आर्मस्ट्राँग ने इस शताब्दी के मौसम परिवर्तनों का अपनी पत्रिका में विस्तार से उल्लेख किया है। विद्वान लेखक डान टेलर इसमें लिखते हैं कि संसार में औद्योगीकरण बढ़ने से पृथ्वी के वायुमण्डल का ताप क्रम तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह बढ़ोत्तरी ही प्राकृतिक प्रकोपों, अप्रत्याशित मौसम परिवर्तनों का प्रमुख कारण है। मौसम विज्ञानी भी मानते हैं कि पृथ्वी के सौर चक्र में जो परिवर्तन गत दशाब्दियों में हुए हैं, वे पहले कभी नहीं देखे गये। सौर कलंक भी इन्हीं दिनों अधिक दृष्टिगोचर हो रहे हैं। पृथ्वी पर बढ़ते तापक्रम का सीधा संबंध भूकम्पों, ज्वालामुखी विस्फोटों से है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि विगत दस वर्षों में तो उनमें असामान्य रूप से बढ़ोत्तरी हुई है।
डा. टेलर का कहना है कि 1980 के बाद दो वर्षों में जितने अभूतपूर्व परिवर्तन संसार के मौसम में देखे गये हैं, उतने पहले कभी, किसी समय नहीं हुए। वर्ष 1982 महत्वपूर्ण परिवर्तनों के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विद्वान लेखक ने संसार के विभिन्न क्षेत्रों में प्रकट हुए प्रकृति विक्षोभों का विस्तृत अध्ययन कर उसका सार-संक्षेप इस प्रकार प्रस्तुत किया है-
आस्ट्रेलिया में पूरे वर्ष भर सूखे का प्रकोप रहा। अपने उत्पादन का यह देश 45 प्रतिशत सदा निर्यात कर रहा है, पर उस वर्ष उसे बाहरी राष्ट्रों से मदद माँगनी पड़ी, भारी मात्रा में खाद्यान्न आयात करना पड़ा।
दक्षिण महासागर स्पिल टोंगा द्वीप में मार्च माह में 172 प्रति घण्टे की रफ्तार से तूफान आया नब्बे प्रतिशत फसल नष्ट हो गयी तथा 95 प्रतिशत अचल सम्पत्ति, मकान, भूमि आदि समुद्र के गर्भ में समा गये।
चीन के सबसे बड़े प्रान्त हो बाई एवं लाओनिंग में इस सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा। ठीक समय साथ साथ के लगे एक दूसरे प्रान्त-शाँघजींग में बाढ़ के प्रकोप से हजारों व्यक्ति अकाल मृत्यु के मुँह में समा गये, लाखों बेघर हुए, खरबों की सम्पत्ति नष्ट हुयी।
दक्षिणी चीन में वर्ष के उत्तरार्ध में, पीली नदी में आयी भयंकर बाढ़ ने पिछले सभी रिकार्ड चीन के तोड़ दिए। हजारों व्यक्ति काल के ग्रास बने, लाखों बेघर हुए।
इन्डोनेशिया के एक करोड़ पचास लाख व्यक्ति सूखे के दुर्भिक्ष के कोप बने। ऐसा सूखा वहाँ पिछले दो सौ वर्षों में कभी नहीं पड़ा था।
फ्राँस का दक्षिणी क्षेत्र अंगूर की फसल के लिए प्रख्यात है। विश्वभर की पैदावार का अस्सी प्रतिशत अंगूर यही होता है। सूखे के भयंकर प्रकोप से समूची फसल मारी गयी जबकि उत्तरी फ्राँस में उन्हीं दिनों वर्ष की सर्वाधिक बर्फ पड़ी।
इटली का मौसम का असाधारण व्यतिरेक देखा गया। ठण्ड के मौसम में भयंकर गर्मी तथा रात्रि में ओलों की वर्षा से सारी फसलें नष्ट हो गयी। सिसली प्राँत की राजधानी पलेंरमों तथा उसके आसपास के इलाकों में बयालीस डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान रिकार्ड किया गया जो वहाँ के लिए एक अनहोनी घटना है। ऐसी स्थिति मात्र ट्रॉपिक्स में ही होती है। जापान की नागासाकी नदी में गतवर्ष ऐतिहासिक बाढ़ आयी। हिरोशिमा पर बमबारी से हुई क्षति के बाद पहली बार इतनी अधिक जनशक्ति तथा धन शक्ति नष्ट हुई।
न्यूजीलैण्ड के अधिकाँश प्रान्तों को सूखे का शिकार होना पड़ा। देश को अकाल के दुर्भिक्ष से सामना करना पड़ा है। जिम्बाब्बे, साउथ अफ्रीका में इस सदी का भीषणतम सूखा पड़ा है। खाद्यान्न संकट से हजारों व्यक्तियों की मृत्यु हुयी। कितने ही नये प्रकार के रोग फैले।
सोवियत संघ का उत्तरी भाग जो उत्तरी ध्रुव के निकट पड़ता है, तुलनात्मक दृष्टि से अधिक ठण्डा है, पर इस बार वह अत्यधिक गर्म रहा। जबकि दक्षिणी भाग में भयंकर ठण्ड पड़ी। बरसात एवं ओलों के कारण करोड़ों हेक्टेयर की फसलें नष्ट हो गयी। कितनी ही नदियों में बाढ़ आयी।
दक्षिण पूर्व एशिया के थाईलैंड, मलेशिया आदि देशों में भी इस वर्ष मौसम का असन्तुलन विशेष रूप से देखा गया। मात्र 10-20 मील के फासले पर कहीं सुखा, तो कहीं अतिवृष्टि जैसे व्यतिक्रम देखे गये।
अमरीकी में बसन्त के मौसम में ओलों की वर्षा से जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। उत्तरी भाग की सभी नदियों में आयी बाढ़ से फसलों को भारी क्षति पहुँची, असंख्यों के मकान बह गये। समुद्र किनारे बसे फ्लोरिडा, सॉन फ्राँसिस्को, वाशिंगटन डी.सी., न्यूयार्क, लासवेगास नगरों में बाढ़ का पानी तटों को पारकर शहरी क्षेत्र में फैल गया। बरसाती पानी की सड़न-दुर्गन्ध से उन नगरों में महामारी फैली। हजारों की जानें गयी।
इसी वर्ष 30 मई के दिन पश्चिम जर्मनी में इतनी मूसलाधार वर्षा हुई कि बाढ़ की स्थिति आ गई। पश्चिमी जर्मनी के अधिकाँश इलाकों के बाजारों में सड़कों पर बतखें तैर रही थी। डाक नावों से बाँटी गयी। अधिकारियों का कहना था कि गत 36 सालों में इतना भयंकर बाढ़ कभी नहीं आयी। सैकड़ों के मरने तथा असंख्यों के बह जाने की यह खबर सुर्खियों के साथ अनेकों समाचार पत्रों ने छापी। इसी वर्ष तेईस मई के हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार लन्दन में लगातार 35 दिनों तक मूसलाधार वर्षा होती रही है। 1940 के बाद झड़ी लगी सतत् वर्षा का यह नया कीर्तिमान है। केन्द्रीय मौसम पूर्वानुमान कार्यालय के अनुसार इस घटना की इसी वर्ष फिर पुनरावृत्ति होने की सम्भावना है। इस वर्षा के साथ ही साढ़े छः किलोमीटर क्षेत्र में 8 सेण्टीमीटर बर्फ की परतें कई दिनों तक जमी रहीं। आवागमन, यातायात, पूर्णतः अवरुद्ध रहा। सरकारी प्रयत्नों से बर्फ काट-काटकर हटायी गयी तो भी यातायात शुरू न हो सका। मौसम के सामान्य होने, वर्षा बन्द होने के कुछ दिनों बाद सामान्य क्रम कुछ-कुछ पटरी पर आया है।
भारत भी इस पर्यावरण असन्तुलन से अछूता नहीं रहा है। विगत कुछ वर्षों से भारत का मौसम भी बहुत तेजी से बदला है। प्रकृति प्रकोपों के अतिवाद की बहुलता देखी गयी है। 1979 में चमोली जनपद के कोथा गाँव में 16 अगस्त की रात्रि को घनघोर वर्षा हुयी। दूसरे दिन भू-स्खलन हुआ। पूरा गाँव पृथ्वी के भीतर समा गया हिमाचल प्रदेश में हुए भूस्खलन से 13 सौ व्यक्तियों की जानें गयी, कितने ही घायल हुए। शिमला व निकटवर्ती क्षेत्रों में मई माह तक बर्फ गिरती रही है। पिथौरागढ़ जिले के शिसनागाँव के लोगों पर 1981 की मध्यरात्रि को प्रकृति की एक भयंकर काली साया मंडरायी और वहाँ के सम्पूर्ण जन-जीवन को समाप्त करके तिरोहित हो गयी। यह एक तूफानी बवण्डर था।
15 अगस्त 1977 को तावा घाट प्रभाग (तराई) में जमीन के धँसने से हजारों लोग मृत्यु की गोद में चले गये। भू-स्खलनों के कारणों के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में वृक्ष वनस्पतियों की अंधाधुन्ध कटाई के कारण उस क्षेत्र की जमीन की जल रोकने की क्षमता में निरंतर ह्रास आ रहा है। वृक्षों के कारण मिट्टी का कटाव नहीं हो पाता, किन्तु पेड़ों के कटते ही उनकी जड़ों से चिपकी मिट्टी का कटाव आरम्भ हो जाता है तथा अनेकानेक गड्ढे नाले बनना आरम्भ हो जाते हैं।
गत वर्ष उड़ीसा में आया तूफान अत्यन्त विध्वंसक रहा उसके बवण्डर से तत्काल पाँच सौ व्यक्ति काल के ग्रास बने, 1000 घायल हुए। दो लाख व्यक्तियों को गृह हीन करने का श्रेय इस चक्रवात को ही मिला था। कटक, बालासोर, पुरी, क्यौंझर, धेनुकनाल के पाँचों जिले उस तूफान से बुरी तरह प्रभावित हुए। जून 1982 का वह तूफान वस्तुतः भयावह एवं अविस्मरणीय घटना के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा। 220 कि.मी. प्रति घण्टा की भयंकर गति से चलने वाले इस तूफान ने पाराद्वीप बन्दरगाह को 12 घण्टे की विनाशलीला के बाद श्मशान में परिणत कर दिया। 35 हजार निवासियों की करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हुयी। बन्दरगाह पर खड़े 32 से 35 फीट लम्बे ट्रेलर्स एक दूसरे के ऊपर ऐसे चढ़ गये जैसे लकड़ी के अनेकों खोखे एक पर एक जमा दिए गये हों। 100 से अधिक नावों को क्रेन से पानी के बाहर निकाला गया। 80 फीट ऊँचे तीन चट्टान जैसे प्रकाश स्तम्भ टूटकर गिर पड़े।
सन् 1982 वस्तुतः भारत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा। देश के दस करोड़ व्यक्ति सूखे की चपेट में आये। आँध्र, गुजरात, कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों पर आए तूफान ने सहस्रों व्यक्तियों की जान ले ली। संचार तन्त्र अव्यवस्थित हुआ। अरबों की सम्पत्ति नष्ट हुयी। उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र तो मौसम के झंझावातों से और भी अधिक प्रभावित रहा। एक ही दिन में, तेज सर्दी, अधिक गरमी, भयंकर वर्षा के तीनों ही मौसम समय के थोड़े-थोड़े अन्तरों पर दिखायी पड़े।
विश्वव्यापी मौसम में संव्याप्त इस हेर-फेर का कारण क्या हैं? मूर्धन्य मौसम विज्ञानियों का मत है कि सूक्ष्म अन्तरिक्ष में एक जेट-स्ट्रीम लॉकिंग व्यवस्था सतत् चल रही है। पृथ्वी की सतह से ऊपर वातावरण अधिक गरम है जबकि ध्रुवों पर अपेक्षाकृत अधिक ठंडा है। ऐसे में जहाँ ये दोनों मिलते हैं, 6 से 10 मील लम्बी बादलों की सघन शृंखला बनती चली जाती है। ये बादल सामान्य नहीं अपितु अत्यन्त ठंडे, कृत्रिम तथा अविज्ञात वायु घटकों के घनीभूत रूप है। सामान्यतया ये बादल बनकर कुछ ही समय में समाप्त हो जाते थे किन्तु विगत बीस वर्षों में हुए पृथ्वी के वातावरण में परिवर्तन के फलस्वरूप इन बादलों की परस्पर लॉकिंग होने से एक ही स्थान पर कई माहों से वे स्थिर से हो गये हैं। ऐसे एक नहीं करोड़ों ‘जेटस्ट्रीम्स” हैं। ध्रुवों पर होने वाले ये परिवर्तन सारे पृथ्वी के बदलते मौसम का मूल कारण हैं।
आखिर अचानक ऐसी स्थिति कैसे बनी? ध्रुवों पर परिवर्तन तथा अन्तरिक्ष में घातक गैसों की मात्रा में वृद्धि इस सीमा तक कैसे पहुँची? वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ते औद्योगीकरण संसाधन दोहन, हरीतिमा उन्मूलन जैसे मानवी दुष्कृतों के कारण सतत् बढ़ता जा रहा है। उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों पर असामान्य स्थिति उत्पन्न करने में मानवी दुर्बुद्धि ने प्रमुख भूमिका निभाई है। सारा विश्व जिस इकॉलाजिकल साइकल से चलता हो, ध्रुवीय व्यवस्था से सुनियोजित होता हो, उसे ही यदि अव्यवस्थित कर दिया गया तो मौसम के दुष्प्रभावों से कोई भी अछूता नहीं रह सकता। विक्षोभों के बादल सतत् विश्व समुदाय पर मँडरा रहे हैं। ये और भी उग्र स्वरूप लेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं अपने ही कृत्यों की प्रतिक्रियाएँ प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य स्वयं देखते हुए भी नहीं समझ पा रहा, यह और भी बड़ा आश्चर्य है।
ऐसी सम्भावना है कि अगले कुछ ही दशकों में समस्त वायुमण्डल विषाक्त हो उठेगा। पृथ्वी, जल, वायु सभी दूषित हो जायेंगे पीने योग्य पानी, श्वास के लिए वायु तथा शरीर पोषण के लिए खाद्यान्न शुद्ध न मिलने से अगणित प्रकार के रोग उत्पन्न होंगे, जिनके प्रकोप से जीवधारियों को घुट-घुटकर मरने के लिए विवश होना पड़ेगा। दूसरी ओर बढ़ता हुआ पर्यावरण असन्तुलन प्राकृतिक प्रकोपों को आमन्त्रित करेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस असन्तुलन की परिणति जल प्रलय, हिमयुग जैसी विभीषिकाओं के रूप में भी हो सकती है। अनेकानेक तथ्य, वैज्ञानिक निष्कर्ष तथा घटनाक्रम भी भावी विभीषिकाओं की ओर संकेत कर रहे हैं।
विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि भारत का अधिकाँश नदियाँ बुरी तरह प्रदूषण का शिकार है। लगभग सभी नदियों में अम्ल की मात्रा अत्यन्त बढ़ गयी है। कलकत्ता में गंगा (हुगली) नदी के जल की भी यही स्थिति है। बड़ौदा के पास माही नदी का पानी पीने लायक नहीं रहा है। पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र नैनीताल का प्रसिद्ध ताल प्रदूषित हो गया है। जब से भारत में कृषि कार्य के लिए बड़े पैमाने पर कीटनाशी दवाओं तथा रासायनिक खादों का प्रयोग होने लगा है तथा उद्योगों का कचरा नदियों में बहाया जाने लगा है नदियों में विषाक्तता बढ़ती जा रही है। सत्तर प्रतिशत नदियों का पानी पीने योग्य नहीं रहा है। यमुना, दामोदर, सोन, कावेरी, कृष्णा आदि के जलचर जीव अकाल मृत्यु के ग्रास बन रहे हैं।
बढ़ते प्रदूषण के साथ जल संकट भी बढ़ता चला जा रहा है। ऐसा लगता है कि कुछ ही वर्षों में पीने योग्य शुद्ध जल के दर्शन दुर्लभ हो जायेंगे। शुद्ध जल की अधिकाँश मात्रा अब औद्योगिक प्रतिष्ठानों में झोंक दी जाती है। एक लीटर पेट्रोल के लिए 10 लीटर पानी, एक किलो कागज के लिए 100 लीटर पानी तथा एक टन सीमेण्ट के लिए 3500 लीटर पानी जलाना पड़ता है। पृथ्वी में पीन योग्य जितना जल है उसका 20 प्रतिशत से भी अधिक नदियों, समुद्रों में फेंक दिया जाता है।
औद्योगिक कचरे की नदियों तथा समुद्रों में झोंक दिए जाने के अनेकानेक खतरे हैं जो और भी अधिक गम्भीर होकर मनुष्य जाति को ही प्रभावित करेंगे। गन्दगी मिला जल समुद्र से वाष्पित होगा, जिससे दूषित मेघ बनेंगे तथा अपने में समेटी गन्दगी को व्यापक क्षेत्र में वर्षा के माध्यम से फैलाएंगे। दूषित जल अनेकों प्रकार के रोगों को जन्म देगा जिसका प्रभाव जीवधारियों तथा वृक्ष वनस्पतियों पर समान रूप से पड़ेगा। कनाडा के दक्षिण तथा अमरीका के उत्तरी क्षेत्र में पिछले दिनों हुई “एसिडरेन”-अम्ल वर्षा से जो हानि पहुँची है, उसे देखकर यह भय और भी प्रबल हो चला है कि ऐसी वर्षा कहीं विश्व-व्यापी न बन जाय।
हारवर्ड विश्व विद्यालय के अमरीकी प्रोफेसर डा. माइकेल मैकलोरी ने पेरिस में हुयी एक पर्यावरण संगोष्ठी में कहा कि वायुमण्डल की महत्वपूर्ण परत “स्ट्रेटोस्फीयर” जो पृथ्वी के अल्ट्रावायलेट रेडिएशन के दुष्प्रभाव से बचाती है, निरन्तर कमजोर होती जा रही है। अल्ट्रावायलेट विकिरण से सुरक्षा करने वाली स्ट्रेटोस्फीयर की ओजोन परत तीव्र गति से कम सघन होती जा रही है। ऐसी सम्भावना है कि ओजोन परत की दस प्रतिशत क्षमता इस सदी के अन्त तक नष्ट हो जायेगी। इसका कारण प्रो. माइकेल ने प्रदूषण के कारण वायुमण्डल में बढ़ती कार्बनडाइ ऑक्साइड को बताया। इस रक्षा कवच के कमजोर पड़ने से अनेकों प्रकार के अन्तरिक्षीय हानिकारक विकिरणों का सामना पृथ्वी के जीवधारियों को करना पड़ सकता है।
वायुमण्डल में लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई तक विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण- सन्तुलन रहता है। इसमें 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, .9 प्रतिशत निष्क्रिय गैसें तथा .03 प्रतिशत कार्बनडाइ ऑक्साइड गैसें सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न मात्राओं में जलवाष्प, धूलकण, नाइट्रोजन व सल्फर यौगिक भी पाये जाते हैं।
ऐसा अनुमान है कि वायुमण्डल में कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा में 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इससे विश्व का औसत तापमान 2 डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ा है। जिस अनुपात में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, उसे देखते हुए वैज्ञानिकों ने सम्भावना व्यक्त की है कि इस सदी के अन्त तक विश्व का तापमान 4 डिग्री सेन्टीग्रेड तक बढ़ जायेगा, जिससे ध्रुवों की बर्फ पिघलने तथा जल प्रलय की विभीषिका उत्पन्न हो सकती है।
मौसम विशेषज्ञों ने विगत एक दशक में विश्व भर में ठण्ड बढ़ने का निष्कर्ष निकाला है। ठण्ड के मौसम में पहले ठण्डे इलाकों में जितनी बर्फ गिरती थी, उसका तीस प्रतिशत अधिक रिकार्ड किया गया। ग्रीनलैण्ड में तापमान गिरने का 100 वर्षों का रिकार्ड टूट गया। विशेषज्ञों का मत है कि समस्त संसार का मौसम क्रमशः ठण्डा होता जा रहा है। भूतल को ढँकने वाली बर्फ 90 प्रतिशत सौर प्रकार को परावर्तित कर देती है। जब लम्बी ठण्ड की ऋतुएँ होने लगेंगी तो प्राणी जगत तथा वनस्पति समुदाय जीवनदायी सौर ऊर्जा से वंचित हो जायेंगे। प्रकाश किरणों के और अधिक परावर्तित हो जाने से नम हवा सघन होकर अधिक बर्फ में बदलने की सम्भावना बढ़ेगी। इस प्रकार कोई आश्चर्य नहीं कि अगले की दशक में हिमयुग की विभीषिका प्रस्तुत हो जाय।
अहमदाबाद भौतिकी अनुसंधानशाला के प्रो. अग्रवाल का मत है कि “पृथ्वी पर नये हिमयुग की शुरुआत होने वाली है। जिसके कारण आधी पृथ्वी बर्फ की मोटी चादर से ढक जायेगी। नार्वे, स्वीडेन, डेनमार्क, फिनलैण्ड, उत्तरी मंचूरिया, स्विट्जरलैण्ड, नेपाल, सिक्किम, भूटान, इंग्लैंड आदि का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। सोवियत संघ, मैक्सिको, चीन, अमरीका, आस्ट्रेलिया के बड़े भूभाग हिम नदों के चपेट में आ जायेंगे। बर्फानी तूफान चलेंगे जिसके कारण गुआना, अर्जेटाइना, युरुग्वे, मेरिटाइना, दक्षिण मैक्सिको, केनिया, तंजानिया, जाबिया, पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीप के उत्तरी भागों में भयंकर सूखा पड़ने की अगले वर्षों की सम्भावना है।”
यूगोस्लाविया के एक एस्ट्रोफिजीसिस्ट का कहना है कि “हमारी पृथ्वी की ध्रुवीय धुरी अपनी कक्षा के बाहर की ओर झुकी हुई है। जिससे सर्दी, गर्मी के मौसम सूर्य की गति के अनुरूप बनते हैं। जब यह झुकाव अत्यधिक होता है तो हिमयुग आरम्भ होता है। कुछ ही समय बाद ऐसी स्थिति आने वाली है क्योंकि यह झुकाव अविज्ञात कारणों से बढ़ता जा रहा है।”
सौर गतिविधियों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का अभिमत है कि सूर्य का सतही तापक्रम निरन्तर कम होता जा रहा है। तापक्रम में दो सेल्सियस तक की गिरावट विशेष प्रभाव नहीं डालती, पर इससे अधिक होने पर पृथ्वी के वातावरण पर गम्भीर प्रभाव पड़ सकता है। प्रख्यात अमेरिकी भूगर्भ शास्त्री सिजारएमिलियानी का मत है कि “सूर्य के सतही तापक्रम में आने वाली क्रमिक गिरावट आने वाले हिमयुग का परिचायक है। इस तरह की परिस्थितियाँ पहले भी चार बार आ चुकी हैं पहला हिमयुग सबसे अधिक भयंकर था जो सत्तर करोड़ वर्ष पूर्व आया था। इसमें भारत, चीन, यूरोप, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका का एक व्यापक क्षेत्र बर्फ से ढक गया था। अन्तिम हिमयुग पच्चीस लाख वर्ष तक रहा। उसे समाप्त हुए मात्र सत्रह हजार वर्ष बीते हैं। अब पांचवें हिमयुग की बारी हैं।”
आसन्न संकटों की चर्चा डराने के लिए नहीं, मानव द्वारा स्वयं आमन्त्रित इन खतरों से सभ्यता को नष्ट होने से बचाने के लिये की गयी है। विश्व के हर नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वे चिन्तन और कर्त्तव्य को बदलें। प्रज्ञा अभियान ऐसी ही पृष्ठभूमि खड़ी करते हेतु सृजा गया एक प्रयास-पुरुषार्थ है।
वातावरण जिसमें हम रहते हैं, चेतनात्मक है। उसका संबंध प्राण-प्रवाह के स्तर से है। ऐसी मान्यता है कि सतयुग में ऐसा अदृश्य प्राण-प्रवाह चलता था जिससे व्यक्तित्वों की भावना, मान्यता प्रभावित होती थी। इसी कारण उनके गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता भरी होती थी। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश रहता था। मानवी पुरुषार्थ का भी इसमें योगदान रहता था, पर इस प्रयोजन को सफल बनाने में अदृश्य वातावरण की भूमिका-अनुकूलता का भी भारी योगदान रहता था। परिस्थितियाँ मनःस्थिति के आधार पर इतने बड़े करवट लेती है कि उसे भाग्य विधान, ईश्वरेच्छा जैसा नाम देना होता है। इसलिये अदृश्य जगत में संव्याप्त वायुमण्डल की तरह ही उसका दूसरा पक्ष वातावरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
इन दिनों बढ़ती विषाक्तता एवं उससे वायुमण्डल तथा वातावरण दोनों के ही प्रभावित होने की चर्चा तथ्यों व आँकड़ों के साथ पिछले पृष्ठों में की गयी है। इसका गम्भीर पर्यवेक्षण करें तो ज्ञात होता है कि इनका मूल कारण प्रचलन-प्रवाह तक ही नहीं है। इसकी जड़ें अदृश्य वातावरण में बड़ी गहराई तक घुसी दृष्टिगोचर होती है। दुष्चिंतन की भरमार से विषाक्त अदृश्य वातावरण और इससे फिर लोक-मानस में असुरता-निकृष्टता का बढ़ता। यह एक ऐसा कुचक्र है जो एक बार चल पड़ने पर फिर टूटने का नाम नहीं लेता। लोक चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय संबंध है।
इस कुचक्र को संघबद्ध प्रयासों द्वारा तोड़ना ही होगा। परमात्मा की तरह आत्मा को भी अपना उत्तरदायित्व निभाना होगा। अवतार प्रकरण की सूक्ष्म प्रक्रिया अपने स्थान पर है लेकिन सुधार प्रयोजन का दूसरा पक्ष मनुष्यकृत है जिसे जागृत व्यक्ति आपत्ति धर्म की तरह अपनाते और सृष्टा के प्रयोजन में हाथ बँटाते हैं। उन्हें अध्यात्म उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। विशालकाय सामूहिक धर्मानुष्ठान प्रायः इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं।
लंका विजय में असुरों का संहार तो हुआ पर अदृश्य वातावरण में विषाक्तता भरी होने के कारण लगा कि सामयिक समाधान भर पर्याप्त नहीं, अदृश्य का भी संशोधन होना चाहिए। श्रीराम ने दस अश्वमेधों का नियोजन इसी निमित्त किया। कुरुक्षेत्र में महाभारत विजय के उपरान्त कंस, दुर्योधन, जरासंध से तो पीछा छूटा पर अदृश्य की विषाक्तता यथावत् रहने से स्थायी समाधान न सूझा। अन्ततः अध्यात्म उपचार का आश्रय लिया गया एवं विशालकाय राजसूय यज्ञ की भी ऐसी ही अध्यात्म परक योजना बनाई गई।
सामूहिक धर्मानुष्ठानों से अदृश्य वातावरण की संशुद्धि के और भी अगणित प्रमाण-उदाहरण इतिहास पुराणों में भरे पड़े है। आसुरी सत्ता से भयभीत देवगणों को रक्षा का आश्वासन ऋषिरक्त के संचय से बनी सीता के माध्यम से मिला था। इसी प्रकार देवता जब संयुक्त रूप से प्रजापति के पास पहुँचे, एक स्वर से प्रार्थना की तो महाकाली प्रकट हुई जिन्होंने असुरों का संहार किया। संघशक्ति की ही यह परिणति थी। जिस समय राम-रावण युद्ध हो रहा था, अगणित अयोध्यावासी मौन धर्मानुष्ठानरत थे ताकि अन्य परास्त हो, नीति की विजय हो। ये सभी उदाहरण सामूहिकता के माध्यम से वातावरण को संशोधित करने के घटनाक्रमों पर लागू होते हैं।
सामूहिकता में असाधारण शक्ति है। दो निर्जीव वस्तुएं मिलकर एक+एक=दो ही बनती हैं जबकि प्राणवानों की एकात्मकता कई गुना हो जाती है। तिनके-तिनके मिलकर रस्सा बंटने, धागों के बुन जाने से कपड़ा बनने, ईंटों से इमारत, बूँदों से समुद्र तथा सींकों से बुहारी बनने के उदाहरण यही बताते हैं कि मिलकर एक हो जाने की परिणति कितनी महान होती है। एक लय-ताल से जब संघात किया जाता है तो बड़ी विस्फोटक परिणति की सम्भावनाएँ दृश्यमान होने लगती है। तालबद्ध ढंग से परेड करती फौज ध्वनि शक्ति द्वारा पुल तोड़ सकती है तथा एक छोटा-सा पेण्डुलम निरन्तर संघात से गर्डर तोड़कर भवन धराशायी कर सकता है। समूह बद्ध ढंग से की गयी प्रार्थना में वह प्रभाव है जो वातावरण के प्रवाह को बदल-उलटकर असम्भव को भी सम्भव बना सकता है। आज जो परिस्थितियाँ हैं, वे न रहकर सतयुग के अरुणोदय जैसी स्वर्गीय परिस्थितियाँ उभर सकें, जैसी दिव्यदर्शियों ने अपने भविष्य कथन में व्यक्त की हैं, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मानव निर्मित वातावरण की जहाँ चर्चा की जा रही है, वहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि अवसर आने पर इसकी भूमिका बड़ी विशिष्ट होती है। एक चिन्तन-एक प्रयास जब आँधी की तरह चलता है, सारे वातावरण को हिलाकर रख देता है। इसका एक उदाहरण ‘युद्धोन्माद’, “मॉब मेन्टलिटी” के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में दिमाग पर मात्र लड़ने का आवेश छाया होता है। हवा में तेजी और गर्मी कुछ ऐसी होती है जिसके कारण सामान्य व्यक्ति भी सम्मोहित होकर, असामान्य पुरुषार्थ करते देखे जाते हैं।
महात्मा गाँधी का सत्याग्रह आन्दोलन, दाण्डी यात्रा मानव निर्मित प्रवाह का एक स्वरूप है। अगणित व्यक्ति स्वेच्छा से जेल गए। मस्ती की इस युग में अनेकों शहीद हो गए। स्वतन्त्रता इस आँधी प्रवाह की परिणति थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विंस्टन चर्चिल ने हाथ की उंगलियों से अंग्रेजी का ‘वी’ (क) बनाते हुए एक नया नारा दिया था-“वी फॉर विक्ट्री।” इस नारे ने जन-साधारण को आत्मबल ऐसा बढ़ाया कि अन्ततः जीत नाज़ीवाद से संघर्ष करने वाली समूह शक्ति की ही हुई।
नियाग्रा जल प्रपात के बारे में अमरीका की जनजातियों में यह मान्यता संव्याप्त है कि जिस दिन यह झरना बन्द हो गया, प्रलय आ जाएगी। योगवश इसी सदी में एक बार हिम ग्लेशियर के नदी के उद्गम स्त्रोत पर जम जाने से कुछ घण्टों के लिए झरने से पानी गिरना बन्द हो गया। विश्व के सबसे बड़े प्रपात के थम जाने से सारा अमरीकन समुदाय अनायास ही शंकित हो उठा। सारे राष्ट्र में चर्चा में घण्टियाँ बजने लगी एवं सामूहिक प्रार्थना की जाने लगी। कुछ ही घण्टों में वह प्रपात फिर बहने लगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कथन है कि सामान्यतः ऐसा होता नहीं (ग्लेशियर का जमना)। परन्तु होने पर इतना शीघ्र पूरे प्रवाह से नदी का शीत ऋतु में भी बह निकलना अपने आप में अविज्ञात रहस्य है। स्कायलैब के गिरने व सारे विश्व में उसके गिरने से होने वाली क्षति से आशंकित जनसाधारण द्वारा प्रार्थना व उसके समुद्र पर गिरकर नष्ट होने का वर्णन तो अभी-अभी का ही है।
मुस्लिमों की नमाज का एक सुनिश्चित समय होता है। अजान का समय होते ही जो व्यक्ति जहाँ भी है, तुरन्त अपनी उपासना का शुभारम्भ कर देता है। ईसाई रविवार प्रातः एकत्र होते हैं तथा चर्च में सामूहिक प्रार्थना करते हैं। मिलिट्री की ‘रिट्रीट’ जब भी होती है, जो व्यक्ति जहाँ होता है, वहीं सावधान मुद्रा में खड़ा हो जाता है। ये सारे उदाहरण एक समय एवं सामूहिकता की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए बताए जा रहे हैं।
प्रज्ञा अभियान का प्रस्तुत प्रयास पुरुषार्थ कई विशेषताएँ लिए हुए हैं। अगणित व्यक्तियों की प्राण ऊर्जा, एक-सा चिन्तन, शब्द शक्ति की अपरिमित क्षमता एक समय-एक साथ जप ध्यान तथा महाप्रज्ञा की प्रेरणा का चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश हैं। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन-जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोधन हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है, उतना किसी का नहीं हुआ। शब्द शक्ति ओंकार गुँजन के रूप में समग्र अन्तरिक्ष में संव्याप्त है। ऐसी स्थिति में उच्चारित मन्त्र की शक्ति का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। समधर्मी कम्पन परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते ही है।
शब्द शक्ति सूक्ष्म मानव शरीर तथा परोक्ष अन्तरिक्षीय संसार को प्रभावित करने वाली एक समर्थ ऊर्जा शक्ति है। यह जीभ से नहीं, मन व अन्तःकरण से निकलती है। लोक प्रवाह को निकृष्टता से उलटकर उत्कृष्टता की ओर मोड़ने के लिए उच्चस्तरीय शब्द सामर्थ्य चाहिए। साधक स्तर की उत्कृष्ट जीवनचर्या वाले माँत्रिक जब एक साथ पुरश्चरण सम्पादित करते हैं तो ऋषि कल्प महामानवों जैसी वातावरण की आमूलचूल बदले देने की सामर्थ्य विकसित होने लगती है तपःपूत उच्चारण ही मन्त्र जाप है। सदाशयता को संघ बद्ध करने और एक दिशा में चल पड़ने की व्यवस्था बनाने के लिए इस जप का सामूहिक अनुष्ठान स्वरूप ही आदर्श है। श्रुति ने आदेश भी दिया है-“सहस्र सा कमर्चत्” अर्थात्-“हे पुरुषों तुम सभी सहस्रों मिलकर देवार्चन करो।” वस्तुतः सामवेद और ऋग्वेद की समस्त ऋचाएँ सामूहिक गान ही तो हैं।
लोहे का लम्बा गर्डर, सीमेन्ट का एक बड़ा पिलर अकेला एक व्यक्ति नहीं उठा पाता। जब कई व्यक्ति मिलकर “हईशा” के निनाद के साथ जोर लगाते हैं तो वे उसे उठाकर खड़ा कर देते हैं। बड़े-बड़े भवन इससे बन जाते हैं। लेकिन जब यही शब्द शक्ति शुभ कामना का चिन्तन लिए एक साथ कई व्यक्तियों द्वारा उच्चारित होती है, एक सी तरंगें जन्म लेती है और बदले में शुभ विचारों की वर्षा ऊपर से करती हैं। “धियो यो नः प्रचोदयात्”, “आग्नेय सुपथा राये अस्मान्”, “आनो भद्रा कृणवो यन्तु विश्वतः”-इन सभी मन्त्रों में सारे समूह के लिए श्रेष्ठ विचारों की-सन्मार्ग पर चलने की भारी प्रार्थना की गयी है। एक सी भाव लहरें एक ही चित्तवृत्ति को जन्म देती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक फ्रीक्वेंसी पर तरंगें उत्पन्न होने पर वे अप्रत्याशित परिवर्तन लाती है। अल्ट्रासोनिक तरंगों से रोगों का निदान व चिकित्सा की जाने लगी है। माइक्रोवेव्स से केवल संपर्क वरन् ऊर्जा उत्पन्न करने में भी सफलता मिली है। गायत्री मन्त्र की विशेषता उसे वह स्तर प्रदान करती है जिससे वह सामूहिक उच्चारण के माध्यम से अन्तरिक्ष को मथने में समर्थ हो सके। “सिम्पेथेटिक वाइब्रेशन” के सिद्धान्त पर आधारित यह प्रक्रिया “लाइटनिंग” (तड़ित विद्युत) जैसी सामर्थ्य रखती है।
वैज्ञानिकों का कथन है कि शब्द शक्ति से इलेक्ट्रो-मैगनेटिक लहरें उत्पन्न होती है जो स्नायु प्रवाह पर वाँछित प्रभाव डालकर उनकी सक्रियता ही नहीं बढ़ाती-वरन् विकृत चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं। एक अन्य निष्कर्ष के अनुसार संसार के पचास व्यक्ति यदि एक साथ एक शब्द का तीन घण्टे तक उच्चारण करें तो उससे छह हजार खरब वाट विद्युत शक्ति पैदा होगी। सारे विश्व में इससे घण्टों तक प्रकाश किया जा सकता है।
विशिष्ट बात यह है कि पृथ्वी जिसका चुम्बकत्व 0.5 गॉस है, हमेशा 0.1 से 100 साइकल्स प्रति सेकेंड की गति से स्पन्दन छोड़ती रहती है। इन चुम्बकीय धाराओं को “शूमैन्स रेजोनेन्स” कहा जाता है। इसकी गति साढ़े सात साइकल्स प्रति सेकेंड है। यह चुम्बकीय प्रभाव लगभग उतना ही है जितने की मस्तिष्क के विद्युत उद्भव। ब्रेनवेव्स की तरंगें भी अल्फाव थीटावेव्स के मध्य साढ़े सात साइकल्स की होती है। यह तथ्य व्यष्टि चेतना के उस महत् चेतना से विद्युत चुम्बकीय सम्बन्धों को सिद्ध करता है। मन्त्र शक्ति के कम्पन दोनों ही चेतन धाराओं को “इनट्यून” करके उन्हें बड़े विस्तार से समग्र ब्रह्माण्ड में फैला देते हैं।
प्रातःकालीन प्रज्ञा पुरश्चरण का अपना वैज्ञानिक महत्व है। शोध निष्कर्ष बताते हैं कि शरीर में प्राण शक्ति को प्रवाहित रखने के लिये उत्तरदायी “सिरोटोनिन” नामक हारमोन ‘पीनियल’ ग्रन्थि से इसी समय प्रवाहित होता है। मनःसक्रियता, काया की स्फूर्ति सार्थक मन्त्रोच्चार हेतु अनिवार्य मानी जाती है।
प्रस्तुत साधना को युग परिवर्तन हेतु अनिवार्य परिशोधन का, युग शक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान मानकर सविता देवता के उदय काल को प्रमुख मानते हुए सभी स्थानों पर आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। विभीषिका निवारण, अनीति-उन्मूलन तथा परिस्थिति की अनुकूलन हेतु महाकाल निर्देशित यह साधना अनुष्ठान है।
महत्वपूर्ण कार्यों और प्रयत्नों के लिए संयुक्त शक्ति का जुटाना आवश्यक होता है। भौतिक क्षेत्र में तो ऐसा ही हो सकता है कि तोप का एक बड़ा गोला सौ गोलियों जितना काम कर दें, किन्तु अध्यात्म क्षेत्र में वैसा नहीं है। एक बड़ी मशाल की अपेक्षा यहाँ सौ दीपकों का महत्व अधिक माना जाता है। यों भौतिक क्षेत्र में भी छोटी-छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी संरचना बनने की बात को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता। रुई का एक गट्ठा मरोड़कर वैसा मजबूत रस्सा या कीड़ा नहीं बन सकता जैसा कि पतले धागों के संयोग से बनता है। सभी जानते हैं कि ईंटों से चुनकर मकान बनते हैं। कणों के सम्मिश्रण से पदार्थों की रचना होती है। चक्रवात की तुलना में हवा के छोटे-छोटे झोंके सन्तुलन बिठाते हैं। ज्वार-भाटों पर नहीं समुद्र की शोभा व्यवस्था सामान्य लहरों पर टिकी हुई है।
मनुष्य में शरीर और प्राण दोनों हैं। शरीर में बल और प्राण में जीवन रहता है। शरीर की संयुक्त शक्ति जितनी बनती है उसकी समता से एक यन्त्र मानव बन सकता है। किन्तु हर व्यक्ति की जो अपनी-अपनी सूझ-बूझ जीवट होती है उसका भी तो महत्व है। इसलिए सेना में अधिकाधिक सुयोग्य सैनिकों की आवश्यकता पड़ती है। अस्त्र-शस्त्रों की न्यूनाधिकता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी कि सैनिकों का कौशल, साहस और पराक्रम। यह जीवन्तों की विशेषताएँ हैं। इसलिए प्रीति भोजों में, जुलूसों में, उत्सव आयोजनों में जन शक्ति के सहारे शोभा बनती है। एक दो सेनापति, नेता, विद्वान, धनाढ्य को विराजमान कर देने से न जुलूस बनता है न समारोह। व्यक्ति की प्राण शक्ति की अपनी गरिमा है। उसका गणित अलग है। एक और एक मिलकर जड़ पदार्थ दो होते हैं पर जीवन्तों के विषय में एक और एक मिलकर ग्यारह होने की उक्ति ही सार्थक होती है। भावनात्मक मिलन का अपना महत्व है। मुसाफिरखानों की भीड़ में भावनात्मक एकता न होने से उसका महत्व भले ही नहीं पर एक स्वभाव, एक शिक्षण, एक लक्ष्य वाले सैनिकों की संयुक्त शक्ति कैसा गजब ढाती है, यह किसी से छिपा नहीं है। शरीर संरचना छोटे जीवाणुओं और अवयवों के संयुक्त समन्वय से ही बनती है।
अदृश्य परिशोधन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए आदर्शवादी भावनाशीलों की संयुक्त सामर्थ्य सदा अपेक्षित रही है। उसका कोई और विकल्प नहीं हो सकता है। सीता अवतरण के लिए ऋषियों का एक-एक बूँद रक्त संग्रह करके वह घड़ा भरा गया था। जिसे हल चलाते समय जनक ने सीता समेत खेत में पड़ा पाया था। यह प्रयोजन एक व्यक्ति ने सिर काटकर रक्त से घड़ा भर लेने से पूरा नहीं हो सकता था। उससे प्राणवानों की संयुक्त शक्ति से प्रजापति ने महाकाली की संरचना की थी। इन्द्र कुबेर जैसे एक दो वरिष्ठों को मिला देने भर से वह कार्य पूरा नहीं हो सकता था।
एक प्रकृति की अनेक प्राणवान् इकाइयों को एक लक्ष्य के लिए नियोजित कर देने कितनी प्रचंड शक्ति उत्पन्न होती है, उसे सभी विज्ञजन भली-भाँति जानते हैं। प्रजापति ने ऋषि रक्त की बूँद-बूँद संग्रह करके घड़ा भरने का इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए परामर्श दिया था। दुर्गावतरण में देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति का संग्रह करने का प्रबन्ध स्वयं भी इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए किया था।
राम-लक्ष्मण में बल कम न था। समुद्र को सुखा देने वाले बाण के धनी रावण को भी मार सकते थे। पर्वत उखाड़ने वाले हनुमान लंका को भी पानी में डुबा सकते थे, किन्तु यह पर्याप्त न समझा गया। व्यवस्था यह बनी कि अधिक संख्या में रीछ, वानरों की उमंगों का संचय करके समन्वित प्राण शक्ति का उद्भव किया जाय। यह महत्वपूर्ण कार्यों के लिए नीति निर्धारण भी है, साथ ही प्राणवानों को संयुक्त शक्ति से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड क्षमता का रहस्योद्घाटन भी। भगवान कृष्ण क्या नहीं कर सकते थे। जरासन्ध और शिशुपाल की तरह वे कौरवों से भी अकेले निपट सकते थे, पर महाभारत में उन्होंने बड़े प्रयत्न से पाण्डवों के पक्ष में विश्वभर से सैन्य सहयोग जुटाया। इतना ही नहीं उनने गोवर्धन तक ग्वाल-बालों की समन्वय शक्ति से उठा सकने का प्रदर्शन किया। यों वे उसे उठा तो अकेले भी सकते थे।
परशुराम के एकाकी प्रयत्नों का नगण्य परिणाम देखते हुए बुद्ध ने दूसरी नीति अपनाई। यों दोनों के सामने एक ही जैसी समस्या थी। बुद्ध भी भगवान थे। परशुराम तीन कला के और बुद्ध बीस कला के। फरसा वे भी उठा सकते थे, पर वे महान एवं व्यापक प्रयोजनों के लिए प्राणवानों की संयुक्त शक्ति का प्रयोग करने के पक्ष में रहे उनने चीवरधारी श्रवण परिव्राजक स्तर के नर नारियों की एक विश्ववाहिनी खड़ी थी। विश्व के कोने-कोने में पहुँचने का कार्य इसी प्रकार हो सका। शंकर दिग्विजय की तरह वे अकेले की दौड़ धूप करने की निरर्थकता को भी समझते थे अतएव उन्होंने गहराई तक सोचने और दूरगामी परिणाम उत्पन्न कर सकने वाले निष्कर्ष निकाले।
प्राचीन काल में राजाओं के मल्ल युद्धों में थोड़े से लोग ही हार जीत का फैसला कर लेते थे, और राज्य बदल जाते थे। गान्धी और अंग्रेज के बीच मल्लयुद्ध नहीं रचा गया। जन जागरण, जन समर्थन, जन सहयोग की संयुक्त जन शक्ति को उभारा गया और उस तूफान के सामने सूर्य समर्थ समझी जाने वाली सत्ता भी टिक न सकी। गान्धी की जीत का रहस्य इतना ही है कि उनने देश के मणि मुक्तकों-साहसियों को कोने-कोने से ढूँढ़ निकाला और उनकी एक जुट बनाकर इतनी बड़ी शक्ति पुँज एकत्रित किया, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में जीतने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को बुरी तरह पछाड़ कर रख दिया।
अवाँछनीयता से लोहा लेने के लिए ही नहीं सृजन प्रयोजनों के लिए भी संयुक्त प्राण शक्ति का समय-समय पर प्रयोग होता रहा है। भगवान बुद्ध के समय में एक लड़की ने जन-जन की कसक जगाने का व्रत लिया और उस आधार पर दुर्भिक्ष पीड़ित बालकों की प्राण रक्षा का ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया। समुद्र का पुल बाँधने में रीछ वानरों के तनिक-तनिक से सहयोग से कितना बड़ा काम बन पड़ा, यह सर्वविदित है। देवर्षि नारद जन-जागरण के लिए निरन्तर परिभ्रमण करते थे। सूत जी शौनिकों को स्थान-स्थान पर एकत्रित करके प्रयत्नरत होने का प्रशिक्षण देते थे। ऋषि प्रणीत तीर्थ धामों और बुद्धकालीन विहार संघारामों में सदाशयता की संयुक्त शक्ति को एकत्रित एवं प्रशिक्षित किया जाना था। भूतकाल के महान इतिहास की-भारत की साँस्कृतिक गरिमा की-पृष्ठभूमि इसी आधार पर विनिर्मित हो सकी।
साधन क्षेत्र में यों होती तो व्यक्तिगत एवं एकान्तिक साधनाएँ भी हैं पर उनका लक्ष्य प्रयोजन एवं लाभकर्ता तक ही सीमित रहता है। सर्वजनीन समाधान एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई है तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता हुई है तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गई है। राजतन्त्र द्वारा राजसूय यज्ञ और धर्मतन्त्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, संवर्धन, सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या तपस्वी परिकर एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से सम्पन्न नहीं कर सकता था उसे मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
बड़े वजन उठाने या धकेलने वाले मजूर एक साथ हल्ला बोलकर संयुक्त बल लगाने के सिद्धान्त को भली प्रकार समझते हैं। इसी आधार पर वे कठिन कार्य सम्पन्न करते हैं। संयुक्त बल एक साथ लगाने का क्रम न बने तो फिर बड़े भार वाले चट्टान को इधर से उधर ले पहुँचना और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता है। संयुक्त शक्ति के ऐसे प्रमाण परिचय छप्पर उठाने, आग बुझाने जैसे छोटे-मोटे कार्यों में आये दिन दृष्टिगोचर होते रहते हैं।
तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञा पुरश्चरण की सामयिक परिस्थिति से निपटने के लिए योजना बनी है। इसका समय और विधान तो तनिक-सा है। सूर्योदय से पूर्व पाँच मिनट मानसिक गायत्री जप और उसका अदृश्य परिशोधन के लिए संकल्प।” इसे किसी विधान प्रतिबन्ध उपकरण आदि से सर्वथा मुक्त रखा गया है। जो प्रज्ञा परिजन जहाँ भी जिस भी स्थिति में हों नीयत समय पर पुरश्चरण की निर्धारित प्रक्रिया को पूरा कर लें। देखने-सुनने में यह प्रयोग बहुत छोटा और महत्वहीन-सा लगता है, पर बात ऐसी है नहीं। उसमें एक वर्ग, एक लक्ष्य, एक विधान, एक समय, के चार तथ्यों का एक साथ समावेश हो जाने से जिस संयुक्त प्राणशक्ति का उद्भव होता है उसके प्रयोग-परिणाम की प्रतिक्रिया निश्चित रूप से असाधारण होनी चाहिए। समय, श्रम, लक्ष्य एवं उपक्रम के बिखराव से महत्वपूर्ण शक्ति स्त्रोत भी विश्रृंखलित बने रहते हैं। बिखराव में सामर्थ्य का कितना अपव्यय होता है और उसके विकेन्द्रीकरण से उत्पन्न चमत्कार कितने प्रचण्ड होते हैं, यह किसी से छिपा नहीं हैं। सूर्य किरणें पृथ्वी पर पड़ती और छितराती रहने के कारण मात्र गर्मी रोशनी भर उत्पन्न करती हैं। यदि एक इंच परिधि की सूर्य किरणें आतिशी शीशे के द्वारा एकत्रित कर ली जाय तो देखते-देखते चिनगारियाँ उठने लगेंगी और उनके दावानल बनने से देर न लगेगी।
तनिक-सी भाप के केन्द्रीकरण द्वारा प्रेशर कूकर से लेकर विशालकाय वालयर प्रचण्ड सामर्थ्य का परिचय देते देखे गये हैं। वर्षा का बिखरा जल जहाँ-तहाँ बहता रहता है, पर जब वह किसी नदी नाले में एकत्रित होकर एक दिशा पकड़ता है तो उसे हाथी तक बहा ले जाने वाले प्रवाह का रौद्र रूप धारण करते देखा गया है। बिखरी हुई ढेरों बारूद को जलाने पर भक से उड़ती देखी गई हैं, किन्तु यदि तनिक-सी मात्रा एक कारतूस में बन्द करके छोटी नली वाली बन्दूक द्वारा चला दी जाय तो सिंह के आर-पार निकलने, कड़े लक्ष्य बेधने में सफल होती है। विचारों की एकाग्रता से उत्पन्न होने वाली ध्यान शक्ति का महत्व योगीजन भली प्रकार समझते हैं।
देव-दानव संघर्ष में देवताओं के बार-बार हारने और असुरों के बार-बार जीतने के पीछे कारण ढूँढ़ा जाय तो बिखराव और एकत्रीकरण के भिन्न परिणामों का प्रमाण परिचय स्पष्टतः सामने आ खड़ा होता है। देवता हर दृष्टि से वरिष्ठ और समर्थ होते हुए भी इसलिए हारते रहे कि उनने संयुक्त शक्ति विकसित करने की आवश्यकता नहीं समझी और अपनी ढपली, अपना राग बजाते रहे। जबकि दैत्यों ने गठन का महत्व समझा और गिरोह बनाकर हमला किया। इस एक ही विशेषता के कारण वे जीते, यद्यपि वे हर दृष्टि से देवताओं की तुलना में पिछड़े हुए थे।
धर्मशीलों की संकल्प शक्ति का एकत्रीकरण और उसका सामयिक समस्या के समाधान में उपयोग, यह है एक महत्वपूर्ण आधार जिसके कारण प्रज्ञा पुरश्चरण से उन परिणामों की आशा की गई हैं जो प्रस्तुत विपन्नता से विश्व-व्यवस्था को उबार सकें।
ग्लोब का तापमान मानव के कृत्यों से अब इतना अधिक बढ़ चुका है कि हिमनदों तथा ध्रुवों के पिघलने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। दक्षिणी ध्रुव पर गए एक वैज्ञानिक दल ने विश्लेषण कर बताया कि विश्वभर के वायुमण्डल में संव्याप्त प्रदूषण की झाँकी वहाँ की जा सकती है जहाँ आइस कैप्स से निरन्तर पृथ्वी ऊष्मा उत्सर्जित करती रहती है। समुद्र की सतह गत बीस वर्षों में 7 से 9 इंच ऊँची बढ़ी है, पोलर क्लाइमेट में भी बहुत परिवर्तन हुआ है। लगभग तीन खरब छियासठ अरब टन कार्बनडाइ ऑक्साइड वायुमण्डल के पाकेट्स में बन्द पड़ी हैं। वृक्षों के निरन्तर कटते चले जाने से यह मात्रा नित्य बढ़ती जा रही है।
वृक्ष का तना आँखों से दीखता है पर उसमें जीवन संचार करने वाली जड़ें जमीन में नीचे दबी होती हैं, दीखती नहीं। मनुष्य का शरीर दीखता है, प्राण नहीं। परिस्थितियों का आँकलन होता है पर उनके पीछे कठपुतली के धागों जैसा सूत्र संचालन करने वाली मनःस्थिति का समझने समझाने की ओर ध्यान ही नहीं जाता। यही बात दृश्यमान भली-बुरी परिस्थितियों के संबंध में भी है। अनुकूलता और प्रतिकूलता से संबंधित घटनायें- हलचलें- समस्यायें दृष्टिगोचर होती है और आमतौर से उनके उपचार साम, दाम, दण्ड, भेद के आधार पर सोचे, खोजे और कार्यान्वित किये जाते रहते हैं। यह उचित भी है और आवश्यक भी, किन्तु इतने भर को पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए।
निशाने पर गोली गलती है और बन्दूक उसे चलाती है। इस प्रत्यक्ष के पीछे चलाने वाले का अभ्यास और साहस भी परोक्ष रूप से काम करता है उसके अभाव में कारतूस और बन्दूक सब प्रकार ठीक होने पर भी काम बनता नहीं। पौष्टिक आहार और कारगर औषधि उपचार की महिमा अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं पर पाचन तन्त्र का सही होना भी कम आवश्यक नहीं। यहाँ भी प्रत्यक्ष की तुलना में परोक्ष की गरिमा कम नहीं आँकी जा सकती। अच्छी पौध लगाने से ही बगीचा खड़ा नहीं हो जाता, भूमि की उर्वरता, मौसम की अनुकूलता तथा माली की कुशलता भी उसके लिए आवश्यक है। अच्छे विद्यालय की भर्ती और सुयोग्य अध्यापक की नियुक्ति से ही कोई विद्वान नहीं हो जाता इसमें छात्र की लगन और मेधा अपनी भूमिका निभाती है।
व्यक्ति और समाज के सम्मुख प्रतिकूलताओं, कठिनाइयों, समस्याओं के समाधान के निराकरण और अभिवर्धन के कडुए-मीठे उपचार करने और साधन जुटाने होते हैं। प्रताड़ना और सहायता अपना-अपना काम करती हैं। इतने पर भी परोक्ष वातावरण की अनुकूलता प्रतिकूलता की सफलता असफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है। विज्ञजन उस संबंध में भी आवश्यक ध्यान रखते हैं। फसल उगाने के लिए वर्षा ऋतु की प्रतीक्षा करते हैं। अथवा अन्य उपायों से खेत का नम रखने का प्रबन्ध करते हैं। परोक्ष के संबंध में उपेक्षा बरतने से काम चलता नहीं। साधनों की तरह पराक्रम का भी-परिस्थितियों की तरह भावनाओं का भी ध्यान रखना होता है। परोक्ष भी प्रत्यक्ष से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण प्रसंगों के संबंध में तो यह और भी अधिक आवश्यक है। युग परिवर्तन जैसे व्यापक और विशद् प्रयोजनों में प्रत्यक्ष से भी अधिक परोक्ष का योगदान रहता है।
रावण के आसुरी आतंक का निवारण करने के लिए लंका काण्ड महायुद्ध होने, लंकादहन से लेकर सेतुबन्ध बाँधने तक की बात सर्वविदित है। युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ था। और अन्ततः राम को विजय का श्रेय मिला था। सीता वापस लौटी और राज्याभिषेक का उत्सव हुआ था। रामचरित्र के ज्ञाता इस प्रसंग को भली भाँति जानते हैं। समझा जाता है कि इतने भर से ही तात्कालिक समस्या का समाधान हो गया होगा। सुख चैन की परिस्थितियाँ बन गयी होंगी।
तात्कालीन तत्वदर्शियों ने एकत्रित होकर यह निष्कर्ष निकाला था कि अदृश्य में संव्याप्त विषाक्तता ने उन दिनों लंका से शेकर, चित्रकूट, पंचवटी तक अगणित असुरों को उपजाया और आतंक बढ़ाया था। उसका अदृश्य घटाटोप लंका विजय के उपरान्त भी यथावत् बना हुआ था। कुछ ही समय के उपरान्त उसी दुःखद घटनाक्रम भी फिर पुनरावृत्ति होती कुछ के मर जाने पर रक्तबीज की तरह नये असुर उत्पन्न होते और नये उपद्रव खड़े करते। इसलिए राम विजय को पर्याप्त न माना जाय, अदृश्य का परिशोधन भी किया जाय। इनके लिए अध्यात्म उपचारों की आवश्यकता थी उनकी विज्ञजनों द्वारा व्यवस्था बनाई गयी थी। दस अश्वमेध यज्ञों की योजना बनी और सम्पन्न हुयी थी। काशी का दशाश्वमेध घाट, भगवान राम के द्वारा सम्पन्न हुयी अदृश्य परिशोधन की उस मात्र शृंखला को अभी भी साक्षी प्रस्तुत करता है।
जड़ बनी रहने पर टहनी कटने से भी कुछ बनता नहीं। जड़ें नयी कोपलें उगाती रहती हैं। प्रथम विश्वयुद्ध को कुछ ही दिन बाद दूसरा विश्व युद्ध और भी भयंकर रूप से लड़ा गया। दूसरे के बाद तीसरे की तैयारी तथा विनाश विभीषिका और भी बढ़ी-बढ़ी है। चम्बल क्षेत्र के डाकू निपटते ही नहीं। कितने ही पकड़े गये, कितने मरे, कितनों ने आत्म समर्पण किये पर वह आतंक अपने स्थान पर यथावत् विद्यमान है। सभी जानते हैं कि स्वच्छता का समुचित प्रबन्ध न होने के कारण सड़न के अगणित मक्खी मच्छर पैदा होते रहते हैं। मलेरिया विभाग के अधिकारी मच्छर मारने के लिए अपने तोप विभाग के अधिकारी मच्छर मारने के लिए अपने तोप तमंचों का भरपूर प्रयोग करते हैं। टनों डी.डी.टी. की बमबारी होती है किन्तु मच्छर हैं जो टस से मस नहीं होते। वरन् और भी अधिक ढीठ बनते जाते हैं। उनने अपनी प्रकृति ही विष भक्षण की बना ली है। स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष उपचार ही सब कुछ नहीं है। उसके लिए गन्दगी और नमी का भी निराकरण करना होगा। पत्ते तोड़ने की अपेक्षा अधिक अच्छा यह है कि जड़ पर कुल्हाड़ा चलाया जाय।
लंका विजय और रामराज्य स्थापना के बीच दस अश्वमेधों की शृंखला यह बताती है कि वातावरण में छाई हुयी विषाक्तता का निराकरण और अदृश्य जगत में देवत्व का अभिवर्धन एक ऐसा आयोजन था जिसे महायुद्ध और महा सृजन की मध्यवर्ती कड़ी कहा जा सकता है। दो पहियों के बीच में वह धुरी आँखों से ओझल रहने पर भी कम आवश्यक नहीं होती।
कृष्णावतार के समय भी इसी उपक्रम की पुनरावृत्ति हुयी। कंस, दुर्योधन, जरासंध, शिशुपाल जैसों से निपटने के लिए श्रीकृष्ण ने ध्वंस लीला रची। महाभारत युद्ध भी लड़ा गया। पाण्डव जीते। इसके उपरान्त परीक्षित के नेतृत्व में द्वापर में सतयुग की झलक दिखाने के तथा संगठित राष्ट्र को चक्रवर्ती आवश्यकता पूर्ण करने की व्यवस्था बनी। महाभारत का तात्पर्य था विशाल भारत। उस लक्ष्य की पूर्ति भली प्रकार हुयी। तात्कालीन भारत का नक्शा समूचे जम्बू द्वीप के साथ गुँथा हुआ दीखता है।
यह ध्वंस और सृजन की उभयपक्षीय प्रक्रिया हुयी। इतना बन पड़ने पर भी अदृश्य जगत में भरी हुयी विषाक्तता का निराकरण आवश्यक था अन्यथा कुछ ही समय उपरान्त उस अनाचार की पुनरावृत्ति होने लगती। नये कंस दुर्योधन उपजते और नये महाभारत की आवश्यकता पड़ती। भगवान कृष्ण ने उस परोक्ष समस्या का निराकरण आवश्यक समझा और प्रख्यात राजसूय यज्ञ के रूप में वातावरण परिशोधन का अध्यात्म उपचार नियोजित किया। उससे कुछ तो काम चला पर अधूरापन रह जाने के कारण कुछ ही समय उपरान्त परीक्षित पुत्र जन्मेजय ने नाग यज्ञ के नाम से विष परिशोधन का दूसरा अध्यात्म उपचार सम्पन्न किया।
भगवान राम और भगवान कृष्ण द्वारा नियोजित उपरोक्त दो घटनायें सर्वविदित हैं। पुरातन इतिहास पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि समय-समय पर ऐसे ही अनेक उपचार सम्पन्न होते रहे हैं। पीछे तो उनकी एक क्रमबद्ध व्यवस्था परिपाटी ही बन गयी ताकि कूड़े का ढेर जमा होने पर सफाई करने की अपेक्षा साथ की साथ बुहारी लगती, धुलाई होती और फिनायल छिड़की जाती रहे।
विशेष पर्वों, विशेष तीर्थों में धर्मानुष्ठान होते रहने की परम्परा उसी उद्देश्य के निमित्त बनी और चली। तीन-तीन वर्ष बाद हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक कुम्भ आयोजन ऐसे ही हैं जिनमें साधनात्मक उपचार और ज्ञान यज्ञ की उभयपक्षीय व्यवस्था साथ-साथ चलती थी। प्रस्तुत समस्याओं पर मूर्धन्य मनीषियों द्वारा गम्भीर विचार विनियम करके किन्हीं निर्णय निष्कर्षों पर पहुँचा जाता था। बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उस अवसर पर उपस्थित होते थे और विद्वज्जनों के निर्धारणों को अपने अपने क्षेत्रों में कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व कन्धे पर लेकर प्रयाण करते थे। ऐसे ही बड़े सम्मेलन आयोजन बुद्धकाल में भी संघारामों के माध्यम से सम्पन्न होते थे। उनमें उन सभी देश क्षेत्रों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे जिनमें बौद्ध धर्म का प्रचार पहुँच पाया था।
बड़े और केन्द्रीय वाजपेय यज्ञों को छोटे क्षेत्रीय एवं स्थानीय धर्म समारोहों में बाँटा गया। उनके लिए तिथि, समय, स्थान बार-बार बदलने के स्थान पर यह उचित समझा गया कि किसी पर्व पर किसी तीर्थ में ऐसे आयोजन हर वर्ष होते रहे। उनका क्रम निरन्तर जारी रहे। इस विकेन्द्रीकरण का सबसे बड़ा लाभ यह समझा गया कि समीपवर्ती धर्म प्रेमी उनमें सरलतापूर्वक पहुँच सकें जबकि दूरवर्ती बड़े आयोजनों में उनका पहुँच सकना समय साध्य, श्रम साध्य और व्यय साध्य होने के कारण कठिन असुविधाजनक पड़ता। इन दिनों भी अनेकानेक तीर्थों में नियत पर्वों पर हर साल धार्मिक मेले होते हैं। यद्यपि आज उनका रूप विकृत उपहासास्पद जैसा हो गया है और वे मनोरंजक व्यवस्थापक मेले ठेलों में अधिक कुछ रह नहीं गये हैं तो भी अतीत के उद्देश्यों की झाँकी किसी न किसी रूप में मिलती है। खण्डहरों को देखकर भी यह अनुमान लगता है कि वहाँ कभी कितने भव्य भवन खड़े रहे होंगे।
इन दिनों के धार्मिक मेले कभी क्षेत्रीय आयोजन थे जिनमें साधना यज्ञ और ज्ञानयज्ञ का समान समन्वय रहा तो था। प्रज्ञा अभियान द्वारा उस पुरातन परम्परा का नये रूप में जीर्णोद्धार करने का प्रयत्न किया है। गायत्री यज्ञ और युग निर्माण सम्मेलन की संयुक्त समारोह प्रक्रिया बहुत समय से चल रही है। इसका शुभारम्भ स्वरूप निर्धारण सन् 57 में गायत्री तपोभूमि मथुरा में सम्पन्न हुये सहस्र कुण्डीय गायत्री महायज्ञ से सम्पन्न हुआ था। उस अवसर पर देश के कोने-कोने से प्रायः चार लाख की संख्या में धर्म क्षेत्र की मूर्धन्य प्रतिभायें एकत्रित की गयी थी। और उनके प्रभाव सहयोग से धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण का प्रयोग देशव्यापी बनाया गया था। जो अब बढ़ते-बढ़ते समस्त संसार में युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण कर रहा है। मत्स्यावतार की तरह उसकी प्रगति देखते ही बनती है।
इन दिनों वाणी अत्यधिक मुखर हुयी है। उसके पीछे ऊर्जा का नियोजन करने वाली साधना उपेक्षा के गर्त में गिर पड़ी है। यही कारण है कि जहाँ देखा जाय वहाँ छोटे-बड़े जन समारोहों में मात्र गीत प्रवचन भर की उछल-कूद होती रहती है। प्रचारात्मक, उत्तेजनात्मक प्रयोजन ही इनके सहारे पूर्ण होता है। भावनात्मक-आध्यात्मिक-अदृश्य को प्रभावित करने वाले-प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने वाले धर्मानुष्ठानों का समन्वय भी रहना चाहिए यह तथ्य विस्मृत हो जाने के कारण विभिन्न संस्थाएं अपने-अपने वार्षिकोत्सव गीत मंगल के साथ धूमधाम से सम्पन्न करती रहती है। राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक संस्थाओं के छोटे-बड़े समारोह आये दिन देखने को मिलते रहते हैं। पर इस प्रचलन के पीछे काम करने वाली-भावनात्मक, श्रद्धासिक्त वातावरण बनाने वाली प्रक्रिया के दर्शन नहीं होते जिसे कभी सामूहिक धर्मानुष्ठान कहा और अत्यधिक महत्व दिया जाता था। प्राचीन काल के सतयुगी प्रचलनों के पीछे तात्कालीन समाज व्यवस्था तो प्रत्यक्ष थी ही। परोक्ष रूप में उन धर्मानुष्ठानों सहित सम्पन्न होने वाले ज्ञान यज्ञों का भी कम महत्व न था जिन्हें वाजपेय यज्ञ कहा जाता था। जिनका जनमानस के परिष्कार और अदृश्य वातावरण के अनुकूलन में असाधारण योगदान रहता था। प्रज्ञा पुरश्चरण आयोजनों के माध्यम से अब उसे अस्त-व्यस्त पराक्रम को नये सिरे से पुनर्जीवित किया जा रहा है। प्रस्तुत विपन्नताओं के समाधान में उनका असाधारण योगदान होगा, यह सुनिश्चित है।
जीयन्ताँ दुर्जया देहे रिपवश्चक्षुरादयः। जितेषु ननु लोकोऽयुँ तेषु कृत्स्नस्त्वयाजितः॥
अपने ही शरीर में रहने वाले चक्षु, आदि दुर्जय शत्रुओं को पहले जीतना चाहिए। उनके जीत लेने पर ऐसा समझो कि मानो सारा संसार तुमने जीत लिया।
पृष्ठभूमि सुदृढ़ हो तो छोटे साधन भी बड़े चमत्कार प्रस्तुत कर सकते हैं। अंगद ने रावण की सभा में पैर जमाकर समस्त असुरों को उसे उखाड़ने की चुनौती दी थी। यह अंगद का पराक्रम नहीं, राम का समर्थन था। जस्ते का तनिक सा टुकड़ा गोली बनकर इसलिए लक्ष्य बेध करता है कि उसके पीछे बन्दूक में उत्पन्न हुई प्रचण्ड शक्ति काम करती है। इसके बिना वह गोली बच्चों के खेल-खिलवाड़ से अधिक और कोई प्रयोजन पूरा नहीं कर सकती। यौगिकों का अभिमन्त्रित जल या भस्म से होने वाले चमत्कारों के पीछे उसे पानी या राख की नहीं योगियों की सामर्थ्य काम करती है। प्रज्ञा पुरश्चरण का विधान तनिक-सा ही कर्मकाण्ड के हल्का-फुलके होने के कारण किसी का यह सन्देह नहीं करना चाहिए कि इतने भर से क्या प्रयोजन सधेगा। देखना उस पृष्ठभूमि को है, जिसके कारण इस प्रयोग के असाधारण परिणाम की आशा एवं घोषणा की गई हैं।
प्रज्ञा परिवार से इन दिनों प्रायः बीस लाख व्यक्ति सम्बद्ध हैं। उनका चिन्तन, विश्वास, स्वभाव एवं निर्धारण एक निश्चित दिशा में प्रवाहित अग्रसर होता है। इतने लोगों द्वारा नियत समय पर नियत विधान एक विश्वास के आधार पर किया गया साधना उपचार यदि चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है तो उसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
किसी बड़े पुल पर से यदि सैनिकों की एक टुकड़ी कदम से कदम मिलाकर इस प्रकार चले कि उनकी ध्वनि तालबद्ध होकर उठें तो इतने भर से वह पुल धराशायी हो सकता है। संगीत यन्त्र साधारण रीति से बजता और मनोरंजन करता रहता है, किन्तु यदि उसके ताल स्वर क्रमबद्ध कर दिये जाय तो दीपक राग-मेघ मल्हार, मृग सम्मोहन जैसे चमत्कृत करने वाले परिणाम सामने आ सकते हैं। रोग निवारण में, दूध बढ़ाने में, पौधे बढ़ाने में, प्रजनन सुधारने में इन दिनों संगीत के अद्भुत परिणाम सामने आये हैं। उन शोध प्रयोजनों से यह निष्कर्ष निकला है कि स्वर और ताल की क्रमबद्धता से ध्वनि प्रवाह को सामर्थ्य स्त्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है।
मन्त्र विज्ञान के आधार पर उत्पन्न होती परिणतियों का कारण स्वर विज्ञान में खोजा जा सकता है। उनके साम गान के आधार पर और विज्ञानी परोक्ष विधा के आधार पर असाधारण प्रभाव परिणाम उत्पन्न करते थे। उन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञा पुरश्चरण की छोटी-सी सर्वसुलभ साधना को महत्वपूर्ण बनाया गया है। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षर जब एक समय में, एक साथ, एक प्रकार, एक प्रयोजन के लिए ध्वनित होंगे, तो उसमें सामूहिकता की प्राणशक्ति का आश्चर्यजनक समावेश होगा। बीस लाख व्यक्तियों की प्राण ऊर्जा जब तालबद्ध, समयबद्ध, क्रमबद्ध, अनुशासनबद्ध, विधानबद्ध होकर निस्सृत होगी तो उसके आशातीत परिणामों की अपेक्षा करने में तनिक भी अतिवाद नहीं है।
उपासना विज्ञान के रहस्यवेत्ता एक समय पर एक प्रक्रिया के क्रियान्वित होने की परिणति का अनुमान ही नहीं अनुभव भी प्रस्तुत करते रहे हैं कि मन्त्र शक्ति की पृष्ठभूमि में इस एकता, एकरूपता, एक समय निर्धारण का कम महत्व नहीं है। भारतीय धर्म में प्रातः सायं सूर्योदय और सूर्यास्त का समय संध्या काल बताया गया है। इस समय के संध्या वन्दन को अन्य समयों की अपेक्षा कहीं अधिक सत्परिणाम प्रस्तुत करने वाला बताया गया है। इस्लाम धर्म में नमाज के मन्त्रों का जितना महत्व है, उतना ही उस प्रक्रिया का नियत समय पर करने का भी अनुशासन है। मस्जिदों में अजान दी जाती है। मन्दिरों में शंख ध्वनि होती है, ताकि नियत समय पर सभी साधक अपनी विधान प्रक्रिया सम्पन्न करें। गिरजाघरों में भी नियत समय पर ‘प्रेशर’ के लिए उपस्थित होने का अनुशासन है। इसके लिए घन्टे बजते हैं और घड़ी से नियत विधान का परिपालन होता है। सभी महत्वपूर्ण धर्मों में अपने-अपने ढंग से उपासना कृत्यों को नियत समय पर सम्पन्न करने का अनुशासन है, उसके निर्वाह का कठोर निर्धारण भी।
अस्त-व्यस्त ढंग से मनमौजी ढंग से की गई महत्वपूर्ण उपासना भी निरर्थक चली जाती है, जबकि निर्धारित अनुशासन का परिपालन सामान्य विधि-विधानों की भी अद्भुत परिणति उत्पन्न करता देखा गया है। इस संदर्भ में न केवल समय का वरन् विधान की एकरूपता का भी अपना महत्व है। जीवन्त धर्मों में उपासनात्मक-एकरूपता को बहुत महत्व दिया गया है। उनमें एक मन्त्र, एक विधान, एक अनुगमन पर बहुत जोर दिया गया है। एक विच्छृंखलित हिन्दू धर्म ही है। जिसमें साम्प्रदायिक विभ्रमों ने सब कुछ अस्त-व्यस्त अव्यवस्थित करके रख दिया है। धार्मिक क्षेत्र की इस अराजकता को दूर करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। अन्यथा विपरीत के रहते साधना विधानों का सत्परिणाम न तो व्यक्ति विशेष को मिल सकता और न उससे अदृश्य वातावरण-अदृश्य जगत पर कोई कारगर प्रभाव पड़ सकेगा। फलतः वह प्रयास एक प्रकार से निरर्थक जैसा बनकर रह जायेगा।
इन विश्व संकट के दिनों में जबकि अध्यात्म उपचारों का आश्रय लिया जा रहा है, समय, विधान एवं अनुशासन की समस्वरता पर ध्यान केन्द्रित करने की विशेष रूप से आवश्यकता है। यह सार्वभौम प्रश्न है। इस ओर साधना क्षेत्र के संबंध रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। अन्य धर्मों की तुलना में सिकुड़ते हुए हिन्दू धर्म की विच्छृंखलिता अधिक चिन्ताजनक है। न केवल इस समुदाय को सम्भाला सुधारा जाना चाहिए वरन् विश्व के समस्त धर्मप्रेमियों, आस्तिकों, उपासना प्रिय लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि उपासना में भावना का, विधान का जितना महत्व है उससे अनुशासन पालन की गरिमा किसी भी प्रकार कम नहीं। इस संदर्भ में असावधानी बरती गई तो चिन्ह-पूजा भर चलती रहेगी, जिन तीक्ष्ण परिणामों की आशा की गई है उस संबंध में निराश ही रहना पड़ेगा।
इस विश्व संकट के दिनों में 500 करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक को युग साधना के रूप में-प्रज्ञा पुरश्चरण की भागीदारी ग्रहण करने के लिए कहा और सहमत किया जाना है। यह प्रयत्न न तो हिन्दू धर्मानुयायियों तक सीमित है और न परिणामों को उन्हीं लोगों तक रहना है। ऐसी दशा में प्रज्ञा पुरश्चरण को सार्वजनीन ही समझा जाना चाहिए। गायत्री मन्त्र के संबंध में यह रहस्य समझा और समझाया जाना चाहिए कि वह किसी सम्प्रदाय विशेष की पूजा पत्री नहीं है वरन् उसके अक्षरों में ध्वनि विज्ञान के ऐसे रहस्यों का भी समावेश है, जिससे साधक की सत्ता में उपयोगी तरंगें उत्पन्न होती है और समूचे अदृश्य जगत में विषाक्तता को निरस्त करने की सशक्त प्रक्रिया विनिर्मित होती है। साथ ही अन्तरिक्ष में देव-तत्वों के अभिवर्धन-परिपोषण का ऐसा प्रमाण बन पड़ता है जैसा कि किसान और माली फसल उद्यान के निमित्त अपनाया करते हैं।
सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि गायत्री मन्त्र की जितनी आवृत्तियाँ हुई हैं, उतनी और किसी उपासना प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले शब्द गुच्छक की नहीं। सृष्टि में अनेकों विभूतियाँ हैं, उनमें से एक गायत्री भी है। उसका शब्द गुँथन इस प्रकार हुआ हैं, जो भावार्थ और सामर्थ्य की दृष्टि से विलक्षण है। उससे व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न, सुसंस्कृत एवं समृद्ध बनाने वाले अनेकानेक रहस्यमय तत्वों का समावेश है। त्रिपदा के तीन चरणों में समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के सिद्धान्त की साँगोपाँग विवेचना भरी पड़ी है। विश्व का यह सबसे छोटा किन्तु सबसे सारगर्भित धर्मशास्त्र तत्व-दर्शन एवं अध्यात्म विज्ञान है। सतयुगी विश्व व्यवस्था के समस्त सूत्र संकेत इसमें बीज रूप में कूट-कूटकर भरे हुए हैं। इसे नवयुग का संविधान कहें तो भी अत्युक्ति न होगी। नई दुनिया का-प्रज्ञा युग का जब भी ढाँचा खड़ा होगा तब उसका संविधान बनाने के लिए इसी चिर पुरातन एवं नित नवीन बीज मन्त्र का आश्रय लेना पड़ेगा। ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराएँ इसमें समान रूप से समाहित हैं। उपासना की दृष्टि से उसके दोनों ही प्रभाव प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। साधक के स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर का परिशोधन, परिष्कार करने की व्यक्तिगत जितनी सामर्थ्य इसमें है उतनी कदाचित ही किसी अन्य उपासना आधार से मिल सके। साथ ही इस शब्द प्रवाह के साथ जुड़ी हुई सामर्थ्य अदृश्य जगत में अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तताओं का निराकरण कर सकने में भी समर्थ है।
ऐसे ही अनेक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गायत्री को पुरातन काल की तरह भविष्य में भी विश्व मानव की समग्र प्रगति में सहायक माना जायेगा। समय रहते उसका ज्ञान विज्ञान जन साधारण को समझना और समझाया जाना चाहिए। सामयिक आवश्यकताओं की दृष्टि से उसे तात्कालिक उपचार के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
इन दिनों की प्रत्यक्ष विभीषिकाओं के पीछे अदृश्य जगत का परिमार्जन आवश्यक हो गया है। इसके लिए गायत्री मन्त्र के शब्द बेधी बाण का-नाद ब्रह्म का आश्रय लेना आवश्यक है। प्रज्ञा अनुष्ठान की सुनियोजित अत्यधिक व्यापक योजना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाई गई है और उसमें गायत्री मन्त्र को हर दृष्टि से उपयुक्त पाकर आधार बनाया गया है।
एक समय में, एक विधान अनुशासन सहित एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए यदि बीस लाख व्यक्तियों द्वारा एक अध्यात्म उपक्रम अपनाया जाता है तो उसका प्रतिफल भी आयोजन के अनुरूप ही होना चाहिए। भूतकाल में भी ऐसा ही होता रहा है। देवताओं पर जब-जब विपत्ति आई है और वे अपने निजी प्रयत्नों द्वारा उसे टालने में असफल रहे हैं। तब-तब वे एकत्रित होकर विधाता के पास गये हैं। एक स्वर में बोले-एक प्रयास के लिए सहमत हुए और एक अनुशासन के अंतर्गत काम करने के लिए सहमत हुए है। त्राण उन्हें इससे कम में मिला भी नहीं और मिल भी नहीं सकता था। एक दो शक्ति कितनी ही प्रखर क्यों न हो, रहेगी अकेली ही। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वाली कहावत यों लागू तो अनेक प्रसंगों पर होती है, पर सामूहिक विपत्ति के टालने के संदर्भ में तो यह एक प्रकार से अनिवार्य ही हो जाता है कि सज्जनों की संयुक्त शक्ति विकसित करने का सरंजाम जुटाया जाय।
समय संकट से जूझने के लिए अध्यात्म उपचार के रूप में जहाँ प्रज्ञा पुरश्चरण का आयोजन है, उसका एक सामान्य लाभ यह भी है कि समय की पाबन्दी और नियत समय पर नियत काम करने की आदत का नये सिरे से शुभारम्भ होगा। कार्य चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक स्वार्थ के हों या परमार्थ के-हर प्रसंग में समय, कार्य और अनुशासन का तालमेल बिठा सकने की प्रवृत्ति ऐसी है जिससे सफलताओं के सुनिश्चित आधार खड़े होते हैं। असफलताओं के अन्यान्य कारणों में प्रमुख मनुष्य की स्वभावगत अस्त-व्यस्तता है, उसे सुधारने, बदलने से भी प्रज्ञा पुरश्चरण का बहुत बड़ा प्रयोजन सम्भव हो सकेगा।
स्थूल क्राँति तोड़-फोड़ को-बदलाव परिवर्तन कहते हैं। उसमें उखाड़-पछाड़ का ध्वंस पक्ष ही प्रधान होता है। आत्मिक क्षेत्र में सृजन को प्रधान माना जाता है ताकि ध्वंस की जरूरत ही न पड़े। अन्धेरे को पाटने की अपेक्षा यह अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण होगा कि प्रकाश की व्यवस्था बनाई जाय। युग क्रान्ति वातावरण परिशोधन और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के रूप में ही सम्भव है। जैसे-जैसे सज्जन बलशाली बनेगा, दुष्प्रवृत्तियाँ स्वयमेव घटती चली जाएँगी। विचार क्रान्ति का सच्चा सार्थक स्वरूप यही है।
आकार में बड़े और वजन में भारी कामों के लिए अपनी क्षमता, योग्यता की कमी भी दर्शाई जा सकती है। बहुत समय देना या धन खर्चना हो तो व्यस्तता दरिद्रता की बात कहकर भी मन समझाया जा सकता है किन्तु क्रिया रूप में नितान्त हल्के-फुलके प्रतिफल की दृष्टि से दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाले ऐसे कामों में अरुचि दिखाना उपयुक्त नहीं, जिनसे स्वार्थ और परमार्थ के दोनों ही प्रयोजन समान रूप से सधते हैं।
प्रज्ञा पुरश्चरण एक ऐसी विधा है जिसका प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप नितान्त सरल है इतने कम समय में-अनुबन्धों और विधानों से रहित अध्यात्म उपचार की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। इतने पर भी उसके असाधारण परिणामों की अपेक्षा की गयी है। कारण उसमें विधान का विस्तार नहीं वरन् 20 लाख व्यक्तियों की संयुक्त शक्ति है। सभी जानते हैं बूँद-बूँद से घट भरता है। कन-कन से मन बनता है। तिनके मिलकर हाथी को बाँधने वाले रस्से का रूप बनाते हैं। जड़ पदार्थों का संख्या बल एवं समन्वय जब चमत्कार दिखाता है तो कोई कारण नहीं कि प्राणवान भावनाशीलों की संयुक्त शक्ति का प्रतिफल दिव्य परिणति के रूप में परिलक्षित न होने लगे।
प्रज्ञा पुरश्चरण की विधि व्यवस्था कहने-सुनने में ही नहीं करने में भी नितान्त सरल है “सूर्योदय के समय जो जहाँ, जिस भी स्थिति में है। उसी में मौन मानसिक गायत्री जप करने लगे। सविता के तेजस् प्रकाश पुँज का ध्यान करे। अवधि समाप्त होने पर यह संकल्प करे इस संयुक्त प्रयत्न से उत्पन्न हुयी शक्ति को अदृश्य जगत का परिशोधन करने के लिए सशक्त राकेट की तरह अन्तरिक्ष में उछाला जा रहा है।” बात इतनी भर है। जिसे करने से किसी को भी न तो कठिनाई अनुभव होनी चाहिए और न आना-कानी करनी चाहिए।
निजी प्रयोग में इस विद्या को लाने के उपरान्त प्रत्येक प्रज्ञा चिन्तन को एक प्रयत्न और करना चाहिए कि उसके प्रयत्न से न्यूनतम पाँच अन्य व्यक्ति भी इसे अपनाने लगें। इसके लिए अपने घर परिवार के लोगों से चर्चा की जाय। उसका लाभ और महत्व बताया जाय तो उनमें से कुछ अनगढ़ों को छोड़कर प्रायः सभी विचारशील सहज सहमत होंगे और दस पाँच दिन याद दिलाने-साथ लेने के उपरान्त स्वयं रस लेने लगेंगे। अभ्यास पड़ने पर तो उसे छोड़ने का विचार तक न करेंगे। आलस्य प्रमाद के अतिरिक्त इसमें और कोई बाधा नहीं। अपने पर थोड़ा सा अनुशासन थोपा जा सके तो गाड़ी सहज सरलता के साथ पटरी पर दौड़ने लगेगी।
घर परिवार की तरह ही कुछ मित्र पड़ौसी भी घनिष्ठ होते हैं। उन पर अपने प्रभाव-परामर्श का असर होता है। उन्हें इसे करने के लिए कहा-समझाया और सहमत किया जा सकता है। किन्हीं के घरों पर जाने में संकोच होता है तो अपने पास किसी न किसी निमित्त आते जाते रहने वालों में से जिनमें परमार्थ परायण के बीजांकुर दृष्टिगोचर हों उनसे इसी प्रसंग पर वार्त्तालाप किया जा सकता है। कारण, माहात्म्य एवं परिणाम बताने पर इस छोटे प्रयास से विश्व संकट में महत्वपूर्ण योगदान बन पड़ने की जानकारी मिलने पर कदाचित् ही उपेक्षा दिखाये। इनकार करें।
इस प्रकार प्रजा पुरश्चरणों के साधकों की संख्या का, देखते-देखते विस्तार हो सकता है। अभी प्रज्ञा परिजन 20 लाख हैं। वे स्वयं तो इस युग साधना के भागीदार बनें ही, पर उतने भर से कर्त्तव्य की इतिश्री न समझें। पाँच अन्य सहयोगी बनाने बढ़ाने के प्रयत्न में भी अविलम्ब जुट जायें। यह प्रथम चरण उठते ही 20 लाख से बढ़कर एक करोड़ हो जायेंगे। इतना तो तत्काल एक दो महीने के भीतर ही हो सकता है। पुरश्चरण की शक्ति पाँच गुनी बढ़ जाना बहुत बड़ी बात है। 20 लाख प्रज्ञा परिजन यदि अपने साथी सहयोगियों की संख्या पाँच गुनी बढ़ा लेते हैं तो इसमें न केवल पुरश्चरण की सामर्थ्य, प्रक्रिया एवं परिणति ही पाँच गुनी हो जायेगी वरन् प्रज्ञा अभियान के अन्यान्य रचनात्मक कार्यों में भी इस बढ़ी हुई जनशक्ति के सहारे असाधारण योगदान मिलेगा। शक्ति का-क्षेत्र का पाँच गुना हो जाना कुछ अर्थ रखता है। अकेला व्यक्ति ठूंठ की तरह खड़ा या गोले की तरह लुढ़कता-फिरता है पर जब एक से पाँच का विस्तार होता है तो एक सुव्यवस्थित परिवार बनकर खड़ा हो जाता है और उसकी चहल-पहल देखते ही बनती है।
यह विस्तार क्रम योजनाबद्ध रूप से चल पड़े-विश्वास और उत्साह शिथिल न पड़े प्रक्रिया और परिणति को समझने समझाने के लिए गम्भीर रहा जा सके तो कोई कारण नहीं कि एक से पाँच के रूप में यह आध्यात्मिक वंश वृद्धि का सिलसिला अविच्छिन्न रूप से न चलता रहे। सृष्टि के आरम्भ में मनु शतरूपा-आदम हब्बा दो ही थे। उन्हीं की सन्तति बढ़ते-बढ़ते अब 500 करोड़ मनुष्यों के रूप में सामने है। उसने धरती के चप्पे-चप्पे पर अधिकार जमा लिया है जबकि आरम्भ वाले उत्पादक मात्र दो ही थे और किसी सुनसान में बैठे अनगढ़ वातावरण में जैसे-तैसे दिन गुजारते थे। वैभव तो उनके वंशजों ने पुरुषार्थपूर्वक खड़ा किया है। यह वंश वृद्धि क्रम क्रमशः तीव्र से तीव्रतर गति पकड़ता चला आया है। चक्रवृद्धि की बात सभी जानते हैं। 1 से 5, 5 से 25, 25 से 125, 125 से 625, 625 से 3125, 3125 से 15625, 15625 से 78125, 78128 से 390625, 390625 से 1953125, 1953125 से 9765625, 9765625 से 78828125, 48828125 से 244140625, 244140625 से 1220703125, 1220703125 से 6103515625। दस छलाँगों में एक से प्रायः 24 करोड़ हो जाते हैं। फिर वर्तमान प्रज्ञा परिजनों की 20 लाख संख्या यदि 500 करोड़ मनुष्यों को इस युग साधना में नियोजित करने के लिए प्रयत्नरत हो तो उसे कुछ ही छलाँगे लगानी पड़ेगी। 30 लाख से 1 करोड़। 1 करोड़ से 5 करोड़। 5 से 25। 25 से 125। 125 से 625 करोड़ हो जाते हैं। यह मात्र पाँच छलाँगे हुयी। वंश−वृद्धि चक्रवृद्धि का यह क्रम न तो असम्भव है और न अत्युक्तिपूर्ण। इन दिनों संसार की जनसंख्या लगभग 460 करोड़ है। इसमें से 100 करोड़ अबोध बालक या अपंग असमर्थ गिने जा सकते हैं। शेष 360 करोड़ मनुष्यों को प्रज्ञा साधना में सम्मिलित करने के प्रयास से 20 लाख सदस्यों को-उनके द्वारा जुटाये गये सहयोगियों को मात्र चार छलाँगे लगानी पड़ेंगी। एक छलाँग के लिए एक वर्ष का समय माना जाय तो भी इससे चार पाँच वर्ष से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। कठिनाई मात्र इतनी भर है कि हम जब तथ्य को, प्रयोग को गंभीरतापूर्वक समझें और संपर्क क्षेत्र में उस प्रक्रिया को गले उतारने के लिए विश्वास और उत्साह भरे प्रयत्नों को शिथिल न होने दें।
वर्तमान बीस लाख परिजनों के माध्यम से इन्हीं दिनों न्यूनतम 24 करोड़ जप हो जाने की आशा की गयी है। पाँच मिनट में प्रायः 100 मन्त्रों का जप हो जाता है। इस प्रकार आशा की गयी है कि इन्हीं दिनों हर दिन 24 करोड़ जप होने लगेगा। लक्ष्य है-24 करोड़ साधक और उनके द्वारा 2400 करोड़ जप की साधना हर दिन सम्पन्न होना। इस लक्ष्य की पूर्ति अगले पाँच वर्षों की अवधि में हो सकने की आशा की गयी है। इतने अधिक व्यक्तियों का एक लक्ष्य के निमित्त एक साथ चरण बड़ा सकने की बात प्रस्तुत बिखराव को देखते हुये असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य प्रतीत होता है। इतने पर भी भूतकाल की सफलताओं पर मुड़कर दृष्टिपात करने से असमंजस का निराकरण भी सहज ही हो जाता है। मिशन का बीजाँकुर देश को आजादी मिलने के दिन 15 अगस्त सन् 47 को हुआ था। अभी मात्र 36 वर्ष हुये हैं। एक बीज अंकुरित हुआ था। उसकी वंश वृद्धि से 20 लाख चन्दन तरु कल्पवृक्ष विश्व उद्यान की शोभा बढ़ा रहे हैं और अपनी शोभा सुषमा, महक शीतलता से समूचे विश्व वातावरण को प्रभावित अनुप्राणित कर रहे हैं। विगत पर दृष्टि डालने और सफलताओं का आँकलन करने पर यह कठिन नहीं रह जाता कि अगले पाँच वर्षों में प्रज्ञा पुरश्चरण के 24 करोड़ भागीदार बनेंगे और उनके माध्यम से 2400 करोड़ गायत्री जप से समूचा अन्तरिक्ष एक चेतना, प्रेरणा, उमंग से भरेगा और उस आधार पर विश्व-व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप में काया-कल्प जैसा परिवर्तन प्रस्तुत होगा।
इसका अर्थ यह नहीं है कि नव सृजन के सुधार, सुधारात्मक संघर्ष और रचनात्मक पुरुषार्थ की आवश्यकता ही न पड़ेगी। वह प्रत्यक्ष उपचार तो होना ही है-करना ही है। इस संदर्भ में हर स्तर के लोग अपने-अपने ढंग से कुछ न कुछ सोचते और करते ही रहते हैं। इन प्रयत्नों को दिशाबद्ध और संगठित करने से बिखराव एवं खींचतान से नष्ट होने वाली शक्ति बच जायेगी और दिशाबद्ध होकर कार्यरत रहते हुए चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करेगी।
प्रस्तुत समस्यायें बहुमुखी है। इनके दृश्यमान स्वरूप अगणित हैं। उन्हें सम्भालने-सुधारने के लिए प्रत्यक्ष प्रयत्न भी तद्नुरूप करने होंगे। इन प्रयासों की न तो उपेक्षा की जा रही है और न मनाही। इन्हें तो हर हालत में करना ही करना है। सच तो यह है कि इन दिनों नैतिक, क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति, सामाजिक क्रान्ति की इतनी अधिक आवश्यकता है जितनी कि इससे पूर्व कभी भी नहीं रही। इसी प्रकार व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की नियति से क्रिया-कलाप अपनाये जाने हैं। प्रज्ञा अभियान के माध्यम से इसका योजनाबद्ध शुभारम्भ भी हुआ है और विकास विस्तार भी। किन्तु स्मरण रखने योग्य तथ्य यह भी है कि अदृश्य अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तता के रहते तो दो गज जोड़ने और चार गज तोड़ने जैसी स्थिति बनी रहेगी। हमारे प्रयत्न प्रत्यक्ष भी होने चाहिए और परोक्ष भी। क्रिया पक्ष में प्रज्ञा अभियान को रचनात्मक प्रवृत्तियों द्वारा अग्रगामी किया जा रहा है। उसका दूसरा पक्ष अदृश्य वातावरण का-अदृश्य जगत का परिशोधन-परिष्कार भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसकी पूर्ति प्रज्ञा पुरश्चरण की साधनात्मक प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न की जा रही है। इस प्रकार की दो पहियों की गाड़ी निर्धारित लक्ष्य की ओर लँगड़ाई हुई न चलेगी वरन् सरपट दौड़ेगी।
निकोसिया (दक्षिण यूरोप) से समाचार है कि भयंकर अकाल के बाद पीड़ित जन-समुदाय की सामूहिक प्रार्थना के फलस्वरूप 24 घण्टे के अन्दर घनघोर वर्षा हुई। भूमध्य सागर से लगे सायप्रस नामक इस पूर्वी उपद्वीप में 10 माह से भयंकर सूखा पड़ रहा था। पशु मरने लगे। कई व्यक्ति सायप्रस छोड़कर चले गए। आर्य विशप क्राइसोस्टोमॉस ने सन्तपाल से संबंधित घटना को जन समुदाय को सुनाते हुए सामूहिक प्रार्थना की महत्ता बताई व एक ही स्थान पर एकत्र हो, एक समय परम सत्ता ने अपने कष्ट निवारण हेतु प्रार्थना करने को कहा। दिसम्बर 82 में घटी इस घटना को चमत्कारिक माना गया, क्योंकि फिर यह वर्षा सतत् तब तक होती रही जब तक व्यक्तियों की आवश्यकता हेतु वर्षा जल उपलब्ध न हो गया।
युग पुरश्चरण को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-(1) सामूहिक जप परक साधना (2) धर्मानुष्ठानों का उपक्रम (3) जन-मानस के परिष्कार हेतु ज्ञानयज्ञ। इस त्रिविधि समन्वय को प्रकारान्तर से त्रिवेणी संगम की उपमा दी जा सकती है। जिसका माहात्म्य बताते हुए रामायणकार ने कायाकल्प होने की बात जोर देकर कही है। कायाकल्प में कौए के कोयल और बगुले के हंस हो जाने का उल्लेख अलंकारिक है वस्तुतः उसे अशुभ के शुभ में बदल जाने की प्रक्रिया कहा जा सकता है। शरीर तो क्या बदलते हैं किन्तु मनःस्थिति के परिवर्तन से परिस्थिति में आमूलचूल परिवर्तन होना सम्भव है। “काया-कल्प” शब्द वस्तुतः ऐसे ही प्रसंगों में प्रयुक्त होता है।
सामूहिक गायत्री जप साधना की चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। सूर्योदय के समय हर धर्मप्रेमी को पाँच मिनट मौन मानसिक गायत्री जप करना चाहिए, साथ में सविता के प्रकाश का ध्यान। समय पूरा होते ही उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के परिशोधन हेतु अन्तरिक्ष में बिखेर देने का संकल्प। संक्षेप में इतनी-सी संक्षिप्त साधना ही प्रज्ञा पुरश्चरण का वैयक्तिक साधना कृत्य है। जिसे कहीं भी किसी की स्थिति में उतने समय साधारण काम-काज रोककर किया जा सकता है। समय का अनुशासन इसका महत्वपूर्ण पक्ष है। एकता, एकरूपता, एकाग्रता, लक्ष्य की एकात्मकता ही इस प्रसंग से जुड़े हुए महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो विस्तार की दृष्टि से स्वल्प होते हुए भी चिनगारी की तरह महान परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकते हैं।
इस ऐतिहासिक उपक्रम का दूसरा पक्ष है-धर्मानुष्ठान। इसे सामूहिक कृत्य के रूप में प्रयुक्त किया जाना है। सर्वविदित है कि गायत्री का युग्म यज्ञ है। दोनों को भारत की देव संस्कृति का माता-पिता कहा गया है। एकाकी अपूर्णता दूसरे से सम्पूर्ण होती हैं। दोनों परस्पर पूरक है। इसलिए गायत्री साधक किसी न किसी रूप में यज्ञ द्वारा उसे समग्र बनाते हैं। जो साधन नहीं जुटा सकते वे दशाँश जप अधिक करके भी उसकी प्रतीक पूजा करते हैं। आवश्यकता और अनिवार्यता सभी अनुभव करते हैं, यह दूसरी बात है कि साधन न बन पड़ने पर उसका वैकल्पिक प्रतीक जिस-तिस प्रकार से सम्पन्न कर लिया जाय।
जिस प्रकार प्रस्तुत प्रज्ञा पुरश्चरण में जप का केन्द्रित न करके विकेन्द्रित किया गया है उसी प्रकार इसका यज्ञ कृत्य भी एक बड़े आयोजन के रूप में सम्पन्न न करके विकेन्द्रित रखा गया है। सभी क्षेत्र प्रदेशों को इस दिव्य ऊर्जा से अनुप्राणित करना जो है। चूँकि अधिकाधिक व्यक्ति सरलतापूर्वक सम्मिलित हो सकें और अनुबन्धों से रहित निर्धारण प्रस्तुत किया गया है।
साधारणतया एक महीने में प्रज्ञा पुरश्चरण के भागीदार एक महीने में एक बार एक स्थान पर एकत्रित होकर प्रज्ञा यज्ञ सम्पन्न कर लिया करें, ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए इससे एक स्थान के लोग इतना अनुभव कर सकेंगे कि उनका परिवार कितना बढ़ रहा है और उसमें कितने नये पुराने परिजन सम्मिलित हो सके हैं। अधिकों को देखकर अधिक उत्साह बढ़ना स्वाभाविक है। जन मनोविज्ञान का यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अधिक लोग-बड़े लोग-जिसे करते हैं उसका अनुकरण सामान्य जन अनायास ही करने लगते हैं। रामलीला समाप्त होने के बाद छोटे बालकों को उसके प्रमुख पात्र के मुखौटे लगाये-गदा धनुष फटकारते देखा जा सकता है। यह अनुकरण प्रवृत्ति है जिसे सामान्य जन सहज ही अपनाते रहते हैं। सिगरेट, पान, चाय आदि का प्रचलन उनकी उपयोगिता के कारण नहीं वरन् अनुकरण प्रिय प्रवृत्ति के कारण है। जुलूसों में एकत्रित जन समुदाय स्वयं उस माहौल में उत्तेजित होता है और दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है। विचार क्रान्ति अभियान में घटनापरक कम और चिन्तन की उलट-पलट, उथल-पुथल को प्रमुख माना गया है।
यह महाभारत जिस धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जा रहा है उसे जनमानस का चिन्तन क्षेत्र ही कहा जा सकता है। इसकी रणनीति में अधिक लोगों का अधिक सहयोग एक बहुत बड़ा आधार है। प्रज्ञा पुरश्चरण में अध्यात्म तत्वज्ञान के उच्चस्तरीय अवलम्बनों के अतिरिक्त उसमें अधिकाधिक लोगों का अधिकाधिक सहयोग अर्जित करना भी ध्यान में रखा गया।
प्रसंग प्रज्ञा पुरश्चरण के दूसरे पक्ष धर्मानुष्ठान का यज्ञ आयोजन का चल रहा था। इसके लिए ऐसी ही सरल प्रक्रिया अपनानी होगी जिसकी अपना सकना हर स्तर वालों के लिए सम्भव हो सके।
पाँच छोटे-छोटे घृत दीप-पाँच-पाँच अगरबत्तियों के पाँच गुच्छक एक सुसज्जित चौकी पर प्रतिष्ठित कर देने से यज्ञ का दृश्य रूप बन जाता है। घृत और सुगन्धित द्रव्य अग्नि और समिधा यह वस्तुएँ यह में प्रमुख होती हैं। उपरोक्त विधि में इन सभी का सहज समन्वय हो जाता है। अगरबत्ती के हवन, द्रव्य, उसमें लगी हुई लकड़ी की समिधा दीपक के घृताहुति की प्रतीक बन जाता है। इस स्थापना के पीछे गायत्री मन्त्र का चित्र प्रतिष्ठित करना चाहिए। चौबीस आहुति का न्यूनतम विधान गायत्री यज्ञों में होता है। यह कार्य उपस्थिति सभी लोगों को साथ-साथ गायत्री मन्त्र का उच्चारण करके सम्पन्न करना चाहिए। सभी उपस्थित लोगों के सिर पर चन्दन की एक बूँद लगाकर उन्हें यजमान भागीदार माना जा सकता है। यह अत्यन्त छोटा निर्धारण ऐसा है जिसे कहीं भी किसी भी स्तर के लोगों द्वारा सहज सम्पन्न किया जा सकता है। यज्ञ की समाप्ति पर यदि प्रसाद वितरण की आवश्यकता समझी जाय तो जल, शकर और तुलसी दल के सम्मिश्रण से बना हुआ अभिमन्त्रित जल इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त समझा जा सकता है।
प्रजा पुरश्चरण के साथ इतना छोटा ही यज्ञ आयोजन कृत्य जोड़ा गया है। बड़े यज्ञ करने हों तो उन्हें फिर कभी करना चाहिए। इस संदर्भ में जो भी निर्धारण हो वे सर्वत्र एक जैसे हों। पाँच मिनट का जप ही सर्वत्र एक जैसा चले। जिन्हें अधिक जप करना हो वे उसके लिए स्वतन्त्र हैं, पर अन्य समय उसे करें। इस प्रक्रिया में पाँच मिनट का ही अनुशासन पालें। इसी प्रकार प्रज्ञा अभियान का जो स्वरूप निर्धारित किया गया है उसे उसी रूप में कार्यान्वित किया जाय, ताकि विश्वव्यापी एकता-एकरूपता अक्षुण्ण बनी रहे। नमाज का अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप, विधान, समय एक जैसा है। गिरजाघरों के प्रेयर के संबंध में भी यही बात है। प्रज्ञा पुरश्चरण की जप तथा यज्ञ विधा सर्वत्र एक जैसी होनी चाहिए। सरलता इसलिए रखी गई है कि सभी धर्मों के सदस्य उसे गले उतारने अपनाने में कठिनाई अनुभव न करें। यों एकता, एकरूपता लाने के लिए सभी मतावलम्बियों को थोड़ा-थोड़ा तो झुकना ही पड़ेगा। अपनी ही अड़ पर अकड़े रहने वाले हठवादियों के संबंध में कोई इलाज उपचार नहीं। उनकी उपेक्षा करके हमें समन्वयवादी भावना उभारनी है जो आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्” के प्रचलन में सहायक सिद्ध हो सके। एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म, एक व्यवस्था के आधार पर जब प्रज्ञा युग की सभी स्थापनाओं को प्रचलन में उतारना है तो समन्वयवादी नीति अपनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं। एकात्म अनुशासन का लक्ष्य सामने रखकर प्रज्ञा पुरश्चरण के जप और यज्ञ पक्षों में सरलतम बनाया गया है और इतना लचीला रखा गया है कि उसे दुराग्रहियों को छोड़कर अन्य किसी के लिए अपनाने में कोई कठिनाई दृष्टिगोचर न हो।
एक अन्य विकल्प यह है कि गायत्री मन्त्र याद होने में किसी को कोई कठिनाई पड़े तो ‘ॐ’ के उच्चारण की विधि अपना सकते हैं। ‘ॐ’ कार अक्षर ही नहीं ध्वनि भी है। अक्षरों के साथ भाषा, धर्म, सम्प्रदाय आदि के मतभेद जड़ सकते हैं किन्तु जब विशुद्ध ध्वनि के रूप में उसे समझा अपनाया जाय तो किसी को कोई आपत्ति या कठिनाई नहीं होनी चाहिए। कठिनाई उच्चारण संबंधी, पूरा मन्त्र याद करने में मात्रा ज्ञान संबंधी अड़चन या मस्तिष्कीय अदक्षता बाधक हो सकती है। साम्प्रदायिक हठवादिता गायत्री के सार्वभौम सर्वजनीन स्वरूप को स्वीकारने में बाधक भी हो सकती है, विग्रह भी प्रस्तुत कर सकती है। उन्हें गायत्री को हिन्दू धर्म के साथ जुड़े होने संस्कृत भाषा में सजे होने-के कारण विरानापन लग सकता है। ऐसी संकीर्णता के रहते हुए भी ‘ॐ’कार की ध्वनि से किसी को ‘एलर्जी’ नहीं होनी चाहिए। वह किसी भाषा या धर्म से संबंधित नहीं है। प्रकृति के अन्तराल में अनादि काल से चली आ रही एक झंकार मात्र है। घड़ियाल पर घण्टे की चोट पड़ने से जिस प्रकार झन-झनाहट छर-छराहट भरे कम्पन निसृत होते हैं और उसी प्रकार ‘प्रकृति और पुरुष’-‘माया और ब्रह्म’ का निरन्तर चलने वाला घड़ी के पेण्डुलम जैसा उपक्रम ऊँकार है। उसे सृष्टि का सूत्र संचालक शब्द प्रवाह एवं अनादि ऊर्जा स्त्रोत कह सकते हैं। वह ज्ञान और विज्ञान का अविच्छिन्न स्त्रोत है।
गायत्री ॐकार की है। इसलिए उसे आरम्भ में ही जोड़ दिया गया है। अ+उ+म् से भूर्भुवः स्वः। भूः से ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’। भुवः से ‘भर्गो देवस्य धीमहि’। स्वः से धियो योनः प्रचोदयात्’ का शब्द विस्तार हुआ है। ॐकार को बीज और गायत्री को वृक्ष कहा गया है। इसलिए जहाँ गायत्री की समग्र अवधारणा किसी कारण कठिन जान पड़ती हो वहाँ उसके स्थान पर मात्र ‘ॐकार ध्वन्यात्मक मानसिक जप किया जा सकता है। यह निरक्षरों और बालकों के लिए भी सम्भव है। भाषा ज्ञान संबंधी कठिनाई भी इसमें बाधक नहीं होती। साम्प्रदायिक विग्रह की भी इसमें गुंजाइश नहीं है।
इतने पर भी यह स्मरण रखने योग्य है कि गायत्री का शब्द गुँथन समग्र और ऊर्जा का पुँज है। उसकी पूर्णता और क्षमता को नकारा नहीं जा सकता। उसके स्थान पर ऊँकार से काम चलना आपत्ति धर्म जैसा है। उसे गायत्री का स्थानापन्न नहीं बनाया जा सकता। जहाँ पूर्ण गायत्री जप में कोई अड़चन नहीं है वहाँ उसी का उपयोग करना चाहिए। अभ्यास संबंधी कठिनाई को सरल बनाने और परिपूर्ण गायत्री का ज्ञान अभ्यास कराने के प्रयासों में किसी प्रकार की शिथिलता भी नहीं आने देनी चाहिए। लेकिन जहाँ प्रारम्भ ऊँकार गुँजन से करने की बात बनती हो वहाँ मनाही भी नहीं है। शुभारम्भ तो हो, परिणति निश्चित ही फलदायी होगी। जप और यज्ञ के इस युग्म का प्रचलन अब प्रजा धर्मानुष्ठान का प्राण मानते हुए सभी परिजनों को जुट ही जाना चाहिए।
जप और यज्ञ की समन्वित प्रक्रिया को धर्मानुष्ठान कहा गया है। यह साधनात्मक उपचार है। इसमें ज्ञान-यज्ञ का पुट रहना भी आवश्यक है। जहाँ समग्र यज्ञ प्रक्रिया सम्पन्न होती हो वहाँ भी उसके प्रत्यक्ष कृत्य के साथ जुड़ी हुई प्रेरणाओं, भावनाओं को भागीदारों एवं उपस्थित लोगों को समझाया जाना चाहिए। समझाने के संबंध में मौन रहा जाय और मात्र कर्मकाण्ड या मन्त्रोच्चार की प्रक्रिया में ही लगे रहा जाय तो उसे अपूर्ण ही कहा-समझा जायेगा। शास्त्रकारों ने प्रत्येक कर्मकाण्ड की व्याख्या विवेचना करते चलने का निर्देश दिया है, जिससे उसे चिन्ह पूजा भर न माना जाय और लकीर पीटने जैसे अनगढ़ असमंजस कहने-कहाने का किसी को अवसर न मिले।
वस्तुतः समस्त कर्मकाण्ड ने केवल रहस्यमय परोक्ष उपचार हैं वरन् उनमें लोक शिक्षण की वैसी ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया भी सुनियोजित है। हर हालत में उसे समझने और समझाने का अवसर उपस्थित लोगों को मिलना चाहिए, अन्यथा वे उसे कौतुक-कौतूहल की तरह देखते रहेंगे और मनमाने अनुमान लगाते रहेंगे। यही कारण है कि धर्म कृत्यों के साथ व्याख्या-विवेचना करते रहने के लिए उनमें ब्रह्मा प्रवक्ता की नियुक्ति आवश्यक मानी गई है। क्रिया यज्ञ के साथ ज्ञान यज्ञ जुड़ने पर ही समग्रता आती है। नाड़ी का एक पहिया सही गतिशीलता उत्पन्न कर सकने में कहाँ समर्थ होता है।
प्रज्ञा पुरश्चरण में पाँच मिनट का जप-महीने में एक बार का प्रज्ञा यज्ञ-धर्मानुष्ठान का समन्वित निर्धारण है। जो भी जप प्रक्रिया में सहयोगी बने उन्हें यह प्रयत्न भी करना चाहिए कि महीने में एक दिन, डेढ़ घण्टे में सम्पन्न होने वाले इस सामूहिक आयोजन में भी सम्मिलित हों। पन्द्रह मिनट में चौबीस मन्त्रों का उच्चारण। पन्द्रह मिनट का प्रज्ञा संगीत और एक घण्टे का प्रज्ञा प्रवचन इस अवसर पर सम्पन्न किया जाय। समय का जब हर प्रयोजन के लिए निर्धारण और अनुशासन है तो उस व्यवस्था को इस मासिक आयोजन में भी सतर्कतापूर्वक पालन किया जाय। समय पर आरम्भ करने और समय पर समाप्त करने का अनुशासन इस प्रसंग में भी उसी प्रकार पालन किया जाय जिस प्रकार कि निर्धारित जप कृत्य पूरा करने में किया जाता है। प्रज्ञा परिजनों को नवयुग का एक महान प्रचलन समय के परिपालन का इस आधार पर भी अभ्यास करना चाहिए।
एक घण्टे का प्रवचन क्या हो? इस संदर्भ में ‘प्रज्ञा अभियान’ में प्रकाशित लेखों को पढ़कर सुनाया जाना उनकी व्याख्या किया जाना ही पर्याप्त है। वक्तागण अपनी चतुरता न बघारे। अपने निजी विचारों को प्रज्ञा परिजनों पर न लादें। लोक शिक्षण का भी एक अनुशासन प्रवाह-एक निर्धारण है। उसमें हर अधिकारी अनधिकारी को अपनी टाँग नहीं अड़ानी चाहिए वरन् शास्त्र श्रवण की वर्ण परम्परा का निर्वाह करना चाहिए।
रामायण, भागवत, सत्यनारायण आदि की कथाओं का वाचन, पठन, श्रवण, प्रवचन, विवेचन इसलिए होता है कि उन धर्मग्रन्थों को शास्त्र कहा और दैवी सम्मान प्रदान किया गया है। आप्त जनों के प्रतिपादनों को बार-बार श्रवण करना अधिक प्रभावी प्रेरणाप्रद सिद्ध होता है, जबकि बातूनी लोगों की अपनी निजी अक्लमन्दी कला प्रदर्शन की तरह उथली बचकानी बनकर रह जाती है। उसमें वक्ता का आत्म प्रदर्शन अधिक उछलता है और तथ्य कम होता है। इन दिनों विभिन्न मंचों से वकृत्व के नाम पर आत्मश्लाघा की धूम रहती है। यह भुला दिया जाता है कि हर प्रेरणास्पद प्रवचन के पीछे वक्ता का व्यक्तित्व और प्रतिपादन का आधार स्तर ही श्रवणकर्ताओं के अन्तराल तक पहुँचता है।
इन आधारों से रहित होने पर वक्तृत्व मात्र कौतुक कौतूहल बनकर रह जाती है। उससे कठपुतली के तमाशे में ग्रामोफोन के शब्द श्रवण जैसा मनोरंजन भर होता है। इस विनोद कौतुक की, युग परिवर्तन जैसे उच्चस्तरीय निर्धारण की पूर्ति में तनिक भी आवश्यकता नहीं है। प्रज्ञा आयोजनों में फुदकने-फुदकने वाले वक्ताओं की आत्म प्रदर्शन की आत्महत्या पर अंकुश लगाने के लिए कहा गया है और सुझाया गया है कि वे अपनी वाचालता का प्रदर्शन अन्य कहीं भले ही करते हों पर प्रज्ञा मंच में उसकी गरिमा के अनुसार ही बना रहने दें।
सूत शौनिक संवाद की तरह हमें धर्मशास्त्रों की चर्चा विवेचना ही करना चाहिए। सामान्य लोक शिक्षण के लिए प्रज्ञा पुराण के कथन पुराण के कथन पक्ष की मर्यादा बना दी गई है। अपने युग का यह उपर्युक्त धर्मशास्त्र एवं कथा पुराण है। उसे आधार मानकर अपनी ओर से थोड़ी-सी व्याख्या विवेचना भर जोड़ी जा सकती है। ऐसा करने से उच्चस्तरीय उद्गम केन्द्र गोमुख गंगाजल सभी प्रज्ञा परिजनों तक बिना मध्यवर्ती विकृतियों की भरमार हुए सही एवं शुद्ध रूप में पहुँचता रहेगा।
सर्वसाधारण के लिए जहाँ कथा परक सरलता लानी हो वहाँ प्रज्ञा पुराण का उपयोग करना चाहिए। बाल, वृद्ध, शिक्षित सभी उसे रुचिपूर्वक सुनते समझते हैं। युग समस्याओं के सभी समाधान उनमें विद्यमान हैं जिन्हें यथा अवसर थोड़ी टिप्पणियों के साथ, सामयिक सन्दर्भों के साथ कहा जा सकता है। प्रज्ञा पुराण का एक खण्ड गत वर्ष छपा था। दूसरा यह पंक्तियाँ पढ़ने के एक दो मास के बाद ही छप जायेगा। हर वर्ष एक नया खण्ड प्रकाशित होता रहे ऐसी योजना युग सन्धि इन बीस वर्षों के लिए बनी है। यह सर्वजनीन लोक शिक्षण की बात हुई।
प्रज्ञा पुरश्चरण के संबंध में अतिरिक्त निर्धारण है। उसके भागीदारों को प्रज्ञा परिजन माना गया है। उनके कन्धों पर नव सृजन की अग्रगामी भूमिका निभाने का उत्तरदायित्व है। इसलिए उन्हें वह सीखना चाहिए जो युद्ध मोर्चा सम्भालने वाले सैनिकों को विशेष रूप से सिखाया जाता है।
यों देश भक्ति, शौर्य, साहस जैसे गुणों के आधार पर ही कोई सच्चा सैनिक बनता है, वस्तु इन विशेषताओं का उत्तेजन व्यापक रूप से होना चाहिए। किन्तु सेना में भर्ती हुए लोगों का काम उतने सामाजिक या दार्शनिक प्रतिपादन से नहीं चल सकता जो सर्वसाधारण को समय-समय पर बार-बार अनेक उदाहरणों समेत दिया जाता है। सैनिकों को युद्ध कौशल से संबंधित अभ्यास एवं कौशल ही गले उतारने का प्रयत्न चलना चाहिए। उनकी शिक्षा उसी स्तर की होनी चाहिए।
“प्रज्ञा अभियान” पत्रिका मात्र एक ही प्रयोजन के लिए प्रकाशित होती है कि प्रज्ञा परिजनों का युग धर्म के निर्वाह का व्यवहार एवं कौशल सिखाया जाय। ऐसा शिक्षण सामान्य जन नहीं दे सकते। यह ऋषिमेधा का उत्तरदायित्व है कि वह दिव्य चेतना से संबंध साधे और नियन्ता की इच्छा, योजना तथा निर्धारण के साथ तालमेल बिठाकर ऐसा कुछ कहे जो रोग के उपचार में संजीवनी बूटी का काम दे सके। यह कार्य सामान्य जन अपनी लोक बुद्धि के सहारे करेंगे तो वे भ्रान्तियाँ उत्पन्न करेंगे और लोगों को भटकाव के जंजाल में धकेलेंगे। वक्ताओं को कौशल दिखाने के लिए अनेक मंच मौजूद है। नेताओं-अभिनेताओं के अभिनय प्रवचन देखने-सुनने के लिए कहीं कोई स्थान न हो ऐसी बात नहीं है। किन्तु उन्हें कृपापूर्वक ऐसे प्रसंगों से अपने को दूर रखना चाहिए जो उनकी पहुँच से बाहर है। युग सृजन ऐसा विषय है जिसमें तर्क बुद्धि और बहक सनक के लिए गुंजाइश है नहीं। अनाधिकार भरे हस्तक्षेप सदा दुःखदायी परिणाम उत्पन्न करते हैं।
युद्ध कौशल पर योद्धाओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए उस विधा का अनुभव अभ्यास और तद्नुरूप सूझ-बूझ का गहन गम्भीर विकास होना चाहिए। यह न तो अन्ताक्षरी सम्मेलन है और न वाद विवाद प्रतियोगिता न कवि सम्मेलन। इस मंच के रंग बिरंगे फूलों वाले गुलदस्ते अथवा चित्र विचित्र आकृति प्रकृति वाले प्राणियों का चिड़िया घर नहीं बनाना चाहिए। प्रज्ञा मंच की गरिमा व्यास पीठ जैसी है जिस पर शास्त्र वचन होने से ही शोभा है। उसका प्रतिपादन ऐसा होना
चाहिए जैसा कि आप्त जन ही कर सकते हैं। प्रहसन, अभिनय, रंगमंच और प्रज्ञा प्रवचन सब एक ही स्तर के लोगों द्वारा किये जाने लगे तो कौतुक कौतूहल मात्र रह जायेगा वह उद्देश्य सधेगा नहीं जिसकी पूर्ति के लिए प्रज्ञा पुरश्चरण के रूप में अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान का नियोजन किया गया है।
कहा जा चुका है कि प्रज्ञा यज्ञ के अवसर पर होने वाले एक घण्टे के प्रवचन का एकमात्र उद्देश्य प्रज्ञा परिजनों को प्रज्ञा अभियान की प्रस्तुत निर्धारणाओं का तत्वदर्शन एवं क्रिया विधान का व्यावहारिक मार्गदर्शन होना चाहिए। इसके लिए प्रज्ञा अभियान पत्रिका के लेखों में से उपस्थिति एवं परिस्थिति के साथ संगति बिठाने वाले लेखों को पढ़कर सुना देने के काम चल जायेगा। उन लेखों को सधी वाणी में तद्नुरूप अभिव्यक्तियों सहित सुनाने में भी कौशल की आवश्यकता है। भावनाओं का सही रूप में प्रस्तुत कर सकना भी कम महत्व की बात नहीं है। जो इसे ठीक प्रकार अभिव्यक्ति की क्षमता रखते हों उन्हें यह काम ‘खुशी-खुशी सौंपा जा सकता है कि वे हर महीने के लिए पिछले या अब के ‘प्रज्ञा अभियान’ में से कुछ लेख चुन लें और उन्हें अभिव्यक्ति के साथ पढ़कर सुना दें। एक घण्टे में प्रायः 13 से 16 पृष्ठों तक की सामग्री पढ़कर सुनाई जा सकती है। क्रमबद्ध प्रशिक्षण के लिए पिछले प्रसंगों के आगे की बात कहने का सिलसिला चलना चाहिए।
प्रज्ञा यज्ञ और प्रज्ञा प्रवचन के बीच पन्द्रह मिनट के मध्यकाल में प्रज्ञा संगीत होना चाहिए। गायन के साथ वादन का प्रबन्ध हो सके तो भाव तरंगों को उमंगाने में दूनी सहायता मिलती है। यदि वैसा प्रबन्ध न हो सके तो कवि सम्मेलनों की तरह प्राणवान कविताएँ मधुर स्वर एवं तद्नुरूप भावाभिव्यक्ति के साथ गाई सुनाई जा सकती है। स्तर हर हालत में मधुर एवं भावनायुक्त होना चाहिए।
मासिक प्रज्ञा यज्ञ तो एक धर्मकृत्य है जो पुरश्चरण प्रक्रिया के साथ जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त प्रज्ञा अभियान की लोक-मानस परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन प्रक्रिया के अंतर्गत प्रवाह के अनुपम संगीत एवं प्रवचनों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए मंच सम्भालने वाले उपयुक्त व्यक्ति बड़ी संख्या में प्रशिक्षित किये जाने चाहिए। शान्ति-कुँज हरिद्वार में चलने वाले एक-एक महीने वाले कल्प-सत्रों में यह व्यवस्था की गई है और सत्र साधकों में से हर किसी को यह योग्यता उपलब्ध करके लौटने के लिए उपयुक्त पाठ्य विधि बनाई गई है जिन्हें सुविधा हो वे संगीत एवं प्रवचन का कौशल सीखकर अगले दिनों तूफानी गति से नियोजित होने वाले प्रज्ञा आयोजनों का मंच सम्भाल सकने की क्षमता अर्जित कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त हर प्रज्ञा केन्द्र में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें गायन, वादन, एक्शन साँग तथा प्रवचन का अभ्यास करके विचार क्रान्ति अभियान को अग्रगामी बना सकने में समर्थ प्रज्ञा-पुत्रों को बड़ी संख्या में प्रशिक्षित किया जा सके।
‘स्टाक होम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट’ के अनुसार सारे विश्व में मात्र एक वर्ष में युद्ध आयुधों पर अनुमानित खर्च चार खरब चौदह अरब बहत्तर करोड़ रुपये है। इसका अर्थ यह कि प्रति मिनट अस्सी लाख रुपये मात्र विनाश हेतु आयुध निर्माण में ही खर्च कर दिये जाते हैं।
सन् 1951 से 1983 तक शस्त्रों पर होने वाले खर्च में 173 गुनी वृद्धि हुई है। इसके विपरीत ढाई अरब व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें निर्वाह युक्त साधन भी उपलब्ध नहीं हो पाते। यदि एक वर्ष के लिए यह आयुध निर्माण कार्य रोक दिया जाय तो इन सभी के निर्वाह भर की ही नहीं-सारे विश्व की समग्र सुव्यवस्था का निर्धारण हो सकता है।
इन दिनों जो भी अपने आपको प्रज्ञा परिवार में सम्मिलित समझते हैं और अपने आपको प्रज्ञा परिजन या प्रज्ञा पुत्र कहते हैं उन सभी के लिए सामयिक निर्देशन यह है कि वे प्रज्ञा पुरश्चरण की प्रक्रिया के साथ अपने को सम्बद्ध करें। स्वयं उसे अपनाने को व्रत लें और परिवार में जो भी इस सरल किन्तु दूरगामी निर्धारण को समझ सकने में समर्थ हो सकें, उन्हें सहयोगी बनायें। इसके लिए सर्वप्रथम इस बात की आवश्यकता है कि इस अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान का उद्देश्य, स्वरूप, दर्शन, कार्यक्रम समझाने के साथ-साथ यह भी बताया जाय कि अदृश्य जगत का दृश्य जगत के साथ कितना गहन संबंध है। व्यापक प्रयोजनों के लिए तो विशेष रूप से परोक्ष क्षेत्र का अनुकूलन आवश्यक है।
इस पृष्ठभूमि को समझने-समझाने के लिए अखण्ड ज्योति का प्रस्तुत अंक विशेष रूप से उपयोगी है। उसे सुरक्षित रखने के लिए जिल्द बना ली जाय और बारी-बारी करके उसे ऐसे अनेक लोगों को पढ़ाया जाय, जिनमें आस्तिकता के बीजांकुर मौजूद है। उर्वर भूमि में बीज ही अंकुर फूलते और हरे-भरे पत्ते बहार देते हैं। परिश्रम निरर्थक तो तब जाता है जब ऊसर भूमि पर परिश्रम किया जाय। इन विचारों की चर्चा करनी चाहिए। विचार विनिमय भी साहित्य पठन की तरह ही प्रभावी परिणाम उत्पन्न करता है। स्वाध्याय और सत्संग, लेखनी और वाणी के सहारे यदि प्रज्ञा पुरश्चरण की पृष्ठभूमि एवं कार्यपद्धति जन-जन को समझाने का कोई व्रत धारण करे तो कोई कारण नहीं कि कोई प्रतिभावान लगनशील व्यक्ति 100 भागीदार न बना सके। हजारी किसान के पास न साहित्य था न सुवचन का अभ्यास, तो भी उसने हजार आम्र उद्यान लगाने का संकल्प पूरा किया था। एक उद्यान में बीस पेड़ माने जाय तो बीस हजार पेड़ लगाने लगवाने का श्रेय उसे मिला था। एक अनपढ़ साधन रहित व्यक्ति मात्र लगन और जीवट के सहारे इतना कर सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा परिवार की जागृत आत्माएँ अपनी संकल्प शक्ति को उभारें और चमत्कारी परिणति उत्पन्न न कर सकें। प्रश्न न समय का है, न योग्यता का न परिस्थितियों का। कमी मात्र अपने ही संकल्प-उत्साह की पड़ती है। इस प्रसुप्ति को यदि जगाया जा सके तो हममें से कोई भी एक दो महीने के भीतर ही 100 भागीदार बना सकता है। जबकि अनिवार्य जिम्मेदारी मात्र पाँच नये बनाने की सौंपी गई है।
प्रज्ञा पुरश्चरण का स्वरूप मिशन की अन्य पत्रिकाओं में भी प्रकाशित किया, जा रहा है। अब परिजनों में से प्रत्येक की जिम्मेदारी आती है कि वे इसे स्वयं अपनायें और अपने संपर्क क्षेत्र में जितनों को इससे परिचित प्रभावित सहमत कर सकते हैं, उसके लिए सच्चे मन से प्राण-पण से प्रयत्न करें संकल्पों को प्राणवान बनाने का एक स्वरूप यह है कि इतना न कर लेने तक इस सुविधाओं का परित्याग किये रहेंगे जैसा कोई व्रत ले लें। अच्छा हो पाँच भागीदार बनाने का छोटा व्रत लिया जाय और उसकी पूर्ति न होने तक घी, चीनी आदि सरलता से छोड़ी जा सकने वाली वस्तु का परित्याग करने का व्रत ग्रहण कर लें। हर बार पाँच-पाँच के नये संकल्प लेते चलने पर पाँच बार में 25 व्यक्तियों तक भागीदारी पहुँचाई जा सकती है। एक बार घी, एक बार शकर, एक बार नमक, एक बार चावल तब तक छोड़े रहने का संकल्प लिये जा सकते हैं जब तक कि पाँच-पाँच के चरण पूरे होते-होते 25 या 100 की संख्या पूरी न हो ले।
स्वयं निष्ठावान होने पर संपर्क क्षेत्र में भाव श्रद्धा उत्पन्न करना कठिन नहीं। जुआरी, शराबी, व्यभिचारी जैसे लोग अपनी लतों में पक्के रहने पर अपने अनेकों नये अनुयायी बना लेते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि सत्प्रयोजनों में सघन निष्ठा रखने वाले क्षेत्र विस्तार न कर सकें। एक बीज गलकर वृक्ष बनता है और अपने जैसे असंख्यों नये बीज हर वर्ष पैदा करता रहता है। यह प्रक्रिया प्रज्ञा पुरश्चरण को अग्रगामी बनाने के लिए भी अपनाई जानी चाहिए। वर्तमान परिजन यदि उसे स्वयं गम्भीरतापूर्वक समझे, अपनाये, और अपने संपर्क क्षेत्र में नये सहयोगी बनाने के लिए इस प्रकार लगनपूर्वक प्रयत्न करें जैसा कि चुनाव जीतने के लिए दिन रात एक करते हुए किया जाता है तो कोई कारण नहीं कि बंजर ऊसर में भी खेत न लहलहाने लगे। प्रयत्नशीलों ने निर्जीव मिट्टी खोदकर अन्यत्र फेंकी और उपयोगी कहीं बाहर से लाकर वहाँ जमाई है तो ऐसा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है। लगनशील प्रज्ञा परिजन इस आड़े समय में इस युग धर्म के निर्वाह में अपने आपत्तिकाल उत्तरदायित्व सहज ही निभा सकते हैं।
जहाँ प्रस्तुत पुरश्चरण के जप, यज्ञ और उद्बोधन वाले तीनों पक्ष चल पड़े, उसके भागीदार अपनी छोटी प्रक्रिया का दूरगामी महत्व समझने और उसमें उत्साह पूर्वक भाग लेने लगे, वहाँ उसे परिपक्व, चिरस्थायी बनाने के लिए स्वाध्याय मण्डल की स्थापना के रूप में एक स्मारक खड़ा कर देना चाहिए। बड़े कार्यों में बड़ी घटनाओं के स्मारक बनाने के पुरातन परम्परा अभी भी उतनी ही उपयुक्त एवं आवश्यक बनी हुई है। देवालयों की स्थापना इसी निमित्त हुई है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, हनुमान जैसे महानों की स्मृतियों में उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र के प्रति जन-साधारण की श्रद्धा जगाने प्रवृत्ति उभारने का निमित्त कारण ही सन्निहित रहा है। तीर्थों की स्थापना ऐसी ही ऐतिहासिक प्रेरणास्पद घटनाओं के जनमानस पर छाये रहने के निमित्त होती थी।
संसार के महामानवों के जन्म-मरण एवं पुरुषार्थ से संबंधित स्थानों में स्मारक बने हैं। चित्तौड़ का कीर्ति स्तम्भ, जलियावाला बाग, अशोक की लाट, सारनाथ, श्रावस्ती आदि ऐतिहासिक महत्व के स्थानों में दर्शनीय स्मृतियाँ बनाने में विचारशील लोगों ने उदारता बरती है। अयोध्या, मथुरा में अपने महामानवों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने में कुछ उठा नहीं रखा है। जो बड़ी इमारतें नहीं बना सकते वे अपने पूर्वजों के नाम पर वृक्ष लगाते-साँड़ छोड़ते-कुआँ, तालाब बनाते देखे गये हैं।
गायत्री परिवार की सशक्त प्रतिभाओं ने अपने-अपने यहाँ गायत्री शक्तिपीठ विनिर्मित की है। उनके माध्यम से रचनात्मक कार्य तो हो ही रहे हैं साथ ही उन स्थानों के प्रज्ञा परिजनों का पुरुषार्थ भी अपनी यज्ञ गाथा का परिचय देता है। जब कभी गायत्री परिवार के जागृत केन्द्रों की चर्चा होती है तब सहज ही गायत्री शक्तिपीठों के स्थान स्मरण हो आते हैं। इस बार स्वाध्याय मण्डल की स्थापना को हर प्रज्ञा पुरश्चरण केन्द्र के साथ जोड़ा जाना चाहिए। अनेक बार कहा जा चुका है कि यह बिना निजी इमारत के प्रज्ञा संस्थान है। स्थान की तो हर कार्य के लिए आवश्यकता होती है, पर यह आवश्यक नहीं कि वह अपना निजी ही हो। किराये के, माँगे के, साझे के स्थानों में भी तो लोग गुजारा करते हैं। सब लोगों के पास अपने निजी मकान कहाँ होते हैं। ऐसी दशा में यदि प्रज्ञा संस्थानों की अपनी निजी इमारत नहीं तो कोई बात नहीं, वे किसी की कोठरी आलमारी में भी अपने आवश्यक कागज, पत्र, उपकरण रखकर काम चलाते रह सकते हैं। संसार के अगणित महत्वपूर्ण कार्य जिस-तिस स्थानों पर होते और चलते बदलते रहते हैं। ऐसी दशा में स्वाध्याय मण्डल के प्रज्ञा संस्थान भी जहाँ तहाँ रहते रहें तो हर्ज नहीं। बड़े अफसरों तक के ट्रान्सफर होते और क्वार्टर बंगले बदलते रहते हैं। वे इनके निजी कहाँ होते हैं? ऐसी दशा में यदि स्वाध्याय मण्डल भी अफसरों की तरह किसी के यहाँ अपना कार्यालय रखे रहे तो हर्ज नहीं। न कुछ से कुछ अच्छा की नीति भी बुरी नहीं।
प्रज्ञा युग के अवतरण में जिस अदृश्य चेतना प्रवाह को प्रज्ञावतार के रूप में अनुभव किया जा रहा है, इसके लिए जहाँ-तहाँ अगणित प्रकाश केन्द्रों की आवश्यकता पड़ेगी। वर्षा का जल मात्र समुद्र में ही नहीं पहुँचता। झील, सरोवरों, पोखरों और नदी नालों में भी भरा रहता है। प्रज्ञावतार के अदृश्य स्वरूप को दृश्यमान देखना होगा तो विज्ञजनों की दृष्टि सीधी प्रज्ञा केन्द्रों पर जमेगी। भले ही वे निजी इमारत वाले प्रज्ञा पीठों के रूप में दृष्टिगोचर हों या बिना इमारत वाले स्वाध्याय संस्थानों के रूप में। अन्तर स्वरूप विस्तार का है। उद्देश्य और उत्तरदायित्व का वहन दोनों ही समान रूप से कर रहे होंगे।
अब प्रज्ञा पुरश्चरण और प्रज्ञा संस्थान एक-दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप में गुँथ कर रहेंगे। जहाँ एक होगा वहाँ दूसरे की, धूप छाँह की तरह साथ-साथ रहना चाहिए, रहना होगा। प्रज्ञा पुरश्चरण की गतिविधियों में जप, यज्ञ और उद्बोधन के साथ ही यह लक्ष्य भी जुड़ना चाहिए कि उपासना की परोक्ष और युग सृजन की प्रत्यक्ष गतिविधियाँ एक-दूसरे के साथ पूरी तरह गुँथी रहे। प्राण और शरीर की तरह दोनों की परस्पर सघनता आवश्यक है। एकाकी रहने पर दोनों ही निरर्थक हो जायेंगे। उनकी शोभा और सफलता साथ-साथ रहने में है। गृहस्थ के नर-नारी दो पक्ष हैं। गाड़ी दो पहियों पर चलती है। प्रज्ञावतरण के निमित्त परोक्ष साधनात्मक प्रज्ञा पुरश्चरण और प्रत्यक्ष रचनात्मक प्रज्ञा अभियान को संयुक्त समन्वित होना चाहिए और पैर से पैर, कन्धे से कन्धा मिलाकर सहगमन करना चाहिए। चिरस्थायी एवं महत्वपूर्ण सफलता के लिए यह सुयोग-संयोग हर दृष्टि से अनिवार्य आवश्यक है।
इन दिनों जहाँ भी प्रज्ञा पीठ स्थापित है। स्वाध्याय मण्डल गतिशील है। वहाँ उनकी पूर्व निर्धारित गतिविधियों में एक नितान्त आवश्यक प्रक्रिया प्रज्ञा पुरश्चरण की उस क्षेत्र में व्यापक बनाने की भी चाहिए। इसी प्रकार जहाँ भी प्रज्ञा पुरश्चरण की प्रक्रिया कार्यान्वित हो वहाँ प्रज्ञा पीठ न सही स्वाध्याय मण्डल के रूप में प्रज्ञा संस्थान खड़ा करने का पुरुषार्थ भी प्रकट होना चाहिए।
जीवन को जीवट का-प्रमाण परिचय देने वाला-पुरुषार्थ की मुनादी करने वाला-यह स्मारक बहुत ही सस्ता किन्तु उच्चस्तरीय परिणति से भरा-पूरा है। यह स्थापना बताती रहेगी कि भावना की परिणति क्रियाशीलता में हुई। मात्र विचारणा ही सबकुछ नहीं है। मान्यता, कल्पना भावना, श्रद्धा का मूल्य कितना ही क्यों न आँका जाय, जब तक उनका प्रकट प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आता तब तक यह जाँच परख नहीं होती कि मात्र उड़ानें ही उड़ी जा रही थी या उनके पीछे प्राण पौरुष का भी समावेश था। जीवट प्रकट हुए बिना नहीं रह सकती। श्रद्धा की परिणति क्रिया रूप में न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। मात्र दिवा-स्वप्न की कल्पना के आसमान में बेपर की उड़ानें उड़ते रहते हैं। उनसे बनता कुछ नहीं, उलटे शेख चिल्ली कहलाने और उपहास का भाजन बनाने की विडम्बना ही पल्ले बँधती है। प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक से यह आशा की गई है कि वे पठन वाचन की आवश्यकता तो मानें पर उतने तक ही सीमित न रहें। कर्त्तव्य उत्तरदायित्व के इतने भर से ही इतिश्री न कर दें। उन्हें इस अन्ध तमिस्रा की मोह रात्रि काल में दीपावली के दीपकों की तरह तुच्छ होते हुए महान उद्देश्य एवं पुरुषार्थ के लिए अपने को तिलतिल जलाने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। क्रिया ही जीवन का प्राण है। निष्क्रिय काया को मृत घोषित किया या अर्धमृत-मूर्छित घोषित किया जाता है। इन दोनों में से एक भी स्थिति प्रज्ञा परिजनों को नहीं होनी चाहिए। वे गुण धर्म अपनायें आपत्तिकाल का अनुमान करते हुए निजी कार्यों में कटौती करके भी प्रस्तुत विभीषिका से जूझें। इसके लिए उन्हें उपरोक्त दोनों प्रत्यक्ष और परोक्ष पराक्रमों के लिए प्रस्तुत चुनौती स्वीकार करनी ही चाहिए।
कः काल-कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ। कश्चाहं का च में शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥
समय क्या है, कौन मित्र हैं, देश क्या हैं, आमदनी और खर्चा क्या है, मैं स्वयं क्या हूँ और मुझमें कितनी शक्ति है-ये छः बातें मनुष्य को बार-बार बराबर सोचते रहना चाहिए।
सीमित संकुचित स्वार्थ की परिणति अनर्थ में होती है और उदात्त परमार्थ परायणता से सच्चे अर्थों में स्वार्थ सिद्धि होती है। इस तथ्य को समझ सकना मूढ़मति के लिए कठिन है। किन्तु जहाँ भी दूरदर्शिता विद्यमान होगी वहाँ इस निष्कर्ष पर पहुँचने में तनिक भी कठिनाई न पड़नी चाहिए कि परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ हैं। उसमें भौतिक और आत्मिक, लौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार के सुखद प्रयोजन साथ-साथ सधते हैं। इसे विचारशीलता का अभाव ही कहना चाहिए कि लोग परमार्थ से विमुख रहते और संकीर्ण स्वार्थपरता की कीचड़ में कृमि कीटकों की तरह कुलबुलाते रहते हैं।
अदूरदर्शिता के प्रमाणों से सारा वातावरण भरा पड़ा है। आटे की गोली के लिए गरदन कटाने वाली मछली और दोनों के लालच में प्राण गँवाने वाली चिड़िया का उदाहरण बनने वाले मनुष्यों की कहीं कोई कमी नहीं। बीन की मोहकता में मृग और सर्पों की तरह सुध-बुध भूल जाने वाले और बन्धन में बँधने वालों का अनुकरण करते हुए असंख्य मनुष्य भी देखे जा सकते हैं। कमल पुष्प के रूप पर भौंरा और दीपक की शोभा पर पतंगा इतना मुग्ध होता है कि उसे अगले ही क्षणों इस व्यामोह की परिणति पर सोचने का अवकाश ही नहीं मिलता। चासनी पर बेहिसाब टूट पड़ने वाली मक्खी अपने पर और पैर फँसाकर किस प्रकार दम तोड़ती है इस दृश्य को देखकर उसकी मूर्खता का उपहास उड़ाने वाले तो अनेकों होते हैं, पर यह नहीं देख पाते कि वे स्वयं भी तो वैसा ही कुछ तो करते रहने में संलग्न नहीं है।
इसे अदूरदर्शिता ही कहना चाहिए जिसके कारण स्वार्थ में लाभ और परमार्थ में हानि होने का बुद्धि भ्रम चढ़ दौड़ता है। कहते हैं कि कौरव एक बार पाण्डवों के घर गये तो वहाँ मरकत मणियों से बने भवन में जल को थल और थल को जल समझने का भ्रम हुआ था। उसी विभ्रम का उपहास उड़ाते हुए द्रौपदी मखौल में कह बैठी-अन्धों के अन्धे ही होते हैं। सर्वविदित है कि वह व्यंग्य ही महाभारत का निमित्त कारण बना और धन जन की अपार हानि करने के उपरान्त ही समाप्त हुआ। प्रायः ऐसी ही उपहासास्पद मनःस्थिति उन सबकी होती है जो संकीर्ण स्वार्थपरता के दल-दल में घुसते धँसते चले जाते हैं और उस प्रगति के पीछे जुड़ी हुई अवगति को देखने-समझने में असमर्थ रहते हैं।
दूरदर्शिता साथ दे सकती होती तो हर व्यक्ति सौभाग्यशाली होता। तब उसे भटकावजन्य दुर्भाग्य के साथ हर घड़ी सिर न फोड़ना पड़ता। दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए किसान खेत में श्रम करते और फसल की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। विद्यार्थी 14 वर्ष का तप करके स्नातक बनता और विद्वान होने का श्रेय गौरव एवं उपहार अर्जित करता है। पहलवान लम्बे समय तक कसरत, खुराक, मालिश, संयम आदि का झंझट उठाते रहने के उपरान्त बहुत समय बाद दंगल जीतता और गर्दन ऊँची उठाकर चलता है। व्यवसायी पूँजी लगाते हैं, कलाकार लम्बे समय तक अभ्यास करते हैं। योगियों को सतत् साधनारत देखा जाता है। वे तत्काल हाथों हाथ कोई लाभ अर्जित नहीं करते वरन् सच तो यह है कि हानि उठाते हैं। वह समय देर में आता है जिसमें वे बीज की तरह गलने के उपरान्त विशाल वृक्ष की तरह फलने का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
इन दिनों प्रज्ञा परिजनों को समय की कसौटी पर कसा जा रहा है और यह जाँचा परखा जा रहा है कि वे नर पामरों की तरह अदूरदर्शिता के नागपाश में ही जकड़े रहेंगे या उन महामानवों की तरह श्रेयाधिकारी बनेंगे जिनने दूरदर्शिता अपनाई-आदर्श अपनाने के लिए कठिनाई उठाई और अन्ततः इतने अधिक लाभ में रहे जिनकी चर्चा करने मात्र से मुँह में पानी भर आता है।
कभी हनुमान-अंगद को भी मूर्ख कहा गया होगा। शबरी, केवट, विभीषण से लेकर रीछ वानरों तक द्वारा अपनाई गई नीति का उपहास उड़ाया गया होगा। क्योंकि उनके कदम उस मार्ग पर उठे, जिसमें तत्काल विलास वैभव हस्तगत नहीं होता था। दुनियादारी का प्रचलन यही है कि जिस भी प्रकार तुरन्त सम्पदा-सफलता हस्तगत होती हो उसी में बुद्धिमानी मानी जाय और जो भी जितने ढीठ मन से यह सब कर गुजरे उसी को चतुर भाग्यवान कहा जाय। प्रचलन के अनुसार आदर्शवादी, दूरदर्शी मूर्ख कहे जाते हैं। क्योंकि वे बीज की तरह गलने और बरगद की तरह फलने की नीति अपनाते हैं और प्रलोभन के आकर्षण तथा भय दबाव में आने से इनकार कर देते हैं। प्रत्यक्षतः यह घाटा लगता है। घाटा उठाने वाले को मूर्ख कहा ही जाना चाहिए। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। यदि ऐसा होता तो कोई भी सन्तानोत्पादन जैसे कष्टकारक और हानिकारक काम में हाथ न डालता। परमार्थ में समय और शक्ति खर्च करने के लिए कोई भी सहमत तत्पर न होता। तब देश भक्ति, समाज सेवा, पुण्य परमार्थ का कहीं कोई अता-पता भी न लगता। दया धर्म का पालन करने में, तप संयम जैसे कष्टसाध्य उपक्रम अपनाने में किसी की भी प्रवृत्ति न होती। त्याग बलिदान के प्रेरणास्पद प्रसंग कहीं भी देखने सुनने को न मिलते। अच्छा ही हुआ कि सभी ने प्रत्यक्षवाद को तत्काल लाभ भर को महत्व देने वाली संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में मोद मनाने की चतुरता को नहीं अपनाया। कुछ ऐसे आदर्शवादियों की भी आवश्यकता थी जो घाटा उठाने और मूर्ख कहलाने में भी-मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने में गर्व गौरव अनुभव कर सके।
प्रज्ञा युग के इस प्रभात पर्व पर प्रज्ञावतार का-प्रज्ञा अभियान का अभिनव आलोक इन्हीं दिनों उदय हुआ है। इस अवसर पर देवालयों में बजने वाले शंख, घण्टों की तरह स्वयं मुखर होने और अनेकानेक प्रसुप्तों को जगाने में जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका है उनकी इतिहासकार स्वर्णाक्षरों में चर्चा करेंगे। युग चेतना से अनुप्राणित कोटि-कोटि मस्तक उनके चरण चिन्हों पर चलते और शत्-शत् नमन वन्दन करते रहेंगे।
प्रज्ञा पुरश्चरण में विश्व विभीषिकाओं से जूझने और संव्याप्त विषाक्तता से निपटने की समुचित क्षमता है। युग परिवर्तन के लिए अभीष्ट ऊर्जा उत्पन्न कर सकने की समर्थता उसमें विद्यमान है। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के निमित्त जिस पृष्ठभूमि की आवश्यकता है वह उससे बनती है। 590 करोड़ मनुष्यों की नियति को विनाश के गर्त में गिरने से बचाने और उत्कृष्ट को स्वर्ण शिखर तक पहुँचाने के लिए मात्र भौतिक पुरुषार्थ एवं सरंजाम ही पर्याप्त नहीं हो सकता। उसके लिए चेतना को प्रभावित करने वाली अध्यात्म ऊर्जा का उत्पादन भी विपुल परिणाम में करना होगा। कहना न होगा कि उसी आवश्यकता की पूर्ति में प्रज्ञा पुरश्चरण की महती भूमिका अगले दिनों परोक्ष न रहकर प्रत्यक्ष भी परिलक्षित होने लगेगी। यह पारमार्थिक चर्चा हुई। विश्व कल्याण का लोक मंगल का यह प्रसंग इतना तुच्छ नहीं है जिसके लिए लोभ मोह के भव बन्धनों को थोड़ा भी शिथिल न किया जा सके। समयदान अंशदान की थोड़ी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने में अपने को असमर्थ कहा जा सके।
दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वालों के हाथ अनायास ही लाल होते हैं। दूसरों पर इत्र लगाने वाले के कपड़े अनायास ही महकने लगते हैं। अन्यों के लिए भोजन वाला चूल्हा स्वयं भी गरम रहता है। परमार्थ में प्रकारान्तर से उच्चस्तरीय स्वार्थ साधन का समावेश है। बर्फ बनाने वाले स्वयं भी शीतलता का लाभ देते हैं। सरकस में नौकरी करने वाले उस आकर्षक तमाशे को हर दिन मुफ्त में ही देखते रहते हैं। इतिहास साक्षी है कि परमार्थ परायणों को आरम्भ में जितना त्याग करना पड़ा है उसकी क्षति पूर्ति चलकर ब्याज समेत होती रही है। गाँधी, बुद्ध, शंकराचार्य, विवेकानन्द आदि परमार्थ परायण अन्ततः भौतिक दृष्टि से भी लाभ में रहे हैं। धन की तरह यश भी एक सम्पदा है। हजारी किसान ने धन न सही यश तो इतना कमा लिया जितना करोड़ों खर्च करके भी नहीं खरीदा जा सकता था। न हनुमान घाटे में रहे न अर्जुन। ऋषि परम्परा के महान व्यक्तियों को सफलता असफलता की तात्विक दृष्टि से परखा जाय तो प्रतीत होगा कि उनने घाटा नहीं वरन् उच्चस्तरीय लाभ उठाया। यह समझ का अन्तर ही है जो एक को माया के भ्रम जंजाल में घुमाता भटकाता है तो दूसरे को श्रेय सौभाग्य के अनुपम उपहार देकर हर दृष्टि से कृतकृत्य कर देता है। प्रज्ञा परिजनों को-प्रज्ञा पुत्रों को ऐसी ही दूरदर्शिता अपनानी चाहिए और युग परिवर्तन के महान उत्तरदायित्वों की चुनौती जिम्मेदारी आगे बढ़कर स्वीकारनी चाहिए।
गलाई ढलाई के अप्रिय और प्रिय प्रसंगों के साथ-साथ सुरक्षा प्रयत्नों में निरत लोग अन्यान्यों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित रहेंगे। और श्रेय सम्पादन में सामान्य लोगों की तुलना में अधिक लाभान्वित रहेंगे। स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों ने “हतोवा प्राप्यसि स्वर्ग, न जित्वा वा मोक्षसे महीम्” का उभयपक्षीय लाभ उठाया। तिलक गाँधी जैसे अजर-अमर हो गये और नेहरू, पटेल जैसे बेताज के बादशाह कहलाये। घाटे में वे रहे जो उस आन्दोलन में सम्मिलित होने पर घाटा पड़ने का हिसाब लगाते रहे। आये दिन की मुसीबतों ने अछूता तो उन्हें भी नहीं छोड़ा। गृह कलह, स्वास्थ्य संकट, परिस्थिति प्रतिकूलता, भाग्यचक्र आदि के कारण कष्ट उन्हें भी कम नहीं उठाने पड़े। इन्द्र और कुबेर बनने के सपने साकार कर सकने में वे भी असफल रहे। ऐसी दशा में तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर प्रतीत होता है कि संकीर्ण स्वार्थ परायण भी वैसा लाभ उठा सकने में सफल नहीं होते जैसा कि आदर्शवादियों को ताने दिये जाते हैं।
प्रज्ञा पुरश्चरण की भागीदारी में मात्र विश्व कल्याण ही हो और उसके प्रयोक्ता इस निमित्त के पुण्य प्रतिफल से सर्वथा वंचित रहें सो बात भी नहीं है। उन्हें अग्रगामी साहस का प्रतिफल व्यक्तिगत लाभ के रूप में न मिले सो बात भी नहीं है। जब दुष्कर्मों के दुष्परिणाम भुगतना निश्चित है तो कोई कारण नहीं कि सत्कर्मों की परिणति श्रेय सौभाग्य के रूप में न हो। विनाश विभीषिकाओं के माहौल में वे अपने परिकर के साथ अधिक सुरक्षित रहेंगे। अग्निकाण्ड में अनेकों जल भरते हैं किन्तु फायर ब्रिगेड वाले अपेक्षाकृत उस संकट में प्राण त्यागते कम ही सुने जाते हैं। पानी में डूबने वालों की संख्या हर वर्ष असंख्यों होती हैं पर नाव खेकर दूसरों को पार लगाने वाले मल्लाहों में से जल समाधि लेने वालों की संख्या नगण्य ही होती है। महामारी के प्रकोप में जिस अनुपात से सामान्य जन मरते हैं उनमें डॉक्टरों की मृत्यु नहीं होती। सृष्टि का विधान है कि दूसरों का बचाव करने के लिए प्रयत्नशीलों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। असंख्यों की शुभ कामनाएँ सद्भावनाएँ उनके ऊपर ढाल बनकर छाई रहती हैं और आड़े समय में चमत्कारी सहायता प्रस्तुत करती हैं। परमार्थ परायणों के जीवनक्रमों पर दृष्टिपात करने से एक नया प्रसंग यह भी उभरकर आता है कि उन्हें साँसारिक प्रतिकूलता भले ही रही हो पर दैवी सहायता के अप्रत्याशित अवसर अनायास ही आते रहे हैं।
प्रज्ञावतार-प्रज्ञा अभियान-प्रज्ञा पुरश्चरण की भागीदारी किसी के लिए भी घाटे का सौदा सिद्ध नहीं हो सकती। इस प्रसंग में प्रस्तुत किया गया अनुदान अनेक गुने सत्परिणाम लेकर वापिस लौटे ऐसी आशा-अपेक्षा करने में तनिक भी अतिवादिता नहीं है।
अनाहत ध्वनि श्रवणेन्द्रियों से परे है पर सूक्ष्म अन्तरिक्ष में संव्याप्त इस ऊर्जा स्त्रोत से सामूहिक ध्यान प्रक्रिया द्वारा संबंध जोड़ सकना सम्भव है। वैज्ञानिकों ने परीक्षण द्वारा पाया है कि गायत्री मन्त्र के उच्चारण से मानवी मस्तिष्क से जो विचार तरंगें निकलती हैं, उनके कारण एक विशिष्ट प्रकार तेजोवलय बना जाता है। थियासाफिस्ट श्री लेडबीटर ने अपनी पुस्तक “मैन-विजीबुल अनविजीबुल” में इसका वर्णन करते हुए सामूहिक ध्यान की महत्ता पर विशेष बल दिया है।
प्रस्तुत विभीषिकाओं से निपटने और उज्ज्वल भविष्य का अभिनव निर्धारण करने के लिए जागृत आत्माओं को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करना होगा। सृजन पर्व के अग्रदूत की भूमिका निभानी होगी। उदीयमान सूर्य की प्रथम किरणें पर्वत शिखरों पर चमकती हैं। सृष्टा की अदृश्य युग परिवर्तन प्रक्रिया को प्रत्यक्ष कार्यान्वयन दायित्व युग प्रहरियों के कन्धों पर ही आता है।
हनुमान, अर्जुन निजी पुरुषार्थ के धनी नहीं थे। अन्यथा जो समुद्र छलाँग सकता है, पर्वत उखाड़ सकता है, लंका उजाड़ सकता है वह बालि के भय से छिपते-फिरने वाले सुग्रीव के यहाँ नौकरी क्यों करते? पहले ही बाली से क्यों न लिपट लिया होता? अर्जुन यदि महाभारत जीत सकते थे तो द्रौपदी का भरी सभा में अपमान क्यों सहा? अज्ञातवास में दिन गुजारते, मुँह छिपाते जिस-तिस की नौकरी क्यों करते फिरे? निश्चय ही भगवान की इच्छापूर्ति के निमित्त माध्यम बन कर उनने वह श्रेय पाया। बुद्ध और गाँधी का निजी व्यक्तित्व या पराक्रम की जाँच-पड़ताल व्यर्थ है। यदि वे युग की पुकार को समझने और तद्नुरूप जीवनक्रम बनाने में कदम न बढ़ाते तो उन्हें सामान्य जन्मों की तरह ही पेट प्रजनन के कोल्हू में पिघले हुए संसार से विदा होना पड़ता। शंकराचार्य, समर्थ, विवेकानन्द दयानन्द आदि की भूमिकाएँ इसलिए उच्चस्तरीय रहीं कि उनने युग धर्म पहचाना और उसकी पूर्ति में संलग्न होने का शौर्य साहस अपनाया। लोभ मोह के व्यवधान को आड़े न आने दिया। तूफान के साथ उड़ने वाले तिनके और धूलि कण आकाश चूमते हैं। प्रवाह के साथ तैरने वाले पत्ते सहज ही दौड़ लगाते और समुद्र तक जा पहुँचते हैं। सृष्टा के संकेतों पर चलने वाले सुदामा, नरसी, सुग्रीव, विभीषण की तरह निहाल होते देखे गये हैं।
इन दिनों युगान्तरीय चेतना के पीछे सृष्टा की उद्दीप्त आकाँक्षा काम करती देखी जा सकती है। उसके सहयोगी रीछ-वानरों, ग्वाल-बालों, सत्याग्रहियों और बौद्ध परिव्राजकों की तरह चिरस्मरणीय और अभिनन्दनीय बनेंगे। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखना हो तो प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालकों की वरिष्ठता को देखते हुए तथ्य का अनुमान लगाया जा सकता है और अनुकरण करते हुए श्रेयाधिकारी बना और कृत-कृत्य हुआ जा सकता है। सार्थकता उसी जीवन की है जो स्वयं पार उतरे और अनेकों को अपनी नाव में बिठाकर पार करे।
जागृत आत्माओं का समयदान ही अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रस्तुत समस्याओं का एक मात्र हल लोक-मानस का परिष्कार है। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए कठोर शौर्य साहस अपनाये बिना-त्याग बलिदान का परिचय दिये बिना और कोई गति नहीं। संकीर्ण स्वार्थपरता के अतिरिक्त जिन्हें और कुछ दीखता सूझता ही नहीं, उनकी बात दूसरी है पर जिनमें उदात्त दूरदर्शिता का बीजाँकुर विद्यमान है उन्हें तृष्णाओं पर अंकुश लगाने और युग निमन्त्रण स्वीकारने के लिए कदम बढ़ाने ही चाहिए। इसके लिए आज से अच्छा मुहूर्त फिर कभी आने वाला नहीं है।
युग सन्धि के बीस वर्षों में यह वर्ष अत्यधिक महत्व का है। उसमें वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों का अधिक समयदान अपेक्षित है। सामान्य जन स्थानीय स्वाध्याय मण्डल-प्रज्ञा संस्थान के साथ संयुक्त रहकर दो घण्टे नित्य उस प्रयोजन के लिए लगाने लगे तो निश्चय ही उस क्षेत्र में नव-जागरण का माहौल बनेगा और उत्साहवर्धक परिवर्धन अभिवर्धन का प्रवाह देखते-देखते चल पड़ेगा। समय की अनुकूलता में स्वल्प प्रयत्न भी सफल होते देखे गये हैं। हवा का रुख अनुकूल हो तो हर किसी की चाल में अनायास ही अभिवृद्धि होती है।
यहाँ विशेष चर्चा अधिक समय देने वालों की हो रही है। इन दिनों कितने ही असाधारण कार्यक्रम सामने आ खड़े हुए हैं ऐसे उत्तरदायित्व कन्धों पर लद गये हैं जिनकी पूर्ति वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों के अधिक समयदान से ही हो सकती है।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान, अभी-अभी अंकुरित हुए हैं। उनमें खाद पानी लगाने की ठीक इन्हीं दिनों आवश्यकता पड़ रही है। उन्हें प्रेरणा प्रदान करने, उत्साह भरने और जन सहयोग दिलाने के लिए आवश्यक घोषित किया गया है कि सभी की वार्षिकोत्सव प्रज्ञा आयोजनों के रूप में सम्पन्न हों। ऐसे आयोजन इस वर्ष में-अक्टूबर से जून तक प्रायः दस हजार की संख्या में सम्पन्न किये जाने हैं। इनके लिए प्रचारकों की मण्डलियाँ प्रशिक्षित की जाती हैं। उन्हें गायन, वादन, प्रवचन, प्रदर्शनी, प्रदर्शन, जन संपर्क, सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसे कितने ही महत्वपूर्ण कार्यों की अतिरिक्त शिक्षा व्यवस्था की गई है। शान्ति-कुँज में इस वर्ष जुलाई, अगस्त, सितम्बर के एक-एक महीने वाले सत्र प्रायः इसी प्रयोजन के लिए चल रहे हैं। आगामी एक अक्टूबर से कार्य क्षेत्र में जाने के लिए जीप गाड़ियाँ और मोटर साइकिलें बड़ी संख्या में जुटाई जा रही हैं। तीन महीने का प्रशिक्षण और नौ महीने का प्रचार प्रवास इस प्रकार इस कार्य के लिए एक वर्ष का समय देने वाले ही निश्चिन्तता की स्थिति में उत्पन्न कर सकेंगे। अन्यथा महीने दो महीने का समय देने वालों से काम बनेगा नहीं। भगदड़ में अनिश्चितता भी रहती है और उनका कौशल भी नहीं निखरता।
चौबीस सौ शक्ति पीठों, प्रज्ञा पीठों में से अधिकाँश की यहाँ माँग आवश्यकता है कि कोई बाहर के अनुभव कुछ समय यहाँ रहें और स्थानीय लोगों को साथ लेकर उत्साहवर्धक वातावरण बनायें तो काम चलेगा। यह एक तथ्य है। इन स्थापनाओं द्वारा रचनात्मक कार्य उस प्रकार उस अनुपात से नहीं हो रहे जैसा कि उनसे अपेक्षा की गई और जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस अवरोध को दूर करने का एक उपाय यह हो सकता है कि प्रशिक्षित प्रचारक उनके पास कुछ समय रहें और स्थानीय लोगों को साथ लेकर नवचेतना का संचार करें। यह कार्य भी ऐसा है जो न्यूनतम एक वर्ष का समय चाहता है। इसके बिना अनुभव भी तो परिपक्व नहीं होता। कौशल भी तो नहीं निखरता। चार-चार महीने एक प्रज्ञापीठ में रहा जाय तो एक वरिष्ठ समयदानी वर्ष में तीन संस्थाओं में तो प्राण ऊर्जा भर सके। इस प्रयोजनों में पत्नी समेत रहने की भी गुंजाइश है।
शान्ति-कुंज में अब कितने पुराने कार्यक्रमों का असाधारण विस्तार हुआ है। कल्प साधना और युग शिल्पी सत्रों में सम्मिलित होने वालों की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है। उस व्यवस्था के कितने ही पक्ष ऐसे है जिसके लिए सुयोग्य व्यक्तियों का सहयोग चाहिए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की गतिविधियाँ दिन-दिन बढ़ती जा रही हैं उनकी साज सम्भाल में भी नये सहयोगी अपेक्षित हो रहे हैं। साहित्य सृजन में भी अधिकों की आवश्यकता पड़ेगी। शान्ति-कुंज में पधारने वाले जिज्ञासुओं की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है। उनके सत्कार एवं समाधान के लिए पुराने लोग कम पड़ते हैं फलतः उसमें भी नये स्वयं सेवकों का समावेश होना है। ऐसे-ऐसे अनेक काम हैं जिनके लिए अनेक योग्यता वालों की नई भर्ती एक प्रकार से आवश्यक हो गई है। उदाहरण के लिए कार्यक्षेत्र में जाने वाली दर्जनों जीपों के लिए कुशल ड्राइवरों की आवश्यकता पड़ेगी। जिन्हें संगीत का थोड़ा सा अभ्यास है ऐसे लोग तो सैंकड़ों की संख्या में अपेक्षित होंगे। जो मात्र शारीरिक श्रम ही कर सकते हैं वे भी शान्ति-कुंज के श्रम प्रयोजनों में अपना भाव भरा योगदान दे सकते हैं।
अच्छा होता जिनकी मनःस्थिति और परिस्थिति उतनी जटिल नहीं है वे परिवार व्यवस्था पुराने साधनों से अथवा अन्य समर्थ परिजनों की सहायता से बनालें और पूरा या अधिकाँश समय युग धर्म के निर्वाह में लगालें। शान्ति-कुँज की ओर कदम बढ़ाते। वानप्रस्थ परम्परा पुनर्जीवित होती और परिव्राजकों-सत्याग्रहियों की नई पीढ़ी समय को बदलने के लिए जुट पड़ती। पर लगता है व्यामोह की खुमारी बहुत गहरी है। वह इस संदर्भ में गम्भीरता पूर्वक कुछ सोचती तक नहीं फिर करे कौन? धर्म की दुहाई देने वाले और ईश्वर की रंगीली चर्चा करने वालों को माला के कुछ दाने सटका देने या अगरबत्ती जलाने के अतिरिक्त और कुछ सूझता तक नहीं। बहुत हुआ तो निठल्लों की मण्डली में सम्मिलित होकर भीख माँगने और गाँजा पीने के गर्त में जा गिरे।
उत्कृष्ट आदर्शवादिता के त्याग पराक्रम के इस घोर दुर्भिक्ष को देखते हुए वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों से इन दिनों यह याचना की गई है कि वे एक वर्ष प्रव्रज्या का मध्यवर्ती मार्ग अपनायें। किसी प्रकार ऐसा तालमेल बिठायें की एक वर्ष घर से बाहर रह सकना बन पड़े। फिर राज सिंहासन सम्भालें। विश्वामित्र राम, लक्ष्मण को कुछ समय के लिए अति महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए पिता से माँग ले गये थे। इन दिनों भी हर गाँव को-हर परिवार को अपने यहाँ से एक-एक राम लक्ष्मण भेजने चाहिए।
समर्थ गुरु रामदास ने अपने शिष्ट परिवारों में से एक-एक सदस्य शिवजी की सेना में भेजा था। गुरु गोविन्दसिंह को भी उनके शिष्यों ने अपने परिवार का एक सदस्य गुरु को समर्पित किया था। उसी आधार पर सिखों की सिंह सेना का निर्माण हुआ। शेखावाटी राजस्थान में पिछले दिनों तक यह प्रचलन रहा है कि राजपूतों के हर परिवार का एक सदस्य सेना में भर्ती होता था। बुद्धकाल में भी ठीक यही परम्परा सुनियोजित ढंग से चल पड़ी थी। गान्धी की तो आँधी थी वह लम्बे समय नहीं चली फिर भी उनमें से नेहरू, पटेल बजाज जैसे कितने ही परिवार समुदाय ऐसे थे जिनने देश हित में अपनों की भावभरी श्रद्धांजलियां समर्पित की और वे इतिहास की पंक्तियों में अविस्मरणीय हो गये। ब्राह्मण वर्ग तो पुरातन काल से इस परम्परा को अपनाकर ही भूसुर कहलाने का श्रेयाधिकारी बना। साधु वर्ग तो पूरी तरह इसी निमित्त समर्पित रहता रहा है। उस समय सिद्धि, चमत्कार और स्वर्ग मुक्ति के लिए कर्महीन होकर बैठने और चित्र विचित्र कल्पना उड़ानें उड़ने वाले सनकी कदाचित् ही कहीं दृष्टिगोचर होते थे। उन सभी ने आत्म परिवार और लोक मंगल की सम्बन्धी तप साधना को जीवन नीति बनाया और समस्त पराक्रम उसी लक्ष्य पर जुटाया।
आज एक वर्ष की प्रव्रज्या के लिए वरिष्ठ प्रजा परिजनों को कहा जा रहा है। उतना समय वे चाहें तो किसी भी व्यवधान के अड़ जाने पर बर्बाद हुआ भी समझ सकते हैं। युवकों में से कितने ही फेल हो जाते हैं। नौकरी की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं। हारी-बीमारी, मुकदमा, झगड़ा-झंझट, आदि में फँस जाने में एक वर्ष ऐसे ही गुजर जाता है। किसी वर्ष वर्षा न होने, व्यापार में उतार-चढ़ाव आ जाने से कमाना दूर गाँव से खाना पड़ता है। चोरी-शराब आदि में पूँजी चुक जाती है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जिनमें प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ दबोचती हैं और वर्षों का समय बिना कुछ खाये कमायें ऐसे ही खीज झुँझलाहट में चला जाता है। निषेधात्मक चिन्तन में जिन्हें आदत हो वे मन समझाने के लिए ऐसा भी सोच सकते हैं और एक वर्ष का समय निकाल सकते हैं। उतनी अवधि के लिए संचित साधनों से अथवा अन्य परिजनों पर भार सौंपकर युग पुकार के लिए समय निकालने का तालमेल बिठा सकते हैं। आखिर मनुष्य के चले जाने पर भी तो घर परिवार की व्यवस्था किसी प्रकार बन ही जाती है। यदि अपनी उदारता, साहसिकता और सूझ-बूझ का उपयोग करके वैसा कुछ आदर्शवादी प्रयोजनों के लिए स्वेच्छापूर्वक किया जा सके तो समझना चाहिए सचमुच ही सौभाग्य सूर्य का उदय हो गया।
वस्तुतः इसमें निषेधात्मक चिन्तन के साथ तालमेल बिठाने और आकस्मिक हानि के साथ संगति जोड़ने जैसा कुछ है नहीं। यह एक उच्चस्तरीय कौशल उपार्जित करने का स्वर्ण सुयोग है। डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर कलाकार आदि बनने के लिए कई-कई वर्ष की ट्रेनिंग प्राप्त करनी पड़ती है साथ ही निर्वाह, फीस, पुस्तकें आदि का खर्च भी जेब से देना पड़ता है। योग्यता वृद्धि के लिए किया गया यह त्याग वस्तुतः बीज बोकर सौ गुना काटने के समान है। आरम्भ में घाटा उठाकर भविष्य में समुचित लाभ उठाने वालों में किसान, माली, विद्यार्थी, व्यापारी, शिल्पी, पहलवान, अफसर, आदि उपयोगी पद प्राप्त करने वालों का बहुत बड़ा समुदाय है जो भावी योजनाओं के निमित्त जी खोलकर पूँजी लगाता और अथक परिश्रम करता है। ऐसा ही कुछ वरिष्ठ युग शिल्पी भी सोचने लगें तो उसे दूरदर्शी विवेकशीलता की कहा जायगा।
घर घुसे लोगों की तुलना में उद्देश्यपूर्ण प्रव्रज्या के लिए निकलने वाले असाधारण लाभ पाते देखे गये हैं। गोखले ने गाँधी को देश भ्रमण करने के लिए भेजा था ताकि वे वस्तुस्थिति को समझें और व्यावहारिक योजना बनायें। विवेकानन्द ने भी अपने महत्वपूर्ण कदम उठाने से पूर्व पूरे देश का दौरा किया था। ऋषियों सन्त परिव्राजकों को तो यह निरन्तर कराना पड़ता था। तीर्थयात्रा का वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य यही है। भगवान बुद्ध जब मरने लगे तो उन्होंने शिष्यों को बुलाकर अन्तिम उपदेश दिया-‘तुम लोग तीन दिन से अधिक कहीं ठहरना मत। दो से अधिक का जत्था बनाकर चलना मत” इस निर्देशन में उनका उद्देश्य प्रव्रज्या धर्म को अधिकाधिक व्यापक बनाना था। देवर्षि नारद की भक्ति साधना इसीलिए सर्वोच्च मानी गई कि उनने आजीवन धर्म प्रचार की पदयात्रा में ही संलग्न रहने का व्रत लिया और निभाया।
प्रव्रज्या के अनेकानेक व्यक्तिगत लाभ हैं। अस्वस्थता का यह कारगर उपचार है। बुद्धि कौशल और व्यवहारिक अनुभव इस आधार पर निश्चित रूप से निखरता है। स्वभावों और परिस्थितियों को समझने में अधिक यथार्थवादी बनने का अवसर मिलता है। अनेकों से मैत्री बढ़ती है। व्यक्तित्व को निखारने उभारने वाले इतने अधिक लाभों के लिए यदि कुछ समय लगाया जाता है तो उस अवधि को हर दृष्टि से सार्थक ही कहा जायगा। उसमें स्वार्थ और परमार्थ का समान समन्वय है। लोक मंगल में निरत होने का पुण्य परामर्श और प्रतिभा प्रखरता अर्जन का उच्चस्तरीय स्वार्थ मिलकर गंगा यमुना के संगम जैसा सुयोग बनाते हैं।
कुछ समय पूर्व तक बौद्ध देश कम्बोडिया एवं थाईलैंड में यह प्रथा थी कि हर समर्थ व्यक्ति को जीवन में एक वर्ष का संन्यास लेना पड़ता था। उस अवधि में वह बौद्ध विहार में रहकर प्रातःकाल योग साधना करता और दिनभर समाज सेवा के कामों में निरत रहता। फलतः उस देश के सभी सरकारी कर्मचारी इसी वर्ग में अवैतनिक रूप से मिल जाते थे। परिणाम यह रहा कि उस देश की समर्थता, सम्पन्नता और शालीनता संसार भर के लिए आदर्श रही। छोटा देश होने पर भी उसकी विशिष्टता संसार भर में प्रख्यात बनीं स्वर्णकोष आश्चर्यजनक था। अपराधों का-रोगों का नाम नहीं। सभी बलिष्ठ, सभी हँसमुख, सभी प्रगतिशील। इस उस एक वर्षीय संन्यास परम्परा का प्रत्यक्ष प्रतिफल माना जाता था। अपने धर्म-प्राण देश में इन दिनों उस परम्परा को नये रूप में प्रज्ञा प्रव्रज्या बनकर प्रकट होना चाहिए।
जिनकी मनःस्थिति ऐसी है उन्हें परिस्थिति की अनुकूलता के लिए कुछ अधिक न करना पड़ेगा। नया चिन्तन और नया निर्धारण करने की उमँग उठाने भर से काम बन जायगा और उस अवरोध को राई होते हवा में उड़ते देखा जा सकेगा जो कृपणता के कारण पर्वत जैसा भारी और समुद्र जैसा दुस्तर प्रतीत होता है।
जो इस एक वर्ष में प्रव्रज्या में निर्वाह व्यय प्राप्त करने के लिए विवश हों उन्हें भी निराश नहीं होना चाहिए। शान्ति-कुंज ने ऐसी व्यवस्था भी बनाई है कि जहाँ कोई चारा नहीं, वहाँ ब्राह्मणोचित निर्वाह परिव्राजकों को दिया जा सके। इसके लिए पत्र व्यवहार से भी कुछ भी स्पष्टीकरण हो सकता है। पर ठोस आधार तब बनता है जब अगस्त, सितम्बर के किसी एक महीने में कल्प साधना सत्र सम्पन्न करने के लिए अपने खर्च से शान्ति-कुंज आया जाय और विस्तृत विचार विनिमय के आधार पर किसी निश्चय पर पहुँचा जाय।
स्मरण रहे युग सन्धि का यह वर्ष अनेक दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसमें प्रतिभाशाली, भावनाशील प्रज्ञा परिजनों के समयदान की अत्यधिक आवश्यकता पड़ रही है। युग देवता की इस याचना में जो एक वर्ष की समय-श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे वे अगले दिनों उस दूरदर्शिता का अनेक गुना लाभ प्राप्त करेंगे और अपनाये गये साहस का देवी वरदान की तरह स्मरण एवं अनुभव करते रहेंगे।
माया वर्मा
नाव डगमगाती जब तब, तुम ही बनते पतवार। थक जाता मानव जब पथ पर, तुम देते आधार॥
पीर डुबा देती गहरे में वाणी होती मौन। उँगली पकड़ उठा लेता है तभी न जाने कौन॥
जब रोते हैं प्राण और चेतनता भरती आह। आकर कौन रोक देता है अविरल अश्रु प्रवाह॥
टूटी हुई हृदय-वीणा के तुम्हीं जोड़ते तार। नाव डगमगाती जब-जब, तुम ही बनते पतवार॥
कुँठित होता ज्ञान, भटकती मेधा चारों ओर। लक्ष्य बिन्दु तो दूर, न मिलता लक्ष्य-मार्ग का छोर॥
तब ध्रुवतारा बन कर देते तुम्हीं दिशा-निर्देश। पहुँचा देता कौन न जाने तुम तक मम संदेश॥
यों ही सदा बने रहना प्रभु! सकरुण और उदार। नाव डगमगाती जब-जब, तुम ही बनते पतवार॥
देना वह वरदान कर सकूँ पूरा निज कर्त्तव्य। जिसके हित भेजा पृथ्वी पर भोगूँ वह भवितव्य॥
लोक हितों के लिए कर सकूँ जीवन का उपयोग। करके कुछ सत्कर्म मेट लूँ पिछले शोक व रोग॥
कभी न कम करना प्रभु! अपना प्रेरक मधुर दुलार। नाव डगमगाती जब-जब, तुम ही बनते पतवार॥
*समाप्त*