समष्टि की साधना का तत्व दर्शन

प्रभु स्मरण को ब्रह्म विद्या अथवा तत्वदर्शन कहते हैं। प्रभु अथवा भगवान को सही शब्द देना हो तो परमात्मा नाम से पुकारा जा सकता है। इस महातत्व को आत्मसात् करना ही ब्रह्म विद्या का लक्ष्य होता है। परम को व्यापकता एवं उत्कृष्टता दो नामों से समझा जा सकता है। परमात्मा की व्यापकता जितनी उसके अंश मनुष्य के समझने व विचार करने योग्य है, उसे समष्टि कहते हैं। यही विराट् है। इसी का दिग्दर्शन अर्जुन को, यशोदा का, कौशल्या को ज्ञान चक्षुओं द्वारा कराया गया था। ‘स्व’ का ‘पर’ के साथ एकात्म भाव विकसित हो यही विराट दर्शन का सार तत्व है।

उत्कृष्टता परम का दूसरा पर्याय है। अर्थात् भावना एवं विचारणा में श्रेष्ठता का वरण। सद्भावना सद्विचारणा, सत्प्रवृत्ति अपनाना-आदर्शों का परिपालन करना ही परमात्मा की उपासना का लक्ष्य है, यह भाव इस शब्दार्थ से प्रकट होता है। संक्षेप में भगवान को सत्प्रवृत्तियों का समावेश करता है वह उसी अनुपात में ईश्वर पारायण माना जाता है। समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाना, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन हेतु प्रखर पुरुषार्थ करना एवं इस हेतु स्वयं को उस योग्य बनाना परमात्मा की विश्वात्मा की विराट् की आराधना ही है।

यदि उस महान के साथ अपने क्षुद्र की घनिष्ठता अभीष्ट है और तद्रूप बनने के रूप में चरम प्रगति तक पहुँचने की अन्तःप्रेरणा उमंगे तो फिर पूजा उपचार से ऊंचे उठकर परमात्मा के संबंध में यथार्थवादी निर्धारण अपनाना चाहिए। यही योग साधना है, युगानुकूल उपासना आराधना है।


मैं नित्य जिन्दा प्रेतों को दफनाता हूँ

खलील जिब्रान अपनी कथा प्रधान शिक्षाओं के लिये एक ख्याति प्राप्त विद्वान थे। जीवन दर्शन संबंधी सूत्र जो उन्होंने अपनी सारगर्भित प्रतीकात्मक कहानियों में दिये, समय-समय पर मानव का मार्गदर्शन करते रहे हैं। मनोविज्ञान की गहराई में जाकर कैसे एक साधारण से उदाहरण से नैतिक सीख दी जा सकती है; इसकी झाँकी उनकी इस कथा से मिलती है।

एक बार मैं सपना देख रहा था। स्वप्न में ही एक भयानक भूत आया और सामने खड़े होकर मुझे डराने लगा। पूछने लगा - तेरा नाम क्या है? मैंने डरते-डरते कहा-अबदुल्ला! उसने फिर तिरछी नजर से देखा और व्यंग्य की हँसी-हँसते हुए बोला-“इसका अर्थ तो ईश्वर का दास होता है। क्या तुम ईश्वर के दास हो, उसके भक्त हो? तुम्हारे कार्यों एवं चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता।”

मैं अधिक सकपकाने लगा और उसकी भाव-भंगिमा से भयभीत हो भगाने की कोशिश करने लगा। भूत ने मुझे जाने नहीं दिया। कस कर पकड़ लिया और कहा तुम्हारी ही बिरादरी के लोग हैं जिनने मिलकर ईश्वर की नाकों दम कर रखी है। तुम्हीं लोगों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिये ईश्वर ने मुझे नियुक्त किया है। आज तो मैं तुम्हीं से निपटूँगा।

भूत ने कहा-‘तुम लोग धर्म की बातें करके अपनी चमड़ी बचाते हो और उन कामों को करने में लगे रहते हो जिनकी खुदाने मना ही की है। धर्म के प्रवक्ताओं की इस क्रिया पद्धति से खुदा बहुत दुःखी एवं नाखुश हैं दुहरी गलती करने वालों पर खुदा दूने नाराज हैं।

मैं क्या कहता। जान बचाकर किसी तरह घर जाने की पड़ी थी। विदाई का नमस्कार करते हुए पूछा-मेरी स्थिति को देखते हुए कुछ सेवा हो तो बताएँ और मुझे जाने दें। आगे से ऐसी गलती स्वयं नहीं करूंगा औरों की कह नहीं सकता।

भूत की हँसी फूट पड़ी और मुस्कुराकर उसने मेरे हाथ में एक फावड़ा थमा दिया। कहा-फुरसत के समय तुम कब्रें खोदते रहना। जितनी अधिक खुद सकें उतनी खोदना।

पहेली को बूझने का मन हुआ। भूत मन की बात समझ गया और बिना पूछे ही बोल पड़ा-“दुनिया में चलते-फिरते प्रेत बहुत हैं। तुम उन्हीं को दफन करना। खुदा ने तुम्हारे लिए यही जिम्मेदारी सौंपी हैं।”

“जिन्दा प्रेत”? इतना कह भी नहीं पाया था कि भूत ने कहा-जो दूसरों का दर्द नहीं समझ सकते जिन्हें आपाधापी के अलावा और कुछ नहीं सूझता, जिनके पास दूसरों को धोखा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना ही एक मात्र धन्धा है, वे जिन्दे भूत नहीं तो और क्या है? ऐसे व्यक्ति धरती पर बोझ हैं, समाज के लिए सिरदर्द हैं, जीवित रहते हुए भी मृतक के समान हैं। उन्हें दफन नहीं करोगे तो इस दुनिया में जिन्दों को रहने के लिये जगह ही कहाँ बचेगी?

तब से हर रात वही सपना बारम्बार आता है। जिन्दा मुर्दों के लिए कब्र खोदता हूँ। रात भर न जाने कितनी खोद-खोदकर फेंक देता हूँ।

सपना अपने एक अन्तरंग मित्र को सुनाया तो वे हँस पड़े। बोले - भला उनमें गड़ेगा कौन? तुम्हारे सपने की कब्रें तो कल्पना लोक की हैं। नींद क्यों लिया और गम्भीर होकर कहा-“दूसरों की तो खुदा जाने। अपने को तो मैं जिन्दा मुर्दों-प्रेतों में गिनता हूँ। अपने संकीर्ण विचारों को नित्य चिन्तन कर गहरे गाड़ देता हूँ। सोचता हूँ अपने लिए तो समय रहते जगह बना ही लूँगा। एक बात और मन में आती है कि यही सपना औरों की भी समझ में आ जाय तो सम्भवतः खुदा को हैरान न होना पड़े, जिन्दा प्रेत कहीं नजर न आएँ, सारा संसार सही अर्थों में मनुष्यों से घिरा-सुख-समुन्नति की ओर बढ़ता दिखाई देने लगे।”


“तमेव विद्वान न विभाय मृत्योः”

विशालकाय वृक्ष का सारा वैभव उसके सूक्ष्मतम घटक बीज में निहित है। अनुकूल वातावरण पाते ही ये विशेषताएँ प्रकट होने लगती हैं। जीव एवं परब्रह्म के मध्य का तारतम्य भी कुछ इसी प्रकार का है। परब्रह्म की समस्त विशेषताएँ बीज रूप में अविनाशी अंश जीव में समाई हुई है। एक ही ज्योति ज्वाला के अनेकानेक स्फुल्लिंगों को जीव के अन्दर प्रकाशित होते देखा आ सकता है। इसीलिये उपनिषद्कार ने कहा है कि “वह है तो एक नियामक सत्ता लेकिन उसे लोग भिन्न-भिन्न रूपों में जानते-समझते हैं।”

पेड़ पादपों में जीवन तो है पर विकसित चेतना नहीं है। प्रकृति से उपलब्ध सम्पदा मात्र से ही वे सन्तुष्ट रहकर जीवित भर बने रहते हैं। मनुष्य की स्थिति वृक्ष वनस्पतियों तथा अन्याय जीवों से इस संबंध में भिन्न है। परम सत्ता का ही एक अंग होते हुए भी उसके अन्दर वह सामर्थ्य हैं कि बिना प्रकृति के सहयोग के भी विकास की ओर अग्रसर हो सके। इच्छा, आकाँक्षा, बुद्धि के अतिरिक्त संकल्प शक्ति के रूप में उसे एक ऐसी प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य प्राप्त हैं, जिसके सहयोग से वह न केवल प्रकृति को अपने अनुकूल बना सकता है, वरन् अपनी चेतना को उच्चतम सोपानों तक पहुँचा सकता है। यह एक सच्चाई है कि जिसकी चेतना जितनी अधिक विकसित होगी उतनी ही उसकी संकल्प-शक्ति भी प्रखर होगी। यह अतिरिक्त वरदान निस्सन्देह जीवों में एक मात्र मनुष्य को ही मिला हुआ है। वैदिक ऋचाओं का उद्घोष है “अयं खलु क्रतुमयः पुरुषः” अर्थात्-“यह पुरुष अपनी विचारणाओं की ही प्रतिमूर्ति है”-अपने विचारों एवं भावनाओं से ही बनता है। जैसा सोचता और जिस प्रकार का संकल्प करता है वैसा ही बन जाता है।

जीव की संकल्प शक्ति तथा उसके विकास में योगदान पर गीताकार का कथन है-

“श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छृद्धः स एव सः”।

अर्थात्-यह पुरुष श्रद्धामय है, जैसी इसकी आस्थाएं होती हैं यह वैसा ही बन जाता है। दूसरे शब्दों में पुरुष के बनने में आन्तरिक संकल्प शक्ति ही काम करती है जिसकी अभिव्यक्ति गीता में श्रद्धा के रूप में की गयी है।

वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य स्वामी रामानुज का कहना है कि “जीवात्मा की स्थिति घड़ी की कमानी की तरह होती है। बाह्य मल विक्षेपों के कारण वह शान्त पड़ी रहती है, किन्तु उसके प्रसार विस्तार की प्रबल सम्भावना है।” योगीराज अरविन्द मनुष्य की गयी-गुजरी-दीन-हीन स्थिति में पड़े रहने का कारण स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “प्रबल अभीप्सा का न होना ही बन्धनों का कारण है। संकल्प शक्ति को उभरने तथा कुछ विशेष कर-गुजरने का अवसर भी इसीलिए नहीं मिल पाता।”

भोगशक्तियों के बन्धन मनुष्य को इस तरह जकड़े रहते हैं कि उसकी मूल सत्ता को अपनी विशेषताओं के साथ प्रकट होने का अवसर ही नहीं मिल पाता। इस विषय में स्थिति से बचने का तरीका क्या हो? जीव ब्राह्मी सत्ता को अपने भीतर उजागर कैसे करे? जीव ब्रह्म की एकता, अभिन्नता का पारस्परिक दिव्य आदान-प्रदान की रसानुभूति का आनन्द कैसे प्राप्त हो? संसार में रहते हुए भी उसके मल विक्षेपों से आसक्ति बन्धनों से कैसे बचा जाय?

ईशावास्योपनिषद् इसका समाधान प्रस्तुत करता है। “संसार के प्रति कैसी दृष्टि हो इसका उल्लेख- ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित्जगत्याँ जगत”- के रूप में करते हुए उपनिषद्कार कहता है कि वह तो सर्वव्यापी है। जीव संसार के हर कण में प्रतिक्षण उसकी अनुभूति करे।

यह स्पष्ट है कि जब तक शरीर है और इस संसार में रहना है, कर्मों का परित्याग सम्भव नहीं है। उनसे चाहते हुए भी छुटकारा पाया नहीं जा सकता। कर्मासक्ति से मुक्ति पाने का साधन है-निस्पृह होकर सत्कर्म करते रहना। श्रुति कहती है-“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः- कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा रखो।

संसार एवं उसके आकर्षणों के स्वरूप का अलंकारिक वर्णन उपनिषदों में है। उपनिषद् के अनुसार यह जगत सुवर्ण के पात्र के सदृश है जिसने सत्य को ढक रखा है। जो आकर्षणों के आवरण को चीरकर सत्य के साक्षात्कार के लिए प्रवृत्त होते हैं, वे सफल भी होते हैं। पर उनकी संख्या अधिक है जो संसार के आकर्षणों में भटक जाते हैं तथा मूल लक्ष्य को भी भूल बैठते हैं। शास्त्रकारों ने अनात्म शरीर में आत्म भाव रखने तथा साँसारिक आकर्षणों का वास्तविक मान बैठने की अविद्या कहा है। इसी का दूसरा नाम माया है। मनीषियों ने माया अर्थात् “वह जो नहीं है” को एक प्रबल शक्ति माना है तथा उसके चंगुल से बचने का सुझाव दिया है। विषयासक्ति से मनुष्य अपने शाश्वत स्वरूप को भूल बैठता है। उतना ही वह आत्मा के प्रकाश से भी दूर होता जाता है। ऐसे व्यक्तियों की निन्दा करते हुए शास्त्रकार कहते हैं-

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमतसावृता। तास्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः॥

अर्थात्-“जो भोगेच्छाओं को प्रबल करके आत्मा का हनन करते हैं, वे आत्म हन्ता भरकर उन लोकों को जाते हैं जो आसुरी हैं और अंध तमिस्रा से ढके हुए हैं।

चराचर में संव्याप्त उस परम सत्ता की सतत् अनुभूति ही योगत्रयी का तात्विक लक्ष्य है। इसी अनुभूति को साकार करने में विभिन्न पथों का अवलम्बन लिया जाता है। जप, ध्यान, धारणा और समाधि की उच्च स्तरीय-साधनाओं का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। “विराट् सत्ता की आत्म-सत्ता में अनुभूति।”

पर अद्वैत की चरम अनुभूति मात्र सैद्धान्तिक चर्चा भर बनकर न रह जाय इसलिए साधना द्वैत से आरम्भ करनी पड़ती है। अहम् ब्रह्मास्मि, सोऽहम्, तत्वमसि, सच्चिदानंदोऽहम्, वस्तुतः अद्वैत अनुभूतियों के उद्घोष है। पर इस स्थिति तक पहुँचने के लिए साधना का आरम्भ भक्ति भावना से करना पड़ता है अन्यथा शाश्वत अनुभूतियों के अभाव में सत्य की मात्र वैचारिक स्वीकारोक्ति तो अहम् को घोषित करती है आत्म प्रवंचना की यह स्थिति साधक को ले डूबती है। स्वसम्मोहन के एक ऐसे आवरण से घिर जाता है, जिससे प्रायः निकलते नहीं बनता। आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। लक्ष्य प्राप्ति से वह भटक जाता है।

“अहम् ब्रह्मास्मि” को स्वीकार करने पर “सर्वखल्विदं ब्रह्म” पर आशंका प्रकट करने वाले साधक सत्य से उतने ही अपरिचित हैं जितना कि सामान्य व्यक्ति वास्तविकता में तो एक साथ दोनों ही को स्वीकार करना तथा अनुभूति में उतारने का प्रयत्न करना पड़ता है।

दार्शनिक सिद्धान्तों का सही स्वरूप समझने से लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ने का सैद्धान्तिक आधार बन जाता है इससे आगे का चरण विभिन्न साधनाओं से शुरू होता है। उनमें अपनी श्रद्धा भावना का जितना ही अधिक अभिसिंचन किया जायेगा, उतनी ही सफलता मिलेगी। कहा जा चुका है कि जीव में बीज-रूपेण ब्रह्म बनने की सभी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। अभिव्यक्ति के लिए जीवात्मा छटपटाती भी रहती है पर अभीष्ट स्तर का पोषण न मिल पाने तथा विकास के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति न जुट पाने से ही वह दीन-हीन गई गुजरी स्थिति में पड़ी रहती है। इससे निकलने के लिए क्या कमर कसकर तैयार हो जाने का नाम ही साधना पुरुषार्थ है; परम पुरुषार्थ इसे ही कहा गया है। जीवात्मा अपने ईष्ट से विलग रहकर छटपटाती रहती है। यह बेचैनी उस परम सत्ता से मिलकर ही मिटती है। जितना समर्थ वह है उतना ही जीव भी बन सकता है, बशर्ते कि अपने को उसकी सत्ता में धुला मिला दे। यही है आत्मतत्व का जीवन दर्शन-बंधनमुक्ति जिसका अलंकारिक वर्णन विभिन्न रूपों में शास्त्रों में किया गया है। इस आत्मतत्व को जान लेने पर मनुष्य मृत्यु से भी भयभीत नहीं होता। यह सिद्धि साधना की सबसे बड़ी साधना है, ऐसा विद्वानों का मत है।


पूर्वाग्रह छोड़ें, आत्मिकी का अवलम्बन लें

मान्यताओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होने पर सत्य के निकट पहुँच पाना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसे व्यक्तियों की स्थिति उस मेंढक की तरह होती है जो कुएँ में परिभ्रमण करता, उसकी जलराशि एवं विस्तार को ही अधिकतम मानता रहता है। झरनों, नदियों तथा समुद्रों की अगाध जलराशि, प्रवाह, गहराई एवं विस्तार के चर्चा प्रसंग कुएँ के मेंढक को अवास्तविक लगते हैं। अपने अनुभव एवं जानकारी को ही वह सर्वोपरि महत्व देता है। लगभग ऐसी ही हालत उन तथाकथित विद्वानों बुद्धिजीवियों तथा प्रत्यक्षवाद को ही महत्व देने वाले भौतिक विज्ञानियों की है जो इन्द्रिय ज्ञान के सीमित परिकर में ही चक्कर काटते रहते हैं, जो भी दृष्टिगोचर होता है, उसे ही सब कुछ मानते हैं। इसी उथली कसौटी पर वे आत्मा एवं परमात्मा को, उसके अस्तित्व एवं विस्तार को भी कसते रहते हैं। असफलता हाथ लगने पर परम ज्ञानी की भाँति उद्घोष करते हैं-‘नो गाड’, ‘नो सोल’। जब परमात्मा की सत्ता ही नहीं तो उसे मानने से क्या लाभ? फिर कर्मफल के-आस्तिकता के-परमार्थ परायणता के मानवी अनुबन्धों एवं नैतिक अनुशासनों के परिपालन का क्या औचित्य? यह चिन्तन ही वस्तुतः प्रच्छन्न नास्तिकता के रूप में प्रकट होता है। पर इसकी जड़ें उन मान्यताओं में हैं जो प्रत्यक्षवाद की सीमित जानकारियों की पृष्ठभूमि पर बनी होती है।

ज्ञानेंद्रियों का अनुभव कितना सीमित, कितना संकुचित हैं, इसे देखकर और भी हैरत होती है। आँखें एक निश्चित दूरी तक ही देखने में सक्षम हैं। कानों के सुनने की एक मर्यादा है। वे न्यूनतम 30 सायकल्स प्रति सेकेंड तथा अधिकतम बीस हजार सायकल्स की ध्वनियों को ही सुन सकते हैं। जबकि कितने ही प्रकार की ध्वनियाँ ऐसी हैं जो कानों की पकड़ सीमा के बाहर हैं। घ्राणेन्द्रियाँ निश्चित प्रकार की गन्धों को ही अवग्रहण कर पाती हैं। जिह्वा की स्वाद अनुभूति सीमित हैं। इन इन्द्रियों की पकड़ सीमा से बाहर भी अगणित विषयों का अस्तित्व है जिनकी जानकारी इन्हें नहीं मिलती।

संसार एवं उसकी वस्तुएँ जो इन नेत्रों को दिखायी पड़ती हैं तीन आयामों के भीतर आती हैं। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई अथवा गहराई। इनसे बनी दुनिया ही दिखायी पड़ती अथवा अनुभव में आती है। वैज्ञानिकों ने दिक् और काल के रूप में एक चौथे आयाम का अस्तित्व खोज निकाला है। उन्होंने सम्भावना व्यक्त की है कि चार आयामों से बनी एक और दुनिया इसी संसार के भीतर हो सकती है जिसकी हमें कोई जानकारी नहीं रहती। उसके पदार्थ एवं जीवन दृश्य संसार से सर्वथा भिन्न गुण धर्म वाले हो सकते हैं। स्वर्ग नरक की, भूत-प्रेत, पितर आदि की गुत्थियाँ इस अदृश्य संसार के रहस्यों के खुलने से सुलझने की सम्भावना है।

अविज्ञात दुनिया की परिकल्पनाओं से दृश्य जगत में आये तथा उससे जुड़े तथ्यों की खोज-बीन करें तो भी विदित होता है कि हमारी जानकारियाँ उतनी सत्य नहीं हैं जितनी कि प्रायः हम समझते हैं। कितने ही विषयों के संदर्भ में तो अधिकाँश व्यक्ति भ्रामक और गलत मान्यताएँ पाले रहते हैं। समझते यह भी हैं कि जो भी कुछ उन्हें ज्ञात है वहीं समग्र है।

एक स्थान पर बैठे अधिकाँश व्यक्तियों को यह कल्पना भी नहीं होती कि वे पृथ्वी के साथ कितनी तीव्रगति से परिभ्रमण कर रहे हैं। अपनी धुरी पर पृथ्वी कितनी तेजी से घूम रही है? कितनी तीव्रगति से यह एक विशेष परिक्रमा कक्ष में सूर्य के चारों और चक्कर काट रही है? सौर मण्डल भी किस गति से अन्तरिक्ष में घूम रहा है? सामान्य व्यक्ति इन प्रश्नों पर विचार भी नहीं करते। उनकी मान्यता यह रहती है कि वे गतिहीन अवस्था में एक स्थान पर स्थिर बैठे हुए हैं। जबकि यथार्थता यह है कि हर व्यक्ति हर समय शरीर से गतिहीन रहते हुए अत्यन्त तीव्र गति से पृथ्वी के साथ परिभ्रमण कर रहा होता है।

प्राचीन युग की वह मान्यता कि हर गति निरपेक्ष होती है, आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त द्वारा भ्रमपूर्ण सिद्ध हो चुकी है। किसी भी वस्तु की निरपेक्ष गति सम्भव नहीं है। गति सदा सापेक्ष होती है। प्रख्यात खगोलविद् डा. जे. एलेन हाइनेख ‘साइन्स डाइजेस्ट’ पत्रिका के ‘वॉडीज इन मोशन’ लेख में लिखते हैं कि मध्य अक्षाँश पर रहने वाले लोग पृथ्वी के केन्द्र के चारों ओर सात सौ मील प्रति घण्टे की रफ्तार से घूम रहे हैं। जबकि विषुवत् रेखा पर रहने वाले, जो ग्रहों की परिभ्रमण धुरी से दूरी पर हैं, एक हजार मील प्रति घण्टा की तीव्र गति से घूम रहे हैं। ठीक उसी समय पृथ्वी की यात्रा भी जारी रहती है। वह साढ़े अठारह मील प्रति सेकेंड सूर्य के सापेक्ष घूम रही है। अर्थात् एक घण्टे में उसकी गति 1110 मील है। रेलगाड़ी के इंजन की तरह सूर्य अपने परिवार के सभी सदस्यों-पृथ्वी तथा ग्रहों को साथ लिए आकाश गंगा के केन्द्र के चारों ओर 150 मील प्रति सेकेंड अर्थात् 9000 मील प्रति घण्टे की गति से यात्रा कर रहा है।

आकाश गंगा कितनी तेजी से परिभ्रमण कर रही है, यदि इसे हम एक कास्मिक पड़ौसी-एन्ड्रोमेडा आकाश गंगा जो सबसे निकटवर्ती होते हुए भी अपनी आकाश गंगा से मात्र 20 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है वे केन्द्र से देख सकें तो मालूम होगा कि मन्दाकिनी (आकाश गंगा) का केन्द्र हम लोगों की ओर 50 मील प्रति सेकेंड अर्थात् 300 मील प्रति घण्टा से गतिशील है। यदि और भी दूर अवस्थित आकाश गंगाओं से पृथ्वी को देखें तो वह हमसे दूर लट्टू की तरह नाचती दिखाई देगी। अभी हाल में खोज हुए क्वासार-पी.के.एस. 2000-330, जो पृथ्वी से सबसे दूर 12 अरब प्रकाश वर्ष दूरी पर अवस्थित माना जा रहा है, से यदि देखें तो पृथ्वी एक आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय गति-1,65000 मील प्रति सेकेंड या 99,00000 मील प्रति घण्टे की गति से घूमती दिखाई देगी। पृथ्वी की यह गति प्रकाश की गति की 91.7 प्रतिशत है।

इस तरह हम देखते हैं कि हमारा शरीर कभी भी स्थिर अवस्था में नहीं है। एक आराम कुर्सी पर बैठा हुआ व्यक्ति कुर्सी के सापेक्ष तो स्थिर है, पर आकाश गंगा के केन्द्र के सापेक्ष 150 मील प्रति सेकेंड की रफ्तार से एक अविज्ञात जगत की यात्रा कर रहा है। एक घण्टे में वह दूरी 900 मील तथा 24 घण्टे में 216000 मील होती है। अर्थात् मात्र आकाश गंगा के सापेक्ष यदि दैनिक यात्रा का अनुमान लगायें तो हर व्यक्ति 216000 मील की दूरी घर बैठे तय कर लेता है। जिसकी प्रायः अधिकाँश व्यक्तियों को न तो कोई जानकारी रहती और न ही वे अधिकाँश कर पाते हैं।

इन्द्रियों के आधार पर तो दृश्य संसार की भी वास्तविक जानकारी नहीं मिल पाती। बुद्धि का क्षेत्र भी दृश्य जगत ही है। जो देखा और सुना गया है उसी के इर्द-गिर्द उसका चिन्तन घूमता है। इनमें प्राप्त अधूरे अपूर्ण और भ्रामक ज्ञान परोक्ष जगत को समझने में मदद नहीं कर सकता। आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व तो और भी सूक्ष्म हैं। उन्हें अगोचर कहा गया है। इन्द्रियों से प्राप्त भौतिक जानकारियों के सहारे उनके अस्तित्व एवं वैभव को समझना सम्भव नहीं। यथार्थता के बोध के लिए तो जानकारियों एवं मान्यताओं के बौने धरातल से ऊपर उठना होगा तथा आत्मिकी के सिद्धान्तों का अवलम्बन लेना होगा।


बहुत शराब पी (kahani)

उस दिन बादशाह ने बहुत शराब पी रखी थी। मदहोशी में वह गृहस्थों के घरों में घुसने लगा। साथ में वफादार नौकर था। उसने बढ़ने से रोका और घसीटता हुआ राजमहल ले आया। होश में आने पर दूसरे दिन दरबारियों ने उस नौकर की गुस्ताख़ी बताई और उसे सजा देने के लिए कहा। बादशाह ने उसे राज्य मन्त्री बना दिया और कहा-“वफादारी यह भी है कि मालिक को गलत रास्ते पर चलने से रोकें भी।”


“इन्द्रोः मायाभिः पुरुरूप ईयते”

तात्विक दृष्टि अपनाने एवं अध्यात्म दर्शन के लक्ष्यों पर ध्यान देने पर पता चलता है कि संसार में फैले हुए धर्म मतों में जो भी भिन्नता दृष्टिगोचर होती है, वह बाह्य है। लक्ष्य तो सबका एक ही है। धर्म के कुछ मूल-भूत सिद्धान्त ऐसे हैं जिन्हें कोई भी नकार नहीं सकता। वे शाश्वत हैं, सनातन हैं। अन्तर वहाँ पड़ता है जब उनका अर्थ अपने संदर्भ में अलग लगा लिया जाता है। सभी धर्म सम्प्रदायों के सिद्धान्तों की आचार संहिता में तो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप भिन्नता हो सकती है किन्तु उनके उद्देश्य-मन्तव्य में किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं हो सकता।

ईश्वर के अस्तित्व एवं कर्त्तव्य के प्रश्न को ही लें। ज्ञात होता हैं कि इस संदर्भ में सबकी मान्यताएँ एक जैसी नहीं हैं। एक सम्प्रदाय कहता है कि जगत्कर्त्ता ईश्वर है, जबकि दूसरा इनकार करता है। दोनों वादों पर ध्यान देने पर पता चलता है कि वस्तुतः भेद है नहीं। एक ही तथ्य को दो प्रकार से कहा भर गया है। ईश्वर को जगत् का सृष्टा मानने वाला कहता है कि यदि तुम पाप करोगे-अनीति का पथ अपनाओगे तो वह तुम्हें दण्ड देगा। तुम्हें इस कुमार्गगामिता के फलस्वरूप नरक में आना होगा। सदाचरण एवं नीति पर चलोगे तो परमात्मा प्रसन्न होगा। उसके अनुदान तुम पर बरसेंगे। वह लोक व परलोक दोनों ही श्रेष्ठ बनेंगे। परमात्मा को सृष्टि का सृजेता न मानने वाले धर्म मतावलम्बियों का कहना है कि तुम्हारे पापयुक्त कर्म बन्धन के कारण होंगे तथा वे अनेकों प्रकार के रोग-क्लेशों के रूप में दिखाई देंगे। अच्छे कार्यों की परिणति ही श्रेष्ठ जीवन एवं समुन्नत परिस्थितियों के रूप में होती है।

दोनों ही प्रकार की मान्यताओं की गहराई में जाने पर पता चलता है कि दोनों ही कर्मफल के सनातन सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं। अच्छे का फल अच्छा एवं बुरे का बुरा प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। इस मान्यता में कोई मतभेद नहीं। एक धर्म ईश्वर को जगत को सृष्टा मानकर जिस लक्ष्य की पूर्ति कराना चाहता है, दूसरा ईश्वर को सृष्टा न मानते हुए उसी लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यहाँ भिन्नता कहाँ हुई? भिन्नता तो मात्र सोचने के तरीके एवं लक्ष्य पूर्ति के साधनों में हुई। साधन साधन हैं, लक्ष्य नहीं। साधनों की भिन्नता देखकर एक धर्म को दूसरे का विरोधी मान बैठना भारी भूल है।

मानवी संरचना एवं मनोगत प्रकृति को दृष्टिगत रख चिन्तन करते हैं तो भी दोनों ही प्रकार की मान्यताएँ उपयोगी लगती है। मानवी प्रकृति दो रूपों में विभाजित है-एक भाव प्रधान, दूसरी बुद्धि प्रधान। जो भावनाशील हैं-जिनके हृदय में सम्वेदनाओं के लिए स्थान है उनके लिए ईश्वर का क्रिया वाला स्वरूप अधिक श्रेष्ठ एवं उपयोगी है। समर्पण की उदात्त भावना के कारण वे निश्चिन्त रहते हैं, उनमें कर्त्तव्य का अहंकार नहीं पैदा होता। इस सुदृढ़ अवलम्बन द्वारा वे अपने कृत्यों को परमात्मा में अर्पित करते हुए क्रमशः लक्ष्य की और बढ़ते चले जाते हैं। जबकि ईश्वर को प्रत्येक कार्य का कर्त्ता मानने वाले से परावलम्बन को बुद्धिजीवी समुदाय एक अभिशाप मानता है। इस नीति को छोड़ कर्त्तव्य साधना में निरत रहने को ही वे सच्चा पथ मानते हैं। नीति पर चलते व अनीति से बचते हुए वे क्रमशः लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। मानवी प्रकृति की भिन्नता के कारण दोनों ही मत अपने-अपने स्थान पर सही है।

परमात्मा को सृष्टि का कारण मानने एवं न मानने वाले दोनों ही मत पाप कर्म से बचने एवं पुण्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यह एक ऐसा सार्वभौम सिद्धान्त है जो सभी धर्मों में समान रूप से पाया जाता है। इस सिद्धान्त के पीछे एक ही लक्ष्य है-मानव मात्र को सुखी व श्रेष्ठ बनाना। यह कर्मफल के सिद्धान्त को अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। यदि यह अंकुश उठ जाय तो मनुष्य उच्छृंखल हो जायेगा। पाप-पुण्य के बीच की दीवार ही लुप्त हो जायेगी। न केवल आस्तिक वरन् नास्तिकों का भी यही कर्त्तव्य होना चाहिए-मानव मात्र सुखी एवं सन्तोष से भरा जीवनयापन करे। यह मात्र सदाचरण से ही सम्भव है। स्पष्ट है कि सभी धर्म मानव मात्र के कल्याण के लिए प्रयत्नशील हैं। अपने देशकाल एवं परिस्थितियों के अनुरूप वे सचेष्ट भी रहे हैं।

कलेवर नहीं विभिन्न धर्मों के अन्तरंग में झाँकने पर पता चलता है कि सबके सनातन सिद्धान्त प्रायः एक जैसे हैं। अज्ञान में पड़े रहने एवं साम्प्रदायिकता की दुराग्रह पूर्ण मान्यता के कारण ही भेद पनपता है। राम-कृष्ण परमहंस के विषय में प्रसंग प्रचलित है कि धर्म की साधना प्रणाली अपनायी थी। साधना की परिपक्व अवस्था में उन्होंने पाया कि सभी धर्म उसी एक सत्ता में ही जाकर मिलते हैं।

आलोचनात्मक दृष्ट छोड़कर यदि ग्रहण करने की प्रवृत्ति अपनायी जा सके तो ढूँढ़ने पर प्रत्येक धर्म में कुछ ऐसे उपयोगी तत्व मिल सकते हैं जो मानव मात्र के लिए कल्याणकारी हैं। यह समदृष्टि अपने एवं दूसरे धर्मों का आदर करने से ही सम्भव हो सकती है। इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए कि वर्तमान में पूर्णतया कल्याणकारी न सिद्ध होते हुए भी कोई धर्म पूर्णतया निरर्थक नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि जो तत्व निरर्थक नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि जो तत्व वर्तमान में निरुपयोगी दृष्टिगोचर हो रहे हैं, कभी उपयोगी रहे हों। कालान्तर में बदली हुई परिस्थितियों के कारण वे अब उतने लाभप्रद नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं।

प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय तभी जन कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है जब वह रूढ़ियों एवं अन्ध विश्वासों को अपने अन्दर से निकाल फेंके। यह धर्म को नये परिवेश में स्वस्थ स्वरूप देने से ही सम्भव हो सकेगा। पुरातन के नाम पर अनुपयोगी कर्मकाण्डों-क्रिया कृत्यों की लकीर पीटना अविवेकपूर्ण है। उनके स्थान पर उन तत्वों एवं प्रचलनों को अपनाया जाना चाहिए जो मानवी व्यक्तित्व के विकास में योगदान देते हैं। वस्तुतः धर्म तत्वदर्शन का वास्तविक लक्ष्य भी यही है।

सार्वभौम धर्म की स्थापना के लिए साम्प्रदायिकता की संकीर्ण परिधि से बाहर आना होगा। इसके लिए आवश्यक नहीं कि सभी धर्म सम्प्रदायों को तोड़कर एक नवीन धर्म खड़ा करने की बात सोची जाय। क्योंकि यह न तो सम्भव है और न ही उपयोगी। प्रत्येक समाज की अपनी अलग परिस्थितियाँ एवं आवश्यकताएँ है। इस कारण सबको एक स्वरूप प्रदान कर सकना सम्भव नहीं है। यदि यह किसी प्रकार सम्भव हो जाय तो भी व्यावहारिक दृष्टि से प्रचलन में ला पाना सम्भव नहीं हो पायेगा।

सार्वभौम सार्वजनिक अध्यात्म दर्शन तो प्रत्येक धर्म में से सर्वोपयोगी तत्वों के चयन से ही सम्भव हो सकेगा। इसके लिए प्रत्येक धर्म की सनातन विशेषताओं को ढूँढ़ना एवं संकलित करना होगा। प्रत्येक धर्म के शाश्वत एवं उपयोगी तत्वों को लेकर ही ऐसे विश्व धर्म की पृष्ठभूमि बन सकती है। इस दिशा में जितना शीघ्र प्रयास चल पड़े उतना ही श्रेयस्कर होगा।

एक दुःखी व्यक्ति किसी सिद्ध पुरुष के पास पहुँचा, और सारे दुःख दूर करने का वरदान माँगा। महात्मा ने कहा-“इसके लिए जो अनुष्ठान करना पड़ेगा, उसके लिए एक ऐसे व्यक्ति का कुर्ता चाहिए जिसे कोई दुःख न हो। वह व्यक्ति घर-घर घूमा पर कोई भी ऐसा न मिला।”

एक अलमस्त से पूछा तो उसने अपने को सर्वसुखी बताया। जब कुर्ता माँगा तो कहा-नंगे बदन रहता हूँ। कुर्ता रहा होता तो इतना सन्तोष कैसे रह पाता।

दुःखी व्यक्ति सिद्ध पुरुष के पास नहीं गया। घर लौट पड़ा। जब संसार दुःखी और साधनों के बिना भी सुखी रहा जा सकता है तो मैं क्यों निर्धन होने का दुःख मनाऊँ?


बिना सद्ज्ञान के अधूरा है भौतिक ज्ञान

सृष्टि की संरचना जड़ चेतन के संयोग से हुयी है। प्रकृति जड़ है पर उसमें जो गति है, शक्ति है उसका कारण चेतन तत्व है। चेतना की ही सर्वत्र हलचल है तथा जीवधारियों में जीवन तत्व ही विभिन्न रूपों में क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा है। विज्ञान जड़ प्रकृति की खोज करता है-नये-नये रहस्यों का उद्घाटन करता है। अध्यात्म का क्षेत्र चेतना है। उसकी खोज सृष्टि के आदि कारणों की ओर चलती है जबकि विज्ञान बाह्य जगत से अपना कार्य आरम्भ करता है। ज्ञान की दोनों ही धाराएँ यदि परस्पर पूरक बनकर कार्य करें तो सृष्टि के रहस्यों को-उसमें क्रियाशील चेतना को समझने में विशेष मदद मिल सकती है और साथ ही संसार की अगणित समस्याओं को सुलझाने में भी सहयोग मिल सकता है।

प्राचीन काल में ज्ञान की दोनों ही धाराएँ-तत्वज्ञान और भौतिक विज्ञान परस्पर सम्बद्ध थीं जिसे एक समग्र ज्ञान-अध्यात्म विज्ञान के नाम से जाना जाता था। ऋषिकाल में सब कुछ सन्तुलित-सुव्यवस्थित था। परिस्थितियाँ आज जैसी जटिल नहीं थी। न साधना की कमी थी और नहीं महान उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्तित्वों की। पर कालान्तर ज्ञान की दोनों ही धाराएँ एक-दूसरों से काटकर अलग हो गयी, अपनी ढपली आप बजाने लगी। अपना राग आप अलापने लगीं। इस विलगाव ने ही संसार में अगणित समस्याएँ पैदा की हैं।

ज्ञानी, तत्वज्ञानी और वैज्ञानिक मनीषी कहलाने का एकमात्र सौभाग्य मनुष्य को प्राप्त है परन्तु मनुष्य जाति के सभी सदस्य ज्ञानेन्द्रियों का साधनों का सम्यक् प्रयोग करते हुए भी वस्तुतः वैज्ञानिक नहीं है। लाखों में से कठिनता से दो चार निकलेंगे जिन्हें सही अर्थों में वैज्ञानिक कहा जा सकता है ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से कुछ अनुभूतियाँ प्राप्त कर लेने का नाम ज्ञान नहीं है नहीं दर्शनों के अनुशीलन का नाम दर्शन। ऋषि दार्शनिक वैज्ञानिक या तत्ववेत्ता वस्तुतः वही है जो सृष्टि के सौंदर्य से, उसके भीतर निहित गुह्य विद्या को जानने का प्रयास करे तथा कला व्यवस्था के निमित्त कारण-परम कलाकार-नियामक सत्ता से हमारा परिचय करायें। जिस सृष्टि में मनुष्य रहता है वह प्रत्येक आयाम में महान है। सृष्टि से भी महान वह कला है जो कि उसे सौंदर्य प्रदान करती है और इस कला से भी महान वह कलाकार है जिसने प्रकृति के उपादान तत्वों पर उस श्रेष्ठतम रचना की अभिव्यक्ति की है। वैज्ञानिक एवं ऋषि की आस्था इसी प्रकार की आस्तिकता में होती है। प्राचीन काल में ऋषि तथा आज के वैज्ञानिक इसी आस्था का अवलम्बन लेकर नये-नये रहस्यों का उद्घाटन करते आ रहे हैं।

ऋषियों और वैज्ञानिकों में समानता यह है कि दोनों की ही खोज जिज्ञासा से अभिप्रेरित होती रही है। एक पिण्ड और ब्रह्माण्ड के मूलतत्व की खोज करता है, तो दूसरा सृष्टि के रहस्यों के उद्घाटन में अपने को खपा देता है। वैज्ञानिक अपने सीमित साधनों एवं ज्ञान के सहारे सृष्टि के विशद् अध्ययन की यात्रा सम्पन्न करता है। सृष्टि भी उसकी तपस्या और आस्था पर मुग्ध होकर धीरे-धीरे अपने समस्त गुह्य रहस्यों को वैज्ञानिक के समक्ष अभिव्यक्त करने लगती है। हिरण्यमय पात्र से ढँका हुआ सत्य भी अपने सही रूप में अनावृत्त होकर वैज्ञानिक के सामने प्रकट होने लगता है। वैज्ञानिक जगत में जितने भी आविष्कार हुए हैं उनके पीछे विचित्र संयोग भी जुड़े हुए हैं। प्रकृति का किसी न किसी रूप में उनमें परोक्ष सहयोग रहा है। ऋषियों ने अपनी खोज भीतर से आरम्भ की। अपनी तपस्या तथा अविचल निष्ठा-आस्था द्वारा इन रहस्यों का साक्षात्कार किया। वे विज्ञान परम्परा के आदि-जनक थे। उसी ऋषि परम्परा में आज के वैज्ञानिक भी सृष्टि सम्बन्धी जिज्ञासाओं के समाधान में लगे हुए है।

विज्ञान के माध्यम से जो जानकारियाँ मिली है उनसे अणु और महान, सूक्ष्म और विराट् की दोनों ही दिशाओं में परमात्म सत्ता के विराट् भाव का कुछ आभास कराती है। परमाणु के सूक्ष्मतम स्वरूप की नयी-नयी जानकारियाँ मिलती जा रही हैं। एक बदलती है तो दूसरी मान्यता स्थानापन्न बनती है। सूक्ष्मता की ओर खोज जारी है। उसका अन्त कहाँ होगा, यह किसी को मालूम नहीं। विराट् की ओर अत्यधिक आधुनिक यन्त्रों के माध्यम से देखने का प्रयास किया गया। उस खोज का भी कोई सुनिश्चित अन्त दिखायी नहीं पड़ता। लगता है अगले दिनों विज्ञान को भी ऋषियों की भाँति उद्घोष करना पड़ेगा “अणोरणीयान् महतोमहीयान्।” “वह अणु से भी विराट् है, महान से भी महानतम है।”

समय के साथ विज्ञान की सूक्ष्मता अब अत्यन्त आगे बढ़ चुकी है। एक सेकेंड के समय मापन को अब बहुत स्थूल माना जाता है। ऐसे यन्त्र बन चुके हैं जिनसे एक सेकेंड के एक लाखवें भाग जैसे अल्पकाल को भी मापा जा सकता है। द्रव्य के ऐसे सूक्ष्म कणों की जानकारी मिल चुकी है जिनका जीवन काल 10-12 से 1030 सेकेंड की माप के बीच है-अर्थात् एक सेकेंड का वह सूक्ष्म भाग जिस पर 10 के अंक पर 20 से 30 बिन्दु तक होवें। एण्टी यूनीवर्स- एण्टी मैटर- एण्टी मैन की एक अति सूक्ष्म पर अत्यन्त सामर्थ्यवान दुनिया हाथ लगने वाली है।

खगोलशास्त्री धरती पर बैठे हुए सुदूर स्थित ग्रह नक्षत्रों की- ज्योति पिण्डों का परिचय प्राप्त कर रहे हैं। उनमें से कितने ऐसे हैं जिनका प्रकाश पृथ्वी पर आने में वर्षों लग जाते हैं वैज्ञानिक धरती की आयु अधिक से अधिक दो से चार अरब वर्ष मानते। पर ऐसे अगणित सृष्टि पिण्डों का परिचय मिला है जिनकी आयु खरबों वर्ष से भी अधिक हैं। अपने सौर मण्डल में एक सूर्य, एक चन्द्रमा है पर ऐसी सम्भावना है कि ब्रह्माण्ड में इनसे भी बड़े और प्रकाशवान अगणित सूर्य, चन्द्र जैसे पिण्ड मौजूद हैं।

पृथ्वी का द्रव्यमान दस अरब का 6600 गुना टन है। उस वजन की मात्र कल्पना की जा सकती है। सौर मण्डल के अन्य ग्रह हैं। सूर्य उनमें सबसे विशाल है। वह पृथ्वी के दस अरब गुणा 6600 अरब टन द्रव्यमान से भी 3,30000 गुणा भारी है। अपनी आकाश गंगा में कम से कम दस अरब सूर्य हैं जिनमें से औसतन प्रत्येक सूर्य का आकार एवं भार अपने सूर्य से अधिक है ज्योतिर्विदों का मत हैं कि इस आकाश गंगा जैसी कम से कम एक लाख आकाश गंगाएँ इस ब्रह्माण्ड में हैं उनमें अपनी पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा जैसे कितने पिण्ड होंगे, उनका कितना अधिक भार होगा, यह सोचकर ही मानव मन हतप्रभ हो जाता है और विराट् की एक झाँकी उसे दिखाई देने लगती है।

लेकिन इन्द्रियों और यन्त्रों की पकड़ में आने वाला यह गोचर-इन्द्रियातीत का क्षेत्र वृहद् हैं। पर एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। दृश्य जगत पर अदृश्य की प्रतिक्रियाएँ होती देखी जाती है। इससे अदृश्य जगत की सत्ता तथा उसकी सामर्थ्य का बोध होता है। उदाहरणार्थ एक्स किरणें आँखों को दिखायी नहीं पड़ती। अल्ट्रावायलेट, इन्फ्रारेज, कास्मिक रेज आदि की भी यही स्थिति है। पर जब वे अनुकूल पर्दों पर पड़ती है जो तो फ्लोरेन्स उत्पन्न करती हैं जो इन्द्रियगम्य हैं जिसे देखकर एक्सरे की प्रतीत होती है। विद्युत धारा दिखायी पड़ती पर उसका परिचय बल्ब जलने, पंखा चलने, हीटर के गरम होने आदि के रूप में होता है।

उल्लेखनीय बात यह भी है कि प्रत्यक्ष की तुलना में परोक्ष जगत अद्भुत और विलक्षण ही नहीं है। जैसे-जैसे परोक्ष से परिचय बढ़ेगा, नयी-नयी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हाथ आती जायेंगी। पर उनका सदुपयोग मानव तभी कर सकेगा जब उसमें सद्ज्ञान का सद्विवेक का प्रादुर्भाव होगा। ज्ञान के विस्तार से मनुष्य का कल्याण भी हो सकता है और विनाश का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है।

परमाणु बम भी बन सकते हैं और परमाणु संचालित ऊर्जा स्टेशन भी चल सकते हैं। पर ज्ञान पर विवेक का अंकुश लग जाने से दुरुपयोग की सम्भावना नहीं रहती। यह विवेक मानव मस्तिष्क में विद्यमान है जो विशुद्ध रूप से परमात्मा की देन है। विवेक ने ही सृजन की अगणित सम्भावनाओं को साकार किया है। उसके जागरण से ही मानव जाति का कल्याण होगा।

परिकल्पना तर्क पर आधारित हो तथा उनसे निकले निष्कर्ष युक्तियुक्त हों तो वे सर्वग्राही बन जाती हैं जिन्हें वैज्ञानिकों एवं दर्शन शास्त्रियों दोनों ही को स्वीकार करना पड़ता है। आइन्स्टीन की रिलेटिविटीथ्योरीलॉजिक की दृष्टि से खरी उतरती है। वैज्ञानिक विधि में सरफ्राँसिस बेकन का आगमनिक तर्क (इंडक्टिव लॉजिक) तथा अरस्तू का निगमनिक तर्क (डिडक्टिव लॉजिक) मान्यता प्राप्त है। ये उदाहरण बताते हैं कि हाइपोथीसिस बनाने हेतु कोई सशक्त आधार हो तो किसी विवेकशील को उसे स्वीकार करने में कोई अड़चन नहीं।

सिद्धान्त, मत या वाद भी वस्तुतः युक्तिपूर्ण परिकल्पनाएँ होती हैं जो निश्चित प्रकार के नियमों की व्याख्या करती हैं। वर्तमान भौतिक जगत के प्रमुख प्रचलित सिद्धान्त हैं-काइनेटिक मौलिक्यूलर थ्योरी, एटामिक थ्योरी, थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन, थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी, क्वाण्टम थ्योरी, थ्योरी ऑफ यूनीफिकेशन ऑफ फोर्सेस। विज्ञान क्रमशः नवीन खोजों एवं परिकल्पनाओं द्वारा व्यवस्थित ज्ञान की ओर बढ़ रहा है। पर उसका प्रयास एकाकी और अपूर्ण है। उसकी विचारधारा जड़वादी है। उसमें प्रेम, करुणा जैसी सम्वेदनाओं का कोई स्थान नहीं है। यही कारण संसार में विज्ञान के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ मानवी गरिमा को सार्थक करने वाली उच्चस्तरीय भावनाएँ भी कम होती जा रही है। “पेड़-पादपों की तरह जीवन का भी अन्त सुनिश्चित है, “भलाई-बुराई का कोई अर्थ नहीं है”, ये मान्यताएँ बनी रही तो किसी दिन कोई सिर-फिरा घातक परमाणु बमों से इस खूबसूरत संसार को यह सोचकर नष्ट भी कर सकता है कि एक न एक दिन तो समस्त जीवधारियों का अवसान होना ही है तो इस कृत्य में हर्ज ही क्या है।

विज्ञान की उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण है। उसकी खोजें भी अद्वितीय हैं। पर उसकी सीमाएँ हैं। जड़ प्रकृति के सीमित रहस्यों को ही वह जान सकता है पर उसकी चमत्कारी सामर्थ्य की व्याख्या करने में वह असमर्थ है। विज्ञान यह बता सकने में अक्षम है कि ग्रह-नक्षत्र, आकाश गंगा आदि की सुव्यवस्थित गति का कारण क्या है। वह ‘क्या’ की व्याख्या कर सकता हैं, ‘क्यों’ की नहीं। विज्ञान यह तो बता सकता है कि भौतिक सृष्टि कैसे बनती है, विभीषिकाएँ कैसे आती हैं पर यह नहीं बता सकता है कि द्रव्य और ऊर्जा कहाँ से आए तथा विश्व की रचना इतनी सुव्यवस्थित कैसे हो गयी। निश्चित ही इन प्रश्नों का हल भौतिक विज्ञान के आधार पर नहीं पाया जा सकता।

स्टैनफोर्ड विश्व विद्यालय के बायोफिजीक्स के प्रोफेसर पाल क्लेरेंस एवरसोल्ड अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि “अपने वैज्ञानिक अध्ययन काल के आरम्भ में वैज्ञानिक तर्कों एवं प्रणाली से मैं इतना मुग्ध हो गया था कि मुझे विश्वास हो चला था कि वैज्ञानिक विश्व की प्रत्येक घटना की व्याख्या कर सकते हैं। किन्तु ज्यों-ज्यों अध्ययन की गहराई में पहुँचता गया, उतनी ही निराशा होती गयी। मुझे अपनी मान्यता बदलनी पड़ी तथा यह मानना पड़ा कि विज्ञान के द्वारा कुछ घटनाओं की ही व्याख्या की जा सकती है। मेरा सुनिश्चित विश्वास है अध्यात्म विज्ञान का अवलम्बन लिए बिना सृष्टि की अगणित पहेलियों को सुलझ पाना सम्भव नहीं।”

खोज की गहराइयों में विज्ञान जैसे-जैसे उतर रहा है उसी अनुपात में उलझता भी जा रहा है। स्थूल की तुलना में सूक्ष्म जगत उसे और भी विस्मित कर रहा है। उसे अनुभव हो चला है कि खोज के प्रयास एकांगी और अधूरे हैं। यह स्थिति निश्चित ही उसे अध्यात्म की शाश्वत आधारों को अपनाने को विवश करेगी, ऐसा विश्वास सुनिश्चित किया जा सकता है।


कर्मयोग के उपासक-आराधक

विधाता ने जय-विजय को धरती पर यह तलाश करने के लिए भेजा कि इस वर्ष किसे स्वर्ग में सम्मान प्रवेश दिया जाय।

दोनों दूत सर्वत्र घूमते फिरे और सज्जनों, भक्तजनों का लेखा-जोखा नोट करते रहें।

इस बीच उन्होंने एक अन्धा वृद्धजन देखा जो रास्ते के किनारे दीपक जलाये बैठा था। देवदूतों ने वृद्ध से पूछा, ‘घर से दूर आंखें न होते हुए, दीपक जलाना और रात भर जागना, कुछ समझ में नहीं आया।

वृद्ध ने कहा-जो किया जाय वह अपने लिए हो, यह क्या जरूरी है। संसार के अन्य लोग भी तो अपने ही हैं रात्रि को निकलने वालों को ठोकर लगने से बचाकर मुझे ही सन्तोष और आनन्द मिलता है। स्वार्थरत रहने की तुलना में यह लाभ क्या कम है।

देवदूत पर्यवेक्षण करके वापस लौटे और सारे विवरण सुनाये, तो सर्वश्रेष्ठ वह अन्धा ही निकला। देवता अपने कन्धों पर पालकी से उसे स्वर्ग लाये और पुण्यात्माओं में वरिष्ठों को दिया जाने वाले स्थान पर कर्मयोग के उस उपासक को रखा गया।

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खलीफा उमर, छत पर बैठे थे। आसमान पर नजर डाली तो एक फरिश्ता मोटी किताब बगल में दबाये ऊपर उड़ता नजर आया।

खलीफा ने प्रार्थना की और वह जमीन पर उतर आया। पूछा-इस मोटी किताब में क्या लिखा है। उत्तर मिला उसमें खुदा के उन बन्दों के नाम हैं जो इबादत करते हैं।

खलीफा की उत्सुकता मिटाने के लिए फरिश्ते ने सभी सुना दिये। उनमें खलीफा का नाम नहीं था। वे उदास रहने लगे। उनकी इबादत इस लायक क्यों समझी गई।

एक दिन फिर आसमान पर उड़ता एक दूसरा फरिश्ता, खलीफा ने देखा। इसकी बगल में छोटी किताब थी। अबकी बार भी वैसी ही उत्सुकता उभरी और विनयपूर्वक उसे नीचे उतरने के लिए रजामन्द कर लिया।

छोटी किताब में क्या लिखा है? पूछने पर फरिश्ते ने कहा-इसमें उन लोगों के नाम हैं जिनकी इबादत खुदा बन्द करीम खुद करते हैं। आश्चर्यचकित खलीफा ने पूछा-क्या ऐसे भी भाग्यशाली लोग संसार में हैं जिनकी इबादत खुदा को करनी पड़ती है। फरिश्ते ने कहा, “क्यों नहीं, जो उनका काम करने में दिन-रात लगे रहते हैं उनकी रखवाली ही नहीं कृतज्ञता पूर्वक इबादत भी खुदा करते हैं।”

पुस्तक में थोड़े से ही नाम थे। फरिश्ते ने सुना दिये उनमें खलीफा उमर का नाम पहला था।

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रात्रि के समय कोई सन्त कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक कुत्ता मिला और भौंकने लगा।

सन्त ने कहा मूर्ख अकारण क्यों चिल्लाता है। इससे तो सोने वालों की नींद टूटती है। राहगीरों की मंजिल खोटी होती है और तुझे बदनामी मिलती है।

कुत्ते ने सन्त को नमन किया और कहा भगवन् मेरी दृष्टि आपसे भिन्न हैं। चोरों की घात न लगे इसलिये गृह स्वामियों को जागरुक रखता हूँ। राहगीरों से कहता है और सन्तों पर तब भूँकता हूँ जब वे विचित्र वेश बनाकर निकलते हैं। इस वर्जना के साथ मेरा अनुरोध जुड़ा रहता है कि यदि वे साधारण नागरिक जैसे कपड़े पहनते, आचरण में साधुता का परिचय देते और कर्त्तव्य पारायण ही बने रहते तो क्या बुरा था?


पत्तों को नहीं, जड़ों को सींचा जाय

मानवी व्यक्तित्व को तीन घटकों में विभाजित किया जा सकता है-शरीर, मन और आत्मा। शरीर की भूमिका दैनन्दिन जीवन में प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती है। मन के क्रिया-कलाप इच्छाओं, आकाँक्षाओं, कल्पनाओं के रूप में अनुभव में आते हैं। सबसे सूक्ष्मतम परत आत्मा की है जो इन्द्रियों से न तो दिखायी पड़ती और न ही उसकी सत्ता पकड़ में आती है। प्रत्यक्ष अनुभव में न आने पर भी उसकी चैतन्य प्रेरणाओं को एक सबसे अधिक सामर्थ्यवान शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। मन की घुड़-दौड़ तथा शरीर की हलचल भी प्रकारान्तर से उसी अजस्र शक्ति स्त्रोत की सामर्थ्य से अभिप्रेरित है।

मनुष्य के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जबकि तीनों ही घटक अपने-अपने अनुरूप पोषण प्राप्त करें। उनकी देख-रेख-सुधार-सम्भाल एवं विकास पर सन्तुलित ध्यान दिया जाय।

वैज्ञानिक अनुसन्धानों की एक विडम्बना यह रही कि वे शरीर के इर्द-गिर्द तथा उससे जुड़े साधनों के आविष्कार में ही घूमते रहते हैं। लाभ यह हुआ है कि अधिकतम चिकित्सा एवं सुविधा साधन जुटने से मनुष्य की औसत आयु बढ़ी है पर उसी अनुपात में उसकी जीवनी शक्ति कम हुई तथा मनःस्थिति विकृत हुई है। संसार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो शरीर से समर्थ हैं, युवा हैं पर मानसिक दृष्टि से उन वृद्धों के समान है और न ही उमँग। शरीर से जीवित पर आत्म गरिमा से वंचित मरे हुओं की संख्या करोड़ों में है। मन के रुग्ण-असन्तुलित रहने तथा आत्म-सत्ता के उपेक्षा के गर्त्त में पड़े रहने का ही परिणाम है कि संसार में मरघट के पिशाचों की भाँति जलते रहने वालों की बिरादरी अब दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

दृष्टिकोण का शरीर तक परिसीमित रह जाने का ही यह दुष्परिणाम है कि अंगों की टूट-फूट, चिकित्सा आदि पर जितना ध्यान दिया एवं पैसा खर्च किया जा रहा है, वह आश्चर्यजनक है। चिकित्सा विज्ञान की अंग प्रत्यारोपण की विधा विकसित हो जाने से कोई भी व्यक्ति अपनी अपंगता अथवा इन्द्रियों की विकृतियों को उनके सहयोग से दूर कर सकता है।

संसार के मूर्धन्य वैज्ञानिक जीवशास्त्री तथा रसायनविद् विभिन्न प्रयोगशालाओं में ‘बायोनिक मैन’ के निर्माण एवं विकास के लिए प्रयत्नशील हैं। इस कार्य में तो सफलता नहीं मिल पाई है पर कुछ ढर्रे के कार्यों के लिए आविष्कृत यन्त्र मनुष्य के स्थानापन्न बन चुके हैं। मानव शरीर के जीवित सक्रिय अंगों के क्षतिग्रस्त होने पर दूसरे कृत्रिम अंगों के प्रत्यारोपण में न्यूनाधिक रूप से सफलता मिलने लगी है।

बीसवीं सदी के आरम्भ में कृत्रिम पैर, बाजू, दाँत तथा दृष्टिकोण को दूर करने वाले सहयोगी यन्त्र बनने लगे थे। कृत्रिम गुर्दे तथा “हार्ट बाय-पास” मशीन का विकास क्रमशः 1940 तथा 1950 में हुआ जिससे प्रेरणा लेकर 1955 में “अमेरिकन सोसायटी फॉर आर्टीफिशियल इण्टरनल आर्गन्स” संस्था बनी। पिछले एक दशक में जापान तथा अन्य यूरोपीय देशों में ऐसी कितनी ही संस्थाओं का गठन हो चुका है जो ‘बायो इंजीनियरिंग’ के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। इस क्षेत्र में तीव्र विकास का एक प्रमुख कारण है ‘इलेक्ट्रानिक्स’ ‘कम्प्यूटर साइन्स’, ‘पदार्थ विज्ञान’ तथा रसायन शास्त्र की स्तुत्य उपलब्धियों का योगदान। इन क्षेत्रों की उपलब्धियों ने विभिन्न प्रकार के कृत्रिम अंगों के निर्माण एवं उनके प्रत्यारोपण का कार्य अत्यन्त सुगम बना दिया है। बायो इंजीनियरिंग के शोध कार्य में पदार्थ विज्ञान, शरीर विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, भौतिकी के विशेषज्ञ अब परस्पर सहयोग से कार्य कर रहे हैं तथा मानव को अधिकतम सुविधाएँ दे सकने में सफल हुए हैं।

कोलम्बिया विश्व-विद्यालय के कृत्रिम अंग विभाग के डायरेक्टर विलियम डोवले ने कृत्रिम नेत्र योजना का कार्य अपने हाथों में लिया है। वे शरीर विज्ञान विशेषज्ञ हैं। बायो इंजीनियरिंग में प्रवीण विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के सहयोग से वे कृत्रिम नेत्रों का निर्माण करते हैं। “माइक्रोसरकिट लैबोरेटरी ऑफ यूटाह यूनिवर्सिटी” के भौतिकविदों द्वारा आविष्कृत कृत्रिम नेत्र की प्रणाली का वे उपयोग करते हैं। इन्हें न्यूरोसर्जन के माध्यम से यूनाइटेड स्टेटस् तथा कनाडा के विभिन्न मेडिकल सेन्टरों अन्धों में प्रत्यारोपित किया जाता है। वैज्ञानिकों के इस दल द्वारा आविष्कृत कृत्रिम नेत्र मस्तिष्क के दृश्य कार्टेक्स के संवेदनशील केन्द्रों पर सीधे विद्युत अभिप्रेरणा सिद्धान्त के आधार पर कार्य करते हैं।

कान एवं नेत्र क्रिया प्रणाली की दृष्टि से एक दूसरे के अधिक निकट हैं। इन विशेषज्ञों द्वारा यह प्रयास चल रहा है कि कृत्रिम आँख, नाक तथा कान को एक ही प्रणाली में एक साथ विकसित किया जाय। क्योंकि इनमें पारस्परिक संबंध है। अनुमानतः कृत्रिम आँखों के प्रत्यारोपण का खर्च एक व्यक्ति पर दस लाख रुपयों से भी ऊपर आता है। कार्निया बैंक में दान दिये गये नेत्रों की कीमत कम पड़ती है। पर यदि उन्हें बाजार भाव से खरीदना पड़े तो सामान्य व्यक्ति के लिए खरीद सकना तो असम्भव ही होगा।

कृत्रिम गुर्दे अथवा डायलसिस मशीनों का प्रयोग पिछले पैंतीस वर्षों से हो रहा है। सन् 1978 में 39000 अमरीकी रोगियों ने डायलिसिस के माध्यम से नव जीवन प्राप्त किया। गुर्दे के रोगी यदि कृत्रिम गुर्दे लगवाने पड़ें तो एक गुर्दे का न्यूनतम खर्च पन्द्रह लाख रुपये से कम नहीं आयेगा। जो अपने गुर्दे दूसरों को दान दे देता है वह पैसे की दृष्टि से कम से कम उपरोक्त राशि का नकद सहयोग देता है। जिससे जीवन दान मिला, उस उपलब्धि की कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती।

अनेकों प्रयत्नों के बावजूद भी कृत्रिम लीवर का निर्माण कर सकना सम्भव नहीं हो सका है। एक स्वस्थ लीवन द्वारा अनेकों प्रकार के विजातीय विषाक्त पदार्थों का निष्कासन रक्त से होता है। बुरी आदतों अथवा नशेबाजी के कारण जब दूषित पदार्थ अत्यधिक मात्रा में जमा हो जाते हैं तो लीवर क्षतिग्रस्त हो जाता है तथा काम करना बन्द कर देता है। इस अवरोध को दूर करने के लिए विषाक्तता परिशोधन हेतु कितने ही प्रयास किये गये पर सफलता अत्यल्प ही मिल पायी है। जितनी सफलता मिली है उसमें एक खतरा यह बना रहता है कि रक्त परिशोधन में कहीं वे विषाक्त पदार्थ रक्त प्रवाह में पहुँचकर पूरे रक्त को ही दूषित न कर दें। इसका एक समाधान शरीर विज्ञानियों ने यह निकाला है कि ऐसी स्थिति में आने के पूर्व ही पूरे रक्त से प्लाज्मा को अलग कर दिया जाय तथा शुद्ध रक्त के प्लाज्मा को इन्जेक्ट कर दिया जाय जो कि अत्यन्त महंगा तथा कष्टसाध्य विकल्प है।

अग्न्याशय (पैन्क्रियाज) से उपयुक्त मात्रा में इन्सुलिन उत्पादन न होने से मधुमेह रोग उत्पन्न होता है अनुमानतः संसार की पाँच प्रतिशत आबादी इस रोग से पीड़ित है। लगभग तीस प्रतिशत अमरीकी तथा संसार की एक प्रतिशत जनसंख्या अग्नाशय के कैन्सर से पीड़ित हैं जिसमें से अधिकाँश को तो जीवन पर्यन्त अपने भयंकर रोग की जानकारी भी नहीं मिल पाती। मधुमेह के मरीजों के लिए उपचार यह है कि विशिष्ट मर्यादाओं का पालन करते हुए उचित परिणाम में इन्सुलिन की मात्रा ग्रहण करते हैं। बायो इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों ने कृत्रिम अग्नाशय के विकास के लिए प्रयास किया है ताकि स्वसंचालित यान्त्रिक प्रक्रिया से रक्त के लिए आवश्यक परिणाम में इन्सुलिन का उत्पादन होता रहे। सम्बन्धित संवेदनशील यन्त्र एक ग्लुकोज सेन्सर, एक पम्प तथा इन्सुलिन वितरण नलिका से युक्त होता है। यह यन्त्र थोड़े समय तक कार्य करने में सक्षम हो सकता है पर लम्बे समय तक प्रयुक्त नहीं हो सकता। साथ ही इसके लिए करोड़ों रुपये की जरूरत भी पड़ती है जो मरीज वहन नहीं कर सकता।

विगत कुछ दशकों में प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में भी असाधारण प्रगति हुई है। उसकी मदद से कोई भी व्यक्ति अपनी बदसूरती तक को मिटाने में सफल हो सकता है। प्लास्टिक सर्जरी में आरोपण योग्य पदार्थ के रूप में सिलीकॉन युक्त रबर का प्रयोग सफलतापूर्वक किया जाता है। यही ऐसा पदार्थ हैं जो शरीर के विभिन्न तरल पदार्थों के प्रति प्रायः अक्रियाशील रहता है। पर कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहाँ उसका प्रयोग वर्जित है। उदाहरणार्थ कृत्रिम यूरेटर्स, तथा मूत्राशयों में यदि सिलीकॉन पदार्थ का प्रयोग किया जाय तो वह उनके कैल्शियम साल्ट को सिलीकॉन रबर की दीवारों पर अवक्षेपित कर देता है जो कितने ही नये प्रकार के खतरों को जन्म देता है। इस खतरे से बचने के लिए वैज्ञानिकों ने कितने ही अस्थायी कृत्रिम विकल्प प्रस्तुत किये हैं जिनका प्रयोग विभिन्न देशों में चल पड़ा है। हृदय के वाल्वों (कपाटों) के विकृत हो जाने पर कृत्रिम प्लास्टिक की गेंद जो तार के घेरे में फँसी गोलाकृति होती है, के प्रत्यारोपण में भी सफलता मिल चुकी है।

रक्त परिवहन संस्थान की शरीर क्रिया प्रणाली को सुचारु रूप में चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक सदी पूर्व तक लाखों व्यक्ति रक्त परिवहन संस्थान से जुड़े रोगों से अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे। पर कृत्रिम “हार्ट-लंग बाइपास” मशीन के निर्माण एवं विकास से अगणितों को जीवनदान मिला है। बीसवीं सदी के इन महत्वपूर्ण आविष्कारों से न केवल खुले तौर पर हृदय की शल्य-चिकित्सा में मदद मिली है बल्कि इस संस्थान की अनेकों समस्याओं को दूर करने में आशातीत सफलता प्राप्त हुई है। संसार में आज लाखों व्यक्तियों में कृत्रिम वाल्वों का सफल प्रत्यारोपण हो चुका है। अब तो पूर्णतः सफल प्रत्यारोपण किसी व्यक्ति द्वारा दान में दिए गये हृदय का ही नहीं बनाए गए कृत्रिम हाथ और पैरों का भी होने लगा है, जिनकी मदद से वे अपना दैनन्दिन कार्य आसानी से चला सकते हैं।

अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में ही नहीं अगणित रोगों के उपचार में चिकित्सा विज्ञान तथा जैव इंजीनियरिंग की मिली सफलताएँ आश्चर्यजनक हैं। वैज्ञानिक प्रशंसा के पात्र हैं जिनने अपनी साधना से असंख्यों व्यक्तियों को जीवनदान दिया है। पर अनुसंधान की इस शृंखला में कुछ महत्वपूर्ण कड़ियाँ और भी जोड़नी होंगी। अंगों की टूट-फूट, रुग्णता की भाँति मन भी विघटित होता है-व्याधियों से घिरता है। अन्तःक्षेत्र जो आत्मा की क्रीड़ा स्थली है, की परत और भी गहरी है। असन्तुलन इस क्षेत्र में भी पैदा होता है। शरीर की तुलना में उपचार इनका होना और भी आवश्यक है। अन्यथा शरीर को स्वस्थ, सन्तुलित एवं सुगठित रखने के वे प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हो सकेंगे। शरीर का संचालन मन और अन्तःकरण के हाथों में है। वे विक्षुब्ध रहेंगे तो प्रभावित अन्ततः शरीर भी होगा। अगणित प्रकार के नये रोग पैदा होंगे।

आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्तित्व के अति महत्वपूर्ण घटकों की उपेक्षा न की जाय। धन, जन, प्रतिभा, समय का जितना अंश शरीर से जुड़े अनुसन्धान कार्यों में नियोजित हो रहा है, उतना ही मन और आत्मा की परतों की खोज-बीन में प्रयुक्त है। उनकी भी साज, सम्भाल उपचार एवं विकास की शरीर की तरह ही आवश्यकता है। यह सम्भव हो सके तो इसी काया में एक नये महामानव का जन्म हो सकता है जिसकी आज जरूरत है।


पुस्तक को पढ़ने में तन्मय (kahani)

एक अध्ययनशील किसी पुस्तक को पढ़ने में तन्मय था। किसी कारीगर ने पूछा-क्या पढ़ रहे हों। विद्वान झल्लाया-तुम जैसे मूर्ख, दार्शनिक के विषय के बारे में क्या जान सकते हैं।

कारीगर ने हँसकर कहा-बिना बताये ही मैंने समझ लिया कि यह ज्योतिष का ग्रन्थ है। अन्यथा आपको मेरे मूर्ख होने का पता कैसे चलता। इस पर विद्वान खीझा और बोला-नहीं यह व्यवहार शास्त्र का ग्रन्थ है।

कारीगर की हँसी न रुकी-तभी तो आपका व्यवहार इतना उत्तम है कि बात करने तक में चिढ़ते और झगड़ते हैं।


विकलाँगता प्रगति में बाधक न बन सकी

प्रकृति ने जन्मजात अपंग पैदा करके उस बालक के साथ निर्मम अत्याचार किया था। पर वह उन अपंगों से भिन्न था जो अपनी दयनीय स्थिति से सदा के लिए निराश होकर आशाजनक उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करना तक छोड़ देते हैं। छः सात वर्ष की अवस्था में वह बच्चों को पढ़ाने के लिए घर से होकर गुजरने वाली सड़क से आते-जाते देखता तो उसका मासूम हृदय बिलख-बिलख कर रोने लगता। वह भी अन्य बालकों की तरह पढ़ना चाहता था पर अपनी बेबसी पर मन-मसोस कर रह जाता। अपंगता की हालत में स्कूल कैसे जायेगा, उसे कौन पढ़ायेगा, यह सोचकर उसकी आन्तरिक इच्छा दबकर रह जाती।

निकटवर्ती विद्यालय के एक अध्यापक नित्य ही पढ़ाने के लिए उसी मार्ग से आते-जाते थे। बालक उन्हें जानता था। एक दिन जैसे ही अध्यापक महोदय उधर से गुजरे, छोटे बच्चे ने उनका अभिवादन किया। सड़क के किनारे बैठा देखकर उनने पूछा-कहो बेटे! चुपचाप यहाँ क्यों बैठे हो? सहानुभूति का सम्बल मिल जाने से उसके उद्गार फूट पड़े-“श्रीमान! मेरा मन पढ़ने को बहुत करता है। पर मुझे कौन पढ़ायेगा?

उस मासूम की बातों से अध्यापक महोदय का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने आश्वासन दिया कि अगले दिन से वह तैयार रहे, वे स्वयं उसे पढ़ायेंगे। दूसरे दिन से शिक्षक महोदय बालक को कन्धे पर बिठाकर विद्यालय ले जाते। वह दूसरे लड़कों के साथ पढ़ता तथा शाम को पुनः उनके सहयोग से घर आ जाता। अध्यापक एवं शिक्षक के भावभरे सहयोग से बालक का आरम्भिक शिक्षण पूरा हुआ।

संसार में दुष्टों की कमी नहीं है पर सज्जनों एवं सहृदयता के धनी व्यक्तियों का भी सर्वथा लोप नहीं हुआ है। उनके कारण ही मनुष्यता जीवित है। समय-समय पर ऐसे सहृदय व्यक्तियों का सहयोग भी मिलता है। कुछ ऐसा ही सुयोग उस अपंग बालक के साथ बिठा। दिल्ली के इरविन अस्पताल के एक डॉक्टर दम्पत्ति नैनीताल के भीमताल में छुट्टियाँ बिताने आये। नौ कुचिया ताल के निकट उनकी दृष्टि इस अपंग बालक पर पड़ी। जाने कौन-सी प्रेरणा उठी कि उस बालक के परीक्षण करने से डॉक्टर अपने को नहीं रोक सके। निरीक्षण में उन्होंने पाया कि शल्य चिकित्सा के द्वारा बच्चे को चलने योग्य बनाया जा सकता है। उन्होंने बालक एवं उसके अभिभावक से बातचीत की। स्वयं सब खर्च वहन करके डॉ. कोहली ने इरविन अस्पताल में रखकर बालक का उपचार आरम्भ किया। दर्जनों आपरेशन हुए जिसके फलस्वरूप बालक लाठियों के सहारे चलने-फिरने योग्य हो गया।

आकस्मिक इस सहयोग को परमात्मा की कृपा मानकर वह किशोर पुनः पढ़ाई में जुट गया। गाँव के निकटवर्ती इंटर कॉलेज में दाखिला लेकर उसने आगे की पढ़ाई आरम्भ कर दी। इण्टर परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् नैनीताल के एक कॉलेज में प्रवेश लिया। पढ़ने के लिए वह नित्य डेढ़ किलोमीटर पहाड़ी-ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पार करके आता जाता। बी.ए. करने के बाद अर्थशास्त्र में उसने मास्टर डिग्री प्राप्त की। अब वह नैनीताल के प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान में एक कर्मचारी के रूप में कार्यरत है।

परिस्थितियों का-अभावों का रोना रोते रहने वाले लोगों को इस युवक से प्रेरणा लेनी चाहिए तथा बारम्बार यह विचार करना चाहिए कि क्या उनकी स्थिति सचमुच ही इतनी दयनीय गयी-गुजरी है कि वे आगे बढ़ने के लिए कुछ नहीं कर सकते। शरीर एवं बुद्धि से सक्षम होने पर भी जो ऐसा सोचते अथवा कहते हैं स्वाभाविक रूप से उनकी नियत पर शक होता है। आन्तरिक आकाँक्षा हो तो आगे बढ़ने तथा ऊँचे उठने के लिए हजार रास्ते निकल सकते हैं पर जिनने हार मान ली उनके लिए सचमुच ही प्रगति के रास्ते बन्द हैं। उनको दयनीय स्थिति से कोई देवता भी नहीं उतार सकता।


साहस ही सफलता के लक्ष्य तक पहुँचता है।

जीवन की महत्वपूर्ण विभूतियों में एक साहस भी है। इसे शरीर बल, मनोबल, धनबल की तुलना में भी प्रगतिशीलता एवं सफलता के लिए अधिक आवश्यक माना गया है। डरपोक प्रकृति के, कायर, भयभीत, आशंकाग्रस्त व्यक्ति अवसर रहने पर भी असमंजस की स्थिति में पड़े रहते हैं और लाभ हानि की जोड़-बाकी करते कराते ऐसे ही दिन गुजारते रहते हैं। कभी एक कदम आगे बढ़ने की हिम्मत हुई तो दूसरे ही क्षण दो कदम पीछे हटने की सूझती है। जबकि साहसी व्यक्ति आत्मविश्वासपूर्वक आगे बढ़ते हैं और खतरों से खेलते हुए नाव को भँवर वाली नदी पार करते हुए इस पार से उस पार तक धकेल ले जाते हैं। ऐसे प्रसंगों में उसका सच्चा साथी और सहायक एकमात्र साहस ही होता है। इसकी कमी न पड़े तो कठिनाई को परास्त करने से लेकर आवश्यक साधन और सहयोग जुटाने की बात भी किसी न किसी प्रकार बनती ही चलती है।

अपराधों और कुकर्मों के लिए अपनाया गया दुस्साहस ही दानवी कहा और भर्त्सना से लेकर आक्रोश अपनाकर कमर तोड़ देने योग्य माना गया है। मर्यादाओं का व्यतिक्रम करने वाले दुष्ट दुरात्मा जिस आततायी आतंक का सहारा लेते हैं उसमें भी साहस का पुट तो रहता है, पर अनीति के साथ जुड़ जाने से उसे दुष्ट दानवी कहा जाता है। यह ऐसे दुरुपयोग की बात हुई जिसमें अमृत भी विष बन जाता है।

सामान्यतः सत्प्रयोजनों को अपनाने संकल्प को बल देने वाले साहस की अनिवार्यतः आवश्यकता पड़ती है। पानी नीचे की ओर बहता है। उसे कुएँ से ऊपर खींचना हो तो अतिरिक्त बल लगाना पड़ता है। इस अतिरिक्त बल को सत्साहस ही कहना चाहिए जिसके बल पर कठिनाइयों, अवरोधों तक से जूझ सकना सम्भव हो पाता है। प्रगति के लिए पुराने ढर्रे को तोड़ना और नये को अपनाना पड़ता है। इस परिवर्तन को बिना अनख-आलस्य के सम्पन्न कर सकना सत्साहस का ही काम है। यही वह ऊर्जा है, जिसके सहारे उत्कृष्टता की दिशा में जीवन चक्र को अग्रगामी कर सकना बन पड़ता है।

कितने सामान्यों ने आश्चर्यचकित करने वाले-जोखिम भरे काम इसी के सहारे कर दिखाये। समुद्र लाँघने में इसी का अवलम्बन देकर हनुमान ने छलाँग लगाई और एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया। पार होने न होने के असमंजस में उधेड़बुन करने की स्थिति जामवन्त के प्रोत्साहन से दूर हुई तो फिर असम्भव समझी जाने वाली बात सम्भव हो गई। वीर हम्मीर चौदह वर्ष की आयु में विकराल युद्ध मोर्चे पर स्वेच्छापूर्वक लड़ने के लिए पहुँचा था। अभिमन्यु जब चक्र-व्यूह बेधने चले तब उनकी आयु भी लगभग इतनी ही थी। चौरासी घावों से जर्जर राणा साँगा मर्मवेधी पीड़ा की परवाह न करके शरीर में प्राण रहते लड़ते ही रहे, पीछे हटने का नाम भी नहीं लिया। शरशैय्या पर पड़े भीष्म पितामह की तरह वे भी साहस के बल पर ही एक ओर वेदना तो दूसरी ओर कर्त्तव्य निष्ठा के साथ जूझते रहे। दुराचारी कीचक को अपने संबंधियों का समर्थन भी प्राप्त था। एकाकी प्रवास में निहत्थे भीम उससे भिड़ गए और अनाचारी का कचूमर निकाल कर ही पीछे हटे।

चित्तौड़ की आत्मदाह करने वाली सती रानियों का जौहर विश्व विख्यात है। हाड़ा रानी ने मोहग्रस्त पति को मोर्चे पर जाने के लिए अपना सिर काटकर ही उसके सामने रख दिया था। रानी दुर्गावती ने समर्थ आततायी को किस प्रकार नीचा दिखाया, इन प्रसंगों की चर्चा सत्साहस के इतिहास लेखक अनन्त काल तक करते रहेंगे। लक्ष्मीबाई रानी का नगण्य से साधनों की परवाह न करते हुए अनेक गुनी सामर्थ्य के धनी अंग्रेजों से किस प्रकार लड़ी। टूटी पर झुकी नहीं। इस पराक्रम की यश गाथा लिखने-लिखाने में एकमात्र साहस ही उभरता दीखता है।

मुगलों के इतने बड़े साम्राज्य के साथ जूझने में गुरु गोविन्दसिंह, बन्दा वैरागी तथा उनके पूर्ववर्ती परावर्ती व्रतधारियों का एक बड़ा परिकर किस प्रकार जूझा इसे चींटी हाथी की लड़ाई में चींटी की विजय गाथा के समतुल्य माना जा सकता है। सिकन्दर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो उसके सैन्यबल से हतप्रभ होकर अन्य राजा पराजय स्वीकारते और आधीन होते चले गये। किन्तु पौरव ने अन्त तक जूझते रहने का निश्चय किया। कदम-कदम पर उसने लोहा लिया उस महाबली के दाँत खट्टे कर दिये। पौरव के पौरुष से हतप्रभ होकर अन्ततः सिकन्दर को भी भारतीय वीरता का लोहा मानना पड़ा और उसने आगे बढ़ने का विचार छोड़कर सेना को वापस लौटा दिया। तात्याटोपे, पेशवा प्रभृति शूरवीरों ने अंग्रेजों से कैसी रणनीति अपनाकर छक्के छुड़ाये, इसे पढ़ने-सुनने वालों के मस्तक गर्व-गौरव से ऊँचे उठ जाते हैं। लाजपतराय की जघन्य हत्या का बदला चुकाने वाले भगतसिंह और जलियावाला बाग का ‘प्रतिशोध लेने वाले ऊधमसिंह नामक युवकों ने एकाकी साहस के बलबूते कितना बड़ा खतरा उठाया। इसका विवरण सुनने वालों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। शिवाजी, राणा प्रताप और छत्रसाल को अपने स्वल्प साधनों का भली प्रकार ज्ञान था। फिर भी वे महाबली शत्रु पक्ष पर इस प्रकार टूटे जिस प्रकार बाज कबूतर पर टूटता है। यदि वे बल और साधनों की समता तौलकर लड़ने की योजना बनाते तो कदाचित उन्हें वैसा सोचते भी न बन पड़ता जैसा कि उन्होंने आदर्शवादी साहस को सब कुछ मानते हुए कर दिखाया। वस्तुतः साहस एक ऐसी विभूति है, जिसका अवलम्बन लेकर आदि काल से मानव असम्भव को सम्भव करता आया है। जो इसकी महत्ता को समझ लेता है वह लक्ष्य प्राप्त करके रहता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डी. मैकडॉनोल्ड ने अपने ग्रन्थ “द पर्सनालिटी एक्सप्लोर्ड” में लिखा है-“कौन क्या करता और कितना सफल होता है, इस बात का महत्व नहीं। महत्व इस बात का है कि किसने कितने उच्च आदर्श अपनाने में सत्यनिष्ठा को आधार बनाया। जहाँ इस स्तर की मजबूती होगी वहीं अवरोधों से लड़ने ओर लम्बे समय तक अविचल भाव से लक्ष्य तक चलते ही रहने का साहस भरा विश्वास पाया जाएगा।”

समृद्धि संबंधी सफलताएँ तो चतुर परिश्रमी और साधन सम्पन्न लोगों को भी मिलती रहती हैं पर वह प्रगति जो व्यक्तित्व को सुसंस्कृत और परिणाम से संपर्क क्षेत्र को समुन्नत बना सके, मात्र उन्हीं को उपलब्ध होती हैं जो सिद्धान्तों और आदर्शों के प्रति गम्भीरतापूर्वक निष्ठावान रहते हैं। आत्म विश्वास शब्द का उपयोग तो कई बार कई प्रसंगों में होता रहता है पर वस्तुतः उसे आत्मिक मन्तव्यों के प्रति निष्ठावान, होने का परिचय देने के लिए ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए। टिकाऊ आत्मविश्वास उपलब्ध भी उन्हीं को होता है जो उत्कृष्टता को अपनाते और उस पर सुदृढ़ रहने के लिए अवरोधों की परवाह न करने का निश्चय किये होते हैं।

साहसी कठिन काम करने वालों को ही कहते हैं। ऐसे तो क्रूर कर्म करने वाले आतंकवादी भी दुस्साहसी कहे जा सकते हैं। पर सच्ची साहसिकता उस रीति-नीति को अपनाने में है जिसे सामान्य जन घाटा पड़ने या सहयोग न मिलने के भय से अपनाने के लिए सहमत ही नहीं होते। उच्चस्तरीय कार्यों को सम्पन्न करने के लिए एक ही आधार है-व्यक्तित्व की पवित्रता और प्रखरता। उसे उगाने में ऐसे उपाय अपनाने पड़ते हैं और जो न अभ्यास में हैं न प्रचलन में। उन्हें परिपक्व करने के लिए आत्मानुशासन अपनाने और आत्म परिष्कार के अन्तः क्षेत्रीय दुस्साहस करने पड़ते हैं।

इस कठिन मार्ग पर कौन चले? जिन्हें एकाकी चल सकने-अपने विवेक को अन्तिम निर्धारक मानने प्रचलनों के प्रभाव दबाव से बचे रहने का जिनमें अतिरिक्त स्तर का साहस हो वे ही महानता के पथ पर अन्त तक चलते रह सकते हैं। इस प्रकार के निश्चय करने और उन्हें निभाने में जो अंतःप्रेरणा काम करती है उसी को ‘आत्म विश्वास’ कहा जाना चाहिए। आत्मविश्वास वह विभूति

है जिसे उगा लेने वालों के लिए व्यक्तित्व को महान बनाने और उच्चस्तरीय सफलता पाने में फिर कोई बड़ी कठिनाई शेष नहीं रह जाती। साहस एवं आत्मविश्वास एक-दूसरे के पर्याय ही तो हैं।

मार्टिन लूथर को योरोप में फैले पोप पाखण्ड से जूझना पड़ा और वही कार्य स्वामी दयानन्द ने भारत में कर दिखाया। चारों ओर से शत्रुओं और प्रतिपक्षियों के आक्रमण वे सहते रहे किन्तु यथार्थता को अपनाते हुए अपने पथ पर अन्तिम साँस तक अड़े रहे। ईसा को भी इसी प्रकार अपनी स्पष्टवादिता के लिए दण्ड भुगतना पड़ा। तो भी उन्होंने प्राण गँवाने की तुलना में सत्य के प्रति निष्ठावान बने रहना ही उचित समझा। ऐसा अजस्र आत्मबल प्रदान करने में सदा सत्साहस ही समर्थ रहा है। फ्रांसीसी स्वतन्त्रता की अग्रदूत कुमारी जोन ऑफ आर्क के बलिदान ने अपने समय में देर भर को बलिदानी आवेश से ओत-प्रोत कर दिया था। अविज्ञात अमेरिका महाद्वीप कोलम्बी यात्रा में कोलम्बस किस प्रकार अपना जलयान धकेलता चला गया और जिन्दगी मौत से जूझता हुआ लक्ष्य तक पहुँचा इसकी कथा गाथा दुर्बल मन वालों से भी एक बारगी साहस उभारती है।

दुर्गम समुद्रों को पार करने गगनचुम्बी गिरि शिखरों पर चढ़ दौड़ने वाले, लम्बे रेगिस्तानों और दलदलों को पार करके एक क्षेत्र से दूसरे तक पहुँचने वालों के पराक्रम देखते ही बनते हैं। जिन लोगों ने उत्तर ध्रुव की सर्वप्रथम यात्रा की उनके घटिया साधनों और जोखिम भर असम्भव जैसे लगने वाले कार्यों की कोई संगति नहीं बैठती। नैपोलियन की योजनाओं में तो दुस्साहस के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। उसने जुआरी की तरह अपने दाँव पर सब कुछ लगा देने में कभी असमंजस नहीं किया। छोटी परिस्थितियों में रहकर जिन्होंने क्रमिक उन्नति की-प्रतिकूलताओं को अनुकूल बनाया और सफलता के इतने ऊँचे शिखर पर पहुँचे जिस पर कि सहसा विश्वास नहीं होता। ऐसे लोगों ने अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों का-लिंकन और वाशिंगटन का नाम बड़े गौरव के साथ स्मरण किया जाता है। उनके पास सत्साहस ही प्रधान अवलम्बन था।

यह जाना चाहिए कि परिस्थितियाँ किसी के भी साथ सदा अनुकूल ही नहीं रह सकती। क्योंकि वे किसी एक वर्ग के द्वारा या एक वर्ग के लिए विनिर्मित नहीं होती। वह साझे का उत्पादन है। जिसमें मनुष्य ही नहीं, अन्य प्राणी तथा प्रकृति के अन्तरिक्ष प्रेरित प्रवाह भी सम्मिलित हैं। ऐसी दशा में सदा अनुकूलता की आशा रखे रहना व्यर्थ है। साथ ही अनावश्यक और हानिकारक भी। उचित यह है कि अपनी साहसिकता और सहन शक्ति बढ़ाई जाय। जो अनिवार्य है उसे धैयपूर्वक सहन करना ही बुद्धिमत्ता है अथवा हड़बड़ी में गलत निर्णय होंगे साथ ही संकट बढ़ेंगे। जो सम्भव है उसके लिए उपाय सोचने और प्रयास करने में कमी न रहने दी जाय। दोनों ही दशाओं में सन्तुलन बनाये रहना आवश्यक है। ऐसा सन्तुलन जो कठिनाइयों से डरता नहीं वरन् अपनी प्रतिभा को उनसे निपटने में जुटा देता है-साहस कहा जाता है। साहस वह अस्त्र है जिसके सहारे हर प्रतिकूलता से इस या उस प्रकार निपटना सम्भव हो सकता है।


सीप कराह रही थी (kahani)

एक सीप कराह रही थी उसके पेट में मोती था। प्रसव पीड़ा उसे कष्ट दे रही थी।

कराह का कारण जानने के बाद सीप की सहेली ने सन्तोष की साँस ली और अपने भाग्य को सराहते हुए कहा-“मैं मजे में हूँ मुझे पीड़ा का झंझट नहीं सहना पड़ा।”

एक बुड्ढा केकड़ा कुछ दूर बैठा-बैठा यह सब देख सुन रहा था-उसने गरदन उठाकर देखा और कहा-आज की पीड़ा से एक को सुन्दर मोती की जन्मदात्री बनना है और दूसरी का चैन उसे सदा दरिद्र बनाये रहने वाला है। ये क्यों नहीं जानती कि पीड़ा ही कष्ट और चैन ही सुख नहीं है।


मानवी अन्तराल में सन्निहित दिव्य विभूतियां

पदार्थों की तरह मनुष्य में भी चुंबकत्व होता है वह वस्तुओं को अपनी ओर खींचता भी है और फेंकता भी। आग जहाँ भी जलती है गर्मी बिखेरती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी अपनी क्षमताओं और विशेषताओं से संपर्क क्षेत्र के पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित करता है। सुसंस्कारी अपने स्नेह सम्बन्धियों और परिचितों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रगति प्रसन्नता का लाभ अनायास ही देता रहता है। उसके उपयोग में आने वाले वस्त्र, उपकरण भी स्वच्छ और सुव्यवस्थित रहते हैं। इसके विपरीत कुसंस्कारी व्यक्ति न केवल संबंधित व्यक्तियों को रुष्ट किये रहते हैं वरन् उन्हें तरह-तरह की हानि भी पहुँचाते रहते हैं। वस्तुएँ तो उनकी बर्बाद होतीं और कुरूप दीखती ही रहती है। सामान्य जीवन में यह सामान्य चुम्बकत्व का प्रभाव है जिसे हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में प्रकट करता रहता है।

विशेष चुम्बकत्व वह है जिसे महामानव स्तर के व्यक्ति अपनी प्रतिभा के रूप में प्रकट करते रहते हैं। व्यक्तियों एवं समुदायों को प्रेरणा देते और सुधारते हैं। ऐसों की प्राण ऊर्जा वातावरण बदलने में समर्थ होती है। युग पुरुषों में पाई जाने वाली अनेकों विशेषताओं में से वह भी एक है जिसे स्व उपार्जित भी कहा जा सकता है और ईश्वर प्रदत्त भी।

यह चुम्बकत्व प्रयोग करने या न करने पर घटता बढ़ता भी रहता है। योगाभ्यास के क्षेत्र में इस स्तर की जागृति एवं उपलब्धि को अतीन्द्रिय क्षमता कहा जाता है। विज्ञजनों ने पाया है कि मनुष्य उतना ही सीमित नहीं है जितना कि दैनिक व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है उसमें अगणित विशेषताएँ बीजरूप में विद्यमान हैं। प्रश्न एक ही है कि उन्हें जागृत समुन्नत एवं प्रयुक्त कैसे किया जाय।

कई बार यह विशेषताएँ पूर्व संचित भण्डार की तरह तनिक-सा कुरेदने पर उछालकर ऊपर आती और बिना प्रयास के ही प्रकट होती देखी गई है। कई बार उन्हें योगाभ्यास, तप साधन जैसे प्रयत्नों द्वारा समुन्नत बनाया जाता है। जो हो, यह तथ्य अब सर्वमान्य बनता जा रहा है कि मनुष्य क्षमताओं का ही नहीं दिव्य विभूतियों का भी भण्डार है। उसके गहन कलेवर में ऋद्धि-सिद्धियों के मणि मुक्तकों की खदानें भरी पड़ी हैं। आवश्यकता इतनी भर है कि उन्हें खोजा, समेटा और खरादा जाय। प्रयास यदि इस दिशा में चल पड़े तो सामान्य मनुष्य आन्तरिक क्षेत्र के विकास में अग्रगामी हो सकता है और इतना कुछ प्राप्त कर सकता जिसके सहारे सिद्ध पुरुष या ऋषि-कल्प बनने जैसी स्थिति हस्तगत हो सके। अतीन्द्रिय क्षमताओं का प्रसंग अब कौतुक कौतूहल का विषय नहीं रहा वरन् उसे विज्ञान की एक सुनिश्चित शाखा के रूप में मान्यता मिल गई हैं।

सर विलियम क्रूक्स नामक एक अंग्रेज ने मनः सम्प्रेषण नाम से जानी जाने वाली एक शक्ति को यथार्थता मानते हुए उस पर खोज की और उनके “रिसर्चेज इन दी फिनोमिना ऑफ स्प्रिचुएलिज्म” नामक एक पुस्तक में प्रकाशित भी किया।

पहिले प्रयोग में कोई वस्तु को अपने स्थान से केवल छूकर हटाने की बात कही गई। जबकि दूसरे प्रयोग में अनेक प्रकार की ध्वनि तरंगों का प्रदर्शन किया गया जो कि किसी मानव द्वारा उत्पन्न नहीं की गई थी। इसमें साधारण टिक-टिक की आवाज से लेकर विस्फोट की आवाज तक कई प्रकार की आवाज पैदा की गई। तीसरे प्रयोग द्वारा किसी भी वस्तु का भार कम और ज्यादा करके दिखाया गया।

चौथे प्रयोग में भारी वस्तुओं को इधर-उधर हटाना प्रमुख था। इसमें क्रूक्स की कुर्सी को जिस पर कि वह स्वयं बैठे थे और उनके पैर जमीन से ऊपर थे, उस कमरे में चारों और बिना किसी मदद के घुमाया गया और

उनके कई मित्रों के सामने एक छोटी टेबल को जिसके कि पास कोई नहीं था, कमरे में इस ओर से उस ओर तक घुमाया। पाँचवें प्रयोग में बिना किसी मानव की मदद के कमरे में फर्नीचर को भूमि से ऊपर हवा में इधर उधर घुमाकर (उड़ाकर) दिखाया गया। अन्तिम एवं सफलतम छठे प्रयोग में मनुष्य को ही हवा में उड़ाकर दिखाया गया।

क्रूक्स ने लिखा है कि एक बार मैंने स्वयं देखा कि एक कुर्सी को जिस पर एक महिला बैठी थी, कई इंच भूमि की सतह से मनःशक्ति की सामर्थ्य से ऊपर उठा दिया गया। लोगों की शंका को दूर करने की दृष्टि से दूसरी बार उस महिला को कुर्सी पर इस प्रकार बिठाया कि जिससे उसके पैर ऊपर रहें और कुर्सी के चारों पैर सबको स्पष्ट दिखाई दें। इस स्थिति में उस महिला समेत उस कुर्सी को लगभग 3 इंच भूमि से ऊपर उठाया और थोड़ी देर बाद धीरे से फिर भूमि पर नीचे उतार दिया।

क्रूक्स ने लिखा है कि अतीन्द्रिय मानसिक क्षमताओं के कारनामों की यह अन्तिम कड़ी नहीं है। किन्तु यह शृंखला और भी बढ़ी है जिन्हें मनः सम्प्रेषण के नाम से जानते हैं। इसमें अपने आप लिखने की एक क्रिया भी है जिसमें कोई भी एक माध्यम के रूप में केवल कलम हाथ में पकड़ता है और फिर किसी अदृश्य शक्ति द्वारा वह कलम अपने आप लिखती चली जाती है।

एक अत्यन्त ही रहस्यमय विस्मयकारी करतब स्थानान्तरण से संबंधित है। इसमें एक वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाना होता है। इसमें उस वस्तु को केवल हवा में ले जाकर दूसरी जगह पहुँचाना ही नहीं था किन्तु एक बन्द कमरे में रखी किसी वस्तु को वहाँ से निकालकर दूसरे कमरे में पहुँचाना भी था। क्रूक्स ने इस प्रकार की एक घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “मिसलेनियस ऑकरन्सेस ऑफ ए कॉम्पलेक्स करेक्टर” “जटिल महामानव के अनेकानेक वृत्तान्त” में दिया है। एक बार वह एक आध्यात्मिक सभा में एक माध्यम के साथ बैठे थे। उन्होंने एक घण्टी को उन लोगों के आस-पास बजते हुए सुना उन्हें ऐसा आभास हो रहा था कि जैसे कोई व्यक्ति उस घण्टी को उनके आस-पास घूमकर बजा रहा हो किन्तु कोई व्यक्ति दिखाई ही नहीं दे रहा था। फिर उन्होंने देखा कि वह घण्टी अचानक उनके टेबल पर गिरी। उन्होंने उस घण्टी को अच्छी तरह पहिचान लिया और उन्हें आश्चर्य हुआ कि इस घण्टी को तो वे स्वयं पास के कमरे में रखकर आये थे और वह कमरा अभी तक बन्द था और ताला लगा हुआ था और उस ताले की चाबी उनके जेब में मौजूद थी।

क्रूक्स ने अपने अनुसन्धान के लिये कुछ तथ्यों को एकत्र करना प्रारम्भ किया। इसके लिये उन्हें कई स्थानों पर जाना पड़ा। उन्हें पता लगा कि विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे प्रमाण मिले हैं कि आदिवासी जन और कुछ जादूगर लोग किसी वस्तु को बिना स्पर्श किये एक स्थान से दूसरे स्थान को हटा सकते हैं। यही नहीं वे दूर से ही किसी को आरोग्यता भी प्रदान कर सकते हैं तो किसी को मार भी सकते हैं। यह शक्ति शाप वरदान के समान ही मानी जा सकती है। प्राचीन साहित्य में भी कई मनः सम्प्रेषण की कहानियाँ आई हैं जिनमें जीव नामक एक देवता द्वारा दम्भी व्यक्तियों को वज्रपात द्वारा दण्ड देते दिखाया गया है और कई बुरे लोगों को नष्ट करने की व अच्छों को संरक्षण देने की बात कही गई है। बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेन्ट में किसी विशेष प्रकार की ध्वनि का वर्णन है जिसके पीछे कोई अदृश्य शक्ति थी। उसने खड़ी दीवार को समतल बना दिया था। न्यू टेस्टामेन्ट में कुछ चमत्कारों को प्रदर्शन किया गया है जिसमें एक स्थान पर यीशु को पानी को मदिरा में बदलते हुए दिखाया गया है और उन्हें जल से पूर्ण झील पर पैदल चलते दिखाया गया है।

अतीन्द्रिय क्षमताओं के विषय में ब्रिटेन के डेनियल डुँगलाज होम से बढ़कर कोई अन्य उदाहरण मिलना कठिन होगा। इनका जन्म सन् 1933 में स्काटलैण्ड में हुआ। इन्हें बचपन से ही अतीन्द्रिय ज्ञान का आभास होने लगा था। वह उनकी आयु के साथ बढ़ता गया और 1850 में तो वह अनेकानेक प्रकार के अतीन्द्रिय क्षमता के प्रयोग जन सामान्य के सामने प्रदर्शित करने लगे। हवा में उड़ना उसमें एक प्रधान कार्य था। वह अनेकों बार हवा में उड़े। कभी वह स्वयं की प्रेरणा से और कभी किसी सभा में अथवा किसी भी मौके पर हवा में उड़कर इधर-उधर मँडराने लगते थे। उनके हवा में उड़ने के बारे में कई लोगों ने लिखा है। उनमें लिंडने के मास्टर भी एक है।

एक घटना का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है-“एक समय में, श्रीमान होम, लार्ड अडारे और उनके भतीजे के साथ बैठे थे कि होम अचानक समाधिस्थ हो गये और उसी स्थिति में वे उस कमरे की खिड़की से बाहर निकल गये और पास के कमरे की खिड़की में से दूसरे कमरे में प्रवेश कर गये। दोनों खिड़कियों का अन्तर सात फीट छः इंच था और इनके बीच में किसी प्रकार का कोई भी सहारा लेने का स्थान नहीं था। ये खिड़कियाँ भूमि की सतह 1 से 5 फीट ऊपर थी। हमने स्वयं देखा कि कैसे खिड़कियाँ खोली गई और होम ने उसमें पहिले पैर और फिर शरीर के साथ प्रवेश किया और फिर कमरे में आकर वे बैठ गये। उनसे पूछने पर कि यह उन्होंने कैसे किया तो वे फिर उसी हालत में उसी खिड़की से बाहर जाकर दूसरी खिड़की से दूसरे कमरे में प्रवेश कर गये। हाँ इस बार उनका सिर आगे था और पैर पीछे थे। इस घटना के बारे में जब लार्ड अडारे और उनके भतीजे कैप्टन बिने से पूछा गया तो उन्होंने इस घटना को उनके द्वारा प्रत्यक्ष रूप में देखी गई निरूपित किया। अमेरिका और ब्रिटेन के कई स्वतन्त्र विचार वाले व्यक्तियों ने भी होम के इस प्रकार के करतबों की सत्यता की पुष्टि की है। सर विलियम क्रूक्स ने तो इनके उड़ने की लगभग सौ घटनाओं का विवरण किया है।

विलियम स्टेनटोन मोजेस नामक एक सम्माननीय नागरिक और स्कूल मास्टर को अचानक एक बार अपनी उड़ने की अतीन्द्रिय क्षमता के बारे में आभास हुआ। किन्तु वयोवृद्ध सेवा निसृत व्यक्ति के रूप में जो उनका व्यक्तित्व लोगों के समक्ष आ चुका था। उसमें वे हवा में उड़ने का प्रदर्शन कर बाजीगर के रूप में जनता के सामने आना नहीं चाहते थे। अतः कुछ व्यक्तिगत मित्रों के समक्ष ही वे हवा में उड़ते थे। उनकी इस क्षमता के बारे में लोगों को अविश्वास होने का कोई कारण ही नहीं हो सकता था। क्योंकि वे स्वयं सदैव प्रचार से दूर ही रहे।

इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि अतीन्द्रिय क्षमता के भण्डागार की सत्ता को समझा, स्वीकारा और उपयोगी बनाया जाय। यदि ये प्रयास चल पड़ें तो मनुष्य अपनी मेधा का उपयोग सामान्य काम चलाऊ बुद्धि तक ही नहीं-उससे भी कुछ इतर विशिष्ट प्राप्त करने के लिये करेगा। इन दिनों हम सब अतीन्द्रिय क्षमता को जादू-टोना न समझते रहकर उसे यथार्थता के रूप में अंगीकार करने की स्थिति में गुजर रहे हैं। यदि इस निश्चय पर असंदिग्ध रूप से पहुँचा जा सका तो कल परसों उन उपायों को भी खोजा-अपनाया जा सकेगा जिनके सहारे अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मानव अत्यधिक महत्व की विभूति से लाभान्वित होने की स्थिति में होगा।


उल्लू ने सपना देखा (kahani)

उल्लू ने सपना देखा कि वह स्वर्ग लोक में पहुँच कर नन्दन वन के कल्पवृक्ष पर घोंसला बनाकर रहने लगा है।

आँखें खुली तो उस स्वप्न लोक को हाथों से निकलते देखकर बहुत दुःख हुआ तो भी हिम्मत न हारी और जहाँ भी वह मिले जा पहुँचने के लिए आँखें मूँदकर उड़ चला।

सारस ने इस बेसब्री की उड़ान का कारण पूछा-जाना तो वह भी साथ हो लिया। जिस जिसने इसे जाना वे सभी पक्षी उस अन्धी दौड़ में शामिल हो गये। एक बड़ा पक्षी समुदाय किसी अज्ञात दिशा के स्वप्न लोक में प्रवेश करने के लिए उड़ानें भरने चल पड़ा। बूढ़े गिद्ध ने आश्चर्य पूर्वक पूछा-आप सब लोग बिना आधार के क्यों दौड़े जा रहे हैं? कहाँ के लिए प्रयाण कर रहे हैं? स्थान और आधार से अपरिचित पक्षी ठिठके। गिद्ध ने कहा दुःस्वप्नों के पीछे दौड़ने की आदत मनुष्यों के लिए छोड़ दें। हम पक्षी लोग तथ्य को जानें और मात्र वह करें जिसकी सम्भावना है।


अतीन्द्रिय क्षमताओं का सुविस्तृत भण्डार

भगवान ने न केवल मनुष्य को वरन् अन्यान्य प्राणियों को असीम शक्ति भण्डार से भरा है पर वे अनुदान बीज रूप में मनःसंस्थान में जहाँ-तहाँ भरे रहते हैं। इन क्षमताओं का इतना ही पक्ष जागृत और अभ्यस्त रहता है जितने से जीवनचर्या की गाड़ी लुढ़कती रहती है। शेष ‘भाग’ प्रसुप्ति में पड़ा रहता है। इसलिए समझा जाता है कि जितनी समर्थता उपलब्ध है, उतनी ही कार्य क्षमता है। जबकि बात ऐसी है नहीं। अविज्ञात अतिरिक्त क्षमताओं को खोजा और जगाया जा सके तो किसी को भी सामान्य की परिधि पार करके विशिष्ट बनने का अवसर मिल सकता है।

योगियों, सिद्धपुरुषों में अनेकानेक ऋद्धि-सिद्धियों की बात देखी और सुनी जाती है। कितनों में ही यह बिना साधना या अभ्यास प्रयास के भी अनायास फूट पड़ती देखी गई है। इसलिए अतीन्द्रिय क्षमता का एक स्वतन्त्र विज्ञान ही बन गया है और उसे अनुसंधान की पर मनोविज्ञान शाखा के अंतर्गत मान्यता मिल गई है। इस दिशा में जो हुई हैं खोजें उनसे पता चला है कि मानवी क्षमता की मूलभूत सीमा उससे कहीं अधिक है जितना कि वह दैनिक जीवन में प्रयुक्त करता है। अब प्रश्न इस बात का शेष रह जाता है कि उस सामर्थ्य को विकसित करने का उपाय क्या हो सकता है? अध्यात्मवादी इस संदर्भ में योग और तप का प्रयोग परीक्षण बहुत पहले से ही करते रहे हैं। पर यह भौतिक विज्ञानियों का हठ है कि अतीन्द्रिय क्षमता को भी एक शरीरगत विशेषता माना जाय और उसे जगाने के लिए कोई भौतिक उपाय उपचार ही खोज निकाला जाय।

अतीन्द्रिय क्षमता का क्षेत्र अब बहुत व्यापक समझा जाने लगा है और इस निष्कर्ष तक पहुँच गया है कि चेतना क्षेत्र की यह विशिष्ट क्षमता न केवल मनुष्यों में वरन् अन्यान्य प्राणियों में भी न्यूनाधिक मात्रा में पाई जाती है। उनमें से कितने ही विपत्ति से बचने और सुविधा साधन खोजने में इसी आधार पर आश्चर्यजनक रूप से सफल होते हैं। इतना ही नहीं वे उन्हें भी इस अतिरिक्त क्षमता से लाभान्वित करते हैं जो इनके संपर्क में आते अथवा गतिविधियों पर ध्यान देते हैं। यहाँ प्राणि वर्ग में सूक्ष्म जीवियों और वनस्पति समुदाय को भी सम्मिलित किया जा सकता है क्योंकि बहुत बार उन्हें भी योगियों सिद्ध पुरुषों जैसी सिद्धियों का परिचय देते हुए पाया गया है।

“फ्राइबर्ग इन्स्टीट्यूट ऑफ पैरासाइकोलॉजी (प. जर्मनी) के प्रोफेसर डॉ. हान्स बेण्डर ने पशुओं में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमताओं की 500 घटनाओं का संकलन किया है। इन घटनाओं की फ्राई वर्ग पार्क की एक ऐसी चिड़िया का उल्लेख है जो मित्र राष्ट्रों द्वारा की जाने वाली बमबारी की सूचना ठीक 15 मिनट चिल्ला-चिल्ला कर देने लगती थी। इस संकेत को सुनते ही स्थानीय नगर निवासी सुरक्षित स्थानों (एयर रेड शेल्टर्स) में पहुँच जाते थे। इस प्रकार उस पक्षी ने अनेक अवसरों पर हजारों लोगों की जान बचाने के लिए भावी आपत्ति की पूर्व सूचना दी। एक दिन सूचना देने का अपना कर्त्तव्य पूरा करके जब वह अपने छिपने के लिए निरापद स्थान की तलाश कर रहा था तभी बमबारी होने लगी और सबकी जान बचाने वाला वह पक्षी अपनी जान गँवा बैठा। स्थानीय निवासियों को जब उसकी मृत्यु का पता चला तो उसी पार्क में उस पक्षी का एक भव्य स्मारक बनाकर, उसे श्रेष्ठतम नागरिक का अलंकरण प्रदान कर दुःखी संतप्तों द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

प्रसिद्ध मनोविश्लेषक श्रीमती रेनी हाइन्स ने अपनी पुस्तक ‘दि हिडेन स्प्रिंग्स’ में पशुओं में पाई जाने वाली ऐसी अतीन्द्रिय क्षमताओं के अनेक उदाहरणों का संकलन किया है। उसमें एक ऐसे कुत्ते का दृष्टान्त दिया गया है जिसके मालिक का घर आने का समय अनिश्चित रहता था। उसने एक चीनी रसोइया नौकर रखा हुआ था ताकि हारे-थके घर लौटने पर गर्म भोजन तत्काल मिल सके। वह कुत्ता मालिक के लौटने से तीन-चार घण्टे पूर्व ही रसोइये को मालिक के आने की सूचना उसके कपड़े खींचकर अथवा विशेष आवाज में बोलकर दे देता था। रसोइया इस संकेत को समझकर तुरन्त भोजन बनाने की तैयारी में जुट जाता और मालिक को पधारने पर गर्मागर्म भोजन तैयार मिलता। कुत्ते द्वारा बिना टेलीफोन के दी जाने वाली यह सूचना कभी भी गलत नहीं निकली।

दि साइकिक पावर ऑफ एनीमल्स नामक पुस्तक में मानवेत्तर प्राणियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय शक्तियों संबंधी कई घटनाओं को संकलित किया गया है। उसमें लेखक ने अपने ही एक अनुभव का उल्लेख इस प्रकार किया है।

“एक दिन मैं अपने घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहा था। अचानक घोड़ा एक मिनट के लिए अड़ गया। काफी मारपीट करने और जोर लगाने पर भी वह टस से मस नहीं हुआ। उसी समय थोड़ी दूर पर बिजली गिरी। यह देखकर मेरे मन में अपने घोड़े के प्रति असीम प्यार उमड़ पड़ा क्योंकि यदि वह अपने स्थान से चल देता तो हम दोनों की मृत्यु हो जाती।

एक और विचित्र घटना अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन से जुड़ी है। उनका प्यारा कुत्ता ‘पैंट’ जो व्हाइट हाउस में बँधा था, लिंकन की हत्या से कुछ समय पूर्व विचित्र प्रकार से भौंकने एवं अपने स्थान पर ही बेचैनी से चहलकदमी करने लगा था।

सोसायटी ऑफ पैरासाइकोलॉजी रिसर्च के डा. जे.बी. राइन के कबूतरों के पैट में नम्बर डालकर कई प्रयोग किए। उसमें 167 नम्बर के कबूतर की एक घटना इस प्रकार है।

इस विशिष्ट कबूतर को पालने के लिए एक लड़के की नियुक्ति की गई थी। उसका नाम हग ब्रेडी परकिन्स था। सर्दी का मौसम था उस लड़के को एक रात “फ्रास्ट बाइट” के कारण तकलीफ हुई। शल्य चिकित्सा के लिए उस लड़के को 120 मील दूर अस्पताल में ले जाया गया। दिन में ऑपरेशन सम्पन्न हो गया। रात को वह लड़का हॉस्पिटल के एक कमरे में सोया हुआ था। बाहर बर्फ पड़ रही थी। बर्फीली हवा भीतर न आये इसलिए खिड़की दरवाजे बन्द रखे गये थे। तभी खिड़की के शीशे पर कुछ फड़फड़ाहट की आवाज सुनायी पड़ी। नर्स ने ज्यों ही खिड़की खोली कबूतर भीतर घुस आया। इसकी आहट पाकर लड़के की नींद खुल गयी। लड़के ने नर्स से पूछा कि “इसके पैर में बँधे टैग पर कहीं 167 नम्बर तो नहीं लिखा है।” नर्स के उसके कथन को सही पाया।

ड्यूक युनिवर्सिटी के परामनोविज्ञान विभाग के डा. कार्ल्स ओसिस ने अँग्रेजी अक्षर ‘टी’ के आकार का एक चेसिस बनवाया और उसमें बिल्ली के बच्चे छोड़े और इस प्रयोग में इस बात की जाँच की गई कि कौन-सा बच्चा प्रयोगकर्ता की इच्छानुसार दाँये-बांये मुड़ता है इस अनुसंधान में पाया गया कि जो बच्चा प्रयोगकर्ता से प्यार करता था। उसी अनुपात में उसके विचारों का प्रभाव उस पर पड़ता था। इन विभिन्न परीक्षणों से निष्कर्ष निकालते हुए बताया गया है कि पालतू पशु एक उसके मालिक के बीच टेलीपैथीक सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। इसका अनुपात उनकी आन्तरिक घनिष्ठता पर निर्भर करता है।

“कैन ह्यूमन्स कम्यूनिकेट विद प्लैण्ट्स” के लेखक ने एक मरुस्थल के उपजाऊ भूमि में बदल जाने की घटना का उल्लेख इस प्रकार किया है-1962 में उत्तर स्काटलैंड में एक अमरीकी दम्पत्ति आकर बसे। पति-पीटर केडी, पत्नी-इलिन तथा उसकी आया डोरोथी मेक्लीन-यही तीन लोग तथा तीन बच्चे कुल छह लोग उस छोटे से परिवार में रहते थे। वहाँ और कोई काम न देख उन लोगों ने बागवानी करने का निश्चय किया। वह स्थान उस क्षेत्र की सबसे अनुपजाऊ भूमि मानी जाती थी। बर्फ और रेत की अधिकता के कारण वहाँ खेती करने कोई नहीं आता था। लेकिन उन लोगों का निश्चय दृढ़ था। इस कार्य में एलिन तथा मैक्लिन ने अपनी विशेष सूझ-बूझ का परिचय दिया। कुछ ही वर्षों में वे लोग उसी जमीन से इतनी अधिक पैदावार लेने लगे। जिससे वहाँ के स्थानीय लोगों को ही नहीं अपितु पूरा

इंग्लैण्ड वासियों को आश्चर्यचकित कर दिया। और वह उपेक्षित कृषि व वनस्पति शास्त्रियों का तीर्थ बन गया। उनने उस ऊसर समझी जाने वाली जमीन से 28 किलोग्राम से भी अधिक वजन के पत्ता गोभी उपजाकर पूरे देश में तहलका मचा दिया। जब पत्रकार उनसे इसका रहस्य पूछने आये तो उनने इतना ही कहा कि “अन्ततः प्यार ही वह तत्व है जो अन्य सभी नियमों की सम्पूर्ति कर देता है।”

केडी का कहना है कि हमारे परिवार के प्रेम के प्रत्युत्तर में वन देवता हमें विपुल वनस्पति और धान्य ही नहीं अपितु कृषि कार्य में उन्नति के लिए अधिकाधिक सूझबूझ भी प्रदान करते हैं।

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रसिद्ध भारतीय वनस्पति विद् सर जगदीशचन्द्र बसु ने इन्हीं तथ्यों पर अपना अनुसंधान कार्य किया था। विषय यह था कि जिस प्रकार मनुष्यों में सम्वेदना के वाहक स्नायु तन्तु बने हुए हैं उसी प्रकार वनस्पति जगत में सम्वेदनवाही तन्त्र (सेन्सरी सिस्टम) विद्यमान हैं। इसी तथ्य की पुष्टि प्रसिद्ध अमरीकी हॉर्टीकल्चरिस्ट लूथर बरबैंक ने अपने प्रयोगों में की। उनके कथनानुसार प्रेमपूर्ण इच्छाशक्ति के माध्यम से वनस्पतियों में अनहोनी परिवर्तन भी लाया जा सकता है। जैसे कि बिना काँटे का गुलाब उत्पन्न करना।

1950 में माननीय फ्रेंकलिन लोहर ने कैलीफोर्निया में वनस्पतियों पर किए गए अपने प्रयोगों के आधार पर सिद्ध किया कि प्रार्थना के बल पर फसल की उपज 20 प्रतिशत तक अधिक बढ़ाई जा सकती है।

इस विषय में मैग्रिल युनिवर्सिटी मौण्ट्रियल (कनाडा) के डा. बर्नार्ड ग्रेड के व्यावसायिक साइकिक हीलर ऑस्कर एस्टबनी के वनस्पतियों पर हाथ फैराने से होने वाले परिवर्तनों की जाँच की। इस प्रयोग में अंकुरित हो रहे जौ के पौधों को दो विभाग में बाँटा गया। एक विभाग को वह पानी दिया गया जिस फ्लास्क के जल पर ऑस्कर ने हाथ रखा था। दूसरे को साधारण जल दिया गया। बाद में विभिन्न यन्त्रों से उनके विकास दर को मापा गया तो डा. बर्नार्ड ग्रेड ने देखा कि जिस पौधे को ऑस्कर के हाथ से संस्कारित पानी दिया गया था विकास गति अधिक तीव्र थी। इसी कारण दार्शनिक मनोवैज्ञानिक सर विलियम जेम्स ने लिखा है कि समूची जीव सृष्टि एक अदृश्य सत्ता से संचालित है तथा वहीं इन सभी घटकों को एक माला के धागे की तरह एक सूत्र में पिरोए रहती है।

जिस प्रकार प्रकृति के भण्डार से प्रयत्नपूर्वक मनुष्य ने अनेकानेक क्षमताओं को खोजा और लाभ उठाया है उसी प्रकार अबकी बारी यह है कि चेतना क्षेत्र की उन विलक्षणताओं की उपयोगिता भी समझे जो उसके अन्तराल में प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी मनुष्य अब की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी समुन्नत हो सकता है। इस प्रयास में प्राणि समुदाय एवं वनस्पति वर्ग की विशिष्ट क्षमताएँ भी वैसा ही अतिरिक्त सहयोग कर सकती है जैसे कि अनेक प्रकार से मानवी सहयोग से निरत रह कर रही है।


बाप मूर्तिकार था (kahani)

बाप मूर्तिकार था। बेटे को भी उसने कला सिखाई। सोचता था बढ़-चढ़कर निकले। सो उसे हर दिन नये सुझाव देता। नये सुधार कराता।

कला निखरी। मूर्तियाँ महँगी बिकने लगी। पहले एक रुपये की बिकती थी। फिर दो की, तीन की, चार की, पाँच तक की कीमत मिलने लगी। बाप तो भी उसमें कुछ कमी बताता और सुधार कराता। बेटा एक दिन झल्लाने लगा। आपकी मूर्ति एक रुपये की बिकती थी। मेरी पाँच में बिकने लगी। तो भी दोष ही बताते चले जाते हैं।

बाप सन्न रह गया। अब आगे की प्रगति रुक गई न। दस रुपये तक पहुँचने का रास्ता जल्द हो गया न। निरन्तर के पर्यवेक्षण और सुधार के क्रम जारी रखे बिना, प्रगति क्रम आगे बढ़ता कहाँ है?


प्राण ऊर्जा का ज्वाला रूप में प्रकटीकरण

मानवी काया की संरचना पंचतत्वों से हुई है और उसकी चेतना में पाँच प्राणों का समावेश है। तत्वों से विनिर्मित रासायनिक पदार्थों द्वारा रक्त, माँस, अस्थि, चर्म आदि की संरचना हुई है। पंच प्राणों में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ काम करती हैं। इन्हीं का समुच्चय पंच देवों के नाम से जाना और उपासना उपक्रम द्वारा समर्थ समुन्नत किया जाता है।

प्राण को अग्नि भी कहा गया है। यज्ञाग्नि की तरह उसकी भी अपनी महत्ता है। यज्ञ में यों देखने में तो वैसी ही लपट आती है, जैसी कि चूल्हे या चिता में, तो भी उसमें विशेष अन्तर रहता है। पवित्र समिधा, शाकल्प, विधान एवं मन्त्रोच्चारण के सहारे उसे उस स्तर की बनाया जाता है जो चेतना के साथ घुल सके, उसके साथ तारतम्य बैठाने एवं प्रभावित करने में समर्थ हो सके। इस स्तर तक पहुँचने के उपरान्त ही साधारण आग को यज्ञाग्नि कहलाने का श्रेय मिलता है और उसका पूजन देवता के समतुल्य किया जाता है।

प्रेमाग्नि को जीवन तत्व-जीवनी शक्ति भी कहा जाता है। उसका परिचय नस-नाड़ियों में विद्युत की तरह काम करते देखा जाता है। ज्ञान तन्तु इसी के माध्यम से मस्तिष्क एवं शरीर के साथ संबंध स्थापित किये रहते हैं। त्वचा के इर्द-गिर्द उसे तेजोवलय के रूप में देखा जाता है। कायिक स्फूर्ति और मानसिक सूझ-बूझ एवं हिम्मत बनकर वही काम करती है। पराक्रम दोनों के संयोग को कहते हैं। शूरवीरों में मात्र कायिक बलिष्ठता ही नहीं, साहसिकता का भी बाहुल्य होता है। इस आधार पर किसी में प्राणाधिक्य होने का परिचय मिलता है। इसी को शरीरगत ओजस्-मनोगत तेजस् एवं भाव क्षेत्र का वर्चस् कहते हैं। तपश्चर्या में मनोनिग्रह और इन्द्रिय संयम का काय कष्ट तो होता है किन्तु साथ-साथ तपस् का उत्पादन भी होता है जिसे ब्रह्मतेज या ब्रह्मवर्चस् कहते हैं। यह सब प्राणाग्नि के ही विभिन्न स्वरूप या भेद उपभेद हैं।

यह ऊर्जा शरीर और मनःक्षेत्र में तो काम करती रहती है किन्तु चर्म चक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होती। संवेदनशील यन्त्र उपकरणों के माध्यम से इसे जाँचा तो जा सकता है पर आँखों से बल्ब की तरह जलता हुआ नहीं देखा जा सकता। प्राण विद्युत की चर्चा शक्तिपात से लेकर मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म आदि के रूप में होती रहती है। इतने पर भी उसे चूल्हे में जलने वाली आग की तरह प्रकट होते नहीं देखा जाता।

कई बार इसके अपवाद भी होते हैं। यह प्राणाग्नि कभी-कभी अनायास भी प्रकट होती देखी गई है। उससे वह शरीर जलने लगता है जिसमें से वह प्रकट होती है। कई बार तो वह समीपवर्ती वस्तुओं को भी जला देती है। किन्तु कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि जिस शरीर में से आग प्रकट हुई मात्र वही जला और पहने हुए कपड़े तथा सटे हुए सामान तक को कोई क्षति न पहुँची। इस प्रकार के विवरणों में कुछ पंजीकृत उल्लेख इस प्रकार है-

इटली के प्रख्यात सन्त पादरी डॉन जिओ मारिया बर्थोली के शरीर से उपासना के समय एक दिन अचानक आग की लपटें निकलने लगी। इस अग्नि परीक्षा से सन्त डॉन चार दिनों तक जूझते रहे और अचेतावस्था में हो गए। इस घटना के समय इटली के मूर्धन्य शल्य चिकित्सक डा. बाटाग्लिया भी उस स्थान पर परीक्षण हेतु आये थे जहाँ सन्त परीक्षा से जूझ रहे थे। इस विवरण को फ्लोरेंस की एक पत्रिका ने अक्टूबर 1776 में प्रकाशित किया था।

सन्त डॉन देश का परिभ्रमण करते हुए अपने बहनोई के घर पहुँचे और उनसे अपने कमरे को दिखाने के लिए आग्रह किया। अपने गले में एक रूमाल डाले और एक शर्ट पहने सन्त अकेले ही कमरे में प्रार्थना करने लगे। कुछ क्षणों बाद उस कमरे से चीखने चिल्लाने की आवाज आने लगी। घर के सभी लोग दौड़कर सन्त के कमरे में पहुँचे। सन्त डॉन के शरीर से हलकी लपटें निकल रही थी। धीरे-धीरे अग्नि शान्त हो गई। चिकित्सा उपचार के लिए डा. बाटाग्लिया को बुलाया गया। उन्होंने देखा कि सन्त के दाहिने हाथ की त्वचा हड्डियों से अलग होकर लटक गई थी। दाहिना हाथ बुरी तरह झुलस गया था। कन्धे से लेकर जंघे तक के हिस्से की त्वचा हड्डियों से अलग हो गई थी। विशेष चिकित्सा उपचार के बाद भी पादरी को बचाया नहीं जा सका। चार दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई पर अन्त तक उन्हें कष्ट नहीं हुआ।

सेसना, इटली की काउन्टेस डि बैन्डी नामक 62 वर्षीय महिला 4 अप्रैल 1731 को अपने कमरे में मृतक पाई गई। शाम को वह अपनी नौकरानी से देर रात्रि तक वार्तालाप करती रही और प्रार्थना करके सो गई। सुबह समय पर मालकिन को जगे हुए न पाकर नौकरानी ने खिड़की से झाँककर देखा तो देखकर हैरान रह गई। कमरे में बिस्तर से चार फुट की दूरी पर घुटने के नीचे पैर का हिस्सा, झुलसी हुई उंगलियों के टुकड़े और सिर का आधा भाग एवं इसके अतिरिक्त राख का ढेर देखकर नौकरानी हतप्रभ रह गई।

एकत्रित लोगों ने दरवाजे को तोड़ा और कमरे के अन्दर प्रविष्ट हुए। कमरे से एक विशेष प्रकार की गन्ध निकल रही थी। राख को हाथ से छूने पर चिकनी, बदबूदार एवं नम प्रतीत हुई। कमरे के सभी बर्तनों, कपड़ों, फर्नीचर तथा दीवार पर इस राख की हल्की-सी परत देखने को मिली।

निरीक्षण करने पर पाया गया कि काउन्टेस दि वैन्डी बिस्तर पर से उठकर जैसे ही कुछ दूर चली होंगी वैसे ही उनके शरीर की प्राणाग्नि ने दावानल का रूप धारण कर लिया होगा और उसे भस्मीभूत बना दिया। सभी कमरों में विचित्र बदबू फैल रही थी। कमरे में रखे एक बर्तन में रोटियों के कुछ टुकड़े पड़े थे जिन्हें कुत्तों को खाने को दिया गया परन्तु किसी कुत्ते ने मुँह तक न लगाया। उसे गड्ढे में बन्द कर दफना दिया गया।

सन् 1673 में पेरिस में स्वतः जल जाने वाली एक गरीब महिला का वर्णन करते हुए थामस बार्थोलिन ने लिखा था कि यह महिला “स्ट्राँग स्प्रिट” की अतिशय आदी थी। अपनी इस आदत के कारण यह महिला ने तीन वर्षों तक बिना किसी भोजन के ही दिन गुजारे। एक शाम को वह महिला पुलाव से बनी तृण शय्या पर सो रही थी। रात्रि में अचानक उसके शरीर से आग की लपटें निकलने लगी और कुछ ही क्षणों में वह बिस्तर सहित जलकर राख हो गयी सुबह देखने पर लोगों को उसका सिर तथा उँगलियों के कुछ हिस्सों के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला।

पेरे ऐमे लेमर ने इस घटना का पुनर्मूल्याँकन किया और उपरोक्त तथ्य को सही पाया जिसे बाद में उन्होंने एक लेख विशेष में प्रकाशित भी किया।

डा. दि ब्रस ने ‘एडिन बर्ग मेडिकल एण्ड सजिकल जनरल के मार्च में एक रहस्यमय अग्निकाण्ड का वर्णन किया था। एक व्यक्ति के शरीर से नीली लपटें निकल रहीं थी और वह छटपटा रहा था। शरीर पर के कपड़े जल रहे थे समीप खड़े छोटे भाई ने सहायता करनी चाही परन्तु उसके भी हाथ झुलस गये। यह आग कई घण्टों तक लगातार निकलती रही और हाथों तक फैल गई। जब उस व्यक्ति को घण्टों पानी में डुबाकर रखा गया तब कहीं जाकर अग्नि शान्त हुई। घाव शीघ्र भर गए। फिर कभी इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई।

सुप्रसिद्ध लेखक चार्ल्स फोर्ट ने अपनी पुस्तक “दी कम्प्लीट बुक ऑफ चार्ल्स में एक ऐसी महिला का वर्णन उद्धत किया है जो अपने ही शरीर स्थित अग्नि से कई बार ग्रसित हो चुकी थी। लन्दन निवासी जान राइट की माँ को 5 जनवरी 1820 को अस्पताल में भरती होना पड़ा। उनका शरीर कई स्थानों पर शरीर पर से निकली ज्वाला से झुलस गया था। 7 जुलाई को श्री राइट अपने रसोई घर से नौकरानी लड़की से बात कर रहे थे तभी

एकाएक राइट की माँ के कपड़े जलने लगे। लड़की उठकर बाहर चली गई और अग्निकाण्ड समाप्त हो गया। 12 जनवरी को फिर से उपरोक्त घटना घटित हुई उस समय भी वही लड़की उपस्थित थी।

राइट ने अपनी माँ की देखभाल के लिए अपनी बहन को बुला लिया। एक दिन उनकी बहन रसोईघर में उसी नौकरानी लड़की के समीप बैठी थी कि एकाएक उसके कपड़ों में भी आग लग गई और भयंकर रूप से जल गई। यह घटनाक्रम कई बार घटित हुआ। अतः नौकरानी लड़की को अपराधी ठहराकर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। जाँच करने पर मजिस्ट्रेट ने पाया कि उस लड़की का प्रत्यक्षतः कोई अपराध नहीं था। यह एक ऐसी सुपर नेचुरल प्रक्रिया थी जिसका उत्तर किसी के पास नहीं था, कानून के पास भी नहीं। ऐसे में किस दण्ड विधान के अंतर्गत उसे दण्ड दिया जाता? अन्त तक मामला अनुत्तरित ही रहा।

27 अगस्त 1938 की शाम के समय इंग्लैण्ड के चेल्सफोर्ड शायर हाल में 22 वर्षीय नर्तकी फिलिस न्यूकोम्ब का नृत्य चल रहा था। आधी रात को नृत्य समाप्त हुआ और फिलिस नृत्यशाला से बाहर निकलने लगी। हाल के मध्य में वह पहुँची ही थी कि अचानक उसकी ड्रेस में से आग की लपटें निकलने लगीं। कुछ ही क्षणों में नर्तकी का सम्पूर्ण शरीर नीली ज्वाला में खो गया। हेनरी मैक आसलैण्ड नामक महिला ने आग बुझाने का प्रयत्न किया परन्तु तब तक देरी हो चुकी थी। एम्बुलेंस आने तक उसका शरीर कोयले में बदल चुका था। इस रहस्यमयी घटना का जवाब किसी के पास नहीं था।

ये सभी घटनाएँ जनश्रुतियाँ नहीं हैं। इनका उल्लेख सरकारी कागजातों और विज्ञान क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा किये गये पर्यवेक्षणों में है। ऐसी घटनाओं में यह आशंका रहती है कि किन्हीं अनाड़ियों द्वारा किये गये कुकृत्यों पर पर्दा डालने के लिए उन्हें अविज्ञात कारणों से घटित हुई घटना कहा जाय। किन्तु उपरोक्त परीक्षित अभिलेखों में ऐसी बात प्रतीत नहीं हुई। क्योंकि जो लोग जले उनमें से कोई ऐसा नहीं था जिनकी किसी से शत्रुता रही हो अथवा धन के लिए इस प्रकार का कुकृत्य किया गया हो।

ऐसी स्थिति में इस अग्नि प्राकट्य को मानवी प्राण ऊर्जा का आकस्मिक उभार ही कहा जा सकता है साथ ही यह उत्साह भी उभरता है कि इस सामर्थ्य का सामान्य जीवन यापन में प्रयुक्त होने भर से सन्तोष न कर किन्हीं बड़े प्रयोजनों में नियोजित करने का मार्ग खोजा जाय।


खजाना खिंचकर तो नहीं आया (kahani)

रुपया रुपये को खींचता है। समान स्तर वाले खिंचते चले आते हैं। यह चर्चा किसी सामान्य मनुष्य से सुनी थी। उसने सोचा क्यों न अपने रुपये को अन्यान्यों के रुपये खींच बुलाने के लिए प्रयोग में लाऊँ। वह सरकारी खजाने के समीप पहुँचा। रुपयों के ढेर लगे थे। जेब से रुपया निकालकर वह बार-बार खजाने के ढेर की ओर ले जाता। ताकि वे उसकी ओर खिंचते चले आवें। बहुत देर यह प्रयोग चलता रहा। बात बनी नहीं। दिखाने वाले का हाथ थकने लगा। और पकड़ ढीली हुई तो वह रुपया छूटकर खजाने के ढेर में जा गिरा।

व्यक्ति रुआँसू हो गया। खजाना खिंचकर तो नहीं आया। उल्टा अपना भी हाथ से चला गया। खजाँची यह कौतुक देख तो देर से रहा था पर कुछ समझ नहीं सका। अब उस व्यक्ति के आँसू देखकर सोचा कि बात कुछ गम्भीर है। पास बुलाया और कारण पूछा आदमी ने सारा वृत्तान्त सुना दिया और जो था वह भी चले जाने पर उसकी निरर्थकता पर दुःख प्रकट करने लगा। खजांची हँसा, रुपया गिरते देखा था सो उठाकर वापस कर दिया, और कहा-“उक्ति सही थी। समझते में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि अधिक कम को अपनी ओर खींचता है।


चेतना क्षेत्र के रहस्यमय भण्डार को भी कुरेदा जाय

व्यक्तियों, हलचलों तथा परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से कई प्रकार के घटनाक्रम घटित होते रहते हैं। इनमें एक जैसे दृश्य कभी-कभी किसी दुर्घटना जैसे प्रसंग में ही देखे जाते हैं। बाढ़ में बहने, महामारी में मरने और बुद्ध में आहत होने वालों का दृश्य एक जैसा हो सकता है, पर सामान्यतया व्यक्तियों के जीवन क्रम सदा अपने-अपने ढंग से चलते हैं। एक ही समय में एक ही क्रम से एक जैसी घटनाएँ घटित हों तो इसे असाधारण ही कहा जायगा।

प्रकृति के अनेकों रहस्यपूर्ण नियम हैं। मनुष्य के हाथ तो अभी कुछ मोटी-मोटी जानकारियों ही लगी हैं। उसने खोज का विषय भी पदार्थों की संरचना जानने और उन्हें अधिक उपयोगी बनाने तक सीमित रखा है। संक्षेप में यही भौतिक विज्ञान है। विगत शताब्दियों में इसी क्षेत्र में अनुसन्धानों और आविष्कारों की शृंखला चली हैं। उपलब्धियाँ भी इसी स्तर की हुई हैं। चेतना पक्ष एक प्रकार से अछूता ही छोड़ दिया गया है। जबकि वस्तुतः मानवी विशेषता, समर्थता, प्रगति, प्रसन्नता का वास्तविक क्षेत्र चेतना के साथ ही सुसम्बद्ध है।

कभी-कभी अपवाद दृष्टिगोचर होते हैं। उन्हें प्रकृति की भूल या आश्चर्य-चमत्कार जैसा कुछ मान लिया जाता हैं, किन्तु वस्तुतः इस सुनियोजित सृष्टि व्यवस्था में व्यतिरेक जैसा कुछ है नहीं। जो कुछ घटित होता है उस सबके पीछे प्रकृति के नियम ही काम कर रहे होते हैं। यह दूसरी बात है कि उन अविज्ञात असाधारण नियमों से हम परिचित न हों और उन्हें चरितार्थ होते यदा-कदा ही देखा जाता है।

यों प्रकृति के रहस्य भी कम नहीं वे क्रमशः प्रकट होते रहे हैं। और पिछली जानकारियों की तुलना में इन नई उपलब्धियों को चमत्कार कहा जाता रहा है, पर वस्तुतः यहाँ चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। अविज्ञात का आकस्मिक प्रकटीकरण ही चमत्कार कहा जा सकता है। यह बात पदार्थ जगत के बारे में समझी जाने लगी हैं। किन्तु उपेक्षित चेतना क्षेत्र के रहस्य भरे नियमों के बारे में तो इन दिनों उत्साह ही नहीं उभरा, अनुसंधान ही नहीं हुआ-महत्व ही नहीं समझा गया ऐसी दशा में उस क्षेत्र के असाधारण नियमों को-ऋद्धि-सिद्धि या दैवी हलचल समझा जाय तो आश्चर्य ही क्या हैं?

पंच भौतिक प्रकृति की तुलना में पंच प्राणों का चेतना क्षेत्र कहीं अधिक समर्थ और रहस्यमय है। उन विशिष्टताओं का कभी-कभी प्रकटीकरण होता है तो उन्हें रहस्यवाद का नाम दे दिया जाता है। गुत्थी न सुलझा सकने वाली बुद्धि प्रायः ऐसा कुछ बहाना मनःसन्तोष के लिए बना लेती है और अधिक गहराई में उतर कर तथ्यों तक पहुँचने के झंझट से बचने का प्रयत्न करती रहती हैं।

चेतना क्षेत्र के संयोग साम्यों के कई बार ऐसे घटना क्रम सामने आते हैं जिन्हें देखकर अवाक् रह जाना पड़ता है। दो व्यक्तियों के समक्ष एक जैसे घटनाक्रमों का प्रवाह क्यों कर जुड़ गया, इसका कोई स्पष्ट समाधान नहीं मिलता। जब वैयक्तिक हलचलों और विभिन्न परिस्थितियों के तालमेल से घटनाक्रमों में भी स्वाभाविक भिन्नता रहती है तो फिर ऐसा क्यों होता है कि दो अपरिचित व्यक्ति एक ही प्रवाह में बहें, एक जैसे घटनाक्रम से अनायास ही प्रभावित हो चलें। ऐसे कुछ प्रसंग दृष्टव्य हैं-

उन दिनों इंग्लिश स्टील कम्पनी के धातु विज्ञान एरिक डब्ल्यू स्मिथ शेफील्ड नामक उपनगर में निवास कर रहे थे। उनके घर के पीछे एक जंगल था जहाँ लोग घोड़ों पर सवारियाँ करने आते थे। बसन्त और ग्रीष्म ऋतु में स्मिथ का नियम था कि वे उस स्थान पर आकर काफी समय शान्ति और प्रसन्नता के साथ व्यतीत करते और चलते वक्त घोड़े की लीद एकत्रकर अपने साथ घर ले जाते। इसको खाद के रूप में अपने बाग के टमाटर के खेतों में डालते।

सन् 1950 में एक दिन स्मिथ जंगल में टमाटर के खेतों में खाद डालने के लिए लीद एकत्र करते आगे बढ़ रहे थे। अचानक उनकी नजर सामने से आते एक व्यक्ति पर पड़ी। वह व्यक्ति भी वही कार्य रहा था जिसे वर्षों से स्मिथ करते आ रहे थे।

रास्ते में आकर दोनों व्यक्ति एक बेंच पर बैठ गये। संयोग से दोनों के पास एक छोटा-सा डस्टपैन लीड एकत्र करने के लिए तथा एक पुराना मोमजामा खरीददारी के लिए साथ था। दोनों ही अपने-अपने टमाटर खेतों के लिए खाद एकत्र किया करते थे। परिचय पूछे जाने पर दोनों ने अपना नाम एरिक स्मिथ बताया। दोनों के पास एक ही प्रकार की वर्जीनिया तम्बाकू और पीने का पाइप भी समान आकार के थे। इस वैचित्र्य पूर्ण संयोग को देखकर दोनों आश्चर्यचकित रह गए।

जॉन और आर्थर मॉफोर्थ दोनों ही जुड़वा भाई थे। इनमें परस्पर घनिष्ठ आत्मीयता थी। एक दिन 22 मई 1975 को दोनों को अपने सीने में अचानक भयानक दर्द का अनुभव हुआ और दोनों अस्पताल में भर्ती हो गए। जॉन-ब्रिस्टल अस्पताल में और दूसरा भाई आर्थर 70-80 मील दूर विन्डसोर अस्पताल में भर्ती हुआ। भर्ती होने के कुछ क्षणों बाद इनमें से दोनों की हृदयाघात के कारण एक साथ, एक समय मृत्यु हो गई।

सुप्रसिद्ध मेजबान और स्तम्भ लेखक इर्ब कुपकिनेट “कुप” सन् 1953 में एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक में भाग लेने के लिए सेवाय होटल में ठहरे हुए थे। अपने कमरे के एक दराज से उन्हें अपने पुराने घनिष्ठतम मित्र बास्केटबाल संयोजक हैरी हेनिन से संबंधित कुछ लेख मिले। दो दिन बाद हेनरी हेनिन का पत्र पाकर वे और आश्चर्यचकित रह गये जिसमें लिखा गया था कि “अ कभी विश्वास नहीं करेंगे” परन्तु यह सत्य है कि जैसे ही मैंने पेरिस के म्यूरिक होटल में जिसमें मैं ठहरा हुआ हूँ के एक दराज को खोला उसमें एक टाई पर आपका नाम लिखा मिला।”

सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एनी पेरिश ने 1920 में अपने पति के साथ पेरिस नगर की यात्रा की। साइन नदी के किनारे बसे ‘इलेडि ला साइट’ नामक स्थान पर एक सेकेंड हैण्ड बुक स्टाल पर खड़े होकर पुस्तकों के पन्ने पलट रहे थे कि अचानक “जैक फ्रास्ट एण्ड अदर स्टोरीज” नामक एक पुरानी पुस्तक हाथ लगी। अपने पुराने मित्र को पाकर एनी पेरिश अत्यन्त खुश हुई। कोलोरैडो स्प्रिंग्स में अपने बाल्यकाल में उन्हें यह पुस्तक सर्वाधिक प्रिय थी। जो बाद में कहीं खो गई थी। पुस्तक के पन्ने पलटने पर उनके पतिदेव ने देखा कि एक पन्ने के किनारे पर “एन्नी पेरिश 209 एन बेबर स्ट्रीट, कोलोरैडा स्प्रिंग्स” लिखा था। बड़ी ही विचित्रता थी इस घटनाक्रम में, जिसमें वही पुस्तक उसी व्यक्ति को वर्षों बाद संयोगवश मिल गई।

डबलिन आयरलैण्ड के निवासी अन्थोनी एस. क्लैन्सी ने “द रुट्स ऑफ क्रोइन्सीडेन्स’ के प्रख्यात लेखक आर्थर कोएस्लर को 1973 में एक पत्र लिखा। अपने जीवन में घटित होने वाले 7 अंकों को भाग्यशाली बतलाते हुए क्लैन्सी ने लिखा कि उनका जन्म वर्ष के सातवें महीने में महीने के सातवें दिन और सप्ताह के सातवें दिन तथा शताब्दी के सातवें वर्ष में हुआ। वे अपने पिता की सातवीं सन्तान थे। उनके पिता के साथ भाई थे जिनमें से प्रत्येक के सात-सात पुत्र थे। अपनी 27 वीं वर्षगाँठ पर वे एक घुड़दौड़ देखने गये जहाँ उन्हें सातवें नम्बर का रेस कार्ड मिला। उस सातवें घोड़े का नाम ‘सेवन हैवन’ था जिस पर क्लैन्सी ने सात शिलिंग रखे। और वह सात पर ही समाप्त हुआ। इसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक में किया है।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डा. लारेंस ली शान द्वारा लिखा गया ध्यान और पैरानार्मल फेनामिना पर एक लेख सन् 1968 में इंटरनेशनल जनरल ऑफ पैरासाइकोलाजी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

दिसम्बर 1967 में लारेंस ने रहस्यवाद में लिखी गई अपनी एक अनुपम कृति को पढ़ने और उस पर अपने बहुमूल्य सुझाव देने के लिए सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डा. नीना रिडिनौर के पास भेजा। नीना रहस्यवाद की विशेषज्ञ मानी जाती थी। 11 दिसम्बर को लारेंस डा. नीना से एक लचं पर मिले और अपने पेपर से संबंधित उनके विचारों, और समीक्षाओं को ध्यान से नोट करने लगे। लेख से संबंधित रहस्यवाद पर आठ पुस्तकों के नाम नीना ने सुधारा जिनमें पांचवीं पुस्तक एम. ए. क्रेंमरमग द्वारा लिखित ‘दी विजन ऑफ एशिया’ थी।

डा. लारेंस ने इस पुस्तक की खोज अनेक विख्यात पुस्तकालयों में की परन्तु कहीं भी यह पुस्तक उपलब्ध नहीं थी। एक दिन निराश लारेंस अपने घर लौट रहे थे कि अचानक रास्ते में एक पुरानी पुस्तक पड़ी हुई मिली। उठाकर देखने पर ‘दी विजन ऑफ एशिया’ शीर्षक से वह पुस्तक रखी मिली। लारेंस के विस्मय मिश्रित हर्ष का ठिकाना न रहा।

दूसरे दिन प्रातः लारेंस डा. रिडिनौर से मिले और उन्हें अपनी रहस्यात्मक कहानी कह सुनायी। पुस्तक का नाम सुनते ही लारेंस चौंक पड़ी। और बोली-“मैंने तो इस पुस्तक का नाम तक नहीं सुना।” यह एक और दूसरी पहले सामने आ उपस्थित हुई। जिसका कोई उत्तर दोनों के पास नहीं था। दोनों के मुख से एक ही समाधान सुना गया कि यह किसी अदृश्य सहायक का अनुदान है जिसने आवश्यकता का महत्व समझा और उसे पूरी करने का सुयोग बिठा दिया। शोध कार्य में इस पुस्तक से उन्हें बड़ी मदद मिली। अदृश्य आत्माओं की करतूत संबंधी एक और भी ऐसी ही घटना है।

19वीं सदी के सुप्रसिद्ध खगोलविद् कैमाइल फ्ल्मैरिआन गुह्य विद्या के भी विद्यार्थी थे अपनी पुस्तक ‘द अननोन’ में मृत्यु के बाद जीवन की पहेलियों का वर्णन करते समय उन्हें एक प्रेतात्मा से साक्षात्कार हुआ था। इस पुस्तक का प्रकाशन सन् 1900 में हुआ। कैमाइल अपने कमरे में बैठे वायुमण्डल की गतिविधियों के बारे में लिख रहे थे अचानक तेज झंझावात आया और खिड़कियों के शीशे तोड़ता हुआ कमरे के प्रवेश कर गया। लेखक की मेज पर फैले कागज के पन्नों को उड़ाता हुआ सड़क पर बिखेरता चला गया। कुछ दिनों बाद जब यह पुस्तक छपने प्रकाशक के पास भेजी गई तो उसमें हवा के प्रभाव वाला चैप्टर गायब था। जिसकी सूचना प्रकाशक ने श्री कैमाइल को अपने एक दरबान के माध्यम से भेज दी। संयोग से दरबान को रास्ते में बिखरे हुए कुछ पन्ने मिले जिन्हें समेटकर उसने अपने मालिक को दे दिया। प्रकाशक को उन खोये हुए पन्नों के मिल जाने पर प्रसन्नता मिश्रित आश्चर्य हुआ।

यह समझना भूल होगी कि जो कुछ हम जानते हैं, वह पूर्ण है। सच तो यह है कि संसार के अगणित रहस्यों में से हमें कभी तक जो हस्तगत हुआ है उसे बहुत ही स्वल्प कहा जा सकता है। जो जानना शेष है उसे विज्ञात की तुलना में असंख्यों गुना अधिक कहा जा सकता है। प्रभृति ज्ञान के संवर्धन में जब उस क्षेत्र के विशेषज्ञ तक अपनी अपूर्णता को स्वीकारते हैं तो उस चेतना क्षेत्र का तो कहना ही क्या, जिसके संबंध में हजारों वर्षों से कोई कहने लायक अनुसन्धान ही नहीं हुआ और जो पुरातन काल में उपलब्ध था, उसे भी प्रमाद वश गँवा दिया गया।

चेतना क्षेत्र के उपरोक्त रहस्यों को देखते हुए इस संदर्भ में विश्वास और उत्साह रखने वालों को चाहिए कि खोज के लिए भौतिक विज्ञानियों जैसी तत्परता बरतें और देखें कि चेतना अदृश्य जगत में संव्याप्त अतिमहत्वपूर्ण विभूतियों में से किन्हें, किस प्रकार मनुष्य के लिए हस्तगत कर सकना सम्भव हो सकता है।


किसी गाँव में जा पहुँचा (kahani)

कोई राजा भटकता हुआ किसी गाँव में जा पहुँचा। अपरिचित होते हुए भी ग्रामवासियों ने बहुत-बहुत आतिथ्य सत्कार किया। सज्जनता से प्रभावित होकर राजा ने उन गाँव वासियों के लिए अस्पताल बनवा दिया। पर उसमें कोई भी मरीज नहीं आया। राजा को सूचना मिली तो उसने सुविधा से लाभ न उठाने के कारण पूछा तो ग्रामीणों ने कहा हम लोग भूख से कम खाते हैं और कठोर परिश्रम करते हैं। इससे बीमारी पहले तो आती नहीं, आती है तो पसीने के रास्ते तत्काल निकल जाती है।


जिन्दगी और मौत की आँख मिचौनी

जिन्दगी पर मौत का आक्रमण सदा से सफल होता रहा है। मृत्यु जब आती है तब जिन्दगी को सहज ही हड़प जाती है। कोई प्रयत्न उसे बचा नहीं पाता। पर कभी-कभी जिन्दगी से मौत भी हारती देखी गई हैं। ऐसी घटनाएँ भी इतिहास के पृष्ठों पर हैं, जिनमें मारने से सरंजाम सही रहने पर भी मृत्यु आई नहीं।

इंग्लैण्ड के ईक्सटर जेलखाने में जानली नामक एक कुख्यात अपराधी को अपनी मालकिन मिस इमाअन केसी की हत्या करने के अपराध में प्राणदण्ड का आदेश दिया गया। 23 फरवरी 1885 को ईवस्टर के शासनाधिकारी ने जानली को फाँसी के तख्ते पर लटकाने का इशारा किया। तख्ते और रस्सियों की जाँच पड़ताल अच्छी तरह से कर ली गई थी। हैंगमैन बेरी ने बोल्ट खींच दिया। रस्सा जानली की गर्दन से खुल गया और ली नीचे गिर गया। फाँसी का फंदा दुबारा उसकी गर्दन से कसा गया और तख्ते पर खड़ा किया गया। शेरिफ का इशारा मिलते ही बेरी ने बोल्ट खींच दिया, इस बार टैपडोर खुला ही नहीं। यह प्रक्रिया चार बार दोहराई गई परन्तु फन्दे ने जान ली की गर्दन को नहीं दबोचा।

जानली को वापस जेल की काल कोठरी में ले जाया गया। ट्रैप और ट्रैपडोर का सूक्ष्म निरीक्षण किया गया सभी ठीक ढंग से कार्य कर रहे थे। जान ली को फिर से तख्ते पर खड़ा किया गया। चर्चा तब तक खूब फैल चुकी थी पत्रकारों समेत हजारों की भरी भीड़ के सामने ली को फाँसी के फन्दे से लटका दिया गया। बोल्ट खींचा गया परन्तु इस बार भी ट्रैपडोर ने खिंचने से मनाही कर दी। दो बार के प्रयास करने पर भी जब जान ली नहीं मारा जा सका तो शेरिफ ने उसे उसकी काल कोठरी में वापस भेज दिया। जाँच दुबारा आरम्भ करने पर ली निर्दोष पाया गया व रिहा कर दिया गया।

7 फरवरी 1894 को विल परविस नाम के एक चौबीस वर्षीय युवक को कोलम्बिया, मिसीसिपी के एक किसान की हत्या करने के अपराध में प्राण दण्ड की सजा सुनाई गयी। निश्चित तिथि को नियत स्थान पर तीन हजार से अधिक लोगों की भीड़ परविस के प्राण दण्ड को देखने के लिए मैदान में डँटी थी। बिल परविस को फाँसी के तख्ते पर लटका दिया गया। जूरी ने जल्लाद को रस्सा खींचने का इशारा किया और रस्सा खींचा गया। संयोग से रस्सा परविस के गले से खिसक गया और परविस धड़ाम से नीचे आ गिरा। उसे कोई चोट नहीं लगी। परविस को दुबारा फाँसी के फन्दे मेंकसकर लटकाया गया। शेरिफ इर्विन मेगी ने ट्रैपडोर खींचने के लिए जल्लाद को आदेश दिया। इस बार भी परविस बच गया। उपस्थित जनसमुदाय उछलते-कूदते, गाते हुए सर्वोच्च शक्तिमान ईश्वर को साधुवाद देने लगे।

विलपरविस को पुनः वापस कोठरी में बन्द कर दिया गया। स्टेट सुप्रीम कोट ने दुबारा 12 दिसम्बर 1895 की तिथि को उसको फाँसी के फन्दे से लटकाने के लिए तिथि निश्चित की। फाँसी दिए जाने के पूर्व ही उसके साथियों ने परविस को जेल से बाहर निकाल कर छिपा दिया। इसके एक माह बाद मिसीसिपी का गवर्नर बदल दिया। नये गवर्नर ने परविस के प्राणदण्ड को आजीवन कारावास में बदल दिया। 12 मार्च 1896 में परविस ने गवर्नर के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। और मात्र 2 वर्ष बाद 1898 में उसे कारावास में निरपराध मानते हुए मुक्त कर दिया गया।

जिन दिनों मामले की सुनवाई चल रही थी। 12 जूरियों का एक पैनल हत्या के मामले की जाँचकर रहा था। परविस को इस हत्या में दोषी ठहराया गया। परन्तु कटघरे में खड़ा परविस तभी चिल्ला उठा-“मैं निर्दोष हूँ और आपमें बारहों जूरियों में से अन्तिम की मृत्यु के तीन दिन बाद 13 अक्टूबर 1938 को अड़सठ वर्ष की अवस्था में विल परविस की मृत्यु हुई।

कहते हैं कि जीवन मरण भगवान के हाथ में होता है। वह किसी के बुलाए आता नहीं, और किसी के टाले टलता नहीं। इन घटनाओं से यही समर्थन मिलता है।


सौभाग्यों और दुर्भाग्यों की अविज्ञात शृंखला

सौभाग्य की तरह दुर्भाग्य का भी अपना अस्तित्व है। व्यक्ति अपने बुद्धि कौशल और पराक्रम से अनेकों सम्पदाएँ-सफलताएँ प्राप्त करता है इसमें सन्देह नहीं। किन्तु यह भी सच है कि कितनों ही को अनायास ही उतना कुछ मिल जाता है। जिसकी उनकी योग्यता तत्परता से कहीं अधिक ही कहा जा सकता है। स्वल्प प्रयास से अधिक बढ़ी-चढ़ी सफलताओं की तरह अनेकों के सम्मुख ऐसा दुर्भाग्य प्रकट होते भी देखा गया है जिसमें सही प्रयास करने पर भी असफलता का मुँह देखना पड़ा। इसी प्रकार ऐसा भी होता रहता है कि किन्हीं को अकारण संकट में फंसना और त्रास सहना पड़ा। ऐसे प्रसंगों को दुर्भाग्य कहा जाता है।

दुर्भाग्य जैसी दुर्घटनाओं का कारण अविज्ञात है। पूर्व जन्मों का संचित कर्मफल, ग्रह दशा, दैवी प्रकोप, भाग्य विधान कहकर इन प्रसंगों का निमित्त कारण समझने का प्रयत्न किया जाता है। फिर भी इतने भर से सन्तोष नहीं होता। अभी उन वास्तविक कारणों का जानना शेष है जो सौभाग्य और दुर्भाग्य की तरह प्रकट होते और अप्रत्याशित परिणतियां प्रस्तुत करते हैं।

इस संदर्भ में रहस्य तब और भी अधिक जटिल हो जाते हैं जब दुर्भाग्यों को कई व्यक्तियों के साथ एक ही घटना क्रम के साथ जुड़ते हुए देखा जाता है। अथवा एक ही समय में एक जैसी घटनाएँ घटित होती देखी जाती है। संयोग भी तो आखिर किसी-किसी नियम के अंतर्गत ही होने चाहिए। यहाँ अकस्मात् या अपवाद जैसा घटित होने की भी तो इस सुनियोजित सृष्टि में कोई गुंजाइश नहीं है।

मनुष्यों के साथ कई बार कई प्रकार की घटनाएँ एक ही क्रम में घटित होती देखी जाती हैं। इन दुर्भाग्यों के पीछे क्या तारतम्य है इसका कारण विदित न होने पर भी इतना अवश्य है कि सृष्टि के कुछ नियम ऐसे हैं जो इस प्रकार के संयोग बिठाने के लिए आधारभूत कारण है। भले ही हम उन्हें समझ न पायें हों। चेतना के अदृश्य क्षेत्र का अनुसंधान क्रम जब चलेगा तब प्रतीत होगा कि सौभाग्यों और दुर्भाग्यों का सूत्र संचालन किस केन्द्र से होता है। उसका स्वरूप और स्थान और विधान समझ सकने पर हमें सौभाग्य से लाभान्वित हो सकने और दुर्भाग्य से बच सकने की स्थिति में भी पहुँच सकते हैं।

संसार में विभिन्न अवसरों पर घटित होने वाले योजनाबद्ध दुर्भाग्यों में से कुछ विशेष रूप से विचारणीय है।

प्रथम विश्वयुद्ध के आरम्भ होते ही फ्राँस के इन्टेलिजेन्स विभाग के एक जर्मन जासूस पेटर कार्पिन को देश में प्रवेश करते ही गिरफ्तार कर लिया और उसे गुप्त स्थान में कैदी बनाकर रखवाया। सन् 1917 में छद्मवेश बनाकर फ्राँस की जेल से पेटर भाग निकला। इसके पूर्व उसने एक जाली दस्तावेज बनाकर अपने अधिकारियों को इस आशय का पत्र भेजा जिसमें उसने अपने ऊपर किये जा रहे व्यय को बन्द कर देने और उससे एक वाहन खरीदने के लिए निवेदन किया था। 1919 में रूहर में एक सड़क दुर्घटना में उसी वाहन से एक व्यक्ति कुचल कर मर गया। अब तक यह प्रान्त फ्राँस के अधिकार में था। जाँच-पड़ताल करने पर पाया गया कि यह वही पेटर कार्पिन था जिसने तीन वर्ष पूर्व फ्राँस की सरकार के आँखों में धूल झोंकी थी।

हनी ग्रोव, टेक्सास के हेनरी जीगलैण्ड ने 1883 में अपनी प्रेमिका से संबंध विच्छेद कर लिया। उसके इस व्यवहार से प्रेमिका के भाई ने जीगलैण्ड को मार डालने के इरादे से उस पर प्राणघातक हमला किया। परन्तु

निशाना ठीक नहीं बैठा और गोली उसके चेहरे को स्पर्श करती हुई निकल कर समीप के एक पेड़ में जा धँसी। हमलावर ने समझ लिया कि जीगलैण्ड मारा गया और वह वहाँ से भाग निकला।

सन् 1913 में जीगलैण्ड ने उस पेड़ को काटना चाहा परन्तु स्तम्भ मोटा और मजबूत होने के कारण उसे मुश्किल जान पड़ी। पेड़ काटने के लिए उसने डायनामाइट का इस्तेमाल किया। दुर्भाग्य से पेड़ से धँसी गोली विस्फोट के कारण निकल कर जीगलैण्ड के सिर में जा समाई। जीगलैण्ड वहीं ढेर हो गया।

सन् 1930 में डेट्राइड की सड़कों पर जोसेफ फिगलाक चहलकदमी कर रहे थे कि अचानक एक हृष्ट-पुष्ट मोटा-ताजा लड़का ऊँचाई पर स्थित एक खिड़की से उनके ऊपर आ गिरा। एक वर्ष बाद उसी दिन उसी खिड़की से वही बालक फिर से फिगलाक के ऊपर कूद पड़ा। फिगलाक और वह बालक दोनों अभी जीवित हैं।

क्लौडे वालबोने नामक हत्यारे ने 1872 में फ्राँस के बैरन रोडेमायर डि ताराजोन नामक प्रख्यात व्यक्ति की हत्या कर दी। इससे 21 वर्ष पूर्व इसी नाम के एक अन्य हत्यारे ने बैरन के पिता को मौत के घाट उतार दिया था। इन दोनों हत्यारों में कोई आपसी सम्बन्ध नहीं था।

राजकुमारी मारिया डेलपोजो डेला सिस्टर्ना की शादी इटली के राजकुमार अमेडियो दि ड्यूक डी. एओस्टा के साथ 30 मई 1867 में ट्यूरिन में बड़े धूमधाम के साथ सम्पन्न हुई। विवाहोपरान्त राजकुमार के साथ जुड़ा दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का क्रम। शादी के कुछ क्षणों बाद ही रानी की साहसिक ने रस्सी के फन्दे से लटक कर खुदकुशी कर ली। राजमहल के द्वारपाल ने अपनी गर्दन काट ली। विवाहोत्सव की शोभायात्रा का मार्गदर्शन कर रहे कर्नल की आतप अघात से मृत्यु हो गई। स्टेशन मास्टर हनीमून ट्रेन के पहिये के नीचे आ जाने से कुचल कर मर गया। राजा का सहयोगी घोड़े की पीठ पर से गिर कर दम तोड़ गया। अधिक से अधिक श्रेष्ठ व्यक्तियों ने अपने आपको गोली मार लिया। यह दम्पत्ति कभी भी सुख चैन से प्रसन्नता की जिन्दगी व्यतीत नहीं कर सका।

मार्सीले फ्राँस के हेनरी ट्रैग्ले की गणना महान द्वन्द्व योद्धाओं में की जाती है। सन् 1861 से 1878 तक उसने पाँच लड़ाइयाँ लड़ी। चार युद्धों में उसने अपने प्रतिद्वन्द्वियों दुश्मनों को मात्र एक-एक गोलियों के अचूक निशाने से ही धराशायी किया था। पांचवें युद्ध में गोलियों के आदान-प्रदान से वह स्वयं मारा गया फिर भी उसका निशाना अचूक रहा और अपने प्रतिद्वन्द्वी की जान लेकर ही रहा।

जोसेफ एनर अपने समय के प्रख्यात चित्रकार थे सन् 1836 में एनर 18 वर्ष की अल्पायु में वियना में रस्सी के फन्दे गले में डालकर आत्महत्या करने जा रहे थे कि अचानक कैपूचियन सन्त उनके सम्मुख प्रकट हो गये। और इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से उनकी रक्षा की चार वर्ष बाद बुडापेस्ट में एनर ने फिर से रस्सी से लटककर मरना चाहा परन्तु इस बार भी सन्त ने अचानक प्रकट होकर फाँसी के फन्दे से त्राण दिलाया। आठ वर्ष व्यतीत होने के उपरान्त क्रान्ति का समर्थन करने और राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेने के आरोप में एनर को फाँसी की सजा मिली। कैपुचियन सन्त की प्रेरणा से जोसेफ एनर का प्राण दण्ड स्थगित कर दिया गया।

1886 में 68 वर्ष की आयु में जोसेफ ने एक दिन अपनी ही पिस्तौल से गोली मारकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। उसके अन्तिम दाह संस्कार का पूरा प्रबन्ध उसी प्राण रक्षक सन्त ने किया जिसके नाम तक को एनर नहीं जानता था।

फ्रांस के लूइस पन्द्रहवें के शैशवकाल से ही प्रत्येक महीने की 21वीं तिथि को एक ज्योतिषी उनके घर आता और बालक की सुरक्षा के लिए अभिभावकों को विशेष चेतावनी देकर चला जाता। बार-बार की चेतावनी ने नवयुवक लूइस को आतंकित कर दिया। परिणामस्वरूप उस तारीख को लूइस किसी कार्य विशेष को या व्यापारिक मामले को हाथ में न लेता।

संयोग से 21 जून 1791 को अत्यन्त सावधानी बरतने पर भी वह बड़े ही रहस्यमय ढंग से पकड़ लिया गया। लूइस और उसकी रानी अन्टोइनेटी को वारेन्नेस में उस समय गिरफ्तार किया गया जब वे क्रान्ति से निकलकर भागने की तैयारी में थे। दूसरे वर्ष 21 सितम्बर को फ्रांस में क्रान्तिकारियों ने राजशाही को समाप्त कर गणतन्त्र की घोषणा कर दी। 21 जनवरी 1793 को लूइस पंद्रहवें को फांसी दे दी गई।

कभी-कभी कुछ वस्तुएँ किसी कारण ऐसी अभिशाप ग्रस्त होती पाई गई हैं कि उनके प्रयोग करने वाले अकारण ही विपत्ति में फँसते और संकट झेलते देखे गये हैं।

लीडेन, मेसाचूसेट निवासी जावेज स्पाइसर को शेयस के विद्रोह के समय 25 जनवरी 1778 को स्प्रिंगफील्ड में उस समय दो गोलियाँ आकर लगी। जब वह एक संघीय शस्त्रागार में कार्यरत था और वह वहीं ढेर हो गया। उस समय वह अपने भाई डैनिमल का कोट पहने हुए था जिसे तीन वर्ष पूर्व 5 मार्च 1784 को उसी संघीय शस्त्रागार पर दो गोलियाँ आकर लगी थी। यह गोलियां उसी छिद्र से होकर निकली थी जिससे स्पाइसर का भाई डेनियल मारा गया था।

फ्रांस के राजा लूइस चौदहवें के पास डच वैज्ञानिक क्रिश्चियन हायजेन्स द्वारा प्रदत्त एक अलंकृत घड़ी थी। 1 सितम्बर 1715 को प्रातःकालीन बेला में 7.45 पर अचानक राजा की मृत्यु हो गई। तब से आज तक उस घड़ी में 7.45 ही बजे हैं। उस घड़ी को सुधारने के अनेकों प्रयत्न किये गये परन्तु एक भी प्रयास सफल नहीं हुआ। सुइयाँ यथावत 7.45 पर ही टिकी हुई हैं।

नोयल न्यूट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिस्ट्री डि टोक्यो’ में एक अभिशप्त प्राणघातक’ वस्त्र किमोनो का वर्णन किया है। इस वस्त्र को एक के बाद दूसरी ओर तीसरी किशोरियों ने धारण किया और पहनने के बाद ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। इस दुर्भाग्यशाली किमोनो को फरवरी 1657 में एक जापानी पादरी ने आग लगा दी। उसी वक्त भयानक आँधी आई और भयंकर लपटें उठने लगीं और नियन्त्रण से बाहर हो गईं। बढ़ती हुई आग ने टोक्यो के तीन-चौथाई भाग को भस्मीभूत बना दिया, जिसमें 300 मन्दिर, 500 महल, 9000 दुकानें, 61 पुल ध्वस्त हो गये और एक लाख व्यक्तियों की जानें गई।

जान माइकेल और रोबर्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “फेनामिनाः ए बुक ऑफ वर्न्डस” में एक दुर्घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि 1975 में एक व्यक्ति मोपेड पर सवार बरमूडा की सड़क से गुजर रहा था कि अचानक उसकी भिड़ंत एक टैक्सी से हो गई और वह वहीं ढेर हो गया। इस घटना के ठीक एक वर्ष बाद उसी दिन उसका छोटा भाई बरमूडा की उसी सड़क पर अपने की उसी मोपेड पर बैठा जा रहा था कि सामने से आती हुई टैक्सी से दुर्घटनाग्रस्त होकर वहीं मर गया। यह वही टैक्सी थी जिसने उसके भाई की जान ली थी और संयोग से वही व्यक्ति उस टैक्सी ड्राइवर के साथ गाड़ी में बैठा था जो एक साल पहले बड़े भाई की दुर्घटना के समय टैक्सी पर सवार था।


समुद्र की ओर (kahani)

समुद्र की ओर बही जा रही नदी अपने नाम और रूप को त्यागकर समुद्र में विलीन हो जाती है, उसी तरह ज्ञानी नाम-रूप का त्याग कर दिव्य पुरुष में लीन हो जाते हैं। -— मुंडकोपनिषद्

मनुष्य ने अपने विकास क्रम में लम्बी यात्रा की है इसमें उसे बहुत कुछ मिला भी है। प्रकृति का अनुसंधान करते-करते वह अन्यान्य प्राणियों की तुलना में इतना समृद्ध, समर्थ और समुन्नत बना है। उस प्रक्रिया को मात्र भौतिक क्षेत्र तक ही सीमित न रखकर चेतना की रहस्यमयी परतों को समझने का भी प्रयत्न चलना चाहिए। अनुसंधान का यह क्षेत्र और भी अधिक महत्वपूर्ण है। अदृश्य जगत के साथ घनिष्ठता स्थापित कर सकना प्रगतिशील एवं खोजप्रिय मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है। दुर्भाग्यों का कारण और निवारण समझा जाना चाहिए और सौभाग्यों की उपलब्धि का मार्ग खोजा जाना चाहिए। इसके लिए और आध्यात्मिक अनुसंधानों में हमारी अभिरुचि और तत्परता की अधिक बढ़ोतरी आवश्यक है।


मानवी विलक्षणताओं के आधार की अभिनव खोज

मनुष्य कमाने खाने में ही आमतौर से अपनी सामर्थ्य लगाता रहता है। इतने में ही उसकी क्षमता खप जाती है। किन्तु यदि ध्यान दिया और प्रयास किया जा सके तो यह रहस्य भी प्रकट हुए बिना न रहेगा कि वह इससे अधिक भी बहुत कुछ है जैसा कि सामान्यतया प्रतीत होता है। उसमें अध्यात्म स्तर की कितनी ही विलक्षण क्षमताएँ विद्यमान हैं। उनके उभारने और उपयोग करने की विद्या जानी जा सकें तो उस आधार पर सामर्थ्य का एक स्त्रोत हाथ लग सकता है। इस संबंध में मूर्धन्यों ने उत्साहपूर्वक प्रयास भी आरम्भ कर दिया है-

अमेरिका के विस्कासिन विश्व विद्यालय में-वाशिंगटन विश्वविद्यालय में- ओकलैण्ड विश्वविद्यालय में अब विधिवत् तन्त्र और मन्त्र को पढ़ाया जा रहा है उन्हें दर्शन और विज्ञान का एक समन्वित विषय के रूप में मान्यता मिल गई है। रहस्यवाद को अब “दि रेटोरिक ऑफ डस्ट” (कुहरे का मूक भाषा) कहा जाने लगा है और उस पर पड़े हुए पर्दे को हटाकर वस्तुस्थिति समझने का प्रयत्न किया जा रहा है। शारीरिक और मानसिक चिकित्सा के लिए जिन उपाय उपचारों का पर्यवेक्षण हो रहा है उनमें एक विषय मानसोपचार के सहधर्मी झाड़-फूँक को भी सम्मिलित कर लिया गया है। ओकलैण्ड विश्वविद्यालय में इसके सिद्धान्त और प्रयोग परीक्षण, निर्धारित पाठ्यक्रम के अंग बना लिये हैं।

ड्यूक विश्वविद्यालय के डा. जोसेफ राइन के प्रयोगों के उपरान्त विभिन्न देशों में ऐसे शोध प्रयासों की होड़ लगी जो मानवी विलक्षणताओं के अस्तित्व एवं कारण की जाँच पड़ताल में निरत है। ब्रिस्टन विश्वविद्यालय के राबर्ट डान ने संकल्प शक्ति द्वारा उत्पन्न किये जा सकने वाले अनेक चमत्कारों की पुष्टि की है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा. ब्रायन जोसेफ मैन क्वान्टम ने यान्त्रिकी के सिद्धान्तों की अधिक विस्तृत व्याख्या करते हुए बताया कि परामनोविज्ञान भी भौतिक शास्त्र से भिन्न नहीं है। चेतना क्षेत्र में पाई जाने वाली विलक्षणता को मान्यता देने की उन्होंने सिफारिश की है। वैज्ञानिक लियोनिद् वासिलयेव भी इन तथ्यों पर समय से प्रयोग परीक्षण कर रहे हैं और इस निष्कर्ष पहुंचेंगे कि मानवी कलेवर में सन्निहित विलक्षणताओं को समझने और उन्हें प्रयोग में लाने की महत्ती आवश्यकता है। इससे मनुष्य अधिक समर्थ बन सकेगा।

अतीन्द्रिय क्षमताओं एवं अलौकिक घटनाओं के प्रमाण अब इतनी अधिक संख्या में सामने आने लगे हैं कि इनका कारण ढूँढ़ने के लिए मनीष को विवश होना पड़ा है। कभी यह बातें अन्ध विश्वास या किंवदंती कहकर ‘हँसी’ में उड़ाई जा सकती थी। किन्तु अब और विश्वस्त परीक्षण की कसौटी पर खरे उतरने वाले प्रमाणों की संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसी दशा में प्रकृति के विज्ञात नियमों से आगे बढ़कर यह देखना पड़ रहा है कि इन रहस्यों के पीछे किन सिद्धान्तों एवं कारणों का समावेश है।

धर्म धारणा वाले लोगों तक अब अध्यात्म मान्यताओं का क्षेत्र सीमित नहीं रह गया है। वरन् आस्तिकों की तरह ही नास्तिकों ने भी उस खोज-बीन में समान रूप से उत्साह प्रकट करना एवं भाग लेना आरम्भ कर दिया है, सुशिक्षित वर्ग का रुझान इस ओर मुड़ा है। न्यूयार्क विश्व विद्यालय के मनोविज्ञानी महलान वेगनर ने नेतृत्व में चले एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका के प्राध्यापकों में 9 प्रतिशत अतीन्द्रिय क्षमता को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हैं और 45 प्रतिशत इसी प्रबल सम्भावना मानते हैं। इस दिशा में साम्यवादी देशों के विज्ञानवेत्ता भी कम रुचि नहीं ले रहे हैं। ईश्वर और देवताओं के अस्तित्व पर विश्वास न करते हैं जिसे अब तक की जानकारी से अधिक आगे का प्रतिपादन कहा जा सके। मनुष्य में पाई जाने वाली ऐसी विलक्षणताओं को उन्होंने स्वीकार किया है जिसकी शरीर विज्ञान या पदार्थ विज्ञान के साथ सीधी संगति नहीं बैठती। अस्तु यथार्थता की खोज में वे भी पूर्वाग्रहों को छोड़कर आगे बढ़े हैं।


सामान्य शरीर में असामान्य विलक्षणताएँ

मानव शरीर देखने में हाड़-माँस का बना और सीमित सामर्थ्य के सहारे सीमित कार्य कर सकने वाला प्रतीत होता है। उन्हें उसके अन्तराल में छिपी रहस्यमयी शक्तियों का यदा-कदा आभास मिलता है तब विदित होता है कि वह उतना तुच्छ नहीं जितना कि आमतौर से समझा जाता है।

सोने, खाने, चलने, दौड़ने, करने की दृष्टि से मनुष्यों के बीच थोड़ी ही न्यूनाधिकता रहती है। शेष सभी लोग मिलते-जुलते परिणाम में खाते, पहनते देखे जाते हैं। इतने पर भी जब काया में सन्निहित विलक्षण क्षमताओं का प्रमाण परिचय सामने आता है तब आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। सामान्य बुद्धि यह समझने में असमर्थ ही रहती है कि सीमित लम्बाई, मुटाई, ऊँचाई एवं वजन का मनुष्य किस प्रकार अद्भुत सामर्थ्यों का धनी हो सकता है।

13 अगस्त 1931 को ‘न्यूयार्क हेराल्ड ट्रिब्यून’ ने जैक्सनबाइल, फ्लोरिडा के विश्व प्रख्यात तैराक एन्जिलो फैटीकोनी के दुःखद निधन का समाचार प्रकाशित किया था-शीर्षक था-“ह्यूमन कार्क इज डेड, हिज सेक्रेट अनरिवील्ड”। फैटीकोनी तैरते समय अपने शरीर को इतना हल्का बना लेता था मानो लकड़ी का कोई टुकड़ा पानी पर तैर रहा हो। 15 घण्टे लगातार 20 पौण्ड वजन को अपने टखने से जकड़कर बिना किसी असुविधा के आराम से तैरता रहता था। पानी पर सो सकता था, अपने शरीर को गेंद के आकार में ढालकर कार्क की तरह तैरते रहना उसकी विशेषता था। एक बार उसे एक वजनदार कुर्सी से बाँधकर तैरने के लिए कहा गया। इस चुनौती को उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया और तैरकर अपने शारीरिक हल्केपन और उत्प्लाविकता का प्रदर्शन किया।

नाथन कोकर का जन्म 1814 ई. में एक दास परिवार में मेरीलैण्ड के हिल्सबोरो कस्बे में हुआ था। कोकर के मालिक के बचपन में ही इसे हेनर के हाथों बेच दिया। हेनरी ने बिशप एमरी और एमरी ने इस दास बालक को प्रूनेल नामक बकी के हाथों बेच दिया। प्रूनेल बहुत ही क्रूर एवं निर्दयी प्रकृति का व्यक्ति था। कोकर से रात दिन काम लिया करता और बदले में उसे मिलती डण्डे की मार और स्वल्प भोजन। नाथन सदैव भूख से छटपटाता रहता। इस तड़पन ने नाथन को नये आविष्कार करने के लिए प्रोत्साहित किया।

नाथन एक दिन रसोई घर में अकेला था और सामने चूल्हे पर मालिक के नाश्ते के लिए मालपुआ बना रहा था। नाथन ने बर्तन में खौलते वक्त गरम मालपुए में हाथ डाला और निकालकर खा गया। शाम को गरम खौलते पानी में से बसा के कुछ टुकड़े निकालकर खाया और खौलती हुई गरम कॉफी पी गया। इतना गरम खाने के बाद भी नाथन के न तो हाथ जले और न जीभ। यही आदत नाथन की दिनचर्या का एक अंग बन गई।

कुछ वर्षों बाद कोकर प्रूनेल की नौकरी छोड़कर डेन्टन शहर में लोहारी का धन्धा करने लगा। धधकती भट्टी में हाथ डालकर रक्त वर्ण गरम लौह पिण्ड निकालना, जलते अंगारे हाथ पर घण्टों रखे रहना उसका दैनिक व्यवसाय बन गया। कोकर के करामातों की चर्चा मैरीलैण्ड के पत्र पत्रिकाओं में सुर्खियों में प्रकाशित होने लगे। वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और सम्पादकों की एक टीम ने नाथन कोकर की दृढ़ इच्छा शक्ति और उसके फायर फ्रूफ हाथों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। हाथों में कोई जादू, रसायन कुछ भी न था। लाल अंगारों को भट्टी में से निकालने के लिए कोकर से कहा गया। कोकर ने अंगारों को हाथ पर ऐसे उठा लिया जैसे जली हुई राख। इस प्रक्रिया को तीन चार बार करके दिखाने के बाद नाथन कोकर ने पिघले शीशे को मुँह में डाला और देर तक मुँह में हिलाता रहा। और थोड़ी देर बाद मुख से बाहर निकाल दिया। मुख, जिह्वा में आँच तक नहीं लगी और न फफोले पड़े।

इस साहस का रहस्योद्घाटन करते हुए नाथन ने उपस्थित वैज्ञानिकों को बताया कि विषम परिस्थितियों में दृढ़ इच्छा शक्ति और विश्वास ने उसे इस योग्य बनाया है कि अग्नि भी उसे नहीं जला सकती।

सुप्रसिद्ध लेखक श्रीमती अलेक्जेण्ड्रा डेविड नील ने अपनी पुस्तक “मैजिक एण्ड मिस्ट्री इन तिब्बत” ने लिखा है कि तिब्बत के योगी बौद्ध 1100 से 18000 फीट की ऊँचाई पर स्थित बर्फीली चोटियों पर निवास करते और साधनारत रहते देखे गये हैं। अलेक्जेण्ड्रा ने 14 वर्षों तक इनकी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया और पाया कि तिब्बत के योगी अत्यधिक सर्दी के दिनों में जब नदी, झरनों का पानी जम जाता है, वे नंगे बदन अथवा एक पतले कपड़े को शरीर पर लपेटकर साधना करते रहते हैं। बर्फ में एक गहरा गड्ढा खोदकर उसी में बैठ जाते हैं और रात भर चन्द्रमा की शीतल रोशनी में साधना करते रहते हैं। कड़ी ठण्डक का उनके शरीर के ऊपर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

नवदीक्षित योगियों को सर्वप्रथम ठण्डी रात में अपने बदन पर बर्फ से भीगे हुए कपड़ों के टुकड़ों को लपेटकर सुखाना पड़ता है। यह प्रक्रिया रात भर चलती है और लगभग 40 टुकड़े बदलकर नंगे बदन पर सुखाते हुए तपस्या करते रहते हैं। धीरे-धीरे शरीर के तापमान को नियन्त्रित करने की क्षमता जागृत हो जाती है और वे तपस्वी लम्बे समय तक खुले बदन बर्फ के गड्ढों में-गुफाओं में ध्यानमग्न बैठे रहते हैं।

यौगिक प्रक्रियाओं के माध्यम से शरीर के किसी एक अंग अवयव या हिस्से का तापमान घटाया अथवा बढ़ाया जा सकता है। भारतवर्ष और तिब्बत के योगियों पर 1981 में दलाई लामा के निमन्त्रण पर हारवर्ड मेडिकल स्कूल के चिकित्सकों के एक दल ने डा. हर्बर्ट बेन्सन की अध्यक्षता में प्रयोग परीक्षण किया। ध्यान के द्वारा साधक योगियों ने अपने हाथ और पेट की अंगुलियों का तापमान सामान्य तापमान से 15 डिग्री फारेनहाइट बढ़ा लिया था जबकि अन्तरंग का तापमान सामान्य बना रहा।

डा. बेन्सन इस निष्कर्ष पर पहुँचे की ध्यानावस्था में संकल्प बल से त्वचा में उपस्थित रक्तवाहनियों को फैला दिया जाता है जिससे उस अंग में रक्त का संचालन बढ़ जाता है फलतः उस स्थान का तापमान भी बढ़ जाता है। बर्फीली चोटियों पर साधनारत योगी अपने शरीर की रक्तवाहनियों को संकुचित कर लेते हैं और शरीर का तापमान वातावरण के अनुकूल बना लेते हैं।

प्रथम विश्वयुद्ध के समय जिवरपूल, इंग्लैण्ड के एक सिपाही जैक ट्रेनर को घायलावस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया। ट्रेनर को दो गोलियाँ लगी थी एक सिर में दूसरी दाहिने बाँह में। मूर्धन्य चिकित्सकों ने ट्रेनर को विकलाँग घोषित कर दिया और सरकार की ओर से विकलाँगता पेन्शन मिलने लगी।

सन् 1923 में ट्रेनर एपीलेप्सी का शिकार बन गया। अब वह चल फिर भी नहीं सकता था। उसी वर्ष वह अपने परिवार के साथ लार्डस् फ्राँस गया और एक सामुदायिक स्नानागार में स्नान किया। चौथे दिन एकाएक अपने बिस्तर से नीचे कूद पड़ा और जाकर स्नान किया, कपड़े बदले। अब वह पूर्ण स्वस्थ हो चुका था। गोलियों के घाव भर गये थे और बिना किसी सहारे के वह चल फिर सकता था।

मानव शरीर की संरचना सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में हुई है। नियन्ता ने अपनी सभी विशेषताओं को बीज रूप से उस छोटी-सी तिजोरी में सुनियोजित रूप से संजोकर रखा है। सामान्यतया उस भण्डार में से मनुष्य उतना ही उपयोग कर पाता है, जितनी कि उसकी वास्तविक इच्छा आवश्यकता एवं पात्रता है। जब स्तर में वृद्धि होती है तो वह चाबी भी हाथ लग जाती है जिसमें विभूतियों के भण्डार का ताला खोला और उसमें से उपयुक्त वैभव निकाला और काम में लाया जा सके।

कभी-कभी फटे कपड़े में से अवयव, चमड़ी फट जाने पर माँस दीखने लगता है। ठीक इसी प्रकार कभी-कभी तो अनायास भी कायगत विलक्षणताओं का आभास मिलने लगता है पर विधि पूर्वक प्रयत्न करने से यह सम्भव हो सकता है कि चमड़े से ढके शरीर में से सन्निहित विशिष्टताओं को जगाया और काम में लाया जा सके।


डॉक्टर कोवूर और उनकी चुनौती

संसार भर के प्रमुख अखबारों के माध्यम से सन् 1963 में श्रीलंका के एक मनीषी डा. अब्राहम कोवूर ने एक चुनौती प्रकाशित कराई थी, जिसका साराँश इस प्रकार था-

“यदि कोई तथाकथित भगवान, सिद्ध, योगी, सन्त अपनी आध्यात्मिक सिद्धियों या ईश्वरीय वरदानों से सम्पन्न होने का दावा सिद्ध कर दिखायेगा तो उसे श्रीलंका की मुद्रा से एक लाख रुपये का पुरस्कार उपलब्ध होगा। किन्तु उसे उन परीक्षणों में होकर गुजरना पड़ेगा जिससे चालाकी के लिए गुंजाइश न रहे। यह चुनौती मेरी मृत्यु अथवा प्रथम विजेता के मिलने तक खुली रहेगी।”

अब्राहम टी. कोवूर, तिरुवल्ला, उद्घोषक पापन कडालेन कोलम्बो-6।

यह चुनौती अब तक किसी ने भी स्वीकार नहीं की है। जिनकी इस संदर्भ में ख्याति थी उन सभी को उनने व्यक्तिगत पत्र लिखे और कहा कि-“इस चुनौती को स्वीकार करने में उनका दुहरा लाभ है एक तो इससे भ्रान्तियों से उबर कर किसी सचाई तक पहुँचने का अवसर सर्वसाधारण को मिलेगा दूसरा यह कि यदि वे वस्तुतः चमत्कारी होंगे तो इस आधार पर उनकी प्रामाणिक ख्याति भी फैलेगी। इस आधार पर वे स्वयं तो लाभान्वित होंगे ही अन्य लोगों को भी उनके द्वारा लाभ मिलेगा।”

आश्चर्य है कि चुनौती एक ने भी स्वीकार न की जबकि चमत्कारों के दावेदार सैकड़ों हैं। डा. कोवूर कलकत्ता में कोट्टायम के कॉलेज में वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता थे। बाद में वे श्रीलंका के जाफना कॉलेज में चले गये, इसके अतिरिक्त वे पढ़ाते भी रहे और अन्ततः हर्स्टन कॉलेज में विज्ञान विभाग के अध्यक्ष पर से रिटायर हुए। वे केरल के एक पादरी परिवार में जन्मे थे। बहुत समय तक धार्मिक वातावरण में रहने के उपरान्त भी अपने वैज्ञानिक मानसिक धरातल के कारण चमत्कारवाद के पीछे छिपा थोथापन रुचा नहीं और सत्य शोधक की तरह अपनी मान्यताएँ वे प्रकट करने लगे।

उनने इस संबंध में पता लगाने के लिए भुतहे मकानों में रहना आरम्भ किया। श्मशानों और कब्रगाहों के सुनसान में कितनी ही रातें बताईं। मन्त्र-तन्त्र करके हानि पहुँचाने वालों को खुली चुनौतियाँ दी। इसके बावजूद उन्हें ऐसा कुछ लगा नहीं जिसके आधार पर किसी असाधारण चमत्कार से उनका पल्ला पड़ा हो। भारत और कोलम्बो में उनकी इस निवासावधि में जाने-माने तान्त्रिकों व तथाकथित चमत्कार दिखाने वाले बाबाओं से भी मिले लेकिन उन्हें उपेक्षा ही मिली, अपने प्रश्न का उत्तर नहीं।

धार्मिक अन्धविश्वासों के विरुद्ध उनने अनेकों व्याख्यान दिये। कई देशों में घूमे और चमत्कारी लोगों से जा-जाकर मिले। ऐसे लोग जिन चालाकियों से भावुक लोगों को बहकाते हैं उनका भंडाफोड़ उनने अपनी पुस्तक “बिगान राडमैन-एनकाउन्टर्स विद स्प्रिचुअल फ्राड्स” में किया है। उनने पत्र-पत्रिकाओं में इस संदर्भ में अनेकों लेख भी लिखें।

उनने ऐसे लोगों की भी खरब ली जो अपने को अवतार बताते थे और कहते थे कि उन्होंने भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती गान्धी और राष्ट्रपति राधाकृष्णन को हवा में से शिवलिंग प्रकट करके प्रदान किया। इसकी सत्यता जानने के लिए डा. कोवूर ने दोनों को पत्र लिखें। श्रीमती गान्धी के निजी सचिव ने उत्तर देते हुए इस घटना को सर्वथा बेबुनियाद बताया।

डा. कोवूर ने एक लेख प्रकाशित कराया जिसमें “साईं बाबा को कपटी अवतार” बताया। इसके उत्तर में उनके एक भक्त डा. एस. भागवतम् ने उस आरोप का खण्डन किया और लिखा-“साईं बाबा के अनेकों चमत्कार बहुचर्चित हैं। इनमें से एक यह भी है कि जापान का एक घड़ी उत्पादक एक नई मशीन के बारे में कुछ पूछने आया था। मशीन उसके बक्से में बन्द थी। वह भीड़ में बैठा था। साईं बाबा ने उसे पास बुलाया और हवा में हाथ हिलाकर वह घड़ी उसकी हाथ में थमा दी। जो उसके बक्सों में बन्द थी। इस पर वह जापानी साईं बाबा के चरणों में गिर पड़ा उन्हें भगवान मानने लगा और भक्त बन गया।”

इस घटना के संबंध में भी डा. कोवूर ने सचाई जानने की कोशिश की जापानी दूतावास की मारफत उस “सीको” घड़ियों के कथित निर्माता “रोजी हलोरी” को पत्र लिखा तो कम्पनी के अध्यक्ष ने लिखा कि “न मेरा, न मेरे स्टाफ के किसी व्यक्ति का साईं बाबा से कोई परिचय है। निश्चय ही यह खबर सर्वथा मन गढ़न्त और धूर्तता पूर्ण है।”

कोवूर ने प्रख्यात ज्योतिषियों को भी यह चुनौती दी कि वे कुण्डलियाँ देखकर मात्र किसी के स्त्री या पुरुष होने की बात बता दें। पाँच प्रतिशत गलतियों को भी वे नजर अन्दाज करने को तैयार थे। पर उनमें से कोई तैयार न हुआ। उलटे डराने के लिए एक गंडा ताबीज भेजते रहे कि उनके पहुँचते ही उनका अनिष्ट होगा। पर वैसा भी कहीं कुछ हुआ नहीं।

अपने व्याख्यानों के दौरान उनने कई बार हवा में हाथ हिलाकर “भभूत” पैदा की उसे दर्शकों को बाँटा। इससे चमत्कृत हुए लोगों को अपना कोट उतार कर उसमें जहाँ-तहाँ छिपी हुई ‘भभूत’ को दिखाया और कहा यह हाथ की सफाई के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ऐसा करने वाले अन्य लोग यदि कपड़ों की तलाशी देने के बाद भी ऐसी ही भभूत पैदा कर सकें तो उनकी घोषणा के अनुसार एक लाख रुपया जीत सकते हैं।

डा. कोवूर मात्र खण्डन परक ही काम नहीं करते रहे। उनने मनोविज्ञान और परामनोविज्ञान पर बहुत अधिक काम भी किया है। विज्ञान उनका विषय रहा है इसलिए चेतना क्षेत्र की गहरी जानकारियों को व सत्यता को लोगों तक पहुँचने के संबंध में उनकी ख्याति समस्त संसार में रही है। यही कारण है कि प्रथम तथा एक मात्र इसी शोध कार्यों के उपलक्ष में अमेरिका के मिनिसोटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फिलासाफी ने उन्हें “डाक्टरेट” की उपाधि प्रदान की।

डा. कोवूर का मत था-अध्यात्म मार्ग के अवलम्बन से मनुष्य की प्राण प्रतिभा का विकास होता है। इस मार्ग पर चलने वाले अपना व्यक्तित्व महामानव स्तर पर विकसित कर सकते हैं। ऐसे लोगों में सत्परामर्श देकर तद्नुकूल आचरण करने के लिए अन्य लोगों को सहमत करने की क्षमता पाई जाती है। अपने समय एवं संपर्क के वातावरण में उत्कृष्टता का अभिवर्धन भर उनसे बन पड़ता है। यह विशेषता विभूतियाँ या सिद्धियों कहीं जा सकती है। पर यह नहीं हो सकता है कि ऐसे लोग मदारी बाजीगर जैसे कौतुक दिखाते फिरे। कौतुक दिखाकर लोगों पर अपनी अलौकिकता प्रकट करना और उस आधार पर उनकी श्रद्धा का दोहर करना किसी भी प्रकार अध्यात्म विज्ञान से संगति नहीं खाता। सच्चे अध्यात्मवादी चमत्कार प्रदर्शित करके बुद्धि भ्रम उत्पन्न नहीं करते। जो ऐसा करते हैं वे मदारी भर हो सकते हैं। अध्यात्मवादी नहीं।”

डा. कोवूर की चुनौती स्वीकार करने वाला एक भी आगे नहीं आया, इससे सिद्ध होता है कि सिद्धि चमत्कारों के नाम पर प्रचलित कौतुक कौतूहलों में कोई दम नहीं। वे छलावा मात्र होने के कारण अनैतिक भी हैं। सन्त इस मार्ग को अपनायें, यह हो ही नहीं सकता।


पानी पीने आया (kahani)

हाथी सरोवर में पानी पीने आया। मेंढक ने उसे लात दिखाते हुए कहा-मूर्ख दूसरे के राज्य में प्रवेश करता है, लात खायेगा क्या? हाथी हँस भर दिया और बिना कुछ कहे सुने-हँसाता मुस्कराता वापस लौट गया।

दो विचारशील सरोवर तट पर बैठे, वह दृश्य देख रहे थे। एक ने दूसरे से पूछा-क्षुद्र मेंढक का इतना अहंकार? दूसरे ने कहा-इसमें आश्चर्य ही क्या है? सर्वत्र छुद्रता पर ही अहंकार छाया दीखता है।


देवलोक वासियों का सत्प्रयोजन के लिए धरती पर आगमन

जीव विकास के नवीनतम अनुसन्धान इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं कि मानवी अस्तित्व धरातल पर पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों का संयोग नहीं हो सकता। उससे सूक्ष्म जीवी और कृमि−कीटक भर उत्पन्न हो सकते हैं। वनस्पति उत्पादन से आगे बढ़कर धरती पर पाये जाने वाले जीवाणुओं की चरम परिणति छोटे स्तर के प्राणियों को ही उत्पन्न कर सकती है। उसमें ऐसा कुछ नहीं जो मनुष्य जैसी अद्भुत संरचना में समर्थ हो सके। इस वर्ग के शोधकर्ता यह दावा करते हैं कि मानवी सत्ता किसी अन्य लोक से यहाँ आई हैं। जिस लोक से आई है वहाँ उसका विकास और भी ऊँचे स्तर का हो चुका होगा। इस प्रकार देव लोक की मान्यता के साथ संगति बैठती है और इस मान्यता को बल मिलता है कि अन्य लोक वासी अपनी उत्सुकता को भी मनुष्यों की तरह ही रोक न पा रहे हैं और यहाँ की अधिक खोज-खबर लेकर तद्नुरूप अधिक सघन संपर्क बनाने की कोई योजना बना रहे हों। उड़न तश्तरियों का दृश्य दर्शन सम्भवतः इसी शृंखला की कोई कड़ी हो।

इस संदर्भ में कुछ दृश्य ऐसे भी देखे जाते रहे हैं जिनमें मात्र प्रकाश पुँज या वायुयान स्तर की कोई वस्तु आकाश में उड़ती, दिशा बदलती, डुबकी या छलाँग लगाती देखी गई। यह प्रकृति कौतुक रहा होता तो उसका प्रवाह एक दिशा में चलता रहा और उल्कापात जैसा दृष्टिगोचर होता, किन्तु बुद्धिमानों जैसी उलट-पुलट होते देखकर यह सोचा जाता है कि इसके पीछे किन्हीं बुद्धिमानों की इच्छा या योजना जुड़ी होनी चाहिए।

अब कुछ ऐसे भी उदाहरण सामने आये हैं जिसमें इन उड़न तश्तरियों के साथ वस्तुएँ निकलती पाई गई हैं और बुद्धिमानों द्वारा सम्भव हो सकने वाली हरकतें-हलचलें देखी गईं। इसमें इस विश्वास की पुष्टि होती हैं कि उड़न तश्तरियों के पीछे लोकान्तर वासियों के योजनाबद्ध प्रयासों का समावेश हो सकता है।

अक्टूबर 1973 में पैस्कागोला (मिसीसिपी) के सन्निकट रहने वाले मछुआरे ने तीन ऐसे विलक्षण व्यक्तियों को उड़न तश्तरियों से उतरते देखा जिनके हाथ केकड़े का सदृश दिखाई दे रहे थे। यूफो ऐक्सपीरियेंस -साइन्टिफिक इनक्वारी के लेखक डा. जे. ऐलन हाईनेक ने इस घटना का सविस्तार उल्लेख किया है।

22 अक्टूबर 1975 को एक इंजीनियर को कौविटन के समीप एक चक्राकार वस्तु घूमती हुई दिखाई पड़ी। यह दृश्य उन्होंने दूरबीन की सहायता से नगर निगम की इमारत के ऊपर चढ़कर देखा।

गौर्डन कूपर को अन्तरिक्ष विज्ञान के इतिहास में अग्रणी समझा जाता है जिन्होंने अपने मर्करी और जैमिनी यान द्वारा लम्बी से लम्बी यात्रायें पूरी की। यूफो के बारे में उनका कहना है कि ये अंतर्ग्रही वाहन हैं जिन्हें ऐन्टी ग्रेविरी प्रोपेल्शन के प्रयोग में लाया जाता है। इसका रहस्योद्घाटन उन्होंने 1950 में किया।

अपहरण की घटनायें भी उड़न तश्तरियों के संबंध में आये दिन घटित होती देखी जा सकती है। ऐरियल फैनोमिना रिसर्च आर्गनाइजेशन’ के संचालक श्रीमती लारेजन के अनुसार 13 अगस्त 1975 को स्टाफ सार्जेन्ट चार्ल्स मूडी के अपहरण की चर्चा को भुलाया नहीं जा सकता। जिसे किसी अलौकिक परछाई ने हवाई जहाज से अचानक गायब कर दिया। यह घटना अलामोगोर्डा (न्यू मैक्सीको) की हैं। मूडी 1 घण्टा 20 मिनट तक गायब रहा। तत्पश्चात् वापस लौटा तो उसने बताया कि जिस व्यक्ति ने मेरा अपहरण किया वह पाँच फीट लम्बा, बड़ा सिर, भूरे रंग की चमड़ी तथा गोल गहरी आँखों का था। उसके शरीर के सभी वस्त्र चमड़े के बने ही प्रतीत होते थे जिससे वह ऊपर से नीचे तक ढका हुआ था।

पुल्किनान (फिनलैण्ड) की दो लड़कियों ने दिसम्बर 1972 को गुम्बजाकार उड़न तश्तरियों को आकाश में चक्कर लगाते हुए देखा। जिसका प्रकाश लाल के रंग था। जैसे ही लड़कियों के ऊपर ये प्रकाश किरणें पड़ीं तो दोनों का शरीर सिर से पैरों तक लकवा जैसी स्थिति में हो गया। लड़कियों की इतनी दुर्दशा हो गयी कि उनमें सुनने तथा श्वास लेने की क्षमता तक नहीं रही। उनमें से एक लड़की ने साहस किया और कपकपाती हुई सहायतार्थ अपने एक सहयोगी के पास जा पहुँची। उसके सारे कपड़े धूल से लथपथ सने हुए थे। इसी घबराहट में उसका एक जूता भी गायब हो गया।

उड़न तश्तरियों में से उतरते हुये ऐसे विलक्षण जीवों को देखा गया है जिनकी बनावट भूलोक के व्यक्तियों से भिन्न होती है। ऐसी ही एक घटना अगस्त 1961 में रोजर्स केन्टिकों में घटी। क्विन्स नाम की एक महिला अपनी दो बच्चियों के साथ अपने कृषि फार्म के निरीक्षण हेतु गयी। वहीं पर उसने उड़नतश्तरी के दृश्य को देखा। एक विलक्षण परछाई ने श्रीमती विन्स का पीछा उसके बैडरुम तक किया। विन्स अपनी छोटी लड़की स्कैट के साथ सोई हुई थी। रात को डेढ़ बजे उसकी आँखें अचानक खुलीं तो उसने एक भयावह दृश्य को देखा। गोल-मटोल सिर का-बिना नाक का एक विलक्षण व्यक्ति उसके बिस्तर के पास खड़ा हुआ था। बिन्स उसे देखकर काँप उठी। प्रातःकाल उसने अपने पति के साथ रोजर्स को छोड़ने तथा मिडिल टाउन (ओहियो) में निवास स्थान बनाने का दृढ़ निश्चय किया।

सन् 1950 की बात है। डा. बोटा नामक एक वैज्ञानिक ने पैम्पास में किसी निर्माण योजना में लगे थे। यहीं पर बहीया ब्लैका एक ऐसा स्थान है जहाँ पर यह घटना घटी। वह अपनी कार को 75 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से चला रहे थे कि एक चमकती हुयी उड़न तश्तरी सुनसान क्षेत्र में ऊपर चक्कर काटते हुए नीचे उतरी और हरी-भरी घास पर उसके लोग विश्राम जैसी मुद्रा में देखे गये। इन लोगों की ऊँचाई 4 फीट की थी उनके चेहरे बिल्कुल काले पाये गये। बोटा ने अपनी कार को तेजी की रफ्तार से दौड़ाया और एक होटल के पास आ पहुँचा। वहाँ पर उसके दो मित्र मिले जिनके हाथ में कैमरा व रिवाल्वर थी। वापस फिर घटना स्थल पर लौटें तो उन्हें एक राख का ढेर देखने को मिला। डा. बोटा ने उस राख की ढेरी में हाथ दिया तो बैंगनी रंग से रंग गया और लम्बे अर्से तक यह रंग उनके हाथ से नहीं छूटा। कुछ दिन बाद उन्होंने देखा कि तीन उड़न तश्तरियाँ वहाँ पर घूमती हुयी स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये 100 मीटर व्यास वाली तश्तरियाँ 600 मीटर की ऊँचाई पर डा. बोटा को साफ दिखाई दी। उनका चित्र भी डा. बोटा द्वारा उतारा गया है। इस दृश्य को देखने के एक सप्ताह बाद ही डा. बोटा को बड़े जोर से बुखार ने घेर लिया जिसका उपचार किसी चिकित्सक से होना सम्भव नहीं हो पा रहा था। उसकी चमड़ी फफोलों से लद गयी। यद्यपि चिकित्सकों ने विकिरणों के कुप्रभाव का भी उपचार किया फिर बात नहीं सधी।

यूनियन टाउन, फैटेकाउन्टी (पेन्सिलवेनिया) में 6 फरवरी 1974 को एक ऐसी घटना घटित हुयी जिसमें लम्बे पैरों का एक व्यक्ति उड़न तश्तरी से उतरते हुये पृथ्वी पर देखा गया। म्यूचल यूफो नैट वर्क के डायरेक्टर जो पेन्सिलवेनिया प्रदेश में रहते हैं, उन्हीं के द्वारा इस घटना को उल्लेखित किया गया है। इसी प्रकार की 118 विलक्षण घटनाओं को गौर्डन महोदय प्रामाणिक सिद्ध कर चुके हैं। जिसमें उड़न तश्तरियों से नीचे आने वाले विचित्र काया के लोगों का वर्णन किया गया है।

उड़न तश्तरी अनुसन्धान केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार अब तक 1500 घटनाओं का पता लगाया जा चुका है जिसमें ऐसे व्यक्तियों का अस्तित्व पाया गया है जिनकी कायिक संरचना भूलोक के प्राणियों से बिल्कुल भिन्न स्तर की पायी गयी है।

यदि अन्य लोकों के बुद्धिमान प्राणी धरातल पर आते हैं तो हमें इससे भयभीत होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। यह सोचना सही नहीं कि वे लूटपाट करने या अपहरण आधिपत्य करने जैसी योजना बनाकर यहाँ आ रहे हैं। ऐसा चिन्तन और आचरण तो अविकसित और

अनगढ़ लोगों का ही हो सकता है। उदारमना सदा व्यापकता, उदारता, आत्मीयता और सहायता की बात सोचते हैं जैसाकि देवताओं के सम्बन्ध में आमतौर से सोचा जाता है। समुन्नत लोगों की पहचान की यह है कि आवश्यकताएँ स्वल्प और उत्पादन अधिक रखें ताकि अपने लिए माँगने या चाहने की आवश्यकता ही न पड़े। दूसरों की सहायता कर सकने की इच्छा तथा सुविधा बनी रहे। पुरातन काल के सतयुगी देवमानव इस धरती पर भी ऐसी ही स्थिति में थे। उठने समस्त संसार को स्वयं जा-जाकर अनुदान बाँटे थे। समुन्नत लोगों के निवासियों की भी ऐसी ही स्थिति हो सकती है। ऐसी दशा में उनसे यह भय करना व्यर्थ है कि पृथ्वी निवासियों को कोई कष्ट देने के लिए इतनी लम्बी यात्राएँ करके यहाँ तक पहुँचने का भारी श्रम करेंगे। ऐसा तो अपनी ही क्षुद्रता है जो अणु आयुधों के भण्डार जमा करके महाप्रलय जैसी विनाशलीला का सरंजाम जुटाने में निरत हैं।

उड़न तश्तरियाँ धरती निवासियों को आहत करें और उनमें आने वाले हमें त्रास देंगे ऐसा सोचना व्यर्थ है यदि उनमें समुन्नत लोकों के कोई श्रेष्ठ लोग आ रहे होंगे तो उनसे यही आशा की जानी चाहिए जिससे इस धरती का कल्याण हो। अनादि काल में मनुष्य रूप में यदि वे जीवन तत्व यहाँ बखेर गये हैं तो यह आशा क्यों न की जाय कि वे इस बार देव प्राणियों के सृजन और देवलोक जैसी परिस्थितियाँ बनाने की कोई योजना साथ लेकर आ रहे होंगे।


वन विहार को निकले (kahani)

एक राजा थे वन विहार को निकले। रास्ते में प्यास लगी। नजर दौड़ाई एक अन्धे की झोपड़ी देखी। उसमें जल भरा घड़ा दूर से ही दीख रहा था।

राजा ने सिपाही को भेजा और एक लोटा जल माँग लाने के लिये कहा। सिपाही वहाँ पहुँचा और बोला- ऐ अन्धे एक लोटा पानी दे दे।

अन्धा अक्कड़ था। उसने तुरन्त कहा- चल-चल तेरे जैसे सिपाहियों से मैं नहीं डरता। पानी तुझे नहीं दूँगा। सिपाही निराश लौट पड़ा।

इसके बाद सेनापति को पानी लाने के लिए भेजा गया। सेनापति ने समीप जाकर कहा अन्धे! पैसा मिलेगा, पानी दे।

अन्धा फिर अकड़ पड़ा। उसने कहा- पहले वाले का यह सरदार मालूम पड़ता है। फिर भी चुपड़ी बातें बनाकर दबाव डालता है। जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा।

सेनापति को भी खाली हाथ लौटता देखकर राजा स्वयं चल पड़े। समीप पहुँचकर वृद्धजन को सर्वप्रथम नमस्कार किया और कहा- “प्यास से गला सूख रहा है। एक लोटा जल दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।”

अन्धे ने सत्कारपूर्वक उन्हें पास बिठाया और कहा- “आप जैसे श्रेष्ठजनों का राजा जैसा आदर है। जल तो क्या मेरा शरीर भी स्वागत में हाजिर है। कोई और भी सेवा हो तो बतायें।”

राजा ने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई फिर नम्र वाणी में पूछा- “आपको तो दिखाई पड़ नहीं रहा है फिर जल माँगने वालों को सिपाही, सरदार और राजा के रूप में कैसे पहचान पाये?”

अन्धे ने कहा- “वाणी से हर व्यक्ति के स्तर का पता चल जाता है।”


अन्तर्ग्रहीय आदान-प्रदान के केन्द्र ध्रुव प्रदेश

मस्तिष्क और हृदय दो केन्द्र होते हैं जो शरीर के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। यों तो महत्व हर अंग अवयव का है। शरीर परिचालन तथा विभिन्न क्रियाकलापों में उनकी अपनी-अपनी भूमिकाएँ हैं, पर जो रोल मस्तिष्क और हृदय का है, अन्य किसी भी कायिक अंग-प्रत्यंग का नहीं है। मस्तिष्क का सामान्य परिचय विभिन्न तन्त्रों के ऊपर नियन्त्रण रखने तथा हृदय का रक्त परिवहन में केन्द्रीय भूमिका निभाने के रूप में मिलता है। ये कार्य स्थूल हैं। इनकी सूक्ष्म भूमिकाएँ और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। सोचने विचारने निर्णय लेने आदि की क्षमता मस्तिष्क में ही होती है। हृदय से भाव सम्वेदनाएँ निस्सरित होती है। बाह्य जगत से आदान-प्रदान का क्रम भी इन्हीं दो केन्द्रों के माध्यम से चलता है। ये स्वयं भी बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित होते तथा दूसरों को भी अपनी स्थिति के अनुरूप प्रभावित करते हैं। अत्याधिक संवेदनशील होने के कारण इनकी स्थिति में समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं, जिसकी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति एवं वातावरण पर दिखायी पड़ती हैं। समूचे शरीर में क्या परिवर्तन होते रहते हैं, जिसकी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति एवं वातावरण पर दिखायी पड़ती हैं। समूचे शरीर में क्या परिवर्तन हो रहे हैं, उसकी सूक्ष्म जानकारी इन दो मर्मस्पर्शी केन्द्रों की स्थिति से मिल जाती है। विचारणा के स्तर तथा अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के आधार पर उसका परिचय आसानी से मिल जाता है।

सौर मण्डल शरीर की तरह ही एक विराट् शरीर है। ब्रह्माण्ड में ऐसे अगणित विराट् घटक क्रियाशील है। उनकी संख्या एवं स्वरूप की सही-सही जानकारी किसी को भी नहीं हैं। अपने सौर-मण्डल में नौ ग्रह हैं। उल्टी कक्षा में घूमने वाले एक अन्य ग्रह का भी प्रमाण मिला है जिसे दसवाँ ग्रह समझा जा रहा है। मंगल, पृथ्वी, बृहस्पति, बुध, शनि, शुक्र, प्लेटो, नेपच्यून, यूरेनस के अतिरिक्त दसवाँ ग्रह भी उस परिवार में सम्मिलित हो गया है। ये सभी सूर्य के चारों और परिक्रमा करते हैं। हर ग्रह के एकानेक उपग्रह हैं। अपनी पृथ्वी का चन्द्रमा है। सौर मण्डल के हर घटक परस्पर एक-दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं तथा अपनी गति एवं स्थिति से एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। पृथ्वी का निज का जितना वैभव है उससे अनेक गुना दूसरे घटकों के अनुदानों से मिला है। गर्मी, प्रकाश, वर्षा आदि अनुदान तो प्रत्यक्ष दीखते हैं पर सूक्ष्म दिखायी नहीं पड़ते। सूक्ष्म आदान-प्रदान के अति सम्वेदी केन्द्रों का परिचय पृथ्वी के ध्रुव केन्द्रों के रूप में मिला है। उनके सम्बन्ध में जो तथ्य विदित हुए हैं वे हैं तो अत्यल्प पर अत्यन्त विलक्षण तथा आश्चर्यचकित करने वाले हैं।

पृथ्वी के अन्य भागों की अपेक्षा ध्रुवों की परिस्थितियां असामान्य हैं। समझा जा रहा है कि अंतर्ग्रही विशिष्ट अनुदान इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से अवतरित होकर समस्त भू-मण्डल पर वितरित होते हैं तथा विजातीय द्रव्य दक्षिणी ध्रुव के माध्यम से अन्तरिक्ष में फेंक दिए जाते हैं।

इन ध्रुव प्रदेशों पर दुर्लभ मनोरम दृश्य दिखायी पड़ते हैं। उत्तरी ध्रुव पर छाया रहने वाला सुविस्तृत तेजोवलय ‘आरोरा बोरिएलिस’ अपनी अद्भुत आभा से हर किसी का मन मोह लेता है। “दि नेशनल एरौनाटिक्स एण्ड स्पेश एडमिनिस्ट्रेशन” (नासा) द्वारा छोड़े गये डायनामिक्स एक्स प्लोरट- ‘ए’ सेटेलाइट से अनेकों हाई रिजोल्यूशन फोटोग्राफ्स लिए गए। उससे आश्चर्यजनक जानकारियाँ मिली। अध्ययन-अन्वेषण में लगे वैज्ञानिकों का मत है कि अन्तरिक्ष से आने वाले सब एटोमिक पार्टिकल्स पृथ्वी के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करके आवेशित हो जाते हैं तथा ध्रुव केन्द्रों पर ध्रुव प्रथा के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। ध्रुव प्रभा का क्षेत्र विस्तार 4000 कि.मी. व्यास हैं। इसकी किरणें की पट्टियाँ जो ध्रुव केन्द्र को आवृत किए होती हैं, उनकी चौड़ाई 1000 कि.मी. हुआ करती है। यह प्रभा मण्डल जमीन से 100 कि.मी. ऊपर चमकता है तथा उसके स्वयं की ऊँचाई दस से लेकर सैकड़ों किलोमीटर तक होती है। दिन में चर्म-चक्षुओं से आरोरा को देखने में कठिनाई होती है पर रात को वह स्पष्ट दिखायी पड़ता है। दिन और रात के आरोरा के विशेष अन्तर भी पाया जाता है। सूर्य किरणों के आड़े-तिरछे पड़ने से उसका रूप, रंग बदलता रहता है। जैसे शक्तिशाली कैमरों से देखा और उसका फोटो लिया जा सकता है।

यूनाइटेड स्टेट्स के उत्तरी क्षेत्र के आकाश मार्ग से ध्रुवीय ज्योति को सत फ्रेंसिस्को, मेमफिस तथा एटलान्टा के दक्षिण छोर पर रंग बिरंगे रूप में देखा जा सकता है। 53 डिग्री अक्षाँश पर तथा मध्य रात्रियों में उसके दर्शन किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों को अभिमत है कि ध्रुवीय ज्योति का प्रकाश हाइड्रोजन आयन अथवा प्रोटोन के प्रवाह से उत्पन्न होता है जो सूर्य से 1500 मील प्रति सेकेंड की गति से फेंका जाता है। प्रकाश कण प्रोटोन्स इलेक्ट्रान्स को भी साथ खींचकर लिये चलते हैं जिनका कुछ अंश पृथ्वी तक पहुँचता है जहाँ का चुम्बकीय क्षेत्र इलेक्ट्रानों तथा प्रोटानों को अलग कर देता है। प्रोटानों का जल कुछ अंश पृथ्वी के वायुमण्डल से स्पर्श करता है तो ध्रुवीय ज्योति (आरोरा) के रूप में प्रकट होता है। इसका यथार्थ स्वरूप तथा भूमिका अविज्ञात होते हुए भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि धरती पर अन्तर्ग्रहीय अनुदानों की वर्षा का वह स्थूल प्रकटीकरण है।

किसी सौर टेलिस्कोप से दक्षिण ध्रुव के हिमाच्छादित प्लेटो का अध्ययन किया जाय तो आश्चर्यजनक तथ्य एवं दृश्य सामने आते हैं। वहाँ के स्थान तो प्राकृतिक लगते हैं पर दिखायी पड़ने वाले दृश्य अत्यन्त ही अस्वाभाविक मध्य गर्मी के मौसम में वहाँ सूर्यास्त होता ही नहीं। कभी-कभी 16 दिनों तक सूर्य बिना अस्त हुए चमकता रहता है। रातें भी 20 से लेकर तीस रातों जितनी लम्बी होती हैं। कितनी बार हिमखण्डों पर कितने ही नकली सूर्य चमकते दिखायी पड़ने लगते हैं जो अवास्तविक होते हुए भी वास्तविक जान पड़ते हैं।

उत्तरी ध्रुव की तरह दक्षिणी ध्रुव में भी ध्रुव प्रभा के दर्शन होते हैं। उत्तरी ध्रुव से उसकी भिन्नता होने के कारण वैज्ञानिकों ने उसका नाम ‘आरोरा आस्ट्रेलिस’ दिया है। दिन यहाँ भी बहुत ही लम्बे होते हैं। जिन अन्वेषी दलों ने वहाँ की परिस्थितियों का अध्ययन किया है उनका कहना है कि कई दिनों तक रात्रि के दर्शन नहीं हो सके। आकाश में रंग-बिरंगे गैसों के बादल मँडराते रहते हैं। तापक्रम शून्य से भी कई डिग्री नीचे बारहों माह तक बना रहता है। सदा बर्फ की मोटी परत जमीं रहती हैं। सफेद भालू, पेन्गुइन पक्षी तथा मछलियाँ उस भयंकर शीत में भी जीवित रहते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का मत है कि उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर दीखने वाला प्रभा मण्डल का अंतर्ग्रहीय परिस्थितियों के आदान-प्रदान से गहरा सम्बन्ध है जिसकी यथार्थ जानकारी तो उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, पर अगले दिनों मिलने की सम्भावना है।

पृथ्वी को सूर्य से सर्वाधिक अनुदान मिलते हैं। और ही वह उसकी स्थिति गति एवं परिवर्तनों से प्रभावित भी होती हैं। उन प्रभावों को इन ध्रुवों पर अध्ययन कर सकना अधिक सुगम है। ध्रुवीय ज्योति का सूर्य कलंकों से भी घना सम्बन्ध है। जल सूर्य का प्रकृति शान्त रहती है तब ध्रुवीय ज्योति मन्द दिखायी पड़ती है पर उग्र होने पर उस ज्योति का दर्शन दिन और रात को अधिक समय तक किया जा सकता है। सौर गतिविधियों का चक्र चरम बिन्दु के नीचे उतरना प्रारम्भ होने पर नासा अनुसंधान केन्द्र द्वारा उसके प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक सेटेलाइट छोड़ा गया। उससे प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार प्रति 11 वर्ष की अवधि में सूर्य हलचलों की एक अवस्था ऐसी आती है जब उसका उच्चतम उफान क्रम नीचे उतरना आरम्भ होता है। ध्रुवीय प्रदेशों में चलने वाले ऑटोरल स्टार्म्स सर्वोच्च स्थिति में जा पहुँचते हैं जब सौर चक्र की स्थिति अपने निम्नतम बिन्दु को स्पर्श कर रही होती है। विशेषज्ञ हाफमैन के अनुसार किन्हीं अज्ञात कारणों से ध्रुव प्रभा के अंतर्गत सौर स्पन्दन के उतार के समय में अति उच्च गति के तूफान उठा करते हैं।

सूर्य ग्रहण के समय दिखायी पड़ने वाले कोरोना का अध्ययन करने से यह ज्ञात हुआ है कि 11 वर्षीय चक्र में सबसे कम धब्बों एवं लपटों वाले समय में कोरोना का उभार भी सबसे कम होता है और जिस समय अधिकतम धब्बे व लपटें देखी जाती हैं उस समय कोरोना में भी सबसे अधिक उभार देखा जाता है। इन सब घटनाओं का संबंध सौर चुम्बकीय क्षेत्र की हलचलों से है जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी की परिस्थितियों पर पड़ता है। विशेषकर उस प्रभाव को ध्रुव केन्द्रों पर अधिक स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।

स्पेश क्राफ्ट से किये गये निरीक्षणों के अनुसार सोलर विण्ड की धाराएँ सूर्य के विषुवत वृत्त से उत्तर एवं दक्षिण की ओर क्रमशः फैलते-उतरते हुए उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव तक जा पहुँचती हैं। सोलर विण्ड की गति जब तीव्र रहती हैं तो सूर्य के उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के पोलर होल्स अधिक चौड़े रहते हैं। जिसके कारण ध्रुव प्रदेशों में सोलर विण्ड की धारा उत्पन्न तेज पायी जाती है। जब उनकी गति कम होती है तो ध्रुव प्रदेशों में भी उस प्रवाह की गति कम दिखायी पड़ती है।

न केवल अन्तर्ग्रहीय प्रभावों को इन ध्रुव केन्द्रों पर देखा जा सकता है बल्कि पृथ्वी एवं उसके वातावरण में हुए हेर-फेर का भी प्रभाव वहाँ देखना सम्भव है। विगत दिनों यह आश्चर्यजनक तथ्य विदित हुआ है कि पृथ्वी पर होने वाले नाभिकीय परीक्षणों से होकर विकिरण दक्षिणी ध्रुव तक न आने कैसे और क्यों पहुँच जाते हैं। खतरनाक विकिरणों की बड़ी मात्रा दक्षिणी ध्रुव के किनारे एकत्रित होती जा रही है।

मानवी काया की तरह ही रहस्यमय एवं विलक्षणताओं से युक्त पृथ्वी के ध्रुव अनेकों ऐसे महत्वपूर्ण सूत्र पिण्ड ब्रह्माण्ड के संबंधों के विषय में देते हैं जिनसे अन्तर्ग्रहीय आदान-प्रदान की विधि व्यवस्था बनाने समझने में मदद मिलती है। आवश्यकता उन केन्द्रों के विषय में अधिक बनने की तो है ही उनसे संपर्क बिठाकर लाभान्वित होने की भी है।


मेवाड़ के राजा (kahani)

मेवाड़ के राजा न रहे तो सिंहासनारूढ़ उदयसिंह को किया गया जो अभी पालने में झूलने वाली आयु के थे। संरक्षक बनवीर को नियुक्त किया गया।

बनवीर ने सोचा क्यों न राजकुमार को मारकर गद्दी हथिया ली जाय। लालच का नशा पूरे उभार पर था। रात्रि के समय नंगी तलवार लेकर बनवीर वहाँ पहुँचा जहाँ पन्ना उसे दूध पिला रही थी। बगल में उसका अपना बच्चा भी सोया हुआ था। धाय को झकझोरते हुए बनवीर ने पूछा- बताओ इनमें उदयसिंह कौन-सा है। एक जैसे कपड़े होने के कारण वह पहचान नहीं पा रहा था।

पन्ना को वस्तुस्थिति समझने में देर न लगी प्यार को महत्व दें या कर्त्तव्य को। सही बताने में अधिक उपयोगी व्यक्ति जाता था और कर्त्तव्य पर आँच आती थी। गलत बताने में अपना लाड़ला हाथ से जाता था। असमंजस कुछ क्षण ही रहा। कर्त्तव्य चली और बच्चे के दो टुकड़े हो गये। पन्ना का प्राण चीत्कार कर उठा पर रोने से भेद खुलता था सो वह आँसू पी गई। काम समाप्त हुआ। राजकुमार का धाय बच्चा बना रहा और उसी प्रकार पलता रहा। किसी को कानों कान खबर न पड़ी। समय बीता वस्तुस्थिति प्रकट हुई। उदयसिंह को गद्दी पर बिठाया गया। गद्दी पर बैठते समय उसने पन्ना धाय के चरण चूमे और कहा राजपूतों की बलिदान शृंखला में आप सदा मूर्धन्य गिनी जाती रहेंगी।


ओछे लोगों की उद्धत सनक फिजूलखर्ची

उपलब्धि एक बात है और साधनों का सदुपयोग सुझा सकने वाली विवेक बुद्धि सर्वथा दूसरी। यह हो सकता है कि किसी के पास विपुल वैभव हो पर उसके सहारे वह न कर सके जिससे अपना कल्याण और दूसरों का हित साधन होता है। यह भी हो सकता है कि वह हस्तगत साधनों को अनर्थ में न सही व्यर्थ में गँवाता रहे। कितने व्यक्ति दुर्व्यसनों और क्रूर कर्मों में रस लेने लगते हैं। आवश्यकता या विवशता न होने पर भी ऐसी कार्य पद्धति अपनाते हैं जिससे असंख्यों को त्रास मिले प्रस्तुत किये अनाचरणों से दुर्बल मन वालों को वैसा ही अनुकरण करने को मन चलता है। सम्पन्नों को समर्थों का उत्तरदायित्व है कि वे साधनों के बल पर ऐसी परम्परा विनिर्मित न करे जिससे अपना और दूसरे अनेकों का भविष्य अन्धकारमय बनता हो।

आवश्यक नहीं सम्पन्नों में विवेक बुद्धि भी हो। कई बार वे सम्पदा को इस प्रकार व्यर्थ बर्बाद करते हुए भी देखे जाते हैं जिसके आधार पर उन्हें सनकी, अपव्ययी जैसे शब्दों में भर्त्सना की जा सके। धन अपने अधिकार में है उसका अर्थ यह तो नहीं होना चाहिए कि उन्हें अहंकार के उद्धत प्रदर्शन में बेतरह लुटाया जाय। कुछ चाटुकार अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसे लोगों की झूठी बड़ाई भी कर सकते हैं पर मुँह फेरते ही सच्चाई हर किसी के मुँह से निकलती है। अपव्ययी की सच्चे मन से कोई समझदार व्यक्ति प्रशंसा नहीं कर सकता। जिन साधनों से अनेकों उपयोगी कार्य हो सकते थे उसे उद्धत अहंकार की पूर्ति में ऐसे ही लुटा दिया जाय तो उसे कोई किस प्रकार समझदार मानेगा।

इतिहास में ऐसे अपव्ययी सनकियों के अनेकानेक उल्लेख मिलते हैं।

बगदाद के खलीफा हसन जब कभी यात्रा पर निकलते, उनके सेवक हजारों मील तक उनके सामने चाँदी के सिक्के बिखेरते चलते। इसका अभिप्राय उन्हें सभी लोग धनी-मानी जानने-मानने का था। ऐसी यात्राएँ उनने सैकड़ों बार सम्पन्न की और हर बार यही तरीका अपनाया जाता।

फारस के शाह फतह को बेश-कीमती- रत्न जटित पोशाक पहनने का बहुत शौक था। हर रोज नया वस्त्र पहनता। राज्याभिषेक के समय तो उसकी पोशाक सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात, पन्ना व लाल से इतने जटित थे कि पोशाक का वजन उसके वजन से कहीं अधिक था। अधिक भार के कारण उसका बड़ा होना मुश्किल रहता था।

12वीं शताब्दी के प्रख्यात यमन सम्राट मलिक अल-अजीज तो बेमिसाल था। नित नये कपड़ों को तैयार करने के लिए सैकड़ों कारीगर उसके यहाँ लगे रहते थे। वस्त्र भी कोई सामान्य नहीं-हीरे-पन्नों से जटित होते थे। जिसका मासिक खर्च लाखों में आता था। इस अपव्यय से प्रजा अत्यधिक रुष्ट हो गयी। अन्ततः राज्य में बगावत हुई और वह शासक मारा गया।

हैदराबाद के छठवें निजाम ‘मीर बहबूब अली खाँ’ की विचित्र आदत थी। प्रतिदिन नई पोशाक सफेद बारीक मलमल की पहनता था। उसे दूसरे नौकरों आदि में बाँट देता, स्वयं एक बार का पहना कपड़ा, दुबारा नहीं पहनता था।

गजनी के बादशाह ‘मसूद’ को अपने खजाने के प्रदर्शन का बड़ा शोक था। वह जब कभी यात्रा करता, तो अपना सम्पूर्ण खजाना ऊँटों की पीठ पर लादकर ले चलता था तीन हजार ऊँट इस कार्य के लिए प्रशिक्षित और नियुक्त थे। प्रशिक्षण इस बात का कि चोरों-डकैतों से वे अपनी रक्षा स्वयमेव कर सकें। कहते हैं कई बार डाकुओं ने यात्रा के बीच उसकी धनराशि लूट ली, पर विपुल धनराशि को साथ लेकर, युद्ध के मैदान में भी चलने की आदत उसकी अन्तिम दिनों तक समाप्त नहीं हुई।

मिस्र के एक धनाढ्य ‘अमीर बेसारी’ की सनक और भी विचित्र थी। उसे विरासत में बेशुमार धनराशि मिली, जिसे शराब में बर्बाद कर डाला। जिन सोने के प्यालों में एकबार शराब पीता था, उसे मिट्टी के सकोरों की तरह फेंक देता। दुबारा शराब नये सोने के प्याले में ही पीता। धीरे-धीरे उसने सम्पूर्ण पैतृक सम्पत्ति शराब में गवाँ दी। मरते समय उसके पास कफ़न के लिए पैसे न रह गये। उसकी अन्त्येष्टि क्रिया निकटवर्ती लोगों की व्यवस्था से सम्पन्न हुई।

काफी समय पहले अफ्रीका के गायना में एक सम्राट हुआ था- व्यूविस्र। उसे नित नये सिंहासन पर बैठने का शौक था। उसे रोज सिंहासन मिल सके, इसके लिए देश के चुने हुए कारीगरों की स्थायी नियुक्ति हुई थी। सिंहासन की डिजाइन भी हर बार नये ढंग की होती थी। साथ ही मूल्यवान रत्न उसमें जड़े हुए होते थे। ऐसे सिंहासन पर सम्राट एक ही बार बैठता यही नहीं उस सिंहासन को यह कहकर नदी में प्रवाहित करा दिया जाता कि यदि कोई दूसरा इस सिंहासन पर बैठेगा, तो सम्राट की गरिमा गिरेगी।

मंगोलिया के शेख शाहरुख को अपने जन्मदिन विचित्र ढंग से मनाने का शौक था। इस दिन जो भी व्यक्ति आता उसे हीरे-मोतियों से भरा थाल उपहार में मिलता। यह क्रम उसने अपने 43 जन्म दिनों पर सम्पन्न किये। फलतः उसकी सारी सम्पत्ति हाथ से चली गई।

मिस्र के टकसाल के मालिक खलील था। हेरी की मक्का यात्रा बड़ी विचित्र होती। रास्ते में सोने की मोहरें इस उद्देश्य से बिछाई जाती कि उसका ऊँट जमीन पर नहीं, सोने पर ही कदम रखता हुआ चले। बाद में उसे अन्य यात्री उठा लिया करते। उसका समस्त कोष इसी प्रकार समाप्त हो गया।

बगदाद के खलीफा हारुन अलरशीद पर दानशीलता का भूत सवार था। वह प्रतिदिन घोड़े पर बैठकर निकलते और जो भी सामने पड़ जाता उसकी और 100 चाँदी के टुकड़ों की थैली उछाल देता। भले ही वह जरूरत मन्द हो या नहीं। उसके इस सनक ने उसे तो कंगाल बना दिया लेकिन धूर्तों ने इससे पर्याप्त लाभ उठाया।

भारतीय नवाब अलीशाह का नाम भी ऐसे ही व्यक्तियों की श्रेणी में आता है। वह बिना सोचे-समझे अपने कृपा पात्रों को विपुल धनराशि यों ही दे देता। एकबार तो उसने अपने बाल काटने वाले नाई पर प्रसन्न होकर उसे चौलखी इमारत का एक समूह ही मुफ्त में दे दिया। विशेषज्ञों ने उन इमारतों की कीमत एक करोड़ रुपये आँकी थी।

वेवील के अलेक्जेण्डर को एकबार अपनी अदूरदर्शिता पर बहुत पछतावा हुआ उसने अपने प्रिय दोस्त की मृत्यु के शोक का विचित्र रूप में प्रदर्शन किया। 96 करोड़ डालर की सोने की सिल्लियाँ दोस्त के साथ उसने दफना दी जिसे दूसरे ही दिन चोर खोद ले गये। अलेक्जेण्डर को अपनी मूर्खता पर पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा।

अमीर खुसरो के नाना के पास 200 तुर्क और 2,000 गुलाम व नौकर सिर्फ उनकी सेवा के लिए थे। इसके अतिरिक्त 50-60 गुलाम तो मात्र सभा में पान पेश करने के लिए नियुक्त थे। यदि कोई सुन लेता कि किसी खान या मालिक ने 500 आदमियों को खाना खिलाया है तो वह 1,000 को निमन्त्रित करने का प्रयास करता था। अगर कोई घोड़े पर निकलता हुआ 200 तन्का खैरात करता तो दूसरा 400 तन्का बाँटने का इरादा करता। कोई यदि किसी पान गोष्ठी में 50 घोड़े और 200 वस्त्रों के जोड़े समर्पित करता तो दूसरा 100 घोड़े व 500 वस्त्रों के जोड़े देने की योजना बनाता। इस तरह फिजूलखर्ची के कारण ‘उमरा’ हमेशा ऋण की भार से दबे रहते थे। वे हुण्डी-पर्चे लिखकर सेठ साहूकारों से रुपया उधार लेते तथा अपना खर्च चलाते। बड़े कर्जों पर सूद की दर 10 प्रतिशत तथा छोटों पर 20 प्रतिशत वार्षिक थी।

अमीर खुसरो के नाना के पास 200 तुर्क और 2,000 गुलाम व नौकर सिर्फ उनकी सेवा के लिए थे। इसके अतिरिक्त 50-60 गुलाम तो मात्र सभा में पान पेश करने के लिए नियुक्त थे। यदि कोई सुन लेता कि किसी खान या मालिक ने 500 आदमियों को खाना खिलाया है तो वह 1,000 को निमन्त्रित करने का प्रयास करता था। अगर कोई घोड़े पर निकलता हुआ 200 तन्का खैरात करता तो दूसरा 400 तन्का बाँटने का इरादा करता। कोई यदि किसी पान गोष्ठी में 50 घोड़े और 200 वस्त्रों के जोड़े समर्पित करता तो दूसरा 100 घोड़े व 500 वस्त्रों के जोड़े देने की योजना बनाता। इस तरह फिजूलखर्ची के कारण ‘उमरा’ हमेशा ऋण की भार से दबे रहते थे। वे हुण्डी-पर्चे लिखकर सेठ साहूकारों से रुपया उधार लेते तथा अपना खर्च चलाते। बड़े कर्जों पर सूद की दर 10 प्रतिशत तथा छोटों पर 20 प्रतिशत वार्षिक थी।

यह उन सम्पन्नों और समर्थों के फिजूल खर्चों के कुछ नमूने हैं। जिसके पास अनाप-शनाप सम्पदा भरी पड़ी और सदुपयोग की सूझ-बूझ का अभाव है वे ऐसे उद्धत आचरण करें तो बात एक सीमा तक समझ में आती है। पर उनके लिए क्या कहा जाय जो निजी एवं पारिवारिक प्रगति के आवश्यक खर्चों की तो उपेक्षा करते रहते हैं पर जेवर, फैशन, शृंगार, दुर्व्यसन आदि पर ढेरों पैसा बहाते रहते हैं। उन लोगों की मनःस्थिति और भी अधिक दयनीय है जो विवाह शादियों के अवसर पर आवेशग्रस्त विक्षिप्तता अपना लेते हैं और आवश्यक कामों को रोककर बाहर से कर्ज लेकर ऐसा दिखावा करते हैं मानो कहीं कूड़े-करकट की तरह पड़ा मिल गया हो और उसकी होली जलाकर मजा लूट रहे हों।


Quotation

दिनभर आपको धूप दी, आपके पुत्र-पौत्रों को प्रकाश और गर्मी प्रदान की और आप हैं कि मुझे थोड़ी ही देर में विदा कर रहे हैं, कुछ अधिक देर ठहरने देते तो आपका क्या बिगड़ जाता, ढलते हुए सूरज ने मुस्कराते हुए क्षितिज के पास लिखित उलाहना भेजा।

गम्भीर क्षितिज स्याही लेकर उत्तर लिखने बैठा तो कुल एक पंक्ति से वह आगे नहीं बढ़ सके, प्रातः के प्रकाश में सूर्य ने उसे पढ़ा। लिखा था-“इसलिये कि तुम हर बार एक नई चमक, नई रोशनी लेकर जाओ और पहले से भी अधिक प्रकाश फैलाओ।”

सूर्य का सिर श्रद्धा से नीचे झुक गया।


अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने (kahani)

युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला-भगवन्! मेरी इच्छा का रास्ता दिखाऊँ? बुद्ध हँसे और बोले-तात्! संसार को कुछ देने से पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की सेवा करना। अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती थी उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया। अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई। अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमानपूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा-भगवन! अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पण्डित हूँ।’ भगवान् बुद्ध मुस्कराये और बोले अभी तो तुम कलायें सीख कर आयें हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।

अगले दिन भगवान् बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेष बदल कर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुए वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेष बदल कर अंकमाल के समीप जाकर बोले-आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे।अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा-हाँ-हाँ अभी चलो। दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये। अंकमाल हैरान था-बात क्या है?

थोड़ी देर पीछे भगवान् बुद्ध पुनः उपस्थित हुए। उनके साथ आम्रपाली थी। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे। सायंकाल अंकमाल को बुद्धदेव ने पुनः बुलाया और पूछा-वत्स! क्या तुमने क्रोध काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है। अंकमाल को दिन भर की सब घटनायें याद हो आईं। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।


अध्यात्म की ओर मुड़ता लोक मानस

तर्क और प्रत्यक्षवाद ने मनुष्य की भौतिकवाद की ओर अग्रसर किया है। इस क्षेत्र में गम्भीरता पराक्रम भी हुए। विज्ञान के अनेकानेक आविष्कार हुए और उनके सुविधा साधनों के ढेर लगा दिये। समझा जाने लगा कि प्रगति और समृद्धि का यही मार्ग है। कुछ समय उपरान्त इसी मार्ग पर चलते हुए प्रचुर वैभव अर्जित कर लिया जायगा और उसके सहारे मनुष्य की सुविधा सम्पदा का असीम लाभ मिल सकेगा। किन्तु वे आशाएँ पूरी न हो सकीं। बुद्धिवाद लक्ष से भटका और अर्थवाद के उस कुचक्र में फँस गया जिसमें मनुष्य स्वार्थी, विलासी और अहंकारी बनकर रह गया। चतुरों ने सामर्थ्य सम्पदा को अपने हाथों जकड़ लिया। गरीब अधिक गरीब बन गये और अमीर अधिक अमीर। ऐसी स्थिति में विग्रह उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। एक और पिछड़ों और सम्पन्नों के बीच ठनी, दूसरी और संग्रही अपनी बिरादरी को भी सहन न कर सके। फलतः प्रगति की परिणति मर्यादाओं के व्यतिक्रम से अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी। यही है आज की स्थिति का सार संक्षेप। इस जंजाल में उलझा हुआ व्यक्ति अपने को असहाय अनुभव कर रहा है। और नये सिरे से विचार करने लगा कि जिस प्रत्यक्षवाद की प्रगतिशीलता का पर्यायवाचक माना जाने लगा था, वह वस्तुतः वैसी है भी या नहीं। प्रगति के साथ नीति का संपर्क सूत्र टूट जाने से जो बिखराव पैदा हुआ है उसका समाधान खोजा जा रहा है। इस खोज में अनायास ही उस पुराण युग की ओर ध्यान मुड़ा है जिसमें लोग न केवल सुख-शान्ति से रहते बताये जाते हैं वरन् सिद्धि विभूतियों से सम्पन्न भी कहे जाते हैं। प्रगतिशीलता ने जो विभीषिकाएँ खड़ी कर दी हैं वे सबके सामने हैं व्यक्ति खोखला हो चला और बढ़ी हुई सुविधा के रहते हुए भी घुटन अनुभव करने लगा। समाज की भी ऐसी ही दुर्गति हुई है। वर्जना टूटी तो, पर उनके स्थान पर उत्साहवर्धक स्थापना नहीं हुई। अप्रामाणिकता की बाढ़ में मानवी गरिमा के पैर उखड़ गये। अनिश्चितता, असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण में कहीं पैर टिकाने के लिए मनुष्य जगह खोज रहा है। इस संदर्भ में उसे अध्यात्म क्षेत्र की फलश्रुतियों की ओर उसका ध्यान मुड़ा है। सोचा जाने लगा है कि जिस आधार पर कभी समुन्नत परिस्थितियाँ होती रही हैं उसे फिर से क्यों न अपनाया जाय। पौराणिक इतिहास में जिस सुख-शान्ति का वर्णन है। उस पर यों संदेह भी कम नहीं है पर उसके अतिरिक्त और कुछ सूझता भी तो नहीं। यह सरल प्रतीत लगने लगा है कि क्यों न उसी का पर्यवेक्षण किया जाय। प्रत्यक्षवाद ने जब उलझनों से निकलने का रास्ता बताने से लगभग इनकार जैसी सनक स्थिति बना ली है तो फिर डूबते को तिनके का सहारा लेने की तरह उसी ओर चलना पड़ रहा है। निश्चितता न सही उसमें गति तो है।

भौतिकवाद या अध्यात्मवाद के प्रति कुछ कट्टर पन्थियों को छोड़कर मनीषा का कभी कोई दुराग्रह नहीं रहा। चाहा यही गया है कि चिन्तन और व्यवहार को प्रभावित करने वाला कोई ऐसा तत्वदर्शन हाथ लगे जिसके सहारे सुखपूर्वक रहा और शान्तिपूर्वक जिया जा सके। पिछले दिनों प्रत्यक्षवाद ने यह आशा दिलाई थी कि उसके सहारे प्रगतिशील जीवन जिया जा सकेगा।

न केवल हारे थके, प्यासे उदास लोग छाया तलाशने के लिए अध्यात्म की ओर मुड़ रहे हैं, दूसरी बात यह भी हुई है कि विज्ञान ने क्रमशः अधिक सूक्ष्म की गहराई में उतरते-उतरते वहाँ तक पहुँच बढ़ाई है जहाँ प्रकृति की समीपता दृष्टिगोचर होती है। जहाँ चेतना और पदार्थ सम्पदा के बीच दृष्टिगोचर होने वाली दूरी घटती ओर समीपता बढ़ती है। अब अध्यात्म विद्या और परा मनोविज्ञान आपसे तालमेल बनाने और पटरी बिठाने लगे हैं। इस सम्भावना आर्थर कौए स्तर जैसे अनेकों मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने जोरदार शब्दों में स्पष्ट किया है।


गंध की प्रभाव क्षमता

मस्तिष्क को ऊर्जा तन्त्र माना गया है। हृदय उसके लिए ईंधन जुटाता है। मस्तिष्कीय संरचना कैसी ही क्यों न हो, इसे आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त करने और ज्ञान सम्पदा बढ़ाने के लिए ज्ञानेन्द्रियाँ पर निर्भर रहना पड़ता है। आम धारणा यह है कि कान और आँख की भूमिका अन्य इन्द्रियों की तुलना में अधिक है।

जिनके कान ठीक काम नहीं करते वे बहरे लोग बोलना भी नहीं सीख पाते। क्योंकि शब्दोच्चार सुनते और उनका अनुकरण करने से ही बोलने का अभ्यास आरम्भ होता है। जो सुनेंगे ही नहीं उनका मस्तिष्क शब्द ध्वनि और उसके साथ जुड़े हुए तात्पर्य को समझने में समर्थ नहीं इसलिए बोलने का आधार कान बन सकेगा और बहरे को गूँगा ही रहना पड़ेगा।

आँख से दृश्य दीखते हैं। वस्तुओं का स्वरूप समझ में आता है साथ ही उनके गुण एवं प्रयोग की जानकारी भी मिलती है। पढ़ने लिखने में कान की तरह आँख का भी योगदान रहता है। ज्ञानवृद्धि में शिक्षा का महत्व माना जाता है। पुस्तकें पढ़ने में आँख और अध्यापक का मार्गदर्शन समझ में कान सहायता करते हैं। पहचानने, वर्गीकरण करने में आँखों की सहायता लेनी पड़ती है। स्मृतियों को सँजोये रखना बहुत करके दृश्यों पर आधारित है।

इतना सब होते हुए भी नाक की अपनी विशेषता है। उनकी क्षमता सूक्ष्म है। तो भी इनकी अधिक है कि वह सचेतन तक को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखती है। गंध की ज्ञानवृद्धि में कितनी बड़ी भूमिका हैं, उस प्रश्न के उत्तर में हमें अचेतन की महत्ता और क्षमता को समझना होगा। ज्ञान भण्डार मात्र आँख और कान से ही नहीं सरता वरन् उसमें गन्ध का भी योगदान रहता है। क्रमिक मानवी प्रगति में आँख कान का महत्व बढ़ गया है। प्रत्यक्ष के साथ व्यवहार अब अधिक चल पड़ा है। इसलिए प्रत्यक्ष ही सब कुछ प्रतीत होने लगा है। इसमें बौद्धिक परिधि के मनःक्षेत्र को विकसित करने में सहायता मिली है। फिर भी अचेतन को जिन परोक्ष जानकारियों की आवश्यकता होती है। उनकी पूर्ति के लिए इनको प्रमुख समझी जाने वाली इन्द्रियों से काम नहीं चलता है। अचेतन पर सर्वाधिक प्रभाव गन्ध का पड़ता है। इस दृष्टि से नासिका की महत्ता अधिक सिद्ध होती है। नासिका को भगवान ने व्यर्थ नहीं बनाया है वह आँख और कानों के बीच इसलिए अवस्थित है कि अचेतन की आवश्यक जानकारियाँ एवं उत्तेजना प्रदान करने का काम करती रहे। गन्ध की महत्ता दर्शन या श्रवण से कम नहीं अधिक ही ठहरती है। क्योंकि जीवन को समर्थ और प्रखर बनाने में मस्तिष्क के सचेतन भाग से अचेतन का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। इस क्षेत्र को प्रभावित करने में गन्ध का असामान्य योगदान होता है।

प्राणियों के विकास क्रम और दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि प्रागैतिहासिक काल के जीवधारी निर्वाह व्यवस्था जुटाने, कठिनाइयों से निपटने और सहयोग बढ़ाने में घ्राण शक्ति का ही सबसे अधिक उपयोग करते रहे हैं। आँख और कान का विकास तो बहुत बाद में हुआ है। प्रारम्भ में वे गौण हैं। आगे चलकर उनने प्रमुखता प्राप्त कर ली यह दूसरी बात है।

पशु पक्षियों की जीवनचर्या में अभी भी घ्राण शक्ति का ही प्रमुख योगदान रहता है। हिंस्र पशु अपना अधिकार ढूँढ़ने और जिन पर आक्रमण की आशंका है वे उसी आधार पर खतरा समझने में समर्थ होते हैं सिंह, व्याघ्र आदि को इसी आधार पर यह पता चलता है कि इन्हें क्या शिकार किस दिशा में कितनी दूरी पर क्या करता हुआ मिलेगा। विभिन्न पशुओं के शरीर से निकलने वाली गन्धों की तुलना में उनकी घ्राण शक्ति अपने काम के पशुओं की गन्ध अधिक अच्छी तरह पहचानती हैं। इसलिए आक्रमण करने और शिकार पकड़ने में जिस पूर्व जानकारी की आवश्यकता है उसे उनकी नासिका जुटाती रहती है।

हिरन, खरगोश, सुअर आदि को हिंस्र वर्ग में जाना पड़ता है। उन्हें आत्म रक्षा का अवसर मिलता रहे इस सतर्कता में उनकी भी प्राण शक्ति ही काम करती है। इस आधार पर वे जान लेते हैं कि आक्रमण कहाँ और किस स्थिति में है। संकट में बचने के लिए वे दौड़ने, छिपने, दिशा बदलने की सुरक्षात्मक कार्यवाही करने लगते हैं। इसी आधार पर उन्हें यह भी पता चलता है कि आक्रामक भूखा है या नहीं। भूखे होने पर ही वे आक्रमण करते हैं। भूखे के शरीर से अन्य प्रकार की गन्ध आती है। यही कारण है कि वे जब खतरा देखते हैं तभी चौकन्ने होते हैं अन्यथा भरे पेट के सिंह के आसपास भी शिकार हो सकने वाले प्राणी निर्द्वन्द्व होकर विचरण करते रहते हैं।

कुत्ते, बिल्ली और भेड़िये अपने शरीर से एक विशेष प्रकार की गन्ध निकालते हैं। उसका प्रभाव जितने क्षेत्र में रहता है उतने में उस बिरादरी के अन्य प्राणी प्रवेश नहीं करते हैं तो यह समझ का कार्य है कि लड़कर ही उस क्षेत्र में पैर जमाये जा सकते हैं। जिनका आधिपत्य है वह आक्रमण करेगा। इस क्षेत्रीय बटवारे के आधार पर उन वर्गों वाले अपने लिए अन्य सुरक्षित क्षेत्र ढूँढ़ते हैं अथवा आक्रमण के लिए तैयार होकर हड़पने या मर मिटने के लिए तैयार होते हैं। आक्रामक पशुओं के अपने-अपने क्षेत्र इसी आधार पर बनते और घटते-बढ़ते रहते हैं। इस प्रयोजन में नासिका की समर्थता ही उनका मार्ग दर्शन करती है। शिकार के अन्य क्षेत्र में घुस जाने पर प्रायः आक्रामक वापस लौट पड़ते हैं। सोचते हैं दूसरे के अधिकार क्षेत्र में शिकार पकड़ने पर उन्हें क्षेत्र के अधिकारी को स्पष्ट करने का खतरा उठाना पड़ेगा।

कुत्ते इस संबंध में और भी आगे हैं। उनकी घ्राण शक्ति अन्य पशुओं की तुलना में अधिक होती है। मनुष्य से तो सैंकड़ों गुनी अधिक है। इसलिए प्राचीन काल में शिकारी लोग कुत्तों के झुण्ड साथ लेकर चलते थे। अभी भी उनका प्रयोग अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस द्वारा किया जाता है।

पक्षियों को झुण्ड बनाकर रहने, अपने परिवार वालों को पहचानने में आँखों से नहीं नासिका से सहायता मिलती है। उनमें से नेता कौन है, किस का अनुकरण करता है यह निर्णय वे प्रमुख की जानी पहचानी गन्ध से ही करते हैं। चिड़ियों के परिवार और दम्पत्ति जीवन में जिस पहचानने की आवश्यकता पड़ती है उसे वे घ्राण शक्ति के सहारे ही पूरा करते हैं। मधु-मक्खियों, तितलियों और चींटियों का अति जटिल जीवनचर्या इसी आधार पर चलती है। तितलियों को नर-मादा पुष्पों के बीच निषेचन की दलाली करनी पड़ती है वे नर वर्ग का पराग अपने पैरों और पंखों में लपेट कर मादा वर्ग तक पहुँचाती हैं। उन्हें इन दोनों वर्गों का अन्तर गन्ध भिन्नता के आधार पर ही करना पड़ता है। मधु-मक्खियाँ इसी आधार पर ताड़ लेती हैं कि उन्हें किस दिशा में खिले हुए पुष्पों से मधु संचय में सुविधा रहेगी। चींटियाँ मिठास का पता लगाने और वहाँ तक टेढ़े-मेढ़े रास्ते पार करके भी जा पहुँचने में अपनी नासिका से सहायता लेती है।

मछलियाँ अपने तैरते अण्डे बच्चों की स्थिति इसी आधार पर समझती और उनकी सहायता करती रहती हैं। इसी प्रकार अन्य जल जन्तु भी बहते प्रवाह एवं गहरे जलाशयों में रहते हुए भी अपना परिवार सम्भालते, शिकार पकड़ते और आक्रामकों से जान बचाते रहते हैं। वंश वृद्धि के लिए उपयुक्त समय स्थान और साथी ढूंढ़ निकालने का सुयोग बिठाने में भी उन्हें शरीरों से निकलने वाली गन्ध के सहारे ही काम चलाना पड़ता है।

पशु पक्षियों से लेकर कृमि-कीटकों तक में यथा समय मादा वर्ग के शरीरों से विशेष प्रकार की तेज गन्ध निकलती है। वह जितने क्षेत्र में फैलती है उसमें रहने वाले नर वर्ग को उत्तेजित एवं आकर्षित करती है। निमन्त्रण पाते ही वे दौड़ पड़ते हैं और वंश वृद्धि के कार्य में जुट पड़ते हैं। गन्ध समाप्त होते ही आकर्षण भी समाप्त हो जाता है और वे अपना-अपना रास्ता पकड़ते हैं।

मौसम बदलने और कोई प्रकृति उभरने का पूर्वाभास कितने ही प्राणियों को होता है। वे संकट अपने से पूर्व ही अपना स्थान बदलने और सुरक्षित स्थान पर जा पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। इसे उनकी अतीन्द्रिय क्षमता कहा जाता है। यह क्या है और कहाँ से उत्पन्न होती है इसका रहस्य खोजने वालों का निष्कर्ष यह है कि यह उस गन्ध का चमत्कार है जो घटनाक्रम बदलने के साथ-साथ अपना स्वरूप एवं स्तर बदलती रहती है। जिनकी घ्राण शक्ति पैनी है वे उसे पहचान लेते हैं और संकट से बचने का प्रयत्न करते हैं।

कृमि-कीटकों के यौनाचार का संयोग बिठाने में मादा वर्ग के शरीर से निकलने वाली जिस गन्ध की प्रधान भूमिका रहती है उसे ‘फेरीमोन’ रसायन कहा जाता है। इसे अब वैज्ञानिक विधि से उन शरीरों से पृथक भी किया जाने लगा है। इस गन्ध को जहाँ बखेरा जाता है वह उस वर्ग का नर समुदाय दूर-दूर से आकर इकट्ठाने होने लगता है। इस आधार पर उन्हें पकड़ने या मार का उद्देश्य पूरा किया जाता है। नर वर्ग अपनी परिपक्वता की छाप छोड़ता है और समूह की अनेक मादाएँ उसके हरम में सम्मिलित होती हैं। कोई नया नर उभरता है तो उस परिपक्वता का दबाव से अपना मन मार लेता है। या तो बिना दम्पत्ति सहयोग के ही काम चलने लेता है या फिर अन्यत्र जाने या प्रमुख को खदेड़ने की बात सोचता है। नवयुवकों को क्या करना चाहिए इसके लिए उसे प्रमुख की गन्ध प्रखरता को देखते हुए ही अनुमान लगाना पड़ता है। ऐसा भी देखा गया है कि किसी की प्रखरता के सामने उस समुदाय का मन ही ठण्डा पड़ जाता है। रानी मधुमक्खी की प्रजनन शक्ति इतनी प्रखर होती है उस छत्ते की अन्य मादाओं में प्रजनन की आकाँक्षा ही नहीं उभरती वे अपना चुपचाप श्रम करती और दिन काटती रहती है। नरों का दबाव भी अपने झुण्ड के अन्य नरों को निस्पृह बनाकर रख देता है।

मनुष्य की घ्राण शक्ति आँख और कान की प्रमुखता मिलने के कारण दब गई है। काम न मिलने उपयोग न हो पर ही वस्तु निकम्मी हो जाती है। अपनी नाक का भी यही हाल है वह साँस लेने भर का काम करती रहती है। सर्दी जुकाम होने पर ही उसके अस्तित्व का पता चलता है। इतने पर भी वह अचेतन को अनेकानेक परोक्ष जानकारियाँ अभी भी देती रहती है। यदि वह वस्तुतः अपनी क्षमता गँवा बैठे तो मनुष्य बुद्धिमान दीखते हुए भी अचेतन क्षेत्र की समस्वरता गँवा बैठेगा और बुद्धू या सनकी बनने लगेगा।

प्राण विद्युत की इन दिनों बहुत चर्चा है। शरीर में पाई जाने वाली बिजली के ऊपर गहरे अनुसंधान चल रहे हैं। इस संदर्भ में नये तथ्य यह सामने आये हैं कि यह प्राण विद्युत ताप, शब्द या प्रकाश तरंगों के रूप में पहचानी तो जाती है। पर वस्तुतः होती गन्ध की प्रतिक्रिया भर ही है। ऋषि आश्रमों में सिंह गाय के एक घाट पानी पीने में वातावरण की जिस विशेषता पर दृष्टिपात किया गया है अब उसे गन्ध विशेष के रूप में निरूपित किया जा रहा है। व्यक्ति विशेष के शरीर से जो गन्ध निकलती है उस आधार पर व्यक्तित्व के अनेक पक्षों का पता चलता है। यहाँ तक कि शारीरिक एवं मानसिक रोगों तक का स्वरूप समझा जा सकता है। चिकित्सा क्षेत्र में अब तक मल, मूत्र, रक्त आदि की परीक्षा ही निदान के लिए प्रयुक्त होती थी अब इससे रोगी के शरीर में निकलने वाली गन्ध को भी जाँच-पड़ताल का एक माध्यम मानने लगा है। हर रोग के रोगी में एक विशेष प्रकार की गन्ध पाई जाती है जिस घ्राण शक्ति विकसित कर लेने वाला कोई भी चिकित्सक सहज ही पहचान कर सकता है और रोग का स्वरूप समझने की गुत्थी सुलझा सकता है।

इस प्रकार गन्ध चिकित्सा की एक उपचार पद्धति विनिर्मित की जा रही है। येल विश्व विद्यालय के शोधकर्ता डा. जुडिथ रोडन ने सिद्ध किया है कि भोजन में स्वाद ही नहीं उसकी गन्ध भी खाने वाले के शरीर में उतार-चढ़ाव उत्पन्न करती है। कपड़ों में घर आँगन में रहने वाली गन्ध को भी मनुष्य के स्वास्थ्य और सन्तुलन पर प्रभाव पड़ते देखा गया है। परीक्षण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए रोडन ने लिखा है कि एक व्यक्ति का चाकलेट की गन्ध मात्र से स्वास्थ्य सुधारा और वजन बढ़ा। चर्बी घटाने एवं शर्कराजन्य रोगों पर नियन्त्रण पाने में गन्ध संपर्क से उत्साहपूर्वक परिणाम देखने को मिला है।

जार्ज टाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेन्टर के अभ्यास जीव विज्ञानी राबर्ट हेनकिन ने अपने प्रयोग से सिद्ध किया है कि श्रम जीवियों की थकान घटाने या बढ़ाने में कारखाने कार्यालय की पाई जाने वाली गन्ध का भी हाथ रहता है। अस्तु श्रमिकों का तनाव घटाने के लिए कार्यालयों में उपयुक्त स्तर की गन्ध का छिड़काव होना चाहिए।

सुगन्ध उत्पादन में इन दिनों अरबों-खरबों की राशि खर्च होती है। इनका उपयोग आमतौर से भोजन, वस्त्र, घर में नासिका प्रेम बनाने के लिए किया जाता। अब इस संदर्भ में एक नया अध्याय जुड़ा है कि शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए किन प्राकृतिक या कृत्रिम कामों का उपयोग किया जाय यहाँ यह समझना भी उपयुक्त होगा कि मनुष्य के स्वभाव, आचरण एवं दृष्टिकोण को भी विशेष गन्धें प्रभावित करती हैं। पूजा उपचार में इसी हेतु विभिन्न गन्धों का प्रबन्ध किया जाता है। अगरबत्ती, धूपबत्ती, कपूर, चन्दन, दीपक, हवन आदि को इसलिए भी अध्यात्म कृत्यों में सम्मिलित रखा गया है कि उनके सहारे चेतन, अचेतन और सुपर चेतन को उपयुक्त दिशा में विकसित होने का अवसर मिलता रहे।

दुर्गन्ध के साथ जुड़े रहने वाली अहितकर सम्भावनाओं से सभी परिचित हैं। सड़न से उठने वाली कुरुचि पूर्ण गन्ध यह बताती है कि यहाँ रहने से खैर नहीं। इसे हटाया जाय या स्वयं भाग जाए। अन्यथा रुग्णता का संकट सिर चढ़ेगा। कार्य क्षमता घटेगी और मानसिक संतुलन बिगड़ेगा। ठीक इसी प्रकार यह भी समझा जाना चाहिए कि सुगन्ध की परिणति भी कितनी उपयोगी हो सकती है।

इत्र, फुलेन आदि का इन दिनों बहुत प्रचलन है। यह कृत्रिम और उत्तेजक होने से उलटी प्रतिक्रिया भी उत्पन्न कर सकती है। सात्विक एवं उपयोगी गन्ध वह है कि जो वृक्ष वनस्पतियों और खिले फूलों से निकलती है। इसे भी जीवनोपयोगी आवश्यकताओं में सम्मिलित रखा जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र में रहना चाहिए जहाँ ऐसा सुविकसित वातावरण हो अथवा अपने घर आ जाने में पुष्पोद्यान लगाने का प्रबन्ध करना चाहिए। इस व्यवस्था की भी सुविधा एवं सुसज्जा की तरह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता समझी जानी चाहिए।


गंधों का एक झुण्ड (kahani)

उस जंगल में गंधों का एक झुण्ड रहता था। घास खाता और मौज करता।

लोमड़ी ने उन्हें डराकर भगा देने और उस क्षेत्र में मौज करने की बात सोची।

गधों के पास पहुँची और बोली। सुनते नहीं,मछलियों की सेना बन गई है और वे जल्द ही तुम लोगों पर हमला करके, निगल जाने को घात में बैठी है।

गधे बहुत घबराये उनने कहा-‘दीदी, तो अब हमारे प्राण कैसे बचेंगे।

लोमड़ी ने आश्वासन दिया, मैं तुम्हें, सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दूँगी। यहाँ से जल्दी ही निकल चलो।

गधे लोमड़ी के पीछे हो लिये। चलते-चलते वे धोबियों के गाँव में पहुँचे। उन्हें धैर्य बँधाया, रक्षा का आश्वासन दिया और गले में रस्से डालकर खूँटे से बाँध दिया।

लोमड़ी धोबियों के घर जाकर खूब हँसी और बोलो-डर से बुरा और कोई नहीं। इन गधों को उसने यह तक नहीं सोचने दिया कि मछलियों की सेना कहाँ बन सकती है और वह गधों को कैसे निगल सकती है?

ग्रह नक्षत्रों के हमले से डरने वाले अविवेकी भी आमतौर से धूर्त ज्योतिषियों द्वारा इसी प्रकार ठगे जाते हैं।


वाक् शक्ति की अधिष्ठात्री गायत्री

मन्त्र की शक्ति असीम है। उसकी सामर्थ्य का पारावार नहीं हैं। लोहे से बने, विद्युत संचालित यन्त्रों का करतब हम प्रत्यक्ष देखते हैं पर वह होता तभी है जबकि वे सभी यन्त्र लोहे के हों, ओर सही पद्धति से निर्मित किये गये हों। बच्चों के खिलौने के रूप में रेल, मोटरें, हवाई जहाज आदि बने होते हैं पर उनकी बाहरी शक्ल बनी होती है। निर्माण पद्धति का प्रयोग जैसा होना चाहिए वैसा न होने से वे खिलौने भर बनकर रह जाते हैं, वह काम नहीं कर सकते जो असली यन्त्र करते हैं। यन्त्र की तरह मन्त्र भी है वह समर्थ और सर्वांगपूर्ण होता है लेकिन शर्त यह है कि उसके साथ साधक का व्यक्तित्व भी अध्यात्म प्रक्रिया पद्धति को अपनाए।

गायत्री मन्त्र की महत्ता सर्वोपरि प्रधान है। उसकी प्रधानता और वर्चस् को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि उसकी साधना और उपासना में व्यक्तित्व को और अधिक प्रखर बनाया जाय। स्मरण रखा जाना चाहिए कि वाणी से उपासना करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है, कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकें। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है। पर वह सम्भव तभी होता है जबकि उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है शोधित होने पर वह अमृत बन जाती हैं और विकृत होने पर विष का काम करती है।

गायत्री मन्त्र की साधना का प्रथम प्रयास अपने गुण कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना है। मात्र वाणी का संयम करने से उसे वाक् रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। मौन, सत्य, मधुर वचन, सत्प्रयोजन, सन्तुलित एवं स्वल्प समाज जिह्वा साधना के बाह्य उपचार है। अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय अन्तः उपचार है। प्याज, मूली, शराब, हींग आदि खाने पर मुँह में वैसी ही गन्ध आती हैं, अन्तःकरण में यदि असन्तुलन भरा हो तो जिह्वा की रोक बाँध में भी चूक होती ही रहेगी और वस्तुस्थिति उभरकर जिह्वा के माध्यम से प्रकट होती रहेगी। असद् वाणी साधना को मात्र शब्द साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध समझना चाहिए। तभी वाणी का प्रत्यावर्तन वाक् रूप में होता है और उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल व सार्थक होता है। ऐसी वाक् शक्ति की शास्त्रों में पग-पग पर महिमा गाई गयी है। कहा गया है -

क्ल यद्वाग्वदन्त्य विचेतानानि, राष्ट्री देवानाँ निषसाद् मन्द्रा। चतस्रव लर्ज्ज दुदुरे पयाँसि, क्व ल्विदस्याः परमं जगाम॥ -सरस्वती रहस्योपनिषद्

अर्थात्-वाक् विश्वव्यापी है, समस्त प्राणियों में व्याप्त है। अल्प चेतनों में भी वह विद्यमान है। वह देवताओं का भी संचालन करती है। न जाने हम कब उसे जान सकेंगे।

स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निभवत् साऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते। -वृ.उ. 1।3।12

अर्थात्-‘वाक्’ देवता को प्राण ने मृत्यु से पार किया। यह वाक् अग्नि बनकर अमर हो गई वह असीम शक्तियों से ओत-प्रोत होकर ज्योतिर्मय हो गई।

मननात्सर्वं भवानाँ गरुणात्संसार सागरात्। मन्त्र रुपा हि तटछक्तिर्मं तनत्राण रुपिणी॥ -प्रपंच सारतंत्र

अर्थात्-मन, मनन और भावनायें समस्त जगत का त्राण करने वाली शक्ति का नाम मन्त्र है। वह मूल में एक होते हुए भी प्रयोग में अनेक हो जाती है।

मन्त्र साधना में जप का प्रमुख स्थान है। उसकी साधना ही जप द्वारा की जाती है। मंत्र जप का अर्थ बताते हुए कहा गया है।

जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः। तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः॥ -अग्नि पुराण

अर्थात् ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश। इन दोनों प्रयोजनों को पूरा करने वाली निष्पाप और जीवन मुक्त बनाने वाली साधना ‘जप’ कहते हैं।

जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर ऊँचा होना चाहिए। जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण की बैखरी वाणी कहते हैं। यह केवल जानकारी के आदान-प्रदान से प्रयुक्त होती है। भावों के प्रत्यावर्तन में मध्यमा वाणी काम आती है। इसे भाव सम्पन्न व्यक्ति ही बोलते हैं। जीभ और कान के माध्यम से नहीं वरन् हृदय से हृदय तक यह प्रवाह चलता है। भावनाशील व्यक्ति ही दूसरों की भावनायें उभार सकता है। यह बैखरी और मध्यमा वाणी मनुष्यों के बीच विचारों एवं भावों के बीज आदान-प्रदान का काम करती है।

इससे आगे दो और वाणियाँ हैं जिन्हें परा और पश्यन्ति कहते हैं। परा पिण्ड में और पश्यन्ति ब्रह्माण्ड क्षेत्र में काम करती है। आत्म-निर्माण का-अपने भीतर दबी हुई शक्तियों को उभारने का काम ‘परा’ करती है। ईश्वर से-देव शक्तियों से-समस्त विश्व से-लोक-लोकान्तरों से संबंध संपर्क बनाने में पश्यन्ति का प्रयोग किया जाता है। अस्तु इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।

ऐं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्वाह्मणा यं मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति, तुरीर्य वाचो मनुष्या वदन्ति॥

अर्थात्-वाणी के चार चरण होते हैं, परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी। इनमें से पृथक तीन अन्तःकरण रूपी गुफा में छिपी रहती है चौथी बैखरी ही बोलने में प्रयुक्त होती है।

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदु ब्रह्मिणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ ऋक् 1।22।164।40

अर्थात्-यह वाणी चरण वाली होती है। उसे विद्वान ब्रह्मवेत्ता ही जानते हैं। इन वाणियों में से तीन तो गुफा में ही छिपी बैठी है। वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती। चौथी बैखरी को ही मनुष्य बोलते हैं।

परायामंकुरी भूय पश्यन्ताँ द्विदलीकृता॥ मध्यमायाँ मुकुलिता बैखर्या विकसीकृता। पूर्व यथोदिता वाग्विलोमेनास्तगा भवेत्॥ -योग कुण्डल्युषनिषद् 3।18-19

अर्थात्-वाणी का उद्भव परा से होता है। पश्यन्ती में विकसित होकर उसकी दो शाखायें फूटती है। मध्यमा में वह पुष्पों से लद जाती है और बैखरी में वह फलित होती है। जिस क्रम से उसका विकास होता है उसके उलटे क्रम से वह लय भी हो जाती है।

विधानात्मक कर्मकाण्ड की उपयोगिता भी है और महत्ता भी। पर उसे समय सर्वांगपूर्ण नहीं मानना चाहिए उसके साथ जब भावनाओं का-वृत्तियों का-समन्वय होता है तभी उस कर्मकाण्ड से शक्ति उत्पन्न होती है।

वाक् शक्ति को अग्नि भी कहा गया है। यह अग्नि सर्वत्र तेजस्विता, ऊर्जा, प्रखरता एवं आभा उत्पन्न करती है इसलिए वाक् अग्नि भी है। ऋग्वेद के दशक मण्डल के 98 वें सूत्र में 9 वें मन्त्र में कहा गया है कि ऋषि वाणी द्वारा ही अग्नि को प्राप्त करते रहे हैं। यदि देव, मन्त्र, वाक्, जप और स्वर के तात्विक स्वरूप को समझा जा सके तो गायत्री की अद्भुत चमत्कारी क्षमता मूर्तिमान होकर सामने खड़ी हो सकती है।


अपनों से अपनी बात - समझदारी को समय की जिम्मेदारी निभानी होगी

हम सब इन दिनों ऐसे संकटों भरी बेला में जी रहे है जिसकी भयानकता मात्र दूरदृष्टि से ही देखी जा सकती है। चर्म चक्षुओं की समीपता से तो पेट-प्रजनन में उत्पन्न व्यवधान ही संकट प्रतीत होते हैं। उन्हें तो मृत्यु, बुढ़ापा तो क्या, बहुत खा मरने पर पेट-फूलने तक का निकटवर्ती भविष्य तक दिखाई नहीं पड़ता।

पृथ्वी गोल है, घूमती है और सूर्य परिक्रमा में सनसनाती भ्रमण करती है इस सुनिश्चित तथ्य को किसी मूढ़मति के गले उतारना कठिन है। कर्मफल को अवश्यम्भावी होने पर लोग विश्वास नहीं करते। असंयम, आलस्य और अपव्यय के दुष्परिणाम तत्काल सामने नहीं रहते इसलिए उनकी भी उपेक्षा होती है। नशे बाजों को तत्काल मजा दीखता है, धन, यश, स्वास्थ्य और परिवार की बर्बादी पर वे कहाँ सोचते हैं? ऐसी ही अदूरदर्शी मूढ़मति को इन दिनों सर्वत्र साम्राज्य है। दूर तक दृष्टि पसार कर बनने वाली परिस्थितियों का मूल्यांकन कर सकना उन लोगों के लिए भी सम्भव नहीं हो रहा है। जो बुद्धिमत्ता का दम भरते हैं, पर उमड़ते आ रहे घटाटोप एवं अन्धड़ की परिणति सोचने और समय रहते कुछ बचाव करने तक की आवश्यकता नहीं समझते।

निस्संदेह बहुमत उन्हीं का है जिन्हें सामने भर की स्थिति समझ सकने की दृष्टि दोष सवार है। नेत्र ज्योति घट जाने पर अति समीप का ही कुछ दीखता है। दूरी पर रखी चीजें तक सूझती नहीं। बकरे कटते समय तक चारा खाते और साथी से टकराते रहते हैं। धूमधाम और देन-दहेज के विवाह करने वालों को दूरगामी दुष्परिणामों का भान कहाँ होता है? मानवी दुर्भाग्यों में यह विडम्बना सबसे निकृष्ट और दुःखद है कि उसे इर्द-गिर्द नजर पसार कर घटित होने वाले घटनाक्रमों को देखने और उनकी परिणति का अनुमान लगाने तक की फुरसत नहीं मिलती या आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। सबके साथ जुड़े हुए भविष्य की सूत्र शृंखला का पता तक नहीं चलता। जो हो रहा है उसका भले-बुरे परिणामों से कल परसों हमें तथा हमारे बच्चों को भी प्रभावित होना पड़ेगा, यह सोचे बिना स्वार्थ तक तो नहीं सधता फिर परमार्थ की बात तो बहुत दूर की रह जाती है।

बुद्धिमान समय को पहचानते हैं और विषम परिस्थितियाँ सामने होने पर अभ्यस्त ढर्रे को बदलने में आना-कानी नहीं करते। अग्निकाण्ड, अन्धड़, आक्रमण, उपद्रव, दुर्भिक्ष, बाढ़, दुर्घटना जैसी परिस्थितियों में जागरूकों को यह निर्णय करने में देर नहीं लगती है कि विषम परिस्थिति का सामना करने में विलम्ब नहीं लगना चाहिए भले ही इससे कामकाज में हर्ज क्यों न होता हो। जो ऐसे अवसरों पर उपेक्षा बरतते हैं वे आत्म प्रताड़ना और लोक भर्त्सना सहने के अतिरिक्त समर्थ होते हुए भी निष्ठुरता अपनाने में कारण समझदारी की नजर में गिरते असहयोग भुगतते और भविष्य को धूमिल करते हैं।

आज का अनास्था असुर पौराणिक काल के महादैत्यों से कहीं अधिक भयंकर और दुर्दान्त है उसके सामने हिरण्यकश्यपु, वृत्तासुर, भस्मासुर, महिषासुर, रावण, कुम्भकरण, कंस, जरासंध आदि सभी छोटे पड़ते हैं। वे शरीर धारी थे और क्षेत्र विशेष में निवास करते थे। उनके कुकृत्य भी थोड़े से थे इसलिए निरस्त करने वाली शक्तियों को बहुत बड़ा ताना-बाना नहीं बुनना पड़ा। वे सीधे भिड़ गये और अवतारी पराक्रम ने मल्लयुद्ध में उन्हें पछाड़ कर रख दिया। पर आज के अनास्था

असुर के संबंध में वह रणनीति काम नहीं आती। कारण कि अनास्था अदृश्य है, वह जन-जन के मन मन को आवृत्त आच्छादित किये हुए हैं। उसकी आकृति और प्रकृति सनक जैसी है जो उपचारकों के लिए सिरदर्द रहती है और जिस पर चढ़ बैठती है उसे यह पता नहीं चलने देती कि मुझे किसी संकट ने अपने जाल-जंजाल में जकड़ रखा है। ऐसी दशा में उससे पिण्ड छुड़ाना कितना कठिन पड़ता है इसे वे लोग ही समझ सकते हैं जिन्हें ऐसे असमंजस से निपटने की आफत उठानी पड़ती है।

प्रश्न दस पाँच का नहीं, समूचा अवा ही खराब हो गया है। कुएँ में भाँग पड़ी है जिसे पीकर समूचा क्षेत्र ही बावला हो गया है। मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुबन्ध अब किसी को स्वीकार नहीं। मानवी गरिमा के अनुरूप व्यक्तिगत कर्त्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व निर्वाह की बात किसी के गले नहीं उतरती। स्वतन्त्रता का नारा नये रूप में स्वेच्छाचार बन गया है। पशु प्रवृत्तियों को खुला खेलने का अवसर मिला है। प्रलोभनों की तुलना में अब कोई आदर्श अपनाने के लिए तैयार नहीं। इन दिनों तात्कालिक लाभ ही इष्ट है भले भी वह बुरे से बुरे आधार पर उपलब्ध किया जाय। दूरदर्शी विवेकशीलता को तो मानो तिलाँजलि ही दे दी गई हो। इसे छद्म का युग कह सकते हैं। बड़प्पन की सनक में लोग अपव्यय और पाखण्ड की चरम सीमा पर जा पहुँचे हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर लोकमानस का यही संव्याप्त चित्रण है। इसे इस प्रकार उल्टा जाय। उलटे को उलटकर पीछा कौन करे? इसके लिए इतनी शक्ति सामर्थ्य कौन जुटाये? प्रश्न टेढ़ा है। आश्चर्य है कि इसे पर्वत उठाने समुद्र सोखने जैसे दुस्तर कार्य को किस प्रकार अपने कन्धे पर उठाने का दुस्साहस प्रज्ञा अभियान ने अपनाया।

लोकमानस में दुष्प्रवृत्तियाँ भर जाने की भयावह प्रतिक्रिया अवश्यम्भावी है। आग में हाथ देने वाला बिना जले कैसे रहे? विष पान करने वाले का प्राण कैसे बचे? घड़े भर मदिरा पी जाने पर सन्तुलन कैसे निभे? मनःस्थिति में विकृतियाँ भरी नहीं है कि परिस्थितियाँ संकटापन्न हुई नहीं। नियति की क्रिया-प्रतिक्रिया व्यवस्था से बच निकलने की कोई पगडंडी नहीं। मरने वाले को आज नहीं तो कल मरना ही पड़ता है। बबूल बोने वालों के पैरों में आये दिन काँटे चुभते देखे जा सकते हैं। राह में रोड़े बखेरने वालों को पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ रही है। बर्रे के छत्ते में हाथ डालने वाले मुँह सुजाये फिरते हैं। अनास्था अपनाने की परिणति हाथों-हाथ सामने आ रही है। असंयम ने मनुष्य को दुर्बल और रुग्ण बनाकर रख दिया है। दुर्मतिग्रस्त मस्तिष्क की हरकतें दुर्गति का ऐसा चक्रव्यूह रच रही है जिनमें बाहर निकलने का मार्ग दीखता ही नहीं। अपव्यय और आलस्य को अपना लेने के बाद अर्थ संकट से उबरने की सम्भावना दीखती नहीं। मर्यादाओं की खुली अवज्ञा करने पर पारिवारिक वातावरण में विषाक्तता भरती जाती है ओर उसमें रहने के लिए विवशता में सराय या जेलखाने से अच्छा अनुभव होता ही नहीं। अब परिवारों के घोंसले धरती के स्वर्ग बनकर कहाँ रह रहे हैं। आँगनों में मात्र स्वार्थों की शतरंज बिछी रहती है और एक-दूसरे को मात देने की चाल ढूँढ़ता रहता है। समाज की स्थिति ऐसी है जिसमें जंगल का कानून ही सर्वमान्य है। जिसकी लाठी जिसकी भैंस का मत्स्य न्याय अब मनुष्यों ने भी प्रकृति व्यवस्था कह कर अपनाना आरम्भ कर दिया है। ऐसी दशा में नीति न्याय की बात कौन सुने? सद्भाव अब आत्मिक उपादान नहीं रहा उससे शिष्टाचार की विडम्बना के रूप में ही स्वीकारा गया है। फलतः एक दूसरे की जेब काटने की घात में घूमते रहते हैं। मनुष्यों के रूप में भेड़ियों, श्रंगालों के झुण्ड ही अपनी-अपनी वाणी बोलते और चित्र-विचित्र क्रियाएँ करते रहते हैं। प्रस्तुत हलचलों में से यह ढूँढ़ निकालना कठिन है कि इसके पीछे आदर्शों के लिए भी कहीं कोई स्थान रहा है या नहीं? जो हो रहा है उसे व्यर्थ ही नहीं अनर्थ भी कहा जा सकता है। सार्थक तो आदर्श भरा पुरुषार्थ ही हो सकता था। अब उसे अवैध सन्तान की तरह अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं।

भ्रष्ट विचारणा की परिणति दुष्ट गतिविधियों में हुई है। फलतः समस्याओं, विपत्तियों, विग्रहों और विभीषिकाओं के घटा टोप समूचे विश्वाकाश में उमड़ने-घुमड़ने लगे हैं। दुर्बलता, रुग्णता, दरिद्रता, वितृष्णा, उद्विग्नता, आशंका से आतंकित मनुष्य जी किस प्रकार लेता है यही आश्चर्य है। इतने विषाक्त वातावरण में भी मनुष्य की आत्मा का दम घुट नहीं गया, उसे एक अपने ढंग का अनोखा आश्चर्य कहना चाहिए। अपना युग वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत किये गये आश्चर्यों और श्रीमन्तों द्वारा उत्पन्न किये गये अजूबों का समय है। इसे एक अनबूझ पहेली ही कहना चाहिए कि वैज्ञानिक बौद्धिक और आर्थिक प्रगति के तूफानी बवण्डरों की ऊँचाई जहाँ आकाश में चूमने लगी है उसे मनुष्य की अपराधी प्रवृत्तियों ने और उसकी नारकीय परिणतियों ने भी बेतरह निचोड़ कर रख दिया है। इसे प्रगति कहा जाय या अवगति कुछ ठीक से कहते नहीं बनता।

मूर्धन्यों के कन्धों पर अपनी समर्थता से जन-जीवन की सुविधा, सुरक्षा और प्रगति की परिस्थितियाँ बनाने का उत्तरदायित्व था, पर वे उनने उल्टे पैरों उलटी दिशा से भूत-पलीत की तरह चलना आरम्भ कर दिया है। शासनाध्यक्षों का ध्यान महायुद्ध की-महाविनाश की सामग्री जुटाने और एक-दूसरे से आगे बढ़ जाने की होड़ में संलग्न है। धर्माध्यक्षों ने अपने को देवताओं का ऐजेन्ट घोषित करके चित्र-विचित्र भ्रान्तियों में भावुकों को भ्रमाने और चेली-चेलों की जेब काटते रहने से बढ़कर और कोई धन्धा सूझता नहीं। वे इतने सस्ते और इतने लाभदायक धन्धे से विरत होने के लिए किसी शर्त पर तैयार नहीं। वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों की कमी तूती बोलती थी और वे जनमानस की उत्कृष्टता बनाये रहने की जिम्मेदारी सम्भाल पर वैसा कुछ रह नहीं गया है। इन सभी बुद्धिजीवियों ने श्रीमन्तों की स्वेच्छा गुलामी स्वीकार करती है। अब श्रीमन्त ही साहित्यकार, कलाकार, बुद्धिजीवी, मनीषी को मनचाही भूमिका अपनी थैली के बल पर निभा लेते हैं। उन बेचारों का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व रह नहीं गया है। कुछ अपवादों को छोड़कर वे मालिकों के लिए इनके इशारे पर करते हैं। जब सभी को सुविधा प्रिय है तो वे ही क्यों आदर्शवादिता के झंझट में पड़कर गरीबी अपनायें और कष्ट उठायें।

श्रीमन्त तो सच्चे अर्थों में लक्ष्मी के पति होने के कारण नगद नारायण बन गये हैं। उन्हें वे ही व्यवसाय प्रिय है जिनमें उनकी जेब गरम हों। इसके लिए नशे उगाने, चकले चलाने, बूचर खाने बनाने, कामुकता भड़काने जैसे साधनों में पूँजी लगाना श्रेयस्कर जँचा है। लोगों के तेवर बदलते देखे तो अपने को धर्मात्मा विज्ञाप्तित करने के लिए देवालय बनाने या धर्म समारोह कराने जैसे शिगूझे छोड़ते रहने में भी उनकी अकल दूर की कौड़ी खोज लाती है।

इन परिस्थितियों की परिणति क्या हो रही है और क्या होने जा रही है इसका अनुमान लगाने वालों को भयाक्रान्त-रोमाँचित होना पड़ता है। अपराधों की बाढ़-बीमारियों का प्रकोप-अर्ध विक्षिप्त स्थिति का मस्तिष्क, आये दिन के उपद्रव विग्रह, तूफानी बवंडरों की तरह उफनते और सब कुछ निगल जाने की धमकी देते हैं। अणुयुद्ध से महाविनाश, परीक्षण विकिरण में अपंगता, जनसंख्या विस्फोट, ईंधन की समाप्ति, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, खाद्य प्रदूषण, जैसे संकट आज क्या कर रहे हैं और कल क्या करेंगे? इसकी चर्चा अब चौराहों पर होती है। उसे भविष्यवक्ता का कथन नहीं यथार्थता का प्रत्यक्ष दर्शन कहा जा सकता है। प्रस्तुत विकृतियों से विक्षुब्ध प्रकृति ने प्रताड़ना करने और बदला लेने का निश्चय किया है वह उन्मत्त हथिनी की तरह इस समूची हरियाली को कुचल डालने के लिए चिंघाड़ने लगी है। ध्रुव पिघलने, समुद्र उफनने, दम घुटने, हिमयुग आने, दावानल में सबकुछ जल जाने, महाप्रलय का दृश्य उपस्थित होने जैसी आशंकाएँ सामने हैं। इससे जो बच रहेंगे और उन्हें लाखों वर्ष पूर्व वाले आदिमकाल के नर वानर के रूप में रहने के लिए वाँछित होना पड़ेगा और अनाथ जीवन जीना पड़ेगा।

प्रकृति का ऐसा उद्धत प्रकोप पिछले दिनों चिरकाल से ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ जैसा इन दिनों हो रहा है। ऋतुएँ अपना समय धर्म छोड़ रहा है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि के ऐसे ज्वार भाटे कभी आये हों ऐसा इतिहासकारों की जानकारी में नहीं। भूकम्प और ज्वालामुखी जिस तेजी से जितनी अधिक संख्या में आ रहे और जैसी विषाक्त धूलि उड़ा रहे हैं उसे भी अभूतपूर्व ही कहना चाहिए। मैक्सिको के भूकम्प में जैसे तेजाबी धुएँ का बादल उड़ाया है वैसा इससे पूर्व कभी देखने-सुनने में नहीं आया। सूर्य कलंक, सौर ज्वालाएँ, चुम्बकीय आंधियां, खग्रास ग्रहणों की शृंखला, आगत धूमकेतु ग्रहों का एक राशि पर एकत्रीकरण अन्तरिक्ष विशारदों की दृष्टि से भू-लोक वासियों के लिए किसी अनिष्ट की आशंका व्यक्त करते हैं। कोरिया में सम्पन्न हुई ज्योतिर्विदों की अन्तर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में स्थिति के निकट भविष्य में विस्फोटक होने के संकेत दिये हैं। अध्यात्म क्षेत्र के दिव्यदर्शी ऐसी सम्भावना पहले से ही व्यक्त करते रहे हैं। बाइबिल, कुरान, पुराण जैसे ग्रन्थों में भी ऐसी ही विभीषिकाओं के संकेत है।

समय की सबसे बड़ी पहेली एक ही है कि इस आतंक का निराकरण कैसे हो? उसे कौन करे? स्थिति बताती है कि मनुष्य ने माचिस फेंक तो दी पर अब जबकि दावानल की ज्वालमाल गगनचुम्बी बन चली तो तब बुझाना उसकी बात नहीं रही। इसे बुझाने के लिए समर्थ दमकलों के अतिरिक्त बरसने वाले बादल ही आशा भरे आश्वासन दे सकते हैं।

इतिहास बताता है कि जब बिगाड़ बेकाबू हुआ है तो उस मदोन्मत्त हाथी को काबू में लाने के लिए चाबुक मार महावतों की मण्डली ही उसे झुकाने और लिटाने में समर्थ हुई है। अन्य किसी उपाय ने काम दिया ही नहीं। यह चर्चा अदृश्य युग प्रवाह के संदर्भ में की जा रही है। पौराणिक भाषा में इसे भगवान के अवतार कहते हैं। यह पेंडुलम जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया है। रात्रि के बाद दिन, भाटे के बाद ज्वार, मरण के बाद जन्म में भी यही ध्वनि प्रति ध्वनि की प्रक्रिया काम करती है। इतिहास में अनेक ऐसे अवतारों की चर्चा है जिनने अपने-अपने समय के युग संकटों को अपने-अपने ढंग से उपचारों से विग्रहों को हटाया और सन्तुलन बनाया है। दार्शनिक कहते हैं कि यह धरित्री नियन्ता की सर्वोत्तम कलाकृति है। उस पर जब-जब विनाशकारी घटाटोप छाये हैं तब-तब नियन्ता ने सन्तुलन बनाने के लिए दौड़ आने का वचन निबाहा है। इस बार भी ठीक वैसी ही परिस्थिति है जिसमें मानवी बुद्धिमत्ता और चेष्टा कुछ काम आ नहीं रही है। सुलझाने वाले-और भी अधिक उलझने की शिकायत करते और हार मानने जैसा भाव दर्शाते हैं। ऐसे समय में उस अदृश्य की ओर निहारा जा सकता है। जिसकी इच्छा से यह सृष्टि बनी और जिसकी प्रेरणा योजना के अनुरूप यह बढ़ी विकसित हुई है। उसके एक संकेत से ही कुछ का कुछ हो सकता है। वह तमिस्रा के व्यापक साम्राज्य को निरत करने के लिए एक छोटा-सा सूरज उगाकर देखते-देखते समूची परिस्थिति ही उलट सकता है। घोर निद्रा में पड़े हुए सभी प्राणी देखते-देखते उठ खड़े होने और कार्यरत होते दीख पड़ते हैं। निशाचरों की स्वेच्छाचारिता किसी माँद कोंतर में जा छिपती है। बीज को वृक्ष और शुक्रार्ण को हाथी बना देने वाला सृजेता जब चाहता है जलते धरातल पर जल जंगल एक कर देता है। ढूँठों पर बसन्त बहार ला देता उसके बांये हाथ का खेल है।

निराकार की सन्तुलन संवर्धन योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए उसके प्रतिनिधित्व सदा से साकार भूदेव करते रहे हैं। इन्हीं को सन्त, सुधारक और शहीद के नाम से जाना और खुली आँखों से देखा जाता है। ऋषियों और महामानवों की पुण्य-परम्परा के पीछे भगवान का सूत्र-संचालन देखा जा सकता है अन्यथा लोभ मोह के पतनोन्मुख प्रवाह को चीरकर मछली की तरह उलटा चलने और प्रचलन से भिन्न स्तर की रीति-नीति अपनाने की उमंग किसे उठें? क्यों उठें? सरल सुविधा को छोड़कर झंझट में पड़ने और कष्ट सहने के लिए कोई क्यों दुस्साहस अपनाये?

युग परिवर्तन की प्रक्रिया सदा अदृश्य में उफनने वाले आँधी-तूफान की तरह आती है। उसके सहभागी तिनके पत्ते तक गगनचुम्बी उड़ानें उड़ते हैं। इन दिनों युगान्तरीय चेतना का अदृश्य प्रवाह दृश्यमान प्रज्ञा अभियान के रूप में किसी सुनियोजित योजना के अंतर्गत काम करता देखा जा सकता है। उसके सहभागी प्रज्ञा पुत्र अपनी वरिष्ठता का परिचय देते हुए, युग सृजन को सहज श्रेय अर्जित करते हुए देखे जा सकते हैं।


बढ़ती आवश्यकताएँ और उठते कदम

छोटे बच्चे का काम तनिक से दूध और कपड़े में चल जाता है पर जैसे-जैसे वह बढ़ता जाता है उसी अनुपात में उसकी आवश्यकताओं में भी अभिवृद्धि होती है। खिलौने, किताबें, फीस, खेल-कूद से लेकर क्रमशः वह विवाह, व्यवसाय के लिए साधन मँगाता है और अन्ततः अभिभावकों को अपनी बची-खुची पूँजी उत्तराधिकार में हस्तान्तरित करने तक की नौबत आती है। उत्पादकों को जहाँ उत्साह उल्लास मिलता है, वहाँ साथ ही यह उत्तरदायित्व भी बढ़ता है कि सृजन को गतिशील समझे और उसकी बढ़ती हुई आवश्यकता तथा माँग को समयानुसार जुटाने के लिए तत्परता बरतें। जो इस तथ्य से अनभिज्ञ रहते, आंखें मूँदते हैं, वे समय की माँग न पूरी कर सकने पर दाँत निपोरते, उपहासास्पद बनते और पश्चाताप करते देखे गये हैं।

किसान और माली समान रूप से जानते हैं कि बीज बोने या पौधे उगाने का काम सरल है। पर जब फसल बढ़ती पकती है तो उसकी सिंचाई से लेकर रखवाली तक की ऐसी नई जिम्मेदारियाँ सामने आती हैं जिन्हें जुटाने के लिए दिन-रात एक करना पड़ता है। व्यवसायी भी इस तथ्य से परिचित रहते हैं। बैंक से लोन लेकर रोड के नीचे मशीन फिट कर देने पर कारखाने का उद्घाटन समारोह तो हो सकता है पर उसे ठीक तरह चलाने के लिए पूँजी, कच्चा माल, ग्राहक, कारीगर, चौकीदार, मुनीम आदि के न जाने कितने साधन जुटाने पड़ते हैं। यह जुगाड़ न जुटे तो दिवालिया बनते, कारखाना नीलाम होने, कर्जदारों द्वारा माँस-खिंचाई, साथियों में लोग हँसाई होती है।

प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालकों-प्रज्ञा परिजनों को-श्रेय सन्तोष तो बहुत मिला है। किन्तु साथ ही यह उत्तरदायित्व भी सामने खड़ा है कि आन्दोलन का अवश्यम्भावी विस्तार जिन नई आवश्यकताओं की माँग करे, उसकी पूर्ति को न केवल ध्यान रखे वरन् जुटाने का प्रयत्न प्राण-पण के साथ करने के लिए अहिर्निशि तत्परता बरतें।

जिनका यथार्थता से पाला पड़ा है वे जानते हैं कि युग समस्याओं के समापन में सृजन संघर्ष के लिए कटिबद्ध होने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग है नहीं। अनादि काल से महामानव इसी राज को अपनाते और मानवी गरिमा के निर्वाह का लक्ष्य प्राप्त करते रहे हैं। इसका और कोई शार्टकट नहीं। भजन-पूजन भी नहीं। वैराग्य का आडम्बर ओढ़कर प्रमादी बनने से भी बात बनती नहीं। जिन्हें भक्ति शब्द से कुछ लगाव हो उन्हें हनुमान अर्जुन का अनुकरण करना होगा। बुद्ध गाँधी न सही-विवेकानन्द दयानन्द बनने से कम में गुजारा नहीं। हम भामाशाह भले ही न बन सकें पर ईश्वरचन्द विद्यासागर की तरह न्यूनतम में निर्वाह करके अधिकतम अंशदान की उदारता तो अपना ही सकते हैं। हजारी किसान का हजारी बाग और पिसनहारी का कुँआ जब तक जीवित है तब तक किसी को भी शिक्षा सम्पदा की कमी की दुहाई देकर कृपणता के कारण असमर्थ विवशता व्यक्त नहीं करनी चाहिए।

मंजिल तो चलने से ही पार होती है। साधनों के अभाव में भी बड़े कामों के लिए बड़े कदम इस आशा से उठाने पड़ते हैं कि जब पेड़ों का माँग बादलों के बरसने के लिए विवश कर सकती है तो कारण नहीं कि जिसे प्रेरणा के बलबूते दुस्साहस किये जाते हैं वही उसकी पूर्ति का सरंजाम न जुटाये। महाभारत लड़ने के लिए अर्जुन को विवश करने वाले न हो उस असहाय के पक्ष में सैन्य दल भी न जाने कहाँ से खड़ा कर दिया था और समय पड़ने पर सारथी तक का काम सम्भाला था। अब की बार भी गूँगा-बहरा, अन्धा अपंग थोड़े ही हो गया है।

मिशन की बढ़ती आवश्यकताओं ने कुछ नये कदम बढ़ाने और उनके लिए नये सरंजाम जुटाने के लिए विवशता उत्पन्न कर दी है। परिस्थितियों को बदलने के लिए मानवी गरिमा की फरियाद सभी मूर्धन्यों ने अनसुनी कर दी है। शासनाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, श्रीमन्त, साहित्यकार, कलाकार कोई भी अपना अभ्यास ढर्रा बदलने की तैयारी नहीं। जन समुदाय को जगाने, उठाने, संजोने और परिवर्तन के लिए सहमत करने का झंझट उठाने की न किसी में इच्छा है न योग्यता। नेता बनने के लिए मंच संजो लेने और उस पर चित्र-विचित्र बोलियाँ बोलने के आयोजन, सम्मेलन भी अब एक प्रकार के कला कौतुक बन गये हैं। उस विनोद मनोरंजन से लोकमानस के प्रचलित प्रवाह को उलट देने की आशा करना आकाश कुसुम खिलाने के सदृश है। स्पष्ट है कि इससे आगे मूर्धन्यों के पाँचों पथ और कुछ करने को तैयार नहीं है। इन निचली अदालतों में अर्जी खारिज होने-मुकदमा हारने के उपरोक्त मानवी गरिमा का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रज्ञा अभियान ने जनता के सुप्रीम कोर्ट में सीधा जा पहुँचने और जोर-जोर से दरवाजा खटखटाने का निश्चय किया है। उसकी योजना पाँच सौ करोड़ मनुष्य के साथ व्यक्तिगत विचार विनिमय करने-दरवाजे-दरवाजे अलग जानने, और गली चौराहों पर ऊँचे स्वर से गुहार मचाने की है। इससे कम में बात बनती दीखती नहीं। बिचौलियों के माध्यम से चर्चा कहाँ तक चलाई जाय? बात जी खोलकर करनी है और आमने-सामने खड़े होकर। इस मन्थर गति से चली आ रही क्रिया पद्धति को अब आँधी तूफान जैसी गति देने का निश्चय किया गया है।

फोटो छापने वाले प्रदर्शन पदयात्राएँ नहीं, अपनी जन-जागरण के लिए जन संपर्क योजना को पुरातन तीर्थयात्रा के स्तर पर जब जीवन प्रदान किया गया है और इसके लिए युग प्रवक्ताओं के साथ युग गायकों की टोलियाँ बनाकर उन पिछड़े देहाती क्षेत्रों में भेजने का निश्चय किया गया है जहाँ से स्वागत और उपहार की सम्भावना न देखकर अब तक वरिष्ठों में से कोई पहुँचा ही नहीं। 70 प्रतिशत देहातों में वसा हुआ-इतने ही अनुपात में अनपढ़ों से भरा हुआ-क्षेत्र की असली भारत है। इसी को इष्टदेव माना गया है और उसी के कानों पर नगाड़ा न सही टूटा, कनस्तर बजाने का निश्चय किया गया है। विचार ऐसी हजार टोलियाँ कार्य क्षेत्र में उतारने का है जिनमें पाँच-पाँच युग प्रवक्ता और गायक हों। श्री गणेश सौ टोलियों में किया गया है। क्रमशः इसमें अभिवृद्धि होती चलेगी।

इतनी संख्या में भावनाशील प्रज्ञापुत्र ढूँढ़ने और सिखाने में उतनी कठिनाई आड़े नहीं आई जितनी लगती थी। एक वर्ष की समयदान योजना के अनुरूप अपनी श्रद्धांजलियां लेकर इतने प्रज्ञा पुत्र सामने आ गये हैं जिनके बलबूते जन-साधारण की प्रचार मण्डलियाँ जितनी अभीष्ट है उतनी में जो जा सके। कठिनाई लम्बे प्रवास में उनके वस्त्र विस्तार, प्रचार उपकरण और भोजन छादन का सरंजाम लादकर चलने वाले वाहनों की है। उन पर वृद्धों, असमर्थों, रुग्णों को जब तक बैठने की सुविधा भी तो मिल जाती है। फिर आगे पहुँचकर पद यात्राओं, तीर्थ यात्राओं उद्गाताओं के आगमन की पूर्व सूचना देने और कार्यक्रम से अवगत करना भी तो आवश्यक है। इन सब कार्यों के लिए द्रुतगामी और अधिक ढो सकने वाले वाहन चाहिए। यह कार्य अभी तो जीपें ही ठीक तरह कर सकती हैं। बाद में तो पूर्वकाल की तरह भविष्य में भी बैलगाड़ियों का सहारा लेना पड़ेगा। पर आज तो बैलों का चारा, पेट्रोल की तुलना में महँगा पड़ता है।

ज्यों-ज्यों करके कुछ पुरानी-धुरानी जीप गाड़ियाँ इकट्ठी की गई हैं और ठोंक-पीटकर काम चलाऊ बनाई गई हैं या उनकी संख्या इतनी कम है कि आवश्यकता- योजना का- एक बहुत छोटा अंश ही उनसे पूरा हो सका है। आवश्यकता एक लाख बुद्ध परिव्राजकों और इतने ही ईसाई मिशनरियों जितनी है, पर उनके निर्वाह प्रशिक्षण तक का सरंजाम जुट नहीं पा रहा है। नालन्दा तक्षशिला विश्व-विद्यालयों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है पर उन्हें चलाने के लिए न कहीं हर्षवर्धन है न अशोक, न चन्द्रगुप्त न चाणक्य। फिर प्रचारकों को दूर देशों तक पहुँचाने वाले काफिले भी तो चाहिए। ऊँटों और नावों के बिना बोझ लादकर भूखे नंगे प्रचारक कितनी दूर तक चलें और अभावग्रस्तता से जूझ-जूझकर कितने दिन जियें? ऐसी अग्नि परीक्षा में कई बार आदर्श की तुलना में साधना की महत्ता मानने को जी करता है। फिर भी जीते जी मक्खी कैसे निगली जाय? धन के लिए गरिमा को कैसे और कहाँ तक गिराया जाय?

पहेली को अनबूझी- समस्या को अधसुलझा छोड़ दिया गया है और जैसे बने जैसे जन-जागरण का-जन शक्ति के उद्भव को अनिवार्य आवश्यकता को आकाशी वर्षा के सहारे पूरे होने की आशा पर आरम्भ कर दिया गया है। तीर्थ यात्रियों की प्रचार टोलियाँ पच्चीस न रहकर सौ की संख्या तक जा पहुँचे इसके लिए जो कुछ सम्भव हो सो सब कुछ किया जा रहा है।

इस संदर्भ में एक नई कठिनाई यह है कि मथुरा हरिद्वार के केन्द्रों के हाथ अब तक हिन्दी भाषी क्षेत्र पड़े है। यह उत्तर और मध्य भारत की छोटी परिधि में ही अपना आलोक वितरण सम्भव हो सका। जबकि समूचे भारत में नव चेतना उत्पन्न करने के लिए गुजराती, मराठी, बंगला, पंजाबी, उड़िया, असामी, तमिल, तेलंग, मलयालम, कन्नड़ आदि प्रमुख भाषाओं के लिए युग पुरोहितों को तैयार करने के निमित्त नालन्दा तक्षशिला विश्व विद्यालय जैसी निर्वाह और प्रशिक्षण व्यवस्था तत्काल अभीष्ट है। बात चल ही पड़ी तो सोचना यह भी होगा कि हिन्दू धर्म में पहल करने के उपरान्त फैलना अन्यान्य धर्म सम्प्रदायों के क्षेत्र में भी होगा। धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण की रीति-नीति अपनाने के उपरान्त यह भी आवश्यक हो गया है कि विभिन्न धर्म की मान्यताओं, प्रथाओं और गाथाओं के आधार पर नवयुग की चेतना उत्पन्न करने वाले भी वर्ग समुदायों में काम करने के लिए उतारे जायँ। साम्प्रदायिक विलगाव वैमनस्य को एक केंद्र पर लगाने और एक कड़ी में गूंथने के अतिरिक्त और कोई व्यावहारिक मार्ग है नहीं। सब धर्मों को मिलाकर एक करना या एक मन्त्र पर सभी को एकत्रित करना वर्तमान मनःस्थिति और परिस्थिति को देखते हुए एक प्रकार से रंगीली कल्पना उड़ान भर है व्यावहारिक इतना ही है कि सभी धर्मों को यथावत् रहने देकर उन्हें बहुलता को एकात्मता के अपनाने के लिए सहमत किया जाय और रंग बिरंगे फूलों का एक महकता हुआ नयनाभिराम गुलदस्ता बनाया जाय।

भाषाओं और साम्प्रदायिक विलगाव को कोसते रहने भर से क्या काम चलने वाला है। कुएँ में उतरकर उसकी तली में जमी हुई सड़ी कीचड़ ऊपर खींचनी पड़ेगी अन्यथा विषाणु उपजते और हैजा, मलेरिया फैलाते ही रहेंगे। काँटे को काँटे से निकाला जाता है। हमें भाषाओं और साम्प्रदायिक क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहिए। उनके बनकर उनकी बात सुननी और जहाँ विग्रह का विष जमा है उसे निरस्त करना चाहिए। सभी वर्गों के विभेदों को एक केन्द्र पर लाने के लिए घुसने और मनोभूमि को ध्यान में रखते हुए पिछड़ेपन को आगे धकेलने का प्रयत्न करना चाहिए। यही है यथार्थवादी समाधान। जिनके संबंध में बुद्धकाल के उपरान्त कहीं किसी ने कुछ किया ही नहीं। इस टूटी कड़ी को जोड़ने के कुछ कर गुजरने की जिम्मेदारी ही प्रज्ञा अभियान ने नहीं सम्भाली है वरन् उसकी योजनाबद्ध तैयारी भी कर ली है।

बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए शान्ति-कुँज की इमारत बहुत छोटी पड़ी गई है। बड़ी इमारत बनने की व्यवस्था बनने में बीस साल की प्रतीक्षा भी तो नहीं की जा सकती। जो साधन हाथ में है उन्हीं के सहारे श्री गणेश करना पड़ रहा है। बन्दूक आने तक डकैतों का प्रतिरोध रोके रहने से भी तो बात नहीं बनती। रोड़े पत्थर बरसाकर भी तो बहादुरी का परिचय दिया जा सकता है। शान्ति-कुँज के एक कक्ष को ही इस योग्य बनाया गया है कि उसमें भारत भर की भाषाओं का काम चलाऊ प्रशिक्षण देकर युग प्रवक्ताओं को उन-उन क्षेत्रों में इसी प्रकार भेजा जा सके जिस प्रकार हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सफल प्रयास चल रहा है। इसका दूसरा पक्ष है सम्प्रदाओं की मान्यताओं, प्रथाओं एवं गाथाओं का अध्ययन कराते हुए नव सृजन में योगदान दे सकने योग्य जितने बीजाँकुर हैं उन्हें सींचना और ऐसी मनःस्थिति बनाना जिसमें एकता, सद्भावना और सहकारिता का सम्मिलित उद्यान फूलने फलने लगे। यह दोनों ही कक्षाएँ आरम्भ कर दी गई हैं। यह नालन्दा तक्षशिला की भावना एवं योजना का अनुकरण है। कह नहीं सकते, कि प्रयास को सुविस्तृत होने में कितना समय लगेगा।

युग परिवर्तन के कुछ मौलिक सिद्धान्त और प्रतिपादन हैं इन्हें सर्वप्रथम साहित्य रूप में प्रकाशित करना और मध्यवर्ती शिक्षित वर्ग तक पहुँचाना पड़ेगा। साम्यवाद और ईसाई धर्म को साहित्य प्रचार माध्यम अपनाने पर ही इतने कम समय में इतनी व्यापक सफलता मिली है। जर्मनी में मीनकैम्फ ने और चीन में लाल किताब ने जो हलचल उत्पन्न की उसे भुलाया नहीं जा सकता। मार्क्स और रूसो की लौह लेखनी ने सिद्ध किया कि बन्दूक की नली से नहीं क्रान्ति उँगलियों से पकड़ी जाने वाली कलम और दिल के फफोलों की स्याही से भी उबल सकती है। प्रज्ञा साहित्य का सृजन इसी स्तर पर हो रहा है। यों लिखा तो पिछले दिनों भी बहुत कुछ गया है या अब एक फोल्डर पुस्तिका हर दिन लिखे जाने और प्रकाशित होकर झोला पुस्तकालयों द्वारा जन-जन तक पहुँचाने की जो नये सिरे से नई व्यवस्था बनी है उसने तो नई चेतना जगाई और नई हलचल उत्पन्न की है। चालीस पैसा मूल्य की यह पुस्तिकाओं को लिखने, छापने और पाठकों तक हाथों-हाथ पहुँचाने का ऐसा तन्त्र बना है जिसे अपने ढंग का अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।

अब इस प्रस्तुतीकरण को अन्यान्य भाषाओं तक पहुँचाने की आवश्यकता पूरी करने के लिए जितना सम्भव हो रहा है तत्काल किया जा रहा है। इन नये फोल्डरों का अंग्रेजी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगला, उड़िया, तामिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन के लिए नये उपाय सोचे और नये ताने-बाने बुने जा रहे हैं। अनुवादकर्ता, पूँजी, प्रचारक का त्रिगुट संगम की अभीष्ट बना सकेगा साधन हाथ में हो तो तुगलक भी आये दिन नई राजधानियाँ बनाता, बदलता रहता था, पर हैरत उन पर की जानी चाहिए जो स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने के लिए भागीरथी हठवादिता या तप साधना का परिचय देते हैं। युग साहित्य के सृजन और विस्तार की प्रस्तुत योजना को गिलहरी द्वारा समूह को परों की बाजू से पाटने जैसा दुस्साहस कहा जा सकता है। इतने पर भी किसी को अविश्वास या उपहास नहीं करना चाहिए। आखिर समुद्र का पुल बाँधा तो गया ही था। भले ही उसे गिलहरी ने नहीं किसी अन्य ने बाँधा। कई बार सत्संकल्पों में भी इतना प्रचण्ड चुम्बकत्व होता है कि वे कार्यान्वित होने के लिए जब मचलते हैं तो साधनों को खिंचते घिसटते सिर पर वस्त्रों के बण्डल की तरह द्रौपदी तक पहुँचना पड़ता है।

बात प्रकाशन की ही चल पड़ी तो अब इसी सिलसिले में एक नया कदम यह है कि सभी भाषाओं की प्रचलित पत्र पत्रिकाओं में मिशन की विचारधारा को छपाने के लिए नया कदम उठाया जाय। अब तक यह कार्य मात्र मिशन की पत्रिकाएँ ही करती रही है। अब अन्यान्य पत्र पत्रिकाओं का सहारा लेकर कई लाख की अपेक्षा कई करोड़ की युग चेतना से अवगत अनुप्राणित करने का प्रयास चल पड़ेगा। इस संदर्भ में जहाँ भाषाई विद्यालय की स्थापना की गई हैं, वहाँ अनुवादक भी ढूंढ़े जा रहे हैं और लेखों को सही लिपि में लिखे जाने की पत्रकार परम्परा के अनुरूप उन-उन भाषाओं के टाइप राइटर उपलब्ध करने का भी प्रयास हो रहा है। कुछ भाषाओं के नये पुराने टाइप राइटर खरीद भी लिये गये हैं। कुछ सुविधानुसार अगले दिनों खरीदें जाते रहेंगे। भाषाओं विद्यालयों के लिए पाठ्य पुस्तकें, शब्द कोष आदि की व्यवस्था के साथ-साथ ही टाइप राइटरों का संग्रह एवं अभ्यास भी एक कार्यक्रम है। प्रचारक जहाँ पहुँचे, उन भाषाओं का उन्हें साहित्य भी तो प्रस्तुत करना होगा। इसलिए लेखनी और वाणी का समन्वत अनिवार्य हो गया है। युग पुरोहितों को प्रवचन देकर ही नहीं चल देना है पर संपर्क क्षेत्र के उस प्रतिपादनों को स्वाध्याय के सहारे चिन्तन मनन का विषय बनाने की ललक भी पीछे छोड़ना है। स्वाध्याय और सत्संग को परस्पर पूरक-अन्योन्याश्रित माना जाता रहा है अस्तु दोनों कदम साथ-साथ उठते चलने में मंजिल तक पहुँचने की बात बनती है। दो पहियों के बिना किसी गाड़ी का चल सकना सम्भव नहीं होता।

लाभदायक न होने से अन्यान्य प्रकाशकों को पुस्तक विक्रेताओं को मिशन के साहित्य में कोई रुचि नहीं। यदि उनका उचित शर्तों पर सहयोग मिला होता तो न तो स्वयं का प्रकाशन तन्त्र खड़ा करना पड़ता और न प्रचार विक्रय के लिए ज्ञानरथों की-झोला पुस्तकालयों की-अपनी स्वतन्त्र व्यवस्था बनानी पड़ती। विवशता ही है जो सहयोग के अभाव में एकाकी चल पड़ने वाले रविन्द्र उद्बोधन का आश्रय लेती और “एकला चलोरे” का साहस जुटाती है।

लेखनी वाणी के उपरान्त जन-मानस को आन्दोलित करने की प्रक्रिया ‘कला’ ही रह जाती है। लेखनी को गंगा-वाणी को यमुना और कला को सरस्वती की उपमा दी जाती रही है और उसका त्रिवेणी तीर्थराज कहा जाता है। “काक होहि पिक—बकहु मराला” जैसा काया-कल्प इसी संगम के अवगाहन में सम्भव होता है। कला का आश्रय नटराज का डमरू नृत्य, बैण्ड वादन का रास, नारद की वीणा झंकार, चैतन्य का कीर्तन, मीरा के घुंघरू न जाने कितनों को रोमांचित गदगद पुलकित भाव विभोर एवं परिवर्तित करते रहें हैं। युग चेतना की पृष्ठभूमि में कला का भी किसी न किसी प्रकार योगदान रहना चाहिए।

पिछले दिनों टेप रिकार्डर और स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से ही यह प्रयास किसी प्रकार किया जाता रहा है। टेप रिकार्डर के मिनी रेडियो और स्लाइड प्रोजेक्टर को मिनी सिनेमा कहकर परिजन किसी प्रकार मन बहलाते रहे हैं। अब इस दिशा में कैसेट प्रवचनों और संगीतों का एक सुनियोजित सिलसिला आरम्भ किया जा रहा है। इनसैट उपग्रह का नया आधार बनने से अगले दिनों टेलीविजन सर्वसुलभ होगा। इस माध्यम से छोटे बड़े ‘वीडियो फिल्म’ प्रस्तुत किये जा सकेंगे और उनके द्वारा सतयुग की वापसी का स्वरूप दर्शाने और उसके लिए तद्नुरूप जन-मानस विनिर्मित करने की नई सम्भावना प्रकट हुई है। अस्तु कला क्षेत्र में नये उत्साह के साथ प्रवेश करते हुए कैसिड निर्माण एवं वीडियो फिल्मों की लम्बी शृंखला चलाने का निश्चय किया गया है। तद्नुरूप गायक वादक अभिनयकर्ताओं से संपर्क साधने और उनके उपकरण खरीदने की अर्थ व्यवस्था बनाने का ताना-बाना बुनना आरम्भ कर दिया गया हैं। बन पड़ा तो ऐसा नाटक मंच भी इसी योजना के अंतर्गत बन सकता है। जो दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की क्रान्तिकारी अभिव्यक्तियों को रंगमंच पर प्रस्तुत करते हुए जन-जीवन में प्राण फूँक सके। कुरीति विरोधी सम्मेलनों में बिना दहेज के सामूहिक विवाहों का आयोजन हुआ करे और उसी अवसर पर मिशन का नाटक रंगमंच भी पहुँचा करे। चित्र प्रदर्शनी दिखाया करे। यह योजना खर्चीली और झंझट भरी तो है पर युग परिवर्तन भी ऐसा सरल कहाँ है जो जादू की छड़ी घुमाते ही चमत्कार बनकर प्रकट हो सके। इसके लिए न जाने कितने तन्त्र खड़े करने पड़ेंगे। उन्हीं झंझटों में एक कला मंच भी सम्मिलित करना पड़ेगा। कला के एक अंग चित्रकला को भी अछूता नहीं छोड़ा जा सकता। अभी तो मात्र आदर्श वाक्यों के स्टीकर पोस्टर ही इस प्रयोजन की पूर्ति कर रहे हैं। अगले दिनों कैलेंडरों के माध्यम से महान व्यक्तियों और महान घटनाओं की छवियाँ घर-घर पहुँचाने की योजना कार्यान्वित हो सकती है। निजी फिल्में बनाने की योजना तो बहुत बड़ी है। उसे तो कोई मिल खड़े करने वाला तन्त्र ही हाथ में ले सकता है। नितान्त आवश्यक कार्यों की पूँजी जुटाने के उपरान्त फिल्म बनाने जैसी व्यवस्था बन सकेगी। इसकी आशा वर्तमान सूत्र संचालनों के जीवन काल में बन पड़ने की सम्भावना कम ही है। फिर भी इस आशा को जीवन्त रखा जाना चाहिए कि शिक्षा और कला के दो महान माध्यमों को कोई न कोई कभी न कभी अवश्य ही हाथ में लेगा और समय की माँग पूरी करेगा।

उपरोक्त शुभारम्भों का निश्चित रूप से जागृत आत्माओं द्वारा स्वागत होगा। नये कदमों के नये दुस्साहस पर हर्ष भी व्यक्त किया जायगा और प्रशंसा प्रोत्साहन की भी कमी न रहेगी। पर बात इतने से बनती कहाँ है? आकाश से स्वर्ण मुद्राएँ बरसने वाली नहीं है। सहयोगियों की सेना कहीं से भी साज-सज्जा बनाकर चल पड़ने वाली नहीं है। उपरोक्त सभी काम सुयोग्यों का श्रम समय और सम्पन्नों का उदार सहयोग माँगते हैं। पर यह भी एक विडम्बना है कि इतने बड़े संकल्प के सहयोगियों में मूर्धन्य सुयोग्यों और थैली वाले श्रीमन्तों का एक भी नाम नहीं है। यह काम पूरा होना है तो फिर युग प्रहरियों को ही न केवल समर्थक रहना होगा अपितु समयदान अंशदान के लिए भी अपना ही मन टटोलना पड़ेगा। जो टटोलेंगे वे अपढ़ हजारी किसान और निर्धन पिसनहारी से कम नहीं अधिक ही महाकाल की झोली में अपनी अनुदान श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे।


देव संस्कृति की गरिमा

( मंगल विजय)


देव संस्कृति की गरिमा (kavita)

देवत्व को बचाने संघर्ष भी किये हैं। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण तक दिये हैं॥1॥

अज्ञान के तिमिर में जब जग भटक रहा था। विज्ञान की प्रगति का पहिया अटक रहा था॥

तब ज्ञान के दिवाकर हमने उगा दिये है। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण भी दिये हैं॥2॥

संस्कृति महान अपनी, थे विश्व के गुरु हम। रुकता जहाँ जमाना, होते वहाँ शुरू हम॥

अपने लिए न केवल, जग के लिए जिए हैं। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण भी दिये हैं॥3॥

भूलें न आत्म गौरव की उस परम्परा को। बंजर नहीं बनायें, इस शस्यश्यामला को॥

चैतन्य भी दिये हैं, हनुमान भी दिये हैं। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण भी दिये हैं॥4॥

विकृत विचार-विष से फिर जल रही मनुजता। देवत्व डर रहा है, खुश हो रही दनुजता॥

विष से उसे बचाने, संकल्प शिव किये हैं। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण भी दिये हैं॥5॥

फिर से मनुज हृदय में देवत्व हम भरेंगे। फिर स्वर्ग इस धरा पर हम अवतरित करेंगे॥

साहस नहीं मरेगा, संजीवनी पिये हैं। हमने दधीचि बनकर, निज प्राण भी दिये हैं॥6॥

*समाप्त*