साधनों का सदुपयोग कर सकने वाली बुद्धिमता को सर्वत्र सराहा जाता है। उसी आधार पर मनुष्य आगे बढ़ते और ऊँचे उठते हैं। हर कोई कुछ न कुछ धन कमाता है और उसके पास पूर्व संचित साधन होते हैं। प्रश्न एक ही रह जाता है कि इसे किसने किस प्रयोजन के लिए, कब, किस प्रकार उपयोग किया? महत्व इस बात का नहीं कि किसने कितना कमाया और कितना उड़ाया। बुद्धिमानी की कसौटी एक ही है कि जो हाथ आया उसे किन प्रयोजनों में किस दृष्टिकोण से खर्चे किया गया। यों तो चोर, उचक्के भी विपुल सम्पत्ति कमाते देखे गये हैं। गरिमा इसी एक बात में है साधनों का सदुपयोग बन पड़ा या नहीं? उन्हें उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित कर सकने का विवेक रहा या नहीं?
वैभव स्व उपार्जित है। पूर्व संचित पुण्य परमार्थ या वर्तमान कौशल पराक्रम के आधार पर उसे अर्जित किया जाता है। इस अपनी कमाई के अतिरिक्त ईश्वर प्रदत्त अनुदान भी मनुष्य के पास कम नहीं हैं। श्रम, समय, मस्तिष्क जैसे साधन हर किसी को प्रायः समान रूप से उपलब्ध हुए हैं। इस उच्च स्तरीय वैभव का सदुपयोग कर सकना और भी बढ़े-चढ़े कौशल का काम है। ऐसे ही कौशल को दूरदर्शी विवेक कहा जाता है। श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा उसी के नाम है। ‘ऋतम्भरा मेधा’ के नाम से उसी का अर्चन, अभिवर्धन किया जाता है।
मनुष्य न तो सम्पदाओं की दृष्टि से दरिद्र है न विभूतियों की दृष्टि से असमर्थ। प्रश्न इतना भर है कि जो हस्तगत हुआ, उसका उपयोग किस प्रकार बन पड़ा। जो इस कसौटी पर खरा सिद्ध हो सका, समझना चाहिए कि उसका मनुष्य जन्म सार्थक हो गया।
मानवी सत्ता और उसका वास्तविक पर्यवेक्षण करते हुए दो प्रसंग सामने आते हैं। एक चेतना पक्ष का ऊँचा उठना, दूसरा काया वैभव का आगे बढ़ना। ऊंचा उठने से तात्पर्य है- चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का अभिवर्धन। आगे बढ़ने का अर्थ है- समर्थता और सम्पदा का उपार्जन उपयोग। दोनों के समन्वय से जीवन की दिशाधारा बनती है। मान्यताओं, आकाँक्षाओं का स्तर श्रेष्ठ या निकृष्ट होना व्यक्ति का अपना चुनाव है। जो जिसे वरण करेगा वह उस दिशा में अग्रसर अवश्य होगा। जिनकी गति धीमी होती है उनकी आलसी, प्रमादी आदि नामों से भर्त्सना की जाती है। ऐसे ही लोग पिछड़े वर्ग में गिने जाते हैं और अभाव, उपहास के भाजन बनते हैं। जिनकी दिशाधारा सही होती है वे वैभव, सम्मान पाते और श्रेय संतोष के अधिकारी बनते हैं। यह समस्त उपलब्धियाँ उस आकाँक्षा तत्व की हैं जो न्यूनाधिक मात्रा में सभी में पाई जाती हैं। गति मंद भले ही हो, पर सभी मनुष्य को आगे बढ़ने एवं ऊँचा उठने के उपक्रम में संलग्न पाया जाता है।
दोनों का सन्तुलन ठीक बना रहे तो जीवन का स्वरूप हर दृष्टि से सफल सराहनीय बनता है। गड़बड़ी तब पड़ती है जब एक पक्षीय असंतुलन उत्पन्न करने वाले अतिवाद को अपनाया जाता है। वैभववान् बनने की अतिवादी उमंगें तृष्णा कहलाती हैं। उसके प्रदर्शन की आतुरता अहंता में परिणत होती है। उपलब्धियों के अवाँछनीय उपभोग की ललक को वासना के नाम से जाना जाता है। शरीरगत आकाँक्षा बढ़ने की, वैभववान् बनने की होती है और आत्मिक अभिलाषा ऊँचा उठने की। दोनों को साथ-साथ लेकर चलने से सन्तुलन ठीक बना रहता है और प्रगति रथ बिना किसी व्यवधान के हँसते-हँसाते चलता रहता है। सभी जानते हैं कि 'बैलेन्स' बिगड़ने पर वाहन, भवन, यंत्र सभी लड़खड़ाने और धराशायी होने लगते हैं। ग्रह-नक्षत्रों से लेकर पैरों चलने तक में यह 'बैलेन्स' ही गतिशीलता का आधार-भूत तथ्य है। इसे बिगाड़ने में मनुष्य की आतुरता एवं अदूरदर्शिता का अतिवादी दृष्टिकोण ही बाधक होता है। यदि उस बालबुद्धि पर अंकुश रखा जा सके और संतुलन बिठाते हुए जीवनचर्या की दिशाधारा निर्धारित की जा सके तो फिर सुनियोजित समग्र प्रगतिशीलता का लाभ मिलना सुनिश्चित है।
प्रगति की आकाँक्षा स्वाभाविक भी है और उचित उपयोगी भी। उसमें व्यक्ति का निजी लाभ भी है और समाज का समग्र हित साधन भी। ‘इच्छा का त्याग’ वाली उक्ति जिन अध्यात्मिक ग्रन्थों में पाई जाती है वहाँ उसका प्रयोजन प्रतिफल की आतुरता का परित्याग करने भर से है। शब्दावली में जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है उससे किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। बुरे कामों के परिणाम तो तत्काल भी मिल जाते हैं पर भले कामों का उपयुक्त प्रतिफल मिलने में क्षमता एवं पुरुषार्थ की, निर्धारण एवं साधन की परिस्थितिजन्य अनुकूलता की कमी रहने पर अभीष्ट सत्परिणामों की मात्रा तथा अवधि में व्यतिरेक हो सकता है। ऐसी दशा में कर्त्ता को जो खोज, निराशा एवं अनास्था उत्पन्न होती है उसी की रोकथाम के के लिए यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है कि सत्कर्म से मिलने वाले सन्तोष एवं सन्मार्ग पर चलने के गौरव को ही पर्याप्त प्रतिफल मान लिया जाय और समयानुसार जब भी सत्परिणाम उपलब्ध हो, तब उसे अतिरिक्त उपहार भर माना जाय। इस मान्यता को अपनाने से सन्तुलन बना रहता है और मार्ग से विचलित होने में उद्विग्नताजन्य अवरोध बाधक नहीं बन पाता।
सभी जानते हैं कि दूध को दही बनने में कुछ समय लगता है। हथेली पर सरसों नहीं जमती। बीज बोने और फसल कटने का मध्यान्तर रहेगा ही। विद्यारम्भ करने और पारंगत बनने में अभ्यास की लम्बी अवधि पार करनी होती है। व्यायामशाला में प्रवेश करते ही कौन पहलवान बना है। कारखाना लगने के दिन ही धन कुबेर बन जाना कहाँ सम्भव होता है? सत्प्रयोजनों से निरत होने और उसकी सुखद परिणति तक पहुँचने में समय भी लगता है और मध्यवर्ती व्यवधानों से भी पाला पड़ता है। इन्हीं अवरोधों में अधिकाँश सन्मार्गगामी अपना धैर्य खोते, साहस गँवाते और श्रद्धा का समापन करते देखे गये हैं। इस दुर्घटना से बचने के लिए ही इस प्रतिपादन को उजागर किया गया है कि फलाशा छोड़कर निष्काम कर्म किया जाय। यह एक 'अवरोध-निवारण' भर है। शाश्वत सिद्धान्त नहीं।
व्यवहारतः इसका क्रियान्वयन किसी भी प्रकार संभव नहीं। परिणाम का विचार करने के लिए ही तो तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण, मनन, चिन्तन आदि की समूची बौद्धिक कसरत की जाती है। उस पर विचार करने की बात छोड़ देने पर तो दिशाधारा का निर्धारण तक संभव न हो सकेगा और कुछ करने का झंझट उठाने की इच्छा ही न उभरेगी। तब मनुष्य जड़भरत, परमहंस, अवधूत आदि कुछ भी क्यों न हो जाय, प्रगतिशील मनुष्य-समुदाय की बिरादरी से हटकर किसी कल्पना लोक का निवासी भर बनकर रह जाएगा। यह मानवी सत्ता की संरचना को देखते हुए किसी भी प्रकार शक्य नहीं है।
सन्तजन तक स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि शान्ति, आत्मकल्याण, परमार्थ, ईश्वर साक्षात्कार, ब्रह्म-निर्वाण आदि की उत्कट अभिलाषा से प्रेरित होकर ही योग, तप, व्रत, संयम जैसे कष्टसाध्य प्रयास करने का साहस जुटा पाते हैं। फलाशा छोड़ देने पर तो शरीर यात्रा तक के साधन जुटाने तक का उत्साह न उठेगा और ऐसे ही अपंग आलसी बना बेमौत मरने की तैयारी करेगा। अस्तु, किसी को भी 'निष्काम कर्म' का वैसा उल्टा अर्थ नहीं लगाना चाहिए जैसा कि इन दिनों अनेकों दिग्भ्रान्त लोग लगाते देखे जाते हैं।
सृष्टि के आदि में सृष्टा ने इच्छा की कि "मैं एक से अनेक बन जाऊँ और अपने अनेक रूपों के साथ रमण की क्रीड़ा-कल्लोल में निरत रहूँ।" यह इच्छा ही परा और अपरा प्रकृति के रूप में प्रादुर्भूत हुई और सृष्टि क्रम चल पड़ा। प्राणियों में यह इच्छा प्रगति की अभिलाषा के रूप में पाई जाती है और पदार्थों में गतिशील रहने का पराक्रम अनुशासन बनकर रहती है। गति इसी का नाम है। यही सुनियोजित होने पर प्रगति कहलाती है। उद्भव, परिष्कार और परिवर्तन का नियतिचक्र इसी धुरी पर घूमता है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र इसी गोलाकार परिभ्रमण का नाम है। ब्रह्माण्ड के सभी छोटे-बड़े क्रियाकलाप इसी दैवी निर्धारण अनुशासन के अंतर्गत चल रहे हैं।
इन पंक्तियों में चर्चा यह की जा रही है कि 'आकांक्षा' मानवी सत्ता का मूलभूत प्रेरक तत्त्व है। इसी के आधार पर दिशाधारा निर्धारित होती और गति-विधियाँ चल पड़ती हैं। उत्थान-पतन के दोनों ही मार्ग इसी के एक उद्गम केन्द्र से आरम्भ होते हैं। अस्तु आत्मसत्ता एवं जीवनचर्या को भटकाव एवं पतन-पराभव से बचाने के लिए यह आवश्यक है कि आकाँक्षा को भ्रमित न होने दिया जाय और उसे इसी मार्ग पर गतिशील रहने दिया जाये जिसे संतुलित प्रगति का सुनिश्चित राजमार्ग समझा जाता रहा है। जंक्शन पर एक लाइन पर खड़ी गाड़ियाँ लीवर गिराने और पटरियाँ इधर-उधर हटाने के प्रक्रिया भर से दिशा बदल देती हैं। एक पूर्व को चलती है, दूसरी पश्चिम को। कुछ समय चलते रहने पर दोनों के बीच आश्चर्यजनक दूरी उत्पन्न हो जाती है। ठीक यही बात आकाँक्षाओं के प्रवाह का मोड़-मरोड़ उत्पन्न होने के सम्बन्ध में है। पहाड़ के शिखर पर बरसने वाला पानी एक इंच इधर, एक इंच उधर होने भर से दिशा बदल देता है और बहते-बहते एक का अंत एक नदी समुद्र में होता है और दूसरे का अन्त दूसरे समुद्र में होता है। यह एक इंच की दूरी ही आकाँक्षाओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। एक प्रकार के महत्वाकांक्षी जीवन प्रवाह को एक दिशा में बहाते एक परिणाम पर पहुँचते हैं जबकि दूसरे अपनी रीति-नीति दूसरी बनाते और उसी स्तर की सफलताएँ पाते हैं।
इस तथ्य को समझ लेने के उपरान्त हर विचारशील को यह निर्धारण करना होगा कि वह अपने लक्ष्य का निर्धारण करे और गन्तव्य के सम्बन्ध में किसी सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुँचे। बुद्धिमत्ता इस में है कि शरीरगत और चेतनागत आकाँक्षा अभिलाषा के बीच तालमेल बिठाया जाय और जिसकी जितनी उपयोगिता आवश्यकता है उसके अनुरूप उसे पोषण दिया जाय। काया की सत्ता, चेतना के वाहन उपकरण जितनी है। इसलिए औचित्य इसी में है कि आत्मा के उत्कर्ष में जिस देवपक्ष की प्रमुखता है उसे प्राथमिकता दी जाय और शरीर को इस अनुपात का परिपोषण दिया जाय जिससे वह निर्वाह सुविधाओं से सुसंपन्न बना रहे। इस सन्तुलन को बिठा लेने पर समग्र प्रगति की रूपरेखा बना लेने और उस मार्ग पर सफलता पूर्वक प्रयाण करने का कार्यक्रम बना लेना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता।
प्रगति के लिए प्रेरणा देने वाली आकाँक्षा जीव-सत्ता के साथ अनादिकाल से जुड़ी हुई है और अनन्तकाल तक जुड़ी रहेगी। उसे उपयुक्त दिशा देना ही मानवी बुद्धिमत्ता का चरम कौशल है। इसी को परम पुरुषार्थ कहते हैं। आत्म निरीक्षण, आत्मनिर्माण, आत्म सुधार, आत्म विकास के नाम से जिस आत्मोत्कर्ष एवं आत्मकल्याण का ऊहापोह होता रहता है, उसमें करने योग्य पराक्रम एक ही है कि आकाँक्षाओं को चेतना को सुसंस्कृत बनाने वाली उत्कृष्टता अपनाने के लिए बाधित करने वाली मान्यताओं से जकड़ दिया जाय। इन मान्यताओं को ही श्रद्धा कहते हैं। गीतकार का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “आत्मा का स्वरूप श्रद्धामय है, जो जैसी श्रद्धा रखता है वह वैसा ही बन जाता है।”
प्रकृति प्रदत्त आकाँक्षाएँ शरीर पर छायी रहती हैं और भूख, प्रजनन, अस्तित्व रक्षा के रूप में तृष्णा, वासना अहंता के विविध रूपों में प्रकट परिलक्षित होती रहती हैं। यह सामान्य प्रवाह की बात हुई जिसे समस्त जीवधारी अपनाते और सृष्टा का गतिचक्र चलाते रहने के लिए विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ करते हुए जीवनलीला समाप्त करते हैं। इससे आगे का पक्ष वह है जिसे आत्मा या चेतना को उच्चस्तरीय प्रगति की ओर ले चलने वाला निर्धारण कह सकते हैं। इससे दैवी प्रवाह को अपनाना पड़ता है। आस्थाओं को आस्तिकता के साथ, बुद्धि को आध्यात्मिकता के साथ और पौरुष को धार्मिकता के साथ नियोजित करना पड़ता है। यही अध्यात्म दर्शन एवं साधनाक्रम का सारभूत सिद्धान्त है। आत्म की, चेतना की प्रगति इसी पर निर्भर है।
उपरोक्त कथन प्रतिपादन से इस प्रतिपादन पर पहुँचना चाहिए कि जीवसत्ता की मूलभूत प्रवृत्ति आकाँक्षा के वर्तमान स्वरूप का पर्यवेक्षण किया जाय और देखा जाय कि वह शरीर को आगे बढ़ने और आत्मा के ऊँचे उठने की प्रवृत्ति को साथ-साथ लेकर चल रही है या नहीं। दोनों के बीच असन्तुलन तो नहीं बन रहा है। असन्तुलन ही प्रगति, अवगति या दुर्गति की बनता देखा जाता है।
मनुष्य यदि सचमुच ही बुद्धिमान हो तो उसे समग्र प्रगति का दूरदर्शी निर्धारण करना चाहिए। यदि वह इतना कर सके तो समझना चाहिए कि वास्तविक ज्ञान चेतना का वह अधिष्ठाता अधिपति हो गया। उस सम्पदा का सही उपयोग जो भी कर सका है वह प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचा है और हर दृष्टि से कृतकृत्य बना है। हमें प्रगति और अवगति के अन्तर को समझना चाहिए और अपनी वर्तमान परिस्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए औचित्य का, अनौचित्य का विवेक सम्मत पर्यवेक्षण करना चाहिए। आत्मोत्कर्ष की परम श्रेयस्कर आकाँक्षा को सुनियोजित करने में ही व्यक्ति का अभ्युदय और समाज का कल्याण है। जो इतना समझने, स्वीकारने में समर्थ हो सकेगा उसका भविष्य सुनिश्चित रूप से उज्ज्वल बनकर रहेगा।
ज्ञानं न भवतो भिन्नं ज्ञेयं ज्ञानत् पृथं नहि अतो न त्वितरं किंचित् तस्माद्भेदो न विद्यते॥ -योग वासिष्ठ
ज्ञान मुझ (आत्मा) से कोई भिन्न वस्तु नहीं है, इसी प्रकार ज्ञान द्वारा ज्ञात होने वाले विषया (ज्ञेय) भी मुझ (आत्मा) से भिन्न वस्तु नहीं है। इसीलिए आत्मा के अतिरिक्त न तो कुछ है और न किसी प्रकार का भेद विद्यमान है।
कस्तूरी की खोज में हिरन भटकता रहता है। वनों, कन्दराओं में वह ढूंढ़ता है, पर कहीं नहीं मिलती। जो भीतर है उसे बाहर खोजने में उसका जीवन खप जाता है। व्यर्थ की इस भाग दौड़ से उसे निराशा ही हाथ लगती है। अतृप्ति यथावत् बनी रहती है। यह बोध हो सके कि जिसे प्राप्त करने की आकुलता में वह वन एवं कन्दरा में विचरता रहता है वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान है तो उसे तृष्णा की आग में इस तरह न जलना पड़े। उसकी निकटता प्राप्त कर मृग स्वयं परितृप्त हो जाय।
मृग ही क्यों? मनुष्य भी तो आनन्द की खोज में मृग मरीचिका की तरह जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। आनन्द की प्राप्ति उसकी मूलभूत माँग है। बचपन से लेकर जरावस्था तक वह इस आकाँक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। पर हिरन की भाँति दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मनुष्य सोचता है कि आनन्द के स्रोत बाहर हैं। दृश्य संसार और उससे सम्बद्ध परिवर्तनशील पदार्थों के आकर्षण में वह स्थायी और शाश्वत आनन्द की खोज करता है। इन्द्रियों की तुष्टि के लिए विषय रूपी साधन जुटाता है। पर उनका उपभोग अतृप्ति की आग को और भी अधिक भड़काता और बढ़ाता है।
बचपन से लेकर वृद्धावस्था की मध्यावधि में शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में अनेकों तरह के परिवर्तन होते हैं। उन परिवर्तनों के साथ-साथ आनन्द प्राप्ति के बाह्य साधन भी बदलते रहते हैं। शैशव अवस्था की माँग अलग प्रकार की होती है और किशोरावस्था की अलग। युवा वय की मनःस्थिति और वृद्धों की मनःस्थिति सर्वथा एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती है। इस कारण आनन्द प्राप्ति के बाह्य स्रोत भी क्रमिक रूप से बदलते रहते हैं। नवजात शिशु माँ की छाती से चिपकता रहता है। पय पान में ही उसे सामयिक तृप्ति मिलती है। पर थोड़ा बड़ा होते ही दुग्ध पान के प्रति उसकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। जो कभी माँ के हृदय से चिपका रहता था, वह अब चित्र-विचित्र खिलौनों में रमण करता है। सुखानुभूति के केन्द्र बिन्दु खिलौने बनते हैं। पर यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं चलने पाती। खिलौने जो बचपन में अत्यंत ही आकर्षक मनोरंजक लगते थे किशोरावस्था में नहीं भाते। घर की सीमा से बाहर वह प्रवेश करता है। मित्रों की टोली में उसका अधिकाँश समय व्यतीत होता है। पढ़ने-लिखने की- आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है।
बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि वैसे अधिक से अधिक योग्यता सम्पादित की जाय। सन्तुष्टि इस आकाँक्षा की पूर्ति से भी नहीं होती। एक की आपूर्ति दूसरे तरह की इच्छा को जन्म देती है। वयस्क होते ही अनुकूल साथी जीवन संगिनी की खोज चलती है। मिलते ही पत्नी के यौवन, रूप और लावण्य पर वह मुग्ध बना आनन्द की अनुभूति करता है। किन्तु यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं रहने पाती। शरीराकर्षण कुछ ही दिनों बाद समाप्त हो जाता है। तब तक प्रजनन का दौर चल पड़ता है।
नवागन्तुक शिशु प्रसन्नता का नवीन केन्द्र बिन्दु बनता है। उनकी किलकारियाँ सुनकर वह बड़े से बड़ा दुःख भी भूल जाता है। उसकी एक मुस्कान के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए मनुष्य तैयार रहता है। पर धीरे-धीरे वह आकर्षण भी कम होने लगा है जिससे प्रेरित होकर मानव बच्चे के लिए कष्ट उठाने के लिए तत्पर रहता था।
धनोपार्जन, संपदा संग्रह तथा लोकयश पाने की आकाँक्षा पूर्ति में वह अब सुख आनन्द ढूँढ़ने लगता है। तद्नुरूप प्रयासों का ताना बाना बुनता है। वह सब मिलने के बाद भी संतोष नहीं होता। अतृप्त और अशांत मनःस्थिति पुनः नये तरह के खेल खिलौने- मन बहलाने के साधन ढूंढ़ती है। सम्पूर्ण जीवन ही इन बाह्य प्रयासों में खप जाता है। जितना मनुष्य आनन्द पाने का प्रयत्न करता है उतना ही वह उससे दूर होता चला जाता है।
हर मनुष्य की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। परस्पर एक दूसरे की अभिरुचियाँ भी भिन्न होती हैं। एक को एक तरह के काम में आनन्द आता है दूसरे को भिन्न प्रकार के काम में। स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, सम्मान योग्यता की प्राप्ति में अधिकाँश व्यक्ति जीवन खपाते और तद्नुरूप सफलता मिलने पर मोद मनाते हैं। पर वह प्रसन्नता भी चिरस्थायी नहीं होती। कुछ ऐसे भी होते हैं जो समाज के ढर्रे से अलग हटकर अपना मार्ग चुनते हैं। वे असामान्य दुस्साहस का परिचय देते तथा ऐसे काम कर गुजरते हैं जिन्हें देखकर दांतों तले उंगली दवानी पड़ती है। जीवन के धनी व्यक्तियों को संकटों से युक्त कार्यों को करने में ही आनन्द आता है। कुछ व्यक्तियों की मनःस्थिति विकृत स्तर की बन जाती है। निकृष्ट कामों में ही उन्हें रस आता है। व्यसनी शराब के प्याले में आनन्द देखता और ढूंढ़ता है- उसी में डूबा रहता और अपना सर्वस्व गँवाता है। कामी कामतृप्ति की क्षणिक रसानुभूति में अपने शरीर को गलाता- मनःशक्ति को क्षीण करता रहता है। क्रूर आतातायियों को जघन्य अपराधों को करने में प्रसन्नता होती है। दूसरों को रोते-कलपते, पीड़ा से कराहते-तड़पते देखकर आनन्द आता है। इसकी विकृति उनसे हत्या जैसे पाप कराती है।
बाह्य संसार में आनन्द प्राप्ति के लिए मनुष्य भटकता रहता है, यह इस बात का परिचायक है कि शाश्वत सुख की अनुभूति उसके जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए कभी वह एक तरह का माध्यम ढूंढ़ता है तो कभी दूसरे प्रकार का। व्यक्ति के सुख का केन्द्र सदा बदलता रहता है। शैशव काल माँ की गोद में, बाल्यावस्था खिलौने में, छात्र जीवन पुस्तकों में, यौवन पत्नी तथा धन संचय में, गृहस्थाश्रम पुत्र मोह में, यश प्राप्ति में नियोजित रहता है। गम्भीरता से विचार करने पर पता चलता है कि जिन भौतिक चीजों से आनन्द प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है वे पदार्थ वस्तुतः आनन्द से रहित हैं। यदि आनन्द होता तो मन सदा उनमें लीन रहता, पर आनन्द प्राप्ति के केन्द्र सतत् बदलते रहना इस बात का प्रमाण है कि यह विशेषता उन भौतिक वस्तुओं में नहीं है।
सुख एवं आनन्द का केन्द्र भीतर है- बाहर नहीं। आनन्द की भावना मनुष्य की अन्तरात्मा में विद्यमान है। यह भाव ही विभिन्न वस्तुओं में आरोपित होकर हमें आनंददायक प्रतीत होता है। इसी कारण भ्रमवश लोग वस्तुओं को ही आनन्द का हेतु समझ लेने की भूल कर बैठते हैं। भ्रमवश विभिन्न वस्तुओं में उसे ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं। फलस्वरूप असफलता ही हाथ लगती है। यह स्थिति उस हिरन जैसी ही है जो कस्तूरी की गंध से मोहित होकर उसे बाहर तो खोजता है पर भीतर नहीं झाँकता।
आनन्द आत्मा का शाश्वत गुण है। वही भीतर बैठा आनन्द प्राप्ति का भाव सम्प्रेषित करता तथा अपनी आनन्दमय स्थिति का भान कराता है। इन्द्रियों की बनावट बहिर्मुखी है। अन्तर्मुखी होकर मूल केन्द्र को तलाशने की अपेक्षा वे बाहर की ओर चंचल रहती हैं। साँसारिक आकर्षणों में वे सुख और आनन्द खोजती हैं- उन्हें ही सुख का आधार मान लेती हैं।
आनन्द की प्रतिच्छाया भावों के रूप में आरोपित होकर जड़ वस्तुओं तक को आकर्षक बना देती हैं। जबकि उनमें अपना कोई आकर्षण नहीं होता और न ही आनन्द। लुभाने दृश्य तथा संसार वही रहते हैं। समग्र इन्द्रियों से युक्त काया का स्वरूप भी नष्ट नहीं होता, पर चैतन्य आत्मा के शरीर से निकलते ही सब खेल समाप्त हो जाता है। कहीं कोई आकर्षण नहीं दीख पड़ता। जड़ काया के भीतर विद्यमान अन्तरात्मा की सौंदर्य प्रवाह किरणें ही वस्तुओं पर पड़कर सुन्दरता का आभास कराती हैं। दर्पण में दिखायी पड़ने वाली मुखाकृति की प्रतिच्छाया को देखकर दर्पण की सराहना की जाय तथा सुन्दर मुखाकृति का कारण दर्पण को माना जाय तो यह मान्यता अविवेकपूर्ण ही होगी। प्रतिच्छाया से आनन्द प्राप्ति का भ्रमपूर्ण प्रयास असफल ही सिद्ध होगा।
विषयों में कर्मेंद्रियां, ज्ञानेन्द्रियाँ रमण करती- कुछ क्षणों के लिए आनन्द की अनुभूति करती हैं। पर उनकी वे विशेषताएँ तब तक ही रहती हैं जब तक कि आत्मा काया में निवास करती है। इन्द्रियाँ उसी से गति एवं सामर्थ्य प्राप्त करती हैं। उनकी विभिन्न तरह की क्षमताएँ आत्मशक्ति का ही अनुदान हैं। रंग, रूप गंध स्पर्श स्वाद आदि कायिक अनुभूतियों से लेकर प्रसन्नता, प्रफुल्लता, उत्साह, उमंग आदि की मानसिक विशेषताएँ तक उस आन्तरिक चेतन शक्ति की ही प्रतिच्छाया है। शरीर एवं मन में जुड़ी हुई विभिन्न इन्द्रियाँ काय-कलेवर में आत्मसत्ता के बने रहने से ही पदार्थों, दृश्यों एवं विषयों में आत्मसत्ता के बने रहने से ही पदार्थों, दृश्यों एवं विषयों में सुख की अनुभूति कर पाती हैं। ऐसे सुख की जो क्षणिक, अस्थायी और अतृप्ति को और भी अधिक बढ़ाने वाला है। आत्मा के शरीर छोड़ते ही इन्द्रियाँ किसी प्रकार की अनुभूति नहीं कर पाती। पार्थिव शरीर मिट्टी तुल्य हो जाता है, उसे गाढ़ने-दफनाने-जलाने की तुरन्त बात सोची जाती है।
आनन्द का केन्द्र बिन्दु अन्तरात्मा है। वह चैतन्य गतिविधियों का प्रेरणा स्थल भी है। पर चेतना की यह विशेषता होती है कि वह जड़ वस्तुओं में अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जब तक उसका प्रकाश-आनन्द की किरणें वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा विषयों पर पड़ती है, तब तक वे आकर्षक लगती है। जैसे ही किरणें सिमटती हैं, वह दृश्यमान सौंदर्य लुप्त हो जाता है। वस्तुतः अन्तरात्मा से निकली भाव तरंगें दृश्य संसार तथा उससे सम्बद्ध वस्तुओं में अपने उद्गम स्थल की खोज करती हैं। बाहर वह नहीं मिलता। अतृप्ति मिटाने के लिए वह साँसारिक चीजों का सहारा लेती है। मिटने के स्थान पर वह और भी बढ़ती है तथा उसकी स्थिति उस प्यासे व्यक्ति की तरह होती है जो पानी की तलाश में निकलता है, पर मदिरालय पहुँच कर मद्यपान में अपना होश-हवाश गवाँ बैठता है। शराबी की तरह ही हालत जीवात्मा की हो जाती है जो सदा अतृप्त बनी आकुल व्याकुल रहती है।
यह एक विडम्बना ही है कि जीव स्वयं आनन्द का स्रोत होते हुए भी जीवन पर्यन्त उस अमृतत्व से वंचित रहता है। खेल खिलौने, भोग विलास, इच्छाओं आकाँक्षाओं, ऐषणाओं की पूर्ति में बचपन, किशोरावस्था युवावस्था प्रौढ़ावस्था खप जाती है, जब वृद्धावस्था में मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। व्यतीत हुए भूतकाल के जीवन को स्मरण करके हर व्यक्ति की अंतर्व्यथा जेम्स एलन की भाँति मूक रूप में प्रस्फुटित होती है- “मैंने साँसारिक जीवन एवं उससे जुड़ी वस्तुओं में आनन्द की खोज का प्रयास किया किन्तु वह नहीं मिल सका। विद्याभ्यास किया- ऐश आराम के साधन जुटाये, श्रेय सम्मान अर्जित किया, पर अशान्ति बढ़ती ही गयी। मैंने दर्शनों का अनुशीलन किया किन्तु मेरा हृदय अहंभाव से विदग्ध हो गया तब पहली बार मुझे अनुभव हुआ है, कि शान्ति एवं आनन्द का केन्द्र बाहर नहीं भीतर है।”
ऐसी व्यथा-वेदना की अनुभूति हर व्यक्ति को कभी व कभी अवश्य होती है। जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों में अलग-अलग प्रकार को होती है। यह एक ऐसा अभाव है जिसकी आपूर्ति भौतिक वस्तुओं, विषयों अथवा भौतिक ज्ञान द्वारा नहीं हो सकती। वे मनुष्य के अन्तराल को तृप्त नहीं कर सकतीं। अन्तराल में इस पीड़ा का होना इस शाश्वत तथ्य की परिचायक है कि शाश्वत आनन्द की प्राप्ति जीव की प्रमुख माँग है। उसे पाने की उत्कंठा भी उसमें प्रबल है। भीतर की यह आकाँक्षा और उत्कंठा उस दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिए के लिए सतत् प्रेरित करती रहती है। दृष्टि बहुमुखी होने के कारण मानव उसे बाह्य संसार में ढूंढ़ता है, उसका पुरुषार्थ एवं सामर्थ्य इस प्रयास में ही खप जाता है। इन्द्रियों की क्षणिक तृप्ति आग में घी डालने का काम करती है तथा अतृप्ति अग्नि को और भी तीव्र करती है। एक कामना की पूर्ति दूसरी कामना की और दूसरी तीसरी को, इस तरह अनेकों प्रकार की कामनाओं की शृंखला चल पड़ती है। उन सभी की पूर्ति कभी नहीं हो पाती। छोटा जीवन और अनन्त कामनाएँ। ईश्वर प्रदत्त अलभ्य अनुपम जीवन कामनाओं की पूर्ति में होकर नष्ट होता है और अन्ततः पल्ले पड़ती है- अशान्ति, अतृप्ति, असन्तोष और पश्चाताप।
आन्तरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि आनन्द का अजस्र स्रोत अन्दर बैठा सतत् अपना प्रवाह संप्रेषित कर रहा है। वह समझते ही दुश्चिन्तन कुचेष्टाएँ समाप्त होने लगती हैं- लालसाएँ कम होने लगती तथा चेष्टाएँ अन्तर्मुखी बन जाती हैं। ऐसा आत्म बोध चेतना के उद्गम स्थल पर ही पहुँचने पर सम्भव है।
सृष्टि की ओर सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह एक इकाई के रूप में प्रतीत होती है। विभेद तो स्थूल जगत तक सीमित है। सूक्ष्म में पहुँचने पर एकता का ही दिग्दर्शन होता है। इस तथ्य को संसार के सभी प्रमुख दर्शन एकमत से स्वीकार करते हैं। एकता के सूत्र में गुँथी प्रकृति में विभिन्नता उसके अवयवों में दिखाई पड़ती है किन्तु मूलतः वे सभी एकत्व के सूत्र में बँधे हुए हैं।
शरीर के सभी अंग एक समान नहीं होते। हाथ पैर, नेत्र, नासिका तथा अन्य शरीर के अंगों में मात्र रचना आकार-प्रकार की ही भिन्नता नहीं होती वरन् उनके कार्यों में भी भिन्नता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। एक अंग का जो कार्य है दूसरे का उससे सर्वथा भिन्न है। अंगों की रचना एवं उनके कार्य में भिन्नता होते हुए भी लक्ष्य की एकता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। वह है- शरीर को स्वस्थ एवं सन्तुलित बनाए रखना। शरीर के सर्वांगीण विकास के लिए यह व्यवस्था आवश्यक है। इस विषमता को देखकर विभिन्न अंगों की स्वतंत्र सत्ता एवं परस्पर एक दूसरे से भिन्न होने की मान्यता बना ली जाय तो यह भी भारी भूल होगी। सहयोग-सहकार का यह सिद्धान्त ही सृष्टि को सन्तुलित बनाए हुए है। प्रकृति के विभिन्न अंगों में अन्तर उनकी रचना एवं कार्य पद्धति का हो सकता है- लक्ष्य का नहीं। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, नदी, पहाड़ सभी मिल-जुलकर सृष्टि-चक्र को सन्तुलित तथा उसके प्रवाह को सुव्यवस्थित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करते हैं। देखा जाय तो न उसकी रचना में एकरूपता होती है और न ही कार्यों में। किन्तु इस भिन्नता में भी एक तथ्य अनिवार्य रूप से जुड़ा है, वह है- सम्पूर्ण सृष्टि को सन्तुलित रखना। प्रकृति द्वारा सौंपे गये दायित्व का निर्वाह उसके विभिन्न अंग-प्रत्यंग भलीभाँति करते देखे जाते हैं।
असन्तुलन की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब एकाँगी वर्चस्व सिद्ध करने की ललक उठती है कई बार क्षुद्र ग्रह-नक्षत्र संकीर्णता की भावना से प्रेरित होकर दूसरों से असहयोग और अपना स्वतंत्र स्थान बनाते एवं पृथक मार्ग अपनाते हैं। इस क्षुद्रता का कुछ लाभ तो मिलता नहीं उल्टे टकराकर चकनाचूर हो जाते हैं। विराट् सृष्टि का सन्तुलित प्रवाह सहयोग के ही सिद्धान्त पर चल रहा है। जड़ प्रकृति ही नहीं समस्त चेतन प्राणी भी एकता के सूत्र में आबद्ध हैं। विश्व का प्राणिमात्र का आश्रय एवं प्रकाशक एक चेतन सत्ता हैं। जड़ प्रकृति में उसका प्रवाह ही सौंदर्य उत्पन्न करता तथा समर्थता प्रदान करता है। चेतन जगत उसी से प्रकाशित है। मानव मात्र में उसी की सत्ता विद्यमान है। शरीर के कलेवर की भिन्नता में भी सब में मूल सत्ता की एकता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच उनके स्वभाव एवं क्रियाकलाप की दृष्टि से भिन्नता दिखाई पड़ती है।
व्यक्तिगत एवं सामूहिक विकास की दृष्टि से इस भिन्नता का होना आवश्यक है किन्तु इसको ही सत्य मानकर जब मनुष्य सबमें विद्यमान चेतन सत्ता के तथ्य को भुला बैठता है। तो ऐसी स्थिति में ही संघर्ष उत्पन्न है। विषमता की दीवार संकीर्णता उत्पन्न करती है। अपने पराये की भेद दृष्टि पनपती है। फलस्वरूप “एकत्व” दर्शन कर पाना सम्भव नहीं हो पाता।
मनुष्य-मनुष्य के बीच, वर्ग-वर्ग के बीच, राष्ट्र-राष्ट्र के बीच भिन्नता देखी जा सकती है। उनके क्रिया कलाप में अन्दर दिखायी पड़ सकता है। किन्तु उपयोगिता की दृष्टि से यह भिन्नता आवश्यक है। समाज में रहने वाले व्यक्तियों के कार्य एक समान नहीं होते। किसान अन्न पैदा करता है। जुलाहा कपड़ा बुनता है। कारीगर मकान बनाता है। मजदूर दैनिक जीवन की वस्तुओं का उत्पादन कारखाने में करता है। अध्यापन बच्चों को पढ़ाता है। कर्मचारी शासन व्यवस्था का दायित्व सँभालते हैं। व्यक्ति व्यक्ति के कार्यों में यह भिन्नता ही सामाजिक विकास का कारण बनती है। एक के कार्य दूसरे के लिए उपयोगी होते हैं। एकता के सूत्र में आबद्ध रहने के लिए कार्यों में विषमता का होना आवश्यक है। हर व्यक्ति यदि अन्न उत्पादन करने लगे तो अन्यान्य आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सकेगी। व्यवस्था अव्यवस्था के रूप में परिवर्तित हो जाएगी। सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाएगा।
एकत्व के सूत्र में जड़-चेतन सभी आबद्ध हैं। इस तथ्य को हृदयंगम करते हुए प्रत्येक मनुष्य को सहकारिता की, आदान-प्रदान की रीति-नीति अपनाना चाहिए। बाह्य भिन्नता में भी एकता की अनुभूति कर सकना तथा उससे मिलने वाले दिव्य आनन्द का लाभ उठा पाना तभी सम्भव है।
योगीराज अरविन्द के पूर्णयोग के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति। सर्वप्रथम साधना मार्ग में आत्म-शुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक साधना प्रणाली में परिशुद्धि का विधान है। शुद्धि का क्षेत्र व्यापक है। बाहर और भीतर दोनों ही क्षेत्र का परिशोधन आवश्यक है। हठयोग की साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है। पूर्णयोग की साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।
शुद्धि के प्रारम्भ होने का चिन्ह है समता का दिग्दर्शन। साधक प्रकृति की सब क्रियाओं को, द्वंद्वों और अविद्या के आक्रमण को, अपने अज्ञान को समता की दृष्टि से देखता है तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। शुद्धि के अंतर्गत मन बुद्धि चित्त अहंकार और प्राण की सभी परतें समाहित हैं। इस सबका परिष्कार आवश्यक है।
पूर्णयोग और आत्मसिद्धि का दूसरा अंग महर्षि अरविन्द के अनुसार है- मुक्ति। मुक्ति का अर्थ है आत्मा का जीव शरीर के बन्धनों एवं आकर्षणों से परे हो जाना तथा आत्मा की असीम अमरता में उन्मुक्त हो जाना। महर्षि का कहना है कि- “समस्त स्थूल क्रिया-कलापों अथवा प्रकृतिगत चेष्टाओं का परित्याग कर निष्क्रिय निर्वाण स्थिति में पहुँचने का नाम मुक्ति नहीं है जैसा कि कितने चिंतक कहते हैं। यह एक ऐसा आन्तरिक परिवर्तन है जो साधक को दिव्य बनाता है। मुक्ति के दो चरण हैं- परित्याग और ग्रहण। जिसमें एक निषेधात्मक पक्ष है दूसरा भावनात्मक। मुक्ति की निषेधात्मक गति का अर्थ है- अपनी सत्ता की निम्न प्रकृति के प्रधान बन्धनों एवं मुख्य ग्रन्थियों से छुटकारा पाना। उसके भावनात्मक पक्ष का अर्थ है- उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता में समाहित हो जाना- उसकी दिव्य अनुभूतियों में रमण करना। वैचारिक दृष्टि से मुक्ति का अर्थ है निष्काम और निरहंकार होना, मन और अन्तरात्मा में त्रिगुण से रहित, निस्त्रैगुण्य होना। मुक्ति के सभी मौलिक तत्व दार्शनिक दृष्टि से इस लक्ष्य में समाहित है। भावनात्मक अभिप्राय मुक्ति का है- अपनी आत्मा को विश्वात्मा के साथ एक करना उच्चतम दिव्य प्रकृति को धारण करना। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि भगवान के समान बनना। यही मुक्ति का सम्पूर्ण और समग्र आशय है।
शुद्धि और मुक्ति सिद्धि की पूर्वावस्थाएँ हैं। आध्यात्मिक सिद्धि का अर्थ योगीराज अरविन्द की दृष्टि में है- भागवत सत्ता की प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त करना। पर विभिन्न दर्शनों में सिद्धि की मान्यता के संदर्भ में मतभेद मायावादी के लिए सत्ता का सर्वोच्च तथा एकमात्र वास्तविक सत्य निर्विकार निर्गुण एवं आत्म सचेतन ब्रह्म है। इसलिए आत्मा की निर्विकार शान्ति तथा शुद्ध आत्म चेतनता में विकसित होना ही उसका सिद्धि विषयक विचार है तथा व्यक्तिगत अहंता का परित्याग करके शान्त आत्म ज्ञान में प्रतिष्ठित होना ही उसका मार्ग है। बौद्ध-मतावलम्बो के लिए उच्चतम सत्य सत्ता का अस्वीकार है। अतः उसके लिए सत्ता की क्षणिकता, कामना की विनाशकारी निःसारता का बोध, अहंकार का तथा उसे धारण करने वाले विचार संस्कारों का एवं कर्म श्रृंखलाओं का विलय ही सर्वांगपूर्ण मार्ग है। प्रत्येक दर्शन अपने-अपने विचार के अनुसार भगवान के साथ कुछ सादृश्य प्राप्त करता है और प्रत्येक तद्नुरूप अपना मार्ग ढूँढ़ निकालता है।
पर सर्वांगीण योग के लिए सिद्धि का अर्थ- एक ऐसी दिव्य आत्मा और दिव्य कर्म को प्राप्त करना होगा जो जगत में दिव्य सम्बन्ध और दिव्य कर्म का खुला क्षेत्र प्रदान करेंगे। अपने समग्र स्वरूप में उसका अर्थ है- सम्पूर्ण प्रकृति को दिव्य बनाना तथा उसके अस्तित्व और कर्म की समस्त असत्य ग्रन्थियों का परित्याग करना।
सिद्ध या पूर्णता प्राप्त पुरुष उस ब्राह्मी चेतना में पुरुषोत्तम के साथ एक होकर जीवन धारण करता है। वह सर्व मय ब्रह्म, सर्व ब्रह्म में, अनन्त सत्ता और अनन्त गुणों वाले ब्रह्म, अनन्त ब्रह्म में स्वयंभू- चैतन्य स्वरूप और विश्व ज्ञानमय ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म में, स्वयंभू आनन्द स्वरूप और विराट् अस्तित्व- आनन्दमय ब्रह्म, आनन्द ब्रह्म में सचेतन होकर निवास करेगा। वह सम्पूर्ण विश्व को एक असीम विराट् सत्ता की अभिव्यक्ति अनुभव करेगा तथा समस्त गुणों एवं कर्मों को उसकी विराट् और असीम शक्ति की क्रीड़ा। उच्चतर अनुभूति की आनन्दमय स्थिति में वह उस तत् के साथ एक होगा। जो समस्त सत्ता का उद्गम और आधार है- सबको अन्तर्वासी, मूल आत्म तत्व और उपादान शक्ति है। यही है- आत्मसिद्धि की पराकाष्ठा।
भूक्ति का अर्थ अरविन्द की दृष्टि में है- ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’। अर्थात्- अनासक्त भाव से उसको (भोगों को) भोगो। कामना प्रेरित जीवन में रहकर भोग को भोगने का प्रयत्न करना निश्चय ही लक्ष्य प्राप्ति में बाधक है। जीवन में दिव्य पूर्णता का आविर्भाव करना, सम्पूर्ण जीवन को अध्यात्मिक शक्ति का क्षेत्र मानकर दिव्य भोग करना ही भुक्ति का रहस्य है। इस तरह पूर्ण योग में जीवन के दिव्य भोग के आदर्श को अरविन्द ने स्वीकारा है। पूर्णयोग के साधक को इस विश्व उपवन में उत्पन्न हुए दिव्य आनन्द का उपभोग करना चाहिए।
महर्षि अरविन्द के अनुसार समर्पण का अर्थ है- अपनी सम्पूर्ण प्रकृति को- अपने आपको भगवान के हाथ में सौंप देना। हमें अपनी प्रत्येक चीज को- बाह्याभ्यन्तरिक विभूतियों को उस विश्वमय विश्वातीत परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए। अपने संकल्प अपने भाव और अपने विचार को उस एक बहुरूप भगवान पर पूर्णरूपेण एकाग्र करना और अपनी सम्पूर्ण सत्ता को भगवान पर ही न्यौछावर करा देना समर्पण योग की एक निर्णायक गति है। यह अहं का उस ‘तत्’ की ओर मुड़ना है जो उससे अनन्त गुना महान् है। इसी में आत्म समर्पण की पूर्णता है।
सर्गे-सर्गे पृथगरूप सन्ति सर्गान्तराण्यपि। तेष्वप्यंतःस्थसर्गोधाः कदलीदल पीठवत॥ -योग वशिष्ठ 4।15।16-1
आकाशे परमाष्वन्तर्द्र व्यादेररणुकेऽपिच। जीवाणुर्यत्र तत्रेंद जगदवेत्ति निजं वपुः॥ -योग वाशिष्ठ 3।44।34-35
अर्थात्- हे लीला! जिस प्रकार केले के तने के अन्दर एक के बाद एक परतें निकलती चली आती हैं। उसी प्रकार प्रत्येक सृष्टि के भीतर नाना प्रकार के सृष्टि क्रम विद्यमान हैं। इस प्रकार एक के अन्दर अनेक सृष्टियों का क्रम चलता है। संसार में व्याप्त चेतना के प्रत्येक परमाणु में जिस प्रकार स्वप्नलोक विद्यमान है उसी प्रकार जगत में अनन्त द्रव्य के अनन्त परमाणुओं के भीतर अनेक प्रकार के जीव और उनके जगत विद्यमान हैं।
जलती हुई आग के पास बैठकर घोर शीत में भी सर्दी से बचा जा सकता है। आग अपने आसपास के समीपवर्ती क्षेत्र को भी गर्म करती है। वह अपनी ताप किरणें दूर-दूर तक फैलाती है और निकटवर्ती क्षेत्र को गर्म रखती है। यों शरीर में भी गर्मी होती है। साँस के द्वारा उस गर्मी को अनुभव किया जा सकता है और देह के संपर्क में जो वस्त्र आते हैं वे भी गरम हो जाते हैं। सर्दियों में कपड़े पहनकर सर्दी से इसीलिए बचा जा सकता है कि इन वस्त्रों से शरीर की गर्मी बाहर निकलने से बच जाती है और शरीर गर्म रहता है। मनुष्य में रहने वाली तापशक्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण और प्रखर शक्ति है- विचार शक्ति। उसकी प्रचण्डता देखते ही बनती है।
इस शक्ति का- विचार शक्ति एवं इच्छा शक्ति का निर्माण मस्तिष्क में होता है। विचार शक्ति और इच्छा शक्ति की प्रचण्डता तथा प्रखरता के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष जगत में देखे जा सकते हैं। कई लोगों ने तो अपनी इस शक्ति का विकास इस स्तर तक किया है कि उनकी मिसाल दी जा सकती है और सामान्यजनों के लिए वे प्रसंग चमत्कारी ही कहे जा सकते हैं। ड्यूक विश्वविद्यालय की परामनोविज्ञान प्रयोगशाला ‘अमेरिकन सोसाइटी फार साइकिक पावर’ तथा कुछ अन्य विश्वविद्यालयों ने इस सम्बन्ध में रुचि दिखाई है और ऐसे अनेक उदाहरण एकत्रित किए हैं। जिनमें विचार या इच्छा शक्ति का महत्व समझा जा सके।
इन प्रसंगों में रेड सीरियस का उदाहरण बहुत चमत्कारी कहा जा सकता है। रेड के सम्बन्ध में पत्र-पत्रिकाओं में बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है। पिछले दिनों अमेरिका के ही एक व्यक्ति आइजक बोर्न ने स्पेन के समुद्र में डूबे जहाजों का पता लगाने के लिए अपनी विचार शक्ति का प्रयोग किया और तमाम उपाय असफल हो जाने के उपरान्त इस पद्धति से सफलता प्राप्त की। अतीन्द्रिय शक्तियों में से अधिकाँश इन्हीं विचार और इच्छा शक्ति का परिणाम है। दूर-दर्शन, दूरानुभूति पूर्वाभास आदि अतीन्द्रिय विशेषताएँ प्रकारान्तर से इसी विचार शक्ति के परिणाम हैं।
यहाँ यह तथ्य समझ लेना चाहिए कि विचार शक्ति और इच्छा शक्ति में बहुत थोड़ा-सा अन्तर है। इन दोनों का निर्माण मस्तिष्क में होता है, यहाँ तक तो कोई विवाद नहीं है, लेकिन यहाँ आकर इच्छा शक्ति विचार शक्ति का पलड़ा भारी हो जाता है कि इच्छा शक्ति का प्राण है। कहा जा सकता है कि इच्छा शक्ति की प्रबलता से मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ती है। मस्तिष्कीय उपचारों से कदाचित ही किन्हीं जड़मति लोगों को बुद्धिमान बनाया जा सकता हो पर इच्छा शक्ति की प्रेरणा से वरदराज जैसे अगणित मन्दमति लोग उच्च श्रेणी के विचारवान बुद्धिमान बन सकते हैं। अन्तःप्रेरणा उनके अविकसित मस्तिष्क को विकसित स्तर का बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित की है।
यह शक्ति कहाँ से आती है? एक ही उत्तर है, इस शक्ति का स्रोत और निवास स्थान मस्तिष्क है। निश्चित रूप से उसे जादू का पिटारा कहा जा सकता है। यद्यपि इन दिनों विलक्षण कम्प्यूटरों का निर्माण हो रहा है। इनके निर्माण से कठिन बौद्धिक कार्यों को बड़ी सरलता से सम्पादित किया जा सकता है। इस कारण इनकी बड़ी चर्चा प्रशंसा की जाती है। किन्तु मस्तिष्कीय क्रियाकलापों को देखा जाए तो उनकी तुलना में अब तक के बने सभी कम्प्यूटर आविष्कारों को न्यौछावर किया जा सकता है। यह एक ऐसा यन्त्र है जिसका तुलना का या बराबरी का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना कल्पना के बाहर की बात है।
प्रकृति के इस अद्भुत विलक्षण आविष्कार के क्रियाकलापों को केवल जीवनयापन सम्बन्धी गतिविधियों तक ही सीमित समझना या यह सोचना कि यह केवल सोच विचार में ही लगा रहता है और उसकी शक्ति इतने तक ही सीमित रहती है, गलत होगा। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों का क्षेत्र इससे बहुत आगे तक व्यापक है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बखेरता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प, भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उसके संयुक्त सम्मिश्रण के रूप में सम्बोधित किया या पहचाना जा सकता है। इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को अनजाने ही असाधारण रूप से प्रभावित करता रहता है। इसे अनन्त आकाश में भरे ईथर तत्व के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।
तालाब में ढेला फेंकने पर जिस प्रकार चारों ओर पानी की लहरें इकट्ठी होती रहती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी ईथर महासागर में हमारे विचार अपने स्तर के प्रहार करते हैं और उनके प्रकाश ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती हैं। वे कुछ दूर आकर ही समाप्त नहीं हो जातीं वरन् अनन्त आकाश में भ्रमण करती हुईं निकल जाती हैं। स्पष्ट है कि किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने से उसका अन्त प्रारम्भ किये जाने वाले स्थान पर ही होता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुईं वापस अपने उद्गम स्रोत पर लौट आती हैं। इस प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। एक तो उसी स्तर की विचार बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं और जब वे वापस लौटते हैं तो अपने इस उत्पादन को नये आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ पहुँचाते हैं।
किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं नहीं उठाता है। उसे लाभ मिलता है परन्तु उसके कृषि कर्म से जो उत्पादन होता है, जो लाभ अर्जित किया जाता है उसमें अन्य अनेकों का भी हिस्सा होता है। किसान द्वारा उत्पादित किये गये अन्न से सैकड़ों व्यक्तियों को भोजन मिलता है। विचारों का उत्पादन भी इसी प्रकार कृषि कार्य है। पशु अपनी शरीर यात्रा सम्बन्धी सोच विचारों में ही लगे रहते हैं इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।
किसी तरह की भावनाएँ चिन्तन में- विचार तरंगों में- प्रखरता उत्पन्न करती हैं? एक ही शब्द में यदि इसका उत्तर देना हो तो कहना होगा- आदर्शवादी भावनाएँ। आदर्शवादी भावनाएँ ही मनुष्य को उच्च स्तर का चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।
समान विचार वाले लोगों को अपने स्तर के नये विचार अन्तरिक्ष में व्याप्त ईथर तत्व से मिलते रहते हैं। या कि कहना चाहिए, उन्हें वहाँ से पोषण मिलता रहता है। सजातीय तत्वों के आकर्षण का प्रकृति नियम सर्वविदित है। धातुओं के कण धूलि में बिखरे रहते हैं परन्तु जिधर इन धातुओं की खदानें होती हैं उधर ये कण धीरे-धीरे सहज ही खिसकते तथा खदान में इकट्ठे होते जाते हैं। सभी नदियाँ समुद्र की दिशा में सहज ही बहती हैं। नाले नदियों की तरफ दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातीय विचारों की ओर उसी तेजी से दौड़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोरी, लबारी, जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं तो इसका यही कारण है और सन्त सज्जनों के सत्संग जमे रहते हैं तो इसका कारण भी यही है। अर्थात् जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे वहाँ उसी स्तर की अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गई विचार तरंगें भी आकर्षित होती हैं और अपना अड्डा जमा लेती हैं।
इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उस समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं, अपने रेडियो यन्त्र से उन्हीं का संपर्क हो पाता है जिन्हें अपना रेडियो पकड़ता है। विचार तरंगों को भी रेडियो तरंगों का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती उमड़ती हैं और सभी को स्पर्श भी करती हैं। सभी पर वे सूक्ष्म प्रवाह भी छोड़ती हैं, पर विशेष प्रवाह अपने सजातियों पर ही डालती हैं। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है, जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हों। दुर्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।
शारीरिक पुण्य पापों की तरह मानसिक पुण्य पापों की चर्चा धर्मशास्त्रों में मिलती है और उनके अनेक भले बुरे परिणाम होने की बात भी कही जाती है। इस प्रतिपादन में ठोस तथ्य है। कहा जा चुका है कि हमारा चिन्तन परोक्ष रूप से सारे विश्व को प्रभावित करता है, ऐसी दशा में हमारे क्रिया-कलापों द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही कुछ क्षति पहुंचाई गई अथवा सेवा सहायता की गई तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें निश्चित रूप से मिलना चाहिए और वह मिलता है। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्व है, लेकिन मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक, नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रभाव होता है तो परिणाम क्यों नहीं मिलेगा?
जब चाहे जैसी कल्पनाएँ करने के लिए हर कोई स्वतन्त्र है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि यह कोई निरर्थक मनोविनोद मात्र है। विचारों की शक्ति और उनका महत्व आग या बिजली की तरह है। उनके साथ मखौलबाजी करना खतरनाक है। दुष्टता और दुराचार की कल्पना भर करते रहें, योजना भर बनाते रहें, उसी स्तर के सजातीय विचार चारों ओर से दौड़ पड़ेंगे और मस्तिष्क पर हावी हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हमारे प्रादुर्भूत विचार अनेक गुनी शक्ति सामर्थ्य से भर जायेंगे तथा उनके अच्छे-बुरे परिणाम सामने आ उपस्थित होंगे। यदि कोई व्यक्ति बुरे विचारों में निमग्न है तो स्वभावतः उस बुराई की अगणित प्रेरणाएँ योजनाएँ उसके मस्तिष्क के सामने आती चली जायेंगी और उसका मन क्रमशः उसके लिए प्रशिशित होता चला जाएगा।
कहा जा चुका है कि विचारशक्ति को विद्युत शक्ति जैसे अणु शक्ति जैसी- प्रचण्ड सामर्थ्य का माना जाना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए कि उसका सही सदुपयोग क्या हो सकता है? अपने पास धन सम्पत्ति हो तो उसका ऐसे ही निरर्थक कार्यों में कोई अपव्यय नहीं करता है। धन की बर्बादी करने से लोग क्षतिग्रस्त होते, नुकसान उठाते और उपहासास्पद बनते हैं। यही तथ्य विचारों की सम्पदा पर भी लागू होना चाहिए। जिन विचारों को अपनाया गया है वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में काम करने के लिए किया शक्ति को सहमत तथा तत्पर कर लेते हैं। अवाँछनीय विचारों को मस्तिष्क में स्थान देने और उन्हें वहाँ जड़े जमाने देने का अर्थ है भविष्य में हम उसी तरह का जीवन जीने की तैयारी कर रहे हैं। भले ही यह सब अनायास या अनपेक्षित रीति से हो रहा है, परन्तु उसका परिणाम तो होगा ही। उचित यही है कि हम उपयुक्त और रचनात्मक विचारों को ही मस्तिष्क में प्रवेश करने दें। यदि उपयोगी और विधायक विचारों का आह्वान करने और उन्हें अपनाने का स्वभाव बना लिया जाए तो निस्सन्देह प्रगति पथ पर बढ़ चलने की सम्भावनाएँ आश्चर्यजनक गति से विकसित हो सकती हैं।
विचारों एवं कृत्यों से दृश्य के अतिरिक्त एक अदृश्य सूक्ष्म वातावरण भी तैयार होता है जो चिरकाल तक बना रहता है, अपने भले-बुरे प्रभावों से जुड़े परिकर को प्रभावित करता है। मानवी चिन्तन एवं क्रिया-कलाप तत्काल प्रतिक्रिया दिखाकर समाप्त नहीं हो जाते वरन् एक सूक्ष्म वातावरण का भी निर्माण करते हैं। जिसे थोड़े प्रयत्नों से अनुभव किया जा सकता है। स्थानों की महत्ता सर्वविदित है। वे अदृश्य किन्तु जीवन्त व्यक्तित्व होते हैं। देवालय, तीर्थ मदिरालय, बूचड़खाना, अपने-अपने स्तर के वातावरण बनाते, प्रभाव छोड़ते तथा प्रेरणा देते हैं। नदी के तीव्र प्रवाह में खर-पतवार ही नहीं विशालकाय वृक्ष तक बहते देखे जाते हैं। भीड़ के प्रवाह के साथ जन-मानस मुड़ता बहता देखा जाता है। सूक्ष्म वातावरण का भला-बुरा प्रभाव भी लगभग इसी स्तर का होता है।
विचारों की प्रतिक्रिया जीवंत प्राणियों पर ही नहीं वृक्ष वनस्पतियों पर भी पड़ती देखी गयी है। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस से लेकर विश्व के मूर्धन्य वनस्पति शास्त्रियों ने इस तथ्य की पुष्टि की है- वृक्ष वनस्पतियां भी विचारों एवं सम्वेदनाओं को उसी तरह ग्रहण करते हैं, जिस प्रकार कि प्राणी समुदाय न्यूयार्क के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री वेक्स्टर के पौधों पर किये गये अनुभूतिजन्य प्रयोगों से अमरीकी प्रोफेसर मार्केल वोगल विशेष प्रभावित हुए। एक वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक होने के कारण उन्होंने पेड़-पौधों पर प्रयोग करने में गहरी रुचि ली। अपनी एक शोध सहायिका को उन्होंने सम्बद्ध विषय की रूपरेखा समझाकर आवश्यक निर्देश दे दिया।
विवियन विले उद्यान के पेड़ से दो हरी पत्तियाँ तोड़ लायीं। एक पत्ती उन्होंने अपने ड्राइंग रूम में, दूसरी को अपने सोने के कमरे में बिस्तर के निकट एक मेज पर रख दिया। पलंग के पास रखी पत्ती को वह नित्य स्नेह भरी निगाहों से देखती, अपनत्व उड़ेलती जैसी कोई व्यक्ति अपने अत्यन्त स्नेह पात्र के प्रति बखेरता है। मन में वह पत्ती को हरा भरा बने रहने की कामना करती। दूसरे कमरे में रखी पत्ती को उन्होंने जान-बूझकर उपेक्षित रखा। एक माह बाद उन्होंने अपने मित्र बोगल को एक विशिष्ट प्रकार के फोटो कैमरे के साथ आने को आमन्त्रित किया। बोगल ने दोनों पत्तियों का अलग-अलग फोटो लिया। दोनों ने फोटो का अध्ययन किया। यह देखकर उन्हें भारी आश्चर्य हुआ कि जो पत्ती ड्राइंग रूम में उपेक्षित रखी थी उसका चित्र मुरझाया हुआ आया, किन्तु दूसरी पत्ती का चित्र हरा-भरा तथा ताजा लग रहा था।
इस निष्कर्ष को और पुष्ट करने के लिए उन्होंने प्रयोग क्रम को आगे बढ़ाया। पौधों की संवेदनशीलता जानने के लिए उन्होंने एक दूसरा प्रयोग किया। एक पौधे का सम्बन्ध गैल्वेनोमीटर के तार से जोड़ दिया। अपनी स्नायुओं को शिथिल करके लम्बी-लम्बी साँस खींचते हुए पौधे के ऊपर हाथ फेरने लगे। उस समय उनके मन में पौधे के प्रति स्नेह भाव उमड़ रहे थे। पीलीग्राफ पर उन्होंने देखा कि तरंगों की रेखा अंकित हो गयी है। विचारों का क्रम चार मिनट तक चलता रहा। वह टूटते ही यन्त्र में तरंगों का अंकन बन्द हो गया। गैल्वेनो मीटर का सम्बन्ध पौधे से विच्छेद करके थोड़ी देर के लिए उन्होंने विश्राम दिया। पुनः गैल्वनो मीटर से जोड़कर पहले वाली विचार शृंखला का प्रयोग आरम्भ किया। पोलीग्राफ पर उसी प्रतिक्रिया की पुनरावृत्ति हुई। इस प्रयोग से निष्कर्ष निकला कि पौधे में न केवल संवेदनशीलता होती है वरन् उनसे संचार सम्बन्ध भी स्थापित किया जा सकता है।
एक अन्य प्रयोग में डा. वोगल ने अपने एक मिल को प्रयोगशाला में बुलाया। कमरे में रखे पौधे का सम्बन्ध पोलीग्राफ से जोड़कर उन्होंने मित्र से किसी विषय पर गम्भीरता से सोचने के लिए कहा। निरन्तर अठारह सेकेंड तक यन्त्र ने पोलीग्राफ पर अपनी प्रतिक्रिया अंकित की। एकाएक अंकन रुक गया। डा. ने मित्र से पूछ- ‘क्या उन्होंने सोचना बन्द कर दिया है। मित्र ने स्वीकारात्मक उत्तर दिया यह देखने के लिए कि बीच में प्रयोग रोक देने तथा पुनः आरम्भ किये जाने पर प्रतिक्रियाओं में क्या अन्तर आता है, उन्होंने थोड़ी देर के लिए प्रयोग रोक दिया। कुछ समय बाद पौधे को गैल्वेनो मीटर से जोड़कर मित्र को पुनः उसी विषय पर सोचने का निर्देश दिया। उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा कि दुबारा अंकित तरंगों तथा पहले की तरंगों में थोड़ा भी अन्तर न था। डा. बोगल ने इस निष्कर्ष के बाद घोषणा की कि पौधे न केवल संवेदनशील होते हैं, बल्कि उनमें स्मृति की भी विशेषता पायी जाती है।
प्रख्यात रूसी मनोवैज्ञानिक वी. यन पुश्किन का एक रोचक प्रयोग विवरण वैज्ञानिक पत्रिका ‘कोनियासिला’ में प्रकाशित हुआ जो इस प्रकार था-
तान्या नामक एक सुन्दर युवा लड़की को सम्मोहित किया गया। पौधे का सम्बन्ध यन्त्र से जोड़ा गया। डा. पुश्किन ने लड़की से पूछा क्या तुम सचमुच ही एक सुन्दर लड़की हो? लड़की ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सकारात्मक उत्तर दिया। उन्होंने लड़की के व्यक्तिगत जीवन के संदर्भ में भी अनेकों प्रश्न पूछे। जब तक वह प्रश्नों का सही उत्तर देती रही पोलीग्राफ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं अंकित हुई, पर जैसे ही प्रश्नों के बौछार से झल्लाकर उसने गलत उत्तर देना शुरू किया गैल्वेनोमीटर की सुई घूमने लगी तथा पोलीग्राफ पर तरंगें अंकित होने लगीं। लड़की के सामान्य अवस्था में आने पर डा. ने गलत उत्तरों के विषय में दुबारा पूछा। उसने स्वीकार किया कि जिन प्रश्नों के उत्तर में यन्त्र ने प्रतिक्रिया दर्शायी वे गलत थे। पुश्किन ने कहा कि पौधे तथा मनुष्य ने नाड़ी संस्थान में कहीं न कहीं सूक्ष्म सम्बन्ध है तथा वे झूँठ को पकड़ने में भी सक्षम हैं।
न्यूयार्क के डा. कल्यू ने एक विचित्र तथ्य का उद्घाटन किया है कि पौधे मात्र विचारों को ग्रहण करने में ही नहीं मनुष्य के कृत्यों की गवाही देने में भी समर्थ हैं। एक प्रयोग में उन्होंने दो पौधों को पोलीग्राफ से जोड़ा। छह व्यक्तियों को कमरे में बुलाकर छह मिली हुई कागज की पर्चियाँ रखीं तथा उनमें से प्रत्येक को कहा कि एक पर्ची उठा लें तथा जैसा निर्देश पर्ची पर लिखा है उसका बिना बताये पालन करें। उन पर्चियों में से एक पर लिखा था कि अवसर देखकर चुपके से कमरे में रखे पौधों में से एक को नष्ट कर दें। यह जानकारी किसी को नहीं थी कि उक्त निर्देशों वाली पर्ची किसके पास है। जिस व्यक्ति को वह पर्ची मिली उसने चुपके से एक पौधे को नष्ट कर डाला।
एक सप्ताह बाद डा. ने उन छह व्यक्तियों को पुनः बुलाया तथा शेष एक पौधे के सामने से गुजारा। पाँच व्यक्ति पौधे के सामने से होकर निकल गये पर गैल्वेनोमीटर में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। छठे व्यक्ति के आते ही यंत्र की सुई तेजी से घूमने लगी तथा पोलीग्राफ पर तरंगें अंकित होने लगीं। डा. क्ल्यू ने उस व्यक्ति से पूछताछ की तो मालूम हुआ कि उसने ही एक पौधे को नष्ट कर डाला था। गैल्वेनोमीटर की सुई घूमने का यही कारण था।
एक दूसरे प्रयोग में उन्होंने ड्रेकेनामे सेंजियाना नामक पौधे की एक शाखा को पोलीग्राफ लाइटिरेक्टर के तार से जोड़ दिया। पौधे की जड़ में थोड़ा पानी डाला तथा गल्वेनोमीटर में हल्की विद्युत तरंगें छोड़ दी। गैल्वेनोमीटर की सुई में गति आरम्भ हो गयी। यह जानने के लिए पौधे के ऊपर सुखद प्रतिक्रिया हुई या यह मात्र एक संयोग था। उन्होंने पौधे की एक शाखा को जलाने का विचार किया। एकाएक उनकी दृष्टि पौधे से जुड़े गैल्वेनोमीटर पर पड़ी। वेक्स्टर यह देखकर विस्मित रह गये कि पौधे को जलाने का विचार आते ही गैल्वेनोमीटर की सुई विपरीत दिशा में नीचे ग्राफ पर ऊर्ध्ववक्र रेखा में तेजी से गति करने लगी। यह प्रतिक्रिया विचारों से हुई अथवा किन्हीं और कारणों से। यह परखने के लिए वेकस्टर ने माचिस की एक तीली जलायी तथा पौधे की ओर इस प्रकार बढ़ाया जैसे जलाने जा रहे हों, पर उनके मन में पौधे को जलाने का कोई विचार न था। जो पौधा पहले जलाये जाने के भय की प्रतिक्रिया गैल्वेनोमीटर में तेजी से दे रहा था विचार के उलटते ही शान्त पड़ गया। वेक्स्टर ने निष्कर्ष निकाला कि मन में चलने वाले विचारों को पौधा पकड़ने में पूर्णतया सक्षम है।
एक अन्य प्रयोग में उन्होंने पोलीग्राफ को एक पौधे से जोड़कर उसका सम्बन्ध एक व्यक्ति से कर दिया। उस व्यक्ति ने व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित उन्होंने अनेकों प्रश्न पूछे। प्रश्न का उत्तर सही आने पर गैल्वेनोमीटर में कोई गति नहीं होती थी, पर जिस प्रश्न का उत्तर वह हड़बड़ाकर गलत देता था गैल्वेनोमीटर की सुई एकाएक घूमने लगती थी प्रयोग के उपरान्त उस व्यक्ति ने स्वीकार किया कि जिस प्रश्न का उत्तर उसने गलत दिया। गैल्वेनोमीटर ने उसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त की।
विचार व्यक्त हो अथवा अव्यक्त उनका भला-बुरा प्रभाव पड़ना सुनिश्चित है। सूक्ष्म वातावरण में वे बने रहते हैं तथा अनायास ही दूसरों को जाने अनजाने प्रभावित करते रहते हैं। परिवार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। प्रायः बच्चों को सत्याचरण के लिए अभिभावक- माता-पिता शिक्षा देते रहते हैं, पर उन बच्चों की संख्या अत्यल्प होती है जो उन शिक्षाओं का पालन करते हैं। उन्हें झूँठ बोलने की कोई ट्रेनिंग नहीं मिलती पर देखा यह जाता है कि अधिकाँश बच्चे झूँठ बोलने में पारंगत हो जाते हैं। कारणों की खोज करने पर पता चलता है कि अभिभावकों के आन्तरिक विचार उनकी कथनी के विपरीत होते हैं। अव्यक्त होते हुए भी उसका दुष्प्रभाव बच्चे पर पड़ता है। पेड़-पादप तक जब विचारों का भली-बुरी प्रतिक्रियाओं को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं तो भला चेतना सम्पन्न बच्चा उनसे कैसे अछूता रह सकता है।
न केवल विचारों को अपितु विगत कृत्यों को पकड़ने की भी सामर्थ्य पौधों में विद्यमान होती है। अपने प्रयोग शृंखला में डा. वेक्स्टर को एक रोचक किन्तु विचित्र रहस्य हाथ लगा। एक कनाडा की महिला उनके प्रयोगों का अध्ययन करने आयी। वह स्वयं भी पौधों पर कार्य कर रही थी। डा. की प्रयोगशाला में गैल्वेनोमीटर से जुड़े पौधे का निरीक्षण करती वह गुजर रही थी। एक पौधे के समक्ष पहुंचते ही गैल्वेनोमीटर की सुई में एकाएक तीव्र गति आरम्भ हो गयी। ग्राफ पर एक विशेष प्रकार की तरंगें अंकित होने लगी जो यह बताती थी कि पौधे भयभीत हो गये। डा. वेक्स्टर ने उस महिला से पूछा कि क्या वह पौधों को प्रयोग के दौरान नष्ट भी करती है। महिला को भारी अचरज हुआ। उसने बताया कि ठीक उसी समय वह अपने एक प्रयोग के विषय में सोच रही थी जिसमें पौधे की टहनी तोड़कर भट्टी में भूनती थी। डॉक्टर ने गैल्वेनोमीटर की सुई में गति का कारण स्पष्ट करते हुए बताया कि मस्तिष्क में उक्त महिला के चल रहे आक्रामक विचारों को पौधे ने पकड़ लिया।
इन आश्चर्यजनक निष्कर्षों से वैज्ञानिकों को यह विश्वास हो चला है कि जड़ चेतन के बीच ऐसा कोई सूक्ष्म सम्बन्ध है, जो परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करता है। यह विचार भारतीय दर्शन की उस मान्यता की पुष्टि करता है जिसमें ऋषि कहता है-
यो देवो अग्नो यो अप्सु, यो विश्वं भुवनमाविवेश। य औषधीषुयो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमोनमः। -श्वेताश्वतरोपनिषद
अर्थात्- जो चेतना अग्नि में, जल में, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, औषधियों एवं वनस्पतियों आदि में संव्याप्त है, उसको नमस्कार है।
ये सभी उदाहरण विचारों की असाधारण महत्ता पर प्रकाश डालते हैं। वे इस बात की प्रेरणा देते हैं कि विचार स्वयं में शक्ति पुँज हैं। अपनी भली-बुरी प्रतिक्रियाओं से समीपवर्ती समूचे वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। रेडियो विकिरण की विषाक्तता जिस तरह दीर्घकाल तक वातावरण में बनी रहती है तथा अनेकों प्रकार के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समस्याओं को जन्म देती है, उसी तरह विचार भी सूक्ष्म रूप से अदृश्य वातावरण में बने रहते हैं और अपने स्तर के अनुरूप प्रेरणा देते- प्रभाव छोड़ते हैं। तत्काल ही नहीं, दूरगामी परिणामों की दृष्टि से भी श्रेष्ठ, उदात्त विचारों की महत्ता असाधारण है। शुभ एवं कल्याणकारी सोचने में ही मनुष्य एवं समाज सबका ही हित है।
समस्याएँ असन्तुलन से उत्पन्न होती हैं। समग्र दृष्टि का अभाव और एकाँगी प्रयत्नों के कारण ही अनेकानेक समस्याओं का जन्म होता है तथा वे संकटों का कारण बनती हैं। सन्तुलित एवं सुव्यवस्थित जीवन क्रम के लिए उन सभी पक्षों का समावेश करना होता है जो शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हों। मानवी काया जड़ चेतन के समन्वय से बनी है। शरीर भौतिक तत्वों से पुष्ट होता और उत्कृष्ट विचारणा एवं उदात्त सम्वेदनाओं से। इन दोनों के समन्वय को ही जीवन दर्शन की संज्ञा दी जा सकती है। जिस पर व्यक्ति एवं समाज की प्रगति एवं उन्नति अवलम्बित है। असन्तुलन सामंजस्य का अभाव ही विभिन्न प्रकार की समस्याओं को जन्म देता तथा मानवी अधःपतन का कारण होता है।
आकृति विज्ञान द्वारा गढ़ी जाती है, प्रकृति अध्यात्म द्वारा। साधनों के निर्माण में विज्ञान का योगदान होता है, व्यक्तित्व में अध्यात्म का। प्रकृतिगत स्थूल रहस्यों का उद्घाटन विज्ञान करता है। उसके सूक्ष्म रहस्यों- उद्देश्यों को अध्यात्म। वस्तुओं के आकार-प्रकार एवं संरचना का विश्लेषण विज्ञान का विषय है और उन संरचना के लक्ष्य एवं मूलभूत कारणों का उद्घोष अध्यात्म करता है। क्षेत्र एवं प्रकृति की भिन्नता होते हुए दोनों में एक मूलभूत समानता यह है कि दोनों ही सृष्टि के मूलभूत रहस्यों को जानना चाहते हैं। अन्तर मात्र इतना है कि एक खोज करता है कि अमुक वस्तु क्या है, जबकि दूसरे की खोज वस्तु क्यों है? पर टिकी हुई है। आवश्यकता सामंजस्य की है- परस्पर सहयोग की है। एक नदी के दो पाट- एक क्षितिज के दो छोर होते हुए भी नदी और क्षितिज के प्रवाह विस्तार से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
सामंजस्य के अभाव ने ही अनेकानेक समस्याओं को जन्म दिया है। विज्ञान ने प्रकृति के भण्डार को खोजा उधेड़ा और भौतिक सामर्थ्य प्राप्त की। पर आध्यात्मिक अवलम्बन के न होने के कारण वह प्राप्त सामर्थ्य का सदुपयोग न कर सका। वस्तुएँ ही लक्ष्य बनकर रह गईं और जीवन लक्ष्य जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों की उपेक्षा कर दी गई। जबकि होना यह चाहिए था कि उन प्रश्नों पर भी विचार किया जाय जो उन गुत्थियों को भी सुलझा सकें, जिनमें जीवन लक्ष्य का समावेश हो। भौतिक खोजों में जड़ की सामर्थ्य पकड़ में आयी। पर मानवी अन्तरंग में निवास करने वाली उत्कृष्ट विचारणा- भाव सम्वेदना की असीम सामर्थ्य अनभिज्ञ एवं उपेक्षित ही बनी रही। फलस्वरूप जड़ सभ्यता जीवन पर हावी हो गई और चेतना की उपेक्षा हुई। जो होना चाहिए वही हुआ। लक्ष्य जब वस्तुएँ बनीं तो सद्विचारणा- सद्भावना की महत्ता एवं उपयोगिता की बात क्यों कर समझ में आये। नीति-सदाचार, सौहार्द्र, सहयोग, उदारता से भरा दृष्टिकोण तो उच्चस्तरीय भाव-सम्वेदनाओं पर टिकाऊ है। जब उनकी महत्ता नहीं समझी गई तो अपनाया ही क्यों जाय? संकीर्ण स्वार्थपरता की आपाधापी भाव-सम्वेदनाओं की उपेक्षा एवं दरिद्रता की ही परिचायक है। जिसके कारण ही भौतिक सम्पन्नता होते हुए भी विश्व में अनेकानेक समस्याएँ नित्य-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं।
शोध की गरिमा एवं विज्ञान की उपलब्धियों का लाभ सही रूप में तब मिल सकेगा जब वह क्या की सीमा से बढ़कर क्यों पर विचार करेगा। अनेक प्रकार के दार्शनिकों ने विज्ञान के समक्ष इस प्रकार प्रश्न रखे हैं। प्रसिद्ध नाटककार एवं दार्शनिक टॉलस्टाय एवं रोशजाक जैसे विद्वानों ने एक अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में प्रश्न उठाया कि विज्ञान की हर वस्तु कैसी है, यह प्रश्न करता है- क्यों है। यह जानने की चेष्टा क्यों नहीं करता? स्वयं उत्तर देते हुए टॉलस्टाय ने कहा- विज्ञान का बचपन ‘क्या’ से आरम्भ होता है। परिपक्वता ‘क्यों’ में निहित है। ‘क्यों’ में प्रवेश से ही सृष्टि के मूल रहस्यों का उद्घाटन सम्भव है। यही विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय का केन्द्र बिन्दु होगा। प्लेटो ने भी कहा है कि विज्ञान की समग्रता परिपूर्णता अध्यात्म में प्रवेश पर निर्भर करती है।
दृश्य जगत क्यों है? मनुष्य जीव जन्तुओं की उत्पत्ति क्यों हुई? सृष्टि सुव्यवस्था का कारण क्या है? गणित के नियमों के समान ब्रह्माण्ड का प्रत्येक घटक एक निर्धारित क्रम में क्यों गतिशील है? सृष्टि की सुव्यवस्था, अनुशासन, व्यापकता जैसे प्रश्नों का विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है। अस्तित्ववादियों के इन प्रश्नों का समाधान वैज्ञानिकों के पास नहीं है।
इन गूढ़ दार्शनिक प्रश्नों को छोड़ भी दिया जाय तो भी मनुष्य जीवन के विकास से सम्बन्धित अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जिन पर खोज करने की आवश्यकता विज्ञान द्वारा अनुभव नहीं की गई। जिन पर मानव जाति का अस्तित्व अवलम्बित है।
टॉलस्टाय ने जहाँ आधुनिक विज्ञान के सृजनात्मक प्रयत्नों की प्रशंसा की है, जिसके कारण मनुष्य जाति को अनेकों प्रकार के उपयोगी साधन मिले। वहीं दूसरी ओर आक्रोश भी व्यक्त किया है कि विज्ञान ने नैतिकता एवं मान्यता जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्यों नहीं विचार किया? अपने शोध का विषय क्यों नहीं बनाया?
‘बैनेवार वुश’ नामक विचारक ने अपनी पुस्तक ‘साइन्स इज नाट इनफ’ नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘विज्ञान वस्तुओं के विश्लेषण एवं संश्लेषण के अध्ययन तक ही सिमट कर रह गया है। वह एक सामान्य वस्तु की पूर्ण जानकारी होने तक का भी दावा नहीं कर सकता। प्रमाण सामने है। पदार्थ का छोटा घटक परमाणु तक अपने स्वरूप के लिए रहस्यात्मक बना हुआ है। बदलती हुई मान्यताओं ने उसकी वैज्ञानिक क्षमताओं को अपर्याप्त ठहराया है। ‘रोशजाक’ नामक विचारक ने अपना सुझाव प्रस्तुत करते हुए कहा है कि “जब तक कि विज्ञान की दार्शनिक नींव मेटाफिजिक्स में नहीं होगी- चेतन विज्ञान की ओर नहीं मुड़ेगा, तब तक वह एक बनावटी तकनीक के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता।”
‘वारेन बीवर’ जैसे वैज्ञानिक ने भी कहा है कि समग्र शोध एवं सृष्टि की गुत्थियों को सुलझाने के लिए विज्ञान को भी पूर्वाग्रहों से हटना होगा। पूर्वाग्रह इन अर्थों में कि उसे शोध की विषय वस्तु जड़ वस्तुओं तक ही नहीं रखना होगा। बस, उससे ऊपर उठकर चेतना के क्षेत्र में प्रविष्ट करने से ही वह अधिक उपयोगी बन सकेगा।
‘वारेन बीवर’ की मान्यता है कि दुःख शोक, क्लेश, भय के क्षणों में, अन्तःप्रेरणा के क्षणों में अन्तःप्रेरणा के रूप में कोई शक्ति आश्वस्त करती प्रतीत होती है। प्रस्तुत संकटों के निवारण के लिए शक्ति का संचार करती है। असमंजस की स्थिति में समाधान देने वाली शक्ति ही परमात्मा का अदृश्य स्वरूप है। जिसकी अनुभूति प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी करता है।
सदियों से विज्ञान एवं अध्यात्म परस्पर पूरक न रहकर विरोधी रहे हैं। इस प्रतिगामिता के कारण दोनों को ही एक दूसरे की विशेषताओं से वंचित रहना पड़ा है। वैज्ञानिक दृष्टि के अभाव में अध्यात्म की उपयोगिता संदिग्ध है। ऐसा अध्यात्म लोकोपयोगी नहीं बन सकता। उसमें अन्ध विश्वास, मूढ़ मान्यताएँ जड़ जमा लेती हैं। विज्ञान भी अध्यात्म के बिना एकाँगी तथा अपूर्ण है। सद्विचारों एवं सद्भावनाओं को विकसित करने का माध्यम अध्यात्म है। एकाकी रहने पर विज्ञान निरंकुश बन जाता है। मनमानी करने एवं बरतने की उसे खुली छूट मिल जाती है। इस सच्चाई को परखना हो तो आज की परिस्थितियों का अध्ययन पर्यवेक्षण गहराई से किया जा सकता है विकास क्रम में विज्ञान ने जितना सहयोग दिया है उससे अधिक भयावह विस्फोटक परिस्थितियाँ भी उत्पन्न की हैं। यह एकाँगी वैज्ञानिक प्रगति का दुष्परिणाम है। समय रहते विज्ञान की अपूर्णता दूर करना अनिवार्य है। यह तभी सम्भव है जब उपेक्षित अध्यात्म का अवलम्बन लिया जाय। विज्ञान साधनों की पूर्ति कर सकता है नैतिकता की नहीं। समृद्धि दे सकता है- भाव सम्वेदनाओं से अभिपूरित परिस्थितियाँ नहीं। इस आवश्यकता की पूर्ति न हो सकी तो बढ़ी हुई प्रगति भी मानव जाति के लिए अभिशाप ही सिद्ध होगी।
मानवी संरचना को नर और नारी दो भागों में विभक्त किया गया है। यह दो विभाजन प्रकृति द्वारा विनिर्मित तो हैं किन्तु उन्हें पत्थर की लकीर नहीं समझना चाहिए। इसके पीछे भी मानसिक मान्यता एवं परम्परागत अभ्यास ही आधारभूत कारण है। चिरकाल से जिस प्रकार का अभ्यास पड़ गया है उसी मान्यता के अनुरूप प्रजनन की भूमिका निभाने वाले परमाणु अपनी गतिविधियाँ अग्रसर बनाते हैं और नर और नारी में से जैसी भी परम्परा स्वभाव में आ गई हो उसी के अनुरूप लिंग बनाने लगाते हैं। मान्यता के गहन क्षेत्र में किसी प्रकार अभ्यास क्रम में परिवर्तन किया जा सके तो लिंग परिवर्तन की असम्भव दीखने वाली प्रक्रिया सम्भव हो सकती है, नर-नारी बन सकता है और नारी प्रकृति से ही नहीं आकृति से भी नर बन सकती है। भ्रूण कई महीने तक उभयलिंगी स्थिति में होता है। आरम्भिक दिनों में यह पता नहीं लग सकता कि गर्भ में कन्या है या पुत्र। क्योंकि उस अवधि तक दोनों प्रकार के लक्षण विद्यमान रहते हैं। जब चेतना जोर मारने लगती है। अभ्यस्त प्रकृति उभरने लगती है तो एकलिंग के लक्षण बलिष्ठ होने और दूसरे के दबने लगते हैं। प्रसव काल आने तक बालक का अभीष्ट पथ दब चुका होता है। इतने पर भी स्तन आदि के ऐसे चिन्ह शेष रह जाते हैं जो उभयपक्षीय संरचना की साक्षी देते हैं। समय आने पर नारी के स्तन विकसित होने लगते हैं, किन्तु नर में भी उसका स्थान बना रहता है। नारी की यौन रचना में ‘भग’ नासा को पुरुष शिश्न का छोटा रूप माना गया है। पुरुष के बाहर तो नहीं किन्तु भीतरी संरचना में गर्भाशय का छोटा अस्तित्व पाया जाता है। अनेक नर-नारियों की मनोवृत्ति अपनी सजातीय परम्परा से भिन्न पाई जाती है। पुरुषों की प्रकृति में नारी स्तर की उमंगें और नारियों में पुरुषों जैसा रुझान देखा गया है। जनखे प्रायः इसी मध्यवर्ती स्थिति के होते हैं। कइयों में यौन संरचना में प्रत्यक्ष अन्तर न दीखते हुए भी काम-कौतुक के सम्बन्ध में ही नहीं, स्वभाव की ऐसी भिन्नताएं पाई जाती हैं जिन्हें विपरीत स्तर की कहा जा सके। छिपाये रहने पर भी वे उभरती रहती हैं। इस संदर्भ में यदि अतिरिक्त हलचलें उभरने लगें तो इसी जीवन में प्रत्यक्ष लिंग परिवर्तन हो सकता है। ऑपरेशनों से ऐसे कितने ही परिवर्तन हुए भी हैं।
पूर्व जन्म की स्मृति के प्रामाणिक विवरण जिन बालकों ने बताये हैं उनमें से कितने ही ऐसे भी हैं जिनमें पूर्वजन्म का पुरुष अगले जन्म में स्त्री बना। इसी प्रकार स्त्री ने पुरुष रूप में जन्म लिया। ऐसे प्रकरणों में इच्छाशक्ति ही प्रधान कारण होती है। लक्ष्मीबाई जैसी नारियों के सम्बन्ध में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे पूर्वजन्म में कोई पुरुष योद्धा रही होंगी। इसी प्रकार आकृति एवं प्रकृति से नारी स्वभाव के कितने ही पुरुष पाये जाते हैं। इनके स्वर, रहन-सहन एवं यौन आकाँक्षाओं में नारी प्रकृति की विशेषताएँ अनायास ही उभरती रहती हैं। अचेतन मन में व्यक्ति अपने आपको नर या नारी में- जिस वर्ग का मान बैठता है और उसकी प्रकृति को स्वभाव का बना लेता है उसके वह अभ्यास ही कालान्तर में लिंग परिवर्तन का कारण होते हैं। वे एक वर्ग से दूसरे में बदलने की आधी-अधूरी प्रक्रिया के मध्य रह रहे होते हैं। आगे बढ़ना या पीछे हटना भी ऐसे प्रसंगों में उनकी इच्छा पर निर्भर रहता है। ऐसी घटनाएँ भारतीय संस्कृति के इतिहास में भी कम नहीं हैं।
शिखण्डी का सेक्स परिवर्तन सभी को विदित है। वे पांचाल नरेश द्रुपद के पुत्र थे। उनका लालन पालन राजकुमारों जैसा हुआ। जब कुछ बड़े हुए तो उनका विवाह दशार्ण सम्राट हिरण्य वर्मा की पुत्री से कर दिया गया। किन्तु पहली ही रात राजकुमारी को पता चल गया कि उसका पति स्त्री है। शिखण्डी को इस बात का पता चला तो उसने गृह त्याग कर दिया और वन में जाकर तप करने लगे। वह उसकी शल्य चिकित्सा स्मूणाकर्ण नामक यज्ञ ने की और वह स्त्री से पुरुष बन गया।
इंग्लैण्ड में मिडिल गेट स्ट्रीट, पारमाउथ नगर में दो बहनें साथ साथ रहती थीं। एक का नाम मार्जोरी था और दूसरे का डेजीफेरो। मार्जोरी 13 वर्ष की थी और कॉलेज में पढ़ती थी। इसी बीच उसे अपने में कुछ परिवर्तन महसूस हुए। आवाज भारी होने लगी और बहिरंगों में बदलाव आने लगा। उसकी शरीर परीक्षा करने पर पुरुषत्व के लक्षण उभरते पाये गये। बाद में ऑपरेशन द्वारा वह पूर्ण लड़का बन गई और उसका नाम मार्क रखा गया। कुछ समय बाद डेजीफेरो में भी इसी प्रकार के परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए। जाँच करने पर उसमें भी पुरुष के लक्षण पाये गये। ऑपरेशन द्वारा वह भी लड़की से लड़का बन गई और नाम डेविड रख लिया।
ऐसी ही एक घटना फ्राँस की है। जार्मे गार्नायर नामक एक 15 वर्षीय लड़की एक दिन जंगल में सूअर चरा रही थी। उसके सूअर किसी किसान के खेत में घुस गये। खेत के किनारे-किनारे ऊँची खाई थी। जार्मे गार्नायर को पता चला तो वह भागी और रास्ते में पड़ रही खाई को लाँघने के लिए जोर से कूदी। कूदने से उसके पेडू में जोर का धक्का लगा और वह चीखमार कर गिर पड़ी। जब उसे घर पर डाक्टरों को दिखाया गया तो एक विलक्षण बात का उद्घाटन हुआ। परीक्षण के बाद डाक्टरों ने बताया कि लड़की में पुरुष जननेन्द्रिय का विकास हो गया है और वह लड़का बन गई है। इसके बाद वह जार्मे गार्नायर से जर्मेमेरिया बन गई।
इसी प्रकार की एक घटना इंग्लैण्ड की ‘पियर्सन’ पत्रिका में छपी। कु. जेंकन कौबकोवा चेकोस्लोवाकिया की प्रसिद्ध महिला खिलाड़ी थी। जब उसने यौवन में प्रवेश किया तो स्त्रैण लक्षण प्रकट होने की बजाय उनका लोप होने लगा। उरोज धीरे-धीरे छोटे होने लगे और पेडू में प्रायः दर्द रहने लगा। डाक्टरों को दिखाने पर पता चला कि उसके पेडू में शिश्न विकसित हो गया है। बाद में उसका ऑपरेशन हुआ वह स्त्री से पुरुष बन गई।
बेलग्रेड के सरविया अस्पताल में कुछ वर्ष पूर्व एक किसान के पेट से दो बच्चों के जन्म की घटना समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी। उसे पेट में शिकायत रहती थी। बाहरी परीक्षणों में फोड़े के होने के संकेत मिले। सरविया अस्पताल में जब उसका ऑपरेशन किया गया तो उससे दो बच्चे निकले जिनकी शारीरिक रचना जन्म लेने वाले सामान्य बच्चों की तरह परिपूर्ण थी।
अमेरिका की “नेशनल इन्स्टीट्यूट फार चाइल्ड एण्ड ह्यूमन डेवलपमेंट” संस्थान के सामने ऐसे बालकों के अनेकों उदाहरण हैं जिनकी यौन क्षमता असाधारण रूप से बढ़ी या समाप्त होती गई। ग्रीनवे की एक जैमिका नामक लड़की को तीन वर्ष की आयु में ही प्रजनन अंग स्तन आदि तेजी से परिपक्व हुए और वयस्कों जैसा मासिक धर्म आने लगा।
एक घटना इण्डियाना की एक अपराधी महिला के सम्बन्ध में है। वह जेल में बन्द हुई तब महिला थी। कुछ दिन बाद उसके दाढ़ी मूँछ उग पड़े। डाक्टरों ने घोषित किया कि वह पुरुष बन गई है। छूटने पर उसने एक पुरुष से विवाह किया। फिर कुछ ऐसी उलट-पुलट हुई कि उसका पुरुषत्व बढ़ा और किसी नारी के साथ विवाह बन्धन में बँध गई। इस विवाह झंझट में बँधे तीनों साथ-साथ रहे और नर-नारी की आवश्यकताएँ मिलजुल कर पूर्ण करते रहे।
सन् 1917 में संघाई में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया था जिसके तीन पैर थे, साथ ही उसका शरीर आधा पुरुष का था, आधा स्त्री का। 8 वर्ष की आयु तक जीवित रहने के पश्चात् वह मर गया।
साधारणतया यौन कर्म गोपनीय माना जाता है, मनुष्यों में वैसा प्रचलन नहीं है जैसा कि पशुओं में निर्लज्ज परम्परा है। बहुपति प्रथा, बहु पत्नी प्रथा में भी पर्दे की ओट रखी जाती है किन्तु ऐसे उदाहरण भी हैं, जिनमें उस तरह की लज्जा परम्परा का परित्याग करने की आवश्यकता समझी गई और नये प्रचलन का नया मार्ग निकाला गया।
थाईलैण्ड के- मीकलांग गाँव में 11 मई सन् 1811 को दो ऐसे यमन बच्चों ने जन्म लिया जो अलग अलग-अलग अस्तित्व रखते हुए भी सीने के दाँये-बाँये हिस्से से जुड़े हुए थे। यह तो अपने आप में कोई खास अनोखी बात नहीं है। आश्चर्य की बात तो यह है कि वे दोनों 63 वर्ष आयु तक जीवित रहे, उन्होंने विवाह किया, घर बसाया और इसी तरह जुड़े रहकर सामान्य जीवन व्यतीत किया।
इन दोनों भाइयों का सचित्र विवरण ‘एनी वालेस’ ने ‘द टू’ नामक पुस्तक में लिखा है -
चीनी पिता और थाईलैंड की निवासी माता से जन्म लेने वाले इन बालकों की विचित्रता को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। उनमें कई डाक्टर भी थे। डाक्टरों ने उनके माता-पिता से उन्हें अलग करने का आग्रह एवं प्रस्ताव भी किये किन्तु उनकी माँ गरम तार या रस्सी के द्वारा कटवाकर अलग कराने के लिए सहमत न हुई। उन दोनों चिकित्सा विज्ञान आज जैसा विकसित नहीं था।
उन बच्चों के नाम रखे गये थे- चांग और इंग। माँ ने दोनों बच्चों को गिरते-पड़ते चलना भी सिखा दिया साथ ही परस्पर सहयोग एवं सद्भावपूर्वक जीवनयापन करने के लिए प्रशिक्षित भी किया।
आरम्भ में चलने में उन्हें कठिनाई तो हुई किन्तु धीरे धीरे न केवल वे चलना सीख गये वरन् तैरना और नाव चलाना भी सीख लिया। सन् 1828 में नदी में तैरते देखकर एक अंग्रेज व्यापारी राबर्ट हन्टर आश्चर्यचकित रह गया। पहले तो वह उन्हें जल का कोई विचित्र जीव समझा परंतु जब पानी से निकल कर नाव में चढ़ते देखा तो समझ सका कि वे दोनों जुड़वा भाई हैं।
हन्टर ने चांग और इंग के माता पिता को कुछ दे दिलाकर उन्हें अपने साथ अमेरिका ले जाने पर सहमत कर लिया। अमेरिका ले जाकर हन्टर ने ‘वोस्टन’ के हारवर्ड मेडिकल कॉलेज के प्रो. जान वारेन तथा अन्य डाक्टरों से परीक्षण कराया, उन्हें नैसर्गिक रूप से जुड़वा पाया। हन्टर ने अमेरिका और ब्रिटेन में चांग तथा इंग के प्रदर्शन करके लाखों की सम्पत्ति कमाई।
समझ आने पर दोनों भाइयों ने हन्टर से सम्बन्ध तोड़कर स्वतन्त्र रूप से प्रदर्शन करके अपार धन कमाया। 1833 से 1839 तक अमेरिका में उन्होंने सैकड़ों प्रदर्शन किये। उन्हीं दिनों उनकी भेट जार्जिया के एक समृद्ध किसान की लड़कियों ‘एडलीस’ और ‘लैसी’ से हुई। विवाह के लिए दोनों ने आप्रेशन करवाकर अलग होने की बात सोची परन्तु दोनों पक्षों के सहमत हो जाने पर उस स्थिति में उनकी शादी सम्पन्न हो गई। चांग एवं इंग तथा एडलीस एवं लैसी के युगल दम्पत्ति ने विवाह के बाद 21 बच्चों को जन्म दिया जिनमें से 15 सामान्य आयु तक जीवित रहे। विवाहित जीवन बिताने के सम्बन्ध में उन्होंने अपने नियम और मर्यादाएँ बना ली, आजीवन उनका पालन करते रहे। उनके जीवन में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि वे आपस में बहुत कम बोलते थे, फिर भी बिना बोले ही एक-दूसरे के मन कि बात समझ जाते थे। सन् 1874 में उनकी सामान्य मृत्यु हो गई।
पाश्चात्य देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन के अंतर्गत अब महिलायें इस प्रचलन को अपना रही हैं कि नारियाँ आपस में विवाह करके गृहस्थ चला लिया करें। पुरुषों के शोषण की शिकार न बनें। यह इस बात के चिन्ह हैं कि नर और नारी के बीच पाया जाने वाला विपरीत स्वभाव आकर्षण एवं गठन पत्थर की लकीर नहीं है, उसमें मनःस्थिति और परिस्थिति बदल जाने पर परिवर्तन भी हो सकता है। एक लिंग वाले प्राणी अपने विपरीत पक्ष में परिवर्तित हो सकते हैं।
कृमि कीटकों में, जल जीवों में कितने ही ऐसे हैं जो एक ही शरीर में नर और मादा में हेर-फेर करते रहते हैं, उन्हें प्रजनन के लिए किसी विपरीत प्रकृति के साथी का सहयोग नहीं लेना पड़ता है। इससे प्रकट है कि चेतना का मूल स्वरूप एक है। उसमें यौन निर्धारण एवं परिवर्तन की प्रक्रिया उनकी इच्छा, आकाँक्षा प्रकृति एवं आदतों पर निर्भर है।
मनुष्यों का किन्हीं अदृश्य लोकों तक पहुँचना और लोक-लोकांतरों के बुद्धिमान प्राणियों का मनुष्य लोक के साथ संपर्क बनाने के लिए दौड़ लगाना आश्चर्यजनक तो लगता है, पर सर्वथा अविश्वस्त नहीं है।
कुछ दिन पहले मनुष्य ने चन्द्रमा के धरातल पर पैर रखा था और वहाँ की परिस्थितियों की जानकारी विस्तारपूर्वक दी थी। अन्तरिक्ष में इन दिनों सैकड़ों यान पृथ्वी की परिक्रमा लगा रहे हैं। इनमें से कितनों में ही मनुष्य उड़े और अभीष्ट जाँच-पड़ताल के उपरान्त वापस लौटे हैं। सौर मण्डल के समीपवर्ती ग्रहों तक मानव रहित यान पहुँच चुके हैं। अगले दिनों वहाँ तक मनुष्य समेत यान भेजने की योजना है। हो सकता है यह प्रयास किसी दिन आगे बढ़ते-बढ़ते लोक-लोकान्तरों तक यात्रा कर सकने वाले वाहनों का विकास करते और उनमें बैठकर वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की, अभीष्ट ग्रह-तारकों की खोज-खबर लेने के लिए चल पड़ें।
जब समर्थ जलयानों का आविष्कार नहीं हुआ था तब सुविस्तृत समुद्रों को पार कर सकना सम्भव नहीं था। उन दिनों महाद्वीप भी एक प्रकार से अविज्ञात लोक ही बने हुये थे। कोलम्बस ने अमरीका को इसी स्थिति में खोजा था। समर्थ जलयानों ने जिस प्रकार भूलोक के विभिन्न खण्डों को आपस में जोड़ दिया, हो सकता है अगले दिनों अन्तरिक्ष यान दूरवर्ती लोक-लोकान्तरों के बीच भी आवागमन का आदान-प्रदान का रास्ता खोलें।
पौराणिक गाथाओं में धरती और स्वर्ग के बीच आवागमन की अनेकों चर्चाएँ सम्मिलित हैं। देवर्षि नारद धरती से विष्णुलोक और विष्णुलोक से धरती पर दौड़ लगाते रहते थे। अर्जुन और दशरथ के सशरीर देव लोक पहुँचने, अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के उपरान्त वापस लौटने की कथाएँ कहीं-सुनी जाती हैं। समय-समय पर देवता भी धरती की समस्याओं को सुलझाने के लिए आते, ठहरते एवं अवतार धारण करते रहे हैं। लोक-लोकान्तरों के मध्य चलने वाले आवागमन सूत्रों का यह पौराणिक उल्लेख है। आज के वैज्ञानिक प्रयत्नों का पौराणिक गाथाओं के साथ तालमेल बिठाने पर सम्भावना यह उभरती है कि आज की स्थिति में यह कठिन भले ही हो, पर असम्भव नहीं है। कम-से-कम सैद्धान्तिक दृष्टि में तो उसे मान्यता दी ही जा सकती है।
इस चर्चा में एक कड़ी उड़न तश्तरियों और विद्युत जेटों की भी जुड़ती है। वे इतनी अधिक संख्या में प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष देखा जा चुका है कि उनका अस्तित्व झुठलाया जाना सम्भव नहीं। वैज्ञानिक इस संदर्भ में कुछ ठीक से बता नहीं पाते। अब तक अन्तरिक्ष ज्ञान द्वारा कोई निश्चित निष्कर्ष निकला नहीं। ऐसी दशा में उन्हें लोक-लोकान्तरों के साथ आवागमन का एक सूत्र होने की बात सोची जाय तो उसे उपहासास्पद नहीं कहा जाना चाहिए।
उड़न तश्तरियों को अन्तरिक्षयान समझा जा सकता है। विद्युत गेदें किसी अन्य लोक के सुविकसित जीवधारी हो सकते हैं। यदि वे दोनों प्रकृति के कोई विशिष्ट आधार हैं तो पता चलना चाहिए कि इनके आकस्मिक प्रकटीकरण और विलुप्तीकरण के पीछे किन शक्तियों एवं सिद्धान्तों का रहस्य सन्निहित हो सकता है। दोनों में से कोई भी कारण हो, यह हर दृष्टि से विचारणीय और अनुसंधान की दृष्टि से महत्वपूर्ण समझा जाने योग्य है।
ब्राजील के दो युवा इंजीनियर मिगले बायना और मैनुअल क्रूज उड़न तश्तरियों के रहस्य ज्ञात करने के प्रयोग कर रहे थे। इसके लिए दोनों ने मिलकर एक प्रयोगशाला बनायी थी और उसमें विभिन्न प्रकार के प्रयोग करते थे।
अगस्त 1966 की बात है। दोनों इंजीनियर सुबह ही विन्टेम पहाड़ी पर चढ़ने के लिए चल पड़े। यह पहाड़ी घने जंगलों में भरा है और पिछले 25 वर्षों से वहाँ अक्सर उड़न तश्तरियाँ देखी जाती रही हैं। वहाँ प्रायः प्रतिदिन कोई विचित्र वस्तु आकाश से उतरती और कुछ देर ठहर कर चली जाती है। समझा जाता है कि अन्तरिक्षवासियों ने ब्राजील की इस पहाड़ी को धरती की परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए स्टेशन बनाया है।
जैसे ही दोनों पहाड़ी पर चढ़े, कोई उड़नतश्तरी के आकार की वस्तु पहाड़ी पर उतरती दिखाई दी। नगर के अनेक प्रामाणिक व्यक्तियों ने इसकी पुष्टि की।
दूसरे दिन प्रातःकाल कुछ लड़के शिकार खेलने के उद्देश्य से उस पहाड़ी पर चढ़े तो वहाँ दोनों इंजीनियर मृत पाये गये। सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस आयी, पर मृत्यु का कारण का पता नहीं लगा सकी, क्योंकि उनके हाथ कोई ऐसा सुराग नहीं लगा जो मृत्यु का कोई ठोस कारण बता सके। शव परीक्षा में भी उनके शरीर में किसी प्रकार के विष का कोई प्रभाव नहीं पाया। इसी शृंखला की एक दूसरी कड़ी है- ‘आग की गेंद’। यह अनेक स्थानों पर प्रकट और लुप्त होती देखी गई है। उनके प्रत्यक्षदर्शियों में ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं, जिनकी साक्षियों पर अविश्वास नहीं किया जा सकता है। उन्हें मनगढ़न्त अफवाहें फैलाने वाले बचकाने लोगों में भी किसी प्रकार गिना नहीं जा सकता।
15 मार्च सन् 1963 की बात है। न्यूयार्क से वाशिंगटन जाने वाले ‘ईस्टर्न एयर लाइन’ फ्लाइट नं. 539 विमान में सुबह पाँच बजे एक आग की गेंद घूमती हुई देखी गई। वह एक छोर से प्रविष्ट हुई और दूसरे छोर में शौचालय के पास जाकर अदृश्य हो गईं। देखा तो उसे अनेकों ने पर किसी का कोई नुकसान न हुआ। मात्र गंधक या नाइट्रोजन आक्साइड जैसी गन्ध भरी पायी गई।
यह घटना विश्व विख्यात वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ में छपी। विश्लेषणकर्ताओं ने उसके सम्बन्ध में अनेक कारणों और सम्भावनाओं का प्रस्तुतीकरण किया, पर निश्चित कुछ भी नहीं कहा जा सका। आग या बिजली की गेंद का आखिर कुछ तो प्रभाव होना ही चाहिए था।
अन्यत्र भी बहुत स्थानों पर इन विद्युत गेंदों को देखा गया है। वैज्ञानिक संस्था ‘नासा’ के इस संदर्भ में एकत्रित उदाहरणों की संख्या 600 से भी अधिक है। इनके आकार 1 सेन्टीमीटर से लेकर 1 मीटर तक देखे गये हैं। इनके अस्तित्व को सिद्ध करने वाली 4000 साक्षियाँ उपलब्ध हैं, पर यह नहीं कहा जा सका कि वे आखिर हैं क्या, और क्यों इस प्रकार उछलती-कूदती दौड़ती प्रकट और लुप्त होते हुए भी किसी वस्तु को अपना दृश्यमान ऊर्जा से प्रभावित नहीं करती।
उड़नतश्तरियों की तरह इन विद्युत गेंदों ने भी उन मनुष्यों को कोई हानि नहीं पहुँचाई जिनके समीप से वे निकलीं या सटकर अपनी ऊर्जा अस्तित्व का छोटा-मोटा प्रमाण देती गईं।
अधिक सम्भावना इसी बात की है कि यह किन्हीं विकसित सभ्यता वाले लोकों के निवासियों द्वारा धरती वालों के साथ संपर्क साधने और यहाँ की परिस्थितियाँ समझने का प्रयत्न है। एक ओर से बढ़ाये गये हाथ के उत्तर में दूसरी ओर से भी हाथ बढ़ाना चाहिए और ब्रह्माण्डव्यापी चेतना के घटकों को मिल-जुलकर किसी बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए सहयोगपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।
इस संदर्भ में प्रकृति के एक रहस्य का कुछ दिन पूर्व ही पता चला है कि ब्रह्माण्ड में ऐसे अनेकों अरबों-खरबों मील लम्बे-चौड़े छिद्र हैं जहाँ विद्यमान चुम्बकत्व के सहारे पदार्थों या प्राणियों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की दूरी पार कर लेना नितान्त सरल है। इन मार्गों को ‘अन्ध छिद्र’ कहते हैं। अन्ध इसलिए कि उसमें प्रकाश का सर्वथा अभाव रहने के कारण यह पता नहीं चलता है कि इस मार्ग पर दौड़ाने वाले किस दिशा में कितनी तेजी से दौड़ रहे हैं और वे अन्ततः कब कहाँ पहुँचने वाले हैं। इस अनिश्चय की स्थिति के कारण ही उसे अन्ध तमिस्रा कहा गया है। यह राह अपने आप यात्री को घसीटती-धकेलती है। उस पर चलने वाले को तनिक भी श्रम नहीं करना पड़ता। समझा जाता है कि मार्ग पर प्रकाश गति की तुलना में कहीं अधिक तेजी से चलने वाले पदार्थों का प्रमाण है।
‘ह्वाइट होल’ अन्तरिक्ष में पाये जाने वाले ऐसे सुविस्तृत क्षेत्र हैं जहाँ न तारे होते हैं न आकाश गंगाएँ। यह ब्लैक होल से गुण और प्रकृति में पूर्णतः भिन्न होते हैं। इनमें न तो उनकी जैसी विलक्षण आकर्षण क्षमता होती है, और न उसके समतुल्य कोई अन्य गुण। हाँ, विस्तार में ये अवश्य काफी बड़े होते हैं। अब तक इस प्रकार की करीब दस होलों की गवेषणा की जा चुकी हैं जिनमें अन्तिम होल क्षेत्रफल में सबसे बड़ा है। इसका आयाम 30 करोड़ लाख प्रकाश वर्ष है।
अमरीका शोधकर्ताओं ने आकाश में जब एक प्रकाश बम फेंका तो पाया कि 50 करोड़ लाख प्रकाश वर्ष दूर भी अन्तरिक्ष में बहुत सारी आकाश गंगाएँ हैं। इसी प्रकार 80 करोड़ लाख प्रकाश वर्ष दूर भी आकाश गंगाएँ पायी गईं, किन्तु इन दानों के बीच का 30 करोड़ लाख प्रकाश वर्ष का विस्तृत क्षेत्र तारा एवं आकाश गंगा से पूर्णतः रहित था। इसे ही ह्वाइट होल की संज्ञा दी गई।
इन छिद्रों में होकर वारमूडा स्थानों से कितने ही जलयान, वायुयान गायब हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ-तहाँ ऐसी भी घटनाओं का पता चला है जहाँ से मनुष्य या कोई पदार्थ देखते-देखते गायब होते हैं। इन्हें उड़न तश्तरियों या विद्युत गेंदों के समतुल्य समझा जा सकता है। इनका अस्तित्व यह बताता है कि अदृश्य लोकों के साथ अपनी धरती का सम्बन्ध अविज्ञात रूप से जुड़ता रहा है और जुड़ा हुआ है।
जुलाई 1768 की घटना है। इंग्लैंड के सिफ्टन मैलेट नामक गाँव में 70 वर्षीय दर्जी, पारफिट अपनी बड़ी बहन के साथ रहता था। युद्ध के दौरान वह लंगड़ा हो गया था अतः आजीविका के लिए उसने दर्जी का काम आरम्भ किया। वह इतना कमजोर था कि चलना-फिरना तो दूर स्वयं बिस्तर से भी नहीं उठ सकता था। एक दिन प्रातः उसने दरवाजे के पास बैठने की इच्छा प्रकट की। पड़ौस की एक लड़की तथा उसकी बहन ने मिलकर उसे दरवाजे के पास कुर्सी पर बिठाया। फिर दानों अपने-अपने काम में लग गईं। उसकी बहन ऊपर की मंजिल में काम करने चली गई। पारफिट के घर का दरवाजा मुख्य सड़क की ओर खुलता था। उसी दरवाजे पर वह बैठा था। 15 मिनट बाद जब उसकी बहन वहाँ पहुँची तो पारफिट गायब था। दूर-दूर तक उसकी खोज-बीन की गई पर कहीं उसका पता न चला, न ही कोई ऐसा सुराग मिला जिससे लापता का कारण जाना जा सके।
यह घटना उस व्यक्ति की है जिसने डीजल इंजन का आविष्कार किया। रुडोल्फ डीजल एक दिन किसी आवश्यक कार्यवश अमरीका जा रहा था। 29 सितम्बर 1913 को ड्रेस्डन जहाज से यात्रा के लिए रवाना हुआ। रात्रि भोजन के उपरान्त डीजल अपने इंजीनियर मित्र लुकमान के साथ जहाज पर घूमने निकला। 10 बजे दोनों वापस लौट आये और अपने-अपने केबिन में चले गये। दूसरे दिन सवेरे डीजल लापता था। कमरे की जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि उसने सोने की पूरी तैयारी कर ली थी। घड़ा इतनी ऊँचाई पर रखी थी कि वह सोते हुए भी समय ठीक प्रकार देख सके। किन्तु बिस्तर पर किसी प्रकार की सिकुड़न नहीं थी। शायद वह बिस्तर पर लेट नहीं सका था और इससे पहले ही घटना घटी तथा वह गायब हो गया। उसकी काफी खोज-बीन की गई, पर कहीं पता न चला।
सन् 1920 का अक्टूबर माह। ब्रिटिश पार्लियामेंट में लेबर पार्टी के सदस्य विक्टर ग्रेसन लीवर पुल से रवाना होकर एक सभा को सम्बोधित करने जा रहे थे। उन्हें लेने कई लोग स्टेशन पहुँचे, पर वे ट्रेन में थे ही नहीं। पुलिस को जाँच का दायित्व सौंपा गया। खोजबीन से उसका बैग लन्दन के एक होटल मैनेजर के पास पाया गया। मैनेजर ने बताया कि एक व्यक्ति ने यहाँ यह छोड़ दिया है, मगर इसे लेने वह अब तक नहीं आया। उसके सिर में पट्टी बँधी थी, किन्तु मैनेजर के बताये हुलिए से ग्रेसन बिल्कुल ही नहीं मिलता था। ग्रेसन का अब तक कहीं पता नहीं चल सका।
मनुष्य का इस प्रकार अचानक अदृश्य हो जाना क्यों कर होता है? इसका कारण लोकान्तर आवागमन का पथ प्रशस्त करने वाले किन्हीं शोधकर्ताओं का आवश्यकता के साथ जोड़ा जा सकता है अथवा ऐसा भी हो सकता है कि कोई छोटे ब्लैक होल उसी तरह जहाँ-तहाँ पकड़ते-खींचते, घसीटते-फिरते हों, जिस तरह कि विद्युत गेंदें उड़न तश्तरियों का छोटी प्रतिकृति के रूप में यदाकदा दृष्टिगोचर होती हैं।
शरीर के अवयवों के संचालन एवं क्रिया-कलाप में आमतौर से रक्त की प्रधान भूमिका मानी जाती है। यह मोटी जानकारी है यदि थोड़ी गहराई में घुसकर देखा जाय तो प्रतीत होता है कि समूचे काय तन्त्र की अनेकानेक गतिविधियों का उत्तेजन एवं नियमन एक विशेष प्रकार की बिजली के सहारे होता है जो मस्तिष्क में उत्पन्न होता और नाड़ी तन्तुओं द्वारा समस्त अवयवों के भीतर तथा बाहर छाई रहती है। बिजली की शरीर में वही भूमिका होती है जो मोटर में बैटरी डायनेमो की। रक्त पैट्रोल है, तो जैव विद्युत। दोनों के संयोग से ही जीवन धारण बन पड़ता है।
यह कायिक बिजली मशीनी बिजली से भिन्न है। यन्त्र विद्युत झटका मारती और मशीनें चलाती है। कायिक बिजली शरीर और मस्तिष्क के अवयवों को सम्भालती है। बाहरी क्षेत्र में अपने प्रभाव का परिचय देती है। इसे प्राण कहते हैं। वह ब्रह्माण्डव्यापी महाप्राण का एक अंश है जो मनुष्य शरीर में काम करता है। इसे घटाया बढ़ाया जा सकता है। संकल्प बल एवं अभ्यास से जिस प्रकार अनेक कला-कौशलों की प्रवीणता प्राप्त होती है, उसी प्रकार प्राण विद्युत को भी योग साधनों के सहारे समुन्नत किया जा सकता है।
यों छोटी बैटरी भी विद्युत भाण्डागार का एक घटक ही है और टार्च जलाने जैसे छोटे काम वह भी कर सकती है पर यदि किसी नगर या कारखाने की मशीनें चलानी हों तो बड़ा जनरेटर चाहिए। इसी प्रकार सामान्य प्राण से शरीर निर्वाह एवं उपार्जन की आवश्यकता पूरी होती रहती है। पेट प्रजनन के लिए अनिवार्य साधन सधते रहते हैं किन्तु यदि उच्चस्तरीय क्रिया कलाप सम्पादित हों तो उसके लिए महाप्राण स्तर की प्राण-शक्ति चाहिए और वह साधनात्मक विशेष उपाय उपचारों से ही अर्जित करनी पड़ती है।
प्राण विद्या के ज्ञाता गुरु अपने प्राण देकर शिष्यों के व्यक्तित्व और उनकी क्षमतायें बढ़ाया करते थे। इसी कारण श्रद्धावनत होकर लोग ऋषि आश्रमों में जाया करते थे। ऋषि अपने प्राण देकर उन्हें तेजस्वी, मेधावान् और पुरुषार्थी बनाया करते थे। महर्षि धौम्य ने आरुणी को, गौतम ने जाबालि को, इन्द्र ने अर्जुन को, यम ने नचिकेता को, शुक्राचार्य ने कच को इसी तरह उच्च स्थिति में पहुँचाया था। योग्य गुरुओं द्वारा यह परम्परायें, अब भी चलती रहती हैं। परमहंस स्वामी रामकृष्ण ने विवेकानन्द को शक्तिपात किया था। स्वामी विवेकानन्द ने सिस्टर निवेदिता में प्राण प्रत्यार्पित किये थे। महर्षि अरविन्द ने प्राण-शक्ति द्वारा ही सन्देश भेजकर पाँडिचेरी आश्रम की संचालिका ‘मदिति-सह भारत-माता’ की सम्पादिका ‘श्री यज्ञ शिखा माँ’ को पेरिस से बुलाया था और उन्हें योग विद्या देकर भारतीय दर्शन का निष्णात बनाया था।
कहते हैं जब राम वनवास में थे, तब लक्ष्मण अपने तेजस्वी प्राणों का संचालन करके प्रत्येक दिन की स्थिति के समाचार अपनी धर्मपत्नी उर्मिला तक पहुँचा देते थे। उर्मिला उन सन्देशों को चित्रबद्ध करके रघुवंश परिवार में प्रसारित कर दिया करती थी और बेतार-के-तार की तरह के सन्देश सबको मिल जाया करते थे।
अनुसुइया आश्रम में अकेली थी। भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और महेश वेष बदलकर परीक्षार्थ आश्रम में पहुँचे। अत्रि मुनि बाहर थे। उन्होंने ही भगवान के त्रिकाल रूप को पहिचाना था और वह गुप्त सन्देश अनुसुइया को प्राण-शक्ति द्वारा ही प्रेरित किया था। ऐसी कथा-गाथाओं से सारा हिन्दू-शास्त्र भरा पड़ा है।
एक बार राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन इन्द्र के पास पहुँचे। इन्द्र ने उनके पुरुषार्थ से प्रसन्न होकर कहा- “में तुम्हें लोक-कल्याण करने वाली प्राण-विद्या सिखाऊँगा।” इसके बाद इन्द्र ने प्रतर्दन को प्राणतत्व का उपदेश दिया- “प्राण ही ब्रह्म है। साधनाओं द्वारा योगी, ऋषि-मुनि अपनी आत्मा में प्राण धारण करते और उससे विश्व का कल्याण करते हैं।”
कोषीताकि ब्राह्मणोपनिषद् के दूसरे अध्याय में भगवान इन्द्र ने प्रतर्दन को यह प्राण विद्या सिखाई है। इस अध्याय में असीम प्राण-शक्ति द्वारा दूसरों तक अन्तःप्रेरणायें व विचार पहुंचाने का रहस्योद्घाटन करते हुये बताया गया है-
‘अथ खलु तस्मा देतमेवोक्थ मुपासित। यौ वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राण...........। स यदा प्रतिबुद्धते यथाऽग्नेविस्फुलिंग। विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवोभ्यो लोका........।
अर्थात् जब मन विचार करता है तब अन्य सभी प्राण उसके सहयोग होकर विचार मग्न हो जाते हैं। नेत्र किसी वस्तु को देखने लगते हैं। तो अन्य प्राण उनका अनुसरण करते हैं। वाणी जब कुछ कहती है, तब अन्य प्राण उसके सहायक होते हैं। मुख्य प्राण के कार्य में अन्य प्राणों का पूर्ण सहयोग होता है।
मनुष्य शरीर भी एक व्यवस्थित बिजलीघर है। मस्तिष्क से लेकर हाथ के पोरुओं तक शरीर के इंच-इंच भाग को ठंडा और गरम नाड़ियां इफरेन्ट एण्ड आफरेन्ट नर्वस फैली हुई हैं। ठीक डा. ब्राउन के अनुसार शारीरिक और मासिक कार्यों को चलाने में जितनी बिजली खर्च होती है उतने से एक बड़ा मील चल सकता है। छोटे बच्चे के शरीर में प्राप्त विद्युत शक्ति ही इतनी अधिक होती है कि उससे रेल के इंजन को चलाया जा सकता है।
स्नायु विज्ञानी कार्ल लैसले ने तो यहाँ तक खोज करने में सफलता प्राप्त कर ली है कि किस स्थान पर कितनी विद्युत प्रवाह किये जाने से किस काल खण्ड में किस किस्म की स्मृति उभारी जा सकती है।
कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट ऑफ टैक्नालाजी के डा. रोगर स्पैरी ने सुदीर्घ कालिक संचित, आदत, अभ्यासों से मुक्त होने तथा सर्वथा नये अभ्यासों को अपनाये जाने के लिए मस्तिष्क को प्रेरित कर सकने के अपने प्रयोगों में सफलता प्राप्त कर ली है।
स्वीडन के डॉक्टर हाल्गर हाउडन आर. एन. ए. (रिवो यूक्लिक एसिड) मात्रा को बढ़ाकर चेतना की परतों में विविध उभार, उतार-चढ़ाव में सफल रहे हैं।
अध्यात्मिक चिकित्सा और प्राण संचालन की प्रक्रिया को समझने के लिए शरीर के अंतर्गत रहने वाली मनःशक्ति को समझ लेना आवश्यक है। क्योंकि जिस प्रकार ध्वनि-तरंगों को पकड़ने के लिए रेडियो में एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल फिट किया जाता है शरीर अध्यात्म का भी एक क्रिस्टल है और वह मन है। विज्ञान जानने वालों को पता है कि ईथर नामक तत्व सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, हम जो भी बोलते हैं, उनका भी एक प्रवाह है, पर वह बहुत हल्का होता है, किन्तु जब अपने शब्दों को विद्युत परमाणुओं में बदल देते हैं तो वह शब्द तरंगें भी विद्युत शक्ति के अनुरूप ही प्रचण्ड रूप धारण कर लेती हैं और बड़े वेग से चारों तरफ फैलने लगती हैं। वह शब्द तरंगें सम्पूर्ण आकाश में भरी रहती हैं, रेडियो उन लहरों को पकड़ता है और विद्युत परमाणुओं को रोककर केवल शब्द तरंगों को लाउडस्पीकर तक जाने देता है, जिससे दूर बैठे व्यक्ति की ध्वनि वहाँ भी सुनाई देने लगता है। शब्द को तरंग और तरंग को फिर शब्द में बदलने का काम विद्युत करती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्सा और विचार प्रेषण (टेलीपैथी) का काम मन करता है।
यों मन शरीर में एक प्रथम सत्ता की भाँति दिखाई देता है, पर वैज्ञानिक जानते हैं कि शरीर के प्रत्येक कोश में एक पृथक मन होता है। कोशों के मनो का समुदाय ही अवयव समग्र मन का निर्माण करता है। प्रत्येक अवयव का क्रिया क्षेत्र अलग-अलग है, पर वह सब मन अवयव के अधीन है। मान लीजिए यौन केन्द्रों के समीपवर्ती न जीवकोश (सैल्स) अपनी तरह के रासायनिक पदार्थ ढूँढ़ते और ग्रहण करते हैं। उनकी उत्तेजना काम वासना को भड़काने का काम करती है, किन्तु समग्र मन नहीं चाहता कि इन यौनावस्थित जीवकोशों की इच्छा को पूरा किया जाय, तो वह काम वासना पर नियन्त्रण कर लेगा। इसी प्रकार शरीर के हर अंग के मन अपनी-अपनी इच्छाएं प्रकट करते हैं। पर समग्र मन उन सबको काटता-छाँटता रहता है। जो इच्छा पूर्ण नहीं होने की होती, उसे दबाता रहता है और दूसरों को सहयोग देकर वैसा काम करने लगता है।
यह जीवकोशों के मन ही मिलकर समग्र मन का निर्माण करते हैं, इसीलिए मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म शास्त्र में उसे ‘मनोमय कोश’ कहा गया है। एक अवस्था ऐसी होती है जब शरीर के सब मन उसके आधीन काम करते हैं, जब यह अनुमान स्थापित हो जाता है तो मन की क्षमता बड़ी प्रचण्ड हो जाती है और उसे जिस ओर लगा दिया जाय वहीं तूफान की सी तीव्र हलचल पैदा कर देता है।
प्रत्युत्पन्न मन जब एकाग्र और संकल्पशील होता है तो सभी कोश स्थित मन जो विभिन्न गुणों और स्थानों की सुरक्षा करने वाले होते हैं, उसी के आधीन होकर कार्य करने में लग जाते हैं, फिर उस संग्रहित शक्ति से किसी भी स्थान के जीवकोशों को किसी दूसरे के शरीर में पहुँचा कर उस व्यक्ति की किसी भी रोग से रक्षा की जा सकती है, सुनने-समझने वाले मनों में हलचल पैदा करके उन्हें सन्देश दिया जा सकता है, किसी को पीड़ित या परेशान भी किया जा सकता है।
चौथी सदी में एक युवक जिसे प्रेतबाधा थी उसके पिता उसे अच्छा करने के लिए सन्त मकारियस के पास ले गये जो मिश्र के मरुस्थल में रहते थे। उन्होंने एक हाथ युवक के सिर पर और एक छाती पर रखा और प्रार्थना करने लगे। धीरे-धीरे युवक का शरीर फूलने लगा और इतना फूला कि ऐसा लगने लगा कि युवक अधर में लटका हो। फिर अचानक युवक चीखा और उसके शरीर से पानी निकला। इसके बाद युवक अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ गया और रोग मुक्त होकर अच्छा हो गया।
सन्त आगस्टाइन, मिलान के सन्त एम्ब्रोज, टूर के सन्त मार्टिन, विशिष्ट हस्तियाँ थीं, जिन्होंने प्रार्थना एवं सिर पर हाथों के स्पर्श द्वारा रोगोपचार की परम्परा को जीवित रखा।
शताब्दियों तक ऐसे अनेक सन्त होते रहे हैं। जिनके पास अपने हाथों के स्पर्श एवं प्रार्थना के द्वारा रोगमुक्त करने की ईश्वरी शक्ति रही है। इन सन्तों की वजह से लोगों में धर्म के प्रति झुकाव बना रहा। बारहवीं सदी में असीसी के सन्त फ्रान्सिस और क्लेअर बाक्स के सन्त बरनार्ड ने अनेकों को अपनी रोगमुक्त करने का शक्ति से अच्छा किया। चौदहवीं सदी में सियेना के सन्त केथराइन तथा सन्त फ्राँसिस जेवियर, सोलहवीं शताब्दी में अपनी रोगमुक्त करने की शक्तियों के लिए बहुत प्रख्यात रहे और अनेकों को इसका लाभ पहुँचाया। जार्ज फाक्स जिसने सत्रहवीं सदी में ‘सोसायटी ऑफ फ्रैन्डस” की स्थापना की थी, ने इंग्लैंड और अमेरिका में अनेक रोगियों को अपनी रोगमुक्त करने की शक्ति से अच्छा किया। इन्होंने अपने द्वारा आध्यात्मिक उपचार से रोगमुक्त करने के अनुभवों का वर्णन, अप्रकाशित पुस्तक ‘बुक आफ निरकेल्स” में किया है।
सेंटपाल के समय से ही प्रसिद्ध सन्तों, आत्म बलिदानियों, अथवा शहीदों के द्वारा उपयोग में लाये गये रुमालों और एप्रनों को रोगी के अंगों पर रखकर उन्हें दबाया जाता जिससे उन्हें रोगमुक्ति से छुटकारा मिलाता था। ऐसा लिखित रिकार्ड उपलब्ध है। बाद में यह सुरक्षित महसूस किया गया कि आत्म बलिदानी धर्म-प्रचारकों के अवशेष उसकी कब्र से निकालकर उन्हें नये चर्चों में स्थापित किया जावे। सेंट स्टीफन के ऐसे रखे हुये अवशेषों से अनेक रोगियों को बहुत लाभ हुआ है। सन्त कोसमास तथा सन्त डाभियन, दो चिकित्सक भाइयों एवं अनेक धर्म प्रचारक सन्तों के अवशेषों का उपयोग इस प्रकार लगातार रोग मुक्ति के लिए होता रहा।
बहुत सारी कब्रों को समाधियों का रूप दिया गया, जहाँ बहुत से रोगी उन समाधियों के पास, जिनमें संतों के शव अथवा उनके अवशेष रखे होते थे, के नजदीक श्रद्धा से पूरी रात गुजारते थे। ईसामसीह का “काँटों का ताज” जिसे उन्हें सूली पर चढ़ाते समय पहनाया गया था एक अतिमहत्वपूर्ण और प्रभावकारी अवशेष सिद्ध हुआ। जिसके द्वारा अनेकों रोगियों को लाभ मिला।
प्राण का बाहुल्य ही विशिष्ट प्रतिभा के रूप में परिलक्षित होता है। प्राणवान व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से सामान्य होते हुये भी ऐसे पराक्रम करते देखे गये हैं मानों उन्हें कोई दैवी वरदान उपलब्ध हो। व्यक्तित्व का विशिष्टता प्राण वैभव की बहुलता पर ही निर्भर है।
आमस्टा माइजे निवासी जान मिल्ले 124 वर्ष तक जिया। उसने अन्तिम विवाह 80 वर्ष की आयु में एक 18 वर्षीय युवती से विवाह किया। इसके बाद उसके 10 बच्चे जन्मे और दीर्घजीवी रहे। मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व उसके सफेद बाल फिर से काले होने लगे थे।
जियान्गी प्रान्त में रहने वाला 101 वर्षीय चीनी किसान को अपने द्वितीय बचपन की दाँत समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अब कुल उसके 16 दाँत नीचे 11 दाँत ऊपर वाले जबड़े में सबके सब नये चमकीले उग आये हैं। किसान अब प्रसन्नतापूर्वक अपने भोजन को चबाने लगा है। यह समाचार “वेनहू वाओ” नामक दैनिक पत्र ने दिया है।
मैक्सिस जर्मनी का प्रसिद्ध भारोत्तोलक हुआ है। उसका निज का वजन 147 पौंड था। पर एक प्रदर्शन में उसने अपने से 40 पौंड भारी 187 पौंड के व्यक्ति को एक हाथ पर बिठाकर 16 बार अपने सिर से ऊपर तक उठाया। दूसरे हाथ में वह पानी से लबालब भरा गिलास इसलिए थामे रहा कि कोई यह न सोचे कि इतना वजन उठाने में उसके ऊपर कोई खिंचाव पड़ता है। खिंचाव पड़ेगा तो पानी फैलेगा यह प्रमाण देने के लिए उसने दूसरे हाथ में गिलास थामे रहने का प्रदर्शन किया।
ओलम्पिक खेलों में अमेरिका का सर्वप्रथम दौड़ विजेता जेन्सवीन कौलौनी था। सन् 1896 में उसने होप स्टैप एण्ड जम्प की प्रतियोगिता में भाग लिया और बाजी मारी। वह अभ्यस्त एवं प्रशिक्षित खिलाड़ी नहीं था। अमेरिकी सरकार का वह प्रतिनिधि था। निजी तौर पर किसी प्रकार वह खिलाड़ियों के समुदाय में बड़ी कठिनाई से सम्मिलित हुआ था। विजय के उपरान्त उसने यह कहा- बचपन से ही दौड़ के उसके एकाँगी शौक को आज संयोगवश प्रोत्साहन का अवसर मिल गया।
सन् 1818 में इंग्लैंड में एक ऐसी महिला के साहसिक कृत्यों की चर्चा रही, जिसने दिखा दिया था कि उसका शरीर बिल्कुल ही ज्वलनशील नहीं है। नाइट्रिक एसिड को कुछ देर तक मुँह में रखने के बाद 38 वर्षीया ‘जो गिराडेली’ ने उसे लोहे पर थूक दी तो लाल लपटें निकलने लगीं। उसने इसी प्रकार जब उबलते तेल को कुछ देर तक मुँह में रखने के बाद कुल्ला किया तो उसके पश्चात् भी उसे गर्म ही पाया गया। पिघले मोम को गर्म पानी की भाँति मुँह में रखकर उसने अपने होटों पर सील लगवा दी थी। उबलते जस्ते ने जब द्रव का रूप धारण कर लिया तो इस महिला ने उसमें अपनी उँगलियों को डालकर कुछ अंश उठाया और उसे अपने मुँह में रख लिया। इसे चूसकर एक सिक्के के आकार में परिवर्तित कर दिया।
जो गिराडेली का जन्म इटली में हुआ था। अपनी अग्नि परीक्षा दिखाने के लिए वह पिघले हुए लोहे के टुकड़ों पर नंगे पाँव ऊपर से कूदती थी। फावड़े को गर्म करके लाल बनाया गया। जब उसके डंडे से आग निकलने लगी, तब उसने अपनी बाहुओं पर, पैरों पर तथा सिर के बालों पर उससे चोट पहुँचाई। जब रक्त तप्त फावड़े ने उसे चोट नहीं पहुंचाई तो उसने अपनी एड़ी से गरम लोहे को पीटकर मोड़ दिया। उस लोहे से ‘छन्न’ की आवाज तब हुई जब गिराडेली ने उसे अपनी जीभ से चाट लिया। आठ जलती मोमबत्तियों पर हाथों और पैरों की उँगलियों को क्रमशः इस प्रकार घुमाया करती थी कि उनकी गर्मी शरीर को लगे किन्तु उँगलियों के बीच से लो निकलती रहे। धुंये से वे अंग तो काले हो गये किन्तु जलने का काई चिन्ह दृष्टिगोचर न हो पाया। परीक्षण के बीच पाया गया कि गरम धातु की शलाका जब उसके शरीर की त्वचा से स्पर्श किया जाता था तो किसी प्रकार की वाष्प बिल्कुल नहीं निकलती थी। ‘जो गिराडेली’ कहा करती थी कि वह अग्नि की भट्टी में माँस के लोथड़े के साथ प्रवेश कर सकती है। आग में माँस बुरी तरह चल जाता और वह निरापद बच निकलती।
प्राणवानों में शारीरिक ही नहीं मानसिक विशिष्टता भी पाई जाती है। मस्तिष्कीय संरचना में कोई अन्तर न होने पर भी कोई-कोई व्यक्ति ऐसे देखे गये हैं जिनकी मानसिक क्षमता सामान्यजनों की तुलना में असाधारण रूप से बढ़ी-चढ़ी होती है। प्रयत्न करने पर प्राणशक्ति का अभिवर्धन हर कोई कर सकता है।
मस्तिष्क में अगणित क्षमताओं और विशेषताओं के भाण्डागार भरे पड़े हैं। विचित्रताओं और विविधताओं को देखते हुए उसके लिए भानुमती का पिटारा, जादू का झोला की उक्ति सार्थक ही प्रतीत होती है। संसार की वरिष्ठ प्रतिभाओं में उनकी परिस्थितियों ने कम और मनःस्थिति की विशिष्टताओं ने अधिक भूमिका निभाई है।
मस्तिष्कीय क्षमताएँ ईश्वर प्रदत्त हैं। उनके उपार्जन अभिवर्धन में अपना कोई हाथ नहीं ऐसा सोचना गलत है। मस्तिष्कीय संरचना में भी शरीर संरचना की तरह नगण्य सा अन्तर रहता है। किसी को समर्थ-असमर्थ देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्रसुप्ति को जगाने के संदर्भ में कहीं कम कहीं अधिक प्रयत्न हुए। जागा हुआ चूहा भी चकित करने वाली उछलकूद दिखाता है। इसके विपरीत निद्राग्रस्त होने पर बलिष्ठ से बलिष्ठ की स्थिति भी मृतक तुल्य हो जाती है। यही बात मस्तिष्क के सम्बन्ध में भी है। उसकी क्षमताओं में जो अन्तर पाया जाता है, उसे संरचना का नहीं वरन् प्रसुप्ति एवं जागृति का भेद माना जाना चाहिए।
मस्तिष्कीय क्षमताओं में ‘स्मरण शक्ति’ का बहुत बड़ा योगदान है। जो आज पढ़ता-सुनता है और कल भूल जाता है, उसे अशिक्षित एवं अनगढ़ जैसी स्थिती में रहना पड़ेगा। भूतकालीन स्मरणों के आधार पर ही आज की समस्याओं के सम्बन्ध में किसी सही निष्कर्ष पर पहुँच सकना सम्भव होता है। प्राचीन काल में स्मरण शक्ति की उपयोगिता आवश्यकता अधिक अच्छी तरह समझी जाती थी, तब उसके लिए प्रयत्न भी होते थे। वेद मन्त्रों की श्रुति कहते हैं। शास्त्र संहिताओं की स्मृति। यह श्रुति- स्मृति पुस्तकों तक सीमित नहीं रहने दी जाती थी वरन् कण्ठस्थ करके- स्मरण कर अविच्छिन्न अंग बनाई जाती थी। गीता रामायण आदि को अभी भी कितने ही लोग कण्ठस्थ करते हैं।
स्मृति स्मरण शक्ति कितनों में ही जन्मजात रूप में असाधारण मात्रा में पायी जाती है। पर इसका अर्थ यह नहीं दूसरे लोग यदि चाहें तो उस विशेषता के अधिकारी नहीं बन सकते हैं। जो काम एक कर सका, जो एक को उपलब्ध हुआ वह सिद्धान्ततः दूसरे को भी मिल सकता है। असफलता- सफलता की न्यूनाधिकता की बात पुरुषार्थ पर ही टिकती है। पुरुषार्थों में अध्यात्म क्षेत्र के पराक्रम भी हैं, जो साधारण उपाय विदित होने पर उन असाधारण अवलम्बनों के सहारे सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचने में समर्थ हो सकते हैं।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर फर्डिनेण्ड वान न्यूट्राइटर ने एक ऐसे ल्यूनिथियन लड़के की रहस्यमय सामर्थ्य का वर्णन किया है जो विश्व की किसी भी भाषा के गद्य अथवा पद्य को सुनकर उसी भाषा में पूर्ण विराम, अर्द्ध विराम सहित दुहरा सकता है। अपने निष्कर्षों में उनने लिखा है कि जिन शक्तियों को सौ साल पूर्व तक हम काल्पनिक मानते थे, वही आज हमारी आँखों के सामने सत्य सिद्ध हो रही हैं।
एक बार फ्रांस की एक अदालत में एक मुकदमा पेश हुआ। अपराधी के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, तथापि उसकी पैरवी करने वालों ने सुप्रसिद्ध एटार्नी लुईस बनार्ड को अपना वकील चुनकर मुकदमा लड़ा। सैनिक अदालत से उसे सजा हो गई। एटार्नी ने अदालत से याचना की कि उसे मुकदमा राजा के सामने ले जाना है, अतएव सजा पाँच दिन के लिए रोक दी जाय क्योंकि राजा पाँच दिन के लिए बाहर थे। अदालत ने यह बात अस्वीकार कर दी। एटार्नी ने इस पर तर्क उपस्थित करने की आज्ञा माँगी और वह मिल गयी। उसने अपना तर्क जूरी के सामने लगातार एक सौ बीस घण्टे तक अर्थात् पूरे पाँच दिन- पाँच रात तक जारी रखा। इस बीच उसने कानून शास्त्र के दुनिया भर के पन्ने जवाबी अदालत के सामने रखकर अपनी आश्चर्यजनक बौद्धिक क्षमता का सिक्का जमा दिया। सम्भव है वह और भी बोलता पर इसी बीच राजा साहब आ गये और इस प्रकार उन्हें महाराज के सामने पेश होने का अवसर मिल गया और उसके बाद क्षमादान भी। जर्मनी के म्यूनिख नगर में एक साथ-साथ तीन हाई स्कूलों में यहूदी भाषा पढ़ाने वाले अध्यापक फ्रंज एक्सावररिक्टर 77 भाषाओं के विद्वान थे।
लार्ड मैकाले 19वीं शताब्दी के विश्व विख्यात ब्रिटिश इतिहास लेखक ने इंग्लैण्ड का इतिहास आठ जिल्दों में लिखा। उसके लिए उन्होंने दूसरी पुस्तक उठाकर नहीं देखी। सैकड़ों घटनाओं की तिथियों और घटना से सम्बन्धित व्यक्तियों के नाम उन्हें जबानी याद थे। यहाँ नहीं स्थानों के परिचय, दूसरे विषय और अब तक जितने भी व्यक्ति उनके जीवन में उनके संपर्क में आ चुके थे, उन सबके नाम उन्हें बाकायदा कण्ठस्थ थे। लोग उन्हें चलता-फिरता पुस्तकालय कहते थे।
पोर्सन ग्रीक भाषा का अद्वितीय पण्डित था, उसने ग्रीक भाषा की सभी पुस्तकें और शेक्सपियर के नाटक मुख जबानी याद कर लिये थे। ब्रिटिश संग्रहालय के सहायक अधीक्षक रिचर्ड गार्नेट बारह वर्ष तक एक संग्रहालय के मुद्रित पुस्तक विभाग के अध्यक्ष थे, इस संग्रहालय में पुस्तकों की हजारों अलमारियां और उनमें करोड़ों की संख्या में पुस्तकें थीं। श्री गार्नेट अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे न केवल प्रत्येक पुस्तक का ठिकाना बता देते वरन् पुस्तक की जानकारी भी देते थे। अमराकी प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट का सेक्रेटरी जेम्स ए. फेचरली ने अपनी याददाश्त का इतना विकास किया था कि वह 20 हजार व्यक्तियों से परिचित था और सबके बारे में सैकड़ों बातें जानता था।
स्मरण शक्ति के धनी लोगों का विवरण गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्डस (1981) पुस्तक में छपा है। उसमें अब तक के तीव्र गणित स्मरणकर्ताओं में अग्रणी व्यक्ति ने नौ घण्टे 14 मिनट में 18013 अंकों तक की संख्या सुनाई। अब इस कीर्तिमान को बेंगलोर के एक छात्र महादेवन ने तोड़ा है। वह 3 घण्टे 40 मिनट में 31811 अंकों तक की संख्या सुनाने की विलक्षणता प्रस्तुत कर चुका है।
अरब के एक कोश लेखक अलीइब्न बगदाद में हुए। इन्होंने आँखें चले जाने के बाद भी अपना ग्रन्थ जारी रखा और केवल स्मरण शक्ति के सहारे 32 खण्ड वाला कोश तैयार किया।
प्रसिद्ध फ्राँसीसी तत्ववेत्ता आर्गेस्ट कॉमटे (19वीं सदी) अपने विचारों को लिपिबद्ध करने से पूर्व स्मृति में संग्रह कर लेते थे। सात लाख शब्दों की 4,712 पृष्ठों में छह जिल्दों वाली ‘पॉजिटिव फिलॉसफी’ नामक अपनी पुस्तक उन्होंने 1830 से लेकर 1842 ई. तक लगातार बारह वर्षों तक लिखकर पूरा किया। इस अवधि में उन्हें किसी प्रकार के नोट्स या संदर्भ ग्रन्थ देखने की आवश्यकता नहीं अनुभव हुई। मानो उनके मस्तिष्क में विचार किसी ‘प्रीरिकार्डेड कैसेट’ में अंकित करके रखे हुए थे। इस बीच न तो उनका कोई विचार खोया और न ही लिखते हुए प्रवाह का क्रम भंग हुआ। यह समूचा ग्रन्थ स्याही और कलम से कागज पर अंकित करने के पूर्व एक सुसंबद्ध क्रम में उनने अपने मस्तिष्क में अंकित कर लिया था।
मनःशास्त्री वार्टलेट का कथन है कि जिन तथ्यों को भविष्य में याद रखने की आवश्यकता समझी जाय उनमें गहरी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि स्मरण से क्या लाभ और विस्मरण से क्या हानि होने की सम्भावना है। इतना सोच-विचार कर लेने के उपरान्त यदि किन्हीं तथ्यों की परत मस्तिष्क पर जमायी जायेगी तो देर तक स्थिर बनी रहेगी और उन प्रसंगों को भूल की कठिनाई उत्पन्न प्रायः नहीं ही होगी।
विद्वान गेट्स वर्ग ने पुनरावृत्ति पर बहुत जोर दिया है। वे प्राचीन काल की तोता-रटन्त पद्धति का मजाक नहीं उड़ाते वरन् स्मरण को चिरस्थायी बनाने के लिए उपयोगी मानते हैं।
प्रो. इवेगार्ड्स का कथन है कि प्रसंगों को न केवल कल्पना चित्र के रूप में वरन् उनके तात्पर्य और फलितार्थ को भी ध्यान में रखते हुए यदि मानस पटल पर जमाया जाय तो जल्दी याद भी हो जायेंगे और देर तक टिकाऊ भी बने रहेंगे। आवश्यकतानुसार उनको स्मरण करने में किसी प्रकार की कठिनाई न होगी।
मिश्र के बादशाह नासर के पास 20 हजार गुलाम थे। उसे उनके नाम ही नहीं जन्म स्थान, जाति उम्र और पकड़े जाने का स्थान भी जबानी याद रहता था। कब कौन-सा गुलाम कितने दाम का खरीदा बेचा गया था, यह भी उन्हें बिना भूल-चूक के याद था।
राजा भोज के दरबारी एक श्रुतिधर नामक विद्वान् का उल्लेख मिलता है, जो एक घड़ी (24 मिनट) तक सुने हुए प्रसंग को तत्काल ज्यों का त्यों सुना देते थे।
मनोविज्ञानी कार्ल सीशोर का कथन है कि औसत व्यक्ति अपनी स्वाभाविक स्मरण शक्ति का मात्र दस प्रतिशत प्रयोग करता है। 90 प्रतिशत तो ऐसे ही मूर्छित और अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ी रहती है। फलतः मनुष्य मन्द बुद्धि और मूर्ख स्तर का बना रहता है। यदि प्रयत्न किया जाय तो ऐसे लोग अपने को बौद्धिक दृष्टि से कहीं अधिक सक्षम बना सकते हैं। विकसित मस्तिष्क वालों को भविष्य में और भी अधिक तीक्ष्णता उत्पन्न कर लेने की पूरी-पूरी गुँजाइश है।
दक्षिण अफ्रीका के फील्ड मार्शल स्मट्स भी ऐसे ही विलक्षण स्मृति के धनियों में से एक थे। उनकी लाइब्रेरी में अन्यन्त उच्चकोटि की दस हजार पुस्तकें संग्रहित थीं। स्मट्स को वे सभी पुस्तकें अक्षरशः याद थीं। बात-चीत के बीच-बीच में वे अक्सर उनके कई अंश पृष्ठ संख्या, पुस्तक संख्या, लेखक आदि को पूर्ण विवरण सहित प्रस्तुत करते रहते थे।
डेनमार्क शहर में एक बार भयंकर आग लगी। वहाँ के एक बैंक के सारे बही-खाते तथा कागजी नोट भी इसी अग्निकाण्ड में स्वाहा हो गये। केवल सोने-चाँदी जैसी धातुएँ ही बची रह गईं। बैंक के सामने जमाकर्ताओं की भीड़ लग गयी। तभी उक्त बैंक के एक क्लर्क ने उस बैंक के सभी 2000 जमाकर्ताओं की सही-सही जमा राशि का मुँह जबानी हिसाब-किताब कर दिया। इतना ही नहीं उसके द्वारा बताये गये विवरण इतने सही थे कि सभी व्यक्ति बैंक के भुगतान से पूर्णतः सन्तुष्ट होकर गये। इस कार्य के पुरस्कार स्वरूप उसे उस बैंक समूहे का डायरेक्टर बना दिया गया।
थॉमस कार्लाइल ने “दि फ्रेंच रिवोल्यूशन” नामक बहुत बड़ा हस्तलिखित पुस्तक लिखी थी। उसे वह पुस्तक संशोधन के लिए जॉन स्टुअर्ट मिल को दी। वह पुस्तक मिल के घर में नौकर ने लापरवाही से चूल्हे में जला दिया। जब यह बात मिल ने कार्लाइल को बतायी तो कार्लाइल बिना रोष, चिन्ता या हताश हुए उस पुस्तक के पुर्नलेखन में जुट गये तथा उसको संशोधित रूप में लिखकर तैयार कर दिया।
इंग्लैंड निवासी एक अन्धे व्यक्ति फिल्डिंग को दस हजार व्यक्तियों के नाम याद थे। इतना ही नहीं वह आवाज सुनकर उस व्यक्ति का नाम बता देता था। इसी प्रकार की विलक्षणता एक और माण्टुगुनस नामक अँग्रेज में थी। वह जन्माध था। पच्चीस वर्ष तक उसने पोस्टमैन का काम किया घर-घर जाकर चिट्ठी बाँटता था। उसके बाँटने में कभी गलती नहीं पकड़ी गई। वह पत्रों को सिलसिले से लगाता था और बाँटने से पहले दूसरों की सहायता से नाम और क्रम मालूम कर लेता था। इतने भर से हर दिनों सैकड़ों चिट्ठियाँ बांटने में उसकी स्मरण शक्ति सही काम दे जाती थी।
जर्मन इतिहास में स्मरण शक्ति की प्रखरता के लिए विद्वान नेबूर प्रसिद्ध है। यह ख्याति सर्व प्रथम तब मिली जब वे एक दफ्तर में क्लर्क थे। कागजों में संयोगवश आग लग गई। इस पर नेबूर ने सारे रजिस्टर और जरूरी कागज-पत्र मात्र स्मरण शक्ति के आधार पर ज्यों के त्यों बना दिये। इसके बाद वे अपनी स्मृति की विलक्षणता के एक से एक बड़े प्रमाण देते चले गये और उस देश के प्रख्यात लोगों में गिने गये।
जर्मनी में ही म्यूनिख की नेशनल लाइब्रेरी के डायरेक्टर जोनफ वर्नवर्ड डोकन को भी ऐसी ही ख्याति है। उन्हें आती तो कितनी ही भाषाएँ थीं, पर 9 भाषाओं पर उनका पूरा अधिकार था। उन्हें पत्र व्यवहार बहुत करना पड़ता था। इसके लिए उनके पास नौ विभिन्न भाषाओं के नौ अलग-अलग सेक्रेटरी थे। वे सबको एक साथ बिठा लेते थे और सभी को पत्र लिखाते जाते थे। इतना ही नहीं उन्हें पूरी बाइबिल अक्षरशः कण्ठस्थ थी। प्रसंग के अनुसार वे कहीं से भी उसे सुना सकते थे।
लिथूयानिया निवासी रेबी एलिजा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसे विचित्र मानसिक शक्ति प्राप्त थी, पर नियन्त्रण न होने के कारण वह शक्ति जीवन में कुछ काम न आई। उसने अपने जीवन में दो हजार से अधिक पुस्तकों को एक बार पढ़कर याद कर लिया था। कोई भी पुस्तक लेकर किसी भी पन्ने को खोलकर पूछने पर वह उसके एक-एक अक्षर को दोहरा देता था।
जर्मनी के राजा की एक लाइब्रेरी प्रसा में थी। इसके लाइब्रेरियन मैथुरिन बेसिरे की आवाज सम्बन्धी याददाश्त अद्भुत थी। एक बार उसकी परीक्षा के लिए बारह देशों के राजदूत पहुँचे और उन्होंने अपनी-अपनी भाषा में बारह वाक्य कहे। जब वे चुप हो गये तो बेसिरे ने बारहों भाषाओं के बारहों वाक्य ज्यों के ज्यों दोहरा दिये।
बेंजामिन शुल्स ने बाइबिल का अनुवाद तीन भारतीय भाषाओं में किया। उन्हें सौ भाषाओं को पढ़ना बोलना आता था। ईसाई प्रार्थना स्रोत के उन्हें 215 भाषाओं के गीत अनुवाद याद थे। वे यथा अवसर उन्हें भावनापूर्वक गाते थे और उन भाषाओं के जानकारों पर अपने भाषा ज्ञान की छाप डालते थे।
फ्राँस का प्रधान मन्त्री लियान मैम्ब्रेज स्मरण शक्ति का धनी था। उसे विद्रोही नेताओं के अनेक भाषण जबानी याद थे। वह पिछले दस साल के बजटों में कोई भी बात अंक गणनाओं के साथ सुना सकता था।
हैरो स्कूल- इंग्लैंड के एक अध्यापक हेमरी जोसफ डूरी ने विद्वान लूकान के लैटिन भाषा में लिखे हुये सम्पूर्ण ग्रन्थ कण्ठस्थ कर रखे थे। इन ग्रन्थों की पृष्ठ संख्या 2600 थी, एक बार 16 मील का सफर करते समय साथियों के मनोरंजन के लिए फरसेलिया नामक काव्य ग्रन्थ के 8000 छन्द स्मरण शक्ति के आधार पर यथावत् सुनाये थे।
बारहवीं सदी में फ्रांस की सेना का वार्षिक विवरण वहाँ के अफसरों के नाम और स्तर तथा जन्म तिथियों समेत प्रकाशित होता था। यह बड़ा ग्रन्थ हर साल छपता था। सन् 1856 की वार्षिक रिपोर्ट मिलिट्री होटल के एक बैरा को अक्षरशः याद थी। उसका नाम था- फैलिक्स मार्टिनी। उस वर्ष के विवरण पुस्तक में 16208 अफसरों के विस्तृत विवरण छपे थे। पूछने पर मार्टिनी किसी भी अफसर का पूरा उल्लेख यथावत् सुना देता था।
जेनेवा स्विट्जरलैण्ड के पियरे माउशोज नामक व्यक्ति ने 17 जिल्दों में प्रकाशित फ्रेंच इनसाइक्लोपीडिया पूरी तरह याद कर रखी थी। उसमें 18 लाख शब्द थे।
इटली (रोम) का राजा हैडियन बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। वह एक साथ बातचीत करते हुए लिखता भी जाता था लिखाता भी जाता। तीनों सिलसिले में कहीं चूक नहीं होती थी। उसे अपने राज्य के सभा पेन्शन प्राप्त कार्यकर्ताओं के पूरे पते याद थे।
इटली के फारेन्स कस्बे का रहने वाला मैग्लयाविने पुस्तकालयाध्यक्ष था। उसे अपने पुस्तकालय के 30 हजार पुस्तकों के नाम, मूल्य, प्रकाशक ही नहीं यह भी याद था कि वह पुस्तकालय के किस आलमारी में किस नम्बर पर रखी है।
दिल्ली के प्रसिद्ध न्यायाधीश जस्टिस हरनामदास को भारतीय दण्ड संहिता की सभी धारायें आदि से अन्त तक कॉमा, पूर्ण विराम सहित अक्षरशः याद थीं।
अब मस्तिष्क की अद्भुत स्मरण शक्ति की तुलना में इलेक्ट्रानिक मस्तिष्क (कम्प्यूटर ब्रेन) बहुत आगे हो रहे हैं किन्तु भारत की शकुंतला देवी नामक महिला जटिल गणनाओं के सवाल को पूरा होते ही हल करके रख देती हैं। तेज से तेज कम्प्यूटर भी उसकी विलक्षणता के आगे-पीछे होते देखे गये हैं। विश्व के मूर्धन्य गणक उनकी समता को विश्व का अद्वितीय नमूना मानते हैं।
मानवी मस्तिष्क असीम क्षमताओं का भण्डार है। इतना सशक्त साधन उपलब्ध होते हुए भी कोई विरले ही उसका कहने लायक उपयोग कर पाते हैं। अधिकाँश तो पेट-प्रजनन में काम आने वाले क्षेत्र को ही सक्षम रख पाते हैं। विस्मृति के कारण अनेक प्रकार की हानियाँ उठाने वाले यह भी समझें कि अपने असीम शक्ति भण्डार मनःसंस्था के महत्व को विस्मृति किये रहना उसे जागृत एवं सक्षम बनाने के लिए प्रयत्न न करना परले सिरे का दुर्भाग्य है। जिनके लिए सम्भव हो वे मानसिक क्षमताएँ जगायें और उस स्तर का लाभ कमायें जिसके लिए लोग तरसते रहते हैं।
मरण के उपरान्त कुछ समय पश्चात मनुष्य का नया जन्म होता है, इस सम्बन्ध में अब उपलब्ध तथ्यों का इतना बाहुल्य है कि सन्देह एवं अविश्वास की बहुत कम गुंजाइश रह गई है।
पुनर्जन्म के संबंध में नास्तिकवादियों के अतिरिक्त ईसाई मुसलिम धर्मों की पुरातन मान्यताएं भी बाधक थीं। यह दोनों धर्म आत्मा का अस्तित्व बना रहने की बात तो कहते हैं, पर साथ ही यह भी बताते हैं कि महाप्रलय के उपरान्त जब नई सृष्टि का सृजन होगा तभी नया जन्म मिलेगा। इस मान्यता में लम्बी अवधि का प्रतिपादन होने से पुनर्जन्म के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह जाता और भले-बुरे कर्मों को भुगतने के लिए कुछ ही दिनों बाद नया जन्म लेना पड़ेगा यह मान्यता न रहने पर उस एकांत अवधि के प्रति निराशा जैसा चिन्तन उभरने लगता है।
पुनर्जन्म की मान्यता जीवन के अनवरत रूप से गतिशील रहने का विश्वास दिलाती है और प्रगति-प्रयासों को तनिक-सा विराम लेने के उपरान्त फिर से गतिशील बनने का उत्साह उत्पन्न करती रहती है। यह परिणति की बात हुई। जहाँ तक जीवन के मरण उपरान्त के बाद भी बने रहने का प्रश्न है, वहाँ तक पुनर्जन्म के प्रमाणों से इस तथ्य की भली-भांति पुष्टि हो जाती है। इतना विश्वास लोकमानस में सुदृढ़ रह सके तो उसकी परिणति बिना वृद्धावस्था एवं मरण की बात सोचकर निराश हुए उपयोगी उत्कर्ष क्रम को उत्साहपूर्वक जारी रखा जा सकता है। साथ ही दुष्कृत्यों से विनिर्मित हुए कुसंस्कारों का प्रतिफल अगले जन्म में भुगतने की बात को भी बहुत बड़ा बल मिल सकता है।
कभी पुनर्जन्म धर्म एवं दर्शन का विषय था। यह दोनों ही क्षेत्र प्रधान हैं। तर्क प्रमाण जुटाने की आवश्यकता अनुभव की जाय तो धर्म प्रेमियों का ही समाधान हो सकता है। जिनमें तथ्यान्वेषी जिज्ञासाएं हैं, उनको बिना आधार प्रमाण पाये सन्तोष होता ही नहीं। अध्यात्म तत्व ज्ञान की आधार शिला समझी जाने वाली पुनर्जन्म मान्यता को अब वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय स्वीकार कर लिया है। उस संदर्भ में जो प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं, उनसे पुरातन असमंजस की स्थिति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। प्रत्यक्ष-प्रच्छन्न नास्तिकवाद के इन प्रस्तुत प्रमाणों के सम्मुख अपने पूर्वाग्रहों को जोड़ना या शिथिल करना पड़ रहा है। पुनर्जन्म की मान्यता जीवनक्रम में नीतिमत्ता एवं भविष्य की आशा बनाये रहने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है।
डा. इयान स्टिवेन्शन (डायरेक्टर आफ डिपार्टमेण्ट आफ साइकियाट्री) पूर्वजन्म सम्बन्धी शोध करने वाले व्यक्तियों के अगुआ हैं। उनने ‘टवेण्टी केसेज सजेस्टिव आफ रीइनकारनेशन’ नामक एक पुस्तक लिखी है।
अमरीका के उतर पश्चिमी समुद्र के किनारे रहने वाले रेड इण्डियनों के पूर्वज हजारों वर्ष पूर्व एशिया से आकर वहाँ बसे हैं। इन लोगों में एक व्यक्ति ने अपनी मृत्यु से पूर्व भावी जन्म ग्रहण का भविष्य कथन कर दिया। बाद में उसका अगला जन्म ठीक उसी आधार पर हुआ पाया गया। घटना इस प्रकार है।
1949 में विलियम ज्योर्ज सीनीयर अपने स्थानीय क्षेत्र में मछुआ का अगुआ था। उसने अपने पुत्र और पुत्रवधु से एक दिन कहा कि यदि पुनर्जन्म नाम की चीज सचमुच होती होगी तो में तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। मेरे शरीर पर इस समय जहां-जहां जो चिन्ह विद्यमान हैं वे यदि तुम्हारे पुत्र के शरीर पर भी यथावत दिखें तो समझना कि मैंने ही तुम्हारे गर्भ से अपना नया जन्म ग्रहण किया है। थोड़े ही दिनों बाद मछली मारने जाने पर नाव उलट जाने से समुद्र में डूब कर वह मर गया। इसके कुछ दिनों बाद उस मछुआरे की पुत्रवधु गर्भवती हुई और समय पूर्ण होने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम विलियम ज्योर्ज जूनियर रखा गया। जैसे-जैसे लड़का बड़ा होने लगा उसके गुण, कर्म स्वभाव को देखते हुए उसके माता-पिता का यह विश्वास दृढ़तर होता गया कि उस लड़के की केवल आकृति ही नहीं अपितु प्रकृति भी अपने दादा से हू-ब-हू मेल खाती थी। इसके कुछ और भी उदाहरण प्रमाण इस प्रकार हैं।
विलियम ज्योर्ज सीनियर को बास्केट बाल खेलते हुए पैर में चोट आ गई थी जिसके कारण वह लँगड़ा कर चला करता था। विलियम ज्योर्ज जूनियर बचपन से ही इसी प्रकार लँगड़ा कर चला करता था। इतना ही नहीं भयप्रद स्थानों पर उसका दादा जिस तरह लोगों को आगाही देते हुए गुस्सा प्रदर्शित करता था वही आदत इसकी भी थी। इतनी कम उमर में ही वह मछली मारने में अपने दादा जैसी निपुणता प्रदर्शित करने लगा। अपने मित्र सम्बन्धी और परिचितों के बारे में भी वह अच्छी खासी जानकारी रखता था। मरने से कुछ वर्ष पूर्व विलियम ने अपने बेटे को सोने की घड़ी दी थी। एक दिन विलियम के जूनियर के साथ उसकी माँ अपने जेवरों को देख रही थी। जैसे ही लड़के ने घड़ी देखी- उसने कहा मेरी घड़ी लाओ। घंटों की लड़-झगड़ के बाद भी उस घड़ी पर उसकी ममता कम नहीं हुई। 19 वर्ष की अवस्था तक घड़ी के प्रति उसका आकर्षण बना रहा। इसके पश्चात् युवावस्था में प्रवेश करते ही पूर्वजन्म सम्बन्धी सारे-के-सारे लगाव क्रमशः कम होते चले गये। इस लड़के पर इयान स्टीवेन्सन ने किशोरावस्था में उस पर परीक्षण किया था। दुबारा युवावस्था में भी उसने प्रयोग करके सारे निष्कर्ष निकाले थे।
अपने अनुसन्धान के आधार पर इयान स्टीवेन्सन ने मृत्यु और पुनर्जन्म की मध्यावधि सम्बन्धी कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। उनमें से एक यह है कि भिन्न-भिन्न स्थानों पर यह अवधि भिन्न पाई गई है- यथा टर्की में नौ महीने, लंका में इक्कीस महीने, भारत में 45 महीने तथा अलास्का के विलजिट इण्डियन्स में 48 महीने। जिनकी किसी हिंसक घटना अथवा आक्रमण से मृत्यु हुई होती है उनका जन्म जल्दी होता है तथा वे आमतौर पर अपना बदला चुकाने के लिए आते हैं। ऐसे प्रसंग सम्बन्धित जन्म श्रीलंका और भारत में 40 प्रतिशत तथा लेबनान और सीरिया में 80 प्रतिशत पाया गया है।
पुनर्जन्म में व्यक्ति का लिंग परिवर्तन भी होता देखा गया है। ऐसे पूर्व देह के सामान्य लक्षण अधिकतर 2 से 4 वर्ष की उम्र में अधिक प्रकट होते हैं तथा 5 से 8 वर्ष की उम्र तक समाप्त हो जाते हैं।
डा. इयान स्टिवेन्सन ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त का निष्कर्ष निकालने से पूर्व सोलह सौ लोगों के पूर्व जन्म का अध्ययन करके कुछ ठोस अवधारणाएँ वैज्ञानिक जगत के समक्ष प्रस्तुत कीं। बचपन से विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों के व्यक्तित्व का कारण पुनर्जन्म के सिद्धान्त के द्वारा ही समझाया जा सकता है और इसके मूल में कर्म का अकाट्य सिद्धान्त अविच्छिन्न अंग के रूप में जुड़ा हुआ है।
प्रो.सी.जे. डुकास (ब्राउन यूनिवर्सिटी) ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- “दि डाक्ट्रिन आफ दि झकार्नेशन इन दि हिस्ट्री आफ थाट।” इसमें प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक की पुनर्जन्म सम्बन्धी अनेक घटनाओं का वर्णन है। इसमें एडनर कैसी का भी उदाहरण दिया गया है। अमरीका में पुनर्जन्म की बातों का प्रचलन एडगर कैसी के प्रयत्नों के फलस्वरूप स्थापित हुआ। एडगर कैसी ने यह दावा किया कि मैं बाइबिल के समय से लेकर वर्तमान समय तक की पुनर्जन्म सम्बन्धी सारी घटनाओं को संकलित कर सकता हूँ।
इन प्रमाणों से पुनर्जन्म की वैज्ञानिकता जो अब तक सिद्ध नहीं हो पा रही है किन्तु पुनर्जन्म की पुष्टि करने वाले सशक्त उदाहरणों की संख्या और प्रामाणिकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। इससे ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य के लिए जो दो तत्व आज मान्यता प्राप्त हैं- (1) जेनेटिक हेरेडिटी (2) एनवायसमेण्टल इन्फ्लूएन्सेडा। में एक तीसरी बात और जुड़ना चाहिए और वह है- कर्म का सिद्धान्त।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जी. जुँग एकबार अफ्रीका में कहीं जा रहे थे। यह उनकी वहाँ की पहली यात्रा थी। वहां पहाड़ी पर खड़े आदिम जाति के एक व्यक्ति को देखते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे यह उनकी अपनी मातृभूमि है। उस काले व्यक्ति को देखते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे वह उसी स्थान पर 5,000 वर्षों से खड़ा उनकी प्रतीक्षा कर रहा हो। उस गाँव में प्रवेश करते ही उसके प्रत्येक स्थान के विषय में उन्हें ऐसा लगा मानों वहाँ के चप्पे-चप्पे से पूर्व परिचित हो। इस प्रकार की घटना के पीछे छिपे सिद्धान्त को मनोविज्ञान में ‘देजा बु’ नाम से जाना जाता है। जुँग इसकी व्याख्या ‘रिकॉग्नीशन आफ दि इम्मेमोरिम्मी नोन’ कहकर करते हैं।
विलियम चैपमैन व्हाइट ने इस विषय पर लिखी अपनी पुस्तक में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का वर्णन किया है। इसमें एक इस प्रकार है।
श्री व श्रीमती ब्रेलोर्न अमरीका से पहली बार बम्बई घूमने आये। उन लोगों ने बताया कि मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं इस स्थान से चिर -परिचित हूँ। एक रास्ते पर चलते हुए मैंने अपनी पत्नी से कहा कि अगले मोड़ पर अफ़गान चर्च होगा और उससे थोड़ी दूर आगे चलकर जब हम गली पार करेंगे तो डिलाईल रोड आयेगा। मेरी पत्नी ने मजाक में कहा- लगता है आप यहाँ पहले कभी आये हुए हैं इसीलिए आपको सभी रास्तों का पता है। यह बात सुनते ही मैं चौंक पड़ा कि मुझे क्यों ऐसा लग रहा है कि मैं यहाँ के प्रत्येक स्थान से पूर्व परिचित हूँ। हम वहाँ प्रत्येक स्थान पर घूमते रहे और मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि हर गली प्रत्येक पुराना मकान मेरा अच्छी तरह देखा भाला हुआ है। मलाबार हिल के पास पहुँचने पर पति ने एक बड़े वट वृक्ष के पास खड़े सिपाही से पूछा कि क्या इस स्थान पर कहीं कोई पुराना मकान था? सिपाही ने बताया कि मेरे पिता उस मकान में काम करते थे इसलिए मुझे पता है कि वहाँ पर एक मकान था लेकिन वह 90 वर्ष पूर्व तोड़ दिया गया। वह मकान किसी ‘भान’ परिवार का था। सिपाही का उत्तर सुनते ही श्री ब्रेलोर्न ने अपनी पत्नी को याद दिलाया कि उनने भी तो अपने पुत्र का नाम भान ब्रेलोर्न ही रखा है। इस आश्चर्यजनक संगति को देखकर वे विस्मित रह गये।
बेंगलूर के मानसिक स्वास्थ्य तथा स्नायु तन्त्र विज्ञान के राष्ट्रीय प्रतिष्ठान द्वारा किये गये एक अध्ययन में बताया गया है कि 45 मामलों में पुनर्जन्म के दावों पर पर्याप्त व ठोस प्रमाण मिले हैं।
अध्ययन के दौरान प्रतिष्ठान के सामने 200 मामले आए जिनमें से अधिकाँश उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब व मध्यप्रदेश के थे। लगभग आधे लोगों ने बताया कि पूर्वजन्म में उनकी अप्राकृतिक मृत्यु हुई थी। पुनर्जन्म की कथाएँ सुनाने वाले सभी की आयु 10 वर्ष के भीतर थी। इसमें एक तिहाई संख्या लड़कियों की है।
पुनर्जन्म किस योनी में या किस स्थिति में होगा यह मृतक के अपने संस्कार समुच्चय पर बहुत कुछ निर्भर है। जिधर अपना रुझान, झुकाव या अभ्यास होता है उसी दिशा में मन मुड़ता है और अपने अनुरूप वातावरण तलाश कर लेता है। एक ही बगीचे में भौंरा फूल पर बैठता है और गुबरीला सड़े गोबर की माँद ढूंढ़ निकलता है। संस्कार उसी रुझान को कहते हैं। इसके अतिरिक्त संचित कार्यों के भले-बुरे परिणाम भी अपने विधान आकर्षण से प्राणी को अपनी ओर खींच बुलाते हैं। इन्हीं रस्से से बँधा हुआ प्राणी पुनर्जन्म के लिए स्थान एवं वातावरण ढूँढ़ निकालता है।
शास्त्र मत इस संदर्भ में इस प्रकार है-
मानसेदं शरीरं हि वासनार्थ प्रकल्पितम्। कृमि कोश प्रकारेण स्वात्मकोश इवस्वयम्॥ -योग वाशिष्ठ- 4।11।19
करोति देहं संकल्पात्कुम्भ कारी घंट यथा॥ -योग वाशिष्ठ 4।15।7
जिस प्रकार रेशम का कीड़ा अपने रहने के लिए अपने आप ही कोश तैयार कर लेता है वैसे ही मन ने भी अपने संकल्प से शरीर को इस प्रकार बनाया है जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाता है।
काले काले चिता जीवस्त्वन्योऽयोभवति स्वयम् भविताकार वानतं वसिना कलिको दयात्॥ -योग वाशिष्ट 6।1।50।39
अपने भीतर की वासना को मूर्तरूप देने की इच्छा से आकार धारण करने के लिए जीव अपना शरीर बदलता रहता है।
श्रीमद्भागवत में एक अत्यन्त मार्मिक आख्यायिका आती है। जिसमें देवर्षि नारद ने मरते हुए व्यक्ति को देखा, तो उनका अन्तःकरण जीव के मायावी बन्धन को देखकर द्रवित हो उठा। मृतक के शव के समीप खड़े कुटुम्बीजन तथा पुत्र विलाप कर रहे थे। नारद ने जीवात्मा को समझाया वत्स इस संसारी बन्धन को छोड़ कर मेरे साथ चल और जीवन मुक्ति का आनन्द ले। किंतु मृतक पिता की आसक्ति विलाप कर रहे कुटुम्बियों से जुड़ी थी। नारद की ओर उसने ध्यान नहीं दिया और अपने वासनामय सूक्ष्म शरीर से वहीं घूमता रहा। कुछ दिन बाद उसने पशुयोनि में प्रवेश किया और बैल बनकर अपने किसान बेटे की सेवा करने लगा।
कुछ दिन पश्चात् नारद पुनः आये और बैल के पिंजरे में बन्द जीव से मिले और पूछा तेरा मन हो तो चल और अच्छे लोकों को आनन्द ले। बैल ने कहा- “भगवन्! अभी तो बेटे की आर्थिक स्थिती खराब है- मैं इसे छोड़ कर कैसे चलूँ? नारद जी चले गये। जीव डण्डे खाकर भी बेटे की आसक्ति में डूबा रहा। मृत्यु के समय भी आसक्ति कम न हुई, सो वह कुत्ता बनकर बेटे की सम्पत्ति की रक्षा करता रहा। पूर्वजन्मों के संस्कार और मोह भावना में तल्लीन उस कुत्ते को मिलती दुत्कार और डण्डे फिर भी उसने मालिक बने पुत्र का दरवाजा नहीं छोड़ा।
देवर्षि नारद पुनः आये और चलने को कहा तो कुत्ते ने कहा- भगवन्! आप देखते नहीं, मेरे बेटे की सम्पत्ति को चोर डाकू ताकते रहते हैं ऐसे में उसे छोड़कर कहाँ जाऊँ। नारद ने कहा- वत्स! तू जिन इन्द्रियों को सुख का साधन समझता है वे तुझे बार-बार धोखा देती हैं फिर तू उनके पीछे बावला क्यों बना है, किन्तु कुत्ते की समझ में कहाँ आती? मानवीय सत्ता तक तो इसे समझ नहीं पाती।
जीव को बेटे के व्यवहार से क्रोध आया और अपना हिस्सा लेने के प्रतिशोध की भावना से कुत्ते का शरीर छोड़कर चूहा बना। उस स्थिति में भी नारद ने समझाया परन्तु उसे फिर भी ज्ञान न हुआ। चूहे से तंग आकर किसान बेटे ने विष मिले आटे की गोलियाँ रखीं। चूहा मर गया। चूहे ने देखा कि इस बार विष देकर मेरा प्राणान्त किया गया है उसका मन क्रोध और प्रतिशोध की भावना से जल उठा। फलतः उसे सर्प योनी मिली। क्रोधित हो सर्प बदला लेने बिल से जैसे ही बाहर निकला कि घर वालों ने उसे लाठियों, पत्थरों से कुचल-कुचलकर मार डाला। अब नारद जी ने उधर जाना ही व्यर्थ समझा क्योंकि वे समझ चुके थे कि अभी व प्रतिशोध की धुन में चींटी, मच्छर, मक्खी न जाने क्या-क्या बनेगा?
‘आफ्टर डेथ’ नामक पुस्तक सन् 1897 में प्रकाशित हुई थी तब से अब तक इसके लगभग बीस संस्करण कई भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें जुलिया नामक लड़की का विवरण बड़े ही मार्मिक ढंग से लिखा गया है। जुलिया बहुत ही सुन्दर एवं बहुत ही रंगीन स्वभाव की लड़की थी। उसके अनेक मित्र थे। मित्रों से वह कहा करती थी कि यदि मेरी मृत्यु हुई तो मिलती अवश्य रहूँगी। संयोग वश 12 दिसम्बर 1891 में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी प्रेतात्मा अपने मित्रों से मिलने के लिए भटकने लगी। इस बात को उसके सभी मित्रों एवं अन्य परिचित व्यक्तियों ने स्वीकार किया और बताया कि- जुलिया की आत्मा अपने मित्रों के लिए भटकती रहती है, वह उन्हें देखती है पर स्वयं न देखे जाने या स्पर्शजन्य अनुभूति का आनन्द न प्राप्त कर सकने के कारण उद्विग्न एवं खिन्न रहती है।
भौतिक शरीर के साथ सदा सर्वदा के लिए जीवन की समाप्ति नहीं हो जाती। नये कलेवर के रूप में जीव अपने कर्मानुसार परिस्थितियां लिए पुनः प्रकट होता है। इस तथ्य की पुष्टि धर्म ही नहीं तर्क एवं प्रमाण भी करने लगे हैं। विज्ञान भी दबी जुबान से पुनर्जन्म का समर्थन करने लगा है। सच्चाई को और भी गहराई से परखने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। वह दिन दूर नहीं जब पुनर्जन्म तथा उससे जुड़ा कर्मफल का अकाट्य सिद्धान्त सर्वत्र स्वीकार होगा। तब निश्चित ही मानव जाति को जीवनयापन के लिए स्पष्ट आचार संहिता प्राप्त होगी। मनुष्य के कर्मों के नियमन एवं सुनियोजन में उससे विशेष मदद मिलेगी।
अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा शास्त्री डा. एल.एच. एण्डर्सन ने बहुत समय पूर्व एक पुस्तक लिखी- ‘मानवोचित आहार’। इस पुस्तक में उन्होंने मनुष्योचित आहार के सम्बन्ध में विस्तृत उल्लेख किया है। एक स्थान पर लिखा है कि- “खान पान एवं स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के लिये पश्चिमी लोगों को हिन्दू ग्रन्थों का पर्यवेक्षण करना चाहिये।” आहार सम्बन्धी उन तथ्यों का पता लगाना चाहिये जिनको अपनाकर भारतीय सदा स्वस्थ बने रहते थे।
आहार शरीर संचालन के लिये प्रमुख आधार है- शरीर रूपी गाड़ी का ईंधन है। इसके अभाव में शरीर रूपी गाड़ी ठप्प पड़ जाती है। चिकित्सा शास्त्री इटरिट का कहना है कि 99.9 प्रतिशत रोग आहार अनियमितता एवं असंयम के कारण उत्पन्न होते हैं। सन्तुलित ,सात्विक एवं उचित मात्रा में लिया गया भोजन आरोग्य का कारण बनता है। आहार भी तीव्र भूख लगने पर ही लाभप्रद सिद्ध होता है। आधी अधूरी भूख में जबरन लिया गया भोजन यो उल्टे विकार उत्पन्न करता है।
आहार सम्बन्धी नियम सन्तुलित पोषक तत्वों तक सीमित नहीं है। उसका उपार्जन किस प्रकार हुआ। उपार्जन में ईमानदारी का समावेश था या नहीं, जैसी बातों का भी स्वास्थ पर विशेष प्रभाव पड़ता है। अनीतिपूर्वक की गई कमाई एवं उससे उपलब्ध किया गया आहार स्वास्थ के लिये हानिकारक सिद्ध होता है। अनीति एवं पाप की कमाई के संस्कार भोजन के साथ सूक्ष्म रूप से जुड़े रहते हैं तथा उपयोगकर्त्ता के ऊपर उलट कर वार करते हैं। जो विभिन्न प्रकार के मनोविकारों एवं मनोरोगों के रूप में प्रकट होते हैं। अंततः उनकी प्रतिक्रिया शरीरगत रोगों के रूप में भी दृष्टिगोचर होती है। यही कारण है कि महापुरुषों ने सात्विक आहार पर जोर दिया है।
स्वास्थ रक्षा एवं आरोग्य प्राप्ति का दूसरा आधार है ‘श्रम’। शरीर को सक्रिय एवं स्फूर्तिवान बनाये रखने के लिये श्रम भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन। श्रम में शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के श्रम का संतुलन होना आवश्यक है। मानसिक श्रम ही पर्याप्त नहीं होता, शारीरिक सक्रियता होना भी अनिवार्य है। समुचित श्रम के अभाव में अनेकों प्रकार के शारीरिक रोग पैदा होते हैं। देखा यह जाता है कि शरीर से श्रम न करने वाले अनेकों प्रकार की बीमारियों से घिरे रहते हैं। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोग अधिकांशतः उन व्यक्तियों को ही अधिक होते हैं जो शारीरिक श्रम से वंचित बने रहते हैं। जिनके पास शारीरिक श्रम के काम नहीं है, तो भी उन्हें ऐसे काम ढूंढ़ना चाहिये जिससे शरीर के प्रत्येक अंगों का व्यायाम हो जाय। सुविधानुसार बागवानी आदि का कार्य रुचिकर है और स्वास्थ वर्धक भी। अपनी सुविधानुसार प्रत्येक मानसिक श्रम करते रहने वाले व्यक्ति को शरीर की सक्रियता बनाये रखने के लिए उपरोक्त किन्हीं एक का आश्रय लेना चाहिये। श्रम चाहें जिस प्रकार का किया जाय, उसमें मनोयोग का होना आवश्यक है।
शरीर में मांस पेशियों का भार 45 प्रतिशत होता है। इनकी सक्रियता निष्क्रियता पर शारीरिक एवं मानसिक सीमा तक निर्भर करता है। श्रम अथवा व्यायाम के बिना सक्रियता नहीं बन पाती। महान रूसी जनरल ए. वी. सुवोरोव अपनी पुस्तक ‘युद्ध में कैसे विजयी हो’ नामक पुस्तक में लिखते हैं कि- “जो अपनी क्रियाशीलता, कार्य क्षमता, मानसिक दक्षता एवं आरोग्य की लम्बी अवधि तक अक्षुण्ण रखना चाहता है उसे नित्य व्यायाम और भ्रमण का क्रम अपनाना चाहिये।
प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री के.डी. उशिन्स्की का कहना है कि- “मानसिक श्रम करने के बाद विश्राम का अभिप्राय बेकार बैठना नहीं है वरन् उपयोगी शारीरिक श्रम करना है।”
रूसी वैज्ञानिक आई.पी. पावलोन एवं आइ.एम. सेचेनोव ने अपने शोधों के उपरांत यह तथ्य उद्घाटित किया है कि- पेशीय श्रम अथवा व्यायाम तंत्रिका को शक्ति प्रदान करता है। उनका कहना है कि मानसिक श्रम करने वाले जो लोग शारीरिक श्रम से वंचित बने रहते हैं प्रायः वे ही हृदय रोग से अधिक ग्रसित होते हैं। अमेरिका से प्रकाशित राष्ट्रीय स्वास्थ समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में शारीरिक श्रम से वंचित रहने वाले बुद्धिजीवी हृदय रोगियों की संख्या श्रमजीवियों से अधिक है। स्पष्ट है कि सन्तुलित आहार स्वास्थ के लिए जितना आवश्यक है उतना है शारीरिक श्रम।
आहार श्रम के साथ तीसरी स्वास्थ के लिए आवश्यक चीज है- विश्राम। शारीरिक एवं मानसिक श्रम से जो शक्ति व्यय होती है उसकी आपूर्ति विश्राम से होती है। निरन्तर श्रम से शरीर के कोषों में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत शरीर को विश्राम देने से ठीक होती है। न्यूनतम प्रत्येक व्यक्ति को छह घंटे सोना आवश्यक है आयु की दृष्टि से इसमें कमी और बढ़ोतरी भी हो सकती है। वृद्धों की निद्रा कम समय में पूरी हो जाती है जबकि बच्चे सबसे अधिक सोते हैं। स्वस्थ युवक के लिए छह घंटे कि निद्रा पर्याप्त है। विश्राम में महत्व समय का नहीं वरन् निद्रा की प्रगाढ़ता का है। कम समय में भी गहरी निद्रा द्वारा पर्याप्त शक्ति प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए सोने से पूर्व शरीर एवं मन को सभी प्रकार के तनावों एवं चिंताओं से मुक्त रखना होता है।
स्वस्थ एवं निरोग बने रहने का चौथा आधार है- संयम। स्वास्थ्य रक्षा के अन्य नियमों की तलना में इसका सर्वाधिक महत्व है। संयम को स्वास्थ का मेरुदण्ड माना जा सकता है। शरीर की अधिकाँश शक्तियाँ असंयम रूपी छिद्र से यों ही बेकार चली जाती हैं। उन्हें रोका न जाय तो पौष्टिक आहार भी आरोग्य को बनाए नहीं रख सकते। जिह्वा एवं इंद्रियों की भोग लिप्सा के कारण बहुमूल्य जीवन-सम्पदा नष्ट होती रहती है। जीवन शक्ति असंयम रूपी छिद्र से निकलती रहती है तथा स्वस्थ से स्वस्थ व्यक्ति को भी कमजोर एवं रुग्ण बनाती है। शरीरगत संयम न केवल शारीरिक बलिष्ठता के रूप में वरन् मानसिक प्रखरता एवं आत्मिक तेजस्विता के रूप में परिलक्षित होता है। संयम इंद्रियों पर नहीं विचारों एवं भावनाओं पर भी किया जाना चाहिए।
स्वास्थ, आरोग्य प्राप्ति एवं दीर्घ जीवन का अन्तिम आधार है प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता। मनोविज्ञान का जैसे-जैसे विकास होता जा रहा है, इस तथ्य की पुष्टि हो रही है कि शरीर कि स्वस्थता मन की स्थिति पर निर्भर करती है। चिन्ता, आवेश, क्रोध का बुरा प्रभाव शरीर पर पड़ता है। न्यूयार्क की ‘अकादमी ऑफ मेडिसिन’ नामक संस्था ने चिन्ता के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोग किया। शोध का निष्कर्ष यह निकला कि चिन्तित रहने पर मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार के रसायन का निर्माण होता है, जिससे शरीर के अंग-प्रत्यंगों में संकुचन पैदा होता है। उक्त संस्था के विशेषज्ञों का कहना है कि रक्तचाप, हृदय रोग, उदरशूल मधुमेह जैसी बीमारियाँ चिन्ताग्रस्त व्यक्तियों को अधिक होती हैं।
मन को सदा चिंताओं से मुक्त बनाये रहना चाहिये। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता का सीधा सम्बन्ध शारीरिक स्वास्थ्य से है। देखा यह गया है कि प्रसन्न रहने पर शरीर में विशेष उत्साह बना रहता है। सक्रियता अधिक होती है। नागोची कहा करते थे- “है परमात्मा मुझे बड़ा से बड़ा दण्ड दे देना पर चिंता न देना।’ कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के सहारे स्वास्थ्य को बनाये रखा जा सकता है। वर्नार्डशा कहते थे- “जिन्हें शीघ्र मरना हो वे चिन्ता का अवलम्बन लें।”
आहार, श्रम, विश्राम, संयम एवं प्रसन्नता पाँच आधार ऐसे हैं जिनका अवलम्बन लेकर सदा स्वस्थ रहा जा सकता है। आरोग्य प्राप्ति के अनेकों कृत्रिम साधनों का आश्रय लेने की अपेक्षा इन पांचों को अपनाया जा सके तो रुग्णता का, अशक्तता का अभिशाप कभी सामने न आये।
“आज जिस व्यक्ति के पास गया था वह नगर के बहुत प्रतिष्ठित डाक्टर हैं। उनने यह समझा था कि मुझे कोई शारीरिक तकलीफ है, क्योंकि मैंने उनसे क्लीनिक में ही भेंट का आग्रह किया था। एक-एक कर तीस रोगी डाक्टर के पास गए, उनमें से एक सर्जरी से सम्बन्धित मरीज था, एक को सर्दी लग गई थी, शेष अट्ठाइस यूरोसिस अथवा सिजोफ्रेनिया (निराशा और मानसिक बीमारी) के शिकार थे। किसी के मस्तिष्क में तनाव था, किसी के मन में अशान्ति, कुछ केवल यह जानने के लिए आये थे- डाक्टर साहब! बताइए हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? डाक्टर ने उन्हें मानसिक बीमार की संज्ञा दी है जब कि आदमी विचारवान लगता था। अब में पूरी तरह आश्वस्त हो चूका हूं कि आज का आदमी पूरी तरह थक गया है। उसकी यह थकावट जितनी भौतिक है उससे अधिक आत्मिक है। यह कैसी बेबसी है कि उसे जो समाधान एक पुरोहित से चाहिए उसके लिए उसे डाक्टर के पास शरणागत होना पड़ रहा है।”
उपरोक्त पंक्तियाँ किसी महापुरुष का जीवन प्रसंग भले ही न हों, पर वह जिस व्यक्ति की डायरी के पृष्ठों का उद्धरण है वह कोई सामान्य व्यक्ति भी नहीं है, जो उसकी बात यों ही उपेक्षा में डाल दी जाए।
हम जिस युग में आज रह रहे हैं उसमें पहले की अपेक्षा आध्यात्मिक चेतना की कहीं आवश्यकता है। इसके बिना उसका जीवन उद्देश्य पूर्ण नहीं बन सकता, उसे शीतल शान्ति चाहिए, जीवन का बोध चाहिए। आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान किये बिना समस्या का निराकरण हो सकेगा, यह आशा आत्म प्रतारणा ही सिद्ध होगी”- यह उद्गार वियेना विश्व विद्यालय के चिकित्सा विभाग में स्नायु विकारों व मानसिक रोगों के प्रोफेसर तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मानसिक रोगों के चिकित्सक डा. विक्टर ई. फ्रैंकल के हैं। आधुनिक साधन सुविधाओं से भरपूर पश्चिमी देशों की सामाजिक परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मानवीय अंतःकरण को बड़े कोमल हाथों से सहलाया और बताया है कि यदि उन्हें आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान न किया गया तो अपनी इसी प्यास के कारण पश्चिमी समाज अपना सर्वनाश कर लेगा। सच पूछा जाए तो न्यूनाधिक यह समस्या सारी धरती की समस्या है। आध्यात्मिक सत्ता की सजीव प्रतिमा मनुष्य ही जब पानी में रह रही मछली के व्यास के मारे तड़पने जैसी स्थिति में जिन्दगी बिता रहा हो तो विचारक कबीर की हँसी स्वाभाविक ही मानी जायगी।
डा. फ्रैंकल ने एक जेल के दो कैदियों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है- एक स्त्री हमेशा यह कहा करती थी कि उसे जीवन में क्या मिला? अपनी इसी व्यथा की ऊब सहन न कर सकने के कारण उसने आत्महत्या का प्रयास किया और उसे जेल में जाना पड़ा जबकि उसका बेटा विदेश में इस प्रतीक्षा में था कि मेरी माँ आती होगी, उसके साथ स्नेह आत्मीयता का जीवन मिलेगा। महिला अपने ही जीवन की शुष्कता से, अपनी ही निराशा से, थकी हुई थी, जबकि साँसारिक दृष्टि से उसे कहीं किसी तरह का भी अभाव नहीं था। डा. फ्रैंकल ने उससे जान पहचान कर जब उसके जीवन में प्रवेश किया तो पता चला कि भौतिक आकांक्षाओं में भटकाव उसके जीवन की नीरसता का प्रमुख कारण है। उसे श्रद्धा, भाव, सम्वेदना अन्य प्राणियों के हितों में अभिरुचि जैसे संस्कार प्रसन्न रख सकते थे, किन्तु किसी ने उसको शिक्षण दिया नहीं, फलतः जीवन मरुस्थल जैसा बना गया। यही बात उस पुरुष के बारे में भी थी। वह एक अच्छा लेखक था। उसकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं, कई प्रकाशन के लिए तैयार थी, पर जीवन में सम्वेदना का अभाव उसे निरन्तर खटकता रहा। इसी कारण उसने भी आत्महत्या का प्रयास किया जबकि वह एक ऐसी सन्तोष भरी, यश और सम्मान की जिन्दगी जी सकता था जिसमें ऊब और उत्तेजना का नाम ही न होता। सच है कि उसे डाक्टर मिले, पर धार्मिक जीवन की परिभाषा और मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं मिला।
मनुष्य तीन क्षेत्रों में विभक्त है। पहला है भौतिक जीवन, जिसमें उसके शरीर की आवश्यकताएं प्रमुख होती हैं। उसे खान-पान से लेकर वंश-वृद्धि की सुविधाएं चाहिए। यह उतना कठिन क्षेत्र नहीं है। सामान्य प्रयत्नों से भी भौतिक जीवन की अपेक्षाएं पूर्ण हो जाती हैं जिसका तात्पर्य ही यह है कि भौतिक जीवन मानवीय अस्तित्व के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है। जबकि 99 प्रतिशत व्यक्तियों का जीवन उसी मृगतृष्णा के इर्द-गिर्द घूमता रहता है- अच्छा से अच्छा भोजन, विशाल भवन और इन्द्रिय सुखों की अपार साधना सामग्री। स्वल्प आवश्यकता को साधनों के अम्बार से पाट दिया जाए तो स्वाभाविक ही है कि वह आवश्यकताएं दूषित होंगी। आज का भौतिक क्षेत्र इसी कारण अश्लील, अपवित्र और अत्यधिक उत्तेजनापूर्ण बन गया है। सामान्य बाधाएँ भी मनुष्य को आत्महत्या जैसी क्रूर स्थिति में पटक देती हैं।
ऐसा ही, इसी का एक और सगा भाई, दूसरा क्षेत्र है मन का मान मर्यादा की, बड़प्पन की, अहंकार की रक्षा के लिए आदमी भौतिक तृष्णा से भी अधिक उतावला दिखाई देता है, जबकि इस तथ्य को जानते सब हैं कि मन की वासनाएं क्षणिक हैं। अपना शरीर बल ही जब स्थिर नहीं है तो बाह्य परिस्थितियों में प्राप्त पद प्रतिष्ठा और सम्मान ही स्थायी कैसे रह सकते हैं। उनकी ललक सताएगी तो स्वाभाविक ही। जब कभी विघ्न दिखाई देगा, मनुष्य का भय सीमा को पार करेगा वह निराशा होगा, खीजता रहेगा। उस स्थिति में डाक्टर उसे भटकायेगा, सही राह दिखाने वाला प्रशिक्षण उसे मिला ही नहीं तो वह देगा कहां से बाह्य चिकित्सा सम्भव हो सकती है, पर मनों के घुसे रोगों का उपचार डाक्टर नहीं कर सकते। जबकि आज हो सर्वत्र यही रहा है।
मनुष्य जीवन का तीसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण किन्तु अत्यन्त उपेक्षित क्षेत्र है उसका- आत्म जगत। मनुष्य जीवन का 60 प्रतिशत से अधिक भाग उसकी आध्यात्मिक सत्ता भावनाओं से विनिर्मित होती है। पर इस भाव विज्ञान की जानकारी, विकास और विस्तार के साधनों का उसे कोई प्रशिक्षण नहीं मिलता। हर व्यक्ति के अंतःकरण से कभी न कभी ऐसी स्फुरणा उठती अवश्य है कि आखिर उसने जन्म क्यों लिया? वह आया कहाँ से और उसका गन्तव्य क्या है? जीवन का अर्थ ज्ञात करना मानवीय संस्कार है। कोई भी पशु उसके लिए परेशान नहीं दिखाई देता, पर मनुष्य उस अर्थ बोध के बिना सन्तोष और शांति पा नहीं सकता। यह बोध उसे सच्चे पुरोहित, अध्यात्मवादी ही दे पाते हैं। आस्तिकता, अध्यात्मिकता और धार्मिकता को थोड़ी देर के लिए मनोवैज्ञानिक ही मान लें तो भी उनके फलितार्थ ऐसे हैं जो मानवीय अंतःकरण को सन्तोष और व्यापकता प्रदान करने में सक्षम हैं। इसका दार्शनिक आधार भी बेबुनियाद नहीं है। संसार इतना व्यवस्थित है तो उसका रचयिता होगा ही, जब मानवीय चेतना में सत्य, प्रेम, न्याय और चिरसौंदर्य की आकांक्षा ओत-प्रोत है तो वह जिस सर्वशक्तिमान चेतना से जन्मा है उसमें इन तत्वों की पूर्णता अवश्यंभावी है। मनुष्य जीवन ही नहीं पशुओं में भी नैतिक नियम हैं, यह भी उसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं। यह जानकारी कोई अनुभव सिद्ध साधक सन्त और ब्रह्मवेत्ता पुरोहित ही अंतःकरण की सच्चाई के साथ प्रदान कर सकता है। अतएव आज संसार के लिए सच्चा पौरोहित्य अनिवार्य हो गया है।
मनोविज्ञान केवल सुख की इच्छा और महत्वाकांक्षाओं के अध्ययन तक ही सीमित है। चेतना के इति, अन्त और मध्य का विश्लेषण अपनी दार्शनिक अनुभूति और अध्ययन के आधार पर धार्मिक व्यक्ति ही दे सकता है। मनोवैज्ञानिक मन के स्वभाव का विश्लेषण मात्र कर सकते हैं, मन के विज्ञान का नहीं। मानवीय मूल्यों तथा भावनाओं का क्षेत्र अकेला डाक्टर (विज्ञान) सुलझा नहीं सकता। यह अस्तित्वजन्य रोग है जिसका उपचार वही करा सकता है जिसने अस्तित्व का अध्ययन किया हो, पहचाना, जाना और अनुभव किया हो। ऐसा व्यक्ति धर्म परायण ही हो सकता है। आज ऐसे धर्म परायणों की धरती को बड़ी भारी आवश्यकता है।
प्राण का एक रूप वह है, जिससे यान्त्रिक कार्य सम्पन्न होते हैं। यांत्रिक प्रविधि का उद्देश्य प्राण-ऊर्जा के इसी स्वरूप को वशवर्ती बनाकर उसका अधिकाधिक इच्छानुसार उपयोग करना है।
प्राण का दूसरा रूप दैवी चेतन एवं अधिक सूक्ष्म है। वह दीप्तिमान चैतन्य विकिरण रूप है। मन उसी का एक रूप है। देव सत्ताएँ प्राणमय ही होती हैं। योग में इसी प्राण-ऊर्जा को वशवर्ती बनाया जाता है।
अज्ञानवश लोग योग को चमत्कार पूर्ण एवं विचित्रताओं से भरपूर कोई रहस्य विद्या मानते हैं। किन्तु वस्तुतः योग एक श्रेष्ठ प्रविधि है, जिसका एक लक्ष्य है प्राण-ऊर्जा का तात्विक ज्ञान प्राप्त कर उसका सूक्ष्म प्रक्रियाओं से अवगत होकर, उसका सर्वोत्तम उपयोग करने में समर्थ होना है। प्राण-शक्ति के अधिकतम उपयोग की प्रविधि भी योग के नाम से जानी जाती है। यान्त्रिक प्रविधि से वह अधिक समर्थ, अधिक शक्तिशाली एवं अधिक परिपूर्ण है।
जब व्यक्ति सामान्य साँसारिक गतिविधियों में लिप्त रहता है, उस समय उसकी पिण्ड सत्ता में सक्रिय मुख्य प्राण-प्रवाह सम्पूर्ण संवेदन-तन्त्र में फैला रहता है। इस प्राण प्रवाह को जब तीव्र संवेग के साथ एक ही दिशा में निर्देशित किया जाता है, तो वह कितना विस्फोटक- रूप धारण कर लेता है इसका एक प्रमाण है कामावेग, जो मन बुद्धि एवं इंद्रियों की सामान्य वृत्तियों को उस समय पीछे ठेल देता है।
मानव शरीर में विद्यमान प्राण-शक्ति से ही समस्त अन्तः संचालन एवं नाडी समूह संचालन होता है। मस्तिष्क की कल्पना, धारणा, इच्छा, निर्णय, नियन्त्रण, स्मृति, प्रज्ञा आदि समस्त शक्तियों का उत्पादन-अभिवर्धन तथा संचालन प्राणशक्ति द्वारा ही होता है। इंद्रियों की सजीवता प्राण-शक्ति से ही सम्भव है। सम्पूर्ण बोध एवं क्रिया की धारक शक्ति प्राण है।
इस प्राण को वशीभूत करने के लिए मन की निर्मलता आवश्यक है। इसलिए यम एवं नियम प्राण-प्रविधि या प्राण विद्या के अनिवार्य प्राथमिकता सोपान हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह को ‘यम’ और शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान को ‘नियम’ कहते हैं। इन यम-नियमों के पालन से शरीर यन्त्र शुद्ध बनता है, मन पवित्र बनता है, प्राण ऊर्जा के स्वरूप का बोध होता है और लक्ष्य के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसके साथ आसन सिद्धि का अभ्यास आवश्यक है, जिससे पर्याप्त समय तक एक ही मुद्रा में स्थिर रहकर साधना-अभ्यास किया जा सके।
इसके उपरान्त प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। सामान्यतः शरीर में क्रियाशील प्राण-शक्ति अनियन्त्रित ढंग से वासनाओं एवं तज्जन्य क्रियाओं के चपल संकेतों पर थिरकती-घूमती रहती है। उस शक्ति को इच्छानुसार चला सकने की साधना-प्रविधि प्राणायाम है।
मनःसाधना या मनःशुद्धि एवं प्राण-साधना परस्पर अन्योन्याश्रित है। मन-प्राण में जनक-जन्य का सम्बन्ध है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है-
“मन एव पिता, वांमाता प्राणः प्रजा।” (वृहदा. उ. 1।5।7)
अर्थात्- मन ही पिता है, विचार-प्रक्रिया रूप वाणी माता है और प्राण सन्तान है। अतः प्राण-साधना में मन, विचार एवं प्राण-प्रवाह तीनों की ही साधना अन्तर्निहित है। मन और विचारों को एक ही दिशाधारा में नियोजित रखते हुए प्राण-प्रवाह पर नियन्त्रण प्राप्त करने का अभ्यास ही प्राणायाम है।
शरीरस्थ पांच प्राणों एवं पांच उपप्राणों के कार्य कलापों का स्वरूप भली-भांति समझकर उन्हें वशवर्ती बनाना प्राण-साधना है। ये सभी प्राण-उपप्राण एक ही व्यष्टि प्राण के वर्गीकरण मात्र हैं। मूलतः प्राण सत्ता एक ही है और विराट् प्राण-सता का ही अंश है।
पूर्णाधिकार न सही ‘विराट प्राण’ पर सीमित अधिकार भी व्यक्ति को कम शक्तिशाली नहीं बनाता। प्रबल प्राण-संवेग से भौतिक द्रव्यों की प्रकृति का परिवर्तन हो सकता है और दूसरों की मनःस्थितियों को प्रभावित किया जा सकता है। नियंत्रित प्राण-शक्ति के द्वारा अचेतन मन को अपनी सम्पूर्ण क्षमता से सक्रिय बनाया जा सकता है। दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, दूरानुभूति, भविष्य दर्शन जैसी शक्तियां इसी अचेतन मन में होती हैं। ग्रह-नक्षत्रों, सूक्ष्म लोकों से संबंध जोड़ना, दिव्य ज्ञान की ज्योति को दीप्तिमान रखना, प्राण पर अधिकार पाने पर ही सम्भव है। किन्तु उच्चस्तरीय प्राण-साधना समर्थ मार्गदर्शक के निर्देशन में ही सफल हो सकती है।
यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि मन और चिन्तन मन के माता पिता एवं अभिन्न सहयोगी हैं। मन और विचार को अस्त-व्यस्त रखते हुए प्राणायाम की उच्चस्तरीय साधना तो असम्भव है ही, अस्त व्यस्त मन की स्थिति में प्राणायाम का अधिक समय तक अभ्यास व्यक्तियों को पागल भी बना देता है। अतः प्राणायाम सदैव तत्त्वबोध एवं ध्यान अभ्यास के साथ करना चाहिए। मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति को अभीष्ट दिशा में नियोजित किये बिना प्राण-साधना मात्र श्वास-प्रश्वास का साधारण व्यायाम और फेफड़ों की कसरत होकर रह जाती है। उससे स्वास्थ्य लाभ तो सम्भव है, किन्तु वह न तो योग है और न ही उसके द्वारा प्राण-शक्ति पर नियन्त्रण हो सकता है।
प्राणायाम- अभ्यास में प्रारम्भ से ही पेशियों पर नियन्त्रण एवं लक्ष्य का निरन्तर ध्यान रखने का अभ्यास सम्मिलित होता है। उसी के लिए विभिन्न प्रकार के वेध, मुद्राएँ तथा बन्ध हैं, जिनका अभ्यास कर, प्राण को वशवर्ती बनाना होता है। संकल्प-शक्ति के प्रबल चुम्बकत्व से व्यापक प्राणतत्व आकाश से खींचा जाता है। फिर इस उपार्जित उपलब्धि को अभीष्ट स्थान पर भेजने तथा मनोवांछित परिणाम पाने की प्रक्रिया सीखनी होती है। यह सब प्रचण्ड मनोबल के बिना सम्भव नहीं।
प्राण साधना का उद्देश्य स्पष्ट है। वह है- पिण्डस्थ प्राण-शक्ति का ब्रह्मांडव्यापी प्राण-शक्ति से योग एवं इस योग की प्रक्रिया पर अपना अधिकार। वही प्राण-शक्ति मनुष्यों में चेतना, ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति, तत्परता, तन्मयता, साहस, शौर्य, उमंग, उत्साह, वीरता, चमक या सौंदर्य, तेजस्विता, सजीवता, प्रखरता, दृढता आदि के रूप में अभिव्यक्त होती है। जिनमें यह प्राण-शक्ति प्रचुर मात्रा में विद्यमान होती है, वे ही महामानव- महाप्राण कहलाते हैं।
शरीर में सामान्यतः जो प्राण-शक्ति भरी-बिखरी रहती है, उसका भी साधारण व्यक्ति इच्छित उपयोग नहीं कर सकते। चित्त-चांचल्य और वासनात्मक उद्वेग इस प्राण-शक्ति को हर क्षण फुलझड़ी की तरह बिखेरता- फेंकता रहता है। यम एवं नियमों का अभ्यास व्यक्ति में वह सामर्थ्य उत्पन्न करता है जिससे वह प्राण-शक्ति को संयमित ढंग से ही व्यय करने में कुशल होता चले। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यान के समन्वित स्वरूप के साथ की गई प्राण साधना वह सामर्थ्य इतनी अधिक विकसित कर देती है कि व्यक्ति समष्टिगत महाप्राण की वाँछित मात्रा स्वयं में खींच सके तथा उस एकत्र शक्ति का अधिकतम उपयोग उत्कृष्ट रीति से कर सके।
ईरान के जनसेवी शाह अब्बास ने सार्वजनिक उद्यान के लिए कुछ वृक्षों की पौध मंगवायी। उनको शुभ मुहूर्त में आरोपित किया गया किन्तु संयोग से उस मुहूर्त पर माली अनुपस्थित था। शाह ने अपने हाथों गड्ढे खोदकर उन्हें आरोपित किया। कुछ देर बाद माली आया। उसने बेतरतीब लगे पेड़ों को देखा तो उखाड़कर ढंग से लगाने लगा।
शाह हुसैन तक इसकी सूचना पहुँची। उन्होंने माली को बुलाकर डाँटा। माली मुहूर्त वाली बात से अनभिज्ञ था बोला- “महाराज आपने अच्छे मुहूर्त में पौधे लगाये जो एक घंटा भी लगे न रह सके।” माली की यह अर्थपूर्ण बात सुन विवेकी राजा हंस पड़े, बोले- “तुम्हारी इच्छा हो वैसे लगाओ। शुभ काम के लिए हर समय शुभ मुहूर्त होता है यह मुझे अब पता लगा है।”
मानवी सता को दो भागो में विभाजित किया जा सकता है- काया और चेतना। शरीर पंचतत्वों से बना है- वायु, जल, आकाश, अग्नि और पृथ्वी। इन पांचों के समन्वय-सन्तुलन पर शरीर का अस्तित्व बना रहता है। सभी की, शरीर में अपनी उपयोगिता एवं महत्ता है। शरीर संस्थान को स्वस्थ एवं आरोग्य बनाये रखने में इन पंचतत्वों की असाधारण भूमिका होती है। पंचतत्वों के अनुदान पर ही शरीर पुष्ट बना रहता है।
अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ दूसरा पक्ष चेतना का है। जो शरीर की अपेक्षा अधिक सामर्थ्यवान एवं सूक्ष्म है। आत्मसत्ता भी पंच आवरणों में लिपटी पड़ी है। चेतना के ये पाँच दिव्य कोश हैं। जिनमें एक से बढ़कर एक सम्भावनाएँ निहित हैं। इन पाँच कोशों में पाँच देवसत्ताएँ निवास करती हैं। गायत्री को पंचमुखी कहा गया है। गायत्री के पाँच मुख वस्तुतः ये पाँच कोश ही हैं, जिनका चित्रण आलंकारिक रूप में किया गया है।
गायत्री के आरम्भिक उपासना पक्ष का अपना महत्व एवं लाभ है। जप-अनुष्ठान का विधान इसी प्रयोजन के लिए है। गायत्री-विज्ञान का उच्चस्तरीय पक्ष कुण्डलिनी जागरण का है। यह योगाभ्यास पक्ष है। प्राण पक्ष है। शक्ति का केन्द्र बिन्दु मूलाधार है, ज्ञान का ब्रह्मरंध्र। क्रिया एवं ज्ञान का सामान्यतया समन्वय नहीं हो जाता। जीवन में अनेकानेक प्रकार के विक्षोभ इसी कारण उठ खड़े होते हैं। गायत्री के जप पक्ष द्वारा ज्ञान अभिवृद्धि का लक्ष्य पूरा होता है- कुण्डलिनी साधना द्वारा शक्ति के जागरण का। चेतना के यह दो ध्रुव हैं, जो परस्पर एक दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं। ऋण और धन विद्युत के दो तारों के रूप में ये दो ध्रुव चैतन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं। ये परस्पर पूरक हैं। उपनिषद् में वर्णन है-
कुण्डलिन्यां समुभ्दूतां गायत्री प्राणधारिणी। प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेदवित्॥ -योग चूड़ामणि उपनिषद्
कुण्डलिनी ही प्राण शक्तिमयी गायत्री का उत्पत्ति स्थान है। यह गायत्री ही प्राणरूपी महाविद्या है। जो व्यक्ति इस विद्या को जानते हैं वे ही वेदवेत्ता हैं। कठोपनिषद् यम-नचिकेता संवाद में जिस पंचाग्नि विद्या का उल्लेख किया गया है वह गायत्री महाशक्ति में सन्निहित पंचप्राणों को प्रखर बनाने का ही विज्ञान है। यही पंचमुखी सूक्ष्म शरीर के पंचकोश हैं। गायत्री की प्राणशक्ति को उभारने के लिए पंचकोश की उच्चस्तरीय साधना की जाती है, जिसकी उपलब्धि पंचदेवों के रूप में होती है। निद्राग्रस्त होने पर ये मृत तुल्य पड़े रहते और किसी काम नहीं आते। फलस्वरूप मनुष्य दुर्बल एवं हेय बना रहता है। यदि इन देवों को जगाया जा सके- उपयोग किया जा सके, तो तो मनुष्य असामान्य सामर्थ्य का स्वामी बन सकता है। शरीरगत पाँच तत्वों को पंचदेवों का उल्लेख निम्न प्रकार मिलता है-
आकाशस्यधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी। वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः॥ (कपिल तन्त्र)
आकाश के अधिपति विष्णु हैं। अग्नि की अधिपति महेश्वरी शक्ति है। वायु के अधिपति सूर्य हैं। पृथ्वी के स्वामी शिव हैं और जल के अधिपति गणेश हैं। इस प्रकार पाँच देव शरीर की ही अधिपति सत्ताएँ हैं।
यदा कुण्डलिनी शक्तिराविर्भवति साधके। तदा स पंच कोशे मत्तेजोऽनुभवति ध्रुवम्। (महायोग विज्ञान)
जब कुण्डलिनी जागृत होती है तो साधक के पांचों कोश ज्योर्तिमय हो उठते हैं।
पंचकोशों के स्वरूप एवं प्रकृति का परिचय देते हुए उपनिषद्कार कहते हैं-
अन्न कार्याणां कोशानां समूहोऽन्नमय कोश इत्युच्यते।
प्राणादि चतुर्दश वायुभेदा अन्न्मयकोशो यदा वर्तन्ते तदा प्राणमय कोश इत्युच्यते। एतत्कोशचतुष्टयसंसक्त स्वाकारणाज्ञाने वटकणिकायमिववृक्षो यदा वर्तते तदा आनन्द मय कोश इत्युच्यते। -सर्व सारोपनिषद्
अन्न के द्वारा उत्पन्न होने वाले कोशों के समूह (इस प्रत्यक्ष शरीर) को अन्नमय कोश कहते हैं। प्राण सहित चौदह तत्वों का समूह प्राणमय कोश कहलाता है। इन दो कोशों के भीतर इन्द्रियों तथा मन का समूह मनोमय कोश कहा जाता है। बुद्धि एवं विवेक वाली भूमिका विज्ञानमय कोश की है। इन सब कलेवरों के भीतर आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप और स्थान आनन्दमय कोश कहलाता है।
इन पंचकोशों का वर्णन शास्त्रों में अनेकों प्रकार से हुआ है।
पंचस्रोतोऽम्बुं पंचयोन्युग्रवक्रां। पंचप्राणोमिं पंचबुद्धयादिमूलाम्॥ पंचावर्ता पंचदुःखोघ वेगा। पंचाशद्भेदां पंचपर्वाम धीमः॥ -श्वेताश्वतरोपनिषद् 1। 5
हम, पचास भेदों वाली, एक ऐसी नदी को देख रहे हैं, जो पाँच भंवरों वाली, पाँच घोर प्रवाह वाली पाँच स्रोतों से प्राप्त जल वाली, पाँच स्थानों से उत्पन्न, पाँच प्राण- उर्मियों वाली टेढ़े-तिरछे प्रवाह वाली तथा पंच ज्ञान रूप मन के मूल वाली है।
योग वाशिष्ठ में ईश्वर प्राप्ति का साधन बताया गया है। उपनिषद्कार कहते हैं कि- आत्म साक्षात्कार के लिए पंचकोशों का अनावरण आवश्यक है। इन द्वारों के खुलने पर ही आत्म-साक्षात्कार एवं ब्रह्म साक्षात्कार सम्भव है।
गुहाहितं ब्रह्म यत्तत्पचं कोश विवेकतः। बोद्धु शक्यततः कोश पंचक प्रविविच्यते।।
ब्रह्म पंचकोशों के भीतर गुहा में विराजमान है। उस तक पहुँचने के लिए पंचकोशों का विज्ञान जानना आवश्यक है।
अन्नमय कोश स्थूल है तथा चेतना का प्रथम आवरण है। शरीर- भोजन जल एवं वायु पर जीवित रहता है। इसलिए इस कोश को भोजन कोश भी कहते हैं। अहार विहार से लेकर तप-तितीक्षा की साधनाओं द्वारा इसे परिष्कृत-परिशोधित किया जाता है। सविता-ध्यान के माध्यम के महाप्राण का अवतरण कर इस केन्द्र को जगाया जा सकता है।
प्राणमय कोश को जीवन सता का केन्द्र बिन्दु समझा जा सकता है। प्राण की सामान्य माया द्वारा दैनिक व्यापार चलता है। यह कोश सुषुप्तावस्था में पड़ा रहता है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में इसे जागृत करने का प्रयत्न किया जाता है। अन्नमय शरीर में परिव्याप्त प्राण शरीर ही भौतिक शरीर के अस्तित्व को कायम रखता है। प्राणमय कोश में प्राण प्रकाश तथा ऊर्जा के रूप में यह जलती हुई उस अग्नि लौ के समान है जो कम-अधिक होती हुई अंततः बुझ जाती है। प्राणमय कोश में सविता के प्राण अनुसन्धान साधना द्वारा जगाने पर विभिन्न प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। प्राणमय कोश प्रकाश पुंज के रूप में जगमगाता हुआ दीखता है।
मनोमय कोश प्राणमय से भी अधिक सूक्ष्म है। शरीर की समस्त गतिविधियाँ मन द्वारा ही संचालित हैं। जन्म जन्मांतरों के संचित संस्कार- संचित होते तथा भली-बुरी आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। इच्छा, विचारणा संकल्प यहीं से उठते हैं। सविता ध्यान के द्वारा उन्हें परिशोधित एवं जागृत किया जा सकता है।
विज्ञानमय कोश मनोमय से भी अधिक सूक्ष्म है। यह अपने गर्भ में सृष्टि के समस्त रहस्यों को छिपाये हुए हैं। कुण्डलिनी की प्राणानुसन्धान प्रक्रिया द्वारा जागृत होने पर साधक को अनेकों प्रकार की दिव्य अनुभूतियां होती हैं। सृष्टि के रहस्यों का उद्घाटन होता है, अविज्ञात रहस्य भी ऐसे दृष्टिगोचर होने लगते हैं, जैसे सामने घटित हो रहे हैं।
अन्तिम कोश वह स्थान है जहाँ आत्मा निवास करती है। आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का केन्द्र बिंदु यही है। जीव को अपने सत्-चित्-आनन्द स्वरूप का दिग्दर्शन यहीं होता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलन स्थल है।
इन पाँचों कोशों की एक से बढ़कर एक सिद्धियां हैं। गायत्री की उच्चस्तरीय-पंचकोशी साधना द्वारा इन पांचों कोशों का अनावरण सम्भव है।
प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से होती है, जिसका अर्थ जीवनी शक्ति के रूप में किया जाता है। अध्यात्म शास्त्र में प्राण तत्व की गरिमा का भाव भरा उल्लेख है और उसे जीवन का सारतत्त्व प्राण कहते हैं। यह प्राण प्रगति का आधार है। यह प्राण तत्व अपने भीतर प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा है और यदि प्रयास किये जायं तो उस शक्ति को विश्व भण्डार से और भी अधिक मात्रा में कर्षित किया जा सकता है विश्व के अन्तराल में काम करने वाली समग्र सामर्थ्य के रूप में व्याख्यायित प्राण-शक्ति जड़ चेतन दोनों को प्रभावित करती है। उपासना उसके एक पक्ष की ही की जाती है, जो मनुष्य को उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करे। अन्यथा चेतना की सामर्थ्य तो उभयपक्षीय है, वह दुष्टता के क्षेत्र में दुःत्साहस बन कर भी काम करती है और उत्कृष्टता के क्षेत्र में मानवी चेतना का स्तर ऊंचा उठाने वाले सत्साहस के रूप में भी सक्रिय रहती है। प्राण के जिस रूप की उपासना की जाती है वह दुष्टता का निषिद्ध पक्ष नहीं उत्कृष्टता का वरणीय स्वरूप ही है। इसी विशेषता को ब्राह्मी शक्ति- ब्रह्म प्रेरणा साक्षात् ब्रह्म आदि नामों से पुकारा गया है। इस प्राण-शक्ति की व्याख्या करते हुए शास्त्रों में कहा गया है-
प्राणो ब्रह्मेतिहस्माह कोषीतकिस्तस्य हवा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वाक्पारिवेष्ट्री चक्षुर्गात्र श्रोत्रं संश्रावयितृ यो ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वेद दूतवान्भवित यश्चक्षु गोप्तृ मान्भवति यः श्रोत्रं सश्रावयितृ मान्भवति यो वाचं परिवेष्ट्री परिवेष्ट्रामान्भवति। -कोषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् 2।1
यह प्राण ही ब्रह्म है। यह सम्राट है। वाणी उसकी रानी है। कान उसके द्वारपाल हैं। नेत्र अंग रक्षक, मन दूत, इन्द्रियाँ दासी, देवताओं द्वारा यह उपहार उस प्राण ब्रह्म को भेंट किये गये हैं।
प्राणो भवेत् परंब्रह्म जगत्कारणमयव्यव्ययम्। प्राणो भवेत् यथामंत्र ज्ञानकोश गतोऽपिवा॥ -ब्रह्मोपनिषद्
प्राण ही जगत का कारण परमब्रह्म है। मन्त्र ज्ञान तथा पंच कोश प्राण पर आधारित हैं।
अधिकांश, उपनिषद्कारों ने प्राण को आत्मसत्ता की त्रिपदा शक्ति माना है और उससे अविच्छिन्न कहा है। आत्मा को ब्रह्म भी कहा है। दोनों की एकता बोधक कितने ही प्रतिपादन मिलते हैं। इस दृष्टि से प्राण को ब्रह्म शक्ति भी कहा गया है। जिनमें यह शक्ति जागृत होती है, उसी व्यक्ति को जागा हुआ बताया गया है। अन्यथा निष्प्राण, जीवट से रहित और दुर्बल व्यक्तियों को सोया हुआ ही बताया गया है। शास्त्रों में कहा है-
तदाहुः कोऽस्वप्नुमर्हति, यद्वाव प्राणो जागार तदेव जागरितम् इति। -ताण्ड्य 10।4।4
कौन सोता है? कौन जागता है? जिसका प्राण जागता है, वस्तुतः वही जागता है।
उस रहस्य-मर्म को जानने वाले व्यक्तियों को ही बुद्धिमान कहा गया है-
य एवं विद्वान् प्राणं वेद रहस्या प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तयेव श्लोकः। -प्रश्नोपनिषद् 3।11
जो बुद्धिमान इस प्राण रहस्य को जान लेता है वह अमर बन जाता है उसकी परम्परा नष्ट नहीं होती।
प्राणग्नय एवास्मिन् ब्रह्मपुरे जागृति। -प्रश्नोपनिषद्
इस ब्रह्मपुरी में प्राण की अग्नियाँ ही सदा जलती रहती हैं।
इस प्राण को ही ब्रह्म कहा गया है और इस कारण प्राण को प्रत्यक्ष ब्रह्म भी कहा गया है। अप्रत्यक्ष ब्रह्म की सत्ता किसी प्राणी पर कितनी मात्रा में अवतरित हुई इसका परिचय उसमें दृष्टिगोचर होने वाले प्राण तत्व को देखकर ही लगाया जा सकता है। गायत्री को प्राण और प्राण को ब्रह्म कहा गया है। इस तरह एक प्रकार से गायत्री साक्षात ब्रह्म भी कही जा सकती है-
कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म तदिव्या वक्षते। -बृहदारण्यक
वह एकमात्र देव कौन है? वह प्राण है। उसे ही ब्रह्म कहा जाता है।
वप्राण ब्रह्म इति दृस्याह कौषीतकिः। -ब्रह्म संहिता
प्राण ही ब्रह्म है। ऐसा कौषीतिक ऋषि ने कहा है।
स एवं वैश्वानरो विश्व रूपः प्राणोदऽग्नि रुदयते। -पिप्पलाद
यह प्राण ही समस्त विश्व में वैश्वानर रूप से उदय होता है।
ऋतंभरा प्रज्ञा को गायत्री का प्राणरूप बताते हुए शास्त्रकार ने कहा है-
प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्या। तं मामायुरमृत भित्युपास्वायुः प्राणः प्राणोवा आयुः। प्राणेन हि एवास्मिन् लोकेऽमृतत्व माप्नोति। -सांख्यायन, आरण्यक 5। 2
में ही प्राण रूप प्रज्ञा हूँ। मुझे ही आयु और अमृत मान कर उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमृत की प्राप्ति का आधार प्राण है।
यो वे प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः। -सांख्यायन
जो प्राण है वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
इसी प्राण-शक्ति को गायत्री कहते हैं। यों वह क्षमता, स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के कण-कण में संव्याप्त है, पर उसका केन्द्र संस्थान मल मूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार चक्र गहवर में माना गया है। प्राण-शक्ति के अभिवर्धन से इसी मूलाधार संस्थान का द्वार खटखटाना पड़ता है। दुर्ग में प्रवेश करने के लिए उसका फाटक खोलना या तोड़ना पड़ता है। मूलाधार चक्र की साधना से यही प्रयोजन पूरा होता है। गायत्री की प्राण शक्ति मूलाधार चक्र से संबंधित होने का उल्लेख गायत्री मंजरी में मिलता है-
यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये। गायव्येव मतालोके मूलाधारा विदो वरैः॥ -गायत्री मंजरी
विद्वानों का मत है कि समस्त यौगिक साधनाओं का मूलाधार गायत्री ही है।
प्राणाग्नय एवास्मिन् ब्रह्मपुरे जागृति। -प्रश्नोपनिषद्
इस ब्रह्मपुरी में प्राण अग्नियाँ ही सदा जलती रहती हैं।
यद्वाव प्राणा जागर तदेवं जागारितम इति। -ताण्डय.
प्राण को जागृत करना ही महान जागरण है।
प्राण का ज्ञान एवं जागरण ही अमृतत्व एवं मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है। उसी से यह लोक और परलोक सुधारता है। इसी से भौतिक और आत्मिक विभूतियाँ प्राप्त होती हैं क्योंकि इसी शक्ति के बल पर आत्म परिष्कार तथा आत्मिक शक्तियों का विकास होता है।
सन्त ज्ञान देव कहते थे- “माली जिधर ले जाय, उधर ही चुपचाप चले जाने वाले पानी की तरह बनो।” माली जिन फूल और फलों के पौधों को चाहता है, उन्हें पानी देता व बढ़ाता है। इसी प्रकार यदि भगवान को हम माली मान लें तो हमारे हाथों जो कुछ होना है, वह उसी के द्वारा तय होना चाहिए। जीवन की सारी हलचल, नाच कूद, फलना-फलाना सब कुछ अन्त में परमात्मा ही तो होना है। हमारे जीवन का ‘वह’ महेश्वर बन जाय, यह समर्पण भाव आए बिना अहंता के पर्दे का हटना सम्भव नहीं।
बसन्त पर्व की इस पुण्य बेला में महत् सता की और से यह विशिष्ट प्रेरणा उभरी है कि युग धर्म के निर्वाह को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी एवं चुनौती समझने वाले प्रत्येक नैष्ठिक परिजन को एक स्वाध्याय मण्डल का सृजेता, संस्थापक एवं संचालक बनना है। इस पुण्य संकल्प की सम्भावनाएं अद्भुत एवं अनुपम है। बसन्त पर्व सूत्र संचालक का आध्यात्मिक जन्म दिवस है। इस वर्ष बसन्त पंचमी का पर्व 19 जनवरी बुधवार को पड़ता है इस वर्ष के लिये उनका यह विशेष सन्देश अपने हर प्राणवान परिजन के नाम व्यक्तिगत रूप से इन पंक्तियों द्वारा भेजा जा रहा है। लोक मानस के परिष्कार का इस अभियान के अनेकानेक महत्वपूर्ण कदम संकल्प लेकर चलने वाले इसी उल्लास भरे पर्व की बेला में उठे हैं। प्रस्तुत प्रेरणा को भी उसी शृंखला की एक कड़ी माना जाय एवं अपने संकल्प को और अधिक प्रखर बनाते हुए एक कदम और आगे बढ़ाया जाय।
प्रस्तुत विभीषिकाओं से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की सृजन साधना में जुटने के लिए जागृत आत्माओं को अग्रिम मोर्चे पर खड़ा होना ही पड़ेगा। बाद में तो रेल मोटरों के पीछे-पीछे रेत और कूड़ा भी दौड़ते देखा गया है। बात आगे चलने की है। प्रभात बेला में सूर्य निकलता है तो सब ओर चहल-पहल मचने लगती है। जिम्मेदार लोग तो न केवल समय से पहले स्वयं उठ पड़ते हैं वरन् दूसरों को भी जगाने उठाने में कुक्कुट की तरह बाग लगाते और पहल करते हैं। किन्तु उनींदे और आलसी भी जब सब ओर उठने खड़े होने का कार्य में संलग्न होने का माहौल देखते हैं तो इच्छा या अनिच्छा से बिस्तर छोड़ते, नित्य कर्म करते और निर्धारित काम में हाथ डालते देखे जाते हैं। यह सारा श्रेय जागरण पर्व की पहल करने वाले दिनकर की है। यदि उसने आलस बरता होता तो फिर सम्भव है रात का पलायन और लम्बा हो जाता। निशाचरों की तूती और भी देर तक बोलती रहती। अच्छा है कि जिन्हें उत्तरदायित्वों का भान है वे कठिनाइयों की बात नहीं सोचते वरन् परिस्थितियों का दबाव अस्वीकार करते हुए कर्तव्य की पुकार सुनते हैं और चुनौती स्वीकार करने में बगलें नहीं झाँकते।
बादल उमड़ते हैं तो मोर नाचते हैं, पपीहा बोलते देखे गये हैं। यहाँ तक कि मेंढक तक टर्राने में किसी से पीछे नहीं रहते। पावस के अनुदान धरती पर उतरते देर नहीं लगती कि देवता दूब का मखमली फर्श धरातल के कौने-कौने में बिछा देते हैं। उद्विजों की उपज कितनी द्रुतगति से होती है इसे देखकर आश्चर्य होता है। धान रोपने में किसानों और पौधे लगाने में मालियों का उत्साह देखते ही बनता है। युद्ध मोर्चे पर जो नायकों के घोड़े हिनहिनाते हैं तो पिछली पंक्ति में खड़े हुए सैनिकों के भी भुज दण्ड फरकते हैं। यह अग्रगामियों का भी यशगान है। संसार में जो कुछ भी- जहाँ कहीं भी- महत्वपूर्ण घटित, विनिर्मित हुआ है उसका अधिकाँश श्रेय अग्रगामियों के हिस्से में आता है। यों पहाड़ काटने में छैनी हथौड़े तो अनेकों के चलते हैं और लम्बे समय तक खटकते हैं। गोवर्धन एक ने उठाया तो लाठी का टेका लगाने वालों की भीड़ भी दौड़ पड़ी। बुद्ध और गाँधी के आंदोलनों में यही चमत्कार आँखों के आगे देखा जा चुका है।
युग परिवर्तन के इस प्रभात पर्व में जागृत आत्माओं की भूमिका ठीक उषा काल जैसी होनी चाहिये, जिससे असंख्यों की प्रेरणा मिले और माहौल बदले। प्रज्ञा परिजनों में से जिनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति उलझी हुई है और उन्हें भी इन दिनों केवट, शवरी, गिलहरी जितना तो कुछ करना ही होगा। हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने में तो उनकी भी गति नहीं। इन ऐतिहासिक क्षणों में जो पेट प्रजनन की ही दुहाई देते रहेंगे और व्यस्तता अभाव ग्रस्तता की कहानी कहते रहेंगे, वे घाटे ही घाटे में रहेंगे। कृपणताजन्य दरिद्रता तो उन पर छाई ही रहेगी, वह सुयोग बेला भी हाथ से निकल जायगी जिसमें वे सुदामा के तंदुल प्रस्तुत करके असंख्य गुना पाने का सौभाग्य उपलब्ध कर सकते थे। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सामान्य स्थिति के प्रज्ञा परिजनों को कहा गया है कि वे न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना करने छोटे-छोटे प्रज्ञा परिवार चलाने जितना उत्तरदायित्व तो ओढ़े हैं। इस सरलतम सृजन प्रक्रिया में हर स्तर का व्यक्ति सहगामी बन सकता है। उसमें जोखिम तनिक भी नहीं। लाभ इतना जिसका सत्परिणाम हाथों हाथ देखा जा सकता है।
समझा जाना चाहिए कि ढाई हजार वर्ष पूर्व बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन का उत्तरार्ध ही प्रज्ञा अभिमान है। इसमें “बुद्ध शरणं गच्छामि”, “धर्म शरणं गच्छामि”, “संघं शरणं गच्छामि” के तीनों ये सूत्र बौद्धिक कर्म, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति के रूप में सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप मुखर एवं प्रखर हुए हैं।
एक-एक कदम बढ़ाते हुए युगान्तरीय चेतना ने बीज से बढ़कर अब वृक्ष का रूप धारण किया है। विद्यार्थी एक वर्ष एक कक्षा उत्तीर्ण करते हुए बाल कक्षा से स्नातकोत्तर बनता है। यही क्रम प्रज्ञा अभियान ने भी अपनाया है। बसन्त पर्व उसका जन्म दिवसोत्सव है। इस पुनीत अवसर पर हर वर्ष अंतरिक्ष में उस पर दिव्य अनुग्रहों की पुष्प वर्षा हुई है। साथ ही एक से एक बड़ा साहसिक कदम भी उठा है। मिशन का प्रगति इतिहास में एक-एक नया अध्याय जुड़ता चला आया है। एक का समापन और दूसरे का शुभारम्भ इसी मुहूर्त में होता रहा है। अस्तु न केवल मिशन का वरन् उसके सूत्र संचालक का जन्म दिन भी बसन्त पर्व पर ही मनता रहा है। अब प्रत्येक प्राणवान प्रज्ञा परिजन का जन्म दिन भी वही है। हृदय और मस्तिष्क जिस दिन जन्मे उसी दिन हाथ पैरों का प्रादुर्भाव भी माना जायगा।
प्रज्ञा परिजन जन्म जन्मांतरों से इस शृंखला में बँधे चले आते हैं। भले ही उनके मन में उल्लास या उपेक्षा के उतार चढ़ाव आते हों, पर यह निश्चित है कि नौका यदि बीच में ही न डूबी तो सभी एक साथ पार लगेंगे और युग अवतरण की भूमिका एक सुगठित सैन्य दल के घटकों की तरह सभी समान श्रेय प्राप्त करेंगे।
नव सृजन के लक्ष्य तक बिना समय गंवाये हर वर्ष एक साहसिक कदम उठाने की अपनी परम्परा रही है। अब तक जो बन पड़ा सर्वविदित है। जो युग संधि की प्रस्तुत चुनौती स्वीकार करते हुए किया जाना है, उस पर हम सबका ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस दृष्टि से सन् 83 का बसन्त पर्व ऐसा होना चाहिए जिसे अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक कहा जा सके।
इस बसन्त पर्व पर एक ही दिव्य प्रेरणा उतरी है कि प्रत्येक प्राणवान परिजन को एक स्वाध्याय मण्डल का सृजेता संस्थापक एवं संचालक होना चाहिए। यह देखने में अति सरल और परखने में नगण्य सा काम है किन्तु इसकी दूरगामी सम्भावना और परिणति पर विचार करते ही यह तथ्य उजागर हुए बिना नहीं रहता कि यह असाधारण, अद्भुत, एवं अनुपम प्रयास है। जिस विचार क्रान्ति को युग धर्म माना गया है और जिस आधार पर लोकमानस के परिष्कार का स्वप्न देखा गया है उसकी समग्र सम्भावना एवं बीजारोपण में सुनिश्चित रूप से सन्निहित है।
हममें से कोई ऐसा नहीं जिसकी चार विज्ञजनों से घनिष्ठता न हो। इनमें से एक भी ऐसा नहीं होगा जो एक घंटा समय और एक मुट्ठी अन्न का प्रतिदिन अनुदान ऐसे महत्वपूर्ण प्रयास के लिए न निकाल सके, जिस पर समूचा मानवी भविष्य निर्भर है। प्रज्ञा परिवार की नैष्ठिक सदस्यता के लिए न्यूनतम शर्त प्रत्येक ईमानदार परिजन को अनिवार्यतः निभानी होती है। इस संदर्भ में बरती जाने वाली शिथिलता को दूर करने भर से किसी को प्रज्ञा परिजन कहलाने का गौरव और श्रेय मिलता है। ऐसे चार व्यक्ति ढूंढ़ निकालना किसी भी लगनशील व्यक्ति के लिए कठिन नहीं हो सकता है। एक संकल्पवान चार साथी और तलाश करके पाँच का नैष्ठिक युनिट बने। यह पांचों सदस्य नित्य नियमित रूप से स्वयं प्रज्ञा साहित्य का स्वाध्याय करे और साथ ही अपने पड़ोस परिवार के पाँच-पाँच अन्य शिक्षितों को यही चस्का लगाये। उन्हें हर दिन, नियमित रूप से बिना मूल्य साहित्य देने और वापस लेने का सिलसिला चलाने लगें तो देखते-देखते तीस सदस्यों का एक सुदृढ़ प्रज्ञा परिवार गठित हो जायेगा।
इस प्रेरणा से जो भी अनुप्राणित होंगे- आत्म निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की दिशा में छोटे-बड़े कदम उठाये बिना रहेंगे नहीं। फलतः उन स्वप्नों के साकार होने का उपक्रम एक छोटी परिधि में सुनिश्चित रूप से चल पड़ेगा। संयुक्त प्रयत्नों में एक-दूसरे को प्रोत्साहन मिलता है और वर्षा की बूंदें देखते-देखते उफनते नाले की तरह बह निकलती हैं।
विचारशीलों की एक मित्र मण्डली का गठन- उस समुदाय में पारस्परिक घनिष्ठता का संवर्धन, मात्र के लाभों को एक बड़ी उपलब्धि समझा जा सकता है। इन दिनों हर व्यक्ति अपने आप को अकेला अनुभव करता है। स्वार्थ सिद्धि के लिए तो गिद्ध, कुत्ते तक मुर्दों का माँस नोचने आ जाते हैं। अवारा कुत्ते झुण्ड बनाकर गली कूची में मारे-मारे फिरते हैं। चोर तस्करी की चाण्डाल चौकड़ियाँ किन्हीं कोतरों में बैठकर षडयन्त्र रचती रहती हैं। वे परस्पर घनिष्ठ कहाँ होते हैं। स्वार्थों की खींचतान में वे परस्पर सिर फोड़ते और एक दूसरे की जान के ग्राहक होते देखे गये हैं। नीबू चूसने के उपरान्त छिलके कूड़ेदान में ही पटके जाते हैं उनकी साज सम्भाल फिर कौन करता है। आज की तथाकथित ‘यार बासी’ न इससे कम है न जादा। ऐसी दशा में उस मैत्री के लिए आत्मा तरसती ही रह जाती है जो सज्जनों के उद्देश्यपूर्ण कार्यों के माध्यम से ही पकड़ में आती है। उच्चस्तरीय मैत्री हर पक्ष को ऊंचा उठाती, आगे बढ़ाती और विपत्ति में कारगर सहयोगी सिद्ध होती है। एकाकी पाकर हर किसी का हमला करने को मन करता है, पर किसी के साथ समुदाय हो तो फिर समर्थ आक्रांता को भी हजार बार सोचना पड़ता है। दुःख बँटाने और सुख बाँटने में सज्जनों का समुदाय ही समर्थ रहता है। वैसा सुयोग जिन्हें मिले उन्हें भाग्यवान ही कहा जायगा। स्वाध्याय मंडल चलाने का यह लाभ प्रत्यक्ष है। इसके उपरान्त सत्प्रवृत्ति संवर्धन का कार्य इतना महान है जिसे उच्चस्तरीय कहे जाने वाले पुण्य परमार्थों से किसी से भी कम महत्व का नहीं समझा जा सकता है।
आस्था संकट ही आज की समस्त समस्याओं और विपदाओं का आधारभूत कारण है। उससे निपटने के लिए जो भी प्रयत्न चलेंगे उन्हें दुर्घटनाग्रस्तों के सहायता के लिए करुणा भरे परमार्थाय की श्रेणी में ही गिना जायगा। उज्ज्वल भविष्य की सृजन सम्भावना का आधार एक ही है- सत्प्रवृत्ति संवर्धन। इसके लिए लोक मानस का परिष्कार ही वह उपाय है जिसके सहारे इस मार्ग पर प्रगति का रथ चक्र आगे बढ़ता है। इस महती संभावनाओं के बीजांकुर स्वाध्याय मण्डली के संचालन में मौजूद हैं। इस प्रक्रिया को कोई छोटा न समझे। उसका नन्हा-सा कलेवर देखकर उपहास न करे। जो वट बीज के आकार और फलित होने पर उसके विशाल आकार वाली बात जानते हैं कि मात्र दुष्टता ही छूत की बीमारी बन कर फैलती नहीं है। किसान द्वारा फैलाये गये एक टोकरी दाने उसके कोठी-कुठीले भी भरते हैं। उद्देश्यपूर्ण साहसिक और व्यक्तित्व सम्पन्नों द्वारा हाथ में लिये गये काम भी चन्दन वृक्ष की तरह महकते और वातावरण में मनमोहक सुवास से भरते हैं। जिनने स्वाध्याय मंडल योजना को गम्भीरतापूर्वक समझाने का प्रयत्न किया होगा। जिनने उस प्रयोग को हाथ में लिया, अग्रगामी बनाया ओर उसके लिए अनवरत प्रयत्न किया होगा उन्हें अनुभव हुआ होगा कि रीछ बानरों के स्वल्प प्रयास ने किस प्रकार सेतुबन्ध बंध और असुर दमन हुआ होगा।
स्वाध्याय मण्डली का यह शुभारंभ है। तीस की मंडली में जब स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से घर-घर प्रकाश चित्र प्रदर्शन और टेप रिकार्डरों के माध्यम से जन-जन का उद्बोधन क्रम चल पड़ता है। तो उस आधार पर युगान्तरीय चेतना को गगन चुम्बी बनने का अवसर मिलता है। सदस्यों के जन्म दिवसोत्सव उनके घरों पर मानते हैं तो एक अच्छी-खासी ज्ञान गोष्ठी सम्पन्न होती है और उस आधार पर आलोक वितरण करने में समर्थ वातावरण बनाता है। यही सदस्य मिलजुल कर खड़िया, गेरू से दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने, घरों में उन्हें टाँगने के लिए निकलते हैं तो उस क्षेत्र में प्रगतिशीलता की उमंगें उफनती दृष्टिगोचर होती हैं।
यही है वह पंच सूत्री योजना जिसे विगत दो वर्षों में विनिर्मित 2400 निजी इमारतों वाले प्रज्ञापीठों ने अनिवार्य रूप से अपनाया और अपने क्षेत्रों को आलोकवान प्राणवान बनाया है। अब इस वर्ष बिना इमारतों वाले छोटे प्रज्ञा संस्थान स्वाध्याय मंडली के रूप में विनिर्मित किये जा रहे हैं। इन छोटे घटकों को ही अब सजीव प्रज्ञा परिवार कहा जायगा। उनके कार्यालय प्रज्ञा संस्थान कहे जा सकेंगे। इनकी संख्या इस वर्ष 24000 होती है। यह दूसरा कदम है। अर्थ साधन जुटा सकने वालों ने प्रज्ञापीठें बनाने में जिस पराक्रम का परिचय दिया है उसी का छोटा संस्करण उपरोक्त प्रज्ञा परिवारों के गठन को स्वाध्याय मंडल संस्थापन को समझा जायगा।
इन पंक्तियों में प्रज्ञा परिवार के प्रत्येक प्राणवान परिजनों को निजी प्रेरणा दी जा रही है कि वे मात्र पत्रिकाओं के पाठक न रहें। या तो स्वयं एक स्वाध्याय मण्डल गठित करें या फिर किसी अन्य के गठन प्रयास में सम्मिलित होकर रहें। एकाकी पाठक बने रहने भर से काम नहीं चलेगा। सृजन पर्व पर हममें से प्रत्येक का संगठन और सृजन प्रयास में भावभरा योगदान भी होना चाहिए। भले ही वह गिलहरी के श्रमदान एवं शबरी के अंशदान जितना स्वरूप ही क्यों न हो। इस संदर्भ में एक सुनिश्चित सामयिक एवं सरलतम प्रयास यही हो सकता है जिसके लिए प्रत्येक जागृत आत्मा से इन पंक्तियों में न केवल अनुरोध वरन् आग्रह भी किया जा रहा है। पाँच नैष्ठिक सदस्यों पीछे एक मण्डल गठित करने का निर्धारक के अनुसार एक स्थान में कई-कई मंडलों का गठन ही हो सकता है और उनके पृथक-पृथक संचालक हो सकते हैं। संचालक और नैष्ठिक सदस्यों की सूची शांतिकुंज भिजवानी चाहिए और ज्ञानघटों की राशि का साहित्य युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि मथुरा से मँगाना चाहिए।
पिछले वर्ष कितनी ही संसदों का गठन हुआ है। उनमें से कितनों ने ही अपने नामांकन कराये हैं। प्रज्ञा पुत्रों, वानप्रस्थों, परिव्राजकों के रूप में कितनों ने ही अपना पंजीकरण कराया है। प्रज्ञा पीठों के ट्रस्टी एवं सहयोगी भी कितने ही मूर्धन्य व्यक्ति रहे हैं। कार्यवाहकों का एक बड़ा समुदाय है। पत्रिकाओं को इकट्ठी एक जगह मांगने और वितरण करने वाले निष्ठावानों का भी एक बड़ा समुदाय है। उन्हें ‘वरिष्ठ’ अग्रगामी कह सकते हैं। इनमें से एक भी इस बार ऐसा न रहे जो अपने संपर्क क्षेत्र के सभी परिजनों के साथ इस प्रयोजन के लिए संपर्क न साधे। यह कार्य सुविधानुसार एक मुहल्ले बार गोष्ठियां बुलाकर या उनके घरों पर जाकर जो भी उपयुक्त हो करना चाहिए। पत्रिकाओं के पाठकों में से एक भी ऐसा नहीं रहना चाहिए जो इस बसन्त पर्व पर सर्वथा निष्क्रियता अपनाये रहे। हम सभी को इस बार स्वाध्याय मंडली के अंतर्गत न केवल संघबद्ध होना है वरन् उन्हें सुयोजित ढंग से चलाने-बढ़ाने के लिए भी सामर्थ्य भर प्रयत्न करना है।
गायकों की आवश्यकता
प्रज्ञा पीठों के वार्षिकोत्सवों, प्रज्ञा पुराण आयोजनों, युग निर्माण चित्र प्रदर्शनी कार्यक्रमों एवं स्वाध्याय मंडल उद्घाटनों के संदर्भ में शांति कुँज हरिद्वार से इन दिनों देश के कोन कोने में प्रचारक जीप टोलियां भेजी जा रही हैं। माँगे अधिक होने एवं प्रस्तुत जीपें कम पड़ने से और भी अधिक संख्या में जीप गाड़ियों की व्यवस्था की जा रही है।
इस संदर्भ में मधुर कंठ वाले गायकों की कमी पड़ रही है। अपने प्रज्ञा परिवार के जो परिजन गायक हों और न्यूनतम पाँच माह का समय दे सकते हों, उन्हें इन टोलियों में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया जा रहा है।
ऐसे गायक जिन्हें निर्वाह की आवश्यकता होगी उन्हें भोजन के अतिरिक्त प्राय 200 से 300 मासिक वृति देने की भी व्यवस्था की गई है। जिनके संपर्क में ऐसे व्यक्ति हों वे शान्ति-कुँज हरिद्वार के पते पर पत्र-व्यवहार कर लें।
व्यक्तिगत रूप से हर प्रज्ञा परिजनों को बसन्त की इस बेला में करने के लिए जो कहा जा रहा है उसकी चर्चा पिछले लेख में हो चुकी। इसी प्रयोजन के लिए दूसरा सामूहिक कार्यक्रम है- प्रज्ञा सम्मेलनों की व्यापक व्यवस्था। इस आधार पर परिजनों को संगठित होने, मिल-जुलकर काम करने, अन्यमनस्कता को सक्रियता में बदलने का अवसर मिलता है और जन-मानस को प्रशिक्षित करने का असाधारण अवसर भी प्रज्ञा पीठों के लिए यह एक अनिवार्य कर्तव्य घोषित किया गया है कि वे वर्ष में एक बार वार्षिकोत्सव के रूप में एक उमंग भरा आयोजन किया करें। इसके लिए शांति-कुंज में प्रचार मण्डलियाँ जीप गाड़ियों द्वारा भेजी जाती हैं। इसमें पाँच प्रचारकों का एक जत्था होता है जो संगीत मंडली की तरह उद्बोधन करते और युगान्तरीय चेतना से लोक-मानस को अनुप्राणित करते हैं। इसी जीप में एक चित्र प्रदर्शनी भी रहती है जो आगंतुकों के लिए एक आकर्षण का चर्चा का विषय रहती है। इस वर्ष जहां भी ये सम्पन्न हुए हैं निष्क्रियता के स्थान पर गतिशीलता उभरी है। सर्वत्र इनकी उपयोगिता समझी गई और उनके हर वर्ष होते रहने का सुनिश्चित निर्धारण बन गया है। यह शृंखला अब सदा सर्वदा चलती रहने वाली है। इन आयोजनों के साथ प्रज्ञा पुराण कथा क्रम रहने में उन्हें हर वर्ष होते रहने की बात में और भी अधिक आकर्षण बना रहेगा।
प्रज्ञा पीठों की तुलना में स्वाध्याय मंडल प्रायः 10 गुने अधिक होंगे। वार्षिक आयोजन उनके भी होने चाहिए। इसके लिए जीपों के स्थान पर टैम्पो खरीदे जा रहे हैं और पाँच प्रचारकों के स्थान पर तीन गायक वक्ताओं के मंडल गठित किये जा रहे हैं। एक छोटी चित्र प्रदर्शनी भी तैयार की गयी है जो टैम्पो में भेजी जा सकेगी। जहाँ स्वाध्याय मंडल बन चुके हैं या बनने जा रहे हैं उनके सूत्र संचालकों से कहा गया है कि अपनी स्थापना का उद्घाटन आयोजन इसी वर्ष रखें और भविष्य में उन्हें वार्षिकोत्सवों के रूप में सम्पन्न करते रहें।
इस समूचे आयोजन अभिमान के लिए ऐसे युग गायकों की कमी पड़ रही है जो मिशन से संबद्ध भी रहे हों साथ ही गायन वादन में प्रचारक स्तर की योग्यता भी रखते हों। जीपों वाले बड़े सम्मेलनों में और टैम्पो वाले छोटे आयोजनों में इस स्तर के परिजनों का विशेष रूप से आह्वान किया गया है। उन्हें मात्र संगीत ही नहीं गाना है वरन् वार्तालाप में मुखर होने के अतिरिक्त अन्यान्य प्रसंगों को भी सफल बनाने योग्य सक्रियता एवं प्रतिभा से युक्त होना है।
कहना न होगा कि इस स्तर के उत्साही और सक्षम लोगों की अपने परिवार में कमी नहीं जो उपरोक्त उत्तरदायित्व का भली प्रकार निर्वाह न कर सकें। पाठकों, परिजनों में से जो ऐसे हों अथवा उनके निकट संपर्क में भी इस स्तर के व्यक्ति हों वे शान्ति कुंज हरिद्वार से पत्र व्यवहार संपर्क साधें। आवश्यक ट्रेनिंग के उपरान्त प्रचारक मंडलियों में सम्मिलित करके उन्हें देशव्यापी कार्यक्रमों पर भेजा जायगा।
जिनके पास अपनी निर्वाह व्यवस्था नहीं है उनके लिए औसत भारतीय स्तर की ब्राह्मणोचित व्यवस्था का भी प्रबन्ध है। छोटा परिवार होने पर शांति-कुँज में उसके रहने तथा सद्गृहस्थ जैसी अन्य आवश्यकताओं की पूति की व्यवस्था व्यक्तिगत परामर्श के आधार पर यहां बना दी जाती है कोई वेतनमान तो नहीं है पर निर्वाह क्रम का एक स्तर निर्धारित होना आवश्यक है। इन पंक्तियों में जहाँ बसन्त पर्व पर स्वाध्याय मंडलों की स्थापना- उनके उद्घाटन आयोजनों की व्यवस्था करने के लिए प्राणवान परिजनों को प्रेरणा दी जा रही है वहाँ एक अनुरोध उनसे यह भी किया जा रहा है कि प्रचारक स्तर के प्राणवानों की आवश्यकता पूरी करने जैसी सामयिक आवश्यकता पर भी अविलम्ब ध्यान दें।
कोई बहुत कुशल सृष्टा है अखिल सृष्टि का रचनाकार। लगता है मानव के हित ही उसने रचा सकल संसार॥
तेज पुज सविता को आभा जीवन भरती कण-कण में। कितनी व्यापक शक्ति कि छायी जड़ जंगम में जीवन में॥
प्राणमयी लालिमा उषा की पिला रही अमृत रसाधार॥ सुन्दर शशि व तारकावलि की उषमा अभी न मिल पायी।
रात दिवस का क्रम मानव के हित है कितना सुखदायी॥ अन्य ग्रहों से भी कर सकते हम अपना परिचय विस्तार॥
गिरी की दृढ़ता रची उसी ने नदियों की मतवाली चाल। खारे जल वाले सागर को मोती देकर किया निहाल॥
प्राण छिड़कती कल-कल करते झरनों की रसमयी फुहार॥ माँ के वक्षस्थल सी धरती उस पर शैया फूलों की।
बहती हुई हवा मानो अनुभूति कराती झूलों की॥ क्षुधा मिटाने हेतु वनस्पतियों कहा है अक्षय भण्डार॥
है कमाल उस चित्रकार का रंगों की संरचना में। है न दूसरा कलाकार इस परम पुरुष की तुलना में।।
भाँति-भाँति के जीव जन्तु इसका विचित्र कल्पना प्रसार॥ तन-मन सौंपा हमें मनोहर सुखमय जीवनयापन को।
करुणा ममता दया क्षमा निधियां दी मानव मन को॥ और दिया है जिससे बढ़कर आत्मतृप्ति कर मधु सा प्यार॥
कोयल का संगीत मोर की मनमोहक मतवाली तान। सुनकर जगती मृदुल भावना तन्मय हो जाते हैं प्राण॥
इन सुंदरताओं में मानो वह खुद हो उठता साकार।। समझें अपने सृजनहार को इसके लिये दिया है ज्ञान।
इस भव का सौंदर्य बढ़े इसमें प्रयत्नरत हो विज्ञान॥ सत्यम् शिवम् सुंदरम् हो अपनी हर गतिविधि का आधार॥
कोई बहुत कुशल सृष्टा है अखिल सृष्टि का रचनाकार। लगता है मानव के हित ही उसने रचा सकल संसार॥
(माया वर्मा)