प्रगति की आकाँक्षा मनुष्य का एक स्वाभाविक गुण है। चेतना सम्पन्न तो अन्य प्राणी भी पाये जाते हैं परन्तु यह विशिष्टता मात्र मानव के साथ ही जुड़ी है। यह आकाँक्षा ही महत्वाकाँक्षा बनती और मनुष्य को भौतिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में क्रमशः ऊँचे सोपानों पर पहुँचाती देखी जाती है। महत्वाकाँक्षा से रहित दो ही श्रेणी के व्यक्ति हो सकते हैं। मूढ़मति-जड़ता से विभूषित मनुष्य अथवा स्थित प्रज्ञ-परमहंस। मूढ अपनी जड़तावश एवं ब्रह्म ज्ञानी अपनी दिव्य चेतनावश साँसारिक महत्वाकांक्षाओं से बचे रहते हैं और सन्तोष के साथ स्वल्प साधनों में गुजारा करते देखे जाते हैं।
मूढ़मति जिन्हें कभी जगद्गति से कोई नाता नहीं रहता एवं इन्द्रिय लिप्सा में निमग्न प्राणियों में कोई विशेष अन्तर नहीं। ढर्रे की जिन्दगी जोते इन प्राणियों को निम्नतम श्रेणी में रखा जा सकता है। इससे ऊँचा स्तर अहंता- यश लिप्सा प्रधान भौतिकवादी दृष्टिकोण वाले मनुष्यों का होता है। चर्चा का विषय बनने के आकाँक्षी इस समूह की बहुलता सामान्य जन समुदाय में चारों ओर देखी जा सकती है। लोभ एवं अहंकार की पूर्ति की यह व्यग्रता तृष्णा कहलाती है और न्यूनाधिक रूप में बहुसंख्य में पायी जाती है। इससे भी ऊँची परत अध्यात्म प्रधान है। उत्कृष्ट आदर्शवादिता से भरी-पूरी सद्भाव सम्पन्न आकाँक्षाएँ ही आत्मिक प्रगति का माध्यम बनती हैं। महत्वाकांक्षाओं का यह मोड़ ही जीवन का काया-कल्प करता है। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता के समावेश तथा लोकमंगल की कामना से जिया गया जीवन ही मनुष्य को अभीष्ट है इसी के लिये उसका जन्म हुआ है। कौन, कब, कितना अपनी आकाँक्षाओं का स्तर मोड़ पाता- ऊँचा उठा पाता है, इसी पर निर्भर है मनुष्य की वास्तविक प्रगति।
पारस के संपर्क में आने पर लोहे का टुकड़ा भी सोना बन जाता है। चन्दन वृक्ष की समीपस्थ झाड़ियां भी सुगन्ध से ओत-प्रोत होती पायी जाती हैं। संपर्क सान्निध्य एवं वातावरण का प्रभाव व्यक्ति को आमूल-चूल बदलकर उसे कहीं से कहीं पहुँचा देता है। ऐसी कई साक्षियाँ हैं जो बताती हैं कि जिन्होंने महामानवों का पल्ला पकड़ा, उनकी दी हुई शिक्षा पर चले तथा उनके संपर्क में रहकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव को वैसा ही बनाने का प्रयास किया तो वे भी उसी राजमार्ग पर चल पड़े। शक्तिपात या कुण्डलिनी जागरण होता है अथवा नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से तो कहा नहीं जा सकता, पर तथ्य एवं प्रमाण बताते हैं कि श्रेष्ठ सान्निध्य का प्रभाव इससे कम नहीं होता।
समर्थ गुरु रामदास को योग्य शिष्य की तलाश थी तथा शिवाजी को एक छत्रछाया की। वह सब उन्हें मिला। साथ में मिला समयानुकूल प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं मुगलों से जूझने हेतु शस्त्र विद्या का शिक्षण। अपने गुरु का दामन पकड़ कर वे छत्रपति बन गए और संस्कृति के रक्षक कहलाए। रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने विवेकानन्द को अल्पायु में ही विश्व बंधु सन्त बना दिया तथा प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द जी के मार्गदर्शन ने सत्य की खोज में भटक रहे मूलशंकर को आर्य समाज का संस्थापक कुरीतियों से जूझने वाला एक प्रखर संन्यासी दयानन्द। बुन्देलखण्ड के राजा छत्रसाल को यदि स्वामी प्राणनाथ न मिले होते तो वे सम्भवतः उतने प्रखर पुरुषार्थी न बन पाते। यह सब चमत्कार उसी सान्निध्य का है जिसकी यशोगाथा गुरु शिष्य परंपरा में हमेशा से गायी जाती रही है।
इसी क्रम में सहज ही हमें एक सौम्य सरल एवं कार्य कुशल व्यक्ति की याद हो आती है जिसे बापू का सान्निध्य मिला, जो चम्पारन के एक साधारण से किसान से स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति बना। बाबू राजेन्द्र प्रसाद को कौन नहीं जानता। पर कम को ही विदित है कि इस पद तक पहुँचने के पूर्व उन्हें समर्पण सेवा लगन की कितनी कड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के संपर्क में अनेकानेक व्यक्तियों में से कइयों ने अपने त्याग-बलिदान के बदले स्वतन्त्र राष्ट्र में उच्च पद पाए। किसी के भी समर्पण की परस्पर तुलना कर पाना सम्भव नहीं। नेहरू अधिक त्यागी थे अथवा पटेल, मौलाना आजाद अथवा राजाजी। प्रश्न इस बात का नहीं। परन्तु जैसा बापू चाहते थे वैसा ही सीधे सादे स्तर पर बने रहकर यदि किसी ने महान बनने का प्रयास किया है तो उसमें राजेन्द्रबाबू का नाम बड़े श्रद्धा से लिया जाता है, लिया जाता रहेगा।
इतिहास साक्षी है कि राजेन्द्रबाबू उसके बाद बिना श्रेय की कामना के कई बार जेल गए लेकिन अंग्रेजों के नीली कोठी वाले साहबों के प्रयासों को कभी सफल नहीं होने दिया। चम्पारन के आन्दोलन को राष्ट्रीयता स्वतन्त्रता के रूप में 1947 में हुए उपसंहार की भूमिका माना जा सकता है। दृष्टा गाँधी ने जैसा कहा था, वही हुआ। इस संपर्क वार्तालाप के ठीक 29 वर्ष बाद भारत को स्वतन्त्रता मिली और विदेशियों के हाथ से सत्ता का हस्तान्तरण सर्वप्रथम संविधान सभा के अध्यक्ष श्री राजेन्द्रबाबू के हाथों में हुआ।
बिहार का एक सीधा-सादा यह किसान अपनी लगन कर्मठता एवं समर्पण के कारण ही उस उच्चतम पद को विभूषित कर सकने में समर्थ हुआ, जिसे स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति नाम दिया गया। पद लिप्सा से कोसों दूर, सादगी की प्रतिमूर्ति राजेन्द्रबाबू जब तक जीवित रहे, इसी सिद्धांत की बानगी बने रहे कि श्रेष्ठ सान्निध्य एवं गुण ,कर्म, स्वभाव के परिष्कार से व्यक्ति महामानव बन सकता है। यही है वह चमत्कार जिसकी कामना तो लोग करते हैं, पुरुषार्थ नहीं करते।
आत्मिक प्रगति के सप्त आयामीय सोपानों के रूप में विभिन्न शरीरों के विकास के बारे में अनेकानेक मत चले आए हैं। इन्हीं को आप्त वचनों में सप्तलोकों- भूः, भुवः,स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् के रूप में अलंकारिक रूप से वर्णित किया जाता रहा है। ये वस्तुतः होते हैं कि नहीं, इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक दृष्टि से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन मानवी काया की सूक्ष्म चेतना में निवास करने वाली इन स्थितियों का अध्यात्म- मनोविज्ञान के ज्ञाता वर्णन करते हैं तथा उनके क्रमिक विकास को ही आत्मोत्थान, जीवनमुक्ति, परब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।
जाव चेतना की ये सात स्थितियाँ इस प्रकार हैं- फिजिकल बॉडी ( दृश्य कायिक स्वरूप), इथरिक बॉडी (अदृश्य चेतन स्वरूप), एस्टल बॉडी (सूक्ष्मतम दिव्य स्वरूप), मेण्टल बॉडी (मानसगत् चेतन स्वरूप), स्प्रिचुअल बॉडी (कारणगत चेतन स्वरूप), कॉस्मिक बॉडी (देव स्वरूप), बॉडीलेस बॉडी अथवा ब्रह्म स्वरूप स्थिति इसी जीवनमुक्ति, बंधनमुक्ति की अन्तिम चरमावस्था।
जो व्यक्ति साधना द्वारा अपनी चेतना का जिस सीमा तक विकास कर लेता है, उसके अंदर उसी अनुपात में क्षमताएँ उभरती और दृष्टिगोचर होने लगती हैं। एक ही व्यक्ति में एक से लेकर सात तक किसी भी स्वरूप के अपनी आत्मिक प्रगति के अनुपात में दर्शन हो सकते हैं। यह वह राजमार्ग है जिस पर अध्यात्म पथ के हर पथिक को गुजरना ही होता है। भ्रूण एक कोश की स्थिति से बहुगुणित होकर विकसित हो शिशु रूप लेता है। मानवी चेतना भी योग एवं तप के द्विविधि साधनों से विकसित होती हुई अन्तिम स्थिति को पहुँचती है। जो जिस स्थिति में अपनी काया से मुक्त हो जाती हैं वे क्रमशः अगले जीवन में उस उच्च स्थिति से फिर आगे बढ़ती हैं। कारण विशेषों के कारण कई बार ऐसे विक्षेप भी उत्पन्न होते हैं कि व्यक्ति अन्तश्चेतना की उच्चस्थिति में होते हुए भी बाह्य वातावरण के प्रभाव से सहज ही अपना प्रगति-पथ स्वयं अवरुद्ध कर लेते हैं और फिर वापस उन्हीं आयामों में लौट आते हैं जहाँ से उनका विकासक्रम आरम्भ हुआ था।
फिजीकल बॉडी दृश्य भौतिक शरीर है जो पंच तत्वों से बना है। इस इन्द्रियगम्य कहते हैं। जन्म से ही प्राणी इसी कलेवर को धारण किए रहता है। मात्र शरीरगत अनुभूतियाँ ही इसमें विकसित हो पाती हैं। अन्य जीव जगत के प्राणी आजीवन इसी स्थिति में बने रहते व प्रकृति के नियमानुसार स्वचालित जीवन जीते हैं। मात्र मानव ही एक अपवाद है। इसी जीवन में अन्य गहरी परतों- उच्चतर आयामों में प्रवेश करने की क्षमता रखता है।
दो वर्ष की आयु से मानवी काया में इथरिक बॉडी जो अदृश्य चेतन एवं सूक्ष्म स्वरूप है, विकसित होने लगती है। अपना-पराया, राग द्वेष, मिलन-वियोग की अनुभूति इसी के माध्यम से होती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ ये अनुभूतियाँ परिपक्व होती तथा इच्छाओं, आकांक्षाओं, संवेदनाओं के रूप में देखी जाती हैं। इससे अगली प्रगति की सीढ़ी है एस्ट्रल बॉडी जो सभ्यता एवं संस्कृति के परिवेश के अनुरूप किशोरावस्था में विकसित होने लगती है। यौन-अनुभूति, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, विचारों का व्यवस्थित क्रम, तर्क शक्ति का विकास इस शरीर के जागरण की उपलब्धियां हैं। सामान्यतः इसी सीढ़ी तक आकर सामान्य व्यक्तियों का विकास रुक जाता है। पेट-प्रजनन की परिधि में चक्कर काटते हुए यह प्रगति-पथ आगे अधिकाँश में अवरुद्ध हो जाता है। शरीरगत अनुभूतियाँ, सामान्य व्यावहारिक भाव- सम्वेदनाएँ तथा लोकाचार-व्यवहार कुशलता ये ही तीन मिलकर एक बहिरंग की दृष्टि से विकसित सामान्य मनुष्य का ढाँचा बनाते हैं। चाहे हम आदिम जीवन जी रहे वन्य वासियों के ढर्रे के जीवन को देखें अथवा सभ्य, सुविकसित कहे जाने वाले नागरिकों को इसी स्थिति तक पहुँचा देखा जा सकता है।
वस्तुतः अन्तः की प्रगति इसके बाद की स्थितियों में दृश्यमान होती है एवं इसके लिये साधना पुरुषार्थ करना होता है। मेण्टल बॉडी (मानसगत चेतन स्वरूप) कला सौंदर्य, विज्ञान एवं नूतन कल्पनाओं के विकास की स्थिति है। कवि, कलाकार, मनीषी, वैज्ञानिक, विचारक इसी भाव लोक में विचरण करते हैं। यह स्पष्ट माना जा सकता है कि जिस किसी भी समूह, जाति, समाज अथवा देश में सुविकसित मानस गत चेतन शरीर वाले व्यक्तियों की बहुतायत होती है वहाँ महत्वपूर्ण वैचारिक और आध्यात्मिक क्रांतियां जन्म लेती हैं। एक से बढ़कर एक विचारक, मनीषी, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक पैदा होते हैं। मानस शरीर उभरे तो सही परन्तु विकृति की दिशा में जाने लगे तो मनुष्य व्यसन और व्यभिचारजन्य क्रीड़ा-कौतुकों में रस लेने लगता है। ऐसे स्तर के लोग रसिक और कामुक अधिक पाए जाते हैं। अन्ततः वे अवगति को प्राप्त हो पूर्व के शरीरों की स्थिति में चले जाते हैं। महत्वाकाँक्षाएँ वस्तुतः इसी क्षेत्र में जागृत होती हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति भौतिक जीवन में महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करते देखे जाते हैं। लेकिन इनकी रंचमात्र सी विकृति से ही हिटलर, नेपोलियन और मुसोलिनी जन्म ले लेते हैं। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, अशोक जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति विकृत मनःस्थिति में घोर आतंकवादी थे, पर दिशा के मोड़ से असामान्य बन गए। इसे प्रतिभा भी कह सकते हैं। प्रतिभाशाली व्यक्तियों में मनस् तत्व प्रबल होता है। संसार की समस्त भौतिक उपलब्धियां, श्रेय सम्मान आदि ‘मेण्टल बॉडी’ के विकास की ही परिणति है।
अतीन्द्रिय शक्तियाँ पांचवें आयाम- स्प्रिचुअल बॉडी में सन्निहित मानी जा सकती हैं। अचेतन मन की गहरी परतों में दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं, वे पांचवें शरीर से संबंधित हैं। टेलीपैथी ‘साय’ फिनामेनॉ जैसे चमत्कारी प्रयोग इसी स्तर के विकसित होने पर होते हैं। उग्र तपश्चर्याएं एवं कठोर तन्त्र साधनाएं इस पांचवें शरीर, स्थिति या आयाम को ही प्रबल बनाने, परिपुष्ट करने के लिए की जाती हैं। संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग, सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएं इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होती हैं। यों तो सामान्य तरह के सपने सभी देखते हैं पर किन्हीं-किन्हीं के सपने बिल्कुल यथार्थ होते तथा पूर्व बोध की अद्भुत क्षमता रखते हैं। जिनका पांचवां शरीर सुविकसित होता है उन्हें भूत-भविष्य अथवा महत्वपूर्ण घटनाओं का सन्देश देने तथा रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन करने वाले सपने आते हैं। त्रिकालज्ञ, सिद्ध स्तर के व्यक्तियों में पांचवां शरीर ही जागृत होता है। उन्हें भविष्य के गर्भ में पक रही घटनाएं सूक्ष्म जगत में प्रत्यक्ष वर्तमान की भांति दिखाई पड़ती हैं जो कि सामान्य स्थिति के व्यक्तियों के लिए असम्भव सा ही होता है।
ऋषि, तपस्वी, संतों योगीजनों में छठा शरीर विकसित होता है। इसे कॉस्मिक बॉडी या देव स्वरूप स्थिति भी कहा गया है। जिनका अंतःकरण देवत्व से ओत-प्रोत हो, वे ही देवता हैं। देवता मानवी चेतना के छठे आयाम में ही निवास करते हैं अर्थात् ऐसे व्यक्ति जिनकी मनःस्थिति एवं अन्तःकरण देवताओं जैसा विकसित हो, जो मात्र देना ही जानते हों, सर्वत्र विराट् की ही अनुभूति जिन्हें हो वे जीते जागते मानव शरीर में विराजमान देवता हैं।
ब्रह्म शरीर अथवा बॉडीलेस बॉडी अन्तिम सातवें आयाम की स्थिति है। इस सातवें शरीर के विकसित होने पर स्थूल शरीर सम्बन्धी सभी प्रारम्भिक आसक्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। परमात्मा से, नियामक सत्ता से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता तथा परस्पर दिव्य आदान-प्रदान का मार्ग खुल जाता है। ब्रह्म शरीर का सम्बन्ध ब्रह्म से बन जाने से उसकी स्थिति लगभग ब्रह्म स्तर की हो जाती है। ऐसे ही स्तर पर पहुँचने की स्थिति को वेदान्त में ‘तत्वमसि’, ‘सच्चिदानंदोऽहम्’, ‘शिवोऽहम्’ कहा गया है। अवतार सातवें शरीर में पहुँची आत्माएँ होती हैं। जिनकी अपनी कोई इच्छा-आकाँक्षा नहीं होती। सृष्टि सन्तुलन के लिए वे समय-समय पर विधाता की इच्छानुसार विकसित अवतरित होती हैं तथा प्रयोजन पूरा करतीं, लोक मंगल के लिये जीकर अनेकानेकों को अपने साथ तारती देखी जाती हैं।
भौतिक आकर्षणों की परिधि तीसरे आयाम तक होती है। नर और नारी की मान्यताएँ भी इसी स्थिति तक सीमित रहती हैं। क्रमशः चौथे। पांचवें, छठे एवं सातवें आयामों के विकसित होने पर साधक को सर्वत्र एक ही आत्मा की अनुभूति होने लगती है। गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ तथा उपनिषद् में उल्लिखित तत्वदर्शी की स्थिति छठे शरीर के विकसित होने पर बन जाती है। परिवर्तनशील संसार की घटनाएं ऐसी मनःस्थिति सम्पन्न देवपुरुषों को प्रभावित नहीं कर पातीं। वे निर्विकार, निर्लिप्त एवं निस्पृह बने रहकर आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रगामी बने रहते हैं।
प्रकृति प्रेरणा से तीन शरीरों तक विकास हर व्यक्ति का अन्य जीवों की तरह अपने आप होता रहता पर इसके आगे के सूक्ष्मतम शरीरों के आयामों के लिए स्वयं साधना पुरुषार्थ करना पड़ता है। सप्तलोकों में एक से बढ़कर एक सम्पदाएँ एवं विभूतियाँ का उल्लेख शास्त्र ग्रंथों में मिलता है। वे सभी विभूतियाँ, ऋद्धियां एवं सिद्धियां मनुष्य के भीतर विद्यमान इन गहन परतों में सन्निहित हैं। भौतिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ उन्हें ही करतलगत होती हैं, जो असाधारण पुरुषार्थ के लिए साहस जुटाते हैं। इससे भी आगे की आत्मिक क्षेत्र की चमत्कारी विभूतियाँ उन्हें ही प्राप्त होती हैं, जो उच्चस्तरीय साधना पुरुषार्थ के लिए साहस संजोते तथा तत्पर होते हैं। आध्यात्मिक जगत की इस रीति नीति से अवगत होना हर मनुष्य शरीर धारी जीव के लिये अनिवार्य है। इस ज्ञान को पाकर ढर्रे का जीवन न जीकर कुछ ऊंचा कर गुजरना एवं अधिक न सही तो भौतिक दृष्टि से ही लाभान्वित हो सकना हर किसी के लिये सहज ही शक्य है।
अन्तश्चेतना जब जागती है तो भोग में डूबे व्यक्ति को भी सही दिशा देकर वैराग्य की ओर मोड़ देती। मिथिला देश के अधिपति राजा नमि “याव त् जीवेत् सुखं जीवत्...........” मन्त्र को मानने वाले, सदैव विलास में रत, अपनी दृष्टि में सुखी व्यक्ति थे। भोग-विलास की अति की परिणति हुई- दाह ज्वर के रोग में जो भयंकर रूप में उनकी त्वचा को फोड़कर बह निकला। जीवन भार में बदल गया। वे ही सुख-साधन अब भारभूत नजर आने लगे।
वैद्यराज के आदेश से चन्दन का लेप आरम्भ किया गया। राजा के प्रति समर्पित उनकी रानियों ने चन्दन घिसने, परिशोधित करने व अपनी भावनाओं से अनुप्राणित करने का कार्य अपने जिम्मे लिया। अपने प्रति इस अनुराग को देख राजा भाव विभोर हुए लेकिन रानियों के चन्दन घिसते समय चूड़ियों के मिलने से होने वाला शोर उनकी रोगी काया को सहन नहीं हुआ। रानियों ने विकल्प सोचा तथा सौभाग्य सूचक एक-एक चूड़ी रखकर अपना काम चालू रखा। अब वातावरण शान्त था तथा चन्दन का लेप सतत् राजा को दिया जा रहा था।
राजा सहज ही पूछ बैठे- कोलाहल न होने का कारण क्या है? चन्दन यदि घिसा जा रहा है तो क्या रानियों द्वारा नहीं, कहीं और से मँगाया जा रहा है? उत्तर मिला- “हर रानी के हाथ में मात्र एक चूड़ी होने से घर्षण नहीं हो रहा। “राजा को अनायास अन्तर्बोध हुआ। एकत्व की महत्ता उन्हें पहली बार ज्ञात हुई। एकत्व असंगत्व की पराकाष्ठा वैराग्य के रूप में हुई और रोगमुक्त हो वे आत्म साधना के राजपथ पर चल पड़े। उन्हें यह बोध न मिला होता तो सम्भवतः रोगों से ग्रसित वह काया कष्ट निवारण के बाद पुनः उस अधोगामी पथ पर चल पड़ते अन्तबोध- आत्म जागृति की प्रेरणा सदैव मनुष्य को श्रेष्ठ पथ पर ले जाने की होती है। जरा कोलाहल तो थमे, उस ओर ध्यान तो जाए।
आम आदमी अपनी प्रसन्नता कुछ वस्तुओं, व्यक्तियों या परिस्थितियों पर निर्भर मानता है और उनका सान्निध्य, अनुग्रह या बाहुल्य उपलब्ध करने के लिए प्रयत्नरत रहता है। सुख की इच्छा स्वाभाविक है। उस प्रयास में पुरुषार्थी बनने और व्यस्त रहने का अवसर मिलता है। इसी प्रकार दुःख से बचने की बात भी सारगर्भित है। कठिनाई में न पड़ने या उबरने के प्रसंग भी अधिक जागरुकता एवं साहसिकता प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से सुविधा साधनों के संचय तथा परिस्थितियों के अनुकूल की आकाँक्षा भी अधिक जागरुकता एवं साहसिकता प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से सुविधा साधनों के संचय तथा परिस्थितियों के अनुकूलन की आकांक्षा का औचित्य भी है। सामान्य जन यदि ऐसा सोचते हैं और उस हेतु प्रयत्नरत रहते हैं तो इसमें अनुचित जैसी कोई बात भी नहीं है। असमंजस तब उत्पन्न होता है जब इन प्रयत्नों में संलग्न रहने पर भी छुटपुट सफलताएँ मिलते रहने पर भी सन्तोष नहीं होता और दुःखी विपन्नों जैसी मनःस्थिति जड़ जमाये बैठी रहती है।
इस संदर्भ में यदि हम थोड़ा गहराई से विचार करें तो जान पड़ता है कि मान्यता क्षेत्र की कुछ मौलिक भूलें भी रहती हैं जिनके कारण आवश्यकता से अधिक निराशा और खिन्नता से ग्रसित रहना पड़ता है। इन भूलों में प्रमुख यह है कि जैसा हम चाहते हैं, वैसा ही होना चाहिए। जिन वस्तुओं की अभिलाषा है, वे मिलनी ही चाहिए। संबद्ध व्यक्तियों को हमारा कहना मानना ही चाहिए। जैसी उनसे अपेक्षा की गयी है, वैसा ही उन्हें करना या रहना चाहिए। परिस्थितियों का प्रवाह वैसा ही बहना चाहिए जैसा की सोचा या चाहा गया है। यह मान्यता संसार की संरचना और प्रकृति प्रवाह के तारतम्य के साथ परिचय न होने के कारण ही बनती है। यह संसार मात्र हमारे लिए ही नहीं बना है। वैभव का सृजन हमारे हाथ में रहने के लिये ही नहीं हुआ है। प्राणियों की अपनी सत्ता एवं चेतना भी है, यह बहुधा हम भूल जाते हैं।
यह कोई अनिवार्य नहीं कि कोई हमारी मर्जी के अनुरूप ही अपनी गतिविधियों का निर्धारण करे? जब हम स्वयं दूसरों की इच्छा के अनुरूप ढल नहीं पाए तो यह आशा करना व्यर्थ एवं अनौचित्यपूर्ण है कि संबद्ध लोग ही हमारे कहने पर चलेंगे। जब लोग नियन्ता तक की अवज्ञा करते हैं तो फिर कैसे आशा की जाय कि हर कोई वैसा करेगा, बनेगा, रहेगा, जैसा कि चाहा गया है। यह अतिवाद है। हर किसी कि एक मर्यादा है। अपनी भी है। दूसरों के साथ व्यवहार साधना तो पड़ता है, पर यह मानकर चलना चाहिए कि जितनी अनुकूलता मिल सके उतने से ही काम चलाया जाय और अधिक पाने के लिये प्रयास जारी रखे जायं। जो नहीं मिला, उससे खिन्न रहने की अपेक्षा यही अधिक अच्छा है कि जो हस्तगत हुआ, उस पर मोद मनाते हुए जीवन शकट को नियति पथ पर आगे बढ़ाया जाय। महत्वाकाँक्षी होने में हर्ज नहीं, पर वे उमंगें मात्र सुखद कल्पनाओं तक ही सीमित रहे। उनका उपयोग प्रयत्नशीलता को अधिकाधिक बढ़ाते रहने के लिए ही करना चाहिए। इससे आगे बढ़ना और आतुरता की सीमा तक पहुंचना हानिकारक है। गुँजाइश इस बात की भी रहनी चाहिए कि प्रतिकूलता प्रबल रही तो भी अपना उत्साह गँवाया न जाएगा। असफलता को निराशा और खिन्नता की सीमा तक पहुँचने न दिया जाएगा। स्मरण रहे सन्तुलन बनाये रहने पर ही अभीष्ट लक्ष्य की दिशा में गिर-गिरकर उठने और उठ-उठकर चलने की बात बनती है। आतुर महत्वाकाँक्षाएँ ही प्रातः निराशा में बदलती और मनोबल को इतना तोड़-मरोड़कर रख देती हैं कि फिर कुछ करते धरते ही न बन पड़े।
जीवन शास्त्र के मनीषी ए. एल्वारेज ने लिखा है- “प्रतिकूलता एवं अनुकूलता सापेक्ष हैं। एक व्यक्ति के लिए जो बात दुर्भाग्य का चिन्ह हो सकती है, उसी की उपलब्धि अधिक गई-गुजरी स्थिति में रहने वाले अपना सौभाग्य मान सकते हैं। अपंगों के लिए वे भी सौभाग्यवान हैं जो लंगड़ाकर चल लेते हैं। किन्तु लंगड़ा जब दौड़ने वालों के साथ अपनी तुलना करेगा तो स्वयं को अभागा अनुभव करेगा। वस्तुतः अभागा कोन है? इसका कोई पैमाना नहीं। दरिद्री किसे कहा जाय? दुःखी किसे कहा जाय? इसके उत्तर में दो बातों ही कही जा सकती हैं। एक यह कि किसके साथ तुलना की जा रही है। दूसरा यह कि आकाँक्षा की आतुरता का दबाव कितना है? कइयों को छोटी-छोटी प्रतिकूलताओं में अपना सन्तुलन खोते- आत्मघात तक करते देखा गया है जबकि दूसरे लोग उन्हीं असफलताओं को नियति का एक मजाक भर मानते, नया रास्ता अपनाते और नये सिरे से ताना-बाना इस प्रकार बुनते देखे गये हैं मानो कि कुछ हुआ ही न हो। इससे सिद्ध होता है कि महत्व परिस्थितियों का नहीं, मनःस्थिति का है।”
खीज और निराशा भी शोक सन्ताप की तरह मानसिक सन्तुलन को गड़बड़ा देती है। असन्तुष्ट और विक्षुब्ध व्यक्ति अध-पागलों की स्थिति में जा पहुँचते हैं। कठिनाई से निकलने के लिए क्या करना चाहिए, प्रतिकूलताओं से बचते बचाते नया रास्ता क्या अपनाना चाहिए, इसका निर्धारण आतुर या आवेश ग्रस्त मस्तिष्क के लिए कर सकना कठिन है। सामान्य परिस्थितियों में काम-काज का ढर्रा घुमाते रहना एक बात है और अवरोध खड़ा होने पर नये सिरे से नया कुछ सोच सकना- नया कुछ कर सकना सर्वथा दूसरी। इसके लिए अधिक यथार्थवादी सूझ-बूझ चाहिए। वह उद्विग्नता के रहते सम्भव नहीं। कुशल सेनापति हर स्थिति में अपना सन्तुलन बनाये रहते हैं तभी तो उनके लिए स्थिति के अनुरूप उलट-पलटकर निर्णय कर सकना सम्भव होता है। यदि वह किसी असफलता से सन्तुलन गँवा बैठे, असफलता पर उन्मत्त होने लगे तो समझना चाहिए कि अनुपयुक्त कदम उठेगा और नया संकट खड़ा होगा। जो अपेक्षा कुशल सेनापति से बड़े मोर्चे पर बड़े रूप में युद्ध संचालन के निमित्त की जाती है, वही छोटे रूप में सामान्य जीवनचर्या के संदर्भ में भी आवश्यक होती है। यह स्थिति है या नहीं इसका एक ही मापदण्ड है कि व्यक्ति अपने चेहरे पर सहज मुसकान बनाये रह रहा है या नहीं।
खिन्नता असफलता की अभिव्यक्ति है। असफलता का मूल्यांकन अयोग्यता के रूप में किया जाता है। अयोग्यों के साथ किन्हीं की सहानुभूति तो हो सकती है और कोई उदार उनकी सहायता भी कर सकता है किन्तु ऐसा नहीं होता कि उन्हें सम्मान दिया जाय, सराहा जाय, मैत्री योग्य समझा जाय। ऐसी दशा में खिन्नता व्यक्त करने वाले भले ही दूसरों से उथली सहानुभूति कुछ समय के लिए पा सकें, पर अपनी गरिमा तो गँवा बैठते हैं। लोग ऐसे साथी चाहते हैं जो सफल, समर्थ एवं सुयोग्य हों। यह विशेषताएँ सिद्ध करने में मात्र वे ही समर्थ होते हैं जो प्रसन्न और आशान्वित रहते हैं। साहस और पराक्रम बनाये रहना भी ऐसे ही लोगों से बन पड़ता है। फलतः सम्मान और सहयोग भी उन्हें ही मिलता है। मित्रता के लिए उन्हीं की ओर संसार के हाथ बढ़ते हैं।
प्रसन्नता निठल्लेपन की नहीं, व्यस्तता के नजदीक खोजी जा सकती है। कई लोग मौज मजे की जिन्दगी उसे समझते हैं जिसमें खाली बैठने का अवसर मिलता है और निरर्थक या उथली बातों में दिन गुजरता है। यह हलकापन व्यक्ति को अपनी और दूसरों की आंखों में भी हलका बना देता है। हलके का अर्थ है- उथला निरर्थक। यह व्यक्तित्व का अवमूल्यन है। महत्व खो बैठन पर सम्मान भी चला जाता है। जो अपनी तथा दूसरों की आँख में महत्व गँवा बैठा, समझना चाहिए कि उसकी गणना उथलों में- अयोग्यों में होने लगी। ऐसी स्थिति में न कोई गौरवान्वित हो सकता है और न सच्चे अर्थों में प्रसन्न ही रह सकता है।
दूसरों की निंदा या प्रशंसा पर लहराने वालों को भी एक तथ्य जानना चाहिए कि इसके पीछे प्रायः चाटुकारिता या ईर्ष्या काम करती है। ऐसी दशा में सामान्य जनों को न तो प्रशंसा का कोई महत्व है और न निंदा का। उसका महत्व तो तब बनता है जब किसी विवेकवान व्यक्ति द्वारा गहरी छान-बीन करने के उपरान्त कोई निष्कर्ष निकाला और सुधार प्रोत्साहन के उद्देश्यों को सामने रखकर व्यक्त किया गया हो। उद्देश्य और काम का सही स्वरूप समझना मात्र अपने लिए ही सम्भव हो सकता है। इसलिए यदि निन्दा प्रशंसा का कोई महत्व माना जाय तो वह आत्मावलोकन आत्म-निरीक्षण के आधार पर अपने द्वारा ही प्रस्तुत की गई होनी चाहिए।
दुराग्रही प्रायः रुष्ट असन्तुष्ट पाए जाते हैं। बदली हुई परिस्थितियों में अपने चिन्तन एवं व्यवहार को बदलने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए जो तैयार रहते हैं, वे प्रसन्न रहते पाये जाते हैं। जिन्हें देश, काल, पात्र के अनुरूप अपने व्यवहार में परिवर्तन करना आता है, समझना चाहिए कि उन्हें संसार में रहना हलका-फुलका जीवन जीना आ गया। अड़ियल लोग ही प्रायः हैरान पाये जाते हैं। आदर्शवादी सिद्धांतों पर अडिग रहना और अपनी निजी जीवनचर्या को उसी ढाँचे में ढालना- इतने भर का आग्रह रखना पर्याप्त है। सभी वैसा करेंगे, वैसी अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। अवांछनीयता को सुधारने के कई तरीके हैं। उसके लिए विरोध, असहयोग और संघर्ष तक के तरीके काम में लगाये जा सकते हैं। पर वे कटु प्रयास भी अपनी शालीनता गँवा बैठन जैसे नीचे स्तर पर उतर कर नहीं होने चाहिए। रोग को निरस्त करने और रोगी को बचाने की नीति अपनाकर दुर्जनों से भी सफल लड़ाई लड़ी जा सकती है। इस नीति को अपनाकर चलने में प्रसन्नता भी बनी रहती है और सफलता भी अपेक्षाकृत अधिक मिलती है।।
अपने काम ही अपनी प्रसन्नता के आधार हो सकते हैं। अपने लोगों के साथ रहकर भी प्रफुल्ल रहा जा सकता है। अपनी परिस्थितियों को सँभालने और सुधारने का कार्यक्षेत्र भी इतना है, जिसमें कौशल व्यक्त करते हुए किसी के लिए भी प्रसन्न रहने और रखने का आधार बना रह सकता है। नई वस्तुओं में, नई परिस्थितियों में, नये व्यक्तियों में प्रसन्नता खोजते फिरने की अपेक्षा यही अच्छा है कि जो कार्यक्षेत्र एवं परिकर उपलब्ध है उसी का स्तर उठाने में अपना कौशल प्रदर्शित किया जाय और उसी पुरुषार्थ के आधार पर प्रसन्न रहने का अपना स्वरूप बना लिया जाय।
अविश्वास और आशंका की हलकी सी किरणें बनाये रहने पर खतरों से बचा और जागरुक रहा जा सकता है किन्तु उसकी अति में हानि ही हानि है। हर किसी को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाय, हर किसी पर सन्देह किया जाय तो फिर इस संसार में कुरूपता और कुढ़न के अतिरिक्त और कुछ शेष ही न रहेगा। भविष्य की आशंका में निमग्न रहा जाय तो अपनी कुकल्पनाएँ ही चित्त को उद्विग्न बनाये रहने के लिए निमित्त कारण बन जायेगी। भले ही वस्तुतः वैसा कुछ होने वाला न हो।
एकाकी व्यक्ति अपने आपको असहाय अनुभव करता है। जो व्यक्ति अपने को आत्मीयों और सज्जनों से घिरा हुआ अनुभव करते हैं, उन्हें मानवी सज्जनता और सहकारिता पर विश्वास रहता है। जो दूसरों का दुःख बँटाते और अपना सुख बाँटते रहते हैं, उन्हें हलकी-फुलकी- हंसती-हंसाती जिन्दगी जीने का अवसर मिलता है। ऐसे लोग हर परिस्थिति में- हर स्थान में- हर प्रकार के व्यक्तियों के साथ रहते हुए भी अपनी प्रसन्नता को अक्षुण्य बनाये रहते हैं।
चीनी कभी घुलकर भी अपना अस्तित्व नहीं खोती, और जल घुलाकर अस्तित्व नहीं बनाए रख पाता। वस्तुतः जिसमें घुलने की क्षमता है, वही अपने को बृहद् रूप में अभिव्यक्त कर पाता है। यदि हम विवेक सम्मत ढंग से समर्पित होना- घुलना सीख लें तो मान लेना चाहिए कि हमारी तौल बढ़ गयी। ऐसे में हमारा उद्देश्य सदैव सच्चा हो, समर्पण को भुनाने की कभी कोई कामना न हो।
इंद्रियों की बनावट बहिर्मुखी है। यही कारण है कि अधिकांश व्यक्ति जो कुछ सोचते अथवा करते हैं उनमें बहिरंग परिस्थितियों की प्रेरणा का अधिक योगदान होता है। बाह्य अनुकूलताओं को प्रायः अत्याधिक महत्व दिया जाता है। प्रतिकूलताओं को एक दैवी अभिशाप के रूप में माना जाता है तथा यह सोचा जाता है कि इनके रहते कभी भी आगे बढ़ना प्रगति-पथ पर चलना सम्भव नहीं है। साधनों का महत्व तो है पर उन्हें ही सर्वस्व मानना एक मानसिक परावलंबन है। ऐसी मनःस्थिति के रहते सचमुच ही प्रगति सम्भव नहीं।
मनुष्य को प्राप्त क्षमताएं अन्यान्य भौतिक साधनों की तुलना में अधिक मूल्यवान तथा सामर्थ्यवान हैं। अध्यात्मवादियों से लेकर आधुनिक मनोवैज्ञानिकों तक सभी ने माना है कि मनुष्य के संकल्प, इच्छा, आकांक्षा जीवन्त शक्ति स्त्रोत है तथा बाह्य भौतिक साधनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं। इनके अनुरूप ही व्यक्ति का स्तर बनता है। दृश्य परिस्थितियों के निर्माण में भी अदृश्य भूमिका इनकी ही होती है। इच्छाएँ आकाँक्षाएँ न केवल परिस्थितियों को प्रभावित करती हैं वरन् शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जिम्मेदार हैं।
प्रचलित फ्रायडवादी मनोविज्ञान से अलग सुपर साइकोलॉजी का प्रतिपादन करने वालों में अमरीकी मनोवैज्ञानिक अब्राह्म मैस्लो का नाम प्रमुख है। उनका कहना है कि ‘मानसिक स्वास्थ विचार अथवा इच्छा तंत्र पर निर्भर करता है। यह विचार तन्त्र एक कार की बैटरी के समान है। जिस प्रकार बैटरी के निष्क्रिय पड़ते ही कार का चलना सम्भव नहीं है, उसी तरह निकृष्ट विचारणा के रहते मानवी विकास अवरुद्ध रहता है। मनःअसन्तुलन प्रायः इसी कारण उत्पन्न होते और विविध प्रकार के शारीरिक, मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। मैस्लो का मत है कि मनुष्य के अन्तराल में सुपर चेतन केन्द्र का भी अस्तित्व है जो प्रसुप्त पड़ा है। इस प्रसुप्ति का कारण है उस केंद्र से उठने वाली दिव्य प्रेरणाओं की उपेक्षा। उन्हें सुना और तद्नुरूप क्रियाकलाप अपनाया जा सके तो मनुष्य अपनी सामर्थ्य को कई गुना बढ़ा सकता है।।
आत्म विस्मृति से ग्रस्त व्यक्तियों के संदर्भ में मनःशास्त्री जेम्स अपनी पुस्तक ‘दि एनर्जीज ऑफ मैन’ में लिखते हैं कि ‘उनकी स्थिति हिस्टीरिया ग्रस्त रोगी की तरह होती है जिसकी दृष्टि भ्रमित रहती तथा शक्ति एवं प्रतिभा कुँठित पड़ जाती है। समाज में उन व्यक्तियों की ही बहुलता है जो अपनी भीतर की सामर्थ्य से प्रायः अपरिचित बने रहते हैं, न तो उसे जगा पाते हैं और न ही उपयोग कर पाते हैं। फलतः दीनहीन असमर्थों असहायों जैसी जिन्दगी व्यतीत करते हैं।’
जेम्स के अनुसार विचार पद्धति सही होने पर मनुष्य हर समस्या का समाधान ढूंढ़ने में पूर्णतया समर्थ है। आत्मविस्मृति के कारण ही विचार तन्त्र गड़बड़ाता और किसी भी समस्या पर सही विचार करते नहीं बनता। वे पहाड़ जैसी दीखतीं और दुर्जेय जान पड़ती हैं। ऐसी स्थिति में निषेधात्मक दृष्टि को परिपोषण मिलता है। जीवन के प्रति निराशा ऐसे कदम उठाने की प्रेरणा देती है जिसे पलायनवाद की संज्ञा दी जा सकती है। उलटे चिन्तन के उलटते तथा सही मार्ग पर आते ही अपनी भूल का पता चलता तथा अनुभव होता है कि जो सोचा और किया जा रहा था वह अज्ञान से अभिप्रेरित था। ‘दि डिवाडडेडसेल्फ’ में एक घटना का उल्लेख है जो विधेयात्मक चिन्तन की असाधारण महत्ता पर प्रकाश डालती है-
एक युवक को विरासत में अगाध पैतृक संपत्ति मिली। उसने संपत्ति को व्यसनों में पानी की तरह बहा दिया। उसकी मौजमस्ती तब तक चलती रही जब तक कि वह पूरी तरह कंगाल नहीं बन गया। विलासिता की स्थिति में उसकी सामर्थ्य भी कुंठित हो गयी। दरिद्रता असह्य होने पर वह आत्म हत्या करने चल पड़ा। इसके लिए वह एक ऊँची चोटी पर चढ़ गया। छलांग लगाने को जैसे ही तैयार हुआ उसके मस्तिष्क में एक विचार बिजली की तरह कौंधा। आत्म विश्वास जग पड़ा। उसने सोचा जितना दुस्साहस आत्महत्या करने के लिए जुटाया जा रहा है उतना ही यदि प्रस्तुत विपन्नता को दूर करने में लगा दिया जाय तो निश्चित रूप से दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल सकता है। इसी विचारणा से प्रेरित होकर एक नये उत्साह नयी उमंग के साथ वह पहाड़ी से नीचे उतरा। पुरुषार्थ एवं संचय की नीति अपनाकर कुछ ही वर्षा में सम्पन्न बन गया। ज्ञातव्य है कि ऐसे ही विचार आत्मबोध की दिशा में अग्रसर स्वामी रामतीर्थ व दयानन्द को भी आये थे। उन्होंने अन्तः की प्रेरणा के आधार पर अपनी जीवन दिशा बनायी खुद तरे और कइयों को पार किया।
एक अन्य घटना का उल्लेख इस पुस्तक में किया गया है- भाव शून्यता के रोग से एक युवक ग्रस्त था। अहिर्निश वह शराब के नशे में डूबा रहता था। मद्यपान से शारीरिक एवं मानसिक शक्तियां खोखली पड़ गयीं। किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता था। क्रमशः वह मृत्यु की और बढ़ रहा था। एक दिन अचानक भीतर से प्रेरणा उठी की वह अपने आपको मारने पर तुला हुआ है। उसे व्यसन छोड़ देना चाहिए। यह असम्भव नहीं पूर्णतया सम्भव है। इस तरह के भावों का संचरण होते ही उसने शराब न पीने का संकल्प लिया। उस दिन से वह अपने आपको कामों में जबरन व्यस्त रखने लगा। जब कभी भी मन में नशे की माँग उठती वह अपने संकल्पों को मजबूत बनाता तथा उस समय अच्छी पुस्तकों के अध्ययन में लग जाता। ऐसी पुस्तकें जो उसके संकल्पों को दृढ़ बनाती तथा विधेयात्मक विचारों को परिपुष्ट करतीं। इस साधना का प्रतिफल यह निकाला कि उसने अपने जानलेवा व्यसन को छोड़ने में सफलता पायी। इस दृढ़ता से उसके संकल्प शक्ति में वृद्धि हुई। विधेयात्मक चिन्तन के कारण उसे असाध्य जान पड़ने वाले रोग से छुटकारा मिला। जीवन, जो उसे भारभूत निरर्थक जान पड़ता था। अब उत्साह उमंग से भरा तथा सार्थक लगने लगा।
प्रख्यात मनःशास्त्री कॉलिन विल्सन का कहना है कि मन की परतों को समझने में कुछ गलती हुई है। दृश्य पक्ष चेतन के क्रिया-कलापों के रूप सामने आता हैं, जो बहिर्मुखी इंद्रियों का प्रायः पक्षधर रहता है। इंद्रियों की रुझान उपभोग में होती है। वह चेतन मन को भी अपने अनुरूप खींचती है। फ्रायड ने यह देखकर ही प्रतिपादन किया था कि मनुष्य अन्य पशुओं की तरह मूल प्रवृत्तियों का गुलाम तथा इंद्रियों का दास है। पर विल्सन का मत है कि “अदृश्य पक्ष अचेतन तथा सुपर चेतन की चमत्कारी सामर्थ्य से अपरिचित होने तथा उपयोग में न आने के कारण ही ऐसा सोचा जाता है। बोध हो सके तो मनुष्य अपनी हर विकृत इच्छा, आकांक्षा तथा उनसे संचालित होने वाले अवाँछनीय क्रिया-कलापों पर नियन्त्रण स्थापित कर सकता है।
चेतन अचेतन के बीच सामंजस्य का अभाव भी कितनी ही प्रकार की समस्याएँ खड़ा करता है। उचित अनुचित के बीच भेद न कर पाने तथा यथार्थता से दूर बने रहने में प्रायः यह अड़चन ही आड़े आती तथा आत्मविकास के मार्ग में गतिरोध उत्पन्न करती है। दोनों में तालमेल बिठा सके तो मन की सामर्थ्य कई गुनी बढ़ सकती है। इसके लिए सुपर चेतन के निर्देशों को समझना तथा उसकी प्रेरणाओं पर चलना होगा, जिसकी प्रायः उपेक्षा होती रहती है। इस केन्द्र से दिव्य प्रेरणाएं कभी न कभी उभरती हैं पर अचेतन का अभ्यस्त स्वभाव उन्हें दबा देता तथा व्यवहार में आने से रोक देता है। विद्वान ‘मित्या करामाजोव’ के अनुसार श्रेष्ठता की भावना का उद्भव ही मानवी विकास का सही अर्थों में कारण बनता है। ऐसी भावनाएँ सुपर-चेतन से समय-समय पर निस्सृत होती रहती हैं जिसे अधिकांश व्यक्ति प्रायः अनसुनी कर देते हैं। फलतः व्यक्तित्व विकास की संभावनाएं धूमिल पड़ी रहती हैं।
‘व्हाट मेक्स ए लाइफी सिग्नीफिकेण्ट’ पुस्तक में मनःशास्त्री विलियम मोक्स ने मनुष्य की सुपर चेतन परतों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि मनुष्य के भीतर अतिमानवी सामर्थ्य विद्यमान हैं। जिन्हें करतलगत कर सकना सम्भव है। इसका आरम्भिक क्रियात्मक चरण है ढर्रे की गतिविधियों को उलटने तथा सूझ-बुझ से भरी दूरदर्शिता युक्त महानता के मार्ग का अवलम्बन करने के लिए अपने संकल्पों को परिपुष्ट तथा दृढ़ करना। संकल्प की दृढ़ता पशुवत् अभ्यस्त स्वभावों से छुटकारा पाने तथा आत्म विजय प्राप्त करने का प्रमुख आधार है। इसका सम्पादन तथा अभिवर्धन निरन्तर के अभ्यास से सम्भव है। जो जितना आधिक संकल्पवान है, वह उतना ही अधिक समर्थ है। संकल्प दृढ़ता जब सत्प्रवृत्तियों का पक्षधर बन जाती है तो अतिमानवी सामर्थ्य हस्तगत करने का मार्ग क्रमशः प्रशस्त होने लगता है।
जेम्स ने एक नये मनोवैज्ञानिक तथ्य का उद्घाटन किया है जिसकी प्रायः फ्रायड तथा फ्रायडवादी अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने उपेक्षा की है। वे कहते हैं ‘मनुष्य के सदुद्देश्यपूर्ण कार्य करने से इच्छा शक्ति, संकल्पशक्ति प्रबल होती है। इससे मन की सचेतन अचेतन परतों के बीच तारतम्य बनाने में भी सफलता मिल जाती है। प्रायः अधिकांश व्यक्ति यह शिकायत करते सुने जाते हैं कि मन में श्रेष्ठ कार्य करने तथा महानता के पथ पर चलने की आकाँक्षा तो है पर जाने किन कारणों से वह सुयोग नहीं बन पा रहा है। वस्तुस्थिति पर गम्भीरता से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उनकी गतिविधियाँ निरुद्देश्य बनी रहतीं अथवा भौतिक प्रयोजनों के ही इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। सत्प्रवृत्तियां अपनाने का वे सत्साहस नहीं जुटा पाते, जिसने संकल्पों को सुदृढ़ बनाने का सुअवसर मिल सकता था। सत्कार्यों में मन को अभ्यास का अवसर न देने से ‘वह आकाँक्षा’ कि महानता को वरण किया जाय, मात्र एक कपोल कल्पना बनी रहती है।
इच्छाओं-आकाँक्षाओं के अनुरूप ही मनुष्य के क्रिया-कलाप बनते हैं। उनकी बागडोर शरीर की इन्द्रियों अथवा मन के हाथों में दे देने से मनुष्य सचमुच ही अपनी मूल प्रवृत्तियों का गुलाम बन जाता है और आत्मविकास के मार्ग को स्वयं अवरुद्ध कर लेता है। अभ्यास में ढल जाने के बाद इंद्रियों की गुलामी तोड़ना कठिन पड़ता है। तब वह उनकी माँगों को ही प्रमुख मानता है तथा उनकी पूर्ति में ही जीवन खपा देता है। बाह्य साधनों को अतिशय महत्व देने की ऐसी प्रवृत्ति बन जाती है कि उनके अभाव में मनुष्य स्वयं को असहाय असमर्थ,दीन-दुर्बल महसूस करता है।
बाह्य परिस्थितियों को ही सब कुछ मानने की अपेक्षा भीतर झाँका जा सके तो मालूम होगा कि कितनी ही प्रकार की शक्तियाँ अपने ही अन्दर मौजूद हैं जिनका प्रायः सदुपयोग नहीं हो पाता। आत्म विस्मृति के कारण इच्छाओं, आकाँक्षाओं का सुनियोजन नहीं हो पाता। वे मात्र सामान्य प्रयोजन पूरा करने तक रह जाती हैं। सुपर चेतन की दिव्य प्रेरणाओं के अनुरूप उन्हें गतिशील किया जा सके तो महानता को वरण करना हर व्यक्ति के लिए सुगम हो सकता है।
बच्चा दिये को बड़ी मोहक दृष्टि से देख रहा था। घर ठहरे मेहमान ने पूछा- ‘मुन्ने, यह प्रकाश कहाँ से आया?’ बच्चे ने उत्तर दिया, ‘भगवान के घर से।’ अतिथि ने जिज्ञासा जतलाई- ‘अच्छा, तुम भगवान को जानते हो तो बताओ वह कहाँ रहता है?, बच्चे ने दीपक को बुझाते हुए कहा- ‘यह प्रकाश जहाँ चला गया वहाँ।’ बच्चे की सरलता ने स्पष्ट किया- अदृश्य प्रकाश के रूप में वही तो कण-कण में विद्यमान है। यही तो सम्भवः उस प्रश्न का उत्तर भी है कि बाल सुलभ निश्चलता की स्थिति में पवित्रता को पाए बिना हम कभी भगवान की उपस्थिति की उसकी सत्ता के हमारे रोम-रोम में बसे होने अनुभूति नहीं कर सकते।
सम्पन्न और सफल कौन बन सकेगा, इसका विवेचन बाइबिल की कई ऋचाओं में आया है। भविष्य किसका उज्ज्वल है। बड़ों की पंक्ति में कोन खड़ा होने वाला है। इस सम्भावना का आधार बताते हुए बाइबिल में कहा गया है-
“यदि ऐसा कोई व्यक्ति देखें जो तत्परता और तन्मयता पूर्वक अपना काम-काज करता हो तो समझना वह अगले दिनों पिछड़ों की पंक्ति में नहीं, शासकों और मार्ग दर्शकों के ऊंचे स्थान पर खड़ा होगा।”
इसी तथ्य की पुष्टि में एक और भी उक्ति है-
“लाभ में सिर्फ परिश्रमी रहते हैं। बकवादी तो अपनी रही बची इज्जत और ताकत को गंवाते चले जाते हैं।”
“जिसके पास आज धन नहीं वह चिन्ता न करे। जो परिश्रमरत है, वह समेटेगा और बढ़ेगा।”
वस्तुतः यह शारीरिक और मानसिक परिश्रम ही है जिसे यदि ईमानदारी और दिलचस्पी के साथ करते रहा जाय तो मनुष्य की योग्यता बढ़ती है। प्रतिभा निखरती है। साथ-साथ सुविधा साधनों की भी कमी नहीं रहती।
कई व्यक्ति सुयोग्य भी होते हैं और कमाऊ भी। किन्तु उन्हें पिछड़ी एवं गई-गुजरी स्थिति में पड़ा देखा जाता है। इसका कारण क्या है। इसमें बताते हुए बाइबिल ने दुर्व्यसनों की ओर इशारा किया है और कहा है कि बुरी लतें लग जाने पर जो कमाया जाता है वह सब कुछ गुम जाता है। ऐसे लोग आवश्यक कामों के लिए खर्च करने और बचाने की स्थिति में ही नहीं रहते। छेद वाले बर्तन में दुहने या दुधारू काम भी निरर्थक सिद्ध होता है। बुरी आदतें वह छिद्र हैं जिनके रहते किसी के सुख-शांति से रहने एवं उज्ज्वल भविष्य के सुनहरे दिन देखने की आशा नहीं करनी चाहिए।
दुर्व्यसनों की हानियाँ दर्शाते हुए बाइबिल ने कहा है- “पियक्कड़ और चटोरे अपने भाग्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। जो पियेगा सो चिथड़े पहनेगा और नंगा उघाड़ा मारा-मारा फिरेगा।”
यही बात बेईमानी के संबंध में भी है। वे लालच के वशीभूत होकर जिस-तिस उपाय से उचित अनुचित का विचार छोड़कर जल्दी ही सम्पन्न बनने के लिए उतारू होते हैं और कुमार्गगामिता अपनाकर अनीति पूर्वक धन कमाते हैं। कृपण लोग भी इसी प्रकार के होते हैं वे कमाते तो हैं पर जोड़ते भी हैं। उपयोगी और आवश्यक कामों में भी खर्च करने से कतराते हैं। ऐसों की कमाई भारभूत होती है और संग्रहकर्ता को सुख देने के स्थान पर उलटे ले डूबने का कारण बनती है। बाइबिल का एक सूक्त इस प्रकार है- “लोभी उतावला होकर विवेक खो बैठता है और कोई अनीति पूर्वक कमाता है तो वह नहीं सोचता की ऐसा करने पर हर दृष्टि से घाटा ही घाटा है।”
जो दुष्टता करने का साहस नहीं कर पाते वे लालच की पूर्ति के लिए दूसरों को ठगते हैं और विश्वास देकर घात करते हैं। जिस तिस बहाने उधार माँगकर फिजूल-खर्ची की ललक पूरी करते हैं। कर्ज लेकर उसे शौक-मौज अथवा प्रमाद प्रसंगों में खर्च कर डालने वाले भी इसी श्रेणी में आते हैं। दुष्ट भ्रष्ट एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। ऐसे लोग आत्म-प्रताड़ना सहते और लोक भर्त्सना से नीचे आंखें किये रहते देखे गये हैं। बाइबिल की उक्ति है-
“जो उधार लेता है उसे देने वाले के सामने दास दीन या अपराधी की तरह नीची आँख करके रहना पड़ता है।”
इन तथ्यों को समझने वाले जहां परिश्रम और मनोयोग पूर्वक उपार्जन करते हैं, जहाँ अपनी योग्यता बढ़ाकर अधिक कमाने की सामर्थ्य अर्जित करते हैं वहाँ वे इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि खर्च में मितव्ययिता बरती जाय। जितनी आजीविका है उतनी सीमा में ही बजट बनाकर चला जाय। बेईमानी से न कमाया जाय और ठगने उधार लेने की अवांछनीयता को अपनाया जाय। नीतियुक्त और पसीना बहाकर कमाया हुआ धन ही किसी को सुख दे सकता है और भविष्य बना सकता है। इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए।
प्रत्यक्ष शरीर दीखता है। साज, संभाल एवं श्रृंगार भी उसी का सर्वाधिक किया जाता है। काया के पोषण एवं विकास पर ढेरों समय एवं साधन खर्च किये जाते हैं। बहुमूल्य आहार जुटाने जैसे बलवर्धक साधनों से लेकर आसन-व्यायाम आदि का उपक्रम अपनाया जाता है। स्वस्थ नीरोग रखने के लिए उपचार आदि की व्यवस्था बनायी जाती है। कितने ही व्यक्ति अपना सौंदर्य निखारने के लिए कृत्रिम संसाधनों का प्रयोग करते देखे जाते है। स्वस्थ एवं सुन्दर दीखने के लिए हर व्यक्ति अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप अपने-अपने स्तर पर प्रयास करता है। इस प्रयास में सफलता कितनों को मिलती है, यह बात अलग है, पर यह तो सुनिश्चित है कि अधिकांश व्यक्ति अपने शरीर के लिए प्रचुर समय, धन एवं शक्ति खर्च करते हैं।
शरीर के बाद आज के विज्ञजनों ने बुद्धि को महत्व दिया है। बुद्धि अर्थात् ‘इन्टेलीजेन्स’, जो प्रतिभा निखारने योग्यता बढ़ाने में काम आती है। बुद्धि को पैना बनाने तथा बढ़ाने के लिए भी तरह-तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं। स्कूली शिक्षा से बौद्धिक क्षमताओं का ही विकास होता है। वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ- प्रतिस्पर्धाएं भी इसीलिए आयोजित कि जाती हैं कि प्रतिभा निखरती चले। इस प्रयास में सफलता भी मिली है। बुद्धि की दृष्टि से आज का मनुष्य पुरातन की तुलना में कहीं आगे है और इस दिशा में वह निरन्तर ही आगे बढ़ता चला जा रहा है।
मानवी व्यक्तित्व की इन दो स्थूल परतों-शरीर और बुद्धि को ही सर्वत्र महत्व मिलता रहा है। मन इन दोनों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। प्रत्यक्षतया उसकी भूमिका नहीं दीख पड़ने से अधिकाँश व्यक्ति उसे महत्व भी नहीं देते। प्रायः वह उपेक्षित ही बना रहता है। यह एक सबसे बड़ी विडम्बना है कि व्यक्तित्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण परत उपेक्षा की गर्त में पड़ी है। शरीर एवं बुद्धि- न केवल मन के इशारे पर चलते हैं, वरन् उसकी भली-बुरी स्थिति से असामान्य रूप से प्रभावित भी होते हैं, इस तथ्य का समर्थन आधुनिक मनोविज्ञान भी निर्विवाद करने लगा है। व्यक्तित्व के इतने मूल्यवान घटक पर ध्यान न दिया जाय, उसकी साज-सम्भाल न की जाय, उसे स्वस्थ संतुलित रखने का प्रयास न किया जाय तो इससे बढ़कर आज के बुद्धिमान मनुष्य की भूल दूसरी और कोई नहीं हो सकती।
पोषण एवं सन्तुलन के अभाव में काया भी रुग्ण बन जाती है। अपनी सामर्थ्य गंवा बैठती है। वैचारिक खुराक न मिले तो बुद्धि की प्रखरता मारी जाती है। अधिक से अधिक वे जीवन-शकट को किसी तरह खींचने जितना सहयोग ही दे पाते हैं। उपेक्षा की प्रताड़ना मन को सबसे अधिक मिली है। फलतः उसकी असीम संभावनाओं से भी मनुष्य जाति को वंचित रहना पड़ा है। निरुद्देश्य भटकती एवं मचलती हुई इच्छाओं, आकांक्षाओं का एक नगण्य स्वरूप ही मन की क्षमता के रूप में सामने आ सका है। मनोबल संकल्प बल की प्रचण्ड सामर्थ्य तो यत्किंचित् व्यक्तियों में ही दिखायी पड़ती है। अधिकांश व्यक्तियों से मन की प्रचण्ड सामर्थ्य को न तो उभारते ही बनता है और न ही लाभ उठाते। मन को सशक्त बनाना उसमें सन्निहित क्षमताओं को सुविकसित करना तो दूर, उसे स्वस्थ एवं सन्तुलित रखना भी कठिन पड़ रहा है। फलतः रुग्णता की स्थिति में वह विकृत आकांक्षाओं, इच्छाओं को ही जनम देता है। इच्छाएँ मानवी व्यक्तित्व की, स्वास्थ्य सन्तुलन एवं विकास की प्रेरणा स्रोत होती है। उनका स्तर निकृष्ट होने पर मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती है। रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही जन्म देगा। मन रोगी हो तो काया भी अपना स्वास्थ्य अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रख सकती।
वैज्ञानिक क्षेत्र के नये अनुसंधानों ने प्रचलित कितने ही सिद्धांतों का खण्डन किया है। कितनी ही नयी प्रतिस्थापनाएँ हुई हैं तथा कितने ही सिद्धांतों में उलट-फेर करने के लिए विवश होना पड़ा है। अब धीरे-धीरे स्थूल के ऊपर से विश्वास टूटता जा रहा है। पदार्थ ही नहीं कायिक स्वास्थ्य के संबंध में भी प्रचलित धारणाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन होने की सम्भावना नजर आने लगी है। मनोविज्ञान ने मन की रहस्यमय परतों का विश्लेषण करते हुए यह रहस्योद्घाटन किया है कि मनःसंस्थान में कितने ही शारीरिक रोगों की जड़ें विद्यमान हैं। मन का उपचार यदि ठीक ढंग से किया जा सके तो उन रोगों से भी मुक्ति मिल सकती है, जिन्हें असाध्य एवं शारीरिक मूल का कभी ठीक न हो पाने वाला माना जाता है।
चिकित्सा जगत में ‘बिहेवियोरल मेडिसिन’ के विकास से उपचार की सर्वथा एक नयी मनोवैज्ञानिक पद्धति का प्रादुर्भाव हुआ है। इस उपचार प्रक्रिया में विशेषज्ञों ने मन और शरीर को एक कड़ी का दो छोर माना है। इसके आधारभूत प्रयोगों में न्यूरोकेमिकल्स को विकसित करने का प्रयास किया जाता है। बिहेवियोरल मेडिसिन के आविष्कारकों का मत है कि मन के भावनात्मक दबाव एवं तद्जन्य तनाव ही रोगोत्पादन के कारण बनते हैं।
‘बिहेवियोरल मेडिसिन’ चिकित्सा पद्धति का विकास सन् 1977 में येल विश्वविद्यालय (यू.एस.ए.) में हुआ। इसमें एन्थ्रोपोलॉजी, सोशियोलॉजी, एपिडेनिओलॉजी, साइकोलॉजी, साइकियाट्री, मेडिसिन तथा प्रारम्भिक जीवविज्ञान जैसे अनेकों विषयों का अध्ययन सम्मिलित था। संस्थान की व्यवस्था यहाँ पर सम्भालते हैं- मनःशास्त्री स्टीफेन एमवेस। इसकी शाखाएँ हृदय फेफड़ा, रक्त, संस्थान से सम्बन्धित मनोशारीरिक रोगों के उपचार के लिए खोली गयी हैं। मनःचिकित्सक डेविड हैमबर्ग के नेतृत्व में बिहेवियोरल मेडिसिन के प्रयोग परीक्षण के लिए एक एकेडेमी की स्थापना भी हुई है। संस्थान से एक मासिक जर्नल ‘दी जर्नल ऑफ बिहेवियोरल मेडिसिन’ नियमित रूप से प्रकाशित होती है, जिसमें इस उपचार पद्धति की नयी जानकारियों का प्रकाशन होता है।
उपचार पद्धति साइकोसोमैटिक मेडिसिन पर अवलम्बित है। शोध कार्य में लगे विशेषज्ञों का यह दृढ़ विश्वास है कि मन और शरीर के क्रिया-कलाप पूर्णतः एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। इनके बीच थोड़ा भी असन्तुलन कैंसर, मल्टीपुल स्केलेरोसिस आर्थ्राइटिस, माइग्रेन हेडेक, डॉयबिटीज तथा हृदय रोगों का कारण बन सकता है। ‘न्यूरो एण्डोक्राइनालॉजी’ की नयी खोजों के अनुसार सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम तथा ‘एण्डोक्राइन सिस्टम’ एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। वे परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। शरीर के हारमोन्स न्यूरोट्रान्समीटर के रूप में क्रियाशील होते हैं। इन्हें सक्रिय बनाने के लिए बिहेवियोरल मेडिसिन की इस पद्धति में रोगोपचार हेतु रिलेक्सेशन, बायोफिडबैक आदि का का निरापद प्रयोग आरम्भ किया गया है। इससे यह आशा बंधती है कि मनोशारीरिक रोगों का उपचार अब सम्भव हो सकेगा। चिकित्सा जगत की असाधारण प्रगति के बावजूद कैंसर जैसे रोग आज भी असाध्य बने हुए हैं। अनेकानेक उपचार असफल सिद्ध हो रहे हैं। शरीर शास्त्रियों को वे सूत्र पकड़ में नहीं आ रहे हैं कि शरीर के किसी विशेष की कोशिकाएँ क्यों बागी हो जाती हैं, क्यों अपना सामान्य क्रम छोड़ बैठती हैं, उन्हें कैसे इस असामान्य व्यवहार से रोका जा सकता है? लम्बी माथापच्ची के बाद भी ये प्रश्न जैसे के तैसे बने हुए हैं तथा मानवी मस्तिष्क को चुनौती देते हैं। अब सोचा जा रहा है कि कैंसर की जड़ें व्यक्तित्व की कहीं अधिक सूक्ष्म परतों में विद्यमान होनी चाहिए। जब निदान ही सम्भव नहीं हो पा रहा तो उपचार कैसे सम्भव होगा? ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि कैंसर की जड़ें शरीर में न होकर मनःक्षेत्र में है तथा इस रोग का जन्मदाता भी मन ही होना चाहिए।
अमेरिका के रोचेस्टर विश्व विद्यालय द्वारा किये गये अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि किसी व्यक्ति का जीवन के प्रति अतिशय निराशाजनक चिन्तन कैंसर रोग को जन्म दे सकता है। फोटवर्थ टैक्सास के डॉ. कार्ल साइमन्टन ने कैंसर के रोगियों का उपचार ‘रेडियेशन’, ‘केमोथेरेपी’ तथा ’शल्य’ क्रिया की परम्परागत उपचार पद्धति से अलग हटकर रिलैक्सेशन (शिथिलीकरण) और विजुवलाइजेशन (आत्म निरीक्षण) पद्धति से कर रहे हैं। इसमें रोगियों को नियमित रूप से दिन में तीन बार प्रातः उठते समय, दोपहर और रात्रि सोते समय 15-15 मिनट का ध्यान करने को कहा जाता है, इस साधना में रोगी ‘आटोसजेशन’ का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त सन्तुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे कैंसर ग्रस्त स्थान पर ध्यान करना पड़ता है, जिसमें वह प्रबल भावना का आरोपण करता है कि शरीर के श्वेत कण कैन्सरग्रस्त स्थान पर एकत्रित हो रहे हैं तथा रुग्ण कोशिकाओं को शरीर के बाहर निकाल रहे हैं। रोगियों को सदा प्रसन्नचित रहने तथा आशावादी दृष्टिकोण अपनाये रखने का ही निर्देश दिया जाता है। डॉ. साइमन्टन को अब तक डेढ़ सौ से भी अधिक कैंसर के रोगियों के उपचार में पूर्ण सफलता मिली है। स्वस्थ रोगियों में से अधिकांश वे हैं, जो आशावादी विचारणा के थे।
जर्मनी के एक चिकित्सक डॉ. हैमर ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को अपने मत द्वारा चुनौती दी है तथा यह कहा है कि कैंसर रोग की उत्पत्ति का कारण मानव मन है। यह बीमारी विषैले वातावरण, जीवाणु, आनुवांशिक खामियों के कारण नहीं, मरीज के स्वयं के मानसिक संघर्षों के कारण पैदा होती है। डॉ. हैमर स्वयं भी कभी कैंसर के रोगी थे। उनके रोग के साथ एक मर्मस्पर्शी घटना जुड़ी है। डॉ. हैमर के पुत्र डर्क को 1978 में इटली के एक व्यक्ति ने गोली मार दी थी। चार महीने तक उपचार चलता रहा, पर कोई फायदा न हुआ। डर्क की मर्मान्तक पीड़ा को अपने ही नेत्रों से डॉ. हैमर नित देखते थे। अन्ततः उसकी मृत्यु हो गयी। पुत्र को तिल-तिलकर मरते हुए देखने से उन्हें तीव्र मानसिक विक्षोभों से होकर गुजरना पड़ा। निरन्तर के मानसिक संघर्षों ने ही कैंसर को जन्म दिया, डॉ. हैमर का यह निश्चित विश्वास है।
अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने क्यूनिख, रोम, कोल, कोलोन के विभिन्न अस्पतालों में 400 रोगियों की जाँच पड़ताल की। जिससे उनकी धारणा और भी परिपुष्ट होती चली गयी। अपने मत का उन्होंने जर्मनी के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन कराया। चिकित्सा जगत की प्रचलित मान्यताओं से मेल खाने के कारण उनका चारों ओर विरोध हुआ। विशेषकर आधुनिक चिकित्सा पद्धति के प्रतिपादनों द्वारा डॉ. हैमर ने विरोध देखते हुए अपनी मान्यताओं को और अधिक मजबूत करने के लिए देश छोड़ना व बाहर जाकर प्रयोग करना अधिक उपयुक्त समझा। इन दिनों वे रोम में जाकर बस गये हैं तथा अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
वस्तुस्थिति को वैज्ञानिक कसौटियों पर कसा जाना अभी शेष है कि कैंसर जैसे गम्भीर रोगों को उत्पन्न करने में मनःस्थिति कहाँ तक जिम्मेदार है तथा किस तरह की भूमिका सम्पादित करती है, पर जो तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं उनसे यह सम्भावना प्रबल होती जा रही है कि गम्भीर तथा असाध्य रोगों को जन्म देने में मन की अहम् भूमिका हो सकती है। इंग्लैंड की एक महिला पैट्रिक का रोचक केस आज भी चिकित्साविदों के लिए एक रहस्य बना हुआ है। चिकित्सकों ने उसे ब्रैस्ट कैंसर घोषित किया था। यदि निदान प्रारम्भ में हो गया होता तो उन्हें बचाये जाने की भी सम्भावना थी। कैंसर रोग की शुरुआत की स्थिति में निदान के लिए एवं सर्जरी के लिए जो यन्त्र आवश्यक थे, वे लन्दन के अतिरिक्त और कहीं नहीं थे। महिला के लिए उन्हें स्वयं के उपचार के लिए जुटा पाना प्रायः असम्भव था चिकित्सकों ने घोषणा की थी- “रोग की गम्भीरता के कारण छह माह बाद वे मर जायेंगी।” घोर निराशा की स्थिति में इस महिला ने सोचा- “मेरा मरना तो सुनिश्चित है। क्यों न ही जीवन के अवशेष दिनों का उपयोग ऐसे कार्य में किया जाय ताकि अन्य रोगियों को मेरी तरह घुट-घुटकर न मरना पड़े।” रेडियो एवं टेलीविजन सेवाधिकारियों की सहानुभूति अर्जित करके उसने यह प्रसारण कराया- “मैं एक वक्ष कैंसर से पीड़ित महिला हूं। छह माह बाद मेरी मृत्यु सुनिश्चित है। कैंसर के रोगियों के प्रारम्भिक निदान के लिए “कैटस्केन” यन्त्र आवश्यक है। मेरी इच्छा एक ऐसे कम्प्यूटराइज्ड एक्जियल टोमोग्राफी युक्त यूनिट की स्थापना है ताकि दूसरे रोगियों का इलाज हो सके। मेरी याचना एवं पीड़ा पर आप सब ध्यान दें तथा आर्थिक मदद करे।”
इस प्रसारण का अप्रत्याशित प्रभाव पड़ा। इतना अधिक चन्दा एकत्रित हुआ कि उसकी व्यवस्था बनाने के लिए पैट्रिक को एक पूरा स्टाफ रखना पड़ा। करोड़ों की लागत से बनने वाले दर्जनों ऐसे कैंसर उपचार केंद्रों का निमार्ण सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में हो गया। तब तक नो माह का समय गुजर चुका था। अपने कैंसर रोग को इस व्यस्तता के कारण लगभग वह भूल चुकी थी। श्रेष्ठ प्रयोजन में मिली असाधारण सफलता की प्रसन्नता में उसे कुछ भी याद न रहा। एक दिन उसके एक अभिन्न मित्र ने याद दिलाया कि चिकित्सकों ने छह माह बाद ब्रैस्ट कैंसर के कारण उसके मर जाने की भविष्य वाणी की थी। एक झटका सा लगा और पैट्रिक ने अपने ही बनवाये हुए एक कैंसर निदान उपचार केन्द्र में विशेषज्ञों की एक टोली द्वारा पूरा परीक्षण कराया। चिकित्सकों को यह देखकर आश्चर्य का पारावार न रहा कि पैट्रिक के वक्ष में कैंसर का नामोनिशान नहीं है। लंबे समय तक खोज-बीन चलती रही, पर यह रहस्योद्घाटन न हो सका कि बिना किसी उपचार के पैट्रिक असाध्य बैस्ट कैंसर के रोग से मुक्त कैसे हो गयी। मनःशास्त्रियों ने अपना मत व्यक्त करते हुए यह सम्भावना व्यक्त की कि- “पैट्रिक की परमार्थ भावना, रचनात्मक दृष्टिकोण तथा प्रसन्नचित मनःस्थिति आदि के समन्वय से प्रचण्ड मनोबल का उद्भव हुआ जो कैसरग्रस्तह कोशिकाओं के कायाकल्प का कारण बना।
शरीर एवं बुद्धि की अपेक्षा मानसिक सामर्थ्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। रचना, सामर्थ्य एवं सम्भावना की दृष्टि से भी वह इन दोनों की तुलना में भारी ही बैठती है। आधुनिक मनोवेत्ता भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि मन के सन्तुलन एवं विकास पर अब अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। सामर्थ्यों एवं संभावनाओं का यह महत्वपूर्ण स्रोत यदि उपेक्षित ही पड़ा रहा, तो स्वास्थ्य एवं आरोग्य को स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। मात्र मन को ही समुचित दिशा दे देने से कायिक अवरोध तथा अस्त-व्यस्तताओं पर नियन्त्रण पाया जा सकना सम्भव है। अब विज्ञान की मुहर भी लग जाने से इस चिकित्सा-प्रक्रिया को और भी सशक्त स्वर से कहा व प्रतिपादित किया जा सकता है। आधुनिक चिकित्सा को मानने वाले विद्वानों को भी मानवी अंतस् के उपेक्षित से पड़े कल्पवृक्ष मानव-मन को अब मान्यता देकर इसकी सामर्थ्यों का लाभ सब को देना चाहिए.
श्रम से सामान्यतया लोग कतराते देखे जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि हर महान घटना को, ऐतिहासिक परिवर्तनों के तथा महामानवों की उत्पत्ति के मूल में श्रम की ही प्रधानता रही है।
राज सरकार द्वारा संचालित रेलवे लाइन के मास्को-कजान उपखण्ड में कई जगह टूट-फूट हो गयी थी। लेनिन व उनके श्रमिकों ने निश्चय किया कि अपनी साप्ताहिक छुट्टी के दिन भी वे सभी काम करेंगे ताकि राष्ट्र की हो रही हानि बचायी जा सके। इस संकल्प को लेनिन ने रूसी क्रान्ति का आधार स्तम्भ माना था। एक आतंकवादी द्वारा उन पर पिस्तौल चला देने से वे स्वयं घायल हो गए थे। पर फिर भी वे बीमार बनकर बैठे नहीं रहे। वे स्वयं काम पर आते। कंधों पर लकड़ी के लट्ठे उठा कर सुबह से शाम तक जुटे रहते। एक वर्ष तक यही क्रम चलता रहा। इसी अवधि में वे पूर्ण स्वस्थ हो गए। इस तप साधना के सहारे इस नेता ने सहज ही साम्यवादियों की श्रमशीलता का -कर्तव्य निष्ठा का- शिक्षण दिया और इसी के बलबूते वे समाज निर्माण के साम्यवादी स्वरूप को आधे विश्व में फैला सकने में सफल हुए।
सत्साहस जिसे आत्मबल कहते हैं, सामने की कठिन परिस्थितियों को सरल कर सकता है, कठोरों को नरम बना सकता है और आक्रमण की क्षमता को कुंठित कर सकता है।
प्राचीनकाल की ऐसी कितनी ही घटनाएं हैं। बुद्ध ने दुर्दान्त अंगुलिमाल को पानी-पानी कर दिया था। शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, नारद आदि के चरित्रों में ऐसी घटनाओं का वर्णन है जिनमें उनके प्राण घातक शत्रु भी उनके समक्ष नतमस्तक हो गये थे और विरोध छोड़कर सहयोगी, आज्ञाकारी के रूप में परिवर्तित हुए थे।
चेतना क्षेत्र की इस महती शक्ति का कभी भी कोई भी प्रयोग कर सकता है और उसके चमत्कारी प्रतिफल हाथोंहाथ देख सकता है।
सर्प का एक नाम विषधर है। विषैले जंतुओं में वे ही सबसे अग्रणी होते हैं। यो बिच्छू भी कम जहरीला नहीं, उसके दंश की जलन एवं पीड़ा असह्य होती है जबकि साँप के काटने पर अफीम पीने जैसा नशा ही आता है और पीड़ा नहीं होती। फिर भी सर्प के काटने से जितने मरते हैं, उनकी तुलना में बिच्छू दंश से कम ही मरते हैं। इसके बाद ही अन्यान्य विषैले जंतुओं की गणना होती है।
यो सभी सर्प तो विषैले नहीं होते। उनमें से बहुत से मात्र आकृति की दृष्टि से ही डरावने होते हैं। जहर उनमें नाम मात्र का होता है फलतः काटने पर मरने का खतरा नहीं रहता। विषैले सर्पों की कुछ जातियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ तो ऐसी हैं कि काटना तो दूर उनकी फुंसकार भर प्राण हरण कर सकती है। विषधर जातियों में भारत में प्रायः 171 जातियाँ प्रख्यात हैं। इनमें कोबरा, बाइपर करैल, रसैल, घोड़ा पछाड़ , धामन, तक्षक आदि बहुत प्रसिद्ध हैं।
आमतौर से सर्पों से सभी डरते हैं और उन्हें काल रज्जु मानते हैं, पर अब प्रयोग परीक्षणों में यह सिद्ध हुआ है कि उन पर भी भावना का प्रभाव पड़ता है और यदि उन्हें डराया, छेड़ा न जाय और स्वयं भयभीत न हुआ जाय तो विषैले सर्प भी नरम पड़ जाते हैं और बिना हानि पहुँचाये मनुष्य के साथ रहने के लिए तैयार हो जाते है।
इस अविश्वस्त तथ्य को विश्वस्त सिद्ध करने के लिए दक्षिण भारत में पिछले दिनों ऐसे कई प्रदर्शन हुए हैं जिनमें कुछ साहसी लोगों ने लम्बे समय तक विषधर जाति के सर्पों के साथ निरन्तर रहने का कीर्तिमान स्थापित किया है। इनके निवास ग्रह पारदर्शी काँच के बनाये गये। भीतर हवा, रोशनी पहुँच सके और रहने वाले को शौच, स्नान , भोजन , शयन आदि कि सुविधा रह सके, ऐसे कक्ष बनाये गये। ताकि बाहर के लोग भीतर की गतिविधियों को भली प्रकार देख सकें।
ऐसे प्रदर्शनों का कीर्तिमान स्थापित करने वालों को सर्पों के विषधर होने की बात सिद्ध करनी पड़ती है, साथ ही यदि मृत्यु हो जाय तो उसकी लिखित जिम्मेदारी भी अपनी घोषित करनी पड़ती है।
ऐसे सर्प सान्निध्य प्रदर्शन की एक घटना ‘गिनीज बुक आफ रिकार्डस्’ में भी अंकित है। सन 1979 में एक अठारह वर्षीय अफ्रीकी लड़की लेइथान ड्रेनवर्ग ने 65 विषैले सर्पों के साथ 65 दिन रहने का कीर्तिमान स्थापित किया था। जिसे पिछले दिनों एक दक्षिण भारत के युवक ने तोड़ा व अपना नाम 1982 की रिकार्ड बुक में शामिल करवाया।
इस प्रकार के प्रदर्शन गत दो वर्षों में भारत में बहुत हुए हैं। पूना में नीलम कुमार खरे ने 70 सांपों के साथ 70 घंटे तक रहे। इसके बाद इन प्रदर्शनों की होड़ लग गई। केरल के एक बिजली कर्मचारी टी. बेला युधन ने 75 दिन तक 75 सर्पों के साथ समय बिताया। यह आयोजन बड़ा था। इसे देखने बहुत लोग आये। ख्याति मिली और दर्शकों पर एक रुपया टिकट लगा देने से आजीविका भी अच्छी हुई। तमिल नायडू शिवाकाशी की वेत्रिवन्दन ने 137 साँपों को साथ रहकर दिखाया। भेलापुरम की एक महिला फातिमा बीबी भी इस प्रदर्शन में अपना स्थान बना गई। वे गाड़ी में एक बच्चा भी साथ लेकर काँच के कमरे में सांपों के साथ रहीं।
मदुराई के टी. पी. हारि ने अपने कक्ष में 101 साँप रखे। जिनमें 67 कोबरा, 15 वाइपर 23 करैत और 6 रसैल बिरादरी के थे। एक साँप के काट लेने पर उन्हें अस्पताल भर्ती होना पड़ा और प्रदर्शन बीच में ही छूट गया। वे बच गए पर अभी भी बड़ा संकल्प लेने को कटिबद्ध हैं। कोयम्बटूर में एन. पार्थ सारथी अपना प्रदर्शन 100 दिन तक करने वाले थे। उनके साथ 150 साँप थे। उनने सर्पों के अतिरिक्त काले बिच्छुओं का एक झुण्ड रखा। पर यह प्रदर्शन 34 दिन में ही बन्द करना पड़ा।
अन्तिम सफल प्रदर्शन कोच्चिं का सत्ताईस वर्षीय डाक्टर टायलाम्बी का था। उनने 127 दिन 152 सांपों के साथ बिताये। 12 अक्टूबर 1980 से लेकर 15 फरवरी 1982 तक यह प्रदर्शन चला। इससे आगे की चुनौती आर किसी ने नहीं दी तो उस विश्व रिकार्ड की गिनीज बुक में अंकित करा दिया गया है।
डाक्टर नाम्बी का कथन है कि साँप जहरीला तो अवश्य होता है, पर उसे निर्भयता निश्चिन्तता और स्नेह-सौजन्य की अनुभूति कराई जा सके तो वह सर्प हानि रहित जन्तु है। वह अकारण हमला नहीं करता। डराने और छेड़ने पर ही उसका क्रोध उमड़ता है। यदि उसे दुलार सहकार की अनुभूति कराई जा सके तो वह मनुष्यों से दूर नहीं भागता वरन् उनके साथ रहना पसंद करता है।
विषैले सर्पों के साथ रहकर खतरे भरा जीवन जीकर दिखाने के पीछे प्रदर्शन वृति काम करती है, यह कहना ठीक नहीं। यह तो अन्तः की एक प्रसुप्त सामर्थ्य की नगण्य-सी अभिव्यक्ति भर है। आत्मबल हर किसी की अमूल्य सम्पदा है। शरीर समर्थ हो, भुजाएँ बलशाली हों पर यदि अन्दर से उसका सुनियोजन करने वाली सामर्थ्य न उभर पाए तो वह जीवन भी व्यर्थ है। ऐसा शरीर तो मात्र अपना भार ढोता रहता है। शरीर भले ही बलवान न हो, मन में यदि अनीति से जूझने की, खतरों से खेलने की, आत्म-रक्षा हेतु लड़-भिड़ने की सामर्थ्य है तो ऐसा व्यक्ति कई गुने अधिक शक्तिशाली व्यक्तियों को भी प्रचण्ड आत्म-बल के सहारे परास्त कर देता है।
आत्मबल सम्पन्न मनुष्य किसी से भी नहीं डरता। सर्प से भी नहीं, सिंह से भी नहीं। शिवाजी सिंहनी का दूध दुहकर लाए थे और बालक भरत सिंह शावकों के साथ खेलता था। निर्भयता युक्त आत्मबल के ऐसे चमत्कार कहीं भी देखे जो सकते हैं।
कुछ समय पूर्व लखनऊ में एक वृद्ध जन-सम्मान आयोजन हुआ था। उसमें उस क्षेत्र के सर्वाधिक आयु की दृष्टि से 119 वर्षीय जया देवी और उनसे कुछ ही छोटे 116 वर्षीय मुहम्मद सुलेमान सम्मिलित किये गये थे। यह सम्मान वस्तुतः उस सम्भावना का है जिसके अनुसार शरीर में लम्बे समय तक जीवित रहने की क्षमता है। शर्त एक ही है कि उस प्रकृति प्रदत्त विशेषता को नष्ट भ्रष्ट न करते रहा जाय। भारत यात्री ईब्नबतूता ने अपनी मात्र विवरण पुस्तक में हिन्दुकुश क्षेत्र में रहने वाले एक ऐसे योगी के साथ हुई भेंट का विवरण दिया है जिसकी आयु 350 वर्ष थी। उसका कहना था कि हर सौ वर्ष के बाद उसके नये दांत और काले बाल निकले।
विश्व भर में दीर्घ जीवन का कीर्तिमान स्थापित करने वालों में एक चीनी 142 वर्ष का एक रूसी 159 वर्ष का आर सर्वाधिक आयु वाली इटली के मोन्ट सान्तोजला नगर में एक 194 वर्ष की वृद्धा पाई गई जिसका नाम मारिया वास्ता था। इन सभी दीर्घ जीवियों को यह सौभाग्य कैसे मिला इसके उत्तर में उन सभी ने एक ही बात बताई सुपाच्य और स्वल्प आहार नियमित श्रेय और हंसता-हँसाता महत्वाकांक्षाओं से रहित सन्तोषी स्वभाव।
विज्ञान ने शोध के अनेकानेक आयामों में प्रवेश कर दृश्य जगत की कई पहेलियाँ सुलझाने में सहयोग दिया है। इससे न केवल मनुष्य की जानकारी बढ़ी है, उसे उन अविज्ञात साधनों का उपयोग भी भली-भांति समझ में आ गया जिनका सुनियोजन कर उसने सुविधाएँ बढ़ायी हैं, रोगों से मुक्ति दिलायी है तथा भावी सम्भावनाएँ उज्ज्वल बनायी हैं। लेकिन भौतिकी की शोध करने वाले मनीषियों को अब एक युगानुकूल दृष्टिकोण अपनाकर चेतना के क्षेत्र में भी प्रवेश करना होगा।
आत्मिकी चेतना का विज्ञान है, अविज्ञात के रहस्यों की बहुमूल्य विधा है जिसका सदुपयोग न हो पाने के कारण मानव इस शक्तिशाली भण्डार का लाभ उठा पाने में असमर्थ रहा है। लेकिन इसे मान्यता दे कौन? मात्र आप्त वचनों की दुहाई तो पर्याप्त नहीं। जब तर्क, तथ्य, प्रमाण उदाहरण प्रस्तुत करने की जवाबदारी हर क्षेत्र में विज्ञान ने ले रखी है, पदार्थ ही नहीं चिन्तन पर भी उसका आधिपत्य है तो उसी का यह दायित्व भी है कि वह आत्मिकी के सूत्रों पर प्रयोग-अनुसंधान कर उसे प्रामाणिक ठहराने हेतु वैसा ही वातावरण बनाए, साधन जुटाए तथा ऐसे समस्त उपायों पर मंथन करे जिनके प्रयोग से मानवी काया तथा मनःसंस्थान की प्रसुप्त क्षमताओं को उभारा, जा सके- व्यक्ति को वर्तमान से कहीं अधिक सक्षम, समर्थ, असामान्य बनाया जा सके। अविज्ञात घटनाओं को मात्र संयोग या चमत्कार न कहकर उनकी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में जा पाना तभी सम्भव है जब विज्ञान स्वयं इसका दायित्व अपने हाथ में लेगा।
अध्यात्म के कई उपचार अनुशासन मात्र श्रद्धा पर टिके हैं। कभी समय था, जब संयम-साधना के, योग-तप के इन उपक्रमों को आप्त वचनों के प्रति श्रद्धा के सहारे अपनाया जाना था और वे अपने चमत्कार दिखा पाने में समर्थ थे। अब धर्मश्रद्धा लड़खड़ा गई तो प्रखर तथ्यों के सहारे उस प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है। विज्ञान की साक्षी इन दिनों प्रामाणिकता की परिचायक बन गई है। वरिष्ठता विज्ञान के पलड़े पा जा बैठी है। ऐसी दशा में विचार और भावना क्षेत्र को शालीनता समर्थक बनाने वाले तथ्यों को ढूंढ़ निकालने में उसे अग्रगामी होना चाहिए। यह कार्य तनिक भी कठिन नहीं हैं। प्राचीनकाल में उसे जिस उपचार से सम्पन्न किया जाता था, उसका तर्ज तरीका भर आधुनिक बनाना है। यह निश्चित रूप से सरल एवं संभव हो सकता है।
उदाहरणार्थ मनोविकारों एवं अन्तर्द्वन्द्वों की परिणति शारीरिक-मानसिक रोगों के रूप में होने और उस कुचक्र में फंस जाने पर आर्थिक, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन नष्ट-भ्रष्ट होने की बात पूर्णतः स्पष्ट है। पुरातनकाल में यही बात पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक की बात कहकर हृदयंगम कराई जाती थी। अब उसी को मनोविकारों की परिणति सिद्ध करके व्यक्ति को सदाशयता अपनाने के लिए सहमत किया जा सकता है।
प्राचीनकाल में साधना-निग्रह, आहार-विहार, ध्यान-धारणा, योग-तप जैसे अध्यात्म उपचारों की सफलता में देव अनुग्रह को माध्यम माना जाता था। अब इन्हीं को क्रिया-कृत्यों के सहारे स्वसम्मोहन, अचेतन-परिशोधन, प्रसुप्त शक्तियों का जागरण, संकल्पबल, एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति का चमत्कार कहा एवं सिद्ध किया जा सकता है।
मानवी सत्ता में सन्निहित ऐसे अनेकानेक आधार अब विदित उपलब्ध हो गए हैं जिन पर वैज्ञानिक प्रयोग प्रहार करके व्यक्ति की उपयोगी विशेषताओं को उभारा और उसे उनके दृष्टियों से समर्थ बनाया जा सकता है। गुणसूत्र, हारमोन्स, नाड़ी-गुच्छक एक प्रकार से षट्चक्रों, उपत्यिकाओं- महा ग्रन्थियों के परिवार में पुरातनकाल जैसी चमत्कारी भूमिका निभा सकते हैं। अभी व्यक्ति का मात्र रासायनिक पक्ष समझा गया है। उसी को परिपुष्ट करने एवं सुधारने के लिए अहार-विहार, व्यायाम, सर्जरी, औषधि आदि का उपयोग होता रहा है। अब थोड़ा और भीतर उतरा जाये तो जीवाणुओं ऊतकों, न्यूरान्स की मूल प्रकृति में अन्तर ला सकने वाले ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं जो प्राचीनकाल की तरह आत्मशक्ति बढ़ाने वाले नये समय के अनुरूप नये द्वार खोल सकें।
प्राचीनकाल में ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा अपने ढंग से होती थी। आज भी उन प्रसुप्त विशेषताओं का अस्तित्व स्वीकार करने और उन्हें उभारने की सम्भावना पर विज्ञान ने समर्थन की मुहर लगा दी है। सम्मोहन, विचार संचालन, दूर-श्रवण, भविष्य ज्ञान, स्वप्न विज्ञान, ब्रेन वाशिंग, प्राण विनिमय जैसे उपचार अब अध्यात्म न रहकर परामनोविज्ञान की जानी-मानी धाराएँ बन चुकी हैं। इन्हें एक कदम और बढ़ाया जा सके तो बहुचर्चित ऋद्धि-सिद्धियों से आज के मनुष्यों को भी लाभान्वित होने का अवसर मिल सकता है। इन दिनों इन्हें मात्र कौतूहल की तरह देखा समझा जा सकता है पर अगले दिनों इन्हीं उपलब्धियों को बड़े एवं व्यापक रूप में इसी प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है जैसा कि इन दिनों भाप, बिजली आदि का प्रयोग भौतिक क्षेत्र में किया जाता है।
आज व्यक्तित्वों को न केवल श्रेष्ठ वरन् अधिक समर्थ बनाए जाने की भी आवश्यकता है ताकि वह विकृतियों से बचने बचाने में, विपत्ति से जूझने जुझाने में प्रवीण एवं सफल सिद्ध हो सके। यह श्रेष्ठता एवं समर्थता शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक तीनों ही स्तर की होनी चाहिए ताकि मनुष्य की कर्म, ज्ञान एवं भाव की त्रिविधि क्षमताओं को उच्चस्तरीय बनाया जा सके। महामानव-निर्माण का यह समग्र क्षेत्र अनुसंधान प्रक्रिया से गुजरे, यह समय की माँग है।
मनुष्य को सुधारने के लिए आमतौर से वाणी, लेखनी आदि के सहारे प्रशिक्षण भर की व्यवस्था बन पा रही है। पर देखा यह जाता है कि आस्था क्षेत्र में निकृष्टता की जड़ें जमी होने के कारण बाहरी सुझाव तनिक भी प्रभावी सिद्ध नहीं होते। मस्तिष्क की क्षमता समझने-समझाने भर की है। उस सम्बन्ध में तो हर किसी को पहले से ही बहुत कुछ विदित रहा होता है। मानवी सत्ता का उद्गम केन्द्र अन्तःकरण है। उस क्षेत्र में भावनाओं का, मान्यताओं, आकांक्षाओं का साम्राज्य होता है। उसे सँभालने-सुधारने की सामर्थ्य किसी भी भौतिक उपचार में नहीं है। वहाँ तक पहुँच अध्यात्म की ही रही है। अब विज्ञान के सूक्ष्म प्रयोग ऐसे हो सकते हैं जो ब्रेनवाशिंग की तरह आस्था-परिष्कार का उद्देश्य भी पूरा कर सकें। प्राचीनकाल में शक्तिपात, कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र वेधन जैसे उपचारों का आश्रय लिया जाता था। अब अचेतन को प्रभावित करने वाली अभिनव पद्धतियों द्वारा प्रभावित कर सकने वाले उपाय निकल सकते हैं। सामान्य को असामान्य बनाने के लिए भौतिक प्रयोग- परीक्षण चल ही रहे हैं। परखनली से लेकर इलेक्ट्रोड़ो द्वारा मस्तिष्कीय उथल-पुथल कर सकने के उपचार सफलतापूर्वक अग्रसर हो रहे हैं। इस प्रयोग शृंखला में आस्थाओं को उच्चस्तरीय बनाने वाले कई उपचारों ने उत्साहवर्धक सफलता के लिए आशा दिलाई और उत्साह बँधाया है ध्यान एवं प्राणायाय के कई प्रयोग ऐसे हैं जो मानसिक धरातल में आवश्यक उथल-पुथल प्रस्तुत कर सकने में सफल हो सकते हैं।
संक्षेप में व्यक्ति का अतिमानस जगाने- अतिमानव बनने की पूरी-पूरी सम्भावना है। दार्शनिक, विज्ञानी, शासक, मनीषी, अध्यात्मवादी अपने-अपने ढंग से इस सम्भावना के संदर्भ में अपने सुझाव प्रस्तुत करते रहे हैं। आवश्यक इस बात की है कि इस समूचे क्षेत्र को विज्ञान अपने हाथ में ले और देखें कि चिरकाल की व्यवहृत और सफल होती रही मनुष्य में देवत्व के उदय की सम्भावना को वर्तमान परिस्थितियों में, वर्तमान साधनों से किस प्रकार पुनर्जीवित किया जा सकता है। अतीत में चिरकाल तक मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ बनी रही हैं फिर कोई कारण नहीं कि उस खोयी कड़ी को न जोड़ा जा सके। विज्ञान चाहे तो यह सब कुछ कर सकता है। इसके लिए उसे अध्यात्म का सहयोगी एवं विश्वासी होकर चलना होगा। इस मानवता की यह उससे भी महत्वपूर्ण सेवा है जो कि अब तक विज्ञान ने पदार्थ को अधिकाधिक उपयोगी बनाने की दिशा में सफलता पाकर प्रस्तुत की है।
चेतना की विकास प्रक्रिया को योगाभ्यास कहते हैं और शरीर को अधिक समर्थ बनाने की पद्धति को तंत्र साधना। तन्त्र प्रयोगों के द्वारा साधक के शरीर की विद्युत को सामान्य स्तर की तुलना में कही अधिक प्रखर किया जा सकता है और उसका उपयोग अपने तथा दूसरों के लिए प्रायः वैसा ही हो सकता है जैसे कि प्रकृति साधनों में से किन्हीं के द्वारा किया जाता रहा है। यह उपयोग भला भी हो सकता है, बुरा भी। आग से शीत निवारण का लाभ भी मिल सकता है और किसी घर नगर को भस्म कर देने का अनर्थ भी हो सकता है। यही बात तन्त्र साधना के सम्बन्ध में भी है। वह विशुद्ध रूप से शरीरगत पंच तत्वों में सन्निहित वरिष्ठ ऊर्जा का उत्पादन है। उपयोग प्रयोक्ता की मर्जी पर निर्भर है।
शरीर एक ऐसा अद्भुत यन्त्र है, जिसमें न केवल जीवन निर्धारण निर्वाह के सामान्य क्रिया-कलाप सहज क्रम में होते रहते हैं। वरन् यदि प्रयत्न किया जाय तो उसमें सन्निहित उन प्रसुप्त क्षेत्रों को भी जगाया जा सकता है जो वैज्ञानिक क्षेत्र में मिलते हैं, या मिल सकते हैं। अनेक यन्त्र उपकरणों की सहायता से प्रकृति शक्तियों को वशवर्ती करके उनसे आश्चर्यजनक काम लिये जाते हैं। यदि शरीरगत अदृश्य मर्मस्थलों को उभारा जा सके तो उससे भी वही काम हो सकते हैं जिन्हें वैज्ञानिक बहुमूल्य उपकरणों के माध्यम से कर सकते हैं। शरीर एक ऐसा ऊर्जा भण्डार है जिसे प्रकृति की किसी भी क्षमता के साथ संबद्ध करके उन कृत्यों को किया जा सकता है जो भौतिक जगत में मनुष्य द्वारा किये जा सकते हैं। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं उन्हें तन्त्र साधना कहते हैं। योगाभ्यास की धारा उससे सर्वथा भिन्न है। उसमें आत्मा और परमात्मा के मध्यवर्ती चेतनात्मक-भावनात्मक प्रयोजन पूरे किये जाते हैं। उस क्षेत्र की सफलताओं को ‘ऋद्धि’ कहा जाता है। वे ऋषियों में देखी जाती है। तंत्र साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। सिद्धियां अर्थात् समर्थता एवं सम्पदा के सहारे मिल सकने वाली सफलताएँ।
योग का केंद्र ब्रह्मरंध्र, सहस्रार है। तन्त्र का मूलाधार- कुण्डलिनी केन्द्र है। यह जननेंद्रिय मूल में है और योग का उद्गम मस्तिष्क में। यो किसी न किसी अंश में दोनों ही साधनाओं के लिए दोनों का प्रयोग करना पड़ता है। कुण्डलिनी साधना के लिए मनोगत संकल्प चाहिए और योग साधना के लिए जननेंद्रिय संयम ब्रह्मचर्य। इस प्रकार दो धाराएँ गंगा-यमुना की तरह पृथक-पृथक होते हुए भी मूलतः हिमाचल के एक विशेष क्षेत्र के साथ समान रूप से जुड़ी हुई हैं।
तन्त्र साधना में मस्तिष्क के अचेतन भाग का एक रहस्यमय केन्द्र झकझोरा जाता है। इस केन्द्र को अविज्ञात, रहस्यमय या अतीन्द्रिय संस्थान के नाम से जाना जाता है। इसकी सहायता से ही जननेंद्रिय मूल में सन्निहित कुण्डलिनी क्षमता को उभारने, नियन्त्रित करने एवं दिशा विशेष में मोड़ने का प्रयोजन पूरा किया जाता है। संकल्प बल के अभाव में तो जननेन्द्रिय स्वस्थ समर्थ होने पर भी यौन कर्म ठीक तरह कर सकने तक में समर्थ नहीं होते। मानसिक नपुंसकता प्रायः संकल्प बल की कमी से समर्थों को भी असमर्थ बना देती है इस सम्बन्ध में की गई वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि मानवी मस्तिष्क का एक बड़ा क्षेत्र ‘साइलेण्ट एरिया’ मौन क्षेत्र- कहलाता है। यहां की हलचलें प्रायः निस्तब्ध जैसी प्रतीत होती हैं और समझ में नहीं आता है कि इसकी उपयोगिता क्या है। तो भी पाया गया है वहाँ किसी प्रकार का आघात लगने या उभार आने से सामान्य जीवन भी असामान्य बनते देखा जाता है।
अजित मुकर्जी की ‘दि तांत्रिक वे’, स्वामी अगेहानन्द की ‘तान्त्रिक परम्परा’ - डिरोप्प की- ‘यौन ऊर्जा’- हास जेक्सन की- ‘पश्चिमी मनोविज्ञान और भारतीय साधना’- ओमर गैरिसन की- ‘तन्त्र यौन योग’- उलरिख हास रोकर की ‘हठयोग प्रदीपिका’ - फिलिप रासन की, ‘तान्त्रिक कला’ - जान दि बाइट की - ‘चेतना का सीमान्त’ हाइन रिख जीमर की ‘भारतीय सभ्यता में उपाख्यान और प्रतीक’ - जॉन वुडरफ की ‘दि सर्पेन्टाइन पावर’ आदि पुस्तकें तन्त्र के दर्शन सिद्धांत और विधि-विधान पर यत्किंचित् प्रकाश डालती है तो भी यह विषय ऐसा है कि जिसमें निजी अनुभव के आधार पर सामयिक विधि-व्यवस्था और उसकी वर्तमान परिस्थितियों में सम्भावित उपलब्धियों पर प्रकाश डाला जा सकता है एवं इस विषय में जन-मानस में बैठी भ्रांतियों को काफी सीमा तक हटाया जा सकता है।
सामयिक एवं परिस्थितियों का संकेत इसलिए किया गया है कि तन्त्र की प्रौढ़ता वाले युग में जिस प्रकार का वातावरण था, वैसा अब नहीं रहा। जलवायु में भारी अन्तर आ गया है। तद्नुसार शरीरों की क्षमता तथा मनःसंस्थानों की दृढ़ता में असाधारण हेर-फेर हुआ है। उन दिनों परम्परागत श्रद्धा के आधार पर साधनाएँ सहज सिद्ध थीं, पर अब तर्क युग में हर व्यक्ति अध्यात्म प्रतिपादनों के सम्बन्ध में शंकाशील और उदास है। इसी प्रकार चिन्तन व क्रिया दोनों में इन्द्रिय संयम घटते चले जाने से मनोबल में भी कमी आई है। आहार की शुद्धता न रहने से चित्त की चंचलता भी असाधारण रूप से बढ़ गई है। फिर प्रत्यक्ष कुछ कर गुजरने वाले अपनी सफलता देखकर अनुचरों में प्रगाढ़ विश्वास उत्पन्न करने वाले मार्गदर्शक भी कहां रहे हैं? फिर भी अध्ययन पर आधारित निष्कर्ष इस सम्बन्ध में असीम संभावनाओं का स्रोत मानवी काया को बताते हुए उस दिशा में पराक्रम पुरुषार्थ की महत्ता सिद्ध करते हैं। मानवी विद्युत सामान्यतया निर्वाह के काम चलाऊ प्रयोजनों में ही खपती रहती है किन्तु विशेष स्थिति में उसका उपयोग अन्य प्रयोजनों के लिए भी हो सकता है। इस तथ्य को प्रामाणित करने वाली घटनाएं कभी-कभी अनायास ही प्रकट होती देखी गई है।
चीन में ऐसे कई बच्चे खोज निकाले गये हैं जिनमें एक्सरे-लेसर रेज जैसी वेधक दृष्टि है। वे दृष्टि की परिधि में- बाहर की वस्तुओं को देख और कागजों को पढ़ लेते हैं। ल्हासा के ‘ट्रेडिशनल मेडीसिनल स्कूल’ की शिक्षिकाओं ने इस खोज-बीन में बहुत उत्साह दिखाया और दौरा करके ऐसे विशेष क्षमता सम्पन्न बालकों को ढूंढ़ निकाला है जिनकी आंखें अदृश्य दर्शन कर सकती हैं। बड़ी उम्र वालों में यह विशेषता नहीं पाई गई। इससे प्रतीत होता है कि इस प्रकार के अनुभवों के लिए बालकपन की अवधि ही अधिक समर्थ रहती है। चीन की दो कुमारिकाओं की अतीन्द्रिय क्षमता पिछले दिनों संसार भर में चर्चा का विषय रही है। यह लड़कियां हैं 13 वर्षीय रेंग क्वेग और 11 वर्षीय बैग विंग। यह दोनों दूर रखे हुए कागजों को पढ़ सकती हैं। दीवार के पीछे बैठे हुए व्यक्तियों को पहचान सकती हैं। यहाँ तक कि कागज के टुकड़े बगल में दबा कर भी उनमें जो लिखा है उसे पढ़ सकती हैं।
इन लड़कियों का परीक्षण 30 वैज्ञानिकों द्वारा हुआ। जो तीन दिन चला और 25 टैस्ट लिये गये। इस परीक्षण के समय अन्यान्य उत्सुकजनों को भी बैठने व देखने का अवसर दिया गया। इस परीक्षण का विवरण उस देश की अनेक पत्रिकाओं में छपा। सभी इस सामर्थ्य के प्रदर्शन को देखकर हतप्रभ थे। जबकि यह प्रसुप्त क्षमताओं के जागरण की एक झलक भर थी।
पिछले दिनों तन्त्र और अनाचार प्रायः पर्यायवाची बने रहे हैं। उस विद्या का उपयोग, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, संतमन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए होता रहा है। दूसरों को आतंकित करके या आक्रमण से अस्त-व्यस्त करके अपने क्षुद्र स्वार्थों को सिद्ध करने वाले तांत्रिकों ने इस विद्या के प्रति लोक मानस में तिरस्कार एवं भय का संचार किया है। इसके कितने ही उदाहरण प्रमाण भी देखे जाते हैं।
स्काटलैंड यार्ड के उड़न दस्ते के प्रमुख राबर्ट फेवियन ने नौकरी से निवृत्त होने के उपरान्त अपनी अनुभव पुस्तक प्रकाशित की है। उसमें ऐसे अनेक विवरणों का उल्लेख है जिसमें तांत्रिकों द्वारा कितने ही लोगों को न केवल हैरान किया वरन् उन्हें मार तक डाला गया। इंग्लैंड के वारबिक शायर नगर में कुछ समय पूर्व एक उद्यान मालिक चार्ल्स वालटन की लाश बरगद के पेड़ तले पड़ी हुई मिली। जमीन कुरेदने के लिए काम आने वालों पैने दांतों वाला लोहे का पंजा उसकी गरदन में घुसा हुआ था। साथ ही एक इस तरह की दरार सीने में थी जैसी कब्रिस्तानों में क्रूस चिन्ह की पाई जाती है। इस हत्या का रहस्य खोजने का काम वहाँ की गुप्तचर संस्था स्काटलैंड के अधिकारी राबर्ट फेबियन को सौंपा गया। उसने घटना के समीपवर्ती लोगों से पूछताछ करने की कोशिश की तो लगा कि वे जानते हुए भी बताना नहीं चाहते। इसी प्रकार की एक मौत इस इलाके में पहले भी हो चुकी है। अन्ततः उसने जाना कि यह मारण मन्त्र के प्रयोग का मामला है। इस विद्या को उस क्षेत्र के कई यांत्रिक जानते हैं। और किसी लालच या प्रतिशोध वश ऐसे कृत्य जादू के जोर से करते रहते हैं।
गुप्तचर विभाग के पास ऐसी ही कुछ और भी घटनाएँ दर्ज हैं। सन् 1971 में लन्दन में ऐसी कितनी ही मृत्युएं हुईं जिन्हें न रोगजन्य कहा जा सकता था न दुर्घटनाजन्य। अच्छे खासे आदमी ऐसे ही बेमौत मरे थे। कहा जाता था कि वहाँ के घुमक्कड़ बंजारे ऐसे कृत्य करते हैं उनके जादू से ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं। पूछताछ करने पर बंजारा सभा के एक सदस्य ग्रेटन पक्सन ने यह स्वीकार भी किया था कि बंजारे यह विद्या जानते हैं और उनकी मरण विद्या से ऐसी घटनाएं घटित होती भी रहती हैं। उन्होंने प्रमाण में ऐसी घटनाओं का वर्णन भी किया।
इस संदर्भ में मनोविज्ञान वेत्ताओं से पूछा गया तो उनने कहा कि भयभीत प्रकृति के शंकाशील व्यक्ति किसी के डरा देने पर इस प्रकार स्व संकेतों के आधार पर मृत्यु के मुंह में जा सकते हैं। इन्हें एक प्रकार से अन्ध विश्वासजन्य आत्म-हत्या का मामला कहा जा सकता है।
कैलीफोर्निया के फिल्म अभिनेता ल्यू ग्रेजाना को किसी तांत्रिक ने मार डालने की चुनौती दी थी। वह डर गया और अपने को एक कमरे बन्द कर लिया। दरवाजा तक वह खोलता नहीं था। ऊपर के रोशन दान से ही घर वाले उसे भोजन पानी पहुँचाते थे। इस प्रकार निर्धारित चुनौती की 22 दिन अवधि समाप्त होने पर उसने दरवाजा खोला और बाहर निकला। इसे संयोग ही कहना चाहिए कि जैसे ही वह भयभीत मनःस्थिति में सड़क पर बाहर आया कि एक दनदनाता हुआ भारवाही ट्रक उधर से आया और उसे कुचलता हुआ निकल गया।
तन्त्र के हेय प्रयोजन करने वाले अपना व्यक्तित्व एवं स्वभाव भी तद्नुरूप बनाते हैं। “मघं मासं च मीनं च मुद्रा मैथुन मेवच” को अपनाकर जीवित भूत प्रेतों जैसे ढाँचे में अपने को ढालते हैं। श्मशान सेवन, अघोरी आचरण, मृतकों के कपालों का उपयोग, पशुबलि जैसे कृत्यों से अपने को आतंक आक्रमण के लिए पैने हथियार की तरह विनिर्मित करते हैं। आसुरी प्रकृति वाले प्रायः इसी दिशा में कदम बढ़ाते हैं और अपने को शुक्राचार्य विनिर्मित असुर सम्प्रदाय का अनुयायी बताते हैं। सिद्ध तांत्रिकों में रावण, कुम्भकरण, मारीच, भस्मासुर आदि का उल्लेख करते हैं। तो भी यह विद्या वस्तुतः वैसी है नहीं। दुरुपयोग से यों अच्छे साधनों की भी बदनामी होती है पर तथ्यतःतन्त्र एक महत्वपूर्ण आत्मविज्ञान है। उसमें कायगत भौतिकी क्षमता को उभारने का वैसा ही प्रयोजन सध सकता है जैसा कि भौतिक विज्ञानी विभिन्न उपकरणों से साधते हैं। बारूद से पहाड़ तोड़कर रास्ता भी बनाया जा सकता है और किसी अच्छे खासे निर्माण को बर्बाद भी किया जा सकता है। अणु शक्ति से विश्व ऊर्जा की आवश्यकता पूरी हो सकती है। साथ ही यह भी सम्भव है कि उसका विस्फोट करके किसी क्षेत्र, महाद्वीप या समूचे विश्व को भस्मसात् बना दिया जाय। तन्त्र के दुरुपयोग से ही उसका स्तर गिरा है। यदि उसे सही रीति से समझा, संजोया और सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाय तो उसे अध्यात्म क्षेत्र के भौतिक प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त हो सकने वाला अन्तिम महत्वपूर्ण सामर्थ्य स्रोत कहा जा सकता है।
लन्दन के दीर्घायुषी अनुसंधान केन्द्र तथा कैलीफोर्निया की दीर्घजीवन अनुसंधानी संस्था के निदेशक नाथान प्रिटिकिन ने अपनी खोजों के आधार पर दो पुस्तकें प्रकाशित की हैं एक “लिव लाँगर नाऊ” दूसरी “दि प्रिटिकिन प्रोग्राम फॉर डाइट एण्ड एक्साइज”। इन ग्रंथों में उनने इस बात पर विश्वास किया है कि मनुष्य की समझदारी वापस लौटेगी। वह स्वास्थ्य का महत्व समझेगा और उन आदतों को छोड़ देगा जिनके कारण उसे दुर्बलता, रुग्णता, असमय की वृद्धता और अकाल मृत्यु का शिकार बनना पड़ रहा है। बुरी आदतें मजेदारी के लिए अपनाई जाती हैं किन्तु आदमी इतना नासमझ सदा नहीं बना रह सकता है कि मजेदारी के लिए अपनी स्थिरता और सत्ता को ही गँवा बैठे। वे विश्वास करते हैं कि समझदारी का जमाना वापस लौटने में अब देर नहीं है। यह कार्य करारी ठोकरें और भी जल्दी करने के लिए मजबूर करेंगी।
प्रिटिकिन ने इक्कीसवीं सदी का सुनहरा चित्र खींचा है और कल्पना की है कि आदमी अब की अपेक्षा भोजन की मात्रा आधी कर देगा। माँसाहार छोड़कर शाक-भाजी मात्र पर निर्वाह करेगा। फलतः खाद्य संकट की समस्या सहज ही हल हो जायगी और जितनी खाद्य सामग्री इन दिनों खपती है। उतने में ही वर्तमान जनसंख्या दूनी हो आने पर भी आहार सम्बन्धी कोई संकट खड़ा न होगा
वे कहते हैं, तब बच्चों की तुलना में वृद्धों की समस्या सामने होगी। समझदार लोग कम बच्चे पैदा करेंगे किन्तु दीर्घ जीवी होने पर उन्हें अनेक वर्ष वयोवृद्ध स्थिति में गुजारने पड़ेंगे इसलिए उन दिनों बाल कल्याण केन्द्र- वृद्धों की सुविधा जुटाने का काम करेंगे।
इन दिनों आदमी की मजेदारी- नशेबाजी और काम-क्रीडा के इर्द-गिर्द केन्द्रित दीखती है। अगली शताब्दी में इनकी हानियों को भली प्रकार समझ लिया जायेगा। तब लोग संगीत और कला की ओर मुड़ेंगे तथा खेल-कूदो में रुचि लेंगे। आहार औषधि कि तरह लिया जायगा। कपड़ों की डिजाइनें और भोजनों की स्वाद भिन्नताएँ जितनी अब दीखती हैं उनका सफाया हो जायेगा। लोग संग्रह की बात नहीं सोचेंगे वरन् काम-चलाऊ साधनों पर ही सन्तोष करेंगे। इतना परिवर्तन होने से आदमी का खर्च चौथाई रह जायगा और जिन लोगों को इन दिनों अहिर्निशि फँसा रहना पड़ता है उनमें से किसी का भी महत्व न रह जायगा। उन दिनों ‘सन्तोषी सर्वदा सुखी’ की कहावत चरितार्थ होगी।
डॉ. थामस के अनुसार प्रदूषण के कारण बिगड़े हुए वातावरण का दबाव अनेक प्राणी सहन न कर सकेंगे और उनकी जातियां इस धरती पर से उसी प्रकार लुप्त हो जायेंगी जैसे भूतकाल के महागज और महा सरीसृप (डायनासोर्स) परिस्थितियों के साथ तालमेल न बिठा पान के कारण अपना अस्तित्व खो चुके। इसी संदर्भ में वातावरण विशेषज्ञ ‘बाल्डर’ का कहना है कि अगले दिनों आदमी समेत अन्य प्राणियों का समुदाय जहरीला हो जायगा। ऐसी दशा में उसकी आकृति और प्रकृति में भी परिवर्तन होगा। फिर भी आदमी अब इतना समझदार हो गया कि अपनी सत्ता किसी रूप में बनाये रहेगा और परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की बात इसी प्रकार खोज लेगा जैसा कि उसने विगत सहस्राब्दियों में अपने को बदला है।
आशा करनी चाहिए कि इन सभी वैज्ञानिकों के कथन मिथ्या नहीं हैं। वार्धक्य एक समस्या नहीं है यदि वह स्वस्थ-समर्थ काया एवं प्रफुल्लता से भरी मनःस्थिति वालों का हो। आज की तुलना में कल अधिक शानदार है। आहार-बिहार के नियमानुशासनों पर इस दशक में जिस प्रकार चिन्तन चल पड़ा है, उससे यही विश्वास दृढ़ होता चला जाता है।
खोपड़ी की चहारदीवारी में जो लिबलिबा-सा पदार्थ भरा है उसका विश्लेषण करने पर वैसा ही आश्चर्य होता है जैसा कि ब्रह्मांड की रहस्यमयी क्षमताओं पर दृष्टिपात करते समय। यह संरचना अद्भुत है। यों शरीर के जीवकोश भी कम रहस्यमय नहीं हैं, पर उनकी प्रधानता शारीरिक गतिशीलता बनाये रहने तक सीमित है। उसे प्रकृति का प्रतिनिधि कह सकते हैं। मस्तिष्क का दर्जा उससे कहीं ऊँचा है। वह ब्रह्मांडीय चेतना का- परमात्मा का प्रतीक है। शरीर पदार्थ विज्ञान है तो मस्तिष्क ब्रह्म विज्ञान। स्वभावतः गरिमा चेतना की ही मानी जायगी क्योंकि शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गतिविधियों पर उसी का नियन्त्रण है। इतना ही नहीं मस्तिष्क जिस व्यापक चेतना केन्द्र के साथ आदान-प्रदान स्थापित करने में समर्थ है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि परमात्मा और आत्मा के बीच विद्यमान एकात्मता की तरह मस्तिष्क भी विश्व चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहने के कारण उतना ही सशक्त है।
विज्ञान के विद्यार्थी के लिए प्रकृति के रहस्योद्घाटन की तरह ही समझने योग्य मस्तिष्कीय विचित्रता का क्षेत्र भी है। उसे समझा जा सके और सन्निहित संभावनाओं का थोड़ा भाग भी हस्तगत किया जा सके तो प्रकृति सम्पदा के पर्वत जुटा लेने की तुलना में वे मुट्ठी भर चेतनात्मक उपलब्धियाँ अधिक सुखद एवं श्रेयस्कर सिद्ध हो सकती हैं। चेतना विज्ञान का नाम ही ब्रह्म विज्ञान है।
सामान्य जीवन में शरीर यात्रा भर के नगण्य से प्रयत्न चलते रहते हैं फलतः उस छोटे काम के लिए मस्तिष्क का तनिक-सा अंश ही काम में आता है। जो प्रयुक्त न हो वह निष्क्रिय रहेगा ही। यही कारण है कि सर्वजनीन मस्तिष्कीय क्षमता को समूचे समुद्र में से भरे गये एक चुल्लू के बराबर समझा जा सकता है। शेष को समझने, उभारने और अपनाने का प्रयत्न किया जाय तो मानवी वैभव को आज की तुलना में असंख्यों गुना अधिक बढ़ाया जा सकता है।
मस्तिष्कीय विकास की बिजली कभी-कभी कौंधती है तो आश्चर्यचकित ही रह जाना पड़ता है। जो संयोग उपलब्ध हुआ उसे प्रयत्नपूर्वक उगाने-उभारने की पूरी-पूरी गुँजाइश है। आवश्यकता लगनशील प्रयत्नों की है। पदार्थ विज्ञान द्वारा भौतिक उपलब्धियाँ भी इसी मार्ग पर चलते हुए हस्तगत हुई हैं। यह मार्ग आत्मिक विभूतियों के उपार्जन में भी क्रियान्वित होता है।
कुछ वर्ष पूर्व इच्छा शक्ति के चमत्कारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन के लिए डॉ. एलेक्जेण्डर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन मैक्सिको में किया था। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों को किसी भी स्थान से- किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसे ही शकल दी जा सकती है। उन्हें बुलाया जा भगाया जा सकता है। नियत समय पर प्रदर्शन हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर प्रयोगकर्ता ने देखते-देखते घटायें बुला दीं और दर्शकों की माँग के अनुसार बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशा में बखेर देने और उनकी विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया।
अमेरिका के अलवामा राज्य में ‘गाड्स डेन’ नगर के समीप एक इसी प्रकार का आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न युवक फ्रैंक रेन्स रहता है। उसे सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। इस युवक की विशेषता यह है कि आप दुनिया की कोई भी भाषा उसके सामने किसी भी लहजे में बोलें, वह आप के साथ-साथ उसी लहजे में धारा प्रवाह बोलता चला जायेगा। एक शब्द के बाद दूसरा कोन-सा शब्द बोला जाएगा यह उसे खुद-ब-खुद मालूम हो जाता है और सेकेंड का भी अन्तर किये बिना वह सारी बातें उस व्यक्ति के साथ-साथ बोलता चला जाता है। इसे देखने में ऐसा लगता है मानो एक ही ग्रामोफोन से बस्टिरियों की तरह दो लाउडस्पीकर जुड़े हुए हों। टी. वी. के कुछ कार्यक्रमों में फैंकरेन्स ने गाने भी गाये। गीत साथ वाले गायक के स्वर लय से मिलाकर इस प्रकार गाया गया मानो फ्रैंक को वह गीत पहले से ही आता हो। एक अन्य अवसर पर रेन्स को लोलोब्रिगिडा नामक एक महिला से पाला पड़ा। वह अनेक भाषाएँ जानती थी, किन्तु फ्रैंक उन सभी भाषाओं को उसी प्रकार दोहराता गया जैसे वह महिला बोल रही थी। लोलोब्रिगिडा ने कुछ बनावटी शब्द भी कहे जिनका न तो कोई अर्थ था न ही वे किसी भाषा से संबद्ध थे। पर फ्रैंक ने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।
वैज्ञानिकों के लिए अतीन्द्रिय क्षमताएँ चुनौती और गुत्थी बनकर खड़ी हैं जो उनके वैज्ञानिक नियमों को ऐसे लांघ जाती हैं जैसे वायु बहुमंजिली इमारतों को। इटली का गियोवानी गलान्ती रात के अन्धेरे में ऐसे पढ़ता है जैसे सूरज की रोशनी में सामान्य आदमी। जम्मू शिक्षा विभाग के एक कर्मचारी गोपीकृष्ण साधारण हिन्दी पढ़े हैं, छोटी कक्षाओं के अध्यापक थे। एक बार उन्हें ऐसा लगा कि वे कई भाषाएँ जानते हैं। तब से वे जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक, अरबी, संस्कृत आदि कई भाषाओं में न केवल वार्तालाप करने लगे वरन् भावभरी कविताएँ भी रचने लगे। उस विलक्षण उभार के सम्बन्ध में अनेक अनुसंधानकर्ताओं ने खोजबीन भी की है।
जापान के हनावा होकाइशी अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण ज्ञान के अवतार कहे जाते थे। 1722 में जन्म लेकर 101 वर्ष की अवस्था में 1823 में मरने वाले हनावा होकाइशी की 7 वर्ष की अवस्था में नेत्र ज्योति चली गई थी। नेत्रहीन होकर भी उन्होंने 40 हजार से अधिक पुस्तकें पड़ डालीं। बहुत-सी पुस्तकें तो उन्होंने केवल एक ही बार सुनी थीं। उनके मस्तिष्क में ज्ञान का असीम भण्डार जमा हो गया था। अपने मित्रों के आग्रह पर एक पुस्तक लिखाकर उन्होंने तैयार कराई जिसके 2820 खण्ड बने।
स्काटलैंड के जेम्स क्रिस्टन ने 12 वर्ष की आयु में अरबी, ग्रीक, यहूदी तथा फ्लैमिश सहित विश्व की 12 भाषाएँ सीख ली थीं। इसी प्रकार फ्रांस में जन्मे लुईस कार्डक 4 वर्ष की आयु में अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन तथा अन्य योरोपीय भाषाएँ बोल लेते थे। जब वे 6 माह के थे तभी से बाइबिल पढ़ने लगे थे। 6 वर्ष के हुए तो गणित, इतिहास एवं भूगोल के प्रकाण्ड पण्डित बन गये। ऐसे अनेकानेक उदाहरण मिलता हैं जिनमें कम आयु में ही प्रतिभा मुखरित हुई। व्लेहस पास्कल ने 12 वर्ष की आयु में ध्वनि शास्त्र पर निबन्ध लिखकर सारे फ्रांस को आश्चर्य में डाल दिया। जोन फिलिप बेरोटियर को 14 वर्ष आयु में ही डाक्टर आफ फिलॉसफी की उपाधि मिल गई। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जो पढ़ते, सुनते उन्हें याद हो जाता और वे हू-बहू वैसा ही सुना देते। ट्रिनिटी कालेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक-दूसरे मैरीलेण्ड कालेज में प्रकृति विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्ति हो गया, वह पढ़ता भी रहा और पढ़ता भी। नियुक्ति के समय कुछ डिग्रियाँ दो वर्ष के भीतर प्राप्त कर लेने की शर्त उस पर लगाई गई थी। वह उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी। साथ ही अपने कालेज की पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी।
लेबनान के केन्टुकी नगर का मार्टिन जे. स्पैल्डिंग 14 वर्ष की आयु में प्रोफेसर बना। उन दिनों मैरीज कालेज में विद्यार्थी था। किन्तु गणित सम्बन्धी उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए उसे उसी कालेज में उस विषय के प्रोफेसर की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। बड़ा होने पर उसे वाल्टीमोर के आर्क विशप पद पर प्रतिष्ठित किया गया। हालैण्ड-लेडन का जान डाइस्की पूरे 17 वर्ष का भी नहीं होने पाया था कि उसे इंग्लैंड के राजा किंग जेम्स प्रथम ने राजकीय धर्मोपदेशक नियुक्त किया। तब तक वह न केवल धर्म-शास्त्र का विशेषज्ञ बन चुका था वरन् हिब्रू और यूनानी भाषाओं में भी प्रवीण था।
सेना में भर्ती होते समय मारक्लिस डी. नैनाजिस की आयु मात्र आठ वर्ष की थी। इतनी छोटी आयु में उसने यह प्रवेश नियमानुसार नहीं, अपनी विशिष्ट प्रतिभा का प्रमाण देकर पाया था। उसने पूरे 52 वर्ष तक फ्रांसीसी सेना में काम किया। इस बीच क्रमशः ऊंचे पदों का अधिकारी बनते-बनते फील्ड मार्शल बन गया था। इसी पद में सेवा करते-करते उसकी मृत्यु हुई। निवृत्ति के नियम उस पर लागू नहीं किए गए। इंग्लैंड के रोज पब्लिक स्कूल में फिलिप हैरिंधम तब विद्यार्थी ही था। पर विद्यालय की प्रबन्ध समिति ने उसे पढ़ते रहने के साथ-साथ हैडमास्टर का पद सम्भाल लेने के लिए भी सहमत कर लिया गया। तब वह मात्र 16 वर्ष का था। उसने अपनी शिक्षा जारी रखी और सौंपी गई जिम्मेदारी भी भली-भाती निबाही। एक अंग्रेज कवियित्री अपनी अठारह वर्ष की आयु में ही इतनी ख्याति प्राप्त कर चुकी थी कि उस आयु में नियम के विरुद्ध भी संसद सदस्यता के लिए खड़े होने पर उसे भारी बहुमत से सफलता मिली।
अमेरिकी पाल मार्फी ने स्नातकोत्तर परीक्षा ही नहीं वकालत की पदवी भी 19 वर्ष की आयु में प्राप्त कर ली। इन दिनों परीक्षा देने में आयु का कोई प्रतिबन्ध नहीं था। इसलिए प्रवेश और उत्तीर्ण होने पर तो ऐतराज नहीं उठा, पर कानून की डिग्री देते समय विश्व विद्यालय ने उस पर विशेष प्रतिबन्ध अंकित किया कि वह 21 साल का होने तक वकालत का व्यवसाय न कर सकेगा।
शिकागो विश्व विद्यालय के संस्थापक विलियन रैने हार्वर जब 12 वर्ष के थे तभी उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी करके ओहियो कालेज में प्रवेश पा लिया था। कानूनी वयस्कता प्राप्त होने से पूर्व ही उन्होंने प्रख्यात शिकागो विश्वविद्यालय की नींव डाली। प्रभावित जनता ने पूरा साथ दिया और वह विशाल संस्था बन कर खड़ी हो गई। अन्य कालेज उन्हें अपने यहाँ बुलाना चाहते थे इसलिए उनमें से 9 के विभागोध्यक्षों ने त्याग पत्र देकर उनके लिए स्थान खाली किया था।
पैरिस की रायल लाइब्रेरी का सर्वोच्च अधिकारी फैन्कोइसे आगस्टे जब उस पद पर आसीन किया गया तब 12 वर्ष का था और कुछ ही वर्ष बाद वयस्क होने से पूर्व उस संपूर्ण पुस्तकालयों की संचालन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। उसका पुस्तकीय ज्ञान तथा पुस्तकालयों के संचालन सम्बन्धी कोशल असाधारण था।
फ्राँस की ग्राण्ड असेम्बली की संसद सदस्या जीन बैप्टिस्ट टैसटे को 13 वर्ष की आयु में ही चुन लिया गया था। उसमें उन दिनों बड़े तेजस्वी व्यक्ति ही चूने गए थे। फ्रांसीसी विद्रोह के उपरान्त वही उच्चतम प्रशासन संस्था थी।
विक्टर डी. ज्वाय जब फ्रांसीसी एकेडेमी की सदस्या चुनी गई तब वे 13 वर्ष की थी। उन्हें वाल्टेयर की कृतियाँ कंठस्थ थीं। यह साहित्य 36 ग्रन्थों में है और उसमें तीस लाख शब्द हैं।
जर्मनी के एल्डार्फ विश्वविद्यालय का रीडर काउण्ट वान पैपनेहम नियुक्त हुआ तब वह 14 वर्ष का था। इसके बाद उसने सेना में प्रवेश किया और जीवन भर हर महत्वपूर्ण लड़ाई में प्रमुख पद सम्भालता रहा। उसने छोटी-बड़ी 101 लड़ाइयों की कमान सम्भाली और अन्ततः लड़ते-लड़ते ही शहीद हुआ।
फ्रांस का काउंट डी. टेण्डे बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। 13 वर्ष की आयु में ही उसने अपने कंधों पर अत्यन्त महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व उठाये और हरेक को पूरी तरह निभा कर दिखाया। वह राज्य सभा का सभासद, संसद के एक विभाग का प्रबन्धक, प्रोवेन्स प्रान्त का राज्यपाल, थल सेना का लेफ्टिनेण्ट जनरल और जल सेना का सेनाध्यक्ष था। इतनी छोटी उम्र में इतने महत्वपूर्ण पद उसे शासन ने किसी पक्षपात से नहीं वरन् उसकी प्रतिभा से कायल होकर सौंपे।
यह उदाहरण हर विचारशील को इस दिशा में प्रोत्साहित करते हैं कि संयोगवश प्राप्त हो चुकी मस्तिष्कीय क्षमता को विकसित करने के लिये कारगर प्रयत्न होने चाहिए। सुविधा साधन जुटाने वाले पदार्थ विज्ञान को जितना श्रेय, श्रम, एवं अनुदान मिला है उतना ही आत्म विज्ञान के आधार पर मानसिक क्षमताओं को समुन्नत करने और सच्चे अर्थों में विभूतिवान् बनने के निमित्त भी होने चाहिए। उसके बिना हमारे प्रगति प्रयास अपूर्ण ही बने रहेंगे।
मार्क्स हिल्स 12 वर्ष की आयु में पेड़ पर शौक-शौक में चढ़ा। पैर फिसला तो धड़ाम से गिरा और उसकी हड्डी पसली चकनाचूर हो गई। माँस के लोथड़े की तरह उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। बचने की उम्मीद न थी तो वह बच गया। हड्डियां ज्यों-त्यों करके जोड़ी गई और उसे दस महीने तक इस प्रकार उलटा-पुलटा अस्पताल के पलंग से कसकर रखा जाता रहा ताकि हड्डियां जुड़ सकें। वे ओंधी-सीधी जुड़ तो गईं पर बेचारा हो गया सर्वथा अपाहिज-कुरूप। दिखने में भोंडा। चलने फिरने में असमर्थ। हाथ भी थोड़ा सहारा भर देते थे। कुछ करने योग्य नहीं बन सके। गरदन भी इतनी जकड़ गई कि वह थोड़ी सी इधर-उधर मुड़ सकती थी। पहियेदार कुर्सी पर बैठकर ही उसे छोटे बच्चों की तरह इधर-उधर ले जाया सकता था।
इस प्रकार दिन काटने उसे भारी पड़ गये। उन दिनों वह कैलीफोर्निया में मैन हैटन तट पर अपने परिवार के साथ रहता था। पिता अध्यापक की नौकरी करते थे। पूरे परिवार का गुजारा उसी से चलता था। इस गरीबी में भी उनने बच्चों की उपेक्षा नहीं की। यहाँ तक कि मार्क्स हिल्स के अपंग होने पर भी उसकी ओर से निराश नहीं हुए और यही समझाते रहे कि आंखें और दिमाग सही सलामत होने पर हाथ पैरों की अपंगता प्रगति पथ पर बढ़ने में बाधक नहीं हो सकती। कुछ सोचो और कुछ करो हम सहायता करेंगे।
मार्क्स जब गिरा था उससे पूर्व उसे ड्राइंग का शौक था। वह उसे पूरा करना चाहता था, पर हाथ जरा भी सहायता नहीं करते थे। इसी दशा में उसने मुँह से पेन्सिल पकड़ कर चित्र बनाने शुरू किये। पेन्सिल छोटी तथा कड़ी होने से आंखें मोड़नी पड़ती थीं तथा दांतों की जड़ें छिलती थीं। इस कठिनाई का हल उसके पाँव से निकाला। ऐलमूनियम और रबड़ को मिलाकर एक ऐसी नली बनाई जिसमें पेन्सिल या ब्रुश लगाकर दूर तक ले जाया जा सके। इससे आंखों और दांतों पर दबाव पड़ना बन्द हो गया और उसे चित्र बनाने में सुविधा होने लगी। पेन्सिल का अभ्यास आगे बढ़ा तो उसने ब्रुश पकड़ा और बढ़िया चित्र बनाने लगा।
आगे पढ़ने के लिए उसने लास एंजेलस स्थित यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया में प्रवेश पाने का आवेदन किया। इंटरव्यू के लिए जब वह उपस्थिति हुआ तो परीक्षक अवाक् रह गये कि कैसे वह मुंह से लम्बी नली लगाकर बढ़िया चित्र बना लेता है। उसे प्रवेश मिल गया। अब उसके उत्साह का ठिकाना न था। दूने चौगुने साहस के साथ प्रयत्न करने लगा। खुश भी बहुत रहता था। मित्रों से कभी-कभी मजाक में कहता- “यदि मेरे जबड़े की तरह शरीर की अन्य मांस पेशियां भी मजबूत होतीं तो मैं इस मकान को कन्धे पर उठाये-उठाये फिरता।”
उसने न केवल चित्र कला सीखी वरन् अध्ययन भी जारी रखा और आर्ट कालेज के मेधावी छात्रों में गिना जाने लगा, सफल चित्रकारों में उसकी गणना होने लगी।
साथी छात्रगण उसकी लगन और साहसिकता पर मुग्ध थे। उनके विश्व विद्यालय के डीन से प्रार्थना की गयी कि अपंगता को चुनौती देने वाली इस प्रतिभा का एक फिल्म बनाना चाहिए जो पिछड़ों में उत्साह जगाने का काम कर सके। छात्रों की समिति के इस प्रस्ताव को डीन ने तत्काल स्वीकार कर लिया। साथ ही 6000 डालर का अनुदान भी मंजूर कर दिया। रंगीन बोलती फिल्म बनी। पैसे की कमी पड़ी तो अन्यत्र से उसकी पूर्ति हुई। अन्ततः उसे अमेरिका के छात्रों में, विशेषतया बाधितों में उसे दिखाया गया। इससे कितनों ने ही नये सिरे से सोचना और प्रयास करना आरम्भ कर दिया।
गोल्डन ग्रेट पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म का नाम था- ‘ग्रेविटी इज माई ऐनिमी’ अर्थात् गुरुत्वाकर्षण मेरा दुश्मन। इस फिल्म में गिराने वाली परिस्थितियों की तुलना पृथ्वी की ग्रेविटी से की गई है और सिद्ध किया गया है कि साहस के आधार पर किसी भी प्रकार की गिरावट के माहौल से जूझा जा सकता है, जीवन को नयी दिशा दी जा सकती है।
यह सच है कि गहरी नींद में या ता स्वप्न आते ही नहीं, आते हैं तो छोटे होते हैं। निरर्थक और असंगत स्वप्न उथली नींद में आते हैं। वे उद्विग्न करने वाले और असमंजस में डालने वाले भी होते हैं। गहरी नींद का न आना इस बात का चिन्ह है कि आहार-बिहार को प्रकृति के अनुशासन में नहीं चलाया जा रहा है। अनावश्यक तनाव या दबाव के बीच रहा जा रहा है। स्वप्नों की विसंगतियों को देखकर जीवनक्रम की अस्त-व्यस्तता की जानकारी मिलती है। साथ ही चेतावनी भी प्रस्तुत होती है कि तनावयुक्त जीवन क्रम को बदलने का समय रहते प्रयत्न किया जाय। इस प्रकार स्वप्न हमें अपने सम्बन्ध की अविज्ञात एवं उपेक्षित जानकारियों को सचित्र की तरह प्रस्तुत करते हैं और सुधार के लिए परामर्श प्रोत्साहन भी प्रस्तुत करते हैं।
नींद की आवश्यकता तो मात्र आहार के समान ही समझी जानी चाहिए, थकान के बाद थोड़ा सुस्ताने से दैनिक कार्यों का ढर्रा ठीक तरह चलता है। बिना रुके लगातार काम करने वाले आरम्भ में तो कुछ अधिक काम भी कर लेते हैं किन्तु बाद में शरीर में बढ़ी हुई गर्मी कष्टकारक सिद्ध होती है। इंजन को लगातार बहुत देर नहीं चलाया जाता, उसे बीच-बीच में ठण्डा होते रहने का अवसर दिया जाता है। श्रम और विश्राम का भी ऐसा ही तारतम्य है। एक से दूसरे को राहत मिलती है। श्रम की महत्ता जिस प्रकार समझी जाती है उसी प्रकार विश्राम की भी समझी जानी चाहिए किन्तु स्मरण रहे इस बहाने कोई आलसी बनने का प्रयत्न न करने पाये। ठलुआ रहने से तो विश्राम ही विश्राम हाथ रह जाता है और थकान के कारण जो गहरी नींद आती है उस लाभ एवं आनन्द से वंचित रहना पड़ता है।
नींद न आने की व्यथा, रक्त न बनने या आहार न मिलने जैसी ही हानिकारक है उससे बचने के लिए ऐसे प्रयत्न करने चाहिए जो स्थायी समाधान कर सकें। अन्यथा लगातार नींद से वंचित रहने की स्थिति में मानसिक दक्षता धीरे-धीरे घटती चली जाती है। लम्बे समय तक वह स्थिति चलती रहे तो पागलपन जैसी स्थिति भी बन सकती है। नाजी यंत्रणा गृहों में कैदियों को सोने नहीं दिया जाता था फलतः वे अर्ध विक्षिप्त की स्थिति में पहुँचकर कुछ समय में ही अकाल मृत्यु के ग्रास बनते थे।
हर व्यक्ति जिन्दगी का प्रायः एक तिहाई भाग नींद में गुजरता है। देखने में यह व्यर्थ गया प्रतीत होता है पर बात ऐसी है नहीं। यह अवधि थकान उतारने और नई क्षमता अर्जित करने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। रात्रि न हो और सदा दिन ही बना रहे तो कोई अदूरदर्शी ही यह अनुमान लगा सकता है कि इससे दूना काम एवं उपार्जन होने लगेगा। सच तो यह है कि ऐसी स्थिति में काम करने वाली मशीन कुछ ही समय में इतनी गरम और अशक्त हो जायगी कि उसके लिए अपने मस्तिष्क की रेखा तक सम्भव न रहेगी। नींद के सम्बन्ध में भी यही बात है उसमें कटौती करना या होना सौभाग्य का नहीं दुर्भाग्य का ही चिन्ह है।
निद्रा विशेषज्ञ डॉ. माइकेल जुवेट का कथन है कि निद्रा को मनःसंस्थान की विद्युत प्रक्रिया के साथ सम्बन्ध जोड़े रहने की बात भूल है। उसमें शरीरगत रसायनों की भी बड़ा योगदान रहता है। यदि आहार गले और साँस के द्वारा मिलने वाले रसायनों को शारीरिक आवश्कताओं के अनुरूप होने की बात न बनी तो अन्य विकृतियाँ उत्पन्न होने के साथ-साथ नींद में भी विक्षेप पड़ेगा। अधूरी नींद में जो स्वप्नों की भरमार रहती है उससे उपयुक्त विश्राम मिलने में विघ्न खड़ा होता रहेगा। उनसे पेट साफ रखने की तथा सुपाच्य आहार पद्धति अपनाने की व्यवस्था बनाने की सलाह भी अनिद्राग्रस्तों तथा डरावने स्वप्न देखने वालों को दी है।
निद्रा लाने वाली औषधियों का उपयोग इन दिनों संसार भर में आश्चर्यजनक गति से बढ़ रहा है। अकेले अमेरिका से अब हर रोज प्रायः बीस लाख डालर की निद्रा औषधियां सेवन की जाती हैं। इसमें से अधिकांश ‘वाविचुरेट’ नामक रसायन से बनती हैं। इसी श्रेणी में प्रोमाइड, क्लोरल हाइडेट, पैरिल्डिहाइड, फिनोबार्बीटोन जैसे रसायन भी आते हैं। प्रकारान्तर से इन्हीं को उलट-पुलट कर निद्रा औषधियां बनती हैं। इनका आरम्भ के दिनों में तो अभीष्ट प्रभाव होता है पर धीरे-धीरे शरीर उनका अभ्यस्त हो जाता है तो असर भी घटने लगता है ऐसी दशा में मात्रा बढ़ानी पड़ती है इतने पर भी असर कम होते चलने की कठिनाई बढ़ती ही जाती है।
मनोरोग विशेषज्ञों ने स्वप्नों की कल्पना स्वप्न, निद्रा स्वप्न और दृश्य स्वप्नों में विभाजित किया है। कल्पना स्वप्न वे जिन्हें व्यक्ति अपने निजी निर्धारण में गढ़ता है और चिन्तन में इस प्रकार संजोये रहता है मानो वे वास्तविक हैं। प्रेमी-प्रेमिकाओं ने एक दूसरे की भावना का चित्रण अपनी-अपनी कल्पना के आधार पर करते हैं। इसी प्रकार मित्रता, शत्रुता की थी, सम्भावना, आशंका आदि के सम्बन्ध में भी ऐसे ही सर्जनाएं कर लेता है जो वास्तविक जैसी लगती है और मस्तिष्क पर छाई रहती हैं और तद्नुसार काम करने की प्रेरणा देती है।
निद्रा स्वप्न जो सोते समय रात को दीखते हैं। उसमें से अधिकाँश विस्मृत होते रहते हैं। याद तो उनमें से थोड़े से ही रहते हैं सो भी आधे अधूरे रूप में।
जिस प्रकार प्रत्यक्ष जीवन से सुखद घटनाक्रमों परिस्थितियों के मध्य रहने पर प्रसन्नता अनुभव होती है उसी प्रकार स्वप्नों में दृष्टिगोचर होने वाली अनुकूलताएं भी प्रोत्साहन प्रदान करतीं और मनोबल बढ़ाती है। जागृत स्थिति में कलह, शोक, अपमान, हानि सफलता आदि के कारण चित्त खिन्न होता है। उसी प्रकार अशुभ स्वप्न भी सामर्थ्य का क्षरण करते हैं।
स्वप्न देखना यदि अनिवार्य है तो हर कोई उन्हें सुखद स्तर के देखना पसन्द करेगा। पर क्या यह अपने हाथ की बात है? उसका उत्तर ‘हां’ में दिया जा सकता है। स्वस्थता के नियमों का पालन करने पर गहरी और मीठी नींद आने में सन्देह नहीं। पेट हलका रखा जाय और थकाने वाला शारीरिक श्रम करते रहा जाय तो गहरी नींद आयेगी।
परिस्थितियों को अनुकूल बना सकना अपने हाथ की बात नहीं है। पर मन अपना है उसे एक तरह सोचने की अपेक्षा दूसरी तरह सोचने का अभ्यास कराया जा सकता है। इसी प्रकार शरीर चर्या की अवाँछनीय आदतों से मुक्त करके नये सिरे से इस प्रकार निर्धारित किया जा सकता है जिससे रुग्णता को न्यौत बुलाने के कारण आये दिन खड़े रहने वाले स्वास्थ्य संकट का सामना न करना पड़े। इस प्रकार का सरल सौम्य जीवन क्रम जिन बुद्धिमानों ने अपनाया है, उन्हें तत्काल गहरी निद्रा का वरदान मिलता है। उस कारण वे न केवल थकान मिटाने, अभिनव स्फूर्ति पाने में सफल होते हैं वरन् सुखद स्वप्नों का उत्साहवर्धक चलचित्र भी बिना टिकट खरीदे देखते रहते हैं और दुहरे आनन्द का लाभ लेते हैं।
स्वप्नों को परिस्थितियों का सांकेतिक चित्रण ही नहीं समझा जाना चाहिए उनमें कई महत्वपूर्ण समाधान भी रहते हैं। इसी प्रकार यदि थोड़ी समझदारी से काम लिया जाय तो इस आधार पर हम अपने लिए आवश्यक उपचार भी उपलब्ध कर सकते हैं। वे हमारे लिए चिकित्सक या परामर्शदाता की भूमिका भी निभा सकते हैं। स्वप्नों से न खिन्न होने की आवश्यकता है और न उन्हें असमंजस का निमित्त कारण बनाने की। यह मानकर चला जा सकता है कि वे स्वाभाविक और हानि रहित होते हैं। उनका अर्थ समझा जा सके तो बहुत उपयोगी भी हो सकते हैं। मार्गदर्शक एवं सहयोगी भी सिद्ध हो सकते हैं।
मनो विज्ञान सी. जी. जुंग ने एक विशेष सिद्धांत प्रतिपादित किया है। उसका नाम उन्होंने दिया है- ‘यूनिवर्सल पैटर्न आव कलेक्टिव अनकान्शस।’ इसमें वे स्वप्नों की व्याख्या विवेचना करते हुए कहते हैं कि इच्छानुसार स्वप्न देख सकना तो किसी के बस की बात नहीं, पर यदि बारीकी से इनमें रहने वाले संकेतों और संदेशों को समझा जा सके तो एक उच्चस्तरीय परामर्श दाता के सहयोग जैसा लाभ मिल सकता है।
फ्रायड पर एक सनक सवार रही कि वे मनुष्य की हर महत्वपूर्ण गतिविधि की संगति ‘सेक्स’ के साथ जोड़ते थे। फलतः उन्होंने स्वप्नों में भी यौन आकाँक्षा की अतृप्ति को जिस-तिस माध्यम से प्रकट होने की संगति बिठाई है। किसी भी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता है कि समूचा स्वप्न तो इसी धुरी पर परिभ्रमण करता है।
स्वप्न याद रहें या ना रहें पर आते सभी को हैं। कोई व्यक्ति अपवाद रूप में ही ऐसा हो सकता है। जिसे स्वप्न आते ही न हों उनसे छोटे या बड़े- स्पष्ट या धुंधले होना अलग बात है किन्तु यह सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति उन्हें देखे ही नहीं। मनुष्य तो क्या जानवर तक स्वप्न देखते हैं यह निद्रित स्थिति में उनकी बदलती हुई मुखाकृति को देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि वे कोई दृश्य देख रहे हैं और उनकी प्रभाव प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। नवजात शिशुओं तक को सोते-सोते हँसते मुस्कराते, डरते और अप्रसन्नता व्यक्त करते देखा जा सकता है। कोन किस स्तर के स्वप्न देख सकता है इसका उत्तर उसकी जानकारियों इच्छाओं तथा समस्याओं के साथ जोड़कर ही खोजा पाया जा सकता है।
जिस प्रकार दिनमान को चार प्रहरों में बांटा जाता है उसी प्रकार रात्रि के भी चार खण्ड हैं। यह नवभाजन स्वप्न प्रक्रिया के सम्बन्ध में और भी सही बैठता है। औसत निद्रा अवधि छह घण्टे की होती है। इसमें एक-एक घण्टे के चार स्वप्न उभार आते हैं। एक उभार उठता चढ़ता और ठण्डा होता है। इसके उपरान्त कुछ समय विश्राम जैसी स्थिति आती है। तदुपरान्त फिर वह पिछले वाला दौर चल पड़ता है। दूध में जिस प्रकार एक के बाद दूसरा उफान आता है वैसा ही स्वप्नों के सम्बन्ध में भी होता है। सामान्यतया ऐसे चार दौर आते हैं पर यह अनिवार्य नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि वे कम या अधिक सोपानों में अपना दौर पूरा करें। एक घंटे से न्यून या अधिक भी हों। इस सम्बन्ध में कुछ न कुछ अन्तर हर व्यक्ति के मध्य पाया जाता है। स्वप्नों की अवधि या प्रक्रिया सभी की एक जैसी नहीं होती।
सामान्यतया स्वप्नों से किसी को भी परेशान नहीं होना चाहिए। यह अचेतन मन द्वारा अपने दबावों को हलका करने के लिए किया गया एक क्रीडा विनोद है। अपने बनाये चित्र खिलौने से वह स्वयं खेलता है और थकान को दूर करने का अपना रास्ता निकाल लेता है।
इसके अतिरिक्त उनकी उपयोगिता इस दृष्टि से समझी जा सकती है कि वे शारीरिक मानसिक प्रस्तुत परिस्थितियों की सांकेतिक भाषा में जानकारी देते हैं। उस पर्यवेक्षण के आधार पर अपनी त्रुटियों को सुधारा जा सकता है। कहना न होगा कि अनुपयुक्तताओं का सुधार करके ही प्रगति पथ पर बढ़ सकना सम्भव होता है। इस दृष्टि से स्वप्नों का लाभ भी है और उपयोग भी।
शिकागो के सेण्ट ल्यूक मेडिकल सेण्टर के डॉ. रोसालिन्ड डी कार्ट राइट के अनुसार स्वप्न मनुष्य के भावनात्मक विकास में सहायक होते हैं। कई जीवन से हतोत्साहित व्यक्तियों पर उन्होंने स्वप्न उपचार का प्रयोग किया एवं पुनः स्वास्थ्य लाभ दे सकने में सफल हुए। साइकोमैट्री प्रयोगों के माध्यम से स्मरण शक्ति बढ़ाने व एकाग्रता का अभ्यास कराने के लिये भी स्वप्नों की मदद ली गयी है। संबंधित विषय के चित्रों का प्रोजेक्शन कर वाँछित स्वप्न ला सकने व क्षमताएँ बढ़ाने, टेलीपैथी के प्रयोग तक कर सकने में उन्हें सफलता मिली है।
पुराने शरीर का अन्त और नवीन का आरम्भ होने के मध्य क्या स्थिति रहती है, इसका परिचय दो आधारों पर प्राप्त किया जा सकता है। एक घोषित मृत्यु के बाद फिर पुराने शरीर में वापस लौट आने वालों द्वारा उस थोड़ी अवधि में प्राप्त हुये अनुभवों से। दूसरों प्रेत स्तर पर अपने अस्तित्व का प्रमाण देने वाली आत्माओं की हलचलों से।
यह दोनों ही संयोग हर मरने वाले को प्राप्त नहीं होते। न तो हर मरने वाला वापस लौटता है और न हर किसी का भूत-प्रेत बनना आवश्यक है। फिर भी जब-तब, जिस-तिस को इस स्थिति में पाया जाय और उसके कथन तथा हलचलों को नोट किया जाय। यदि ऐसे संयोग बैठ जाते हैं तो उन साक्षियों के आधार पर दो जन्मों की मध्यवर्ती अवधि में प्राणी को किन परिस्थितियों में गुजरना पड़ता है, इसका आभास मिल जाता है। ऐसे कुछ प्रामाणिक प्रसंग उपलब्ध भी हैं।
विज्ञान की एक नयी शाखा विकसित हो रही है, जो मरणासन्न व्यक्तियों का अध्ययन करती है। इस विधा में यह जानने का प्रयास करते हैं कि क्या इन व्यक्तियों को मृत्यु का भय होता है? निकटतम आ रही मृत्यु के बारे में बोध होने पर इन व्यक्तियों को कैसी अनुभूति होती है? मृत्यु संबंधी ऐसे तथ्यों का अध्ययन करने वाले इस विज्ञान को ‘थेनेटालॉजी’ कहते हैं। थेनेटॉस (ग्रीक शब्द) का अर्थ है मृत्यु।
पश्चिमी जर्मनी के एक डाक्टर लोथर विट्जल ने मरणासन्न मरीजों से उनकी मृत्यु के 24 घंटे पूर्व बातचीत की। उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे मृत्यु आती है मरणासन्न व्यक्ति में उसका भय मिटता जाता है- बीमारी की वृद्धि के साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों की धार्मिक आस्था दृढ़ होती चली जाती है और चिन्ताएँ कम होती जाती हैं।
‘मैसाचुसेट्स मेडिकल सोसायटी’ के बोस्टन निवासी डॉ. मूर रसेल क्लेचर ने लगभग पच्चीस वर्षों तक गहन अन्वेषण करने के पश्चात इन तथ्यों को “ट्रिटॉइज ऑन सस्पेण्डेड-एनीमेशन’ नामक ग्रन्थ में लिपिबद्ध किया है, जिसमें मरने के उपरान्त फिर से जी उठे लोगों के अनुभव हैं। डॉ. फ्लैचर ने अपनी इसी पुस्तक में गार्नाइट शहर निवासी श्रीमती जान डी. ब्लेक के बयान के अनुसार लिखा है कि वे तीन-दिन तक मृतावस्था में पड़ी रही थीं। डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया किन्तु घर वालों ने शरीर गर्म देखते हुए नहीं दफनाया। तीन दिन बाद वे जी उठीं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वे ऐसे लोक में जा पहुँची थीं जिसे सचमुच ‘परीलोक’ कहा जा सकता है। वहाँ बहुत-सी आत्माएँ उन्हें प्रत्यक्ष प्रसन्न उड़ती दिखाई दीं, जिनमें उनकी कुछ मृत सहेलियाँ भी थीं। ऐसे कई प्रसंग पिछले दिनों शोधकर्ताओं की जानकारी में आए हैं जिनसे मरने के बाद जी उठने वाले व्यक्तियों ने अपनी सुखद-दुखद अनुभूतियों को व्यक्त कर एक अदृश्य लोक पर पड़े पर्दे को उठाने में मदद की है।
दस वर्षीया बालिका डेजी ड्राइडन की मृत्यु दस वर्ष की आयु में टाइफ़ाइड के बिगड़ जाने के कारण हुई। मरने से दो-तीन दिन पूर्व उसे परलोक के दृश्य प्रत्यक्ष दीखने लगे थे। उसने जो बताया उसके आधार पर ‘जीवन के उस पार’ नाम से अनुभव प्रकाशित हुए हैं। डेजी के कथनानुसार अपनी इसी दुनिया की तरह एक-दूसरी दुनिया भी है, जिसमें मृतात्माएँ और देवात्माएँ उसी प्रकार निवास-निर्वाह करती हैं जैसे कि अपने इस लोक के निवासी।
मृतक समझे गये रोगियों को पुनर्जीवित करने के लिए किये गये प्रयासों का विशिष्ट अध्ययन मनोविज्ञानी स्टेनिस्लाव ग्रोफ और जॉनहेलिफाक्स ग्रोफ ने किया है। इन्होंने अपने शोध प्रकाशनों में ऐसे कई रोगियों का वर्णन किया है, जो मरकर जी उठे और मरण क्षणों के मध्यवर्ती अनुभव बता सकने में समर्थ हुए। कैन्सर से मरे डीन गिबसन नामक एक रोगी ने पुनर्जीवित होने पर बताया कि पहले वह गहरे अन्धकार में डूबा, इसके बाद उसे प्रकाश दीखा और उस पर फिल्म के पर्दे की तरह जीवन में किये गये भले-बुरे कर्मों की तस्वीरें फिल्म की तरह दिखाई पड़ीं। उसे लगा कि यह किसी न्यायाधीश का काम है। जो दण्ड-पुरस्कार देने से पहले यह दृश्य साक्षियां प्रस्तुत कर रहा है।
हृदय रोग से मृत एक महिला ने शोधकर्ताओं को बताया कि वह रुई के रेशों की तरह हल्की बनकर अस्पताल की छत तक उड़ी चली जा रही थी। डाक्टर नर्स आदि यथास्थान दीख रहे थे। दूसरी महिला को ‘मृत्यु का क्षण’ दुखद नहीं प्रतीत हुआ अपितु मृतक संबंधियों की समीपता, जो कि उसके स्वागत के लिए खड़े थे, सुखद ही लग रही थी। अधिकांश मृत व्यक्तियों को प्रकाश ज्योति के दर्शन हुए जिसमें स्नेह और सहयोग का अनुदान झरते हुये अनुभव हुआ।
सत्य की शोध में चेतना के सिद्धांत का कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है- इस निष्कर्ष पर पहुँचे सर आलिवर लॉज एवं विलियम क्रुक्स जैसे भौतिकविदों ने इस तथ्य को मुक्त कण्ठ से स्वीकारा है। उनका मत है चेतना पदार्थों के संघात का प्रतिफल मात्र नहीं अपितु उससे भिन्न स्वतन्त्र है, जो शरीर के विनष्ट हो जाने पर भी विद्यमान रहती है। इस तथ्य के प्रमाण में उन्होंने कई मृतात्माओं का सहयोग परक आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप आत्माओं ने उसे स्वीकारा और उन्हें सहयोग भी प्रदान किया था। ‘केरी ऑन टाकिंग’ पुस्तक में कई प्रेतात्माओं के वैज्ञानिकों द्वारा टेप किये गये सन्देशों का वर्णन है। इससे अदृश्य जगत के अस्तित्व की पुष्टि ही होती।
मृत्यु के समय अलग-अलग लोगों को इस लोक में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं। इसका वर्णन करते हुए लेखक खेरेण्ड सीडेट्रन टॉमस ने अपनी पुस्तक “इन दी डान बियाण्ड ऑफ’ में एक व्यक्ति के मृत्यु के समय के अनुभवों को इन शब्दों में व्यक्त किया है- “मेरा हृदय बैठा जा रहा था। दिन का प्रकाश समाप्त होता जा रहा था। एकदम अंधेरा छा गया- फिर वायुमण्डल में कुछ उजाला दिखाई दिया। मेरे पिता, मेरे भाई तथा अनेक सम्बन्धी जो मुझ से पहले मर चुके थे उनकी आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं, वे सब मेरे पास ही उपस्थित थे।”
“फ्रन्टियर्स आफ द आफ्टर लाइफ” के लेखक एडवर्ड सी. रेण्डेल ने ऐसी ही एक दिवंगत आत्मा के अनुभवों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है- “मरने के बाद मैंने स्वयं को चारों ओर से स्वजन संबंधियों से घिरा हुआ पाया। पहले पहल अपने आपको ऊपर उठते हुए देखा फिर धीरे-धीरे नीचे आ गया। एक शरीर बिस्तरे पर पड़ा था तो दूसरा मैं खड़ा था। शारीरिक वेदनायें समाप्त हो गई थीं। जो आत्मायें मुझे लेने आयी थीं, उन्होंने मुझसे चलने को कहा। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं मर चुका हूँ। संयोगवश मेरा पुनर्जीवन हुआ लेकिन स्मृति उन क्षणों की भी रही।
मूर्धन्य मनोविज्ञानी कार्लजुंर्ग ने अपने निजी मरणोत्तर जीवन का रोचक वृत्तांत स्वलिखित “मेमोरीज ऑफ ड्रीम्सरिफ्लेक्शंस” में लिखा है। सन् 1944 में उन्हें भयानक दिल का दौरा पड़ा। डाक्टर उन्हें मरणासन्न स्थिति में अनुभव कर रहे थे और आक्सीजन के सहारे बचाने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी समय जुंग ने अनुभव किया वे हजारों मील ऊपर उड़ गये और अधर में लटके हुए हैं। इतने हल्के हैं कि किसी भी दिशा में इच्छानुसार जा सकते हैं। ऊपर से ही उन्होंने यरूशलम नगर का दृश्य तथा और भी बहुत-सी चीजें देखीं। उन्हें लगा वे अब पहले की अपेक्षा बहुत बदल गये हैं। बहुत देर इसी स्थिति में रहने के बाद उन्हें अपने पुराने शरीर में पुनः लोटना पड़ा और शरीरगत जीवन पुनः प्रारम्भ हो गया। जुंग ने लिखा है “मरणोत्तर जीवन की इस अलौकिक अनुभूति ने मेरे समस्त संशय समाप्त कर दिये और यह समझा दिया कि मरने के बाद क्या होता है?” इसी प्रकार सुप्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक डॉ किंग हृेलर ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दी इम्मार्टल सोल” में ऐसी अनेकों घटनाओं को संकलित कर मृत्यु से वापस लौटे व्यक्तियों की अनुभूतियों का वर्णन उसमें किया है।
ओटोरियो (कनाडा) कोस्टल क्षेत्र के एक एन्थ्रापॉलाजीस्ट डॉ. हर्बग्रिफिन को सन् 1974 में तीन बार हृदय के दौरे पड़े। हर बार उन्हें डाक्टरों द्वारा मृतक घोषित कर दिया गया। पर आश्चर्य कि वे दौरे के कुछ मिनटों बाद ही जीवित हो उठते थे। मृत्यु के उपरान्त उन्हें जो अनुभूतियां होती थी, वे लगभग समान थीं। ग्रिफिन का कहना है कि- प्रत्येक मृत्यु के उपरान्त के अनुभव में मैंने अपने को तेज प्रकाश से घिरा पाया वह प्रकाश मेरी ओर बढ़ रहा था। साथ ही आवाज हुई- ‘आ जाओ- सब ठीक है।’ अचानक मेरे सीने पर तेज आघात हुआ, आवाज भी सुनाई दी- ‘क्या मैं बिजली के झटके दूँ? दूसरी ओर से आवाज आई- ‘नहीं अभी नहीं। ऐसा लगता है कि जीवन अभी शेष है स्वयं यह श्वास लेने लगेगा।’ इसके बाद मैं अस्पताल में पड़े अपने शरीर में वापस पहुँच गया। जहाँ मेरे दोनों ओर दो चिकित्सक खड़े थे। एक के पास डिफिब्रिलेटर ( शॉक देने वाली मशीन) व दूसरे पास निदान के उपकरण थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अगस्त सन् 1944 को एक फौजी अफसर से संबंधित एक घटना मित्र राष्ट्र गजेटियर में प्रकाशित हुई थी। आफीसर स्काउट कार द्वारा जा रहा था तभी जर्मन टैकों ने उस पर सीधा प्रहार किया। उसकी कार में भी विस्फोटक पदार्थ भरा था। उसमें तुरन्त आग लग गयी। गजेटियर में लिखा है- “जैसे ही विस्फोट हुआ, मैं 20 फुट दूर जा गिरा। ऐसा लगा मानो मैं दो भागों में विभक्त हो गया हूँ। मेरा एक शरीर नीचे जमीन में पड़ा तड़प रहा है उसके कपड़ों में आग लगी है। दूसरा ऊपर आकाश में हवा की तरह तैर रहा है। वहाँ से सड़क पार की, वस्तु युद्ध का दृश्य, झाड़ियां, जलती कार आदि सब कुछ मैं देख रहा था। तभी अंतःप्रेरणा उठी कि तड़फड़ाने से कुछ लाभ नहीं, शरीर को मिट्टी से रगड़ दो ताकि आग बुझ जाये। शरीर ने ऐसा ही किया। वह लुढ़क कर बगल की नम घासयुक्त खाई में जा गिरा, आग बुझ गयी। फिर मैं वापस उसी शरीर में आ गया। अब शरीर की पीड़ा का आभास हुआ जो असहनीय था। जबकि थोड़ी देर पूर्व ही मैंने इस दृश्य को देखा था।
‘थेनेटॉलाजी’ विज्ञान के इस पक्ष पर जब वैज्ञानिक बड़ी गहराई से ध्यान दे रहे हैं। मरण प्रक्रिया के मनोसामाजिक पक्षों का अध्ययन ही इसका केन्द्र बिन्दु है। कई घटनाओं के विश्लेषण एवं किसी भी प्रकार के ‘फ्राड’ का खण्डन कर वैज्ञानिक अब क्रमशः इसी निष्कर्ष पर पहुंचते जा रहे हैं कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। चेतना शाश्वत है व आत्मा शरीर क्षय के बाद भी बनी रहती है। एक नहीं, सहस्रों ऐसे उदाहरणों ने इस पूर्वार्त्त दर्शन के सिद्धांत की पुष्टि भी की है। वैज्ञानिकों ने भी अपना दुराग्रह छोड़ा है और तथ्यों को अंगीकार किया है।
इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के जीवन के अन्तिम समय का वर्णन मरण के समय की अनुभूतियों का एक सत्यापित दस्तावेज कहा जा सकता है। शासकों के निर्देशानुसार सुकरात को जहर दिये जाने की तैयारी चल रही थी। इस महाप्रयाण की घड़ी में उनके सभी शिष्य, मित्र, सहयोगी, सम्बन्धी वहाँ उपस्थिति आँसू बहा रहे थे। पर सुकरात पर इसका कोई प्रभाव नहीं था। उल्टे उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा उनके मुख मण्डल पर प्रसन्नता, प्रफुल्लता, और भी अधिक परिलक्षित हो रही थी। ऐसा लगता था मानो किसी प्रियजन से मिलने की उत्सुकता हो। मित्रों ने, शिष्यों से जब इस आतुरता का कारण रोते हुये पूछा तो सुकरात ने कहा- “मैं मृत्यु से साक्षात्कार करना चाहता हूं और यह जानना चाहता हूं कि मृत्यु के बाद हमारा अस्तित्व रहता है या नहीं। मृत्यु जीवन का अन्त है अथवा एक सामान्य जीवन क्रम”।
सुकरात को निर्धारित समय पर विष दे दिया गया। सभी के नेत्र सजल हो उठे। उन्होंने उपस्थित आत्मीयजनों को संबोधित कर कहना शुरू किया- ‘मेरे घुटने तक विष चढ़ गया है। पैरों ने काम करना बन्द कर दिया। वे मर चुके, किन्तु मैं फिर भी जीवित हूँ। मेरे हाथ, कान, नाक सभी निर्जीव हो चुके, पर मैं पूर्ण हूँ। मरो अस्तित्व पूर्ववत ही है। जीन की वास्तविकता को समझने का यह एक अलभ्य अवसर है। तुम्हें इसका लाभ लेना चाहिए। मृत्यु की अवधि से गुजरता हुआ एक व्यक्ति तुम सबको सन्देश दे रहा है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं एक अविरल प्रवाह है। जीवन की सत्ता मरणोपरान्त भी बनी रहती है।
गंगा यो उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, पर उसके बीच-बीच में कई स्थानों पर ऐसे मोड़-मरोड़ हैं जिनमें वह दिशा लगभग उलट सी जाती है। उत्तर काशी में कई मील तक गंगा दक्षिण से उत्तर की ओर बहने लगी है। यही क्रम वाराणसी में दुहराया गया है। हवा में चक्रवात और पानी में भंवर भी सामान्य प्रवाह में व्यतिक्रम ही उत्पन्न करते हैं। यद्यपि होते वे भी किसी प्रकृति नियम के अंतर्गत ही है। भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि की घटनाएं आकस्मिक अप्रत्याशित होती हैं, आश्चर्यजनक लगती हैं, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे प्रकृति नियमों के अंतर्गत नहीं हैं। यह बात दूसरी है कि उनके कारण एवं रहस्य मनुष्य की पकड़ में अभी न आए हों।
सामान्य व्यवस्था से भिन्न प्रकार के आश्चर्य जब दृष्टिगोचर हों तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि प्रकृति क्रम अनगढ़ है और कुछ भी उलटा-पुलटा होता रहता है। नियति के सुनियोजित व्यवस्था क्रम में इस प्रकार के व्यतिरेक की सम्भावना कहीं भी नहीं है।
प्रकृति के अनुसन्धान क्रम में यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि घटनाओं और संभावनाओं में ऐसे मोड़ भी विद्यमान हैं जो सर्वदा नहीं यदा-कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं। सामान्यतया इन्हें देखकर कौतूहल का आनन्द लेने की बात ही बन पड़ती है किन्तु विज्ञजनों के सामने यह चुनौती आती है कि वे प्रवाह क्रम को ही अकाट्य न मानें वरन् प्रकृति के अन्तराल में चलते रहने वाले चित्र विचित्र मोड़-मरोड़ों की संभावना भी ध्यान में रखे और उनके कारणों को खोज निकालने और अधिक रहस्यों का उद्घाटन करने हेतु दत्त चित हों।
गुरुत्वाकर्षण के नियम को शाश्वत माना जाता है। कोई भी घटना गतिक्रम जो इसके विपरीत हो, हमें स्वीकार नहीं। परन्तु पृथ्वी पर एक स्थान ऐसा है जहाँ यह नियम काम नहीं करता और बार-बार सोचने पर विवश कर देता है कि ऐसा क्यों व कैसे होता है? अमेरिका के ओहियो प्रान्त की क्लीवलैण्ड नगरी से तीस मील पूर्त्र की ओर किर्टलैण्ड पहाड़ी पर चढ़ने का प्रयास करें तो तली में खड़ी मोटर गाड़ी अपने आप बिना प्रयास सड़क पर चलती हुई चोटी तक पहुँच जाती है। इस टीले के अलावा इस शाँत स्थान पर और कुछ विशेष है नहीं। लेकिन मात्र इस चमत्कार को देखने के लिए कई पर्यटक प्रतिदिन यहाँ आते हैं। पहाड़ी की तलहटी पर चलती गाड़ी का इंजन बन्द करने पर ब्रेक से पैर हटाते ही गाड़ी धीरे-धीरे पहाड़ी चढ़ने लगती है। आरम्भ में तो गति धीमी रहती है परन्तु धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते यह 20 से 24 किलोमीटर प्रति घंटे की चाल पर चलते हुए चोटी पर पहुँच जाती है, बहुसंख्य व्यक्ति प्रकृति के आश्चर्य भौतिकी का उपहास उड़ाने वाले इस दृश्य की स्वयं अनुभूति करने के लिए अपनी गाड़ी लेकर आते व आनन्द लेकर चले जाते हैं। इस ‘ग्रेवीटी हिल’ नाम भी दिया गया है जहाँ चौदह टन भार की गाड़ियां बिना ऊर्जा अथवा शक्ति के अपव्यय के यात्रा करती देखी जाती हैं।
‘टाइम पत्रिका के 24 अप्रैल 1944 अंक में एक घटना प्रकाशित हुई थी जिसने पाठकों को चौंका दिया था। डकोटा प्रान्त (अमेरिका) के रिचर्डसन नगर में एक महिला अध्यापिका पाल्मिन रैवेल आठवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ा रही थीं कि एकाएक उस कमरे में गर्म करने को रखी अंगीठी के कोयले स्वयं प्रज्वलित होने लगे। थोड़ी ही देर में वे उछलकर दीवारों से जा-जाकर टकराने लगे। कुछ छात्रों को भी लगे। इसके बाद अंगीठी स्वतः दूसरी जगह जाकर खड़ी हो गयी एवं वहाँ रखी पुस्तकों का बन्डल तेजी से जलने लगा। श्रीमती रैवेल व अन्य बच्चे तमाशा देख ही रहे थे कि एक बच्चे की सूचना पर फायर ब्रिगेड आ पहुँची। अग्नि उससे भी शान्त नहीं हुई। कुछ मिनटों बाद वह स्वतः शान्त हो गयी। वैज्ञानिकों ने इस विचित्र अग्निकाण्ड की जाँच की लेकिन कोई कारण वे खोज नहीं पाए।
भारत में तो उत्तराखण्ड में स्थान-स्थान पर गन्धक की चट्टानों के समीपस्थ जलाशय तप्त कुंडों के रूप में प्रसिद्ध हैं। लेकिन एक ही समुद्र के एक स्थान विशेष पर पानी इतना गर्म है कि उसमें दाल-चावल पकाए जा सकते हैं। यह विश्व का सबसे खारा समुद्र ‘डेड सा’ (मृतक सागर) है जिसके स्कीपा द्वीप (इटली) के फारिया बन्दरगाह के समीपस्थ जल में यह विशेषता है।
गरम और ठण्डे जल के स्रोतों ‘गीजर्स’ के रूप में न्यूजीलैण्ड से लेकर कैलीफोर्निया तक पाए जाते हैं जिनमें पृथ्वी की अन्तर्त्वचा को भेदकर गरम पानी फुहारों के रूप में ऊपर निकलता है। इटली के ही आरमिया क्षेत्र में अपने ढंग का एक विचित्र स्रोत है। उसमें सर्दी के दिनों में गरम पानी निकलता है और भाप के बादल उठते हैं। दर्शक-पर्यटक पास बैठकर ठण्डक भगाते हैं। गर्मी के दिनों में जबकि तापमान लगभग 24-25 डिग्री सेल्सियस औसतन होता है, उसका पानी बरफ जैसा ठण्डा बना रहता है। इतना तापमान भारत के लिये तो सामान्य है परन्तु इटली जैसे देश के लिये गरम ही माना जायगा। ऐसे में सम्भवतः पर्यटकों को राहत देने के लिये मौसम की नब्ज़ पहचानते हुए स्रोत ठंडे पानी की फुहारों से उन्हें नहला देते हैं।
इंडोनेशिया में ‘जिरिनाज’ पर्वत की तलहटी में एक शान्त ज्वालामुखी है। कभी वह गरम लावा उगलता था पर अब वैसा कुछ नहीं है। फिर भी ऊपर के वातावरण में उसका चुम्बकीय चक्रवात अभी भी विद्यमान है। एक चपटा-सा बादल उसके गतिचक्र में इस प्रकार फंसा है कि वह इस परिधि से बाहर नहीं जा सकता। वह उस शिखर के ऊपर ही मँडराता एवं चक्र की तरह अनवरत घूमता रहता है। इसका कारण ज्वालामुखी की नोक से निकलने वाली गरम हवा का कोई विचित्र प्रत्यावर्तन भी समझा जाता है। फिर भी कोई तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण अभी तक इस पर कोई नहीं दे पाया।
ऐसे अनेकानेक विचित्र अविज्ञात स्थान हमारी इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं जिनके कारणों की कोई जानकारी वैज्ञानिक समुदाय को नहीं है। वे इसे ‘मिस्ट्री ऑफ नेचर’ कहकर टाल देते हैं जबकि यह क्षेत्र गहन अनुसन्धान का है।
आयरलैण्ड के एण्ट्रिल प्रदेश में एक बड़ी झील है- ‘लोधारिना’। साधारणतया वह पानी से लबालब भरी होती है। किन्तु कभी-कभी एक विचित्र आश्चर्य होता है कि झील का पानी पूरी तरह अदृश्य हो जाता है। मात्र कीचड़ ही उसके स्मृति चिन्ह के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इतना पानी इतनी जल्दी कहाँ चला जाता है, इतना विशाल जलागार कुछ ही घंटों में कहाँ गायब हो जाता है, उसकी खोज मुद्दतों से चल रही है लेकिन अभी तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सम्भव नहीं हो पाया है।
आस्ट्रिया के टोर्न नामक पर्वत का नोडेन जल प्रपात संसार के प्रकृति आश्चर्यों में से एक है। यह झरना यों निरन्तर गिरता रहता है लेकिन तीसरे पहर ठीक 3.30 पर उस पर एक इन्द्र धनुष उदय होता है। उसका समय इतना सुनिश्चित है कि लोग उससे अपनी घड़ी मिलाकर टाइम सही करते हैं।
आस्ट्रेलिया में एक चलती-फिरती पहाड़ी है। यह ग्रासमीन के नाम से प्रसिद्ध है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहती है। यह पहाड़ी एक छोटे ग्राम एवं होटल की तरह है। वह अपना स्थान बदलती रहती है। कभी यहां तो कभी वहां स्थान बदलती रहती है। कारण यह बताया जाता है कि उसकी तली में 200 फुट मोटी नमक की चट्टान है। पहाड़ की जड़ इसी पर टिकी हुई है। नीचे का नमक नमी, गर्मी और सर्दी से प्रभावित होकर उथल-पुथल करता रहता है और पहाड़ी को इधर-उधर खींचता-धकेलता रहता है।
प्रकृति की ये सभी चित्र-विचित्र गतिविधियां यह रहस्योद्घाटन करती हैं कि शोध-अनुसंधान की परिधि बड़ी व्यापक है। हमें अपने व अपने आस-पास के ही कुछ तथ्यों को देख-समझकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि विज्ञान प्रदत्त दृष्टि ने हमें सब कुछ बता दिया है। ईश्वर की लीला विचित्र है। मनुष्य का क्षेत्र सीमित है। फिर भी उद्देश्य यही होना चाहिए कि कारण जानने के प्रयास चलते रहें ताकि मानवी पुरुषार्थ सीमाबद्ध होकर न रह जाय।
काया कल्प की चर्चा बहुत होती रहती है और वृद्धता को यौवन में बदलने के स्वप्न देखे जाते रहते हैं। इसका एक पक्ष सम्भावित है और दूसरा असम्भव। सम्भव यह है कि मनुष्य अपनी कार्य क्षमता को आजीवन बनाए रहे और स्वास्थ्य को बिगड़ने न दे। रोगों के चंगुल में न फंसे। असंभव यह है कि सृष्टि क्रम उलट जाय। बुड्ढे जवान, जवान किशोर बच्चे, भ्रूण और भ्रूण शुक्राणु बनने के लिए उल्टी दिशा में चलने लगें। यह प्रकृतिक्रम को उलट देने के सदृश है। इसे सूर्य को पश्चिम से उगाने और पूर्व में डुबाने की तरह, प्रकृतिक्रम को उलटने के मनसूबों की तरह असम्भव ही कहा जा सकता है। जो वार्धक्य को यौवन में उलट सकेगा उसके लिए नई सृष्टि बना देना और प्रकृति के नये नियम निर्धारित कर गुजरना भी सम्भव हो जायगा। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा बन पड़ने की कोई सम्भावना नहीं है। इसलिए यह जल्पना तो छोड़ ही देनी चाहिए कि मृतकों को बूढ़ा और बूढ़ों को जवान बनाने की बात बन सकेगी।
इस संदर्भ में इतना ही हो सकता है कि मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक लम्बी अवधि तक जी सकता है और इस अवधि में उसे जो बार-बार रुग्णताग्रस्त होना पड़ता है उससे बच सकता है। स्वाभाविक समर्थता को देर तक स्थिर रखे रहना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। अधिकांश तो अपने ही उद्धत आचरण से समय से बहुत पहले मरते हैं और इस प्रकार भी जितने दिन जीते हैं उनमें से अधिकाँश को दुर्बलता, असमर्थता, रुग्णता का त्रास सहते हुए अनुपयोगी बना देते हैं। उस स्थिति में कोई कहने लायक पुरुषार्थ भी नहीं बन पड़ता। साथ ही जितने दिन गुजरते हैं वे भी नीरस एवं भारभूत स्थिति में रहते हुए व्यतीत होते हैं। यह मनुष्य की स्वनिर्मित स्थिति है। इससे समझदारी अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति सहज ही बच सकता है। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि अमरता न सही, समर्थ, प्रसन्न और सफल जीवन जी सकने का सुयोग बन गया।
स्वस्थ और समर्थ दीर्घजीवन के लिए आहार-बिहार के संयम का राजमार्ग अपनाना ही श्रेयस्कर है। इस दिशा में खोजी गई पगडण्डियों में से प्रायः सभी असफल सिद्ध हुई हैं। विधाता ने इस क्षेत्र में किसी ‘शाटर्कट’ की गुंजाइश नहीं रखी है। च्यवन प्राशावलेह से लेकर पारद विनिर्मित सिद्ध मकरध्वज के विभिन्न प्रयोगों का अपने देश में चिरकाल से यशेगान होता रहा है। पौराणिक गाथाओं से उत्साहित होकर महामना मालवीय जी तक कायाकल्प उपचार कराने के लिए तत्पर हुए। अमीरों के लिए राजवैद्यों द्वारा तरह-तरह के कीमिया कुश्ते बनाने में उनकी हैसियत के अनुरूप खर्च कराने वाले चित्र-विचित्र सरंजाम खड़े किये जाते रहे हैं पर इनमें किन्हें कितनी सफलता मिली, इसका पर्यवेक्षण किंवदंतियों से आगे बढ़कर जब किया जाता है तो कुछ सार सार हाथ नहीं लगता।
बुड्ढों को जवान बनाने के जादुई उपचारों की समय-समय पर जोर आज़माइश होती रही है। इनमें से एक है प्रौढ़ पशुओं के यौवन रस को मनुष्य शरीर में प्रविष्ट कराना। इसके लिए बंदरों की आफत आई और उनके अन्दर कोशों का रस निचोड़कर या अवयवों का आरोपण करके यौवन वापिस बुलाने का स्वप्न देखा गया। स्टालिन, ब्रेझनेव, चर्चिल, टीटो आदि मूर्धन्य राजनेताओं के नाम ऐसे लोगों में सम्मिलित हैं जिनकी जवानी वापस लौटाने के लिए विशेषज्ञों ने प्राणपण से प्रयत्न किए। किन्तु क्षणिक कौतूहलों के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा। छुटभैयों में तो सहस्रों ऐसे हैं जो इस आशा में दौलत पानी की तरह बहाते रहे। चिकित्सक कर तो बहुत कुछ सकते हैं पर इतना आगे तक वे भी नहीं बढ़ सके कि नियति व्यवस्था को उलट सकने में समर्थ हो सकें। जो बुड्ढे को जवान बना सकेगा वह जवान को बच्चा, बच्चों को नवजात, नवजात को भ्रूण और भ्रूण को शुक्राणु बनाने में भी क्यों असफल रहेगा। ऐसे लोग शायद सूर्य को पश्चिम में उगाने और बादलों से अनाज बरसाने में भी समर्थ होंगे। प्रकृति क्रम को सकने उलट सकने वाला मात्र बुड्ढे को जवान बनाकर ही चुप क्यों बैठेगा? वह नियति व्यवस्था को अपनी इच्छानुकूल बनाने वाले अन्य क्रम अपनाने से भी चूकेगा क्यों?
तब क्या इस सम्बन्ध में कुछ सोचने या करने की आवश्यकता ही नहीं? ऐसी निराशा में पड़ने की भी कोई बात नहीं है। मानवी संरचना में यह पूरी गुंजाइश है कि सामान्यतः 200 वर्ष तक और विशेष रूप से 200 वर्ष तक जीवित रहना सम्भव हो सके और इस अवधि में इंद्रियां भली प्रकार काम देती रह सकें। अवयवों की संरचना का पर्यवेक्षण करने वाले मानवी आयुष्य इतना होने की बात को तथ्य पर आधारित सिद्ध करते हैं। इन दिनों भी संसार में ऐसे लोग जीवित हैं जो प्रायः 150 वर्ष पूरे कर चूके और अभी देर तक जीवित रहने की आशा करते हैं। शतायु लोगों की संख्या तो अभी भी हजारों को पार कर लाख का अंक छू रही होगी। ऐसी दशा में यह क्या बुरा है कि आम आदमी से प्रायः तीन गुनी इस अवधि को भी स्वाभाविक और संभावित मानकर चला जाय और उसके लिए उस मार्ग को अपनाया जाय जो किसी के लिए भी कठिन नहीं है। उसमें प्रस्तुत असंयम पर अंकुश लगाने और प्राणिमात्र द्वारा अपनाई जा रही प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण करने मात्र की समझदारी अपनाई जाय।
स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रहने वाले अवयवों में तीन प्रधान हैं। एक आमाशय, दूसरा हृदय और तीसरा मस्तिष्क। इन तीनों को हम अवांछनीय दुर्व्यवहार अपनाकर बेतरह तोड़ते, उजाड़ते रहते हैं। यदि इस आत्मघात की हानि को समझा जा सके और अपने हाथों अपना घर जलाने का कौतुक रचने से बचा जा सके तो इतने भर से वह प्रयोजन पूरा हो जाता है जिसके द्वारा दीर्घायुष्य का लाभ लेने के मार्ग में प्रस्तुत होते रहने वाले समस्त व्यवधानों से छुटकारा पाया जा सके।
इस संदर्भ में विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा इन्हीं दिनों प्रकाश में आई है जिसका नाम है- जेरेण्टोलॉजी। जिसका अर्थ वार्धक्य (एजींग) की समस्या पर प्रकाश डालने वाला पर्यवेक्षण। इस शाखा के निष्णात कहते हैं, मनुष्य बिना किसी कठिनाई का सामना किए या विशेष उपचारों के फेर में पड़े आसानी से 110 वर्ष जी सकता है। विशेष परिस्थितियों में इससे अधिक भी। जो इससे पूर्व मरते हैं उन्हें अकाल मृत्यु से अथवा आत्महत्या से मरे हुओं में गिना जाना चाहिए।
जेरेण्टोलॉजी के विशेषज्ञ कहते हैं कि आदमी अमर तो नहीं हो सकता और न बुढ़ापा रोका जा सकता है पर उतना अवश्य हो सकता है कि वृद्धावस्था किसी को भी अपंग परावलम्बी होने की स्थिति न पहुंचाये और मनुष्य मरते समय तक अपनी जीवनचर्या भली प्रकार निभाता हुआ किसी के लिए भार न बने। यहाँ तक कि कुछ न कुछ उत्पादक श्रम भी करते रहने की स्थिति में बना रहे। शरीर और मस्तिष्क की क्षमता घटने पर उस स्थिति में काम का स्तर हलका-फुलका रहना चाहिए। यह स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है। काम के दबाव से शरीर को बेतरह दबाने या मस्तिष्क को तनाव की स्थिति में जकड़ने वाले काम ही कठिनाई उत्पन्न करते हैं अन्यथा बालकों की तरह हँसते-खेलते काम करते रहने में शरीर की हानि नहीं होती वरन् पाचन कृत्य में सहायता ही मिलती है।
स्विट्जरलैंड के स्वास्थ्य विज्ञानी ग्यानोली का कहना है कि आहार का वर्तमान प्रचलन शरीर पोषण की दृष्टि से सर्वथा अनुपयुक्त है। उसे बदला जाना चाहिए। आदमी को शाकाहार पर गुजारे की आदत डालनी चाहिए और भरपेट खाने के वर्तमान ढर्रे को उलटकर ऐसा होना चाहिए कि आधे पेट से अधिक आहार उदरस्थ न किया जाय। दो बार खाना बहुत है। जलपान का रिवाज बन्द होना चाहिए। बीच-बीच में खाने की आवश्यकता पड़े तो वह दूध, छाछ, रस, रसा आदि पेय पौष्टिकों के सहारे पूरी करनी चाहिए। देर तक चबाने और सप्ताह में एक बार उपवास करने की भी पेट को ठीक रखने के लिए आवश्यकता पड़ती है। जो इतना कर सकेंगे उनका पाचन तन्त्र सही बना रहेगा और अकाल मृत्यु के खतरे से बहुत हद तक बचा जा सकेगा। आहार विज्ञानियों का मत है कि आरोग्य और खाद्य प्रक्रिया का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जो जीवन को महत्वपूर्ण मानते हैं और बिना रुग्ण असमर्थ हुए देर तक अपनी कार्यक्षमता बनाए रखना चाहते हैं उन्हें उस पद्धति को बदलना चाहिए जो आजकल लोक व्यवहार में आती है।
हृदय विशेषज्ञ डॉ डिवैकी का कहना है कि शारीरिक श्रम की न्यूनाधिकता से न केवल पाचन वरन् श्वास प्रक्रिया एवं रक्त संचार तन्त्र में व्यवधान उत्पन्न होता है। उन्हें या ता दबाव में पिसना या फिर ठालीपन के कारण निष्क्रियता की व्यथा में फँसना पड़ता है। जिस प्रकार पेट का गुजारा आहार बिना नहीं उसी प्रकार रक्त संस्थान की सक्षमता के लिए श्रम सन्तुलन आवश्यक है। अधिक श्रम के कारण उत्पन्न हुई थकान पर जिस प्रकार चिन्ता की जाती है उसी प्रकार निठल्लेपन के कारण जकड़न की अर्धमृतक जैसी स्थिति रहने की हानि पर भी गौर करना चाहिए। श्रम से किसी को भी नहीं बचना चाहिए अन्यथा पाचन और परिशोधन व्यवस्था गड़बड़ाने पर वैसा स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होगा जैसा कि आमतौर से बुद्धिजीवियों या अमीरों पर छाया रहता है।
रूसी मनःशास्त्री मायरोवस्की कहते हैं- हलका-फुलका जीवन जीने, हँसते-हँसाते रहने की आदत दीर्घ जीवन के नितान्त आवश्यक है। महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरे कामों को करने के लिए चिन्ताग्रस्त या उद्विग्न रहने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। वे सन्तुलित मनःस्थिति में ही ठीक तरह निभ सकते हैं। ऐसी स्थिति बनाए रहने के लिए आवश्यक है कि अवसाद या आवेश से ग्रसित होने की आदत से पीछा छुड़ाया जाय। यह असन्तुलन कामों के भारी होने या कठिनाइयाँ रहने के कारण नहीं, मस्तिष्क विद्या से अपरिचित होने के कारण होता है। यह नितान्त सम्भव है कि बड़े कामों का वजन उठाते हुए भी, अनेकों समस्याओं का समाधान या सामना करते हुए भी हलकी मनःस्थिति बनाए रखी जाय। मानसिक दबाव का आरोग्य से गहरा सम्बन्ध है, इस तथ्य को भली भांति समझ लेना चाहिए।
डॉ. कैमण्ट का कथन है- आरोग्य का विपुल भण्डार मनुष्य को प्रकृति के अनुग्रह से अनायास ही मिला हुआ है। अब समझदारी की बारी है कि वह इस सम्पदा को किस प्रकार सुरक्षित रखे और किस प्रकार इसका सदुपयोग करके पूर्णायुष्य प्राप्त करे। कौन कितने दिन तक जिया, इसका वास्तविक मूल्यांकन यह है कि किसने किस स्तर का कितना काम सही तरीके से सम्पन्न किया। इसके लिए शारीरिक, मानसिक आरोग्य बनाये रहने की सर्वप्रथम आवश्यकता पड़ती है। स्पष्ट है कि इसके लिये नये उपचार खोजने की आवश्यकता नहीं। काम इतने से ही चल जाता है कि पेट, हृदय और मस्तिष्क को अनावश्यक दबावों से बचाकर उन्हें स्वतन्त्रतापूर्वक काम करते रहने का अवसर दिया जाय। यही वास्तविक कायाकल्प है। इस शब्द के अनावश्यक भ्रम जंजाल में उलझने वालों को नीरोग प्राकृतिक जीवन जीने, मन को पवित्र हलका-फुलका बनाने एवं शरीर को यथा सम्भव श्रम-विश्राम का सन्तुलित अभ्यास कराते हुए ही चिरयौवन की बात सोचना चाहिए।
मनुष्य का प्रमुख आधार वनस्पति है। इसलिए उसकी कार्य संरचना में वे ही पदार्थ पाये जाते हैं जो वनस्पतियों में हैं। यह प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है, जिसे आँख खोलकर चारों ओर देखा जा सकता है। स्वास्थ्य विपर्यय में इन पदार्थ घटकों की ही न्यूनाधिक मात्रा में घट बढ़ होती रहती है, जो बीमारी के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इसका निराकरण करने के लिये यदि अमुक विशेषता वाली वनस्पतियों का सहारा लिया जाना है तो उसे उचित उपयुक्त ही कहा जायेगा।
पुरातन काल की चिकित्सा प्रणाली वनस्पति प्रधान है। चरक संहिता में उसी की प्रधानता है। संसार के इतिहास में सर्वत्र उपचार पद्धति में यही विनियोग काम आता रहता है। अब धीर-धीरे आधुनिक चिकित्सा पद्धति के प्रतिपादक भी इसी दिशा में सोचने लगे हैं।
पिछली शताब्दियों में विज्ञानवादी घुड़दौड़ ने चिकित्सा पद्धति को भी प्रभावित किया है और खनिजों क्षारों, रसायनों, मद्यों, विषों को जिस-तिस प्रकार तोड़ मरोड़कर औषधि रूप में प्रयुक्त करने का प्रचलन बढ़ा है। तात्कालिक उत्तेजना की दृष्टि से कभी-कभी चमत्कारी प्रभाव भी इनका होता रहा है पर नशा पीने से जैसे वे आदत में सम्मिलित हो जाते हैं और न पीने पर शिथिलता-व्याकुलता उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार इन उत्तेजक औषधियों का परिणाम भी देखा गया है। क्षणिक लाभ पहुँचाने की दृष्टि से जिनने प्रलोभन वश इन्हें अपनाया, वे दूसरी प्रकार की व्याधियों में फस गये और सोचा गया लाभ अन्ततः घाटे के रूप में दृष्टिगोचर होता रहा। ऐलोपैथिक दवायें औषधीय पौधों के सक्रिय संघटकों के शुद्ध अणुओं से बनाई तो गयी पर उनकी प्रतिक्रिया दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाली ही रही।
अब चिकित्सा शास्त्रियों का ध्यान नये सिरे से जड़ी बूटी उपचार की ओर मुड़ा है। वे सस्ती भी हैं और सरलतापूर्वक उपलब्ध होने वाली भी। फिर उनमें वे तत्व भी हैं जो मनुष्य शरीर में पच और खप जाते हैं। कृत्रिम औषधियों में यह विशेषता नहीं होती। विटामिन ‘बी कम्पलेक्स’ की गोलियाँ पीले पेशाब के रूप में बाहर निकल जाती हैं, शरीर में उसका न्यूनतम अंश ही रुक पाता है। कैल्शियम के इन्जेक्शन हड्डियों में प्रवेश करने और उन्हें मजबूत बनाने का उद्देश्य पूरा नहीं कर पाते पर अस्थियों पर परत की तरह वह चूना जम जाता है।
इस दृष्टि से वनस्पतियाँ अपने प्राकृतिक रूप में सर्वोत्तम हैं। उनमें अन्यान्य गुणों के साथ पचने और रक्त में घुलने की भी विशेषता है। अस्तु चिकित्सा में उनका अवलम्बन लेना ही बुद्धिमता है।
भारत सहित विश्व के अन्यान्य महत्वपूर्ण देशों ने इस सम्बन्ध में जो अनुसंधान किये हैं, उनसे नये परिणाम प्रकाश में आये हैं। भारत में पाई जाने वाली पीला कनेर, सर्पगंधा, गुग्गुल, विड़ंग, कुमारी, जटामांसी, हल्दी जैसी औषधियों में से ऐसे गुण पाये गये हैं जिससे उन्हें चिकित्सा क्षेत्र में बहुत ऊँचा सम्मान मिल सके।
पीली कनेर हृदय रोगों में सर्पगंधा- मस्तिष्कीय रोगों व उच्च रक्त चाप में रामबाण पाई गयी है। सदाबहार में ( विन्कारोजिया व अल्बा) में कैंसर दूर करने की क्षमता है। दमे में लाल प्याज तथा मधुमेह व गठिये में लहसुन का चमत्कारी प्रभाव देखा गया है। रूस में इसे पेनीसिलिन के समतुल्य माना जा रहा है। विड़ंग में सन्तति निग्रह के गुण पाये गये हैं।
दिल्ली के नेशनल ऐलर्जी सेण्टर, बल्लभ भाई पटेल चेस्ट इन्स्टीट्यूट, आल इण्डिया इन्स्टीट्यूट आफ मेडिकल साइन्सेज, पंजाब विश्व विद्यालय, महाराष्ट्र राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला, जामनगर आयुर्वेद विद्यालय, जम्मू की क्षेत्रीय अनुसंधानशाला (आर. आर. एल.) जैसे भारत स्थित शोध संस्थानों ने जड़ी बूटियों पर जो नवीनतम शोधें की हैं उनसे यह आशा बंधती है कि भारत जैसे निर्धन देशों में चिकित्सा प्रयोजन के लिये जड़ी बूटियों का उपयोग अधिक कारगर सिद्ध होगा।
ब्रह्मविद्या से तात्पर्य है- वह उच्चस्तरीय नीतिदर्शन जिसके पठन-पाठन से व्यक्तित्व आमूल-चूल बदल जाय। इसका शिक्षण भी सार्थक माना जाता है जब इन सिद्धांतों की व्याख्या उचित परिकर में उचित व्यक्ति द्वारा की जा रही हो। सत्परामर्श तो कहीं भी, किसी भी स्थिति में दिया जा सकता है परन्तु आध्यात्मिक काया कल्प जैसा सुनिश्चित परिवर्तन लाने वाला शिक्षण शक्ति सम्पन्न वातावरण में- उचित मार्गदर्शन में ऐसे व्यक्तियों द्वारा ही सम्भव है जिन्होंने स्वयं उन सिद्धांतों का अपने जीवन में अभ्यास किया हो। अपने आपको ही प्रयोगशाला मानकर जिनने इन सिद्धांतों को परखा, कसौटी पर कसा, उनका कहा हुआ हर वाक्य नीति वाक्य, दर्शन का सूत्र बन गया। बुद्ध, ईसा, हजरत मोहम्मद, गाँधी, रामकृष्ण परमहंस को उस श्रेणी में रखा जा सकता है जिन्होंने ज्ञानगंगा बहाई एवं तद्नुरूप स्वयं रूप भी जीवन जिया।
प्रशिक्षण प्रक्रिया की चर्चा की जाय तो उसे दो पक्षों में बाँटा जा सकता है। एक वाणी और दूसरा लेखनी के द्वारा प्रयुक्त स्वाध्याय सत्संग का वार्ता उपक्रम जिसमें कथन और पठन की प्रधानता रहती है। अध्यापक कक्षाएँ पढ़ाते हैं, विद्यार्थी इस ज्ञान को पुस्तकों के सहारे अधिक अच्छी तरह मस्तिष्क में जमाते उतारते हैं। इस समूची प्रक्रिया का प्रभाव मात्र उस बाह्य मस्तिष्क पर ही होता देखा जाता है जिसे व्यवहार में काम आने वाला सचेतन कहते हैं। इसी आधार पर कुशलता भी अर्जित की जाती है। स्कूलों- कॉलेजों- शिल्पगृहों में इसी की धूम रहती है। इसे मात्र योग्यता बढ़ाने वाली शिक्षा कह सकते हैं। बाजारू मूल्य इसी का है। मनोरंजन, व्यवसाय, संपर्क, लोकाचार आदि में इसी कौशल का प्रयोग होता है। आजीविका उपार्जन का यह प्रमुख माध्यम है। कई बार भ्रान्तिवश इसे ‘प्रतिभा’ मान लिया जाता है। मोटी दृष्टि इसी का मूल्यवान करती देखी जाती है।
शिक्षा क्षेत्र की इस विद्या को विशुद्ध रूप से व्यवहार कोशल संबंधी सामान्य ज्ञान कहा जा सकता है। इसमें मात्र भौतिक जानकारियाँ भरी रहती हैं। यों नीति, धर्म, सदाचार, दर्शन, समाज शास्त्र सम्बन्धी विषय भी इसी परिधि में शामिल हैं, पर उस आधार पर जो सीखा-समझा गया होता है, आमतौर से वह जानकारी तक ही सीमित होता है। इन सभी शास्त्रों के ज्ञाता- महाविद्यालयों के शिक्षकगण विद्वान कहे जा सकते हैं, पर यह आवश्यक नहीं कि इस आधार पर जो भी कुछ सीखा समझा गया है, वह मान्यता भी बने और व्यवहार में भी उतरे। शालीनता की पक्षधर बातें कहने वाले प्रवक्ता उस उत्कृष्टता पर सच्चे मन से विश्वास करते हों, उन्हें व्यवहार में उतारते हों, यह कतई अनिवार्य नहीं। कई बार तो कथनी और करनी में सर्वथा प्रतिकूलता दिखाई पड़ती है। इसे ही शैतान के मुंह से बाइबिल का उच्चारण भी कहा जाता है। बोलचाल की भाषा में “पोथी के बैंगन” कहकर इन पर व्यंग्य भी किया जाता है। यह विरोधाभास है तो एक विडम्बना, परन्तु इसका बाहुल्य इतना अधिक दृष्टिगोचर होता है कि उपदेशों का बहिरंग श्रेष्ठतम होते हुए भी उन नीति वाक्यों पर सहज ही विश्वास नहीं होता। लगता है इनकी वाणी प्रभावहीन हो गयी है अथवा सुनने वालों में जड़ता समा गयी है। यदि ऐसा न हुआ होता तो इतने प्रवचनों- कथा उपदेशों-सप्ताह परायणों के होते रहते यह स्थिति क्यों देखने को मिलती। इसका मर्म समझने के लिये हमें रामचरित्र मानस के पृष्ठ उलटने होंगे जहाँ पर रामायणकार ने इस विडम्बना को और भी अधिक उजागर करते हुए एक चौपाई रची है-
“पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जो आचरहिं ते नर न घनेरे।।” जानने पर भी न मानने की बात है तो आश्चर्यजनक, पर देखा उसी का बाहुल्य जाता है। इसलिए भौतिक जानकारियों को ही आमतौर से प्रवक्ता द्वारा सीखा जाता है। नीति धर्म की बातें तो ऐसे ही प्रवंचना मानकर मजाक में उड़ा दी जाती हैं। इस माहौल में लोगों का ऐसा विश्वास बनता जा रहा है कि आदर्श मात्र कथन श्रवण के लिए है, उन्हें व्यवहार में नहीं उतारा जा सकता। बात बढ़ते-बढ़ते अब यहाँ तक पहुँची है कि लोग कथा सुनने या धर्मग्रन्थ पढ़ने मात्र से पुण्य मिल जाने और प्रकरण समाप्त होने जैसी मान्यता बनाते जा रहे हैं। धर्ममंच से जो कहा जाता है उसके सम्बन्ध में कुछ ऐसा ही माहौल बन चला है कि कथन श्रवण के साथ ही धर्मचर्चा का समापन हो जाता है, उसे व्यवहार में उतारना न तो सम्भव है और न आवश्यक है। ऐसा दुस्साहस तो कोई गृहत्यागी-विरक्त-महात्मा ही कर सकते हैं।
उसे विचार क्षेत्र का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि भौतिक क्षेत्र में तो शिक्षा और प्रक्रिया जुड़ी और व्यावहारिक मानी जाती रहे किन्तु जीवन परिष्कार के सम्बन्ध में उसे अव्यावहारिक माना जाय। यदि स्थिति ऐसी ही रही तो सोचना होगा कि नागरिकता और सामाजिकता के सिद्धांतों को पढ़ने-पढ़ाने और सुनने-सुनाने में भी समय की बर्बादी क्यों की जाय? व्यावहारिक असंगत और अनुपयोगी बातों को फिर पढ़ने सुनने की भी क्या आवश्यकता रही?
इस संदर्भ में शान्त चित्त और गम्भीरतापूर्वक सोचना होगा कि आखिर ऐसा होता क्यों है? जब आदर्शवादिता हर कसौटी पर व्यक्तित्व को परिष्कृत करने और जन-सम्मान सहयोग अर्जित करने में सफल है तो उसका महत्व क्यों नहीं समझा जा रहा है, अपनाने में क्या अवरोध अड़ गया है? इसके उतर में दो कारण हैं एक तो बहुजनों द्वारा अपनाये जा रहे अवाँछनीय प्रवाह प्रचलन का दबाव, दूसरा इस शिक्षण को अचेतन तक उतारने वाली प्रक्रिया साथ न जुड़ने के कारण उसका अपंग रहना। प्रचलन बदलने के लिए ‘विचार क्रान्ति अभियान’ जैसे व्यापक प्रयत्नों की आवश्यकता है किन्तु जहाँ तक विचारणा को- आस्था को प्रभावित करने और दूरदर्शी तथ्यों को हृदयंगम करने का प्रश्न है वहां तक यह समझा जाना चाहिए कि यह कार्य क्षेत्र अचेतन चित्त का है। व्यवहार में कम करने वाले कामकाजी मन-मस्तिष्क का नहीं, इसलिए आदर्शवादी शिक्षण के साथ ऐसे तत्वों का भी समावेश करना पड़ता है जो अचेतन- सुपर चेतन की अन्तःकरण परतों तक अपना प्रभाव पहुँचा सकने में सफल हो सके।
प्रत्यक्ष मस्तिष्क की मन और बुद्धि परत को शिक्षित करना एक बात है और अप्रत्यक्ष अचेतन की- चित्त एवं आस्था मर्मस्थल तक पहुँचकर श्रद्धा विश्वास को जगाना- उत्कृष्टता का पक्षधर बनाना दूसरी। आदर्शों का स्वागत वहाँ होता है जहाँ विवेक है। इन दोनों का मस्तिष्क की भौतिकी सतह पर ठहराव नहीं होता। वहाँ तो फिसलन और दलदल ही भरे पड़े हैं। उथले स्तर पर मनुष्य भी नरपशु है डार्विन ने उसकी व्याख्या नर वानर के रूप में की है। ऐसी दशा में पशु प्रवृत्तियों के धरातल पर न तो दूरदर्शिता के लिए कोई स्थान है और न आदर्शवादी उत्कृष्टता के लिए। पशुओं को आदर्श पालन पर सहमत नहीं किया जा सकता। इस दृष्टि से वे मनुष्य से पीछे हैं। किन्तु वे प्रकृति अनुशासन पालन की दृष्टि से मनुष्य से आगे भी हैं। पतन की व्यापक परम्परा है। उत्थान के लिए कौशल और बल साधन दोनों चाहिए। पानी नीचे की ओर सहज बहता है। ढेला ऊपर से नीचे सहज गिरता है किन्तु यदि उसे ऊपर उछालना हो तो अतिरिक्त प्रयास एवं साधन जुटाने होंगे। मन को कुमार्ग पर सहज लाया जा सकता है। संकीर्ण स्वार्थपरता की निकृष्टता अपनाने के लिए कोई ओछे दुर्बुद्धि व्यक्ति भी सफल हो सकते हैं। यहाँ तक कि कागज पर छपी तस्वीर तक किसी की कामुकता भड़का सकती है किन्तु उच्च उद्देश्यों की ओर आगे चलने ऊँचे उठने के लिए कई विशिष्ट उपकरण चाहिए साथ ही फेंक सकने की क्षमता वाला बल जुटाना पड़ेगा।
आदर्शवादी प्रशिक्षण के लिए तीन बातें आवश्यक हैं। एक ऐसा प्रशिक्षक जो प्रतिपादित आदर्शों को देर से, सच्चे मन से पालन करता रहा हो। दूसरा यह कि साधक की मनोभूमि मुलायम बनाने वाली श्रद्धासिक्त वातावरण भी ऐसे प्रसंगों में अपेक्षित होता है। तीसरे प्रतिपादन की शैली ऐसी हो जो व्यक्ति की प्रसुप्त मनोभूमि के साथ तालमेल खाती हो।
एक वैश्या जीवन में सैंकड़ों नये व्यभिचारी उत्पन्न कर देती है। एक मद्यष सैकड़ों नयों को वह चस्का लगा देता है। यह प्रभाव इसलिए उत्पन्न होता है कि उनकी कथनी और करनी एक होती है। आदर्शों के प्रतिपादन कर्ता निजी जीवन में छूंछ होते हैं और छद्मों के सहारे अपना छकड़ा घसीटते हैं। ऐसी दशा में यदि उन उपदेशों का प्रभाव न पड़े, अवज्ञा हो, उपहास उड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि प्राकृतिक रूप में उपलब्ध कच्चे लोहे को पिघलाना और नये रूप में ढालना हो तो भट्टी जैसी गर्मी चाहिए। विवाह एक खास माहौल में हो तो ही उसमें स्थिरता आती है। यों पार्क में बैठकर भी वैसा अनुबन्ध बंध सकता है।किन्तु उसमें उतनी निश्चिन्तता नहीं रहती जितनी कि पंच समुदाय, देव सान्निध्य एवं अग्नि की साक्षी में उस प्रक्रिया को भावभरे वातावरण में सम्पन्न करने से बनती है।
जो जिस भाषा को समझता है उसका उसी में बात करने से प्रयोजन पूरा होगा अन्यथा अन्य भाषा में दी गई सिखावन निरर्थक सिद्ध होगी। यहाँ भाषा से तात्पर्य है- मनोभूमि। जिसका भावार्थ है- लोभ, मोह, स्वार्थ, अहंकार, तर्क, प्रमाण, परम्परा आदि के प्रति झुकाव की जानकारी। जिसके ऊपर जिन आधारों का आधिपत्य है उसे उसी प्रकार के तथ्य तर्क, प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सहमत करने का प्रयत्न करना चाहिए। चतुर सेल्समैन अपने माल की विशेषता, किसी को सस्तेपन की, किसी को मजबूती की, किसी को नये फैशन डिजाइन की, किसी को शान-बड़प्पन की विशेषता बताते हुए प्रभावित करते और माल चपेटते हैं। वे ध्यान रखते हैं कि कौन ग्राहक किस रुझान का है। वे माल की संगति उस रुझान के साथ बिठाने की कुशलता का परिचय देते और सफल विक्रेता बनते हैं। ठीक यही बात किन्हीं ऐसे प्रसंगों के सम्बन्ध में लागू होती है जो दैनिक व्यवहार में काम नहीं आते। कल्प साधना के साधकों की मनोभूमि जिस स्तर की है- उन्हें जो उपयुक्त जँचता रहा है उसके साथ भी उस आदर्शवादी शिक्षण की संगति भली प्रकार बैठ जाती है, जो इस अवसर पर सिखाये- हृदयंगम कराये जाते हैं। यहाँ तक कि विशुद्ध स्वार्थान्ध महत्वाकांक्षा और अहंकारी तक में बिना उसके रुझान को चोट पहुँचाये उत्कृष्टतावादी सिद्धांतों को उसी के अनुकूल अनुरूप सिद्ध किया जा सकता है। प्रज्ञा साहित्य की- प्रज्ञा मंच की यही विशेषता है। उसे आज के प्रत्यक्षवादी चिन्तन प्रवाह को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण आदि के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से लिखा और कहा जाता है फलतः उसका प्रभाव भी जन साधारण को अनुप्राणित करता है।
कल्प साधना सत्र में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण इसलिए प्रभावी सिद्ध होता है कि उसमें उपरोक्त तीनों ही तथ्यों का सघन समावेश है। जिनका प्रतिपादन है, जो प्रशिक्षण की प्रक्रिया संजोते हैं, वे भले ही स्वयं बोलें या दूसरों की वाणी से अपनी बात कहें हर हालत में उन्हें अध्यात्म प्रवक्ता के लिए आवश्यक कसौटी पर खरा पाया जा सकता है। कथनी और करनी में अन्तर का यहाँ प्रश्न नहीं। गान्धी, बुद्ध आदि के प्रवचन इसीलिए कोई-कोई मानवों के गले उतरे की उनके प्रतिपादन में वचन ही नहीं, चरित्र एवं व्यक्तित्व भी बोलता था। लगभग ऐसी ही प्रेरक परिस्थितियाँ यहाँ भी हैं।
गुरुकुल और आरण्यकों में जिस शिक्षा पद्धति का समावेश था, वह मात्र बौद्धिक ही नहीं था वरन् उसके साथ श्रद्धासिक्त वातावरण का भी समावेश था। यदि ऐसा न होता तो होटलों, प्लेटफार्मों, मेले ठेले जैसे माहौल में प्रवचन के नाम पर धमाल भर मचता रहता, किसी को बदलने ढालने जैसी बात बनती ही नहीं। तीर्थ का तात्पर्य उच्चस्तरीय वातावरण से है। गुरुकुल आरण्यक ऐसी ही विशेषताओं से भरे-पूरे क्षेत्र में अपना उद्देश्य पूरा कर पाते हैं। आज वैसी परिस्थितियां कहीं ढूंढ़े नहीं मिलतीं। आडम्बर खड़े कर लेना- ऐतिहासिक संदर्भों की उस स्थान के साथ संगति जोड़ना एक बात है और हर दृष्टि से आध्यात्मिकता के अनुरूप वातावरण विनिर्मित करना दूसरी। ऐसे स्थानों को एक प्रकार से वातानुकूलित स्तर का कहा जा सकता है। शान्ति-कुँज में अखण्ड-ज्योति, अखण्ड अग्नि, नित्य एक गायत्री महा पुरश्चरण, नित्य चौबीस हजार आहुतियों का हवन, गंगा-हिमालय का मन्दिर, गायत्री महाशक्ति की नियमित पूजा आरती, प्रमुख तीर्थों की नित्य झाँकी, भावोत्तेजक प्रदर्शनी, जड़ी-बूटी उद्यान, कल्प साधकों की साधना तथा शिक्षा, गंगा की गोद- हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की साधना भूमि, गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र की तपस्थली, प्राण प्रखरता की प्रचण्ड ऊर्जा, दिव्य सान्निध्य एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन- संरक्षण जैसी विशेषताओं में से एक-एक का पर्यवेक्षण प्रतीत होता है कि यहाँ वह वातावरण विद्यमान है जिसमें मिलने वाली शिक्षा और की जाने वाली साधना सफल सार्थक हो सकती है। ऐसी व्यवस्था बना लेने के उपरान्त ही अब यह साहस किया गया है कि उपयुक्त वातावरण में उच्चस्तरीय साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय।
कल्प साधना में जो कराया जाता है उसकी पृष्ठभूमि तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर नवम्बर 1982 के अंक में भली-भांति समझाई गई है। इसके लिए आवश्यक पाठ्य सामग्री भी छाप दी गयी है और वह प्रत्येक साधक को अनिवार्यतः पढ़ना होता है। सारे साहित्य का सैट सभी के पढ़ने के लिए निःशुल्क वाचनालय में उपलब्ध रहता है। इसके अतिरिक्त वाणी में भी उनका ऐसा समाधान किया जाता रहता है जो शास्त्र कथन, आप्त वचन की दुहाई देकर थोपा नहीं जाता वरन् बुद्धि संगत आधारों पर हृदयंगम कराया जाता है। यही कारण है कि प्रतिपादन और प्रशिक्षण बेबी फूड की तरह पौष्टिक स्वादिष्ट होने के साथ-साथ हाथों-हाथ पचता भी जाता है।
गायत्री तीर्थ की समग्र शिक्षा पद्धति एवं साधना विधि को अध्यात्म विज्ञान की- ब्रह्म विद्या की पृष्ठभूमि पर आधारित किया जा सकता है। यह शिक्षा नहीं विद्या है। “सा विद्या या विमुक्तये।” विद्या वह जो बन्धन मुक्त करे। “विद्ययामृत मश्नुते” विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है। डडडडडड हि ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते” सद्ज्ञान से श्रेष्ठ इस संसार में और कुछ नहीं है- जैसे अगणित सार सूत्रों में जिस ज्ञान गंगा की महिमा पाई गई है उसे अध्यात्म क्षेत्र की वे विभूतियाँ ही समझा जाना चाहिए- जिन्हें श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के नाम से जाना जाता है और जिनका प्रतिफल ‘तृप्ति’, ‘तुष्टि’ और ‘शांति’ के नाम से बताया जाता है।
आज शिक्षा की नहीं, इसी ब्रह्म विद्या की आवश्यकता है। जानकारियों के पुतले हर जगह एक से एक कीमती परिवेश पहने, पिटारियों में जहाँ-तहाँ सजधज के साथ बैठे, इठते अकड़ते दिखलाई देते हैं। जानकारियों को देने वाली- प्रदर्शन करने वाली संस्थाओं की भी कमी नहीं है। दुर्भिक्ष तो विद्या के क्षेत्र में ही पड़ा है। आत्म-निर्माण का- देवोपम व्यक्तित्व के निखार वाला जीवन्त प्रशिक्षण चिराग लेकर भी कहीं ढूंढ़े नहीं मिलता। मात्र पुस्तकों में ही ऐसे प्रशिक्षण वाले गुरुकुलों का वर्णन पढ़ने को मिलता है। यदि आज ऐसा शिक्षण कहीं हो भी हो तो उसके साथ प्रशिक्षकों का व्यक्तित्व, भावश्रद्धा उभारने वाला वातावरण एवं हृदयग्राही स्तर का प्रतिपादन ढूंढ़ने पर तो गाड़ी बुरी तरह रुककर खड़ी हो जाती है। मन हताश हो जाता है एवं लगता है अब उस स्थिति को लौटा पाना सम्भव नहीं है। गायत्री तीर्थ में आने वाले हर कल्प साधक को यह विश्वास दिलाया जाता है कि स्थिति उतनी निराशाजनक नहीं है। यहाँ प्रयत्न यही किया गया है कि साधकों को अध्यात्म विद्या का लाभ लेने में उन अवरोधों का सामना न करना पड़े जो सर्वत्र नुकीली चट्टानों के रूप में रास्ता रोके खड़े हैं और एक कदम आगे नहीं बढ़ने देते।
जो अपने को सिखा समझा सकता है उसी के लिए यह संभव है कि दूसरों को समझाये और सही रास्ते पर चलाये।
कोई वस्तुतः क्या है? उसकी परख उसकी योग्यता या प्रतिभा से नहीं वरन् उदारता एवं चरित्र निष्ठा के आधार पर की जानी चाहिए।
समस्याओं को सुलझाने और सुविधा संपदाओं को बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति उत्सुक इच्छुक पाया जाता है और इसके लिए अपनी मति के अनुसार कुछ न कुछ सोचता और करता भी है। पर इस संदर्भ में कोई ऐसी कठिनाई अड़ी रह जाती है जिससे चिन्तन के अनुरूप परिस्थितियाँ नहीं बन पातीं और जिनकी इच्छा तनिक न थी, उन्हें उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। देखना होगा कि वह व्यवधान क्या हो जो ईश्वर के अंश राजकुमार प्रतिनिधि कहे जाने वाले मनुष्य को इस प्रकार खिन्न विपन्न रखे रहता है। उसकी इच्छा आकांक्षाओं में से अधिकांश को मृग तृष्णा ही बनाये रहता है। जिसे भी देखा जाय, असन्तुष्ट उद्विग्न पाया जाता है।
इतना ही नहीं उसे अभिशाप भी घेरे रहते हैं जो अन्यान्य प्राणियों में से किसी को भी हैरान नहीं करते पर मनुष्य पर ही उनका आक्रमण होता है। दुर्बलता, रुग्णता, चिन्ता, अतृप्ति, अशांति, आशंका से ग्रसित पशु पक्षियों के समुदाय में कदाचित ही कोई कहीं मिलेंगे सभी हंसते हुए उठते, चैन की सास लेते और लम्बी चादर तानकर सोते हैं। फिर मनुष्य पर ही क्या ऐसी आफत टूटती है जिसके कारण न वह स्वयं चैन से रह पाता है और न जिनके साथ रहता है उन्हें चैन से रहने देता है।
दरिद्रता की शिकायत किसी प्राणी को नहीं, निर्वाह के उपयुक्त साधन सामग्री उन्हें अपने चारों ओर पर्याप्त मात्रा में पड़ी दीखती है। साथियों से बैर विद्वेष की उन्हें कोई शिकायत नहीं। सभी हिलमिल कर रहते हैं। मृगों से लेकर हाथियों तक- गौरैया से लेकर हंसों तक- चींटी से लेकर मधु-मक्खी तक सभी को मण्डली बनाकर सहयोगपूर्वक रहते देखते हैं। अपवाद तो कभी-कभी कहीं-कहीं ही दीखते हैं। जब सर्वत्र सन्तोष और शांति का वातावरण है। भगवान का अनुदान सभी पर बरसा हो तो अकेला मनुष्य ही क्यों ऐसा अभागा रह गया जिसे उतना समुन्नत शरीर- इतना सुविकसित मस्तिष्क इतना समृद्ध वातावरण उपलब्ध होते हुए भी चैन का नाम नहीं, सन्तोष दुर्लभ और हर समय खीजते-कलपते रहने की मनःस्थिति।
अवश्य ही यहां कोई ऐसा गतिरोध अड़ गया है जिससे आनन्द लुटने और प्रगति के उच्च शिखर तक चढ़ दौड़ने की समस्त सम्भावनाओं को ही कुँठित करके रख दिया। मनुष्य के सामने महती समस्या यही है यदि इसका समाधान बन पड़े तो समझना चाहिए दुर्भाग्य से छुटकारा मिला और सौभाग्य अनायास ही आकाश से टूट पड़ा।
यह व्यक्तिगत जीवन की चर्चा हुई। इससे एक कदम आगे बढ़ते ही परिवार सामने आता है। परिवार के बीच सभी को आनन्द मनाने का अवसर मिलता है। पक्षी अपने घोसलों में अण्डे बच्चों समेत मोद मनाते हैं। मुर्गी अपने परिवार को साथ लिए फिरती है। चींटी अपनी सन्तान को लिये लिये फिरती है। बिल्ली से लेकर कुतिया तक के बच्चे अपनी माताओं की पीठ पर चढ़े मोद मनाते हैं। माता जिस भी परिस्थिति में है उन्हें दुलार से नहा देती है। बालकों को भी कोई शिकायत नहीं। एक मनुष्य है जिसके घर में स्वार्थों की खींचतान आरम्भ से लेकर अन्त तक चलती रहती है। सभी अपनी-अपनी गोद हरी करना चाहते हैं। बाहर से देखने में भेड़ों के बड़े सरायों, जेलखानों, मुसाफिर खानों की तरह एक घर में रहते अवश्य हैं और लोकाचार भी किसी कदर पालते हैं पर जिस साधन आत्मीयता के लिए प्राणी तरसता और घर परिवार बसाता है उसका कहीं नाम निशान नहीं दीखता। बुढ़ापे का सहारा किसी को मानना इन दिनों शेख चिल्ली के सपनों से कम नहीं रह गया है। पिण्ड मिलने, वंश चलने जैसी मूढ मान्यताओं को उपहासास्पद ठहराया जा सकता है पर बनता इतना तक नहीं कि उन्हें स्वावलम्बी सुसंस्कारी बन सकने तक का अनिवार्य उद्देश्य सध सके।
अनीति उपार्जन और निष्ठुर अपव्यय करने वाली सन्तान का बखान करना निरर्थक डींगे हांकने के समान है। इससे दूसरों पर रौब जमाया जा सकता है। आत्मा को, परमात्मा को, विश्वात्मा को यह सन्तोष नहीं दिलाया जा सकता कि जिनके लिए जीवन रस निचोड़ दिया उनका स्तर मानवी गरिमा के उपयुक्त बन सका या नहीं।
चन्दन अपने समीपवर्तिय पौधों को सुगन्धित बना देता है, माली का उद्यान फल-फूलों से लदा दीखता है किसान जिन खेतों में मेहनत करता है उसके बदले में अनाज के कोठे भर लेता है, गड़रिया जिन्हें पालता है उनकी संख्या और स्थिति बढ़ाता है। दूध, ऊन और बच्चों के सहारे अपने श्रम का प्रतिफल पाता है। यह बात देखने योग्य है कि परिवार पालने वाले इतना अधिक त्याग और श्रम करने के उपरान्त भी अनीति संचय उड़ेलते रहने पर भी आखिर पाते क्या हैं? उनके उस खेत से क्या फसल उगी और उससे किसका हित सधा यह विचारने ही योग्य है। इस तथ्य पर आरम्भ से अन्त तक विचार किया जाना चाहिए कि मनुष्य अपने लिए- परिवार के लिए- करता तो बहुत कुछ है, पर दोनों ही क्षेत्रों में उसे घोर असफलता हाथ लगती है। आखिर इस श्रम की निरर्थकता का कोई तो कारण होना ही चाहिए।
कोई अहंकारी दूसरों पर रोब गाठने की प्रवंचना कुछ भी कर सकता है। पर वास्तविकता की कसौटी पर हर व्यक्ति बुरी तरह असफलता ग्रस्त और जीवन की लाश ढोता पाया जायगा। बढ़िया कपड़े आभूषण शृंगार साधन दूसरे पर सौंदर्य और वैभव की छाप डालने में सफल हुए या नहीं, यह दर्शकों की आंखों में घुसकर ही देखना पड़ता है। अपनी दुर्बलता और अस्वस्थता तो उस हालत में भी पीछा छोड़ने वाली नहीं है। उसकी कसक तो मर्माहित करती ही रहेगी। धन वैभव का चमत्कार दिखाने के वाहन, बँगला, मोटर और गृह सज्जा से कितना प्रयोजन सधा, कह नहीं सकते। कितने रौब में आये, कितनों ने सराहना की, कुछ निश्चय नहीं। मन के लड्डू फोड़ते रहने पर भी हो सकता है कि इस प्रदर्शन से दूसरों को ईर्ष्या उभरी हो, सकता है अनीति उपार्जन और उद्धत अपव्यय का असंख्यों ने दोषारोपण किया हो और नीचा दिखाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का ईर्ष्यालु षडयन्त्र बनाया है। सफलताओं का, बड़प्पन का, वैभव का ढिंढोरा पीटने के लिए धन की होली जलाना एक बात है और जिस सम्मान की प्यास के लिए यह महंगा जंजाल संजोया ढोया गया था उसमें वस्तुतः कितनी सफलता मिली उसे खोज निकालना सर्वथा दूसरी बात है।
ऐसे लोग कम नहीं जो शादियों में हजारों लाखों की संपत्ति फुलझड़ी की तरह देखते-देखते धुंआ उड़ा देते हैं। ऐसों की कमी नहीं जो तीर्थयात्रा, ब्रह्मभोज और देव पूजन और चींटी के बिलों पर आटा डालते और अपने को पुण्यात्मा सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। कौन जाने उन्हें उसमें कितनी सफलता मिली होगी। जिन पण्डों से जेबकटी वे उस ‘धर्म धुरीण’ यजमान को काठ का उल्लू से अधिक और कुछ समझ रहे होंगे या नहीं। जिन चींटियों के बिलों पर आटा डाला गया था उन्हें दूसरे ही क्षण कुत्ता उदरस्थ कर दिया होगा तो वे बेचारी क्या कहती होंगी? उन्हें पुण्य प्रदर्शन के ढिढोर नियों को शादी में दौलत उड़ाने वालों का ससुर और जमाता भविष्य में इन धन कुबेरों से और भी न जाने कितना पाने की आशा लगाने लगे होंगे और न मिलने पर उस वधू को मार कर दूसरी शादी करने पर इतना ही धन और कमाने की योजना बना रहे होंगे।
मनुष्य की बुद्धिमानी में कोई शक नहीं, पर उसकी मूर्खता भी ऐसी है जिस पर हंसते-हंसते लोट पोट हो जाने या आंखों से आँसू बहाते हुए हिचकी भर कर फूट पड़ने को मन करता है। बुद्धिमानी और मूर्खता का इतना विचित्र संयोग देख कर कभी तो उसके सृजेता से लड़ पड़ने को जी करता है और कभी मन आता है कि इन विडम्बनाओं, विपन्नताओं में बेतरह उलझे हुए अभागों को छाती से चिपटा कर फफक-फफक कर रो लिया जाय। उसका न सही अपना तो मन हलका कर ही लिया जाय। वस्तुतः दुर्गतिजन्य दुर्गति का ऐसा अभिशाप जैसा मनुष्य के हिस्से में आया, कदाचित ही सृष्टा की इस सृष्टि में अन्य किसी को संत्रस्त कर रहा हो।
आखिर यह सब है क्या? मनुष्य जीवन सृष्टा का सर्वोपरि उपहार है। उसे भव-बन्धनों से मुक्त होने, आत्म कल्याण के चरम लक्ष्य तक जा पहुँचे, सदुपयोग कर सकने पर और भी ऊँची पदोन्नति पाकर ऋषि, देवता, अवतार बनने जैसी अगणित सम्भावनाओं से भरा-पूरा यह उपहार क्या इसलिए था कि उसे अभिशाप की तरह वहन करना पड़े। सृष्टा ने अपेक्षा रखी है कि उसका राजकुमार हाथ बंटायेगा और उससे विवेक उद्यान को अधिक सुरम्य बनाने में सहयोग देगा। पर यह क्यों, वह तो स्वयं ही ऐसे दलदल में फँस गया है। जिससे उबरने से उसका अपना पुरुषार्थ काम नहीं दे रहा। जिस-तिस के सामने पल्ला पसरता, गिड़गिड़ाता, नाक रगड़ता देखा जाता है। देवी-देवताओं, मन्त्र-तंत्रों, पूजा-पाठन और सिद्ध पुरुषों के लिए इर्द-गिर्द मंडराने का उसका मात्र एक ही प्रयोजन है कि उसकी ऊपर लदी हुई विपत्तियों से किसी कदर छुटकारा दिलाने में उनका वरदान काम आये? यह ठीक है कि डूबता तिनके का सहारा चाहता है। पर पूछने लायक बात यह भी तो है कि बैठे ठाले उसे डूबने की आवश्यकता ही क्यों पड़ गई, जिसके लिए तिनकों की मनुहार करनी पड़े।
अपने पुरुषार्थ से सभी काम चलाते हैं। फिर मनुष्य के छह इंच वाले पेट को छह फुट वाली भुजाएँ क्यों कम पड़ीं? इतना विकसित मस्तिष्क होते हुए भी गुजारे में इतनी बाधा क्यों पड़ी जिसको अनीति पर उतारू होना पड़ा। अपराधी कृत्यों पर कमर बाँधनी पड़ी। षडयन्त्र कुचक्र, छद्मों का सहारा लेना पड़ा। निष्ठुरता और निर्दयता की नीति अपनाकर असंख्यों की आत्मा से चीत्कार उगलवा लेने की आवश्यकता पड़ी। आखिर इतना दरिद्र कहां से आया? आखिर इतनी बड़ी आवश्यकता क्या पड़ गई जिसके लिए ऐसा हेय आचरण अपनाना पड़ा जैसा कि हिंस्र पशु भी नहीं अपनाते। पेट खाली हो तो ही सिंह आक्रमण करता है। वह भरा हो तो समीप में ही अन्य पशु निर्भयतापूर्वक विचरते रहते हैं। छेड़खानी तक का प्रसंग नहीं आता। फिर मनुष्य का ही क्या हुआ जो गुजारे की सभी आवश्यकताएं उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अपराधों की बात सोचता है। साहस आक्रमण करते हैं कायर छल के जाल बिछाते हैं। दोनों की दिशाधारा एक ही है। न जाने मनुष्य हिंस्र पशुओं से भी गई-गुजरी हेय परिस्थिति में फंसता चला जा रहा है। न जाने कौन-सी विपत्ति उस पर टूट पड़ी है जिससे इतना निकृष्ट स्तर अपनाये बिना और बदले में देखने वाली आत्म प्रताड़ना सहे बिना काम ही नहीं चलता।
असफलताओं और असमंजसों से घिरा, विडंबनाओं से उलझा, समय और संकटों से जकड़ा- दलदल में पैर से सिर तक धंसा- यह कैसा जीवन जिसमें न सन्तोष, न चैन, न उत्साह, न आशा, न भविष्य। निश्चय ही कहीं कोई बड़ी भूल हो गई है। लगता है वह है ऐसी जो मूर्खता होते हुए भी बुद्धिमता दीखती है। विष तुल्य होते हुए भी अमृत जैसी मीठी लगती है। समझने में आती नहीं, न छूटती है, न हटती है, न उसे छोड़ने की इच्छा ही होती है। सम्भवतः इसी को मोह मयी मदिरा और माया की मृग तृष्णा कहा गया है। सम्भवत यही भ्रमग्रस्तता है जिसके लिए कस्तूरी के हिरन भटकते रहते हैं। यही वह मृग तृष्णा है जो प्यासे मृगों की ललचाती और दौड़ाती थकाती बेमौत मारती है।
चासनी पर बेहिसाब टूट पड़ने वाली मक्खी अपने पंख फंसाती और प्राण गंवाती है। आटे को गोली के प्रलोभन में मछली और जाल के दानों पर टूट पड़ने वाली चिड़िया की अदूरदर्शिता हर किसी को अखरती है, पर उस व्यामोह को क्या कहा जाय? जो दुर्गति के सहारे दुर्गति कराने वाले अभिशाप के रूप में जन-जन के ऊपर लदा पड़ा है। इस सुयोग का जो लाभ मिलना चाहिए उनमें से तो एक भी मिल नहीं पाता, उलटा ऐसे संकटों का दुर्भाग्य सहना पड़ता है जितना कदाचित ही इस सृष्टि के अन्य किसी प्राणी के ऊपर लदता हो। अन्य प्राणी अपने संचित भोग कर निवृत्त हो जाते हैं किन्तु मनुष्य है जो त्राण पाने की अपेक्षा जन्म-जन्मान्तरों तक भुगते जाने वाले पाप कर्मों का पोटला बोझिल करता चला जाता है।
बुद्धिमान इस मूर्खता का कीकारण प्राचीन काल में ‘माया’ के नाम से जाना और कहा जाता रहा है और उससे विरत होने वाले को लोक-परलोक से असीम आनंद मिलने का प्रतिपादन अपने ढंग से किया जाता रहा है। अब परिभाषाएँ बदल गई हैं। ‘माया’ शब्द का उपयोग किये बिना भी कहा जा सकता है। उसमें दृष्टिकोण में समाविष्ट भ्रान्ति व्यवहार अव्यवस्था और निर्धारण में अदूरदर्शिता का समावेश कहा जाय तो भी हर्ज नहीं। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने वाले सिद्धांतों, आदर्शों और विधानों के तथा आज के प्रचलनों के बीच जमीन आसमान जैसी खाई बन गई है। पहले यह अन्तर कम था। तब मनुष्य उतना ही प्रसन्न और सन्तुष्ट था। आज परिस्थितियों में जटिलता आ गई है। उसके अनुरूप दृष्टिकोण की अपेक्षाकृत अधिक उदात्त और परिमार्जित होना चाहिए था। इसके स्थान पर हुआ ठीक उलटा है। समाज में सम्पन्नता अर्जित करने और उसे उद्धत प्रयोजनों में उड़ाने की प्रथा चल पड़ी है। इसके निमित्त मनुष्य को अधिक संकीर्ण, निष्ठुर, अनैतिक एवं आक्रामक बनना पड़ा है। संक्षेप में रहा है आज का प्रचलन।
यदि सामयिक समस्याओं का तात्कालिक हल निकालना ही अभीष्ट हो तो उसी प्रचलित नीति को अपनाये रहा जा सकता है जिससे मच्छरों, मक्खियों को पकड़ने और चेचक की हर फुँसी पर अलग-अलग मरहम पट्टी करने की विडम्बना प्रचलित है। यदि अत्यन्तिक और चिरस्थायी समाधान खोजना हो तो उसका उपाय एक ही है कि दृष्टिकोण, व्यवहार, स्वभाव एवं निर्धारण का पुनर्निरीक्षण किया जाय। नाली साफ करके सड़ी कीचड़ बुहार देने से ही मक्खी मच्छरों दुर्गन्ध कृमियों से छुटकारा मिलेगा। रक्त शोधन के उपचार से ही फुंसियों से पीछा छूटेगा। मनुष्य का आज का चिन्तन और स्वभाव ही गड़बड़ा गया और उसे भटकाव ने ग्रस्त लिया है कि सुखी सन्तुष्ट एवं समुन्नत जीवनयापन के लिए क्या सोचना और क्या करना चाहिए। प्रचलित ढर्रे ने किस प्रकार, कितना, क्या हेर-फेर करना चाहिए। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि जन-जन के सम्मुख उपस्थित समस्याओं और विभीषिकाओं में से अधिकाँश का- अधिकांश समाधान मिल गया है और संकटों का घटाटोप अनुकूल हवा बहते ही उड़ गया।
अध्यात्म विज्ञान व्यक्ति के विकास के समुन्नत जीवन के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सुविधा साधन अर्जित करने के लिए भौतिक विज्ञान। सुविधा सामग्री श्रम और साधनों के सहारे उपलब्ध होती है। व्यक्तियों और परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा सकने में समर्थ व्यक्तित्व का निर्माण अध्यात्म विज्ञान के सुनिश्चित फार्मूलों के आधार पर ही सम्भव होता है। परिष्कृत व्यक्तित्व ही अपनी सुव्यवस्था बना सकता है और उसी के लिए यह संभव है कि स्वास्थ, सन्तुलन, सम्मान, वैभव, प्रभाव को सन्तोषजनक मात्रा में अर्जित कर सके। ऐसे व्यक्ति ही अपने संपर्क क्षेत्र को सुव्यवस्थित रख पाते हैं और उन्हीं के लिए सम्बन्धियों को सुसंस्कारिता प्रदान कर सकना सम्भव होता है। परिवार पोषण एक बात है और परिवार निर्माण दूसरी। इसके लिए जिन साधनों और परिस्थितियों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, उनकी सम्भावना तो सुनिश्चित नहीं, पर इतना हो सकता है कि जैसे भी साधन उपलब्ध हैं उन्हीं के साथ उच्चस्तरीय दृष्टिकोण का समन्वय करके ऐसा सन्तुलन बनाया जाय जिसमें डडडडडडड फूट पड़े- उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना उमड़ पड़े।
पदार्थ विज्ञान प्रत्यक्ष है। उसके सहारे अभीष्ट प्रतिफल हाथोंहाथ पाया कमाया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार अध्यात्म विज्ञान भी ऐसा सुनिश्चित विधान है जिसके आधार पर अपने दृष्टिकोण, व्यवहार, स्वभाव निर्धारण को परिष्कृत किया जाता है। प्रस्तुत ढर्रे को दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर पर्यवेक्षण कर सकना बन पड़े और जो उचित है उसी को अपनाने- अभ्यास में उतारने का साहस उग सके तो समझना चाहिए कि समस्याओं का कुहारा छंट गया। तमिस्रा ही डरावनी होती है। उसी में ठोकरें लगने का भय रहता है। निशाचर की दाल भी उसी आवरण के पीछे गलती है। आलस्य भी उन्हीं घड़ियों में चढ़ता है और नींद की गोद में भी उसी माहौल में सब लोग चले जाते हैं। उत्पादन होता नहीं न कुछ सूझता है न बन पड़ता है। सभी लोग बिस्तरों में मुंह छिपाये पड़े होते हैं और खरीद करते दीखते हैं। यह दुर्गति तमिस्राजन्य है। इसे हटाने के लिए जन-जन को झकझोरने और दरवाजे दरवाजे को खटखटाने का प्रयोजन पूरा कर सकना कठिन है। प्रकाश उगने से ही यह सारी समस्याएँ हल होती हैं।
अध्यात्म वह प्रकाश है जिसे अपनाने पर मनुष्य को प्रचलित ढर्रे के दलदल से उबरने की आवश्यकता प्रतीत होती है। साथ ही उन भ्रांतियों, आदतों को बदलने की इच्छा होती है जो वस्तुतः इस सारी विपत्ति की जन्मदात्री है। जिसमें आज जन-जन को फँसा पाया जा सकता है। विपत्तियों कहीं से उतरती नहीं हैं, समस्याएँ ऊपर से टूटती नहीं हैं। वे मनुष्य की अपनी बोई उगाई या न्यौति बुलाई हुई होती है। जाला मकड़ी बुनती है और उसमें स्वयं उलझकर विलाप करती और बेमौत मरती है। जब उसे यथार्थता का बोध होता है तो ढर्रा बदलती है। नये सिरे से सोचती और नई रीति-नीति अपनाती है। इतने मात्र से सारा माहौल बदल जाता है। जाले को वह उसी मुंह से समेटती निगलती चली जाती है जिसके माध्यम से कि उसे निकाला और फैलाया गया था। जाले का कच्चा मसाला मकड़ी के पेट से निकलता है और फिर ढर्रा बदलते ही उसी पेट में चला जाता है जिसमें से कि वह निसृत हुआ था। मनुष्य भी एक प्रकार की मकड़ी है। अपने दृष्टिकोण में अवांछनीयताओं का समावेश करके उन संकटों का सृजन करता है। जिनने उन्हें बेतरह खिन्न, विपन्न कर रखा है और तोड़-मरोड़कर रख दिया है।
परित्राण पाने के लिए दूसरों की और तकना व्यर्थ है। हम मुंह से भोजन करते और पेट से पचाते हैं। नित्य ही नहाते, मल-मूत्र त्यागते, सोते, पढ़ते, व्यवसायरत होते और बच्चे जनते हैं। यह कार्य औरों से नहीं कराये जा सके। अपना उद्धार आप करने का गीता परामर्श, नितान्त सही सार्थक है। यदि कोई आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म परिष्कार के लिए सच्चे मन से सहमत हो, उसकी आवश्यकता अनुभव करे और उस परिवर्तन के लिए साहस संजोये तो कोई कारण नहीं कि भौतिक विज्ञान की तरह ही आत्म विज्ञान के चमत्कार भी हाथोंहाथ न देखे जा सकें। खोया स्वास्थ्य वापस लौटाने की, उद्विग्न मनःक्षेत्र में उल्लास भरने की, अर्थ संकट से उबरने की, शत्रुता को मित्रता में बदलने की और निराशा के वातावरण में- उज्ज्वल भविष्य की आशा किरणें देखने की पूरी-पूरी गुंजाइश है। जहाँ इतना आत्म परिशोधन, आत्म परिष्कार का क्रम चलेगा वहाँ यह भी बने बिना रहेगा नहीं कि जिस परिवार में सर्वत्र कुसंस्कारिता, आपाधापी, खींचतान अशिष्टता और असहकारिता भरी दीखती है उसमें आमूल चूल परिवर्तन के दृश्य न दीखने लगें।
स्मरण रखने योग्य तथ्य एक ही है कि अध्यात्म जादूगरी नहीं है। उसके द्वारा किसी देवी देवता का अनुदान सिद्ध पुरुष का वरदान या मन्त्र-तन्त्र का चमत्कार बरसने की दुराशा में जहाँ-तहाँ नहीं भटकते फिरना चाहिए। यह विशुद्ध आत्म निर्माण की विद्या है। इसके कुछ सिद्धांत और निर्धारण हैं। जो उन्हें अपनाते हैं वे उबरते हैं और अपने साथ-साथ संबंधियों समेत समूचे समाज समुदाय को उबारते हैं।
यही है वह आत्म विज्ञान जिसकी प्रत्यक्ष परिणति का रसास्वादन कराने के लिए शान्ति कुँज को एक समर्थ विद्यालय के गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित किया गया है। त्रिवेणी स्नान का प्रतिफल रामायण में “काक पिक बकहु मराला।” का आलंकारिक उल्लेख किया गया। त्रिपदा गायत्री की तीन धाराएं समझदारी, जिम्मेदारी, ईमानदारी के रूप में किस प्रकार जीवन चर्या में समाविष्ट की जा सकती है इसी की अनुभूत प्रशिक्षण कल्प साधना सत्रों में कराया जाता है। इस कल्प वृक्ष उद्यान में जो प्रवेश करते हैं उन्हें इस अध्यात्म विज्ञान की जानकारी, प्रेरणा एवं विद्या हस्तगत होती है जिसके आधार पर शेष जीवन को सुखी, समृद्ध, सम्मानित, सुसंस्कारी और आदर्श अनुकरणीय स्तर का बनाया जा सके।
व्यक्ति की अपनी समस्यायें हैं और समाज की अपनी। स्वास्थ्य, सन्तुलन, वैभव, ज्ञान, प्रभाव कौशल आदि निजी जीवन की सफलताएँ हैं। इसी के साथ पारिवारिक सौमनस्य भी सम्मिलित है। व्यक्तिगत जीवन आमतौर से इतनी ही परिधि में परिभ्रमण करता रहता है पर वस्तुतः वह उतना सीमित है नहीं। विकास क्रम में एक कदम आगे बढ़ाते ही उसे शरीर और परिवार से- पेट और प्रजनन से- आगे की भी बहुत सी बातें दीख पड़ती हैं और लगती है उसे कूप मंडूक की तरह- गूलर के भुनगों की तरह- पिंजड़े के पक्षी की तरह सीमाबद्ध होकर रहना अशोभनीय है
उसकी सत्ता एवं गरिमा व्यापक है। व्यापकता के साथ ही उसका सम्बन्ध जुड़ना चाहिए। संकीर्णता को ही भव बंधन कहा गया है। विशालता के क्षेत्र में प्रवेश करने का नाम ही जीवन मुक्ति है। मोक्ष, जीवन लक्ष, पूर्णता, आत्म-दर्शन, ईश्वर प्राप्ति आदि नामों से इसी स्तर की- स्थिति की- व्याख्या विवेचना की जाती है। कथा प्रसंगों में जिस-तिस प्रकार से इसी अवलम्बन को अपनाने की प्रेरणा दी जाती है।
वैसे इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए राजयोग, हठ योग, प्राणयोग, लययोग, कुण्डलिनीयोग की अनेकों साधनाएँ भी की जाती हैं। किन्तु स्मरण रखने योग बात एक ही है उन सभी फसलों का उगना और फलना-फूलना तभी संभव है जब खाद पानी वाली उपयुक्त भूमि पर उन्हें बोया जाय। यह मनुष्य का चिन्तन और चरित्र ही है जिसे महानता सम्पन्न व्यक्तित्व कहते हैं। यदि उसकी उपेक्षा की जाय और मात्र क्रिया-कृत्यों के साथ दिव्य विभूतियों, सिद्धियों को अर्जित करने की बात सोची जाय तो यह उपहासास्पद होगा। मात्र कृत्यों के आधार पर जो चमत्कार दिखाये जाते हैं उन्हें जादूगरी बाजीगरी कहते हैं। अध्यात्म उससे भिन्न है उच्चस्तरीय है। उसमें कहने योग्य सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्तित्व के परिष्कार से बच निकलने का कोई सरल सस्ता मार्ग ढूंढ़ निकालने की गुँजाइश है नहीं। यही कारण है कि आमतौर से आध्यात्मिक साधनाएँ या चर्चा करने वाले निराश देखे जाते हैं। उनकी वह निष्ठा भी चली जाती है जो आरम्भ करने से पूर्व थी।
स्वाध्याय सत्संग से लेकर पूजा-अर्चा तक के विभिन्न उपचारों का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को वस्तुतः ऊँचाई की ओर उछाल देना है। कामना से भावना के- क्षुद्रता से महानता के- बन्धन से मोक्ष के- नरक से स्वर्ग के- क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए एक ही राजमार्ग है कि मनुष्य स्वार्थ को परमार्थ में बदले। महानता इसी को कहते हैं। इसी में मानव जीवन की समग्र गरिमा केंद्रीभूत है। इस स्तर को अपनाने वाला ही यह गर्व गौरव अनुभव कर सकता है कि उसे मनुष्य जन्म का जो अनुपम अनुदान सृष्टा ने बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाते हुए प्रदान किया था, उसे सार्थक कर दिखाया। नर-वानरों की तरह- नर पासदों की तरह पेट प्रजनन के लिए जीने वाले कृमि कीटकों जैसा जीवन गुजार देना, किसी विवेकशील के लिए लज्जा की बात है। इन पाषाण हृदयों को क्या कहा जाय जिन्हें अपने चारों ओर के चीत्कार ही सुनाई नहीं पड़ते।
बात यहाँ पत्थरों की नहीं मनुष्य की हो रही है। उन मनुष्यों की जिनकी छाती में हृदय धड़कता है। जिनमें भावना, सम्वेदना, करुणा नाम के तत्व किसी न किसी अंश में जीवित हैं। जिनमें ममता, आत्मीयता, शालीनता, स्नेह सौजन्य के रूप में मानवी गरिमा की झाँकती दृष्टिगोचर होती है। ऐसे लोगों को यह मानकर चलना होगा कि यह विराट विश्व ही ईश्वर की साकार प्रतिमा है और उसकी पूजा-चर्चा के लिए उन्हें अपने श्रम स्वेद का गंगाजल समर्पित करना है। अपने समय और चिन्तन के एक अंश श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत करते रहना है। अपनी कमाई को अपने ही उदर में ठूंसते नहीं रहना है वरन् जो मिलता है उसे मिल-बाँटकर खाना है।
जागृत आत्मा शब्द यहाँ मात्र ऐसे ही लोगों के लिए किया जा रहा है। युग प्रहरी, सृजन शिल्पी प्रज्ञा परिजन जैसे शब्द भी ऐसे ही भावनाशीलों के लिए इन पंक्तियों में प्रयुक्त किये जाते रहे हैं और कहा जाता रहा है कि इन विनाश विभीषिकाओं से भरे आपत्ति काल में उन्हें हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए। मूक दर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। ऐसे ही लोगों से यह अनुरोध किया जाता रहा है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना में उनका भी कुछ योगदान तो होना ही चाहिए।
युग देवता की याचना को किसी भी भावनाशील ने विमुख नहीं लौटने दिया है। शबरी, गिलहरी, केवट, गिद्ध तक ने उसकी हथेली पर कुछ रखा था। रीछ वानरों, ग्वाल-वालों, बौद्ध परिव्राजकों और सत्याग्रहियों ने जो सम्भव था किया था। हजारी किसान तक के हृदय में परमार्थ की उमंग उठी थी। पिसनहारी तक ने दो पैसे रोज बचाकर कुंआ बनवा दिया था। हमें इतना कृपण नहीं होना चाहिए कि इस विषम बेला में सर्वत्र संव्याप्त त्राहि-त्राहि की घड़ियों में अपने समय का- अर्थ साधनों का- एक छोटा अंश निकालने की युग याचना के प्रति सर्वथा निष्ठुर बना रहे। अब हमें एक दो कदम परमार्थ क्षेत्र में भी धरने चाहिए और सोचना चाहिए कि जब मरणासन्न वर्षा भगवान की हथेली पर अपने स्वर्ण मंडित दांत उखाड़कर रख सकते हैं। सुदामा अपना पेट काटकर छोटी पोटली में बँधे चावल अपने प्रिय सखा की हथेली पर रख सकते हैं तो हमीं क्यों ऐसे निष्ठुर रहे कि लेने के लिए दुनिया भर की आल्ही गावें और देने के समय ठेंगा दिखायें।
यदि किसी के मन में इस ऐतिहासिक बेला में परमार्थ वृति की दबी चिनगारी चमके तो उसे मात्र एक ही बात सोचनी चाहिए इन दिनों संव्याप्त आस्था संकट के निवारण में कुछ पुरुषार्थ भी किया जाय। लोक-मानस के परिष्कार प्रयास में कुछ योगदान किया जाय। आज न धन की कमी है न साधनों की, न शिक्षा की कमी है न कला की, न शास्त्रों की, न चतुरों की। कमी एक ही पड़ रही है कि आदर्शों को जीवन में उतारने वाले- ऐसे मनुष्य ढूंढ़े नहीं मिलते जिन्हें देवता न सही कम से कम मनुष्य तो कहा जा सके। वंश के ब्राह्मणो और वेष के साधु बरसाती मेंढकों की तरह दिन दूने रात चौगुने बढ़ते जा रहे हैं। न मंदिरों की कमी है न कथा कीर्तनों की। अभाव उन देव मानवों का होता जा रहा है, जो उदात्त भावनाशील एवं आदर्शवादी कहा जा सके। ऐसे ही लोग अपना पराक्रम, कौशल और साधनों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगा सकते हैं। उन्हीं के संपर्क, सान्निध्य, प्रभाव और अनुकरण से महामानवों की पीड़ी उपजती है। कहना न होगा कि इस संसार का सच्चा सौभाग्य ऐसे ही सद्भाव संपन्नों पर अवलम्बित है जो चन्दन तरु का, स्वाति बूंद का, पारस पत्थर का, कल्प वृक्ष का जीवन्त उदाहरण बने। जलते दीपक से बुझे दीपक जलते हैं। जलती आग की निकटता से गीले उपले ज्वलन्त अंगारे बनते हैं।
किसी देश, धर्म, समाज, वंश या समय का सौभाग्य एक ही है कि उसमें महामानव जन्में। जीवन्त वैभव वे ही होते हैं। कल-कारखाने, अस्त्र-शस्त्र, साधन वैभव, विद्वान कलाकार वास्तविक सम्पदा नहीं है। यह धुंए की तरह उठते और बबूले की तरह बैठते देखे जाते हैं। कोई समय या समाज महामानवों के आधार पर कृत-कृत्य होता है। गाँधी युग में प्रायः दो दर्जन महामानव उस धरती पर उगे थे, उनसे गये गुजरे जमाने में बलिदानियों की सेना खड़ी करदी, अंग्रेजों की जड़ हिला दी और संसार भर की भारती पुत्रों के चमत्कार से दांतों तले उंगली दबाने के लिए विवश कर दिया। भारतीय इतिहास की गरिमा उसके ऋषि कल्प, आदर्शवादी, मृत्यु से खिलवाड़ करने वाले महामानवों की बहुलता पर अवलम्बित है। उनका अभाव रहा होता तो पर्वत जितने ग्रन्थ और आकाश चूमने वाले देवालय भी देश की गौरव गरिमा की राई-रत्ती बढ़ा सकने में समर्थ नहीं रहे होते। प्रशंसा न कुबेर जैसे संपन्नों की है न इन्द्र जैसे बलिष्ठों की। गरिमा तो भागीरथों की- दधीचियों की- बुद्धों की- गांधियों की है वे जहाँ भी, जब भी जन्मने वहीं का वातावरण नन्दन बन जैसा दिव्य और स्वर्ग जैसा चित्र बनाकर रख देगा।
हमारा ध्यान इस तथ्य पर केन्द्रीभूत होना चाहिए कि समय की महती समस्याओं के समाधान में जिस विभूति उपलब्धि की आवश्यकता है वह एक ही है- महामानवों की भावी पीढ़ी। पुराने बुझ चुके या बुझ रहे हैं। जो जीवित हैं उनके अस्त होने की बेला निकट है। जिन्हें अगली जिम्मेदारियां सम्भालनी हैं वे नई पीढ़ी के लोग हैं। अगले दिन घोर संघर्ष के हैं। उनमें अवांछनीयताओं से जूझना है और सत्प्रवृत्तियों के उद्यान लगाना है। यह दुहरा बोझ है, दुहरा पराक्रम। समय इतना कम और संकट इतना सघन कि एक-एक क्षण उसी में खपाना होगा वैभव भी बढ़ता रहे, विलास भी चलता रहे, अहंकारी प्रदर्शन भी जैसे का तैसा बना रहे, साथ ही युग धर्म के निर्वाह कर सकने वाले महामानवों की पंक्ति में भी खड़े रहने का अवसर मिलता रहे। यह विसंगतियां एक साथ निभ नहीं सकेंगी। “हँसहु ठिठाहि फुलावहु गालू” के दो प्रतिपक्षी काम एक साथ कैसे बनें। अमीरी और महानता में से इन दिनों एक ही चयन करना होगा। दो नावों पर सवारी गांठना कम से कम इस विषम बेला में तो बन ही नहीं पड़ेगा।
महानता के अर्जन उपार्जन प्रयास में किसी को, किसी प्रकार का कभी घाटा नहीं हुआ। यह अपडर सर्वथा अज्ञान मूलक है कि परमार्थ परायणों को घाटा सहना पड़ता है और स्वार्थी अनाचारी नफे में रहते हैं। घाटे में महानता नहीं वह मूर्खता रहती है जो महानता की आड में अपनी चमड़ी बनाती रहती है और उचित मूल्य देने से कतराती है। सच्चे अर्थों में महानता के मार्ग पर चलने वाला परीक्षा के दिनों तक ही अपनी सच्चाई और गहराई की जांच पड़ताल कराने में थोड़ी ठोंक पीठ कर सकता है। इसके बाद उसका राजमार्ग हर क्षेत्र सफलता ही प्रदान करता चला जाता है। ऐसे प्रमाणों से इतिहास पुराणों के कलेवर भरे पड़े हैं। आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो सच्चे अर्थों में महान बने अन्त तक दृढ़ रहे और पराक्रम से पीछे नहीं हटे।
विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, अंगद को कोई घाटा नहीं पड़ा, भीम अर्जुन अपने बलबूते नहीं श्रेष्ठता का अवलंबन पकड़कर पार हुए। सुदामा ने क्या खोया? तुलसी, सूर, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, नानक, कबीर आदि यदि परमार्थ पथ पर न चलते, अपने पूर्वजों के धंधे अपनाये रहते। अन्यान्य चतुर लोगों की तरह पेट और प्रजनन भर में उलझे रहते तो नफा नुकसान का लेखा जोखा लेते समय लाभ में रहने वाले नहीं हानि उठाने वाले ही कहे जाते। शंकराचार्य यदि परमार्थ क्षेत्र में न उतरते, विवेकानन्द ने लोक मंगल के क्षेत्र में प्रवेश न किया होगा। चाणक्य, चरक, व्यास, वशिष्ठ, आर्य भट्ट, नागार्जुन , विश्वकर्मा जैसे परमार्थ परायण यदि चतुरता ही बरतते रहते और अपनी क्षमता को मात्र संकीर्ण स्वार्थपरता में ही खपाते रहते तो निश्चय ही घाटे में रहते। अदूरदर्शी तो बीज बोने वालों को भी मूर्ख कह सकते हैं। उनके लिए तो विद्या पढ़ना, व्यायाम करना, कृषि करना, व्यवसाय में पूंजी लगाना भी बेतुका लग सकता है क्योंकि उन कार्यों में तत्काल तो घाटा ही घाटा है। दूरदर्शिता अपनाने और धैर्यपूर्वक प्रतिफल की प्रतीक्षा करने पर ही यह सिद्ध होता है कि विद्यार्थी, कृषक आदि में से कोई भी मूर्ख नहीं था। एक मक्का बोने पर हजार दाने उत्पन्न होते हैं। एक बाजरा बोने पर जो बालें निकलती हैं, उनमें हजार दाने होते हैं। महानता खरीदने के लिए परमार्थ के पथ पर चलना ऐसा ही है जिसके दूरगामी परिणामों को देखते हुए हर दृष्टि से लाभ ही लाभ है। हानि तो इतनी ही है कि माली को आरम्भ में तो पूंजी मेहनत लगाने और रखवाली के जागरुकता बरतने का झंझट ही उठाना पड़ता है। श्रेय पाने के लिए कुछ तो ठहरना ही पड़ता है। हथेली पर सरसों कहाँ जमती है?
भगवान ने मनुष्य के अन्तराल में बहुत कुछ रहस्यमय छिपा रखा है। वह इतना अद्भुत, इतना रहस्यमय, इतना चमत्कारी है कि उसे देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाला अनुदान कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इसे जगाया जा सकता है उनका प्रत्यक्ष वरदान ठीक वैसा ही पाया जा सकता है जैसा कि किसी अदृश्य लोक से कोई दिव्य अनुदान बरसा हो। इन्हें व्यवहार की सृष्टा में ऋद्धि-सिद्धियां कहते हैं और तत्वज्ञान की भाषा में स्वर्ग मुक्ति। मानवी अन्तरात्मा में दिव्य विभूतियों के भण्डार भरे पड़े हैं जिनसे अपने को धरती के देवताओं में गिने जाने योग्य बनाया जा सकता है और असंख्यों की विपत्तियां हलकी करने तथा ऊँचा उठाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
युग निर्माण मिशन के सूत्र संचालन अक्सर अपना उदाहरण देते हुए यह बताया करते हैं कि महानता वरण करने का साहस संजोकर उनने गंवाया कुछ नहीं पाया है लागत से हजारों लाखों गुना अधिक। तिहत्तर वर्ष की आयु में युवकों जैसा स्वास्थ्य, उत्साह और मनोबल प्रज्ञावानों जैसी बौद्धिक प्रखरता लाखों व्यक्तियों का स्नेह सम्मान और सहयोग- स्वर्ग जैसी अनुभूति हर समय कराते रहने वाला आत्म सन्तोष- सभी महंगी आवश्यकता को जुटाते रहने वाला अर्थ सन्तुलन- लोकहित के निमित्त किये गये प्रयासों के आधार पर चिरकाल तक विस्मृत न होने वाला यश- दैवी अनुग्रह का अनवरत अनुदान जैसे प्रतिफल ऐसे हैं जिसे उनकी जीवन यात्रा के मार्ग पर मिलने वाले मील के पत्थर कहा जा सकता है। वह दूसरों को क्यों नहीं मिलता? इसका रहस्य समझाते हुए वे अध्यात्म की सुविस्तृत परिभाषा किया करते हैं कि यह दृष्टिकोण, स्वभाव, व्यवहार एवं निर्धारण में आदर्शवादिता का समावेश करने का प्रयास भर है। यदि उसे छोड़ दिया जाय और पूजा पत्री की टण्ट-घण्ट भर से देव दर्शन, या मनोकामना पूर्ति के चमत्कारों का मनोरथ बाँधते रहा जाय तो उतने भर से काम नहीं चलेगा और निराशा का भाजन बनना पड़ेगा।
प्रज्ञा परिजनों में से जिन्हें भी महानता का पथ गरिमामय दीखता है उन्हें खरीदने के लिए साहस जुटाना चाहिए और प्राथमिक प्रयत्न के रूप में आत्म निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म विकास की साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। यह किन परिस्थितियों में- किस मात्रा में, किस प्रकार, क्या करना चाहिए इसी का प्रशिक्षण इन दिनों शांति-कुज के विभिन्न साधना सत्रों में चलता रहता है। यह अपने युग की महती आवश्यकता है कि 450 करोड़ के मनुष्य समुदाय में अधिक न सही 4500 मनुष्य ऐसे निकले जो सच्चे अर्थों में महामानव बनने की ठान ठाने, साध साधें तो काम चल जाय। लाख पीछे एक मनुष्य भी यदि सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बन सके तो समझना चाहिए कि युग समस्याओं के समाधान का पथ प्रशस्त हो गया और जिस व्यवधान के कारण असंख्यों को रोते, कलपते जीवन जीना पड़ता था, उन सभी के परिभ्रमण का सुदिन आ गया।
विसंगत, काल्पनिक और जादुई अध्यात्म की विडंबना ही इन दिनों जहाँ-तहाँ दीख पड़ती है। ऐसा अध्यात्म विज्ञान जिसे अपनाकर मनुष्य उसकी गरिमा स्वयं अनुभव कर सके और दूसरों को करा सके, एक प्रकार से लुप्त प्रायः हो गया प्रतीत होता है। समय आ गया है कि आत्म-शक्ति उभरे- उसके सहारे प्रयोक्ता को हर प्रकार का श्रेय सन्तोष मिले- इस उपलब्धि का उसके क्षेत्रों को ही नहीं समस्त विश्व को लाभ मिले- ऐसे अध्यात्म प्रयोग परीक्षण, अनुभव और अभ्यास अविलम्ब चल पड़े और उसके लिए प्रज्ञा परिजनों का उत्साह अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिखाई पड़े। यह बात हर किसी को कर लेनी चाहिए कि भौतिक विज्ञान के सदुपयोग में जिस प्रकार लाभ ही लाभ उठाया गया है उसी प्रकार उससे ही महत्वपूर्ण आत्म विज्ञान के प्रयोग का घाटा नहीं उठायेंगे वरन् लाभ में ही रहेंगे।
इस प्रयोजन को अधिक व्यावहारिक रूप में समझने और जो अपने उपयुक्त हो ऐसा कुछ प्रयास आरम्भ करने के लिए शान्ति-कुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने और तथ्यों को अधिक अच्छी तरह समझने तथा अनुभव में उतारने का लाभ लेना चाहिए। हर महीने एक-एक मास के- दस-दस दिन के सत्र चलते हैं। अब तो तीर्थयात्रा के निमित्त आने वालों के लिए तीन दिन की सत्रों की व्यवस्था करदी गई है। जो मात्र दर्शन झांकी करने आते हैं उन्हें भी एक घंटे रुकने- कुछ समझने और अपनाने की प्रेरणा मिल जाती है। प्रज्ञा परिजनों की महानता के प्रति अपनी आस्था विकसित करनी चाहिए। समय की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इसी वर्चस्व को उभारना और व्यापक बनाना चाहिए। इस प्रयोजन में जिन्हें उत्सुकता हो उन्हें शान्ति-कुँज की सत्र योजना के साथ अपना संपर्क जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए भले ही वह एक साथ लम्बे समय तक न सही थोड़ा-थोड़ा करके खण्डों-खण्डों में ही क्यों न चलता रहे।
(मंगल विजय)
सबसे अधिक कठिन होता है, अपना ही निर्माण। क्योंकि स्वयं से लड़ते रहना काम नहीं आसान॥
अपने सारे गुण-अवगुण का रहता हमको बोध। करनी होती है प्रतिफल ही निज कलुपों की शोध॥
खुद को ही खुद का देना पड़ता है प्रबल-प्रमाण। सबसे अधिक कठिन होता है, अपना ही निर्माण॥
छुपने और छुपाने जैसी बात न रहती शेष। अपना सब कुछ देखा करती, अन्तः दृष्टि विशेष।
धोखे की टट्टी को इसमें तनिक नहीं स्थान। क्योंकि स्वयं से लड़ते रहना, काम नहीं आसान॥
अपने ऊपर अपने हाथों करनी होती चोट। निर्ममता से ही निकालनी पड़ती अपनी खोट॥
अपने ही दश-मुख को मारे जाते अपने बाण। सबसे अधिक कठिन होता है अपना ही निर्माण॥
किन्तु, व्यक्ति-निर्माण, सभी निर्माण का ओधार॥ क्योंकि व्यक्ति से निमित्त होता है समाज-उत्थान॥
व्यक्ति-व्यक्ति का होकर, होता है समाज, परिवार॥ इसलिये तो आवश्यक है प्रथम व्यक्ति निर्माण॥
आओ! युग निर्माण करें हम इसी तरह प्रारम्भ॥ औरों का निर्माण करेंगे गढ़ निज जीवन स्तम्भ॥
सिन्धु-शोध का बिन्दु-शोध ही तो है बिभल-विधान॥ सबसे अधिक कठिन होता है, अपना निर्माण।
त्याग, तपस्या का जीवन जी, करें स्वयं की शोध॥ करना है तो करें स्वयं के कलुषों पर ही क्रोध॥
हुआ व्यक्ति निर्माण अगर तो होगा युग-निर्माण। किन्तु स्वयं से लड़ते रहना काम नहीं आसान॥
*समाप्त*