यह जगत बड़ा विचित्र है। इसमें अनगढ़ एवं सुगढ़ दोनों प्रकार के व्यक्ति रहते हैं। इच्छित प्रकृति के सुसंस्कृत व्यक्ति ही सदा मिलते रहें, ऐसा हो नहीं सकता। ऐसा दुराग्रह करना भी अनुचित है। यह संसार मात्र हमारे लिए ही नहीं बना है। इसमें भाँति-भाँति के जीवों-मनुष्यों के निर्वाह की विधाता ने गुँजाइश रखी है। इस संयुक्त समुदाय के रसोई घर में सदा वह नहीं पक सकता जो हम चाहते हैं। हमें तो मात्र श्रेष्ठजनों से प्रेरणा लेनी चाहिए, उन्हीं से घनिष्ठता साधने का उपक्रम बनाना चाहिए। सामान्यों के साथ तालमेल बिठा सके, बिना टकराये जीवन गुजारा जा सके इसी की बात सोचनी चाहिए।
हर किसी के साथ अनावश्यक उदारता बरतने की भावुकता अन्ततः बड़ी महंगी पड़ती है। संपर्क क्षेत्र में इसी कारण एक सामान्य वर्गीकरण एवं स्तर के अनुरूप अपने व्यवहार में हेर-फेर अनिवार्य हो जाता है। एक कठिनाई वहाँ आती है, जहाँ अनगढ़ों से वास्ता पड़ता है। यह विचित्र प्राणी अहंकारी व दुराग्रही तो होते हैं, निजी विवेक के सहारे किसी निर्णय पर पहुँचना उनके बसकी बात भी नहीं रहती। ऐसों के लिए प्रताड़ना से सुधार अपना काम नहीं, शासन तन्त्र का है। ऐसे में टकराव से बचना ही उचित है। अनगढ़ दुराग्रहियों के प्रति वैसा ही रुख रखा जाय जैसा कि मनोरोगियों के प्रति रखा जाता है। न तो क्षमाशील बना जाय, नहीं उपचार से विमुख हुआ जाय। लेकिन सत्परामर्श मान ही लिया जायेगा, यह नहीं सोचना चाहिए। अनीति के प्रति असहयोग व्यक्त ही नहीं, चरितार्थ भी करना चाहिए। सच्ची आदर्शवादिता यही है। जब एकाकी साहस जुट पड़ता है तो स्वतः ऐसे व्यक्तित्व पीछे-पीछे खिंचे चले आते हैं। अनगढ़ों में भी परिवर्तन होकर ही रहता है।
अवसर की तलाश में मत रहो। बुद्धिमानों के लिए हर समय अवसर है। न वे मुहूर्त निकालते हैं, न साथ ढूँढ़ते हैं और न सहारा तकते हैं। सृष्टा ने समय को ऐसी धातु से गढ़ा है कि उसका प्रत्येक क्षण शुभ है। अशुभ तो मनुष्य का संशय है, जो पल में आशा बाँधता और पल में निराश होता है।
बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं। पतन और प्रलोभनों की सर्वत्र भरमार है। धरती पर गुरुत्वाकर्षण हर किसी को- हर घड़ी गिरने के लिए बुलाता और घसीटता है। अच्छाई का अवसर तो मनुष्य को स्वयं विनिर्मित करना पड़ता है। वह बिना बुलाये किसी के पास नहीं आता है। आदर्शों के प्रति निष्ठा और अपने भरोसे पर हिम्मत जिस घड़ी उठ पड़े, समझना चाहिए कि ऊँचे उठने आगे बढ़ने की शुभ घड़ी आ पहुँची।
राह मिले तो ठीक, नहीं तो उसे बुलाना चाहिए। अवसर आये तो ठीक, नहीं तो उसे आग्रहपूर्वक बुलाना चाहिए। जो अवसर का उपयोग जानते हैं वे उसे पैदा भी कर सकते हैं। आज का दिन हर भले काम के लिए उपयुक्त है। जो शुभ है उसे शीघ्र ही किया जाना चाहिए। देर तो उनमें करनी चाहिए जो अशुभ है। जिसे करते हुए अन्तःकरण में भय संकोच का संसार होता है।
मनस्वी लोगों ने कभी अवसर की शिकायत नहीं की, हमें अवसर मिलता तो यह कर दिखाने की डींग हाँकने वाले थोथे चने की तरह हैं जो सिर्फ बज सकते हैं, उग नहीं सकते। अवसर आगे बढ़कर हाथ में लिया जाता है और अपनी प्राणाणिकता के आधार पर उसे सार्थक कर दिखाया जाता है। काम चाहे छोटा ही क्यों न हो, यदि सही तरीके से कर दिखाया जायगा तो उससे अच्छा परिणाण अनायास ही दौड़ता आयेगा और कहेगा कि हमें भी कर दिखाया जाय। यही उन्नति की सीढ़ी है। एक-एक कदम आगे बढ़ने और ऊँचे उठने का तरीका यही रहा है कि एक काम सही तरीके से किया नहीं गया कि उससे अच्छा, तत्काल आगे आ उपस्थित हुआ।
आशावादी हर कठिनाई में से उपयोगी अवसर ढूँढ़ निकालता है जबकि निराशावादी हर उपस्थिति अवसर में कोई न कोई कठिनाई देखता है और उसे करने से जी चुराने का कोई बहाना खोजता है। हर दिन, हर सप्ताह, हर मास, हर वर्ष हमारे लिए उज्ज्वल भविष्य के उपहार लिए हुए आता है, हम हैं जो न तो उसे पहचानते हैं और न उसका स्वागत करते हैं फलतः वह वापस चला जाता है और फिर कभी वापस लौटकर नहीं आता।
शेक्सपियर कहते हैं- ‘समय को मैंने बर्बाद किया और वही बर्बादी मेरी परेशानी और बर्बादी का कारण बनी हुई है।’ फ्रेकलिन कहते थे “एक ‘आज’ दो ‘कल’ के बराबर है। इसलिए कल की प्रतीक्षा में न बैठो, जो करना है उसके लिए आज ही कमर कसनी और तैयारी करनी चाहिए। जिसने समय का मूल्य नहीं समझा समझना चाहिए कि वह छोटे काम करने और छोटे स्तर का बने रहने के लिए ही पैदा हुआ है।”
भूतकाल की चर्चा न करें। जो गया वह लौटने वाला नहीं। सोचा इतना ही जाना चाहिए कि जो शेष है वह कम महत्वपूर्ण नहीं। यदि भूत की शिकायत करने की अपेक्षा भविष्य की योजना बनाने में विचारों को केन्द्रित किया जाय और परिवर्तन का क्रम आज के दिन से ही आरम्भ किया जाय तो समझना चाहिए कि महत्वपूर्ण समझदारी का आरम्भ हुआ। ऐसी समझदारी जिसे कुछ समय कार्यान्वित कर लेने पर भी एक समूची जिन्दगी का लाभ मिल सकता है।
सामान्यतः अध्यात्म प्रयोजनों से भौतिक लाभ उपलब्ध होने की बात कही जाती रही है और इसी के माहात्म्य बताये जाते रहे हैं। उनमें प्रायः आदि और अन्त का ही वर्णन दीख पड़ता है। मध्यवर्ती प्रयासों का विस्तृत उल्लेख कदाचित इसलिए नहीं किया गया है कि जिन दिनों शास्त्र रचे गये अथवा आप्त वचन कहे गये उन दिनों सर्वसाधारण का चिन्तन और चरित्र उच्चस्तरीय था। यह कहने की आवश्यकता नहीं समझी गई कि इस क्षेत्र के प्रवेशकर्ताओं का व्यक्तित्व की दृष्टि से पवित्र एवं प्रखर होना आवश्यक है। इस आरम्भिक शर्त से उन दिनों सभी परिचित थे। अस्तु उसकी चर्चा विस्तारपूर्वक करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और आदि तथा अन्त बताते हुए यह अनुमान लगा लिया गया कि मध्यवर्ती प्रक्रिया तो सर्वविदित है उसे तो लोग सामान्य बुद्धि से ही समझ रहे होंगे। फिर पिसे को पीसने से क्या लाभ?
बन्दूक का घोड़ा दबाने और लक्ष्य बेधने का आदेश ही कप्तान देते हैं। वे जानते हैं कि इस प्रयोजन के लिए सिपाही कारतूस को बन्दूक में भरने की आवश्यकता से अवगत होंगे ही। इसमें भूल होने की आदेश देने वाले को आशंका नहीं रहती। कोई सिपाही कारतूस भरे बिना ही घोड़ा दबादे और निशाने पर गोली न लगने पर लक्ष्य, बन्दूक, कप्तान आदि को दोष देने लगे तो उसका आक्रोश निरर्थक माना जायगा और कहा जायगा कि नली में कारतूस डालने का सामान्य ज्ञान क्यों भुला दिया गया।
औषधि खाने और रोग अच्छा होने की ही आमतौर से चर्चा होती रहती है। निदान, पथ्य, परिचर्या मात्रा, अनुपान आदि का विस्तार उस सम्बन्ध में विस्तृत विवेचन नहीं किया जाता क्योंकि हर कोई जानता है कि इलाज कराना है तो यह बातें तो ध्यान में रखनी ही होती हैं, उनको तो हर हालत में अपनाना ही होता है।
डाक्टर बनने के लिए मेडिकल कालेज में प्रवेश- इंजीनियर बनने के लिए इंजीनियरिंग कालेज में भर्ती हेतु दौड़-धूप करनी होती है। अभिभावक और विद्यार्थी यह जानते हैं कि डाक्टर या इंजीनियर बनने पर धन, यश, पद आदि की दृष्टि से सन्तोषजनक स्थिति प्राप्त होती है। कालेजों में दाखिला मिलने पर सदा ध्यान केन्द्रित रहता है। दौड़-धूप होती है और प्रवेश मिलने पर सन्तोष की साँस ली जाती है। उत्साह से आँखें चमकने लगती हैं। इस माहौल में कोई यह प्रसंग नहीं उभारता कि पाँच वर्ष तक मनोयोगपूर्वक पढ़ना पड़ेगा।
उपयुक्त जोड़ी, विवाह निर्धारण और सुखी गृहस्थ जीवन की संगति बिठाते हुए आयोजनकर्ता प्रसन्न होते हैं। इसकी मध्यवर्ती एक शर्त भी है कि वर-वधू अपने-अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का नियमित रूप से पालन करते रहें। इसकी उपेक्षा पर तो चयन निर्धारण कितना ही उपयुक्त क्यों न हो, विवाह सफल नहीं हो सकता और सुखी गृहस्थ की आशा नहीं बँधती। फिर भी विवाह निर्धारण के लिए दौड़-धूप करते समय उपयुक्त चयन ही पर्याप्त मान लिया जाता है। इसकी चर्चा नहीं होती कि वे दोनों किस प्रकार गृहस्थ की गाड़ी चलायेंगे। सभी जानते हैं कि वर-वधू इतना तो स्वयं ही समझते होंगे।
उपरोक्त उदाहरण इसलिए दिये गये हैं कि अध्यात्म क्षेत्र की साधनाओं का स्वरूप और उनका सिद्धि प्रतिफल बताते समय भी आदि और अन्त का ही वर्णन किया जाता रहा है। इसकी बहुत अधिक चर्चा नहीं की गई कि हर साधक को उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और उदात्त व्यवहार को अपनाने की शर्त पूरी करने पर ही साधक कहलाने का अधिकार मिलता है। ओछा और घिनौना व्यक्तित्व बनाये रखकर कोई मात्र पूजा पाठ के मन्त्र-तन्त्र के सहारे उन सफलताओं को प्राप्त नहीं कर सकता जो माहात्म्य प्रतिपादन में बताई गई हैं।
योग साधन का प्रथम सोपान “यम और नियम” जिनका तात्पर्य है जीवनचर्या में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का समुचित समावेश। भक्ति साधना में “नामापराध” का निर्धारण है। नाम तो जपा पाय पर चरित्र दोषों से लिप्त रहा जाय तो उस पर भगवान का नाम बदनाम करने का अपराध लगेगा और छद्म करने का दण्ड सहना पड़ेगा। भक्ति भावना का सत्परिणाम मिलना तो दूर- उलटा भगवान के क्रोध का भागी बनना पड़ेगा। साधनात्मक कर्मकाण्डों की फलश्रुतियों को सुनाते, समझाते समय इस तथ्य के प्रतिपादनकर्त्ताओं को उतना जानकार तो माना ही होगा कि उन्हें इस प्रयास में दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का उच्चस्तरीय समावेश स्वयं करना एक अनिवार्य शर्त है। इसकी उपेक्षा करने पर तो शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना पड़ेगा। वह बेचारा यह तो भूल करता रहा कि आदि और अन्त की बात सोची, मध्यवर्ती क्रिया प्रक्रिया की उपेक्षा करके रंगीन सपने दीखने लगा और बिना पंखों के उड़ान उड़ने लगा। यह भूल वे लोग भी करते हैं जो मन्त्र जप मात्र से सम्पदाओं और विभूतियों से घर भर लेने के दिवास्वप्न देखते रहते हैं। शिर और पैर ही सब कुछ नहीं हैं, मध्यवर्ती धड़ की भी उपयोगिता और महत्ता है। इस तथ्य से हर किसी को अवगत होना चाहिए। साधना और सिद्धि के मध्य में चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता- संयम और सेवा की जीवन साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है, यह एक अकाट्य तथ्य है, जिसे समझा जाना चाहिए।
भूल यह होती रही है कि विकृत भ्रमग्रस्तता द्वारा यह समझा या समझाया गया कि देवी देवता पूजा-पाठ के बिना भूखे बैठे रहते हैं और उतना-सा लालच दिखाकर उन्हें कुछ भी कराने के लिए वशवर्ती किया जा सकता है। उपासना को जादूगरी बाजीगरी के समतुल्य ठहराया गया और सोचा गया कि उससे कौतुक कौतूहल देखने दिखाने वाले दृश्य सामने दौड़ने लगते हैं। मनोकामना सिद्धि के लिए यह सस्ते नुस्खे बाल-बुद्धि को बहुत सुहाये। बिना पात्रता और परिश्रम के ऐसे ही हाथों की हेरा-फेरी- जीभ से कुछ कहते रटते भर रहने से ऋद्धि-सिद्धियां छप्पर फाड़कर घर में कूदेंगी, ऐसे ही कुछ अनगढ़ सपने तथाकथित साधकों के सिर पर छाये रहते हैं।
इन्हें सच मानने में मनुष्य की वह मनोवैज्ञानिक दुर्बलता सहायता करती है जिसके अनुसार वह कम परिश्रम से अधिक लाभ कमाने की विडम्बनाएँ रचता रहता है और इस चिन्तन को परिपुष्ट करते-करते दुरभि सन्धियाँ- दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है। जुआ, सट्टा,लाटरी, गढ़ा खजाना आदि की ललक इसी आधार पर उभरती है। उत्तराधिकार में- दान दहेज में विपुल धन मिलने की लिप्सा भी इसी कारण प्रचंड बनती और लूट खसौट को अधिकार मानती- उसके लिए हठ करती देखी गई है। एक कदम और आगे बढ़ने पर मनुष्य छल प्रपंच रचता या अपराध आक्रमण पर उतारू होता है। मुफ्तखोरी अनैतिकता- अवाँछनीयता की जन्मदात्री है। वह जिस कारण भी पनपे उस पूरे परिवार की निन्दा की जानी चाहिए।
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिस अध्यात्म तत्वज्ञान की संरचना- जिस साधना विधान की निर्धारणा- मात्र व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अनुपात बढ़ाने के लिए हुई थी उसका आधार ही उलटा जा रहा है। वह बिना मूल्य चुकाये, जिस-तिस प्रकार सम्पदाएँ सफलताएँ बटोरने के लिए व्यक्ति को प्रोत्साहित करता है। जबकि इससे ठीक उलटा होना चाहिए था। अध्यात्मवादी को अपरिग्रही स्वल्प सन्तोष एवं औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने वाला होना चाहिए था, औचित्य का पक्षधर एवं न्यायनीति का समर्थन करना चाहिए था। मनोकामना सिद्धि का तात्पर्य एक ही है- योग्यता और श्रमशीलता की मर्यादाओं को छलाँगकर- तुर्त-फुर्त- नैतिक या अनैतिक उपाय से मनचाही सुविधाएँ हस्तगत कर लेना। जहाँ भी ऐसी प्रवृत्ति उभरती हो, समझना चाहिए कि नीतिमत्ता पर कुठाराघात हुआ और साथ ही अध्यात्म तत्वज्ञान के आधार को समाप्त कर देने वाला कुचक्र चल पड़ा।
भगवान, सिद्ध पुरुष, धर्मानुष्ठान, साधना विज्ञान सभी इस मर्यादा में बँधे हैं ताकि न्याय एवं औचित्य का निर्वाह होता रहे। सत्प्रवृत्तियों को उच्चस्तरीय निर्धारणों को मान्यता मिलती रहे। उनकी प्राण प्रतिष्ठा दिन-दिन गहरी बनती चले। इसके विपरीत यदि वह समुदाय तनिक-तनिक से प्रलोभनों से मनुहारों से प्रभावित होकर तथाकथित भक्तजनों के साथ पक्षपात बरतने लगे तो समझना चाहिए औचित्य के आदर्श का अन्त होने जा रहा है। भगवान भी यदि ऐसा करेंगे, सिद्ध पुरुष भी यदि इतने ओछे सिद्ध होंगे तो फिर न्याय नीति की रक्षा कौन करेगा? औचित्य को संरक्षण कहाँ मिलेगा? यदि रिश्वत और चापलूसी भगवान को भी वशवर्ती कर सकती है। न्याय की, पात्रता की- उपेक्षा करके यदि व्यक्तिगत कृपा अकृपा का सिलसिला चल पड़े तो फिर सामान्य लोगों को रिश्वत, खुशामद, भाई-भतीजावाद, पक्षपात जैसे अमान्य अधारों से विरत करने की बात कैसे बनेगी।
सामान्य निर्धारण है उचित मूल्य चुकाकर उचित उपलब्धियाँ प्राप्त करना। यदि यही आधार उच्चस्तरीय सत्ताओं ने निरस्त कर दिया और भक्तजनों को उसकी छूट दे दी तो फिर समझना चाहिए कि औचित्य के आधार पर कुछ पाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया कोई क्यों अपनाता रहे? तब तप त्याग की- संयम पराक्रम की शोधन, परिष्कार की- कष्टसाध्य प्रक्रिया अपनाने की कोई उपयोगिता आवश्यकता ही न रहेगी। सभी’ शार्ट कट’ ढूंढ़ेंगे। इसकी प्रतिक्रिया का प्रत्यक्ष स्वरूप होगा- अनौचित्य का प्रचलन और अनुशासन का समापन। यदि यह क्रम चल पड़ा तो समझना चाहिए कि पूजा पाठ और अनौचित्य का ठाट-बाट यही दो इस संसार में शेष रहेंगे। उस आधार का समापन ही हो जाएगा जिसके लिए कि धर्म, अध्यात्म, की- भक्त और भगवान की- आवश्यकता अनुभव की गई।
संकट में एक दूसरे की सहायता करना- उठाने और बढ़ाने में सहायता करना मानवी गरिमा का एक पक्ष है। उसे यथावत् चलना चाहिए। जिनके पास आत्म बल की सम्पदा है वे उसे सहायता के लिए भी प्रयुक्त करते हैं पर साथ ही औचित्य का भी ध्यान रखते हैं। जिस-तिस की उचित-अनुचित मनोकामनाओं की पूर्ति में सस्ती वाहवाही के बदले उसे खर्च करने लगे तो समझना चाहिए कि ‘सिद्ध पुरुष’ कहलाने की अध्यात्म गरिमा से वे लोग बहुत नीचे आ गये। दाता और याचक के बीच में औचित्य की कसौटी रहती है। उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। तथाकथित भक्तजन और सिद्ध पुरुष मिलकर भी ऐसे भ्रष्टाचार की मान्यता नहीं दिला सकते। विश्व व्यवस्था के कुछ मूलभूत सिद्धान्त हैं और उसमें उचित मूल्य चुकाकर उचित उपलब्धियाँ प्राप्त करने की भी एक परम्परा है। सस्ते मोल महंगे साधन समेट लेना विश्व व्यवस्था से सर्वथा बाहर की बात है।
अध्यात्म विज्ञान के विद्यार्थियों को यह तथ्य गिरह बाँध लेना चाहिए कि यह विधा चिन्तन एवं चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने तथा व्यक्तित्व में पवित्रता प्रखरता भर देने की सुव्यवस्था का दूसरा नाम है। इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ता है, उसकी पात्रता प्रामाणिकता का स्तर उतना ही ऊँचा उठता जाता है। फलतः आत्मवत् के रूप में साहस, संकल्प एवं पुरुषार्थ के सत्प्रयोजनों में तत्परतापूर्वक निरत देखा जाता है। सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों से व्यक्तित्व भरा-पूरा दीखता है। जहाँ ऐसी स्थिति होगी वहाँ आत्मिक ही नहीं, भौतिक सम्पदाओं की भी कमी न रहेगी। जिसे आत्म विश्वास उपलब्ध है, जिसने जन सम्मान और जन सहयोग अर्जित कर लिये। उसके लिए भौतिक सफलताएँ एवं सम्पन्नताएँ प्राप्त कर लेने में तनिक भी कठिनाई नहीं रहती। हाँ, साथ ही इतना भी अवश्य होता है कि अध्यात्मवादी- साधनारत व्यक्ति उपार्जित या प्राप्त वैभव का उपयोग नहीं करता। उपार्जन कितना ही क्यों न करते, उसमें से औसत नागरिकों जैसा ही निर्वाह स्वीकार करता है, शेष को उदारता पूर्वक उस लोक-मंगल के लिए हाथों -हाथ वापस कर देता है। जिसके कन्धों पर कि सर्वजनीन सुख-शान्ति का आधार टिका हुआ है।
आज हम वह हैं जो पिछले दिन इच्छा और कल्पना करते रहे हैं, कल हम वह होंगे जैसा कि इन दिनों सोचते रहते हैं।
परिव्राजकों में परस्पर चर्चा चल रही थी। समाधान न मिलता देख उनमें से एक जिज्ञासावश संघ स्थविर आचार्य अभिष्यन्द से पूछ बैठा- “महामन्। आपने सर्व श्रेष्ठ दान को ही महायज्ञ की संज्ञा दी है। मूढ़ मान्यताओं से ग्रसित- बलि प्रथा से अभिशिप्त यज्ञ परम्परा को तो हम बौद्ध नहीं मानते। इस नाम से संव्याप्त अनाचार का तो हमने खण्डन भी किया है। परन्तु महायज्ञ का स्वरूप समझ पाने में हम असफल रहे हैं। कृपया इसकी व्याख्या करें ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
जिज्ञासा को पूरा सम्मान देते हुए आचार्य श्री ने कहा- ‘भद्रजनों! यज्ञ का अर्थ है उदारशील-दानवृत्ति, सत्प्रवृत्तियों का अभिनन्दन एवं सामूहिकता को समर्थन।’ यदि अन्तः से उदार आत्मीयता का निर्झर निस्सृत होने लगे, सम्वेदना से अभिपूरित मानवी सत्ता अपनी गरिमा को पहचान कर व्यष्टिगत स्वार्थ को समष्टिगत हित में बदलने के लिये आतुर हो उठे तो मानना चाहिए कि व्यक्ति में देवत्व जाग उठा। महायज्ञ इसी पुनीत प्रयोजन को कहा गया है।
संघ स्थविर प्रमुदित मन से बोल उठे- “भद्रजनों! आपने सम्राट अशोक का तो नाम सुना ही होगा जिन्होंने कलिंग के नर संहार के बाद अपना जीवन क्रम ही बदल डाला। बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर उन्होंने सारा जीवन भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार में लगा दिया।
“हे परिव्राजक गणों! श्रेष्ठतम दान धन मुद्राओं का समर्पण नहीं, अपितु इससे भी ऊँचा है। सम्राट अशोक अपने अन्तिम समय में मृत्यु शैय्या पर पड़े थे। अपना घर, परिवार, धन, विलास दुःखी पीड़ितों की सेवार्थ- परिव्राजकों के लिये संघाराम निर्माण हेतु लगाने के बाद भी उसके मन में असन्तोष ही बना हुआ था। भगवान के आह्वान पर एक साधारण गृहस्थ अनाथ पिण्डक द्वारा सौ करोड़ मुद्राएँ देने के बाद उन्होंने भी इतनी ही राशि जनहित में दान करने का संकल्प लिया था। विद्यालयों, मठों और लोक कल्याण के अन्यान्य कार्यों के लिए वे छियानवे करोड़ मुद्राएँ दे चुके थे। संकल्प पूर्ति के पूर्व ही रुग्ण होने के कारण वे क्षुब्ध होने लगे। लगा कि कहीं मृत्यु ने समय से पूर्व ही काल कवलित कर लिया तो वे अपना संकल्प पूरा नहीं कर सकेंगे। सम्राट कुणाल के पुत्र सम्पदी को युवराज बना चुके थे। राज्य के कोष से दान देने की व्यवस्था पर अंकुश लग चुका था। सत्ता अब नये राजा के हाथ में थी विवश सम्राट अपने निजी उपयोग की वस्तुएँ दान में देने लगे। स्वयं वे मिट्टी के पात्रों व नाम मात्र के वस्त्रों से काम चलाने लगे।
अन्तिम दिन संघाराम से आए भिक्षुक को दुःखी सम्राट ने काँपते हाथों से सूखे आँवले का आधा शेष भाग दे दिया और कहा- “अब मेरे पास इसके अतिरिक्त और कुछ भी शेष नहीं बचा है। इसे ही अन्तिम दान समझें और स्वीकार करें।” संघ अधीक्षक ने उस आँवले के टुकड़े को श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर चूर्ण रूप बनाकर भिक्षुओं के लिये बनने वाले अमृताशन में मिला दिया। सबने उस महाप्रसाद को पाया। इस बीच सम्राट अशोक की अन्तिम वेला के समय आचार्य संघाराम उनके पास गए और मस्तक पर हाथ फेरते हुए कहा- “राजन्! आप शान्तिपूर्वक स्वर्ग प्रयाण कीजिए। आपका संकल्प पूरा हुआ। आपने जो आधे आँवले का दान किया था, वह सहस्रों करोड़ मुद्राओं से भी अधिक पुण्यदायक है। उसका मूल्य आँका नहीं जा सकता। आपका संकल्प पूरा हुआ।” सम्राट ने सन्तोष की साँस ली व सदा-सदा के लिए अपने नेत्र बन्द कर लिए।
भिक्षुकों को सम्बोधित करते हुए आचार्य बोले- “यही सर्व मेध यज्ञ है- महायज्ञ है। इससे बढ़कर पुण्यदायक मुक्ति प्रदाता और कोई कर्म नहीं।”
सामान्य जन, अनेकानेक क्षुद्र योनियों के कुसंस्कारों से लदे होते हैं। शिश्नोदर परायण पशु प्रवृत्तियों में ही उनका मन रमता और प्रयत्न चलता है। इस स्तर से उबर कर मानवी गरिमा के क्षेत्र में प्रवेश करने की प्रक्रिया अध्यात्म तत्वज्ञान और साधना विधान के सहारे ही सम्भव होती है। उसका आलोक अन्तराल में प्रवेश करता है तो पुण्य परमार्थ की दो प्रवृत्तियाँ उभरती हैं। पुण्य अर्थात् आत्म संयम, परमार्थ अर्थात् सत्प्रवृत्ति संवर्धन में उत्साह। इन्हीं के समन्वय को देवत्व कहते हैं। महामानवों का यह कार्यक्षेत्र है। उनकी विचारणा एवं तत्परता इन्हीं दो प्रयोजनों पर केन्द्रित होती है। फलतः वे स्वयं कृत-कृत्य होते हैं और अपने संपर्क क्षेत्र में शालीनता का वातावरण उत्पन्न करने में चन्दन वृक्ष का उदाहरण बनते हैं। यह अध्यात्म क्षेत्र ही देव मानवों की नर-रत्नों की खदान है। इस विधा का जब जितना प्रचलन विस्तरण होता है तब उसी अनुपात से वैयक्तिक प्रखरता और सामूहिक समर्थता की अभिवृद्धि होती है। सर्वतोमुखी प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है। चेतना में उत्कृष्टता का स्तर बढ़ने से स्वल्प साधनों को मिल बाँटकर खाया और सन्तोषपूर्वक रहा जा सकता है। जबकि इसमें कमी पड़ने पर लोग आपस में टकराते और नारकीय दुष्प्रवृत्तियों से सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न करते हैं। भले ही सम्पदा के पर्वत इर्द-गिर्द ही क्यों न खड़े रहें।
इन तथ्यों पर ध्यान देने से अध्यात्म तत्वज्ञान और साधन विधान की व्यावहारिक गरिमा प्रकट होती है। यह प्रतिफल ऐसे हैं, जिन्हें अपनाये जाने पर मनुष्य में देवत्व का उदय होना निश्चित है। जहाँ सज्जनता बढ़ेगी वहाँ अपनी इसी धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बिखरा-बिखरा फिरेगा। यही है अध्यात्म की विभूतिवान् परिणति; जिसके लिए उसे विचारशीलों द्वारा असाधारण महत्व दिया गया है और उसके महात्यों का वर्णन अलंकारिक आकर्षणों सहित व्यक्त किया है।
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि चेतना को नरक से उवार कर स्वर्ग में पहुँचाने वाली इस विधा को जादूगरी बाजीगरी की पंक्ति में बिठा दिया गया है। प्रचलन में अध्यात्म का अर्थ कौतुक, कौतूहल, चमत्कार जैसा माना जाता है और उस आधार पर छुटपुट-सी हथफेरी करने पर विपुल सम्पदाएँ मनमानी सफलताएँ पाने का सपना देखा जाता है। अकर्मण्य लोग पुरुषार्थ के बल पर वैभव खरीदने में सफल नहीं होते तो इन हथकण्डों के सहारे सम्पत्तिवान और यशस्वी बनने की बात सोचते हैं। कइयों को चित्र-विचित्र दृश्यों के देखने की बाल-सुलभ उत्सुकता रहती है। कोई देवी-देवताओं को अपने इर्द-गिर्द नाचने-कूदने का दृश्य देखना चाहते हैं। कुछ की कुण्डलिनी सर्पिणी को फुसकार सुनने आँखों के आगे आज्ञाचक्र घूमने, आकाश से पुष्प वर्षा होने जैसे कौतूहलों का मजा लूटने की इच्छा रहती है। कुछ हवा में हाथ मार कर इलाइची जलेबी आदि मँगाने और उन मुफ्त की वस्तुओं का स्वाद चखना चाहते हैं। संक्षेप में यही है ऋद्धि-सिद्धि का कौतुक कौतूहल। जिसके आधार पर किसी को गढ़ा खजाना बता देने का प्रलोभन और किसी को मरण मोहन का भय दिखा कर उँगली के इशारे पर नचाया जाता है। कुछ देवताओं के सोल ऐजेन्ट बनते हैं और कुछ भविष्य वक्ता भाग्य विधाता होने का करते हुए अपने को सिद्ध पुरुष के रूप में चमत्कारी घोषित करते हैं। अब अणिमा, महिमा जैसी हवा में उड़ने, पानी पर चलने और अदृश्य बनने जैसी करामातों के दावेदार तो नहीं रहे, पर बाजीगरों की तरह वालों में से बालू निकालने वालों की अभी भी कमी नहीं है। आश्चर्य होता है कि यह सारा भ्रम-जंजाल अध्यात्म के साथ कैसे जुड़ गया। देवता के साथ मलीनता का यह अम्बार किस प्रकार चिपक गया?
अध्यात्म क्षेत्र के साधनों को जहाँ दूरदर्शी विवेकवान होना चाहिए था। तथ्य और सत्य की परख में रस लेना चाहिए। संयमी और परोपकारी जैसी प्रवृत्ति से उन्हें विभूतिवान् रहना चाहिए था। वहाँ मुफ्त में मनोकामनाएँ पूरी कराने और कौतूहल देखने की ललक से उनका मनःक्षेत्र किस कारण इतना दिग्भ्रांत और कलुषित हो गया? पुरातन उदाहरणों में अध्यात्म क्षेत्र के साधक और प्रवक्ता ऋषि स्तर के ही दीख पड़ते हैं उन्हें ऋषि कल्प जीवनयापन करते और अहिर्निश लोक सेवा में प्राण-पण से बिरत पाते हैं, पर आज तो सब कुछ उलटा है। तथाकथित साधु सन्तों की मनःस्थिति और परिस्थिति को कसौटियों पर कसने से प्रतीत होता है कि महानता के साथ-साथ प्रवंचना और विडम्बना ने बुरी तरह आधिपत्य जमा रखा है।
चमत्कारवाद की घुसपैठ इस क्षेत्र में कैसे हुई? इसका आधार तपश्चर्या के आधार पर उपलब्ध होने वाली अतीन्द्रिय क्षमता के साथ जुड़ता या दीखता है। अन्तराल की गहन परतों में साधना के आधार पर प्रवेश करने वाले निस्सन्देह अतीन्द्रिय क्षमताएँ अर्जित करते रहे हैं। अति मानोस का निखार होने पर व्यक्ति अति मानव बनता है। ऐसों के पास देवोपम स्तर की क्षमताएँ होनी चाहिए। होती भी हैं। पर प्रश्न यह है कि उनका प्रदर्शन कौतुक कौतूहल प्रदर्शित करने के लिए क्यों है? क्यों न उस विशिष्टता के आधार पर लोक-मंगल को सामयिक एवं महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा किया जाय। पुरातन काल की ऋषि परम्परा यही थी। आत्म बल के धनी एकोंएक महामानव ने अपने उपार्जन को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए प्रयुक्त किया है। किसी को चमत्कार तमाशे नहीं दिखाये। फिर आज उस प्रदर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ गई?
यह तथ्य है कि किसी क्षेत्र में असाधारण पुरुषार्थ करने पर उसकी असाधारण उपलब्धि भी हस्तगत होती है। सामान्य तथा स्थूल शरीर ही व्यवहार में आता है और उससे सम्बन्धित बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता, सम्पन्नता प्रतिभा जैसी सम्पदाएँ उपार्जित की जाती हैं। सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के क्षेत्र और भी अधिक महत्वपूर्ण विभूतियों के भरे पड़े हैं। उनमें सृष्टा का समस्त वैभव बीज रूप से प्रतिष्ठित है। प्रयत्न कर्त्ता उस सम्पदा को कुरेदने, उभारने और बटोरने में समर्थ हो सकते हैं अतीन्द्रिय क्षमता का भण्डार हस्तगत कर सकते हैं और देव मानव स्तर के चमत्कारी सिद्ध पुरुष बन सकते हैं। अध्यात्म क्षेत्र के वरिष्ठों में ऐसी ऋद्धि-सिद्धियों के समय-समय पर दर्शन होते भी रहते हैं। इससे इतना तो सिद्ध होता है कि तपश्चर्या एवं योग साधना के सहारे सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की क्षमता को देवोपम स्तर तक उभारा उठाया जा सकता है।
इतना जानने वालों को इतना और भी जानना चाहिए कि जिनके पास ऐसी विभूतियाँ होंगी वे उनका प्रदर्शन कौतुक कौतूहल दिखाने जैसी आत्मश्लाधा एवं बालक्रीड़ा कभी भी न करेंगे और न ठगों की चापलूसी से प्रभावित होकर कुपात्रों की मनोकामना के निमित्त लुटाने की भूल करेंगे। उन्हें ध्यान रहता है कि इस उपार्जन का सदुपयोग मात्र लोक मंगल एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त ही हो सकता है। ऐसी दशा में कौतुक देखने वालों और मुफ्त का वरदान बटोरने वालों का पक्ष हेय रहने से उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। अध्यात्म क्षेत्र के सुसम्पन्नों में से प्रत्येक का स्तर एवं प्रयास यही रहा है। उनका उच्चस्तरीय उपार्जन व्यक्ति विशेष को इन्द्र कुबेर बनाने का नहीं वरन् मात्र लोक मंगल के लिए नियोजित रहा है। पुरातन काल के ऋषियों से लेकर मध्यकालीन बुद्ध, शंकर, समर्थ, परमहंस, गाँधी जैसे सच्चे अध्यात्मवादी अपनी शक्ति को महान प्रयोजन में ही निरत रखे रहे हैं। सुपात्रों को सत्प्रयोजनों के लिए ही उनने अपने अनुदान हस्तान्तरित किये हैं। किसी भी लुटेरे की दाल उनके आगे नहीं गली। व्यक्तिगत सम्पन्नता पाने और गुलछर्रे उड़ाने के लिए कोई भी धूर्त उनकी जेब काट लाने में कुछ भी विडम्बना रच कर सफल नहीं हो सका। सन्त सामान्य जनों की मनोदशा मोड़ते और सुधारते हैं। सस्ती चापलूसी के बदले अपने बहुमूल्य भण्डारों को कुपात्रों को लुटाने या चित्र-विचित्र करामातें दिखाने की भूल सच्चे अध्यात्मवादियों में से आज तक किसी ने भी नहीं की है। जिनकी जेब खाली है उन्हें ही करोड़पति जैसी शेखी बघारने और विडंबना रचने में संलग्न देखा जाता है। विभूतिवान् जिस घोर तप साधना से सिद्धियों को अर्जित करते उसी जिम्मेदारी के साथ उसका उपयोग भी फूँक-फूँक कर करते हैं। लुटाने का पाखंड रचने वालों में से शत-प्रतिशत ढपोर शंख ही होते हैं।
अतीन्द्रिय क्षमताओं की ऋद्धि-सिद्धियाँ, ऋषि स्तर के विशिष्ट व्यक्तियों के पास ही होती हैं और उनका प्रयोग विशिष्ट प्रयोजनों के लिए ही होता है। सार्वजनीन सिद्धियाँ वस्तुतः तीन ही हैं- (1) आत्म सन्तोष (2) जन सहयोग (3) दैवी अनुग्रह। इन तीनों को हर कोई सच्चा अध्यात्मवादी हाथोंहाथ प्राप्त करता है। उनके महत्व प्रतिफल का रसास्वादन करते हुए अपने आपको कृत-कृत्य अनुभव करता है। यह सिद्धियाँ ऐसी हैं जिन्हें पारस, कल्पवृक्ष और अमृत की उपमा निःसंकोच दी जा सके।
आत्म सन्तोष के लिए ही लोग दिन रात श्रम करते और भले-बुरे कामों में हाथ डालते हैं। सम्पन्नता, बुद्धिमत्ता, प्रतिभा कितनी ही अधिक अर्जित करने पर उनका लाभ शरीर भर को मिलता है। आत्मा की क्षुधा पिपास आन्तरिक उत्कृष्टता एवं उदार सेवा, साधना से ही तृप्त होती है। सच्चे अध्यात्मवादी को इन्हीं दो प्रयत्नों में सर्वतोभावेन निरत होना पड़ता है फलतः अजस्र मात्रा में आत्म सन्तोष मिलता है। जड़ें मजबूत एवं गहरी होने से ही वृक्ष सुविकसित होता है। आत्मा के समर्थन एवं आशीर्वाद से ही व्यक्तित्व की महानता उभरती है। फलतः साहस, उत्साह और संकल्प की कमी नहीं रहती। आत्म सन्तोष और आत्मबल अन्योन्याश्रित है। जहाँ एक होगा वहाँ दूसरा भी रहेगा। अंतर्द्वंद्व ही आत्मबल को नष्ट करते हैं। जहाँ आत्मा और परमात्मा की व्यक्ति और आदर्श की एकता है वहाँ हर घड़ी प्रसन्नता बनी रहेगी और उल्लास भरी उमँग उठती रहेगी।
आत्मबल संसार का सबसे बड़ा बल है। जहाँ-जहाँ होता है वहाँ अन्य बल भीतर से उपजते बढ़ते भी हैं और बाहर से खिंचते भी चले आते हैं। आत्म सम्पदा के धनी लोगों को भौतिक सम्पन्नता की भी कमी नहीं रही। जहाँ क्षुद्रता से घिरे लोग कुकर्म करते और हंस स्तर अपनाने पर भी दरिद्र उद्विग्न बने रहते हैं। वहाँ आत्मबल के धनी बुद्ध और गाँधी की तरह हर स्तर की विभूतियों से घिरे रहते हैं। यह बात दूसरी है कि वे क्षुद्रजनों की तरह अपना पराया सब कुछ उदरस्थ ही नहीं करते रहते वरन् उसे सत्प्रयोजन के निमित्त भगवान के खेत में बोते रहते हैं ताकि अदृश्य स्तर की दिव्य विभूतियों से उनका कोष हजारों गुना बढ़ता रहे। जिसे खिलाने का मजा आ गया वह खाने में कटौती करता है ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की तरह दूसरों को खिलाता रहता है। शबरी इसी आधार पर कृत-कृत्य हुई थी। गोपियों ने यही नीति अपना कर भगवान को ललचाया और आँगन में नचाया था। क्षुद्रजन खाना ही खाना जानते हैं जबकि महान खिलाने का आनन्द लूटते और आत्म-संतोष आत्मबल के धनी बनते हैं।
(2) अध्यात्म क्षेत्र की दूसरी सिद्धि है- लोक सम्मान, जनसहयोग। हर किसी की इच्छा लोक सम्मान पाने की होती है। सजधज, ठाट-बाट में ढेरों समय और धन इसीलिए लगता है कि लोगों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न हो, वरिष्ठता स्वीकारें, प्रभावित हों और वाह-वाह कहने लगें। इस ललक की पूर्ति के लिए मनुष्य निरन्तर लालायित रहता है। ‘स्टेट्स’ बनाना ‘स्टैण्डर्ड मेन्टेन’ करना इसी को कहते हैं। इस विडम्बना में मनुष्य का अधिक चिन्तन, श्रम एवं उपार्जन खप जाता है फिर भी पल्ले कुछ नहीं पड़ता, वरन् उल्टे ईर्ष्या का शिकार होना पड़ता है। अपव्ययजन्य तंगी और उसकी पूर्ति के लिए अनीति अपनाने का एक कुचक्र अलग ही चल पड़ता है।
अध्यात्मवादी को आत्म परिष्कार और लोक मंगल में संलग्न सत्प्रवृत्तियां जन-जन का मन जीत लेती हैं। सहज श्रद्धा उत्पन्न करती हैं। श्रेष्ठता को सदा वरिष्ठता मिलती है और उसे हार्दिक स्नेह सम्मान मिलता है। शत्रु भी उसकी प्रशंसा करते हैं। इसी आधार पर मनुष्य प्रामाणिक बनता है। जो प्रामाणिक है उसे भरपूर सम्मान मिलता है। यह तथ्य भी स्मरण रखने योग्य है कि सम्मान के साथ सहयोग भी जुड़ा हुआ है। जो जिसकी इज्जत करेगा उसका अनायास ही सहयोग करेगा सहयोग ही वह आधार है जिसके सहारे बहुमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर होना किसी के लिए सम्भव होता है। महामानवों को सफलताएँ इसी आधार पर सम्भव हुई हैं। उन्होंने अपनी टाँगों से छलाँग नहीं लगाई वरन् लोगों ने कंधों पर बिठाकर उन्हें ऊँचा उठाया और सफल बनाया है। इस स्तर की सफलता भले ही आँखों से तत्काल प्रत्यक्ष न दीखती हो, पर उसकी परोक्ष परिणति को तनिक-सी गहराई में उतरने पर सहज ही जाना परखा जा सकता है। इस स्तर की सफलताओं को सच्चे अर्थों में सिद्धि कहा जा सकता है। इससे अपना ही नहीं दूसरे असंख्यों का भी भला होता है। अगणितों को अनुकरण की प्रेरणा मिलती है और वातावरण में उत्कृष्टता का पक्षधर उभर आता है।
(3) दैवी अनुग्रह तीसरी सिद्धि है। सत्प्रयोजन में आमतौर से सर्वसाधारण का व्यंग, उपहास, असहयोग विरोध ही रहता है। प्रचलन के विपरीत कदम बढ़ाने वाले के मार्ग में लोग पग-पग अड़ंगे अटकाते, निरुत्साहित करते और विपरीत परामर्श देते हैं। ऐसी दशा में श्रेय पथ के पथिक को आत्मविश्वास के सहारे एकाकी आगे बढ़ता होता है। स्पष्ट है कि विरोध में सारा वातावरण और प्रयास में साधन रहित एकाकी। फिर सफलता कैसे मिले? इस संदर्भ में सदा दैवी शक्तियाँ सहायता करतीं और प्रतिकूलता में अनुकूलता से बदलती देखी गई हैं। इन्हीं के समर्थन से आदर्शवादी संकल्प को स्थिर रखने एवं साहस बनाये रहने में समर्थ होता है। आदर्शवादियों की सफलता का यही परोक्ष इतिहास है। उन्हें दैवी अनुग्रह के सहारे ही भँवरों को पार करते हुए पार पहुँचने का सौभाग्य मिला है। इतना ही नहीं उसने अपनी नाव खेते हुए अगणित अन्यान्यों की भी पार उतारा है।
अणिमा, महिमा लघिमा आदि सिद्धियाँ सम्भव हैं या नहीं? चमत्कार दिखाने और निहाल बनाने की जादूगरी का अध्यात्म से कोई सम्बन्ध है, या नहीं? इसका निर्णय हर विज्ञजन को अपने विवेक से करना चाहिए। किन्तु इस तथ्य को निश्चित रूप से गिरह बाँध लेना चाहिए कि अध्यात्म मार्ग का अवलम्बन करने पर व्यक्तित्व में उत्कृष्टता के अभिवर्धन का जो लाभ मिलता है, उसके सहारे आत्म सन्तोष, जन सहयोग एवं दैवी अनुग्रह की अजस्र वर्षों निश्चित रूप से होती है।
जैतवन के ग्राम निवासी भगवान बुद्ध का दर्शन करने और उपदेश सुनने की आकाँक्षा से समवेत होकर आये।
उस समय तथागत की गम्भीर धर्मचर्चा चल रही थी। महा काश्यप, माौदगल्यायन, सारिपुत्र चुन्द और देवदत्त आदि उस अमृतपान में तन्मय थे।
तथागत ने आगत ग्रामवासियों को देखा और प्रवचन रोक दिया, अनाथ पिण्डक से बोले- ‘भद्र ! उठो- सामने ब्राह्मण मण्डली आ रही है। उन्हें आसन दो और आतिथ्य की उपचार सामग्री ले आओ।’
अनाथ पिण्डक ने देखा ब्राह्मण मण्डली कहीं नहीं थी। मात्र कुचिंत वस्त्रों में ग्राम वासियों का एक झुण्ड तितर-वितर होकर चला आ रहा था। उनने तथागत का भ्रम दूर करते हुए कहा-’देव! इन आगन्तुकों में एक भी ब्राह्मण नहीं है। यह सभी अन्त्यज जाति के हैं। कई तो इनमें शूद्र भी हैं।’
बुद्ध गम्भीर हो गये और बोले- ‘जो सदाशयता के प्रति श्रद्धावान है वही ब्राह्मण है। यह लोग श्रेष्ठ प्रयोजन के लिए भाव युक्त होकर आये हैं। यह इस समय तो ब्राह्मण ही हैं। उनका समुचित सत्कार होना चाहिए।’
वैसा ही किया भी गया।
भाव सम्वेदनाओं से युक्त अन्तःकरण को मानव जीवन की एक महान उपलब्धि कहा गया है। ऐसे अन्तःकरण से युक्त व्यक्ति जिस भी समाज एवं देश में रहते हैं, उनकी सुख-शान्ति बढ़ाने में सहायक होते हैं। पवित्र अन्तःकरण एवं उच्चस्तरीय भावों का गुणगान संसार के सभी धर्म एवं शास्त्र करते हैं। भावनाओं की महिमा गाते शास्त्र नहीं अघाते। सन्तों ने तो यहाँ तक कहा है “भावों के भूखे हैं भगवान”। तत्त्वदर्शियों के अनुसार वह परमात्मा भावनाओं में निवास करता है, उसी के सहारे अन्तःकरण में दर्शन देता है। भावनाशील होना मानवी गरिमा के अनुकूल हैं एवं उत्कर्ष की और बढ़ने का प्रथम चिन्ह हैं।
परन्तु भावों के प्रवेश पर विवेक का अंकुश न हो तो वह कितनी ही प्रकार की समस्याओं को जन्म दे सकता है। अनियन्त्रित भावनाएँ भावातिरेक कहलाती हैं। इनकी प्रतिक्रिया मनः असन्तुलन, मानसिक विक्षोभ, चिन्ता, आतुरता जैसे व्यतिरेकों के रूप में दिखायी पड़ती है। ये असन्तुलन समूचे विचार तन्त्र को ही गड़बड़ा देते हैं। फलतः किसी भी विषय पर सही सोचते अथवा निर्णय लेते नहीं बनता। मनःशास्त्रियों ने भावातिरेक को एक मानसिक रोग माना है तथा इससे बचने के लिए कठोर निर्देश दिये हैं। भावों पर अंकुश न रहने तथा उनमें औचित्य एवं दूरदर्शिता का समावेश न रहने से वे अति भावुकता के प्रवाह के रूप में प्रकट होते हैं।
उल्लेखनीय है कि मनोकायिक रोगों की चिकित्सा पद्धति में यह सर्व सम्मत से स्वीकार किया जाने लगा है कि शरीर के हारमोनल स्रावों की न्यूनाधिकता में विचारों एवं भावनाओं का विशेष प्रभाव पड़ता है। वे सन्तुलित न होने के कारण मानसिक असन्तुलन को ही जन्म देते हैं। फलतः समूची शरीर की संचार प्रणाली अव्यवस्था की शिकार हो जाती है। उसकी प्रतिक्रिया अनेकानेक शारीरिक-मानसिक रोगों के रूप में प्रकट होती दिखायी पड़ती हैं।
प्रख्यात चिकित्सा शास्त्री डा. फ्लैन्ड्रस डूनेवर ने अपने प्रयोग परीक्षणों का निष्कर्ष “इमोशन्स एण्ड बॉडिली चेन्जेज” में प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिसमें यह सप्रमाण उल्लेख किया गया है कि भावनाओं का शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भय, चिन्ता, क्रोध, आवेश जैसी उत्तेजनाओं से एड्रिनल ग्रन्थि के स्राव में कमी आती है। प्रायः देखा भी जाता है कि उत्तेजनाग्रस्त होने पर उसकी बाह्य प्रतिक्रिया जीभ सूखने, जीभ लड़खड़ाने के रूप में होती है। यह भी प्रयोगों में देखा गया है कि उत्तेजना से रक्त संचार की गति बढ़ जाती है। चेहरे की दमक उठना, आँखों का लाल हो जाना उसका बाह्य संकेत हैं। ऐसी स्थिति में रक्त नलिकाओं के फटने तक की सम्भावना रहती है। अतिशय तनाव तथा बारम्बार इस तनाव की पुनरावृत्ति ब्रैन हैमरेज का भी कारण बन सकती है, कई बार बनती भी है।
नोबेल पुरस्कार विजेता डा. अलेक्सिस कैरेल ने अपने प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला है कि घृणा, भय क्रोध, चिन्तातुरता जो भावातिरेक के कारण पैदा होते हैं, जब हमारी आदत के अंग बन जाते हैं तो कई कायिक परिवर्तनों व रोगों को जन्म देते हैं। प्रख्यात चिकित्सा शास्त्र की पुस्तक ‘वाथवेज ऑफ साइन्स’ में एक रूसी वैज्ञानिक ने रोगोत्पत्ति और भावनात्मक असन्तुलन में गहरा तादात्म्य स्थापित करते हुए कहा है कि “मनुष्य का भाव जगत एक वरदान है और एक तरह से अभिशाप भी। वरदान इसलिए कि इस क्षेत्र से निस्सृत उच्च-स्तरीय भावनाएँ स्वयं व्यक्ति के शारीरिक मानसिक विकास के लिए न केवल हितकारी हो सकती है वरन् समस्त समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है। यह अभिशाप उस स्थिति में साबित होता है जब व्यक्ति भाव असन्तुलन का शिकार होता है। ऐसी हालत में दूसरों का तो दूर मनुष्य अपना स्वयं का विकास भी नहीं कर पाता। उल्टे ऐसी स्थिति मानसिक असन्तुलन को जन्म देती है। जिसकी परिणति शरीरगत एवं मनोगत रोगों के रूप में होती है।
“पेशेन्ट्स एण्ड डाक्टर्स देयर इन्टररिलेशन” पुस्तक के लेखक हैं- एक ब्रिटिश मेडिकल अधिकारी। उनका कहना है कि “भावनाओं की प्रतिक्रिया हम सम्पूर्ण शरीर में अनुभव कर सकते हैं। उन अनुभूतियों के आधार पर उचित अनुचित का चयन भी कर सकते हैं। अर्थात् किस भाव को मन में स्थान देना चाहिए तथा किसे नहीं, इसका निर्धारण हर कोई कर सकने में सक्षम है। उदाहरणार्थ- किसी खतरे का अवसर सामने प्रस्तुत होते ही सम्पूर्ण शरीर में भय का संचार होने लगता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शरीर में कंपन, मुँह सूखना, त्वचा का पीला हो जाना, हृदय की धड़कन बढ़ना आदि शारीरिक संकेत मिलते हैं। देश प्रेम की भावना से शरीर रोमांचित हो उठता है। त्याग, बलिदान, उत्सर्ग की प्रेरणाएँ उभरने लगती हैं। समाज सेवा का भाव एक अद्भुत सन्तोष प्रदान करता है। ईर्ष्या द्वेष के भावों से मन विक्षुब्ध हो उठता है। दया, करुणा, क्षमा से एक विशेष प्रकार की शान्ति मिलती है। सच्ची प्रेम भावना का प्राकट्य एक दिव्य मस्ती से मन को भर देता है। प्रतिस्पर्धा की भावना से शरीर एवं मन की गतिशीलता बढ़ जाती है। पुरुषार्थ में माँसपेशियाँ फड़कने लगती हैं।
भावनाओं का एक क्षेत्र वह है जो विशेष प्रकार की प्रेरणाएँ उभारता तथा मनुष्य को एक दिशा विशेष में गतिशील होने को विवश करता है। दूसरा क्षेत्र वह है जो स्वयं के शरीर एवं मन को प्रभावित करता है। स्वास्थ्य एवं सन्तुलन को बनाने अथवा बिगाड़ने में यही काम आता है। निषेधात्मक भावों की प्रतिक्रिया तत्काल मन एवं शरीर पर अनुभव की जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि शरीर की जीवनी शक्ति चुक रही हो। मन की प्रफुल्लता, प्रसन्नता, उत्साह एवं उमंग धीरे-धीरे समाप्त हो रही हो। ऊब, थकान, एवं अशक्तता, की अनुभूति होती है। विधेयात्मक भाव भी अपनी प्रतिक्रियाएँ मानसिक प्रसन्नता, शान्ति एवं सन्तोष- शारीरिक तत्परता, सजगता के रूप में बहिरंग में दृष्टिगोचर होते हैं। शरीर में जीवनी शक्ति का स्वतः उभार होने लगता है और ऐसा अनुभव होता है जैसे कहीं से अतिरिक्त शक्ति का निर्झर फूट पड़ा हो। निराशा की घड़ियों में जब कभी भी आशावादी विचार उमड़ते हैं तो प्रतिकूलताओं में भी ऐसा प्रतीत होता है कि करने वाले के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। अपनी सामर्थ्य पहले से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी नजर आने लगती है।
मनोवैज्ञानिक प्रणाली द्वारा भी ऐसे विधेयात्मक अथवा निषेधात्मक विचार उत्पन्न करके तद्नुरूप प्रभाव प्रायः उन व्यक्तियों पर डाले जा सकते हैं जो कमजोर मनोभूमि के हैं। आज की मनःचिकित्सा प्रणाली भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। आटोसजैशन एवं हेट्रोसजैशन के इर्द-गिर्द वह घूमती है। मनःचिकित्सक विधेयात्मक निर्देशन द्वारा ही मानसोपचार में सफल होते हैं। यह प्रक्रिया निषेधात्मक रूप में किसी-किसी के लिए प्राण घातक भी सिद्ध हो सकती है यदि वह व्यक्ति निराशावादी तत्वों से युक्त है। वह घटना प्रख्यात है कि योरोप के किसी देश में एक व्यक्ति को फाँसी दी जानी थी। वह हत्या अभियोग का मुजरिम था। फाँसी निर्धारित तारीख को होनी थी। मनःशास्त्र विशारदों ने एक प्रयोग विचार शक्ति की महत्ता का उस पर किया। उन्होंने अपने प्रयोग का प्रारूप न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करके उसे पूरा करने की अनुमति प्राप्त कर ली। इन विशेषज्ञों का ऐसा विश्वास था कि अपराधी को बिना किसी हथियार के मात्र विचार सम्प्रेषण द्वारा भी मारा जा सकता है।
प्रयोग आरम्भ हुआ। अपराधी की आँख पर पट्टी बाँध दी गयी। चिकित्सकों ने उससे कहा कि तुम्हारे हाथ की नस काट दी जायेगी। उससे होकर शरीर का सारा खून बह जायेगा। इस तरह तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी। प्रयोग में एक हल्का-सा चीरा हाथ में लगा दिया गया। पानी की एक ट्यूब इस ढंग से हाथ लगाकर रखी गयी कि अपराधी को उसका पता न चले, मात्र उससे नीचे एक बाल्टी में पानी के गिरने की आवाज सुनायी दे।
निर्देशन प्रक्रिया आरम्भ हुई। चिकित्सकों ने बताया कि तुम्हारी नस काट दी गयी है। पानी के हाथ के समीप हो रहे बहाव को घबराते हुए उसने तीव्र गति का रक्त स्राव समझा। नीचे बाल्टी में द्रव्य गिरने की आवाज उसे स्पष्ट सुनायी दे रही थी। चिकित्सक उसे हर क्षण यही बताते रहे कि शरीर से खून की कितनी मात्रा निकल चुकी है। आधे घण्टे तक यह प्रयोग चलता रहा। इस बीच उसके हृदय की गति दुगुनी हो गयी थी, होंठ सूख चुके थे तथा भय के चिन्ह चेहरे पर प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे थे। प्रयोग समाप्ति के पूर्व ही एकाएक उसके हृदय की गति अपने आप रुक गयी और सचमुच ही वह बिना किसी रक्तस्राव के मर गया। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के इतिहास में विशेषज्ञों ने यही पहली बार अनुभव किया कि विचार शक्ति इतनी अधिक सामर्थ्यवान हो सकती है। भावनाओं की विधेयात्मक अथवा निषेधात्मक दिशाधारा इतनी प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है इसे पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने स्वीकार किया। यह अनुभव किया गया कि दूसरे के ऊपर निर्देशन द्वारा इतना प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है तो स्वयं के ऊपर तो उनकी प्रतिक्रियाएँ असाधारण रूप से पड़ती ही होंगी। कम्युनिस्ट राष्ट्रों ने तो ‘ब्रेन वाशिंग’ की तकनीक में विशेष रूप से इसी पद्धति को अपनाया है। ‘बायो फीड बैक’ की आधुनिक योग पद्धति भी इसी विधा की प्रशाखा है।
शरीर संस्थान, बुद्धि संस्थान की तरह भाव संस्थान भी मनुष्य के साथ जुड़ा हुआ है। शरीरबल बुद्धिबल की अपेक्षा भावबल कहीं अधिक सामर्थ्यवान है। व्यतिरेक होने अथवा बेलगाम छोड़ देने पर तो शरीर तन्त्र और बुद्धि तन्त्र दोनों ही बेलगाम घोड़ों की तरह हो जाते हैं। इन्द्रियों पर अंकुश न हो- उन्हें खुली छूट दे दी जाय तो शरीर का जर्जर, निर्बल अशक्त हो जाना सुनिश्चित है। बुद्धि की दिशाधारा निश्चित न हो, उसके चिन्तन को जहाँ-तहाँ बहने दिया जाय तो न केवल उसकी क्षमता मारी जाती है वरन् दुष्प्रयोजनों में निरत होकर कई बार तो अनेकों प्रकार के विग्रह विक्षोभ उत्पन्न करती है। भाव सम्वेदनाएँ इन दोनों की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है। वह जितनी सूक्ष्म है उतनी अधिक गतिवान भी होती है। उनका उभार एवं उफान वेगवती नदी की भाँति उमड़ता है। अनियन्त्रित होने पर वे बुद्धि और शरीर को भी अपने साथ मनचाही दिशा में बहा ले जाती हैं। बाढ़ के पानी को रोकने के लिए बाँध बाँधे जाते हैं। गतिवान भाव सम्वेदनाओं का नियन्त्रण भी होना चाहिए। उन्हें उपयुक्त दिशा देना भी उतना ही आवश्यक है। भावातिरेक की स्थिति की जाँच पड़ताल विवेक की कसौटी पर भी करनी चाहिए। प्रयत्न यह हो कि वे हमेशा उच्चस्तरीय हों, महान प्रयोजनों से जुड़ी हों। यदि ऐसा सम्भव हो सके तो सचमुच ही भावसरिता का अभिसिंचन पाकर जीवन रूपी उपवन में अगणित प्रकार के सद्गुणों के रंग-बिरंगे पुष्प खिल सकते हैं। उस उद्यान की सुवास से व्यक्ति का जीवन महक उठेगा, उसे धन्य बनायेगा और अपने सौरम्भ से असंख्यों का जीवन महकायेगा।
कोयल कौआ पास-पास के दो पेड़ों पर रहते थे। एक पेड़ सूखा था दूसरे का हरा। दोनों नियति को दोष देते कि ऐसा पक्षपात क्यों चलता है।
मौसम बदला। ठूँठ हरा होने लगा और हरे के पत्ते झड़ गये। कौए और कोयल को इस नये परिवर्तन पर भी वही पुरानी शिकायत थी। दोनों बहस की झड़ी लगा रहे थे।
एक हंस उधर से निकला। विवाद में रस लिया और गम्भीर मुद्रा में कहा- “नियति में पक्षपात नहीं, परिवर्तन का क्रम है। उसे ही स्वीकार करें, विवाद में न उलझें।”
जीवन दुःखों, और पापों का संग्रह भी और आशा उल्लास से भरा-पूरा अमृत कलश भी। उसे किस रूप में विकसित किया जाय यह अपना काम है। जीवन एक खेत है उसमें इच्छानुसार कुछ भी बोया उगाया जा सकता है।
परिवर्तन के लिए संकल्प साहस और पुरुषार्थ के अतिरिक्त धैर्य की भी आवश्यकता पड़ती है। उतावले लोग जो आज सोचते हैं उसे कल ही प्रत्यक्ष और फलित देखना चाहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि बीज को अंकुरित होकर बढ़ाने और फलने में कितना समय लगता है। हथेली पर सरसों जमाने और जादू चमत्कार की तरह अभीष्ट मनोरथ तुर्त-फुर्त पूरा होने की उतावली देर तक ठहरती नहीं। वह पानी के बबूले की तरह उठती और देखते-देखते धूप-छाँव की तरह समाप्त भी हो जाती है।
जीवन एक कहानी है। जिसका प्रसंग ही सराहा जाता है, यह नहीं देखा जाता कि वह कितनी लम्बी हुई या कितनी देर तक कही गई। कौन कितने दिन जिया इसका महत्व नहीं। सराहने के योग्य उतने ही दिन हैं जो शानदार रहे और सत्प्रयोजनों में व्यतीत हुए।
जीवन एक चित्र है जिसे इतना सुन्दर बनाया जाना चाहिए कि जिनकी भी आँख पड़े मन्त्र मुग्ध हुए बिना न रहे। रास्ते पर फूल बखेरते चलना कठिन है पर यह किसी के लिए भी सरल है कि मुसकान लुटाता चले। जिन्दगी एक खेल है, जिसे इस तरह खेला जाना चाहिए कि बिना हार-जीत की परवा किये एक कुशल खिलाड़ी की तरह खेला जाय। खेलने वालों की तरह दर्शक भी जिससे प्रसन्नता ग्रहण कर सकें तभी उस प्रयत्न की सार्थकता समझी जा सकती है। अन्यथा वह ऐसा भारभूत श्रम बनेगा जैसा कि हारे हुए खिलाड़ी मुँह लटका कर वापस लौटते हैं।
क्या देखा, क्या समेटा, क्या चखा इस आधार पर जीवन की सफलता असफलता नहीं आँकी जानी चाहिए वरन् यह देखा जाना चाहिए कि उससे कितनों को सहारा मिला। कितनों ने प्रगति पथ पर चल पड़ने का प्रकाश एवं उत्साह पाया। इस संदर्भ में दूसरों के साथ रहते हुए भी उनसे मार्ग दर्शन की आशा नहीं करनी चाहिए। श्रेष्ठता की राह पर चलने में जो आरम्भिक हानि दीखती है उसके सम्बन्ध में बीज बोने और फसल काटने जैसी दृष्टि दूरदर्शियों की ही होती है। सामान्य जन वैसे नहीं होते। तत्काल का लाभ तो क्षुद्रता और दुष्टता से ही साधता है। लोगों को वैसा ही अभ्यास अनुभव है इसलिए वे परामर्श भी वैसा ही दे सकते हैं। श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने के लिए आत्म चिन्तन और आत्म विश्वास के अतिरिक्त और किसी का समर्थन किसी को कदाचित ही कभी मिला हो, वैसी आशा हमें भी क्यों करनी चाहिए?
जीवन एक कलाकारिता की कसौटी है। कौन उसे कितना सुन्दर बना सका इस प्रतिस्पर्धा में जो जीतते हैं वे असाधारण उपहार पाते हैं। प्रतिस्पर्धाओं में अनेकानेक हैं। उनमें जो आगे रहते हैं। वे विजेता का पुरस्कार पाते हैं। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा जीवन को अधिकाधिक पवित्र और प्रखर बनाने की है। जो इसमें जितनी सफलता पा सके उन्हें उतना ही बड़ा कलाकार माना जायेगा। मनुष्य का इससे बड़ा गौरव और सम्मान दूसरा नहीं हो सकता कि उसने अपने लिए प्रमाणिकता का सम्मान अर्जित किया। दूसरों के लिए सहारा दिया गया पीछे वालों को अनुकरणीय अभिनंदनीय दिशा में चल पड़ने का उदाहरण उपलब्ध हुआ।
वाल्टेयर कहते थे- “जिन्दगी की सफलता उसमें मिले हुए वैभव सम्मान और विलास से मत आँको वरन् इस आधार पर जाँचो कि उससे अपना भविष्य और दूसरों का उत्कर्ष कितना बन पड़ा। भला मनुष्य दुहरी कमाई करता है उसके द्वारा आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण दोनों ही प्रयोजन समान रूप से सधते हैं।”
व्यवहार विज्ञान पर विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। भारतीय मनोविज्ञान जहाँ अचेतन की बहिरंग में प्रतिक्रिया को व्यावहारिक मनोविज्ञान नाम देता है- संस्कारों एवं अभ्यासजन्य प्रवृत्तियों की कर्म में परिणति को अपना मुख्य सिद्धान्त मानता है। वहीं पाश्चात्य जगत के विद्वान पशु प्रवृत्तियों को ही मुख्य मानते हुए किसी भी संवेगात्मक अनुभूति को व्यवहार का मूल कारण ठहराता है। इसे उन्होंने ‘स्वयंभू’ प्रवृत्तियाँ (इंस्टिक्ट्स) कहा है।
सामान्य जीवधारियों में उनकी सहज वृत्तियाँ भूख, सुरक्षा और युवा होने पर विपरीत लिंगी साथी की आवश्यकता इन तीन के ही इर्द-गिर्द चक्कर काटती रहती है। प्रकृति प्रेरणा से वे यह कार्य सहज ही करते रहते हैं। इन्हें इनके पीछे किसी विशेष प्रयोजन का भान नहीं होता। प्रकृति ने भूख-प्यास प्रजनन आदि की आवश्यकताओं में ऐसा आकर्षण पैदा करके रखा है कि मानव के अतिरिक्त प्रायः सभी प्राणी उस प्रवाह में अपने जीवन की इतिश्री कर देते हैं उनकी जीवनचर्या इसी परिधि के अंतर्गत गतिशील रहती- प्रकृति की सहज प्रेरणाओं से संचालित होती देखी जाती है। सामान्य मनुष्यों के क्रियाकलाप भी इसी श्रेणी के होते हैं। उनके चिन्तन और कर्तृत्व में इन्हीं सहज क्रियाओं का ताना-बाना चलता रहा है।
मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए अनुसन्धानों से पता चलता है कि वस्तुतः जिन प्रवृत्तियों या क्रियाओं को ‘मूल प्रवृत्तियाँ’ कहा गया था वे सब स्थायी रूप से वैसी ही नहीं रहतीं, उनमें परिवर्तन भी सम्भव है। पहले यह समझा जाता था कि बिल्ली में चूहे को मारने की मूल प्रवृत्ति है इसलिए वह चूहों का शिकार अचूक ढंग से कर लेती है। किन्तु जेड. वाई. क्यो. महोदय ने अपने अनुसन्धानों से सिद्ध कर दिया कि बिल्ली के जो बच्चे चूहों के साथ पाले जाते हैं और जिन्होंने अपनी माता बिल्ली को चूहे मारते हुए नहीं देखा वे चूहों के साथ खूब खेलते एवं स्नेह प्रदर्शित करते हैं। इसका विवरण उन्होंने ‘जर्नल ऑफ कम्पेरेटिव साइकोलॉजी’ वाल्यूम 2 में ‘रिसपान्स टू दी रैट’ नामक शीर्षक में प्रस्तुत किया था।
मूल प्रवृत्तियों के बारे में विभिन्न मनोवैज्ञानिकों में कुछ मतभेद हो सकता है किन्तु एक तथ्य सभी स्वीकार करते हैं कि प्राणियों के जीवन के लिए विभिन्न आवश्यकतायें होती हैं उन्हीं के लिए वे चेष्टा करते हैं और पूर्ति होने पर तृप्ति या सन्तुष्टि अनुभव करते हैं उन्हें नाम चाहें जो भी दिया जाय। शरीर के लिए भोजन आवश्यक है अस्तु भोजन की आवश्यकता पूर्ति सभी जीवधारियों को समान रूप से तृप्तिदायक होती है। पशु−पक्षियों एवं अन्य प्राणियों की आवश्यकताएँ दैहिक सुरक्षात्मक होती हैं। बहुत से जीवधारी अपनी सुरक्षात्मक आवश्यकता के कारण ही सामूहिक रूप से झुण्डों में रहते और परस्पर मैत्री भावना रखते पाये जाते हैं।
मनुष्य को भी प्रारम्भ में सुरक्षा की आवश्यकता के लिए ही समूह में रहना पड़ा, इस सामूहिकता की भावना से वह विकसित होता चला गया और आज उसकी बौद्धिक क्षमताएँ उसी का परिणाम हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ‘मेस्लो’ महोदय ने मनुष्य की आवश्यकताओं को कई श्रेणियों में वर्गीकृत किया है उनके अनुसार मनुष्य के विकसित स्तर के साथ-साथ उसकी आवश्यकताओं का स्तर भी होता जाता है। उन्होंने कहा है कि- ‘शारीरिक एवं सुरक्षात्मक आवश्यकताएँ तो प्रत्येक व्यक्ति में होती हैं। उसके उपरान्त प्रेम, आदर, जानने व समझने और आत्म वास्तविकीकरण की आवश्यकताएँ अनुभवों की वृद्धि के साथ बढ़ती जाती हैं। व्यक्तियों की आवश्यकताओं की समानता उनके समान अनुभवों और विभिन्नता अनुभवों की विविधताओं के कारण होती हैं।’
आधे से अधिक मानवीय प्रवृत्तियाँ अनुकरण की परिणाम होती हैं बच्चे तो अधिकाँश दूसरों को देखकर ही भली-बुरी आदतों को सीखते हैं और अभ्यास होने पर उनकी भी वैसी ही आदतें विनिर्मित हो जाती हैं। प्राणी जो आचरण अभ्यास में लाता है उसके प्रति लगाव (आसक्ति) हो जाता है। इस संदर्भ में खरगोशों और पक्षियों पर किए अनुसन्धानों से पता चला है कि खरगोश अपने बिल के एक निश्चित कोने में ही मल-विसर्जन करते हैं। पक्षी अपने घोंसले निश्चित स्थानों पर ही बनाते हैं। सामान्य मनुष्य भी जिस स्थान विशेष में रहते हैं, उस स्थान से उनका लगाव हो जाता है और घुमक्कड़ लोगों को अपना स्थान बदलने में ही आनन्द आता है वे अपने आचरण एवं अभ्यास से उसी तरह की अपनी वृत्ति बना लेते हैं फिर उनकी जीवन पर्यन्त स्थान परिवर्तित करते रहने में ही प्रसन्नता होती है।
मनःशास्त्रियों का कहना है कि दो विपरीत प्रवृत्तियों में जिसे विकास का पहले अवसर मिल जाता है वही व्यक्ति पर हावी हो जाती है और वह तद्नुरूप आचरण का अभ्यस्त हो जाता है। प्रायः देखा जाता है कि बहुत से बच्चे कुत्ते को देखकर भयग्रस्त हो जाते हैं और बहुत से उनसे खेलने के लिए उद्यत हो जाते हैं। इस भिन्नता के मूल में उनके प्रारम्भिक अनुभव ही उत्तरदायी होते हैं। जिस बच्चे ने पहली बार कुत्ते को क्रोधित भौंकती अवस्था में देखा होगा उसके मन में कुत्ते के प्रति भय की वृत्ति बैठ गयी। दूसरी ओर जिन बच्चों को पहली बार कुत्ते के साथ खेलने का अवसर मिला- उसकी दुम कान पकड़कर किलकारियाँ करते रहे उनमें पहले से विपरीत अर्थात् प्रेम की भावना घर कर गयी। फिर तो वे बच्चे कुत्ते के भौंकने पर भी अपनी उसी प्रेमवृत्ति का परिचय देते हैं, डरते नहीं देख जाते।
कुछ मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि अभ्यास में लाए गए आचरण अथवा अभ्यास से परिपक्व आदतें ही प्राणियों की स्वयंभू प्रवृत्तियों की तरह काम करने लगती हैं। उनका कहना है कि प्रवृत्तियों के विकास की एक निश्चित अवधि होती है जिसके पश्चात् वे सक्रिय नहीं हो पातीं- जैसे बच्चे की प्रवृत्ति माँ के स्तनों से चूसकर दूध पीने की होती है, पर यदि जन्म के बाद कुछ दिनों तक बच्चे को माँ से अलग रखा जाय तो उसकी यह वृत्ति निष्क्रिय हो जाती है फिर उसे चूसकर दूध पीने में अत्यधिक अस्वाभाविकता लगती है।
यदि उनकी विवेक बुद्धि और संकल्प जागृत हो जाय तो इन दुर्व्यसनों से छूटते देर नहीं लगती- उल्टे इनके प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है तथा अपने उदाहरण से अन्यों को भी इन दूषित प्रवृत्तियों से छूटने में सहायता प्रदान करते हैं। इस तथ्य को सभी मनःशास्त्री स्वीकार करते हैं कि मानवी विवेक एवं मनोबल प्रवृत्तियों को बदल देने में सक्षम हैं। मूल प्रवृत्तियों का परिशोधन परिष्कार करके ही मानव से महामानव, देव मानव बना जा सकता है। कुछ सहज वृत्तियाँ तो निश्चित रूप से मनुष्य में जन्मजात पायी जाती हैं। इस संदर्भ में प्रसिद्ध व्यावहारिक मनोविज्ञानवेत्ता डॉ. वाट्सन का कथन उल्लेखनीय है।
मनुष्य को ऐसी मानसिक विशेषता मिली हुई है कि वह उचित-अनुचित, लाभ-हानि का विचार कर सकता है और विचार मन्थन में मुक्ति संगत औचित्यपूर्ण निष्कर्ष निकाल कर उन्हें ग्रहण कर सकता है। इसी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता या विवेकशीलता के आधार पर प्रदत्त प्रवृत्तियों को विकसित एवं परिष्कार करके मानव-जीवन को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। सामान्य मनुष्य से महामानव स्तर तक वे ही पहुँचे हैं जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों को शोधित एवं परिष्कृत कर लिया। अस्तु मूल प्रवृत्तियों को औचित्य एवं विवेक की कसौटी पर कसकर अपनाने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। यही भारतीय मनोविज्ञान की विशेषता रही है कि उसने देवत्व को मुख्य माना है- विकासवाद की चरम सीमा को महामानव बनना माना है। यही वास्तविक मानवी प्रगति का स्वरूप है, वह नहीं जो पारम्परिक मनोविज्ञान वेत्ता सदा में कहते चले आ रहे हैं।
विश्व की दो ही प्रमुख शक्तियाँ हैं। तलवार और कलम। लड़ाई में तलवार हारती और कलम जीतती है।
लोक मान्यता किसी ऊँचे या नीचे सुन्दर क्षेत्र में बसे स्थान पर स्वर्ग नरक अवस्थित होने की है। स्वर्ग को ऊपर आकाश में और नरक को नीचे पाताल में माना जाता है। इस संदर्भ में अंतरिक्षीय जाँच-पड़ताल करने से निराशा उत्पन्न होती है और अविश्वास बढ़ता है। अभी तक किसी ऐसे ग्रह नक्षत्र का पता नहीं चला है जिनमें स्वर्ग नरक में दर्शाई गई परिस्थितियाँ उपलब्ध होने की सम्भावना हो। फिर पूरे लोक में एक ही तरह की परिस्थितियाँ हों। वहाँ दूसरे प्रकार का कुछ होता ही नहीं। ऐसी भी कुछ सहज समझने योग्य नहीं है। जो सुविधाएँ या प्रताड़नाएँ वहाँ मिलती हैं वे प्रायः वैसी ही हैं जैसी कि अपनी धरती पर उपलब्ध होने वाली साधन सामग्री के द्वारा सम्भव है। जहाँ इतनी सामग्री रहती हो भी निश्चित ही उसका वातावरण भी धरती जैसा ही होना चाहिए। यदि वे लोक सूक्ष्म होते तो फिर वह पदार्थजन्य सुख-दुख न होकर मात्र मानसिक भाव सम्वेदनाओं से सम्बन्धित होने चाहिए थे। किन्तु वर्णनों में तो वहाँ कष्टकारक एवं सुविधादायक पदार्थ परक साधनों का ही वर्णन है। ऐसी दशा में किसी विचारशील का असमंजस घटता नहीं बढ़ता ही है।
तो क्या स्वर्ग नरक की मान्यता गलत है। ऐसा भी नहीं कहना चाहिए। कर्मफल की मान्यता किसी न किसी रूप में प्रत्येक दर्शन ने स्वीकार की है। विज्ञान भी इसी आधार पर शारीरिक, मानसिक उत्थान पतन की बात मानता है। ऐसी दशा में मूल तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुष्ट कर्मों का प्रतिफल दुःख और सत्कर्मों की परिणति सुख के रूप में होनी चाहिए। प्रश्न केवल इतना भर रह जाता है कि वे दुःख और सुख किस प्रकार की अनुभूति देते ओर किन साधनों की सहायता से, किन के माध्यम से उपलब्ध होते हैं। पौराणिक गाथाओं में किन्हीं साधन सम्पन्न लोकों में स्वर्ग नरक होने की मान्यता है। यमदूत या देवदूत उन दण्ड उपहारों का प्रबन्ध करते हैं और हाड़-माँस जैसा शरीर रहने पर ही उन प्रताड़नाओं या सुविधाओं का अनुभव हो सकना सम्भव है। यहाँ फिर वही असमंजस सामने आता है कि मरने के उपरांत मात्र वायुभूत आत्म सत्ता शेष रहती है तो उसके द्वारा प्रत्यक्ष शरीर के लिए ही जिनकी अनुभूति सम्भव है उनका तारतम्य किस प्रकार बैठता होगा। वायुभूत शरीर किस प्रकार सुविधा असुविधाओं से प्रवाहित होता होगा?
समझा जाना चाहिए कि अनुकूलता, प्रतिकूलता- सुविधा, असुविधा- खिन्नता, प्रसन्नता हर स्थिति में उपलब्ध हो सकती है। वायुभूत शरीर के साथ भी तो मन, बुद्धि, चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्ट्य रहता है। अनुभूतियों का संस्थान वही है। यह मरने के बाद भी बना रहता है। इन्द्रियाँ भर स्थूल शरीर के साथ समाप्त होती है। मरण के उपरान्त भी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्राएँ आत्मा के साथ गुँथी रहती हैं। ऐसी स्थिति में परलोक में, जितने समय तक जहाँ भी रहा जाय वहाँ दुःख सुख की अनुभूतियाँ कर्मानुसार उपलब्ध होने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए।
पीड़ाएँ शरीर की ही नहीं होती, मन की भी होती हैं। प्रसन्नता शरीर की ही नहीं मन की भी होती है। सच तो यह है कि शरीर तो वाहन मात्र है जो कुछ भी सुख दुख अनुभव होता है उसे मनःक्षेत्र में सम्पन्न होने वाली स्थिति ही कहना चाहिए। जब औषधि से कोई अंग विशेष या समूचा मस्तिष्क संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तो फाड़-चीर होते रहने पर भी कष्ट नहीं होता किन्तु जैसे ही चेतना लौट आती है, फिर अनुभूतियाँ होने लगती हैं। यह मन ही सुख-दुःख का अनुभव करता है। शरीर तो उस अनुभूति का एक सामान्य-सा उपकरण मात्र है। उसके न रहने पर भी मरणोत्तर जीवन में भली-बुरी अनुभूतियों में कोई कठिनाई नहीं रहती।
चित्रगुप्त द्वारा परलोक में दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करने का वर्णन आता है। यह चित्रगुप्त, अपना ही गुप्त चित्र- अचेतन मन है। इसमें अन्यान्य कृत्य करते रहने के लिए यह विशेषता भी है कि क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न करके स्वसंचालित पद्धति के अनुसार दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था भी करता रहे। हम स्वयं ही आग छूते और स्वयं ही जलन अनुभव करते हैं। विष खाते और मरते हैं। विद्या पढ़ते और श्रेय पाते हैं। कुकर्म करते और आत्म प्रताड़ना भुगतते हैं। इसके लिए किसी अन्य मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी प्रकार शुभ-अशुभ कर्मों का भला-बुरा, प्रतिफल पाने के लिए अपने भीतर ही ऐसा तन्त्र विद्यमान है जो समुचित दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता रहे। देर सवेर में जीवित स्थिति में भी यह प्रतिफल प्राप्त होते हैं और मरणोत्तर जीवन में भी वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार ऐसी व्यवस्था हो सकती है जिसमें कि पाप पुण्य के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली प्रतिक्रियाओं की बुरी-भली अनुभूति का कोई न कोई क्रम चलता रहे।
स्वर्ग नरक की मूल स्थापना कर्मफल की सुनिश्चितता प्रकट करने के लिए की गई है। वर्णन के साथ जुड़े हुए घटनाक्रमों में जो विसंगतियां हैं उन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं। यह धर्म दर्शन के प्रवक्ताओं ने सामान्य जनों को उनकी अभ्यस्त अनुभूतियों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए निर्धारित की है। जिन देशों में- जिन क्षेत्रों में, जिन समुदायों में सुख दुःख की अनुभूति जिस स्तर की होती है, जिन माध्यमों से होती है, उन्हीं को स्मरण दिलाते हुए, स्वर्ग नरक का वर्णन किया गया है। यही कारण है कि संसार के विभिन्न भागों में इस संदर्भ में जो वर्णन किये गये हैं उनके बीच अन्तर पाया जाता है। इतने पर भी मूल तथ्य जहाँ का तहाँ रहता है। अशुभ कर्मों का फल दुःखदायक और सत्कर्मों की प्रतिक्रिया सुख सन्तोष से भरी-पूरी होनी चाहिए यह स्थापना हर दृष्टि से सही है। इस विश्वास के उपरान्त स्वर्ग नरक के चित्र विचित्र वर्णन भी कोई असमंजस उत्पन्न नहीं करते वरन् स्थानीय परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की उन प्रतिपादनकर्ताओं की सूझ-बूझ की प्रशंसा ही करते हैं।
स्वर्ग और नरक में कैसी परिस्थितियाँ हैं, इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों ओर क्षेत्रों में विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं। इसका कारण वहाँ की स्थानीय परिस्थितियाँ, भावनाएँ और अनुभूतियाँ ही प्रधान कारण है। अन्यथा यह विवेचन वास्तविक होता तो मान्यताएँ सभी जगह की एक जैसी होनी चाहिए सूरज चन्द्रमा आदि की आकृतियाँ तथा विशेषताएँ संसार भर में एक जैसी दीखती हैं। बादल सभी जगह एक जैसे बरसते हैं, बिजली की चमक कड़क भी वैसी ही होती है। बुखार, खाँसी, दमा आदि रोगों की अनुभूति भी एक जैसी लगती है। जन्म और मरण के समय की अनुभूतियों में भी कोई अन्तर नहीं होता ऐसी दशा में स्वर्ग नरक भी यदि वास्तविकता पर आधारित होते तो उनके सम्बन्ध में भी जानकारों ने एक ही तरह के विवरण प्रस्तुत किये होते। किन्तु देखा जाता है कि धर्म सम्प्रदायों ने इस संदर्भ में एक दूसरे से भिन्न प्रकार के विवरण प्रस्तुत किये हैं।
स्वर्ग को सुख का और नरक को दुःख का स्थान माना गया है, पर वे सुख दुःख किस प्रकार के हैं। किनके द्वारा दिये जाते हैं इस विषय की मान्यताओं में काफी अन्तर पाया जाता है।
ठण्डे देशों के नरक अत्यधिक ठण्डे हैं और गर्म देशों के आग उगलते हुए। कारण कि उन देशों में ऋतु प्रभाव की कठिनाई का सामना एक दूसरे से विपरीत स्तर का करना पड़ता है। इसलिए जहाँ जिस प्रकार के कष्ट अधिक भोगने पड़ते हैं, उन्हीं की बढ़ी-चढ़ी मात्रा नरक की स्थिति मानली जाती है। स्वर्ग के सम्बन्ध में भी यही बात है। जहाँ के लोग जिस प्रकार की वस्तुओं का अभाव अनुभव करते हैं, जिनके लिए लालायित रहते हैं उनको बाहुल्य की कल्पना करके ऐसे स्थानों का निर्धारण किया गया है जहाँ वे विपुल परिमाण में निरन्तर उपलब्ध रहती हैं। स्वर्ग इसी का नाम है। जिस प्रकार नरक की पीड़ाएँ विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार का मानी गई है उसी प्रकार स्वर्ग की साधन सामग्री, तथा परिस्थिति में भी भारी अन्तर देखा जाता है। एकता एक ही बात में है कि नरक में दुःख और स्वर्ग में सुख की अनुभूति होती है।
श्रीमद्भागवत में 28 नरकों का वर्णन है जो पृथ्वी से नीचे किन्तु पानी के ऊपर हैं। गरुड़ पुराण में नरकों का इतना विस्तृत वर्णन है मानों उनमें किसी समूचे ग्रह नक्षत्र जितना बड़ा क्षेत्र हो और उसका असंख्यों कर्मचारी उसी उत्पीड़न प्रक्रिया में निरत रहते हों। हिन्दू धर्मानुयायी दक्षिण दिशा में नरक बताते हैं किन्तु पारसियों का उत्तर में है। मुसलमानों को दोजख में आग की लपटें उठती रहती हैं जबकि ईसाइयों के यमदूत त्रिशूल धारी दानवों के रूप में मार-काट मचाते रहते हैं। पाश्चात्य देशों को परलोक मान्यताओं का चित्रण करने वाले परिचय ग्रन्थ ‘स्पोकेलिरस ऑफ मीटर’ में उत्पीड़न के नृशंस निर्धारणों का उल्लेख है। उसमें जीभ को रस्सी से बाँधकर लटकाये जाने जैसे वीभत्स वर्णन हैं दात्ते के नरक में मात्र दस घर हैं इन्हीं से निकल-निकलकर पैने सींगों वाले यमदूत आते हैं और दिन भर खून खख्चर करके रात को घर लौट जाते हैं। होमर के दुर्गन्ध भरे भयानक अन्धकार वाले क्षेत्र को नरक बताया है। जापानियों के नरक में बारह बिरादरी के घिनौने प्राणियों की भरमार है, यूनानियों की ‘स्टिक्स’ नदी, हिन्दुओं को वैतरणी के समान ही सड़े पानी और काटने वाले कीड़ों से भरी है। अन्तर इतना ही है कि हिन्दुओं को गाय की पूँछ पकड़कर पार होने की सुविधा है और यूनानियों के मुर्दे जितना पैसा मरते समय मुँह में दाव कर ले जाते हैं उतने ही टैक्स से घटिया जलपान प्राप्त करते हैं। दोनों ही मान्यताओं में वह गौ या मुर्दे के मुँह की राशि पुरोहितों के घर पहुँचती है। “सार्त्र” के “हुइस क्लाकर्स” ग्रन्थ में नरक को एक पिंजड़ा बताया है जिसमें हिलने-डुलने की बहुत कम जगह है। एक स्थान पर उन्होंने दो औरतें रखने वाले मर्द की विपन्नता का नरक से उपमा दी है।
स्वर्ग के सम्बन्ध में एक मत इतना ही है कि वहाँ सुख साधनों की कमी नहीं, पर वे साधन है किस प्रकार के इस सम्बन्ध में ऐसे वर्णन हैं जो एक दूसरे से तालमेल नहीं खाते। यूनानी भी ईसाइयों की तरह ही सात स्वर्ग मानते हैं। मुसलमानों का खुदा भी सबसे ऊँचे स्वर्ग सातवें आसमान पर अवस्थित है। प्रायः प्रशान्त महासागर की सीध में बहुत ऊँचाई पर यूनानियों का स्वर्ग है जिसमें हिन्दुओं के नन्दन वन जैसा मीठे फलों वाला एक विशाल एवं रमणीक उद्यान है। स्कैण्डेनेविया का एस गार्ड विशाल भवन ही स्वर्ग है। इस महल के 450 दरवाजे हैं। चीनियों का ‘यांग’ सुनहरे प्रकाश और सुख सुविधाओं से भरा-पूरा है। जापान के स्वर्ग में स्वर्ण पर्वत पर भगवान बुद्ध भव्य कमलासन पर विराजमान है। चारों ओर सन्त विराजमान हैं। स्वर्ग यात्री भी उन्हीं की पंक्ति में जा बैठता है और ज्ञानामृत का पान करता है। वेदकाल की मान्यताओं में कामधेनु गौ और कल्प वृक्ष के माध्यम से स्वर्ग पथ व्यक्ति सभी अभीष्ट सुविधाएँ प्राप्त करते हैं।
मध्यकाल में सामन्ती विलासिता ने युद्धोन्माद को जन्म दिया था। इसके लिए कटने काटने वाले योद्धाओं की आवश्यकता पड़ती थी। उन्हें लूट-पाट में हिस्सा और मोटा वेतन तो मिलता ही था, पर इसके अतिरिक्त स्वर्ग में उन सुविधाओं का बाहुल्य भी दरसाना पड़ता था जिनके लिए वे लालायित रहते हैं। ऐसे प्रलोभनों में धन सम्पदा के उपरान्त कामुकता की तृप्ति ही बड़ा आकर्षण रह जाता है। स्थानीय लड़ाइयों में भी यह योद्धा लोग न केवल धन लूटते थे वरन् जहाँ भी कामुकता की तृप्ति का अवसर आकर्षण देखते वहाँ उसका बेरोक-टोक लाभ उठाते। बलात्कार और अपहरण की उन्हें छूट थी। यह छूट स्वर्ग में और भी बढ़े-चढ़े रूप में होनी चाहिए। इसलिए युद्ध में मरने वालों को उस आकर्षण का पूरा-पूरा लालच दिखाया गया है। इन्द्रलोक में परियों की भरमार है जो वीर गति पाने वाले सभी योद्धाओं की मनोकामना पूर्ण करने के लिए हर घड़ी उत्सुक आतुर रहती हैं। सत्तारों का मिलना और शराब की नहर से हर घड़ी सुरापान करने का चित्रण भी उसी मनोवृत्ति का परिचायक है। गीता में ‘हतो वा प्राप्स्य से स्वर्ग’ का उल्लेख उसी मान्यता के अनुरूप है कि युद्ध में मरने वाले स्वर्ग सुख की निरन्तर उपलब्ध करते हैं। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि इस प्रकार मरने वाले का पक्ष नीति युक्त ही हो।
मरने के बाद किसी स्थान विशेष में पहुँच कर सुख दुःख की उपलब्धि के सम्बन्ध में आस्तिक परामनोविज्ञानवादियों का मत है कि लम्बे समय तक दिन रात श्रम संलग्न रहने के उपरान्त मृतात्मा को कुछ समय विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। श्रम के साथ विश्राम का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। दिन रात की तरह यह चक्र सर्वत्र चलता है। जन्म और मरण के मध्य भी कुछ ऐसा ही अवकाश समय मिलता है जैसा कि सरकारी कर्मचारियों की बदली होते समय कुछ समय का अवकाश मिलने का अवसर रहता है। मृतात्मा अनन्त अन्तरिक्ष में अपनी भार हीन स्थिति में किसी अनुकूल स्थान पर गहरी तन्द्रा में चला जाता है और प्रगाढ़ निद्रा में विश्राम लाभ करता है। इस अवधि में उसे भले-बुरे स्वप्न भी आते हैं। दैनिक जीवन में भी निद्रा सर्वथा स्वप्न रहित नहीं होती उसका प्रायः आधा समय स्वप्नावस्था में व्यतीत होता है। उद्विग्न दिनचर्या में निरत रहने वालों के सपने भी भयानक एवं असन्तोषजनक होते हैं जबकि शान्त और प्रसन्न दिनचर्या बिताने वालों के सपने भी सुरुचि और प्रसन्नता के माध्यम बनते हैं। ठीक इसी प्रकार मृतात्मा को मरणोत्तर जीवन के विश्राम काल में ऐसी भली-बुरी अनुभूतियाँ होती हैं जिन्हें स्वर्ग या नरक कहा जा सके। अचेतन मन जिस प्रकार अपनी संचित कुत्साओं, कुण्ठाओं का निराकरण स्वप्न के माध्यम से करते हुए चेतना पर चढ़ा हुआ भार हलका करता है उसी प्रकार मरणोत्तर काल की विश्राम बेला में भी ऐसी स्वप्न शृंखला चलती रहती है जिसमें भली या बुरी- सुखद कष्टकारक अनुभूतियों का अवसर मिलता रहे। परामनोविज्ञानियों में से जो आस्तिक स्तर के हैं वे इस संदर्भ में अपना प्रतिपादन इसी रूप में प्रस्तुत करते हैं।
प्रत्यक्षवादियों ने पूर्व जन्म के भले-बुरे कर्मों का प्रतिफल जन्मजात अपंगताओं एवं प्रतिभाओं के रूप में प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं कि कितने ही लोग अपने जन्मकाल से ही कुछ असामान्य प्रकृति साथ लेकर आते हैं। इनमें विलक्षण मेधावानों के कलाकारों के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं। जो बिना प्रशिक्षण एवं वातावरण के भी ऐसा प्रतिभा का परिचय देने लगे जिनकी प्रस्तुत परिस्थितियों के साथ कोई संगति नहीं बैठती। वंशानुक्रम, सुविधा साधन, सहयोग, अवसर आदि के आधार पर ही आमतौर से किसी की विशेष प्रतिभा या प्रगति का तारतम्य जोड़ा जाता है। पर जहाँ ऐसा कुछ भी न हो किन्तु बचपन से ही अनोखापन दृष्टिगोचर होने लगे तो यही कहना पड़ता है कि पूर्व संचित पुण्य या सुसंस्कार अनायास ही फलित होने लगे।
नरक के सम्बन्ध में भी इस क्षेत्र का प्रतिपादन यही है। कुछ बालक जन्म से ही अपंग, असमर्थ, मूढ़मति एवं कुसंस्कारी होते हैं। यह उन्हें वहाँ से नहीं मिली होती जहाँ कि वे जन्मे। वैसी विपन्नता का कोई प्रत्यक्ष कारण दृष्टिगोचर न होने पर यही मानकर सन्तोष करना पड़ता है कि यह पूर्व जन्मों के शुभ-अशुभ संस्कारों की जन्मजात प्रतिक्रिया है।
मनोविज्ञानी इस प्रसंग में प्रत्यक्ष उदाहरण मनोविकारों की शारीरिक और मानसिक सभ्यता की परिणित के रूप में कर्मफल का प्रतिपादन करते हैं और इसी को हाथों-हाथ मिलने वाला स्वर्ग नरक बताते हैं।
किसी ने एक सन्त से पूछा- “महाराज ! जब सन्त और धूर्त सब एक ही तरह के कपड़ों में विचरण करने लगे तब तो हम लोगों के लिए बड़ी कठिन समस्या खड़ी हो जाती है। कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे धूर्तों से बच कर हम सन्तों की सेवा कर सकें।”
सन्त ने मुस्कराते हुए कहा- “इसमें कौन-सी बड़ी बात है। धूर्त सेवा करवाने के फेर में रहते हैं और सन्त सेवा करने के फेर में। सन्त प्रत्येक स्थिति में सन्त जैसा व्यवहार करता है, धूर्त का व्यवहार अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए चापलूसी और चतुराई से भरा रहता है। धूर्त माँगता है और सन्त देता है।”
अदृश्य सूक्ष्म शक्तियों का ज्ञान न होने से मनुष्य उनका लाभ नहीं उठा पाता। शरीरबल, बुद्धिबल तथा अन्यान्य भौतिक सम्पदाएँ जो प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती हैं, प्रायः उन्हें ही करतलगत करने का प्रयास किया जाता है, पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो समुद्र से मोती निकालने जैसे दुस्साहसी कार्य की तरह शक्ति अर्जित करने के लिए अधिक गहराई में डुबकी लगाने का जोखिम उठाते और उनमें से थोड़े सफल होते भी देखे जाते हैं। शक्ति का भाण्डागार प्रकृति और चेतना दोनों ही क्षेत्रों में भरा पड़ा है। अनुसंधान एवं उससे जुड़ी उपलब्धियों के लिए प्रकृति एवं चेतना से समन्वित एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला मानवी काया के रूप में हर व्यक्ति को मिली हुई है, जिसमें एक से बढ़कर एक सम्भावनाएँ निहित हैं, जो हर पुरुषार्थी के मानस पटल पर दस्तक देतीं तथा उन्हें हस्तगत करने के लिए मूक आह्वान करती हैं।
पदार्थ की स्थूल शक्ति की तुलना में परमाणु की सूक्ष्म शक्ति कितनी अधिक प्रचण्ड, सामर्थ्यवान् हो सकती है, यह सत्य सदियों तक तो अविज्ञात रहा, पर अब किसी से छुपा नहीं रह गया है। शरीर और उससे जुड़ी इन्द्रियों की बनावट ही ऐसी है कि मनुष्य दृश्य अथवा प्रत्यक्ष लाभ देने वाले भौतिक घटकों को ही अधिक महत्व देता है। फलतः उनसे सीमित ही लाभ उठा पाता है। शरीरबल एवं बुद्धिबल का मानव ने महत्व समझा और उनसे एक सीमा तक लाभान्वित हुआ है। पर इतने पर भी सूक्ष्म शक्ति स्रोतों का महत्व कम नहीं हो जाता। उनकी गरिमा एवं सामर्थ्य यथावत् है। शरीर एवं बुद्धि की तुलना में मन अधिक सूक्ष्म विलक्षण एवं सामर्थ्यवान है, पर उसकी क्षमता का विकास बिरले कर पाते तथा बिरले ही उससे लाभ उठा पाते हैं। व्यक्तित्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं समर्थ घटक के उपेक्षित पड़े रहने से ही अधिकाँश व्यक्तियों का जीवन व्यर्थ भटकाव में व्यतीत होता तथा शरीर एवं बुद्धि से समर्थ होते हुए भी वे अपने जीवन को सही दिशा एवं प्रेरणा देने में प्रायः असमर्थ सिद्ध होते हैं।
भारतीय ऋषियों की पहुँच प्रकृति एवं चेतना के गहन परतों तक थी। उन्होंने भौतिक जगत एवं उससे जुड़े उपादानों को उतना ही महत्व दिया जितना कि शरीर व्यापार को गतिशील रखने के लिए आवश्यक था। शरीर एवं बुद्धि का मन न केवल संचालक है, वरन् मनुष्य के उत्थान-पतन का कारण भी है, यह वे भली-भाँति जानते थे। उनका उद्घोष था-
- “तस्मान्मनः कारणमस्त जन्तोर्बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने। (विवेक चूणामणि)
अर्थात्- जीव के बन्धन और मोक्ष के विधान में मन ही प्रधान कारण है।
यही कारण था कि उनकी अधिकाँश चेष्टाएँ- जप तप की प्रक्रियाएँ मानसिक परिष्कार एवं विकास के लिए चला करती थीं। शोधन, अभिवर्धन से प्रचण्ड मनोबल एवं प्राण ऊर्जा का अभ्युदय होता था, जिसके सहारे वे न केवल अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाते थे, वरन् उनसे मानव जीवन की अगणित समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते थे। स्वस्थ, सभ्य एवं सुसंस्कारी समाज की संरचना इसीलिए हो सकी थी कि हर व्यक्ति जीवन की गरिमा एवं उसका लक्ष्य समझता था तथा यह भी जानता था कि शरीर एवं बुद्धि की लगाम मन के हाथों में है। यदि उसका सुधार, सम्भाल एवं विकास कर लिया जाय तथा उसकी शक्ति को जीवन लक्ष्य की दिशा में नियोजित कर लिया जाय तो मनुष्य के लिए कुछ भी असम्भव न रह जाय। अतिमानवी शक्तियों का प्राकट्य भी उस युग में इसी कारण सम्भव हो सका था।
बुद्धिवादी युग की यह विडंबना ही है कि मन जैसे चैतन्य, विलक्षण एवं व्यक्तित्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक को जानने एवं उसकी शक्तियों का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। आधुनिक मनोविज्ञान ने मन की चेतन अचेतन परतों की बनावट एवं क्रिया प्रणाली की जो सीमित जानकारियाँ दी हैं उनसे मन की विशिष्ट सम्भावनाएँ उजागर नहीं होतीं। उल्टे मूर्धन्य मनःशास्त्री फ्रायड के प्रतिपादित सिद्धान्तों से यही भ्रांति अधिकाँश बुद्धिजीवियों में बनी हुई है कि मनुष्य मूल प्रवृत्तियों का गुलाम है, सैक्स ही प्रमुख प्रेरक शक्ति है, पर प्रगति के इस युग में वे मान्यताएँ जो भ्रान्तिपूर्ण हैं, अधिक समय तक अपनी जड़ें जमाये नहीं रख सकतीं। अतीन्द्रिय सामर्थ्य के प्रमाण में आयी अनेकानेक साक्षियों, इच्छाशक्ति के चमत्कारों भविष्य बोध की सामर्थ्य जैसी घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य की सम्भावनाएँ असीम हैं। मन के भीतर ही शक्ति का सागर लहलहा रहा है- चैतन्य ऊर्जा का वह केन्द्र है। इससे मानवी सत्ता की गरिमा समझने तथा उसकी महानता में विश्वास रखने वाले मनःशास्त्रियों को मन के सम्बन्ध में नये सिरे से शोध करने की प्रेरणा मिली है। जैसे-जैसे वे खोज की गहराई में उतर रहे हैं, यह मान्यता सप्रमाण परिपुष्ट होती जा रही है कि मन एक प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत है। वह न केवल शरीर एवं बुद्धि का नियन्त्रण कर्ता है वरन् मानवी उत्थान पतन का माध्यम भी है।
मनुष्य की महानता में विश्वास रखने वाले मनःशास्त्री मैस्लो का कहना है कि “मन एक प्रकार का एंप्लिफायर है जिसके सहारे हमें दृश्यों, घटनाओं अथवा तथ्यों को समझने में मदद मिलती है। वह ठीक तरह से चलता रहे तथा सही दिशा में उसकी ऊर्जा नियोजित रहे तो जीवन सन्तुलित, सुव्यवस्थित तथा प्रसन्नचित बना रहता है। जबकि परेशानी, चिन्ता, भय आशंका की घड़ियों में उस ऊर्जा का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता तथा अनेकानेक प्रकार की समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं और मनुष्य को अनायास ही बेतरह परेशान करती है। मन के एंप्लिफायर को जब कोई चिन्तित, भयभीत व्यक्ति चालू करता है तो उसकी कठिनाइयाँ बढ़ने के स्थान पर घटनी आरम्भ हो जाती हैं। मस्तिष्क का प्रीफ्रन्टलल्यूकोटामी भाग इस एम्प्लिफायर के तार का काम करता है। फलतः मस्तिष्क भी मन की प्रेरणाओं, सन्देशों से सक्रिय बन जाता है। सक्रियता की विधेयात्मक स्थिति में अशान्तिकारक अवरोध अपने आप दूर हो जाते हैं। रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहने पर उस एम्प्लिफायर से शक्ति मिलती रहती है।
मनः एम्प्लिफायर का स्वरूप स्पष्ट करते हुए मनोवैज्ञानिक मैस्लो कहते हैं- “यह एक प्राण ऊर्जा का सरोवर है। इस सरोवर में नदी के जल प्रवाह की तरह प्राण ऊर्जा सतत् प्रवाहित होती रहती है।” मैस्लो के अनुसार- “आनन्ददायक घड़ियों में जिसे उन्होंने मनोविज्ञान की भाषा में ‘पिक एक्सपेरिमेन्स’ नाम दिया है, यह ऊर्जा संचित-संग्रहित होती रहती है तथा भावी उपयोग में काम आ सकती है। प्राण ऊर्जा ही- ‘ओवर फ्लो’ होकर दूसरों को आकर्षित-प्रभावित करती तथा उन्हें सहयोगी बनाकर असम्भव व कार्य को भी सम्भव करने कराने में समर्थ होती है।” मैस्लो के अनुसार- “प्राण ऊर्जा का सतत् गतिशील रहना स्वास्थ्य सन्तुलन तथा व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। यह गतिशीलता विधेयात्मक चिन्तन एवं संरचनात्मक कार्यों में निरत रहने से ही बनी रह सकती है।
फ्रायड की मान्यता से ठीक विपरीत मैस्लो का कहना है कि- “मूल प्रवृत्तियों में ऐसी एक भी नहीं है जिन पर मनुष्य नियन्त्रण न कर सके। हर पशु प्रवृत्ति का परिष्कार, सुधार मनुष्य के लिए सम्भव है। असम्भव इसलिए लगता है कि वह मन की सामर्थ्य से अपरिचित रहता है तथा उसके चिन्तन में निषेधात्मक तत्वों का बाहुल्य होता है। अपने प्रति अपनायी गयी निषेधात्मक दृष्टि ही मनःऊर्जा की गति एवं प्रवाह को अवरुद्ध करती तथा प्रगति पथ को अवरुद्ध कर देता है।” उनका मत है कि “व्यापक स्तर पर जन समुदाय में ऐसा निषेधात्मक दृष्टि बनाने में जिम्मेदार वे तथाकथित दर्शन भी हैं जो डार्विन तथा फ्रायड जैसे नियतिवादी दार्शनिकों द्वारा दिये गये हैं। भ्रान्त करने वाले उस वैचारिक जाल से मनुष्य को बाहर निकलना होगा तथा अपने ही भीतर महानता के बीजों को टटोलना-खोजना होगा जो हर व्यक्ति के मन की अदृश्य सूक्ष्म परतों में विद्यमान है और विकास के लिए मनुष्य से समुचित खाद पानी की अपेक्षा करते हैं। मानसिक परतन्त्रता की यह स्थिति ही इस युग की हर समस्या के लिए जिम्मेदार है जिसके पाश को तोड़ना एवं उससे निकलना आगे बढ़ने ऊँचे उठने की दिशा में पहला साहसिक कदम है।”
स्वास्थ्य, सन्तुलन एवं विकास का मानसिक स्वतन्त्रता से कितना गहरा सम्बन्ध है, इसका एक निष्कर्ष मनःशास्त्री फ्रैंकल ने प्रस्तुत किया है। एक प्रयोग अध्ययन में उन्होंने देखा कि कुछ कैदियों को आजीवन कारावास की सजा मिली तथा कुछ को उसी केस में कुछ वर्षों की कैद के बाद छूटने का दण्ड मिला। जिन्हें जीवन भर कैद मिली, उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता गया विक्षिप्तों जैसी स्थिति बन गयी। कुछ ने तो थोड़े समय बाद ही दम तोड़ दिया। पर जिन्हें छूटने की आशा थी, उनके ऊपर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।” फ्रैंकल कहते हैं कि “मनुष्य पशु-प्रवृत्तियों का गुलाम है इस मान्यता ने समाज के अधिकाँश व्यक्तियों को मानसिक पराधीनता की जंजीरों में बुरी तरह जकड़ दिया है। फलतः वह आत्मविश्वास गवाँ बैठा है। न केवल मनोविज्ञान ने वरन् आधुनिक ज्ञान की अन्य राजनीति, साहित्य, दर्शन, इतिहास जैसी विधाओं ने भी उन्हीं निषेधात्मक तथ्यों को उभारा और प्रश्रय दिया है। ये सब सम्मिलित रूप से मिलकर मानवी प्रकृति के लगभग आधे हिस्से को पंगु बना देते हैं। मात्र शेष आधी के बल पर ही मनुष्य अपनी पहचान एवं अस्तित्व बनाये हुए है। मानसिक पंगुता की इस स्थिति में मनुष्य अपनी महानता तथा भीतर सन्निहित असीम अद्भुत सम्भावनाओं को उजागर कर सकेगा, यह असम्भव है। सम्भावना मनः सामर्थ्य को समझने तथा उसके सहारे प्रसुप्त आत्मविश्वास को जगाने से ही बन सकती है।
व्यावहारिक धरातल पर यह कैसे बन पड़े? मनःशास्त्री फ्रैंकल का मत है। सर्वप्रथम यह विश्वास सुदृढ़ करना होगा कि मनुष्य की मानसिक क्षमता शारीरिक की तुलना में न केवल समर्थ है वरन् हर समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में समर्थ है। अस्त-व्यस्त रहने तथा असंयमित दिनचर्या के कारण शरीर की शक्ति खोखली हो जाती है। उससे भी अधिक बर्बादी निरुद्देश्य चिन्तन के भटकाव के कारण मनःऊर्जा की होती है। क्योंकि हमारी अधिकाँशतः इच्छाएँ और चेष्टाएँ अनुपयुक्त और अदूरदर्शितापूर्ण होती हैं। सुनिश्चित उच्चस्तरीय आदर्श एवं दिशाधारा का चयन और निर्धारण हो सके तो उस फुलझड़ी की भाँति व्यर्थ उड़ जाने वाली मनःशक्ति का सुनियोजित और सदुपयोग सम्भव हो सकता है। श्रेष्ठ आदर्श का निर्धारण और उसकी पूर्ति की उत्कट आकाँक्षा स्वयं में एक ऐसी प्रेरक शक्ति है जो प्रेरणा के साथ-साथ दूरदर्शी विवेक को जगाती है। दूरदर्शी विवेक का अभ्युदय एक ऐसी महान उपलब्धि है जिसके सहारे मनुष्य के सामान्य से असामान्य महामानव बनने तक की सम्भावना बन जाती है।
दूरदर्शिता से मानसिक सन्तुलन बनता और मनःशक्ति का सुनियोजन होने लगता है। तब मनुष्य परिस्थितियों की गुलामी कभी स्वीकार नहीं करता। हर स्थिति में सदा सन्तुष्ट प्रसन्नचित, और प्रफुल्लित रहने वाली मनःस्थिति की अनुभूतियों को ही मनःशास्त्री मैस्लो ने ‘पिक एक्सपेरिमेन्स’ नाम दिया है। इस स्थिति को सदा कैसे बनाये रखा जाय? मैस्लो अपनी पुस्तक “न्यू डायमेन्शन्स ऑफ साइकोलॉजी” में लिखते हैं कि “सदा दूरगामी, विधेयात्मक बातें सोची जायं। साथ ही डिप्रेशन, निराशा, हतोत्साह उत्पन्न करने वाले निषेधात्मक बातों को मन में जड़ न जमाने दिया जाय। जब कभी भी वे मानसिक परतों पर अड्डा जमाने की कोशिश करें, विधेयात्मक विचारों की सुसज्जित सेना से उन्हें खदेड़ कर बाहर कर दिया जाय।”
मनःशास्त्री मानसिक परिष्कार सन्तुलन एवं विकास के जो विचार एवं सिद्धान्त प्रस्तुत कर रहे हैं, भारतीय ऋषि सदियों पूर्व से उनका प्रतिपादन करते चले आ रहे हैं। देवासुर संग्राम का वर्णन पौराणिक गाथाओं में मिलता है। यह मन में चलने वाले विधेयात्मक निषेधात्मक, रचनात्मक- ध्वंसात्मक विचारों के युग्म का अलंकारिक चित्रण है। निषेधात्मक चिन्तन से बचने, दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने, सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना करने के लिए उन्होंने मनःशास्त्रियों की तरह मात्र वैचारिक स्तर पर ही समाधान प्रस्तुत नहीं किया। वरन् उन्हें आदत व्यवहार एवं आचरण का अंग बनाने की दृष्टि से सुनिश्चित उपाय भी सुझाया है जो हर युग के लिए शाश्वत एवं अपरिवर्तनीय है।
जप, तप की साधना उपासना की सामान्य तथा कठोर अध्यात्मिक उपचार मनःशक्ति के परिशोधन एवं उसमें सन्निहित प्रचण्ड-ऊर्जा जिसे मनोबल, संकल्प बल के नाम से जाना जाता है, के लिये किये जाते थे। अभ्यास में- संस्कारों में घुल न पाने के कारण सद्विचार मानवी विकास में उतने सहायक नहीं सिद्ध हो पाते। उन्हें आचरण में उतारने की दृष्टि से पुनरावृत्ति होना आवश्यक है। प्रतीक क्रियाओं एवं माध्यमों से उनका अभ्यास किया जाता है। तप तितीक्षा से संकल्पबल मजबूत होता मनोबल उभरता तथा सद्मार्ग पर चलने का आधार सुदृढ़ बनता है। सद्विचारों को आचरण में- व्यवहार में- उतारने का यही एक मार्ग है। भारतीय योग मनोविज्ञान वैचारिक समाधान प्रस्तुत करता है, तो योगाभ्यास- साधना, उपासना, तप, तितीक्षा की प्रक्रियाएँ अन्तःकरण में जड़ जमाये कुसंस्कारों के परिशोधन तथा सुसंस्कारों की प्रतिष्ठापना का प्रयोजन पूरा करती है। जिनका अवलंबन लेकर हर कोई न केवल मन की उपयोगिता- उपादेयता को समझने में समर्थ हो सकता है वरन् मनःशक्ति को उभरने- विकसित करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
मनःशास्त्री फ्रैंकल का यह कहना अत्यन्त सारगर्भित है कि “शरीर एवं बुद्धि के संचालक मन की उपेक्षा का ही परिणाम है कि समाज के अधिकाँश व्यक्ति भौतिक सुविधाओं से सुसम्पन्न होते हुए भी मानसिक रूप से बीमार हैं। यह बढ़ती हुई स्थिति हमें निराशामय भविष्य की ओर ही ले जा रही है। अतएव इस युग की सबसे प्रमुख आवश्यकता है मन की सामर्थ्यों को समझना- उभारना तथा अति मानसिक शक्तियों को उजागर करना। इसके बिना भौतिक अन्यान्य शक्तियों का सही रूप से लाभ उठा सकना मानव जाति के लिए सम्भव न होगा।”
एक राजा ने किसी विदेशी को जासूस समझा और उसे मृत्यु दण्ड सुना दिया। सजा सुनकर बन्दी को बहुत दुःख हुआ और उसने भर पेट राजा को गालियाँ सुनाईं।
राजा उसकी भाषा समझता न था, सो जानकार को बुलाकर पूछा- “यह क्या कह रहा है।” भाषाविद् विचारशील था। उसने कहा- “यह आपकी बहुत प्रशंसा कर रहा है और मरने से पूर्व अनेकों दुआएँ दे रहा है। उसे अपने मरने की चिन्ता नहीं। आपको अधिक सुखी समृद्ध होने का मनोरथ कर रहा है। यही है उसके कथन का तात्पर्य।
राजा उसकी सदाशयता का परिचय पाकर बहुत प्रभावित हुआ और मुक्त करने का आदेश दिया। वह चला गया। दूसरे दिन बंदी की भाषा समझने वाले एक दूसरे दरबारी ने कहा- ‘राजन्! आपको गलत बताया गया है। असल में उसने भर पेट गालियाँ दी थीं।
राजा ने इस असमंजस को सुलझाते हुए कहा- पहले का कथन सत्य है और दूसरे का झूठ। क्योंकि सत्य असत्य की विवेचना मात्र यथार्थ कथन को ही सत्य नहीं कहते, किन्तु उसके द्वारा क्या परिणाम निकला यह देखकर उसका स्वरूप समझा जाना चाहिए।’
प्रथम विद्वान के कथन झूँठ होते हुए भी उसने एक निर्दोष की जान बचाई इसलिए वह झूठ होते हुए भी सत्य था। जबकि दूसरे के कथन से उसकी जान चली जाती इसलिए वह सच भी झूठ था।
व्यक्ति और समाज को भौतिक शक्तियों और सम्पदाओं के सहारे प्रगति पथ पर अग्रसर होने एवं सुखी समुन्नत बनने का अवसर मिला है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है। आदिमकाल में जबकि इस स्तर की उपलब्धियाँ नहीं मिल सकी थीं तो व्यक्ति कितना असमर्थ और समाज कितना अस्त-व्यस्त रहा होगा इसकी कल्पना करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये।
आग, पहिया, कृषि, पशुपालन, वस्त्र, आच्छादन, चिकित्सा, उच्चारण, लेखन जैसी वे उपलब्धियाँ जो आज दैनिक जीवन का अविच्छिन्न अंग बन गई हैं, किसी समय इन सबकी उपलब्धि तो दूर किसी को इनकी जानकारी तक नहीं होगी। उन दिनों का आज के साथ तुलना करने पर मानवी सत्ता की स्थिति में जमीन आसमान जैसा अन्तर दीखता है। उन दिनों डार्विन के उस प्रतिपादन पर किसी को भी सन्देह करने की गुंजाइश नहीं थी कि मनुष्य बन्दर की औलाद है। सचमुच ही उन दिनों बन्दर और मनुष्य में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा होगा।
मानवी प्रगति में उसकी बुद्धि को सराहा और प्रमुख माध्यम कहा जाता है, पर यह भुला दिया जाता है कि बुद्धि को विकसित एवं प्रखर बनाने के लिए भी कोई क्षेत्र या आधार चाहिए। कहना न होगा कि समृद्धि और प्रगति की सुखद उपलब्धियों के निमित्त ही मनुष्य की ललक जागी और इसके लिये उसने भौतिक क्षेत्र का मन्थन आरम्भ कर दिया। इस प्रयास में सफलता मिली और वह क्रमशः अधिकाधिक समृद्ध, सशक्त एवं समुन्नत होता चला गया।
मानवी सत्ता ने भौतिकता के समुद्र में गहराई तक प्रवेश करने और उसमें से बहुमूल्य मणि मुक्तक ढूँढ़ निकालने की तत्परता बरत कर ही प्रगति के उस स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है जहाँ कि वह आज है। बुद्धि वैभव भी इसी आधार पर बढ़ा है। अन्य प्राणी अपने निर्वाह भर से सन्तुष्ट रहे और जो सहज सरलता से उपलब्ध था, उसी पर सन्तोष करके दिन गुजारते रहे। जबकि मनुष्य ने प्रकृति के साथ घनिष्ठता जोड़ी और उसके साथ तादात्म्य स्थापित कर बहुमूल्य पयपान आरम्भ कर दिया। यही वह कौशल है, जिसके सहारे उसे प्रगतिशीलता का सृष्टि के मुकुटमणि-ईश्वर के राजकुमार होने का श्रेय सौभाग्य मिल सका। इस प्रयत्नशीलता को अब उस दिशा में चल पड़ना चाहिए जिससे सुविधाओं का उपयोग शालीनता के साथ कर सकना सम्भव हो सके। यह सब कैसे सम्भव हो- प्रयासों को किस आधार पर नियोजित किया जाय, इसी के आधार पर मानव जाति का भावी जीवन क्रम निर्धारित किया जा सकता है। इसके लिये पिछले पृष्ठ भी उलटने होंगे- विज्ञान की श्रेष्ठता को भी स्वीकारना होगा तथा पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाकर एक सुनिश्चित दिशाधारा बनानी होगी।
आदिम युग से लेकर आज के युग में मानव को पहुँचाने, उसे प्रकृति का स्वामी- अधिष्ठाता बनाने में विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका को दृष्टिगत रख उसे देवाधि देव कहना किसी भी प्रकार अत्युक्तिपूर्ण नहीं होगा। मानवी प्रकृति भी इतनी विलक्षण है कि सम्भावनाओं के स्रोत सामने देख प्राप्य लाभों से वह कभी वंचित न होना चाहेगी। यही कारण है कि इस खदान से मणि-मुक्तकों को ढूँढ़ तलाशने का क्रम रुका नहीं है। निरन्तर नूतन शोध प्रयास इस क्षेत्र में चल रहे हैं और मनुष्य संसाधनों से स्वयं को सम्पन्न बनाता चला जा रहा है। उपलब्धियों के सदुपयोग तक तो बात मानी जा सकती है। परन्तु यदि इस सफलता को अति उत्साह में आकर असन्तुलित दोहन की स्थिति में पहुँचा दिया जाय तो इससे अनेकानेक संकट उत्पन्न होंगे। ऐसा ही कुछ इन दिनों हो भी रहा है। अमर्यादित उपयोग से महाप्रलय जैसी चुनौती मानव के सामने आ खड़ी हुई है, उसके पीछे यही दुर्बुद्धि काम करती दिखाई देती है। विज्ञान क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी इसी असमंजस से ग्रस्त हैं कि मनुष्य को अधिक सुखी-समुन्नत बनाने के लिये कैसे इन उपलब्ध संसाधनों को सदुपयोग की ओर मोड़ा जाय? यदि समाधान न मिला तो विज्ञान का देव रूप समाप्त होकर प्रलयंकर स्वरूप जन्म ले लेने की स्थिति आ सकती है। नियति किसी भी स्थिति में औचित्य का सीमा उल्लंघन स्वीकार नहीं कर सकती।
कैसे इस दुरुपयोग को रोका जाय और उपयोगी पक्ष को अपनाया जाय, यह आज के युग की सबसे बड़ी समस्या है जो तुरन्त समाधान चाहती है। समग्र मंथन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि विज्ञान को आत्मिकी का सुदृढ़ सम्बल प्रदान किया जाय। निर्धारण की कसौटी ‘उत्कृष्ट आदर्शवादिता’ को मानकर चला जाय, तभी विज्ञान की अमृतोपम उपलब्धियों का सही सदुपयोग सम्भव है। चिन्तन में उत्कृष्टता एवं व्यवहार में औदार्य पूर्ण सहकारिता की सत्प्रवृत्तियों को हम ‘आध्यात्मिक’ नाम दे सकते हैं।
असीम प्राप्त करते चले जाना और एक विशिष्ट वर्ग को उसके निहित स्वार्थों की पूर्ति में प्रयुक्त करना यदि निषिद्ध ठहराया जा सके, जो उपलब्ध है, उसे औचित्य की मर्यादा में मिल बाँट कर प्रयुक्त किये जाने की बात विचारी जा सके तो इतने भर से प्रस्तुत समस्याओं की विभीषिकाओं का सहज समाधान हो सकता है। तब फिर विश्व व्यवस्था का रूप ही दूसरा होगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की नीति को जब, जितना, जहाँ भी जिस प्रकार भी अपनाया जायगा वहाँ से उसी अनुपात में विग्रहों और संकटों की जड़ कटती चली जायेगी। प्रलोभन एवं दमन की सामयिक शक्ति को स्वीकार करते हुए भी यह मानना होगा कि सुख-शान्ति की चिरस्थायी साधना के लिये उदार आदर्शवादिता को व्यवहार में उतारे बिना और कोई मार्ग है नहीं। प्रकृति के अनुदान और विज्ञान के वरदान अब तक इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो चुके हैं कि उनके सहारे मानव समुदाय के 450 करोड़ सदस्य ही नहीं, अन्यान्य प्राणियों और वृक्ष पादपों को हरीतिमा से परिपूर्ण मात्रा में सुसम्पन्न कर सकते हैं और इस दुनिया को सुख सुविधा से ही नहीं, स्नेह सौजन्य के आदान-प्रदान से कृतकृत्य कर सकते हैं। उस स्थिति में आज की अपनी आशंका, अविश्वास और आतंक से भयभीत दुनिया कल शान्ति, समृद्धि एवं प्रगति के आनन्द उल्लास का भरपूर रसास्वादन कर सकती है। दृष्टिकोण बदलने भर की देर है। अध्यात्मवादी उत्कृष्टता को यदि नीति-निर्धारण का आधार माना जा सके तो दरिद्रता, अशिक्षा, उच्छृंखलता, रुग्णता, दुर्बलता, आशंका जैसी एक भी विपत्ति को पैर जमा सकना सम्भव न हो सकेगा। बारीकियों में जाने की इस समय जरूरत नहीं, व्यवहार में उतारने के लिये कार्यक्रम बना डालने वाले विज्ञजन हर क्षेत्र में भरे पड़े हैं। उन्हें यदि विश्वास दिलाया जा सके कि उपलब्धियों का विनियोग उत्कृष्टता की पक्षधर आदर्शवादिता की- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की- आध्यात्मिकता की नीति अपना कर किया जाना है तो नई दुनिया का ऐसा नक्शा बनने में देर नहीं लगेगी जिसमें न कहीं विग्रह होंगे, न अभाव, न अनाचार। सर्वत्र स्नेह सौजन्य का बसन्ती वातावरण छाया दिखेगा और उस परिस्थिति में हर व्यक्ति उसी अपनी धरती पर तथाकथित स्वर्ग लोक जैसी गुदगुदाने वाली अनुभूतियों का आनन्द लेता हुआ जीवनयापन करेगा। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि उस दिशा में उपेक्षा ही बरती जाती रही है और प्रचलित उच्छृंखलता को यथास्थान बनाये रखा गया तो इतना और नोट करना चाहिये कि राजनीति, अर्थनीति, बुद्धि कौशल, विज्ञान, वैभव आदि के सहारे जो भी समाधान प्रयत्न चल रहे हैं, वे क्षणिक चमत्कार भर दिखा सकने की फुलझड़ी छोड़ते रहेंगे। सघन तमिस्रा का आत्यन्तिक समाधान मात्र उस औचित्य एवं औदार्य को अपनाये बिना और किसी प्रकार सम्भव नहीं है, जिसे पिछले दिनों अध्यात्म के नाम से जाना जाता रहा है।
जो कुछ किया जाता है वह सारे का सारा मात्र आज की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए ही नहीं होता। उसे भविष्य को ध्यान में रखते हुए भी किया जाता है। भोजन आज का बनाया आज खाया जाता है पर अन्न भण्डार इसलिए भरा जाता है कि अगले दिनों भी उसका उपयोग हो सके। महत्वपूर्ण योजनाएँ इसी दृष्टि से बनती हैं। रहने के मकान इसी दृष्टि से बनते हैं कि उनमें बुढ़ापा कट सके और सन्तान को भी उसमें रहने का अवसर मिल सके। राष्ट्रीय प्रगति की विविध योजनाएँ न केवल आज का समाधान ध्यान रखते हुए बनती हैं, वरन् उनके पीछे उज्ज्वल भविष्य की संरचना को भी ध्यान में रखा जाता है। युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित प्रज्ञा अभियान भी इसी प्रयोजन के लिए है कि अगले दिनों की व्यवस्था प्रगति समृद्धि का क्रमिक विकास चल पड़े।
भविष्य निर्माण की समस्त योजनाओं में मूर्धन्य यह है कि भावी पीढ़ियों का स्तर कैसा हो? उसी के ऊपर समस्त सम्भावनाएँ निर्भर हैं। मात्र सम्पत्ति भर की बात सोचने से काम नहीं चलेगा। साधन जुटा देना पर्याप्त नहीं। महत्वपूर्ण बात स्तर की है। किसी देश का क्षेत्रफल, जनसंख्या, प्रकृति सम्पदा, उद्योग, शस्त्र सज्जा आदि के आधार पर उसकी सही गरिमा का मूल्यांकन नहीं हो सकता। यह सभी साधन ऐसे हैं जो तनिक-सी प्रतिकूलता उत्पन्न होने पर देखते-देखते धराशायी हो सकते हैं। स्थायी और सच्चा बल वैभव सुदृढ़ व्यक्तित्वों पर निर्भर है। वे जहाँ, जितनी संख्या में जिस स्तर के होंगे वहाँ समर्थता और सम्पदा उसी अनुपात से विकसित होती चलेगी। नागरिकों का स्तर गया-गुजरा रहे तो साधन सम्पदा भर से उज्ज्वल भविष्य की आशा नहीं की जा सकती।
रावण की लंका में धनबल, जनबल, शस्त्रबल और कौशल की कुछ भी कमी नहीं थी किन्तु व्यक्तित्वों का स्तर निकृष्ट रहने के कारण वह समूचा वैभव नष्ट-भ्रष्ट हो गया। निवासियों को असीम त्रास सहने पड़े। और वे अपने संपर्क क्षेत्र में भी अनीति अशान्ति का माहौल बनाते रहे। दूसरों को दुःखी करते रहे और स्वयं दुःखी हुए। इसे कहते हैं व्यक्तित्वों की गिरावट।
अब से पचास वर्ष पूर्व अपने देश में महान व्यक्तित्वों का बाहुल्य था। तिलक युग, गान्धी युग पर दृष्टिपात करते हैं तो भारतीय आकाश पर उज्ज्वल नक्षत्र चमकते दीखते हैं। उन दिनों महामानवों की भरमार थी। फल यह हुआ कि हजार वर्ष की गुलामी से पददलित मनोबल से नया उभार आया और लाखों सत्याग्रहियों ने इतनी बड़ी शक्ति से जूझने का जौहर व्रत अपनाया। अंग्रेज चले गये। स्वाधीनता मिली। इसे योजनाओं की, साधनों की नहीं वरन् समुन्नत व्यक्तित्वों की प्रखरता का प्रतिफल कहा जायगा।
इन दिनों भी जापान, इस्राइल, क्यूबा जैसे छोटे-छोटे देश अपने प्रबल पराक्रम का परिचय देते देखे जाते हैं। इसका कारण वहाँ की सम्पदा नहीं वरन् नागरिकों की प्रखरता है। वह जहाँ भी होगी, साधनों की कमी न रहेगी। इसके विपरीत जहाँ गये-गुजरे निकृष्ट स्तर के लोगों की भरमार होगी वहाँ नित नये कलह, और संकट खड़े दृष्टिगोचर होंगे। ‘नीत्से’ ने अपनी व्यंग्यात्मक शैली में इन्हें ही चाण्डाल की श्रेणी में रखते हुए जड़ मूल से समाप्त करने का प्रतिपादन किया था। इससे भले ही हम सहमत न हों, व्यक्तित्व के स्तर सम्बन्धी तथ्य एवं तर्क अपने स्थान पर सही हैं।
मनुष्य यदि सच्चे अर्थों में मनुष्य हो तो वह उतना शक्तिशाली सिद्ध होता है जिस पर विशाल शस्त्रागार और रत्न भण्डार निछावर किये जा सकें। ऐसे लोग अपने पुरुषार्थ से कठिन परिस्थितियों में भी समुचित वैभव उपार्जित कर लेते हैं। कम पड़े तो भी मितवाद का जो है उसी का भावभरा वितरण करके सुख सौभाग्य का हँसता हँसाता वातावरण बना लेते हैं। अस्तु यदि उज्ज्वल भविष्य की संरचना वस्तुतः अभीष्ट ही हो तो इसके लिए भावी पीढ़ी के स्तर को ऊँचा उठाने की दूरगामी योजना बननी और गम्भीरतापूर्वक क्रियान्वित होनी चाहिए। इस एक ही प्रसंग की उपेक्षा किये जाने पर वे सभी दिवा स्वप्न निरर्थक सिद्ध होंगे जिनमें साधनों की बहुलता के आधार पर भावी समृद्धि एवं प्रगति की मनुष्य में देवत्व तथा धरती पर स्वर्ग के अवतरण की आशा की गई है। कुपात्र के जो हाथ में है उसे भी उजाड़ देते हैं और सत्पात्रों के हाथ खाली हों तो भी वे उन्हें अपना पसीना मोती बनाकर इन्द्र और कुबेर जैसी विभूतियों से भर लेते हैं।
भावी पीढ़ियों के निर्माण के लिए क्या किया जाय? यह विचारने से पूर्व यह सोचना होगा कि वर्तमान जनक और जननियों को क्या सिखाया और कराया जाय। जिससे वे सुप्रजनन के उत्तरदायित्व का सही निर्वाह कर सकें। ऊसर भूमि में कुछ भी बोया जाय, कैसी ही सिंचाई सुरक्षा का प्रबन्ध किया जाय, कुछ काम बनेगा नहीं। क्योंकि जब भूमि ही किसी काम की नहीं और बीज ही घुना हुआ है तो उसमें उगेगा ही क्या? और जो उगेगा उसका सन्तोषजनक परिणाम कैसे दृष्टिगोचर होगा?
बच्चों का शारीरिक विकास आहार-विहार जलवायु पर निर्भर रहता है। शिक्षण के आधार पर उन्हें क्रिया कुशल सम्पन्न भी बनाया जा सकता है। सामान्यतया इतना कर पाना ही अभिभावकों के लिए सम्भव होता है। इतने पर भी व्यक्तित्वों की प्रखरता के संबंध में यह तथ्य अनिर्णीत ही रह जाता है कि उन्हें सद्गुणी, एवं प्रामाणिक कैसे बनाया जाय। इस संदर्भ में अधिक से अधिक इतना ही कहा या किया जा सकता है कि पारिवारिक वातावरण में सज्जनता एवं सुव्यवस्था का समावेश रखा जाय ताकि उसका प्रभाव ग्रहण करके कच्ची आयु की कच्ची मिट्टी को उपयोगी ढाँचे में ढलने का अवसर मिले। अच्छे स्कूलों में भर्ती करने को अच्छे अध्यापकों का सुयोग बिठाने की बात सारगर्भित है। इन सब प्रसंगों के संबंध में बाल-विकास में रुचि रखने वाले बहुत कुछ कहते करते भी रहे हैं और उस व्यवस्था का परिणाम भी कुछ न कुछ हितकर ही होता है।
इतने पर भी एक रहस्य जहाँ का तहाँ ही बना रहता है कि बालकों में उस जन्मजात प्रतिभा की स्थापना कैसे हो जो परिस्थितियों की परवा न करके उलटी दिशा में भी चलती है। अच्छी परिस्थितियों में पले हुओं में से कितने ही न केवल दुर्गुणी वरन् मूढ़मति भी होते हैं। इसके विपरीत विपन्न परिस्थितियों में पैदा हुए बालक बुद्धि-कौशल की दृष्टि से ऊँचे उठते भी देखे जाते हैं।
ऐसे प्रसंग भले और बुरे दोनों ही स्तर के हो सकते हैं। बुरे परिवारों में अच्छे व्यक्तित्व उभरने पर कीचड़ में कमल की उपमा दी जाती है और श्रेष्ठ घरों में हेय सन्तान जन्मने पर ‘उत्तम कुल पुलिस्त कर नाती” कहे जाने वाले रावण कुम्भकरण बनते देखे गये हैं। ऐसे ही उदाहरणों में सन्त कबीर के पुत्र कमाल का भी उल्लेख होता है। “डूबा वंश कबीर का उपजे पूत कमाल” अब एक उक्ति बन गई है जिसे उपयुक्त वातावरण की अवहेलना करके सन्तानों के कुमार्गगामी होने पर प्रयुक्त किया जाता है।
इस संबंध में विभिन्न कारणों के प्रस्तुतीकरण में अधिक वजनदार वह प्रतिपादन है जिसमें वंशानुक्रम की परिणति का महत्व बताया जाता है। पूर्वजों की अनेक पीढ़ियों का प्रभाव रज वीर्य के साथ गुँथा रहता है। जीन्स- क्रोमोसोम आदि का ऊहापोह वैज्ञानिक क्षेत्रों में इसी संदर्भ में होता रहता है। आवश्यक नहीं कि माता-पिता के सदृश ही बालक हो। कई पीढ़ी पूर्व की मात्र परम्परा या पितृ परम्परा के साथ जुड़े हुए विशेष तथ्य अपना काम करते रहते हैं और बहुत समय तक दबे रहने पर भी जब अनुकूल परिस्थिति पाकर उभरते हैं तो उनके विशेष प्रभाव परिणाम भी सन्तानों में दृष्टिगोचर होते हैं। यह भले भी हो सकते हैं और बुरे भी। पर उनका बहुत कुछ आधार वंशधरों की विशिष्टता पर ही निर्भर रहता है। सामान्य स्वभाव और निर्वाह वाले व्यक्तियों की सन्तानें भी सामान्य स्तर की गुजर-बसर करती देखी गई हैं। पर जिनमें प्रतिभा होती है, उनकी पीढ़ियों में से कुछ में ऐसे असाधारण तत्व पाये जाते हैं जिनमें परिवार स्तर की अवहेलना करके ऐसी सन्तानें जन्में जिन्हें भले या बुरे स्तर की ‘विशिष्ट’ कहा जा सके।
वंशानुक्रम विज्ञान पर इन दिनों बहुत गहरी खोजें हुई हैं और पाया गया है कि सुप्रजनन के लिए जन्मदाताओं का सुसंस्कारी होना आवश्यक है। जिस प्रकार माता-पिता के रंग रूप से मिलता-जुलता शरीर बालकों का होता है उसी प्रकार उनकी प्रतिभा एवं आदत में भी ऐसा ही साम्य पाया जाता है। विशेषतया गर्भस्थापना के दिनों उनकी जैसी मनःस्थिति रही होती है उसकी छाप सन्तान पर विशेष रूप से देखी गई है।
शारीरिक मानसिक रोगों के बारे में यह तथ्य बहुत पहले ही स्वीकारा जा चुका है। इसके समर्थन में अगणित प्रमाण सर्वत्र दीखने को मिलते हैं। श्वास, रक्त विकार, कुष्ठ, उन्माद आदि से ग्रसित अभिभावकों की सन्तानें आरम्भ में न सही बड़े होने पर उन रोगों की शिकार अकारण ही हो जाती हैं। कई परिवारों में अल्पायु या दीर्घायु होने का सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहता है। कइयों में दाँत जल्दी गिरने या देर तक स्थिर रहने की परम्परा चलती रहती है। अब एक कदम आगे बढ़कर इतना परिशिष्ट और भी इस प्रतिपादन में जुड़ा है कि आदतों के संबंध में भी पैतृक विशेषताएँ सन्तान को प्रभावित करती हैं। चारित्रिक गुण दोष भी लम्बी अवधि तक पीढ़ियों में दृष्टिगोचर होते रहते हैं। स्वभाव का भी एक ढर्रा इसी आधार पर घूमता रहता है। राजपूतों में साहसिकता और ब्राह्मणों में नम्रता की विशेषता अनायास ही पाई जाती है। वैश्य परिवार में व्यवसाय बुद्धि न केवल वातावरण के प्रभाव से विकसित होती है वरन् जन्मजात रूप से वह कौशल और रुझान अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाया जाता है।
इन दिनों हर क्षेत्र में उत्कृष्टता संवर्धन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। साधन सामग्री से लेकर चिकित्सा, सुरक्षा आदि के सभी क्षेत्र में अधिक उत्तम को जुटाया जाता है। कपड़े और फैशन में- द्रुतगामी वाहनों के उपयोग में- विनोद मनोरंजनों में अब घटिया का तिरस्कार होता है और बढ़िया की ढूँढ़-खोज चलती है, भले ही वह महंगी ही क्यों न पड़े?
भावी पीढ़ियों को अधिक प्रतिभावान, सुयोग्य समुन्नत बनाने में भी यह सुरुचि काम करती है। लोग अपनी-अपनी सन्तानों को सजाने में ही नहीं समुन्नत बनाने में भी रुचि लेते हैं। इसके लिए कुछ कृपणों या असमर्थों को छोड़कर प्रत्येक अभिभावक अपनी क्षमता के अनुरूप प्रयत्न भी करता है। बात बढ़कर समाज के मूर्धन्यों की दृष्टि में भी जमी है और राष्ट्रों के कर्णधार सोचते हैं कि उनके नागरिक अधिक समर्थ एवं सुयोग्य हों। उनकी प्रतिभा से सर्वतोमुखी प्रगति का लाभ मिले। साथ ही यह भी सोचा जाता है कि शारीरिक मानसिक दृष्टि से असमर्थों, अविकसितों, खण्डित व्यक्तित्वों का उत्पादन रोका जाय। बुरी आदतों और विकृत मनोभावों वाले व्यक्ति न केवल अपने लिए ही वरन् सम्बद्ध लोगों के लिए भी संकट उत्पन्न करते हैं। उनके कुकृत्यों द्वारा समूचे समाज को क्षति पहुंचती है। इसलिए जिस प्रकार अपराधियों की, आक्रमणकारी आतंकवादियों की रोकथाम की जाती है उसी प्रकार कुप्रजनन पर भी प्रतिबन्ध लगाया जाय। अच्छे उत्पादन के साथ ही यह भी ध्यान रखा जाय कि हेय या निकृष्ट के संबंध में प्रतिरोधात्मक प्रबन्धों की व्यवस्था की जा रही है या नहीं।
देव मानवों का निर्माण सुगढ़ सुसंस्कारी दम्पत्ति ही कर पाते हैं। स्तर बदले बिना सुसन्तति को जन्म दे पाना सम्भव नहीं। ऊपरी उपचार का- शिक्षा का- वातावरण का कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है, पर वह इतना नहीं होता जिससे जन्मदाताओं की स्थिति में सर्वथा विपरीत प्रकार का व्यक्तित्व विनिर्मित हो सके। अच्छों के बुरे होना तो सरल है, पर बुरों से अच्छे उत्पन्न करने में असाधारण पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ेगी। शुभारम्भ वहीं से करना होगा जहाँ उत्पादनकर्त्ताओं का स्तर साधना पराक्रम द्वारा अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि में समर्थ बनाया जा सके।
मनुष्य में एक विलक्षण विद्युत शक्ति है जिसे ओजस् कहते हैं। इसी को प्राण भी कहते हैं। उसका ध्रुव स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में है, जिसे मूलाधार भी कहते हैं। इसकी स्थिति तो सुषुम्ना क्षेत्र के अन्तरंग गह्वर में है, पर उसका दृश्य प्रतीक जननेन्द्रिय के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इस क्षेत्र में जब उत्तेजना उत्पन्न होती है तो सारा मनःसंस्थान उन्माद जैसी स्थिति में जा पहुँचता है। कामोन्माद की चर्चा तक उत्तेजक होती है और ऐसा आवेश उत्पन्न करती है जिसमें प्राणी विवेक से विमुख होकर कृत्य अकृत्य कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। इस आवेश का समाधान ढूँढ़ने के लिए ही प्रायः विवाह किया जाता है। यद्यपि सभी जानते हैं कि इस बन्धन में बँधने के उपरान्त इतने उत्तरदायित्व सिर पर लदते हैं जिनको ढोते-ढोते समूची जिन्दगी खप चले।
प्राण विद्युत यों समूचे शरीर में संव्याप्त है और उसके सूत्र संचालन का कार्य मनःसंस्थान द्वारा होता है। तो भी उसका उद्गम जननेन्द्रिय क्षेत्र को ही माना गया है। अध्यात्म भाषा से उसे सुषुम्ना मूल, कुण्डलिनी केन्द्र, मूलाधारचक्र आदि नामों से जाना जाता है। शरीर शास्त्र के अनुसार यह प्रजनन और रति कर्म का स्थान है। मनोविज्ञानी यहाँ की उत्तेजना को कला, विनोद, उल्लास एवं साहस का उद्गम मानते हैं। नपुँसक को न सेना में भर्ती किया जाता है और न ही उसका पौरोहित्य के लिए वरण किया जाता है। सामान्य जीवन में भी वह अपंग लुँज-पुँज होकर रहता है और कोई बड़ा पुरुषार्थ कर सकने में समर्थ नहीं होता।
ब्रह्मचर्य के साथ शारीरिक बलिष्ठता और मानसिक प्रखरता भी जुड़ी हुई है। उसे अपनाने वाले ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी बनते हैं। यह तथ्य है कि ऋषियों और मनीषियों में से अधिकाँश ब्रह्मचारी रहे हैं। जिन्हें अपनी बलिष्ठता और प्रखरता को कौड़ी मोल न बहाना हो- उन सम्पदाओं को किन्हीं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाना हो उनके लिए यही उचित है कि ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन करें साथ ही अन्य इन्द्रियों को भी वश में रखने का प्रयत्न करें। शास्त्रकारों ने इस तथ्य के समर्थन में बहुत कुछ कहा है। यथा-
आयुस्तेजोबलं वीर्य प्रज्ञाश्रीश्च महद्यशः। पुण्यं च प्रीतिमत्वं च हन्यतेऽब्रह्मचर्यया॥
अर्थात्- आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, पुण्य, प्रीति आदि सभी विभूतियाँ ब्रह्मचर्य न पालने पर पलायन कर जाती हैं।
अथर्ववेद 1।5।19 की ऋचा है-
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्यु मुपाघ्नतः। इन्द्रो ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वरा भरत॥
अर्थात्- ब्रह्मचर्य रूपी तप का आश्रय लेकर देवताओं ने मृत्यु को जीता। इन्द्र को उच्च पदासीन होने का श्रेय सौभाग्य ब्रह्मचर्य पालन के कारण ही मिला था।
शिव वचन है-
न पतस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्य तपोत्तमम। ऊर्ध्व रेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः॥
अर्थात्- शरीर कष्ट की तितीक्षा ही तप नहीं है। उत्कृष्ट तप तो ब्रह्मचर्य है। “ऊर्ध्वरेता” ब्रह्मचारी को मनुष्य नहीं देवता ही कहना चाहिए।
अथर्ववेद की एक अन्य ऋचा है-
रुजन् परिरुजन् मृणन् परिमृणन्। म्रोक्री मनीहा खनो निर्दाह आत्मदषिस्तन्द् षिः॥
अर्थात्- यह काम विकार मनुष्य को रोगी बनाने वाला है, बुरे-बुरे रोगों में फँसाता है। यह मारने वाला बधिक है। बहुत बुरी प्रकृति का बधिक है। यह अपने शिकार को उलटा घसीटता है। और बुद्धि का अपहरण कर लेता है। शरीर में से आरौग्य और बल की जड़ें खोदकर फेंक देता है। धातुओं को जलाता है। आत्मा को मलीन करता है और तेजस् को चुरा लेता है।
ब्राह्मण ग्रन्थों में इस संयम मर्यादा की चर्चा करते हुए कहा गया है-
‘व्रतेषु वै ब्रह्मचर्यम्।’
अर्थात्- व्रतों में सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचर्य है।
‘ब्रह्मचर्य परं बलम्।’
अर्थात्- ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट स्तर का बल है।’ योग दर्श साधन पाद 18 का वचन है-
‘ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभः।’
अर्थात्- ब्रह्मचर्य पालने से बलिष्ठता का लाभ मिलता है।
वीर्यं वै भर्गः। -शतपथ
अर्थात्- वीर्य निश्चय ही ब्रह्म तेज है।
सूत्र कृताँक 6।23 का वचन है-
तपेसु वा उत्तमं वंभचेरे।
अर्थात्- तपों में उत्तम तप ब्रह्मचर्य है।
वैकालिक सूत्र 6।17 का वचन है-
अवंभ चरियं घोरं पमायं दुरहिट्ठियं।
अर्थात्- ब्रह्मचर्य का व्यतिरेक प्रमाद भी है और पाप भी।
याज्ञवल्क्य संहिता में उल्लेख है-
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थेसु सर्वथा। सर्वत्र मैथुन त्यागा ब्रह्मचर्य प्रचक्षते॥
अर्थात्- ब्रह्मचर्य वह है जिसमें क्रिया से ही नहीं, चिन्तन और कथन-श्रवण से भी कामुक प्रसंगों का परित्याग किया जाता है।
घेरंग संहिता के अनुसार शिव का वचन है- सिद्धे बिन्दौ महादेवि, किं न सिद्धयति भूतते।
अर्थात्- हे पार्वती, बिन्दु को सिद्ध कर लेने- ब्रह्मचर्य पालने पर इस धरती की कोई सिद्धि ऐसी नहीं जो प्राप्त न हो सके।
महाभारत के मोक्ष धर्म प्रकरण में शुकदेव, जनक को प्रबोधन करते हुए कहते हैं-
‘तपसा गुरुवृत्या च ब्रह्मचर्येण वा विभो।’
“उस विद्यार्थी का अध्ययन सार्थक होता है जो ब्रह्मचर्यपूर्वक, तपस्वियों जैसा जीवन जीता है और गुरु अनुशासन को पालता है।”
कामुकताजन्य शारीरिक उत्तेजना आवश्यकता नहीं वह विशुद्ध रूप से संकल्पजन्य है। अश्लील चिन्तन से ही कामोत्तेजना उत्पन्न होती है और मन को उस प्रसंग से विरत कर लेने पर उसका समाधान भी सरलतापूर्वक हो जाता है। महाभारत आपद्धर्म प्रसंग में उल्लेख है-
संकल्पाज्जायते कामः सेव मानो विवर्धते। यदा प्रात्तोविरमते तथा सथः प्रणश्यति॥
“चिन्तन से कामोत्तेजना उत्पन्न होती है। सेवन करने पर वह और भी अधिक प्रचण्ड हो उठती है। किन्तु जब विज्ञजन उस ओर से मन हटा लेते हैं तो उसके समाप्त होने में भी देर नहीं लगती।”
महाभारत आदि पर्व में एक कथा है- पाँचाल जाते समय मार्ग में मिले सोमापयाण नगर के समीप महाप्रतापी गंधर्वराज अंगारपर्ण के साथ भयंकर युद्ध होने का वर्णन है, जिसमें अन्ततः गंधर्व राजा हारे और अर्जुन जीते।
विजय के उपरान्त अर्जुन ने पराजित गंधर्व से पूछा “कहाँ हम साधारण मनुष्य और कहाँ आप दैव शक्तियों से सम्पन्न महाबली। फिर आप हारे कैसे, कृपया इसका रहस्य समझाइए।”
उस गंधर्व ने कहा-
ब्रह्मचर्य परो धर्मः स चापि नियतस्त्वपि।
यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽरि मविजित स्त्वया॥
हे पार्थ! ब्रह्मचर्य परम धर्म है। वह तुममें विद्यमान है। मैं उससे रहित होने के कारण हारा और तुम जीत गये।
वयोवृद्ध ययाति ने अपने पुत्र पुरु से यौवन माँगकर अपनी वासनात्मक तृप्ति का प्रयत्न किया। फिर भी उनकी वासना शान्त नहीं हुई कामना तृप्ति की कोई सम्भावना नहीं दीखी। तब उनने पुत्र को उसका यौवन वापस लौटा दिया और पश्चाताप करते हुए जो विचार व्यक्त किये। उसका उल्लेख महाभारत आदिपर्व में इस प्रकार है।
न जातु कामः कामानामुपभोगन शाम्यति। हविषा कृष्ण वर्त्मेवभूय एषाविवर्तते॥
अर्थात्- “हे पुत्र, इतना उपभोग कर लेने पर भी मेरी कामुकता शान्त नहीं हुई। कामना पूरी होने की अपेक्षा वह और भी अधिक अतृप्त रहने लगी। आग में घी डालने की तरह वह बढ़ती ही है।”
उर्वशी के प्रणय प्रस्ताव को अस्वीकृत करते हुए अर्जुन कहते हैं-
गच्छ मूर्घ्ना प्रपन्नोस्मि पादौ ते वर वर्णिनि। त्वंहि म मातृवत् पूज्या रक्षोऽहं पुत्रवत् त्वया॥
अर्थात्- “आपके चरणों में मस्तक रखकर मैं आपकी वन्दना करता हूँ। आप मुझे माता के समान पूज्य हैं। मुझे पुत्र मानकर वात्सल्य प्रदान करें और वापस लौट जाएँ।”
चिकित्साचार्य सुश्रुत के अनुसार आहार से रस, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य बनता है। इसमें से प्रत्येक प्रक्रिया पाँच-पाँच दिन में सम्पन्न होती है। इस प्रकार आहार चालीस दिन में वीर्य की स्थिति तक पहुँचता है।
कहा गया है कि 40 सेर भोजन का एक सेर रक्त और एक सेर रक्त का दो तौला वीर्य बनता है। एक बार के मैथुन क्षरण में डेढ़ तौला वीर्यपात का औसत माना जाता है। इस प्रकार मैथुन प्रक्रिया इतनी महंगी पड़ती है जिसमें आहार की लागत और शरीर के अनेकानेक अवयवों की इतने समय की मेहनत एक प्रकार से निरर्थक ही चली जाती है। अमृतोपम घृत को गन्दी नाली में बहाते रहना और अपने स्वास्थ्य मनोबल को खोखला करते रहना किसी भी प्रकार बुद्धिमानी नहीं है।
शिव वचन है-
यस्य प्रसादान महिमा ममाप्येता दशो भवेत्।
अर्थ- “मेरी इतनी महिमा ब्रह्मचर्य पालन के कारण ही हुई है।
और भी-
मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्।
अर्थात्- “ब्रह्मचर्य जीवन है और उसका उल्लंघन मरण।”
ब्रह्मचर्य की शास्त्र प्रतिपादित महिमा को कोई भी नर-नारी अनुभव द्वारा प्रत्यक्ष देख सकता है। अविवाहित लड़की लड़के अपना स्वास्थ्य सौंदर्य लम्बे समय तक यथावत् बनाये रहते हैं परन्तु अतिक्रमण करने वालों को जवानी में ही वृद्धावस्था घेर लेती है। अतः ब्रह्मचर्य की मर्यादा का पालन व्यक्तित्व सम्पदा के अर्जन हेतु करना ही चाहिए।
एक जिज्ञासु कबीर के पास पहुँचा। बोला दो बातें सामने हैं- संन्यासी बनूँ या गृहस्थ।
कबीर ने कहा जो भी बनो आदर्श बनो। उदाहरण के लिए उन्होंने दो घटनायें प्रस्तुत कीं।
अपनी पत्नी को बुलाया। दोपहर को प्रकाश तो था, पर उन्होंने दीपक जला लाने के लिए कहा ताकि कपड़ा अच्छी तरह बुन सकें। पत्नी दीपक लाई और बिना कुछ बहस किये रख गई।
कबीर ने कहा- गृहस्थ बनना हो तो परस्पर ऐसे विश्वासी बनना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा बने। दूसरा उदाहरण संन्यासी का देना था। वे जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गये जहाँ वयोवृद्ध महात्मा रहते थे। वे कबीर को जानते न थे। नमन के उपरान्त उनसे पूछा- आपकी आयु कितनी है? बोले अस्सी बरस।
इधर-उधर की बातों के बाद कबीर ने कहा बाबाजी आप क्यों नहीं बताते। सन्त ने कहा- बेटे अभी तो बताया था, अस्सी बरस, तुम भूल गये हो। फिर कबीर ने सन्त को दूर जाकर पुकारा। वे हाँफते-हाँफते चले गये। कारण पूछा तो फिर वही प्रश्न किया आपकी आयु कितनी है। सन्त को तनिक भी क्रोध नहीं आया और कहा- अस्सी बरस है। हँसते हुए वापस लौट गये।
कबीर ने कहा सन्त बनना हो तो ऐसा बनना जिसे क्रोध ही न आये।
सान्निध्य कितना प्रभावी होता है इसका प्रतिपादन कई उदाहरण देकर सिखाया, समझाया जाता रहता है। पारस को छूकर लोहे का स्वर्ण बन जाना- चन्दन के समीप उगे झाड़-झंखाड़ों का महकने लगना, कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर मनोवांछित पा लेना, अमृत पीकर जरा-मरण से छुटकारा पाना जैसे उदाहरणों में यही बताया गया है कि सत्संगति का कितना प्रभाव होता है। स्वाति बूँदों का सान्निध्य प्राप्त करके सीपी का मोती उगलना इसी प्रमाण शृंखला के अंतर्गत आता है।
पति-पत्नी के दो शरीर एक मन होने की उक्ति इसी आधार पर सार्थक बनती है कि वे दोनों परस्पर अधिकाधिक घनिष्ठता बढ़ाते हैं और एक दूसरे के साथ घुलते चले जाते हैं। माता का सर्वाधिक प्रभाव संतान पर पड़ने की बात के पीछे भी इसी तथ्य को प्रधान रूप से कार्यान्वित होते देखा जा सकता है। सत्संग की ही नहीं कुसंग की महिमा भी ऐसी ही है। “कोयले की दलाली से काले हाथ” - “साँप के पेट में पहुँच कर दूध भी विष बन जाता है”, इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।
जुड़वा बच्चों के बीच पाई जाने वाली असाधारण समता इस तथ्य को और भी अच्छी तरह प्रमाणित करती है। उनमें से अधिकाँश के बीच न केवल रंग रूप की समता पाई जाती है वरन् आकृति के साथ-साथ प्रकृति भी बहुत कुछ मिलती-जुलती है। न केवल प्रकृति मिलती है वरन् एक-दूसरे के साथ असाधारण स्नेह सहयोग भी रखती है।
माता के पेट में एक साथ नौ महीने रहने और एक ही वातावरण में लगातार पलने का प्रभाव उनके बीच ऐसा अदृश्य तालमेल भी बैठ जाता है कि वे एक-दूसरे की परिस्थितियों से प्रभावित होते और दूर रहते हुए भी परस्पर एक जैसी भाव सम्वेदनाओं का अनुभव करते हैं। एक के कष्ट में दूसरा दुःखी और एक के सुख में दूसरा सुखी होते देखा गया है। यहाँ तक की जन्म की तरह उनके मरण काल में भी बहुत ही कम अन्तर देखा गया है।
यह एकता एवं घनिष्ठता का चमत्कार है। स्वार्थों और दुष्टता का व्यतिक्रम तो कहीं भी रस में विष घोल सकता है किन्तु सामान्य नियम यही है कि निकटतम घनिष्ठता से मनुष्य भी प्रभावित होते हैं। आग की निकटता से गर्मी और बर्फ की निकटता से सर्दी अनुभव होना सान्निध्य संपर्क के चमत्कारी प्रतिफल की ओर इंगित करता है। इस संबंध में जुड़वा बच्चों की घनिष्ठता विशेष रूप से दृष्टव्य है।
लन्दन में ग्रेटा और फ्रेडा दो जुड़वा भाई एक जैसी शक्ल सूरत के थे। उनके देखने और चलने का ढंग भी एक जैसा था। एक जैसा भोजन पसन्द करते और एक जैसे कपड़े पहनते। दोनों एक जैसा सोचते और एक जैसी दिनचर्या अपनाते। यही ही नहीं दोनों में संवेदनात्मक एकता भी थी और दूर होने पर भी एक की मनःस्थिति दूसरे को प्रभावित करती।
वे उत्तरी इंग्लैंड के आटयार्क स्थान में रहते थे। इनमें से एक को शान्ति भंग के आरोप में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो दूसरा भी ठीक उसी तरह उद्विग्न पाया गया।
मनोविज्ञान विशेषज्ञ डेविड वेस्वरी ने दोनों की मनःस्थिति का गम्भीर अध्ययन किया। वे उन्हें “एक मस्तिष्क दो शरीर” कहते थे।
ऐसी ही एक घटना और भी है। दो लड़कियां बॉक्स और पारिस एक साथ जन्मी। 16 वर्ष की आयु में उन्हें वेसटर्न यूनियन टेलीग्राफ कम्पनी में आपरेटर के पद पर नौकरी मिल गई। दोनों उसी कम्पनी में 40 वर्ष लगातार काम करती रहीं। दोनों ने शादियाँ तो कर ली पर बच्चा एक को भी नहीं हुआ। उनमें से एक कॉम्स को 1973 में मस्तिष्कीय नाड़ी विकार की बीमारी हुई। दूसरी अस्पताल में उसे देखने जाया करती थी कि उसे भी वही बीमारी हो गई। कार्डेल के नर्सिंग होम में दोनों की मृत्यु एक साथ एक समय ही हुई। अस्तु उन्हें दो खाँचे वाले ताबूत में रखकर एक साथ ही दफन भी किया गया।
जुड़वा बच्चे बहुधा एक जैसी आकृति के न सही प्रकृति में समान पाये जाते हैं। उनमें न केवल गुण स्वभाव ही एक जैसे होते हैं वरन् ऐसा भी पाया गया है कि परस्पर घनिष्ठता भी बहुत होती है। प्रकृतिगत साम्य भी असाधारण मात्रा में पाया जाता है।
जार्डिया के कार्डेस नगर में दो बच्चे एक साथ पैदा हुए। एक का नाम मार्गेट नीहम, दूसरे का फ्लोरेंस नीहम। दोनों जीवन भर साथ रहे। जहाँ कहीं भी जाते साथ जाते। साथ काम करते और साथ-साथ ही रहते। वे 87 साल तक जिये। दोनों के बीच जन्म समय में भी दो घण्टे का अन्तर था और मृत्यु में भी वही ठीक घण्टे का आगा पीछा हुआ। उनके जीवन काल की घटनाओं में विचित्र साम्य था, जिसका कोई समाधान न्यूरो साइंटिस्टों के पास नहीं था।
मथुरा जिले के सहपऊ कस्बे में 65 वर्ष पूर्व एक ही रात्रि को एक ही समय में दो व्यक्ति जन्मे थे। वे जुड़वा तो नहीं पर पड़ोसी अवश्य थे। दोनों जीवन भर मित्र भी रहे। इनमें से एक का नाम था- बनवारी लाल दूसरे का श्रीराम। दोनों ही ब्राह्मण थे।
अचानक हृदय के दौरे से उनमें से एक की मृत्यु हुई। दूसरे ने कहा अब हमको भी चलना चाहिये। इतने में दूसरे को भी हृदय का दौरा हुआ और वह भी कुछ क्षणों के अन्तर से ही परलोक सिधार गया।
इसी प्रकार बिजनौर जिले के निकटवर्ती गाँव गिलाड़ा के दो जुड़वा भाइयों की मृत्यु भी एक घन्टे के आगे-पीछे से ही हो गई। वे जन्में भी इतने ही अन्तर से थे। दोनों भाई पहलवानी करते थे और पचास वर्ष तक हृष्ट-पुष्ट जिये। कभी बीमार नहीं पड़े, पर कुछ ही घण्टे की आकस्मिक बीमारी से उनका स्वर्गवास हो गया।
जुड़वा बच्चों की आत्मा दो ही होती हैं, पर उनकी शारीरिक मानसिक निकटता जब घनिष्ठता बन जाती है तो एक दूसरे के साक्षी बन कर रहते हैं। यह सिद्धांत उन सभी पर लागू होता है। जो सच्चे अर्थों में घनिष्ठता स्थापित कर सके। सच्चे अर्थों में मित्र साथी बन सकें। इन उदाहरणों से समष्टिगत चेतना की व्यष्टि में संव्याप्त चेतना शक्ति की महत्ता सिद्ध होती है। आर्षग्रन्थों में वर्णित मान्यताओं को प्रमाणित ही करती है।
किसी को कुछ, किसी को कुछ देने के लिये लोग भगवान की निन्दा कर रहे थे और उसे पक्षपाती ठहरा रहे थे।
सुन रहे थे कोई दार्शनिक। वे लोगों को साथ लेकर खेतों पर गये। एक में गुलाब बोया था दूसरे में तमाखू। एक से सुगन्ध उठ रही थी दूसरे से बदबू।
दार्शनिक ने कहा- जमीन बहुत बुरी है। किसी को क्या, किसी को क्या देती है। उसका पक्षपात देखा।
लोग बोले- नहीं, यह धरती का नहीं बोने वालों के कृत्यों का फल है।
हंसते हुए ज्ञानवान ने कहा- “भगवान एक प्रकार का खेत है उसमें जो जैसा बोता है वह वैसा काटता है।”
औसत आदमी की श्रमशक्ति गधे-घोड़े से भी कम है। सफर करने, बोझ उठाने, काम में जुटने की दृष्टि से गधे, घोड़े, बैल आदि की तुलना में मनुष्य कहीं पीछे है। बन्दर की औलाद कहने वाले उसके शरीर की क्षमता का मूल्याँकन उस रूप में कहते रह सकते हैं, किन्तु यदि सामान्य को असामान्य वाले कौशल हस्तगत हो सकें तो फिर उस नगण्य-सी क्षमता में असंख्य गुना अभिवृद्धि हो सकती है। बीज के अन्तराल में विद्यमान शक्ति आमतौर से प्रसुप्त स्तर की ही रहती है। किन्तु उसे जगा दिया जाय तो अंकुर फूटने, पौधा बनने, वृक्ष रूप लेने तथा फलों-फूलों से लद जाने की परिणति भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सकती है।
पौराणिक और ऐतिहासिक काल में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं, जिनकी शारीरिक क्षमता असाधारण मानी जाती है। हनुमान का पहाड़ उखाड़ना, समुद्र छलाँगना, भीम का हाथियों के झुण्ड को गेंद की तरह आकाश में उछालना, यदि किसी की समझ में न आता हो तो पृथ्वीराज चौहान के शब्दबेधी बाण का स्मरण किया जा सकता है। प्रो. राममूर्ति किसी जमाने में अपने सीने पर हाथी खड़े करते थे और मोटी चट्टानों को हथौड़ों से तुड़वाते थे। उन दिनों उन्हें बजरंगी भी कहा जाता था। ऐसे उदाहरण संसार के कोने में समय-समय पर देखे जाते रहे हैं।
जर्मनी का भीमकाय मैक्ससिक वजन उठाने की कला में अपने समय का दैत्य माना जाता था। वह खुद तो 147 पौण्ड भारी था, पर 200 पौंड भारी वजन को आसानी से उठा कर दिखा देता था। उसने एक प्रदर्शन में 200 पौंड भारी एक मनुष्य को अपने सिर से ऊंचा उठाकर दिखाया। यह प्रदर्शन एक बार नहीं पूरे सोलह बार उसने एक हाथ से किया। दूसरे हाथ में उसने पानी से लबालब भरा गिलास थामा और दिखाया कि एक हाथ से वजन उठाने में उसे कुछ भी असाधारण कठिनाई नहीं उठानी पड़ती है। यदि ऐसा होता तो दूसरे हाथ के लबालब भरे गिलास का कुछ बूँद पानी तो फैलता।
अरब का खलीफा इब्ने अबीतालिब अपने समय का सर्वाधिक बलिष्ठ शासक था। उसका जीवनकाल सन् 602 से 661 तक था। खैबर की लड़ाई में उसकी ढाल टूट गई। बचाव के लिये उसने किले के एक छोटे फाटक को एक ही घूँसे में उखाड़ लिया और उसी को ढाल की तरह प्रयोग किया। यह छोटा फाटक भी 850 पौण्ड भारी था। लड़ाई जीतने के बाद उस फाटक को उठाने का अन्य बलवान साथियों ने भी प्रयत्न किया, पर सात सरदारों में से कोई भी उसे उठाने में सफल न हो सका।
भुजाओं की मजबूती का वैसा कोई उदाहरण अभी तक दूसरा सुनने को नहीं मिला, जैसाकि लाक्सन फ्राँस के मडटेव रिहार्द ने प्रस्तुत किया। वह ठगों के एक गिरोह का सरदार था। एक बाद दो साथियों में माल के बँटवारे को लेकर मुठभेड़ हो गई। दोनों एक बड़ी मेज पर चढ़ कर चाकुओं से परस्पर आक्रमण करने लगे। रिहार्द को और तो कुछ न सूझा, उसने उस पत्थर से बनी भारी मेज को सिर पर उठा लिया, जिस पर खड़े होकर वे दोनों लड़ रहे थे। मेज समेत वह दोनों का बोझ लादकर कमरे से आँगन तक गया और मेज पटक कर दोनों को गिरा दिया। इस चमत्कार को देखकर दोनों लड़ने वाले हतप्रभ रह गये और उस दैत्य से बचने के लिये भाग खड़े हुए।
विगोरीज, फ्राँस के एक शिकारी वैरन क्रिस्टोफ टर्सन के घोड़े की टाँग आखेट की उछल-कूद से टूट गई। घोड़े को उस दयनीय स्थिति में छोड़ना टर्सन ने उचित न समझा। उसने उस 420 पौण्ड भारी घोड़े को कंधे पर उठाया और डेढ़ मील दूरी तक उतना भार वहन करते हुए पशु चिकित्सक के पास पहुँचाया।
गुन्नार हैमण्डरसन आइसलैण्ड द्वीपसमूह के क्षेत्र में समुद्री डाकुओं के सरदार थे। लड़ते समय उन दिनों लोहे का रक्षा कवच पहनने का रिवाज था। वह भी उस भारी परिधान को समय-समय पर धारण करता। इस वजन से लदा होने पर भी वह खड़े आदमी को छलाँग लगाकर पार जा सकता था। इतना ही नहीं वह उल्टी छलाँग पीठ की दिशा में भी इतनी ही ऊंची लगा सकता था। पीठ पीछे खड़े हुए आदमी को भी उल्टी छलाँग लगा कर पार करने में उसे कोई कठिनाई नहीं होती थी।
वाइजैन्टिवम का राजा रोमैनस पंचम युद्ध के समय लोहे का तकब पहनता था, जो प्रायः चालीस पौण्ड भारी था। वह तकब पहने जमीन पर से उछल कर ऊंचे कद के घोड़े पर सवार होता था। सहारा लेकर जीन पर वह कभी चढ़ा ही नहीं।
बर्फीली पहाड़ियों पर रहने वाले “लैप” जाति के लोग बर्फीली खाइयां पार करने के लिये छलाँग लगाने का अभ्यास करते हैं। उनमें से युवा लोग 125 फुट तक की लम्बी छलाँग लगाते देखे गये हैं।
अपने सैनिकों का साहस बढ़ाने के लिये मिश्र के एक बादशाह वैवर्स ने एक अजीब उपाय सोचा और अजीब रवैया अपनाया। वही 38 पौण्ड भारी लोहे का कवच पहन कर रोज नील नदी की तेज धार को पार करता और उसी भार से लदकर वापस आता। यह रवैया उसने पूरे 17 वर्षों तक जारी रखा।
कोरिया में जन्मा और जापान में बड़ा हुआ, नाटे कद का “मौस” नामक व्यक्ति मात्र 4 फुट 1 इंच का था, पर इतनी सामर्थ्य से भरा कि जापान और अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के पहलवानों तक को बातों-बातों में पछाड़ देता था।
जापान में प्रदर्शन के समय वह विशेष पद्धति से बनाई गयी कठोर ईंटों को हथेलियों से दबाकर चूर-चूर कर देता। एक बार तो हारे हुए पहलवानों ने एक साँड से कुश्ती लड़ने की चुनौती उसे दी। पहले तो उसने इन्कार कर दिया, किन्तु बार-बार चिढ़ाये जाने पर तैयार हो गया। 13 मन वजन के साँड को नशा पिलाकर दंगल में लाया गया। डाक्टरों और पुलिस की व्यवस्था पहले से ही कर ली गई थी। दंगल में उन्मत्त साँड और निहत्था मौस उतर पड़े। पहला वार करने का मौका साँड को दिया गया। प्रशिक्षित साँड ने वैसा ही किया। मौस चट्टान की तरह अडिग खड़ा रहा। प्रत्याक्रमण में उसे एक घूँसा भर मारा कि साँड चक्कर खाकर गिर पड़ा और दम तोड़ दिया।
अमरीका में मौस को चुनौती दिये जाने पर उसने वहाँ के चैम्पियन डिकरियल के साथ कुश्ती लड़ना स्वीकार कर लिया। 6 फुट 7 इंच का डिकरियल और 4 फुट 1 इंच का मौस, दर्शकों की भीड़ इस बेतुकी कुश्ती को देखने से पहले ही छंटने लगी, किन्तु जब थोड़ी ही देर में मौस ने डिकरियल को चित्त कर दिया तो लोगों के आश्चर्य का पारावार न रहा। एक हजार डालर का इनाम मौस को मिल गया।
कीवैस्ट (अफ्रीका) निवासी पीटर जेकाक्स के हाथ इतने मजबूत थे कि वह अपने हाथों के दोनों हथेलियों पर दो जवान आदमी बिठा लेता था और उन्हें सड़क पर लिये-लिये फिरता था।
स्विट्जरलैंड और लीशेन स्टेज के मध्य 235 वर्ष तक सीमा विवाद चला और झंझट होता रहा। अन्ततः एक सूझ-बूझ वाले लकड़हारे कास्टोडड ने उसे सुलझाया। वह एक बलिष्ठ व्यक्ति था। उसने कहा वह 1040 पौण्ड भारी पत्थर पीठ पर लाद कर चलेगा। वह जहाँ गिरे वहीं विभाजन रेखा मान ली जाय। दोनों पक्ष सहमत हो गये। वह उस भारी चट्टान को लाद कर चला और 1 मील 4500 फुट तक उसे वहन कर सका। फिर थक कर गिर पड़ा वह पत्थर जहाँ गिरा उसी स्थान को सीमा विभाजन चिन्ह मान लिया गया और झंझट मिट गया।
वस्तुओं को दूर तक तेजी से फेंकने वालों में मैक्लेन वर्ग, जर्मनी का एडोल्फ प्रख्यात था। एक प्रदर्शन में उसने चाँदी के सिक्के को बीस फुट दूर खड़े होकर बेलूत के पेड़ में खींचकर मारे। सिक्के इतनी गहराई तक घुस गये थे कि उन्हें कुदाल से खोदकर निकालना पड़ा।
मानवी काया की संरचना ऐसी है कि वह लम्बे समय तक जीवित रह सकती है। आहार विहार की अनियमितता और प्रकृति विरोधी आचरण में अपनी मौत बुलाई और असमय ही विदाई ली जाती है। शरीर की ठीक प्रकार से साज-सम्भाल रखी जा सके और उसके साथ तोड़-फोड़ की उच्छृंखलता न बरती जाये तो सामान्य स्तर के मनुष्य भी बिना किसी कठिनाई के लम्बे समय तक जीवित रह सकते हैं फिर उन लोगों का कहना ही क्या जो विशेष साधन-उपचारों की सहायता लेकर सामान्य लोगों की तुलना में कई गुनी आयु का उपभोग करते और प्रसन्नता भरा जीवन बिताते हैं।
अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन तथा जेरियाट्रिक्स सोसायटी के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. एडवर्ड बोर्ड के अनुसार मनुष्य इन सात भूलों से बचकर विश्वासपूर्वक शतायु बन सकता है-
(1) आहार सम्बन्धी मर्यादाओं का उल्लंघन (2) अत्याधिक या अत्यन्त परिश्रम (3) अस्त-व्यस्त दिनचर्या (4) नशेबाजी (5)काम वासना सम्बन्धी असंयम (6) अधिक मानसिक तनाव (7) स्वच्छता शुचिता की उपेक्षा।
डॉ. केनिथ रोंसले ने अनेक सूक्ष्म प्रयोगों के बाद प्रतिपादन यह किया कि यदि मनुष्य शरीर के कोशों में कोई गड़बड़ी न आये तो गुर्दे 200 वर्ष और हृदय 300 वर्ष तक जीवित रखे जा सकते हैं। इसके बाद इन्हें बदला भी जा सकता है। हृदय प्रत्यारोपण के प्रयोग तो बहुत ही सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त चमड़ी, फेफड़े और हड्डियों को तो क्रमशः 1000 वर्ष और 4000 वर्षों तक भी जीवित रखा जा सकता है।
भारतीय धर्म-ग्रन्थों में जीवेम् शरदः शतम्” ‘हम सौ वर्ष के आयुष्य का उपभोग करें’ की कामना की गई है। वह उस समय के संयमित और प्राकृतिक दिनचर्या को देखते हुए अत्युक्ति नहीं थी। सूत्र स्थान अध्याय 27 में आचार्य चरक ने मनुष्य की आयु में 36000 रात्रियाँ होने का उल्लेख किया है। यदि मनुष्य हंसी-खुशी, परिश्रम और सादगी का आचरण करें तो इतनी आयु का होना कोई कठिन बात नहीं है।
ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं जिनसे इस कथन की पुष्टि होती है। सन् 1750 में हेगरी का बोविन 172 वर्ष की आयु में मरा तब उसकी विधवा पत्नी 164 वर्ष की थी और सबसे बड़े बेटे की उम्र 115 वर्ष थी। वियना के सोलियन साबा 132 वर्ष की आयु के होकर मरे थे, उन्होंने 98 वर्ष की आयु में सातवीं शादी की थी।
‘नार्थ चाइना हैरल्ड’ में उत्तर चीन के शांगचूआन ग्राम के निवासी वानशियन जिच नामक वृद्ध की आयु के सम्बन्ध में अनेकों विश्वस्त प्रमाणों का संग्रह प्रकाशित करते हुए यह सिद्ध किया गया गया है कि वह 255 वर्ष तक जिया। उसका भोजन पूर्ण शाकाहारी था और दिन में दो बार ही जो कुछ खाना होता, खाता था।
लन्दन के सेंटू लियोवार्ड चर्च में रखे जन्म मृत्यु तिथि रजिस्टर में एक ऐसे व्यक्ति का नाम भी अंकित है, जिसका जन्म 1588 में हुआ था और मृत्यु 17695 में 207 वर्ष की आयु में। जब उसकी मृत्यु हुई उसके पूर्व उसके दीर्घ जीवन का रहस्य जानने के लिये लोग बड़ी संख्या में बराबर उससे संपर्क करते रहते थे।
आगस्ता माईने निवासी जॉन मिल्ले वृद्धावस्था में भी जवान रहे और मरते समय तक यौवन का आनन्द लूटते रहे। उनने 80 वर्ष की आयु में एक 18 वर्षीया युवती से विवाह किया। उससे उसे दस बच्चे हुए और 44 वर्ष तक सधवा रही। मिल्ले 124 वर्ष की उम्र में मरे। तब तक उनके सफेद बाल फिर से लौटकर काले हो गये थे।
इन उदाहरणों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि मनुष्य की प्रसुप्त क्षमताएँ असाधारण हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक पराक्रम द्वारा या संयोगवश जगने का अवसर मिले तो यही नगण्य सा शरीर ऐसे अद्भुत पराक्रम प्रस्तुत कर सकता है, जिसे देखते हुए सामान्यजनों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।
इतिहास साक्षी है कि व्यक्ति महापुरुष तभी बने हैं, जब उन्होंने धन को तिलाँजलि देकर दरिद्रता अपनायी है। -एमर्सन
तुम्हें तो सदैव सम्पत्ति के खोने की चिंता रहती है, सो मेरी भाँति तुम्हारे हास्य में गूँज कहाँ से आये? -अज्ञात
भूलोक का परिभ्रमण करने देवता स्वर्ग लोक से चले। उन्हें आशा थी कि धरती के निवासी उनका स्वागत करेंगे और कृतज्ञता व्यक्त करेंगे, पर देवताओं की ओर किसी ने आँख उठाकर भी नहीं देखा। अपेक्षित स्वागत कहीं नहीं मिला। वरदान देने की अपनी क्षमता पर उन्हें जो गर्व था वह टूट गया।
उन दिनों खेतों में अनाज के पौधे लहलहा रहे थे। बालें और कलियाँ निकल रही थीं। लोग उन्हें देखकर फूले नहीं समा रहे थे। चारों ओर बसन्ती मस्ती छाई हुई थी। सर्वत्र बसन्तोत्सव मनाने की तैयारियाँ चल रही थीं।
देवताओं का अनुमान था कि अभावग्रस्त मनुष्य उनकी अनुकम्पा पाने के लिये गिड़गिड़ायेंगे और न जाने क्या-क्या मांगेंगे। याचकों की मनोकामना पूर्ण करने से यश मिलता है, देवता यह भली-भाँति जानते थे। वरदान देने की क्षमता उनमें है ही। सो वे देने का आनन्द भी प्राप्त करना चाहते थे। पर उनकी यह कामना पूरी होती नहीं दिखाई पड़ी।
निराशा की स्थिति में जब देवता वापस लौटने लगे तो उन्होंने धरती से पूछा- “तुम्हारे पुत्र किस खुशी एवं उपलब्धि में इतने हर्ष-विभोर हो रहे हैं? अभावग्रस्त होते हुए भी वे हमसे कुछ माँगने क्यों नहीं आते?”
धरती ने देवताओं को पहचाना, उनका अभिवादन किया तथा नम्रता पूर्वक बोली- “इस लोक में भी एक देवता है, वह भी आपकी तरह ही सामर्थ्यवान है। मेरे पुत्र उसकी ही पूजा करते हैं। फलस्वरूप जो चाहते हैं, सो प्राप्ति कर लेते हैं। आजकल उसी की अनुकम्पा सर्वत्र बरस रही है। इसलिये सबका ध्यान उसी के स्वागत में लगा हुआ है। आप लोग कुसमय भूलोक पर पधारे। दूसरे दिनों आते तो सम्भव है आपकी पूजा-अर्चना भी होती।”
देवता आश्चर्यचकित रह गये। मन ही मन सोचने लगे कि सभी देवता तो स्वर्ग लोक में निवास करते हैं। भला ऐसा कौन-सा देवता है जो भूलोक में रहता तथा हमसे भी अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहा था। असमंजस को दूर करने के लिये उन्होंने पूछा- “भला इस मनुष्य लोक में भी कोई देवता बसता है? और वह हम लोगों की तरह ही सामर्थ्यवान है? ऐसा हमें अब तक मालूम न था। यदि ऐसा है तो हमें उसका नाम बताओ, स्थान दिखाओ।”
धरती मुस्कराई। खेत में कार्य कर रहे एक मनुष्य को बुलाया और उसकी हथेली दिखाते हुए बोली- “वह देवता यहाँ रहता है, खेत-खेत में उसी की विभूति बिखरी पड़ी है। मेरे सभी पुत्रों का भरण-पोषण उसी के द्वारा होता है। श्री और समृद्धि, प्रगति एवं समुन्नति सभी कुछ उससे मिलता है।”
गुत्थी सुलझने के स्थान पर और भी उलझ गई। असमंजस घटने के बजाय बढ़ गया। हथेली में रहने वाला, न दीखने वाला तथा इतनी विभूतियों का अधिपति भला कौन देवता होगा? स्वर्ग के देवताओं के लिये यह एक विचित्र पहेली थी। सुलझा ना पाने की स्थिति में पूछ ही पड़े- “देवी! जरा अपनी बात और स्पष्ट करो। उस देवता का सही नाम और रूप तो बताओ।”
स्वाभिमान से धरती की छाती तन गयी, बोली- “वह देवता है- श्रम”। मेरे पुत्रों ने उसी की उपासना आराधना करने की ठानी है। वे आज नहीं तो कल इस लोक में स्वर्ग की रचना अवश्य कर लेंगे। खेतों में हरियाली के रूप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। उसी का अनुदान- वरदान पाकर धरती पुत्र कृतकृत्य हो रहे हैं। जब तक उसकी अर्चना होती रहेगी भूलोक पर वैभव की कमी न पड़ेगी।”
“श्रम की प्रतिष्ठापना तथा आराधना जहाँ भी होगी वहाँ किसी प्रकार की कमी कभी भी नहीं हो सकती। ऐसी कमी जिसकी पूर्ति के लिये देवताओं को कष्ट सहना पड़े।” देवतागण इस तथ्य से परिचित हुए, वस्तुस्थिति को जाना और अपनी निरुपयोगिता को समझा। मनुष्य ने उपेक्षा क्यों की, यह रहस्य उन्हें विदित हुआ। जैसे आये थे वैसे ही वापस वे स्वर्ग लोक को चले गये।
प्रकाश क्या है? देखने में उसे सफेद चमक भर कहा जाता है, पर विश्लेषण करने पर उसके अन्तराल में कुछ विशिष्ट शक्तिधाराओं का समुच्चय पाया जाता है। इन्हें रंग कहते हैं। सूर्य किरणों में सात रंग हैं इसलिये सविता देवता को सात अश्वों के रथ में सवार होकर परिभ्रमण करते हुए निश्चित किया गया है। किरणों का विश्लेषण करने या उन्हें सात विशेषताओं से युक्त- सात रंगों के रूप में देखा गया है।
इन रंगों की अपनी-अपनी विशेषता है। उन सबके पृथक-पृथक प्रभाव शरीर और मन पर पड़ते हैं। इसलिये उनका उपयोग इसी प्रकार करने के लिये परामर्श दिया जाता है जैसे कि भोजन से आवश्यक तत्वों का समन्वय रखने का प्रतिपादन किया जाता है।
मनुष्य जीवन की एक अविज्ञात आवश्यकता प्रकाश की है। प्रकाश के साथ गर्मी भी जुड़ी होती है। दोनों के समन्वय से विस्तार एवं हलचल का लाभ मिलता है। इसके अभाव में जड़ता छाने लगेगी और विकास विस्तार का क्रम अवरुद्ध हो जायेगा। अपने सौर मण्डल को ही लें। अधिक दूरवर्ती नेपच्यून, प्लेटो, यूरीनस ग्रह और उनके उपग्रह सूर्य प्रकाश का वैसा लाभ नहीं पाते जैसा कि समीपवर्ती पृथ्वी आदि को मिलता है। यही कारण है कि उन दूरवर्ती ग्रहों में ठण्डक की चरम सीमा है। वहाँ न जीवन है न वनस्पति। गति भी उनकी धीमी है। दिन में प्राणियों और वनस्पतियों को गतिशील रहते तथा विकसित होते देखा जाता है जबकि रात्रि के अन्धेरे में सर्वत्र सन्नाटा छाया रहता है। और प्रगति के हर क्षेत्र में विराम जैसा लग जाता है।
धरती पर जीवन का अवतरण स्थानीय रासायनिक सम्पदा के साथ सूर्य ऊर्जा का सम्मिश्रण होने पर ही सम्भव हुआ है। यदि यह सुयोग न बना होता तो फिर नेपच्यून प्लेटो ग्रहों की तरह धरती भी शून्य तापमान से नीचे की स्थिति में रहकर निर्जीव स्थिति में दिन गुजार रही होती। सूर्य को जीवन कहा गया है। पुराणों में आदित्य का पति के और पृथ्वी का पत्नी के रूप में वर्णन हुआ है और प्राणियों की उत्पत्ति उन्हीं दोनों के सुयोग से सम्भव हुई बताई गई है। वैदिक प्रतिपादन में सूर्य ही इस जगत की आत्मा है।
सूर्य किरणें सात रंग के रूप में धरती पर उतरती हैं। उन सभी की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। जो पदार्थ जिन किरणों को अधिक मात्रा में ग्रहण करता है वह उसी रंग का दृष्टिगोचर होने लगता है। यह हमारी आंखों की कमी है जिसके कारण प्रकाश केवल सफेद ही दिखता है। वस्तुतः उसमें सात रंगों का सम्मिश्रण है। जिसे इन्द्रधनुष के रूप में किरणों पर जल-कण चमकते समय देखा जा सकता है। विशेष प्रकार के काँच पर भी यह रंग प्रतिबिम्बित होते हैं।
सूर्य किरणों के माध्यम से धरती पर आने वाले सप्त रंगों को सप्त अश्व कहा गया है और उस रथ पर सवार होकर उनके परिभ्रमण का वर्णन किया गया है। हर रंग की अपनी-अपनी विशेषता है। वस्तुओं के गुण धर्मों में इसी आधार पर भिन्नता पाई जाती है।
मानवी शरीर पर भी इन रंगों की मात्रा न्यूनाधिक हो जाने से स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार आवश्यक रासायनिक पदार्थ कम होने पर कई प्रकार के रोग एवं असन्तुलन उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार प्रकाश रंगों की उपयुक्त मात्रा में कारण वश कमीवेशी हो जाने पर भी स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है। अतएव जहाँ चिकित्सा उपचार में वनस्पतियों, क्षारों तथा खनिजों का उपयोग करके तद् विषयक घट-बढ़ को ठीक किया जाता है उसी प्रकार विज्ञजन रंगों की न्यूनाधिकता हो जाने के सम्बन्ध में भी जाँच पड़ता है और उस क्षति पूर्ति के लिये किये गये प्रयत्नों को रंग चिकित्सा का नाम देते हैं।
रंगीन वस्तुएँ प्रायः उन्हीं रंगों की किरणें अपने में ग्रहण एवं धारण करती हैं जिसकी वे स्वयं होती हैं। इस प्रकार रंगे हुए कपड़े कपड़े या पदार्थ न केवल नेत्रों को आकर्षक प्रतीत होती है वरन् अपने स्तर की विशेषताओं से भरे रहने के कारण जहाँ रहते हैं या जिनके प्रयोग में आते हैं उन्हें प्रभावित करते हैं। गन्धों की तरह रंगों का भी अपना प्रभाव है। फिनायल, किरासिना, सड़न, इत्र, पुष्प आदि की भली-बुरी गंध मनुष्य पर अपने-अपने ढंग से प्रभाव डालती है इसलिये उनसे बचने या समीप रखने का प्रयत्न किया जाता है। यही बात रंगों के सम्बन्ध में भी समझी जानी चाहिये। विशेष शारीरिक मानसिक स्थिति में विशेष रंगों से दूर रहने या समीप रखने का परामर्श इसी आधार पर दिया जाता है।
ठण्ड जनित रोगों में लाल रंग का उपयोग करने से ऊष्मा बढ़ती है। रक्त विकार एवं चर्म रोगों में भी इसका उपयोग किया जाता है। रक्त की कमी, उदासी, निराशा की मनःस्थिति में भी लाल रंग के कपड़े पहनने तथा उसमें रंगी वस्तुओं को संपर्क में रखने से लाभ होता है। उस रंग के गिलास में पानी पीने की भी उपयोगिता बताई जाती है। गठिया, लकवा, सूजन दर्द में भी उसका उपचार प्रयोग होता है।
पीला रंग पाचक माना गया है। पेट के अपच या अन्य अवयवों की परिपाक प्रक्रिया शिथिल हो जाने पर उसका उपयोग हितकर होता है। फलों में से अधिकाँश पीले होते हैं। आम, नींबू, पपीता, बेर, लुकाट, मकोय में अन्य गुणों के अतिरिक्त पाचन में सहायता करने की भी विशेषता है। बलगम, बुखार, खुजली आदि रोगों में जमी हुई विकृतियाँ प्रधान कारण होती हैं। उन्हें निकाल बाहर करने में पीला लाभदायक माना गया है।
नीला रंग शीतल है उसे गर्मी शान्त करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। शिर दर्द, नेत्र रोग, जलन, अनिद्रा रक्तचाप, उत्तेजना, जैसे रोगों को उष्णता प्रधान माना जाता है। इसलिए उनकी निवृत्ति के लिए नीला रंग उपयुक्त समझा गया है। लू लगने, फोड़ा-फुन्सी उठने, जहरीले कीड़ों के काट लेने पर इस रंगा का कपड़ा पानी में भिगोकर पीड़ित अंग पर रखने से ठण्डक की अनुभूति होती है। सूखी खाँसी, श्वास में भी उस रंग के उपयोग से राहत मिलती है।
प्रमुख रंग तीन ही हैं लाल, पीला, नीला। इन्हीं के सम्मिश्रण से अनेक रंग बनते हैं। पीले और नीले के सम्मिश्रण से हरा-पीले और लाल के मिलने से नारंगी। नीले और लाल के मिलने से कत्थई रंग बनते हैं। इस मिश्रण में उनकी मात्राएं न्यूनाधिक होने से भी रंग बदलते हैं। उसी आधार पर उनके गुणों का भी मिश्रण होता है और तद्नुरूप प्रभाव परिणाम में भी अन्तर आता है।
किस रंग की शरीर में कमी है इसका अनुमान इस आधार पर भी लगाया जाता है कि व्यक्ति की पसन्दगी किस रंग की ओर अधिक आकर्षित होती है। खान-पान के सम्बन्ध में देखा गया है कि जिन रासायनिक पदार्थों की शरीर में कमी पड़ती है उन्हें खाने के लिए मन विशेष रूप से चलता है। इच्छित वस्तु पाने पर इन्हें तृप्ति ही नहीं मिलती, आवश्यकता की पूर्ति होने पर रोग से निवृत्ति भी मिलती है। इसी प्रकार रंगों के सम्बन्ध में भी है। कौन किसे पसन्द करता है इस रुचि भिन्नता को देखकर भी अनुमान लगाया जाता है कि किसे किस तत्व की आवश्यकता पड़ रही है।
गुणों को बढ़ाने के सम्बन्ध में भी रंगों की उपयोगिता है। पीला सात्विक, नीला राजसिक और लाल तामसिक माना जाता है। प्रकृति की परख और गुणों की वृद्धि के लिए भी रंगीन वस्त्रों तथा उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, साधु प्रकृति के धर्म परायण लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं। भगवान राम एवं कृष्ण का वर्ण नील कमल जैसा माना गया है। आकाश एवं समुद्र का रंग भी नीला है उन्हें वैभव एवं वर्चस्व का प्रतीक मानते हैं। रक्तपात में खून खच्चर लाल रंग का होता है। आग लाल रंग की होती है। क्रोध में आंखें लाल हो जाती हैं। इनमें तमोगुण का दर्शन होता है। इन रंगों के उपयोग से उपरोक्त गुण स्वभाव घटाये या बढ़ाये भर जा सकते हैं।
समर्थ होते हुए भी मनुष्य सर्व समर्थ नहीं हैं। उसकी भी अपनी सीमा है। मूलतः पूर्ण होते हुए भी उस पूर्णता को व्यक्त कर पाना उसके लिए अति कठिन पड़ता है। सर्व समर्थ बनने तथा तथा पूर्णता प्राप्त करने में सबसे बड़ा अवरोध- सबसे बड़ा असमंजस उसके एकाँगी जीवन का होता है। उस नियामक सत्ता से विलगाव बने रहने- उससे जुड़े न होने से मनुष्य की शक्ति सीमित ही बनी रहती है। फलतः वह साधना मार्ग के कष्टकर पथ पर अपने को असहाय महसूस करता है। उसके विचलित होने की प्रबल सम्भावना रहती है। उसे सत्ता का अवलम्बन मिल जाये- उससे अपना आपा जुड़ जाये तो वह असमंजस दूर हो जाता है जिससे भटकाव की सम्भावना रहती है।
योग का शाब्दिक अर्थ होता है- जोड़ना। आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा के परमात्मा से जुड़ने को योग कहते हैं। यों तो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग की तीन विभिन्न धाराएँ जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बतायी गयी हैं, पर उस सत्ता से तारतम्य सही अर्थों में भक्ति का अवलम्बन किये बिना नहीं बन पाता तथा योग का- जुड़ने का उपक्रम भी पूरा नहीं हो पाता। कर्मयोग एवं ज्ञानयोग की शुष्कता, नीरसता भक्तियोग से पूरी होती है। साधना मार्ग का एक सबसे बड़ा अवरोध अहम् को माना गया है। कर्मयोग- ज्ञानयोग की साधनाओं में प्रायः साधक अपने अहम् को विगलित नहीं कर पाते। सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, अहंब्रह्मास्मि आदि की सच्ची अनुभूति विराट् से जुड़कर ही हो पाती है। उस अनुभूति में अपना शुद्र अहम्, विराट् का एक क्षुद्र घटक मात्र दिखायी पड़ता है। पर इन अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए पूर्ण समर्पण का होना आवश्यक है, जो भक्ति योग के बिना पूरा नहीं हो पाता। समर्पण न होने पर सोऽहम् का तत्व दर्शन साधक के अहम् को ही उत्प्रेरित करता है। अन्तःकरण के अनुभूति प्रधान धरातल को स्पर्श नहीं कर पाता। यही है वह तात्विक एवं मनोवैज्ञानिक व्यतिरेक जिसके कारण साधनाएँ बहुधा असफल होती देखी जाती हैं। इसी कारण आर्ष ग्रन्थों में भक्तियोग की भूरि-भूरि महिमा प्रतिपादित की जाती रही है। साधना मार्ग के भटकावों से बचने की दृष्टि से ही नहीं उस परम शक्ति का सहयोग, सामर्थ्य एवं अनुदान प्राप्त करने की दृष्टि से भी भक्ति का सम्बल साधन के लिए आवश्यक है।
विश्व के सभी धर्मों ने भक्ति की महत्ता को विभिन्न रूपों में स्वीकारा अपनाया है। प्रार्थना, स्तुति, स्तवन, जप आदि माध्यमों से साधक अपनी श्रद्धा को परिपुष्ट करते तथा समर्पण भाव को सुदृढ़ बनाते हैं। श्रद्धा ही पोषित- अभिवर्धित होकर ईश्वरीय सत्ता से तारतम्य जोड़ती- उसे द्रवीभूत होने तथा परस्पर दिव्य आदान-प्रदानों के लिए विवश करती है।
सन्त ‘मदर टेरेसा’ का कहना है- “प्रार्थना अपने सबसे विश्वस्त, सर्व समर्थ तथा सबसे आत्मीय सत्ता से जुड़ने की एक सरल किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली, आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो क्रिया में सामान्य होते हुए भी प्रतिक्रिया की दृष्टि से असामान्य है। पवित्र भावों से का गयी प्रार्थना असम्भव को भी सम्भव कर सकने में सक्षम है।”
महात्मा गाँधी कहते थे कि “प्रार्थना के बिना धर्म का कोई स्वरूप नहीं बनता। वह याचना की नहीं समर्पण की एक ऐसी महान प्रक्रिया है जो साधक के व्यक्तित्व को अगणित विभूतियों से सुसम्पन्न बना देती है।”
साधु सुन्दरसिंह कहते हैं- “साधना का लक्ष्य प्रार्थना के बिना कभी पूरा नहीं हो सकता। साधक के लिए प्रार्थना का उतना ही महत्व है जितना मनुष्य का साँस लेना। आत्मा की परमात्मा से मिलने की तीर्थयात्रा में प्रार्थना एक निरापद, पर समर्थ वाहन है।”
मनःशास्त्री विलियम जेम्स लिखते हैं- “प्रार्थना चेतन से अचेतन भावनाओं में बहने की एक ऐसी क्रिया है जिसमें मानसिक परिशोधन का प्रयोजन अपने आप पूरा होता चलता है। यह मस्तिष्कीय विचारों का एक स्फोट है जो अदृश्य सत्ता से संपर्क साधने का काम करता है।”
प्रार्थना अनुनय-विनय की प्रक्रिया नहीं है। आत्मशोधन तथा सद्गुण सम्वर्धन के लिए दुहरा प्रयास इसमें करना पड़ता है, जिसमें भक्त इष्ट के समक्ष अपने दोषों को प्रकट करना- उससे शक्ति माँगता है ताकि उन्हें दूर करने का सत्साहस उत्पन्न हो सके। सच्चे हृदय से जो प्रार्थना करता है, उसे दैवी शक्तियों का सहयोग मिलता है। ऋग्वेद की एक ऋचा में उल्लेख है- “अपने दोषों को जो सच्चे मन से स्वीकार करता तथा प्रायश्चित के लिए तैयार रहता है, उसके ऊपर वरुण देव कृपा करते हैं।
प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय में किसी न किसी रूप में प्रार्थना प्रचलित है। सेन्ट्रल अफ्रीका के बौने आदिवासी भगवान की प्रार्थना करते समय कहते हैं- “हे ईश्वर तुझे धन्यवाद। तुमने हमें पशु दिए, मधु दिया, सोम समान अमृत दिया।”
नवाज वस्तुतः प्रार्थना का ही एक रूप है जिसे हर मुस्लिम के लिए आवश्यक माना गया है। कुरान के अनुसार दिन में तीन बार- प्रातः दोपहर तथा सायं को नवाज पढ़ने के लिए निर्देश है। जिसमें ‘अल्लाह श्रेष्ठ है’ की प्रार्थना की जाती है, नेकी की राह पर चलने हेतु शक्ति माँगी जाती है।
इस्लाम धर्म की नींव मुहम्मद साहब ने 700 ए.डी. में रखी। इस्लाम अरबी का एक बहु प्रचलित शब्द है जिसका अर्थ होता है- ‘समर्पण’। उस अर्थ के अनुसार जिसमें खुदा के प्रति समर्पण की भावना है वही मुसलमान है। कुरान की मूल नींव ही भक्तियोग की साधना पर आधारित है। कुरान के अनुसार सच्चे दिल से पुकारने पर सर्वत्र मौजूद अल्लाह इंसान की मदद के लिए प्रकट होता है- और सही मार्ग दिखाता है।
क्रिश्चियन धर्म के अनुयायिओं को हर रविवार को चर्च में जाकर सामूहिक प्रार्थना में भाग लेना पड़ता है। ईसाई “ओ लार्ड! कम लार्ड! हैव मरसी,” जैसे प्रार्थना युक्त शब्दों में अपने उद्गार प्रकट करते हैं। जीसस ने अपने शिष्यों को ईश्वर की प्रार्थना करने का सन्देश इन शब्दों में दिया था- “अपने कमरे में चले जाओ और दरवाजे बन्द कर लो और तब अपने गुप्त पिता की पूरी भावना से प्रार्थना करो” मैथ्यू. 6, 6 आशय यही था कि अन्तर्मुखी होकर गहराई में जाकर प्रार्थना का अभ्यास किया जाय।
जापान का प्रसिद्ध धर्म है- शिष्टो ‘शिष्टो’ शब्द का अर्थ है- “दी वे ऑफ क्रामी”- अर्थात् ‘श्रेष्ठता पवित्रता’। देवताओं की यही विशेषता व उन तक पहुँचने का मार्ग प्रार्थना है। इस धर्म का इतिहास 712 ए. डी. तथा 420 ए.डी. में लिखी गयी दो पुस्तकों में- “रिकार्डस् ऑफ एन्सि एण्टमैटर्स” तथा “क्रॉनिकल्स ऑफ जापान” में मिलता है। अन्य कोई ग्रन्थ शिष्टो धर्म का नहीं मिलता। प्रार्थना ही साधना की उनकी एक मात्र प्रणाली है। शिष्टो धर्म की मान्यता है कि देवता अदृश्य अशरीर धारी दिव्य शक्तियाँ हैं, जो सच्ची प्रार्थना का प्रत्युत्तर भी दिया करती हैं। शिष्टो धर्म का कथन है- “मैन इज कामीज चाइल्ड” अर्थात् मनुष्य देवताओं का पुत्र है। अतः मूलतः उसकी प्रकृति भी देवताओं जैसी है। गन्दगी के आवरण के कारण मनुष्य का मूल पवित्र स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। पर यदि मनुष्य मन से प्रार्थना करे तो उस आवरण को हटा सकता है तथा अपनी पवित्र स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इस कार्य में पुकारने पर देव शक्तियाँ सहयोग भी देती हैं।”
अनुभव सिद्ध है कि वह करुणामयी सत्ता पुकारने पर कभी स्नेहमयी माँ बनकर, कभी पिता के रूप में, कभी सखा बनकर अपनी अदृश्य सहायता पहुँचाती है। पौराणिक उपाख्यानों से लेकर ऐतिहासिक घटनाक्रमों में असंख्यों उदाहरण मौजूद हैं जो इस सत्य की पुष्टि करते हैं। उस सत्ता से सचमुच ही संपर्क जुड़ जाय तो वह सब कुछ प्राप्त कर सकना सम्भव है जिनसे ईश्वरीय सुसत्ता ओत-प्रोत है। भक्तियोग की समर्पण साधना इसी महती प्रयोजन की पूर्ति करती है।
डा. व्हिक्टर ई. फ्रेन्कल अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मनः चिकित्सक हैं। वे वियेना विश्वविद्यालय में चिकित्सा विभाग में मानसिक रोगों के प्राध्यापक हैं। मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में विशेष अध्ययन, लम्बे अनुभव एवं रोगियों पर किये गये शोध कार्य के उपरान्त उन्होंने जो महत्वपूर्ण तथ्य बताये, वे ध्यान देने योग्य हैं। अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘दी डाक्टर एण्ड दी सोल’ में वे लिखते हैं कि “रोगी की दवा देने एवं रोगों के निवारण के असंख्यों प्रकार की दवाओं के निर्माण की अपेक्षा आवश्यकता इस बात की है कि जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों को समझा जाय- महत्व एवं लक्ष्य को बताया जाय- आदर्शों एवं सिद्धान्तों को उपयोगिता से अवगत कराया जाय। रोगी का स्थायी इलाज कर सकना तभी सम्भव है।”
वे आगे लिखते हैं कि “अनास्था की विकृतियों के निवारण में मनोवैज्ञानिकों की पहुँच नहीं है। इसके लिए आस्था सम्पन्न, आध्यात्मिकता के साकार स्वरूप, धर्म को जीवन में धारण करने वाले पुरोहितों की आवश्यकता है। अन्तः मर्मस्थल तक पहुँचकर अनास्था की जड़ें उखाड़ सकना तो आस्थावान चिकित्सकों द्वारा ही सम्भव है।”
पश्चिमी जगत का उदाहरण देते हुए फिर कहते हैं कि “यहाँ का मनुष्य ऐसी बहुत-सी समस्याओं को जो उसे धार्मिक पुरोहित के समक्ष रखना चाहिए, न रखकर, डाक्टर के पास रखता है। फलस्वरूप डाक्टर अन्तः के मूल कारणों से अनभिज्ञ होने के कारण निदान नहीं कर पाता। शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर दिया गया समाधान उपयोगी नहीं सिद्ध हो पाता।” चिकित्सकों एवं मनोवैज्ञानिकों के समक्ष इस प्रकार अब आस्था का एक नवीन आयाम आ खड़ा हुआ है, जिसका निदान इनके पास नहीं हैं।
आस्था की विकृतियों का निष्कासन एवं आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति निष्ठा उत्पन्न कर सकना शरीर शास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों द्वारा नहीं आत्मिक क्षेत्र में पहुँचा हुआ व्यक्ति ही कर सकता है। डा. फ्रैंकल के अनुसार “श्रेष्ठताओं, आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा न होना ही वस्तुतः सभी समस्याओं एवं विविध प्रकार के मनोविक्षोभों का कारण है। इसके लिए आवश्यकता इसकी है कि मानव जीवन के महत्व एवं उसके लक्ष्य से मनुष्य को अवगत कराया जाय।”
डा. फ्रेंकल का कहना है कि “आज मनोवैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली में जीवन मूल्यों से सम्बन्धित प्रश्नों का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि इन प्रश्नों को भी वह मनःक्षेत्र में समाहित मानता है। इस प्रकार मानसिक चिकित्सक आध्यात्मिक मूल्यों की उपेक्षा करके महत्वपूर्ण आधार को छोड़ बैठता है”
जिस सीमा तक मनोवैज्ञानिक इलाज सफल होते हैं उनके कारण भी आध्यात्मिक तत्व ही होते हैं। मनो चिकित्सक रोगी के मन की दबी परतों को उधेड़ता, विश्लेषण करता, तत्पश्चात् निदान बतलाता है? ये निदान वस्तुतः आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर ही अवलम्बित होते हैं। उनको निकाल दिया जाय तो मानसिक चिकित्सा प्रणाली सफल नहीं हो सकेगी। इस दृष्टि से डा. फ्रेंकल ने मनःचिकित्सकों को न केवल चिकित्सा प्रणाली वरन् अपने जीवन क्षेत्र में भी आध्यात्मिक सिद्धान्तों को अपनाने की प्रेरणा दी है। समुचित एवं स्थायी निदान वही चिकित्सक कर सकता है जिसने जीवन के महत्व एवं उद्देश्य को समझ लिया हो? चिकित्सक को मन ही नहीं आत्मा को केन्द्र बिन्दु मानकर चिकित्सा आरम्भ करना चाहिए।
आज मनुष्यों में अधिकाँश की चिन्तन प्रणाली निषेधात्मक है। मनोविकारों का बाहुल्य उनके चिन्तन में देखा जा सकता है। फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति अर्धविक्षिप्त बना किसी प्रकार अपने जीवन के दिन पूरे कर रहा है। मानसिक व्याधियों की इतनी बहुलता पहले कभी नहीं देखी गई थी। निस्संदेह असन्तुलित मनःस्थिति समस्त आधि-व्याधियों की जननी है।
विकारों से युक्त मन अनेकों प्रकार की मानसिक बीमारियों को जन्म देता है। इसका उल्लेख न भी किया जाय, तो भी मन का प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर क्या पड़ता है? इसका अध्ययन किया जाय तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आयेंगे।
इस संदर्भ में ‘जर्मन’ के कुछ वैज्ञानिकों के शोध का उल्लेख करना उपयुक्त होगा। उन्होंने संसार के प्रमुख व्यवसाइयों एवं महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मृत्यु के कारणों का पता लगाया। जो परिणाम सामने आये वे चौका देने वाले हैं। आंकड़ों के अनुसार उन प्रमुख व्यक्तियों में अधिकाँश की मृत्यु स्नायु-रोगों के कारण हुई। मानसिक तनाव के कारण- ‘वेगस नर्व’ की क्रियाशीलता बढ़ जाने से हृदय की गति कम हो जाती है। ‘वेगसनर्व’ पैरासिम्पैथैटिक सिस्टम का एक भाग है, जो हृदय की गति को प्रभावित करती है।
उक्त वैज्ञानिकों के अनुसार क्रोधित अवस्था में शरीर में गुर्दे के ऊपर अवस्थित ‘एड्रीनल’ ग्रन्थि से एड्रीनेलीन नामक अंतःस्राव होता है जो हृदय की गति को सिम्पैथेटिक प्रक्रिया को बढ़ा देता है। गति अधिक बढ़ जाने से मृत्यु तक हो सकती है। मानसिक उद्वेगों का शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किए गये एक सर्वेक्षण के अनुसार एक महत्वपूर्ण तथ्य और भी प्रकट हुआ कि तनाव की स्थिति में काम करने वाले तथा घृणा, भय, क्रोध आदि मानसिक आवेगों के मध्य रहने वाले लोग नाड़ी- मण्डलीय, अजीर्ण, पेट की एसिडिटी आदि रोगों से ग्रस्त होते हैं। तनाव से ‘इरीटेवल कोलोन सिन्ड्रोम’ एवं ‘इसोफोजियलस्पेज्म’ नामक रोग उत्पन्न होते हैं। पाश्चात्य देशों में तनाव की स्थिति अधिक है इस कारण बड़ी आँत की बीमारी जिसे ‘अल्सरेटिव कोलाइटाएज’ कहते हैं, बढ़ती जा रही है। इसमें रोगी को रक्त से युक्त दस्त बारम्बार होने लगते हैं। “प्रोक्टेल्जिया फ्यूगैक्स” नामक रोग भी मानसिक उद्वेगों के कारण उत्पन्न होता है। गुदा में जोरों का दर्द होना इसका प्रमुख लक्षण है।
न केवल मानसिक बिमारियों वरन् अधिकाँश शारीरिक रोगों का कारण मन की विकृतियाँ हैं। शरीर के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े होने तथा नियन्त्रण करने के कारण मन की विचारणा उसमें से उठने वाले क्रोध, ईर्ष्या के आवेगों का प्रभाव शरीर के विभिन्न संस्थानों पर पड़ता है। फलस्वरूप शरीर के सूक्ष्म संस्थान, जिन पर शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर रहता है, सही प्रकार से कार्य नहीं कर पाते। संसार में बढ़ते हुए अनेक प्रकार के रोग इस बात के प्रमाण हैं कि मानसिक दृष्टि से मनुष्य अब असन्तुलित होता जा रहा है।
इस दयनीय स्थिति से मानव जाति को उबारने के लिए उन उपचारों को ही अपनाना होगा जो मन को शांति प्रदान करते हों, सन्तुलित रखते हों। शारीरिक रोगों के निवारण के लिए अस्थायी किए जाने वाले निदानों की अपेक्षा उन आधारों को ढूँढ़ना होगा जो स्थायी समाधान स्तुत करते हों। यह उपचार प्रणाली शारीरिक स्तर पर नहीं, मानसिक स्तर पर ही विकसित करनी होगी।
शारीरिक स्वास्थ्य का केन्द्र बिन्दु मन की उपेक्षा से ही असन्तुलन की स्थिति में पहुँचता है। होना यह चाहिए था कि मानसिक शोधन एवं मन के विकास के लिए चिकित्सा जगत में प्रयत्न चलते। जबकि इसकी अवहेलना हुई। शरीर स्तर पर ही वैज्ञानिक शोध की प्रक्रिया चलती रही। उसे सँवारने, स्वस्थ रखने के सारे सरंजाम खड़े किये गये। इस प्रक्रिया में भूल यह हुई कि स्वास्थ्य एवं विकास की जड़ें सींचने के संदर्भ में मन की जड़ें सींचने की उपेक्षा हुई। पत्तों (शरीर) को सींचने, निरोग रखने का प्रयास हुआ। फलस्वरूप असफलता हाथ लगी। इन प्रयत्नों में जितने रोगों के उपचार हुए, उनसे कई गुना अधिक नये रोग उठ खड़े हुए।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड के अनुसार “मनुष्य को शारीरिक समस्याओं का बोध रहता है। जबकि उनका केन्द्र बिन्दु मन है। यदि किसी प्रकार उसे बोध करा दिया जाय कि समस्याओं, विकारों की जड़ मन में है न कि तन में और मन से यह भ्रान्ति निकाल दी जाय कि वस्तुतः कोई समस्या नहीं है, तो शारीरिक समस्याओं, रोगों आदि से अपने आप छुटकारा पाया जा सकता है।”
मनोविज्ञान का क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ता जा रहा है। इस तथ्य को स्वीकार किया जा रहा है कि मानसिक स्वास्थ्य पर शरीर का सन्तुलन बना रह सकता है। आज के मूर्धन्य चिकित्सक भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि रोगों में 80 प्रतिशत रोग मनौदेहिक हैं। फलस्वरूप रोगों से मुक्ति पाने का जो आवेश चिकित्सा जगत में दवाओं के माध्यम से चला था, वह कम होता रहा है। चिकित्सक अब वह प्रणाली ढूँढ़ने में तत्पर हैं, जो मन को स्वस्थ एवं सन्तुलित रखती है।
अमेरिका के ‘केन्सास’ नगर में ‘मेन्निन्जर फाउण्डेशन’ नामक संस्था है। उक्त संस्था के संचालक डा. इल्मरेग्रीन अपनी पत्नी सहित पिछले 17 वर्षों से ऐसी उपचार पद्धति को ढूँढ़ने में संलग्न हैं, जो रोगी के मन को सुदृढ़, स्वस्थ बनाती हो। उन्होंने अपने ‘बायोफिड बैक’ सम्बन्धित शोध में प्रायः सुप्त आरोनामिक नर्वस सिस्टम के कार्यों में ‘बायोफिडबैक’ मशीन के प्रयोग से चेतन पर नियन्त्रण प्राप्त करने की विधि खोज निकाली। अब तो यह विधि बड़े पैमाने पर पाश्चात्य जगत में प्रयुक्त की जा रही है।
गिरते हुए स्वास्थ्य की समस्या औषधि उपचार से काबू में नहीं आ रही है। बढ़ते हुए मानसिक रोगों के लिए अनिद्रा और तनाव पर नियन्त्रण करने के प्रयास में मनःशास्त्री सफल नहीं हो पा रहे हैं। सच्ची स्वास्थ्य रक्षा का एक ही उपाय है कि अनास्था के निबिड़ दलदल में फँसी हुई मनुष्यता को उठाया जाय और उसे स्नेह सदाचार, सहयोग की रीति-नीति अपनाने के लिए सहमत किया जाय। आरोग्य और सन्तोष इसी आधार के अवलम्बन में सम्भव हो सकेगा।
एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोंपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ से आतिथ्य मिला तो जान बची।
चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा- हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुक नगर का चन्दन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा आनन्दमय बीतेगा।
वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चन्दन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।
धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अन्तिम पेड़ बचा। वर्षा के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा- यह चन्दन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान् है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।
वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चन्दन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा- “मित्र! पछताओ मत, यह सारी दुनिया तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी मोल में गंवाते रहते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी कोई मनुष्य अन्त में सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।”
गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में एक शंका अक्सर उठाई जाती है कि उसके कई रूप हैं। कई लोग भिन्न-भिन्न ढंग से उसका उच्चारण करते या लिखते हैं। वस्तुतः शुद्ध रूप क्या है? इस सम्बन्ध में सारे ग्रन्थों का अध्ययन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री में आठ-आठ अक्षर के तीन चरण एवं चौबीस अक्षर हैं। भूः, भुवः, स्वः के तीन बीज मन्त्र- ओजस् तेजस् और वर्चस् को उभारने के लिए अतिरिक्त रूप से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक वेद मन्त्र के आरम्भ में एक ॐ लगाया जाता है। जैसे किसी व्यक्ति के नाम से पूर्व सम्मान सूचक ‘श्री’ मिस्टर, पण्डित, महामना आदि सम्बोधन जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार ॐकार- तीन व्याहृति और तीन पाद समेत पूरा और सही गायत्री मन्त्र इस प्रकार लिखा जा सकता है- “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।” कई व्यक्ति इसी घटाने-बढ़ाने में अपनी-अपनी तिकड़म भिड़ाते देखे जाते हैं। कोई तीन ॐ- कोई पाँच ॐ लगाने की बात कहते हैं। कोई-कोई हर चरण के साथ एक ॐ जोड़ते हैं। कोई ब्राह्मणों की- क्षत्रियों की- वैश्यों की अलग-अलग गायत्री बताते हैं। यह अपनी-अपनी मनगढ़न्त है। वस्तुतः गायत्री का शुद्ध स्वरूप उतना ही है जितना कि ऊपर बताया गया। आर्ष ग्रन्थों में कहीं-कहीं तीन या सात व्याहृतियों के प्रयोग की, बीज मन्त्रों को भी साथ जोड़ने की चर्चा है। यह अपने-अपने विशेष प्रयोग उपचार हैं। शुद्ध गायत्री मात्र उतनी ही है जिसका उल्लेख किया गया।
वेदों में अनेकों मन्त्र हैं, फिर गायत्री को ही प्रमुखता क्यों दी गयी? इस पर विचार करने पर मत यही बनता है कि इस मन्त्र की अपनी विशेष गरिमा है। इसका उल्लेख वेदों में स्थान-स्थान पर हुआ है तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थों में भी माहात्म्य सहित प्रमुखता दी गयी है। देव संस्कृति के दो प्रतीकों- शिखा और सूत्र (यज्ञोपवीत) को भी गायत्री का ही बहिरंग पर आरोपित स्वरूप माना जा सकता है। एक को सिर पर धर्म ध्वजा के रूप में तथा दूसरे को कन्धे पर उत्तरदायित्व अनुशासन के रूप में धारण किया जाता है। यह गौरव किसी भी अन्य मन्त्र को प्राप्त नहीं है।
हर धर्म का एक प्रतीक बीज मन्त्र होता है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में वपतिस्मा, जैन धर्म में नमोंकार मन्त्र आदि का प्रचलन है। भारतीय धर्म का आस्था केन्द्र- गायत्री को माना गया है। इसे इसके अर्थ की विशिष्टता- सन्निहित प्रेरणा के कारण विश्व आचार संहिता का प्राण तक माना जा सकता है। वेदों की सार्वभौम शिक्षा लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुई है। गायत्री रूपी बीज के तने, पल्लव ही वेद शास्त्रों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इसी कारण उसे ‘वेदमाता’ कहा गया है। वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की गंगोत्री। इसे देवमाता कहा गया है- अर्थात् जनमानस में देवत्व का अभिवर्धन करने वाली। विश्वमाता भी इसे कहते हैं अर्थात् “वसुधैव कुटुम्बकम्” के तत्व दर्शन तथा नीति-निर्धारण का पोषण करने वाली। ये विशेषण इसकी प्रमुखता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
एक अन्य चर्चा इस उपासना के सम्बन्ध में की जाती है कि गायत्री मन्त्र गुप्त है। इसका उच्चारण निषिद्ध है। यह प्रचार वर्ण के नाम पर स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले धर्म मंच के दिग्गजों ने अधिक किया है। विशेषकर दक्षिण भारत में यह भ्रान्ति तो सर्वाधिक है। वस्तुतः गुप्त तो मात्र दुरभि सन्धियों को रखा जाता है। श्रेष्ठ निर्धारणों को खुले में कहने में कोई हर्ज नहीं। गायत्री में सदाशयता की रचनात्मक स्थापनाएँ हैं। उन्हें जानने-समझने का सबको समान अधिकार है ऐसे पवित्र प्रेरणायुक्त उपदेश को उच्चारणपूर्वक कहने-सुनने में भला क्या हानि हो सकती है? पर्दे के पीछे व्यभिचार, अनाचार जैसे कुकर्म ही किये जाते हैं। षड्यन्त्रों में काना-फूसी होती है। किसी को पता न चलने देने की बात वहीं सोची जाती है जहाँ कोई कुचक्र रचा गया हो। सद्ज्ञान का तो उच्च स्वर से उच्चारण होना चाहिए। कीर्तन-आरती जैसे धर्म कृत्यों में वैसा होता भी है।
तन्त्र विधान की कुछ विधियाँ गुप्त रखी गयी हैं। ताकि अनधिकारी लोग उसका दुरुपयोग करके हानिकार परिस्थितियाँ उत्पन्न न करने पाएँ। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन जैसे आक्रामक अभिचारों के विधि-विधान तथा तन्त्र को इसी दृष्टि से कीलित या गोपनीय रखा गया है। एक तरह से इन्हें सौम्य साधना का स्वरूप न मानकर इन पर ‘बैन’ लगा दिया गया है ताकि लोग भ्रान्तिवश इनमें भटकने न लगें। वैदिक प्रक्रियाओं में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं। गायत्री वेदमन्त्र है। उसका नामकरण ही “गाने वाले का त्राण करने वाली” के रूप में हुआ है। फिर उसे मुँह से न बोलने, गुप्त रखने, चुप रहने, कान में कहने जैसा कथन सर्वथा उपहासास्पद है। ऐसा वे लोग कहते हैं जो तन्त्र और वेद में अंतर नहीं समझते। गायत्री मन्त्र का उच्चारण व्यापक विस्तृत होने से उसकी तरंगें वायु मण्डल में फैलती हैं और जहाँ तक वे पहुँचती हैं, वहाँ लाभदायक परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती हैं। उच्चारण न करने पर तो उस लाभ से सभी वंचित रहेंगे।
क्या गायत्री की उपासना रात्रि में की जा सकती है? इस विषय पर भी भाँति-भाँति के मत व्यक्त किये जाते हैं एवं जन-साधारण को भ्रान्ति के जंजाल में उलझा दिया जाता है। वस्तुतः गायत्री का दाता सूर्य है सूर्य की उपस्थिति में की गयी उपासना का लाभ अधिक माना गया है। किन्तु ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं कि सविता देवता की अनुपस्थिति में- रात्रि होने के कारण उपासना की ही न जा सकेगी। ब्राह्ममुहूर्त को भी एक प्रकार से रात्रि ही कहा जा सकता है। उसमें तो सभी को जल्दी उठकर उपासना करने और सूर्योदय होने पर सूर्यार्घ देकर उसे समाप्त करने की साधारण विधिव्यवस्था है। वस्तुतः सूर्य न कभी अस्त होता है और न देवता शयन करते हैं। इसलिए रात्रि में उपासना करने में कोई हर्ज नहीं। किसी को बहुत ही सन्देह हो तो मौन, मानसिक जप तो बिना संकोच कर सकता है। मानसिक जप पर तो स्नान, स्थान जैसा भी प्रतिबन्ध नहीं है।
एक और अहम् प्रश्न है कि गायत्री के साकार एवं निराकार रूपों में से किस-किस प्रकार से उपासना प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जाय? इसका समाधान मात्र यही है कि जिन्हें निराकार रुचता हो, वे सविता के ‘भर्गः’ स्वरूप का ध्यान करें। सूर्य का तेज- प्रकाशवान स्वरूप उसका प्रतीक है। प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता की आकृति माना जाता है। यह मात्र आग का गोला नहीं है। वरन् अध्यात्म की भाषा में ब्रह्म भर्ग से युक्त एवं सचेतन है। उदीयमान सूर्य से तो मात्र उसकी संगति बिठाई जाती है। इसके लिए सूर्य के स्थान पर दीपक को, धूपबत्ती की अथवा गायत्री मन्त्र जिसकी किरणों के साथ जुड़ा हो ऐसे सूर्य चित्र को भी प्रयुक्त कर ध्यान नियोजित किया जा सकता है।
साकार उपासना में गायत्री को माता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। माता होते हुए भी उसका स्वरूप नवयौवना के रूप में दो कारणों से रखा गया है। एक तो इसलिए कि देवत्व को कभी वार्धक्य नहीं सताता। सतत् उसका यौवन रूपी उभार ही झलकता रहता है। सभी देवताओं की प्रतिमाओं में उन्हें युवा सुदर्शन रूप में ही दर्शाया जाता है। यही बात देवियों का चित्रण करते समय भी ध्यान में रखी जाती है और उन्हें किशोर निरूपित किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि युवती के प्रति भी विकार भाव उत्पन्न न होने देने- मातृत्व की परिकल्पना परिपक्व करते चलने के लिये उठती आयु को इस अभ्यास के लिये सर्वोपयुक्त माना गया है। कमलासन पर विराजमान होने का अर्थ है- कोमल, सुगन्धित, उत्फुल्ल कमल पुष्प जैसे विशाल में उसका निवास होने की संगति बिठाना। यही है विभिन्न रूपों में उसकी उपासना का तात्विक दर्शन।
स्त्रियों को गायत्री का अधिकार है या नहीं, यह आशंका सभी उठाते देखे जाते हैं- धर्माचार्य भी तथा शोषक पुरुष समुदाय भी। वस्तुतः नर और नारी भगवान के दो नेत्र, दो हाथ, दो कान, दो पैर के समान मनुष्य जाति के दो वर्ग हैं। दोनों की स्थिति गाड़ी के दो पहियों की तरह मिल-जुलकर चलने और साथ-साथ सहयोग करने की है। दोनों कर्त्तव्य और अधिकार समान हैं। प्रजनन प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए एक का कार्य क्षेत्र परिवार, दूसरे का उपार्जन- उत्तरदायित्व इस रूप में बँट गए हैं। इस पर भी वह कोई विभाजन रेखा नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, साहित्य, राजनीति आदि में किसी भी वर्ग पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसी प्रकार धर्म-अध्यात्म क्षेत्र में- साधना-उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।
नर और नारी को- सवर्ण और असवर्ण को ऊंचा-नीचा मानना, एक को अधिकारी- दूसरे को अनधिकारी ठहराने का प्रचलन मध्यकालीन अन्धकार युग की देन है। उसमें समर्थों ने असमर्थों को पैरों तले रौंदने, उनसे मनमाने लाभ उठाने और विरोध की आवाज न उठा सकने के लिए जहाँ डण्डे का उपयोग किया, वहाँ पण्डिताऊ प्रतिपादन भी लालच या भय दिखाकर अपने समर्थन में प्राप्त कर लिये। शूद्रों को- स्त्रियों को नीचा या अनधिकारी ठहराने के पीछे मात्र एक ही दुरभि सन्धि है कि समर्थों को मनमाने लाभ मिलते रहें और किसी विरोध- प्रतिरोध का सामना न करना पड़े। बहुपत्नी प्रथा चलते हुए यह आवश्यक हो गया कि इसकी प्रतिक्रिया से नारी को भी तनकर खड़े न होने देने के लिए धार्मिक मोर्चे पर मनोवैज्ञानिक दीवार खड़ी की जाय और उन्हें अपनी विवशता को भगवद् प्रदत्त या धर्मानुकूल मानने के लिए बाधित किया जाय। सती प्रथा- पर्दा प्रथा- जैसे प्रचलन नारी को अपनी विवशता- नियति प्रदत्त मानने के लिये स्वीकार करने हेतु कुचक्र भर थे। इसी सिलसिले में धार्मिक अधिकारों से उन शोषित वर्गों को वंचित करने की बात कही जाने लगी। शस्त्रों में भी जहाँ-तहाँ ये अनैतिक प्रतिपादन ठूँस दिये गए और भारतीय संस्कृति की मूलाधार को उलट देने वाले प्रतिपादन चल पड़े। धार्मिक कृत्यों से वंचित रखने की बात भी उसी सामन्ती अन्धकार युग का प्रचलन- आधुनिक संस्करण भर है। वस्तुतः नर-नारी के बीच शास्त्र परम्परा के अनुसार कहीं राई-रत्ती भर भी अन्तर नहीं है।
प्राचीन काल में वेद-ऋचाओं की दृष्टा प्रतिपादनकर्त्ता ऋषियों की तरह ऋषिकाएँ भी हुई हैं। गायत्री वेदमन्त्रों का सिरमौर है। स्त्री, शूद्रों को वंचित करने के सिलसिले में गायत्री का वेदमन्त्र होने के कारण प्रतिबन्ध लगाया जाता है, जिसका किसी तर्क, तथ्य, न्याय, औचित्य की कसौटी पर कसने वाला कोई भी विज्ञजन समर्थन नहीं कर सकता।
गायत्री नारी रूप है। माता से पुत्रियों को कैसे दूर किया जा सकता है। बेटे को दूध पिलायें और बेटी को कचरे में फेंक दें, ऐसे निष्ठुर तो मात्र पिशाच ही होते हैं। गायत्री माता का ऐसा पिशाचिनी स्वरूप नहीं हो सकता। नर को नारी के क्षेत्र में प्रवेश से रोकने का मर्यादा के नाते कोई तुक भी हो सकता है पर नारी-नारी के क्षेत्र में प्रवेश न कर सके इसका तो लोक व्यवहार की दृष्टि से भी कोई औचित्य नहीं है। इस शंका का सर्वथा निर्मूल कर नर और नारी समान रूप से इसकी उपासना करते रह सकते हैं। ( क्रमशः )
भक्त पुण्डलीक अपने माता-पिता की सेवा साधना में लगे थे।
भगवान आये और बोले, दरवाजा खोलो, दर्शन देने आया हूँ। देर न करो, जल्दी लौटना है।
पुण्डलीक ने कहा- “भगवान् ! थोड़ा ठहरना पड़ेगा। जिस सेवा साधना ने आपकी अनुकम्पा सम्भव की उसे छोड़कर आपकी मनुहार कर सकना मुझसे बन नहीं पड़ेगा।”
आज की अभिलाषा को आज ही हल करने की उतावली में प्रायः कुछ ऐसा करना पड़ता है, जिसके लिए पीछे पश्चात्ताप करना पड़े। तुरन्त धनी बन जाने की आतुरता को एक ही मार्ग सूझता है कि अनीति अपनाकर जैसे भी बने वैसे, जहाँ से भी मिल वहाँ से, अभीष्ट धन प्राप्त कर लिया जाय। इसी ललक में आमतौर से लोग अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाते हैं। इस तरह जो मिलता है, दुर्व्यसनों में चला जाता है, अप्रामाणिकता उजागर होती है, फलतः असहयोग-तिरस्कार की लानत बरसने लगती है। प्रतिशोध और प्रताड़ना की प्रतिक्रिया भी सामने आती है। कुछ समय बाद ही यह प्रतीत होता है कि सोने का एक अण्डा नित्य देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर एक ही दिन में सारे अण्डे निकाल लेने की योजना गलत थी।
बात अपराधी प्रवृत्तियां अपनाने या मुर्गी का पेट चीरने की नहीं, उस अदूरदर्शिता की है, जो तत्काल का लाभ सोचती, और भविष्य की ओर से आंखें मीच लेती है। अदूरदर्शिता से बढ़कर और कोई हानिकारक तथ्य इस संसार में है नहीं। जिनने बचपन में विद्या नहीं पढ़ी, ब्रह्मचर्य नहीं रखा, कुसंग में दिन काटे, वे उस भूल के लिए आजीवन पछताते रहे हैं। यौवन के दिनों असंयम बरतने वाले, अपव्यय अपनाने वाले वृद्धावस्था में कितने दुःख सहते और पग-पग पर ठोकर खाते हैं, इसे अपने इर्द-गिर्द ही नजर उठाकर देखा जा सकता है। आलस्य और प्रमाद में समय गुजारने वाले प्रस्तुत बहुमूल्य अवसरों को गँवाते और पिछड़ेपन की हेय परिस्थितियों में दिन गुजारते हैं। यह आदत तब और भी अधिक कष्टकारक होती है, जब सुरदुर्लभ जीवन-सम्पदा को गँवाकर, पाप का पोटला सिर पर लादे हुए सृष्टा के दरबार में जाना और नारकीय यन्त्रणाओं के कोल्हू में पिलना पड़ता है।
दूरदर्शिता ही प्रकारान्तर से मानवी सौभाग्य का सराहनीय सोपान है। किसान, माली, विद्यार्थी, व्यवसायी, अध्यवसायी, योद्धा, कलाकार, तपस्वी, परमार्थी इसी को अपनाकर भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं, भले ही आरम्भिक पूँजी नियोजन की तरह श्रम, संयम बरतना और संचित को खर्च करना पड़े। दूरदर्शी आरम्भ में कुछ घाटा-सा उठाते जैसे दीखते हैं। आतुर उद्धत अपनी चतुरता पर इठलाते और भविष्य-निर्माण में संलग्न लोगों का उपहास उड़ाते देखे जाते हैं, किन्तु तथ्य सामने आते देर नहीं लगती। हथेली पर सरसों जमाने वाले कौतुक कौतूहल से मन बहलाने जैसी विडम्बना भर रच पाते हैं। आम्र-उद्यान लगाकर पीढ़ियों तक आजीविका और प्रशंसा मिलते रहने जैसा लाभ उन दूरदर्शियों को ही मिलता है, जो बीज बोने और फसल काटने के नियतिक्रम को ठीक प्रकार समझते और तद्नुरूप रीति-नीति अपनाते हैं।
व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित समस्याओं, कठिनाइयों, विपत्तियों, विग्रहों और विभीषिकाओं के मूल में एकमात्र आस्था-संकट ही काम करता है। यह आस्था-संकट क्या है? इसका उत्तर एक शब्द में प्राप्त करना हो, तो उसे ‘अदूरदर्शिता’ कहा जाता है। आँखों की रोशनी घट जाने पर दूर का दीखना बन्द हो जाता है और उतना ही दीखता है, जितना आँखों के अत्यन्त निकट हो। ऐसे ही लोग ठोकरें खाते, खाई-खड्डों में गिरते, मोच और चोट से आहत होते देखे जाते हैं। लगता है कब्ज की तरह अदूरदर्शिता की बीमारी जन-जन के पीछे लग गई है। संकीर्ण स्वार्थपरता का कुहासा इतना गहरा, कि दस कदम आगे तक का कुछ सूझता नहीं। स्वार्थपरता को दोष देना हो, तो समझ लेना चाहिए कि यह मात्र अदूरदर्शिता का ही दूसरा नाम है।
कौरव जब द्रौपदी के महल में गये थे, तब वहाँ उन्हें जल में थल, और थल में जल दीखने जैसा भ्रम हुआ था, उपहासास्पद बने थे। लगता है, या जो जमाना उलट गया है, या मनुष्य ने अपनी विवेक बुद्धि से काम लेना बन्द कर दिया है। यही कारण हँसते-हँसते सुखी-सम्पन्न जी सकने योग्य मनुष्य जन्म पर अगणित रोग शोकों के घटाटोप छाये रहते हैं। पतन-पराभव के चित्र विचित्र दृश्य सामने खड़े रहते हैं। तत्कालिक लाभ देखना बुरी बात नहीं। आये दिन की समस्याओं के समाधान ढूंढ़ने ही पड़ते हैं, किन्तु यदि औचित्य एवं धैर्य का परित्याग कर दिया जाय, तो उस आतुरता में अनीति अपनाना ही एक विकल्प रह जाता है। इन दिनों विलास, संचय, व्यामोह, अहंकार ही हर किसी पर प्रेत-पिशाच एवं सन्निपात की तरह चढ़ा हुआ है। मर्यादा, नीतिमत्ता शालीनता, उदारता जैसे आदर्शपालन से उपलब्ध होने वाले दूरगामी लाभों को एक प्रकार से विस्मृत कर दिया है। यह है युग संकट, जिसने मनुष्य के सामने सामूहिक आत्महत्या करने जैसी विवशता उत्पन्न कर दी है।
मानवी सत्ता काया में विरमती दीखती भर है, वस्तुतः वह चेतना है। चिन्तन का स्तर ही व्यक्तित्व का आधार है। उसी के आधार पर आकाँक्षाएँ उभरती मान्यताएँ बनती, विचारणा तरंगें बहती और गतिविधियाँ चलती हैं। यही कारण है, कि चिन्तन को दिशा देने वाले तत्वदर्शन को जीवनधारा कहा गया है। उसी पर किसी का उत्थान-पतन निर्भर रहता है। इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए लोग स्वर्ग या नरक में प्रवेश करते हैं।
व्यक्ति और समाज को जिन अवाँछनीयताओं ने इन दिनों बेतरह आच्छादित किया गया है, उसके मूल में अदूरदर्शिता से उत्पन्न विषाक्तता काम करती देखी जाती है। इसे हटाया-मिटाया न जा सके, तो घटाने के लिए तो तत्पर होना ही चाहिए, अन्यथा बुद्धिमान-अबुद्धिमानों से लदी हुई यह नाव एक साथ डूबेगी और सूखे के साथ गीला भी जलेगा। विपन्नता बढ़ती जा रही है। अवसर हाथ से निकलता जा रहा है। प्रस्तुत विभीषिकाओं से निपटना और विनाश को विकास में बदलना तभी सम्भव हो सकता है जब अदूरदर्शिता के विरुद्ध मुहीम खड़ी की जाय और महामारी से भी बढ़कर इस बढ़ती हुई विपत्ति की रोकथाम पर समूचा ध्यान केन्द्रित किया जाय। इस विपत्ति को बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, दुर्घटना स्तर की समझ कर समय रहते राहत कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
प्रज्ञा अभियान इसी प्रक्रिया का नाम है, उसका संघर्ष पक्ष अदूरदर्शिता के भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के विरुद्ध मोर्चाबन्दी करता है, उसका सृजन पक्ष लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन में निरत है। इसे धुलाई-रंगाई की, गलाई-ढलाई की समन्वित प्रक्रिया कह सकते हैं। इस प्रयत्न-प्रवाह की सफलता-असफलता पर ही भविष्य का अन्धकारमय होना या समुज्ज्वल बनना पूरी तरह निर्भर है। इस तथ्य को गम्भीरता पूर्वक समझा और विश्वासपूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इन दिनों करने को असंख्यों काम सामने हैं, पर आपत्ति धर्म की तरह जिसे प्रमुखता मिलनी चाहिए, वह एक ही है कि प्रज्ञा अभियान को व्यापक एवं सफल बनाने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया जाय। उपेक्षा को आड़े न आने दिया जाय।
यह उत्तरदायित्व प्रज्ञा-परिजनों के कंधों पर आया है कि जन-जन के मन में दूरदर्शी विवेकशीलता का बीजारोपण करें, और उसे सींचते रहकर लहलहाती फसल के स्तर तक पहुँचायें। स्मरण रहे, परिस्थिति मनःस्थिति की परिणति मात्र होती है। परिस्थिति बदलनी हो, तो जनमानस की आस्थाओं और प्रचलन में समाविष्ट आदतों को बदलना पड़ेगा उलटे को उल्टा कर सीधा करने का एक ही मार्ग है कि प्रज्ञा अभियान को गति प्रदान करें उसे चिनगारी से ज्वालभाल बनाने में अपने श्रम, सहयोग एवं अनुदान की भावभरी श्रद्धाँजलियाँ प्रस्तुत करने में कुछ उठा न रखें। युग धर्म यही है। जागरुक युग प्रहरियों को समय की इस पुकार को सुनना ही चाहिए, प्रस्तुत चुनौती को स्वीकार करना ही चाहिए।
देखने में छोटा किन्तु परिणाम में दूरगामी परिणति उत्पन्न करने वाला एक कार्यक्रम सभी प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख नियति ने प्रस्तुत किया है। वह है- स्वाध्याय मण्डलों का संस्थापन संचालन। अपने समय का यह सर्व सुलभ कार्य ऐसा है जिसमें युग समस्याओं का समाधान भली प्रकार खोजा और पाया जा सकता है।
प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सभी जागृत आत्माओं को एक काम सौंपा गया है कि वे अपने-अपने संपर्क क्षेत्रों में युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण नियमित रूप से करते रहने की जिम्मेदारी उठायें। यदा-कदा धूमधाम कर देने से बात बनती नहीं। विद्या तब आती है जब पढ़ने का क्रम निरन्तर चलता रहे। कलाकार, शिल्पी, गायक, दुकानदार, कृषक, ग्वाले अपना कार्यक्रम निरन्तर जारी रखते हैं। एक दिन रोटी खाने और महीने भर के लिए निश्चित हो जाने जैसी बात कहाँ बनती है। संपर्क क्षेत्र की विचारणा को परिमार्जित करने का काम ऐसा नहीं है, जिसे किसी धूमधाम भरे सम्मेलन समारोह भर में सम्पन्न किया जा सके। यह नित्य की घिसाई, रगड़ाई जैसा प्रसंग है। झाडू लगाने, नहाने, कपड़े धोने, दाँत माँजने जैसे काम ऐसे हैं जिन्हें बार-बार आये दिन करते रहने की आवश्यक पड़ती है। चिरकाल से जमे हुए कुसंस्कारों और कुविचारों को झटके से नहीं वरन् रेती से रेत कर हलका करना पड़ेगा। पत्थर को लम्बे समय तक रगड़ते रहकर ही उसे चिकना बनाया जाता है। पगडण्डी के निशान एक बार की यात्रा भर से कहाँ बनते हैं। यह सभी कार्य समय साध्य है और निरन्तर का श्रम, समय एवं मनोयोग माँगते हैं।
प्रज्ञा साहित्य पिछले दिनों भी व्यक्ति और समाज की अनेकानेक समस्याओं का नितान्त गम्भीर पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ऐसे समाधान प्रस्तुत करता रहा है, जो तथ्यपूर्ण भी हैं और व्यावहारिक भी। इसे जिनने पढ़ा है वे युग समस्याओं से अवगत ही नहीं, उनके समाधान सम्पन्न करने के लिए अनुप्रमाणित भी हुए हैं। यही कारण है कि इन दिनों तक प्रज्ञा परिवार मत्स्यावतार की तरह बढ़ते-बढ़ते प्रायः बीस लाख जितनी संख्या में जा पहुँचा है। यह पाठक, बाधक मात्र नहीं है। उनमें से अधिकाँश की चेतना उभरी है और किसी न किसी रूप में ये युग परिवर्तन की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष योगदान की भावभरी भूमिका निभा रहे हैं।
प्रज्ञा साहित्य के सृजन में इसी बसन्त पर्व से एक नई कड़ी जुड़ी है। मिशन के सूत्र संचालक ने हर दिन एक फोल्डर पुस्तिका लिखना आरम्भ किया है और उसका छपने का प्रबन्ध भी हाथों हाथ हो गया है। बड़ी पुस्तकें महँगी होती हैं, उनके खरीदने, पढ़ने की गति बहुत धीमी रहती है। समय की माँग है कि दूरदर्शी विवेकशीलता जगाने का प्रज्ञा अभियान धीमी गति से नहीं आँधी तूफान की तरह अग्रगामी बनाया जाय। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए युग समस्याओं के हर पथ पर प्रकाश डालने और समाधान बताने वाला साहित्य ऐसा हो जो सस्ता, टिकाऊ एवं व्यस्त लोगों के लिए भी जल्दी पढ़ लिये जाने जैसी सुविधा से सम्पन्न हो। हर दिन एक फोल्डर के लिखे जाने का इस वर्ष गुरुदेव द्वारा लिया गया व्रत इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। युगान्तरीय चेतना का यह आलोक ऐसा है, जिस घर-घर पहुँचने में हम सबका उत्साह मूर्धन्य रहना चाहिए।
इस प्रक्रिया को सुनियोजित रीति से सम्पन्न करने के लिए स्वाध्याय मण्डली की स्थापना पर पूरा जोर दिया गया ओर प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को कहा गया है। कि वे अपनी स्वतन्त्र सृजन शक्ति का परिचय देने के लिए निजी प्रयत्न पुरुषार्थ के सहारे एक स्वाध्याय मण्डल स्थापित करें और उसे उमंग भरे वातावरण में सजीव सक्रिय रखें।
स्वाध्याय मण्डल स्थापना में एक व्यक्ति संस्थापक होता है। वह अपने चार साथी और तलाश करके पाँच की एक कार्यकारी समिति बना लेता है। यह पाँच सदस्य अपना एक कार्यक्षेत्र बनाते हैं, जिसके न्यूनतम पाँच सदस्य हों। पाँच संचालक पच्चास सहयोगी- इस प्रकार वह तीस की मण्डली बन जाती है। संचालक स्वयं नित्य प्रज्ञा साहित्य पढ़ते और अपने पाँच सहयोगियों से नियमित रूप से पढ़ाते रहते हैं इस प्रकार एक मण्डल के अंतर्गत प्रायः तीस सदस्य ऐसे होते हैं जो नियमित रूप से युग साहित्य के पढ़ने का क्रम चलाते हैं। उसमें संगठन भी है, संपर्क भी और प्रोत्साहन भी। विचारणा को गहराई तक हृदयंगम कराना हो तो न केवल उस विचारधारा के साथ नियमित संपर्क साधना पड़ता है वरद् साथ में व्यक्तिगत परामर्श, प्रोत्साहन का भी दबाव रहता है। प्रज्ञा साहित्य को इंजेक्शन की औषधि कहा जाय तो संपर्क परामर्श को उसे रक्त तक पहुँचाने वाली पैनी सुई मानना होगा। लाभ नियमितता से ही होता है, इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। निरन्तरता ही फलवती होती है, उसे भुला नहीं दिया जाना चाहिए।
स्वाध्याय मण्डल का यह जन संपर्क कार्यक्रम हुआ। संचालक लोग अपना समय देकर इसे चलायें। इस संदर्भ में नया प्रज्ञा साहित्य मँगाते रहने की दूसरी आवश्यकता सामने आती है। इस निमित्त एक रुपया हर दिन का बजट रखा गया है। एक रुपया प्रतिदिन अर्थात् तीस रुपया मासिक। इस राशि से तीस व्यक्तियों को नियमित रूप से युग चेतना के साथ मुफ्त में हर दिन संपर्क साधते रहने का अवसर मिल जाता है। यह पैसा पाँचों सदस्य बीस-बीस पैसा नित्य एक ज्ञानघट में जमा करते हुए जुटा लिया करें। इस प्रकार थोड़ा-सा समयदान और अंशदान देने से कहीं भी यह स्थापना भली प्रकार सम्पन्न हो सकती है और उत्साह भरे वातावरण में नियमित रूप से चलती रह सकती है।
तीन व्यक्तियों के यह विचार परिवार हर जगह गठित होना चाहिए। प्रत्येक प्राणवान प्रज्ञा परिजन को इस स्थापना का श्रेय लेना चाहिए। यह ऐसा काम है जिसे कोई भी उत्साही, भावनाशील बिना किसी अड़चन के कहीं भी करता रह सकता है। पाँच साथी मिलने में कठिनाई हो तो वह कार्य अपने निज के बलबूते भी करते रहा जा सकता है। तीस व्यक्तियों तक प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने वापस लेने का कार्य एक व्यक्ति भी कर सकता है। हर किसी को निजी कार्यों में अनेकों के साथ संपर्क साधना होता है। हर किसी के कुछ न कुछ मित्र परिचित होते हैं। उन्हें इस बहुमूल्य साहित्य को बिना कुछ खर्च किये पढ़ते रहने भर का कार्य ऐसा नहीं है जिसमें कोई विघ्न आये या संकट खड़ा हो। इसी प्रकार एक रुपया प्रतिदिन का बजट भी ऐसा नहीं है जिसे कोई भावनाशील व्यक्ति अपने अन्यान्य खर्चों में कटौती करके उसे जुटा न सके। इन दिनों अस्सी पैसे की एक कप चाय आती है। इतनी राशि अपनी जेब से सब स्वजन सम्बन्धियों से थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करके सहज ही पूर्ति हो सकती है। दोनों ही कार्य ऐसे हैं जिन्हें कोई एक प्रतिभावान भली प्रकार करता रह सकता है। फिर समयदान या अंशदान में अन्य लोग भी हाथ बटाने लगे तब तो कहना ही क्या?
इन दिनों हर महीन तीस फोल्डर- पुस्तिकाएं प्रकाशित होती हैं। प्रकाशन, मुद्रण, विक्रय का कार्य युग निर्माण योजना मथुरा से होता है इसलिए जिन्हें मँगाना हो वहीं से मँगायें। प्रत्येक का मूल्य चालीस पैसा है। इस प्रकार महीने में बारह रुपये की फोल्डर पुस्तिकाएँ तथा अठारह रुपये की अन्य पुस्तिकाएँ मिलाकर तीस रुपये मासिक का बजट पूरा हो जाता है। बसन्त से अब तक की 75 पुस्तिकाएँ छप चुकीं जिनका मूल्य 30 रु. है। पहली बार की किश्त में इन्हें मँगाया जा सकता है और स्वाध्याय परिवार के जितने सदस्य आरम्भ में बने, उन्हें एक-एक करके नित्य एक पुस्तिका पढ़ाने का क्रम नियमित रूप से चलाया जा सकता है। आगे से सामान्य क्रम चलेगा। बारह रुपये के फोल्डर और अठारह रुपये की पुस्तकें। युग निर्माण योजना मथुरा के पते पर पत्र भेजकर पुस्तक की सूची मँगाई जा सकती है। जुलाई से दिसम्बर तक के छः महीनों के लिए उसमें से यह चुना जा सकता है कि किस महीने किन पुस्तकों का पार्सल पहुँचे। फोल्डरों के नाम पूछने की आवश्यकता नहीं है। वे तो हर महीने तीस की संख्या में नये लिखे जाते और प्रकाशित होते ही रहेंगे।
स्वाध्याय मण्डलों के साथ प्रज्ञा संस्थान नाम को भी जोड़ा गया है। इनका पूरा नाम है ‘स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान’। उन्हें बिना इमारत के छोटा प्रज्ञापीठ समझा जाना चाहिए। उनके जिम्मे भी वही कार्यक्रम सौंपे गये हैं जो बड़े प्रज्ञा पीठों को बड़े रूप में वहन करने पड़ रहे हैं। स्वाध्याय से शुभारम्भ होने के कारण उसकी प्रधानता रखी गई है। पर जड़ जमते ही पेड़ों से नई पत्तियाँ निकल पड़ेंगी। पंचसूत्री कार्यक्रम इन दिनों प्रायः सभी प्रज्ञा संस्थानों को चलाना पड़ रहा है। (1) शिक्षितों को नित्य नियमित रूप से प्रज्ञा साहित्य पढ़ाना वापिस लेना (2) जन्म दिवसोत्सव के माध्यम से परिवार निर्माण की ज्ञान गोष्ठियाँ चलाना (3) स्लाइड प्रोजेक्टर एवं टेप रिकार्डर के माध्यम से हर गली मुहल्ले में सत्संग की व्यवस्था (4) दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन एवं घर कमरों में उन्हें कलण्डरों की तरह लटकाना (5) पर्व त्यौहारों के अवसर पर विशेष प्रज्ञा आयोजन, उस अवसर पर बुराइयाँ छुड़वाने, अच्छाइयाँ अपनाने के लिए संकल्प। यह कार्य ऐसे हैं जिसके सहारे जन जागरण के लिए जन संपर्क का एक सुनिश्चित कार्यक्रम चलता है। इसके बिना जन समर्थन जनसहयोग मिल नहीं सकेगा और नव सृजन के निमित्त जो बहुमुखी गतिविधियाँ हाथ में लेनी हैं, उनका सरंजाम जुटेगा नहीं। स्वाध्याय मण्डल यदि उपरोक्त पंचसूत्री संपर्क योजना का प्रथम चरण पूरा कर लेते हैं तो उनमें इतनी सामर्थ्य उभरेगी कि सृजन और सुधार के लिए जो अगले चरण निर्धारित हैं, उन्हें भली प्रकार सम्पन्न कर सकें।
अगले दिनों प्रौढ़ शिक्षा, बालकों की संस्कार पाठशालाएँ, वृक्षारोपण, हरीतिमा सम्वर्धन, स्वास्थ्य सम्वर्धन, व्यायामशालाओं की स्थापन, श्रमदान से स्वच्छता अभियान, गृह उद्योगों का प्रचलन, खर्चीली शादियों का विरोध, नशा निवारण, परिवार नियोजन, जाति-पाँति के नाम पर ऊँच-नीच की मान्यता, पर्दा प्रथा आदि कितने ही सृजनात्मक एवं सुधारात्मक काम हाथ में लेने हैं। स्वाध्याय मण्डल जैसे-जैसे जन समर्थन प्राप्त करते चलने में सफल होंगे वैसे-वैसे उन्हें लोक-मानस के परिष्कार तक सीमित न रहकर सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के उभयपक्षीय कार्यक्रम हाथ में लेने एवं सफल कर दिखाने होंगे। 500 करोड़ मनुष्यों के भाग्य का निर्धारण इन्हीं दिनों होना है। उसके लिए सृष्टा की परिवर्तन व्यवस्था में सभी प्रज्ञा परिजनों को अपनी भूमिका निभानी है। इसके लिए एक सुनियोजित मंच चाहिए जिसके माध्यम से क्रमिक गति से आगे बढ़ते हुए विश्व का अभिनव निर्माण के लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सके।
इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए 30 अतिरिक्त फोल्डर प्रश्नोत्तरी के रूप में जुलाई से प्रकाशित होंगे। उनके आधार पर परीक्षा भी ली जायेगी ताकि यह पता चल सके कि वर्तमान प्रज्ञा परिजनों में से कितनों को मिशन के स्वरूप एवं कार्यक्रम की सही जानकारी है कितनों में नहीं। इस आधार पर आधी अधूरी जानकारियों को पूरा किया जायेगा और जिन्हें समग्र जानकारी है उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में तद् विषयक शिक्षण सत्र चलाने को कहा जायेगा। जो लोक शिक्षण के उपयुक्त ज्ञान संचय कर चुके हैं, उन्हें ‘उपाध्याय’ उपाधि से अलंकृत करने का निश्चय किया है ताकि वह पुरोहित वर्ग आज के जन समुदाय को मार्गदर्शन कर सकने की स्थिति में समझा जा सके और उससे उपयुक्त काम लिया जा सके।
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक विचारशील पाठक को प्रज्ञा परिजन के नाम से सम्बोधन किया जाता है। उन्हें पाठक या वाचक नहीं समझा जाता वरन् यह आशा की जाती है कि युग सत्र में उनकी छोटी बड़ी भूमिका अवश्य होगी। वे मूक दर्शक नहीं रहेंगे। युग धर्म का निर्वाह करेंगे और युगान्तरीय चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रज्ञा अभियान को व्यापक बनाने में कुछ उठा न रखेंगे।
इन दिनों प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को यह काम सौंपा जा रहा है कि वह एक स्वतन्त्र स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान का गठन करे। उसे सुसंचालित रखे और सफल बनाये। इस सुलभ व सरल किन्तु परिणति की दृष्टि से उच्चस्तरीय प्रक्रिया को संपन्न करने में किसी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए।
(लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’)
भू पर परिवर्तन लाने को, हम प्रज्ञा-प्राण, कान्ति लाये। मानव में उतरे देव पुरुष, धरती पर स्वर्ग-शान्ति लाये॥
मानव ही गिरा उठा ऊपर, मानव का प्राण-पसार है। मानव की अनुपम क्षमता का फैला देखो उजियारा है।
मानव ने महाविनाश रचा, मानव ने विश्व सँवारा है। है मानव की महिमा अपार, ये मानव लोक हमारा है।
मानव-मंगल की प्रभा लिये, हरने दुःख अशान्ति आये। भू पर परिवर्तन लाने को, हम प्रज्ञा-प्राण, क्रान्ति लाये॥
मानव, महानता, मधुता का भण्डार भरे तम में खोया। मानव ने दुःख दुर्बलता नित दाह-भरा दुःखना रोया।
अपने छोटेपन में अकड़ा, जकड़ा, खुद की जंजीरों से। अपने स्वरूप का बोध भुला, उलझा कुरूप तस्वीरों से।
निरभ्रान्त बना मानव-प्रज्ञा, हम हरने सकल भ्रान्ति आये। भू पर परिवर्तन लाने को, हम प्रज्ञा-प्राण, क्रान्ति लाये॥
फिर महाप्राण की धारायें, भागीरथ लाये धरती पर। दुःखिया मानवता की पीड़ा, करुणा-उफनाये, धरती पर है।
सन्तोष शान्ति, शुचि तृप्ति-सुधा की धार बहाये धरती पर। छू-छूकर प्राणों की लहरें, जीवन लहराये धरती पर।
मानव में उतरे देव पुरुष, धरती पर स्वर्ग-शान्ति लाये। भू पर परिवर्तन लाने को, हम प्रज्ञा-प्राण, क्रान्ति लाये॥
*समाप्त*