शाश्वत जीवन को सुसम्पन्न बनाना श्रेयस्कर है।

यह सच है कि हम रात्रि और दिन चक्र में से गुजरते रहने पर भी मरते नहीं, अपना अस्तित्व यथावत् बनाये रहते हैं। उसी प्रकार यह भी सच है कि बार-बार जन्मने मरने पर भी जीवन का अन्त नहीं है। वह अविच्छिन्न है। अनादि और अनंत तक उसकी सत्ता में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होता है।

सूर्य हर दिन पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। चन्द्रमा का दृश्य स्वरूप अमावस्या की की रात को अगोचर रहता है और पूर्णिमा को उसे पूर्णतया उजागर देखा जा सकता है। बीच की तिथियों में उसकी कलाएँ घटती बढ़ती रहती हैं। इतने पर भी उसके मूल स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता। जन्म और मरण का चक्र भी ऐसा ही है, जिसे जागृति और सुषुप्ति के बीच चलने वाली आँख मिचौनी कहा जा सकता है। बचपन, यौवन, ढलान और मरण का चक्र तो अपने क्रम से यथावत घूमता है। फिर भी उसकी सत्ता अविचल धुरी की तरह अडिग ही बनी रहती है।

मरण से डरना क्या, वह तो पुराने वस्त्र बदलने और नये पहनने की तरह एक सुखद परिवर्तन है। नियति के इस गति चक्र को रोक सकना किसी के बस की बात नहीं। जो आया है वह जायेगा अवश्य। इसके लिए न शोक की आवश्यकता है, न सन्ताप की। बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि जीवन की अविच्छिन्न शृंखला को शाश्वत समझें और उसकी प्रत्येक कड़ी को अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्नशील रहें। आज के प्रयास कल को अधिक सुखी, समृद्ध और समुन्नत बनाने के लिए होते हैं। प्रस्तुत जीवन का ऐसा निर्धारण होना चाहिए जिससे उसका भावी स्वरूप क्रमशः अधिकाधिक श्रेष्ठ, प्रखर और उज्ज्वल बनता चले और वह पूर्णता के निर्धारित लक्ष्य तक बिना भटकाव के यथा समय जा पहुँचे और अपनाई रीति-नीति पर गर्व कर सके।


प्रसन्नता संपन्नता पर निर्भर नहीं

सम्पन्नता के साथ प्रसन्नता रहने की बात एक सीमा तक ही सच है। प्रसन्नता का अर्थ सामयिक शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो तो उसके साथ कुछ क्षण के लिए प्रसन्नता मिलने की बात समझ में भी आती है, पर यदि उसे आन्तरिक सन्तोष एवं उल्लास आनंद के साथ जोड़ा जायेगा तो उत्तर ‘नहीं’ में ही देना पड़ेगा। शरीर की आवश्यकताएँ कृत्रिम भी हो सकती हैं और वास्तविक भी। कृत्रिम वे हैं- जिनमें पेट भरा होने पर भी स्वादिष्ट वस्तुओं की ललक उठती रहती है। वास्तविक वे जिनमें भूख लगने पर खाली पेट को भरने की आवश्यकता पड़ती है। कृत्रिम की पूर्ति चखते ही हो जाती है क्योंकि पेट भरा होने पर गले से नीचे कुछ उतरता ही नहीं। वास्तविक की पूर्ति में कुछ मिनट लगते हैं। जैसे-जैसे पेट भरता जाता है वैसे-वैसे आहार से तृप्ति नहीं, अरुचि भी उत्पन्न होने लगती है और फिर बहुत आग्रह होने पर भी स्पष्ट इनकार करना पड़ता है। यही बात अन्य इंद्रियों के सम्बन्ध में भी है। उनमें से प्रत्येक की तृप्ति में तनिक सा समय लगता है और वस्तु प्राप्त होने पर उस प्रसन्नता का भी अन्त हो जाता है जो कुछ समय पहले उद्विग्न कर रही थी। फिर यह प्रसन्नता वस्तुओं के स्तर से भी सम्बन्धित है। घटिया मिलने पर कम और बढ़िया मिलने पर कुछ अधिक होती है। पर है दोनों ही सामयिक क्षणिक। कुछ ही समय में थकान, ऊब आने लगती है फिर हट जाने या हटा देने को जी करता है।

यह इन्द्रियजन्य वासना का विषय हुआ। मन भी ग्यारहवीं इन्द्री है उसका स्तर कुछ ऊँचा है। उसे अहंता की पूर्ति में रस आता है। वस्तुओं का संग्रह, व्यक्तियों पर आधिपत्य, अन्यान्यों की तुलना में वरिष्ठता जैसे प्रसंग मन को बहुत सुहाते हैं। ठाट-बाट, प्रदर्शन, प्रशंसा, आदि के द्वारा दूसरों पर धाक जमाने की ललक मन में छिपी रहती है। ऐसे अवसर जब भी आते हैं तब प्रसन्नता होती है। किन्तु है वह भी क्षणिक ही। जब तक इच्छित वस्तु नहीं मिली तभी तक उत्कंठा रहती है। मिलने पर सुरक्षा ईर्ष्या जैसी कितनी ही नई समस्याएँ उत्पन्न होती है और दुरुपयोग चल पड़ने पर तो उनकी बड़ी भयावह प्रतिक्रिया होती है। दुर्व्यसनों से प्रायः समय और धन फालतू होने पर ही मनुष्य घिरता है। दुर्व्यसनी किस प्रकार स्वयं डूबते और साथियों को डुबाते हैं, यह आये दिन की घटनाएं हर किसी के सामने घटती रहती हैं। यह तथाकथित सम्पन्नता- अहंता- का ही प्रतिफल है जो मन में तृष्णा बनकर निरन्तर कोलाहल मचाये रहती है।

तृष्णा को न बुझने वाली आग कहा गया है। एक की पूर्ति होते-होते ही उसने भी बड़ी- नयी आवश्यकता बनकर सामने आ खड़ी होती है। जो मिला, उसकी सुखानुभूति में कुछ ही क्षण व्यतीत होते हैं कि वह नगण्य लगने लगता है और दूसरे सुसम्पन्नों की तुलना में अपना भी वैभव बढ़ाने की उत्कंठा उभरती है। स्थिति ज्यों की त्यों। जो मिला था वह एक प्रकार से बेकार चला गया। न मिलने से पूर्व जो अभिलाषा थी उसी ने नये रूप में फिर उसी स्थान पर आकर अड्डा जमा लिया।

वासना तृष्णा का कुचक्र ही आमतौर से आँख-मिचौनी खेलता रहता है। सम्पन्नता कितनी ही क्यों न बढ़ती रहे, अतृप्ति से छुटकारा मिलने वाला नहीं। जब जो मिला वह या तो कम पड़ा या फिर अरुचिकर ही हो गया। इसके अतिरिक्त एक और बात भी है कि अभावग्रस्त स्थिति में मनुष्य जो नितान्त आवश्यक है उसी के उपार्जन में व्यस्त रहता है और समय, श्रम, खाली न रहने पर उन बुराइयों से बच जाता है जो खाली दिमाग को “शैतान की दुकान” सिद्ध करती है और ठलुआ लोगों को आवारागर्दी के- कुसंग के- दुर्व्यसनों के गर्त में गिराकर वर्तमान को बदनाम ओर भविष्य को अन्धकारमय बनाती है। इस दृष्टि से अभावग्रस्तों को सुसंपन्नों की तुलना अधिक भाग्यवान कहा जा सकता है। जबकि दूसरों की आंखें चौंधियाने की दृष्टि से धन वालों का ही पलड़ा भारी रहता है।

बात प्रसन्नता की चल रही थी। गम्भीर पर्यवेक्षण करने पर वह एक विशेष प्रकार की मनःस्थिति ही समझी जा सकती है ऐसी मनःस्थिति, जिसे शालीन, सभ्य सुसंस्कृत एवं उदात्त भी कहा जा सके। वह जिसे जितनी मात्रा में उपलब्ध है वह अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है और वस्तुओं तथा व्यक्तियों के साथ तालमेल बिठाने का प्रयत्न करता है। अमुक वस्तु मिलने की उपयोगिता हो सकती है। अमुक व्यक्ति का अनुग्रह सहयोग लाभदायक माना जा सकता है, पर ऐसा कुछ नहीं कि यदि वे उपलब्ध न हों तो काम चले ही नहीं, या प्रसन्नता से सर्वथा वंचित रहना पड़े। यदि ऐसा होता तो निर्धनों में ये अधिकांश दुःखी पाये जाते और धनवानों को प्रसन्नता से भरी-पूरी स्थिति में रहते देखा जाता। पर वैसा होता नहीं। सच तो यह है कि वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत पाई जाती है। अनुपात की दृष्टि से सम्पन्नों को चिन्ताग्रस्त, असन्तुष्ट, रुग्ण एवं विपन्न पाया जाता है। दबाव और तनाव के बीच घिसते हुए वे बेमौत मरते हैं जबकि अभावों में दिन गुजारने वाले सन्तोष की साँस लेते और गहरी नींद सोते देखे गये हैं। जितनी गहराई में उतरा जाय, उतना ही यह तथ्य स्पष्ट होता जाता है कि सम्पन्नता और प्रसन्नता में घनिष्ठता दीखती भर है। वस्तुतः वे हैं एक दूसरे से सर्वथा भिन्न। प्रसन्न रहने के लिए सम्पन्नता अनिवार्य नहीं। इसी प्रकार यह भी नहीं माना जा सकता कि जिसके पास सम्पन्नता होगी, वह प्रसन्न रहेगा ही। इतने पर भी सुविधा साधनों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। वे जहाँ होंगे अपनी अहिंसा का परिचय देंगे ही।

मनोविज्ञानी जेम्स ऐरिक प्रसन्नता की व्याख्या करते हुए लिखा है- “खुशी में खुशहाली एक सीमा तक ही सहायता कर सकती है। दोनों को एक दूसरे के साथ जोड़ा नहीं जा सकता। खुशी एक मनोदशा है जो तथ्यानुयायी चिन्तन एवं परिपक्व व्यक्तित्व के आधार पर स्वयं उपार्जित करनी पड़ती है। इसका जीने की कला के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। जो यह जानता है कि जीना किसे कहते हैं और उसके लिए किस स्तर का दृष्टिकोण तथा व्यवहार अपनाया जाना चाहिए, वही अपने भीतर प्रसन्नता उगा सकता है और उसके सुगन्ध भरे सौंदर्य से समीपवर्ती वातावरण में अनुकूलता तथा सहानुभूति भरा आकर्षण उत्पन्न कर सकता है।

श्रीमती नोरा जानसन ने अपने ग्रन्थ “प्रसन्नता का मनोविज्ञान” में लिखा है- दूसरे लोग एक सीमा तक ही हमें सुख या दुःख दे सकते हैं। इसी प्रकार सुविधा साधनों का बाहुल्य या अभाव भी इस संबंध में तनिक सा ही सहयोग देने या व्यवधान उत्पन्न कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। मानसिक दृष्टि से पराधीन व्यक्ति ही यह सोचते हैं कि अनुकूलता होने पर प्रसन्न रहा जा सकेगा। जबकि आत्म निर्भरों की मान्यता यह होती है कि हर स्थिति के साथ तालमेल बिठाकर सन्तोष एवं उल्लास का मार्ग खोज निकाला जा सकता है।

हर्बर्ट स्पेन्सर कहते थे “मनुष्य अपनी गरिमा समझे और उभारे तो उसे इस बात का अनुभव होने लगेगा कि परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति ही किसी की प्रसन्नता-अप्रसन्नता का आधारभूत कारण होती है। जो अपने को महत्वपूर्ण मानता है, अपने क्रिया-कलाप में रस लेता है और दूसरों से सीमित आशा अपेक्षा रखता है उसे किसी भी परिस्थिति में उत्साह बनाये रहने का अवसर मिलता रहेगा। जो उपलब्ध है उसमें मोद मनाने और भविष्य के लिए आशान्वित रहने की आदत डाली जा सके तो फिर अपनी प्रसन्नता मुट्ठी में रहेगी और उसे कोई अन्य छीन नहीं सकेगा।”

अरस्तू अपने शिष्यों से कहा करते थे- प्रसन्नता एक आदत है, जिस सुरुचि सम्पन्न दैनिक अभ्यास में प्रयुक्त करते रहने पर निरन्तर आगे बढ़ाते रह सकते हैं। अपने भीतर और बाहर इतना कुछ भरा पड़ा है कि उसकी शोभा निरखते और अनुकूलता का अनुमान लगाया जाय तो हर व्यक्ति अपने वर्तमान को सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा अनुभव कर सकता है। कठिनाइयां होती तो हैं, पर उन्हें जागरुकता और तत्परता उभारने वाली चुनौती भी तो समझा जा सकता है। चुनौतियां स्वीकार करने और वहाने प्रबल पुरुषार्थ करने से मनुष्य घाटे में नहीं रहता। इस प्रकार कठिनाइयों को दुःख में नहीं, सुयोग में गिना जा सकता है।”

दार्शनिक नीत्से कहते थे- “व्यक्तित्व की प्रखरता ही किसी में उत्साह भरे रह सकती है। मनोबल गिरा रहे तो मनुष्य आशंका और असफलता की कल्पना करता रहेगा। जिस-तिस पर दोषारोपण करके अपने को असहाय या निर्दोष सिद्ध करने की प्रवंचना से कोई मन हलका भले ही करले पर उससे कुछ बनता नहीं। जिन्दगी खिलाड़ी की तरह जीनी चाहिए। हर प्रतिकूलता से दूने उत्साह के साथ जूझना चाहिए और विश्वास करके चलना चाहिए कि मन से हार न मानने वाला अंततः जीत कर ही रहता है। असफलताएँ तो अधिक तत्परता अपनाने का उद्बोधन मात्र है उनमें ऐसा कुछ नहीं जिससे निराश होना या अप्रसन्न रहना पड़े”।

फ्रायड ने लिखा है- “दैनिक जीवन में कितनी ही छोटी-छोटी सफलताएँ आती रहती हैं। उपलब्धियां हस्तगत होती रहती हैं। प्रसन्नतादायक घड़ियां आती रहती हैं। यदि इन सब पर गौर किया जाय तो प्रतीत होगा कि अपने सौभाग्य में कोई कमी नहीं। बड़ी सफलताओं की योजना बनाने में हर्ज नहीं, पर आरम्भ से ही यह मानकर चलना चाहिए कि अपने हाथ में मात्र पुरुषार्थ है। जो चाहा गया है उसका मिलना बहुत कुछ उन परिस्थितियों पर निर्भर है जिन पर अपना काबू नहीं। इसलिए हर महत्वाकांक्षी को जहाँ आशावादी होना चाहिए वहाँ प्रतिकूलता ओर असफलता की सम्भावना को भी स्वीकारना चाहिए। इन उतार-चढ़ावों में जो अपना मनोबल बनाये रहते हैं उनकी प्रसन्नता कभी हाथ से जाती नहीं है।”

अभावों से किसी को छुटकारा नहीं। अपने से अधिक सम्पन्नों के साथ तुलना करने पर हर कोई अपने को अभावग्रस्त समझेगा। इसके विपरीत यदि अधिक कठिनाइयों से घिरे हुए लोगों के साथ तुलना की जाय तो प्रतीत होगा कि जो मिला हुआ है वह भी कम नहीं उसके लिए भी असंख्यों तरसते हैं। ऐसी दशा में क्यों अपने को अभावग्रस्त माना जाय? क्यों न अपने सौभाग्य को सराहा जाय?

हर उत्तरदायित्व को महत्व दिया जाय और उसे यथा सम्भव पूरी समझदारी एवं ईमानदारी के साथ निभाया जाय। किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखा जाय कि परिस्थितियों के उतार चढ़ाव तो धूप छांव की तरह हैं। उनका कौतूहल भर देखा जाय पर यह मानकर न चला जाय कि उन्हीं पर अपनी प्रसन्नता- अप्रसन्नता निर्भर है। अधिक साधन सुविधाओं के उपार्जन सदुपयोग का प्रयत्न तो किया जाय, पर साथ ही यह भी गिरह बांध कर रखा जाय कि सीमित या स्वल्प साधनों में भी सन्तुलन बिठाया और हँसता-हँसाता जीवन क्रम चलाया जा सकता है।


Quotation

लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढ़तरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं, स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम्। ब्रह्मात्मैक्यमपेत्य तन्मयतया चाखण्डवृतयानिशं, ब्रह्मानन्दरंस पिवात्मनिं मुदाशून्यैः किमन्यैर्भ्रमैः॥ -विवेक. - 979

अर्थात्- शंकराचार्य जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ विवेक चूड़ामणि में ध्यान की विधि बताते हुए लिखते हैं कि- सर्वप्रथम अपने चित्त (मन) को ब्रह्म परमात्मा में दृढता पूर्वक स्थिर करके, बाह्य इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर, उनके केंद्रों में स्थिर करो। शरीर को निश्चल रखते हुए उसके प्रति निश्चिन्त हो जाओ। इस प्रकार आत्मा और परमात्मा की ऐक्यानुभूति के साथ अहिर्निश मन ही मन ब्रह्मानंद रस का पान करो, अन्यान्य व्यर्थ की बातों से क्या लाभ?


सृजेता की एक अनुपम कृति यह सृष्टि

मोटी दृष्टि से यह सृष्टि अनगढ़, अव्यवस्थित और निष्प्रयोजन जान पड़ती है, पर गहराई से पर्यवेक्षण- अध्ययन करने वाले जानते हैं कि सर्वत्र सुव्यवस्था, सुगढ़ता का साम्राज्य है। अनगढ़, निष्प्रयोजन दीखने वाले घटकों की भी अपनी महत्ता उपयोगिता है। विशालकाय समुद्र को देखकर यह प्रतीत हो सकता है कि उसने बेकार में भूमण्डल का एक बड़ा भाग घेर रखा है। पर इकॉलाजी शास्त्र के विशेषज्ञ जानते हैं कि समुद्र का अस्तित्व न होता तो समय पर वर्षा, मौसम आदि की प्रकृति सुविधाएँ नहीं उपलब्ध होती। इस विराट सृष्टि में जो कुछ भी है, उपयोगी है। उन घटकों में एक अद्भुत तारतम्य, एवं सामंजस्य देखने को मिलता है। ऐसा लगता है, जिसने भी सृष्टि बनायी, बड़ी सोच-समझकर बनायी होगी।

गढ़ने एवं परस्पर एक दूसरे से तारतम्य स्थापित करने वाले सृष्टा कलाकार की कलाकृति एवं व्यवस्था बुद्धि को देखकर हैरत में पड़ जाना पड़ता है। गर्भ काल में जीवन को परिपोषित करने वाली एक तरह की परिस्थितियाँ उपलब्ध थीं। जन्म होने पर समूची सत्ता ही बदली हुई थी, पर तद्नुरूप दूसरे तरह की अनुकूल परिस्थितियां पहले से ही मौजूद थी। शरीर को विभिन्न प्रकार की इंद्रियां मिली, तो उनकी उपयोगिता को सार्थक करने वाले अनेकों विषयों का भी अस्तित्व विद्यमान था। शरीर को दो छोटी आंखें मिलीं, तो उन आंखों को सार्थकता प्रदान करने वाला लाखों मील दूर प्रचण्ड सूर्य था, उससे भी दूर टिमटिमाते हुए नन्हे-नन्हें तारे थे। उनसे निस्सृत प्रकाश को हमारी आंखों ने देखा। प्रकाश का अस्तित्व न होता तो ये आंखें बेकार थी। एकाकी वे देख पाने में कुछ भी समर्थ न हो पातीं। दांये बांये कानों को सुनने के लिए ध्वनि की सत्ता मौजूद थी। तभी तो कर्णेंद्रियां उसे सुनने में समर्थ हो सकीं। ऐसा लगता है कि जिसने इन कानों की रचना की, मानो उसी ने ध्वनि उत्पादक स्रोतों में ध्वनि आविर्भाव की क्षमता भी प्रदान की। जिसने स्वादानुभूति के लिए जिह्वा दी उसी ने फलों, शाकों एवं खाद्यान्नों में रस उत्पन्न किया। यही स्थिति घ्राणेंद्रियों की है। इसकी सार्थकता के लिए ही पुष्पों एवं वनस्पतियों की सुगन्ध सम्भवत अभिव्यक्त हुई। इस विलक्षण तादात्म्य को देखकर यह भान होता है कि गर्भावस्था की घोर अन्धकार तमिस्रा में बैठा जो इंद्रियों की रचना कर रहा था, वह अवश्य ही कुशल तत्वदर्शी सृष्टि का दृष्टा रहा होगा, जिसे बाह्याभ्यन्तर जगत का परिपूर्ण ज्ञान था। जिसे इंद्रियों को मात्र गढ़ना ही अभीष्ट नहीं था, वरन् उनका सुनिश्चित प्रयोजन भी उसके समक्ष स्पष्ट था।

सुनिश्चित प्रयोजन और सुव्यवस्था का प्रमाण भूमण्डल पर उपलब्ध परिस्थितियां भी देती हैं। उन्हें देखकर लगता है कि किसी सर्वज्ञ द्वारा ही जीवन को परिपोषित करने के लिए हर तरह की अनुकूलताओं का सृजन किया गया है। भौतिकीविदों के वह प्रतिपादन तर्क पूर्ण नहीं लगते कि पृथ्वी सृष्टि की आदि में जलता हुआ एक आग का गोला था जो कालान्तर में अनेकानेक परिवर्तनों से गुजरने के बाद अपने आप इस योग्य बन गया कि जीवधारी जीवनयापन कर सकें। जीवन धारण करने योग्य बनने के लिए पृथ्वी ने जितने रूप बदले हैं वे इतने अधिक एवं सुव्यवस्थित हैं कि उन्हें आकस्मिक नहीं माना जा सकता। एक निश्चित गति एवं कक्षा में पृथ्वी सतत् परिभ्रमणशील है। पृथ्वी सतत् अपनी धुरी पर घूमती रहती है, जिससे एक दिन और रात बनते हैं। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का घूमना एक दूसरे प्रकार की गति है। गैलीलियो तथा ग्रूनों ने इन्हीं दो गतियों की खोज की थी पर भारत के प्रख्यात ज्योतिर्विद् आर्यभट्ट ने सदियों पूर्व इन दोनों ही तरह की गतियों का वर्णन ‘आर्य गौः पृश्निर कमीदसदन्मातरं पुरः’ मन्त्र में किया है। इन दोनों गतियों के कारण ही पृथ्वी के परिभ्रमण में स्थिरता आती है। वह अपने ध्रुवीय अक्षों पर घूमते हुए 23 अंश पर झुकी हुई है। ऋतुओं में नियमितता का कारण यह झुकाव ही है उल्लेखनीय है कि यदि झुकाव एवं गति विशेषताएं न होतीं तो पृथ्वी पर विविध प्रकार की वृक्ष वनस्पतियों का अस्तित्व भी न होता। पृथ्वी की स्थिरता जड़ता को जन्म देती और वह ‘सत्य श्यामला’ नहीं दिखायी पड़ती। ध्रुवीय अक्ष पर पृथ्वी के झुकाव में पड़ने वाले थोड़े अन्तर से भी गम्भीर संकट उत्पन्न हो सकते हैं।

जीवन धारण करने योग्य परिस्थितियों के निर्माण में भूमण्डल के वातावरण की सहायक गैस परतों का विशेष योगदान है। खगोल विज्ञानियों के अनुसार प्रतिदिन लगभग दो करोड़ उल्काएँ तीस मील प्रति सेकेंड की गति से गिरती हैं। इनकी गति एवं प्रचंड ऊर्जा पृथ्वी को तहस-नहस करने के लिए पर्याप्त है। इनके अतिरिक्त सूर्य आदि पिंडों से पोषक जीवन तत्वों के साथ-साथ घातक किरणें भी आती हैं। सोलह सौ कि. मी. की मोटी गैस परतें उन हानिकारक प्रभावों से पृथ्वी की रक्षा करती हैं। टोपोस्फीयर, स्ट्रैटोस्फीयर, मीजोस्फीयर, थर्मोस्फीयर, आयनोस्फीयर जैसी विभिन्न परतें रक्षा कवच की भूमिका निभाती हैं। सूर्य की प्रचण्ड गर्मी का उपयोगी अंश पृथ्वी के जीवधारियों के लिए इन परतों से छनकर आता है। साथ ही समुद्र की विशाल जलराशि को वाष्पीकृत करने में भी इन परतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वायुमण्डल के साथ मिलकर महासागर भी प्रकृति के सन्तुलन चक्र में सहयोग देते हैं।

मूलतः जलवायु और प्रकाश पर सभी जीवधारियों का अस्तित्व टिका हुआ है। वृक्ष, वनस्पतियां जो प्राणियों की आहार हैं, भी इन्हीं तीनों के सहयोग से उगती, बढ़ती, फूलती और फलती हैं। ये तीनों ही जीवनदायी तत्व पृथ्वी पर प्रचुर परिमाण में मौजूद हैं। न केवल मौजूद हैं वरन् उनका एक सुनिश्चित चक्र एवं सन्तुलन है जिसके डगमगाते ही भारी संकट उत्पन्न हो सकता है। अन्यान्य ग्रहों पर ऐसी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं हैं कि जीवधारी वहाँ जीवित रह सकें। लम्बी खोज-बीन के वाद भी ऐसा कोई प्रमाण अब तक नहीं मिल सका है कि जीवन का अस्तित्व अन्य ग्रहों पर भी है। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करके अन्यान्य ग्रहों पर बसने की योजनाएँ तो बन रही हैं, पर वे व्यावहारिक कम काल्पनिक अधिक हैं।

न केवल जीवित रहने बल्कि प्रगति की दिशा में अनवरत बढ़ते रहने के लिए भी किसी दूरदर्शी सत्ता ने समस्त संसाधन प्रदान किये हैं। वन सम्पदा, खनिज सम्पदा, पेट्रोलियम आदि का सभ्यता के विकास में विशेष सहयोग है। वे मनुष्य को हाथ नहीं लगी होतीं तो उसकी बुद्धि की प्रखरता एक किनारे रखी रह जाती और आज भी वह आदिम युग की भाति पत्थरों से खेलता होता पर धन्यवाद उस सृष्टा को- उस कलाकार को जिसने कि भूमण्डल की अनुकूलताएं देकर अपनी महानता का परिचय दिया। पृथ्वी पर भी यदि चन्द्रमा, सूर्य अथवा मंगल जैसी दुरूह परिस्थितियाँ होतीं तो जीवन का अस्तित्व कभी का समाप्त हो गया होता और सर्वत्र श्मशान जैसी नीरवता का साम्राज्य होता।

पृथ्वी की आकृति एवं प्रकृति को देखने से भी लगता है कि उसे सोच समझकर इस योग्य बनाया गया है कि जीवधारी निवास कर सकें। यदि पृथ्वी का आकार अब की तुलना में छोटा, चंद्रमा जितना होता तो उसका व्यास भी एक चौथाई होता। प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से चन्द्रमा की गुरुत्व शक्ति छह गुनी कम है। पृथ्वी का आकार चन्द्रमा जितना हो जाने पर उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी अत्यन्त कम हो जाती। उल्लेखनीय है कि धरती के वायुमण्डल, जल एवं खनिज सम्पदा को सम्भालने, सुरक्षित रखने में गुरुत्व बल का विशेष सहयोग है। उसमें कमी होते ही अनेकों प्रकार के असन्तुलनों का सामना करना पड़ता है। वायु मण्डल की रक्षा परतों में व्यतिरेक से ताप की मात्रा इतनी अधिक हो जाती कि जीवित रहना कठिन पड़ता। यदि पृथ्वी का व्यास वर्तमान व्यास से दुगुना होता तो भी अनेकों प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होतीं। व्यास दूना होने से धरातल चौगुना हो जाता तथा पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी दुगुनी हो जाती। परिणाम स्वरूप 16 सौ कि.मी. की ऊंचाई तक फैला वायु मण्डल खतरनाक रूप से सिकुड़कर कम हो जाता। वायु मण्डलीय गैसों का दबाव भी 15 से 20 पौण्ड प्रति वर्ग इंच तक बढ़ जाता, जिसका दुष्प्रभाव जीवन पर भी पड़ता। उतरी एवं दक्षिणी ध्रुव जैसी भीषण ठण्ड अधिकांश क्षेत्रों में पड़ती। फलतः जीना दूभर हो जाता।

उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्यों पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले मानिटोवा (कनाडा) विश्व विद्यालय के जीव भौतिकीविद् फ्रेंक एलेन ‘दी एवीडेन्स ऑफ गाड इन एक्सपेंडिग यूनीवर्स पुस्तक में लिखते हैं कि- “यह पृथ्वी किसी समर्थ सत्ता द्वारा बड़ी सोच समझकर सत्प्रयोजन के लिए बनायी गयी है ताकि जीवों एवं पादपों का निर्वाह होता चले। यदि हमारी पृथ्वी का आकार सूरज जितना बड़ा होता तथा उसकी क्षमता यथावत् कायम रहती तो उसकी गुरुता 150 गुनी बढ़ जाती। फलस्वरूप वायुमंडल की ऊँचाई घटकर मात्र चार मील रह जाती। यदि ऐसा हो तो यह एक ऐसी स्थिति होगी जिसमें पानी का भाप बनकर उड़ना बन्द हो जायेगा। तब एक पौंड के प्राणी का वजन बढ़कर 150 पौण्ड हो जायगा तथा मनुष्य, हाथी, शेर आदि का आकार घटकर अत्यन्त कम हो जायेगा।” फ्रेंक एलेन का मत है कि गिलहरी जैसी इस छोटी आकृति वाले मनुष्य में बौद्धिक क्षमता भी प्रायः समाप्त हो जाती। पर सचमुच ही वह सत्ता अत्यन्त महान है जिसने उन प्रतिकूलताओं से धरती को बचाये रखा तथा अनुकूलताओं को जन्म देकर समस्त जीवों को विकसित होने का अवसर प्रदान किया।”

आकार का ही नहीं पृथ्वी की अन्य ग्रहों की दूरी से भी धरती पर अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में घना तारतम्य एवं सम्बन्ध है। सूर्य को ही लें। उसकी दूरी पृथ्वी से इस समय जितनी है उससे यदि बढ़कर दूनी हो जाय तो सूर्य से मिलने वाला ताप घटकर चौथाई हो जायेगा। सदियों के मौसम की अवधि दुगुनी हो जायेगी। यह स्थिति हिमयुग को आमंत्रित करेगी। इसके विपरीत यदि सूर्य से पृथ्वी की दूरी वर्तमान दूरी से घटकर आधी हो जाय तो सूर्य से मिलने वाली गर्मी चार गुनी बढ़ जायेगी। फलतः ऋतुओं की लंबाई आधी रह जायेगी। धरती इतनी अधिक गरम हो जायेगी कि प्राणी वृक्ष पादप सभी जलकर खाक बन जायेंगे। इस समय पृथ्वी का जो आकार है, सूर्य से जितनी दूरी है, अयन में घूमने का उसका जो वर्तमान वेग है, वे सभी जीवन धारण करने के अनुकूल है। मनुष्य जाति अनेकानेक सुख-सुविधाओं का उपभोग करती हुई आमोद-प्रमोद कर रही है वह उन अनुकूलताओं का ही परिणाम है।

जड़ परमाणुओं के संघात से सृष्टि के अकस्मात बनने जैसे निराधार तथ्यों का प्रतिपादन करने वाले तथाकथित अल्प बुद्धि संपन्नों के लिए सदियों पूर्व प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रासिस बेकन ने कहा था कि “थोड़ी वैज्ञानिक बुद्धि तथा दार्शनिकता आदमी को नास्तिकता की ओर ले जाती है पर गम्भीर शोध बुद्धि एवं दार्शनिकता मनुष्य को आस्तिकता की ओर ले जाती है। अतएव सृष्टि के नियामक सत्ता के संदर्भ में इन्कार करने के पूर्व गम्भीरता से विचार करना चाहिए।”

सचमुच ही वह अन्वेषक दृष्टि विकसित हो जाय तथा गहराई से मनुष्य खोज-बीन करे तो अपने ही चारों ओर उसे समर्थ अदृश्य सत्ता के अनेकों प्रमाण मिल जायेंगे। तब वह चाहे वैज्ञानिक ही क्यों न हो, रसायन शास्त्री ‘थामस डेविड पार्क्स’ की भांति अपनी भाषा में कह उठेगा “मेरे चारों जितना भी यह दृश्य जगत है, मैं उसमें नियम और प्रयोजन देखता हूं। मुझे वह मान्यता निराधार जान पड़ती है कि सभी पदार्थ एवं पदार्थों से युक्त यह सृष्टि अकस्मात- मात्र परमाणुओं के संघात से बनी है। मैं तो सर्वत्र कण-कण में बुद्धि व्यवस्था का साम्राज्य देखता हूं। एक ऐसी बुद्धि जो सुपर है, अचिन्त्य, अगोचर है। उस महती बुद्धि को ही मैं “परमात्मा कहता हूँ।”

डेविड पार्क्स के अनुसार “एक रसायनविद् के लिए तत्वों की नियत कालिक व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण एवं आकर्षण अध्ययन का विषय होना चाहिए न कि मात्र तत्वों के गुण-दोषों का अध्ययन- विश्लेषण। कारण कि समाहित नियमबद्धता किसी निर्माणकर्ता ‘सर्व समर्थ’ का प्रमाण स्वयं दे देगी।” पानी का उन्होंने एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। फार्मूला के अनुसार पानी का परमाणु भार 28 होता है। रसायन शास्त्र के सिद्धांतानुसार सामान्य तापमान एवं दबाव पर इसे गैसीय अवस्था में होना चाहिए। कारण कि तत्वों की कालक्रम तालिका से यही निष्कर्ष निकलता है। अमोनिया का परमाणु भार 27 तथा वह ऋण 33 सेन्टीग्रेड जितने कम तापक्रम पर भी वायु मण्डल के दबाव में गैस है। कालक्रम तालिका में तत्वों की स्थिति के हिसाब से हाइड्रोजन सल्फाइड का पानी से घनिष्ठ सम्बन्ध है। उसका परमाणु भार 34 तथा ऋण 59 सेन्टीग्रेड पर भी वह गैस ही है किंतु आश्चर्य यह कि सामान्य तापमान पर भी वह सर्वथा द्रव्य अवस्था में रहता है यह एक ऐसी विलक्षण स्थिति है जो हर विचारशील को सोचने पर बाध्य करती है। पर कोई कारण समझ में नहीं आता है, सिवाय इसके कि पानी की उपयोगिता पृथ्वी पर सर्वाधिक है। वृक्ष-वनस्पतियों तथा प्राणियों सभी के लिए वह अत्यन्त उपयोगी है। सम्भव है उसे अन्य पदार्थों से अलग विशिष्ट स्थिति सृजनकर्ता ने इसीलिए प्रदान की है।

थोड़ी और गहराई में चलें तो पानी के इस विशिष्ट गुण की महत्ता और भी स्पष्ट होती है। भूमण्डल का तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका है। ऋतु चक्र एवं तापमान के सन्तुलन में इस विपुल जल सम्पदा का विशेष सहयोग है। तत्वों की क्रम तालिका के अन्य तत्वों से अलग हटकर पानी की अपनी अलग विशेषताएँ न हों तो वायुमंडलीय तापमान एवं प्रकृति सन्तुलन चक्र में भारी व्यतिरेक उत्पन्न हो सकता है। पानी को पिघलने के लिए अधिक गर्मी चाहिए। चिरकाल तक वह द्रवावस्था में बना रहता है। भाप के रूप में परिवर्तित होकर उड़ने के लिए उसे भी अधिक 200 अंश सें.ग्रे. तापक्रम चाहिए। तापक्रम के सामान्य परिवर्तनों में पानी अपनी अवस्था नहीं बदलता। यह उसकी महत्वपूर्ण विशेषता है। थोड़े तापक्रम पर यदि भाप बनकर उड़ने लगे अथवा ताप की थोड़ी कमी होने पर बर्फ के रूप में जमने लगे तो गम्भीर संकट पैदा होने लगेंगे। सर्वत्र पानी का अभाव पड़ जायेगा। ऐसी स्थिति में जीवन संकट में पड़ जायेगा। यदि पानी के अन्दर तापमान रोधक विशिष्ट क्षमता न होती तो पृथ्वी जीवन के लिए उतनी अनुकूल न होती।

यह भी एक विलक्षण बात है कि जितने भी ज्ञात पदार्थ हैं उनमें एक मात्र पानी ही ऐसा द्रव है जो जमने पर हल्का हो जाता है। अन्यान्य द्रवों की स्थिति इसके विपरित है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि जमने के बाद नदियों अथवा झीलों में डूब जाने के बजाय वह ऊपर सतह पर तैरती है और कठोर पिण्ड के रूप में बदल जाती है। पानी के सबसे ऊपरी सतह पर यह इन्सुलेशन की एक ऐसी सतह बना लेती है जिसके कारण नीचे का पानी जमने नहीं पाता, उसका तापक्रम जमाव बिन्दु से ऊपर बना रहता है। जलचर जीव तथा जलीय वनस्पतियाँ इसी कारण सुरक्षित जीवित बने रहते हैं।

पानी ही नहीं सृष्टि के ऐसे अनेकों घटक हैं जो मस्तिष्क को हतप्रभ करते हैं। उनकी रचना अध्ययन विश्लेषण तो भौतिक विज्ञान द्वारा किया जा सकता है। पर इसका कोई उत्तर नहीं मिलता कि उनमें वे आवश्यक विशेषताएँ क्योंकर उत्पन्न हुईं। विशेषकर भू-मण्डल के लिए ही क्यों? उत्तर एवं समाधान के लिए डेविड थामस जैसे अनेकों मूर्धन्य वैज्ञानिकों की भाँति सोचना होगा कि “यह समूची सृष्टि किसी सर्वोच्च बुद्धिमान कुशल कलाकार की अद्भुत कलाकृति है जो किसी प्रयोजन हेतु बनायी गयी है। वह परम सत्ता अभिनन्दनीय वरणीय एवं श्रद्धा करने योग्य है। उससे सम्बन्ध जोड़कर सहयोग प्राप्त कर मनुष्य अपनी सत्ता को भी समीम से असीम, लघु से महान बना सकने का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है।”


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कायेन संवुता धीरा, अथो वाचाय संवुता। मनसा संवुता धीरा, ते वे सपरि संवुता॥ -धम्मपद

अर्थात्- शरीर, वचन व मन से संयत रहने वाले, बुद्धिमान् मनुष्य ही वास्तव में सुसंयमी कहलाते हैं।


महानता भीतर से उभरती है, ऊपर से नहीं टपकती

आदिकाल से मानवी व्यक्तित्व दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों के लिए चिन्तन का विषय रहा है। पूर्वार्त्त मनोविज्ञान इसकी संरचना, विकास के स्वरूप एवं लक्ष्य प्राप्ति की संभावनाओं पर पाश्चात्य चिन्तकों से अलग विचार प्रकट करता रहा है। जहाँ पाश्चात्य विद्वानों ने व्यक्तित्व की प्रौढ़ता-परिपक्वता पर नहीं के बराबर विचार व्यक्त किये हैं, वहाँ भारतीय विद्वान व्यक्तित्व को ब्रह्म का ही एक अंश मानकर उसके विकास की असीम संभावनाएँ बताते हैं। प्रवृत्तियों पर ही केन्द्रित पाश्चात्य मनोविज्ञान के अध्येताओं में से कुछ विद्वान ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने इस विषय पर ढर्रे से अलग चिन्तन किया है। ऐसे विद्वानों में आलपोर्ट, मेस्लोव, एडलर, जुग, काण्ड एवं ग्रीन का नाम लिया जा सकता है।

श्री.जी. डब्ल्यू आलपोर्ट परिपक्व व्यक्तित्व की तीन स्थितियाँ बताते हैं। आत्मविस्तार के लिये सतत् क्रियाशील बने रहना, आत्म केन्द्रित रहकर ही लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास करना, जीवन आदर्शों से परिचित बने रहकर प्रतिक्षण उनका ध्यान बनाये रखना।

अपनी पुस्तक ‘पर्सनालिटी’ में वे लिखते हैं कि परिपक्व एवं प्रौढ़ व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति अहं केन्द्रित, स्वार्थी नहीं होता। वह परमार्थ के कार्यों में, सब के कल्याण के कार्यों में समान रूप से रस लेता है। दूसरों के कार्यों में अभिरुचि का होना व्यक्ति के लिये उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि स्वयं के कार्यों में। महानता ही प्रौढ़ता का पर्यायवाची मानी जा सकती है। यह क्रमिक रूप से उभरने, विकसित होने लगती है, ज्यों-ज्यों व्यक्ति का आपा विस्तृत होता चला जाता है।

आत्म केन्द्रित स्थिति से विद्वान लेख का तात्पर्य है बाह्य परिस्थितियों से अप्रभावित बने रहकर आत्मचिन्तन में रस लेना, अपने आपको- अपने लक्ष्य को अधिक अच्छी तरह जानने का प्रयास करना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति परमार्थरत रहते हुए भी लोक प्रवाह में नहीं बहता। सदैव स्वयं को व अन्यों को गिराने वाले परामर्शों से बचाता एवं लक्ष्य का बोध कराता रहता है। अन्तिम है जीवन आदर्शों का सदैव ध्यान रख अपने आपको कभी दिग्भ्रान्त न होने देना। प्रौढ़ व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ एवं चिन्तन आदर्शों से ही अभिप्रेरित एवं संचालित होती हैं।

प्रसिद्ध नीतिशास्त्री ग्रीन महोदय ने मनुष्य की नैतिक प्रगति को दो प्रमुख लक्षण बतलाये हैं- सामंजस्य एवं व्यापकता। इनको जीवन क्रम में समाविष्ट कर मनुष्य अधिकाधिक महान बनता जाता है। वे कहते हैं- “महानता के लक्ष्य को प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति के जीवन में विभिन्न क्रियाओं में सामंजस्य रहना अनिवार्य है। उसके स्वयं के सिद्धान्तों एवं आचरण के मध्य विरोध नहीं होना चाहिए। कथनी-करनी में एकरूपता हो। ऐसा तो हो सकता है कि परस्पर विरोधी दीखने वाले नियम मन के विकास के स्तर हों, तब उन्हें विरोधी नहीं कहा जा सकता।” व्यापकता, नैतिकता का शाश्वत सिद्धान्त है। मनुष्य के आचरण का उद्देश्य जितना व्यापक होता है उतने ही अंशों में वह महान् होता है। वैयक्तिक लाभ की अपेक्षा पारिवारिक हित ही अधिक श्रेष्ठ है। परिवार की अपेक्षा गाँव, गाँव की अपेक्षा जिला, प्रदेश राष्ट्र एवं समस्त मानव समाज के कल्याण का लक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण है। जिस व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य सम्पूर्ण मानव-समाज का हित साधन करना है, नैतिक दृष्टि से वह संसार का सबसे महान व्यक्ति है। संकीर्ण मनुष्य में न तो सामंजस्य ही होता है और न ही व्यापकता। वह नैतिकता की दृष्टि से हेय समझा जाता है।

नैतिकता जीवन का लक्ष्य वैयक्तिक सुखों से ऊपर सामाजिक हितों के कार्यों में भाग लेना है। ऐसा करने से व्यक्ति अपने को एक महान संज्ञा का अंग अनुभव करने लगता है। यह अनुभूति ही उसे महानता के पथ पर बढ़ने के लिए प्रेरणा देती रहती है और व्यक्ति सामाजिक एवं आध्यात्मिक इच्छाओं की तृप्ति में आनन्दित होता है। धीरे-धीरे वह ‘स्व’ की पूर्णता की अनुभूति करने लगता है। मानव के नैतिक आदर्श का विकास अनायास नहीं हो जाता। यह धीरे-धीरे होता है बीज से वृक्ष बनने की तरह यह लम्बे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है। साँसारिक जीवन में कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उसने अन्तिम नैतिक आदर्श की उपलब्धि कर ली। एक स्तर पर पहुँचने पर उसे अगले स्तर पर चलने की अन्तःप्रेरणा मिलती है। इसी प्रकार उसके कर्तव्य एवं आदर्श भी उसके विकास के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं।

कार्ल युग ने मानवी विकास की वास्तविकता और उत्कृष्टता को व्यक्ति की अन्तर्मुखी चेतना के साथ जोड़ा है। वे कहते हैं- “बहिर्मुखी चिन्तन अविकसित व्यक्तित्व का परिचायक है। छोटे प्राणिमात्र परिस्थितिजन्य संवेदनाओं से ही प्रभावित होते हैं और उन्हीं के साथ तालमेल बिठाने, बदलने या बढ़ाने में लगे रहते हैं। उन्हें आत्म चिन्तन की न तो आवश्यकता अनुभव होती है और न ही उस क्षेत्र में प्रवेश करने का अनुभव अभ्यास। अतएव उनके लिए यह समझना कठिन पड़ता है कि अपना चिन्तन, स्वभाव, दिशा निर्धारण या कार्य प्रयास भी कठिनाइयों का कारण, अनुकूलता में अवरोध बन सकता है। आत्म समीक्षा कर सकने के क्षेत्र में जो भी पिछड़े होंगे, वे मात्र परिस्थितियों से उलझे रहेंगे। अपने प्रवाह में हरे फेर करने की बात वे विवेक पूर्वक नहीं सोच सकेंगे। ऐसी दशा में उनकी सफलता उसी सीमा तक की होगी जितनी कि अनुकूलता शक्य हो सके।”

प्रगतिशीलों की विशेषता रही है कि वे मनःस्थिति के महत्व को भी स्वीकार करते हैं और परिस्थितियों के लिए उसे भी एक बड़ी सीमा तक निमित्त कारण स्वीकार करते हैं। ऐसे लोग अपने को सुधारने या समर्थ बनाने पर भी उतना ही ध्यान देते हैं जितना कि परिस्थितियों का उलझने में। आत्म समीक्षा, आत्म निर्माण, आत्म विश्वास और आन्तरिक उल्लास ही वे विभूतियाँ हैं, जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में प्रगतिशील बनाती और अभीष्ट सफलता के मार्ग पर द्रुत गति से अग्रसर करती है। जबकि बहिर्मुखी व्यक्ति परिस्थितियों के झकोरों में तिनके की तरह इधर-उधर अनिश्चित दिशा में भटकते रहते हैं।

नितिशास्त्री एच.ए. मरे ने ‘एक्सप्लोरेशन इन पर्सनालटी’ में लिखा है- व्यक्तित्व के विकास के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने रुझान को अपने से हटाकर दूसरों की ओर ले जाय। कारण कि समाज में सभी व्यक्ति एक दूसरे से जुड़े हैं और सामाजिक समस्याएँ वास्तव में व्यक्ति की समस्याएँ हैं। इसी को परोपकार या पर सेवा, दूसरों के प्रति सहानुभूति आदि नामों से कहा गया है। सामाजिक अभिरुचि जागृत होते ही व्यक्ति की बुद्धि भी विकसित होने लगती है।”

बुद्धिमत्ता एक बात है और विवेकशीलता या दूरदर्शिता दूसरी। बुद्धि के निर्णय स्वार्थ परक होते हैं। इसे यह देखना होता है कि अपनी भौतिक आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति होती है या नहीं। यदि होती हो तो ही उसे अपनाया जाय। बुद्धिमत्ता का दूसरा चरण यह है कि अनुकूलता प्राप्त करने के लिए जल्दी किस तरह हो सकती है और परिमाण में उसे किस प्रकार अधिक मात्रा में हस्तगत किया जाता है। यह दोनों ही आधार ऐसे हैं जो नीति निष्ठा की परवाह नहीं करते, गुंजाइश दीखते ही उसे उखाड़ फेंकने में भी संकोच नहीं करते। दूसरों को इस निर्णय या प्रयास से क्या लाभ-हानि पहुँचती है- उस ओर से भी वहीं आंखें बंद किये रहती है। बुद्धिमता प्रत्येक प्राणी में पाई जाती है। आहार खोजने, ऋतु प्रभाव के अनुकूल सुविधा ढूंढ़ने, आत्म रक्षा के उपाय खोजने, प्रजनन का ताना बाना बुनने में वे सभी प्रवीण होते हैं। इन कार्यों में परिस्थिति की विषमता से टकराने में उनकी छोटी सी चेतना कितना बड़ा काम करती है यह देखते ही बनता है। हिंस्र पशु तो जीवधारियों को शिकार बनाने में उनकी बुद्धि से भी जूझते हैं जबकि शाकाहारियों को सीधी साधी वनस्पतिओं से ही पाला पड़ता है। यही कारण है कि माँसाहारी, शाकाहारियों की तुलना में अधिक चतुर और दक्ष होते हैं। बुद्धि वैभव का यही चमत्कार है जो मनुष्यों में उनकी स्थिति के अनुरूप और भी अधिक पाया जाता है। संक्षेप में बुद्धिमत्ता को स्वार्थ साधन की सहधर्मिणी कह सकते हैं।

बुद्धिमत्ता मात्र शरीर सुविधा के लिए अपनी तीक्ष्णता द्वारा अधिक सुविधा साधन इकट्ठे कर सकती है। उसके द्वारा उपार्जित सभी उपलब्धियाँ उसी स्तर की हो सकती हैं। इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति अधिक बलवान वैभववान् भर हो सकता है। इतने पर भी उसे असामान्य स्तर की प्रगति के लिए सामान्य नीति मर्यादा को उल्लंघन करके अपनी तीव्रता को ऐसी बनाना पड़ेगा जिसे पराक्रम स्तर की- चमत्कारी असाधारण कहा जा सके। इस प्रयास में उसे नीति मर्यादाओं की उतनी ही अधिक उपेक्षा अवज्ञा भी करनी पड़ेगी।

इतने भर से कोई व्यक्ति श्रेष्ठता अपनाकर श्रद्धास्पद नहीं बन सकेगा और सर्वजनीन हित साधन के लिए महत्वपूर्ण कर सकने की न तो मनःस्थिति में ही रहेगा न परिस्थिति ही हाथ लगेगी। ऐसी दशा में उन सद्गुणों और सद्भावों को व्यवहार में उतारने का कभी अभ्यास ही नहीं मिलेगा जो विवेकशीलता को जानकारी मात्र न रहने देकर व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बनाते हैं। सदाशयता ऐसी ही स्थिति का नाम है जो सद्भावों के सद्व्यवहारों में परिणत होने के कारण ही विकसित एवं परिपुष्ट होती है। कहना न होगा कि विवेकशील दूरदर्शिता ही वह उच्चस्तरीय भावशक्ति है जो दूसरों पर असाधारण छाप छोड़ती और अपनी निजी सत्प्रवृत्तियों को उभारने में सफल होती है। इतनी सफल जिसे गरिमाशील व्यक्तित्व की अधिष्ठात्री भी कहा जा सके।

अब्राह्म मॉस्लोव ने मानव समाज को दो भागों में विभक्त किया है। वे निर्वाह चक्र में परिभ्रमण करने वाले मनुष्य शरीर धारियों को ‘नीडडिपेण्डेन्ट’ वर्ग में गिनते हैं और आदर्शवादिता के पक्षधर लोगों की गणना ‘सेल्फ एक्चुअलाइजेशन’ श्रेणी में करते हैं। दोनों की विभाजन रेखा जो उनने बनाई है वह इस प्रकार है। “जो सुविधा साधनों के उपार्जन में संलग्न रहने और उन्हीं के उपयोग संचय में मोद मनाते हैं। व्यथायें भी जिन्हें वही सताती हैं, जिन्हें शरीर पीड़ा, धन हानि या अपमान के रूप में जाना और कष्टकर माना जाता है। उन्हें निर्वाह चेतना वाले ‘नीड डिपेण्डेन्ट’ स्तर का कहा जायेगा।

आदर्शवादी अथवा ‘सेल्फ एक्चुअलाइजेशन’ वर्ग के वे हैं जिनकी आकाँक्षाएँ एवं प्रवृत्तियाँ महानता के उच्चस्तरीय निर्धारणों के साथ जुड़ी होती हैं। ऐसे लोग पूर्वाग्रहों की परवाह न करके सत्य और तथ्य को खोजते तथा उसी निष्कर्ष को अपनाते हैं। वे सफलता को आदर्शवादिता की दृढ़ता के रूप में देखते हैं न कि लाभ-हानि का बही-खाता देख कर।

वे सादगी अपनाते, विनम्र रहते और सज्जनोचित व्यवहार का स्वभाव बनाते हैं। वे कर्तव्य को प्रधान और अधिकार को गौण मानते हैं। मित्रता केवल उन्हीं से करते हैं जिन्हें प्रामाणिक, दूरदर्शी एवं उदार हृदय जाना जा सके। आत्म निर्भरता उनमें कूट-कूट कर भरी होती है। वे दूसरों के सहयोग का स्वागत तो करते हैं पर उसको प्रधान मानकर कोई योजना नहीं बनाते। कठिनाइयों में संतुलन नहीं गंवाते और दूरदर्शी सूझबूझ का परिचय देते हैं। वे आशावादी होते हैं, तथा ईमानदारी का किसी परिस्थिति में परित्याग नहीं करते।

निर्वाह चक्र में संलग्न व्यक्ति सम्पन्न तो हो सकते हैं और दूसरों की तुलना में अधिक कुशल पुरुषार्थ होने का गर्व भी कर सकते हैं किन्तु न उनके पल्ले आत्म संतोष पड़ता है और न आत्म विकास का वह लाभ वे उठा पाते हैं जिसके कारण लोग श्रद्धास्पद बनते मानवता की महती सेवा करते हैं तथा इतिहास के पृष्ठों पर अपने प्रकाश भरे अविस्मरणीय चरण चिन्ह छोड़ते हैं।


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धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी सत्यं सूनुस्यं दया च भगिनी भ्राता मनः संयमः। शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजन मेते अस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद्भयं जायते॥ -बाण भट्ट

जिसका पिता धैर्य हो, क्षमा जिसकी माता हो, शान्ति जिसकी गृहिणी हो, सत्य जिसका पुत्र हो, दया बहन हो, मन का संयम भाई हो, भूमितल शय्या हो, दिशाएँ वस्त्र हों, अमृतमय ज्ञान ही भोजन हो- इस प्रकार के परिवार से युक्त व्यक्ति के लिए, है मित्र! इस संसार किससे भय होता है? अर्थात् किसी से नहीं।


आधुनिक मनोविज्ञान का उपनयन संस्कार किया जाय

अविज्ञात शक्तियों की कितनी ही धाराएँ प्रकृति के गर्भ में अभी भी विद्यमान हैं। असीम सम्भावनाओं के समक्ष प्राप्त हुई भौतिक शक्तियों की सामर्थ्य अत्यन्त न्यून है। सामर्थ्यों के जो महत्वपूर्ण स्रोत हाथ लगे हैं वे कभी काल्पनिक तथा असम्भव जान पड़ते थे। बिजली, भाप, चुम्बक, परमाणु ऊर्जा जैसी शक्तियाँ भी करतलगत होंगी, ऐसी कल्पना थोड़े से व्यक्तियों को रही होगी। पर आज सर्वत्र उनका ही वर्चस्व है। उन्हें प्राप्त कर लेना न केवल सम्भव हो गया है बल्कि विभिन्न कार्यों में उपयोग भी होने लगा है। प्रकृति की शक्ति धाराओं की जो जानकारी मिली तथा प्रयोग में आयीं, उनकी तुलना में अविज्ञात का क्षेत्र कई गुना अधिक है। पदार्थ की नाभिकीय शक्ति से भी अधिक प्रचण्ड अदृश्य भौतिक शक्तियों का अस्तित्व प्रकृति में मौजूद है। अपने ही इर्द-गिर्द एक और प्रतिविश्व, प्रतिपदार्थ, प्रतिकण, प्रतिअणु की दुनिया है जो अत्यन्त रहस्यमय तथा विलक्षण है। उस अदृश्य दुनिया तथा जुड़े घटकों के विषय में वैज्ञानिक कितने ही प्रकार की अटकलें लगा रहे तथा सम्भावनाएँ व्यक्त कर रहे हैं। ब्लैक होल, साइक्लोन, सूर्य, गुरुत्वाकर्षण आदि की प्रचण्ड शक्तियों का भी उपयोग होना अभी बाकी है। वह विधा हाथ नहीं आयी है जिससे उनकी शक्तियों को कैद किया जा सके तथा प्रयोग में लाया जा सके।

प्रकृति की भाँति मानवी काया भी अत्यन्त रहस्यमय है। शारीरिक जानकारियों का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा विज्ञान की पकड़ में आया है, पर वह परिपूर्ण नहीं है। मन तो और भी विलक्षण है। उसका सामान्य क्रिया-कलाप, इच्छा-आकाँशा एवं विचारणा के रूप में दिखायी पड़ता तथा स्थूल गतिविधियों का कारण बनता है। आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी, अध्ययन, विश्लेषण यहीं तक सीमित है। चेतन, अचेतन मन की रचना तथा प्रकृति को समझने तक ही अभी मनोविज्ञान सीमित है। छुपा हुआ चमत्कारी सुपर चेतन भी विद्यमान है, जो कि शक्ति एवं प्रेरणा का केन्द्र बिन्दु है। यह रहस्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में अभी उजागर होना बाकी है। जानकारियों का अभाव किसी भी शक्ति के उपयोग से वंचित रखता है जैसा कि प्रकृति की प्राप्त शक्तियों के संदर्भ में दीर्घ काल तक होता रहा है।

आधुनिक मनोविज्ञान की मानवी सत्ता को भलीभाँति समझने, सन्निहित सामर्थ्यों को करतलगत करने एवं प्रयोग में लाने के लिए एक छलाँग लगानी होगी। मन के अध्ययन विश्लेषण के सीमित दायरे से निकलकर विस्तृत आत्म क्षेत्र में प्रविष्ट करना होगा। अन्यथा प्रचलित फ्रायडवादी मनोविज्ञान मनुष्य को मूल प्रवृत्तियों का गुलाम ठहराता रहेगा और उसके आत्म विकास की सम्भावनाओं को अवरुद्ध रखेगा।

मनोविज्ञान का उद्गम एवं विकास का मूल स्रोत वस्तुतः भारतीय अध्यात्म है। वह अध्यात्म शास्त्र का एक अभिन्न अंग है। उसकी उपयोगिता अध्यात्म से अलग कर देने पर सिद्ध भी नहीं होती। आत्म विज्ञान से कटकर मनोविज्ञान मन के अध्ययन-विश्लेषण तक कैसे सीमित हो गया, इसका एक क्रमिक इतिहास है। प्राचीन समय में पाश्चात्य साइकोलॉजी का क्षेत्र भी विस्तृत था। साइकोलॉजी शब्द लैटिन भाषा के ‘साइक’ तथा ‘लोगस’ शब्द से मिलकर बना है। ‘साइक’ अर्थात् आत्मा तथा ‘लोगस’ अर्थात् शास्त्र अथवा ज्ञान। साइकोलॉजी का शाब्दिक अर्थ हुआ- आत्मा का विज्ञान। पाश्चात्य मनोविज्ञान का गवेषक भी अरस्तू को माना जाता है। अरस्तू, सुकरात, प्लूटो तीनों ही मूर्धन्य दार्शनिक ने आत्मतत्त्व पर गहन चिन्तन किया तथा इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा है। आत्मसत्ता एवं उसकी असाधारण महत्ता पर इन विद्वानों ने प्रकाश डाला है। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने आत्मानुसंधान को मनोविज्ञान का एक अभिन्न तथा महत्वपूर्ण अंग माना था।

दो शतक पूर्व तक भारत तथा साँस्कृतिक दृष्टि से सुविकसित अन्य पश्चिमी देशों में भी मनोविज्ञान, अध्यात्म विज्ञान का एक अविच्छिन्न अंग माना जाता था। पर जैसे-जैसे प्रत्यक्षवाद-भौतिकवाद मानवी चिंतन में अपनी जड़ें गहरी जमाता गया, उसी क्रम में मान्यताओं एवं प्रतिपादनों में उलट-फेर होता गया। समय-समय पर मनोविज्ञान की परिभाषाएँ भी बदलती गयीं। पर एक बात समान रूप से उन परिभाषाओं में दिखायी पड़ती है कि सबने मन का तत्व चेतना को माना है।

मनोविज्ञान का ‘टिंचनर’ ने ‘मन का विज्ञान’ के रूप में उल्लेख किया है तथा मन की विशेषताओं को तीन भागों- संवेदना, प्रतिभा तथा भावना के रूप में विभाजित किया है। अनेकों मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया है। चेतना के भी जो अर्थ विभिन्न विद्वानों ने लगाये हैं, उनमें परस्पर मतभेद है। वार्ड ने चेतना को अनुभव के अर्थ में प्रयुक्त किया। व्यवहारवादी मनःशक्तियों ने चेतना के स्थान पर अनुभव को ही प्रधानता दी। ‘वाटसन’ ने उसे आत्मा के स्थानापन्न के रूप में माना। इस तरह ‘चेतना’ शब्द आज भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में विवादास्पद बना हुआ है।

‘विलियम जेम्स’ के मनःशास्त्र का चेतना की अवस्थाओं के रूप में वर्णन किया तथा उनका विश्लेषण कर चार रूपों में प्रतिपादित किया। चेतना की अवस्था से उनका अभिप्राय संवेदनाओं, इच्छाओं, संवेगों और संकल्पों के अध्ययन से था। ‘पिल्सवरी’ ने मनोविज्ञान को मानव व्यवहार का विज्ञान बताया। व्यवहारवादी मनःशास्त्री ‘वाटसन’ ने मनोविज्ञान में सीखे अथवा बिना सीखे हुए कथनों अथवा कार्यों के रूप में मानव व्यवहार को सम्मिलित करते हुए उसे प्राकृतिक विज्ञान कहा है। उन्होंने मनःशास्त्र का प्राकृतिक विज्ञान की प्रयोगात्मक शाखा और चेतना का ‘उत्तेजक प्रतिक्रिया’ सिद्धान्त के आधार पर प्रतिपादन किया।

नारमन एल. मन ने मनोविज्ञान के अध्ययन में अनुभव एवं व्यवहार का समन्वय स्थापित किया। उनका कहना था कि ‘चेतन’ अनुभव के विज्ञान से तथा ‘ज्ञान’ व्यवहार से सम्बन्धित होता है। इस तरह अनुभव एवं व्यवहार आन्तरिक एवं बाह्य जीवन की अभिव्यक्तियाँ हैं। व्यवहारवाद के जन्म पश्चात् मनोविज्ञान तथा शरीर विज्ञान में भेद स्थापित कर विलियम मैकडूगल ने मनोविज्ञान की परिभाषा देते हुए कहा कि ‘वह एक ऐसा विज्ञान है जो सम्पूर्ण शरीर के व्यवहार का ज्ञान कराता है।’ ‘वुडवर्ड’ के अनुसार मनोविज्ञान व्यक्ति की क्रियाओं का विज्ञान है। क्रियाओं से उनका अभिप्राय केवल शारीरिक क्रियाओं से ही नहीं, अपितु ज्ञानात्मक एवं भावात्मक क्रियाओं से भी था। सीखना, स्मरण करना एवं विचार करना आदि मानसिक क्रियाएँ इसमें समाहित हैं। मैकडूगल ने मनःशास्त्र को ज्ञान, भावना एवं क्रिया तीन भागों में विभक्त किया।

मनःशास्त्र को नयी दिशा देने तथा मन की चेतन अचेतन परतों के विषय में विश्व को नयी जानकारियां देने में आधुनिक मनोवैज्ञानिक में फ्रायड, जुंग, एडलर आदि मूर्धन्य माने जाते हैं। पर इन विद्वानों का ज्ञान भी मन के दृश्य पक्षों तक ही सीमित है। दृश्य के पार भी अदृश्य क्षेत्र में सम्भावनाओं के रहस्यमय एवं सामर्थ्यवान स्रोत मानवी सत्त में ही विद्यमान हैं, यह जानना अभी भी अवशेष है। कुछ मनःशास्त्रियों ने भारतीय प्राचीन योग मनोविज्ञान की समग्रता एवं गूढ़ता की ओर इंगित करते हुए कहा है कि मानवी सत्ता की विशद् एवं सर्वांगपूर्ण व्याख्या करने में वह आज भी समर्थ है।

डा. कैनन अपनी पुस्तक ‘इन विजीबिल इनफ्लूएन्स’ में लिखते हैं कि ‘भारत हमको मनोविज्ञान एवं मन की क्रियाओं के सम्बन्ध में फ्रायड, एडलर तथा पश्चिमी विचारकों से कहीं अधिक ज्ञान दे सकता है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि शाश्वत ज्ञान अनुभूतियों पर अवलम्बित होता है। भारतीय मनीषियों ने शरीर ही नहीं मन एवं बुद्धि से भी परे जाकर आत्मा के क्षेत्र में गहन मन्थन किया। ध्यान की गहन अनुभूतियों में उन्होंने अनुभव किया कि शरीर एवं मन से भी समर्थ सत्ता आत्मा के रूप में मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है, जिसके पतन अथवा विकास पर मानवी प्रगति अवलम्बित है।”

सरजॉन वुडरफ प्रख्यात पुस्तक “वर्ल्ड एज पावर रियल्टी” में लिखते हैं कि “वेदान्त मनोविज्ञान के विकास की चरम अभिव्यक्ति है। वेदान्त के सिद्धान्त ऊँचे से ऊँचे दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों से भी श्रेष्ठ हैं।”

पॉल ब्रन्टन ने अपनी पुस्तक ‘विसडम ऑफ दी ओवर सेल्फ’ में लिखा है कि “भारत के पास उसके आध्यात्मिक ज्ञान की प्राचीन थाती है जिसकी गहराई और विस्तार की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती। वैज्ञानिक क्षेत्रों में आज जो नयी खोजें होती जा रही हैं, वे प्राचीन भारतीय खोजों का ही समर्थन करती देखी जाती हैं। भारतीय ऋषियों-मनीषियों ने जो कुछ भी लिखा अथवा उद्घोष किया वह सब मनःशास्त्र को भी दिशा देने में समर्थ है।”

विद्वान् जूलियन जॉनसन ने “पथ ऑफ दी मास्टर्स” में उल्लेख किया है कि- आधुनिक मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों का आधार मनुष्य की चेतना का साधारण जीवन और प्रयोगशालाओं में प्रकट हुआ बाह्य रूप है, जिससे मात्र मन के स्वरूप एवं सामर्थ्य की सीमित जानकारी मिलती है। उससे मानवी व्यक्तित्व एवं उसकी संभावनाओं का सर्वांगीण परिचय नहीं मिलता। आधुनिक मनःशास्त्री यह बता सकने में असमर्थ हैं कि मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास अथवा पतन के वास्तविक कारण कौन-कौन से हैं? क्या मानवी चेतना ऋषि-सिद्धियों की अधिष्ठात्री भी हो सकती है? मनोविज्ञान इस पर कुछ भी प्रकाश नहीं डालता। जब कि समय-समय पर इसकी पुष्टि में प्रमाण अतींद्रिय सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्तियों के रूप में मिलते रहते हैं।

पदार्थ जगत शरीर एवं मन से भी परे जाकर अदृश्य के गर्भ में पक रही घटनाओं का उद्घोष करने वाले भविष्यविदों का परिचय भी देश विदेश में मिलता रहता है जिसे देखकर वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही हतप्रभ होते हैं। उन्हें यह सोचने पर बाध्य होना पड़ता है कि प्रत्यक्ष ज्ञान ही सब कुछ नहीं है। असीम जानकारियों एवं संभावनाओं को उजागर करना अभी भी शेष है।

जीवन का अन्त भौतिक शरीर के साथ मानने वालों को गहरी ठेस उस समय लगती है जब पुनर्जन्म के अकाट्य प्रमाण सामने आते हैं। वे नहीं जानते कि किस आधार पर कोई व्यक्ति अपने पूर्वजन्म का लेखा-जोखा सप्रमाण प्रस्तुत कर देता है। आधुनिक मनःशास्त्र इसकी व्याख्या करने में पूर्णतया असमर्थ है। स्थूल-सूक्ष्म के अतिरिक्त मनुष्य के भीतर कारण शरीर भी विद्यमान है जिसमें जन्म-जन्मांतरों के संस्कार एवं अनुभव संचित होते हैं जो किसी दिशा विशेष में चलने एवं विशिष्ट कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। फ्रायडवादी मनोविज्ञान व्यक्तित्व की इन गहरी परतों को कोई जानकारी नहीं देता। फलतः मनोविज्ञान का वर्तमान ज्ञान अगणित मानवी समस्याओं का सुनिश्चित हल नहीं प्रस्तुत कर पाता।

अगणित सामर्थ्यों का स्रोत मानवी सत्ता में मौजूद है। उन्हें जानने-समझने तथा शक्तियों को करतलगत करने के लिए प्रचलित मनोविज्ञान से आगे बढ़कर योग मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करना होगा। जो न केवल मनुष्य की मूल सत्ता की सर्वांग जानकारी देता है वरन् उसके विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है। मन की अल्प जानकारियों तक सीमित रहने वाले आधुनिक मनोविज्ञान का जीवन की अनेकानेक समस्याओं का सही हल प्रस्तुत करने वाले- व्यक्तित्व विकास का व्यावहारिक मार्गदर्शन करने वाले अध्यात्म मनोविज्ञान का पक्षधर बनना युग की एक महान आवश्यकता है।


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अविज्ञाते परे तत्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला। विज्ञातेऽपि परे तत्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला॥ -विवेक.-61

परमतत्व-आत्मतत्त्व को न जाना जा सकता तो शास्त्रों का अध्ययन करना निष्फल ही रहा और यदि जानना सम्भव हो सका तो भी शास्त्राध्ययन करना निष्फल ही होता है अर्थात् आत्म-ज्ञान हो जाने पर शास्त्राध्ययन की आवश्यकता नहीं रह जाती है।


विज्ञान और अध्यात्म में विरोध कहाँ?

मनुष्य की प्रवृत्तियाँ दो दिशाओं में गति करती हैं एक अंतर्मुखी और दूसरी बहिर्मुखी। जीवन निर्वाह के लिए कई एक भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति उन आवश्यकताओं को सरलता है पूरा करने का प्रयत्न करती है और किस प्रकार सरलतम ढंग से पूरी हो जायं इसके लिए प्रयत्न करती है। अन्तर्मुखी दिशा में अपनी वृत्तियों और प्रवृत्तियों का अन्वेषण, परिशोधन किया जाता है और किस प्रकार चरमलक्ष्य, अक्षय आनन्द की प्राप्ति हो सके इसके लिए यत्न किया जाता है।

जीवन निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करने तथा सुख-शान्ति, सुव्यवस्था का सम्पादन करने के लिए किये गये प्रयास विज्ञान के अंतर्गत आते हैं। यों विज्ञान की परिभाषा किसी वस्तु या विषय का क्रमबद्ध, सुव्यवस्थित और तर्क व तथ्य संगत ज्ञान है। फिर भी विज्ञान का क्षेत्र अभी मुख्यतः स्थूल जगत, भौतिक संसार ही है। वह जीवन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने ढंग से आप करता है। अध्यात्म दूसरी दिशा से मनुष्य को सुखी और आनन्दित बनाने की व्यवस्था देता है। वह मनुष्य के स्वभाव, प्रकृति, संस्कार और अन्तश्चेतना को परिष्कृत करने पर जोर देता है तथा उसी आधार पर मनुष्य को शाँत, ज्ञानी तथा आनन्दित बनाने की कला सिखाता है। इस अन्तर्मुखी दृष्टि को अध्यात्म कहा जा सकता है और बहिर्मुखी प्रयोजनों को विज्ञान का नाम दिया जा सकता है। दीखने में अध्यात्म और विज्ञान अलग-अलग दिखाई देते हैं। उनके प्रयोग प्रयोजन भी भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। दोनों की दिशाएँ भी अलग-अलग दिखाई देती हैं। एक बहिर्जगत में अनुसंधान करता है तो दूसरा आन्तरिक उत्कर्ष को महत्व देता है।

स्थूल दृष्टि से देखने पर विज्ञान और अध्यात्म सर्वथा भिन्न तथा एक-दूसरे के विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः ऐसा है नहीं। दोनों एक दूसरे के साथ इतने घुले मिले हैं कि एक को दूसरे से अलग कर पाना उतना ही कठिन है जितना कि रक्त के जलीय तथा शुष्क अंशों को पृथक करके उन्हें अपने मूल में बनाये रखना। दोनों की दिशाएँ भिन्न-भिन्न दिखाई देती हैं लेकिन वास्तव में दोनों एक ही दिशा में चल रहे हैं। वह दिशा है- मनुष्य को अधिकाधिक सुख-शान्ति सम्पन्न बनाना।

कहा जा चुका है कि एक बाह्य दृष्टि से मनुष्य की सुख-शान्ति के लिए प्रयत्नशील है और एक उसे आँतरिक दृष्टि से समृद्ध व सम्पन्न बनाने का उपक्रम रचता है। आँतरिक और बाह्य कार्यक्षेत्र की दृष्टि से अध्यात्म और विज्ञान में यह दो ही भिन्नताएँ हैं अन्यथा दोनों का लक्ष्य एक ही होने से वे एक ही दिशा में बढ़ने वाले दो पग हैं। अज्ञान से छूट कर ज्ञान की धूमिका में प्रवेश करने वाला दोनों का लक्ष्य है। दोनों सत्य की, परम सत्य की खोज में निरत हैं और दोनों एक साथ जन्मे, पले बढ़े और विकसित हुए दो भाई हैं।

विज्ञान और अध्यात्म कई स्तर पर एक समान कार्यपद्धति अपनाते हैं। उदाहरण के लिए दोनों ही पिछली मान्यताओं के गलत सिद्ध होने पर उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। दोनों ही इस तथ्य से सहमत हैं कि मनुष्य निरन्तर विकसित हो रहा है। दोनों मनुष्य के कल्याण को लक्ष्य बनाकर गतिशील हैं। दोनों सत्य की खोज में निरत हैं। जब दोनों में इतनी समानता है तो उनमें विरोध कैसा?

विरोध वहाँ उत्पन्न हुआ जहाँ दोनों क्षेत्र के अधिकारी विद्वानों ने पूर्वाग्रहों को पकड़ कर दूसरे की उपेक्षा आरम्भ कर दी। यह विरोध अधकचरे अध्यात्मवादियों और विज्ञानवादियों में ही है अन्यथा विज्ञान भी उन्हीं तथ्यों की पुष्टि करता है जिनकी अध्यात्म। बल्कि कई बार तो दोनों ने एक-दूसरे का सहयोग लेकर काम चलाया। जब तक विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के सहयोगी, पूरक बन कर काम करते रहे तब तक समाज में सुख-शाँति और समृद्धि, आनन्द की स्वर्गिक परिस्थितियाँ बनी रहीं। प्राचीन काल में सभ्यता और संस्कृति के चरम शिखर पर पहुँचने का यही कारण था कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करते रहे। अन्तश्चेतना के क्षेत्र में गूढ़ सत्यों की शोध के लिए प्रयोग, अनुभूति और पक्षपातपूर्ण आग्रह से मुक्त नीति अपनाई गई। ईश्वर सर्वव्यापी है, कण-कण में प्राणिमात्र में विद्यमान है, सृष्टि जड़-चेतन का समुच्चय है आदि मान्यताएँ ऐसी हैं, जिन्हें स्थापित और सिद्ध करने के लिए विज्ञान का सहयोग लिया गया और आधार पर मनुष्य को आदर्शवादिता की दिशा में अग्रसर किया गया।

इस प्रकार अध्यात्म ने मनुष्य की आत्मा को, उसकी चेतना को विकसित बनाकर उसे आन्तरिक उल्लास और आनन्द प्रदान करने का उपक्रम रचा। विज्ञान ने अपने प्रयास दूसरे छोर से आरम्भ किये थे। उसी छोर से वह आज भी बढ़ रहा है। वह छोर है मनुष्य को बाह्य दृष्टि से सुविधा सम्पन्न बनाना। अध्यात्म अपनी लम्बी अनुसंधान यात्रा सम्पन्न करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँच गया है कि ईश्वर एक शक्ति है और शक्ति के स्फुल्लिंग जगत में प्राणियों की चेतना के रूप में विद्यमान है। इस तत्वदर्शन को अपनाकर कोई भी व्यक्ति आँतरिक दृष्टि से सुखी व सम्पन्न बन सकता है। अध्यात्म दर्शन को जीवन क्रम में उतार कर कोई भी व्यक्ति आनन्दित और उल्लसित जीवन व्यतीत कर सकता है।

विज्ञान भी उस स्थिति में पहुँच गया है कि मनुष्य की जीवनयापन के लिए, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत अधिक मरना-खपना न पड़े। उसने इतने यन्त्र, उपकरण जुटा दिये हैं कि मनुष्य को कम से कम श्रम करना पड़े, वहीं उसने मनुष्य की दुनिया को इतना विस्तृत बना दिया है, उसका अपना आपा स्वयं तक या परिवार तक ही सीमित न रहकर मुहल्ले, गाँव, नगर प्रदेश और राष्ट्र की सीमाओं को लाँघ कर पूरे विश्व तक फैल गया है। आज यदि हजारों मील दूर किसी स्थान पर कोई दुर्घटना घटती है तो सारे विश्व को उसका तुरन्त पता लग जाता है। कहीं कोई प्राकृतिक विपदा आती है तो पूरे विश्व का मनुष्य समाज विपत्तिग्रस्त क्षेत्र के लिए चिंतित हो उठता है। चिंतित नहीं भी हो तो कम से कम सहानुभूति उमड़ती हुई अवश्य अनुभव करता है। यह मनुष्य का आपा विस्तृत होना कहा जाय अथवा दुनिया का छोटा हो जाना, बात एक ही है। अब मनुष्य संसार में घटने वाली किसी भी घटना क्रम या परिवर्तन से अप्रभावित नहीं रह सकता।

अध्यात्म की प्रेरणा भी पूरी वसुधा को एक परिवार मान कर चलने की है। “वसुधैव कुटुंबकम्” सर्व खल्विदं ब्रह्म” “आत्मैवेदं सर्व” आदि उक्तियों में अपनी चेतना और भावना को विश्वव्यापी मानकर चलने तथा उसी तरह रहने का सन्देश निहित है। बहिर्जगत में विज्ञान ने दुनिया को एक सूत्र में आबद्ध करने का आधार प्रस्तुत किया है तो अंतर्जगत में वही प्रयोजन अध्यात्म पूरा करता है।

इस प्रकार अध्यात्म और विज्ञान का लक्ष्य एक रहा, दिशा एक रही, जन्म एक साथ हुआ। विकास, परिवर्तन और निष्कर्षों की गति एक रही। इतिहास भी लगभग दोनों का एक समान ही है तो किस आधार पर कहा जा सकता है कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोध हैं। वस्तुतः तो दोनों एक-दूसरे के पूरक, सत्य की खोज में एक ही अस्तित्व को बढ़े हुए दोनों हाथ हैं। दोनों में तात्विक दृष्टि से कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि अलग-अलग भाषा में दोनों एक ही बात कहते रहे हैं। अगले दिनों यह एकता मनुष्य के भविष्य को और अधिक उज्ज्वल बनायेगी, इससे कोई सन्देह नहीं है।


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स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिव। स्वयं विश्वमिवं सर्व स्वस्मादन्यन्न किंचन॥ -विवेक. -389

‘यह आत्मा ही ब्रह्मा, विष्णु अथवा शिव है, यही सारा विश्व है, आत्मा से व्यतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।


पुरातन ज्ञान सम्पदा से भविष्य की सुसम्पन्नता

भौतिकी के प्रारम्भिक छात्र भी जानते हैं कि संसार में जितना भी पदार्थ विश्व संरचना के आदि में था, वह सदा सर्वदा यथावत् ही बना रहता है। न घटता है न बढ़ता। मात्र उसका रूपांतरण होता रहता है। ठोस, द्रव, भाप के रूप में उसका परिवर्तन क्रम सतत् चलता है और नया बनने, पुराना बिगड़ने की सृष्टि प्रक्रिया अपने चित्र-विचित्र रूप दिखाती, विश्व वसुधा की शोभा बढ़ाती रहती है।

ठीक इसी प्रकार विचार सम्पदा के सम्बन्ध में भी यही बात है। मनुष्य के सम्मुख कुछ मूलभूत प्रश्न हैं। कुछ सीमित इच्छाएँ, आवश्यकताएँ हैं। सोचने, खोजने समाधान निकालने के भी कुछ गिने-चुने तरीके हैं। दैत्य और देव दो विचार पद्धतियाँ उनमें से प्रमुख हैं। एक अन्य-मनस्कों, स्वल्प सन्तोषियों का भी है जिन्हें आलसी, प्रमादी, पिछड़े कहा जाता है। वे दबाव पड़ने पर ही कुछ सोचते और करते हैं। इसी छोटी-सी परिधि में मानवी चिन्तन और प्रयत्न का गतिचक्र अपनी धुरी पर परिभ्रमण करता रहा है। समयानुसार नये तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण, कारण दबाव बढ़ते-घटते रहते हैं।

पृथ्वी समेत सभी ग्रह पिण्ड गोलाकार हैं। उनकी परिभ्रमण कक्षाएँ भी न्यूनाधिक अन्तर के साथ गोलाकार ही बनी हुई हैं। जीवनक्रम भी प्रायः ऐसा ही है। बालक, किशोर, तरुण, वृद्ध, मरण यही प्राणियों का उदय-अस्त। शरीर की कोशाएँ वृद्ध होकर मरती और साथ-साथ नित नूतन जन्मती रहती हैं। मस्तिष्क का भी यही हाल है उसमें नित नये विचार उठते और पुराने विस्मृत होते रहते हैं। स्मृति विस्मृति का चक्र ही मनःक्षेत्र में पुरानी फसल कटने, नई उगने की तरह अपनी उर्वरता का परिचय देता रहता है।

मनःक्षेत्र को जीवन का उद्गम, उद्भव समझा जाना चाहिए। मनुष्य जैसा भी कुछ है जैसा भी कुछ होने वाला है, वह सब कुछ उसकी विचार सम्पदा का प्रतिफल है। इसलिए चिन्तन को यदि जीवनचर्या में सर्वोपरि स्थान मिले तो उसे न तो अनुचित कहा जाना चाहिए और न अत्युक्ति। पेट भरने के बाद मनुष्य की इच्छा आवश्यकता मनःक्षेत्र में ही उगती है। वहीं से उपलब्धियों का उपाय खोजा और प्रयत्न किया जाता है। फलतः जो भली-बुरी अनुभूतियाँ होती हैं वह भी प्रकारांतर से मस्तिष्क के हिस्से में ही आती हैं। वासना, तृष्णा, अहंता का बाह्य रूप “रसास्वादन” ठाट-बाट के रूप में भी दृष्टिगोचर हो सकता है, पर तथ्य यही है कि वह गोरख धन्धा है, मनःक्षेत्र में चलती रहने वाली उथल पुथलों का ही।

मस्तिष्क की उर्वरता में नया उपार्जन करने के लिए जरूरी है कि पुराना कूड़ा-कचरा बुहारा जाता रहे। मलत्याग न करें तो नये आहार पेट में कैसे चले? स्मृति का महत्व सभी समझते हैं। जिनकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है उन्हें प्रशंसा पाने और विभूतियाँ हथियाने का अवसर अधिक आसानी से मिलता है। अस्तु उसकी इच्छा सभी करते हैं। पर साथ ही यह भी नहीं भुला देना चाहिए कि विस्मृति भी उतनी ही आवश्यक है। विस्मरण न हो तो मस्तिष्क पटल थोड़े ही दिनों में इतना भर चले कि उसमें नया सोचने की कहीं गुंजाइश ही न बचे। हर्ष शोक के भावावेश तो कई बार इतने उन्मादी होते हैं कि यदि वे उमंगने की स्थिति में यथावत् बने रहें, झीने न पड़ें, विस्मृत न हों तो जीवित रहना ही सम्भव न हो। उस आवेश की उद्विग्नता ही विश्रान्ति छीन ले और प्राण संकट खड़ा कर दे। क्रोध, प्रतिशोध, स्नेह, भय जैसे आवेशों के सम्बन्ध में भी यही बात है। अच्छा हुआ कि प्रकृति ने इन्हें अस्थायी बनाया अन्यथा वे जिसके पीछे लगते उन्हें अशान्त, उद्विग्न रखकर असमय ही काल का ग्रास बना देते।

स्मृति-विस्मृति की सामान्य प्रक्रिया के मध्य कई बार ऐसी आवश्यकता पड़ती है कि किन्हीं बहुमूल्य विचार सम्पदाओं को विस्मृति के गर्त से उबारकर फिर से हरा किया जाय और उस पुरातन का भी सामयिक लाभ उठाया जाय। किन्तु कठिनाई तब आती है जब विस्मृति के गर्त में उपयोगी स्मृतियों को खोज निकालना और हरी करना प्रयत्न करने पर भी सम्भव नहीं होता।

सामान्य जीवन में भी लेन-देने में भूल पड़ने से भारी कठिनाई उत्पन्न होती रहती है। उपयोगी व्यक्तियों का अता-पता भूल जाने से आवश्यकता पड़ने पर उस सूत्र के सहारे जो महत्वपूर्ण काम कर सकना सम्भव था उसकी सम्भावना समाप्त हो जाती है। कृतज्ञता भरी घटनाएँ भूल जाने से आत्मीय तक बिराने लगते हैं। संचित अनुभव याद न रहे तो मनुष्य अविकसित बालबुद्धि के छोटे क्षेत्र में ही परिभ्रमण करता रहेगा, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से उसे गई-गुजरी स्थिति में रहना पड़ेगा।

असामान्य जीवन इससे आगे का है। मानवी अचेतन में प्रसुप्त विस्मृतियों का इतना भण्डार भरा पड़ा है कि उसे एक छोटा-मोटा ब्रह्माण्ड भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता उसी प्रकार मानसिक उपार्जन भी किसी न किसी रूप में विद्यमान बना रहता है। इस अर्जित सम्पदा में से आवश्यकतानुसार कुछ उपयोगी खोजा और बनाया जा सके तो व्यक्ति निश्चय ही सामान्य न रहकर असामान्य स्तर का बन सकेगा।

वंशानुक्रम की परम्परा में मनुष्य को पूर्वजों की अनेकानेक पीड़ियों का संचित उत्तराधिकार उपलब्ध होता है। जन्म-जन्मान्तरों में जो सीखा गया था वह भी पूर्णतया समाप्त नहीं हो जाता। घटनाएँ इस जन्म की हों या पुराने किसी जन्म की, मनःसंस्थान में सुरक्षित रहती हैं। जगह न घिरे इसलिए प्रकृति उन्हें प्रसुप्त बना कर स्थान खाली करा देती है। मुर्दे को जमीन में गाढ़ देने पर वह दीखता भी नहीं और जगह भी नहीं घेरता फिर भी उसका पार्थिव अस्तित्व किसी न किसी रूप में चिरकाल तक बना रहता है। ठीक इसी प्रकार सार्थक और निरर्थक स्मृतियों का विपुल भण्डार मनुष्य के सीमित किन्तु वस्तुतः असीमित मनःसंस्थान में जमा रहता है।

प्रश्न यह है कि इन विस्मृतियों, अवधारणाओं में से जो उपयोगी है उन्हें किसी प्रकार हटा दिया जाय और काम में लाया जाय? यदि ऐसा हो सके तो पीड़ियों के उत्तराधिकार से और जन्म-जन्मान्तरों के स्वउपार्जन से जो समय-समय पर अर्जित होता रहा है, इतना अधिक लाभ उठाया जा सकता है कि मनुष्य सामान्य न रहे, देव मानवों की पंक्ति में जा बैठे। सिद्ध पुरुष कहा जाने लगे।

विस्मृतियों को स्मृति के रूप में बदला जा सकना सम्भव है। गर्मी में दूब सूख जाती है पर वर्षा होते ही उसे हरी होने में देर नहीं लगती। ठीक इसी प्रकार गुम गई स्मृति सम्पदा को फिर से जीवित जागृत बनाया और उसका समन्वित लाभ उठाया जा सकता है। इस तथ्य को अब वैज्ञानिक समर्थन प्राप्त होने लगा है। उससे पूर्व पुनर्जन्म की घटनाओं में बताये जाने वाले विवरण दैवी चमत्कार मानकर उपेक्षित कर दिये जाते थे। अब नये सिरे से यह सोचा जाने लगा है कि नया ज्ञान प्राप्त करने को ही पर्याप्त क्यों माना जाय और क्यों न विस्मृत बहुमूल्य को पुनर्जागृत करके विलक्षण बनाया जाय। इस आकाँक्षा को उत्तेजित करने में विज्ञान की नवीनतम शोधें बहुत सहायक सिद्ध हो रही हैं।

स्मृति एक जटिल प्रक्रिया तन्त्र है जिसे जानने के लिए न्यूरोएनाटॉमिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, मालिक्यूलर, बायोलाजीस्ट एवं वायोकेमीस्ट वर्ग ने अनेकों प्रयास किए हैं। इन विभिन्न तथ्यों में से निष्कर्ष यह निकाला गया है कि स्मृति दो प्रकार की होती है (1) क्षणिक स्मृति जो कुछ ही क्षणों तक याद रहती है जैसे टेलीफोन डायरेक्टरी में नम्बर देखने के बाद डायल घुमाने तक याद रहना। फिर आदमी सामान्यता उसे भूल जाता है, बशर्ते वह नम्बर नियमित अभ्यास में न हो। (2) दीर्घकालीन स्मृति जो संचित बनी रहती है व समय आने पर कुरेद-बीन करने पर उभर आती है। मस्तिष्कीय ज्ञान-तन्तुओं में विद्यमान आर.एन.ए. (राइबो न्यूकलिक अम्ल) स्मृति के स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के ‘ब्रेन स्पेसिफिक प्रोटीन्स’ बनाने का आदेश देता है। इस रासायनिक परिवर्तन के कारण मस्तिष्क में घटनाएँ टाइप की तरह स्थायी रूप से लिख जाती हैं। वही प्रसंग पुनः आने पर वे घटनाएँ याद आ जाती हैं।

विस्मृति को स्मृति में बदलने के लिए सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा मदद ली जा सकती है। रेडक्लीफ नामक एक मनोवैज्ञानिक ने एक घटना का अपने संस्मरणों में वर्णन किया है। किसी साहूकार ने एक मिस्त्री से घर की दीवार में खजाना गाड़ने के लिए एक गुप्त स्थान बनवाया। सम्पत्ति वहाँ रखकर दीवार चुन दी गयी। कालान्तर में साहूकार की मृत्यु हो गयी। धन की आवश्यकता पड़ने पर पुत्र ने मिस्त्री को बुलवाया तथा वह स्थान बताने को कहा। संयोगवश मिस्त्री लाख कोशिश करने पर भी विस्मृति के कारण वह स्थान न बता पाया। अत्यन्त एक जानकार परिचित के माध्यम से उसे सम्मोहित किया गया। वर्षों पूर्व की वह घटना उसे याद हो आई एवं उसी स्थिति में अनायास ही वह उस स्थान पर पहुँच कर इशारा करने लगा। खोदने पर वहाँ खजाना मिल गया।

डा. विल्डर पेनफील्ड ने ब्रेनसर्जरी में अपने समय में काफी ख्याति प्राप्त की थी। शल्य क्रिया द्वारा मस्तिष्क के विशेष भाग में उन्होंने एक महिला पर लो वोल्टेज की विद्युत सुई चुभोकर उत्तेजित करने का प्रयोग किया। विद्युत प्रवाहित होते ही उसे अपने जीवन की 50 वर्ष पूर्व की एक महत्वपूर्ण घटना याद हो आई।

प्रयोगों द्वारा पाया गया है कि 35 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं का पुनर्निर्माण नहीं होता। आयु बढ़ने के साथ मस्तिष्क की रक्त पहुँचाने वाली नलिकाएँ भी कड़ी होती चली जाती हैं अतः स्नायुकोश रक्त कम ही पाते हैं। उसी कारण वृद्धों को पुरानी संचित बातें तो ज्यों की त्यों याद रहती हैं लेकिन वे तुरन्त की बात को उसी समय भूल जाते हैं। आक्सीजन उपचार के माध्यम से कइयों की तुरन्त की स्मृति को ठीक करने में सहायता मिली। लेकिन प्राणवायु का प्रभाव समाप्त होते ही स्थिति पूर्ववत् हो गयी।

आधुनिक मनोविज्ञान ने सम्मोहन विद्या, इलेक्ट्रोडों द्वारा विद्युत प्रवाह, आक्सीजन उपचार के तीन उपाय सुझाये हैं और कहा है कि यदि इस दिशा में आवश्यक अनुसंधान और प्रयत्न किया जाय तो मनुष्य जाति का अपार हित साधन हो सकता है और वह भूमि में गढ़ा खजाना मिलने पर मालदार बन जाने वालों की तरह ज्ञान क्षेत्र में देखते-देखते आश्चर्यजनक प्रगति कर सकता है। विगत जन्म में जितनी विद्या बढ़ी थी वह इस जन्म में बिना अधिक परिश्रम किये देखते-देखते उपलब्ध हो सकती है और मन्द-बुद्धि समझे जाने वालों के लिए भी कालीदास जैसा विद्वान बन सकना सम्भव हो सकता है।

पुरातन मनोविज्ञान में समाधि, साधना, योग निद्रा का उच्चस्तरीय प्रयोग होता रहा है उसका छोटा-सा रूप आधुनिक सम्मोहन विज्ञान है। इलेक्ट्रोडो द्वारा सुप्त को जगाने के लिए जो झटके दिये जाते हैं वह प्रयोजन ध्यान धारणा के सहारे प्रसुप्त संस्थानों को पुनर्जीवित करने के द्वारा भली प्रकार पूरा हो सकता है। प्राणायाम से आक्सीजन उपचार के सुविस्तृत विज्ञान का समावेश है। इन उपचारों के सहारे सामान्य मनुष्य का अनेक दृष्टियों से असामान्य बन सकना सम्भव है। विस्मृति के गर्त से निकलकर स्मृति का वरदान पाया जा सकता है। इस प्रकार भूतकाल की संचित सम्पदा के सहारे से बिना नया उपार्जन किये भविष्य को समुन्नत और सुसंपन्न बनाया जा सकता है।


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व्यसनस्य च मृत्योश्य व्यसनं कष्टमुच्यते। व्यसन्य धोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः॥

दुर्व्यसन और मृत्यु में से दुर्व्यसन ही अधिक कष्टकारक है, क्योंकि व्यसनी मनुष्य पतन के गर्त में गिरता जाता है, जबकि व्यसन रहित मनुष्य स्वर्ग में उन्नति की ओर जाता है।


काया पर समग्र नियंत्रण की दिव्य क्षमता

अपनी काया पर मनुष्य का सीमित नियन्त्रण है। इच्छानुसार हाथ पैर भर चलाने के लिए वह स्वतन्त्र है। मोटेतौर पर खाने कमाने जैसे कार्यों में ही कोई व्यक्ति अपने शरीर पर नियन्त्रण कर पाता है। आहार, व्यायाम, खेल-कूद दौड़ आदि के सहारे वह पहलवान जैसा भी कुछ बन सकता है। इससे आगे की अवयवों की भीतरी क्रिया-पद्धति पर उसका प्रत्यक्ष नियन्त्रण कुछ नहीं। रक्त संचार, आकुँचन-प्रकुँचन, निमेष-उन्मेष, श्वास प्रश्वास जैसी क्रियाएँ अचेतन मन के द्वारा संचालित होती हैं। इस पर इच्छा शक्ति का नगण्य जितना ही नियन्त्रण रहता है। इन्हें स्वसंचालित संस्थान द्वारा अपने सहज क्रम में नियमित रूप से संचालित किया जाता रहता है, चाहे व्यक्ति चाहे अथवा न चाहे। यह ढर्रा अभ्यस्त चेतना संस्थान द्वारा अविज्ञात रूप से गतिशील बना रहता है। सामान्य स्थिति में इसे रोकना या घटाना-बढ़ाना किसी के अपने हाथ में नहीं होता।

यदि इस क्षेत्र का नियमन-संचालन जागृत मस्तिष्क में काम करने वाली इच्छा शक्ति के हाथों हो सके तो ऐसे व्यक्ति को शरीर का पूर्ण स्वामी कहा जा सकता है। तब वह भीतर क्रियाओं को घटाने-बढ़ाने में ही नहीं, उनकी दिशाधारा बदलने में भी समर्थ हो सकता है। ऐसा व्यक्ति रुग्णता की व्यथा को अपने मनोबल से हटा सकता है। जराजीर्ण अवयवों का काया कल्प कर सकता है। मृत्यु की घड़ी टाल सकता है। प्रसुप्त शक्ति भण्डारों को जगा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी हो सकता है और शरीर क्षेत्र में ऐसे पराक्रम कर सकता है जिसे कई सामान्य लोगों के लिए असम्भव ही कहे जायेंगे।

शरीर पर नियन्त्रण करने वाली इस क्षमता को कई बार अविश्वासियों को विश्वास दिलाने के लिए- प्रमाण परीक्षण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि मानवी संकल्प बल के लिए यह सम्भव है कि कोई अपने शरीर की भीतरी, अविज्ञात एवं प्रसुप्त क्षमताओं को प्रखर बनाकर दूसरों की तुलना में अधिक समर्थ सिद्ध हो सके।

शरीर में अगणित सामर्थ्य भरी पड़ी हैं। वे प्रसुप्त स्थिति में रहती हैं। उन तक सामान्य इच्छा शक्ति की पहुँच नहीं होती। पर यदि प्रयत्नपूर्वक वैसी सामर्थ्य उत्पन्न की जा सके तो व्यक्ति अपने में असाधारण क्षमता की अभिवृद्धि अनुभव करेगा और जितना कुछ सामान्य व्यक्ति कर पाते हैं, उसकी तुलना में असंख्यों गुना अधिक कर सकेगा।

यही बड़ी सफलता है। इसे कौतूहल प्रदर्शन की बाजीगरी न समझी जाय। प्रदर्शन तो मात्र तथ्यों से अवगत होने एवं विश्वस्त मानने मनवाने के लिए किये जाते हैं। उपयोगिता यह है कि जिस काया की स्वल्प क्षमता का ही उपयोग होता रहता है, यदि उस पर अधिकाधिक अधिकार पाया जा सके तो व्यक्ति की विशिष्टता सिद्ध पुरुषों जैसी हो सकती है। अणिमा, महिमा आदि सिद्धियों के अधिष्ठाता ऐसे ही लोग होते हैं और वे असाधारण स्तर के पुरुषार्थ करके न केवल स्वयं लाभान्वित होते हैं वरन् उस उपलब्धि का एक छोटा अंश दूसरों की सहायता के लिए देकर पुण्य परमार्थ के भागी बन सकते हैं। काया पर असाधारण नियन्त्रण कर सकने के कितने ही प्रमाण समय-समय पर मिलते रहते हैं।

सन् 1837-38 की बात है। डा. मैक ग्रेगर नामक एक अंग्रेज भारतीय योग विद्या का चमत्कार देखना चाहता था। अतः उसने इसका जिक्र महाराजा रणजीत सिंह से किया। सन्त हरदास महाराजा रणजीत सिंह के गुरु थे। उन्होंने उनसे योग विद्या का कोई चमत्कार दिखाने का निवेदन किया। सन्त हरिदास इसके लिए तैयार हो गये और 40 दिनों तक उन्होंने निराहार भूमिगत रहने का निश्चय किया। इसके लिए जमीन में एक बड़ा गड्ढा खोदा गया। सन्त हरिदास ने मुख को छोड़कर सारे इन्द्रिय द्वार मोम से बन्द कर लिये। अन्त में जीभ को तालू-कण्ठ से लगाकर मुख से जाने वाली श्वास का मार्ग भी बन्द कर दिया। फिर एक काष्ट सन्दूक में बन्द हो गये। सन्दूक में ताला लगाकर उसे सील बन्द कर दिया गया। तत्पश्चात् उसे गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी ढक दी गयी और सीमेंट से प्लास्टर कर दिया गया। 40 दिन बाद जब सन्दूक को खोला गया तो सन्त हरिदास शान्त प्रसन्न मुद्रा में बैठे मिले। उनकी शरीर परीक्षा की गई। नाड़ी हृदय में किसी प्रकार का स्पन्दन नहीं था। समस्त शरीर अत्यन्त ठण्डा था। गर्मी थी तो सिर्फ सिर पर चोटी वाले स्थान में। परीक्षण के बाद कान-नाक से मोम निकाल ली गई और गुनगुना पानी सम्पूर्ण शरीर पर छिड़का जाने लगा। धीरे-धीरे चेतना लौटने लगी। हृदय धड़कने लगा और नाड़ियाँ चलने लगीं। थोड़ी देर में सन्त हरिदास उठकर खड़े हो गये। अभी भी उनके चेहरे पर पूर्ववत् चमक विद्यमान थी। वहाँ उपस्थित सभी सज्जन यह देख आश्चर्यचकित रह गये।

‘हिस्ट्री ऑफ दि सिख्स’ पुस्तक में इस घटना का उल्लेख करते हुए डा. मैक ग्रेगर ने लिखा है- “श्वास-प्रश्वास को बन्द कर जीवित रहना एक विलक्षण बात है। दीर्घ कालीन उपवास का उन साधु महाराज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। उनके चेहरे पर चमक और प्रसन्नता में कोई अन्तर नहीं आया था।”

इसी प्रकार सन्त हरिदास ने दूसरी समाधि सन् 1838 में पटियाला नरेश के समक्ष ली थी। समाधि की प्रक्रिया तो पहली ही जैसी थी, किन्तु भूमिगत रहने की अवधि इस बार दस महीने की थी। समाधि के बाद सम्पूर्ण खेत में जौ की बोआई कर दी गई, ताकि यदि हरिदास जमीन से बाहर निकलें तो पता चल जाय। नियत अवधि के बाद गड्ढा खोदा गया और सन्दूक को बाहर निकाला गया। सन्दूक खोलने पर इस बार भी उनकी वही स्थिति पायी गयी जैसी आरम्भिक समाधि में थी। इस बार भी वे थोड़ी ही देर में सामान्य स्थिति में आ गये। फिर तोपें दागकर उनका सम्मान किया गया और बहुमूल्य उपहार भेंट किये गये। कैप्टन ओस बर्न ने इस घटना का उल्लेख अपनी पुस्तक “रणजीतसिंह” में बड़े भावपूर्ण शब्दों में करते हुए लिखा- “भारतीयों के पास ऐसा अलभ्य ज्ञान और विलक्षण क्षमताएँ हैं जो अलौकिकता और भौतिकता से बढ़कर हैं। अन्यथा इसे प्राप्त करने के लिए वे इतने कठोर तप और योगाभ्यास न करते।”

“हारवर्ड इन्स्टीट्यूट फार साइकिक एण्ड कलचर रिसर्च” की ओर से डा. थेरेस ब्रोसे अपने दल के साथ भारत में योग विलक्षणता की शोध करने आई थीं। उन्होंने समाधिस्थ योगियों के शरीरों की उसी स्थिति में पूरी-पूरी जाँच की और पाया कि वे लगभग मृत स्थिति में पहुँचने पर भी सामान्य स्थिति में जीवित रह रहे हैं और उनके शरीर में कोई अवाँछनीय स्थिति उत्पन्न नहीं हो रही है। इस सम्बन्ध में आगे के अनुसन्धान करने के लिए श्रीमती ब्रोसे एक फ्राँसीसी शरीर विज्ञानी डा. माइलोवेनोविच के साथ भारत आई थीं, उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने शेष सन्देहों को भी दूर कर लिया। कुछ समय के लिए दिल की धड़कन बिल्कुल बन्द कर लेने का दावा भी उनने सही पाया। ऐसे योगी तो बहुत से हैं जो सामान्यतया प्रति मिनट 72 बार की धड़कन को घटाकर 60 की संख्या तक शिथिल कर लेते हैं। तीन दिन से लेकर 28 दिन तक बिना साँस लिए, बिना अन्न जल ग्रहण किये, बिना मल-मूत्र विसर्जन किये- समाधिस्थ रहने वाले योगियों में से भी अधिकाँश के दावे सही पाये गये। उनके संज्ञा शून्य होने की बात उनका हाथ बर्फ में दबाये रहने और आग का स्पर्श करने पर भी खरी उतरी। एक योगी संकल्प बल से जिस भी अंग से कहा जाय उसी से पसीना निकाल देते थे। लन्दन में एक भारतीय योगी ने सन् 1928 में एक सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उसने नाड़ी की गति को न्यूनतम 20 और अधिकतम 120 करके डाक्टरों को आश्चर्यचकित कर दिया था। वह अपनी माँस-पेशियों और त्वचा को इतनी कड़ी कर लेता था कि सामान्य हथियार के प्रभाव का भी उन पर कुछ प्रभाव न पड़े।

पचास के दशक की बात है। मिशिगन विश्व विद्यालय के चिकित्सा संस्थान ने समाधि की स्थिति में शरीर और मन की स्थिति का विवेचन करने के लिए एक भारतीय योगी शान्तानन्द को चुना था। प्रयोगशाला में उनकी समाधि स्थिति का अनेक यन्त्रों से परीक्षण किया गया था उससे निष्कर्ष निकला कि उस अवस्था में शरीर की आन्तरिक हलचलें अत्यन्त न्यून हो जाती हैं- मस्तिष्क मूर्च्छा स्थिति में चला जाता है। फिर भी शरीर में सड़न अथवा विघटन की कोई बुरी प्रक्रिया आरम्भ नहीं होती। यहाँ तक कि विभिन्न छिद्रों से निसृत होते रहने वाले मलों में प्रक्रिया रुक जाने से भी कोई विषाक्त प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। भूमि समाधि की घटनाओं में से एक परीक्षण उदयपुर आयुर्विज्ञान महाविज्ञान के प्राँगण में ली गई एक समाधि का हुआ था। डाक्टरों ने समाधि से पूर्व विविध परीक्षाएँ लीं। योगी के शरीर के साथ ‘इलेक्ट्रो कार्डियोग्राफ’ ‘पॉली ग्राफ’ आदि कई यन्त्र फिट किये गये और उनका लेखा-जोखा बाहर निरन्तर अंकित होता रहे ऐसी व्यवस्था की। आठ दिनों बाद समाधि खोली गई योगी मूर्च्छित था। उसका तापमान 87.6 था जबकि सामान्यतया 98.4 होता है। निर्धारित निर्देशों के अनुसार गरम पानी से स्नान कराया गया और मालिश की गई तो चेतना फिर लौट आई।

‘हवा में उड़ने वाले साधु’ के रूप में विख्यात ‘जोसेप’ का जन्म 1603 में इटली के कापरटिनों नामक स्थान पर हुआ था। पिता बढ़ई का काम करते थे। उनके काम में कोई रुचि न रख यह अनूठा बालक बचपन से ही अन्तर्मुखी अध्यात्म प्रधान अभिरुचि का था। पूजा वेदी के समक्ष वह घण्टों बैठा रहता था। एक दिन वह चर्च में प्रार्थना कर रहा था कि उसने एक तीव्र गर्जना की और हवा में ऊपर उठ गया। उठकर वह हवा में तैरने लगा। थोड़ी देर की उड़ान के बाद वह पूजा की वेदी पर उतरा जो कि जलती मोमबत्तियों व पुष्पों से सुसज्जित थी। पुनः गर्जना के साथ वह वहाँ से उड़ा तथा पहले वाले स्थान पर घुटने टेककर उतर आया और पुनः प्रार्थना आरम्भ कर दी। उसके इन चमत्कारों की चर्चा बड़ी तेजी से फैली। बेरिकन में पोप के दर्शन को जब वह गया तो वहाँ अंकित चित्रों को देखते ही वह हवा में उड़ने लगा तथा समीप जा-जाकर माइकेल एन्जेलों की कलाकृतियों को देख हर्षित हो चीत्कार करने लगा। पोप के नीचे उतरने के आदेश पर वह नीचे उतर आया व घुटने टेककर प्रार्थना में मग्न हो गया। अकेले ही नहीं उसने कभी अपने पिता के साथ, कभी भाइयों को लेकर भी उड़ानें भरीं। चिकित्सा के रूप में बाद में ख्याति प्राप्त जोसेप चमत्कारी चिकित्सा कर कई मनोरोगियों को स्वास्थ्य लाभ दे सकने में सफल हुआ। इसके पीछे क्या रहस्य था कोई जान नहीं पाया।

एक बार वाराणसी के 300 वर्षीय दिगम्बर योगी श्री तैलंग स्वामी को पकड़ने के लिए पुलिस को निर्देश मिले क्योंकि वे नंगे घूमते थे। पुलिस के जवान उन्हें ढूँढ़ते हुए मणिकर्णिका घाट पर पहुँचे। जब पुलिस दो गज थी, तभी तैलंग स्वामी उठे और दौड़कर गंगाजी में कूद पड़े। तभी पुलिस बाहर प्रतीक्षा करती रही- किन्तु स्वामी जी बाहर न निकले। अगले दिन वे घूमते पाये गये। स्वामी को किसी ने कुछ खाते नहीं देखा था फिर भी उनका वजन प्रति वर्ष 1 पौण्ड बढ़ जाता था। 300 वर्ष की अवस्था में उनका वजन 300 पौण्ड हो गया था। दूसरे दिन पुनः पुलिस ने उन्हें वहीं देखा। पुलिस को देखकर वे पुनः गंगाजी की ओर भागे लेकिन इस बार उन्होंने डुबकी नहीं लगाई अपितु जल के ऊपर से ही दौड़ते हुए उस पार निकल गये।

उपरोक्त उदाहरण रहस्य रोमाँच के आख्यान मात्र नहीं हैं वरन् मानवी संकल्प शक्ति की वरीयता, अद्भुतता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। यह सामर्थ्य पिण्ड के एक-एक घटक में कूट-कूट कर भरी गयी, इन सिद्धियों का प्रयोग मानव की असामान्यता बताने व असीम सम्भावनाओं की ओर इशारा करने मात्र के लिए ही होता रहा है। मानवी संकल्प बल कितना महान है, कितना कुछ कर सकता है, इसे साधारण जन भी समझ सकें तो अपने सामान्य जीवन क्रम में ही बहुत कुछ ऐसा किया जा सकता है जिसे अद्भुत कहा जा सके।


मनुष्य शरीर एक अच्छा खास बिजली घर

शरीर एक ऐसे बहुत बड़े उद्योग नगर की भाँति है जिसमें अगणित छोटी बड़ी मशीनों वाले कल कारखाने लगे हैं। यह सभी यन्त्र बिजली की शक्ति से चलते हैं। यदि उसका प्रबन्ध न हो तो सभी कलपुर्जे ठप्प हो जायं और शरीर की स्थिति निष्प्राण जैसी बन जाये।

इस विशालकाय फैक्टरी को चालू रखने में प्रायः एक लाख वोल्ट बिजली की आवश्यकता पड़ती है। इसका उत्पादन हृदय के वायलर द्वारा होता है। उत्पादन के साथ ही वह 70 खरब कोशिकाओं रूपी पुर्जों से बने कारखाने के कोने-कोने से भेज दी जाती हैं और सभी को गतिशील बनाये रहने में काम आती रहती है। आमतौर से इतनी ऊर्जा शरीर संचालन, मस्तिष्कीय चिन्तन एवं विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये जाने वाले क्रियाकलापों में खप जाती है। कम पड़ती है तो शरीर ढीला-पोला पड़ जाता है। थका-हारा आलस्य सुस्ती से ग्रसित उदास परास्त जैसा दीख पड़ता है। यदि वह पर्याप्त मात्रा में हो तो चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है और हँसती-हँसाती जिन्दगी कटती है। किन्तु यदि उत्पादन खपत से अधिक हो तो मनुष्य कुछ अतिरिक्त करने के लिए उमंगता रहता है। उत्साह देखते ही बनता है। नयी योजनाएँ बनाते, नये उत्तरदायित्व ओढ़ते और नये खतरे उठाते देखा जाता है। यह मानवीय विद्युत का चमत्कार है। वह पर्याप्त मात्रा में हो तो चेहरे पर आकर्षण शक्ति के रूप में फैली-फैली फिरती है। जो समीप आता है खिंचता चला आता है, प्रभावित होता और सहयोगी बनता है। यह विद्युत प्रवाह शरीर के चारों और एक तेजोवलय के रूप में छाया रहता है। उसकी तरंगों नेत्रों से उँगलियों के पोरवों से, तथा प्रजनन केन्द्रों से चुम्बकत्व की अतिरिक्त यात्रा की परिचय देती है।

पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर एक चुम्बकीय अन्धड़ प्रकाशवान देखा जा सकता है। इसे ‘अरोरा बेरिएलिस’ कहते हैं। काया एक पृथ्वी है उसके चेहरे को उत्तरी ध्रुव की संज्ञा दी जा सकती है। दक्षिण ध्रुव प्रजनन केन्द्र के इर्द−गिर्द बिखरा हुआ है। इन दोनों संस्थानों में तेजोवलय की मात्रा अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक पाई जाती है। प्रतिभावान लोगों में यही क्षमता उनके व्यक्तित्व को चमकाती है। अनेकों को मित्र सहयोगी बनाती है तथा हाथ में लिये हुए, कन्धों पर ओढ़े गये उत्तरदायित्वों को निभाने में पराक्रम पुरुषार्थ, साहस, संकल्प, उत्साह परिश्रम के रूप में काम करती दृष्टिगोचर होती है।

मानवी प्रयोजनों में काम आने वाली बिजली का चुम्बकीय पक्ष हृदय तथा ब्रह्मरंध्र से उत्पन्न होता है। यह चुम्बकत्व विश्वव्यापी विद्युत प्रवाह से अपने लिए आवश्यक क्षमता खींच लाता है और उपार्जन की तुलना में कई गुनी अनुदान सम्पदा का भण्डार जमा कर उसे आवश्यक प्रयोजनों में काम लाता है। पेड़ की बहुत कुछ खुराक जड़ों से प्राप्त होती है यह ठीक है, पर यह भी गलत नहीं कि पत्ते भी साँस लेते हैं और आकाश से हवा, गर्मी, नमी आदि को उसमें भी बड़ी मात्रा में खींचते रहते हैं। जितनी कि जड़ों से प्राप्त होती है। शारीरिक उत्पादन अधिक से अधिक इतना ही कर सकता है कि मनुष्य भी अन्य प्राणियों की भाँति जिन्दा रह सके और पेट प्रजनन के लिए आवश्यक क्षमता जुटाता रहे। यदि कोई बड़ी महत्वाकाँक्षा या जिम्मेदारी सिर पर लदी हो तो उसे वहन करने के लिए ब्रह्माण्डीय चेतना के विपुल भाण्डागार में आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध करने के लिए योग साधना तपश्चर्या स्तर के विशेष प्रयोग पुरुषार्थ करने पड़ते हैं।

प्रश्नोपनिषद् में एक मन्त्र आता है- “प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति” अर्थात् मनुष्य काया रूप पुरी में पाँच प्रकार की प्राणाग्नियां जागती रहती हैं।

यह लोहा गलाने वाले विशालकाय कारखानों में लगी हुई प्रचण्ड अग्नि वाली ‘फरनिशों’ की तरह है, जिनमें प्राणाग्नि जलती ही नहीं वरन् बिजली को विपुल मात्रा भी उत्पन्न करती है। कहा जा चुका है कि शरीर में एक लाख वोल्ट प्रति सेन्टीमीटर का दबाव होता है। यह प्राण विद्युत झटका मारने वाली या प्राण लेने वाली नहीं है। उसकी प्रकृति दूसरे प्रकार की है फिर भी वह है बिजली ही। नियन्ता ने इस विद्युत को चक्रों, ग्रन्थियों उपत्यिकाओं, जीवकोश ऊतकों में कैद कर रखा है ताकि वह अनावश्यक रूप से बाहर निकलने और बर्बाद न होने लगे। कभी इन्सुलेशन हट जाय, या हटा लिया जाय तो ही चौक होने पर वह व्यक्तियों एवं पदार्थों को अनावश्यक रूप से प्रभावित करने लगती है।

फ्रांस की स्ट्रास वर्ग युनिवर्सिटी के प्रो फ्रेड ब्लेज का मानवी विद्युत सम्बन्धी शोध प्रबन्ध “दी वायोलाजिकल कन्डीसन्स क्रिएटेड वाय दि इलेक्ट्रिकल प्रापर्टीज आफ दि एटमाराफियर” ग्रंथ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसमें वे अपना निष्कर्ष व्यक्त करते हुए मनुष्य शरीर को चलता फिरता बिजली घर बताते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि यदि इस उत्पादन को अन्य कार्यों में लगाया जा सके तो उसे भी किसी सशक्त हाइडल पावर स्टेशन की तरह बड़े टर्वाइन्स की तरह महत्वपूर्ण भौतिक प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त भीतरी प्रयोजनों में उसे अति मानवी सामर्थ्यों को जगाकर मनुष्य को दिव्य पुरुष बनाने के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

मनःशास्त्री विक्टर ई. क्रोमर मानवी विद्युत की चर्चा करते हुए कहते हैं यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाली ऐसी चाबी है जिनका सही उपयोग करने पर भौतिक जगत में भारी उथल पुथल उत्पन्न की जा सकती है और अपनी निजी क्षमता में विशिष्ट स्तर की अभिवृद्धि भारी मात्रा में की जा सकती है।

संसार में ऐसे अगणित प्रमाण उदाहरण समय-समय पर मिलते रहे हैं कि मनुष्य की विद्युत शक्ति का उभार यदि किसी विशेष दिशा में मोड़ा जा सकता तो उसका प्रभाव ऐसा प्रभाव देखने में आया कि लोग दाँतों तले उँगली दबाये रह गये। देव दानवों की चित्र विचित्र क्षमताओं का कथा पुराणों में उल्लेख मिलता है। उन वर्णनों में किंवदंती भी हो सकता है। किन्तु तथ्यतः यह सिद्धान्त सही है कि मनुष्य असाधारण है। इस असाधारण के बल पर वह वैसा कुछ कर सकता है जैसा कि किसी दैत्य के सम्बन्ध में कहा या सुना जाता है।

सौंदर्य, कला-कौशल, बल पराक्रम आदि का अपना महत्व और आकर्षण है। अस्त्र शस्त्र पद धन आदि के बलबूते भी मनुष्य बहुत कुछ करने में सफल होते हैं। किन्तु जिन क्षमताओं के बलबूते महामानव स्तर के काम बन पड़ते हैं उन्हें आत्म शक्ति के ऊपर आधारित माना जा सकता है। यह आत्म शक्ति और कुछ नहीं मानवी विद्युत का दिव्य संस्थानों के साथ जोड़ा गया सम्बन्ध अथवा किया गया आदान प्रदान ही है।

मनुष्य का मैगनेट घटता बढ़ता रहता है। घटने से उसे विस्मृति, भ्रान्ति, उदासी, थकान जैसी अनुभूति होती है। बढ़ने से प्रतिभा, स्मृति, स्फूर्ति जैसी उत्साह वर्धक विशेषताएँ उभरी हुई प्रतीत होती हैं। बड़े हुए चुम्बकत्व वाला अपने से हल्के वालों को प्रभावित करने में सफल रहता है।

जहाँ शरीर को कई प्रकार के खाद्य-पदार्थ एवं पोषण चाहिए वहाँ उसे वातावरण में संव्याप्त चुम्बकीय ऊर्जा की मात्रा भी उसी प्रकार चाहिए जैसे कि साँस के लिए हवा की जरूरत पड़ती है। इसी प्रकार मस्तिष्क को भी अपना बैटरी चार्ज करने वाला चार्जर चाहिए। अन्यथा वह डाउन होता चला जायेगा और मनुष्य अपनी प्रखरता गँवा बैठेगा।

शरीर का प्रत्येक कोशाणु एक विद्युत इकाई हे। उनके कंपन और दोलन क्रम उसी शक्ति के आधार पर संचालित होते हैं।

स्विट्जरलैंड के डाक्टर फिलिप्स आरोलस पैरा सेलसस ने अनेकों बीमारियों का कारण शारीरिक चुम्बकत्व की विकृति एवं विश्रृंखलता को सिद्ध किया है।

कुछ वर्ष पूर्व मेडिकल वर्ल्डन्यूज पत्रिका में शिकागो की ‘बायोमैगनेटिक रिसर्च फाउन्डेशन’ द्वारा किये गये शारीरिक चुम्बकत्व सम्बन्धी अनुसन्धानों का विस्तृत विवरण छपा था। हंगरी के डा. जीन बारगेथी ने विषाणुओं से निपटने और कोशाणुओं की अशक्तता को दूर करने में चुम्बक के प्रयोग से आश्चर्यजनक सफलता पाई। इस चिकित्सा पद्धति को ‘बायोमैगनेटिक्स’ के स्वतंत्र नाम से भी जाना जाता है।

डा. के. हिलाल ने मस्तिष्कीय मूढ़ता और विकार ग्रस्तता के लिए चुम्बकीय चिकित्सा को बहुत उपयोगी बताया है।

कुछ वर्ष पूर्व ‘फेट’ पत्रिका में डाक्टर के. ई. मेकलीन के निजी प्रयोगों की चर्चा करते हुए जी.सी. एफ. गुडवेज ने उल्लेख किया है कि वे प्रतिदिन 3600 गॉस शक्ति के चुम्बकीय क्षेत्र का अपने शरीर पर प्रयोग करने के कारण अपने स्वास्थ को अक्षुण्ण रखने में सफल रहे हैं। वे 64 वर्ष की आयु में भी 45 वर्ष जैसे लगते हैं।

सन् 1600 में स्काचमेन मैक्सवैल ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि ब्रह्माण्डव्यापी जीवनी शक्ति का अस्तित्व मौजूद है। प्रयत्न करके उसकी न्यूनाधिक मात्रा अपने में भी भरी जा सकती है और उसे स्वयं के उत्कर्ष में मनचाहे ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। मैक्सवैल से पहले, विद्वान गौक्लेनियस अनेक तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध करता रहा था कि मनुष्य की अंतःशक्ति का प्रमुख आधार उसकी वह जीवन्त शक्ति है जिसे चुम्बकत्व के स्तर का समझा जा सकता है। वान हेलमान्ट ने मानवी चुम्बक शक्ति का शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगियों पर सफल प्रयोग करने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी। उसे पीड़ितों का मसीहा या सिद्ध पुरुष कहा जाने लगा था।

फ्राँस के मनीषी ‘ला फान्टेन’ और डा. ब्रेण्ड ने हिप्नोटिज्म द्वारा रोगियों को कृत्रिम निद्रा में पहुँचा कर ऐसे कितने ही ऑपरेशन किये जिनमें रोगियों को किसी प्रकार की कष्ट अनुभूति नहीं हुयी।अमेरिका में न्यू आरलीन्स तो इन प्रयोगों का केन्द्र ही बन गया। मानवीय विद्युत की सिद्धि और उसके उपयोग की विधि को ‘इलेक्ट्रो वायोलाजीकल्स’ नाम दिया गया। सन् 1850 में अमेरिकी डा. ‘डार्लिंग’ और फ्राँसीसी डा. ‘द्रुरान्ड डे ग्रास’ ने जैव चुम्बकत्व के सफल प्रयोगों से अपने संसार भर के विज्ञान वेत्ताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

डा. मेस्मर फ्रेडरिक का प्रतिपादन है कि मनुष्य के शरीर में चुम्बकत्व भरा पड़ा है। जो आँखों से एवं उँगलियों के पोरुओं से बाहर निकलता रहता है। इस प्रवाह से अपने निज के लिए तथा दूसरों के लिए उपयोगी लाभ उठाया जा सकता है। मोडायूज तथा काउण्ड पुलीगर ने इस संदर्भ में गहरी खोजें कीं और सिद्ध किया कि यह सामान्य समझे जाने वाली उपेक्षित मानवी विद्युत शक्ति बड़े काम की है और इसके प्रयोग से महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं।

जर्मनी के अधिनायक हिटलर का उसकी रुग्णावस्था में उपचार एक ‘क्रिस्टन’ नामक व्यक्ति करता था। उसकी उंगलियों में दर्द को भगाने की जादुई क्षमता थी, जिनके स्पर्श मात्र से वह रोगियों को चंगा कर देता था। दवादारू तो वह नाम मात्र की करता था।

उनका जन्म इस्टोनिया में सन् 1898 में हुआ था। मालिश करके रोगोपचार के कौशल को सीख कर उसने ऐसी जादुई क्षमता प्राप्त की थी। हिटलर के अन्तरंग मित्र हिमलर तक को कई बार उसने अपनी चिकित्सा से चमत्कृत कर दिया और भयंकर रुग्णता के पंजे से मुक्त किया। क्रिस्टन ने अपने प्रभाव एवं परिचय का उपयोग करके हिटलर की मृत्युपाश में जकड़े हुए लगभग एक लाख व्यक्तियों को छुटकारा दिलाया।

यूनानी चिकित्सा के आविष्कारकर्ता पैपिरस ने सिर पर हाथ फिराकर रोग चिकित्सा करने की पद्धति को शास्त्रीय रूप दिया है। बादशाह पाइरस और वैंस पैसियन को कठिन रोगों से मुक्ति ऐसे ही प्रयोगों से मिली थी। फ्राँस के सम्राटों में फ्राँसिस प्रथम से लेकर चार्ल्स दशम तक की चिकित्सा में जैव चुम्बक का प्रयोग शक्तिशाली प्रयोक्ताओं द्वारा होता रहा है।

प्रो. फोन्टान ने एक फ्रांसीसी नाविक का ऐसा ही उल्लेख किया है। वह अन्धा व्यक्ति उँगलियों से छूकर ऐसे विवरण बताता था जो साधारणतया आँखों के बिना नहीं बनाये जा सकते। कनाडा की एक अन्धी लड़की हाथ की कुहनियों के माध्यम से ऐसा ही अदृश्य दर्शन कर सकने में समर्थ थी ऐसे प्रमाण मिले हैं।

फ्राँसीसी कवि-जूल्स रोमेन्स की उन दिनों परोक्ष दृष्टि विज्ञान में बड़ी दिलचस्पी थी। उसने अपने साहित्य कार्यों के साथ-साथ इस विषय में भी शोध की थी और बताया है कि त्वचा में अगणित ‘कीट नेत्र’ विद्यमान हैं जो स्पर्श सम्वेदना के द्वारा निकटवर्ती वस्तुओं के बारे में निरन्तर जानकारी संग्रहित करते रहते हैं। आँखों की तरह ये छोटे नेत्र वस्तुओं की आकृति भले ही स्पष्ट रूप से न जान सकें पर उनकी प्रकृति के सम्बन्ध में नेत्र गोलकों से भी अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

मेरीलैण्ड (अमेरिका) के कॉलेज ऑफ फार्मेसी की सोलह वर्षीय छात्रा ‘लुई हैवर्गर’ वैज्ञानिकों के लिए अनबूझ पहेली बनी रही। उस लड़की की उँगलियों के अग्रभाग में चुम्बकीय गुण था। आधी इंच मोटी और एक फुट लम्बी लोहे की छड़ वह उँगलियों के पोरुओं से छूकर अधर में उठा लेती थी और वह छड़ बिना किसी सहारे के हवा में लटकती रहती थी। धातुओं की वस्तुएँ उसके हाथ में चिपककर रह जाती थीं पर किसी मनुष्य को जब वह छूती तो कोई झटका प्रतीत नहीं होता था।

स्टाक होम (स्वीडन) के निकट मोस्टेरीज नामक कस्बे की एक तेरह वर्षीय लड़की ल्कोरो फाइन को एक दिन ऐसी गहरी नींद आई कि वह फिर अनेक प्रयत्न करने पर खुली ही नहीं। डाक्टरों की सहायता से उसके शरीर में पतला आहार पहुँचाने और मलमूत्र विसर्जन का प्रबन्ध तो कर दिया गया पर नींद खोलने में तनिक भी सफलता न मिली। यह क्रम विशेषज्ञों के शोध का विषय बना और वे उसकी सुरक्षा तथा प्रतीक्षा में अपनी पूरी शक्ति लगाते रहे। पूरे 23 वर्ष बाद नींद खुली तब वह 39 वर्ष की थी, जागते ही उसने अपनी वे पुस्तकें माँगी जो जहाँ से पढ़ाई छोड़ी थी। शिक्षा का क्रम फिर वहीं से आरम्भ हुआ जहाँ से कि छूटा था।

आरमण्ड जैक्विस लुहरवेट नामक एक फ्रांसीसी वकील एक ऐसा अद्भुत व्यक्ति था जो लगातार 71 वर्ष तक एक क्षण भी नहीं सोया।

आरमाण्ड का जन्म सन् 1791 ई. में पेरिस में हुआ था। 21 जनवरी 1793 को जब उनकी माँ उन्हें लेकर सम्राट लुई सोलहवें का मृत्युदण्ड देखने गईं। वहाँ का वीभत्स दृश्य देखकर बच्चा ऐसा सहमा कि उसकी नींद सदा के लिए गायब हो गई।

ट्रेन्कुलाइजर्स से लेकर मालिश तक के विभिन्न उपचारों का कोई प्रभाव न पड़ा। विचित्रता यह रही कि आरमण्ड के स्वास्थ्य पर भी कोई विपरीत प्रभाव न पड़ा। 73 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु 1864 में हुई।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शरीर में विद्युत तन्त्र की समर्थता विद्यमान है और वह यदा-कदा अपनी प्रखरता का परिचय भी देता रहता है। सामान्य जीवन क्रम उसी पर निर्भर है। प्रगति के विभिन्न पक्षों में प्रायः इस बिजली की ही खपत विशेष रूप से होती है। जो उसके उत्पादन की उपेक्षा करते हैं तथा अपव्यय की रोकथाम में सतर्कता नहीं बरतते वे पौष्टिक आहार लेते हुए भी दुर्बलता, रुग्णता, थकान और जराजीर्ण स्थिति की ओर तेजी से घिसटते जाते हैं।

बुढ़ापा क्यों आता है इसका उत्तर आमतौर से रक्त संचार में शिथिलता, माँस-पेशियों में दुर्बलता, अवयवों का वजन घट जाना आदि माना जाता है, पर यह दुर्बलता क्यों आती है इनका विश्लेषण नहीं किया जाता। वस्तुतः हमारी विद्युत उत्पादन और संचार प्रणाली लड़खड़ाती है और अवयवों को यथा समय पोषण मिलने का काम ढीला पड़ जाता है। इसके लिए वे उपाय ढूंढ़े जाने चाहिए थे जो शरीर को विद्युतीय व्यवस्था को समर्थ बनाये रहें। यह कार्य योग साधनों से अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह हो सकता है और बुढ़ापा रोकने में हर व्यक्ति उस पर आधार पर एक बड़ी सीमा तक सफल हो सकता है।

कुछ समय पूर्व बम्बई के एक विद्वान बी.जे. रेले ने एक पुस्तक लिखी थी- दी वैदिक गार्डस एस. फिगर्स आफ बायोलॉजी। उसमें उन्होंने सिद्ध किया था कि वेदों में वर्णित आदित्य, वरुण, अग्नि, मरुत, मित्र, अश्नि, रुद्र आदि मस्तिष्क के स्थान विशेष में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ हैं जिन्हें जागृत करके विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बनाया जा सकता है।


भविष्य कथन-असम्भव नहीं

इन्द्रियों की सामान्य क्षमता के आधार पर सामने प्रस्तुत प्रत्यक्ष को वर्तमान में ही देखा जाना जा सकता है। सुनकर या पढ़कर भूतकाल की जानकारियाँ भी मिल सकती हैं किन्तु भविष्य को जानना सिद्धान्त और व्यवहार दोनों ही दृष्टियों से कठिन पड़ता है। सैद्धान्तिक दृष्टि से इसलिए कि कर्मफल की मान्यता के अनुरूप जो अब किया जा रहा है उसी का परिणाम भविष्य में मिलेगा। फिर भविष्य का पूर्व निर्धारण कैसे हो सकता है? यदि भविष्य निश्चित है तो कर्म पुरुषार्थ की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।

व्यावहारिक कठिनाई यह है कि ऐसे कोई भौतिक साधन नहीं जो भविष्य का सुनिश्चित ज्ञान करा सकें। ऋतुओं के भावी परिवर्तन की लँगड़ी लूली सम्भावनाएँ ही इन दिनों वातावरण की जानकारी देने वाले यन्त्र प्रकट करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त किस मनुष्य का भविष्य क्या है? क्या घटना क्रम कब किसी रूप में घटित होने वाला है इसका पूर्व परिचय किस आधार पर मिले। बुद्धि से अटकल भरे अनुमान ही लगा सकते हैं। कम्प्यूटर किसी निर्धारित सिद्धान्त के अनुरूप गणितीय निष्कर्ष ही प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसी दशा में भविष्य कथन की सम्भावना गले नहीं उतरती। फलित ज्योतिष के नाम पर ग्रह गणित करने वाले कुछ अटकल पच्चू लड़ाते रहते हैं। पर उस अन्धेरे में ढेला फेंकने वालों की स्वयं भी अपने कथन पर भरोसा नहीं होता। फिर दूसरों से कुछ विश्वास पूर्वक कह सके ऐसी स्थिति उनकी कहाँ होती है। इस व्यवस्था का दिन-दिन अवमूल्यन होता जा रहा है। बुद्धिवाद के जमाने में यही स्वाभाविक भी है।

फिर पूर्वाभास में भविष्य कथन के जो सही उदाहरण सामने आते रहते हैं उनका कारण क्या हो सकता है? उसका तथ्य संगत उत्तर एक ही हो सकता है- अध्यात्म स्तर की विशेषता। दिव्य दृष्टि। वह अदृश्य जगत की हाँडी में पकती हुई भावी सम्भावनाओं का स्वरूप और समय जान सकता है। कर्म का प्रतिफल, समय साध्य है। इस मध्यवर्ती अवधि में यह पता चलाना कठिन पड़ता है कि किस कृत्य की परिणति कितने समय में किस प्रकार किस स्थान में होगी। इतने पर भी उसका स्वरूप बहुत कुछ इस स्थिति में होता है कि कोई दिव्यदर्शी उसका पूर्वाभास प्राप्त कर सके। यह सम्भावना है भी या नहीं, इस संदर्भ में कितनी ही महत्वपूर्ण साक्षियाँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं।

लेडी चारलौट किंग अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं के कारण विश्व-विख्यात हैं। उनका निवास स्थान सलेन नामक स्थान पर यू.एस.ए. के और्गन प्रदेश में है। आने वाली गाड़ियों की ध्वनि को तो वह सबसे पहले सुनकर बता ही देती हैं लेकिन एक और विलक्षणता की कड़ी उनके जीवन में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है वह है- भूकम्पों का पूर्वाभास। जिन भूकम्पों के आने से पूर्व ही चारलौट ने जो भविष्य वाणियाँ कीं वह बिल्कुल प्रमाण सिद्ध होकर रही हैं।

6 अगस्त 1979 को होलिस्टर (कैलीफोर्निया), इसी वर्ष 12 सितम्बर को न्यू जूनिया, 24 जनवरी, 1950 को लिवरमोर (कैलीफोर्निया), तथा 3 मार्च 1980 को यूरेका (कैलीफोर्निया) में आने वाले भूकम्पों का लैडी चारलौट ने पूर्व उद्घोष किया था।

लेडी चारलौट ने बताया कि जैसे ही भूकम्प आने वाला होता है तो उसके मस्तिष्क में गहन और बारम्बार लय जैसी आवृत्ति बनती चली जाती है। जब भूकम्प तेज होने की स्थिति होती है तो लेडी का सिर दर्द होने लगता है। चार वर्षों में 80 से भी ऊपर ऐसी घटनाओं को वह स्पष्ट रूप से बता चुकी हैं।

पिक्चर ऑफ डोरियन डे के लेखक आक्सर वाल्ड का भविष्य कथन करते हुए काइरो ने कहा था कि आप जल्दी ही जेल जायेंगे तब तो उन्होंने यही समझा कि यह कोरी गप्प है, इस तरह डराकर रकम ऐंठना चाहता है किंतु एक काण्ड में वे ऐसे फँसे कि आजीवन कारावास की सजा मिली।

इसी प्रकार 1897 में रूस के सम्राट जार ने अपना हस्त चित्र भेजकर यह प्रकट नहीं किया कि यह किसका चित्र है किन्तु काइरो ने चित्र की पीठ पर लिखा। आप बीस वर्ष उपरांत शासन सत्ता से अलग कर दिये जायेंगे और आपका परिवार रोमाँचकारी मृत्यु से मरेगा। घटना उसी प्रकार हुई जैसे चित्र पर 20 वर्ष पूर्व अंकित कर दिया गया था।

इंग्लैण्ड के सम्राट सप्तम एडवर्ड के सम्बन्ध में वे उनके राजतिलक की तिथि प्राण घातक बीमारी की बातें सही सिद्ध हुईं। महारानी विक्टोरिया को मृत्यु दिवस की जानकारी बहुत समय पूर्व दे दी गई थी। अष्टम एडवर्ड की प्रणय लीला और राज त्याग की प्रसिद्ध घटना की घोषणा वे वर्षों पहले कर चुके थे।

भारत के विशिष्ट व्यक्ति जिनकी हस्त रेखाएँ देखीं वे एनीसेन्ट, स्वामी विवेकानन्द, मोतीलाल नेहरू, कर्नल आर्थर, लार्ड किचनर, आदि थे। उनसे वे बहुत प्रभावित हुए।

अपनी पुस्तक “विश्व का भविष्य” में भारत की स्वतन्त्रता, गृह युद्ध, पाकिस्तान की स्थापना, शरणार्थी समस्या, साम्प्रदायिक हिंसा आदि पर जो भी लिखा वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुआ।

घटना फरवरी 1965 की है। रोनाल्ड आर्थर जार्ज होटल में नाश्ते के लिए गये क्योंकि वहाँ एक ऐसी लड़की काम करती थी जो भविष्य बता सकती थी। रोनाल्ड को भूत की बातें बताईं वे अक्षरशः सत्य थी और आगे की बातें बताते एकाएक लड़की रुक गई तो रोनाल्ड ने पूछा मेरा भविष्य क्या होगा। लड़की बोली दुर्भाग्य- कि नवम्बर के बाद आपका कोई भविष्य ही नहीं है, सच में उसी वर्ष नवम्बर में रोनाल्ड चल बसे।

फिलिप को एक भविष्य वक्ता ने कहा कि स्पेन का राजवंश 24 पीड़ियों तक ही चलेगा उसने विश्वास कर पूर्व ही 24 कब्रें तैयार करा दीं।

सन् 1929 में मैरिया क्रिस्टीना की मृत्यु हुई वह 20वीं और ‘अलफोनो’ दो वर्ष उपरांत राज गद्दी से उतार दिया वह 24वाँ अन्तिम राजवंश का शासक था इसके बाद स्पेन में गणतन्त्र स्थापित हो गया। शताब्दियों पूर्व की भविष्य वाणी अक्षरशः सत्य सटीक निकली।

वैरान विलेन्यूफ नामक एक फ्राँसीसी पर्वतारोही सन् 1854 में आल्पस पहाड़ के एलेटश ग्लेशियर पर चढ़ाई की योजना बनाकर अपने दल के साथ चढ़ा। चढ़ने से पूर्व उसने एक भविष्य वाणी नोट कराई जो बाद में सच निकली। उसने लिखा था- “दल का कोई सदस्य हिमि स्खलन में दब सकता है। दबेगा तो उसकी लाश का पता लगाना सम्भव न होगा। हाँ 33 साल बाद ऐसी स्थिति आयेगी कि बर्फ पिघल जायेगी और लाश ऊपरी रखी मिलेगी। ठीक वैसा ही हुआ भी। वह स्वयं ही बर्फ में दब गया। लाश कहीं नहीं मिली। पर भविष्य वाणी के अनुसार 33 वर्ष बाद खोजी वहीं पहुँचे तो लाश पूर्ण सुरक्षित रखी हुई थी। ठण्डक के कारण उसमें कोई सड़न या विकृत उत्पन्न नहीं हुई थी।

जोर्डन (खाव) के भविष्य वक्त शेख अब्दुलरजा ने एक बार भविष्य वाणी की थी कि जोर्डन के शासक अब्दुल्ला का कत्ल होगा। बताये हुए समय सन् 1951 में वह घटना उसी रूप में घटित हुई। भविष्य वक्ता की शक्ति की जहाँ सराहना हुई वहाँ उन पर षड़यन्त्र में सम्मिलित होने का लाँछन भी लगाया गया। खिन्न होकर उनने 13 वर्ष का मौन धारण कर लिया और फिर लाख कहने पर भी इतने दिन तक किसी से नहीं बोले।

कोरीलीना में मिल फोर्ड कालेज बना। उसके लिए एक व्यक्ति ने एक हजार डालर दान देने का वचन दिया। पूछा गया कि वह वचन कब पूरा होगा? तो उसके उत्तर में उसने निश्चिंतता पूर्वक कहा, अभी अपना जहाज ह्वेल के शिकार पर गया है। आज ही वह 800 मील दूर न्यूवेड फोर्ड बन्दरगाह पर लगा है। उसमें ह्वेल का तेल भरा है। जहाज एक सप्ताह में आ जायेगा। आते ही वह वचन की राशि चुका देगा।

उन दिनों टेलीफोन जैसी व्यवस्था नहीं थी। उसके भविष्य कथन को सनक माना गया पर बात सच निकली। तेल से भरा जहाज यथा समय पहुँचा। आते ही उसने राशि चुकादी।

थाईलैंड के राजा फ्याकाँग ने अपना प्रथम पुत्र जन्मते ही यह भविष्य वाणी की थी कि बड़ा होने पर पुत्र ही उसकी हत्या करेगा। दरबारियों ने उसकी आशंका का समर्थन नहीं किया। बालक लाड़-चाव में पलता रहा। युवा होने पर उसने बाप को गद्दी से उतारकर स्वयं सिंहासनारूढ़ होने के लोभ में उसकी हत्या कर ही दी। जिन्हें स्मरण था उनने चर्चा की कि राजा यह भविष्यवाणी तीस वर्ष पूर्व ही कर चुका था।

स्काटलैण्ड के राजा अलेक्जेण्डर तृतीय को किसी भविष्य वक्ता ने बताया कि उसकी मृत्यु घुड़सवारी के समय घोड़ा बिदकने से होगी। उसने इस सम्भावना का अनुमान वर्तमान घोड़े से लगाया और उसे मरवा दिया। कुछ दिन बाद दूसरे घोड़े पर वह बाहर जा रहा था कि रास्ते में एक अजूबा देखकर घोड़ा ऐसा बिदका कि उछलकर पास के गड्ढे में जा गिरा। राजा और घोड़ा दोनों ही मर गये।

एक फ्रांसीसी नाविक वोटिनो सन् 1762 में मैरिसस में जहाजी व्यवस्था के लिए नियुक्त किया। उधर से कम ही जहाज निकलते थे इसलिए काम कम रहता। उन दिनों जहाजों के पूर्व आगमन की सूचना मिल सके ऐसी टेलीफोन रेडियो जैसी व्यवस्था नहीं थी। चौकसी रख कर ही जानकारी पाई और व्यवस्था की जाती थी। बेटिनो ने दिव्य दृष्टि का अभ्यास आरम्भ किया। कुछ दिन में उसने वह क्षमता विकसित कर ली और कई दिन पूर्व जहाजों के आगमन, स्वरूप समय की सही जानकारी देने लगा।

सन् 1778 से लेकर 1782 तक के चार वर्षों में उसने 575 जलयानों के आगमन की पूर्व सूचनाएँ बताईं और वे सभी सही थीं। इस विशेषता के उपहार में फ्रांस सरकार के गवर्नर का पद और विपुल धन दिया।

इटली के अल्बर्टो अस्करी 8 सितम्बर 1935 को अपने पिता एन्टोनिया अस्करी के साथ कार रेस में दौड़ रहे थे, उस समय उनकी आयु 16 वर्ष थी। वायलोन के घने जंगल को पार करते समय एक काली बिल्ली सामने से गुजरी जिसे बचाने के लिए एन्टोनियो ने स्टीयरिंग घुमाया, तीव्र गति से दौड़ रही कार अनियन्त्रित होकर एक पेड़ से टकराई। एन्टोनियो की उसी समय मृत्यु हो गयी। 16 वर्षीय अल्बर्टो को उसी समय ऐसा लगा कि 20 वर्ष बाद जब वह 36 वर्ष का होगा तो उसकी भी मृत्यु इसी प्रकार होगी।

समय बीतता गया, 1953 और 1954 में अल्बर्टो ने तेज कार चलाने की प्रतियोगिता में सर्वप्रथम आने का पुरस्कार भी प्राप्त किया किन्तु 1955 में जिन दिनों वह पुनः ‘कार रेस’ में भाग लेने की तैयारी कर रहे थे, 20 वर्ष पुरानी 8 सितम्बर 1935 की घटना याद हो आयी और निश्चित तिथि से अपने पिता एन्टोनियो की तरह चार दिन पूर्व तबियत भी खराब हुई। उसकी इच्छा कार-रेस में भाग लेने की नहीं हो रही थी, परन्तु उसके प्रशिक्षक भूतपूर्व काररेस चैम्पियन बिल्लोरसी ने उसके आभास को अन्ध विश्वास कहकर फटकार भी लगाई। अस्तु अल्बर्टो ने नियत समय पर रेस के लिए अपनी कार चालू की। कार जब वायलोन के उसी जंगल से गुजर रही थी, 20 वर्ष पूर्व वाले दृश्य के अनुसार एक काली बिल्ली ने रास्ता काटा और बचाने के चक्कर में उसकी कार पेड़ से जा टकराई, अल्बर्टो की वहीं मृत्यु हो गई।

मार्टिन इबोन ने अपनी पुस्तक “डू एक्सपीरियन्स इन प्रोफेसी” में कई प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए यह सिद्ध किया है कि मनुष्य के भीतर अद्भुत अलौकिक और विलक्षण क्षमताएँ हैं। उन क्षमताओं के माध्यम से भूत, भविष्य, वर्तमान को देश, काल की सीमाओं से परे जाकर भी देखा जा सकता है।

न्यूरो साइक्रेट्रिक संस्थान कैलीफोर्निया के डायरेक्टर डॉ. क्रेग ने अपने विस्तृत शोध प्रबन्ध में कु. एडम तथा निएशन नामक दो लड़कियों की विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमता पर किये प्रयोगों का विस्तृत विवरण लिखा है। ये दोनों लड़कियाँ किसी भी वस्तु को छूकर उससे सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय रहस्य तथा भूत, वर्तमान और भविष्य का हाल ऐसे बता देती थीं मानो अपने सामने रखी हुई किसी पुस्तक को पढ़ रही हों।

कैलीफोर्निया के लॉस गेटोस शहर में ‘क्लेरिसा वर्नहर्ड’ को ‘अर्थक्वेकलेडी’ के नाम से पिछले एक दशक में भारी ख्याति मिली है। भूकंपों की पूर्व जानकारी देने में वह सक्षम है। समय-समय पर उसने भूकम्पों की कितनी ही भविष्यवाणियाँ कीं जो समय एवं स्थान के हिसाब से बिल्कुल सही निकलीं। कितनी बार उसके भविष्य बोध का प्रसारण सीधे रेडियो, टेलीविजन के माध्यम से भी हुआ है।

वर्ष 1974 को नवंबर माह में उसको एक ऐसी ही भविष्य वाणी का प्रसारण हुआ। अधिकारी गण भी रेडियो एवं टेलीविजन सेवाओं से प्रसारण की अनुमति इस कारण देते हैं क्योंकि उसके पूर्ववर्ती कथन अपने समय पर सच निकल चुके हैं। नवम्बर माह में रेडियो एवं टेलीविजन दोनों ही प्रसारणों से वर्नहर्ड ने अपनी दिव्य दृष्टि से खबर दी कि 28 नवंबर, बृहस्पतिवार, दोपहर ठीक तीन बजे मध्य तटवर्तीय क्षेत्र में भूकम्प का एक तीव्र झटका अनुभव किया जायेगा, पर किन्हीं अविज्ञात कारणों से कोई विशेष क्षति नहीं होगी। 28 नवंबर की दोपहर को भूकम्प आया। पोलिस रेडियो स्टेशन का संपर्क अन्य क्षेत्रों से टूट गया तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में अत्यन्त सामान्य नुकसान हुआ। जन हानि की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई। भूकम्प का समय तीन बजकर एक मिनट रिकार्ड किया गया। इस तरह क्लेरीसा के कथन में मात्र एक मिनट का अन्तर आया।

क्लेरीसा ने वर्ष 1975 के आरम्भ में ही कहा कि ‘इस वर्ष प्रमुख रूप से दो भूकम्प आयेंगे। 29 नवम्बर को उत्तरी गोलार्ध में और 25 मई को दक्षिणी गोलार्ध में। उत्तरी गोलार्ध वाले भूकम्प का स्थान हवाई द्वीप समूह होगा। उक्त कथन पूरी तरह सही निकला। भूकम्प के तीव्र झटके से हवाई द्वीप समूह भयंकर सर्वनाश का शिकार बना।

दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों में हेरोल्ड शर्मन को भी प्रसिद्धि मिली। सन् 1915 में उस मनुष्य की अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का परिचय मिला। उस समय से ही वह उन्हें करतलगत करने का अभ्यास करने लगा। धीरे-धीरे उसे सफलता मिलने लगी। एक शाम वह अपने कमरे में बैठा टाइप कर रहा था। अन्धेरा हो चला था। वह प्रकाश करने के लिए स्विच खोलने के लिए उठा। जैसे ही स्विच तक पहुँचा, अपने ही भीतर से एक आवाज आयी ‘लाइट मत खोलो’। इस प्रकार का उसका पहला अनुभव था कि अपनी ही सत्ता के भीतर से स्पष्ट निर्देश मिल रहा हो। वापिस वह टाइप करने पुनः बैठ गया पर अन्धेरे के कारण कुछ सूझ नहीं रहा था। सोचा कि वह निर्देश मन का भ्रम भी हो सकता है, दुबारा वह स्विच बोर्ड के पास स्विच दबाने चला।’ पर इस बार पहली बार से भी अधिक स्पष्ट उसी निर्देश की पुनरावृत्ति हुई। ठीक उसी समय किसी व्यक्ति के नीचे दौड़ने की आवाज आयी। कोई धड़ाधड़ दरवाजा खटखटाने लगा। वह दरवाजा पीटने के साथ-साथ तेज आवाज में बोलता भी जा रहा था कि “लाइट मत जलाना। हाई वोल्टेज लाइन के साथ आपकी लाइन अकस्मात जुड़ गयी है” बाद में मालूम हुआ कि वह लाइनमैन था तथा दौड़ता हुआ यह सूचना देने के लिए ही आया था। यदि शर्मन स्विच दबाता तो भयंकर संकट उपस्थित हो सकता था। उसे उस दिन के बाद समय समय पर भविष्य की कितनी ही बातें पहले ही मालूम हो जाती थीं जिसका उल्लेख प्रायः वह अपने निकटवर्ती मित्रों से करता रहता था।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डा. नेल्सन वाल्टर का कथन है कि मनुष्य के अन्दर एक बलवती आत्म चेतना रहती है, जिसे जिजीविषा एवं प्राणधात्री शक्ति कह सकते हैं। यह चेतन-जगत के गर्भ में पक रही उन हलचलों-घटनाओं का पूर्वज्ञान प्राप्त करने में सक्षम है जो आगे विपत्ति बनकर आने वाली है।

भविष्य बोध असम्भव नहीं, पर उतना ही सच यह भी है कि जितना सुगम प्रायः समझा जाता है उतना है नहीं। भविष्य वाणियों के नाम पर तथाकथित भविष्य वक्ता जन-मानस को गुमराह करते हैं। पर इतने पर भी सच्चाई अपने स्थान पर है। आत्म विद्या के क्षेत्र में वे सूत्र विद्यमान हैं जिनका अवलंबन लेकर तथा साधना का मार्ग अपनाकर वह क्षमता भी विकसित की जा सकती है जिसे दिव्य दृष्टि के नाम से अध्यात्म जगत में जाना जाता है।


आइये! अपनी विस्मृत धरोहर का स्मरण करें

पिण्ड और ब्रह्माण्ड का, चेतना और जड़ का, पृथ्वी और अन्तरिक्ष का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध दर्शाने वाले अनेकों मन्त्र, सूत्र धर्म ग्रन्थों में मिलते हैं। वेद में वर्णन है-

“सूर्यो मे चक्षुर्वातः प्राणोऽन्तरिक्षमात्या पृथ्वी शरीरम्। अस्तृतोनामाहमयस्मि स आत्मानं निदधैद्यावपथिव्यां गोपीथाय॥” -अथर्व 5।8।7

अर्थात्- सूर्य मेरा नेत्र है, वायु मेरा प्राण है, अन्तरिक्ष मेरी आत्मा (हृदय) और धरती मेरा शरीर है। मैं अपने आपको अपराजित समझकर द्यु लोक और धरती के मध्य सुरक्षित रखता हूँ।

इसी प्रकार यजुर्वेद में भी कहा गया है-

“शीर्ष्णोद्यौः समवर्ततः यस्य वातः प्राणाप्राणौः नाभ्याऽसीदन्तरिक्षं दिशः श्रोत्रं पदभ्या भूमिः।”

अर्थात्- द्यौ मेरा सिर, वायु, प्राण, अन्तरिक्ष नाभि, दिशा कान और भूमि मेरे पैर हैं।

इन ऋचाओं में जहाँ पिण्ड की असीम ब्रह्माण्डीय शक्ति का परिचय मिलता है वहीं शरीर, अन्तरिक्ष की विभिन्न शक्तियों के आपसी तारतम्य पर प्रकाश डाला गया है। मन्त्रों के उद्गाता ऋषि इस तथ्य से भलीभाँति परिचित थे कि मनुष्य का एकाकी पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है। न ही पृथ्वी पर उपलब्ध सम्पदाएँ उसकी स्वयं की हैं। अपनी धुरी पर घूमती अपनी कक्षा में दौड़ लगाती आत्म निर्भर दीखती भर है, पर वास्तविकता वैसी है नहीं। सौर परिवार के सदस्यों की आकर्षण शक्ति उसे एक व्यवस्था क्रम में जकड़े रहती है। उनमें असन्तुलन उत्पन्न होते ही किसी भी ग्रह-नक्षत्र के एक-दूसरे से टकरा जाने से स्वयं मरने और दूसरे को मारने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। यों तो सौर परिवार के प्रत्येक सदस्य परस्पर एक-दूसरे से न्यूनाधिक अनुदान प्राप्त करते हैं। इस दृष्टि से पराश्रित तो सभी ही हैं, पर पृथ्वी की जो स्थिति है उसमें उसके स्वयं का उपार्जन कम और अंतर्ग्रही अनुदान अधिक है।

भू वेत्ताओं का मत है कि अन्तरिक्ष से अनुदान उत्तरी ध्रुव से होकर आता है। उत्तरी ध्रुव का विचित्र चुम्बकत्व अपने उपयोग की आवश्यक वस्तुएँ अनन्त अन्तरिक्ष से खींचता रहता है। यदि यह अनुदान का क्रम रुक जाय तो पृथ्वी अपनी निज की सम्पदा द्वारा प्राणियों एवं वनस्पतियों की रक्षा कर पाने में भी अक्षम सिद्ध होगी। पृथ्वी पर जीवन, ऊर्जा, ताप, प्रकाश, प्राण जैसी विशेषताएँ सूर्य से प्राप्त होती हैं। ऋतुओं का आना उनमें परिवर्तन सौर गतिविधियों द्वारा संचालित है। सूर्य अपने अनुदान समेट ले तो भू-तल पर बिखरा वैभव देखते-देखते तिरोहित हो जायेगा और श्मशान की निस्तब्धता छा जायेगी।

उपरोक्त विश्लेषण से यह रहस्योद्घाटन होता है कि व्यक्ति और समाज की भाँति ग्रह-नक्षत्र भी एक-दूसरे पर आश्रित हैं और पारस्परिक आदान-प्रदान द्वारा अपना काम चलाते हैं। सौर-मण्डल ही नहीं समूचा ब्रह्माण्ड ही इस नियम व्यवस्था में जकड़ा गतिशील है और अपना अस्तित्व बनाये हुए है।

वेद की ऋचाओं से यह पता चलता है कि प्राचीन काल में ऋषि न केवल पिण्ड और ब्रह्माण्ड की एकता से सुपरिचित थे वरन् उन्हें यह भी मालूम था कि ग्रह-नक्षत्रों का गतिविधियाँ और उनमें समय-समय पर होने वाले हेर-फेर पृथ्वी के वातावरण और प्राणी जगत को प्रभावित करते हैं। ज्योतिर्विज्ञान ज्ञान की एक विज्ञान सम्मत शाखा थी जिसका उपयोग अंतर्ग्रही गतिविधियों और प्रभावों की खोजबीन करने के लिए किया जाता था। फलतः अन्तर्ग्रही अनुदानों से लाभ उठा सकना और आने वाले विक्षोभों से पूर्व सुरक्षा व्यवस्था बना लेना ज्योतिर्विज्ञान की गणनाओं द्वारा सुलभ था।

अब वह सारगर्भित और अति महत्वपूर्ण विद्या के ध्वंसावशेष ही दृष्टिगोचर होते हैं। पर जिन तथ्यों पर प्राचीनकाल के ज्योतिषाचार्य पहुँचे थे उस ओर अब विज्ञान का भी ध्यान आकर्षित हुआ है। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव पृथ्वी के वातावरण और जीवधारियों पर पड़ता है। विशेषतया सूर्य में तनिक-सा भी अन्तर पड़ने पर उसकी प्रतिक्रिया तुरन्त धरातल पर दिखाई पड़ती है। तापमान घटने और बढ़ने का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों से सभी परिचित हैं। अन्तरिक्ष में संव्याप्त सूक्ष्म तरंगों की स्थिति में हुए परिवर्तन पृथ्वी के अनेकों क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। उसका प्रकृति सम्पदा तथा प्राणियों के शारीरिक मानसिक स्थिति पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। सूर्य और चन्द्रग्रहण के समय थोड़ा हेर-फेर होते ही उसका दूरगामी परिणाम दृष्टिगोचर होता है। चन्द्रमा की कलाएँ घटने-बढ़ने से समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटों से सभी परिचित हैं। प्रकृति विक्षोभों, मानसून, तूफान साइक्लोन आदि की घटनाओं में धरती की परिस्थितियाँ इतना बड़ा कारण नहीं होती जितना कि सौर-मण्डल के साथ पृथ्वी के साथ चल रहे तालमेल में व्यतिक्रम।

वाराहमिहिर की गणना भारतीय मूर्धन्य ज्योतिर्विदों में होती है। उनका मत था कि चन्द्रमा की गति एवं स्थिति का मनुष्य मन के साथ घना सम्बन्ध है। चन्द्र कलाओं के उतार-चढ़ाव में मनःस्थिति प्रभावित होती है। मार्च 1980 के रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका में एक लेख “डज मून कन्ट्रोल योर मूड” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ। लेखक ये “मियामी’ के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डा. लीवर। उन्होंने अपनी खोजों द्वारा जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया वह भारतीय ज्योतिषाचार्यों के मत की ही पुष्टि करता है। डा. लीवर के अनुसार मानवीय मन की उग्रता का चन्द्र की कलाओं से घना सम्बन्ध है। यह जानना अत्यन्त महत्वपूर्ण होगा कि पृथ्वी की तरह मानव शरीर में भी 80 प्रतिशत पानी और 20 प्रतिशत ठोस पदार्थ है। पृथ्वी के 80 प्रतिशत पानी से आच्छादित समुद्र में जिस तरह चन्द्रमा के प्रभाव से ज्वार-भाटे आते हैं ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मन-मस्तिष्क में भी उथल-पुथल होती है। सामान्यतया विशाल महासागरों में ज्वार-भाटे का प्रभाव कुछ फुट तक ही होता है जबकि खाड़ियों में उसका प्रभाव अत्यधिक देखा जाता है। इसी प्रकार सामान्य सन्तुलन मनःस्थिति वालों पर प्रभाव तो कम पड़ता है पर असन्तुलित और अपराधी विक्षुब्ध मनःस्थिति वालों पर प्रभाव अधिक पड़ता है।” इस तरह के निष्कर्ष की पुष्टि अनेकों मनः चिकित्सकों ने की है कि अपराध की घटनाएँ पूर्णिमा और अमावस्या के दिन सर्वाधिक घटती है पागलों की उग्रता इन्हीं दिनों बढ़ जाती है।

न केवल चन्द्रमा बल्कि सौर-मण्डल के अन्यान्य ग्रह भी विभिन्न प्रकार के प्रभाव पृथ्वी के वातावरण पर डालते हैं, जिनकी भली-बुरी प्रतिक्रियाएँ आये दिन दृष्टिगोचर होती हैं। जब सौर मण्डल ही नहीं ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक परस्पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं तो उनके प्रभावों का एक दूसरे पर पड़ना भी स्वाभाविक है। इस संदर्भ में काफी पूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक पैरा सेल्सस कह चुके हैं कि ग्रह-नक्षत्र हमारे इर्द-गिर्द पृथ्वी से आबद्ध हैं। उनकी गतिविधियाँ एवं प्रभावों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उपेक्षा का अर्थ होगा मानवी भविष्य का निर्धारण करने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी को छोड़ देना।” ‘पास्कल’ जैसे विद्वान का मत है कि मैं ब्रह्माण्डीय एकता तथा ‘डाइसिमेट्रिक प्रभाव’ पर विश्वास करता हूँ जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हर घटक को प्रभावित करते हैं।

विज्ञान के बढ़ते हुए चरण ने अन्तरिक्ष को भी अपने शोध का लक्ष्य बनाया है। ज्योतिर्विज्ञान का अधिष्ठाता भारत रहा है। इस विद्या की खोई कड़ियों को एकत्र करे और अध्ययन पर्यवेक्षण का क्रम चल पड़े तो समस्त मानव जाति के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग सकता है।


Quotation

त्रिविधिं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ -गीता 16।21

काम, क्रोध और लोभ ये नरक के तीन द्वार मनुष्य को विनष्ट करने वाले हैं, अतएव इन तीनों का मनुष्य को त्याग कर देना चाहिए।


प्रेतात्माओं का स्वरूप एवं स्वभाव समझने में हर्ज नहीं

प्रचलित अन्धविश्वासों में एक ‘भूतों की भयानकता’ भी है। पिछड़े क्षेत्रों में पिछड़े समुदायों में तनिक भी असाधारण प्रतीत होने वाली घटना के साथ भूतों का भी सम्बन्ध जुड़ जाता है। चेचक, बुखार, खाँसी, सिर दर्द, मासिक धर्म की गड़बड़ी, गर्भपात के बाद संक्रमण आदि कोई भी रोग क्यों न हो, उसके पीछे भूत नाचते दीखते हैं और सियाने दिवानों की झाड़ फूँक चल पड़ती है। बच्चों को दस्त लगना, पसली चलना, किसी की नजर लगने का कारण ठहराया जाता है। मानसिक दुर्बलता कई बार उग्रता के स्तर तक चली जाती है तो चित्र, विचित्र प्रकार के उन्मादी, लम्पट प्रकट होने लगते हैं, उसकी मानसिक चिकित्सा कराने के स्थान पर भूतों का आक्रमण ठहराया जाता है और मेंहदीपुर के वालावीर से लेकर न जाने कहाँ-कहाँ पहुँचा जाता है।

यह भूतवाद मूर्खों और धूर्तों के संयोग से चला है। अन्यान्य अन्धविश्वासों की तरह उसकी परिणति भी हर दृष्टि से हानि उत्पन्न करने के रूप में ही होती है। काम चोर तबियत के स्त्री, बच्चे इन कल्पनाओं और प्रतिवादनों से भयभीत, स्व सम्मोहित होकर ऐसे आचरण करने लगते हैं, मानो उन्हें सचमुच ही भूतों का सामना करना पड़ रहा हो। देवी का आवेश आने के नाम पर असंख्यों को भ्रमित किया जाता है एवं लाखों की सम्पत्ति ऐसे धूर्त कमाते देखे जाते हैं। यह पिछड़ेपन की निशानी है। जो भारत के पिछड़े क्षेत्रों में इस बुद्धिवाद के युग में भी अपनी जड़ें गहरायी तक जमाये बैठी है।

एक और जहाँ इस अन्धविश्वास और भ्रम जंजाल का उन्मूलन करने की आवश्यकता है वहाँ दूसरी और मरणोत्तर जीवन में पुनर्जन्म से पूर्व की मध्यवर्ती स्थिति से आत्मा के स्वरूप एवं कार्यक्रम को खोजने, समझने की भी आवश्यकता है। जब शरीर धारियों की परिस्थितियों और समस्याओं को समझने में इतना प्रयत्न किया जाता है, तो उन अदृश्य मनुष्येत्तर प्राणियों की क्यों उपेक्षा की जाय जो कल, परसों हमारी ही तरह पूर्ण समक्ष और दृश्यमान थे। मरना सभी को है। अपनी बारी भी देर सवेर में आनी ही है। जिस क्षेत्र में प्रवेश करना अवश्यंभावी है, उसका पूर्व परिचय प्राप्त करने से सुविधा ही रहेगी। फिर जो इन दिनों अदृश्य है उनमें से कई महत्वपूर्ण भी हैं। कई स्नेही सम्बन्धी भी हैं। कइयों में विलक्षण सामर्थ्य भी है। उनके साथ सहयोग एवं ताल-मेल का सूत्र बिठाया जा सके तो निश्चय ही अपनी शक्ति सामर्थ्य एवं कार्यक्षमता के विस्तार में भारी सुविधा होती है।

प्रेतात्माओं का अस्तित्व, लोक एवं कार्य विधान यदि समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि दृश्य होने पर भी दृश्यमान मनुष्यों में भी अपनी सजातियों में भारी दिलचस्पी रखते हैं। इसलिए अपनी ओर से भी सम्बन्ध साधने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रक्रिया अटपटी हो जाने के कारण लोग डरने लगते हैं और उस सूत्र को तोड़ने का प्रयत्न करते हैं जो वस्तुतः किसी अहित के लिए नहीं जुड़ रहा था, वरन् उससे कुछ न कुछ हित ही होने जा रहा था। उदारमना मित्र, परिचितों, स्नेही सहयोगियों की तरह अशरीरी आत्माएँ हमारे जीवन से रस लेने लगें, सहयोगी आदान प्रदान से सन्तुष्ट रह सकें तो उपयोगी सहायता भी कर सकती हैं।

सहायता मिले या न मिले- प्रेतात्माओं के साथ दिलचस्पी रखने में इतना तो हो ही सकता है कि उनमें से जो विक्षुब्ध स्थिति में हैं उनका सन्तोष सम्मान कर सकें। छेड़खानी किये जाने पर, उत्पन्न होने वाले उनके रोष, आक्रोश से बच सकें। इस संदर्भ में प्रेत संसार से सम्बन्धित कुछ घटनाओं के आधार पर उपयोगी जानकारी मिलती है। इन्हें ध्यानपूर्वक समझने की पर्यवेक्षण दृष्टि तो बनाये ही रहना चाहिए।

थियॉसाफी आन्दोलन की जन्मदात्री मैडम ब्लैवट्स्की ने एक बार भाई को एक हलकी-सी मेज उठाकर लाने को कहा। वह ले आया। मैडम ने उसे दुबारा उठाने को कहा लेकिन इस बार वह पूरा जोर लगाने पर भी नहीं उठ सकी। घर के सभी लोगों ने सम्मिलित रूप से भी उठाने की कोशिश की फिर भी सफलता नहीं मिली। तब मैडम ने उस मेज पर सवार प्रेतों को वहाँ से हट जाने को कहा जिससे मेज पुनः पूर्ववत् हल्की हो गई। रहस्योद्घाटन करते हुए मैडम ब्लैवट्स्की ने बताया कि उनके पास अदृश्य सहायक सात प्रेतों की एक पूरी मण्डली है जो समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श देते और मुक्त हस्त से उनकी सहायता किया करते हैं। अदृश्य सहायकों के अस्तित्व पर थियॉसाफिस्ट अपनी संस्थापिका मैडम ब्लैवट्स्की के मत से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण दृढ़ विश्वास रखते हैं। उनके ग्रन्थों में इनका वर्णन मिलता है।

घटना सन् 1968 की है। रोजेनहीन (प. जर्मनी) के एक लब्ध प्रतिष्ठ वकील ने अपने अनुभव दर्ज करते हुए आश्चर्यजनक विवरण दिये हैं। उनके टेलीफोन की घंटी बार-बार बजती वकील साहब चोंगा उठाकर कान से लगाते किन्तु दूसरी ओर से किसी के बोलने की आवाज न सुनाई देती। वे ऐसा करते-करते थक गये। झल्लाकर टेलीफोन के मोनीटर को इस शरारत की जाँच करने के लिए रिपोर्ट लिखा दी गई। किन्तु अब बिजली के बल्ब का नम्बर था कभी तेज कभी धीमा। कभी ट्यूबलाइट जलती बुझती तथा एक दो बार तेज रोशनी कर फूट भी गई। हार कर बिजली विभाग में रिपोर्ट लिखा दी गई। सारे सर्किटों की छान-बीन की गई किन्तु कहीं गड़बड़ी न मिली। टेलीफोन विभाग ने भी उत्तर में यही कहा कि क्षमा करें! पूरी जाँच कर ली गई है किन्तु हमें शरारत का कोई सुराग हाथ नहीं लगा है। इसके उपरान्त 8 या 9 महीने बाद यह सारी घटनाएँ ब्यौरे वार प्रो. हाँस वेण्डर (अध्यक्ष ‘फ्री वर्ग इन्स्टीट्यूट ऑफ पैरा साइकोलॉजी’) को बताई गईं तो उन्होंने बारीकी से जाँच करके बताया कि यह मामला पदार्थ संचालन (साइको-काइनेसिस) का है। कुछ सूक्ष्म शक्तियाँ भी भौतिक पदार्थों पर नियन्त्रण कर सकने की क्षमता का आभास देती रहती हैं और यही वह अवस्था है जो भूत-प्रेत के रूप में परिचय देती रहती हैं।

जापान में उन दिनों सामन्तशाही का समय था। प्रजा के लिए यह सम्भव नहीं था कि वह अपने कष्ट क्लेशों और जागीरदारों के जुल्मों की फरिआद सम्राट तक पहुँचा सके। किन्तु सोगोरों के नेतृत्व में 136 ग्रामों के किसान एकत्रित होकर राजधानी में पहुँचे। किन्तु अधिकारियों ने उन्हें सम्राट् से नहीं मिलने दिया। सम्राट जब अपने पूर्वजों की समाधि पर पूजा करने आने वाले थे अवसर पाकर सोगोरो ने उनके हाथ में अर्जी थमा दी। सोगोरो को आशा थी उसे अवश्य न्याय मिलेगा किन्तु परिणाम ठीक विपरीत, कठोर क्रूर, जघन्य और बर्बरता पूर्ण निकला। सोगोरो पत्नी, बच्चे, बच्चियों सहित जनसमूह के समक्ष कत्ल करा दिया गया। दर्शक मूक देखते रहे। सोगोरो सपरिवार दफना दिया गया। सोगोरो के परिवार की लाशें रफा-दफा तो करदी गईं किन्तु इस घटना के बाद वातावरण में न जाने कैसा भयंकर उभार आया कि सर्वत्र एक आग और घुटन अनुभव की जाने लगी। शासकों को विचित्र भयानकता ने घेर लिया। तीसरे ही दिन सुधार की घोषणाएं हुईं। किसानों पर अत्याचार की जाँच प्रारम्भ हुई और अत्याचारी शासनाध्यक्ष, बाईस अफसर, सात न्यायाधीश, तीन लेखापरीक्षक बर्खास्त कर दिये गये और किसानों पर से बढ़े हुए कर तथा प्रतिबन्ध हटा लिये। यह सब एकाएक परिवर्तन कैसे हुआ। यदि यही सब होना था तो सोगोरो परिवार की बलि क्यों दी गई। तब रहस्य पर से पर्दा उठा। सम्राट के पूरे परिवार को सोगोरो परिवार के हत्याकाण्ड के उपरान्त चारों और प्रेतात्माएँ ही दिखाई पड़ने लगी थीं। सोते-जागते प्रेतों को देखकर वे भयभीत हुए। यह परिवर्तन उस डर का ही परिणाम था। अनेकों ओझा, ताँत्रिक हार गये किन्तु प्रेत भयानक त्रास देते ही रहे। अन्त में सम्राट का पतन हुआ और पड़ौस के राजा ने उसे बन्दी बना लिया और मृत्यु दण्ड दिया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक हेनरी प्राइस ने अपनी पुस्तक ‘फिफ्टी पिर्क्चस आफ साइकिकल रिसर्च’ में एक घटना का विवरण देते हुए लिखा है कि एक लड़की के पिता प्रथम विश्व युद्ध में मारे जा चुके थे। सन् 1921 ई. में उनकी लड़की रोसेली भी 6 वर्ष अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। मृत्यु के चार वर्ष बाद 1925 ई. से ही वह अपनी माँ को स्वप्न में दिखाई देने लगी। बाद में प्रत्येक बुधवार को वह घर के सभी सदस्यों को भी दीखने लगी। इस घटना की सत्यता प्रामाणित करने के लिए वैज्ञानिकों व पत्रकारों के दल ने 25 दिसम्बर 1937 को उसके घर वालों से संपर्क किया। प्रयोग के लिए कमरे की खिड़कियाँ दरवाजे बन्द कर लिये गये।

प्रयोग प्रारम्भ होते ही रोसेली की छाया धीरे-धीरे अपनी माँ के पास आयी। माँ ने पूछा- ‘रोसेली’, उसने उत्तर दिया- “हाँ”। तब पत्रकार व वैज्ञानिकों ने उस लड़की को स्पर्श करने की स्वीकृति उसकी माँ से लेकर लड़की के गले, हाथ सिर पर अपना हाथ फेरते हुए उसकी नाड़ी देखी जो चल रही थी। कमरे में प्रकाश करने पर रोसेली के हाथ, पैर व चेहरा सभी साफ-साफ शुभ्र संगमरमर जैसे दिखाई दे रहे थे। शरीर बड़ा ही कोमल था। प्रयोग 15 मिनट तक चलता रहा और वह लड़की ‘हाँ’ और ‘नहीं’ में बराबर उत्तर देती रही। तदुपरान्त उसका शरीर छाया में रूपांतरित हो अन्तर्ध्यान हो गया।

प्रेतात्माओं के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। उनका अस्तित्व होता है और अपनी गलतियों पर जीवित व्यक्तियों की ही तरह उन्हें पश्चाताप करते देखा गया है। ‘फेट’ पत्रिका के अगस्त 1962 के अंक में प्रकाशित श्रीमती सेना सरंजेस्की का संस्मरण ‘सिसकते भूत का सन्देश’ इस तथ्य पर प्रकाश डालता है। वे लिखती हैं- “में जिस मकान में रहती थी उसमें कभी-कभी सीढ़ियों पर और कमरों में किसी के टहलने की आवाज आया करती थी। एक दिन मुझे लगा कि पास ही कोई छाया खड़ी है। तभी मुझे टेड ऐलिसन नामक व्यक्ति का स्मरण हो आया जिसने कुछ मय पहले इसी मकान में आत्महत्या की थी। ऐलिसन के भूत की याद आते ही मुझे डर लगने लगा। किन्तु मैंने अपने को सम्हाला। साहस करके उससे पूछ ही लिया- ‘आप टेड तो नहीं हैं?’ मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मैंने स्पष्ट सुना- ‘यस’। मैंने पुनः पूछा- ‘आप कुछ कहना चाहते हैं?’ पर इससे पूर्व कि कोई उत्तर सुनूँ, वह छाया अदृश्य हो गई और फिर कई दिन बाद आई। मैंने फिर साहस बटोर कर पूछा- ‘आप सिसकते क्यों हैं, क्या आप कुछ कहना चाहते हैं?” इस बार उसने बताया- ‘मैंने आत्महत्या नहीं की थी। किसी जहरीली औषधि के भूल से सेवन से यह दुर्घटना हुई। आप मेरी धर्म-पत्नी को कहना कि मैं अपनी बच्चियों को बहुत प्यार करता हूँ।’ इसके साथ ही वह छाया गायब हो गई और फिर कभी नहीं दिखाई पड़ी। बाद में मैंने श्रीमती टेड से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि निःसन्देह वे अपने साथ इन्सूलिन की शीशी रखते थे और उसी के द्वारा उनकी मृत्यु हुई थी।”

इन घटनाओं से प्रतीत होता है कि दिवंगत आत्माएँ शरीरधारी स्वजनों के साथ सम्बन्ध स्थापित करके अपना मन हल्का करना चाहती हैं अथवा किसी छोटे-मोटे सहयोग की अपेक्षा लेकर इर्द-गिर्द मँडराती हैं।

“इन्टर प्रिटेशन ऑफ ड्रीम” नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानवेत्ता डा. सिगमंड फ्रायड एक घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं-

“मेरे शहर के एक सम्भ्रान्त व्यक्ति के पुत्र का देहावसान हो गया। रात में अन्त्येष्टि सम्भव नहीं थी, अतएव प्रातःकाल अन्त्येष्टि का निर्णय कर लाश के चारों ओर मोमबत्तियाँ जलाकर छोड़ दी गईं। एक व्यक्ति पहरे पर नियुक्त कर मृतक का पिता अपने कमरे में जा सो रहा। थोड़ी ही देर बाद उसने स्वप्न देखा, उसका लड़का सामने खड़ा कह रहा है- “बाबा! तुम यहाँ सो रहे हो और में जल रहा हूँ। मेरा शरीर यहीं जल जाने दोगे क्या?” स्वप्न देखते ही पिता की नींद खुल गई। खिड़की से झाँककर देखा तो जिस कमरे में बच्चे का शव रखा हुआ था, तेज प्रकाश दिखाई दिया। अज्ञात आशंका से पिता वहाँ दौड़कर गया तो देखा कि पहरे वाला व्यक्ति अलग हटकर सो रहा है और मोमबत्ती गिरने से कफ़न में आग लग चुकी है। थोड़ी देर और पहुँचना न होता तो लाश का क्या, घर का ही पता न चलता, जलकर खाक हो जाता।

कई क्षुब्ध आत्माएँ शेष-आक्रोश से भरी होती हैं और छेड़ खानी करने वालों का अनिष्ट करने पर उतारू हो जाती हैं। उनके सम्बन्ध में सही जानकारी हो तो उनसे दूर रहने की नीति अपनाई जा सकती है और व्यर्थ की आफत मोल लेने की मुसीबत से बचा जा सकता है।

घटना अमेरिका की है। कैलीफोर्निया शहर के इण्डावरी मुहल्ले में एक मकान था। वह काफी दिनों से खाली पड़ा था। एक बार चार विद्यार्थी आये। उन्होंने मकान किराये पर ले लिया और रहने लगे। एक दिन जब चारों आँगन में कुर्सियों पर बैठे थे तो अचानक चारों कुर्सियाँ ऊपर उठने लगीं। सात-आठ फुट ऊपर जाकर चारों हवा में स्थिर हो गईं। वे चारों बहुत घबरा गये। पर यह न समझ पाये कि ऐसा क्यों हुआ, फिर भी उन्होंने मकान छोड़ा नहीं। एक रात जब वे सो रहे थे तो उन पर अचानक पत्थरों की वर्षा होने लगी। पत्थरों से भरा एक टूटा सन्दूक बिस्तर पर आ गिरा। इससे घबरा कर चारों मकान छोड़कर भग गये। खोज करने पर पता चला कि उस मकान में चार-पाँच वर्ष पहले एक डाक्टर ने आत्महत्या कर ली थी। उसी की विक्षुब्ध आत्मा वहाँ मंडराया करती थी।

इंग्लैंड में पोर्ट्स साउथ रोड इशरकाउण्टी के पास से जो भी मोटर गुजरती उसमें बंदूक की गोली इस प्रकार लगती कि शीशे, छत या दरवाजे पर एक इंच का साफ, गोल छिद्र बन जाता मानो किसी मशीन से किया गया हो। ऐसी घटनाएँ लगातार होती रहीं जिससे उस क्षेत्र में आतंक फैल गया। पुलिस की छानबीन तथा स्काटलैण्ड थार्ड की वैज्ञानिक जाँच भी इस घटना का कोई सुराग न लगा सकी। अन्ततः उस क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था की गई, किन्तु वह भी बेकार गयी। धीरे-धीरे आवागमन ठप्प पड़ गया।

जब घटना के तथ्य को पता लगाने के सारे सूत्र विफल रहे तो तरह-तरह की किंवदंतियां कही जाने लगीं। परोक्ष जीवन और अदृश्य जगत पर विश्वास करने वाले इस घटना का सम्बन्ध प्रेतात्माओं से जोड़ने लगे। कहा जाता है कि क्लेयर माउण्ट स्टेट नामक यह स्थान पहले एक जागीरदार ‘ड्यूक ऑफ न्यू कॉन्सिल’ के पास था। उसने विलिक केन्ट नामक ठेकेदार से एक झील तैयार करवाई। तैयार होने पर ड्यूक ने उसका पैसा दबा लिया और उसे मार कर उसी झील में फिकवा दिया। शायद वही क्षुब्ध आत्मा ड्यूक मोटर मालिक के प्रति घृणा करने लगी हो और इसका प्रतिकार अन्य मोटर मालिकों से भी लेने लगी हो।

एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार यह लार्ड क्लाइव की विक्षुब्ध आत्मा है जिसे मोटरों का शोर पसन्द नहीं। लार्ड क्लाइव ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से हिन्दुस्तान गया था तथा वहाँ उसने छल-कपट द्वारा अंग्रेजी राज्य बढ़ाया तथा अपना व्यक्तिगत स्वार्थ भी सिद्ध किया। वह जब इंग्लैंड लौटा तो करोड़ों की सम्पत्ति भारत से साथ ले गया। उससे उसने क्लेयर माउण्ट का इलाका खरीदकर उस जंगल में एक महल बनवाया। उसमें वह अनेक खानसामा, नौकरों, वेश्याओं के साथ रहने लगा। वहाँ वह पूर्व के कुकृत्यों को बार-बार स्मरण कर अर्द्ध विक्षित्त-सा हो गया। यह एक तथ्य है कि उसे मोटरों की आवाज नापसन्द थी। अतः उसने सनक से आकर उस सड़क को खत्म करवा दिया और मोटरों के लिए 12 मील दूर रास्ता बनवा दिया। एक दिन असह्य मानसिक तड़पन में उसने आत्म-हत्या कर ली। सम्भव है लार्ड क्लाइव की ही आत्मा उन मोटरों से द्वेष रखने के कारण अनोखे अस्त्रों से मोटरों पर आक्रमण करती हो। परोक्ष जीवन और अदृश्य जगत पर विश्वास करने वाले ऐसा ही मानते हैं।

घटनाएँ चाहे मृतात्मा के रोष की हों अथवा अदृश्य रूप में सहायता की, वे अनुसंधान का एक नूतन क्षेत्र खोलती हैं। आत्मा की अमरता, मरने के बाद भी उसका अस्तित्व, पुनर्जन्म, प्रेत-पितर योनि, कर्मफल जैसे सिद्धान्त जिन्हें भारतीय अध्यात्म विज्ञान पूरी मान्यता देता आया है, इन घटनाओं से सत्यापित होते हैं। इस प्रकरण का डराने वाला एवं इस माध्यम से धूर्तता का चक्र चलाने वाला पक्ष तो निन्दनीय है। फिर भी इससे वर्तमान को श्रेष्ठ बनाने, चिन्तन की उत्कृष्टता बनाये रख देवत्व युक्त जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। ‘परलोक सुधारना’ सम्भवतः इसी को कहा जाता रहा हो। कुछ भी हो, प्रेत-पितरों के अस्तित्व के विषय में कोई सन्देह नहीं है। अदृश्य जगत का अन्वेषण कुछ और भी गहराई से हो तो कई महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग सकते हैं।


दृश्य प्रकृति की अविज्ञात विलक्षणताएं

प्रकृति की विलक्षणताएँ भी किन्हीं नियमों के आधार पर ही प्रकट एवं घटित होती हैं। उन्हें जाना जा सके तो उपलब्ध विचित्रताओं को सहज स्वाभाविक बनाया जा सकता है। साथ ही इतना महत्वपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है जो अब तक मनुष्य के हाथ नहीं लग सका है।

आज तक जितनी भी विलक्षणताएँ अंकित की गयी हैं, उन सब में सर्व साधारण है अप्राकृतिक वर्षा। 19वीं शताब्दी में किसी समय बिल्ली और कुत्ते को वर्षा के रूप में गिरते देखकर घनघोर वर्षा के लिए अंग्रेजी में एक मुहावरा बन गया “इट्स रेनींग कैट्स एण्ड डॉग्स।” वैसे भी समय-समय पर अगणित प्राणियों का वर्षा के रूप में गिरना देखा गया है। 28 मई 1881 के दिन इंग्लैंड के वरसेस्टर शहर के परिसर में गरजते तूफान के राथ केंकड़ों और घोघों को टनों के हिसाब से वर्षा के रूप में गिरते देखा गया। यह समाचार जब वारसेस्टर वासियों को मिला तब वे उन्हें थैलों-गाड़ियों में लादकर शहर की मण्डी में बेचने के लिए ले गये।

मछली, मेंढक, सीपी, गिरगिट तथा अन्य प्राणियों के समाचार कम ही मिलते हैं। किन्तु उपरोक्त घटना से 20 वर्ष पूर्व ऐसी ही एक विचित्र घटना का विवरण सिंगापुर में स्थित टाइम पत्रिका के एक फ्रेंच संवाददाता ने “ला साइन्स फॉर टॉस” के लिए भेजा था। यह घटना 16 फरवरी 1861 के दिन घटी। उस दिन वर्षा एकदम तेज होने के कारण 10 फीट दूर तक देखना असम्भव सा प्रतीत हो उठा था। वर्षा के साथ समुद्र में तूफान आ जाने के कारण समुद्र अपनी मर्यादा लाँघकर शहर की गलियों तक अपना विस्तार फैला चुका था। बाद में जब वर्षा कम हुई और रास्ते से पानी उतर गया अब देखने को मिला कि रास्ते में ढेर सारी मछलियों बिखरी पड़ी हैं। इसके साथ उन फ्रेंच प्रतिवेदक को यह भी देखने को मिला कि उसके घर के पिछले आँगन में भी मछलियाँ बिखरी पड़ी है। जबकि उसका घर पूरी तरह से दीवारों से घिरा हुआ था। इसलिए उसने यह सुनिश्चित अनुमान लगाया कि मछलियाँ समुद्र के पानी के साथ आयी हों या न आयी हों, किन्तु उनकी वर्षा निश्चित रूप से हुई है।

ऐसी सब मछलियों की वर्षा के जितने भी विवरण मिले हैं उन सबमें प्रायः यह देखा गया है कि जमीन पर गिरने के साथ भी यदि उन्हें पकड़ लिया जाता है तब भी वे जीवित नहीं मिलती जिससे यह अनुमान लगाना असम्भव हो जाता है कि वे कितनी देर तक हवा में रहीं। किन्तु एक असाधारण वर्षा की घटना जीवित मछलियों की भी पढ़ने को मिलती है। 11 फरवरी 1859 को वेल्स की एक पहाड़ी की ढाल में काम करने वाले एक किसान “जॉन लेविस” ने निकटवर्ती शहर अक्षर अवेरडार के पादरी के साथ मुलाकात में बताया कि उस दिन दोपहर खेत में काम करते समय अचानक उसकी पीठ पर कुछ टकराने लगा। अगल, बगल झाँकने से उसे जो दृश्य देखने मिला उसे देखकर उसकी आँखें चौंधिया गई। सारा खेत छोटी-छोटी मछलियों से भर गया था फिर भी ऊपर से उनकी वर्षा चालू ही थी। उसने अपनी टोपी उतार कर हवा में फैला दी तो कुछ ही क्षणों में वह टोपी भी भर गई तब अचम्भे के साथ उसे देखने को मिला कि वे सारी मछलियाँ प्रायः जीवित थीं और उछल-कूद मचा रही थीं। उन सबको बचाने के लिए उसने उन्हें समुद्री मछली समझ कर नमकीन पानी में डाला। किंतु जैसे ही उसने कुछ मछलियाँ पहली बार डालीं वे तत्काल मर गईं। इसलिए बाकी को खारे पानी में न डालकर उसने साफ पानी में डालीं। फलस्वरूप वे सारी बच गईं। अन्ततः जब वे बड़ी हुईं तब पादरी द्वारा उन्हें ‘स्टीकल बेकस’ प्रकार की मछलियों के रूप में पहचाना गया। इस घटना का विवरण उन दिनों विस्तार से लन्दन के ‘टाइम्स’ दैनिक में छपा था। ‘मिस्ट्रीस अनरिवील्ड’ नामक पुस्तक में ऐसी अनेकों घटनाएँ वर्णित हैं।

जीवित वस्तु की वर्षा, अपेक्षाकृत कम क्षेत्र पर ही होती है, किन्तु अन्य पदार्थों की अप्राकृतिक वर्षा कभी-कभी पूरे राष्ट्र और महाद्वीप के एक भू-भाग तक को आच्छादित कर देती है। सन् 1903 की फरवरी में पश्चिमी योरोप का विस्तृत भू-भाग सहारा रेगिस्तान काली रेत से भर गया था। जगह-जगह पर उसके रंगों में विभिन्नता देखने को मिली थी। कहीं-कहीं तो उसे लाल-पीले अथवा धुंधले रंग से पहचाना गया अथवा कत्थई रंग से उसका वर्णन किया गया था। अनुमान यह लगाया गया था कि लगभग 1 करोड़ टन की वर्षा तो केवल इंग्लैंड भर में ही हुई थी। उसी तरह की वर्षा का विवरण 30 जून 1968 को इंग्लैंड और वेल्स में दुबारा घटने के रूप में भी मिलता है, और वहाँ भी उसकी उत्पत्ति सहारा मरुभूमि ही बताई जाती है।

इन प्राणियों तथा पदार्थों की अनैसर्गिक वर्षा की जानकारी के बाद फफूँदों की वर्षा का विलक्षण वर्णन भी पढ़ने में आता है तब माथा टनकते ही बन पड़ता है। ऐसी घटना सन् 1819 में 13 अगस्त की रात को अमरीका के मेरोच्युसेट शहर में घटी। दिन भर की सख्त गरमी के बाद लगभग पूरी रात वर्षा की हल्की बौछार रही। वातावरण में हल्की ठंडक आ जाने से लोग अपनी सुस्ती उड़ाने जब बाहर निकले तब बाहर का वातावरण देखते ही वे आश्चर्यचकित रह गये। जगह-जगह पर उन्हें लगभग आठ इंच व्यास तथा एक इंच मोटाई के चमकीले गोल पदार्थ देखने मिले, जिनका सिरा रोएँदार था। पहले तो उनकी समझ में कुछ आया ही नहीं कि वह कौन सा पदार्थ या प्राणी है किन्तु कुछ समय बाद के अन्वेषण ने इस बात की जानकारी प्रदान की कि वह एक प्रकार की फफूँद है जो हवा में तैरती रहती है और उचित अवसर मिलने पर जमीन पर आ गिरती है। विश्व के आदि पुरातन ग्रन्थों में इसकी जानकारी ‘नोस्टॉक’ के नाम से मिलती है। इस फफूँद में विशेषता यह रहती है कि वह सूखे दिनों में कागज की तरह पतली हो जाती है किन्तु आर्द्रता अथवा जल का समागम प्राप्त करते ही देखते-देखते द्राक्षाकार की हो जाती है। इनके अचानक प्रकटन से ऐसा प्रतीत होता है मानो उनकी वर्षा हुई हो।

केवल पदार्थ-प्राणी ही नहीं, आग की वर्षा भी होती देखी गयी है। 13 नवम्बर 1833 को उत्तरी अमेरिका में आग बरसने का विवरण मिलता है। उस इतिहास प्रसिद्ध घटना का कारण था अन्तरिक्ष से छोटी-छोटी उल्काओं का एक साथ बरस पड़ना। अनुमानतः 2 लाख छोटे-बड़े जलते अंगारे आकाश से जमीन की ओर तेजी के साथ दौड़ते हुए देखे गये। गनीमत इतनी ही रही कि वे सभी जमीन तक पहुँचने से पहले ही बुझ गये। एक भी उल्का धरती को छू नहीं सकी और आकाश में धूल बनकर बिखर गई।

विचित्र वर्षा की तरह ही विचित्र ध्वनियों के सुनाई देने की घटनाएँ भी ऐसी हैं जिनसे प्रतीत होता है कि कान मात्र टेलीफोन, रेडियो जैसे उपकरण ही अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाले ध्वनि प्रवाहों को पकड़ने के कारण नहीं हैं वरन् अन्य माध्यमों से भी वे सुनने में आ सकती हैं।

इनमें से कुछ ध्वनियाँ इन्हीं दिनों की हो सकती हैं किन्तु कुछ के बारे में यही कहा जा सकता है कि वे पूर्व संचित हैं, कहीं जगह पकड़ कर बैठ गई हैं तथा किसी प्रकृति नियम के अनुसार अपनी पुनरावृत्ति करती रहती हैं।

एक बार चेकोस्लोवाकिया की एक नदी में कुछ लोग स्नान कर रहे थे, तभी सामने से कुछ मधुर संगीत सुनाई देने लगा। लोगों ने छान मारा पर पता न चला कि कौन और कहाँ से गा रहा है जबकि आवाज उनके पास ही हो रही थी। उस स्थान पर कुछ समय पूर्व कुछ सिपाही मारे गये थे, इसलिए यह मानकर उस बात को टाल दिया गया कि उन सिपाहियों की मृतात्माएँ ही गा रही होंगी।

दो दशक पूर्व की बात है। ‘लाइफ’ पत्रिका में प्रकाशित एक विवरण के अनुसार न्यूयार्क में एक बार बहुत से लोग रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे। एकाएक संगीत ध्वनि तो बन्द हो गई और दो महिलाओं की ऊँची-ऊँची आवाजों में बातें आने लगीं। रेडियो स्टेशन से पूछा गया तो पता चला कि वहाँ से केवल नियमबद्ध संगीत ही प्रसारित हुआ है। बीच की आवाज कहां से आई यह किसी को पता नहीं है।

सेण्ट लुईस में एक बार रात्रि-भोज का आयोजन किया गया। जैसे ही संगीतकारों ने वाद्य-यन्त्र उठाये कि उनसे ताजा खबरें प्रसारित होने लगीं। इससे आयोजन के सारे कार्यक्रम ही फेल हो गये। एलबर्टा के एक किसान का कहना है कि जब वह अपने कुएँ के ऊपर पड़ी हुई लोहे की चादर को हटाता है, तो कुएँ के तल से संगीत सुनाई देने लगता है। पुलिस को सन्देह हुआ कि किसान ने कहीं रेडियो छुपाया होगा। इसलिए इंच-इंच जमीन की जाँच कर ली। पड़ोसियों के रेडियो भी बरामद कर लिए पर जैसे ही उस लोहे की चादर को हटाया गया, आवाज बार-बार सुनाई दी और अन्ततः उस समस्या का कोई हल निकाला नहीं जा सका।

‘वण्डर बुक ऑफ दि स्ट्रेंज फैक्ट्स’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक ने नील नदी के किनारे स्थित कारनक के खण्डहरों में दो घूरती हुई प्रतिमाओं का उल्लेख किया है। ये दोनों प्रतिमाएँ डेढ़ कि. मी. के फासले पर जमी हुई हैं तथा उनके पास जाने पर ऐसा लगता है जैसे कोई विशालकाय दैत्य घूर रहा हो। इनमें एक प्रतिमा पत्थर की सामान्य मूर्तियों की तरह चुप खड़ी रहती है पर दूसरी से अक्सर कुछ बोलने की आवाज आती रहती है। पत्थर की मूर्ति क्यों और कैसे बोलती है इसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गई किन्तु अभी तक कुछ कारण खोजा नहीं जा सका।

मध्य एशिया के आठ लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्र में फैले हुए गोवी मरुस्थल के तकला मारान के पश्चिमी छोर पर स्थित अन्दास पादशा नामक स्थान में करुण संगीत सुनायी देता है। यह संगीत कभी-कभी ही सुनाई देता है और अधिक से अधिक पन्द्रह मिनट तक चलता है। अमेरिका की एक रेडियो कम्पनी ने इस करुण संगीत को टेपकर सुनाया तो कुछ ही दिनों में आकाशवाणी केन्द्र को हजारों श्रोताओं ने पत्र लिखे और बताया कि इस संगीत को सुनकर उनका हृदय व्यथा-वेदना से भर आया। एक टी. वी. कम्पनी ने इस स्थान की रिकार्डिंग की और अपने दर्शकों को बिना किसी कमेण्ट्री के सुनायी तो असंख्यों दर्शक रोने लगे।

कवाई टापू पश्चिमी आइलैण्ड के हवाइयाँ ग्रुप में आता है। होनोलूलू से करीब 12 कि. मी. दूर के इस टापू पर स्थित एक 20 मीटर ऊँची पहाड़ी तरह-तरह की आवाज करती है। इस पहाड़ी के पत्थर कोरल, शेल्स तथा लावा के कणों से निर्मित पाये गये हैं जो स्वयं अपने आप में आश्चर्य हैं। उससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि पहाड़ी से प्रायः कुत्तों के भौंकने की ध्वनि आती है। रात के अन्धकार और आँधी-वर्षा के समय यह ध्वनि बहुधा होती है। बच्चों के लिए यह क्षेत्र निषिद्ध घोषित है क्योंकि बच्चे इस आवाज को सुनने पर भयभीत हो जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि पास के किसी गाँव में कुत्ते ही भौंकते हों और उनकी प्रति-ध्वनि आती हो। इस पहाड़ी के आस-पास मीलों दूर तक कोई गाँव नहीं है। आज तक कोई भी वैज्ञानिक उस कारण की खोज नहीं कर पाया कि इस टीले से भौंकने की आवाज क्यों आती है? सदियों से यह रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है तथा अपने विश्लेषण की लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहा है।

प्रकृति के ऐसे अनेकों रहस्य हैं जो मनुष्य को अभी तक अविज्ञात है। पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों की भौतिकी विदों ने परिकल्पना तो गणितीय आधार पर कर ली पर उन्हें देखा किसने? जो नहीं दृश्यमान है पर जिसकी हलचलें दिखाई पड़ती हैं, उसे ‘मिस्ट्री’, ‘अनएक्सप्लेन्ड’, ‘ऑकल्ट’ नाम देकर इतिहास के गर्त्त में धकेलने की अपेक्षा उसे जानने का प्रयास करना ही उचित है। प्रकृति विलक्षण है, अचिन्त्य-अगोचर परब्रह्म की एक ऐसी माया है जिसे अध्यात्म विज्ञान अदृश्य जगत की सत्ता से संचालित मानता चला आया है। प्रति विश्व की दुनिया अत्यन्त ही निराली है। अविज्ञात कारणों की खोज करनी हो तो हमें पहले अध्यात्म की मान्यताओं को भी विज्ञान की एक सशक्त धारा के रूप में स्वीकार करना होगा। पूर्वाग्रह, दुराग्रह हटें तो अवरोध हटें भी। अदृश्य जगत का अनुसन्धान सभी विज्ञानविदों के लिए एक ऐसा ही चुनौती भरा क्षेत्र है।


“न मनुष्यात् श्रेष्ठतरम् हि किंचित्”

देवर्षि नारद की स्थिति कुछ दिनों से अत्यन्त विचित्र हो गयी थी। मन की व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी। विराट् सृष्टि और उससे जुड़े जड़ चेतन-घटकों पर जितना विचार करते उतना ही मन का असन्तोष बढ़ता जा रहा था। यह प्रश्न बारम्बार मन मस्तिष्क को झकझोर रहा था कि इस बृहद् सृष्टि में सबसे बड़ा सबसे महान कौन है? प्रश्न अत्यन्त गम्भीर था। उत्तर के लिए वे कुछ समय के लिए एकान्त स्थान में कोलाहल से दूर तत्व साधना के लिए चल पड़े।

लोक लोकान्तरों में उनका आवागमन रुक गया। समय-समय पर अन्य लोकों के समाचार, जो उनके माध्यम से मिलते रहते थे, वे मिलने बन्द हो गये। यह सूचना भगवान विष्णु को मिली। अपने एक दूत को उन्होंने नारद को ढूँढ़ने तथा साथ लेकर आने के लिए भेजा। दूत ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखा कि महर्षि नारद विष्णुलोक से सुदूर एक निर्जन एकान्त क्षेत्र में तप-साधना कर रहे हैं। वहाँ पहुँचकर विनय पूर्वक दूत ने महर्षि को भगवान विष्णु का सन्देश सुनाया कि आपको देवाधिदेव ने शीघ्र ही बुलाया है।

विष्णुलोक में पहुँचते ही उनकी हालत देखकर अंतर्यामी लक्ष्मीपति को यह समझते देर न लगी कि नारद किसी समस्या से अति चिन्तित हैं। पूछने पर महर्षि ने बताया- “देव! कुछ दिनों से मेरे मन में बारंबार यह प्रश्न उठ रहा है कि इस जगत में सबसे महान कौन है? मेरी चिन्ता का यही कारण है। आप सर्वज्ञ हैं। समाधान करके मेरी व्याकुलता दूर करें।”

भगवान विष्णु बोले - “नारद! प्रत्यक्ष रूप से तो यह पृथ्वी ही सबसे बड़ी दीखती है, पर वह भी समुद्र से घिरी हुई है। अतएव वह भी बड़ी नहीं है। रही बात समुद्र की, सो उसे अपनी तपः शक्ति से एक बार अगस्त्य मुनि पी गये। अतः वह भी बड़ा कैसे हो सकता है। इससे तो अगस्त्य मुनि ही सबसे बड़े हुए। पर देखा जाता है कि अनन्त आकाश में एक सीमित सूचिका सदृश भाग में वे मात्र एक जुगनू की तरह चमक रहे हैं। विराट् आकाश के समक्ष तो उनका कुछ भी विस्तार नहीं है। इससे वे भी बड़े नहीं हो सकते। उनसे तो असंख्यों गुना अधिक बड़ा आकाश है। पर एक बार तो वामनावतार ने समस्त आकाश को केवल एक ही पग में नाप लिया था। अतः आकाश की महानता भी संदिग्ध सिद्ध होती है। उसकी तुलना में तो वामनावतार की सामर्थ्य अधिक जान पड़ती है। परन्तु उनका अंगुष्ठ मात्र स्वरूप हर मनुष्य के अन्तःकरण में आत्मा के रूप में विद्यमान हैं। जिसमें स्वयं ईश्वरीय सत्ता बीज रूप में मौजूद है, उससे बढ़कर महान् और कौन हो सकता है? उस बीच को विकसित करके आत्मा परमात्मा की स्थिति में पहुँच सकती है। उन विशेषताओं से सुसम्पन्न बन सकती है जो परम सत्ता में है। अस्तु है नारद! मनुष्य इस सृष्टि में सबसे महान है।

देवर्षि नारद को यथार्थता का बोध हुआ, व्यग्रता समाप्त हुई। जो ज्ञान उपलब्ध हुआ उसे भू-लोक वासियों को हृदयंगम कराने के लिए वे तुरन्त चल पड़े।


Quotation

योगस्य प्रथमं द्वारं वांग् निरोधोऽपरिग्रहः। निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता।।

योग-साधना में प्रवृत्त लोगों के लिए प्राथमिक स्तर पर वाणी पर संयम, धन का अनावश्यक संग्रह न करना, भौतिक साधनों की (आर्थिक मात्रा में) आशा छोड़ना, कामनाओं का त्याग करना और नित्य एकान्त में रहना- अपेक्षित होता है।


“यज्ञ” भारतीय दर्शन का इष्ट आराध्य

अध्यात्म विज्ञान के तत्व दर्शन एवं क्रिया प्रयोजन के दोनों ही पक्ष यज्ञ विधा से सम्बन्धित हैं। कठोपनिषद् में यम नचिकेता संवाद में जिन पंच प्राणाग्नियों का विवेचन हुआ है वे अग्निहोत्र से सर्वथा भिन्न प्राण परिष्कार की चिंतनपरक दिशा धाराएँ हैं। मीमाँसा, सूत्र-ग्रन्थ, ब्राह्मण एवं आरण्यकों में ‘यज्ञ’ शब्द यजन कृत्य के साथ सम्बद्ध है। जीवन यज्ञ का तात्पर्य है। चिन्तन और चरित्र को पवित्र एवं प्रखर बनाना। अग्निहोत्रों का तात्पर्य ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करना है जो न केवल शरीर को ओजस्, मन को तेजस् आत्मा को वर्चस् दे सके वरन् इस प्रकृति ब्रह्माण्ड में भी अनुकूलताओं का अनुपात बढ़ा सके।

यज्ञ में अग्नि का प्रयोग होता है इस परम्परा में शास्त्रकारों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस ब्रह्माण्ड में अग्नि के अनेक स्वरूप हैं। वे सभी अपने-अपने प्रयोजन के लिए समर्थ शक्तिमान हैं। किन्तु ‘यज्ञाग्नि’ उनमें विशिष्ट है। वह जलनशील होते हुए भी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न होती है और देव संज्ञा में गिनी जाती है। यजन पूजन उसी का होता है और वही याजक की पवित्रता प्रखरता का संवर्धन करती हुई अभीष्ट सत्परिणाम प्रदान करती है।

अग्नि देव का भारतीय देव मण्डल के प्राचीनतम सदस्य के रूप में वैदिक संहिताओं और ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में महत्वपूर्ण स्थान है। अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप जाने जाते हैं- (1) व्योम में सूर्य, (2) अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत और (3) पृथ्वी पर साधारण अग्नि रूप।

ऋग्वेद में सबसे अधिक सूक्त अग्नि की स्तुति में ही अर्पित किए गए हैं। अग्नि के आदिम रूप संसार के प्रायः सभी धर्मों में पाए जाते हैं। वह ‘गृहपति’ है और परिवार के सभी सदस्यों से उसका स्नेहपूर्ण घनिष्ठ सम्बन्ध है। (ऋ. 2. 1. 9; 7. 15. 12; 1. 1. 9; 4. 1. 9)। वह अन्धकार, निशाचर, जादू-टोना, राक्षस और रोगों को दूर करने वाला है (ऋ. 3. 5. 1; 1. 64. 5; 8. 43. 32; 10. 88. 2)।

अग्नि का यज्ञीय स्वरूप मानव सभ्यता के विकास का लम्बा चरण है। परिपाक और शक्ति-निर्माण की कल्पना इसमें निहित है। यज्ञीय अग्नि वेदिका में निवास करती है (ऋ. 1.140.1)। वह समिधा, सोम और धृत से शक्तिमान् होता है। (ऋ. 3. 5. 10; 1. 64. 14); वह मानवों और देवों के बीच मध्यस्थ और सन्देश वाहक है (ऋ. वे. 1, 26. 9; 1. 94. 3; 1. 59. 3; 1. 59. 1; 7. 2. 1; 1., 58. 1; 7. 2. 5; 1. 27. 4; 3. 1. 17; 10. 2. 1; 1. 12. 4 आदि)। अग्नि की दिव्य उत्पत्ति का वर्णन भी वेदों में विस्तार से पाया जाता है। (ऋ. 3. 9. 5; 6. 8. 4)। अग्नि दिव्य पुरोहित है (ऋ. 2. 1. 2; 1. 1. 1; 1. 94. 6)। वह देवताओं का पौरोहित्य करता है। वह यज्ञों का राजा है (राजा त्वमध्वराणाम्; ऋ. वे. 3. 1. 18; 7. 11. 4; 2. 8. 3; 8. 43. 24 आदि।

नैतिक तत्वों से भी अग्नि का अभिन्न सम्बन्ध है। अग्नि सर्वदर्शी है। उनकी 100 अथवा 1000 आंखें हैं जिनसे वह मनुष्य के सभी कर्मों को देखता है (ऋ. 10. 79. 5)। उसके गुप्तचर हैं। वह मनुष्य के गुप्त जीवन को भी जानता है। वह ऋत का संरक्षक है। (ऋ. 10. 8. 5)। अग्नि पापों को देखता और पापियों को दण्ड देता है। (ऋ. 4. 3. 5-8; 5. 4-5)। वह पाप को भी क्षमा करता है। (ऋ. 7. 03. 7)।

अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वह मन्त्र, घी (बुद्धि) और ब्रह्म का उत्पादक है। इस प्रकार का अभेद सूक्ष्मतम तत्व से दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि के जिस रूप का वर्णन है उससे विश्व व्यवस्था के वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष पर काफी प्रकाश पड़ता है।

वेदों को भारतीय तत्वज्ञान का उद्गम स्रोत माना गया है। उनमें श्रद्धा, निष्ठा और प्रज्ञा के तीनों दिव्य तत्वों की गरिमा तथा उपलब्ध करने की प्रक्रिया समझाई गई है। वेद त्रयी ही- त्रिपदा गायत्री है। इन्हीं के प्रतिपादन सत्-चित आनन्द, सत्य, शिव, सुन्दर एवं ज्ञान भक्ति कर्म कहलाते हैं। यह वेद ज्ञान त्रिविधि होते हुए भी त्रिवेदी संगम की तरह एक ही केन्द्र पर केन्द्रित होता है और वह है- यज्ञ। संक्षेप में वेदों का विस्तृत विवेचन विस्तार ‘यज्ञ विद्या’ को समझने समझाने के लिए हुआ है। ऋग्वेद प्रथम वेद है उसके प्रथम मन्त्र में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी है और उसके ऋत्वजों को देव कहते हुए रत्न राशि में परिपूर्ण होने वाले सौभाग्यशाली बताया है। स्पष्ट है कि यज्ञ ही वेद ज्ञान का इष्ट आराध्य है।

‘विद् ज्ञाने’ धातु निष्पन्न ‘वेद’ शब्द का तात्पर्य ‘ज्ञान’ के भाण्डागार से होता है। वेदों में जिस ‘ज्ञान’ का प्रतिपादन है, उसका प्रमुख माध्यम ‘यज्ञ’ है। ‘यज्ञ’ के प्रयोजन से ही वैदिक ज्ञान आविर्भूत हुआ है, दूसरे शब्दों में हम यों कह सकते हैं कि वेद का ज्ञान पक्ष यज्ञों में ओत-प्रोत है।

वैदिक ज्ञान का जो प्रतिनिधित्व ‘यज्ञ’ करता है, उसका सार संक्षेप इस शब्द में ही समाविष्ट है। ‘यज्’ धातु से निष्पन्न ‘यज्ञ’ शब्द के तीन अर्थ होते हैं -

1.देव-पूजा, 2. संगतिकरण और 3. दान।

अपने से बड़ों के प्रति सम्मान की भावना रखना- ‘देवपूजन’ कहलाता है क्योंकि अपने से बड़े व्यक्ति देव तुल्य होते हैं। अपने से बराबर के व्यक्ति मित्र तुल्य होते हैं उनसे संगति करना- उनसे मित्रवत् व्यवहार करना भी ‘यज्ञ’ कहा जायेगा। साथ ही अपने से छोटों को कुछ देना भी ‘यज्ञ’ है। छोटे कुछ न कुछ पाने के अधिकारी होते हैं, उनके प्रति दान देते रहने की भावना यज्ञ कही जायेगी। अन्य कर्मों की तुलना में यज्ञ कर्म की श्रेष्ठता इस आधार पर प्रतिपादित हुई है। शतपथ, ब्राह्मण में कहा गया है-

‘यज्ञो वे श्रेष्ठतमं कर्म।’ (शतपथ. 1। 7।45)

अर्थात्- ‘यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है।’ दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जितने भी श्रेष्ठतम कर्म हैं, वे सब ‘यज्ञ’ ही हैं।

वेदों में जो कुछ कहा गया है उसे संक्षेप में ‘श्रेष्ठ’ का प्रतिपादन कह सकते हैं। यही यज्ञ का तत्वज्ञान भी है। जीवन यज्ञ एवं दिव्य ऊर्जा उत्पादन के दोनों ही प्रकरण इसी परिधि में आते हैं।

शास्त्रों में वर्णन आता है-

वेद्यर्थ पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थ तथैव च। इहं मार्थमथ यूपार्थ बह्मा चक्रे वनस्पतिम्॥ -महा. अश्व अ. 92

अर्थात्- यज्ञ की वेदी निर्माणार्थ तथा सभी सामग्री धारण करने के लिए पृथ्वी की रचना की गयी है तथा समिधा और यूप के लिए वनस्पतियों को पैदा किया गया है।

इदं तु सकलं द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये। यज्ञार्थ विद्धि तत् सष्टं लोकानां हित काम्यया॥ -महा. अनु. पर्व अध्याय 145

अर्थात्- यह जो सम्पूर्ण द्रव्य स्वर्ग लोक या पृथ्वी में दिखाई पड़ रहा है, उसको लोगों की भलाई के लिए यज्ञ निमित्त रचा गया समझो।

संक्षेप में ज्ञान सम्पदा और कौशल एवं पदार्थ सम्पदा का श्रेष्ठतम उपयोग यज्ञ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ही भगवान ने किया ऐसा समझा जाना चाहिए। भारतीय तत्वज्ञान आचार शास्त्र एवं क्रिया कलाप का केन्द्र बिन्दु ‘यज्ञ’ को ही माना गया है।


Quotation

छन्दः शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च। शास्त्रं ज्योतिर्निरुक्तं चाप्याग्नि होत्र कृते कृतम्॥

अर्थात्- छन्द शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष और निरुक्त की संरचना अग्निहोत्र के लिए ही हुई है।


शक्ति की अधिष्ठात्री - त्रिपदा गायत्री

संसार के समस्त दुःखों के तीन प्रधान कारण हैं- (1) अज्ञान (2) अभाव (3) अशक्ति। सत्, रज, तम की त्रिविधि प्रकृति से मनुष्य का निर्माण हुआ है। वस्तुतः सत्ता दो की है। सत और तम की। रज की उत्पत्ति तो दोनों के सम्मिश्रण से होती है। दुःखों के कारणों में भी प्रधान दो ही हैं- अज्ञान और अशक्ति। अभाव तो उनकी परिणति है। गायत्री की तीन शक्ति धाराएँ हैं- ह्रीं, श्रीं और क्लीं। ह्रीं सद्ज्ञान की, श्रीं वैभव की और क्लीं शक्ति की- बल की प्रतीक है।

सत्-रज-तम से बनी काया को आवश्यकता तीनों ही शक्ति धाराओं की है। इनमें किसी का भी महत्व कम नहीं है। तीनों का सन्तुलन आवश्यक है। जीवन निर्वाह के लिए जितना महत्व ज्ञान का है उतना ही साधनों एवं शक्ति का। एक भी पक्ष को छोड़ा नहीं जा सकता। गायत्री महामन्त्र में तीनों शक्ति धाराओं का समान रूप से समावेश है।

ह्रीं को सत् या सरस्वती कहते हैं। ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में माँ सरस्वती की अभ्यर्थना उपासना भारतीय संस्कृति में सदियों से होती चली आ रही है। तत्वेत्ता ऋषि इस तथ्य से अवगत थे कि सद्ज्ञान के बिना मनुष्य का कल्याण सम्भव नहीं। इसीलिए उन्होंने गायत्री मन्त्र का आश्रय लिया। सद्ज्ञान की ओर ले चलने वाला सर्व समर्थ मन्त्र घोषित किया। यह ऋषियों की परम्परा रही है कि ज्ञान एवं शक्ति धाराओं को उत्पन्न करने वाली दैवी शक्तियों को ‘माँ’ के रूप में विभूषित किया जाता है। तत्वज्ञानियों की शृंखला में आने वाले प्रत्येक महामानव ने गायत्री के ह्रीं सत् शक्ति की उपासना द्वारा असाधारण सामर्थ्य प्राप्त की है। चाहे वह रामकृष्ण परमहंस हों अथवा योगीराज अरविन्द। महर्षि दयानन्द हों अथवा महर्षि रमण। विवेकानन्द से लेकर स्वामी रामतीर्थ तक सभी के ऊपर माँ सरस्वती का वरद्हस्त रहा है। ज्ञान सम्पदा का अनुग्रह आत्मज्ञान की प्राप्ति गायत्री महाशक्ति द्वारा ही सम्भव हो सकी है।

अन्यान्य सभी प्रकार की सम्पदाओं की अपेक्षा ज्ञान की महत्ता सर्वोपरि है। इसके अभाव में जीवन यों ही अस्त-व्यस्त बना रहता और मूल्यवान जीवन निरर्थक चला जाता है। अपनी गरिमा एवं लक्ष्य का बोध न रहने से ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं का सदुपयोग नहीं हो पाता। उपभोग की पशु-प्रवृत्ति के कारण सदा असन्तोष ही बना रहता है। अज्ञान के रहते मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह की संकीर्ण परिधि से बाहर नहीं निकल पाता। अपनी संकीर्ण प्रवृत्तियां ही उलटकर हमला करती और मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती हैं। वासना, तृष्णा एवं अहंता की पूर्ति के लिए असन्तुष्ट बना वह वस्तुओं के पीछे पागल के समान भागता है।

अज्ञान ही समस्त दुःखों की जननी है जिसके रहते मनुष्य सम्पन्नता का भी लाभ नहीं उठा सकता। सुख तो दूर रहा मिली सम्पदा दुःखदायी बोझ के तुल्य सिद्ध होती है। इस सत्य को वर्तमान में सर्वत्र देखा जा सकता है। सम्पन्नता साधनों की दृष्टि से आज का मनुष्य भूतकाल की तुलना में बहुत आगे है। सारा संसार ही सिमट कर एक छोटे घेरे में आ गया है, यह साधनों का चमत्कार है। बुद्धि का भी असामान्य विकास हुआ है। किन्तु अन्तः में निवास करने वाले ‘धी’ तत्व में भारी कमी आयी है प्रज्ञा का स्थान बुद्धि की जड़ता ने ले लिया है। फलतः बुद्धि भी जड़वाद की ही पक्षधर बनती चली जा रही है। समर्थन जब जड़ को मिला है तो चेतना की गरिमा की बात क्यों कर समझ में आये। साधनों के संग्रह की आपाधापी में विश्व मानस ने चेतना की महत्ता को लगभग भुला दिया है।

लोकमान्य तिलक कहते हैं- “जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में मानव जाति जकड़ी हुई है उसका अन्त राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से न हो जायेगा। उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए जिससे सत् और असत् का विवेक जागे। कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले गायत्री मन्त्र में यही भावना विद्यमान है। इस तथ्य को जानते हुए योगीराज, ब्रह्मवेत्ता, अध्यात्मवादी, तत्वदर्शी जीवन साधक, दार्शनिक, परमार्थी व्यक्ति प्रकारान्तर से ह्रीं तत्व की- सरस्वती की ही आराधना-उपासना करते रहे हैं। इन सबका विभिन्न माध्यमों से एकमात्र लक्ष्य है- मनुष्य को असत् से सत् की ओर ले चलना।

गायत्री उपासना से आत्मिक आवश्यकताओं की ही मात्र पूर्ति नहीं होती। अपितु भौतिक साधनों की भी आपूर्ति होती है। गायत्री की धीं शक्ति धारा द्वारा भौतिक साधन संवर्धन की सुसम्पदा अर्जन की विवेक बुद्धि प्राप्त होती है। यह स्वाभाविक है कि प्रगति के प्रयास तो भौतिक स्तर पर ही करने पड़ेंगे। पर उन पर विवेक का अंकुश होने से भटकाव की गुँजाइश नहीं रहती। ऐसी योग्यता, प्रतिभा सृजनात्मक दिशा में ही नियोजित होती है। व्यक्ति एवं समाज के सामूहिक उत्थान की ही बात रुचती है। गायत्री की श्रीं लक्ष्मी शक्ति धारा विभूतियों की अधिष्ठात्री है। श्रीं तत्व के उपासक को अपना ही स्वार्थ अभीष्ट नहीं होता वरन् वह सम्पूर्ण समाज की प्रगति की बात सोचता है। सामूहिक विकास में ही उसे अपना सच्चा स्वार्थ दीखता है। उसके सारे प्रयास उसी दिशा में लगे रहते हैं। बुद्धिवादी, धर्म प्रचारक सुधारवादी, समाज सेवी श्रीं शक्ति की सुव्यवस्था में लगकर लक्ष्मी के उपार्जन में सफल हो पाते हैं। गायत्री की श्रीं शक्तिधारा में व्यक्ति एवं समाज के भौतिक विकास के सभी समाधान विद्यमान हैं। वैभव की वृद्धि ही नहीं उनका सदुपयोग सम्पूर्ण मानव जाति के लिए किस प्रकार किया जा सकता है, वह विवेक बुद्धि भी गायत्री उपासना से ही मिलती है। यही कारण है कि सच्चा गायत्री उपासक साधन सम्पन्न होते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है। अपने लिए कम से कम साधनों का उपयोग करता है। व्यापक स्तर पर विद्यमान अभाव, दरिद्रता के निवारण में ही उसे शाश्वत आनन्द की अनुभूति होती है।

श्रीं तत्व की अवहेलना करने वाला व्यक्ति संकीर्ण बनता है। व्यक्तिगत उपभोग के लिए ही वह सारे ताने-बाने बुनता है। समाज से उपार्जित सम्पत्ति का वह संग्रह तो करता है, पर उसका उपयोग स्वयं करता है। इसके विपरीत श्रीं तत्व का उपासक लक्ष्मी का सच्चा साधक सम्पत्ति का मोह नहीं रखता। उसे उपभोग में नहीं सम्पत्ति के सदुपयोग में आनन्द आता है। समाज की उन्नति के लिए वह अपनी सम्पत्ति सहर्ष समर्पित करता है।

गायत्री का ‘क्लीं’ तत्व भौतिक सामर्थ्य का प्रतीक है। उसे ही गायत्री की शक्ति धाराओं में ‘काली’ के रूप में अलंकृत किया गया है। ज्ञान एवं साधन हो किन्तु शक्ति न हो उनका उपयोग नहीं बन पड़ता। शक्ति रहित व्यक्ति के पास साधन भी अधिक दिन तक टिके नहीं रह सकते। कमजोर अशक्त न तो अपनी सुरक्षा रख सकता है न ही अपनी सम्पदा का। शक्ति के अभाव में अर्जित ज्ञान का भी लाभ नहीं मिल पाता। इसी कारण ऋषियों ने ज्ञान सम्पादन ही नहीं शक्ति संचय पर भी जोर दिया है।

मानवी अन्तराल में ऐसे शक्ति केन्द्र छिपे पड़े हैं जिनको जागृत किया जा सके तो मनुष्य शक्ति का पुँज बन सकता है। वे सुषुप्तावस्था में पड़े हैं। ‘क्लीं’ की महाकाली की उपासना द्वारा इन शक्ति केन्द्रों को जागृत किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण इस क्लीं शक्ति की आराधना की ही फलश्रुति है। अन्तः जागरण की इस प्रक्रिया से इतनी सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है जितनी कि परमाणु द्वारा भी नहीं हो सकी है।

अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति के निवारण हेतु त्रिपदा गायत्री की तीन शक्ति धाराओं ह्रीं, श्रीं, और क्लीं की उपासना की जानी चाहिए। ज्ञान, सम्पदा एवं शक्ति के तीनों ही अनुदान आद्य शक्ति गायत्री की ही अनुकम्पा से मिलते हैं। इस महाशक्ति का अंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ा जा सके तो अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति की स्थिति ही समाप्त हो जाय, ज्ञान, वैभव एवं सामर्थ्य की त्रिवेणी साधक में फूट पड़े।


कुंडलिनी का निवास, स्वरूप और प्रतिफल

बहुमूल्य सम्पदाएँ पृथ्वी की गहराई में दबी पड़ी हैं। खनिज, कोयला, लोहा, सोना को प्राप्त करने के लिए भूमि को गहरा खोदना पड़ता है। इतने श्रम के उपरान्त ये वस्तुएँ प्राप्त हो पाती हैं। मोती सामान्य नदी-नालों नहीं समुद्र की गहराई में पाया जाता है। दुस्साहसी उन्हें करतलगत करने के लिए जीवन की बाजी लगा देते हैं। उथले पानी का पर्यवेक्षण करने वाले मछुआरे तो मछलियाँ ही प्राप्त कर पाते हैं। समुद्र के किनारे खड़े रहने वालों के हाथ पत्थर और बालू ही आता है। कीमती वस्तुओं की उपलब्धि के लिए अभीष्ट मात्रा में पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है और उसी अनुपात में साहस एवं मनोयोग की भी।

प्रकृति की व्यवस्था भी कुछ ऐसी है कि बड़ी सम्पदाएँ पुरुषार्थी को ही मिलें। यही कारण है कि उसने भौतिक सम्पदाओं को पृथ्वी के- समुद्र के धरातल में छिपाकर रखा है। ताकि पुरुषार्थ से हीन, आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति उन्हीं न प्राप्त कर सके। मनुष्य शरीर को परमात्मा की सर्वोत्तम कृति माना गया है। सर्वोत्तम इन अर्थों में कि इसके विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं। काया के अन्तरंग में शक्ति के स्रोत छिपे पड़े हैं। उन्हें जगाया एवं उपयोग में लाया जा सके तो मनुष्य असाधारण सामर्थ्य का स्वामी बन सकता है। अन्तःशक्ति स्रोतों को जगाने के लिए भी असामान्य साहस जुटाना पड़ता है। कठोर साधना पुरुषार्थ का परिचय देना होता है।

सामान्यतया शरीर उतनी ही आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाता है जितनी कि जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। खाने-पीने, सोने, श्रम करने सम्पत्ति उत्पादन जैसे प्रयोजन ही पूरे होते हैं। शरीर सामर्थ्य की इतने में ही इतिश्री समझा ली जाती है। शरीर के अन्तराल में शक्ति के प्रचण्ड स्रोत भी हो सकते हैं इसका अनुमान भी नहीं हो पाता। जिन्हें होता भी है वे साधना के लिए इतना पुरुषार्थ साहस एवं धैर्य नहीं जुटा पाते। फलतः असीम शक्ति के लाभों से वंचित बने रहते हैं। पेट और प्रजनन तक में ही उनका जीवन समाप्त हो जाता है। जबकि साधना के लिए साहस जुटाने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल में प्रविष्ट करते हैं। इनका काम वैसा ही होता है जैसा कि एक वैज्ञानिक का धूल जैसे परमाणु कणों से परमाणविक ऊर्जा प्राप्त करना। फलतः शरीर के सूक्ष्म परतों में दबी शक्ति को करतलगत करके असीम शक्ति से सम्पन्न बन जाते हैं। साधक योगी इसी स्तर के होते हैं।

शरीर में अनेकों मर्म स्थान ऐसे हैं जिनका महत्व वैज्ञानिक दृष्टि से भी असाधारण है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी। विज्ञान को अभी इन केन्द्रों के सम्बन्ध में विशेष जानकारी तो नहीं मिल पायी है, पर उनका विश्वास है कि शरीर संस्थान के संचालन में उनकी विशेष भूमिका होनी चाहिए। अध्यात्म विज्ञानवेत्ता इन मर्मस्थलों की शक्ति से परिचित रहे हैं। उनके जागरण का उपाय विभिन्न योग ग्रन्थों में दिया गया है।

ऐसे मर्मस्थलों में मेरुदण्ड शरीर का प्रमुख स्थान है। यह शरीर की आधारशिला है। मेरुदण्ड छोटे-छोटे तैंतीस अस्थि खण्डों से मिलकर बना है। योगियों को प्रत्येक खण्डों में ऐसी विशेष शक्तियाँ परिलक्षित होती हैं जिनका सम्बन्ध दैवी शक्तियों से है। देवताओं में जिन शक्तियों का केन्द्र होता है वे शक्तियाँ भिन्न-भिन्न रूप में इन अस्थि खण्डों में पाई जाती हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया कि मेरुदण्ड तैंतीस देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, इन्द्र और प्रजापति इन तैतीसों की शक्तियाँ उसमें बीज रूप में उपस्थित रहती हैं। पुराणों में देवताओं का निवास स्थान सुमेरु पर्वत बताया गया है वह वस्तुतः मेरुदण्ड ही है। उसके तैंतीस गुटके, तैंतीस देवता हैं।

इस पोले मेरुदण्ड में शरीर विज्ञान के अनुसार अनेकों नाड़ियाँ हैं और वे विविध कार्यों में नियोजित रहती हैं आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार उनमें प्रमुख तीन नाड़ियाँ हैं। इड़ा पिंगला और सुषुम्ना। इन तीनों को मेरुदण्ड को चीरने पर प्रत्यक्ष आँखों से तो नहीं देखा जा सकता क्योंकि उनका अस्तित्व सूक्ष्म है और सूक्ष्म जगत से सम्बन्धित है। यह एक प्रकार का विद्युत प्रवाह है। जिस प्रकार बिजली से चलने वाले यन्त्रों में ऋण और धन, निगेटिव और पॉजिटिव धाराएँ दौड़ती हैं और इन दोनों का जहाँ मिलन होता है, वहीं शक्ति पैदा हो जाती है इसी प्रकार इड़ा को निगेटिव और पिंगला को पॉजिटिव कह सकते हैं। इड़ा को चन्द्र नाड़ी और पिंगला को सूर्य नाड़ी भी कहते हैं। दोनों के मिलने से जो तीसरी शक्ति पैदा होती है उसे सुषुम्ना कहते हैं। प्रयाग में गंगा और यमुना मिलती है। इस मिलन से एक तीसरी सूक्ष्म शक्तिधारा सरस्वती की विनिर्मित होती है। इन प्रकार दो नदियों के सम्मिलन से त्रिवेणी बन जाती है। मेरुदण्ड के अंतर्गत भी ऐसी अध्यात्मिक त्रिवेणी है। इड़ा पिंगला की दो धाराएँ मिलकर सुषुम्ना की सृष्टि करती हैं। इस प्रकार त्रिवर्ग बन जाता है।

यह त्रिवेणी ऊपर मस्तिष्क के मध्य केन्द्र से ब्रह्मरंध्र से सहस्रार कमल से सम्बन्धित और नीचे मेरुदंड का जहाँ नुकीला अन्त है वहाँ लिंग मूल और गुदा के बीच ‘सीवन’ स्थान के सीध में पहुँचकर रुक जाती है। यही त्रिवेणी का अन्त है। सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक और त्रिवर्ग है। इसके अंतर्गत भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित हैं। जिन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्म नाड़ी कहते हैं। ब्रह्म नाड़ी सब नाड़ियों का मर्मस्थल केन्द्र एवं शक्ति स्रोत है।

ब्रह्म नाड़ी ही मस्तिष्क के केन्द्र में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है। इसी कारण उस स्थान को सहस्र दल कमल कहते हैं। भगवान विष्णु की शय्या सहस्र फनों पर होने का अलंकार भी उस सहस्र दल कमल से ही लिया गया है। सहस्र दल सूक्ष्म लोकों- विश्व व्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है। यह मस्तिष्क का एरियल है जिसके द्वारा परमात्मा की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक से पकड़ा जाता है।

मेरुदण्ड के नीचे अन्तिम भाग में सुषुम्ना के भीतर रहने वाली ब्रह्म नाड़ी एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बंध जाती है। षट्कोण परमाणु को यौगिक ग्रन्थों में अलंकारिक भाषा में कूर्म कहा गया है। उसकी आकृति कछुए जैसी होती है। पृथ्वी कूर्म भगवान पर टिकी है। शेषनाग के फन पर अवलम्बित है। इस उक्ति का आधार ब्रह्मनाड़ी की वह आकृति है जिसमें वह इस कूर्म में लिपटकर बैठी हुई है और जीवन को धारण किए हुए है। यदि वह अपना आधार त्याग दे तो जीवन भूमि के चूर-चूर हो जाने में थोड़ी भी देरी न लगे।

कूर्म से ब्रह्म नाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलाकार होने के कारण ही उसका नाम कुण्डलिनी पड़ा। यह साढ़े तीन फेरे उस कूर्म में लगाये हुए है और मुँह नीचे की ओर है। कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति एवं उपयोगिता इतनी अधिक है जितनी कि बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिए परमाणु एक चमत्कार बना हुआ है। उसके तोड़ने की विधि प्राप्त हो जाने पर प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया है। अभी तो उसकी ऊर्जा के एक अंश का विध्वंसात्मक स्वरूप देखा गया है। रचनात्मक एवं शक्ति का एक बड़ा पक्ष अछूता है। यह तो जड़ जगत के एक नगण्य से परमाणु की शक्ति की बात हुई जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। फिर चैतन्य जगत का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की तुलना में अनन्त गुना शक्तिशाली है, कितना अद्भुत होगा यह कल्पना भी नहीं की जा सकती।

विज्ञान की शक्ति एवं उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। योग की उपलब्धियाँ हैं ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ। जिस प्रकार परमाणु की शोध में अनेकों वैज्ञानिक जुटे हैं उसी प्रकार पूर्वकाल के आध्यात्मिक विज्ञान वेत्ताओं, तत्वदर्शी ऋषियों ने मानव शरीर के अंतर्गत एक बीज परमाणु की अत्यधिक शोध की थी ओर उसकी असीम शक्ति से लाभ उठाया।

दो परमाणुओं को तोड़ने, मिलाने या स्थानान्तरित करने का सर्वोत्तम स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में होता है क्योंकि अन्य सभी स्थानों के चैतन्य परमाणु गोल और चिकने होते हैं पर कुण्डलिनी में यह मिथुन के रूप में लिपटा हुआ है। जिस प्रकार युरेनियम एवं प्लूटोनियम धातु के परमाणुओं का गुन्थन ऐसे टेढ़े-तिरछे ढंग से हुआ है कि उनका तोड़ा जाना अन्य पदार्थों के परमाणुओं की अपेक्षा अधिक सरल है उसी प्रकार कुण्डलिनी स्थिति स्फुल्लिंग परमाणुओं की गतिविधि का इच्छानुकूल संचालन अधिक सुगम है। अतएव पूर्वकाल के ऋषियों ने बड़ी तत्परता से कुण्डलिनी जागरण पर शोध की। शोध के परीक्षण एवं प्रयोग के उपरांत उन्होंने इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर ली जिसे चमत्कार समझा जाता है।

कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों का भण्डार-तिजोरी कहा गया है। बहुमूल्य रत्नों को तिजोरी में रखकर किसी गुप्त स्थान में रख दिया जाता है। उसमें मजबूत ताले लगा दिये जाते हैं जिससे कोई अनाधिकारी बाहरी व्यक्ति न प्राप्त कर सके। परमात्मा ने भी मनुष्य की अनन्त शक्तियों के भण्डार दिए हैं पर उन पर छह ताले लगा दिए हैं। इन्हें ही षट्चक्र कहते हैं। चक्रों के रूप में यह ताले इसलिए लगाये गये हैं कि कोई उन्हें कुपात्र न प्राप्त करले। कुण्डलिनी शक्ति पर लगे छह तालों- छह चक्रों को बेधना- खोलना पड़ता है। सामान्यतया कुण्डलिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में मूलाधार में नीचे की ओर मुँह किए बैठी रहती है। उसे जगाने के लिए सविता की प्राण शक्ति का आश्रय लेना होता है।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है। सविता की प्राण साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है। इस साधना पक्ष में लगभग उसी स्तर का मनोबल जुटाना एवं पुरुषार्थ करना होता है। जितना कि समुद्र से मोती निकाल लाने वाले गोताखोर। अंतर्निहित शक्ति स्रोतों को जागृत किया जा सके तो मनुष्य इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है। जिसे सामान्यतया सिद्ध और चमत्कार के नाम से जाना जाता है।


उपचार या परिष्कार

चरक के निदान में एक कथा आती है महर्षि चरक रचित उस महान ग्रन्थ के प्रणेता पुनर्वसु अपने शोध प्रयासों के लिए सघन वनों में परिभ्रमण कर रहे थे। साथ में थे उनके पट्ट शिष्य अग्निवेश।

चलते चलाते पुनर्वसु ने अन्तरिक्ष की ओर देखा और किसी अप्रत्याशित आशंका से स्तब्ध होकर लम्बी सांसें भरने लगे। खड़े ऐसे थे जैसे काठ मार गया हो। आंखें ऐसी फट रही थीं मानो वे किसी विभीषिका का दर्शन कर रहे हों।

शिष्य अग्निवेश गुरुदेव के इस अकस्मात परिवर्तन को देखकर चिन्तातुर हो चला। समाधान के लिए उसने साहस बटोर कर डरते-काँपते प्रश्न किया- देव! क्या विग्रह उत्पन्न हुआ? क्या असमंजस सामने आया?

पुनर्वसु ने लम्बी साँस खींचते हुए कहा- “मैं तो जन साधारण को स्वस्थ बनाने की बात सोचता था, पर होता इससे ठीक विपरीत जा रहा है- देखता हूँ सर्वनाश की घटाएँ घुमड़ती चली आ रही हैं। मनुष्य भयंकर विपत्ति में फंसेंगे। पाँचों तत्व देवता कुपित होंगे और विनाश की वर्षा करेंगे। प्रकृति विपर्यय से अनेकों संकट खड़े होंगे। औषधियाँ अपना प्रभाव छोड़ देंगी और जिस मनुष्य के लिए हम इतना प्रयत्न पुरुषार्थ कर रहे हैं, वह स्वयं आत्मघात करेगा। यह भवितव्यता मेरे अन्तराल को विदीर्ण किये दे रही है।”

शिष्य अवाक् रह गया। उसने फिर हिम्मत की और विनयावनत होकर पूछा- ‘देव! आपने इतना महान ग्रन्थ रच दिया। इतना शोध प्रयत्न करके जनसाधारण के हाथ में अमृत कलश थमा दिया। फिर लोग क्यों रोगी पड़ेंगे? क्यों विपत्ति में फँसेंगे और जो फंसेंगे वे क्यों न उबरेंगे?

पुनर्वसु की उद्विग्नता में तनिक भी कमी नहीं आई। वे बोले- “जब मन ही अधर्मरत होकर विपत्तियों को आमन्त्रित करेगा तो बेचारा उपहार किस काम आयेगा? औषधियाँ तो व्याधियों की रोकथाम भर करती हैं। मन के पतन पर उनका नियन्त्रण है। कुमार्ग पर चल पड़ने वाले लोगों को आत्महत्या से रोकने में उपचारों से क्या काम बनेगा?

अग्निवेश का समाधान फिर भी न हुआ। उनने तीसरी बार पूछा- देव! मनुष्यों का अधर्माचरणों के लिए झुकाव किस कारण होता है और वे उसकी हानि को न समझते हुए क्यों उसे अपनाने लगते हैं?

ऋषि बोले- “तात! बुद्धि विपर्यय मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। बुद्धि के भ्रमित और पतित होने पर सब उलटा दीखता है। हानि में लाभ और लाभ में हानि देखने की विपन्नता उपज पड़ती है और जो करने योग्य है उसका परित्याग करके न करने योग्य को करने की प्रवृत्ति उभरती है। फलतः न केवल शारीरिक व्याधियाँ बढ़ती हैं वरन् हर दिशा से विपत्तियाँ बरसती हैं। जब विनाश काल आता है तो दुर्बुद्धि का प्रकोप ही तूफान की तरह उतरता है और जो कुछ श्रेष्ठ है उसे उजाड़ कर रख देता है। अगले दिनों मुझे ऐसी ही विपत्ति की सम्भावना आकाश में घुमड़ती दीखती है।”

शिष्य ने तथ्य को समझा और निराशाग्रस्त होकर भूमि पर लोट गया। बोला- हाँ हन्त! क्या हम लोगों को मनुष्य को सुखी देखने की आकाँक्षा दिवास्वप्न होकर ही रह जायेगी?

पुनर्वसु बहुत समय तक हतप्रभ न रहे। अपना होश सम्भाला और शिष्य को सहारा देकर उठाया। बोले! साँस रहने तक हमें निराश न होना चाहिए और न प्रयत्न छोड़ना चाहिए। सम्भावना को पराक्रम के सहारे बदला जा सकता है। सो हमें अब भवितव्यता को ध्यान में रखते हुए पराक्रम का नया निर्धारण करना चाहिए।

आशा जगी। अनुरूप निर्धारण की आकाँक्षा उठी दोनों परस्पर विचार विनिमय करते रहे। अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उस महाग्रन्थ के जितने प्रकरण लिख गये, उतने से ही सन्तोष करना और विराम देना चाहिए। अब हमें अपना शोध प्रयोग उस प्रयोग हेतु नियोजित करना चाहिए जिससे शारीरिक व्याधियों के निवारण हेतु मानसिक आधियों का समाधान अधिक आवश्यक ओर प्राथमिकता देने योग्य है।


अपनों से अपनी बात - शान्ति कुँज में सपरिवार ठहरने की व्यवस्था

अब तक शान्ति कुँज में मात्र साधकों के प्रशिक्षण के लायक ही स्थान था। इसलिए पर्यटकों को अन्यत्र ठहरने के लिए कहा ता रहा है। बाल बच्चों समते आने पर भी प्रतिबन्ध था। इस रोकथाम के दो कारण थे एक तो स्थान की कमी। दूसरे अनगढ़ लोगों द्वारा आश्रम की छावनी एवं अस्पताल जैसी अनुशासित सुव्यवस्था को अस्त व्यस्त करके रख देना। धर्मशाला पर बरात जैसी स्वेच्छाचारिता यहाँ भी बरती जाय तो समझना चाहिए इन ठहरने वाले भक्तजनों ने यहाँ का स्वरूप ही विकृत करके रख दिया और इतने प्रयत्नपूर्वक बनी हुई सुव्यवस्था का अन्त ही हो गया।

उपरोक्त दोनों ही कारण अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण थे। इसलिए आगन्तुकों इच्छुकों की भावना को ठेस लगाने की बात समझते हुए भी नाराजी का जोखिम उठाते हुए भी यह रीति नीति अपनाई जाती रही है कि पर्यटकों को अन्यत्र ठहरने के लिए कहा जाय। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए भी अपनी विवशता को भी सामने रखा जाय और शान्ति कुँज मात्रा साधना शिक्षा के निमित आने वालों के लिए ही सुरक्षित रखा जाय।

इस वर्ष सें इस अनुबन्ध की कठोरता में शिथिलता की जा रही है और 20 लाख प्रज्ञा परिजनों की श्रद्धा भावना का ध्यान रखते हुए यह सोचा गया है कि जिन्हें मात्र पर्यटन का मनोरंजन ही अभीष्ट नहीं है, जो वस्तुतः शान्ति कुँज के प्रति आत्मीयता रखने हैं और हरिद्वार आने पर वहीं ठहरने में लाभ आनन्द अनुभव करते हैं। थोड़े समय की निकटता में भी हित साधन देखते हैं और इस वातावरण के साथ जुड़ने की बात को भी महत्व देते हैं ऐसे लोगों के ठहरने की भी व्यवस्था बनाई जाय और बाल बच्चों समेत आने की छुट दी जाय। इस नये निर्धारण के अंतर्गत उन परिजनों को परिवार समेत आने ठहरने की सुविधा दी जाया करेगी जो यहाँ के कार्यक्रम और वातावरण के संपर्क में आने तथा लाभान्वित होने के लिए इच्छुक होंगे। उन लोगों पर तो अभी भी प्रतिबन्ध लागू है और भविष्य में भी लागू रहेगा जो बसों में अनगढ़ यात्री भर कर लाते हैं। जिन्हें अपनी सुविधा ही सब कुछ है जिसे दूसरे के अनुशासन और स्तर में कोई सम्बन्ध नहीं। ऐसों को ठहराने के लिए वे ही तैयार हो सकते हैं जिनकी न अपनी कोई व्यवस्था है और न गरिमा। तीर्थों में आमतौर से इसी स्तर की अनगढ़ भीड़ जहाँ तहाँ मारी7मारी फिरती देखी जाती है। वैसा माहौल तो शान्ति कुँज में कभी भी किसी भी कारण बनने नहीं दिया जाना है।

फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि आगन्तुकों में सभी बेसिलसिले के हाते हैं और पैसा बटोरने, धक्के खाने और गन्दगी फैलाने के अतिरिक्त और कुछ करते ही नहीं। तीर्थ सेवन की पुरातन धर्म परम्परा का पुनः जीवन किया गया है। तो इसका स्वाभाविक परिणात यह भी होना चाहिए कि शान्तिकुँज में तीर्थ सेवन विधि के साथ-साथ लोग समीपवर्ती तीर्थों के दर्शन भ्रमण का भी कार्यक्रम बनाकर चलें। इन दिनों सर्वत्र भयानक भीड़े है और तथाकथित तीर्थों में न धार्मिक वातावरण रहा है न शान्तिदायक सुविधाजनक परिस्थितियाँ। मात्र उत्तराखण्ड ही इसका अपवाद है जहाँ पुरातन तीर्थ प्रेरणा की कुछ झलक मिल सकती है। ऐसा दशा में यदि सामान्य जनों की इच्छा शान्ति कुँज में तीर्थ सेवन के साथ-साथ पर्यटन की इच्छा शान्ति कुँज में तीर्थ सेवन के साथ-साथ पर्यटन दर्शन की भी हो तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। अपना परिवार 20 लाख सदस्यों का है। उनमें से हर साल हजारों ऐसे होते हैं जो शान्ति कुँज के अतिधनिष्ठ हैं साथ ही किराये से घर परिवार की दर्शन झाँकी कराने के उद्देश्य से निकलते हैं मात्र यही वर्ग ऐसा है जिसे शान्ति कुँज में ठहरने और तीर्थ सेवन के साथ-साथ दर्शन झाँकी का सुयोग बिठाने की भी व्यवस्था बनाई जा रही है।

ऐसे लोगों मात्र अपने परिवार को ही लेकर चलेंगे। बसों में आमतौर से अनगढ़ भीड़ होती है। उनमें 80 प्रतिशत ऐसे लोग होते हैं जो मिशन के स्वरूप तथा अनुशासन से तनिक भी परिचित नहीं होते। ऐसे लोगों के लिए नहीं। मात्र ऐसे लोगों के लिए प्रबन्ध किया जा रहा है जो न केवल स्वयं मिशन के घनिष्ठ हैं वरन् उनका परिवार भी उससे भली भाँति परिचित है। अब वे परिवार समेत आ सकेंगे और उपयुक्त समय तक ठहर भी सकेंगे। ऐसे लोगा मध्याह्न काल तक जप, हवन, प्रवचन और भोजन से निपट लिया करेंगे और मध्याह्न से सायंकाल तक परिभ्रमण के लिए निकल जाया करेंगे। इस प्रकार प्राय दिन दिन रुकने से शान्तिपूर्वक तीर्थ यात्रा भी सम्पन्न हो जाया करेगी और इस अवधि में थोड़ा बहुत साधना उपासना का संपर्क श्रवण का सुयोग भी व्यवस्थापूर्वक वन जाया करेगा। घोड़े पर सवार भगदड़ मचाने वालों के लिए तो ऐसा कुछ बन पड़ना सम्भव नहीं है। बसों में आये यात्री मात्र 12 से 3 की निर्धारित अवधि में ही भेंट कर सकेंगे चाहे जब नहीं।

प्रज्ञा परिजनों के लिए अब धीरे-धीरे शान्तिकुँज निजी अध्ययन लोक की तरह गुरुद्वारो की तरह बनता जा रहा है। अब हजारों परिजन अपना जन्म दिन विवाह दिन मनाने शान्ति कुँज आते हैं। बच्चों के नामकरण अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत दीक्षा भी यहीं कराने में रुचि रहती हैं लोग सोचते हैं जब यह संस्कार कराने ही है तो लकीर क्यों पीटी जाय। संस्कारवान वातावरण में संस्कारवान हाथों से ही शास्त्रों की विधि से उन्हें सम्पन्न क्यों न कराया जायं यह सुविधा शान्ति कुँज में प्रत्यक्ष है। इसलिए इन प्रयोजनों को लेकर तथा साथ ही दर्शन झाँकी करने कराने का भी लाभ लेने के उद्देश्य से आने वालों की भीड़ बढ़ती ही जाती है। ऐसे उद्देश्यपूर्ण लोगों के दो तीन दिन ठहरने की व्यवथा बनाना अब आवश्यक हो गया था उन्हें धर्मशाला से भाग देने सभी गधे घोड़ों को एक लाठी से हाँकना बहुत दिनों से अखर रहा था। अब इस वर्ग के लिए विधिवत् सुविधा बना दी गई। विशेषतया इसलिए कि इसमें अपनी तीर्थ सेवन कार्य पद्धति का विस्तार होता है और तीर्थ परम्परा के पुनर्जीवन वाला उद्देश्य आँशिक रूप से पूरा होता है।

दिवंगत पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण कराने लोग प्रायः हरिद्वार जैन तीर्थों में आते हैं। अस्थि विसर्जन के लिए भी। ऐसे लोगों के लिए श्राद्ध तर्पण की व्यवस्था भी यहाँ बना दी गई है। इससे मृतक भोज और कुपात्रों के हाथों श्रद्धा साधनों के जाने का विपर्यय भी नहीं होता विधिवत् सब कार्य भी सम्पन्न हो जाते हैं। यह व्यवस्था भी शान्ति कुँज में बना दी गई है।

अगले दिनों प्रज्ञा परिवार को बिना दहेज और बिना धूमधाम की अपने बच्चों की शादियाँ शान्ति कुँज में ही करनी पड़ेगी। इतना खर्च उठाना और उतना अपव्यय करना कम से कम शान्ति कुँज के विज्ञजनों के लिए तो किसी प्रकार शोभनीय न रहेगा। सोचा गया है कि कार्तिक पूर्णिमा से लेकर फागुन की पूर्णिमा के बीच सर्दी के दिनों शान्ति कुँज में गायत्री परिवार के बालक बालिकाओं के विवाह शान्ति कुँज में ही हुआ करे। दोनों पक्षों के दस दस से अधिक व्यक्ति न आयें। सब कार्य ऐसे वातावरण और विधान के साथ सम्पन्न हो जाया करें जिससे विवाह का उद्देश्य एवं भविष्य भी स्वर्णिम बने और अपव्यय से पिण्ड छूटना भी सम्भव हो सके। एक उपयोगी प्रचलन भी बढ़े चले।

उपरोक्त प्रयोजनों के लिए असंख्यों लोग बहुत समय से व्याकुल थे। पर वैसी व्यवस्था बन नहीं पाती थी। अब कुछ स्थान इन्हीं प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से बनाया गया है और उनमें आने बालों के लिए विशेष रूप से बनाया गया है और उनमें आने वालों के लिए तीन दिन के तीर्थ सत्र का भी प्रबन्ध किया गया है। जो आवेंगे वे इस स्वल्प अवधि में भी यह अनुभव करेंगे कि उनकी हरिद्वार यात्रा उद्देश्यपूर्ण भी रही और सफल सार्थक भी हुई।

इन आगन्तुकों के लिए ठहरने के अतिरिक्त भोजनालय का भी स्वतंत्र प्रबन्ध कर दिया गया है जिनमें बाजार भाव की तुलना मेंकही सस्ता और अच्छा भोजन उकनी माँग के अनुसार बनाकर दे दिया लाया करेगा।

बद्रीनाथ, गंगोत्री यात्रा के लिए कई जत्थे जाते रहते हैं। वे भी यदि चाहे तो एक रात आते जाते यहाँ ठहर सकते हैं। कारण कि इन दिनों धर्मशालाएँ ठसाठस भरी रहती है। उनमें भी होटलों जैसा किराया देना पड़ता है। फिर भी जगह नहीं मिलती। बाजार का भोजन महंगा भी है और अस्वास्थ्यकर भी। इन असुविधाओं से प्रज्ञ परिवारके परिजनों को बचाने के लिए उपरोक्त व्यवस्था की गई है। जिन्हें अब तक सदर निराश होना पड़ा है। वे अब शान्ति कुँज के स्वर्णिम वातावरण में कुछ समय ठहरकर तीर्थ पुरातन स्वरूप की झाँकी करते हुए सन्तोष लाभ ले सकेंगे। जिन्हें आना हो पूर्व स्वीकृति तो उन्हें भी लेनी पड़ेगी।


शान्ति कुँज के प्रशिक्षण - साधना सत्रों का अभिनव स्वरूप

नि प्रज्ञा पुत्रों को आत्मा - कल्याण और लोक-कल्याण की दुहरी साधना सम्पन्न करती है, उनके लिए शान्तिकुँज में एक-एक महीने के युग श्ल्पी सत्र हर महीने चलते रहे हैं जब डाक्टर, इंजीनियर प्रोफेसर, कलाकार, शिल्पी अपने-अपने विषयों का लम्बे समय तक प्रशिक्षण प्राप्त करने और प्रवीण होने पर काम में हाथ डालते हैं तो युग सृजन जैसे असाधारण कार्य के लिए शिक्षण प्राप्त न करना पड़े ऐसा हो नहीं सकता। मोटर कितनी ही बढ़िया क्यों न हो, रास्ता कितना ही निरापद क्यों न हो पर ड्राइविंग का अभ्यास तो होना ही चाहिए अन्याि लक्ष्य तक पहुँचने के साथ एक्सीडेन्ट होने और ड्राइवर समेत सवारियों की जान-जोखिम का संकट सोमने खड़ा रहेगा। युग सृजन में अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन कर सकने वाले युग समस्याओं के अनुरूप अनेक कार्यक्रमों का समावेश है। जनमानस का परिष्कार और आस्था संकट का उन्मूलन किसी एक स्थान पर नहीं 450 करोड़ मनुष्यों को एक-एक मोर्चा मान कर उन सभी पर एक साथ सम्पन्न किया जाना है। इतने बड़े उत्तरदायित्व को उठाने वाले, अनुीव और अभ्यास न होने पर भी उसे ठीक तरह कर गुजरेंगे इसकी आशा कोई नहीं कर सकता। ऐसी दशा में यह नितान्त आवश्यक था कि कार्य क्षेत्र में उतरने वाले प्रज्ञापुत्र एक-एक महीने की ट्रनिंग युग शिल्पी सत्र में सम्मिलित होकर प्राप्त करें।

अब तक गायत्री शक्ति पीठो प्रज्ञा पीठों के लिए जिन कार्यकर्ताओं की स्थायी रूप से नियुक्ति हुई है उनके लिए यह ट्रेनिंग आवश्यक समझी और सम्पन्न कीजाती रही हैं। अब इनमें एक नया अध्याय जड़ा है-स्वाध्याय मंडलों के मचालकों को भी उसी प्रक्रिया का अनुभव अभ्यास कराने का।

स्वाध्याय मण्डल असल में बिना निजी इमारत छोटे दायरे में काम करने वाले - एक व्यक्ति के प्रयास से चल पड़ने वाले प्रज्ञा संस्थान ही हैं। दोनों के कार्यक्रम और उत्तरदायित्व समान हैं। दोनों का कार्य अपने-अपने क्षेत्रों में स्वाध्याय प्रक्रिया द्वारा युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण से आरम्भ होता है और दोनों को ही थेड़ा समर्थन-सहयोग उपलब्ध होने लगने पर पंच सूत्री कार्यक्रम हाथ में लेना पड़ता है। एक दशा में अन्तर केवल छोटे या बड़े का रह जाता है। गतिविधियाँ सर्वथा एक जैसी हैं। फिर भी यह निश्चित है कि प्रज्ञा संस्थानों के लिए नियुक्त कार्यकर्ताओं को जिस प्रकार ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है उसी प्रकार स्वाध्याय मण्डलों के रूप में छोटे प्रज्ञा संस्थानों की बारी है। यह भी हो सकता है कि प्रज्ञा पीठों की तरह वह भी सौ गुना अधिक बढ़ चले और 24 हजार के स्थान पर 24 लाख की संख्या में प्रज्ञा संस्थान-स्वाध्याय मण्डल-विनिर्मित हो चुकें। युग सन्धि का प्रज्ञा अभियान एक अद्वितीय एवं अभूत पूर्व तूफान है उसका प्रखरता और व्यापकता अपनी शक्ति और सफलता का जितना प्रभाव परिचय देने लगे उतना ही कम हैं।

ऐसी दशा में ट्रेनिंग इन स्वाध्याय मण्डलों के संस्था पकों की भी होनी है। इतने बड़े काम की शिक्षा एक महीने से कम में किसी प्रकार भी सम्पन्न नहीं हो सकती। उसके साथ जो पाठ्यक्रम जुड़े हैं वे कल्प साधना सत्र की तुलना में कही अधिक कठिन और जटिल है। ऐसी दशा में एक महीने से कम में उनकी शिक्षा भी पुरी नहीं हो सकती। वह नई व्यवस्था कैसे हो? आवश्यकता आविष्कार की जननी कही गई है। अतः इस असमंजस का भी हल खोज निकाला गया है। एक महीने के कल्प साधना सत्रों का भविष्य में नया स्वरूप यह होगा कि प्रातः 4 से 12 तक कल्प साधना की श्क्षा साधना चला करेगी। अपराह्न 12 से 8 तक युग शिल्पी शिक्षा का समावेश रहेगा। अब यह दो पाली में चलेगा। अब इस विद्यालय में दो शिफ्टों का समावेश रहेगा। दोनों के लिए पूरे आठ-आठ घन्टे का समय है। जो उत्साही साहसी हैं वे एक साथ दोनों शिक्षा भी सम्पन्न करते रह सकते हैं। कई छात्र एक साल में दो दर्जे भी पास कर लेते हैं। एम.ए. और कानून की कक्षाएँ एक ही समय में साथ-साथ पूरी करते देखे गये हैं। प्रस्तुत प्रशिक्षण क्रम भी दुहरा हो सकता है। कल्प साधना और युग शिल्पी सत्र के जो दुहरे उपक्रम पूरा करना चाहें उन्हें अब वैसी सुविधा व्यवस्था बना दी गई है। जो इनमें से एक ही शिक्षा प्राप्त करना चाहें उन पर कोई दबाव नहीं है कि उन्हें दोनों ही पूरी करनी पड़ेगीं। वे अपना इच्छित एक सत्र भी चलाते रह सकते हैं।

युग शिल्पी सत्रों में चार शिक्षाएँ हैं। यह चारों ही ऐसी हैं जिनमें से एक को भी छोड़ते नहीं बनता। (1) जन-संपर्क के लिए सम्भाषण कला, सभा गोष्ठियों में वक्तृता। (2) प्रचार कार्यक्रमों को आकर्षक एवं प्रभावी बनाने के लिए युग संगीत (3) ईसाई चर्चों की तरह लोक सेवा एवं आकर्षण का आधार चिकित्सा उपचार (4) यज्ञादि धार्मिक कर्मकाण्डों के माध्यम से श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा का समर्थ जागरण। इन चारों को व्यावहारिक शिक्षा कहा जा सकता है। मिशन के सिद्धान्तों और निर्धारणों का स्वरूप एवं भविष्य समझना पाँचवाँ कार्यक्रम है जो तत्वदर्शन के रूप में इन्हीं चारों के साथ धुला दिया गया हैं।

(1) कितने कार्यकर्ता भय, संकोच, अभ्यास, घबराहट, आत्महीनता के कारण अपने विचार व्यक्त नहीं कर पाते। यह झिझक छूटनी चाहिए और हर युग शिल्पी को मुखर होना चाहिए। विचार विनिमय हर स्तर के हर व्यक्ति के साथ बिना झिझक संकोच कर सकने की आदत रहनी चाहिए। इसी प्रकार जन्म दिवसोत्सवों से लेकर पर्व आयोजनों और विशेष समारोह सम्मेलनों को ओजस्वी ढंग से भाषण कर सकने की क्षमता होनी चाहिए। यह भाषण और सम्भाषण कक्षाएँ परस्पर सम्बद्ध हैं। इनका अभ्यास होने पर ही जन संपर्क सफल हो सकता है।

(2) अपने देश में 70 प्रतिशत लोग छोटे देहातों में रहते हैं। प्रायः 70 प्रतिशत ही बिना पढ़े हैं। युगान्तरीय चेतना का आलोक हमें इसी बहुसंख्यक और असली भारत के घर-घर में पहुँचाना है। सामान्यतया संगीत के बिना भाषणें को हृदयंगम कर सकना कठिन पड़ता है। मध्यकाल के तात्कालीन संतों में से अधिकाँश ने अपना प्रचार कार्य संगीत के माध्यम से ही सम्पन्न किया था। सूर, तुलसी, नानक, दादू, कबीर, रैदास, मीरा, चैतन्य आदि सभी ने लोक जागरण के लिए संगीत उपचार को अनिवार्य माना और अपनाया था। युग शिल्पियों के लिए भी यह आवश्यक समझा गया है। और ढपली घुंघरू के माध्यम से स्ट्रीट सिंगर स्तर का युग संगीत एक महीने में सम्पन्न करा देने का निश्चय किया गया है।

(3) आसनों द्वारा शरीरगत स्वास्थ्य रक्षा, प्राणायाम द्वारा मानसिक रोगों की चिकित्सा, चौबीस जड़ी−बूटियों द्वारा सामान्य रोगों की घरेलू चिकित्सा यह तीनों ही उपक्रम योग चिकित्सा की परिधि में आते हैं। ईसाई चर्चों में से प्रत्येक में चिकित्सालय है। जन-सेवा और घनिष्ठता के लिए यह प्रक्रिया बहुत ही प्राणवान है। युग शिल्पी को एक महीने में इन तीनों उपचारों का अभ्यास करा दिया जाता है।

(4) धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत प्रत्येक शुभारम्भ में यज्ञ की प्रमुखता रहती है। संस्कार पर्व, जन्मदिन, नवरात्रि सत्र, शुभारम्भ, उद्घाटन, प्रतिमा पूजन, व्रत संकल्प, अनुष्ठान आदि में कर्मकाण्ड कराने की आवश्यकता पड़ती है। उन्हीं क्रिया-कृत्यों के साथ-साथ लोक-शिक्षण जुड़ा रहता है। अस्तु इस पौरोहित्य में भी प्रत्येक युग शिल्पी की प्रवीणता होनी चाहिए।

इस प्रकार अब कल्प साधक और युग शिल्पी एक ही महीने में दोनों अति महत्वपूर्ण शिक्षा साधनाएँ सम्पन्न कर सकते हैं। टाइम टेबिल ऐसा बना दिया गया है कि इस दुहरी पद्धति को बिना थके, ऊबे भली प्रकार सम्पन्न किया जा सके।


अब मिनी कल्प साधना सत्र दस दिन के भी

एक महीने के कल्प साधना सत्र जिस आश्चर्यजनक सफलता के साथ सम्पन्न हो रहे हैं उनमें ने केवल सम्मिलित होने वाले साधकों को आशातीत सन्तोष मिला है वरन् दर्शकों को भी चकित कर दिया हैं अमृताशन के आहार से पुराने कब्ज दूर हुए हैं। जिसके पेट सदा भारी रहते थे, सड़ी वायु नीचे ऊपर चलती रहती थी और धड़कन बढ़ा देने तथा सिर दर्द जैसे उपद्रव खड़े करती थी, उनका समाधान हो गया। इस आहार-उपचार से सभी को विश्वास हुआ है कि पाचक-रेचक औषधियाँ खाते रहने की अपेखा यह कहीं अधिक अच्छा है कि आहार पर संयम बरता जाय और जीभ प अंकुश रखा जाय। यह अब सैद्धान्तिक रुप् में तो अनेक वार सुना जाता रहा है, पर व्यवहार में वैसा कभ्ज्ञी वन ही नहीं पड़ा। कल्प साधना सत्र में यह अनुशासन सहज ही निभ गया। जिनने इसका लाभ देख लिया है वे अब उसे सदा अपनाते ही रहेंगे और दस वर्ष अधिक जियेंगे, ऐसी आशा की गई हैं। कल्प-सत्रों की अद्वितीय विशेषता यह है कि यहाँ हर शिक्षार्थी को शारीरिक और मानसिक जाँच-पड़ताल उच्च शिक्षित एम.डी., एम.एस. स्तर के डॉक्टरों द्वारा बारीकी से की जाती है। प्रत्येक अंग अवयव का परीक्षण करके यह जाना जात है कि शिक्षार्थी में न्यूनता एवं रुग्णता के बीजाँकुर कहाँ हैं? इसी आधार पर जड़ीबूटी कल्प का प्रबन्ध होता है। ब्राह्मी, अश्वगंधा, शंख पुष्पी, शतावरि, आँवला, वच, तुलसी आदि औषधियों में से जिसके लिए जो निर्धारिण होता है उसे उसी का सेवन नित्य प्रति प्रातःकाल सर्व प्रथम कराया जाता है।

वातावरण का प्रभाव कैसा होता है उसे इस गायत्री तीर्थ के आध्यात्मिक सेनेटोरियम में साधना के साथ-साथ भली प्रकार संपर्क में आने वालों को अनुप्राणित करती है। उच्चस्तरीय विचार-विनिमय और परामर्श मार्ग-दर्शन से किस प्रकार भ्रान्तियों से उबरने और श्रेय पथ पर चल पड़ने की प्रेरणा मिलती है, इस तथ्य को भी यहाँ रहकर भली प्रकार अनुभव किया जा सकता है। अनुदान, वरदान, आशीर्वाद किसे कहते हैं और वे किस आधार पर कितनी मात्रा में किसे कहते हैं और वे किस आधार पर कितनी मात्रा में किसे मिलते हैं। इसका तत्व-दर्शन यहाँ पहुँचने पर जिस प्रकार समझने को मिलता है उससे नया प्रकाश मिलता है। नये सिरे से सोचने और नया आधार प्राप्त करने का द्वार खुलता है। लोग अधिकतर यही अनुभव प्रकट करते हुए पाये गये कि इस दरवाजे पर से कोई खाली हाथ नहीं जाता।

घर जाने के उपरान्त किसकी क्या परिवर्तित रीति-नीति, दिशाधारा और दिनचर्या, कार्यपद्धति और विधिव्यवस्था होगी। इसका बहुत कुछ निर्धारण यहीं हो जाता है। देखा गया है कि यहाँ किये गये निश्चय, संकल्प वान होने या घर जाने पर भी टूटे नहीं, यथावत् निभे हैं। घर लौटने के उपरान्त सत्र शिक्षार्थियों ने अपने जो अनुभव लिखे है उन सबमें एक ही ध्वनि निकलती है कि जो भी इन सत्रों में आया उपलब्धियों के लिए अपने भाग्य को सराहता रहा। उनके परिवार एवं सम्बन्धियों का भी यही मत सुनने को मिला है कि एक महीने का समय लगने के बदले जो परिवर्तन देखने को मिला उसे कोड़ी के भाव हीरा खरीदने जैसा सुयोग ही माना जा सकता है।

भेले-बुरे अनुभवों की चर्चा सर्वत्र होती है। लम्बे समय बाद कोई लौटता है तो सहज ही उसके प्रवास का विवरण पूछने की सभी मित्र संबंधियों की इच्छा होती है। उत्सुकों को जो सुनने को मिला है वह ऐसा है कि हर किसी का मन इस सुयोग सौभाग्य से लाभ उठाने का होता है। यही कारण है कि अब इन सत्रों में सम्मिलित होने का आग्रह करने वाले आवेदनकर्त्ताओं की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है।

स्थान कम, व्यवस्था सीमित, शिक्षकों, परीक्षकों पर दबाव आदि कारणों से कल्प साधकों की संख्या पूर्व निर्धारण से अधिक बढ़ा देने की अब कोई गुँजाइश नहीं है किन्तु किया क्या जाय? इसी संदर्भ में एक और नई समस्या यह उठी कि बहुत से लोग सचमुच ही इस स्थिति में हैं कि वे एक महीने का समय बाहर रहने के लिए निकाले जो उत्तरदायित्वों के कारण उनका व्यवसाय ही चौपट हो जाय। विवशता में कोई मार्ग न देखकर वे कितने हैरान होते हैं। इस व्यथा का हल्का सा आभास उनके पत्रों को पढ़कर ही जाना जा सकता है।

इस समूचे धर्म संकट पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त नया मार्ग यह खोजा गया है कि व्यस्त लोगों के लिए कल्प-साधना सत्र का एक दस दिवसीय ‘मिनी कल्प साधना सत्र’ भी साथ-साथ चलाया जाय। जिसमें साधना तो वे ही सब हो, उपक्रम तो ठीक वैसा ही चले और अन्तर इतना ही रखा जाय कि एक महीने के स्थान पर उसे सिकोड़कर दस दिन का कर दिया जाय। इस प्रकार न कुछ से कुछ अच्छा वाला साधन तो सच ही जायेगा।’ अधिक लोगों का अधिक समाधान सन्तोष बन पड़ने और सुयोग का लाभ कम समय में अधिक लोगों द्वारा उठाये जाने का अवसर मिलने की बात को ध्याम में रखते हुए यह नया निर्धारण भी अपने स्थान पर उपयुक्त ही समझा गया है और उसका भुभारम्भ वसन्त पर्व से आरम्भ कर दिया गया है। जब पूर्ववत् हर महने 1 से 29 तक एक मास के कल्प साधना सत्र तो चलेंगे ही। साथ-साथ (1) 1 से 10, (2) 11 से 20 (3) 21 से 30 तक के दस दिवसीय सत्र भी आरम्भ कर दिये गये हैं। साधना नौ दिन की, हरिद्वार कनखल, ऋषीकेश, लक्ष्मण झूला, तीर्थों का परिभ्रमण एक दिन का। इस प्रकार यह सत्र रहेगा तो दस दिन के ही पर साधना नौ दिन करने से काम चल जायेगा। जिन्हें दोनों में से जिस सत्र में स्थान प्राप्त करना हो वे समय रहते अपनी सुविधा वाले सत्र में आवेदन पत्र भेजकर स्थान सुरक्षित करालें।


आत्म सूर्य का आह्वान

(लाखनसिंह भदौरिया “सौमित्र’)


आत्म सूर्य का आह्वान (kavita)

सूरज का तेज नहीं घटता, तपकर उजियारा देता है।

बढ़ते अँधियारे की दम क्या, उगती रश्मियाँ निगल जाये। यह सूरज की उदार क्षमता जो तुम के लिये पिघल जाये।

काजत बिखेरता अन्धकार, रवि रोज बुहारा देता है। हम तुम हैं भागीदार मित्र, बढ़ते तुम की नादानी में।

देते सलामियाँ स्वागत में, नाचते खड़े अगवानी में। रह रोज अमावस के घर में उत्तर ध्रुवतारा देता है।

जिसके होने से सूरज है, वह तम की छाया क्या जाने। जिसका अभाव ही अन्धकार, वह भ्रम की माया क्या जाते?

आलोक पुँज का उदय सदा, दिन प्यारा-प्यारा देता है॥ जो सूर्य चन्द्र को रचता है, देता प्रकाश विश्वासों को।

जिससे भू-अम्बर ज्योतिवान ज्योति करता जो श्वासों को रवि शशि को तम में डुबा डुबा जो जन्म दुबारा देता है॥

धरती को ज्योति नहीं मिलती नभ गंगा के उजियारा से। अन्तर की राह नहीं दिखती उत्तर दिशि के ध्रुवतारे से।

भीतर बैठा जो ज्योति पुरुष वह हमें इशारा देता है। सूरज बैठा जो ज्योति पुरुष वह हमें इशारा देता है।

*समाप्त*