समर्थ होते हुए भी असमर्थ क्यों?

मनुष्य उतना तुच्छ नहीं है जितना कि वह अपने को समझता है। वह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। न केवल वह प्राणियों का मुकुटमणि है वरन् उसकी उपलब्धियाँ भी असाधारण हैं। प्रकृति की पदार्थ सम्पदा उसके चरणों पर लोटती है। प्राणि समुदाय उसका वशवर्ती और अनुचर है। उसकी न केवल संरचना अद्भुत है वरन् इन्द्रिय समुच्चय की प्रत्येक इकाई अजस्र आनन्द-उल्लास हर जगह उड़ेलते रहने की विशेषताओं से सम्पन्न है। ऐसा अद्भुत शरीर इस सृष्टि में कहीं भी, किसी भी जीवधारी के हिस्से नहीं आया।

मनः संस्थान उससे भी विलक्षण है। जहाँ अन्य प्राणी मात्र अपने निर्वाह तक की सोच पाते हैं, वहाँ मानवी मस्तिष्क भूत-भविष्य का तारतम्य मिलाते हुए वर्तमान का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने में समर्थ है। ज्ञान और विज्ञान के दो पंख उसे ऐसे मिल हैं जिनके सहारे वह लोक-लोकान्तरों का परिभ्रमण करने, दिव्य लोक तक पहुँचने का अधिकार जमाने में समर्थ है।

इतना सब होते हुए भी स्वयं को तुच्छ मान बैठना एक विडम्बना ही है। यह दुर्भाग्य जिस कारण उस पर लदता है, वह है आत्म-विश्वास की कमी। अपने ऊपर भरोसा न कर पाने के कारण वह समस्याओं को सुलझाने, कठिनाइयों से उबरने और सुखद सम्भावनाओं को हस्तगत करने में दूसरों का सहारा तकता है। दूसरे कहाँ इतने फालतू होंगे कि हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ें। बात तभी बनती है, जब मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होता है, अपनी क्षमताओं पर भरोसा करके, अपने साधनों व सूझ-बूझ के सहारे आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है। यह भली-भाँति समझा जाना चाहिए कि आत्म-विश्वास संसार का सबसे बड़ा बल है, एक शक्तिशाली चुम्बक है जिसके आकर्षण से अनुकूलताएँ स्वयं खिंचती चली आती हैं।


अपरिग्रह का वास्तविक अर्थ

तीर्थांकुर भगवान महावीर उन दिनों राजगीर में अपना अपरिग्रह प्रवचन माला चलाते हुए चातुर्मास सम्पन्न कर रहे थे। उनके प्रभावी प्रतिपादन श्रोताओं के गले उतरते चले जा रहे थे। परिणाम स्वरूप चारों ओर सत्प्रवृत्ति विस्तार हेतु परमार्थ परायणता की भावना ही संव्याप्त थी। धनिकों और मध्यम वर्ग के अनेकों लोगों ने सत्प्रयोजनों हेतु अपनी सम्पदा दान कर दी। संचय और स्व की ही- सुख उपभोग मात्र की ही- विचारणा करने वाले उस समाज के लिए लिये यह एक असाधारण घटना थी। भगवान् का कहा हुआ हर वाक्य व्यवहार में उतरता चला जा रहा था।

उन दिनों भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिनके पास धन था, उन्होंने सामान्य नागरिकों जैसा जीवनयापन कर शेष सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु दान कर दिया। लोभजन्य अपराधों का तो समापन ही हो गया। बारी अब उनकी थी जिनके पास धन तो नहीं था, पर जन्मजात श्रम सम्पदा की तनिक भी कमी नहीं थी। उन्होंने श्रमदान भगवान के चरणों में अर्पित किया। शरीर यात्रा भर के लिए निजी उपार्जन करने के उपरान्त अपनी शेष समय श्रम-सम्पदा उन्होंने धर्मधारणा के व्यापक विस्तार हेतु नियोजित कर दी। इस श्रम-सम्पदा से प्रगति की अनेकानेक गतिविधियाँ चल पड़ीं।

प्रवचन माला जारी थी। नहीं आए थे तो मात्र एक ही धनाधिपति- राजगृही के सबसे समृद्ध गाथापति महाशतक। जन-सामान्य इसी ऊहापोह में था कि इस प्रवाह का क्या किंचित मात्र भी प्रभाव इस महाधनिक पर नहीं पड़ा। मानों उनके समाधान हेतु ही उस दिन एक किशोरी के संकल्प के रूप में तीर्थांकुर की प्रेरणा प्रस्फुटित हुई।

किशोरी मधूलिका के संकल्प लिया- “भगवान्! जब आयुष्य भी परिग्रह है, तो फिर लम्बी आयु तक जीकर मैं ही क्यों परिग्रह का पाप ओढूँ? मेरे पास और तो कुछ नहीं, मेरा आयुष्य दान स्वीकार कर लें। जीवन भर धर्म चेतना के प्रसार-विस्तार हेतु लगी रहूं- यही अभिलाषा है।”

जीवन दान के इस आत्म निवेदन को अर्हन्त ने स्वीकार किया। उसे महिला जागरण के कार्य को अहिर्निशि सम्पन्न करते रहने की साधना में प्राण-पण से जुटने को जब प्रभू ने कहा तो सारा राष्ट्र उस किशोरी के त्याग से झकझोर उठा। सामान्य गृहणियों का स्तर भी देवियों जैसा बनने लगा। मधूलिका के समर्पण से परिवारों में स्वर्गीय सुसंस्कारिता की हरीतिमा उगने- लहलहाने लगी।

महाशतक के घर आज वही आयुष्य दानी कुमारिका आयी था। उसके तेजस् ने धनपति के मन में सत्संग समागम तक पहुँचने के लिए उत्कंठा उत्पन्न कर दी। परिग्रह त्याग से ग्रहीता की तुलना में दानी अधिक लाभ में रहता है, यह उसने उपस्थित लोगों के परिवर्तित जीवन को देखकर प्रथम बार अनुभव किया। उसने भी अपना वैभव-कुबेर समान धनराशि श्रमण संघ हेतु समर्पित कर दी। नये बिहार बनने लगे। नये धर्म प्रचारकों के प्रवेश का अवरुद्ध द्वार खुला। शालीनता की बासन्ती सुरभि से वह सारा प्रदेश सुगन्धित हो उठा।

महाशतक की पत्नी स्वयं में बड़ी कृपण व कर्कश थी। वस्तुतः अभी तक उसी का प्रभाव उनकी उदारता में बाधक बनता रहा था। उसके असहयोग ने महाशतक के अपरिग्रह व्रत में कई व्यवधान डाले। एक दिन सामा से बाहर होने पर वह क्रुद्ध हो उठा। कटु वचनों के उपरान्त प्रताड़ना तक की नौबत आ गयी। दैवी संयोगवश उसी समय भगवाग उधर भिक्षाटन हेतु आ निकले। कलह का दृश्य देख दुःखी हो वे बोले- “महाशतक। अपरिग्रह का व्रत मत तोड़ो। तुम्हारे पास स्नेह सौजन्य और मधुर वचनों का भण्डार भरा पड़ा है। उसे क्यों रोकते हो? बाँटते क्यों नहीं। सौजन्य के प्रसाद से पत्नी को क्यों वंचित करते हो?” भगवान के इन शब्दों ने महाशतक की पत्नी पर जादू-सा असर डाला। अपरिग्रह की और भी परिमार्जित विवेचना सुन दोनों तीर्थांकुर के चरणों में गिर पड़े। भगवान अन्य सोयों को जगाने आगे चल दिए।


आत्मसत्ता- आत्मिकी की सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला

मनुष्य की कायिक एवं मानसिक संरचना विलक्षण एवं असीम सम्भावनाओं से भरी-पूरी होते हुए भी उसे पूर्ण नहीं माना जा सकता। जीवन व्यापार में उसे हर समय दूसरों की मदद लेनी ही पड़ती है। पदार्थ जगत की सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा मनुष्य की काया और ब्राह्मी चेतना के परोक्ष वैभव का प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिनिधि मानवी मस्तिष्क इतने श्रेष्ठ स्तर का होते हुए भी मनुष्य तब तक परावलंबी है जब तक इस यन्त्र उपकरण को अनुशासित कर नियन्त्रण करने वाली परब्रह्म सत्ता से उसके तारतम्य का पता नहीं लगाया जाता। यह पराक्रम पुरुषार्थ भी उसी स्तर का दैव-दानव संग्राम है जिससे कभी चौदह रत्न निकले थे व विश्व वसुधा गौरवान्वित हुई थी। भौतिकी को आत्मिकी के अनुशासन में बद्धकर देखना ही ऋषिगणों की- महामानवों की विशेषता रही है। आज के भौतिकवादी युग में उन्हीं मूल्यों की पुनः खोज, नये परिप्रेक्ष्य में उनकी स्थापना व उन्हें जन सुलभ बनाकर मानव को उसकी गरिमा का बोध करा देना उतना ही अनिवार्य हो गया है।

जब आज मनुष्य को अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए परावलम्बी होना पड़ता है, विज्ञान के आविष्कारों की परिणति को सुख-साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है, तो आत्मिक प्रगति के लिये उच्चस्तरीय सहयोग की आवश्यकता पड़ना स्वाभाविक ही है। ब्राह्मी चेतना की अनुकूलता, अनुकम्पा सदैव मनुष्य के उत्थान हेतु उपलब्ध है। प्रश्न यही है कि कितना लाभ मनुष्य ने इस काया रूपी जन्म लेने के बाद आत्मोत्कर्ष की दिशा में बढ़ने के लिये उठाया। अनुग्रह ऊपर से बरसें या सिद्धियाँ अन्तः से उछलें, यह प्रश्न इतना अहम् नहीं जितना कि यह निर्धारण कि ऊँचा उठने के लिये कोई सहारा ढूंढ़ा गया अथवा नहीं। साधना से सिद्धि प्राप्ति की दिशा में विभूतियों का सहयोग तभी मिलता है और वे श्रेष्ठ भी होती हैं। जब मनुष्य अपने को मनुहार द्वारा नहीं, पात्रता सम्पादन द्वारा तद्रूप-तद्नुकूल बनाने का प्रयास करता है। यही है ब्रह्म को परब्रह्म से जोड़ने का तत्वदर्शन तथा समस्त सिद्धियों उच्चस्तरीय उपलब्धियों की प्राप्ति का राजमार्ग। इसी पर चलकर भौतिकी के विभिन्न मनीषियों ने- अध्यात्मविज्ञान के ऋषियों ने बहुमूल्य मणिमुक्तक खोज निकाले हैं, स्वयं को देवदूत स्तर तक पहुँचाया है। इसी कड़ी को पकड़ कर ही वह आधार बनाया जा सकता है जो व्यक्तित्व की मग्रता, पूर्णता की लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बन सकेगा। इस प्रक्रिया को ही, जो जीव स्वयं सम्पन्न करता है, ‘साधना’ नाम से जाना जाता है।

साधना-जीवन साधना- आदतों एवं मान्यताओं को साध लेना इतना व्यापक शब्द है जिसमें व्यक्तित्व की परिष्कृति का सारा स्वरूप छिपा पड़ा है। किसान अपने उच्छृंखल बैल को नकेल डालकर साधता है जबकि सर्कस का रिंगमास्टर शेर, हाथी, रीछ जैसे उग्र प्रकृति के जीवों को नरम व्यवहार द्वारा- कभी कड़ाई से साधकर पालतू बना लेता है। गुलाब के पौधों में ‘बडिंग’ (कलम) लगाकर भाँति-भाँति के रंगीन फूल पैदाकर माली अपनी कला-सौंदर्य की साधना का परिचय देता है। बंजर अनुपजाऊ भूमि को खेत का रूप देकर धरती को सोना उगलने वाली देवी बना देना किसान की अथक साधना का ही प्रतिफल है। इसी प्रकार अणु-विखण्डन द्वारा, भूगर्भ की पुरुषार्थ भरी खोजों तथा अन्तरिक्ष की गहरी छानबीन करते हुए आधुनिक मानव ने बहुमूल्य सुख-साधन प्राप्त किए हैं। यह भी एक साधना है जिसके सुनियोजित प्रतिफलों ने आज युग को भौतिकी की दृष्टि से चरमावस्था पर पहुँचा दिया है। प्रश्न यह उठता है कि अनगढ़ प्रकृति तथा जीव जगत को सुगढ़ बनाते समय वह चेतना सत्ता को सुव्यवस्थित बनाने का- उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास क्यों नहीं करता? प्रगति के इस राजमार्ग का सुनिश्चित पथ जानते हुए भी वह चौराहे पर भटक क्यों जाता है? यही है वह विडम्बना जिसके चलते व्यक्ति दिग्भ्रान्त, अशान्त, उद्विग्न नजर आता है। सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की दिशा में, अपने आपे को सुव्यवस्थित- सुगढ़ बनाने में यदि उसी स्तर का पुरुषार्थ किया जाता तो आज जैसी परिस्थितियाँ सम्भवतः दृष्टिगोचर नहीं होतीं। सर्वत्र स्वर्गोपम वातावरण एवं देवत्व भरी मनः स्थिति पायी जाती।

मानवी गरिमा के अनुरूप व्यक्तित्व कैसे ढले- इस विधा को ही आत्मिकी कहते हैं। इस विद्या का अनुशासन व्यक्ति को अपने अपने जन्म-जन्मांतरों के संचित कुसंस्कारों हठीले अभ्यासों को छोड़ने हेतु विवश करता है, निपटने हेतु समुचित मनोबल जुटाता है, कष्ट सहकर भी प्रगति की दिशा में अग्रगमन की प्रेरणा देता है।

उस प्रसंग में कदम जो उठाने पड़ते हैं, वे उच्च स्तरीय होते हैं। प्रसुप्त की जागृति इससे कम में सम्भव नहीं। बहुमूल्य पौध उगाने-फसलें प्राप्त करने के लिए भूमि को भी परिशोधित कर विशिष्ट रूप से तैयार किया जाता है। उच्च स्तर का आत्मबल यदि अभीष्ट है तो परिष्कृत व्यक्तित्व का उपार्जन करना होता है ताकि विभूतियों को सम्भाल कर रखा जा सके- उनका दुरुपयोग न होने पाए।

वाल्मीकि को भौतिकी के अनुरूप बनाने उसकी प्रामाणिकता का तर्क, प्रमाणों के आधार पर सिद्ध करने के लिए मानवी काया को ही प्रयोगशाला बनाकर साधक की व्यष्टि सत्ता को प्रखर-परिमार्जित करना होगा। साधना के अनेकानेक पक्षों की चर्चा इसी संदर्भ में होती रही है। योग और तप, साधना के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। ‘योग’ जहाँ शरणागति एकत्व की स्थिति है, वहाँ ‘तप’ शोधन की अग्नि-संस्कार वाली प्रक्रिया है। आत्म-सम्पादन हेतु वाँछित ऊर्जा इसी काया से ‘तप’ प्रक्रिया के माध्यम से ही उद्भूत होती है। ऊर्जा जहाँ भौतिकी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण- बलशाली शक्ति है, वहाँ अध्यात्म क्षेत्र में भी सामर्थ्य उपार्जन का यही एक मात्र आधार है। चेतना को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता के साथ जोड़ देना ‘योग’ और शरीरगत अस्त-व्यस्तता को सुसंस्कारिता के अनुशासन में जकड़ देना ‘तप’ है। दोनों ही परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। दोनों पैरों को उठाते बढ़ते रहने पर ही यात्रा क्रम चलता है। दो पहियों से ही गाड़ी लुढ़कती है। दोनों हाथों से ही ताली बजती है। योग और तप को- शरीर और मन को, चिन्तन और कर्म को उत्कृष्टता का अभ्यास कराने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है- यह समझना और समझाना आत्मिकी के पुनर्जागरण में शुभारम्भ की तरह आवश्यक माना जाना चाहिए और इसके लिए गम्भीरता से प्रयास चलना चाहिए।

गम्भीरता से चिन्तन की बात इसलिए कही जा रही है कि अक्सर इनको बड़े हल्के रूप में ले लिया जाता है। इससे लाभ मिलना तो दूर- अध्यात्म के समीप भी साधक पहुँचता नहीं देखा जाता। वस्तुतः यह गीत में वर्णित महाभारत है जो अंतर्जगत के धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जाता है। भाव कल्प- चिन्तन का परिष्कार- समग्र प्रत्यावर्तन ही इस प्रक्रिया की फलश्रुति है।

योग में ‘ध्यान’ अभ्यास की प्रमुखता है। मेडीटेशन एकाग्रता का महत्व बहुत बताया जाता रहा है। उसका तात्पर्य यही है कि निकृष्टता के- लोभ, मोह और अहंता के जाल-जंजाल में जकड़े हुए मन को इन विडम्बनाओं में भटकते रहने की आदत छुड़वाना तथा निर्धारित लक्ष्य इष्टदेव के साथ तादात्म्य होने का अभ्यास करना। इसमें मन को बिखराव की बाल बुद्धि छोड़ने और इष्टदेव से लेकर दिनचर्या के प्रत्येक क्रिया कृत्य में तादात्म्य होने का अभ्यास करना भी है। न ता पूजा उपचार में बिखराव रहे और न दैनिक क्रिया-कृत्य को बेगार भुगतने की तरह आधे-अधूरे मन से किया जा। इस ढोंग- मन बहलाने की प्रक्रिया से पीछा जितनी जल्दी छुड़ाया जा सके, इसके प्रयास चलने चाहिए। समय क्षेप तो इससे बचेगा ही- सोद्देश्य साधना के लाभ भी शीघ्र ही मिलने लगेंगे। क्रिया के साथ मनोयोग को घनिष्ठ कर देने की सफलता बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे अपनाने वाले भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में समान रूप से सफल होते हैं।

किसी देवता का ध्यान करते रहना और उसी की छवि में मन रमाए रहना मनोनिग्रह का एक स्वरूप तो है पर इतने भर से अभीष्ट सफलता नहीं समझी जानी चाहिए। ऐसी एकाग्रता तो नट, बाजीगर, मुनीम, कलाकार, वैज्ञानिक भी अपने स्वभाव का अंग बना लेते हैं। मैस्मरेजम के प्रयोगों में यही एकाग्रता चमत्कार दिखाती है। इतने पर भी लोग आत्मिक दृष्टि से किसी भी प्रकार ऊँचा उठे हुए नहीं कहे जा सकते। किसी कल्पना मात्र पर ध्यान जमाए रहना इस प्रयोजन के लिए एक उपचार भर है। लक्ष्य यह है कि सर्वतोमुखी उत्कृष्टता के प्रति सघन श्रद्धा उत्पन्न की जाय, उसके माहात्म्यों का भावभरा चिन्तन किया जाय और अपनी समूची चेतना को उसी में सराबोर होने दिया जाय। उद्देश्यपूर्ण स्वाध्याय और सत्संग भी ध्यानयोग के ही अंग माने गये हैं। उत्कृष्टता की गरिमा पर श्रद्धा केन्द्रित करने को ‘चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने की आकाँक्षा को उभारना, योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है।

योगाभ्यास की ध्यान योजना के अंतर्गत आत्मसमीक्षा, आत्मपरिष्कार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की सुविस्तृत रूपरेखा खड़ी करना, उसे सफल बनाने के लिए कटिबद्ध होना प्रमुख कार्य है। इसी के निमित्त स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता (मेडीटेशन) ध्यान योग के अंतर्गत ये प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं। अन्यथा मन को एक कल्पना भर देकर रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा जिसके आधार पर आत्मसत्ता को आत्मिकी की प्रयोगशाला के रूप में परिणति करने की व्यवस्था बनती थी।

योग का साथी तप मात्र शरीरगत क्रिया है। संजोई अनगढ़ आदतों को मोड़ना-मरोड़ना एवं अपने स्वभाव में सुसंस्कारिता को सम्मिलित करने का अभ्यास प्रबल पुरुषार्थ है। बिखराव रुकने पर तप द्वारा शक्ति अर्जन का आप्त वचन सही होता देखा जा सकता है। मात्र निरोध नहीं- संकल्पों से जुड़ा संयम ही तप कहलाता है। इंद्रियां, समय, अर्थ, विचार संयमों के रूप में इन तप साधनों की चर्चा समय-समय पर होती रही है। बाल बुद्धि के लोग मात्र ब्रह्मचर्य को ही तप मानते हैं जबकि तप एक समग्र साधना है जिसका ब्रह्मचर्य भी एक अंग है। इन्द्रिय लिप्सा जब पूरे जोश-खरोश पर है, ऐसी दशा में संयम समर्थक तर्क, तथ्य, प्रमाण और वैज्ञानिक प्रतिपादनों के आधार पर सत्यापन नितान्त आवश्यक है। अन्यथा आत्मिकी के प्रयोग परीक्षणों के लिए द्वारा बन्द ही पड़ा रहेगा। जब साधक की सत्ता आत्मिकी का अवधारण ही न कर सकेगी तो उससे लाभ उठाने की बात ही कैसी बनेगी? इन्द्रिय छिद्रों में से जीवन रस टपकता रहेगा और आत्मिक दृष्टि से छूंछ बना हुआ व्यक्ति उच्चस्तरीय पुरुषार्थ करने एवं तद्नुरूप सफलताएँ प्राप्त कर सकने में सफल कैसे होगा?

योग और तप सम्बन्धी इस विवेचन को आज की भ्रष्ट मान्यताओं और दुष्ट परम्पराओं के सामने किस प्रकार मल्लयुद्ध के लिए प्रस्तुत करने और विजयी बनाने का सरंजाम जुटाया जाय, यही वास्तविक युगानुकूल पुरुषार्थ है। इन प्रयासों की सफलता पर आत्मिकी का पुनर्जीवन और मानवी भविष्य के उज्ज्वल पक्ष का निर्धारण अवलम्बित है। यह प्रयत्न छोटा दीखते हुए भी परिणाम की दृष्टि से कितना महान और महत्वपूर्ण है, इसकी मात्र कल्पना से ही मन पुलकित हो उठता है।


Quotation

अज्ञान हृदय ग्रन्थेर्निःशेष विलयस्तदा। समाधिना विकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम्॥ - विवेक. 354

हृदय की अज्ञान रूपी ग्रन्थि का सर्वथा नाश तब होता है जब निर्विकल्पक समाधि द्वारा अद्वैत आत्म स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया जाता है।


कमल के समान निर्लिप्त स्थिति

भागीरथी का पावन किनारा। तट पर प्रकृति के सुरम्य वातावरण में महर्षि प्रवर वशिष्ठ का निवास था। आचार्य अपनी सहधर्मिणी अरुन्धती देवी के साथ गृहस्थ जीवन की मर्यादाओं को निबाहते हुए तपश्चर्यारत थे। सूर्यवंशी राजाओं के पुरोहित- ज्ञान के अधिष्ठाता के रूप में उनकी ख्याति चहुँ ओर व्याप्त थी।

एक बार वशिष्ठजी के आश्रम में अपने क्रोधी स्वभाव के लिये प्रख्यात दुर्वासा ऋषि पधारे। ऋषिका देवी अरुन्धती ने उनके स्वागतार्थ अनेकों प्रकार के व्यंजन बनाए। सभी को रुचि पूर्वक खाते हुए वे समूचे आश्रम का स्वयं भोजन अकेले ही उदरस्थ कर गए, मानो ऋषि दम्पत्ति की परीक्षा ले रहे हों। इतना अधिक भी कोई खा सकता है, यह अरुन्धती ने पहली बार देखा था।

वर्षा तेजी से होने लगी। गुरुकुल और आश्रम के बीच पड़ने वाली छोटी सी, पर वर्षा में भयंकर रूप ले लेने वाली सरिता का सहज ही ऋषिका को ध्यान आ गया जो आगे चलकर भागीरथी में एकाकार हो जाती थी। गुरुकुल की व्यवस्था हेतु उन्हें तुरन्त लौटाना भी जरूरी था। ब्रह्मचारी भूखे बैठे होंगे, इस चिन्ता से वे खिन्न हो रही थीं।

महर्षि ने असमंजस को समझा और कहा- “भद्रे! चिन्ता न करो। जब तुम यहाँ से चलो तो नदी के तट पर पहुँचकर उससे अनुरोध करना- “निराहारी दुर्वासा को भोजन कराने का पुण्य फल यदि मैंने कमाया हो तो उसके सहारे मुझे मार्ग मिले और मैं पार जाऊँ।”

अरुन्धती मन में असमंजस लिए चलीं लेकिन पति द्वारा निर्देशित वचन कहते ही देखते-देखते प्रवाह रुक गया पानी घटा और अरुन्धती पार निकल गईं। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इतना अधिक खा जाने वाले दुर्वासा निराहारी कैसे रहे? नदी ने किस कारण इस मिथ्या कथन को सत्य माना।

असमंजस चलता ही रहा। दूसरे दिन फिर दुर्वासा को भोजन कराने अरुन्धती वशिष्ठ की पर्णकुटी पहुँची और भोजन बना। दुर्वासा आज स्वरूप भोजन में ही सन्तुष्ट हो गए। संयोगवश लौटते समय आज फिर कल जैसी ही घटना घटी। मूसलाधार वर्षा होने लगी। पहाड़ी नदी देखते ही देखते विशाल रूप लेते हुए इतराते हुए चलने लगी। पानी इतना था कि पार करना कठिन था। अभी तीन-चार पहर और पानी रुक सकेगा, इसकी सम्भावना कम ही थी।

आज फिर महर्षि प्रवर ने ऋषिका को समीप बुलाकर नया अनुरोध नदी से करने का परामर्श दिया। उन्होंने कहा- “भद्रे! आज नदी से कहना- यदि मैं बाल ब्रह्मचारी वशिष्ठ की पत्नी रही हूँ तो मुझे रास्ता मिले।” आज्ञा पाक ऋषि पत्नी चल पड़ीं, पर मन में एक ऊहापोह बराबर बना रहा कि यह कैसा अनुरोध व सरिता इसे कैसे स्वीकार करेगी?

पति के परामर्श के अनुसार उन्होंने पूरी श्रद्धा से इस कथन को दुहराया। नदी कल की तरह ही फिर रुक गयी। किंचित मात्र पानी में चलते-चलते वे सरलता पूर्वक पार हो गयीं। उनके पार होते ही नदी फिर उसी वेग से बहने लगी।

लेकिन उनका आज का असमंजस और भी बड़ा व जटिल था। वशिष्ठ सौ पुत्रों के पिता बन चुके। फिर वे ब्रह्मचारी, कैसे रहे? क्या यह कथन एक ऋषिका के मुँह से मिथ्या नहीं निकला?

अरुन्धती के इस असमंजस का समाधान करते हुए वशिष्ठ ने उन्हें कहा- “भद्रे! मनुष्य का मूल्याँकन उसकी मनःस्थिति के अनुरूप होता है। मात्र शरीर क्रियाओं के आधार पर किसी का स्तर, चिन्तन एवं चरित्र का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रधानता भावना की है, क्रिया की नहीं। जो जल में रहकर भी उससे दूर है, जीवन व्यापार को निभाते हुए भी उसमें लिप्त नहीं है, उसका मूल्याँकन उसके अन्तरंग के अनुसार ही किया जा सकता है- बहिरंगीय क्रिया-कलापों के आधार पर नहीं।” ऋषिका का समाधान हुआ, एक नहीं दृष्टि मिली।


शक्तियों को बिखेरें नहीं एकत्रित करें

बिखराव से शक्ति का अपव्यय होने की बात सभी को विदित है। फैला देने से बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्य भी अस्त-व्यस्त होती देखी गई है। और यदि उसे एक स्थान पर समेट दिया जाय तो असाधारण क्षमता उत्पन्न होती है।

बारूद बखेर दी जाय और उसमें आग लगाई जाय तो वह भक् से जलकर समाप्त हो जायेगी। किंतु यदि उसे बन्दूक की नली में केन्द्रित करके एक निशाने पर लगाया जाय तो शीशे की भरी गोली को भी साथ ले उड़ती है और कठोर ठिकाने को भी बेधकर आर-पार छेद कर देती है। दो इंच परिधि की सूर्य किरणें यदि आतिशी शीशे पर केन्द्रित की जायं तो उतने भर से देखते देखते आग जलने लगती है। उस चिनगारी को यदि अवसर मिले तो दावानल बनकर सुविस्तृत क्षेत्र को भस्मसात् कर सकती है। भाप खेत तालाबों से अनायास ही उठती और इधर-उधर उड़ती रहती है। किन्तु यदि छोटे से वायलर में उसे केन्द्रित कर लिया जाय तो उससे भारी बोझा लादकर लम्बी रेलगाड़ी हजारों मील का सफर कर सकती है।

मनुष्य शरीर के संचालन में जो विद्युत शक्ति काम करती है उसे यदि एकत्रित किया जा सके और एक प्रयोजन के लिए लगाया जा सके तो वे चमत्कारी कार्य सम्पन्न हो सकते हैं जो तन्त्र या कुण्डलिनी शक्ति के नाम से जाने जाते हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क क्षेत्र है। देखने में तो वह शरीर का छोटा अवयव मात्र है, पर उतनी सी परिधि में कितनी विद्युत शक्ति काम करती है इसका लेखा-जोखा लिया, तो प्रतीत होगा कि एक बड़ी मील को चलने में जितनी बिजली खपती है उससे कम नहीं, कुछ अधिक ही इस कम्प्यूटर के अगणित, अत्यन्त पेचीदा अवयवों का सूत्र संचालन करने में खप जाता है। सामान्य तर्क इसका उपयोग निर्वाह की दैनिक समस्याओं का ताना-बाना बुनने, उलझनों को सुलझाने भर से होता रहता है। निरर्थक कल्पनाएँ और भी अधिक शक्ति खाती हैं। इस बिखराव को समेटकर यदि किसी लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया जा सके तो उसके भी चमत्कारी परिणाम सामने आ सकते हैं।

योग में ‘चित्त की वृत्तियों का निरोध’ वह कृत्य है जिसमें जो जितने स्तर की सफलता प्राप्त कर लेता है वह उसी स्तर का योगी माना जाने लगता है। योग की आध्यात्मिक परिभाषा आत्मा को परमात्मा के साथ सटा देना, उसके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेना होता है किन्तु भौतिक जीवन में भी उसका कम उपयोग नहीं है। चिन्तन का बिखराव रोककर यदि उसे किसी एक प्रयोजन में लगाया जा सके तो उसकी सफलता असंदिग्ध हो जाती है। वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार बुद्धिजीवी इसी विशेषता को अर्जित करके अपने कार्यों में प्रगति करते और सफल होते हैं। अर्जुन के मत्स्य बेध की कथा प्रसिद्ध है। यह सफलता उसने एकाग्रता की सिद्धि प्राप्त करके ही पाई थी।

मन की शक्ति असीम है। उसका उपयोग जीवन में सम्बन्धित कृत्यों और चिन्तनों में होता है। फलतः बिखराव की स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है। अनेकानेक पक्षों की मस्तिष्कीय क्षमता का थोड़ा-थोड़ा अंश मिलता है और उन सभी का ढर्रा किसी न किसी प्रकार लुढ़कता रहता है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सृष्टा ने मनःशक्ति की संरचना इस प्रकार की है जिससे वह जीवन के हर क्षेत्र का परिपोषण करती रहे और कहीं भी अभावग्रस्त की स्थिति उत्पन्न न होने पाये। इसी व्यवस्था को चंचलता कहते हैं। मन की वानर वृत्ति प्रसिद्ध है वह हर घड़ी उचकता मचकता रहता है। इस डाली से उस डाली पर फुदकते रहने की उसकी चंचल प्रवृत्ति का परिचय प्रायः सभी को है।

इस स्वाभाविकता पर सन्तोष तभी किया जा सकता है जब जीवन की गतिशीलता मात्र निर्वाह व्यवस्था तक ही सीमित रही होती। पक्षी इसी प्रकार के विनोद कौतुक में निरत रहते हैं। उनकी फुदकन देखते ही बनती है। इस प्रवृत्ति का सूत्र संचालन निश्चय ही उनकी मानसिक चंचलता करती होगी। यदि उसमें कमी रही होती तो मगरमच्छ, और बाराह भैंसे की तरह वे भी आलसी जीवन जी रहे होते और पेट भरने के उपरान्त चादर तान कर सोया करते।

मानवी प्रगति में उसकी कल्पना शक्ति का बड़ा योगदान है। बुद्धिमता तो बाद की चीज है। मस्तिष्क अनगढ़ कल्पना चित्र बनाता रहता है। बुद्धि उनमें से उचित अनुचित, शक्य अशक्य का विश्लेषण करती है और जो उपयोगी प्रतीत होते हैं उन्हें विचारपूर्वक किसी निष्कर्ष पर पहुँचने तक के लिए मान्यता देकर शेष को उपहासपूर्वक उपेक्षित एवं बहिष्कृत करती रहती है।

मनःक्षेत्र का यह सामान्य उपक्रम तब असमंजस उत्पन्न करता है जब किन्हीं महत्वपूर्ण प्रसंगों के लिए अधिक गम्भीरता से विचार करके उसे सुनिश्चित योजना का रूप देना अभीष्ट होता है। इसके लिए अधिक मानसिक अनुदान चाहिए। यह कैसे मिले? उसका उत्तर एक ही मनः उस प्रयोजन में अधिक गहराई तक उतरे, अधिक ध्यान दे, अधिक समय तक रुके। यह आवश्यकता की पूर्ति में एक ही बाधा रहती है, मन की बनावट या आदत। वह अपने स्थान पर उचित और आवश्यक भी है। पर तर्क क्या किया जाय जब कोई महत्वपूर्ण प्रसंग सामने हो, और उसके लिए अधिक मनोयोग उपलब्ध किये बिना काम न चलता हो।

साधारणतः नदी प्रवाह बहता रहता है और वर्षा हो या हिमि देश से प्राप्त हुई जल सम्पदा बहते-बहते समुद्र तक पहुँचती रहती है। इस सामान्य में गतिरोध उत्पन्न करने की आवश्यकता तब पड़ती है जब बाँध बनाकर संचित जलराशि को नहरों में मोड़ना और आवश्यकता वाले खेतों को सींचना अभीष्ट होता है। यह बाँध बनाये बिना सम्भव नहीं। सिंचाई से लेकर बिजली घर बनाने जैसी योजनाएँ इस अवरोध को आवश्यक बताती हैं जिनके आधार पर नदी प्रवाह को रोककर बाँध से जलराशि का संचय किया जाता है। ठीक यही बात महत्वपूर्ण प्रसंगों के लिए लागू होती है। एकाग्रता के आधार मनःशक्ति को उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिये नियोजित करना पड़ता है। अन्यथा अभ्यस्त चंचलता के रहते कोई बात बनेगी ही नहीं। विनोद कौतुक चलता रहेगा। इच्छा उठना एक बात है और उसके प्रगति पथ को प्रशस्त करने वाली अवरोधों से निपटने वाली- साधन जुटाने वाली योजना बनाने के लिए कार्यान्वित करने वाली पद्धति निश्चित कर सकना दूसरी। यह दूसरी बात ही वह उपलब्धि है जिसके आधार पर विशिष्ट व्यक्ति- विशिष्ट योजनाएँ बनाते और उन्हें पूरा कर सकने की स्थिति तक पहुँचते देखे गये हैं।

एकाग्रता का अवलम्बन उस दशा में नितान्त आवश्यक हो जाता है जब सामान्य क्रिया-कलापों को बिना रोके भी ऐसा कुछ करना होता है जिनके आधार पर विशेष योजना या आवश्यकता की पूर्ति के लिए अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा उपलब्ध हो सके। इसके लिए प्रवाह का नियम आवश्यक है। यह अनायास ही नहीं हो जाता क्योंकि मन के स्वाभाविक क्रम में चंचलता प्रधान रहने के कारण उसे देर तक कहीं ठहरने के लिए सहमत नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उसे विशेष रूप से सधाना पड़ता है। जानवरों की अनगढ़ प्रकृति को अनुकूल बनाने के लिए किसान, बैलगाड़ी वाले, घुड़सवार, मदारी आदि को ऐसी ही सिरफोड़ी करनी पड़ती है अन्यथा उन्हें सहज सहमत कर सकना किसी प्रकार बन ही नहीं पड़ेगा।


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वायुनानीयते मेघः पुनस्तेनैव नीयते। मनसा कल्प्यते बन्धो मोक्षस्तेनैव कल्प्यते॥ -विवेक चूड़ामणि - 174

‘जिस प्रकार’ बादल वायु के द्वारा आता है और उसी के द्वारा अन्यत्र चला जाता है, उसी प्रकार ‘मन’ से ही बन्धन की कल्पना होती है और उसी से मोक्ष की।


“बस तेरी रजा रहे, तू ही तू रहे”

आत्मोत्कर्ष की साधना में बाह्य शत्रुओं- अवरोधों से जितना लड़ना- जूझना पड़ता है, उनसे कहीं अधिक अपनी वृत्तियों से युद्ध करना पड़ता है। जन्म जन्मांतरों के संस्कारों तथा इस जन्म के विकृत अभ्यासों से आसानी से छुटकारा नहीं मिल पाता। वे इतने दृढ़ एवं हठीले होते हैं कि न तो उन्हें बाँधा जा सकता है, न ही जड़ से उखाड़ फेंकना सम्भव है। कर्मयोग, ज्ञानयोग की साधनाएँ शरीर, मन एवं बुद्धि की परतों को ही प्रभावित कर पाती हैं। अन्तःकरण की गहरी परतों में जमे सूक्ष्म संस्कारों का परिशोधन, भावों के उदात्तीकरण के बिना सम्भव नहीं होता। यह प्रयोजन भक्तियोग के माध्यम से ही पूरा हो पाता है।

कर्मयोग से पुरुषार्थ को सही दिशा में नियोजन का अवसर मिलता है। ज्ञानयोग से तत्व दृष्टि विकसित होती है, उचित अनुचित के बीच, औचित्य-अनौचित्य के बीच अन्तर परखने की क्षमता अर्जित होती है। पर बुद्धि की पहुँच सीमित है। अधिक से अधिक उससे भौतिक जगत की गुत्थियों को सुलझाने, घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है। परमात्मा- वह परम तत्व, बुद्धि की पकड़ सीमा से परे है।

काण्ट जैसे प्रखर पाश्चात्य दार्शनिक को भी सत्य की खोज हेतु अन्ततः श्रद्धा विश्वास का सहारा लेना पड़ा, बुद्धि से आगे बढ़कर भावनाओं का सम्बल लेना पड़ा। उनकी पुस्तक ‘क्रिकेट ऑफ दी प्योर रीजन’ मानवी बुद्धि परिसीमा का यथार्थ उदाहरण प्रस्तुत करती है। सर्पल्ली राधाकृष्णन जैसे विद्वान ने सच ही लिखा है कि मनुष्य बुद्धि एक ऐसे विषय के संदर्भ में विश्वसनीय घोषणा करने में नितान्त असमर्थ है जो उसकी सीमा के परे है। किन्तु मानवीय हृदय उस परम तत्व को समझने में पूर्णतः समर्थ है।

हृदय भाव सम्वेदनाओं का वह मर्मस्थल है जो भक्तियोग की साधना से तरंगित होता तथा अपनी भाव तरंगों को निस्सृत करता रहता है। भक्ति उस परम तत्व की अनुभूति का एक महत्वपूर्ण साधन है। सामान्य व्यक्ति के लिए ज्ञानयोग, कर्मयोग के मार्ग का परिपालन प्रायः कठिन पड़ता है। क्योंकि प्रचण्ड वैराग्य तथा प्रखर विवेक के अभाव में कर्माकर्म का सही निर्णय करते नहीं बनता। ध्यान धारणा की उच्चस्तरीय साधनाओं के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है, वह जुट नहीं पाती। भक्तियोग इन दुर्बलताओं से मुक्त है। वह अभ्यासगत संस्कारों की परिधि को चीरते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से अध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। सहज मानवी वृत्तियों को समाप्त करना सम्भव नहीं है, उनका उदात्तीकरण करके सद्वृत्तियों में परिवर्तन सम्भव है। भक्ति के माध्यम से यह प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है।

शक्ति शब्द ‘भज्’ धातु से बना है। जिसका अर्थ है सेवा करना। सेवा किसकी? परमात्मा की। परमात्मा व्यक्ति नहीं शक्ति है। फिर शक्ति की सेवा किस प्रकार हो? सेवा तो मात्र साकार की- जीवन्त व्यक्तियों की हो सकती है। इसी असमंजस की स्थिति में भक्ति का दार्शनिक स्वरूप समझना अनिवार्य हो जाता है अन्यथा भटकाव की गुँजाइश तथा अन्धविश्वासों के जाल जंजाल में फँसने की सम्भावना प्रबल रहती है। विराट् सृष्टि उस परमात्मा का साकार स्वरूप है- जड़ चेतन उसकी अभिव्यक्ति है। सबमें वह समाया हुआ है। किसी भी देवता को साकार इष्ट मानकर उस विराट् से तादात्म्य जोड़ने- संपर्क स्थापित करने का ही प्रयास किया जाता है।

भक्ति से अपनापन का- पारिवारिकता का दायरा विस्तृत होता है। अपनेपन को इष्ट में घनीभूत तो किया जाता है पर उसकी परिणति विराट् के प्रति निःस्वार्थ प्रेम के रूप में होती है। भक्ति सार्थक हुई अथवा नहीं, इसकी पहचान करनी हो तो सर्वप्रथम अपना अन्तरंग टटोलना चाहिए कि वह संकीर्णता की परिधि को तोड़कर किस सीमा तक बाहर निकला तथा मानव मात्र के प्रति कितना जुड़ा। प्रतिमा के समक्ष आँसू बहाना मात्र भक्ति नहीं। भावातिरेक की स्थिति में किसी के लिए भी यह संभव है। एक सीमा तक भावों के उद्दीपन में यह सहायक हो सकता है।

सच्चे भक्त के मन में ‘सियाराम मय सब जग जानी’ की भावनाएँ हिलोरें लेती हैं। वह सबमें ईश्वर का- सर्वत्र उसकी छवि का दर्शन करता है।

विराट् की इस अनुभूति का आरम्भ इष्ट निर्धारण उसके प्रति समर्पण के रूप में करना पड़ता है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि सजातियों के प्रति आकर्षण अधिक होता है। ईश्वरी निराकार है पर आरम्भ में उसकी साकार कल्पना इष्ट के रूप में- देवी-देवताओं के रूप में इसीलिए करनी पड़ती है कि उससे तादात्म्य जोड़ना मानवी मन के लिए सुगम पड़ता है। निराकार सत्ता कल्पनातीत है। उसकी अनुभूति और भी कठिन है। साकार से सम्बन्ध जोड़ना, उसके सम्बन्ध में उच्चस्तरीय कल्पना करना, तद्नुरूप प्रेरणा ग्रहण करना अधिक सरल है। साथ ही उपासना में सत्, चित्त के साथ आनन्द की अनुभूति की भी कामना रहती है। इष्ट को सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुण सम्पन्न, अलौकिक सुन्दरतम् अभिव्यक्त किया जाता है। उसमें मन को दिव्य आनन्द के सागर में डुबकी मारने का अवसर मिलता है। मन की प्रकृति चंचल है। सरस आधार न मिलने पर वह भटकता है। वह सम्बल मिलते ही भटकाव की गुँजाइश नहीं रहती। इष्ट के नाम, रूप, गुणों का चिन्तन साधक को वैसा ही बनने की प्रेरणा देता है।

भक्ति की आधारशिला श्रद्धा और विश्वास है। बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार श्रद्धा मन की प्रजा है। भक्त के ये ही सम्बल है, जिन्हें पकड़कर वह साधना मार्ग पर आगे बढ़ता है। श्रद्धा विश्वास शक्ति के स्रोत हैं। सन्त तुलसीदास इन्हीं की अभ्यर्थना शक्ति और शिव के रूप में करते हैं। “भवानी शंकरी वन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणों” के रूप में उपरोक्त तथ्य का ही रहस्योद्घाटन किया गया है। श्रद्धा से अभिप्राय है- श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति असीम प्यार। जिनने ईश्वर को लक्ष्य माना है उन्हें सद्मार्ग पर, आदर्शों पर चलने के लिए सत्साहस जुटाना चाहिए। सच्चे भक्त के यही लक्षण हैं। जिनमें प्रतिभा की पूजा अर्चा तक अपनी भक्ति कि इतिश्री मान ली है, समझना चाहिए कि वे कर्मकाण्डों की मात्र लकीर पीट रहे हैं, उनका विकास अवरुद्ध हो गया। भक्ति जब जीवन में अवतरित होती है तो उस सूफी सन्त की भाँति उद्गार फूटते हैं कि “न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे, तेरी रजा रहे, तू ही तू रहे।” तब भक्त ‘गेटे’ की भाँति कह उठता है “हे संसार के रक्षक तू मुझे सदा सन्मार्ग पर चलाना, अन्धकार में जब कभी भी भटक जाऊँ, प्रकाश की एक किरण चमका देना, मुझे गिरने से बचा लेना।”

भक्त का विश्वास एक शक्तिशाली ‘ऑटो सजेशन’ का कार्य करता है तथा प्रत्येक विपत्ति में उसकी सहायता करता है। प्रचण्ड आत्म-विश्वास तथा आत्म-शक्ति का उद्भव होता है। सर्व समर्थ शक्ति परम दयालु तथा आपत्तिकालीन परिस्थितियों में सहायक है, यह विश्वास साधक को आशावादी बनाता, उसे अधिक पुरुषार्थी बनने तथा सदा सन्मार्ग पर चलने की ही प्रेरणा देता है। सम्बल महान का पकड़ा गया है। इसलिए प्रेरणाएँ भी उसी के अनुरूप मिलेंगी। वैसा ही चिन्तन चलेगा। मन में सत्कार्यों के प्रति उमंग उमड़ेंगी। अन्याय भौतिक अवलम्बनों की तुलना में ईश्वर का सम्बल अधिक समर्थ, सहायक तथा फलदायी है।

श्रद्धा विश्वास अटूट हो तो वह निराकार सत्ता साकार रूपों में भी प्रकट हो सकती है। ऐसी स्थिति में ही काली का साकार रूप लेकर वह सत्ता रामकृष्ण परमहंस के साथ भोग लगाती देखी जा सकती है। इस स्तर की श्रद्धा होने पर तो वह विवाद भी समाप्त हो जाता है जो साकार निराकार की मान्यता को लेकर खड़े होते हैं। भक्ति का चरम परिणति भक्त के भगवान में विलय-विसर्जन के रूप में होती है। इस चरम उपलब्धि के लिए भक्ति का अवलम्बन लेना जितना आवश्यक है उतना ही उसका सही स्वरूप समझना- उसे आत्मसात करना।


“पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते”

तत्वदर्शी सृष्टि की प्रत्येक संरचना को परिपूर्ण मानते हैं तथा यह विश्वास करते हैं कि अनगढ़ होते हुए भी वे घटक महत्वपूर्ण तथा विशिष्ट प्रयोजन के लिए बनाये गये हैं। उनका यह प्रयास रहता है कि इस सृष्टि तथा उससे जुड़े जड़-चेतन उपादानों को सुगढ़ और अधिक सुन्दर बनाने का प्रयत्न करें। अनुदान एवं वरदान के रूप में जो प्रकृति प्रदत्त परिस्थितियाँ मिली हैं, उन पर सन्तोष व्यक्त करते और उनका नियोजन- सदुपयोग प्राणी मात्र के विकास के लिए करते हैं। यही तत्वदृष्टि है, जिसके सहारे वे स्वयं आगे बढ़ते- ऊँचे उठते तथा सभी के कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। अपनी सन्तुलित दृष्टि में वे जिस पूर्णता का सर्वत्र दर्शन करते हैं उसे अधिकाधिक उजागर करने का प्रयास अपने अन्दर एवं चारों ओर की जुड़ी परिस्थितियों में करते रहते हैं। इस सत्प्रयत्न में उनका जीवन धन्य बनता और अनेकों को धन्य बनाता है।

दोष पूर्ण दृष्टि सर्वत्र अपूर्णता का रोना ही रोती रहती है। उसे चारों ओर दोष, दुर्गुणों का- अभावग्रस्त विपन्न परिस्थितियों का ही दर्शन होता है। फलतः ऐसी दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति अपनी निषेधात्मक मनोवृत्ति के कारण सदा खीजते रहते, दुःख रहते तथा अपनी प्रकृति प्रदत्त प्रसन्नता को गँवा बैठते हैं। स्वयं के विकास के लिए वे जो प्रयत्न पुरुषार्थ कर सकते थे, उसका भी पल्ला छोड़ बैठते हैं। फलतः वह अपूर्णता जो उनकी कल्पना क्षेत्र में ही रहती है, वह साकार हो उठती है तथा तत्वतः वह न होते हुए भी सर्वत्र दिखायी पड़ने लगती है।

तथ्यों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने पर तो सचमुच ही हर वस्तु अपूर्ण जान पड़ती है। अपूर्ण इस अर्थ में कि उनके सम्बन्ध में जो मापदण्ड के प्रचलित पैमाने हैं, वे अधूरे हैं। मापने के पैमाने एक सापेक्ष जानकारी ही दे पाते हैं। लम्बे समय तक मान्यता थी कि अनेकों ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं और दीर्घवृत्त बनाते हैं।

वृत्त का अर्थ है- एक गोल संरचना। पर ग्रहों की वह परिक्रमा वृत्त गोल नहीं होती। सूर्य तथा अन्य सभी ग्रह अपने ध्रुव केन्द्र पर चपटे होते हैं फलतः बनने वाला वृत्त पूर्णतः गोल नहीं होता। पृथ्वी भी गोल नहीं है, उसका स्वरूप चपटा गोलाभ है। आइन्स्टीन ने भी अपनी ‘जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटाविटी’ में यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि यदि किसी रेखा को अनन्त तक बढ़ाया जाय तो वह सीधी न रह सकेगी एक झुके हुए स्वरूप में दृष्टिगोचर होगी। पूरी सतर्कता एवं सजगता से खींची जाने वाली शुद्ध सरल रेखा भी सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखने पर टेड़ी-मेढ़ी दिखायी पड़ती है। गणितज्ञों ने पूर्ण संख्या की अपनी मान्यता प्रतिपादित की है, पर वह भी एक भ्रम मात्र है।

कम्पोजर, संगीतज्ञ भी अष्टक के बीच स्वरान्तराल को पूर्ण बताते हैं पर वास्तव में वह पूर्ण नहीं है। इससे निखरित प्रथम ध्वनि से उसकी अपूर्णता ज्ञात होती है। जीव विज्ञानियों के अनुसार जीवन का क्रमिक विकास भी त्रुटिपूर्ण है। उसमें आर0एन0ए0, डी0एन0ए0 को ही इकाई मानने की प्रणाली पूर्णतः सही नहीं है। चरम वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद वैज्ञानिकों ने यह स्वीकारना आरम्भ कर दिया है कि प्रकृति में कोई भी गोल अथवा पूर्ण सीधी रेखा नहीं है तो बाह्य जगत में रेखा गणितीय पूर्णता को पाना भी प्रायः असम्भव है। यदि पाया भी जा सकता है तो मात्र मानव मस्तिष्क में।

“वैज्ञानिक जैकोव ब्रोनोस्की ने इस अपूर्णता को मानव जाति के लिए सौभाग्य सूचक माना है तथा कहा है कि इस अपूर्णता के कारण ही प्रकृति की खोज निरन्तर चलती रह सकेगी। फलतः विज्ञान का कभी अन्त नहीं होगा।” ब्रह्माण्ड विज्ञानियों को यह अनिश्चित जगत हमेशा एक प्रश्न का उत्तर पाने हेतु प्रेरित करता है कि इस ब्रह्माण्ड का क्यों व किस प्रकार उद्भव तथा विकास हुआ? सदियों एवं युगों बाद भी सटीक उत्तर का न मिलना मानवी बुद्धि की अपूर्णता का परिचायक है।

ऐसे कितने ही प्रश्न हैं जिनका सही उत्तर दे सकना प्रायः कठिन है। संसार में सबसे अधिक सुन्दर कौन है, अथवा कौन अब तक पैदा हो चुका है, यह बता सकना अत्यन्त कठिन है। कारण कि सुन्दरता के मापदण्ड हर देश, समाज एवं सभ्यता के अलग-अलग हैं। सबसे कुरूप व्यक्ति की तलाश कर सकना भी उतना ही दुस्कर काम है। ऐसे बुद्धिमान की खोज करनी हो जो अपने में परिपूर्ण हो तो आइन्स्टीन का उदाहरण देना भी समीचीन न होना क्योंकि सृष्टि के विराट् स्वरूप तथा रहस्यों को देखकर वे भी अपनी बुद्धि की तुच्छता- नगण्यता महसूस करते थे। जिन कार्यों के लिए किसी वैज्ञानिक, कलाकार, खिलाड़ी, मनीषी, समाज सेवी को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता है तथा विभिन्न प्रकार की उपाधियाँ एवं पारितोषिक दिये जाते हैं, वे मान्यताएँ भी सामयिक ही होती हैं, चिरस्थायी नहीं रह पातीं।

न्यूटन, डारविन, मेण्डलीफ के भौतिक एवं जैविकी सिद्धान्त कभी अपने में परिपूर्ण समझे जाते थे, पर नयी खोजों ने उनके सिद्धान्तों को उलट-पलट दिया। संगीत, गायन, वादन, बलिष्ठता, समर्थता शारीरिक एवं मानसिक दक्षता के क्षेत्र में कितनी ही प्रतिस्पर्धाएँ समय-समय पर आयोजित होती रहती हैं। उनमें कितने ही नये रिकार्ड स्थापित होते तथा पुराने टूटते हैं। यह क्रम सतत् चलता रहता है तथा आगे भी चलता रहेगा। उनमें सर्वश्रेष्ठता एवं पूर्णता का वर्चस्व किसी का भी सदा कायम रह सकना असम्भव है।

बुद्धिवाद एवं प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर कसने पर तो सृष्टि का हर घटक- हर संरचना अपने में अपूर्ण अधूरी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ईश्वर पूर्ण है, सर्वज्ञ परन्तु जिन्होंने उसका साक्षात्कार नहीं किया, उनके लिए तो यह संसार ही ईश्वर का साक्षात् स्वरूप हो सकता है, जिसका भौतिक विश्लेषण करने पर अपूर्णता का ही दर्शन होता है। उस आधार पर तथाकथित बुद्धिजीवी उस सृष्टा को भी अपूर्ण घोषित कर सकते हैं।

ऐसे तर्कों की कसौटी पर विश्लेषण करने पर तो हर उपयोगी वस्तु अथवा घटक का एक काला पक्ष नजर आता है। दिन के साथ रात का अविच्छिन्न पक्ष जुड़ा है। फूल के साथ काँटे गुँथे होते हैं। सूर्य की किरणें जीवनदायी- प्राणतत्व से परिपूर्ण होती हैं पर गर्मी की दुपहरी में उसका ताप असह्य एवं कष्टकारक मालूम पड़ता है। उस आधार पर तो सूर्य भी अपूर्ण जान पड़ता है। चन्द्रमा की शीतलता एवं धवल प्रकाश हर किसी के मन को पुलकित करने में सक्षम है, पर कलुषित दृष्टि को तो उसका काला दाग ही दिखायी देता है। सामान्य व्यवहार में भी भले व्यक्तियों में बुराइयाँ ढूंढ़ते रहने की प्रवृत्ति निषेधात्मक मनोवृत्ति का परिचायक है।

सर्वत्र अपूर्णता ढूँढ़ते रहने की दोष दृष्टि का परिमार्जन आवश्यक है। अधिक अच्छा है सृष्टि के प्रत्येक घटक को परिपूर्ण माना जाय। बन पड़े तो उसे सुन्दरता एवं सुगढ़ता प्रदान करने का प्रयत्न किया जाय। मूल रूप से मनुष्य भी पूर्ण है। ‘स्व’ का रूप तमसाच्छन्न हो जाने के कारण अपूर्णता दिखायी पड़ती है। उस तमस् को हटाने तथा ‘स्व’ को प्रकाशित करने के लिए साधनात्मक प्रचण्ड पुरुषार्थ किया जाना चाहिए।


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बुद्धिर्बुद्धीन्द्रियैः सार्धं सवृत्तिः कर्तृलक्षणः। विज्ञानमय कोशः स्यात्पुंसः संसार कारणम्॥ -विवेक. - 186

पुरुष के जन्म-मरण रूप संसार का कारण यह “विज्ञानमय-कोश’ ज्ञानेन्द्रियों के साथ अपने क्रिया व्यापार के सहित बुद्धि के जुड़ जाने से विनिर्मित होता है।


नीति शास्त्रियों की दृष्टि में विकसित व्यक्तित्व

व्यक्तित्व की संरचना एवं विकास एक लम्बे समय से शोध का विषय रहा है। मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शन एवं विज्ञान- हर क्षेत्र के विद्वानों ने समय समय पर अपने मन्तव्य प्रकट किए हैं तथा सामाजिक परिवेश में इसके विकास की सम्भावनाओं का अध्ययन किया है। विकसित व्यक्तित्व कैसे स्वयं को ऊँचा उठाकर लोक-सम्मान का पात्र बनता है तथा परिस्थितियों की अनुकूलता- प्रतिकूलता कैसे उसे प्रभावित करती है, इस पर जितना अधिक अध्ययन नीतिशास्त्र की विधा के अंतर्गत किया गया है, उतना अन्य किसी भी विषय के मूर्धन्यों द्वारा नहीं हुआ।

विश्व विख्यात नीतिशास्त्री मनीषियों ने विकसित व्यक्तित्व को ही महामानव की संज्ञा दी है। इसके लिए वे परिस्थितियों को महत्व नहीं देते वरन् उत्कृष्ट मनःस्थिति का होना आवश्यक मानते हैं। उनके मूल्याँकन की कसौटी से किसे खोटा कहाँ जाय, इस पर तो प्रकाश नहीं डाला गया, लेकिन खरा होने के कारण बताते हुए इसी लक्ष्य का उन्होंने समर्थन किया है कि जिसका दृष्टिकोण जितना परिष्कृत होगा, जिसमें आदर्शों के प्रति जितनी दृढ़ निष्ठा होगी- वह उसी अनुपात में श्रेष्ठजनों की बिरादरी में सम्मिलित होता और सम्मान पाता चला जाएगा।

ऐसी श्रेष्ठतावादी मान्यताओं को प्राधन्य देने वाले कतिपय विद्वानों में ‘अब्राहम मेस्लोव’ का प्रमुख स्थान है। उन्होंने अपने जीवन काल में महानता अर्जित करने वाले, लोक सम्मान पाने वाले महापुरुषों के व्यक्तित्व का बड़ी गहराई से अध्ययन किया। मानव मात्र को समर्पित लिंकन एवं गाँधी जैसे व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए वे उन्हें क्षमता सम्पन्न, प्रतिभा से भरा पूरा, भावना सम्पन्न “एनरीच्ड व्यक्तित्व” मानते हैं। ऐसे महामानवों की विशेषताओं का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि “ऐसे व्यक्ति कभी-कभी ही जन्म लेते हैं तथा अपनी शारीरिक इच्छाओं- आकाँक्षाओं को उच्चस्तरीय जरूरतों के आगे न्यौछावर कर देते हैं। छोटी-छोटी जरूरतों का पूरा न होना उनके पक्के व्यक्तित्व को हिला नहीं पाता। सामान्य प्रलोभन उन्हें डिगा नहीं पाते।” आगे वे कहते हैं- “किसी भी सामान्य अथवा असामान्य व्यक्ति का बहिरंग में प्रकट होने वाला व्यवहार सिर्फ ‘मोटिवेशन’ जैसी मनोवैज्ञानिक वृत्ति के आधार पर ही नहीं समझाया जा सकता। लड़ाई के मैदान में कोई भी व्यक्ति क्यों हँसते-हँसते प्राणों को त्याग देता है? कौन से कारण ऐसे हैं जो समाज सेवियों,- देश प्रेमियों को कष्ट उठाने के लिये प्रेरित कर देते हैं? इनका उत्तर देते हुये वे कहते हैं कि- “ये व्यक्तित्व ऊँचे उठे हुये व्यक्तित्व होते हैं जो ‘स्व’ की गरिमा को पहचान कर अपने अन्तः का विस्तार कर सकने में सफल होते हैं।”

“ऐसे व्यक्ति देखने में तो सामान्य ही होते हैं पर इनका चिन्तन स्तर ऊँचा होता है। स्वयं कष्ट सहते हुये सिद्धान्तों के प्रति अटूट निष्ठा इन्हें कुछ उच्चस्तरीय आनन्द की अनुभूति होती है” -ऐसा मेस्लोव का मत है। मात्र पेट और प्रजनन के लिये जीने वाले एवं सिद्धान्तों के प्रति समर्पित व्यक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए उन्होंने लिंकन जैसे चालीस व्यक्तित्वों की तलाश की जिनमें से कुछ ऐतिहासिक व कुछ जीवित थे।

उन्होंने पाया कि इन सबमें विधेयात्मक चिन्तन की प्रमुखता थी। इनका व्यक्तित्व आशावादिता से सम्पन्न था जो उन्हें विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनःस्थिति को विचलित नहीं होने देता था। कुछ जीवित व्यक्तियों को मेसलाव ने कोर्सेकॉफ टेस्ट से भी गुजारा। सारी स्थिति का पर्यवेक्षण कर उन्होंने, महामानव- जिन्हें उन्होंने ‘‘सेल्फ एक्चुअलाजिंग” व्यक्ति सम्बोधन दिया है के ये लक्षण बताये हैं।

(1) वस्तुस्थिति को स्पष्ट समझकर उसके साथ अधिक आरामदेह सम्बन्ध स्थापित कर पाना उनकी विशेषता होती है। ऐसे व्यक्ति कभी पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते। वे परिस्थिति को यथास्थिति देख समझकर बिना उससे विचलित हुए अपने कार्य का स्वरूप निर्धारित करते हैं। कोई भी शंका या अड़चन किसी काम में आने पर वे उसे एक सुखद चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, उससे डरते नहीं।

(2) स्वयं या अन्य किसी व्यक्ति को उसकी स्वभाव की विचित्रताओं के बावजूद स्वीकार करना, यह विशेषता महान व्यक्तित्वों में ही पाई जाती है। अतिवादियों जैसी “पूर्ण पुरुष” की तलाश या अपेक्षा उन्हें नहीं रहती। वे न तो अतिवादी होते हैं, न निरपेक्षतावादी और न पूर्णतावादी। मानव को कमजोरियों का पुतला मानकर उस पर दुःखी न होकर वे उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं। स्वयं की जिन्दगी में निरन्तर आते रहने वाले कठिन संघर्ष उन्हें व्यथित नहीं करते।

(3)वे अपनी बाह्य एवं आन्तरिक जिन्दगी में सरल एवं बनावट से रहित होते हैं। अन्दर एवं बाहर से एक, अभिव्यक्ति में सन्तुलन स्पष्ट होने के कारण उन्हें स्वयं तो तनाव होता नहीं, साथ ही औरों के लिए भी दोष के पात्र नहीं बनते। इसे उन्होंने ‘स्पान्टेनिटी’ का गुण कहा है।

(4) ये व्यक्ति कोलाहल से दूर फिर भी समाज के प्रत्यक्ष संपर्क में रहते हैं। समाज की समस्याओं व उनको सुलझाने के लिए विकल्प इनके चिन्तन में सतत् चलते रहते हैं पर फिर भी एकान्तवास इन्हें अधिक प्रिय होता है।

(5) इनकी इच्छाएँ कभी भी स्वार्थ परक न होकर उद्देश्य परक होती हैं। स्वार्थ- परमार्थ में बदल जाता है। अपनी समस्याओं को वे समाज की समस्याओं के आगे भूल जाते हैं।

(6) ऐसे लोगों को स्वसंचालित, स्वतन्त्र वातावरण के निर्माता कहा जा सकता है। स्वयं में दृढ़ होने के कारण वे अपने चारों ओर एक स्वतन्त्र वातावरण का निर्माण कर सकने में सफल होते हैं। ये अपने मनस्वी होने का परिचय, श्रेष्ठ वातावरण का स्वयं अपने बलबूते सृजन करके देते हैं।

(7) हमेशा जवानों जैसी मस्ती, ताजगी एवं उत्साह युक्त होने के कारण उन्हें कर्माधिक्य के बावजूद थकान नहीं होती।

(8) वे प्रकृति से अधिक समीप होते हैं एवं उसमें व्याप्त सौंदर्य को सामान्य आदमी से अधिक पैनेपन से समझते एवं अनुभव करते हैं।

(9) वे मानवता से असीम प्यार करते हैं। मानव की सहज स्वाभाविक बुराइयों को देखकर भी इनका स्नेह कम नहीं होता। बुराई की वृत्ति से तो घृणा करते हैं पर बुरे व्यक्ति से नहीं। चूँकि ये सभी से गहरा स्नेह रखते हैं, अतएव इन्हें भी प्रत्युत्तर में सभी से सौहार्द्र, स्नेह मिलता है।

(10) अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए किसी प्रकार की सौदेबाजी इन्हें मंजूर नहीं। ऐसे हर काम में ईमानदार होते हैं। सफलता प्राप्ति के लिए अनैतिकता का सहारा नहीं लेते, न ही मित्रता का गला घोंटते हैं।

(11) विनोद प्रियता उनके स्वभाव का अंग होती है। गम्भीर से गम्भीर अवसरों पर अपनी सहज विनोदप्रियता से ये वातावरण को हल्का बनाये रखते हैं। इनके व्यंग्य बाणों में कटुता एवं दूसरों का उपहास नहीं बल्कि स्वाभाविकता एवं शिक्षण, मस्ती और हल्कापन निहित होता है।

(12) सृजनात्मकता इनकी मूल प्रवृत्ति होती है। वे ध्वंस की नहीं निर्माण की योजनाएँ बनाते हैं। सृजन के लिए थोड़ी-फोड़ करनी पड़े तो बात दूसरी है। मैस्लोव ने जिनका अध्ययन किया, उनमें इन मौलिक गुणों की प्रधानता पायी। हर महामानव इन गुणों से सम्पन्न था।

महामनीषी जे.एम. ग्राहम ने अपनी पुस्तक “पर्सनालिटी’ में व्यक्तित्व के स्वरूप, विशेषताओं एवं विकास की सम्भावनाओं पर विस्तृत प्रकाश डाला है। वे कहते हैं कि “व्यक्तित्व से अभिप्राय एक ऐसी सर्वांगपूर्ण जीवन पद्धति से है जो सच्ची मैत्री भावना, स्नेह, सद्भाव एवं सुन्दर अनुभवों से भरा हुआ हो तथा जिसमें व्यक्ति को यह सन्तोष हो कि उसने जीवन के श्रेष्ठतम आदर्शों और विश्वासों के अनुकूल आचरण किया हो। सज्जनता, विनयशीलता, शिष्टता, उदारता, सरलता और दृढ़ आत्म-विश्वास श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आवश्यक तत्व हैं। उत्कृष्ट व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति महत्वाकाँक्षाओं के पीछे नहीं दौड़ते। उनमें दूसरों के प्रति असीम सद्भावना भरी होती है तथा सभी के सुख-दुःख के साथी होते हैं।”

‘दी गेन ऑफ पर पर्सनालिटी’ ग्रन्थ में नीतिशास्त्री डब्ल्यू.सी. लूसमोर ने विकसित व्यक्तित्व की व्याख्या करते हुए उसे तीन हिस्से में बांटा है। एक को विवेक, दूसरे को पराक्रम और तीसरे को साहचर्य नाम दिया है। उनकी और अधिक व्याख्या करते हुए वे कहते हैं- आदर्श व्यक्ति सदैव चिन्तनशील होता है। चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय-निर्धारण के लिए ज्ञानोपार्जन अत्यावश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिन्तनशील- विवेकशील होना चाहिए। सिद्धान्तों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है।”

“चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। जीवन का व्यावहारिक पक्ष- चिन्तन श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है। सिद्धान्तों के कार्यान्वयन के लिए क्रियाशीलता- गतिशीलता नैतिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। संसार के सभी महापुरुष जीवन भर क्रियाशील रहे- अनवरत श्रम-साधना करते रहे हैं। शारीरिक व मानसिक श्रम में संतुलन रख निरन्तर लगे रहकर उन्होंने महानता अर्जित की। गाँधी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। व्यक्तिवादी संकीर्ण चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। आदर्श व्यक्ति आत्म-कल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।”

वे कहते हैं कि “क्रिया और विचार नैतिक जीवन के व्यायाम और संगीत है। एकान्त के समय जीवन के कार्यों की समीक्षा की जाती है और एकान्त में प्राप्त सिद्धान्तों की सामाजिक जीवन में परख होती है।” इस प्रसंग में “एसेआन सोसाइटी एण्ड सालीट्यूड” में इमसैन महाशय का कथन भी उल्लेखनीय है-

“हमारे विचार तो एकान्त में उद्भूत हों, परन्तु हमारी क्रियाओं का क्षेत्र समान ही हो। जब हम अपने विचारों को स्वतन्त्र रखते हैं और अपने संसर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं खोते, तो हम आदर्श जीवन को चरितार्थ करते हैं।”

मध्यम मार्ग का अनुसरण करने वाला आदर्शवादी व्यक्ति अतिवादी नहीं होता, उसके चिन्तन और कर्त्तव्य में साम्य होता है। मनुष्य को अपने गुण और अवगुणों का बोध तभी होता है जब समाज के लोगों के संपर्क में आता है। बाह्य जीवन में वह सामान्य मनुष्यों की भाँति रहता है। आदर्श व्यक्ति का मस्तिष्क स्वतन्त्र विचार के जगत में विचरण करता है, पर हृदय संसार के सामान्य लोगों के साथ बहता है।”

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध नीतिशास्त्री विद्वान एफ. एच. ब्रेडले ने कहा है- “मनुष्य अपने व्यक्तित्व को समाज में जितना ही अधिक घुला-मिला देता है उतना ही अधिक उसको नैतिक रूप से विकसित मानना चाहिए। वस्तुतः सामाजिकता से पृथक् मनुष्य की नैतिकता का मूल्य एवं उपयोगिता ही नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम अपने आचरण में नैतिकता का समावेश करना चाहिए एवं सामान्य जीवनयापन की रीति-नीति की इसके लिए सर्वोत्तम मानना चाहिए नैतिक जीवन का विकास करने के लिए संकुचित-संकीर्ण नियम अथवा विचारधारा की अपेक्षा व्यापक उदार नियमों को अपनाना अधिक उत्तम है चाहे वे व्यापक नियम अपने देश, धर्म, समाज के हों अथवा किसी अन्य के द्वारा प्रतिपादित।

नीति शास्त्रियों द्वारा की गयी यह व्याख्या पूर्णतः भारतीय अध्यात्म शास्त्र के उन प्रतिपादनों से मेल खाती है जिन्हें पूर्वार्त्त मनोविज्ञान के नाम से जाना जाता है। आज महामानवों की उत्पत्ति- महानता के बीजाँकुरों के विकास हेतु ऐसे ही विचारों के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता भी है।


इच्छित संसार हर किसी के सामने

भगवान का बनाया संसार समग्र और सर्वांग सुन्दर है। उसे कोई-कोई ही देख समझ पाता है। संसार एक अति महत्वपूर्ण विश्व कोश है जिसमें हर प्रसंग का सुविस्तृत विवरण विद्यमान है। इतने पर भी उसे पढ़ने और समझने वाले बहुत कम हैं। समझने में किसी कदर सफल होने वाले भी यह प्रयत्न नहीं करते कि जो सामने है उसे अपनाने और लाभ उठाने की कुशलता दिखा सकें।

हर मनुष्य का अपना बनाया हुआ एक स्वतन्त्र संसार है वह उसी में निवास और निर्वाह करता है। मकड़ी अपना जाला बुनती है। शहद की मक्खी अपना छत्ता बनाती है। रेशम के कीड़े अपने रेसे बनाते हैं। देवताओं का मन्दिर में और भूतों का श्मशान में निवास उनका अपना चुनाव है। संसार में कहाँ क्या नहीं है? पर रुझान अपना-अपना। गुबरीला कीड़ा अपने लिए गोबर तलाश करता और उसी में अपने ढंग की जिन्दगी जीता है। तितलियों और भौंरों की बिरादरी दूसरी है उन्हें अपनी रुचि की पुष्प वाटिकाएँ भी हर जगह मिल जाती हैं। वे उन्हें सरलतापूर्वक खोज निकालते हैं।

दुष्टों की संगति और सज्जनों की मंडली में प्रवेश पाने का श्रेय अपने ही रुझान को है। सजातीय अपनों को न्यौत बुलाते हैं। दूषित दृष्टिकोण रखने पर दुष्टों के साथ संपर्क बनता है और उनके सहवास से मिलने वाले दुःखद दुर्गुणों का उपहार हस्तगत होता है। विपरीत प्रकृति के साथ भिन्न स्तर के लोग कदाचित ही कभी फटक पाते हैं। चोरों के मुहल्ले में सन्त के पैर टिकेंगे ही नहीं। इसी प्रकार सज्जनों के बीच दुर्जनों का गुजारा नहीं। उनका मन उचटता है और अपने जैसी साथी तलाश करके उनके साथ तालमेल बिठा लेते हैं।

यह संसार क्या है? इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। पूछने वाले से उलट कर यह पूछा जा सकता है कि यह संसार क्या नहीं है। यह भगवान का विराट् रूप है अथवा उसका सृजा हुआ चन्दन वन जैसा सुरम्य उद्यान। यदि कहा जाय कि यह नरक, भव-बन्धन, दुःखों का समुद्र है तो भी उस कथन को चुनौती नहीं दी जा सकती। यहाँ विषाणुओं से लेकर प्रेत पिशाचों तक अदृश्य जीवधारियों की अपनी-अपनी दुनिया ऐसी है जिसमें किसी एक साथ दूसरी की कोई समता नहीं। मछलियों का अपना संसार है और मच्छरों का अपना। उनकी इच्छाएँ, आवश्यकता, सुविधा असुविधाएँ ऐसी हैं जिसमें परस्पर कोई तालमेल नहीं। अपने समुदाय के अतिरिक्त वे दूसरे समुदाय का अस्तित्व या महत्व मानते भी होंगे या नहीं, यह कहना कठिन है।

किसानों, पहलवानों, कलाकारों, दार्शनिकों, अपराधियों के अपने-अपने दर्शन हैं। वे अपनी एक निर्धारित कार्यपद्धति अपनाते, अपने ढंग से सोचते और अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। कन्दराओं में रहने वाले तपस्वियों, वनवासियों, विलासियों, व्यवसायियों के चिन्तन रहन-सहन और प्रयत्नों को देखते हुए लगता है कि मनुष्यों के बीच देश, धर्म, भाषा, संस्कृति के आधार पर ही विभाजन नहीं हुए हैं वरन् दृष्टिकोण एवं जीवन दर्शन के भी इतने विभेद हैं जिन्हें पास-पास रखकर देखने अथवा उनके स्तर का मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि यहाँ अनेकता के बीच एकता विद्यमान है।

यह संसार माया, भ्रम, सत् असत्, क्षणिक भी हो सकता है और शाश्वत, सनातन, सत्, चित और आनन्द से परिपूर्ण भी। देखना यह है हम अपना संसार कैसा बनाते या बने बनाये किस संसार में प्रवेश करते हैं। सृष्टा ने जहाँ असंख्यों सुविधाएँ और विभूतियाँ मनुष्य को प्रदान की हैं वहाँ यह व्यवस्था भी बनाई है कि वह अपने लिए श्रेष्ठ से श्रेष्ठ या निकृष्ट से निकृष्ट चुन सके। यहाँ असंख्यों संसार पहले से ही विद्यमान हैं इनमें से भले या बुरे किसी का भी अपने लिए चयन किया जा सकता है और उसमें इच्छानुसार प्रवेश तथा निर्वाह करते रहा जा सकता है।


मानसिक परिष्कार और सुखी समुन्नत जीवन

साथियों के साथ अपने आदान-प्रदान, सहयोग समर्थन पर भी प्रसन्नता एवं प्रगति का बहुत कुछ आधार निर्भर रहता है। उस क्षेत्र की प्रतिकूलताओं के लिए आमतौर से दूसरों को दोष दिया जाता है किन्तु गम्भीरता पूर्वक खोजने से प्रतीत होता है कि अपनी ही कुरूपता दर्पण में भयावह होकर प्रतिबिम्बित हो रही है।

इस तथ्य को सिद्ध करने वाले अगणित प्रमाण उदाहरण यह बताते हैं कि सुखी और समुन्नत जीवनयापन के लिए मनःसंस्थान का परिष्कृत होना आवश्यक है। यह कार्य उतना कठिन नहीं जितना कि समझा जाता है। आत्मनिरीक्षण और सुधार परिवर्तन का क्रम चलता रहे तो हर कोई अपने चिन्तन को सुनियोजित एवं प्रभावोत्पादक बना सकता है।

इसके अतिरिक्त ऐसे वैज्ञानिक आध्यात्मिक उपाय उपचार भी हैं जो अपने-अपने ढंग से मानसिक क्षमता को सुविकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। हमें दोनों ही क्षेत्रों के सफल प्रयोगों को गम्भीरता पूर्वक समझना चाहिए और उन्हें अपनाने के लिए दुराग्रह त्याग कर उत्साहपूर्वक तत्पर रहना चाहिए।

व्यक्तित्व का साथियों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है इसके कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं। पार्मा इटली के पाइट्रो जुक्क्री ने अपने बालकों को धर्म सेवी बनाने के लिए आरम्भ से ही प्रयत्न किया। उसकी 7 सन्तानें थी। इनमें से 1 ईसाई पादरी, 3 बौद्ध भिक्षु और 3 धर्मोपदेशिका का काम करने लगे। सभी आजीवन ब्रह्मचारी रहे और धर्म सेवा में संलग्न रहे। यह उनके पिता की श्रद्धा और लगन और चेष्टा की ही परिणति थी। विनोबा की माँ मदालसा ने जिस तरह अपनी-अपनी सन्तानों को गढ़ा, उसका आधुनिक संस्करण इसे माना जा सकता है।

फ्रांस के फ्रेन्कीइस फाडक्वेट ने सन्तानें तो कई जनीं पर साथ ही उसने यह भी निश्चय रखा कि उसके सभी बालक धर्म परायण जीवन जियेंगे। इसी के लिए उसने आरम्भ से अन्त तक प्रयत्न किया। फलतः 2 विशप (बड़े पादरी) 1 प्रोष्ट (छोटा पादरी) बने और छहों कन्याओं ने नन्स (भिक्षुणियों) की दीक्षा लेकर धर्म परायण जीवन जिया।

सेन्टपाल अलावर्टा की धर्म सेविका कोराइलजानी ने अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक को धर्म सेवक बनाने का आग्रह किया और सफल रही। वह 4 पादरियों की बहिन- 4 भिक्षुणियों की माता, 6 पादरियों की नानी और 3 पादरियों की दीदी बनकर संसार से विदा हुई।

हाइना- जर्मनी का एक कलाकार हैनरिच टिचवेन अपने परिवारियों तथा सम्बन्धियों को कलाकारिता का चस्का लगाता रहा। उन्हें सिखाने और सफल बनाने में भी उसने पूरी-पूरी रुचि ली। फलतः उनका निजी परिवार तो जर्मनी के इतिहास में कलाकारों की खदान के नाम से प्रख्यात हुआ ही। उसके पड़ौसी सम्बन्धी भी पीछे न रहे। हैनरिच 7 प्रख्यात चित्रकारों का पिता 16 कलाकारों का दादा और 34 कलाकारों का परदादा था।

वेस्लेस (फ्राँस) का विक्टर चाओ सीनेन्ड एक ऐसे परिवार में जन्मा, पला और जिसमें सभी धर्म परायण लोग थे। उसने अपनी सन्तानों को भी उसी ढाँचे में ढाला। वह 4 पादरियों का भाई- 3 पादरियों का भतीजा और 4 पादरियों का पिता था। लान पम्प सेन्ट वेल्स के एक परिवार में जन्में पाँचों सगे भाई सन्त बने। उनके नाम पर बना पाँच सन्तों का गिरजा अभी भी प्रख्यात है। उसी गिरजे की भूमि पर वे पाँचों भाई- सेन्ट ग्वाइन, सेन्ट सीथो, सेन्ट सेलाइमन, सेन्ट ग्वाइनो, सेन्ट ग्वाई नीरो की समाधि बनी है। ट्यूक्सवटी का प्रसिद्ध चिकित्सक बैजामिन किटुज अपने व्यवसाय के प्रति अत्यन्त निष्ठावान था। उसने अपनी प्रत्येक सन्तान को चिकित्सक बनाने का लक्ष्य रखा, वैसा ही उत्साह बढ़ाया और वातावरण बनाया।

अमेरिकी चित्रकार चार्ल्स पीले अपनी कला में इतना तन्मय एवं सफल था कि उसका समूचा परिवार भी उसी ढाँचे में ढल गया, वह उस देश के प्रख्यात आठ चित्रकारों का पिता तथा दादा था।

एडम मोल्ट (डेनमार्क) का फेडरिक 22 सन्तानों का पिता था। उसने हर सन्तान के प्रति अपना कर्त्तव्य निवाहा और उन्हें गुणवान, चरित्रवान, प्रतिभावान बनाने में कोई कसर न रहने दी, फलतः उसकी सन्तानों में से 4 राजदूत, 2 सेनाध्यक्ष, 5 राज्य मन्त्री, तथा 11 महापौर, राज्यपाल जैसे उच्च पदों पर आसीन हुए।

शरीर अपना है। उसकी सचेतन और अचेतन गतिविधियों पर नियन्त्रण रख सकने की क्षमता यदि उपलब्ध कर ली जाय तो आत्म नियन्त्रण के आधार पर अपनी समूची क्षमता को अभीष्ट प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। जबकि सामान्यतः 70 प्रतिशत चिन्तन और क्रिया कलाप व्यर्थ निरर्थक ही नहीं जाता, अनर्थ सँजोने में भी लगा रहता है। साधने से मन सध जाता है। मन सध जाने से शरीर में ऐसी एक भी असत्य व्यस्तता शेष नहीं रहती जो प्रकारान्तर से अनेकानेक कष्ट संकटों का निमित्त कारण बनी रहे।

कैपटाउन के एक इंजीनियर वानवान्डे के बारे में कहा जाता है कि समय उनकी इच्छा से चलता था। ज्ञात नहीं रहस्य क्या था। किन्तु वे सोने जा रहे हों और आप कहें महोदय आप आठ बजे सो रहे हैं, पर जागिये आप ठीक बारह बजकर सात मिनट उनसठ सेकेंड पर। आप घड़ी लेकर बैठ जाइये क्या मजाल कि उनकी नींद एक भी सेकेंड आगे-पीछे टूटे। परीक्षण के लिए उन्हें कई दिनों तक किसी से न तो मिलने ही दिया गया और न घड़ी ही पास रखने दी गई। एक टूटी घड़ी रख कर उसकी चाभी घुमाकर 8 बजे का समय लगा दिया गया और उन्हें प्रातःकाल आठ बजे सोने को कहा गया तथा सायंकाल 8 बजे जगने का आग्रह किया गया। और तब भी जब उनकी नींद टूटी तो लोग आश्चर्यचकित रह गए कि ठीक 8 ही बजे थे। इस बायोलॉजी के नियमों पर आधारित ‘सर्केडियन रिदम’ का चक्र भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें भी समय की ऐसी सुनिश्चितता देखने में नहीं आती।

प्रगति की दिशा में पुरुषार्थ मात्र परिश्रम एवं साधन संचय का भी नहीं समझना चाहिए। उसका एक कारगर उपाय अचेतन मन से सहारे शरीर की विभिन्न क्षमताओं को समृद्ध बनाना भी है। हमें इस क्षेत्र का भी महत्व समझना चाहिए कि समग्र उत्कर्ष के लिए इन सम्भावनाओं को समझने कार्यान्वित करने की ओर जुड़ना चाहिए।

मास्को के निकट दूबना नामक स्थान पर किए जा रहे एक अनोखे प्रयोग का समाचार नावोत्सी न्यूज एजेन्सी ने “सोते समय अंग्रेजी पढ़ाने का प्रशिक्षण” शीर्षक से छापा है। आमतौर से जागृत अवस्था में पढ़ने वाले शिक्षार्थियों को पाठ याद न होने की शिकायत बनी रहती है। किन्तु इस प्रयोग में सोते-सोते ही 40 दिन में अंग्रेजी सिखाने का दावा किया गया है। इस परीक्षण में शिक्षार्थी को पहले गहरी नींद में सोने दिया जाता है। फिर उसके निकट भाषा-शिक्षण का टेप चालू कर दिया जाता है। अब तक किए गए इस प्रकार के प्रयोग बहुत सफल हुए हैं। स्वप्नावस्था में स्मृति संचय की यह एक बेमिसाल घटना है।

विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी डा. पेनफील्ड ने मस्तिष्क के अग्रभाग में लगभग ढाई वर्ग इंच और 1/10 इंच मोटे एक ऐसे क्षेत्र का पता लगाया था, जहाँ दो काली पट्टियाँ हैं- जिन्हें टेम्पोरल कारटेक्स कहा जाता है। ये कनपटी के नीचे मस्तिष्क को चारों ओर छल्लानुमा घेरे हुए हैं। यही वे पट्टियाँ हैं जहाँ मानसिक विद्युत का प्रवेश होते ही अच्छी-बुरी स्मृतियाँ उभरती हैं। इसी में स्मृतियों के भण्डार भरे पड़े हैं। यदि इनमें विद्युत आवेश प्रवाहित किया जाये तो इतनी-सी पट्टी ही उस व्यक्ति के ज्ञात अज्ञात सारे रहस्यों को उगल सकती है। जिसे भयवश, लोक-लाज अथवा संकोचवश मनुष्य व्यक्त नहीं कर पाता। जो जन्म जन्मान्तरों से संस्कार रूप में मनुष्य के साथ संचित बने रहते हैं।

वैज्ञानिकों का कथन है कि मस्तिष्क की ये पट्टियाँ किसी केन्द्रक तत्व (न्यूक्लिक एलीमेन्ट) से बनी हैं। जब इनमें लहरें उठती हैं तो इनसे प्रभावित नलिका विहीन नसों (डक्टलेस ग्लैण्डस्) से एक प्रकार के हारमोन्स निकलते हैं। जो क्रोध, घृणा, काम-वासना, भय, ईर्ष्या, द्वेष, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहिष्णुता आदि भावों के जनक कहे जाते हैं। हारमोन्स के कारण ही मनुष्य स्वस्थ या रोगी बनता है, यदि अच्छे गुण होते हैं तो अच्छे हारमोन्स और बुरे गुण तो बुरे हारमोन्स के द्योतक हैं। अच्छे हारमोन्स का सीक्रिशन स्निग्धता, हल्कापन, प्रसन्नता, प्रफुल्लता, अच्छे विचार उत्पन्न करता है। बुरे हारमोन्स ठीक इसके विपरीत प्रभाव दिखाते हैं।

उदाहरण के लिए डा. पेनफील्ड ने एक व्यक्ति की इस काली पट्टी में विद्युत प्रवाहित की तो वह एक गीत गुनगुनाने लगा जो न तो वह अमेरिकन था न जर्मनी, उपस्थित कोई भी व्यक्ति उसे समझ न सका उस गीत को टेप कर लिया गया और भाषा शास्त्रियों की मदद ली गई तो पता चला कि वह भाषा किसी आदिवासी क्षेत्र की थी और वह गाना सचमुच ही उस क्षेत्र के लोग गाया करते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में इन प्रयोगों को अधिक उत्साह के साथ अपनाने की बात सोची जा रही है। इसमें कम समय में कम परिश्रम में- अधिक मात्रा में उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने की सम्भावना नये रूप से सामने आती जा रही है

मनोविज्ञान ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि भावनाओं द्वारा कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। साथ ही मस्तिष्क के ठीक ढंग से प्रशिक्षण एवं विचारणा और भावनाओं के नियन्त्रण द्वारा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।

विगत कुछ वर्षों में हुई स्नायु विज्ञान सम्बन्धी खोजों से विदित हुआ है कि भावनाएँ मानवीय मस्तिष्क को अनेक प्रकार से प्रभावित करती हैं। इनसे मस्तिष्क में विष तुल्य एवं जीवनरस जैसे दोनों ही प्रकार के रसायन उत्पन्न होते हैं। इसके आधार पर अब ऐसे प्रयास भी किये जा रहे हैं कि भावनाओं और रसायनों का सम्बन्ध खोजकर, विशिष्ट रसायन को मस्तिष्क के अमुक आय में पहुँचाकर मनोरोगों, दर्द, आदि की चिकित्सा की जा सके और मस्तिष्कीय क्षमता की प्रखर बनाया जा सके।

यह अब पता लगाया जा चुका है कि एक स्वस्थ और सुविकसित मस्तिष्क में प्रायः एक करोड़ ग्रन्थों में लिखी जा सकने जितनी सामग्री संग्रह करके रखी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता में सहज ही दूनी अभिवृद्धि भी की जा सकती है। किसी कारणवश आधा मस्तिष्क नष्ट हो जाए तो शेष आधे से भी पूरे का काम चल सकता है।

फ्रांसीसी वैज्ञानिक देल्गादो के अनुसार मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को बिजली का झटका देकर आदतों एवं अभ्यासों को बदला जा सकता है और स्मृति केन्द्रों की क्षमता को जागृत किया जाना शक्य है।

मैकगिल विश्व विद्यालय माण्ट्रियल (कनाडा) के डा. विल्डर पेनफील्ड ने दृश्य ध्वनि और विचार का सम्बन्ध स्थापित करते हुए यह सम्भावना व्यक्त की है कि लोगों के मस्तिष्कों को इच्छानुसार चिन्तन करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।

कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डा. रोगरस्पेरी ने चिरसंचित आदतों को भुला देने और अनायास ही नये अभ्यास के आदी बना देने में सफलता प्राप्त की है।

मस्तिष्क के लिए उपयोग रासायनिक पदार्थ उपलब्ध करने के लिए आहार में आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन किया जाय। इस प्रयोजन को साधने में समर्थ दिव्यौषधियों का प्रयोग किया जाय। जैसा कि इन दिनों शान्ति कुँज की ‘कल्प साधना’ प्रक्रिया में समाविष्ट किया जाता है।

दिव्य ऊर्जा को मस्तिष्क तक पहुँचाने के लिए प्राणवान व्यक्तित्वों के सान्निध्य एवं अनुदान का सुयोग बिठाना चाहिए। आवश्यक नहीं कि इसके लिए इलेक्ट्रोड ही प्रयुक्त करने पड़ें या बिजली के झटके लगाने पड़ें। यह कार्य कोई प्राण प्रत्यावर्तन का अभ्यासी आध्यात्मिक क्षेत्र का प्रयोक्ता भी अपनी सामर्थ्य का एक अंश देकर कर सकता हूँ।


जब मन्यु जाग उठा

जुए में सर्वस्व हारने के बाद पाण्डवों को वनवास हुआ। शर्त के अनुसार उन्हें बारह वर्ष वनवास के रूप में तथा एक वर्ष अज्ञातवास के रूप में बिताने थे। अज्ञातवास की अवधि में यदि वे पहिचान लिये जायेंगे तो पुनः बारह वर्ष की सजा भुगतनी होगी, यह कूटनीतिक शर्त दुर्योधन ने रखी थी। तब बारह वर्ष का समय बीत चुका था, एक वर्षीय अवधि चल रही थी। पाण्डव एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर छुपकर, अपनी वेशभूषा बदलकर रह रहे थे।

उस नगरी में बकासुर नामक एक भयंकर राक्षस रहता था। उसके आतंक, अत्याचार से पूरी नगरी त्रस्त थी। किसी को भी मारकर रक्त पी जाना उसके लिए सामान्य बात थी। हर व्यक्ति भयभीत था तथा अपनी जीवनरक्षा के लिए आशंकित था। नगरवासियों ने उसके उत्पीड़न से परेशान होकर सर्व सम्मति से यह निश्चय किया कि राक्षस के भोजन के लिए हर घर से बारी-बारी से एक आदमी भेजा जाता रहेगा, किसी अन्य को राक्षस यदि न मारे तो यह क्रम चलता रहेगा। घर बैठे बिना मेहनत के आहार की शर्त उसने मंजूर कर ली। धीरे-धीरे एक-एक व्यक्ति उसका ग्रास बनने लगे नगर की आबादी तेजी से घटने लगी। पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी, माता-पिता आदि के असहाय बिछुड़न की विरह-वेदना से समूचे वातावरण में भय आतंक संव्याप्त था। घर-घर में रुदन चीत्कार सुनायी पड़ रही था।

उस दिन ब्राह्मण के घर की बारी थी। उसके घर कुहराम मच गया। ब्राह्मण उसकी पत्नी, पुत्र और कन्या अपने-अपने प्राण देकर एक दूसरे को बचाने का आग्रह करने लगे। आँखों से आँसुओं के निर्झर बह रहे थे। माँ कुन्ती और भीमसेन को छोड़कर अन्य चारों भाई उस दिन भिक्षा के लिए बाहर गये थे। कुन्ती ने सारी बातें सुनी, उसका हृदय दयार्द हो उठा। ब्राह्मण परिवार से जाकर बोली- आप लोग चिन्ता न करें। आपके आश्रम में हम रह रहे हैं। मेरे पाँच लड़के हैं, उनमें से एक को राक्षस के भोजन के लिए में भेज दूँगी।” ब्राह्मण के ननुनच को देखते हुए माता कुन्ती ने फिर समझाया- ब्राह्मण देवता! आप हमारी चिन्ता न करें। मेरे लड़के साहसी और पराक्रमी हैं। अनीति, अत्याचार से संघर्ष करना ही उन्हें सिखाया गया है। कदाचित् इस धर्मयुद्ध में एक मारा जाता है, तो भी मेरे चार बच्चे तो बचेंगे। अनीति के विरुद्ध संघर्ष की धर्म परम्परा तो अन्ततः जीवित रहेगी।

माता की आज्ञा पाकर भीम युद्ध में जाने की तैयारी करने लगे। अपनी गदा सम्भाली। इतने में युधिष्ठिर आदि चारों भाई लौटकर घर पहुँचे। माँ की बात सुनकर उन्होंने वनवास के साथ जुड़ी शर्त को याद दिलाते हुए कहा- “भीम महाबली है। पर राक्षस के मारे जाने के बाद सबको खबर हो जायेगी कि यह कार्य भीम का है। हम सब पहिचाने जायेंगे। इससे पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना होगा।”

धर्मराज युधिष्ठिर की बात सुनकर कुन्ती ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा- “युधिष्ठिर! धर्मात्मा होकर भी तुम कायरों जैसी बातें करते हो। तुम्हें अपनी चिन्ता मात्र है। सोचो इस नगर का क्या होगा? एक दिन पूरे नगर में श्मशान सी नीरवता छा जायेगी। राक्षस सबको मारकर खा जायेगा। अनीति को सामने देखकर भी यदि उससे जूझने के लिए भुजाएँ नहीं फड़कती- मन्यु नहीं उभरता तो किस काम का- वह पराक्रम- वह शौर्य?

लज्जा से युधिष्ठिर का सिर झुक गया। “स्वयं दुःख सहकर कष्ट उठाकर भी यदि अनीति का उन्मूलन होता हो, तो उसके लिए किसी प्रकार का असमंजस नहीं करना चाहिए,” उन्हें माता की नीतियुक्त शिक्षा उचित जान पड़ी। समीप खड़े भीम सारी चर्चा सुन रहे थे। वार्ता के अन्त होते ही उनका मन्यु जग उठा। भुजाएँ फड़कीं। एक हुँकार भरकर वे चल पड़े राक्षस बकासुर को मारने और मारकर ही लौटे।


मनुष्य और भूलोक को देवताओं के अनुदान

इस धरती पर जो जीवन है, वह यहीं से उत्पन्न हुआ या अन्तरिक्ष के किसी लोक से अनुदान की तरह प्राप्त हुआ? इस संदर्भ में अब विश्वस्त तथ्य सामने आते जा रहे हैं और यह माना जाने लगा है कि मनुष्य की सत्ता एवं संरचना पृथ्वी निवासी अन्य प्राणियों की तुलना में इतनी भिन्न है कि उसे किसी देव लोक की सन्तति कहा जाय तो इसे स्वीकार करने के लिए पर्याप्त प्रमाण मिल सकेंगे।

विकास क्रम के अनुसार मनुष्य की योग्यता तथा साधन सुविधा का विकास अभी थोड़े ही दिन पूर्व हुआ है। उससे पूर्व वह नर वानरों के रूप में वनमानुषों की तरह निर्वाह करता माना जाता रहा है। यदि यह सही है तो प्रागैतिहासिक काल की ऐसी संरचनाएँ संसार भर में क्यों कर फैली हुई हैं, जिन्हें आज के समुन्नत लोगों से भी कहीं अधिक विकसित और साधन सम्पन्न लोगों द्वारा विनिर्मित ही कहा जा सकता है। जिनके बारे में कोई स्पष्टीकरण विद्वान दे नहीं पाते।

पृथ्वी पर देव लोक निवासियों के आवागमन के प्रमाण समय-समय पर मिलते रहे हैं और अभी भी मिलते रहते हैं। उड़न तश्तरियों के सम्बन्ध में कई जानकारियाँ ऐसी मिली हैं जिन्हें दृष्टि भ्रम या प्रकृति विपर्यय मात्र कहकर नहीं टाला जा सकता। इसी प्रकार कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आती रहती हैं जिनसे कई मनुष्य देखते-देखते अदृश्य हो गये। वे या तो फिर लौटे ही नहीं या लौटे तो भिन्न स्थानों पर देखे गये या भिन्न-भिन्न स्थिति में पाये गये।

इन साक्षियों पर दृष्टिगत करने से यह विश्वास करने के अधिकाधिक कारण प्रत्यक्ष होते जाते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि इस धरती के साथ अन्य लोकवासियों- देवताओं का चिरकाल से किसी न किसी रूप में संपर्क बना हुआ है और वे अभी भी उसे किसी न किसी रूप में बनाये रहने के लिए अपनी ओर से प्रयत्न करते रहते हैं। अब अपनी बारी है कि उस आदान-प्रदान को अधिक सरल और सफल बनाने के लिए स्वयं भी कुछ प्रयत्न करें और एक ब्रह्माण्ड बिरादरी के सदस्य बनकर आज की अपेक्षा अधिक समुन्नत बनने का सौभाग्य कमायें।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध खगोल वेत्ता सरफ्रेड हालल ने अपना नवीनतम अभिमत व्यक्त करते हुए कहा है- ‘प्रस्तुत प्रमाणों और तथ्यों को देखते हुए डार्विन का विकासवादी सिद्धान्त सही नहीं मालूम पड़ता जिसमें एक कोशीय जीवों से क्रमशः विकसित होते-होते प्राणियों के वर्तमान स्वरूप की शृंखला जोड़ी गई है। जीवन की संरचना इतनी जटिल है कि उसे प्रोटीनों और रसायनों की परिणत नहीं कहा जा सकता। जीवन के विभिन्न घटक अपने आप में पूर्ण हैं और वे पीढ़ी दर पीढ़ी न्यूनाधिक हेर-फेर के साथ यथावत् बने रहते हैं। उदाहरण के लिए मछली को करोड़ों वर्ष अपने इसी रूप में निर्वाह करते ही गये पर उसमें कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं हुआ है। यही बात अन्य जीवधारियों के सम्बन्ध में भी सोची जा सकती है। यदि बन्दर से विकसित होकर आदमी बना तो फिर जो शेष जाति के बन्दर दृष्टिगोचर होते हैं वे क्यों उसी आदिम स्थिति में बने हुए हैं?

संसार भर में उपलब्ध होने वाले अद्भुत अवशेषों से इस बात की पुष्टि होती है कि पुरातन काल में किसी उच्च सभ्यता का अस्तित्व रहा है और वह अति मानवी स्तर की रही होगी।

मैक्सिको क्षेत्र में मिले वेधशाला स्तर के प्रायः 10 खण्डहरों को न तो प्रकृति कृति कहा जा सकता है और न मानव निर्मित कहने की बात में कुछ तुक है। फिर वे सब क्या हैं? पेरू की भूमि पर सैकड़ों मील लम्बी ज्यामिती रेखाएँ प्राकृत नहीं वरन् किन्हीं बुद्धिमानों द्वारा हाथ से खोदकर बनाई गई हैं। यह कैसे बनीं? किसने बनाईं?

मध्य एशिया में जावा- कम्पोडिया- अनकोरवाट आदि के खण्डहर भी यही कथा कहते हैं कि मात्र इन्हीं दिनों में विज्ञान का बोलबाला नहीं है इससे पूर्व भी बढ़ी−चढ़ी संस्कृतियों और क्षमताओं वाले लोग रहते थे। मिश्र के पिरामिड इसी तथ्य की साक्षी प्रस्तुत करते हैं। ईस्टर द्वीप के समुद्र तट पर अनेकों विशालकाय पाषाणों से बनी मानवाकृति प्रतिमाएँ बिखरी पड़ी हैं। इन्हें आकू वाकू कहा जाता है पर इसका पता नहीं चलता कि इस निस्तब्ध क्षेत्र में किसने, किसलिए उतना अति कष्टसाध्य श्रम किया होगा।

गोवा मरुस्थल की चट्टानों पर मनुष्यों के विशालकाय पदचिह्नों के निशान पाये गये हैं। यह करोड़ों वर्ष पुराने हैं। कहा जाता है कि उन दिनों यहाँ कीचड़ थी जो अब जमकर चट्टान बन गई है। हो सकता है कोई मनुष्य उधर से निकले हों और उनके भारी चरण चिन्ह उस स्थान पर अपनी स्मृति छोड़ गये हों। ओडेसा नदी के तट पर गुफाओं की एक लम्बी शृंखला है। इनका निर्माण प्राकृत नहीं है वरन् उन्हीं विकसित उपकरणों के माध्यम से हुआ है। लाखों वर्ष पूर्व आदिम मनुष्य के लिए ऐसे साधन जुटाना कैसे सम्भव हुआ होगा। सहारा मरुस्थल की सफारा पहाड़ियों के समीप फ्रांसीसी सैनिकों ने विचित्र गुफाओं, चट्टानों और प्रतिमाओं का पता पुरातत्व विभाग को दिया था। इन 19 फुट ऊँची असाधारण प्रतिमाओं को शोध कर्ता प्रो. लहोते ने ‘मंगल ग्रह के देवता’ नाम दिया था। उसने वैसे ही वस्त्र पहन रखे हैं जैसे कि इन दिनों अन्तरिक्ष यात्रियों द्वारा पहने जाते हैं।

रूस के इटरूस्किया क्षेत्र में एक अति प्राचीन पाषाण शिला मिली है। जिस पर राडार उड़नतश्तरी की आकृति है और उसमें बैठने वाला अन्तरिक्ष सूट पहने हुए है।

आस्ट्रिया के माल्जवर्ग नगर में कुछ समय पूर्व एक 785 ग्राम का पादप का टुकड़ा मिला है। यह पाँच करोड़ वर्ष से भी अधिक पुराना आँका गया है। यह इतना पुराना है कि उस समय मनुष्य का अस्तित्व भी नहीं बन पाया था।

दक्षिण अमेरिका में एण्डीज पर्वत माला के अंचल में एक झील है रिरिकजि। इसके तट पर अत्यन्त प्राचीन सूर्य मन्दिर मिला है। उसमें एक ऐसी वेधशाला मिली है जो तत्कालीन काल गणना का परिचय देती है। इनमें 290 दिन का वर्ष और 24-24 दिन के महीनों के हिसाब से सारा गणित किया हुआ है। इसी क्षेत्र में लम्बी दूरी तक मीलों तक बिखरी हुई ज्यामिती रेखाएँ खुदी हुई पाई गई हैं। आश्चर्य यह है कि यह खुदाई करके चमकदार पत्थरों से भरी गई हैं। इन्हें चाँदनी रात में हवाई जहाज से भली प्रकार चमकता देखा जा सकता है।

यह कृतियाँ ऐसी हैं जिससे उस समय की सभ्यता तथा दक्षता का पता चलता है जबकि जीव विज्ञानियों के अनुसार मनुष्य नंगा फिरता था और मात्र पत्थरों के उपकरण काम में लाता था। ऐसी दशा में यह निर्माण किनने किये? इतनी जानकारी और साधन सामग्री कहां से आई? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए किन्हीं अन्य लोकवासियों की कृति या सहायता की संगति बिठानी पड़ती है।

सभी देशों में पाये जाने वाली विभिन्न पुराण गाथाओं में अन्य लोकवासियों के साथ पृथ्वी वालों के चलते रहे सम्बन्ध सूत्रों का वर्णन है। इनके पीछे कुछ आधार होने की बात भी सर्वथा उपहासास्पद नहीं समझी जानी चाहिए। अभी भी उस स्तर के प्रमाण पुरातत्व वेत्ताओं को मिल रहे हैं जिसमें उन पदार्थों को इतर लोक वाली कोई अनुकृति कह कर झुठलाया नहीं जा सकता।

“इन्टेलिजेंट लाइफ इन दि युनिवर्स” ग्रन्थ में बेबोलीन क्षेत्र के भूतकालीन इतिहास के साथ जुड़े हुए अध्यायों पर सुविस्तृत प्रकाश डाला गया है और तथ्यों के साथ यह प्रामाणित किया गया है कि सुमेर तथा अक्कद देशवासियों की कला, संस्कृति तथा वैज्ञानिक क्षमता बहुत आगे बढ़ी-चढ़ी थी। यह सब उन दिनों की बात है जिसे मानवी विकास का पिछड़ा अध्याय कहा जाता है। उन पिछड़ी परिस्थितियों में आज की प्रगति से भी ऊँची स्थिति पर होना यह बताता है कि विकास क्रमिक गति से नहीं हुआ, वरन् या तो सनातन प्रवाह से बढ़ा या अनायास उछला है। जो हो, इस प्रगति प्रक्रिया में अन्य लोकवासियों का हाथ अवश्य रहा है।

अन्तरिक्ष में जीवन विषय पर लम्बी शोध करने वाले प्रो. जे. हाइन ने विश्वास पूर्वक कहा है- ‘अन्य लोकों में भी बुद्धिमान प्राणियों का निवास, उसके साथ साधने के लिए हम भूलोक निवासियों को विशेष रूप से प्रयत्न करने चाहिए।’

अब से 2500 वर्ष पूर्व जन्मे तत्कालीन महान तत्ववेत्ता ‘हेराल्कीट्स’ ने इस तथ्य का प्रतिपादन किया था कि ब्रह्माण्ड के लोक-लोकान्तरों में न केवल समुन्नत स्तर के देव मानव रहते हैं वरन् वे धरती के साथ संपर्क साधने तथा सहयोग, आदान-प्रदान के लिए भी उत्सुक रहते हैं। इस प्रतिपादन के पक्ष में उन्होंने अनेकों तर्क और तथ्य भी प्रस्तुत किये थे। साथ ही वे यह भी कहते थे कि सत्य अनन्त है। मनुष्य उसमें से अपने विकास स्तर के अनुरूप एक सीमित भाग ही उपलब्ध कर पाता है। इसलिए जो इन दिनों देखा समझा जा रहा है उसी को सब कुछ नहीं मान बैठना चाहिए वरन् अविज्ञात की खोज के लिए प्रयत्नरत रहना चाहिए। वे देव मानवों के सम्बन्ध में भी यह तर्क प्रस्तुत करते थे। इस तथ्य के समर्थन में जो तथ्य मिलते हैं उन्हें आधार मानकर यदि चलते रहा जाय तो हम चैतन्य जगत की किसी सुविकसित बिरादरी के सदस्य बन सकते हैं।

हेराल्कीट्स के प्रतिपादनों से प्रभावित कितने ही मनीषियों ने इस संदर्भ में अपने प्रस्तुतीकरण किये हैं। उनने इस शृंखला को और भी आगे बढ़ाया है और विज्ञजनों में यह आशा विश्वास उत्पन्न किया है कि वे इस क्षेत्र का महत्व समझें और अनुसंधान में शिथिलता न आने दें। ऐसे विद्वानों में क्रेम अमलेण्ड, एण्ड्र थामस, हरमन कान, एल, दियोन, लेविस, रिचर्ड, यंग, एरिक वान, डानिकेन आदि की गणना अग्रणियों में की जाती है।

महान वैज्ञानिकों में से कुछ के विचार इस संदर्भ में बहुत विचारणीय हैं। आइन्स्टीन ने एक भेंट वार्ता में प्रो. चार्ल्स हैप गुड़ से कहा था कि अन्य लोकवासियों के सम्बन्ध में समुचित प्रमाण एकत्रित किये बिना सार्वजनिक प्रतिपादन करना तो ठीक न होगा किन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से यह विश्वास करता हूँ कि प्रागैतिहासिक अवधि में अन्य लोकवासियों का आवागमन हमारी धरती पर रहा है।

अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्सफोर्ट ने अपने ग्रन्थ ‘दि बुक ऑफ दि डैम्ड” में लिखा है कि मनुष्य के वास्तविक पूर्वज अन्तरिक्षवासी उच्च सभ्यता निभाते रहे हैं। प्रो. हरमैन हरवर्थ, जिन्हें रॉकेट सिद्धान्तों का जनक माना है, ने कहा था- भूतकाल में पृथ्वी पर अन्य लोकवासियों के आवागमन का सिद्धान्त मुझे असत्य नहीं लगता।

‘स्टेंजर्स फ्रॉम दि इकाई’ ग्रन्थ के लेखक विज्ञानी ब्रेड स्टेयर ने इन दिनों धरती पर उतरने वाली उड़नतश्तरियों की विवेचना करते हुए कहा है- ये उन्हीं लोगों का परिचय देती हैं जिनने भूतकाल में मानवी अस्तित्व उसके विकास को समर्थ बनाने में योगदान दिया होगा। वे धरतीवासी नहीं वरन् अन्य लोक से आते हैं, बुद्धि की दृष्टि से समर्थ प्रतिभावान हैं जीवशास्त्री टी. ऐन्डरसन ने अपने ग्रन्थ “ए बायोलॉजिस्ट लुक्स एवं यू. एफ. ओ.” में उड़नतश्तरियों को दृष्टि भ्रम नहीं माना और उन्हें किसी बुद्धिमत्ता भरे प्रयासों का अंग कहा है। वे कहते हैं- उन विकसित लोगों की नस्ल इस पृथ्वी पर भी उत्पन्न हो सकती है। सम्भव है, वे “मैक्रोमॉलिक्युल्स” अणुओं को किसी विशेष विधि से निषेचित करके धरती पर भी देव मानवों की एक समुन्नत बिरादरी उत्पन्न कर सकें।

अमेरिका के एक अन्तरिक्ष ज्ञाता ट्रेवर जेम्स ने अदृश्य आकाश की परिस्थितियों के इन्फ्रारेड फिल्म उतारे हैं। उनमें अन्य जानकारियों के अतिरिक्त आकाशगामी ऐसे प्राणियों के भी चित्र हैं जिन्हें सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। ये विचित्र प्राणी रचना में भिन्न प्रतीत होते हैं।

उड़न तश्तरियों के पृथ्वी पर अन्तरिक्ष से उतरते रहने की चर्चा बहुत दिनों से सुनने को मिलती रहती है। अब इससे भिन्न प्रकार के दृश्य भी सामने आने लगे हैं। बिजली एवं आग के सम्मिश्रण से बने गोले धरती पर गिरते और प्राणियों तथा पदार्थों को चोट पहुंचाते देखे गये हैं। ऐसी कितनी ही घटनाएँ नोट की गई हैं। हिन्द महासागर में एक जलयान ‘आइलिस’ को इस शताब्दी में ऐसे ही एक भयानक गोले का सामना करना पड़ा। सौभाग्य से ही वह उस आक्रमण से उबर सका।

सन् 1963 में अमेरिका में का एक जेट विमान जार्जिया के आकाश में ऐसे ही एक प्रहार में जलकर नष्ट हो गया। पायलट सिर्फ इतना ही सन्देह दे सका- “जो आक्रमण हुआ है उससे अब किसी के बचने की सम्भावना नहीं है।” स्पष्ट है कि वहाँ न कोई मानवी शत्र का आक्रमण ही सम्भव था और न अग्निकाण्ड जैसी कोई घटना ही घटित हुई। आकाश से किसी विद्युत पिण्ड के गिरने की ही सम्भवतः यह घटना थी।

प्यूर्टोरिको जाने वाले एक विमान पर भी ऐसा ही आकाशी आक्रमण हुआ और देखते-देखते नष्ट हो गया। चीनी समुद्र के ऊपर उड़ता हुआ एक वायुयान भी उसी प्रकार नष्ट हुआ था। उसमें सवार सभी यात्री मारे गये थे।

1953 में दक्षिण जार्जिया के आकाश में ऐसा ही एक अग्नि पिण्ड दौड़ता हुआ पाया गया। अमेरिकी वायु सेना के एफ. 89 लड़ाकू विमान ने लगातार उसका एक घण्टे तक पीछा किया, बाद में लुप्त हो जाने के कारण उसे वापस लौटना पड़ा।

इस प्रकार की छोटी बड़ी अनेकों घटनाएँ, आकाश से अग्निबाण टूटने की तरह, समय-समय पर सामने आती रही हैं। इनके सम्बन्ध में दो अनुमान लगाये जाते रहे हैं कि यह किसी टूटी हुई उल्का के अधजले टुकड़े हो सकते हैं या फिर कोई सौर ऊर्जा से सम्बन्धित भँवर प्रवाह हो सकते हैं। किन्तु इन दोनों ही कारणों की पुष्टि कर सकने वाले कोई प्रमाण कहीं उपलब्ध नहीं हुए, जिनसे इन सम्भावनाओं की पुष्टि हो सके। अस्तु आशंका यही की जाती रही है कि यह किसी अन्य लोक से आया हुआ कोई भला या बुरा उपकरण ही हो सकता है।

वेस्वे प्राइज ने अपनी ‘भूतों की दुनिया’ पुस्तक में इस प्रकार के कितने ही उदाहरण प्रस्तुत किये हैं जिनसे अदृश्य प्राणियों के आकाश में विचरण करने की मान्यता पुष्ट होती है।

धरती पर अन्य लोकवासी आते रहे हैं, यह बहुचर्चित विषय है। इसके साथ ही एक और सम्भावना व्यक्त की जाती है कि मनुष्य लोकवासियों को अन्य लोकवासी किसी जाँच पड़ताल के लिए पकड़ तो नहीं ले जाते। कई व्यक्तियों के अचानक गायब हो जाने और कुछ समय बाद अन्यत्र प्रकट होने की घटनाएँ ऐसी हैं जिन्हें सहज बुद्धि से अविश्वस्त ठहराया जा सकता है, पर गहरी जाँच पड़ताल करने पर उपलब्ध विवरणों से यह पता भी चलता है कि ऐसे विवरणों में तथ्य और प्रमाण भी ऐसे पाये गये हैं जिन्हें सहज ही उपहासास्पद भी नहीं ठहराया जा सकता।

लियोनार्ड अपने घर वैथम वेलवर्थ से गायब होकर किसी सुदूर वन प्रदेश में प्रकट हुआ। अगाथा क्रिस्टी के सम्बन्ध में 1926 की प्रख्यात रिपोर्ट है कि वे गुम हुईं और स्मृति गँवाकर कई वर्ष बाद प्रकट हुईं। कारलोस ने आप बीती सुनाते हुए कहा- ‘उसे कोई हवा में उड़ा ले गया और फिर बहुत दिन बाद अन्यत्र पटका। इस बीच वह कहाँ रहा और क्या करता रहा, इसका कुछ भी स्मरण नहीं है, लन्दन के ‘डेली मिरर’ में एक टैक्सी चालक का समाचार छपा था कि वह अपने कपड़े गाड़ी में छोड़कर देखते-देखते गायब हो गया।

निकोलाई रौकिक ने अपनी हिमालय यात्रा विवरण में तिब्बती लामाओं का ऐसा विवरण छापा है जिसमें उन्हें आकाश गमन और अदृश्य होने की सिद्धियों से सम्पन्न बताया गया।

इन तथ्यों के आधार पर यह मान्यता अधिकाधिक परिपुष्ट होती है कि मनुष्य देवलोक का अनुदान है और देवता उसके साथ सम्बन्ध बनाये रहने का भूतकाल में समुचित प्रयत्न करते रहे हैं और अब भी उनके वे प्रयास चल ही रहे हैं।


परिवर्तन चक्र में घूमता हुआ अपना ब्रह्माण्ड

आकाश पर नजर डालने से एक काली चादर या कुछ जुगनू से बैठे चमकते दिखते हैं। दिन में एक फानूस जैसी और रात में लालटेन जैसी रोशनी चमकाते हुए दो गोले घूमते नजर आते हैं। मोटी दृष्टि यहीं समाप्त हो जाती है, पर जब गहराई में उतर कर वास्तविकता खोजने की बात चलती है तो प्रतीत होता है कि इस नगण्य के पीछे न जाने कितना बड़ा विशाल विस्तार छिपा पड़ा है। उसकी परतें उठाते चलने पर विशालता का अनन्त विस्तार आँखों के सामने आकर खड़ा हो जाता है।

ब्रह्माण्ड का स्वरूप कभी मानवी मान्यता के अनुसार बहुत छोटा था पर अब पर्यवेक्षण से उसकी विशालता इतनी बढ़ चली है कि उसकी कल्पना करने तक में मस्तिष्क चकराने लगता है।

कभी ब्रह्माण्ड इतना छोटा भी रहा होगा जिसे कृष्णचन्द्र ने अपने मुख में रखी हुई गोली की तरह यशोदा या अर्जुन को दिखा सके। रामचन्द्र के लिए भी कदाचित यह सम्भव रहा हो कि वे बड़ी सुपाड़ी जितने ब्रह्माण्ड की झाँकी कौशल्या या काकभुसुण्डि को तनिक-सी मुस्कान बखेरकर भली प्रकार दिखा सकें। पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। अब कोई हनुमान सूरज को मधुर फल समझकर निगलने के लिए तैयार न होगा।

ब्रह्माण्ड के बारे में जैसे-जैसे जानकारियाँ बढ़ती जा रही हैं वैसे-वैसे उसके विस्तार का दायरा बढ़ता जा रहा है। अभी वह बचपन की ही अवधि में है इसलिए उसे बहुत समय बढ़ना, फैलना और परिपुष्ट होने में लगेगा। प्रौढ़ता आने के उपरान्त ही वृद्धावस्था की झुर्रियां पड़ना आरम्भ होंगी। कमर झुकेगी। खाँसी, श्वास का सिलसिला चलेगा और घटते-घटते हारा-थका, जरा-जीर्ण होने पर वह मरण की तैयारी करेगा। मरने के उपरांत उसे फिर जन्म लेने में कितने समय भूतकाल जैसी गर्भावस्था में रहना होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता किन्तु यह निश्चित है कि जन्म-मरण के चक्र में पदार्थों एवं प्राणियों की तरह ब्रह्माण्ड को भी गुजरना पड़ेगा। इससे पूर्व यह जन्म-मरण की स्थिति कितने बार आई होगी या भविष्य में कितनी बार आ सकती है, इस गतिचक्र का आदि अन्त क्या है, इस सम्बन्ध में उसका सृजेता ही कुछ कह सकता है। हम अल्पज्ञ प्राणी तो इतना ही कह सकते हैं कि वर्तमान कल्प का प्रस्तुत ब्रह्माण्ड अभी बचपन की अवधि में रह रहा है और क्रमशः बढ़ता-फूलता जा रहा है। सम्भवतः कुछ समय उपरान्त वह फलने भी लगेगा।

अपनी नीहारिका- मन्दाकिनी नाम से जानी जाती है। इसमें एक अरब से अधिक सौर-मण्डल जुड़े हुए हैं। इसका विस्तार एक लाख प्रकाश वर्ष आँका गया है। सम्बद्ध सौर मण्डल उसे केन्द्र मानकर अनन्त अन्तरिक्ष में अपनी निर्धारित कक्षा पर चलते हुए उसकी परिक्रमा करते रहे हैं। अपने सौर-मण्डल को उस परिक्रमा में प्रायः तीस हजार वर्ष लगते हैं। इतना भ्रमण कर लेने के उपरांत वह अपनी पुरानी जगह पर आता है।

आकाश में अपनी मन्दाकिनी जैसी लाखों आकाश गंगाएँ हैं। बहुचर्चित और शोध परिधि में जकड़ी गई ‘एन्डोमेण्ड्रा’ आकाश गंगा हमसे बीस लाख प्रकाश वर्ष दूर हैं।

आकाश को अत्यधिक प्रभावित करने वाले क्वासार तारे अब तक चार खोजे जा सके हैं। इनमें जो निकटतम हैं उसकी दूरी 800 करोड़ प्रकाश वर्ष मानी गई है। यदि वहाँ तक पहुँचने का कोई मनुष्य दावा करे और अब तक विनिर्मित राकेटों के सहारे ढाई हजार मील प्रति घण्टा की चाल से चले तो उसकी पूर्णायुष्य 100 वर्ष होने पर भी आठ करोड़ जन्म लेने पड़ेंगे। यदि वापस भी लौटना हो तो फिर इतने ही वर्ष और चाहिए। यह अनवरत गति होने का लेखा-जोखा है, बीच में तेल पानी लेने या सुस्ताने की आवश्यकता पड़ी तो समय और भी अधिक लग जायेगा।

अपनी मन्दाकिनी से निकटवर्ती दूसरी आकाश गंगा देवयानी (एण्डोमेन्ड्रा) अधिक चमकीली और बड़ी होने के कारण आसानी से देखी जानी जाती है फिर भी यह एक आकाश गंगा परिवार के सदस्य हैं। उनका भी एक मण्डल है और 19 आकाश गंगाओं वाला समूह किसी अकल्पनीय दूरी वाले महा ध्रुव के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करती है। यह भ्रमण पथ 35 लाख प्रकाश वर्ष का है।

अब तक के खगोल पर्यवेक्षणों से 100 अरब आकाश गंगाओं का अस्तित्व खोजा गया है। इन खोज चित्र में मात्र 5 अरब प्रकाश वर्षों की ही परिधि पकड़ में आई जबकि समस्त ब्रह्माण्ड का विस्तार इससे भी कितना ही गुना अधिक है।

माना जाता है कि पदार्थ जब अत्यधिक घनीभूत हो जाता है तब ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होता है। इसी का एक पूरक सिद्धान्त यह भी है कि जब ऊर्जा अत्यधिक घनीभूत होती है तो पदार्थ के रूप में भी परिवर्तित हो जाती है। आत्यन्तिक तापमान 100 करोड़ अंश माना गया है। जब भी इतनी स्थिति पहुँचती होगी तो उसे ठण्डा करने की परिणति पदार्थ रूप में होने लगती है। इसी सिद्धान्त के अनुरूप ब्रह्माण्ड के आदि और अन्त का कारण खोजा जा रहा है। समझा जा रहा है कि तापमान की वृद्धि विकास बेला है और उसके चरम स्तर पर पहुँच जाने के उपरान्त जो ढलान आता है उसे स्थिरता, ढलना, वृद्धता या मरण की तैयारी कह सकते हैं। मानवी आयुष्य क्रम की भाँति ही यह ब्रह्माण्ड भी बढ़ता, फैलता, सिकुड़ता और मरता, जन्मता रहता है।

ग्रह नक्षत्रों की बिरादरी में नये सदस्य बढ़ते रहते हैं और पुराने समाप्त होते रहते हैं। कुछ का तो सर्वथा अन्त हो जाता है और वे पुनः वापस बादल के रूप में लौट जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो अव्यवस्था अस्त-व्यस्तता के चंगुल में फँसकर अपनी दुर्गति करते हैं। कुछ नये बालकों की तरह जन्मते हैं और कुछ प्रेत पिशाच बनकर डरावनी विनाशकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते रहते हैं।

सन् 1054 में किसी विशाल तारे का विस्फोट देखा गया। शुक्र से भी अधिक चमकीला एक अनोखा तारा यकायक आकाश में प्रकट हुआ। वह इतना चमकदार था कि दिन में भी सरलतापूर्वक देखा जा सकता था। यह चमक कई सप्ताह तक रही।

चीनी ज्योतिषियों ने इस जानकारी को सुरक्षित रखा है और उसका कारण किसी तारे का विस्फोट माना है। ऐसे विस्फोटों को सुपरनोवा कहा जाता है। उसका छितराव अभी भी एक छोटे गैसीय गन्ध के रूप में देखा जा सकता है। वह क्रमशः फैल ही रहा है। ऐसे विस्फोट आकाश में सदा ही होते रहते हैं। उनके आधार पर पुरानों का अन्त और नयों का जन्म होता रहता है।

“हारवर्ड स्मिथ सोनियन सेन्टर फार ऐस्ट्रोफिजिक्स” के मूर्धन्य खगोल विज्ञानियों ने अपनी आकाश गंगा केन्द्र में कुछ तारे ऐसे पाये हैं जो शराबियों की तरह बुरी तरह लड़खड़ा रहे हैं और बेढंगी चाल से चल रहे हैं। लगता है उन्हें कोई झकझोर या दबोच रहा है। हरवर्ड गस्की का कहना है कि सम्भवतः वे किसी ब्लैक होल की पकड़ में आ गये हैं और वह उन्हें क्रमशः खींचता निगलता चला जा रहा है।

इसी प्रकार ‘सिगनस’ नक्षत्र समूह का एक तारा जो हमारे सूर्य से प्रायः बीस गुना बड़ा है किसी ब्लैक होल की पकड़ में आ गया है और वह उसके मुँह में घुसता चला जा रहा है।

आकाश में कितने ही ‘ब्लैक होल’ विद्यमान हैं। उनका अस्तित्व होते हुए भी दृष्टिगोचर नहीं होते। कारण कि उनका पदार्थ अत्यधिक सघन है। इस स्थिति में गुरुत्वाकर्षण चरम सीमा पर होता है। इतना चरम कि अपनी परिधि में काम करने वाले प्रकाश को भी बाहर नहीं जाने देता। प्रकाश ही एक ऐसा आधार है जिसके सहारे अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों का अस्तित्व, स्थान एवं क्रिया-कलाप जाना जा सकता है। चूँकि ब्लैक होल कहे जाने वाले तारों का पदार्थ अत्यधिक सघन होने के कारण प्रकाश के बाहर जाने की बात बनती ही नहीं। ऐसी दशा में उनके अस्तित्व का ज्ञान भी किसी को नहीं हो सकता है। अपने इर्द-गिर्द ही कोई छोटा ब्लैक होल यदि मौजूद है तो भी हम उसके सम्बन्ध में तनिक भी जानकारी प्राप्त न कर सकेंगे।

आकाश की इन अन्धेरी गुफाओं में भरे पदार्थ का भार अत्यधिक होता है। वहाँ की एक चम्मच का भार अपनी धरती के 20 करोड़ हाथियों के बराबर भारी बैठेगा। जब कोई तारा मरता है तो उसका द्रव्य सिकुड़ते-सिकुड़ते इतना सघन हो जाता है कि वह ब्लैक होल के रूप में परिणत हो सके।

यह ब्लैक होल ही है जो कभी-कभी इतने विशाल और इतने सशक्त होते हैं कि वे अपनी आकर्षक शक्ति से समीपवर्ती ग्रह तारकों को ही निगल जाते हैं। कई बार वे किसी ग्रह के किसी भाग विशेष को प्रभावित करते हैं और जो उस क्षेत्र की वस्तुओं को खींचकर अपनी खाई खड्ड जैसी झोली में समेट लेते हैं। अपनी धरती पर बारमूडा क्षेत्र में एक ऐसा ही ब्लैक होल का काम करता पाया गया है जो इस क्षेत्र से निकलने वाले कितने ही वायुयानों, जलयानों को निगल चुका है।

प्रस्तुत ब्रह्माण्ड की विशालता और विचित्रता का इस छोटी जानकारी के साथ ही अन्त ही नहीं हो जाता वरन् सम्भावनायें इतनी अधिक हैं जिनका अनुमान लगाने तक में मानवी बुद्धि मापने को असमर्थ दिखती है।

विज्ञात सृष्टि के आरम्भ में जिस गैस बादल के विस्फोट की चर्चा इन पंक्तियों में हुयी है। ठीक उसके समतुल्य एक दूसरा भी ठीक वैसा ही एक अपरिचित गैस बादल इस विनिर्मित ब्रह्माण्ड के इर्द-गिर्द भ्रमण करता पाया गया है। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि वह भी किसी दिन अपना विकास विस्तार इसी प्रकार करेगा जैसा कि अपने इस विज्ञात मेघ ने किसी समय किया था। यदि वैसा हुआ तो उससे नयी समस्याओं का जन्म होगा।

इस संदर्भ में एक नया प्रतिपादन सोवियत खगोल विज्ञानियों ने किया है। उनने सुदूर अन्तरिक्ष में एक बृहत्तर वाष्पीय बादल को देखा है। यह ठीक उसी प्रकार का है जैसा कि विज्ञात ब्रह्माण्ड के आरम्भिक निर्माण काल में विस्फोट से पूर्व था। इन विज्ञानियों का कहना है कि सम्भवतः महा विस्फोट मूल द्रव्य के एक अंश का ही हुआ है और उतने से ही अपने ब्रह्माण्ड में गतिशील निहारिकाओं तथा ग्रह-नक्षत्रों का जन्म हुआ है। शेष अंश अभी भी अपनी आरम्भिक स्थिति में विद्यमान है। कह नहीं सकते कि वह सिकुड़ या फैल रहा है। यह भी विदित नहीं कि वह ठण्डा या गरम हो रहा है। दोनों ही स्थिति में वह अपनी वर्तमान गतिविधियों के अन्तिम चरण तक पहुँचने से पूर्व कोई बड़ा उपद्रव खड़ा करेगा। गरम हो रहा होगा तो ढाई अरब सेन्टीग्रेड तापमान तक पहुँचते-पहुँचते फट पड़ेगा और वैसे ही एक नये ब्रह्माण्ड को जन्म देगा जैसाकि हमारे परिचय घेरे में धीरे-धीरे आता जा रहा है। तब वह महा विस्फोट अपने वर्तमान ब्रह्माण्ड के साथ टकराकर ऐसी स्थिति में पैदा कर सकता है जैसा कि अपने सौर मण्डल में मंगल और बृहस्पति के मध्य परिभ्रमण करने उल्का खण्डों की शृंखला बनकर छितराई स्थिति में घूमते देखा जा सकता है। ठण्डा होने और सिकुड़ने की प्रक्रिया भी कम खतरनाक नहीं है। वह भी चरम सीमा पर पहुँचते-पहुँचते नये किस्म के संकट उत्पन्न करती है। यह भी हो सकता है कि वह अति दूरगामी गैस बादल अपने ब्रह्माण्ड के निकट चला आवे और परिवार का सदस्य बनकर रहने लगे। मानवी बुद्धि को उसकी सत्ता की ससीमता देखते हुये सृष्टा की इस विशाल संरचना के मर्मों को समझ सकना अति कठिन प्रतीत होता है तो भी हम क्रमशः सत्य और तथ्यों की ओर बढ़ ही रहे हैं। इस मार्ग पर चलते रहकर हम न केवल सृष्टि के रहस्यों को वरन् सृष्टा के सान्निध्य अनुग्रह को प्राप्त कर सकने में भी समर्थ हो सकेंगे।


Quotation

अतीव सूक्ष्मं परमात्मतत्वं न स्थूल दृष्ट्या प्रत्तिपत्तु मर्हति। समाधिनात्यन्त सुसूक्ष्मवृत्या ज्ञातव्यमार्यैरति शुद्धबुद्धिभिः॥ -विवेक. 361

अर्थात्- अति सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्म-तत्व का दर्शन स्थूल दृष्टि से किया जाना शक्य नहीं है। अतएव सूक्ष्म बुद्धि वाले सज्जनों को समाधि द्वारा अति सूक्ष्म वृत्ति से उसे जानना चाहिए।


यहाँ ध्रुव कुछ नहीं सभी परिवर्तन शील है।

गाड़ी के पहिये घूमते रहते हैं और धुरी यथास्थान स्थिर रहती है। इसी प्रकार समझा जाता रहा है कि पृथ्वी का एक ध्रुव स्थान है जिस पर वह लट्टू की कील की तरह घूमती रहती है। यह स्थिरता का सिद्धान्त अब निरस्त हो गया है और माना जाता है कि इस ब्रह्माण्ड में हर वस्तु गतिशील है। स्थिरता किसी के भी भाग्य में बदी नहीं है।

पृथ्वी नारंगी जैसी शकल की मानी गई है। उसके दोनों सिरों पर गड्ढे हैं। भीतर धँसा हुआ उत्तर ध्रुव और बाहर उभरा हुआ दक्षिण ध्रुव। सामान्य गोलाई पृथ्वी पर अन्यत्र तो है पर इन दोनों क्षेत्रों में व्यतिक्रम हुआ है। इसलिए सूर्य से सम्बन्धित अनुदानों का लाभ वहां अन्यत्र की तरह नहीं मिलता है। गढ्डे अपने किस्म का व्यतिरेक उत्पन्न करते हैं। पृथ्वी की भ्रमण कक्षा भी वृत्ताकार न होकर अण्डाकार है। साथ ही वह लट्टू की तरह चटकती हुई भी घूमती है। ऐसे ही कुछ अन्य कारण भी हैं जिनके कारण ध्रुवों की स्थिति में व्यतिरेक उत्पन्न होता है। वहाँ छह महीने की रात और छह महीने का दिन होता है, पर वह दिन भी वैसा नहीं जैसा कि हम अपने यहाँ देखते हैं। इसी प्रकार वह रात भी वैसी नहीं होती जैसी अन्यत्र होती है। यह व्यतिरेक ध्रुवों की अपनी भिन्नता विचित्रता के कारण है। व्यक्ति हो या ग्रह-नक्षत्र अथवा धरातल का कोई भाग खण्ड, सामान्य से असामान्य की स्थिति में रहेगा तो उसे असाधारण परिस्थितियों में भी रहना होगा। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की परिस्थितियाँ धरातल के अन्य स्थानों से इसी कारण भिन्न हैं। वहाँ और भी कितने ही आश्चर्यजनक दृश्य एवं तथ्य दृष्टिगोचर होते हैं।

उत्तरी ध्रुव में प्रायः सीटी जैसी पैनी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती रहती हैं। यह अन्तरिक्ष से धरती पर उतरने वाले अनुदानों की जानकारी देती हैं। इनके उतार-चढ़ाव को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि किस स्तर के प्रवाह ऊपर से नीचे आ रहे हैं। इस क्षेत्र में 7000 मील की ऊँचाई पर विद्युतीय गैसों का बादल मंडराता हुआ देखा गया है। समझा जाता है कि वह छलनी का काम देता है और उन्हीं ऊर्जाओं को धरती पर उतरने देता है जो उसके काम की हैं।

उत्तरी ध्रुव की धरती भीतर की ओर धँसी है। इसकी गहराई 14000 हजार फुट है। दक्षिणी ध्रुव ऊँट की पीठ पर देखे जाने वाले कूबड़ की तरह ऊपर उठा हुआ है। यह उभार 19000 फुट है। यहाँ की बर्फ स्थिर है जबकि उत्तरी ध्रुव पर वह बहती रहती है। वहाँ एस्किमो जाति के मनुष्य तथा कुत्ते, हिरन, रीछ जैसे प्राणी पाये जाते हैं पर दक्षिणी ध्रुव पर पेन्गुइन और बिना पंख वाले मच्छर के अतिरिक्त और कोई प्राणी नहीं है। इस क्षेत्र में रात धीरे-धीरे आती है और सूर्य बहुत कम समय तक निकलता है फिर भी उसके अस्त होते समय की लालिमा देर तक छाई रहती है। रात्रि बहुत लम्बी होती है। उसमें उत्तर दिशा में ही थोड़ी-सी प्रकाश आभा दीख पड़ती है। सूर्य किरणों के विचित्र मोड़-मरोड़ों के कारण इस क्षेत्र के आकाश में चित्र-विचित्र दृश्य दीखते रहते हैं। कभी-कभी सूर्य हरे रंग का दीख पड़ता है।

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की अपनी-अपनी विचित्रताएँ हैं, जो अजनबी को हतप्रभ कर देने के लिए पर्याप्त है। कई वस्तुएँ जमीन पर होते हुए भी अपने आकार से कई गुनी बड़ी दिखाई पड़ती हैं और हवा में अधर में लटकी हुई प्रतीत होती हैं। कई बार बर्फ में, कई बार हवा में ऐसे नकली सूर्य-चन्द्र चमकने लगते हैं जो अवास्तविक होते हुए भी वास्तविक जैसे प्रतीत होते हैं। उत्तरी ध्रुव में रातें सामान्य क्षेत्रों के बीस दिनों के बराबर लम्बी होती हैं। क्षितिज में सूर्य का दर्शन भी 16 दिन तक बना रहता है। चन्द्रमा की रोशनी में सूर्य के प्रकाश की तरह काम हो सकता है।

यह दृश्यमान ध्रुव हुए। इसके अतिरिक्त दो अदृश्य ध्रुव भी हैं जिन्हें विद्युत चुम्बकीय ध्रुव कहते हैं। वे स्थान बदलते रहते हैं। जबकि दृश्यमान ध्रुवों का स्थान परिवर्तन बहुत धीमी गति से होता है। जब होता है तब धरातल को प्रभावित करता है। समुद्रीय भाग का कुछ अंश थल के रूप में उभरता और थलीय भाग पानी में डूबता देखा गया है। महाद्वीपों की स्थिति में इसी कारण परिवर्तन होते रहे हैं। कुछ भाग बँटकर विलग हुए हैं। और कुछ विलग खण्डों को समीपता का लाभ मिला है। वे जुड़कर एक हो गए हैं। किन्तु विद्युत चुम्बकीय ध्रुवों के परिवर्तन से ऐसी भौगोलिक हेरा-फेरी नहीं होती। उनके कारण पृथ्वी के वातावरण पर प्रभाव पड़ता है और प्राणियों का आन्तरिक स्तर इस कारण बदलते हुए देखा गया है।

नक्शे में दिखाये गये उत्तर दक्षिण ध्रुव भौगोलिक हैं। नारंगी के शकल वाली धरती के दो सिरे गड्ढे एवं टीले जैसे हैं, यही सर्वविदित ध्रुव हैं। चुम्बकीय ध्रुव इससे भिन्न होते हैं। इन दिनों चुम्बकीय और भौगोलिक ध्रुव अति समीप होने के कारण उनकी संयुक्त स्थिति का परिचय हमें प्राप्त हो रहा है। पर सदा से ऐसा न था। और सर्वदा ऐसा रहेगा भी नहीं। चुम्बकीय ध्रुव अपना स्थान बदलते रहते हैं। यहाँ तक कि वे घूमते-घूमते एक दूसरे के स्थान तक पहुँच जाते हैं। पृथ्वी के आरम्भिक दिनों वाला उत्तरी ध्रुव दक्षिण छोर पर आया है और दक्षिण वाले ने उत्तर वाले के स्थान पर अधिकार कर लिया है। अनुमान है कि अब से दो हजार वर्ष बाद सन् 4000 में फिर यह ध्रुव परिवर्तन की एक परिधि पूरी कर लेगा। इस अवधि में एक या दो शताब्दियों का समय ऐसा भी गुजरेगा जिसमें पृथ्वी का सामान्य गुरुत्वाकर्षण शक्ति में बेतरह घट-बढ़ होने के कारण भयानक उथल-पुथल होगी।

चुम्बकीय परिवर्तनों के अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं। उस कारण न केवल शीत ग्रीष्म की स्थिति में भयानक परिवर्तन हो सकते हैं वरन् प्राणियों की नस्लें भी बदल सकती हैं। भूतकाल में कितने ही हिम युग आये हैं और सर्दी की अधिकता और बर्फ का भरमार से प्राणियों की जान बचना कठिन हो गया है। जिनकी सूझबूझ काम दे गयी या जिन्हें आत्मरक्षा के साधन मिल गये, मात्र वे ही जीवित रह सके। इसी प्रकार ग्रीष्म युग में ध्रुवों की बर्फ पिघलने से समुद्र की सतह ऊपर उठी है और कितने ही महाद्वीपों को उदरस्थ करने के साथ-साथ ही नये द्वीप नीचे से ऊपर उछलने का उपक्रम बना है। इस प्रकार धरातल और समुद्र के स्थानों में आश्चर्यजनक परिवर्तन होते रहे हैं। यह सब पृथ्वी की चुम्बकीय क्षमता में व्यतिरेक उत्पन्न होने के कारण होता रहा है। इसका मूलभूत कारण ध्रुवों का स्थान बदलते रहना ही है।

ध्रुवों का असाधारण परिवर्तन अब से 90 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। उस समय की समुद्री तल छट निकालकर नील उपडाइक जैसे मूर्धन्य शोध कर्त्ताओं ने जाना है कि इस चुम्बकीय व्यतिरेक के कारण समुद्र क्षेत्र में ‘रेडियो लारिया’ नामक एक जीव कोश अचानक ही उपज पड़ा, साथ ही पूर्ववर्ती कितने ही जीवन घटकों का लोप हो गया। कितनों ही में आनुवाँशिक परिवर्तन हुए और पुरानी शकल सूरतों में भारी उलट-पुलट हो गई। ऐसा इसलिए हुआ कि धरती की चुम्बकीय दुर्बलता देखकर आकाश से कास्मिक किरणें उतर पड़ी और उनके प्रभाव से प्राणियों की नस्लें तथा पदार्थों की विशेषताओं में असाधारण व्यतिरेक उत्पन्न हुआ। कितने ही छोटी जाति के प्राणी बहुत बड़े आकार के हो गये और कितने ही विशालकाय होने पर उस बोझ से आत्मरक्षा न कर सके और सदा के लिए समाप्त हो गये। कितनों की जातियों का तो पूरी तरह रूपांतरण ही हो गया।

ध्रुवों की स्थिति का पर्यवेक्षण करने पर कई तथ्य सामने आते हैं। उनमें से एक यह है कि यहाँ कोई वस्तु स्थिर नहीं। दूसरा यह कि मानवी पुरुषार्थ का अत्यधिक महत्व होते हुए भी वह सर्वशक्तिमान नहीं है। उसे भी न केवल धरातल की वरन् ब्रह्माण्डीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होना पड़ता है। इन तथ्यों का निष्कर्ष यह निकलता है कि हम न केवल परिवर्तनों का सामना करने की तैयारी रखें वरन् यह भी सोचें कि जानकारियाँ जो हस्तगत हैं, वे पूर्ण नहीं है। उनमें क्रमिक विकास की दिशा में बढ़ते हुए पिछली मान्यताओं की अपेक्षा अधिक प्रमाणित जानकारियां प्राप्त होती रही हैं। अभी इसमें और भी सुधार की गुंजाइश रहेगी। आत्यंतिक सत्य तक पहुँचने के लिए अभी बहुत समय धैर्य रखना पड़ेगा। साथ ही यह भी समझना होगा कि उपलब्ध जानकारियाँ न तो परिपूर्ण हैं और न स्थिर। इसलिए अपने मस्तिष्क के कपाट खुले रखे और अधिक जानने की जिज्ञासा रखते हुए, वर्तमान मान्यताओं को पत्थर की लकीर न मानें। न ही पूर्वाग्रहों से प्रभावित होकर भविष्य सुधार की सम्भावनाओं से आँखें बन्द कर लें।

ध्रुवों के परिवर्तन क्रम को देखते हुए दूसरा निष्कर्ष यह निकलता है कि इस हेर-फेर के लिए बाधित करने वाली अन्तर्ग्रही परिस्थितियों का महत्व कम नहीं है। हमारी स्वतंत्रता सीमित है। पुरुषार्थ पर भी सीमा बन्धन है। भूलोक इस ब्रह्माण्ड परिवार का एक छोटा सा घटक और मनुष्य व्यापक प्राणि जगत का एक नगण्य सा सदस्य है। हमें अपनी मर्यादाएँ समझनी चाहिए और पारिवारिकता के अनुबंधों को ध्यान में रखकर अपनी रीति-नीति निर्धारित करनी चाहिए।

अरस्तू के ब्रह्माण्ड का केन्द्र अपनी पृथ्वी थी और अन्य सभी ग्रह-नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते थे। रोमन चर्च ने भी यही मान्यता अपना ली। बाद में जब गैलीलियो, कोपरनिकस, न्युटन आदि ने उस मान्यता में परिवर्तन करने का प्रयास किया तो उन्हें पूर्व पंथियों के साथ लड़ाई मोल लेनी पड़ी और उत्पीड़न भरी प्रताड़ना सहनी पड़ी। इससे पूर्व अरस्तू की मान्यता को एक दूसरा खगोलवेत्ता एरिस्यर्कस भी चुनौती दे चुका था। वह सूर्य को ब्रह्माण्ड का केन्द्र बताता था और आकाश को जगमगाते तारों से सजी हुई चादर कहता था।

अब न तो सूर्य ध्रुव केन्द्र है और न महासूर्य, जिसकी परिक्रमा में अपना सौरमण्डल निरंतर परिभ्रमण करता रहता है। महासूर्यों का समुदाय किसी अतिसूर्य के इर्द-गिर्द घूमता है। परिक्रमा क्रम अन्ततः कहाँ तक पहुँचता है, कोई नहीं जानता।

ध्रुव अन्तर्ग्रही परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं तथा प्रभावित करते हैं। पृथ्वी के पास सब कुछ अपना नहीं है। उपलब्ध वैभव में से अधिकाँश भाग तो उसे सूर्य से अनुदान रूप में प्राप्त हुआ है। किन्तु बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती। समूचा ब्रह्माण्ड पृथ्वी को कुछ न कुछ प्रदान करता है। वह साधारण भी होता है और असाधारण भी। यह पृथ्वी की ध्रुवों की सूझबूझ और क्षमता पर निर्भर है कि वे उसमें से कितना आवश्यक उपयोगी समझते हैं और कितना ग्रहण कर सकने की पात्रता से सम्पन्न है।

उत्तरी ध्रुव अन्तर्ग्रही क्षेत्र के सिर का काम करता है। अन्त, जल, वायु जैसे आहार वही ग्रहण करता और पेट में धकेलता है। आँख, कान, नाक आदि बाह्य ज्ञान को मस्तिष्क गह्वर तक पहुँचाने का काम भी शिर का ही है। दोनों ही ध्रुव बेतुका बेडौल होते हुए भी ग्रहण विसर्जन का काम करते हैं। दक्षिण ध्रुव को गुदा मार्ग कहना चाहिए। पचने के उपरान्त जो अनावश्यक मलवा कचरा शेष रह जाता है वह इसी मार्ग से आन्तरिक्ष के खाई खन्दक में धकेल दिया जाता है। इस प्रकार हम अंतर्ग्रही परिस्थिति से सतत् प्रभावित होते भी हैं और करते भी हैं।

ध्रुव क्षेत्र की स्थिति इस ब्रह्माण्ड की भौतिक स्थिति के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी देने और आदान-प्रदान में समर्थ रहने की है। वह स्थिरता के पूर्वाग्रह अपनाने वालों को निरुत्साहित करती है और कहती है- ‘इस परिवर्तनशील विश्व में हम हठवादी न बनें, जिज्ञासु की तरह अधिक और सही जानने की उत्सुकता बनाये रहें। साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि पृथ्वी समेत उसके समस्त जड़ चेतन निवासी किसी विशाल विश्व व्यवस्था के अनुशासन में बँधे हुए उपलब्ध स्वतन्त्रता का इतना ही उपयोग करें जिससे विश्व अनुशासन में विग्रह और व्यतिरेक उत्पन्न न हो। ग्रहण का औचित्य है, वह उपलब्ध भी है। किन्तु विसर्जन की बात को भूलें नहीं ध्रुव ग्रहण और विसर्जन में निरत रहकर ही अपने ग्रह गोलक का सन्तुलन बनाये हुए है। हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियाँ भी इसी विश्व व्यवस्था के अनुरूप बननी और गतिशील रहनी चाहिए।


पुनर्जन्म की कुछ और साक्षियाँ

पिछले जन्म में संचित हुई विशेषताएं अगले जन्म तक चली जाती हैं- इस आधार पर भी पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि होती है। इस संदर्भ में दो तथ्य सामने आते हैं। एक यह कि कुछ बालक जन्म से ही विशिष्ट प्रतिभा साथ लेकर जन्मते हैं, उनकी ज्ञान-सम्पदा इतनी अधिक होती है, जितनी कि कठिन से कठिन प्रयत्न करने पर भी उतना अविकसित मस्तिष्क अपने में इतनी मनीषा भर नहीं सकता। सामान्य विकासक्रम की एक मर्यादा है। यदि उससे व्यतिरेक हो रहा हो, तो समझना चाहिए कि कोई असामान्य तथ्य काम कर रहा है। कम आयु के बच्चों की विशिष्ट प्रतिभा इस तथ्य की साक्षी देते हैं, कि इस जन्म का नहीं, पूर्व संचित ज्ञान का प्रभाव काम कर रहा है।

‘गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ के अनुसार लॉर्ड केवलिन ने 10 वर्ष की आयु में विलियम टॉमसन के नाम से ग्लासगो विश्व विद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी।

उक्त पुस्तक के अनुसार ताइवान के एक मेधावी छात्र जेलू ने 9 वर्ष की वय में वोइस स्टेट विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जेलू की आयु उस विश्वविद्यालय के छात्रों की औसत उम्र से आधी थी। उसने अमेरिका के 4 वर्षीय पाठ्यक्रम को 3 वर्ष में ही पूरा कर लिया। अमेरिकी इतिहास में जेलू स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाला सबसे कम उम्र का प्रथम छात्र है।

डॉन फ्राँसिस्को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में जब प्राकृतिक इतिहास का प्रोफेसर नियुक्त हुआ, तो उसकी आयु मात्र 16 वर्ष थी।

चार वर्षीय वेबेल थाम्पनन अंकगणित त्रिकोणमिति और प्रारम्भिक भौतिक में असाधारण गति रखती है। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने इस अतिशय मेधावी बालिका के लिए अध्ययन का विशेष प्रबन्ध किया है।

रवि किरण नामक ढाई वर्ष का एक भारतीय बालक ने केवल कई वाद्य यन्त्रों का कुशल वादक है, अपितु अन्यों द्वारा गलत बजाए जाने पर उनकी त्रुटि भी बता सकता है- मद्रास संगीत अकादमी ‘न्यास’ ने उसे 50 रुपये प्रतिमास की छात्रवृत्ति देने की घोषणा की है।

दूसरा आधार है- वंशानुक्रम माता पिता तथा मातृकुल के अन्य पूर्वजों की विशेषता साथ लेकर जन्म लेना भी एक प्रकार का पुनर्जन्म ही है। इसके लिए आवश्यक नहीं कि मरण और जीवन का मध्यान्तर रहना ही चाहिए। माता-पिता के शरीर में शुक्राणु डिम्बाणुओं के रूप में निवास करने वाली आत्मा, उस विशिष्ट लोक में निवास करने वाली मानी जा सकती है। गर्भाशय में भ्रूण बनकर विकसित होना भी कुंभीपाक नरक के सदृश्य है। जीवन उस स्थिति में भी विद्यमान रहता है। जन्म लेना उस अदृश्य का दृश्यमान होना भर है। पितृ शरीर से मातृ शरीर के दो लोकों का परिभ्रमण करते हुए, जब मनुष्य प्रसव कार्य से अपनी सत्ता दृश्यमान बनाता है, तो उस प्रत्यावर्तन को एक प्रकार का पुनर्जन्म ही समझा जाना चाहिए।

मन्दबुद्धि, चंचल, उद्धत, अनगढ़ प्रकृति के ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जाते हैं, जिन पर उपयुक्त शिक्षण का प्रभाव भी नगण्य जैसा ही होता है। यही बात शारीरिक विकास के संदर्भ में भी है। कुछ बालक ऐसे होते हैं, जिन्हें कितना ही खिलाया-पिलाया जाय, उनकी निजी विशेषता में बहुत अधिक हेर-फेर नहीं होता।

विकास के साधन उपलब्ध होने पर भी मनुष्य की अपनी निजी विशेषता एक सुनिश्चित तथ्य जैसी बनकर भारी चट्टान की तरह अड़ी बैठी रहती है, और बहुत प्रयत्न करने पर भी उत्साहवर्धक परिणाम उपलब्ध नहीं हो पाता। शारीरिक और मानसिक विकास में मनुष्य की निजी विशेषता का असाधारण महत्व है। सुधार प्रयत्नों से उस पर सीमित प्रभाव ही होता है और परिवर्तन भी यत्किंचित् हो पाता है। मनुष्य के चेहरे, रंग एवं कार्य शक्ति दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि इस भिन्नता का परिस्थितियों या साधनों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। काले नीग्रो अमेरिका जैसे शीत प्रधान देश में गोरों के बीच बसते हुए भी अपने रंग और चेहरे को पीढ़ी-दर-पीढ़ी यथावत् बनाए रहते हैं। इसी प्रकार गोरे लोग दक्षिण अफ्रीका जैसे गर्म क्षेत्र में शताब्दियों में बसे होने पर भी काले नहीं हुए। उनकी सन्तान अपने पैतृक गुणों को यथावत् बनाए हुए है।

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पैतृक गुणों की माता के लिए जिम्मेदारी है- ‘गुणसूत्र’। यह गुणसूत्र शरीर की समस्त कोशाओं में विद्यमान हैं, परन्तु शुक्राणुओं और डिम्बाणुओं में पाये जाने वाले घटक ही तात्कालिक भूमिका का निर्वाह करते हैं। इन गुणसूत्रों में रासायनिक पदार्थ के साथ ही अदृश्य विद्युत प्रवाह घुला रहता है, जिसमें पूर्व पीढ़ियों के अनेकानेक रहस्य एवं सभी कायिक मानसिक विशेषताएँ जुड़ी रहती हैं। इन गुण सूत्रों में एक पितृपक्ष और दूसरा मातृपक्ष का सम्मिश्रण होता है। इनमें पूर्व पीढ़ियों की विरासत सन्निहित होती है। आवश्यक नहीं कि ये सब विशेषताएँ एक ही पीढ़ी में प्रकट हो जायं। आदिमानव की तुलना में अर्वाचीन पीढ़ी में पाये जाने वाले गुणसूत्र अत्यधिक विकसित हैं। उनके साथ एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी के अनुदान जुड़ते चले आये हैं और कुल मिलाकर स्थिति इतनी साधन सम्पन्न बन गई है, कि उनमें पाये जाने वाले पक्षों में यदि उपयोगी अनुपयोगी का भेद एवं उपयोग करना सम्भव हो सके, तो हर स्तर की सन्तति उत्पन्न करना शक्य हो सकता है।

फ्राँस के क्लरमाण्ट शहर का निवासी क्रेटीन एक पादरी था। एक बार घर वालों से किसी बात पर विवाद हो जाने के कारण ईर्ष्यावश उसने एक ऐसी लड़की से विवाह कर लिया, जिसके वंशजों को पीढ़ियों के कुख्यात अपराधी माना जाता रहा था। इस दम्पत्ति से जीन क्रेटीन नामक पुत्र पैदा हुआ, जिसे हत्या और लूटपाट के अपराध में फाँसी दी गई। जीन क्रेटीन के पियरी, टामस और बैपरिस तीन पुत्र हुए। अपने पिता के समान यह तीनों भी अपराध जगत में कुख्यात निकले और यह तीनों भी फाँसी की भेंट चढ़े। पियरी का इकलौता लड़का जीन फ्रांसिस, टॉमस के दो पुत्र- फ्रांसिस और मार्टिन, बैपरिस की एकमात्र सन्तान- जीन फ्रांसिस इन सब में भी हत्या नृशंसता जन्मजात रूप में विद्यमान थी। वह सभी या तो फाँसी से या जेल की सजा भुगतते मरे। मार्टिन का इकलौता बेटा मार्टिन जूनियर केने को सुधार गृह में रखा गया। वहाँ उसने आत्महत्या करली। जीन फ्राँसिस और उसकी पत्नी टेम से सात सन्तानें जन्मी जिनमें सभी पुत्र थे। वह सब भी हत्या एवं अपराध के मामले में मृत्युदण्ड के भागी बने।

9 माह 10 दिन के लगभग की अवधि गर्भधारण की मानी गई है। इस अवधि में लगभग 24 करोड़ 1 लाख 92 हजार सेकेंड होते हैं। तीन सेकेंड से कुछ कम समय में आकृति परिवर्तन होता है। इस हिसाब से उपरोक्त समय में 80 लाख 60 हजार छः सौ छियासठ (लगभग 84 लाख, पौराणिक मान्यता के अनुसार) कलेवर परिवर्तन सम्भव हैं। यह 84 लाख योनियाँ एक लाख योनियाँ एक प्रकार से जीव, जिन-जिन योनि-जीवन में रहकर आ चुका होता है, उसका छाया-चित्रण है।

कई बार इस जन्म-मरण के मध्यान्तर में जीवात्मा अपनी बदली हुई अभिरुचि के अनुसार लिंग-परिवर्तन भी कर लेता है। ऐसे कितने ही प्रमाण मिले हैं, जिसमें एक जन्म का लड़का दूसरे जन्म में लड़की हो गया और लड़की ने लड़के के रूप में जन्म लिया। पूर्ण परिवर्तन न होने की दशा में नपुंसक स्तर का कलेवर मिलता है। कई स्त्रियों में पुरुषों जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई पुरुष स्त्रियों जैसी वाणी बोलते, हाव-भाव दिखाते और उसी स्तर की अभिरुचि प्रकट करते पाए गये हैं।

इन प्रमाणों से भी पूर्व जन्म की संचित-सम्पदा का अगले जन्म तक जाना, प्रकारान्तर से पुनर्जन्म सिद्धान्त की ही अपने सही रूप में पुष्टि करता है।


पदार्थों से जुड़े हुए अभिशाप

पदार्थों में गुण तो हैं पर चेतना नहीं। इतने पर भी वे चेतना के संपर्क में प्रभावित अवश्य होते हैं। इसलिए किन्हीं प्राणवान व्यक्तियों के उपयोग में आयी हुई वस्तुओं का विशेष महत्व माना और प्रभाव देखा जाता है।

तीर्थों की- स्मारकों की- संरचना प्रायः ऐसे स्थानों पर हुई है, जहाँ किन्हीं महाप्राणों द्वारा कोई प्रेरणा कार्य सम्पन्न किये गये। वहाँ असाधारण शक्ति का उद्गम उभरते देखा तो मूक-दर्शियों ने उस उभार में अनेकों को लाभान्वित करने की दृष्टि से ऐसी व्यवस्था बना दी जिसके सहारे जो भी उस संपर्क में आयें, नई चेतना प्राप्त करें।

ऋषियों के आश्रमों में गाय, सिंह एक घाट पानी पीते थे। यह उस क्षेत्र मैं फैले हुए प्राण प्रवाह की ही चमत्कार था। महामानवों के उपयोग में आई हुई वस्तुओं में भी ऐसा प्रभाव पाया गया है, जो उसका सान्निध्य लाभ लें। वे भी कुछ विशेष अनुदान प्राप्त करें।

एल्थिस- अमेरिका के एक बैंक में पुलिस ने एक अँगूठी सुरक्षा पूर्वक जमा की है। यह बिकाऊ है। मूल्य जो भी तय हो जाय, पर देनी उसी को है जो इसे समझ-बूझकर ले और परिणामों की जिम्मेदारी स्वयं उठाये।

इस अँगूठी के पीछे एक अजीब इतिहास जुड़ा हुआ है। वह अभिशप्त है। जहाँ भी गई, जिसके पास रही उसका पट्टाढ़ार करके हटी। ऐसे अनेक चक्रव्यूहों में भ्रमण करते-करते वह अन्ततः पुलिस के कब्जे में जा पहुँची। उस विभाग की समझ में भी न आया कि इसका आखिर क्या किया जाय, कारण कि पुलिस के कब्जे में जो भी वस्तु पहुँचे वह कायदे से उसके मालिक को लौटाई जाय। मालिक के न मिलने पर वह नीलाम ही की जा सकती है। भले ही मूल्य कुछ भी क्यों न मिले। जो राशि मिलेगी वह सरकारी खजाने में जमा होगी।

चर्चित अँगूठी चाँदी की बनी है। उसमें कुछ नगीने जड़े हैं। कहा नहीं जा सकता कि वे असली हैं या नकली। पर देखने में सुन्दर लगती है और मन पहनने को करता है। जिसने भी उसे पाया-खरीदा, पहना या पास रखा, उस पर मुसीबत ही टूटी। यहाँ तक कि अधिकार कर्त्ताओं में से कइयों को अपनी जानें गँवानी पड़ी।

आरम्भ में वह सहज ही खरीदी और पहनी गई। पर जब उसके अभिशप्त होने की चर्चा फैली तो कई साहसी लोगों ने इसे अन्ध विश्वास कहा और उस वहम को मिथ्या साबित करने के लिए हिम्मत के साथ खरीदा और डराने वाली चर्चा करने वालों को डरपोक- भ्रम ग्रस्त सिद्ध करने के लिए जान-बूझकर पहना। इस इरादे को उनने छिपाया भी नहीं वरन् घोषणा पूर्वक धारण किया और कहा- ‘देखें, उनका किस प्रकार क्या कुछ बिगड़ता है।’

इसे आश्चर्य ही कहना चाहिए कि अँगूठी ने किसी को भी नहीं बख्शा। विश्वासी और अन्ध-विश्वासी दोनों पर उसने समान रूप से गाज गिराई। जितनों ने उससे संपर्क साधा, वे आगे या पीछे हाथ मलते और पछताते ही रह गये। जब तक वे अपनी भूल समझते तब तक वे इस दुनिया से ही उठ गये।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना क्रम की शृंखला इस प्रकार है- सन् 1920 में वह सेन फ्रांसिस्को के एक जौहरी के शो केस में रखी थी। उसे भी कोई अनजान आदमी सस्ते मोल बेच गया था। जौहरी उसी दिन से बीमार रहने लगा था। बहुत दिन बाद हालीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता रूडोल्फ वैले जौहरी की दुकान से उसे खरीद लाए। उन्हें वह न जाने क्यों बहुत पसंद आई थी। अभिनेता की सभी फिल्में हिट होती थीं। पर उस अंगूठी को पहनकर जो फिल्म बनी थी, उसका भट्टा ही बैठ गया। बेचारे को दो वर्ष तक किसी कंपनी ने कौड़ी मोल न पूछा। अँगूठी उतारकर जब बक्से में बन्द कर दी तब कहीं नये काम मिले।

यह अँगूठी फिर रुडोल्फ ने पहनी। एक बार वह एक दावत में गया था। अचानक पेट में भयानक दर्द उठा और अस्पताल में पहुँचते-पहुँचते उसकी मृत्यु हो गयी। रुडोल्फ ने मरने से पूर्व वह अंगूठी अपनी प्रेयसी पोला नैग्री को उपहार में दी थी। वह भी हालीवुड में अभिनेत्री थी। पहनने के कुछ ही दिन बाद वह भी बीमार पड़ी, कुछ ही दिन में वह भी मर गई। बीमारी किसी डाक्टर के समझ में न आई।

पोला मरने से पूर्व वह अँगूठी अपने दूसरे प्रेमी संगीतज्ञ कोलवो को दे गई। उसे पहने एक सप्ताह भी न बीता था कि मोटर दुर्घटना में अचानक ही मर गया।

दुर्घटना के उपरान्त यह अंगूठी उसके संगीतज्ञ के मित्र कोंसिलो ने ले ली। आशंकावश कुछ दिन तो उसने उसे ताले में बन्द रखा पर जब कोई अनहोनी बात नहीं हुई तो उसे पहन लिया। एक सड़क दुर्घटना में उसकी भी मृत्यु हो गई।

इसके बाद वह कोंसिलो के भाई डेल के हाथ पड़ी। वहाँ अन्य सामान के साथ में उसे चोर चुरा ले गये। चोर की रास्ते में पुलिस से मुठभेड़ हो गई और वह गोली का निशाना बन गया।

यह अँगूठी पुलिस के कब्जे में चली गई। भेद खुला और इतिहास प्रकाश में आया। संयोगवश रूडोल्फ पर एक फिल्म बनी। उसका पार्ट अदा करना था हैरी नामक अभिनेता को। पुलिस से जमानत पर मांगकर वह अँगूठी लायी गई और फिल्माने के लिए उसे हैरी को पहनाया गया। हैरी भी बीमार पड़ा और अस्पताल में दाखिल होने के बाद जीवित लौटकर घर नहीं आया।

अन्ततः अंगूठी फिर पुलिस के पास वापस पहुँच गई। उसे नीलाम किया जाना है। कई बार पत्रों में विज्ञापन छपाये गये पर कोई खरीदने न पहुँचा तो पुलिस ने उसे थाने में भी नहीं रखा और बैंक के लॉकर में जमा कर दिया।

कब कोई खरीददार आये और वह बैंक से बाहर निकले। इसकी न जाने कितने दिन प्रतीक्षा चलती रहेगी।

जिस प्रकार अच्छे प्रभाव से वस्तुएँ अनुप्राणित होती हैं, उसी प्रकार बुरे लोगों के बुरे कृत्यों के संपर्क वाली वस्तुएँ भी उस माहौल से प्रभावित होती हैं और उपयोग करने वालों का अहित करती हैं। कई मृतात्मा की भी ऐसी ही मनोभूमि होती है कि वे अपनी उद्विग्नता- दुष्टता जिस वस्तु पर उडेल देती हैं वह अभिशप्त बनकर जहाँ भी जाती है संकट पैदा करती है। उनका जो भी उपयोग करता है दुःख पाता है। ऐसा विवरण एक अभिशप्त अँगूठी के बारे में उपलब्ध है।

घटना स्पने के विलमेज नगर की है। उस मकान में एक वृद्धा अपने परिवार सहित रहती और सामान्य गृहस्थी जैसा जीवन गुजारती थी।

सन् 1971 का अगस्त का महीना था। दोपहर का भोजन बनाकर वृद्धा उठ ही रही थी कि उसे सामने की दीवार पर एक आकृति दिखाई पड़ी। भित्ति चित्र जैसी, देखने में वह कुरूप और डरावनी थी। यह अचानक किसने बनायी? क्योंकर बन गई? इस असमंजस में देर तक रहने की अपेक्षा वृद्धा ने यह उपयुक्त समझा कि उसे गीले कपड़े से पोंछकर साफ कर दिया जाय। उसने वैसा ही किया। पर यह क्या, चित्र और भी अधिक साफ हो गया, मानों किसी ने धुँधले शीशे को साफ करके दृश्य और भी अधिक स्पष्ट कर दिया हो।

तस्वीर को मिटाने के कई प्रयत्न किये गये, पर सफलता न मिली। निदान के लिए वृद्धा ने मकान मालकिन को सूचना दी। उसने भी इस आश्चर्य को देखा और मिटाने के प्रयत्न सफल न होते देख कर दीवार का पलस्तर उखाड़कर इसे नये सिरे से करा देने की व्यवस्था की। वैसा हो भी गया। पर यह क्या? तस्वीर और भी दूने आकार की बन गई। न केवल आकार बढ़ा वरन् डरावनापन भी उभरने लगा। लगता था तस्वीर रो रही है और पीड़ा से आक्रांत होकर छटपटाती भी है। मकान मालकिन भी इस अद्भुत प्रसंग से उद्विग्न थी। उसने इन अंकनों को मिटाने के और भी उपाय किये पर सफल न हुए। एक के स्थान पर कई आकृतियाँ उभरने लगीं। उनमें से कुछ पुरुषों की थी, कुछ महिलाओं की।

वृद्धा ने डरकर घर खाली कर दिया और वह अन्यत्र चली गई। मालकिन को डर था कि कहीं उसका घर भुतहा होकर बदनाम न हो जाय- यह बला कहीं उसके परिवार को तंग न करने लगे।

चर्चा फैली। निकटवर्ती शहर कार्डोवा तक समाचार पहुँचा। कौतूहल वश अनेकों दर्शक आने लगे। पत्रकारों की मण्डली आई। वे भी स्तब्ध थे। आकृतियाँ हिलने-डुलने तक लगी थी अपने दुःखी स्थिति का परिचय देने वाले मनोभाव प्रकट कर रही थीं। पत्रकारों ने वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और अधिकारियों तक खबर पहुँचाई, तो वे सब इस अचीज की वास्तविकता परखने के लिए दौड़ पड़े। जो सम्भव था, सो जाँचा और जाना गया पर कुछ हाथ न लगा।

दीवारों पर अंकित होने वाली तस्वीरों का हिलना-डुलना देखकर विशेषज्ञों ने ऐसे यन्त्र लगाये जिनसे यदि वे कुछ वार्ता भी करती हो तो उसका आभास मिल सके। खुले कानों से तो वैसा कुछ सुनाई पड़ता नहीं था। यन्त्र रात्रि भर रखे रहे। सवेरे उन्हें ध्वनि बढ़ाकर सुना गया तो रोने, चीत्कार करने, गिड़गिड़ाने जैसी ध्वनियाँ थीं। वे कुछ कहते भी थे पर जो कह रहे थे वह समझा नहीं जा सका।

निदान यह सोचा गया कि पलस्तर उखाड़ने से परिवर्तन नहीं होता तो फर्श उखाड़कर देखा जाय, शायद उसके नीचे कोई कारण छिपा हो। खोदने पर एक दर्जन नर मुण्ड मिले। उनकी अवधि मध्ययुग के सामन्त काल की थी। अनुमान लगाया गया कि किन्हीं बर्वरों ने कोई नृशंस हत्याकाण्ड करके उनकी लाशें इस स्थान पर गाड़ दी होंगी। मुण्ड वहाँ से बीन कर अन्यत्र पहुँचाये गये। उन्हें विधिवत् दफनाया गया, इसके बाद दीवारों पर आकृतियाँ बननी बन्द हो गईं। सम्भवतः अन्त्येष्टि संस्कार- पिण्डदान- तर्पण के रूप में भारतीय परम्परा इसी कारण ऋषियों ने चलाई थी।

पिलखुवा (मेरठ) के एक आर्य समाजी परिवार में ऐसा प्रेत उपद्रव देखा गया जिस पर सभी स्तब्ध थे। अचानक सबके सामने कपड़ों के समान में आग जलने लगना और कीमती वस्तुओं को देखते-देखते भस्म हो जाना ऐसी घटना है, जिसकी सच्चाई को दर्शकों की भारी भीड़ ने बार-बार दिन दहाड़े देखा है। बन्द बक्शों के भीतर आग जलने लगना- पहने हुए कपड़ों में से शीलें टूटना, ऐसा दृश्य है जिस पर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता, पर वैसा होते अविश्वासियों और शंकाशीलों ने भी देखा है। उसके पीछे किसी की खुराफात तो नहीं है, इसके सभी सुरागों पर गुप्तचर विभाग ने हर सन्देह को ध्यान में रखा है पर जाना कुछ न जा सका।

मरण के उपरान्त भी जीवन की सत्ता बनी रहती है। न केवल सत्ता का अस्तित्व रहता है वरन् सम्बन्धियों के साथ किसी न किसी प्रकार सम्बन्ध बनाये रहने की भी उसकी इच्छा रहती है। कभी यह सम्बन्ध उदार होते हैं, उनमें सहयोग दृष्टिगोचर होता है। कभी आक्रोश प्रतिशोध। आमतौर में उद्विग्न आत्मायें अपने विक्षोभ को डरावने या हानिकारक प्रसंगों के रूप में प्रकट करती हैं। हत्या, अपघात, दुर्घटना आदि से जो बिना पूर्व तैयारी का मरण होता है उसमें उद्विग्न रहने के अधिक सम्भावनाएँ रहती हैं और ऐसी आत्माएँ ही प्रायः दूसरों को डराती या त्रास देती जाती हैं। इसके विपरीत सन्तुष्ट, उदात्त और भावनाशील आत्माओं को संपर्क और सौजन्य एवं सहयोग ही प्रदान करता देखा गया है।


सर्वोपरि यज्ञ-पीड़ा निवारण

ऐसा भयंकर अकाल पहले कभी नहीं पड़ा था। समस्त अभयारण्यक ताप और भूख की ज्वाला में जल रहा था। राजकोष में जमा अन्न भण्डार भी समाप्त हो चला था। अन्न एवं पानी के एक साथ अभाव पड़ने से क्षुधार्थ लोग दम तोड़ रहे थे। राहत के सारे राजकीय उपाय-उपचार असफल सिद्ध हो रहे थे। सम्राट विडाल ने सभी मनीषियों, तत्त्वदर्शियों तथा ज्योतिर्विदों की गोष्ठी बुलायी। विचार विमर्श का क्रम चला। सर्वसम्मति से निश्चय हुआ कि भगवान इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए विशाल यज्ञ का आयोजन किया जाय। तैयारियाँ आरम्भ हुईं।

सन्त शार्गंधर भी उसी प्रदेश में रहते थे। उनके दो पुत्र, पत्नी भी क्षुधा पिपासा के कारण प्राण त्याग चुके थे। असमय सगे सम्बन्धियों पुत्रों के बिछुड़ने का उन्हें जितना दुःख हुआ, उससे अधिक इस बात का था कि यदि उपाय न निकला तो प्रदेश की अधिकाँश जनता अकाल के कारण दम तोड़ देगी। इस आशंका से सन्त का हृदय द्रवित हो उठा।

भूख की ज्वाला में जल रहे लोगों के लिए अन्न का प्रबन्ध करना पहली और प्रमुख आवश्यकता थी। पड़ौसी राज्य से सहयोग पाने अन्न जुटाने के लिए वे चल पड़े। कौमीलिया नामक स्थान पर जाकर एक धनाढ्य के यहाँ नौकरी कर ली। ब्राह्मण सन्त की विद्वता तथा आचरण की पवित्रता से विशेष प्रभावित हुआ। वास्तविकता मालूम होते ही उसने सन्त को एक सहस्र मुद्राएं दीं। उन्हें लेकर वे स्वदेश लौटे किन्तु अभी सीमा पर ही पहुँच पाये थे कि देखा सैकड़ों व्यक्ति भीख माँग रहे हैं, भूख से पीड़ित हैं। सन्त की करुणा उमड़ी, एक सहस्र मुद्राएं उन्होंने भूखे लोगों को बाँट दी और फिर काम की खोज में लौट पड़े।

इस बार एक किसान के यहाँ नौकरी मिली। किसान उनकी परिश्रमशीलता से बहुत प्रभावित हुआ। प्रसन्न होकर उसने बहुत-सा अन्न तथा कुछ मुद्राएँ दीं। जैसे ही कमाई लेकर राज्य सीमा में प्रवेश किया, अनेकों नारियाँ अपने मरणासन्न अबोध बच्चों को लिए बिलख रही थीं। अपने बच्चों के मरण का दुःख वे भुगत चुके थे। स्मृति पटल पर वह याद अभी ताजी थी। बिना विलम्ब किये उन्होंने उस मुद्रा से वस्त्र खरीदे तथा उसे अन्न सहित स्त्रियों में बाँट दिया। पुनः वे वापस लौटे और एक चाण्डाल के यहाँ काम करना आरम्भ किया।

पूरे सप्ताह काम करने के बाद चाण्डाल ने उन्हें पाँच रोटियाँ दी। शार्गधर को इस बीच भूखे रहकर ही काम करना पड़ा। रोटियाँ लेकर अपने घर वापस चले। जैसे ही एक गाँव में पहुँचे, एक कारुणिक दृश्य दिखायी पड़ा। एक किसान के छः पुत्रों को कहीं से एक रोटी मिली थी। सभी भूखे थे। रोटी, एक दूसरे से छिनने के लिए झगड़ रहे थे। सन्त का हृदय हाहाकार कर उठा। एक रोटी के लिए ऐसी छीना-झपटी! दुर्दैव का यह कैसा प्रकोप? उन्होंने बच्चों को शान्त किया और अपनी पाँचों रोटियाँ बच्चों में बांट दीं। बच्चे शान्त हो गये। रोटियां खाने लगे। उनकी नम आंखें मूक रूप से सन्त के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही थीं।

यह दृश्य सभी दैव शक्तियाँ देख रही थीं। जैसे ही उन्होंने लड़कों के हाथ में रोटियाँ थमायीं उसी क्षण आकाश में तेज ध्वनि हुई, बिजली कड़की, देखते ही देखते घनघोर घटाएँ आकाश में घिर आयीं और मूसलाधार बारिश होने लगी। उसी दिन से अकाल का प्रकोप समाप्त हो गया। प्यासी धरती ने जी भर कर अपनी प्यास बुझायी। परितृप्ति होते ही उसके पेट से अंकुर फूटने लगे।

उधर सम्राट विडाल के यहाँ यज्ञ की सभी तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी थीं। मंगल कलश स्थापित किये जा चुके थे। इन्द्र देवता का आह्वान आचार्यगण कर रहे थे। एकाएक वृष्टि आरम्भ हुई देखकर विद्वान गण आश्चर्यचकित रह गये। उन्होंने इन्द्रदेव की स्तुति की। वे प्रकट हुए। आचार्यगण ने सविनय पूछ- देवेश! इस अप्रत्याशित कृपा का कारण क्या है? न ऋचाएं बोली गयीं, न आहुतियाँ पड़ीं, न यज्ञ पूरा हुआ। पर इसके उपरान्त भी आपकी करुणा मेघ बनकर कैसे बरसने लगी?

देवेन्द्र मुस्कराये, बोले- तात! यज्ञ तो पूरा हो गया। अब आप किस यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। विद्वानों की सभा में खलबली मच गयी। सबके मुँह से एक ही प्रश्न निकला- किसने सम्पन्न किया यह यज्ञ?

इन्द्र ने सन्त की परदुःख का कारण बताते हुए कहा- मनीषियों! परमार्थ- सबसे बड़ा यज्ञ है। जहाँ यह यज्ञ सम्पन्न होता रहेगा, वहाँ अकाल की छाया टिक नहीं सकती सुख शान्ति एवं समृद्धि की वृद्धि ऐसे ही यज्ञ पर अवलंबित है।


मरण से भयभीत न हों

जीवन में और कोई घटना निश्चित हो या न हो, परन्तु मृत्यु एक अनिवार्य घटना है। अन्य घटनाओं की संभावना को फिर भी टाला जा सकता है परन्तु मृत्यु को टाल पाना आज तक किसी के लिए भी सम्भव नहीं हुआ है। इस तथ्य से सभी लोग परिचित हैं फिर भी मृत्यु का भय जितने लोगों को कपा देता है उतना भय अन्य किसी भी कारणों से नहीं होता। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि मृत्यु के साथ ही अपने अस्तित्व का नष्ट हो जाना भी मान लिया जाता है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भारतीय दर्शन मृत्यु को आत्मा का देह परिवर्तन मात्र मानता है। पुराने कपड़े उतार कर नये कपड़े पहनने की तरह ही आत्मा पुराना, जीर्ण शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है। यह तथ्य केवल दार्शनिक आधार पर ही नहीं, वैज्ञानिक आधार पर भी सिद्ध हो चुका है।

मरण से भयभीत होने का दूसरा कारण यह है कि लोग मृत्यु को बहुत ही यन्त्रणादायक, कष्टप्रद और दुःखदायी प्रक्रिया मानते हैं। समझा जाता है कि मृत्यु के समय भयंकर वेदना होती है। तथ्यों का अन्वेषण करने पर यह धारण भी निर्मल सिद्ध हुई है, पश्चिमी देशों में वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काफी अन्वेषण किया है और उन लोगों से मिल कर तथ्य एकत्रित किये हैं जो आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए थे और पुनः जीवित हो उठे या जिनकी थोड़े समय के लिए मृत्यु हुई थी। इस विषय पर कई पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं जो बहुत चर्चित हुई हैं।

इसी तरह की पुस्तकों में एक है ‘जौन वेस्ट” जिसके लेखक हैं एस.एस.वार्ड। वार्ड ने इस पुस्तक में परलोक गत आत्माओं ने संपर्क स्थापित कर उनके अनुभवों का तो विवरण दिया ही है, उन व्यक्तियों के अनुभव भी संकलित किये हैं जो थोड़े समय के लिए मरे थे अर्थात् मरकर पुनः जीवित हो उठे थे। ऐसे ही एक व्यक्ति का अनुभव अपनी पुस्तक में संकलित करते हुए उन्होंने उसी व्यक्ति के शब्दों में पृष्ठ 28 पर लिखा है- “मृत्यु के आगमन पर मुझे एक प्रकार का बोझ सा अनुभव होने लगा। धीरे-धीरे मुझे ऐसा आभास होने लगा कि यह बोझ खिसकता जा रहा है। कुछ ऐसी अनुभूति थी, जैसे कोई मेरा हाथ भीगे दस्ताने पर से निकाले रहा हो। अन्धकार जो पहले बहुत गहरा अनुभव हो रहा था, अब तिरोहित हो गया और मैं अपने आपको प्रकाश में अनुभव करने लगा। इस प्रकाश में मैं अपने आसपास खड़े व्यक्तियों को स्पष्ट देख रहा था। मैं अब बिल्कुल मुक्त था और अपने शरीर को बिस्तर पर पड़े हुए देख रहा था। उस समय मेरा ख्याल है, किसी ने कहा, यह अब चला गया उसके बाद कमरा और उसकी अन्य वस्तुएँ धुँधली पड़ती गई और धीरे-धीरे ओझल हो गई। मैं फिर एक बहुत ही सुन्दर दुनिया में था।

‘डेथ एन इण्टरेस्टिंग जर्नी” पुस्तक के लेखक एल्विन ने विभिन्न व्यक्तियों और माध्यमों से संपर्क कर मृत्यु के समय जो बीतती है, उसके सम्बन्ध में व्यापक छानबीन और जाँच-पड़ताल की। इसके बाद ही उन्होंने यह पुस्तक लिखी। एल्विन के अनुसार मृत्यु के समय घटना बड़ी तीव्र गति से घटती है और जीवात्मा एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करती है जहाँ बहुत तेज कम्पन होते हैं। यह अपने-अपने विश्वासों पर आधारित है कि मृत्यु के समय क्या अनुभव होता है? तथा कैसा लगता है? किन्तु यह निश्चित है कि हमारी जीवात्मा की चेतना शरीर की चेतना बोध शक्ति से बहुत सूक्ष्म और आगे होती है। इसलिए वह अपने पुराने मकान को छोड़ने के लिए पहले से ही तैयार रहती है। यहाँ तक कि कोई दुर्घटना घटने की स्थिति में भी जीवात्मा दुर्घटना से पहले ही अपने शरीर को छोड़ देती है। इस प्रकार दुर्घटना में मरने वाले व्यक्तियों का अपने शरीर पर लगने वाली चोटों का न ज्ञान होता है, न उससे कोई पीड़ा ही होती है। आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्तियों को इसीलिए पीड़ा का अनुभव नहीं होता कि उनकी जीवात्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी होती है। उदाहरण के तौर पर एक सिपाही को, जिसके मस्तिष्क में गोली लगती है, कुछ अनुभव नहीं होता बल्कि वह पूरे होश में यह देख पाता है कि एक क्षण पहले वह क्या था? यद्यपि इस तरह की आकस्मिक दुर्घटनाएं ऊपरी तौर पर बड़ी निर्भय, भीषण और दर्दनाक दिखाई पड़ती हैं किन्तु जो मर जाते हैं, उनके लिए मृत्यु कोई विस्मयपूर्ण घटना नहीं होती।”

स्विट्जरलैण्ड के खैलोन हरमन एकबार बर्फ के तूफान में भटक गए थे और वहीं उनका प्राणाँत हो गया। बाद में उन्हें ढूंढ़ा जा सका और सौभाग्य से वे पुनः जीवित हो उठे। पुनर्जीवित होने के बाद उन्होंने बताया कि, “मैं मार्ग की तलाश में घण्टे तक भटकता रहा और जब मार्ग नहीं मिला तो बेहद थक जाने पर निराश होकर गिर पड़ा। इसके बाद मुझे कुछ भी होश नहीं रहा। केवल इतना याद है कि मैं उस अवस्था में बहुत सुख और आनन्द अनुभव कर रहा था। मेरे हाथ बर्फ से ठिठुर गये थे। बर्फ का गिरना मुझे बेहद सुखकर लग रहा था। उस समय मेरी एक माया आकाँक्षा यही थी कि सब कुछ ऐसा ही चलता रहे और कहीं कोई विघ्न पैदा न हो।

बर्फ पर स्केटिंग करते हुए फिसलकर एक गहरे खड्ड में धंस जाने से कुछ देर के लिए मृतक से हो गए डा. बर्न्ट ने अपना अनुभव इस प्रकार लिखा है- एडिनवरा में बर्फ पर स्केटिंग करते समय मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँच गया जहाँ नीचे की बर्फ बहुत पिघल गई थी और ऊपर बर्फ की हलकी-सी परत ही रह गई थी। मैं उसमें धंसने लगा। अपने आपको बचाने का काफी प्रयत्न किया किन्तु कुछ नहीं हो सका। मैं एक बड़े छिद्र में घुसा जा रहा था। मैं उस अध जमे पानी के अन्दर समा गया और जब ऊपर उठ सका तो अपने आपको बर्फ की सतह के नीचे पाया। मेरी शक्ति जवाब दे रही थी। मैं संज्ञा शून्य हुआ जा रहा था, यहाँ तक कि मेरा खाना भी बन्द हो गया था। मेरे पेट और फेफड़ों में पानी भर गया। इसके बाद मैंने अपनी रक्षा के लिए प्रयत्न करना बन्द कर दिया और जब मैंने प्रयत्न बन्द किये तो मुझे बड़ा आनन्द आने लगा।”

“मैं जानता था कि मैं मर रहा हूँ और उस समय यह जानते हुए भी मुझे बड़ा आनन्द आ रहा था। मुझे न ठंड लग रही थी और न ही मेरा दम घुट रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं एक नर्म कोच पर लेटा हूँ और मेरे चारों ओर एक मधुर संगीत बज रहा है। मैंने अपने चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश संव्याप्त देखा। वह प्रकाश अलौकिक सा प्रतीत होता था। संगीत की ध्वनि मन्द पड़ने लगी थी। किसी चलचित्र की भाँति मेरे विगत जीवन की सारी घटनाएँ मेरी आँखें के सामने नाचने लगीं। आश्चर्य की बात तो यह थी कि मुझे वही घटनाएँ दिखाई देती थी जिनमें मैंने आनन्द ही आनन्द अनुभव किया था, या जिनसे मैं आनन्दित हुआ था।”

मृत्यु के सम्बन्ध में जितने लोगों को अनुभव करने का अवसर मिला है, या जिन व्यक्तियों ने भी इस तरह के विवरण दिवंगत व्यक्तियों की आत्माओं से संपर्क कर प्राप्त किये हैं, उन सभी का साराँश यही है कि मृत्यु कोई दुखद घटना नहीं है। यह घटना नहीं है। यह घटना घटते समय न तो पीड़ा का अनुभव होता है, न ही किसी प्रकार का कोई कष्ट होता है।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारे ‘यौवने’ जरा। तथा देहान्तर प्राप्तिर्धीर स्तत्र न मुह्यति॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ -गीता 2। 13, 22

अर्थात्- जिस प्रकार जीवात्मा इस शरीर में रहते हुए कुमार, युवा और वृद्धावस्था से प्राप्त होता है उसी प्रकार मृत्यु के बाद इसे दूसरा देह प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नवीन शरीर को धारण करता है।

इस तत्वदर्शन का हृदयंगम करने के बाद मृत्यु से भयभीत होने का न तो कोई कारण है न ही औचित्य।


गंध शक्ति का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान

मनुष्य जितना भी कुछ इस जीवन में जानता-सीखता है, उसमें नेत्र और कान दोनों ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज्ञानार्जन का 90 प्रतिशत भाग नेत्रों के हिस्से में आता है। इसी प्रकार कान भी वातावरण से अनुकूल प्रेरणाएँ ग्रहण कर मस्तिष्क पटल में ज्ञान-भण्डार संचित करते हैं। इन दो के अतिरिक्त नासिका भी एक महत्वपूर्ण इन्द्रिय है जिसका प्रायः मनुष्य उपयोग तो अधिक नहीं करता परन्तु घ्राणशक्ति के लिए उत्तरदायी ज्ञान तन्तु जितनी महत्वपूर्ण भूमिका उसके जीवन में निभाते हैं, उसकी उसे अधिक जानकारी नहीं है। वैज्ञानिकों की विकासवादी मान्यता के अनुसार भी यह धारणा बन गयी है घ्राणशक्ति मात्र पशु-पक्षी जगत के लिये जरूरी है।

पिछले दिनों “ऑस्फ्रेजियोलॉजी” नाम से एक नयी विधा विकसित हुई है। इसे घ्राण की तन्मात्रा का विज्ञान माना गया है जिसमें ज्ञान तन्तुओं द्वारा मस्तिष्क को उत्तेजन पहुँचाया जाता है। मनुष्य के अग्र व मध्य मस्तिष्क की केन्द्र स्थली “हिप्पोकेम्पस” कहलाती है। इसका सम्बन्ध नासिका के ऊपरी भाग स्थित एक छलनी नुमा हड्डी की प्लेट से गुजरने वाले स्नायु रज्जुओं के माध्यम से ज्ञान तन्तुओं से होता है जो सुगन्ध व दुर्गन्ध में अन्तर की जानकारी को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं।

स्थूल दृष्टि से पशुओं में यह भाग अधिक विकसित होता है जबकि मनुष्यों में यह सिकुड़ा हुआ बना रहता है। फिर भी सूक्ष्म विश्लेषण की दृष्टि से मानव नासिका लगभग दस लाख से भी अधिक प्रकार की गन्धों को पकड़ने में समर्थ है। मनुष्य ईथर की गंध की सघनता को 603×10–5 ग्राम मॉलीक्यूल्स प्रति लीटर पकड़ सकता है। यह विशिष्टता अपने आप में अद्भुत है।

इसके अतिरिक्त जीवन को स्थायित्व देने वाला अमृत तत्व श्वास द्वारा ही प्राप्त होता है। प्राणवायु को ग्रहण करने, फेफड़ों तक पहुँचाने तथा जीवन धारण किये रहने का कार्य नासिका ही सम्पन्न करती है। श्वास चलना बन्द होते ही मृत्यु सामने आ खड़ी होती है और जीवन नाटिका का यवनिकापात हो जाता है। यह तो नासिका द्वारा सम्पन्न की जाने वाली श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया से सम्बन्धित बात हुई। ज्ञानेन्द्रियों के रूप में नासिका गन्ध शक्ति ग्रहण करने वाली इन्द्रिय है, और यह एक आश्चर्य की बात है कि छोटे कृमि कीटकों से लेकर पशु वर्ग के जीवधारियों तक में कई का जीवन प्रवाह गन्ध शक्ति पर ही निर्भर होता है। नेत्र और कान की अपेक्षा वे अपनी गन्ध शक्ति पर ही ज्यादा निर्भर करते हैं।

मनुष्य के लिए भी घ्राण शक्ति का कम महत्व नहीं है। यदि इस शक्ति को विकसित किया जा सके तो न केवल शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास किया जा सकता है, वरन् प्रचुर मात्रा में आत्मबल अर्जित किया जा सकता है। योग साधना में स्वर विधा को इतना अधिक महत्व इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए दिया गया है। प्राणायाम अभ्यास द्वारा मनुष्य भी अपनी दिव्य घ्राण शक्ति को विकसित करके अतीन्द्रिय क्षमताओं के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकता है।

मनुष्य भले ही अपनी दैनिक क्रिया-कलापों में घ्राण शक्ति का उपयोग सुगन्ध और दुर्गन्ध लेने के लिए ही करता हो किन्तु कई प्राणी इसके सहारे अपना जीवन व्यापार चलाते हैं, आवश्यकता देखकर प्रकृति ने उन्हें यह शक्ति सम्पदा मुक्तहस्त से बाँटी भी है। उदाहरणों के लिए कुत्ते को ही लिया जाय वह केवल सूंघकर ही अपने शत्रु या मित्र की पहचान कर लेता है। कौन व्यक्ति मालिक के घर में चोरी के इरादे से घुस रहा है और कौन यहाँ का पूर्ण परिचित है, पहले से ही आता जाता है, इन बातों का विश्लेषण कुत्ता घ्राण शक्ति के द्वारा ही करता है।

घ्राण शक्ति के विकास की दृष्टि से कुत्ता सम्भवतः अन्य सभी प्राणियों से बाजी मार ले जाता है। यही कारण है कि अपराधी द्वारा अपराध स्थल पर कोई चिह्न न छोड़े जाने के बावजूद भी वह उस स्थान पर फैल गई गन्ध के आधार पर ही मीलों दूर पहुँच गये या हजारों लोगों की भीड़ में खड़े अपराधी को भी पहचान लेता है।

सुरक्षा अभियानों में जहाँ मनुष्य जासूस किसी वस्तु की गन्ध तक नहीं ले पाए, कुत्तों ने भारी मात्रा में शास्त्रास्त्र बरामद कराए। एक बार इसी तरह ‘जे’ नामक एक जासूस कुत्ता शस्त्रों का पता लगाने के लिए एक फार्म की तलाशी ले रहा था। उसके साथ काम कर रहे अन्य लोगों ने फार्म का चप्पा-चप्पा छान मारा परन्तु कहीं कुछ पता नहीं चला। जे अचानक एक पेड़ के पास रुका और वहाँ डटा रहा। पुलिस ने पेड़ के ऊपर चढ़कर देखा तो वहाँ पिस्तौलों का एक बक्सा मिला।

कुत्ते तो अपनी अद्वितीय गन्ध शक्ति के लिए विख्यात हैं ही, अन्य प्राणियों में भी अद्भुत घ्राण शक्ति होती है। चींटियां किसी फर्श या दीवार पर कतारबद्ध होकर चलती है। किसी कारणवश कोई चींटी पिछड़ जाती है या अपने दल से भटक कर किसी दूसरे वर्ग में मिल जाती है तो वे सूंघकर ही पता लगाती है कि सही रास्ता कौन-सा है या अपना दल कहाँ है?

मकरन्द पीकर मधुमक्खियाँ जब वापस अपने छत्ते पर पहुँचती हैं और उसी स्थान पर और दूसरे छत्ते लगे हों तो भी उन्हें अपना छत्ता पहचानने में कोई दिक्कत नहीं होती। मक्खियों की शक्ल सूरत तो एक सी होती है। फिर यह पहचान कैसे होती है कि किसका घर कहाँ है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए जीव विज्ञानी बताते हैं कि गन्ध ही उनकी पहचान का प्रमुख आधार होता है। हर छत्ते की अपनी एक स्वतन्त्र गन्ध होती है। रानी मधुमक्खी की लार ग्रन्थियों से एक गंधयुक्त स्राव निकलता है। इस गन्ध को सभी मधुमक्खियाँ पहचानती हैं और उसी के आधार पर वे अपने छत्ते को पहचान लेती हैं।

मधुमक्खियों की तरह दीमकों के छत्ते में भी एक रानी दीमक होती है और शेष बाँदिया। रानी दीमक जब अण्डे देती है तो उन अण्डों को पालना और रानी के लिए भोजन की व्यवस्था करना बाँदियों का काम होता है। रूप और आकार में रानी भी अन्य दीमकों के समान ही होती है। उसके शरीर में केवल एक विशेष प्रकार की गन्ध निकलती है। उस गन्ध के आधार पर ही दीमकें रानी को पहचानती हैं और उसे विशेष सम्मान तथा विशेष सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

और तो और मधु मक्खियों तथा दीमकों में रानियों की प्रजनन क्षमता भी उनके भीतर विद्यमान विशिष्ट गन्ध उत्पादन की क्षमता से ही उत्पन्न होती है। प्रो. फार्लवान फ्रिश ने इस रस का पता लगाते हुए इसे रानी रस (क्वनी सब्सटैन्स) कहा है। इसका विश्लेषण करने पर पाया गया कि रानी रस में ट्रांस डिसेनोइक एसिड और लियोनीन की प्रधानता होती है, जिनसे एक मादक गन्ध उत्पन्न होती है। यह गन्ध रानी की अपनी विशिष्ट पहचान तो बनाती ही है, उसमें निरन्तर अण्डे उत्पन्न करते रहने की स्थिति भी पैदा करती है। इस गन्ध की मोहक तीव्रता ही बाँदी मक्खियों में प्रणय संवेदना उत्पन्न करती है।

छोटे जीवों का क्रिया व्यापार अधिकाँशतः उनकी घ्राण शक्ति के सहारे ही चलता है। जर्मनी की साइकोफिजियोलाजी प्रयोगशाला, जो स्ट्रासबर्ग में स्थित है के निर्देशक डा. फिलिप कोपार्टस ने दीर्घकाल के प्रयोगों और अध्ययनों के बाद इस निष्कर्ष को प्रतिपादित करते हुए कहा है कि इन प्राणियों की चेतना आँखों की अपेक्षा नासिका के माध्यम से अधिक ज्ञान संवर्धन करती है तथा उसी के सहारे अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करती हैं। वे गन्ध के आधार पर एक दूसरे की शारीरिक और मानसिक स्थिति का परिचयात्मक आदान-प्रदान करती है।

केवल ये छोटे-छोटे कीट पतंग ही नहीं अन्य प्राणी भी गंध शक्ति के आधार पर अपने कई प्रयोजन सिद्ध करते हैं। उदाहरण के लिए लोबो जाति के भेड़िये यह जानते हैं कि शिकारी कुत्ते गन्ध के आधार पर ही उनका पीछा करते हैं। इसलिए जब कभी शिकारी कुत्तों से उनका पाला पड़ जाता है वे अपने भागने का रास्ता इस प्रकार उलटा सीधा करते हैं कि कुत्ते भूल-भुलैया में फँस जाते हैं और उन्हें रास्ता पहचानने में इतनी देर हो जाती है कि लोबो भेड़िये आसानी से बचकर भाग निकलते हैं।

राल बैरोजा की लकड़ी जलाकर जहाँ उसका कोयला तैयार किया जाता है वहाँ की गन्ध में भेड़िये की गन्ध खो जाती है। लोबो भेड़िये इस तथ्य को जानते हैं और जब कभी शिकारी कुत्ते उनके पीछे पड़ते हैं और ऐसा स्थान कहीं आस-पास ही हुआ तो वे भूल-भुलैया रचाने के स्थान पर उन्हीं स्थानों में दौड़े जाते हैं। तब वे अपने आपको अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित अनुभव करते हैं और कई बार ऐसी स्थिति में कुत्तों पर ही आक्रमण कर देते हैं।

चूहे भी गन्ध के आधार पर बिल का रास्ता ढूँढ़ता है, मित्र और शत्रु को पहचानता है तथा कौन-सी वस्तु खाद्य है और कौन-सी अखाद्य इसका विश्लेषण करता है। प्रयोगशाला में चूहों की घ्राणेंद्रियां शल्य क्रिया द्वारा निकाल दी गईं तो देखा गया कि वे एक प्रकार से विक्षिप्त जैसे होते चले गये। उनके लिए अपने पराये का अन्तर कर पाना भी असम्भव सा हो गया।

कैनबरा के कामनवेल्थ एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च आर्गनाइजेशन की एनाटोपिज शाखा के वैज्ञानिकों ने कुछ कृमि-कीटकों के शरीर से निकलने वाले रसों का विश्लेषण कर यह पता लगाया है कि उनकी अधिकाँश हलचलें इन द्रवों के गन्ध के आधार पर ही चलती हैं। विशेषतः प्रजनन कार्य तो इन्हीं गन्धों पर आधारित होता है। फ्राँस के कीट विज्ञानी ई. ओ. विल्सन तथा प्रो. हैनरी फ्रावे भी अपने परीक्षण प्रयोगों से इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि कृमि कीटकों के बीच संवाद और सन्देशों का संचार उनके शरीरों से समय-समय पर उठने वाले विभिन्न रसायनों की गन्ध पर ही निर्भर रहता है।

प्रकृति ने अपनी सभी सन्ततियों के लिए गन्ध शक्ति को आदान-प्रदान और ज्ञान सम्वेदना के अनुभव का प्रमुख आधार बनाकर प्रस्तुत किया है। उसका अपना महत्त्व है। कीट वर्ग पर तो उसी का अधिकार है पशुओं को भी इससे बड़ी सहायता मिलती है। इस प्रकार सृष्टि के अधिकांश प्राणी गन्ध शक्ति का उपयोग अपनी जीवन यात्रा को सफलतापूर्वक पूरी करने में करते हैं।

ऐसी बात नहीं है कि मनुष्य के लिए प्रकृति ने कोई पक्षपात बरता है। सही बात तो यह है कि मनुष्य ने ही अपनी घ्राण शक्ति की उपेक्षा कर उसे निर्बल बना दिया है। उससे इतना लाभ वह नहीं उठा पाता जितना कि उठाया जा सकता है। यों धूप, दीप, पुष्प, चन्दन का देवपूजा में और प्राणायाम विभिन्न प्रयोगों द्वारा उस शक्ति का प्राण शक्ति को विकसित करने के लिए भी अभ्यास किया जा सकता है, हम उसका वह महत्व जानते हैं। प्राचीन काल में योग साधना द्वारा गन्ध शक्ति का विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग करने हेतु जो उपयोग होता था, उसे पुनर्जीवित कर निष्क्रिय समझे जानी वाली इस सामर्थ्य से भी अतीन्द्रिय शक्तियों को जगाया जा सकना सम्भव है। घ्राण एवं प्राण दोनों ही कैसे सुनियोजित किये जायँ, योगविज्ञान इसका सही मार्गदर्शन भी देता है।


सहायता अपने ही बाजुओं से माँगो (kahani)

एक बार एक गरीब आदमी हजरत इब्राहीम के पास पहुँचा और कुछ आर्थिक सहायता माँगने लगा। हजरत ने कहा- ‘तुम्हारे पास यदि कुछ सामान हो तो मेरे पास ले आओ’ गरीब आदमी के पास का तश्तरी, लोटा और दो कम्बल छोड़कर सब सामान नीलाम करा दिया।

नीलाम में प्राप्त हुए दो दिरम उसे देते हुए कहा- ‘एक दिरम का आटा और एक दिरम की कुल्हाड़ी खरीद लो। आटे से पेट भरो और कुल्हाड़ी से लकड़ी काटकर बाजार में बेचो। गरीब आदमी ने यही किया। पन्द्रह दिन बाद लौटकर फिर आया तो उसके पास बचत के दस दिरम थे। हजरत ने कहा- समझदारी का मार्ग यही है कि मनुष्य यदि समर्थ हो तो सहायता अपने ही बाजुओं से माँगे।


विशिष्ट प्रयोजनों के लिए विशेष यज्ञ

विशिष्ट प्रयोजनों के लिए विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट उद्देश्यों के लिए कुछ अतिरिक्त यज्ञ किए जाते हैं। जिनमें भैषज्य यज्ञ, राजसूय, वाजपेय, अग्निष्टोम, सत्रमेध, सोमयाग, पुरश्चरण की प्रमुखता है। इनके संक्षिप्त परिचय इस प्रकार हैं-

अग्निष्टोम- ताण्ड्य ब्राह्मण 6। 3। 8 और शतपथ ब्राह्मण 10। 1। 2। 9 में अग्निष्टोम का विवरण है।

एष वै ज्येष्ठो यज्ञाना यदग्निष्टोम। तस्मात् उह वसन्ते वसने।

अर्थात् यह अग्निष्टोम यज्ञों में ज्येष्ठ श्रेष्ठ है। वह हर बसन्त में किया जाता है।

प्रचलित होलिका उत्सव का अस्त-व्यस्त एवं विकृत स्वरूप इसी पुण्य प्रक्रिया का ध्वंसावशेष है।

बदलते हुए ऋतु प्रभाव का दबाव लोक स्वास्थ्य पर बुरा न पड़े इसकी रोकथाम के लिए अग्निष्टोम किए जाते थे। नयी फसल के नये अन्न में से भगवान का समाज का अंश सर्वप्रथम निकालने की बात को ध्यान में रखते हुए यह विशिष्ट यज्ञ सम्पन्न किए जाते थे। नये उपार्जन का व्यक्तिगत तथा सामूहिक प्रयोजन के लिए किस प्रकार उपयोग हो इसका निर्धारण भी इसी अवसर पर सामयिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाता था।

सोमयाग- सोमयाग व्रत-उपवास प्रधान होते हैं। उनमें आहार तप का यजमान को विशेष अनुशासन पालना पड़ता है। आहार का नियमन तपश्चर्या में गिना जाता है। आहुति का विधान अलग है, पर उसमें साधक की आहार शुद्धि को प्रमुखता दी जाती है।

सोमयाग प्रायश्चित परक होते हैं। जानबूझ कर किए गए पाप, अपराधों अज्ञान में हुए भूलों, आवेश में बन पड़े दुष्कृत्यों के शमन-समाधान का एकमात्र उपाय प्रायश्चित ही है। विस्मरण हो गये विस्मरण हो गये अथवा पूर्वजन्मों के कर्मों का भी दण्डफल तो भोगना ही पड़ता है। उस दण्ड के लिए शासन, समाज या ईश्वरीय विधान की प्रतीक्षा न करके स्वयं ही स्वेच्छापूर्वक उस दण्ड को सहन करने का साहस उभरे तो उसे प्रायश्चित कहा जायेगा।

ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड में अनेक पाप प्रायश्चितों के लिए चान्द्रायण, कृच्छ चान्द्रायण आदि व्रत उपवास करने के साथ-साथ सोमपान पर निर्वाह करने और यजन करने का निर्देश है। सोमपान देवलोक के किसी उल्लासपूर्वक भाव संवेदन को कहा गया है। ऋषियों के लिए सोमवल्ली के रसपान के रूप में उसी का उल्लेख है। सामान्य मनुष्यों के लिए हविष्यान्न एवं यज्ञावशिष्ट चरु पुरोडाश का नाम ही सोमपान है। पुरोडाश चावल का, चरु जौ का बनता है। इसे दलिया या भात की तरह यज्ञ सान्निध्य में विनिर्मित किया जाता है।

विभिन्न पापों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रायश्चित विधानों का उल्लेख विभिन्न धर्म ग्रन्थों में हुआ है। इस संदर्भ में जहाँ शारीरिक-मानसिक तितीक्षा परक कष्ट सहने, व्यक्ति या समाज को पहुँचाई गई हानि की क्षतिपूर्ति करने, तीर्थयात्रा आदि पुण्य-परमार्थ करने का विधान है, वहाँ कषाय-कल्मषों को धोने में सोमयाग जैसे यज्ञकृत्य करने का भी निर्देश है। इस संदर्भ में तैत्तिरीयारण्यक 2। 7-8 वाज. सं 20। 14। 16 तै. आ. 2। 3। 1, बोधायन धर्मसूत्र 3। 7। 1, याज्ञ. 3। 309, मनु. 11। 34, वशिष्ठ. 26। 16, शतपथ 1। 5। 2। 20 देखने योग्य है।

किसी महिला से व्यभिचारजन्य पाप बन पड़े तो उसके लिए वाज. सं. 1। 8। 3 के अनुसार यज्ञ कृत्य करने तथा भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा करने पर प्रायश्चित हो जाता है और उस बन पड़े पाप की समाप्ति हुई समझ ली जाती है। इसके लिए एक विशेष मन्त्र से आहुति देनी पड़ती है। वह मंत्र इस प्रकार है-

“यद् ग्रामे यदरण्य यत्सभायां यदिन्द्रिय। यदेनश्चकृमा वयमिदं तदव यजामहे स्वाहा।”

अर्थात्- जो पाप ग्राम में, वन में, समाज में, इन्द्रियों से तथा दूसरे प्रकार से बन पड़े हैं उन्हें इन आहुतियों के साथ नष्ट करते हैं।

इस संदर्भ में ऐसे ही प्रायश्चित का संकेत मनुस्मृति 8। 105 और याज्ञ. 2। 83 में भी किया गया है।

सत्र- ज्ञानयज्ञों को सत्र कहते हैं। उनमें स्वाध्याय सत्संग, मनन, चिन्तन एवं विचार विमर्श ही यजन माना जाता है। दिनचर्या उसी आधार पर बनती है। यह सामूहिक होते हैं और अधिक समय तक चलते हैं।

भागवत सप्ताह, रामायण कथा, पुराणवाचन, उपनिषद् चर्चा अथवा किसी प्रयोजन विशेष का लगातार प्रशिक्षण अभ्यास कराने की व्यवस्था को सत्र कहा जायगा। नैमिषारण्य में सूत द्वारा शौनकादिक अनेक ऋषियों को लम्बे समय तक कथा सुनाते रहने का वर्णन मिलता है। इस प्रकार के आयोजन को सत्र संज्ञा दी जाती है।

राजसूय-बाजपेय- शतपथ ब्राह्मण 13। 2। 2। 1 में उल्लेख है-

“राज्ञः एवं सूर्य कर्म। राजा वै राजसूयेन दृष्ट्वा भवति।”

अर्थात्- शासन व्यवस्था को राजसूय कहते हैं। राजा इस आयोजन के उपरान्त ही शासन की बागडोर सम्भालता है। आज की स्थिति में संसद विचार मन्थन एवं चुनाव आयोजनों को राजसूय कह सकते हैं। प्रज्ञा की सहमति से प्रजाहित को प्रमुखता देते हुए की जाने वाली शासन व्यवस्था राजसूय है।

इस प्रयोजन के लिए समय-समय पर जनसाधारण को भी एकत्रित करके सभा-सम्मेलनों के रूप में उसका मत जाना जाता था और लोक मानस के सामयिक मार्गदर्शन का प्रबन्ध किया जाता था इस उद्देश्य के लिए होने वाले सभा-सम्मेलनों, वार्षिक आयोजनों को भी यही नाम दिया जा सकता है। विभिन्न संस्थाएँ शासकीय सुव्यवस्था बनाने के लिए प्रस्तुत गतिविधियों की समीक्षा उपयुक्त प्रवृत्तियों में सहयोग करने तथा आवश्यक सुधार के लिए परामर्श देने जैसे प्रयोजनों को लेकर जन सम्मेलन होते रहते हैं वह भी इसी श्रेणी में आते हैं।

विशेष परिस्थितियों में विशेष परिस्थितियों के अनुरूप सामयिक निर्णय करने एवं योजना बनाने की किसी बड़ी बात को लेकर विशालकाय राजसूय यज्ञ होते हैं। महाभारत के बाद भगवान कृष्ण ने और लंका विजय के उपरान्त भावी निर्धारणों के लिए जनता का परामर्श सहयोग प्राप्त करने के लिए विशालकाय राजसूय यज्ञ किए थे। ऐसे ही विशाल आयोजन समय-समय पर अन्यत्र भी होते हैं।

इसी प्रकार बाजपेय यज्ञों में धर्मक्षेत्र में संतुलन बनाये रहने के लिए लोकसेवी विद्वान परिव्राजक एकत्रित सामयिक परिस्थितियों पर विचार करते थे। जो आवश्यक होता था उसका निर्धारण करके अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में लौटते थे। बाजपेय सम्मेलनों में निर्धारित की गई नीति एवं योजना को कार्यान्वित करने के लिए विज्ञजनों को तत्पर किया जाता था। तद्नुरूप वातावरण बनाने, साधन जुटाने की सार्वदेशिक योजना चल पड़ती थी। साधारणतया वे ‘कुम्भ’ जैसे पर्वों के निर्धारित समय पर होते थे और विशेष आवश्यकता पड़ने पर विशेष रूप से किन्हीं स्थानों पर बाजपेय यज्ञों के आयोजन होते थे।

बलिवैश्व- दैनिक संध्यावन्दन की तरह प्रातः सायं जो आहुतियाँ दी जाती हैं उन्हें अग्निहोत्र कहते हैं। प्रातः यज्ञ को सूर्योपासन और सायंकालीन को अग्नि साधना कहा गया है।

“अग्नये एवं सायं सूर्याय प्रातः एव ह वै अग्नि होत्रं जुहोति।” -शतपथ 2। 2। 4। 15

प्रातः सूर्य के लिए और सायं अग्नि के लिए यजन किया जाता है। सूर्य को ज्ञान का और अग्नि को कर्म का प्रतीक माना गया है।

‘स यद्वैश्वदेवेन यजते। अग्निरेव तर्हि भवत्यग्नेरेव सायुज्य सलोकतां जयति...........। -शतपथ 2। 6। 4। 8

अर्थात्- जो भी व्यक्ति वैश्वदेव यज्ञ करता है, वह अग्नि ही हो जाता है और अग्नि के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त करता है।

सायं प्रातर्वैश्वदेवः कर्तव्यों बलिकर्म च। अनशनताति कर्त्तव्यमन्यथा किल्विष्ज्ञी भवेत्॥

प्रातःकाल एवं सायंकाल भोजन से पहले बलिवैश्यदेव करना चाहिए। अन्यथा पाप भाजन बनना पड़ता है।

श्रुति का निर्देश है कि भोजन बनाकर केवल अकेले खाने वाला पाप ही खाता है-

“केवलादो केवलाघो भवति।” -ऋग्वेद

बिना बलिवैश्व किए हुए अकेले भोजन करने वाला ‘पाप’ खाता है अर्थात् पाप का भागी बनता है।

शास्त्र तो यहाँ तक कहता है कि बलिवैश्वदेव करने तक की असमर्थता हो तो मात्र जल से हवन कर लेना चाहिए।

‘जुहुयादम्बुनापि च।’

बलिवैश्वदेव की इस शास्त्रीय परम्परा के पीछे एक ही तथ्य समझ में आता है कि समाज में बहुत से प्राणी ऐसे है जिन्हें अपने जीवन निर्वाह योग्य साधनों के लाले पड़े होते हैं। ऐसे प्राणियों की भोजन-व्यवस्था हेतु साधन-सम्पन्नों को उदारता बरतनी पड़ती है। बलि वैश्वदेव द्वारा ऐसे ही निरीह प्राणियों को पोषण प्राप्त होता है। हवन के सूक्ष्म प्राणयुक्त अंश से उन्हें पोषण मिलता है।

बलिवैश्वदेव के पीछे उसके कर्त्ता के यही भाव दिखाई पड़ते हैं-

येषाँ न माता न पिता न बन्धु, र्नैवान्नसिद्धिर्न तथान्नमस्ति। तत् तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्, प्रयान्तु तृप्तिं मुदिता भवन्तु॥

जिनके माता, पिता या बन्धु-बान्धव नहीं होते हैं, या अन्न की व्यवस्था नहीं है, उन सबकी तृप्ति के लिए मैं अन्न प्रदान करता हूँ- बलिवैश्वदेव करता हूँ।

प्रतिदिन आहुतियाँ देकर इन कर्त्तव्यों की पूर्ति करते रहने की प्रतिज्ञा दुहराई जाती थी। पहले ‘यज्ञ’ परमार्थ पीछे निर्वाह स्वार्थ। यही रीति-नीति भारतीय धर्मानुयायियों की रही है। उसे विस्मृत न होने देने, नित्य, व्यवहार में लाने की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए भी यह दैनिक अग्निहोत्र की प्रथा-परम्परा है। उससे देव अनुग्रह और आत्म कल्याण का लाभ तो है ही।


सेवा योग की साधना की (kahani)

एक सन्त ने सेवा योग की साधना की थी। वे रात में राम नाम जपते, दिन में पीड़ितों की सेवा पतितों की सहायता करने में लगे रहते।

मरने का समय आया। भगवान के लोक में पहुँचे, उन्हें स्वर्ग मिला।

विलास की जिन्दगी जीते-जीते वे ऊब गये। सेवा के बिना उन्हें चैन ही नहीं पड़ता था, सो उनने भगवान से प्रार्थना की- यहाँ मेरा दम घुटता है, मुझे दुःखियों के बीच भिजवा दीजिये। भगवान ने उनकी इच्छा पूरी की। वे फिर दुःखी लोगों के बीच प्रकट हुए और पहले की तरह सेवा कार्य करने लगे।

परिचितों ने पूछा- ‘भला आप तो स्वर्ग चले गये थे। आपको तो पुण्य फल देने के लिये स्वर्ग मिला था, फिर वापस कैसे आ गये?’

सन्त ने कहा- ‘पुण्य का फल नहीं पाप का दण्ड भुगतने वहाँ गया था। सेवा धर्म में प्रगाढ़ निष्ठा होती तो पहले दिन ही स्वर्ग को अस्वीकार कर देता। यही था मेरा पाप उसका दण्ड विलास व्यसन में घुटन सहकर लौटा हूँ।”


समग्र चिकित्सा अध्यात्म के समन्वय से ही सम्भव होगी

मनुष्य काया अद्भुत है- अनुपम है। स्थूल क्रियाकलापों की एक झांकी भर जब हतप्रभ कर देती है तो सूक्ष्म का कहना ही क्या? वास्तविकता तो यह है कि सारे स्थूल क्रिया-कलाप सूक्ष्म की हलचलों पर ही निर्भर है। चेतना के स्पन्दन दृश्यमान स्थूल के काय-कलेवर को सुरक्षित ही नहीं बनाये रखते, उसके प्रत्येक क्रिया-कलाप के प्रत्येक घटक के मूल कारण भी होते हैं। हारमोन्स रूपी अंतःस्रावी रसमय सागर व्यक्तित्व की संरचना, जीवनी शक्ति, जिजीविषा, भाव सम्वेदना, कोमलता-दृढ़ता आदि महत्वपूर्ण पर अदृश्य सामर्थ्यों का निर्धारणकर्त्ता है। इन सूक्ष्म रस स्रावों को प्रत्यक्ष तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इनके परोक्ष चमत्कारों की झांकी हर क्षण देखने को मिलती है। मात्र हारमोन्स ही नहीं- जीन्स व न्यूरोह्यू मरल संस्थान दोनों मिलकर पौरुष एवं दृढ़ता, करुणा एवं कोमलता के लिये भी उत्तरदायी माने जाते हैं। इनकी सूक्ष्म संरचना के कारण ही इन्हें “सटलर सिस्टम” में गिना जाता है।

स्थूल को ही मान्यता देने वाली बहिरंग प्रधान दृष्टि का एक सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो मानव जाति को भुगतान पड़ा है। वह है- अन्तःकरण का शुष्क हो जाना, भाव सम्वेदनाओं-करुणा-उदारता जैसे गुणों का लोप होते चले जाना। आस्थाओं- उत्कृष्टता प्रधान- मान्यताओं का तो मानों आज अकाल ही हो गया है। अन्तः की यही दुर्गति आस्था संकट एवं प्रकारान्तर से रोक-शोकों का मूल कारण जान पड़ती है, ऐसा मत अब बहुसंख्य वैज्ञानिकों- मनोवैज्ञानिकों का बनता चला जा रहा है।

वृक्ष का ऐश्वर्य फल, फूल, पत्तियों के रूप में दिखाई देता है। मूल सत्ता जो इस वैभव का कारण है, उसकी जड़ों में विद्यमान है जो निरन्तर ऊर्जा खींचती और पोषण देती रहती है। जड़ें जितनी मजबूत होंगी, वृक्ष भी उतना ही दृढ़-फल वैभव से सम्पन्न होगा। ठीक यही तथ्य मानवी काया पर भी लागू होता है। अन्तःकरण में संव्याप्त आस्थाएँ- भाव-सम्वेदनाएँ ही वे जड़ें हैं जो मनुष्य को समग्र रूप से स्वस्थ ठहराती है। अन्तः यदि सूखा हो एवं दुष्चिन्तन-कुकल्पनाओं ने मस्तिष्क में घर बना रखा हो तो काया बाहर से भले ही स्वस्थ दीखे, अध्यात्म मान्यता के अनुसार अस्वस्थ ही कहलाती है। अज का रोग भूतकाल के मनोविकारों एवं शुष्क अन्तःकरण की ही परिणति हैं, यह एक सुनिश्चित सत्य है। तनाव वस्तुतः उस हिम खण्ड के समान है जो बाहर से दिखाई नहीं पड़ता, पर किसी भी क्षण जहाज से टकराकर उसे तहस-नहस कर सकता है। शरीर का हर जीवकोश अन्तः के विक्षोभ की प्रतिक्रिया बहिरंग में दिखाता है, इसे वैज्ञानिक अब “लाइ डिटेक्टर” के माध्यम से सिद्ध भी किया जा चुका है।

पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति जब निदान मात्र में ही सहयोग कर रोग निवारण के प्रयोजन में सार्थक होती नहीं दिखाई देती तो प्रश्न यह उठता है कि स्वास्थ्य संरक्षण के जन-व्यापी इस महत् तन्त्र को कैसे सही रूप दिया जाय? उत्तर एक ही है- सूक्ष्मता के दर्शन पर आधारित, आध्यात्म प्रधान चिकित्सा पद्धति को आधार बनाया जाय जो व्यक्ति की गहरी परतों को छू सके। इसमें औषधि से अधिक महत्ता देनी होगी आहार-बिहार के संयमित जीवन क्रम को, नैसर्गिक जीवन पद्धति को तथा चिन्तन की परिष्कृति को। इन सबका समुचित समन्वय जिस चिकित्सा पद्धति में हो वही सर्वांगपूर्ण उपचार प्रणाली कही जा सकती है। इसी से मनुष्य आत्मिक, मानसिक एवं कायिक दृष्टि से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर अपनी सामर्थ्यों का सुनियोजन भौतिक अथवा आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में करते हुए प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

स्वस्थ मनुष्य का अर्थ है- मनोविकारों से मुक्त स्वच्छ मन तथा अन्तः में कारुण्य, औदार्थ जैसे गुणों के बाहुल्य वाला व्यक्ति। ऐसा व्यक्ति काया की दृष्टि से कभी रोगी नहीं होता। जब कुण्ठाएँ मुक्त होती हैं- ग्रन्थियाँ सुलझ जाती हैं, तब व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ अनुभव करता है। यही शारीरिक स्वास्थ्य की अनुभूति है। दमित भावनाएँ तो गुपचुप व्याधियों के घर बनाती रहती हैं जो समय आने पर रोग के रूप में प्रकट होती हैं और चिकित्सा के प्रयास पर न होने असाध्य रूप ले लेती हैं।

सामयिक राहत मात्र पर ही सन्तोष करना हो तो प्रचलित चिकित्सा पद्धति पर भी सन्तोष किया जा सकता है। पर यदि अस्वस्थता का आत्यन्तिक समाधान खोजना है तो गहराई में जाकर उस मूल केन्द्र को खोज निकालना होगा जहाँ से विकार जन्म लेते हैं। मेंड़ बाँधने से काम नहीं चलेगा। उफनता नाला एक स्थान से रोकने पर दूसरे स्थान से फूट पड़ता है। असंयम की मनःस्थिति शरीर से प्रकृति की अवज्ञा कराती रहेगी और दण्ड शरीर को ही भुगतना होगा। “स्प्रिचुअल पैथॉलाजी” या आध्यात्मिक रोग विज्ञान समझे बिना किसी प्रकार का न तो निदान ही सम्भव है, न चिकित्सा। ईसाई धर्म में प्रायश्चित कर्म द्वारा यही कराया जाता है। मन के हल्का होते ही शरीर भी स्वस्थ हो चुका होता है।

नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर ऐलेक्सी कैरेल के अनुसार “मनुष्य ससीम है, इस कारण समय-समय पर आस्थाओं की दृष्टि से कमजोर पड़ता- व्याधिग्रस्त होता देखा जाता है। यदि वह प्रार्थना द्वारा अपने अन्दर निहित असीम सामर्थ्य को बढ़ाने का प्रयास करे तो वह रोगमुक्त हो उस विराट् शक्ति पुँज से शान्तिरूपी वरदान पा सकता है जो कि आज की बढ़ती तनावजन्य स्थितियों में उसे अभीष्ट भी है। जिस प्रकार दृष्टिहीन मानव बसन्त के फूलों के वैभव, अरुणोदय की लालिमा, इन्द्र धनुष के सौंदर्य का आनन्द ले नहीं पाता, उसी प्रकार आस्थाहीन लोग उस परम सत्ता की शक्ति से अनभिज्ञ बने भावनात्मक विकृतियों एवं तद्जन्य रोगों से ग्रसित होते व अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।”

भारतीय अध्यात्म इस मान्यता में दृढ़ विश्वास रखता है कि मनुष्य के शरीर का नहीं, मन मात्र का ही नहीं, अन्तःकरण का उपचार होना चाहिए। जब तक सारस सम्वेदनाओं- उदात्त भावनाओं का सिंचन इस क्षेत्र में नहीं किया जाता, मानवता रुग्णता से कभी मुक्ति नहीं पा सकती। अनास्था ही विक्षोभों को- उद्वेगों को- निषेधात्मक चिन्तन को जन्म देती है। इस “पैथालॉजी” का मापन करने वाला कोई यन्त्र नहीं है लेकिन इससे होने वाली विकृतियों की फलश्रुति जिन शरीरगत व्याधियों, मनोशारीरिक रोगों, कायविद्युत सम्बन्धी अव्यवस्थाओं के रूप में प्रकट होती हैं, उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। साथ ही चिन्तन की परिष्कृति, दृष्टिकोण की व्यापकता तथा सुनियोजित भाव-सम्वेदनाओं की परिणति भी स्वस्थ, प्रफुल्लचित्त हल्के-फुल्के व्यक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है।

रोगों के मूलतः दो वर्ग माने गए हैं- आधि एवं व्याधि। आधि अर्थात् मनोरोग एवं व्याधि अर्थात् शारीरिक रोग। मधुमेह, रक्त भाराधिक्य, अपच, दमा आदि शरीरगत रोग हैं और उन्माद, सनक, अल्प मन्दता, आवेश, अवसाद आदि आधियाँ हैं। मनोविकारों की चिकित्सा पागलखानों में नहीं हो सकती। इसके लिये तो मनोआध्यात्मिक परामर्श की सेनिटोरियम व्यवस्था ही कारगर हो सकती है। वे कुण्ठाएँ- गुत्थियां सुलझाकर शारीरिक व्याधियाँ (साइकोसोमेटिक) की चिकित्सा करते हैं।

जब तक चेतना के मर्मस्थल को जो व्यक्तित्व का केन्द्रबिन्दु है, छुआ नहीं जाता, चिकित्सा अधूरी है। आज के वैज्ञानिक जिसे न्यूरोह्यूमरल एबनार्मलिटी कहते हैं, अध्यात्म चिकित्सा से ही दूर की जा सकती है। मान्यताओं को बदलना एक प्रकार का भावकल्प है। चाहे उसके लिये प्रायश्चित का सहारा लिया जाय अथवा मार्गदर्शक, स्वाध्याय, सत्संग सत्परामर्श का- उद्देश्य सदा उसका एक ही रहेगा- अन्तराल का परिशोधन परिष्कार। रुग्ण मानवता को यही चिकित्सा पद्धति अब चाहिए भी।


गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान

किसी भी कार्य को उपयुक्त विधि-विधान के साथ किया जाय, तो यह उत्तम ही है। इसमें शोभा भी है, सफलता की सम्भावनाएँ भी हैं। चूक से यदि अपेक्षित लाभ नहीं मिलता तो किसी प्रकार के विपरीत प्रतिफल की या उल्टा- अशुभ होने की कोई आशंका नहीं है। पूजा-उपासना कृत्यों पर, विशेषकर गायत्री उपासना पर भी यह बात लागू होती है। भगवान सदैव सत्कर्मों का सत्परिणाम देने वाली सन्तुलित विधि-व्यवस्था को ही कहा जाता रहा है। दुष्परिणाम तो दुष्कृतों के निकलते हैं। यदि उपासना में भी चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इन्हीं उपचारों में मुँह से जप लेना, जल्दी-जल्दी या उँघते-उँघते माला घुमा लेना, किसी तरह संख्या पूरी कर लेना, मात्र कृत्य तक ही सीमित रहना भी आता है। इतना अन्तर तो सभी को समझना चाहिए और तथ्यों को भली-भाँति हृदयंगम करना चाहिए। उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।

गीता में भगवान ने कहा है-

“नेहाभिक्रम नाशोस्ति प्रत्ययवयो न विद्यते। स्वल्प मप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो मयात्।” (40, अध्याय 2 गीता)

अर्थात्- “इस मार्ग (भक्ति उपासना) पर कदम बढ़ाने वाले का भी पथ अवरुद्ध नहीं होता। उल्टा परिणाम भी नहीं निकलता। थोड़ा-सा प्रयत्न करने पर भी भय से त्राण ही मिलता है।”

वस्तुतः गायत्री के तीन पक्ष हैं। एक उपासनात्मक कर्मकाण्ड। दूसरा- धर्मधारणा का अनुशासन। तीसरा उत्कृष्टता का पक्षधर तत्व दर्शन। इन तीनों ही क्षेत्रों का अपना-अपना महत्व है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों से शरीर और मनःक्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियों को उभारा जाता है। इस मन्त्र में सार्वभौम धर्म के सभी तथ्य विद्यमान हैं। इसे संसार का सबसे छोटा किन्तु समग्र धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। गायत्री के शब्दों और अक्षरों में वे संकेत भरे पड़े हैं जो दृष्टिकोण और व्यवहार में उदार शालीनता का समावेश कर सकें।

इस मन्त्र समुच्चय के साथ जुड़े हुए अक्षरों में से प्रत्येक में अति महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश है। बीज में समूचे वृक्ष की सत्ता एवं सम्भावना सन्निहित रहती है। शुक्राणु में पैतृक विशेषताओं समेत एक समूचे मनुष्य की सत्ता का अस्तित्व समाया होता है। माइक्रो फिल्म के एक छोटे से फीते में विशालकाय ग्रन्थ की झाँकी देखी जा सकती है। ठीक इसी प्रकार गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों में ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराओं का समान रूप से समावेश है। अध्यात्म दर्शन की शाखा- प्रशाखाओं में बँटा समूचा विज्ञान इन अक्षरों में पढ़ा जा सकता है। यदि इस समग्र तत्वदर्शन को ध्यान में रखते हुए उपासना की जाती है तो चिन्तन और कर्म में स्वभावतः श्रेष्ठता का समावेश होना ही चाहिए। यदि मन्त्र जाप के पूर्व ही उसे ‘इफ’ और ‘बट’ की आशंकाओं के जाल में उलझा दिया गया तो सारा प्रयोजन ही गड़बड़ा जाता है।

विज्ञान की समस्त उपलब्धियाँ स्तुत्य हैं, पर यदि किसी एक बात ने वस्तुस्थिति को असमंजस में डाला है तो वह है “कुतर्क”। तर्क को तो वस्तुतः ऋषि माना गया है एवं तथ्यों, प्रमाणों के साथ उसकी आर्ष ग्रन्थों में अभ्यर्थना की गयी है। तर्क सम्मत प्रतिपादनों के साथ श्रद्धा का समुचित समावेश होने पर जब मनोयोगपूर्वक कोई कार्य किया जाता है तो आत्मिक प्रगति सुनिश्चित है। लेकिन असमंजस ग्रस्त मनःस्थिति में किया गया पुरुषार्थ तो किसी भी क्षेत्र प्रगति नहीं दिखा सकता। सम्भवतः जनसाधारण की इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शी मनीषियों ने यह निर्देश किया था कि उपासना विधान के सम्बन्ध में एक विज्ञ मार्गदर्शक अवश्य होना चाहिए। अनुभव ज्ञान रहित मार्गदर्शक के स्थान पर आप्त निष्कर्षों के आधार पर निर्धारित अनुशासनों को ग्रहण कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। मार्गदर्शक की खोज-बीन में जल्दी भी न की जाय और स्वयं का समुचित समाधान पहले कर लिया जाय, यही उचित है। हिन्दू धर्म में की गयी खींचतान और मध्यकालीन मनमानियों ने परस्पर विरोधी मतभेदों को अधिक जन्म दिया है। इन सबको सुन, समझकर उचित-अनुचित के चयन की बात यदि सोची जाएगी तो शंकाएँ इतनी अधिक होंगी कि उसका समाधान तो दूर, स्वयं को भ्रम जंजाल से निकालना भी भारी पड़ जाएगा। ऐसी स्थिति में विवेक यही कहता है कि किसी प्रकार का कोई दुराग्रह न रखकर श्रेष्ठता को स्वीकारा जाय और श्रद्धा को मान्यता देते हुए मनःस्थिति साफ रखी जाय।

गायत्री के बारे में एक चर्चा जो की जानी है- वह यह कि इसकी कृपा से- अर्चा- आराधना से स्वर्ग और मुक्ति मिलती है। शंकालु इस विषय पर काफी ऊहापोह करते देखे गए हैं। वस्तुतः स्वर्ग कोई स्थान विशेष नहीं है। न ही कोई ऐसा ग्रह-नक्षत्र है जहाँ स्वर्ग के नाम पर अलंकारिक रूप में वर्णित अनेकानेक प्रसंग बताए जाते रहे हैं। वस्तुतः इस सम्बन्ध में ऋषि चिन्तन सर्वथा भिन्न है। परिष्कृत दृष्टिकोण को ही स्वर्ग कहते हैं। चिन्तन में उदात्तता का समावेश होने पर सर्वत्र स्नेह, सौंदर्य, सहयोग और सद्भाव ही दृष्टिगोचर होता है। सुखद- दूसरों को ऊँचा उठाने- श्रेष्ठ देखने की ही कल्पनाएँ मन में उठती हैं। उज्ज्वल भविष्य का चिन्तन चलता तथा उपक्रम बनता है। इस उदात्त दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है। स्नेह, सहयोग और सन्तोष का उदय होते ही स्वर्ग दिखाई पड़ने लगता है।

नरक ध्वंस, द्वेष एवं पतन को कहते हैं। ये जहाँ कहीं भी रहेंगे, वहीं व्यक्ति अस्वस्थ, विक्षुब्ध रहेंगे और कुकृत्य करते रहेंगे। सर्वत्र नरक के रूप में अलंकारिक वर्णित भयावहता और कुरूपता ही दृष्टिगोचर होगी, फलतः संपर्क क्षेत्र विरोधी एवं वातावरण प्रतिकूल होता जाता है। यही नरक है और उससे उबर पाना स्वर्ग है। मुक्ति कहते हैं- भव बन्धनों से छुटकारा पाने को, इसी लोक में रहते हुए। भव बन्धन तीन हैं, जो मनुष्य को सतत् अपनी पकड़ में कसने का प्रयास करते रहते हैं। लालच, व्यामोह और अहंकार। लोभ, मोह और अहंता नाम से प्रख्यात इन तीन असुरों से जो जूझ लेता है, उनके रज्जु जंजाल से मुक्त होने का प्रयास करता है, वही जीवनमुक्त है जो पूर्ण मुक्ति की दिशा में गतिशील है। ये तीनों ही मनुष्य को क्षुद्र और दुष्ट प्रयोजनों में निरत रखते हैं और इतनी लिप्सा भड़काते हैं जिससे पुण्य परमार्थ के लिए समय निकाल सकना- साधन लगा सकना सम्भव ही न हो सके। अर्थ का सर्वथा सदैव अभाव लगता रहे और उसकी पूर्ति में इतनी व्यस्तता-व्यग्रता रहे कि सत्प्रयोजनों को करना तो दूर, वैसा सोचने तक का अवसर न मिले।

तीनों ही नितान्त अनावश्यक होते हुए भी अत्यधिक आकर्षक लगते हैं। इस भ्रान्ति एवं विकृति से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। महाप्रज्ञा के आलोक में ही इन निविड़ भव बन्धनों से छुटकारा मिलता है। व्यक्ति स्वतन्त्र चिन्तन अपनाता, अपने निर्धारण आप करता है। प्रचलनों एवं परामर्शों से प्रभावित न होकर श्रेय पथ पर एकाकी चल पड़ता है। विवेक अवलम्बन जन्य इस स्थिति को ही मुक्ति कहते हैं, जो महाप्रज्ञा गायत्री का तत्वदर्शन समझकर उनके आश्रय में जाने वाले सच्चे साधक को अवश्य ही मिलती है।

स्वर्ग-नरक की चर्चा के बाद एक प्रसंग संकट मुक्ति का है, जिसके बारे में शंकाएँ उठाई जाती रही हैं कि यह कहाँ तक सही है। क्या जप करने से संकट समीप नहीं आते? इसे भी तत्व दर्शन के परिप्रेक्ष्य में सभी इन्द्रियाँ जागृत रख समझना होगा। महाप्रज्ञा के स्वरूप को समझने तथा शिक्षा को हृदयंगम करने पर आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार के दो कदम संकल्प पूर्वक उठने लगते हैं। फलतः कुसंस्कारों एवं अवाँछनीयता से छुटकारा मिलता है। साथ ही उस उन्मूलन से खाली हुए स्थान को गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से भरने का काम भी द्रुतगति से चल पड़ता है। यह परिवर्तन जिस क्रम से अग्रसर होता है, उसी अनुपात से संकटों से भी छुटकारा मिलता चला जाता है।

संकट वस्तुतः स्वाभाविक नहीं, स्व उपार्जित है। असंयम से रुग्णता, असंतुलन से विग्रह, अपव्यय से दारिद्रय, असभ्यता से तिरस्कार, अस्त-व्यस्तता से विपन्नता के घटाटोप खड़े होते हैं। अपनी अवाँछनीयताएँ- कुसंस्कारिताएं ही दुर्गति को- सुखद परिस्थितियों को न्यौत बुलाती हैं। मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदलने में देर न लगे। आकस्मिक अपवाद तो कभी-कभी ही खड़े होते हैं। आमतौर से दृष्टिकोण, स्वभाव एवं व्यवहार में घुसा अनगढ़पन ही विभिन्न स्तर के संकटों के लिये उत्तरदायी होता है। इस तथ्य को समझने वाले बाहरी संकटों का साहस और सूझ-बूझ द्वारा मुकाबला करते हैं। साथ ही यह भी देखते हैं कि अपनी किन त्रुटियों के कारण अवाँछनीयता के साथ घनिष्ठता जुड़ी और वैसा परिणाम निकला। अपने को बदलने के लिये तत्पर व्यक्ति प्रतिकूलताओं में बदलने में भी प्रायः सफल होते हैं। गायत्री उपासना के उपयुक्त निर्धारण एवं अवलम्बन से आत्मपरिष्कार– पराक्रम का लक्ष्य पूरा होता है। फलतः संकटों के निवारण में भी संदेह नहीं रह जाता। गायत्री लाठी लेकर संकटों को मार भगाये और श्रद्धालु आँखें मूँदकर उस तमाशे को देखें, ऐसा नहीं होता।

इसी प्रकार एक शंका और प्रश्न के रूप में कुरेदी-उभारी जाती रही है- गायत्री की कृपा से सम्पन्नता और सफलता कैसे मिलती है? वस्तुतः इस प्रश्न में एक और कड़ी जुड़नी चाहिये- मध्यवर्ती कर्तव्य और परिवर्तन की। स्कूल में प्रवेश करने और ऊंचे अफसर बनने, डाक्टर की पदवी पाने में आरम्भ और अन्त की चर्चा मात्र है। इसके बीच मध्यान्तर भी है जिसमें मनोयोग पूर्वक लम्बे समय तक नियमित रूप से पढ़ना पुस्तकों की- फीस की, व्यवस्था करना आदि अनेकों बातें शामिल है। इस मध्यान्तर को विस्मृत कर दिया जाये और मात्र प्रवेश एवं पद दो ही बातें याद रहें तो कहा जायेगा कि यह शेख चिल्ली की कल्पना भर है। यदि मध्यान्तर का महत्व और उस अनिवार्यता का कार्यान्वयन भी ध्यान में हो तो कथन सर्वथा सत्य है। पहलवान बलिष्ठता की मनोकामना नहीं पूरी करता, न ही ‘पहलवान-पहलवान’ रटते रहने से कोई वैसा बन पाता है। उसके लिये व्यायामशाला में प्रवेश से लेकर नियमित व्यायाम, आहार-विहार, तेल मालिश आदि का उपक्रम भी ध्यान में रखना होता है।

साधना से सम्पन्नता की सिद्धि या सफलता प्राप्त के शाश्वत सिद्धांत पर ये सभी बातें लागू होती हैं। छुटपुट कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेने से अभीष्ट सफलता कहाँ मिलती है? उसके लिये श्रम साधना, मनोयोग, साधनों का दुरुपयोग आदि सभी आवश्यक हैं।

गायत्री के आकर्षक महात्म्य जो बताये जाते रहे हैं, वे किसी को मिलते हैं- किसी को नहीं। इसका एक ही कारण है- उपासना व साधना के मध्य अविच्छिन्न संबंध। दोनों परस्पर पूरक हैं। उपासना से तात्पर्य है- उत्कृष्टता की देवसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।

बिना किसी जाति, लिंग, देश और धर्म का अन्तर किये मानव मात्र को गायत्री उपासना करने और उससे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस सम्बन्ध में अधकचरे ज्ञान के आधार पर उठायी गई प्रतिगामी टिप्पणियों से अप्रभावित हो, जिन्हें भी आत्मिक प्रगति में तनिक भी रुचि हो, बिना किसी आशंका-असमंजस के श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करते रहना चाहिये।


अपनों से अपनी बात - वर्षा ऋतु के तीन विशेष सत्र

हर वर्ष ऊँची कक्षा में चढ़ते समय पुस्तकें बदल जाती हैं। हर वर्ष बन्दूक, मोटर, रेडियो, टेलीविजन आदि का नया लाइसेंस लेना पड़ता है। क्लर्क की जब अफसर पद पर उन्नति होती है तो उस नये कार्य को सम्भालने के लिये नई ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। प्रज्ञा पुत्रों के सम्बन्ध में भी यही बात है और उन्हें अवाँछनीयता के प्रति घमासान लड़ाई लड़ने के लिये सेनापतियों जैसा युद्ध−कौशल प्राप्त करने, नये-नये मोर्चे सम्भालने के लिये नये सिरे से नई रणनीति सीखनी पड़ती है। निर्माण कार्य में संलग्न रहने वाले इंजीनियरों का उतनी ही जानकारी से नहीं चल पाता जितना कालेज छोड़ते समय पल्ले बँधा है। विभिन्न स्तर के निर्माण कार्यों की अपनी-अपनी स्थानीय एवं सामयिक समस्यायें होती हैं। उनके स्वरूप समाधान समझने के लिये समय-समय पर नये प्रशिक्षणों का लाभ लेना पड़ता है। अन्यथा बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अभिनव भूमिकाएं निभा सकने योग्य उनकी क्षमता कुशलता का विस्तार हो नहीं सकेगा। ऐसी दशा में बड़ी जिम्मेदारी कैसे डट सकेगी? बड़ी सफलता कैसे मिलेगी?

युग शिल्पियों को समय के साथ ही नहीं चलना है वरन् नयी समस्याओं के नये समाधानों का कार्यान्वयन का अभ्यास भी करना है। अस्तु आवश्यक समझा गया है कि वरिष्ठ और कनिष्ठ के पुराने नये सभी प्रज्ञा पुत्रों की वार्षिक शिक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध किया जाये। इसके लिये जुलाई, अगस्त, सितम्बर के तीन महीने उपयुक्त समझे गये हैं। वर्षा ऋतु में आयोजन सम्मेलन संभव नहीं होते। न यज्ञशाला बन सकती, न पण्डाल खड़े हो सकते हैं। घर से बाहर निकलते ही भीगने का भय रहता है। गीले कपड़े सहज सूखते तक नहीं। किसानों तक का वह समय प्रायः घर में वैसे ही बीतता है। अन्य वर्षों की दौड़-धूप भी ठण्डी पड़ जाती है। रास्ते की कीचड़ को लांघते हुए पैदल यात्रायें कठिन पड़ती हैं। इसलिये अन्य व्यवसायों की तरह धर्म प्रचार के कार्यक्रम भी गतिशील नहीं रहते। सन्त जन एक स्थान पर चातुर्मास मनाते हैं और वहीं बैठकर सत्संग शिक्षण का उपक्रम बनाते, चलाते रहते हैं।

वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों की वार्षिक प्रशिक्षण प्रक्रिया के लिये एक-एक महीने के तीन सत्र जुलाई, अगस्त, सितम्बर में रखे गये हैं। यों ऐसे महत्वपूर्ण विषयों के लिये एक महीने का समय हर दृष्टि से कम पड़ता है तो भी स्थान की कमी और शिक्षार्थियों की बढ़ी-चढ़ी संख्या का संतुलन बिठाने की दृष्टि से शिक्षा काल स्वल्प रखने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। एक महीने से कम में काम चलता नहीं और उसमें अधिक समय रखकर शिक्षार्थियों की संख्या में कटौती करना अभीष्ट नहीं। अस्तु उतने से भी सन्तोष करते हुए तद्नुरूप प्रबन्ध किया गया है।

इस वर्ष के तीन विशिष्ट कार्यक्रम हैं। (1) प्रज्ञा पुरश्चरण को व्यापक बनाना। (2) प्रज्ञा अभियान कार्यक्रमों का प्रबन्ध करना। (3) तुलसी आरोहण- हरीतिमा संवर्धन का उत्साह हर घर में जगाना। इन कृत्यों में पुरश्चरण और आरोपण के काम ऐसे हैं जिन्हें घर रहकर भी संपर्क क्षेत्र में गतिशील करते रहा जा सकता है किन्तु प्रज्ञा आयोजन की व्यवस्था ऐसी है जिसके लिये घर छोड़कर दूर-दूर तक जाने और अपने अनुभव का लाभ एवं हाथ बँटाने जैसा सहयोग देने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। अधिकाँश आयोजन नये स्थानों पर होने जा रहे हैं। इस वर्ष दस हजार आयोजनों का लक्ष्य है। जबकि गत वर्षों में उनकी संख्या कभी दो हजार से अधिक नहीं रही। प्रायः आठ हजार सम्मेलन आयोजन ऐसे हैं जिन्हें नये लोगों द्वारा नये स्थानों में सम्पन्न किया जाना है। उत्साह होना एक बात है और अनुभव होना दूसरी। अनुभव के अभाव में विवाह शादियों जैसे छोटे आयोजनों तक में भी गड़बड़ी फैलती और फजीहत होती देखी गयी है जब कि अनुभवी लोग उन्हें रास्ता चलते सुसम्पन्न बना देते हैं।

स्वाध्याय मण्डल प्रायः ऐसे स्थान पर बने हैं, उनके संचालक लोग ऐसे हैं उनकी भावना और कर्मठता बढ़ी-चढ़ी होने पर भी आयोजन सम्मेलन करने की रूपरेखा ध्यान में नहीं है। ऐसी दशा में अनुभवहीनता के कारण वह छोटा प्रबन्ध भी उनके लिये सरदर्द बनेगा। इस असमंजस को दूर करने का एक ही उपाय है कि अनुभवी प्रज्ञा पुत्र अपने-अपने कार्य क्षेत्र बांटे और वहाँ मितव्ययिता पूर्वक अधिकाधिक सफलता के साथ निर्धारित आयोजनों को सम्पन्न करायें।

इसी से मिलती-जुलती एक दूसरी कठिनाई यह है कि प्रज्ञापीठें उत्साही भावनाशीलों ने अधिक परिश्रम करके, बनाकर खड़ी कर दीं। उसमें गाँठ का पैसा भी उदारतापूर्वक लगाया। अब एक अवरोध यह खड़ा होता है कि उनके सुसंचालन का क्रम कैसे बने। यहाँ भी अनुभवी कार्यकर्ताओं का अभाव ही आड़े आता है। उसका समाधान न हो तो प्रतिमा पूजन की लकीर ज्यों-त्यों करके पीटी जाती है। वह उद्देश्य सधता ही नहीं, जिसके लिये कि इन नये निर्माण को चर्च जैसा सचेतन बनाने का स्वप्न सँजोया गया था। अवरोध का कारण अनुभवी कार्यकर्ताओं का अभाव ही समझा जा सकता है। अन्यथा जन सहयोग की कमी से कठिनाई उत्पन्न होने जैसी कोई बात कहीं भी नहीं है। जिन लोगों ने इतनी राशि लगाकर इतने भव्य महल बनाये हैं, वे मुट्ठी-मुट्ठी अनाज या दस-दस पैसे जैसे अनुदान प्रस्तुत करने में भी पीछे हटने वाले नहीं हैं। जो देश साठ लाख सन्त बाबाओं का निर्वाह करता है और मन्दिर मठों तीर्थों के निमित्त अरबों-खरबों की राशि खर्चता है वह प्रज्ञा पीठों का काम करने वाले लोगों का निर्वाह व्यय वहन न करेगा ऐसी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

तीसरी आवश्यकता प्रज्ञा आयोजनों की व्यास पीठ सँभालने वाले कुशल प्रचारकों की है। अपने मंच को संगीत प्रधान बनाया गया है। छोटे देहातों, अनपढ़ों वाले अपने देश में बाल-वृद्ध– नर-नारी, शिक्षितों अशिक्षितों के लिये समान रूप से आकर्षक एवं प्रेरक आधार युग संगीत ही असंदिग्ध रूप से बन सकता है। अस्तु जो कुछ भी कहा समझाया जाना है उसके लिये संगीत का माध्यम बनाया गया है। तद्नुरूप गीत लिखाये गये हैं। उनके साथ टिप्पणियाँ, व्याख्यायें जोड़कर भजनोपदेश स्तर के प्रवचन विनिर्मित किये गये हैं। इन्हीं के सहारे प्रज्ञा आयोजनों की व्यवस्था बनी है। रूखे, प्रवचन, अविकसित मनःस्थिति वालों के लिये उन्हें समझना और भी अधिक कठिन पड़ते हैं। फिर धारा प्रवाह प्रवचन कर सकना भी तो सरल नहीं है।

सम्भाषण की आवश्यकता प्रज्ञा आयोजनों में चित्र प्रदर्शनी के माध्यम से पूरी की जाती है। लोग दृश्य देखते जाते हैं और उसके संदर्भ सुनकर वह प्रकाश प्राप्त करते जाते हैं जो इन आयोजनों का उद्देश्य है। वक्ता के लिये इस प्रकार विवरण वार्ता करते रहने से कोई दबाव नहीं पड़ता। इस माध्यम से सामान्य स्तर का भी प्रखर व्यक्ति चार छह घण्टे लगातार प्रवचन करता रह सकता है और व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर साधा प्रवचन की तुलना में लोगों को कहीं अधिक गहराई तक तथ्यों से अवगत एवं अनुप्राणित कर सकता है।

विगत वर्षों में न युग संगीत का एक क्रमबद्ध निर्धारण था और न चित्र प्रदर्शनी के माध्यम से से जन-जन को युग चेतना से अवगत कराने का प्रबन्ध था। यह दोनों ही उपचार इसी वर्ष के हैं। जो सरल भी सिद्ध हुए हैं और आश्चर्यजनक रीति से सफल भी हुए हैं। अगले दिनों सभी प्रज्ञा पुत्रों को लोक शिक्षण के लिये इन्हीं दोनों माध्यमों को अपनाना होगा। सस्ती चित्र प्रदर्शनी बनाने का काम इन दिनों हाथ में लिया गया है। युग संगीत के लिये स्ट्रीट सिंगर स्तर की गायन वादन प्रणाली में एक सुनियोजित पाठ्यक्रम बनाना है। ढपली, खटताल, मंजीरा, इकतारा स्तर के एकाकी गाने बजाने की आवश्यकता पूरी करने वाले वाद्य यन्त्र इस निर्धारण में प्रमुख माने हैं।

उपरोक्त कार्यों का स्वरूप सुनने कहने में तो सरल सीधा प्रतीत होता है, पर इनमें से प्रत्येक के साथ अनेक गुत्थियाँ जुड़ी हुयी हैं। अनेक उतार-चढ़ाव और अनेक मोड़-तोड़ हैं। उनका स्वरूप और समाधान समझे बिना इन नये निर्धारणों को कार्यान्वित करने में पग-पग पर नयी सूझ -बूझ की आवश्यकता पड़ेगी। उसके बिना सिद्धांत समझ लेने पर भी व्यवहार कठिन पड़ेगा। विवाह शादियाँ पक्की करने में भी उतनी कठिनाई नहीं होती जितनी कि उस उत्सव के साथ हुयी अनेकानेक समस्याओं से निपटना तथा आवश्यकताओं का जुटाना। सार्वजनिक क्षेत्र के आन्दोलनों आयोजनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके संबंध में भी इंजीनियरों, डाक्टरों, नर्तक कलाकारों जैसे अनुभव अभ्यास चाहिये। इसे जुटाने के लिये एक महीने के शान्ति-कुँज सत्रों में सम्मिलित होने की आवश्यकता एक प्रकार से अनिवार्य ही हो जाती है।

प्रज्ञापीठों के निर्माण भर हुये हैं, उनमें सक्रियता का प्राण फूंकना अभी भी शेष है। इन अभिनव निर्माणों को नवजात शिशु तुल्य समझा जाना चाहिये। उनकी आवश्यकतायें ऐसी होती हैं जिन पर न केवल माता को वरन् समूचे परिवार को ध्यान रखना पड़ता है। ठीक प्रायः 13 हजार इसी प्रकार निजी इमारत वाले प्रज्ञापीठों तथा बिना इमारतों वाले स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों को प्रखर परिपुष्ट बनाने के लिये सभी प्रज्ञा पुंजों को पूरा-पूरा ध्यान देना है। इस वर्ष के दस हजार आयोजन भी उन्हीं से सम्पन्न करने तथा दूसरों से कराने हैं।

इन निर्माणों को प्राणवान बनाने के लिये इन दिनों समूचे प्रज्ञा परिवार को ध्यान में देना और अपना क्षेत्र सम्भालना होगा। छोटे-छोटे क्षेत्र संगठनों का नया निर्माण करना होगा। साथ ही ऐसा भी बहुत कुछ करना होगा जिससे मात्र 10 लाख परिजन आज जितनी संख्या में ही न बने रहें। उनको पाँच गुनी आय वृद्धि का लक्ष्य इन्हीं दिनों पूरा करना है। एक करोड़ भी नव सृजेता न उभरे तो 70 करोड़ भारतवासियों का सर्वतोमुखी कायाकल्प किस प्रकार बन पड़ेगा।

ऊपर की पंक्तियों में जिस क्रिया कौशल के सम्बन्ध में चर्चा हुयी है। उसे सम्पन्न करने के लिये आत्म-बल की ऊर्जा चाहिये। इसके बिना इतने बड़े कारखाने की अगणित मशीनें चलेंगी किस आधार पर। प्रत्येक प्रज्ञा पुँज को हर वर्ष न्यूनतम एक महीने की विशिष्ट अध्यात्म साधना करनी चाहिये जो शेष 11 महीनों तक अभीष्ट ऊर्जा प्रदान करती रहे। यह सभी प्रयोजन एक महीने के कल्प सत्रों में सम्मिलित होने से सम्पन्न होते हैं। यही कारण है कि जुलाई, अगस्त, सितम्बर के तीन कल्प साधना सत्र विशेष रूप से प्रज्ञा पुंजों के लिये ही लगाये जा रहे हैं उनमें नये पुराने सभी प्रज्ञा पुत्रों को अपनी सुविधा के महीने में सम्मिलित होने- स्थान सुरक्षित करा लेने- के लिये कहा जा रहा है।


भगवान के बाद मनुष्य का काम आरम्भ होता है (kahani)

महाभारत समाप्त हो चुका था। उस क्षेत्र को पार करते हुए शमीक ऋषि अपनी शिष्य-मण्डली के साथ कहीं जा रहे थे। शिष्यों ने उस क्षेत्र में हाथी के गले से टूटा घण्टा पड़ा पाया। उन्होंने उत्सुकता पूर्वक उसे उठाया तो नीचे एक पक्षी का बच्चा अण्डा फोड़कर उसी समय बाहर निकलते देखा। शिष्य आश्चर्य चकित थे और उतने घमासान के बीच एक अण्डे को सुरक्षित रखने में- भगवान की कृपा को सराह रहे थे।

शमीक ने उस यशगाथा को रोकते हुए कहा- “भगवान का काम समाप्त हो चुका अब मनुष्य का काम आरम्भ होता है। इस बच्चे को ले चलो और किसी ऐसे आश्रम में रखो जिससे वह जीवित रह सके।”


पूज्य गुरुदेव प्रणीत अध्यात्म विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

(1) गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (तीनों भाग) 22.50 (2) गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग) 3.00, (3) सामूहिक गायत्री यज्ञ विधान (द्वितीय भाग) 3.00 (4) गायत्री चित्रावली 4.00 (5) गायत्री मन्त्रार्थ 3.50 (6) गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य।

(अ) छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट- आकर्षक कवर वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 12.00। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं।

1. गायत्री का स्वरूप एवं रहस्य। 2. गायत्री की गुप्त शक्ति। 3. सर्व सुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7.गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियां। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध (ब) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि मू. 60 पैसे। (स) दैनिक गायत्री साधना मू. 60 पैसे (द) गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।

अध्यात्म का वैज्ञानिक प्रतिपादन साहित्य

प्रस्तुत बुद्धिवादी युग में तर्क, तथ्य, प्रत्यक्ष, प्रमाण एवं विज्ञान को प्रामाणिकता मिली है और शास्त्र, श्रद्धा एवं आप्त वचनों को अमान्य किया गया है। इस मनःस्थिति में पनपने वाले नास्तिकवाद एवं स्वेच्छाचार को निरस्त करने के लिये युग दृष्टा गुरुदेव की लेखनी से अभिनव युग साहित्य सृजा गया है। प्रत्येक पुस्तक विचारशील वर्ग के लिये अत्यन्त प्रेरणाप्रद हैं।

1. विवादों से परे ईश्वर का अस्तित्व, 2. ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?, 3. दृश्य जगत के अदृश्य संचालन सूत्र, 4. चेतना की प्रचण्ड-क्षमता एक दर्शन, 5. असीम पर निर्भर ससीम जीवन, 6. मनुष्य चलता-फिरता पेड़ नहीं है, 7. पाँच प्राण– पाँच देव, 8. दिव्य शक्तियों का उद्भव प्राण शक्ति से, 9. मानवीय क्षमता असीम अप्रत्याशित, 10. अणु में विभु– गागर में सागर, 11 आत्मा न नर है, न नारी, 12. मानवीय मस्तिष्क विलक्षण कम्प्यूटर, 13. अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि, 14. जड़ के भीतर विवेकवान चेतना, 15. शरीर की अद्भुत क्षमताएँ और विलक्षणताएँ, 16. मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, 17. क्या धर्म अफीम की गोली है?, 18. धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक, 19. विज्ञान को शैतान बनने से रोकें, 20. पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य, 21. स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया, 22. तात्विक दृष्टि से बन्धन मुक्ति, 23. मरें तो सही पर बुद्धिमता के साथ, 24. भूत कैसे होते हैं? क्या करते हैं?, 25. पितरों को श्रद्धा दें वे– वे शक्ति देंगे, 26. सपने झूठे भी सच्चे भी, 27.शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म, 28.आध्यात्मिक काम विज्ञान, 29. जीव जन्तु बोलते भी हैं सोचते भी हैं, 30. संसार चक्र की गति प्रगति, 31. असामान्य एवं विलक्षण, किन्तु सम्भव और सुलभ, 32. मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु, 33. दृश्य-जगत की अदृश्य पहेलियाँ, 34. हम सब एक दूसरे पर निर्भर, 35. चेतना का सहज समभाव-स्नेह सहयोग, 36. सहृदयता आत्मिक प्रगति के लिये अनिवार्य, 37. बच्चे बढ़ाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी न मारें, 38. युग शक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण, 39. ब्रह्मवर्चस की ध्यान-धारणा, 40. कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि, (41) सर्वोपयोगी गायत्री साधना, (42) गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।

प्रत्येक की छपाई-सफाई सुन्दर। कवर आकर्षक। पृष्ठ संख्या 112। मूल्य तीन रुपया। डाक व्यय अलग। पूरे सैट का मूल्य 110 रु. डाक व्यय मुफ्त।

अखण्ड ज्योति प्रकाशन, मथुरा


अब तो होश संभाल

(कैभालचन्द्र कौशिक)


अब तो होश संभाल (kavita)

उत्तम तन पाकर भी दुःख के काट ना पाया जाल। हतभागी मानव तू अपने अब तो होश संभाल ॥

महानाश की सृष्टि अहिर्निश रचने में तू व्यस्त। लतावत् यह जाल करेगा स्वयं तुझे ही ध्वस्त ॥

तू अनीति में डूबा है अब हुआ मोह में मस्त। जब परिणाम सामने आयें तब होगा संत्रस्त ॥

अच्छा हो, यदि शीघ्र बदल ले तू अपनी यह चाल। हतभागी मानव तू अपने, अब तो होश संभाल ॥

मानव का जीवन यह मानव नहीं कभी भी जीता। अमृत के धोखे में निशदिन घोर हलाहल पीता ॥

सृष्टा की इस भव्य सृष्टि में तूने आग लगाई। और हंसा, फिर देख देखकर, तू अपनी चतुराई ॥

तेरी सब काली करतूतें देख रहा है काल। हतभागी मानव तू अपने अब तो होश संभाल ॥

नहीं पतन में शान, शान तो है ऊँचा उठने में। नहीं लूट में चैन, चैन तो है खुद के लुटने में ॥

तू क्या जाने धृष्ट, मजा क्या, परहित मर मिटने में। रोने में क्या मजा, और उससे बढ़कर घुटने में ॥

तुझे स्वार्थ से काम और सब धन्धे है जंजाल। हतभागी मानव तू अपने अब तो होश संभाल ॥

तू जाने मेरा क्या बिगड़े मैं समर्थ अति भारी। लगता है, पर धरी रहेंगी तेरी सब तैयारी ॥

मानवता का पतन देखकर दुःखी हुये युगदेव। करुणा फूट पड़ी अन्तर से जिनके अब स्वयमेव॥

सीख मान ले युग दृष्टा की बन जाये खुशहाल। हतभागी मानव तू अपने अब तो होश संभाल ॥

*समाप्त*